HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 114 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

HBSE 12th Class History विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
1940 के प्रस्ताव के जरिए मुस्लिम लीग ने क्या माँग की?
उत्तर:
1937 के चुनावों में असफलता के बाद जिन्ना ने उग्र-साम्प्रदायिक राजनीति को अपना लिया था। 1940 में उन्होंने द्विराष्ट्रों का सिद्धांत मुस्लिम जनता के सामने रखा। इस सिद्धांत की दो मान्यताएँ थीं। पहली मान्यता के अनुसार “हिंदू और मुसलमान बिल्कुल दो समाज थे। धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों अलग-अलग थे. ……..इसलिए ये दोनों कौमें एक राष्ट्र नहीं बन सकती थीं।” दूसरी मान्यता यह थी कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। इसका अर्थ होगा इस्लाम के बहुमूल्य तत्त्व का पूर्ण विनाश और मुसलमानों के लिए स्थायी दासता। धीरे-धीरे पाकिस्तान की स्थापना की माँग ठोस रूप ले रही थी। 23 मार्च, 1940 को लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव ही ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है।

इसमें कहा गया कि भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में जरूरत के हिसाब से इलाकों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन हिस्सों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, उन्हें इकट्ठा करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए जिनमें शामिल इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी।

प्रश्न 2.
कुछ लोगों को ऐसा क्यों लगता था कि बँटवारा बहुत अचानक हुआ?
उत्तर:
कुछ लोगों का विचार है कि भारत का विभाजन एक बहुत ही अचानक लिया गया निर्णय है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि 1940 में लीग ने ‘लाहौर प्रस्ताव’ या ‘पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया था। इसमें अस्पष्ट शब्दों में एक मुस्लिम बहुल इलाके में स्वायत्त राज्य की स्थापना की माँग रखी गई थी। इस प्रस्ताव के रखने के बाद अगले सात वर्षों में ही विभाजन हो गया। यहाँ तक कि किसी को मालूम नहीं था कि पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ क्या होगा, इससे भविष्य में लोगों की जिंदगी किस तरह तय होगी। यहाँ तक कि 1947 में घर-बार छोड़कर गए लोगों को भी लगता था कि वे शांति स्थापित होने पर वापस अपने घरों में लौट सकेंगे। नेताओं ने भी लोगों के भविष्य के बारे में न ही सोचा और न ही जनसंख्या की पारस्परिक अदला-बदली पर कोई विचार किया।

यहाँ तक कि स्वयं लीग ने भी एक संप्रभु राज्य की माँग ज्यादा स्पष्ट और जोरदार ढंग से नहीं उठाई थी। ऐसा लगता है कि माँग सौदेबाजी में एक पैंतरे के रूप में उठाई गई थी ताकि मुस्लिमों के लिए अधिक रियायतें ली जा सकें। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। इसकी समाप्ति के बाद सरकार को भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण की बातचीत करनी पड़ी, जिसमें अन्ततः भारत का विभाजन अचानक स्वीकार करना पड़ा। इससे लगता है कि भारत का विभाजन अचानक हुई घटना है।

प्रश्न 3.
आम लोग विभाजन को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
यह भी अनुमान लगाया जाता है कि विभाजन के कारण लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 के बीच सीमा पार करने पर विवश हुए। विश्व इतिहास में ऐसा कष्टदायक विस्थापन नहीं मिलता। विस्थापन का अर्थ था लोगों का अपने घरों से उजड़ जाना। पलक झपकते ही इन लोगों की संपत्ति, घर, दुकानें, खेत, रोजी-रोटी के साधन उनके हाथों से निकल गए। वे अपनी जड़ों से उखाड़ दिए गए। उनसे उनकी बचपन की यादें छीन ली गईं। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए। अपनी स्थानीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति से वंचित होकर शरणार्थी बने लोगों को तिनका-तिनका जोड़कर नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ा।

यह मात्र सम्पत्ति और क्षेत्र का विभाजन नहीं था, बल्कि एक महाध्वंस था। 1947 में जो लोग सीमा पार से जिंदा बचकर आ रहे थे, वे विभाजन के फैसले को ‘सरकारी नज़रिए’ से नहीं देख रहे थे। उनके अनुभव भयानक थे और वे उसे ‘मार्शल लॉ’ ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे। वस्तुतः जनहिंसा, आगजनी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार को देखते हए अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और विद्वानों ने इसे ‘महाध्वंस’ (होलोकॉस्ट) कहा है। 1947 का हादसा इतना जघन्य था कि ‘विभाजन’ या ‘बँटवारा’ या, ‘तकसीम’ कह देने मात्र से इसके सारे पहलू प्रकट नहीं होते। मानवीय पीड़ा और दर्द का अहसास नहीं होता। महाध्वंस से सामूहिक नरसंहार की भयानकता और अन्य प्रभावों की भीषणता को कुछ हद तक समझा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि आम लोग विभाजन को एक ऐसी घटना समझते थे जिसमें उनका सब कुछ नष्ट हो गया था तथा उनके परिजन मर गए थे या बिछुड़ गए थे।

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प्रश्न 4.
विभाजन के खिलाफ महात्मा गाँधी की दलील क्या थी?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने विभाजन का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने विभाजन के खिलाफ यहाँ तक कह दिया था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। गाँधी जी को विश्वास था कि देश में सांप्रदायिक नफरत शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी तथा पुनः

आपसी भाईचारा स्थापित हो जाएगा। लोग घृणा और हिंसा का मार्ग छोड़ देंगे तथा सभी आपस में मिलकर अपनी समस्याओं का हल खोज लेंगे। विभाजन के अवसर पर भड़की हिंसा को शांत करने के लिए वे 77 वर्ष की आयु में भी दंगाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचे। उन्होंने सभी स्थानों पर हिंदुओं और मुसलमानों को शांति बनाए रखने और परस्पर स्नेह और एक-दूसरे की रक्षा करने की बात कही। उनका मानना था कि दोनों समुदाय सैकड़ों सालों से एक-साथ रहते आए हैं। 7 सितंबर, 1946 को उन्होंने प्रार्थना सभा में कहा था, “मैं फिर वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिंदू और मुसलमान आपसी सलाह के बिना कोई काम नहीं करेंगे। मैं दिन-रात इसी आग में जले जा रहा हूँ कि उस दिन को जल्दी-से-जल्दी साकार करने के लिए क्या करूँ। लीग से मेरी गुजारिश है कि वे किसी भी भारतीय को अपना शत्रु न मानें……….। हिंदू और मुसलमान, दोनों एक ही मिट्टी से उपजे हैं। उनका खून एक है, वे एक जैसा भोजन करते हैं, एक ही पानी पीते हैं और एक ही जबान बोलते हैं।

26 सितंबर, 1946 को गाँधीजी ने इसी प्रकार की बात ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक में दोहराई। उन्होंने लिखा, “लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की जो माँग उठायी है, वह पूरी तरह गैर-इस्लामिक है और मुझे इसको पापपूर्ण कृत्य कहने में कोई संकोच नहीं है। इस्लाम मानवता की एकता और भाईचारे का समर्थक है, न कि मानव परिवार की एकजुटता को तोड़ने का। जो तत्त्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं, वे भारत और इस्लाम दोनों के शत्रु हैं। भले ही वे मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े कर दें, किंतु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते, जिसे मैं गलत मानता हूँ।”

प्रश्न 5.
विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ क्यों माना जाता है?
उत्तर:
विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में ऐतिहासिक मोड़ की संज्ञा दी जाती है। इसके कारण देश दो सम्प्रभु राज्यों (भारत और पाकिस्तान) में बँट गया। विभाजन ने तात्कालिक रूप से करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। साथ ही विभाजन की स्मृतियों और कहानियों ने रूढ़छवियों (Stereotypes) का निर्माण किया जो आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को प्रभावित कर रही हैं। यहाँ तक कि भारत में आतंकवाद जैसी समस्या की जड़ें भी कुछ हद तक विभाजन के परिणामों से जुड़ी हैं।

1. जनसंहार और विस्थापन (Massacre and Displace ment)-विभाजन सांप्रदायिक हिंसा, जनसंहार, आगजनी, लूटपाट, अराजकता, अपहरण, बलात्कार आदि का पर्याय बन गया था। ‘दंगाई भीड़ों’ ने दूसरे समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर मारा। गाँव के गाँव जला दिए। ट्रेनों में सफर कर रहे लोगों पर हिंसक
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हमले हुए। ट्रेनें मौत का पिंजरा बन गईं। यद्यपि हिंसा में पाकिस्तान और हिंदुस्तान में मारे गए लोगों की ठीक-ठीक संख्या बता पाना असंभव है, तथापि अनुमान लगाया जाता है कि 2 लाख से 2.5 लाख गैर-मुस्लिम तथा इतने ही मुस्लिम विभाजन की हिंसा में मारे गए।

यह भी अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 के बीच सीमा पार करने पर विवश हुए। विश्व इतिहास में ऐसा कष्टदायक विस्थापन नहीं मिलता। विस्थापन का अर्थ था लोगों का अपने घरों से उजड़ जाना। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए। अपनी स्थानीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति से वंचित होकर शरणार्थी बने लोगों को तिनका-तिनका जोड़कर नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ा।

2. महाध्वंस (Holocaust)-यह मात्र सम्पत्ति और क्षेत्र का विभाजन नहीं था, बल्कि एक महाध्वंस था। 1947 में जो लोग सीमा पार से जिंदा बचकर आ रहे थे, वे विभाजन के फैसले को ‘सरकारी नज़रिए’ से नहीं देख रहे थे। उनके अनुभव भयानक थे और वे उसे ‘मार्शल लॉ’, ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे। वस्तुतः जनहिंसा, आगजनी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार को देखते हुए अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और विद्वानों ने इसे ‘महाध्वंस’ कहा है।

3. रूढ़छवियों का निर्माण (Formation of Stereotypes)-बँटवारे की वजह से दोनों देशों में रूढ़छवियों का निर्माण हुआ। इन रूढछवियों ने लोगों की मानसिकता को गहरा प्रभावित किया है। इन छवियों का दुरुपयोग सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा तक भी किया जा रहा है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
ब्रिटिश भारत का बँटवारा क्यों किया गया?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत का बँटवारा निम्नलिखित कारणों से किया गया

1. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति (British Policy of Divide and Rule)-अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को भारत में सांप्रदायिकता के उदय व विकास और अन्ततः विभाजन के लिए जिम्मेदार माना गया है। अंग्रेज़ों ने हिंदुओं और मुसलमानों में घृणा पैदा करने को राजनीतिक शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। अंग्रेज़ों ने कांग्रेस को हिंदू आंदोलन बताया तथा सर सैयद अहमद के साथ मिलकर मुसलमानों को कांग्रेस के आंदोलन से दूर रखने का प्रयास किया। साथ ही उच्चवर्गीय मुसलमानों को अपना संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। 1906 में मुस्लिम लीग का निर्माण करवाया। इस नीति पर चलते हुए उन्होंने आगे बहुत से और कदम उठाए जो विभाजन का कारण बने।

2. सांप्रदायिक संगठनों की स्थापना (Formation of Communal Organisations)-20वीं सदी के प्रथम दशक के मध्य से साम्प्रदायिक संगठन बनने लगे। सरकार ने उन्हें प्रोत्साहन दिया। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। लीग का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना तथा मुसलमानों में अंग्रेज़ सरकार के प्रति निष्ठा पैदा करना था। प्रारंभ के वर्षों में लीग ने पृथक् निर्वाचन प्रणाली की मांग की तथा बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

इसी समय 1909 ई० में लाल चंद और बी० एन मुखर्जी के प्रयासों से पंजाब हिंदू महासभा की स्थापना हुई। इनका मूल मंत्र था कि ‘हिंदू पहले हैं और भारतीय बाद में।’ इन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह हिंदुओं के हितों को नजरअंदाज कर रही है और मुसलमानों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपना रही है। 1915 में अखिल भारतीय हिंदू सभा की स्थापना हुई जो हिंदू सांप्रदायिकता को संगठित रूप देने की दिशा में अगला कदम था।

3. सांप्रदायिक तनाव व कलह (Communal Tensions and Conflicts)-1922 में असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद सांप्रदायिक तनावों में वृद्धि हुई। इस समय में मुसलमानों की नाराजगी के प्रमुख कारण हिंदुओं द्वारा त्योहार (होली) पर ‘मस्जिद के सामने संगीत बजाना’, ‘गो रक्षा आंदोलन’ और आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन होते थे। हिंदू मुसलमानों के तबलीग (प्रचार) और तंजीम (संगठन) जैसे कार्यक्रमों के विस्तार से उत्तेजित होते थे। ये सांप्रदायिक तनाव इन समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद करने का अवसर प्रदान करते थे जिससे आसानी से दंगे भड़क उठते थे।

4. ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव (‘Pakistan’ Resolution)-1937 के बाद जिन्ना की राजनीति पूरी तरह से उग्र-सांप्रदायिकता की राजनीति थी। उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। 1940 में जिन्ना ने अपने ‘द्विराष्ट्रों के सिद्धांत’ को मुस्लिम जनता के समक्ष रखा। इस सिद्धांत की दो मान्यताएँ थीं। पहली मान्यता के अनुसार “हिंदू और मुसलमान बिल्कुल दो समाज थे। धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों अलग-अलग थे………इसलिए ये दोनों कौमें एक राष्ट्र नहीं बन सकती थीं।” दूसरी मान्यता यह थी कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। धीरे-धीरे पाकिस्तान की स्थापना की माँग ठोस रूप ले रही थी। 23 मार्च, 1940 को लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव पेश किया।

5. वेवल योजना की विफलता (Failure of Wavell Plan)-1945 में वेवल योजना के तहत शिमला कांफ्रेंस हुई जिसमें वेवल ने मुख्य योजना ‘नयी कार्यकारी परिषद्’ के निर्माण को लेकर रखी। नयी कार्यकारिणी में वायसराय और मुख्य सेनापति को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होने थे तथा सभी समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाना था। हिंदू-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बराबर होनी थी। परंतु नई परिषद् के निर्माण को लेकर भारतीय दलों में कोई सहमारे नहीं बन पाई। कांग्रेस ने लीग की असहमति को योजना की असफलता का मुख्य कारण बताया। इससे कांग्रेस व लीग में कटुता बढ़ी तथा योजना की असफलता से देश में निराशा फैली। इस घटना ने देश को विभाजन की ओर धकेला।

6. कैबिनेट मिशन की असफलता (Failure of the Cabinet Mission)-15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत को जल्दी ही स्वतंत्रता देने की बात कही। अतः मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसका लक्ष्य भारत में एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तथा भावी संविधान के लिए रास्ता तैयार करना था। इस समय सबसे कठिन समस्या सांप्रदायिक समस्या बन गई थी। मुस्लिम लीग ने इसके लिए एकमात्र हल पाकिस्तान की माँग को बताया था, परंतु कैबिनेट मिशन ने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार कर एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। लीग और कांग्रेस में इस पर प्रारंभ में सहमति बनी, परंतु अन्ततः दोनों ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया। कैबिनेट मिशन योजना की अस्वीकृति दुर्भाग्यपूर्ण थी। यह भारत को एक बनाए रखने का अंतिम प्रयास था। इसकी अस्वीकृति और असफलता के बाद विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता विभाजन को एक त्रासद परंतु अवश्यम्भावी परिणाम मान चुके थे। केवल महात्मा गाँधी और खान अब्दुल गफ्फार ख़ान ही अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे।

7. सीधी कार्रवाई तथा साम्प्रदायिक दंगे (Direct Action and Communal Riots)-कैबिनेट योजना की असफलता के बाद लीग ने 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ घोषित किया तथा ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ का नारा दिया। इसके साथ ही कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए जो 20 अगस्त तक चलते रहे। दंगे अन्य स्थानों पर भी भड़कने लग गए। पूर्वी बंगाल में नोआखली जिले में 10 अक्तूबर को दंगे शुरू हो गए। इन दंगों का असर अन्य स्थानों पर भी हुआ। पंजाब के अनेक नगरों और गाँवों में भी खतरनाक दंगे भड़क गए। साथ ही हजारों लोग विस्थापित हो गए। दंगों ने सारे देश को दहला दिया। कानून और व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई तथा देश में गृह-युद्ध की स्थिति पैदा होती जा रही थी।
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8. माऊन्टबेटेन योजना तथा ब्रिटिश भारत का बँटवारा (Mountbatten plan and Division of British India)-भारत में सांप्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकल पा रहा था। देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। उधर 20 फरवरी, 1947 को एटली ने भारत की सत्ता 30 जून, 1948 तक भारतीयों को सौंपने की घोषणा की। साथ ही वेवल के स्थान पर माऊन्टबेटेन को भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा। माऊन्टबेटेन ने 3 जून, 1947 को भारत के विभाजन की योजना की घोषणा की। इस योजना के अनुसार भारत और पाकिस्तान नाम के दो राज्यों को सत्ता का हस्तांतरण किया गया।

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प्रश्न 7.
बँटवारे के समय औरतों के क्या अनुभव रहे?
उत्तर:
विभाजन के समय सबसे अधिक पीड़ा महिलाओं को उठानी पड़ी। ‘दूसरे समुदाय’ के सम्मान को रौंदने एवं ठेस पहुँचाने के लिए महिलाओं को ही ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाया गया। उनके साथ बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, उन्हें बार-बार बेचा-खरीदा गया। उनसे जबरदस्ती विवाह किया गया और उन्हें ‘अजनबी’ व्यक्तियों के साथ रहने को मजबूर होना पड़ा। महिलाएँ मूक एवं निरीह प्राणियों की तरह इन अत्याचारों से गुजरती रहीं। उन्हें गहरे सदमे झेलने पड़े।

इन सदमों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने बदली हुई स्थितियों में नए पारिवारिक बंधन स्थापित किए। किंतु जब भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने गुमशुदा औरतों की ‘बरामदगी’ की मुहिम चलाई तो महिलाओं को पुनः संकट का सामना करना पड़ा। इस बरामदगी की प्रक्रिया में मानवीय संबंधों की जटिलता के विषय पर किसी प्रकार की संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई। दोनों सरकारों के बीच समझौता हुआ था कि “जबरन धर्म परिवर्तन तथा बलपूर्वक विवाहों को मान्यता नहीं दी जाएगी। सरकारों द्वारा अपहरण की गई औरतों को ढूँढ़ने तथा बरामद करने का हर प्रयत्न किया जाएगा तथा उन्हें उनके परिवारों के सुपुर्द किया जाएगा।”

इस बरामदगी की पूरी प्रक्रिया में इन ‘प्रभावित औरतों’ से उनकी किसी प्रकार की राय नहीं ली गई। उन्हें अपनी जिंदगी के संबंध में फैसला लेने के अधिकार से वंचित किया गया। सरकार यह मानकर चल रही थी कि इन महिलाओं को बलपूर्वक बैठा लिया गया था। इसलिए उन्हें उनके नए परिवारों से छीनकर पुराने परिवारों के पास अथवा पुराने स्थान पर भेज दिया गया। एक अनुमान के अनुसार महिलाओं की बरामदगी के अभियान में कुल मिलाकर लगभग 30,000 औरतों को बरामद किया गया। इनमें से 8000 हिंदू व सिक्ख औरतों को पाकिस्तान से तथा 22,000 मुस्लिम औरतों को भारत से बरामद किया गया। यह अभियान 1954 तक जारी रहा।

  • ‘इज्जत’ की रक्षा के लिए औरतों की हत्या-बँटवारे के दौरान ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जब परिवार के पुरुषों ने ही परिवार की ‘इज्जत’ की रक्षा के नाम पर अपने परिवार की स्त्री सदस्यों को स्वयं ही मार दिया या आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। इन पुरुषों को भय होता था कि शत्रु उनकी औरतों-माँ, बहन, बेटी को नापाक कर सकता था। इसलिए परिवार की मान-मर्यादा को बचाने के लिए खुद ही उनको मार डाला। उर्वशी बुटालिया ने अपनी पुस्तक दि अदर साइड ऑफ साइलेंस (The Other Side of Silence) में रावलपिंडी जिले के थुआ खालसा नामक गाँव की एक इसी प्रकार की दर्दनाक घटना का विवरण दिया है। वे बताती हैं कि बँटवारे के समय सिक्खों के इस गाँव की 90 औरतों ने ‘दुश्मनों’ के हाथों में पड़ने की बजाय ‘अपनी इच्छा से’ एक कुएँ में कूदकर अपनी जान दे दी थी। इस गाँव के लोग इसे आत्महत्या नहीं शहादत मानते हैं और आज भी दिल्ली के एक गुरुद्वारे में हर वर्ष 13 मार्च को उनकी शहादत की याद में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तथा इस घटना को मर्दो, औरतों व बच्चों को विस्तार से सुनाया जाता है। अंतः स्पष्ट है कि बँटवारे के समय औरतों के अनुभव पुरुषों से भिन्न थे। उन्हें असहनीय पीड़ा और संताप से गुजरना पड़ा।

प्रश्न 8.
बँटवारे के सवाल पर कांग्रेस की सोच कैसे बदली?
उत्तर:
कांग्रेस ने 1940 के दशक के प्रारंभ से ही पाकिस्तान के निर्माण या ब्रिटिश भारत के बँटवारे का विरोध किया था। परंतु सांप्रदायिक समस्या का हल न निकलने, सांप्रदायिक दंगे भड़कने तथा लीग की हठधर्मिता के चलते उसकी सोच में बदलाव आने लगा था। अंग्रेजों द्वारा 1946 के बाद भारत को जल्दी छोड़ने के फैसले से भी कांग्रेस के विचारों में बदलाव आया। कांग्रेस की सोच में बदलाव के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. कांग्रेस मंत्रिमण्डल व लीग से मतभेद (Conflicts in Congress Ministries and League)-1937 के चुनावों में सफलता के बाद कांग्रेस ने प्रांतों में सरकार बनाई परन्तु कुछ प्रांतों (विशेषतः यू०पी० व बिहार) में स्थिति यह थी कि कांग्रेस सत्ता पक्ष में तथा मुस्लिम लीग के सदस्य विपक्ष में थे। ये लीग के सदस्य प्रांतों में कांग्रेसी शासन के पूरे 27 महीनों के काल में कांग्रेस के खिलाफ जोरदार प्रचार करते रहे। आरोप लगाया गया कि काँग्रेसी शासन में मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। फलतः लीग व कांग्रेस में दूरियाँ भी बढ़ीं। यहाँ तक कि जब 22 अक्तूबर, 1939 को कांग्रेस सरकारों ने त्यागपत्र दिया तो लीग ने मुक्ति दिवस (Day of Deliverance) मनाया।

2. ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव (‘Pakistan’ Resolution)-1937 के बाद जिन्ना की राजनीति पूरी तरह से उग्र-सांप्रदायिकता की राजनीति थी। उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। उन्होंने दुष्प्रचार किया कि कांग्रेस का आला कमान दूसरे सभी समुदायों और संस्कृतियों को नष्ट करने तथा हिंदू राज्य कायम करने के लिए पूरी तरह दृढ़ प्रतिज्ञ है। उन्होंने मुस्लिम जनता को भयभीत करना शुरू किया कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम और इस्लाम दोनों के ही अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा। 1940 में जिन्ना ने अपने ‘द्विराष्ट्रों के सिद्धांत’ को मुस्लिम जनता के समक्ष रखा। लीग का कहना था कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। इसका अर्थ होगा इस्लाम के बहुमूल्य तत्त्व का पूर्ण विनाश और मुसलमानों के लिए स्थायी दासता। 1940 में लीग ने लाहौर में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया। इससे स्थितियों में बदलाव आया।

3. वेवल योजना की विफलता (Failure of Wavell Plan)-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वायसराय वेवल ने अपनी कार्यकारिणी में भारतीयों को शामिल करने के लिए शिमला में सम्मेलन बुलाया। परंतु लीग की हठधर्मिता के कारण यह योजना असफल हो गई। लीग चाहती थी कि परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य उसके द्वारा चुने जाएँ। इससे कांग्रेस व लीग में कटुता बढ़ी तथा निराशा फैली।

4. कैबिनेट मिशन की असफलता (Failure of the Cabinet Mission)-15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत को जल्दी ही स्वतंत्रता देने की बात कही। अतः मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसका लक्ष्य भारत में एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तथा भावी संविधान के लिए रास्ता तैयार करना था। इस समय सबसे कठिन समस्या सांप्रदायिक समस्या बन गई थी। मुस्लिम लीग ने इसके लिए एकमात्र हल पाकिस्तान की माँग को बताया था, परंतु कैबिनेट मिशन ने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार कर एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। इस योजना को कांग्रेस तथा लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। यह विभाजन का एक संभावित विकल्प था। परन्तु बाद में मतभेद उभर गए तथा लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया। कैबिनेट मिशन योजना की अस्वीकृति दुर्भाग्यपूर्ण थी। इसकी अस्वीकृति और असफलता के बाद विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता विभाजन को एक त्रासद परंतु अवश्यम्भावी परिणाम मान चुके थे।

5. सीधी कार्रवाई तथा साम्प्रदायिक दंगे (Direct Action and Communal Riots)-कैबिनेट योजना की असफलता के बाद लीग ने 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ घोषित किया तथा ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ का नारा दिया। इसके साथ ही कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए जो 20 अगस्त तक चलते रहे। साथ ही हजारों लोग विस्थापित हो गए। दंगों ने सारे देश को दहला दिया। कानून और व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई तथा देश में गृह-युद्ध की स्थिति पैदा होती जा रही थी। इससे कांग्रेस की सोच में पूरी तरह बदलाव आ गया।

6. माऊन्टबेटेन योजना तथा पाकिस्तान का निर्माण (Mountbatten Plan and the Creation of Pakistan)-भारत में सांप्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकल पा रहा था। देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। अन्तरिम सरकार भी लीग की रोड़ा अटकाने की नीति के कारण काम नहीं कर पा रही थी। उधर 20 फरवरी, 1947 को एटली ने भारत की सत्ता 30 जून, 1948 तक भारतीयों को सौंपने की घोषणा की। साथ ही वेवल के स्थान पर माऊन्टबेटेन को भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा। माऊन्टबेटेन ने 3 जून, 1947 को भारत के विभाजन की योजना की घोषणा की। इस योजना के अनुसार भारत और पाकिस्तान नाम के दो राज्यों को सत्ता का हस्तांतरण करने का फैसला हुआ। कांग्रेस अब तक लीग की नीतियों के कारण बँटवारे के पक्ष में हो चुकी थी। अतः उसने बँटवारे को स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 9.
मौखिक इतिहास के फायदे व नकसानों की पड़ताल कीजिए। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन के बारे में हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिलता है?
उत्तर:
विभाजन को समझने के लिए हम मौखिक इतिहास का प्रयोग करते हैं। ये स्रोत हमें विभाजन के दौर में सामान्य लोगों के कष्टों और संताप को समझने में मदद करते हैं। लाखों लोगों ने विभाजन को पीडा और चनौती के दौर के रूप में देखा। उनके लिए यह मात्र सवैधानिक बँटवारा या मुस्लिम लीग और कांग्रेस की दलगत राजनीति का मामला नहीं था। उनके लिए यह एक ऐसी घटना थी जिसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया; बुरी तरह से झकझोर डाला था। हमें विभाजन को मात्र राजनीतिक घटना के रूप में ही नहीं समझना चाहिए वरन् इस रूप में भी देखना चाहिए कि जिन लोगों ने इस त्रासदी को भुगता वे इसके क्या अर्थ लगा रहे थे। इस घटना की उनकी स्मृतियाँ और अनुभव किस प्रकार के थे। उन स्मृतियों और अनुभवों की तह तक पहुँचकर ही हम विभाजन जैसी घटना के मानवीय आयामों (Human dimensions) को समझ सकते हैं और इसमें मौखिक इतिहास बहुत कारगर है।

1. मौखिक इतिहास के फायदे-मौखिक स्रोत के रूप में व्यक्तिगत स्मृतियों का एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि इनसे हमें लोगों के अनुभवों और स्मतियों को गहराई से समझने में सहायता मिलती है। इन स्मतियों के माध्यम से इतिहासकारों को विभाजन जैसी दर्दनाक घटना के दौरान लोगों को किन-किन शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं को झेलना पड़ा, का बहुरंगी एवं सजीव वृत्तांत लिखने में सहायता मिलती है। यहाँ यह उल्लेख करना भी उपयुक्त है कि सरकारी दस्तावेज़ों में इस तरह की जानकारी नहीं मिलती। ये दस्तावेज नीतिगत और दलगत या विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित होते हैं। इन फाइलों व रिपोर्टों में बँटवारे से पहले की वार्ताओं, समझौतों या दंगों और विस्थापन के आँकड़ों, शरणार्थियों के पुनर्वास इत्यादि के बारे में काफी जानकारी मिलती है। परंतु इनसे देश के विभाजन से प्रभावित होने वाले लोगों के रोजाना के हालात, उनकी अंतीड़ा और कड़वे अनुभवों के बारे में विशेष पता नहीं लगता। यह तो मौखिक स्रोतों से ही जाना जा सकता है।

2. मौखिक इतिहास के नुकसान-बहुत-से इतिहासकार मौखिक इतिहास के बारे में शंकालु हैं। वे इसे यह कहकर खारिज़ करते हैं कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती। इन जानकारियों से जो क्रम (Choronology) उभरता है. : होता। मौखिक इतिहास के खिलाफ यह भी तर्क दिया जाता है कि निजी अनुभवों की विशिष्टता के सहारे सामान्य नतीजों पर पहुँचना कठिन होता है। मौखिक वृत्तांतों के छोटे-छोटे अनुभवों से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। कई इतिहासकारों को लगता है कि मौखिक वृत्तांत सतही मुद्दों (Surfacial Issues) से संबंध रखते हैं और यादों में बने रहे छोटे-छोटे अनुभव इतिहास की बड़ी प्रक्रियाओं (Larger Processes) का कारण ढूँढ़ने में असफल होते हैं।

3. विभाजन के बारे में हमारी समझ का विस्तार-मौखिक इतिहास से विभाजन के बारे में हमारी समझ का विस्तार संभव है। मौखिक स्रोतों से इतिहासकारों को जन इतिहास को उजागर करने में मदद मिलती है। वे गरीबों और कमजोरों (जन सामान्य, स्त्रियों, बच्चों, दलितों आदि) के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से बाहर निकाल पाते हैं। ऐसा करके वे इतिहास जैसे विषय की सीमाओं को और फैलाने का अवसर प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए मौखिक स्रोत से हमने अब्दल लतीफ की भावनाएँ, थुआ गाँव की औरतों की कहानी व सद्भावनापूर्ण प्रयासों की कहानियों को जाना। डॉ० खुशदेव सिंह के प्रति कराची में गए मुसलमान अप्रवासियों की मनोदशा को समझ पाए। शरणार्थियों के द्वारा किए गए संघर्ष को भी मौखिक स्रोतों से समझा जा सकता है। इस प्रकार इस स्रोत से इतिहास में समाज के ऊपर के लोगों से आगे जाकर सामान्य लोगों की पड़ताल करने में सफलता मिलती है। सामान्यतः आम लोगों के वजूद को नज़र-अंदाज कर दिया जाता है या इतिहास में चलते-चलते ज़िक्र कर दिया जाता है। संक्षेप में, ये स्रोत हमें जन इतिहास को समझने में मदद प्रदान करते हैं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
दक्षिणी एशिया के नक्शे पर कैबिनेट मिशन प्रस्तावों में उल्लिखित भाग क, ख और ग को चिह्नित कीजिए। यह नक्शा मौजूदा दक्षिण एशिया के राजनैतिक नक्शे से किस तरह अलग है?
उत्तर:
संकेत-1947 से पूर्व के अविभाजित भारत के मानचित्र पर कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों को दर्शाइए।
क समूह-संयुक्त प्रांत, मध्यप्रांत, बंबई, मद्रास, बिहार व उड़ीसा (हिंदू बहुल प्रांत)।
ख समूह-पंजाब, सिंध व उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांत)।
ग समूह-असम व बंगाल (पूर्व के मुस्लिम बहुल प्रांत)!

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
यूगोस्लाविया के विभाजन को जन्म देने वाली नृजातीय हिंसा के बारे में पता लगाइए। उसमें आप जिन नतीजों पर पहुँचते हैं उनकी तुलना इस अध्याय में भारत विभाजन के बारे में बताई गई बातों से कीजिए।
उत्तर:
प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूगोस्लाविया राज्य का उदय हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यहाँ कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। इसका 1990 में अंत हुआ। 1992 तक आते-आते यह देश पाँच स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। इस क्षेत्र में नृजातीय हिंसा भी हुई। पाँच राज्य थे-यूगोस्लाविया (सर्विया व मॉनटेनेग्रो को मिलाकर), क्रोशिया, मैकेडोनिया, स्लोवेनिया व बोस्निया-हर्जेगोविना। परंतु बोस्निया-हर्जेगोविना में हिंसा समाप्त नहीं हुई। यहाँ के तीन समुदायों (सर्व, क्रोर व मुसलमान) में आपस में लड़ाई चलती रही। इससे वहाँ की जनता को भारी कष्ट झेलने पड़े हैं। भारत विभाजन में हिंदू, सिक्ख और मुसलमान समुदाय आपस में लड़े। फलतः लाखों लोग मारे गए व करोड़ के करीब लोग उजड़ गए। (भारत विभाजन की हिंसा व विस्थापन पर विस्तार से लिखें।)

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 12.
पता लगाइए कि क्या आपके शहर, कस्बे, गाँव या आस-पास के किसी स्थान पर दूर से कोई समुदाय आकर बसा है (हो सकता है आपके इलाके में बँटवारे के समय आए लोग भी रहते हों)। ऐसे समुदायों के लोगों से बात कीजिए और अपने निष्कर्षों को एक रिपोर्ट में संकलित कीजिए। लोगों से पूछिए कि वे कहाँ से आए हैं, उन्हें अपनी जगह क्यों छोड़नी पड़ी और उससे पहले व बाद में उनके कैसे अनुभव रहे। यह भी पता लगाइए कि उनके आने से क्या बदलाव पैदा हुए।
उत्तर:
संकेत-आपके शहर/कस्बे/गाँव में पाकिस्तान से आकर बसे पंजाबी समुदाय या सिक्ख समुदाय के लोगों का पता लगाइए और उनसे एक प्रश्नावली बनाकर उसके उत्तर जानिए। प्रश्नावली प्रश्न में दिए गए सवालों को शामिल कीजिए। अन्य प्रश्न भी डालें; जैसे वे यहाँ कब आए, पहले कहाँ आए, क्या व्यवसाय शुरू किया, अब आर्थिक स्थिति क्या है? आदि।

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