Class 9

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

HBSE 9th Class Hindi उपभोक्तावाद की संस्कृति Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार जीवन में ‘सुख’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
लेखक ने ‘सुख’ को व्यंग्यात्मक शैली में परिभाषित करते हुए कहा है कि आज उपभोग का भोग ही सुख है।

प्रश्न 2.
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को किस प्रकार प्रभावित कर रही है ?
उत्तर-
आज की उपभोक्तावादी संस्कृति हमारे दैनिक जीवन को अनेक प्रकार से प्रभावित कर रही है। एक ओर इस संस्कृति में उपभोग की वस्तुओं का अत्यधिक निर्माण हो रहा है जिससे आकृष्ट होकर हम उसे बिना सोचे-समझे खरीदते चले जा रहे हैं। इससे संतुष्टि की अपेक्षा अशांति एवं अँधी होड़ की भावना बढ़ती है। दूसरी ओर, समाज के विभिन्न वर्गों में सद्भाव की अपेक्षा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है। सीमित साधनों का अपव्यय हो रहा है। सांस्कृतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है। हम पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण करने के कारण अपनी संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। इस उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास से हमारी अपनी संस्कृति के मूल्य खतरे में पड़ गए हैं।

प्रश्न 3.
गांधी जी ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है ?
उत्तर-
गांधी जी सदा भारतीय संस्कृति के पुजारी रहे हैं। वे चाहते थे कि हम नए विचारों को अपनाएँ, किन्तु अपनी संस्कृति की नींव से दूर न हटें अर्थात् अपनी संस्कृति का त्याग न करें। गांधी जी ने अनुभव कर लिया था कि उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है। यह हमारे समाज के लिए खतरा है। इसलिए गांधी जी ने इसे समाज के लिए चुनौती कहा है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

प्रश्न 4.
आशय स्पष्ट कीजिए
(क) जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
(ख) प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं, चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हों।
उत्तर-
(क) इस पंक्ति में लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति के विकास से उत्पन्न वातावरण के प्रभाव को चित्रित किया है। जाने-अनजाने आज के वातावरण में हमारा चरित्र बदल रहा है अर्थात् हमारी सोच में परिवर्तन आ रहा है। हम जिन बातों या विचारों को पहले उचित नहीं समझते थे, आज उन्हीं को करने में गर्व अनुभव करने लगे हैं। हम अपने-आपको उत्पाद के प्रति समर्पित करते जा रहे हैं अर्थात् उत्पादन ही हमारा सब कुछ बन गया है, मानवीय मूल्य गौण होते जा रहे हैं।

(ख) इस पंक्ति में लेखक ने आज के दिखावे की प्रतिष्ठा पर करारा व्यंग्य किया है। लेखक ने बताया है कि हम अपनी प्रतिष्ठा अर्थात् मान-सम्मान को बनाने के लिए तरह-तरह के ढंग अपना रहे हैं, भले ही वे हास्यास्पद ही क्यों न हों। कहने का तात्पर्य है कि हम साधनों की चिंता नहीं करते, वे कैसे भी हों हमें तो अपनी प्रतिष्ठा बनाए रखनी है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 5.
कोई वस्तु हमारे लिए उपयोगी हो या न हो, लेकिन टी०वी० पर विज्ञापन देखकर हम उसे खरीदने के लिए अवश्य लालायित होते हैं, क्यों ?
उत्तर-
आज के युग में किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए उसकी आवश्यकता का होना अनिवार्य नहीं है। कुछ वस्तुएँ ऐसी भी हैं, जिन्हें हम विज्ञापन देखकर इसलिए खरीदते हैं, क्योंकि उन वस्तुओं को खरीदने से हमारी हैसियत का पता चलता है और समाज में प्रतिष्ठा भी बढ़ती है। अतः स्पष्ट है कि हम दिखावे की शान को बनाए रखने के लिए ऐसी वस्तुओं को खरीदने के लिए लालायित होते हैं।

प्रश्न 6.
आपके अनुसार वस्तुओं को खरीदने का आधार वस्तु की गुणवत्ता होनी चाहिए या उसका विज्ञापन ? तर्क देकर स्पष्ट करें।
उत्तर-
हमारे अनुसार किसी भी वस्तु को खरीदने का प्रमुख आधार उसकी गुणवत्ता एवं उपयोगिता होनी चाहिए, न कि विज्ञापन। यदि हम केवल विज्ञापन को देखकर किसी वस्तु को खरीदते हैं तो यह आवश्यक नहीं है कि उसमें वे सभी गुण होंगे, जो हम चाहते हैं। इसलिए हमें किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए उसके गुणों को देखना चाहिए। यही उचित एवं सार्थक होगा। विज्ञापन में तो केवल चमक-दमक ही अधिक दिखाई जाती है।

प्रश्न 7.
पाठ के आधार पर आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही ‘दिखावे की संस्कृति’ पर विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में आज के उपभोक्तावादी युग में पनप रही दिखावे की संस्कृति का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है। सर्वप्रथम इस संस्कृति से हमारे धन का अपव्यय बढ़ा है। हम अधिकाधिक वस्तुओं को खरीदने के लिए लालायित हो उठते हैं। इस संस्कृति के विकास से भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आघात पहुँचा है। हम उपभोक्तावाद के चक्कर में फँसकर अथवा झूठी प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए मानवीय मूल्यों से दूर हटते जा रहे हैं। लेखक का यह भी मानना है कि उपभोक्तावादी युग में समाज के विभिन्न वर्गों की दूरियाँ कम होने की अपेक्षा बढ़ी हैं। सामाजिक सद्भावना व सहयोग की भावना की अपेक्षा अँधी प्रतिस्पर्धा का विकास हुआ है जिसमें दया, सहिष्णुता, ममता आदि सद्भावों के लिए कोई स्थान नहीं है।

प्रश्न 8.
आज की उपभोक्ता संस्कृति हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को किस प्रकार प्रभावित कर रही है ? अपने अनुभव के आधार पर एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर-
आज की उपभोक्ता संस्कृति न केवल हमारे दैनिक जीवन को, अपितु हमारे रीति-रिवाजों और त्योहारों को भी प्रभावित कर रही है। इससे पूर्व रीति-रिवाज व त्योहार एक महान् उद्देश्य की पूर्ति हेतु मनाए जाते थे। उनसे आपस में प्रेम, सद्भाव, मेल-जोल आदि भावों का विकास होता था। यही उनका मुख्य लक्ष्य भी था, किन्तु आज उपभोक्ता संस्कृति के आने पर हम रीति-रिवाजों व त्योहारों पर अनेकानेक वस्तुएँ खरीदते हैं और प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए महँगे-महँगे उपहार देते हैं। दिखावे के लिए अनावश्यक वस्तुओं को खरीदते हैं। इससे समाज के लोगों में होड़ की भावना उत्पन्न होती है और धन का अपव्यय होता है। उदाहरणार्थ, दीपावली दीपों एवं सद्भावना का त्योहार है। हम दीप जलाने की अपेक्षा महँगे पटाखे, बम आदि चलाते हैं। अपने संबंधियों व पड़ोसियों को महँगे-महँगे तोहफे देते हैं। हम इस त्योहार के वास्तविक उद्देश्य से भटककर दिखावे की भावना में फँस जाते हैं। इस प्रकार उपभोक्ता की संस्कृति का हमारे रीति-रिवाजों व त्योहारों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 9.
धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है।
इस वाक्य -में ‘बदल रहा है’ क्रिया है। यह क्रिया कैसे हो रही है-धीरे-धीरे। अतः यहाँ धीरे-धीरे क्रिया-विशेषण है। जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं, क्रिया-विशेषण कहलाते हैं। जहाँ वाक्य में हमें पता चलता है क्रिया कैसे, कब, कितनी और कहाँ हो रही है, वहाँ वह शब्द क्रिया-विशेषण कहलाता है।

(क) ऊपर दिए गए उदाहरण को ध्यान में रखते हुए क्रिया-विशेषण से युक्त लगभग पाँच वाक्य पाठ में से छाँटकर लिखिए।
उत्तर-

  1. आपको लुभाने की जी तोड़ कोशिश में निरंतर लगी रहती हैं।
  2. हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात कितनी ही करें।
  3. विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं।
  4. नैतिक मानदंड ढीले पड़ रहे हैं।
  5. शीघ्र ही शायद कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी बन जाए।

(ख) धीरे-धीरे, जोर से, लगातार, हमेशा, आजकल, कम, ज्यादा, यहाँ, उधर, बाहर-इन क्रिया-विशेषण शब्दों का प्रयोग करते हुए वाक्य बनाइए।
उत्तर-
धीरे-धीरे – मोहन धीरे-धीरे चल रहा है।
जोर से – जोर से मत बोलो।
लगातार – वह लगातार दौड़ रहा है।
हमेशा – प्रभु शर्मा हमेशा गाता है।
आजकल – तुम आजकल पढ़ते नहीं हो।
कम – तुम कम तोलते हो।
ज्यादा – वह ज्यादा हँसता है।
यहाँ – राम यहाँ सोता है।
उधर – वह उधर रहता है।
बाहर – सीता बाहर देख रही थी।

(ग) नीचे दिए गए वाक्यों में से क्रिया-विशेषण और विशेषण शब्द छाँटकर अलग लिखिए-

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति 1
उत्तर-
क्रिया-विशेषण– विशेषण
(1) निरंतर — कल
(2) मुँह में पानी आ गया — पके
(3) जोरों की — हलकी
(4) उतना ही — जितनी
(5) भरा — आजकल

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

पाठेतर सक्रियता

‘दूरदर्शन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापनों का बच्चों पर बढ़ता प्रभाव’ विषय पर अध्यापक और विद्यार्थी के बीच हुए वार्तालाप को संवाद शैली में लिखिए।
इस पाठ के माध्यम से आपने उपभोक्ता संस्कृति के बारे में विस्तार से जानकारी प्राप्त की। अब आप अपने अध्यापक की सहायता से सामंती संस्कृति के बारे में जानकारी प्राप्त करें और नीचे दिए गए विषय के पक्ष अथवा विपक्ष में कक्षा में अपने विचार व्यक्त करें।

क्या उपभोक्ता संस्कृति सामंती संस्कृति का ही विकसित रूप है।

आप प्रतिदिन टी.वी. पर ढेरों विज्ञापन देखते-सुनते हैं और इनमें से कुछ आपकी ज़बान पर चढ़ जाते हैं। आप अपनी पसंद की किन्हीं दो वस्तुओं पर विज्ञापन तैयार कीजिए।
उत्तर-
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं हैं। विद्यार्थी इन्हें अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करेंगे।

HBSE 9th Class Hindi उपभोक्तावाद की संस्कृति Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ नामक इस निबन्ध में लेखक का उद्देश्य यह बताना है कि आज के बदलते युग की नवीन . जीवन-शैली के साथ-साथ उपभोक्तावादी संस्कृति भी पनप रही है। आज उपभोक्तावादी जीवन-दर्शन में सुख की परिभाषा बदल गई हैं। मानव का चरित्र भी बदल रहा है। लेखक ने मानव को विलासिता की वस्तुओं व दिखावे का जीवन न जीने का उपदेश दिया है। विज्ञापनों की चकाचौंध में न आकर अपनी आवश्यकताओं पर ध्यान देना चाहिए। भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं के अवमूल्यन के प्रति भी हमारा ध्यान आकृष्ट करना लेखक का प्रमुख लक्ष्य है। दिखावे की संस्कृति से निरन्तर अशांति बढ़ती है, इसलिए दिखावे को त्यागकर सत्य का दामन थामना चाहिए उसी से ही शांति मिल सकती है। लेखक ने उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के प्रति चिंता व्यक्त की है तथा हमें उसके प्रति सचेत किया है। यह इस निबन्ध का परम लक्ष्य है।

प्रश्न 2.
आधुनिक युग में आम आदमी के जीवन में विज्ञापन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर-
आधुनिक युग में आम आदमी का जीवन अत्यंत व्यस्त हो गया है। हर वस्तु की जाँच-पड़ताल करना उसके लिए असंभव हो गया है। इसलिए वह अपनी इस कमी को विज्ञापन की सहायता से पूरा करता है। वह विज्ञापन के द्वारा वस्तुओं के गुणों, उनके प्रयोग आदि की जानकारी हासिल करता है। विज्ञापन ही आम व्यक्ति के सामने वस्तुओं के कई-कई विकल्प प्रस्तुत करता है जिससे वह अपनी पसंद की वस्तु प्राप्त कर सकता है। विज्ञापन आम आदमी के लिए कई बार हानिकारक भी सिद्ध होता है। वह आम आदमी के मन में नई वस्तुओं के लिए लालच उत्पन्न करता है। तब उसे पुरानी वस्तुएँ व्यर्थ लगने लगती हैं। इससे फिजूलखर्ची बढ़ती है।

प्रश्न 3.
लेखक ने उपभोक्ता संस्कृति को हमारे समाज के लिए चुनौती क्यों कहा है?
उत्तर-
लेखक का मानना है कि हम नए विचारों को अपनाने के साथ-साथ अपनी संस्कृति की नींव से दूर न हटें अर्थात् अपनी संस्कृति का त्याग न करें। परन्तु उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है। आपसी दूरी बढ़ती जा रही है। नैतिकता पीछे छूटती जा रही है। स्वार्थ परमार्थ पर भारी पड़ता जा रहा है। यह हमारे समाज के लिए खतरा है। इसलिए लेखक ने इसे समाज के लिए चुनौती कहा है।

प्रश्न 4.
हम भारतीय लक्ष्य-भ्रम की पीड़ा से पीड़ित हैं। कैसे ?
उत्तर-
प्राचीनकाल से भारत के लोगों का उच्च विचार साधारण जीवन-शैली में विश्वास था। इस प्रकार हर व्यक्ति शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करता था। किन्तु आज हम आधुनिकता की चमक-दमक में फँस गए हैं। हम अपने जीवन का लक्ष्य भूल गए हैं। भारतीय जीवन के पुराने संस्कार जो हमें धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि के लिए जीना सिखाते थे, हम उन्हें पूरी तरह भूल चुके हैं। हम पश्चिमी जीवन के उपभोक्तावाद के समर्थक बन बैठे हैं जिसमें कही संतुष्टि व शांति नहीं है। इस दिखावे व चमक-दमक के छलावे में फँसकर जीवन के वास्तविक लक्ष्य से भ्रमित हो गए हैं। हर समय दिखावे व उपभोक्तावाद की भावना से ग्रसित रहने के कारण हमारे जीवन में अशांति व दुःख ही छाए रहते हैं। इसलिए हम लक्ष्य-भ्रम की पीड़ा से पीड़ित रहने लगे हैं।

प्रश्न 5.
उपभोक्तावादी युग में विशिष्ट जन समाज का सामान्य जन पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर-
उपभोक्तावादी संस्कृति एवं सभ्यता के प्रचार-प्रसार से समाज का हर वर्ग प्रभावित हुआ है। जिनके पास अधिक धन है वे उपभोक्तावादी समाज के उच्च वर्ग के लोग हैं। इन्हें ही विशिष्ट जन भी कहते हैं। इस वर्ग के लोगों के सुख व वैभवपूर्ण जीवन को देखकर सामान्य जन भी उनका अनुकरण करने लगता है। वह भी उपभोक्तावादी संस्कृति की ओर लालायित हो उठता है। किन्तु उनकी आय सीमित होती है। वे उपभोक्तावादी संस्कृति में अपने आपको चाहते हुए भी सम्मिलित नहीं कर सकते इसलिए तनावपूर्ण जीवन जीने के लिए विवश हो जाते हैं।

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प्रश्न 6.
भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास कौन और क्यों कर रहा है? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में बताया गया है कि भारत में उपभोक्तावादी संस्कृति का विकास करने में सामंती संस्कृति का योगदान रहा है। भारत में भले ही सामंत बदल गए हैं, किन्तु उनके गुण व आदतें अब तक वहीं हैं। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य संस्कृति और सभ्यता का अंधानुकरण भी उपभोक्तावादी संस्कृति को बढ़ावा दे रहा है। विज्ञापन का प्रचार-प्रसार भी उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास का एक प्रमुख कारण है। इसके अतिरिक्त आधुनिकता और दिखावे की अंधी दौड़ भी कुछ हद तक उपभोक्तावादी संस्कृति को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ पाठ के लेखक कौन हैं ?
(A) आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी
(B) प्रेमचंद
(C) महादेवी वर्मा
(D) श्यामाचरण दुबे
उत्तर-
(D) श्यामाचरण दुबे

प्रश्न 2.
श्यामाचरण दुबे का जन्म कब हुआ था ?
(A) सन् 1912 में
(B) सन् 1922 में
(C) सन् 1932 में
(D) सन् 1942 में
उत्तर-
(B) सन् 1922 में

प्रश्न 3.
श्यामाचरण दुबे की मृत्यु कब हुई ? .
(A) सन् 1986 में
(B) सन् 1990 में
(C) सन् 1992 में
(D) सन् 1996 में
उत्तर-
(D) सन् 1996 में

प्रश्न 4.
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ है एक
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) एकांकी
(D) संस्मरण
उत्तर-
(A) निबंध

प्रश्न 5.
नए जीवन-दर्शन को लेखक ने कौन-सा दर्शन कहा है ?
(A) समाज-दर्शन
(B) उपभोक्तावाद का दर्शन
(C) साहित्य-दर्शन
(D) शिक्षा का दर्शन
उत्तर-
(B) उपभोक्तावाद का दर्शन

प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार चारों ओर किस बात पर जोर दिया जा रहा है ?
(A) गीत गाने पर
(B) अधिक खर्च करने पर
(C) उत्पादन बढ़ाने पर ।
(D) बचत करने पर
उत्तर-
(C) उत्पादन बढ़ाने पर

प्रश्न 7.
लेखक के अनुसार आज किसे सुख समझा जाता है ?
(A) ईश्वर-भक्ति को
(B) उपभोग-भोग को
(C) अधिक धन को
(D) अत्यधिक वस्तुएँ खरीदने को
उत्तर-
(B) उपभोग-भोग को

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

प्रश्न 8.
बाजार कैसी सामग्री से भरा पड़ा है ?
(A) आवश्यकता की
(B) विलासिता की
(C) हवन की
(D) पूजा की
उत्तर-
(B) विलासिता की

प्रश्न 9.
नए डिज़ाइन के परिधान कैसे हैं ?
(A) सस्ते
(B) सुंदर और टिकाऊ
(C) महँगे
(D) घटिया
उत्तर-
(C) महँगे

प्रश्न 10.
उपभोक्तावादी समाज को कौन ललचाई दृष्टि से देखते हैं ?
(A) कंजूस लोग
(B) अमीर लोग
(C) साधारण लोग
(D) गरीब लोग
उत्तर-
(C) साधारण लोग

प्रश्न 11.
हमारी नई संस्कृति कैसी संस्कृति बन गई है ?
(A) अनुकरण की
(B) त्याग की
(C) उपभोग की
(D) पैसे की
उत्तर-
(A) अनुकरण की

प्रश्न 12.
हम कौन-सी दासता को स्वीकार करते जा रहे हैं ?
(A) धन की दासता
(B) बौद्धिक दासता
(C) भाषा की दासता
(D) सभ्यता की दासता
उत्तर-
(B) बौद्धिक दासता

प्रश्न 13.
कौन-सी शक्तियों के अभाव में हम दिग्भ्रमित होते जा रहे हैं ?
(A) संस्कृति की नियंत्रक शक्ति
(B) चारित्रिक शक्ति
(C) वैराग्य की शक्ति
(D) संस्कृति के परिवर्तन की शक्ति
उत्तर-
(A) संस्कृति की नियंत्रक शक्ति

प्रश्न 14.
हमारी मानसिक शक्ति कौन बदल रहा है ?
(A) सरकार
(B) विज्ञापन और प्रसार के तंत्र
(C) फैशन
(D) उद्योगपति
उत्तर-
(B) विज्ञापन और प्रसार के तंत्र

प्रश्न 15.
उपभोक्तावाद की संस्कृति में किसका घोर अपव्यय हो रहा है ?
(A) सीमित साधनों का
(B) भावनाओं का
(C) धर्म का
(D) पारस्परिक संबंधों का
उत्तर-
(A) सीमित साधनों का

प्रश्न 16.
लेखक ने ‘सुख’ किसे कहा है ?
(A) उपभोग सुख
(B) मानसिक व शारीरिक आराम
(C) धन की प्राप्ति
(D) वैराग्य सुख
उत्तर-
(A) उपभोग सुख

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प्रश्न 17.
सांस्कृतिक अस्मिता का अर्थ है-
(A) सांस्कृतिक पहचान
(B) सांस्कृतिक विकास
(C) सांस्कृतिक पतन
(D) सांस्कृतिक मेल
उत्तर-
(A) सांस्कृतिक पहचान

प्रश्न 18.
दूसरों को श्रेष्ठ समझकर उनकी बौद्धिकता के प्रति बिना आलोचनात्मक दृष्टि अपनाए उसे स्वीकार कर लेना कहलाता है-
(A) बौद्धिक दासता
(B) बौद्धिक विलास
(C) बौद्धिक उन्नति
(D) बौद्धिक दिवालिया
उत्तर-
(A) बौद्धिक दासता

प्रश्न 19.
संभ्रांत महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर कितने हजार की सौंदर्य सामग्री का होना मामूली बात है ?
(A) दस
(B) बीस
(C) तीस
(D) चालीस
उत्तर-
(C) तीस

प्रश्न 20.
सामान्य जन किस समाज को ललचाई दृष्टि से देखते हैं ?
(A) पूँजीपति समाज
(B) विशिष्टजन समाज
(C) संत-समाज
(D) वेतनभोगी समाज
उत्तर-
(B) विशिष्टजन समाज

प्रश्न 21.
लेखक के अनुसार भारत में अशांति और आक्रोश का प्रमुख कारण क्या है ?
(A) दिखावे की संस्कृति का विकास
(B) संस्कृति को भूल जाना
(C) संस्कृति का परिवर्तन
(D) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
उत्तर-
(A) दिखावे की संस्कृति का विकास

प्रश्न 22.
भारतीय संस्कृति के पुराने संस्कार सिखाते हैं-
(A) संतोषमय जीवन जीना
(B) आवेशमय जीवन जीना
(C) आक्रोशमय जीवन जीना
(D) प्रतियोगितामय जीवन जीना
उत्तर-
(A) संतोषमय जीवन जीना

प्रश्न 23.
आधुनिक चकाचौंध में भारतीय किस पीड़ा से पीड़ित हैं ?
(A) वियोग की
(B) लक्ष्य भ्रम की
(C) अपव्यय की
(D) धन की बचत होने की
उत्तर-
(B) लक्ष्य भ्रम की

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

उपभोक्तावाद की संस्कृति प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। एक नयी जीवन-शैली अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। उसके साथ आ रहा है एक नया जीवन-दर्शन-उपभोक्तावाद का दर्शन। उत्पादन बढ़ाने पर ज़ोर है चारों ओर। यह उत्पादन आपके लिए है; आपके भोग के लिए है, आपके सुख के लिए है। ‘सुख’ की व्याख्या बदल गई है। उपभोग-भोग ही सुख है। एक सूक्ष्म बदलाव आया है नई स्थिति में। उत्पाद तो आपके लिए हैं, पर आप यह भूल जाते हैं कि जाने-अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं। [पृष्ठ 35]

शब्दार्थ-जीवन-शैली = जीवन जीने का ढंग। वर्चस्व = प्रमुखता। जीवन-दर्शन = जीवन संबंधी विचारधारा। उत्पादन = निर्माण। माहौल = वातावरण। समर्पित होना = अपने-आपको सौंप देना।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसके रचयिता श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस पाठ में लेखक ने आज की उपभोक्तावादी संस्कृति और विज्ञापन की चमक-दमक से भ्रमित समाज आदि के प्रश्नों पर प्रकाश डाला है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के विकास के कारण सामाजिक परिस्थितियों में बदलाव आ गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने बताया है कि आज भौतिक विकास के कारण समाज में धीरे-धीरे सब कुछ बदल रहा है। आज एक नए जीवन जीने के ढंग की प्रमुखता स्थापित हो रही है। जीवन के प्रति नई सोच, विचारधारा, दर्शन अथवा उपभोक्तावाद का दर्शन आ रहा है। चारों ओर उत्पादन बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है अर्थात अधिक-से-अधिक वस्तुओं का निर्माण किया जा रहा है। यह उत्पादन आपके उपभोग के लिए है। आप इन सब वस्तुओं का प्रयोग करके सुख प्राप्त कर सकते हैं। आज के युग में सुख की परिभाषा बदल गई है। पहले सुख संतुष्टि या संतोष से संयमपूर्वक जीवन जीने से प्राप्त होता था। अब उपभोग-भोग ही सुख है अर्थात् अधिक-से-अधिक वस्तुओं का उपभोग ही सुख है। इस प्रकार इन परिस्थितियों में जीवन में एक सूक्ष्म बदलाव आया है। जीवन जीने के मानदंड अथवा मूल्य ही बदल गए हैं। अधिकाधिक भोग में संतुष्टि नहीं है। उपभोग की कामनाएँ बढ़ती ही जाती हैं। निश्चय ही, सभी उत्पादन हमारे लिए हैं, किन्तु हम यह भूल गए हैं जाने-अनजाने आज के वातावरण में हमारा चरित्र भी बदल गया है। हम आज उत्पादनों के प्रति अपने-आपको अर्पित कर रहे हैं। वस्तुतः विकास के साथ-साथ हमारे चरित्र का भी विकास होना चाहिए था, परन्तु ऐसा लगता है कि जैसे हम केवल उत्पादकों के भोग के लिए जी रहे हैं। यही हमारे जीवन का लक्ष्य बन गया है।

विशेष-

  1. लेखक ने आज की उपभोक्तावादी परिस्थितियों पर करारा व्यंग्य किया है।
  2. भौतिकवाद की कमियों की ओर संकेत किया गया है।
  3. उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास के साथ-साथ मानव चरित्र में आई गिरावट का उद्घाटन करना भी लेखक का लक्ष्य है।
  4. भाषा-शैली सरल, सहज एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) धीरे-धीरे क्या बदल रहा है ?
(2) उपभोक्तावाद किसे कहते हैं ?
(3) सुख की व्याख्या में क्या परिवर्तन आया है ?
(4) हम क्या भूल जाते हैं ?
उत्तर-
(1) धीरे-धीरे हमारा वातावरण बदल रहा है। एक नई संस्कृति पनप रही है। जीने का नया ढंग हम पर हावी हो रहा है।
(2) उपभोग को ही जीवन का सब कुछ मान लेना, उपभोक्तावाद कहलाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मनुष्य उपभोग को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान लेता है।
(3) पहले सुख के अंतर्गत शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक हर प्रकार का आनंद व संतुष्टि आती थी। किन्तु अब तो केवल उपभोग के साधनों को भोगना ही सुख कहलाता है।
(4) हम भूल जाते हैं कि जाने-अनजाने में आज के माहौल में हमारा चरित्र बदल रहा है। हम उत्पादन को समर्पित होते जा रहे हैं। हम उत्पादों के पूर्णतः गुलाम बनते जा रहे हैं।

2. संभ्रांत महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हज़ार की सौंदर्य सामग्री होना तो मामूली बात है। पेरिस से परफ्यूम मँगाइए, इतना ही और खर्च हो जाएगा। ये प्रतिष्ठा-चिह्न हैं, समाज में आपकी हैसियत जताते हैं। पुरुष भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। पहले उनका काम साबुन और तेल से चल जाता था। आफ्टर शेव और कोलोन बाद में आए। अब तो इस सूची में दर्जन-दो दर्जन चीजें और जुड़ गई हैं। [पृष्ठ 36]

शब्दार्थ-संभ्रांत = अमीर। सौंदर्य = सुंदरता। परफ्यूम = सुगंधित तेल । प्रतिष्ठा = सम्मान। आफ्टर शेव = शेव करने के बाद लगाया जाने वाला पदार्थ।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित एवं श्री श्यामाचरण दुबे द्वारा रचित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक निबंध से लिया गया है। इस पाठ में लेखक ने आज के युग में बढ़ती हुई उपभोक्तावादी प्रवृत्ति के दुष्परिणामों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट किया है। इन पंक्तियों में अमीर वर्ग की स्त्रियों द्वारा सौंदर्य प्रसाधनों पर किए गए फिजूलखर्च का वर्णन किया गया है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने उपभोक्तावादी संस्कृति के विकास में अंधी प्रतिस्पर्धा का उल्लेख करते हुए कहा है कि आज अमीर वर्ग की नारियाँ केवल अपने-आपको श्रेष्ठ दिखाने की ललक में महँगे-से-महँगे सौंदर्य प्रसाधन खरीदती हैं। एक संभ्रांत महिला के ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हजार की सौंदर्य सामग्री का होना उसके लिए साधारण-सी बात है। ये लोग पेरिस से सुगंधित तेल मँगवाते हैं, जो इतनी ही कीमत में आते हैं। ऐसे महँगे सौंदर्य प्रसाधनों की आवश्यकता नहीं, अपितु ये तो प्रतिष्ठा के चिह्न हैं। समाज में अमीर होने के भाव को प्रदर्शित करते हैं तथा उनकी हैसियत भी बताते हैं कि उनमें कितना धन खर्च करने की शक्ति है। यह बात स्त्रियों पर ही लागू नहीं, अपितु पुरुष भी आज इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। पहले पुरुष केवल साबुन और तेल का ही प्रयोग करते थे। अब तो आफ्टर शेव, कोलोन आदि तरह-तरह के सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग भी खूब करते हैं। अब तो सौंदर्य प्रसाधनों की सूची में दर्जन-दो-दर्जन चीजें और जुड़ गई हैं। कहने का तात्पर्य है कि उपभोक्तावादी संस्कृति में कुछ वस्तुएँ तो पहले की भाँति अनिवार्य हैं किन्तु कुछ समाज में अपनी हैसियत का प्रदर्शन करने के लिए खरीदी जाती हैं।

विशेष-

  1. लेखक ने अमीर वर्ग के लोगों की प्रदर्शनप्रिय वृत्ति पर व्यंग्य किया है।
  2. उपभोक्तावादी संस्कृति फिजूलखर्ची को अधिक बढ़ावा देती है।
  3. अन्य प्रतिस्पर्धाओं की भाँति सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग की प्रतिस्पर्धा पर भी प्रकाश डाला गया है।
  4. भाषा व्यंग्यात्मक एवं प्रभावशाली है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) संभ्रांत महिलाएँ कौन हैं ? उनकी किस वृत्ति पर कटाक्ष किया गया है ?
(2) सौंदर्य प्रसाधन क्या बनते जा रहे हैं ?
(3) पुरुष वर्ग भी किस दौड़ से पीछे नहीं और कैसे ?
(4) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
(1) अमीर परिवारों की महिलाओं को संभ्रांत महिलाएँ कहा जाता है। लेखक ने उनकी फिजूलखर्ची पर कटाक्ष किया है। उनकी ड्रेसिंग टेबल पर तीस-चालीस हजार की सामग्री का होना तो मामूली बात है।
(2) सौंदर्य प्रसाधन आज के समाज की झूठी प्रतिष्ठा के प्रतीक बनते जा रहे हैं। इससे समाज में आपकी हैसियत का पता चलता है।
(3) पुरुष वर्ग भी सौंदर्य प्रसाधन प्रयोग की अंधी दौड़ में पीछे नहीं रहा। पहले पुरुष साबुन व तेल से काम चला लेते थे। अब तो वे भी इस तरह साबुन, शैंपू, आफ्टर शेवलोशन, कोलोन आदि का प्रयोग करते हैं। उनकी इस सूची में और भी कई वस्तुएँ जुड़ गई हैं।
(4) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि उपभोक्तावाद के इस युग में जहाँ फिजूलखर्ची बड़ी वहीं दिखावे की भावना ने भी जन्म लिया। कुछ ऐसी वस्तुएँ हैं जिनका वास्तव में इतना प्रयोग नहीं होता अपितु अपनी प्रतिष्ठा बनाने के लिए उन्हें महँगे दामों में खरीदकर रखा जाता है। इस दौड़ में स्त्रियों के साथ-साथ पुरुष भी आगे बढ़ रहे हैं।

3. हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात कितनी ही करें; परंपराओं का अवमूल्यन हुआ है, आस्थाओं का क्षरण हुआ है। कड़वा सच तो यह है कि हम बौद्धिक दासता स्वीकार कर रहे हैं, पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेश बन रहे हैं। हमारी नई संस्कृति अनुकरण की संस्कृति है। [पृष्ठ 37]

शब्दार्थ-अस्मिता = अस्तित्व, सत्ता। अवमूल्यन = मूल्यों में गिरावट आना। आस्था = विश्वास। क्षरण = विनाश । दासता = गुलामी। अनुकरण = पीछे चलने वाली।

प्रसंग-प्रस्तुत अवतरण हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक निबंध में से उद्धृत है। इसके रचयिता श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस निबंध में लेखक ने आज के युग में पनपती ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ के दुष्परिणामों से सावधान किया है। इन पंक्तियों में लेखक ने बताया है कि इस संस्कृति के विकास से मानवीय जीवन-मूल्यों को हानि पहुँची है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक का मत है कि आज हम भले ही अपने सांस्कृतिक जीवन की कितनी ही बातें क्यों न करें, किन्तु इसमें संदेह नहीं है कि इस नई संस्कृति के विकास से अर्थात् उपभोक्तावादी संस्कृति से हमारी परंपराओं के मूल्य में गिरावट अवश्य आई है। हमारे विश्वासों का भी. विनाश हुआ है। आज हम केवल भौतिक विकास की बात तो करते हैं, किन्तु इससे भावात्मक संबंधों के टूटने की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। यह कटु सत्य है कि हम बौद्धिक दासता को स्वीकार करते जा रहे हैं अर्थात् मानसिकता के स्तर पर हम दूसरों के गुलाम बनते जा रहे हैं। हमारी अपनी सोच व जीवन-शैली समाप्त हो रही है। पश्चिम देशों के लोगों ने अपने सांस्कृतिक उपनिवेश बना लिए हैं। आज की उपभोक्तावाद की नई संस्कृति वस्तुतः हमारी संस्कृति नहीं रही, अपितु वह दूसरों की नकल की संस्कृति बन गई है। कहने का भाव है कि आज की उपभोक्तावादी सोच के कारण हमारी भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आघात पहुँचा है और हम पश्चिमी सभ्यता एवं संस्कृति के मानसिक तौर पर गुलाम बनते जा रहे हैं।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 3 उपभोक्तावाद की संस्कृति

विशेष-

  1. लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सचेत एवं सावधान किया है।
  2. भाषा-शैली विषयानुकूल एवं विश्लेषणात्मक है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) ‘सांस्कृतिक अस्मिता’ से आप क्या समझते हैं ?
(2) कड़वा सच क्या है ?
(3) कौन और कैसे बौद्धिक दास बने हैं ?
(4) सांस्कृतिक उपनिवेश क्या होते हैं ?
उत्तर-
(1) सांस्कृतिक अस्मिता, इन दोनों शब्दों के अर्थ अलग-अलग हैं। सांस्कृतिक का अर्थ है संस्कृति से संबंधित या विशेष जीवन-शैली जिसे अपनाकर लोग जीवन व्यतीत करते हैं। अस्मिता का अर्थ है-पहचान। इस प्रकार सांस्कृतिक अस्मिता का तात्पर्य है एक ऐसी जीवन-शैली जिससे किसी समाज विशेष की पहचान होती है।
(2) लेखक ने इस बात को कड़वा सच बताया है कि हम भारतीय अपनी परंपराओं एवं विचारधाराओं से हटकर पश्चिम से आई उपभोक्तावादी संस्कृति को स्वीकार करते जा रहे हैं।
(3) भारतवासी पश्चिम देशों की बौद्धिकता के दास बनते जा रहे हैं अर्थात हम भारतीय अपनी विचारधारा व सोच को हेय समझते हैं। पश्चिमी विचारों को श्रेष्ठ समझकर उन्हें अपना रहे हैं। इस प्रकार दूसरों की सोच को सही मानकर हम उनके बौद्धिक दास बन रहे हैं।
(4) जब कोई शक्तिशाली देश विजेता के रूप में दूसरे देश पर अपनी संस्कृति या जीवन-शैली को बलात् थोपता है और वहाँ के लोग उसे स्वीकार करके अपनी पहचान भूल जाते हैं, तब वह देश विजेता देश का सांस्कृतिक उपनिवेश बन जाता है। कहने का भाव है कि अपनी संस्कृति व विचारधारा तथा जीवन-शैली का प्रचार-प्रसार करके अपनी तरह की एक और कॉलोनी बना लेना।

4. समाज में वर्गों की दूरी बढ़ रही है, सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है। जीवन स्तर का यह बढ़ता अंतर आक्रोश और अशांति को जन्म दे रहा है। जैसे-जैसे दिखावे की यह संस्कृति फैलेगी, सामाजिक अशांति भी बढ़ेगी। हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का हास तो हो ही रहा है, हम लक्ष्य-भ्रम से भी पीड़ित हैं। विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं, हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। [पृष्ठ 38]

शब्दार्थ-सरोकार = संबंध, मेल-मिलाप। अंतर = भीतरी। आक्रोश = विरोध। अस्मिता = अस्तित्व, पहचान। हास = विनाश। लक्ष्य-भ्रम = उद्देश्य से भटकना। पीड़ित = दुखी। विराट = महान् । तुष्टि = संतुष्टि, पूर्ति । तात्कालिक = क्षणिक, उसी समय का।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हमारी हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इस पाठ के लेखक श्री श्यामाचरण दुबे हैं। इस प्राठ में लेखक ने उपभोक्तावाद की संस्कृति से उत्पन्न खतरों के प्रति हमें सावधान किया है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि आज उपभोक्तावाद के विकास से सामाजिक संबंधों में बिखराव आया है और मानसिक अशांति भी बढ़ी है। हम अपने जीवन के महान उद्देश्यों को भूल गए हैं।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने बताया है कि हम उपभोक्तावाद की इस संस्कृति के विकास से समाज में विद्यमान वर्गों की दूरियाँ बढ़ी हैं अर्थात् अमीर और अमीर होता जा रहा है तथा गरीब और गरीब। मालिक और नौकर तथा कारखानेदार और मजदूर में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है। आपसी सद्भाव की भावना समाप्त होती जा रही है। एक ओर जीवन स्तर बढ़ता जा रहा है तो दूसरी ओर मन की शांति समाप्त होती जा रही है। हर व्यक्ति विकास के लिए व्याकुल है। लोगों के मन में आक्रोश की भावना बढ़ती जा रही है। लेखक का मत है कि जैसे-जैसे उपभोक्तावादी संस्कृति का प्रसार एवं विकास होगा, वैसे-वैसे सामाजिक अशांति बढ़ेगी। उपभोक्तावाद के विकास से प्रतिस्पर्धा का जन्म होता है और प्रतिस्पर्धा में कभी किसी को चैन नहीं मिलता। इससे समाज में अशांति को बढ़ावा मिलता है। हमारे सांस्कृतिक जीवन का विनाश हो रहा है। हम अपनी संस्कृति को भूलकर उपभोक्तावाद की संस्कृति की ओर बढ़ रहे हैं। आज हम अपने लक्ष्य से भटकने की पीड़ा से पीड़ित हैं। हमारे सामने कोई स्पष्ट एवं महान् उद्देश्य नहीं है, इसलिए हम भटकने की स्थिति में फँस गए हैं। हम झूठी तुष्टि के क्षणिक लक्ष्यों को अपनाते जा रहे हैं। तात्कालिक लक्ष्यों की पूर्ति से कभी भी स्थायी शांति प्राप्त नहीं हो सकती।

विशेष-

  1. लेखक ने उपभोक्तावाद से उत्पन्न नई संस्कृति में समाज के विभिन्न वर्गों में उत्पन्न संघर्ष व दूरियों की स्थिति पर प्रकाश डाला है।
  2. तात्कालिक व क्षणिक लक्ष्यों की अपेक्षा अपने जीवन में विराट एवं उदात्त लक्ष्यों की अपनाने की प्रेरणा दी गई है।
  3. भाषा-शैली अत्यंत सरल, स्पष्ट एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-

(1) आज के समाज की सबसे बड़ी चिंता क्या है ?
(2) समाज में आक्रोश और अशांति क्यों बढ़ रही है ?
(3) हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का हास कैसे हो रहा है ?
(4) ‘झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्य’ का क्या अभिप्राय है ?
उत्तर-
(1) आज के समाज की सबसे बड़ी चिंता यह है कि समाज के विभिन्न वर्गों की दूरियाँ बढ़ती जा रही हैं। सामाजिक संबंध बिखरते जा रहे हैं।
(2) जीवन स्तर के बढ़ते अंतर के कारण समाज में अशांति और आक्रोश बढ़ रहा है। आज अमीर अधिक अमीर होता जा रहा है। आम आदमी की खरीदने की क्षमता कम होती जा रही है। इस वर्ग के मन में इसलिए अशांति और आक्रोश है और धनी वर्ग में आपसी प्रतियोगिता की भावना के कारण अशांति है।
(3) आज हम अपनी जीवन-शैली, रहन-सहन व सोच को त्यागकर पश्चिम की जीवन-शैली और सोच को अपनाते जा रहे हैं। इसलिए हमारी सांस्कृतिक अस्मिता (पहचान) का ह्रास (हानि) हो रहा है।
(4) मानव को भोग के साधनों के उपभोग से कभी संतुष्टि नहीं हो सकती। इनके उपभोग की इच्छा बढ़ती ही जाती है। फिर वह इन्हीं को सुख मानकर मन को सांत्वना दे देता है। इसे ही ‘झूठी तुष्टि’ कहते हैं। इस झूठी तुष्टि को प्राप्त करने का तात्कालिक लक्ष्य है-उपभोग के आधुनिक साधन; जैसे एल.इ.डी., फ्रिज, कंप्यूटर, कार, मोबाइल फोन आदि।

उपभोक्तावाद की संस्कृति Summary in Hindi

उपभोक्तावाद की संस्कृति लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री श्यामाचरण दुबे का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री श्यामाचरण दुबे का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-श्री श्यामाचरण दुबे का नाम सामाजिक वैज्ञानिकों में बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने भारतीय समाज की बदलती परिस्थितियों पर जमकर लिखा है। ऐसे गंभीर चिंतक का जन्म सन् 1922 में मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में हुआ। उन्होंने आरंभिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में प्राप्त की। बाद में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से मानव-विज्ञान में पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। वे भारत के अग्रणी समाज-वैज्ञानिक रहे हैं। उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन कार्य किया तथा अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर भी सफलतापूर्वक कार्य किया। इसके साथ ही आजीवन लेखन-कार्य भी किया। ऐसे महान् लेखक का निधन सन् 1996 में हुआ।

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2. प्रमुख रचनाएँडॉ० श्यामाचरण दुबे ने अनेक ग्रंथों की रचना की है। उनमें से हिंदी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं’मानव और संस्कृति’, ‘परंपरा और इतिहास बोध’, ‘संस्कृति तथा शिक्षा’, ‘समाज और भविष्य’, ‘भारतीय ग्राम’, ‘संक्रमण की पीड़ा’, ‘विकास का समाज-शास्त्र’, ‘समय और संस्कृति’ आदि।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-डॉ० श्यामाचरण दुबे जहाँ महान् समाजशास्त्री हैं, वहीं साहित्यकार भी हैं। उन्होंने आजीवन अध्यापन कार्य किया। उन्होंने अपने युग के समाज, जीवन और संस्कृति का गहन अध्ययन किया है। उनसे संबंधित ज्वलंत विषयों पर उनके विश्लेषण और स्थापनाएँ उल्लेखनीय हैं। डॉ० -दुबे ने आज के बदलते जीवन मूल्यों में आ रही गिरावट पर चिंता व्यक्त की है। वे परिवर्तन के विरोधी नहीं हैं, अपितु गलत दिशा में हो रहे परिवर्तनों का उन्हें बेहद दुःख है। आज के भौतिकतावादी और प्रतियोगिता की अंधी दौड़ के युग में वे चाहते हैं कि हमें विकास तो करना चाहिए, किन्तु अपनी सभ्यता और संस्कृति का मूल्य चुकाकर नहीं। व्यक्तिगत विकास व सुख के साथ-साथ परोपकार की भावना को नहीं भूलना चाहिए। ऐसा उनका स्पष्ट मत है।
भारत की जन-जातियों और ग्रामीण समुदायों पर केंद्रित उनके लेखों ने बृहत समुदाय का ध्यान आकृष्ट किया है। वे जानते हैं कि भारतवर्ष की संस्कृति की जड़ें यहाँ के ग्रामीण जीवन में ही फँसी हुई हैं। यदि हम अपनी संस्कृति के वास्तविक रूप को देखना चाहते हैं तो हमें ग्रामीण जीवन-शैली को समझना होगा।

4. भाषा-शैली-श्री श्यामाचरण दुबे के साहित्य की भाषा-शैली अत्यंत सरल, सहज एवं स्वाभाविक है। वे जटिल विचारों को तार्किक विश्लेषण के साथ सहज भाषा में व्यक्त करने की कला में कुशल हैं। उनकी भाषा में वाक्य-गठन अत्यंत सरल एवं स्पष्ट है। उन्होंने लोक प्रसिद्ध मुहावरों एवं लोकोक्तियों का प्रयोग भी विषयानुकूल किया है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ शीर्षक पाठ का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘उपभोक्तावाद की संस्कृति’ आज के जीवन की समस्या को उजागर करने वाला निबंध है। यह पाठ बाजार की गिरफ्त में आ रहे समाज की वास्तविकता को प्रस्तुत करता है। आज का युग तीव्र गति से बदल रहा है। इस बदलते युग में एक नई जीवन-शैली का उद्भव हो रहा है। इसके साथ ही उपभोक्तावादी जीवन-दर्शन भी आ रहा है। चारों ओर उत्पादन के बढ़ाने पर बल दिया जा रहा है। यह सब हमारे सुख के लिए तथा भोग के लिए हो रहा है। आज सुख की परिभाषा भी बदल गई है। वस्तुओं का भोग ही सुख समझा जाने लगा है। नई परिस्थितियों में जाने-अनजाने में हमारा चरित्र ही बदलता जा रहा है। हम अपने-आपको उत्पाद को अर्पित करते जा रहे हैं।

आज बाजार विलासिता की वस्तुओं से भरा पड़ा है। आज हमें लुभाने के लिए दैनिक जीवन मे काम आने वाली वस्तु के तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। उदाहरणार्थ, टूथ-पेस्ट को ही ले लीजिए। कितने ही प्रकार के टूथ-पेस्ट आ गए हैं।

प्रत्येक टूथ-पेस्ट के अलग-अलग गुण बताकर हमें लुभाया जा रहा है। इसी प्रकार टूथ-ब्रश के लिए भी तरह-तरह के विज्ञापन दिए जा रहे हैं। इससे हम इनके प्रति आकृष्ट होकर आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। इसी प्रकार सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुओं को देख सकते हैं। प्रति माह बाजार में नए-नए उत्पादन आ रहे हैं। उच्चवर्ग की महिलाएँ तो अपने ड्रेसिंग टेबल पर तीस-तीस हजार रुपए का सामान खरीदकर रख लेती हैं। यह सब उनके उपभोग के लिए कम और प्रतिष्ठा के लिए अधिक है। पुरुष भी इस दौड़ में पीछे नहीं रहते।

इसी प्रकार वस्त्रों की दुनिया में भी यही दशा है। जगह-जगह बुटीक खुल गए हैं। नए-नए डिजाइन के परिधान बाजार में आ गए हैं। प्रतिदिन नए-नए डिज़ाइन आते हैं और पहले वाले परिधान व्यर्थ लगने लगते हैं। इसी प्रकार घड़ी का काम समय बताना है। चार-पाँच सौ रुपए की घड़ी भी यह काम करती है, किन्तु अपनी प्रतिष्ठा दिखाने के लिए पचास-साठ हजार रुपए की ही नहीं लाख, डेढ़ लाख रुपए की घड़ियाँ भी खरीदी जाती हैं। इसी प्रकार म्यूजिक सिस्टम और कंप्यूटर आदि वस्तुएँ भी अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने के लिए खरीदी जाती हैं। यह बात उच्च वर्ग के लिए ही नहीं है, अपितु मध्य वर्ग के लोग भी पीछे नहीं रहते। अतः समाज में उपभोक्तावाद की संस्कृति के युग में अंधी होड़ से समाज में जीवन-स्तर भले ऊपर उठ रहा हो, किन्तु सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं।

आज बात भोजन खाने की हो या फिर बच्चों को स्कूल में प्रवेश दिलवाने की हो, पाँच सितारा होटल या स्कूल का होना अनिवार्य है। बीमार पड़ने पर पाँच सितारा अस्पतालों में जाना भी प्रतिष्ठा का प्रदर्शन है। इतना ही नहीं, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में तो स्वयं मरने से पहले ही अपने अंतिम संस्कार और अनंत विश्राम का प्रबंध भी कर सकते हैं, किन्तु एक विशेष मूल्य चुकाकर। आने वाले समय में यह कार्य भारत में भी हो सकता है। प्रतिष्ठा के अनेक रूप हो सकते हैं, भले ही वे हास्यास्पद ही क्यों न हों। यह उदाहरण विशिष्टजन समाज (धनी लोगों) का है, किन्तु साधारण व्यक्ति भी इसे ललचाई हुई दृष्टि से देखते हैं तथा अपने मन की शांति को खो बैठते हैं।

भारतवर्ष में धनी लोग अर्थात् सामंती संस्कृति के तत्त्व पहले भी रहे हैं, किन्तु आज सामंती संस्कृति के अर्थ बदल गए हैं। आज हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात भले ही करें, किन्तु सच्चाई यह है कि परंपराओं का अवमूल्यन हो रहा है और आस्थाएँ टूट रही हैं। हम पश्चिम की बौद्धिक दासता को तेज गति से अपनाने में लगे हुए हैं। आज की नई संस्कृति केवल ढोंग है। यह तो अनुकरण संस्कृति है। प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में हम अपने को खोकर छदम आधुनिकता की गिरफ्त में आते जा रहे हैं, दिग्भ्रमित हो रहे हैं। हमारा समाज ही दूसरे से निर्देशित हो गया है। विज्ञापन और प्रसार के साधनों ने हमारी मानसिकता बदल डाली है।

लेखक ने इस संस्कृति के फैलाव व प्रसार के परिणाम के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त की है। हमारे सीमित साधनों का अपव्यय हो रहा है। जीवन की गुणवत्ता आलू के चिप्स से नहीं सुधर सकती और न ही नए बहुविज्ञापित शीतल पेयों से। आज उपभोक्तावाद की संस्कृति के उदय के कारण आपसी दूरी बढ़ती जा रही है। जीवन का बढ़ता हुआ स्तर मानव-जीवन में अशांति और आक्रोश को जन्म दे रहा है। दिखावे की संस्कृति से अशांति बढ़ेगी तथा सांस्कृतिक अस्मिता का विनाश होगा। हमारे विराट उद्देश्य धुंधले पड़ गए हैं तथा मर्यादाएँ टूट रही हैं। नैतिकता पीछे छूटती जा रही है। स्वार्थ परमार्थ पर भारी पड़ता जा रहा है। भोग की कामनाएँ आकाश को छू रही हैं। इनकी कोई सीमा दिखाई नहीं देती।

गांधी जी ने कहा था कि स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाज़े-खिड़की खुले रखें पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें। उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमारी सामाजिक नींव को ही हिलाकर रख दिया है। यह हमारे लिए चिंता एवं चुनौती का विषय है।

कठिन शब्दों के अर्थ –

(पृष्ठ-35) : वर्चस्व = प्रधानता। स्थापित होना = बनना। जीवन-दर्शन = जीवन के प्रति विचारधारा, सोच। उत्पादन = वस्तुओं का निर्माण। सूक्ष्म = बारीक । बदलाव = परिवर्तन। माहौल = वातावरण, परिस्थितियाँ । विलासिता = ऐश्वर्य। लुभाना = आकृष्ट करना। दुर्गंध = बदबू। मैजिक फार्मूला = जादुई तरीका। बहुविज्ञापित = अत्यधिक प्रचारित/सूचित। कीमती ब्रांड = महँगी वस्तु। सौंदर्य प्रसाधन = सुंदरता बढ़ाने वाली सामग्री।

(पृष्ठ-36) : जर्स = सूक्ष्म कीटाणु। संभ्रांत औरतें = अमीर महिलाएँ। प्रतिष्ठा-चिहून = सम्मानसूचक। परिधान = पहनने के वस्त्र। बुटीक = वस्त्र भंडार। ट्रेंडी = रिवाज के। म्यूज़िक सिस्टम = संगीत के साधन।

(पृष्ठ-37) : हास्यास्पद = हँसी के योग्य। विशिष्टजन = विशेष व्यक्ति (अमीर लोग)। निगाहें = नज़रें । सामंत = अमीर लोग। मुहावरा बदलना = अर्थ में परिवर्तन होना। अस्मिता = पहचान, अस्तित्व। अवमूल्यन = मूल्य गिरा देना।
प्रतिस्पर्धा = होड़। उपनिवेश = वह विजित देश, जिसमें विजेता राष्ट्र के लोग आकर बस गए हों।

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(पृष्ठ-38) : गिरफ्त = पकड़। नियंत्रक = नियंत्रण करने वाली। क्षीण = कमजोर। दिग्भ्रमित = दिशाहीन, रास्ते से भटकना। वशीकरण = वश में करना। अपव्यय = फिजूलखर्च। आक्रोश = गुस्सा। तात्कालिक = उसी समय का। परमार्थ = दूसरों की भलाई। हावी होना = प्रभाव पड़ना। आकांक्षाएँ = इच्छाएँ। आसमान को छूना = बहुत अधिक बढ़ना। बुनियाद = नींव।

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HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

HBSE 9th Class Hindi ल्हासा की ओर Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
थोङ्ला के पहले के आखिरी गाँव पहुँचने पर भिखमंगे के वेश में होने के बावजूद लेखक को ठहरने के लिए उचित स्थान मिला जबकि दूसरी यात्रा के समय भद्रवेश भी उन्हें उचित स्थान नहीं दिला सका। क्यों ?
उत्तर-
लेखक जब पहली बार तिब्बत की यात्रा पर गया तो एक भिखारी के वेश में था। यात्रा के समय मार्ग में उसकी मुलाकात मंगोल जाति के बौद्ध भिक्षु से हुई थी, जिसे लेखक ने सुमति का नाम दिया। सुमति की तिब्बत के गाँवों में बहुत जान-पहचान थी। वहाँ के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। उसके साथ होने के कारण ही लेखक को भिखारी के वेश में भी ठहरने का उचित स्थान मिला था। किन्तु दूसरी बार वह एक सम्मानित यात्री के रूप में संध्या के समय तिब्बत पहुंचा था। उस समय वहाँ के लोग नशीला पदार्थ पीने के कारण नशे की अवस्था में थे। इसलिए उसे ठहरने के लिए कोई उचित स्थान नहीं मिला था।

प्रश्न 2.
उस समय के तिब्बत में हथियार का कानून न रहने के कारण यात्रियों को किस प्रकार का भय बना रहता था ?
उत्तर-
उस समय जब लेखक ने तिब्बत की यात्रा की थी तब वहाँ हथियार का कानून न होने के कारण लोग लाठियों की भाँति पिस्तौल और बंदूक उठाए फिरते थे। उस समय एकांत मार्ग पर चलते समय डाकुओं का भय सदा बना रहता था कि कहीं कोई डाकू उनका खून न कर डाले। कहने का भाव है कि यात्रियों के साथ लूटपाट व उनकी हत्या होने का भय बना रहता था।

प्रश्न 3.
लेखक लड़कोर के मार्ग में अपने साथियों से किस कारण पिछड़ गया था ?
उत्तर-
लेखक के अपने साथियों से पिछड़ने के मुख्यतः दो कारण थे-

  1. उसका घोड़ा बहुत धीमी चाल से चल रहा था।
  2. दूसरा कारण था कि लेखक रास्ता भूल गया था। उसे एक-डेढ़ मील चलने पर पता चला था कि वह गलत मार्ग पर जा रहा है। वहाँ से लौटने में भी उसे देरी हो गई थी।

प्रश्न 4.
लेखक ने शेकर विहार में सुमति को उनके यजमानों के पास जाने से रोका, परन्तु दूसरी बार रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया ?
उत्तर-
शेकर विहार में लेखक का मित्र सुमति अपने यजमानों को, जो आसपास के गाँवों में रहते थे, मिलना चाहता था। लेखक ने उसे इसलिए रोका क्योंकि वह अपने यजमानों से मिलने में कई दिन लगा देता और यात्रा में और भी विलंब हो जाता। दूसरी बार लेखक ने सुमति को यजमानों से मिलने के लिए इसलिए नहीं रोका क्योंकि लेखक मंदिर में रखी हस्तलिखित कन्जुर (बुद्धवचन-अनुवाद) की पोथियों को पढ़ना चाहता था। उसके जाने पर उसे उन पोथियों को पढ़ने का समय मिल जाता।

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प्रश्न 5.
अपनी यात्रा के दौरान लेखक को किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ? [H.B.S.E. March, 2017]
उत्तर-
लेखक को पहाड़ों पर पैदल चलना पड़ा था। इसके साथ ही लेखक को अपना सामान भी स्वयं उठाना पड़ा था। दूसरी बड़ी कठिनाई यह रही कि लेखक साधारण यात्री के वेश में नहीं था। उसने भिखमंगे का रूप धारण किया हुआ था जबकि तिब्बत में भिखमंगों के प्रति आदर का भाव नहीं रखा जाता था। इसलिए लेखक को कदम-कदम पर संदेह की दृष्टि से देखा जाता था। लेखक को भार ढोने वाला व्यक्ति न मिलने पर भी यात्रा में कठिनाई का सामना करना पड़ा। एक स्थान पर जब लेखक ने भार उठाने और सवार होने के लिए घोड़ा लिया तो वह बहुत ही धीमी गति से चला, फलस्वरूप लेखक अपने अन्य साथियों से पिछड़ गया। निर्जन मार्ग पर चलते समय डाकुओं द्वारा लूटने व हत्या होने का भय भी लेखक के मन में था।

प्रश्न 6.
प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत के आधार पर बताइए कि उस समय का तिब्बती समाज कैसा था ?
उत्तर-
जिस समय लेखक ने तिब्बत की यात्रा की थी, उस समय तिब्बत का सामाजिक ढाँचा व्यवस्थित था। वहाँ पर जातिगत भेदभाव नहीं किया जाता था। सब एक-दूसरे को समान समझते थे। स्त्रियाँ भी परदा नहीं करती थीं। भिखमंगों को छोड़कर सभी का आदर या सम्मान किया जाता था। किन्तु हथियार रखने का कानून न होने के कारण वहाँ प्रत्येक व्यक्ति लाठी की भाँति हथियार (पिस्तौल व बंदूक) उठाए फिरता था। निर्जन मार्ग में डाकुओं का भय भी था। तिब्बत में जागीरदारी व्यवस्था थी। वहाँ छोटे-बड़े सभी प्रकार के जागीरदार थे, किन्तु अधिकाँश जागीरें बौद्ध विहारों के पास थीं। खेतों में काम करने वाले मजदूरों का शोषण किया जाता था। जागीरों में बौद्ध भिक्षुओं को राजा के समान आदर दिया जाता था।

प्रश्न 7.
‘मैं अब पुस्तकों के भीतर था। नीचे दिए गए विकल्पों में से कौन-सा इस वाक्य का अर्थ बतलाता है-
(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।
(ख) लेखक पुस्तकों की शैल्फ के भीतर चला गया।
(ग) लेखक के चारों ओर पुस्तकें ही थीं।
(घ) पुस्तक में लेखक का परिचय और चित्र छपा था।
उत्तर-
(क) लेखक पुस्तकें पढ़ने में रम गया।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 8.
सुमति के यजमान और अन्य परिचित लोग लगभग हर गाँव में मिले। इस आधार पर आप सुमति के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का चित्रण कर सकते हैं ?
उत्तर-
सुमति के यजमान और अन्य परिचितों का हर गाँव में मिलने से पता चलता है कि वह बहुत ही मिलनसार व्यक्ति है। वह सबके भले की कामना करता है, तभी उसे हर गाँव में सम्मान दिया जाता है। वह परोपकारी व्यक्ति है। वह हमारे लेखक के लिए तिब्बत में प्रवेश की राहदारी बनवाता है और अपने परिचितों के यहाँ ठहराता है। वह थोड़ा-सा लालची प्रवृत्ति का भी है क्योंकि वह हर गाँव में अपने यजमानों को गंडे देना चाहता है क्योंकि उसके बदले में यजमान उसे दान-दक्षिणा अवश्य देते हैं।

प्रश्न 9.
‘हालाँकि उस वक्त मेरा भेष ऐसा नहीं था कि उन्हें कुछ भी खयाल करना चाहिए था’-उक्त कथन के अनुसार हमारे आचार-व्यवहार के तरीके वेशभूषा के आधार पर तय होते हैं। आपकी समझ से यह उचित है अथवा अनुचित, विचार व्यक्त करें।
उत्तर-
हमारे आचार-व्यवहार के तरीकों का वेशभूषा के आधार पर तय होना उचित नहीं है क्योंकि किसी भी व्यक्ति की वेशभूषा को देखकर उसके अच्छे-बुरे का निर्णय करना अथवा उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए इसका अंदाजा लगाना उचित नहीं है। अतः हमें किसी की वेशभूषा की अपेक्षा व्यक्ति के गुणों को देखकर ही उसके साथ व्यवहार करना चाहिए।

प्रश्न 10.
यात्रा-वृत्तांत के आधार पर तिब्बत की भौगोलिक स्थिति का शब्द-चित्र प्रस्तुत करें। वहाँ की स्थिति आपके राज्य/शहर से किस प्रकार भिन्न है ?
उत्तर-
तिब्बत पहाड़ों में बसा एक देश है। वहाँ ऊँचे-ऊँचे पर्वत हैं तथा उनको काटती हुई अनेक जल की धाराएँ बहती हैं। वहाँ के कुछ पहाड़ों पर कुछ हरे-भरे वृक्ष बर्फ से ढके हुए हैं तो कुछ बिल्कुल नंगे हैं। कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत समतल भूमि भी है कहीं-कहीं तो पहाड़ों से घिरा हुआ टापू-सा लगता है। कहीं-कहीं पहाड़ों की ढलानों पर छोटे-छोटे गाँव बसे हुए हैं। पहाड़ों को काटकर छोटे-छोटे मार्ग व सड़कें बनाई हुई हैं। पहाड़ी की चढ़ाई कहीं-कहीं सरल है तो कहीं-कहीं अत्यंत सीधी और कठिन है। हमारे हरियाणा राज्य से तिब्बत की भौगोलिक स्थिति पूर्णतः भिन्न है। यहाँ की भूमि सर्वत्र समतल है और चारों ओर हरे-भरे खेत लहराते हैं। सिंचाई के अनेक साधन हैं। आवागमन के लिए सड़कों व रेल की पटरियों का जाल बिछा हुआ है।

प्रश्न 11.
आपने भी किसी स्थान की यात्रा अवश्य की होगी, यात्रा के दौरान हुए अनुभवों को लिखकर प्रस्तुत करें।
उत्तर-
मैंने छोटी-छोटी कई यात्राएँ की हैं। उनमें से एक यात्रा के दौरान हुए अनुभवों का वर्णन इस प्रकार है। मैं अपने स्कूल के बच्चों के साथ गर्मियों के अवकाश में कुल्लू-मनाली गया था। स्कूल की ओर से एक प्राइवेट बस का प्रबंध किया गया। हम लगभग 40 विद्यार्थी और दो अध्यापक उस यात्रा में थे। सबसे रोचक अनुभव मेरे लिए यह रहा कि मैंने प्रथम बार रात को यात्रा की थी। प्रातः होते ही हम कुल्लू पहुँच गए थे। वहाँ से नाश्ता करने के पश्चात् हमारी बस मनाली के लिए चल पड़ी। मार्ग में घुमावदार पहाड़ी सड़कों से जाते पहाड़ों एवं नदी-नालों के दृश्य देखते ही बनते हैं। मनाली हिमाचल प्रदेश का सबसे सुंदर पर्यटन स्थल है। वहाँ हम एक दिन ठहरे तथा आस-पास के सुंदर स्थान एवं प्राकृतिक दृश्य देखे। अगले दिन हमने रोहतांग दर्रा देखने का निश्चय किया और कई छोटी बसें किराए पर कीं। आस-पास के पूरे क्षेत्र में बर्फ दिखाई दे रही थी। वहाँ का तापमान बहुत कम था। वहाँ पर अनेक विदेशी पर्यटक भी घूमने के लिए आए हुए थे। कुछ ही दूरी पर चीन का बार्डर दिखाई दे रहा था। हम रोहतांग दर्रा देखकर लौट रहे थे कि एक बर्फीला तूफान आ गया। पहले तो मैं घबरा गया कि हम अपने ठहरने के स्थान पर कैसे पहुंचेंगे। किन्तु बस के ड्राइवर ने हमें साहस दिलाया और कहा कि यह तूफान थोड़ी देर में निकल जाएगा। तूफान खत्म होने पर हम फिर चल पड़े और सूर्य छिपते-छिपते हम मनाली लौट आए। अगले दिन प्रातः वहाँ से वापस चल पड़े और अपनी यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ घर पहुँच गए।।

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प्रश्न 12.
यात्रा-वृत्तांत गद्य साहित्य की एक विधा है। आपकी इस पाठ्यपुस्तक में कौन-कौन सी विधाएँ हैं ? प्रस्तुत विधा उनसे किन मायनों में अलग है ?
उत्तर-
हमारी पाठ्यपुस्तक में कहानी, निबंध, यात्रा, संस्मरण, रिपोर्ताज, व्यंग्य आदि गद्य साहित्यिक विधाएँ संकलित हैं। प्रत्येक विधा का अपना-अपना महत्त्व है। ‘यात्रा’ विधा इन सभी विधाओं से अलग है। कहानी में कथानक, पात्र, संवाद, देशकाल और वातावरण प्रमुख होता है। निबंध विचारों का गुंफन होता है और संस्मरण में पूर्व जीवन में बीती बातों को अनुभव के साथ लपेटकर प्रस्तुत किया जाता है तो व्यंग्य में किसी प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य करके उसकी वास्तविकता को नंगा करने का प्रयास किया जाता है। किन्तु यात्रा में यह सब कुछ नहीं होता। यात्रा में देखी और अनुभव की हुई बातों के साथ प्राकृतिक दृश्यों, स्थान-विशेष की भौगोलिक स्थितियों, वहाँ की संस्कृति, सामाजिक जीवन, रीति-रिवाजों आदि को यथार्थ रूप से साहित्यिक भाषा में प्रस्तुत किया जाता है। यह कल्पना की अपेक्षा तथ्यों पर आधारित होती है। रोचकता का तत्त्व इसमें आदि से अंत तक बना रहता है। अतः स्पष्ट है कि यात्रा-वृत्तांत गद्य साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 13.
किसी भी बात को अनेक प्रकार से कहा जा सकता है, जैसे–
सुबह होने से पहले हम गाँव में थे।
पौ फटने वाली थी कि हम गाँव में थे।
तारों की छाँव रहते-रहते हम गाँव पहुँच गए।
नीचे दिए गए वाक्य को अलग-अलग तरीके से लिखिए
‘जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा आगे जा रहा है या पीछे।’
उत्तर-
(1) घोड़ा अत्यंत मरियल चाल से चल रहा था।
(2) जान नहीं पड़ता था कि घोड़ा चल भी रहा है कि नहीं।
(3) घोड़े की चाल से पता चलता था कि मैं अपने लक्ष्य स्थान पर कभी नहीं पहुँच पाऊँगा।

प्रश्न 14.
ऐसे शब्द जो किसी ‘अँचल’ यानी क्षेत्र विशेष में प्रयुक्त होते हैं उन्हें आँचलिक शब्द कहा जाता है। प्रस्तुत पाठ में से आंचलिक शब्द ढूँढकर लिखिए।
उत्तर-
बसेरा, चोभी, टोटीदार, छङ्, डाँडा, गिराँव, कुची-कुची, भीटे, गंडे, कंडे, थुक्पा आदि।

प्रश्न 15.
पाठ में कागज, अक्षर, मैदान के आगे क्रमशः मोटे, अच्छे और विशाल शब्दों का प्रयोग हुआ है। इन शब्दों से उनकी विशेषता उभरकर आती है। पाठ में से कुछ ऐसे ही और शब्द छाँटिए जो किसी की विशेषता बता रहे हों।
उत्तर-
मुख्य) परित्यक्त, आखिरी, अच्छी, निर्जन, उतना, सर्वोच्च, बराबर, थोड़ी, सुस्त, जल्दी आदि।

पाठेतर सक्रियता

प्रश्न 1.
यह यात्रा राहुल जी ने 1930 में की थी। आज के समय यदि तिब्बत की यात्रा की जाए तो राहुल जी की यात्रा से कैसे भिन्न होगी ?
उत्तर-
जब राहुल जी ने यह यात्रा की थी तब आवागमन के साधन नहीं थे और न ही तिब्बत जाने वाला मार्ग ‘फरी-कलिङ्पोङ् खुला था। इसलिए उस समय की यात्रा और आज की जाने वाली यात्रा में निश्चित रूप से अंतर होगा। उस समय कोई मोटरगाड़ी आदि वहाँ नहीं चलती थी। इसलिए उन्हें यात्रा पैदल व घोड़ों पर करनी पड़ी थी। मार्ग में चोर-डाकुओं का भी डर निरंतर बना रहता था, किन्तु आजकल तिब्बत में आने-जाने के साधन उपलब्ध हैं। चोर-डाकुओं का भी कोई डर नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि आज की तिब्बत यात्रा राहुल जी की 1930 में की गई यात्रा से अत्यंत सरल एवं आरामदायक होगी।

प्रश्न 2.
क्या आपके किसी परिचित को घुमक्कड़ी/यायावरी का शौक है ? उसके इस शौक का उसकी पढ़ाई/काम आदि पर क्या प्रभाव पड़ता होगा, लिखें।
उत्तर-
निश्चय ही घुमक्कड़ी या यायावरी से किसी भी व्यक्ति की पढ़ाई या काम पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा क्योंकि प्रत्येक काम को करने का एक निश्चित समय होता है। यदि उस काम को समय पर न किया गया तो उसमें सफलता नहीं मिलेगी। मेरे एक संबंधी घुमक्कड़ प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। वे अच्छे इंसान हैं। वे साहसी भी हैं, किन्तु अपनी घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के कारण गृहस्थ जीवन की जिम्मेवारियों को पूर्ण करने में सफल नहीं हो सके। यदि वे अपनी यात्राओं को योजनाबद्ध करके करते तो शायद उनका उनके कार्यों पर बुरा प्रभाव न पड़ता।

प्रश्न 3.
अपठित गद्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
आम दिनों में समुद्र किनारे के इलाके बेहद खूबसूरत लगते हैं। समुद्र लाखों लोगों को भोजन देता है और लाखों उससे जुड़े दूसरे कारोबारों में लगे हैं। दिसंबर 2004 को सुनामी या समुद्री भूकंप से उठने वाली तूफानी लहरों के प्रकोप ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कुदरत की यह देन सबसे बड़े विनाश का कारण बन सकती है।

प्रकृति कब अपने ही ताने-बाने को उलटकर रख देगी, कहना मुश्किल है। हम उसके बदलते मिजाज को उसका कोप कह लें या कुछ और मगर यह अबूझ पहेली अकसर हमारे विश्वास के चीथड़े कर देती है और हमें यह अहसास करा जाती है कि हम एक कदम आगे नहीं, चार कदम पीछे हैं। एशिया के एक बड़े हिस्से में आने वाले उस भूकंप ने कई द्वीपों को इधर-उधर खिसकाकर एशिया का नक्शा ही बदल डाला। प्रकृति ने पहले भी अपनी ही दी हुई कई अद्भुत चीजें इंसान से वापस ले ली हैं जिसकी कसक अभी तक है।

दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है। वह हमारे जीवन में ग्रहण लाता है, ताकि हम पूरे प्रकाश की अहमियत जान सकें और रोशनी को बचाए रखने के लिए जतन करें। इस जतन से सभ्यता और संस्कृति का निर्माण होता है। सुनामी के कारण दक्षिण भारत और विश्व के अन्य देशों में जो पीड़ा हम देख रहे हैं, उसे निराशा के चश्मे से न देखें। ऐसे समय में भी मेघना, अरुण और मैगी जैसे बच्चे हमारे जीवन में जोश, उत्साह और शक्ति भर देते हैं। 13 वर्षीय मेघना और अरुण दो दिन अकेले खारे समुद्र में तैरते हुए जीव-जंतुओं से मुकाबला करते हुए किनारे आ लगे। इंडोनेशिया की रिजा पड़ोसी के दो बच्चों को पीठ पर लादकर पानी के बीच तैर रही थी कि वह विशालकाय साँप ने उसे किनारे का रास्ता दिखाया। मछुआरे की बेटी मैगी ने रविवार को समुद्र का भयंकर शोर सुना, उसकी शरारत को समझा, तुरंत अपना बेड़ा उठाया और अपने परिजनों को उस पर बिठा उतर आई समुद्र में, 41 लोगों को लेकर। महज 18 साल की यह जलपरी चल पड़ी पगलाए सागर से दो-दो हाथ करने। दस मीटर से ज्यादा ऊँची सुनामी लहरें जो कोई बाधा, रुकावट मानने को तैयार नहीं थीं, इस लड़की के बुलंद इरादों के सामने बौनी ही साबित

जिस प्रकृति ने हमारे सामने भारी तबाही मचाई है, उसी ने हमें ऐसी ताकत और सूझ दे रखी है कि हम फिर से खड़े होते हैं और चुनौतियों से लड़ने का एक रास्ता ढूँढ निकालते हैं। इस त्रासदी से पीड़ित लोगों की सहायता के लिए जिस तरह पूरी दुनिया एकजुट हुई है, वह इस बात का सबूत है कि मानवता हार नहीं मानती।

(1) कौन-सी आपदा को सुनामी कहा जाता है ? ।
(2) ‘दुख जीवन को माँजता है, उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता है’-आशय स्पष्ट कीजिए।
(3) मैगी, मेघना और अरुण ने सुनामी जैसी आपदा का सामना किस प्रकार किया ?
(4) प्रस्तुत गद्यांश में ‘दृढ़-निश्चय’ और ‘महत्त्व’ के लिए किन शब्दों का प्रयोग हुआ है ?
(5) इस गद्यांश के लिए एक शीर्षक ‘नाराज समुद्र’ हो सकता है।
आप कोई अन्य शीर्षक दीजिए।
उत्तर-
(1) समुद्री भूकंप से उठने वाली तूफानी लहरों को सुनामी कहा जाता है।
(2) जीवन में आने वाले दुख व संकट का सामना करने से मनुष्य के जीवन में साहस और हिम्मत उत्पन्न होती है। उसी साहस और हिम्मत के बल पर हम जीवन को और भली-भाँति जीने का प्रयास करते हैं। अतः यह कहना ठीक है कि दुख जीवन को माँजता है और उसे आगे बढ़ने का हुनर सिखाता हैं। दुख न हो तो मनुष्य साहसी नहीं बन सकता।
(3) मैगी ने अपने बेड़े पर अपने परिवार के अतिरिक्त 41 लोगों की जानें बचाई थीं। उसने समुद्र की भयंकर लहरों का सामना करके साहसी कार्य किया था।
मेघना-13 वर्षीय मेघना दो दिन अकेली समुद्र के खारे पानी में तैरती हुई और समुद्री जीव-जंतुओं का मुकाबला करती हुई समुद्र के किनारे आ लगी।
अरुणा-अरुणा दो दिनों तक समुद्र की लहरों का मुकाबला करती हुई किनारे पर आ पहुँची थी। उसके साहस को देखकर अच्छे-अच्छे तैराक भी अवाक् रह गए थे।
(4) दृढ़ निश्चय और महत्त्व के लिए क्रमशः ‘बुलंद इरादों’ और ‘अहमियत’ का प्रयोग किया गया है। (5) इस गद्यांश का शीर्षक ‘नाराज समुद्र’ के अतिरिक्त ‘समुद्री प्रकोप’ भी हो सकता है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

HBSE 9th Class Hindi ल्हासा की ओर Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘लहासा की ओर’ पाठ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘लहासा की ओर’ एक यात्रावृत्त है। इसमें श्री राहुल सांकृत्यायन ने अपनी तिब्बत यात्रा का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया है। लेखक ने यह यात्रा नियमानुकूल नहीं की अपितु छद्मवेश में की है क्योंकि उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी। इस यात्रावृत्त के लेखन का प्रमुख उद्देश्य तिब्बत के लोगों के जीवन का वर्णन करना है। साथ ही तिब्बत एक पहाड़ी क्षेत्र हैं वहाँ की प्राकृतिक छटा को दर्शाना भी लेखक के लिए मुख्य बात थी। भारत से तिब्बत तक की यात्रा करने में कैसी-कैसी कठिनाइयाँ आती हैं, दर्शाना भी यात्रावृत्त का लक्ष्य है। तिब्बत में लोगों का जीवन कैसा है, उनके व्यवसाय, समाज, संस्कृति अर्थिक व्यवस्था आदि सभी का एक साथ वर्णन करना भी महत्त्वपूर्ण लक्ष्य रहा है।

प्रश्न 2.
पठित पाठ के आधार पर सिद्ध कीजिए कि भारतीय महिलाओं की अपेक्षा तिब्बती महिलाओं की स्थिति अधिक सुरक्षित है।
उत्तर-
भारत में महिलाओं को पुरुषों से परदा करना पड़ता है, जबकि तिब्बत में ऐसी कोई प्रथा नहीं है। भारत में महिलाएँ अपरिचित व्यक्ति को घर में नहीं घुसने नहीं देतीं। उनके घर के अन्दर तक जाना तो और भी कठिन है। इसका कारण है कि वे असुरक्षित अनुभव करती हैं। तिब्बती महिलाएँ न तो परदा करती हैं और न ही किसी अपरिचित से भयभीत ही होती हैं, अपितु वे अपरिचितों पर सहज विश्वास करके उनका स्वागत करती हैं और मुसीबत में अपनी सुरक्षा स्वयं कर लेती हैं।

प्रश्न 3.
पठित पाठ के आधार पर नम्से का परिचय देते हुए उसके जीवन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
नम्से एक बौद्ध भिक्षु था। वह तिब्बत में शेकर बिहार नामक जागीर का प्रमुख बौद्ध भिक्षु था। उस जागीर में उसका खूब मान-सम्मान था। वह अत्यन्त ही भला व्यक्ति था। अहंकार तो उसे छूता भी नहीं था। वह लेखक से अत्यन्त प्रेम एवं सम्मानपूर्वक मिला। यद्यपि उस समय लेखक भिखारी की वेशभूषा में था, किन्तु नम्से ने इस ओर ध्यान न देकर उसका हार्दिक स्वागत किया।

प्रश्न 4.
लेखक को भिखारी के वेश में तिब्बत की यात्रा क्यों करनी पड़ी ? [H.B.S.E. March, 2020]
उत्तर-
पाठ में बताया गया है कि तिब्बत के पहाड़ों में निर्जन स्थान अधिक है। वहाँ लूटपाट व हत्या का भय बना रहता है। वहाँ ज्यादातर हत्याएँ धन व रुपए-पैसे लूटने के लिए की जाती हैं। लेखक ने डाकुओं से बचने के लिए यह वेश धारण किया था। जब भी लेखक के सामने कोई भयानक दिखने वाला व्यक्ति आता तो वह कुची-कुची (दया-दया) ‘एक पैसा’ कहकर भीख माँगने लगता। अतः स्पष्ट है कि लेखक ने अपने जान-माल की सुरक्षा हेतु यह उपाय किया था।

प्रश्न 5.
लेखक सुमति को उसके यजमानों से मिलने को क्यों मना करता था ?
उत्तर-
सुमति का स्वभाव थोड़ा लालची था। वह यजमानों के पास जाकर हफ्ता-हफ्ता आने का नाम नहीं लेता था। इतने दिनों तक लेखक को उसकी प्रतीक्षा में एक ही स्थान पर ठहरना पड़ता था। इससे उसकी यात्रा में बाधा पड़ती थी। इसलिए लेखक सुमति को उसके यजमानों से मिलने से मना करता था।

प्रश्न 6.
पाठ में वर्णित ‘थोङ्ला के जंगल’ का उल्लेख सार रूप में कीजिए।
उत्तर-
डाँडा थोङ्ला का जंगल तिब्बत का खतरनाक स्थान माना जाता है। यह जंगल सोलह-सत्रह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित है। इन जंगलों के आस-पास कोई गाँव व बस्ती नहीं है। नदियों के मोड़ों व पहाड़ों के कारण यहाँ कोई आदमी दिखाई नहीं देता। ये जंगल डाकुओं के लिए सुरक्षित स्थल हैं। यहाँ सरकार पुलिस पर अधिक धन खर्च नहीं करती। इसलिए यहाँ आदमी की हत्या करना बहुत सरल है। डाकू पहले आदमी को मार डालते हैं फिर उसका माल लूटते हैं। यही कारण है कि लोग यहाँ अपनी सुरक्षा के लिए लाठी की अपेक्षा बंदूक व पिस्तौल लिए फिरते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘ल्हासा की ओर’ नामक पाठ के लेखक का नाम क्या है ?
(A) राहुल सांकृत्यायन
(B) प्रेमचंद
(C) हजारीप्रसाद द्विवेदी
(D) श्यामाचरण दुबे
उत्तर-
(A) राहुल सांकृत्यायन

प्रश्न 2.
‘ल्हासा की ओर’ पाठ हिंदी साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आता है ?
(A) कहानी
(B) यात्रा-वृत्तांत
(C) एकांकी
(D) निबंध
उत्तर-
(B) यात्रा-वृत्तांत

प्रश्न 3.
ल्हासा किस देश में स्थित है ?
(A) चीन
(B) बर्मा
(C) भारत
(D) तिब्बत
उत्तर-
(D) तिब्बत

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प्रश्न 4.
राहुल सांकृत्यायन कहाँ के रहने वाले थे ?
(A) हरियाणा
(B) पंजाब
(C) मध्य प्रदेश
(D) उत्तर प्रदेश
उत्तर-
(D) उत्तर प्रदेश

प्रश्न 5.
लेखक ने अपना नाम परिवर्तन कब किया था ?
(A) तिब्बत जाने पर
(B) विवाह करने पर
(C) बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर
(D) चीन जाने पर
उत्तर-
(C) बौद्ध धर्म ग्रहण करने पर

प्रश्न 6.
राहुल सांकृत्यायन ने बौद्ध धर्म कब ग्रहण किया था ?
(A) सन् 1925 में
(B) सन् 1930 में
(C) सन् 1935 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर-
(B) सन् 1930 में

प्रश्न 7.
राहुल जी ने किस शास्त्र की रचना की है ?
(A) कामशास्त्र
(B) राजनीतिशास्त्र
(C) घुमक्कड़ी शास्त्र
(D) अर्थशास्त्र
उत्तर-
(C) घुमक्कड़ी शास्त्र

प्रश्न 8.
श्री राहुल सांकृत्यायन प्रथम बार तिब्बत किस रास्ते से गए थे ?
(A) नेपाल
(B) फरी-कलिङ्पोङ्
(C) बर्मा
(D) चीन
उत्तर-
(A) नेपाल

प्रश्न 9.
लेखक, ने तिब्बत के किस स्थान की यात्रा को खतरनाक बताया है ?
(A) थोङ्ला
(B) ल्हासा
(C) डाँडा
(D) लङ्कोर
उत्तर-
(C) डाँडा

प्रश्न 10.
तिब्बत में डाकुओं के लिए कौन-सा स्थान अच्छा माना गया है ?
(A) डाँडा
(B) ल्हासा
(C) लङ्कोर
(D) थोङ्ला
उत्तर-
(A) डाँडा

प्रश्न 11.
कुची-कुची का क्या अर्थ है?
(A) धीरे-धीरे
(B) कुछ-कुछ
(C) दया-दया
(D) परे-परे
उत्तर-
(C) दया-दया

प्रश्न 12.
डाँड़े की समुद्रतल से कितनी ऊँचाई है ?
(A) 15-16 हजार फीट
(B) 16-17 हजार फीट
(C) 17-18 हजार फीट
(D) 20-22 हजार फीट
उत्तर-
(C) 17-18 हजार फीट

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प्रश्न 13.
रात को लेखक और उसका मित्र किस स्थान पर ठहरे थे ?
(A) लङ्कोर
(B) तिकी
(C) डाँड़े
(D) थोङ्ला
उत्तर-
(A) लङ्कोर

प्रश्न 14.
लेखक लङ्कोर के मार्ग में अपने साथियों से क्यों पिछड़ गया था ?
(A) आराम करने के कारण
(B) चाय पीने के कारण
(C) मार्ग भूल जाने के कारण
(D) घोड़े से गिर जाने के कारण
उत्तर-
(C) मार्ग भूल जाने के कारण

प्रश्न 15.
तिकी का मैदान कैसा था ?
(A) पहाड़ों से घिरा हुआ
(B) नदियों से घिरा हुआ
(C) बर्फ से ढका हुआ
(D) फसलों से भरा हुआ
उत्तर-
(A) पहाड़ों से घिरा हुआ

प्रश्न 16.
‘तिकी-समाधि-गिरि’ किसका नाम है ?
(A) मैदान का
(B) छोटी-सी पहाड़ी का
(C) मंदिर का
(D) गाँव का
उत्तर-
(B) छोटी-सी पहाड़ी का

प्रश्न 17.
राहुल सांकृत्यायन एवं उसका साथी तिभी से कितने बजे चले थे ?
(A) 8 बजे (प्रातः)
(B) 10-11 बजे
(C) 12 बजे
(D) दोपहर 2 बजे
उत्तर-
(B) 10-11 बजे

प्रश्न 18.
तिब्बत में जागीरों का बड़ा भाग किनके हाथों में है ?
(A) राजाओं के
(B) मठों के
(C) भिक्षुओं के
(D) किसानों के
उत्तर-
(B) मठों के

प्रश्न 19.
शेकर के मंदिर में रखी बुद्धवचन की हस्तलिखित पोथियों को क्या कहा जाता है ?
(A) कंजुर
(B) बुद्ध ग्रंथ
(C) हस्तलिखित बुद्ध ग्रंथ
(D) काव्य ग्रंथ
उत्तर-
(A) कंजुर

प्रश्न 20.
एक कंजुर का वजन अनुमानतः कितना-कितना बताया गया है ?
(A) 8-10 सेर
(B) 12-12 सेर
(C) 15-15 सेर
(D) 20-20 सेर
उत्तर-
(C) 15-15 सेर

प्रश्न 21.
सुमति कौन था ?
(A) लेखक का नौकर
(B) मंगोल भिक्षु
(C) लेखक का गुरु
(D) लेखक का संबंधी
उत्तर-
(B) मंगोल भिक्षु

प्रश्न 22.
मंगोल भिक्षु का नाम लोब्ज था। लोज़ का सामान्य अर्थ है-
(A) सुबुद्धि .
(B) प्रज्ञ
(C) सुमति
(D) सुविचार
उत्तर-
(C) सुमति

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प्रश्न 23.
तिब्बत में किस धर्म के अनुयायी रहते हैं ?
(A) हिंदू धर्म
(B) सिक्ख धर्म
(C) बौद्ध धर्म
(D) जैन धर्म
उत्तर-
(C) बौद्ध धर्म

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ल्हासा की ओर प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. वह नेपाल से तिब्बत जाने का मुख्य रास्ता है। फरी-कलिङ्पोङ् का रास्ता जब नहीं खुला था, तो नेपाल ही नहीं हिंदुस्तान की भी चीजें इसी रास्ते तिब्बत जाया करती थीं। यह व्यापारिक ही नहीं सैनिक रास्ता भी था, इसलिए जगह-जगह फौजी चौकियाँ और किले बने हुए हैं, जिनमें कभी चीनी पलटन रहा करती थी। आजकल बहुत से फौजी मकान गिर चुके हैं। दुर्ग के किसी भाग में, जहाँ किसानों ने अपना बसेरा बना लिया है, वहाँ घर कुछ आबाद दिखाई पड़ते हैं। [पृष्ठ 25]

शब्दार्थ-फरी-कलिङपोङ् = तिब्बती सीमावर्ती स्थान का नाम। व्यापारिक = व्यापार से संबंधित। फौजी चौकियाँ = सेना की एक टुकड़ी के ठहरने का स्थान। पलटन = सेना। दुर्ग = किला। बसेरा = घर। आबाद = बसे हुए।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘ल्हासा की ओर’ शीर्षक यात्रावृत्त से लिया गया है। इसके लेखक श्री राहुल सांकृत्यायन हैं। इस पाठ में लेखक ने अपनी तिब्बत की राजधानी ल्हासा की यात्रा का वर्णन किया है। इन पंक्तियों में लेखक ने भारत की स्वतंत्रता से पूर्व के समय के तिब्बत जाने वाले मार्ग एवं वहाँ के लोगों की स्थितियों का वर्णन किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक का कथन है कि जब उसने तिब्बत की यात्रा की थी, उस समय भारत का प्रत्येक यात्री तथा व्यापारिक वस्तुएँ भी नेपाल से होकर तिब्बत पहुँचती थीं। लेखक भी उसी प्रमुख रास्ते से तिब्बत गया था, क्योंकि उस समय फरी-कलिङपोङ् का रास्ता नहीं खुला था। नेपाल की ही नहीं, भारतवर्ष की वस्तुएँ भी इसी मार्ग से तिब्बत ले जाई जाती थीं। यह केवल व्यापार करने का ही रास्ता नहीं था, अपितु सैनिक रास्ता भी था। सेना भी इसी मार्ग से होकर जाती थी। इसलिए स्थान-स्थान पर सेना के ठहरने के लिए चौकियाँ (अस्थाई व्यवस्था) और किले (सेना के ठहरने के बड़े-बड़े भवन) बनाए हुए थे। इनमें चीनी सेनाएँ रहा करती थीं। आजकल (जब लेखक ने यात्रा की थी) बहुत-से फौजी मकान गिर चुके थे। दुर्ग के किसी-किसी भाग में जहाँ किसानों ने अपना घर बना लिया था वह भाग ही आबाद दिखाई पड़ता था अन्यथा शेष भाग गिर चुके थे। अतः स्पष्ट है कि लेखक ने तत्कालीन नेपाल से तिब्बत जाने के मार्ग का यथार्थ चित्र अंकित किया है।

विशेष-

  1. तत्कालीन तिब्बत जाने वाले मार्ग की दशा और उससे भी पूर्व उस मार्ग पर बनाई चीनी सैनिक व्यवस्था की ओर भी संकेत किया गया है।
  2. लेखक ने तथ्य एवं घटना को आधार बनाकर सुंदर एवं रोचक वर्णन किया है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं व्यावहारिक है जिसमें तत्सम शब्दों के साथ-साथ उर्दू-फारसी शब्दों का भी सफल प्रयोग किया गया है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) पहले तिब्बत जाने के लिए कौन-सा रास्ता प्रयोग में लाया जाता था ?
(2) इस मार्ग में स्थान-स्थान पर क्या बना हुआ है ? उनका क्या प्रयोग होता था ?
(3) बाद में भारत से तिब्बत जाने का कौन-सा मार्ग खुला था ?
(4) तिब्बत में भिखमंगों की कैसी स्थिति थी ?
उत्तर-
(1) आरंभ में भारत से तिब्बत जाने के लिए नेपाल के मार्ग से जाना पड़ता था। उस समय कोई अन्य मार्ग नहीं बना था।
(2) नेपाल से तिब्बत के मार्ग पर स्थान-स्थान पर. फौजी चौंकियाँ बनी हुई थीं। मार्ग में अनेक किले भी बने हुए थे। इनमें कभी चीन की सेनाएँ रहती थीं। अब इनमें से बहुत-सी चौकियाँ व दुर्ग गिर चुके थे।
(3) बाद में भारत से तिब्बत जाने के लिए ‘फरी-कलिङ्पोङ्’ नामक मार्ग बना दिया गया था। इसके बनने से तिब्बत जाने के लिए नेपाल नहीं जाना पड़ता था।
(4) तिब्बत में भिखमंगों की स्थिति अच्छी नहीं थी। लोग चोरी के डर के कारण उन्हें अपने घरों में घुसने नहीं देते थे।

2. वहाँ जाति-पाँति, छुआछूत का सवाल ही नहीं है और न औरतें परदा ही करती हैं। बहुत निम्न श्रेणी के भिखमंगों को लोग चोरी के डर से घर के भीतर नहीं आने देते; नहीं तो आप बिलकुल घर के भीतर चले जा सकते हैं। चाहे आप बिलकुल अपरिचित हों, तब भी घर की बहू या सासु को अपनी झोली में से चाय दे सकते हैं। वह आपके लिए उसे पका देगी। [पृष्ठ 25]

शब्दार्थ-छुआछूत = छोटे-बड़े के भेदभाव की भावना। सवाल = प्रश्न। निम्न श्रेणी = तुच्छ। भिखमंगों = भिखारी, भीख माँगने वाले। अपरिचित = अनजान।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘ल्हासा की ओर’ शीर्षक पाठ से अवतरित है। इस पाठ के रचयिता श्री राहुल सांकृत्यायन हैं। इसमें लेखक ने अपनी तिब्बत यात्रा का वर्णन किया है, साथ ही वहाँ के लोगों की चारित्रिक विशेषताओं का भी उल्लेख किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक का कथन है कि तिब्बत में जातिगत भेदभाव नहीं किया जाता। विभिन्न जातियों के लोग आपस में मिलजुल कर रहते हैं। वहाँ छुआछूत की भावना भी नहीं है। वे सबको एक समान समझते हैं। वहाँ स्त्रियाँ भी परदा नहीं करतीं। कहने का तात्पर्य है कि स्त्रियाँ पुरुषों के समान स्वतंत्रतापूर्वक काम करती हैं। किन्तु वहाँ घटिया किस्म के भीख माँगने वालों को घर में घुसने नहीं दिया जाता क्योंकि उनके द्वारा चोरी करने का संदेह होता है। अन्यथा सामान्य व्यक्ति उनके घरों में आ-जा सकता है। चाहे आप उनसे अनजान भी हों तो भी आप उनके घरों में बेरोक-टोक जा सकते हैं। आप अनजान होने पर भी उनके घर की बहू या सास को अपनी झोली में से चाय निकालकर दे सकते हैं। वे आपको पकाकर दे देंगी। कहने का अभिप्राय है कि तिब्बत में स्त्रियाँ अधिक स्वतंत्र हैं। उन पर विश्वास किया जाता है।

विशेष-

  1. लेखक ने तिब्बती समाज की सामाजिक दशा और स्त्रियों के जीवन के विषय में बताया है।
  2. तिब्बत में भिखारियों को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता।
  3. भाषा सरल, सहज एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) तिब्बत में जातिगत स्थिति कैसी है ?
(2) क्या तिब्बत में परदा प्रथा है ?
(3) तिब्बत में भिखारियों को घर में क्यों नहीं आने देते ? (4) आम लोगों के प्रति तिब्बत की औरतों का व्यवहार कैसा है ? उत्तर-(1) तिब्बत में जातिगत भेदभाव नहीं किया जाता। वहाँ जातिगत दृष्टि से सबको समान देखा जाता है। (2) तिब्बत में नारियाँ परदा नहीं करतीं। वे पुरुषों के समान काम करती हैं। (3) तिब्बत में निम्न स्तर के भिखारियों को घरों में चोरी के भय के कारण नहीं आने दिया जाता।
(4) आम लोगों के प्रति तिब्बती नारियों का व्यवहार सम्मानजनक होता है। आप सीधे उनके घरों में जा सकते हो। वे आपको चाय आदि भी बनाकर दे देंगी।

{3} नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण बहुत दूर तक आदमी को देखा नहीं जा सकता। डाकुओं के लिए यही सबसे अच्छी जगह है। तिब्बत में गाँव में आकर खून हो जाए, तब तो खूनी को सज़ा भी मिल सकती है, लेकिन इन निर्जन स्थानों में मरे हुए आदमियों के लिए कोई परवाह नहीं करता। [पृष्ठ 26]

शब्दार्थ-कोनों = किनारों। खून होना = मार देना। खूनी = मारने वाला। निर्जन = एकांत स्थान।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यावतरण हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘ल्हासा की ओर’ शीर्षक पाठ से उद्धृत है। इसके लेखक श्री राहुल सांकृत्यायन हैं। इस गद्यांश में लेखक ने तिब्बत के निर्जन स्थानों पर डाकुओं के डर की ओर संकेत किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक जब तिब्बत-यात्रा पर था तो उसके मार्ग में ‘डाँडा थोङ्ला’ एक ऐसा स्थान आया, जो बिल्कुल सुनसान था। सोलह-सत्रह हजार फुट की ऊँचाई होने के कारण वहाँ मार्ग के दोनों ओर कोई गाँव या थोड़ी-बहुत आबादी नहीं थी। यहाँ तक कि नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण वहाँ मीलों तक कोई आदमी दिखाई नहीं देता। यह उस यात्रा का सबसे खतरनाक स्थल था, क्योंकि डाकुओं के लिए डाका डालने के लिए यही सबसे अच्छा स्थान है। यहाँ डाकू अपनी मनमानी करते हैं। तिब्बत में यदि किसी गाँव में किसी का खून हो जाए तो खूनी को सजा होती है, किन्तु एकांत स्थान पर यदि किसी का खून हो
विरुद्ध किसी प्रमाण का न मिलना ही है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

विशेष-

  1. लेखक ने तिब्बत यात्रा के समय विशेषकर ‘डाँड़े थोङ्ला’ स्थान को पार करने में होने वाले खतरे का उल्लेख किया है।
  2. तिब्बत में कानून की डुलमुल स्थिति की ओर भी संकेत किया गया है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं व्यावहारिक है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) उक्त गद्यांश के पाठ एवं लेखक का नाम बताइए।
(2) तिब्बत की सड़कों पर बहुत दूर तक आदमी क्यों नहीं दिखाई देते थे ?
(3) डाकुओं के लिए कौन-सी जगह सबसे अच्छी थी ?
(4) कहाँ खून करने पर खूनी को सजा मिल सकती है ?
(5) निर्जन स्थानों से लेखक का क्या तात्पर्य है?
उत्तर-
(1) पाठ का नाम ल्हासा की ओर लेखक का नाम-राहुल सांकृत्यायन।
(2) तिब्बत एक पहाड़ी क्षेत्र है। यहाँ गाँव बहुत दूर-दूर बसे हुए हैं। नदियों के मोड़ और पहाड़ों के कोनों के कारण दूर-दूर तक आदमी दिखाई नहीं देता।
(3) डाकुओं के लिए नदियों के मोड़ व पहाड़ों के कोनों वाला स्थान ही अधिक अच्छे होते हैं क्योंकि ऐसे स्थानों पर दूर-दूर तक आदमी दिखाई नहीं देते और उन्हें लूटमार करने का अवसर मिल जाता है।
(4) तिब्बत में गाँव में किए गए खून के कारण सजा मिल सकती है। गाँव के बाहरी क्षेत्रों में किए गए खून के लिए कोई सजा नहीं दी जाती।
(5) निर्जन स्थानों से तात्पर्य है-एकांत व शांत स्थान जहाँ दूर-दूर तक कोई आदमी दिखाई नहीं देता।

4. सरकार खुफिया विभाग और पुलिस पर उतना खर्च नहीं करती और वहाँ गवाह भी तो कोई नहीं मिल सकता। डकैत पहिले आदमी को मार डालते हैं, उसके बाद देखते हैं कि कुछ पैसा है कि नहीं। हथियार का कानून न रहने के कारण यहाँ लाठी की तरह लोग पिस्तौल, बंदूक लिए फिरते हैं। डाकू यदि जान से न मारे तो खुद उसे अपने प्राणों का खतरा है। [पृष्ठ 26]

शब्दार्थ-खुफिया-विभाग = गुप्त-विभाग। गवाह = साक्षी। डकैत = डाका डालने वाले। हथियार का कानून = हथियार रखने का नियम।

प्रसंग-ये गद्य-पंक्तियाँ हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित श्री राहुल सांकृत्यायन की प्रमुख रचना ‘ल्हासा की ओर’ से उद्धृत हैं। इन पंक्तियों में उन्होंने तिब्बत की कानून-व्यवस्था का उल्लेख किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने अपनी तिब्बत-यात्रा के समय वहाँ की सामाजिक व्यवस्था को ध्यानपूर्वक देखा तो उन्हें पता चला कि वहाँ की सरकार खुफ़िया-विभाग (गुप्त रूप से सरकार को सूचनाएँ देने वाला विभाग) और पुलिस पर बहुत कम व्यय करती है, इसीलिए वहाँ का गुप्त-विभाग अधिक सक्रिय एवं सतर्क नहीं है। किसी हत्यारे के विरुद्ध कोई कार्रवाई इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि वहाँ उसके विरुद्ध कोई गवाही भी नहीं देता। वहाँ डाकू भी अत्यंत निर्दयी एवं हृदयहीन होते हैं। वे पहले व्यक्ति को मारते हैं फिर देखते हैं कि उसके पास पैसा है भी या नहीं। ऐसा शायद वे इसलिए करते हैं कि यदि वे उसकी हत्या नहीं करते तो कहीं वह उन्हें मार न डालें या उनके विरुद्ध गवाही देकर उन्हें पुलिस के हवाले न कर दे। तिब्बत में हथियार रखने का कोई कानून नहीं है। यही कारण है कि वहाँ लोग लाठी की भाँति ही पिस्तौल व बंदूक लिए घूमते हैं। कहने का तात्पर्य है कि तिब्बत में हथियार रखने पर सरकार की ओर से कोई पाबंदी नहीं है। इसलिए कानून-व्यवस्था ठीक नहीं है। हर कोई हथियार रख सकता है। डाकू भी इसलिए डरते हैं कि कहीं कोई उन पर पहले वार करके उन्हें न मार डाले।

विशेष-

  1. तिब्बत की कानून-व्यवस्था का यथार्थ चित्रण किया गया है।
  2. तिब्बत में हथियार रखने का कोई नियम नहीं है, जिससे वहाँ की सरकार की कमजोरी का कोई भी नाजायज फायदा उठा सकता है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) तिब्बत में लोगों की सुरक्षा का क्या प्रबंध है ?
(2) तिब्बत में लोग लाठी की बजाए पिस्तौल या बंदूक क्यों रखते हैं ?
(3) डकैत आदमी को लूटने से पहले क्यों मार देते हैं ?
(4) प्रस्तुत गद्यांश के आशय पर प्रकाश डालिए। .
उत्तर-
(1) तिब्बत में लोगों की सुरक्षा के लिए उचित प्रबंध नहीं है। यहाँ की सरकार खुफिया विभाग तथा पुलिस पर अधिक खर्च नहीं करती। यहाँ कोई किसी की गवाही भी नहीं देता।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

(2) तिब्बत में हथियार रखने या न रखने का कोई कानून नहीं है। वहाँ कोई भी नागरिक अपनी इच्छानुसार हथियार रख . सकता है। यही कारण है कि यहाँ लोग अपनी सुरक्षा के लिए लाठी की अपेक्षा पिस्तौल या बंदूक रखते हैं।

(3) डकैत जानते हैं कि यहाँ लोग अपनी सुरक्षा के लिए पिस्तौल या बंदूक रखते हैं। इसलिए उन्हें अपनी जान का खतरा रहता है। यही कारण है कि वे आदमी को मारते पहले हैं और उसका धन बाद में लूटते हैं।

(4) प्रस्तुत गद्यांश में बताया है कि तिब्बत में कानून-व्यवस्था उचित नहीं है। यहाँ डाकुओं के लिए लूटमार करके या खून करके बच निकलना बहुत आसान है। निर्जन स्थान होने के कारण कोई गवाह भी नहीं मिलता। सरकार भी इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं देती।

5.तिब्बत की ज़मीन बहुत अधिक छोटे-बड़े जागीरदारों में बँटी है। इन जागीरों का बहुत ज्यादा हिस्सा मठों (विहारों) के हाथ में है। अपनी-अपनी जागीर में हरेक जागीरदार कुछ खेती खुद भी कराता है, जिसके लिए मज़दूर बेगार में मिल जाते हैं। खेती का इंतजाम देखने के लिए वहाँ कोई भिक्षु भेजा जाता है, जो जागीर के आदमियों के लिए राजा से कम नहीं होता। [पृष्ठ 28]

शब्दार्थ-जागीरदार = बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी। हिस्सा = भाग। बेगार = बिना मजदूरी दिए काम करवाना। इंतजाम = प्रबंध। भिक्षु = बौद्ध धर्म का अनुयायी।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘ल्हासा की ओर’ यात्रावृत्त से लिया गया है। इस पाठ के लेखक श्री राहुल सांकृत्यायन हैं। इसमें उन्होंने अपनी तिब्बत यात्रा का वर्णन किया है। इन पंक्तियों में उन्होंने तिब्बत की भूमि-विभाजन अथवा जागीरदारी व्यवस्था का वर्णन किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने अपनी तिब्बत यात्रा के समय देखा कि तिब्बत की जमीन बहुत-सी छोटी-बड़ी जागीरों में बँटी हुई है। इनके स्वामी जागीरदार हैं। तिब्बत की अधिकांश जागीरें वहाँ के बौद्ध धर्म के मठों व विहारों के अधीन हैं। कहने का तात्पर्य है कि वहाँ के सामाजिक एवं आर्थिक जीवन पर बौद्ध धर्म का अत्यधिक प्रभाव है। इन जागीरों के स्वामी अपनी-अपनी जागीरों में कुछ खेती स्वयं करवाते हैं क्योंकि वहाँ मजदूरों की कमी नहीं है। वहाँ बहुत कम मजदूरी पर मजदूर उपलब्ध हो जाते हैं। विहारों की जागीरों का प्रबंध करने के लिए किसी बौद्ध भिक्षु को भेजा जाता है। वहाँ उस बौद्ध भिक्षु की स्थिति किसी राजा से कम नहीं होती। जागीरों में काम करने वाले आदमी भिक्षु को राजा के समान आदर-सत्कार देते हैं।

विशेष-

  1. लेखक ने तिब्बत में प्रचलित जागीरदारी व्यवस्था का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।
  2. जागीरदारी व्यवस्था में होने वाले मजदूरों के शोषण की ओर भी संकेत किया गया है।
  3. लेखक ने भिक्षु की स्थिति राजा के समान बताकर वहाँ की व्यवस्था पर व्यंग्य किया है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) तिब्बत की जागीर व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
(2) तिब्बत में खेती का प्रबंध करने वाले भिक्षुओं की स्थिति कैसी है ?
(3) तिब्बत में खेती मजदूरों की दशा कैसी है ?
(4) जागीरों का बड़ा हिस्सा किसके हाथ में है ?
उत्तर-

(1) तिब्बत में सारी जमीन छोटे-बड़े जागीरदारों में विभाजित है। इन जागीरों में अधिक जागीरें बौद्ध मठों व विहारों के अधीन हैं। बौद्ध भिक्षु ही वहाँ जागीरों में खेती-बाड़ी का काम देखते हैं। इन भिक्षुओं को अत्यधिक महत्त्व दिया जाता है।
(2) खेती का प्रबंध करने वाले भिक्षुओं की स्थिति एक राजा जैसी होती है। वहाँ के लोग भिक्षु को राजा जैसा सम्मान देते हैं।
(3) तिब्बत में खेती मज़दूरों की दशा दयनीय है। वहाँ खेती मज़दूरों को बहुत कम मजदूरी दी जाती है।
(4) जागीरों का बड़ा हिस्सा विहारों व मठों के हाथ में है।

ल्हासा की ओर Summary in Hindi

ल्हासा की ओर लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री राहुल सांकृत्यायन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री राहुल सांकृत्यायन का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय श्री राहुल सांकृत्यायन का नाम आधुनिक हिंदी साहित्यकारों में बड़े आदर के साथ लिया जाता है। वे घुमक्कड़ प्रवृत्ति वाले थे। उन्होंने अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। श्री राहुल सांकृत्यायन का जन्म सन् 1893 में गाँव पंदहा, जिला आज़मगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनका असली नाम केदार पांडेय था। उन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में प्राप्त की। तत्पश्चात् काशी, आगरा और लाहौर में उच्च शिक्षा ग्रहण की। सन् 1930 में उन्होंने श्रीलंका जाकर बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया था। तब से ही ये केदार पांडेय से राहुल सांकृत्यायन बन गए थे। उन्होंने हिंदी के अतिरिक्त पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, तिब्बती, चीनी, जापानी, रूसी, अंग्रेज़ी, संस्कृत, उर्दू, फारसी आदि अनेक भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इसीलिए उन्हें ‘महापंडित’ कहा जाता था। माँ भारती के इस सपूत की मृत्यु सन् 1963 में हुई थी। उन्होंने आजीवन साहित्य की रचना की।

2. प्रमुख रचनाएँ-श्री राहुल सांकृत्यायन ने एक सफल साहित्यकार की भाँति अनेक विधाओं पर अपनी लेखनी साधिकार चलाई। उन्होंने उपन्यास, कहानी, आत्मकथा, यात्रावृत्त, जीवनी, आलोचना, शोध आदि अनेक साहित्यिक विधाओं की रचना की है। इतना ही नहीं, उन्होंने अनेक ग्रंथों का हिंदी अनुवाद भी किया है। ‘मेरी जीवन यात्रा’ (छह भाग), ‘दर्शन-दिग्दर्शन’, ‘बाइसवीं सदी’, ‘वोल्गा से गंगा’, ‘भागो नहीं दुनिया को बदलो’, ‘दिमागी गुलामी’, ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। साहित्य के अतिरिक्त दर्शन, राजनीति, धर्म, इतिहास, विज्ञान आदि विभिन्न विषयों पर भी उनकी लगभग 150 रचनाएँ उपलब्ध हैं। राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी साहित्य की छुपी हुई सामग्री को ढूँढ़कर साहित्य का उद्धार कर अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-यात्रावृत्त लेखन-कार्य में राहुल सांकृत्यायन जी का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने घुमक्कड़ी शास्त्र की रचना की। इसमें उन्होंने घुमक्कड़ी से होने वाले लाभों का सविस्तार वर्णन किया है। उन्होंने यात्रावृत्त पर प्रकाश डालते हुए मंजिल के स्थान पर यात्रा को ही घुमक्कड़ का उद्देश्य बताया है। कहने का भाव है कि मंजिल पर पहुंचने से पहले यात्रा करते समय जो अनुभव होते हैं, वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हैं। घुमक्कड़ी में मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थानों की जानकारी के साथ-साथ भाषा एवं संस्कृति का भी आदान-प्रदान होता है। घुमक्कड़ी से मनुष्य साहसी और संघर्षशील भी बनता है। राहुल जी ने विभिन्न स्थानों के भौगोलिक वर्णन के अतिरिक्त वहाँ के जन-जीवन का सुंदर एवं सजीव चित्रण किया है। इसे ही यदि राहुल जी के यात्रावृत्तों की महत्त्वपूर्ण विशेषता कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

4. भाषा-शैली-राहुल जी को विभिन्न भाषाओं का गहन ज्ञान था। हिंदी के प्रति उनका विशेष लगाव था। उन्होंने अपनी रचनाओं में शुद्ध साहित्यिक हिंदी का प्रयोग किया है, किन्तु यात्रावृत्तों में विभिन्न-विभिन्न स्थानों की बोलियों एवं भाषाओं के शब्दों का प्रयोग प्रसंगानुकूल किया है। इससे भाषा में व्यावहारिकता एवं रोचकता का समावेश हुआ है। लोक-प्रचलित मुहावरों का प्रयोग करके भाषा को सारगर्भित रूप भी प्रदान किया है। सुगठित वाक्य-रचना के कारण भाषा प्रभावशाली बन पड़ी है। गंभीर भावों व विचारों को सरलतम भाषा में व्यक्त करना श्री राहुल जी की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषता है।

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ल्हासा की ओर पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘ल्हासा की ओर’ शीर्षक यात्रावृत्त का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘ल्हासा की ओर’ श्री राहुल सांकृत्यायन की प्रथम तिब्बत यात्रा है जो उन्होंने 1929-30 में नेपाल के रास्ते से की थी। उस समय भारतीयों को तिब्बत यात्रा की अनुमति नहीं थी। इसलिए राहुल जी ने यह यात्रा भिखमंगे के छद्मवेश में की थी।

इसमें उन्होंने तिब्बत की राजधानी ‘ल्हासा’ की ओर जाने वाले दुर्गम रास्तों का वर्णन अत्यंत रोचकतापूर्ण किया है। जब राहुल जी ने यह यात्रा की थी, तब फरी-कलिङपोङ्ग का मार्ग नहीं खोला गया था। इसलिए भारत की वस्तुएँ नेपाल होकर ही तिब्बत जाती थीं। इसे सैनिक व व्यापारिक रास्ता भी कहा जाता था। मार्ग में स्थान-स्थान पर चीनी सेना की चौकियाँ और किले बने हुए थे जिनमें चीनी पलटन के सैनिक रहते थे। किन्तु आजकल वे दुर्ग गिर चुके हैं और उनमें किसान रहते हैं। मार्ग में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहाँ जातिगत भेदभाव नहीं हैं और न ही स्त्रियाँ वहाँ परदा करती हैं। वे आपके लिए निःसंकोच खाना पका देंगी व चाय बना देंगी। वे यात्रियों की खूब सेवा करती हैं।

परित्यक्त चीनी किले से चाय पीने के पश्चात् जब लेखक आगे बढ़ा तो उन्हें राहदारी देनी पड़ी। उसी दिन वे थोङ्ला के पहले के अंतिम गाँव में पहुंच गए। वहाँ उनके सहायक सुमति के जान-पहचान के आदमी थे। भिखमंगे के वेश में होने पर भी उन्हें रहने के लिए अच्छी जगह मिली। लेखक पाँच वर्ष पश्चात् एक यात्री के रूप में इस स्थान से गुजरा था, किन्तु तब उसे किसी ने अच्छी जगह नहीं दी थी। यह वहाँ के लोगों की मनोवृत्ति पर निर्भर करता है।

लेखक को अब सबसे खतरनाक मार्ग डाँड़ा थोङ्ला पार करना था। तिब्बत में सबसे खतरनाक स्थान डाँड़े है। यहाँ दूर-दूर तक मार्ग के दोनों ओर कोई गाँव नहीं है। डाकुओं के लिए यह सबसे अच्छी जगह है। ऐसे स्थान पर हुए खून की वहाँ परवाह नहीं की जाती और न ही सरकार इस ओर कोई ध्यान देती है। हथियार का कानून न होने के कारण वहाँ लाठी की भाँति लोग पिस्तौल व बंदूक रखते हैं। इस मार्ग पर अनेक खून हो चुके थे, किन्तु लेखक को खून की कोई परवाह नहीं थी क्योंकि वह भिखमंगे के वेश में था। पहाड़ की ऊँची चढ़ाई और पीठ पर सामान लदा हुआ था। अगला पड़ाव भी 16-17 मील की दूरी पर था। लेखक के सहायक ने दो घोड़े लेने की सलाह दी।

अगले दिन वे घोड़ों पर सवार होकर चले और दोपहर तक डाँड़े से ऊपर जा पहुँचे। वहाँ हजारों मील तक पहाड़-ही-पहाड़ थे। भीटे की ओर दिखाई देने वाले पहाड़ तो बिल्कुल नंगे थे। डाँड़े के सबसे ऊँचे स्थान पर वहाँ के देवता का स्थान था, जो पत्थरों के ढेर, जानवरों के सींगों और रंग-बिरंगे कपड़ों की झाड़ियों से सजाया हुआ था। लेखक के साथ कुछ और घुड़सवार भी चल रहे थे। अब चढ़ाई कम थी, किन्तु उतराई अधिक थी। लेखक का घोड़ा बहुत सुस्त पड़ गया था। इसलिए लेखक अन्य सवारों से पिछड़ गया था। आगे चलकर दो मार्ग फूट रहे थे। लेखक गलत मार्ग पर चल पड़ा। एक डेढ़-मील चलकर पता चला कि वह गलत मार्ग पर जा रहा है। उसने लौटकर सही मार्ग पकड़ा। गाँव से मील भर की दूरी पर लेखक सुमति से सांय के चार-पाँच बजे मिला। वह उस पर लाल-पीला हो उठा। किन्तु लेखक ने घोड़े की धीमी गति का बहाना बताकर उसे शांत कर दिया। लङ्कोर में वे एक अच्छी जगह पर ठहरे थे। पहले उन्होंने चाय-सत्तू खाया और रात को गरमागरम थुक्पा मिला।

अंततः लेखक तिकी के विशाल मैदान में पहुँच गया जो पहाड़ों से घिरा टापू-सा लगता था। उसमें एक छोटी-सी पहाड़ी दिखाई देती थी। उसी पहाड़ी का नाम ‘तिश्री-समाधि-गिरि’ था। वहाँ सुमति के अनेक यजमान थे जिनके पास वह जाना चाहता था। किन्तु लेखक ने उसे जाने की आज्ञा नहीं दी। हाँ, इतना अवश्य कहा कि जिस गाँव में वे रुके थे, उसी गाँव के यजमानों में वह गंडे बाँट सकता है। सुमति ने यह बात स्वीकार कर ली। दूसरे दिन उन्हें कोई भरिया नहीं मिला। वे सुबह ही आगे चल दिए। तिब्बत में 10-11 बजे तक धूप बहुत तेज हो जाती है। वे दो बजे तक सूरज की ओर मुँह करके चलते रहे। ललाट धूप से जलता रहा। तिब्बत की जमीन बहुत-से छोटे-बड़े ज़मींदारों में बँटी हुई है। प्रत्येक ज़मींदार अपनी-अपनी जमीन पर खेती स्वयं कराते हैं, जिसके लिए मजदूर बेगार में मिल जाते हैं। खेती का प्रबंध देखने के लिए किसी भिक्षु को भेज दिया जाता है। वह किसी राजा से कम नहीं होता। सुमति के यजमान शेकर की खेती का मुखिया भिक्षु बहुत अच्छा व्यक्ति था। वह लेखक के भिखारी के वेश में होने पर भी बहुत प्रेम से मिला। वहाँ उन्हें एक मंदिर में ठहराया गया। इस मंदिर में कन्जुर (बुद्धवचन अनुवाद) की हस्तलिखित 103 पोथियाँ रखी हुई थीं। वे मोटे और अच्छे कागज पर लिखित थीं। एक-एक पोथी का बोझ 15-15 सेर से कम न था। लेखक उनमें रम गया तथा सुमति दूसरे दिन तक अपने यजमानों से मिलकर लौट आया। तिकी गाँव वहाँ से दूर नहीं था। उन्होंने अपना-अपना सामान पीठ पर लादा और अपने मार्ग पर चल दिए।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-25) : व्यापारिक = व्यापार से संबंधित। सैनिक = सेना के लिए। पलटन = सेना का भाग। दुर्ग = किला। बसेरा = रहने के लिए घर। आबाद = बसे हुए। परित्यक्त = छोड़ा हुआ। तकलीफें = कठिनाइयाँ। औरतें = नारियाँ । अपरिचित = अनजान।

(पृष्ठ-26) : राहदारी = जेनम् गाँव के पास पुल से नदी पार करने के लिए जोपोन (मजिस्ट्रेट) के हाथ की लिखी लमयिक् (राहदारी) जो लेखक ने अपने मंगोल दोस्त के माध्यम से प्राप्त की (पहचान के लिए दी गई चिट्ठी)। थोङ्ला = तिब्बती सीमा का एक स्थान। भद्र = सज्जन। छङ् = नशीला पदार्थ । दुरुस्त = स्वस्थ, सही। डाँडा = ऊँची जमीन। गाँव-गिराँव = गाँव या बस्ती। निर्जन = एकांत। डकैत = डाकू। पड़ाव = ठहरने का स्थान।

(पृष्ठ-27) : श्वेत = सफेद। शिखर = चोटियाँ। सर्वोच्च = सबसे ऊँचा। दोन्क्विक्स्तो = स्पेनिश उपन्यासकार सार्वेतेज (17 वीं शताब्दी) के उपन्यास ‘डॉन क्विक्ज़ोट’ का नायक, जो घोड़े पर चलता था। सुमति = लेखक को यात्रा के दौरान मिला मंगोल भिक्षु जिसका नाम लोब्जङ् शेख था। इसका अर्थ है-सुमति प्रज्ञ। अतः सुविधा के लिए लेखक ने उसे सुमति नाम से पुकारा है। इंतजार = प्रतीक्षा। सत्तू = भूने हुए अन्न (जौ, चना) का आटा। थुक्पा = सत्तू या चावल के साथ मूली, हड्डी और माँस के साथ।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 2 ल्हासा की ओर

(पृष्ठ-28-29) : तिकी = तिब्बत के महत्त्वपूर्ण स्थान का नाम। गडे = मंत्र पढ़कर गाँठ लगाए हुए धागे व वस्त्र। चिरी = फाड़ी हुई। भरिया = भारवाहक। ललाट = माथा। बेगार = बिना मजदूरी या कम मजदूरी पर। इंतजाम = व्यवस्था। पुस्तकों के भीतर = पुस्तकें पढ़ने में लीन।

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HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

HBSE 9th Class Hindi दो बैलों की कथा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कांजीहौस में कैद पशुओं की हाज़िरी क्यों ली जाती होगी ?
उत्तर-
कांजीहौस में कैद पशुओं की हाज़िरी इसलिए ली जाती होगी, ताकि उनमें से किसी पशु को कोई चुराकर न ले जाए। कांजीहौस में लाए गए पशुओं की देखभाल की जिम्मेदारी भी कांजीहौस के कर्मचारियों की ही होती थी।

प्रश्न 2.
छोटी बच्ची को बैलों के प्रति प्रेम क्यों उमड़ आया ?
उत्तर-
एक सच्चाई है कि दुखी व्यक्ति ही दूसरे दुखी व्यक्ति के दुख को अधिक अनुभव कर सकता है। गया के घर में छोटी बच्ची की विमाता हर समय उसके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार करती थी। जब उसने देखा कि गया (छोटी बच्ची का पिता) अपने बैलों को अच्छा चारा देता है और झूरी के बैलों को रूखा-सूखा भूसा खाने को देता है और मारता भी है तो उनके प्रति गया के अन्याय को देखकर छोटी बच्ची के मन में प्रेम उमड़ आया था।

प्रश्न 3.
कहानी में बैलों के माध्यम से कौन-कौन से नीति-विषयक मूल्य उभरकर आए हैं ?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में नीति संबंधी अनेक विषयों की…………. ओर संकेत किया गया है। उनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-

(क) अपने स्वामी के प्रति सदा वफादार रहना चाहिए।
(ख) सच्चा मित्र वही होता है, जो हर सुख-दुःख में साथ रहे।
(ग) आत्मसम्मान की रक्षा के लिए संघर्ष करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।
(घ) आजादी के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है।
(ङ) एकता में सदा बल होता है।
(च) परोपकार के लिए आत्मबलिदान देना महान् कार्य है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कहानी में प्रेमचंद ने गधे की किन स्वभावगत विशेषताओं के आधार पर उसके प्रति रूढ़ अर्थ ‘मूर्ख’ का प्रयोग न कर किस नए अर्थ की ओर संकेत किया है ?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में कहानीकार ने गधे को ‘मूर्ख’ न कहकर उसकी अन्य स्वभावगत विशेषताओं का उल्लेख किया है, यथा-वह निरापद सहिष्णु होता है। यदि कोई उसको मारता है या दुर्व्यवहार करता है तो वह शांत स्वभाव से उसे सहन कर लेता है। उसका प्रतिरोध नहीं करता, जैसे अन्य पशु करते हैं। उसे कभी किसी बात पर क्रोध नहीं आता। वह सदा उदास व निराश ही दिखाई देता है। वह सुख-दुःख, हानि-लाभ सब स्थितियों में समभाव रहता है। अतः उसका सीधापन ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है, इसीलिए लोग उसे ‘मूर्ख’ की पदवी दे देते हैं।

प्रश्न 5.
किन घटनाओं से पता चलता है कि हीरा और मोती में गहरी दोस्ती थी ? ।
उत्तर-
हीरा और मोती, दोनों सदा एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ देते थे। उदाहरणार्थ-जब गया ने हीरा को अत्यधिक मारा तो मोती ने विद्रोह कर दिया और हल जुआ आदि लेकर भाग गया और उन्हें तोड़ डाला और कहा कि यदि वह तुम पर हाथ उठाएगा तो मैं भी उसे गिरा दूंगा। इसी प्रकार जब दोनों को भारी-भरकम साँड़ का सामना करना पड़ा तो भी दोनों सच्चे मित्रों की भाँति उससे संघर्ष किया और उसे हरा दिया। इसी प्रकार जब मोती मटर के खेत में फंस गया था, हीरा ने वहाँ से न भागकर उसके साथ ही अपने आपको पकड़वा लिया। इसी प्रकार जब कांजीहौस में हीरा रस्सी से बँधा हुआ था, किन्तु मोती स्वतंत्र था। वह चाहता तो कांजीहौस से भाग सकता था, किन्तु उसने ऐसा नहीं किया और हीरा के साथ ही खड़ा रहा और कांजीहौस के चौकीदार से मार भी खाई। इन सब घटनाओं से पता चलता है कि हीरा और मोती में गहरी दोस्ती थी।

प्रश्न 6.
‘लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूल जाते हो।’-हीरा के इस कथन के माध्यम से स्त्री के प्रति प्रेमचंद के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
मोती को यह देखकर कि गया की छोटी-सी बच्ची को गया की पत्नी (बच्ची की विमाता) खूब मारती व तंग करती है। वह गया की पत्नी को उठाकर पटकने की बात कहता है। यह सुनकर हीरा उपरोक्त शब्द कहता है। हीरा के इन शब्दों से पता चलता है कि प्रेमचंद नारी के प्रति अत्यंत उदार दृष्टिकोण एवं सम्मान की भावना रखते थे। वे मानते थे कि नारी को पीटना व मारना कोई बहादुरी का काम नहीं है। यह हमारी संस्कृति के भी विपरीत है।

प्रश्न 7.
किसान जीवन वाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी संबंधों को कहानी में किस तरह व्यक्त किया गया है ?
उत्तर-
किसान जीवन वाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी संबंधों को अत्यंत आत्मीयतापूर्ण व्यक्त किया गया है। झूरी किसान है। उसके पास हीरा और मोती नामक दो बैल हैं। वह अपने बैलों को अत्यधिक प्यार करता है। उनकी देखभाल भी भली-भाँति करता है। उन्हें अपने से दूर करने में उसका जी छोटा होता है, किन्तु उन्हें पुनः प्राप्त करके अत्यंत खुश होता है। उनसे गले लगकर मिलता है जैसे बिछुड़े हुए मित्र मिलते हैं। उसकी पत्नी भी अपनी गलती मानकर बैलों के माथे चूम लेती है। अतः स्पष्ट है कि किसान जीवन वाले समाज में पशु और मनुष्य के आपसी संबंधों को अत्यंत निकटता एवं आत्मीयता के संबंधों के रूप में व्यक्त किया गया है।

प्रश्न 8.
“इतना तो हो ही गया कि नौ दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।”-मोती के इस कथन के आलोक में उसकी विशेषताएँ बताइए।
उत्तर-
मोती भले ही स्वभाव का विद्रोही लगता हो, किन्तु वास्तव में वह एक सच्चा मित्र और पशु होते हुए भी मानवीय गुणों का प्रतीक है। जहाँ कहीं भी उसे अन्याय या अत्याचार अनुभव होता है, वहीं वह अपना विद्रोह व्यक्त करता है। वह दूसरों के दुःखों को अनुभव करता है और उसे दूर करने के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने के लिए तत्पर रहता है। छोटी बच्ची के प्रति होने वाले अन्याय को देखकर वह कह उठता है कि “मालकिन को ही उठाकर पटक हूँ।” इसी प्रकार कांजीहौस में वह सींगों से दीवार को गिराकर अन्य पशुओं की जान बचा देता है। उसे इसके लिए बहुत मार खानी पड़ी और कसाई के हाथों नीलाम होना पड़ा, किन्तु उसे अपने बारे में कोई चिंता नहीं थी। वह चाहता है कि वह अधिक-से-अधिक दूसरों के काम आए।

प्रश्न 9.
आशय स्पष्ट कीजिए-
(क) अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है।
(ख) उस एक रोटी से उनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानों भोजन मिल गया।
उत्तर-
(क) कहानीकार ने प्रस्तुत पंक्ति के माध्यम से हीरा और मोती के चरित्रों पर प्रकाश डाला है। इन दोनों बैलों में कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे वे एक-दूसरे की भावनाओं को तुरंत समझ जाते थे। भले ही वह गया को मजा चखाने की योजना हो, साँड से भिड़ने की बात हो अथवा कांजीहौस में परोपकार करने में आत्मबलिदान की बात हो। इन सब घटनाओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे वे एक-दूसरे की भावनाओं को तुरंत समझ लेते थे। ऐसी शक्ति से अपने आपको प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ समझने वाला मनुष्य वंचित लगता है।

(ख) गया के घर में दोनों बैलों का अत्यधिक अनादर होता था, किन्तु गया की छोटी-सी बच्ची बैलों का सम्मान करती थी और घरवालों से चोरी-चोरी उन्हें एक रोटी रोज लाकर खिलाती थी। इतने बड़े-बड़े बैलों का एक-एक रोटी में कुछ नहीं बनता था, किन्तु सम्मान की दृष्टि से बैलों का मन संतुष्ट हो जाता था। उनसे भले ही उनकी भूख न मिट सके, किन्तु मन को यह यकीन हो जाता था कि यहाँ भी हमारा सम्मान करने वाला अवश्य है।

प्रश्न 10.
गया ने हीरा-मोती को दोनों बार सूखा भूसा खाने के लिए दिया क्योंकि-
(क) गया पराये बैलों पर अधिक खर्च नहीं करना चाहता था।
(ख) गरीबी के कारण खली आदि खरीदना उसके बस की बात न थी।
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से बहुत दुःखी था।
(घ) उसे खली आदि सामग्री की जानकारी न थी।
(सही उत्तर के आगे (√) का निशान लगाइए)
उत्तर-
(ग) वह हीरा-मोती के व्यवहार से बहुत दुःखी था।

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रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 11.
हीरा और मोती ने शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई लेकिन उसके लिए प्रताड़ना भी सही। हीरा-मोती की इस प्रतिक्रिया पर तर्क सहित अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर-
निश्चय ही यदि कोई व्यक्ति शोषण या अन्याय के प्रति अपनी आवाज़ ऊँची करता है तो उसे सदा ही संघर्ष करना पड़ता है और अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इतिहास इस बात का गवाह है। हीरा और मोती ने गया के द्वारा किए गए अन्याय तथा शोषण का विरोध किया तो उसने उन्हें भूखा रखा। इसी प्रकार कांजीहौस में कांजीहौस के मुँशी और पहरेदार के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई तो वहाँ भी उन्हें मार खानी पड़ी। अतः यह स्पष्ट है कि शोषण के विरुद्ध बोलने वाले को सदा ही कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 12.
क्या आपको लगता है कि यह कहानी आजादी की लड़ाई की ओर भी संकेत करती है ?
उत्तर-
दो बैलों की कथा’ शीर्षक कहानी में मुंशी प्रेमचंद ने आजादी की लड़ाई की ओर भी संकेत किया है। उन्होंने कहा है कि भारतीय अत्यधिक सीधे और सरल हैं इसलिए अंग्रेज सरकार उनका शोषण करती है और उनके जन्मसिद्ध अधिकार स्वतंत्रता से वंचित रखना चाहती थी। प्रेमचंद ने दोनों बैलों के चरित्र के माध्यम से यह समझाया है कि यदि हम बैलों की भाँति एकता बनाकर संघर्ष करेंगे तो हमें स्वतंत्रता प्राप्त हो सकती है। यदि आपस में झगड़ते रहे तो कभी आजाद नहीं हो सकेंगे। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। अतः यह कहानी भारत की आजादी की लड़ाई की ओर संकेत करने वाली कहानी है।

भाषा-अध्ययन

प्रश्न 13.
बस इतना ही काफी है।
फिर मैं भी ज़ोर लगाता हूँ
‘ही’, ‘भी’ वाक्य में किसी बात पर जोर देने का काम कर रहे हैं। ऐसे शब्दों को निपात कहते हैं। कहानी
में से पाँच ऐसे वाक्य छाँटिए जिनमें निपात का प्रयोग हुआ हो।
उत्तर-
(क) फिर भी बदनाम हैं।
(ख) कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है।
(ग) कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे।
(घ) मालकिन मुझे मार ही डालेगी।
(ङ) पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।

प्रश्न 14.
रचना के आधार पर वाक्य भेद बताइए तथा उपवाक्य छाँटकर उसके भी भेद लिखिए
(क) दीवार का गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे।
(ख) सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर, आया।
(ग) हीरा ने कहा-गया के घर से नाहक भागे।
(घ) मैं बेचूंगा, तो बिकेंगे।
(ङ) अगर वह मुझे पकड़ता तो मैं बे-मारे न छोड़ता।
उत्तर-
(क) मिश्र वाक्य
दीवार का गिरना था। (प्रधान उपवाक्य)
अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे। (संज्ञा उपवाक्य)

(ख) मिश्र वाक्य
जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर। (विशेषण उपवाक्य)
सहसा एक दढ़ियल आदमी आया। (प्रधान वाक्य)

(ग) मिश्र वाक्य
हीरा ने कहा। (प्रधान वाक्य)
गया के घर से नाहक भागे। (संज्ञा उपवाक्य)

(घ) मिश्र वाक्य
मैं बेचूँगा। (प्रधान वाक्य)
तो बिकेंगे। (क्रिया-विशेषण उपवाक्य)

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(ङ) मिश्रवाक्य –
अगर वह मुझे पकड़ता। (प्रधान वाक्य)
मैं बे-मारे न छोड़ता। (क्रियाविशेषण उपवाक्य)

प्रश्न 15.
कहानी में जगह-जगह मुहावरों का प्रयोग हुआ है। कोई पाँच मुहावरे छाँटिए और उनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए।
उत्तर-

  • ईंट का जवाब पत्थर से देना-भारतवर्ष शांतिप्रिय अवश्य है, किन्तु ईंट का जवाब पत्थर से देना भी भली-भाँति जानता है।
  • दाँतों पसीना आना-पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त करने के लिए तो दाँतों पसीना आ जाता है।
  • कोई कसर न उठा रखना-मैंने परीक्षा में प्रथम आने में कोई कसर न उठा रखी थी।
  • मज़ा चखाना-मोती और हीरा ने मिलकर साँड को खूब मजा चखाया था।
  • जान से हाथ धोना-मोहन को चरस बेचने के धंधे में जान से हाथ धोने पड़े।

पाठेतर सक्रियता

पशु-
पक्षियों से संबंधित अन्य रचनाएँ ढूँढकर पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

HBSE 9th Class Hindi दो बैलों की कथा Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘दो बैलों की कथा’ नामक कहानी का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-
‘दो बैलों की कथा’ शीर्षक कहानी एक सोद्देश्य रचना है। इस कहानी में लेखक ने कृषक समाज एवं पशुओं के भावात्मक संबंधों का वर्णन किया है। कहानी में बताया गया है कि स्वतंत्रता सरलता से प्राप्त नहीं हो सकती, इसलिए बार-बार प्रयास किया जाता है। स्वामी के प्रति वफादारी निभाने का वर्णन करना कहानी का प्रमुख लक्ष्य है। कहानीकार का सच्ची मित्रता पर प्रकाश डालना भी एक उद्देश्य है। एक सच्चा मित्र ही सुख-दुःख में साथ देता है। आत्म रक्षा के लिए सदैव संघर्ष करना चाहिए। ‘एकता में सदा बल है’ इस सर्वविदित सत्य को दर्शाना भी कहानी का मूल उद्देश्य है।

प्रश्न 2.
‘दो बैलों की कथा’ कहानी के अनुसार बताइए कि आज संसार में किन लोगों की दुर्दशा हो रही है और क्यों?
उत्तर-
‘दो बैलों की कथा’ नामक कहानी में बताया गया है कि आज सीधे-सादे व साधारण लोगों की दुर्दशा हो रही है। इस संसार में सरलता, सीधापन, सहनशीलता आदि गुणों का कोई महत्त्व नहीं रह गया है। सरलता को मूर्खता और सहनशीलता को डरपोक होना समझा जाता है। आज इन्हीं गुणों के कारण व्यक्ति का शोषण होता है। आज हर सीधे-सादे व्यक्ति का शोषण किया जाता है। आज शक्तिशाली व चालाक व्यक्ति को सम्मान दिया जाता है। उससे सभी लोग डरते हैं। प्रस्तुत कहानी में प्रश्न उठाया है कि अफ्रीका व अमेरिका में भारतीयों का सम्मान क्यों नहीं है ? स्वयं ही इसका उत्तर देते उसने कहा है, क्योंकि वे सीधे-सादे
और परिश्रमी हैं। वे चोट खाकर भी सब कुछ सहन कर जाते हैं। इसके विपरीत जापान ने युद्ध में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करके दुनिया में अपना सम्मान अर्जित कर लिया है।

प्रश्न 3.
‘हीरा और मोती सच्चे मित्रों के आदर्श हैं’ कैसे?
उत्तर-
सच्चे मित्र एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते हैं। वे एक-दूसरे के लिए त्याग भी करते हैं और एक साथ खाते-पीते भी हैं। ये सभी गुण हीरा और मोती दोनों बैलों में भी देखे जा सकते हैं। हीरा और मोती एक-दूसरे से प्यार करते हैं। एक-दूसरे को चाट-चूमकर और सूंघकर अपने प्यार का प्रदर्शन करते हैं। वे आपस में कौल-क्रीड़ा, शरारत आदि भी करते हैं। हीरा-मोती गहरे मित्र हैं। वे इकट्ठे खाते-पीते, खेलते व एक-दूसरे से सींग भिड़ाते हैं। वे एक-दूसरे को संकट से बचाने के लिए अपनी जान खतरे में डाल देते हैं। इससे पता चलता है कि हीरा-मोती बैल होते हुए भी सच्चे मित्रों के आदर्श हैं।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कहानी के आधार पर मोती के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
कहानी में मोती एक बैल है। वह कुछ गर्म स्वभाव वाला है। वह स्वामिभक्त है। वह अन्याय करने वाले का विरोध करता है। झूरी का साला गया जब उनके प्रति अन्याय एवं अत्याचार करता है तो मोती उसका हल-जुआ लेकर भाग जाता है। मोती कहता भी है कि “मुझे मारेगा तो उठाकर पटक दूंगा।” जब गया उसका अपमान करता है और मारता है तो वह हीरा से कहता है कि “एकाध को सींगों पर उठाकर फैंक दूंगा।” इसी प्रकार वह दढ़ियल कसाई को भी सींग दिखाकर गाँव से भगा देता है। किन्तु वह दुखियों के प्रति दया का भाव भी रखता है। वह गया की बेटी तथा कांजीहौस में फँसे हुए जानवरों के प्रति दया दिखाता है।

प्रश्न 5.
‘हीरा एक धैर्यशील एवं अहिंसक प्राणी है’-पठित कहानी के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
कहानी को पढ़कर लगता है कि हीरा गांधीवादी विचारधारा का समर्थक है। वह मुसीबत के समय धैर्य बनाए रखता है। उसे पता है कि धैर्य खो देने से काम बिगड़ जाता है। वह कदम-कदम पर अपने मित्र मोती को भी धैर्य से काम लेने का परामर्श देता है। जब गया बैलों को गाड़ी में जोत कर ले जा रहा था तो मोती ने दो बार गया को गाड़ी सहित सड़क की खाई में गिराना चाहा, किन्तु हीरा ने उसे संभाल लिया। इसी प्रकार गया जब बैलों के प्रति अन्याय करता है, और उन्हें सूखा भूसा देता है तो भी मोती को गुस्सा आ जाता है और वह उससे बदला लेने की ठान लेता है। वह उसे मार गिराना चाहता है। उस समय हीरा ने ही उसे रोक लिया था, गया की पत्नी को भी मोती सबक सिखाना चाहता था, किन्तु हीरा ने कहा कि स्त्री जाति पर हाथ उठाना या सींग चलाना मना है, यह क्यों भूल जाता है। हीरा के धैर्य की परीक्षा तो उस समय होती है जब कांजीहौस की दीवार तोड़ता हुआ पकड़ा जाता है। उसे मोटी रस्सी में बाँध दिया जाता है। वह कहता है कि जोर तो मारता ही जाऊँगा चाहे कितने ही बँधन क्यों न पड़ जाएँ? इन सब तथ्यों से पता चलता है कि हीरा एक धैर्यशील बैल था।

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प्रश्न 6.
साँड के साथ बैलों की टक्कर की घटना से हमें क्या उपदेश मिलता है ?
अथवा
साँड को मार गिराने की घटना के माध्यम से लेखक क्या उपदेश देना चाहता है ?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में बैलों द्वारा साँड को हरा देने की घटना के पीछे एक महान संदेश छिपा हुआ है। इस घटना के माध्यम से लेखक ने संगठित होकर शत्रु का मुकाबला करने की प्रेरणा दी है। उसने बताया है जिस प्रकार हीरा और मोती दो बैल शक्तिशाली साँड को मार भगाते हैं, उसी प्रकार भारतीय भी आपसी मतभेद को त्यागकर एकजुट होकर अंग्रेजों को देश से बाहर कर सकते हैं। अतः लेखक ने ‘एकता में बल है’ नीति वाक्य को भी इस घटना के माध्यम से सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘दो बैलों की कथा’ पाठ हिंदी साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आता है ?
(A) कविता
(B) निबंध
(C) एकांकी
(D) कहानी
उत्तर-
(D) कहानी

प्रश्न 2.
‘दो बैलों की कथा’ कहानी के लेखक कौन हैं ?
(A) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
(B) प्रेमचंद
(C) महादेवी वर्मा
(D) जाबिर हुसैन
उत्तर-
(B) प्रेमचंद

प्रश्न 3.
प्रेमचंद अपनी किस प्रकार की रचनाओं के लिए प्रसिद्ध हुए थे ?
(A) कविता
(B) उपन्यास
(C) एकांकी
(D) निबंध
उत्तर-
(B) उपन्यास

प्रश्न 4.
प्रेमचंद ने अपनी कहानी ‘दो बैलों की कथा’ में किसका वर्णन किया है ?
(A) विद्यार्थियों का
(B) पक्षियों का
(C) बैलों की मित्रता का
(D) किसान का
उत्तर-
(C) बैलों की मित्रता का

प्रश्न 5.
‘दो बैलों की कथा’ कहानी में किस-किस का संबंध दिखाया गया है ?
(A) किसान और उसके पशुओं का
(B) किसान और महाजन का
(C) महाजन और पशुओं का
(D) इनमें से किसी का नहीं
उत्तर-
(A) किसान और उसके पशुओं का

प्रश्न 6.
लेखक के अनुसार सबसे बुद्धिहीन जानवर किसे समझा जाता है ?
(A) बैल को
(B) गाय को
(C) भैंस को
(D) गधे को
उत्तर-
(D) गधे को

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प्रश्न 7.
हम जब किसी व्यक्ति को मूर्ख बताते हैं तो उसे क्या कहते हैं ?
(A) बैल
(B) कुत्ता
(C) गधा
(D) ऊँट
उत्तर-
(C) गधा

प्रश्न 8.
गाय किस दशा में सिंहनी का रूप धारण कर लेती है ?
(A) बैठी हुई
(B) दौड़ती हुई
(C) चरती हुई
(D) ब्याही हुई
उत्तर-
(D) ब्याही हुई

प्रश्न 9.
गधे के चेहरे पर कौन-सा स्थायी भाव सदा छाया रहता है ?
(A) प्रसन्नता का
(B) असंतोष का
(C) विषाद का
(D) निराशा का
उत्तर-
(C) विषाद का

प्रश्न 10.
भारतवासियों को किस देश में घुसने नहीं दिया जा रहा था ?
(A) अमेरिका
(B) इंग्लैंड
(C) जर्मनी
(D) अफ्रीका
उत्तर-
(A) अमेरिका

प्रश्न 11.
किस देश के लोगों की एक विजय ने उन्हें सभ्य जातियों के लोगों में स्थान दिला दिया ?
(A) भारत
(B) जापान
(C) अमेरिका
(D) इंग्लैंड
उत्तर-
(B) जापान

प्रश्न 12.
“अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते” ये शब्द लेखक ने किसके लिए कहे हैं ?
(A) भारतीयों के लिए
(B) जापान के लोगों के लिए
(C) पाकिस्तान के लोगों के लिए
(D) चीन के लोगों के लिए
उत्तर-
(A) भारतीयों के लिए

प्रश्न 13.
‘बछिया का ताऊ’ किसके लिए प्रयोग किया जाता है ?
(A) शेर के
(B) हाथी के
(C) भैंसा के
(D) बैल के
उत्तर-
(D) बैल के

प्रश्न 14.
हीरा और मोती बैलों के स्वामी का क्या नाम था ?
(A) किश्न
(B) झूरी
(C) होरी
(D) रामेश्वर
उत्तर-
(B) झूरी

प्रश्न 15.
झूरी के दोनों बैल किस जाति के थे ?
(A) पछाईं
(B) राजस्थानी
(C) मूर्रा
(D) जंगली
उत्तर-
(A) पछाईं

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प्रश्न 16.
झूरी के साले का क्या नाम था ?
(A) मोहन
(B) गया
(C) बृज
(D) किश्न
उत्तर-
(B) गया

प्रश्न 17.
दोनों बैल कौन-सी भाषा में एक-दूसरे के भावों को समझ लेते थे ?
(A) मूक भाषा
(B) सांकेतिक भाषा
(C) संगीतात्मक भाषा
(D) रंभाकर
उत्तर-
(A) मूक भाषा

प्रश्न 18.
झूरी ने प्रातः ही नाद पर खड़े बैलों को देखकर क्या किया ?
(A) बैलों को पीटा
(B) उन्हें गले से लगा लिया
(C) घर से निकाल दिया
(D) बेच दिया
उत्तर-
(B) उन्हें गले से लगा लिया

प्रश्न 19.
“कैसे नमकहराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया” ये शब्द किसने कहे ?
(A) गया ने
(B) झूरी की पत्नी ने
(C) झूरी ने
(D) झूरी की बेटी ने
उत्तर-
(B) झूरी की पत्नी ने

प्रश्न 20.
“वे लोग तुम जैसे बुद्धओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं” ये शब्द किसने किसके प्रति कहे ?
(A) झूरी की पत्नी ने झूरी को
(B) गया ने झूरी के प्रति
(C) गया की बेटी ने गया को
(D) इनमें से किसी ने नहीं
उत्तर-
(A) झूरी की पत्नी ने झूरी को

प्रश्न 21.
दूसरी बार गया बैलों को कैसे ले गया ?
(A) पीटता हुआ
(B) बैलगाड़ी में जोतकर
(C) हल में जोतकर
(D) प्रेमपूर्वक
उत्तर-
(B) बैलगाड़ी में जोतकर

प्रश्न 22.
गया की लड़की को बैलों से सहानुभूति क्यों थी ?
(A) उसकी माँ मर चुकी थी
(B) सौतेली माँ मारती थी
(C) उसे दोनों बैल सुंदर लगते थे
(D) वह किसी को भूखा नहीं देख सकती थी
उत्तर-
(B) सौतेली माँ मारती थी

प्रश्न 23.
गया के घर में दूसरी बार बैलों की रस्सियाँ किसने खोली थी ?
(A) गया की पत्नी ने
(B) गया के नौकर ने
(C) गया की बेटी ने
(D) स्वयं गया ने
उत्तर-
(C) गया की बेटी ने

प्रश्न 24.
हीरा ने मोती को गया की पत्नी पर सींग चलाने से मना क्यों कर दिया था ?
(A) वह बीमार थी
(B) वह दयालु थी
(C) वह स्त्री जाति थी
(D) वह बूढ़ी थी
उत्तर-
(C) वह स्त्री जाति थी

प्रश्न 25.
“गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए” ये शब्द किसने कहे थे ?
(A) हीरा ने
(B) मोती ने
(C) साँड ने
(D) झूरी ने
उत्तर-
(A) हीरा ने

प्रश्न 26.
खेत के मालिक ने दोनों बैलों को कहाँ बंद कर दिया था ?
(A) जेल में
(B) अपने घर में
(C) कांजीहौस में
(D) थाने में
उत्तर-
(C) कांजीहौस में

प्रश्न 27.
‘दीवार को तोड़ना’ से बैलों की कौन-सी भावना का बोध होता है ?
(A) अनुशासन
(B) विद्रोह
(C) दया
(D) घृणा
उत्तर-
(B) विद्रोह

प्रश्न 28.
मोती द्वारा दीवार गिरा देने पर भी कौन-सा जानवर नहीं भागा ?
(A) घोड़ी
(B) बकरी
(C) भैंस
(D) गधा
उत्तर-
(D) गधा

प्रश्न 29.
कांजीहौस से हीरा और मोती को किसने खरीदा?
(A) सड़ियल ने
(B) दड़ियल ने
(C) मुच्छड़ ने
(D) अड़ियल ने
उत्तर-
(B) दड़ियल ने

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

दो बैलों की कथा प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, व्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहे गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी।[पृष्ठ 5]

शब्दार्थ-बुद्धिहीन = मूर्ख । परले दरजे का बेवकूफ = अत्यधिक मूर्ख । निरापद = कष्ट न पहुँचाने की भावना। सहिष्णुता = सहनशीलता। पदवी = उपाधि। अनायास = अचानक। क्रोध = गुस्सा। असंतोष की छाया = संतोषहीनता का भाव।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित ‘दो बैलों की कथा’ शीर्षक कहानी से अवतरित है। इसके लेखक महान् कथाकार मुंशी प्रेमचंद हैं। इस कहानी में लेखक ने दो बैलों की कहानी के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों पर प्रकाश डाला है। इन पंक्तियों में बताया गया है कि गधे के सीधेपन के कारण ही उसे गधा, मूर्ख कहा जाता है। वस्तुतः लेखक ने ‘गधा’ शब्द पर व्यंग्य करते हुए ये शब्द कहे हैं

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने बताया है कि सब जानवरों व पशुओं में गधा ही सीधा एवं सरल पशु है। वह सबसे अधिक नासमझ पशु है। अपने सीधेपन और मंद-बुद्धि के कारण उसका सर्वत्र अपमान होता है। समाज में जब किसी को परले दरजे का मूर्ख कहा जाता है तो उसे ‘गधा’ शब्द से संबोधित करते हैं। सीधेपन, बुद्धिहीनता, सहनशीलता आदि गुणों के कारण उसे यह उपाधि (गधा) मिली है। गधे में अधिकार-बोध की भावना तनिक भी नहीं होती। न उसमें विद्रोह की भावना है और न अधिकारचेष्टा ही। वह एक सहनशील प्राणी है, जो हर प्रकार के कष्टों को चुपचाप सहन कर लेता है। गाय भी सींग मारती है, भले ही उसे लोग गाय माता कहते हों, किन्तु वह जब ब्याई हुई होती है तो अचानक ही शेरनी का रूप धारण कर लेती है। यहाँ तक कि कुत्ते को भी लोग गरीब कहते हैं, किन्तु उसे भी कभी-न-कभी गुस्सा आ ही जाता है। किन्तु गधे जी को कभी गुस्सा करते न देखा होगा और न सुना होगा। उससे जितना चाहे काम लो, जितना चाहे पीट लो, और तो और चाहे सड़ी-गली व सूखी घास भी डाल दो तो भी उसके चेहरे पर कभी असंतोष की झलक दिखाई नहीं देगी।

विशेष-

  1. ‘गधा’ शब्द की अनेक अर्थों में सुंदर व्यंजना की गई है।
  2. ‘गधा’ शब्द को मूर्खता का पर्याय सिद्ध किया गया है।
  3. अन्य पशुओं से गधे की तुलना करके कहानीकार ने गधे की मूर्खता को स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया है।
  4. भाषा सरल एवं सुबोध है।

उपर्युक्त गयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) हम किसी व्यक्ति को गधा क्यों कहते हैं ?
(2) गधे के जीवन की प्रमुख विशेषता क्या है ?
(3) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से क्या अभिप्राय है ?
(4) गधे को गधा क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
(1) जब हम किसी व्यक्ति को मूर्ख कहना चाहते हैं, तब ही उसे गधा कहते हैं।
(2) सीधापन ही गधे के जीवन की प्रमुख विशेषता है।
(3) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से अभिप्राय है-पूर्णतः मूर्ख व्यक्ति, जिसे दीन-दुनिया की कोई खबर न हो।
(4) गधे की अत्यधिक सहनशीलता, सरलता, अक्रोधी स्वभाव, असंतोष को व्यक्त न करना एवं सुख-दुःख में सदा समान रहने के कारण ही उसे गधा कहते हैं। दूसरे जानवर ऐसे नहीं होते, वे क्रोध भी करते हैं और असंतोष भी दिखाते हैं।

2. उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं। पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा। कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। [पृष्ठ 5]

शब्दार्थ-विषाद = दुःख। दशा = हालत। पराकाष्ठा = चरम सीमा। बेवकूफ = मूर्ख । अनादर = अपमान। सीधापन = सरलता।
प्रसंग-प्रस्तुत गद्यावतरण हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से अवतरित किया गया है। इसमें लेखक ने गधे के सीधेपन का व्यंग्यार्थ के रूप में चित्रण किया है। आज के युग में सीधा या साधारण व सरल हृदयी होना मूर्खता कहलाता है। इन शब्दों में यही भाव झलकता है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-प्रेमचंद गधे के स्वभाव का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि गधा स्वभाव से सीधा होता है। उसमें किसी प्रकार का छल-कपट नहीं होता और न ही कभी प्रसन्नता की झलक ही दिखाई देती है। उसके चेहरे पर सदा निराशा का भाव ही छाया रहता है। सुख-दुःख, हानि-लाभ, सभी दशाओं में यह विषाद उसके चेहरे पर स्थायी रूप से छाया रहता है। ऐसा लगता है मानों ऋषि-मुनियों के सभी श्रेष्ठ गुण पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं। इन्हीं श्रेष्ठ गुणों के कारण ही आदमी उसे ‘बेवकूफ’ कहता है। यह उसके सद्गुणों का अनादर है। ऐसा लगता है कि गधे का सीधापन उसके लिए अभिशाप है। अति सरलता के कारण संसार के लोग उस पर टीका-टिप्पणी करते हैं।

विशेष-

  1. गधे के सीधेपन को व्यंग्य रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसका अत्यधिक सीधापन ही उसकी मूर्खता बन गया है।
  2. कहानीकार ने गधे के वर्णन के माध्यम से सीधे-सादे व्यक्तियों को मूर्ख समझकर उनका शोषण करने वाले चालाक लोगों पर करारा व्यंग्य किया है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं सुबोध है।
  4. ‘सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं’ का अभिप्राय है, संसार में सदा टेढ़ा बनकर ही रहना चाहिए।’
  5. विचारात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) प्रस्तुत गद्यांश का आशय स्पष्ट कीजिए।
(2) लेखक के अनुसार गधे और ऋषि-मुनियों में कौन-सी समानताएँ हैं ?
(3) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने क्या संदेश दिया है ?
(4) स्थायी विषाद का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर-
(1) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बताया है कि कुछ ही क्षणों या अवसरों को छोड़कर गधे के जीवन में सदा निराशा व दुःख ही छाया रहता है। ऋषि-मुनियों की भाँति सुख-दुःख में वह सदा समभाव रहता है। गधा सरल हृदय होता है। इतना कुछ होते हुए भी संसार गधे को मूर्ख कहता है। संसार में सीधापन उचित नहीं है।
(2) लेखक ने गधे और ऋषि-मुनियों की समानताएँ बताते हुए कहा है कि गधा और ऋषि-मुनि दोनों ही सरल स्वभाव वाले होते हैं। वे सुख-दुःख में सदा एक समान रहते हैं। वे अत्यधिक सहनशील और संतोषी होते हैं। उन्हें क्रोध भी बहुत कम आता है।
(3) प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने हमें संदेश दिया है कि हमें अत्यधिक सरल, सीधा व सहनशील नहीं होना चाहिए। हमें अत्याचार, अन्याय आदि के प्रति असंतोष प्रकट करना चाहिए और उसका विरोध भी करना चाहिए।
(4) चेहरे पर सदा छाई रहने वाली निराशा को ही लेखक ने स्थायी विषाद कहा है।

उपर्युक्त गयांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) हम किसी व्यक्ति को गधा क्यों कहते हैं ?
(2) गधे के जीवन की प्रमुख विशेषता क्या है ?
(3) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से क्या अभिप्राय है ?
(4) गधे को गधा क्यों कहा जाता है ?
उत्तर-
(1) जब हम किसी व्यक्ति को मूर्ख कहना चाहते हैं, तब ही उसे गधा कहते हैं।
(2) सीधापन ही गधे के जीवन की प्रमुख विशेषता है।
(3) ‘परले दरजे का बेवकूफ’ से अभिप्राय है-पूर्णतः मूर्ख व्यक्ति, जिसे दीन-दुनिया की कोई खबर न हो।
(4) गधे की अत्यधिक सहनशीलता, सरलता, अक्रोधी स्वभाव, असंतोष को व्यक्त न करना एवं सुख-दुःख में सदा समान रहने के कारण ही उसे गधा कहते हैं। दूसरे जानवर ऐसे नहीं होते, वे क्रोध भी करते हैं और असंतोष भी दिखाते हैं।

3. लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है ‘बैल’। जिस अर्थ में हम गधे का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे; मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। [पृष्ठ 6]

शब्दार्थ-गधा = मूर्ख । बछिया का ताऊ = सीधा-सादा, भोंदू। बेवकूफी = मूर्खता। सर्वश्रेष्ठ = सबसे उत्तम। . प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित एवं महान् कथाकार प्रेमचंद कृत ‘दो बैलों की कथा’ शीर्षक कहानी से उद्धृत है। इन पंक्तियों में कहानीकार ने गधे और बैल के गुणों की तुलना करते हुए बैल को गधे से बेहतर बताया है तथा ‘बछिया के ताऊ’ की सुंदर व्याख्या की है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक ने गधे और बैल के प्रसंग के माध्यम से मनुष्य के कम या अधिक गुणों के आधार पर समाज में उसके स्थान व सम्मान की ओर संकेत किया है। ‘गधा’ शब्द का व्यंजनामूलक अर्थ है-मूर्ख। जब किसी व्यक्ति को अव्वल दरजे का मूर्ख कहना हो, तो उसे गधा कहा जाता है। सामान्यतः बैल को ‘बछिया का ताऊ’ कहा जाता है। यह शब्द भी मूर्खता के अर्थ में प्रयुक्त होता है। कुछ लोग बैल को गधे से ज्यादा मूर्ख मानते हैं, लेकिन लेखक की मान्यता है कि बैल गधे से अधिक मूर्ख नहीं है। बैल में अपने अपमान का बदला लेने की भावना होती है। बैल में गधे की अपेक्षा अधिक संवेदना होती है। अतः बैल गधे की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है।

विशेष-

  1. लेखक ने समाज के सरल एवं सीधे-सादे लोगों के स्वभाव की व्यंग्यार्थ विवेचना की है।
  2. ‘बछिया का ताऊ’ मुहावरे का व्यंजनामूलक अर्थों में सुंदर विश्लेषण किया गया है। किसी को कम मूर्ख कहना हो तो इस मुहावरे का प्रयोग किया जाता है।
  3. भाषा सरल, सुबोध एवं मुहावरेदार है।
  4. वाक्य-योजना सरल एवं सार्थक है। – उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) गधे का छोटा भाई किसे बताया गया है और क्यों ?
(2) ‘बछिया का ताऊ’ किसे कहा जाता है और क्यों ?
(3) लेखक के अनुसार बैल का स्थान गधे से नीचा क्यों है ?
(4) बैल कैसा व्यवहार करता है ?
उत्तर-
(1) गधे का छोटा भाई बैल को बताया गया है क्योंकि जो गुण गधे में होते हैं, वे ही गुण कुछ कम मात्रा में बैल में भी पाए जाते हैं।

(2) बैल को ही ‘बछिया का ताऊ’ कहा जाता है। बछिया अर्थात गाय जो सरल और सीधी होती है। बैल में ये गुण उससे अधिक होते हैं। वह सरल, सीधा एवं कार्यशील होता है। अतः अत्यधिक सरलता और सीधेपन के कारण उसे ‘बछिया का ताऊ’ कहा जाता है।

(3) बैल कभी-कभी सहनशीलता छोड़कर क्रोध में सींग चला देता है। वह असंतोष भी प्रकट करता है तथा अपने अनुकूल व्यवहार न होने पर कभी-कभी अड़ भी जाता है। इसलिए उसका स्थान सीधेपन में गधे से नीचा है।

(4) बैल स्वभावतः सरल, सीधा एवं परिश्रमी होता है, किन्तु कभी-कभी दूसरों को मारता है, अड़ियलपन पर उतर आता है तथा अपना विरोध भी प्रकट करता है।

4. दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक, दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी, जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे-विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हलकी-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। [पृष्ठ 6]

शब्दार्थ-मूक-भाषा = मौन-भाषा। विनिमय = आदान-प्रदान। वंचित = रहित। विग्रह = मतभेद। विनोद = मज़ाक। आत्मीयता = अपनेपन। घनिष्ठता = गहन । फुसफुसी = हलकी, कच्ची।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिन्दी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग-1 में संकलित प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की कथा’ से लिया गया है। लेखक ने इन पंक्तियों में हीरा-मोती की आपसी मित्रता की गहनता, आत्मीयता और प्रेमभाव को सुंदर ढंग से दर्शाया है। साथ ही पक्की दोस्ती के लक्षण की ओर भी संकेत किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-लेखक का कथन है कि हीरा और मोती, दोनों बैलों के बीच अद्भुत मित्रता थी। दोनों आमने-सामने बैठकर मूक-भाषा में अपने हृदय की भावना व्यक्त करते थे। वे एक-दूसरे के मन की बात कैसे समझ पाते थे-यह बताना कठिन है। उनमें एक गुप्त शक्ति थी, जिसे आत्मीयता कहते हैं। इसी शक्ति के कारण उनके हृदय आपस में जुड़े हुए थे। प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य में इस शक्ति का अभाव है। लेखक ने हीरा और मोती की दोस्ती के विषय में बताया है कि दोनों एक-दूसरे को चाटकर या सूंघकर अपने प्रेम को प्रकट करते थे। चाटना, चूमना व सूंघना ही जानवरों के पास अपने प्रेम या स्वामिभक्ति को व्यक्त करने का साधन है, किन्तु हीरा और मोती कभी-कभी सींग भी भिड़ाते थे। ऐसा वे शत्रुता या नाराज़गी के कारण नहीं, अपितु हँसी-मजाक में ही करते थे। इससे उनकी आत्मीयता का भाव भी व्यक्त होता था। फिर दोस्ती में धक्का-मुक्का धौल-धप्पा तो चलता ही है। इसके अभाव में दोस्ती में बनावटीपन व हल्कापन रहता है। ऐसी दोस्ती पर विश्वास नहीं किया जा सकता। कहने का भाव है कि जहाँ आत्मीयता, सरलता, स्पष्टता, हँसी-मज़ाक आदि सब कुछ होता है, वहीं दोस्ती में गहनता होती है।

विशेष-

  1. लेखक ने हीरा और मोती की दोस्ती का वर्णन किया है।
  2. पशुओं की मूक भाषा की ओर संकेत किया गया है।
  3. भाषा सरल, सहज एवं सुबोध है। – उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(1) मोती और हीरा दोनों परस्पर किस भाषा में विचार-विमर्श करते थे ?
(2) उनमें कौन-सी शक्ति होने की बात कही है ?
(3) दोनों बैल अपना प्रेम किस प्रकार प्रकट करते थे ?
(4) कैसी दोस्ती पर अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता ? ।
उत्तर-
(1) मोती और हीरा दोनों बैल मूक-भाषा में विचार-विमर्श करते थे।
(2) लेखक ने दोनों बैलों के बीच किसी गुप्त शक्ति के होने की बात कही है।
(3) दोनों बैल एक-दूसरे को चाटकर अथवा सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते थे।
(4) फुसफुसी व हल्की दोस्ती में अधिक विश्वास नहीं किया जा सकता।

दो बैलों की कथा Summary in Hindi

दो बैलों की कथा लेखक-परिचय

प्रश्न-
मुंशी प्रेमचंद का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी कहानी-कला की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
मुंशी प्रेमचंद का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-मुंशी प्रेमचंद एक महान् कथाकार थे। उन्हें उपन्यास-सम्राट के रूप में भी जाना जाता है। उनका जन्म सन् 1880 में बनारस के निकट लमही नामक गाँव के एक साधारण कायस्थ परिवार में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपतराय था। पाँच वर्ष की आयु में ही उनकी माता का देहांत हो गया था। उनके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया था। विमाता (सौतेली माँ) का व्यवहार उनके प्रति अच्छा नहीं था। 13 वर्ष की आयु में उनका विवाह कर दिया गया था। 14 वर्ष की आयु में पिता की मृत्यु के पश्चात् परिवार का सारा बोझ इनके कंधों पर आ पड़ा। 16 वर्ष की आयु में ही उन्हें एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। नौकरी के दौरान ही प्रेमचंद जी डिप्टी-इंस्पैक्टर के पद तक पहुँचे। वे स्वभाव से स्वाभिमानी थे। सन् 1928 में प्रेमचंद जी नौकरी से त्याग-पत्र देकर गांधी जी द्वारा चलाए गए राष्ट्रीय आंदोलन में कूद पड़े थे। उन्होंने जीवन-पर्यन्त साहित्य-सेवा की। सन् 1936 में उनका देहांत हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-मुंशी प्रेमचंद ने आरंभ में उर्दू में लिखना शुरू किया तथा बाद में हिंदी में आए थे। उन्होंने ‘वरदान’, ‘सेवासदन’, ‘रंगभूमि’, ‘कर्मभूमि’, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘गोदान’ आदि ग्यारह उपन्यासों की रचना की है तथा तीन सौ के लगभग कहानियाँ लिखी हैं जिनमें ‘कफन’, ‘पूस की रात’, ‘दो बैलों की कथा’, ‘पंच परमेश्वर’, ‘बड़े घर की बेटी’, ‘शतरंज के खिलाड़ी’ आदि प्रमुख हैं।

3. कहानी-कला की विशेषताएँ-मुंशी प्रेमचंद का संपूर्ण कहानी-साहित्य ‘मानसरोवर’ के आठ भागों में संकलित है। कहानी-कला की दृष्टि से प्रेमचंद अपने युग के श्रेष्ठ कहानीकार हैं। उन्होंने अपने कहानी-साहित्य में जीवन के विभिन्न पहलुओं को विषय बनाकर कहानी को जन-जीवन से जोड़ा है। उनकी कहानी-कला की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(i) विषय की विभिन्नता-मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में विभिन्न विषयों का वर्णन किया गया है। उन्होंने जीवन के विविध पक्षों पर जमकर कलम चलाई है। उनकी कहानियों के विषय की व्यापकता पर टिप्पणी करते हुए डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लिखा है
“प्रेमचंद शताब्दियों से पददलित, अपमानित और शोषित कृषकों की आवाज़ थे। पर्दे में कैद, पद-पद पर लांछित, अपमानित और शोषित नारी जाति की महिमा के वे ज़बरदस्त वकील थे, गरीबों और बेकसों के महत्त्व के प्रचारक थे। अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, सुख-दुःख और सूझबूझ जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। उनकी कहानियों में तत्कालीन समाज का सजीव चित्र देखा जा सकता है।”

(ii) गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव मुंशी प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य पर गांधीवादी विचारधारा का प्रभाव देखा जा सकता है। इस संबंध में मुंशी प्रेमचंद स्वयं यह स्वीकार करते हुए लिखते हैं-“मैं दुनिया में महात्मा गांधी को सबसे बड़ा मानता हूँ। उनका उद्देश्य भी यही है कि मज़दूर और काश्तकार सुखी हों। महात्मा गांधी हिंदू-मुसलमानों की एकता चाहते हैं। मैं भी हिंदी और उर्दू को मिलाकर हिंदुस्तानी बनाना चाहता हूँ।” यही कारण है कि प्रेमचंद की कहानियों में गांधीवादी विचारधारा की झलक सर्वत्र देखी जा सकती है। उनके पात्र गांधीवादी आदर्शों पर चलते हैं और उनका समर्थन करते हैं।

(iii) मानव-स्वभाव का विश्लेषण-मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जहाँ अपने पात्रों के बाह्य आकार व रूप-रंग का वर्णन किया है, वहाँ उनके मन का भी सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण किया है। वे मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से मुक्त कहानी को उत्तम मानते थे। मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के विषय में उन्होंने लिखा है-“वर्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण, जीवन के यथार्थ और स्वाभाविक चित्रण को अपना ध्येय समझती है।”

(iv) ग्रामीण-जीवन का चित्रांकन-मुंशी प्रेमचंद ने जितना ग्रामीण-जीवन का वर्णन किया है, उतना वर्णन किसी अन्य कहानीकार ने नहीं किया। उन्होंने कथा-साहित्य को जन-जीवन से जोड़ने का सार्थक प्रयास किया है। उनकी कहानियों में ग्रामीण-जीवन की विभिन्न समस्याओं का यथार्थ चित्रण सहानुभूतिपूर्वक किया गया है। उन्होंने अपने कथा-साहित्य में गाँव के गरीब किसानों, मज़दूरों, काश्तकारों, दलितों और पीड़ितों के प्रति विशेष संवेदना दिखाई है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

(v) आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद-मुंशी प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में जीवन की विभिन्न समस्याओं का यथार्थ चित्रण किया है, किन्तु उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए आदर्श भी प्रस्तुत किए हैं। इस प्रकार, इनकी कहानियों में यथार्थ एवं आदर्श का अनुपम सौंदर्य है। इस विषय में प्रेमचंद जी का स्पष्ट मत है कि साहित्यकार को नग्नताओं का पोषक न बनकर मानवीय स्वभाव की उज्ज्वलताओं को भी दिखाने वाला होना चाहिए।

4. भाषा-शैली-मुंशी प्रेमचंद आरंभ में उर्दू भाषा में लिखते थे और बाद में इन्होंने हिंदी भाषा में लिखना आरंभ किया। इसलिए इनकी लेखन-भाषा में उर्दू के शब्दों का प्रयुक्त होना स्वाभाविक है। इनकी कहानियों की भाषा जितनी सरल, स्पष्ट और भावानुकूल है, उतनी ही व्यावहारिक भी है। लोक-प्रचलित मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रसंगानुकूल प्रयोग से इनकी भाषा में गठन एवं रोचकता का समावेश हुआ है। कहीं-कहीं मुहावरों के प्रयोग की झड़ी-सी लग जाती है। सूक्तियों के प्रयोग में तो प्रेमचंद बेजोड़ हैं।

प्रेमचंद की कहानियों में भावानुकूल एवं पात्रानुकूल भाषा का सार्थक प्रयोग किया गया है। सफल संवाद-योजना के कारण उनकी भाषा-शैली में नाटकीयता के गुण का समावेश हुआ है। कहानियों में वर्णन-शैली के साथ-साथ व्यंग्यात्मक शैली का भी सफल प्रयोग किया गया है। प्रेमचंद जी की भाषा-शैली में प्रेरणा देने की शक्ति के साथ-साथ पाठकों को चिंतन के लिए उकसाने की भी पूर्ण क्षमता है। अपनी कहानी-कला की इन्हीं प्रमुख विशेषताओं के कारण प्रेमचंद अपने युग के सर्वश्रेष्ठ कहानीकार माने जाते हैं।

दो बैलों की कथा पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘दो बैलों की कथा’ शीर्षक पाठ का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘दो बैलों की कथा’ प्रेमचंद की एक महत्त्वपूर्ण कहानी है। इसमें उन्होंने कृषक समाज एवं पशुओं के भावात्मक संबंधों का वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि स्वतंत्रता सरलता से नहीं मिलती। उसके लिए बार-बार प्रयास करना पड़ता है तथा आपसी भेदभाव त्यागकर एक-जुट होकर संघर्ष भी करना पड़ता है। कहानी का सार इस प्रकार है-

लेखक ने बताया है कि जानवरों में सबसे मूर्ख गधे को माना जाता है, क्योंकि वह अत्यंत सीधा और सरल है। वह किसी बात का विरोध नहीं करता। अन्य जानवरों को कभी-न-कभी गुस्सा आ जाता है, किन्तु गधे को कभी गुस्सा करते नहीं देखा। बैल के विषय में लोगों की कुछ और ही धारणा रही है तभी तो उसे ‘बछिया का ताऊ’ कहते हैं। किन्तु यह बात सच नहीं है क्योंकि बैल को गुस्सा भी आता है, वह मारता भी है और अड़ियल रुख भी अपना लेता है। इसलिए उसे लोग गधे से बेहतर समझते हैं।

झूरी काछी के यहाँ दो बैल थे। एक का नाम हीरा, दूसरे का नाम मोती था। दोनों सुंदर, स्वस्थ और काम करने वाले थे। दोनों में पक्की मित्रता थी। दोनों साथ-साथ रहते और काम करते थे।

संयोगवश एक बार झूरी ने दोनों बैल अपने साले गया को दे दिए। बैलों को लगा कि उन्हें बेच दिया गया है। अतः गया को बैलों को घर तक ले जाने में बहुत कठिन परिश्रम करना पड़ा। शाम को जब वे गया के घर पहुंचे तो उन्होंने घास को मुँह तक नहीं लगाया। दोनों आपस में मूक भाषा में सलाह कर रात को रस्सियाँ तुड़वाकर झूरी के घर की ओर चल पड़ते हैं। झूरी प्रातःकाल उठकर देखता है कि उसके दोनों बैल नाद पर खड़े घास खा रहे हैं। झूरी दौड़कर स्नेहवश दोनों को गले से लगा लेता है। गाँव के सभी लोग बैलों की स्वामिभक्ति पर आश्चर्यचकित थे, किन्तु झूरी की पत्नी से यह देखते न बना। वह पति और बैलों को भला-बुरा . बताने लगी।

अगले दिन से पत्नी ने मजदूर को बैलों के पास सूखी घास डालने को कहा। मजदूर ने वैसा ही किया। दोनों बैलों ने कुछ नहीं खाया। दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और दोनों बैलों को फिर से ले जाकर मोटी-तगड़ी रस्सियों में बाँधकर सूखा भूसा डाल दिया और अपने बैलों को अच्छा चारा दिया।

अगले दिन दोनों को खेत में जोता गया, लेकिन मार खाने पर भी दोनों ने पैर न उठाने की कसम खा रखी थी। अधिक मार खाने पर दोनों भाग खड़े हुए। मोती के दिल में क्रोध की ज्वाला भड़क रही थी, किन्तु हीरा के समझाने पर मोती खड़ा हो गया। गया ने दूसरे लोगों की सहायता से उसको पकड़ा और घर ले जाकर फिर मोटी रस्सियों में बाँध दिया तथा फिर वही सूखा भूसा डाल दिया गया।

इस प्रकार दोनों बैल दिन-भर परिश्रम करते और मार खाते और संध्या के समय सूखा भूसा खाते। एक दिन गया की लड़की ने दोनों को खोल दिया और फिर शोर मचा दिया कि बैल भाग गए हैं। गया हड़बड़ाकर बाहर भागा और गाँव वालों की सहायता के लिए चिल्लाया, लेकिन बैल भाग चुके थे। दोनों बैल भागते-भागते अपनी राह भी भूल बैठे। अब वे भूख से बेहाल थे, लेकिन पास ही मटर का खेत देखकर उसमें चरने लगे और फिर खेलने लगे। कुछ ही देर में उधर एक साँड आया और उनसे भिड़ गया। दोनों ने जान हथेली पर रखकर बड़े प्रयत्न से उसे आगे-पीछे से रौंदना शुरू किया। दोनों ने बड़े साहस के साथ साँड पर विजय प्राप्त की। साँड मार खाकर गिर पड़ा। संघर्ष के बाद दोनों को फिर भूख लग गई थी। सामने मटर का खेत देखकर उसमें पुनः चरने लगे थे। किन्तु थोड़ी देर में खेत के रखवालों ने दोनों को पकड़कर कांजीहौस में बंद कर दिया।

कांजीहौस में उनसे अच्छा व्यवहार नहीं किया गया। उन्हें रात-भर किसी प्रकार का भोजन नहीं दिया गया। वे भूख के मारे मरे जा रहे थे। हीरा के मन में विद्रोह भड़क उठा। मोती के समझाने पर भी वह न माना और उसने सामने कच्ची दीवार को तोड़ना शुरू कर दिया। इतने में चौकीदार लालटेन लेकर पशुओं को गिनने आया। हीरा को इस प्रकार दीवार तोड़ते देखकर उसने उसको रस्सी से बाँधकर कई डंडे दे मारे। चौकीदार के जाने के बाद मोती ने भी साहस बटोरकर दीवार गिरानी आरंभ कर दी। इस प्रकार काफी संघर्ष के बाद आधी दीवार गिर गई। काफी जानवर भाग निकले। मोती ने फिर हीरा की रस्सी काटनी आरंभ की, लेकिन रस्सी नहीं टूटी। के. दोनों वहीं पड़े रहे।

एक सप्ताह तक वे दोनों कांजीहौस में भूखे मरते रहे। वे बहुत ही कमजोर पड़ गए थे। दोनों बैलों को एक दढ़ियल के हाथों नीलाम कर दिया गया। दढ़ियल उन्हें लिए जा रहा था कि दोनों को परिचित राह मिल गई और वे उससे छूटकर सीधे झूरी के घर जा पहुँचे। झूरी धूप सेक रहा था। बैलों को आता देखकर उसने उन्हें गले से लगा लिया। झूरी और दढ़ियल में झगड़ा हो गया। किन्तु बैलों को फिर वही स्नेह मिला। झूरी ने उनकी पीठ सहलाई और मालकिन ने उनका माथा चूम लिया। दोनों बैलों को अच्छा चारा दिया गया। वे दोनों अब सुखद अनुभव कर रहे थे।

कठिन शब्दों के अर्थ –

(पृष्ठ-5) : ज्यादा = अधिक। बुद्धिहीन = मूर्ख । परले दरजे का बेवकूफ = अत्यधिक मूर्ख । निरापद = सुरक्षित। सहिष्णुता = सहनशीलता। अनायास = अचानक ही। कुलेल करना = खेलकूद करना। विषाद = निराशा, दुःख। पराकाष्ठा = चरम सीमा। अनादर = अपमान। दुर्दशा = बुरी हालत। कुसमय = बुरा समय। जी तोड़कर काम करना = खूब परिश्रम करना। गम खाना = चुप रहना। ईंट का जवाब पत्थर से देना = मुँह तोड़ जवाब देना।

(पृष्ठ-6) : मिसाल = उदाहरण। गण्य = प्रमुख। बछिया का ताऊ = सीधा। अड़ियल = जिद्दी। काछी = किसान। पछाईं = पालतू पशुओं की एक नस्ल। डील = कद। विचार-विनिमय = विचारों का आदान-प्रदान। वंचित = रहित, न मिलना। विग्रह = अलग होना। आत्मीयता = अपनेपन का भाव। घनिष्ठता = समीपता। फुसफुसी = हल्की, दिखावटी। वक्त = समय।

(पृष्ठ-7) : दाँतों पसीना आना = खूब परिश्रम करना। पगहिया = पशु बाँधने की रस्सियाँ। हुँकारना = गुस्से से आवाज निकालना। कोई कसर न उठा रखना = कोई कमी न छोड़ना। चाकरी = सेवा। जालिम = निर्दयी। मूक-भाषा = मौन भाषा। अनुमान होना = अंदाजा लगाना। गराँव = रस्सी जो बैलों के गले में बाँधी जाती है। विद्रोहमय = क्रांतियुक्त। प्रेमालिंगन = प्रेम से गले लगाना। मनोहर = सुंदर। अभूतपूर्व = जो पहले कभी न हुई हो।

(पृष्ठ-8) : प्रतिवाद = विरोध करना। साहस न होना = हौंसला न पड़ना। जल उठना = अत्यधिक गुस्सा आना। नमक हराम = किए हुए उपकार को न मानने वाला। कामचोर = काम न करने वाला। ताकीद करना = आदेश देना।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

(पृष्ठ-9) : मजा चखाना = बदला लेना, तंग करना। टिटकार = मुँह से निकलने वाला टिक-टिक का शब्द। आहत = घायल। सम्मान = इज्जत, आदर। व्यथा = पीड़ा। काबू से बाहर होना = सीमा से बाहर होना। व्यर्थ = बेकार।

(पृष्ठ-10) : दिल में ऐंठकर रह जाना = विवश होना। तेवर = गुस्से से युक्त शक्ल। मसलहत = हितकर। सज्जन = भला व्यक्ति।

(पृष्ठ-11) : बरकत = संतुष्टि। दुर्बल = कमजोर। विद्रोह = क्रांति, गुस्सा। अनाथ = जिसका कोई नहीं होता। उपाय = साधन। सहसा = अचानक। गराँव = पशुओं को बाँधने वाली रस्सियाँ । आफत आना = मुसीबत आना। संदेह = शंका।

(पृष्ठ-12) : हड़बड़ाकर = घबराकर । मौका = अवसर। बेतहाशा = बिना सोचे-समझे । व्याकुल = बेचैन। आहट = किसी के आने की ध्वनि। आज़ादी = स्वतंत्रता। बगलें झाँकना = डर के कारण इधर-उधर देखना। आरजू = इच्छा।

(पृष्ठ-13) : कायरता = डरपोकपन। नौ-दो ग्यारह होना = भाग जाना। रगेदना = खदेड़ना। जोखिम = खतरा। हथेलियों पर जान लेना = जीवन को खतरे में डालना। मल्लयुद्ध = कुश्ती। बेदम होना = थक जाना।

(पृष्ठ-14) : संगी = साथी। कांजीहौस = मवेशीखाना, वह बाड़ा जिसमें दूसरे का खेत आदि खाने वाले या लावारिस पशुओं को बंद किया जाता है और कुछ दंड लगाकर छोड़ दिया जाता है। साबिका = वास्ता। टकटकी लगाए ताकना = निरंतर देखते रहना। विद्रोह की ज्वाला दहक उठना = क्रांति की भावना जागृत होना। हिम्मत हारना = साहस या धीरज त्यागना।

(पृष्ठ-15) : उजड्डपन = शरारतीपन। डडे रसीद करना = डंडे मारना। जान से हाथ धोना = जीवन गँवाना। प्रतिद्वंद्वी= विरोधी। जोर-आज़माई = शक्ति लगाना।

(पृष्ठ-16) : विपत्ति = मुसीबत। अपराध = दोष, कसूर । खलबली मचना = बेचैनी उत्पन्न होना। मरम्मत होना = मार पड़ना। ठठरियाँ = हड्डियाँ। मृतक = मरा हुआ।

(पृष्ठ-17) : सहसा = अचानक। दढ़ियल = दाढ़ी वाला। अंतर्ज्ञान = आत्मा का ज्ञान। दिल काँप उठना = भयभीत हो जाना। भीत नेत्र = डरी हुई आँखें। नाहक = व्यर्थ में। नीलाम होना = बोली पर बिकना। रेवड़ = पशुओं का समूह। पागुर करना = जुगाली करना। प्रतिक्षण = हर पल । दुर्बलता = कमजोरी। गायब होना = समाप्त होना।

(पृष्ठ-18-19) : उन्मत्त = मतवाले। कुलेलें करना = क्रीड़ा करना । अख्तियार = अधिकार। रास्ता देखना = प्रतीक्षा करना। शूर = बहादुर। उछाह-सा = उत्साह ।

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HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij & Kritika Bhag 1 Haryana Board

Haryana Board HBSE 9th Class Hindi Solutions क्षितिज कृतिका भाग 1

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Bhag 1

HBSE Haryana Board 9th Class Hindi Kshitij गद्य-खंड

HBSE Haryana Board 9th Class Hindi Kshitij काव्य-खंड

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kritika Bhag 1

HBSE Haryana Board 9th Class Hindi Kritika

HBSE Class 9 Hindi व्याकरण

HBSE Class 9 Hindi रचना

HBSE 9th Class Hindi Question Paper Design

Class: 9th
Subject: Hindi
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKCEATotal
Percentage of Marks2060155100
Marks164812480

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions1 + 4 = 5611224
Marks Allotted2418221680
Estimated Time75444516180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. व्याकरण (वर्ण, वाक्य, वर्तनी, र् के विभिन्न रूप, बिन्दु, अर्धचन्द्राकार, नुकता, विकारी-अविकारी शब्द, समास, उपसर्ग-प्रत्यय, भाषा व हिन्दी का मानक रूप, पर्यायवाची, विलोम, अनेकार्थी शब्द, मुहावरों का अर्थ एवं वाक्य में प्रयोग, तत्सम तद्भव शब्द)10
2. निबन्ध, पत्र-लेखन, अलंकार (8, 4, 3)15
3. क्षितिज (भाग-1) (काव्य-खण्ड)
काव्यांश के प्रश्न-उत्तर, काव्य-सौन्दर्य, अभ्यास के प्रश्न-उत्तर, प्रश्न-उत्तर
20
4. क्षितिज (भाग-1) (गद्य-खण्ड)
गद्यांश के प्रश्न-उत्तर, अभ्यास के प्रश्न-उत्तर, लेखक-परिचय, प्रश्न-उत्तर
20
5. कृतिका (भाग-1)
पाठ पर आधारित अभ्यास के प्रश्न-उत्तर
15
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% marks
Average: 50% marks
Easy: 40% marks

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HBSE 9th Class Sanskrit Solutions Shemushi Bhag 1 Haryana Board

Haryana Board HBSE 9th Class Sanskrit Solutions शेमुषी भाग 1

  • Chapter 1 भारतीवसन्तगीतिः
  • Chapter 2 स्वर्णकाकः
  • Chapter 3 गोदोहनम्
  • Chapter 4 कल्पतरूः
  • Chapter 5 सूक्तिमौक्तिकम्
  • Chapter 6 भ्रान्तो बालः
  • Chapter 7 प्रत्यभिज्ञानम्
  • Chapter 8 लौहतुला
  • Chapter 9 सिकतासेतुः
  • Chapter 10 जटायोः शौर्यम्
  • Chapter 11 पर्यावरणम्
  • Chapter 12 वाडमनःप्राणस्वरूपम्

HBSE 9th Class Sanskrit अनुप्रयुक्त व्याकरणम्

  • सन्धिः
  • समासः
  • प्रत्यय
  • उपसर्ग
  • शब्द-रूप
  • धातु-रूप
  • कारक एवं उपपद विभक्ति
  • संख्या एवं अव्यय

HBSE 9th Class Sanskrit रचनात्मक कार्यम्

  • पत्र-लेखनम्
  • लघु निबंध-लेखनम्
  • चित्राधारित वाक्य-लेखनम्

HBSE 9th Class Sanskrit अपठित अवबोधनम्

  • अपठित अवबोधनम्

HBSE 9th Class Sanskrit Question Paper Design

Class: 9th
Subject: Sanskrit
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hrs

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUETotal
Percentage of Marks404020100
Marks32321680

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions375116
Marks Allotted2024201680
Estimated Time50704020180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
खण्ड क
1. अपठित अवबोधनम् प्रश्नोत्तर पाँच10
खण्ड ख
2. प्रार्थना पत्र आधारित रिक्त स्थान पूर्ति5
3. चित्र आधारित रिक्त स्थान पूर्ति5
खण्ड ग – पाठ्यपुस्तक
4. गद्यांश अर्थ (4)12
5. पद्यांश अर्थ (4)
6. भावार्थ (4)
7. गद्यांश प्रश्नोत्तर (3)8
8. पद्यांश प्रश्नोत्तर (2)
9. प्रश्न निर्माण (3)
10. कण्ठस्थ श्लोक4
खण्ड घ – अनुप्रयुक्त व्याकरण
11. कारक, सन्धि, समास की सोदाहरण परिभाषाएँ हिन्दी में (2 + 2 + 2)6
12. शब्द तथा धातु रूप, उपपद तथा अव्यय (4 + 4 + 3 + 3)14
खण्ड ङ – बहुविकल्पीय प्रश्न
13. संधि/संधिच्छेद, समास/विग्रह, प्रत्यय संयोग वियोग, पर्यायवाची, विलोम, संख्यावाची, विशेषण-विशेष्य, उपसर्ग। (2 + 2 + 2 + 2 + 2 + 2 + 2 + 2)16
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% marks
Average: 50% marks
Easy: 40% marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), S (Skill), E(Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

Haryana State Board HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

HBSE 9th Class Physical Education सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
सुरक्षा शिक्षा से क्या अभिप्राय है? सुरक्षा शिक्षा की आवश्यकता पर प्रकाश डालिए। अथवा बचाव शिक्षा क्या है? खेलों में लगने वाली चोटों के कारण बताते हुए इसकी आवश्यकता का वर्णन करें।
उत्तर:
सुरक्षा/बचाव शिक्षा का अर्थ (Meaning of Safety Education):
सुरक्षा/बचाव शिक्षा से अभिप्राय उस शिक्षा से है, जिसके द्वारा हम यह सीखते हैं कि हमें अपने जीवन में स्वयं का तथा दूसरे का बचाव कैसे करना है। सुरक्षा शिक्षा से ही हमें पता चलता है कि घर में बिजली या आम से, सड़क पर बस या ट्रक आदि के नीचे आने से, तालाब आदि में डूब जाने से और खेल के मैदान में चोट लगने से कैसे बचाव करना है।

खेलों में लगने वाली चोटों के कारण (Causes of Sports Injuries):
खेल के मैदान में प्रायः चोटें लगती रहती हैं। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) खेल का मैदान समतल न होना।
(2) खेलों में घटिया किस्म के सामान का प्रयोग।
(3) मैदान की खराब योजनाबंदी।
(4) खेल की घटिया निगरानी या प्रबंध।
(5) अकुशल व अपरिपक्व खिलाड़ियों का खेलों में भाग लेना।
(6) खेलने से पहले शरीर का अच्छी तरह गर्म (Warm up) न होना।
(7) खिलाड़ियों में बदले की भावना होना।
(8) खिलाड़ी का थका होना।
(9) खिलाड़ियों की लापरवाही व जल्दबाजी।
(10) खिलाड़ियों का नशा करके खेलना।

कुछ खेलों; जैसे मुक्केबाज़ी, कुश्ती, साइकिल दौड़, कारों की दौड़, नेज़ा फेंकना, हैमर फेंकना, हॉकी तथा कबड्डी आदि में अधिक चोटें लगती हैं।

सुरक्षा शिक्षा की आवश्यकता (Need of Safety Education):
आज के मशीनी युग में यातायात के साधनों के बढ़ने के कारण सुरक्षा शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। इससे हम काफी सीमा तक होने वाली दुर्घटनाओं पर नियंत्रण पा सकते हैं। आजकल साधारण तौर पर बच्चे सड़क पर चलते-फिरते अथवा खेलते समय दुर्घटना का शिकार हो जाते हैं, क्योंकि वे यातायात के नियमों का पालन नहीं करते। इससे कई बार उनको अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ता है। यदि हमें सुरक्षा शिक्षा का पता होगा तो हम प्रतिदिन होने वाली दुर्घटनाओं से मुक्त हो सकते हैं।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता या चिकित्सा से क्या अभिप्राय है? इसकी महत्ता पर प्रकाश डालिए। अथवा प्राथमिक सहायता क्या है? इसकी आवश्यकता व उपयोगिता का वर्णन करें। अथवा प्राथमिक सहायता क्या होती है? इसकी हमें क्यों आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर;
प्राथमिक सहायता का अर्थ (Meaning of First Aid):
किसी रोग के होने या चोट लगने पर किसी प्रशिक्षित या अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा जो सीमित उपचार किया जाता है, उसे प्राथमिक चिकित्सा या सहायता (First Aid) कहते हैं। इसका उद्देश्य कम-से-कम साधनों में इतनी व्यवस्था करना होता है कि चोटग्रस्त व्यक्ति को सम्यक इलाज कराने की स्थिति में लाने में लगने वाले समय में कम-से-कम नुकसान हो। अतः प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षित या अप्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा कम-से-कम साधनों में किया गया सरल व तत्काल उपचार है।

प्राथमिक सहायता की आवश्यकता (Need of First Aid):
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को ओर अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है। इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि घायल अथवा रोगी व्यक्ति को तुरन्त प्राथमिक सहायता मिल जाए तो उसका जीवन बचाया जा सकता है। कुछ चोटें तो इस प्रकार की हैं, जो खेल के मैदान में बहुत होती हैं, जिनको मौके पर प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, यदि हमें प्राथमिक सहायता सम्बन्धी उचित जानकारी हो। इस प्रकार रोगी की स्थिति बिगड़ने से बचाने और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्राथमिक सहायता की बहुत आवश्यकता होती है। इसलिए प्राथमिक सहायता की आज के समय में बहुत आवश्यकता हो गई है। इसका ज्ञान प्रत्येक नागरिक को प्राप्त करना आवश्यक होना चाहिए।

प्राथमिक सहायता की महत्ता (Importance of First Aid):
प्राथमिक सहायता रोगी के लिए वरदान की भाँति होती है और प्राथमिक सहायक भगवान की ओर से भेजा गया दूत माना जाता है। आज के समय में कोई किसी के दुःख-दर्द की परवाह नहीं करता। एक प्राथमिक सहायक ही है जो दूसरों के दर्द को समझने और उनके दुःख में शामिल होने की भावना रखता है। आज प्राथमिक सहायता की महत्ता बहुत बढ़ गई है; जैसे
(1) प्राथमिक सहायता द्वारा किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की बहुमूल्य जान बच जाती है।
(2) प्राथमिक सहायता देने वाले व्यक्ति में दूसरों के प्रति स्नेह और दया की भावना और तीव्र हो जाती है।
(3) प्राथमिक सहायता प्राथमिक सहायक को समाज में सम्मान दिलाती है।
(4) प्राथमिक सहायता लोगों को दूसरों के काम आने की आदत सिखाती है जिससे मानसिक संतुष्टि मिलती है।
(5) प्राथमिक सहायता देने वाला व्यक्ति डॉक्टर के कार्य को सरल कर देता है।
(6) प्राथमिक सहायता द्वारा लोगों के आपसी रिश्तों में सहयोग की भावना बढ़ती है।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायता के नियमों या सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक सहायता आज की जिंदगी में बहुत महत्त्व रखती है। इसकी जानकारी बहुत आवश्यक है। प्राथमिक सहायता के नियम निम्नलिखित हैं
(1) रोगी अथवा घायल को विश्राम की स्थिति में रखना।
(2) घाव से बह रहे रक्त को बंद करना।
(3) घायल की सबसे जरूरी चोट की ओर अधिक ध्यान देना।
(4) दुर्घटना के समय जिस प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तुरंत उपलब्ध करवाना।
(5) घायल की स्थिति को खराब होने से बचाना।
(6) घायल की अंत तक सहायता करना।
(7) घायल के नजदीक भीड़ एकत्रित न होने देना।
(8) घायल को हौसला देना।
(9) घायल को सदमे से बचाकर रखना।
(10) प्राथमिक सहायता देते समय संकोच न करना।
(11) घायल को सहायता देते समय सहानुभूति और विनम्रता वाला व्यवहार करना।
(12) प्राथमिक सहायता देने के बाद शीघ्र ही किसी अच्छे डॉक्टर के पास पहुँचाने का प्रबंध करना।
(13) यदि घायल व्यक्ति की साँस नहीं चल रही हो तो उसे कृत्रिम श्वास (Artificial Respiration) देना चाहिए।
(14) रोगी को आराम से लेटे रहने देना चाहिए, जिससे उसकी तकलीफ़ ज़्यादा न बढ़ सके।
(15) यदि यह पता लगे कि रोगी ने जहर पी लिया है तो उसे उल्टी करवानी चाहिए।
(16) यदि घायल व्यक्ति को साँप या जहरीले कीट ने काट लिया हो तो काटे हुए स्थान को ऊपर की तरफ से बाँध देना चाहिए ताकि ज़हर सारे शरीर में न फैले।
(17) यदि घायल व्यक्ति पानी में डूब गया है तो उसे बाहर निकालकर सबसे पहले उसे पेट के बल लेटाकर पानी निकालना चाहिए तथा उसे कम्बल आदि में लपेटकर रखना चाहिए।.

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायता का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा एक अच्छे प्राथमिक चिकित्सक या उपचारक के गुणों का वर्णन करें।
अथवा
प्राथमिक चिकित्सा देने वाले व्यक्ति में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता का अर्थ (Meaning of First Aid):
घायल या मरीज को तत्काल दी जाने वाली सहायता प्राथमिक सहायता कहलाती है।

प्राथमिक चिकित्सक या उपचारक के गुण (Qualities of First Aider):
घायल व्यक्ति को गंभीर स्थिति में जाने से रोकने के लिए और उसका जीवन बचाने के लिए प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी हो सकता है यदि प्राथमिक सहायक बुद्धिमान और होशियार हो और प्राथमिक सहायता के नियमों से परिचित हो। प्राथमिक सहायता देने वाले व्यक्ति में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ

(1) प्राथमिक सहायक चुस्त और बुद्धिमान होना चाहिए ताकि घायल के साथ घटी हुई घटना के बारे में समझ सके।
(2) प्राथमिक सहायक निपुण एवं सूझवान होना चाहिए ताकि प्राप्त साधनों के साथ ही घायल को बचा सके।
(3) वह बड़ा फुर्तीला होना चाहिए ताकि घायल व्यक्ति को शीघ्र संभाल सके।
(4) प्राथमिक सहायक योजनाबद्ध व्यवहार कुशल होना चाहिए, जिससे वह घटना संबंधी जानकारी जल्द-से-जल्द प्राप्त करते हुए रोगी का विश्वास प्राप्त कर सके।
(5) उसमें सहानुभूति की भावना होनी चाहिए ताकि वह घायल को आराम और हौसला दे सके।
(6) प्राथमिक सहायक सहनशील, लगन और त्याग की भावना वाला होना चाहिए।
(7) प्राथमिक सहायक अपने काम में निपुण होना चाहिए ताकि लोग उसकी सहायता के लिए स्वयं सहयोग करें।
(8) वह स्पष्ट निर्णय वाला होना चाहिए ताकि वह निर्णय कर सके कि कौन-सी चोट का पहले इलाज करना है।
(10) प्राथमिक सहायक दृढ़ इरादे वाला व्यक्ति होना चाहिए ताकि वह असफलता में भी सफलता को ढूँढ सके।
(11) उसका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए ताकि घायल को ज़ख्मों से आराम मिल सके।
(12) प्राथमिक सहायक दूसरों के प्रति विनम्रता वाला और मीठा बोलने वाला होना चाहिए।
(13) प्राथमिक सहायक स्वस्थ और मज़बूत दिल वाला होना चाहिए ताकि मौजूदा स्थिति पर नियंत्रण पा सके।

प्रश्न 5.
मोच (Sprain) क्या है? इसके कारण एवं उपचार के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
मोच कितने प्रकार की होती है? इसके लक्षण व इलाज के बारे में बताएँ।
अथवा
मोच किसे कहते हैं? इसके लिए प्राथमिक सहायता क्या हो सकती है?
अथवा
मोच के कारणों, लक्षणों व बचाव एवं उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मोच (Sprain):
किसी जोड़ के अस्थि-बंधकों (Ligaments) के फट जाने को मोच आना कहते हैं अर्थात् जोड़ के आसपास के जोड़-बंधनों तथा तन्तु वर्ग (Tissues) फट जाने या खिंच जाने को मोच कहते हैं। सामान्यतया घुटनों, रीढ़ की हड्डी तथा गुटों में ज्यादा मोच आती है। इसकी प्राथमिक चिकित्सा जल्दी शुरू कर देनी चाहिए।

प्रकार (Types):
मोच तीन प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है
1. नर्म मोच (Mold or Minor Sprain):
इसमें जोड़-बंधनों पर खिंचाव आता है। जोड़ में हिलजुल करने पर दर्द अनुभव होता है। इस हालत में कमजोरी तथा दर्द महसूस होता है।

2. मध्यम मोच (Medicate or Moderate Sprain):
इसमें जोड़-बंधन काफी मात्रा में टूट जाते हैं। इस हालत में सूजन तथा दर्द बढ़ जाता है।

3. पूर्ण मोच (Complete or Several Sprain):
इसमें जोड़ की हिलजुल शक्ति समाप्त हो जाती है। जोड़-बंधन पूरी तरह टूट जाते हैं। जोड़-बंधनों के साथ-साथ जोड़ कैप्सूल भी जख्मी हो जाता है। इस हालत में दर्द असहनीय हो जाता है।

कारण (Causes):
मोच आने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) खेलते समय सड़क पर पड़े पत्थरों पर पैर आने से मोच आ जाती है।
(2) किसी गीली अथवा चिकनी जगह पर; जैसे ओस वाली घास, खड़े पानी में पैर रखने से मोच आ जाती है।
(3) खेल के मैदान में यदि किसी गड्ढे में पैर आ जाए तो यह मोच का कारण बन जाता है।
(4) अनजान खिलाड़ी यदि गलत तरीके से खेले तो भी मोच आ जाती है।
(5) अखाड़ों की गुड़ाई ठीक न होने के कारण भी मोच आ जाती है।
(6) असावधानी से खेलने पर भी मोच आ जाती है।

लक्षण (Symptoms);
मोच के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) सूजन वाले स्थान पर दर्द शुरू हो जाता है।
(2) थोड़ी देर बाद जोड़ के मोच वाले स्थान पर सूजन आने लगती है।
(3) सूजन वाले भाग में कार्य की क्षमता कम हो जाती है।
(4) सख्त मोच की हालत में जोड़ के ऊपर की चमड़ी का रंग नीला हो जाता है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
खेलों में मोच से बचाव की विधियाँ निम्नलिखित हैं
(1) पूर्ण रूप से शरीर के सभी जोड़ों को गर्मा लेना चाहिए।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता के होने चाहिएँ।
(3) मैदान समतल व साफ होना चाहिए।
(4) सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

उपचार (Treatment):
मोच के उपचार/इलाज हेतु निम्नलिखित प्राथमिक सहायता की जा सकती है
(1) मोच वाली जगह को हिलाना नहीं चाहिए। आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए।
(2) मोच वाले स्थान पर 48 घंटे तक पानी की पट्टी रखनी चाहिए।
(3) यदि मोच टखने पर हो तो आठ के आकार की पट्टी बाँध देनी चाहिए। प्रत्येक मोच वाले स्थान पर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
(4) मोच वाले स्थान पर भार नहीं डालना चाहिए बल्कि मदद के लिए कोई सहारा लेना चाहिए।
(5) हड्डी टूटने के शक को दूर करने के लिए एक्सरे करवा लेना चाहिए।
(6) 48 घंटे से 72 घंटे के बाद सेक तथा मालिश कर लेनी चाहिए।
(7) मोच वाले स्थान का हमेशा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसी स्थान पर बार-बार मोच आने का डर रहता है।

प्रश्न 6.
खिंचाव से क्या अभिप्राय है? इसके कारणों, लक्षणों व बचाव एवं उपचार का वर्णन कीजिए।
अथवा
माँसपेशियों के तनाव से आपका क्या अभिप्राय है? इसके चिह्न तथा इलाज के बारे में लिखें। अथवा पट्ठों का तनाव क्या होता है? यह किस कारण होता है? अथवा पट्ठों का फटना या खिंच जाना किसे कहते हैं? इसके कारण, लक्षण तथा उपचार के उपाय बताएँ।
उत्तर:
पट्ठों का तनाव/खिंचाव (Pull in Muscles/Strain):
खिंचाव माँसपेशी की चोट है। खेलते समय कई बार खिलाड़ियों की माँसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिसके कारण खिलाड़ी अपना खेल जारी नहीं रख सकता। कई बार तो माँसपेशियाँ फट भी जाती हैं, जिसके कारण काफी दर्द महसूस होता है। प्रायः खिंचाव वाले हिस्से में सूजन आ जाती है। खिंचाव का मुख्य कारण खिलाड़ी का खेल के मैदान में अच्छी तरह गर्म न होना है। इसे पट्ठों का खिंच जाना भी कहते हैं।

कारण (Causes):
खिंचाव आने के निम्नलिखित कारण हैं
(1) शरीर के सभी अंगों का आपसी तालमेल ठीक न होना।
(2) अधिक शारीरिक थकान।
(3) पट्ठों को तेज़ हरकत में लाना।
(4) शरीर में से पसीने द्वारा पानी का बाहर निकलना।
(5) खिलाड़ी द्वारा शरीर को बिना गर्म किए खेल में हिस्सा लेना।
(6) खेल का समान ठीक न होना।
(7) खेल का मैदान अधिक सख्त या नरम होना।
(8) माँसपेशियों तथा रक्त केशिकाओं का टूट जाना।

चिह्न/लक्षण (Signs/Symptoms):
माँसपेशियों या पट्ठों में खिंचाव आने के लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) खिंचाव वाले स्थान पर बहुत तेज दर्द होता है।
(2) खिंचाव वाले स्थान पर माँसपेशियाँ फूल जाती हैं, जिसके कारण दर्द अधिक होता है।
(3) शरीर के खिंचाव वाले अंग को हिलाने से भी दर्द होता है।
(4) चोट चाला स्थान नरम हो जाता है।
(5) खिंचाव वाले स्थान पर गड्ढा-सा दिखता है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
खेल में खिंचाव से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करना चाहिए
(1) गीले व चिकने ग्राऊंड, ओस वाली घास पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(2) ऊँची तथा लंबी छलाँग हेतु बने अखाड़ों की जमीन सख्त नहीं होनी चाहिए।
(3) खेलने से पहले कुछ हल्का व्यायाम करके शरीर को अच्छी तरह गर्म करना चाहिए। इससे खेलने के लिए शरीर तैयार हो जाता है।
(4) चोटों से बचने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
(5) खिलाड़ी को सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

उपचार (Treatment):
खिंचाव के उपचार/इलाज के उपाय निम्नलिखित हैं.
(1) खिंचाव वाली जगह पर पट्टी बाँधनी चाहिए।
(2) खिंचाव वाले स्थान पर ठंडे पानी अथवा बर्फ की मालिश करनी चाहिए।
(3) माँसपेशियों में खिंचाव आ जाने के कारण खिलाड़ी को आराम करना चाहिए।
(4) खिंचाव वाले स्थान पर 24 घंटे बाद सेक देना चाहिए।
(5) चोटग्रस्त क्षेत्र को आराम देने तथा सूजन कम करने के लिए मालिश करनी चाहिए।
(6) दर्द कम होने पर सामान्य क्रिया धीरे-धीरे जारी रखनी चाहिए।

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प्रश्न 7.
रगड़ या खरोंच क्या है? इसके कारण, बचाव के उपाय तथा इलाज लिखें।
अथवा
खरोंच के कारण, लक्षण एवं उपचार के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रगड़ (Abrasion):
रगड़ त्वचा की चोट है। प्रायः रगड़ एक मामूली चोट होती है लेकिन कभी-कभी यह गंभीर भी साबित हो जाती है। अगर रगड़ का चोटग्रस्त क्षेत्र विस्तृत हो जाए और उसमें बाहरी कीटाणु हमला कर दें तो यह भयानक हो जाती है।

कारण (Causes):
रगड़ आने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) कठोर धरातल पर गिर पड़ना।
(2) कपड़ों में रगड़ पैदा करने वाले तंतुओं के कारण।
(3) जूतों का पैरों में सही प्रकार से फिट न आना।
(4) हैलमेट और कंधों के पैडों का असुविधाजनक होना।

लक्षण (Symptoms):
रगड़ के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) त्वचा पर रगड़ दिखाई देती है और वहाँ पर जलन महसूस होती है।
(2) रगड़ वाले स्थान से खून बहने लगता है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
रगड़ से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) सुरक्षात्मक कपड़े पहनने चाहिएँ, इनमें पूरी बाजू वाले कपड़े, बड़ी-बड़ी जुराबें, घुटनों व कुहनी के पैड शामिल हैं।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता वाले होने चाहिएँ और प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को गर्मा लेना चाहिए।
(3) फिट जूते पहनने चाहिएँ।
(4) ऊबड़-खाबड़ खेल के मैदान से बचना चाहिए।

इलाज (Treatment):
रगड़ के इलाज या उपचार के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिएँ- ..
(1) चोटग्रस्त स्थान को ऊँचा रखना चाहिए।
(2) चोटग्रस्त स्थान को जितनी जल्दी हो सके गर्म पानी व नीम के साबुन से धोना चाहिए।
(3) यदि रगड़ अधिक हो तो उस स्थान पर पट्टी करवानी चाहिए। पट्टी खींचकर नहीं बाँधनी चाहिए।
(4) चोटग्रस्त स्थान को प्रत्येक दिन गर्म पानी से साफ करना चाहिए।
(5) चोट के तुरंत बाद एंटी-टैटनस का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
(6) दिन के समय चोट पर पट्टी बाँधनी चाहिए और रात को चोट खुली रखनी चाहिए।
(7) चोट लगने के तुरंत बाद खेलना नहीं चाहिए। ऐसा करने से दोबारा उसी जगह पर चोट लग सकती है जो खतरनाक सिद्ध हो सकती है।

प्रश्न 8.
जोड़ उतरना क्या है? इसके कारण, लक्षण तथा इलाज बताएँ। अथवा जोड़ उतरने के कारण, चिन तथा उपचार के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
जोड़ों के विस्थापन (Dislocation) से आप क्या समझते हैं? इनके प्रकारों, कारणों, लक्षणों तथा बचाव व उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जोड़ उतरना या जोड़ों का विस्थापन (Dislocation):
एक या अधिक हड्डियों के जोड़ पर से हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं। कुछ ऐसी खेलें होती हैं जिनमें जोड़ों की मज़बूती अधिक होनी चाहिए; जैसे जिम्नास्टिक, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी आदि। इन खेलों में हड्डी का उतरना स्वाभाविक है। प्रायः कंधे, कूल्हे

कारण (Causes):
जोड़ उतरने के निम्नलिखित कारण हैं
(1) खेल का मैदान ऊँचा नीचा होना अथवा अधिक सख्त या नरम होना।
(2) खेल सामान का शारीरिक शक्ति से भारी होना।।
(3) खेल से पहले शरीर को हल्के व्यायामों द्वारा गर्म न करना।
(4) खिलाड़ी का अचानक गिरने से हड्डी का हिल जाना।

लक्षण या चिह्न (Symptoms or Signs):
जोड़ उतरने के लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) जोड़ों में तेज दर्द होती है तथा सूजन आ जाती है।
(2) जोड़ों का रूप बदल जाता है।
(3) जोड़ में खिंचाव-सा महसूस होता है।
(4) जोड़ में गति बन्द हो जाती है। थोड़ी-सी गति से दर्द होता है।
(5) उतरे हुए स्थान से हड्डी बाहर की ओर उभरी हुई नज़र आती है।

बचाव (Prevention):
इससे बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) असमतल मैदान या जगह पर संभलकर चलना चाहिए।
(2) गीली या फिसलने वाली जगह पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(3) खेलने से पूर्व शरीर को गर्मा लेना चाहिए।
(4) प्रतियोगिता के दौरान सतर्क व सावधान रहना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
जोड़ उतरने के इलाज निम्नलिखित हैं
(1) घायल को आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए।
(2) घायल अंग को गद्दियों या तकियों से सहारा देकर स्थिर रखें। हड्डी पर प्लास्टिक वाली पट्टी बांधनी चाहिए।
(3) उतरे जोड़ को चढ़ाने का प्रयास कुशल प्राथमिक सहायक को सावधानी से करना चाहिए।
(4) जोड़ पर बर्फ या ठण्डे पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए।
(5) घायल को प्राथमिक सहायता के बाद तुरंत अस्पताल या डॉक्टर के पास ले जाएँ।
(6) चोट वाले स्थान पर भार नहीं पड़ना चाहिए।
(7) चोट वाले स्थान पर शलिंग (Sling) डाल देनी चाहिए, ताकि हड्डी स्थिर रहे।

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प्रश्न 9.
फ्रैक्चर (Fracture) की कितनी किस्में होती हैं? सबसे खतरनाक कौन-सा फ्रैक्चर है?
अथवा
टूट कितने प्रकार की होती है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रैक्चर का अर्थ (Meaning of Fracture):
किसी हड्डी का टूटना, फिसलना अथवा दरार पड़ जाना टूट (Fracture) कहलाता है। हड्डी पर जब दुःखदायी स्थिति में दबाव पड़ता है तो हड्डी से सम्बन्धित माँसपेशियाँ उस दबाव को सहन नहीं कर सकतीं, जिस कारण हड्डी फिसल अथवा टूट जाती है। अतः फ्रैक्चर का अर्थ है-हड्डी का टूटना या दरार पड़ जाना।

हड्डी टूटने या फ्रैक्चर के प्रकार (Types of Fracture):
हड्डी टूटने या फ्रैक्चर के प्रकार निम्नलिखित हैं
1. साधारण या बंद फ्रैक्चर (Simple or Closed Fracture):
जब हड्डी टूट जाए, परन्तु घाव न दिखाई दे, तो वह बंद फ्रैक्चर होता है।

2. जटिल फ्रैक्चर (Complicated Fracture):
इस फ्रैक्चर से कई बार हड्डी की टूट के साथ जोड़ भी हिल जाते हैं। कई बार हड्डी टूटकर शरीर के किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचा देती है; जैसे रीढ़ की हड्डी की टूट मेरुरज्जु को, सिर की हड्डी की टूट दिमाग को और पसलियों की हड्डियों की टूट दिल, फेफड़े और जिगर को नुकसान पहुँचाती हैं। ऐसी स्थिति में टूट काफी जटिल टूट बन जाती है।

3. विशेष या खुला फ्रैक्चर (Compound or Open Fracture):
जब हड्डी त्वचा को काटकर बाहर दिखाई दे तो वह खुला फ्रैक्चर होता है। इस स्थिति में बाहर से मिट्टी के रोगाणुओं को शरीर के अंदर जाने का रास्ता मिल जाता है।

4. बहुसंघीय या बहुखंडीय फ्रैक्चर (Comminuted or Multiple Fracture):
जब हड्डी कई भागों से टूट जाए तो इसे बहुसंघीय या बहुखंडीय फ्रैक्चर या टूट कहा जाता है।

5. चपटा या संशोधित टूट या फ्रैक्चर (Impacted Fracture):
जब टूटी हड्डियों के सिरे एक-दूसरे में घुस जाते हैं तो वह चपटी टूट कहलाती है।

6.कच्चा फ्रैक्चर (Green-stick Fracture):
यह छोटे बच्चों में होता है क्योंकि छोटी आयु के बच्चों की हड्डियाँ बहुत नाजुक होती हैं जो शीघ्र मुड़ जाती हैं। यही कच्चा फ्रैक्चर होता है।

7. दबी हुई टूट या फ्रैक्चर (Depressed Fracture):
सामान्यतया यह टूट सिर की हड्डियों में होती है। जब खोपड़ी के ऊपरी .. भाग या आस-पास से हड्डी टूट जाने पर अंदर फंस जाती है तो ऐसी टूट दबी हुई टूट कहलाती है।
सबसे अधिक खतरनाक टूट या फ्रैक्चर जटिल फ्रैक्चर होता है क्योंकि इसमें हड्डी टूटकर किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचाती है। इस फ्रैक्चर में घायल की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

प्रश्न 10.
हड्डी टूटने (Fracture) के कारण, लक्षण, बचाव तथा इलाज या उपचार के बारे में लिखें।
अथवा
अस्थि-भंग (Fracture) कितने प्रकार के होते हैं? इनके कारणों, लक्षणों तथा बचाव व उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थि-भंग (Fracture) सात प्रकार का होता है। कारण (Causes):
हड्डी टूटने या फ्रैक्चर के कारण निम्नलिखित हैं
(1) यदि कोई भार तेजी से आकर हड्डी में लगे तो हड्डी अपने स्थान से खिसक जाती है।
(2) खेल मैदान का ऊँचा-नीचा होना अथवा असमतल होना।
(3) खेल सामान का शारीरिक शक्ति से भारी होना।
(4) खिलाड़ी के अचानक गिरने से हड्डी का हिल जाना।
(5) माँसपेशियों में कम शक्ति के कारण अकसर हड्डियाँ टूट जाती हैं।
(6) किसी भी दशा में गिरने से सम्बन्धित जोड़ के पास की माँसपेशियों का सन्तुलन ठीक न होने के कारण हड्डी टूट जाती है; जैसे घुटने के जोड़, कूल्हे (Hip) का जोड़ आदि।

लक्षण (Symptoms):
हड्डी टूटने के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर दर्द होता है।
(2) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर सूजन आ जाती है।
(3) टूटी हुई हड्डी के स्थान वाले अंग कुरूप हो जाते हैं।
(4) टूट वाले स्थान में ताकत नहीं रहती।
(5) हाथ लगाकर हड्डी की टूट की जाँच की जा सकती है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
फ्रैक्चर से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) असमतल मैदान पर ठीक से चलना चाहिए।
(2) फिसलने वाले स्थान पर सावधानी से चलना चाहिए।
(3) कभी भी अधिक भावुक.होकर नहीं खेलना चाहिए।
(4) खेल-भावना तथा धैर्य के साथ खेलना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
फ्रैक्चर के इलाज या उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) टूट वाले स्थान को हिलाना-जुलाना नहीं चाहिए।
(2) टूट के उपचार को करने से पहले रक्तस्त्राव एवं अन्य तीव्र घावों का उपचार करना चाहिए।
(3) टूटी हड्डी को पट्टियों व कमठियों के द्वारा स्थिर कर देना चाहिए।
(4) टूटी हड्डी पर पट्टियाँ पर्याप्त रूप से कसी होनी चाहिएँ। पट्टियाँ इतनी न कसी हों कि रक्त संचार में बाधा पैदा हो जाए।
(5) कमठियाँ इतनी लम्बी होनी चाहिएँ कि वे टूटी हड्डी का एक ऊपरी तथा एक निचला जोड़ स्थिर कर दें।
(6) घायल की पट्टियों को इस प्रकार से सही स्थिति में लाएँ कि उसको कोई तकलीफ न हो।
(7) घायल व्यक्ति को कंबल या किसी कपड़े के द्वारा गर्म करना चाहिए ताकि उसे कोई सदमा न पहुँचे।

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प्रश्न 11.
कृत्रिम श्वास से क्या अभिप्राय है? कृत्रिम श्वास की विभिन्न विधियों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कृत्रिम श्वास (Artificial Respiration):
कई बार किसी घटना के कारण व्यक्ति का श्वास काफी देर तक रुका रह जाता है और श्वास चलना बंद हो जाता है। व्यक्ति बेहोशी की स्थिति में होता है और कई बार तो उसकी जान खतरे में पड़ जाती है। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति को जो श्वास दिया जाता है, वह कृत्रिम श्वास कहलाता है। कृत्रिम श्वास से उस व्यक्ति की जान बच सकती है। इस प्रकार कृत्रिम श्वास व्यक्ति के जीवन में बहुत महत्त्व रखती है।

कृत्रिम या बनावटी श्वास देने की विधियाँ (Techniques of Artificial Respiration):
कृत्रिम श्वास की प्राथमिक सहायता में बहुत महत्ता है। दुर्घटना में आमतौर पर व्यक्ति का श्वास रुक जाता है। श्वास को पुन: चलाने के लिए कृत्रिम श्वास की आवश्यकता पड़ती है। प्राथमिक सहायक को इस बारे में पूरी तरह जानकारी होनी चाहिए । मनुष्य के जीवन में कृत्रिम श्वास देने के लिए विभिन्न विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं, जिनमें हैं

(क) शैफर विधि (Schafer Technique): शैफर विधि का प्रयोग निम्नलिखित प्रकार से किया जाता है
1. रोगी का आसन (Posture of Patient):
रोगी को आसन पर मुँह के बल इस प्रकार लेटा दें कि उसकी बाजू सिर के ऊपर की दिशा की ओर हों।

2. प्राथमिक सहायक का आसन (Posture of First Aider):
रोगी के एक ओर होकर घुटनों के बल बैठे। उस समय आपका मुँह रोगी के सिर की ओर होना चाहिए और फिर अपने हाथ रोगी की कमर पर इस प्रकार रखें कि दोनों हाथ रीढ़ की हड्डी को दबाते हों। इस स्थिति में दोनों बाजुएँ सीधी रहनी चाहिएँ।
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3. कृत्रिम श्वास की विधि (Technique of Artificial Respiration):
(1) धीरे-धीरे आगे की ओर झुकते हुए शरीर का सारा भार कमर पर डालें। इससे रोगी के पेट के सारे अंग जमीन के साथ लगे होने के कारण फेफड़ों पर दबाव पड़ने से श्वास बाहर निकलने की क्रिया आरंभ हो जाती है।

(2) दो सेकिण्ड के बाद अपना सारा भार पहले वाली स्थिति में ले आएँ। इस प्रकार बाहर की हवा अंदर आने की क्रिया आरंभ हो जाएगी।
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(ख) सिल्वेस्टर विधि (Silvester Technique):
सिल्वेस्टर विधि का प्रयोग उस समय करना चाहिए, जिस समय रोगी मुँह के बल लेटने के योग्य न हो।

1. रोगी का आसन (Posture of Patient):
रोगी को साफ स्थान पर पीठ के बल लेटा दें और यह ध्यान रखें कि उसकी गर्दन पीछे की ओर लटकी होनी चाहिए। इस स्थिति में उसकी जुबान को पकड़कर रखना चाहिए।

2. प्राथमिक सहायक का आसन (Posture of First Aider):
प्राथमिक सहायक ने रोगी को सिर की ओर कोहनी करके सीधा लेटाना चाहिए। रोगी की कोहनियों को दोनों हाथों से पकड़ना चाहिए।

3. कृत्रिम श्वास की विधि (Technique ofArtificial Respiration):
रोगी की बाजुओं को उसकी छाती पर एक-दूसरे के पास रखें और बाजुओं को अपनी ओर खींचते हुए कोहनियों को जोर से दबाएँ। इस प्रकार छाती का आकार बढ़ने से हवा फेफड़ों में भर जाती है।

(ग) होल्गर नीलसन विधि (Holger Nielson Technique):
इस विधि में पीठ पर दबाव डालकर फेफड़ों में से हवा बाहर निकल जाती है और बाजू ऊपर उठाकर हवा को फेफड़ों में दाखिल होने दिया जाता है।

1. रोगी का आसन (Posture of Patient):
रोगी को मुँह के बल लेटाकर इस प्रकार करें कि उसकी हाथों की तलियाँ उसके माथे के नीचे हों।

2. प्राथमिक सहायंक का आसन (Posture of First Aider):
प्राथमिक सहायक का दायाँ घुटना सिर के पास और बायाँ घुटना कोहनी के पास रखना चाहिए। दोनों बाजुओं को सीधी करके रोगी के कंधों पर भार डालना चाहिए। .

3. कृत्रिम श्वास की विधि (Technique of Aritificial Respiration):
(1) अपनी बाजुओं को सीधी करके शरीर का भार रोगी के कंधों पर डालें। हवा फेफड़ों में से बाहर निकल जाएगी।
(2) रोगी की बाजुओं को ऊपर की ओर उठाएँ। ध्यान रखें कि छाती जमीन के। साथ लगी रहे। इस प्रकार हवा फेफड़ों में प्रवेश कर जाएगी।
(3) जब तक प्राकृतिक श्वास क्रिया पुनः आरंभ न हो जाए, उस समय तक बाजुओं और कंधों को ऊपर उठाते और नीचे करते रहो।

प्रश्न 12.
घरों में होने वाली दुर्घटनाओं के कारण तथा उनसे बचाव के तरीके बताएँ। अथवा घर में किस प्रकार की दुर्घटनाएँ घटती हैं? उन दुर्घटनाओं से बचने के लिए कौन-कौन-सी सावधानियाँ बरतनी चाहिएँ?
उत्तर:
घरों में होने वाली दुर्घटनाएँ (Accidents occur at Homes):
घरों में आमतौर पर रसोईघर, रिहायशी कमरे, सीढ़ियाँ और आँगन आदि में दुर्घटनाएं होती रहती हैं। इनका वर्णन निम्नलिखित है
1. रसोईघर में दुर्घटना होने के कारण-
(i) धुएँ के निकलने का उचित प्रबंध न होना।
(ii) बिजली की तारों आदि का नंगे होना।
(iii) फर्श अधिक फिसलना होना।
(iv) चीजों आदि का अधिक ऊँचाई पर होना।
(v) रसोई में सफाई न होना।
(vi) आग भड़कने वाले कपड़े पहनकर काम करना।
(vii) मिट्टी के तेल और ईंधन सामग्री आदि का उचित स्थान पर न रखा होना।
(viii) जूठे बर्तनों का सही ढंग से न रखा होना।
(ix) साबुन और सर्फ का रसोई में सही जगह पर न रखा होना।

2. स्नानघर में दुर्घटना होने के कारण
(i) स्नानघर बहुत छोटा होना जिससे उठते अथवा बैठते समय चोट लग जाती है।
(ii) स्नानघर में कई बार काई जम जाती है, जिससे दुर्घटना हो सकती है।
(iii) फर्श आदि पर तेल अथवा साबुन का गिरा होना।
(iv) कपड़े टाँगने के लिए किल्लियाँ उचित स्थान पर न होना।
(v) फव्वारे अथवा पानी के नलों की ऊँचाई ठीक न होना।

3. रिहायशी कमरे में दुर्घटना के कारण:
(i) कमरों में सामान इधर-उधर बिखरा होना।
(ii) आग को सुलगते छोड़कर सोना।
(iii) फर्नीचर रखने की अवस्था सही न होना।
(iv) रोशनी का ठीक प्रबंध न होना।
(v) फर्श अधिक फिसलना होना।
(vi) बच्चों के खिलौनों का बिखरे होना।
(vii) कैंची अथवा चाकू का बिस्तरों पर बिखरे होना।

4. सीढ़ियों से दुर्घटना के कारण:
(i) सीढ़ियों का सही ढंग से न बने होना।
(ii) सीढ़ी चढ़ते समय अथवा उतरते समय पकड़ने की सही व्यवस्था न होना।
(iii) सीढ़ियाँ तंग होना और कई बार टूटी भी होना।
(iv) बच्चों वाले घर में सीढ़ियों के आगे दरवाजा न लगा होना।
(v) बाँस की सीढ़ी का सही ढंग से प्रयोग न करना।
(vi) सीढ़ियों में रोशनी का ठीक प्रबंध न होना।

5. आँगन में दुर्घटना के कारण:
(i) आँगन तंग और ऊँचा-नीचा होना।
(ii) घर का कूड़ा-कर्कट आँगन में इधर-उधर फेंका होना।
(iii) जानवरों को आँगन में बाँधना।
(iv) बच्चों द्वारा आँगन में खेलते हुए खड्डे आदि का खोदना।

बचाव के तरीके/सावधानियाँ (Safety Methods/Precautions):
घरों में होने वाली दुर्घटनाओं से बचाव/सुरक्षा के तरीके निम्नलिखित हैं
(1) घर का सारा सामान एक निश्चित स्थान पर सलीके से रखना चाहिए।
(2) माचिस आदि के सुलगते हुए टुकड़े इधर-उधर नहीं बिखेरने चाहिएँ।
(3) रोशनी का उचित प्रबंध होना चाहिए।
(4) स्नानघर में काई आदि नहीं जमने देनी चाहिए और स्नानघर को साफ रखना चाहिए।
(5) घर के फर्श पर पानी अथवा तेल गिर जाने पर उसको उसी समय अच्छी तरह साफ करना चाहिए।
(6) घर को अच्छी प्रकार रगड़कर साफ करना चाहिए।
(7) घर व रसोई में प्रत्येक वस्तु सही स्थान पर और सही ऊँचाई पर रखी होनी चाहिए।
(8) घर का कूड़ा-कर्कट एक स्थान पर डालना चाहिए।
(9) जलती लकड़ियाँ और कोयले के प्रति लापरवाही नहीं करनी चाहिए।
(10) सीढ़ियों में चढ़ते-उतरते समय पक्के और मज़बूत सहारे होने चाहिएँ।
(11) चाकू, छुरी, कील आदि वस्तुओं का प्रयोग करने के उपरांत उनको उचित स्थान पर रख देना चाहिए।
(12) आँगन समतल होना चाहिए।
(13) बच्चों के खिलौने बिखरे नहीं होने चाहिएँ।

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प्रश्न 13.
स्कूल में होने वाली दुर्घटनाओं के कारण तथा इनसे बचाव के तरीके बताइए।
अथवा
विद्यालय में किस प्रकार की दुर्घटनाएं घटती हैं? उन दुर्घटनाओं से बचने के लिए कौन-कौन-सी सावधानियाँ बरतनी चाहिएँ?
उत्तर:
स्कूल या विद्यालय में होने वाली दुर्घटनाएँ (Accidents occur at School):
दुर्घटनाएँ न केवल घरों में होती हैं, बल्कि स्कूलों में भी हो जाती हैं। स्कूल में होने वाले दुर्घटनाएँ-फर्श से फिसलकर गिर जाना, खेलते हुए चोट लगना, खेलने का सामान ठीक न होने के कारण चोट लगना, स्कूल की सीढ़ियों से गिर जाना, पानी वाले स्थान के आस-पास काई जमी होने के कारण फिसलकर गिर जाना आदि।
संक्षेप में, स्कूल में दुर्घटनाएँ होने के कारण अग्रलिखित हैं
(1) स्कूल का फर्श और कमरे गंदे व चिकने होना।
(2) खेल का मैदान साफ और समतल न होना।
(3) खेल का टूटा-फूटा सामान इधर-उधर बिखरा हुआ होना।
(4) खेलों के नियमों का उल्लंघन करना।
(5) खेलों का निरीक्षण और नेतृत्व विशेषज्ञ अध्यापकों की निगरानी में न होना।
(6) कबड्डी और कुश्ती आदि खेलों में अंगूठी अथवा कोई अन्य तीखी चीज़ डालना।
(7) स्कूल में तैरने के तालाब, स्नानघर और नलों आदि की ठीक सफाई न होना।
(8) शौचालय की उचित व्यवस्था व सफाई न होना।
(9) स्कूल की सीढ़ियों पर काई का जमा होना।
(10) पीने वाले पानी के स्थान के आस-पास काई का जमा होना।

बचाव के तरीके या सावधानियाँ (Safety Methods or Precautions):
स्कूल में सुरक्षा बहुत आवश्यक है। स्कूलों में बचाव निम्नलिखित अनुसार किया जा सकता है.
(1) स्कूल में सारे कमरे हवादार और खुले होने चाहिएँ।
(2) स्कूल में खेलने का स्थान समतल और साफ-सुथरा होना चाहिए।
(3) खेलने की वस्तुएँ उचित स्थान पर रखी होनी चाहिएँ।
(4) कबड्डी और कुश्ती जैसी खेलें खेलते समय अँगूठी, कड़ा या कोई तीखी चीज़ पहनने की मनाही होनी चाहिए।
(5) खेलों के नियम का उल्लंघन करने वाले के विरुद्ध कार्रवाई करनी चाहिए।
(6) स्कूल में पीने वाले पानी की सफाई जरूर होनी चाहिए।
(7) पीने वाले पानी के स्थान पर काई आदि नहीं जमने देनी चाहिए।

प्रश्न 14.
किसी व्यक्ति के जल जाने के कारण, लक्षण तथा इलाज के उपाय लिखें।
अथवा
किसी व्यक्ति के जल जाने के लक्षण, उपचार तथा उस स्थिति में न करने योग्य बातों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
केवल आग के संपर्क में आकर ही नहीं, किसी भी गर्म वस्तु के शरीर से छू जाने पर त्वचा जल जाती है। जले हुए स्थान पर बहुत दर्द होता है। कई बार त्वचा पर छाले भी पड़ जाते हैं। किसी गर्म वस्तु अथवा आग के संपर्क में शारीरिक त्वचा के आ जाने से त्वचा की ऊपरी अथवा निचली परत की बनावट के जल जाने को जलन कहा जाता है। साधारण तौर पर शरीर पर जलन से संबंधित घटनाएँ रसोईघर, कारखानों और प्रयोगशालाओं में होती रहती हैं।

कारण (Causes):
जलने के कारण निम्नलिखित हैं
(1) आग के प्रत्यक्ष संपर्क से।
(2) किसी गर्म वस्तु के छूने से।
(3) बिजली के करंट से।
(4) आकाशीय बिजली गिरने से।
(5) तेजाब से।
(6) गर्म दूध,पानी, घी और तेल आदि से।

लक्षण (Symptoms):
जलन पैदा होने के निम्नलिखित लक्षण होते हैं
(1) जलन से त्वचा लाल हो जाती है।
(2) त्वचा पर छाले पड़ जाते हैं।
(3) प्रभावित अंग या भाग में दर्द होता है।
(4) जलन से तंतु नष्ट हो जाते हैं।
(5) जले हुए अंग कुरूप दिखाई देते हैं।

इलाज/उपचार (Treatment) जलन का इलाज निम्नलिखित तरीके से करना चाहिए
(1) रोगी को कंबल में लपेट देना चाहिए, ताकि उसका शरीर गर्म रहे।
(2) जले हुए स्थान को स्थिर रखने के लिए पट्टियों अथवा फट्टियों का प्रयोग करना चाहिए।
(3) जलन होने की स्थिति में पड़े छाले नहीं छेड़ने चाहिएँ और उन पर नर्म पट्टी का लेप करना चाहिए।
(4) रोगी को गर्म चाय अथवा दूध देना चाहिए।
(5) जलन वाले स्थान को मीठे सोडे से धो लें, रोगी को आराम मिलेगा।
(6) यदि जलन तेजाबी हो तो खारे पानी के साथ धो लें।
(7) जलन पर पूरी तरह नियंत्रण करने के लिए डॉक्टर की सलाह लें।

जलन की स्थिति में न करने योग्य बातें (Things to Avoid in Burns Situation):
जलन की स्थिति में न करने योग्य बातें निम्नलिखित हैं
(1) जले हुए व्यक्ति पर पानी नहीं डालना चाहिए।
(2) जले हुए व्यक्ति के शरीर पर पड़े छाले नहीं छेड़ने चाहिएँ।
(3) जिस किसी व्यक्ति के कपड़ों में आग लगी हो, उसे दौड़ने नहीं देना चाहिए क्योंकि दौड़ने से आग तीव्र होती है।
(4) यदि जले हुए व्यक्ति के कपड़े उसकी त्वचा से चिपक जाएँ तो उन्हें खींचना नहीं चाहिए।

प्रश्न 15.
लू लगने के लक्षण तथा इलाज के बारे में लिखें।
उत्तर:
लू ग्रीष्म ऋतु में सूर्य की गर्मी के प्रभाव से लगती है। तेज़ धूप में काम करते, खेलते अथवा चलते-फिरते सूर्य की तेज़ किरणों के शरीर पर पड़ जाने के कारण शरीर में असंतुलन की अवस्था का पैदा हो जाना लू लगना (Heat Stroke or Sunstroke) कहलाता है। लू लगने से कई बार रोगी बेहोश भी हो जाता है।

लक्षण (Symptoms): लू लगने के निम्नलिखित लक्षण होते हैं
(1) साँस रुक-रुक कर आती है।
(2) लू लगने से व्यक्ति की नब्ज तेज़ चलने लगती है।
(3) रोगी के चेहरे का रंग पीला पड़ जाता है।
(4) लू के प्रभाव से रोगी बेहोश हो जाता है।
(5) रोगी की त्वचा गर्म हो जाती है।
(6) रोगी को साँस लेने में कठिनाई आती है।
(7) लू के कारण रोगी के शरीर का तापमान बहुत बढ़ जाता है।

इलाज (Treatment):
लू लगने की स्थिति में निम्नलिखित अनुसार इलाज किया जा सकता है
(1) लू लगने की स्थिति में रोगी के कपड़े ढीले कर दें।
(2) रोगी को शीघ्रता से ठंडे स्थान पर ले जाना चाहिए।
(3) रोगी को होश में लाने की कोशिश करनी चाहिए।
(4) रोगी को हवादार वातावरण में रखें ताकि उसको लू से राहत मिल सके।
(5) रोगी के आस-पास लोगों को एकत्रित न होने दें।
(6) रोगी के शरीर पर बर्फ के टुकड़े रखें ताकि उसके शरीर का तापमान साधारण स्थिति में आ जाए।
(7) रोगी के शरीर पर बर्फ का लेप करते रहना चाहिए।
(8) रोगी को होश आने की स्थिति में ठंडा पानी अथवा ग्लूकोज़ देना चाहिए।
(9) रोगी को विश्राम की स्थिति में रखना चाहिए।
(10) रोगी को शीघ्रता से डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

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प्रश्न 16.
साँप के डसने तथा पागल कुत्ते के काटने की प्राथमिक सहायता का वर्णन करें।
अथवा
साँप के काटने के चिह्नों तथा प्राथमिक चिकित्सा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1. साँपका डसना (Biting by Snake):
हमारे देश में विभिन्न प्रकार के साँप पाए जाते हैं जिनमें से कई बहुत जहरीले होते हैं, जिनके डसने से मनुष्य की मृत्यु तक हो जाती है। ऐसे मनुष्य को समय पर प्राथमिक सहायता देकर बचाया जा सकता है।
चिह्न (Remarks): साँप के डसने के चिह्न का निम्नलिखित कारणों से पता चलता है
(1) डसे हुए स्थान पर बहुत दर्द होता है।
(2) व्यक्ति के हाथ-पैर काँपने लग जाते हैं
(3) मुँह में से झाग और लारें निकलनी शुरू हो जाती हैं।
(4) उल्टियाँ आनी आरंभ हो जाती हैं।
(5) व्यक्ति की जुबान बाहर निकल आती है।
(6) साँस लेने में कठिनाई होती है।

प्राथमिक सहायता (FirstAid):
साँप के डसने की प्राथमिक सहायता निम्नलिखित है
(1) साँप के डसे हुए अंग के बीच रक्त संचार को रोक देना चाहिए।
(2) डसे हुए स्थान को लाल दवाई से धो दें।
(3) रोगी को गर्म चाय पिलाएँ।
(4) साँस बंद होने की स्थिति में कृत्रिम श्वास दें।
(5) रोगी को नींद न आने दें।

2. पागल कुत्ते के काटने की प्राथमिक सहायता (First Aid of Mad Dog Biting):
पागल कुत्ते का ज़हर व्यक्ति की केंद्रीय तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव डालता है। इसके काटने से व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है। यदि किसी व्यक्ति को पागल कुत्ता काट जाए तो हमें प्राथमिक सहायता निम्नलिखित अनुसार देनी चाहिए
(1) कटे हुए जख्म से रक्त बहाने का प्रयत्न करें।
(2) कटे हुए स्थान को रस्सी अथवा रूमाल के साथ बाँध दें ताकि रक्त बाहर की ओर बह सके।
(3) पागल कुत्ते के काटे हुए स्थान को लाल दवाई के साथ धो दें।
(4) कटे हुए स्थान को नीचे की ओर रखें।
(5) रोगी को गर्म चाय अथवा गर्म कॉफी दें।
(6) रोगी को विश्राम की स्थिति में रखें।
(7) डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही टीके लगवाएँ।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
खेल की चोटों को कम करने के आधारभूत चरण क्या हैं? अथवा क्या खेलों की चोटों में बचाव के पक्ष, उपचार से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
खेल की चोटों को कम करने के आधारभूत चरण निम्नलिखित हैं
(1) प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को गर्माना।
(2) सुरक्षात्मक उपकरण का प्रयोग खेल की आवश्यकता के अनुसार करना।
(3) तैयारी के समय उचित अनुकूलन बनाए रखना।
(4) प्रतियोगिता के दौरान सतर्क व सावधान रहना।
(5) सुरक्षात्मक कपड़ों व जूतों का प्रयोग करना।
इस प्रकार उपर्युक्त विवरण के आधार पर खेलों की चोटों में बचाव के पक्ष, उपचार से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि सावधानी हमेशा सभी औषधियों या दवाइयों से बेहतर होती है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता के मुख्य नियमों या सिद्धांतों का वर्णन कीजिए। उत्तर-प्राथमिक सहायता के नियम निम्नलिखित हैं
(1) रोगी अथवा घायल को विश्राम की स्थिति में रखना।
(2) घाव से बह रहे रक्त को बंद करना।
(3) घायल की सबसे जरूरी चोट की ओर अधिक ध्यान देना।
(4) दुर्घटना के समय जिस प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तुरंत उपलब्ध करवाना।
(5) घायल की स्थिति को खराब होने से बचाना।
(6) घायल की अंत तक सहायता करना।
(7) घायल के नजदीक भीड़ एकत्रित न होने देना।

प्रश्न 3.
खेलों में चोटों के प्राथमिक उपचार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। अथवा खेलों में चोट लगने पर क्या उपचार करना चाहिए?
उत्तर:
खेलों में चोट लगने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिएँ:
(1) खेलों में चोट लगने पर सबसे पहले बर्फ की मालिश करनी चाहिए। बर्फ सूजन और रक्त के बहाव को रोकती है।

(2) दबाव का प्रयोग करके भी सूजन को घटाया जा सकता है। बर्फ की मालिश के बाद पट्टी को उस स्थान पर इस प्रकार बाँधना चाहिए कि जिससे रक्त का प्रवाह भी न रुके तथा न ही इतनी ढीली होनी चाहिए जिससे कि दोबारा सूजन हो जाए।

(3) खेलों में चोट लगने पर यह जरूरी है कि आराम किया जाए। जब भी शरीर के किसी हिस्से पर चोट लगती है तो चोट वाले स्थान पर दर्द, सूजन जैसे चिह्न बन जाते हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए आराम करना जरूरी है।

(4) चोट लगने पर उस स्थान का उसी के अनुसार इलाज करना चाहिए। यदि शरीर के निचली तरफ चोट लगी है तो उस दर्द और सूजन से बचाने के लिए आराम और सोते समय चोट लगने वाला हिस्सा ऊँचा रखना चाहिए। यदि चोट शरीर के ऊपरी हिस्से में लगी है तो दर्द और सूजन से बचने के लिए ऊपरी हिस्सा थोड़ा ऊँचा कर देना चाहिए। इससे चोट वाले
स्थान को आराम मिलता है।

प्रश्न 4.
खेल में खिंचाव से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर:
खेल में खिंचाव से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करना चाहिए
(1) गीले व चिकने ग्राऊंड, ओस वाली घास पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(2) ऊँची तथा लंबी छलाँग हेतु बने अखाड़ों की जमीन सख्त नहीं होनी चाहिए।
(3) खेलने से पहले कुछ हल्का व्यायाम करके शरीर को अच्छी तरह गर्मा लेना चाहिए। इससे खेलने के लिए शरीर तैयार हो जाता है।
(4) चोटों से बचने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
(5) खिलाड़ी को सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायक को किन तीन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता देने की विधि रोगी की स्थिति के अनुसार देनी चाहिए, जिसके लिए तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है
1. चोट की स्थिति-ध्यान रखा जाए कि चोट से शरीर का कौन-सा अंग और कौन-सी प्रणाली प्रभावित हुई है। उसके अनुसार उपचार विधि अपनाई जाए।
2. चोट का जोर-जहाँ चोट का अधिक ज़ोर हो, पहले उसको संभालने का प्रयत्न किया जाए।
3. प्राथमिक सहायता की विधि-जिस प्रकार की चोट लगी हो, उपचार विधि उसी के अनुसार अपनाई जानी चाहिए। मौके पर उपलब्ध साधनों के अनुसार प्राथमिक सहायता देने की विधि अपनाई जानी चाहिए।

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता के मुख्य नियमों या सिद्धांतों का वर्णन कीजिए। उत्तर-प्राथमिक सहायता के नियम निम्नलिखित हैं
(1) रोगी अथवा घायल को विश्राम की स्थिति में रखना।
(2) घाव से बह रहे रक्त को बंद करना।
(3) घायल की सबसे जरूरी चोट की ओर अधिक ध्यान देना।
(4) दुर्घटना के समय जिस प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तुरंत उपलब्ध करवाना।
(5) घायल की स्थिति को खराब होने से बचाना।
(6) घायल की अंत तक सहायता करना।
(7) घायल के नजदीक भीड़ एकत्रित न होने देना।

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प्रश्न 3.
खेलों में चोटों के प्राथमिक उपचार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
खेलों में चोट लगने पर क्या उपचार करना चाहिए?
उत्तर:
खेलों में चोट लगने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिएँ
(1) खेलों में चोट लगने पर सबसे पहले बर्फ की मालिश करनी चाहिए। बर्फ सूजन और रक्त के बहाव को रोकती है।

(2) दबाव का प्रयोग करके भी सूजन को घटाया जा सकता है। बर्फ की मालिश के बाद पट्टी को उस स्थान पर इस प्रकार बाँधना चाहिए कि जिससे रक्त का प्रवाह भी न रुके तथा न ही इतनी ढीली होनी चाहिए जिससे कि दोबारा सूजन हो जाए।

(3) खेलों में चोट लगने पर यह जरूरी है कि आराम किया जाए। जब भी शरीर के किसी हिस्से पर चोट लगती है तो चोट वाले स्थान पर दर्द, सूजन जैसे चिह्न बन जाते हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए आराम करना जरूरी है।

(4) चोट लगने पर उस स्थान का उसी के अनुसार इलाज करना चाहिए। यदि शरीर के निचली तरफ चोट लगी है तो उस दर्द और सूजन से बचाने के लिए आराम और सोते समय चोट लगने वाला हिस्सा ऊँचा रखना चाहिए। यदि चोट शरीर के ऊपरी हिस्से में लगी है तो दर्द और सूजन से बचने के लिए ऊपरी हिस्सा थोड़ा ऊँचा कर देना चाहिए। इससे चोट वाले
स्थान को आराम मिलता है।

प्रश्न 4.
खेल में खिंचाव से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर:
खेल में खिंचाव से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करना चाहिए
(1) गीले व चिकने ग्राऊंड, ओस वाली घास पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(2) ऊँची तथा लंबी छलाँग हेतु बने अखाड़ों की जमीन सख्त नहीं होनी चाहिए।
(3) खेलने से पहले कुछ हल्का व्यायाम करके शरीर को अच्छी तरह गर्मा लेना चाहिए। इससे खेलने के लिए शरीर तैयार हो जाता है।
(4) चोटों से बचने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
(5) खिलाड़ी को सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायक को किन तीन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता देने की विधि रोगी की स्थिति के अनुसार देनी चाहिए, जिसके लिए तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है
(1) चोट की स्थिति-ध्यान रखा जाए कि चोट से शरीर का कौन-सा अंग और कौन-सी प्रणाली प्रभावित हुई है। उसके अनुसार उपचार विधि अपनाई जाए।
(2) चोट का जोर-जहाँ चोट का अधिक ज़ोर हो, पहले उसको संभालने का प्रयत्न किया जाए।
(3) प्राथमिक सहायता की विधि-जिस प्रकार की चोट लगी हो, उपचार विधि उसी के अनुसार अपनाई जानी चाहिए। मौके पर उपलब्ध साधनों के अनुसार प्राथमिक सहायता देने की विधि अपनाई जानी चाहिए।

प्रश्न 6.
मोच कितने प्रकार की होती है? वर्णन कीजिए। इत्तर-मोच तीन प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है
(1) नर्म मोच-इसमें जोड़-बंधनों (Ligaments) पर खिंचाव आता है। जोड़ में हिलजुल करने पर दर्द अनुभव होता है। इस हालत में कमजोरी तथा दर्द महसूस होता है।
(2) मध्यम मोच-इसमें जोड़-बंधन काफी मात्रा में टूट जाते हैं। इस हालत में सूजन तथा दर्द बढ़ जाता है।
(3) पूर्ण मोच-इसमें जोड़ की हिलजुल शक्ति समाप्त हो जाती है। जोड़-बंधन पूरी तरह टूट जाते हैं। जोड़-बंधनों के साथ-साथ जोड़ कैप्सूल भी जख्मी हो जाता है। इस हालत में दर्द असहनीय हो जाता है।

प्रश्न 7
आजकल प्राथमिक सहायता की पहले से अधिक आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को और अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है। इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि घायल अथवा रोगी व्यक्ति को तुरन्त प्राथमिक सहायता मिल जाए तो उसका जीवन बचाया जा सकता है। कुछ चोदें तो इस प्रकार की हैं, जो खेल के मैदान में निरंतर लगती रहती हैं, जिनको मौके पर प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, यदि हमें प्राथमिक सहायता सम्बन्धी उचित जानकारी हो। इस प्रकार रोगी की स्थिति बिगड़ने से बचाने और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्राथमिक सहायता की बहुत आवश्यकता होती है। इसलिए प्राथमिक सहायता की आज के समय में बहुत आवश्यकता हो गई है।

प्रश्न 8.
आज के मशीनी युग में सुरक्षा शिक्षा की आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
आज के मशीनी युग में मशीनों के द्वारा काम करने का रुझान बढ़ गया है और यातायात के साधनों का बहुत तीव्रता से विकास हो रहा है। अनजान व्यक्ति द्वारा मशीनों का प्रयोग और लापरवाही से चलाई बस, कार, स्कूटर, मोटरसाइकिल आदि हमेशा दुर्घटनाओं के कारण बनते हैं। आधुनिक समय में इन दुर्घटनाओं से बचने के लिए प्रत्येक प्रकार के वाहनों और मशीनों का प्रयोग करने संबंधी शिक्षा की आवश्यकता बढ़ गई है। आज का प्रत्येक कार्य जोखिम भरा बन गया है, जिस कारण सुरक्षा शिक्षा की आवश्यकता हर समय प्रत्येक व्यक्ति को होती है।

प्रश्न 9.
सुरक्षा के लिए सामाजिक स्तर पर लोगों को क्या समझाना चाहिए?
उत्तर:
सामाजिक स्तर पर लोगों को सार्वजनिक सुरक्षा के लिए समझाना चाहिए कि वे घातक बीमारियों के फैलने से बचाव के लिए गली-मौहल्ले को साफ रखें। साधारण लोगों के लिए प्रयोग किए जा रहे रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और कार्पोरेशन की ओर से बनाए पाखानों का सही प्रयोग करें। सड़कों पर छिलके न फेंकें और न ही अपना कोई वाहन, रेहड़ी आदि सड़क पर खड़ी करके यातायात में रुकावट उत्पन्न करें, बल्कि प्रत्येक प्रकार की उत्पन्न हुई सामाजिक रुकावटों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।

प्रश्न 10.
मोच (Sprain) क्या है? इसके बचाव की विधियाँ बताएँ। अथवा खेल में मोच से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर:
मोच लिगामेंट की चोट होती है। सामान्यतया मोच कोहनी के जोड़ या टखने के जोड़ पर अधिक आती है। किसी जोड़ के संधिस्थल के फट जाने को मोच आना कहते हैं।
मोच से बचाव की विधियाँ-खेलों में मोच से बचाव की विधियाँ निम्नलिखित हैं
(1) पूर्ण रूप से शरीर के सभी जोड़ों को गर्मा लेना चाहिए।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता के होने चाहिएँ।
(3) मैदान समतल व साफ होना चाहिए।
(4) थकावट के समय खेल रोक देना चाहिए।
(5) सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

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प्रश्न 11.
मोच आने के कौन-कौन-से कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
मोच आने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) खेलते समय सड़क पर पड़े पत्थरों पर पैर आने से मोच आ जाती है।
(2) किसी गीली अथवा चिकनी जगह पर; जैसे ओस वाली घास या खड़े पानी में अचानक पैर के फिसल जाने से मोच आ जाती है।
(3) खेल के मैदान में यदि किसी गड्ढे में पैर आ जाए तो यह मोच का कारण बन जाती है।
(4) अनजान खिलाड़ी यदि गलत तरीके से खेले तो भी मोच आ जाती है।
(5) अखाड़ों की गुड़ाई ठीक न होने के कारण भी मोच आ जाती है।
(6) असावधानी से खेलने पर भी मोच आ जाती है।

प्रश्न 12.
बिजली के झटके (Electric Shock) की प्राथमिक सहायता का वर्णन करें।
उत्तर:
बिजली की नंगी तार में करंट के कारण व्यक्ति बिजली के साथ चिपक जाता है और उसकी मृत्यु भी हो सकती है। कई बार व्यक्ति झटका खाकर गिर पड़ता है। यदि कोई व्यक्ति तार के साथ चिपक जाए तो सबसे पहले मेन-स्विच को बंद करें ताकि उसकी जान बचाई जा सके। ऐसे समय में घबराना नहीं चाहिए बल्कि बुद्धिमता से काम लेना चाहिए। बिजली के झटके की स्थिति में निम्नलिखित प्राथमिक सहायता दी जा सकती है

(1) बिजली के झटके के कारण साँस रुकने की स्थिति में कृत्रिम श्वास देनी चाहिए।
(2) रोगी को दूध, कॉफी अथवा चाय पिलानी चाहिए।
(3) बिजली के झटके के पश्चात् जले हुए स्थान का इलाज करना चाहिए।
(4) डॉक्टर की सहायता लेनी चाहिए।
(5) ऐसी दुर्घटना होने पर व्यक्ति को सीधे हाथ से नहीं पकड़ना चाहिए, बल्कि सूखी लकड़ी का प्रयोग करना चाहिए।
(6) बिजली के झटके की स्थिति में सबसे पहले मेन-स्विच को बंद करना चाहिए ताकि बिजली के प्रवाह को रोका जा सके।

प्रश्न 13.
किसी व्यक्ति के जल जाने की स्थिति में न करने योग्य बातों का वर्णन कीजिए। उत्तर-किसी व्यक्ति के जल जाने की स्थिति में न करने योग्य बातें निम्नलिखित हैं
(1) जले हुए व्यक्ति पर पानी नहीं डालना चाहिए।
(2) जले हुए व्यक्ति के शरीर पर पड़े छाले नहीं छेड़ने चाहिएँ।
(3) जिस किसी व्यक्ति के कपड़ों में आग लगी हो, उसे दौड़ने नहीं देना चाहिए क्योंकि दौड़ने से आग तीव्र होती है।
(4) यदि जले हुए व्यक्ति के कपड़े उसकी त्वचा से चिपक जाएँ तो उन्हें खींचना नहीं चाहिए।

प्रश्न 14.
सड़कों पर दुर्घटनाएँ होने के साधारण कारण कौन-से होते हैं?
उत्तर:
सड़कों पर दुर्घटनाएँ होने के साधारण कारण निम्नलिखित हैं
(1) शराब पीकर वाहन चलाना।
(2) सिग्नल बत्तियों को नजरअंदाज करके चौक पार करना।
(3) मोटरगाड़ियों को लंबे समय तक बिना निरीक्षण करवाए चलाना।
(4) ड्राइवरों द्वारा थकावट और नींद की स्थिति में मोटरगाड़ियाँ चलाना।
(5) ट्रकों में आवश्यकता से अधिक भार लादना और बसों में अधिक सवारियाँ बिठाना।

प्रश्न 15.
घावों के प्राथमिक उपचार पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
घावों के प्राथमिक उपचार हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं
(1) सबसे पहले रोगी को अनुकूल आसन में बैठाएँ।
(2) रक्त बहते हुए अंग को थोड़ा ऊपर उठाकर रखें।
(3) घाव में यदि कोई बाहरी चीज दिखाई पड़े जो आसानी से हटाई जाए तो साफ पट्टी से हटा दीजिए।
(4) घाव को जहाँ तक हो सके खुला रखें अर्थात् कपड़े आदि से न ढके।
(5) घाव पर मरहम पट्टी लगाएँ।
(6) घायल अंग को स्थिर रखें।
(7) घाव पर पट्टी इस प्रकार से बाँधनी चाहिए जिससे बहता रक्त रुक सके।
(8) घायल के घाव को आयोडीन टिंक्चर या स्प्रिट से भली-भाँति धो देना चाहिए।
(9) घायल को प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत डॉक्टर के पास ले जाए।

प्रश्न 16.
जोड़ या हड्डी के उतर जाने (Dislocation) की प्राथमिक सहायता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जोड़ के उतर जाने की प्राथमिक सहायता निम्नलिखित प्रकार से करनी चाहिए.
(1) घायल को आरामदायक या सुखद स्थिति में रखना चाहिए।
(2) घायल अंग को गद्दियों या तकियों से सहारा देकर स्थिर रखें।
(3) उतरे जोड़ को चढ़ाने का प्रयास कुशल प्राथमिक सहायक को सावधानी से करना चाहिए।
(4) यदि दर्द अधिक हो तो गर्म पानी की टकोर करनी चाहिए।
(5) जोड़ पर बर्फ या ठण्डे पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए।
(6) घायल को प्राथमिक सहायता के बाद तुरंत अस्पताल या डॉक्टर के पास ले जाएँ।

प्रश्न 17.
प्राथमिक सहायक या उपचारक के कर्तव्यों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक सहायक या उपचारक के प्रमुख कर्त्तव्य या दायित्व निम्नलिखित हैं
(1) प्राथमिक उपचारक को रोगी या घायल को अस्पताल ले जाने के लिए योग्य सहायता का उपयोग करना चाहिए।
(2) उसको घायल की पूरी देखभाल की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
(3) घायल के शरीरगत चिह्नों; जैसे सूजन, कुरूपता आदि को प्राथमिक उपचारक को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानकर उचित सहायता देनी चाहिए।
(4) प्राथमिक चिकित्सक को स्थिति को ध्यान में रखकर कार्य करना चाहिए।
(5) प्राथमिक सहायक को घायल या रोगी को यह महसूस करवाना चाहिए कि वह अच्छा है, उसे कुछ नहीं हुआ है। उसे उसके साथ उत्साहपूर्ण बातें करनी चाहिएँ।
(6) प्राथमिक सहायक को घायल का तुरंत उपचार शुरू करना चाहिए। यदि घायल के किसी अंग से रक्त बह रहा हो तो उसे तुरंत रोकने का प्रयास करना चाहिए।
(7) प्राथमिक सहायक को घायल के आस-पास लोगों को इकट्ठा नहीं होने देना चाहिए।
(8) यदि घायल को डॉक्टर की जरूरत है तो प्राथमिक सहायक को तुरंत डॉक्टर को बुलाना चाहिए।

प्रश्न 18.
हड्डी टूटने या अस्थिभंग (Fracture) के प्राथमिक उपचार या सहायता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
टूटी हड्डी के उपचार हेतु किन-किन नियमों (उपायों) का पालन करना चाहिए? उत्तर-टूटी हड्डी के प्राथमिक उपचार के लिए निम्नलिखित उपायों या नियमों को अपनाना चाहिए
(1) टूटी हड्डी का उसी स्थान पर प्राथमिक उपचार करना चाहिए।
(2) टूट के उपचार को करने से पहले रक्तस्राव एवं अन्य तीव्र घावों का उपचार करना चाहिए।
(3) टूटी हड्डी को पट्टियों व कमठियों के द्वारा स्थिर कर देना चाहिए।
(4) टूटी हड्डी पर पट्टियाँ पर्याप्त रूप से कसी होनी चाहिएँ। पट्टियाँ इतनी न कसी हों कि रक्त संचार में बाधा पैदा हो जाए।
(5) कमठियाँ इतनी लम्बी होनी चाहिएँ कि वे टूटी हड्डी का एक ऊपरी तथा एक निचला जोड़ स्थिर कर दें।
(6) घायल की पट्टियों को इस प्रकार से सही स्थिति में लाएँ कि उसको कोई तकलीफ न हो।
(7) घायल व्यक्ति को कंबल या किसी कपड़े के द्वारा गर्म करना चाहिए ताकि उसे कोई सदमा न पहुँचे।
(8) प्राथमिक सहायता या उपचार देने के बाद घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचा देना चाहिए ताकि उसका उचित उपचार किया जा सके।

प्रश्न 19.
आज के दैनिक जीवन में सुरक्षा शिक्षा का महत्त्व क्यों अधिक बढ़ गया है?
अथवा
व्यक्तियों के लिए सुरक्षा शिक्षा का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
आज के वैज्ञानिक युग में दुर्घटनाएँ होना साधारण बात हो गई है। कहीं-न-कहीं बड़ी अथवा छोटी दुर्घटनाएँ निरंतर घटती रहती हैं। दुर्घटना में व्यक्ति को या तो गम्भीर चोट लग जाती है या हड्डियाँ आदि टूट जाती हैं। प्राकृतिक आपदा; जैसे बाढ़ आदि की स्थिति में कई व्यक्ति नदी के पानी में डूब जाते हैं। खेतों में काम करते समय किसान साँप के डंक का शिकार हो जाता है या कई बार व्यक्ति जहरीली वस्तु खा लेता है। ये दुर्घटनाएँ किसी समय भी घटित हो सकती हैं। आज के युग में व्यक्तियों को सुरक्षा शिक्षा की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि सुरक्षा शिक्षा से हमें अनेक महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इससे हम काफी सीमा तक होने वाली दुर्घटनाओं पर नियंत्रण पा सकते हैं।

इस शिक्षा से हमें घरेलू एवं यातायात संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण नियमों की जानकारियाँ होती हैं जिनको अपनाकर हम दुर्घटनाओं से अपना बचाव कर सकते हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है-“सावधानी हटी-दुर्घटना घटी।” सुरक्षा शिक्षा में इसी कहावत को व्यापक रूप से समझाया जाता है। प्रायः देखा गया है कि सड़क पर अधिकतर दुर्घटनाएँ असावधानी के कारण होती हैं । यदि सावधान व सतर्क रहा जाए तो ऐसी दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। यह शिक्षा हमें अपने जीवन के प्रति सजग करती है और हमें अनेक नियमों की जानकारी देकर हमारे जीवन को सुरक्षित करने में सहायता करती है। यदि हमें सुरक्षा संबंधी नियमों का पता होगा तभी हम दुर्घटनाओं से स्वयं का बचाव कर पाएंगे।

प्रश्न 20.
सुरक्षा शिक्षा के प्रमुख सिद्धांतों या नियमों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं
(1) सामान्य दुर्घटनाओं से बचने के लिए अनेक क्षेत्रों से संबंधित सुरक्षा के नियमों का पालन करना चाहिए; जैसे बिजली की तारें नंगी नहीं रहनी चाहिएँ। सुरक्षा शिक्षा के अन्तर्गत अनेक प्रकार के यातायात संबंधी नियमों की जानकारी प्रदान की जाती है।

(2) सीढ़ियों पर चढ़ने एवं उतरने में सावधानी बरतनी चाहिए।

(3) सुरक्षा शिक्षा के अन्तर्गत नशीले पदार्थों के सेवन के दुष्परिणामों से अवगत करवाया जाता है; जैसे किसी व्यक्ति द्वारा शराब आदि पीकर वाहन नहीं चलाना चाहिए।

(4) यह शिक्षा हमें हमेशा सतर्कता हेतु प्रेरित करती है, क्योंकि जरा-सी असावधानी के कारण दुर्घटना हो सकती है।

(5) इसमें सुरक्षा संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान की जाती है। इसलिए हमें सुरक्षा शिक्षा के संबंध में दी जा रही जानकारियों को ध्यान से सुनना एवं समझना चाहिए।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

प्रश्न 21.
सुरक्षा शिक्षा में डूबने पर क्या प्राथमिक उपचार दिए जाने की शिक्षा दी जाती है?
उत्तर:
सुरक्षा शिक्षा में डूबने पर प्राथमिक उपचार की शिक्षा दी जाती है जो निम्नलिखित है
(1) सबसे पहले डूबते व्यक्ति को पानी से बाहर निकालना चाहिए।
(2) उसे जमीन पर पेट के बल लिटाना चाहिए।
(3) यदि वह बेहोश हो तो उसे सी०पी०आर० (कृत्रिम श्वास) देनी चाहिए।
(4) उसके शरीर से पानी निकालने के लिए उचित तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए।
(5) यदि व्यक्ति श्वास नहीं ले पा रहा हो तो सी०पी०आर० को दोहराना चाहिए। जब तक व्यक्ति श्वास शुरू नहीं करता या आपातकालीन सहायता नहीं आती, तब तक यह प्रक्रिया दोहराते रहना चाहिए।

प्रश्न 22.
तेजधार वाली वस्तुओं का प्रयोग करते समय कौन-कौन-सी बातें ध्यान रखने योग्य हैं?
उत्तर:
तेजधार वाली वस्तुओं का प्रयोग करते समय निम्नलिखित बातें ध्यान रखने योग्य हैं.
(1) तेजधार वाली वस्तुओं का प्रयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
(2) तेजधार वाली वस्तुओं या यंत्रों को चलाने में निपुणता या कुशलता होनी चाहिए।
(3) तेजधार वाली वस्तुओं का प्रयोग सुरक्षा शिक्षा के नियमों के अनुसार करना चाहिए।
(4) व्यक्ति जिस टूल या मशीन को चलाने में निपुण हो, उसी टूल को चलाना चाहिए।
(5) तेजधार वाली वस्तुओं का प्रयोग तकनीकी सहायक की सलाहानुसार करना चाहिए।
(6) उत्तम व बढ़िया किस्म की तेजधार वाली वस्तुएँ ही प्रयोग करनी चाहिए क्योंकि इनके टूटने की संभावना कम रहती है।

प्रश्न 23.
सुरक्षा शिक्षा में सहायक प्रमुख संस्थाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
सुरक्षा शिक्षा की जिम्मेवारी किसी एक व्यक्ति अथवा संस्था की नहीं है, बल्कि इसमें सबको मिलकर भाग लेना चाहिए।
1. सरकारी स्तर पर-सरकार के द्वारा सड़कों पर पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ का ठीक प्रबंध किया जाना चाहिए। यातायात के नियमों से लोगों को अवगत करवाना चाहिए। सड़कों पर रोशनी का ठीक प्रबंध हो। सड़कों की स्थिति ठीक हो। सड़कों पर रोशनी की व्यवस्था ठीक होनी चाहिए।

2. शैक्षिक स्तर पर स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों को भी इस शिक्षा से परिचित करवाना चाहिए। इसका प्रचार समय-समय पर होते रहना चाहिए।

3. म्यूनिसिपल कमेटी अथवा कार्पोरेशन स्तर पर-इस संस्था की जिम्मेदारी बनती है कि गलियों, सड़कों और मकानों का निर्माण ठीक प्रकार से करवाया जाए। गलियों और सड़कों पर रोशनी का सही प्रबंध हो।

4. सामाजिक स्तर पर-लोगों को अपने कर्तव्य को मुख्य रखते हुए सड़कों पर गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। यदि मनुष्य सड़क पर कोई ऐसी वस्तु देखे जिससे दुर्घटना हो सकती है तो उसको पीछे कर दे या उसको वहाँ से हटा दे।

प्रश्न 24.
जख्मी या दुर्घटनाग्रस्त खिलाड़ियों के इलाज के बारे में लिखें।
उत्तर:
बहुत-सी सावधानियाँ रखते हुए और सुरक्षा का पूरा ध्यान देने पर भी खिलाड़ियों को चोटें लगती रहती हैं। कई बार खिलाड़ियों का जीवन खतरे में भी पड़ जाता है। खेल में प्राथमिक सहायता के प्रबंध बहुत जरूरी हैं। इसलिए खेल के मैदान में जख्मी खिलाड़ियों के तुरंत इलाज के लिए प्राथमिक सहायता बहुत आवश्यक है
(1) खेलों के मुकाबले के दौरान हर समय प्रत्येक टीम के डॉक्टर का मौके पर हाजिर रहना जरूरी है। खेल समाप्त होने तक डॉक्टर मैदान में मौजूद रहना चाहिए।
(2) शारीरिक शिक्षा के सभी अध्यापकों और कोचों को प्राथमिक सहायता की जानकारी होनी चाहिए।
(3) खेलों के दौरान मैदान में प्राथमिक सहायता के बॉक्स भी अवश्य रखे जाने चाहिएँ।
(4) प्राथमिक सहायता के प्रबंधकों के पास एक मेडिकल वैन अथवा कार होनी चाहिए, जिससे जख्मी खिलाड़ी को उसी समय अस्पताल पहुँचाया जा सके।
(5) खेल के दौरान हुई किसी खतरनाक दुर्घटना के लिए बीमे की योजना भी लागू की जानी चाहिए। यदि उपर्युक्त सभी बातों को अच्छी तरह ध्यान में रखा जाए और खेल के मैदान में उचित सुरक्षा-ढंगों को अपनाया जाए तो जख्मी खिलाड़ियों की गिनती बहुत हद तक कम की जा सकती है।

प्रश्न 25.
स्कूल में बच्चों को दुर्घटनाओं से बचाने हेतु सफाई की कैसी व्यवस्था होनी चाहिए?
उत्तर:
स्कूल में सफाई का प्रबंध निम्नलिखित तरीके से करना चाहिए
(1) पाखाने या शौचालय साफ रखे जाएँ और पानी के निकास का सही प्रबंध हो।
(2) पानी पीने के लिए रखी टंकी में समय-समय पर लाल दवाई डाली जाए और यहाँ की उचित सफाई की जाए।
(3) प्रयोग न किए जाने वाले स्थानों की समय-समय पर सफाई की जाए।
(4) कमरों के डैस्क, दरवाजे, खिड़कियाँ सही स्थिति में रखी जाएँ।
(5) स्कूल के खेल का मैदान समतल व साफ-सुथरा होना चाहिए।

प्रश्न 26.
खेलों में दुर्घटनाओं से सुरक्षित रहने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
खेलों में दुर्घटनाओं से सुरक्षित रहने के लिए निम्नलिखित उपाय करने चाहिएँ
(1) खेल के मैदान साफ रखे जाएँ और नैट, पोल और गोल पोस्टों में हुई कमियों को तुरंत ठीक किया जाए।
(2) खेलों का निरीक्षण खेल विशेषज्ञ अध्यापकों और कोचों द्वारा नियमानुसार किया जाए।
(3) खतरनाक खेलों; जैसे बॉक्सिंग, कबड्डी, जिम्नास्टिक्स, कराटे और तैराकी आदि के अभ्यास करते समय आवश्यक सुरक्षा प्रबंध किए जाएँ।
(4) खिलाड़ियों को आवश्यक सुरक्षा गार्ड पहनकर खेलना चाहिए।

प्रश्न 27.
लू लगने से बचने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
लू लगने से बचने के लिए निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देना चाहिए
(1) लू लगने की स्थिति में रोगी के कपड़े ढीले कर दें,
(2) रोगी को शीघ्रता से ठंडे स्थान पर ले जाना चाहिए,
(3) रोगी को होश में लाने की कोशिश करनी चाहिए,
(4) रोगी को हवादार वातावरण में रखें ताकि उसको लू से राहत मिल सके,
(5) रोगी के आस-पास लोगों को एकत्रित न होने दें,
(6) रोगी के शरीर पर बर्फ के टुकड़े रखें ताकि उसके शरीर का तापमान साधारण स्थिति में आ जाए,
(7) रोगी के शरीर पर बर्फ का लेप करते रहना चाहिए,
(8) रोगी को होश आने की स्थिति में ठंडा पानी अथवा ग्लूकोज़ देना चाहिए,
(9) रोगी को विश्राम की स्थिति में रखना चाहिए,
(10) रोगी को शीघ्रता से डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

प्रश्न 28.
रिहायशी अथवा सोने वाले कमरे को दुर्घटना-रहित करने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
रिहायशी अथवा सोने वाले कमरे को दुर्घटना-रहित करने के निम्नलिखित उपाय करने चाहिएँ.
(1) रिहायशी कमरे में रखे हथियारों को बच्चों की पहुंच से दूर रखें।
(2) सर्दियों में सुलगती अंगीठी सोते समय कमरे में न रखें।
(3) माचिस आदि के सुलगते टुकड़े इधर-उधर न फेंकें।
(4) फर्नीचर को कमरे में सही स्थान पर रखें।
(5) कमरे में रोशनी का ठीक प्रबंध करें।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
सुरक्षा शिक्षा (Safety Education) क्या है?
अथवा
बचाव शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सुरक्षा या बचाव शिक्षा से अभिप्राय है कि किसी कार्य अथवा खेल के दौरान संभावित पैदा होने वाली दुर्घटना अथवा हादसे के प्रति ज्ञान हासिल करना तथा दुर्घटना से बचने के लिए पहले प्रबंध करना। सुरक्षा शिक्षा द्वारा हम सीखते हैं कि किसी चोट अथवा दुर्घटना से आपको कैसे बचना है तथा दूसरों को किस प्रकार बचाना है। इसलिए प्रत्येक कार्य जो आप करने जा रहे हैं, उसके बारे में आपको पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए। इसी को सुरक्षा शिक्षा कहते हैं।

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता (First Aid) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी रोग के होने या चोट लगने पर किसी व्यक्ति द्वारा जो तुरंत सीमित उपचार किया जाता है, उसे प्राथमिक चिकित्सा या सहायता (First Aid) कहते हैं। इसका उद्देश्य कम-से-कम साधनों में इतनी व्यवस्था करना होता है कि चोटग्रस्त व्यक्ति को सम्यक इलाज कराने की स्थिति में लाने में लगने वाले समय में कम-से-कम नुकसान हो।

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प्रश्न 3.
“सुरक्षा में ही बचाव है।” वाक्य का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
इस वाक्य का अर्थ है कि यदि आप दूसरों का बचाव करेंगे तो आपका भी बचाव होगा। जब आप अपनी मोटरगाड़ी यातायात के नियमों के अनुसार सुरक्षित चलाते हैं तो इससे आपका भी बचाव होता है और दूसरों का भी। इसलिए हमें सुरक्षा के नियमों का तत्परता से पालन करना चाहिए।

प्रश्न 4.
यदि किसी व्यक्ति को लू लग जाए तो आप क्या करेंगे?
उत्तर:
रोगी को तुरंत छाया में ले आएँगे और उसको होश में लाने के लिए कपड़े अथवा पंखे से हवा करेंगे। यदि उसकी बेहोशी के कारण साँस रुकती हो तो कृत्रिम श्वास देंगे। उसके शरीर के बढ़े हुए तापमान को साधारण स्थिति में करने के लिए उसके सिर और रीढ़ की हड्डी पर बर्फ की थैलियाँ रखने का प्रयोग करेंगे।

प्रश्न 5.
किसी रोगी को प्राथमिक सहायता देने के कोई तीन लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) प्राथमिक सहायता द्वारा किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की बहुमूल्य जान बच जाती है।
(2) प्राथमिक सहायता देने वाले व्यक्ति में दूसरों के प्रति स्नेह व दया की भावना और तीव्र हो जाती है। उसको आत्मिक खुशी प्राप्त होती है।
(3) प्राथमिक सहायता देने वाले का समाज में सम्मान बढ़ता है।

प्रश्न 6.
बिजली के झटके (Electric Shock) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
बिजली की नंगी तार जिसमें बिजली का करंट हो उससे शरीर का छू जाना अथवा किसी धातु अथवा गीली वस्तु द्वारा संपर्क हो जाने से जोरदार झटका लगता है अथवा व्यक्ति तार के साथ चिपक जाता है। इसको बिजली का झटका अथवा धक्का लगना कहते हैं । झटका लगने से व्यक्ति का शरीर झुलस सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।

प्रश्न 7.
यदि कोई व्यक्ति बिजली की तार के साथ चिपक जाए तो क्या करना चाहिए?
उत्तर-:
(1) मेन स्विच शीघ्र बंद कर देना चाहिए,
(2) सूखी लकड़ी के साथ तार से छुड़वाने का प्रयत्न करना चाहिए,
(3) पैरों ‘ में रबड़ के जूते और हाथों में रबड़ के दस्ताने डालकर ही दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को हाथ लगाएँ।

प्रश्न 8.
प्राथमिक सहायता के कोई दो उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
(1) घायल व्यक्ति की जान बचाना,
(2) घायल की स्थिति को नियंत्रित करना।

प्रश्न 9.
दुर्घटनाओं से बचाव हेतु किन सामान्य नियमों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
(1) यातायात के नियमों का पालन करना,
(2) सुरक्षा संबंधी नियमों का पालन करना,
(3) सड़क पर चलते समय सतर्क रहना।

प्रश्न 10.
सड़क पार करते समय रखी जाने वाली कोई तीन सावधानियाँ बताएँ।
उत्तर:
(1) हमें हमेशा जेब्रा क्रॉसिंग से ही सड़क पार करनी चाहिए।
(2) सड़क पार करते समय किसी वार्तालाप में स्वयं को व्यस्त नहीं करना चाहिए।
(3) सड़क के दाएं-बाएं देखकर ही सड़क पार करनी चाहिए और दौड़कर कभी भी सड़क पार नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न 11.
खिलाड़ियों को खेल शिक्षा देने के साथ सुरक्षा शिक्षा देना क्यों अनिवार्य है?
उत्तर:
खेल कला सिखाने के साथ-साथ खिलाड़ियों को सुरक्षा शिक्षा देना भी बहुत जरूरी है। खिलाड़ियों, अधिकारियों तथा कोचों की लापरवाही के कारण अधिकतर खेलते समय घातक हादसे हो जाते हैं जिससे खिलाड़ी तथा दर्शक गंभीर रूप से घायल हो जाते हैं। इसलिए प्रत्येक खेल से संबंधित बचाव प्रबंध करके खेल करवानी चाहिए। खिलाड़ियों को स्वयं के बचाव संबंधी उचित शिक्षा देनी चाहिए।

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प्रश्न 12.
खेलने से पहले शरीर गर्म करना क्या चोटों से बचाता है?
उत्तर:
खेलने से पहले अच्छी तरह शरीर गर्म करना चोटों से बचाता है। शरीर को गर्म करने से शरीर के सभी अंग पूरी तरह क्रियाशील हो जाते हैं। माँसपेशियों में लचक आ जाती है। वे शरीर पर पड़ने वाले अतिरिक्त भार को सहन करने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती हैं। तंतु, नाड़ी तथा माँसपेशियों में तालमेल बढ़ने से शरीर खेल के दौरान पैदा हो रहे प्रत्येक प्रकार के खतरे से सचेत हो जाता है तथा शरीर चोटों से बचा रहता है।

प्रश्न 13.
क्या थके हुए खिलाड़ी को खेल के दौरान बदल लेना चाहिए?
उत्तर:
अच्छा खिलाड़ी यदि खेलते हुए बुरी तरह थक जाता है तो उसे किसी दूसरे खिलाड़ी से बदल लेना चाहिए।खेलते समय जीतने की भावना खिलाड़ी में बेकाबू होती है। थका हुआ खिलाड़ी अपने शरीर का अधिक जोर लगाकर जीतने की कोशिश करता हुआ संकट में फंस सकता है। थकावट की हालत में खेलते हुए कई बार खेल के मैदान में मौत के हादसे भी हो सकते हैं। इसलिए थके हुए खिलाड़ी को अन्य खिलाड़ी से बदल लेना चाहिए।

प्रश्न 14.
प्राथमिक सहायता बॉक्स में कौन-कौन-सी चीजें होनी चाहिएँ?
उत्तर:
(1) मिली-जुली चिपकने वाली पट्टियाँ,
(2) पतला कागज,
(3) आवश्यक दवाइयाँ,
(4) रुई का बंडल,
(5) कैंची,
(6) सेफ्टी पिन,
(7) तैयार की हुई आकार के अनुसार कीटाणुरहित पट्टियाँ,
(8) कमठियों का एक सैट,
(9) चिपकने वाली पलस्तर,
(10) मरहम पट्टियाँ,
(11) साल वोलाटाइल,
(12) डैटॉल आदि।

प्रश्न 15.
किन कारणों से श्वास क्रिया में रुकावट आ सकती है?
उत्तर:
(1) पानी में डूब जाने से,
(2) सड़क अथवा घरेलू दुर्घटना होने से,
(3) बिजली के करंट लगने से,
(4) ज़हरीली गैसों के सूंघने से,
(5) गले में किसी चीज के फँस जाने अथवा तंतु सूजने से श्वास क्रिया में रुकावट आ सकती है।

प्रश्न 16.
प्राथमिक सहायक कौन होता है?
उत्तर:
घायल व्यक्ति को गंभीर स्थिति में जाने से रोकने के लिए तथा उसका जीवन बचाने के लिए प्राथमिक सहायता देने में निपुण व्यक्ति को प्राथमिक सहायक कहा जाता है।

प्रश्न 17.
खेल के मैदान में खेलते समय चोट लगने के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर;
(1) खेलों का घटिया सामान तथा घटिया निगरानी।
(2) ऊँचे-नीचे या असमतल खेल के मैदान।
(3) बचाव संबंधी उचित सामान की कमी।
(4) खिलाड़ियों द्वारा लापरवाही तथा बदले की भावना से खेलना।

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प्रश्न 18.
“इलाज से परहेज़ बेहतर है।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
“इलाज से परहेज़ बेहतर है।” यह बात बिल्कुल ठीक है। परहेज़ करने में कोई मूल्य नहीं लगता तथा न शरीर को कष्ट सहना पड़ता है। इलाज करवाने से खर्चा भी होता है, शरीर कष्ट भी सहता है। इलाज के पश्चात् भी शरीर पूरी तरह ठीक हो अथवा न हो, कुछ कहा नहीं जा सकता। गलत खाने से, गलत ढंग से खेलने से, खराब हालत में खेलने से तथा खराब वस्तु के प्रयोग करने से परहेज करना बहुत अच्छा होता है।

प्रश्न 19.
क्या खेल मैदान के आस-पास दर्शकों की भीड़ चोट का कारण बन सकती है?
उत्तर:
दर्शकों की बहुत भीड़ खेल के मैदान में चोट का कारण बन सकती है। कई बार खेल के मैदान तथा दर्शकों के लिए बाड़ अथवा दीवार खेल प्रबंधकों द्वारा नहीं बनाई होती। दर्शक खेल के मैदान में आ जाते हैं। बॉल, जैवलिन, डिस्कस अथवा हैमर जैसे खेल उपकरण किसी दर्शक को ज़ख्मी कर सकते हैं। कई बार दर्शक अपनी टीम के पक्ष में भावुक होकर दूसरे खिलाड़ियों तथा विरोधी सहायकों से लड़ पड़ते हैं तथा एक-दूसरे को घातक चोटें लगवा बैठते हैं । इसलिए दर्शकों को प्रत्येक हालत में खेल के मैदान से आवश्यक दूरी पर रखना चाहिए।

प्रश्न 20.
कंट्यूशन/भीतरी घाव से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कंट्यूशन माँसपेशी की चोट होती है। यदि एक प्रत्यक्ष मुक्का या कोई खेल उपकरण शरीर को लग जाए तो कंट्यूशन का कारण बन सकता है। मुक्केबाजी, कबड्डी और कुश्ती आदि में कंट्यूशन होना स्वाभाविक है। कंट्यूशन में माँसपेशियों में रक्त कोशिकाएँ टूट जाती हैं और कभी-कभी माँसपेशियों से रक्त भी बहने लगता है।

प्रश्न 21.
कृत्रिम श्वास (Artificial Respiration) देने से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब किसी कारण किसी व्यक्ति की प्राकृतिक श्वास क्रिया में रुकावट आ जाए और श्वास लेने में तकलीफ हो तो उसके फेफड़ों में कृत्रिम ढंग से ऑक्सीजन के प्रवेश करवाने की क्रिया को कृत्रिम श्वास देना कहा जाता है। कृत्रिम श्वास देने से अभिप्राय फेफड़ों में कृत्रिम विधि द्वारा हवा का प्रवेश करवाना और बाहर निकालना है ताकि रोगी की जान बच सके।

प्रश्न 22.
कृत्रिम श्वास देने के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) कृत्रिम श्वास देने की क्रिया द्वारा श्वास रुके व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है।
(2) कृत्रिम श्वास द्वारा रोगी को उसकी बेहोशी की हालत में से शीघ्र निकाला जा सकता है।

प्रश्न 23.
जोड़ उतर जाने (Dislocation) से क्या अभिप्राय है?
अथवा
जोड़ उतरना क्या है?
उत्तर:
हड्डी का अपने जोड़ वाले स्थान से हट जाना या खिसक जाना, जोड़ उतरना कहलाता है। कुछ ऐसे खेल होते हैं जिनमें हड्डी का उतरना स्वाभाविक है। प्रायः कंधे, कूल्हे तथा कलाई आदि की हड्डी अधिक उतरती है।

प्रश्न 24.
फ्रैक्चर का क्या अर्थ है?
अथवा
हड्डी का टूटना क्या है?
उत्तर:
किसी हड्डी का टूटना, फिसलना अथवा दरार पड़ जाना टूट (Fracture) कहलाता है। हड्डी पर जब दुःखदायी स्थिति में दबाव पड़ता है तो हड्डी से सम्बन्धित मांसपेशियाँ उस दबाव को सहन नहीं कर सकतीं, जिस कारण हड्डी फिसल अथवा टूट जाती है। अतः फ्रैक्चर का अर्थ है-हड्डी का टूटना या दरार पड़ जाना।

प्रश्न 25.
जटिल फ्रैक्चर क्या होता है? गुंझलदार टूट (Complicated Fracture) क्या है?
उत्तर:
जटिल फ्रैक्चर से कई बार हड्डी की टूट के साथ जोड़ भी हिल जाते हैं। कई बार हड्डी टूटकर शरीर के किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचा देती है; जैसे रीढ़ की हड्डी की टूट मेरुरज्जु को, सिर की हड्डी की टूट दिमाग को और पसलियों की हड्डियों की टूट दिल, फेफड़े और जिगर को नुकसान पहुँचाती हैं। ऐसी स्थिति में टूट काफी जटिल टूट बन जाती है।

प्रश्न 26.
दबा हुआ फ्रैक्चर (Depressed Fracture) क्या होता है? ।
उत्तर:
सामान्यतया यह फ्रैक्चर सिर की हड्डियों में होता है। जब खोपड़ी के ऊपरी भाग या आस-पास से हड्डी टूट जाने पर अंदर फंस जाती है तो ऐसा फ्रैक्चर दबा हुआ फ्रैक्चर कहलाता है।

प्रश्न 27.
जोड़ों का विस्थापन (Dislocation) कितने प्रकार का होता है? उत्तर-जोड़ों का विस्थापन तीन प्रकार का होता है
(1) कूल्हे का विस्थापन,
(2) कन्धे का विस्थापन,
(3) निचले जबड़े का विस्थापन।

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प्रश्न 28.
प्राथमिक सहायता के उपकरण (First Aid Equipments) कैसे होने चाहिएँ?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता के बॉक्स में जो उपकरण या सामग्री हो वह जो काम किया जाना है उसी के अनुकूल होनी चाहिए। उसका आधार स्वास्थ्य के नियमों तथा समय की आवश्यकतानुसार ही होना चाहिए। प्राथमिक सहायता के बॉक्स में सभी आवश्यक उपकरण होने चाहिएँ।

HBSE 9th Class Physical Education सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

प्रश्न 1.
वह शिक्षा जो हमें दुर्घटनाओं आदि से बचाती है, क्या कहलाती है?
उत्तर:
वह शिक्षा जो हमें दुर्घटनाओं आदि से बचाती है, सुरक्षा शिक्षा कहलाती है।

प्रश्न 2.
आज के मशीनी युग में किस प्रकार की शिक्षा की अधिक आवश्यकता है?
उत्तर:
आज के मशीनी युग में सुरक्षा शिक्षा की अधिक आवश्यकता है।

प्रश्न 3.
सामान्यतया सड़कों पर बच्चों के साथ दुर्घटनाएँ क्यों होती हैं?
उत्तर:
क्योंकि बच्चे सड़कों पर चलने संबंधी यातायात के नियमों का पालन नहीं करते।

प्रश्न 4.
चौक पार करते समय किस बात की ओर ध्यान देना चाहिए?
उत्तर:
चौक पार करते समय ट्रैफिक पुलिसकर्मी के इशारे की ओर ध्यान देना चाहिए।

प्रश्न 5.
रसोईघर में दुर्घटना के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) फर्श का चिकना होना,
(2) जल्दी आग पकड़ने वाले वस्त्र पहनना।

प्रश्न 6.
घायल या मरीज़ को तुरंत दी जाने वाली सहायता क्या कहलाती है?
उत्तर:
घायल या मरीज़ को तुरंत दी जाने वाली सहायता प्राथमिक सहायता कहलाती है।

प्रश्न 7.
रसोईघर या स्नानघर का फर्श किस प्रकार का होना चाहिए?
उत्तर:
रसोईघर या स्नानघर का फर्श चिकनाहट-रहित तथा समतल होना चाहिए।

प्रश्न 8.
प्राथमिक सहायता मेंABC का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
A= Airways,
B = Breathing,
C = Compression ,

प्रश्न 9.
घाव कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
घाव चार प्रकार के होते हैं
(1) कट जाने का घाव,
(2) फटा हुआ घाव,
(3) छिपा हुआ घाव,
(4) कुचला हुआ घाव।

प्रश्न 10.
प्राथमिक चिकित्सा की प्रमुख विशेषता या गुण क्या है?
उत्तर;
घायल की जान बचाना।

प्रश्न 11.
जेब्रा क्रॉसिंग (Zebra Crossing) की लाइनें कैसी होती हैं?
उत्तर:
जेब्रा क्रॉसिंग में क्षैतिज आकार की काली और सफेद लाइनें लगी होती हैं; जैसा कि चित्र में दिया गया है

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प्रश्न 12.
हमें सड़क पार करते समय किसका प्रयोग करना चाहिए?
उत्तर:
हमें सड़क पार करते समय जेब्रा क्रॉसिंग का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 13.
N.C.C. का क्या अर्थ है?
उत्तर:
N.C.C. का अर्थ है-National Cadet Corps.

प्रश्न 14.
घर पर दुर्घटनाओं से बचाव हेतु दो उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) प्रकाश का उचित प्रबंध हो,
(2) घर में बिजली की नंगी तारें न हों।

प्रश्न 15.

सीढ़ियों पर चढ़ते समय किन दो बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
(1) सीढ़ियों की एक-एक पौड़ी चढ़नी चाहिए,
(2) दौड़कर सीढ़ियाँ न चढ़ें।

प्रश्न 16.
किस प्रकार की मोच में दर्द असहनीय हो जाता है?
उत्तर:
पूर्ण मोच में दर्द असहनीय हो जाता है।

प्रश्न 17.
रगड़ किस अंग की चोट है?
उत्तर:
रगड़ त्वचा की अंग की चोट है।

प्रश्न 18.
कंट्यूशन किस अंग की चोट है?
उत्तर:
कंट्यूशन माँसपेशियों की चोट है।

प्रश्न 19.
खिंचाव कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
खिंचाव माँसपेशियों की चोट है। यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है
(1) साधारण खिंचाव,
(2) असाधारण खिंचाव।

प्रश्न 20.
किसी जोड़ के सन्धि-स्थल (Ligaments) के फट जाने या खिंच जाने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
किसी जोड़ के सन्धि-स्थल (Ligaments) के फट जाने या खिंच जाने को मोच कहते हैं।

प्रश्न 21.
साधारण अथवा बन्द फ्रैक्चर (Simple or Closed Fracture) क्या होता है?
उत्तर:
जब हड्डी टूट जाए, परन्तु घाव न दिखाई दे, तो वह बंद फ्रैक्चर होता है।

प्रश्न 22.
किस प्रकार की टूट अधिक खतरनाक होती है?
उत्तर:
जटिल टूट अधिक खतरनाक होती है।

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प्रश्न 23.
मुक्केबाजी में प्राय: कैसी चोट लगती है?
उत्तर:
मुक्केबाजी में कंट्यूशन या भीतरी घाव चोट लगती है।

प्रश्न 24.
कच्ची अस्थि-भंग प्रायः किन्हें होता है? उत्तर-कच्ची अस्थि-भंग प्रायः बच्चों को होता है।

प्रश्न 25.
ऑस्टिओपोरोसिस (Oesteoporosis) के कारण किस प्रकार की चोट लग सकती है?
उत्तर:
ऑस्टिओपोरोसिस (Oesteoporosis) के कारण फ्रैक्चर हो सकता है।

प्रश्न 26.
मूर्च्छित रोगी या घायल व्यक्ति को होश में लाने के लिए किस उपाय का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
मूर्च्छित रोगी या घायल व्यक्ति को होश में लाने के लिए कृत्रिम श्वास का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 27.
चोट के तुरंत बाद खिलाड़ी को कौन-सा टीका लगवाना चाहिए?
उत्तर:
चोट के तुरंत बाद खिलाड़ी को एंटी-टैटनस का टीका लगवाना चाहिए।

प्रश्न 28.
खेल चोटों का कोई एक कारण लिखें।
उत्तर:
शरीर को बिना गर्माए अभ्यास या प्रतियोगिता में भाग लेना।

प्रश्न 29.
मोच किस अंग की चोट है?
उत्तर:
मोच लिगामेंट की चोट है।

प्रश्न 30.
पागल कुत्ते के काटने पर घाव को सर्वप्रथम किससे धोना चाहिए?
उत्तर:
पागल कुत्ते के काटने पर घाव को सर्वप्रथम साफ पानी से धोना चाहिए।

प्रश्न 31.
मोच क्या है ?
उत्तर:
किसी जोड़ के संधि-स्थल के फट जाने को मोच कहते हैं।

प्रश्न 32.
खिलाड़ी को प्रशिक्षण व प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को क्या करना चाहिए?
उत्तर:
खिलाड़ी को प्रशिक्षण व प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को भली-भाँति गर्मा लेना चाहिए।

बहुविकल्पीय प्रश्न [Multiple Choice Questions]

प्रश्न 1.
बत्ती वाला चौक कब पार करना चाहिए?
(A) हरी बत्ती होने पर
(B) लाल बत्ती होने पर
(C) पीली बत्ती होने पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हरी बत्ती होने पर

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 8 सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा

प्रश्न 2.
घर में पक्की सीढ़ी बनाते समय ध्यान रखना चाहिए
(A) सीढ़ी की पटरियों की समान दूरी का ।
(B) सीढ़ियों में उचित रोशनी का
(C) सीढ़ी के दोनों ओर सुरक्षा पाइप लगवाने का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 3.
सड़क पर पैदल चलने के लिए कौन-सा प्रबंध होना चाहिए?
(A) रोशनी का प्रबंध
(B) फुटपाथ का प्रबंध
(C) ट्रैफिक पुलिस का प्रबंध
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) फुटपाथ का प्रबंध

प्रश्न 4.
यातायात को ठीक ढंग से चलाने के लिए चौराहों पर किसका प्रबंध होना चाहिए?
(A) सिग्नल लाइटों का
(B) पुलिस का
(C) आपातकालीन सेवाओं का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सिग्नल लाइटों का

प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायता बॉक्स में कौन-कौन-से उपकरण होने चाहिएँ?
(A) तैयार की हुई आकार के अनुसार कीटाणुरहित पट्टियाँ
(B) आवश्यक दवाइयाँ व रुई का बंडल
(C) चिपकने वाली पलस्तर व मरहम पट्टियाँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
प्राथमिक सहायता के नियम हैं
(A) घायल की सबसे बड़ी चोट की ओर अधिक ध्यान देना
(B) घायल की स्थिति को खराब होने से बचाना
(C) रोगी अथवा घायल को विश्राम की स्थिति में रखना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
सड़कों पर दुर्घटनाओं से बचाव के लिए सरकार को कौन-सी शिक्षा का प्रचार करना चाहिए?
(A) सर्व शिक्षा
(B) शारीरिक शिक्षा
(C) सुरक्षा शिक्षा
(D) प्राथमिक शिक्षा
उत्तर:
(C) सुरक्षा शिक्षा

प्रश्न 8.
सूर्य की तेज धूप में शरीर का गर्मी के प्रभाव में आ जाना क्या कहलाता है?
(A) जलन
(B) लू लगना
(C) आग लगना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) लू लगना

प्रश्न 9.
शरीर की चेतना के खो जाने को क्या कहते हैं?
(A) चेतनता
(B) बेहोशी
(C) तनाव
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बेहोशी

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प्रश्न 10.
प्राथमिक सहायक होना चाहिए-
(A) बुद्धिमान व फुर्तीला
(B) सूझवान व शांत स्वभाव वाला
(C) सहानुभूति वाला एवं विनम्र
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 11.
दुर्घटनाओं के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारण है
(A) जल्दबाजी एवं लापरवाही
(B) यातायात के नियमों का पालन न करना
(C) शराब या अन्य नशीले पदार्थ का सेवन करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
“सुरक्षा या एहतियात इलाज से बेहतर है।” यह कथन है
(A) हरबर्ट स्पेंसर का
(B) जॉनसन का
(C) एडवर्ड कोक का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) एडवर्ड कोक का

प्रश्न 13.
किन कारणों से श्वास क्रिया में रुकावट आ सकती है?
(A) पानी में डूब जाने से
(B) जहरीली गैसों के सूंघने से
(C) बिजली के करंट लगने से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 14.
कंट्यूशन किस अंग की चोट है?
(A) माँसपेशियों की
(B) हड्डियों की
(C) त्वचा की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) माँसपेशियों की

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प्रश्न 15.
खेलों में लगने वाली सामान्य चोट है
(A) रगड़
(B) मोच
(C) खिंचाव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा Summary

सुरक्षा शिक्षा तथा प्राथमिक शिक्षा परिचय

सुरक्षा शिक्षा (Safety Education):
आज के युग में व्यक्तियों को सुरक्षा शिक्षा की बहुत आवश्यकता है, क्योंकि सुरक्षा शिक्षा से हमें अनेक महत्त्वपूर्ण एवं आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। इससे हम काफी सीमा तक होने वाली दुर्घटनाओं पर नियंत्रण पा सकते हैं। इस शिक्षा से हमें घरेलू एवं यातायात संबंधी अनेक महत्त्वपूर्ण नियमों की जानकारियाँ होती हैं जिनको अपनाकर हम दुर्घटनाओं से अपना बचाव कर सकते हैं। एक प्रसिद्ध कहावत है-“सावधानी हटी-दुर्घटना घटी।” सुरक्षा शिक्षा में इसी कहावत को व्यापक रूप से समझाया जाता है। प्रायः देखा गया है कि सड़क पर अधिकतर दुर्घटनाएँ असावधानी के कारण होती हैं। यदि सावधान व सतर्क रहा जाए तो ऐसी दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। यह शिक्षा हमें अपने जीवन के प्रति सजग करती है और हमें अनेक नियमों की जानकारी देकर हमारे जीवन को सुरक्षित करने में सहायता करती है। यदि हमें सुरक्षा संबंधी नियमों का पता होगा तभी हम दुर्घटनाओं से स्वयं का बचाव कर पाएंगे।

प्राथमिक सहायता (First Aid):
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को ओर अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है। इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि घायल अथवा रोगी व्यक्ति को तुरन्त प्राथमिक सहायता मिल जाए तो उसका जीवन बचाया जा सकता है। कुछ चोटें तो इस प्रकार की हैं, जो खेल के मैदान में बहुत होती हैं, जिनको मौके पर प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, यदि हमें प्राथमिक सहायता सम्बन्धी उचित जानकारी हो। इस प्रकार रोगी की स्थिति बिगड़ने से बचाने और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्राथमिक सहायता की बहुत आवश्यकता होती है। इसलिए प्राथमिक सहायता की आज के समय में बहुत आवश्यकता हो गई है। इसका ज्ञान प्रत्येक नागरिक को प्राप्त करना आवश्यक होना चाहिए।

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HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 7 मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव

Haryana State Board HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 7 मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Physical Education Solutions Chapter 7 मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव

HBSE 9th Class Physical Education मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
नशे (Drugs) क्या हैं? नशा करने के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
नशा या ड्रग्स (Drugs):
नशा या ड्रग्स एक ऐसा पदार्थ है जिसके सेवन के बाद व्यक्ति अपने दिमाग की चेतनता खो बैठता है। माँसपेशियाँ सुन्न होने के कारण व्यक्ति को दर्द का अहसास नहीं होता। वह दिमाग और शरीर से अपना नियंत्रण खो बैठता है। व्यक्ति को कोई सुध नहीं रहती, जिसके कारण वह स्वयं, अपने परिवार तथा समाज के लोगों को नुकसान पहुंचाता है।

नशा करने के कारण (Causes of Drugs): नशा करने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) मानसिक दबाव के कारण; जैसे पढ़ाई का बोझ, किसी समस्या का सामना न कर पाने की स्थिति में कई बार युवा डिप्रेशन में चले जाते हैं, ऐसी स्थिति में वे नशे का सहारा लेते हैं।

(2) कई बार माता-पिता या समाज द्वारा विद्यार्थी या खिलाड़ी को अनदेखा किया जाता है। बच्चे या खिलाड़ी को लगता है कि उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा, इसलिए वह दूसरों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ऐसे गलत तरीकों का प्रयोग करते हैं।

(3) कुछ अभिभावकों द्वारा बच्चे को समय नहीं दिया जाता या बच्चा घर में अधिक समय अकेला ही बिताता है। इस एकाकीपन को दूर करने के लिए वह नशे का सहारा लेता है।

(4) बेरोज़गारी या बेगारी के कारण व्यक्ति द्वारा नशा किया जाता है। कई बार जब किसी अधिक पढ़े-लिखे नौजवान या खिलाड़ी को समय पर नौकरी नहीं मिलती तो वह निराशा व तनाव से ग्रस्त हो जाता है और अपने तनाव को घटाने के लिए नशों का प्रयोग करने लग जाता है। इससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

(5) युवा वर्ग नशे के दुष्प्रभावों की जानकारी के अभाव के कारण भी नशे का आदी हो जाता है।

(6) युवा लड़के और लड़कियाँ मौज-मस्ती के लिए भी नशीली दवाइयों का प्रयोग करते हैं। धीरे-धीरे वे इन नशीली दवाइयों के आदी होने लगते हैं।

(7) गलत संगत के कारण भी व्यक्ति या नौजवान नशे के आदी हो जाते हैं।

(8) घर में किसी सदस्य द्वारा किसी नशे का प्रयोग किया जाता है तो बच्चे में भी उसको जानने की इच्छा पैदा होती है। इसी इच्छा के कारण बच्चे नशे का सेवन करते हैं और धीरे-धीरे वे नशे की जकड़ में आ जाते हैं।

प्रश्न 2.
नशीली वस्तुओं या पदार्थों का खिलाड़ी की खेल निपुणता या कुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है? वर्णन करें।
अथवा
नशीले पदार्थों के प्रयोग से खिलाड़ियों तथा खेल पर क्या-क्या बुरे प्रभाव पड़ते हैं?
अथवा
मादक पदार्थों का खिलाड़ियों के खेल पर क्या-क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
नशीली वस्तुओं के खिलाड़ी की खेल निपुणता या कुशलता पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

1. पाचन क्रिया पर प्रभाव (Effect on Digestion Process):
नशीली वस्तुओं के प्रयोग के कारण पाचन क्रिया पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है क्योंकि नशीले पदार्थों में तेजाबी अंश अधिक होते हैं। इन अंशों के कारण आमाशय के कार्य करने की शक्ति कम हो जाती है तथा पेट के रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

2. सोचने की शक्ति पर प्रभाव (Effect on Thinking Power):
नशीली वस्तुओं का प्रयोग करने से खिलाड़ी की विचार-शक्ति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। वह अच्छी तरह बोलने की अपेक्षा तुतलाता है। वह संतुलित नहीं रह पाता। नशा-ग्रस्त कोई खिलाड़ी खेल में आने वाली अच्छी बातों के विषय में नहीं सोच पाता तथा न ही उस स्थिति से लाभ उठा पाता है।

3. तालमेल तथा फूर्ति की कमी (Loss of Co-ordination and Alertness):
अच्छे खेल के लिए आवश्यक है कि खिलाड़ी में तालमेल और फूर्ति हो। वह खेल के दौरान फुर्तीला तथा चुस्ती वाला हो, परंतु नशीले पदार्थों के सेवन से कोई भी अपनी फूर्ति एवं चुस्ती खो देता है।

4. एकाग्रता की कमी (Loss of Concentration):
नशे से ग्रस्त कोई भी खिलाड़ी एकाग्रता खो देता है। वह खेल के समय ऐसी गलतियाँ करता है जिसके परिणामस्वरूप उसकी टीम को हार का मुँह देखना पड़ता है।

5. लापरवाह होना (Carelessness):
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी लापरवाह तथा बेफिक्र होता है। उसे अपनी ताकत का अंदाजा नहीं होता। वह अपनी समझ की अपेक्षा अधिक जोश से काम लेता है। परिणामस्वरूप जोश व लापरवाही के कारण वह चोट खा बैठता है। ऐसा खिलाड़ी हमेशा के लिए खेल से बाहर हो सकता है। उसको उम्र भर पछताने के सिवाय कुछ भी प्राप्त नहीं होता।

6. खेल का मैदान लड़ाई का अखाड़ा बनना (Playground becomes Battlefield):
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी अपने मन के संतुलन को नियंत्रण में नहीं रख सकता। वह अपनी बुद्धि का प्रयोग किए बिना व्यर्थ में बहस करता है। ऐसा व्यक्ति दलील से काम नहीं लेता, जिसके फलस्वरूप खेल के मैदान में अच्छे खेल की जगह लड़ाई शुरू हो जाती है।

7.खेल-भावना का अभाव (Lack of Sportsmanship):
नशीले पदार्थों का प्रयोग करने वाले खिलाड़ी में खेल की भावना का अभाव हो जाता है। नशे से ग्रस्त खिलाड़ी की स्थिति लगभग बेहोशी की हालत जैसी होती है जिसके फलस्वरूप उसका मानसिक संतुलन ठीक नहीं रहता। इस प्रकार उसमें अच्छे खिलाड़ी होने की भावना समाप्त हो जाती है और खेल कुशलता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

8. नियमों की उल्लंघना (Breaking of Rules):
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी खेल के समय अपनी सफाई ही पेश करता है, दूसरे की नहीं सुनता। वह नियमों का पालन करने की अपेक्षा उल्लंघन करता है। अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी की ओर से नशीली वस्तु खाकर खेलने की मनाही है। यदि खेलते समय कोई खिलाड़ी नशे की हालत में पकड़ा जाए तो उसका जीता हुआ अवॉर्ड वापिस ले लिया जाता है। अतः प्रत्येक खिलाड़ी के लिए यह जरूरी है कि वह नशे से दूर रहकर अपनी प्राकृतिक खेल निपुणता को सक्षम बनाए। नशे के स्थान पर कठिन परिश्रम के सहारे अच्छे खेल का प्रदर्शन करके वह अपने देश का नाम खेल जगत् में ऊँचा करे।

प्रश्न 3.
तम्बाकू के सेवन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए। अथवा धूम्रपान (Smoking) का व्यक्ति व समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है? वर्णन करें।
अथवा
तम्बाकू का हमारे शरीर पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है? वर्णन करें।
उत्तर:
तम्बाकू किसी ज़हर से कम नहीं होता, परंतु दुःख की बात यह है कि लोग जानते हुए भी इसका प्रयोग निरंतर कर रहे हैं। वर्तमान में तम्बाकू या सिगरेट पीने की आदत नौजवानों में अधिक बढ़ गई है जो चिंता का विषय है। तम्बाकू में निकोटिन नामक हानिकारक पदार्थ होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। व्यक्तियों द्वारा सिगरेट, बीड़ी, पान, गुटखा और जर्दे के रूप में तम्बाकू का प्रयोग किया जाता है। हर साल लाखों व्यक्तियों की मौत तम्बाकू के प्रयोग से होती है, जिनमें से एक-तिहाई मौतें हमारे देश में होती हैं। तम्बाकू या धूम्रपान के व्यक्ति व समाज पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं

1. हृदय पर प्रभाव (Effect on Heart):
हृदय मनुष्य के शरीर का सबसे महत्त्वपूर्ण भाग है। तम्बाकू का सीधा प्रभाव हृदय पर पड़ता है। तम्बाकू में निकोटिन (Nicotine) होती है जो रक्त-वाहिनियों में कई प्रकार की हानि पैदा कर देती है। इससे हृदय को अपना काम ठीक प्रकार से करने में मुश्किल आती है, जिस कारण रक्त के दबाव में बढ़ोतरी हो जाती है।

2. कैंसर का मुख्य कारण (Main Cause of Cancer):
तम्बाकू पीने से कैंसर होने का भय रहता है। सामान्यतया यह देखने में आया है कि तम्बाकू न पीने वालों के मुकाबले तम्बाकू पीने वालों में कैंसर ज्यादा होता है। गले, पेट और आहारनली में कैंसर का मुख्य कारण तम्बाकू ही होता है।

3. खेल निपुणता पर प्रभाव (Effect on Sports Performance):
तम्बाकू पीने से खिलाड़ियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। तम्बाकू पीने का सीधा प्रभाव नाड़ी संस्थान पर पड़ता है। खेल में निपुणता प्राप्त करने के लिए खिलाड़ी का नाड़ी संस्थान मजबूत होना बहुत जरूरी है। अगर खिलाड़ी तम्बाकू का सेवन करता है तो वह कभी भी खेल में निपुणता नहीं ला सकता। तम्बाकू पीने से हृदय कमजोर होता है और त्वचा, कैंसर की बीमारियाँ हो जाती हैं। इस तरह खिलाड़ी तम्बाकू पीकर अपने खेल के स्तर को नीचे गिरा लेता है।

4. श्वसन संस्थान पर प्रभाव (Effect on Respiratory System):
तम्बाकू के सेवन से शरीर की कोमल झिल्लियों में सूजन आ जाती है, जिसके फलस्वरूप लगातार खाँसी आने लगती है। धूम्रपान क्षयरोग को बढ़ाता है। धूम्रपान के कारण बोलने वाले अंग एवं हलक (Larynx) संक्रमित हो जाते हैं। धूम्रपान करने वालों को धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा फेफड़ों का कैंसर प्रायः अधिक होता है। अधिक धूम्रपान करने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी जाती है; जैसे ‘सिगरेट से कैंसर होता है’ या ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।’ लेकिन धूम्रपान करने वाले इस प्रकार की चेतावनियों की परवाह नहीं करते। इसी कारण वे कैंसर जैसी भयानक बीमारी को आमंत्रित करते हैं।

5. रक्त-संचार संस्थान पर प्रभाव (Effect on Circulatory System):
एक सिगरेट में अनेक हानिकारक पदार्थ होते हैं जो रक्त में मिलकर हृदय (Heart) की प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न करते हैं। शरीर का तापमान कम हो जाता है। रक्त की नाड़ी का आकार ‘भी कम हो जाता है तथा उनमें रक्त के संचार में भी कमी आ जाती है।

6. पाचन संस्थान पर प्रभाव (Effect on Digestive System):
धूम्रपान करने से अम्लीयता (Acidity) बढ़ जाती है। अम्लता के कारण आमाशय में अल्सर (Ulcer) भी हो सकता है। धूम्रपान से पेट में कैंसर भी हो जाता है।

7. स्नायु संस्थान पर प्रभाव (Effect on Nervous System):
तंत्रिकाओं पर भी धूम्रपान का बुरा प्रभाव होता है। ये प्रायः निष्क्रिय हो जाती हैं। धूम्रपान से मस्तिष्क की कोशिकाएँ खराब होने लगती हैं। इससे माँसपेशियों को लकवा (Paralysis) हो जाता है। माँसपेशी मुड़ने (Convulsion) भी लगती है। धूम्रपान करने से केंद्रीय स्नायु संस्थान में गड्ढा-सा बन जाता है। धूम्रपान करने से उत्तेजना क्षण-भर के लिए होती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ही यह प्रक्रिया ढीली हो जाती है। जो व्यक्ति लगातार धूम्रपान करते हैं उनकी स्मरण-शक्ति (Memory Power) बहुत कम हो जाती है। धूम्रपान से नसें कमजोर हो जाती हैं और फिर नींद न आने जैसी तकलीफें घेर लेती हैं।

8. जीवन अवधि पर प्रभाव (Effect on Longevity):
सिगरेट पीने से व्यक्ति की जीवन अवधि कम होती जाती है। अतः यह कहा जा सकता है कि सिगरेट पीने या अन्य साधनों द्वारा धूम्रपान करने से व्यक्ति की उम्र पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

9. परिवार व समाज पर प्रभाव (Effect on Family and Society):
धूम्रपान का दुष्प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं होता, बल्कि उसके परिवार व समाज पर भी पड़ता है। धूम्रपान की आदत अन्य बुरी आदतों को भी जन्म देती है। धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के परिवारों के सदस्यों व समाज के अन्य व्यक्तियों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
एल्कोहल (Alcohol) क्या है? इसके दुष्प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
मद्यपान के शारीरिक संस्थानों व स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
शराब के हमारे शरीर पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एल्कोहल या मद्यपान (Alcohol):
एल्कोहल या मद्यपान हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। यह एक ऐसा पेय पदार्थ है जिसको पीने से व्यक्ति के शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है। इसमें ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं जिनकी बनावट एक-सी होती है। यह भिन्न-भिन्न अम्लों से मिलकर एस्टर्स (Esters) नामक पदार्थ बनाती है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। इसे इथॉइल, एल्कोहल, शराब व एथानॉल आदि नामों से भी जाना जाता है। जॉनसन के अनुसार, “मद्यपान वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति शराब लेने की मात्रा पर नियंत्रण खो बैठता है जिससे कि वह पीना आरंभ करने के पश्चात् उसे बंद करने में सदैव असमर्थ रहता है।”

एल्कोहल यां मद्यपान के प्रभाव (Effects of Alcohol):
इसमें कोई संदेह नहीं है कि शराब न केवल व्यक्ति पर बुरा प्रभाव डालती है, अपितु यह परिवार व समाज पर भी बुरा प्रभाव डालती है। इसके निम्नलिखित दुष्प्रभाव पड़ते हैं

1. व्यक्ति पर प्रभाव (Effects on Individual):
एल्कोहल (शराब) पीने से व्यक्ति के स्वास्थ्य व शारीरिक संस्थानों पर अनेक दुष्प्रभाव पड़ते हैं, जिनका वर्णन निम्नलिखित है
(i) स्नायु संस्थान पर प्रभाव (Effect on Nervous System):
प्रतिदिन अधिक एल्कोहल का सेवन करने से निश्चित रूप से व्यक्ति के स्नायु संस्थान पर बुरा प्रभाव पड़ता है। व्यक्ति का मस्तिष्क और तंत्रिकाएँ कमजोर हो जाती हैं। इन तंत्रिकाओं का माँसपेशियों पर नियंत्रण आमतौर पर समाप्त हो जाता है। ध्यान को केंद्रित करने की शक्ति में गिरावट आ जाती है। स्नायु तथा माँसपेशियों के संतुलन में भी कमी आ जाती है।

(ii) पाचन संस्थान पर प्रभाव (Effect on Digestive System):
पाचन संस्थान के कोमल अंगों पर एल्कोहल का बुरा प्रभाव पड़ता है। पाचक अंगों की झिल्ली (Membrane) मोटी हो जाती है। पाचक रस, जो पाचन क्रिया में सहायक होते हैं, कम मात्रा में पैदा होने लगते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भोजन का पाचन ठीक तरह से नहीं हो पाता। भूख में भी प्रायः धीरे-धीरे कमी होने लगती है। पाचन संस्थान के खराब होने से शरीर का विकास रुक जाता है।

(iii) माँसपेशी संस्थान पर प्रभाव (Effect on Muscular System):
प्रतिदिन मद्यपान करने से व्यक्ति की माँसपेशियों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे माँसपेशियों में सिकुड़न व प्रसार की क्षमता में कमी आ जाती है। माँसपेशियों की अधिकतम शक्ति की सीमा में भी कमी आ जाती है। हृदय की माँसपेशियाँ भी उचित ढंग से कार्य नहीं कर पातीं। व्यक्ति काफी कमजोर हो जाता है।

(iv) उत्सर्जन संस्थान पर प्रभाव (Effect on Excretory System):
मद्यपान करने से उत्सर्जन संस्थान के अंग भी बुरी तरह प्रभावित होते हैं। उनकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है और इसी के परिणामस्वरूप व्यर्थ के पदार्थ; जैसे एसिड फॉस्फेट व लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) आदि का जमाव अधिक होने लगता है। शरीर से इन पदार्थों का निष्कासन ठीक तरह से नहीं हो पाता। ऐसे व्यक्तियों के गुर्दे प्रायः खराब हो जाते हैं। शराब के सेवन से यकृत भी खराब हो जाता है।

2. परिवार व समाज पर प्रभाव (Effect on Family and Society):
प्रायः मद्यपान करने वाले व्यक्तियों के परिवार अशांत होते हैं। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न हो तो भी शराबी व्यक्ति, किसी भी तरह शराब पीने के लिए पैसे बटोरता है। इसके लिए व्यक्ति अपनी पत्नी व बच्चों को भी पीट डालता है। ऐसे व्यक्ति अपने परिवार के जीवन-स्तर को कभी ऊँचा नहीं उठा पाते। उनका पारिवारिक जीवन नरक बन जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने देश व समाज के लिए बोझ होते हैं क्योंकि राष्ट्रहित में उनका कुछ भी योगदान नहीं होता। वे अच्छे नागरिक नहीं बन पाते।

117 समाज में शराबी व्यक्तियों को कोई न तो पसंद करता और न ही सम्मान देता है। वे तनावग्रस्त तथा निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः अपराध में संलिप्त हो जाते हैं। लंबे समय तक अधिक मात्रा में शराब पीने से स्मरण शक्ति भी समाप्त होने लगती है। अंत में यही कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति स्वयं पर ही बोझ नहीं बल्कि परिवार व समाज पर भी बोझ होते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
नशीले पदार्थों का सेवन करने से खिलाड़ियों पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है? उल्लेख कीजिए।
अथवा
मादक पदार्थों का खिलाड़ियों के खेल पर क्या-क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मादक/नशीले पदार्थों का सेवन करने से खिलाड़ियों पर निम्नलिखित दुष्प्रभाव पड़ते हैं
(1) कुछ खिलाड़ी अपनी शारीरिक या मानसिक क्षमता को बढ़ाने के लिए नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं परन्तु इनके सेवन का उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(2) कई बार खिलाड़ियों को राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नशीले पदार्थों के सेवन के कारण खेल से बाहर होना पड़ता है। इसके कारण उनके सम्मान एवं आदर को ठेस पहुँचती है।।
(3) कुछ खिलाड़ी बिना किसी प्रकार की जानकारी के अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाने हेतु नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं, परन्तु बाद में उसे इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।
(4) मादक पदार्थों का सेवन करने से खिलाड़ी के खेल पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उसका खेल का स्तर कम होता जाता है।

प्रश्न 2.
तम्बाकू शरीर के लिए क्यों हानिकारक है?
उत्तर:
तम्बाकू में अनेक हानिकारक पदार्थ होते हैं, जो शरीर पर बुरा प्रभाव डालते हैं। इसके प्रयोग से शरीर में फेफड़ों, जीभ, गला, तालु, मसूड़ों का कैंसर, श्वास की बीमारियाँ; जैसे दमा, टी०बी०, खाँसी और बलगम आदि बीमारियों का प्रभाव बढ़ जाता है। यह दिमाग की नसों को कठोर, रक्त की नाड़ियों को लचकहीन कर देता है। रक्त में ऑक्सीजन की कमी महसूस होने लगती है। अतः तम्बाकू के कारण शरीर अनेक रोगों से ग्रस्त हो जाता है। इसलिए यह शरीर के लिए हानिकारक है।

प्रश्न 3.
मद्यपान या एल्कोहल का पाचन संस्थान पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
पाचन संस्थान के कोमल अंगों पर मद्यपान का बुरा प्रभाव पड़ता है। पाचक अंगों की झिल्ली (Membrane) मोटी हो जाती है। पाचक रस, जो पाचन क्रिया में सहायक होते हैं, कम मात्रा में पैदा होने लगते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भोजन का पाचन ठीक तरह से नहीं हो पाता। भूख में भी प्रायः धीरे-धीरे कमी होने लगती है। पाचन संस्थान के खराब होने से शरीर का विकास रुक जाता है।

प्रश्न 4.
मद्यपान या एल्कोहल का उत्सर्जन संस्थान या मल निकास प्रणाली पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मद्यपान या एल्कोहल से उत्सर्जन संस्थान या मल निकास प्रणाली के अंग बुरी तरह प्रभावित होते हैं। उनकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है और इसी के परिणामस्वरूप व्यर्थ के पदार्थ; जैसे एसिड फॉस्फेट व लैक्टिक अम्ल (Lactic Acid) आदि का जमाव अधिक होने लगता है। शरीर से

प्रश्न 6.
धूम्रपान का श्वसन संस्थान पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
धूम्रपान के सेवन से शरीर की कोमल झिल्लियों में सूजन आ जाती है, जिसके फलस्वरूप लगातार खाँसी आने लगती है। धूम्रपान क्षयरोग को बढ़ाता है। धूम्रपान के कारण बोलने वाले अंग एवं हलक (Larynx) संक्रमित हो जाते हैं। धूम्रपान करने वालों को धूम्रपान न करने वालों की अपेक्षा फेफड़ों का कैंसर प्रायः अधिक होता है। अधिक धूम्रपान करने से कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है। सिगरेट के पैकेट पर चेतावनी लिखी जाती है; जैसे सिगरेट से कैंसर होता है या सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। लेकिन धूम्रपान करने वाले इस प्रकार की चेतावनियों की परवाह नहीं करते, इसी कारण वे कैंसर जैसी भयानक बीमारी को आमंत्रित करते हैं।

प्रश्न 7.
“तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए एक जहर है।” इस कथन को स्पष्ट करें। अथवा व्यक्ति के स्वास्थ्य पर धूम्रपान का क्या प्रभाव पड़ता है? ।
उत्तर:
तम्बाकू स्वास्थ्य के लिए एक ज़हर है। इसमें निकोटिन नामक हानिकारक पदार्थ होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। तम्बाकू या धूम्रपान के हमारे शरीर पर निम्नलिखित हानिकारक प्रभाव पड़ते हैं
(1) कैंसर का मुख्य कारण तम्बाकू है। इसके प्रयोग से फेफड़े, मुँह, जीभ, गला, तालु और मसूड़ों के कैंसर हो जाते हैं।
(2) तम्बाकू का प्रयोग दमा, टी०बी०, खाँसी और बलगम आदि पैदा करता है।
(3) तम्बाकू के सेवन से दिल का दौरा, उच्च रक्तचाप, रक्त की नाड़ियाँ कठोर और रक्त में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है।
(4) तम्बाकू का प्रयोग करने वाली गर्भवती स्त्रियों का बच्चा कमजोर और कम भार वाला होता है। तम्बाकू के नशे से ग्रस्त माताओं के बच्चे कई बार जन्म के बाद मर जाते हैं।

प्रश्न 8.
धूम्रपान का स्नायु संस्थान पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
धूम्रपान का स्नायु संस्थान या नाड़ियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ये प्रायः निष्क्रिय हो जाती हैं। धूम्रपान से मस्तिष्क की कोशिकाएँ खराब होने लगती हैं। इससे माँसपेशियों को लकवा हो जाता है और माँसपेशी मुड़ने भी लगती है। धूम्रपान करने से केंद्रीय स्नायु संस्थान में गड्ढा-सा बन जाता है। धूम्रपान करने से उत्तेजना क्षण-भर के लिए होती है। लेकिन इसके तुरंत बाद ही यह प्रक्रिया ढीली हो जाती है। जो व्यक्ति लगातार धूम्रपान करते हैं उनकी स्मरण-शक्ति बहुत कम हो जाती है।

प्रश्न 9.
खेल में हार नशीली वस्तुओं के उपयोग के कारण भी हो सकती है, स्पष्ट करें।
उत्तर:
खेल में हार नशीली वस्तुओं के प्रयोग के कारण भी हो सकती है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है
(1) नशे से ग्रस्त खिलाड़ी खेल के दौरान ऐसी गलतियाँ करता है, जिसके परिणामस्वरूप उसकी टीम को पराजय का मुँह देखना पड़ता है।

(2) नशे से ग्रस्त खिलाड़ी अपनी टीम के लिए पराजय का कारण बन जाता है।

(3) नशीली वस्तुओं के प्रयोग के कारण खिलाड़ी के रक्त का दबाव अधिक होता है, जिसके फलस्वरूप वह चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है। वह दूसरों के विचारों को नहीं सुनता, बल्कि अपनी मनमानी करता है। इस कारण वह अपने साथी खिलाड़ियों से सही तालमेल नहीं बिठा पाता और अपनी टीम के लिए पराजय का कारण बन जाता है।

(4) यदि कोई खिलाड़ी खेलते समय नशीली वस्तुओं का प्रयोग करता हुआ पकड़ा जाता है, तो उसका जीता हुआ पुरस्कार वापिस ले लिया जाता है। इस प्रकार खिलाड़ी की विजय भी पराजय में बदल जाती है।

(5) नशे में खेलते समय खिलाड़ी अपनी टीम से संबंधी बहुत-से ऐसे गलत कार्य कर देता है जिससे टीम हार जाती है।

प्रश्न 10.
तम्बाकू या धूम्रपान से खेल निपुणता या कुशलता पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तम्बाकू पीने से खिलाड़ियों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। तम्बाकू पीने का सीधा प्रभाव नाड़ी संस्थान पर पड़ता है। खेल में निपुणता प्राप्त करने के लिए खिलाड़ी का नाड़ी संस्थान मजबूत होना बहुत जरूरी है। अगर खिलाड़ी तम्बाकू का सेवन करता है तो वह कभी भी खेल में निपुणता नहीं ला सकता। तम्बाकू पीने से हृदय कमजोर होता है और त्वचा के कैंसर की बीमारियाँ हो जाती हैं। आँखों की नजर कमजोर होने, फेफड़ों की ताकत में कमी होने एवं माँसपेशियों में हानिकारक पदार्थ इकट्ठे होने के कारण उसकी कार्यक्षमता में कमी आ जाती है। इस तरह खिलाड़ी तम्बाकू पीकर अपने खेल के स्तर को नीचे गिरा लेता है।

प्रश्न 11.
शराब या एल्कोहल का परिवार व समाज पर क्या दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
एल्कोहल का सेवन करने वाले व्यक्तियों के परिवार प्रायः अशांत होते हैं। यदि परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी न हो तो भी शराबी व्यक्ति, किसी भी तरह शराब पीने के लिए पैसे बटोरता है। इसके लिए व्यक्ति अपनी पत्नी व बच्चों को भी पीट डालता है। ऐसे व्यक्ति अपने परिवार के जीवन-स्तर को कभी ऊँचा नहीं उठा पाते। उनका पारिवारिक जीवन नरक बन जाता है। ऐसे व्यक्ति अपने देश व समाज के लिए बोझ बन जाते हैं क्योंकि राष्ट्रहित में उनका कुछ भी योगदान नहीं होता। वे अच्छे नागरिक नहीं बन पाते।

समाज में शराबी व्यक्तियों को कोई न तो पसंद करता और न ही सम्मान देता है। वे तनावग्रस्त तथा निष्क्रिय हो जाते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रायः अपराध में संलिप्त हो जाते हैं। कई व्यक्तियों में तो आत्महत्या करने की प्रवृत्ति भी आ जाती है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में शराब पीने से स्मरण-शक्ति भी समाप्त होने लगती है। अंत में यही कहा जा सकता है कि ऐसे व्यक्ति स्वयं पर ही बोझ नहीं बल्कि परिवार व समाज पर भी बोझ होते हैं।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
डोपिंग किसे कहते हैं?
उत्तर:
डोपिंग का अर्थ कुछ ऐसी मादक दवाओं या तरीकों का प्रयोग करना है जिसके माध्यम से खेल-प्रदर्शन को बढ़ाया जा सकता है। डोपिंग का अधिक रुझान खिलाड़ियों में पाया जाता है। जब कुछ खिलाड़ियों द्वारा खेलों के दौरान अपने प्रदर्शन को बढ़ाने या मजबूत करने के लिए प्रतिबंधित पदार्थों या तकनीकों का सेवन या प्रयोग किया जाता है तो उसे डोपिंग कहते हैं।

प्रश्न 2.
मद्यपान या एल्कोहल (Alcohol) क्या है?
उत्तर:
मद्यपान या एल्कोहल हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। यह एक ऐसा पेय पदार्थ है जिसको पीने से व्यक्ति के शरीर में उत्तेजना उत्पन्न होती है। यह गेहूँ, चावल, जौं और फलों आदि से बनाई जाती है। इसमें ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं जिनकी बनावट एक-सी होती है। यह भिन्न-भिन्न अम्लों से मिलकर एस्टर्स (Esters) नामक पदार्थ बनाती है। इसे इथाइल, एल्कोहल व एथानॉल आदि भी कहा जाता है।

प्रश्न 3.
नशीली वस्तुओं (पदार्थों) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नशीली वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इनके सेवन से न केवल स्वास्थ्य खराब होता है, बल्कि कैरियर भी तबाह हो जाता है। जो खिलाड़ी नशीली वस्तुओं का सेवन करते हैं वे डोपिंग के आदी हो जाते हैं, जिससे उसकी क्रियाशीलता उत्तेजित होती है। इस प्रकार नशीले पदार्थ वे पदार्थ हैं जिनके सेवन से शरीर में किसी-न-किसी प्रकार की उत्तेजना उत्पन्न होती है जिससे क्रियाविहीनता की दशा उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
नशा अथवा डोपिंग खिलाड़ी के शरीर पर क्या प्रभाव डालते हैं?
उत्तर:
नशा अथवा डोपिंग खिलाड़ी की शारीरिक क्षमता धीरे-धीरे समाप्त कर देते हैं। कई बार डोपिंग करके खेल रहा खिलाड़ी मौत के मुँह में भी जा सकता है। खिलाड़ी की शारीरिक और मानसिक दोनों शक्तियों को नशा समाप्त कर देता है। खिलाड़ी बलहीन, सोचहीन, असमर्थ क्रियाविहीन और चिड़चिड़ा हो जाता है।

प्रश्न 5.
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी खेल के मैदान में कैसा व्यवहार करता है?
उत्तर: नशे से ग्रस्त खिलाड़ी खेल के मैदान में बिना कारण जोर-जबरदस्ती करता है। वह सोचहीन खेल खेलता है। विरोधियों और रैफ़रियों के साथ झगड़ता है। गलत शब्दों का प्रयोग करता है। वह स्वयं अथवा दूसरों को चोट लगवा बैठता है।

प्रश्न 6.
नशा-रहित और नशा-ग्रस्त खिलाड़ी में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
नशा-रहित खिलाड़ी चुस्ती-स्फूर्ति और सोचवान खेल खेलने वाला होता है। वह खेल के दौरान अनुशासित रहता है। वह मुसीबत के समय दूसरे खिलाड़ियों की सहायता करता है। इसके विपरीत नशे से ग्रस्त खिलाड़ी लापरवाह, सोचहीन, झगड़ालू और अनुशासनहीन होता है। वह अपनी टीम को हमेशा कठिनाइयों में डाले रखता है और वह विश्वास योग्य नहीं होता।

प्रश्न 7.
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी की मानसिक स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी की मानसिक स्थिति अर्द्ध-बेहोशी वाली होती है। उसका मन संतुलन में नहीं रहता। खेल के समय वह दूसरों की बात नहीं सुनता, केवल अपनी सफाई देता है। वह रैफरी के निर्णयों से संतुष्ट नहीं होता, नियमों की पालना नहीं करता, जिसके फलस्वरूप मैदान से बाहर बैठने के लिए मजबूर हो जाता है।

प्रश्न 8. ड्रग्स के प्रकारों/रूपों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) शराब,
(2) तम्बाकू,
(3) अफीम,
(4) हेरोइन,
(5) मेथाडोन,
(6) भाँग,
(7) कैरीन,
(8) कैफीन,
(9) गाँजा आदि।

प्रश्न 9.
मद्यपान या एल्कोहल के नशे में होने वाले कोई दो अपराध बताएँ।
उत्तर:
(1) यौन सम्बन्धी अपराध करना,
(2) घर या बाहर मारपीट या हिंसा करना।

प्रश्न 10.
सरकार द्वारा नशे की बुराई को दूर करने के लिए क्या प्रयास किए गए हैं?
उत्तर:
सरकार द्वारा नशे की बुराई (Evil of Drugs) को दूर करने के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं
(1) सार्वजनिक स्थानों पर नशीले पदार्थों का सेवन करना निषेध है।
(2) सरकार द्वारा नशे के आदी लोगों को इस बुराई से छुटकारा पाने हेतु अनेक योजनाएँ लागू की गई हैं और अनेक संस्थाएँ स्थापित की गई हैं।
(3) नशे की बुराई को दूर करने के लिए सरकार द्वारा अनेक नशा निषेध कानून बनाए गए हैं जिनका सख्ती से पालन किया जाता है।

प्रश्न 11.
धूम्रपान छोड़ने के कोई दो सामान्य उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) मन से निश्चय कर लें कि हमें इसके सेवन से दूर रहना है।
(2) हमेशा अच्छी संगत में रहना चाहिए।

प्रश्न 12.
मद्यपान से क्या हानियाँ होती हैं?
उत्तर:
(1) मद्यपान से शारीरिक संस्थानों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इनमें अनेक प्रकार के विकार उत्पन्न हो जाते हैं।
(2) मद्यपान करने वाले का घर, परिवार एवं समाज में सम्मान नहीं होता।
(3) मद्यपान से अनेक सामाजिक बुराइयों को बढ़ावा मिलता है।
(4) मद्यपान करने से स्मरण-शक्ति कमजोर होती है।

प्रश्न 13.
नशीली वस्तुओं के सेवन से शरीर को क्या नुकसान होते हैं?
उत्तर:
(1) शरीर में स्फूर्ति और तालमेल नहीं रहता।
(2) अनियंत्रण की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
(3) पाचन क्रिया पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है।
(4) स्मरण-शक्ति कम हो जाती है।

HBSE 9th Class Physical Education मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

प्रश्न 1.
मनुष्य नशीली वस्तुओं का प्रयोग कब से करता आ रहा है?
उत्तर:
मनुष्य आदिकाल से नशीली वस्तुओं का प्रयोग करता आ रहा है।

प्रश्न 2.
खेलों में मादक पदार्थों का सेवन या तरीका क्या कहलाता है?
उत्तर:
खेलों में मादक पदार्थों का सेवन या तरीका डोपिंग (Doping) कहलाता है।

प्रश्न 3.
शराब के सेवन से परिवार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
शराब के सेवन से परिवार में झगड़ा, मारपीट, गाली-गलौच जैसी घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

प्रश्न 4.
मद्यपान या शराबखोरी किसकी सूचक है?
उत्तर:
मद्यपान या शराबखोरी वैयक्तिक विघटन की सूचक है।

प्रश्न 5.
धूम्रपान कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
धूम्रपान मुख्यतः सात प्रकार का होता है।

प्रश्न 6.
सिगरेट के धुएँ में कौन-सा विषैला पदार्थ पाया जाता है?
अथवा
तम्बाकू में कौन-सा पदार्थ नशा उत्पन्न करता है?
उत्तर:
निकोटिन नामक पदार्थ।

प्रश्न 7.
किन्हीं दो नशीले पदार्थों के नाम बताएँ। अथवा किसी एक नशीली वस्तु का नाम लिखें।
उत्तर:
(1) अफीम,
(2) गाँजा।

प्रश्न 8.
खेल प्रदर्शन को बढ़ाने वाले किन्हीं तीन पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) एनाबोलिक स्टीरायड्स,
(2) बीटा-2 एगोनिस्ट्स,
(3) कैन्नाबाइनायड्स।

प्रश्न 9.
नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्ति के पैरों का तापमान सामान्य व्यक्ति से कितना कम होता है?
उत्तर:
नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाले व्यक्ति के पैरों का तापमान 1.8 सैंटीग्रेड तक कम होता है।

प्रश्न 10.
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी को साथी खिलाड़ी क्या समझते हैं?
उत्तर:
नशे से ग्रस्त खिलाड़ी को साथी खिलाड़ी झगड़ालू और गैर-जिम्मेदार खिलाड़ी समझते हैं।

प्रश्न 11.
WADA का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
World Anti Doping Agency.

प्रश्न 12.
चरस, अफीम, भाँग व कोकीन कैसे पदार्थ हैं?
उत्तर:
चरस, अफीम, भाँग व कोकीन नशीले पदार्थ हैं।

प्रश्न 13.
कैंसर का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
कैंसर का मुख्य कारण तम्बाकू है।

प्रश्न 14.
आदिकाल में मनुष्य नशीली वस्तुओं का प्रयोग क्यों करता था?
उत्तर:
आदिकाल में मनुष्य शरीर को बीमारियों से बचाने के लिए नशीली वस्तुओं का प्रयोग करता था।

प्रश्न 15.
किस पदार्थ के सेवन से रोग निवारक क्षमता कम होती है?
उत्तर:
तम्बाकू के सेवन से रोग निवारक क्षमता कम होती है।

प्रश्न 16.
नशीली वस्तुओं का प्रयोग शरीर पर क्या प्रभाव डालता है?
अथवा
मादक पदार्थों के सेवन से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? ।
उत्तर:
नशीली वस्तुओं का प्रयोग मनुष्य की विचार-शक्ति, पाचन शक्ति, माँसपेशी संस्थान, हृदय, फेफड़े और रक्त वाहिकाओं को कमजोर कर देता है।

प्रश्न 17.
तम्बाकू में कौन-सा पदार्थ नशा करता है?
उत्तर:
तम्बाकू में निकोटिन पदार्थ नशा करता है।

प्रश्न 18.
अफीम किस पौधे से तैयार होती है?
उत्तर:
अफीम पैपेवर सोम्नीफेरम (Papaver Somniferum) पौधे से तैयार होती है।

प्रश्न 19.
तम्बाकू के प्रयोग से कौन-कौन से रोग हो जाते हैं?
उत्तर:
तम्बाकू के प्रयोग से शरीर को दमा, कैंसर और श्वास के रोग हो जाते हैं।

प्रश्न 20.
नशीली वस्तुओं का कोई एक दोष बताएँ।
उत्तर:
मानसिक संतुलन बिगड़ना।

प्रश्न 21.
डोपिंग मुख्यतः कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
डोपिंग मुख्यतः दो प्रकार की होती है।

प्रश्न 22.
किस प्रकार के मादक पदार्थ ज्यादा खतरनाक होते हैं?
उत्तर:
एनाबोलिक स्टीरॉयड्स, ऐमफैंटेमिन, बीटा एगोनिस्ट्स, बीटा ब्लार्क्स आदि।

प्रश्न 23.
एक अच्छी खेल के लिए खिलाड़ी को किस चीज़ की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
एक अच्छी खेल के लिए खिलाड़ी को तालमेल, फूर्ति और अडौल शरीर की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 24.
खेलों में नशीली वस्तुओं का प्रयोग करके खेलना किस कमेटी की ओर से मना किया गया है?
उत्तर:
खेलों में नशीली वस्तुओं का प्रयोग करके खेलना अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक कमेटी की ओर से मना किया गया है।

प्रश्न 25.
खिलाड़ी की ओर से जीता अवार्ड कब वापिस ले लिया जाता है?
उत्तर:
खेल के दौरान नशे का प्रयोग करके जीता अवार्ड सिद्ध होने के बाद वापिस ले लिया जाता है।

प्रश्न 26.
शराब के सेवन से व्यक्ति के किस संस्थान पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
शराब के सेवन से व्यक्ति के स्नायु-तंत्र संस्थान पर अधिक दुष्प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 27.
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस प्रतिवर्षे 31 मई को मनाया जाता है।

प्रश्न 28.
प्राचीनकाल में मदिरा का प्रयोग किस रूप में होता था?
उत्तर:
प्राचीनकाल में मदिरा का प्रयोग सोमरस के रूप में होता था।

प्रश्न 29.
तम्बाकू के सेवन से शरीर के किस अंग पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
तम्बाकू के सेवन से फेफड़ों पर गंभीर दुष्प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 30.
व्यक्तियों द्वारा तम्बाकू के रूप में किन-किन पदार्थों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर:
(1) बीड़ी,
(2) सिगरेट,
(3) पान,
(4) गुटखा,
(5) जर्दा आदि।

बहुविकल्पीय प्रश्न [Multiple Choice Questions]

प्रश्न 1.
मनुष्य द्वारा पैदा की गई मुश्किलों में सम्मिलित है
(A) मद्यपान
(B) नशीले पदार्थों का सेवन
(C) धूम्रपान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 2.
मद्यपान या शराबखोरी किसका सूचक है?
(A) राष्ट्र विघटन का
(B) वैयक्तिक विघटन का
(C) राजनीतिक विघटन का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) वैयक्तिक विघटन का

प्रश्न 3.
शराबखोरी किस प्रकार की समस्या है?
(A) गंभीर
(B) दीर्घकालिक
(C) समाज विरोधी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4.
मद्यपान या एल्कोहल भिन्न-भिन्न अम्लों से मिलकर कौन-सा पदार्थ बनाती है?
(A) एस्टर
(B) एथानॉल
(C) एल्कोहल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) एस्टर

प्रश्न 5.
धूम्रपान करने वाले व्यक्ति में रक्त-दाब कितना बढ़ जाता है?
(A) 1 से 20 mm/Hg
(B) 5 से 20 mm/Hg
(C) 3 से 20 mm/Hg
(D) 7 से 30 mm/Hg
उत्तर:
(A) 1 से 20 mm/Hg

प्रश्न 6.
तम्बाकू के धुएँ में टॉर होते हैं जिसके कारण रोग हो जाते हैं-
(A) दमा
(B) कैंसर
(C) श्वास के रोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
“एल्कोहल की असामान्य बुरी आदत ही मद्यपान है।” यह कथन है
(A) फेयरचाइल्ड का
(B) जॉनसन का
(C) डॉ० डरफी का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) फेयरचाइल्ड का

प्रश्न 8.
मानव शरीर पर दुष्प्रभाव डालने वाला मादक पदार्थ है
(A) शराब
(B) हीरोइन
(C) अफीम,
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9.
तम्बाकू का सेवन करने से होने वाला रोग है
(A) दमा
(B) कैंसर
(C) टी०बी०
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 10.
शराब, तम्बाकू और नशीले पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए …………….है।
(A) लाभदायक
(B) आनंदमय
(C) हानिकारक
(D) प्रभावशाली
उत्तर:
(C) हानिकारक

प्रश्न 11.
निम्नलिखित में से अधिक खतरनाक मादक पदार्थ है
(A) एनाबोलिक एटीरॉयड्स
(B) ऐमफैंटेमिन
(C) बीटा ब्लास
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
निम्नलिखित में से कैंसर का मुख्य कारण है
(A) शराब
(B) अफीम
(C) तम्बाकू
(D) भाँग
उत्तर:
(C) तम्बाकू

मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव Summary

मद्यपान, धूम्रपान तथा नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव परिचय

मद्यपान (Drinking):
मद्यपान या शराबखोरी वैयक्तिक विघटन का सूचक है क्योंकि शराबखोरी व्यक्ति को मजबूर कर देती है कि वह शराब पिए। शराबी व्यक्ति किसी भी साधन से शराब प्राप्त करने का प्रयत्न करता है और उसकी दैनिक दिनचर्या में शराब सम्मिलित हो जाती है, जिससे उसका स्वास्थ्य गिरता रहता है, मानसिक शांति व स्थिरता जाती रहती है, पारिवारिक जीवन विषमय हो जाता है और सामाजिक जीवन में अनेक समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। जॉनसन (Johnson) के अनुसार, “मद्यपान वह स्थिति है जिसमें एक व्यक्ति शराब लेने की मात्रा पर नियंत्रण खो बैठता है जिससे कि वह पीना आरंभ करने के पश्चात् उसे बंद करने में सदैव असमर्थ रहता है।” … धूम्रपान (Smoking)- तम्बाकू किसी जहर से कम नहीं होता, परंतु दुःख की बात यह है कि लोग जानते हुए भी इसका प्रयोग निरंतर कर रहे हैं। वर्तमान में तम्बाकू के नशे की आदत नौजवानों में अधिक बढ़ गई है जो चिंता का विषय है। तम्बाकू में निकोटिन नाम का जहरीला पदार्थ होता है, जो शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालता है। व्यक्तियों द्वारा सिगरेट, बीड़ी, पान, गुटखा और जर्दे के रूप में तम्बाकू का प्रयोग किया जाता है। हर साल लाखों व्यक्तियों की मौत तम्बाकू के प्रयोग से होती है, जिनमें से एक तिहाई मौतें हमारे देश में होती हैं।

नशीले पदार्थ (Intoxicants or Drugs):
मनुष्य आदिकाल से नशीली वस्तुओं का प्रयोग करता आ रहा है। चाहे यह प्रयोग मन की उत्तेजना के लिए हो या बीमारियों से छुटकारा पाने के लिए। परंतु जब भी इनका अधिक प्रयोग किया गया, इनके भयानक परिणाम देखने में आए। आधुनिक वैज्ञानिक युग में अनेक नई-नई नशीली वस्तुएँ अस्तित्व में आईं। इनके प्रयोग ने मानव जगत् को चिंता में डाल दिया है। इन नशीली वस्तुओं का प्रयोग करके चाहे थोड़े समय के लिए अधिक काम लिया जा सकता है, परंतु इनका अधिक प्रयोग करने से मानवीय शरीर रोग-ग्रस्त होकर सदा की नींद सो जाता है। इसलिए हमें नशीली वस्तुओं एवं दवाइयों से स्वयं को व समाज को बचाना चाहिए, ताकि हम समाज या खेल के क्षेत्र में आदर एवं सम्मान प्राप्त कर सकें।

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HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान

Haryana State Board HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान

HBSE 9th Class Physical Education शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions] 

प्रश्न 1.
प्रतियोगिता क्या है? विभिन्न खेलकद प्रतियोगिताओं की उपयोगिता पर प्रकाश डालें। अथवा शारीरिक शिक्षा व खेलकूद में प्रतियोगिताओं के महत्त्व का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रतियोगिता का अर्थ (Meaning of Competition);
जब दो या दो से अधिक खिलाड़ी या टीम ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यत हों जिसे केवल एक खिलाड़ी या टीम को ही प्रदान किया जा सकता हो तो ऐसी स्थिति से प्रतियोगिता का जन्म होता है। एक ही वातावरण में रहने वाले जीवों के बीच सहज रूप से ही प्रतियोगिता विद्यमान होती है।

प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का महत्त्व (Importance of Competitive Games & Sports):
वर्तमान में खेलकूद दैनिक जीवन के एक महत्त्वपूर्ण अंग बनते जा रहे हैं। प्रतिस्पर्धा के इस युग में आज पढ़ाई के साथ-साथ खेलों की भी उपयोगिता निरंतर बढ़ती जा रही है। हमारे लिए खेलकूद प्रतियोगिताओं के महत्त्व निम्नलिखित हैं

1. आत्म-विश्वास (Self-confidence):
खेलकूद मनुष्य में आत्म-विश्वास का गुण विकसित करते हैं। यही आत्म-विश्वास उसे विपत्तियों का निडरता से सामना करने में सहायक होता है। आत्म-विश्वास के माध्यम से हम आसानी से बड़ी-से-बड़ी मुश्किलों का सामना कर सकते हैं। अत: खेलकूद प्रतियोगिताएँ हमारे अन्दर आत्म-विश्वास की भावना जगाती हैं।

2. आदर्श खेल की भावना (Spirit of Fair Play):
अच्छा खिलाड़ी खेल को खेल की भावना से खेलता है, हार-जीत के लिए नहीं। वह हेरा-फेरी से या फाउल खेलकर जीतना नहीं चाहता, जिससे उसमें आदर्श खेल की भावना आ जाती है।

3. संवेगों का निकास (Egress of Emotions):
दिन, हफ्ते और महीने से काम करने के पश्चात् व्यक्ति के मन में कुछ उलझनें तथा संवेग रह जाते हैं और मन अशांत रहता है। खेल प्रतियोगिता में भाग लेने से मनुष्य के मन से संवेगों का निकास हो जाता है जिससे व्यक्ति राहत महसूस करता है।

4. मुकाबले की प्रेरणा (Inspiration of Competition):
खेल प्रतियोगिताएँ मनुष्य में मुकाबले की प्रेरणा पैदा करती हैं। प्रत्येक खिलाड़ी विरोधी खिलाड़ी से अच्छा खेलने का प्रयत्न करता है। पहले खेलों में फिर जीवन में वे दूसरों से डटकर मुकाबला करते हैं। डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम के अनुसार, “हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए और हमें कभी मुश्किलों को खुद पर हावी होने का मौका नहीं देना चाहिए।”

5. खिलाड़ी की योग्यता निखारने में सहायक (Helpful in Polish the Talent of Player):
खेल प्रतियोगिताएँ किसी खिलाड़ी की साल-भर में सीखी गई खेल-कला के प्रदर्शन को निखारने में सहायक होती हैं।

6. शारीरिक विकास (Physical Growth):
खेल प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ी का शरीर मजबूत एवं सुडौल होता है। उसमें चुस्ती और स्फूर्ति रहती है।

7. नस्ल-भेद की समाप्ति (To Abolish the Communalism):
भिन्न-भिन्न जातियों तथा मजहबों के खिलाड़ी खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। खेलते समय खिलाड़ी जात-पात अथवा धर्म का अंतर भूलकर आपस में घुल-मिलकर खेलते हैं।

8. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन (Incitement to International Co-operation):
अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में एक देश के खिलाड़ी दूसरे देशों के खिलाड़ियों के साथ खेलते हैं और उनके संपर्क में आते हैं, जिससे उन्हें एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है और इससे अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन मिलता है।

9. समय का पाबंद (Punctuality):
खिलाड़ी को समय पर खेलने जाना पड़ता है। थोड़ी देर से पहुँचने पर वह मैच में भाग नहीं ले सकता। इस प्रकार खेल प्रतियोगिता मनुष्य को समय का पाबंद बनाती है।

10. दृढ़-संकल्प (Resolution):
खेल प्रतियोगिता द्वारा खिलाड़ी में दृढ़ संकल्प की भावना आती है। वह सही समय पर सही निर्णय लेना सीख जाता है। इससे वह अपनी टीम की हार को भी जीत में बदल सकता है। दृढ़-संकल्पी व्यक्ति को कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता।

11. पथ-प्रदर्शन तथा नेतृत्व (Guidance and Leadership):
खेलकूदखेलकूद व्यक्ति में पथ-प्रदर्शन व नेतृत्व का गुण विकसित करते हैं। नेतृत्व करने वाला कप्तान जीवन में भी नेतृत्व करने की कला सीख जाता है।

12. आत्म-अभिव्यक्ति (Self-Manifestation) :
खेलकूद प्रतियोगिता में खिलाड़ी को आत्म-अभिव्यक्ति करने का अवसर मिलता है। मैदान में प्रत्येक खिलाड़ी अपने गुणों, कला तथा कुशलता को दर्शकों के सामने प्रकट करता है। खेल के मैदान ने हमें बहुत अनुशासन प्रिय, आत्म-संयमी और देश पर मर-मिटने वाले नागरिक व सैनिक दिए हैं। इसीलिए तो ड्यूक ऑफ विलिंग्टन ने वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन महान् को हराने के पश्चात् कहा था, “वाटरलू का युद्ध तो एटन तथा हैरो के खेल के मैदान में जीता गया था।”

13. खाली समय का सदुपयोग (Proper use of Leisure Time):
एक प्रसिद्ध कहावत है-खाली दिमाग शैतान का घर होता है। खेलों में भाग लेने से खिलाड़ी बुरे कामों से बचा रहता है और खाली समय का सदुपयोग भी हो जाता है।

14. नए नियमों की जानकारी (Knowledge of New Rules):
खेल प्रतियोगिता से खिलाड़ी को नए नियमों की जानकारी मिलती है जिससे वे अपने खेल के स्तर को ऊँचा कर सकते हैं।

15. देश की प्रतिष्ठा (Dignity of Country):
आज अमेरिका, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस, ऑस्ट्रेलिया, चीन आदि देश औद्योगिक व वैज्ञानिक प्रगति के कारण ही महान् नहीं माने जाते, बल्कि खेलों के क्षेत्र में भी इन देशों ने बड़ा नाम कमाया है। हम अपने राष्ट्र की प्रतिष्ठा में अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताएँ जीतकर और अधिक वृद्धि कर सकते हैं।

16. मनोरंजन (Entertainment):
सारा दिन काम करते-करते व्यक्ति के जीवन में उकताहट आ जाती है। खेलों में भाग लेने से मनुष्य का मनोरंजन होता है और वह उकताहट व थकावट से छुटकारा पा लेता है।

17. आज्ञा पालन का गुण (Quality of Obedience):
खेल प्रतियोगिता द्वारा खिलाड़ी में आज्ञा पालन का गुण विकसित हो जाता है। खेलते समय खिलाड़ी को अपने रैफरी, कोच या कप्तान के आदेशों का पालन करना पड़ता है। इससे उसमें आज्ञा पालन की आदत पड़ जाती है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित की जाने वाली मुख्य खेल प्रतियोगिताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में आयोजित होने वाली प्रमुख खेलकूद प्रतियोगिताओं पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
प्रत्येक व्यक्ति में प्रतियोगिता की भावना होती है। यही भावना उसे उन्नति के मार्ग पर आगे कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित करती है। यही भावना उसे सम्मान देने में सहायता करती है। वर्तमान युग में खेल प्रतियोगिताओं की भावना से व्यक्ति के संवेगों की संतुष्टि होती है। इससे व्यक्ति को न केवल कार्यकुशलता की प्राप्ति होती है, बल्कि वह इनसे दक्षता भी ग्रहण कर लेता है। इस प्रकार वह सर्वश्रेष्ठ खेल प्रदर्शन करने में सफल होता है। खेल प्रतियोगिताएँ मनोरंजन प्रदान करने के साथ-साथ मनुष्य को स्वस्थ रखती हैंतथा रोग या बीमारी से दूर रखती हैं। प्राचीनकाल में घुड़सवारी, भाला फेंकना, मल्लयुद्ध, तीरंदाजी आदि खेलें ही लोकप्रिय थीं और इन्हीं खेलों का आयोजन किया जाता था। मगर समय में बदलाव के कारण इन खेलों का स्थान अन्य खेलों ने ले लिया। इनमें प्रमुख हॉकी, बैडमिंटन, फुटबॉल, क्रिकेट, टेनिस, वॉलीबॉल आदि हैं। आज इन खेलों का आयोजन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किया जाता है। भारत में आयोजित की जाने वाली विभिन्न खेल प्रतियोगिताओं का वर्णन निम्नलिखित है

1. रंगास्वामी कप राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता (Rangaswami Cup/National Hockey Championship):
भारतीय हॉकी एसोसिएशन ने राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता सन् 1927 में आरंभ करवाई। इस प्रतियोगिता में मोरिस नामक न्यूजीलैण्ड के निवासी को सन् 1935 में तथा सन् 1946 में पंजाब एसोसिएशन के सचिव बख्शीश अलीशेख को शील्ड प्रदान की गई। लेकिन विभाजन के कारण यह शील्ड पाकिस्तान में ही रह गई, क्योंकि बख्शीश अलीशेख पाकिस्तान में रहने लगा था। विभाजन के पश्चात् मद्रास के समाचार-पत्र ‘हिंद’ तथा ‘स्पोर्ट्स एंड पास्टाइम’ के मालिकों ने अपने संपादक श्री रंगास्वामी के नाम पर राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता के लिए एक नया कप प्रदान किया। इस कारण इस प्रतियोगिता को ‘रंगास्वामी कप’ के नाम से जाना जाता है। सन् 1947 से ‘रंगास्वामी कप’ के नाम से यह प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। यह प्रतियोगिता नॉक आउट स्तर पर करवाई जाती है।

2. आगा खाँ कप (Agha Khan Cup):
सर आगा खाँ ने पहली बार इस प्रतियोगिता के लिए कप दिया। उन्हीं के नाम पर सन् 1896 से यह प्रतियोगिता नॉक आउट स्तर पर करवाई जा रही है। सर्वप्रथम इस कप को जीतने का श्रेय मुंबई के जिमखाना को प्राप्त है। इस प्रतियोगिता का आयोजन आगा खाँ टूर्नामेंट कमेटी करती है।

3. अखिल भारतीय नेहरू सीनियर हॉकी प्रतियोगिता (All India Nehru Senior Hockey Competition):
सन् 1964 में स्वर्गीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की पुण्य-तिथि की याद में नई दिल्ली में इस प्रतियोगिता का आरंभ हुआ। इस प्रतियोगिता का नाम उनके नाम पर ही रखा गया। यह प्रतियोगिता नॉक आउट-कम-लीग आधार पर करवाई जाती है। जीतने वाली टीम को राष्ट्रपति के द्वारा पुरस्कारों का वितरण किया जाता है और खिलाड़ियों को सम्मानित किया जाता है।

4. अखिल भारतीय नेहरू जूनियर हॉकी प्रतियोगिता (All India Nehru Junior Hockey Competition):
यह हर वर्ष नई दिल्ली में आयोजित की जाती है, जिसमें 18 वर्ष से कम आयु वाले खिलाड़ी भाग लेते हैं। विभिन्न राज्यों की टीमें इसमें भाग लेने के लिए आती हैं । इस प्रतियोगिता का फाइनल मुकाबला भारत के प्रथम प्रधानमंत्री स्व० पं० जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन 14 नवंबर को आयोजित किया जाता है अर्थात् यह प्रतियोगिता 1 नवम्बर से शुरू होकर पंडित जवाहरलाल नेहरू जी के जन्म दिवस 14 नंवबर को समाप्त होती है।

5. डूरंड कप (Durand Cup):
इस कप का यह नाम ब्रिटिश इंडिया के विदेश सचिव सर मोर्टीमोर डूरंड के नाम पर रखा गया। यह प्रतियोगिता पहले ‘शिमला टूर्नामेंट’ के नाम से विख्यात थी। सन् 1931 से इस प्रतियोगिता में सेना के अतिरिक्त असैनिक टीमें भी भाग लेने लगी हैं। सर्वप्रथम इस प्रतियोगिता में भाग लेने का सौभाग्य ‘पटियाला टाइगर’ को प्राप्त हुआ। यह प्रतियोगिता हर वर्ष नॉक आउट-कम-लीग स्तर पर करवाई जाती है।

6. रोवर्ज़ कप (Rovers Cup)-यह खेल प्रतियोगिता फुटबॉल खेल से संबंधित है, जिसका आयोजन प्रतिवर्ष रोवर्ज कप टूर्नामेंट कमेटी की ओर से किया जाता है। इस प्रतियोगिता में देश के विभिन्न भागों से टीमें भाग लेने आती हैं।

7. सुबोटो मुखर्जी कप (Subroto Mukherjee Cup):
सुब्रोटो मुखर्जी कप प्रतियोगिता को ‘जूनियर डूरंड प्रतियोगिता’ के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रतियोगिता का आयोजन एयर मार्शल सुब्रोटो मुखर्जी की याद में किया जाता है। डूरंड कमेटी पिछले कई वर्षों से सीनियर वर्ग के लिए फुटबॉल की इस प्रतियोगिता का आयोजन कर रही है। यह प्रतियोगिता प्रतिवर्ष नवंबर और दिसंबर के महीने में नई दिल्ली में आयोजित होती है। इस प्रतियोगिता में किसी राज्य की एक ही स्कूल की सर्वोत्तम टीम भाग ले सकती है। इसमें 17 वर्ष की आयु तक के खिलाड़ी भाग लेते हैं। विजयी टीम को एक आकर्षक ट्रॉफी दी जाती है और अच्छे खिलाड़ियों को वजीफे भी दिए जाते हैं।

8. संतोष ट्रॉफी (Santosh Trophy):
संतोष ट्रॉफी कूच बिहार के महाराजा संतोष जी ने राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए दी थी। यह प्रतियोगिता भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन द्वारा प्रतिवर्ष अपने किसी प्रांतीय सदस्य एसोसिएशन की तरफ से करवाई जाती है। इस प्रतियोगिता में भारत के सभी प्रांतों की फुटबॉल टीमें, सैनिक और रेलवे की टीमें भाग लेती हैं। यह प्रतियोगिता, नॉक आउट-कम-लीग पर करवाई जाती है।

9. रणजी ट्रॉफी (Ranji Trophy):
पटियाला के महाराजा भूपेंद्र सिंह ने क्रिकेट के महान् खिलाड़ी रणजीत सिंह के नाम पर क्रिकेट में राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए ट्रॉफी भेंट की। यह प्रतियोगिता हर साल क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड द्वारा आयोजित की जाती है, जिसमें Role of Various Competitive Games & Sports in Physical Education भिन्न-भिन्न प्रांतों की टीमें भाग लेती हैं। यह प्रतियोगिता लीग स्तर पर करवाई जाती है। क्षेत्रीय प्रतियोगिता में विजेता टीम आगे नॉक आउट स्तर पर खेलती है।

10. सी०के० नायडू ट्रॉफी (C.K. Naidu Trophy):
सी०के० नायडू प्रतियोगिता स्कूल गेम्स फेडरेशन की तरफ से प्रत्येक वर्ष करवाई जाती है। भारत के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी सी०के० नायडू के नाम पर इस ट्रॉफी का नाम रखा गया है। इस प्रतियोगिता में स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे ही भाग ले सकते हैं। यह प्रतियोगिता नॉक आउट स्तर पर प्रतिवर्ष आयोजित की जाती है। जो टीम एक बार मैच हार जाती है, उसे प्रतियोगिता से बाहर होना पड़ता है।

प्रश्न 3.
एक अच्छे खिलाड़ी में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ? वर्णन करें।
अथवा
स्पोर्ट्समैनशिप क्या है? एक अच्छे स्पोर्ट्समैन के गुण लिखें।
अथवा
खेल-भावना से आपका क्या अभिप्राय है? एक अच्छे खिलाड़ी के गुणों या विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खेल-भावना स्पोर्ट्समैनशिप का अर्थ (Meaning of Sportmanship):
स्पोर्ट्समैनशिप खिलाड़ी के अन्दर छुपी हुई वह खेल-भावना है, जो खेलों को पवित्र कार्य का दर्जा देती है। इस भावना के अन्तर्गत एक खिलाड़ी खेलों से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु को स्नेह
और आदर करता है। वह खिलाड़ियों को खेल देवता और खेल मैदानों को धार्मिक स्थानों जैसा सम्मान देता है। एक अच्छा स्पोर्ट्समैन कभी भी विरोधी टीम के खिलाड़ियों को अपना शत्रु नहीं समझता, बल्कि उनकी ओर से दिखाई गई अच्छी खेल की प्रशंसा करता है।

स्पोर्ट्समैनशिप एक ऐसी भावना है, जो व्यक्ति के अन्दर जागृत होती है। यह वंशानुगत नहीं, अपितु लहर और जज्बे की भान्ति मनुष्य के अन्दर से उठती है। प्रत्येक शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का यह भरसक प्रयास होता है कि वह इस भावना को और उजागर करने में सहायता करें, क्योंकि ऐसी भावना वाले खिलाड़ी अथवा व्यक्ति का सम्मान समाज में अधिक होता है। यह तो जन्म के साथ-साथ चलती है और जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, वैसे-वैसे सुदृढ़ होकर निखरती जाती है। इस भावना के अंतर्गत स्पोर्ट्समैन खेलों के नियमों का पालन करता है। वह हर समय खेलों के विकास के लिए सहयोग देने के लिए तैयार रहता है।

एक अच्छे स्पोर्ट्समैन खिलाड़ी के गुण (Qualities of Good Sportsman)-एक अच्छे खिलाड़ी में निम्नलिखित गुणों का विकास होना आवश्यक है
1. सहनशीलता (Tolerance):
सहनशीलता खिलाड़ी का एक महत्त्वपूर्ण गुण है। खेल के दौरान अनेक ऐसे अवसर आते हैं, जब विजयी होने से बहुत प्रसन्नता मिलती है और हार जाने पर उदासी के बादल छा जाते हैं, परंतु अच्छा खिलाड़ी वही होता है जो विजयी . होने पर भी हारी हुई टीम अथवा खिलाड़ी को उत्साहित करे और हार जाने पर विजयी टीम को पूरे मान-सम्मान के साथ बधाई दे।

2. समानता की भावना (Spirit of Equality):
समानता की भावना खिलाड़ी के गुणों में एक महत्त्वपूर्ण गुण है। एक अच्छा खिलाड़ी खेल के दौरान जाति-पाति, धर्म, रंग, संस्कृति और सभ्यता के भेदभाव से दूर होकर प्रत्येक खिलाड़ी के साथ समानता का व्यवहार करता है।

3. सहयोग की भावना (Spirit of Co-operation):
एक अच्छे खिलाड़ी का महत्त्वपूर्ण गुण सहयोग की भावना है। यह भावना ही खेल के मैदान में सभी टीमों के खिलाड़ियों को एकजुट करती हैं। वे अपने कप्तान के अधीन रहकर विजय के लिए संघर्ष करते ‘ हैं और विजय का श्रेय केवल कप्तान अथवा किसी एक खिलाड़ी को नहीं जाता, बल्कि यह सारी टीम को जाता है।

4. अनुशासन की भावना (Spirit of Discipline):
एक अच्छे खिलाड़ी का मुख्य गुण यह है कि वह नियमपूर्वक अनुशासन में कार्य करे। वास्तविक स्पोर्ट्समैनशिप वही होती है, जिसमें खेल के सभी नियमों की पालना बहुत ही अच्छे ढंग से की जाए।

5. चेतनता (Consciousness or Awareness):
किसी भी खेल के दौरान चेतन या सचेत रहकर प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना ही स्पोर्ट्समैनशिप है। खेल में थोड़ी-सी लापरवाही भी विजय को पराजय में और सावधानी पराजय को विजय में बदल देती है। अन्य शब्दों में, प्रत्येक क्षण की चेतनता स्पोर्ट्समैन का महत्त्वपूर्ण अंग है।

6. ईमानदार और परिश्रमी (Honest and Hard Working):
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन का ईमानदार और परिश्रमी होना सबसे मुख्य गुण है। अच्छा स्पोर्ट्समैन कठोर परिश्रम का सहारा लेता है। वह उच्च खेल की प्राप्ति के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग नहीं करता, बल्कि टीम के मान-सम्मान और देश की शान के लिए आगे बढ़ता है। .

7. हार-जीत में अंतर न समझना (No Difference between Victory and Defeat):
एक अच्छा खिलाड़ी वही माना जाता है जो खेल के नियमों का पालन करता है और वफादारी के साथ खेल में भाग लेता है। यदि खेल के अच्छे प्रदर्शन से उसकी टीम विजयी होती है तो खुशी में वह विरोधी टीम अथवा खिलाड़ी को मज़ाक का हिस्सा नहीं बनाता, अपितु वह दूसरे पक्ष को अच्छे प्रदर्शन के लिए बधाई देता है। यदि वह पराजित हो जाता है तो वह निराश होकर अपना मानसिक संतुलन नहीं गँवाता।

8. ज़िम्मेदारी की भावना (Spirit of Responsibility):
एक अच्छा खिलाड़ी अपनी ज़िम्मेदारी को अच्छी तरह समझता है और उसको ठीक ढंग से निभाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ता। उसे इस बात का एहसास होता है कि यदि वह अपनी जिम्मेदारी से थोड़ा-सा भी पीछे हटा तो उसकी टीम की पराजय निश्चित है। परिणामस्वरूप खिलाड़ी अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाते हुए खेल में शुरू से लेकर अंत तक पूरी शक्ति से भाग लेता है।

9. मुकाबले की भावना (Spirit of Competition):
एक अच्छा खिलाड़ी वही है, जो अपनी जिम्मेदारी को समझता है। वह प्रत्येक कठिनाई में साथी खिलाड़ियों को हौसला देता है और अच्छा खेलने, उत्साह और अन्य प्रयत्न करने की प्रेरणा देता है। वास्तव में खेल की विजय का सारा रहस्य मुकाबले की भावना में होता है। वह करो या मरो की भावना से खेल के मैदान में जूझता है, परन्तु यह भावना बिना किसी वैर-विरोध के होती है। इस भावना में किसी टीम अथवा खिलाड़ी के प्रति बुरी भावना नहीं रखी जाती।

10. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice):
एक अच्छे खिलाड़ी में यह गुण होना भी अनिवार्य है। किसी भी टीम में खिलाड़ी केवल अपने लिए ही नहीं खेलता, अपितु उसका मुख्य लक्ष्य सारी टीम को विजयी करने का होता है। इससे स्पष्ट है कि प्रत्येक खिलाड़ी निजी स्वार्थ को त्यागकर पूरी टीम के लिए खेलता है। वह अपनी टीम को विजयी करने के लिए बहुत संघर्ष करता है। वह अपनी टीम की विजय को अपनी विजय समझता है और उसका सिर सम्मान से ऊँचा हो जाता है। परिणामस्वरूप त्याग की भावना रखने वाला खिलाड़ी ही वास्तव में अच्छा खिलाड़ी होता है। ऐसी भावना वाले खिलाड़ी ही अपनी टीम, स्कूल, प्रांत, क्षेत्र, देश और राष्ट्र के नाम को चार चाँद लगाते हैं।

11. आत्म-विश्वास की भावना (Spirit of Self-confidence):
यह गुण खिलाड़ी का बड़ा ही महत्त्वपूर्ण गुण है। खेल वही खिलाड़ी जीत सकता है, जिसमें आत्म-विश्वास की भावना है। आत्म-विश्वास के बिना खेलना असंभव है। अच्छा खिलाड़ी संतुष्ट और शांत स्वभाव वाला दिखाई देता है। इससे उसका आत्म-विश्वास ज़ाहिर होता है।

12. भ्रातृभाव की भावना (Spirit of Brotherhood):
स्पोर्ट्समैन में भ्रातृभाव की भावना का होना बहुत आवश्यक है। वह जाति-पाति, रंग-भेद, धर्म, संस्कृति और सभ्यता को अपने रास्ते में नहीं आने देता और सभी व्यक्तियों से एक-जैसा व्यवहार करता है। वह सबको एक प्रभु की संतान मानता है और इस कारण वे सभी भाई-भाई हैं।

प्रश्न 4.
टूर्नामेंट करवाने के लिए कौन-कौन-सी प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
खेलकूद प्रतियोगिताएँ करवाने के लिए आमतौर पर हम किन-किन प्रणालियों को अपनाते हैं?
उत्तर:
टूर्नामेंट खेलकूद प्रतियोगिताएँ करवाने के लिए निम्नलिखित प्रणालियाँ अपनाई जाती हैं.

1. नॉक-आउट प्रणाली (Knock-out System):
नॉक-आउट प्रणाली के अंतर्गत टीमों की गिनती देखकर विगत चार वर्षों की विजयी टीमों को बारी दी जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि इनमें से कोई टीम पहले चरण में एक-दूसरे से मुकाबला करके हार न जाए। सामान्यतया विगत वर्ष की विजयी टीम को सबसे ऊपर, रनर-अप टीम को सबसे नीचे और तीसरे व चौथे स्थान पर रहने वाली टीम को कहीं बीच में रखा जाता है। शेष टीमों को उनकी स्थिति या पर्चियाँ डालकर जोड़ियों में बदला जाता है। फाइनल में जीतने वाली टीम को विजेता और हारने वाली या दूसरे नंबर पर आने वाली टीम को उपविजेता (रनर-अप) घोषित किया जाता है और सेमी-फाइनल में हारने वाली टीमों को तीसरा व चौथा स्थान मिलता है।

2. लीग-कम-नॉक-आउट प्रणाली (League-cum-Knock-out System):
लीग-कम-नॉक-आउट प्रणाली में खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाली टीमों के ग्रुप बना दिए जाते हैं। किसी भी ग्रुप में टीमों की संख्या तीन से कम नहीं होती। ग्रुप प्रणाली में मैच लीग प्रणाली के आधार पर खेले जाते हैं। हर ग्रुप में प्रथम स्थान पर आने वाली टीम नॉक-आउट प्रणाली द्वारा खेलती है ताकि पहले चार स्थानों को सुनिश्चित किया जा सके। लेकिन जब ग्रुपों की संख्या दो हो तो प्रत्येक ग्रुप की दो विजेता टीमें अन्तिम चार में स्थान प्राप्त करती हैं और यहाँ ये आपस में एक दूसरे ग्रुप की टीमों से खेलती हैं। ये टीमें पहले दो स्थानों के लिए आपस में खेलती हैं। पहले ग्रुप की विजयी टीम दूसरे ग्रुप की रनर-अप टीम के साथ खेलती है। हारने वाली टीमें तीसरे तथा चौथे स्थान के लिए खेलती हैं। यदि टीमों को चार ग्रुपों (A, B, C, D) में बाँटा जाए तो प्रत्येक ग्रुप की विजेता टीम को लिया जाता है। A-ग्रुप की विजयी टीम C-ग्रुप की विजयी टीम से खेलेगी। B-ग्रुप की विजयी टीम D-ग्रुप की विजयी टीम के साथ खेलेगी। जो दो टीमें विजयी होंगी वे आपस में फाइनल में आमने-सामने होंगी।

3. नॉक-आउट-कम-लीग प्रणाली (Knock-out-cum League System):
इस प्रणाली में नॉक-आउट प्रणाली द्वारा सेमी-फाइनल (Semi-final) में पहुँचने वाली टीमों को पुनः लीग के अनुसार खेलना पड़ता है। अंकों के आधार पर प्रथम चार स्थानों का निर्णय किया जाता है।

4. लीग प्रणाली (League System):
लीग टूर्नामेंट वह टूर्नामेंट है जिसमें भाग लेने वाली प्रत्येक टीम एक-दूसरे के खिलाफ खेलती हैं। इस टूर्नामेंट में विजयी टीम को 2 अंक, मैच को ड्रॉ करवाने वाली टीमों को 1 – 1 अंक और हारने वाली टीम को शून्य दिया जाता है। लीग प्रणाली में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली टीम को विजयी घोषित कर ईनाम दिया जाता है। यदि दो टीमों के अंक बराबर हों तो ऐसी स्थिति में उनके द्वारा किए गए प्रदर्शन के आधार पर विजेता टीम का फैसला किया जाता है।

5. लीग-कम-लीग प्रणाली (League-cum-League System):
इस प्रणाली में आयोजित टूर्नामेंट के विभिन्न पूलों (वर्गों) में विजयी टीमों को एक-दूसरे के खिलाफ खेलना पड़ता है।

6. दोहरी लीग प्रणाली (Double League System):
दोहरी लीग प्रणाली में पूल नहीं बनाए जाते। सभी टीमें एक-दूसरे के साथ आपस में खेलती हैं। सभी टीमें आपस में बिना पूल के दो बार खेलती हैं। जो टीम दोनों बार अधिक-से-अधिक अंक प्राप्त करती है तो अधिक अंक प्राप्त करने वाली टीम को विजयी घोषित कर दिया जाता है।

प्रश्न 5.
खेल प्रतियोगिताओं से खिलाड़ी में किन-किन गुणों का विकास होता है? व्याख्या कीजिए।
अथवा
खेल प्रतियोगिताओं से खिलाड़ी या व्यक्ति में कौन-कौन-से गुण विकसित होते हैं? विस्तृत वर्णन करें। अथवा “खेलकूद से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव होता है।” इस कथन का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खेलों का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है, क्योंकि इनसे व्यक्ति को न केवल शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है, बल्कि ये उसके सम्मान में भी वृद्धि करने में सहायक होते हैं। इनसे व्यक्तियों या खिलाड़ियों में विभिन्न प्रकार के नैतिक एवं सामाजिक गुणों का विकास होता है। ये उनके सर्वांगीण विकास में सहायक होते हैं। अत: खेल प्रतियोगिताओं से खिलाड़ी में विकसित होने वाले गुण निम्नलिखित हैं

1. आत्म-विश्वास (Self-confidence):
खेल एक व्यक्ति में आत्म-विश्वास (Self-confidence) का गुण विकसित करते हैं। जब वह जीत जाता है तो उसे लगता है कि वह कुछ भी कर सकता है। अतः खेलों से खिलाड़ी में आत्म-विश्वास बढ़ता है।

2. आज्ञा पालन की भावना (Feeling of Obedience):
खेल प्रतियोगिता द्वारा खिलाड़ी में आज्ञा पालन की भावना विकसित हो जाती है। खेलते समय खिलाड़ी को अपने रैफरी, कोच या कप्तान के आदेशों का पालन करना पड़ता है। इससे उसे आज्ञा पालन की आदत पड़ जाती है।

3. उत्तरदायित्व की भावना (Feeling of Responsibility):
खिलाड़ी को हर समय ध्यान रखना पड़ता है कि उसकी लापरवाही से टीम पराजित हो सकती है। खेलों से उसमें उत्तरदायित्व की भावना आ जाती है।

4. त्याग की भावना (Feeling of Sacrifice):
खेल के समय खिलाड़ी अपने हितों को त्यागकर टीम के हितों का ध्यान रखता है। उसमें त्याग का गुण विकसित हो जाता है।

5. दृढ़-संकल्प की भावना (Feeling of Resolution):
खिलाड़ी जीतने के लिए जी-तोड़ मेहनत करता है। जीतने की इच्छा उसमें दृढ़-संकल्प की भावना उत्पन्न करती है।

6. समय का पाबंद (Punctuality):
खिलाड़ी को समय पर खेलने जाना पड़ता है। थोड़ी देर से पहुँचने पर वह मैच में भाग नहीं ले सकता। इस प्रकार खेल प्रतियोगिता मनुष्य को समय का पाबंद बनाती है।

7. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना (Feeling of International Co-operation):
अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक देश के खिलाड़ी दूसरे देशों के खिलाड़ियों के साथ खेलते हैं और उनके संपर्क में आते हैं, जिससे उन्हें एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है और उनमें अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना उत्पन्न होती है।

8. दूसरों की सहायता की भावना (Feeling of Co-operation):
खिलाड़ी को अन्य खिलाड़ियों के साथ मिलकर खेलना पड़ता है। उसमें दूसरों की सहायता करने की भावना उत्पन्न हो जाती है।

9. आदर्श खेल की भावना (Spirit of Fair Play):
अच्छा खिलाड़ी खेल को खेल के लिए खेलता है, न कि हार-जीत के लिए। वह हेरा-फेरी से या फाउल खेलकर जीतना नहीं चाहता, जिससे उसमें आदर्श खेल की भावना आ जाती है।

10. अनुशासन का गुण (Quality of Discipline):
प्रत्येक खेल नियमों में बंधे होते हैं। इन नियमों की पालना हर खिलाड़ी को करनी होती है। यदि वह इन नियमों की अवहेलना करता है तो उसे खेल से बाहर कर दिया जाता है। इसलिए खिलाड़ी इन नियमों की पालना करता है जिससे उसमें अनुशासन का गुण विकसित हो जाता है।

11. चरित्र का विकास (Development of Character):
खेलों से खिलाड़ी के चरित्र का विकास भी होता है क्योंकि खिलाड़ी के पास खाली समय न होने के कारण उसमें बुरी आदतें नहीं पनप पातीं।

12. भावनाओं पर नियंत्रण (Control on Emotions):
एक व्यक्ति खेलते समय खेल में इतना मग्न हो जाता है कि वह जीवन की चिंताओं व झंझटों की ओर कोई ध्यान नहीं देता। वह खेलों के माध्यम से क्रोध, चिन्ता, भय आदि भावनाओं पर नियन्त्रण पा लेता है।

13. सहनशीलता एवं धैर्य की भावना (Feeling of Tolerance and Patience):
खेलों से खिलाड़ी में सहनशीलता एवं धैर्य की भावना विकसित होती है। यह भावना उसके जीवन को गति प्रदान करती है और उसके सम्मान में भी वृद्धि करती है।

प्रश्न 6.
लीग टूर्नामेंट किसे कहते हैं? इस टूर्नामेंट में फिक्सचर/आरेखण देने की प्रक्रिया का उल्लेख करें।
अथवा
लीग टूर्नामेंट में फिक्सचर तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली विधियों का वर्णन करें।
उत्तर:
लीग टूर्नामेंट का अर्थ (Meaning of League Tournament):
लीग टूर्नामेंट वह टूर्नामेंट है जिसमें भाग लेने वाली प्रत्येक टीम एक-दूसरे के खिलाफ खेलती हैं। लीग टूर्नामेंट में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाली टीम को विजयी घोषित कर ईनाम दिया जाता है। यदि दो टीमों के अंक बराबर हों तो ऐसी स्थिति में उनके द्वारा किए गए प्रदर्शन के आधार पर विजेता टीम का फैसला किया जाता है।

लीग टूर्नामेंट में फिक्सचर देने की प्रक्रिया (Drawing the Fixture in League Tournament):
लीग टूर्नामेंट में फिक्सचर तैयार करने के तीन मुख्य तरीके निम्नलिखित हैं…

1. सीढ़ीनुमा विधि (Staircase Method)किसी भी टीम को कोई बाई नहीं दी जाती और इसमें टीमों की संख्या सम हो या विषम हो, कोई समस्या नहीं होती।
उदाहरण-11 टीमों का फिक्सचर (Fixture) निम्नानुसार होगा
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खेले जाने वाले मैचों की कुल संख्या
= \(\frac{N(N-1)}{2}\) = \(\frac{11(11-1)}{2}\) = \(\frac{11(10)}{2}\) = \(\frac{110}{2}\) = 55

2. चक्रीय/साइक्लिक विधि (Cyclic Method):
इस पद्धति में एक टीम को स्थिर रखा जाता है और अन्य टीमें एक विशेष . दिशा में आगे बढ़ती हैं। यदि टीमों की संख्या सम होती है तो कोई बाई नहीं दी जाती, लेकिन अगर भाग लेने वाली टीमों की संख्या विषम हो, तो प्रत्येक दौर (राउंड) में एक बाई दी जाती है।
उदाहरण-8 टीमों का फिक्सचर (सम संख्या)
कुल टीमें = 8

मैचों की संख्या = \(\frac{\mathrm{N}(\mathrm{N}-1)}{2}\) = \(\frac{8(8-1)}{2}\) = \(\frac{8(7)}{2}\) = \(\frac{56}{2}\) = 28
राउंड की संख्या = N – 1 = 8 – 1 =7
8 टीमों का फिक्सचर:
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3. सारणी बंध/टैबूलर विधि (Tabular Method):
इस विधि में टैबूलर की तरह फिक्सचर पाया जाता है अर्थात् टेढ़ी व खड़ी रेखाएँ बनाकर फिक्सचर पाया जाता है। यदि टीमों की कुल संख्या समान (Even) हो तो खानों/वर्गों में कुल संख्या = N + 1 होगी। यदि टीमों की कुल संख्या विषम (Odd) हो तो खानों/वर्गों की कुल संख्या = N + 2 होगी। खानों की अपेक्षित संख्या बना लेने के बाद चौरस के ऊपर वाले कोने को उसके उलट नीचे वाले कोने से मिला देना चाहिए। उदाहरण के लिए, यदि 6 टीमों का फिक्सचर पाना है तो कुल टीमें 6 + 1 = 7 खाने कुल राउंड = 5.
6 टीमों का फिक्सचर
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प्रश्न 7.
फिक्सचर/आरेखण क्या है? नॉक-आउट टूर्नामेंट के आधार पर 19 टीमों का एक फिक्सचर तैयार करें।
उत्तर:
(1) फिक्सचर का अर्थ (Meaning of Fixture):
फिक्सचर या स्थिरता एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से टीमों/ खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता टॉस आदि द्वारा निश्चित की जाती है। यह टीमों को उनकी टीम द्वारा खेले जाने वाले मैच का समय, स्थान और तिथि,के बारे में सूचित करता है।

(2) नॉक-आउट टूर्नामेंट में फिक्सचर तैयार करना (Drawing the Fixture in Knock-out Tournament):
नॉक-आउट टूर्नामेंट के आधार पर 19 टीमों का फिक्सचर इस प्रकार होगा

ऊपरी अर्ध-भाग की टीमें = \(\frac{\mathrm{N}+1}{2}\)
= \(\frac{19+1}{2}\) = \(\frac{20}{2}\) = 10

निचले अर्ध-भाग की टीमें =\(\frac{\mathrm{N}-1}{2}\)
= \(=\frac{19-1}{2}\) = \(\frac{18}{2}\) = 9

दी जाने वाली बाईज़ की संख्या (टीमों की संख्या को 2 की पावर (घात) वाले अगले उच्च अंक में से घटाएँ) अर्थात् 32 – 19 = 13
ऊपरी अर्ध-भाग में दी जाने वाली बाईज़ की संख्या = = \(\frac{N b-1}{2}\) = \(\frac{13-1}{2}\) = \(\frac{12}{2}\) = 6
निचले अर्ध-भाग में दी जाने वाली बाईज़ की संख्या = \(\frac{N b+1}{2}\) = \(\frac{13+1}{2}\) = \(\frac{14}{2}\) = 7
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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
टूर्नामेंट क्या है? इसको आयोजित करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
टूर्नामेंट-टूर्नामेंट एक प्रतिस्पर्धा है जिसमें अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में प्रतियोगी भाग लेते हैं। अत: टूर्नामेंट विभिन्न टीमों के बीच कई दौरों की एक बड़ी प्रतियोगिता है। यह एक निश्चित कार्यक्रम के अनुसार किसी विशेष गतिविधि में विभिन्न टीमों के बीच आयोजित एक प्रतियोगिता है जहाँ विजेता का फैसला किया जाता है। टूर्नामेंट आयोजित करवाते समय ध्यान देने योग्य बातें-टूर्नामेंट आयोजित करवाते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

(1) किसी टूर्नामेंट का आयोजन करने हेतु अपेक्षित समय होना चाहिए।
(2) टूर्नामेंट के दौरान प्रयोग होने वाले अपेक्षित सामान व उपकरणों की व्यवस्था टूर्नामेंट से पहले ही करनी चाहिए।
(3) टूर्नामेंट में शामिल होने वाली टीमों को समय रहते टूर्नामेंट आयोजन की जानकारी देनी चाहिए, ताकि सभी टीमें अपनी आवश्यक तैयारी कर सकें।
(4) टूर्नामेंट को आयोजित करने वाले अच्छे अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पहले ही व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि टूर्नामेंट का आयोजन सही ढंग से हो सके।
(5) टूर्नामेंट संबंधी आवश्यक समितियों की व्यवस्था पहले ही कर लेनी चाहिए और उनको जिम्मेवारियाँ बाँट देनी चाहिए।
(6) टूर्नामेंट पर खर्च होने वाली राशि का पूर्व अनुमान कर लेना चाहिए, ताकि धन की कमी के कारण टूर्नामेंट के बीच में कोई बाधा उत्पन्न न हो।

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प्रश्न 2.
खेल मुकाबलों से क्या-क्या लाभ होते हैं? संक्षेप में वर्णन करें। अथवा खेल प्रतियोगिताओं के लाभ बताइए।
उत्तर खेलों का जन्म मनुष्य के जन्म के साथ ही हुआ। खेल प्रतियोगिताएँ आधुनिक मनुष्य के जीवन का अटूट अंग हैं । ये हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से लाभदायक हैं
(1) खेल प्रतियोगिता मनुष्य में आत्म-विश्वास का गुण विकसित करती है। यह आत्म-विश्वास उसे विपत्तियों का निडरता से सामना करने में सहायक होता है।
(2) दिन-भर काम करने के पश्चात् उसमें कुछ अतिरिक्त शारीरिक शक्ति बच जाती है। इस बची हुई शक्ति का खेल प्रतियोगिता में भाग लेने से ठीक प्रयोग हो जाता है।
(3) खेल प्रतियोगिता में भाग लेने से मनुष्य के मन के संवेगों का निकास हो जाता है, जिससे वह राहत महसूस करता है।
(4) खेल प्रतियोगिताएँ मनुष्य में मुकाबले की भावना पैदा करती हैं।
(5) खेल प्रतियोगिताओं में भाग लेने से मनुष्य का मनोरंजन होता है और वह उकताहट व थकावट से छुटकारा पा लेता है।
(6) खेल प्रतियोगिता में भाग लेने वाले खिलाड़ी का शरीर बलवान रहता है। उसमें चुस्ती और स्फूर्ति रहती है तथा स्वास्थ्य ठीक रहता है।
(7) अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में एक देश के खिलाड़ी दूसरे देशों के खिलाड़ियों के साथ खेलते हैं और उनके संपर्क में आते हैं, जिससे उन्हें एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है और उनमें अंतर्राष्ट्रीय भावना उत्पन्न होती है।
(8) खेल प्रतियोगिता द्वारा व्यक्ति में दृढ़-संकल्प आता है। वह सही समय पर सही निर्णय लेना सीख जाता है। इससे वह अपनी टीम की हार को भी जीत में बदल सकता है।
(9) खेल प्रतियोगिता से खिलाड़ियों को नए नियमों की जानकारी मिलती है जिससे वे अपने खेल के स्तर को ऊँचा कर सकते हैं।
(10) खेल प्रतियोगिताओं से अनेक नैतिक एवं सामाजिक गुण विकसित होते हैं।

प्रश्न 3.
प्रतियोगितात्मक खेलकूदों के मुख्य उद्देश्य बताएँ। अथवा खेलों के प्रमुख उद्देश्यों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्रतियोगितात्मक खेलकूदों के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) शारीरिक विकास में सहायता करना।
(2) आत्म-अभिव्यक्ति का अवसर देना।
(3) नेतृत्व का गुण विकसित करना।
(4) आदर्श खेल भावना का विकास करना।
(5) त्याग एवं सहयोग की भावना का विकास करना।
(6) समय के प्रति जागरूकता की भावना पैदा करना।
(7) प्रतिस्पर्धा की भावना का विकास करना।
(8) देश-भक्ति की भावना का विकास करना।

प्रश्न 4.
रंगास्वामी कप या राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भारतीय हॉकी एसोसिएशन ने राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता सन् 1927 में आरंभ करवाई। इस प्रतियोगिता में मोरिस नामक न्यूजीलैंड के निवासी को सन् 1935 में तथा सन् 1946 में पंजाब एसोसिएशन के सचिव बख्शीश अलीशेख को शील्ड प्रदान की गई। लेकिन विभाजन के कारण यह शील्ड पाकिस्तान में ही रह गई, क्योंकि बख्शीश अलीशेख पाकिस्तान में रहने लगा था। विभाजन के पश्चात् मद्रास के समाचार-पत्र ‘हिंद’ तथा ‘स्पोर्ट्स एंड पास्टाइम’ के मालिकों ने अपने संपादक श्री रंगास्वामी के नाम पर राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता के लिए एक नया कप प्रदान किया। इस कारण इस प्रतियोगिता को ‘रंगास्वामी कप’ के नाम से जाना जाता है। यह प्रतियोगिता ‘नॉक-आउट’ स्तर पर करवाई जाती है।

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प्रश्न 5.
सुबोटो मुखर्जी कप टूर्नामेंट पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
डूरंड कमेटी पिछले कई वर्षों से सीनियर वर्ग के लिए फुटबॉल का टूर्नामेंट करवा रही है। इस कमेटी ने स्कूल के बच्चों के लिए खेल की महत्ता को.मुख्य रखते हुए सुब्रोटो मुखर्जी फुटबॉल टूर्नामेंट शुरू किया है। यह टूर्नामेंट प्रतिवर्ष नवंबर और दिसंबर के महीने में दिल्ली में खेला जाता है। इस टूर्नामेंट में किसी राज्य की एक ही स्कूल की सर्वोत्तम टीम भाग ले सकती है। इस टूर्नामेंट में भाग लेने वाले खिलाड़ी की आयु 16 वर्ष तक की होनी चाहिए। विजयी टीम को एक आकर्षक ट्रॉफी दी जाती है और अच्छे खिलाड़ियों को वजीफे भी दिए जाते हैं।

प्रश्न 6.
खेल एक व्यक्ति में किस प्रकार नेतृत्व का गुण उत्पन्न करने में सहायक होते हैं?
उत्तर:
खेल एक व्यक्ति में नेतृत्व का गुण उत्पन्न करने में सहायक होते हैं। खेलकूद में नेतृत्व करने वाला व्यक्ति जीवन में भी नेतृत्व करने की कला सीख जाता है। देश के लिए अच्छा नेता वरदान सिद्ध होता है। इतिहास साक्षी है कि खेल के मैदानों ने हमें अनुशासन-प्रिय, आत्म-त्यागी, आत्म-संयमी, ईमानदार और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर करने वाले नागरिक व सैनिक प्रदान किए हैं। इसीलिए तो ड्यूक ऑफ विलिंग्टन ने वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन महान् को पराजित करने के पश्चात् कहा था, “वाटरलू का युद्ध तो ऐटन और हैरो के खेल के मैदान में जीता गया था।”

प्रश्न 7.
नॉक-आउट प्रणाली का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नॉक-आउट के अंतर्गत विगत चार वर्षों की विजयी टीमों को बारी दी जाती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि इनमें से कोई टीम पहले चरण में एक-दूसरे से मुकाबला करके हार न जाए। सामान्यतया विगत वर्ष की विजयी टीम को सबसे ऊपर, रनर-अप टीम को सबसे नीचे और तीसरे व चौथे स्थान पर रहने वाली टीम को कहीं बीच में रखा जाता है। शेष टीमों को उनकी स्थिति या पर्चियाँ डालकर जोड़ियों में बाँटा जाता है। फाइनल में जीतने वाली टीम को विजेता और हारने वाली या दूसरे नंबर पर आने वाली टीम को उपविजेता (रनर-अप) घोषित किया जाता है।

प्रश्न 8.
खेल प्रतियोगिताएँ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना को कैसे बढ़ाती हैं?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में एक देश के खिलाड़ी दूसरे देशों के खिलाड़ियों के साथ खेलते हैं और उनके संपर्क में आते हैं, जिससे उन्हें एक-दूसरे को समझने का अवसर मिलता है। इससे दोनों देशों के खिलाड़ियों में मित्रता व सूझ–बूझ बढ़ती है। इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना विकसित होती है। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग की भावना से विश्व में शांति स्थापित करने में सहायता मिलती है।

प्रश्न 9.
खेल मुकाबले व्यक्ति के चरित्र-विकास में कैसे सहायक होते हैं?
उत्तर:
खेल मुकाबले व्यक्ति के चरित्र-विकास में सहायक होते हैं। कई बार हम देखते हैं कि कुछ व्यक्ति खेलों में विजय प्राप्त करने के लिए दूसरी टीम के खिलाड़ियों को धन का लोभ देते हैं। प्रभावित खिलाड़ी प्रायश्चित करने के बाद भी अपना खोया हुआ सम्मान वापिस प्राप्त नहीं कर पाता। एक अच्छा खिलाड़ी साफ-सुथरा खेलते हुए खेल में विजय प्राप्त करने का प्रयास करता है। वह विजय के लिए किसी गलत ढंग का सहारा नहीं लेता। खेल मुकाबलों से उसमें अनेक सामाजिक व नैतिक गुण विकसित होते हैं; जैसे सहयोग, सहनशीलता, अनुशासन, बंधुत्व व आत्मविश्वास आदि। अतः स्पष्ट है कि खेलों से व्यक्ति/खिलाड़ी में अनेक चारित्रिक गुण विकसित होते हैं।

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प्रश्न 10.
राष्ट्र को खेल मुकाबलों से क्या लाभ होते हैं? अथवा
किसी भी राष्ट्र के लिए खेलों का क्या महत्त्व है? उत्तर-राष्ट्र को खेल मुकाबले से निम्नलिखित लाभ होते हैं

1. राष्ट्रीय एकता:
खेलों के माध्यम से व्यक्तियों में राष्ट्रीय एकता का विकास होता है। एक राज्य के खिलाड़ी दूसरे राज्यों के खिलाड़ियों से खेलने के लिए आते-जाते रहते हैं। उनके परस्पर समन्वय से राष्ट्रीय भावना उत्पन्न होती है।

2. अंतर्राष्ट्रीय भावना:
एक देश की टीमें दूसरे देशों में मैच खेलने जाती हैं। इससे दोनों देशों के खिलाड़ियों में मित्रता और सूझ-बूझ बढ़ती है, जिससे परस्पर भेदभाव मिट जाते हैं। इस प्रकार अंतर्राष्ट्रीय भावना विकसित होती है। अंतर्राष्ट्रीय भावना के विकास से शांति स्थापित होती है।

3. अच्छे और अनुभवी नेता:
खेलों के द्वारा अच्छे नेता पैदा होते हैं क्योंकि खेल के मैदान में खिलाड़ियों को नेतृत्व के बहुत से अवसर मिलते हैं। खेलों के ये खिलाड़ी बाद में अच्छी तरह से अपने देश की बागडोर संभालने में सक्षम हो सकते हैं।

4. अच्छे नागरिक गुणों का विकास:
खेलें खिलाड़ियों में आज्ञा-पालन, नियम-पालन, जिम्मेदारी निभाना, आत्म-विश्वास, सहयोग आदि गुणों का विकास करती हैं। इन गुणों से युक्त व्यक्ति श्रेष्ठ नागरिक बन जाता है। श्रेष्ठ और अच्छे नागरिक ही देश की बहुमूल्य संपत्ति होते हैं।

प्रश्न 11.
विद्यार्थी जीवन में खेलकूद का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
विद्यार्थी जीवन में खेलकूद का विशेष महत्त्व है। विद्यार्थी शुरू से ही खेलों में रुचि लेते हैं तथा पढ़ाई के साथ उनकी यह रुचि और बढ़ जाती है। विद्यार्थियों के मानसिक विकास के साथ-साथ शारीरिक विकास का भी होना अति आवश्यक है। स्वस्थ मस्तिष्क स्वस्थ शरीर में ही निवास करता है। अत: खेलकूद एवं व्यायाम शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं। इनसे विद्यार्थियों का सर्वांगीण व्यक्तित्व विकसित होता है। खेलों का न केवल शारीरिक विकास की दृष्टि से अधिक महत्त्व है, बल्कि बौद्धिक, शैक्षिक, सामाजिक, संवेगात्मक विकास आदि के लिए भी इनका उतना ही महत्त्व है।

प्रश्न 12.
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ?
उत्तर:
एक अच्छे स्पोर्ट्समैन में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) एक अच्छे स्पोर्ट्समैन में खेल भावना अवश्य होनी चाहिए।
(2) उसमें सहनशीलता एवं धैर्यता होनी चाहिए। उसको हार-जीत को अपने पर हावी नहीं होने देना चाहिए। हारने पर आवश्यकता से अधिक उत्साहित नहीं होना चाहिए और जीतने पर खुशी में मस्त होकर विरोधी टीम या खिलाड़ी का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए।
(3) उसमें अनुशासन, आत्म-विश्वास, सहयोग, समानता, त्याग आदि की भावना होनी चाहिए।
(4) उसे ईमानदार एवं परिश्रमी होना चाहिए।
(5) उसमें प्रतिस्पर्धा और जिम्मेदारी की भावना होनी चाहिए।
(6) उसमें भातृत्व की भावना भी होनी चाहिए। रंग, रूप, आकार, धर्म आदि के नाम पर किसी से कोई मतभेद नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 13.
खेलों से खिलाड़ी या व्यक्ति में विकसित होने वाले प्रमुख गुण बताएँ। उत्तर-खेलों से खिलाड़ी या व्यक्ति में निम्नलिखित प्रमुख गुण विकसित होते हैं
1. आत्म:
विश्वास-खेलें मनुष्य में आत्म-विश्वास का गुण विकसित करती हैं। यही आत्म-विश्वास उसे विपत्तियों का निडरता से सामना करने में सहायक होता है।

2. आदर्श खेल की भावना:
अच्छा खिलाड़ी खेल को खेल की भावना से खेलता है, हार-जीत के लिए नहीं। वह हेरा-फेरी से या फाउल खेलकर जीतना नहीं चाहता, जिससे उसमें आदर्श खेल की भावना आ जाती है।

3. मुकाबले की भावना:
खेल मनुष्य में मुकाबले की भावना पैदा करते हैं। प्रत्येक खिलाड़ी विरोधी खिलाड़ी से अच्छा खेलने का प्रयत्न करता है। वे पहले खेलों में फिर जीवन में दूसरों से डटकर मुकाबला करना सीखते हैं।

4. दूसरों की सहायता की भावना:
खिलाड़ी को हर समय दूसरों के साथ मिलकर खेलना पड़ता है। अतः उसमें दूसरों की सहायता करने की भावना उत्पन्न हो जाती है।

5. त्याग की भावना:
खेलों से खिलाड़ी में त्याग का गुण विकसित हो जाता है।

प्रश्न 14.
खेलों द्वारा बच्चे कौन-से अच्छे गुण सीखते हैं?
उत्तर:
खेलों द्वारा बच्चे निम्नलिखित गुण सीखते हैं
(1) बड़ों, अध्यापकों तथा कोचों की आज्ञा का पालन करना।
(2) नियमों की पालना तथा समय का पाबंद होना।
(3) दूसरों के साथ मिलकर चलना तथा सहयोगी बनना।
(4) मन में पक्का इरादा तथा स्व-विश्वास पैदा करना।

प्रश्न 15.
एथलेटिक्स में कितने प्रकार के इवेंट्स होते हैं? उल्लेख कीजिए।
अथवा
एथलेटिक्स में फील्ड इवेंट्स कौन-कौन-से होते हैं?
अथवा
एथलेटिक्स में छलाँग एवं श्री इवेंट्स का उल्लेख करें।
उत्तर:
एथलेटिक्स में दो प्रकार के इवेंट्स होते हैं
1. ट्रैक इवेंट्स-ट्रैक इवेंट्स या दौड़ें निम्नलिखित प्रकार की होती हैं
(1) छोटी दूरी की दौड़,
(2) मध्यम दूरी की दौड़,
(3) लम्बी दूरी की दौड़,
(4) बाधा दौड़ या हर्डल्ज,
(5) रिले दौड़।

2. फील्ड इवेंट्स-एथलेटिक्स में फील्ड इवेंट्स निम्नलिखित दो प्रकार के होते हैं
(1) छलाँग इवेंट्स-छलाँग या कूदने वाले इवेंट्स में निम्नलिखित इवेंट्स शामिल होते हैं
(i) ऊँची छलाँग,
(ii) लम्बी छलाँग,
(iii) ट्रिप्पल जंप,
(iv) पोल वॉल्ट।।

(2) थ्रो इवेंट्स-थ्रो इवेंट्स में निम्नलिखित इवेंट्स शामिल होते हैं
(i) जैवलिन थ्रो,
(ii) डिस्कस थ्रो,
(ii) शॉट पुट,
(iv) हैमर थ्रो।

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प्रश्न 16.
लीग टूर्नामेंट के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
लीग टूर्नामेंट के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं
(1) यह टूर्नामेंट के एक योग्य विजेता को प्रस्तुत करता है।
(2) यह सभी प्रतियोगियों को रैंकिंग देता है।
(3) यह अंत तक रुचि को बनाए रखता है क्योंकि सभी प्रतिभागियों को लीग के अंत तक खेलना होता है।
(4) यह सभी टीमों या खिलाड़ियों को संतुष्ट करता है, क्योंकि सभी टीमों को एक-दूसरे के विरुद्ध खेलने का समान अवसर मिलता है।
(5) टीमों द्वारा अधिक संख्या में मैच खेले जा सकते हैं।
(6) अधिकतम संख्या में मैचों के कारण लीग टूर्नामेंट के माध्यम से खेलों को और अधिक लोकप्रिय बनाया जा सकता है।

प्रश्न 17.
बाई को निर्धारित करने का तरीका स्पष्ट करें।
उत्तर:
जब प्रतियोगिता में कुल टीमों की संख्या 2 की घात (Power) में न हो तो बाई दी जाती है। बाई देने का तरीका है
(1) सबसे पहले बाई निचले अर्ध-भाग की अन्तिम टीम को दी जाती है।
(2) दूसरी बाई ऊपरी अर्ध-भाग की पहली टीम को दी जाती है।
(3) तीसरी बाई निचले अर्ध-भाग की सबसे ऊपरी टीम को दी जाती है।
(4) चौथी बाई ऊपरी अर्ध-भाग की सबसे नीचे वाली टीम को दी जाती है।
(5) अन्य बाई इसी क्रम से निर्धारित की जाती है।

प्रश्न 18.
सीढ़ीनुमा विधि का अनुसरण करते हुए लीग टर्नामेंट के आधार पर 9 वॉलीबॉल टीमों का एक फिक्सचर बनाएँ।
उत्तर:
9 वॉलीबॉल टीमों का फिक्सचर निम्नानुसार होगा
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खेले जाने वाले मैचों की कुल संख्या:
=\(\frac{\mathrm{N}(\mathrm{N}-1)}{2}\) = \( \frac{9(9-1)}{2}\) = \(\frac{9(8)}{2}\) = \( \frac{72}{2} \) = 36

प्रश्न 19.
लीग टूर्नामेंट की टैबूलर विधि के आधार पर 7 टीमों का फिक्सचर बनाएँ।
उत्तर:
यदि 7 टीमों का फिक्सचर बनाना है, तो कुल टीमें 7 + 2 = 9 खाने
कुल राउंड =7
7 टीमों का फिक्सचर
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान 6

पहला राउंडदूसरा राउंडतीसरा राउंडचौथा राउंडपाँचवाँ राउंडछठा राउंडसातवाँ राउंड
A × BA × CB × CB × DC × DC × ED × E
D × FE × FA × DA × EB × EB × FC × F
C × GD × GE × GF × GA × FA × GB × G
E  × बाईB × बाईF  × बाईC  × बाईG  × बाईD  × बाईA  × बाई

प्रश्न 20.
नॉक-आउट के आधार पर टूर्नामेंट में भाग लेने वाली 11 फुटबॉल टीमों का एक फिक्सचर बनाएँ।
उत्तर
टीमों की संख्या = 11
ऊपरी अर्ध-भाग की टीमें = \(\frac{\mathrm{N}+1}{2}\) = \(\frac{11+1}{2}\) = \(\frac{12}{2}\) = 6
निचले अर्ध-भाग की टीमें = \(\frac{\mathrm{N}-1}{2}\) = \(\frac{11-1}{2}\) = \(\frac{10}{2}\) = 5
बाईज़ की कुल संख्या = (24 – N)
16 – 11 = 5

N (टीमों की संख्या) को अगले उच्चतम मूल्य 24 (अर्थात् 16) में से घटाया जाना चाहिए।
बाईज़ की संख्या 16 – 11 = 5
ऊपरी अर्ध-भाग में दी जाने वाली बाईज़ की संख्या
= \(\frac{\mathrm{N} b-1}{2}\) = \(\frac{5-1}{2}\) = \(\frac{4}{2}\) = 2 (Nb = बाईज़ की संख्या)
निचले अर्ध-भाग में दी जाने वाली बाईज़ की संख्या = \(\frac{\mathrm{N} b+1}{2}\) = \(\frac{5+1}{2}\) = \(\frac{6}{2}\) = 3
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान 7

प्रश्न 21.
नॉक-आउट टूर्नामेंट के आधार पर 13 टीमों का आरेखण/फिक्सचर बनाएँ।
उत्तर:
यदि टूर्नामेंट में 13 टीमें भाग ले रही हैं तो फिक्सचर तैयार होगा
कुल मैचों की संख्या = कुल टीमों की संख्या = 1
कुल राउंड = 2 × 2 × 2 × 2 संख्या 2 की पुनरावृत्ति चार बार हुई, इसलिए 4 राउंड खेले जाएंगे।
कुल बाई = 2 की अगली घात – कुल टीमों की संख्या 16 – 13 = 03

ऊपरी अर्ध-भाग (Upper half) में टीमों की संख्या
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान 9= \(\frac{13 + 1}{2}\) = \(\frac{14}{2}\) = 07

निचले अर्ध-भाग (Lower half) में टीमों की संख्या
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 6 शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान 11= \(\frac{13 – 1}{2}\) =\(\frac{12}{2}\) = 06
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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
खेल-भावना (Sportsmanship) से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
खेल-प्रतियोगिताओं में प्रत्येक खिलाड़ी व टीम जीतने के लिए खेलती है, लेकिन जीत केवल एक खिलाड़ी या एक टीम समूह की ही होती है। जो खिलाड़ी या टीम अपने प्रतिद्वन्द्वी के प्रति वैर-विरोध न करके एक-दूसरे के प्रति सद्भावनापूर्ण व्यवहार से खेलता/खेलती है, खिलाड़ी या टीम के ऐसे आचरण को ही खेल भावना कहते हैं । इस भावना के अंतर्गत स्पोर्ट्समैन खेलों के नियमों का आदर करता है। वह हर समय खेलों के विकास के लिए सहयोग देने के लिए तैयार दिखाई देगा।

प्रश्न 2.
दोहरी लीग-प्रणाली से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह ऐसी प्रणाली है जिसमें पूल नहीं बनाए जाते। प्रत्येक टीम एक-दूसरे के विरुद्ध खेलती है। प्रत्येक टीम एक-दूसरे से दो-दो बार खेलती है। जो टीम अधिक-से-अधिक अंक प्राप्त करती है उसे विजेता टीम घोषित किया जाता है।

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प्रश्न 3.
खेलों द्वारा मनोभावों पर काबू पाने का ढंग कैसे आता है?
अथवा
खिलाड़ी खेलों में अपने संवेगों को कैसे नियंत्रित करता है?
उत्तर:
खेल में मग्न होकर खिलाड़ी अपनी जिंदगी के सभी गम तथा चिंताएँ भूल जाता है जिससे खिलाड़ी को मानसिक बल मिलता है। खेलें खेलते समय खिलाड़ी को बहुत-से मानसिक उतार-चढ़ावों से गुजरना पड़ता है। वह सफलता-असफलता के समय अपने मानसिक या भावनात्मक संतुलन को हमेशा बनाए रखता है। सहजता रखता हुआ वह अपनी उत्पन्न हुई मानसिक समस्याओं या संवेगों का उचित हल ढूँढ लेता है। इस प्रकार खेलें खिलाड़ी को मनोभावों या संवेगों पर काबू पाने की शिक्षा देती हैं।

प्रश्न 4.
एथलेटिक्स क्या है?
उत्तर:
एथलेटिक्स (Athletics) शब्द ग्रीक भाषा का शब्द है। एथलेटिक्स ऐसी खेलें होती हैं जिसमें दौड़ने (Running), कूदने (Jumping) एवं फेंकने (Throwing) आदि से संबंधित इवेंट्स होते हैं।

प्रश्न 5.
फर्राटा दौड़ें (Sprint Races) किसे कहते हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
फर्राटा दौड़ें वे दौड़ें होती हैं जो धावक द्वारा अत्यधिक तेज गति से दौड़ी जाती हैं। उदाहरण के लिए, 100 मी०, 200 मी० की दौड़ें आदि।

प्रश्न 6.
खेलों में किन मुख्य भावनाओं का होना अति आवश्यक है?
अथवा
खेल खेलते समय खिलाड़ी में किन दो भावनाओं का होना आवश्यक होता है?
उत्तर:
(1) अनुशासन की भावना,
(2) सहनशीलता व धैर्यता की भावना,
(3) आत्म-विश्वास की भावना।

प्रश्न 7.
बड़ी खेल (Major Games) किसे कहते हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
बड़ी खेल (Major Games) वे होती हैं जो नियमों के अनुसार खेली जाती हैं। इनके नियमों में समय, स्थान के आधार पर कोई बदलाव नहीं होता। इनका राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व होता है। इनका किसी देश की ख्याति में बहुत महत्त्व होता है। बड़ी खेलें फुटबॉल, हॉकी, वॉलीबॉल, हैंडबॉल, बास्केटबॉल, सॉफ्टबॉल, बेसबॉल, कबड्डी, बैडमिंटन, लॉन टेनिस, टेबल-टेनिस, मुक्केबाजी आदि हैं।

प्रश्न 8.
छोटी खेल (Minor Games) किसे कहते हैं? उदाहरण दें।
उत्तर:
छोटी खेल (Minor Games) वे होती हैं जो मनोरंजन के लिए खेली जाती हैं तथा जिनके नियम समय तथा स्थान के अनुसार बदले जा सकते हैं। ये खेलें हैं-कोकला छपाकी, रूमाल उठाना, लीडर ढूँढना, लुडो, कैरम बोर्ड, बिल्ली-चूहा, मथौला घोड़ा, चक्कर वाली खो-खो, गुल्ली-डंडा आदि।

प्रश्न 9.
खेलकूद आत्म-अभिव्यक्ति में कैसे सहायक होते हैं?
उत्तर:
खेलकूद में खिलाड़ी या व्यक्ति को आत्म-अभिव्यक्ति को प्रकट करने का अवसर मिलता है। खेल के मैदान में प्रत्येक खिलाड़ी अपने गुणों, कला व कुशलता को प्रदर्शित करता है। हम खेलों के माध्यम से ही अपने सभी व्यक्तिगत गुणों को दर्शकों के सामने प्रदर्शित कर सकते हैं।

प्रश्न 10.
लीग-प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
लीग-प्रणाली में प्रत्येक टीम एक-दूसरे के विरुद्ध खेलती है। सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाली टीम को विजेता करार दिया जाता है। मैच खेलने के बाद बराबर रहने पर दोनों टीमों को एक-एक अंक मिलता है। जीतने पर दो अंक और हारने पर शून्य अंक मिलता है। दोनों टीमों के अंक बराबर रहने पर उनके द्वारा किए गए प्रदर्शन के आधार पर जीत का फैसला किया जाता है।

प्रश्न 11.
शीत ऋतु खेल कब करवाए जाते हैं? इनमें कौन-कौन-सी खेलें होती हैं?
उत्तर:
शीत ऋतु खेल दिसंबर या जनवरी में करवाए जाते हैं। इनमें हॉकी, बैडमिंटन, बास्केटबॉल, जिम्नास्टिक, एथलेटिक्स आदि खेल होते हैं।

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प्रश्न 12.
पतझड़ ऋतु खेल कब करवाए जाते हैं? इनमें कौन-कौन-सी खेलें होती हैं?
उत्तर:
पतझड़ ऋतु खेल सितंबर या अक्तूबर में करवाए जाते हैं। इनमें फुटबॉल, वॉलीबॉल, टेबल-टेनिस, कबड्डी, खो-खो, तैराकी आदि खेल होते हैं।

प्रश्न 13.
प्रतियोगिता से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
जब दो या दो से अधिक खिलाड़ी या टीम ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्यत हों जिसे केवल एक खिलाड़ी या टीम को ही प्रदान किया जा सकता हो तो ऐसी स्थिति से प्रतियोगिता का जन्म होता है। एक ही वातावरण में रहने वाले जीवों के बीच सहज रूप से ही प्रतियोगिता विद्यमान होती है।

प्रश्न 14.
रिले दौड़ें क्या हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
रिले दौड़ें वे दौड़ें होती हैं जिनमें एक टीम के चार खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं और प्रत्येक टीम का एक खिलाड़ी बैटन हाथ में लेकर 100 मीटर तक दौड़ता है। ये मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं
(1) 4 × 100 मीटर,
(2) 4 × 400 मीटर।

प्रश्न 15.
ट्रैक इवेंट्स कौन-कौन-से होते हैं?
अथवा
दौड़ें कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
ट्रैक इवेंट्स या दौड़ें निम्नलिखित प्रकार की होती हैं
(1) छोटी दूरी की दौड़,
(2) मध्यम दूरी की दौड़,
(3) लम्बी दूरी की दौड़,
(4) बाधा दौड़ या हर्डल्ज,
(5) रिले दौड़।

प्रश्न 16.
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन कैसा होता है?
उत्तर:
एक अच्छा स्पोर्ट्समैन मेल-जोल और मित्रता वाला होता है। वह जीत के समय अक्कड़ नहीं दिखाता, बल्कि जीत का. श्रेय टीम के सांझे प्रयास को बताता है। उसके अंदर सांझेदारी और अपने कोच, खेल अधिकारियों, बड़ों और साथियों के प्रति आदर की भावना होती है।

प्रश्न 17.
खेलकूद किसे कहते हैं?
अथवा
खेल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
खेल आधुनिक मनुष्य के जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग हैं। शायद ही कोई ऐसा मनुष्य हो जो इनके बारे में कुछ-न-कुछ न जानता हो। जब मनुष्य अपनी दैनिक क्रियाओं से ऊब जाता है तो वह नई प्रकार की क्रियाएँ करता है। इन्हीं क्रियाओं के आधार पर वह प्रसन्नता व आनंद का अनुभव करता है। इस प्रकार की क्रियाएँ खेलकूद कहलाती हैं। क्रो एवं क्रो के अनुसार, “खेल वह क्रिया है जिसमें व्यक्ति उस समय भाग लेता है, जब वह काम को करने के लिए स्वतंत्र होता है जो वह करना चाहता है।” .

प्रश्न 18.
खेल प्रतियोगिता से खिलाड़ी में अनुशासन का गुण कैसे विकसित होता है?
उत्तर:
खेल प्रतियोगिता हमेशा नियम में बंधी होती है। प्रत्येक प्रतियोगी को उन नियमों का पालन करना होता है। यदि वह इन नियमों की पालना नहीं करेगा तो उसकी प्रतियोगिता से बाहर होने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए खिलाड़ी प्रतियोगिता को जीतने के लिए इसके सारे नियमों की पालना करता है। ये सभी बातें खिलाड़ी में अनुशासन के गुण को विकसित करती हैं।

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प्रश्न 19.
खेल प्रतियोगिता से राष्ट्रीय एकता का विकास कैसे होता है?
अथवा
खेल प्रतियोगिताएँ राष्ट्र की प्रगति में कैसे सहायक होती हैं?
उत्तर:
खेल प्रतियोगिताएँ राष्ट्र की प्रगति में सहायक होती हैं। इनसे राष्ट्रीय एकता का विकास होता है। एक राज्य की टीमें दूसरे राज्यों में मैच खेलने जाती हैं। इससे विभिन्न राज्यों के खिलाड़ी आपस में एक-दूसरे से मिलते हैं। उनमें मित्रता एवं सहयोग की भावना का विकास होता है। इन सभी गुणों के कारण उनमें राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास होता है।

प्रश्न 20.
बाधा (हर्डल) दौड़ क्या है? उदाहरण दें।
उत्तर:
वह दौड़ जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुकावटें होती हैं अर्थात् बाधाएँ उत्पन्न की जाती हैं, बाधा या हर्डल दौड़ कहलाती है। उदाहरण के लिए 100 मीटर, 200 मीटर की हर्डल दौड़ आदि।

प्रश्न 21.
क्या खेल का मैदान अच्छी नागरिकता की प्रयोगशाला है?
उत्तर:
हाँ, खेल का मैदान अच्छी नागरिकता की प्रयोगशाला है। खेल के मैदान में खेलते हुए खिलाड़ी में एक अच्छे नागरिक के गुण विकसित होते हैं; जैसे आज्ञा पालन करना, समय का सदुपयोग करना, नियमों का पालन करना, अनुशासनमयी होना, जिम्मेवार बनना, अधिकारों तथा कर्तव्यों को समझना आदि। ये गुण एक अच्छे नागरिक में होने बहुत जरूरी हैं और ये गुण खेल का मैदान खिलाड़ी को सिखाता है।

प्रश्न 22.
पेंटाथलोन से आपका क्या अभिप्राय है? उदाहरण दें।
अथवा
पेंटाथलोन (Pantathlon) में कौन-कौन-से इवेंट्स होते हैं?
उत्तर:
ऐसे खेल जिनमें पाँच इवेंट्स हों, उन्हें पेंटाथलोन कहते हैं। पेंटाथलोन में लम्बी छलाँग, जैवलिन थ्रो, 200 मीटर की · दौड़, डिस्कस-थ्रो तथा 800/1500 मीटर की दौड़ सम्मिलित हैं।

प्रश्न 23.
हेप्टेथलोन (Heptathlon) में कौन-कौन-से इवेंट्स होते हैं? उत्तर-हेप्टेथलोन में निम्नलिखित सात इवेंट्स होते हैं
(1) 100 मी० बाधा (हर्डल) दौड़,
(2) लम्बी कूद,
(3) शॉट पुट,
(4) ऊँची कूद,
(5) 200 मी० की दौड़,
(6) जैवलिन-थ्रो तथा
(7) 800 मी० की दौड़।

प्रश्न 24.
डिकैथलोन (Decathlon) में कौन-कौन-से इवेंट्स होते हैं?
अथवा
डिकैथलोन में कितने इवेंट्स होते हैं? नाम बताएँ।
उत्तर:
डिकैथलोन में दस इवेंट्स होते हैं जो दो दिन खेले जाते हैं

प्रथम दिन:
(1) 100 मी० की दौड़,
(2) लम्बी कूद,
(3) गोला फेंकना,
(4) ऊँची कूद,
(5) 400 मी० की दौड़।

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दूसरे दिन:
(1) 110 मी० की हर्डल,
(2) डिस्कस-थ्रो,
(3) पोल वॉल्ट,
(4) जैवलिन थ्रो,
(5) 1500 मी० की दौड़।

प्रश्न 25.
संतोष ट्रॉफी के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
संतोष ट्रॉफी कूच बिहार के महाराजा संतोष जी ने राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए दी थी। यह प्रतियोगिता भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन द्वारा प्रतिवर्ष अपने किसी प्रांतीय सदस्य एसोसिएशन की तरफ से करवाई जाती है। इस प्रतियोगिता में भारत के सभी प्रांतों की फुटबॉल टीमें, सैनिक और रेलवे की टीमें भाग लेती हैं। यह प्रतियोगिता नॉक-आउट-कम-लीग पर करवाई जाती है।

प्रश्न 26.
फिक्सचर/आरेखण (Fixture) को परिभाषित करें।
उत्तर:
फिक्सचर या आरेखण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से टीमों/खिलाड़ियों के बीच प्रतियोगिता टॉस आदि द्वारा निश्चित की जाती है। यह टीमों को उनकी टीम द्वारा खेले जाने वाले मैच का समय, स्थान और तिथि के बारे में सूचित करता है।

प्रश्न 27.
सीडिंग किसे कहते हैं?
उत्तर:
सीडिंग या क्रम देना एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा अच्छी टीम फिक्सचर (Fixture) में इस प्रकार रखी जाती है कि मजबूत टीमें टूर्नामेंट की शुरुआत में एक-दूसरे के साथ न खेलें।

प्रश्न 28.
बाई (Bye) क्या है?
उत्तर;
बाई आमतौर पर एक टीम को दिया जाने वाला लाभ है, जो पहले दौर में मैच खेलने पर टीम को छूट देता है।

प्रश्न 29.
बाईज़ (Byes) देने का सूत्र लिखें।
उत्तर:
बाईज़ (Byes) की संख्या अगली उच्च संख्या (2 की घात) में से टीमों की संख्या घटाकर तय की जाती है। उदाहरण. के लिए, यदि 12 टीमों ने टूर्नामेंट के लिए प्रवेश किया है, तो 12 से ऊपर की अगली उच्च संख्या जोकि 2 की घात 16 (24) है तथा दी जाने वाली बाईज़ (Byes) की संख्या 16 – 12 = 4 है

प्रश्न 30.
टूर्नामेंट से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
टूर्नामेंट एक प्रतिस्पर्धा है जिसमें अपेक्षाकृत बड़ी संख्या में प्रतियोगी भाग लेते हैं। अन्य शब्दों में टूर्नामेंट विभिन्न टीमों के बीच कई दौरों की एक बड़ी प्रतियोगिता है।

प्रश्न 31.
विभिन्न प्रकार के टूर्नामेंट्स के नाम लिखें। .
उत्तर:
(1) नॉक-आउट या ऐलिमिनेशन टूर्नामेंट,
(2) लीग या राउंड रॉबिन टूर्नामेंट,
(3) मिश्रित/संयोजन टूर्नामेंट,
(4) चुनौती/चैलेंज टूर्नामेंट। ..

प्रश्न 32.
नॉक-आउट टूर्नामेंट के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) यह टूर्नामेंट कम खर्चीला होता है, क्योंकि जो टीम पराजित हो जाती है, वह टूर्नामेंट से बाहर हो जाती है।
(2) यह खेलों का स्तर बढ़ाने में सहायक होता है, क्योंकि प्रत्येक टीम हार से बचने के लिए उत्कृष्ट प्रदर्शन करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 33.
नॉक-आउट टूर्नामेंट के कोई दो दोष बताएँ।
उत्तर:
(1) अच्छी टीमों के प्रथम या द्वितीय राउंड में टूर्नामेंट से बाहर हो जाने के अधिक अवसर होते हैं। इसलिए अच्छी टीमें अंतिम राउंड में नहीं पहुंच पाती।
(2) अंतिम राउंड में कमज़ोर टीमों के पहुंचने की संभावना रहती है।

प्रश्न 34.
लीग टूर्नामेंट के कोई दो दोष बताएँ।
उत्तर:
(1) इसमें बहुत पैसा, समय और सुविधाएँ शामिल होती हैं।
(2) उत्कृष्ट या प्रसिद्ध शीर्ष टीमों के लिए वरीयता का कोई प्रावधान नहीं होता।

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वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

प्रश्न 1.
रोवर्ज कप किस खेल से संबंधित है?
उत्तर:
रोवर्ज़ कप फुटबॉल से संबंधित है।

प्रश्न 2.
रणजी ट्रॉफी किस खेल से संबंधित है?
उत्तर:
रणजी ट्रॉफी क्रिकेट से संबंधित है।

प्रश्न 3.
संतोष ट्रॉफी किस खेल से संबंधित है?
उत्तर:
संतोष ट्रॉफी फुटबॉल से संबंधित है।

प्रश्न 4.
सी० के० नायडू ट्रॉफी किस खेल से संबंधित है?
उत्तर:
सी० के० नायडू ट्रॉफी क्रिकेट से संबंधित है।

प्रश्न 5.
खेलों से किन राष्ट्रीय गुणों को बढ़ावा मिलता है?
उत्तर:
खेलों से राष्ट्रीय एकता, अच्छी नागरिकता, देशभक्ति और अंतर्राष्ट्रीय भावना को बढ़ावा मिलता है।

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प्रश्न 6.
वह दौड़, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुकावटें होती हैं, उसे कौन-सी दौड़ कहते हैं?
उत्तर:
वह दौड़, जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुकावटें होती हैं, उसे हर्डल रेस या बाधा दौड़ कहते हैं।

प्रश्न 7.
ओलंपिक खेल कितने वर्ष के अंतराल पर होते हैं?
उत्तर:
ओलंपिक खेल चार वर्ष के अंतराल पर होते हैं।

प्रश्न 8.
एशियाई खेल कितने वर्ष के अंतराल पर होते हैं?
उत्तर:
एशियाई खेल चार वर्ष के अंतराल पर होते हैं।

प्रश्न 9.
स्टैंडर्ड ट्रैक कितने मीटर लंबा होता है?
उत्तर:
स्टैंडर्ड ट्रैक 400 मीटर लंबा होता है।

प्रश्न 10.
हेप्टेथलोन में कितने इवेंट्स होते हैं?
उत्तर:
हेप्टेथलोन में 7 इवेंट्स होते हैं।

प्रश्न 11.
खेलकूद में जातीय भेदभाव कैसे समाप्त होते हैं?
उत्तर:
जब सभी खिलाड़ी इकट्ठे मिलकर जीतने के लिए खेलते हैं तो जातीय भेदभाव समाप्त हो जाता है।

प्रश्न 12.
चार ऐसे खेलों के नाम लिखें जो टीम बनाकर खेले जाते हैं।
उत्तर:
(1) हॉकी,
(2) क्रिकेट,
(3) फुटबॉल,
(4) वॉलीबॉल।

प्रश्न 13.
छोटी दौड़ों के कोई दो उदाहरण लिखें।
उत्तर;
(1) 100 मीटर की दौड़,
(2) 200 मीटर की दौड़।

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प्रश्न 14.
बाधा दौड़ों के कोई दो उदाहरण लिखें।
उत्तर:
(1) 100 मीटर की दौड़,
(2) 200 मीटर की दौड़।

प्रश्न 15.
रिले दौड़ में एक टीम में कितने खिलाड़ी एक-साथ भाग लेते हैं?
उत्तर:
रिले दौड़ में एक टीम में चार खिलाड़ी एक-साथ भाग लेते हैं।

प्रश्न 16.
दस इवेंट्स वाली खेल क्या कहलाती हैं?
उत्तर:
दस इवेंट्स वाली खेल डिकैथलोन कहलाती हैं।

प्रश्न 17.
शीत ऋतु खेल किन महीनों में करवाए जाते हैं?
उत्तर:
शीत ऋतु खेल दिसंबर या जनवरी महीनों में करवाए जाते हैं।

प्रश्न 18.
पतझड़ ऋतु खेल किन महीनों में करवाए जाते हैं?
उत्तर:
पतझड़ ऋतु खेल सितंबर या अक्तूबर महीनों में करवाए जाते हैं।

प्रश्न 19.
किन्हीं दो कूद इवेंट्स के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) लम्बी कूद,
(2) ऊँची कूद।।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता कब आरंभ हुई?
उत्तर:
राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता सन् 1927 में आरंभ हुई।

प्रश्न 21.
राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता ‘रंगास्वामी कप’ के नाम से कब से आयोजित की जा रही है?
उत्तर:
राष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता ‘रंगास्वामी कप’ के नाम से सन् 1947 से आयोजित की जा रही है।

प्रश्न 22.
भारत का राष्ट्रीय खेल कौन-सा है?
उत्तर:
भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी है।

प्रश्न 23.
‘रंगास्वामी कप’ प्रतियोगिता किस स्तर पर करवाई जाती है?
उत्तर:
‘रंगास्वामी कप’ प्रतियोगिता राष्ट्रीय स्तर पर करवाई जाती है।

प्रश्न 24.
सुब्रोटो मुखर्जी कप किस खेल से संबंधित है?
उत्तर:
सुब्रोटो मुखर्जी कप फुटबॉल से संबंधित है।

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प्रश्न 25.
बड़ी खेलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
(1) क्रिकेट,
(2) हॉकी।

प्रश्न 26.
छोटी खेलों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
(1) कैरम बोर्ड,
(2) गुल्ली -डंडा।

प्रश्न 27.
सीडिंग की कितने किस्में होती हैं?
उत्तर:
सीडिंग की दो किस्में होती हैं
(1) सामान्य सीडिंग,
(2) विशेष सीडिंग।

प्रश्न 28.
क्या सीडिंग वाली टीम पहले राउंड में मैच खेलती है?
उत्तर:
नहीं, सीडिंग वाली टीम पहले राउंड में मैच नहीं खेलती।

प्रश्न 29.
नॉक-आउट टूर्नामेंट कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
नॉक-आउट टूर्नामेंट मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 30.
लीग टूर्नामेंट कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
लीग टूर्नामेंट दो प्रकार के होते हैं-
(1) सिंगल लीग टूर्नामेंट,
(2) डबल लीग टूर्नामेंट।

बहुविकल्पीय प्रश्न [Multiple Choice Questions]

प्रश्न 1.
वह दौड़ जिसमें थोड़ी-थोड़ी दूरी पर रुकावटें होती हैं, कहलाती है
(A) रिले दौड़
(B) मध्यम दूरी की दौड़
(C) हर्डल रेस या बाधा दौड़
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) हर्डल रेस या बाधा दौड़

प्रश्न 2.
डिकैथलोन में कितने इवेंट्स होते हैं?
(A) चार
(B) पाँच
(C) दस
(D) आठ
उत्तर:
(C) दस

प्रश्न 3.
शरीर और मन के तालमेल को खेलों में क्या कहा जाता है?
(A) योग
(B) प्राणायाम
(C) प्राण
(D) आसन
उत्तर:
(A) योग

प्रश्न 4.
ऐसा खेल जिसमें पाँच इवेंट्स सम्मिलित हों, कहलाता है
(A) डिकैथलोन
(B) पेंटाथलोन
(C) हेप्टेथलोन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) पेंटाथलोन

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प्रश्न 5.
खेलकूद के क्षेत्र में सम्मिलित क्रियाएँ हैं
(A) दौड़
(B) कूद
(C) फेंकना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
खेल में किस भावना का होना आवश्यक है?
(A) अनुशासन
(B) सहनशीलता
(C) आत्म-विश्वास
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 7.
प्रतिदिन के कार्य से हटकर ऐसी क्रियाएँ जिनसे मनोरंजन हो, कहलाती हैं
(A) योग,
(B) व्यायाम
(C) खेलकूद
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) खेलकूद

प्रश्न 8.
खेल प्रतियोगिताओं से खिलाड़ी में विकसित होने वाले गुण हैं-
(A) आत्म-विश्वास
(B) त्याग की भावना
(C) सहयोग की भावना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 9.
डिकैथलोन खेल कितने दिन में पूरी होती हैं?
(A) एक सप्ताह में
(B) दस दिन में
(C) दो दिन में
(D) पंद्रह दिन में
उत्तर:
(C) दो दिन में

प्रश्न 10.
निम्नलिखित में से कौन-सी प्रतियोगिता हॉकी से संबंधित नहीं है?
(A) रणजी ट्रॉफी
(B) रंगास्वामी कप
(C) आगा खाँ कप
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) रणजी ट्रॉफी

प्रश्न 11.
प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का उद्देश्य निम्नलिखित है
(A) आदर्श खेल भावना विकसित करना
(B) प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करना
(C) देश-भक्ति की भावना विकसित करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 12.
पाँच एथलेटिक इवेंट्स के समूह को क्या कहते हैं?
(A) डिकैथलोन
(B) हेप्टेथलोन
(C) पेंटाथलोन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) पेंटाथलोन

प्रश्न 13.
एथलेटिक्स में तीन बार कूदने वाले इवेंट को क्या कहते हैं?
(A) तिहरी कूद
(B) बाँस कूद
(C) ऊँची कूद
(D) लंबी कूद
उत्तर:
(A) तिहरी कूद

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प्रश्न 14.
रिले की टीम में कितने खिलाड़ी होते हैं?
(A) 3
(B) 4
(C) 6
उत्तर:
(B) 4

शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान Summary

शारीरिक शिक्षा में विभिन्न प्रतियोगितात्मक खेलकूदों का योगदान परिचय

खेलकूद प्रतियोगिताएँ मनुष्य के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करती हैं। वे मनुष्य को शारीरिक दृष्टिकोण से मज़बूत, शक्तिशाली और कार्यशील, मानसिक दृष्टिकोण से तेज़, मनोभावुक दृष्टिकोण से संतुलित, बौद्धिक दृष्टिकोण से सुशील और सामाजिक दृष्टिकोण से स्वस्थ बनाती हैं। आज विश्व का प्रत्येक देश खेलों में एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहा है और सफलता मिलने पर वह गौरव व सम्मान प्राप्त करता है। यही कारण है कि खेलकद प्रतियोगिताएँ आज के का अंग बन गए हैं। खेलकूद प्रतियोगिताओं को नियमबद्ध और वैज्ञानिक ढंग से करवाया जाना चाहिए ताकि लोगों की रुचि खेलों के प्रति और बढ़ सके।खेलकूद मनुष्य के साथ प्राचीन समय से ही चले आ रहे हैं। पहले खेल केवल मनोरंजन तथा आवश्यकता के लिए खेले जाते थे। तब मनुष्य को अपने बचाव के लिए तेज दौड़ना, शिकार के लिए भाला फेंकना, तीर चलाना आदि सीखना आवश्यक था। आज यही आवश्यकताएँ खेलों में परिवर्तित हो गई हैं। खेलों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद प्रतियोगिताओं का महत्त्व भी दिन-प्रतिदिन निरंतर बढ़ता जा रहा है।

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HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

Haryana State Board HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

HBSE 9th Class Physical Education योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
“योग भारत की एक विरासत है।” इस कथन को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका है कि योग की उत्पत्ति कब हुई? लेकिन प्राम.?णक रूप से यह कहा जा सकता है कि योग का इतिहास भारत के इतिहास जितना ही पुराना है अर्थात् योग भारत की ही देन या विरासत है। इसलिए हमें योग की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए भारतीय इतिहास के कालों को जानना होगा, जिनसे स्पष्ट हो जाएगा कि योग भारत की एक विरासत है। भारतीय इतिहास के विभिन्न कालों का उल्लेख निम्नलिखित है

1. पूर्व वैदिक काल (Pre-Vedic Period):
हड़प्पा सभ्यता के दो प्रसिद्ध नगरों-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों व प्रतिमाओं से पता चलता है कि उस काल के दौरान भी योग किसी-न-किसी रूप में प्रचलित था।

2. वैदिक काल (Vedic Period):
वैदिक काल में रचित वेद ‘ऋग्वेद’ में लिखित ‘युनजते’ शब्द से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि लोग इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए योग क्रियाएँ किया करते थे। हालांकि वैदिक ग्रंथों में ‘योग’ और ‘योगी’ शब्दों का स्पष्ट रूप से प्रयोग नहीं किया गया है।

3. उपनिषद् काल (Upnishad Period):
योग की उत्पत्ति का वास्तविक आधार उपनिषदों में पाया जाता है। उपनिषद् काल में रचित कठोपनिषद्’ में योग’ शब्द का प्रयोग तकनीकी रूप से किया गया है। उपनिषदों में यौगिक क्रियाओं का भी वर्णन किया गया है।

4. काव्य काल (Epic Period):
काव्य काल में रचित महाकाव्यों में योग के विभिन्न रूपों या शाखाओं के नामों का उल्लेख किया गया है। महाकाव्यों; जैसे ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ में यौगिक क्रियाओं के रूपों की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। रामायण के समय योग प्रक्रिया काफी प्रसिद्ध थी। भगवद्गीता’ में भी योग के तीन प्रकारों का वर्णन है।

5. सूत्र काल (Sutra Period):
योग का पितामह महर्षि पतंजलि को माना जाता है, जिन्होंने योग पर आधारित प्रथम पुस्तक ‘योगसूत्र’ की रचना की। उन्होंने इस पुस्तक में योग के अंगों का व्यापक वर्णन किया है।

6. मध्यकाल (Medieval Period):
इस काल में दो संप्रदाय; जैसे नाथ और संत काफी प्रसिद्ध थे जिनमें यौगिक क्रियाएँ काफी प्रचलित थीं। नाथ हठ योग का और संत विभिन्न यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करते थे। इस प्रकार इन संप्रदायों या पंथों में योग काफी प्रसिद्ध था।

7.आधुनिक या वर्तमान काल (Modern or Present Period):
इस काल में स्वामी विवेकानंद, स्वामी योगेन्द्र, श्री अरबिन्दो और स्वामी रामदेव आदि ने योग के ज्ञान को न केवल भारत में बल्कि भारत से बाहर भी फैलाने का प्रयास किया है। स्वामी रामदेव जी आज भी योग को सारे विश्व में लोकप्रिय बनाने हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त वर्णित कालों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि योग भारतीय विरासत है। योग की उत्पत्ति भारत में ही हुई। आज योग विश्व के विभिन्न देशों में फैल रहा है। इसी फैलाव के कारण 21 जून, 2015 को पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

प्रश्न 2.
योग के बारे में आप क्या जानते हैं? इसका क्या उद्देश्य है?
अथवा
योग का अर्थ, परिभाषा तथा उद्देश्य पर प्रकाश डालें।
अथवा
योग क्या है? इसकी परिभाषाएँ बताइए।
उत्तर:
योग का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Yoga):
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मनःस्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य । साधारण शब्दों में, योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है। यह व्यक्ति के गुणों व शक्तियों का आपस में मिलना है।

1. कठोपनिषद् (Kathopnishad):
के अनुसार, “जब हमारी ज्ञानेंद्रियाँ स्थिर अवस्था में होती हैं, जब मस्तिष्क स्थिर अवस्था में होता है, जब बुद्धि भटकती नहीं, तब बुद्धिमान कहते हैं कि इस अवस्था में पहुँचने वाले व्यक्ति ने सर्वोत्तम अवस्था वाले चरण को प्राप्त कर लिया है। ज्ञानेंद्रियों व मस्तिष्क के इस स्थायी नियंत्रण को ‘योग’ की परिभाषा दी गई है। वह जो इसे प्राप्त कर लेता है, वह भ्रम से मुक्त हो जाता है।”

2. महर्षि पतंजलि (Maharshi Patanjali):
के अनुसार, “योग: चित्तवृति निरोधः” अर्थात् “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।”

3. श्री याज्ञवल्क्य (Shri Yagyavalkya):
के अनुसार, “जीवात्मा से परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।”

4. महर्षि वेदव्यास (Maharshi Vedvyas):
के अनुसार, “योग समाधि है।”

5. डॉ० संपूर्णानंद (Dr. Sampurnanand):
के अनुसार, “योग आध्यात्मिक कामधेन है।”

6. श्रीमद्भगवद् गीता (Shrimad Bhagvad Gita):
के अनुसार, “बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थात् समबुद्धि युक्त मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे और बुरे कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है। अत: योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है।

7. भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna):
ने कहा-“योग कर्मसु कौशलम्।” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है।

8. स्वामी कृपालु जी (Swami Kripaluji):
के अनुसार, “हर कार्य को बेहतर कलात्मक ढंग से करना ही योग है।”

इस प्रकार योग आत्मा एवं परमात्मा का संयोजन है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है और संपूर्ण शांति प्रदान करता है। योग हमें उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको भुगतने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता। बी०के०एस० आयंगर (B.K.S. Iyengar): के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य (Objective of Yoga):
योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है। योग व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति वैज्ञानिक ढंगों से करता है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

प्रश्न 3.
अष्टांग योग क्या है? अष्टांग योग के विभिन्न अंगों या अवस्थाओं का वर्णन करें।
अथवा
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के कौन-कौन से आठ अंग बताए हैं? उनके बारे में संक्षेप में लिखें। अथवा अष्टांग योग के आठ अंगों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अष्टांग योग का अर्थ (Meaning of Asthang Yoga):
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ या अंग। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ (Stages) होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। अष्टांग योग का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होता है, जिससे ज्ञान का प्रकाश चमकता है और विवेक (ख्याति) की प्राप्ति होती है।

अष्टांग योग के अंग (Components of Asthang Yoga): महर्षि पतंजलि ने इसकी आठ अवस्थाएँ (अंग) बताई हैं; जैसे.
1. यम (Yama, Forbearance):
यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है।

2. नियम (Niyama, Observance):
नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं-शौच या शुद्धि (Purity), संतोष (Contentment), तप (Endurance), स्व-अध्याय (Self-Study) और ईश्वर प्राणीधान (Worship with Complete Faith)। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है और आचारिक रूप से शक्तिशाली बनता है। .

3. आसन (Asana, Posture):
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है। आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है।

4. प्राणायाम (Pranayama, Control of Breath):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम । प्राण का अर्थ है- श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। इसके तीन भाग हैं
(1) पूरक (Inhalation),
(2) रेचक (Exhalation) और
(3) कुंभक (Holding of Breath)।

5. प्रत्याहार (Pratyahara, Restraint of the Senses):
अष्टांग योग प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों व मन को अपने नियंत्रण में रखने से है। साधारण शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ मन व इन्द्रियों को उनकी संबंधित क्रियाओं से हटकर परमात्मा की ओर लगाना है। प्रत्याहार द्वारा हम अपनी पाँचों ज्ञानेंद्रियों (देखना, सुनना, सूंघना, छूना और स्वाद) को नियंत्रित कर लेते हैं।

6. धारणा (Dharna, Steadying of the mind):
अपने मन के निश्चल भाव को धारणा कहते हैं। अष्टांग योग में धारणा’ का बहुत महत्त्व है। धारणा का अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है। धारणा की स्थिति में हमारा मस्तिष्क बिल्कुल शांत होता है। इस प्रकार की प्रक्रिया से व्यक्ति में एक महान् शक्ति उत्पन्न हो जाती है, साथ ही उसके मन की इच्छा भी पूरी हो जाती है।

7. ध्यान (Dhyana, Contemplation):
धारणा से आगे आने वाली और ऊपरी स्थिति को ध्यान कहते हैं । जब मन पूरी तरह से नियंत्रण में हो जाता है तो ध्यान लगना आरंभ हो जाता है अर्थात् मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता ही ध्यान कहलाती है। .

8. समाधि (Samadhi, Trance):
समाधि योग की सर्वोत्तम अवस्था है। यह सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर की अवस्था है। समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है। प्राचीन काल में ऋषि-मुनि काफी लम्बे समय तक समाधि में बैठते थे। इस विधि द्वारा हम दिमाग पर पूरी तरह अपना नियंत्रण कर सकते हैं।

प्रश्न 4.
योग स्वास्थ्य का साधन है, इस विषय में अपने विचार प्रकट करें। अथवा “योगाभ्यास तंदुरुस्ती का साधन है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट करें। अथवा योगासन की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
योग स्वास्थ्य या तंदुरुस्ती का साधन है। इसका उद्देश्य है कि व्यक्ति को शारीरिक तौर पर तंदुरुस्त, मानसिक स्तर पर दृढ़ और चेतन, आचार-विचार में अनुशासित करना है। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

(1) योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की मानसिक जटिलताएँ मिट जाती हैं। वह मानसिक तौर से संतुष्ट और शक्तिशाली हो जाता है।
(2) शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई के लिए योगाभ्यास में खास क्रिया विधि अपनाई जाती है। धौती क्रिया से जिगर, बस्ती क्रिया से आंतड़ियों व नेती क्रिया से पेट की सफाई की जाती है।

(3) योग द्वारा कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है; जैसे चक्रासन द्वारा हर्निया रोग, शलभासन द्वारा मधुमेह का रोग दूर किए जाते हैं। योगाभ्यास द्वारा रक्त के उच्च दबाव (High Blood Pressure) तथा दमा (Asthma) जैसे रोग ठीक हो जाते हैं।

(4) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक विकृतियों अर्थात् आसन को ठीक किया जा सकता है; जैसे रीढ़ की हड्डी का कूबड़, घुटनों का आपस में टकराना, टेढ़ी गर्दन, चपटे पैर आदि विकृतियों को दूर करने में योगासन लाभदायक हैं।

(5) योगासनों द्वारा मनुष्य को अपने संवेगों और अन्य अनुचित इच्छाओं पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है।

(6) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक अंगों में लचक आती है; जैसे धनुरासन तथा हलासन रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाते हैं।

(7) योग का शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यह इनकी कार्यक्षमता को सुचारु करता है।

(8) योगाभ्यास करने से बुद्धि तीव्र होती है। शीर्षासन करने से दिमाग तेज़ और स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

(9) योगासन करने से शरीर में चुस्ती और ताजगी पैदा होती है।

(10) योगासन मन को प्रसन्नता प्रदान करता है। मन सन्तुलित रहता है। जहां भोजन शरीर का आहार है, वहीं प्रसन्नता मन का आहार है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दोनों की आवश्यकता होती है।

(11) योगाभ्यास द्वारा शरीर ताल में आ जाता है और योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

(12) योगाभ्यास करने वाला व्यक्ति देर तक कार्य करते रहने तक भी थकावट अनुभव नहीं करता। वह अधिक कार्य कर सकता है और अपने लिए अच्छे आहार के बढ़िया साधन प्राप्त कर सकता है। अत: योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है। अतः योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है।

प्रश्न 5.
योग क्या है? योग के प्रमुख सिद्धांत कौन-कौन से हैं?
अथवा
योगासन करते समय किन-किन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
अथवा
योगासन करते समय कौन-कौन सी सावधानियाँ बरतनी चाहिएँ?
उत्तर:
योग का अर्थ (Meaning of Yoga):
योग एक विभिन्न प्रकार के शारीरिक व्यायामों व आसनों का संग्रह है। यह ऐसी विधा है जिससे मनुष्य को अपने अंदर छिपी हुई शक्तियों को बढ़ाने का अवसर मिलता है। योग धर्म, दर्शन, शारीरिक सभ्यता और मनोविज्ञान का समूह है।

योगासन के सिद्धांत/सावधानियाँ (Principles/Precautious of Yoga): योगासन या योगाभ्यास करते समय अग्रलिखित सिद्धांतों अथवा बातों को ध्या

(1) योगासन का अभ्यास प्रात:काल करना चाहिए।
(2) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए, इससे अधिक लाभ होता है।
(3) योगासन का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
(4) योगासन करते समय शरीर पर कम-से-कम कपड़े होने चाहिएँ, परन्तु सर्दियों में उचित कपड़े पहनने चाहिएँ।
(5) योगासन खाली पेट करना चाहिए। योगासन करने के दो घण्टे पश्चात् भोजन करना चाहिए।
(6) योगासन प्रतिदिन करना चाहिए।
(7) योगासनों का अभ्यास प्रत्येक आयु में कर सकते हैं, परन्तु अभ्यास करने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति से जानकारी ले लेनी चाहिए।
(8) यदि शरीर अस्वस्थ या बीमार है तो आसन न करें।
(9) प्रत्येक आसन निश्चित समयानुसार करें।
(10) योग आसन करने वाला स्थान साफ-सुथरा और हवादार होना चाहिए।
(11) योग आसन किसी दरी अथवा चटाई पर किए जाएँ। दरी अथवा चटाई समतल स्थान पर बिछी होनी चाहिए।
(12) योगाभ्यास शौच क्रिया के पश्चात् व सुबह खाना खाने से पहले करना चाहिए।
(13) प्रत्येक अभ्यास के पश्चात् विश्राम का अंतर होना चाहिए। विश्राम करने के लिए शवासन करना चाहिए।
(14) प्रत्येक आसन करते समय फेफड़ों के अंदर भरी हुई हवा बाहर निकाल दें। इससे आसन करने में सरलता होगी।
(15) योग करते समय जब भी थकावट हो तो शवासन या मकरासन कर लेना चाहिए।
(16) योग आसन अपनी शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए।
(17) योग अभ्यास से पूरा लाभ उठाने के लिए शरीर को पौष्टिक व संतुलित आहार देना बहुत जरूरी है।
(18) आसन करते समय श्वास या साँस हमेशा नाक द्वारा ही लें।
(19) हवा बाहर निकालने (Exhale) के उपरांत श्वास क्रिया रोकने का अभ्यास किया जाए।
(20) एक आसन करने के पश्चात् दूसरा आसन उस आसन के विपरीत किया जाए; जैसे धनुरासन के पश्चात् पश्चिमोत्तानासन करें। इस प्रकार शारीरिक ढाँचा ठीक रहेगा।

प्रश्न 6.
दैनिक जीवन में योग के महत्त्व का विस्तारपूर्वक वर्णन करें। अथवा आधुनिक संदर्भ में योग की महत्ता या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आधुनिक संदर्भ में योग के महत्त्व या उपयोगिता का वर्णन निम्नलिखित है
(1) हमारा मन चंचल और अस्थिर होता है। योग मन के विकारों को दूर कर उसे शांत करता है। योग का सतत् अभ्यास करके और लोभ एवं मोह को त्याग कर मन को शांत एवं निर्विकार बनाया जा सकता है।

(2) कर्म स्वयं में एक योग है। कर्त्तव्य से विमुख न होना ही कर्म योग है। पूरी एकाग्रता एवं निष्ठा के साथ कर्म करना ही योग का उद्देश्य है। अत: योग से कर्म करने की शक्ति मिलती है।

(3) हमारी वाणी से जो विचार निकलते हैं, वे मन एवं मस्तिष्क की उपज होते हैं। यदि मन में कलुष भरा है तो हमारे विचार भी कलुषित होंगे। जंब हम योग से मन को नियंत्रित कर लेते हैं तो हमारे विचार सकारात्मक रूप में हमारी वाणी से प्रवाहित होने लगते हैं। योग से नकारात्मक विचार सकारात्मक प्रवृत्ति में बदल जाते हैं।

(4) योग शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं में एकीकरण करने में सहायक होता है।

(5) योग में सर्वस्व कल्याण हित है। यह धर्म-मजहब से परे की विधा है।
(6) योग से शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।

(7) योग हमें उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको सहन करने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता।

(8) योग हमारे जीवन का आधार है। यह हमारी अंतर चेतना जगाकर विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत देता है। यह हमारी जीवन-शैली में बदलाव करने में सहायक है।

(9) योग धर्म, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, ऊँच-नीच तथा अमीर-गरीब आदि से परे है। किसी के साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करता।

(10) योग स्वस्थ रहने की कला है। आज सभी का मूल फिट रहना है और यही चाह सभी को योग के प्रति आकर्षित करती है, क्योंकि योग हमारी फिटनेस में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(11) योग मन एवं शरीर में सामंजस्य स्थापित करता है अर्थात् यह शरीर एवं मस्तिष्क के ऐक्य का विज्ञान है।
(12) योग से शरीर में रक्त का संचार तीव्र होता है। इससे शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(13) योग मोटापे को नियन्त्रित करने में मदद करता है।
(14) योग से शारीरिक मुद्रा (Posture) में सुधार होता है।
(15) योग से मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है। इससे मनो-भौतिक विकारों में सुधार होता है।
(16) योग रोगों की रोकथाम व बचाव में सहायता करता है।
(17) यह शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता को सुचारु रखने में सहायक होता है।
(18) योग आत्म-विश्वास बढ़ाने तथा मनोबल निर्माण में सहायता करता है।

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प्रश्न 7.
वज्रासन की विधि तथा इसके लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वज्रासन (Vajrasana):
‘वज्र’ शब्द का अर्थ है-दृढ़ एवं कठोर । वज्र के साथ आसन जुड़ने से ‘वज्रासन’ बनता है। इस आसन में पैर की दोनों जंघाओं को ‘वज्र’ के समान दृढ़ करके बैठा जाता हैं । वज्रासन हमेशा बैठकर किया जाता है। स्वच्छं कम्बल या दरी पर बैठकर इस आसन का अभ्यास करें।

विधि (Procedure):
समतल भूमि पर जंघाओं तथा पिंडलियों को परस्पर मिलाकर और पीछे की ओर मोड़कर बैठें। पाँवों के दोनों तलवे आपस में सटाकर रखें। बाईं तथा दाईं हथेलियों को। बाएँ-दाएँ पाँवों के घुटनों पर रखें। कमर, ग्रीवा एवं सिर बिल्कुल सीधे रखें। घुटने मिले हुए हों और, हाथों को घुटनों पर रखें। धीरे-धीरे शरीर को ढीला छोड़े। श्वसन क्रिया करते रहें। वज्रासन को जितना। संभव हो, उतनी देर करें। विशेष रूप से भोजन के तुरंत बाद पाचन क्रिया को बढ़ाने के लिए कम-से-कम 5 मिनट के लिए इस आसन का अभ्यास जरूर करें।
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लाभ (Benefits): वज्रासन करने के लाभ निम्नलिखित हैं
(1) वज्रासन ध्यान केन्द्रित करने वाला आसन है। इससे मन की चंचलता दूर होती है तथा वज्रासन चित्त एकाग्र हो जाता है।
(2) इस आसन को नियमित रूप से करने से जाँघों की माँसपेशियाँ कठोर एवं मजबूत होती हैं।
(3) यह एक ऐसा आसन है जिसे भोजन के बाद किया जाता है। इसे करने से अपच, अम्लपित्त, गैस, कब्ज आदि रोग दूर हो जाते हैं।
(4) इससे पाचन-शक्ति में वृद्धि होती है।
(5) यह मन को एकाग्र करने में सहायक होता है।
(6) इसे करने से रक्त प्रवाह ठीक रहता है।
(7) इस आसन को नियमित रूप से करने से आसन संबंधी विकार दूर हो जाते हैं।
(8) इसे करने से स्मरण-शक्ति बढ़ जाती है।
(9) इसे करने से मोटापा कम होता है।
(10) इसे करने से मेरुदण्ड शक्तिशाली व सुदृढ़ हो जाता है।

प्रश्न 8.
ताड़ासन क्या है? इसकी विधि तथा इसके लाभों का उल्लेख करें।
उत्तर:
ताड़ासन (Tadasana):
ताड़ासन में खड़े होने की स्थिति में धड़ को ऊपर की ओर किया जाता है। इस आसन में शरीर की स्थिति ताड़ के वृक्ष जैसी प्रतीत होती है, इसीलिए इसे ताड़ासन कहा जाता है। यह ऐसा आसन है जो न केवल बड़ी माँसपेशियों को ही बल्कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म माँसपेशियों को भी काफी हद तक लचीला बनाता है। ताड़ासन को विभिन्न नामों से जाना जाता है।

विधि (Procedure):
सबसे पहले आप समतल जमीन पर सीधे खड़े हो जाएँ। फिर अपने दोनों पैरों को मिला लें। आपका शरीर स्थिर रहना चाहिए। आपके दोनों पैरों पर शरीर का वजन बराबर होना चाहिए। अब धीरे-धीरे हाथों को कन्धों के समानांतर लाएँ। दोनों हाथों को ऊपर उठाकर अंगुलियों को सीधे ऊपर की ओर रखें। अब साँस भरते हुए अपने हाथों को ऊपर की ओर खींचें और पंजों

Meaning, Definition and Values of Yoga के बल अधिक-से-अधिक ऊपर उठने का प्रयास करें। इस दौरान आपकी गर्दन सीधी होनी चाहिए। इस अवस्था को कुछ देर के लिए बनाए रखें और श्वसन क्रिया करते रहें। फिर साँस छोड़ते हुए धीरे-धीरे अपने हाथों और शरीर को पहले वाली अवस्था में ले आएँ। इस क्रिया को इसी क्रम में कम-से-कम 7-8 बार दोहराएँ।

लाभ (Benefits)-ताड़ासन करने से होने वाले लाभ निम्नलिखित हैं
(1) ताड़ासन पैरों की समस्याओं को दूर करता है। यह पैरों को मजबूती प्रदान करता है।
(2) इससे एकाग्रता में वृद्धि होती है।
(3) यह पाचन क्रिया को ठीक करता है।
(4) इससे शरीर स्वस्थ, लचीला और सुडौल बनता है।
(5) इससे कमर पतली और लचीली बनती है।
(6) यह पेट के भारीपन को कम करके चर्बी घटाने में सहायक होता है। इससे मोटापा कम होता है।
(7) इसे करने से नाड़ियों एवं माँसपेशियों का दर्द कम होता है। यह आसन नाड़ियों के साथ-साथ माँसपेशियों को मजबूत एवं सबल बनाता है।
(8) यह आसन बवासीर के रोगियों के लिए लाभदायक है।
(9) यह उच्च रक्त-चाप को नियंत्रित करने में सहायक होता है। ताड़ासन
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प्रश्न 9.
निम्नलिखित आसनों पर संक्षिप्त नोट लिखें
(क) चक्रासन
(ख) भुजंगासन
(ग) शीर्षासन
(घ) हलासन
(ङ) धनुरासन।
उत्तर:
(क) चक्रासन (Chakrasana):
कमर के बल ज़मीन पर लेट जाएँ।दोनों टाँगों को पूरी तरह फैलाकर पैरों को थोड़ा-सा खोलें। फिर दोनों कोहनियों को सिर के दोनों ओर ज़मीन पर जमाएँ। इस अवस्था में हाथों की हथेलियाँ धरती से लगनी चाहिएँ। फिर धीरे-धीरे कमर को ऊपर की ओर उठाते हुए शरीर को गोल करें, परन्तु पैर धरती से ही लगे रहने चाहिएँ। कुछ समय तक इस अवस्था में रहें।
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लाभ (Benefits):
(1) इससे शरीर में लचक पैदा होती है।
(2) इस आसन से पेट की चर्बी कम होती है।
(3) इससे रीढ़ की हड्डी लचकदार बनती है।
(4) इस आसन द्वारा घुटने, हाथ, पैर, कन्धे और बाजू की माँसपेशियाँ चक्रासन मज़बूत हो जाती हैं।
(5) इससे पेट की बहुत-सी बीमारियाँ दूर होती हैं।

(ख) भुजंगासन (Bhujangasana):
पेट के बल लेट जाएँ और दोनों पैरों को आपस में मिलाकर पूरी तरह धरती से लगाएँ। अपने पैरों की उंगलियों से लेकर नाभि तक का शरीर धरती से लगाएँ। हाथों को कन्धों के सामने धरती से लगाकर धड़ के ऊपरी भाग को पूरी तरह ऊपर की ओर उठाएँ। इस प्रकार कमर का ऊपरी भाग फनियर साँप जैसा बन जाएगा।
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लाभ (Benefits):
(1) यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला और छाती को चौड़ा बनाता है। भुजंगासन
(2) यह आसन गर्दन, कन्धों, छाती और सिर को अधिक क्रियाशील बनाता है।
(3) यह रक्त-संचार को तेज़ करता है।
(4) यह मोटापे को कम करता है।
(5) इससे शरीर में शक्ति और स्फूर्ति का संचार होता है।
(6) इस आसन से जिगर के रोग दूर होते हैं।

(ग) शीर्षासन (Shirshasana)-
घुटने के बल बैठकर दोनों हाथों की अंगुलियाँ ठीक ढंग से बाँध लें और आसन पर रखें। सिर का आगे वाला भाग ज़मीन पर इस प्रकार रखें कि दोनों हाथ सिर के पीछे हों। टाँगों को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएँ। पहले एक टाँग को सीधा करें, फिर दूसरी को सीधा करने के पश्चात् शरीर को सीधा करें। सारा वज़न सिर और भुजाओं पर रहे।
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लाभ (Benefits):
(1) शीर्षासन से मोटापा कम होता है।
(2) यह आसन भूख बढ़ाता है और जिगर ठीक प्रकार से कार्य करता है।
(3) इस आसन से स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(4) इससे पेट ठीक रहता है। शीर्षासन

(घ) हलासन (Halasana):
इस आसन में सबसे पहले अपने पैर फैलाकर पीठ के बल ज़मीन परं लेट जाओ। हाथों की हथेलियों को बगल में जमाएँ। कमर के निचले भाग को ज़मीन से धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएँ और इतना ऊपर ले जाएँ कि दोनों पैरों के अंगूठे सिर के पीछे ज़मीन पर लग जाएँ।
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लाभ (Benefits):
(1) इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है।
(2) इस आसन से मोटापा दूर होता है।
(3) यह आसन रक्त संचार को समान करता है।
(4) इस आसन से रीढ़ की हड्डी लचीली होती है। हलासन
(5) यह आसन शरीर को तन्दुरुस्त बनाता है।

(ङ) धनुरासन (Dhanurasana):
इस आसन का आकार धनुष जैसा होता है। इस आसन में सबसे पहले पेट के बल लेट जाएँ। अपने दोनों हाथों के साथ दोनों पैरों की पिण्डलियों को पकड़ें। छाती और पेट के ऊपरी भाग को खींचें। हर्निया के रोगी को यह आसन नहीं करना चाहिए।
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लाभ (Benefits):
(1) यह आसन रीढ़ की हड्डी में लचीलापन लाता है।
(2) यह आसन मूत्र में शर्करा रोग को रोकता है।
(3) इस आसन द्वारा पेट अथवा कमर के आस-पास आया धनुरासन मोटापा दूर होता है।
(4) इस आसन द्वारा कब्ज़ और पेट संबंधी बीमारियाँ दूर होती हैं।
(5) यह आसन पीठ दर्द और कमर दर्द को दूर करता है।
(6) यह आसन करने से बाजुओं और टांगों की माँसपेशियाँ शक्तिशाली बनती हैं।
(7) इससे श्वासनली और फेफड़ों की कार्यक्षमता में वृद्धि होती है।
(8) यह आसन पेट, आंतड़ियों और जनन के रोगों को दूर करता है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

प्रश्न 10.
पद्मासन की विधि तथा इसके लाभों का वर्णन करें।
उत्तर:
पद्मासन (Padamasana):
पद्मासन का विशेष महत्त्व है क्योंकि अधिकांश आसन सर्वप्रथम पद्मासन लगाने के बाद ही किए जाते हैं। पद्मासन में पालथी लगाकर बैठा जाता है। किसी साफ-सुथरे कम्बल या दरी पर बैठकर इसका अभ्यास किया जाता है। इस आसन में शरीर की आकृति बहुत हद तक कमल के फूल जैसी हो जाती है। इस कारण इसको ‘Lotus Pose’ भी कहा जाता है।

विधि (Procedure):
समतल स्थान पर चटाई या कम्बल बिछाकर चौकड़ी लगाकर बैठे। बाएँ पाँव की एडी को दाईं जाँघ पर और दाएँ पाँव की एडी को बाईं जाँघ पर रखें। पाँव के तलवे ऊपर की ओर होने चाहिएँ। सामने देखते हुए कमर के ऊपरी भाग को सीधा रखें। दोनों हाथों को ज्ञान-मुद्रा की स्थिति में रखें। रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें। धीरे-धीरे श्वसन क्रिया करें। 1 से 10 मिनट तक शांत-भाव से इसी मुद्रा में रहने का अभ्यास करें।

लाभ (Benefits)”
पद्मासन के लाभ निम्नलिखित हैं
(1) यह आसन करने से मन की एकाग्रता बढ़ती है।
(2) इसे करने से घुटनों के जोड़ों का दर्द दूर होता हैं।
(3) इसे करने से पेट सम्बन्धी बीमारियाँ दूर होती है और पाचन-शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) इसे करने से माँसपेशियाँ मजबूत होती हैं। पद्मासन
(5) इसे नियमित रूप से करने से रीढ़ की हड्डी मजबूत एवं लचीली बनती है।
(6) यह आसन करने से स्मरण-शक्ति, विचार-शक्ति व तर्क-शक्ति बढ़ती है।
(7) इसके नियमित अभ्यास से चित्त में स्थिरता आती है और वीर्य में वृद्धि होती है।
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प्रश्न 11.
सर्वांगासन की विधि तथा इसके लाभों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
सर्वांगासन (Sarvangasana):
सर्वांगासन में कंधों के बल शरीर को खड़ा किया जाता है। किसी साफ-सुथरे कम्बल या दरी पर पीठ के बल लेट जाएँ। हथेलियों को नीचे की ओर करके शरीर से सटाए रखें।
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विधि (Procedure):
समतल ज़मीन पर शांत-भाव से पीठ के बल सीधे लेटकर पाँव आपस में मिला लें। धीरे-धीरे पाँवों को ऊपर ले जाते हुए शरीर को भी ऊपर उठाएँ। पाँव इस तरह ऊपर उठाएँ कि टाँगें और नितम्ब कमर के साथ 90 डिग्री का कोण बनाएँ। कुछ देर तक इसी स्थिति में ठहरने के बाद धीरे-धीरे शरीर को नीचे लाकर वापिस सामान्य स्थिति में आ जाएँ। 1 से 5 मिनट तक इस आसन का अभ्यास करें।

लाभ (Benefits):
सर्वांगासन करने के लाभ निम्नलिखित हैं
(1) यह आसन दमा के रोगियों के लिए दवा का कार्य करता है।
(2) इसे करने से शरीर में रक्त का प्रवाह तेज हो जाता है।
(3) कब्ज, गैस तथा पेट के अन्य रोग भी इस आसन से ठीक हो जाते हैं।
(4) यह आसन भूख में वृद्धि करता है।
(5) इसे करने से पेट की माँसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। सर्वांगासन
(6) यह आसन पाचन-शक्ति में वृद्धि करता है।

प्रश्न 12.
शलभासन क्या है? इसकी विधि तथा इससे होने वाले लाभ बताएँ।
उत्तर:
शलभासन (Shalabhasana):
संस्कृत भाषा में ‘शलभ’ टिड्डी नामक कीट को कहते हैं। जिस प्रकार टिड्डी का पिछला भाग ऊपर की ओर उठा रहता है, उसी प्रकार नाभि से निचला भाग ऊपर की ओर उठा होने के कारण इसे शलभासन कहते हैं।
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 1 स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ एवं महत्त्व 8

विधि (Procedure):
सबसे पहले पेट के बल ज़मीन पर लेट जाएँ। अपनी हथेलियों को जाँघों के नीचे रखें। अब गहरा श्वास भरकर ठुड्डी, हाथ एवं शलभासन छाती पर शरीर का भार संभालते हुए दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठाएँ। पैर मिले हुए और घुटने सीधे रखें। श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे पूर्व स्थिति में आ जाएँ। इस तरह से आप यह क्रिया 3 से 5 बार दोहराएँ।

लाभ (Benefits):
शलभासन के लाभ निम्नलिखित हैं
(1) इस आसन से रक्त-संचार की क्रिया तेज होती है।
(2) इससे रीढ़ की हड्डी में लचीलापन आता है।
(3) इससे पेट के कई रोग; जैसे गैस बनना, भूख न लगना और अपच या बदहजमी आदि दूर हो जाते हैं। इससे कमर-दर्द भी दूर होता है।
(4) इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है।
(5) इससे रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है।
(6) इससे शरीर का संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 13.
प्राणायाम से क्या अभिप्राय है? इसकी उपयोगिता या महत्ता पर प्रकाश डालिए। अथवा ‘प्राणायाम’ की परिभाषा देते हुए इसके महत्त्व का वर्णन कीजिए। अथवा प्राणायाम का अर्थ व परिभाषा लिखें। वर्तमान में इसकी आवश्यकता पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
प्राणायाम का अर्थ (Meaning of Pranayama):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम। प्राण का अर्थ हैश्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं। अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and Importance of Pranayama):
वर्तमान समय में श्री श्री रविशंकर ने जीवन जीने की जो शैली सुझाई है, वह प्राणायाम पर आधारित है। आधुनिक जीवन में प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है

(1) प्राणायाम से शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(2) इससे शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।
(3) इससे मन की चंचलता दूर होती है।
(4) इससे सामान्य स्वास्थ्य व शारीरिक कार्य-कुशलता का विकास होता है।
(5) इससे मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है।
(6) इससे हमारी श्वसन प्रक्रिया में सुधार होता है।
(7) इससे आँखों व चेहरे में चमक आती है और आवाज़ मधुर हो जाती है।
(8) इससे आध्यात्मिक व मानसिक विकास में मदद मिलती है।
(9) इससे कार्य करने की शक्ति में वृद्धि होती है।
(10) इससे फेफड़ों का आकार बढ़ता है और श्वास की बीमारियों तथा गले, मस्तिष्क की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(11) इससे इच्छा शक्ति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(12) इससे श्वास-संस्थान मज़बूत होता है।
(13) प्राणायाम करने से पेट तथा छाती की मांसपेशियाँ मज़बूत बनती हैं।
(14) श्वास ठीक ढंग से आने के कारण शरीर को ऑक्सीजन अधिक मात्रा में मिलने लगती है और ऑक्सीजन बढ़ने से रक्त साफ होता है।
(15) इससे रक्त के तेज़ दबाव से नाड़ी संस्थान की शक्ति में वृद्धि होती है।

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प्रश्न 14.
प्राणायाम करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? एक योगसाधक के लिए आवश्यक निर्देश बताएँ।
उत्तर:
ध्यान रखने योग्य बातें (Things to keep in Mind): प्राणायाम करते समय निम्नलिखि बातों का ध्यान रखना चाहिए
(1) प्राणायाम धीरे-धीरे करना चाहिए।
(2) प्राणायाम का अभ्यास प्रात:काल करना अधिक लाभदायक होता है।
(3) प्राणायाम शुरू करने से पहले अपने योग शिक्षक की सलाह अवश्य लेनी चाहिए।
(4) प्राणायाम करते समय श्वास क्रिया नाक से करनी चाहिए।
(5) प्राणायाम करते समय किसी भी तरह का तनाव नहीं होना चाहिए।
(6) प्राणायाम के समय श्वसन क्रिया करते समय श्वसन की आवाज जोर से नहीं करनी चाहिए। श्वास की क्रिया लयात्मक व स्थिर होनी चाहिए।
(7) यदि आप बहुत थके हुए हो तो प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
(8) प्राणायाम के बाद किसी भी तरह का जोरदार अभ्यास नहीं करना चाहिए।
(9) प्राणायाम को जल्दबाजी में नहीं करना चाहिए।
(10) प्राणायाम हमेशा खुले वातावरण में करना अधिक लाभदायक होता है या एक अच्छे हवादार कमरे में करना चाहिए जिसमें आदि न लगा हो।

एक योगसाधक के लिए आवश्यक निर्देश (Important Instructions of a Yoga Instructor) एक योगसाधक के लिए आवश्यक निर्देश निम्नलिखित हैं
(1) प्राणायाम शुरू करने से पहले योगसाधक को अपनी आंत को साफ कर देना चाहिए।
(2) स्वच्छ एवं हवादार कमरे में प्राणायाम का अभ्यास करें। यदि आप किसी शोरगुल वातावरण में अभ्यास करते हैं तो आपका मन विचलित हो सकता है।
(3) प्राणायाम करने से पहले 2 या 3 घंटे तक कुछ भी न खाएँ।
(4) प्राणायाम का अभ्यास एक ही समय में करना चाहिए अर्थात् प्राणायाम में नियमितता होनी चाहिए।
(5) प्राणायाम करने के लिए आप पदमासन, वज्रासन, सिद्धासन व सुखासन में बैठ सकते हैं।
(6) प्राणायाम करते समय अपनी पीठ बिल्कुल सीधी रखनी चाहिए।
(7) टी०बी० व उच्च रक्तचाप के मरीजों को प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
(8) प्राणायाम के लिए सभी बुनियादी दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।
(9) प्राणायाम करते समय अपने जीवन की चिंताओं व तनाव आदि को भूल जाएँ और अपनी साँस पर ध्यान केन्द्रित करने का प्रयास करें।
(10) यदि आपको श्वास से संबंधित कोई बीमारी हो तो अपने चिकित्सक की सलाह या परामर्श से प्राणायाम का अभ्यास करें।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग के इतिहास पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन या विरासत है। भारत में योग लगभग तीन हजार ईसा पूर्व पहले शुरू हुआ। हजारों वर्ष पहले हिमालय में कांति सरोवर झील के किनारे पर आदि योगी ने अपने योग सम्बन्धी ज्ञान को पौराणिक सात ऋषियों को प्रदान किया। इन ऋषियों ने योग का विश्व के विभिन्न भागों में प्रचार किया। परन्तु व्यापक स्तर पर योग को सिन्धु घाटी सभ्यता के एक अमिट सांस्कृतिक परिणाम के रूप में समझा जाता है। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। हिंदू धर्म के ग्रंथ ‘उपनिषद्’ में योग के सिद्धांतों या नियमों का वर्णन किया गया है। महर्षि पतंजलि के बाद अनेक योग गुरुओं एवं ऋषियों ने इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। आधुनिक काल में महर्षि पतंजलि को योग का आदि गुरु माना जाता है। भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसने मानवता के भौतिक और आध्यात्मिक विकास में अहम् भूमिका निभाई है।
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प्रश्न 2.
योग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? अथवा योगासन करते समय ध्यान में रखी जाने वाली मुख्य बातें बताएँ।
उत्तर:
योगासन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
(1) योगासन का अभ्यास प्रातः करना चाहिए। योग करते समय हमेशा नाक से साँस लेनी चाहिए।
(2) योगासन, शान्त जगह पर और खुली हवा में करना चाहिए।
(3) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए। इससे अधिक लाभ होता है।
(4) योगासन करते समय शरीर पर कम-से-कम कपड़े होने चाहिएँ, परन्तु सर्दियों में उचित कपड़े पहनने चाहिएँ।
(5) योगासनों का अभ्यास प्रत्येक आयु में कर सकते हैं, परन्तु अभ्यास करने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति से जानकारी ले लेनी चाहिए।
(6) योगासन खाली पेट करना चाहिए। इसके करने के दो घण्टे पश्चात् भोजन करना चाहिए।
(7) योगासन किसी दरी या चटाई पर किए जाएँ। दरी या चटाई किसी समतल जगह पर बिछी होनी चाहिए।

प्रश्न 3.
योग के लाभों का संक्षेप में वर्णन कीजिए। अथवा योग अभ्यास का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है?
अथवा
योग आसन के मुख्य लाभ लिखें।
उत्तर:
योग धर्म-मजहब से परे की विधा है। जिस तरह से सूर्य अपनी रोशनी करने में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करता, उसी प्रकार से योग करके कोई भी इसका लाभ प्राप्त कर सकता है। दुनिया के हर इंसान को योग के लाभ समभाव से प्राप्त होते हैं; जैसे
(1) योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है अर्थात् इससे मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।
(2) योग से बीमारियों से छुटकारा मिलता है और हमारे स्वास्थ्य में सुधार होता है।
(3) योग एक साधना है जिससे न सिर्फ शरीर बल्कि मन भी स्वस्थ रहता है।
(4) योग आसन से मानसिक तनाव को भी दूर किया जा सकता है।
(5) योग आसन से सकारात्मक प्रवृत्ति में वृद्धि होती है।
(6) योग आसन तन-मन, चित्त-वृत्ति और स्वास्थ्य-सोच को विकार मुक्त करता है।
(7) योग आसन से आत्मिक सुख एवं शान्ति प्राप्त होती है।
(8) योग आसन से कर्म करने की शक्ति विकसित होती है।

प्रश्न 4.
नियम के भागों को सूचीबद्ध करें।
उत्तर:
नियम के भाग निम्नलिखित हैं
1. शौच-शौच का अर्थ है-शुद्धता। हमें हमेशा अपना शरीर आंतरिक व बाहरी रूप से साफ व स्वस्थ रखना चाहिए।
2. संतोष-संतोष का अर्थ है-संतुष्टि। हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए जो परमात्मा ने हमें दिया है।
3. तप-हमें प्रत्येक स्थिति में एक-सा व्यवहार करना चाहिए। जीवन में आने वाली मुश्किलों व परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करना तथा लक्ष्य-प्राप्ति की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहना तप कहलाता है।
4. स्वाध्याय-ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, गीता व अन्य महान् पुस्तकों का निष्ठा भाव से अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है।
5. ईश्वर प्राणीधान-ईश्वर प्राणीधान नियम की महत्त्वपूर्ण अवस्था है। ईश्वर को अपने सभी कर्मों को अर्पित करना ईश्वर प्राणीधान कहलाता है।

प्रश्न 5.
यम क्या है? यम के भागों को सूचीबद्ध करें।
उत्तर:
यम-यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार यम पाँच होते हैं

1. सत्य-सत्य से अभिप्राय मन की शुद्धता या सच बोलने से है। हमें हमेशा अपने विचार, शब्द, मन और कर्म से सत्यवादी होना चाहिए।
2. अहिंसा-मन, वचन व कर्म आदि से किसी को भी शारीरिक-मानसिक स्तर पर कोई हानि या आघात न पहुँचाना अहिंसा कहलाता है। हमें हमेशा हिंसात्मक और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।

प्रश्न 2.
योग करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? अथवा योगासन करते समय ध्यान में रखी जाने वाली मुख्य बातें बताएँ। उत्तर-योगासन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए
(1) योगासन का अभ्यास प्रातः करना चाहिए। योग करते समय हमेशा नाक से साँस लेनी चाहिए।
(2) योगासन, शान्त जगह पर और खुली हवा में करना चाहिए।
(3) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए। इससे अधिक लाभ होता है।
(4) योगासन करते समय शरीर पर कम-से-कम कपड़े होने चाहिएँ, परन्तु सर्दियों में उचित कपड़े पहनने चाहिएँ।
(5) योगासनों का अभ्यास प्रत्येक आयु में कर सकते हैं, परन्तु अभ्यास करने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति से जानकारी ले लेनी चाहिए।
(6) योगासन खाली पेट करना चाहिए। इसके करने के दो घण्टे पश्चात् भोजन करना चाहिए।
(7) योगासन किसी दरी या चटाई पर किए जाएँ। दरी या चटाई किसी समतल जगह पर बिछी होनी चाहिए।

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प्रश्न 3.
योग के लाभों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
योग अभ्यास का हमारे जीवन में क्या महत्त्व है?
अथवा
योग आसन के मुख्य लाभ लिखें।
उत्तर:
योग धर्म-मजहब से परे की विधा है। जिस तरह से सूर्य अपनी रोशनी करने में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करता, उसी प्रकार से योग करके कोई भी इसका लाभ प्राप्त कर सकता है। दुनिया के हर इंसान को योग के लाभ समभाव से प्राप्त होते हैं; जैसे

(1) योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है अर्थात् इससे मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।
(2) योग से बीमारियों से छुटकारा मिलता है और हमारे स्वास्थ्य में सुधार होता है।
(3) योग एक साधना है जिससे न सिर्फ शरीर बल्कि मन भी स्वस्थ रहता है।
(4) योग आसन से मानसिक तनाव को भी दूर किया जा सकता है।
(5) योग आसन से सकारात्मक प्रवृत्ति में वृद्धि होती है।
(6) योग आसन तन-मन, चित्त-वृत्ति और स्वास्थ्य-सोच को विकार मुक्त करता है।
(7) योग आसन से आत्मिक सुख एवं शान्ति प्राप्त होती है।
(8) योग आसन से कर्म करने की शक्ति विकसित होती है।

प्रश्न 4.
नियम के भागों को सूचीबद्ध करें। उत्तर-नियम के भाग निम्नलिखित हैं

1. शौच-शौच का अर्थ है-शुद्धता। हमें हमेशा अपना शरीर आंतरिक व बाहरी रूप से साफ व स्वस्थ रखना चाहिए।
2. संतोष-संतोष का अर्थ है-संतुष्टि। हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए जो परमात्मा ने हमें दिया है।
3. तप-हमें प्रत्येक स्थिति में एक-सा व्यवहार करना चाहिए। जीवन में आने वाली मुश्किलों व परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करना तथा लक्ष्य-प्राप्ति की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहना तप कहलाता है।
4. स्वाध्याय-ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, गीता व अन्य महान् पुस्तकों का निष्ठा भाव से अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है।
5. ईश्वर प्राणीधान-ईश्वर प्राणीधान नियम की महत्त्वपूर्ण अवस्था है। ईश्वर को अपने सभी कर्मों को अर्पित करना ईश्वर प्राणीधान कहलाता है।

प्रश्न 5.
यम क्या है? यम के भागों को सूचीबद्ध करें।
उत्तर:
यम-यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार यम पाँच होते हैं

1. सत्य-सत्य से अभिप्राय मन की शुद्धता या सच बोलने से है। हमें हमेशा अपने विचार, शब्द, मन और कर्म से सत्यवादी होना चाहिए।
2. अहिंसा-मन, वचन व कर्म आदि से किसी को भी शारीरिक-मानसिक स्तर पर कोई हानि या आघात न पहुँचाना अहिंसा कहलाता है। हमें हमेशा हिंसात्मक और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।
3. अस्तेय-मन, वचन व कर्म से दूसरों की कोई वस्तु या चीज न चाहना या चुराना अस्तेय कहलाता है।
4. अपरिग्रह-इंद्रियों को प्रसन्न रखने वाले साधनों तथा धन-संपत्ति का अनावश्यक संग्रह न करना, कम आवश्यकताओं व इच्छाओं के साथ जीवन व्यतीत करना, अपरिग्रह कहलाता है। हमें कभी भी न तो गलत तरीकों से धन कमाना चाहिए और न ही एकत्रित करना चाहिए।
5. ब्रह्मचर्य-यौन संबंधों में नियंत्रण, चारित्रिक संयम ब्रह्मचर्य है। इसके अंतर्गत हमें कामवासना का पूर्णतः त्याग करना पड़ता है।

प्रश्न 6.
योग का आध्यात्मिक विकास (Spiritual Development): में क्या महत्त्व है? अथवा व्यक्ति के आध्यात्मिक विकास में योग की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
योग का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। योग तन, मन और आत्मा को एक साथ लाने का कार्य करता है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है और आत्मिक शांति प्रदान करता है। इसके द्वारा ईश्वर या परमात्मा को प्राप्त करने की दिशा में प्रयास किया जाता है। योग को नियमित रूप से करने से व्यक्ति को अपने मन पर नियंत्रण प्राप्त करने की योग्यता या क्षमता प्राप्त होती है। मन की शुद्धता एवं स्वच्छता से उसे परमात्मा की ओर लगाया जा सकता है। हमारे शास्त्रों में लिखा है कि जैसे आग में तपाते-तपाते लोहा आग जैसा ही हो जाता है, वैसे ही निरंतर योग का अभ्यास करने से योगी स्वयं को भूलकर परमात्मा में लीन हो जाता है। उसको परमात्मा के अलावा कुछ भी याद नहीं रहता। इस प्रकार योग आध्यात्मिक विकास में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। आध्यात्मिक विकास हेतु व्यक्ति को योग के साथ-साथ पद्मासन व सिद्धासन आदि भी करने चाहिएँ।

प्रश्न 7.
हमारे जीवन के लिए योग क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर:
योग उन्नति का द्योतक है। यह चाहे शारीरिक उन्नति हो या आध्यात्मिक। अध्यात्म की मान्यताओं की बात करें तो यह कहा जाता है कि संसार पाँच महाभूतों/तत्त्वों; जैसे पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के मिश्रण या संयोग से बना है। हमारा शरीर भी पाँच महाभूतों के संयोग से बना है। अत: योग विकास का मूल मंत्र है जिससे हमारे अंतस्थ की उन्नति संभव है। योग से मन की एकाग्रता को बढ़ाया जाता है। योग हमारे भीतर की चेतना को जगाकर हमें ऊर्जावान एवं हृष्ट-पुष्ट बनाता है। योग मन को मौन करने की प्रक्रिया है। जब यह संभव हो जाता है, तब हमारा मूल प्राकृतिक स्वरूप सामने आता है। अतः आज हमारे जीवन के लिए योग बहुत आवश्यक है।

प्रश्न 8.
सूर्य नमस्कार क्या है?
उत्तर:
‘सूर्य’ से अभिप्राय है-‘सूरज’ और ‘नमस्कार’ से अभिप्राय है-‘प्रणाम करना’। इससे अभिप्राय है कि क्रिया करते हुए सूरज को प्रणाम करना। यह एक आसन नहीं है बल्कि कई आसनों का मेल है तथा शरीर और मन को स्वस्थ रखने का उत्तम तरीका है। प्रतिदिन सूर्य को नमस्कार करने से व्यक्ति में बल और बुद्धि का विकास होता है और इसके साथ व्यक्ति की उम्र भी बढ़ती है। सूर्य उदय के समय सूर्य नमस्कार करना अति उत्तम होता है, क्योंकि यह समय पूर्ण रूप से शांतिमय होता है। …

प्रश्न 9.
योग के रक्षात्मक एवं चिकित्सीय प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
योग के बचावात्मक व उपचारात्मक प्रभावों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
योग एंक शारीरिक व्यायाम ही नहीं, बल्कि जीवन का दर्शनशास्त्र भी है। यह वह क्रिया है जो शारीरिक क्रियाओं तथा . आध्यात्मिक क्रियाओं में संतुलन बनाए रखती है। वर्तमान भौतिक समाज आध्यात्मिक शून्यता के बिना रह रहा है, जहाँ योग सहायता कर सकता है। आधुनिक समय में योग के निम्नलिखित उपचार तथा रोकथाम संबंधी प्रभाव पड़ते हैं

(1) योग पेट तथा पाचन तंत्र की अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता करता है।
(2) योग क्रियाओं के द्वारा कफ़, वात व पित्त का संतुलन बना रहता है।
(3) यौगिक क्रियाएँ शारीरिक अंगों को शुद्ध करती हैं तथा साधक के स्वास्थ्य में सुधार लाती हैं।
(4) योग के माध्यम से मानसिक शांति व स्व-नियंत्रण उत्पन्न होता है। योग से मानसिक शांति तथा संतुलन बनाए रखा जा सकता है।
(5) योग अनेक मुद्रा-विकृतियों को ठीक करने में सहायता करता है।
(6) नियमित व निरंतर यौगिक क्रियाएँ, मस्तिष्क के उच्चतर केंद्रों को उद्दीप्त करती हैं, जो विभिन्न प्रकार के विकारों की रोकथाम करते हैं।

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प्रश्न 10.
प्राणायाम करने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम श्वास पर नियंत्रण करने की एक विधि है। प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ होती हैं-
(1) पूरक (श्वास को अंदर खींचना),
(2) रेचक (श्वास को बाहर निकालना),
(3) कुंभक (श्वास को कुछ देर अंदर रोकना)।

प्राणायाम में श्वास अंदर की ओर खींचकर रोक लिया जाता है और कुछ समय रोकने के पश्चात् फिर श्वास बाहर निकाला जाता है। इस तरह श्वास को धीरे-धीरे नियंत्रित करने का समय बढ़ा लिया जाता है। अपनी बाईं नाक को बंद करके दाईं नाक द्वारा श्वास खींचें और थोड़े समय तक रोक कर छोडें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके बाईं नाक द्वारा पूरा श्वास बाहर निकाल दें। अब फिर दाईं नाक को बंद करके बाईं नाक द्वारा श्वास खींचें और थोड़े समय तक रोक कर छोडें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके पूरा श्वास बाहर निकाल दें। इस प्रकार इस प्रक्रिया को कई बार दोहराना चाहिए।

प्रश्न 11.
प्राणायाम की महत्ता पर टिप्पणी कीजिए।
अथवा
प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में श्री श्री रविशंकर जी ने जीवन जीने की जो शैली सुझाई है, वह प्राणायाम पर आधारित है। आधुनिक जीवन में प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्त्व निम्मलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है
(1) प्राणायाम से शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(2) इससे रक्त के तेज़ दबाव से नाड़ी संस्थान की शक्ति में वृद्धि होती है।
(3) इससे मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है। इससे आध्यात्मिक व मानसिक विकास में मदद मिलती है।
(4) इससे आँखों व चेहरे में चमक आती है और आवाज़ मधुर हो जाती है।
(5) इससे फेफड़ों का आकार बढ़ता है और श्वास की बीमारियों तथा गले, मस्तिष्क की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(6) इससे इच्छा-शक्ति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(7) प्राणायाम करने से पेट तथा छाती की मांसपेशियाँ मज़बूत बनती हैं।

प्रश्न 12.
योग और प्राणायाम में अंतर स्पष्ट कीजिए। उत्तर-योग और प्राणायाम में निम्नलिखित अंतर हैं
(1) योग एक व्यापक विधा है जबकि प्राणायाम योग का ही एक अंग है।
(2) योग केवल शारीरिक व्यायामों व आसनों की एक प्रणाली ही नहीं, बल्कि यह संपूर्ण और भरपूर जीवन जीने की कला भी है। यह शरीर और मन का मिलन है। प्राणायाम श्वास लेने व छोड़ने की विभिन्न विधियों का संग्रह है।
(3) नियमित योग करने से विभिन्न प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं तथा शरीर में रक्त प्रवाह उचित रहता है। नियमित प्राणायाम से शरीर की विभिन्न कोशिकाओं को ऊर्जा मिलती है। प्राणायाम दमा, सर्दी-जुकाम, गले के रोगों आदि को दूर करने में विशेष रूप से लाभदायक है।

प्रश्न 13.
शवासन करने की विधि बताइए।
उत्तर:
शवासन में शव + आसन शब्दों का मेल है। शव का अर्थ है-मृत शरीर और आसन का अर्थ है-मुद्रा। अतः इस आसन में शरीर मृत शरीर जैसा लगता है, इसलिए इसको शवासन कहा जाता है।
सबसे पहले फर्श पर पीठ के बल सीधे लेट जाएँ। हाथों को आराम की अवस्था में शरीर से कुछ दूरी पर रखें। हथेलियाँ ऊपर की ओर रखें। पैरों के बीच 1 या 2 फुट दूरी रखें। आँखें धीरे-धीरे बंद करें और लयात्मक व यौगिक श्वसन क्रिया करें। श्वसन और आत्मा पर ध्यान केंद्रित करें। इस आसन का अभ्यास प्रत्येक आसन के शुरू में एवं अंत में करना बहुत लाभदायक होता है।
HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व
शवासन

प्रश्न 14.
पश्चिमोत्तानासन की विधि तथा इसके लाभ बताइए।
उत्तर:
विधि-सर्वप्रथम, हम दोनों पैरों को आगे की ओर खींचेंगे, जबकि हम फर्श पर बैठे होंगे। तत्पश्चात् पैरों के दोनों अंगूठों को हाथों से पकड़ते हुए धीरे-धीरे श्वास को छोड़ेंगे तथा मस्तक को घुटनों के साथ लगाने का प्रयास करेंगे। फिर, धीरे-धीरे साँस लेते हुए और सिर को ऊपर उठाते हुए, हम पहले वाली स्थिति में लौट आएंगे। पश्चिमोत्तानासन
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लाभ – (1) यह आसन जाँघों को सशक्त बनाता है।
(2) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है।
(3) इससे मोटापा घटता है।

प्रश्न 15.
अष्टांग योग में ध्यान का क्या महत्त्व है?
अथवा
ध्यान के हमारे लिए क्या-क्या लाभ हैं? उत्तर-ध्यान के हमारे लिए लाभ या महत्त्व निम्नलिखित हैं
(1) ध्यान हमारे भीतर की शुद्धता के ऊपर पड़े क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, कुंठा आदि के आवरणों को हटाकर हमें सकारात्मक बनाता है।
(2) ध्यान से हमें शान्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
(3) ध्यान सर्वस्व प्रेम की भावना एवं सृजन शक्ति को जगाता है।
(14) ध्यान से मन शान्त एवं शुद्ध होता है।

प्रश्न 16.
खिलाड़ियों के लिए योग किस प्रकार लाभदायक है? एक खिलाड़ी की योग किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर:
खिलाड़ियों के लिए योग निम्नलिखित प्रकार से लाभदायक है
(1) योग खिलाड़ियों को स्वस्थ एवं चुस्त रखने में सहायक होता है।
(2) योग से उनके शरीर में लचीलापन आ जाता है।
(3) योग से उनकी क्षमता एवं शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) योग उनके मानसिक तनाव को भी कम करने में सहायक होता है।
(5) योग उनके मन की एकाग्रता को बढ़ाता है। इसके फलस्वरूप वह अपने संवेगों को नियंत्रण में रख सकते हैं।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग क्या है? अथवा योग से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मनःस्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य । साधारण शब्दों में, योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है।

प्रश्न 2.
योग को परिभाषित कीजिए।
अथवा
‘श्रीमद्वद् गीता’ में भगवान् श्रीकृष्ण ने योग के बारे में क्या कहा है? उत्तर-योग छिपी हुई शक्तियों का विकास करता है। यह धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान तथा शारीरिक सभ्यता का समूह है।
1. श्रीमद्भगवद्गीता’ में भगवान् श्रीकृष्ण ने योग के बारे में कहा है, “योगकर्मसुकौशलम्” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है।
2. महर्षि पतंजलि ने योग के संबंध में कहा-“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् चित्तवृत्तियों को रोकने का नाम योग है।

प्रश्न 3.
योग का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
योग का उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला रखना और छिपी हुई शक्तियों का विकास करके, मन को जीतना है। यह शरीर, मन तथा आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का एक अच्छा साधन है।

प्रश्न 4.
योग के कोई दो सिद्धांत लिखें।
उत्तर:
(1) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए, इससे अधिक लाभ होता है।
(2) योगासन का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।

प्रश्न 5.
योग के प्रमुख प्रकारों का नामोल्लेख कीजिए। अथवा योग को किस प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है?
उत्तर
भारतीय दर्शन शास्त्रों में 40 प्रकार के योगों का उल्लेख है। श्रीमद्भगवद् गीता में 18 प्रकार के योगों का वर्णन किया गया है। योग के इन विभिन्न प्रकारों में से प्रमुख प्रकार हैं
(1) कर्म योग,
(2) राज योग,
(3) ज्ञान योग,
(4) ध्यान योग
(5) सांख्य योग,
(6) हठ योग,
(7) कुंडलिनी योग,
(8) समाधि योग,
(9) नित्य योग,
(10) भक्ति योग,
(11) नाद योग,
(12) अष्टांग योग,
(13) बुद्धि योग,
(14) मन्त्र योग आदि।

प्रश्न 6.
योग को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन क्यों माना जाता है?
उत्तर:
योगाभ्यास को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन माना जाता है, क्योंकि इस अभ्यास द्वारा जहाँ शारीरिक शक्ति या ऊर्जा पैदा होती है, वहीं मानसिक शक्ति का भी विकास होता है। इस अभ्यास द्वारा शरीर की आंतरिक सफाई और शुद्धि की जा सकती है। व्यक्ति मानसिक तौर पर संतुष्ट, संयमी और त्यागी हो जाता है जिस कारण वह सांसारिक उलझनों से बचा रहता है।

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प्रश्न 7.
योग के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) मानसिक व आत्मिक शांति व प्रसन्नता प्राप्त होना,
(2) शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य हेतु लाभदायक।

प्रश्न 8.
विद्यार्थियों के लिए योग व प्राणायाम क्यों आवश्यक हैं?
उत्तर:
योग चित्तवृत्तियों को रोकने का नाम है और प्राणायाम श्वास पर नियंत्रण व नियमन करने की प्रक्रिया है। विद्यार्थी जीवन में मन चंचल होता है और उन्हें ज्ञान अर्जित करने हेतु स्मरण शक्ति की विशेष आवश्यकता होती है। योग व प्राणायाम से मन को एकाग्र करके स्मरण-शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। साथ ही उनका शारीरिक और मानसिक विकास किया जा सकता है।

प्रश्न 9.
योगासन करते समय श्वास क्रिया किस प्रकार करनी चाहिए?
उत्तर:
योगासन करते समय श्वास नाक द्वारा लें। आसन आरंभ करते समय फेफड़ों की अंदरुनी सारी हवा बाहर निकाल दें, इससे आसन आरंभ करने में सरलता होगी। हवा बाहर निकालने के उपरांत श्वास क्रिया रोकने का अभ्यास अवश्य करना चाहिए।

प्रश्न 10.
प्राणायाम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम। प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन । इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियंत्रण व नियमन का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है।

प्रश्न 11.
ध्यानात्मक आसन से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ध्यानात्मक आसन वे आसन होते हैं जिनको करने से व्यक्ति की ध्यान करने की क्षमता विकसित होती है अर्थात् ध्यान करने की शक्ति बढ़ती है। इस प्रकार के आसन बहुत ही सावधानीपूर्वक करने चाहिएँ। इनको शांत एवं स्वच्छ वातावरण में स्थिर होकर ही करना चाहिए।

प्रश्न 12.
अष्टांग योग का क्या अर्थ है? अथवा अष्टांग योग से क्या भाव है?
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ या अंग। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ (Stages) होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। अष्टांग योग का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होता है, जिससे ज्ञान का प्रकाश चमकता है और विवेक (ख्याति) की प्राप्ति होती है। .

प्रश्न 13.
आरामदायक या विश्रामात्मक आसन से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
आरामदायक आसन वे आसन हैं जो कि शरीर को पूरी तरह आराम की स्थिति में लाकर शरीर के सभी अंग दिमाग और मन को शांत करते हैं। विश्रामात्मक आसन करने से शारीरिक एवं मानसिक थकावट दूर होती है और शरीर को पूर्ण विश्राम मिलता है।

प्रश्न 14.
अष्टांग योग में आसन का क्या भाव है?
अथवा
आसन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है।आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है। आसन करने से शरीर और दिमाग दोनों चुस्त रहते हैं।

प्रश्न 15.
अष्टांग योग में नियम का क्या भाव है?
उत्तर:
अष्टांग योग में नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता. है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है।

प्रश्न 16.
अष्टांग योग में प्रत्याहार से क्या भाव है?
उत्तर:
अष्टांग योग प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों व मन को अपने नियंत्रण में रखने से है। साधारण शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ है-मन व इन्द्रियों को उनकी संबंधित क्रियाओं से हटकर परमात्मा की ओर लगाना है।

प्रश्न 17.
अष्टांग योग में समाधि से क्या भाव है?
उत्तर:
समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है।

प्रश्न 18.
अष्टांग योग में यम से क्या भाव है?
उत्तर:
यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है।

प्रश्न 19.
प्राणायाम के शारीरिक मूल्य क्या हैं?
उत्तर:
प्राणायाम के मुख्य शारीरिक मूल्य हैं-प्राणायाम करने से शारीरिक कार्यकुशलता का विकास होता है। इससे मोटापा नियंत्रित होता है। इससे आँखों व चेहरे पर चमक आती है और शारीरिक मुद्रा (Posture) सही रहती है। .

प्रश्न 20.
आसन कितनी देर तक करने चाहिएँ?
उत्तर:
एक आसन की पूर्ण स्थिति दो मिनट से पाँच मिनट तक बनाकर रखनी चाहिए। आरंभ में आसन शारीरिक क्षमता के अनुसार किए जा सकते हैं। प्रत्येक आसन के पश्चात् और कुल आसन करने के पश्चात् विश्राम का अंतर अवश्य लेना चाहिए।

प्रश्न 21.
पी०टी० (P.T.) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पी०टी० (PT.) को अंग्रेजी में ‘Physical Theraphy’ या ‘Physical Training’ अर्थात् शारीरिक चिकित्सा या परीक्षण कहते हैं। शारीरिक चिकित्सा या परीक्षण संबंधित कसरतें समूह या व्यक्तिगत दोनों रूपों में की जाती हैं। इस प्रकार की कसरतों में किसी भी प्रकार के सामान या उपकरण की आवश्यकता नहीं होती।

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प्रश्न 22.
किन-किन परिस्थितियों में आसन करना वर्जित है?
उत्तर:
निम्नलिखित परिस्थितियों में आसन करना वर्जित है
(1) गर्भावस्था में आसन नहीं करना चाहिए।
(2) बीमारी व कमजोरी में आसन नहीं करना चाहिए।
(3) हृदय रोगियों व उच्च रक्तचाप वाले व्यक्तियों को आसन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 23.
प्राणायाम के आधार या चरण बताएँ। अथवा प्राणायाम की अवस्थाओं के नाम बताएँ।
उत्तर:
प्राणायाम के आधार या चरण निम्नलिखित हैं
(1) पूरक: श्वास को अंदर खींचने की प्रक्रिया को पूरक (Inhalation) कहते हैं।
(2) रेचक: श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक (Exhalation) कहते हैं।
(3) कुंभक: श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुंभक (Holding of Breath) कहते हैं।

प्रश्न 24.
पद्मासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे मन की एकाग्रता बढ़ती है।
(2) इसे करने से घुटनों के जोड़ों का दर्द दूर होता है।

प्रश्न 25.
शलभासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) शलभासन से रक्त-संचार क्रिया सही रहती है।
(2) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है।

प्रश्न 26.
चक्रासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे पेट की चर्बी कम होती है।
(2) इससे पेट की बीमारियाँ दूर होती हैं।

प्रश्न 27.
शवासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) शवासन से रक्तचाप ठीक रहता है,
(2) इससे तनाव, निराशा व थकान दूर होती है।

प्रश्न 28.
ताड़ासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) ताड़ासन से शरीर का मोटापा कम होता है,
(2) इससे कब्ज दूर होती है।

प्रश्न 29.
सर्वांगासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) सर्वांगासन से कब्ज दूर होती है,
(2) इससे भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया ठीक रहती है।

प्रश्न 30.
धनुरासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) यह कब्ज, अपच, और जिगर की गड़बड़ी को दूर करने में लाभकारी होता है,
(2) इससे रीढ़ की हड्डी को मजबूती मिलती है।

प्रश्न 31.
शीर्षासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) शीर्षासन से मोटापा कम होता है,
(2) इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 32.
मयूरासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) यह कब्ज एवं अपच को दूर करता है,
(2) यह आँखों के दोषों को दूर करने में उपयोगी होता है।

प्रश्न 33.
सिद्धासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे मन एकाग्र रहता है,
(2) यह मानसिक तनाव को दूर करता है।

प्रश्न 34.
मत्स्यासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) इससे माँसपेशियों में लचकता बढ़ती है,
(2) इससे पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं।

प्रश्न 35.
भुजंगासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) यह रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाता है
(2) यह रक्त संचार को तेज करता है।

प्रश्न 36.
मोटापे को कम करने के किन्हीं चार आसनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) त्रिकोणासन,
(2) पद्मासन,
(3) भुजंगासन,
(4) पश्चिमोत्तानासन।

HBSE 9th Class Physical Education योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions)

प्रश्न 1.
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई।

प्रश्न 2.
महर्षि पतंजलि के अनुसार योग क्या है?
उत्तर:
महर्षि पतंजलि के अनुसार-“मनोवृत्ति के विरोध का नाम योग है।”

प्रश्न 3.
भारत में योग का इतिहास कितना पुराना है?
उत्तर:
भारत में योग का इतिहास लगभग 3000 ईसा पूर्व पुराना है।

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प्रश्न 4.
प्रसिद्ध योगी पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं का वर्णन किया है?
उत्तर:
प्रसिद्ध योगी पतंजलि ने योग की आठ अवस्थाओं का वर्णन किया है।

प्रश्न 5.
किस आसन से स्मरण शक्ति बढ़ती है?
अथवा
बुद्धि और याददाश्त किस आसन से बढ़ते हैं?
उत्तर:
स्मरण शक्ति या बुद्धि और याददाश्त शीर्षासन से बढ़ते हैं।

प्रश्न 6.
अष्टांग योग की रचना किसके द्वारा की गई?
उत्तर:
अष्टांग योग की रचना महर्षि पतंजलि द्वारा की गई।

प्रश्न 7.
अष्टांगयोग में यम के अभ्यास द्वारा व्यक्ति क्या सीखता है?
उत्तर:
यम का अभ्यास व्यक्ति को अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता और त्याग करना सीखाता है।

प्रश्न 8.
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को प्रत्याहार कहते हैं।

प्रश्न 9.
श्वास पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
उत्तर:
श्वास पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं।

प्रश्न 10.
“योग कर्मसु कौशलम्।” योग की यह परिभाषा किसने दी?
उत्तर:
योग की यह परिभाषा भगवान् श्रीकृष्ण ने दी।

प्रश्न 11.
“योग समाधि है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन महर्षि वेदव्यास का है।

प्रश्न 12.
योग आत्मा किसे कहा जाता है?
उत्तर:
योग आत्मा प्राणायाम को कहा जाता है।

प्रश्न 13.
आसन कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर;
आसन तीन प्रकार के होते हैं
(1) ध्यानात्मक आसन,
(2) विश्रामात्मक आसन,
(3) संवर्धनात्मक आसन।

प्रश्न 14.
रेचक किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं।

प्रश्न 15.
पूरक किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को पूरक कहते हैं।

प्रश्न 16.
कुम्भक किसे कहते हैं?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। \

प्रश्न 17.
‘वज्रासन’ कब करना चाहिए?
उत्तर:
वज्रासन भोजन करने के बाद करना चाहिए।

प्रश्न 18.
योग का जन्मदाता किस देश को माना जाता है?
उत्तर:
योग का जन्मदाता भारत को माना जाता है।

प्रश्न 19.
प्राणायाम में कितनी अवस्थाएँ होती हैं? उत्तर-प्राणायाम में तीन अवस्थाएँ होती हैं।

प्रश्न 20.
अभ्यास करते समय श्वास किससे लेना चाहिए?
उत्तर:
अभ्यास करते समय श्वास नाक से लेना चाहिए।

प्रश्न 21.
मधुमेह रोग को ठीक करने वाले किन्हीं दो आसनों के नाम बताइए।
उत्तर;
(1) शलभासन,
(2) वज्रासन।

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प्रश्न 22.
किस आसन से बुढ़ापा दूर होता है?
उत्तर:
चक्रासन आसन से बुढ़ापा दूर होता है।

प्रश्न 23.
एक आसन करने के पश्चात् दूसरा कौन-सा आसन करना चाहिए? उत्तर-एक आसन करने के पश्चात् दूसरा आसन पहले आसन के विपरीत करना चाहिए; जैसे धनुरासन के बाद पश्चिमोत्तानासन करना।

प्रश्न 24.
योग किसकी प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है?
उत्तर:
योग स्व-विश्वास और आंतरिक शांति की प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है।

प्रश्न 25.
किन्हीं चार आसनों के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) हलासन,
(2) धनुरासन,
(3) भुजंगासन,
(4) ताड़ासन।

प्रश्न 26.
यौगिक व्यायाम में किस प्रकार के कपड़े पहनने चाहिएँ?
उत्तर:
यौगिक व्यायाम करते समय हल्के कपड़े पहनने चाहिएँ।

प्रश्न 27.
भुजंगासन में शरीर की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
भुजंगासन में शरीर की स्थिति फनियर सर्प के आकार जैसी होती है।

प्रश्न 28.
कौन-सा आसन करने से मधुमेह रोग नहीं होता?
उत्तर:
शलभासन करने से मधुमेह रोग नहीं होता।

प्रश्न 29.
आसन करने वाली जगह कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
आसन करने वाली जगह साफ-सुथरी और हवादार होनी चाहिए।

प्रश्न 30.
योग के आदि गुरु कौन हैं?
उत्तर:
योग के आदि गुरु महर्षि पतंजलि हैं।

प्रश्न 31.
योग अभ्यास करने से शरीर में कौन-सी शक्तियाँ आती हैं?
उत्तर;
योग अभ्यास करने से शरीर में एकाग्रता, सहनशीलता, सहजता, संयमता, त्याग और अहिंसा जैसी शक्तियों का विकास होता है। .

प्रश्न 32.
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है।

प्रश्न 33.
पद्मासन में कैसे बैठा जाता है?
उत्तर:
पद्मासन में टाँगों की चौकड़ी लगाकर बैठा जाता है।

प्रश्न 34.
ताड़ासन में शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर;
ताड़ासन में शरीर की स्थिति ताड़ के वृक्ष जैसी होनी चाहिए।

प्रश्न 35.
शीर्षासन में शरीर की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
शीर्षासन में सिर नीचे और पैर ऊपर की ओर होते हैं।

प्रश्न 36.
शवासन में शरीर की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
शवासन में पीठ के बल सीधा लेटकर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ा जाता है।

प्रश्न 37.
पेट के बल किए जाने वाले आसन का नाम बताइए।
उत्तर:
धनुरासन पेट के बल किए जाने वाले आसन है।

प्रश्न 38.
क्या योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
हाँ, योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का कार्य होता है।

प्रश्न 39.
सांसारिक चिन्ताओं से छुटकारा पाने के उत्तम साधन कौन-से हैं?
उत्तर:
सांसारिक चिन्ताओं से छुटकारा पाने के उत्तम साधन योग एवं ध्यान हैं।

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प्रश्न 40.
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा कौन-सी है?
उत्तर:
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा योग आसन है।

प्रश्न 41.
योग व्यक्ति को किस प्रकार का बनाता है?
उत्तर:
योग व्यक्ति को शक्तिशाली, नीरोग और बुद्धिमान बनाता है।

प्रश्न 42.
योग किन मानसिक व्यधाओं या रोगों का इलाज है?
उत्तर :
योग तनाव, चिन्ताओं और परेशानियों का इलाज है।

प्रश्न 43.
योग आसन कब नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
किसी बीमारी की स्थिति में योग आसन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 44.
कब्ज दूर करने में कौन-से आसन अधिक लाभदायक हैं? \
उत्तर:
(1) गरुड़ासन,
(2) चक्रासन,
(3) ताड़ासन,
(4) सर्वांगासन।

प्रश्न 45.
शवासन कब करना चाहिए?
उत्तर:
प्रत्येक आसन करने के उपरान्त शरीर को ढीला करने के लिए शवासन करना चाहिए।

प्रश्न 46.
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कब मनाया गया?
उत्तर:
21 जून, 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।

प्रश्न 47.
पेट की बीमारियाँ दूर करने में सहायक कोई दो आसन बताएँ।
उत्तर :
(1) चक्रासन,
(2) हलासन।।

प्रश्न 48.
हमारे ऋषि मुनि किन क्रियाओं द्वारा शारीरिक शिक्षा का उपयोग करते थे?
उत्तर:
योग क्रियाओं द्वारा।

प्रश्न 49.
21 जून, 2019 को कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया?
उत्तर:
21 जून, 2019 को पाँचवाँ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।

प्रश्न 50.
योग के विभिन्न पहलू बताएँ।
उत्तर:
(1) आसन,
(2) प्राणायाम,
(3) प्राण।

प्रश्न 51.
‘प्राणायाम’ किस भाषा का शब्द है?
उत्तर:
‘प्राणायाम’ संस्कृत भाषा का शब्द है।

प्रश्न 52.
राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग क्या हैं?

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उत्तर:
राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग, योग के प्रकार हैं।

प्रश्न 53.
‘योग-सूत्र’ पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
‘योग-सूत्र’ पुस्तक महर्षि पतंजलि ने लिखी।

प्रश्न 54.
योग किन शक्तियों का विकास करता है?
उत्तर:
योग व्यक्तियों में मौजूद आंतरिक शक्तियों का विकास करता है।

प्रश्न 55.
योग किसका मिश्रण है?
उत्तर:
योग धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यता का मिश्रण है।

प्रश्न 56.
योग से किस पर नियंत्रण होता है? .
उत्तर:
योग से मनो-भौतिक विकारों पर नियंत्रण होता है।

बहुविकल्पीय प्रश्न [Multiple Choice Questions]

प्रश्न 1.
‘युज’ का क्या अर्थ है?
(A) जुड़ना
(B) एक होना
(C) मिलन अथवा संयोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 2.
“मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।” यह परिभाषा दी
(A) महर्षि पतंजलि ने
(B) महर्षि वेदव्यास ने
(C) भगवान् श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि पतंजलि ने

प्रश्न 3.
प्रसिद्ध योगी पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं का वर्णन किया है?
(A) पाँच
(B) आठ
(C) सात
(D) चार
उत्तर:
(B) आठ

प्रश्न 4.
योग आत्मा कहा जाता है-
(A) आसन को
(B) प्राणायाम को
(C) प्राण को
(D) व्यायाम को
उत्तर :
(B) प्राणायाम को

प्रश्न 5.
श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुंभक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पूरक

प्रश्न 6.
श्वास को अंदर खींचने के कुछ समय पश्चात् श्वास को अंदर ही रोकने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुंभक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कुंभक

प्रश्न 7.
श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को कहते हैं.
(A) पूरक
(B) कुंभक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) रेचक

प्रश्न 8.
“योग समाधि है।” यह कथन है
(A) महर्षि वेदव्यास का
(B) महर्षि पतंजलि का
(C) भगवान् श्रीकृष्ण का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि वेदव्यास का

प्रश्न 9.
“योग आध्यात्मिक कामधेनु है।” योग की यह परिभाषा किसने दी?
(A) ,भगवान श्रीकृष्ण ने
(B) महर्षि पतंजलि ने
(C) महर्षि वेदव्यास ने
(D) डॉ० संपूर्णानंद ने
उत्तर:
(D) डॉ० संपूर्णानंद ने
(B) श्वास प्रणाली से

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 5 योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व

प्रश्न 10.
योग से कब्ज दूर होती है। इसका संबंध किस प्रणाली से है?
(A) रक्त संचार प्रणाली से
(C) माँसपेशी प्रणाली से
(D) पाचन प्रणाली से
उत्तर:
(D) पाचन प्रणाली से

प्रश्न 11.
“योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है।” यह किसने कहा?
(A) महर्षि वेदव्यास ने
(B) महर्षि पतंजलि ने
(C) भगवान श्रीकृष्ण ने .
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) महर्षि पतंजलि ने

प्रश्न 12.
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष मनाया जाता है
(A) 22 दिसम्बर को
(B) 21 जून को
(C) 30 जनवरी को
(D) 8 नवम्बर को
उत्तर:
(B) 21 जून को

प्रश्न 13.
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया
(A) 21 जून, 2014 को
(B) 21 जून, 2013 को
(C) 21 जून, 2015 को
(D) 21 जून, 2016 को
उत्तर:
(C) 21 जून, 2015 को

प्रश्न 14.
“श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।” प्राणायाम की यह परिभाषा किसने दी?
(A) महर्षि वेदव्यास ने
(B) महर्षि पतंजलि ने
(C) भगवान श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) महर्षि पतंजलि ने 15. 21 जून, 2018 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया था?
(A) पहला
(B) दूसरा
(C) तीसरा
(D) चौथा
उत्तर:
(D) चौथा

प्रश्न 16.
निम्नलिखित में से अष्टांग योग का अंग है
(A) यम
(B) नियम
(C) प्राणायाम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 17.
योग के आदि गुरु हैं
(A) महर्षि वेदव्यास
(B) महर्षि पतंजलि
(C) डॉ० संपूर्णानंद
(D) स्वामी रामदेव
उत्तर:
(B) महर्षि पतंजलि 18. 21 जून, 2020 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा?
(A) चौथा
(B) पाँचवाँ
(C) छठा
(D) सातवाँ
उत्तर:
(C) छठा

योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व Summary

योग का अर्थ, परिभाषा एवं महत्त्व परिचय

योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह से पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन है। सिंधु घाटी में मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चलता है कि 3000 ईसा पूर्व में इस घाटी के लोग योग का अभ्यास करते थे। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। हिंदू धर्म के ग्रंथ ‘उपनिषद्’ में योग के सिद्धांतों या नियमों का वर्णन किया गया है। भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है।

हमारे जीवन में शारीरिक तंदुरुस्ती का अपना विशेष महत्त्व है। शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रखने में योग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग एक ऐसी विधा है, जो शरीर तथा दिमाग पर नियंत्रण रखती है। वास्तव में योग शब्द संस्कृत भाषा के ‘युज’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है-जोड़ या मेल । योग वह क्रिया है जिसमें जीवात्मा का परमात्मा से मेल होता है। भारतीय संस्कृति, साहित्य तथा हस्तलिपि के अनुसार, योग जीवन के दर्शनशास्त्र के बहुत नजदीक है। बी०के०एस० आयंगर के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है।

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HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

Haryana State Board HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

HBSE 9th Class Physical Education व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
व्यक्ति और समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा क्या भूमिका निभाती है? वर्णन करें। अथवा
व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा किस प्रकार से अपना योगदान प्रदान करती है?
अथवा
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति एवं समाज के विकास को किस प्रकार से प्रभावित करती है?
अथवा
शारीरिक शिक्षा से व्यक्ति में कौन-कौन से गुण विकसित होते हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
आदिकाल से मनुष्य ने खेलों को अपने जीवन का सहारा बनाया है। आदिमानव ने तीरंदाजी तथा नेज़ाबाजी के साथ शिकार करके अपनी भूख की पूर्ति की है अर्थात् अपना पेट भरा है। खेलें न केवल दिल बहलाने का साधन हैं, अपितु आदिकाल से लेकर आधुनिक काल तक हृष्टता-पुष्टता, जोश, जज्बात और शक्ति के दिखावे के लिए खेली गईं। आजकल शारीरिक शिक्षा पर काफी बल दिया जाता है। शारीरिक शिक्षा विभिन्न व्यक्तिगत एवं सामाजिक गुणों का विकास करती है जिससे व्यक्ति एवं समाज का विकास संभव होता है

1. अनुशासन की भावना (Spirit of Discipline):
आदिकाल की खेलों और आधुनिक खेलों में चाहे अन्तर है, परंतु इन खेलों के पीछे एक भावना है। प्राचीनकाल के व्यक्ति ने इनको दूसरों पर शासन और हुकूमत करने आदि के लिए प्रयोग किया, परन्तु आज के व्यक्ति ने खेलों के नियमों की पालना करते हुए अनुशासन में रहकर इनसे जीवन की खुशी प्राप्त की।

2. अच्छे नागरिक की भावना (Spirit of Good Citizen):
पुरातन समय की क्रियाएँ; जैसे नेज़ा फेंकना, भागना और मुक्केबाजी चाहे लड़ाई की तैयारी के लिए मानी जाती थीं परंतु शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत आधुनिक खेलें व्यक्ति में अनेक अच्छे गुणों का विकास करती हैं जिससे वह देश का अच्छा नागरिक बनकर देश की उन्नति में अपना योगदान देता है।

3. व्यक्तित्व का विकास (Development of Personality):
शारीरिक शिक्षा से व्यक्ति में सहनशीलता और मेल-जोल की रुचि बढ़ती है। इसके फलस्वरूप व्यक्ति के व्यक्तित्व का विकास होता है और वह समाज में अपना स्थान बनाता है। इससे दोनों का विकास होता है।

4. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक शिक्षा में विभिन्न खेलों से शारीरिक विकास होता है। इससे . शरीर में ऑक्सीजन की खपत की मात्रा बढ़ती है और शरीर में से व्यर्थ पदार्थ और जहरीले कीटाणु बाहर निकलते हैं। शरीर में पौष्टिक आहार पचाने की शक्ति बढ़ती है। इस प्रकार शरीर नीरोग, स्वस्थ, शक्तिशाली और फुर्तीला रहता है।

5. सहयोग की भावना (Spirit of Co-operation):
शारीरिक शिक्षा प्रत्येक खिलाड़ी को प्रत्येक छोटे-बड़े खिलाड़ी के साथ मिल-जुलकर खेलना सिखाती है। वह अपने विचारों को दूसरों पर ज़बरदस्ती नहीं थोपता, बल्कि विचार-विमर्श द्वारा मैच के दौरान साझी विचारधारा बनाता है। इस प्रकार उसमें सहयोग की भावना पैदा होती है जिससे समाज उन्नति की ओर अग्रसर होता है।

6. चरित्र का विकास (Development of Character):
शारीरिक शिक्षा ऐसी क्रिया है, जिसमें खिलाड़ी अपनी प्रत्येक छोटी-से-छोटी हरकत द्वारा विभिन्न लोगों; जैसे अध्यापक, खेल के समय देखने वाले दर्शक, विरोधी और साथी खिलाड़ियों के मन पर अपना प्रभाव डालता है। इस प्रकार खिलाड़ी का आचरण उभरकर सामने आता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा व्यक्ति में अनेक चारित्रिक गुणों का विकास करती है।

7.आज्ञा का पालन (Obedience):
शारीरिक शिक्षा के कारण ही खेलों में भाग लेने वाला व्यक्ति प्रत्येक बड़े-छोटे खिलाड़ी की आज्ञा का पालन करता है। खेल एक ऐसी क्रिया है जिसमें रैफ़री की आज्ञा और नियमों का पालन करना बड़ा आवश्यक है। इस प्रकार खिलाड़ी आज्ञा का पालन करने वाला बन जाता है।

8. सहनशीलता (Tolerance):
खेलों में भाग लेने वाला दूसरों के विचारों का आदर करता है और खेल में रोक-टोक नहीं करता, अपितु सहनशीलतापूर्वक दूसरों के विचारों का आदर करता है। वह जीतने पर अपना आपा नहीं गंवाता और हार जाने पर निराश नहीं होता। इस प्रकार इसमें इतनी सहनशीलता आ जाती है कि हार-जीत का उस पर कोई प्रभाव नहीं होता।

9. खाली समय का उचित प्रयोग (Proper Use of Leisure Time):
यदि बेकार समय का प्रयोग सही ढंग से न किया जाए तो मनुष्य दिमागी बुराइयों में फंस जाता है। इसलिए शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत खेलों में भाग लेने वाला व्यक्ति अपने अतिरिक्त समय का प्रयोग खेलों में भाग लेकर करता है। इस प्रकार वह अपने अतिरिक्त समय में बुरी आदतों और विचारों से दूर रहता है। इस प्रकार वह अपने जीवन को सुखमय बनाता है और समाज का जिम्मेदार नागरिक बनता है।

10. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन (Promotion of International Co-operation):
ऐसे समय भी आते हैं, जब खिलाड़ियों को भिन्न-भिन्न देशों और अनेक खिलाड़ियों से मिलने का अवसर मिलता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा के कारण एक-दूसरे के मेल-जोल से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को प्रोत्साहन मिलता है।

11. जातीय भेदभाव का अंत (End of Racial Difference):
शारीरिक शिक्षा जातीय भेदभाव का अंत करके राष्ट्रीय एकता की भावना पैदा करती है। खेल एक ऐसी क्रिया है, जिसमें बिना धर्म, मज़हब और श्रेणी के आधार पर भाग लिया जाता है।

12. परिवार एवं समाज का स्वास्थ्य (Family and Social Health):
परिवार एवं समाज के स्वास्थ्य में भी शारीरिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य को न केवल अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने की कुशलता प्रदान करती है, अपितु यह उसे अपने परिवार एवं समाज के स्वास्थ्य को ठीक रखने में भी सहायता करती है। इस तरह से शारीरिक शिक्षा के द्वारा मनुष्य स्वयं अपने समाज के स्वास्थ्य की देखभाल भली-भाँति कर सकता है।

13. जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक (Helpful in Achieving Aim of Life):
शारीरिक शिक्षा अपने कार्यक्रमों द्वारा मनुष्य को अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के मौके प्रदान करती है। यदि मनुष्य को अपने लक्ष्य का ज्ञान हो तो शारीरिक शिक्षा उसे ऐसे मौके प्रदान करती है जिनकी मदद से वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।

14. मुकाबले की भावना (Spirit of Competition):
शारीरिक शिक्षा में खेली जाने वाली खेलें व्यक्ति के भीतर मुकाबले की भावना उत्पन्न करती हैं। प्रत्येक खिलाड़ी अपने विरोधी खिलाड़ी से बढ़िया खेलने का प्रयास करता है। मुकाबले की यह भावना खिलाड़ी को हमेशा विकास की मंजिल की ओर ले जाती है और वह निरंतर आगे बढ़ता जाता है। व्यक्ति के आगे बढ़ने से समाज पर भी अच्छा प्रभाव पड़ता है।

15. आत्म-अभिव्यक्ति (Self-expression):
शारीरिक शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति को आत्म-अभिव्यक्ति का अवसर देती है। खेल का मैदान आत्म-अभिव्यक्ति का गुण सिखाने का प्रारम्भिक स्कूल है, क्योंकि खेल का मैदान ही एक ऐसा साधन है, जहाँ खिलाड़ी खुलकर अपने गुणों, कला और निपुणता को दर्शकों के समक्ष उजागर कर सकता है।

निष्कर्ष (Conclusion): शारीरिक शिक्षा समाजीकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। व्यक्ति किसी भी खेल में खेल के नियमों का पालन करते हुए तथा अपनी टीम के हित को सामने रखते हुए भाग लेता है। वह अपनी टीम को पूरा सहयोग देता है। वह हार-जीत को समान समझता है। उसमें अनेक सामाजिक गुण; जैसे सहनशीलता, धैर्यता, अनुशासन, सहयोग आदि विकसित होते हैं। इस प्रकार. शारीरिक शिक्षा व्यक्ति व समाज के विकास में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा समूचे व्यक्तित्व का विकास करती है स्पष्ट कीजिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा पूर्ण व्यक्तित्व के विकास में सबसे आवश्यक है। विस्तारपूर्वक लिखें।
अथवा
“शारीरिक शिक्षा संपूर्ण व्यक्त्वि की शिक्षा होती है।” इस कथन पर विचार करें। यह कहाँ तक तर्क-संगत है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास को अपना उद्देश्य बनाती है। शारीरिक क्रियाओं द्वारा व्यक्ति में त्याग, निष्पक्षता, मित्रता की भावना, सहयोग, स्व-नियंत्रण, आत्म-विश्वास और आज्ञा की पालना करने जैसे गुणों का विकास होता है। शारीरिक शिक्षा द्वारा सहयोग करने की भावना में वृद्धि होती है। परिणामस्वरूप यह स्वस्थ समाज की स्थापना होती है। संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा मनुष्य के संपूर्ण विकास में सहायक होती है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट होती है..

1. नेतृत्व का विकास (Development of Leadership):
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व करने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं; जैसे क्रिकेट टीम में टीम का कैप्टन, निष्पक्षता, सूझबूझ और भावपूर्ण ढंग से खेल की रणनीति तैयार करता है। जब किसी खेल के नेता को खेल से पहले शरीर गर्माने के लिए नियुक्त किया जाता है, तब भी नेतृत्व की शिक्षा दी जाती है। कई बार प्रतिस्पर्धाओं का आयोजन करना भी नेतृत्व के विकास में सहायता करता है।

2. अनुशासन का विकास (Development of Discipline):
शारीरिक शिक्षा हमें अनुशासन का अमूल्य गुण भी सिखाती है। हमें अनुशासन में रहते हुए और खेल के नियमों का पालन करते हुए खेलना पड़ता है। इस प्रकार खेल अनुशासन के महत्त्व में वृद्धि करते हैं। यह भी एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक गुण है। खेल में अयोग्य करार दिए जाने के डर से खिलाड़ी अनुशासन भंग नहीं करते। वे अनुशासन में रहकर ही खेलते हैं।

3. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार का विकास (Development of Sympathetic Attitude):
खेल के दौरान यदि कोई खिलाड़ी घायल हो जाता है तो दूसरे सभी खिलाड़ी उसके प्रति हमदर्दी की भावना रखते हैं। ऐसा हॉकी अथवा क्रिकेट खेलते समय देखा भी जा सकता है। यह गुण व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

4. राष्ट्रीय एकता का विकास (Development of National Integration):
शारीरिक शिक्षा एक ऐसा माध्यम है, जिससे राष्ट्रीय एकता में वृद्धि की जा सकती है। खेलें खिलाड़ियों में सांप्रदायिकता, असमानता, प्रांतवाद और भाषावाद जैसे अवगुणों को दूर करती है। इसमें नागरिकों को ऐसे अनेक अवसर मिलते हैं, जब उनमें सहनशीलता, सामाजिकता, बड़ों का सत्कार, देश-भक्ति और राष्ट्रीय आचरण जैसे गुण विकसित होते हैं । ये गुण व्यक्ति में राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देते हैं और उसके व्यक्तित्व को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

5. व्यक्तित्व का विकास (Development of Personality):
मीड के अनुसार खेलें बच्चों के आत्म-विकास में बहुत सहायता करती हैं। बचपन में बच्चा कम आयु वाले बच्चों के साथ खेलता है परंतु जब वह बड़ा हो जाता है तो क्रिकेट, फुटबॉल अथवा वॉलीबॉल आदि खेलता है। ये खेलें व्यक्तित्व का विकास करती हैं। इनके द्वारा बच्चे के भीतरी गुण बाहर आते हैं । जब बच्चे मिलजुल कर खेलते हैं तो उनमें सहयोग का गुण विकसित हो जाता है।

6. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शारीरिक विकास का माध्यम हैं। शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मजबूत, रक्त का बहाव ठीक रखने, पाचन शक्ति में बढ़ोत्तरी और श्वसन क्रिया को ठीक रखने में सहायक हैं। शारीरिक क्रियाएँ न केवल भिन्न-भिन्न प्रणालियों को स्वस्थ और ठीक रखती हैं, बल्कि उनके आकार, शक्ल और कुशलता में भी बढ़ोत्तरी करती हैं।

7. उच्च नैतिकता की शिक्षा (Lesson of High Morality):
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति में खेल भावना (Sportsman Spirit) उत्पन्न करती है। यह इस बात में भी सहायता करती है कि खिलाड़ी का स्तर नैतिक दृष्टि से ऊँचा रहे तथा वह पूरी ईमानदारी और मेहनत के साथ अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर होता रहे।

8. भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance):
भावनात्मक संतुलन भी व्यक्तित्व के पूर्ण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। शारीरिक शिक्षा अनेक प्रकार से भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। बच्चे को बताया जाता है कि वह विजय प्राप्त करने के बाद आवश्यकता से अधिक प्रसन्न न हो और हार के गम को भी सहज भाव से ले। इस तरह भावनात्मक संतुलन एक अच्छे व्यक्तित्व के लिए अत्यावश्यक है।
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9. सामाजिक विकास (Social Development):
शारीरिक शिक्षा समूचे व्यक्तित्व का विकास इस दृष्टि से भी करती है कि व्यक्ति में अनेक प्रकार के सामाजिक गुण आ जाते हैं। उदाहरणतया सहयोग, टीम भावना, उत्तरदायित्व की भावना और नेतृत्व जैसे गुण भी बच्चे में खेलों द्वारा ही उत्पन्न होते हैं। ये गुण बड़ा होने पर अधिक विकसित हो जाते हैं। फलस्वरूप बच्चा एक अच्छा नागरिक बनता है।

10. खाली समय का उचित उपयोग (Proper Use of Leisure Time):
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को उसका अतिरिक्त समय . सही ढंग से व्यतीत करना सिखाती है। यह आदत एक बार घर कर जाने से जीवन भर उसके साथ रहती है। यह आदत व्यक्ति को नियमित सामाजिक प्राणी बनाती है।

निष्कर्ष (Conclusion): संक्षेप में हम कह सकते हैं कि शारीरिक शिक्षा बच्चों में न केवल भीतरी गुणों को ही व्यक्त करती है, अपितु यह उनके व्यक्तित्व के विकास में भी सहायक होती है। यह बच्चे में कई प्रकार के सामाजिक गुण पैदा करती है और उसमें भावनात्मक संतुलन बनाए रखती है। यही कारण है कि शारीरिक शिक्षा सामाजिक-वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा किस प्रकार व्यक्ति के अंदर छिपे हुए गुणों को बाहर निकालकर उसके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास करने में सहायता करती है? वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति की आत्म अनुभूति के विकास में किस प्रकार से अपना योगदान देने में सहायक होती है? .
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के अंदर छिपे हुए गुणों (Latent Qualities) को बाहर निकाल कर उसके व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करने में सहायता करती है। यह मनुष्य में आत्म-अनुभूति का गुण उत्पन्न करके उसे आधुनिक युग की जरूरतों के अनुसार ढालने की योग्यता प्रदान करती है। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के अंदर निम्नलिखित गुणों का विकास करती है

1. स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान (Knowledge Related to Health):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य संबंधी नियमों का ज्ञान देती है। इससे हमें रोगों संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसके अलावा शारीरिक शिक्षा हमें संतुलित एवं पौष्टिक भोजन संबंधी जानकारी देती है। स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करके हम अपने-आपको रोगों से बचा सकते हैं और स्वस्थ जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

2. मानसिक स्फूर्ति या चुस्ती (Mental Alertness or Agility):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य के मन को चुस्त एवं दुरुस्त बनाती है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य को उचित समय पर फौरन निर्णय लेने के काबिल बनाती है। इसके परिणामस्वरूप मनुष्य यह विचार कर सकता है कि वह अपनी कार्य-कुशलता और कार्यक्षमता में किस प्रकार वृद्धि करे। एक चुस्त एवं फुर्तीले मन वाला व्यक्ति ही अपने जीवन में कामयाब हो सकता है।

3. संवेगों एवं भावनाओं को नियंत्रित करना (Control Over Emotions and Feelings):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य को अपने संवेगों एवं भावनाओं को काबू करना सिखाती है। मनुष्य अपनी समस्याओं को हंसी-खुशी सुलझा लेता है। वह शोक, घृणा, उन्माद, उल्लास, खुशी आदि को अधिक महत्त्व नहीं देता। उसके लिए सफलता या असफलता का कोई महत्त्व नहीं होता। वह असफल होने पर साहस नहीं त्यागता और अपने कार्य में लगा रहता है। इस प्रकार वह अपना कीमती समय एवं शक्ति को अवांछनीय कार्यों में व्यर्थ नहीं गंवाता और अपने समय का सदुपयोग करता है।

4. आदर्श नागरिकता का निर्माण (Formation of Ideal Citizenship):
शारीरिक शिक्षा मनुष्यों में ऐसे गुण उत्पन्न करती है जिनकी मदद से वे आदर्श खिलाड़ी एवं आदर्श दर्शक बन सकते हैं। शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हुए खिलाड़ियों में अनेक ऐसे गुण पैदा हो जाते हैं जो भविष्य में उन्हें आदर्श नागरिक बनने में मदद देते हैं।

5. प्रभावशाली वक्ता (Effective Orator or Speaker):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य का शारीरिक विकास करके उसमें पढ़ने-लिखने की क्षमता का भी विकास करती है। स्वस्थ मनुष्य प्रत्येक वस्तु में रुचि लेता है और उसे अपने ढंग से देखता है। इससे पढ़ने-लिखने की कुशलता में बढ़ोतरी होती है। दूसरे, स्वस्थ एवं हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति ही एक अच्छा वक्ता हो सकता है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास करती है जिससे वह दूसरे लोगों को प्रभावित कर सकता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास करके उसे एक अच्छा वक्ता बनने के मौके प्रदान करती है।

6. सौंदर्य और कला प्रेमी (Beauty and Art Loving)शारीरिक शिक्षा मनुष्य में सौंदर्य तथा कला के प्रति प्रेम की भावना को जगाती है। आमतौर पर देखने में आता है कि जब कोई खिलाड़ी उत्कृष्ठ खेल प्रदर्शन करता है तो लोग उसकी प्रशंसा किए बिना नहीं रहते। एक सुंदर और सुडौल शरीर प्रत्येक व्यक्ति को अच्छा लगता है। प्रत्येक मनुष्य अपने शरीर को अधिक-से-अधिक सुंदर एवं सुडौल बनाने का प्रयत्न करता है।

7. खाली समय का सदुपयोग (Proper Use of Leisure Time):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य को अपने खाली समय का सदुपयोग करना सिखाती है। आधुनिक मशीनी युग में मशीनों की सहायता से दिनों का काम घंटों में तथा घंटों का काम मिनटों में हो जाता है। इस प्रकार दिनभर का काम पूरा करने के पश्चात् मनुष्य के पास पर्याप्त समय शेष बच जाता है। खाली समय को बिताना उसके लिए एक समस्या बन जाता है। शारीरिक शिक्षा उनकी इस समस्या का समाधान करने में मदद करती है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

प्रश्न 4.
नेतृत्व को परिभाषित कीजिए। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में एक नेता के गुणों का वर्णन कीजिए। अथवा नेतृत्व क्या है? शारीरिक शिक्षा में एक नेता के गुणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
नेतृत्व का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Leadership):
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि या विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करती है। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है। नेतृत्व को विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है

1. मॉण्टगुमरी (Montgomery):
के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा व योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।”

2. ला-पियरे वफावर्थ (La-Pierre and Farnowerth):
के अनुसार, “नेतृत्व एक ऐसा व्यवहार है जो लोगों के व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है, न कि लोगों के व्यवहार का प्रभाव उनके नेता पर।”

3. पी० एम० जोसेफ (P. M. Joseph):
के अनुसार, “नेतृत्व वह गुण है जो व्यक्ति को कुछ वांछित काम करने के लिए, मार्गदर्शन करने के लिए पहला कदम उठाने के योग्य बनाता है।” .

एक अच्छे नेता के गुण (Qualities of aGood Leader):
प्रत्येक समाज या राज्य के लिए अच्छे नेता की बहुत आवश्यकता होती है क्योंकि वह समाज और राज्य को एक नई दिशा देता है। नेता में एक खास किस्म के गुण होते हैं जिनके कारण वह सभी को एकत्रित कर काम करने के लिए प्रेरित करता है। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे नेता का होना बहुत आवश्यक है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ किसी योग्य नेता के बिना संभव नहीं हैं। किसी नेता में निम्नलिखित गुण या विशेषताएँ होमा आवश्यक है।

1. ईमानदारी एवं कर्मठता (Honesty and Energetic):
शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में ईमानदारी एवं कर्मठता एक नेता के महत्त्वपूर्ण गुण हैं। ये उसके व्यक्तित्व में निखार और सम्मान में वृद्धि करते हैं।

2. वफादारी एवं नैतिकता (Loyality and Morality):
शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में वफादारी एवं नैतिकता एक नेता के महत्त्वपूर्ण गुण हैं। उसे अपने शिष्यों या अनुयायियों (Followers) के प्रति वफादार होना चाहिए और विपरीत-से-विपरीत परिस्थितियों में भी उसे अपनी नैतिकता का त्याग नहीं करना चाहिए।

3. सामाजिक समायोजन (Social Adjustment):
एक अच्छे नेता में अनेक सामाजिक गुणों; जैसे सहनशीलता, धैर्यता, सहयोग, सहानुभूति व भाईचारा आदि का समावेश होना चाहिए।

4. बच्चों के प्रति स्नेह की भावना (Affection Feeling towards Children):
नेतृत्व करने वाले में बच्चों के प्रति स्नेह की भावना होनी चाहिए। उसकी यह भावना बच्चों को अत्यधिक प्रभावित करती है।

5. तर्कशील एवं निर्णय-क्षमता (Logical and Decision-Ability):
उसमें समस्याओं पर तर्कशील ढंग से विचार-विमर्श करने की योग्यता होनी चाहिए। वह एक अच्छा निर्णयकर्ता भी होना चाहिए। उसमें उपयुक्त व अनायास ही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।

6. शारीरिक कौशल (Physical Skill):
उसका स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए। वह शारीरिक रूप से कुशल एवं मजबूत होना चाहिए, ताकि बच्चे उससे प्रेरित हो सकें।

7. बुद्धिमान एवं न्यायसंगत (Intelligent and Fairness):
एक अच्छे नेता में बुद्धिमता एवं न्यायसंगतता होनी चाहिए। एक बुद्धिमान नेता ही विपरीत-से-विपरीत परिस्थितियों का समाधान ढूँढने की योग्यता रखता है। एक अच्छे नेता को न्यायसंगत भी होना । चाहिए ताकि वह निष्पक्ष भाव से सभी को प्रभावित कर सके।

8. शिक्षण कौशल (Teaching Skill):
नेतृत्व करने वाले को विभिन्न शिक्षण कौशलों का गहरा ज्ञान होना चाहिए। उसे विभिन्न शिक्षण पद्धतियों में कुशल एवं निपुण होना चाहिए। इसके साथ-साथ उसे शारीरिक संकेतों व हाव-भावों को व्यक्त करने में भी कुशल होना चाहिए।

9. सृजनात्मकता (Creativity):
एक अच्छे नेता में सृजनात्मकता या रचनात्मकता की योग्यता होनी चाहिए ताकि वह नई तकनीकों या कौशलों का प्रतिपादन कर सके।

10. समर्पण व संकल्प की भावना (Spirit of Dedication and Determination):
उसमें समर्पण व संकल्प की भावना होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसे विपरीत-से-विपरीत परिस्थिति में भी दृढ़-संकल्पी या दृढ़-निश्चयी होना चाहिए। उसे अपने व्यवसाय के प्रति समर्पित भी होना चाहिए।

11. अनुसंधान में रुचि (Interest in Research):
एक अच्छे नेता की अनुसंधानों में विशेष रुचि होनी चाहिए।

12. आदर भावना (Respect Spirit):
उसमें दूसरों के प्रति आदर-सम्मान की भावना होनी चाहिए। यदि वह दूसरों का आदर नहीं करेगा, तो उसको भी दूसरों से सम्मान नहीं मिलेगा।

13. पेशेवर गुण (Professional Qualities):
एक अच्छे नेता में अपने व्यवसाय से संबंधित सभी गुण होने चाहिएँ।

14. भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance):
नेतृत्व करने वाले में भावनात्मक संतुलन का होना बहुत आवश्यक है। उसका अपनी भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए।

15. तकनीकी रूप से कुशल (Technically Skilled):
उसे तकनीकी रूप से कुशल या निपुण होना चाहिए।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

प्रश्न 5.
नेतृत्व (Leadership) क्या है? इसके महत्त्व का विस्तार से वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व प्रशिक्षण की उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डालें।
उत्तर:
नेतृत्व का अर्थ (Meaning of Leadership):
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि व विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करते हैं। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है।

नेतृत्व का महत्त्व (Importance of Leadership):
नेतृत्व की भावना को बढ़ावा देना शारीरिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है, क्योंकि इस प्रकार की भावना से मानव के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास होता है। क्षेत्र चाहे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक अथवा शारीरिक शिक्षा का हो या अन्य, हर क्षेत्र में नेता की आवश्यकता पड़ती है। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है, जिससे उसकी शारीरिक शक्ति, सोचने की शक्ति, व्यक्तित्व में निखार और कई प्रकार के सामाजिक गुणों का विकास होता है। मानव में शारीरिक क्षमता बढ़ने के कारण निडरता आती है जो नेतृत्व का एक विशेष गुण माना जाता है। इसी प्रकार खेलों के क्षेत्र में हम दूसरों के साथ सहयोग के माध्यम से लक्ष्य प्राप्त करना सीख जाते हैं। व्यक्तिगत एवं सामूहिक खेलों में व्यक्ति को अच्छे नेता के सभी गुणों को ग्रहण करने का अवसर मिलता है।
अध्यापक शारीरिक शिक्षा के माध्यम से नेतृत्व की भावना व शारीरिक शिक्षा का विस्तार करने तथा प्रशिक्षण देने में अपने शिष्यों को कई अवसर प्रदान कर सकता है। कक्षा, शिविरों में और शारीरिक शिक्षा कार्यक्रमों के आयोजन के अन्य अवसरों पर ध्यान देने से अच्छे परिणाम सामने आ सकते हैं। इस क्षेत्र के कुछ उचित अवसर इस प्रकार हैं

(1) खेल मैदान की तैयारी और खेल सामग्री की देखभाल की समितियों के सदस्य बनाना।
(2) सामूहिक व्यायाम का नेता बमाना।
(3) खेल-खिलाने तथा अन्य अवसरों पर अधिकारी बनाना।
(4) विद्यालय की टीम का कप्तान बनाना।
(5) कक्षा का मॉनीटर अथवा टोली का नेता बनाना।
(6) छोटे-छोटे खेलों को सुचारु रूप से चलाने के अवसर प्रदान करना।
(7) विद्यालय की विभिन्न समितियों के सदस्य नियुक्त करना।

प्राचीनकाल में बच्चों तथा व्यक्तियों को मनोवैज्ञानिक, सामाजिक, शारीरिक तथा नैतिक विशेषताओं तथा आवश्यकताओं का ज्ञान नहीं था। आज के वैज्ञानिक युग में पूर्ण व्यावसायिक योग्यता के बिना काम नहीं चल सकता, क्योंकि नेताओं की योग्यता पर ही किसी व्यवसाय की उन्नति निर्भर करती है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शारीरिक शिक्षा के क्षेत्रों में कई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं; जैसे ग्वालियर, चेन्नई, पटियाला, चंडीगढ़, लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई, अमरावती और कुरुक्षेत्र आदि। इन केंद्रों में शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को इस क्षेत्र के नेताओं के रूप में प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे शारीरिक शिक्षा की ज्ञान रूपी ज्योति को अधिक-से-अधिक

फैला सकें और अपने नेतृत्व के अधीन अधिक-से-अधिक विद्यार्थियों में नेतृत्व के गुणों को विकसित कर सकें। विद्यार्थी देश का भविष्य होते हैं और एक कुशल व आदर्श अध्यापक ही शारीरिक शिक्षा के द्वारा अच्छे समाज व राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकता है। शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र और मैदान नेतृत्व के गुण को उभारने में कितना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है यह प्रस्तुत कथन से सिद्ध होता है”The battle of Waterloo was won in the play fields of Eton.” अर्थात् वाटरलू का प्रसिद्ध युद्ध, ईटन के खेल के मैदान में जीता गया। यह युद्ध अच्छे नेतृत्व के कारण जीता गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि नेतृत्व का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
समाज (Society) से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
समाज की अवधारणा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
व्यावहारिक रूप से समाज (Society) शब्द का प्रयोग मानव समूह के लिए किया जाता है परन्तु वास्तविक रूप से समाज मानव समूह के अंतर्गत व्यक्तियों के संबंधों की व्यवस्था का नाम है। समाज स्वयं में एक संघ है जो सामाजिक व औपचारिक संबंधों का जाल है। मानव बुद्धिजीवी है इसलिए हमें सामाजिक प्राणी कहा जाता है। परिवार सामाजिक जीवन की सबसे छोटी एवं महत्त्वपूर्ण इकाई है। परिवार,के बाद दूसरी महत्त्वपूर्ण इकाई विद्यालय है। विद्यालय बच्चों को देश-विदेश के इतिहास, भाषा, विज्ञान, गणित, कला एवं भूगोल की जानकारी प्रदान करते हैं।

कॉलेज, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान व्यक्ति को मुख्य विषयों के बारे में जानकारी देते हैं। ‘परिवार और शिक्षण संस्थाओं के बाद व्यक्ति के लिए उसका पड़ोस और आस-पास का क्षेत्र आता है। पड़ोस अलग-अलग जातीय समुदाय से संबंधित हो सकते हैं। परन्तु पड़ोस में रहने वाले सभी व्यक्तियों का कल्याण इस बात में है कि वे मिल-जुल कर शान्ति से रहें, पड़ोस में आमोद-प्रमोद का स्वच्छ वातावरण बनाएँ और एक-दूसरे के दुःख-दर्द में शामिल हों। जैसे-जैसे पारिवारिक पड़ोस में वृद्धि होती जाती है वैसे-वैसे सामाजिक क्षेत्र का दायरा बढ़ता जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि समाज की धारणा व्यापक एवं विस्तृत है।

प्रश्न 2.
शारीरिक शिक्षा किस प्रकार सामाजिक मूल्यों को बढ़ाती है?
अथवा
शारीरिक शिक्षा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, सहनशीलता, सहयोग व धैर्यता बढ़ाने में किस प्रकार सहायक होती है?
अथवा
शारीरिक शिक्षा से मनुष्य में कौन-कौन-से सामाजिक गुण विकसित होते हैं?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा सामाजिक मूल्यों को निम्नलिखित प्रकार से बढ़ाती है

1. सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार;
खेल के दौरान यदि कोई खिलाड़ी घायल हो जाता है तो दूसरे सभी खिलाड़ी उसके प्रति हमदर्दी की भावना रखते हैं। ऐसा हॉकी अथवा क्रिकेट खेलते समय देखा भी जा सकता है। जब भी किसी खिलाड़ी को चोट लगती है तो सभी खिलाड़ी हमदर्दी प्रकट करते हुए उसकी सहायता के लिए दौड़ते हैं। यह गुण व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. सहनशीलता व धैर्यता:
मानव के समुचित विकास के लिए सहनशीलता व धैर्यता अत्यन्त आवश्यक मानी जाती है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता व धैर्यता होती है वह स्वयं को समाज में भली-भाँति समायोजित कर सकता है। शारीरिक शिक्षा अनेक ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे उसमें इन गुणों को बढ़ाया जा सकता है।

3. सहयोग की भावना:
समाज में रहकर हमें एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से सहयोग की भावना में वृद्धि होती है। सामूहिक खेलों या गतिविधियों से व्यक्तियों या खिलाड़ियों में सहयोग की भावना बढ़ती है। यदि कोई खिलाड़ी अपने खिलाड़ियों से सहयोग नहीं करेगा तो उसका नुकसान न केवल उसको होगा बल्कि उसकी टीम को भी होगा। शारीरिक शिक्षा इस भावना को सुदृढ़ करने में सहायक होती है।

4. अनुशासन की भावना:
अनुशासन को शारीरिक शिक्षा की रीढ़ की हड्डी कहा जा सकता है। अनुशासन की सीख द्वारा शारीरिक शिक्षा न केवल व्यक्ति के विकास में सहायक है, बल्कि यह समाज को अनुशासित नागरिक प्रदान करने में भी सक्षम है।

प्रश्न 3.
नेतृत्व (Leadership) से आप क्या समझते हैं? कोई दो परिभाषाएँ बताएँ।
अथवा
नेतृत्व की अवधारणा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि या विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करती है। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है।
1. मॉण्टगुमरी के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा तथा योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।”
2. ला-पियरे व फा!वर्थ के अनुसार, “नेतृत्व एक ऐसा व्यवहार है जो लोगों के व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है न कि लोगों के व्यवहार का प्रभाव उनके नेता पर।”

प्रश्न 4.
हमें एक नेता की आवश्यकता क्यों होती है?
अथवा
एक नेता के मुख्य कार्य बताइए।
अथवा
एक अच्छे नेता के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रत्येक समाज या देश के लिए एक अच्छा नेता बहुत महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वह समाज और देश को एक नई दिशा देता है। नेता जनता का प्रतिनिधि होता है। वह जनता की समस्याओं को सरकार या प्रशासन के सामने प्रस्तुत करता है। वह सरकार या प्रशासन को लोगों की आवश्यकताओं व समस्याओं से अवगत करवाता है। वह लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रयास करता है। एक नेता के माध्यम से ही जनता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं समस्याओं के निवारण हेतु प्रयास करती है। इसलिए हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं समस्याओं के निवारण हेतु एक नेता की आवश्यकता होती है।

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प्रश्न 5.
एक अच्छे नेता में कौन-कौन से गुण होने चाहिएँ?
उत्तर:
नेता में एक खास किस्म के गुण होते हैं जिनके कारण वह सभी को एकत्रित कर काम करने के लिए प्रेरित करता है। एक अच्छे नेता में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ-
(1) एक अच्छे नेता में पेशेवर प्रवृत्तियों का होना अति आवश्यक है। अच्छी पेशेवर प्रवृत्तियों का होना न केवल नेता के लिए आवश्यक है बल्कि समाज के लिए भी अति-आवश्यक है।
(2) एक अच्छे नेता की सोच सकारात्मक होनी चाहिए, ताकि बच्चे और समाज उससे प्रभावित हो सकें।
(3) उसमें ईमानदारी, निष्ठा, समय-पालना, न्याय-संगतता एवं विनम्रता आदि गुण होने चाहिएँ।
(4) उसके लोगों के साथ अच्छे संबंध होने चाहिएँ।
(5) उसमें भावनात्मक संतुलन एवं सामाजिक समायोजन की भावना होनी चाहिए।
(6) उसे खुशमिजाज तथा कर्मठ होना चाहिए।
(7) उसमें बच्चों के प्रति स्नेह और बड़ों के प्रति आदर-सम्मान की भावना होनी चाहिए।
(8) उसका स्वास्थ्य भी अच्छा होना चाहिए, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य अच्छी आदतें विकसित करने में सहायक होता है।
(9) उसका मानसिक दृष्टिकोण सकारात्मक एवं उच्च-स्तर का होना चाहिए।

प्रश्न 6.
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व के अवसर कब-कब प्राप्त होते हैं? वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व का गुण कैसे विकसित किया जा सकता है? ।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम में कभी-कभी ऐसे अवसर आते हैं, जहाँ विद्यार्थी को नेतृत्व की जरूरत होती है। विद्यार्थी को नेतृत्व करने के अवसर निम्नलिखित क्षेत्रों में दिए जा सकते हैं
(1) विद्यार्थियों द्वारा शारीरिक शिक्षा में प्रशिक्षण क्रियाओं या अभ्यास क्रियाओं का नेतृत्व करना।
(2) समूह खेलों का आयोजन करवाकर नेतृत्व का गुण विकसित करना।
(3) खेल मैदान की तैयारी और खेल सामग्री की देखभाल की समितियों के सदस्य बनाना।
(4) सामूहिक व्यायाम का नेता बनाना।
(5) खेल-खिलाने तथा अन्य अवसरों पर अधिकारी बनाना।
(6) विद्यालय की टीम का कप्तान बनाना।
(7) कक्षा का मॉनीटर बनाना।
(8) छोटे-छोटे खेलों को सुचारु रूप से चलाने के अवसर प्रदान करना।
(9) विद्यालय की विभिन्न समितियों के सदस्य नियुक्त करना।

इस तरह अध्यापक विद्यार्थियों में नेतृत्व का गुण विकसित करने में सहायता करता है। इससे विद्यार्थी नेता में स्वाभिमान की भावना पैदा होती है। विद्यार्थी देश का भविष्य होते हैं। एक आदर्श अध्यापक ही शारीरिक शिक्षा के द्वारा अच्छे समाज व राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकता है।

प्रश्न 7.
नेतृत्व अथवा नेता के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं? उत्तर-नेतृत्व/नेता के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
1. संस्थागत नेता:
इस प्रकार के नेता संस्थाओं के मुखिया होते हैं। स्कूल, कॉलेज, परिवार, फैक्टरी या दफ्तर आदि को मुखिया की आज्ञा का पालन करना पड़ता है।

2. प्रभुता:
संपन्न या तानाशाही नेता-इस प्रकार का नेतृत्व एकाधिकारवाद पर आधारित होता है। इस प्रकार का नेता अपने आदेशों का पालन शक्ति से करवाता है और यहाँ तक कि समूह का प्रयोग भी अपने हित के लिए करता है। यह नेता नियम और आदेशों को समूह में लागू करने का अकेला अधिकारी होता है। स्टालिन, नेपोलियन और हिटलर इस प्रकार के नेता के उदाहरण हैं।

3. आदर्शवादी या प्रेरणात्मक नेता:
इस प्रकार का नेता समूह पर अपना प्रभाव तर्क-शक्ति से डालता है और समूह अपने नेता के आदेशों का पालन अक्षरक्षः (ज्यों-का-त्यों) करता है। समूह के मन में अपने नेता के प्रति सम्मान होता है। नेता समूह या लोगों की भावनाओं का आदर करता है। महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन, जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री इस तरह के नेता थे।

4. विशेषज्ञ नेता:
समूह में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको किसी विशेष क्षेत्र में कुशलता हासिल होती है और वे अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। ये नेता अपनी कुशल सेवाओं को समूह की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करते हैं और समूह इन कुशल सेवाओं से लाभान्वित होता है। इस तरह के नेता अपने विशेष क्षेत्र; जैसे डॉक्टरी, प्रशिक्षण, इंजीनियरिंग तथा कला-कौशल के विशेषज्ञ होते हैं।

प्रश्न 8.
शारीरिक शिक्षा या खेलकूद का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर क्या प्रभाव पड़ता है?
अथवा
व्यक्ति के विकास में शारीरिक शिक्षा का क्या योगदान है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा या खेलकूद का लक्ष्य मानव के व्यक्तित्व का विकास इस प्रकार करना है कि वह जीवन की जटिलताओं के उतार-चढ़ाव को सहन कर सके तथा समाज का सम्मानित नागरिक बन सके। व्यक्ति का व्यक्तित्व तीन पक्षों पर आधारित है
(1) मानसिक पक्ष,
(2) शारीरिक पक्ष,
(3) सामाजिक पक्ष।

इन तीनों पक्षों के विकास से ही अच्छे नागरिक का निर्माण होता है। शारीरिक शिक्षा या खेलकूद के माध्यम से शारीरिक व्यक्तित्व निखरता है, इस बात को सभी मानते हैं। शारीरिक व्यक्तित्व का अर्थ है-अच्छा स्वास्थ्य व स्वस्थ दिमाग। अतः शारीरिक व्यक्तित्व के निखरने पर मानसिक पक्ष पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार मनुष्य अच्छे-बुरे को समझने की क्षमता रखने लगता है। यही क्षमता उसके सामाजिक व्यक्तित्व का निर्माण करती है। अतः प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से खेलकूद व्यक्ति के व्यक्तित्व पर अमिट प्रभाव डालते हैं जो उसके भावी जीवन का आधार बनते हैं।

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प्रश्न 9.
दर्शक कैसे अच्छे खिलाड़ी बन सकते हैं?
उत्तर:
दर्शन को अच्छा खिलाड़ी बनने के लिए निम्नलिखित गुण अपनाने आवश्यक हैं
(1) यदि रैफरी अथवा अंपायर उनकी इच्छानुसार निर्णय न दे तो वह अपना रोष प्रकट करने के लिए अनुचित ढंग न प्रयोग करें।
(2) वे अपने साथी दर्शकों के साथ इस कारण ही न लड़ाई-झगड़ा करें, क्योंकि वे विरोधी टीम के पक्ष में हैं।
(3) वे बढ़िया खेल को उत्साहित करने में किसी प्रकार का व्यवधान न डालें।
(4) वे जिस टीम के पक्ष में हैं, यदि वह मैच हार रही है तो दुर्व्यवहार का प्रदर्शन न करें और न ही खेल के मैदान में पत्थर, कंकर, बोतलें अथवा कूड़ा-कर्कट फेंककर खेल में रुकावट डालें।

प्रश्न 10.
आदिकाल में खेलों को मनुष्य ने अपने जीवन का सहारा क्यों बनाया?
उत्तर:
आदिकाल में मनुष्य भागना, कूदना और उछलना जैसी क्रियाएँ करता था। ये मौलिक क्रियाएँ आधुनिक खेलों की आधार हैं। आदिकाल में मनुष्य ये क्रियाएँ अपने जीवन निर्वाह के लिए शिकार करने और निजी सुरक्षा के लिए करता था। मनुष्य की आवश्यकता ने नेज़ा मारने का अभ्यास, तीरंदाजी और पत्थर मारने जैसी खेलों को जन्म दिया। ये आदिकालीन खेलें जहाँ मनुष्य के जीवन निर्वाह के लिए जरूरी थीं, वहीं उनको आत्मिक प्रसन्नता भी देती थीं।

प्रश्न 11.
मानव का विकास समाज से संभव है। व्याख्या करें। अथवा मनुष्य और समाज का परस्पर क्या संबंध है?
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। आधुनिक युग में मानव-संबंधों की आवश्यकता पहले से अधिक अनुभव की जाने लगी है। कोई भी व्यक्ति अपने-आप में पूर्ण नहीं है। किसी-न-किसी कार्य के लिए उसे दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। इन्हीं जरूरतों के कारण समाज में अनेक संगठनों की स्थापना की गई है। समाज द्वारा ही मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। अतः मनुष्य समाज पर आश्रित रहता है तथा इसके द्वारा ही उसका विकास संभव है।

प्रश्न 12.
शारीरिक शिक्षा हानिकारक मानसिक प्रभावों को किस प्रकार कम करती है? अथवा शारीरिक शिक्षा मनोवैज्ञानिक व्याधियों को कम करती है, कैसे?
उत्तर:
आधुनिक युग में व्यक्ति का अधिकतर काम मानसिक हो गया है। उदाहरण के रूप में, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, दार्शनिक, गणित-शास्त्री आदि सभी बुद्धिजीवी मानसिक कार्य अधिक करते हैं। मानसिक कार्यों से हमारे नाड़ी तंत्र (Nervous System) पर दबाव पड़ता है। इस दबाव को कम करने या समाप्त करने के लिए हमें अपने काम में परिवर्तन लाने की जरूरत है। यह परिवर्तन मानसिक सुख पैदा करता है। सबसे लाभदायक परिवर्तन शारीरिक व्यायाम है। जे०बी० नैश का कहना है कि जब कोई विचार उसके दिमाग में आता है तो परिस्थिति बदल जाने पर भी वह विचार उसके दिमाग में चक्कर काटने लगता है तो इससे पीछा छुड़वाने के लिए अपने आपको दूसरे कामों में लगा लेता हूँ ताकि उसका दिमाग तसेताजा हो सके। इसलिए सभी लोगों को मानसिक उलझनों से छुटकारा पाने के लिए खेलों में भाग लेना चाहिए, क्योंकि खेलें मानसिक तनाव को दूर करती हैं। इस प्रकार हानिकारक प्रभावों को कम करने में शारीरिक शिक्षा एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 13.
शारीरिक शिक्षा किस प्रकार रोगों की रोकथाम में सहायता करती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा निम्नलिखित प्रकार से रोगों की रोकथाम में सहायता करती है
(1) शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को शारीरिक रूप से मजबूत बनाने में सहायता करती है और मजबूत एवं सुडौल शरीर किसी भी प्रकार की बीमारी से लड़ सकता है।

(2) शारीरिक शिक्षा व्यक्तियों व छात्रों को शारीरिक संस्थानों का ज्ञान प्रदान करती है। शारीरिक संस्थानों की जानकारी होने से वे अपने शरीर एवं स्वास्थ्य के प्रति सक्षम रहते हैं।

(3) शारीरिक शिक्षा अच्छी आदतों को विकसित करने में सहायता करती है; जैसे हर रोज दाँतों पर ब्रश करना, भोजन करने से पहले हाथ साफ करना, सुबह-शाम सैर करना आदि।

(4) शारीरिक शिक्षा पौष्टिक एवं संतुलित आहार के महत्त्व के बारे में जानकारी देती है। पौष्टिक एवं संतुलित आहार करने से हमारे शरीर की कार्यक्षमता और रोग निवारक क्षमता बढ़ती है।

(5) शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मजबूत, रक्त के प्रवाह को ठीक और पाचन शक्ति में बढ़ोत्तरी करने में सहायक होती हैं।

(6) शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाना है। इसलिए यह व्यक्तियों को अनेक रोगों के लक्षण, कारण एवं नियंत्रण के उपायों से अवगत करवाती है।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
समाज क्या है?
उत्तर:
व्यावहारिक रूप से समाज (Society):
शब्द का प्रयोग मानव समूह के लिए किया जाता है परन्तु वास्तविक रूप से समाज मानव समूह के अंतर्गत व्यक्तियों के संबंधों की व्यवस्था का नाम है। समाज स्वयं में एक संघ है जो सामाजिक व औपचारिक संबंधों का जाल है।

प्रश्न 2.
समाज की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए। अथवा समाज को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. राइट के अनुसार, “समाज व्यक्तियों का एक समूह ही नहीं है, बल्कि यह समूह के व्यक्तियों के बीच पाए जाने वाले संबंधों की व्यवस्था है।”
2. गिडिंग्स के अनुसार, “समाज स्वयं वह संगठन व औपचारिक संबंधों का योग है जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति परस्पर बंधे रहते हैं।”

प्रश्न 3.
क्या मध्यकाल में खेलें केवल मन बहलाने के लिए ही खेली जाती थीं?
उत्तर:
मध्यकाल में खेलें मन बहलाने का साधन थीं परंतु यह हृष्टता-पुष्टता, जोश, ज़ज्बात और शक्ति के दिखावे के लिए भी खेली जाती थीं। खेलों का प्रचलन शक्तिशाली और जोशीले सैनिक तैयार करना भी था। रोमवासियों ने खेलों के हिंसक रूप को भी अपनाया हुआ था। यूनानवासियों ने खेलों को आपसी प्यार और मित्रता में वृद्धि करने के लिए खेला।

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प्रश्न 4.
शारीरिक शिक्षा परिवार व समाज के स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है?
उत्तर:
परिवार एवं समाज के स्वास्थ्य में शारीरिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य को न केवल अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने की कुशलता प्रदान करती है, अपितु यह उसे अपने परिवार एवं समाज के स्वास्थ्य को भी ठीक रखने में सहायता करती है। इस तरह से शारीरिक शिक्षा के द्वारा मनुष्य स्वयं अपने परिवार एवं अपने समाज के स्वास्थ्य की देखभाल भली-भाँति कर सकता है।

प्रश्न 5.
एक अच्छा खिलाड़ी सफलता के लिए क्या-क्या करता है?
उत्तर:
एक अच्छा खिलाड़ी सफलता के लिए कठोर परिश्रम का सहारा लेता है। वह सफलता के लिए अयोग्य तरीकों का प्रयोग नहीं करता, अपितु देश की आन और खेल की मर्यादा के लिए दूसरों को परिश्रम करने और साफ-सुथरा खेल खेलने के लिए प्रेरित करता है। वह विरोधी खिलाड़ियों को भी अपने साथी समझता है।

प्रश्न 6.
खेलें खिलाड़ी में कौन-कौन से गुण पैदा करती हैं?
उत्तर:
खेलें खिलाड़ी को आज्ञा पालन करने वाला, समय का सदुपयोग करने वाला, दूसरों के विचारों का सम्मान करने वाला, सहनशील, स्वस्थ और फुर्तीला खिलाड़ी बना देती हैं। खेलों के द्वारा खिलाड़ियों में दूसरों के साथ मिलकर रहना, उनको अपने बराबर समझना जैसे सामाजिक गुण आ जाते हैं। खिलाड़ी सत्य बोलने वाले, चरित्रवान, नैतिक मूल्यों का पालन करने वाले बन जाते हैं।

प्रश्न 7.
खेलों में भाग लेने से शरीर नीरोगी कैसे होता है?
उत्तर:
खेलों में भाग लेने से शरीर के निरंतर गतिशील रहने से अधिक भूख लगती है और शरीर में नया खून, शक्ति और तंदुरुस्ती पैदा होती है।

प्रश्न 8.
शारीरिक शिक्षा किन नैतिक गुणों का विकास करती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति में ईमानदारी, वफादारी, सच बोलना, दूसरों की सहायता करना, आत्म-त्याग आदि नैतिक गुणों . का विकास करती है। .

प्रश्न 9.
नेता का प्रमुख गुण क्या होना चाहिए? ‘
उत्तर:
सर्वप्रथम तो एक नेता को अच्छा नागरिक होना चाहिए, फिर एक अच्छा वक्ता व प्रशिक्षक तथा उसके बाद एक विशेषज्ञ होना चाहिए। उसे ईमानदार, समय का पाबंद और कर्मठ होना चाहिए।

प्रश्न 10.
मॉण्टगुमरी के अनुसार नेतृत्व को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मॉण्टगुमरी के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा व योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।” ..

प्रश्न 11.
समूह क्या है?
उत्तर:
समूह एक ऐसी सामाजिक अवस्था है जिसमें सभी इकट्ठे होकर कार्य करते हैं और अपने-अपने विचारों या भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। इसके द्वारा एकीकरण, मित्रता, सहयोग व सहकारिता के विचारों को बढ़ावा मिलता है। समूह में समान उद्देश्य की पूर्ति हेतु इकट्ठे होकर कार्य किया जाता है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

प्रश्न 12.
प्राथमिक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
प्राथमिक समूह वह पारिवारिक समूह है जिसमें भावनात्मक संबंध, घनिष्ठता एवं प्रेम-भाव प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसमें सशक्त समाजीकरण, अच्छे चरित्र तथा आचरण का विकास होता है। इस समूह के सदस्य एक-दूसरे से अपनी गतिविधियों व संस्कृति संबंधी वार्तालाप करते हैं।

प्रश्न 13.
द्वितीयक समूह किसे कहते हैं?
उत्तर:
द्वितीयक समूह प्राथमिक समूह से अधिक विस्तृत होता है। यह एक ऐसा समूह है जिसमें अप्रत्यक्ष, प्रभावरहित, औपचारिक संबंध होते हैं । इस समूह में सम्मिलित सदस्यों में कोई भावनात्मक संबंध नहीं होता। ऐसे समूहों में स्वार्थ प्रवृत्तियाँ अधिक पाई जाती हैं।

प्रश्न 14.
आदर्शवादी या प्रेरणात्मक नेता किसे कहा जाता है?
उत्तर:
इस प्रकार का नेता समूह पर अपना प्रभाव तर्क-शक्ति से डालता है और समूह अपने नेता के आदेशों का पालन अक्षरक्षः (ज्यों-का-त्यों) करता है। समूह के मन में अपने नेता के प्रति सम्मान होता है। नेता समूह या लोगों की भावनाओं का आदर करता है। महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन, जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री इस तरह के नेता थे।

HBSE 9th Class Physical Education व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान Important Questions and Answers

वस्तनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

प्रश्न 1.
व्यक्ति के विकास में शारीरिक शिक्षा का कोई एक योगदान बताएँ।
उत्तर:
अच्छी आदतों का विकास करना।

प्रश्न 2.
समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का कोई एक योगदान बताएँ।
उत्तर:
सामाजीकरण में सहायक सामाजिक गुणों; जैसे सहयोग, बंधुत्व व अच्छे नागरिक की भावना का विकास करना।

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के शरीर को कैसा बनाती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के शरीर को मजबूत एवं तंदुरुस्त बनाती है।

HBSE 9th Class Physical Education Solutions Chapter 4 व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान

प्रश्न 4.
एक अच्छे नेता का कोई एक गुण बताएँ।
उत्तर:
एक अच्छा नेता ईमानदार होता है।

प्रश्न 5.
खेल के मैदान में खिलाड़ी का व्यवहार कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
खेल के मैदान में खिलाड़ी का व्यवहार शांत एवं धैर्यपूर्ण होना चाहिए।

प्रश्न 6.
एक नेता कैसा होना चाहिए?
उत्तर-एक
नेता ईमानदार, कर्मठ तथा अच्छा वक्ता होना चाहिए।

प्रश्न 7.
एक योग्य व्यक्ति में नेतृत्व के अलावा कौन-कौन से आवश्यक गुण होते हैं?
उत्तर:
एक योग्य व्यक्ति में नेतृत्व के अलावा ईमानदारी, सहनशीलता, सहयोग की भावना, आज्ञा पालन की भावना और नैतिक गुण होते हैं।

प्रश्न 8.
शारीरिक शिक्षा द्वारा विकसित कोई एक सामाजिक मूल्य बताएँ।
उत्तर:
सामाजिक सहयोग की भावना विकसित होना।

प्रश्न 9.
समूह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर;
समूह दो प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 10.
किस प्रकार के समूह में भावनात्मक संबंध पाया जाता है?
उत्तर:
प्राथमिक समूह में भावनात्मक संबंध पाया जाता है।

प्रश्न 11.
आदिकाल में मनुष्य किस प्रकार की खेलें खेलता था?
उत्तर:
तीरंदाजी, नेज़ाबाजी और पत्थरों को फेंकना।

प्रश्न 12.
प्राचीनकाल में मनुष्य के लिए खेलों का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
जीवन-निर्वाह और शिकार खेलने के लिए युक्ति सीखना।

प्रश्न 13.
समाज किसका जाल है?
उत्तर:
समाज सामाजिक संबंधों का जाल है।

प्रश्न 14.
“नेतृत्व एक ऐसा व्यवहार है जो लोगों के व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है, न कि लोगों के व्यवहार का प्रभाव उनके नेता पर।” यह परिभाषा किसने दी? . .
उत्तर:
यह परिभाषा ला-पियरे व फा!वर्थ ने दी।

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प्रश्न 15.
“मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
अरस्तू का।

बहुविकल्पीय प्रश्न [Multiple Choice Questions]

प्रश्न 1.
“समाज के बिना मानव पशु है या देवता।” यह कथन है
(A) मैजिनी का
(B) क्लेयर का
(C) अरस्तू का
(D) मजूमदार का
उत्तर:
(C) अरस्तू का

प्रश्न 2.
“बच्चा नागरिकता का प्रथम पाठ माता के चुंबन और पिता के दुलार से सीखता है।” यह कथन किसका है?
(A) क्लेयर का
(B) मैजिनी का
(C) मजूमदार का
(D) ईलियट और मैरिल का
उत्तर:
(B) मैजिनी का

प्रश्न 3.
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के अनुसार एक अच्छे नागरिक में अच्छे समाज के निर्माण के लिए गुण होने चाहिएँ
(A) सत्य
(B) अहिंसा
(C) निर्भीकता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 4.
अरस्तू के अनुसार एक अच्छे नागरिक के गुण होते हैं
(A) शारीरिक सौंदर्य
(B) तीव्र बुद्धि व ज्ञान
(C) शुद्ध आचरण व व्यवहार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 5.
आदिकाल में मनुष्य के पसंदीदा खेल थे-
(A) तीरंदाजी
(B) नेज़ा मारने का अभ्यास
(C) पत्थर फेंकना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 6.
शारीरिक शिक्षा समाज के विकास में योगदान देती है
(A) जातीय भेदभाव का अंत करना
(B) सहयोग की भावना का विकास करना
(C) आदर्श नागरिकों का निर्माण करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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प्रश्न 7.
खिलाड़ी का व्यवहार होना चाहिए.
(A) धैयपूर्ण
(B) सहनशील
(C) शांत
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 8.
खिलाड़ी का चयन किस आधार पर किया जाता है?
(A) सामाजिक आधार पर
(B) आर्थिक आधार पर
(C) खेल कला एवं योग्यता के आधार पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) खेल कला एवं योग्यता के आधार पर

प्रश्न 9.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर शारीरिक शिक्षा बढ़ावा देती है’
(A) मित्रता को
(B) सद्भावना को
(C) अंतर्राष्ट्रीय शांति को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

प्रश्न 10.
“हमें खेल जीतने के लिए नहीं, बल्कि अच्छा प्रदर्शन करने के लिए खेलना चाहिए।” यह कथन है
(A) अरस्तू का .
(B) बैरन-डी-कोबर्टिन का
(C) प्लेटो का
(D) सुकरात का
उत्तर:
(B) बैरन-डी-कोबर्टिन का

प्रश्न 11.
“समाज स्वयं वह संगठन व औपचारिक संबंधों का योग है जिसमें सहयोग देने वाले व्यक्ति परस्पर बंधे रहते हैं।” यह कथन है
(A) अरस्तू का
(B) सुकरात का
(C) प्लेटो का
(D) गिडिंग्स का
उत्तर:
(D) गिडिंग्स का

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प्रश्न 12.
“मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” यह कथन है
(A) अरस्तू का
(B) सुकरात का.
(C) प्लेटो का
(D) गिडिंग्स का
उत्तर:
(A) अरस्तू का

व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान Summary

व्यक्ति एवं समाज के विकास में शारीरिक शिक्षा का योगदान परिचय

शारीरिक शिक्षा (Physical Education):
शारीरिक शिक्षा द्वारा केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि इससे व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायता मिलती है। अत: शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक) व्यक्तित्व का विकास होता है। मॉण्टेग्यू (Montague) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा न तो मस्तिष्क का और न ही शरीर का प्रशिक्षण करती है, बल्कि यह सम्पूर्ण व्यक्ति का प्रशिक्षण करती है।”

समाज (Society):
व्यावहारिक रूप से समाज (Society) शब्द का प्रयोग मानव समूह के लिए किया जाता है परन्तु वास्तविक रूप से समाज मानव समूह के अंतर्गत व्यक्तियों के संबंधों की व्यवस्था का नाम है। समाज स्वयं में एक संघ है जो सामाजिक व औपचारिक संबंधों का जाल है। राइट (Wright) के अनुसार, “समाज व्यक्तियों का एक समूह ही नहीं है, बल्कि यह समूह के व्यक्तियों के बीच पाए जाने वाले संबंधों की व्यवस्था है।”

नेतृत्व (Leadership):
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि या विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करती है। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है। मॉण्टगुमरी (Montgomery) के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा व योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।”

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