HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

Haryana State Board HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

HBSE 9th Class Hindi मेरे बचपन के दिन Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है।’ इस कथन के आलोक में आप यह पता लगाएँ कि
(क) उस समय लड़कियों की दशा कैसी थी ?
(ख) लड़कियों के जन्म के संबंध में आज कैसी परिस्थितियाँ हैं?
उत्तर-
(क) उस समय भारतीय समाज में लड़कियों की दशा अच्छी नहीं थी। उन्हें प्रायः बोझ समझा जाता था और जन्म के समय ही मार दिया जाता था। लड़की के जन्म पर सारे घर में मातम छा जाता था। महादेवी ने अन्यत्र लिखा है कि लड़के के जन्म की प्रतीक्षा में बैंड वाले व नौकर-चाकर खुश बैठे रहते थे। लड़की के जन्म का समाचार मिलते ही सब चुपचाप विदा हो जाते थे। ऐसे वातावरण में लड़कियों के प्रति अन्याय होना स्वाभाविक ही था।
(ख) लड़कियों के जन्म के संबंध में आज स्थिति बदल चुकी है। शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ लड़के-लड़कियों के बीच भेदभाव का दृष्टिकोण बदल रहा है। उनमें कोई भेदभाव नहीं समझा जाता। आज लड़कियाँ लड़कों से भी अधिक संख्या में पढ़ने-लिखने में आगे आ रही हैं, किंतु फिर भी लड़कियों के प्रश्न को लेकर कहीं-न-कहीं मन में एक कसक बाकी बची हुई है। उसका प्रमाण हम कन्या भ्रूण हत्या के रूप में देख सकते हैं। कन्या को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। इससे लड़के-लड़कियों के अनुपात में अंतर हो गया है और समाज में अनेक समस्याएँ उत्पन्न होने का भय बना हुआ है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

प्रश्न 2.
लेखिका उर्दू-फारसी क्यों नहीं सीख पाईं?
उत्तर-
लेखिका की उर्दू-फ़ारसी सीखने में जरा भी रुचि नहीं थी। लेखिका ने इस तथ्य को स्वयं स्वीकार किया है-“ये (बाबा) अवश्य चाहते थे कि मैं उर्दू-फारसी सीख पाऊँ।” लेकिन यह मेरे वश की बात नहीं थी। इसलिए जब उन्हें मौलवी साहब उर्दू-फारसी पढ़ाने घर पर आए तो वे चारपाई के नीचे जाकर छुप गईं।

प्रश्न 3.
लेखिका ने अपनी माँ के व्यक्तित्व की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
उत्तर-
लेखिका की माँ हिंदी व संस्कृत का अच्छा ज्ञान रखती थी। उन्होंने ही उसे ‘पंचतंत्र’ पढ़ाया था। लेखिका की माँ आस्थावादी थी। वह पूजा-पाठ में विश्वास रखती थी। वह हर रोज भगवान की वंदना करती थी। वह गीता का अध्ययन भी करती थी। इतना ही नहीं, लेखिका की माँ हिंदी में कविता भी लिखती थी और सूरदास व मीराबाई के पद भी गाती थी।

प्रश्न 4.
जवारा के नवाब के साथ अपने पारिवारिक संबंधों को लेखिका ने आज के संदर्भ में स्वप्न जैसा क्यों कहा है?
उत्तर-लेखिका के परिवार के संबंध नवाब साहब के परिवार के साथ अपनों से भी बढ़कर थे। जवारा की बेगम ने ही उनके छोटे भाई का नाम ‘मनमोहन’ रखा था। वे हर उत्सव के समय उनके साथ घुल-मिल जाती थी। ऐसे आत्मीय संबंधों की तो आज के युग में कल्पना भी नहीं की जा सकती। आज तो हिंदू-मुस्लिम एक-दूसरे पर संदेह करते हैं और उनमें सांप्रदायिक भेदभाव बना हुआ है।

रचना और अभिव्यक्ति

प्रश्न 5.
जेबुन्निसा महादेवी वर्मा के लिए बहुत काम करती थी। जेबुन्निसा के स्थान पर यदि आप होती/होते तो महादेवी से आपकी क्या अपेक्षा होती?
उत्तर-
ज़ेबुन्निसा के स्थान पर यदि हम महादेवी वर्मा के लिए काम करते तो हम उनसे यह अपेक्षा करते कि वह हमें कविता लिखना सिखाए और हमारी पढ़ाई-लिखाई में भी सहायता करे।

प्रश्न 6.
महादेवी वर्मा को काव्य प्रतियोगिता में चाँदी का कटोरा मिला था। अनुमान लगाइए कि आपको इस तरह का कोई पुरस्कार मिला हो और वह देशहित में या किसी आपदा निवारण के काम में देना पड़े तो आप कैसा अनुभव करेंगे/करेंगी?
उत्तर-
महादेवी वर्मा को काव्य-प्रतियोगिता में विजयी होने पर चाँदी का कटोरा पुरस्कार स्वरूप मिला था। यदि हमें भी काव्य-प्रतियोगिता में विजयी रहने पर पुरस्कार के रूप में चाँदी का कटोरा मिले और उसे हमें देश हित या आपदा निवारण में देना पड़े तो हम अपने आपको धन्य समझेंगे क्योंकि यह एक महान कार्य होता है जिसमें हमें अपना योगदान करने का अवसर मिलेगा। ऐसा करने पर हमें सुख एवं संतोष अनुभव होगा और अपने ऊपर गर्व भी होगा।

प्रश्न 7.
लेखिका ने छात्रावास के जिस बहुभाषी परिवेश की चर्चा की है, उसे अपनी मातृभाषा में लिखिए।
उत्तर-
लेखिका ने छात्रावास के बहुभाषी परिवेश की चर्चा की है। वहाँ विभिन्न भाषाएँ बोलने वाली छात्राएँ रहती थीं। वहाँ हिंदी, संस्कृत मराठी आदि भाषाएँ बोलने वाली छात्राएँ विभिन्न क्षेत्रों से आकर एक साथ अध्ययन करती थीं। इसलिए वहाँ एक-दूसरी छात्रा के साथ रहती हुई छात्राओं को अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त अन्य भाषाएँ सीखने का भी अवसर मिलता था। वहाँ हिंदी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ पढ़ाई जाती थीं। सभी अपनी-अपनी मातृभाषा बोलने के लिए स्वतंत्र थीं। कहीं भी भाषा को लेकर किसी प्रकार का विवाद नहीं था।

प्रश्न 8.
महादेवी जी के इस संस्मरण को पढ़ते हुए आपके मानस-पटल पर भी अपने बचपन की कोई स्मृति उभरकर आई होगी, उसे संस्मरण शैली में लिखिए।
उत्तर-
महादेवी जी के इस संस्मरण को पढ़कर हमारे मानस-पटल पर भी बचपन की अनेक स्मृतियाँ उभरती हैं। जब मैं पाँचवीं कक्षा में पढ़ता था तो गाँव में सरदार बख्शी सिंह हमारे पड़ोसी थे। उनके यहाँ कोई पुत्र नहीं था। उनकी दो बेटियाँ थीं जिनका विवाह हो चुका था। सरदार जी मुझे अपने बेटे की भाँति मानते थे। उनके मन में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था। विभिन्न त्योहारों को दोनों परिवार साथ-साथ मनाते थे। सरदार जी मुझे अपनी घोड़ी पर बिठाकर अनेक बार खेत में ले जाते थे। आरंभ में मैं घोड़ी पर बैठने से डरता था, किंतु बाद में घोड़ी की सवारी करने में मुझे आनंद आता था। उनके आकस्मिक निधन पर मुझे बहुत दुःख हुआ था। मुझे लगा था कि मेरे सिर से वह साया उठ गया था, जिसके नीचे बैठकर मैंने अपने बचपन के अनेक क्षण बिताए थे। आज भी बचपन की वे स्मृतियाँ मेरे मानस-पटल पर ताज़ा हो आती हैं।

प्रश्न 9.
महादेवी ने कवि सम्मेलनों में कविता पाठ के लिए अपना नाम बुलाए जाने से पहले होने वाली बेचैनी का ज़िक्र किया है। अपने विद्यालय में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते समय आपने जो बेचैनी अनुभव की होगी, उस पर डायरी का एक पृष्ठ लिखिए।
उत्तर-
दिनांक………….
आज विद्यालय का वार्षिक उत्सव आरंभ होने वाला है। मुझे इस उत्सव में देश भक्ति का गीत गाना है। कार्यक्रम काफी लंबा है और मेरी बारी काफी देर में आएगी। उस समय मैं अपनी बारी की प्रतीक्षा करता हुआ बेचैन हो रहा था। मेरे मन में उस समय बहुत शंकाएँ उत्पन्न हो रही थीं कि पता नहीं मैं वह गीत ठीक प्रकार से गा पाऊँगा या नहीं। सुनने वालों को मेरा गीत कैसा लगेगा। कभी लगता था कि कहीं मैं घबराकर गीत भूल न जाऊँ। मन में ऐसे विचार आने से मेरी बेचैनी और भी बढ़ती जा रही थी। किंतु अंततः मेरा नाम पुकारा गया। मैं पूर्ण विश्वास से मंच पर गया और भगवान का धन्यवाद करते हुए गीत गाने लगा तो संपूर्ण पंडाल में खामोशी छा गई। जब मेरा गीत समाप्त हुआ तो पंडाल तालियों की ध्वनि से गूंज उठा था।

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भाषा-अध्ययन

10. पाठ से निम्नलिखित शब्दों के विलोम शब्द ढूँढकर लिखिए-
विद्वान, अनंत, निरपराधी, दंड, शांति।
उत्तर-
विद्वान = मूर्ख
अनंत = सीमित
निरपराधी = अपराधी
दंड = पुरस्कार
शांति . = अशांति।

11. निम्नलिखित शब्दों से उपसर्ग/प्रत्यय अलग कीजिए और मूल शब्द बताइए
निराहारी – निर् + आहार + ई
सांप्रदायिकता
अप्रसन्नता
अपनापन
किनारीदार
स्वतंत्रता
उत्तर-
सांप्रदायिकता = संप्रदाय + इक + ता
अप्रसन्नता = अ + प्रसन्न + ता
अपनापन = अपना + पन
किनारीदार = कि + नारी + दार
स्वतंत्रता = स्व + तंत्र + ता

12. निम्नलिखित उपसर्ग-प्रत्ययों की सहायता से दो-दो शब्द लिखिए-
उपसर्ग – अन्, अ, सत्, स्व, दुर्
प्रत्यय – दार, हार, वाला, अनीय
उत्तर-
उपसर्ग = अनाधिकार, अन्वेषण
अ = अधर्म, अज्ञान
सत् = सत्कर्म, सत्प्रकाश
स्व = स्वाभिमान, स्वतंत्र
दुर् = दुरुपयोग, दुर्गुण

प्रत्यय
दार = देनदार, किराएदार
हार = देवनहार, खेवनहार
वाला = दिलवाला, रखवाला
अनीय = दर्शनीय, पठनीय

13. , पाठ में आए सामासिक पद छाँटकर विग्रह कीजिए-
पूजा-पाठ — पूजा और पाठ
उत्तर-
कवि-सम्मेलन = कवियों का सम्मेलन
रोना-धोना = रोना और धोना
उत्तर
विद्यापीठ = विद्या की पीठ
ब्रजभाषा = ब्रज की भाषा
निराहार = बिना आहार
ताई-चाची = ताई और चाची
जेब खर्च = जेब के लिए खर्च
सत्याग्रह = सत्य के लिए आग्रहा
प्रचार-प्रसार = प्रचार और प्रसार

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

पाठेतर सक्रियता

प्रश्न 1.
बचपन पर केंद्रित मैक्सिम गोर्की की रचना ‘मेरा बचपन’ पुस्तकालय से लेकर पढ़िए।
उत्तर-
विद्यार्थी इसे स्वयं करेंगे।

प्रश्न 2.
‘मातृभूमि : ए विलेज विदआउट विमेन’ (2005) फिल्म देखें। मनीष झा द्वारा निर्देशित इस फिल्म में कन्या भ्रूण हत्या की त्रासदी को अत्यंत बारीकी से दिखाया गया है।
उत्तर-
यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

प्रश्न 3.
कल्पना के आधार पर बताइए कि लड़कियों की संख्या कम होने पर भारतीय समाज का रूप कैसा होगा?
उत्तर-
विद्यार्थी इस प्रश्न का उत्तर अपने अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करेंगे।

यह भी जानें

स्त्री दर्पण-इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली यह पत्रिका श्रीमती रामेश्वरी नेहरू के संपादन में सन 1909 से 1924 तक लगातार प्रकाशित होती रही। स्त्रियों में व्याप्त अशिक्षा और कुरीतियों के प्रति जागृति पैदा करना उसका मुख्य उद्देश्य था।

HBSE 9th Class Hindi मेरे बचपन के दिन Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘मेरे बचपन के दिन’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर-
‘मेरे बचपन के दिन’ संस्मरण में महादेवी वर्मा ने अपने बचपन की प्रमुख घटनाओं का वर्णन किया है। उन्होंने इस पाठ में बेटियों (कन्याओं) के प्रति समाज के संकीर्ण दृष्टिकोण का भी उल्लेख किया है। उनके अपने परिवार में भी लड़कियों के जन्म को उचित नहीं माना जाता था। दो-सौ वर्षों के पश्चात् उनके परिवार में कन्या (महादेवी) का जन्म हुआ था। उन्होंने छात्रावास के जीवन में सुभद्रा कुमारी चौहान व अन्य छात्राओं से मित्रता के प्रसंगों का वर्णन कर तत्कालीन परिस्थितियों व छात्रावास के वातावरण को सजीव रूप में प्रस्तुत किया है। सम्पूर्ण पाठ में भारतीय जीवन-मूल्यों को उजागर करना भी प्रस्तुत पाठ का मूल उद्देश्य है।

प्रश्न 2.
महादेवी वर्मा को कविता लिखने की प्रेरणा किससे और कैसे मिली?
उत्तर-
महादेवी वर्मा को कविता लिखने की प्रेरणा अपनी माता से मिली थी। उनकी माता धार्मिक प्रवृत्ति की स्त्री थी। वह भजन लिखती भी थी और गाती भी थी। बचपन से ही महादेवी जी अपनी माता को गाते हुए सुनती थीं। यहाँ से उन्हें ब्रजभाषा में लिखने की प्रेरणा मिली। जब वे क्रास्थवेट कॉलेज, इलाहाबाद में पढ़ने के लिए आई तो वहाँ छात्रावास में उनका परिचय सुप्रसिद्ध हिंदी कवयित्री सुभद्राकुमारी चौहान से हुआ। वे उस समय खड़ी बोली हिंदी में कविता लिखती थीं। उनके संपर्क में आने पर महादेवी जी ने भी खड़ी बोली हिंदी में तुकबंदी करनी आरंभ कर दी। वे वहाँ कवि-सम्मेलनों में भी जाने लगीं। वे इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली ‘स्त्री दर्पण’ नामक पत्रिका में कविताएँ भेजने लगी थी। उन्हीं दिनों महादेवी वर्मा ने कविता पाठ प्रतियोगिता में अनेक पुरस्कार भी प्राप्त किए थे। इस प्रकार महादेवी जी का काव्य लिखने में उत्साह दिनोंदिन बढ़ता गया।

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प्रश्न 3.
स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ कवि-सम्मेलनों व हिंदी के प्रचार-प्रसार के आयोजन का क्या लक्ष्य था?
उत्तर-
सन 1917 के आसपास भारतवर्ष स्वतंत्रता आंदोलन जोरों पर था। महात्मा गांधी ने स्वतंत्रता आंदोलन की बागडोर अपने हाथ में ले ली थी। वे संपूर्ण देश को एक सूत्र में बाँधना चाहते थे। भारत के बहुत बड़े भाग में हिंदी समझी व बोली जाती है, इसलिए स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ कवि सम्मेलनों व हिंदी के प्रचार-प्रसार का आयोजन किया जाता था। हिंदी के माध्यम से ही देश-प्रेम को उत्पन्न किया जा रहा था।

प्रश्न 4.
‘ताई साहिबा और लेखिका के परिवार में बड़ी घनिष्ठता थी’-इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखिका ने बताया है कि ताई साहिबा और उनके परिवार में आपस में बहुत प्रेम था। बच्चों के जन्मदिन के अवसर पर दोनों परिवारों के लोग एक-साथ भोजन करते और शुभकामनाएँ देते। वे हर त्योहार को मिलकर मनाते थे। ताई साहिबा ने लेखिका के छोटे भाई का नामकरण भी किया था। नेग भी साधिकार प्राप्त किया था। इन सब तथ्यों से पता चलता है कि ताई साहिबा व लेखिका के परिवारों में अत्यधिक घनिष्ठता थी।

प्रश्न 5.
छात्रावास में लेखिका और सुभद्राकुमारी के बीच मित्रता कैसे हुई?
उत्तर-
छात्रावास में लेखिका एवं सुभद्राकुमारी दोनों एक ही कमरे में रहती थीं। सुभद्राकुमारी खड़ी बोली में कविता लिखती थीं। उसको कवयित्री के रूप में थोड़ी-बहुत प्रसिद्धि भी मिल चुकी थी। महादेवी जी उनसे बहुत प्रभावित थीं और छुप-छुपकर थोड़ी बहुत तुकबंदी भी करने लगी थीं। जब सुभद्रा को महादेवी के इस रहस्य का पता चला तो उसने उसे और भी उत्साहित किया, जिससे दोनों की मित्रता गहन होती चली गई। आगे चलकर दोनों साथ-साथ विभिन्न कवि सम्मेलनों में भी भाग लेने लगी थीं।

प्रश्न 6.
छात्रावास का वातावरण कैसा था ? सोदाहरण उत्तर दीजिए।
उत्तर-
महादेवी जी क्रास्थवेट कॉलेज के छात्रावास में रहती थीं। महादेवी जी ने उस समय के वातावरण के विषय में लिखा है कि उस समय का वातावरण बहुत अच्छा था। वहाँ रहने वाली छात्राओं में आपस में बहुत स्नेह था। वे सब एक-दूसरे की सहायता करती थीं। उनमें सांप्रदायिकता का भाव नहीं था। विविध धर्मों और विविध क्षेत्रों से आई विविध भाषी छात्राएँ एक साथ बिना किसी भेदभाव के वहाँ रहती थीं। उनमें से कोई अवधी बोलती, तो कोई बुंदेलखंडी में बातें करती थी। कॉलेज में हिंदी व उर्दू पढ़ाई जाती थी। किसी प्रकार का कोई विवाद नहीं था। अतः यह सिद्ध होता है कि वहाँ का वातावरण बड़ा स्नेही एवं सहयोगमयी था।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मेरे बचपन के दिन’ शीर्षक पाठ किसके द्वारा रचित है?
(A) हजारी प्रसाद द्विवेदी :
(B) महादेवी वर्मा
(C) प्रेमचंद
(D) चपला देवी
उत्तर-
(B) महादेवी वर्मा

प्रश्न 2.
लेखिका के अनुसार किसमें एक विचित्र आकर्षण होता है?
(A) खेलकूद में
(B) बचपन की स्मृतियों में
(C) सपनों में
(D) लड़कपन में
उत्तर-
(B) बचपन की स्मृतियों में ।

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प्रश्न 3.
लेखिका के परिवार में कोई लड़की कितने वर्ष बाद पैदा हुई थी?
(A) चालीस वर्ष बाद
(B) पचास वर्ष बाद
(C) अस्सी वर्ष बाद
(D) दो सौ वर्ष बाद
उत्तर-
(D) दो सौ वर्ष बाद

प्रश्न 4.
लेखिका के बाबा ने कौन-सी भाषा पढ़ी थी?
(A) अंग्रेज़ी
(B) हिंदी
(C) संस्कृत
(D) फारसी एवं उर्दू
उत्तर-
(D) फारसी एवं उर्दू

प्रश्न 5.
लेखिका के परिवार में सबसे पहले अंग्रेज़ी किसने पढ़ी थी?
(A) स्वयं लेखिका ने
(B) लेखिका की माता ने
(C) पिता ने
(D) दादा ने
उत्तर-
(C) पिता ने

प्रश्न 6.
लेखिका की माँ कौन-सी भाषाएँ जानती थी?
(A) हिंदी एवं संस्कृत
(B) अंग्रेज़ी एवं पंजाबी
(C) उर्दू एवं फ़ारसी
(D) बंगला एवं उड़िया
उत्तर-
(A) हिंदी एवं संस्कृत

प्रश्न 7.
लेखिका को सर्वप्रथम किस स्कूल में दाखिल करवाया गया था?
(A) पुतली पाठशाला
(B) मिशन स्कूल
(C) विद्या भारती
(D) राजकीय उच्च विद्यालय
उत्तर-
(B) मिशन स्कूल

प्रश्न 8.
छात्रावास में लेखिका की सबसे पहली सहेली कौन बनी थी?
(A) इंदिरा गाँधी
(B) रानी लक्ष्मीबाई
(C) सुभद्रा कुमारी
(D) उषा प्रियंवदा
उत्तर-
(C) सुभद्रा कुमारी

प्रश्न 9.
सुभद्रा और महादेवी किस कॉलेज में साथ-साथ पढ़ी थी?
(A) क्रास्थवेट
(B) हिंदू गर्ल्स कॉलेज
(C) नेशनल कॉलेज
(D) शांति निकेतन
उत्तर-
(A) क्रास्थवेट

प्रश्न 10.
महादेवी की विद्यार्थी जीवन की रचनाएँ किस पत्रिका में छपती थीं?
(A) सारिका
(B) सरस्वती
(C) हंस
(D) स्त्री दर्पण
उत्तर-
(D) स्त्री दर्पण

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

प्रश्न 11.
महादेवी जी ने अपना कटोरा किसे दे दिया था?
(A) जवाहर लाल नेहरू को
(B) गाँधी जी को
(C) मोतीलाल नेहरू जी को .
(D) शास्त्री जी को
उत्तर-
(B) गाँधी जी को

प्रश्न 12.
लेखिका की सहेली जेबुन्निसा (जेबुन) कहाँ की रहने वाली थी?
(A) बंबई
(B) पूना
(C) अहमदाबाद
(D) कोल्हापुर
उत्तर-
(D) कोल्हापुर

प्रश्न 13.
ज़ेबुन कैसी पोशाक पहनती थी?
(A) किनारीदार साड़ी
(B) कुर्ता सलवार
(C) कुर्ता और घाघरा
(D) पैंट्स-कमीज
उत्तर-
(A) किनारीदार साड़ी

प्रश्न 14.
महादेवी के भाई का नाम क्या रखा गया था?
(A) आलोक मोहन
(B) मनमोहन
(C) क्षितिज मोहन
(D) त्रिभुवन
उत्तर-
(B) मनमोहन

प्रश्न 15.
श्री मनमोहन किस विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर बने थे?
(A) पंजाब विश्वविद्यालय
(B) दिल्ली विश्वविद्यालय
(C) गोरखपुर विश्वविद्यालय
(D) बनारस हिंदू विश्वविद्यालय
उत्तर-
(C) गोरखपुर विश्वविद्यालय

प्रश्न 16.
किसकी नवाबी छिन गई थी?
(A) लखनऊ के नवाब की
(B) जवारा के नवाब की
(C) दिल्ली के नवाब की
(D) कलकत्ता के नवाब की
उत्तर-
(B) जवारा के नवाब की

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 1 दो बैलों की कथा

मेरे बचपन के दिन प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या/भाव ग्रहण

1. अपने परिवार में मैं कई पीढ़ियों के बाद उत्पन्न हुई। मेरे परिवार में प्रायः दो सौ वर्ष तक कोई लड़की थी ही नहीं। सुना है, उसके पहले लड़कियों को पैदा होते ही परमधाम भेज देते थे। फिर मेरे बाबा ने बहुत दुर्गा-पूजा की। हमारी कुल-देवी दुर्गा थीं। मैं उत्पन्न हुई तो मेरी बड़ी खातिर हुई और मुझे वह सब नहीं सहना पड़ा जो अन्य लड़कियों को सहना पड़ता है। परिवार में बाबा फारसी और उर्दू जानते थे। पिता ने अंग्रेज़ी पढ़ी थी। हिंदी का कोई वातावरण नहीं था।
मेरी माता जबलपुर से आईं तब वे अपने साथ हिंदी लाईं। वे पूजा-पाठ भी बहुत करती थीं। पहले-पहल उन्होंने मुझको ‘पंचतंत्र’ पढ़ना सिखाया। [पृष्ठ 69]

शब्दार्थ-उत्पन्न हुई = पैदा हुई। परमधाम भेज देना = मार देना। खातिर होना = सम्मान होना। वातावरण = परिस्थितियाँ, माहौल। अपने साथ हिंदी लाना = हिंदी का ज्ञान होना। पंचतंत्र = धार्मिक ग्रंथ का नाम। .

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य-पंक्तियाँ हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित “मेरे बचपन के दिन’ नामक पाठ से ली गई हैं। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा जी हैं। इस पाठ में उन्होंने अपने बचपन की घटनाओं का वर्णन किया है तथा उस समय देश में चल रहे राष्ट्रीय आंदोलन और समाज में लड़कियों के प्रति सामाजिक रवैये पर भी प्रकाश डाला है। इन पंक्तियों में महादेवी जी ने अपने परिवार की परंपराओं और परिस्थितियों का उल्लेख किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-महादेवी जी ने अपने बचपन की स्मृतियों को बताते हुए लिखा है कि वे अपने परिवार में कई पीढ़ियों के पश्चात उत्पन्न हुई थीं अर्थात उनके परिवार में लड़की पैदा ही नहीं हुई थी। दो सौ वर्षों से उनके परिवार में कोई लड़की नहीं थी। ऐसा सुना है कि उससे पहले लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। महादेवी जी ने पुनः बताया है कि उनके बाबा जी ने उनकी प्राप्ति के लिए दुर्गा माता की प्रार्थना की थी। दुर्गा उनके कुल की देवी थी। जब महादेवी जी का जन्म हुआ तो उनके परिवार को बहुत खुशी हुई। इसलिए उनका परिवार में बहुत सम्मान व सेवा हुई। महादेवी को वे सब कष्ट नहीं सहन करने पड़े थे जो उनसे पूर्व उत्पन्न लड़कियों को उनके परिवार में सहने पड़े थे। कहने का भाव है कि उनके परिवार में लड़की को जन्म के तुरंत बाद ही मार दिया जाता था। उनके परिवार में उनके बाबा उर्दू-फारसी ही जानते थे। बाद में उनके पिताजी ने अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी प्राप्त किया था। उनके परिवार में हिंदी भाषा को पढ़ने-लिखने वाला कोई नहीं था। किंतु उनकी माता जबलपुर से वधू बनकर उनके परिवार में आईं तो वह हिंदी जानने व पढ़ने-लिखने वाली थीं। इस प्रकार उनकी माता के आने पर उनके परिवार में हिंदी भाषा का पढ़ना-लिखना व बोलना आरंभ हुआ था। वह पूजा-पाठ भी बहुत करती थीं। उन्होंने ही मुझे सबसे पहले ‘पंचतंत्र’ पढ़ना सिखाया था।

विशेष-

  1. कन्याओं के प्रति समाज के संकीर्ण दृष्टिकोण को प्रकट किया गया है।
  2. भाषा सरल, सहज एवं भावानुकूल है।
  3. तत्सम शब्दों का प्रयोग किया गया है।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) महादेवी के परिवार में कितने समय बाद किसी कन्या का जन्म हुआ था ?
(2) महादेवी के जन्म के समय लड़कियों के प्रति समाज का दृष्टिकोण कैसा था ?
(3) महादेवी का जन्म किस देवी की मन्नत (आशीर्वाद) से हुआ था ?
(4) महादेवी के परिवार में हिंदी का प्रचलन कैसे हुआ था ?
उत्तर-
(1) महादेवी के परिवार में किसी कन्या का जन्म व पालन-पोषण लगभग दो सौ वर्षों के पश्चात हुआ था।
(2) महादेवी के जन्म के समय समाज में लड़कियों को बोझ समझा जाता था। इसलिए उन्हें जन्म के तुरंत बाद मार दिया जाता था। यदि वे जीवित भी रह जातीं तो उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया जाता था। उन्हें लड़कों की तुलना में हीन समझा जाता था। उनकी दशा अत्यंत शोचनीय थी।
(3) महादेवी के दादा ने उनके जन्म के लिए अपनी कुल देवी ‘दुर्गा माता’ की वंदना की थी। अतः महादेवी दुर्गा माता के आशीर्वाद से उत्पन्न हुई थी।
(4) महादेवी के दादा उर्दू-फारसी जानते थे और पिता ने अंग्रेज़ी भाषा भी सीख ली थी। उनकी माता हिंदी भाषा को पढ़ने-लिखने का ज्ञान रखती थी। वह ‘पंचतंत्र’ जैसे ग्रंथ पढ़ती थी। इसलिए उसने महादेवी को भी हिंदी पढ़ना-लिखना सिखाया था। अतः उसकी माता के प्रयास से उनके परिवार में हिंदी का प्रचलन हुआ था।

2. बाबा कहते थे, इसको हम विदुषी बनाएँगे। मेरे संबंध में उनका विचार बहुत ऊँचा रहा। इसलिए ‘पंचतंत्र’ भी पढ़ा मैंने, संस्कृत भी पढ़ी। ये अवश्य चाहते थे कि मैं उर्दू-फारसी सीख लूँ, लेकिन वह मेरे वश की नहीं थी। मैंने जब एक दिन मौलवी साहब को देखा तो बस, दूसरे दिन मैं चारपाई के नीचे जा छिपी। तब पंडित जी आए संस्कृत पढ़ाने। माँ थोड़ी संस्कृत जानती थीं। गीता में उन्हें विशेष रुचि थी। पूजा-पाठ के समय मैं भी बैठ जाती थी और संस्कृत सुनती थी। उसके उपरांत उन्होंने मिशन स्कूल में रख दिया मुझको। मिशन स्कूल में वातावरण दूसरा था, प्रार्थना दूसरी थी। मेरा मन नहीं लगा। वहाँ जाना बंद कर दिया। जाने में रोने-धोने लगी। तब उन्होंने मुझको क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में भेजा, जहाँ मैं पाँचवें दर्जे में भर्ती हुई। यहाँ का वातावरण बहुत अच्छा था उस समय। हिंदू लड़कियाँ भी थीं, ईसाई लड़कियाँ भी थीं। हम लोगों का एक ही मेस था। उस मेस में प्याज़ तक नहीं बनता था। [पृष्ठ 69-70]]

शब्दार्थ-विदुषी = विद्वान स्त्री। पंचतंत्र = धार्मिक ग्रंथ का नाम। ऊँचा विचार = अच्छा विचार। मौलवी = उर्दू-फ़ारसी पढ़ाने वाले अध्यापक। उपरांत = पश्चात। मेस = भोजनालय । वातावरण = माहौल।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित एवं महादेवी वर्मा द्वारा रचित ‘मेरे बचपन के दिन’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इस पाठ में उन्होंने अपने बचपन की घटनाओं का वर्णन स्मृतियों के सहारे किया है। इस गद्यांश में बताया गया है कि महादेवी जी ने किस प्रकार हिंदी पढ़ना सीखा था। उन्हें किन-किन स्कूलों में भर्ती करवाया गया था। साथ ही क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज और वहाँ के छात्रावास का वर्णन किया गया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण-महादेवी जी ने अपने बचपन की स्मृतियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि उनके बाबा उन्हें खूब पढ़ाना-लिखाना चाहते थे। वे चाहते थे कि महादेवी एक विदुषी बने ताकि परिवार का नाम ऊँचा हो। इसलिए महादेवी ने ‘पंचतंत्र’ में संकलित कहानियों को भी पढ़ा था। महादेवी ने बचपन में संस्कृत भी सीखी थी। महादेवी के दादा जी चाहते थे कि वह उर्दू-फ़ारसी भी पढ़ना-लिखना सीख ले, किंतु उर्दू-फारसी भाषा में उनकी जरा-सी भी रुचि नहीं थी। उसके दादा जी ने उनको उर्दू-फारसी पढ़ाने के लिए एक मौलवी साहब की नियुक्ति की थी। महादेवी ने जब मौलवी साहब को देखा तो वह डर गई और दूसरे दिन जब मौलवी साहब आए तो वह चारपाई के नीचे छुप गई थी। इस प्रकार महादेवी को उर्दू-फारसी पढ़ने से छुट्टी मिल गई थीं। तब उन्हें संस्कृत पढ़ाने के लिए एक पंडित जी को बुलाया गया। महादेवी की माता जी भी संस्कृत का ज्ञान रखती थीं। उनकी गीता पढ़ने में बहुत रुचि थी। जब उनकी माता पाठ-पूजा करतीं तो वह भी अपनी माता के साथ बैठ जातीं और माता द्वारा बोली गई संस्कृत को बड़े ध्यान से सुनती थीं। कुछ दिन महादेवी ने घर पर ही संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की। इसके पश्चात् उन्हें मिशन स्कूल में दाखिल करवा दिया गया। किंतु वहाँ का वातावरण महादेवी जी के अनुकूल नहीं था। वहाँ बोली जाने वाली प्रार्थना भी दूसरी ही थी। उस स्कूल में महादेवी जी का मन नहीं लगा। उन्होंने वह स्कूल त्याग दिया और तब उन्हें क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में भेजा जाने लगा। वहाँ उन्हें पाँचवीं कक्षा में दाखिल करवाया गया था। वहाँ का माहौल बहुत अच्छा था। महादेवी जी को वह कॉलेज बहुत पसंद था। उस समय वहाँ विभिन्न धर्मों की लड़कियाँ पढ़ती थीं। सब लड़कियों का भोजनालय भी एक अर्थात सभी लड़कियाँ एक साथ एक ही भोजनालय में भोजन खाती थीं। उस मेस में प्याज़ तक प्रयोग नहीं होता था अर्थात वहाँ पूर्णतः शाकाहारी भोजन बनता था।

विशेष-

  1. महादेवी जी के बचपन में उन्हें दी गई शिक्षा का उल्लेख किया गया है।
  2. महादेवी जी की शिक्षा के प्रति रुचि का उल्लेख भी हुआ है।
  3. महादेवी जी की माता के स्वभाव पर भी प्रकाश डाला गया है।
  4. भाषा-शैली भावानुकूल है।

उपर्युक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) महादेवी के बाबा जी उसे क्या बनाना चाहते थे ?
(2) लेखिका उर्दू-फारसी क्यों नहीं सीखना चाहती थी ?
(3) मिशन स्कूल में लेखिका का मन क्यों नहीं लगा था ?
(4) क्रास्थवेट कॉलेज का वातावरण कैसा था ?
उत्तर-
(1) लेखिका के बाबा जी चाहते थे कि वह पढ़-लिखकर महान विदुषी बने। इसलिए उसकी शिक्षा के लिए घर पर प्रबंध किया गया था।
(2) लेखिका की रुचि उर्दू-फारसी पढ़ने में नहीं थी। मौलवी साहब को देखकर वह चारपाई के नीचे छुप गई थी। इसके अतिरिक्त उनकी रुचि संस्कृत सीखने में थी।
(3) मिशन स्कूल का वातावरण महादेवी जी के मनोनुकूल नहीं था। वहाँ प्रार्थना भी दूसरी थी जो महादेवी जी ने पहले कभी नहीं बोली थी। इसलिए महादेवी जी वहाँ जाने के नाम पर रो पड़ती थीं। इन्हीं कारणों से उनका मन मिशन स्कूल में नहीं लगा था।
(4) क्रास्थवेट कॉलेज का वातावरण खुला था। वहाँ विभिन्न धर्मों तथा विविध भाषाएँ बोलने वाली लड़कियाँ पढ़ती थीं। वहाँ किसी के साथ भेदभाव नहीं किया जाता था। सभी लड़कियाँ साथ-साथ रहती थीं और एक साथ बैठकर खाना खाती थीं। अतः स्पष्ट है कि वहाँ का वातावरण अच्छा था।

3. फिर हम दोनों की मित्रता हो गई। क्रास्थवेट में एक पेड़ की डाल नीची थी। उस डाल पर हम लोग बैठ जाते थे। जब और लड़कियाँ खेलती थीं तब हम लोग तुक मिलाते थे। उस समय एक पत्रिका निकलती थी-‘स्त्री दर्पण’-उसी में भेज देते थे। अपनी तुकबंदी छप भी जाती थी। फिर यहाँ कवि-सम्मेलन होने लगे तो हम लोग भी उनमें जाने लगे। हिंदी का उस समय प्रचार-प्रसार था। मैं सन् 1917 में यहाँ आई थी। उसके उपरांत गांधी जी का सत्याग्रह आरंभ हो गया और आनंद भवन स्वतंत्रता के संघर्ष का केंद्र हो गया। जहाँ-तहाँ हिंदी का भी प्रचार चलता था। कवि-सम्मेलन होते थे तो क्रास्थवेट से मैडम हमको अपने साथ लेकर जाती थीं। हम कविता सुनाते थे। कभी हरिऔध जी अध्यक्ष होते थे, कभी श्रीधर पाठक होते थे, कभी रत्नाकर जी होते थे, कभी कोई होता था। कब हमारा नाम पुकारा जाए, बेचैनी से सुनते रहते थे। मुझको प्रायः प्रथम पुरस्कार मिलता था। सौ से कम पदक नहीं मिले होंगे उसमें। [पृष्ठ 70-71]

शब्दार्थ-तुक मिलाना = कविता बनाना। उपरांत = पश्चात्। सत्याग्रह = सच्चाई के लिए आग्रह। संघर्ष = मुकाबला। पुरस्कार = इनाम। पदक = मैडल।

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित ‘मेरे बचपन के दिन’ शीर्षक पाठ से लिया गया है। इस निबंध में महादेवी जी ने स्मृतियों के सहारे अपने बचपन की विविध घटनाओं पर प्रकाश डाला है। साथ यह भी बताया है कि उस समय के समाज का लड़कियों के प्रति क्या दृष्टिकोण था। इन पंक्तियों में लेखिका ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के प्रयासों पर प्रकाश डाला है और महात्मा गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन की ओर भी संकेत किया है।

व्याख्या/भाव ग्रहण लेखिका क्रास्थवेट कॉलेज के छात्रावास में रहते हुए घटित घटनाओं को याद करती हुई कहती है कि छात्रावास में रहते हुए उनकी मित्रता सुभद्राकुमारी चौहान से हो गई थी। छात्रावास में एक पेड़ था। उसकी शाखाएँ बहुत लंबी और झुकी हुई थीं। जब दूसरी लड़कियाँ खेल-कूद में व्यस्त रहतीं तो वे दोनों वृक्ष की डालियों पर बैठकर तुकबंदी करती थीं अर्थात् कविताएँ लिखती थीं। उस समय ‘स्त्री दर्पण’ नामक एक पत्रिका प्रकाशित होती थी। उस पत्रिका में वे अपनी रचनाएँ भेजती थीं। उनकी वे तुकबंदी छप भी जाती थी। यह देखकर महादेवी जी को बहुत प्रसन्नता होती थी। फिर वहाँ कवि सम्मेलन भी होने लगे थे तो महादेवी जी उनमें भाग लेने लगी थीं। उस समय हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम भी जोरों पर था। महादेवी जी सन् 1917 में छात्रावास में आई थी। उसके बाद ही गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन आरंभ हुए थे। इलाहाबाद में आनंद भवन उन दिनों स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र बना हुआ था। हिंदी का प्रचार-प्रसार कई प्रकार से हो रहा था। उसके लिए हिंदी कवि सम्मेलन किए जाते थे। जहाँ भी कवि सम्मेलन का आयोजन होता था तो महादेवी जी की मैडम उन्हें अपने साथ ले जाती थी। महादेवी जी वहाँ अपनी कविताएँ सुनाती थीं। कभी हरिऔध जी कवि सम्मेलन के अध्यक्ष होते तो कभी श्रीधर पाठक होते थे तो कभी रत्नाकर जी अयक्षता करते। कभी कोई और साहित्यकार सम्मेलन की अध्यक्षता करते। महादेवी जी उस समय बड़ी बेचैनी से प्रतीक्षा करती रहती थीं कि कब उसका नाम पुकारा जाए। महादेवी जी को प्रायः कवि सम्मेलनों में प्रथम पुरस्कार मिलता था। उन्हें सौ से भी अधिक पदक मिले होंगे।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

विशेष-

  1. महादेवी जी की बचपन की यादों का सुंदर उल्लेख किया गया है।
  2. तत्कालीन समाज में हिंदी का प्रचार-प्रसार जोरों पर था।
  3. स्वतंत्रता आंदोलनों की ओर भी संकेत किया गया है।
  4. भाषा सरल, सहज एवं भावानुकूल है।

उपर्युक्त गपांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) सन 1917 में हिंदी की क्या स्थिति थी?
(2) जब दूसरी लड़कियाँ खेलती थीं तो लेखिका उस समय क्या करती थी?
(3) सन 1917 में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन पर प्रकाश डालिए।
(4) इलाहाबाद में 1917 के आसपास कवि सम्मेलनों की अध्यक्षता कौन-कौन करते थे?
उत्तर-
(1) सन 1917 में हिंदी का खूब प्रचार-प्रसार हो रहा था। अनेक स्थानों पर हिंदी कवि सम्मेलन किए जाते थे। हिंदी का प्रचार-प्रसार स्वतंत्रता आंदोलन का ही एक भाग बन गया था। सुभद्राकुमारी चौहान, हरिऔध, रत्नाकर जैसे महान कवि हिंदी के विकास में लगे हुए थे।
(2) महादेवी वर्मा क्रास्थवेट कॉलेज के छात्रावास में रहती थीं। जब दूसरी लड़कियाँ खेलती थीं तो महादेवी वर्मा और सुभद्राकुमारी चौहान वृक्ष की शाखा पर बैठकर तुकबंदी अर्थात कविताएँ लिखती थीं।
(3) इस पाठ में बताया गया है कि सन 1917 में स्वतंत्रता आंदोलन आरंभ हो चुका था। गांधी जी के नेतृत्व में सत्याग्रह भी चलने लगे थे। जन-साधारण को आंदोलन से जोड़ने के लिए हिंदी का प्रयोग किया जाता था। उसके लिए हिंदी प्रचार-प्रसार भी बराबर चल रहा था। इलाहाबाद में आनंद भवन राष्ट्रीय आंदोलनों का गढ़ बन गया था। वहाँ ही राष्ट्रीय आंदोलनों की रूप-रेखा तैयार की जाती थी।
(4) इलाहाबाद में सन 1917 के आसपास होने वाले कवि सम्मेलनों की अध्यक्षता हरिऔध, रत्नाकर एवं श्रीधर पाठक जैसे महान कवि करते थे।

4. उसी बीच आनंद भवन में बापू आए। हम लोग तब अपने जेब-खर्च में से हमेशा एक-एक, दो-दो आने देश के लिए बचाते थे और जब बापू आते थे तो वह पैसा उन्हें दे देते थे। उस दिन जब बापू के पास मैं गई तो अपना कटोरा भी लेती गई। मैंने निकालकर बापू को दिखाया। मैंने कहा, ‘कविता सुनाने पर मुझको यह कटोरा मिला है।’ कहने लगे, ‘अच्छा, दिखा तो मुझको।’ मैंने कटोरा उनकी ओर बढ़ा दिया तो उसे हाथ में लेकर बोले, ‘तू देती है इसे?’ अब मैं क्या कहती? मैंने दे दिया और लौट आई। दुख यह हुआ कि कटोरा लेकर कहते, कविता क्या है? पर कविता सुनाने को उन्होंने नहीं कहा। लौटकर अब मैंने सुभद्रा जी से कहा कि कटोरा तो चला गया। सुभद्रा जी ने कहा, ‘और जाओ दिखाने!’ फिर बोलीं, ‘देखो भाई, खीर तो तुमको बनानी होगी। अब तुम चाहे पीतल की कटोरी में खिलाओ, चाहे फूल के कटोरे में।
[पृष्ठ 71-72]

शब्दार्थ-सरल हैं। …….

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘क्षितिज’ भाग 1 में संकलित ‘मेरे बचपन के दिन’ पाठ से उद्धृत है। इसकी रचयिता महादेवी वर्मा हैं। इस पाठ में उन्होंने स्मृतियों के माध्यम से अपने बचपन की घटनाओं का उल्लेख किया है। इन पंक्तियों में लेखिका ने उस घटना का उल्लेख किया है जब उन्हें आनंद भवन में महात्मा गांधी जी मिले थे और उन्होंने पुरस्कार में मिला चाँदी का कटोरा देश-सेवा के लिए महात्मा गांधी को दे दिया था।

व्याख्या/पाव ग्रहण-महादेवी जी ने अपने बचपन की एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा है कि उन दिनों महात्मा गांधी आनंद भवन में अकसर आते थे। हम लोग अपने जेब-खर्च में से पैसे बचाकर सदैव एक-एक, दो-दो आने देश के लिए बचाते थे। जब भी बापू गांधी जी से भेंट होती तो हम वह राशि उन्हें भेंट कर देते। उस दिन जब महात्मा गांधी आनंद भवन में आए तो मैं अपना चाँदी का कटोरा भी साथ लेकर उनसे मिलने गई। अपना वह कटोरा निकालकर गांधी जी को दिखाया और कहा कि यह कटोरा मुझे कविता सुनाने पर पुरस्कार के रूप में मिला था। गांधी जी को यह कटोरा बहुत पसंद आया। महादेवी ने अपना कटोरा गांधी जी की ओर बढ़ा दिया। उन्होंने इसे हाथ में लेकर कहा कि क्या तुम इस कटोरे को मुझे दे रही हो। उस समय महादेवी जी ने कुछ नहीं कहा और कटोरा गांधी जी को भेंट कर दिया तथा वह लौट आई। महादेवी जी को इस बात का दुःख हुआ कि उन्होंने कटोरे के बारे में तो पूछा किंतु कविता कौन-सी सुनाई थी, यह नहीं पूछा। उन्होंने कविता सुनाने को भी नहीं कहा। छात्रावास में लौटकर सुभद्रा कुमारी ने कहा कि और जाओ कटोरा दिखाने! फिर बोली कि चाहे कुछ हो खीर तो तुम्हें खिलानी ही होगी। अब चाहे तुम पीतल की कटोरी में खिलाओ या फूल के कटोरे में। मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं है। कहने का अभिप्राय है कि महादेवी को स्वतंत्रता आंदोलन में सहयोग देने की खुशी भी थी, साथ ही पुरस्कार में मिले कटोरे के पास न रहने पर थोड़ी निराशा भी थी।

विशेष-

  1. महादेवी के बचपन की घटनाओं का मनोरम चित्रण किया गया है।
  2. आनंद भवन में होने वाली राजनीतिक गतिविधियों की ओर संकेत किया गया है।
  3. सुभद्राकुमारी चौहान और महादेवी की मित्रता का भी बोध होता है।
  4. भाषा सरल, सहज एवं भावानुकूल है।

उपर्यक्त गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

(1) भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में लेखिका व उसकी सहेलियों ने कैसे योगदान दिया था?
(2) अपना पुरस्कार में मिला चाँदी का कटोरा गांधी जी को भेंट करने पर महादेवी की क्या प्रतिक्रिया हुई थी?
(3) इस गद्यांश से उस समय का कैसा चित्र उभरता है? ।
(4) महादेवी का कटोरा गांधी जी द्वारा ले लेने पर सुभद्राकुमारी के मन में क्या प्रतिक्रिया हुई? ।
उत्तर-
(1) राष्ट्रीय आंदोलन में महादेवी वर्मा व उसकी सहेलियों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। इलाहाबाद के क्रास्थवेट कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राएँ अपने प्रतिदिन के जेब-खर्च में से कुछ पैसे बचाकर महात्मा गांधी को दे देती थीं। महादेवी जी ने अपना चाँदी का कटोरा भी गांधी जी को दे दिया था।

(2) महात्मा गांधी जी को अपना पुरस्कार में मिला चाँदी का कटोरा दे देने पर महादेवी जी को बहुत खुशी हुई, क्योंकि उन्हें यह पता था कि उन्होंने देश के स्वतंत्रता आंदोलन में कुछ सहयोग किया है। किंतु उनके मन में थोड़ी-सी निराशा भी हुई कि गांधी जी ने उनसे कविता सुनाने के लिए नहीं कहा।

(3) इस गद्यांश को पढ़कर पता चलता है कि उस समय भारतवर्ष गुलाम था। किंतु देश का बच्चा-बच्चा स्वतंत्रता-प्राप्ति के संघर्ष में लगा हुआ था। यह बात भी स्पष्ट है कि देश-प्रेम की भावना न केवल बड़ों में, अपितु बच्चों में भी देखी जा सकती थी।

(4) महादेवी.जी ने आनंद भवन से लौटकर कहा कि चाँदी का कटोरा तो चला गया। यह सुनकर सुभद्राकुमारी चौहान के मन में न कोई खुशी हुई और न ही गम, अपितु उन्होंने व्यंग्य में कहा कि खीर तुम्हें खिलानी पड़ेगी चाहे पीतल की कटोरी में खिलाओ या फूल के कटोरे में।

मेरे बचपन के दिन Summary in Hindi

मेरे बचपन के दिन लेखक-परिचय

प्रश्न-
महादेवी वर्मा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनके साहित्य की प्रमुख विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
महादेवी वर्मा का संक्षिप्त साहित्यिक परिचय लिखिए।
उत्तर-
1. जीवन-परिचय-महादेवी वर्मा का जन्म सन 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद नगर के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। नौ वर्ष की अल्पायु में ही इन्हें विवाह के बंधन में बाँध दिया गया था, किंतु यह बंधन स्थायी न रह सका। इन्होंने अपना समय अध्ययन में लगाना प्रारंभ कर दिया और सन् 1932 में प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। इनकी योग्यताओं से प्रभावित होकर इन्हें प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या के रूप में नियुक्त किया गया। इन्हें छायावादी हिंदी . काव्य के चार स्तंभों में से एक माना जाता है। इन्हें विभिन्न साहित्यिक पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। इनका देहांत 11 सितंबर, 1987 को हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-महादेवी वर्मा ने कविता, रेखाचित्र, आलोचना आदि अनेक साहित्यिक विधाओं में रचना की है। इनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं
(i) काव्य-ग्रंथ-‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्यगीत’, ‘दीपशिखा’, ‘यामा’ आदि।
(ii) नारी-साहित्य-‘श्रृंखला की कड़ियाँ’।
(iii) रेखाचित्र-संस्मरण-‘अतीत के चलचित्र’, ‘स्मृति की रेखाएँ’, ‘पथ के साथी’, ‘क्षणदा’ ।
(iv) आलोचना-‘हिंदी का विवेचनात्मक गद्य’, ‘विभिन्न काव्य-संग्रहों की भूमिकाएँ।
(v) संपादन-‘चाँद’, ‘आधुनिक कवि काव्यमाला’।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

3. साहित्यिक विशेषताएँ-महादेवी वर्मा मूलतः कवयित्री हैं तथा इन्हें अपनी काव्य रचनाओं के लिए ही अत्यधिक प्रसिद्धि प्राप्त हुई है, किंतु महादेवी जी ने हिंदी गद्य साहित्य के विकास में भी अपना बहुमूल्य सहयोग दिया है। निबंध, आलोचना, रेखाचित्र, संस्मरण आदि विधाओं पर महादेवी जी ने अपनी लेखनी सफलतापूर्वक चलाई है। इसके अतिरिक्त संगीत, चित्रकला, प्रकृति एवं पशु-पक्षियों में भी महादेवी जी की रुचि रही है। इनसे संबंधित भी इन्होंने गद्य-शैली में लिखा है। महादेवी जी के निबंध-साहित्य में जहाँ राष्ट्रीय स्वर मुखरित हुआ है, वहीं दीन-दुखियों के दर्द व पीड़ाओं का भी वर्णन हुआ है। इन्होंने अपने निबंध साहित्य में शिक्षा और विद्या का सूक्ष्म अंतर बताते हुए भारत भूमि की प्राचीन उज्ज्वल परंपराओं और आधुनिक आवश्यकताओं की ओर विद्यार्थियों का ध्यान आकृष्ट किया है। नारी जीवन के विविध पक्षों पर भी इन्होंने अपने निबंधों के माध्यम से प्रकाश डाला है। महादेवी जी का निबंध-साहित्य समाज की पहचान करवाता है। नारी जागरण पर इन्होंने विशेष बल दिया है।

4. भाषा-शैली-महादेवी वर्मा जी के गद्य-साहित्य की भाषा भी उनके काव्य की भाषा की भाँति ही अत्यंत सहज, स्वाभाविक एवं प्रवाहमयी है। कहीं-कहीं गद्य में भी काव्यात्मक भाषा के दर्शन होते हैं। बीच-बीच में तत्सम शब्दों की भरमार के कारण भाषा साधारण पाठक की समझ से बाहर हो जाती है। महादेवी जी की भाषा के दो रूप साफ तौर पर देखे जा सकते हैं-विचारात्मक एवं भावात्मक। सटीक वर्णन, प्रभावशाली बिंब-योजना एवं चित्रात्मकता इनकी शैली की अन्य प्रमुख विशेषताएँ हैं।

मेरे बचपन के दिन पाठ-सार/गद्य-परिचय

प्रश्न-
‘मेरे बचपन के दिन’ शीर्षक पाठ का सार/गद्य-परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखिका ने अपने बचपन के दिनों की प्रमुख घटनाओं का मनोरम चित्रण किया है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए लिखा है कि उनके खानदान में लड़कियों को पैदा होते ही मार दिया जाता था। अतः दो सौ वर्षों के बाद महादेवी ने अपने परिवार में जन्म लिया था। महादेवी के बाबा ने दुर्गा की पूजा करके कन्या को माँगा था। अतः महादेवी को बचपन में कोई कष्ट नहीं सहन करना पड़ा था। उन्हें हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध करवा दी गई थी। उनके लिए घर पर ही उर्दू, फारसी, अंग्रेज़ी आदि की पढ़ाई का प्रबंध किया गया था। किंतु उनकी माता ने उन्हें हिंदी पढ़ना सिखाया था। महादेवी ने बचपन में ‘पंचतंत्र’ आदि का अध्ययन किया, किंतु उर्दू में उनका मन नहीं रमा। फिर उन्हें मिशन स्कूल में दाखिल करवा दिया गया। उन्हें मिशन स्कूल की प्रार्थना और वहाँ का वातावरण भी रास नहीं आया। तब उन्हें क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज की पाँचवीं कक्षा में प्रवेश दिलवाया गया।

छात्रावास में रहते हुए सुभद्राकुमारी चौहान से महादेवी जी की मित्रता हो गई। सुभद्राकुमारी कविताएँ लिखती थी। महादेवी जी की माता भी भक्ति के गीत लिखती व गाती थी। इन्हें माता से ही कविता लिखने की प्रेरणा मिली थी। इन्होंने पहले ब्रजभाषा में लिखना आरंभ किया था। सुभद्राकुमारी चौहान की संगति में रहकर महादेवी जी भी खड़ी बोली हिंदी में कविता लिखने लगी थीं। जब सुभद्राकुमारी चौहान को पता चला कि वह छिप-छिपकर कविताएँ लिखती है तो उसने इनकी कापियाँ ढूँढकर कविताओं का पता लगाया और सारे छात्रावास में इस रहस्य को उजागर कर दिया। तब दोनों में पक्की मित्रता हो गई। जब दूसरी छात्राएँ खेला करतीं तो ये दोनों बैठकर तुकबंदी किया करती थीं। सौभाग्य से वह तुकबंदी विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में छप जाती थी।

महादेवी जी की कविता पर पकड़ दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही थी। वे अब कवि सम्मेलनों में भी भाग लेने लगी थीं। यह समय हिंदी प्रचार का समय था। महादेवी ने भी इस शुभ कार्य में अपनी कविताओं के माध्यम से महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। कवि सम्मेलनों में श्री हरिऔध, श्रीधर पाठक व रत्नाकर जैसे महान् मनीषी होते थे। ऐसे सम्मेलनों में महादेवी अपना नाम सुनने के लिए बड़ी व्याकुल रहती थी। अनेक कवि सम्मेलनों में महादेवी जी प्रथम स्थान पर रहीं।

एक कवि सम्मेलन में प्रथम पुरस्कार के रूप में उन्हें चाँदी का नक्काशीदार कटोरा मिला था। उन्हीं दिनों गाँधी जी आनंद भवन में आए थे। उन दिनों आनंद भवन स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र बना हुआ था। महादेवी जी और उनकी अनेक सखियाँ अपने जेब खर्च में से पैसे बचाकर देश हित के लिए देती थीं। महादेवी जी ने गाँधी जी को पुरस्कार में मिला चाँदी का कटोरा दिखाया। गाँधी जी ने उस समय उनकी कविता तो नहीं सुनी, उनका वह कटोरा अवश्य रख लिया। महादेवी अपने कटोरे को देश के प्रति अर्पित करके बहुत प्रसन्न हुई थीं।

महादेवी वर्मा के छात्रावास में अनेक स्थानों से आई हुई छात्राएँ रहती थीं। जेबुन्निसा नाम की एक मराठी लड़की महादेवी जी का साफ-सफाई का काम देखती थी। वह हिंदी और मराठी दोनों भाषाएँ बोलती थी। किंतु वहाँ रहने वाली उस्तानी जीनत बेगम को मराठी बोलने पर एतराज था। किंतु जेबुन कहती है कि हम मराठी हैं, तो मराठी ही बोलेंगे। वहाँ अवध से आई हुई कन्याएँ अवधी बोलती थीं और बुंदेलखंड से आई हुई बालिकाएँ बुंदेली बोलती थीं। सभी छात्राएँ एक मेस में खाना खाती थीं और एक प्रार्थना का उच्चारण करती थीं। वहाँ कोई विवाद नहीं था अर्थात वहाँ सांप्रदायिक भावना का नामोनिशान नहीं था।

महादेवी ने विद्यापीठ में आने पर बेगम साहिबा का किस्सा लिखते हुए कहा है कि जब वह विद्यापीठ में उच्च शिक्षा ग्रहण करने हेतु आई, तो भी उनके बचपन के संस्कार बने रहे। जिस भवन में महादेवी जी रहती थी, उसी में जवारा के नवाब भी रहते थे। उनकी बेगम आग्रह करती थीं कि महादेवी उन्हें ताई कहे। बेगम के बच्चे महादेवी की माँ को चची जान कहते थे। दोनों परिवारों में अत्यधिक प्रेम था। बच्चों के जन्मदिन भी मिलकर मनाए जाते थे। बेगम साहिबा अपने बच्चों को तब तक पानी नहीं देती थी जब तक महादेवी उन्हें राखी न बाँधे।

इसी तरह मुहर्रम पर इनके लिए भी नए वस्त्र बनते थे। . इसी प्रकार महादेवी जी के छोटे भाई के जन्म के अवसर पर बेगम साहिबा ने उनके पिता से कहकर नेग लिया तथा बच्चे के लिए नए वस्त्र बनवाए। बच्चे का नाम भी बेगम ने ही ‘मनमोहन’ रखा था। वही मनमोहन बड़े होकर जम्मू और गोरखपुर विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर बने। घर में अवधी बोली जाती थी, किंतु बाहर हिंदी व उर्दू का प्रयोग होता था। आरंभ में भारतवर्ष के वातावरण में जितनी निकटता व स्नेह का भाव था, यदि उतना बाद तक बना रहता तो भारतवर्ष की कहानी आज कुछ अलग प्रकार की होती।

कठिन शब्दों के अर्थ –

[पृष्ठ-69] : स्मृतियाँ = यादें। विचित्र = अनोखा। आकर्षण = खिंचाव। परमधाम भेजना = मार देना। खातिर होना = सेवा होना। वातावरण = परिस्थितियाँ। विदुषी = विद्वान स्त्री। दर्जा = कक्षा।

[पृष्ठ-70] : मेस = भोजनालय। सीनियर = श्रेष्ठ। प्रभाती = प्रभात के समय गाया जाने वाला गीत। प्रतिष्ठित होना = सम्मानित होना। तलाशी लेना = खोजना। अपराधी = दोषी।

[पृष्ठ-71] : प्रचार-प्रसार = बढ़ावा देना। उपरांत = बाद में। सत्याग्रह = सच्चे मार्ग पर चलने का निश्चय करना। संघर्ष करना = मुकाबला करना। पुरस्कार = इनाम। पदक = मैडल। नक्काशीदार = बेल-बूटे के काम से युक्त।

[पृष्ठ-72] : फूल = ताँबे व रांगे के मेल से बनी एक मिश्र धातु। अवकाश = समय, अवसर। सांप्रदायिकता = संप्रदाय (जाति) के नाम पर भेदभाव। विवाद = झगड़ा।

HBSE 9th Class Hindi Solutions Kshitij Chapter 7 मेरे बचपन के दिन

[पृष्ठ-73] : संस्कार = गुण। कंपाउंड = क्षेत्र, स्थान। निराहार = बिना कुछ खाए-पिए। नेग = सामाजिक रीति-रिवाज़ों के अंतर्गत दी जाने वाली भेंट। यूनिवर्सिटी = विश्वविद्यालय। वाइस-चांसलर = कुलपति। तात्पर्य = अर्थ। कथा = कहानी।

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