Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Sociology Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Sociology Solutions

HBSE 12th Class Sociology Solutions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Sociology Part 1 Indian Society (भारतीय समाज भाग-1)

HBSE 12th Class Sociology Part 2 Social Change and Development in India (भारत में सामाजिक परिवर्तन एवं विकास भाग-2)

HBSE 12th Class Sociology Solutions in English Medium

HBSE 12th Class Sociology Part 1 Indian Society

  • Chapter 1 Introducing Indian Society
  • Chapter 2 The Demographic Structure of the Indian Society
  • Chapter 3 Social Institutions: Continuity and Change
  • Chapter 4 The Market as a Social Institution
  • Chapter 5 Patterns of Social Inequality and Exclusion
  • Chapter 6 The Challenges of Cultural Diversity
  • Chapter 7 Suggestions for Project Work

HBSE 12th Class Sociology Part 2 Social Change and Development in India

  • Chapter 1 Structural Change
  • Chapter 2 Cultural Change
  • Chapter 3 The Story of Indian Democracy
  • Chapter 4 Change and Development in Rural Society
  • Chapter 5 Change and Development in Industrial Society
  • Chapter 6 Globalisation and Social Change
  • Chapter 7 Mass Media and Communications
  • Chapter 8 Social Movements

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions and Answers

HBSE 12th Class Political Science Important Questions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Political Science Important Questions: समकालीन विश्व राजनीति

HBSE 12th Class Political Science Important Questions: समकालीन विश्व राजनीति

HBSE 12th Class Political Science Important Questions in English Medium

HBSE 12th Class Political Science Important Questions: Contemporary World Politics

  • Chapter 1 The Cold War Era Important Questions
  • Chapter 2 The End of Bipolarity Important Questions
  • Chapter 3 US Hegemony in World Politics Important Questions
  • Chapter 4 Alternative Centres of Power Important Questions
  • Chapter 5 Contemporary South Asia Important Questions
  • Chapter 6 International Organisations Important Questions
  • Chapter 7 Security in the Contemporary World Important Questions
  • Chapter 8 Environment and Natural Resources Important Questions
  • Chapter 9 Globalisation Important Questions

HBSE 12th Class Political Science Important Questions: Politics in India since Independence

  • Chapter 1 Challenges of Nation Building Important Questions
  • Chapter 2 Era of One-party Dominance Important Questions
  • Chapter 3 Politics of Planned Development Important Questions
  • Chapter 4 India’s External Relations Important Questions
  • Chapter 5 Challenges to and Restoration of the Congress System Important Questions
  • Chapter 6 The Crisis of Democratic Order Important Questions
  • Chapter 7 Rise of Popular Movements Important Questions
  • Chapter 8 Regional Aspirations Important Questions
  • Chapter 9 Recent Developments in Indian Politics Important Questions

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HBSE 12th Class Political Science Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Political Science Solutions

HBSE 12th Class Political Science Solutions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Political Science Part 1 Contemporary World Politics (समकालीन विश्व राजनीति भाग-1)

HBSE 12th Class Political Science Part 2 Contemporary World Politics (समकालीन विश्व राजनीति भाग-2)

HBSE 12th Class Political Science Solutions in English Medium

HBSE 12th Class Political Science Part 1 Contemporary World Politics

  • Chapter 1 The Cold War Era
  • Chapter 2 The End of Bipolarity
  • Chapter 3 US Hegemony in World Politics
  • Chapter 4 Alternative Centres of Power
  • Chapter 5 Contemporary South Asia
  • Chapter 6 International Organisations
  • Chapter 7 Security in the Contemporary World
  • Chapter 8 Environment and Natural Resources
  • Chapter 9 Globalisation

HBSE 12th Class Political Science Part 2 Politics in India since Independence

  • Chapter 1 Challenges of Nation Building
  • Chapter 2 Era of One-party Dominance
  • Chapter 3 Politics of Planned Development
  • Chapter 4 India’s External Relations
  • Chapter 5 Challenges to and Restoration of the Congress System
  • Chapter 6 The Crisis of Democratic Order
  • Chapter 7 Rise of Popular Movements
  • Chapter 8 Regional Aspirations
  • Chapter 9 Recent Developments in Indian Politics

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. मौसम की प्रमुख दशा है-
(A) मेघाच्छन्न
(B) आर्द्र
(C) तूफानी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. मौसम संबंधी प्रेक्षणों को कितने स्तरों पर रिकॉर्ड किया जा सकता है?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(B) तीन

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

3. फारेनहाइट थर्मामीटर में हिमांक तथा क्वथनांक के बीच कितने का अन्तर होता है?
(A) 90°
(B) 120°
(C) 180°
(D) 320°
उत्तर:
(C) 180°

4. एल्कोहल कितने डिग्री सेण्टीग्रेड पर जमता है?
(A) -115°C
(B) -90°C
(C) -50°C
(D) -10°C
उत्तर:
(A) -115°C

5. आर्द्रता कितने प्रकार की होती है?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) दो

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौसम किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी स्थान की थोड़े समय की वायुमंडलीय दशाओं को वहाँ का मौसम कहते हैं।

प्रश्न 2.
मौसम के आधारभूत या महत्त्वपूर्ण या प्रमुख तत्त्व कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
तापमान, वर्षा, वायुदाब, वायु की गति व दिशा, मेघाच्छन्नता तथा आर्द्रता आदि मौसम के आधारभूत तत्त्व हैं।

प्रश्न 3.
मौसम की प्रमुख दशाएं कौन-कौन सी होती हैं?
उत्तर:
मेधाच्छन्न (Cloudy), आर्द्र (Humid), उमसवाला (Sultry), तूफानी (Stormy) तथा खिला मौसम (Sunny) इत्यादि।

प्रश्न 4.
मौसम के पूर्वानुमान से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर:
आने वाले मौसम के अनुसार हम अपने कार्यक्रम निश्चित या स्थगित कर सकते हैं। फसलों को बचाया जा सकता है। तटीय क्षेत्र के लोगों और मछुआरों को सचेत किया जा सकता है। वायुयान व जलयान के चालकों के लिए भी यह पूर्वानुमान लाभदायक सिद्ध होता है।

प्रश्न 5.
साधारण थर्मामीटर कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
मुख्यतः साधारण थर्मामीटर दो प्रकार के होते हैं-

  1. सेल्सियस थर्मामीटर
  2. फारेनहाइट थर्मामीटर। एक तीसरा कम प्रचलित रियूमर थर्मामीटर भी होता है।

प्रश्न 6.
सिक्स के अधिकतम व न्यूनतम थर्मामीटर में कौन-कौन से दो द्रव प्रयोग किए जाते हैं?
उत्तर:
पारा और एल्कोहल।

प्रश्न 7.
आर्द्रता को मापने वाले यंत्र को क्या कहते हैं?
उत्तर:
आर्द्र एवं शुष्क बल्ब थर्मामीटर।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

प्रश्न 8.
सेल्सियस और फारेनहाइट थर्मामीटरों में हिमांक बिंदु तथा क्वथनांक बिंदु कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
सेल्सियस थर्मामीटर में हिमांक 0°C तथा क्वथनांक 100°C होता है। फारेनहाइट थर्मामीटर में हिमांक 32°F तथा क्वथनांक 212°F होता है।

प्रश्न 9.
निर्द्रव और पारद बैरोमीटरों में अंतर बताओ।
उत्तर:
पारद बैरोमीटर में पारे (Mercury) का प्रयोग किया जाता है, जबकि निर्द्रव बैरोमीटर में किसी भी द्रव का प्रयोग नहीं किया जाता।

प्रश्न 10.
सेल्सियस तापमान को फारेनहाइट तापमान में बदलने का क्या सूत्र है?
उत्तर:
°F = (°C x \(\frac { 9 }{ 5 }\)) + 32

प्रश्न 11.
स्टीवेंसन स्क्रीन का क्या उपयोग होता है?
उत्तर:
इसमें रखे थर्मामीटरों को ऊष्मा, धूप व विकिरण से बचाया जा सके तथा केवल वायु ही स्वतंत्र रूप से इसमें से आ-जा सके ताकि वायु का तापमान ठीक-ठीक मापा जा सके।

प्रश्न 12.
वायु की गति और दिशा बताने वाले यंत्रों के नाम बताएँ।
उत्तर:
वायु की गति को वेगमापी (Anemometer) द्वारा तथा वायु की दिशा को वादिक-सूचक (Wind Vane) द्वारा मापा जाता है।

प्रश्न 13.
वायुदाब किन इकाइयों में मापा जाता है?
उत्तर:
इंच, सेंटीमीटर और मिलीबार में।

प्रश्न 14.
भारत में मौसम विज्ञान सेवा का आरंभ कब और कहाँ पर हुआ?
उत्तर:
सन् 1864 में, शिमला में।

प्रश्न 15.
भारत में मौसम विभाग का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
दिल्ली में।

प्रश्न 16.
भारतीय दैनिक मौसम सूचक मानचित्र कहाँ से प्रकाशित किया जाता है?
उत्तर:
पुणे से।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौसम क्या होता है और इसकी रचना किन तत्त्वों के द्वारा होती है?
उत्तर:
किसी स्थान पर थोड़ी अवधि की; जैसे कुछ घण्टों, एक दिन या एक-दो सप्ताह की वायुमण्डलीय अवस्थाओं को वहाँ का मौसम कहते हैं। तापमान, वर्षा, वायुदाब, पवनें, आर्द्रता तथा मेघ आदि मौसम के प्रमुख तत्त्व माने जाते हैं।

प्रश्न 2.
मौसम की प्रमुख दशाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मौसम की प्रमुख दशाएँ निम्नलिखित होती हैं-

  • मेघाच्छन्न (Cloudy)-जब किसी दिन आकाश में बादल छाए हुए हों और सूर्य दिखाई न दे रहा हो तो कहा जाता है कि मौसम मेघाच्छन्न है।
  • आर्द्र (Humid)-वर्षा वाले दिन जब वायु में आर्द्रता सामान्य से अधिक होती है तो कहा जाता है कि मौसम आर्द्र है।
  • उमसवाला (Sultry)-जब वायु में आर्द्रता सामान्य से अधिक हो और सूर्य भी तेजी से चमक रहा हो तो कहा जाता है कि मौसम उमसवाला है।
  • तूफानी (Stormy)-जिस दिन तेज वायु चल रही हो तो कहा जाता है कि मौसम तूफानी है।
  • खिला मौसम (Sunny)-जब आकाश में बादल न हों और धूप खिली हुई हो तो कहा जाता है कि मौसम धूपयुक्त या खिला हुआ है।

प्रश्न 3.
मौसम के पूर्वानुमान से क्या लाभ होते हैं?
उत्तर:
मौसम का पूर्वानुमान हो जाने से हम मूसलाधार बारिश, हिमपात, तड़ितझंझा व आंधी-तूफानों से बच सकते हैं तथा तदानुकूल अपने कार्यक्रम बना सकते हैं। मौसम का कुछ दिन पहले पता चल जाने से किसान अपनी फसलों की रक्षा कर सकते हैं, तटवर्ती क्षेत्रों में लोगों की जान बचाई जा सकती है, मछुआरों को समुद्र में जाने से सचेत किया जा सकता है और जलयान चालक अपने जहाज़, माल व सवारियों को सुरक्षित रख सकते हैं। वायुयानों की सफल उड़ान मौसम के पूर्वानुमान पर ही निर्भर करती है। मौसम की पूर्व जानकारी से अकाल और बाढ़ से बचाव किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
मौसम चार्ट क्या है?
उत्तर:
विभिन्न मौसम वेधशालाओं से प्राप्त आंकड़े पर्याप्त एवं विस्तृत होते हैं। अतः ये एक चार्ट पर बिना कोडिंग के नहीं दिखाए जा सकते। कोडिंग के द्वारा कम स्थान में सूचनाएं देकर चार्ट की उपयोगिता बढ़ जाती है। इन्हें सिनाप्टिक मौसम चार्ट कहते हैं तथा जो कोड प्रयोग में लाए जाते हैं, उसे मौसम विज्ञान प्रतीक कहते हैं। मौसम पूर्वानुमान के लिए मौसम चार्ट प्राथमिक यंत्र हैं। ये विभिन्न वायुराशियों, वायुदाब यंत्रों, वातारों तथा वर्षण के क्षेत्रों की अवस्थिति जानने एवं पहचानने में सहयोग करते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मौसम मानचित्र क्या है? इसका महत्त्व बताते हुए इसकी रचना कीजिए।
उत्तर:
मौसम मानचित्र (Weather Maps)-आज के वैज्ञानिक युग में मौसम के विभिन्न तत्त्वों को मानचित्र पर अंकित करना सम्भव हो गया है। प्रतिदिन किसी विशेष समय का मौसमी विवरण मौसम मानचित्र पर अंकित किया जाता समय पर अल्पकालीन मौसम की दशाओं को दर्शाने वाले मानचित्र को मौसम मानचित्र कहते हैं।” मौसम के तत्त्वों को दर्शाने के लिए समान रेखाओं, प्रतीकों तथा संकेतदारों की सहायता ली जाती है। अभ्यास हो जाने पर उनके द्वारा मौसम मानचित्र का अध्ययन करके मौसम के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।

मौसम मानचित्र का महत्त्व (Importance of Weather Maps)-प्रतिदिन के मौसम मानचित्रों के अध्ययन से हम आने वाले दिन के मौसम की कल्पना कर सकते हैं। मौसम वेधशालाएँ प्रतिदिन के मौसम मानचित्रों के अध्ययन के पश्चात् भविष्य के मौसम के विषय में अपने विचार जनता तक पहुँचाती हैं। इस ज्ञान से जलयान अथवा वायुयान द्वारा यात्रा के विषय में ज्ञात हो जाता है और वे अपने प्रोग्राम को उचित प्रकार से निश्चित कर सकते हैं। वायुयान चालक तथा जलयान चलाने वाले खराब मौसम का पता लग जाने पर सावधान हो जाते हैं, जिनसे बहुत-सी दुर्घटनाओं से रक्षा हो जाती है। मौसम ज्ञात हो जाने पर अकाल एवं बाढ़ से रक्षा के लिए पहले से ही बहुत कुछ तैयारी कर ली जाती है। मौसम के विवरण का कृषकों के लिए विशेष महत्त्व है। वे कृषि योजनाओं को मौसम के अनुसार सुचारु रूप से चला सकते हैं।

मौसम मानचित्रों की रचना भारत में मौसम मानचित्र दिन में दो बार बनाए जाते हैं जिनमें से एक प्रातः 8.30 बजे तथा जे बनाया जाता है। मौसम मानचित्रों की रचना भारत के विभिन्न भागों में स्थापित की गई मौसम प्रेक्षणशालाओं से प्राप्त की गई सचनाओं के आधार पर की जाती है। ये भारत के मौसम विभाग के अधीन कार्य करती हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-

भारत में मौसम सम्बन्धी सेवा-भारत में मौसम सम्बन्धी सेवा सन् 1875 में आरम्भ की गई। तब इसका मुख्यालय शिमला में था। प्रथम विश्व-युद्ध के पश्चात् इसका मुख्यालय पुणे ले जाया गया। अब भारत के मौसम सम्बन्धी मानचित्र वहीं से प्रकाशित होते हैं।

भारत के दैनिक मौसम मानचित्र पर वायुदाब का वितरण, वायु की दिशा एवं गति, वर्षा, आकाश की दशा तथा दृश्यता आदि प्रदर्शित किए जाते हैं। इसके साथ एक रिपोर्ट संलग्न होती है जो पिछले दिन का मौसम तथा आने वाले 24 घण्टों के लिए मौसम . का पूर्वानुमान बताती है। इस पर भारत के सभी महत्त्वपूर्ण स्थानों के मौसम सम्बन्धी आँकड़े अंकित किए जाते हैं।

ये आँकड़े बेतार के तार (Wireless) की सहायता से एकत्रित किए जाते हैं। इन आँकड़ों के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की जाती है। आजकल कृत्रिम उपग्रह इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। INSAT I-B की सहायता से हम दूरदर्शन पर हर रोज भारतीय मौसम की जानकारी लेते हैं। INSAT I-C भी अन्तरिक्ष में छोड़ा गया है। मौसम का अध्ययन करने के लिए Air Photographs का भी प्रयोग किया जाता है।

भारतीय मौसम प्रेक्षणशालाएँ इस समय भारत में लगभग 350 प्रेक्षणशालाएँ हैं। इन्हें पाँच वर्गों में बाँटा गया है। प्रथम श्रेणी की प्रेक्षणशालाओं में स्वतः अभिलेखी (Self-recording) मौसम विज्ञान यन्त्रों; जैसे तापलेखी (Thermograph), वायुदाबलेखी (Barograph), आर्द्रतालेखी (Hygrograph), पवनवेग-लेखी (Anemograph) आदि प्रयोग किए जाते हैं। ये दिन में दो बार पुणे में स्थित केन्द्रीय प्रेक्षणशाला को मौसम सम्बन्धी सूचनाएँ भेजती है।

द्वितीय श्रेणी की प्रेक्षणशालाओं में सामान्य नेत्र-अभिलेखी (Eye-recording) मौसम विज्ञान यन्त्रों, जैसे अधिकतम व न्यूनतम तापमापी, वायुदाबमापी, शुष्क तथा आर्द्र बल्ब तापमापी, पवन वेगमापी, वायुदिक्-सूचक, वर्षामापक यन्त्र आदि का प्रयोग होता है। ये प्रेक्षणशालाएँ भी दिन में दो बार मुख्य कार्यालय को सूचना भेजती हैं।

तृतीय श्रेणी की प्रेक्षणशालाओं में भी नेत्र-अभिलेखी यन्त्रों का ही प्रयोग होता है। अन्तर केवल यह है कि ये दिन में केवल एक ही बार मुख्य कार्यालय को सूचना भेजती हैं। चतुर्थ श्रेणी की प्रेक्षणशालाओं में केवल तापमान एवं वर्षा सम्बन्धी आँकड़े एकत्रित किए जाते हैं। पंचम श्रेणी की प्रेक्षणशालाएँ प्रतिदिन प्रातः 8 बजे तार द्वारा पिछले 24 घण्टों में हुई वर्षा की सूचना केन्द्रीय प्रेक्षणशाला को भेजती हैं।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

प्रश्न 2.
मौसम के कुछ प्रमुख तत्त्वों को मापने वाले यन्त्रों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वायुमण्डल का तापमान, दाब, वर्षा तथा वायु की दिशा एवं गति मौसम के प्रमुख तत्त्व हैं। इन्हें मापने के लिए प्रायः निम्नलिखित यन्त्रों का प्रयोग किया जाता है-
1. तापमान को मापना-सूर्य से ऊर्जा प्राप्त करके वायुमण्डल का तापमान बढ़ता है जिसे तापमापी (Thermometer) द्वारा मापा जाता है। तापमापी कई प्रकार के होते हैं, परन्तु यहाँ पर सिक्स का अधिकतम तथा न्यूनतम तापमापी का ही विवरण दिया जा रहा है-

सिक्स का अधिकतम व न्यूनतम तापमापी-दिन का अधिकतम तथा रात्रि का न्यूनतम तापमान मापने के लिए एक विशेष प्रकार का तापमापी प्रयोग किया जाता है। इसका आविष्कार जे० सिक्स (J.Six) नामक विद्वान ने किया था इसलिए इसे सिक्स का अधिकतम तथा न्यूनतम तापमापी (Six’s Maximum and Minimum Thermometer) कहते हैं। यह शीशे की एक ‘U’ आकार की नली का बना होता है जिसके दोनों सिरों पर एक-एक बल्ब लगा हुआ होता है।

नली की बाईं ओर के बल्ब ‘A’ के पूरे भाग में एल्कोहल भरा होता है जबकि दाईं ओर के बल्ब ‘D’ के निचले भाग में ही एल्कोहल होता है और ऊपरी भाग खाली होता है। नली के निचले भाग में पारा भरा होता है। पारे के ऊपर इस्पात के दो सूचक (Steel Index) E तथा F लगे होते… हैं। इन सूचकों के साथ स्प्रिंग लगे हुए होते हैं जिनकी सहायता से ये अपने स्थान पर तब तक बने रहते हैं जब तक पारा उन्हें धकेल न दे।

पारे की गति एल्कोहल के फैलने और सिकुड़ने पर निर्भर करती है क्योंकि एल्कोहल पारे से छः गुना अधिक फैलता है। जब तापमान बढ़ता है तो बल्ब A का एल्कोहल फैलता है। पतला तरल होने के कारण यह सूचक को पार कर जाता है और नली के AB भाग में पारे को नीचे धकेलता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 1
इससे नली के CD भाग में पारा ऊपर को उठता है। ऊपर उठता हुआ पारा सूचक F को ऊपर की ओर धकेलेगा। यह तब तक धकेलता रहेगा जब तक तापमान बढ़ना बन्द नहीं हो जाता। सूचक F का निचला सिरा अधिकतम तापमान दर्शाता है। जब तापमान कम होना आरम्भ होता है तब बल्ब A का एल्कोहल सिकुड़ना शुरू कर देता है और नली के AB भाग में पारा ऊपर चढ़ना शुरू कर देता है। ऊपर चढ़ता हुआ पारा सूचक E को ऊपर की ओर धकेलता है। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक तापमान गिरना बन्द नहीं हो जाता। सूचक E का निचला सिरा न्यूनतम तापमान को दर्शाता है। इस प्रकार न्यूनतम तापमान वाली भुजा पर ऊपर से नीचे की ओर तथा अधिकतम तापमान वाली भुजा पर नीचे से ऊपर की ओर तापमान पढ़े जाते हैं।

इस थर्मामीटर के साथ घोड़े के खुर के आकार का चुम्बक (Horse Shoe Magnet) होता है। इस चुम्बक की सहायता से इस्पात के सूचक पारे के तल तक लाए जाते हैं जिससे अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान का पता लगाने में सहायता मिलती है।

आर्द्र एवं शुष्क बल्ब थर्मामीटर-इसमें एक ही आकार के दो थर्मामीटर T1 तथा T2 होते हैं जिन्हें लकड़ी के एक फ्रेम पर लगाया जाता है। इनमें T1 शुष्क थर्मामीटर है जबकि T2 आर्द्र थर्मामीटर है। T2 के बल्ब को मलमल के कपड़े से ढक दिया जाता है। इस कपड़े के निचले सिरे को नीचे रखी जल से भरी शीशी में डाल दिया जाता है (चित्र 9.2)। जब इस यन्त्र के पास वायु चलती है तो शीशी में पड़े जल का वाष्पीकरण होता है जिससे इस थर्मामीटर का तापमान कम हो जाता है।

परन्तु T1 का तापमान वायु के सामान्य तापमान को ही दर्शाता है। इस प्रकार शुष्क एवं आर्द्र थर्मामीटर द्वारा दर्शाए गए ताप में अन्तर आ जाता है। यह अन्तर वायुमण्डल में उपस्थित आर्द्रता का सूचक है। इन दोनों के तापमान में अन्तर जितना अधिक होगा, वायुमण्डल में आर्द्रता उतनी ही कम होगी। इसके विपरीत यदि दोनों थर्मामीटरों के तापमान में अन्तर कम होगा तो वायु में आर्द्रता अधिक होगी। आर्द्रता को शुद्धता से मापने के लिए विशेष तौर पर तैयार की गई तालिका का प्रयोग करना पड़ता है।

2. वायुमण्डलीय दाब का मापना-वायुमण्डलीय दाब को मापने के लिए फोर्टिन का वायुदाबमापी तथा निर्द्रव वायुदाबमापी-प्रयोग किए जाते हैं।

फोर्टिन का वायुदाबमापी (Fortin’s Barometer)-यह साधारण पारद वायुदाबामापी का ही परिष्कृत रूप है। इस यन्त्र का आविष्कार फोर्टिन महोदय ने किया था इसलिए इसका नाम ‘फोर्टिन का वायुदाबमापी’ रखा गया है। यह लगभग एक मीटर लम्बी काँच पारद स्तम्भ की नली होती है जिसका ऊपरी सिरा बन्द तथा निचला सिरा खुला होता है। इस नली में (Mercury Column) रहता है। नली के नीचे की ओर पारे की एक हौज (Cistern) होती है जिसमें नली का खुशक हुआ निचला सिरा डूबा रहता है। इस हौज में चमड़े की एक थैली होती है जिसमें पारा होता है। इस थैली की तली लचीली (Flexible) होती है।

इसके नीचे एक समंजन पेच (Adjusting Screw) होता है जिसकी सहायता से लचीली थैली की तली को ऊपर-नीचे करके थैली में पारे की सतह को ऊपर-नीचे किया जा सकता है। थैली के पारे की सतह के थोड़ा ऊपर हाथी-दाँत का बना एक नुकीला सूचक (Ivory Index) लगा होता है। इस सूचक की नोक वायुदाबमापी पर बनी मापनी के शून्य मान लेने वाले बिन्दु को प्रकट करती है। वायुदाबमापी की काँच की नली का केवल थोड़ा-सा भाग ही दिखाई देता है, शेष भाग सुरक्षा के लिए पीतल की बनी एक नली में ढका रहता है।

नली के दिखाई देने वाले भाग पर वायुमण्डलीय दाब की मिलीबार में मापनी अंकित की जाती है। इस मापनी पर एक वर्नियर मापनी (Vernier Scale) लगी होती है। इसे वर्नियर पेंच की सहायता से ऊपर या नीचे किया जाता है। इस वर्नियर का सम्बन्ध काँच की नली के पीछे की ओर स्थित पीतल की एक प्लेट से होता है। इस प्लेट का निचला सिरा तथा वर्नियर मापनी का शून्य बिन्दु पर क्षैतिज रेखा में होते हैं। वर्नियर पेच घुमाने पर यह प्लेट तथा वर्नियर मापनी इकट्ठे ही खिसकते हैं।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 2
फोर्टिन के वायुदाबमापी पर एक साधारण थर्मामीटर लगा होता है जिससे वायुदाब के समय वायु का तापमान पढ़ा जा सके (देखें चित्र 9.3)।

वायुदाब पढ़ने से पहले दो काम करने होते हैं-(1) समंजन पेंच की सहायता से हौज से पारे को इतना ऊँचा कीजिए कि पारे की ऊपरी सतह हाथी-दाँत के सूचक की नोक को स्पर्श करने लगे। (2) नली के दिखाई देने वाले भाग में, जहाँ मापनी बनी है, पारद स्तम्भ की ऊपरी सतह देखिए। अब वर्नियर पेंच की सहायता से वर्नियर को इतना खिसकाइए कि वर्नियर का शून्य पारद स्तम्भ की ऊपरी सतह तथा वर्नियर से जुड़ी प्लेट का निचला सिरा, तीनों एक क्षैतिज रेखा में दिखाई दें। इसके बाद वर्नियर मापनी की सहायता से वायुदाब पढ़ लीजिए।

निर्द्रव वायुदाबमापी (Aneroid Barometer)-जैसा कि इसके नाम से ही विदित है, इसमें कोई द्रव प्रयोग नहीं होता। यह एक गोल घड़ी के समान होता है जिसके डायल पर वायुदाब का मान लिखा हुआ होता है। यन्त्र के भीतर एक धात्विक बॉक्स होता है जिसमें से हवा निकालकर आंशिक शून्य पैदा किया जाता है। इसकी सतह को लहरदार बनाया जाता है ताकि वायुदाब में थोड़ा-सा परिवर्तन होने पर भी इस पर अधिक प्रभाव पड़ सके।

वायुदाब में वृद्धि होने पर यह लहरदार ढक्कन नीचे की ओर दबता है और दाब में कमी होने पर ऊपर को उठता है। इसका प्रभाव स्प्रिंग (Spring) पर पड़ता है जिसकी प्रगति को उत्तोलकों (Levers की सहायता से बढ़ाया जाता है। ये उत्तोलक एक छोटी-सी जंजीर (Chain) से जुड़े हुए होते हैं जो डायल के केन्द्र पर लगी हुई सुई (Moovable Needle) को घुमाते हैं। इस सुई को पढ़कर वायुमण्डलीय दबाव का पता लगाया जाता है।

डायल पर एक अन्य सुई भी होती है जिसे यन्त्र के ऊपर लगे धात्विक स्टैंड द्वारा घुमाया जा सकता है। इस सुई का प्रयोग किसी निश्चित अवधि में दाब में हुए परिवर्तन का पता लगाने के लिए किया जाता है। यन्त्र के डायल पर आँधी (Stormy), वर्षा (Rainy), परिवर्तन (Change), सुहाना (Fair) तथा बहुत शुष्क (Very Dry) मौसम सम्बन्धी दशाओं के नाम अंकित होते हैं जिससे मौसम सम्बन्धी पूर्वानुमान लगाने में सहायता मिलती है। निर्द्रव बैरोमीटर की रचना (चित्र 9.4) में दर्शाई गई है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 3

3. वर्षा का मापना- वर्षा को वर्षामापी यन्त्र (Rain Gauge) द्वारा मापा जाता है। वर्षामापी यन्त्र धातु का एक खोखला बेलनाकार (सिलेण्डर) बर्तन होता है जिसमें एक कीप अच्छी प्रकार से बिठाई गई बाह्यपात्र होती है और उसमें से होकर वर्षा का जल नीचे बर्तन में पहुँचता है। कीप के मुँह की परिधि, ग्राह्य बर्तन के आधार की परिधि के बराबर होती है। सिलेण्डर का मुँह कीप के मुँह से 12.5 सेंटीमीटर ऊपर रहता है, जिससे गिरती हुई वर्षा के जल का कोई भाग निकलकर बाहर न भीतरी सिलेंडर चला जाए। इस प्रकार से अपने-आप ही सारा वर्षा का जल जो भूमि तल कीप के मुँह की सतह पर गिरता है, ग्राह्य बर्तन में चला जाता है
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 4
इस प्रकार से एकत्रित जल एक मापक जार द्वारा मापा जाता है जिस पर मिलीमीटर या इन्चों में निशान लगे होते हैं। मापक जार के आधार का क्षेत्रफल तथा कीप के क्षेत्रफल में एक विशेष सम्बन्ध होता है। भारत में हम लोग वर्षा को मिलीमीटर या सेंटीमीटर की इकाई में नापते हैं। दिन में किसी निश्चित समय पर 24 घण्टे में एक बार पाठ्यांक लिया जाता है। सामान्यतः यह समय 8 बजे प्रातःकाल होता है और यह पिछले 24 घण्टे या पूरे दिन की सारी वर्षा की मात्रा को प्रकट करता है।

यथार्थ पाठ्यांकों के लिए यन्त्र को खुले और समतल क्षेत्र में भूमि से 30 सेंटीमीटर की ऊँचाई पर रखना चाहिए, जिससे उसमें पानी छिटककर या बहकर न जा सके। वर्षामापी में वर्षा के जल को निर्विघ्न गिरने के लिए उसे किसी वृक्ष, मकान या किसी ऊँची वस्तु से दूर रखना चाहिए। साथ ही उसे जानवरों से भी सुरक्षित रखना चाहिए क्योंकि उनसे वर्षामापी के उलट जाने का भय हो सकता है।

4. वायु की दिशा तथा गति-वायु की दिशा तथा गति को क्रमशः वायुदिक्-सूचक तथा पवन-वेगमापी से मापा जाता है।
1. वायुदिक् (वातदिक्)-सूचक-यह एक लम्बा तीर-सा होता है जिसके पीछे धातु की चादर का टुकड़ा लगा हुआ होता है। इसे एक लोहे के डण्डे पर बाल बियरिंग की सहायता से इस प्रकार लगाया जाता है कि थोड़ी-सी हवा चलने पर भी यह घूम जाता है। तीर के नीचे चार मुख्य दिशाएँ, North (N), South (S), East (E), West (W) लगा दी जाती हैं। तीर का मुँह पवन के चलने की दिशा का सूचक होता है (चित्र 9.6)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 5

2. पवन-वेगमापी-पवन-वेगमापी एक प्रकार का यन्त्र होता है जो पवन की गति को मापने के लिए प्रयुक्त होता है। इस पवन-वेगमापी में तीन या कभी-कभी चार अर्द्धगोलाकार प्यालियाँ लगी रहती हैं जो क्षैतिज भुजाओं द्वारा एक ऊर्ध्वाधर त’ से सम्बन्धित होती हैं (चित्र 9.7)। –
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 6
जब पवन चलती है तो प्याले घूमते हैं और इससे क्षैतिज भुजाएँ भी घूमने लगती हैं। इन भुजाओं के घूमने से ऊर्ध्वाधर त’ भी घूमने लगता है। पवन जितने ही अधिक वेग से चलती है, उतनी ही अधिक वेग से तर्कु घूमता है। तर्कु के आधार पर एक यन्त्र लगा होता है जो निश्चित अवधि में तर्कु के चक्करों अर्थात् पवन की गति को अंकित करता रहता है। कभी-कभी पवन-वेगमापी बिजली के तारों द्वारा मौसम केन्द्र के अन्दर एक डायल से लगा दिया जाता है। यह डायल हवा की चाल को प्रति घण्टा किलोमीटर या मील या ‘नाट’ में प्रदर्शित करता है।

वात यन्त्रों को ऐसे खुले स्थान पर रखना चाहिए जहाँ स्थानीय बाधाएँ न हों। इन्हें बहुत दूर तथा आस-पास की ऊँची वस्तुओं से अधिक ऊँचाई पर रखना चाहिए। सामान्यतया वात यन्त्रों को ऊँचे टावर पर खुली जगह पर लगाया जाता है।

प्रश्न 3.
मौसम मानचित्र में प्रयोग होने वाले मौसम-चिह्नों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मौसम मानचित्र पर वायु की गति, मेघाच्छादन, वर्षा, समुद्र की दशा तथा अन्य कई प्रकार के मौसम तत्त्वों को विभिन्न चिहनों की सहायता से दर्शाया जाता है।
1. वायु की गति तथा दिशा-वायु की गति तथा उसकी दिशा एक छोटे से वृत्त के किनारे पर खींचे गए तीर द्वारा दर्शाई जाती है। तीर पवनों की दिशा से वृत्त की ओर खींचा जाता है। तीर पर छोटी रेखाएँ या त्रिभुजाएँ होती हैं जो वायु की गति को प्रस्तुत करती हैं (चित्र 9.8)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 7

2. मेघाच्छादन-आकाश पर मेघों के आवरण को एक छोटे-से वृत्त द्वारा दर्शाया जाता है। बिल्कुल स्वच्छ आकाश को खाली वृत्त द्वारा तथा पूर्ण मेघाच्छादन को पूर्णतः काले वृत्त द्वारा दर्शाया जाता है। चित्र 9.9 में आकाश में मेघाच्छादन की विभिन्न दशाओं को दर्शाया गया है।

3. अन्य चिह्न-धुन्ध कोहरा, झंझावात, हिमपात, बौछार, ओला आदि मौसमी तत्त्वों विभिन्न चिह्नों द्वारा दर्शाया जाता है। जिनकी सूची चित्र 9.9 में दी गई है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 8

4. समुद्र की दशाएँ समुद्र की दशाओं को संकेताक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है। इनका विवरण इस प्रकार है-

संकेताक्षरपूर्ण शब्दअर्थ
WWave directionतरंग की दिशा
CmCalmशान्त सागर
SmSmoothअत्यल्प तरंगित सागर
SISlightअल्प तरंगित सागर
ModModerateसामान्य तरंगित सागर
RoRoughप्रक्षुब्ध सागर
V.RoVery Roughअति प्रक्षुब्ध सागर
HiHighउच्च तरंगित सागर
V.HiVery Highअत्युच्च तरंगित सागर
PhPhenomenalप्रलयकारी सागर

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

प्रश्न 4.
भारतीय दैनिक मौसम मानचित्र के वर्णन के शीर्षकों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दैनिक मौसम मानचित्र का वर्णन करने की विधि के अनुसार इन मानचित्रों का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जाता है-
1. प्रारम्भिक सूचना (Preliminary Introduction)

2. वायुमण्डलीय दाब (Atmospheric Pressure)

  • उच्च दाब के क्षेत्र (Location of bar high)
  • निम्न दाब के क्षेत्र (Location of bar low)
  • समदाब रेखाओं की प्रवृत्ति (Trend of isobars)
  • दाब प्रवणता (Pressure gradient)

3. पवनें (Winds)

  • पवनों की दिशा (Direction of winds)
  • पवनों का वेग (Velocity of winds)

4. आकाश की दशा (Sky condition)

  • मेघावरण (Cloud cover) की मात्रा
  • मेघों की प्रकृति (Nature of the clouds)
  • अन्य वायुमण्डलीय परिघटनाएँ (Other atmospheric Phenomena)

5. वृष्टि (Precipitation)

  • वर्षण का सामान्य वितरण (General distribution of rainfall),
  • भारी वर्षण के क्षेत्र (Areas of heavy precipitation)

6. समुद्र की दशा (Sea condition)

7. न्यूनतम तापमान का प्रसामान्य से विचरण
(Departure of minimum temperature from normal)

8. वायुदाब का प्रसामान्य से विचलन
(Departure of Pressure from normal)

सायः 5.30 बजे (17.30 hours) के मौसम मानचित्र में न्यूनतम तापमान के प्रसामान्य से विचलन के स्थान पर अधिकतम तापमान का प्रसामान्य से विचलन (Departure of maximum temperature from normal) दिखाया जाता है। इसके साथ ही समुद्र-तल से 1.5 कि०मी० की ऊँचाई पर पवनों (Winds at 1.5 km above mean sea level) को भी दिखाया जाता है।

प्रश्न 5.
दिए गए भारतीय मौसम मानचित्र का विस्तृत अध्ययन कीजिए।
उत्तर:
1. प्रारम्भिक सूचना (Preliminary Introduction)-दिया गया मौसम मानचित्र 15 अगस्त, 1969 को भारतीय समय के अनुसार प्रातः 8.30 बजे की मौसमी दशाओं को प्रदर्शित करता है (चित्र 9.10)।

2. वायुमण्डलीय दाब-
(1) सामान्य (General) सामान्य रूप से वायुदाब दक्षिण से उत्तर की ओर कम होता है। दक्षिण में अधिकतम वायुदाब 1012 मिलीबार तथा उत्तर में न्यूनतम वायुदाब 994 मिलीबार है।

(2) उच्च वायुमण्डलीय दाब-क्षेत्र अरब सागर में लक्षद्वीप के दक्षिण-पश्चिम में उच्च वायुदाब की समभार रेखा स्थित है जिसका मान 1012 मिलीबार है। उत्तर में एक अन्य 1006 मिलीबार का उच्च भार क्षेत्र भूटान के निकट स्थित है।

(3) निम्न वायुमण्डलीय दाब-क्षेत्र भारत के मानचित्र पर निम्न वायुमण्डलीय दाब-क्षेत्र उपस्थित हैं
(क) एक निम्न भार क्षेत्र भारतीय सीमा के निकट पाकिस्तान के उत्तरी-पूर्वी सीमान्त पर स्थित है। यह 994 मिलीबार की समभार रेखा द्वारा घिरा हुआ है।

(ख) दूसरा निम्न भार क्षेत्र उत्तरी-पूर्वी राज्यों पर स्थित है जो 1004 मिलीबार की समभार रेखा द्वारा घिरा हुआ है।

(ग) तीसरा महत्त्वपूर्ण निम्न वायुदाब क्षेत्र उड़ीसा के तट पर स्थित है। यह 996 मिलीबार की समभार रेखा द्वारा घिरा हुआ है। यह रेखा लगभग वृत्ताकार है और यहाँ पर विकसित हुए चक्रवात का केन्द्रीय भाग है।

(4) समभार रेखाओं की प्रवृत्ति-सामान्यतः समभार रेखाएँ पश्चिम से पूर्व दिशा में जाती हैं। परन्तु कई स्थानों पर स्थानीय रूप से इस प्रवृत्ति में विकार आ रहा है। उदाहरणतः ओडिशा के तट पर चक्रवात विकसित होने के कारण समभार रेखाएँ – वृत्ताकार हैं। दक्षिणी पठार पर स्कान (Wedge) बनता है। उत्तर-पश्चिमी भाग में समभार रेखाएँ दक्षिण-पश्चिम से उत्तर:पूर्व की ओर
जाती हैं।

(5) दाब प्रवणता-बंगाल की खाड़ी तथा निकटवर्ती ओडिशा एवं पश्चिमी बंगाल में समभार रेखाएँ एक-दूसरे के बहुत निकट हैं जिस कारण यहाँ पर दाब प्रवणता अधिक है। देश के अन्य भागों में समभार रेखाएँ दूर-दूर हैं जिस कारण वहाँ पर दाब प्रवणता कम है।

3. पवनें पवनों की दिशा तथा उनका वेग उच्च व निम्न वायुदाब की स्थिति तथा दाब की प्रवणता पर निर्भर करते हैं।
(1) पवनों की दिशा लगभग सारे प्रायद्वीपीय भारत में पवनें पश्चिम से पूर्व की ओर चलती हैं। बंगाल की खाड़ी के चक्रवातीय क्षेत्र में पवनें वामावर्त हैं। उत्तरी भारत के अधिकांश भागों में पवनें पूर्व से पश्चिम दिशा में चल रही हैं।

(2) पवनों का वेग पवनों का वेग दाब प्रवणता पर निर्भर करता है। अधिक दाब प्रवणता होने पर पवनों का वेग अधिक होता है जबकि कम दाब प्रवणता होने पर पवनों का वेग कम होता है। दक्षिणी भारत में उत्तरी भारत की अपेक्षा पवनों का वेग अधिक है। उत्तरी भारत में पवन वेग 1-10 नॉट है जबकि दक्षिणी भारत में 10-15 नॉट प्रति घण्टा है। पूर्वी तट पर चक्रवात उत्पन्न होने के कारण पवनों का वेग कई स्थानों पर 15-20 नॉट है।

4. आकाश की दशाएँ-(1) मेघावरण की मात्रा (Cloud cover)-वर्षा ऋतु के कारण देश के अधिकांश भाग मेघाच्छादित हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, गंगा का मैदान तथा पर्वतीय भाग पूर्ण रूप से मेघों से ढके हुए हैं। कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु मेघारहित हैं।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट 9

(2) मेघों की प्रकृति देश में अधिकतर निम्न ऊँचाई (Low Clouds) वाले मेघ छाए हुए हैं। पूर्वी तट पर ऊँचे मेघ मिलते हैं।

(3) अन्य वायुमण्डलीय घटनाएँ कई स्थानों पर झंझा, ओला तथा तूफान की घटनाएँ दिखाई गई हैं।

5. वृष्टि-वर्षा ऋतु के कारण देश के सभी भागों में कुछ-न-कुछ वर्षा आवश्यक है। अधिक वर्षा के क्षेत्र पंजाब, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश हैं जहाँ पिछले 24 घण्टों में 3 से 17 मिलीमीटर वर्षा अंकित की गई है, उड़ीसा तट पर चक्रवात के कारण कई स्थानों पर 3 से 8 मिलीमीटर वर्षा रिकॉर्ड की गई। मध्य प्रदेश, बिहार, मेघालय में 2 से 6 मिलीमीटर वर्षा हुई। दक्षिणी पठार तथा राजस्थान वर्षारहित प्रदेश हैं।

6. समुद्र की दशा-पूर्वी तट पर तेज पवनों के कारण सागर की लहरें मन्द (Moderate) हैं। पश्चिमी तट पर सागरीय लहरें विनित (Smooth) हैं।

7. अधिकतम तथा न्यूनतम तापमान का सामान्य से विचलन-राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा पूर्वी तट पर दिन का तापमान सामान्य से 4° अधिक है। शेष भागों में रात्रि का तापमान सामान्य से विचलन कम है।

8. वायुदाब का सामान्य से विचलन लगभग सारे देश में वायुदाब सामान्य से कम है। यह विचलन दक्षिण भारत में 4 से 8 मिलीबार तक है। अन्य भागों में वायुदाब सामान्य है।

मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट HBSE 11th Class Geography Notes

→ मौसम (Weather) : किसी स्थान तथा विशेष समय के मौसम संबंधी वायुमण्डलीय दिशाओं को ‘मौसम’ कहते हैं।

→ वायुदाब (Air Pressure) : अन्य पदार्थों की भाँति वायु में भी भार होता है जिस कारण वह भूतल पर दबाव डालती है। वायु के इस दबाव को ‘वायुदाब’ कहते हैं।

→ वास्तविक आर्द्रता (Absolute Humidity) : किसी निश्चित तापमान पर वायु में उपस्थित जलवाष्प की वास्तविक मात्रा को उस वायु की वास्तविक आर्द्रता कहा जाता है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 8 मौसम यंत्र, मानचित्र तथा चार्ट

→ समदाब रेखाएँ (Isobars) : समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ होती हैं जो मानचित्र पर समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलाती हुई खींची जाती हैं।

→ समताप रेखाएँ (Isotherms) : समान तापमान वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ।

→ समवर्षा रेखाएँ (Isotherms) : दिए गए समय में समान औसत वार्षिक वर्षा वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखाएँ।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 7 सुदूर संवेदन का परिचय

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 7 सुदूर संवेदन का परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 7 सुदूर संवेदन का परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. हमारे शरीर में प्रदत्त सुदूर-संवेदन के प्राकृतिक उपकरण हैं-
(A) आँख
(B) कान
(C) नाक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. यांत्रिक सुदूर-संवेदन मुख्यतः कितने प्रकार के होते हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(C) चार

3. सुदूर-संवेदन में प्रयुक्त होने वाली ऊर्जा के कितने स्रोत हो सकते हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) दो

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 7 सुदूर संवेदन का परिचय

4. सुदूर-संवेदन का प्रकार है-
(A) धरातलीय विभेदन
(B) वर्णक्रमीय विभेदन
(C) रेडियोमीट्रिक विभेदन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. वायुयान द्वारा सुदूर-संवेदन का लक्षण है-
(A) प्लेटफॉर्म कम स्थायी
(B) बृहत् मापक
(C) उच्च क्षेत्रीय विभेदन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुदूर-संवेदन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी वस्तु को छुए बिना उसका बोध या संवेद होना सुदूर-संवेदन कहलाता है।

प्रश्न 2.
तरंगदैर्ध्य को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
दो निकटवर्ती तरंग श्शृंगों (Wave Crests)अथवा तरंग गर्तों (Wave Troughs) के बीच की लम्बाई को तरंगदैर्ध्य कहते हैं।

प्रश्न 3.
सदूर-संवेदक कितने प्रकार के होते हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
सुदूर-संवेदक दो प्रकार के होते हैं-

  • प्राकृतिक सुदूर-संवेदक एवं
  • कृत्रिम सुदूर-संवेदक।

प्रश्न 4.
विद्युत-चुम्बकीय विकिरण को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रकाश की गति से ऊर्जा का किसी दिकस्थान अथवा माध्यम से होने वाला प्रवर्धन विद्युत-चुम्बकीय विकिरण कहलाता है।

प्रश्न 5.
संवेदक किसे कहते हैं?
उत्तर:
कोई भी प्रतिबिम्बन अथवा अप्रतिबिम्बन साधन, जो विद्युत चुम्बकीय विकिरण को प्राप्त करने एवं उसे ऐसे संकेतों में परावर्तित करता हो, जिनसे फोटोग्राफीय अथवा अंकिक प्रतिबिम्बों को अभिलेखित तथा प्रदर्शित किया जा सकता हो।

प्रश्न 6.
राडार व फ्लैशगन में किस प्रकार की ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
राडार व फ्लैशगन में कृत्रिम ऊर्जा का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 7.
भू-स्थैतिक उपग्रह की ऊँचाई कितनी है?
उत्तर:
36,000 कि०मी०।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 7 सुदूर संवेदन का परिचय

प्रश्न 8.
त्रियक रंग मिश्र को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
कृत्रिम रूप से उत्पादित रंगीन बिम्ब जिसमें नीला, हरा और लाल रंग उन तरंग क्षेत्रों को निर्दिष्ट किया जाता है जो प्राकृतिक रूप से अलग होते हैं। उदाहरण के तौर पर एक मानक त्रियक रंगी मिश्र में नीला रंग हरे विकिरण क्षेत्र (0.5 से 0.6 माइक्रोमीटर) को, हरा रंग लाल विकिरण क्षेत्र (0.6 से 0.7 माइक्रोमीटर) और अन्ततः लाल रंग अवरक्त क्षेत्र (0.7 से 0.8 माइक्रोमीटर) वाले विकिरण क्षेत्रों को निर्दिष्ट किए जाते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुदूर-संवेदन क्या है? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुदूर-संवेदन (Remote Sensing)-दूरस्थ संवेदन सूचनाएँ एकत्रित करने की आधुनिक तकनीक है जिसके अन्तर्गत किसी वस्तु के बिना सम्पर्क में आए उसके बारे में दूर से ही सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं। पृथ्वी के सभी पदार्थ ऊर्जा का विकिरण, अवशोषण तथा परावर्तन करते हैं। अतः धरातलीय तत्त्वों की विशिष्टता के आधार पर सुदूर अन्तरिक्ष में सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं और वहाँ से निश्चित भू-केन्द्रों तक प्रेषित की जाती है। सुदूर-संवेदन तकनीक विभिन्न प्रकार के प्राकृतिक तत्त्वों के मानचित्रण में अत्यन्त लाभदायक है। आधुनिक युग में कम्प्यूटर विधि द्वारा सुदूर-संवेदन से प्राप्त सूचनाओं को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। अतः प्राकृतिक संसाधनों के विश्लेषण में सुदूर-संवेदन विधि का प्रयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

प्रश्न 2.
प्राकृतिक और कृत्रिम सुदूर-संवेदकों में अन्तर स्पष्ट करते हुए चार मुख्य प्रकार के यान्त्रिक सुदूर-संवेदकों के नाम बताइए।
उत्तर:
आँख, नाक, कान व त्वचा सुदूर-संवेदन के प्राकृतिक उपकरण हैं। कृत्रिम सुदूर-संवेदी उपकरणों का आविष्कार किया जाता है। रेडियोमीटर, ऑडियोमीटर, मैग्नेटोमीटर, ग्रेवीमीटर तथा साधारण कैमरा कृत्रिम सुदूर-संवेदी यन्त्र हैं।

प्रश्न 3.
उपग्रह द्वारा सुदूर-संवेदन के क्या-क्या गुण हैं?
उत्तर:
उपग्रह द्वारा सुदूर-संवेदन ने वर्षों और महीनों में एकत्रित होने वाली ‘सूचनाओं को क्षणों में उपलब्ध करवाकर ज्ञान-विज्ञान की शाखाओं में सूचना क्रान्ति ला दी है। उपग्रह द्वारा सुदूर-संवेदन में दृश्य का चित्र विस्तृत तथा सार रूप में खींचा जा सकता है।

प्रश्न 4.
सुदूर-संवेदन की सक्रिय प्रणाली क्या है?
उत्तर:
सक्रिय संवेदन प्रणाली वह प्रणाली होती है जिसमें मानव द्वारा उत्पादित ऊर्जा का प्रयोग होता है। इसमें ऊर्जा अपने स्रोत से वस्तु तक जाती है और उसका कुछ भाग परावर्तित होकर पुनः स्रोत तक पहुँचता है। वहाँ पर इसे डिक्टेटर द्वारा रिकॉर्ड किया जाता है। राडार सक्रिय संवेदन प्रणाली का प्रमुख उदाहरण है।

प्रश्न 5.
भूगोल में सुदूर-संवेदन के प्रयोग की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भूगो सुदूर-संवेदन तकनीक का निम्नलिखित विषयों के अध्ययन में प्रयोग किया जाता है-

  • समुद्र विज्ञान तथा सागरीय सम्पदा।
  • कृषि, वन सम्पदा तथा मिट्टी।
  • भू-गर्भ विज्ञान।
  • जल विज्ञान।
  • मौसम विज्ञान।
  • भूमि-उपयोग विश्लेषण।
  • मानचित्र विज्ञान।

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निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुदूर-संवेदन विधि के क्या उपयोग हैं? इस विधि में आधारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दूरस्थ संवेदन प्रणाली का उपयोग-वर्तमान समय में सामान्य, रंगीन, इन्फ्रारेड एवं त्रिआयामी (Three dimensional) फोटोग्राफी द्वारा, लेज़र किरणों की पद्धति के उपयोग द्वारा तथा कम्प्यूटर एवं रेडार के उपयोग द्वारा कुछ विकासशील देशों की . दृश्य-भूमि (Landscape) का प्रमाणिक ज्ञान ऐसे साधनों द्वारा होने लगा है। इससे मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रकार की सम्बन्धित सूचनाएँ प्राप्त की जाती हैं

  • भतल पर विकसित दृश्यावली एवं दृश्यभूमि (An Areal Mosaic and Landscapes)
  • प्राकृतिक प्रदेश एवं पृष्ठभूमि (Natural regions and its background)
  • भूशैल एवं भू-विज्ञान अध्ययन तकनीकी-रडार इन्फ्रारेड एवं विविध बैण्डों की रंगीन फोटोग्राफी से विभिन्न प्रकार की शैलों, मिट्टियों एवं खनिजों का प्रारम्भिक अध्ययन किया जाता है
  • प्रादेशिक यातायात विकास हेतु नीति निर्धारण इससे सम्भावित मार्ग-निर्माण का स्वरूप एवं उसकी दिशा आदि का ज्ञान निरन्तर प्राप्त इमेजियरी चित्रों से होता है।

सुदूर-संवेदन विधि (Remote Sensing) द्वारा अर्द्धविकसित प्रदेशों का एवं ऐसे क्षेत्रों का, जिनका कि एकाधिक कारणों से स्थलाकृति मानचित्र उपलब्ध नहीं है, का सम्पूर्ण सर्वेक्षण कार्य अल्प समय में ही पूरा किया जा सकता है। लेण्डसेट उपग्रह शृंखला, इण्टलसेट, रोहिणी, इनसेट I-B से प्राप्त अनेक प्रकार की वेवलेन्थ (Wave length) वाली अलग-अलग बैण्ड (Band) से प्राप्त इमेजरी से संसाधनों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त हुई है। इस दृष्टि से बेण्ड 5 से 7 के बीच विभिन्न स्तरों व बेण्डों के इमेजरी (Imagery) का ज्ञान मानचित्र एवं परिणाम अलग-अलग आभाओं की सघनता एवं विरलता से लगता है।

इससे सरलता से वनों के प्रकार, उनके विकास की अवस्था, फसलों के प्रकार एवं अवस्था, उनके रोग एवं प्रकोप, वनों के विदोहन की सम्भावनाएँ, चट्टानों एवं मिट्टियों का विशिष्ट वितरण, किसी क्षेत्र की पहुँच आदि बातों का पता लगाया जा सकता है। इन्फ्रारेड इमेजरी (Infra-red Imagery) के द्वारा इन सबकी सघनता एवं विरलता का ज्ञान होता है। इसी कारण अब वायु फोटो व्याख्या एवं दूरस्थ संवेदन (Remote Sensing) अपने-आप में एक महत्त्वपूर्ण स्वतन्त्र विज्ञान बनता जा रहा है। इसकी विधियों में तीव्र गति से विकास हो रहा है। इसके साथ ही अब इसमें लेजर किरणों का प्रयोग कर साधारण फोटो या त्रिविमीय (Third Dimensional)

फोटोग्राफी करने के लिए होलोग्राफी (Holography) का भी प्रयोग किया जाने लगा है। इस तकनीक द्वारा वायुफोटो एवं इमेजरी एवं दूरस्थ संवेदन तन्त्र को सीखने हेतु विशिष्ट प्रशिक्षण अनुसन्धान केन्द्र भी स्थापित किए जा चुके हैं। भारत में ऐसे केन्द्र हासन, हैदराबाद, देहरादून तथा अहमदाबाद में स्थापित किए गए हैं। कुछ अन्य केन्द्रों, जिनमें हरिकोटा, कोलकाता एवं दिल्ली मुख्य हैं, में ऐसी सुविधाएँ विकसित की जा चुकी हैं।

भूगोल में इस तकनीक का प्रयोग न सिर्फ विषय के विकास के लिए वांछनीय है, बल्कि यह एक अनिवार्य तत्त्व बनकर स्थान (Locality), क्षेत्र (Area) अनेक प्रकार के प्रदेशों (Various types of regions e.g., Macro, Meso, Mico) की तुलनात्मक व्याख्या, विश्लेषण एवं नियोजन के लिए भी किया जाता है।

नवीन परिवेश से भूतल की क्रियाओं से प्रभावित आँकड़े फोटो एवं इमेजरी सूचनाएँ एवं पृष्ठभूमि के द्वारा जो सम्पूर्ण सूचना संग्रह प्राप्त होता है, उसके परिष्करण, विश्लेषण एवं परिणाम की प्रक्रिया में भी निश्चित रूप से गतिशीलता एवं तेजी बनी रहनी चाहिए। इसी कारण वर्तमान समय में दूरस्थ संवेदन विधियों का प्रयोग बढ़ रहा है। दूरस्थ संवेदन में व्याख्या करने के लिए निम्नलिखित आधारों का सहारा लेना पड़ता है
1. आकार-अधिकांश दूरस्थ संवेदन चित्रों को अनेक आकार के आधार पर पहचाना जा सकता है; जैसे पहाड़ी क्षेत्रों का उच्चावच मैदानी क्षेत्रों की तुलना में छोटा व विरल होता है। मैदान के आकार को देखकर कृषि की सघनता देखी जाती है। अधिकतर वस्तुओं को मानक के आधार पर पहचाना जाता है।

2. आकृति-आकाशीय छायाचित्रों के विश्लेषण के लिए यह जरूरी है कि वस्तुओं की आकृति का ज्ञान हो, भवन व कारखाने, खेत, सड़कें, रेलमार्ग, नहरें, रजवाहे, खेल के मैदान तथा बाग-बगीचे आदि नियमित ज्यामितीय आकृति के होते हैं, जबकि नदी, झीलें, मरुस्थल, तालाब एवं वन आदि अनियमित आकृति के होते हैं।

3. आभा आकाशीय छायाचित्रों में धूसर रंग की विभिन्न प्रकार की आभाएँ होती हैं, इन आभाओं का गहरापन इस बात पर आधारित है कि धरातल से प्रकाश की कितनी मात्रा परावर्तित होती है। यदि सतह पर प्रकाश का परावर्तन अधिक होता है तो आभाएँ पतली होती हैं तथा प्रकाश के कम परावर्तन में आभाएँ गहरी होती हैं।

इन आभाओं के आधार पर छायाचित्रों को पहचाना. जाता है; जैसे स्वच्छ पानी, गहरा धूसर या काला दिखाई देता है, जबकि गन्दा पानी हल्का भूरा दिखाई देता है। ऊर्ध्वाधर छायाचित्रों में सड़कों की आभा रेलमार्गों से कम होती है, क्योंकि सड़कों से प्रकाश का परावर्तन अधिक होता है। इसी तरह शुष्क भू-भाग की अपेक्षातर भू-भाग की आभा हल्के रंग की दिखाई देती है। रेत का रंग सफेद दिखता है। लम्बी फसल वाले क्षेत्र की आभा गहरी दिखती है। पके गेहूँ की कृषि की आभा हल्के रंग की दिखाई देती है।

4. गठन गठन अनेक तरह का होता है; जैसे चिकना, चितकबरा एवं धारीदार आदि। आकाशीय छायाचित्रों के गठन द्वारा भी क्षेत्रों की पहचान अच्छे ढंग से की जा सकती है। सामान्यतः जुते हुए खेतों का गठन धारीदार, झाड़ियों का गठन महीन चितकबरा एवं वनों का गठन मोटा चितकबरा होता है।

5. परछाई परछाई से हमें पता चलता है कि सम्बन्धित विवरण सामान्य धरातल से नीचा है या ऊँचा है। परछाई विवरण के बाहर ता है, जबकि परछाई विवरण अन्दर होने पर धरातल नीचा होगा। परछाई से ऊँचाई भी ठीक ज्ञात की जा सकती है। यदि हवाई चित्रों में अक्षांशीय विस्तार दिया हो तो परछाई से दिशाएँ भी ज्ञात की जा सकती हैं।

6. पहुँच मार्ग-पहुँच मार्गों के द्वारा भी छायाचित्रों को पहचाना जा सकता है, जैसे किसी आवास तक कोई मार्ग अवश्य होगा, . यदि वह मार्ग चित्र में समाप्त होता दिखाई दे तो स्पष्ट होता है कि यहाँ आवास गृह अवश्य होंगे, चाहे वे दिखाई न देते हों।

लक्ष्यों की पहचान तथा उनके महत्त्व को जानने के लिए प्रतिबिम्बों के परीक्षण करने का कार्य प्रतिबिम्ब व्याख्या के रूप में परिभाषित किया जाता है। व्याख्याकार दूरस्थ संवेदन (Remote Sensing) के आँकड़ों का अध्ययन करता है। वायु फोटोग्राफी विधि में निम्नलिखित नौ तत्त्व महत्त्वपूर्ण माने गए हैं-

  • आकृति
  • आकार
  • आभा
  • छाया
  • गठन
  • पैटर्न
  • स्थान
  • प्रस्ताव
  • स्टीरियोस्कोपिक आकृति।

आकाशीय फोटोचित्रों का मापक भारतीय सर्वेक्षण विभाग की तरह निश्चित एवं समान नहीं होता। आकाशीय फोटोचित्रों में । किन्हीं दो या अधिक स्थानों का मापक भारतीय सर्वेक्षण विभाग के उन्हीं स्थानों को सन्दर्भ बिन्दु मानकर मापक का पता लगाया जाए तो कभी भी समान नहीं होगा। इसे निम्नलिखित सूत्र द्वारा ज्ञात किया जाता है-
मापक = \(\frac { f }{ H’ }\)
यहाँ f = कैमरा (लैन्स) की फोकस दूरी।
H = माध्य, H = H-h (H = M.S.L. से ऊँचाई, h = सामान्य ऊँचाई)
भारतीय दूरस्थ संवेदन उपग्रह प्रणाली (आई०आर०एस०) राष्ट्रीय प्राकृतिक संसाधन प्रणाली का मुख्य भाग है एवं अन्तरिक्ष . विभाग दूरस्थ संवेदन आँकड़े उपलब्ध कराने वाली मुख्य संस्था है। इस संस्था का पहला उपग्रह आई०आर०एस० -ए मार्च, 1988 में अन्तरिक्ष में छोड़ा गया था। पहले की तरह दूसरा भारतीय दूर-संवेदी उपग्रह आई०आर०एस० I-बी अगस्त, 1991 में छोड़ा गया था। भारतीय दूरस्थ संवेदन प्रणाली आई०आर०एस० I-सी, आई०आर०एस०पी०-3, आई०आर०एस० -डी तथा आई०आर०एस०पी०-4 के प्रक्षेपण से बहुत सुदृढ़ हुई है। इनमें अन्तिम तीन उपग्रहों का प्रक्षेपण भारतीय प्रक्षेपण यान पी०एस०एल०वी० द्वारा किया गया। आई०आर०एस० -सी को 28 दिसम्बर 1995 में एक रूसी रॉकेट से तथा आई०आर०एस०डी० को पी०एस०एल०वी० से 29 दिसम्बर, 1997 को अन्तरिक्ष में छोड़ा गया था।

इन अन्तरिक्ष यानों में पहले अन्तरिक्ष यानों की तुलना में बेहतर वर्णक्रमीय और स्थानिक विभेदन, अधिक तेजी से चक्कर लगाने, स्टीरियो (त्रिविमीय) निरीक्षण और रिकॉर्डिंग क्षमता अधिक होती है। इनमें रखे टेप-रिकॉर्ड आँकड़ों को दर्ज करते हैं। आई०आर०एस०पी०-3 को 21 मार्च, 1996 में छोड़ा गया था। इसमें डी०एल०आर० जर्मनी द्वारा परिकल्पित आप्टो इलैक्ट्रानिक स्केनर है। इसमें वनस्पति विज्ञान के अध्ययन के लिए आई०आर०एस० I-सी की तरह ही एक अतिरिक्त शार्ट वेव बैण्ड है तथा एक्स-रे खगोल-विज्ञान पर लोड भी है जो अन्तरिक्ष के एक्सरे-स्रोतों के स्पेक्ट्रम की विशेषताएँ एवं उनमें परिवर्तन की जानकारी देता है। पी०एस०एल०वी० से आई०आर०एस०पी० को 26 मई, 1999 को अन्तरिक्ष में छोड़ा गया था। भारत में दूरस्थ संवेदन (Remote Sensing) विधि का प्रयोग निम्नलिखित क्षेत्रों में किया जा रहा है

  • विभिन्न फसलों के क्षेत्रफल और उत्पादन का आकलन
  • बंजर भूमि प्रबन्धन
  • शहरी विकास
  • बाढ़ नियन्त्रण और क्षति का आकलन
  • भूमि उपयोग
  • जलवायु के अनुसार कृषि की योजना बनाना
  • मौसम सम्बन्धी जानकारी के लिए
  • जल संसाधन का प्रबन्धन
  • भूमिगत पानी की खोज
  • मत्स्य पालन विकास
  • खनिजों का पता लगाना
  • वन-संसाधनों के सर्वेक्षण आदि।

सुदूर संवेदन का परिचय HBSE 11th Class Geography Notes

→ सुदूर-संवेदन (Remote Sensing) : किसी वस्तु को छुए बिना उसका बोध या संवेद होना सुदूर-संवेदन कहलाता है।

→ मैग्नेटोमीटर (Magnetometre) : यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।

→ ग्रेवीमीटर (Gravimetre) : यह पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में होने वाले परिवर्तनों को मापता है।

→ संवेदक (Sensors) : संवेदक एक प्रकार की मशीनें युक्ति या उपकरण होते हैं जो विद्युत चुंबकीय विकिरण ऊर्जा को एकत्रित करते हैं और उन्हें संकेतकों में बदलकर अन्वेषण लक्ष्यों के विषय में सूचना प्रदान करते हैं।

→ वर्णक्रमीय विभेदन (Spectral Resolution) : यह विभेदन विद्युत-चुंबकीय स्पेक्ट्रम के विभिन्न ऊर्जा क्षेत्रों में संवेदक के अभिलेखन की क्षमता से संबंधित है।

→ प्रतिबिम्ब (Image) : प्रतिबिम्ब किसी क्षेत्र विशेष को संसूचित व अभिलेखित की गई ऊर्जा का चित्र रूप में प्रदर्शन करता है।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 6 वायव फोटो का परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. पहली बार वायव फोटो खींचने के लिए वायुयान का प्रयोग कब हुआ?
(A) सन् 1902 में
(B) सन् 1905 में
(C) सन् 1907 में
(D) सन् 1909 में
उत्तर:
(D) सन् 1909 में

2. भारत में वायव फोटो चित्र का सर्वप्रथम उपयोग कब हुआ?
(A) सन् 1908 में
(B) सन् 1912 में
(C) सन् 1915 में
(D) सन् 1916 में
उत्तर:
(D) सन् 1916 में

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

3. मापनी के आधार पर वायव फोटो को कितने प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है?
(A) तीन
(B) चार
(C) पाँच
(D) छः
उत्तर:
(A) तीन

4. वायव फोटोग्राफी की कितनी विधियाँ हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(A) दो

5. भारत में कितनी उड्डयन एजेंसी ही सरकारी अनुमति से वायव फोटो ले सकती हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(B) तीन

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
फोटोग्राममिति किसे कहा जाता है?
उत्तर:
वायव फोटो चित्रों से धरातलीय एवं अन्य सूचनाओं के मापन और चित्रण की कला और विज्ञान को फोटोग्राममिति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में वायव फोटो चित्र का सर्वप्रथम उपयोग किसने किया था?
उत्तर;
मेजर सी.पी. गुंडुर (1916) ने।

प्रश्न 3.
राष्ट्रीय सुदूर संवेदी संस्था कहाँ स्थित है?
उत्तर:
हैदराबाद में।

प्रश्न 4.
‘नत फोटोग्राफ’ किसे कहते हैं?
उत्तर:
ऊर्ध्वाधर अक्ष से प्रकाशीय अक्ष में 3° से अधिक विचलन वाले फोटोग्राफ को ‘नत फोटोग्राफ’ कहा जाता है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

प्रश्न 5.
ऊर्ध्वाधर अक्ष किसे कहते हैं?
उत्तर:
कैमरा लैंस केन्द्र से धरातलीय तल पर बने लंब को ऊर्ध्वाधर अक्ष कहा जाता है।

प्रश्न 6.
बृहत मापनी फोटोग्राफ किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब एक वायव फोटो की मापनी 1:15,000 तथा इससे बड़ी होती है, तो इस प्रकार को फोटोग्राफ के बृहत मापनी फोटोग्राफ कहते हैं।

प्रश्न 7.
वायव फोटो चित्रों में दर्ज भौतिक तथा मानवीय लक्षणों की पहचान किस आधार पर की जा सकती है?
उत्तर:
आभा एवं आकृति के आधार पर।

प्रश्न 8.
विश्व का पहला फोटोग्राफिक सर्वेक्षण कब और किसने किया था?
उत्तर:
विश्व का पहला फोटोग्राफिक सर्वेक्षण सन् 1840 में फ्राँस के ल्यूसिडा (Laussedat) ने किया था।

प्रश्न 9.
उपग्रह द्वारा इमेजरी प्राप्त करने का प्रचलन कब से शुरू हुआ?
उत्तर:
1970 के दशक से।

प्रश्न 10.
स्टीरियोस्कोप कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
दो प्रकार का-

  1. लैंस स्टीरियोस्कोप
  2. दर्पण स्टीरियोस्कोप।

प्रश्न 11.
वाय फोटो चित्रों में स्वच्छ जल कैसा दिखाई देता है?
उत्तर:
काला या धूसर।

प्रश्न 12.
वायु फोटो चित्रों में रेतीले इलाके का रंग कैसा दिखाई देता है?
उत्तर:
सफेद।

प्रश्न 13.
वायव फोटो का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वायुयान में लगे कैमरे द्वारा वायुमण्डल से खींची गई फोटो को वायव फोटो कहा जाता है। वायव फोटो भू-तल का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है जिसकी सहायता से स्थलाकृतिक मानचित्रों को बनाने में सहायता मिलती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायव फोटो के महत्त्वपूर्ण उपयोग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वायव फोटो के उपयोग निम्नलिखित हैं-

  1. वायव फोटो हमें बड़े क्षेत्रों का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है जिनसे पृथ्वी की सतह की स्थलाकृतियों को उनके स्थानिक सन्दर्भ में देखा जा सकता है।
  2. वायव फोटो का उपयोग ऐतिहासिक अवलोकन में किया जाता है।
  3. वायव फोटो से पृथ्वी के धरातलीय दृश्यों का त्रिविम स्वरूप प्राप्त किया जा सकता है।
  4. वायुयान की ऊँचाई के आधार पर विभिन्न मापनियों पर आधारित वायुफोटो चित्रों को प्राप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 2.
वायव फोटो के लक्षणों की पहचान किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
वायव फोटो की व्याख्या करने के लिए निम्नलिखित आधारों का सहारा लेना पड़ता है-
1. आभा (Tone) सामान्यतः वायु फोटो में ब्लैक एण्ड व्हाइट चित्र लिए जाते हैं जिनमें धूसर रंग की अनेक आभाएँ होती हैं जो धरातल द्वारा परावर्तित प्रकाश की मात्रा पर निर्भर करती है। धरातल के जिस भाग से प्रकाश का अधिक परावर्तन होता है, वायु फोटो में उस भाग की आभा हल्की होगी और पृथ्वी का जो भाग प्रकाश का कम परावर्तन करेगा उस भाग की आभा वायु फोटो पर गहरी होगी। उदाहरणस्वरूप स्वच्छ जल धूसर या काला दिखाई देगा जबकि सड़कों और रेल मार्गों की आभा हल्की होती है।

2. आकृति (Shape)-सामान्यतः प्राकृतिक लक्षण अनियमित आकार के होते हैं तथा मानवीय लक्षणों का आकार नियमित होता है; जैसे नदियों, तालाबों, पर्वतों तथा मरुस्थलों की आकृति अनियमित होती है जबकि मानवकृत भवन, खेत, सड़कें, रेलें आदि नियमित आकार प्रदर्शित करते हैं।

3. आकार (Size) धरातलीय लक्षणों की पहचान उनके आकार से भी की जा सकती है। उदाहरणतया नहर पतली व सीधी दिखाई देती है तथा नदी बड़ी व टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देती है।

4. त्रिविमीय प्रतिरूप (Stereoscopic Pattern)-अतिव्यापन वाले दो वायव फोटो की सहायता से त्रिविमीय स्वरूप देखकर प्रदर्शित तथ्यों की पहचान आसानी से की जा सकती है।

प्रश्न 3.
फोटोग्राफिक सर्वेक्षण का संक्षिप्त इतिहास बनाते हुए वायु फोटो के उपयोगों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
विश्व का पहला फोटोग्राफिक सर्वेक्षण सन् 1840 में फ्रांस के ल्यूसिडा (Laussedat) ने किया था। वायु फोटोग्राफी का वास्तविक विकास द्वितीय विश्व युद्ध में आरम्भ हुआ। आजकल तो वायु फोटो का उपयोग स्थलाकृतिक सर्वेक्षण (Tapographical Survey), भू-विज्ञान (Geology), जल विज्ञान (Hydrology), वानिकी (Forestry), पुरातत्व विज्ञान (Archeology), मृदा अपरदन के नियन्त्रण, यातायात नियन्त्रण तथा अनेक प्रकार के खोज कार्यों में किया जाने लगा है।

प्रश्न 4.
वायु फोटोग्राफी के तेजी से उभरने के कारण और उद्देश्य क्या हैं?
उत्तर:
वायु फोटोग्राफी के तेजी से उभरने के प्रमुख कारण और उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  1. इनकी सहायता से अगम्य (Inaccessible) क्षेत्रों का चित्रण बहुत ही आसान हो गया है।
  2. जो सर्वेक्षण साधारण विधियों द्वारा कई-कई महीनों में तैयार होता था, वायु फोटो द्वारा वह अत्यन्त थोड़े समय में तैयार हो जाता है और वह भी बिना किसी त्रुटि के।
  3. यद्यपि इस विधि का प्रारम्भिक व्यय अधिक है किन्तु अन्ततः इसका कुल व्यय साधारण विधियों की अपेक्षा कम ही पड़ता है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

प्रश्न 5.
उपग्रहीय इमेजरी क्या होती है? इन चित्रों से किस प्रकार की सहायता मिलती है?
उत्तर:
अन्तरिक्ष में उच्च तकनीक से युक्त संवेदनशील उपकरणों से सुसज्जित उपग्रहों को स्थापित करके उनके द्वारा लिए गए चित्रों को उपग्रहीय इमेजरी कहा जाता है। इन चित्रों से दूर संवेदन में सहायता मिलती है। दूर संवेदन के लिए उपग्रह द्वारा इमेजरी प्राप्त करने का प्रचलन 1970 के दशक में आरम्भ हुआ।

प्रश्न 6.
उपग्रहीय इमेजरी वायु फोटोग्राफी से क्यों बेहतर है?
उत्तर:
उपग्रहीय इमेजरी वायु फोटोग्राफी से निम्नलिखित कारणों से बेहतर है-

  1. उपग्रह इमेजरी से अपेक्षाकृत विस्तृत क्षेत्रों के भौतिक तथा मानवीय तत्त्वों का अवलोकन किया जा सकता है।
  2. सार अवलोकन (Synoptic Coverage) के लिए उपग्रह द्वारा इमेजरी वायु फोटो की अपेक्षा अधिक सार्थक एवं कारगर है।
  3. उपग्रह द्वारा चित्रण और उनकी पुनरावृत्ति (Repetition) अत्यन्त शीघ्र होती है। इसमें क्षण भर में उतनी जानकारी प्राप्त हो जाती है जितनी रूढ़ चित्रण (Conventional Contact Prints) द्वारा कई घण्टों तक प्राप्त नहीं हो सकती द्वारा इतनी जानकारी जुटाने में अनेक वर्ष लग सकते हैं।
  4. यदि उपग्रह ध्रुवीय कक्षा में स्थिति हो तो इसमें सम्पूर्ण पृथ्वी का भी चित्रण किया जा सकता है।

प्रश्न 7.
लैंस स्टीरियोस्कोप पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
लैंस स्टीरियोस्कोप-यह एक साधारण-सा उपकरण होता है जिसमें दो जुड़वा टाँगों वाले स्टैण्ड पर एक फ्रेम फिट किया गया होता है। इस क्षैतिज फ्रेम पर निश्चित दूरी के अन्तर पर दो लैंस लगे होते हैं। इन लैंसों के एकदम निकट आँख रखकर स्टीरियोस्कोप के नीचे रखे गए अतिव्यापित (Overlapped) फोटो चित्रों का अध्ययन किया जा सकता है। वायु फोटो के अतिव्यापन का एक तरीका होता है। सबसे पहले मेज पर स्टीरियोस्कोप के नीचे एक फोटो चित्र रखा जाता है। इसके ऊपर दूसरा फोटो चित्र इस प्रकार रखा जाता है कि उनके अतिव्यापित भाग ठीक एक-दूसरे के ऊपर आ जाएँ। अब ऊपर वाले वायु फोटो को दायीं ओर 5 सें०मी० सरकाइए। ऐसा करते समय ध्यान रहे कि निचले वायु फोटो के सन्दर्भ में ऊपरी वायु फोटो का अनुस्थान बिगड़ न जाए। ऐसी स्थिति में जब हम स्टीरियोस्कोप में से देखेंगे तो हमें अतिव्यापित फोटो चित्रों में धरातल का त्रि-विस्तारीय (Three Dimensional) स्वरूप दिखाई देगा।

प्रश्न 8.
सार सर्वेक्षण अथवा अवलोकन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इस सर्वेक्षण में केवल अपेक्षित विषय के बारे में सूचनाएँ एवं चित्र इकट्ठे किए जाते हैं न कि समस्त क्षेत्र के। उदाहरणतया यदि हम भारत के पूर्वी एवं पश्चिमी तटों पर स्थिति लैगून झीलों का सर्वेक्षण करते हैं, सम्पूर्ण तटीय प्रदेश का नहीं, तो इसे सार सर्वेक्षण कहा जाएगा।

प्रश्न 9.
मानचित्र तथा वायव फोटों में अन्तर बताइए।
उत्तर:
मानचित्र तथा वायव फोटो में अन्तर निम्नलिखित है-

मानचित्र फोटोवायव फोटो
1. इनकी रचना लम्बकोणीय प्रक्षेप पर होती है।1. इनकी रचना केन्द्रीय प्रक्षेप पर होती है।
2. इसमें मापनी एक समान होती है।2. इसमें मापनी एकसमान नहीं होती है।
3. अगम्य तथा अवास्य क्षेत्रों में मानचित्र बनाना अत्यधिक कठिन है।3. वायव फोटो अगम्य तथा अवास्य क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी है।
4. इसमें दिकमान शुद्ध होता है।4. इसमें दिक्मान अशुद्ध होता है।
5. मानचित्र पर धरातल के लक्षण अदृश्य होते हैं।5. वायव फोटो में धरातलीय लक्षणों को पहचाना जा सकता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायव फोटो के प्रकारों का विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वायव फोटो का वर्गीकरण-वायव फ़ोटो का वर्गीकरण अनेक आधारों पर किया जा सकता है; जैसे कैमरा अक्ष, मापनी, व्याप्ति क्षेत्र के कोणीय विस्तार एवं उसमें उपयोग में लाई फिल्म के आधार पर किया जाता है। लेकिन वायव फोटो का प्रचलित वर्गीकरण, कैमरा अक्ष की स्थिति और मापनी के आधार पर किया जाता है।
1. कैमरा अक्ष की स्थिति के आधार पर वायव फोटो के प्रकार कैमरा अक्ष की स्थिति के आधार पर वायव फोटो को निम्नलिखित प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  • ऊर्ध्वाधर फोटोग्राफ
  • अल्प तिर्यक फोटोग्राफ
  • अति तिर्यक फोटोग्राफ।

(1) ऊर्ध्वाधर फोटोग्राफ (Vertical Photograph)-वायव फोटो को खींचते समय कैमरा लैंस के केंद्र से दो विशिष्ट अक्षों की रचना होती है

  • धरातलीय तल की ओर
  • फोटो के तल की ओर।

कैमरा लैंस केंद्र से धरातलीय तल पर बने लंब को ऊर्ध्वाधर अक्ष (Vertical Axis) कहा जाता है, जबकि लैंस के केंद्र से .. फ़ोटो की सतह पर बनी साहुल रेखा को फोटोग्राफी ऑप्टीकल अक्ष (Optical Axis) कहा जाता है। जब फोटो की सतह को धरातलीय सतह के ऊपर, उसके समांतर रखा जाता है, तब दोनों अक्ष एक-दूसरे से मिल जाते हैं। इस प्रकार, प्राप्त फोटो को ऊर्ध्वाधर वायव फोटो कहते हैं (चित्र 7.1)। यद्यपि, दोनों सतहों के बीच समांतरता प्राप्त करना काफ़ी कठिन होता है, क्योंकि वायुयान पृथ्वी की वक्रीय सतह (Curved surface) पर गति करता है। इसलिए फोटोग्राफ के अक्ष ऊर्ध्वाधर अक्ष से विचल
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 1
(Deviate) हो जाते हैं। यदि इस प्रकार का विचलन धनात्मक या ऋणात्मक 3° के भीतर होता है, तो लगभग ऊर्ध्वाधर वायव फ़ोटो प्राप्त होते हैं। ऊर्ध्वाधर अक्ष से प्रकाशीय अक्ष में 3° से अधिक विचलन वाले फोटोग्राफ को नत फोटोग्राफ कहा जाता है।

(2) अल्प तिर्यक फोटोग्राफ (Low Oblique Photograph)-ऊर्ध्वाधर अक्ष से कैमरा अक्ष में 150 से 30° के अभिकल्पित विचलन (Designed Deviation) के साथ लिए गए वायव फ़ोटो को अल्प तिर्यक फ़ोटोग्राफ़ कहा जाता है (चित्र 7.2)। इस प्रकार के फोटोग्राफ का उपयोग प्रायः प्रारंभिक सर्वेक्षणों में होता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 2

(3) अति तिर्यक फोटोग्राफ़ (High Oblique Photography)-ऊर्ध्वाधर अक्ष से कैमरे की धुरी को लगभग 60° झुकाने पर एक अति तिर्यक फोटोग्राफ प्राप्त होता है (चित्र 7.3)। इस प्रकार की फ़ोटोग्राफी भी प्रारंभिक सर्वेक्षण में उपयोगी होती है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 3

2. मापनी के आधार पर वायव फोटो के प्रकार मापनी के आधार पर वायव फ़ोटो को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है
(1) बृहत मापनी फोटोग्राफ (Large Scale Photograph)-जब एक वायव फोटो की मापनी 1:15,000 तथा इससे बड़ी होती है, तो इस प्रकार को फोटोग्राफ के बृहत मापनी फ़ोटोग्राफ़ कहते हैं (चित्र 7.4)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 4

(2) मध्यम मापनी फोटोग्राफ (Medium Scale Photograph)-ऐसे वायव फोटो की मापनी 1:15,000 से 1:30,000 के बीच होती है (चित्र 7.5)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 5

(3) लघु मापनी फोटोग्राफ़ (Small Scale Photograph)-1:30,000 से लघु मापक वाले फ़ोटोग्राफ़ को लघु मापनी फोटोग्राफ़ कहा जाता है (चित्र 7.6)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय 6

प्रश्न 2.
वायव फोटो में लक्षणों की पहचान किस प्रकार की जाती है?
उत्तर:
वायव फ़ोटो पर प्रदर्शित तथ्यों के बारे में विवरण नहीं दिया गया होता और न ही उन पर किसी संकेत या रूढ़ चिह्न का प्रयोग किया जाता है। वायु फ़ोटो में वृत्तों एवं पट्टियों पर कुछ प्रारंभिक सूचनाएँ अंकित होती हैं, जिनसे कुछ सामान्य प्रारंभिक जानकारी ही प्राप्त हो पाती है। अतः वायु फोटो चित्रों पर प्रदर्शित तथ्यों का विश्लेषण करने के लिए निम्नलिखित चीज़ों की आवश्यकता होती है-

  • जिस क्षेत्र के वायव फोटो का विश्लेषण करना है, वहां का मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र होना चाहिए ताकि बिंबों (Images) को पहचाना जा सके।
  • वायव चित्र में दिखाए गए क्षेत्र की भौतिक एवं मानवीय विशेषताओं की जानकारी विश्लेषणकर्ता को होनी चाहिए।

किसी क्षेत्र के वायु फोटो चित्रों में दर्ज भौतिक तथा मानवीय लक्षणों की पहचान आभा एवं आकृति के आधार पर की जा सकती है।
1. आभा (Tone)-यूं तो आजकल रंगीन हवाई चित्रों का चलन हो गया है किंतु सामान्यतया वायु फोटोग्राफ़ी में ब्लैक एंड व्हाइट चित्र ही लिए जाते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट वायु चित्रों में धूसर रंग की अनेक आभाएं होती हैं जो धरातल द्वारा परावर्तित (Reflected) प्रकाश की मात्रा पर निर्भर करती हैं।

धरातल के जिस भाग से प्रकाश का परावर्तन ज्यादा होता है, वायु फ़ोटो में उस भाग की आभा हल्की (Light) होती है। इसके विपरीत धरती का जो भाग प्रकाश का कम मात्रा में परावर्तन करता है उस भाग की वायु फ़ोटो पर आभा गहरी होती है। अतः स्पष्ट है कि वायु फोटो चित्र पर भिन्न-भिन्न गहराई की आभाएं पाई जाती हैं। इन आभाओं के गहरेपन के आधार पर ही विभिन्न लक्षणों की पहचान की जा सकती है। देखिए कुछ उदाहरण-

  • स्वच्छ जल ऊर्ध्वाधर फ़ोटो (Vertical Photo) में घूसर या काला दिखाई देता है।
  • रेतीले इलाके का रंग सफेद दिखाई देता है।
  • गंदला जल हल्का भूरा दिखाई पड़ता है।
  • नमी वाली भूमि शुष्क भूमि की अपेक्षा गहरे रंग की प्रतीत होती है।
  • खेतों की आभा का गहरापन फसलों की लंबाई पर निर्भर करता है।
  • गेहूं की पकी हुई फसल हल्के रंग की आभा देती है।
  • हरियाली गहरे भूरे से काले रंग के बीच की आभा होती है।
  • सड़कों की आभा रेलमार्गों की आभा से हल्की होती है।

2. आकृति (Shape)-वस्तुओं के आकार की पहचान कर पाना वायु फ़ोटो चित्रों के अध्ययन में सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। आमतौर पर प्राकृतिक लक्षणों की अनियमित(Irregular) तथा मानवीय लक्षणों की आकृति नियमित होती है। उदाहरणतया नदियों, नालों, वनों, तालाबों, झीलों, मरुस्थलों, पर्वतों तथा तट रेखाओं आदि प्राकृतिक लक्षणों की आकृति अनियमित होती है जबकि मानवकृत वस्तुओं; जैसे भवन, खेत, सड़कें, नहरें, खेल के मैदान आदि नियमित आकार के होते हैं लेकिन इसके अपवाद भी हो सकते हैं। उदाहरणतः युद्ध की स्थिति में बैरकों, बंकरों, वाहनों, युद्ध सामग्रियों तथा जवानों को अनियमित रूप दे दिया जाता है जिसे छद्मावरण(Camouflage) कहते हैं ताकि वायुयान में बैठे शत्रु को सैनिक ठिकानों का आभास न हो सके।

3. आकार (Size)-तथ्यों के सापेक्षिक आकार से भी उनकी पहचान की जा सकती है। उदाहरणतः नहर पतली व सीधी दिखाई देती है जबकि नदी अपेक्षाकृत बड़ी और टेढ़ी-मेढ़ी दिखाई देती है। इसी प्रकार कारखाने लंबाकार व आवासीय भवन अपेक्षाकृत छोटे होते हैं।

4. गठन (Texture)-परती एवं बंजर भूमि सपाट व कहीं-कहीं धब्बों ये युक्त भूरे रंग की होती है। कृषि क्षेत्र की पहचान खेतों के आकार, मेढ़ तथा नहरों की स्थिति से की जा सकती है।

5. साहचर्य (Association)-तथ्यों के आस-पास स्थित अन्य तथ्यों से उनके संबंध के आधार पर भी तथ्यों की पहचान की जा सकती है। उदाहरणतः मानव अधिवास के क्षेत्र में सड़कें, गलियां एवं बाहर की ओर कृषि क्षेत्र मिलेगा। कृषि क्षेत्र में नहरों के होने की संभावना हो सकती है। पर्वतीय क्षेत्रों, वनों व नदियों और झीलों में भी साहचर्य पाया जाता है।

6. त्रिविमीय प्रतिरूप (Stereoscopic Pattern)-अतिव्यापन (Overlapping) वाले दो वायव फ़ोटो की सहायता से त्रिविमीय स्वरूप देखकर प्रदर्शित तथ्यों की पहचान आसानी से की जा सकती है। यह एक महत्त्वपूर्ण पान जाताना स का जा सकती है। यह एक महत्त्वपूर्ण विधि है, जिससे विवरणों की पहचान और विश्लेषण किया जा सकता है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 6 वायव फोटो का परिचय

वायव फोटो का परिचय HBSE 11th Class Geography Notes

→ वायव फोटो (Air Photo) वायुयान अथवा हैलीकॉप्टर में लगे कैमरे द्वारा वायुमण्डल से खींची गई फोटो को वायव फोटो कहा जाता है।

→ फोटोग्राममिति (Photogrammetry)-वायव फोटो चित्रों से धरातलीय एवं अन्य सूचनाओं के मापन और चित्रण की कला और विज्ञान को फोटोग्राममिति कहा जाता है।

→ प्रतिबिंब निर्वचन (Imagery Interpretation) यह वस्तुओं के स्वरूपों को पहचानने तथा उनके सापेक्षिक महत्त्व से निर्णय लेने की प्रक्रिया है।

→ लम्बकोणीय प्रक्षेप (Orthogonal Projection) यह समान्तर प्रक्षेप की विशेष स्थिति है जिसमें मानचित्र, धरातल एवं लम्बकोणीय प्रक्षेप होते हैं।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला के स्थलाकृतिक मानचित्रों की संख्या कितनी है?
(A) 2,222
(B) 1,822
(C) 2,144
(D) 2,488
उत्तर:
(A) 2,222

2. सर्वे ऑफ इण्डिया का स्थापना वर्ष है-
(A) सन् 1744
(B) सन् 1755
(C) सन् 1764
(D) सन् 1767
उत्तर:
(D) सन् 1767

3. सर्वे ऑफ इण्डिया का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है?
(A) देहरादून में
(B) कोलकाता में
(C) मुम्बई में
(D) इलाहाबाद में
उत्तर:
(A) देहरादून में

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

4. कृषिकृत भूमि उपयोग को प्रदर्शित करने के लिए किस रंग का प्रयोग किया जाता है?
(A) पीला
(B) हल्का हरा
(C) भूरा
(D) लाल
उत्तर:
(A) पीला

5. मानचित्र पर उच्चावच प्रदर्शित करने की प्रचलित विधि है-
(A) हैश्यूर
(B) पहाड़ी छायाकरण
(C) समोच्च रेखाएँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थलाकृतिक मानचित्र क्या होते हैं?
उत्तर:
स्थलाकृतिक मानचित्र वृहत् पैमाने पर बने बहु-उद्देशीय मानचित्र होते हैं जिन पर प्राकृतिक व सांस्कृतिक लक्षणों के विवरण को देखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला के मानचित्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इस श्रृंखला के मानचित्रों को 1:1000000 अथवा 1:250000 के मापक पर बनाया जाता है। इनका विस्तार 4° अक्षांश तथा 6° देशान्तर होता है। इन मानचित्रों को वन-टू-वन मिलियन शीट भी कहा जाता है।

प्रश्न 3.
स्थलाकृतिक मानचित्रों पर कौन-कौन से विवरण अंकित होते हैं?
उत्तर:
इन मानचित्रों पर भौतिक और सांस्कृतिक विवरण दिखाए जाते हैं; जैसे उच्चावच, अपवाह तन्त्र, जलीय स्वरूप, प्राकृतिक वनस्पति, बस्तियाँ (गाँव, नगर), मार्ग, सड़कें, रेलमार्ग, भवन, स्मारक, संचार-साधन, सीमाएँ, पूजा-स्थल इत्यादि।

प्रश्न 4.
स्थलाकृतिक मानचित्रों पर भौतिक तथा सांस्कृतिक लक्षणों को किस तरीके (विधि) से दिखाया जाता है?
उत्तर:
रूढ़ चिह्नों द्वारा।

प्रश्न 5.
रूढ़ चिह्न क्या होते हैं?
उत्तर:
वे संकेत व प्रतीक जिनके माध्यम से मानचित्रों पर विभिन्न लक्षण प्रदर्शित किए जाते हैं, रूढ़ चिह्न कहलाते हैं।

प्रश्न 6.
स्थलाकृतिक मानचित्रों पर कौन-से प्रमुख भौगोलिक लक्षण नहीं दिखाए जाते हैं?
उत्तर:
जलवायु, तापमान, वर्षा, मिट्टी के प्रकार, चट्टानें, भू-गर्भ, फसलों के अन्तर्गत भूमि, जनसंख्या इत्यादि तत्त्व स्थलाकृतिक मानचित्रों पर नहीं दिखाए जाते।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

प्रश्न 7.
स्थलाकृतिक मानचित्रों का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यह सर्वेक्षण के समय की भू-तल की आकृति को हू बहू मानचित्र पर उतार देता है। अतः इसका उपयोग क्षेत्रीय विकास (Regional Development) के लिए खूब किया जाता है।

प्रश्न 8.
सर्वे ऑफ इण्डिया की स्थापना कब हुई थी? इसका मुख्य कार्यालय कहाँ स्थित है?
उत्तर:
इस विभाग की स्थापना सन् 1767 में हुई थी। इसका मुख्य कार्यालय देहरादून में है।

प्रश्न 9.
अन्तर्राष्ट्रीय शृंखला के मानचित्रों की कुल संख्या कितनी है?
उत्तर:
2,2221

प्रश्न 10.
अन्तर्राष्ट्रीय श्रृंखला के मानचित्रों का मापक क्या होता है?
उत्तर:
1:1,000,000; इन्हें एक मिलियन मानचित्र कहते हैं।

प्रश्न 11.
भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ये 4° दक्षिण से 40° उत्तर अक्षांश तथा 44° पूर्व से 104° पूर्व देशान्तर के बीच स्थित क्षेत्र के 106 मानचित्र हैं। इनका मापक 1:1,000,000 (मिलियन) है। इनका विस्तार 4° अक्षांश x 4° देशांतर है।

प्रश्न 12.
स्थलाकृतिक मानचित्र किस मापक पर बना होता है?
उत्तर:
वृहत् मापक पर।

प्रश्न 13.
स्थलाकृतिक मानचित्र किस विभाग द्वारा बनाए जाते हैं?
उत्तर:
भारतीय सर्वेक्षण विभाग द्वारा।

प्रश्न 14.
भारतीय सर्वेक्षण विभाग का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
देहरादून (उत्तराखंड)।

प्रश्न 15.
भारत के स्थलाकृतिक मानचित्रों की सूची संख्या बताओ।
उत्तर:
40 से 92 तक।

प्रश्न 16.
रूढ़ चिह्नों को मापक के अनुसार क्यों नहीं बनाया जाता?
उत्तर:
मापक के अनुसार बनाने पर अधिकतर लक्षण बहुत छोटे हो जाते हैं।

प्रश्न 17.
स्थलाकृतिक मानचित्रों में किसी क्षेत्र के ढाल का अनुमान कैसे लगता है?
उत्तर:
नदियों की प्रकट दिशा तथा समोच्च रेखाओं से।

प्रश्न 18.
मौसमी नदियों को किस रंग द्वारा प्रदर्शित किया जाता है?
उत्तर:
काले रंग से।

प्रश्न 19.
सड़कों तथा रेलमार्गों के साथ-साथ मिलने वाली बस्तियों का प्रतिरूप कैसा होता है?
उत्तर:
रेखीय प्रतिरूप।

प्रश्न 20.
भू-पत्रकों पर बस्तियों को किस रंग द्वारा दिखाया जाता है?
उत्तर:
लाल रंग से।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
स्थलाकृतिक मानचित्र क्या होता है?
उत्तर:
स्थलाकृतिक मानचित्र समतल और भूगणितीय सर्वेक्षणों पर आधारित ऐसे बहु-उद्देशीय मानचित्र होते हैं जिन्हें वृहत् मापक (Large Scale) पर बनाया जाता है। इन पर प्राकृतिक व सांस्कृतिक विवरण देखे जा सकते हैं; जैसे धरातल, जल-प्रवाह, वनस्पति, गाँव, नगर, सड़कें, नहरें, रेल लाइनें, पूजा स्थल इत्यादि विस्तारपूर्वक रूढ़ चिह्नों द्वारा प्रदर्शित किए जाते हैं।

प्रश्न 2.
स्थलाकृतिक मानचित्रों की उपयोगिता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यदि भू-तल पर वितरित विभिन्न भौतिक एवं सांस्कृतिक स्वरूपों में पाए जाने वाले अंतर्संबन्धों (Inter-relationships) का विश्लेषण और व्याख्या करनी हो तो स्थलाकृतिक मानचित्रों से बढ़िया और कोई साधन नहीं है। भौगोलिक अध्ययन के अतिरिक्त ये मानचित्र सैनिक गतिविधियों, प्रशासन, नियोजन, शोध, यात्रा तथा अन्वेषण के लिए भी उपयोगी होते हैं। रक्षा विशेषज्ञों का ऐसा कहना है कि युद्ध की सफलता सेना अधिकारियों द्वारा उस क्षेत्र के स्थलाकृतिक मानचित्रों के गहन अध्ययन पर निर्भर करती है क्योंकि ये मानचित्र भूमि के चप्पे-चप्पे की जानकारी देते हैं। इससे सम्भावित आक्रमण और सुरक्षित स्थानों का अन्दाजा हो जाता है।

प्रश्न 3.
भारत और निकटवर्ती देशों की मानचित्र शृंखला का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत और निकटवर्ती देशों के मानचित्र निम्नलिखित प्रणालियों में तैयार किए गए हैं-
1. एक मिलियन शीट या डिग्री शीट-इस शृंखला के मानचित्रों को 1:1,000,000 के मापक पर बनाया जाता है तथा इनका विस्तार 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तर होता है।

2. चौथाई इंच प्रति मील शृंखला-इनका मापक \(\frac { 1 }{ 4 }\) इंच : 1 मील अथवा 1″ : 4 मील या 1:253440 होता है। इसलिए इनको चौथाई इंच शीट या डिग्री शीट भी कहा जाता है। इनका विस्तार 1° अक्षांश से 1° देशान्तर होता है।

3. आधा इंच प्रति मील श्रृंखला-इनका मापक 1/2″ : 1 मील या 1″ : 2 मील या 1:126720 होता है। इनका अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार आधा डिग्री या 30′ होता है।

4. एक इंच प्रति मील शृंखला-इन मानचित्रों का मापक 1 इंच : 1 मील अथवा 1:63360 होता है तथा इनका अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार 15′ होता है।

5. 1:25,000 मापक की शृंखला-इन्हें चौथाई डिग्री शीट वाले मानचित्र भी कहा जाता है। इनका मापक 1:50,000 होता है। इनका अक्षांशीय विस्तार 5′ तथा देशान्तरीय विस्तार 7V’ होता है।

प्रश्न 4.
उच्चावच को प्रदर्शित करने की विधियों के नाम बताइए।
उत्तर:
मानचित्र पर भू-तल के प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों का चित्रण भूगोल का एक अभिन्न अंग है। धरातल पर कहीं पर्वत, पठार, समतल मैदान तथा घाटियाँ हैं। अतः धरातलीय उच्चावच को प्रदर्शित करना भूगोलवेत्ता का महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसको प्रदर्शित करने की निम्नलिखित विधियाँ हैं-

  • हैश्यूर (Hachures)
  • स्थानिक ऊँचाइयाँ, तल चिह्न एवं त्रिकोणमितीय स्टेशन (Spot Heights, Bench Marks and Trigonometrical Stations)
  • पहाड़ी छायाकरण (Hill Shading)
  • स्तर वर्ण (Layer Tints)
  • भू-आकृति चिह्न (Physiographic Symbols)
  • समोच्च रेखाएँ (Contours)
  • खंडित रेखाएँ (Form lines)
  • मिश्रित विधियाँ (Mixed Methods) आदि।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

प्रश्न 5.
समोच्च रेखाओं से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समोच्च रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं जो समुद्र-तल से ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाती है। (A Contour is an imaginary line which joins place of equal altitude above the sea level.) अतः 200 मीटर वाली समोच्च रेखा का तात्पर्य इस समोच्च रेखा से है जो समुद्र की सतह से 200 मीटर वाले स्थानों को मिलाकर खींची जाती है। इन्हें एक निश्चित अन्तराल पर खींचा जाता है।

प्रश्न 6.
समोच्च रेखाओं की क्या विशेषताएँ (लक्षण) हैं?
उत्तर:
समोच्च रेखाओं की निम्नलिखित विशेषताएँ (लक्षण) हैं-

  • समोच्च रेखाएँ मानचित्र में वक्राकार होती हैं।
  • ये समुद्र-तल से समान ऊँचाई वाले स्थानों को मिलाती हैं।
  • ये रेखाएँ तो मिल जाती हैं परन्तु एक-दूसरे को काटती नहीं हैं। ये रेखाएँ जल-प्रपात के स्थान पर मिल जाती हैं, केवल प्रलम्बी भृगु (Over hanging clif) की समोच्च रेखाएँ एक-दूसरे को काटती हैं।
  • किसी स्थान का उच्चावच इन रेखाओं की सहायता से किया जाता है।
  • ये निश्चित उर्ध्वाकार अन्तराल पर खींची जाती हैं। इनके द्वारा दो स्थानों के बीच ऊँचाई का स्पष्ट एवं सही ज्ञान हो जाता है।
  • जब समोच्च रेखाएँ पास-पास हों तो ढाल तीव्र तथा जब इनकी आपसी दूरी अधिक हो तो ढाल मन्द होती है।

प्रश्न 7.
समोच्च रेखाओं के गुण और दोष क्या हैं?
उत्तर:
गुण समोच्च रेखाओं के गुण निम्नलिखित हैं-

  • इस विधि द्वारा विभिन्न भू-आकृतियाँ सरलता से दिखाई जा सकती हैं।
  • इस उच्चावच को दर्शाने की सर्वोत्तम विधि है।
  • समोच्च रेखाओं द्वारा किसी भी क्षेत्र की ऊँचाई तथा ढाल ज्ञात की जा सकती है।
  • यह एक शुद्ध विधि है।

दोष समोच्च रेखाओं के दोष निम्नलिखित हैं-

  • ऊर्ध्वाधर अन्तराल अधिक होने पर छोटी-छोटी भू-आकृतियों को इस विधि द्वारा मानचित्र पर नहीं दर्शाया जा सकता।
  • इस विधि द्वारा पर्वतीय तथा मैदानी क्षेत्रों को साथ-साथ दिखाने में कठिनाई होती है।

प्रश्न 8.
ऊर्ध्वाधर अन्तराल किसे कहते हैं?
उत्तर:
किन्हीं दो समोच्च रेखाओं के मध्य ऊँचाई का जो अन्तर होता है, उसे ऊर्ध्वाधर अन्तराल कहते हैं। (Vertical interval is the difference of height between any two successive contours.) इसे संक्षेप में V.I. कहते हैं। यह हमेशा स्थिर रहता है तथा इसे मीटर तथा फुट में दिखाया जाता है। मानचित्र पर समोच्च रेखाएँ भूरे रंग से 20, 50, 100 तथा 200 मीटर अथवा फुट के अन्तर पर खींची जाती हैं।

प्रश्न 9.
क्षैतिज तुल्यमान किसे कहते हैं?
उत्तर:
दो समोच्च रेखाओं के बीच क्षैतिज दूरी को क्षैतिज तुल्यमान कहते हैं। (Horizontal equivalent is the horizontal distance between any two successive contours.) इसे H.E. से पुकारा जाता है। यह ढाल के अनुसार परिवर्तित होता रहता है। यदि ढाल अधिक है तो समोच्च रेखाओं के मध्य की दूरी कम होगी और यदि ढाल कम है तो इनके बीच की दूरी अधिक होगी। पर्वतीय क्षेत्रों की समोच्च रेखाएँ पास-पास होती हैं। इसलिए ऐसे क्षेत्रों की समोच्च रेखाओं का क्षैतिज तुल्यमान कम तथा मैदानी क्षेत्रों में यह अधिक होता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
परिच्छेदिका किसे कहते हैं? परिच्छेदिका खींचने की सचित्र व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
परिच्छेदिका अथवा अनुप्रस्थ काट (Profile or Cross-Section)-“समोच्च रेखा मानचित्र पर किसी दी गई पार्श्व रेखा के सहारे भू-तल की बाहरी रूपरेखा को परिच्छेदिका कहते हैं।” इसे अनुप्रस्थ काट अथवा पार्श्व चित्र भी कहते हैं। परिच्छेदिका समझ सकते हैं। मान लीजिए धरातल पर किसी स्थलरूप को एक सरल रेखा के सहारे खड़े तल में ऊपर से नीचे काटकर उसके एक भाग को हटा दिया जाए तो बचे हुए भाग का ऊपरी किनारा या सीमा रेखा उस स्थल की परिच्छेदिका को प्रकट करेगा। जिस सरल रेखा के सहारे स्थलरूप को काटा गया है वह उस परिच्छेदिका की काट-रेखा (Line of Section) कहलाती है। काट-रेखा के बारे में उल्लेखनीय है कि इसे सरल रेखा के रूप में सीधा या तिरछा किसी भी दिशा में खींचा जा सकता है।

परिच्छेदिका खींचना – मान लो एक समोच्च रेखा मानचित्र में AB, CD, EF तथा GH चार समोच्च रेखाएं दी हुई हैं। (चित्र 6.1) तथा AB रेखा के साथ इसकी परिच्छेदिका खींचनी है।

  • सर्वप्रथम A तथा B बिंदुओं को मिलाते हुए एक सरल रेखा इस प्रकार खींचो कि वह समोच्च रेखाओं को C, D, E, F, G तथा H बिंदुओं पर काटे।
  • मानचित्र के नीचे एक अन्य रेखा A B लो जिसकी लंबाई AB रेखा के बराबर हो। यह रेखा परिच्छेदिका की आधार रेखा होगी।
    A तथा B बिंदुओं से नीचे की ओर AA’ तथा BB’ दो लंब गिराओ।
  • इन लंबवत रेखाओं के सहारे आधार रेखा से ऊपर की ओर समान दूरी पर किसी मापनी के अनुसार 200, 300, 400, 500 व 600 मीटर की ऊंचाई दिखाने वाली रेखाएं खींचो जो A B के समानांतर हों। ये रेखाएं ऊर्ध्वाधर अंतराल V.I. को प्रकट करती हैं।
  • अब A व B,C व D, E व F तथा G व H से AA’ व BB’, CC’ व DD’, EE’ व FF’ तथा GG’ व HH क्रमशः 200, 300, 400 तथा 500 मीटर वाली रेखाओं पर लंब गिराओ।
  • A, C, E’,G’, H’, F’, D’ तथा B’ को मिलाने वाली वक्र रेखा परिच्छेदिका का निर्माण करेगी।

परिच्छेदिका खींचते समय क्षैतिज मापक (Horizontal Scale) की तुलना में ऊर्ध्वाधर मापक (Vertical Scale) का 5 से 10 गुना तक परिवर्धन कर लिया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि परिच्छेदिका द्वारा ढाल और भू-आकृति की रूपरेखा स्पष्ट और प्रभावशाली ढंग से उभरकर सामने आए।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 1

प्रश्न 2.
निम्नलिखित भू-आकृतियों को समोच्च रेखाओं द्वारा प्रदर्शित करो तथा इनकी परिच्छेदिका भी खींचो :
(1) समढाल (Uniform Slope)
(2) नतोदर ढाल (Concave Slope)
(3) उन्नतोदर ढाल (Convex Slope)
(4) सीढ़ीनुमा ढाल (Terraced Slope)
(5) विषम ढाल (Undulating Slope)।
उत्तर:
1. समढाल (Uniform Slope)-जिन प्रदेशों में ढाल में कोई विशेष परिवर्तन नहीं आता, ढाल सभी जगह एक जैसा
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 2
ही रहता है अथवा ढाल में शनैःशनैः परिवर्तन आता है, उसे समढाल (Uniform Slope) कहते हैं। इसमें समोच्च रेखाओं के बीच की दूरी बराबर रहती है। (चित्र 6.2)

2. नतोदर ढाल (Concave Slope) पर्वतीय क्षेत्रों में शिखर के तीव्र ढाल तथा गिरीपद क्षेत्र में मन्द ढाल होते हैं। इसलिए शिखर के पास समोच्च रेखाएँ पास-पास तथा गिरीपद के निकट ये दूर-दूर होती हैं। (चित्र 6.3)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 3
3. उन्नतोदर ढाल (Convex Slope)-इसमें ढाल का क्रम नतोदर के ठीक विपरीत होता है। शिखर के निकट ढाल मन्द तथा गिरीपद के निकट तीव्र ढाल होता है। शिखर के निकट समोच्च रेखाएँ दूर-दूर तथा गिरीपद के निकट ये रेखाएँ पास-पास होती हैं। (चित्र 6.4)

4. सीढ़ीनुमा ढाल (Terraced Slope)-इसमें समोच्च रेखाएँ जोड़ों में होती हैं। इसमें कहीं पर ढाल समतल तथा कहीं सीढ़ीनुमा या सोपानी होता है। इसलिए इसमें दो रेखाएँ एक युग्म के रूप में पास-पास होती हैं। (चित्र 6.5)

5. विषम ढाल (Undulating Slope)-इसे तरंगित ढाल भी कहते हैं। इसमें ढाल कहीं तीव्र तथा कहीं मन्द होता है, कहीं पर ढाल नतोदर तथा कहीं उन्नतोदर होता है। एक लहर या तरंग की भाँति विषम ढाल असमान होता है, उसे विषम ढाल कहते हैं। (चित्र 6.6)

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र

प्रश्न 3.
समोच्च रेखाओं द्वारा निम्नलिखित भू-आकृतियों का प्रदर्शन करें।
(1) पठार (Plateau)
(2) शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill)
(3) कटक (Ridge)
(4) स्कन्ध (Spur)
(5) V-आकार की घाटी (V-Shaped Valley)
(6) जलप्रपात (Waterfall)
(7) समुद्री भृगु (Sea Cliff)।
उत्तर:
1. पठार (Plateau)-पठार भू-तल का एक मेजनुमा भू-भाग है, जिसके पार्श्व खड़े ढाल वाले होते हैं। इसीलिए किनारों पर समोच्च रेखाएँ पास-पास तथा मध्यवर्ती भाग समतल होने के कारण नहीं पाई जाती हैं। (चित्र 6.7)

2. शंक्वाकार पहाड़ी (Conical Hill)-यह एक पहाड़ी भू-आकृति है, जिसमें चारों ओर ढाल प्रायः एक समान होता है। समोच्च रेखाएँ समान दूरी पर होती हैं। पहाड़ी त्रिभुजाकार शिखर संकरे तथा आधार चौड़े होते हैं। (चित्र 6.8)

3. कटक (Ridge)-एक ऊँची पहाड़ी जो श्रृंखला के रूप में लम्बाई में विस्तृत हो कटक कहलाती है। यह प्रायः संकरी होती है। इनको प्रायः अण्डाकार समोच्च रेखाओं द्वारा दिखाया जाता है। इसके किनारों के ढाल तीव्र होते हैं तथा दीर्घवृत्तों वाली समोच्च रेखाओं द्वारा प्रदर्शित किए जाते हैं। (चित्र 6.9)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 4
4. स्कन्ध (Spur) उच्च प्रदेशों में निम्न प्रदेशों की ओर एक जिह्वा की भाँति निकली स्थलाकृति को स्कन्ध कहते हैं। इसकी समोच्च रेखाएँ अंग्रेजी के अक्षर V की तरह होती हैं। (चित्र 6.10)

5. V-आकार की घाटी (V-Shaped Valley)-यह नदी द्वारा पर्वतीय क्षेत्रों में बनने वाली महत्त्वपूर्ण स्थलाकृति है, इससे प्रदर्शित समोच्च रेखाओं का आकार V की तरह होता है तथा बाहर से अन्दर को उनका मान कम होता जाता है। नदी की तलहटी के कटाव के कारण घाटी निरन्तर गहरी होती चली जाती है तथा पार्श्व खड़े रहते हैं। (चित्र 6.11)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 5

6. जलप्रपात (Waterfall)-जलप्रपात भी नदी के अपरदन के कारण नदी द्वारा प्रारम्भिक अवस्था में बनने वाली आकर्षक स्थलाकृति है। जब नदी के अपरदन द्वारा कोमल चट्टान कटकर निम्न हो जाती है तो जलप्रपात का निर्माण होता है। जहाँ पर पानी गिरता है वहाँ दो या दो से अधिक समोच्च रेखाएँ आकर मिल जाती हैं क्योंकि ढाल लगभग 90° के आस-पास होता है। (चित्र 6.12)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 6

7. समुद्री भृगु (Sea Cliff)-सागरीय तट के खड़े ढाल वाली चट्टान, जो मुख्य रूप से किसी सागर तट में ऊर्ध्वाधर दिशा में होती है, को भृगु कहते हैं। इसमें कम ऊँचाई दिखाने वाली समोच्च रेखाएँ मिली होती हैं। ये खड़े ढाल को प्रदर्शित करती हैं। उच्च भूमि की समोच्च रेखाएँ दूर-दूर होती हैं। ये मन्द ढाल दर्शाती हैं। (चित्र 6.13)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 7

प्रश्न 4.
भारत में प्रकाशित होने वाले स्थलाकृतिक मानचित्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में प्रकाशित स्थलाकृतिक मानचित्र-
1. अन्तर्राष्ट्रीय शृंखला (International Series)-इस श्रृंखला के मानचित्र 1:1,000,000 मापक पर बनाए गए हैं। 60° उत्तरी व 60° दक्षिणी अक्षांशों के बीच स्थित क्षेत्रों के प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 6° देशान्तर है। इस श्रृंखला में पूरे विश्व के 2,222 मानचित्र बनने हैं। इन मानचित्रों को 1/IM या one-to-one million sheets भी कहा जाता है। इनमें ऊँचाई मीटरों में दर्शायी जाती है। यह शृंखला अन्तर्राष्ट्रीय समझौते के अन्तर्गत बनाई गई है।

2. भारत एवं निकटवर्ती देशों की श्रृंखला (India and Adjacent Countries Series) इस श्रृंखला के मानचित्रों का मापक भी 1:1,000,000 है, परन्तु इसमें प्रत्येक मानचित्र का विस्तार 4° अक्षांश तथा 4° देशान्तर है। इनकी संख्या 1 से 106 तक है जिनके अन्तर्गत भारतीय उपमहाद्वीप के अतिरिक्त ईरान, अफगानिस्तान, म्याँमार, तिब्बत व चीन के कुछ भाग शामिल होते हैं। भारतीय क्षेत्र के मानचित्रों की संख्या 38 है जो क्रम संख्या 40 से 92 के बीच पाए जाते हैं।

इन संख्याओं को सूचक संख्याएँ (Index Number) कहा जाता है। वर्तमान में इस श्रृंखला का प्रकाशन बन्द हो चुका है। इसके बावजूद भी यह श्रृंखला भारत में छपने वाली अन्य सभी शृंखलाओं का आधार है। इस शृंखला के प्रत्येक मानचित्र को 4 डिग्री शीट या एक मिलियन शीट कहते हैं।

3. चौथाई इंच प्रति मील शृंखला (Quarter Inch or Degree Sheets)- 4°x4° शीट जब किसी 4°x 4° शीट अर्थात् एक मिलियन शीट (जैसे 55 या 57 या 73 कोई 24° भी जो भारत व निकटवर्ती देशों की श्रृंखला में आती है) को 16 बराबर स्थलाकृतिक मानचित्रों में बाँटेंगे तो प्रत्येक मानचित्र 1° अक्षांश x1° देशान्तर द्वारा घेरे हुए क्षेत्र को दिखाएगा। अतः ऐसी प्रत्येक शीट को डिग्री शीट या चौथाई इंच शीट कहा जाता है।

इनका मापक \(\frac { 1 }{ 4 }\) इंच : 1 मील अथवा 1 इंच : 4 मील अर्थात् 1:253,440 होता है। (63,360 x 4 = 253,440)। इन मानचित्रों में समोच्च रेखाओं का अन्तराल 250 फुट होता है। इन डिग्री शीटों का अंकन करने के लिए अंग्रेजी A के P से 16 है। तक अक्षरों का प्रयोग किया जाता है; जैसे 55A, 55B, 55C तथा 55D आदि 76° (चित्र 6.14)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 8
इन मानचित्रों का नवीन संस्करण मीट्रिक प्रणाली में छापा गया है जिनका मापक 1:250,000 तथा समोच्च रेखाओं का अन्तराल 100 मीटर होता है।

4. आधा इंच प्रति मील श्रृंखला (Half Inch or Half Degree Sheets) जब किसी चौथाई इंच शीट या डिग्री शीट को चार बराबर भागों में बाँटेगें तो इनमें से प्रत्येक आधा डिग्री शीट होगी अर्थात् अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार आधा डिग्री या 30 होगा। इसका मापक \(\frac { 1″ }{ 2 }\) : 1 मील या 1″ : 2 मील अर्थात् 1:126,720 होता है। (63,360 x 2 = 126,720)। इन पत्रकों में समोच्च रेखाओं का अन्तराल 100 फुट होता है। इन चार भागों में प्रत्येक को उसकी दिशानुसार अंकित किया जाता है; जैसे 55\(\frac { P }{ MW }\), 55\(\frac { P }{ NE }\)इत्यादि (चित्र 6.15)। मेट्रिक प्रणाली के अन्तर्गत इन मानचित्रों का मापक 1 : 100,000 रखा गया है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 9
इन मानचित्रों का प्रकाशन अब बन्द हो गया है।

5. एक इंच प्रति मील शृंखला (One Inch or Quarter Degree Sheets)-जब किसी चौथाई इंच या डिग्री शीट (जैसे 55P) को 16 बराबर भागों में बाँटते हैं तो प्रत्येक मानचित्र का 45° अक्षांशीय और देशान्तरीय विस्तार 15′ होगा। इन 16 मानचित्रों को 1 से 16 तक संख्याओं द्वारा 30 अंकित किया जाता है; जैसे 55 P/1, 55 P/2, 55 P/3 …… 55 P/16 इत्यादि। इन मानचित्रों का मापक 1 इंच : 1 मील अथवा 1:63,360 तथा समोच्च रेखाओं का अन्तराल 50 फुट होता है। मौद्रिक प्रणाली में बने इस श्रृंखला के नए मानचित्रों का मापक 1:50,000 तथा समोच्च -0761530 4577 रेखाओं का अन्तराल 20 मीटर होता है। (चित्र 6.16)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 10

6. 1 : 25,000 मापक की श्रृंखला (Series of 1:25000 scale)- स्थलाकृतिक मानचित्रों की यह एक नई श्रृंखला है जिसमें एक इंच या चौथाई डिग्री शीट या 1 : 50,000 मापक वाली शीट (जैसे 55 P/7) को छः बराबर भागों में बाँटा जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 11

इसका प्रत्येक भाग 5′ अक्षांशीय तथा 7 – देशान्तीय विस्तार वाला होता है। इन 6 मानचित्रों पर क्रमशः 1, 2, 3, 4, 5 व 6 इस प्रकार लिखा जाता है-55 P/7/1, 55 P/7/2, 55 P/7/6 इत्यादि। इन मानचित्रों को 1:25,000 मानचित्र भी कहा जाता है (चित्र 6.17)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 12

रूढ़ चिहन एवं प्रतीक [Conventional Signs and Symbols]
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 5 स्थलाकृतिक मानचित्र 13

स्थलाकृतिक मानचित्र HBSE 11th Class Geography Notes

→ स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Maps) यह एक दीर्घमापक पर बनाया गया बहुउद्देशीय मानचित्र है।

→ रूढ़ चिहन (Conventional Signs)-स्थलाकृतिक मानचित्रों पर विभिन्न भौतिक एवं सांस्कृतिक लक्षणों को जिन सर्वमान्य और परम्परागत चिह्नों, संकेतों व प्रतीकों की सहायता से प्रदर्शित किया जाता है, उन्हें रूढ़ चिह्न कहते हैं। समोच्च रेखाएँ (Contours)-समोच्च रेखाएँ वे कल्पित रेखाएँ हैं जो माध्य समुद्र-तल से समान ऊँचाई वाले समीपस्थ स्थानों को मिलाती हैं।

→ ऊर्ध्वाधर अन्तराल (Vertical Interval) किन्हीं दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच लम्बवत् ऊँचाई के अंतर को ऊर्ध्वाधर अन्तराल कहा जाता है।

→ क्षैतिज तुल्यमान (Horizontal Equivalent)-किन्हीं दो उत्तरोत्तर समोच्च रेखाओं के बीच क्षैतिज दूरी को क्षतिज तुल्यमान कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. मानचित्र प्रक्षेप, जो कि विश्व के मानचित्र के लिए न्यूनतम उपयोगी है।
(A) मर्केटर
(B) बेलनी
(C) शंकु
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बेलनी

2. एक मानचित्र प्रक्षेप, जो न समक्षेत्र हो एवं न ही शुद्ध आकार वाला हो तथा जिसकी दिशा भी शुद्ध नहीं होती है।
(A) शंकु
(B) ध्रुवीय शिराबिंदु
(C) मर्केटर
(D) बेलनी
उत्तर:
(A) शंकु

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

3. एक मानचित्र प्रक्षेप, जिसमें दिशा एवं आकृति शुद्ध होती है, लेकिन ध्रुवों की ओर यह बहुत अधिक विकृत हो जाती है।
(A) बेलनाकार समक्षेत्र
(B) मर्केटर
(C) शंकु
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) मर्केटर

4. जब प्रकाश के स्रोत को ग्लोब के मध्य रखा जाता है, तब प्राप्त प्रक्षेप को कहते हैं-
(A) लंबकोणीय
(B) त्रिविम
(C) नोमॉनिक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) नोमॉनिक

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रक्षेप (Projection) का शाब्दिक अर्थ क्या होता है? उदाहरण देकर समझाएं।
उत्तर:
किसी पारदर्शी (Transparent) कागज़ या फिल्म पर अंकित चित्र, शब्दों या सूत्रों को प्रकाश की सहायता से कुछ दूरी पर स्थित दीवार या पर्दे पर प्रदर्शित करने की क्रिया को प्रक्षेप कहा जाता है। उदाहरणतः सिनेमा के पर्दे पर आने वाले चित्र या शब्द किसी फिल्म पर अंकित होते हैं, जिन्हें Projector की सहायता से पर्दे पर प्रक्षेपित किया जाता है।

प्रश्न 2.
मानचित्र प्रक्षेप को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रकाश अथवा गणितीय विधियों द्वारा ग्लोब की अक्षांश व देशांतर रेखाओं के जाल का कागज़ या किसी समतल सतह पर प्रदर्शन मानचित्र प्रक्षेप कहलाता है।

प्रश्न 3.
प्रक्षेप बनाना क्यों जरूरी होता है?
उत्तर:
ग्लोब से मानचित्र बनाने के लिए कागज़ पर अक्षांश-देशांतर रेखाओं के जाल अर्थात् प्रक्षेप की ज़रूरत पड़ती है।

प्रश्न 4.
विकासनीय और अविकासनीय पृष्ठ क्या होते हैं?
उत्तर:
ऐसे तत्त्व (Surfaces) जिन्हें फैलाकर समतल किया जा सकता है, विकासनीय पृष्ठ या तल कहलाते हैं; जैसे बेलन तथा शंकु। अविकासनीय पृष्ठ वे होते हैं, जिन्हें काटकर समतल रूप में नहीं फैलाया जा सकता, जैसे गोला (Sphere)।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

प्रश्न 5.
“ग्लोब को सर्वगुण संपन्न कहते हैं किंतु मानचित्र को नहीं।” ऐसा क्यों?
उत्तर:
ग्लोब पृथ्वी को शुद्ध रूप से प्रदर्शित करता है, इसलिए सर्वगुण संपन्न माना जाता है। मानचित्र पर पृथ्वी के क्षेत्र, आकार, दिशा और दूरी जैसी विशेषताएं शुद्ध नहीं रह पातीं। इसलिए मानचित्र त्रुटिपूर्ण होता है।

प्रश्न 6.
अक्षांश और अक्षांश रेखाओं में क्या फर्क है?
उत्तर:
किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं। समान अक्षांश वाले स्थानों को मिलाने वाली कल्पित रेखा को अक्षांश रेखा कहते हैं।

प्रश्न 7.
देशांतर और देशांतर रेखा में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
किसी स्थान की प्रधान देशांतर रेखा से पूर्व या पश्चिम की ओर कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशांतर कहते हैं। समान देशांतर वाले स्थानों को मिलाने वाली रेखा या अर्धवृत्त को देशांतर रेखा कहते हैं।

प्रश्न 8.
प्रधान देशांतर रेखा किसे कहते हैं?
उत्तर:
लंदन में स्थित ग्रीनिच रॉयल वेधशाला से होकर जाने वाली देशांतर रेखा को 0° देशांतर या प्रधान देशांतर रेखा या प्रधान मध्याह्न रेखा कहा जाता है।

प्रश्न 9.
भारत में किस देशांतर रेखा को मानक देशांतर रेखा कहा जाता है?
उत्तर:
82 1/2° पूर्वी देशांतर।

प्रश्न 10.
गणों के अनुसार प्रक्षेप कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:

  1. शुद्ध क्षेत्रफल प्रक्षेप
  2. शुद्ध आकृति प्रक्षेप
  3. शुद्ध दिशा प्रक्षेप
  4. शुद्ध दूरी प्रक्षेप।

प्रश्न 11.
रचना विधि के अनुसार प्रक्षेप कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:

  1. बेलनाकार प्रक्षेप
  2. शंक्वाकार प्रक्षेप
  3. शिरोबिंदु प्रक्षेप
  4. रूढ़ प्रक्षेप।

प्रश्न 12.
मापक के अनुसार ग्लोब का अर्धव्यास (r) कैसे निकाला जाता है?
उत्तर:
ग्लोब का अर्धव्यास (r) = प्रदर्शक भिन्न x पृथ्वी का वास्तविक अर्धव्यास।

प्रश्न 13.
इंचों और सेंटीमीटरों में पृथ्वी का वास्तविक अर्धव्यास बताओ।
उत्तर:
इंचों में लगभग 250,000,000 इंच तथा सेंटीमीटरों में 640,000,000 सें०मी०।

प्रश्न 14.
बेलनाकार प्रक्षेप में दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी कैसे ज्ञात करते हैं?
उत्तर:
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 1

प्रश्न 15.
बेलनाकार प्रक्षेप पर किन क्षेत्रों को सही ढंग से दिखाया जा सकता है?
उत्तर:
भूमध्यरेखीय क्षेत्रों को।

प्रश्न 16.
शंक्वाकार प्रक्षेपों में मानक अक्षांश (Standard Parallel) क्या होता है?
उत्तर:
ग्लोब की वह अक्षांश रेखा जिसे कागज़ से बने खोखले शंकु का भीतरी तल स्पर्श करता है, मानक अक्षांश कहलाता है।

प्रश्न 17.
एक मानक अक्षांश वाला शंक्वाकार प्रक्षेप किस क्षेत्र को दिखाने के लिए बढ़िया होता है?
उत्तर:
शीतोष्ण कटिबंधों के कम अक्षांशीय विस्तार तथा अधिक देशांतरीय विस्तार वाले क्षेत्रों के लिए।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

प्रश्न 18.
मर्केटर प्रक्षेप का दूसरा नाम बताइए।
उत्तर:
बेलनाकार समरूप या शुद्ध आकृति प्रक्षेप।

प्रश्न 19.
मर्केटर प्रक्षेप के दो प्रमुख गुण बताइए।
उत्तर:

  1. शुद्ध आकृति (Orthomorphic)
  2. शुद्ध दिशा (True Direction)।

प्रश्न 20.
मर्केटर प्रक्षेप के दो अवगुण (दोष/कमियाँ/सीमाएँ) बताइए।
उत्तर:

  1. ध्रुवों की ओर अक्षांशीय मापक बढ़ने से क्षेत्रफल बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
  2. इस पर ध्रुवों पर प्रदर्शन नहीं हो सकता।

प्रश्न 21.
लोक्सोड्रोम या एकदिश नौपथ क्या होता है?
उत्तर:
मर्केटर प्रक्षेप पर स्थिर दिक्मान की रेखा (Line of Constant Bearing) को एकदिश नौपथ कहा जाता है।

प्रश्न 22.
मर्केटर प्रक्षेप पर बृहत वृत का आकार कैसा होता है?
उत्तर:
भूमध्य रेखा तथा समस्त देशांतर रेखाओं पर बृहत वृत सरल रेखाओं के रूप में होते हैं, जबकि अन्य बृहत वृत वक्राकार होते हैं, जिनके वक्र ध्रुवों की ओर होते हैं।

प्रश्न 23.
मर्केटर प्रक्षेप पर लोक्सोड्रोम का आकार कैसा होता है?
उत्तर:
सरल रेखा।

प्रश्न 24.
मानक अक्षांश की क्या विशेषता होती है?
उत्तर:
मानक अक्षांश पर मापक शुद्ध होता है।

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में रिक्त स्थानों की पूर्ति उचित शब्दों द्वारा करो-

  1. मानचित्रों में पृथ्वी की गोलाकार आकृति प्रदर्शित करने से पहले ………. रेखाओं का जाल बनाना ज़रूरी होता है।
  2. ……….. पृष्ठ वे होते हैं जिन्हें फैलाकर समतल किया जा सकता है।
  3. ग्लोब एक ……….. पृष्ठ है।
  4. प्रधान मध्याह्न रेखा से पूर्व में ……….. देशांतर रेखाएं और पश्चिम में ……….. देशांतर रेखाएं होती हैं।
  5. ……….. स्थान से गुज़रने वाली देशांतर रेखा प्रधान देशांतर रेखा कहलाती है।
  6. सबसे बड़ी अक्षांश रेखा ……….. होती है।
  7. वह अक्षांश रेखा जिसे कागज़ के खोखले शंकु का भीतरी तल स्पर्श करता है ………. कहलाती है।
  8. सागरीय धाराओं को ……….. प्रक्षेप द्वारा प्रदर्शित करते हैं।
  9. पूर्व-पश्चिम दिशा में संकरी पट्टी में फैले क्षेत्रों के लिए ……….. प्रक्षेप उपयुक्त होता है।

उत्तर:

  1. अक्षांश व देशांतर
  2. विकासनीय
  3. अविकासनीय
  4. 180, 180
  5. ग्रीनिच
  6. भूमध्य रेखा
  7. मानक अक्षांश
    मर्केटर
  8. एक मानक वाला साधारण शंक्वाकार।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र प्रक्षेप क्या है? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मानचित्र प्रक्षेप का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मानचित्र प्रक्षेप को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र प्रक्षेप का अर्थ (Meaning of Map Projection) ग्लोब, पृथ्वी का सबसे अच्छा प्रतिरूप है। यह त्रिविम है। ग्लोब के इसी गुण के कारण महाद्वीपों एवं महासागरों के सही आकार एवं प्रकार को इस पर दिखाया जाता है। यह दिशा एवं दूरी की भी सही-सही जानकारी प्रदान करता है। ग्लोब अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के द्वारा विभिन्न खंडों में विभाजित होता है। क्षैतिज रेखाएं अक्षांश के समांतरों एवं ऊर्ध्वाधर रेखाएं देशांतर के याम्योत्तरों को दर्शाती हैं। इस जाल को रेखा जाल (Graticule) के नाम से भी जाना जाता है। यह जाल मानचित्रों को बनाने में सहायक होता है। अतः गोलाकार पृष्ठ से अक्षांशों एवं देशांतरों के जाल के समतल सतह पर स्थानांतरण करना मानचित्र प्रक्षेप कहलाता है।

ग्लोब पर देशांतर अर्द्धवृत्त एवं अक्षांश पूर्णवृत्त होते हैं। जब उन्हें समतल सतह पर स्थानांतरित किया जाता है, तब वे सीधी या वक्र प्रतिच्छेदी रेखाएं बनाते हैं। इतना समझ लेने के बाद अब हम मानचित्र प्रक्षेप की परिभाषा दे सकते हैं “गोलाकार पृथ्वी अथवा उसके किसी बड़े भाग का मानचित्र बनाने के लिए प्रकाश अथवा किसी ज्यामितीय विधि के द्वारा कागज़ या किसी समतल सतह पर खींचे गए ग्लोब की अक्षांश-देशांतर रेखाओं का जाल (Graticule) मानचित्र-प्रक्षेप कहलाता है।”

प्रश्न 2.
मानचित्र प्रक्षेप की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्लोब के प्रयोग में अनेक दिक्कतें हैं जैसे ग्लोब पर छोटे स्थानों का विस्तृत विवरण नहीं दिखाया जा सकता। इसी प्रकार, ग्लोब पर यदि दो प्राकृतिक प्रदेशों की तुलना करनी हो तो यह काम कठिन हो जाता है। इसलिए यह बहुत जरूरी हो जाता है कि समतल पृष्ठ पर बड़ी मापनी के मानचित्र बनाकर भू-आकारों का सही-सही चित्रण किया जाए।

अब, प्रश्न यह उठता है कि अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं को समतल सतह पर कैसे स्थानांतरित किया जाए। यदि हम एक समतल पृष्ठ को ग्लोब पर चिपकाए, तो यह एक बड़े भाग पर बिना विकृति के सतह के अनुरूप नहीं बैठेगा। ग्लोब के केंद्र से प्रकाश डालने पर प्रक्षेपित छायांकन, ग्लोब पर कागज के स्पर्श बिंदु या स्पर्श रेखा से दूर विकृत हो जाएगा। स्पर्श बिंदु या स्पर्श रेखा से बढ़ती दूरी के साथ-साथ विकृति में वृद्धि हो जाती है। यही कारण है कि मानचित्र पर क्षेत्र (Area), आकार (Shape), दिशा (Direction) और दूरी (Distance) जैसी सभी विशेषताएं उस तरह शुद्ध नहीं रह पातीं जिस तरह वे ग्लोब पर होती हैं। इसका कारण यह है कि ग्लोब एक विकासनीय पृष्ठ नहीं है।

प्रश्न 3.
विकासनीय और अविकासनीय पृष्ठ क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कुछ पृष्ठ या तल (Surfaces) ऐसे होते हैं जिन्हें हम फैलाकर समतल नहीं कर सकते और न ही उनके गिर्द बिना मोड़ अथवा बल (Fold) के कागज़ लपेटा जा सकता है। ऐसे पृष्ठों को अविकासनीय पृष्ठ या तल कहते हैं। गोला-(Sphere) एक ऐसा ही तल है (चित्र 5.1 और 5.2)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 2

प्रश्न 4.
मानचित्र प्रक्षेप के तत्त्वों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र प्रक्षेप के तत्त्व निम्नलिखित हैं
1. पृथ्वी का छोटा रूप-प्रक्षेप को पृथ्वी के मॉडल के रूप में छोटी मापनी की सहायता से कागज की समतल सतह पर उतारा जाता है। यह मॉडल लगभग गोलाभ होना चाहिए, जिसमें ध्रुव का व्यास विषुवतीय व्यास से छोटा हो।

2. अक्षांश के समांतर-ये ग्लोब के चारों ओर स्थित वे वृत्त हैं, जो विषुवत वृत के समांतर एवं ध्रुवों से समान दूरी पर स्थित होते हैं। प्रत्येक समांतर इसकी सतह पर स्थित होता है, जो कि पृथ्वी की धुरी से समकोण बनाती है। अक्षांश रेखाएं एक समान लंबाई की नहीं होती हैं। इनका विस्तार ध्रुव पर बिंदु से लेकर विषुवत वृत्त पर ग्लोबीय परिधि तक होता है। इनका सीमांकन 0° से 90° उत्तरी एवं 0° से 90° दक्षिणी अक्षांशों में किया जाता है।

3. देशांतर के याम्योत्तर-ये अर्द्धवृत्त होते हैं, जो कि उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर, एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक खींचे जाते हैं। दो विपरीत देशांतर अर्धवृत्त एक वृत्त का निर्माण करते हैं, जो ग्लोब की परिधि होती है। प्रत्येक देशांतर रेखा अपनी सतह पर स्थित होती है, लेकिन ये सभी ग्लोब की धुरी के साथ एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं। यद्यपि वास्तव में कोई मध्य देशांतर रेखा नहीं होती, लेकिन सुविधा के लिए ग्रिनिच की देशांतर रेखा को मध्य देशांतर रेखा माना गया है जिसका मान 0° देशांतर रखा गया है। अन्य सभी देशांतरों के निर्धारण में इससे संदर्भ देशांतर (Reference Longitude) का काम लिया जाता है।

4. ग्लोब के गुण मानचित्र प्रक्षेप बनाने में, ग्लोब की सतह के निम्नलिखित मूल गुणों को कुछ विधियों के द्वारा संरक्षित रखा जाता है

  • किसी क्षेत्र के दिए गए बिंदुओं के बीच की दूरी
  • प्रदेश की आकृति
  • प्रदेश के आकार या क्षेत्रफल का सही माप
  • प्रदेश के किसी एक बिंदु से दूसरे बिंदु की दिशा।

प्रश्न 5.
आधारभूत अक्षांश-देशांतर कौन-से होते हैं?
उत्तर:
आधारभूत अक्षांश-देशांतरों पर मापक शुद्ध होता है। विभिन्न प्रक्षेपों में आधारभूत अक्षांश-देशांतर अलग-अलग होते हैं। उदाहरणतः बेलनाकार प्रक्षेप में भूमध्य रेखा तथा प्रधान मध्याह्न रेखा आधारभूत होते हैं जबकि शंक्वाकार प्रक्षेपों में मानक अक्षांश रेखा (Standard Parallel) तथा केंद्रीय देशांतर रेखा (Central Meridian)आधारभूत अक्षांश-देशांतर रेखाएं होती हैं। इसी प्रकार शिरोबिंदु प्रक्षेपों में ध्रुव तथा 0° देशांतर रेखा आधारभूत होते हैं।

चरण-2. ग्लोब का अर्धव्यास (r) ज्ञात करने के बाद उन आधारभूत अक्षांश-देशांतरों को बनाइए जिन पर सारा प्रक्षेप निर्भर करता है।

चरण-3. अन्य अक्षांश-देशांतरों की रचना करके प्रक्षेप पूरा कीजिए।

चरण-4. ड्राईंग शीट पर प्रक्षेप के ऊपर शीर्षक, नीचे मापक तथा यथास्थान अक्षांश-देशांतरों का अंतराल लिखिए। अंततः इस रचना को प्राध्यापक महोदय को दिखाइए।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र प्रक्षेप क्या है? इसका वर्गीकरण कीजिए।
अथवा
मानचित्र प्रक्षेप के अर्थ को समझाते हुए इसके प्रकारों का वर्णन कीजिए। अथवा मानचित्र प्रक्षेप के प्रकारों का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।।
उत्तर:
मानचित्र प्रक्षेप का अर्थ (Meaning of Map Projection) ग्लोब, पृथ्वी का सबसे अच्छा प्रतिरूप है। यह त्रिविम है। ग्लोब के इसी गुण के कारण महाद्वीपों एवं महासागरों के सही आकार एवं प्रकार को इस पर दिखाया जाता है। यह दिशा एवं दूरी की भी सही-सही जानकारी प्रदान करता है। ग्लोब अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के द्वारा विभिन्न खंडों में विभाजित होता है। क्षैतिज रेखाएं अक्षांश के समांतरों एवं ऊर्ध्वाधर रेखाएं देशांतर के याम्योत्तरों को दर्शाती हैं। इस जाल को रेखा जाल (Graticule) के नाम से भी जाना जाता है। यह जाल मानचित्रों को बनाने में सहायक होता है। अतः गोलाकार पृष्ठ से अक्षांशों एवं देशांतरों के जाल के समतल सतह पर स्थानांतरण करना मानचित्र प्रक्षेप कहलाता है।

ग्लोब पर देशांतर अर्द्धवृत्त एवं अक्षांश पूर्णवृत्त होते हैं। जब उन्हें समतल सतह पर स्थानांतरित किया जाता है, तब वे सीधी या वक्र प्रतिच्छेदी रेखाएं बनाते हैं। इतना समझ लेने के बाद अब हम मानचित्र प्रक्षेप की परिभाषा दे सकते हैं
“गोलाकार पृथ्वी अथवा उसके किसी बड़े भाग का मानचित्र बनाने के लिए प्रकाश अथवा किसी ज्यामितीय विधि के द्वारा कागज़ या किसी समतल सतह पर खींचे गए ग्लोब की अक्षांश-देशांतर रेखाओं का जाल (Graticule) मानचित्र-प्रक्षेप कहलाता है।”

मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण (Classification of Map Projections)-मानचित्र प्रक्षेपों का वर्गीकरण दो आधारों पर किया जाता है

  • प्रक्षेप के गुणों के आधार पर।
  • प्रक्षेप की रचना विधि के आधार पर।

(1) गुणों के आधार पर प्रक्षेपों का वर्गीकरण क्षेत्र, आकृति, दिशा और दूरी जैसे लक्षणों का शुद्ध प्रदर्शन केवल ग्लोब पर ही संभव है। अभी तक ऐसा कोई प्रक्षेप नहीं बन पाया जो इन सभी गुणों को एक साथ शुद्ध रूप से प्रदर्शित कर सके। यही कारण है कि कोई भी मानचित्र पृथ्वी के सभी भागों को शुद्धता के साथ नहीं दिखा सकता। ऐसी दशा में हम उन प्रक्षेपों की रचना करते हैं जो कम-से-कम एक या दो गुणों का सही प्रदर्शन कर सकते हों। अतः गुणों या लक्षणों के आधार पर प्रक्षेप अग्रलिखित चार प्रकार के होते हैं-

1. शुद्ध क्षेत्रफल प्रक्षेप (Equal Area or Homolographic Projections) इस वर्ग के प्रक्षेपों में विभिन्न क्षेत्रों के क्षेत्रफल को शुद्ध रूप से प्रदर्शित किया जाता है चाहे इसके लिए वास्तविक लंबाई या चौड़ाई को कम या ज्यादा क्यों न करना पड़े। क्षेत्रफल को सही रखने के प्रयत्न में आकृति और दिशा जैसे गुणों की उपेक्षा हो जाती है। इन समक्षेत्र प्रक्षेपों का उपयोग विभिन्न प्रकार के वितरण मानचित्रों को बनाने के लिए किया जाता है।

2. शुद्ध आकृति प्रक्षेप (True Shape or Orthomorphic Projections)-इन प्रक्षेपों में ग्लोब के विभिन्न भागों की आकृति को शुद्ध रूप में प्रदर्शित किया जाता है। वास्तव में बड़े भू-भागों की आकृति को शुद्ध रख पाना संभव नहीं होता। इन प्रक्षेपों में केवल छोटे भू-भागों या किसी एक भू-भाग की आकृति का अनुरक्षण (Preservation) हो जाता है। अतः शुद्ध आकृति का लक्षण कुछ भ्रांतिपूर्ण है। प्रक्षेप पर शुद्ध आकृति या यथाकृति के गुण को विकसित करने के लिए निम्नलिखित दो दशाओं का होना अनिवार्य है

  • अक्षांश और देशांतर रेखाएं समकोण पर काटती हों।
  • प्रक्षेप के किसी भी बिंदु पर प्रत्येक दिशा में मापक समान रहे अर्थात् यदि अक्षांशीय मापक में वृद्धि हो तो देशांतरीय मापक में भी उसी अनुपात में वृद्धि हो। इन प्रक्षेपों पर राजनीतिक मानचित्रों की रचना की जाती है।

3. शुद्ध दिशा प्रक्षेप या खमध्य या दिगंश प्रक्षेप (True Bearing or Azimuthal Projections)-शुद्ध दिशा से अभिप्राय है कि मानचित्र पर किन्हीं दो स्थानों को मिलाने वाली सरल रेखा की वही दिशा होती है जो ग्लोब पर उन बिंदुओं को मिलाने वाले बृहत वृत्त (Great Circle) की होती है। शुद्ध दिशा प्रक्षेपों पर सर्वत्र और सभी ओर दिक्पात शुद्ध पाया जाता है। ऐसे प्रक्षेपों का प्रयोग जलमार्गों, पवनों और धाराओं की दिशा दिखाने वाले मानचित्रों को बनाने में किया जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 3

4. शुद्ध पैमाना या समदूरस्थ प्रक्षेप (True Scale or Equidistant Projections) ये ऐसे प्रक्षेप होते हैं जिन पर विभिन्न के बीच की दूरी ग्लोब पर उन्हीं बिंदुओं के बीच की दूरी के समान होती है। वास्तव में प्रक्षेप के हर स्थान पर पैमाने को शुद्ध रख पाना असंभव होता है। पैमाना या तो सभी अक्षांश रेखाओं पर शुद्ध रह सकता है या सभी देशांतर रेखाओं पर शुद्ध रह सकता है अथवा कुछ अक्षांश रेखाओं तथा कुछ देशांतर रेखाओं पर पैमाना शुद्ध रह सकता है।

(2) रचनाविधि के आधार पर प्रक्षेपों का वर्गीकरण-रचना विधि के आधार पर मानचित्र प्रक्षेप निम्नलिखित चार प्रकार के होते हैं-
1. बेलनाकार प्रक्षेप (Cylindrical Projections)- जिन प्रक्षेपों की रचना बेलनाकार आकृति से विकसित करके की जाती है उन्हें बेलनाकार प्रक्षेप कहते हैं। इन प्रक्षेपों में यह माना जाता है कि बेलन के आकार में मुड़ा हुआ कोई कागज़ पारदर्शक ग्लोब को भूमध्य रेखा पर स्पर्श करता हुआ लिपटा है और ग्लोब के अंदर एक विद्युत बल्ब प्रकाशित है। ग्लोब की अक्षांश-देशांतर रेखाएं कागज़ पर प्रतिबिंबित हो रही हैं। अब यदि रेखा जाल के प्रतिबिंबों को पैन या पैंसिल से अंकित करके उस कागज़ को फैला दें तो हमें अक्षांश-देशांतर का एक आयताकार जाल प्राप्त होगा जिसे बेलनाकार प्रक्षेप कहा जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 4
वास्तव में ये प्रक्षेप ज्यामितीय विधि द्वारा बनाए जाते हैं। प्रकाश द्वारा प्रक्षेपण तो ज्यामितीय विधियों को केवल आधार प्रदान करता शंकु करता है (चित्र 5.3)। बेलनाकार प्रक्षेप भूमध्यरेखीय क्षेत्रों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं, यद्यपि इन पर सारी पृथ्वी का मानचित्र बनाया जाता है।

2. शंक्वाकार प्रक्षेप (Conical Projections)-जिन प्रक्षेपों की रचना शंकु की आकृति से विकसित की जाती है, उन्हें शंक्वाकार प्रक्षेप कहते हैं। इन प्रक्षेपों में यह माना जाता है कि शंकु के आकार शंकु सतह को समतल करने पर प्रक्षेपण बिंदु परिणामी रेखा जाल में मुड़ा हुआ एक कागज़ पारदर्शक ग्लोब जिसके अंदर एक बल्ब जल रहा है, पर इस प्रकार रखा हुआ है कि शंकु का शीर्ष किसी ध्रुव के ऊपर स्थित है। इस अवस्था में शंकु का भीतरी तल ग्लोब की किसी-न-किसी अक्षांश रेखा को स्पर्श करेगा जिसे प्रधान या मानक या प्रामाणिक अक्षांश रेखा (Standard Meridian) कहा जाता है।

बल्ब के प्रकाश से प्रसारित किरणों द्वारा शंकु के भीतरी तल पर अक्षांश-देशांतर रेखाओं का प्रतिबिंब बनेगा। इस प्रतिबिंब को शंकु पर अंकित करके यदि उसे आधार से ऊपर तक काटकर फैला दिया जाए तो शंकु एक वृत्तांश का रूप धारण कर लेगा। यही शंक्वाकार प्रक्षेप कहलाता है (चित्र 5.4)। इन प्रक्षेपों पर पूरी पृथ्वी का मानचित्र नहीं बनाया जा सकता। ये केवल शीतोष्ण कटिबंधों के लिए उपयुक्त होते हैं। शंक्वाकार प्रक्षेप भी ज्यामितीय ढंग से बनाए जाते हैं।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 5

3. शिरोबिंदु प्रक्षेप (Zenithal Projections) इन प्रक्षेपों की रचना करते समय यह मान लिया जाता है कि एक समतल कागज़ पारदर्शी ग्लोब के किसी विशेष बिंदु पर स्पर्श करता हुआ रखा जाता है यह स्पर्श बिंदु भूमध्य रेखा या कोई ध्रुव या इन दोनों के बीच स्थित हो सकता है (पिन 5.5)। बल्ब अथवा प्रकाश पुंज ग्लोब के भीतर या बाहर कहीं भी हो सकता है। प्रकाश द्वारा प्रतिबिंबित अक्षांश-देशांतर रेखाओं के जाल को कागज़ पर अंकित कर लिया जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 6
ऐसी दशा में अक्षांश रेखाएं वृत्ताकार और देशांतर रेखाएं सीधी होती हैं। शिरोबिंदु या खमध्य प्रक्षेपों पर केवल गोला? मा प्रक्षेपण बिंदु के मानचित्र बनाए जा सकते हैं, पूरी पृथ्वी के नहीं (चित्र 5.6)।

4. रूढ़ या परिवर्तित प्रक्षेप (Conventional or Modi fied Projections) ये वे प्रक्षेप होते हैं जिन्हें मूल प्रक्षेपों का रूपांतरण करके किसी खास उद्देश्य के लिए उपयुक्त बना लिया जाता है। इनकी रचना में किसी विकासनीय पृष्ठ का प्रयोग नहीं ध्रुव पर ग्लोब को स्पर्श करता तल समतल सतह पर परिणामी जाल किया जाता बल्कि गणितीय सूत्रों की सहायता ली जाती है। इसलिए इन्हें गणितीय प्रक्षेप भी कहते हैं। इन प्रक्षेपों से ‘प्रक्षेप’ शब्द का अर्थ प्रकट नहीं होता। मॉलवीड प्रक्षेप व सिनुसाइलड : प्रक्षेप इत्यादि ऐसे ही प्रक्षेप हैं।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 7

प्रश्न 2.
मानचित्र प्रक्षेपों की रचना के चरणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र प्रक्षेपों की रचना के चार चरण (Four Steps in the Drawing of Map Projections) चरण-1. दिए हुए मापक के अनुसार ग्लोब कर अर्धव्यास (त्रिज्या) निकालिए।
अर्धव्यास (r) = प्रदर्शक भिन्न – पृथ्वी का वास्तविक अर्धव्यास, पृथ्वी का वास्तविक अर्धव्यास लगभग 6,400 कि०मी० या 640,000,000 सें०मी० है अथवा लगभग 3,960 मील या 250,000,00 इंच हैं।
आइए! अब हम दो बार सें०मी० में व दो बार इंचों में ग्लोब के अर्धव्यास को निकालने का अभ्यास करें-
उदाहरण 1.
मापक \(\frac { 1 }{ 320,000,000 }\) हो तो ग्लोब का r (अर्धव्यास) ज्ञात करो।
हल:
(1) इंचों में r = \(\frac { 1 }{ 320,000,000 }\) x 250,000,000
= 0.78 इंच

(2) सें०मी० में r = \(\frac { 1 }{ 320,000,000 }\) x 640,000,000
उत्तर:
= 2 सें०मी०

उदाहरण 2.
\(\frac { 1 }{ 200,000,000 }\) प्रदर्शक भिन्न पर ग्लोब का r ज्ञात करो।
हल:
(1) इंचों में r = \(\frac { 1 }{ 200,000,000 }\) x 250,000,000
= 1.25 इंच

(2) सें०मी० में r = \(\frac { 1 }{ 200,000,000 }\) x 640,000,000
उत्तर:
= 3.2 सें०मी०

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

प्रश्न 3.
बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप क्या है? इसके लक्षणों (विशेषताओं) पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप (Cylindrical Equal Area Projection)-जैसा कि इस प्रक्षेप के नाम से ही स्पष्ट होता है कि इस प्रक्षेप में क्षेत्रफल शुद्ध रहता है। सभी अक्षांश रेखाओं की लंबाई भूमध्य रेखा के बराबर होती है अर्थात् ध्रुवों की ओर उनका मापक बढ़ता जाता है। अतः अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी (अर्थात देशांतर रेखाओं का मापक) इस प्रकार समायोजित कर दी जाती है कि प्रक्षेप पर किन्हीं दो अक्षांश रेखाओं के बीच की पट्टी का क्षेत्रफल ग्लोब पर उन्हीं दो अक्षांश रेखाओं के बीच की पट्टी के क्षेत्रफल के समान हो जाए। इस प्रकार पूरे प्रक्षेप पर सम-क्षेत्रफल का गुण परिरक्षित हो जाता है।

इस प्रक्षेप को सर्वप्रथम जोहान्न हेनरिच लैंबर्ट (Johann Henrich Lambert) नामक मानचित्रकार ने सन 1722 में बनाया था। इसलिए इस प्रक्षेप को लैंबर्ट का बेलनाकार समक्षेत्र प्रक्षेप भी कहते हैं।

बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप के लक्षण-इस प्रक्षेप की प्रमुख विशेषताएं एवं लक्षण निम्नलिखित हैं-
1. अक्षांश रेखाओं का आकार-इस प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएं सरल व सीधी होती हैं जो भूमध्य रेखा के समानांतर व इसके समान लंबी होती हैं। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए अक्षांश रेखाओं के बीच की अपनी दूरी उत्तरोत्तर कम होती जाती है।

2. देशांतर रेखाओं का आकार सभी देशांतर रेखाएं सरल रेखाएं होती हैं। ये भूमध्य रेखा के लंबवत, एक-दूसरे के समानांतर तथा परस्पर समान दूरी पर अंकित होती हैं।

3. अक्षांश तथा देशांतर रेखाओं के बीच प्रतिच्छेदन इस प्रक्षेप में अक्षांश तथा देशांतर रेखाएं परस्पर समकोण पर काटती हैं।

4. अक्षांश रेखाओं का मापक-भूमध्य रेखा पर मापक शुद्ध होता है जबकि बाकी अक्षांश रेखाओं पर मापक अशुद्ध होता है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए मापक में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। इस प्रक्षेप पर 60° की अक्षांश रेखा पर मापक ग्लोब की अपेक्षा दुगुना हो जाता है और ध्रुवों पर यह वृद्धि अनंत हो जाती है। इसका कारण यह है कि इस प्रक्षेप पर सभी अक्षांश रेखाएं भूमध्य रेखा के बराबर लंबी होती हैं, जबकि ग्लोब पर ये भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए छोटी होती चली जाती हैं।

5. देशांतर रेखाओं का मापक-इस प्रक्षेप में, सम-क्षेत्रफल के गुण को परिरक्षित करने हेतु किसी स्थान विशेष पर देशांतर रेखाओं का मापक उसी अनुपात में कम कर दिया जाता है। जिस अनुपात में वहां अक्षांश रेखाओं के मापक में वृद्धि होती है। यही कारण है कि इस प्रक्षेप पर अक्षांश रेखाओं के बीच की दूरी भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर उत्तरोत्तर कम होती चली जाती है।

6. विशेष गुण-बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप का यह एक विशेष गुण है कि इस प्रक्षेप पर किन्हीं दो अक्षांश रेखाओं के बीच की पट्टी का क्षेत्रफल ग्लोब पर उन्हीं दो अंक्षाश रेखाओं के बीच के पट्टी के क्षेत्रफल के बराबर होता है।

7. उपयोग-सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप होने के कारण इस प्रक्षेप का प्रयोग प्रायः संसार का राजनीतिक मानचित्र तथा वितरण मानचित्र बनाने के लिए किया जाता है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र ठीक प्रकार से प्रदर्शित किए जा सकने के कारण इस प्रक्षेप का प्रयोग मुख्यतः उष्ण-कटिबंधीय उपजों; जैसे रबड़, चावल, नारियल, कहवा, कोको, गर्म मसाले, कपास, गन्ना, केला तथा मूंगफली इत्यादि के विश्व-वितरण को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है।

8. सीमाएं ध्रुवीय क्षेत्रों में अक्षांश रेखाओं के मापक में बहुत अधिक विवर्धन तथा देशांतर रेखाओं के मापक में बहुत अधिक लघुकरण के कारण इन क्षेत्रों में स्थित देश पूर्व-पश्चिम दिशा में बहुत अधिक खिंच जाते हैं और उत्तर:दक्षिण दिशा में बहुत संकुचित हो जाते हैं। फलस्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों में देशों की आकृतियों में अधिकाधिक विकृति आ जाती है, परंतु उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में देशों की आकृति में विकृति नगण्य होती है। अतः इस प्रक्षेप का प्रयोग ध्रुवीय क्षेत्रों के लिए नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 4.
समस्त ग्लोब के लिए एक ऐसे बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप की रचना करो, जिसका मापक 1:320,000,000 हो। अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं का अंतराल क्रमशः 15° और 30° हो।
उत्तर:
रचना विधि-दिए गए मापक के अनुसार-
(1) जनक ग्लोब का अर्धव्यास (r)
\(\frac{1}{320,000,000} \times 640,000,000\) = 2 सें०मी०

(2) भूमध्य रेखा की लंबाई = 2πr
= 2 x \(\frac { 22 }{ 7 }\) = 12.6 से०मी०

(3) 30° के अंतराल पर दो देशांतर रेखाओं के बीच की दरी = \(\frac { 12.6×30° }{ 360° }\) = 1.05 सें०मी०
ग्लोब को प्रदर्शित करने के लिए 2 सें०मी० अर्धव्यास का एक वृत्त खींचिए। कल्पना कीजिए की EOE’ तथा POP’ क्रमशः भूमध्यरेखीय और ध्रुवीय व्यास हैं। 0 केंद्र पर 15° के अंतराल पर कोण बनाइए और 15°, 30°, 45°, 60°, 75° और 90° की अक्षांश रेखाएं बनाइए। कल्पना कीजिए कि ये कोण वृत्त की परिधि को उत्तर में a, b, c, d, e तथा p पर और दक्षिण में a’, b’, c’, d’, e’ तथा p’ बिंदुओं पर काटते हैं। EOE’ रेखा को Q बिंदु तक बढ़ाइए जिससे EQ रेखा भूमध्य रेखा की वास्तविक लंबाई अर्थात् 12.6 सें०मी० के बराबर हो। अब a, b, c,d,e तथा P बिंदुओं से और a’, b’, c’, d’, e’ तथा P बिंदुओं से भी भूमध्य रेखा के समानांतर सरल रेखाएं खींचिए। ये सभी रेखाएं 15° के अंतराल पर अक्षांश रेखाओं को प्रकट करती हैं।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 8
अब 1.05 सें०मी० परकार खोलकर EQ रेखा को 12 समान भागों में बांटिए। इन बिंदुओं से देशांतर रेखाएं खींचिए जो भूमध्य रेखा को समकोण (90°) पर काटे। RM इस प्रक्षेप की मध्य देशांतर होगी। इस प्रकार यह विश्व के मानचित्र के लिए बेलनाकार सम-क्षेत्रफल प्रक्षेप का रेखा जाल बन जाएगा (चित्र 5.7)।

प्रश्न 5.
1 : 300,000,000 मापनी पर संसार का मानचित्र बनाने के लिए मर्केटर प्रक्षेप की रचना कीजिए। प्रक्षेप में अंतराल 20° है।
उत्तर:
रचना विधि:
चरण-1.
सर्वप्रथम ग्लोब का अर्धव्यास या त्रिज्या (r) ज्ञात करें। ग्लोब का अर्धव्यास (r)
= \(\frac{1}{300,000,000} \times 640,000,000\)

चरण-2.
ग्लोब पर भूमध्य रेखा की लंबाई ज्ञात करें (2πr)
= 2 x \(\frac { 22 }{ 7 }\) x 2.1 = 13.2 सें०मी०

चरण-3.
अब भूमध्य रेखा पर 20° देशांतरीय अंतराल के अनुसार दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी ज्ञात करें
= \(\frac { 22×r×20 }{ 360 }\)
= \(\frac { 13.2×20 }{ 360 }\)

Mecrator’s Projection:
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 9

चरण-4.
चित्र 5.8 के अनुसार कागज़ के बीचों-बीच 13.2 सें०मी० लंबी रेखा खींचिए। परकार में 0.73 सें०मी० की दूरी लेकर इस रेखा पर 17 निशान लगा दीजिए। इस प्रकार यह रेखा 18 भागों में विभक्त हो जाएगी। इन चिह्नों पर लंब डाल दीजिए। ये लंब देशांतर रेखाओं को प्रकट करेंगे।

चरण-5.
दिए हुए अंतराल के अनुसार प्रक्षेप 20°, 40°, 60° में व 80° उत्तरी तथा दक्षिणी अक्षांश बनेंगे। इन अक्षांश रेखाओं की भूमध्य रेखा से दूरी को निम्नलिखित तालिका से ज्ञात करें।

अक्षांशभूमध्य रेखा से दूरी (सें०मी०)
20°0.356 x r = 0.356 x 2.1 = 0.75
40°0.763 x r = 0.763 x 2.1 = 1.6
60°1.317 x r = 1.317 x 2.1 = 2.76
80°2.437 x r = 2.437 x 2.1 = 5.1

अब इन दूरियों में से प्रत्येक को पहले A की ओर, फिर A से नीचे की ओर काटिए।

उदाहरणतया 13.2 सें०मी० की आधार रेखा AB भूमध्य रेखा को प्रकट करती है। इस रेखा के उत्तर व दक्षिण में 0.75 सें०मी० के चिह्न लगा दीजिए तथा इन चिह्नों में से होती हुई भूमध्य रेखा के समांतर रेखाएं खींच दीजिए। ये रेखाएं 10° उ० व 10° द० अक्षांशों को प्रकट करेंगी। इसी प्रकार 1.6 सें०मी०, 2.76 सें०मी० तथा 5.1 सें०मी० की दूरियां लेकर A से उत्तर व दक्षिण की ओर चिह्न लगाइए तथा भूमध्य रेखा के समांतर रेखाएं खींच दीजिए। ये रेखाएं क्रमशः 40°, 60° व 80° उत्तरी व दक्षिणी अक्षांशों को प्रकट करेंगी।

चरण-6.
चित्र के अनुसार रेखा जाल के बाहर अक्षांशों व देशांतर रेखाओं के मान लिख दीजिए। इन मानों के साथ उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम (N,S,E,W) लिखना न भूलें।

प्रश्न 6.
मर्केटर प्रक्षेप की विशेषताएँ, उपयोग तथा सीमाएँ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मर्केटर प्रक्षेप की विशेषताएँ (Characteristics of Mercator’s Projection)-मर्केटर प्रक्षेप की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. अक्षांश रेखाओं का आकार प्रक्षेप में सभी अक्षांश रेखाएं सरल रेखाएं हैं, जो भूमध्य रेखा के समांतर खींची गई हैं तथा समान लंबाई वाली हैं।

2. देशांतर रेखाओं का आकार देशांतर रेखाएं भी सरल रेखाएं हैं जो भूमध्य रेखा पर समान दूरी पर खींची गई समांतर रेखाएं हैं। सभी देशांतर रेखाओं की लंबाई समान है इस प्रक्षेप पर ध्रुव प्रदर्शित नहीं किए जा सकते।

3. अक्षांश तथा देशांतर रेखाओं का प्रतिच्छेदन-अक्षांश व देशांतर रेखाएं एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।

4. अक्षांश रेखाओं का मापक इस प्रक्षेप में भूमध्य रेखा पर तो मापक शुद्ध होता है, किंतु भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाते हुए अन्य अक्षांश रेखाओं का मापक निरंतर बढ़ता जाता है। इसका कारण यह है कि मर्केटर प्रक्षेप पर सभी अक्षांश रेखाएं भूमध्य रेखा के बराबर खींची जाती हैं, जबकि ग्लोब पर ये ध्रुवों की ओर छोटी होती जाती हैं। उदाहरणतः ग्लोब पर 60° उ० व द० अक्षांश रेखा भूमध्य रेखा से आधी होती है, जबकि इस प्रक्षेप में वह भूमध्य रेखा के बराबर होती है। अतः इस प्रक्षेप पर 60° अक्षांश रेखा पर मापक ग्लोब की तुलना में दुगुना हो जाता है। इसी प्रकार 75%° अक्षांश रेखा पर मापक ग्लोब की तुलना में गुना हो जाता है। ध्रुवों पर तो यह मापक अनंत गुना बड़ा हो जाता है।

देशांतर रेखाओं का मापक भूमध्य रेखा पर तो देशांतर रेखाओं का मापक भी लगभग शुद्ध होता है, किंतु शुद्ध दिशा और शुद्ध आकृति के गुणों को बचाए रखने के लिए इस प्रक्षेप पर देशांतर रेखाओं के मापक को भी ध्रुवों की ओर उ दिया जाता है।

उपयोग (Utility)-संसार में वायुमार्ग, समुद्री मार्ग, महासागरीय धाराओं, पवनों के परिसंचरण, अपवाह, समताप तथा समदाब रेखाएं दिखाने के लिए इस प्रक्षेप पर बने मानचित्रों का प्रयोग किया जाता है।

मर्केटर प्रक्षेप की सीमाएं (Limitations of Mercator’s Projection)-

  • इस प्रक्षेप में उच्च अक्षांशों में क्षेत्रफल बहुत ही ज्यादा बढ़ जाता है। इसी कारण ग्रीनलैंड दक्षिणी अमेरिका के बराबर दिखता है। वास्तव में दक्षिणी अमेरिका ग्रीनलैंड से 9 गुना बड़ा है।
  • ग्लोब पर एशिया, यूरोप और उत्तरी अमेरिका के उत्तरी भाग एक-दूसरे के काफी निकट हैं, जबकि इस प्रक्षेप में वे दूर-दूर दिखाई देते हैं।
  • मर्केटर प्रक्षेप गोल पृथ्वी की भ्रामक तस्वीर प्रस्तुत करता है, क्योंकि इस पर ध्रुव नहीं दिखाए जा सकते।

प्रश्न 7.
मर्केटर प्रक्षेप पर रंब लाइन तथा बृहत वृत्त की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मर्केटर प्रक्षेप पर रंब लाइन तथा बृहत वृत्त (Loxodrome and Great Circles on Mercator’s Projection) मर्केटर प्रक्षेप में सभी देशांतर रेखाएं आपस में समांतर होती हैं, इसलिए इस प्रक्षेप पर खींची गई कोई भी सरल रेखा सभी देशांतर रेखाओं के साथ एक समान कोण बनाती है। इसके अतिरिक्त इस प्रक्षेप पर अक्षांश व देशांतर रेखाओं का मापक भी समान होता है। अतः इस प्रक्षेप पर किन्हीं दो स्थानों को जोड़ने वाली कोई भी सीधी रेखा एक स्थिर दिक्मान रेखा (A Line of Constant Blaring) होती है। चित्र 5.9 में AB रेखा ऐसी ही एक स्थिर दिक्मान रेखा है जो सभी देशांतर रेखाओं के साथ 35° का कोण बनाती है। इसी प्रकार इस चित्र में अन्य सरल रेखाएं भी स्थिर दिक्मान कहलाती हैं। ऐसी रेखाओं को एकदिश नौपथ अथवा रंब लाइन अथवा लोक्सोड्रोम (Loxodrome) कहा जाता है। लोक्सोड्रोम मूलतः यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘तिरछा चलते हुए’ वास्तव में ग्लोब पर लोक्सोड्रोम वक्राकार रेखाएँ होती है जो इस प्रक्षेप पर सीधी दर्शाई जाती हैं।

बेलनाकार प्रक्षेपों में केवल मर्केटर प्रक्षेप पर ही दो स्थानों के बीच दिक्मान ग्लोब के अनुसार शुद्ध होता है। (नीचे दिया गया बॉक्स देखें) मर्केटर प्रक्षेप का यही गुण नाविकों के लिए वरदान सिद्ध हुआ।

नाविकों की First Choice था मर्केटर प्रक्षेप:

  • शुद्ध दिशा प्रक्षेप होने के कारण नाविकों के लिए गंतव्य स्थान की सही-सही दिशा मानचित्र पर ज्ञात कर अपने जहाज को निश्चित दिशा में स्थापित करना सरल हो गया।
  • इस प्रक्षेप का सही उपयोग वायुयान चालकों के लिए भी था।
  • इस प्रक्षेप पर 50° अक्षांश के बाद आकृतियां बहुत बड़ी दिखाई देती हैं। अतः इस प्रक्षेप पर ब्रिटेन साम्राज्य अपने वास्तविक विस्तार से कई गुना बड़ा दिखाई देता था। यह तथ्य एक राष्ट्र और नस्ल विशेष के श्रेष्ठ और बहुत बड़ा दिखाने के अहम की पुष्टि करता था।
  • ध्रुवीय प्रदेशों के वायु एवं जल यातायात के लिए भी शिरोबिंदु ध्रुव प्रक्षेप तथा मर्केटर प्रक्षेप समान रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
    HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 10

नाविकों को अपने गंतव्य स्थान पर पहुंचने के लिए अपने जहाज को एक स्थिर दिक्मान रेखा पर चलाना होता है। इसके बाद जहाज बिना दिशा बदले निश्चित मार्ग पर चलता रहता है। याद रहे कि मर्केटर प्रक्षेप पर स्थिर दिक्मान रेखा आरंभिक बिंदु (Starting Point) तथा गंतव्य स्थान (Destination) के बीच सीधी रेखा खींचकर प्राप्त की जा सकती है।।

नौ संचालन के दौरान मर्केटर प्रक्षेप के प्रयोग करने से एक कठिनाई आती है, जिसे नाविक दूर करते चलते हैं। समय और ईंधन बचाने के लिए नाविक छोटे से छोटा रूट पकड़ते हैं, जिसके लिए उन्हें बृहत वृत्त मार्ग अपनाना होता है।

परंतु ग्लोब पर भूमध्य रेखा और देशांतर रेखाएं ही ऐसे बृहत वृत हैं, जो सरल रेखाओं द्वारा दर्शाए जाते हैं। बाकी सभी बृहत वृत वक्राकार होते हैं। इनकी वक्रता ध्रुवों की ओर होती है। अन्य शब्दों में ये बृहत वृत उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तर की ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण की ओर झुके हुए होते हैं। उल्लेखनीय है कि मर्केटर प्रक्षेप पर न्यूनतम दूरी वाले बृहत वृत वक्राकार होते हैं, जबकि अधिक दूरी वाले एकदिश नौपथ (Loxodromes) सीधी रेखाओं द्वारा दर्शाए जाते हैं।

अतः साफ है कि कोई बृहत वृत मार्ग भूमध्य रेखा अथवा किसी देशांतर रेखा का भाग नहीं है तो वह वक्र होगा। इस वक्र के साथ-साथ जहाज चलाने के लिए नाविक को जहाज की दिशा जल्दी-जल्दी बदलनी पड़ती है जो बहुत मुश्किल काम है। इस मुश्किल को आसान करने के लिए बृहत वृत को छोटे-छोटे खंडों में बांट दिया जाता है और इन खंडों के विभाजन बिंदुओं को सीधी रेखा द्वारा मिला दिया जाता है। ऐसी प्रत्येक सीधी रेखा स्वयं एकदिश नौपथ (Loxodrome) या रंब लाइन बन जाती हैं।

इन खंडित रंब रेखाओं के सहारे नौसंचालन करते समय नाविक जहाज को केवल तभी मोड़ते हैं जहां दो रंब रेखाएं आपस में मिलती है। ऐसी ही खंडित रंब रेखाओं को चित्र 5.10 में दर्शाया गया है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप 11

प्रश्न 8.
एक मानक शंक्वाकार प्रक्षेप के लक्षण, गुण, अवगुण एवं उपयोग को समझाइए।
उत्तर:
1. एक मानक शंक्वाकार प्रक्षेप के लक्षण (Properties)

  • सभी अक्षांश रेखाएं संकेंद्रीय वृत्तों की चापें हैं जो आपस में समान दूरी पर स्थित हैं। ये चापें देशांतर रेखाओं के मिलन बिंदु को केंद्र मानकर खींची गई हैं।
  • ध्रुव भी एक चाप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।
  • प्रत्येक अक्षांश रेखा पर देशांतर रेखाओं की परस्पर दूरी समान होती है।
  • देशांतर रेखाएं शंकु के शीर्ष से प्रसारित होने वाली सरल रेखाएं होती हैं।

2. एक मानक शंक्वाकार प्रक्षेप के गुण (Merits)-

  • मानक अक्षांश रेखा पर मापक शुद्ध होता है। इससे दोनों ओर की अन्य अक्षांश रेखाओं पर मापक शुद्ध नहीं रहता।
  • सभी देशांतर रेखाएं ग्लोब की दूरी के अनुसार विभाजित की जाती हैं, अतः सभी देशांतरों पर मापक शुद्ध रहता है।

3. एक मानक शंक्वाकार प्रक्षेप के अवगण (Demerits)-

  • मानक अक्षांश से दूरी बढ़ने के साथ-साथ प्रदेशों की आकति और क्षेत्रफल में अशुद्धि आने लगती है, क्योंकि इसमें केवल मानक अक्षांश पर ही मापक शुद्ध रहता है।
  • इस प्रक्षेप में ध्रुव को भी चाप द्वारा प्रदर्शित किया जाता है, अतः यह प्रक्षेप पृथ्वी की सतह को शुद्ध रूप में प्रकट नहीं करता।

4. एक मानक शंक्वाकार प्रक्षेप के उपयोग (Uses)-मानक अक्षांश के दोनों ओर पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली संकरी पट्टी के प्रदर्शन के लिए यह प्रक्षेप श्रेष्ठ है। अतः उच्च अक्षांशों वाले प्रदेशों में पूर्व-पश्चिम दिशा में फैली अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं, सड़कों, रेल-मार्गों, नदी घाटियों को प्रदर्शित करने के लिए यह एक उपयोगी प्रक्षेप है। ट्रांस-कैनेडियन रेलवे (Trans-Canadian Rly.), कैनेडियन-पैसेफिक रेलवे (Canadian-Pacific Rly.), कनाडा-संयुक्त राज्य अमेरिका की अंतर्राष्ट्रीय सीमा, भारत में नर्मदा और तापी नदी घाटियों को इस प्रक्षेप पर सही ढंग से दिखाया जा सकता है।

मानचित्र प्रक्षेप HBSE 11th Class Geography Notes

→ बृहत वृत्त-यह दो बिंदुओं के बीच की लघुत्तम दूरी को दर्शाता है, जिसका उपयोग प्रायः वायु परिवहन एवं नौसंचालन में किया जाता है।

→ यथाकृतिक प्रक्षेप-वह प्रक्षेप जिसमें धरातल के किसी क्षेत्र की यथार्थ आकृति बनाए रखी जाती है।

→ लेक्सोड्रोम या रंब रेखा यह मर्केटर प्रक्षेप पर खींची गई सीधी रेखा है, जो स्थिर दिक्मान वाले दो बिंदुओं को जोड़ती है। नौसंचालन के दौरान दिशा निर्धारण में यह अत्यंत सहायक होती है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 4 मानचित्र प्रक्षेप

→ ग्रिड (जाल)-किसी स्थान की सही स्थिति बताने और जानने के लिए मानचित्र पर खींची गई अक्षांश और देशांतर – रेखाओं का जाल। इन रेखाओं पर अक्षांशों और देशांतरों के मान अंकित होते हैं।

→ विकासनीय सतह ऐसी सतह जिसे बिना फटे समतल रूप में फैलाया जा सकता है, विकासनीय सतह कहलाती है।

→ अविकासनीय सतह ऐसी सतह जिसे बिना फाड़े समतल रूप में नहीं फैलाया जा सकता है।

→ केंद्रीय मध्याह्न रेखा (Central Meridian) रेखा जाल के मध्य की रेखा को केंद्रीय मध्याह्न रेखा या केंद्रीय देशांतर कहते हैं। इस पर चिह्न लगाकर निश्चित दूरी पर अक्षांश रेखाएं खींची जाती हैं।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. यदि सिंगापुर (103.5° पूर्व) में प्रातः के 10 बजे हों तो मोम्बासा (39° पूर्व) पर स्थानीय समय क्या होगा?
(A) 5.42 प्रातः
(B) 6.40 प्रातः
(C) 4.52 प्रातः
(D) 5.22 प्रातः
उत्तर:
(A) 5.42 प्रातः

2. एक गोले में होते हैं-
(A) 360°
(B) 320°
(C) 180°
(D) 90°
उत्तर:
(A) 360°

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

3. भूमध्य रेखा की अक्षांश रेखा है-
(A) 0°
(B) 90°
(C) 180°
(D) 360°
उत्तर:
(A) 0°

4. अक्षांश रेखाओं की संख्या कितनी है?
(A) 90
(B) 180
(C) 360
(D) 190
उत्तर:
(B) 180

5. देशान्तर रेखाओं की संख्या कितनी है?
(A) 90
(B) 180
(C) 360
(D) 480
उत्तर:
(C) 360

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भौगोलिक निर्देशांक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भौगोलिक निर्देशांक, अक्षांश तथा देशांतर रेखाओं का ग्लोब पर बना वह रेखा जाल होता है जिससे हम विभिन्न स्थानों की स्थितियां निश्चित करते हैं।

प्रश्न 2.
अक्षांश तथा अक्षांश रेखा में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण की ओर पृथ्वी के केंद्र पर बनने वाली कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं। ग्लोब पर समान अक्षांश वाले बिंदुओं को प्रकट करने वाले काल्पनिक वृत्तों को अक्षांश अथवा अक्षांश रेखाएं कहते हैं।

प्रश्न 3.
देशांतर तथा देशांतर रेखा में क्या भेद होता है?
उत्तर:
किसी स्थान की प्रधान देशांतर रेखा (0° देशांतर) से पूर्व या पश्चिम दिशा में कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशांतर कहते हैं। ग्लोब पर समान देशांतर वाले बिंदुओं को प्रकट करने वाले काल्पनिक अर्धवृत्तों को देशांतर रेखाएं कहा जाता है।

प्रश्न 4.
बृहत वृत्त (Great Circle) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब किसी गोले को उसके केंद्र से गुजरने वाले तल (plane) से काटा जाए तो कटा हुआ तल उस गोले का सबसे बड़े आकार (size) का होगा। यह वृत्त ‘बृहत वृत्त’ कहलाता है।

प्रश्न 5.
बृहत वृत्त मार्ग (Great Circle Route) क्या होता है व इसका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
यात्रा का वह मार्ग जो बृहत वृत्त का अनुसरण (Follow) करता हो, बृहत वृत्त मार्ग कहलाता है। यदि मार्ग में कोई बाधा न हो तो ग्रेट सर्कल रूट का अनुसरण करने वाला वायुमार्ग या समुद्री मार्ग सबसे छोटा होता है जो ईंधन व समय की बचत करता है। इसका कारण यह है कि किसी महान वृत्त की चाप दो दूर बिंदुओं के बीच न्यूनतम दूरी दर्शाती है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

प्रश्न 6.
प्रधान मध्याहून रेखा (Prime Meridian) किसे कहते हैं?
उत्तर:
ग्रीनविच रॉयल प्रेक्षणशाला से होकर गुजरने वाली 0° देशांतर रेखा को प्रधान मध्याह्न रेखा कहते हैं।

प्रश्न 7.
देशांतर तथा समय में क्या संबंध है?
उत्तर:
पृथ्वी अपने अक्ष पर 24 घंटे में एक चक्कर पूरा करती है। अतः 24 घंटे में पृथ्वी की समस्त 360 देशांतर रेखाएं एक-एक करके सूर्य के सामने से होकर गुजरती हैं। इस प्रकार पृथ्वी एक घंटे में \(\frac { 360° }{ 24 }\) = 15° घूम जाती है। एक देशांतर को सूर्य के सामने से गुजरने में \(\frac { 60 }{ 5 }\) = 4 मिनट का समय लगता है।

प्रश्न 8.
स्थानीय समय (Local Time) क्या होता है?
उत्तर:
किसी स्थान पर मध्याह्न सूर्य के समय को दोपहर 12.00 बजे मानकर निर्धारित किया गया समय स्थानीय समय कहलाता है।

प्रश्न 9.
मानक या प्रामाणिक समय से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी देश या समय कटिबंध के बीच से गुजरने वाली देशांतर रेखा के स्थानीय समय को मानक समय कहा जाता है।

प्रश्न 10.
समय कटिबंध (Time Zone) क्या होता है?
उत्तर:
समय कटिबंध संसार का ऐसा क्षेत्र है जहां घड़ियां एक जैसा समय दर्शाती हैं।

प्रश्न 11.
GMT या ग्रीनविच माध्य समय क्या होता है?
उत्तर:
सारे विश्व में समय की समरूपता बनाए रखने के लिए 0° देशांतर के समय को सब देश अपनाते हैं तो इस समय को GMT कहते हैं।

प्रश्न 12.
किसी देश का प्रामाणिक देशांतर 71° के गुणज पर क्यों लिया जाता है?
उत्तर:
प्रत्येक 71/2° का देशांतर 30 मिनट या आधे घंटे (7.5 x 4 = 30) का अंतर दर्शाता है। समय में आधे घंटे का गुणी समय की गणना को सरल व सुविधाजनक बनाता है।

प्रश्न 13.
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशांतर के लगभग अनुरूप वह काल्पनिक रेखा है जिसे पार करने पर दिशा के अनुसार एक दिन बढ़ाया या घटाया जाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अक्षांश रेखाएँ क्या हैं? इनकी विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
अक्षांश रेखाएं (Lines of Latitudes) ग्लोब पर समान अक्षांश वाले बिंदुओं को मिलाने वाले काल्पनिक वृत्तों को अक्षांश वृत्त अथवा अक्षांश रेखाएं अथवा अक्षांश समांतर (Parallel of Latitudes) कहा जाता है।

अक्षांश रेखाओं की प्रमुख विशेषताएं (लक्षण) निम्नलिखित हैं-

  • अक्षांश रेखाएं एक-दूसरे के समानांतर और आपस में समान दूरी पर होती हैं।
  • ध्रुवों के अक्षांश वृत्त केवल बिंदुओं के रूप में होते हैं।
  • शेष सभी अक्षांश रेखाएं एक पूर्ण वृत्त के रूप में होती हैं। इसलिए इन्हें अक्षांश वृत्त कहा जाता है।
  • भूमध्य रेखा बृहत वृत्त (Great Circle) होती है, जबकि शेष सभी अक्षांश रेखाएं लघु वृत्त होती हैं।
  • अक्षांश रेखाएं यथार्थ पूर्व-पश्चिम (True east-west direction) रेखाओं के रूप में होती हैं।
  • भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण की ओर अक्षांश रेखाओं की लंबाई उत्तरोत्तर कम होती जाती है। 60° उत्तर व 60° दक्षिण की अक्षांश रेखाओं की लंबाई भूमध्य रेखा की लंबाई की आधी होती है।

प्रश्न 2.
भूमध्य रेखा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
पृथ्वी का घूर्णन पृथ्वी के कल्पित अक्ष का संकेत देता है। इस अक्ष का ध्रुव तारे (Pole Star) का सीध वाला सिरा उत्तरी ध्रुव और दूसरा सिरा दक्षिणी ध्रुव कहलाता है। दोनों ध्रुवों के बीचों-बीच पृथ्वी के इर्द-गिर्द (Around) मान लिए गए कल्पित वृत्त को भूमध्य रेखा कहा जाता है। यह सबसे बड़ा अक्षांशीय वृत्त है जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्डों में बांटता है। भूमध्य रेखा 0° अक्षांश रेखा है। अन्य अक्षांशों की गणना यहीं से होती है।

प्रश्न 3.
देशान्तर रेखाएँ क्या हैं? इनकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
देशांतर रेखाएं (Lines of Longitude)-ग्लोब पर समान देशांतर वाले बिंदुओं को प्रकट करने वाले काल्पनिक अर्धवृत्तों को देशांतर रेखाएं (Lines of Longitude) कहा जाता है। देशांतर रेखाओं की प्रमुख विशेषताएं (लक्षण) निम्नलिखित हैं-

  • देशांतर रेखाएं दोनों ध्रुवों को मिलाते हुए अर्धवृत्त (Semi circles) बनाती हैं।
  • सभी देशांतरों के सिरे उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों पर मिलते हैं।
  • एक वृत्त में 360° होती हैं, अतः 1° के अंतराल पर कुल 360 देशांतर रेखाएं खींची जा सकती हैं।
  • इनमें से 180 देशांतर रेखाएं प्रधान मध्याह्न रेखा के पूर्व में व 180 देशांतर रेखाएं प्रधान मध्याह्न रेखा के पश्चिम में स्थित होती हैं (चित्र 4.1)।
  • 180° पूर्वी तथा पश्चिमी देशांतर रेखा एक ही है जो प्रधान मध्याह्न के विपरीत दिशा में होती है।
  • भूमध्य रेखा पर दो देशांतर रेखाओं के बीच की दूरी सबसे अधिक होती है जो ध्रुवों पर घटकर शून्य हो जाती है।
    HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 1

प्रश्न 4.
अक्षांश तथा देशांतर रेखाओं में अन्तर बताइए।
उत्तर:
अक्षांश तथा देशांतर में अंतर:

अक्षांश (Latitude)देशांतर (Longitude)
1. अक्षांश किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर अथवा दक्षिण की ओर पृथ्वी के केंद्र पर बनने वाली कोणात्मक दूरी है।1. देशांतर किसी स्थान की प्रधान मध्याह्न रेखा से पूर्व अथवा पश्चिम में बनने वाली कोणात्मक दूरी है।
2. अक्षांश का माप भूमध्य रेखा (0°) से होता है।2. देशांतर का माप प्रधान मध्याह्न रेखा (0°) से होता है।
3. अक्षांश 90° उत्तर तथा 90° दक्षिण तक अर्थात् कुल 180 होते हैं।3. देशांतर 180° पूर्व तथा 180° पश्चिम तक अर्थात् कुल 360 होते हैं।
4. सभी अक्षांश विषुवत वृत्त के समांतर होते हैं।4. देशांतर के सभी याम्योत्तर ध्रुवों पर मिलते हैं।
5. ग्लोब पर अक्षांश समांतर वृत्त के समान प्रतीत होते हैं।5. सभी याम्योत्तर वृत्त के समान प्रतीत होते हैं, जो ध्रुवों से गुजरते हैं।
6. दो अक्षांशों के बीच की दूरी लगभग 111 किलोमीटर होती है।6. देशांतरों के बीच की दूरी विषुवत वृत्त पर अधिकतम (111.3 किलोमीटर) तथा ध्रुवों पर न्यूनतम (0 किलोमीटर) होती है। मध्य में अर्थात् 45° अक्षांश पर यह 79 किलोमीटर होती है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

प्रश्न 5.
अक्षांश व देशान्तर रेखाओं की उपयोगिता बताइए।
उत्तर:
अक्षांश व देशांतर रेखाओं की उपयोगिता निम्नलिखित है-

  • पृथ्वी या ग्लोब पर किसी भी स्थान की अवस्थिति का सही-सही निर्धारण किया जा सकता है।
  • गोलाकार पृथ्वी या उसके भू-भाग का समतल मानचित्र बनाया जा सकता है।
  • अक्षांश भूमध्य रेखा से दूरी और वहां के तापमान का संकेत करते हैं, क्योंकि 1° अक्षांश पृथ्वी के 111 कि०मी० की दूरी के समान होता है।
  • देशांतर से स्थानीय समय (Local Time) का पता चलता है।

प्रश्न 6.
स्थानीय समय क्या है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब कोई देशांतर रेखा सूर्य के ठीक सामने आती है तो सूर्य सिर के ऊपर दिखाई देता है। उस देशांतर रेखा पर स्थित सभी स्थानों पर मध्याह्न होता है और परछाइयों की लंबाई सबसे कम होती है। इस समय यदि घड़ियों में दोपहर के 12 बजा लिए जाएं तो इसे स्थानीय समय कहेंगे। अतः किसी स्थान पर मध्याह्न सूर्य के समय को दोपहर 12 बजे मानकर निर्धारित किया गया समय स्थानीय समय कहलाता है।

प्रश्न 7.
स्थानीय समय तथा प्रामाणिक समय में अन्तर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्थानीय समय तथा प्रामाणिक समय में अंतर

स्थानीय समय (Local Time)प्रामाणिक समय (Standard Time)
1. स्थानीय समय प्रत्येक स्थान के देशांतर के अनुसार होता है।1. प्रामाणिक समय किसी देश या समय कटिबंध के केंद्रीय देशांतर के अनुसार होता है।
2. प्रत्येक स्थान पर स्थानीय समय भिन्न-भिन्न होता है।2. किसी देश या समय कटिबंध के सभी स्थानों पर प्रामाणिक समय एक होता है।

प्रश्न 8.
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कितनी जगह से टेढ़ी है और क्यों?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा तीन जगह से टेढ़ी है क्योंकि-

  • बेरिंग जलडमरू (Bering Strait) पर इस रेखा को पूर्व में घुमाने पर साइबेरिया का समस्त पूर्वी भाग एक तिथि रख सकता है, परंतु थोड़े से पूर्वी छोर पर तिथि अलग होती है।
  • दूसरा मोड़ एल्यूशियन द्वीप को अलास्का प्रायद्वीप वाला समय रखने की सुविधा देता है।
  • तीसरा व अंतिम मोड़ भूमध्य रेखा के दक्षिण में है ताकि एल्लिस, गिलबर्ट, फिजी व टोंगा द्वीप-समूहों को न्यूजीलैंड की तिथि के अनुरूप रखा जा सके।

ध्यान दें कि अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा में टेढ़ापन या तो 7 1/2° देशांतर तक है या फिर सीधा 150 देशांतर तक।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line)-अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशांतर रेखा के लगभग अनुरूप वह काल्पनिक रेखा है जिसे पार करने पर दिशा के अनुसार एक दिन बढ़ाया या घटाया जाता है।

24 घंटों में पृथ्वी अपने अक्ष पर एक घूर्णन पूरा करती है। इससे प्रति देशांतर 4 मिनट का अंतर पड़ जाता है। पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व को घूमती है। अतः यदि हम पश्चिम से पूर्व की ओर यात्रा करें तो हमें अपनी घड़ी प्रति 15° देशांतर पर 1 घंटा आगे व पूर्व से पश्चिम की ओर यात्रा करने पर 1 घंटा पीछे करनी पड़ेगी। अतः ग्रिनिच (ग्रीनविच) से चलकर 180° पूर्व तक पहुंचते-पहुंचते समय 12 घंटे आगे हो जाएगा, जबकि ग्रीनविच से चलकर 180° पश्चिम तक पहुंचते-पहुंचते समय 12 घंटे पीछे हो जाएगा।

इस प्रकार 0° देशांतर रेखा के मुकाबले 180° देशांतर रेखा पर 24 घंटे अथवा 1 दिन का फ़र्क पड़ जाता है। उदाहरणतः यदि ग्रीनविच प्रातः (0° देशांतर) पर रविवार 11 फरवरी, 2002 को प्रातः 6 बजे का समय है तो 180° पूर्व देशांतर पर पहुंचने वाले व्यक्ति को समय \(\frac { 180×4 }{ 60 }\) = 12 घंटे आगे मिलेगा अर्थात् वहाँ रविवार 11 फरवरी (उसी दिन) के सायं के 6 बजे होंगे। दूसरी ओर ग्रीनविच से पश्चिम की ओर यात्रा करने वाले व्यक्ति को 180° पश्चिम देशांतर पर समय 12 घंटे पीछे मिलेगा, अर्थात् वहाँ उसे रविवार 10 फरवरी सायं के 6 बजे मिलेंगे (चित्र 4.2)।

संसार की यात्रा में इस गड़बड़ी को दूर करने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा निश्चित कर दी गई है जो 180° देशांतर रेखा की स्थिति में कुछ हेर-फेर करके मानी गई है।

अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा अपनी संपूर्ण लंबाई में जल प्रदेश (प्रशांत महासागर) से ही गुज़रती है (चित्र 4.2)। जो जहाज़ एक तिथि रेखा को पश्चिम की ओर से पार करता है वह तिथि रेखा को पार करते ही एक दिन छोड़ देता है और जो जहाज़ इसे पूर्व की ओर से पार करता है वह एक ही दिन को दोबारा गिनता है। ऐसा करने से यात्रा में तिथि की गड़बड़ी दूर हो जाएगी।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 2

उदाहरणतः यदि पश्चिम की ओर से आता हुआ जहाज़ अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को रविवार 11 फरवरी को पार करता है तो वह अपने रिकॉर्ड में इस दिन को दो बार दर्ज करेगा-रविवार 11 फरवरी I व रविवार 11 फरवरी II । इस प्रकार पश्चिम से पूर्व की ओर जाने वाले जहाज़ के लिए सप्ताह 8 दिनों का होगा। दूसरी ओर यदि पूर्व की ओर से आता हुआ जहाज़ इस तिथि रेखा को रविवार 11 फरवरी को पार करता है तो वह अगला दिन, अर्थात्सोमवार 12 फरवरी को छोड़ देगा और अपने रिकॉर्ड में दूसरा दिन मंगलवार 13 फरवरी दर्ज कर लेगा। इस प्रकार पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाले जहाज़ के लिए सप्ताह केवल 6 दिनों का होगा।

प्रश्न 2.
यदि ग्रीनविच पर दिन के 2 बजे हों तो भारत में मानक समय क्या होगा? (भारत का मानक समय इलाहाबाद 827° पूर्वार्द्ध से मापा जाता है।) इलाहाबाद का देशांतर 82%° पूर्व तथा ग्रीनविच का देशांतर 0° है।
उत्तर:
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 82 1/2°
82 1/2° = \(\frac { 165° }{ 2 }\)
यदि देशांतर में अंतर 1° है तो समय में अंतर = 4 मिनट
यदि देशांतर में अंतर \(\frac { 165° }{ 2 }\) है तो समय में अंतर
= \(\frac { 165×4 }{ 2 }\) = 330 मिनट या 5 घंटे 30 मिनट
क्योंकि इलाहाबाद ग्रीनविच के पूर्व में स्थित है, इसलिए वहां का समय ग्रीनविच के समय से आगे होगा।
अतः जब ग्रीनविच पर दिन के 2 बजे होंगे तो इलाहाबाद (समस्त भारत) में सायं के 2 + 5:30 = 7:30 बजे होंगे।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 3

प्रश्न 3.
न्यूयॉर्क (74°W) पर स्थानीय समय क्या होगा जब ग्रीनविच पर दोपहर के 12 बजे हों?
उत्तर:
न्यूयॉर्क का देशांतर = 74° W
ग्रीनविच का देशांतर = 0°
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 74° – 0° = 74°
यदि देशांतर में अंतर 1° है तो समय में अंतर = 4 मिनट
यदि देशांतर में अंतर 74° है तो समय में अंतर = 74 x 4 = 296 अर्थात् 4 घंटे 56 मिनट
क्योंकि न्यूयार्क ग्रीनविच के पश्चिम में स्थित है, इसलिए वहां का समय ग्रीनविच के समय से पीछे होगा।
अतः जब ग्रीनविच पर दोपहर 12 बजे होंगे तो न्यूयार्क पर स्थानीय समय 12 – 4 घंटे 56 मिनट = 7 बजकर 4 मिनट

प्रश्न 4.
चेन्नई (मद्रास) (80°E) पर क्या स्थानीय समय होगा जब बोस्टन (71°W) में 15 मार्च सायं के 10 बजे हों?
उत्तर:
बोस्टन का देशांतर = 71° W
चेन्नई का देशांतर = 80° E
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर
= 71° + 80° = 151°
(जब दोनों दिशाएं विपरीत हों तो देशांतरों के जमा होने पर अंतर निकलता है।)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 4
यदि देशांतर में अंतर 1° है तो समय में अंतर = 4 मिनट
यदि देशांतर में अंतर 151° है तो समय में अंतर = 151 x 4 = 604 मिनट
अर्थात् 10 घंटे 4 मिनट
क्योंकि चेन्नई बोस्टन के पूर्व में स्थित है, इसलिए वहां का स्थानीय समय बोस्टन के समय से आगे होगा।
बोस्टन में 15 मार्च वाले दिन, रात के 10 बजे हैं अर्थात् बोस्टन में 15 मार्च के दिन का सूर्योदय हुए 12 + 10 = 22 घंटे हो चुके हैं।
क्योंकि चेन्नई बोस्टन के पूर्व में है इसलिए चेन्नई का समय ज्ञात करने के लिए हमें दोनों स्थानों के समय के अंतर को बोस्टन के समय में जमा करना पड़ेगा।
अतः चेन्नई का समय = बोस्टन का समय + समयांतर = 22.00 + 10.4 = 32.4
हम जानते हैं कि 24 घंटों के बाद अगला दिन शुरू हो जाता है अतः चेन्नई के कुल समय में से 24 घंटे घटा दीजिए अर्थात्
= 32.4-24 = 8.4।
इसका अर्थ यह है कि जब बोस्टन में 15 मार्च के दिन, रात के 10 बजे होंगे उस समय चेन्नई में दिन पहले ही पूरा हो चुका होगा और वहां अगले दिन 16 मार्च प्रातः 8 बजकर 4 मिनट हुए होंगे।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय

प्रश्न 5.
एक स्थान ‘A’ पर स्थानीय समय के अनुसार प्रातः के 10.00 बजे हैं तथा दूसरे स्थान ‘B’ पर उसी दिन सायं के 5.00 बजे हैं। यदि ‘A’ का देशांतर 40°E हो तो ‘B’ का देशांतर क्या होगा?
उत्तर:
घंटे  मिनट
A स्थान का समय = 10 : 00
B स्थान का समय = 17 : 00 (12+ 5)
समय में अंतर = 7 : 00 घंटे
अर्थात् 7 x 60 = 420 मिनट
यदि 4 मिनट के अंतर पर देशांतर का अंतर 1° है
तो 420 मिनट के अंतर पर देशांतर का अंतर
= \(\frac { 420 }{ 4 }\) = 105 देशांतर होगा
क्योंकि B स्थान का समय अधिक है इसलिए ‘B’ ‘A’ स्थान के पूर्व में स्थित होगा।
A का देशांतर = 40°E
B का देशांतर = 40° + 105° = 145° E
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 5

प्रश्न 6.
टोकियो का देशांतर 138° 45′ पूर्व है और अहमदाबाद का देशांतर 72°45′ पूर्व है। टोकियो का समय ज्ञात कीजिए, जबकि अहमदाबाद में प्रातः के 9 बजे हों।
उत्तर:
टोकियो का देशांतर = 138° 45′ पूर्व
अहमदाबाद का देशांतर = 72° 45′ पूर्व
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 138° 45′ – 72° 45′
66° 00′
1° देशांतर के अंतर पर समय का अंतर = 4 मिनट
66 देशांतर के अंतर पर समय का अंतर = 66 x 4 = 264
मिनट अर्थात् 264 ÷ 60 = 4 घंटे 24 मिनट
क्योंकि टोकियो अहमदाबाद के पूर्व में है इसलिए टोकियो का समय अहमदाबाद के समय से आगे होगा।
टोकियो का समय ज्ञात करने के लिए हमें दोनों स्थानों के समय के अंतर को अहमदाबाद के समय में जोड़ना होगा। अतः टोकियो का समय होगा 9:00 + 4:24 = 13:24 अर्थात् दोपहर 1 बजकर 24 मिनट।
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प्रश्न 7.
हांगकांग (114° पूर्व) पर समय ज्ञात कीजिए जब मांट्रियल (74° पश्चिम) पर मंगलवार सायं के 10 बजे हों।
उत्तर:
हांगकांग का देशांतर = 114° पूर्व
मांट्रियल का देशांतर = 74° पश्चिम
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 114° + 74° = 188°
(जब दोनों दिशाएं विपरीत हों तो देशांतरों के जमा होने पर अंतर निकलता है)
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 7
यदि देशांतर में अंतर 1° है तो समय में अंतर यदि देशांतर में अंतर 188° है तो समय में अंतर = 4 मिनट
= 188 x 4 = 752 मिनट अर्थात् 12 घंटे 32 मिनट
क्योंकि हांगकांग मांट्रियल के पूर्व में स्थित है, इसलिए वहां का स्थानीय समय मांट्रियल के समय से आगे होगा।
मांट्रियल में रात के 10 बजे हैं अर्थात् मांट्रियल में सूर्योदय हुए 12 + 10 = 22 घंटे हो चुके हैं।
क्योंकि हांगकांग मांट्रियल के पूर्व में स्थित है, इसलिए हांगकांग का समय ज्ञात करने के लिए हमें दोनों स्थानों के समय के अंतर को मांट्रियल के समय में जोड़ना होगा।
अतः हांगकांग का समय = मांट्रियल का समय + समयांतर = 22:00 + 12:32 = 34:32.
हम जानते हैं कि 24 घंटों के बाद अगला दिन शुरू हो जाता है। अतः हांगकांग के कुल समय में से 24 घंटों घटा दीजिए अर्थात् 34:32-24 = 10:32
इसका अर्थ यह हुआ कि जब मांट्रियल में मंगलवार रात के 10 बजे होंगे उस समय हांगकांग में अगले दिन बुधवार को दिन के 10:32 बजे होंगे।

प्रश्न 8.
भारत के पश्चिम में स्थित भुज का देशांतर 69° पूर्व है तथा भारत के पूर्व में स्थित तेजपुर का देशांतर 93° पूर्व है। भुज का स्थानीय समय ज्ञात करो, जबकि तेजपुर में दोपहर के 12 बजे हों।
उत्तर:
तेजपुर का देशांतर = 93° पूर्व
भुज का देशांतर = 69° पूर्व
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 93° – 69° = 24°
1° देशांतर के अंतर पर समय का अंतर = 4 मिनट
24° देशांतर के अंतर पर समय का अंतर
= 24 x 4=96 मिनट अर्थात् 1 घंटा 36 मिनट
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 8
क्योंकि भुज तेजपुर के पश्चिम में है, इसलिए भुज का स्थानीय समय तेजपुर के स्थानीय समय से पीछे होगा। अतः भुज का समय = 12:00 – 1:36 = 10 बजकर 24 मिनट दिन के।

प्रश्न 9.
एशियाई रूस के पूर्व में स्थित व्लाडिवॉस्टक का देशांतर 132° पूर्व है तथा यूरोपीय रूस के पश्चिम में स्थित सेंट पीटर्सबर्ग का देशांतर 30° पूर्व है। यदि व्लाडिवॉस्टक में 10 मार्च रविवार प्रातः के 4 बजे हैं तो सेंट पीटर्सबर्ग में स्थानीय समय क्या होगा?
उत्तर:
व्लाडिवॉस्टक का देशांतर = 132° पूर्व
सेंट पीटर्सबर्ग का देशांतर = 30° पूर्व
दोनों स्थानों के देशांतरों में अंतर = 132° – 30° = 102°
यदि देशांतर में अंतर 1° है तो समय में अंतर = 4 मिनट
यदि देशांतर में अंतर 102° है तो समय में अंतर
= 102 x 4 =408 मिनट अर्थात
= 6 घंटे 48 मिनट।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 3 अक्षांश, देशान्तर और समय 9
क्योंकि सेंट पीटर्सबर्ग व्लाडिवॉस्टक के पश्चिम में है अतः सेंट पीटर्सबर्ग का स्थानीय समय व्लाडिवॉस्टक के स्थानीय समय से पीछे होगा।
अतः सेंट पीटर्सबर्ग का समय ज्ञात करने के लिए हमें व्लाडिवॉस्टक के समय से 6 घंटे 48 मिनट पीछे जाना होगा अर्थात 4a.m. – 6:48 = 9 बजकर 12 मिनट रात के दिनांक 9 मार्च शनिवार।

अक्षांश, देशान्तर और समय HBSE 11th Class Geography Notes

→ अक्षांश (Latitude)-किसी स्थान की भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण की ओर पृथ्वी के केन्द्र पर बनने वाली कोणात्मक दूरी को उस स्थान का अक्षांश कहते हैं।

→ देशान्तर (Longitude)-किसी स्थान की प्रधान देशान्तर रेखा (0° देशान्तर) से पूर्व या पश्चिम दिशा में कोणात्मक दूरी को उस स्थान का देशान्तर कहते हैं।

→ प्रधान मध्याह्न रेखा (Prime Meridian) एक अन्तर्राष्ट्रीय समझौते में लंदन के समीप ग्रीनविच वेधशाला से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को प्रधान देशान्तर रेखा या प्रधान मध्याह्न रेखा कहा जाता है।

→ कर्क रेखा (Tropic of Capricorn)-भूमध्य रेखा से 2372° उत्तर अक्षांश रेखा को कर्क रेखा कहते हैं।

→ अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा (International Date Line) अन्तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा 180° देशान्तर रेखा के लगभग अनुरूप वह काल्पनिक रेखा है जिसे पार करने पर दिशा के अनुसार एक दिन बढ़ाया या घटाया जाता है।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 2 मानचित्र मापनी Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सी विधि मापनी की सार्वत्रिक विधि है?
(A) साधारण प्रकथन
(B) निरूपक भिन्न
(C) आलेखी विधि
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) निरूपक भिन्न

2. मानचित्र की दूरी को मापनी में किस रूप में जाना जाता है?
(A) अंश
(B) हर
(C) मापनी का प्रकथन
(D) निरूपक भिन्न
उत्तर:
(B) हर

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

3. मापनी में ‘अंश’ व्यक्त करता है-
(A) धरातल की दूरी
(B) मानचित्र की दूरी
(C) दोनों दूरियां
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) धरातल की दूरी

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानचित्र पर प्रदर्शित किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की दूरी तथा पृथ्वी पर उन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक दूरी के अनुपात को मापक कहते हैं।

प्रश्न 2.
मापक की हमें क्यों जरूरत पड़ती है?
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र के बराबर आकार का मानचित्र नहीं बनाया जा सकता। यद्यपि क्षेत्र के अनुपात में कुछ छोटा मानचित्र बनाया जा सकता है। इसके लिए मापक जरूरी है। दूसरे मानचित्र पर दूरियों को मापने और विभिन्न स्थानों की सापेक्षित स्थिति ज्ञात करने के लिए भी हमें मापक की जरूरत पड़ती है।

प्रश्न 3.
मानचित्र पर मापक को कितने तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है?
उत्तर:
तीन विधियों से-

  1. कथनात्मक मापक
  2. प्रदर्शक भिन्न (R.E.) और
  3. रैखिक मापक।

प्रश्न 4.
प्रदर्शक भिन्न (R.F.) क्या होती है?
उत्तर:
यह मापक प्रदर्शित करने वाली भिन्न होती है जिसके बाईं ओर की संख्या अंश तथा दाईं ओर की संख्या हर कहलाती है। अंश (Numerator) का मान (Value) सदा 1 होता है जो मानचित्र की दूरी को दिखाता है और हर (Denominator) धरातल की दूरी को दिखाता है। इन दोनों की इकाई सदा एक-जैसी होती है।

प्रश्न 5.
R.F. को किस मापन-प्रणाली द्वारा व्यक्त किया जाता है?
उत्तर:
प्रदर्शक भिन्न या R.E. की कोई मापन-प्रणाली नहीं होती। यह तो केवल भिन्न (Fraction) के द्वारा व्यक्त होता है।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

प्रश्न 6.
प्रदर्शक भिन्न को मापक व्यक्त करने की अन्य विधियों से बेहतर क्यों माना जाता है?
अथवा
प्रदर्शक भिन्न को अंतर्राष्ट्रीय मापक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
R.F. किसी भी मापन-प्रणाली से जुड़ा हुआ नहीं होता। अतः हर देश में इसका प्रयोग हो सकता है, इसलिए यह एक बेहतर विधि है।

प्रश्न 7.
विकर्ण मापक का क्या लाभ है?
उत्तर:
विकर्ण मापक से मानचित्र की छोटी-से-छोटी दूरी भी सरलता से मापी जा सकती है, क्योंकि इस मापक के द्वारा 1 सें०मी० या 1 इंच का 100वां हिस्सा भी दिखाया जा सकता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक क्या है? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मापक को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मापक की परिभाषा एवं अर्थ (Definition and Meaning of Scale)-पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का मानचित्र बनाने से पहले हम तय करते हैं कि मानचित्र की कितनी दूरी से धरातल की कितनी दूरी दिखाई जानी है। इस प्रकार हम मानचित्र की दूरी और धरातल की दूरी के बीच एक संबंध स्थापित करते हैं। यही संबंध मापक को जन्म देता है। मापक वह अनुपात है जिसमें धरातल पर मापी गई दूरियों को छोटा करके मानचित्र में प्रदर्शित किया जाता है। सरल शब्दों में, “मानचित्र पर किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की सीधी दूरी तथा पृथ्वी पर उन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक सीधी दूरी के अनुपात को मापक कहते हैं।” (Scale is the ratio between a distance measured on a map and the corresponding distance on the Earth.) इसे निम्नलिखित सूत्र में भी व्यक्त किया जा सकता है-
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 1
उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए एक मानचित्र पर A तथा B कोई दो बिंदु हैं, जिनके बीच की दूरी 1 सें०मी० तथा धरातल पर इन्हीं दो बिंदुओं के बीच की दूरी 5 किलोमीटर है; तो उस मानचित्र का मापक 1 सें०मी० : 5 कि०मी० होगा।

प्रश्न 2.
मापक की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मापक की आवश्यकता (Necessity of Scale)-
(1) हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी के धरातल के आकार के बराबर मानचित्र नहीं बनाया जा सकता। अगर बन भी जाए तो वह निरर्थक होगा। प्रदर्शित.किए जाने वाले क्षेत्र की तुलना में मानचित्र का काफी छोटा होना ही उसकी उपयोगिता और सार्थकता को दर्शाता है। मानचित्र आवश्यकतानुसार आकार वाला होना चाहिए। यह कार्य केवल मापक द्वारा ही हो सकता है।

(2) मापक के अभाव में मानचित्र पर विभिन्न स्थानों की सापेक्षित स्थिति (Relative Position) नहीं दिखाई जा सकती। जो मानचित्र मापक के अनुसार न बना हो वह केवल एक कच्चा रेखाचित्र (Rough Sketch) होता है।

प्रश्न 3.
मापक की विभिन्न पद्धतियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मापक की पद्धतियाँ (Methods of Measurement)-मापक की दो पद्धतियाँ हैं-
1. मेट्रिक प्रणाली इस प्रणाली के अंतर्गत धरातल पर किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की क्षैतिज दूरी को मापने के लिए किलोमीटर, मीटर एवं सेंटीमीटर इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। मेट्रिक प्रणाली का उपयोग भारत तथा विश्व के अन्य अनेक देशों में किया जाता है।

2. अंग्रेज़ी प्रणाली-इस दूसरी पद्धति में मील, फल्ग, गज व फुट आदि इकाइयों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रणाली का उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इंग्लैंड दोनों देशों में किया जाता है। रेखीय दूरियों को मापने व प्रदर्शित करने के लिए 1957 से पूर्व इस पद्धति का प्रयोग भारत में भी किया जाता था।
मापक की पद्धतियाँ:
मापक की मेट्रिक प्रणाली

  • 1 कि०मी० = 1,000 मीटर
  • 1 मीटर = 100 सें०मी०
  • 1 सें०मी० = 10 मिलीमीटर

मापक की अंग्रेज़ी प्रणाली

  • 1 मील = 8 फर्लांग
  • 1 फर्लांग = 220 यरर्ड
  • 1 यार्ड = 3 फुट
  • 1 फुट = 12 इंच

प्रश्न 4.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 5 सें०मी० : 1 कि०मी० है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.F.) ज्ञात करें।
क्रिया:
पग 1.
धरातल की दूरी को सें०मी० में परिवर्तित कीजिए, क्योंकि मानचित्र पर दूरी सें०मी० में है। 1 कि०मी० = 1,00,000 सें०मी०।।
पग 2.
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 2
R.F = \(\frac{5}{1,00,000}=\frac{1}{20,000}\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.F. = 1:20,000

प्रश्न 5.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 1 सें०मी० : 250 मीटर है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.E.) ज्ञात कीजिए। क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को सें०मी० में बदलिए क्योंकि मानचित्र की दूरी सें०मी० में है। 250 मीटर = 100 x 250 = 25,000 सें०मी०
पग 2.
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 2
R.F. = \(\frac { 1 }{ 25,000 }\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.E. = 1:25,000

प्रश्न 6.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 3.5 सें०मी० : 7 कि०मी० है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.F.) . ज्ञात करें।
क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को सें०मी० में बदलिए, क्योंकि मानचित्र की दूरी सें०मी० में है।
7 कि०मी० = 7 x 1,00,000 सें०मी०
पग 2.
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 2
R.E = \(\frac{3.5}{7,00,000}=\frac{1}{2,00,000}\) (अंश सदैव 1 रहता है)
उत्तर:
R.F. = 1:2,00,000

प्रश्न 7.
1 इंच : 8 मील वाले कथनात्मक मापक को प्रदर्शक भिन्न (R.F.) में परिवर्तित कीजिए। क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को इंचों में बदलिए क्योंकि मानचित्र की दूरी इंचों में है।
8 मील = 8 x 63,360 = 5,06,880 इंच
(1 मील = 63,360 इंच)
पग 2.
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 1a

R.E. = \(\frac{1}{5,06,880}\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.E. = 1:5,06,880

प्रश्न 8.
एक मानचित्र पर प्रदर्शक भिन्न \(\frac{1}{3,00,000}\) दिया गया है। इसे कि०मी० में दिखाने के लिए कथनात्मक मापक बनाइए।
क्रिया : पग 1. R.F. \(\frac{1}{3,00,000}\) ; इसे मीट्रिक प्रणाली में पढ़िए।
1 सें०मी० : 3,00,000 सें०मी०
पग 2. धरातल की दूरी को कि०मी० में बदलिए।
1 सें०मी० = \(\frac{1}{1,000}\) कि०मी०
3,00,000 सें०मी० = \(\frac{3,00,000}{1,00,000}\) = 3 कि०मी०
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 सें०मी० : 3 कि०मी०।

प्रश्न 9.
यदि प्रदर्शक भिन्न 1:2,53,440 हो तो मील दिखाने के लिए उसे कथनात्मक मापक में परिवर्तित कीजिए।
क्रिया : पग 1. R.F. = \(\frac{1}{2,53,440}\) को ब्रिटिश प्रणाली में पढ़िए।
1 इंच : 2,53,440 इंच।
पग 2. धरातल की दूरी को मीलों में बदलिए।
1 इंच = \(\frac{1}{63,360}\) माल
2,53,440 इंच = \(\frac{2,53,440}{63,360}\)= 4 मील
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 इंच : 4 मील।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

प्रश्न 10.
यदि प्रदर्शक भिन्न 1:10,00,000 हो तो मील दिखाने के लिए इसे कथनात्मक मापक में परिवर्तित कीजिए। क्रिया : पग 1. R.F. \(\frac{1}{10,00,000}\) को ब्रिटिश प्रणाली में पढ़िए।
1 इंच : 10,00,000 इंच
पग 2. धरातल की दूरी को मीलों में बदलिए।
1 इंच : \(\frac{1}{63,360}\) मील
10,00,000 इंच : \(\frac{10,00,000}{63,360}\) = 15.78 मील
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 इंच : 15.78 मील।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र पर मापक को प्रदर्शित करने वाली विधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्र पर मापक प्रदर्शित करने वाली विधियों के गुण-दोषों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र पर मापक को प्रदर्शित करने की विधियां (Methods of Expressing Scale on a Map)-मानचित्र पर मापक को निम्नलिखित तीन विधियों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है

  • कथनात्मक मापक (Statement of Scale)
  • प्रदर्शक भिन्न (Representative Fraction)
  • रैखिक मापक (Linear Scale)

1. कथनात्मक मापक (Statement of Scale) इस विधि में किसी मानचित्र पर उसके मापक को शब्दों में लिख दिया जाता है; जैसे 1 सेंटीमीटर : 2 किलोमीटर। इसका अर्थ यह हुआ कि मानचित्र पर 1 सेंटीमीटर की दूरी धरातल की 2 किलोमीटर की दूरी को प्रदर्शित कर रही है। कथनात्मक मापक में बाएं हाथ की ओर वाली संख्या सदैव मानचित्र पर दूरी को दिखाती है। इस विधि के अन्य नाम विवरणात्मक मापक तथा शाब्दिक विवेचन विधि भी हैं।

गुण-

  • यह एक सरल विधि है जिसे एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है।
  • मापक प्रदर्शित करने की इस विधि में कम समय लगता है और किसी विशेष कुशलता की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • इस विधि से हमें दूरियों का ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है।

दोष-

  • कथनात्मक मापक को पढ़कर केवल वे लोग मानचित्र पर दूरियों की गणना कर सकते हैं, जो उस माप-प्रणाली से परिचित होंगे।
  • इस विधि द्वारा सीधे मानचित्र पर दूरियां नहीं मापी जा सकतीं।
  • जिन मानचित्रों में मापक शब्दों में व्यक्त किया गया होता है, उनका मूल आकार से भिन्न आकार में मुद्रित करना संभव नहीं होता, क्योंकि इससे उनका मापक अशुद्ध हो जाएगा।

2. प्रदर्शक भिन्न (Representative Fraction)-इस विधि में मापक को एक भिन्न द्वारा प्रदर्शित किया जाता है; जैसे \(\frac{1}{10,00,000}\)। इसका अंश (Numerator) सदा एक (1) होता है जो मानचित्र पर दूरी को दर्शाता है। इस भिन्न का हर (Denominator) धरातल पर दूरी को दर्शाता है। मानचित्र का मापक बदलने पर अंश वही रहता है, लेकिन हर बदल जाता है।
अन्य शब्दों में-
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 3
इस विधि की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें अंश और हर एक ही इकाई (Unit) में व्यक्त किए जाते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में मानचित्र का मापक 1 : 1,00,000 या 1/1,00,000 है तो इसका अर्थ यह हुआ कि मानचित्र पर दूरी की 1 इकाई धरातल पर 1,00,000 उन्हीं इकाइयों की दूरी को प्रदर्शित करती है। यदि मानचित्र पर यह इकाई 1 सें०मी० है तो धरातल पर यह 1,00,000 सें०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगी।

गुण-
(1) इस विधि में किसी मापन-प्रणाली (Measurement System) का प्रयोग नहीं होता, केवल भिन्न का प्रयोग होता है। इसलिए मापक दिखाने की इस विधि का प्रयोग किसी भी देश की मापक प्रणाली के अनुसार किया जा सकता है। मान लो एक मानचित्र पर प्रदर्शक भिन्न = \(\frac{1}{10,00,000}\) लिखा हुआ है तो इसका अभिप्राय अलग-अलग मापन प्रणालियों में अलग-अलग होगा; जैसे-

देश/प्रणालीमानचित्र पर दूरीधरातल की दूरी
भारत व फ्रांस, जहां मेट्रिक प्रणाली है।1 सें०मी०1,00,000 सें०मी०
ब्रिटेन, जहां ब्रिटिश प्रणाली है।1 इंच1,00,000 इंच
रूस1 वर्स्ट1,00,000 वसर्ट्रूस
चीन1 चांग1,00,000 चांग

फर्क मामूली है, किंतु महत्त्वपूर्ण है

यह अनुपात (Ratio) हैयह भिन्न (Fraction) है
1: 50,000\(\frac { 1 }{ 50,000 }\)

संपरिवर्तनीयता (Convertibility) की इसी विशेषता के कारण ही इस R.F. विधि को अंतर्राष्ट्रीय मापक (International Scale) और प्राकृतिक मापक (Natural Scale) कहा जाता है।

(2) यह एक अत्यंत लोकप्रिय विधि है जिसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है।

दोष-

  • इस विधि में किसी मापन-प्रणाली का प्रयोग न करके केवल भिन्न का प्रयोग किया जाता है, जिससे सीधे ही दूरियों का अनुमान नहीं लग सकता।
  • फोटोग्राफी द्वारा मानचित्र को छोटा अथवा बड़ा करने पर इसका प्रदर्शक भिन्न बदल जाता है, यद्यपि संख्या वही लिखी रहती है।
    यह विधि एक साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है।

3. रैखिक मापक (Linear Scale)-इस विधि में मानचित्र की दूरी को एक सरल रेखा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिसका अनुपात धरातल की दूरी से होता है। सुविधा के अनुसार इस रेखा को प्राथमिक (Primary) तथा गौण (Secondary) भागों में बांटा जाता है।

गुण-
(1) इस विधि से दूरियों को मापना सरल हो जाता है।

(2) इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि यदि मानचित्र को फोटोग्राफी द्वारा बड़ा या छोटा किया जाए तो मानचित्र पर छपा रैखिक मापक भी उसी अनुपात में बड़ा या छोटा हो जाता है। अतः मापक बड़े या छोटे किए गए मानचित्र के लिए शुद्ध रहता है। यह गुण कथनात्मक मापक और प्रदर्शक भिन्न (R.F.) विधियों में नहीं है जिस कारण मूल मानचित्र से भिन्न मापक पर बने मानचित्र में ये दो विधियां उपयुक्त नहीं होती।

दोष-

  • इस विधि का प्रयोग भी तभी हो सकता है जब हम उस मापन-प्रणाली से परिचित हों जिसका प्रयोग मापक बनाने के लिए किया गया है।
  • इस मापक को बनाने में समय भी लगता है और कुशलता की भी आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
रैखिक मापक की रचना को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
रैखिक मापक की रचना (Drawing of Linear Scale)-रैखिक मापक की रचना करने से पहले हमें एक सरल रेखा को समान भागों में बांटने के तरीके आने चाहिएं क्योंकि इसके बिना शुद्ध रैखिक मापक की रचना नहीं हो सकती। इसके लिए दो विधियां हैं
प्रथम विधि : मान लीजिए AB कोई दी हुई सरल रेखा है जिसे 6 समान भागों में विभाजित करना है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 4

  • A सिरे पर न्यूनकोण (Acute angle) बनाती हुई एक रेखा AC खींचो।
  • अब परकार में कोई भी दूरी भर कर AC रेखा में समान अंतर पर.छः बिंदु D, E, F, G H और I अंकित करो।
  • बिंदु IB को सरल रेखा द्वारा मिलाओ।
  • अब D, E, F, G और 4 बिंदुओं से IB रेखा के समानांतर रेखाएं खींचो।

इस प्रकार AB रेखा 6 समान भागों में बंट जाएगी (चित्र 2.1)।
दूसरी विधि : मान लीजिए AB कोई दी हुई रेखा है जिसे पाँच समान भागों में विभाजित करना है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 5

  • रेखा के दोनों सिरों A और B पर विपरीत दिशाओं में दो समान न्यूनकोण (लंबकोण भी ले सकते हैं) खींचो।
  • अब परकार में कोई भी दूरी भर कर बिंदु A से पांच बिंदु C, D, E, F और G अंकित करो।
  • इसी प्रकार B बिंदु से भी उतनी ही दूरी पर पांच बिंदु C’, D’, E, F व G’ अंकित करो।
  • अब A को G’ से, C को F से, D को E’ से, E को D’ से, F को C’ से तथा G को B से मिला दीजिए।

इस प्रकार AB रेखा के पांच समान भाग बन जाएंगे।

रैखिक मापक की रचना (Drawing of Linear Scale)-जब कथनात्मक मापक अथवा प्रदर्शक भिन्न दिया हुआ है तो हम प्लेन मापक बना सकते हैं। रैखिक मापक की रचना करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए
(1) प्रायोगिक-पुस्तिका (Practical File) में बनाई जाने वाली मापनी (Scale) की लंबाई 12 से 20 सें० मी० या 5 से 8 इंच के बीच ठीक मानी जाती है। वैसे मानचित्र के आकार के अनुसार किसी भी लंबाई की छोटी या बड़ी मापनी बनाई जा सकती है।

(2) मापक द्वारा प्रदर्शित धरातलीय दूरी सदा पूर्णांक संख्या में होनी चाहिए। पूर्णांक संख्या वह संख्या होती है जो 2, 5, 10, 15, 20, 50, 100 अथवा किसी भी अन्य संख्या से पूर्णतः विभाजित हो जाए और उसमें शेष (Remainder) न बचे।

(3) मापक को पहले सुविधानुसार मुख्य भागों (Primary Divisions) में बांटा जाता है। याद रहे प्रत्येक मुख्य भाग भी पूर्णांक संख्या को दर्शाता है।

(4) फिर बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को सुविधानुसार गौण भागों (Secondary Divisions) में बांटा जाता है। इनसे मानचित्र पर छोटी दूरियां मापी जाती हैं।

(5) शून्य सदा बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को छोड़कर अंकित किया जाता है।

(6) इस शून्य से दाईं ओर (Right Side) मुख्य भागों द्वारा दिखाई गई इकाई तथा बाईं ओर (Left side) गौण भागों द्वारा दिखाई गई इकाई अंकित की जाती है।

(7) वैसे तो विश्वविख्यात कंपनियों द्वारा बने मानचित्रों व एटलसों में मापक की तीन विधियों में से केवल एक विधि का प्रयोग होता है। विद्यार्थी क्योंकि अभी सीखने की अवस्था में हैं तो उन्हें रैखिक मापक के साथ कथनात्मक मापक या R.F. या दोनों ही लिखने चाहिएं।

प्रश्न 3.
1:2,50,000 प्रदर्शक भिन्न वाले मानचित्र के लिए एक रैखिक मापक बनाओ जिससे एक किलोमीटर की दूरी भी मापी जा सके।
क्रिया : प्रदर्शक भिन्न 1:2,50,000
पग 1.
12 सें०मी० रेखा को मुख्य तथा गौण भागों में विभक्त कीजिए।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 6

पग 2.
फिर इस प्रकार मापक को पूरा कीजिए।
PLAIN SCALE
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 7
अर्थात् मानचित्र का 1 सें०मी० धरातल के 2,50,000 सें०मी० को प्रदर्शित करता है।
अथवा 1 सें०मी० = 2.5 कि०मी०
(क्योंकि 1,00,000 सें० मी० = 1 कि०मी०)
मान लो हम रैखिक मापक की लंबाई 12 सें० मी० रखना चाहते हैं। इस प्रकार इस लंबाई का मापक 12 x 2.5 = 30 कि०मी० की दूरी को प्रदर्शित करेगा। यह दूरी एक पूर्णांक संख्या है और मापक बनाने के लिए सुविधाजनक भी है। अब एक सरल रेखा 12 सें० मी० लंबी लो और इसे सिखलाई गई विधि से 6 समान भागों में बांटो। इसमें प्रत्येक मुख्य भाग 5 कि०मी०

दूरी को दिखाएगा। बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को 5 गौण भागों में बांटो। प्रत्येक गौण भाग 1 कि०मी० को प्रदर्शित करेगा। इसकी दाईं तथा बाईं ओर कि०मी० लिखकर नीचे R.F.लिखो। इसे अंकित और सुसज्जित करके इसका शीर्षक लिखो (चित्र 2.3)।

विद्यार्थी ध्यान दें कि रैखिक मापक का डिज़ाइन जरूरी नहीं कि वैसा हो जैसा ऊपर बताया गया है। इसी R.F. से बने रैखिक मापक को नीचे दिए गए डिजाइनों से भी बनाया जा सकता है। आपने किस प्रकार का रैखिक मापक बनाना है, इसका निर्देश अपने प्राध्यापक महोदय से लें।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 8

प्रश्न 4.
एक मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1 : 6,33,600 है। इस मानचित्र के लिए एक रैखिक मापक बनाइए जिसमें दो कि०मी० तक की दूरी पढ़ी जा सके।
क्रिया : इस प्रश्न में दूरियां कि०मी० में पूछी गई हैं अतः प्रदर्शन भिन्न का कथनात्मक मापक में परिवर्तन भी मेट्रिक प्रणाली में किया जाएगा।
प्रदर्शक भिन्न 1 : 6,33,600
∴ 1 सें०मी० : 6,33,600 सें०मी०
अथवा 1 सें०मी० : \(\frac { 6,33,600 }{ 1,00,000 }\) = 6.336 कि०मी० (क्योंकि 1,00,000 सें०मी० = 1 कि०मी०)
हम पढ़ चुके हैं कि रैखिक मापक की लंबाई 12 से 20 सें०मी० के बीच होनी चाहिए। यदि हम 12 सें०मी० लंबा मापक लेते हैं तो यह प्रदर्शित करेगा :
6.336 x 12 = 76.032 कि०मी०
परंतु 76.032 एक पूर्णांक संख्या नहीं है। इसकी निकटतम पूर्णांक संख्या 80 है। अब 80 कि०मी० को दर्शाने वाली रेखा की लंबाई ज्ञात करनी होगी।
क्योंकि 6.336 कि०मी० = 1 सें०मी०
1 कि०मी० = \(\frac { 1 }{ 6.336 }\) सेंमी०
80 कि०मी० = \(\frac { 1×80 }{ 6.336 }\) = 12.62 सें०मी०
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 9

प्रश्न 5.
किलोमीटर प्रदर्शित करने के लिए एक रैखिक मापक बनाओ जबकि मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1:20,00,000 . है।
क्रिया: क्योंकि दूरियां कि०मी० में पूछी गई हैं अतः प्रदर्शक भिन्न का कथनात्मक मापक में परिवर्तन भी मेट्रिक प्रणाली में किया जाएगा।
R.F. = 1 : 20,00,000
∴ 1 सें०मी० : 20,00,000 से०मी०
अथवा 1 सेंमी \(\frac { 20,00,000 }{ 1,00,000 }\) = 20 कि०मी० (क्योंकि 1,00,000 सें०मी० = 1 कि०मी०)
यदि हम मापक की लंबाई 15 सेंमी० लेते हैं तो यह 15 x 20 = 300 कि०मी० की दूरी दिखाएगा। अब एक सरल रेखा 15 सें०मी० लो उसके पांच बराबर भाग करो। प्रत्येक मुख्य भाग 60 कि०मी० को प्रदर्शित करेगा। बाईं ओर के प्रथम मुख्य भाग को 6 गौण भागों में बांटो जिसमें प्रत्येक गौण भाग 10 कि०मी० की दूरी दिखाएगा। इसके नीचे प्रदर्शक भिन्न लिख दो (चित्र 2.5)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 10

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

प्रश्न 6.
एक मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1 : 63,360 है। इसके द्वारा एक ऐसा रैखिक मापक बनाओ जिस पर मील और फर्लाग पढ़े जा सकें।
क्रिया: इसमें दूरियां मीलों और फल्गों में पूरी की गई हैं। अतः प्रदर्शक भिन्न का कथनात्मक मापक भी ब्रिटिश प्रणाली में किया जाएगा।
R.F. 1 : 63,360
∴ 1 इंच : 63,360 इंच
अथवा 1 इंच = \(\frac { 63,360 }{ 63,360 }\) = 1 मा
(क्योंकि 63,360 इंच = 1 मील)
हम पढ़ चुके हैं कि रैखिक मापक की लंबाई 5 से 8 इंच के बीच होनी चाहिए। मान लीजिए हम मापक की लंबाई 6 इंच लेते हैं।
6 इंच प्रदर्शित करेंगे 1 x 6 = 6 मील को।
अब 6″ लंबी रेखा लो, उसके 6 बराबर भाग करो। प्रत्येक मुख्य भाग 1 मील को प्रदर्शित करेगा। बाईं ओर के पहले मुख्य भाग के 4 बराबर गौण भाग करो। प्रत्येक गौण भाग 2 फर्लाग को दिखाएगा (क्योंकि 1 मील में 8 फलाँग होते हैं)। इसके नीचे R.F. लिख दो (चित्र 2.6)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 11

मानचित्र मापनी HBSE 11th Class Geography Notes

→ अंश (Numerator)-भिन्न में रेखा के ऊपर स्थित अंक को अंश कहते हैं। उदाहरण के लिए 1:50,000 के भिन्न में 1 अंश है।

→ निरूपक भिन्न-मानचित्र अथवा प्लान की मापनी को प्रदर्शित करने की एक ऐसी विधि, जिसमें मानचित्र या प्लान पर दिखाई गई दूरी तथा धरातल की वास्तविक दूरी के बीच के अनुपात को भिन्न के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है

→ हर (Denominator)-भिन्न में रेखा के नीचे स्थित अंक को हर कहते हैं। उदाहरण के लिए, 1:50,000 के भिन्न में 50,000 हर है।

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