Class 12

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से कौन-सा विकास का सर्वोत्तम वर्णन करता है?
(A) आकार में वृद्धि
(B) गुण में धनात्मक परिवर्तन
(C) आकार में स्थिरता
(D) गुण में साधारण परिवर्तन
उत्तर:
(B) गुण में धनात्मक परिवर्तन

2. मानव विकास की अवधारणा निम्नलिखित में से किस विद्वान की देन है?
(A) प्रो० अमर्त्य सेन
(B) डॉ० महबूब-उल-हक
(C) एलन सी० सेम्पुल
(D) रैटजेल
उत्तर:
(B) डॉ० महबूब-उल-हक

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास

3. निम्नलिखित में कौन-सा देश उच्च मानव विकास वाला नहीं है?
(A) नार्वे
(B) अर्जेंटाइनों
(C) जापान
(D) मिस्र
उत्तर:
(D) मिस्र

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव विकास के तीन मूलभूत क्षेत्र कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
मानव विकास के तीन मूलभूत क्षेत्र हैं जिनके आधार पर विभिन्न देशों का उच्च कोटि-क्रम तैयार किया जाता है। ये मूलभूत क्षेत्र हैं-

  1. स्वास्थ्य
  2. शिक्षा
  3. संसाधनों तक पहुँच।

प्रश्न 2.
मानव विकास के चार प्रमुख घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
मानव विकास के चार प्रमुख घटक अथवा स्तंभ हैं-

  1. समता
  2. सतत् पोषणीयता
  3. उत्पादकता
  4. सशक्तीकरण।

मानव विकास का विचार इन्हीं चार संकल्पनाओं/घटकों पर आधारित है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास

प्रश्न 3.
मानव विकास सूचकांक के आधार पर देशों का वर्गीकरण किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
प्रत्येक देश अपने मूलभूत क्षेत्रों स्वास्थ्य, शिक्षा तथा संसाधनों तक पहुँच के अंतर्गत हुई प्रगति के आधार पर 0 से 1 के बीच अंक अर्जित करते हैं। यह अंक 1 के जितना पास होगा, मानव विकास का स्तर उतना ही अधिक होगा। मानव विकास प्रतिवेदन 2018 के अनुसार 59 देशों का स्कोर 0.800 से ऊपर है जो अति उच्च वर्ग में आते हैं। 53 देशों का स्कोर 0.701 से 0.799 के बीच उच्च वर्ग में, 39 देशों का स्कोर 0.550 से 0.700 के बीच मध्यम वर्ग तथा 38 देशों का स्कोर 0.549 से नीचे है जो निम्न वर्ग में रखे गए हैं। इस प्रकार मानव विकास सूचकांक के आधार पर देशों को चार समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

मानव विकास का स्तरमानव विकास सूचकांक के अंकदेशों की संख्या
अति उच्च0.800 से ऊपर59
उच्च0.701 से 0.799 के मध्य53
मध्यम0.550 से 0.700 के मध्य39
निम्न0.549 से नीचे38

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव विकास शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानव विकास की अवधारणा का प्रतिपादन सन् 1990 में पाकिस्तानी अर्थशास्त्री डॉ० महबूब-उल-हक ने किया था। उन्होंने मानव विकास की कल्पना एक ऐसे विकास के रूप में की जिसका संबंध लोगों के विकल्पों में बढ़ोतरी से है, ताकि वे आत्म-सम्मान के साथ दीर्घ एवं स्वस्थ जीवन जी सकें। सन् 1990 की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार मानव विकास को इस प्रकार से परिभाषित किया गया है, “मानव विकास मनुष्य की आकांक्षाओं एवं उन्हें उपलब्ध जीवनयापन की सुविधाओं के स्तर को विकसित करने की प्रक्रिया है।” अतः मानव विकास के तीन महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं (i) स्वास्थ्य, (ii) शिक्षा का प्रसार, (iii) संसाधनों तक पहुँच।

भारत के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एवं नोबल पुरस्कार विजेता डॉ० अमर्त्य सेन ने विकास का मुख्य उद्देश्य लोगों की स्वतंत्रता में वृद्धि को बताया है। इन सभी अवधारणाओं में सभी प्रकार के विकास का केंद्र-बिंदु मनुष्य है। अतः विकास का मूल उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों को उत्पन्न करना है जिनमें लोग सार्थक जीवन व्यतीत कर सकें।

सार्थक जीवन केवल दीर्घ नहीं होता बल्कि उसका कोई उद्देश्य होना भी जरूरी होता है। इसका अर्थ है-लोग स्वस्थ व तंदुरुस्त रहें और अपने विवेक व बुद्धि का विकास कर सकें। वे समाज में प्रतिभागिता करें और अपने उद्देश्यों को पूरा करने में स्वतंत्र हों। यही जीवन की सार्थकता है। इस अवधारणा से पहले अनेक दशकों तक मानव-विकास के स्तर को केवल आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में मापा जाता था अर्थात जिस देश की अर्थव्यवस्था जितनी बड़ी होती थी उसे उतना ही विकसित माना जाता था। चाहे उस विकास से लोगों के जीवन में कोई परिवर्तन हुआ हो। विकास की नई अवधारणा ने इस पूर्व प्रचलित विचारधारा पर पुनः विचार करने पर मजबूर किया है।

प्रश्न 2.
मानव विकास अवधारणा के अंतर्गत समता और सतत् पोषणीयता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समता (Equity) – समता का आशय ऐसी व्यवस्था करने से है कि प्रत्येक व्यक्ति की उपलब्ध संसाधनों तक समान पहुँच हो सके। लोगों को उपलब्ध अवसर धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म-स्थान तथा आय के भेदभाव के विचार के बिना समान होने चाहिएँ। भारत के संविधान में अनुच्छेद 14-18 के अंतर्गत लोगों को समानता के मूल अधिकार प्रदान किए गए हैं। इसके बावजूद भी प्रत्येक समाज में भेदभाव की घटनाएँ कभी-न-कभी देखने को मिलती रहती हैं।

सतत पोषणीयता (Sustainability) – यहाँ सतत पोषणीयता अथवा निर्वहन का मतलब है कि लोगों को विकास करने के अवसर लगातार मिलते रहें। सतत पोषणीय मानव विकास तभी होगा जब प्रत्येक पीढ़ी को समान अवसर मिलें। अतः यह जरूरी है कि हम पर्यावरणीय, वित्तीय और मानव संसाधनों का आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखते हुए सुविचारित उपयोग करें। यदि हम इन बहुमूल्य संसाधनों का अंधा-धुंध प्रयोग अथवा दुरुपयोग करेंगे तो भावी पीढ़ियों के विकल्प कम हो जाएंगे।

मानव विकास HBSE 12th Class Geography Notes

→ सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) : एक देश की सीमाओं में उत्पादित समस्त वस्तुओं एवं सेवाओं का मुद्रा में मूल्य। इसमें विदेशों से अर्जित आय को शामिल नहीं किया जाता।

→ सकल राष्ट्रीय आय (Gross National Income) : देश का सकल घरेलू उत्पाद तथा विश्व के अन्य देशों में उत्पादन संसाधनों से अर्जित निबल आय का योग।

→ विकास का पारंपरिक अर्थ (Traditional Meaning of Development) : विकास परिवर्तन की ऐसी प्रक्रिया है जिसमें संसाधनों के दोहन से लोगों की गुणवत्ता में सुधार हो सके। विकास की अवधारणा समय और स्थान के साथ बदलती रहती है। प्रति व्यक्ति आय, ऊर्जा उपभोग तथा पोषण स्तर आदि विकास को मापने के कुछ तरीके हैं।

→ वृद्धि (Growth) : वृद्धि मात्रात्मक एवं मूल्य निरपेक्ष है। इसका चिह्न धनात्मक अथवा ऋणात्मक हो सकता है।

→ विकास (Development) : विकास का अर्थ गुणात्मक परिवर्तन से है, जो मूल्य सापेक्ष होता है। विकास की प्रक्रिया जीवन-पर्यंत निरंतर चलती है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 4 मानव विकास

→ मानव विकास (Human Development) : मानव विकास मनुष्य की आकांक्षाओं एवं उन्हें उपलब्ध जीवन-यापन की सुविधाओं के स्तर को विकसित करने की प्रक्रिया है।

→ मानव विकास के सूचक (Indicators of Human Development):

  • जीवन प्रत्याशा
  • साक्षरता एवं
  • प्रति व्यक्ति आय।

→ मानव विकास के चार स्तंभ (Four Pillars of Human Development):

  • समता
  • सतत् पोषणीयता
  • उत्पादकता
  • सशक्तीकरण।

→ मानव विकास के उपागम (Approaches of Human Development):

  • आय उपागम
  • कल्याण
  • आधारभूत आवश्यकता उपागम
  • क्षमता उपागम।

→ मानव विकास सूचकांक (Human Development Index-HDI) : यह मानव विकास में प्राप्तियों का मापन करता है। यह प्रदर्शित करता है कि मानव विकास के प्रमुख क्षेत्रों में क्या उपलब्धियाँ हुई हैं।

→ मानव गरीबी सूचकांक (Human Poverty Index) : यह मानव विकास सूचकांक से संबंधित है, जो मानव विकास में कमियों को दर्शाता है।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से किसने संयुक्त अरब अमीरात के लिंग-अनुपात को निम्न किया है?
(A) पुरुष कार्यशील जनसंख्या का चयनित प्रवास
(B) पुरुषों की उच्च जन्म-दर
(C) स्त्रियों की निम्न जन्म-दर
(D) स्त्रियों का उच्च उत्प्रवास
उत्तर:
(C) स्त्रियों की निम्न जन्म-दर

2. निम्नलिखित में से कौन-सी संख्या जनसंख्या के कार्यशील आयु-वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है?
(A) 15 से 65 वर्ष
(B) 15 से 66 वर्ष
(C) 15 से 64 वर्ष
(D) 15 से 59 वर्ष
उत्तर:
(D) 15 से 59 वर्ष

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

3. निम्नलिखित में से किस देश का लिंग-अनुपात विश्व में सर्वाधिक है?
(A) लैटविया
(B) जापान
(C) संयुक्त अरब अमीरात
(D) फ्रांस
उत्तर:
(A) लैटविया

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जनसंख्या संघटन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जनसंख्या संघटन जनसंख्या के उस पक्ष को प्रदर्शित करता है जिसको मापा जा सकता है। जनसंख्या के मात्रात्मक पक्ष; जैसे-लिंग, आयु, श्रम शक्ति, आवास, कार्यशील और आश्रित जनसंख्या तथा साक्षरता आदि तथ्यों का वर्गीकरण और अध्ययन जनसंख्या संघटन कहलाता है।

प्रश्न 2.
आयु-संरचना का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आयु संरचना जनसंख्या संघटन का महत्त्वपूर्ण सूचक है। यह विभिन्न आयु वर्गों में लोगों की संख्या को प्रदर्शित करती है। इसके अंतर्गत किसी देश की जनसंख्या को तीन आयु वर्गों में बाँटा जाता है- 0-14 आयु वर्ग, 15-59 आयु वर्ग और 60 से ऊपर का आयु वर्ग। इसके द्वारा ही देश की जनसंख्या की जन्म-दर, उत्पादकता, मानव क्षमता, रोजगार की स्थिति तथा आश्रित जनसंख्या आदि का पता चलता है। इससे ही भविष्य में जनसंख्या वृद्धि का अनुमान होता है।

प्रश्न 3.
लिंग-अनुपात कैसे मापा जाता है?
उत्तर:
जनसंख्या में पुरुषों और स्त्रियों की संख्या के बीच के अनुपात को लिंग-अनुपात कहा जाता है। भारत में यह अनुपात प्रति हजार पुरुषों और स्त्रियों की संख्या के रूप में दर्शाया जाता है।
HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन 1

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जनसंख्या के ग्रामीण-नगरीय संघटन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आवास के आधार पर जनसंख्या को दो वर्गों में बाँटा गया है-(i) ग्रामीण जनसंख्या तथा (ii) नगरीय जनसंख्या।
ग्रामीण तथा नगरीय जनसंख्या की अपनी अलग-अलग विशेषताएँ होती हैं तथा इनको अपने अलग-अलग व्यवसाय, संरचना, जीवन-पद्धति आदि के आधार पर पहचाना जा सकता है। गांव के लोग साधारण, सामाजिक संबंधों से ओत-प्रोत तथा अधिकतर कृषि-कार्यों में संलग्न रहते हैं। उनके आचार-विचार तथा सांसारिक दृष्टिकोण नगर में रहने वाले लोगों से भिन्न होते हैं। इसके विपरीत, नगरों में रहने वाले लोग उद्योग तथा व्यापार में संलग्न रहते हैं। इनके आपसी सामाजिक संबंध औपचारिक होते हैं तथा इनका दृष्टिकोण अपेक्षतया भिन्न होता है।

विश्व में ग्रामीण जनसंख्या सबसे अधिक एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों में पाई जाती है जबकि यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में नगरीय जनसंख्या अधिक पाई जाती है। सामान्यतया औद्योगिक दृष्टि से विकसित राष्ट्रों में नगरीय जनसंख्या का अनुपात अधिक पाया जाता है जबकि कृषि प्रधान देशों में ग्रामीण जनसंख्या का अनुपात अधिक पाया जाता है। कुल जनसंख्या में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत किसी देश के आर्थिक विकास का सूचक होता है। इसका कारण है नगरों में उपलब्ध सुविधाएँ और रोजगार की संभावनाएँ। यही कारण है कि विकसित राष्ट्रों में नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत अधिक होता है। विश्व में प्रतिवर्ष नगरीय जनसंख्या में लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हो रही है।

विश्व में नगरीय जनसंख्या में वृद्धि के प्रमुख कारण हैं-

  • नगरीय क्षेत्रों में स्त्रियों की संख्या अधिक होने का कारण ग्रामीण क्षेत्रों से स्त्रियों का नौकरियों हेतु शहरी क्षेत्रों की ओर प्रवास करना है।
  • विकासशील देशों में कृषि संबंधी कार्यों में स्त्रियों की सहभागिता दर काफी ऊँची है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों का कृषि पर प्रभुत्व है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 3 जनसंख्या संघटन

प्रश्न 2.
विश्व के विभिन्न भागों में आयु-लिंग में असंतुलन के लिए उत्तरदायी कारकों तथा व्यावसायिक संरचना की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जनसंख्या की आयु-लिंग संरचना से अभिप्राय विभिन्न आयु-वर्गों में स्त्रियों और पुरुषों की संख्या से है। इसे एक विशेष प्रकार के रेखाचित्र द्वारा दर्शाया जाता है जिसकी आकृति पिरामिड से मिलती है। इस कारण इसे आयु-लिंग अथवा जनसंख्या पिरामिड कहा जाता है। विश्व के विभिन्न भागों में आयु-लिंग में असंतुलन के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं-
1. स्त्री-पुरुष के जन्म-दर में अंतर प्रत्येक समाज में जन्म के समय नर बच्चे, मादा बच्चों से अधिक पैदा होते हैं। सामान्यतया जन्म के समय प्रत्येक 104 से 107 नर बच्चों के अनुपात में 100 मादा बच्चे होते हैं।

2. स्त्री-पुरुष की मृत्यु-दर में अंतर-विकसित देशों में जीवन की सभी अवस्थाओं में पुरुष मृत्यु-दर, स्त्री मृत्यु-दर से अधिक होती है इसके विपरीत विकासशील देशों में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में मृत्यु-दर अधिक होती है।

3. प्रवास-अधिकांश विकासशील देशों, विशेषतया एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में बड़ी संख्या में पुरुष ग्रामीण इलाकों से नगरों की ओर आजीविका की तलाश में प्रवास करते हैं। विकसित देशों में नगरीय लिंगानुपात स्त्रियों के पक्ष में अधिक होता है क्योंकि वहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में खेती के काम में पुरुषों की संख्या ज्यादा होती है स्त्रियाँ नगरों में नौकरी की तलाश में प्रवास करती है।

व्यावसायिक संरचना किसी क्षेत्र की विशिष्ट आर्थिक क्रियाओं में लगे जनसंख्या के अनुपात को व्यावसायिक संरचना कहते हैं। व्यावसायिक संरचना को चार मुख्य वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है-

  1. प्राथमिक व्यवसाय इन व्यवसायों में आखेट, मत्स्यपालन, फल संग्रहण, कृषि संग्रहण, कृषि तथा वानिकी इत्यादि आते हैं।
  2. द्वितीयक व्यवसाय-इन व्यवसायों में विनिर्माण उद्योग तथा शक्ति उत्पादन इत्यादि आते हैं।
  3. तृतीयक व्यवसाय-इन व्यवसायों के अंतर्गत परिवहन, संचार, व्यापार, सेवाएँ आदि शामिल किए जाते हैं।
  4. चतुर्थक व्यवसाय-इनके अंतर्गत चिंतन, शोध योजना तथा विचारों के विकास से जुड़े अत्याधिक बौद्धिकतापूर्ण व्यवसायों को रखा जाता है।

जनसंख्या संघटन HBSE 12th Class Geography Notes

→ नगरीकरण (Urbanisation) : वे प्रक्रियाएँ जिनसे नगर की जनसंख्या बढ़ती है; जैसे-प्राकृतिक वृद्धि, प्रवास व निकटवर्ती गाँवों के शहर में सम्मिलित होने पर।

→ लिंगानुपात (Sex Ratio) : प्रति हज़ार पुरुषों की तुलना में स्त्रियों की संख्या (भारत के संदर्भ में)।

→ आयु संरचना (Age Composition) : विभिन्न आयु वर्गों में जनसंख्या का वर्गीकरण।

→ श्रमजीवी (कार्यरत) जनसंख्या (Working Population) : जनसंख्या में वे लोग जो किसी आर्थिक लाभ के कार्यों में संलग्न हैं।

→ सहभागिता दर (Participation Rate) : कुल जनसंख्या में कार्यरत जनसंख्या का प्रतिशत अनुपात।

→ आश्रित जनसंख्या (Dependent Population) : देश की कुल जनसंख्या का वह भाग जिसमें 15 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चे तथा 60 वर्ष व इससे ऊपर की आयु के वृद्ध आते हैं।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित में से किस महाद्वीप में जनसंख्या वृद्धि सर्वाधिक है?
(A) अफ्रीका
(B) एशिया
(C) दक्षिण अमेरिका
(D) उत्तर अमेरिका
उत्तर:
(A) अफ्रीका

2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक विरल जनसंख्या वाला क्षेत्र नहीं है?
(A) अटाकामा
(B) भूमध्यरेखीय प्रदेश
(C) दक्षिण-पूर्वी एशिया
(D) ध्रुवीय प्रदेश
उत्तर:
(C) दक्षिण-पूर्वी एशिया

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

3. निम्नलिखित में से कौन-सा एक प्रतिकर्ष कारक नहीं है?
(A) जलाभाव
(B) बेरोज़गारी
(C) चिकित्सा/शैक्षणिक सुविधाएँ
(D) महामारियाँ
उत्तर:
(C) चिकित्सा/शैक्षणिक सुविधाएँ

4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक तथ्य नहीं है?
(A) विगत 500 वर्षों में मानव जनसंख्या 10 गुणा से अधिक बढ़ी है
(B) विश्व जनसंख्या में प्रतिवर्ष 8 करोड़ लोग जुड़ जाते हैं
(C) 5 अरब से 6 अरब तक बढ़ने में जनसंख्या को 100 वर्ष लगे
(D) जनांकिकीय संक्रमण की प्रथम अवस्था में जनसंख्या वृद्धि उच्च होती है
उत्तर:
(C) 5 अरब से 6 अरब तक बढ़ने में जनसंख्या को 100 वर्ष लगे

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने वाले तीन भौगोलिक कारकों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  1. प्राकृतिक कारक-धरातलीय स्वरूप, जलवायु, मृदा, प्राकृतिक वनस्पति।
  2. आर्थिक कारक-खनिज, नगरीकरण, औद्योगिक विकास, परिवहन।
  3. सामाजिक-सांस्कृतिक कारक-विस्थापन, श्रम का विकास।

प्रश्न 2.
विश्व में उच्च जनसंख्या घनत्व वाले अनेक क्षेत्र हैं। ऐसा क्यों होता है?
उत्तर:
200 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों को उच्च (घनी) जनसंख्या वाले क्षेत्र कहते हैं। विश्व के जिन क्षेत्रों की जलवायु मानव एवं मानवीय क्रियाओं के अनुकूल है, भूमि उपजाऊ एवं समतल है और खनिज प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं वहाँ जनसंख्या का उच्च घनत्व पाया जाता है। संयुक्त राज्य अमेरिका व कनाडा के पूर्वी भाग, पश्चिमी यूरोप और दक्षिण-पूर्वी एशिया में उच्च जनसंख्या घनत्व के यही कारण हैं। ये सभी क्षेत्र उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित हैं, इसलिए ऐसा है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

प्रश्न 3.
जनसंख्या परिवर्तन के तीन घटक कौन-से हैं?
उत्तर:
जनसंख्या परिवर्तन के तीन घटक निम्नलिखित हैं-

  1. जन्म-दर-इसको प्रति हजार स्त्रियों पर जन्मे जीवित बच्चों की गणना करके ज्ञात करते हैं।
  2. मृत्यु-दर-इसको किसी वर्ष विशेष के दौरान प्रति हजार जनसंख्या पर मृतकों की गणना करके ज्ञात करते हैं।
  3. प्रवास इसके अंतर्गत लोग प्रतिवर्ष कारकों के कारण एक स्थान को छोड़ देते हैं तथा अपकर्ष कारकों के कारण दूसरे स्थान पर जाकर बस जाते हैं।

अंतर स्पष्ट कीजिए

प्रश्न 1.
जन्म-दर और मृत्यु-दर
उत्तर:
जन्म-दर और मृत्यु-दर में निम्नलिखित अंतर हैं-

जन्म-दरजन्म-दर
1. किसी देश में एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या जन्म-दर कहलाती है।1. किसी देश में एक वर्ष में प्रति हजार व्यक्तियों पर जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या जन्म-दर कहलाती है।
2. यह दर प्रति हुजार में व्यक्त होती है।2. यह दर प्रति हुजार में व्यक्त होती है।

प्रश्न 2.
प्रवास के प्रतिकर्ष कारक और अपकर्ष कारक
उत्तर:
प्रवास के प्रतिकर्ष कारक और अपकर्ष कारक में निम्नलिखित अंतर हैं-

प्रतिकर्ष कारकअपकर्ष कारक
1. जब लोग जीविका के साधन उपलब्ध न होने के कारण गरीबी तथा बेरोज़गारी के कारण नगरों की ओर प्रवास करते हैं तो इसे प्रतिकर्ष कारक (Push Factors) कहा जाता है।1. नगरीय सुविधाओं तथा आर्थिक परिस्थितियों के कारण जब लोग नगरों की ओर प्रवास करते हैं तो इसे अपकर्ष कारक (Pull Factors) कहा जाता है।
2. प्रतिकर्ष कारक के कारण लोग अपने उद्गम स्थान से दूसरे स्थान की ओर जाते हैं।2. अपकर्ष कारक के कारण लोग गन्तव्य स्थान को आकर्षक बनाते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व में जनसंख्या के वितरण और घनत्व को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
विश्व में जनसंख्या के वितरण की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह बड़ा असमान तथा अव्यवस्थित है। अनुमान है कि विश्व की 90% जनसंख्या पृथ्वी के केवल 10% भाग पर निवास करती है, जबकि केवल 10% जनसंख्या धरातल का 90% भाग घेरे हुए है। मानचित्र को देखने से पता चलेगा कि विश्व की कुल जनसंख्या का केवल 10% भाग ही दक्षिणी गोलार्द्ध में बसा हुआ है। शेष 90% उत्तरी गोलार्द्ध में निवास करता है। विश्व की 80% जनसंख्या 20° उत्तरी अक्षांश से 60° उत्तरी अक्षांश तक ही सीमित है।

जनसंख्या के वितरण और घनत्व को प्रभावित करने वाले कारक-किसी भी देश अथवा प्रदेश की जनसंख्या के वितरण को अग्रलिखित कारक प्रभावित करते हैं-
(क) भौगोलिक कारक (Geographical Factors)-
1. धरातल (Surface) – जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करने में धरातल की विभिन्नता सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है। ऊबड़-खाबड़ तथा ऊंचे पर्वतीय प्रदेशों में जनसंख्या कम आकर्षित होती है। वहाँ जनसंख्या विरल पाई जाती है क्योंकि वहाँ पर मानव निवास की अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध नहीं होती, कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी का अभाव होता है, यातायात के साधनों का विकास आसानी से नहीं हो पाता, कृषि फसलों के लिए वर्धनकाल (Growing Period) छोटा होता है, जलवायु कठोर होती है। भारत के हिमालय पर्वतीय प्रदेश, उत्तरी अमेरिका के रॉकीज़ पर्वतीय प्रदेश तथा दक्षिणी अमेरिका के एंडीज़ पर्वतीय प्रदेशों में जनसंख्या के कम पाए जाने का यही कारण है। इसी प्रकार मरुस्थलीय भू-भागों में जलवायु कठोर तथा जीवन-यापन के पर्याप्त साधन न होने के कारण जनसंख्या कम पाई जाती है। थार मरुस्थल, सहारा मरुस्थल तथा अटाकामा मरुस्थल आदि में इसी कारण जनसंख्या कम है।

इसके विपरीत मैदानी भागों में जनसंख्या सघन पाई जाती है। विश्व की लगभग 90% जनसंख्या मैदानों में रहती है। वहाँ कृषि के लिए उपजाऊ मिट्टी, यातायात एवं संचार के साधनों का विकास तथा उद्योग-धंधों की स्थिति जनसंख्या को आकर्षित करती प्रारंभ में मनुष्य ने अपना निवास-स्थान इन्हीं नदियों की घाटियों में बनाया। वहाँ उसके लिए जल की आपूर्ति तथा कृषि करने के लिए उपजाऊ मिट्टी मिल जाती थी। यही कारण है कि नदियों की घाटियों में ही विश्व की प्राचीन सभ्यताएँ विकसित हुई हैं। इन्हें सभ्यता का पालना भी कहा जाता है। भारत में सतलुज गंगा के मैदान, म्यांमार में इरावती के मैदान, चीन में यांग-टी-सीक्यांग के मैदान, ईरान-इराक में दज़ला फरात तथा संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसीसिपी के मैदानों में जनसंख्या सघन मिलती है।

2. जलवायु (Climate) – जलवायु का जनसंख्या के वितरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। अनुकूल तथा आरामदेय जलवायु में कृषि, उद्योग तथा परिवहन एवं व्यापार का विकास अधिक आसानी से होता है। विश्व में मध्य अक्षांश (शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र का) जलवायु की दृष्टि से अनुकूल है। इसलिए विश्व की अधिकांश जनसंख्या इन्हीं प्रदेशों में निवास करती है। इसके विपरीत अत्यधिक ठंडे प्रदेश जैसे ध्रुवीय प्रदेश मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। इसलिए शीत प्रदेशों में जनसंख्या विरल पाई जाती है। इसी प्रकार शुष्क मरुस्थलीय प्रदेशों की जलवायु ग्रीष्म ऋतु में झुलसाने वाली होती है तथा शीत ऋतु में ठिठुराने वाली। यही कारण है कि विश्व के मरुस्थलों; जैसे सहारा, थार, कालाहारी, अटाकामा तथा अरब के मरुस्थलों में जनसंख्या विरल है।

3. मृदा (Soil) – मनुष्य की पहली आवश्यकता है-भोजन। भोजन हमें मिट्टी से मिलता है। मिट्टी में ही विभिन्न कृषि फसलें पैदा होती हैं। इसलिए विश्व के जिन क्षेत्रों में उपजाऊ मिट्टी है, वहाँ जनसंख्या अधिक पाई जाती है। भारत में सतलुज गंगा के मैदान, संयुक्त राज्य अमेरिका में मिसीसिपी के मैदान, पाकिस्तान में सिंध के मैदान, मिस्र में नील नदी के मैदान आदि में उपजाऊ मिट्टी की परतें हैं जिससे अधिकांश लोग वहाँ आकर बस गए हैं।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 2 विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि

4. वनस्पति (Vegetation) – वनस्पति भी जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करती है। उदाहरणार्थ, भूमध्य-रेखीय क्षेत्रों में सघन वनस्पति (सदाबहारी वनों) के कारण यातायात के साधनों का विकास कम हुआ है। आर्द्र जलवायु के कारण मानव-जीवन अनेक रोगों से ग्रसित रहता है इसलिए यहाँ की जनसंख्या वेरल है। इसके विपरीत जिन क्षेत्रों में वनस्पति आर्थिक उपयोग वाली होती है वहाँ मानव लकड़ी से संबंधित अनेक व्यवसाय आरंभ कर देता है; जैसे टैगा के वनों का आर्थिक महत्त्व है इसलिए वहाँ जनसंख्या अधिक पाई जाती है। वनस्पति विहीन क्षेत्रों (मरुस्थलों) में भी जनसंख्या विरल है।

(ख) मानवीय कारक (Human Factors)
1. कृषि (Agriculture) – विश्व में जो क्षेत्र कृषि की दृष्टि से अनुकूल हैं, वहाँ जनसंख्या का अधिक आकर्षण होता है। वहाँ लोग प्राचीन समय से ही अधिक संख्या में निवास करते आ रहे हैं। प्रेयरीज़ तथा स्टेपीज़ प्रदेश कृषि के लिए उपयुक्त हैं इसलिए उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा पंजाब में जनसंख्या का घनत्व अधिक है। इसी प्रकार चीन में यांग-टी-सीक्यांग की घाटी कृषि के लिए सर्वोत्तम वातावरण उपलब्ध कराती है इसलिए यहाँ जनसंख्या का केंद्रीकरण अधिक हुआ है।

2. नगरीकरण (Urbanization) – नगर जनसंख्या के लिए चुंबक का कार्य करते हैं। बीसवीं शताब्दी में नगरीकरण की प्रवृत्ति के कारण नगरों की जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। नगरों में रोज़गार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, व्यापार आदि की अधिक सुविधाएँ सुलभ हैं इसलिए जनसंख्या का जमघट नगरों में अधिक देखने को मिलता है। न्यूयार्क, लंदन, मास्को, बीजिंग, शंघाई, सिडनी, दिल्ली, कोलकाता, मुंबई आदि नगरों में जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। कई नगरों में जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति के कारण मूलभूत सुविधाओं के अभाव के कारण स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालने वाली समस्याएँ (Health Hazards) उत्पन्न हो रही हैं।

3. औद्योगीकरण (Industrialization) – जिन क्षेत्रों में उद्योगों की स्थापना अधिक हुई है तथा औद्योगिक विकास तीव्र हुआ है, वहाँ जनसंख्या का आकर्षण बढ़ा है। जापान, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका का उत्तरी-पूर्वी भाग, जर्मनी का रूहर क्षेत्र तथा यूरोपीय देशों में औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हुई है। भारत में पिछले दो दशकों से दिल्ली, मुंबई तथा हुगली क्षेत्र में औद्योगिक विकास के कारण जनसंख्या बड़ी तेजी से बढ़ी है।

4. परिवहन (Transportation) – परिवहन की सुविधाओं का भी जनसंख्या के वितरण पर अत्यधिक प्रभाव पड़त में यातायात की अधिक सुविधाएँ हैं, वहाँ जनसंख्या का अधिक आकर्षण होता है। महासागरीय यातायात के विकास के कारण कई बंदरगाह विश्व के बड़े नगर बन चुके हैं। वहाँ अन्य यातायात के साधन भी विकसित हो जाते हैं। सिंगापुर, शंघाई, सिडनी, मुंबई, न्यूयार्क आदि बंदरगाहों के रूप में विकसित हुए थे, लेकिन आज इन नगरों में रेल, सड़क तथा वायु यातायात की सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं।

5. राजनीतिक कारक (Political Factors) – राजनीतिक कारक भी कुछ सीमा तक जनसंख्या के वितरण को प्रभावित करते हैं। सरकार की जनसंख्या नीति मानव के बसाव को अनुकूल तथा प्रतिकूल बना सकती है। रूस सरकार साइबेरिया में जनसंख्या वृद्धि को प्रोत्साहित करके उनको पारितोषिक देती है। फ्रांस में जनसंख्या वृद्धि के लिए करों में रियायतें दी जाती हैं जबकि चीन, भारत तथा जापान में जनसंख्या की विस्फोटक स्थिति है। चीन में एक बच्चा होने के बाद सरकार ने दूसरे बच्चे के जन्म देने पर प्रतिबंध लगा रखा है। भारत में भी जनसंख्या को नियंत्रित करने के प्रयास किए जा रहे हैं लेकिन पिछले एक दशक से चीन की जनसंख्या में वृद्धि-दर निरंतर कम हो रही है जबकि भारत में वृद्धि-दर 2 प्रतिशत से भी अधिक है। वह दिन निकट ही है जब भारत की जनसंख्या विश्व में सबसे अधिक हो जाएगी।

(ग) आर्थिक कारक (Economic Factors)-जिन क्षेत्रों में खनिज पदार्थों के भंडार मिलते हैं, वहाँ खनन व्यवसाय तथा उद्योगों की स्थापना के कारण जनसंख्या अधिक आकर्षित होती है। ब्रिटेन में पेनाइन क्षेत्र, जर्मनी में रूहर क्षेत्र, संयुक्त राज्य अमेरिका में अप्लेशियन क्षेत्र, रूस के डोनेत्स बेसिन तथा भारत के छोटा नागपुर के पठार में जनसंख्या का केंद्रीकरण वहाँ की खनिज संपदा की ही देन है।

प्रश्न 2.
जनांकिकीय संक्रमण की तीन अवस्थाओं की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
जनांकिकीय संक्रमण सिद्धांत का उपयोग किसी क्षेत्र की जनसंख्या के वर्णन तथा भविष्य की जनसंख्या के पूर्वानुमान के लिए किया जा सकता है। यह सिद्धांत हमें बताता है कि जैसे ही समाज ग्रामीण अशिक्षित अवस्था से उन्नति करके नगरीय औद्योगिक और साक्षर बनता है तो किसी प्रदेश की जनसंख्या उच्च जन्म-दर और उच्च मृत्यु-दर से निम्न जन्म-दर व निम्न मृत्यु दर में बदल जाती है। ये परिवर्तन तीन अवस्थाओं में होते हैं
1. प्रथम अवस्था (First Stage) – उच्च प्रजननशीलता में उच्च मर्त्यता होती है क्योंकि लोग महामारियों और भोजन की अनिश्चित आपूर्ति से पीड़ित थे। जीवन-प्रत्याशा निम्न होती है, अधिकांश लोग अशिक्षित होते हैं और उनके प्रौद्योगिकी स्तर निम्न होते हैं।

2. द्वितीय अवस्था (Second Stage) – द्वितीय अवस्था के प्रारंभ में प्रजननशीलता ऊँची बनी रहती है किंतु यह समय के साथ घटती जाती है। स्वास्थ्य संबंधी दशाओं व स्वच्छता में सुधार के साथ मर्त्यता में कमी आती है।

3. तीसरी अवस्था (Third Stage) – तीसरी अवस्था में प्रजननशीलता और मर्त्यता दोनों घट जाती हैं। जनसंख्या या तो स्थिर . हो जाती है या मंद गति से बढ़ती है। जनसंख्या नगरीय और शिक्षित हो जाती है व उसके पास तकनीकी ज्ञान होता है। ऐसी जनसंख्या विचारपूर्वक परिवार के आकार को नियंत्रित करती है।

विश्व जनसंख्या : वितरण, घनत्व और वृद्धि HBSE 12th Class Geography Notes

→ जनगणना (Census) : किसी निश्चित अवधि में किसी क्षेत्र की जनसंख्या संबंधी विभिन्न आँकड़ों का एकत्रीकरण।

→ जनसंख्या घनत्व (Population Density) : किसी क्षेत्र में प्रति वर्ग किलोमीटर में पाई जाने वाली जनसंख्या। इसमें उस क्षेत्र की कुल जनसंख्या को वहाँ के क्षेत्रफल से भाग दिया जाता है। (D = P/A)।

→ जनसंख्या परिवर्तन अथवा वृद्धि (Population Change or Growth) : एक क्षेत्र विशेष में किसी समय रह रहे लोगों की संख्या में परिवर्तन। यह परिवर्तन नकारात्मक (Negative) भी हो सकता है और सकारात्मक (Positive) भी।

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HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

अभ्यास केन प्रश्न

नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. निम्नलिखित कथनों में से कौन-सा एक भूगोल का वर्णन नहीं करता?
(A) समाकलनात्मक अनुशासन
(B) मानव और पर्यावरण के बीच अंतर्संबंधों का अध्ययन
(C) द्वैधता पर आश्रित
(D) प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं
उत्तर:
(D) प्रौद्योगिकी के विकास के फलस्वरूप आधुनिक समय में प्रासंगिक नहीं

2. निम्नलिखित में से कौन-सा एक भौगोलिक सूचना का स्रोत नहीं है?
(A) यात्रियों के विवरण
(B) प्राचीन मानचित्र
(C) चंद्रमा से चट्टानी पदार्थों के नमूने
(D) प्राचीन महाकाव्य
उत्तर:
(D) प्राचीन महाकाव्य

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3. निम्नलिखित में कौन-सा एक लोगों और पर्यावरण के बीच अन्योन्यक्रिया का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक है?
(A) मानव बुद्धिमता
(B) प्रौद्योगिकी
(C) लोगों के अनुभव
(D) मानवीय भाईचारा
उत्तर:
(B) प्रौद्योगिकी

4. निम्नलिखित में से कौन-सा एक मानव भूगोल का उपगमन नहीं है?
(A) क्षेत्रीय विभिन्नता
(B) मात्रात्मक क्रांति
(C) स्थानिक संगठन
(D) अन्वेषण और वर्णन
उत्तर:
(B) मात्रात्मक क्रांति

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव भूगोल को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मानव भूगोल वह विषय है जो प्राकृतिक, भौतिक एवं मानवीय जगत् के बीच संबंध, मानवीय परिघटनाओं का स्थानिक वितरण तथा उनके घटित होने के कारण एवं विश्व के विभिन्न भागों में सामाजिक एवं आर्थिक भिन्नताओं का अध्ययन करता है। रेटजेल के अनुसार, “मानव भूगोल मानव समाजों और धरातल के बीच संबंधों का संश्लेषित अध्ययन है।”

प्रश्न 2.
मानव भूगोल के कुछ उप-क्षेत्रों के नाम बताइए।
उत्तर:
मानव भूगोल के उप-क्षेत्र हैं-व्यवहारवादी भूगोल, सामाजिक कल्याण का भूगोल, विपणन भूगोल, उद्योग भूगोल, संसाधन भूगोल, जनसंख्या भूगोल, ऐतिहासिक भूगोल, आर्थिक भूगोल, सांस्कृतिक भूगोल, सैन्य भूगोल, चिकित्सा भूगोल, कृषि भूगोल आदि।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 3.
मानव भूगोल किस प्रकार अन्य सामाजिक विज्ञानों से संबंधित है?
उत्तर:
भौतिक भूगोल की तरह मानव भूगोल भी स्वयं में एक स्वतंत्र विज्ञान नहीं है। अपनी विषय-वस्तु तथा उसके विश्लेषण के लिए मानव भूगोल अनेक सामाजिक विज्ञानों पर निर्भर करता है। यह दूसरे विषयों को क्षेत्रीय संदर्भ (Regional Perspective) प्रदान करता है जिसकी उनमें कमी होती है। उदाहरणतया

  • आर्थिक क्रियाओं व जनसंख्या की विशेषताओं के अध्ययन के लिए मानव भूगोल अर्थशास्त्र व जनांकिकी (Demography) की सहायता लेता है।
  • भूगोल स्थान का और इतिहास समय का ज्ञाता होने के कारण ये न केवल एक-दूसरे से अंतर्संबंधित हैं बल्कि एक-दूसरे के पूरक भी हैं।
  • फसलों के वितरण और उन्हें निर्धारित करने वाली भौगोलिक दशाओं तथा भूमि-उपयोग के अध्ययन के लिए मानव भूगोल कृषि विज्ञान का सहारा लेता है।
  • मानव समुदायों, उनके सामाजिक संगठन, परिवार-प्रणाली, श्रम-विभाजन, रीति-रिवाज़, लोक-नीति, प्रथाओं व जनजातियों के अध्ययन के लिए मानव भूगोल समाजशास्त्र की ओर देखता है।

इनके अतिरिक्त अन्य अनेक सामाजिक विज्ञानों के साथ-साथ मानव भूगोल का संबंध विभिन्न प्राकृतिक विज्ञानों से भी है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
मानव के प्राकृतिकरण की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य अपनी सांस्कृतिक विरासत से प्राप्त तकनीक और प्रौद्योगिकी की सहायता से अपने भौतिक पर्यावरण से अन्योन्यक्रिया करता है। महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं है कि मनुष्य क्या उत्पन्न एवं निर्माण करता है बल्कि यह है कि वह किन उपकरणों एवं तकनीकों की सहायता से उत्पादन एवं निर्माण करता है। प्रौद्योगिकी से किसी समाज के सांस्कृतिक विकास की सूचना मिलती है। मनुष्य प्रकृति के नियमों को बेहतर ढंग से जानने के बाद ही प्रौद्योगिकी का विकास कर पाया है।

उदाहरणतया-

  • तीव्रतर यान विकसित करने के लिए हम वायुगतिकी के नियमों का पालन करते हैं।
  • घर्षण एवं ऊष्मा की संकल्पनाओं ने अग्नि के आविष्कार में हमारी सहायता की।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि सभी विज्ञानों का जन्म प्रकृति से हुआ है। आरंभिक मानव ने स्वयं को प्रकृति के आदेशों के अनुसार ढाल लिया था। क्योंकि उस समय मानव का सामाजिक-सांस्कृतिक विकास आरंभिक अवस्था में था तथा प्रौद्योगिकी न के बराबर थी। सतत् पोषण के लिए मनुष्य प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। ऐसे में वह पर्यावरण को माता-प्रकृति (The Goddess of Nature) का नाम देते हैं। समय के साथ-साथ.सामाजिक और सांस्कृतिक विकास हुआ और मनुष्य प्रौद्योगिकी का विकास करने लगा। पर्यावरण से प्राप्त संसाधनों से वे अनेक संभावनाओं को जन्म देने लगा। मानवीय क्रियाओं की छाप हर जगह दिखाई देने लगी जैसे; ऊँचे पर्वतों पर सड़कें बनाना, नगरीय प्रसार, ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी-पठारी भूमि पर रेलमार्ग विकसित करना इत्यादि।
(1) पहले के विद्वानों ने इसे संभववाद का नाम दिया। विद्वानों ने बताया कि कैसे मनुष्य अपनी बुद्धि, कौशल, संकल्प शक्ति इत्यादि के बल पर प्रकृति का मानवीकरण करता है और अपने प्रयासों की छाप प्रकृति पर छोड़ने लगता है।

(2) परन्तु कुछ अन्य भूगोलवेत्ताओं ने एक नई संकल्पना प्रस्तुत की, जो पर्यावरणीय निश्चयवाद तथा संभववाद की चरम सीमाओं के बीच का दर्शन करवाती है। इसे “नव निश्चयवाद” कहा जाता है।

इसका अर्थ है कि मानव प्रकृति का आज्ञापालक बनकर ही इस पर विजय प्राप्त कर सकता है। उन्हें लाल संकेतों पर प्रत्युत्तर देना होगा और जब प्रकृति रूपांतरण की स्वीकृति दे तो वे अपने विकास के प्रयत्नों में आगे बढ़ सकते हैं।

निष्कर्ष – नवनिश्चयवाद संकल्पनात्मक ढंग से एक संतुलन बनाने का प्रयास करता है जो सम्भावनाओं के बीच अपरिहार्य चयन द्वैतवाद को निष्फल करता है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

प्रश्न 2.
मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र-मानव भूगोल का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत तथा व्यापक है। भौगोलिक परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में मानव के उद्यम द्वारा बनाए गए सांस्कृतिक दृश्य-भूमि का अध्ययन ही मानव भूगोल की विषय-वस्तु है। इसमें मनुष्य की आर्थिक क्रियाओं के अतिरिक्त मनुष्यों की अन्य क्रियाएँ; जैसे जनसंख्या और उसका वितरण, नगर व उनके आकार तथा प्रकार, मनुष्य की संस्कृति आदि भी सम्मिलित हैं अर्थात् मनुष्य एक स्वतन्त्र भौगोलिक कारक है।

इस कारण वह भौतिक पर्यावरण के संसाधनों का उपयोग करते हुए खेत, घर और गाँव बनाता है। वह सड़क, नहर, रेलमार्ग, नगर, हवाई अड्डे और बन्दरगाह आदि बनाता है। मनुष्य कहीं पर बाढ़ को रोकता है तो कहीं पर रेगिस्तान को, कहीं पर मनुष्य समुद्र की छाती को भेदकर तेल निकालता है और कहीं पर संचार-तन्त्र का विकास करता है। मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में पदार्थ, कर्म, विचार आदि तत्त्व शामिल होते हैं। ये सभी तत्त्व मनुष्य तथा पर्यावरण से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े होते हैं।

पॉल विडाल-डी-ला ब्लाश ने अपनी पुस्तक ‘Principles de Geographie Humaine’ में जनसंख्या तथा बस्तियों के विश्व तरण तथा सभ्यता को प्रभावित करने वाले कारकों के विकास का विवेचन किया है। ब्लाश ने मानव भूगोल की विषय-सामग्री को तीन भागों में बाँटा है

  • जनसंख्या इसमें जनसंख्या का वितरण, उसका घनत्व एवं प्रभाव, प्रमुख जन-समूह, जीविका के साधन, जनसंख्या वृद्धि के कारण, प्रवास तथा मानव प्रजातियों को सम्मिलित किया जाता है।
  • सांस्कृतिक कारक-इसमें पौधों, पशुओं, कच्चा माल तथा औजार आदि आजीविका के साधन, विनिर्माण की सामग्री आदि सम्मिलित किए जाते हैं।
  • परिवहन-इसमें गाड़ियाँ, सड़कें, रेलें तथा समुद्री परिवहन आदि को सम्मिलित किया जाता है।

इसके अतिरिक्त मानव जातियों और नगरों का वर्णन करना मानव भूगोल का अध्ययन क्षेत्र है।

प्रो० जीन बूंश के अनुसार, मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र को तीन भागों में बाँटा जा सकता है जो निम्नलिखित हैं-

  • मिट्टी के गैर-कृषि उत्पादक व्यवसाय; जैसे मकान तथा सड़क।
  • जीव-जगत् पर मानव की जीत से सम्बन्धित तत्त्व; जैसे कृषि करना तथा पशुपालन आदि।
  • मिट्टी का ह्रासमयी प्रयोग; जैसे पौधों को काटना तथा विभिन्न खनिज पदार्थों का अवशोषण आदि।

एल्सवर्थ हंटिंग्टन द्वारा वर्णित मानव भूगोल का विषय-क्षेत्र बहुत ही व्यापक और विशाल है। इनके अनुसार भौतिक अवस्थाओं का सामूहिक प्रभाव जीवन के विभिन्न रूपों; जैसे मानव, पेड़-पौधों इत्यादि पर होता है। जीवन के ये सभी रूप आपस में एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं। हंटिंग्टन ने मानव भूगोल के इन तत्त्वों को तीन निम्नलिखित भागों में बाँटा है-
1. भौतिक दशाएँ इनके अन्तर्गत पृथ्वी की ग्लोबीय स्थिति अर्थात् पृथ्वी का स्वरूप, आकार, मिट्टी, खनिज तथा जलवायु इत्यादि को शामिल किया जाता है।

2. जीवन के रूप-जीवन के रूप के अन्तर्गत पौधे, पशु और मनुष्य सम्मिलित किए गए हैं।

3. मानवीय अनुक्रियाएँ-इस श्रेणी के अन्तर्गत-

  • भौतिक आवश्यकताएँ; जैसे जल, वस्त्र, औजार आदि आते हैं
  • मौलिक व्यवसाय; जैसे परिवहन के साधन, आखेट, कृषि, पशुचारण आदि आते हैं।

कुछ दशकों से मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में बहुत अधिक विस्तार हुआ है और यह विस्तार अभी भी जारी है। मानव भूगोल एक गत्यात्मक विज्ञान है। जिस तरह तकनीक के विकास के साथ मनुष्य और पर्यावरण का सम्बन्ध बदलता जा रहा है उसी प्रकार मानव भूगोल के विषय-क्षेत्र में भी समय के साथ-साथ वृद्धि और विस्तार होता जा रहा है। नई समस्याओं तथा चुनौतियों का अध्ययन करने के लिए मानव भूगोल की अनेक नई शाखाओं का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया में मानव भूगोल में एकीकरण तथा अन्तर्विषयक गुणों को समाहित किया है।

आधुनिक समय में मानव भूगोल के अध्ययन क्षेत्र में कई नए प्रकरणों को शामिल किया गया है-राजनीतिक आयाम, सामाजिक सम्बद्धता, लिंग असमानता, जन-नीति, नगरीय प्रणाली इत्यादि। मानव भूगोल ने सामाजिक विज्ञानों में आवश्यक आयाम या क्षेत्र सम्बन्धी विचारों को समाहित करने का कार्य किया है। वे सामाजिक विज्ञान मानव भूगोल के उपक्षेत्रों के रूप में जाने जाते हैं; जैसे व्यावहारिक भूगोल, राजनीतिक भूगोल, आर्थिक भूगोल तथा सामाजिक भूगोल इत्यादि। मानव भूगोल का सम्बन्ध सामाजिक विज्ञानों के साथ-साथ प्राकृतिक विज्ञानों से भी है।

मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र HBSE 12th Class Geography Notes

→ निश्चयवाद (Determinism) : मानव-शक्तियों की अपेक्षा प्राकृतिक शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन। इस विचारधारा के अनुसार मानव-जीवन और उसके व्यवहार को विशेष रूप से भौतिक वातावरण के तत्त्व प्रभावित और यहाँ तक कि निर्धारित करते हैं।

→ संभववाद (Possibilism) : प्राकृतिक शक्तियों की अपेक्षा मानव-शक्तियों की प्रधानता स्वीकार करने वाला दर्शन, जिसके अनुसार वातावरण मानव क्रियाओं को नियंत्रित तो करता है किंतु उन सीमाओं में कुछ संभावनाएँ और अवसर प्रस्तुत करता है जिसमें मानवीय छांट महत्त्वपूर्ण होती है।

→ कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect Relationship) : मानव द्वारा किया गया कोई उद्यम और उसके द्वारा उत्पन्न प्रभाव या परिणाम के बीच संबंधों का होना। उदाहरणतया, अर्जित शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक व आर्थिक स्तर में होने वाले परिवर्तन में शिक्षा कारण है और बदलाव कार्य है। इसी प्रकार सिंचाई व्यवस्था होने से कृषि क्षेत्र में होने वाला सकारात्मक आर्थिक बदलाव कार्य-कारण का उदाहरण है।

HBSE 12th Class Geography Solutions Chapter 1 मानव भूगोल : प्रकृति एवं विषय क्षेत्र

→ क्रमबद्ध भूगोल (Systematic Geography) : भूगोल की वह शाखा, जिसके अंतर्गत भौगोलिक तत्त्वों की क्षेत्रीय विषमताओं का क्रमबद्ध अध्ययन किया जाता है।

→ प्रादेशिक भूगोल (Regional Geography) : भू-पृष्ठ पर विभिन्न प्राकृतिक प्रदेशों; जैसे मानसून प्रदेश, टुंड्रा प्रदेश आदि का भौगोलिक अध्ययन।

→ सामान्य भूगोल (General Geography) : भूगोल की वह शाखा जिसमें संपूर्ण पृथ्वी को एक इकाई मानकर इसके लक्षणों का विवेचन किया जाता है।

→ विशिष्ट भूगोल (Special Geography) : भूगोल की वह शाखा जिसमें अलग-अलग प्रदेशों की संरचना के अध्ययन पर बल दिया जाता है।

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HBSE 12th Class History Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 12th Class History Important Questions and Answers

HBSE 12th Class History Important Questions in Hindi Medium

HBSE 12th Class History Important Questions in English Medium

  • Chapter 1 Bricks, Beads and Bones: The Harappan Civilisation Important Questions
  • Chapter 2 Kings, Farmers and Towns: Early States and Economies Important Questions
  • Chapter 3 Kinship, Caste and Class: Early Societies Important Questions
  • Chapter 4 Thinkers, Beliefs and Buildings: Cultural Developments Important Questions
  • Chapter 5 Through the Eyes of Travellers: Perceptions of Society Important Questions
  • Chapter 6 Bhakti-Sufi Traditions: Changes in Religious Beliefs and Devotional Texts Important Questions
  • Chapter 7 An Imperial Capital: Vijayanagara Important Questions
  • Chapter 8 Peasants, Zamindars and the State: Agrarian Society and the Mughal Empire Important Questions
  • Chapter 9 Kings and Chronicles: The Mughal Courts Important Questions
  • Chapter 10 Colonialism and the Countryside: Exploring Official Archives Important Questions
  • Chapter 11 Rebels and the Raj: 1857 Revolt and its Representations Important Questions
  • Chapter 12 Colonial Cities: Urbanisation, Planning and Architecture Important Questions
  • Chapter 13 Mahatma Gandhi and The Nationalist Movement: Civil Disobedience and Beyond Important Questions
  • Chapter 14 Understanding Partition: Politics, Memories, Experiences Important Questions
  • Chapter 15 Framing the Constitution: The Beginning of a New Era Important Questions

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HBSE 12th Class History Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class History Solutions

HBSE 12th Class History Solutions in Hindi Medium

HBSE 12th Class History Solutions in English Medium

  • Chapter 1 Bricks, Beads and Bones: The Harappan Civilisation
  • Chapter 2 Kings, Farmers and Towns: Early States and Economies
  • Chapter 3 Kinship, Caste and Class: Early Societies
  • Chapter 4 Thinkers, Beliefs and Buildings: Cultural Developments
  • Chapter 5 Through the Eyes of Travellers: Perceptions of Society
  • Chapter 6 Bhakti-Sufi Traditions: Changes in Religious Beliefs and Devotional Texts
  • Chapter 7 An Imperial Capital: Vijayanagara
  • Chapter 8 Peasants, Zamindars and the State: Agrarian Society and the Mughal Empire
  • Chapter 9 Kings and Chronicles: The Mughal Courts
  • Chapter 10 Colonialism and the Countryside: Exploring Official Archives
  • Chapter 11 Rebels and the Raj: 1857 Revolt and its Representations
  • Chapter 12 Colonial Cities: Urbanisation, Planning and Architecture
  • Chapter 13 Mahatma Gandhi and The Nationalist Movement: Civil Disobedience and Beyond
  • Chapter 14 Understanding Partition: Politics, Memories, Experiences
  • Chapter 15 Framing the Constitution: The Beginning of a New Era

HBSE 12th Class History Question Paper Design

Class: 12th
Subject: History
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks504010100
Marks4032880

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions45101635
Marks Allotted2420201680
Estimated Time72483525180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. ईंट, मनके तथा अस्थियाँ (हड़प्पा सभ्यता)9
2. राजा, किसान और नगर (आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्था)6
3. बंधुत्व जाति तथा वर्ग (आरंभिक समाज)3
4. विचारक, विश्वास और इमारतें (सांस्कृतिक विकास)3
5. यात्रियों के नजरिए (समाज के बारे में उनकी समझ)6
6. भक्ति सूफी परंपराएं, धार्मिक विश्वासों में बदलाव9
7. एक साम्राज्य की राजधानी (विजयनगर)5
8. किसान, जमींदार और राज्य6
9. शासक और इतिवृत (मुगल दरबार)3
10. उपनिवेशवाद और देहात4
11. विद्रोह राज और 1857 का विद्रोह6
12. औपनिवेशक शहर और नगरीकरण5
13. महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आन्दोलन9
14. विभाजन को समझना3
15. संविधान का निर्माण3
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Questions i.e. Essay Type
in Two Questions.

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge of elements of language), C (Comprehension), E (Expression), A (Appreciation), S (Skill), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 12th Class Geography Important Questions and Answers

Haryana Board HBSE 12th Class Geography Important Questions and Answers

HBSE 12th Class Geography Important Questions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Geography Important Questions: मानव भूगोल के मूल सिद्धान्त

HBSE 12th Class Geography Important Questions: भारत : लोग और अर्थव्यवस्था

HBSE 12th Class Geography Important Questions in English Medium

HBSE 12th Class Geography Important Questions: Fundamentals of Human Geography

  • Chapter 1 Human Geography : Nature and Scope Important Questions
  • Chapter 2 The World Population : Distribution, Density and Growth Important Questions
  • Chapter 3 Population Composition Important Questions
  • Chapter 4 Human Development Important Questions
  • Chapter 5 Primary Activities Important Questions
  • Chapter 6 Secondary Activities Important Questions
  • Chapter 7 Tertiary and Quaternary Activities Important Questions
  • Chapter 8 Transport and Communication Important Questions
  • Chapter 9 International Trade Important Questions
  • Chapter 10 Human Settlements Important Questions

HBSE 12th Class Geography Important Questions: India : People and Economy

  • Chapter 1 Population : Distribution, Density, Growth and Composition Important Questions
  • Chapter 2 Migration : Types, Causes and Consequences Important Questions
  • Chapter 3 Human Development Important Questions
  • Chapter 4 Human Settlements Important Questions
  • Chapter 5 Land Resources and Agriculture Important Questions
  • Chapter 6 Water Resources Important Questions
  • Chapter 7 Mineral and Energy Resources Important Questions
  • Chapter 8 Manufacturing Industries Important Questions
  • Chapter 9 Planning and Sustainable Development in Indian Context Important Questions
  • Chapter 10 Transport and Communication Important Questions
  • Chapter 11 International Trade Important Questions
  • Chapter 12 Geographical Perspective on Selected Issues and Problems Important Questions

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HBSE 12th Class Geography Solutions Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Geography Solutions

HBSE 12th Class Geography Solutions in Hindi Medium

HBSE 12th Class Geography Part 1 Fundamentals of Human Geography (मानव भूगोल के मूल सिद्धान्त भाग-1)

HBSE 12th Class Geography Part 2 India: People and Economy (भारत : लोग और अर्थव्यवस्था भाग-2)

HBSE 12th Class Geography Solutions in English Medium

HBSE 12th Class Geography Part 1 Fundamentals of Human Geography

  • Chapter 1 Human Geography : Nature and Scope
  • Chapter 2 The World Population : Distribution, Density and Growth
  • Chapter 3 Population Composition
  • Chapter 4 Human Development
  • Chapter 5 Primary Activities
  • Chapter 6 Secondary Activities
  • Chapter 7 Tertiary and Quaternary Activities
  • Chapter 8 Transport and Communication
  • Chapter 9 International Trade
  • Chapter 10 Human Settlements

HBSE 12th Class Geography Part 2 India : People and Economy

  • Chapter 1 Population : Distribution, Density, Growth and Composition
  • Chapter 2 Migration : Types, Causes and Consequences
  • Chapter 3 Human Development
  • Chapter 4 Human Settlements
  • Chapter 5 Land Resources and Agriculture
  • Chapter 6 Water Resources
  • Chapter 7 Mineral and Energy Resources
  • Chapter 8 Manufacturing Industries
  • Chapter 9 Planning and Sustainable Development in Indian Context
  • Chapter 10 Transport and Communication
  • Chapter 11 International Trade
  • Chapter 12 Geographical Perspective on Selected Issues and Problems

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

HBSE 12th Class Sanskrit किन्तोः कुटिलता Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम्
(क) भूमिविषयके अभियोगे ‘किन्तु’-ना का बाधा उपस्थापिता ?
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं केन विनाश्यते ?
(ग) लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य कथम् इतिश्रीरभूत् ?
(घ) नेतृमहोदयः पुस्तकप्रशंसां कुर्वन् ‘किन्तु’ प्रयोगेन कं परामर्शम् अददात् ?
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले कीदृशी प्रदर्शनी समायोजिता आसीत् ?
(च) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां क: अरुधत् ?
(छ) धर्मव्यवस्थापक: विधवायाः पुनर्विवाहमुचितं मन्यमानोऽपि व्यवस्थां किमर्थं न ददौ ?
(ज) गृहिणी पत्युः कर्णसमीपे आगत्य शनैः किम् अवदत् ?
(झ) लोकाः किन्तु-युक्तां वार्ता केन कारणेन विगुणां गणयन्ति ?
(ञ) किन्तोः सार्वदिकः प्रभावः कः ?
उत्तरम्:
(क) ‘राजस्वविभागस्य प्रधानः अधिकारी तद्-विरोधे एकं पत्रं प्रेषितवान्’- इति बाधा किन्तुना उपस्थापिता।
(ख) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्यं किन्तुना विनाश्यते।
(ग) “किन्तु किञ्चित् स्वगृहाभिमुखं विलोकनीयम्’ इति अध्यापकवचनेन लेखकस्य देशसेवायाः विचारस्य इति श्रीः अभूत्।
(घ) नेतृमहोदयः परामर्शम् अददात्- “यदि इदं पुस्तकं हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यग् अभविष्यत्।”
(ङ) भोजन-गोष्ठीस्थले भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी समायोजिता आसीत्।
(च) लेखकमहोदयस्य कण्ठनलिकां स्वामिमहोदयस्य ‘किन्तुः’ अरुधत्।
(छ) यतः धर्मव्यवस्थापक: प्राचीनमर्यादाम् अपि रक्षितुम् इच्छति स्म, अतः सः पुनर्विवाहस्य व्यवस्थां न ददौ।
(ज) सा अवदत्-“अन्धकारेऽस्मिन् त्वम् अवश्यं यासि, ‘किन्तु’ दृश्यताम्, स शस्त्रं न प्रहरेत्।”
(झ) यतः किन्तुयुक्तायाः वार्तायाः सिद्धौ किन्तुना बाधा अवश्यमेव स्थाप्यते, अतः लोकाः किन्तुयुक्तां वार्ता विगुणां गणयन्ति।
(ञ) एषः किन्तुः सर्वासां वार्तानां मध्ये प्रविश्य वार्तायाः विच्छेदम् अवश्यं करोति इत्येव किन्तोः सार्वदिकः प्रभावः ।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

2. उपयुक्तशब्दान् चित्वा रिक्तस्थानानां पूर्तिः विधेया
(दुर्घटा, अवधानम्, सन्दानितः, स्वामिमहोदयम्, संस्कृते, विवाहस्य, शान्तम्, पलायांचक्रे, कालात्, संकटे)
(क) अहं…………….. अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।
(ख) अस्य ‘किन्तोः’ कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता…………. अस्ति।
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण ……………अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृह्णम्, तथैव ‘किन्तुः’ मम कण्ठनलिकामरुधत्।
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने……………..अत्यावश्यकम्।
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः……………..कदाचिदुपयुक्तो भवेत् ।
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः……………..न्यायालये चलति स्म।
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः………………..
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं……………..निःश्वासममुचम्।
(झ) जातस्य तस्या …………….. अद्य तृतीयो दिवसः ।
(ञ) बहुकालानन्तरं…………….. एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।
उत्तरम्:
(क) अहं स्वामिमहोदयम् अप्राक्षं किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि ।
(ख) अस्य ‘किन्तोः’ कारणात् कस्मिन्नपि कार्यै सफलता दुर्घटा अस्ति ।
(ग) तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितः अहं यथैव द्वितीयं ग्रासमगृह्णम्, तथैव ‘किन्तुः’ मम कण्ठनलिकामरुधत्।
(घ) गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानम् अत्यावश्यकम्।
(ङ) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत्।
(च) राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहो: कालात् न्यायालये चलति स्म।
(छ) मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे।
(ज) अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं नि:श्वासममुचम्।
(झ) जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः।
(ब) बहुकालानन्तरं संस्कृते एवं विधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।

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3. अधोलिखितैः उचितक्रियापदैः रिक्तस्थानानि पूरयत परिगण्येत, परावर्तिषि, आच्छिनत्ति, मन्यामहे, दीयेत, अलिखिष्यत्।
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं ………… ।
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव …………. ।
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् …………. तर्हि सम्यगभविष्यत्।
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था ………….।
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः ‘किन्तुः’ मुखस्य कवलमपि ………… ।
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः ……….. ।
उत्तरम्:
(क) प्रधानः एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे।
(ख) गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि।
(ग) यदि हिन्दीभाषायाम् अलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत्।
(घ) इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवंविधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत।
(ङ) कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूर: ‘किन्तुः’ मुखस्य कवलमपि आच्छिनत्ति।
(च) नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः परिगण्येत।

4. सन्धिच्छेदं कुरुत
उत्तरसहितम्
(क) तत्रैवास्य = तत्र + एव + अस्य
(ख) सर्वाण्येव = सर्वाणि + एव
(ग) मन्निर्मितमेकम् = मत् + निर्मितम् + एकम्
(घ) किलैकोऽधिकारी = किल + एकः + अधिकारी
(ङ) द्वयोरुपर्येव = द्वयोः + उपरि + एव।

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5. प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम्
उत्तरसहितम्
(क) निर्मुच्य = निर् + √मुच् + क्त्वा > ल्यप्
(ख) आदाय = आ + √दा + क्त्वा > ल्यप्
(ग) प्रविष्टः = प्र + √विश् + क्त (पुंल्लिङ्गम्, प्रथमा-एकवचनम्)
(घ) आगत्य = आ + √गम् + क्त्वा > ल्यप्
(ङ) परिज्ञातम् = परि + √ज्ञा + क्त (नपुंसकलिङ्गम् प्रथमा-एकवचनम्)

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6. अधोलिखितेषु पदेषु विभक्तिं वचनं च दर्शयत
उत्तरसहितम्
(क) कार्ये कार्य-सप्तमी विभक्तिः , एकवचनम्
(ख) अभियोक्तुः अभियोक्तृ-पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(ग) बालिकायाः बालिका – पञ्चमी/षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(घ) न्यायालयेन न्यायालय-तृतीया विभक्तिः, एकवचनम्
(ङ) नेतुः नेतृ – सप्तमी विभक्तिः , एकवचनम्
(च) शक्तौ शक्ति – सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्
(छ) औषधिम् औषधि – द्वितीया विभक्तिः, एकवचनम्

7. स्वरचितवाक्येषु अधोलिखितपदानां प्रयोगं कुरुत
किन्तु, गन्तुम, मह्यम्, विभीषिका, भरणपोषणम्, दृष्ट्वा
उत्तरम्:
(क) किन्तु-अहं धावनप्रतियोगितायां सर्वतो अग्रे आसम्, किन्तु सहसा मम पादस्खलनम् अभवत्।
(ख) गन्तुम्-अहं विद्यालयं गन्तुम् इच्छामि।
(ग) मह्यम्-मयं पठनम् अतीव रोचते।
(घ) विभीषिका-परीक्षायाः विभीषिका मनः उद्वेलयति।
(ङ) भरणपोषणम्-परिवारस्य भरणपोषणं तु सर्वेषां कर्तव्यम् अस्ति।
(च) दृष्ट्वा-अधः दृष्ट्वा कथं न गच्छसि ?

8. विलोमशब्दान् लिखत
उत्तरसहितम्: – विलोमपदम्
(क) विगुणः – सगुणः
(ख) शौर्यम् – अशौर्यम्
(ग) सुरक्षितः – विनष्टः
(घ) शत्रुता – मित्रता
(ङ) धीरः – अधीरः
(च) भयम् – निर्भयम्

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

योग्यताविस्तारः
1. स्वकल्पनया वाक्यपूर्तिं कुरुत
उत्तरम्
(क) अहम् उच्चाध्ययनं कर्तुमिच्छामि, किन्तु आर्थिकस्थितिः न अनुमन्यते।
(ख) छात्राः कक्षायामुपस्थिताः किन्तु अध्यापकः एव नास्ति।
(ग) सः गन्तुमिच्छति, किन्तु बसयानम् एव निर्गतम्।
(घ) वयं तर्तुच्छिामः, किन्तु क्लिन्नाः भवितुं न इच्छामः ।
(ङ) ते कार्यं कर्तुमिच्छन्ति, किन्तु अवसरः एव न लभन्ते।
(च) अर्वाचीनाः जना अपि प्राचीनां भाषां पठितुमिच्छन्ति, किन्तु यदि तया आजीविका सिध्येत तदैव ।
(छ) निर्धना अपि धनमिच्छन्ति, किन्तु धनेन एव धनम् अर्च्यते इति समस्या।
(ज) सर्वे जना आजीविकामिच्छन्ति, किन्तु सर्वेभ्यः सा सुलभा न भवति।
(झ) मूकोऽपि वक्तुमिच्छति, किन्तु असमर्थः अस्ति। ..
(ञ) अध्यापका अध्यापनं कर्तुमिच्छन्ति, किन्तु केचन छात्राः एव पठितुं न इच्छन्ति।

2. अधोलिखितानाम् आभाणकानां समानार्थकानि वाक्यानि पाठात् अन्वेष्टव्यानि
(क) मुँह का कौर छीनना।
(ख) कुछ दिन पहले की बात है।
(ग) खोटा सिक्का और खोटा बेटा भी समय पर काम आते हैं।
(घ) नाक-भौंह सिकोड़ना।
उत्तरम्:
(क) मुखस्य कवलमपि आच्छिनत्ति।
(ख) स्वल्पदिनानामेव वार्तास्ति।
(ग) विगुणः कार्षापणः कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचित् उपयुक्तो भवेत्।
(घ) नासा-भ्रूसकोचः।

HBSE 9th Class Sanskrit किन्तोः कुटिलता Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) भोजनगोष्ठ्यां लेखकस्य कण्ठनलिकां क: अरुधत् ?
(A) पत्नी
(B) स्वामिमहोदस्य किन्तुः
(C) मन्त्रिमहोदयस्य किन्तुः
(D) शिक्षकः।
उत्तराणि
(B) स्वामिमहोदयस्य किन्तुः ।

(ii) वाक्यमध्ये प्रविश्य सर्वं कार्य केन विनाश्यते ?
(A) स्वामिना
(B) सेवकेन
(C) अधिकारिणा
(D) किन्तुना।
उत्तराणि
(C) किन्तुना

(iii) गरिष्ठवस्तुनो भोजने किम् अत्यावश्यकम् ?
(A) मिष्ठान्नम्
(B) तिक्त-व्यञ्जनम्
(C) अवधानम्
(D) क्षीरम्।
उत्तराणि
(B) अवधानम्

(iv) गहिणी कस्य कर्णसमीगे आगत्य शनैः अवदत् ?
(A) पत्युः
(B) अधिकारिणः
(C) किन्तोः
(D) मन्त्रिणः।
उत्तराणि
(A) पत्युः

(v) कस्य कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटा अस्ति ?
(A) पत्न्याः
(B) न्युः
(C) किन्तोः
(D) स्वामिनः।
उत्तराणि
(A) किन्तोः

(vi) भूमेः अभियोगः कुत्र चलति स्म ?
(A) ग्रामपञ्चायते
(B) न्यायालये
(C) नगरे
(D) ग्रामे।
उत्तराणि
(D) न्यायालये।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

II. रेखाकितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) क्रूरः किन्तुः मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति।
(A) कः
(B) काः
(C) के
(D) किम्।
उत्तराणि:
(D) किम्

(ii) राजस्वविभागस्य एक: अधिकारी एतद्विरोधे पत्रं प्रेषितवान्।
(A) काः
(B) कस्मात्
(C) कस्य
(D) कस्मिन्।
उत्तराणि:
(C) कस्य

(iii) कन्यायाः पतिः सहसा अम्रियत।
(A) कस्याः
(B) कः
(C) कथम्
(D) को।
उत्तराणि:
(B) कः

(iv) मानवाः क्षणमपि परपीडनात् न विरमन्ति।
(A) किम्
(B) कुत्र
(C) कस्मात्
(D) कस्य।
उत्तराणि:
(B) कुत्र

(v) स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुना अहं नीरोगः अभवम्।
(A) कीदृशः
(B) काः
(C) के
(D) कथम्।
उत्तराणि:
(A) कीदृशः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

किन्तोः कुटिलता पाठ्यांशः

1. कुटिलेनामुना ‘किन्तु’-ना कियत्कालात् क्लेशितोऽस्मि। यत्र यत्राहं गच्छामि तत्र तत्रैवास्य शत्रुता सम्मुखस्थिता भवति। अस्य ‘किन्तोः’ कारणात् कस्मिन्नपि कार्ये सफलता दुर्घटास्ति। बहून् वारान् दृष्टवानस्मि यत्कार्यं सर्वथा सज्जं सम्पद्यते, सर्वप्रकारैः सिद्धिहस्तगता भवति, यथैव सफलताया मूर्तिः सम्मुखमागच्छन्ती विलोक्यते तथैव क्रूरोऽयं किन्तुर्मध्ये प्रविश्य सर्वं विनाशयति।

हिन्दी-अनुवादः इस कुटिल ‘किन्तु’ शब्द से मैं कितने ही समय से पीड़ित हूँ। मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, वहाँ-वहाँ ही इसकी शत्रुता सामने आ खड़ी होती है। इस ‘किन्तु’ के कारण किसी भी कार्य में सफलता अति-कठिन है। मैंने बहुत बार देखा है कि जो काम पूरी तरह से तैयार होता है, सब प्रकार से सफलता हाथ में आने वाली होती है, जैसे ही सफलता की मूर्ति सामने आती हुई दिखाई पड़ती है, वैसे ही यह क्रूर ‘किन्तु’ बीच में घुसकर सब नष्ट-भ्रष्ट कर देता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च क्लेशितः = दुःखी; कष्टापन्नः, √क्लेिश + क्त । दुर्घटा = असम्भव, कठिन; दुःखेन घटयितुं शक्या, दुर् + √घट् + आ। बहून् वारान् = बहुत बार; अनेकवारम्। आगच्छन्ती = आती हुई; आयान्ती, आ + √गम् + शतृ + ङीप्।

2. राज्यतो लब्धाया भूमेरभियोगो बहोः कालान्यायालये चलति स्म। अस्मिन्नभियोगे प्राविवाकमहोदयो निर्णयं श्रावयन् अवोचत् … वयं पश्यामो यदभियोक्तुः पक्षादावश्यकानि सर्वाण्येव प्रमाणान्युपस्थितानि सन्ति। राज्यतो लब्धाया भूमेर्दानपत्रमप्युपस्थापितमस्ति। न्यायालयेन परिज्ञातं यत् इयं भूमिरभियोक्तुरधिकारभुक्ताऽस्ति……..।’
अहं निश्चिन्तताया एकं शान्तं निःश्वासममुचम्। मया सर्वथा स्थिरीकृतं यद्भाग्य-लक्ष्मीरनुपदमेव मे कन्धरायां विजयमाल्यं प्रददातीति। परं प्राविवाकमहोदयः पुनरग्रे प्रावोचत्- ……… किन्तु राजस्व-विभागस्य प्रधानः किलैकोऽधिकारी एतद्विरोधे एकं पत्रं प्रेषितवानस्ति। एतदुपर्यपि लक्ष्यदानमावश्यकं मन्यामहे।’ मम सर्वोऽप्युत्साहः पलायाञ्चक्रे। किन्तु’-कुन्तो ममान्तः-करणं समन्तात् कृन्तति स्म। निजहृदयमवष्टभ्य न्यायं प्रशंसन् गृहमागमम्।

हिन्दी-अनुवादः राज्य से प्राप्त भूमि का अभियोग बहुत समय से न्यायालय में चल रहा था। इस अभियोग में जज महोदय ने निर्णय सुनाते हुए कहा-‘हम देखते हैं कि अभियोक्ता के पक्ष की ओर से सभी आवश्यक प्रमाण उपस्थित कर दिए गए हैं। राज्य से प्राप्त भूमि का दानपत्र भी उपस्थित कर दिया गया है। न्यायालय ने अच्छी तरह जान लिया है कि यह भूमि अभियोक्ता के अधिकार वाली है………….।

मैंने निश्चिन्तता से एक शान्त श्वास छोड़ी। मैंने पूरी तरह से निश्चय कर लिया कि भाग्यलक्ष्मी तुरन्त ही मेरे गले में विजयमाला पहनाने वाली है। परन्तु जज महोदय ने फिर आगे कहा-‘…………किन्तु राजस्व विभाग के एक मुख्य अधिकारी ने इसके विरोध में एक पत्र भेजा है। इस पर भी एक नज़र डालना मैं आवश्यक समझता हूँ।’ मेरा सारा उत्साह फुर्र हो गया (गायब हो गया)। किन्तु’ रूपी भाला मेरे चित्त को चारों तरफ से काट रहा था। मैं अपने हृदय को सान्त्वना देकर न्याय की प्रशंसा करते हुए घर वापस आ गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च अभियोगः = मुकद्दमा; अभि + √युज् + घञ्, पुंल्लिङ्ग, प्रथम पुरुष एकवचन। अभियोक्तुः = मुद्दई का, मुकद्दमा चलाने वाले का; अभि + √युज् + तृ। ऋकारान्त पुंल्लिङ्ग, पञ्चमी एकवचन। कुन्तः = भाला। मुद्रा = मुखाकृति । प्राबल्यस्य = प्रबलता का, वेगपूर्वक; प्र + √बल + ष्यञ्, नपुंसकलिङ्ग, षष्ठी एकवचन। निर्वाणा = समाप्त हो चुकी; निर् + √वा + क्त, स्त्रीलिङ्ग, प्रथमपुरुष, एकवचन। इतिश्रीः = समाप्ति। मार्मिकः = तत्त्वज्ञ, विषयज्ञ; मर्म + ठक्, प्रथमपुरुष एकवचन। कन्धरायाम् = गले में, गर्दन पर। प्राड्विवाकः = जज, न्यायाधीश। लक्ष्यदानम् = दृष्टिपात, ध्यानदेना; लक्ष्यस्य दानम्, षष्ठी-तत्पुरुष। कृन्तति स्म = काट रहा था। अवष्टभ्य = रोककर; अव + √स्तम्भ (अवरोध) + ल्यप्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

3. दृष्टं मया यदेष ‘किन्तुः’ दयाधर्मादिष्वपि अनधिकारचेष्टातो न विरतो भवति। प्रातः कालस्यैव कथास्ति…. धर्मव्यवस्थापकमहोदयस्य समीपे एको दीनः करुणक्रन्दनपुरःसरं न्यवेदयत्-“महाराज! नववार्षिकी मे कन्या। जातस्य तस्या विवाहस्य अद्य तृतीयो दिवसः। नाद्यापि चतुर्थीकर्म सम्पन्नं येन विवाहः पूर्णः परिगण्येत। तस्याः पतिः सहसाऽम्रियत। हा हन्त! तस्या अबोधबालिकाया अग्रे किं भावि? अस्तकर्मसंख्यावृद्धौ किं ममोच्चकुलमपि सहायकं भविष्यति? आज्ञापयन्तु श्रीमन्तः किं मया साम्प्रतं कर्तव्यम्।” पण्डितमहोदयो गभीरतममुद्रयाऽवोचत्… “अवश्यमिदं दयास्थानम्। वर्तमानकाले समाजस्य भीषणपरिस्थितेः पर्यालोचन इदमेवोचितं प्रतीयते यत् एवं विधस्थले पुनर्विवाहस्य व्यवस्था दीयेत…. किन्तु’ वयं मुखेन कथमेतत् कथयितुं शक्नुमः। प्राचीनमर्यादापि तु रक्षितव्या स्यात्।”

हिन्दी-अनुवादः मैंने देखा है कि यह ‘किन्तु’ दया धर्म आदि में भी अपनी अनधिकार चेष्टा से रुकता नहीं है। प्रातः काल की ही बात है……. धर्मव्यवस्थापक महोदय के पास एक गरीब ने करुणक्रन्दन पूर्वक निवेदन किया-“महाराज! नौ वर्ष की मेरी कन्या है। उसका विवाह हुए तीन दिन बीत गए। आज भी ‘चतुर्थी कर्म’ पूरा नहीं हुआ, जिससे विवाह पूर्ण गिना जाए। उसका पति अचानक मर गया। हाय! उस अबोध बालिका का अब आगे क्या होगा? ‘अस्तकर्म’ की संख्या बढ़ाने में क्या मेरा उच्च कुल भी सहायक होगा ? आप आज्ञा कीजिए कि मुझे क्या करना है?” पण्डित महोदय ने गम्भीरतम मुद्रा में कहा-“यह तो अवश्य ही दयनीय स्थिति है। वर्तमान समय में समाज की
भीषण परिस्थिति को देखते हुए यही उचित प्रतीत होता है कि ऐसी दशा में पुनर्विवाह की व्यवस्था दे दी जाए (नियम बना दिया जाए)। ‘किन्तु हम अपने मुख से यह बात कैसे कह सकते हैं? प्राचीन मर्यादा की रक्षा भी तो की जानी चाहिए।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च विरतः = विरत, पृथक्, अलग; वि + √रम् + क्त। चतुर्थीकर्म = विवाहोपरान्त चौथे दिन किया जाने वाला कर्म, चतुर्थे अहनि क्रियमाणं कर्म, मध्यमपदलोपी समास। न्यवेदयत् = निवेदन किया, नि + अवेदयत्, √विद् (ज्ञाने) लङ् लकार णिजन्त, प्रथमपुरुष, एकवचन । नववार्षिकी = नौ वर्ष की आयु वाली। परिगण्येत = गिना जाए; परि + √गण (संख्याने) + विधिलिङ् प्रथमपुरुष, एकवचन। साम्प्रतम् = अभी, वर्तमान में, सम्प्रति एव साम्प्रतम्। गभीरतमम् = गम्भीरतम; गभीर + तमप्। पर्यालोचने = देखने पर, समग्र दृष्टिपात करने पर; परि + आ + √लोच् + ल्युट् सप्तमी विभक्ति, एकवचन (दर्शन, अंकन)।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

4. कुत्रचित् सोऽयं ‘किन्तुः’ नितान्तमनुतापं जनयति। अनेकवर्षाणां परिश्रमस्य फलस्वरूपं मन्निर्मितमेकं नवीनसंस्कृतपुस्तकमादाय साहित्यमर्मज्ञस्य एकस्य देशनेतुः समीपेऽगच्छम्। ‘नेतृ’-महोदयः पुस्तकस्य गुणान् सम्यक् परीक्ष्य प्रसन्नः सन्नवोचत्… “पुस्तकं वास्तव एव अद्भुतं निर्मितमस्ति बहुकालानान्तरं संस्कृते एवंविधा नवीनता दृष्टिगताऽभवत्।… ‘किन्तु’ मत्सम्मत्यां तदिदं पुस्तकं भवान् संस्कृते न विलिख्य यदि हिन्दीभाषायामलिखिष्यत् तर्हि सम्यगभविष्यत्।” अनेन ‘किन्तु’-ना मह्यं सा शिक्षा दत्तास्ति यद्यहं सत्पुरुषः स्यां तर्हि पुनरस्मिन् मार्गे पदनिक्षेपस्य नामापि न गृह्णीयाम्।

हिन्दी-अनुवादः – कहीं पर तो यह ‘किन्तु’ अत्यधिक दुःख पैदा करता है। अनेक वर्षों के परिश्रम के फलस्वरूप अपने द्वारा रचित एक नवीन संस्कृत पुस्तक लेकर एक साहित्य-मर्मज्ञ देश के नेता के समीप पहुँचा। नेता जी ने पुस्तक के गुणों की उचित परीक्षा करके प्रसन्न होते हुए कहा-“पुस्तक तो वास्तव में अद्भुत लिखी गई है। बहुत समय के पश्चात् संस्कृत में इस प्रकार की नवीनता देखी गई है।…….. किन्तु’ मेरी सम्मति में आप इस पुस्तक को संस्कृत में न लिखकर यदि हिन्दी भाषा में लिखते तो बहुत अच्छा होता।”

घर वापस लौटते हुए मैं ‘किन्तु’ द्वारा दी गई इस मर्मवेधक शिक्षा पर, घर के पूरे रास्ते कान मसलता हुआ चला गया। इस ‘किन्तु’ ने मुझे वह शिक्षा दी थी कि यदि मैं सत्पुरुष हूँ तो फिर इस रास्ते पर पाँव रखने का नाम भी न लूँ।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च नितान्तम् = अत्यधिक। अनुतापम् = पश्चात्ताप, पछतावा; अनु + तापम्। परीक्ष्य = परीक्षा करके, परि + √ईक्ष् + ल्यप्। निवर्तमानः = लौटता हुआ; नि + √वृत् + शानच । मर्मवेधकशिक्षायाः = मर्मभेदी शिक्षा के। मर्दयन् = मसलता हुआ। पदनिक्षेपः = कदम रखना; पदयोः निक्षेपः (षष्ठी-तत्पुरुष)

5. कदाचित् कदाचित्त्वयं क्रूरः ‘किन्तुः’ मुखस्य कवलमप्याच्छिनत्ति। स्वल्प-दिनानामेव वार्तास्ति। आयुर्वेदमार्तण्डस्य श्रीमतः स्वामिमहाभागस्य औषधिं निषेव्य अधुनैवाहं नीरोगोऽभवम्।अस्मिन्नेव समये मित्रगोष्ठ्या अहं स्वामिमहोदयमप्राक्षम्… ‘किमहं तत्र गन्तुं शक्नोमि।’ उत्तरमलभ्यत… ‘तादृशी हानिस्तु नास्ति। ‘किन्तु’ गरिष्ठवस्तुनो भोजने अवधानमत्यावश्यकम् अधुनापि दौर्बल्यमस्ति।

हिन्दी-अनुवादः कभी-कभी तो यह क्रूर किन्तु मुख के कवल (ग्रास) को भी छीन लेता है। थोड़े ही दिनों की बात है। आयुर्वेद मार्तण्ड श्री स्वामी जी महाराज की औषधि का सेवन करके अब मैं स्वस्थ हो गया हूँ। इसी समय मित्र मण्डली की ओर से निमन्त्रण प्राप्त हुआ। भोजनगोष्ठी (पार्टी) में सम्मिलित होने के लिए मेरी इच्छा शक्ति की प्रबलता का प्रवाह पूरी तरह से बढ़ रहा था। मैंने स्वामी जी महाराज से पूछा-“क्या मैं वहाँ जा सकता हूँ।” उत्तर मिला-“वैसे तो कोई हानि नहीं है, ‘किन्तु’ गरिष्ठ पदार्थों के सेवन में बड़ी सावधानी की आवश्यकता है, अभी भी कमजोरी है।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च कवलम् = ग्रास। आच्छिनत्ति = छीन लेता है; आ + √छिद् + लट्लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन। स्वल्पदिनानाम् एव वार्ता = थोड़े दिनों की ही बात। निषेव्य = सेवन करके; नि + √सेव् + ल्यप् । समवेतुम् = सम्मिलित होने के लिए; सम्मिलितुम्, सम् + अव + √इ + तुमुन्। प्रवर्द्धमानः = अत्यधिक बढ़ा हुआ; प्र + √वृध् + शानच्। अप्राक्षम् = पूछा। अवधानम् = सावधानी, परहेज; अव + √धा + ल्युट > अन। दौर्बल्यम् = दुर्बलता, कमज़ोरी; दुर्बल + ण्यत्।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

6. उत्साहस्य ज्वाला या पूर्वं प्रचण्डतमा आसीत् अर्द्धमात्रायां तु तत्रैव निर्वाणाभवत्। अस्तु येन केनापि प्रकारेण भोजनगोष्ठ्याविशेषाधिवेशनेऽस्मिन् सम्मिलितस्त्वभवमेव। भोजनपीठे अधिकारं कुर्वन्नेवाहमपश्यं यत् सर्वागपूर्णा एका भोज्य-व्यञ्जनानां प्रदर्शनी सम्मुखे वर्तत इति।धीरगम्भीरक्रमेणाहं भोजनकाण्डस्यारम्भमकरवम्। अहं मोदकस्यैकं ग्रासमगृह्णम्। तस्य स्वादसूत्रेण सन्दानितोऽहं यथैव द्वितीय ग्रासमगृह्ण तथैव ‘स्वामिमहोदयस्य ‘किन्तुः’ मम कण्ठनलिकामरुधत्। मुखस्य ग्रासो मुख एवाऽभ्राम्यत् अग्रे गन्तुं नाशक्नोत्। ‘किन्तोः’ भीषणविभीषिका प्रत्येकवस्तुनि गरिष्ठतां सम्पाद्य भोजनं तत्रैव समाप्तमकरोत्।

हिन्दी-अनुवादः – उत्साह की जो ज्वाला पहले अत्यधिक प्रचण्ड हो रही थी, आधे ही मिनट में वहीं बुझ गई। भोजन के आसन पर अधिकार जमाते हुए मैंने देखा कि एक सर्वांगपूर्ण भोज्य व्यंजनों की प्रदर्शनी सामने लगी हुई है। धीर-गम्भीर क्रम से मैंने भोजनकाण्ड की शुरुआत कर दी। मैंने लड्डू का एक ग्रास लिया। उसके स्वाद सूत्र से बँधे हुए मैंने जैसे ही दूसरा ग्रास ग्रहण किया तभी स्वामी महोदय की ‘किन्तु’ से मेरी कण्ठनली ही रुंध गई। मुख का ग्रास मुख में ही घूम गया, आगे जा ही न सका। ‘किन्तु’ के भीषण भय ने प्रत्येक वस्तु में गरिष्ठता बता कर भोजन वहीं समाप्त कर दिया।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च अर्द्धमात्रायाम् = आधे मिनट में। निर्वाणा = शान्त हो गई, बुझ गई। सम्मिलितस्त्व- भवमेव = सम्मिलितः + तु + अभवम् + एव। स्वादसूत्रेण = स्वाद रूपी रस्सी से। सन्दानितः = बँधा हुआ; सन्दान + इतच् । अभ्राम्यत् = घूम गया। विभीषिका = भय, डर; वि + √भी + णिच् + ण्वुल् + टाप, षुक्, आगम और इत्व।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

7. अहं देशसेवां कर्तुं गृहाद बहिरभवम्। मया निश्चितमासीत् ‘एतावन्ति दिनानि स्वोदरसेवायै क्लिष्टोऽभवम। इदानीं कियन्तं कालं देशसेवायामपि लक्ष्यं ददामि। यथैवाहं मार्गेऽग्रेसरो भवामि, तथैव मम बाल्याध्यापकमहोदयः सम्मुखोऽभवत्। मास्टरमहोदयेन प्रस्थानहेतौ पृष्टे सति सम्पूर्णसमाचारनिवेदनं ममाऽऽवश्यकमभूत्। अध्यापकमहोदयः प्रावोचत्… “तात, सर्वमिदं सम्यक्। किन्तु स्वगृहाभिमुखमपि किञ्चिद्विलोकनीयं भवेत्। येषां भरणपोषणं भवत्येवायत्तम् तान् किं भवान् निराधारमेव निर्मुच्य स्वैरं गन्तुमर्हेत्।”
पुनः किमासीत्। अत्रैव परोपकारविचाराणाम् इतिश्रीरभूत्। किन्तु’-महोदयेन देशसेवायाः सर्वापि विचारपरम्परा परपारे परावर्त्यत गृहाभिमुखं मुखं कुर्वन् तस्मात् स्थानादेव परावर्तिषि।

हिन्दी-अनुवादः मैं देशसेवा करने के लिए घर से बाहर हुआ। मैंने निश्चय किया था कि इतने दिनों तक अपनी पेट-पूजा के लिए कष्ट उठाया है। अब कुछ समय देशसेवा में भी लगाता हूँ। जैसे ही मैं रास्ते में आगे-आगे हुआ, तभी मेरे बचपन के अध्यापक मेरे सामने आ गए। मास्टर महोदय द्वारा प्रस्थान का कारण पूछने पर मेरे लिए सारा समाचार निवेदन करना आवश्यक हो गया था। अध्यापक महोदय ने कहा-“पुत्र, यह सब तो ठीक है। ‘किन्तु’ अपने घर की तरफ भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। जिनके भरण-पोषण की आपने ज़िम्मेदारी ली है, क्या आप उन्हें बेसहारा छोड़कर अपनी इच्छानुसार जा सकते हो?” फिर क्या था, यहीं पर परोपकार के विचार की इतिश्री हो गई। ‘किन्तु’ जी महाराज ने देशसेवा की सारी विचार परम्परा को परले पार कर (लौटा) दिया। घर की ओर मुँह करते हुए उसी स्थान से वापस लौट गया।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च स्वोदरसेवायै = अपनी पेट-पूजा के लिए। क्लिष्टः = दुःखी। कियन्तं कालम् = कुछ समय। अग्रेसरः = आगे चलने वाला। आयत्तम् = प्राप्त किया गया, स्वीकार किया गया। निराधारम् = व्यर्थ। निर्मुच्य = छोड़कर; परित्यज्य, निः + √मुच् + ल्यप्। स्वैरम् = स्वेच्छानुसार। गन्तुम् अर्हेत् = जा सकते हो; ‘तुमुन्’ प्रत्ययान्त शब्दों के साथ √अर्ह धातु का प्रयोग √शक् धातु (= सकना) के अर्थ में होता है। परपारे = परले पार, दूसरी ओर। परावर्त्यत = लौटा दिया।

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8. मयानुभूतमस्ति यदयं कुटिलः ‘किन्तुः’ नानादेशेषु नानारूपाणि सन्धार्य गुप्तं विचरति। यथैव लोकानां कार्यसिद्धेरवसरः समुपतिष्ठते तथैवायं प्रकटीभूय लोकानां कार्याणि यथावस्थितमवरुणद्धि। अहमेतस्य ‘किन्तु’कुठारस्य कठोरतया नितान्तमेव तान्तोऽस्मि। अहं वाञ्छामि यदेतस्याक्रमणात् सुरक्षितो भवेयम्। परं नायं मां त्यक्तुमिच्छति। बहवो मार्मिका मामबोधयन् यत् ‘त्वम् एतं सम्मुखमायान्तं दृष्ट्वैव कथं वित्रस्यसि, कुतश्च एनमपसारयितुं प्रयतसे ? किमेनं सर्वथा अहितकारिणमेव निश्चितवानसि ? नेदं सम्यक् पशुघातकस्य छुरिकापि पाश-पतितस्य गलबन्धनं छित्त्वा समये प्राणरक्षां कुर्वती दृष्टा।’ अहमपि सत्यस्यैकान्ततोऽपलापं न करिष्यामि। एतस्य कथनस्य सत्यताया मयापि परिचयः कदाचित् कदाचित् प्राप्तोऽस्ति।

हिन्दी-अनुवादः मैंने अनुभव किया कि यह कुटिल ‘किन्तु’ अनेक स्थानों पर अनेक रूप धारण करके गुप्त रूप से विचरण करता है। जैसे ही लोगों की कार्य सिद्धि का अवसर समीप होता है, तभी यह प्रकट होकर लोगों के कार्यों को उसी स्थिति में रोक देता है। मैं इस ‘किन्तु’ के कुल्हाड़े की कठोरता से बुरी तरह पीड़ित हूँ। मैं चाहता हूँ कि इसके आक्रमण से बच जाऊँ। परन्तु यह मुझे छोड़ना ही नहीं चाहता। बहुत से मर्मज्ञों ने मुझे समझाया कि तुम इसे सामने आता हुआ देखकर ही क्यों डर जाते हो और क्यों इसे दूर करने के लिए यत्नशील रहते हो ? क्यों इसे सर्वथा अहितकर ही मानते हो ? यह ठीक नहीं। पशुघातक की छुरी भी जाल में बँधे हुए के गले का बन्धन काटकर, अवसर आने पर प्राण रक्षा करती हुई देखी गई है। मैं भी सच्चाई को पूरी तरह से नहीं झुठलाऊँगा। इस कथन की सत्यता का परिचय मुझे भी कभी कभी प्राप्त हुआ है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च सन्धार्य = धारण करके; सम् + √धृ + णिच् + ल्यप्। तान्तः = पीड़ित, परेशान। वित्रस्यसि = डर रहे हो; वि + √त्रस, लट्लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन। अपसारयितुम् = दूर भागने के लिए; अप + √सृ + णिच् + तुमुन्। पाशपतितस्य = जाल में फंसे हुए के। अपलापम् = झुठलाना, सत्य को असत्य और असत्य को सत्य करना।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

9. ‘शब्दैः प्रतीयते यद गहे चौरः प्रविष्टोऽस्ति’ इति सभयमनुलपन्ती गहिणी रात्रौ मामबोधयत् । अहं निजशौर्य प्रकाशयन् महता वीरदर्पण लगुडमात्रमादाय अन्धकार एव चौरनिग्रहाय प्रचलितोऽभवम्। गृहिणी कर्णसमीप आगत्य शनैरवदत्… “अन्धकारे-ऽस्मिन् यासि त्वमवश्यम्, ‘किन्तु’ दृश्यताम् स शस्त्रं न प्रहरेत्।” पुनः किमासीत्। मम वीरदर्पस्य शौर्यस्य च प्रज्वलितं ज्योतिस्तत्रैव निर्वाणमभूत। चौरनिग्रहः कीदृशः, निजप्राणपरित्राणमेव मे अन्वेषणीयमभवत्। लगडं प्रक्षिप्य कोष्ठके निलीनोऽभवम्। तत एव च कम्पित-कण्ठेन चीत्कारमकरवम्-“लोका: ! आगच्छत, चौरः प्रविष्टोऽस्ति।

हिन्दी-अनुवादः ‘आवाजों से प्रतीत होता है कि घर में चोर घुस आया है’-इस प्रकार भयपूर्वक कहती हुई मेरी घरवाली ने रात्री में मुझे जगाया। मैं अपनी शूरवीरता प्रकट करते हुए बड़े घमण्ड से लाठी मात्र लेकर अन्धकार में ही चोर को पकड़ने के लिए चल पड़ा। पत्नी ने कान के पास आकर धीरे से कहा-“अन्धकार में तुम जाना ज़रूर, ‘किन्तु’ देखना, कहीं वह शस्त्रप्रहार न कर दे।” फिर क्या था। मेरे वीरोचित घमण्ड और शूरता की जली हुई ज्योति वहीं बुझ गई। चोर का पकड़ना कैसा, मैं अपनी प्राणरक्षा ही खोजने लगा। लाठी फैंक कर कोठे (कमरे) में छिप गया। तभी काँपते हुए स्वर से मैं चीखा-“लोगो ! आओ, चोर घुस आया है।”

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च अनुलपन्ती = कहती हुई; अनु + √लप् + शतृ + ङीप्। चौरनिग्रहाय = चोर को पकड़ने के लिए; चौरस्य निग्रहाय (चतुर्थी तत्पुरुष)। परित्राणम् = रक्षण, बचाव, परि + √त्रैङ् (पालने) + ल्युट नपुंसकलिङ्ग प्रथमपुरुष एकवचन। अन्वेषणीयम् = ढूँढने योग्य, खोजने योग्य; अनु + √इष् + अनीयर् प्रत्यय। लगुडम् = लाठी, दण्ड। निलीनः = छुपा हुआ; नि + √ली + क्त प्रत्यय।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

10. एकेन अमुना ‘किन्तु’-ना चौरस्य चपेटाभ्योऽवमुच्य सौख्यस्य सुरक्षिते प्रकोष्ठकेऽहं प्रवेशितः। अनेन किन्तुना कस्मिन्नपि संकटसमये कदाचित् किञ्चित्कार्यं कामं कृतं स्यात् परं भूयसा तु अस्माद् भयमेव भवति। अस्य हि सार्वदिकः स्वभाव एव यत् वार्ता काममुत्तमास्तु अधमा वा परमयं मध्ये प्रविश्य तस्याः कथाया विच्छेदमवश्यं करिष्यति। एतएव कस्मिन्नपि समये कार्यसाधकत्वेऽपि लोका अस्माद् वित्रस्यन्त्येव।वैरिणां भारावताराय कदाचित् हिताधराऽपि करवालधारा क्रूराकारा प्रखरप्रकारा एव प्रसिद्धा लोकेषु। विगुणः कार्षापणः, कुत्सितश्च पुत्रः संकटे कदाचिदुपयुक्तो भवेत् परन्तु जनसमाजे द्वयोरुपर्येव नासा-भूसकोचो जातो जनिष्यते च। इदमेव कारणं यत् यस्यां वार्तायां ‘किन्तुः’ उत्पद्यते तां वार्ता लोका विगुणां गणयन्ति।

हिन्दी-अनुवादः इस एक किन्तु ने चोर की चपेटों से छुड़वाकर मुझे सुख के सुरक्षित कोठे (कमरे) में प्रविष्ट करवा दिया। इस किन्तु ने किसी संकट के समय कभी कोई कार्य शायद किया हो, परन्तु अधिकतर तो इससे भय ही होता है। इसका सदा-सदा रहने वाला स्वभाव ही है कि चाहे बात अच्छी हो बुरी परन्तु यह बीच में प्रविष्ट होकर उस बात को अवश्य ही काट देगा। इसीलिए किसी भी समय कार्य सिद्धि में लोग इससे डरते ही हैं। वैरियों का भार उतारने के लिए शायद हितकारक तलवार की धार भी क्रूर आकार तथा तीखे रूप वाली ही संसार में प्रसिद्ध होती है। खोटा सिक्का तथा निन्दित पुत्र संकट में कभी काम भले ही आ जाए, परन्तु जनसमाज में तो दोनों के ऊपर ही नाक-भौंह सिकोड़ी जाती रही है और आगे भी सिकोड़ी जाती रहेगी। यही कारण है कि जिस किसी बात में ‘किन्तु’ लग लग जाता है, उस बात को लोग खटाई में पड़ी हुई बात ही समझते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्श्च चपेटाभ्यः = थप्पड़ों से। अवमुच्य = छुड़ाकर। प्रकोष्ठके = घर में। कामम् = भले ही। सार्वदिकः = सर्वदा होने वाला। भारावताराय = भार उतारने के लिए। कदाचित् = शायद। करवालधारः = तलवार की धार। विगुणः कार्षापणः = खोटा सिक्का। कुत्सितः = निन्दित, कुत्स + इतच्। नासा-भ्रूसकोचः = नाक-भौंह सिकोड़ना। विगुणाम् = गुण रहित, खटाई में पड़ी हुई।

किन्तोः कुटिलता (किन्तु’ की कुटिलता) Summary in Hindi

किन्तोः कुटिलता पाठ परिचय

प्रस्तुत पाठ ‘किन्तोः कुटिलता’ देवर्षि श्रीकलानाथ शास्त्री द्वारा सम्पादित पं० श्री भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के निबन्धसंग्रह ‘प्रबन्धपारिजातः’ से संकलित किया गया है।

पं० भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के पिता पं० भट्ट द्वारकानाथ जयपुर निवासी थे। पं० भट्ट मथुरानाथ का जन्म जयपुर में सन् 1889 ई० में हुआ और निधन भी 4 जून, 1964 ई० को जयपुर में ही हुआ। श्री भट्ट की पूर्वज परम्परा अत्यन्त प्रतिभा सम्पन्न रही। इन्होंने महाराजा संस्कृत कॉलेज से साहित्याचार्य की उपाधि प्राप्त की और वहीं व्याख्याता बन गए। आप जयपुर से प्रकाशित ‘संस्कृतरत्नाकर’ पत्रिका के सम्पादक रहे। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री द्वारा प्रणीत संस्कृत की रचनाओं में ‘जयपुरवैभवम्’, ‘गोविन्दवैभवम्’, ‘संस्कृतगाथासप्तशती’ और ‘साहित्यवैभवम्’ विशेष उल्लेखनीय हैं। इनके अतिरिक्त इन्होंने चालीस कथाएँ और सौ से भी अधिक निबन्ध संस्कृत में लिखे। इनकी ‘सुरभारती’, ‘सुजनदुर्जन-सन्दर्भः’ और ‘युद्धमुद्धतम्’ नामक पद्य रचनाएँ भी उल्लेखनीय हैं।

यहाँ संकलित पाठ में श्री भट्ट जी ने दिखाया है कि जब कभी किसी कथन के साथ ‘किन्तु’ लग जाता है, तब बहुधा वह पहले कथन के अच्छे भाव को समाप्त कर उसे दोषपूर्ण और सम्बोधित व्यक्ति के लिए दुःख पैदा करने वाला, उसके उत्साह का नाशक और शत्रुरूप बना देता है। ऐसे अवसर विरल होते हैं जहाँ ‘किन्तु’ सम्बोधित व्यक्ति के लिए सुखदायक सिद्ध होता है।

लेख की भाषा सरल व सुबोध है, अलंकारों और दीर्घ समासों आदि का प्रयोग नहीं किया गया है। भाव सुस्पष्ट और सामान्य जीवन में जनसाधारण द्वारा अनुभूत हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 12 किन्तोः कुटिलता

किन्तोः कुटिलता पाठस्य सारः

‘किन्तोः कुटिलता’ यह पाठ पं० श्री भट्ट मथुरानाथ शास्त्री के निबन्ध संग्रह ‘प्रबन्धपारिजात:’ से संकलित किया गया है। इस पाठ में दिखाया गया है कि जब कभी किसी कथन के साथ ‘किन्तु’ लग जाता है तब प्रायः पहले कथन के अच्छे भाव को समाप्त कर वह ‘किन्तु’ उसे दोषपूर्ण बना देता है। तथा सम्बोधित व्यक्ति के लिए कष्टकारी, उत्साहनाशक तथा शत्रुरूप बन जाता है। ऐसे अवसर बहुत कम होते हैं जहाँ ‘किन्तु’ शब्द संबोधित व्यक्ति के लिए सुखकारी सिद्ध होता है। लेखक ने अपने जीवन में घटित तीन- चार घटनाओं के अनुभव से ‘किन्तु’ के इस षड्यन्त्र को प्रमाणपूर्वक पाठकों के समक्ष-प्रस्तुत किया है।

एक बार लेखक का राज्य से प्राप्त हुई भूमि के सम्बन्ध में लम्बे समय से एक मुकदमा न्यायालय में चल रहा था। जज महोदय ने लेखक के पक्ष में निर्णय सुनाया और कहा अभियोक्ता की ओर से सभी आवश्यक प्रमाण उपस्थित कर किन्तोः कुटिलता दिए गए। राज्य से प्राप्त भूमि का दानपत्र भी प्रस्तुत कर दिया गया और न्यायालय को इस बात का पूरा निश्चय हो गया है कि यह भूमि अभियोक्ता के अधिकार वाली है।” जज महोदय के निर्णय से लेखक बड़ा प्रसन्न हो रहा था कि भूमि मेरे पास आ ही गई है। तभी जज महोदय ने आगे कहा-“किन्तु राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने इसके विरोध में एक पत्र भेजा है, उस पर दृष्टिपात करना भी हम अपना कर्तव्य समझते हैं।” किन्तु शब्द के इस भाले ने लेखक के हृदय को चीरकर रख दिया।

इसी प्रकार की एक अन्य घटना में लेखक बताता है कि एक बार धर्माधिकारी के पास एक ग़रीब आदमी चीख पुकार करता हुआ कहने लगा कि मेरी नौ वर्ष की कन्या के विवाह को तीन ही दिन हुए हैं। चतुर्थी कर्म (गौना) न होने से विवाह भी पूरा नहीं हुआ और उसके पति की मृत्यु हो गई। ऐसी दशा में मैं क्या करूँ। धर्माधिकारी ने कहा कि यह तो अवश्य ही दयनीय स्थिति है, वर्तमान समय में समाज की भयंकर दशा पर विचार करते हुए इसके पुनर्विवाह की व्यवस्था दी जानी चाहिए।..किन्तु हम अपने मुँह से कैसे कहे, हमें प्राचीन मर्यादा की रक्षा भी तो करनी है। यहाँ भी किन्तु ने उस अबोध बालिका के जीवन को नरक बना दिया।

लेखक ने एक बहुत ही उत्तम पुस्तक संस्कृत में लिखी और एक साहित्य प्रेमी देश के नेता को समीक्षा के लिए दी। नेता जी ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए अंतिम वाक्य कहा-“बहुत समय के पश्चात् संस्कृत में इस प्रकार की अद्भुत पुस्तक लिखी गई है।……..किन्तु ये हिन्दी में लिखी जाती तो उचित होता।” नेताजी के किन्तु शब्द ने लेखक को मार्मिक पीड़ा दी और वह अपना कान मसलता हुआ घर की ओर निकल गया।

लेखक एक बार बीमार हो गया। एक वैद्य की औषध सेवन से वह स्वस्थ हो गया। तभी लेखक के पास मित्रों की ओर से भोजन गोष्ठी का निमंत्रण आया। लेखक ने वैद्य से उसमें सम्मिलित होने के लिए पूछा। उत्तर में वैद्य ने कहा”कोई खास हानि तो नहीं है…किन्तु गरिष्ठ वस्तुओं के सेवन से परहेज करना।” लेखक प्रीतिभोज में सम्मिलित हुआ, स्वादिष्ट व्यंजन सामने आए। जैसे ही लेखक ने एक ग्रास गले के नीचे उतारा वैद्य के किन्तु ने सारा मजा किरकिरा कर दिया। लेखक ने एक बार देशसेवा करने के लिए घर छोड़ने का निश्चय किया। रास्ते में बचपन के मास्टर जी मिल गए। उन्होंने पूछा तो बताना पड़ा। मास्टर जी ने कहा-“बेटा यह सब तो ठीक है…….किन्तु जिस परिवार का भार तुम्हारे सिर पर है उसे निराधार छोड़कर अकेले कैसे जा सकते हो।”

मास्टर जी के किन्तु ने लेखक के सिर से देशसेवा का भूत उतार दिया। एक बार लेखक की पत्नी ने भयपूर्वक कहा-“शायद घर में कोई चोर घुस आया है।” लेखक बड़ी वीरता से अंधेरे में ही लाठी लेकर चोर को पकड़ने चल पड़ा तभी पत्नी ने कान के पास आकर बुदबुदाया, “अन्धकार में अकेले जा तो रहे हो……. किन्तु देखना कहीं वह शस्त्र का प्रहार न कर दे।” लेखक की वीरता तुरन्त गायब हो गई और वह प्राण बचाने के लिए लाठी फैंककर घर के अन्दर छिप गया और वहीं से चीखते स्वर में बोला- लोगो ! आओ, चोर घुस आया है। पत्नी की इस एक किन्तु ने चोर के थप्पड़ों से छुड़वाकर लेखक को सुरक्षित घर में भेज दिया था। विचारने वाली बात यह है कि यह किन्तु ऐसा कल्याणकारी कार्य भूले भटके ही करता है। खोटा सिक्का तथा नालायक बेटा संकट में कभी भले ही काम आ जाते हों, परन्तु अधिकांश में तो समाज इन दोनों पर नाक भौंह सिकोड़ता रहा है और सिकोड़ता रहेगा। यही दशा ‘किन्तु’ की है। यह ‘किन्तु’ जीवन में एक आध बार ही सुखदायी होता है, संकट से बचाता है और सुखदायी होती है। अधिकांश में तो जिस कथन के साथ ‘किन्तु’ महाराज लग जाते हैं। समझिए वह काम खटाई में पड़ गया। कोई न कोई बाधा आ पड़ी और काम बीच में अटक गया।

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HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद्

Haryana State Board HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद्

HBSE 12th Class Sanskrit उद्भिज्ज-परिषद् Textbook Questions and Answers

1. संस्कृतभाषया उत्तरत
(क) ‘उद्भिजपरिषद्’ इति पाठस्य लेखकः कः अस्ति ?
(ख) उद्भिज्जपरिषदः सभापतिः कः आसीत् ?
(ग) अश्वत्थमते मानवाः तृणवत् कम् उपेक्षन्ते ?
(घ) सृष्टिधारासु मानवो नाम कीदृशी सृष्टिः ?
(ङ) मनुष्यायाणां हिंसावृत्तिः कीदृशी ?
(च) पशुहत्या केषाम् आक्रीडनम् ?
(छ) श्वापदानां हिंसाकर्म कीदृशम् ?
उत्तरम्:
(क) ‘उद्भिज्जपरिषद्’ इति पाठस्य लेखकः पण्डित-हृषीकेश-भट्टाचार्यः अस्ति।
(ख) उद्भिज्जपरिषदः सभापतिः अश्वत्थ-देवः आसीत्।
(ग) अश्वत्थमते मानवाः तृणवत् स्नेहम् उपेक्षन्ते।
(घ) सृष्टिधारासु मानवो नाम निकृष्टतमा सृष्टिः ?
(ङ) मनुष्यायाणां हिंसावृत्तिः निरवधिः अस्ति।
(च) पशुहत्या मनुष्याणाम् आक्रीडनम्।
(छ) श्वापदानां हिंसाकर्म जठरानलनिर्वाणमात्रप्रयोजकम् अस्ति।

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2. रिक्तस्थानानि पूरयत
(क) मानवा नाम सर्वासु सृष्टिधारासु ……………सृष्टिः ।
(ख) मनुष्याणां ……………… निरवधिः।।
(ग) नहि ते करतलगतानपि ……………… उपघ्नन्ति।
(घ) परं तृणवद् उपेक्षन्ते……………… ।
(ङ) न केवलमेते पशुभ्यो निकृष्टास्तृणेभ्योऽपि ……….. एव।
उत्तरम्:
(क) मानवा नाम सर्वासु सृष्टिधारासु निकृष्टतमा सृष्टिः ।
(ख) मनुष्याणां हिंसावृत्तिः निरवधिः ।
(ग) नहि ते करतलगतानपि हरिण-शशकादीन् उपघ्नन्ति।
(घ) परं तृणवद् उपेक्षन्ते स्हेनम् ।
(ङ) न केवलमेते पशुभ्यो निकृष्टास्तृणेभ्योऽपि निस्साराः एव।

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3. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत
मायाविनः, श्वापदान्, निरवधिः, विसर्जयामास, बिभ्यति, पर्याकुलाः, लजन्ते, विरमन्ति, कापुरुषाः, प्रकटयति।
उत्तरम्:
(वाक्यप्रयोगः)
(क) मायाविनः-सृष्टिधारासु मानवाः सर्वाधिकाः मायाविनः सन्ति।
(ख) श्वापदान्-मानवाः स्वमनोविनोदाय श्वापदान् हन्ति।
(ग) निरवधि:-मनुष्याणां हिंसावृत्तिः निरवधिः अस्ति।
(घ) विसर्जयामास-सभापतिः सभां विसर्जयामस।
(ङ) बिभ्यति-मानवाः पापाचारेभ्यः किमपि न बिभ्यति।
(च) पर्याकुला:-विपत्तिषु मानवाः पर्याकुलाः भवन्ति।
(छ) लज्जन्ते-मानवाः अनृतव्यवहारात् किञ्चिद् अपि न लज्जन्ते।
(ज) विरमन्ति – स्वार्थसाधनपरा: मानवाः परपीडनात् न विरमन्ति।
(झ) कापुरुषा:-कापुरुषाः तु आत्मरक्षाम् अपि कर्तुं न शक्नुवन्ति।
(ञ) प्रकटयति-शिशुः क्रोधं प्रकटयति।

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4. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्या
मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः। पशुहत्या तु तेषाम् आक्रीडनम्। केवलं विक्लान्तचित्तविनोदाय महारण्यम् उपगम्य ते यथेच्छं निर्दयं च पशुघातं कुर्वन्ति। तेषां पशुप्रहार-व्यापारमालोक्य जडानामपि अस्माकं विदीर्यते हृदयम्।
उत्तरम्:
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शाश्वती-द्वितीयो भागः’ के ‘उद्भिज्ज-परिषद्’ नामक पाठ से लिया गया है। यह पाठ पण्डित हृषीकेश भट्टाचार्य के निबन्धसंग्रह ‘प्रबन्ध-मञ्जरी’ से संकलित है। इस निबन्ध में वृक्षों की सभा के सभापति पीपल ने मनुष्य की हिंसक प्रवृत्ति के प्रति तीखा व्यंग्य-प्रहार किया गया है।

व्याख्या – हिंसा के दो प्रमुख रूप हैं-(1) स्वाभाविक भूख की शान्ति के लिए हिंसा (2) मन बहलाने के लिए हिंसा। मांस मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नहीं है। परन्तु सिंह-व्याघ्र आदि पशुओं का स्वाभाविक भोजन मांस ही है। अतः ऐसे पशुओं को न चाहते हुए भी केवल पेट की भूख शान्त करने हेतु पशुवध करना पड़ता है। परन्तु इन पशुओं की यह विशेषता भी है कि भूख शान्त होने पर पास खड़े हुए हिरण आदि का भी ये वध नहीं करते। पशुओं का पशुवध भूख शान्ति तक ही सीमित होता है। परन्तु मनुष्य की पशुहिंसा असीम है। क्योंकि वह तो अपने बेचैन मन की प्रसन्नता के लिए ही पशुवध करता है। मनुष्य की इस विलक्षण एवं भयावह हिंसावृत्ति पर वृक्षों की सभा के सभापति अश्वत्थ (पीपल) को अत्यन्त खेद है और जड़ होने पर भी मनुष्य के इस दुष्कर्म से उसका हृदय फटा जा रहा है।

5. प्रकृति-प्रत्ययविभागः क्रियताम्निकृष्टतमा, उपगम्य, प्रवर्तमाना, अतिक्रान्तम्, व्याख्याय, कथयन्तु, उपजन्ति, आक्रीडनम्।
उत्तरम्:
प्रकृतिः + प्रत्ययः
(क) निकृष्टतमा नि + √कृष् + क्त + तमप् + टाप्
(ख) उपगम्य उप + √गम् + ल्यप्
(ग) प्रवर्तमाना प्र + √वृत् + शानच् + टाप्
(घ) अतिक्रान्तम् अति + √क्रम् + क्त
(ङ) व्याख्याय वि + आ + √चक्षि > ख्या + ल्यप्
(च) कथयन्तु √कथ् + लोट्, प्रथमपुरुषः, बहुवचनम्
(छ) उपघ्नन्ति उप + √हन् + लट्, प्रथमपुरुषः, बहुवचनम्
(ज) आक्रीडनम् आ + √क्रीड् + ल्युट् , अन (नपुं०, प्रथमा-एकवचनम्)

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद्

6. सन्धिच्छेदं कुरुत
मानवा इव, भवन्तो, स्वोदरपूर्तिम्, हिंसावृत्तिस्तु, आत्मोन्नतिम्, स्वल्पमपि।
उत्तरम्
(क) मानवा इव = मानवाः + इव
(ख) भवन्तो नित्यम् = भवन्तः + नित्यम्
(ग) स्वोदरपूर्तिम् = स्व + उदरपूर्तिम्
(घ) हिंसावृत्तिस्तु = हिंसावृत्तिः + तु
(ङ) आत्मोन्नतिम् = आत्म + उन्नतिम्
(च) स्वल्पमपि = सु + अल्पम् + अपि

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7. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत
महापादपाः, सृष्टिधारासु, करतलगतान्, वीरपुरुषाः, शान्तिसुखम्।
उत्तरम्
(क) महापादपाः – महान्तः पादपा:-कर्मधारयः।
(ख) सृष्टिधारासु – सृष्टिः एव धारा, तासु-कर्मधारयः ।
(ग) करतलगतान् – करतलं गतान्-द्वितीया-तत्पुरुषः ।
(घ) वीरपुरुषाः – वीराः पुरुषाः-कर्मधारयः ।
(ङ) शान्तिसुखम् – शान्तिः च सुखं च तयोः समाहारः-द्वन्द्वः।

योग्यताविस्तारः
(1) प्रचुरोदकवृक्षो यो निवातो दुर्लभातपः।
अनूपो बहुदोषश्च समः साधारणो मतः॥ चरकसंहिता

(2) मानवं पुत्रवद् वृक्षास्तारयन्ति परत्र च।
पुत्रवत्परिपाल्यास्ते पुत्रास्ते धर्मतः स्मृताः। महाभारतम् , अनुशासनपर्व

(3) एतेषां सर्ववृक्षाणां छेदनं नैव कारयेत्।
चतुर्मासे विशेषेण विना यज्ञादिकारणम्। महाभारतम् , अनुशासनपर्व

(4) एकेनापि सुवृक्षण पुष्यितेन सुगन्धिना।
वासितं वै वनं सर्वं सुपुत्रेण कुलं यथा॥ महाभारतम् , अनुशासनपर्व

(5) “दशकूपसमा वापी दशपुत्रसमो द्रुमः।”
वृक्षविषयिण्यः ईदृश्य अन्य सूक्तयोऽपि गवेषणीयाः॥

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HBSE 9th Class Sanskrit उद्भिज्ज-परिषद् Important Questions and Answers

I. पुस्तकानुसारं समुचितम् उत्तरं चित्वा लिखत
(i) ‘उद्भिज्जपरिषद्’ इति पाठस्य लेखकः कः अस्ति ?
(A) आर्यभट्टः
(B) हृषीकेशः भट्टाचार्यः
(C) बाणभट्टः
(D) अम्बिकादत्तव्यासः ।
उत्तराणि:
(B) हृषीकेशः भट्टाचार्यः

(ii) उद्भिज्जपरिषदः सभापतिः कः आसीत् ?
(A) देवाधिपतिः
(B) देवराज इन्द्रः
(C) आम्रः
(D) अश्वत्थदेवः।
उत्तराणि:
(C) अश्वत्थदेवः

(iii) अश्वत्थमते मानवाः तृणवत् कम् उपेक्षन्ते ?
(A) आत्मानम्
(B) खगान्
(C) स्नेहम्
(D) पशून्।
उत्तराणि:
(B) स्नेहम्

(iv) सृष्टिधारासु मानवो नाम कीदृशी सृष्टि: ?
(A) उत्कृष्टतमा
(B) निकृष्टतमा
(C) उत्तमा
(D) बृहत्तमा।
उत्तराणि:
(A) निकृष्टतमा

(v) मनुष्याणां हिंसावृत्तिः कीदृशी ?
(A) निरवधिः
(B) सावधिः
(C) मासावधिः
(D) वर्षावधिः।
उत्तराणि:
(A) निरवधिः

(vi) पशुहत्या केषाम् आक्रीडनम् ?
(A) पुरुषाणाम्
(B) स्त्रीणाम्
(C) सिंहानाम्
(D) मनुष्याणाम्।
उत्तराणि:
(D) मनुष्याणाम्।

II. रेखाङ्कितपदम् आधृत्य-प्रश्ननिर्माणाय समुचितं पदं चित्वा लिखत
(i) सावहिताः शृणवन्तु भवन्तः।
(A) कः
(B) के
(C) को
(D) काः।
उत्तराणि:
(B) के

(ii) मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः ।
(A) केषाम्
(B) कस्याम्
(C) कस्मात्
(D) कैः।
उत्तराणि:
(A) केषाम्

(iii) मनुजन्मानः प्रतिक्षणं स्वार्थसाधनाय प्रवर्तन्ते।
(A) कम्
(B) के
(C) किमर्थम्
(D) कथम्।
उत्तराणि:
(B) किमर्थम्

(iv) मानवाः क्षणमपि परपीडनात् न विरमन्ति।
(A) कस्मात्
(B) कम्
(C) किम्
(D) किमर्थम्।
उत्तराणि:
(D) कस्मात्

(v) मनुष्याः महारण्यम् उपगम्य यथेच्छं पशुधातं कुर्वन्ति ?
(A) के
(B) काः
(C) कस्मै
(D) किम।
उत्तराणि:
(A) किम्

(vi) जीवसृष्टिप्रवाहेषु मानवाः इव हिंसानिरताः जीवाः न विद्यन्ते।
(A) के
(B) कथम्
(C) कीदृशाः
(D) काः।
उत्तराणि:
(B) कीदृशाः।

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उद्भिज्ज-परिषद् पाठ्यांशः

1. अथ सर्वविधविटपिनां मध्यभागे स्थितः सुमहान् अश्वत्थदेवः वदति-“भो भो वनस्पतिकुलप्रदीपा महापादपाः कुसुमकोमलदन्तरुचः लता-कुलललनाश्च ! सावहिताः शृण्वन्तु भवन्तः। अद्य मानववार्रवास्माकं समालोच्यविषयः । मानवा नाम सर्वासु सृष्टिधारासु निकृष्टतमा सृष्टिः, जीवसृष्टिप्रवाहेषु मानवा इव पर-प्रतारकाः स्वार्थसाधनपराः, मायाविनः, कपट-व्यवहारकुशलाः, हिंसानिरताः, जीवा: न विद्यन्ते। भवन्तो नित्यमेवारण्यचारिणः सिंहव्याघ्रप्रमुखान् हिंस्रत्वभावनया प्रसिद्धान् श्वापदान् अवलोकयन्ति। ततो भवन्त एव कथयन्तु याथातथ्येन किमेते हिंसादिक्रियासु मनुष्येभ्यो भृशं गरिष्ठाः।

हिन्दी-अनुवादः सभी प्रकार के वृक्षों के मध्यभाग में स्थितं विशाल अश्वत्थदेव (पीपल का वृक्ष) कहता है-“हे हे वनस्पतिकुल के दीपक महान् पौधो! और पुष्प रूपी कोमल दाँतों से सुशोभित लतावंश की ललनाओ” आप ध्यानपूर्वक सुनिएआज मनुष्य व्यवहार ही हमारी आलोचना का विषय है। सभी सृष्टिधाराओं में सबसे निकृष्ट सृष्टि मनुष्य ही है। जीवसृष्टिप्रवाहों में मनुष्य की भाँति पर-पीड़क, स्वार्थपरायण, मायावी, कपट-व्यवहार में कुशल, हिंसा में संलग्न जीव नहीं हैं। आप नित्य ही जंगलों में घूमने वाले हिंसात्मक भावना के लिए प्रसिद्ध सिंह, व्याघ्र आदि पशुओं को देखते हैं। फिर आप ही ठीक-ठीक बताएं कि क्या ये (पशु) हिंसक-क्रियाओं में मनुष्यों से बढ़कर हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च उद्भिज्जः = वनस्पति (उद्भिज्य जायते इति उद्भिज्जः)। विटपी = वृक्ष (विटप + इनि > इन्)। अश्वत्थः = पीपल का पेड़। कुलललनाः = कुल की स्त्रियाँ; कुलस्य ललनाः। सावहिता = सावधान । सृष्टिधारासु = सृष्टि की परम्परा में; सृष्टे: धारा, सृष्टिधारा, तासु, षष्ठी तत्पुरुष समास। निकृष्टतमा = अत्यधिक नीच; निकृष्ट + तमप्। परप्रतारकाः = दूसरे को पीड़ित करने वाले; परस्य प्रतारकः, षष्ठी-तत्पुरुष समास।

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2. श्वापादानां हिंसाकर्म किल जठरानलनिर्वाणमात्रप्रयोजकम्। प्रशान्तजठरानले सकृदुपजातायां स्वोदरपूर्ती नहि ते करतलगतानपि हरिणशशकादीन् उपघ्नन्ति। न वा तथाविध-दुर्बलजीवानां घातार्थम् अटवीतोऽटवीं परिभ्रमन्ति। मनुष्याणां हिंसावृत्तिस्तु निरवधिः । पशुहत्या तु तेषाम् आक्रीडनम्। केवलं विक्लान्तचित्तविनोदाय महारण्यम् उपगम्य ते यथेच्छं निर्दयं च पशुघातं कुर्वन्ति। तेषां पशुप्रहार-व्यापारमालोक्य जडानामपि अस्माकं विदीर्यते हृदयम्।

हिन्दी-अनुवादः पशुओं का हिंसाकर्म पेट की आग बुझाने मात्र के लिए होता है। जठराग्नि के शान्त हो जाने पर, एक बार अपनी उदरपूर्ति हो जाने पर वे (पशु) हाथ में आए हुए हिरण, खरगोश आदि को भी नहीं मारते। और न ही इस प्रकार के दुर्बल प्राणियों को मारने के लिए वे एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमते हैं।

मनुष्यों की हिंसावृत्ति तो असीम है। पशुहत्या तो उनका खेल है। केवल अपने बेचैन मन को प्रसन्न करने के लिए बड़े जंगल में जाकर वे जी-भरकर निर्दयतापूर्वक पशुवध करते हैं। उनके पशुप्रहार के व्यवहार को देखकर हम जड़वृक्षों का हृदय भी फट जाता है।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च श्वापदान् = जंगली जानवरों को। याथातथ्येन = वस्तुतः । भृशम् = अत्यधिक। जठरानल-निर्वाणम् = पेट की अग्नि, भूख की शान्ति; जठरानलस्य निर्वाणम्, षष्ठी तत्पुरुष समास। करतलगतान् = हाथ में आए हुए; करतलगतान्। उपघ्नन्ति = मारते हैं; उप + √हन् + लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। घातार्थम् = मारने के लिए। अटवीतः अटवीम् = एक जंगल से दूसरे जंगल को; अटवी + तस्। निरवधिः = असीम। आक्रीडनम् = खेल; आ + √क्रीड् + ल्युट् प्रत्यय। विक्लान्तः= थका हुआ; वि + √क्लम् + क्त प्रत्यय। उपगम्य = पास जाकर; उप + √गम् + क्त्वा (ल्यप् प्रत्यय)।

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3. निरन्तरम् आत्मोन्नतये चेष्टमानाः लोभाक्रान्त-हृदयाः मनुजन्मानः किल प्रतिक्षणं स्वार्थसाधनाय सर्वात्मना प्रवर्तन्ते। न धर्ममनुधावन्ति, न सत्यमनुबध्नन्ति। परं तृणवद् उपेक्षन्ते स्नेहम्। अहितमिव परित्यजन्ति आर्जवम्। अमङ्गलमिव उपघ्नन्ति विश्वासम्। न स्वल्पमपि बिभ्यति पापाचारेभ्यः न किञ्चिदपि लज्जन्ते मुहुरनृतव्यवहारात्। नहि क्षणमपि विरमन्ति परपीडनात्।

हिन्दी-अनुवादः निरन्तर अपनी उन्नति के लिए प्रयत्नशील, लोभ से ग्रस्त हृदय वाले मनुष्य सब प्रकार से अपनी स्वार्थसाधना के लिए प्रतिक्षण लगे रहते है। न धर्माचरण करते हैं, न सत्य को स्वीकारते हैं; अपितु स्नेह (= प्राणिमात्र के प्रति प्यार) को अतितुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा करते हैं। सरलता को हानिकर वस्तु की भाँति त्याग देते हैं। विश्वास को अमंगल (= अपशकुन) समझकर नष्ट कर देते हैं। पापाचार से वे थोड़ा भी नहीं डरते। बार-बार के झूठे व्यवहार से उन्हें थोड़ीसी भी लज्जा नहीं होती। दूसरों को पीड़ित करने से वे क्षणभर भी विराम नहीं लेते।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च सर्वात्मना = पूरे मन से (सभी प्रकार से)। प्रवर्तन्ते = प्रवृत्त होते हैं; प्र + √वृत् + लट्लकार, प्रथम पुरुष बहुवचन। उपेक्षन्ते = उपेक्षा करते हैं; उप + √ईक्ष् + लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। आर्जवम् = सीधापन; ऋजोर्भावः आर्जवम्। बिभ्यति = डरते हैं; √भी + लट्लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। पापाचारेभ्यः = अनुचित आचरण से; पाप-श्चासौ आचारः, पापाचारः तेभ्यः। विरमन्ति = रुकते हैं; वि + √रम् धातु + लट्लकार + प्रथम पुरुष बहुवचन।

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4. न केवलमेते पशुभ्यो निकृष्टास्तृणेभ्योऽपि निस्सारा एव। तृणानि खलु वात्यया सह स्वशक्तितः सुचिरमभियुध्य सम्मुखसमरप्रवर्तमाना वीरपुरुषा इव शक्तिक्षये क्षितितले निपतन्ति, न तु कदाचित् कापुरुषा इव स्वस्थानम् अपहाय प्रपलायन्त। मनुष्याः पुनः स्वचेतसा एव भविष्यत्-समये संघटिष्यमाणं कमपि विपत्पातमाकलय्य परिकम्पमानकलेवराः दुःख-दुःखेन समयमतिवाहयन्ति। परिकल्पयन्ति च पर्याकुला बहुविधान् प्रतिकारोपायान् येन मनुष्यजीवने शान्तिसुखं मनोरथपथादतिक्रान्तमेव।

हिन्दी-अनुवादः वे (मनुष्य) न केवल पशुओं से भी अधिक निकृष्ट हैं, (अपितु) तिनकों से भी अधिक तुच्छ हैं। तिनके तो आँधी के साथ अपनी शक्ति के अनुसार देर तक लड़कर, सम्मुख उपस्थित युद्ध में लगे हुए वीर पुरुषों की भाँति शक्तिक्षीण होने पर धरती पर गिर जाते हैं, न कि एक बार भी कायरों की तरह अपना स्थान छोड़कर भागते हैं। मनुष्य तो फिर अपने मन (ज्ञान) से ही भविष्य में होने वाली किसी विपत्ति का विचार कर कँपकँपाते शरीर वाले बड़े कष्टपूर्वक अपना समय बिताते हैं। और अति व्याकुल होकर प्रतिकार के लिए अनेक प्रकार के उपाय करते हैं, जिसके कारण मनुष्य जीवन में शान्ति और सुख उनके मनोरथ के मार्ग से दूर ही रहते हैं।

शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च – वात्यया = आँधी से। अभियुध्य = संघर्ष करके; अभि + √युध् + क्त्वा > ल्यप्। कापुरुषाः = कायर। प्रपलायन्त = भागते हैं; प्र + परा + √अय् + लङ् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन। अग्रतः = आगे; अग्र + तस्। संघटिष्यमाणम् = घटित होने वाले; सम् + √घट + शानच् प्रत्यय। परिकम्पमानः = काँपता हुआ; परि + √कम्प् + कानच् प्रत्यय, प्रथमा, विभक्ति एकवचन। अतिवाहयन्ति = बिताते हैं; अति + √वह + णिच् + लट् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन। पर्याकुलाः = बेचैन; परि + आकुलाः । अतिक्रान्तम् = बाहर जा चुका है; अति + √क्रम् + क्त प्रत्यय, प्रथम पुरुष एकवचन। अप्यसाराः = सारहीन; अपि + असाराः।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद्

5. अथ ते तावत्तृणेभ्योऽप्यसाराः पशुभ्योऽपि निकृष्टतराश्च । तथा च तृणा-दिसष्टेरनन्तरं तथाविधजीवनिर्माणं विश्वविधातुः कीदृशं नाम बुद्धिमत्ताप्रकर्ष प्रकटयति। इत्येव हेतुप्रमाणपुरस्सरं सुचिरं बहुविधं विशदं च व्याख्याय सभापतिरश्वत्थदेव उद्भिज्ज-परिषद् विसर्जयामास।

हिन्दी-अनुवादः – इस प्रकार वे (मनुष्य) तिनकों से भी तुच्छ तथा पशुओं से भी निकृष्ट हैं। वनस्पति आदि की सृष्टि के पश्चात् इस प्रकार के जीवों (मनुष्यों) का निर्माण करना विश्व के सृजनहार विधाता की कैसी बुद्धिमत्ता की अधिकता को प्रकट करता है ?

इस प्रकार कारण और प्रमाण निर्देशपूर्वक बहुत देर तक, बहुत प्रकार से तथा विस्तृत व्याख्या करके सभापति अश्वत्थदेव (पीपल-देव) ने वृक्षों की सभा को विसर्जित किया।
शब्दार्थाः टिप्पण्यश्च प्रकर्षम् = अधिकता। पुरस्सरम् = पूर्वक, आगे; पुरः सरतीति पुरस्सरः तम्। सुचिरम् = देर तक। विशदम् = . विस्तारपूर्वक। व्याख्याय = व्याख्यान देकर; वि + आ + √ख्या + ल्यप्। सभापतिरश्वत्थदेवः = सभापतिः + अश्वत्थदेव।

उद्भिज्ज-परिषद् (वृक्षों की सभा) Summary in Hindi

उद्भिज्ज-परिषद् पाठ परिचय

आधुनिक गद्य लेखकों में पण्डित हृषीकेश भट्टाचार्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। इनका समय 1850-1913 ई० है। ये ओरियण्टल कॉलेज, लाहौर में संस्कृत के प्राध्यापक थे। इन्होंने ‘विद्योदयम्’ नामक संस्कृत पत्रिका के माध्यम से 44 वर्ष तक निबन्ध-लेखन करके संस्कृत में निबन्ध-विधा को जन्म दिया है। श्री भट्टाचार्य द्वारा लिखित संस्कृत निबन्धों का एक संग्रह ‘प्रबन्धमञ्जरी’ के नाम से 1930 ई० में प्रकाशित हुआ। इसमें 11 निबन्ध संगृहीत हैं। इनमें से अधिकांश निबन्ध व्यङ्ग्य-प्रधान शैली में लिखे गए हैं। संस्कृत में व्यङ्ग्य-शैली का प्रादुर्भाव श्री भट्टाचार्य के इन निबन्धों से ही माना जाता है। इनका व्यंग्य अत्यन्त शिष्ट, परिष्कृत और प्रभावोत्पादक है। इनकी भाषा में सरलता, सरसता, मधुरता तथा सुबोधता है। इनकी भाषा में संस्कृत के महान् गद्यकार बाण की शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा सकता है।
प्रस्तुत पाठ ‘उद्भिज्ज-परिषद्’ श्री भट्टाचार्य की इसी प्रबन्ध-मञ्जरी’ से सम्पादित करके लिया गया है। उद्भिज्ज शब्द का अर्थ है-वृक्ष और परिषद् का अर्थ है-सभा। इस प्रकार ‘उदभिज्ज-परिषद्’ शब्द का अर्थ हुआ ‘वृक्षों की सभा।’ इस सभा के सभापति हैं अश्वत्थ-पीपल। सभापति अपने भाषण में मानवों पर बड़े ही व्यंग्यपूर्ण प्रहार करते हैं।

HBSE 12th Class Sanskrit Solutions Shashwati Chapter 11 उद्भिज्ज-परिषद्

उद्भिज्ज-परिषद् पाठस्य सार:

प्रस्तुत पाठ ‘उद्भिज-परिषद्’ श्री हृषीकेष भट्टाचार्य जी द्वारा रचित ‘प्रबन्ध-मञ्जरी’ नामक निबन्ध संग्रह से सम्पादित किया गया है। ‘उद्भिज्ज’ शब्द का अर्थ है-वृक्ष और ‘परिषद्’ का अर्थ है सभा। वृक्षों की इस सभा के सभापति अश्वत्थ ‘पीपल’ हैं। वे अपने भाषण में मनुष्य पर बड़ा ही व्यंग्यपूर्ण प्रहार कर रहे हैं।

सभी प्रकार के वृक्षों की सभा लगी हुई है। सभा के सभापति अश्वत्थ सभी वृक्ष-वनस्पतियों को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि आज हमारे विचार का विषय ‘मानव व्यवहार’ है इस सृष्टि में मानव से लड़कर कोई भी निकृष्ट जीवन नहीं है। सभी प्राणियों में मनुष्य ही सबसे अधिक दूसरों को पीड़ित करने वाला स्वार्थी, मायावी, छली, कपटी और निरन्तर हिंसा में लगा रहने वाला जीव है। सिंह, व्याघ्र आदि हिंसक भावना के लिए प्रसिद्ध पशु हैं। परन्तु इन पशुओं की हिंसा पेट की आग बुझाने के लिए होती है भूख शान्त हो जाने पर पंजे में आए हुए हिरण, खरगोश आदि को भी

ये नहीं मारते। मनुष्य तो अपना मनोरञ्जन करने के लिए पशुपक्षियों की हत्या करता है। जीव हिंसा करना मनुष्य का खेल है। हिंसक पशुओं की हिंसा तो पेट की आग बुझाने तक सीमित होती है। परन्तु मनुष्य की हिंसा असीम है। इसके इस हिंसा व्यवहार को देखकर जड़ कही जाने वाली वृक्ष वनस्पतियों के हृदय भी फट जाते हैं।

मनुष्य केवल अपनी उन्नति के लिए लोभ से आक्रांत तथा स्वार्थी होकर कार्य करता है। यह किसी भी पापाचार से नहीं डरता। मनुष्य पशुओं से ही घटिया नहीं है, अपितु तिनकों से भी तुच्छ है। आँधी-तूफान आने पर मैदान में खड़ा हुआ एक घास का तिनका भी पूरी शक्ति के साथ तूफान का सामना करता है। गर्मी-सर्दी, बरसात को सहता है। मनुष्य इन सबसे बेचैन होकर इनसे बचने के उपाय खोजता रहता है। इसी से सिद्ध होता है कि मनुष्य से बढ़कर कोई डरपोक भी नहीं है।

सभा पति अश्वत्थ अपने भाषण को समाप्त करते हुए निष्कर्ष रूप में कहते हैं कि इसीलिए मैं कहता हूँ कि यह आदमी नाम का जन्तु तिनकों से भी तुच्छ और पशुओं से भी निकृष्ट है। वृक्ष-वनस्पति, पशु-पक्षी आदि की सुन्दर सृष्टि रच लेने के बाद इस विचित्र स्वभाव वाली मानव सृष्टि की रचना करके विधाता ने अपनी किस बुद्धिमत्ता का परिचय दिया है। इस प्रकार कारण और प्रमाणों के साथ बड़े विस्तारपूर्वक व्याख्यान करके सभापति अश्वत्थ देव ने वृक्ष-सभा को विसर्जित किया। वृक्षों की सभा के माध्यम से लेखक ने मनुष्य के हिंसापरक, परपीड़क तथा स्वार्थी व्यवहार पर तीखा व्यंग्य किया

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