HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

HBSE 12th Class History  किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
कृषि इतिहास लिखने के लिए आईन-ए-अकबरी को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन-सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी मुगलकालीन कृषि इतिहास लेखन का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह अकबर के काल की कृषि व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालती है। इससे हमें मुगलकाल की फसलों, सिंचाई तकनीक, कृषकों तथा ज़मींदारों के आपसी संबंधों की जानकारी मिलती है। इतना होते हुए भी इस पुस्तक की कुछ सीमा रूपी समस्याएँ हैं। इसका वर्णन इस प्रकार है

(i) आइन-ए-अकबरी पूरी तरह से दरबारी संरक्षण में लिखी गई है। लेखक कहीं भी अकबर के विरुद्ध कोई शब्द प्रयोग नहीं कर पाया। उसने विभिन्न विद्रोहों के कारणों व दमन को भी एक पक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ii) आइन-ए-अकबरी में विभिन्न स्थानों पर जोड़ में गलतियाँ पाई गई हैं। यहाँ यह माना जाता है कि गलतियाँ अबल-फज्ल के सहयोगियों की गलती से हुई होंगी या फिर नकल उतारने वालों की गलती से।

(iii) आइन में आंकड़े राज्य के सन्दर्भ में तो सहायक हैं, जिसमें दर इत्यादि का वर्णन सही है। परन्तु मजदूरों की मजदूरी, जन-सामान्य की कर सम्बन्धी समस्या का वर्णन इसमें नहीं है। इसी तरह कई क्षेत्रों के सन्दर्भ में कीमतें भी विरोधाभासपूर्ण बताई गई हैं।

(iv) अबुल-फज़ल ने आइन का लेखन आगरा में किया; इसलिए आगरा व इसके आस-पास का वर्णन बहुत अधिक विस्तार के साथ किया गया है। इस बारे में उसकी सूचनाएँ पूरी तरह सही भी हैं। अन्य स्थानों के आंकड़ों एवं सूचनाओं में कमियाँ भी हैं तथा ये सीमित भी हैं।

इतिहासकार इन सीमा रूपी समस्याओं का निपटारा, अन्य स्रोतों का प्रयोग तुलना रूप में या जानकारी प्राप्त करके करता है। आंकड़ों से संबंधित जानकारी अबुल फज़्ल के ही वर्णन के अन्य स्थानों में मिल जाती है। जोड़ इत्यादि की गलतियों का निदान पुनः जोड़ करके इतिहासकार इसे स्रोत के रूप में प्रयोग कर लेता है।

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प्रश्न 2.
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार, कपास, बाजरा, तिलहन, ग्वार इत्यादि थीं। सामान्यतः कृषक खाद्यान्नों का ही उत्पादन करते थे। ये फसलें भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उगाई जाती थीं। चावल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता था जहाँ 40 इंच या इससे अधिक वार्षिक वर्षा होती थी। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ, ज्वार, बाजरा इत्यादि बोए जाते थे, जबकि गेहूँ लगभग भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बोई जाती थी। फसलों के उत्पादन में सर्वाधिक महत्त्व मानसून पवनों का था। जहाँ वे अधिक सक्रिय होती थीं वहाँ गेहूँ व चावल का फसल चक्र रहता था। कम सक्रिय क्षेत्रों में कम वर्षा या कम पानी वाली फसलें उत्पादित होती थीं। इस काल में गन्ना, कपास व नील इत्यादि फसलें भी उगाई जाती थीं। इन फसलों को जिन्स-ए-कामिल कहा जाता था। मुगलकाल में रेशम, तम्बाकू, मक्का, जई, पटसन इत्यादि भी उत्पादित होने लगा था।

इन सभी तरह के फसलों के उत्पादन के बाद भी यह कहा जा सकता है कि इस समय कृषि उत्पादन महज गुजारे के लिए था। ऐसा इसलिए क्योंकि खाद्यान्न फसलों के अतिरिक्त फसलें सीमित क्षेत्र में उत्पादित होती थीं। कृषक समाज फसलें उत्पादित करते समय परिवार के भरण-पोषण का ध्यान भी रखता था। सरकार के पास राजस्व के रूप में फसल ही आती थी। नकदी मुद्रा नहीं के बराबर ही थी। सरकार तथा ग्रामीण समुदाय के पास अनाज के भंडार न होना भी इस बात की पुष्टि करता है कि अतिरिक्त अनाज का अभाव था। इस कारण और अकाल इत्यादि के समय भूख से मरने के उदाहरण से भी इस बात की पुष्टि होती है कि कृषक जितना उत्पादन करता था उतना साथ-साथ उपभोग भी हो जाता था।

प्रश्न 3.
कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
उत्तर:
मुगलकालीन समाज में महिलाएं पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। कार्य विभाजन की कड़ी में सामाजिक तौर पर यह माना जाता था कि पुरुष बाहर के कार्य करेंगे तथा महिलाएँ चारदीवारी के अन्दर। यहाँ विभिन्न स्रोतों में महिलाएँ कृषि उत्पादन व विशेष कार्य अवसरों पर साथ-साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं। अतः स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन में महिला की भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण थी।
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प्रश्न 4.
विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में एशिया व यूरोप दोनों में हो रहे मौद्रिक परिवर्तनों से भारत को काफी लाभ हो रहा था। जल व स्थल मार्ग के व्यापार से भारत की चीजें पहले से अधिक दुनिया में फैली तथा नई-नई वस्तुओं का व्यापार भी प्रारंभ हुआ। इस व्यापार की खास बात यह थी कि भारत से विदेशों को जाने वाली मदों में उपयोग की चीजें थीं तथा बदले में भारत में चाँदी आ रही थी। भारत में चाँदी की प्राकृतिक दृष्टि से कोई खान नहीं थी। उसके बाद भी विश्व की चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत में एकत्रित हो रहा था। चाँदी के साथ-साथ व्यापार विनिमय से भारत में सोना भी आ रहा था।

भारत में विश्व भर से सोना-चाँदी आने के कारण मुग़ल साम्राज्य समृद्ध हुआ। इसके चलते हुए अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध-चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। बाह्य व्यापार में मुद्रा के प्रचलन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर भी पड़ा। इसमें भी अब वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आने लगी। शहरों में बाजार बड़े आकार के होने लगे। गाँवों से बिकने के लिए फसलें शहर आने लगीं। मुद्रा के प्रचलन में राज्य का राजस्व जिन्स के साथ नकद भी आने लगा। मुद्रा के कारण ही मज़दूरों को मज़दूरी के रूप में नकद पैसा दिया जाने लगा।

प्रश्न 5.
उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुगल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।
उत्तर:
मुगलकाल में राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। राज्य की आर्थिक स्थिति तथा कोष इस बात पर निर्भर करता था कि भू-राजस्व कितना तथा कैसे एकत्रित किया जा रहा है। आइन-ए-अकबरी में टोडरमल की नीति को स्पष्ट किया गया है कि अकबर ने अपने राजकोष को समृद्ध बनाने के लिए इस तरह की नीति अपनाई। उसने अपने राजकोष की स्थिति को देखकर सारे साम्राज्य की भूमि को नपवाया। इस नपाई के बाद प्रत्येक क्षेत्र को इस आधार पर बांटा की उससे भू-राजस्व एक करोड़ रुपया बनता हो। इस तरह सारा साम्राज्य 182 परगनों में विभाजित किया गया। नपाई के बाद जमीन का बंटवारा भी उसके उपजाऊपन के आधार पर किया गया। इस बंटवारे का उद्देश्य भी राजस्व की वास्तविकता का ज्ञान करना था।

मुगलकाल में राज्य की आर्थिक स्थिति भी उसी समय तक अच्छी रही जब तक भू-राजस्व ठीक एकत्रित किया गया। उदाहरण के लिए औरंगजेब के काल में हम सर्वाधिक कृषक विद्रोह देखते हैं क्योंकि उसने कठोरता के साथ अधिक भू-राजस्व वसूलने का प्रयास किया। यह प्रयास असफल रहा। अतः स्पष्ट है कि मुगलकाल में राजकोषीय व्यवस्था का आधार भू-राजस्व व्यवस्था थी। * निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में पंचायत, गाँव का मुखिया, कृषक व गैर-कृषक समुदाय के लोग थे। इस समुदाय के इन घटकों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में गहरा तालमेल था अर्थात् जो वर्ग साधन सम्पन्न था, उसी का सामाजिक स्तर भी ऊँचा था। वह अपने स्तर को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता था। गाँव में रहने वाला हर व्यक्ति सामाजिक ताने-बाने का एक हिस्सा था। मुगलकाल में जाति व गाँव एक-दूसरे के पूरक भी थे। अर्थात् जाति गाँव को बांधती थी तथा गाँव जाति व्यवस्था को बनाकर रखने में मदद करता था। एक गाँव में कृषक, दस्तकार तथा सेवा करने वाली जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति अपना पुश्तैनी कार्य करती थी।

आर्थिक व सामाजिक स्तर पर इन जातियों में समानता की स्थिति नहीं थी। निम्न जातियों में मुख्य रूप से वो जातियाँ थीं जिनके पास भूमि की मिल्कियत नहीं थी। ये लोग गाँव में वे कार्य करते थे जिन्हें निम्न या हीन समझा जाता था; जैसे मृत पशुओं को उठाना, चमड़े के कार्य या सफाई कार्य इत्यादि। इन जातियों के लोग खेतों में मजदूरी भी करते थे। उस काल में खेती योग्य जमीन की कमी नहीं थी। फिर भी निम्न जातियों के लिए कुछ कार्य ही निर्धारित थे क्योंकि अन्य कार्य को करने की जिम्मेदारी अन्य उच्च वर्गों की मानी जाती थी। इस तरह यह कहा जा सकता है कि निम्न जातियों के लोग निर्धनता का जीवन जीने के लिए मजबूर थे।

जैसा कि स्पष्ट है कि गाँव में जाति, गरीबी व सामाजिक हैसियत के बीच प्रत्यक्ष संबंध था। निम्न वर्ग के लोगों की स्थिति अधिक गरीबी वाली थी। समाज में कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी स्थिति बीच वाली थी। इस बीच वाले समुदाय में कुछ वर्गों की आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ सामाजिक हैसियत में भी कुछ बदलाव आया। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि इस काल में पशुपालन व बागबानी का काफी विकास हुआ। इसके कारण इन कार्यों को करने वाली अहीर, गुज्जर व माली जैसी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधरी।

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प्रश्न 7.
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगलवासियों की जिंदगी किस तरह बदल गई?
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में कृषि व्यवस्था पर आधारित समाज के अतिरिक्त भी भारत का ग्रामीण समाज था। यह समाज बड़े जंगल क्षेत्र, झाड़ियों (खरबंदी) का क्षेत्र, पहाड़ी कबीलाई क्षेत्र इत्यादि था। यह समाज मुख्य रूप से झारखंड, उड़ीसा व बंगाल का कुछ क्षेत्र, मध्य भारत, हिमालय का तराई क्षेत्र तथा दक्षिण के पठार व तटीय क्षेत्रों में फैला था। जंगल के लोगों का जीवन कृषि व्यवस्था से भिन्न था।

इस काल में भारत का विशाल भू-क्षेत्र जंगलों से सटा था तथा यहाँ के लोग आदिवासी थे जो कबीलों की जिन्दगी जीते थे। वे जंगलों में प्राकृतिक जीवन-शैली के अनुरूप रह रहे थे। जंगलों के उत्पादों, शिकार व स्थानांतरित कृषि के सहारे वे लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनके कार्य मौसम (जलवायु) के अनुकूल होते थे। मुगलकाल में जंगल की व्यवस्था व जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आया। विभिन्न तरह के व्यापारियों, सरकारी अधिकारियों एवं स्वयं शासक भी विभिन्न अवसरों पर जंगलों में जाया करते थे। इस तरह अब जंगल का जीवन पहले की तरह स्वतंत्र व शान्त नहीं रहा, बल्कि समाज के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा। इन परिवर्तनों के लिए बहुत-से कारण जिम्मेदार थे। इनमें से मुख्य का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

(i) हाथियों की प्राप्ति-मुगलकाल की सेना में हाथियों का बहुत महत्त्व था। ये हाथी जंगलों में मिलते थे। राज्य इन्हें प्राप्त करने के लिए जंगली क्षेत्र पर नियंत्रण रखता था। मुगलकाल में राज्य जंगलवासियों से यह उम्मीद करता था कि वे भेंट अर्थात् पेशकश के रूप में हाथी दें।

(ii) शिकार यात्राएँ-मुग़ल शासक अपना सारा समय दरबार व महल में नहीं गुजारते थे, बल्कि वे अपने अधिकारियों व मनसबदारों के साथ शिकार के लिए भी जाया करते थे। यह शिकार मात्र मनोरंजन या भोजन विशेष के लिए नहीं होता था बल्कि इससे कुछ अधिक इसके सरोकार थे। शासक इस माध्यम से अपने पूरे साम्राज्य की वास्तविकता को जानना चाहता था। वह वहाँ लोगों की शिकायतें सुनता था तथा न्याय भी करता हेत शिविर था। शासक की इस तरह की गतिविधियों ने राज्य व जंगलवासियों की बीच की दूरियों में कमी की।
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(iii) वाणिज्यिक कृषि-वाणिज्यिक खेती व व्यापार के कारण भी जंगलवासियों का जीवन प्रभावित हुआ। जंगल में उत्पादित होने वाले पदार्थों विशेषकर शहद, मोम व लाख भारत से काफी मात्रा में निर्यात होता था। इन पदार्थों की पूर्ति जंगल से होती थी। भारतीय लाख की यूरोप में माँग बढ़ती जा रही थी। इसको जंगलवासी बड़ी कुशलता से तैयार करते थे। इस तरह धीरे-धीरे जंगलवासियों का एक वर्ग इन चीजों को उपलब्ध कराने वाला हो गया। इस समय जंगल में मुख्य व्यापार वस्तुओं के माध्यम से होता था, परन्तु धीरे-धीरे धातु मुद्रा भी वहाँ घुसपैठ कर रही थी।

(iv) व्यापारिक गतिविधियाँ-कुछ छोटे कबीले दो बस्तियों के बीच रहते थे। इन्होंने इन बस्तियों को जोड़ने के लिए व्यापारिक कार्य करने शुरू कर दिए। इस काल में कुछ कबीले गाँव व शहर के बीच व्यापार की कड़ी का काम कर रहे थे। इनके ऊपर गाँव व शहर दोनों की जीवन-शैली का प्रभाव पड़ रहा था।

(v) मुखियाओं का ज़मींदारों के रूप में उदय-जंगल की सामाजिक संरचना में कबीलों के कुछ सरदार या मुखिया जंगल के सरदार या ज़मींदार बन गए। उन्हें अपने जंगल की रक्षा के लिए सेना की आवश्यकता महसूस होने लगी। दूसरी ओर, शासक व अधिकारियों के सम्पर्क में रहने के कारण वह उस तरह की जीवन-शैली अपनाने लगा। कुछ कबीलों के मुखिया तो सरकारी क्षेत्र में आ गए। उन्होंने अपने करीबी लोगों एवं कबीलों के अन्य लोगों को भी सरकारी सेवा में लेने की स्थितियाँ बना दीं। इस तरह स्पष्ट है कि इस सामाजिक बदलाव ने जंगलवासियों व कबीलों की जिन्दगी को पूरी तरह से बदल दिया।
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प्रश्न 8.
मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदार महत्त्वपूर्ण था क्योंकि वह बहुत बड़े भू-क्षेत्र का मालिक था। यह सारा भू-क्षेत्र उसके निजी प्रयोग के लिए था। अपने इस अधिकार के कारण वह गाँव व क्षेत्र में सामाजिक तौर पर भी ऊँची पहचान रखता था। इस ऊँची पहचान का कारण उसकी जाति भी थी। इस तरह वह व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से बहुत ऊँची पहचान रखता था।

उसकी यह स्थिति पैतृक थी तथा राज्य उसकी इस स्थिति में सामान्य तौर पर बदलाव नहीं कर सकता था। इसलिए राज्य उससे विभिन्न प्रकार की सेवाएँ (खिदमत) लेता था जिनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण राजस्व की वसूली थी। राज्य की सेवाओं के बदले उसकी राजनीतिक हैसियत भी ऊँची होती थी। इन स्थितियों के चलते हुए उसके लिए कार्य करने वाले कृषक, दिहाड़ीदार मजदूर, खेतिहर वर्ग तथा गाँवों के अन्य लोग लगभग उसकें पराधीन होते थे। इसलिए उसे स्थानीय स्तर पर कोई चुनौती नहीं मिलती थी।
मुगलकाल में ज़मींदार की तीन श्रेणियाँ थीं। इनका वर्णन इस प्रकार है

(i) प्रारंभिक ज़मींदार ये ज़मींदार वो ज़मींदार होते थे जो अपनी ज़मीन का राजस्व स्वयं कोष में जमा कराते थे। एक गाँव में प्रायः ऐसे ज़मींदार 4 या 5 ही हुआ करते थे।

(ii) मध्यस्थ ज़मींदार ये ज़मींदार वो थे जो अपने आस-पास के क्षेत्रों के ज़मींदारों से कर वसूल करते थे तथा उसमें से कमीशन के रूप में एक हिस्सा अपने पास रखकर कोष में जमा कराते थे। ऐसे ज़मींदार या तो एक गाँव में एक या फिर दो या तीन गाँवों का एक होता था।

(ii) स्वायत्त मुखिया ये ज़मींदार बहुत बड़े क्षेत्र के मालिक होते थे। कई बार इनके पास 200 या इससे अधिक गाँव भी होते थे। इनकी पहचान स्थानीय राजा की तरह होती थी। सरकारी तन्त्र भी उनके प्रभाव में होता था। इनके क्षेत्र में कर एकत्रित करने में सरकार के अधिकारी भी सहयोग देते थे। ये बहुत साधन सम्पन्न होते थे।

जमींदारों के अधिकार व कर्त्तव्य (Rights and Duties of Zamindars) अधिकार व कर्तव्यों की दृष्टि से इनको सामाजिक तौर पर कोई चुनौती नहीं थी। ज़मींदार वर्ग के बारे में बताया गया कि इससे ऊपर व अधीन वर्ग दोनों को इसकी जरूरत थी। ऐसे में अपनी ज़मीन की खरीद, बेच, हस्तांतरण, गिरवी रखने का अधिकार इनके पास था। विभिन्न तरह के प्रशासनिक पदों पर इन्हें नियुक्त किया जाता था। अपने क्षेत्र में विशेष पोशाक, घोड़ा, वाद्य यन्त्र बजवाने का अधिकार इनके पास था। भू-राजस्व से इन्हें एक निश्चित मात्रा में कमीशन मिलता था।

ज़मींदारों के कर्त्तव्यों के बारे में कहा जा सकता है कि अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी इनकी थी। इनके क्षेत्र से शासक व शाही परिवार का कोई सदस्य गुजरता था तो उन्हें वहाँ उपस्थित होना पड़ता था। राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य था। कुछ ज़मींदार अपनी पहचान बनाने के लिए सामाजिक पंचायतों में भाग लेते थे तथा विभिन्न तरह के झगड़ों को निपटाने के फैसले किया करते थे। कुछ ज़मींदार अपने क्षेत्र में धर्मशालाएँ बनवाना व कुएँ खुदवाना भी जरूरी समझते थे।

प्रश्न 9.
पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में एक महत्त्वपूर्ण पहलू पंचायत व्यवस्था थी। गाँव की सारी व्यवस्था, आपसी संबंध तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन पंचायत द्वारा ही किया जाता था। ग्राम पंचायत प्राचीनकाल में ही शक्तिशाली संस्था के रूप में कार्य कर रही थी। विभिन्न प्रकार के राजनीतिक परिवर्तनों का इस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। विभिन्न शक्तिशाली शासकों ने भी इसकी कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं किया। मुग़ल शासकों ने भी इस बारे में पहले से प्रचलित नीति का पालन किया।

(i) पंचायत का गठन-ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थी इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था। हाँ, इतना अवश्य है कि पंचायत में लिए गए फैसले को मानना सभी के लिए जरूरी था।

(ii) पंचायत का मुखिया-गाँव की पंचायत मुखिया के नेतृत्व में कार्य करती थी। इसे मुख्य रूप से मुकद्दम या मंडल कहते थे। मुकद्दम या मंडल का चुनाव पंचायत द्वारा किया जाता था। इसके लिए गाँव के पंचायती बुजुर्ग बैठकर किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमत हो जाते थे। प्रायः गाँव के सबसे बड़े कृषक या प्रभावशाली व्यक्ति को मुखिया माना जाता था। मुखिया का चुनाव होने के बाद पंचायत उसका नाम स्थानीय ज़मींदार के पास भेजती थी। ज़मींदार प्रायः उस नाम को स्वीकार कर लेता था। इस तरह मुखिया के चयन की औपचारिकता पूरी होती थी। मुखिया के कार्यों में पटवारी मदद करता था। गाँव की आमदनी, खर्च व अन्य विकास कार्यों के करवाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। गाँव की जातीय व्यवस्था तथा सामाजिक बंधनों को लागू करने में वह अधिक समय लगाता था।

(iii) पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत व मुखिया को गाँव के विकास तथा व्यवस्था की देख-रेख में कार्य करने होते थे। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(a) गाँव की आय व खर्च का नियंत्रण पंचायत करती थी। गाँव का अपना एक खजाना होता था जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का हिस्सा होता था। इस खजाने से पंचायत गाँव में विकास कार्य कराती थी।

(b) गाँव में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर बाढ़ व अकाल की स्थिति में भी पंचायत विशेष कदम उठाती थी। इसके लिए वह अपने कोष का प्रयोग तो करती ही थी साथ में सरकार से तकावी (विशेष आर्थिक सहायता) के लिए भी कार्य करती थी।

(c) गाँव के सामुदायिक कार्य जिन्हें कोई एक व्यक्ति या कृषक नहीं कर सकता था तो वह कार्य पंचायत द्वारा किए जाते थे। इनमें छोटे-छोटे बाँध बनाना, नहरों व तालाबों की खुदाई करवाना, गाँव के चारों ओर मिट्टी की बाड़ बनवाना तथा सुरक्षा के लिए कार्य करना इत्यादि प्रमुख थे।

(d) गाँव की सामाजिक संरचना विशेषकर जाति व्यवस्था के बंधनों को लागू करवाना भी पंचायत का मुख्य काम था। पंचायत किसी व्यक्ति को जाति की हदों को पार करने की आज्ञा नहीं देती थी। पंचायत शादी के मामले व व्यवसाय के मामले में इन बंधनों को कठोरता से लागू करती थी।

(e) गाँव में न्याय करना पंचायत का अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। गाँव में हर प्रकार के झगड़े व सम्पत्ति-विवाद का समाधान पंचायत करती थी। पंचायत दोषी व्यक्ति को कठोर दण्ड दे सकती थी, जिसमें व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता था।

इस तरह स्पष्ट है कि पंचायत व गाँव का मुखिया गाँव नियमन परंपरावादी ढंग से करते थे। ग्रामीण ताना-बाना व जातीय परंपरा को बनाए रखना इनका मुख्य ध्येय होता था।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
विश्व के बहिरेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।
उत्तर:
मुग़लों का आर्थिक संपर्क, जल व थल मार्ग से कई देशों से था। इन देशों को विश्व के मानचित्र में प्रदर्शित किया जा सकता है मध्य एशिया के देश, पश्चिमी एशिया के देश, दक्षिणी एशिया के देश, अरब क्षेत्र के देश, फ्रांस, ब्रिटेन और पुर्तगाल।
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परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन-सी फसलें उगाई जाती हैं, कौन-से जानवर पाले जाते हैं, कौन-से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी इसके लिए सर्वप्रथम अपने गाँव या पड़ोस के गाँव का चयन करें। इसके लिए वह एक प्रश्नावली तैयार करें। जैसे

  • आपके गाँव में कौन-कौन सी फसलें होती हैं।
  • गाँव के लोग किन-किन पशुओं को पालते हैं।
  • गाँव में किस-किस दस्तकारी से संबंधित लोग रहते हैं।
  • क्या गाँव में महिलाओं को भूमि के मालिक होने का अधिकार है।
  • आपकी पंचायत क्या-क्या कार्य करती है।
  • आपकी पंचायत का चुनाव कैसे होता है।

इन प्रश्नों की जानकारी के बाद विद्यार्थी अध्याय को ध्यान से पढ़कर तुलना करें कि फसलों व जानवरों में कोई बदलाव आया है। इसमें विशेष अंतर पंचायत व्यवस्थाएँ यह हैं कि मुगल काल में पंचायतें प्रभावी वर्ग की स्थायी पैतृक पदों वाली तथा जातीय आधार पर होती थी जबकि आज की पंचायतों को चुनाव में गाँव का प्रत्येक स्त्री पुरुष बिना किसी जाति धर्म, क्षेत्र, भाषा के भेदभाव के बिना हिस्सा ले सकता है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 12.
आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक में वर्णित आइन को पढ़िए। इसके लिए आप इंटरनेट से भी मदद ले सकते हैं या फिर किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय के पुस्तकालय से आइन पुस्तक के रूप में ले सकते हैं। इस पुस्तक के किसी एक अध्याय को पढ़कर अपने विचार निश्चित कर सकते हैं। इसके लिए J.B.D. की पाठ्यपुस्तक आपके लिए मददगार होगी क्योंकि इस पुस्तक में अध्याय के प्रारंभ में भी स्रोतों का अध्ययन किया गया है। इसमें आइन-ए-अकबरी के विभिन्न भागों व अध्यायों का वर्णन है। आइन-ए-अकबरी की स्रोतों के रूप में सीमाएँ तथा महत्त्व को भी स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है। इन्हीं पक्षों का प्रयोग आप विस्तृत विश्लेषण के लिए अपने चयनित किए गए अध्याय पर भी कर सकते हैं।

किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य HBSE 12th Class History Notes

→ आइन-ए-अकबरी-अकबर के शासनकाल में उसके दरबारी अबुल फज्ल द्वारा लिखी गई पुस्तक।

→ रैयत-इसका शाब्दिक अर्थ प्रजा है। मुगलकाल में यह शब्द कृषकों के लिए प्रयोग किया गया है। इस शब्द का बहुवचन ‘रिआया’ है।

→ खुद-काश्त-वह किसान जो ज़मीन का मालिक भी था तथा स्वयं उसको जोतता भी था।

→ पाहि-काश्त-यह वह किसान था जिसके पास अपनी जमीन नहीं होती थी। वह पड़ोस के गाँव या अपने ही गाँव में पड़ोसी की ज़मीन पर खेती करता था।

→ खालिसा-मुगलकाल की वह ज़मीन जिससे एकत्रित भू-राजस्व सीधे सरकारी कोष में जाता था।

→ जागीर-ज़मीन का वह हिस्सा जिसका राजस्व किसी अधिकारी को उसकी सरकारी सेवा अर्थात् वेतन के बदले दिया जाता था।

→ जिन्स-ए-कामिल-मुगलकाल में उत्पादित होने वाली वे फसलें जो खाद्यान्न नहीं होती थीं। राज्य को इन फसलों से अधिक कर प्राप्त होता था।

→ रबी-वह फसल जो अक्तूबर-नवंबर में बोई जाती तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी।

→ खरीफ वह फसल जो मई, जून व जुलाई में रोपित की जाती तथा अक्तूबर व नवंबर में काटी जाती थी।

→ पुश्तैनी-वह कार्य या संपत्ति जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता हो।

→ मल्लाहजादा-मल्लाह वह व्यक्ति होता है जो नौका चलाता है। उसका पुत्र मल्लाहजादा कहलाता था।

→ खेतिहर-वह व्यक्ति जो स्वयं ज़मीन का मालिक नहीं होता बल्कि कृषक के साथ मिलकर मज़दूर इत्यादि के रूप में कार्य करता था।

→ मीरास-किसी व्यक्ति को उसकी सेवा के बदले भूमि दी जाती थी। उसे मीरास या वतन कहा जाता था।

→ जंगली-वे लोग जिनका निवास स्थान जंगल में था।

→ कारवाँ–सामूहिक रूप में पशुओं व गाड़ियों के साथ व्यापार करने वाले लोग।

→ ज़मींदार-मुगलकाल का वह व्यक्ति जो ज़मीन का मालिक होता था। उसे अपनी ज़मीन बेचने, खरीदने व हस्तांतरण का अधिकार होता था।

→ स्वायत्त मुखिया-मुगलकाल में एक ऐसा ज़मींदार जो बहुत बड़े क्षेत्र का स्वामी होता था। जनता उन्हें उस क्षेत्र में शासक ही समझती थी।

→ जरीब-ज़मीन को नापने के लिए प्रयोग की जाने वाली लोहे की जंजीर जरीब कहलाती थी।

→ शिजरा-किसी गाँव, शहर या क्षेत्र का कपड़े पर बनाया गया नक्शा शिजरा कहलाता था। इसमें निवास क्षेत्र व कृषि क्षेत्र का उल्लेख होता था।

→ पोलज-मुगलकाल की वह कृषि भूमि जो सबसे अधिक उपजाऊ थी।

→ जमा-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष के लिए निर्धारित लगान दर जमा कहलाती थी। ”

→ हासिल-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष से जितना कर एकत्रित होता था वह हासिल कहलाता था।

→ टकसाल वह स्थान जहाँ पर किसी राज्य अथवा देश की मुद्रा छपती थी या आज भी छपती है।

→ मुकद्दम-मुगलकाल में गाँव के मुखिया को कहा जाता था।

→ एक ‘छोटा गणराज्य’-भारतीय गाँव के लिए अंग्रेज लेखकों द्वारा प्रयोग किया गया शब्द।

→ पायक-असम क्षेत्र में पैदल सैनिकों को पायक कहा जाता था।

→ सफावी-ईरान के शासकों को सफावी कहा जाता था।

मुगलकाल में कुल जनसंख्या के लगभग 85% से अधिक लोग गाँवों में रहते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था का केन्द्र कृषि थी। छोटे-से-छोटे कृषक तथा खेतिहर मजदूर से लेकर बड़े-से-बड़े व्यक्ति का सम्बन्ध कृषि से था। समाज के सभी वर्ग कृषि उत्पादन में अपना-अपना हिस्सा अपने-अपने ढंग से लेते थे। इस उत्पादन के बँटवारे में समाज के विभिन्न वर्गों में सहयोग, टकराव व प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलती थी। इन्हीं रिश्तों व परिस्थितियों के बीच ग्रामीण समाज की संरचना बनती थी। मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। वह विभिन्न तरीकों से विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से इसे एकत्रित करता था। इस राजस्व के एकत्रित करने में यह आवश्यक था कि ग्रामीण समाज पर नियंत्रण रखा जाए। मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व को एकत्रित करने के लिए जिन्स के साथ-साथ मुद्रा की नीति को भी अपनाया। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी या वाणिज्यिक फसलें भी उगाई जाती थीं। इस प्रक्रिया के चलते हुए व्यापार, मुद्रा व बाजार का सम्बन्ध गाँवों से हो गया। इस कारण गाँव भी अब अलग-अलग न रह कर शहर से जुड़ गए।

→ मुगलकाल का आर्थिक इतिहास जानने का एक प्रमुख साधन आइन-ए-अकबरी है। इस स्रोत से हमें यह पता चलता है कि राज्य का कृषि, कृषक व ज़मींदारों के बारे में दृष्टिकोण कैसा था? इसके अतिरिक्त कुछ और स्रोत भी हैं जो आर्थिक पक्ष की जानकारी देते हैं। इन स्रोतों का प्रयोग कर 16वीं व 17वीं शताब्दी के आर्थिक इतिहास का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।

→ जैसा कि स्पष्ट है मुगलकाल में भी भारत कृषि प्रधान देश था। उस समय लोग आज की तुलना में कृषि पर अधिक निर्भर थे। ये लोग वर्ष भर खेती के कार्यों में लगे रहते थे। ज़मीन की जुताई, बिजाई व कटाई के अनुरूप इनकी दिनचर्या जुड़ी थी। इस समय कृषि पर आधारित उद्योग लगभग प्रत्येक गाँव में थे जिसमें लोग कृषि के मुख्य काम के अतिरिक्त समय गुजारते थे। भौगोलिक दृष्टि से भारत में कृषक व कृषि व्यवस्था की प्रणाली एक-जैसी नहीं थी। मैदानी क्षेत्रों में बड़े-बड़े खेत थे तथा उनमें उत्पादन बड़े स्तर पर होता था। पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत व उत्पादन भी सीमित थे। इस तरह पठारी व मरुस्थल क्षेत्र की स्थिति भी अन्य से भिन्न थी। भारत के बहुत बड़े हिस्से पर जंगल भी थे। वहाँ रहने वाले लोगों की जीवन-शैली पूरी तरह से भिन्न थी। इस तरह से पूरे भारत के बारे में कृषक व कृषि के सन्दर्भ में एक जैसे निष्कर्ष निकालना सम्भव नहीं है।

→ मुगलकाल में कृषक के लिए मोटे तौर पर रैयत या मुज़रियान शब्द का प्रयोग मिलता है। कई स्थानों पर हमें कृषक के लिए किसान व आसामी शब्द भी मिलते हैं। 17वीं शताब्दी के स्रोतों में खुद-काश्त व पाहि-काश्त इत्यादि शब्दों का प्रयोग कृषकों के लिए मिलता है। यह शब्द उनकी प्रकृति में अन्तर को स्पष्ट करता है। कहीं-कहीं यह विभिन्न क्षेत्रों के भाषायी अन्तर के कारण है।

→ मुगलकाल में फसल चक्र खरीफ व रबी के नाम से जाना जाता था। यह फसल चक्र भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में था। उपजाऊ क्षेत्रों में दोनों फसलें होती थीं। जबकि कम उपजाऊ क्षेत्रों में एक फसल मौसम के अनुरूप ली जाती थी। रबी (बसन्त) की फसल अक्तूबर-नवम्बर में रोपित होती थी तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी जबकि खरीफ (पतझड़) की फसल की बिजाई मई, जून व जुलाई में होती थी तथा कटाई सितम्बर, अक्तूबर व नवम्बर में होती थी। इस फसल चक्र का आधार मानसून पवनें थीं। भारत में जिन क्षेत्रों में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती थी या सिंचाई के साधन उपलब्ध थे, वहाँ तीन फसलें भी ली जाती थीं। तीसरी फसल मोटे तौर पर पशुओं के लिए चारा इत्यादि होता था। दूसरी ओर गन्ना व नील इस तरह की फसलें भी थीं जो वर्ष में एक बार ही हो पाती थीं।

→ कृषि सम्बन्धी इन पक्षों की एक विशेष बात यह थी कि मुगलकाल में जोत क्षेत्र काफी बड़ा था। कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए राज्य तथा कृषकों द्वारा लगातार कार्य किए गए। जोत क्षेत्र के बढ़ने तथा नई फसलों के आगमन का परिणाम यह रहा कि अकाल व भुखमरी की स्थिति पहले से कम हुई। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव जनसंख्या पर पड़ा। 1600 से 1700 तक भारत की जनसंख्या में लगभग 5 करोड़ की वृद्धि हुई तथा आगामी 100 वर्षों में यह और अधिक बढ़ी। स्रोतों के अनुमान के अनुसार 16वीं व 17वीं शताब्दी में भारत की जनसंख्या में लगभग 33% की वृद्धि हुई। इस जनसंख्या वृद्धि से कृषि उत्पादन भी बढ़ा क्योंकि कृषि पर काम करने वाले लोग भी बढ़े।

→ गाँव में व्यवस्था का संचालन पंचायतें करती थीं। गाँव में प्रायः कई जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति की अपनी एक पंचायत होती थी। ये जातीय पंचायत गाँव की परिधि के बाहर भी महत्त्व रखती थी। इनका अस्तित्व क्षेत्रीय आधार पर भी होता था। ये बहुत शक्तिशाली होती थीं। ये पंचायतें अपनी जाति (बिरादरी) के झगड़ों का निपटारा करती थीं। जातीय परंपरा व बन्धनों के दृष्टिकोण से ये ग्रामीण पंचायतों की तुलना में अधिक कठोर थीं। दीवानी झगड़ों का निपटारा, शादियों के जातिगत मानदण्ड, कर्मकाण्डीय गतिविधियों का आयोजन तथा अपने व्यवसाय को मजबूत करना इनके काम थे। व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को ये पंचायतें जाति से बाहर कर देती थीं। सामाजिक अस्तित्व की दृष्टि से यह दण्ड बेहद कठोर होता था क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति अपने परिवार, व्यवसाय व वैवाहिक संबंधों इत्यादि से भी कट जाता था।

→ ग्राम पंचायतों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग का प्रभुत्व था। वह वर्ग अपनी मनमर्जी के फैसले पंचायत के माध्यम से लागू करवाता था। सामान्य तौर पर निम्न वर्ग के लोग पंचायत की इस तरह की कार्रवाई को झेल लेते थे। परन्तु स्रोतों में विशेषकर महाराष्ट्र व राजस्थान से प्राप्त दस्तावेजों में इस तरह के प्रमाण मिले हैं कि निम्न वर्ग ने विरोध किया हो। इन दस्तावेज़ों में ऊँची जातियों व सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली या बेगार की शिकायत है, जिसके अनुसार निम्न वर्ग के लोग स्पष्ट करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है तथा उन्हें उनसे न्याय की उम्मीद भी नहीं है।

→ भारतीय ग्राम प्राचीनकाल से छोटे गणराज्य के रूप में कार्य कर रहे थे। मुगलकाल में इस व्यवस्था में थोड़ा-बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की। शासक की ओर से नकदी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इस काल में विदेशी व्यापार में भी वृद्धि हुई। विदेशों को निर्यात होने वाली चीजें गाँव में बनती थीं। इस व्यापार से नकद धन मिलता था। इस तरह धीरे-धीरे मजदूरी का भुगतान भी नकद किया जाने लगा। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें भी उगाई जाने लगी, जिससे कृषक को पर्याप्त मात्रा में लाभ होता था। रेशम तथा नील मुगलकाल में अत्यधिक लाभ देने वाली फसलें मानी जाती थीं। इस तरह ग्रामीण समाज में वस्तु विनिमय के साथ मुद्रा का प्रयोग भी होने लगा। इससे ग्रामीण ताना-बाना व व्यवस्था प्रभावित होने लगी।

→ जंगलवासियों के जीवन में भी मुगलकाल में कई तरह के परिवर्तन आए। विभिन्न कारणों के होते हुए जंगलवासियों की दूरियाँ गाँव व नगरों से कम हुई, वहीं राज्य के साथ भी संबंधों में बदलाव आया। 16वीं सदी के एक बंगाली कवि मुकंदराम चक्रवर्ती ने ‘चंडीमंगल’ नामक कविता लिखी। इस कविता के नायक कालकेतु ने जंगल खाली करवाकर नए साम्राज्य की स्थापना की। उसने अपनी कविता में उस प्रक्रिया को वर्णित किया है जो जंगल में साम्राज्य का विस्तार करने के लिए अपनाई गई तथा जिसने जंगल के जीवन व व्यवस्था को बदल दिया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

→ मुगलकाल में कृषि संबंधों का अध्ययन करते हुए अभी तक हमने कृषक, गैर-कृषक व ग्रामीण समुदायों के कुछ पक्षों का वर्णन किया है। इन संबंधों में एक और बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष का अध्ययन जरूरी है। यह पक्ष ज़मींदार के नाम से जाना जाता था। यह कृषि व्यवस्था का केन्द्र था, क्योंकि वह भूमि का मालिक था। उसे ज़मीन के बारे में सारे अधिकार प्राप्त थे अर्थात् वह अपनी ज़मीन को बेच सकता था या किसी को हस्तांतरित कर सकता था। वह अपनी भूमि से कर एकत्रित करके राज्य को देता था। इस तरह यह वर्ग अपने से ऊपर तथा नीचे वाले दोनों वर्गों पर प्रभाव रखता था। ज़मींदार के सन्दर्भ में एक खास बात यह भी है कि वह खेती की कमाई खाता था, लेकिन स्वयं खेती नहीं करता था। बल्कि वह अपने अधीन कृषकों व मजदूरों से कृषि करवाता था।

→ निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि 16वीं व 17वीं सदी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। इस काल में ग्रामीण व्यवस्था व कृषि व्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। ये बदलाव आपस में जुड़े थे। ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था प्रमुख थी। उसी आधार पर सामाजिक ताना-बाना बना था। कृषक समुदाय इस व्यवस्था में शीर्ष पर था। उसकी जाति भी उच्च थी। निम्न जातियों के लोग भूमि के मालिक नहीं थे। वे या तो गैर-कृषक कार्य करते थे या फिर खेतिहर मजदूर थे।

काल-रेखा

काल घटना का विवरण
1483 ई० बाबर का मध्य एशिया के फरगाना में जन्म
1504 ई० बाबर की काबुल-विजय
1526 ई० बाबर की पानीपत की पहली लड़ाई में जीत, दिल्ली सल्तनत का अन्त व मुग़ल वंश की स्थापना
1530 ई० हुमायूँ का गद्दी पर बैठना
1540 ई० हुमायूँ की शेरशाह सूरी द्वारा पराजय व हुमायूँ का (1540-55) भारत से निर्वासन
1540-45 ई० शेरशाह सूरी का शासन काल
1545-55 ई० शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों का काल
1555-56 ई० हुमायूँ द्वारा फिर से सत्ता पर अधिकार करना
1556 ई० पानीपत की दूसरी लड़ाई व अकबर के शासन काल का प्रारंभ
1556-1605 ई० अकबर का शासन काल
1605-1627 ई० जहाँगीर का शासन काल
1628-1658 ई० शाहजहाँ का शासन काल
1658-1707 ई० औरंगज़ेब का शासन काल
1707-1857 ई० औरंगज़ेब के बाद 11 मुग़ल शासकों का काल या उत्तर मुग़लकाल
1739 ई० नादिरशाह का दिल्ली पर आक्रमण व लूटमार
1757 ई० प्लासी की लड़ाई में बंगाल पर अंग्रेजों का कब्ना
1761 ई० पानीपत की तीसरी लड़ाई व मराठों की अब्दाली के हाथों हार
1765 ई० बंगाल, बिहार व उड़ीसा में अंग्रेजों को दीवानी अधिकार की प्राप्ति
1857 ई० 1857 का जन विद्रोह, अन्तिम मुग़ल बादशाह को बन्दी बनाकर बर्मा की राजधानी रंगून भेजना।

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