Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

HBSE 12th Class Hindi रुबाइयाँ, गज़ल Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता है?
उत्तर:
राखी एक पवित्र धागा है। इसे बहन अपने भाई की कलाई पर बाँधती है। भले ही यह कच्चा धागा है, परंतु इसका बंधन बहुत ही पक्का है। इसकी पावनता मन की प्रत्येक छटा को चीरकर चमकने लगती है। इसका आकर्षण बिजली जैसा है। जिस प्रकार आकाश में चमकने वाली बिजली की हम उपेक्षा नहीं कर सकते, उसी प्रकार राखी के धागे की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भले ही भाई-बहन एक-दूसरे से दूर रहते हों। परंतु राखी की पावन याद एक-दूसरे की याद दिलाती रहती है। राखी का यह पर्व वर्षा की ऋतु (सावन) में आता है। इसलिए कवि ने इस ऋतु को प्रभावशाली बनाने के लिए राखी को उपादान बनाया है। फलतः कवि की भाव-व्यंजना अधिक मनोरम और प्रभावशाली बन पड़ी है।

प्रश्न 2.
खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?
उत्तर:
‘खुद का परदा’ खोलना मुहावरे का प्रयोग कवि ने उन लोगों के लिए किया है जो दूसरों की निंदा करते हैं अथवा बुराई करते हैं। सच्चाई तो यह है कि ऐसे लोग अपने घटियापन का उद्घाटन करते हैं। इससे हमें यह पता चल जाता है कि निंदा करने वाले लोग कैसे हैं और कितने पानी में हैं। बिना बताए ये लोग अपने चरित्र के बारे में हमें बता देते हैं। कवि यह कहना चाहता है कि निंदा करना बुरी बात है। फिर भी कबीरदास ने कहा है
निंदक नियरे राखिए आँगन कुटी छवाय ।
बिन साबुन पानी बिना निर्मल होत सुभाय।

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प्रश्न 3.
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं इस पंक्ति में शायर की किस्मत के साथ तना-तनी का रिश्ता अभिव्यक्त हुआ है। चर्चा कीजिए।
उत्तर:
किस्मत और मानव का गहरा संबंध है। सर्वप्रथम हम इस बात पर चर्चा करते हैं कि किस्मत हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। हम और किस्मत एक-दूसरे के पूरक हैं। विधाता ने जो कुछ हमारे भाग्य में लिखा है, वही प्राप्त होगा। अतः किस्मत पर रोना व उसे कोसना व्यर्थ है। हमारा कर्तव्य है कि हम किस्मत की अधिक चिंता न करके अपना कर्म और परिश्रम करें। परिश्रम करने से हमें जीवन में सफलता अवश्य मिलती है।

चर्चा का एक-दूसरा रूप यह भी हो सकता है कि कुछ लोग अपनी किस्मत को कोसते रहते हैं। उनका यह कहना है कि मेहनत करने पर भी उन्हें पूरा फल नहीं मिलता। इसी कारण शायर कहता है कि हम किस्मत को रो लेते हैं और किस्मत हमें रुलाती है। कवि घोर निराशा से भरा हुआ है। इसलिए वह अपनी किस्मत को कोस रहा है।

टिप्पणी करें

(क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता।
(ख) सावन की घटाएँ व रक्षाबंधन का पर्व।
उत्तर:
(क) गोदी का चाँद शिशु के लिए प्रयुक्त हुआ है। प्रत्येक माँ के लिए उसकी संतान ही अनमोल है। वह अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न होती है और उसी के सहारे जिंदा रहती है। जिस प्रकार आकाश में चाँद सुंदर लगता है, उसी प्रकार माँ को अपना शिशु सुंदर लगता है। इसीलिए शिशु को गोदी का चाँद कहा गया है। नन्हा अबोध शिशु जब आकाश में चाँद को देखता है तो वह अत्यधिक प्रसन्न होकर उसे पाना चाहता है। सूरदास के कृष्ण और तुलसीदास के राम चाँद के लिए हठ करते हुए वर्णित किए गए हैं। सूर का कृष्ण अपनी माता यशोदा से कहता है
मैया मैं तो चंद खिलौना लैहों।
लोरी में भी चाँद का जिक्र किया गया है “चंदा मामा दूर के” गीत द्वारा कवि ने अबोध बच्चों को चाँद की ओर आकर्षित किया है। लोक गीतों.तथा कविताओं में चाँद की बार-बार चर्चा की गई है। इसलिए गोदी के चाँद और गगन के चाँद का गहरा रिश्ता है।

(ख) रक्षाबंधन का पर्व सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। सावन मास में अकसर घने काले बादल आकाश को ढक लेते हैं, बिजली बार-बार चमकती है और मूसलाधार वर्षा होती है। अतः कवि ने सावन की घटाओं से रक्षाबंधन को जोड़कर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया है। सावन के महीने में विवाहित युवतियाँ अपने-अपने मायके चली जाती हैं। वे अपनी सखी-सहेलियों से मिलकर झूला झूलती हैं और गीत गाती हैं। पूर्णिमा के दिन अपने भाइयों को राखी बाँधती हैं। इसी ऋतु में तीज का त्योहार भी आता है। इसलिए कवि ने रक्षाबंधन के पर्व को सावन की घटाओं के साथ जोड़कर एक सुंदर और खुशनुमा वातावरण का निर्माण किया है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
इन रुबाइयों से हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोगों को छाँटिए।
उत्तर:
फ़िराक गोरखपुरी ने अपनी कविताओं में हिंदी, उर्दू तथा देशज शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है-
हिंदी के प्रयोग-
आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी
उर्दू के प्रयोग-
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
देख आईने में चाँद उतर आया है।
लोक भाषा के प्रयोग-
रह रह के हवा में जो लोका देती है
इसी प्रकार कवि ने आँगन, गोद, गूंज, दीवाली, निर्मल, रूपवती, नर्म आदि हिंदी के शब्दों का प्रयोग किया है। जिदयाया, आईना, शाम, सुबह, होशो-हवास, सौदा, कीमत, अदा, दीवाना आदि उर्दू के शब्दों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार पे, घुटनियों, हई, दे के आदि देशज शब्दों का प्रयोग किया है।

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प्रश्न 2.
फिराक ने सुनो हो, रक्खो हो आदि शब्द मीर की शायरी के तर्ज पर इस्तेमाल किए हैं। ऐसी ही मीर की कुछ गज़लें ढूँढ़ कर लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें। यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

आपसदारी
कविता में एक भाव, एक विचार होते हुए भी उसका अंदाजे बयाँ या भाषा के साथ उसका बर्ताव अलग-अलग रूप में अभिव्यक्ति पाता है। इस बात को ध्यान रखते हुए नीचे दी गई कविताओं को पढ़िए और दी गई फिराक की गजल/रुबाई में से समानार्थी पंक्तियाँ ढूँदिए।
(क) मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। -सूरदास
(ख) वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
उमड़ कर आँखों से चुपचाप
बही होगी कविता अनजान -सुमित्रानंदन पंत
(ग) सीस उतारे भुईं धरे तब मिलिहैं करतार -कबीर
उत्तर:
(क) आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है।

(ख) ये कीमत भी अदा करे हैं
हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले
दीवाना भी हो ले हैं।

(ग) तेरे गम का पासे-अदब है
कुछ दुनिया का ख्याल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे
चुपके-चुपके रो ले हैं

HBSE 12th Class Hindi रुबाइयाँ, गज़ल Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न-
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
1. आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूंज उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी
उत्तर:

  1. इस पद्यांश में कवि ने माँ द्वारा अपने बच्चे को झूला झुलाने और उछाल-उछालकर खिलाने का सुंदर वर्णन किया है।
  2. बच्चे को ‘चाँद का टुकड़ा’ कहना माँ के प्यार को व्यंजित करता है।
  3. रह-रह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा रूपक अलंकार की भी योजना हुई है।
  4. ‘लोका देना’ में ग्रामीण संस्कृति का सुंदर प्रयोग है।
  5. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की सुंदर योजना हुई है।
  6. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  7. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. वात्सल्य रस का परिपाक है तथा प्रसाद गुण है।

2. बालक तो हई चाँद पै ललचाया है।
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने एक बालक की प्रवृत्ति का सहज और स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. आईने में चाँद उतर आना ग्रामीण संस्कृति का द्योतक है।
  3. प्रसाद गुण तथा वात्सल्य रस का परिपाक हुआ है।
  4. हिंदी एवं उर्दू मिश्रित भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।

3. दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने दीवाली की जगमग, साज-सज्जा तथा रंग-रोगन आदि का प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की योजना दर्शनीय है।
  3. यहाँ माँ की ममता तथा कोमलता का सुंदर और स्वाभाविक चित्रण किया गया है।
  4. सहज एवं सरल हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें लोक-प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया गया है।
  5. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

4. नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं
या उड जाने को रंगो-ब गलशन में पर तोले हैं।
उत्तर:

  1. इस शेर में कवि ने प्राकृतिक सौंदर्य का वर्णन किया है।
  2. संदेह अलंकार का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. रस और सुगंध में मानवीय भावना का आरोप है, अतः यहाँ मानवीकरण अलंकार का प्रयोग है।
  4. संपूर्ण शेर में उर्दू, फारसी तथा हिंदी का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
  5. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

5. जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं
उत्तर:

  1. प्रस्तुत शेर में कवि ने निंदकों को आड़े हाथों लिया है।
  2. कवि का विचार है कि निंदा करने वाले ईर्ष्यालु होने के साथ-साथ बुरे लोग होते हैं।
  3. इस शेर की भाषा अत्यंत सरल और सहज है।
  4. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. भाव प्रधान वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

6. सदके फिराक एजाजे-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़
इन गज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की गज़लें बोले हैं
उत्तर:

  1. इस शेर में कवि अपनी शायरी पर मुग्ध दिखाई देता है। अतः वह अपनी कविता को मीर जैसी कविता बताता है।
  2. ‘के कैसे’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. उर्दू, फारसी और हिंदी तीनों भाषाओं का मिश्रित प्रयोग है।
  4. भाव प्रधान वर्णनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. उर्दू और फारसी के शेर छंद का सफल प्रयोग है।

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विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
फ़िराक गोरखपुरी ने वात्सल्य का मनोरम और स्वाभाविक वर्णन किया है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
वात्सल्य भाव संसार के सभी प्राणियों में विद्यमान है। यह निर्मल, निश्चल और निःवार्थ प्रेम है। प्रथम रुबाई में कवि ने माँ के पुत्र को चाँद का टुकड़ा कहा है, जिसे लेकर माँ अपने घर के आँगन में खड़ी है। वह बार-बार उसे झुलाती है और हवा में उछालती है और तत्काल उसे पकड़कर अपने गले से लगा लेती है। इस प्रेम-क्रीड़ा में माँ और पुत्र दोनों को असीम आनंद की प्राप्ति होती है। एक अन्य रुबाई में कवि कहता है कि माँ अपने नन्हें शिशु को नहलाती है। फिर दुलार कर उसके बालों में कंघी करती है। ऐसा करते समय वह अपने पुत्र का मुख निहारती है। वह अपने घुटनों में दबाकर उसे कपड़े पहनाती है। नन्हा शिशु भी माँ के स्नेह को अच्छी प्रकार समझता है और वह प्यार से माँ के मुख को देखता है।

प्रश्न 2.
कवि ने दीवाली के किन पारंपरिक रिवाजों का वर्णन किया है?
उत्तर:
दीवाली हिंदुओं का एक पावन त्योहार है। यह प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इससे पहले लोग अपने घरों को साफ-सुथरा करते हैं। वे घरों को सुंदर बनाने के लिए घरों की लिपाई-पुताई करते हैं और उन्हें सजाते हैं। इस अवसर पर लोग मिठाइयाँ बाँटते हैं और खाते हैं। सायंकाल को दीपक जलाए जाते हैं। इस दिन सभी लोग सजते-सँवरते हैं। घर में सभी जगह पर दीपक जलाए जाते हैं। माँ अपने शिशु के घरौंदे में भी दीपक जलाती है। कवि ने एक ही रुबाई में दीवाली की सभी परंपराओं का वर्णन करके गागर में सागर भर दिया है।

प्रश्न 3.
रुबाई के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि वात्सल्य और बाल-हठ का गहरा संबंध है।
उत्तर:
माता-पिता का संतान के प्रति गहरा स्नेह होता है। वे बालक की प्रत्येक इच्छा को पूरा करने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी बालक इस स्नेह का अनुचित लाभ उठाने का प्रयास करता है और वह अनुचित वस्तु के लिए हठ कर बैठता है। प्रेम के वशीभूत होकर माता-पिता उसकी इच्छा पूरी करने का प्रयास करते हैं। मान लो बालक गुब्बारा, आइसक्रीम, खिलौना आदि की जिद करता है तो उसकी इच्छा पूरी कर दी जाती है। परंतु यदि बालक चाँद की माँग करे तो उसे कैसे पूरा किया जा सकता है। फिर भी माता-पिता बालक को खुश करने के लिए कोई-न-कोई उपाय निकाल लेते हैं। जैसे किसी थाली में पानी भरकर या कोई दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाकर उसकी जिद को पूरा करने का प्रयास करते हैं। बच्चा केवल माता-पिता के वात्सल्य के कारण ही इस प्रकार की जिद करता है। वह किसी अन्य से जिद करके कुछ नहीं माँगता। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि वात्सल्य और बालहठ का गहरा संबंध है।

प्रश्न 4.
सिद्ध कीजिए कि फ़िराक की गज़ल वियोग श्रृंगार से संबंधित है।
उत्तर:
प्रस्तुत गज़ल में फ़िराक ने अपने वियोग श्रृंगार का सुंदर वर्णन किया है। कवि स्वयं की किस्मत को खराब मानता है क्योंकि उसे प्रिया का प्रेम नहीं मिल सका। प्रेम के कारण ही विवेकशील कवि को भी दीवाना बनना पड़ता है। वह प्रिया की याद में रोता है और आँखों से आँसू बहाता है। इस गज़ल में कवि की विरह-वेदना व्यक्त हुई है। कवि शराब की महफिल में बैठकर भी अपनी प्रेमिका को याद करता है। एक स्थल पर कवि कहता भी है
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं

प्रश्न 5.
कवि की गज़ल में प्रेम की दीवानगी व्यक्त हुई है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
फ़िराक की प्रस्तुत गज़ल में प्रेम की मस्ती और दीवानगी देखी जा सकती है। कवि प्रेम में इतना दीवाना हो चुका है कि वह सूनी रात में भी अपनी प्रिया को याद करता है।
तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं
दीवानगी के कारण कवि को रात का सन्नाटा बोलता हुआ-सा लगता है। कवि स्वीकार करता है कि उसने सोच-समझकर प्रेम की दीवानगी को अपनाया है।
ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं।
आरोह (भाग 2) फिराख गोरखपुरी

प्रश्न 6.
फ़िराक की गज़ल में प्रेम और मस्ती का वर्णन हुआ है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
फ़िराक की गज़ल प्रेम और मस्ती की गज़ल है। उनका प्रेम दीवानगी तक पहुँच जाता है। कवि सूनी रातों में अपनी प्रिया को याद करके समय व्यतीत करता है। कवि को लगता है कि रात में प्रकृति का कण-कण सो रहा है। तारे भी आँखें झपका रहे हैं, परंतु कवि कहता है कि सन्नाटा कुछ-कुछ बोलता हुआ लगता है। कवि दीवानगी के कारण ही यह समझता है कि सन्नाटा बोल रहा है, परंतु कवि स्वीकार करता है कि उसने सोच-समझकर ही प्रेम की दीवानगी को स्वीकार किया है।

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प्रश्न 7.
‘गजल’ में निहित कवि की पीड़ा का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
फिराक की गज़ल में प्रेम के वियोग की पीड़ा की अनुभूति सहज ही अनुभव की जा सकती है। वियोग की पीड़ा में कवि अपनी प्रेमिका की याद में रोता है और व्याकल हो उठता है अर्थात तडपता है। उसकी आँखों से आँस छलकते रहते हैं। इस गजल में कवि की यही पीड़ा व्यक्त हुई है। उदाहरणार्थ यह शेर देखिए तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का ख्याल भी है। सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो लेते हैं।

प्रश्न 8.
‘गजल’ की मूल चेतना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित गज़ल की मूल चेतना कवि के हृदय की पीड़ा को शब्दों में ढालना है। प्रस्तुत गज़ल में कवि स्वयं की किस्मत को खराब बताता है क्योंकि उसे प्रेम के बदले प्रेम नहीं मिला। इसीलिए वह हर समय प्रिया की याद में चुपके-चुपके आँसू बहाता है-“सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।” गज़ल में बताया गया है कि कवि प्रेम में इतना दीवाना हो चुका है कि रात के सन्नाटे में भी उसे प्रिया के ही शब्द सुनाई पड़ते हैं। अतः स्पष्ट है कि गज़ल की मूल चेतना कवि के प्रेम व विरह चेतना को उजागर करना है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘रुबाइयाँ’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) उमाशंकर जोशी
(B) फ़िराक गोरखपुरी
(C) हरिवंशराय बच्चन
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) फ़िराक गोरखपुरी

2. फिराक गोरखपुरी का मूल नाम क्या है?
(A) रघुपति सहाय
(B) रघुपति लाल
(C) रघुपति गुप्ता
(D) रघुपति राम
उत्तर:
(A) रघुपति सहाय

3. फिराक गोरखपुरी का जन्म कब हुआ?
(A) 28 अगस्त, 1896 में
(B) 28 अगस्त, 1897 में
(C) 28 अगस्त, 1898 में
(D) 28 अगस्त, 1899 में
उत्तर:
(A) 28 अगस्त, 1896 में

4. फिराक गोरखपुरी किस पद के लिए चुने गए थे?
(A) तहसीलदार
(B) पुलिस अधीक्षक
(C) डिप्टी कलेक्टर
(D) मुख्य सचिव
उत्तर:
(C) डिप्टी कलेक्टर

5. फिराक गोरखपुरी किस वर्ष डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए चुने गए थे?
(A) सन् 1916 में
(B) सन् 1917 में
(C) सन् 1915 में
(D) सन् 1921 में
उत्तर:
(B) सन् 1917 में

6. फ़िराक गोरखपुरी ने डिप्टी कलेक्टर के पद से त्याग-पत्र क्यों दे दिया?
(A) बीमार होने के कारण
(B) पारिवारिक समस्या के कारण
(C) स्वराज आंदोलन के लिए
(D) शिक्षक बनने के लिए
उत्तर:
(C) स्वराज आंदोलन के लिए

7. फिराक गोरखपुरी ने किस वर्ष डिप्टी कलेक्टर के पद से त्याग-पत्र दिया?
(A) सन् 1918 में
(B) सन् 1917 में
(C) सन् 1919 में
(D) सन् 1920 में
उत्तर:
(A) सन् 1918 में

8. फिराक गोरखपुरी को जेल क्यों जाना पड़ा?
(A) चोरी करने के कारण
(B) लड़ाई करने के कारण
(C) स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण
(D) सरकार की आज्ञा न मानने के कारण
उत्तर:
(C) स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण

9. फिराक गोरखपुरी को कितने साल की जेल हुई?
(A) 1 वर्ष की
(B) 2 वर्ष की
(C) 1 वर्ष की
(D) 3 वर्ष की
उत्तर:
(C) 19 वर्ष की

10. फ़िराक गोरखपुरी को जेल कब जाना पड़ा?
(A) सन् 1920 में
(B) सन् 1921 में
(C) सन् 1922 में
(D) सन् 1923 में
उत्तर:
(A) सन् 1920 में

11. फिराक गोरखपुरी किस विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में अध्यापक नियुक्त हुए?
(A) मुंबई विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) मेरठ विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

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12. फिराक गोरखपुरी का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1983 में
(B) सन् 1982 में
(C) सन् 1981 में
(D) सन् 1984 में
उत्तर:
(A) सन् 1983 में

13. फिराक गोरखपुरी को किस रचना के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला?
(A) गुले-नग्मा के लिए
(B) बज्मे जिंदगी के लिए
(C) रंगे-शायरी के लिए
(D) उर्दू गज़लगोई के लिए
उत्तर:
(A) गुले-नग्मा के लिए

14. साहित्य अकादेमी पुरस्कार तथा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड के अतिरिक्त फ़िराक गोरखपुरी को कौन-सा पुरस्कार मिला?
(A) शिखर सम्मान
(B) कबीर पुरस्कार
(C) प्रेमचंद पुरस्कार
(D) ज्ञानपीठ पुरस्कार
उत्तर:
(D) ज्ञानपीठ पुरस्कार

15. ‘बज्मे जिंदगी’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) उमा शंकर जोशी
(B) विष्णु खरे
(C) फ़िराक गोरखपुरी
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(C) फ़िराक गोरखपुरी

16. ‘रंगे-शायरी’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) फ़िराक गोरखपुरी
(B) रजिया सज्जाद जहीर
(C) उमा शंकर जोशी
(D) विष्णु खरे
उत्तर:
(A) फ़िराक गोरखपुरी

17. फिराक गोरखपुरी ने किस भाषा में काव्य रचना की है?
(A) हिंदी भाषा में
(B) उर्दू भाषा में
(C) गुजराती भाषा में
(D) बांग्ला भाषा में
उत्तर:
(B) उर्दू भाषा में

18. पाठ्यपुस्तक में संकलित फिराक की रुबाइयों में मुख्य भाव कौन-सा है?
(A) वात्सल्य भाव
(B) भक्ति भाव
(C) सख्य भाव
(D) माधुर्य भाव
उत्तर:
(A) वात्सल्य भाव

19. रुबाइयों में फिराक ने किस भाषा का प्रयोग किया है?
(A) फारसी भाषा का
(B) हिंदी भाषा का
(C) उर्दू भाषा का
(D) हिंदी-उर्दू भाषा का
उत्तर:
(C) उर्दू भाषा का

20. प्रस्तुत गज़ल में रात में कौन बोल रहे हैं?
(A) पक्षी।
(B) सन्नाटे
(C) उल्लू
(D) भूत
उत्तर:
(B) सन्नाटे

21. रुबाइयों में फिराक ने किस शैली का प्रयोग किया है?
(A) विचारात्मक शैली
(B) वर्णनात्मक शैली
(C) संबोधनात्मक शैली
(D) नाटकीय शैली
उत्तर:
(B) वर्णनात्मक शैली

22. राखी के लच्छे किस तरह चमक रहे हैं?
(A) सूरज
(B) चाँद
(C) बिजली
(D) दर्पण
उत्तर:
(C) बिजली

23. रात के सन्नाटे क्या कर रहे हैं?
(A) खामोश हैं
(B) जाग रहे हैं
(C) पसरे हैं
(D) कुछ बोल रहे हैं
उत्तर:
(D) कुछ बोल रहे हैं

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24. प्रस्तुत गज़ल के अनुसार आँखें कौन झपका रहे हैं?
(A) बच्चे
(B) पक्षी
(C) सूर्य-चन्द्रमा
(D) तारे
उत्तर:
(D) तारे

25. ‘गजल’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) उमाशंकर जोशी
(B) रज़िया सज्जाद फरीद
(C) फ़िराक गोरखपुरी
(D) विष्णु खरे
उत्तर:
(C) फ़िराक गोरखपुरी

26. ‘गोदी का चाँद’ से क्या अभिप्राय है?
(A) आकाश का चाँद
(B) सुंदर लड़का
(C) संतान
(D) सुंदर लड़की
उत्तर:
(C) संतान

27. ‘गजल’ कविता में कवि अपनी गज़लों को किनके प्रति समर्पित करता है?
(A) गुलाम अली
(B) मजरूह सुल्तानपुरी
(C) भीर
(D) मिर्जा गालिब
उत्तर:
(C) मीर

28. फ़िराक गोरखपुरी द्वारा रचित रुबाइयों में किस रस का परिपाक हुआ है?
(A) श्रृंगार रस
(B) वीर रस
(C) हास्य रस
(D) वात्सल्य रस
उत्तर:
(D) वात्सल्य रस

29. ‘फितरत का कायम है तवाजुन’-यहाँ ‘तवाजुन’ का अर्थ है-
(A) तराजू
(B) राज्य
(C) संतुलन
(D) स्थिरता
उत्तर:
(C) संतुलन

30. ‘गजल’ किस साहित्य में अधिक प्रसिद्ध है?
(A) उर्दू में
(B) लैटिन में
(B) ग्रीक में
(D) संस्कृत में
उत्तर:
(A) उर्दू में

31. ‘रात गए गर्दू पै फरिश्ते’ यहाँ ‘गर्दू’ का अर्थ है
(A) धरती
(B) आकाश
(C) इन्द्र
(D) भगवान
उत्तर:
(B) आकाश

32. कवि किस प्रकार अपना दुख कम करता है?
(A) अकेले में हँसकर
(B) अपने-आप में बात करके
(C) अकेले में रोकर
(D) कविता रचकर
उत्तर:
(C) अकेले में रोकर

33. फिराक गोरखपुरी की गज़लों में किसकी गज़लें बोलती जान पड़ती हैं?
(A) राही मासूमरज़ा की
(B) नजीर अकबराबादी की
(C) मीर की
(D) इल्तान हुसैन हाली की
उत्तर:
(C) मीर की

34. ‘फितरत’ शब्द का क्या अर्थ है?
(A) आकर्षण
(B) विकर्षण
(C) आदत
(D) सलामत
उत्तर:
(C) आदत

35. ‘तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-जर्रा सोये है’ यहाँ ‘जर्रा-जर्रा’ का अर्थ है-
(A) ज़रा-ज़रा
(B) ज़रा-सा
(C) क्षण-क्षण
(D) कण-कण
उत्तर:
(D) कण-कण

36. ‘सदके फिराक एजाजे-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज़’-पंक्ति में भाषा कौन-सी है?
(A) उर्दू-फ़ारसी
(B) ब्रजभाषा
(C) तत्सम प्रधान
(D) तद्भव प्रधान
उत्तर:
(A) उर्दू-फारसी

रुबाइयाँ पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती है उसे गोद-भरी
रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूंज
उठती है खिलखिलाते बच्चे की हँसी [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-चाँद का टुकड़ा = बहुत प्रिय बेटा। गोद-भरी = गोद में लेकर। लोका देती = उछाल-उछाल कर बच्चे के प्रति अपना स्नेह प्रकट करती।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से अवतरित है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। प्रस्तुत रुबाई में कवि ने एक माँ द्वारा अपने बच्चे को झुलाने तथा उसे ऊपर हवा में उछालने का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या-शायर कहता है कि एक माँ अपने प्रिय बेटे को गोद में लिए हुए घर के आँगन में खड़ी है। कभी वह उसे गोद में लेती है और कभी उसे अपने हाथों पर सुलाती है। वह बार-बार हवा में अपने शिशु को उछाल कर बड़ी प्रसन्न होती है। शिशु भी माँ के हाथों से झूले खाकर खिलखिलाता हुआ हँसने लगता है। भाव यह है कि शिशु अपनी माँ का प्यार पाकर प्रसन्न हो उठता है।

विशेष-

  1. प्रस्तुत पद्यांश में शायर ने एक माँ के पुत्र-प्रेम का स्वाभाविक वर्णन किया है जो उसे अपने हाथों से झुलाती है और पुनः हवा में उछालती है।
  2. पुनरुक्ति प्रकाश तथा स्वभावोक्ति अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  3. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और सटीक है।
  5. ‘चाँद का टुकड़ा’ मुहावरे का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में दृश्य तथा श्रव्य बिंबों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  7. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘चाँद के टुकड़े’ का प्रयोग किसके लिए और क्यों किया गया है?
(ग) इस पद में माँ द्वारा शिशु को खिलाने का दृश्य अंकित किया गया है। स्पष्ट करें।
(घ) बच्चा क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करता है?
(ङ) इस काव्यांश में किस रस का परिपाक हुआ है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
(क) कवि-फ़िराक गोरखपुरी कविता-रुबाइयाँ

(ख) यहाँ नन्हें शिशु के लिए ‘चाँद के टुकड़े मुहावरे का मनोरम प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है-प्यारा पुत्र। पुत्र माँ के लिए प्राणों से भी अधिक प्रिय है। इसीलिए अकसर माँ अपने पुत्र को चाँद का टुकड़ा कहती है।

(ग) माँ अपने शिशु को कभी तो गोद में लेकर झुलाती है तो कभी वह उसे हवा में बार-बार उछालती है। इस प्रकार माँ अपने नन्हें पुत्र के प्रति अपने वात्सल्य भाव को व्यक्त करती है।

(घ) बच्चा अपनी माँ की गोद में झूले लेकर प्रसन्न हो जाता है। वह झूले खाकर इतना खुश होता है कि खिलखिलाकर हँसने लगता है। उसके मुख से हँसी अपने आप फूट पड़ती है।

(ङ) इस पद में वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है। माँ पुत्र को अपनी गोद में खिलाती है। उसे हवा में झुलाती है और नन्हा बेटा भी प्रसन्न होकर किलकारियाँ भरने लगता है। इन दृश्यों का संबंध वात्सल्य रस से है। अतः हम कह सकते हैं कि इस पद्यांश में कवि ने वात्सल्य रस का सही चित्रण किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[2] नहला के छलके छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
किस प्यार से देखता है बच्चा मुँह को
जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-छलके = ढुलक कर गिरना। निर्मल = स्वच्छ तथा पावन। गेसु = बाल। घुटनियाँ = घुटने। पिन्हाती = पहनाती।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से अवतरित है। इसके शायर फिराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने माँ और शिशु का सहज त

व्याख्या-सर्वप्रथम माँ ने अपने नन्हें पुत्र को स्वच्छ जल से छलका-छलका कर नहलाया। फिर उसने उसके उलझे हुए बालों में कंघी की। जब वह अपने घुटनों में अपने बच्चे को थाम कर उसे कपड़े पहनाती है तो वह शिशु बड़े प्यार से माँ के मुँह को देखता है। भाव यह है कि माँ अपने नन्हें पुत्र को स्वच्छ जल में नहलाकर उसे कंघी करती है। जब वह उसे कपड़े पहनाती है तो शिशु प्यार से माँ के मुँह को निहारता है।

विशेष-

  1. इस रुबाई में कवि ने माँ तथा उसके नन्हें बेटे की क्रियाओं का सहज तथा स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास, पुनरुक्ति प्रकाश तथा स्वभावोक्ति अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. संपूर्ण पद में दृश्य बिंबों का सफल प्रयोग किया गया है।
  4. प्रसाद गुण तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है, जिसमें ‘गेसु’ जैसे उर्दू शब्द का भी मिश्रण है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक हैं।
  7. रुबाई छंद का सफल प्रयोग किया गया है।
  8. ‘घुटनियों’ तथा ‘पिन्हाती’ जैसे कोमल शब्दों के प्रयोग के कारण भाषा-सौंदर्य में निखार आ गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बच्चे को नहलाने का दृश्य अपने शब्दों में लिखिए।
(ख) माँ बच्चे के बालों में किस प्रकार कंघी करती है?
(ग) बच्चा माँ को प्यार से क्यों देखता है?
(घ) माँ बेटे को किस प्रकार कपड़े पहनाती है?
उत्तर:
(क) माँ अपने बेटे को स्वच्छ जल में नहलाती है। पानी के छलकने के कारण उसका बेटा अत्यधिक प्रसन्न और उमंगित हो उठता है।
(ख) नहाने से शिशु के बाल उलझ जाते हैं। अतः माँ उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है।
(ग) माँ अपने नन्हें बेटे को अपने घुटनों में थामकर उसे कपड़े पहनाती है। उस समय शिशु के मन में माँ के प्रति प्यार उमड़ आता है और वह माँ को बड़े प्यार से निहारने लगता है।
(घ) माँ बेटे को कपड़े पहनाने से पहले उसे अपनी घुटनियों में थाम लेती है ताकि वह जमीन पर न गिरे। तत्पश्चात् वह उसे कपड़े पहनाती है।

[3] दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-पुते = रंगे हुए। रूपवती = सुंदर। दमक = चमक। घरौंदा = बच्चों के द्वारा रेत पर बनाया गया घर। दिए = दीपक।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि दीवाली के दृश्यों का सजीव वर्णन करता है।

व्याख्या दीपावली का सायंकाल है। सारा घर रंग-रोगन से पुता हुआ और सजा हुआ है। माँ अपने शिशु को प्रसन्न करने के लिए चीनी-मिट्टी के जगमगाते हुए सुंदर खिलौने लेकर आती है। माँ के सुंदर मुख पर एक कोमल चमक है। वह अत्यधिक प्रसन्न दिखाई देती है। बच्चों द्वारा रेत के बनाए हुए घर में वह एक दीपक जला देती है ताकि बच्चा प्रसन्न हो उठे।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने दीवाली के अवसर पर माँ के द्वारा की गई क्रियाओं का मनोरम वर्णन किया है।
  2. माँ की ममता और कोमलता का स्वाभाविक चित्रण है।
  3. प्रस्तुत पद्यांश में दृश्य बिंब की सुंदर योजना की गई है।
  4. पूरी रुबाई में ‘ए’ की मात्रा की आवृत्ति होने से सौंदर्य में वृद्धि हुई है।
  5. सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  6. शब्द-चयन उचित और सटीक है।
  7. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस की अभिव्यक्ति हुई है।
  8. रुबाई छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) दीवाली के दिन घर को कैसे सजाया गया है? (ख) दीवाली के दिन माँ अपने शिशु के लिए क्या लेकर आई?
(ग) बच्चों के लिए दिए जलाते समय माँ का चेहरा कैसा दिखाई देता है? (घ) माँ बच्चे के घरौंदे में दीपक क्यों जलाती है?
उत्तर:
(क) दीवाली के दिन सारे घर को साफ-सुथरा करके उसमें रंग-रोगन किया गया है और उसे अच्छे ढंग से सजाया गया है ताकि सारा घर सुंदर और आकर्षक लगे।

(ख) दीवाली के दिन माँ अपने बच्चे के लिए चीनी-मिट्टी के खिलौने लेकर आती है। वे खिलौने बड़े सुंदर और जगमगाते हैं और बच्चे के मन को आकर्षित करते हैं।

(ग) बच्चों के घरौंदे में दिए जलाते समय माँ के चेहरे पर कोमलता और चमक आ जाती है। इस चमक का कारण माँ के हृदय का वात्सल्य भाव है।

(घ) माँ अपने नन्हें पुत्र को प्रसन्न करने के लिए एक घरौंदा बनाती है जिसमें खिलौने सजे हुए हैं। दीवाली की शाम को वह उस घरौंदे में दिए जलाती हैं ताकि उसका नन्हा बेटा अपने घरौंदे को देखकर प्रसन्न हो जाए।

[4] आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया है
बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है। [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-ठुनक = ठुनकना, मचलना, झूठ-मूठ का रोना। जिदयाया = जिद के कारण मचलता हआ। हई = है ही। दर्पण = शीशा। आईना = शीशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फ़िराक गोरखपुरी हैं। इस पद में कवि ने शिशु के मचलने तथा उसकी जिद का बड़ा स्वाभाविक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि देखो यह शिशु आँगन में झूठ-मूठ में रो रहा है और मचल रहा है। वह जिद्द किए बैठा है क्योंकि वह बालक ही तो है। वह माँ से चाँद लेने की जिद्द कर रहा है अर्थात् वह चाहता है कि आकाश में चमकता हुआ चाँद वह अपने हाथों में ले ले। माँ अपने नन्हें बेटे के हाथ में दर्पण देकर उसे कहती है कि देखो चाँद इस शीशे में उतर कर आ गया है। तुम इस दर्पण को अपने हाथों में ले लो। अब तुम इससे खेल सकते हो। क्योंकि यह चाँद तुम्हारा हो गया है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बच्चे की जिद तथा उसके मचलने का स्वाभाविक वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद में स्वभावोक्ति अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. इस पद का वर्णन गतिशील होने के साथ-साथ चित्रात्मक भी है।
  4. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण किया गया है।
  5. रुबाई में कोमलता लाने के लिए ‘ज़िदयाया’, ‘हई’ शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य रस का परिपाक हुआ है।
  7. रुबाई छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बालक के ठुनकने तथा जिद करने का वर्णन कीजिए।
(ख) कवि ने बाल मनोविज्ञान का किस प्रकार उद्घाटन किया है?
(ग) माँ चाँद को कैसे दर्पण में उतारकर अपने नन्हें बेटे को दिखाती है?
उत्तर:
(क) बच्चा आकाश में चमकते हुए सुंदर चाँद को देखकर प्रसन्न हो जाता है। वह माँ के सामने जिद्द कर बैठता है कि उसे खेलने के लिए यही चाँद चाहिए। जब उसकी इच्छा पूरी नहीं होती तो वह मचल उठता है और जिद्द करने लगता है।

(ख) बाल मनोविज्ञान का उद्घाटन करने के लिए कवि ने ‘बालक तो हई’ शब्दों का प्रयोग किया है। जिसका अर्थ है कि बालक स्वभाव से जिद्दी तथा चंचल होते हैं। वे जिस पर रीझ जाते हैं, उसे पाने की जिद्द करते हैं। चाँद को देखकर बच्चा उस पर रीझ गया और उसे पाने की जिद्द करने लगा।

(ग) माँ अपने हाथ में एक दर्पण ले लेती है और उसमें चाँद का प्रतिबिंब उतार लेती है। तब वह उसे अपने बेटे को दिखाकर उसे प्रसन्न करती है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[5] रक्षाबंधन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी
बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी [पृष्ठ-58]

शब्दार्थ-रस की पुतली = मीठी-मीठी बातें करने वाली बेटी। घटा = जल से भरे हुए काले बादलों का समूह। गगन = आकाश। लच्छे = तारों से बना हुआ गहना जो हाथों या पैरों में पहना जाता है।
आरोह (भाग 2) फिराख गोरखपुरी]

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘रुबाइयाँ’ में से उद्धृत है। इसके शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इस पद्य में कवि ने रक्षाबंधन त्योहार की गतिविधियों का स्वाभाविक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि आज रक्षाबंधन का त्योहार है। आकाश में काले-काले बादलों की हल्की घटाएँ छाई हुई हैं। मीठी-मीठी बातें करने वाली नन्हीं बालिका उमंग और खुशी से भरपूर है। उसके हाथों में राखी रूपी लच्छे बिजली के समान चमक रहे हैं। वह प्रसन्न होकर अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और प्रसन्न होती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने राखियों के रेशमी लच्छों की तुलना बिजली से की है।
  2. पुनरुक्ति प्रकाश तथा उपमा अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. नन्हीं बालिका के लिए ‘रस की पुतली’ अत्यधिक सार्थक शब्द है।
  4. संपूर्ण पद में दृश्य-बिंब की सुंदर योजना हुई है।
  5. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. रुबाई छंद का प्रयोग किया गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) ‘रस की पुतली’ किसे और क्यों कहा गया है?
(ख) राखी के दिन मौसम किस प्रकार का है?
(ग) ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे का क्या आशय है?
(घ) राखी बाँधते समय नन्हीं बालिका की दशा कैसी है?
उत्तर:
(क) राखी बाँधने वाली बहन अर्थात् नन्हीं बालिका को ‘रस की पुतली’ कहा गया है। कारण यह है कि वह मीठी-मीठी बातें करती है और उसके मन में भाई के लिए अपार स्नेह है।
(ख) राखी का दिन है और आकाश में हल्के-हल्के बादलों की घटाएँ छाई हुई हैं। ऐसा लगता है कि हल्की-हल्की वर्षा होगी।
(ग) इसका आशय यह है कि बहन बिजली की तरह चमकते हुए लच्छों वाली राखी अपने भाई की कलाई पर बाँधती है।
(घ) राखी बाँधते समय बहन अत्यधिक प्रसन्न है। उसकी प्रसन्नता उसके द्वारा लाई गई चमकीली राखी से झलक रही है।

गज़ल पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] नौरस गुंचे पंखड़ियों की नाजुक गिरहें खोले हैं
या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं। [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-नौरस = नया रस। गुंचे = कली। नाजुक = कोमल। गिरहें = गांठें। रंगो-बू = रंग और गंध । गुलशन = बाग। पर तोलना = पंख फैलाकर उड़ना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित ‘गजल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का आकर्षक वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि नवीन रस से भरी हुई कलियों की कोमल पंखुड़ियाँ अपनी गाँठों को खोल रही हैं अर्थात् कलियाँ खिलकर फूल बन रही हैं। उनमें से जो सुगंध उत्पन्न हो रही है, उसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानों रंग और सुगंध दोनों आकाश में उड़ जाने के लिए अपने पंख फैला रहे हैं। भाव यह है कि कलियाँ खिलकर फूल बन रही हैं और चारों ओर उनकी मनोरम सुगंध फैल रही है।

विशेष-

  1. इस शेर में कवि ने प्रकृति के सौंदर्य का सजीव वर्णन किया है। यह शेर संयोग शृंगार की भूमिका के लिए लिखा गया है।
  2. इस शेर में संदेह अलंकार का प्रयोग तथा रस और सुगंध का मानवीकरण किया गया है।
  3. संपूर्ण शेर में उर्दू भाषा का सफल प्रयोग देखा जा सकता है। गुंचे, गिरहें, रंगों-बू, गुलशन आदि उर्दू के शब्द हैं।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘नौरस’ विशेषण का क्या अभिप्राय है?
(ग) पंखुड़ियों की नाजुक गिरह खोलने का आशय क्या है?
(घ) इस शेर का मूल आशय क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-फ़िराक गोरखपुरी कविता-गज़ल

(ख) ‘नौरस’ शब्द का प्रयोग नव रस के लिए किया गया है। इसका अर्थ है कि कलियों में नया रस भर आया है।

(ग) पंखुड़ियों की नाजुक गिरह खोलने का अर्थ है कि नन्हीं-नन्हीं कलियाँ धीरे-धीरे अपनी पंखुड़ियों को खोल रही हैं और उनमें से नव रस उत्पन्न होकर चारों ओर फैल रहा है।

(घ) इस शेर का आशय यह है कि कलियों की नन्हीं-नन्हीं पंखुड़ियाँ खिलने लगी हैं। उनमें से रंग और सुगंध निकलकर चारों ओर फैल रहे हैं जिससे आस-पास का वातावरण बड़ा मनोरम और आकर्षक बन गया है।

[2] तारे आँखें झपकावें हैं ज़र्रा-ज़र्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो यारो! शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-झपकावें = झपकना। ज़र्रा-ज़र्रा = कण-कण। शब = रात। सन्नाटा = मौन।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गज़ल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रकृति के उद्दीपन रूप का वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि रात ढल रही है। तारे भी आँखें झपकाकर मानों सोना चाहते हैं। प्रकृति का कण-कण सोया हुआ है। ऐसा लगता है कि मानों रात सो रही है। यह चुप्पी मुझे मेरे प्रिय की याद दिलाती है। हे मेरे मित्रो! तुम भी तनिक सुनो। रात का यह सन्नाटा मेरे साथ कुछ बोल रहा है। भाव यह है कि रात का मौन केवल उसी के साथ वार्तालाप करता है जिसके दिल में प्रेम की पीड़ा होती है।

विशेष-

  1. इस शेर में कवि ने प्रकृति का उद्दीपन रूप में चित्रण करते हुए अपनी प्रेम-भावना को व्यक्त किया है।
  2. संपूर्ण शेर में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
  3. सन्नाटा कुछ बोलता हुआ-सा प्रतीत होता है, अतः सन्नाटे का भी मानवीकरण किया गया है।
  4. ‘ज़र्रा-ज़र्रा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
  5. इस शेर का भाव और भाषा दोनों उर्दू भाषा से प्रभावित हैं।
  6. शब्द-चयन उचित और सटीक है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) ‘तारे आँखें झपकावें हैं’ का आशय स्पष्ट करें।
(ख) शब में सन्नाटा कैसे बोलता है?
(ग) कवि किस दृश्य का वर्णन करना चाहता है?
उत्तर:
(क) ‘तारे आँखें झपकावें हैं’ का आशय है-तारों का टिमटिमाना। अब रात ढलने जा रही है। लगता है कि तारे आँखें झपकाकर सोना चाहते हों। वे धीरे-धीरे बुझते जा रहे हैं।

(ख) रात के समय चारों ओर मौन और चुप्पी छाई हुई है। ऐसे में कवि को लगता है कि मानों सन्नाटा बोल रहा है। कवि को चुप्पी और मौन में से भी हल्की-हल्की आवाज़ सुनाई देती है। क्योंकि उस समय सन्नाटे के अतिरिक्त और कोई आवाज़ नहीं होती।

(ग) इस शेर में कवि रात्रिकालीन चुप्पी और मौन के दृश्य का चित्रण करना चाहता है और इस संबंध में कवि को पूर्ण सफलता भी मिली है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

[3] हम हों या किस्मत हो हमारी दोनों को इक ही काम मिला
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।
जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं। [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-किस्मत = भाग्य। इक = एक। लेवे = लेती है। बदनाम = निंदा फैलाना। परदा = राज।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से उदधत है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। पहले शेर में कवि ने अपनी हृदयगत वेदना का वर्णन किया है और दूसरे शेर में कवि निंदकों को अपनी सीमा में रहने का संदेश देता है।

व्याख्या – कवि अपने भाग्य को और स्वयं को कोसता है। वह स्वीकार करता है कि वह स्वयं तथा उसका भाग्य अलग नहीं हैं, बल्कि एक जैसे हैं। दोनों एक ही काम करते हैं। कवि का मन अत्यधिक दुखी है। इसलिए वह कहता है कि भाग्य मुझ पर रोता है और मैं अपने भाग्य पर रोता हूँ। भाव यह है कि कवि घोर निराशा का शिकार बना हुआ है और वह स्वयं को कोसता है।

अगले शेर में कवि उन लोगों से अत्यधिक दुखी है जो उसे बदनाम करने का षड्यंत्र रचते रहते हैं। कवि कहता है कि काश वे निंदक ये सोच पाते कि वे मेरा पर्दाफाश कर रहे हैं, राज खोल रहे हैं या अपना राज खोल रहे हैं। भाव यह है कि निंदकों को इस बात का एहसास नहीं होता कि वे दूसरों की निंदा करके अपनी कमज़ोरी को प्रकट करते हैं। वे इस सच्चाई को नहीं जानते कि निंदा करने वालों को संसार बुरा ही कहता है। जिसकी वे निंदा करते हैं उसे लोग अच्छी प्रकार से जानते हैं। यदि हम किसी की निंदा करते हैं तो हमारी अपनी बुराई प्रकट हो जाती है।

विशेष-

  1. पहले शेर में कवि अपने भाग्य को कोसता हुआ प्रतीत होता है और दूसरे शेर में कवि निंदकों पर ज़ोरदार प्रहार करता है।
  2. पहले शेर में किस्मत का मानवीकरण किया गया है।
  3. इन शेरों में कवि ने उर्दू भाषा का सफल प्रयोग किया है। किस्मत, बदनाम, परदा आदि उर्दू के शब्द हैं।
  4. अभिव्यक्ति की दृष्टि से सभी शेर सरल और हृदयग्राही हैं।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और उसकी किस्मत में क्या समानता है?
(ख) कवि को कौन बदनाम करते होंगे?
(ग) ‘मेरा परदा खोले है’ का आशय क्या है?
(घ) निंदा करने वाले क्या नहीं सोच पाते?
उत्तर:
(क) कवि और उसकी किस्मत में यह समानता है कि दोनों निराशा के शिकार हैं। यही कारण है कि किस्मत कवि को रोती है और कवि किस्मत को रोता है।

(ख) कवि के वे मित्र तथा संबंधी उसे बदनाम करते हैं जो उससे ईर्ष्या रखते हैं।

(ग) ‘मेरा परदा खोले है’ का आशय है कि कवि के विरोधी उसकी बदनामी करते हैं। वे कवि के दोषों का पर्दाफाश करना चाहते हैं। इस प्रकार के लोग निंदक हैं और वे कवि की निंदा करके उसे अपयश देना चाहते हैं।

(घ) निंदा करने वाले यह नहीं सोच पाते कि कवि के दोष निकालकर उसकी बदनामी करके वे अपनी बुराई को लोगों के सामने ला रहे हैं। ऐसा करने से कवि को कोई हानि नहीं होती, क्योंकि लोग निंदकों को अच्छी प्रकार से जानते हैं।

[4] ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ले हैं
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-कीमत = मूल्य। अदा करे = चुकाना। बदुरुस्ती = भली प्रकार। होशो-हवास = सचेत । सौदा = व्यापार। दीवाना = पागल। गम = दुख। अदब = मर्यादा। खयाल = विचार। दर्द = पीड़ा।।

प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से अवतरित है। इसके कवि फिराक गोरखपुरी हैं। पहले शेर में कवि ने प्रेममय संपूर्ण समर्पण की बात कही है और दूसरे शेर में प्रेम और समाज के द्वंद्व पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या-कवि कहता है कि प्रिया मैं अपने होश-हवास में तुम्हारे प्रेम का मूल्य चुका रहा हूँ। जो व्यक्ति प्रेम में डूब जाता है और प्रेम का सौदा करता है वह पागल-सा हो जाता है। भाव यह है कि कवि भले ही प्रिया के प्रेम में दीवाना है, परंतु अभी तक उसने अपना विवेक नहीं खोया है।

कवि अपनी प्रिया से पुनः कहता है कि प्रिय! मेरे मन में तुम्हारे दुखों का पूरा ध्यान है। मैं हमेशा तुम्हारी चिंता करता हूँ। मुझे तुम्हारी फिक्र लगी रहती है, परंतु इसके साथ-साथ मुझे दुनियादारी की भी चिंता है। संसार यह नहीं चाहता है कि मैं तुम्हारे प्रेम में मग्न रहूँ। इसीलिए मैं सब लोगों से अपने दर्द को छिपा लेता हूँ और तुम्हारे प्रेम में मैं चुपचाप रोता रहता हूँ।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने प्रेम की दीवानगी का संवेदनशील वर्णन किया है। दूसरे शेर में कवि प्रेम और समाज के संघर्ष पर प्रकाश डालता है।
  2. ‘चुपके-चुपके’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
  3. संपूर्ण पद में उर्दू भाषा का सहज और सरल प्रयोग किया गया है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है।
  5. वियोग शृंगार का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि क्या कीमत चुकाता है?
(ख) कवि की मनोदशा पर प्रकाश डालिए।
(ग) कवि किस संघर्ष में उलझा हुआ है?
(घ) कवि छिपकर चुपके-चुपके क्यों रोता है?
उत्तर:
(क) कवि स्वयं को प्रिया के प्रेम पर न्योछावर कर देता है और वह दीवाना होकर प्रेम की कीमत चुकाता है।

(ख) कवि अपनी प्रिया के प्रेम में दीवाना है और उसने स्वयं को अपनी प्रिया पर पूर्णतया न्योछावर कर दिया है, परंतु वह पूरे होशो-हवास में रहते हुए अपने प्रेम की कीमत को चुका रहा है।

(ग) कवि संसार तथा प्रेम के संघर्ष में उलझा हुआ है। एक ओर कवि को सांसारिक दायित्व निभाने पड़ रहे हैं तो दूसरी ओर उसके मन में प्रेम की चाहत है। वह इन दोनों स्थितियों के बीच में झूल रहा है।

(घ) कवि संसार के सामने अपने प्रेम को प्रकट नहीं करना चाहता। यदि वह अपने प्रेम को प्रकट करेगा तो उसके अपने लोगों को ठेस लगेगी। इसलिए वह अपने मन में चुपके-चुपके रो लेता है और अपने-आप से अपना प्रेम प्रकट कर लेता है।

[5] फ़ितरत का कायम है तवाजुन आलमे-हुस्नो-इश्क में भी
उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं
आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो
ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-फ़ितरत = स्वभाव। कायम = बना हुआ। तवाजुन = संतुलन। आलमे हुस्नो-इश्क = प्रेम और सौंदर्य का संसार। आबो-ताब अश्आर = चमक-दमक के साथ। आँख रखना = देखने में समर्थ होना। बैत = शेर। दमक = चमक। मोती रोले = आँसू छलकना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गजल’ में से अवतरित है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि प्रेम और सौंदर्य की चर्चा करता है तथा अपनी शायरी के सौंदर्य पर प्रकाश डालता है।

व्याख्या-प्रथम शेर में कवि कहता है कि सौंदर्य और प्रेम में मनुष्य की प्रवृत्ति अधिक महत्त्व रखती है। इस क्षेत्र में लेन-देन का संतुलन हमेशा बना रहता है। जो प्रेमी प्रेम में स्वयं को जितना अधिक समर्पित कर देता है, वह उतना ही अधिक प्रेम प्राप्त करता है। भाव यह है कि समर्पण से ही प्रेम की प्राप्ति होती है।

दूसरे शेर में कवि कहता है कि तुम मेरी शायरी की चमक-दमक और कलाकारी पर आसक्त न हो जाओ। मेरी कविता का सौंदर्य न तो बनावटी है और न ही सजावटी है। जो लोग मेरे शेरों को अच्छी प्रकार से जानते हैं उन्हें इस बात का पता है कि मेरे शेरों में जो सुंदरता है वह मेरी आँखों के आँसुओं से मिलती है। भाव यह है कि मैंने अपनी प्रिया के वियोग में जो आँसू बहाए हैं, उन्हीं के कारण मेरी कविता में चमक उत्पन्न हुई है।

विशेष –

  1. यहाँ कवि ने प्रेम तथा सौंदर्य के साथ-साथ अपने काव्य-सौंदर्य पर भी प्रकाश डाला है।
  2. कवि ने अपनी अनुभूति से प्रेरित होकर अपनी विरह-वेदना को व्यक्त किया है।
  3. यहाँ वियोग श्रृंगार की सुंदर अभिव्यक्ति हुई है।
  4. ‘मोती रोले’, ‘आँख रखना’ आदि मुहावरों का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. पहले शेर में दुरूह भाषा का प्रयोग हुआ है परंतु दूसरे शेर की भाषा कुछ-कुछ सरल है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि किस फ़ितरत की बात करता है?
(ख) प्रेम को प्राप्त करने के कौन-से उपाय हैं?
(ग) ‘जगमग बैतों की दमक’ किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(घ) ‘या हम मोती रोले हैं’ का आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
(क) यहाँ कवि मानव प्रकृति की बात करता है। साथ ही वह प्रकृति के मूल स्वभाव पर भी प्रकाश डालता है। प्रकृति का यह नियम है कि हमें कोई वस्तु प्राप्त करने के लिए उस वस्तु के बराबर की कीमत चुकानी पड़ती है।

(ख) प्रेम को पाने का केवल एक ही उपाय है। जो मनुष्य स्वयं को प्रेम में समर्पित कर देता है वही व्यक्ति प्रेम पा सकता है।

(ग) ‘जगमग बैतों की दमक’ का अर्थ है-कविता का आलंकारिक सौंदर्य अथवा कविता कहने का कलात्मक ढंग जिसके कारण कविता चमक उठती है और वह पाठक और श्रोता को मंत्र मुग्ध कर देती है।

(घ) “या हम मोती रोले हैं का आशय है कि मैंने अपनी कविता में विरह-वेदना के आँसू बहाए हैं। मेरी यह कविता मेरी अनुभूति पर आधारित है। अतः मैंने अपनी सच्ची विरह-वेदना प्रकट की है।

[6] ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को
रात गए गर्दू पै फ़रिश्ते बाबेगुनह जग खोले हैं
सदके फिराक एजाजे-सखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज
इन गज़लों के परदों में तो ‘मीर’ की गज़लें बोले हैं [पृष्ठ-59]

शब्दार्थ-अंजुमने-मय = शराब की महफिल। रिंद = शराबी। गर्दू = आकाश। फ़रिश्ते = देवदूत। बाबे-गुनह = पाप का अध्याय। सदके = कुर्बान। एजाजे-सुखन = काव्य का सौंदर्य । परदों = शब्दों।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित ‘गज़ल’ में से उद्धृत है। इसके कवि फ़िराक गोरखपुरी हैं। यहाँ कवि ने अपनी प्रेमिका की चर्चा करते हुए अपनी शायरी पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या-कवि कहता है कि जब रात को आकाश में देवता संसार के पापों का लेखा-जोखा कर रहे होते हैं और यह देखने का प्रयास करते हैं कि किस व्यक्ति ने कितने अधिक पाप किए हैं, उस समय हम शराब की महफिल में अपने गम को दूर करते हुए तुम्हें याद करते हैं। भाव यह है कि प्रेमी को अंधेरी रात में अपनी प्रिया की बहुत याद आती है। कभी-कभी वह अपनी विरह-वेदना को दूर करने के लिए शराब पीने लगता है।

दूसरे शेर में कवि कहता है कि अकसर लोग मेरी कविता पर आसक्त होकर मुझे कहते हैं कि हम तुम्हारी शायरी पर न्योछावर होते हैं। पता नहीं तुमने इतनी सुंदर और श्रेष्ठ शायरी कहाँ से सीख ली। तुम्हारी गजलों के शेरों में तो मीर की गज़लों की आवाज़ सुनाई देती है। भाव यह है कि तुम्हारी कविता मीर की कविता के समान सुघड़ और आकर्षक है।

विशेष-

  1. रात के समय प्रिय को अपनी प्रेमिका की अत्यधिक याद आती है।
  2. यहाँ कवि ने स्वयं अपनी शायरी की प्रशंसा की है। इस प्रकार की प्रवृत्ति संस्कृत तथा हिंदी के कवियों में दिखाई नहीं देती।
  3. प्रथम शेर में श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  4. संपर्ण पद में उर्द भाषा का सहज, स्पष्ट और प्रभावशाली प्रयोग हआ है।
  5. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 9 रुबाइयाँ, गज़ल

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) प्रथम शेर में कवि ने किस प्रकार के वातावरण का प्रयोग किया है?
(ख) ‘तू’ शब्द का प्रयोग किसके लिए किया गया है?
(ग) लोग फिराक की प्रशंसा किस प्रकार किया करते थे?
(घ) कवि ने स्वयं अपनी प्रशंसा किस प्रकार की है?
(ङ) ‘एजाजे-सुखन’ का क्या आशय है?
उत्तर:
(क) यहाँ कवि ने रात के सन्नाटे में शराबखाने का चित्रण किया है। प्रेमी शराब खाने में अपनी प्रेम-वेदना को दूर करने के लिए शराब पीता रहता है और अपनी प्रेमिका को याद करता रहता है।

(ख) यहाँ ‘तू’ शब्द का प्रयोग प्रेमिका के लिए किया गया है।

(ग) लोग फ़िराक की प्रशंसा करते हुए अकसर कहते थे कि उसकी शायरी उर्दू के प्रसिद्ध शायर मीर की मधुरता से घुल-मिल गई है।

(घ) कवि ने लोगों का हवाला देकर स्वयं के शेर में अपनी कविता की प्रशंसा की है। इसे हम आत्म-प्रशंसा का शेर कह सकते हैं। यह एक प्रकार से अपने मुँह मियाँ मिट्ठ बनने की बात है।

(ङ) “एजाज़े-सुखन’ का आशय है-काव्य का सौंदर्य अर्थात् कविता के भाव-पक्ष और कला-पक्ष का सौंदर्य । कविता की भाषा, छंद, अलंकार आदि ही उसके सौंदर्य का निर्माण करते हैं।

रुबाइयाँ, गज़ल Summary in Hindi

रुबाइयाँ, गज़ल कवि-परिचय

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा फिराक गोरखपुरी का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-फिराक गोरखपुरी का मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ है। उनका जन्म 28 अगस्त, सन् 1896 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में हुआ। वे एक अमीर परिवार से संबंधित थे। उर्दू कविता के प्रति उनके मन में छोटी आयु में ही रुझान था। बाल्यावस्था में ही उन्होंने उर्दू में कविता लिखनी आरंभ कर दी। वे साहिर, इकबाल, फैज़ तथा कैफी आज़मी से अत्यधिक प्रभावित हुए।

रामकृष्ण की कहानियों से आरंभ करने के बाद उन्होंने अरबी, फारसी और अंग्रेज़ी में शिक्षा ग्रहण की। पढ़ाई में वे बड़े ही योग्य विद्यार्थी थे। 1917 ई० में वे डिप्टी कलेक्टर के पद के लिए चुने गए, परंतु स्वराज्य आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने 1918 में इस पद से त्यागपत्र दे दिया। 1920 ई० में स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण उनको डेढ़ वर्ष की जेल की यात्रा सहन करनी पड़ी। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक भी रहे। ‘गुले-नग्मा’ के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। बाद में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार तथा सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड भी प्राप्त हुए। सन् 1983 में उनका निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ–’गुले-नग्मा’, ‘बज़्मे ज़िंदगी’, ‘रंगे-शायरी’, ‘उर्दू गज़लगोई’।

3. काव्यगत विशेषताएँ-फिराक गोरखपुरी उर्दू के कवि के रूप में विख्यात हैं। प्रायः उर्दू साहित्य में रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता देखी जा सकती है। उर्दू कवियों ने लोक जीवन तथा प्रकृति पर बहुत कम लिखा है परंतु नज़ीर अकबराबादी, इल्ताफ़ हुसैन, हाली जैसे कुछ कवियों ने इस परंपरा को तोड़ने का प्रयास किया। उनमें फ़िराक गोरखपुरी भी एक ऐसे शायर हैं। वे आजीवन धर्म-निरपेक्षता के पक्षधर रहे हैं। उनका कहना था कि उर्दू केवल मुसलमानों की ही भाषा नहीं है, बल्कि यह आम भारतवासियों की भाषा है। पं० जवाहरलाल नेहरू उनकी इस सोच से अत्यधिक प्रभावित हुए। उन्होंने फिराक को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। लगभग पचास वर्ष तक वे सांप्रदायिक सद्भाव के लिए काम करते रहे।

फ़िराक की कविता में कुछ स्थानों पर रुमानियत देखी जा सकती है। उन्होंने वियोग श्रृंगार के सुंदर चित्र अंकित किए हैं, परंतु उनका वियोग वर्णन व्यक्तिगत अनुभूति पर आधारित है। एक उदाहरण देखिए
तेरे गम का पासे-अदब है कुछ दुनिया का खयाल भी है
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।
भारतीय परंपरा और संस्कृति को भी उन्होंने अपनी शायरी में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा, उसे अपने काव्य में लिखा। अपनी कुछ रुबाइयों में फ़िराक साहब ने वात्सल्य का जो वर्णन किया है, वह बेमिसाल बन पड़ा है। लगता है कि कवि सूरदास और तुलसी से प्रभावित हुआ है। एक उदाहरण देखिए
आँगन में ठुनक रहा है ज़िदयाया
है बालक तो हई चाँद पै ललचाया है
दर्पण उसे दे के कह रही है माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है
कहीं-कहीं कवि ने रक्षाबंधन, दीवाली जैसे, त्योहारों को भी अपनी कविता में स्थान दिया है। अन्यत्र कवि मजदूरों तथा शोषितों का भी पक्ष लेता हुआ दिखाई देता है। फिराक ने परंपरागत भाव-बोध और शब्द-भंडार का उपयोग करते हुए उसे नयी भाषा और नए विषयों से जोड़ा। उन्होंने सामाजिक दुख-दर्द, व्यक्तिगत अनुभूति को शायरी में ढाला है। इंसान के हाथों इंसान पर जो गुज़रती है उसकी तल्ख सच्चाई और आने वाले कल के प्रति एक उम्मीद, दोनों को भारतीय संस्कृति और लोकभाषा के प्रतीकों से जोड़कर फ़िराक ने अपनी शायरी का अनूठा महल खड़ा किया।

4. भाषा-शैली-उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों तथा चुस्त मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध है। फ़िराक भी कोई अपवाद नहीं है। उन्होंने भी यत्र-तत्र न केवल मुहावरों का प्रयोग किया है, बल्कि लाक्षणिक प्रयोग भी किए हैं। उन्होंने साधारण-जन से अपनी बात कही है। यही कारण है कि उनकी शैली में प्रकृति, मौसम और भौतिक जगत के सौंदर्य का यथार्थ वर्णन हुआ है। जहाँ तक उर्दू भाषा का प्रश्न है, उन्होंने उर्दू के साथ-साथ फ़ारसी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है। कही-कहीं वे हिंदी के साथ-साथ देशज भाषा का भी मिश्रण करते हैं। उनका शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है। फ़िराक ने हिंदी में भी रुबाइयाँ लिखी हैं और इन रुबाइयों में सहज एवं सरल प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग किया है। एक उदाहरण देखिए

दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे
वो रूपवती मुखड़े पै इक नर्म दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती है दिए

रुबाइयाँ कविता का सार

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित ‘रुबाइयाँ’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत रुबाइयों में कवि ने नन्हें शिशु की अठखेलियों और माँ के वात्सल्य भाव का सुंदर वर्णन किया है। माँ अपने शिशु को लेकर अपने आँगन में खड़ी है। वह कभी उसे झुलाती है और कभी हवा में उछालती है। इससे बालक खिलखिलाकर हँसने लगता है। पुनः माँ अपने नन्हें बालक को पानी में नहलाती है और उसके उलझे बालों को कंघी से सुलझाती है। शिशु माँ के घुटनों में से माँ के मुख को देखता है। दीवाली की सायंकाल को सारा घर सजाया जाता है। चीनी के खिलौने घर में जगमगाते हैं। सुंदर माँ अपने दमकते मुख से बच्चे के घरौंदे में दीपक जलाती है। एक अन्य दृश्य में कवि कहता है कि बच्चा चाँद लेने की जिद करता है। माँ उसे दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाती है और कहती है कि देखो चाँद शीशे में उतर आया है। रक्षाबंधन के पर्व के अवसर पर आकाश में हल्की-हल्की घटाएँ छा जाती हैं। एक छोटी-सी लड़की बिजली के समान चमकते लच्छों वाली राखी अपने भाई की कलाई पर बांधती है। इन रुबाइयों में कवि ने भारतीय सभ्यता और संस्कृति का बड़ा मनोरम वर्णन किया है।

गज़ल कविता का सार

प्रश्न-
फिराक गोरखपुरी द्वारा रचित ‘गज़ल’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘गज़ल’ में फ़िराक गोरखपुरी ने निजी प्रेम का वर्णन किया है। भले ही गज़ल का प्रत्येक शेर स्वतंत्र अस्तित्व रखता हो, परंतु इस गज़ल में एक संगति दिखाई देती है। कवि प्रकृति के उद्दीपन रूप का वर्णन करते हुए कहता है कि कलियों से नवरस छलकने लगा है और चारों ओर सुगंध फैल रही है। रात्रि के सन्नाटे में तारे आँखें झपका रहे हैं जिससे कवि को लगता है कि सन्नाटा कुछ बोल रहा है।
अगले शेर में कवि अपनी किस्मत को कोसता हुआ दिखाई देता है, क्योंकि उसे अपनी प्रिया का प्रेम प्राप्त नहीं हो सका। कवि के प्रेम को लेकर लोग उसकी निंदा और आलोचना करते हैं। लेकिन कवि का विचार है कि ऐसे निंदक लोग स्वयं बदनाम होते हैं। इससे कवि बदनाम नहीं होता।

कवि स्वीकार करता है कि प्रेम के कारण भले ही वह दीवानगी तक पहुंच गया है, फिर भी वह विवेकशील बना हुआ है। विरह की पीड़ा कवि को अत्यधिक व्यथित कर रही है, परंतु कवि को दुनियादारी का ध्यान है। इसलिए वह चुपचाप रोकर अपने दर्द को प्रकट करता है। पुनः कवि का कथन है कि प्रेम में प्रेमी की प्रकृति का विशेष महत्त्व होता है। जो प्रेमी जितना अधिक स्वयं को खो देता है, वह उतना ही गहरे प्रेम को प्राप्त करता है। कवि स्वीकार करता है कि विरह के कारण उसका प्रत्येक शेर आँसुओं में डूबा हुआ है। कवि कहता है कि रात्रि के समय देवता लोगों के पापों का लेखा-जोखा करते हैं। लेकिन कवि शराबखाने में बैठा हुआ अपनी प्रेयसी को याद करता है। अंत में कवि अपनी प्रशंसा करते हुए कहता है कि उसकी गज़लों पर मीर की गज़लों का प्रभाव है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

HBSE 12th Class Hindi कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कवितावली के उद्धृत छंदों के आधार पर स्पष्ट करें कि तुलसीदास को अपने युग की आर्थिक विषमता की अच्छी समझ है।
उत्तर:
भले ही तुलसीदास राम-भक्त कवि थे, परंतु अपने युग की परिस्थितियों से वे भली प्रकार परिचित थे। उन्होंने तत्कालीन लोगों की सामाजिक तथा आर्थिक स्थिति को समीप से देखा था। इसलिए कवि ने यह स्वीकार किया है कि उस समय लोग बेरोज़गारी के शिकार थे। उनके पास कोई ऐसा काम-धंधा नहीं था जिससे वे अपना पेट भर सकें। आर्थिक विषमता के कारण अमीर

और गरीब में बहुत बड़ी खाई बन चुकी थी। लोगों में गरीबी और भुखमरी फैली हुई थी। मजदूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, कलाकार आदि सभी काम न मिलने के कारण परेशान थे। गरीबी के कारण लोग छोटे-से-छोटा काम करने को तैयार थे। तुलसीदास ने लोगों की आर्थिक दुर्दशा को देखकर कवितावली के छंदों में आर्थिक विषमता का यथार्थ वर्णन किया है।

प्रश्न 2.
पेट की आग का शमन ईश्वर (राम) भक्ति का मेघ ही कर सकता है तुलसी का यह काव्य-सत्य क्या इस समय का भी युग-सत्य है? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
उत्तर:
तुलसीदास ने यह स्वीकार किया है कि मनुष्य की पेट की आग को ईश्वर भक्ति रूपी मेघ ही शांत कर सकते हैं। तुलसी का यह काव्य-सत्य प्रत्येक युग पर चरितार्थ होता है। भले ही माता-पिता बालक को जन्म देते हैं, परंतु ईश्वर ही उसे कर्मों के फल के रूप में भाग्य देता है। हम अपने चारों ओर देखते हैं कि करोड़ों लोग कोई-न-कोई व्यवसाय कर रहे हैं। कुछ लोगों को आशातीत सफलता प्राप्त होती है। परंतु कुछ लोग खूब मेहनत करके काम करते हैं, फिर भी उन्हें सफलता नहीं मिलती। अनेक लोग उद्योग-धंधे चला रहे हैं, लेकिन सभी अंबानी बंधु नहीं बन पाते। इसे हम ईश्वर की कृपा के सिवाय कुछ नहीं कह सकते। सच्चाई तो यह है कि मेहनत के साथ-साथ ईश्वर की अनुग्रह भी होनी चाहिए। सच ही कहा गया है-
गुणावंत न जामिये, जामिये भागावन्त
भागावन्त के द्वार में, खड़े रहे गुणवन्त

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

प्रश्न 3.
तुलसी ने यह कहने की ज़रूरत क्यों समझी?
धूत कहौ, अवधूत कही, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ/काहू की बेटीसों से बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ। इस सवैया में काहू के बेटासों बेटी न ब्याहब कहते तो सामाजिक अर्थ में क्या परिवर्तन आता?
उत्तर:
यदि तुलसीदास ‘काहू की बेटी से बेटा न ब्याहब’ की बजाय यह कहते कि काहू के बेटा से बेटी न ब्याहब तो सामाजिक अर्थ में बहुत अंतर आ जाता। प्रायः विवाह के बाद बेटी अपने पिता के कुल गोत्र को त्यागकर पति के कुल गोत्र को अपना लेती है। अतः यदि कवि के सामने अपनी बेटी के ब्याह का प्रश्न होता तो कुल गोत्र के बिगड़ने का भय भी होता जो लड़के वाले को नहीं होता।

प्रश्न 4.
धूत कहौ….. वाले छंद में ऊपर से सरल व निरीह दिखलाई पड़ने वाले तुलसी की भीतरी असलियत एक स्वाभिमानी भक्त हृदय की है। इससे आप कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
इस सवैये से कवि की सच्ची भक्ति-भावना तथा उनके स्वाभिमानी स्वभाव का पता चलता है। वे स्वयं को ‘सरनाम गुलाम है राम को’ कहकर अपनी दीनता-हीनता को प्रकट करते हैं। इससे यह पता चलता है कि वे राम के सच्चे भक्त हैं और उनमें। है। परंत धत कहौ….. छंद को पढ़ते ही पता चल जाता है कि वे एक स्वाभिमानी भक्त थे। उन्होंने किसी भी कीमत पर अपने स्वाभिमान को कम नहीं होने दिया। अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए वे कुछ भी कर सकते थे। लोगों ने उन पर जो कटाक्ष किए, उसकी भी उन्होंने परवाह नहीं की। इसलिए वे अपने निंदकों को स्पष्ट कहते हैं कि उनके बारे में जिसे जो कुछ कहना है वह कहे। उन्हें किसी से कोई लेना-देना नहीं है।

व्याख्या करें-

प्रश्न 5.
(क) मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू॥
(ख) जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।
(ग) माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबोको दोऊ॥
(घ) ऊँचे नीचे करम, धरम-अधरम करि, पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी॥
उत्तर:
(क) इस पद्य भाग में श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण को मूर्छित देखकर शोकग्रस्त हो जाते हैं। यद्यपि हनुमान संजीवनी लेने के लिए गए हुए हैं लेकिन अर्धरात्रि होने तक वे लौटकर नहीं आए। उपचार की अवधि प्रातःकाल तक है अतः अपने भाई लक्ष्मण के प्राणों पर खतरा देखकर वे भावुक हो उठे और अपने मूर्छित भाई लक्ष्मण से कहने लगे आई लक्ष्मण! तुमने मेरे लिए माता-पिता का त्याग किया और मेरे साथ वनवास के लिए चल पड़े। वन में रहते हुए तुमने असंख्य कष्टों को सहन किया, सर्दी-गर्मी आदि का सामना किया, परंतु मेरा साथ नहीं छोड़ा। यदि मुझे पता होता कि वन में आने से मुझसे मेरे भाई का वियोग हो जाएगा तो मैं पिता की आज्ञा का पालन न करता अर्थात् मैं कभी वनवास को स्वीकार न करता।

(ख) इस पद्य भाग में अपने मूर्छित भाई लक्ष्मण के प्रति मोह-भावना को व्यक्त करते हुए राम कहते हैं हे भाई लक्ष्मण! तुम्हारे बिना मेरी स्थिति दीन-हीन हो गई है, क्योंकि तुम ही मेरी ताकत थे। जैसे पंख के बिना पक्षी दीन हो जाते हैं, मणि के बिना सांप तथा सूंड के बिना हाथी हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार जब भाग्य मुझे तुम्हारे बिना जीने के लिए मजबूर कर देगा तो मेरा जीवन भी तुम्हारे बिना वैसा ही हो जाएगा। भाव यह है कि तुम्हारे बिना मेरा जीना बड़ा दुखद और शोचनीय हो जाएगा।

(ग) प्रस्तुत पद्य पंक्ति में कविवर तुलसीदास ने अपने स्वाभिमान का निडरतापूर्वक वर्णन किया है। कवि कहता है कि मुझे निंदकों का कोई भय नहीं है और न ही मुझे अपने जीवन के बिगड़ने का भय है। मुझे किसी की धन-संपत्ति नहीं चाहिए, क्योंकि आ पेट भर लेता हूँ अर्थात् मुझे किसी प्रकार के काम-धंधे की चिंता नहीं है। मैं मस्जिद में सो लेता हूँ। मुझे न तो किसी से कुछ लेना है और न देना है। मेरी जिंदगी फक्कड़ है और मैं अपने आप में मस्त रहता हूँ।

(घ) प्रस्तुत पद्य पंक्ति में कवि ने तत्कालीन आर्थिक विषमता का यथार्थ वर्णन किया है। कवि का कहना है कि मनुष्य के सारे कार्य एवं व्यापार पेट की आग को शांत करने के लिए होते हैं। परंतु यह आग इतनी भयंकर होती है कि लोग ऊँचे-नीचे कर्म तथा धर्म-अधर्म कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं। यहाँ तक कि अपनी भूख को मिटाने के लिए लोग बेटे-बेटियों तक को बेच देते हैं। यह स्थिति तुलसी के युग में थी और आज भी है।

प्रश्न 6.
भ्रातृशोक में हुई राम की दशा को कवि ने प्रभु की नर लीला की अपेक्षा सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में रचा है। क्या आप इससे सहमत हैं? तर्कपूर्ण उत्तर दीजिए।
उत्तर:
यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि लक्ष्मण की मूर्छा पर शोकग्रस्त होकर विलाप करने वाले राम भगवान नहीं हो सकते। कवि का यह कहना सही प्रतीत नहीं होता कि वे भगवान के रूप में नर लीला कर रहे हैं। यदि वे ऐसा करते तो उनका प्रत्येक वचन मर्यादित होता। जब कोई मनुष्य अत्यधिक शोकग्रस्त होता है तब वह असहाय होकर दुख के कारण प्रलाप करने लगता है। राम के द्वारा यह कहना कि यदि उन्हें पता होता कि वन में भाई से उनका वियोग हो जाएगा, तो वे अपने पिता की आज्ञा को न मानते अथवा यह कहना कि पत्नी तो आती-जाती रहती है ये बातें तो सच्ची मानवीय अनुभूति के रूप में प्रकट हुई हैं। इसे हम नर लीला नहीं कह सकते।

प्रश्न 7.
शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?
उत्तर:
वैद्य सुषेण ने यह कहा था कि अगर प्रातः होने से पूर्व संजीवनी बूटी मिल गई तो लक्ष्मण बच सकता है अन्यथा उसकी मृत्यु हो जाएगी। अर्धरात्रि बीत चुकी थी और हनुमान अभी तक लौटकर नहीं आया था। संपूर्ण भालू और वानर सेना घबराई हुई थी। राम भी लक्ष्मण की मृत्यु के डर के कारण घबरा गए थे और वे भावुक होकर विलाप करने लगे। परंतु इसी बीच हनुमान संजीवनी बूटी लेकर पहुँच गए। हनुमान को देखकर राम के विलाप में आशा और उत्साह का संचार हो गया। करुणापूर्ण वातावरण में मानों वीर रस का समावेश हो गया। क्योंकि अब सभी को यह आशा बँध गई थी कि लक्ष्मण होश में आ जाएँगे और फिर रावण पर विजय प्राप्त की जा सकेगी।

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प्रश्न 8.
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥ बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं॥ भाई के शोक में डूबे राम के इस प्रलाप-वचन में स्त्री के प्रति कैसा सामाजिक दृष्टिकोण संभावित है?
उत्तर:
इस प्रकार के विलाप को सुनकर विलाप करने वाले की पत्नी को तो बुरा ही लगेगा। परंतु यह भी एक सच्चाई है कि इस प्रकार के प्रलाप का कोई अर्थ नहीं होता। यह शोक से व्यथित एक व्यक्ति की उक्ति है। इसे यथार्थ नहीं समझना चाहिए। सामाजिक दृष्टि से यह कथन बुरा लगता है परंतु यह भी एक यथार्थ है कि मनुष्य के लिए भाई और पत्नी में भाई का कोई विकल्प नहीं होता, पत्नी का विकल्प हो सकता है। उदाहरण के रूप में यदि किसी की पत्नी का देहांत हो जाता है तो वह दूसरा विवाह करके पत्नी ले आता है लेकिन भाई का देहांत होने पर वह दूसरा भाई नहीं ला सकता। इस उक्ति से यह भी अर्थ प्रकट हो सकता है कि प्रायः लोग पत्नी को भाई से अधिक महत्त्व देते हैं और कभी-कभी ऐसे उदाहरण देखे जाते हैं जहाँ लक्ष्मण जैसे भाई अपनी भाभी के लिए अपनी जान देने को तैयार रहते हैं। परंतु आज ऐसा भी देखने में आया है कि पुरुष अपनी पत्नी के लिए भाई तक को छोड़ देता है। अतः नारी के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण सर्वत्र एक-जैसा नहीं है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
कालिदास के रघुवंश महाकाव्य में पत्नी (इंदुमती) के मृत्यु-शोक पर अज तथा निराला की सरोज-स्मृति में पुत्री (सरोज) के मृत्यु-शोक पर पिता के करुण उद्गार निकले हैं। उनसे भ्रातृशोक में डूबे राम के इस विलाप की तुलना करें।
उत्तर:
जहाँ तक कवि निराला का प्रश्न है, उन्होंने अपने ‘शोक-गीत’ सरोज-स्मृति में इसलिए प्रायश्चित किया है, क्योंकि वह पिता होने के कर्तव्य का ठीक से पालन नहीं कर पाए। दूसरा उनकी बेटी का आकस्मिक निधन हो गया। युवावस्था में ही वह स्वर्ग सिधारं गई। अतः निराला का विलाप बहत गहरा है जो बेटी की मृत्यु के कारण उत्पन्न हुआ है।

परंतु राम का विलाप निराला की तुलना में कुछ कम है, क्योंकि लक्ष्मण की मृत्यु नहीं हुई। उसके जीवित होने की आशा अभी बनी हुई है। हनुमान संजीवनी बूटी लेने गए हुए हैं और वे आ भी जाते हैं। अतः राम का विलाप निराला के विलाप की तुलना में अधिक गहन नहीं है।

प्रश्न 2.
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी तुलसी के युग का ही नहीं आज के युग का भी सत्य है। भुखमरी में किसानों की आत्महत्या और संतानों (खासकर बेटियों) को भी बेच डालने की हृदय-विदारक घटनाएँ हमारे देश में घटती रही हैं। वर्तमान परिस्थितियों और तुलसी के युग की तुलना करें।
उत्तर:
गरीबी कोई आज की समस्या नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक युग की समस्या रही है। समाज का पूँजीपति वर्ग हमेशा किसानों तथा मजदूरों का शोषण करके धन का संग्रह कर लेता है, जिससे नगरों के मज़दूर तथा गाँव के किसान गरीबी का शिकार बन जाते हैं और उन्हें अनेक बार अनापेक्षित संकटों का सामना करना पड़ता है। तुलसी के काल में भी देश में गरीबी थी। आज तो यह एक गंभीर समस्या बन चुकी है। गरीबी के अनेक कारण हो सकते हैं परंतु इसके परिणाम एक जैसे ही होते हैं। गरीबों को अपना मान-सम्मान एवं अभिमान यहाँ तक कि बेटे-बेटियों को भी बेचना पड़ सकता है। आज अनेक लोग गरीबी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं।

प्रश्न 3.
तुलसी के युग की बेकारी के क्या कारण हो सकते हैं? आज की बेकारी की समस्या के कारणों के साथ उसे मिलाकर कक्षा में परिचर्चा करें।
उत्तर:
तुलसी के युग में बेकारी के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं-

  • लोगों के पास कृषि के साधनों का अभाव रहा होगा।
  • तत्कालीन शासक लोगों से बेगार करवाते होंगे।
  • मज़दूरों को उचित मज़दूरी नहीं मिलती होगी।
  • कुछ लोग आलसी होंगे जो काम करना नहीं चाहते होंगे।
  • लोगों को पर्याप्त काम के अवसर प्राप्त नहीं होते होंगे।

आज की समस्या के कारण-

  • देश में बढ़ती हुई जनसंख्या।
  • पूँजीवादी अर्थव्यवस्था पर बल।
  • कृषि की ओर उचित ध्यान न देना।
  • अधिक लोगों का शिक्षित होना।
  • पढ़े-लिखे लोगों में नौकरी करने की इच्छा।
  • श्रम साध्य कामों से बचने का प्रयास करना।

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प्रश्न 4.
राम कौशल्या के पुत्र थे और लक्ष्मण सुमित्रा के। इस प्रकार वे परस्पर सहोदर (एक ही माँ के पेट से जन्मे) नहीं थे। फिर, राम ने उन्हें लक्ष्य कर ऐसा क्यों कहा-“मिलइ न जगत सहोदर भ्राता”? इस पर विचार करें।
उत्तर:
राम लक्ष्मण को अपना सहोदर ही मानते थे। वे लक्ष्मण की माता सुमित्रा को भी अपनी माता समझते थे। उनके मन में तीनों माताओं के लिए एक-जैसी भावना थी। दूसरा, लक्ष्मण का त्याग सहोदर भाई से भी अधिक था। वह भी राम को अपना सहोदर मानता था। यही कारण है कि राम ने लक्ष्मण को अपना सहोदर कहा है।

प्रश्न 5.
यहाँ कवि तुलसी के दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया-ये पाँच छंद प्रयुक्त हैं। इसी प्रकार तुलसी साहित्य में और छंद तथा काव्य-रूप आए हैं। ऐसे छंदों व काव्य-रूपों की सूची बनाएँ।
उत्तर:
तुलसीदास ने अपनी काव्य रचनाओं में दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त, सवैया, छप्पय तथा हरिगीतिका छंदों का प्रयोग किया है।

  • काव्य रूप-प्रबंध काव्य, रामचरितमानस।
  • गेय पदशैली-गीतावली, श्रीकृष्ण गीतावली तथा विनय पत्रिका।
  • मुक्तक-विनय पत्रिका।

तुलसी द्वारा प्रयुक्त छंदों का परिचय-
(i) चौपाई-यह एक सममात्रिक छंद है। इसके चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण में सोलह-सोलह मात्राएँ होती हैं तथा प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु होता है। पहले-दूसरे तथा तीसरे-चौथे चरणों की तुक मिलती है, यथा
सों अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओह।

(ii) दोहा-जिस छंद के विषम चरणों में तेरह मात्राएँ तथा सम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं, उसे दोहा छंद कहते हैं। यह हिंदी का सर्वाधिक लोकप्रिय तथा प्रचलित छंद है, यथा
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि। राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि।

(iii) सोरठा-सोरठा छंद के सम चरणों में तेरह तथा विषम चरणों में ग्यारह मात्राएँ होती हैं। इसमें तुक प्रथम और तृतीय चरण के अंत में मिलती है। यह दोहा छंद का उल्टा है। गोस्वामी तुलसीदास ने सोरठा छंद का पर्याप्त प्रयोग किया है।
सुनत सुमंगल बैन, मन प्रमोद तन पुलक भर।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे स्नेह जल॥

(iv) कवित्त-कवित्त के प्रत्येक चरण में इकतीस वर्ण होते हैं। प्रत्येक चरण के सोलहवें और पंद्रहवें वर्ण पर इति रहती है। प्रत्येक चरण का अंतिम वर्ण गुरु होता है, यथा-
किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी। पेटको पढ़त, गुन गढ़त चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी॥
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागिते बड़ी है आगि पेटकी॥

(v) सवैया सवैया छंद के अनेक प्रकार होते हैं। ये प्रकार गणों के संयोजन के आधार पर किए जाते हैं। इनमें मत गयंद सवैया सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसे मालती सवैया भी कहते हैं। इसके प्रत्येक चरण में तेइस-तेइस वर्ण होते हैं, यथा
सेस महेस गनेस सुरेस दिनेसहु जाहि निरतंर गावै।
नारद से सुक व्यास हैं, पचि हारि रहे पुनि पार न पावै।
जाहि अनादि अनंत अखंड अबेद अभेद सुवेद बतावै।
ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पे नाच नचावै।

HBSE 12th Class Hindi कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न-
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
1. ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेट की॥
उत्तर:

  1. प्रस्तुत पद्य भाग में कविवर तुलसीदास ने तत्कालीन लोगों में व्याप्त गरीबी का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. कवि ने गरीबी तथा पेट की आग के यथार्थ को स्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया है कि उस समय गरीब लोग अपना पेट भरने के लिए बेटे-बेटियों को भी बेच देते थे।
  3. संपूर्ण पद्यांश में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. ‘राम-घनश्याम’ में रूपक अलंकार का प्रयोग है।
  5. ‘आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी’ में गतिरेक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  6. सहज एवं सरल साहित्यिक ब्रजावधी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. प्रसाद गुण है तथा करुण रस का परिपाक हुआ है।
  9. कवित्त छंद का प्रयोग है।

2. धूत कही, अवधूत कही, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटी सों बेटा न ब्याहव, काहूकी जाति बिगार न सोऊ॥
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहैं कछु ओऊ।
माँगि के खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एकु न दैबको दोऊ।
उत्तर:

  1. इस पद से पता चलता है कि तुलसीदास को अपने जीवन में अनेक अपवादों तथा विरोधों का सामना करना पड़ा।
  2. कवि जातिवाद में विश्वास करता दिखाई देता है।
  3. संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. ‘लेना एक न देना दो’ मुहावरे का सशक्त प्रयोग है।
  5. इस पद में दास्य भक्ति का भाव देखा जा सकता है।
  6. सहज एवं सरल साहित्यिक ब्रजावधी भाषा का सफल प्रयोग है।
  7. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. सवैया छंद का प्रयोग है।

3. जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना॥
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही।
उत्तर:

  1. इन काव्य-पंक्तियों में कवि ने लक्ष्मण के मूर्छित होने पर बड़े भाई राम के विलाप का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. अपने सहोदर लक्ष्मण के बिना वे स्वयं को पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सर्प तथा सूंड के बिना हाथी के समान समझते हैं।
  3. अनुप्रास तथा दृष्टांत अलंकारों का सुंदर और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  4. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. प्रसाद गुण है तथा करुण रस का परिपाक हुआ है।
  7. चौपाई छंद का प्रयोग है।

4. बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन।
स्रवत सलिल राजिव दल लोचन।
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने लक्ष्मण मूर्छा के प्रसंग में चिंताग्रस्त राम की स्थिति का भावपूर्ण वर्णन किया है।
  2. भले ही प्रभु राम लोगों की चिंताओं को दूर करने वाले हैं परंतु इस समय वे स्वयं चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
  3. इन पद्य-पंक्तियों में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. ‘राजिव दल लोचन’ में रूपक अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. प्रसाद गुण है तथा करुण रस का परिपाक है।
  8. चौपाई छंद का प्रयोग है।

5. सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओह।
उत्तर:

  1. लक्ष्मण मूर्छा के लिए राम स्वयं को दोषी मानने लगे। इसलिए वे कहते हैं कि यदि मुझे भाई के वियोग का एहसास भी होता तो मैं पिता के वचनों को न मानता।
  2. यहाँ कवि ने राम के विलाप का कारुणिक वर्णन किया है।
  3. अनुप्रास अलंकार (बन-बंधु) का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. प्रसाद गुण है तथा करुण रस का परिपाक है।
  7. चौपाई छंद का प्रयोग है।

6. यह बृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥
व्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने यह स्पष्ट किया है कि लक्ष्मण के होश में आने के समाचार को सुनकर रावण अत्यधिक दुखी हो गया और वह पश्चात्ताप करने लगा।
  2. पुनि-पुनि में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
  3. ‘सिर धुना’ मुहावरे का सफल प्रयोग है।
  4. साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. चौपाई छंद का प्रयोग है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
तुलसीकालीन सामाजिक और आर्थिक दुरावस्था का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
तुलसीकालीन समाज सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से अत्यधिक पिछड़ा हुआ था। उस समय लोगों की आर्थिक दशा बड़ी खराब थी। लोगों के पास रोज़गार के उचित अवसर नहीं थे। मजदूर के पास काम नहीं था, किसान के पास खेती नहीं थी। व्यापारी के पास व्यापार नहीं था और भिखारी को भीख नहीं मिलती थी। चारण, भाट, नौकर, नट, चोर, दूत, बाज़ीगर आदि पेट भरने के लिए उल्टे-सीधे काम करते थे। पहाड़ों पर चढ़ते थे और जंगल में भटकते हुए शिकार करते थे। उन्हें ऊँचे-नीचे, धर्म-अधर्म के सभी प्रकार के काम करने पड़ते थे। यहाँ तक कि पेट भरने के लिए वे अपनी संतान को बेचने से भी नहीं हिचकिचाते थे। चारों ओर गरीबी का आलम था। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कवि ने तत्कालीन सामाजिक एवं आर्थिक दुरावस्था का यथार्थ वर्णन किया है।

प्रश्न 2.
‘तुलसी का युग बेरोजगारी और बेकारी का युग था’-सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
बेरोजगारी प्रत्येक युग की अहम समस्या है। तुलसी का युग भी बेरोज़गारी के संकट का सामना कर रहा था। उस समय बेरोजगारी इस प्रकार फैली हुई थी कि किसान के पास खेती का साधन नहीं था। भिखारी को भीख नहीं मिलती थी और नौकर के पास नौकरी नहीं थी। आजीविका विहीन दुखी होकर लोग एक-दूसरे से कहते थे कहाँ जाएँ और क्या करें। इस प्रकार दरिद्रता रूपी रावण ने लोगों को इस प्रकार दबा दिया था कि सभी त्राहि-त्राहि कर रहे थे। यही कारण है कि कवि तुलसीदास इस बेरोजगारी और गरीबी को दूर करने के लिए प्रभु राम से कृपा की याचना करते थे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

प्रश्न 3.
‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव लिखिए।
उत्तर:
इस प्रसंग में कवि ने लक्ष्मण के मूर्च्छित हो जाने पर बड़े भाई राम के विलाप का कारुणिक वर्णन किया है। लक्ष्मण को मूर्छित देखकर राम इतने व्याकुल हो जाते हैं कि वे सामान्य मानव की तरह विलाप करने लगते हैं। धीरे-धीरे उनका दिलाप प्रलाप में बदल जाता है। राम कहते हैं कि तुम तो मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। मेरे लिए तुमने माता-पिता को त्यागकर वनवास ले लिया। यदि मुझे पता होता कि वन में मेरा तुमसे वियोग हो जाएगा तो मैं पिता की आज्ञा को कभी न मानता। संसार में धन, स्त्री, मकान आदि बार-बार मिल जाते हैं, परंतु सहोदर भाई बार-बार नहीं मिलता है।

वे लक्ष्मण के स्वभाव और गुणों को याद करके अत्यंत भावुक हो उठते हैं और इस दशा के लिए स्वयं को दोषी मानने लगते हैं। वे कहते हैं कि उनकी स्थिति पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना सर्प और सैंड के बिना हाथी के समान हो गई है। वे कहते हैं कि मैं क्या मुँह लेकर अयोध्या जाऊँगा। लोग मेरे बारे में कहेंगे कि मैंने पत्नी के लिए भाई को गँवा दिया। हे भाई! उठकर मझे बताओ कि मैं तुम्हारी माता सुमित्रा को क्या उत्तर दूँगा। इस प्रकार लोगों की चिंताओं को दूर करने वाले राम स्वयं चिंतित होकर रोने लगे। अंततः राम का दुख तब कम होता है जब हनुमान औषधि वाला पहाड़ लेकर पहुँच जाते हैं।

प्रश्न 4.
शोकग्रस्त माहौल में हनुमान के अवतरण को करुण रस के बीच वीर रस का आविर्भाव क्यों कहा गया है?
उत्तर:
मेघनाद की शक्ति के कारण लक्ष्मण घायल होकर मूर्च्छित हो गए थे। इससे राम अत्यधिक व्यथित हो गए। उनके करुण भाव को सुनकर संपूर्ण भालू और वानर सेना शोकग्रस्त हो गई थी। चारों ओर शोक का वातावरण व्याप्त था। राम अनेक प्रकार के वचन कहकर लक्ष्मण को होश में लाने का प्रयास कर रहे थे। अन्ततः वे विलाप करके रोने लगे जिससे सर्वत्र करुण रस का संचार होने लगा।

इसी बीच जामवंत के परामर्श से हनुमान लंका के वैद्य सुषेण को उठाकर ले आया। सुषेण ने एक पर्वत विशेष से संजीवनी लाने की सलाह दी और कहा कि यदि प्रभात वेला से पहले-पहले संजीवनी मिल जाएगी तो लक्ष्मण के प्राण बच सकते हैं, अन्यथा नहीं। यह कार्य हनुमान को सौंपा गया। वे अपनी वीरता के कारण उस विशेष पर्वत को उठाकर ले आए जिस पर औषधि थी। अतः हनुमान का यह कारनामा वीर रस का आविर्भाव करता है। यह दायित्व हनुमान के आगमन से करुण रस के बीच में वीर रस का प्रादुर्भाव हो गया। राम का विलाप बंद हो गया और सुषेण के उपचार से लक्ष्मण होश में आ गए। अतः कवि का कहना सर्वथा उचित है कि हनुमान का अवतरण करुण रस के बीच में वीर रस का आविर्भाव है।

प्रश्न 5.
‘लक्ष्मण-मूर्छा’ प्रसंग के आधार पर तुलसी की नारी दृष्टि पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
तुलसीयुग में भारतीय परिवार व्यवस्था काफी सुदृढ़ थी। उस समय संयुक्त परिवार की परंपरा चलती थी। सभी भाई और उनकी पत्नियाँ एक ही छत के नीचे रहते थे। यही कारण है कि उस समय पत्नी की अपेक्षा भाई का महत्त्व अधिक था। दूसरा भाई का संबंध व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं होता लेकिन पत्नी का संबंध उसके अपने हाथ में होता है। वैसे भी भाई का संबंध जन्मजात होता है। यह संबंध काफी पुराना और प्राकृतिक है। परंतु पत्नी का संबंध व्यक्ति के साथ यौवनकाल में स्थापित होता है। तत्कालीन सामाजिक और पारिवारिक परंपरा को ध्यान में रखकर ही कविवर तुलसीदास ने नारी संबंधी अपना दृष्टिकोण व्यक्त किया है। इसीलिए हम तुलसीदास पर ही नारी दृष्टिकोण का दोष नहीं दे सकते। जहाँ तक नारी के सम्मान का प्रश्न है, कवि ने नारी को उचित मान-सम्मान दिया है। वन में रहते हुए भी राम, लक्ष्मण माँ की चिंता करते हैं। अतः कवि ने नारी के मातृरूप का अधिक सम्मान किया है।

प्रश्न 6.
राम के विलाप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मेघनाद की शक्ति लगने से लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे। सुषेण वैद्य के कथनानुसार हनुमान संजीवनी लेने के लिए गए हुए थे। प्रभात से पहले-पहले लक्ष्मण का उपचार होना आवश्यक था अन्यथा वह मृत्यु को प्राप्त हो सकता था। अर्धरात्रि व्यतीत दर लक्ष्मण को मूर्छित देखकर विलाप करने लगे। भ्रातशोक के कारण वे अत्यधिक व्यथित और बेचैन थे। वे बार-बार लक्ष्मण के त्याग, समर्पण और स्नेह की चर्चा करने लगे। भ्रातृ शोक से व्याकुल होकर वे कहने लगे यदि मुझे पता होता कि वन में मेरा भाई से वियोग होगा तो मैं पिता की आज्ञा को न मानता। पुत्र, धन, मकान आदि बार-बार मिल सकते हैं लेकिन सहोदर भाई पुनः नहीं मिल सकता। वे अपनी स्थिति की तुलना पंखों के बिना पक्षी, मणि के बिना सर्प तथा सैंड के बिना हाथी से करते हैं। उन्हें इस बात का भी भय था कि वे अयोध्या लौटकर माँ सुमित्रा को क्या मुँह दिखाएँगे और अयोध्यावासी उनके बारे में क्या सोचेंगे। इस प्रकार राम विलाप करते-करते प्रलाप करने लगे।

प्रश्न 7.
लक्ष्मण के उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लक्ष्मण के मूर्च्छित होने पर श्रीराम विलाप करने लगते हैं। सारा वातावरण निराशाजन्य हो जाता है। किन्तु ज्यों ही हनुमान संजीवनी लेकर वहाँ पहुँच जाते हैं तो निराशा हर्षोल्लास में बदल जाती है। श्रीराम हनुमान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। वहाँ उपस्थित वैद्य ने संजीवनी से लक्ष्मण का उपचार किया और वह होश में आ गया। वैद्य को ससम्मान वापिस पहुँचा दिया गया।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. तुलसीदास का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1532 में
(B) सन् 1544 में
(C) सन् 1543 में
(D) सन् 1534 में
उत्तर:
(A) सन् 1532 में

2. तुलसीदास का जन्म बांदा जिले के किस गाँव में हुआ?
(A) रजापुर में
(B) राजापुर में
(C) राजगढ़ में
(D) रामपुर में
उत्तर:
(B) राजापुर में

3. बांदा ज़िला भारत के किस प्रदेश में स्थित है?
(A) मध्य प्रदेश में
(B) पश्चिमी बंगाल में
(C) उत्तर प्रदेश में
(D) बिहार में
उत्तर:
(C) उत्तर प्रदेश में

4. तुलसीदास का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1619 में
(B) सन् 1621 में
(C) सन् 1622 में
(D) सन् 1623 में
उत्तर:
(D) सन् 1623 में

5. तुलसीदास का निधन कहाँ पर हुआ?
(A) इलाहाबाद में
(B) काशी में
(C) लखनऊ में
(D) कानपुर में
उत्तर:
(B) काशी में

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

6. ‘रामचरितमानस’ के रचयिता का नाम लिखिए।
(A) तुलसीदास
(B) कबीरदास
(C) सूरदास
(D) केशवदास
उत्तर:
(A) तुलसीदास

7. ‘रामचरितमानस’ किस विधा की रचना है?
(A) मुक्तक काव्य
(B) गीति काव्य
(C) महाकाव्य
(D) खंड काव्य
उत्तर:
(C) महाकाव्य

8. ‘रामचरितमानस’ में कुल कितने कांड हैं?
(A) छह कांड
(B) सात कांड
(C) आठ कांड
(D) नौ कांड
उत्तर:
(B) सात कांड

9. ‘रामचरितमानस’ में किस भाषा का प्रयोग हुआ है?
(A) साहित्यिक अवधी
(B) साहित्यिक हिंदी
(C) भोजपुरी
(D) खड़ी बोली
उत्तर:
(A) साहित्यिक अवधी

10. ‘कवितावली’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) सूरदास
(B) केशवदास
(C) तुलसीदास
(D) कबीरदास
उत्तर:
(C) तुलसीदास

11. ‘रामचरितमानस’ में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) सवैया छंद
(B) कवित्त छंद
(C) हरिगीतिका छंद
(D) दोहा-चौपाई छंद
उत्तर:
(D) दोहा-चौपाई छंद

12. किसबी किसान कुल …………. तुलसीदास की किस काव्य-रचना से अवतरित है?
(A) रामचरितमानस
(B) कवितावली
(C) दोहावली
(D) विनयपत्रिका
उत्तर:
(B) कवितावली

13. ‘अस कहि आयसु पाई पद बंदि चलेऊ हनुमत’ यहाँ ‘आयसु’ का अर्थ है-
(A) आ गया
(B) अवज्ञा
(C) आज्ञा
(D) संकेत
उत्तर:
(C) आज्ञा

14. ‘कवितावली’ कविता के अनुसार लोगों में कौन-सी भावना नहीं रह गई है?
(A) धर्म-अधर्म
(B) दुःख-सुख
(C) अच्छे-बुरे
(D) रोजी-रोटी
उत्तर:
(A) धर्म-अधर्म

15. ‘आगि बड़वागिते बड़ी है आगि पेटकी’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) उपमा
(C) व्यतिरेक
(D) विभावना
उत्तर:
(C) व्यतिरेक

16. वेदों और पुराणों के अनुसार संकट के समय कौन सहायता करता है?
(A) देवता
(B) प्रभु राम
(C) नेता लोग
(D) अफसर
उत्तर:
(B) प्रभु राम

17. ‘कवितावली’ में किस भाषा का प्रयोग किया गया है?
(A) अवधी
(B) ब्रज
(C) मैथिली
(D) ब्रजावधी
उत्तर:
(D) ब्रजावधी

18. ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ रामचरितमानस के किस कांड में से लिया गया है?
(A) लंका कांड
(B) अयोध्या कांड
(C) सुन्दर कांड
(D) किष्किंधा कांड
उत्तर:
(A) लंका कांड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

19. ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ शीर्षक प्रसंग किस भाषा में रचित है?
(A) ब्रज।
(B) अवधी
(C) खड़ी बोली
(D) भोजपुरी
उत्तर:
(B) अवधी

20. ‘उमा एक अखंड रघुराई’ पंक्ति में ‘उमा’ शब्द का क्या अर्थ है?
(A) शची
(B) उर्वशी
(C) शारदा
(D) पार्वती
उत्तर:
(D) पार्वती

21. लक्ष्मण के जीवित होने की खबर सुनकर रावण किसके पास गया?
(A) मेघनाद
(B) विभीषण
(C) कुंभकरण
(D) सुषेण
उत्तर:
(C) कुंभकरण

22. कवितावली से उद्धृत दो कवित्तों में कवि ने किसका वर्णन किया है?
(A) सामाजिक स्थिति का
(B) धार्मिक स्थिति का
(C) आर्थिक विषमता का
(D) राजनीतिक स्थिति का
उत्तर:
(C) आर्थिक विषमता का

23. ‘सहेहु विपिन हिम आतप बाता’- यहाँ ‘आतप’ का अर्थ है-
(A) तपस्या
(B) धूप
(C) पवन
(D) शीत
उत्तर:
(B) धूप

24. श्रीराम ने लक्ष्मण को हृदय से लगाया तो कौन हर्षित हुए?
(A) हनुमान
(B) सुषेण वैद
(C) भालु-कपि-समूह
(D) लक्ष्मण
उत्तर:
(C) भालु-कपि-समूह

25. लक्ष्मण किसको दुःखी नहीं देख सकते थे?
(A) माता-पिता को
(B) हनुमान को
(C) श्रीराम को
(D) गुरु को
उत्तर:
(C) श्रीराम को

26. तुलसीदास के गुरु का नाम क्या था?
(A) रामानन्द
(B) नरहरिदास
(C) स्वामी वल्लभाचार्य
(D) सुखदेव
उत्तर:
(B) नरहरिदास

27. तुलसीदास ने किसके पास रहकर पंद्रह वर्षों तक वेदों का अध्ययन किया?
(A) नरहरिदास के पास
(B) रामानन्द के पास
(C) शेष सनातन के पास
(D) वल्लभाचार्य के साथ
उत्तर:
(C) शेष सनातन के पास

28. ‘जानकी मंगल’ किस प्रकार की रचना है?
(A) प्रबंध काव्य
(B) खंड काव्य
(C) गीति काव्य
(D) मुक्तक काव्य
उत्तर:
(C) गीति काव्य

29. तुलसी की कीर्ति का आधार स्तंभ है-
(A) कवितावली
(B) रामचरितमानस
(C) पार्वती मंगल
(D) विनय पत्रिका
उत्तर:
(B) रामचरितमानस

30. ‘नारि हानि विशेष छति नाहीं यहाँ ‘छति’ का अर्थ है-
(A) छाता
(B) हानि
(C) लाभ
(D) छत
उत्तर:
(B) हानि

31. ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में कवि ने राम के किस रूप का वर्णन किया है?
(A) ईश्वर रूप का
(B) देवता रूप का
(C) राजा रूप का
(D) मानव रूप का
उत्तर:
(D) मानव रूप का

32. हनुमान जी संजीवनी बूटी लेकर आए तो कवि ने करुण रस में किस रस के समावेश की कल्पना की है?
(A) वीर
(B) शांत
(C) श्रृंगार
(D) हास्य
उत्तर:
(A) वीर

33. ‘जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान’ यह पंक्ति किसने कही?
(A) राम
(B) लक्ष्मण
(C) कुम्भकरण
(D) रावण
उत्तर:
(C) कुम्भकरण

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34. श्रीराम का विलाप सुनकर कौन विकल हो गए?
(A) हनुमान
(B) लक्ष्मण
(C) भालू
(D) वानर
उत्तर:
(D) वानर

35. राम जी के एकनिष्ठ भक्त कौन थे?
(A) नील
(B) जामवंत
(C) सुग्रीव
(D) हनुमान
उत्तर:
(D) हनुमान

36. ‘सहेहु विपिन हिम आतप बाता’-यहाँ बाता का अर्थ है-
(A) ‘धूप
(B) शीत
(C) धन
(D) हवा
उत्तर:
(D) हवा

37. ‘पुनि-पुनि’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार
(B) अनुप्रास अलंकार
(C) यमक अलंकार
(D) श्लेष अलंकार
उत्तर:
(A) पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार

38. जागने पर कुम्भकर्ण किसकी तरह देह धारण किए दिखाई दिया?
(A) राक्षस
(B) काल
(C) पशु
(D) जानवर
उत्तर:
(A) राक्षस

39. तुलसीदास की पत्नी का नाम क्या था?
(A) गीता
(B) पार्वती
(C) रत्नावली
(D) सावित्री
उत्तर:
(C) रत्नावली

40. ‘निज जननी के एक कुमारा’ पंक्ति किस पात्र ने कही है?
(A) भरत ने
(B) लक्ष्मण ने
(C) राम ने
(D) हनुमान ने
उत्तर:
(C) राम ने

41. तुलसी के पिता का नाम क्या था?
(A) आत्माराम दूबे
(B) परसराम दूबे
(C) मंगतराम दूबे
(D) सदाराम दूबे
उत्तर:
(A) आत्माराम दूबे

42. लक्ष्मण के मूर्छित होने पर सामान्य मनुष्य की तरह कौन विलाप करने लगता है?
(A) हनुमान
(B) सुग्रीव
(C) सीता
(D) राम
उत्तर:
(D) राम

43. भरत के बाहुबल एवं शील के प्रशंसक का नाम लिखिए-
(A) मयंद
(B) अंगद
(C) सुग्रीव
(D) पवन कुमार
उत्तर:
(D) पवन कुमार

44. श्रीराम के मतानुसार पंखों के बिना किसकी स्थिति दयनीय होती है?
(A) वानर की
(B) मछली की
(C) पक्षी की
(D) सर्प की
उत्तर:
(C) पक्षी की

45. ‘अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ’ काव्यांश में किस पात्र के न आने का वर्णन है?
(A) सुग्रीव
(B) मयंद
(C) अंगद
(D) हनुमान
उत्तर:
(D) हनुमान

46. ‘सहेह विपिन हिम आतप बाता’ पंक्ति में ‘आतप’ का क्या अर्थ है?
(A) आपदा
(B) सूर्य
(C) धूप
(D) तपस्या
उत्तर:
(C) धूप

कवितावली (उत्तर कांड से) पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] किसबी, किसान-कुल, बनिक, भिखारी, भाट,
चाकर, चपल नट, चोर, चार, चेटकी।
पेटको पढ़त, गुन गढ़त, चढ़त गिरि,
अटत गहन-गन अहन अखेटकी ॥
ऊँचे-नीचे करम, धरम-अधरम करि,
पेट ही को पचत, बेचत बेटा-बेटकी।
‘तुलसी’ बुझाइ एक राम घनस्याम ही तें,
आगि बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी॥ [पृष्ठ-48]

शब्दार्थ-किसबी = धंधा करने वाले। बनिक = व्यापारी। भाट = चारण। चाकर = नौकर। चपल नट = उछलने-कूदने वाले कलाकार। चार = दूत। चेटकी = बाजीगर। गुन गढ़त = कलाओं और विद्याओं को सीखते हैं। गिरि = पर्वत। अटत = घूमना। गहन-गन = घना जंगल। अहन = भिन्न। अखेटकी = शिकारी। अधरम = पाप। घनस्याम = काला बादल। बड़वागी = जंगल की आग। .

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘कवितावली’ के उत्तर कांड के पदों में से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। प्रस्तुत कवित्त में कवि
तत्कालीन समाज की बेरोजगारी और गरीबी पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि-

व्याख्या-मेहनत करने वाले मजदूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, चारण, नौकर, कुशल, नट, चोर, दूत तथा बाज़ीगर आदि पेट भरने के लिए तरह-तरह के गण गढ़ते हैं, ऊँचे पर्वतों पर चढ़ते हैं और दिन भर घने जंगलों में शिकार करते हुए घूमते रहते हैं। भाव यह है कि अपना पेट भरने के लिए लोग कलाएँ और विद्याएँ सीख रहे हैं। पहाड़ों पर चढ़कर आजीविका खोज रहे हैं अथवा जंगलों में शिकार करके अपना पेट भरना चाहते हैं। कवि पुनः कहता है कि लोग अपना पेट भरने के लिए ऊँचे-नीचे कर्म करते हैं और धर्म-अधर्म की परवाह न करके अच्छे-बुरे काम करते हैं। यहाँ तक कि लोग अपने पेट के लिए बेटा-बेटी को बेचने के लिए ‘मजबूर हो गए हैं। यह कटु सत्य है कि पेट की आग समुद्र की आग से भी अधिक शक्तिशाली होती है। तुलसीदास कहते हैं कि यह भूख राम रूपी घनश्याम की कृपा से ही दूर हो सकती है। भाव यह है कि उसने अपने दयालु राम की कृपा से ही भूख को मिटा दिया है, परंतु देश के अन्य लोग भूख और बेरोजगारी के कारण बड़े ही व्याकुल हैं।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने युग की यथार्थता का प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. कवि का कथन है कि पेट की आग सर्वाधिक प्रबल आग है जो मनुष्य को बेटा-बेटी तक बेचने को मजबूर कर देती है।
  3. संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. ‘राम घनस्याम’ में रूपक अलंकार का प्रयोग है। ‘आगी-बड़वागितें बड़ी है आगि पेटकी’ में गतिरेक अलंकार का प्रयोग है।
  5. यहाँ सहज एवं सरल साहित्यिक ब्रजावधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. कवित्त छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) कौन लोग पेट भरने के लिए मारे-मारे भटक रहे हैं?
(ग) भूख और गरीबी का सर्वाधिक मार्मिक दृश्य कौन-सा है?
(घ) कवि की भूख कैसे शांत हुई?
(ङ) लोग दिनभर घने जंगलों में शिकार क्यों करते हैं?
उत्तर:
(क) कवि-गोस्वामी तुलसीदास                    कविता-कवितावली

(ख) मज़दूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, चारण-भाट, नौकर, चंचल-नट, चोर, दूत तथा बाज़ीगर और शिकारी अपना पेट भरने के लिए मारे-मारे भटक रहे हैं।

(ग) भूख और गरीबी का मार्मिक दृश्य यह है कि पेट भरने के लिए लोग मजबूर होकर अपने बेटे-बेटियों को बेच रहे हैं।

(घ) कवि की भूख दयालु राम रूपी घनश्याम की कृपा से दूर हो गई है। भाव यह है कि राम ने बादल बनकर स्वयं कवि को भोजन दिया।

(ङ) लोग अपना पेट भरने के लिए दिनभर जंगलों में भटकते रहते हैं और शिकार करते हैं। m सप्रसंग व्याख्या

[2] खेती न किसान को, भिखारी को न भीख, बलि,
बनिक को बनिज, न चाकर को चाकरी।
जीविका बिहीन लोग सीधमान सोच बस,
कहैं एक एकन सों ‘कहाँ जाई, का करी?’
बेदहूँ पुरान कही, लोकहूँ बिलोकिअत,
साँकरे सबै पै, राम! रावर कृपा करी।
दारिद-दसानन दबाई दुनी, दीनबंधु।
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी ॥ [पृष्ठ-48]

शब्दार्थ-बनिज = व्यापार। सीद्यमान = परेशान, दुखी। बेदहूँ = वेद में भी। लोकहूँ = लोक में भी। साँकरे = संकट। रावरें = आपने। दारिद = दरिद्रता। दबाई = दबाया। दुरित = पाप। हहा करी = दुखी होना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘कवितावली’ के उत्तर कांड के पदों में से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि अपने समय की सामाजिक और आर्थिक दुर्दशा का यथार्थ वर्णन करता है। कवि कहता है कि उसके काल में लोग बेरोज़गारी के कारण अत्यधिक व्याकुल थे।

व्याख्या – कवि का कथन है कि ऐसा बुरा समय आ गया है कि देश में किसान के पास खेती करने के साधन नहीं हैं और भिखारी को भीख नहीं मिलती। व्यापारी को व्यापार नहीं मिलता और नौकर को नौकरी नहीं मिलती। भाव यह है कि न किसान के पास खेती है, न व्यापारी को व्यापार मिल रहा है और न ही नौकर को कोई अच्छी नौकरी मिल रही है। सभी लोग आजीविका न होने के कारण दुखी होकर एक-दूसरे से कहते हैं कि कहाँ जाएँ और क्या करें। कोई रास्ता दिखाई नहीं देता अर्थात् काम-धंधा न होने के कारण लोग व्याकुल और परेशान हैं।

कवि प्रभु राम में अपनी आस्था प्रकट करता हुआ कहता है हे राम! वेदों और पुराणों में यह बात लिखी हुई है और संसार में भी अकसर ऐसा ही देखा जाता है कि संकट के समय में आपकी कृपा से ही संकट दूर होता है। हे दीनबंधु राम! दरिद्रता रूपी रावण ने सारी दुनिया को दबा रखा है अर्थात् सभी लोग गरीबी के शिकार बने हुए हैं। चारों ओर पाप का जाल बिछा हुआ है। सभी लोग त्राहि-त्राहि कर रहे हैं। हे प्रभु! इस संकट के समय आप ही सहायता कर सकते हैं।

विशेष-

  1. इस कवित्त में कवि ने अपने समय की बेरोज़गारी की समस्या का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. कवि ने श्रीराम को दीनबंधु और कृपालु कहकर अपनी दास्य भावना की अभिव्यक्ति को व्यक्त किया है।
  3. संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. ‘दारिद-दसानन’ तथा ‘दुरित-दहन’ में रूपक अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. सहज एवं सरल साहित्यिक तथा ब्रजावधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. कवित्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

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पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) किसान, भिखारी, व्यापारी तथा नौकर किसलिए परेशान हैं?
(ख) कवि ने दरिद्रता की तुलना किसके साथ की है और क्यों?
(ग) वेदों पुराणों में क्या लिखा हुआ है?
(घ) सब ओर त्राहि-त्राहि क्यों मची हुई है?
उत्तर:
(क) किसान, भिखारी, व्यापारी और नौकर रोज़गार न मिलने के कारण अत्यधिक परेशान हैं, क्योंकि रोज़गार के बिना वे अपना और अपने परिवार का पेट नहीं भर सकते।

(ख) कवि ने दरिद्रता की तुलना रावण के साथ की है। रावण ने भी सारे संसार को दबाकर रखा हुआ था और लोगों पर अनेक प्रकार के अत्याचार कर रहा था। उसी प्रकार दरिद्रता ने भी लोगों को दुखी और व्याकुल कर रखा है, अतः यह रूपक बड़ा ही सटीक बन पड़ा है।

(ग) वेदों और पुराणों में यह लिखा है कि संकट के समय राम ही अर्थात् भगवान ही कृपा करते हैं। इसलिए लोग भुखमरी और बेरोजगारी के अवसर पर राम की कृपा चाहते हैं।

(घ) बेरोजगारी, भुखमरी और गरीबी के कारण लोग बहुत परेशान और व्याकुल हैं। लोगों को पेट-भर भोजन नहीं मिलता। लोग दरिद्रता रूपी रावण के शिकार बने हुए हैं। इसलिए सब ओर त्राहि-त्राहि मची हुई है।

[3] धूत कहौ, अवधूत कहौ, रजपूतु कहौ, जोलहा कहौ कोऊ।
काहू की बेटीसों बेटा न ब्याहब, काहूकी जाति बिगार न सोऊ।
तुलसी सरनाम गुलामु है राम को, जाको रुचै सो कहै कछु ओऊ ॥
माँगि कै खैबो, मसीत को सोइबो, लैबोको एक न दैबको दोऊ। [पृष्ठ-48]

शब्दार्थ-धूत = धूर्त। अवधूत = वीतरागी (संन्यासी)। रजपूतु = क्षत्रिय। कोऊ = कोई। काहू = किसी की। ब्याहब = विवाह करना। बिगार = बिगाड़ना। सरनाम = प्रसिद्ध। गुलामु = दास। रुचै = अच्छा लगे। ओऊ = और। खैबो = खाना। मसीत = मस्जिद। लैबोको = लेना। दैबो = देना।

प्रसंग – प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘कवितावली’ के उत्तर कांड के पदों में से लिया गया है। इसके रचयिता गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि स्वीकार करता है कि वह राम की भक्ति में मस्त है। उसे लोक-निंदा की कोई परवाह नहीं है।।

व्याख्या – यहाँ गोस्वामी तुलसीदास दुनिया के लोगों को स्पष्ट कहते हैं कि यदि आप मुझे धूर्त और मक्कार कहें या संन्यासी कहें तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। चाहे मुझे राजपूत अर्थात् क्षत्रिय कहें या जुलाहा कहें, इन नामों की भी मुझे कोई परवाह नहीं है। मुझे किसी की बेटी के साथ अपने बेटे का विवाह नहीं करना जिससे किसी की जाति बिगड़ जाए। मैं तुलसीदास तो संसार में राम के दास के रूप में प्रसिद्ध हूँ, अतः मुझे किसी की कोई चिंता नहीं है। जिसको भी मेरे बारे में जो अच्छा लगता है वह बड़े शौक से कह सकता है। मुझे लोगों के द्वारा की गई प्रशंसा या निंदा से कुछ लेना-देना नहीं। मैं माँगकर रोटी खाता हूँ और मस्जिद में जाकर सो जाता हूँ। न मैं किसी से एक लेता हूँ और न किसी को दो देता हूँ। मैं हमेशा अपनी धुन में मस्त रहता हूँ।

विशेष-

  1. इस पद से पता चलता है कि तुलसीदास को अपने जीवन में अनेक अपवादों और विरोधों का सामना करना पड़ा था। परंतु कवि ने अपने विरोधियों की परवाह न करके राम-भक्ति में मस्त होकर अपना जीवन गुज़ार दिया।
  2. संपूर्ण पद में दास्य भक्तिभाव की अभिव्यक्ति हुई है।
  3. संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग देखा जा सकता है।
  4. ‘लेना एक न देना दो’ मुहावरे का प्रभावशाली प्रयोग देखा जा सकता है।
  5. सहज एवं सरल साहित्यिक तथा ब्रजावधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. सवैया छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि के स्वर में क्षोभ का क्या कारण हो सकता है?
(ख) कवि को किस बात पर गर्व है?
(ग) तुलसीदास अपना जीवन किस प्रकार चलाते थे?
(घ) क्या तुलसीदास एक फक्कड़ संत कवि थे?
उत्तर:
(क) इस पद से यह पता चलता है कि कवि को अपने जीवन काल में अनेक अपवादों और विरोधों का सामना करना पड़ा। लोग उनकी जाति को लेकर भली-बुरी बातें करते थे। यही कारण है कि कवि के स्वर में क्षोभ दिखाई दे रहा है।

(ख) कवि को इस बात का गर्व है कि वह राम का भक्त है और उसी की कृपा से वह जीवनयापन कर रहा है। उसने स्पष्ट लिखा भी है ‘तुलसी सरनाम गुलामु है राम को’।

(ग) कवि के पास आजीविका का कोई साधन नहीं था और न ही उसके पास रहने के लिए कोई घर था। इसलिए वे भीख माँग कर खा लेते थे और मस्जिद में जाकर सो जाते थे।

(घ) इस पद से पता चलता है कि तुलसीदास के पास कोई घर-गृहस्थी नहीं थी। उन्हें सांसारिक मान-मर्यादाओं की भी चिंता नहीं थी। उन्हें अपनी जाति की भी कोई चिंता नहीं थी। इसलिए वे कहते हैं कि मैंने किसी की बेटी के साथ अपने बेटे की शादी नहीं करनी। वे मान-अपमान से ऊपर उठ चुके थे और लोक-निंदा की भी परवाह नहीं करते थे। इसलिए वे कहते हैं कि जिसने मेरे बारे में जो कुछ भी कहना है, खुलकर कहो। मुझे किसी की चिंता नहीं है। इसलिए कवि को फक्कड़ संत कहा जा सकता है।

लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

दोहा
[1] तव प्रताप उर राखि प्रभु जैहऊँ नाथ तुरंत।
अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत।।
भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार।
मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार॥ [पृष्ठ-49]

शब्दार्थ-तव = तुम्हारा। प्रताप = यश। उर = हृदय। राखि = रखकर। जैहऊँ = जाऊँगा। अस = इस प्रकार। आयसु = आज्ञा। पद = चरण। बंदि = वंदना करके। बाहु = भुजा। सील = सद्व्यवहार। प्रीति = प्रेम । महुँ = में। अपार = अत्यधिक। सराहत = प्रशंसा करना। पुनि पुनि = बार-बार। पवनकुमार = हनुमान।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित रामचरितमानस के लंका कांड के ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में से अवतरित है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि उस प्रसंग का वर्णन करता है जब हनुमान मूर्छित लक्ष्मण के लिए संजीवनी बूटी लेकर लौट रहे होते हैं और मार्ग में भरत अनर्थ की आशंका से उन्हें नीचे उतार लेते हैं।

व्याख्या – हनुमान ने भरत से कहा हे प्रभु! आप बड़े प्रतापी और यशस्वी हैं। इस बात को हृदय में धारण करके मैं शीघ्र ही प्रभु श्रीराम के पास चला जाऊँगा। यह कहकर हनुमान ने भरत के चरणों की वंदना की और उनकी आज्ञा पाकर लंका के लिए प्रस्थान कर दिया। हनुमान भरत के बाहु-बल (वीरता), उनके सद्व्यवहार, विविध गुणों तथा राम के चरणों से अपार प्रेम देखकर मन-ही-मन उनकी बार-बार सराहना करते हुए चले जा रहे थे।

विशेष –

  1. इन दोहों में कवि ने भरत की वीरता, प्रताप तथा उनके शील का सुंदर वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  4. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. दोहा छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) हनुमान भरत की किस बात से प्रभावित हुए?
(ग) भरत और राम के संबंध कैसे थे?
(घ) आपके विचार में भरत और हनुमान में कौन-सी समानता दिखाई देती है?
उत्तर:

  • कवि-गोस्वामी तुलसीदास                           कविता-लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप
  • हनुमान भरत के प्रताप, उनके बाहुबल, सद्व्यवहार तथा राम के चरणों के प्रति प्रेम को देखकर अत्यधिक प्रभावित हुए।
  • भरत राम से अत्यधिक प्रेम और स्नेह करते थे। उनके मन में राम के प्रति भक्ति-भावना भी थी।
  • भरत और हनुमान दोनों ही श्रीराम के सच्चे भक्त थे। भरत भी राम की भक्ति करते थे और हनुमान भी। दोनों में यही समानता है।

[2] उहाँ राम लछिमनहि निहारी। बोले बचन मनुज अनुसारी॥
अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ। राम उठाइ अनुज उर लायऊ॥
सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ। बंधु सदा तव मूदुल सुभाऊ॥
मम हित लागि तजेहु पितु माता। सहेहु बिपिन हिम आतप बाता।
सो अनुराग कहाँ अब भाई। उठहु न सुनि मम बच बिकलाई।
जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू। पितु बचन मनतेउँ नहिं ओहू। [पृष्ठ-49-50]

शब्दार्थ-उहाँ = वहाँ। निहारी = देखकर। मनुज = मानव। अर्ध = आधी। कपि = वानर/हनुमान। आयउ = आया। अनुज = छोटा भाई। उर = हृदय। सकहु = सकते। तव = तुम्हारा। मूल = कोमल। मम हित = मेरे लिए। बिपिन = जंगल। हिम = ठंड। आतप = गर्मी। बाता = वायु/आंकी। अनुराग = प्रेम। मम = मेरे। वच = वचन। बिकलाई = व्याकुल। जनतेउँ = जानता। बिछोहू = वियोग। मनतेउँ = मानता। ओहू = उसे।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित रामचरितमानस के ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में से अवतरित है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है जब राम हनुमान द्वारा लाई जाने वाली संजीवनी की प्रतीक्षा करते हैं और अपने अनुज लक्ष्मण को मूर्छित देखकर विलाप करते हैं।

व्याख्या-वहाँ जब राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को मूर्च्छित देखा तो वे एक सामान्य मानव के समान विलाप करने लगे। भाव यह है कि लक्ष्मण की मूर्छा के कारण राम अत्यधिक व्याकुल हो चुके थे। इसलिए वे एक साधारण मानव के समान रोने लगे। विलाप करते हुए वे कहते हैं कि आधी रात व्यतीत हो चुकी है, परंतु हनुमान अभी तक नहीं आया। राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को अपनी छाती से लगा लिया और विलाप करते हुए कहने लगे कि तुम्हारा स्वभाव तो इतना कोमल था कि तुम मेरे दुख को भी देख नहीं सकते थे, तुमने हमेशा दुख में मेरा साथ दिया। मेरे लिए तुमने अपने माता-पिता का त्याग किया और वन में रहते हुए सर्दी, गर्मी और तूफान को सहन किया। भाव यह है कि लक्ष्मण ने अयोध्या नगरी का सुविधापूर्ण जीवन त्यागकर वनवास में राम का साथ दिया। श्रीराम कहते हैं हे भाई! मेरे प्रति तुम्हारा वह स्नेह कहाँ चला गया। तुम मेरे व्याकुल वचनों को सुनकर क्यों नहीं उठ खड़े होते। यदि मुझे पता होता कि वन में अपने भाई से मेरा वियोग होगा तो मैं पिता की आज्ञा कभी नहीं मानता। भाव यह है कि राम लक्ष्मण का वियोग एक क्षण के लिए भी सहन नहीं कर सकते।

विशेष –

  1. यहाँ राम के द्वारा बोले गए करुण वचन एक सामान्य मानव के समान हैं। राम के ये वचन भावपूर्ण होने के साथ-साथ लक्ष्मण के आदर्श चरित्र पर भी प्रकाश डालते हैं।
  2. अनुप्रास, पद-मैत्री तथा स्वर-मैत्री अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. तत्सम् प्रधान साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और सटीक है।
  5. प्रस्तुत पद में चौपाई छंद का कुशल निर्वाह हुआ है तथा बिंब-योजना भी सुंदर बन पड़ी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) तुलसीदास ने यहाँ राम के किस रूप का वर्णन किया है?
(ख) राम ने किस प्रकार अपनी चिंता और कातरता को व्यक्त किया?
(ग) मूर्छित लक्ष्मण को देखकर राम ने विलाप करते हुए क्या कहा?
(घ) लक्ष्मण ने राम के लिए क्या-क्या कष्ट सहन किए?
उत्तर:
(क) यूँ तो तुलसीदास ने राम को भगवान विष्णु का अवतार माना है और उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा है, लेकिन यहाँ कवि ने राम का एक सामान्य मानव के रूप में चित्रण किया है। वे पृथ्वी पर अवतार लेकर अवतरित हुए और उन्होंने अपनी मानव लीला दिखाई। इसलिए ‘बोले बचन मनुज अनुसारी’ उपयुक्त शब्दों का प्रयोग किया गया है।

(ख) लक्ष्मण को मूर्च्छित देखकर राम पहले ही अत्यधिक चिंतित थे। उस पर हनुमान ने भी संजीवनी लाने में देर कर दी थी। इसलिए राम ने व्याकुल होकर लक्ष्मण को उठाकर अपने गले से लगा लिया और विलाप करते हुए लक्ष्मण से मोहपूर्ण बातें करने लगे।

(ग) लक्ष्मण को मूर्छित देखकर राम ने बड़े भावपूर्ण वचन कहे। राम ने कहा हे अनुज लक्ष्मण! तुम तो बड़े ही कोमल स्वभाव के रहे हो और तुमने मेरी दुख में भी रक्षा की है। मेरे लिए तुमने माता-पिता को त्याग दिया और वनवास में मेरे साथ रहते हुए सर्दी-गर्मी और आँधी-तूफान को सहन किया। तुम्हारा वह अनुराग अब कहाँ चला गया है। तुम मेरे व्याकुल वचनों को सुनकर क्यों नहीं उठ खड़े होते। यदि मुझे पता होता कि वन में आकर मैं तुमसे अलग हो जाऊँगा तो मैं कभी भी अपने पिता की आज्ञा को न मानता।

(घ) वस्तुतः केवल राम को ही वनवास मिला था, परंतु लक्ष्मण ने अयोध्या की सुख-सुविधाओं को त्यागकर राम के साथ वन-गमन का निश्चय किया। यही नहीं, उसने अपनी नव-विवाहित पत्नी उर्मिला का त्याग किया और राम के साथ वन में रहते हुए गर्मी-सर्दी तथा आँधी-तूफान के कष्टों को सहन किया।

[3] सुत बित नारि भवन परिवारा। होहिं जाहिं जग बारहिं बारा।
अस बिचारि जिय जागहु ताता। मिलइ न जगत सहोदर भ्राता॥
जथा पंख बिनु खग अति दीना। मनि बिनु फनि करिबर कर हीना।
अस मम जिवन बंधु बिनु तोही। जौं जड़ दैव जिआवै मोही॥
जैहउँ अवध कवन मुहुँ लाई। नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई॥
बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं। नारि हानि बिसेष छति नाहीं। [पृष्ठ-50]

शब्दार्थ-सुत = पुत्र। बित = धन। होहिं जाहिं = हो जाते हैं। बारहिं बारा = बार-बार। बिचारि = विचार करके। जिY = मन में। जागहु = जागो। ताता = प्रिय भाई। सहोदर = सगा भाई। जथा = जिस प्रकार। दीना = दुखी। फनि = साँप। करिबर = हाथी। हीना = से रहित। तोही = तेरे। जौ = यदि। जड़ = कठोर। दैव = भाग्य। जिआवै = जीवित रखे। जैहउँ = जाऊँगा। मुहँ लाई = मुँह लेकर। अपजस = कलंक। सहतेउँ = सहता रहँगा। माहीं = में। छति = नुकसान, हानि।।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित रामचरितमानस के ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में से उद्धृत है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ राम मूर्छित लक्ष्मण को संबोधित करते हुए पुनः कहते हैं कि

व्याख्या इस संसार में पुत्र, धन, पत्नी, भवन और परिवार बार-बार प्राप्त होते रहते हैं और नष्ट होते रहते हैं अर्थात् ये जीवन में आते हैं और चले भी जाते हैं, परंतु हे भाई! तुम अपने मन में यह विचार करके जाग जाओ कि सगा भाई पुनः प्राप्त नहीं होता। हे भाई लक्ष्मण! जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी दीन हो जाता है और मणि के बिना साँप तथा सूड के बिना हाथी दीन-हीन हो जाता है। यदि विधाता मुझे तुम्हारे बिना जीवित रखता है तो तुम्हारे बिना मेरी भी हालत ऐसी ही होगी।

हे प्रिय भाई! मैं अयोध्या में क्या मुँह लेकर जाऊँगा। मेरे बारे में लोग कहेंगे कि मैंने अपनी नारी के लिए प्रिय भाई को खो दिया। मैं नारी को खोने का अपयश तो सहन कर लूँगा क्योंकि लोग मुझे कायर कहेंगे, लेकिन मैं भाई को खोने का दुख बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा। मेरे लिए पत्नी की हानि कोई बहुत बड़ी बात नहीं है, परंतु भाई की हानि बहुत बड़ी बात है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने राम को मानव के रूप में प्रस्तुत करते हुए उनकी कथा और पीड़ा का मार्मिक वर्णन किया है।
  2. राम का भ्रातृ-प्रेम अधिक प्रशंसनीय है। वे पत्नी, पुत्र, धन, भवन आदि की तुलना में अपने भाई लक्ष्मण को अधिक महत्त्व देते हैं।
  3. राम ने अनेक दृष्टांत देकर अपने भ्रातृ-भाव पर प्रकाश डाला है।
  4. ‘जो पंख बिनु में उदाहरण अलंकार है।
  5. संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  6. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग है। शब्द-चयन सर्वथा सटीक और उचित है।
  7. चौपाई छंद तथा करुण रस का सुंदर परिपाक है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) राम ने सहोदर भ्राता के महत्त्व का प्रतिपादन किस प्रकार किया है?
(ख) लक्ष्मण के बिना राम स्वयं को कैसा अनुभव करते हैं?
(ग) राम को लक्ष्मण के बिना अयोध्या लौटकर किस प्रकार की ग्लानि सहन करनी पड़ेगी?
(घ) ‘नारि हानि बिसेष छति नाहीं राम के इस कथन के संदर्भ में अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
(क) राम ने अपने सहोदर भाई लक्ष्मण को पुत्र, पत्नी, धन और भवन से भी बढ़कर माना है। मनुष्य पत्नी के मरने के बाद पुनः विवाह करके पुत्र, मकान आदि सब कुछ प्राप्त कर सकता है। लेकिन सहोदर भाई का जन्म उसके वश में नहीं होता। इसलिए राम ने भाई की हानि को सबसे बड़ी हानि सिद्ध किया है।

(ख) लक्ष्मण के बिना राम स्वयं को असमर्थ और शक्तिहीन समझते हैं। इसलिए वे कहते हैं कि जिस प्रकार पंखों के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप तथा सूंड के बिना हाथी दीन-हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार लक्ष्मण के बिना वे भी दीन-हीन हो गए हैं।

(ग) अयोध्या लौटने पर राम को लोगों के अनेक व्यंग्य सहने पड़ेंगे। नगर के लोग उसे लक्ष्मण के बिना देखकर यही कहेंगे कि यह वही राम है जिसने अपनी पत्नी को पाने के लिए सगे भाई को खो दिया।

(घ) राम ने नारी के बारे में यह टिप्पणी की है कि नारी की हानि कोई विशेष हानि नहीं है। यह बात भावावेश की स्थिति में कही गई है। अपने भाई लक्ष्मण को मूर्छित देखकर राम विलाप करने लगते हैं। इस स्थिति में एक सामान्य व्यक्ति अकसर अनर्गल बातें करता है। वह विलाप करता हुआ चीखता तथा चिल्लाता है। यहाँ राम ने भी भ्रातृ-शोक के कारण ये वचन कहे हैं। ये वचन कोई नीति वचन नहीं हैं। आज नारी का वही स्थान है जो पुरुष का है। अतः आधुनिक युग बोध के संदर्भ में इस युक्ति का कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

[4] अब अपलोकु सोकु सुत तोरा। सहिहि निठुर कठोर उर मोरा॥
निज जननी के एक कुमारा। तात तासु तुम्ह प्रान अधारा॥
सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी। सब बिधि सुखद परम हित जानी॥
उतरु काह देहउँ तेहि जाई। उठि किन मोहि सिखावहु भाई।
बहु बिधि सोचत सोच बिमोचन। स्रवत सलिल राजिव दल लोचन॥
उमा एक अखंड रघुराई। नर गति भगत कृपाल देखाई॥
सोरठा
प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर
आइ गयउ हनुमान जिमि करुना मँह बीर रस॥ [पृष्ठ-50]

शब्दार्थ-अपलोकु = अपयश। सोकु = दुख। तोरा = तेरा। उर = हृदय। मोरा = मेरा। कुमारा = पुत्र । तासु = उसके लिए। प्रान अधारा = प्राणों के आधार । सौंपेसि = सौंपा था। गहि = पकड़कर। पानी = हाथ। सब बिधि = हर तरह से। परम हित = सच्चा हितैषी। उतरु = उत्तर। तेहि = वहाँ। किन = क्यों नहीं। बहु बिधि = अनेक प्रकार से। सोच बिमोचन = शोक से मुक्ति देने वाले राम। स्रवत = बहता है। राजिव दल लोचन = कमल के समान खिले हुए नेत्र। उमा = पार्वती। रघुराई = रघुकुल के राजा राम। कृपाल = कृपालु । प्रलाप = विलाप। बिकल = व्याकुल। बानर निकर = बंदरों का समूह। जिमि = जैसे। मँह = में।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित रामचरितमानस के ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में से उद्धृत है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ विलाप करते हुए राम अपने मूर्च्छित भाई लक्ष्मण को संबोधित करते हुए पुनः कहते हैं

व्याख्या – हे पुत्र लक्ष्मण! अब तो मेरे कठोर हृदय को पत्नी खोने का अपयश और तुम्हारा शोक ये दोनों दुख सहन करने पड़ेंगे। भाव यह है कि तुम्हारे बिना मैं अपनी पत्नी सीता को भी नहीं पा सकता। हे भाई! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र हो और उसके प्राणों के आधार हो। तुम्हारी माता सुमित्रा ने सब प्रकार से तुम्हारा सुख और कल्याण समझकर तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में सौंपा था।
अब तुम ही बताओ मैं लौटकर उन्हें क्या उत्तर दूंगा। हे भाई! तुम उठकर मुझे समझाते क्यों नहीं।

इस प्रकार सांसारिक प्राणियों की चिंताओं को दूर करने वाले राम स्वयं अनेक चिंताओं में डूब गए। कमल के समान उनके विशाल नेत्रों से आँसू टपकने लगे। इस प्रकार कथावाचक शिवजी ने पार्वती से कहा जो राम स्वयं परिपूर्ण और अनंत हैं, वे ही अपने भक्तों को कृपा करके नर लीला दिखा रहे हैं। भले ही वे विष्णु के अवतार हैं, लेकिन इस समय वे सामान्य मानव के समान आचरण कर रहे हैं। प्रभु श्रीराम के विलाप को सुनकर वानरों का समूह दुख से अत्यधिक व्याकुल हो गया। उसी समय हनुमान जी अचानक ऐसे प्रकट हो गए जैसे करुण रस में वीर रस प्रकट हो जाता है। भाव यह है कि हनुमान के आते ही शोक का वातावरण वीरता में बदल गया।

विशेष-

  1. यहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम एक सामान्य मानव के रूप में करुणापूर्ण विलाप करते हुए भावपूर्ण वचन कह रहे हैं।
  2. यहाँ कवि ने राम के लिए तीन विशेषणों का प्रयोग किया है सोच बिमोचन, राजिव दल लोचन तथा रघुराई।
  3. ‘सोच बिमोचन’ में यमक अलंकार तथा ‘स्रवत सलिल’ में अनुप्रास अलंकार है।
  4. अन्यत्र संपूर्ण पद में अनुप्रास अलंकार की छटा देखी जा सकती है।
  5. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. प्रसाद गुण है तथा करुण रस का परिपाक है।
  7. चौपाई छंद तथा संवादात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लक्ष्मण के मूर्छित होने पर राम के भावपूर्ण विलाप का वर्णन कीजिए।
(ख) लक्ष्मण की माता को याद करके राम किस प्रकार बेचैन हो गए?
(ग) विलाप करते-करते राम की कैसी दशा हो गई?
(घ) कवि ने राम के लिए किन विशेषणों का प्रयोग किया है? क्या वे सार्थक हैं?
(ङ) उमा को संबोधित करते हुए किसने क्या कहा?
उत्तर:
(क) लक्ष्मण के मर्छित होने पर राम विलाप करते हए कहने लगे हे भाई! अब तो मेरे कठोर हृदय को अपनी पत्नी का अपयश और तुम्हारा शोक दोनों सहन करने पड़ेंगे। तुम तो अपनी माता के एक ही पुत्र हो। उसके प्राणों के आधार हो। तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण समझकर उसने तुम्हें मुझे सौंपा था, अब मैं अयोध्या लौटकर उन्हें क्या उत्तर दूंगा।

(ख) लक्ष्मण की माता सुमित्रा को याद करके राम उनके दुख की कल्पना करने लगे। वे सोचने लगे कि उनका तो एक ही बेटा था। यदि वह भी संसार से चला जाएगा तो उनकी क्या हालत होगी और कौन उस दुखिया माँ को सांत्वना देगा।

(ग) लक्ष्मण के मूर्छित हो जाने पर राम विलाप करने लगे। उनके विशाल नेत्रों से आँसुओं की धारा प्रवाहित होने लगी। वे कभी लक्ष्मण को संबोधित करते थे और कभी उसकी माता सुमित्रा को। वे पूर्णतया शोक पीड़ित और अत्यधिक व्याकुल थे।

(घ) कवि,ने राम के लिए ‘सोच बिमोचन’, ‘राजिव दल लोचन’ तथा ‘रघुराई तीन विशेषणों का प्रयोग किया है। सोच बिमोचन का अर्थ है-संसार के प्राणियों को चिंता से मुक्त करने वाले, राजिव दल लोचन का अर्थ है-जिनके नेत्र कमल के समान खिले हुए हैं, रघुराई शब्द का प्रयोग करके राम को रघुकुल का राजा कहा है।

(ङ) प्रस्तुत रामकथा के वाचक भगवान शिव हैं। उन्होंने अपनी पत्नी उमा को संबोधित करते हुए कहा कि भले ही राम संसार के सभी प्राणियों की चिंताओं को दर करने वाले हैं. परन्त इस समय वे दुखी होकर कमल के समान नेत्रों से आँस बहा रहे हैं। भले ही वे अखंड, अद्वितीय और अनंत हैं परंतु भक्तों पर कृपा करने के लिए वे अपनी नर लीला दिखा रहे हैं।

[5] हरषि राम भेटेउ हनुमाना। अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना।
तुरत बैद तब कीन्हि उपाई। उठि बैठे लछिमन हरषाई।
हृदयँ लाइ प्रभु भेटेउ भ्राता। हरषे सकल भालु कपि ब्राता।
कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा। जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा।।
यह बृतांत दसानन सुनेऊ। अति बिषाद पुनि पुनि सिर धुनेऊ॥
व्याकुल कुंभकरन पहिं आवा। बिबिध जतन करि ताहि जगावा॥ [पृष्ठ-50]

शब्दार्थ-हरषि = प्रसन्न होकर। भेटेउ = भेंट की। कृतग्य = आभारी। सुजाना = ज्ञानी। बैद = वैद्य। उपाई = उपाय। हरषाई = प्रसन्न होकर। सकल = सारे। भालु = भालू जाति के वनवासी। ब्राता = समूह। कपि = वानर जाति के वनवासी। जेहि बिधि = जिस ढंग से। लइ आवा = ले आया था। बृतांत = वर्णन। सुनेऊ = सुना। बिषाद = दुख। सिर धुनेऊ = पछताया। पहिं = के पास। बिबिध = अनेक प्रकार के। जतन = प्रयत्न। जगावा = जगाया।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित रामचरितमानस के ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ में से उद्धृत है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि ने उस स्थिति का वर्णन किया है जब शोक के में हनुमान जी का अवतरण होता है। वे लक्ष्मण के उपचार के लिए संजीवनी लेकर आते हैं। उस प्रसंग का वर्णन करते हुए कवि तुलसीदास कहते हैं,

व्याख्या-प्रसन्न होकर श्रीराम ने हनुमान से भेंट की। परम ज्ञानी होते हुए भी राम ने हनुमान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की अर्थात् उन्होंने हनुमान का उपकार माना। संजीवनी प्राप्त होते ही वैद्य ने लक्ष्मण का उपचार किया और वे प्रसन्न होकर उठ तब प्रभु राम ने लक्ष्मण को अपने हृदय से लगा लिया। जिसे देखकर सभी भालू और वानर समूह अत्यधिक प्रसन्न हुए। इसके पश्चात् हनुमान ने वैद्य को वहाँ पहुँचाया, जहाँ से वह उन्हें सम्मानपूर्वक लाया था।

रावण ने यह सारा वृत्तांत सुना। वह अत्यधिक दुखी होकर अपना सिर धुन-धुन कर पछताने लगा। इसके बाद वह व्याकुल होकर अपने भाई कुंभकरण के पास आया और उसने अनेक प्रकार के प्रयत्न करके उसे गहरी नींद से जगाया।

विशेष-

  1. इस पद में कवि ने जहाँ एक ओर राम, लक्ष्मण, भालू तथा वानर सेना की प्रसन्नता का वर्णन किया है, वहीं दूसरी ओर रावण के विषाद का भी सजीव वर्णन किया है।
  2. मर्यादा पुरुषोत्तम होते हुए भी राम ने हनुमान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की है।
  3. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. सहज एवं सरल साहित्यिक अवधी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. चौपाई छंद का प्रयोग है तथा वर्णनात्मक शैली है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) हनुमान को देखकर राम ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की?
(ख) लक्ष्मण की मूर्छा किस प्रकार दूर हुई?
(ग) लक्ष्मण के होश में आने पर राम और वानर दल की क्या प्रतिक्रिया थी?
(घ) वैद्य के साथ किस प्रकार का व्यवहार किया गया?
(ङ) इस पद्यांश के आधार पर हनुमान की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(क) जब हनुमान संजीवनी लेकर राम के पास पहुँचे तो राम उसे देखकर अत्यधिक आनंदित हो उठे। उन्होंने हनुमान को अपने गले से लगा लिया और उसके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की अर्थात् उसके उपकार को माना। न जी ने संजीवनी लाकर वैद्य को दी और वैद्य ने उस संजीवनी से लक्ष्मण का उपचार किया. जिसके फलस्वरूप लक्ष्मण की मूर्छा दूर हो गई और वे उठकर बैठ गए।

(ग) लक्ष्मण के होश में आने पर राम ने प्रसन्न होकर अपने भाई को गले से लगा लिया। इस अवसर पर सभी भालू और वानर भी अत्यधिक प्रसन्न हो उठे, क्योंकि अब उन्हें आशा बँधी कि वे रावण को पराजित कर सकेंगे।

(घ) हनुमान जिस प्रकार वैद्य को आदर के साथ लाए थे उसी आदर के साथ उन्हें वापस पहुँचाकर आए।

(ङ) इस पद्यांश के आधार पर कहा जा सकता है कि हनुमान सच्चे राम भक्त थे। उन्होंने अपना सारा जीवन राम की सेवा में लगा दिया। वे असंभव काम को भी संभव बना देते थे। जब उन्हें संजीवनी नहीं मिली तो वे पूरे पहाड़ को उठाकर ले आए। इससे पता चलता है कि वे बड़े वीर और दृढ़-प्रतिज्ञ थे परंतु यह सब होते हुए भी वे बड़े विनम्र थे। उनके मन में अहंकार तो लेश-मात्र भी नहीं था। वे वैद्य को आदरपूर्वक उसके निवास स्थान पर छोड़ आए। इससे पता चलता है कि वे बड़े सज्जन और विनम्र थे।

[6] जागा निसिचर देखिअ कैसा। मानहुँ कालु देह धरि बैसा॥
कुंभकरन बूझा कहु भाई। काहे तव मुख रहे सुखाई।
कथा कही सब तेहिं अभिमानी। जेहि प्रकार सीता हरि आनी॥
तात कपिन्ह सब निसिचर मारे। महा महा जोधा संघारे॥
दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी। भट अतिकाय अकंपन भारी॥
अपर महोदर आदिक बीरा। परे समर महि सब रनधीरा॥ [पृष्ठ-50]

शब्दार्थ निसिचर = राक्षस । कालु = काला। देह धरि = शरीर धारण करके। कहु = कहौ । तव = तुम्हारा। तेहिं = तैसा। जेहि = जैसा। तात = भाई। कपिन्ह = वानरों ने। संघारे = मारे । जोधा = योद्धा। सुररिपु = देवशत्रु। मनुज अहारी = मानव खाने वाले। अतिकाय = भारी शरीर वाले। अपर = दूसरा। महोदर = एक राक्षस का नाम। समर = युद्ध। महि = पृथ्वी। रनधीरा = युद्ध में कुशल।

प्रस्तत – पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित रामचरितमानस के ‘लक्ष्मण-मर्जा और राम का विलाप’ में से उद्धत है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कवि ने उस प्रसंग को लिया है जब रावण ने अपने भाई कुंभकरण को नींद से जगाया और उसे सारी स्थिति से अवगत कराया। कवि लिखता है कि-

व्याख्या – नींद से जागने पर वह राक्षस कुंभकरण ऐसा लग रहा था मानों मृत्यु देह धारण करके बैठी हो अर्थात् कुंभकरण देखने में बहुत ही भयंकर था। तब कुंभकरण ने रावण से पूछा हे भाई! मुझे बताओ किस कारण से तुम्हारे मुख सूख गए हैं अर्थात् तुम घबराए हुए क्यों हो?

तब उस अभिमानी रावण ने वह सारी कथा कह सुनाई जिस प्रकार वह सीता का हरण करके लाया था। रावण ने कहा हे भाई! वानर सेना ने सारे राक्षसों को मार दिया है और मेरे बड़े-बड़े योद्धाओं का वध कर दिया है। दुर्मुख, देवशत्रु, मनुष्य भक्षक, महायोद्धा, अतिकाय, अकंपन, महोदर आदि मेरे असंख्य वीर योद्धा युद्ध-क्षेत्र में मारे गए हैं। भाव यह है कि मेरी सेना के बड़े-बड़े योद्धा वानर सेना ने मार गिराए हैं।

विशेष-

  1. यहाँ कुंभकरण ने निर्भीक होकर अभिमानी रावण पर टिप्पणी की है।
  2. रावण ने अपने भाई कुंभकरण के सामने अपनी पराजय का यथार्थ वर्णन किया है।
  3. अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  4. संपूर्ण पद्य में साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग देखा जा सकता है।
  5. चौपाई छंद का प्रयोग है तथा संवादात्मक शैली है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कुंभकरण ने रावण से क्या पूछा?
(ख) उस समय रावण की मनोदशा कैसी थी?
(ग) रावण ने कुंभकरण के सामने अपनी पराजय का वर्णन किस प्रकार किया?
(घ) रावण के कौन-कौन से महायोद्धा मारे गए?
उत्तर:
(क) नींद से जागकर कुंभकरण ने रावण से पूछा कि उसके दसों मुख सूखे हुए क्यों हैं? तथा वह किस कारण से घबराया हुआ है।

(ख) कुंभकरण से मिलते समय रावण बुरी तरह से परेशान और घबराया हुआ था तथा उसका चेहरा मुरझाया हुआ था।

(ग) रावण ने कुंभकरण के सामने अपनी पराजय का वर्णन करते हुए कहा कि उसने किस प्रकार सीता का हरण किया और किस प्रकार राम की वानर सेना ने उसके बड़े-बड़े योद्धाओं को मार गिराया।

(घ) युद्ध-क्षेत्र में रावण के दुर्मुख, देवशत्रु, मनुष्य भक्षक, महायोद्धा अकंपन तथा महोदर आदि योद्धा मारे गए थे।

[7] सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान।
जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान।। [पृष्ठ-51]

शब्दार्थ-दसकंधर = रावण। बिलखान = दुखी होकर। जगदंबा = जगत जननी सीता। हरि = हरण करके। सठ = दुष्ट।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित रामचरितमानस के लंका कांड के ‘लक्ष्मण-मूर्छा तथा राम का विलाप’ में से उद्धृत है। इसके कवि गोस्वामी तुलसीदास हैं। यहाँ कुंभकरण रावण को फटकारता हुआ कहता है

व्याख्या-रावण के वचनों को सुनकर कुंभकरण ने दुखी होकर कहा-हे दुष्ट रावण! तू जगत-माता सीता का हरण करके अब अपना कल्याण चाहता है। ऐसा कदापि नहीं हो सकता। अतः तेरा विनाश तो निश्चित ही है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने कुंभकरण के मुख से रावण के प्रति घृणा-भाव का वर्णन किया है।
  2. अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. साहित्यिक अवधी भाषा का प्रयोग है। शब्द-चयन उचित तथा भावानुकूल है।
  4. दोहा छंद का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) रावण के वचन सुनकर कुंभकरण पर क्या प्रतिक्रिया हुई?
(ख) कुंभकरण ने रावण से क्या कहा?
उत्तर:
(क) रावण के वचन सुनकर कुंभकरण अत्यधिक दुखी हुआ और उसने रावण को कटु शब्द कहे।
(ख) कुंभकरण ने रावण को फटकार लगाते हुए कहा-अरे दुष्ट! तू जगत जननी सीता का अपहरण करके लाया, तब तेरा कल्याण कैसे हो सकता है अर्थात अब तेरा विनाश निश्चित है।

कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप Summary in Hindi

कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप कवि-परिचय

प्रश्न-
गोस्वामी तुलसीदास का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
गोस्वामी तुलसीदास का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-गोस्वामी तुलसीदास न केवल रामकाव्य के, अपितु संपूर्ण हिंदी-काव्य के श्रेष्ठ कवि हैं। वे एक कवि, आलोचक, दार्शनिक, लोकनायक, समाज-सुधारक, भक्त एवं उच्चकोटि के विद्वान हैं। उन्हें विश्व-कवि कहना भी अनुचित न होगा। उनका जन्म सन् 1532 में बाँदा ज़िला (उत्तर प्रदेश) के राजापुर गाँव में हुआ। कुछ विद्वान उनका जन्म-स्थान सोरों भी मानते हैं। उन्होंने अपना बचपन अत्यंत कष्टपूर्ण परिस्थितियों में बिताया। बचपन में ही उनका अपने माता-पिता से बिछोह हो गया और अत्यंत कठिनाइयों में अपना जीवन-यापन किया। अचानक उनकी भेंट स्वामी नरहरिदास से हुई। वे इन्हें अयोध्या ले गए। उन्हें राम-मंत्र की दीक्षा दी और विद्याध्ययन कराने लगे। तत्पश्चात् तुलसी ने काशी में शेष सनातन जी के पास रहकर पंद्रह वर्षों तक वेदों का अध्ययन किया। सन् 1623 में काशी में श्रावण शुक्ला तृतीया को असीघाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने राम-राम करते हुए अपना शरीर त्याग दिया।

2. प्रमुख रचनाएँ-अब तक तुलसीदास के नाम से 36 रचनाएँ प्राप्त हुई हैं, किंतु वे सब प्रामाणिक नहीं हैं। उनमें से प्रामाणिक रचनाएँ निम्नलिखित हैं दोहावली’, ‘कवितावली’, ‘श्रीकृष्ण गीतावली’, ‘गीतावली’, ‘विनय-पत्रिका’, ‘रामचरितमानस’, ‘रामलला नहछू’, ‘बरवै रामायण’, ‘वैराग्य संदीपिनी’, ‘पार्वती मंगल’, ‘जानकी मंगल’ और ‘रामाज्ञा प्रश्न’। इनमें ‘रामचरितमानस’, ‘रामलला नहछू’, ‘पार्वती मंगल’ तथा ‘जानकी मंगल’ प्रबंध काव्य हैं। ‘गीतावली’, ‘श्रीकृष्ण गीतावली’ और ‘विनय-पत्रिका’ गीति काव्य हैं और अन्य रचनाएँ मुक्तक काव्य हैं। ‘रामचरितमानस’ तुलसी का ही नहीं, बल्कि समूचे हिंदी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। इसे ‘भारत की बाईबल’ भी कहा गया है।

3. काव्यगत विशेषताएँ-तुलसीदास के काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) विषय की व्यापकता महाकवि तुलसीदास ने अपने युग का गहन एवं गंभीर अध्ययन किया था। तुलसीदास ने जीवन के सभी पक्षों को अपने काव्य में स्थान दिया है। उनके काव्य में धर्म, दर्शन, संस्कृति, भक्ति, काव्य-कला आदि सभी का सुंदर समन्वय हुआ है। विभिन्न भावों और सभी रसों को उनकी रचनाओं में स्थान मिला है।

(ii) राम का स्वरूप महाकवि तुलसीदास ने अपने काव्य में राम को विष्णु का अवतार मानते हुए उसके सगुण एवं निर्गुण दोनों रूपों का उल्लेख किया है। उन्होंने राम को धर्म का रक्षक और अधर्म का विनाश करने वाला माना है। उन्होंने राम के चरित्र में शील, सौंदर्य एवं शक्ति का समन्वय प्रस्तुत किया है। उन्होंने राम की आराधना दास्य भाव से की है।

(iii) समन्वय की भावना-तुलसीदास के काव्य में समन्वय की भावना का अद्भुत चित्रण हुआ है। उन्होंने शैवों और वैष्णवों, शाक्तों और वैष्णवों, भक्ति और ज्ञान तथा कर्म के धार्मिक समन्वय के साथ सामाजिक, भाषा-क्षेत्र तथा साहित्य-क्षेत्र में सारग्राहिणी प्रतिभा और समन्वयात्मकता का परिचय दिया है।

(iv) प्रकृति-चित्रण-तुलसीदास ने प्रकृति का अत्यंत मनोरम चित्रण किया है। तुलसी काव्य में प्रकृति के विभिन्न रूपों का चित्रण किया गया है। उनके काव्य में वन, नदी, पर्वत, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि के विस्तृत वर्णन मिलते हैं। प्रकृति-चित्रण के साथ-साथ तुलसी उपदेश भी देते चलते हैं।

(v) भाव एवं रस-महाकवि तुलसीदास के काव्य में सभी भावों एवं रसों का अत्यंत सफलतापूर्वक चित्रण किया गया है। तुलसीदास मानव-हृदय के सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाव को समझने में निपुण थे। वे मानव मनोवृत्तियों के सच्चे पारखी थे। उन्होंने मानव-जीवन के विविध पक्षों को गहराई से देखा एवं परखा था। तुलसी काव्य में शांत रस के अतिरिक्त हास्य, रौद्र, वीभत्स, वीर आदि रसों का भी चित्रण हुआ है।

(vi) रचना-शैली-तुलसीदास ने अपने युग में प्रचलित सभी काव्य-शैलियों का प्रयोग किया है। उनके काव्य में वीर काव्य की ओजपूर्ण शैली, संत काव्य की दोहा शैली, सूरदास और विद्यापति की गीति-शैली, भाट कवियों की छप्पय-कवित्त आदि शैलियों के रूप देखे जा सकते हैं। इन सभी शैलियों का प्रयोग तुलसी काव्य में सफलतापूर्वक हुआ है।

4. भाषा-शैली-तुलसी के काव्य का भावपक्ष जितना समृद्ध है कलापक्ष भी उतना ही समुन्नत एवं विकसित है। काव्य-शैलियों की भाँति ही तुलसीदास ने तत्कालीन सभी काव्य-भाषाओं का साधिकार प्रयोग किया है। उन्होंने अवधी और ब्रज भाषा का अपने काव्य में समान रूप से प्रयोग किया है। ‘रामचरितमानस’ में अवधी और ‘विनय-पत्रिका’ में ब्रज भाषा का विकसित रूप मिलता है। तुलसी ने प्रसंगानुकूल भोजपुरी, बुंदेलखंडी, अरबी-फारसी आदि के शब्दों का भी प्रयोग किया है। उन्होंने ब्रज एवं अवधी भाषाओं में संस्कृत का पुट देकर उन्हें सुसंस्कृत बनाया है। तत्सम शब्दों की अधिकता होने पर भी तुलसी की भाषा में कहीं क्लिष्टता नहीं है। अलंकारों की छटा तो उनके काव्य में देखते ही बनती है। उन्होंने उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपक आदि अलंकारों का ही अधिक प्रयोग किया है। अलंकारों की भाँति ही तुलसीदास ने छंदों का प्रयोग भी सफलतापूर्वक किया है। चौपाई, दोहा, छप्पय, सोरठा, कवित्त, बरवै आदि छंदों का प्रयोग उन्होंने अपने विभिन्न ग्रंथों में किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 8 कवितावली (उत्तर कांड से), लक्ष्मण-मूच्छ और राम का विलाप

कवितावली (उत्तर कांड से) कविता का सार

प्रश्न-
कविवर तुलसीदास द्वारा रचित ‘कवितावली’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. प्रथम कवित्त-यहाँ कविवर तुलसीदास राम-नाम की महिमा का गान करते हुए कहते हैं कि मज़दूर, किसान, व्यापारी, भिखारी, चाकर, नौकर, नट, चोर, दूत और बाजीगर सभी अपना पेट भरने के लिए ही ऊँचे-नीचे कर्म करते हैं, गुण गढ़ते हैं, पहाड़ों पर चढ़ते हैं और घने जंगलों में शिकार करते हुए भटकते रहते हैं। यही नहीं, वे अच्छे-बुरे कर्म करके धर्म अथवा अधर्म का पालन करते हुए अपना पेट भरने के लिए बेटे-बेटियों को भी बेच देते हैं। यह पेट की आग बड़वानल से भी अधिक भयंकर है। इसे तो केवल राम-नाम के कृपा रूपी बादल ही बुझा सकते हैं।

2. द्वितीय कवित्त-इस कवित्त में कवि अपने युग की गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी का वर्णन करते हुए लिखता है कि किसान के लिए खेती नहीं है और भिखारी को भीख नहीं मिलती। व्यापारी के लिए व्यापार नहीं है और नौकर को नौकरी नहीं मिलती। आजीविका-विहीन लोग दुखी होकर आपस में कहते हैं कि कहाँ जाएं और क्या करें। वेदों और पुराणों में यही बात कही गई है और संसार में भी देखा जा सकता है कि संकट के समय राम जी आप ही कृपा करते हैं। हे दीनबंधु राम! इस समय दरिद्रता रूपी रावण ने संसार को कुचला हुआ है। अतः पापों का नाश करने के लिए मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ।

3. सवैया यहाँ तुलसीदास लोगों के द्वारा की जा रही निंदा और आलोचना की परवाह न करते हुए कहते हैं कि चाहे मुझे कोई धूर्त कहे, योगी कहे, राजपूत या जुलाहा कहे, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी की बेटी से अपने बेटे का विवाह नहीं करना, फसी की जाति में बिगाड़ हो जाए। मैं तुलसीदास तो राम का दास हूँ। इसीलिए मेरे बारे में जिसको जो अच्छा लगता है, वह कहो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं माँगकर खाता हूँ। मस्जिद में जाकर सो जाता हूँ। मुझे दुनिया से न कुछ लेना है और न देना है अर्थात् मुझे किसी की परवाह नहीं है।

लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप कविता का सार

प्रश्न-
कविवर तुलसीदास द्वारा रचित पद ‘लक्ष्मण-मूर्छा और राम का विलाप’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
यह प्रसंग उस समय का है जब राम-रावण युद्ध के समय लक्ष्मण मेघनाद की शक्ति लगने से बेहोश हो गए और हनुमान जड़ी-बूटी लेने के लिए गए। परंतु हनुमान द्वारा की गई देरी के कारण राम अपने भाई लक्ष्मण के लिए चिंता करने लगे। जब हनुमान संजीवनी बूटी को न पहचानने के कारण पर्वत को उठाकर ले जा रहे थे तो भरत के मन में अनर्थ की आशंका हुई। इसलिए भरत ने हनुमान को नीचे उतार लिया। परंतु जब उसे वास्तविकता का पता चला तो हनुमान को शीघ्र ही श्रीराम के पास भेज दिया।

इधर राम आधी रात बीत जाने पर चिंता करने लगे। वे लक्ष्मण को बेहोश देखकर एक मानव के समान कहने लगे कि आधी रात बीत गई है, लेकिन हनुमान नहीं आया। यह कहकर राम ने अनुज लक्ष्मण को उठाकर अपनी छाती से लगा लिया और विलाप करते हुए कहने लगे कि लक्ष्मण तुम्हारा ऐसा स्वभाव है कि तुम मुझे कभी दुखी नहीं देख सकते थे। मेरे लिए तुमने माता-पिता को त्याग दिया और वन में सर्दी-गर्मी को सहन किया। हे भाई! तुम्हारा वह प्रेम कहाँ चला गया। मेरे व्याकुल वचनों को सुनकर तुम क्यों नहीं उठते।

यदि मुझे पता होता कि वन में भाई से वियोग होगा तो मैं अपने पिता के वचनों को कभी नहीं मानता। पुत्र, धन, पत्नी, भवन और परिवार, ये सब संसार में बार-बार प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन सगा भाई संसार में फिर नहीं मिलता। यह विचार करके तुम जाग जाओ। जिस प्रकार पंख के बिना पक्षी, मणि के बिना साँप और सैंड के बिना हाथी दीन-हीन हो जाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे बिना मेरा जीवन अधूरा है। मैं क्या मुँह लेकर अयोध्या जाऊँगा। लोग मेरे बारे में कहेंगे कि मैंने पत्नी के लिए प्रिय भाई को खो दिया। भले ही मुझे संसार में अपयश सहन करना पड़ता। पत्नी की हानि भी कोई विशेष हानि नहीं है।

परंतु हे लक्ष्मण! अब तो मुझे अपयश और भाई दोनों शोक सहन करने पड़ेंगे। हे भ्राता! तुम अपनी माता के एक ही पुत्र हो और उसके प्राणों के आधार हो। तुम्हारी माँ ने मुझे हर प्रकार से हितैषी समझकर तुम्हारा हाथ मुझे सौंपा था। अब मैं जाकर उसे क्या उत्तर दूंगा। इस प्रकार संसार को चिंतामुक्त करने वाले भगवान राम स्वयं अनेक प्रकार की चिंताओं में डूब गए और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। तब शिवजी ने पार्वती से कहा कि देखो! वे राम स्वयं अखंड और अनंत हैं, परंतु अपने भक्तों पर कृपा करके नव लीला दिखा रहे हैं।

प्रभु के विलाप को सुनकर समूची वानर सेना व्याकुल हो गई। परंतु उस समय वहाँ हनुमान इस प्रकार प्रकट हो गए जैसे करुण रस में वीर रस प्रकट हो जाता है। श्रीराम ने प्रसन्न होकर हनुमान से भेंट की और वे हनुमान के प्रति कृतज्ञ हो गए। उसके बाद वैद्य ने तत्काल उपाय किया और लक्ष्मण प्रसन्न होकर उठ खड़े हुए। राम ने प्रसन्न होकर भाई को गले लगाया और सभी वानर और भालू प्रसन्न हो गए। इसके बाद हनुमान ने वैद्य को लंका वापस पहुँचा दिया। जब रावण ने यह सारा प्रस्ताव सुना तो वह दुखी होकर पछताने लगा और व्याकुल होकर कुंभकरण के पास गया।

उसने अनेक प्रयत्न करके कुंभकरण को जगाया। जागने पर कुंभकरण ऐसा लग रहा था कि मानों काल स्वयं शरीर धारण करके बैठा हो। कुभकरण ने रावण से पूछा कि तुम्हारा मुख घबराया हुआ क्यों है, तब अभिमानी रावण ने सारी कथा सुनाई कि किस प्रकार वह सीता को उठाकर लाया था। वह अपने भाई से कहने लगा कि हे भ्राता! राम सेना ने राक्षसी सेना के बड़े-बड़े योद्धाओं का संहार कर दिया है। दुर्मुख, देवशत्रु, मनुष्य भक्षक, महायोद्धा, अतिकाय, अकंपन तथा महोदर आदि सभी योद्धा युद्धक्षेत्र में मर गए हैं। रावण के वचनों को सुनकर कुंभकरण ने दुखी होकर कहा, तुमने जगत-जननी सीता का हरण किया है, अब तू अपना कल्याण चाहता है। यह तो किसी प्रकार से संभव नहीं है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

HBSE 12th Class Hindi बादल राग Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
अस्थिर सुख पर दुख की छाया पंक्ति में दुख की छाया किसे कहा गया है और क्यों?
उत्तर:
अस्थिर सुख पर दुख की छाया पंक्ति में दुख की छाया क्रांति अथवा विनाश का प्रतीक है। सुविधा-भोगी लोगों के पास धन होते हैं। इसलिए वे क्रांति से हमेशा डरते रहते हैं। क्रांति से पूँजीपतियों को हानि होगी, गरीबों को नहीं। इसलिए कवि ने अमीर लोगों के सुखों को अस्थिर कहा है। क्रांति की संभावना ही दुख की वह छाया है जिससे वे हमेशा डरे रहते हैं। यही कारण है कि ‘दुख की छाया’ शब्दों का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 2.
‘अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर’ पंक्ति में किसकी ओर संकेत किया गया है?
उत्तर:
‘अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर’ पंक्ति में क्रांति विरोधी अभिमानी पूँजीपतियों की ओर संकेत किया गया है जो क्रांति को दबाने का भरसक प्रयास करते हैं परंतु क्रांति के वज्र के प्रहार से घायल होकर वे क्षत-विक्षत हो जाते हैं। जिस प्रकार बादलों के द्वारा किए गए अशनि-पात से पर्वतों की ऊँची-ऊँची चोटियाँ क्षत-विक्षत हो जाती हैं, उसी प्रकार क्रांति की मार-काट से बड़े-बड़े पूँजीपति, धनी तथा वीर लोग भी धरती चाटने लगते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

प्रश्न 3.
‘विप्लव-व से छोटे ही हैं शोभा पाते’ पंक्ति में विप्लव-रव से क्या तात्पर्य है? छोटे ही हैं शोभा पाते ऐसा क्यों कहा गया है?
उत्तर:
विप्लव-रव से तात्पर्य है क्रांति की गर्जना। क्रांति से समाज के सामान्यजन को ही लाभ प्राप्त होता है। उससे सर्वहारा वर्ग का विकास होता है क्योंकि क्रांति शोषकों और पूँजीपतियों के विरुद्ध होती है। संसार में जहाँ कहीं क्रांति हुई है, वहाँ पूँजीपतियों का विनाश हुआ है और गरीब तथा अभावग्रस्त लोगों की आर्थिक हालत सुधरी है। इसलिए कवि ने इस भाव के लिए ‘छोटे ही हैं शोभा पाते’ शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 4.
बादलों के आगमन से प्रकृति में होने वाले किन-किन परिवर्तनों को कविता रेखांकित करती है?
उत्तर:
बादलों के आगमन से प्रकृति में असंख्य परिवर्तन होते हैं। पहले तो तेज हवा चलने लगती है और बादल गरजने लगते हैं। इसके बाद मूसलाधार वर्षा होती है। ओलों की वर्षा अथवा बिजली गिरने से ऊँचे-ऊँचे पर्वतों की चोटियाँ क्षत-विक्षत हो जाती हैं, परंतु छोटे-से-छोटे पौधे वर्षा का पानी पाकर प्रसन्नता से खिल उठते हैं। इसी प्रकार कमलों से पानी की बूंदें झरने लगती हैं।

व्याख्या कीजिए

1. तिरती हैं समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया
उत्तर:
यहाँ कवि कहता है कि बादल वायु के रूप में सागर पर मंडराने लगते हैं। वे इस प्रकार उमड़-घुमड़कर सागर पर छा जाते हैं जैसे क्षणिक सखों पर दुखों की छाया मँडराने लगती है। पँजीपतियों के सख क्षणिक हैं. परंत दख की छाया स्थिर और लंबी होती है। इसलिए बादल रूपी क्रांति को देखकर पूँजीपतियों के अस्थिर सुखों पर दुख की छाया फैल जाती है। ये बादल संसार के दुखों से पीड़ित हृदय पर एक विनाशकारी क्रीड़ा करने जा रहे हैं। भाव यह है कि ये बादल संसार के शोषित और दुखी लोगों के दुखों को दूर करना चाहते हैं।

2. अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन
उत्तर:
यहाँ कवि कहता है कि हमारे समाज में पूँजीपतियों के जो ऊँचे-ऊँचे भवन हैं, वे अट्टालिकाएँ नहीं हैं बल्कि वे तो आतंक के भवन हैं। क्रांति रूपी बादलों को देखकर उन भवनों में भय और त्रास का निवास है। अर्थात् समाज के धनिक लोग क्रांति से डरते रहते हैं। कवि पुनः कहता है कि बादलों की विनाशलीला तो हमेशा कीचड़ में ही होती है। उसमें बाढ़ और विनाश के दृश्य देखे जा सकते हैं। भाव यह है कि समाज के गरीब और शोषित लोग ही क्रांति में खुलकर भाग लेते हैं।

कला की बात

प्रश्न 1.
पूरी कविता में प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। आपको प्रकृति का कौन-सा मानवीय रूप पसंद आया और क्यों?
उत्तर:
संपूर्ण कविता में प्रकृति का सुंदर मानवीकरण किया गया है। कवि ने बादल को क्रांतिकारी वीर कहकर संबोधित किया है। मुझे बादल का वह रूप बहुत पसंद है जिसमें कवि उसे शोषित किसान की सहायता करने के लिए आह्वान करता है; जैसे
जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार!

प्रश्न 2.
कविता में रूपक अलंकार का प्रयोग कहाँ-कहाँ हुआ है? संबंधित वाक्यांश को छाँटकर लिखिए।
उत्तर:

  1. तिरती है समीर-सागर पर
  2. अस्थिर सुख पर दुख की छाया
  3. यह तेरी रण-तरी
  4. भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
  5. विप्लव के बादल
  6. जीवन के पारावार

प्रश्न 3.
इस कविता में बादल के लिए ऐ विप्लव के वीर!, ऐ जीवन के पारावार! जैसे संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है। बादल राग कविता के शेष पाँच खंडों में भी कई संबोधनों का इस्तेमाल किया गया है। जैसे-अरे वर्ष के हर्ष!, मेरे पागल बादल!, ऐ निबंध!, ऐ स्वच्छंद!, ऐ उद्दाम!, ऐ सम्राट!, ऐ विप्लव के प्लावन!, ऐ अनंत के चंचल शिशु सुकुमार! उपर्युक्त संबोधनों की व्याख्या करें तथा बताएँ कि बादल के लिए इन संबोधनों का क्या औचित्य है? ।
उत्तर:
(i) अरे वर्ष के हर्ष-यहाँ कवि ने बादलों को साल भर की प्रसन्नता कहा है। यदि बादल अच्छी वर्षा करते हैं तो देश के लोगों को साल भर का पर्याप्त अनाज मिल जाता है और देश का व्यापार भी चलता रहता है।

(ii) मेरे पागल बादल-बादल को पागल कहने से उसकी मस्ती और उल्लास की ओर संकेत किया गया है।

(iii) ऐ निबंध-बादल किसी प्रकार के बंधन या बाधा को नहीं मानते। वे स्वच्छंदतापूर्वक आकाश में विचरण करते हैं। इसीलिए कवि ने बादल को ‘ऐ-स्वच्छंद’ तथा ‘ऐ-उद्दाम’ भी कहा है।

(iv) ऐ सम्राट कवि के अनुसार बादल एक राजा है जो सब पर राज करता है और सबको प्रभावित करता है।

(v) ऐ विप्लव के प्लावन-यहाँ कवि ने बादलों के भयंकर रूप की ओर संकेत किया है। जब बादल मूसलाधार वर्षा करते हैं तो वे अपने साथ विनाशकारी बाढ़ भी लाते हैं।

(vi) ऐ अनंत के चंचल शिशु सकुमार-यहाँ कवि ने बादल को सागर का चंचल एवं कोमल शावक कहा है क्योंकि बादलों को जन्म देने वाला सागर ही है। जब बादल उमड़ता-घुमड़ता हुआ आगे बढ़ता है तो उसमें शिशु जैसी चंचलता देखी जा सकती है।

प्रश्न 4.
कवि बादलों को किस रूप में देखता है? कालिदास ने मेघदूत काव्य में मेघों को दूत के रूप में देखा। आप अपना कोई काल्पनिक बिंब दीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें। यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

प्रश्न 5.
कविता को प्रभावी बनाने के लिए कवि विशेषणों का सायास प्रयोग करता है जैसे-अस्थिर सुख। सुख के साथ अस्थिर विशेषण के प्रयोग ने सुख के अर्थ में विशेष प्रभाव पैदा कर दिया है। ऐसे अन्य विशेषणों को कविता से छाँटकर खें तथा बताएं कि ऐसे शब्द-पदों के प्रयोग से कविता के अर्थ में क्या विशेष प्रभाव पैदा हुआ है?
उत्तर:
दग्ध हृदय-कवि ने हृदय के साथ ‘दग्ध’ विशेषण का प्रयोग किया है। इससे शोषित व्यक्ति के मन का संताप व्यक्त होता है। इस शब्द के द्वारा शोषण के फलस्वरूप गरीबों द्वारा झेली गई यातनाएँ सामने आ जाती हैं।

निर्दय विप्लव – यहाँ विप्लव अर्थात् विनाश के साथ निर्दय विशेषण का प्रयोग किया गया है जिससे पता चलता है कि विनाश और अधिक क्रूर हो गया है।

पुप्त अंकर – यहाँ कवि ने अंकुर के साथ सुप्त विशेषण का प्रयोग किया है। जो इस बात का द्योतन करता है कि अंकुर मिट्टी में दबे हुए हैं और वर्षा के बाद फूटकर बाहर आ जाते हैं।

घोर वज्र हुंकार – यहाँ कवि ने हुंकार शब्द के साथ घोर तथा वज्र दो विशेषणों का प्रयोग किया है। इससे यह पता चलता है कि बादल रूपी क्रांति की गर्जना बड़ी भयानक और क्रूर होती है।

क्षत-विक्षत-हत अचल-शरीर – यहाँ कवि ने शरीर के साथ क्षत-विक्षत और हत विशेषणों का प्रयोग किया है। जिससे उनकी दुर्दशा का पता चलता है।

प्रफुल्ल जलज – कमल के साथ प्रफुल्ल विशेषण का प्रयोग करने से कमल रूपी पूँजीपति की प्रसन्नता व्यक्त होती है।

रुद्ध कोष – कोष के साथ रुद्ध विशेषण का प्रयोग करने से यह पता चलता है कि पूँजीपतियों के खजाने भरे हुए हैं और उनके पास अपार धन है।

HBSE 12th Class Hindi बादल राग Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न-
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
1. हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार-
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते।
उत्तर:

  1. इन काव्य-पंक्तियों में कवि ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि जिस प्रकार वर्षा से छोटे-छोटे पौधे लाभान्वित होकर हँसते और खिलते हैं, उसी प्रकार क्रांति होने से समाज के शोषित और सर्वहारा वर्ग को लाभ प्राप्त होता है और वे यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि अब उनके शोषण का अंत हो जाएगा।
  2. यहाँ कवि ने प्रकृति का सुंदर मानवीकरण किया है।
  3. हाथ हिलाना, बुलाना आदि में गतिशील बिंब है।
  4. पूरे पद में अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का सुंदर एवं स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. संपूर्ण पद में मुक्त छंद का सफल प्रयोग देखा जा सकता है।

2. रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र-गर्जन से बादल!
उत्तर:

  1. यहाँ कवि स्पष्ट करता है कि समाज के पूँजीपतियों का खजाना भरा हुआ है, लेकिन फिर भी वे सदा असंतुष्ट रहते हैं।
  2. बादल रूपी क्रांति के कारण पूँजीपति अपनी पत्नी से लिपटे हुए भी डर के मारे काँपते रहते हैं।
  3. यहाँ बादल क्रांति का प्रतीक है।
  4. यह पद्यांश प्रगतिवाद का सूचक है। जोकि पूँजीपतियों पर करारा व्यंग्य करते हैं।
  5. ‘अंगना-अंग’ तथा ‘आतंक-अंक’ में अनुप्रास तथा स्वर मैत्री की छटा दर्शनीय है।
  6. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. संपूर्ण पद में मुक्त छंद का सफल प्रयोग देखा जा सकता है।

3. अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
उत्तर:

  1. यहाँ कवि यह स्पष्ट करता है कि समाज के ऊँचे-ऊँचे भवन, जहाँ पूँजीपति रहते हैं, उनमें भय और त्रास का निवास है, क्योंकि अमीर लोग सदा क्रांति से भयभीत रहते हैं।
  2. ‘क्षुद्र प्रफुल्ल जलज’ शोषित वर्ग का प्रतीक है।
  3. प्रतीकात्मक भाषा के प्रयोग के कारण भावाभिव्यक्ति बड़ी प्रभावशाली बन पड़ी है।
  4. अनुप्रास तथा पद मैत्री अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. ‘अट्टालिका नहीं है रे आतंक भवन’ में अपहृति अलंकार है।
  6. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी भाषा है तथा शब्द-चयन सर्वथा सटीक है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

4. घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने बादलों को क्रांति का प्रतीक तथा शोषित वर्ग की आशा का केंद्र सिद्ध किया है।
  2. पृथ्वी के गर्भ में छिपे बीज शोषित वर्ग का प्रतीक हैं जो क्रांति की प्रतीक्षा कर रहे हैं।
  3. संपूर्ण पद्य में बादल का मानवीकरण किया गया है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकारों का सफल प्रयोग है।
  5. ‘सिर ऊँचा करना’ मुहावरे का सटीक प्रयोग है।
  6. तत्सम् प्रधान संस्कृतनिष्ठ हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  7. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. संबोधन शैली है तथा मुक्त छंद का प्रयोग किया गया है।

5. बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने बादल को क्रांति का प्रतीक मानते हुए उसकी भयानकता का प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. मूसलाधार वर्षा का होना क्रांति की तीव्रता को व्यंजित करता है।
  3. ‘बार-बार’, ‘सुन-सुन’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. तत्सम् प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा शब्द-चयन उचित और भावानुकूल है।
  5. ओजगुण का समावेश किया गया है तथा मुक्त छंद है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘बादल राग’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
बादल राग’ निराला जी की एक ओजस्वी कविता है, जिसमें कवि ने बादल को क्रांति का प्रतीक माना है। कवि शोषित वर्ग के कल्याण के लिए बादल का आह्वान करता है। क्रांति के प्रतीक बादलों को देखकर समाज का शोषक वर्ग भयभीत हो जाता है। लेकिन शोषित और सर्वहारा वर्ग उसे आशाभरी दृष्टि से देखता है। कवि स्पष्ट करता है कि क्रांति से समाज के धनिक वर्ग को हानि पहुँचती है, परंतु शोषित वर्ग को इससे लाभ होता है। समाज में शोषितों को उनका अधिकार दिलाने के लिए क्रांति नितांत आवश्यक है। प्रस्तुत कविता का मुख्य उद्देश्य देश में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक वैषम्य का चित्रण करना है। कवि का विचार है कि इस विषमता को दूर करने के लिए क्रांति ही एकमात्र उपाय है। समाज का शोषित और पीड़ित वर्ग क्रांति की कामना करता है क्योंकि वह आर्थिक स्वतंत्रता और अपनी दशा में सुधार चाहता है।

प्रश्न 2.
विप्लवी बादल की रण-तरी की क्या-क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
विप्लवी बादल की रण-तरी अर्थात् युद्ध की नौका समीर-सागर पर तैरती है। वह असंख्य आकांक्षाओं से भरी हुई है और भेरी-गर्जन से सावधान है। कवि अपनी बात को स्पष्ट करता हुआ कहता है कि क्रांतिकारी बादल की युद्ध रूपी नौका पवन सागर पर ऐसे तैरती है जैसे जीवन के क्षणिक सुखों पर दुखों की छाया मँडराती रहती है। यह युद्ध रूपी नौका नगाड़ों की गर्जना के कारण अत्यधिक सजग है और क्रांति उत्पन्न करने के लिए निरंतर आगे बढ़ रही है। जिस प्रकार युद्ध की नौका में युद्ध का सामान भरा रहता है, उसी प्रकार क्रांतिकारी बादल रूपी इस युद्ध नौका में समाज के सर्वहारा वर्ग की इच्छाएँ और आकांक्षाएँ भरी हुई हैं। क्रांतिकारी बादल की युद्ध नौका को देखकर जहाँ शोषक वर्ग भयभीत हो जाता है, वहाँ शोषित वर्ग प्रसन्न हो उठता है।

प्रश्न 3.
सुप्त अंकुर किसकी ओर ताक रहे हैं और क्यों? सुप्त अंकुरों का प्रतीकार्थ क्या है?
उत्तर:
पृथ्वी के गर्भ में सोये हए अंकर लगातार बादलों की ओर ताकते रहते हैं। वे यह सोचकर आशावान बने हुए हैं कि अच्छी वर्षा होने से वे धरती में से फूटकर बाहर निकल आएँगे और उनके जीवन का विकास होगा। यहाँ सुप्त अंकुर समाज के पीड़ित और शोषित वर्ग का प्रतीक हैं जो सुख-समृद्धि और विकास के मार्ग पर आगे नहीं बढ़ सका। उनके मन में यह आशा है कि क्रांति होने से उनको उन्नति प्राप्त करने का अवसर मिलेगा क्योंकि क्रांति से पूँजीवाद वर्ग का विनाश होगा और सर्वहारा वर्ग का कल्याण होगा।

प्रश्न 4.
‘बादल राग’ कविता में अट्टालिका को आतंक-भवन क्यों कहा गया है?
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में अट्टालिका को आतंक का भवन इसलिए कहा गया है क्योंकि उसमें समाज का पूँजीपति वर्ग रहता है। समाज के शोषक और अमीर लोग हमेशा ऊँचे-ऊँचे भवनों और महलों में रहते हैं और जीवन की सुख-सुविधाओं को भोगते हैं परंतु इस पूँजीपति वर्ग को क्रांति का भय लगा रहता है। यदि अट्टालिकाएँ हमेशा सुरक्षित बनी रहें तो शोषक वर्ग हमेशा सुख-सुविधाओं को भोगता रहेगा और प्रसन्न रहेगा, परंतु अमीर और गरीब में जब बहुत बड़ी खाई बन जाती है तो गरीब क्रांति का आह्वान करता है। यही कारण है कि अपनी सुरक्षित अट्टालिकाओं में रहने वाला पूँजीपति क्रांति के परिणामों के फलस्वरूप हमेशा भयभीत रहता है। वह जानता है कि उसने शोषण और बेईमानी से सर्वहारा वर्ग का खून चूसा है। अतः यदि शोषित वर्ग क्रांति का मार्ग अपनाता है तो सर्वप्रथम पूँजीपतियों की धन-संपत्ति बलपूर्वक लूट ली जाएगी और उनके ऊँचे-ऊँचे भवन नष्ट-भ्रष्ट कर दिए जाएंगे। इसलिए कवि ने ऊँचे-ऊँचे भवनों को अट्टालिका न कहकर आतंक भवन की संज्ञा दी है।

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प्रश्न 5.
‘बादल राग’ में निहित क्रांति की भावना पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कविवर ‘निराला’ की ‘बादल राग’ कविता में उनकी समाज में हो रहे कृषक-शोषण के विरुद्ध क्रांति की भावना अभिव्यक्त हुई है। कृषक शोषण से पीड़ित होने के कारण अधीर होकर विप्लव (क्रांति) के बादल को बुला रहा है। जिस प्रकार बादल जल-प्लावन लाकर पृथ्वी के गर्भ में छिपे हुए बीजों को अंकुरित कर देते हैं उसी प्रकार क्रांति भी समाज में गरीबों तथा कृषकों का शोषण करने वाली व्यवस्था का विनाश कर देती है। जैसे बादल वर्षा द्वारा पौधों में पुनः जीवन का विकास कर देता है; वैसे ही क्रांति से शोषक वर्ग का विनाश हो जाता है और गरीब व कृषक वर्ग को फलने-फूलने का अवसर मिलता है। इसलिए निराला जी ने अपनी इस कविता द्वारा क्रांति का आह्वान किया है।

प्रश्न 6.
विप्लव के बादल की घोर-गर्जना का धनी वर्ग पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
विप्लव के बादल की घोर गर्जना को सुनकर समाज का अमीर और शोषक वर्ग आतंक से काँपने लगता है। वह त्रस्त होकर अपना मुँह ढक लेता है और आँखें बंद कर लेता है। वह भली प्रकार से जानता है कि उसने अपना शोषण चक्र चलाकर गरीबों और मजदूरों का खून चूस कर धन का संग्रह किया है। अतः यह क्रांति उसके लिए विनाशकारी हो सकती है, परंतु वह सोचता है कि क्रांति की अनदेखी करने से वह इसके दुष्प्रभाव से बच जाएगा। विप्लव के बादलों की घोर गर्जना और वज्रपात से पर्वतों की चोटियाँ तक गिर जाती हैं। इसी प्रकार क्रांति का बिगुल बजने से पूँजीपति वर्ग भी त्रस्त और भयभीत हो जाता है और वह इससे बचने का भरसक प्रयास करता है।

प्रश्न 7.
‘बादल राग’ कविता के आधार पर निराला की भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भाषा-शैली की दृष्टि से ‘बादल राग’ निराला जी की एक प्रतिनिधि कविता कही जा सकती है। इसमें कवि ने तत्सम प्रधान संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग किया है। आदि से अंत तक इस कविता की भाषा में ओज गुण का समावेश किया गया है। समस्त पदों, संयुक्त व्यंजनों तथा कठोर वर्गों के कारण ओज गुण का सुंदर निर्वाह देखा जा सकता है। कवि द्वारा किया गया शब्द-चयन भावाभिव्यक्ति में पूर्णतया सफल हुआ है। एक उदाहरण देखिए-
अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर
शब्दों की ध्वनि तथा उनका नाद सौंदर्य भी अभिव्यंजना में काफी सहायक सिद्ध हुआ है। शब्द अपनी ध्वनि से शब्द-चित्र प्रस्तुत कर देते हैं। उदाहरण के रूप में हिल-हिल, खिल-खिल शब्दों के जोड़े अपनी ध्वनि द्वारा लहलहाती हुई फसल का बिंब प्रस्तुत करते हैं।

संपूर्ण कविता अपने बिंबों, चित्रों तथा प्रतीकों के लिए प्रसिद्ध है। वर्षा का बिंब, वज्र से आहत क्षत-विक्षत पर्वत का बिंब तथा हँसते हुए सुकुमार पौधों का बिंब सभी इस कविता की काव्य भाषा को आकर्षक बनाते हैं। यहाँ बादल यदि क्रांति का प्रतीक है तो पंक शोषित वर्ग का और जलज पूँजीपति वर्ग का प्रतीक है। इसी प्रकार मुहावरों के प्रयोग से इस कविता की भाषा में अर्थ गम्भीर्य बढ़ गया है। भले ही इस कविता में मुक्त छंद का प्रयोग किया गया है, परंतु सर्वत्र लयात्मकता भी देखी जा सकती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘निराला’ का जन्म बंगाल की किस रियासत में हुआ?
(A) महिषादल
(B) सुंदरवन
(C) कोलकाता
(D) पटना
उत्तर:
(A) महिषादल

2. ‘निराला’ का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1888 ई० में
(B) सन् 1890 ई० में
(C) सन् 1899 ई० में
(D) सन् 1886 ई० में
उत्तर:
(C) सन् 1899 ई०

3. ‘निराला’ के पिता का क्या नाम था?
(A) रामदास त्रिपाठी
(B) राम सहाय त्रिपाठी
(C) राम लाल त्रिपाठी
(D) राम किशोर त्रिपाठी
उत्तर:
(B) राम सहाय त्रिपाठी

4. ‘निराला’ का विवाह किस आयु में हुआ?
(A) 15 वर्ष की आयु में
(B) 16 वर्ष की आयु में
(C) 17 वर्ष की आयु में
(D) 13 वर्ष की आयु में
उत्तर:
(D) 13 वर्ष की आयु में

5. ‘निराला’ की पत्नी का क्या नाम था?
(A) सुंदरी देवी
(B) गीता देवी
(C) मनोहर देवी
(D) लक्ष्मी देवी
उत्तर:
(C) मनोहर देवी

6. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने निराला की किस कविता को लौटा दिया था?
(A) परिमल
(B) जूही की कली
(C) बादल राग
(D) ध्वनि
उत्तर:
(B) जूही की कली

7. ‘निराला’ का निधन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1961 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1963 में
(D) सन् 1964 में
उत्तर:
(A) सन् 1961 में

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8. ‘निराला’ ने सन् 1933 में किस पत्रिका का संपादन किया?
(A) नवनीत
(B) मतवाला
(C) निराला
(D) बाला
उत्तर:
(B) मतवाला

9. ‘निराला’ की बेटी का क्या नाम था?
(A) सरला
(B) नीलम
(C) मनोज
(D) सरोज
उत्तर:
(D) सरोज

10. ‘बादल राग’ कविता के रचयिता का नाम क्या है?
(A) तुलसीदास
(B) जयशंकर प्रसाद
(C) सुमित्रानंदन पंत
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

11. सरोज के निधन के बाद निराला ने बेटी के शोक में कौन-सा गीत लिखा?
(A) सरोज स्मृति
(B) आराधना
(C) अर्चना
(D) अणिमा
उत्तर:
(A) सरोज स्मृति

12. ‘राम की शक्ति पूजा’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
(C) महादेवी वर्मा
(D) राम कुमार वर्मा
उत्तर:
(B) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

13. ‘निराला’ ने किस छंद में रचनाएँ लिखीं?
(A) दोहा छंद
(B) चौपाई छंद
(C) मुक्त छंद
(D) सोरठा छंद
उत्तर:
(C) मुक्त छंद

14. ‘तुलसीदास’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) तुलसीदास
(B) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
(C) सूरदास
(D) कबीरदास
उत्तर:
(B) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

15. ‘बादल राग’ में बादल किसका प्रतीक है?
(A) शांति का
(B) क्रांति का
(C) प्रेम का
(D) सुख का
उत्तर:
(B) क्रांति का

16. ‘रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष’-यहाँ रुद्ध का अर्थ है-
(A) क्रोधित
(B) रुका हुआ
(C) भरा हुआ
(D) खाली
उत्तर:
(B) रुका हुआ

17. ‘बादल राग’ कविता में बादल क्रांति के क्या हैं?
(A) वाहन
(B) दूत
(C) पोषक
(D) शोषक
उत्तर:
(B) दूत

18. प्रस्तुत कविता में ‘रण-तरी’ किससे भरी हुई है?
(A) धन
(B) आकांक्षाओं से
(C) नवजीवन
(D) गर्जन
उत्तर:
(B) आकांक्षाओं से

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19. शैशव का सुकुमार शरीर किसमें हँसता है?
(A) वर्षा
(B) घायलावस्था
(C) रोग-शोक
(D) गर्मी
उत्तर:
(C) रोग-शोक

20. ‘बादल राग’ कविता में क्रांति संसार में किसकी सृष्टि करती है?
(A) दुख और अशांति की
(B) सुख और शांति की
(C) सुख और अशांति की
(D) दुख और शांति की
उत्तर:
(B) सुख और शांति की

21. ‘रोग-शोक’ में भी किसका सकुमार शरीर हँसता है?
(A) यौवन
(B) शैशव
(C) धनी
(D) कृषक
उत्तर:
(B) शैशव

22. किसान का सार किसने चूस लिया है?
(A) सरकार ने
(B) नेता ने
(C) पत्नी और बच्चों ने
(D) पूँजीपति ने
उत्तर:
(D) पूँजीपति ने

23. ‘बादल राग’ कविता के अनुसार जल-विप्लव-प्लावन हमेशा किस पर होता है?
(A) वायु पर
(B) नभ पर
(C) जमीन पर
(D) कीचड़ पर
उत्तर:
(D) कीचड़ पर

24. ‘शीर्ण शरीर’ किसे कहा गया है?
(A) बालक को
(B) महिला को
(C) सैनिक को
(D) किसान को
उत्तर:
(D) किसान को

25. क्रांति का सबसे अधिक लाभ किस वर्ग को मिलता है?
(A) निम्न वर्ग
(B) धनी वर्ग
(C) पूँजीपति वर्ग
(D) सत्ताधारी वर्ग
उत्तर:
(A) निम्न वर्ग

26. ‘गगन स्पर्शी’, ‘स्पर्द्धा धीर’ किसे कहा गया है?
(A) वृक्षों को
(B) पर्वतों को
(C) बादलों को
(D) बिजली को
उत्तर:
(C) बादलों को

27. ‘बादल राग’ कविता में कवि ने सुखों को कैसा बताया है?
(A) चेतन
(B) जड़
(C) स्थिर
(D) अस्थिर
उत्तर:
(D) अस्थिर

28. ‘निराला’ ने अट्टालिकाओं को क्या कहा है?
(A) अजायबघर
(B) चिकित्सालय
(C) आतंक-भवन
(D) योग-भवन
उत्तर:
(C) आतंक-भवन

29. निराला ने ‘जीर्ण बाहु’ किसे कहा है?
(A) रोगी को
(B) वृद्ध को
(C) कृषक को
(D) बालक को
उत्तर:
(C) कृषक को

30. ‘विप्लव’ शब्द का अर्थ क्या है?
(A) क्षान्ति
(B) शान्ति
(C) भ्रान्ति
(D) क्रान्ति
उत्तर:
(D) क्रान्ति

31. क्रांति के बादलों की गर्जना सुनकर कौन-सा वर्ग भयभीत होता है?
(A) कृषक वर्ग
(B) श्रमिक वर्ग
(C) निम्न वर्ग
(D) पूँजीपति वर्ग
उत्तर:
(D) पूँजीपति वर्ग

बादल राग पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] तिरती है समीर-सागर पर
अस्थिर सुख पर दुख की छाया
जग के दग्ध हृदय पर
निर्दय विप्लव की प्लावित माया
यह तेरी रण-तरी
भरी आकांक्षाओं से,
घन, भेरी-गर्जन से सजग सुप्त अंकुर
उर में पृथ्वी के, आशाओं से
नवजीवन की, ऊँचा कर सिर,
ताक रहे हैं, ऐ विप्लव के बादल!
फिर-फिर [पृष्ठ-41]

शब्दार्थ-सागर = समद्र। अस्थिर = अस्थायी। जग = संसार। दग्ध = दखी। निर्दय = क्रर। प्लावित = पानी से भरा हुआ। माया = खेल, क्रीड़ा। रण-तरी = युद्ध की नौका। आकांक्षा = इच्छा, कामना। भेरी-गर्जन = युद्ध में बजने वाले नगाड़ों की आवाज़। अंकुर = बीज। उर = हृदय, मन। नवजीवन = नया उत्साह । ताकना = अपेक्षा से निरंतर देखना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से लिया गया है। इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। यहाँ कवि ने बादलों को विप्लवकारी योद्धा के रूप में चित्रित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि बादल वायु के रूप में समुद्र पर मंडरा रहे हैं। वे इस प्रकार उमड़-घुमड़कर सागर पर छाए हुए हैं जैसे क्षणिक सुखों पर दुखों की छाया मंडराती रहती है। ये बादल संसार के दुखों से पीड़ित हृदय पर एक क्रूर विनाशकारी क्रीड़ा करने जा रहे हैं। भाव यह है कि ये संसार के प्राणी शोषण तथा अभाव के कारण अत्यधिक दुखी हैं। बादल क्रांति का दूत बनकर उन दुःखों को नष्ट करना चाहते हैं।

कवि बादल को संबोधित करता हुआ कहता है हे विनाशकारी बादल! तुम्हारी यह युद्ध रूपी नौका असंख्य संभावनाओं से भरी हुई है। तुम अपनी गर्जना तर्जना के द्वारा क्रांति उत्पन्न कर सकते हो और विनाश भी कर सकते हो परंतु तुम्हारी गर्जना के नगाड़े सुनकर पृथ्वी के गर्भ में छिपे हुए अंकुर नवजीवन की आशा लिए हुए सिर उठाकर तुम्हारी ओर बार-बार देख रहे हैं। कवि कहता है कि हे विनाश के बादल! तुम्हारी क्रांतिकारी वर्षा ही पृथ्वी में दबे हुए अंकुरों को नया जीवन दे सकती है अतः तुम बार-बार गर्जना करके वर्षा करो। इस पद्य से यह अर्थ भी निकलता है कि क्रांति से ही समाज के शोषितों, पीड़ितों तथा दलितों का उद्धार हो सकता है और पूँजीपतियों का विनाश हो सकता है। अतः सामाजिक और आर्थिक विषमता को दूर करने के लिए क्रांति अनिवार्य है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बादलों को विप्लवकारी योद्धा के रूप में चित्रित किया है।
  2. कविता का मूल स्वर प्रगतिवादी है।
  3. छायावादी कविता होने के कारण इस कविता में लाक्षणिक पदावली का अत्यधिक प्रयोग हुआ है।
  4. ‘समीर-सागर’, ‘रण-तरी’, ‘विप्लव के बादल’ तथा ‘दुःख की छाया’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  5. अन्यत्र अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का भी सफल प्रयोग हुआ है।
  6. संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग किया गया है।
  7. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. अंकुरों द्वारा सिर ऊँचा करके बादलों की ओर ताकने में दृश्य-बिंब की सुंदर योजना देखी जा सकती है।
  9. मुक्त छंद का सफल प्रयोग किया गया है।

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पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) अस्थिर सुख पर दुःख की छाया से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) ‘जग के दग्ध हृदय’ का प्रयोग किस अर्थ में किया गया है?
(घ) बादल निर्दय विप्लव की रचना क्यों कर रहे हैं?
(ङ) घन भेरी की गर्जना सुनकर सोये हुए अंकुरों पर क्या प्रतिक्रिया हुई है?
(च) पृथ्वी के गर्भ में सोये हुए अंकुर ऊँचा सिर करके क्यों ताक रहे हैं?
उत्तर:
(क) कवि-सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’। कविता-बादल राग

(ख) वायु अस्थिर है और बादल घने हैं। इसी प्रकार सुख भी अस्थिर होते हैं परंतु दुःख स्थायी होते हैं। इसलिए कवि यह कहना चाहता है कि अस्थायी सुखों पर अनंत दुःखों की काली छाया मंडराती रहती है।

(ग) कवि का यह कहना है कि संसार के शोषित और गरीब लोग अभाव तथा शोषण के कारण दुखी और पीड़ित हैं। वे करुणा का जल चाहते हैं। इसलिए कवि ने बादल रूपी क्रांति से वर्षा करने की प्रार्थना की है।

(घ) बादल क्रांति का प्रतीक हैं। वह लोगों के निर्मम शोषण को देखकर ही विप्लव की रचना कर रहा है।

(ङ) बादलों की घनी गर्जना सुनकर पृथ्वी के गर्भ में अंकुर नवजीवन की आशा से जाग उठे हैं। वे पानी की आकांक्षा के कारण सिर ऊँचा करके बादलों को देख रहे हैं।

(च) पृथ्वी के गर्भ में सोये हुए अंकुर ऊँचा सिर करके इसलिए ताक रहे हैं क्योंकि उन्हें यह आशा है कि बादलों रूपी क्रांति के कारण उन्हें सुखद तथा नवीन जीवन की प्राप्ति होगी तथा उनके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।

[2] बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
अशनि-पात से शापित उन्नत शत-शत वीर,
क्षत-विक्षत हत अचल-शरीर,
गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर।
हँसते हैं छोटे पौधे लघुभार
शस्य अपार,
हिल-हिल
खिल-खिल,
हाथ हिलाते,
तुझे बुलाते,
विप्लव-रव से छोटे ही हैं शोभा पाते। [पृष्ठ-41]

शब्दार्थ-गर्जन = गरजना। मूसलधार = मोटी-मोटी बारिश। हृदय थामना = डर जाना। घोर = घना, भयंकर। वज्र-हुंकार = वज्रपात के समान भीषण आवाज़। अशनि-पात = बिजली का गिरना। उन्नत = बड़ा, विशाल। शत-शत = सैकड़ों। क्षत-विक्षत = घायल। हत = मरा हुआ। अचल = पर्वत। गगन-स्पर्शी = आकाश को छूने वाला। स्पर्द्धा धीर = आगे बढ़ने की होड़ करने के लिए बेचैन। लघुभार = हल्के। शस्य = हरियाली। अपार = बहुत अधिक। विप्लव = क्रांति, विनाश। रख = शोर।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से लिया गया है। इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हैं। प्रस्तुत कविता में कवि ने बादलों के माध्यम से क्रांति का आह्वान किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि हे बादल! तुम्हारे बार-बार गर्जने तथा मूसलाधार वर्षा करने से सारा संसार डर के कारण अपना कलेजा थाम लेता है क्योंकि तुम्हारी भयंकर गर्जन और वज्र जैसी घनघोर आवाज़ को सुनकर लोग काँप उठते हैं। सभी को तुम्हारी विनाश-लीला का डर लगा रहता है। भाव यह है कि क्रांति का स्वर सुनकर लोग आतंकित हो उठते हैं। कवि पुनः कहता है कि बादलों के भयंकर वज्रपात से उन्नति की चोटी पर पहुँचे हुए सैकड़ों योद्धा अर्थात् पूँजीपति भी पराजित होकर धूलि चाटने लगते हैं। आकाश को छूने की होड़ लगाने वाले ऊँचे-ऊँचे स्थिर पर्वत भी बादलों के भयंकर वज्रपात से घायल होकर खंड-खंड हो जाते हैं। अर्थात् जो पर्वत अपनी ऊँचाई के द्वारा आकाश से स्पर्धा करते हैं वे भी बादलों की बिजली गिरने से खंड-खंड होकर नष्ट हो जाते हैं। जो लोग जितने ऊँचे होते हैं उतने ही वे विनाश के शिकार बनते हैं। परंतु बादलों की इस विनाश-लीला में छोटे-छोटे पौधे हँसते हैं और मुस्कराते हैं, क्योंकि विनाश से उन्हें जीवन मिलता है। वे हरे-भरे होकर लहलहाने लगते हैं। वे छोटे-छोटे पौधे खिलखिलाते हुए और अपने हाथ हिलाते हुए तुम्हें निमंत्रण देते हैं। तुम्हारे आने से उन्हें एक नया जीवन मिलता है। हे बादल! क्रांति के विनाश से हमेशा छोटे तथा गरीब लोगों को ही लाभ होता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बादल को क्रांति का प्रतीक सिद्ध किया है और उन्हें ‘विप्लव के वीर’ की संज्ञा दी है।
  2. कवि ने प्रतीकात्मक शब्दावली अपनाते हुए क्रांति की भीषणता की ओर संकेत किया है। ‘गर्जन’, ‘वज्र-हुंकार’, ‘छोटे-पौधे’ ‘अचल’ आदि सभी प्रतीक हैं।
  3. संपूर्ण पद में मानवीकरण अलंकार का सफल प्रयोग किया गया है तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘हाथ हिलाते तुझे बुलाते’ गतिशील बिंब है।
  5. यहाँ कवि ने संस्कृतनिष्ठ शुद्ध साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावानुकूल है।
  7. ओज गुण है तथा मुक्त छंद का प्रयोग किया गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) क्या आप बादल को क्रांति का प्रतीक मानते हैं?
(ख) बादलों की मूसलाधार वर्षा से सृष्टि पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(ग) बादलों के अशनि-पात से किसे हानि होती है और क्यों?
(घ) छोटे पौधे किसके प्रतीक हैं और वे क्यों हँसते हैं?
(ङ) कवि ने गगन-स्पर्शी स्पर्द्धा धीर किसे कहा है और क्यों?
उत्तर:
(क) निश्चित ही बादल क्रांति के प्रतीक हैं। कवि ने बादलों के क्रांतिकारी रूप को स्पष्ट करने के लिए उन्हें ‘विप्लव के वीर’ कहा है। जिस प्रकार क्रांति होने पर चारों ओर गर्जन-तर्जन और विनाश होता है उसी प्रकार विप्लवकारी बादल भी मूसलाधार वर्षा तथा अशनिपात से विनाश की लीला रचते हैं।

(ख) बादलों की मूसलाधार वर्षा से संसार के लोग घबरा जाते हैं और डर के मारे अपना हृदय थाम लेते हैं। बादलों की घोर वज्र हुंकार लोगों में भय उत्पन्न करती है।

(ग) बादलों के अशनि-पात अर्थात् बिजली गिरने से विशाल आकार के ऊँचे-ऊँचे पर्वतों को हानि होती है। निरंतर वर्षा होने से और ओले पड़ने से ये पर्वत क्षत-विक्षत हो जाते हैं।

(घ) छोटे पौधे शोषित तथा अभावग्रस्त लोगों के प्रतीक हैं। बादल रूपी क्रांति से शोषितों को ही लाभ पहुँचता है। पुनः वर्षा का जल पाकर गरीब किसान और मजदूर प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि इससे उन्हें एक नया जीवन मिलता है।

(ङ) कवि ने गगन-स्पर्शी स्पर्धा धीर शब्दों का प्रयोग पूँजीपतियों के लिए किया है। क्योंकि वे अपने धन-वैभव के कारण समाज में ऊँचा स्थान पा चुके हैं। उनके ऊँचे-ऊँचे भवन आकाश को स्पर्श करने में होड़ लगा रहे हैं। धन-वैभव को लेकर उनमें होड़ मची हुई है।

[3] अट्टालिका नहीं है रे
आतंक-भवन
सदा पंक पर ही होता
जल-विप्लव-प्लावन,
क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से
सदा छलकता नीर,
रोग-शोक में भी हँसता है
शैशव का सुकुमार शरीर।
रुद्ध कोष है, क्षुब्ध तोष
अंगना-अंग से लिपटे भी
आतंक अंक पर काँप रहे हैं।
धनी, वज्र-गर्जन से बादल!
त्रस्त नयन-मुख ढाँप रहे हैं। [पृष्ठ-42-43]

शब्दार्थ-अट्टालिका = महल। आतंक-भवन = भय का निवास। पंक = कीचड़। प्लावन = बढ़ा। क्षुद्र = तुच्छ। रुद्ध = रुका हुआ। कोष = खजाना। अंगना = पत्नी। अंक = गोद। वज्र-गर्जन = वज्र के समान गर्जना। त्रस्त = डरा हुआ। नयन = नेत्र, आँख।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से लिया गया है। इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ हैं। यहाँ कवि ने अट्टालिकाओं को आतंक भवन कहा है क्योंकि उनमें रहने वाले अमीर लोग गरीबों का खून चूसकर धन पर कुंडली मारे बैठे हैं। ऐसे लोग ही क्रांति के स्वर से डरते हैं।

व्याख्या कवि कहता है कि हमारे समाज में जो ऊँचे-ऊँचे भवन हैं, ये अट्टालिकाएँ नहीं हैं, बल्कि इनमें तो भय और त्रास का निवास है। इनमें रहने वाले अमीर लोग हमेशा क्रांति से आतंकित रहते हैं। बादलों की विनाश लीला तो हमेशा कीचड़ में ही होती है। उसी में बाढ़ और विनाश के दृश्य देखे जा सकते हैं। कवि के कहने का भाव है कि समाज के गरीब और शोषित लोग ही क्रांति करते हैं। अमीर लोग तो हमेशा भय के कारण डरे रहते हैं। गरीब लोगों को क्रांति से कोई फर्क नहीं पड़ता। कवि कहता है कि पानी में खिले हुए छोटे-छोटे कमलों से हमेशा पानी रूपी आँसू टपकते रहते हैं। यहाँ कमल पूँजीपतियों के प्रतीक हैं जो विप्लव से हमेशा डरते रहते हैं, परंतु समाज का गरीब वर्ग सुकुमार बच्चों के समान है जो रोग और शोक में भी हमेशा हँसता और मुस्कुराता रहता है। अतः क्रांति होने से उन्हें आनंद की प्राप्ति होती है।

परंतु पूँजीपति लोगों ने अपने खजाने को धन से परिपूर्ण करके उसे सुरक्षित रखा हुआ है। जिससे गरीब लोगों का संतोष उबलने को तैयार है। यही कारण है कि अमीर लोग हमेशा आतंकित रहते हैं और वे क्रांति रूपी बादल की गर्जना को सुनकर अपनी सुंदर स्त्रियों के अंगों से लिपटे हुए हैं लेकिन आतंक की गोद में वे काँप रहे हैं। बादलों की भयंकर गर्जना को सुनकर वे अपनी आँखें बंद किए हुए हैं और मुँह को छिपाए हुए हैं। भाव यह है कि क्रांति से पूँजीपति लोग ही डरते हैं, गरीब लोग नहीं डरते।

विशेष-

  1. इस पद में कवि ने समाज के शोषकों के प्रति अपनी घृणा को व्यक्त किया है और शोषितों के प्रति सहानुभूति दिखाई है।
  2. यहाँ कवि क्रांति के प्रभाव को दिखाने में सफल रहा है।
  3. संपूर्ण पद में प्रतीकात्मक शब्दावली का खुलकर प्रयोग किया गया है; जैसे ‘पंक’ निम्न वर्ग का प्रतीक है और ‘जलज’ धनी वर्ग का प्रतीक है।
  4. अनुप्रास, स्वर मैत्री तथा अपहति अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग किया गया है।
  5. तत्सम् प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. ओज गुण है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) ‘अट्टालिका नहीं है रे आतंक-भवन’ का आशय क्या है?
(ख) पंक और अट्टालिका किसके प्रतीक हैं?
(ग) रोग-शोक में कौन हँसता रहता है और क्यों?
(घ) ‘क्षुद्र प्रफुल्ल जलज से सदा छलकता नीर’ का भावार्थ स्पष्ट करें।
(ङ) कौन लोग आतंक अंक पर काँप रहे हैं और डर कर अपने नयन-मुख ढाँप रहे हैं?
उत्तर:
(क) यहाँ कवि यह स्पष्ट करता है कि बड़े-बड़े पूंजीपतियों के भवन अट्टालिकाएँ नहीं हैं, बल्कि वे तो आतंक के भवन हैं अर्थात् क्रांति का नाम सुनते ही वे डर के मारे काँपने लगते हैं। महलों में रहते हुए भी वे घबराए रहते हैं।

(ख) पंक समाज के शोषित व्यक्ति का प्रतीक है और अट्टालिका शोषक पूँजीपतियों का प्रतीक है।

(ग) समाज का निम्न वर्ग रूपी सुकुमार शिशु ही रोग और शोक में हमेशा हँसता रहता है क्योंकि वह संघर्षशील और जुझारू होता है। क्रांति होने से ही उसे लाभ पहुंचने की संभावना है।

(घ) जब वर्षा रूपी क्रांति होती है तो जल में उत्पन्न कमल रोते हैं और आँसू बहाते हैं। भाव यह है कि क्रांति के फलस्वरूप सुविधाभोगी लोग घबराकर आँसू बहाने लगते हैं। उन्हें इस बात का डर होता है कि उनसे उनकी पूँजी छीन ली जाएगी।

(ङ) पूँजीपति लोग अपने महलों में अपनी पत्नियों से लिपटे हुए भी काँप रहे हैं। उनके मन में क्रांति का डर है। उन्हें इस बात का भय लगा हुआ है कि क्रांति के कारण उनकी सुख-सुविधाएँ छिन जाएँगी। इसलिए वे भयभीत होकर अपने नेत्रों और मुख को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।

[4] जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर,
ऐ विप्लव के वीर!
चूस लिया है उसका सार,
हाड़-मात्र ही है आधार,
ऐ जीवन के पारावार! [पृष्ठ-43]

शब्दार्थ-जीर्ण = जर्जर। शीर्ण = कमज़ोर। कृषक = किसान। अधीर = बेचैन। विप्लव = विनाश। सार = प्राण। पारावार = सागर।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘बादल राग’ से लिया गया है। इसके रचयिता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ जी हैं। यहाँ कवि ने किसानों की दुर्दशा का यथार्थ वर्णन किया है। कवि बादलों का आह्वान करता हुआ कहता है कि वह मूसलाधार वर्षा करके गरीब तथा शोषित किसानों की सहायता करें।

व्याख्या कवि बादलों को संबोधित करता हुआ कहता है, हे जीवन के सागर! देखो, यह जर्जर भुजाओं तथा दुर्बल शरीर वाला किसान बेचैन होकर तुम्हें अपनी ओर बुला रहा है। हे विनाश करने में निपुण बादल! तुम वर्षा करके देश के गरीब तथा शोषित किसान की सहायता करो। उसकी भुजाएँ जर्जर हो चुकी हैं तथा शरीर कमज़ोर हो गया है। उसकी भुजाओं के बल को तथा उसके जीवन के रस को पूँजीपतियों ने चूस लिया है। भाव यह है कि देश के धनिक वर्ग ने ही किसान का शोषण करके उसकी बुरी हालत कर दी है। अब उस किसान में केवल हड्डियों का पिंजर शेष रह गया है। आज की पूँजीवादी शोषक अर्थव्यवस्था ने उसके खून और माँस को चूस लिया है। हे बादल! तुम तो जीवन के दाता हो, विशाल सागर के समान हो। तुम वर्षा करके एक ऐसी क्रांति पैदा कर दो जिससे कि वह किसान शोषण से मुक्त हो सके और सुखद जीवनयापन कर सके।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने भारतीय किसानों की दुर्दशा के लिए आज की शोषण-व्यवस्था को उत्तरदायी माना है। देश के पूँजीपतियों और महाजनों ने किसानों का भरपूर शोषण किया है।
  2. पस्तुत पद्यांश से प्रगतिवादी स्वर मुखरित हुआ है। कवि ने बादल को एक क्रांतिकारी योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया है।
  3. संपूर्ण पद्य में बादल का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
  4. तत्सम् प्रधान संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है। शब्द-चयन उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रसाद गुण होने के कारण करुण रस का परिपाक हुआ है और मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जीर्ण बाहु, है शीर्ण शरीर, शब्दों का प्रयोग किसके लिए किया गया है और क्यों?
(ख) कृषक को अधीर क्यों कहा गया है?
(ग) कवि ने ‘विप्लव के वीर’ किसे कहा है और क्यों?
(घ) जीवन के पारावर किसे कहा गया है और क्यों?
(ङ) ‘चूस लिया है उसका सार’ का आशय स्पष्ट करो।
उत्तर:
(क) यहाँ कवि ने जीर्ण बाहु और शीर्ण शरीर शब्दों का प्रयोग किसान के लिए किया है। शोषण तथा अभाव के कारण उसकी भुजाएँ जीर्ण हो चुकी हैं और शरीर दुर्बल और हीन हो चुका है। इसलिए कवि ने किसान के लिए जीर्ण बाहु और शीर्ण शरीर शब्दों का प्रयोग किया है।

(ख) शोषण तथा अभावों के कारण भारत का किसान दरिद्र और लाचार है। पूँजीपतियों ने उसका सब कुछ छीन लिया है। उसे आशा है कि क्रांति के फलस्वरूप परिवर्तन होगा और पूँजीवाद का विनाश होगा, इसलिए वह क्रांति के बादलों की ओर बड़ी बेचैनी से देख रहा है।

(ग) कवि ने बादलों को विप्लव के वीर कहा है क्योंकि कवि ने बादलों को क्रांति का प्रतीक माना है। जिस प्रकार बादल मूसलाधार वर्षा से समाज की व्यवस्था को भंग कर देते हैं, उसी प्रकार क्रांति भी पूँजीपतियों का विनाश कर देती है।

(घ) क्रांति रूपी बादल को ही जीवन का पारावार अर्थात् सागर कहा गया है। जिस प्रकार बादल वर्षा करके फसल को नया जीवन देते हैं, उसी प्रकार क्रांति भी पूँजीपतियों का विनाश करके गरीब लोगों को सहारा देती है और उनका विकास करती है।

(ङ) यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि धनिक वर्ग ने किसान वर्ग का शोषण करके उसके शरीर के सारे रस को मानों चूस लिया है अर्थात् शोषण के कारण किसान की दशा बुरी हो चुकी है। अब तो किसान हड्डियों का पिंजर मात्र बनकर रह गया है।

बादल राग Summary in Hindi

बादल राग कवि-परिचय

प्रश्न-
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-महाकवि ‘निराला’ छायावाद के चार प्रमुख कवियों में से एक थे। आधुनिक हिंदी साहित्य के विकास में उनका महान योगदान है। उनका जन्म सन् 1899 में बंगाल के महिषादल नामक रियासत में बसंत पंचमी के दिन हुआ था। इनके पिता पं० रामसहाय त्रिपाठी उन्नाव जिले के रहने वाले थे, किंतु जीविकोपार्जन के लिए महिषादल नामक रियासत में आकर बस गए थे। बचपन में ही निराला जी की माता का स्वर्गवास हो गया था। उनके पिता अनुशासनप्रिय थे। इसलिए उनके इस स्वभाव के कारण बालक सूर्यकांत को अनेक बार मार खानी पड़ी। 13 वर्ष की आयु में ही निराला जी का विवाह मनोहर देवी नामक कन्या से कर दिया गया था, किंतु वह एक पुत्र और पुत्री को जन्म देकर स्वर्ग सिधार गई। निराला जी को साहित्य जगत् में भी आरंभ में अनेक विरोधों का सामना करना पड़ा। उनकी अनेक रचनाएँ व लेख अप्रकाशित ही लौटा दिए जाते थे। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने उनकी ‘जूही की कली’ कविता लौटा दी थी, किंतु बाद में उनसे मिलने पर द्विवेदी जी भी उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुए बिना रह न सके। सन् 1933 में निराला जी ने ‘मतवाला’ नामक पत्रिका का संपादन किया। इसके पश्चात् उन्होंने रामकृष्ण मिशन के दार्शनिक पत्र ‘समन्वय’ का भी संपादन किया। पुत्री सरोज के निधन ने निराला जी को बुरी तरह तोड़ दिया। जीवन के अंतिम दिनों में तो वे विक्षिप्त से हो गए थे। जीवन में संघर्ष करते हुए और माँ भारती का आँचल अपनी रचनाओं से भरते हुए निराला जी सन् 1961 में इस संसार से चल बसे।

2. प्रमुख रचनाएँ निराला जी बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी थे। उन्होंने साहित्य की विविध विधाओं पर सफलतापूर्वक लेखनी चलाई है और अनेक रचनाओं का निर्माण किया है। उनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं
(i) काव्य-संग्रह-‘परिमल’, ‘गीतिका’, ‘तुलसीदास’, ‘अनामिका’, कुकुरमुत्ता’, ‘अणिमा’, ‘बेला’, ‘नए पत्ते’, ‘अपरा’, ‘अर्चना’, ‘आराधना’ आदि।

(ii) कहानी-संग्रह ‘लिली’, ‘सखी’, ‘सुकुल की बीबी’, ‘चतुरी चमार’ आदि।

(iii) उपन्यास-‘अप्सरा’, ‘अलका’, ‘प्रभावती’, ‘निरुपमा’, ‘चोटी की पकड़’, ‘काले कारनामे’, ‘चमेली’ आदि।
‘कुल्ली भाट’ तथा ‘बिल्लेसुर बकरिहा’ उनके रेखाचित्र (आँचलिक उपन्यास) हैं। उन्होंने रेखाचित्र, आलोचना साहित्य, निबंध तथा जीवनी साहित्य की भी रचना की और अनुवाद कार्य भी किया।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 7 बादल राग

3. काव्यगत विशेषताएँ-सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की काव्य यात्रा बहुत लंबी रही है। उन्होंने एक छायावादी, प्रगतिवादी तथा प्रयोगवादी कवि के रूप में हिंदी साहित्य को समृद्ध किया। उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(i) वैयक्तिकता की भावना-‘निराला’ जी के काव्य में वैयक्तिकता की भावना की प्रधानता है। ‘अपरा’ की अनेक कविताओं में कवि ने अपनी आंतरिक अनुभूतियों को व्यक्त किया है। यह प्रकृति उनकी ‘राम की शक्ति पूजा’, ‘जूही की कली’ आदि कविताओं में देखी जा सकती है। ‘सरोज स्मृति’ में कवि ने निजी दुख का वर्णन किया है
दुख ही जीवन की कथा रही
क्या कहूँ आज, जो नहीं कही।

(ii) विद्रोह का स्वर-छायावादी कवियों में ‘निराला’ एक ऐसे कवि हैं जिनके काव्य में विद्रोह का स्वर है। एक स्वच्छंदतावादी कवि होने के कारण उन्होंने पुरातन रूढ़ियों तथा जड़ परंपराओं को तोड़ने का प्रयास किया। काव्य जगत में उन्होंने सबसे पहले मुक्त छंद का प्रयोग किया। भले ही इसके लिए उनको तत्कालीन साहित्यकारों तथा संपादकों के विरोध को सहन करना पड़ा। ‘सरोज स्मृति’ नामक कविता में वे अपनी बेटी सरोज के वर से कहते हैं
तुम करो ब्याह, तोड़ता नियम
मैं सामाजिक योग के प्रथम
लग्न के पदँगा स्वयं मंत्र
यदि पंडित जी होंगे स्वतंत्र।

(iii) राष्ट्रीय चेतना-महाकवि ‘निराला’ के काव्य में देश-प्रेम की भावना देखी जा सकती है। वे सही अर्थों में राष्ट्रवादी कवि थे। ‘भारतीय वंदना’. ‘जागो फिर एक बार’, ‘तलसीदास’, ‘छत्रपति शिवाजी का पत्र’ आदि कविताओं में कवि ने देश-प्रेम की भावना को व्यक्त किया है। उनकी कुछ कविताएँ भारत की स्वतंत्रता का संदेश भी देती हैं। ‘खून की होली जो खेली’ उन युवकों के सम्मान में लिखी गई है जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। इसी प्रकार ‘जागो फिर एक बार’ कविता में कवि भारतवासियों को यह संदेश देता है कि वे गुलामी के बंधन तोड़कर देश को आजाद कराएँ। ‘जागो फिर एक बार’ से एक उदाहरण देखिए
समर अमर कर प्राण
गान गाए महासिंधु-से
सिंधु-नद-तीर वासी!
सैंधव तुरंगों पर
चतुरंग चमुसंग
सवा सवा लाख पर
एक को चढ़ाऊँगा,
गोबिंद सिंह निज
नाम जब कहलाऊँगा।

(iv) प्रकृति वर्णन छायावादी कवि होने के कारण ‘निराला’ जी ने प्रकृति के अनेक चित्र अंकित किए हैं। उन्होंने प्रकृति के आलम्बन, उद्दीपन, मानवीकरण आदि विभिन्न रूपों का सुंदर चित्रण किया है। बादलों से ‘निराला’ जी को विशेष लगाव था, अतः ‘बादल राग’ संबंधी उनकी छह कविताएँ उपलब्ध होती हैं। ‘बादल राग’ की पहली कविता में कवि ने प्रकृति के आलंबन रूप का वर्णन करते हुए लिखा है
बार-बार गर्जन
वर्षण है मूसलधार,
हृदय थाम लेता संसार,
सुन-सुन घोर वज्र-हुंकार।
इसी प्रकार ‘देवी सरस्वती’ नामक कविता में कवि ने सर्वथा नवीन शैली अपनाते हुए शरद् ऋतु का वर्णन किया है।

(v) प्रगतिवादी भावना–’निराला’ जी एक सच्चे प्रगतिवादी कवि थे। उन्होंने जहाँ एक ओर पूँजीपतियों के प्रति अपना तीव्र आक्रोश व्यक्त किया है वहाँ दूसरी ओर शोषितों के प्रति सहानुभूति की भावना भी दिखाई है। ‘कुकुरमुत्ता’, ‘तोड़ती पत्थर’, ‘भिक्षुक’, ‘विधवा’ आदि कविताओं में कवि ने प्रगतिवादी दृष्टिकोण को व्यक्त किया है। ‘भिक्षुक’ से एक उदाहरण देखिए
वह आता दो ट्रक कलेजे के करता, पछताता
पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक,
चल रहा लकुटिया टेक,
मुट्ठी-भर दाने को-भूख मिटाने को,
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलाता

(vi) प्रेम और सौंदर्य का वर्णन-‘निराला’ जी ने अपने आरंभिक काव्य में प्रेम और सौंदर्य का खुलकर वर्णन किया है। ‘जूही की कली’ में कवि ने स्थूल श्रृंगार का वर्णन किया है, परन्तु अन्य कविताओं में उन्होंने बड़े उदात्त और पावन श्रृंगार का वर्णन किया है। कुछ स्थलों पर कवि का प्रेम-वर्णन लौकिक होने के साथ-साथ अलौकिक प्रतीत होने लगता है जिसके फलस्वरूप ‘निराला’ जी एक रहस्यवादी कवि प्रतीत होने लगते हैं। ‘तुम और मैं’, ‘यमुना के प्रति’ आदि कविताओं में कवि की रहस्यवादी भावना देखी जा सकती है।

4. कला-पक्ष-एक सफल छायावादी कवि होने के कारण ‘निराला’ जी ने तत्सम् प्रधान शुद्ध साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। ‘निराला’ जी का भाषा के बारे में दृष्टिकोण बहुत उदार रहा है। यदि कुछ स्थलों पर वे समास बहुल संस्कृत के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो अन्य स्थलों पर वे सामान्य बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग करते हैं। उदाहरण के रूप में ‘राम की शक्ति पूजा’ की भाषा संस्कृतनिष्ठ है लेकिन ‘तोड़ती पत्थर’ की भाषा सहज, सरल और सामान्य बोलचाल की भाषा है। ‘कुकुरमुत्ता’ में कवि ने उर्दू तथा अंग्रेज़ी के शब्दों का खुलकर प्रयोग किया है। अन्यत्र कवि ने लाक्षणिक तथा प्रतीकात्मक पदावली का भी प्रयोग किया है। इसके साथ-साथ कवि ने अपनी भाषा में शब्दालंकारों के साथ-साथ अर्थालंकारों का भी प्रयोग किया है। अनुप्रास, यमक, श्लेष, उपमा, उत्प्रेक्षा, रूपकातिशयोक्ति, विभावना आदि अलंकारों का प्रयोग उनके काव्य में देखा जा सकता है। पुनः निराला जी ने संपूर्ण काव्य मुक्त छंद में ही लिखा है। यही कारण है कि वे मुक्त छंद के प्रवर्तक माने गए हैं।

बादल राग कविता का सार

प्रश्न-
‘बादल राग’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘बादल राग’ नामक कविता सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें बादल क्रांति का प्रतीक है। कवि कहता है कि वायु रूपी सागर पर क्रांतिकारी बादलों की सेना इस प्रकार छाई हुई है जैसे क्षणिक सुखों पर दुखों के बादल मंडराते रहते हैं। संसार के दुखी लोगों के लिए अनेक संभावनाएँ उत्पन्न होने लगी हैं। लगता है कि एक क्रूर क्रांति होने जा रही है। बादल युद्ध की नौका के संमान गर्जना-तर्जना करते हुए, नगाड़े बजाते हुए उमड़ रहे हैं। दूसरी ओर पृथ्वी की कोख में दबे हुए आशा रूपी नए अंकुर इन बादलों को देख रहे हैं। उन सोये हुए अंकुरों के मन में नवजीवन की आशा है। अतः वे अपना सिर ऊपर उठाकर बार-बार क्रांति के बादलों की ओर देख रहे हैं।

ऐ बादल तुम्हारी घनघोर गर्जन, मूसलाधार वर्षा तथा बिजली की ‘कड़कन’ को सुनकर बड़े-बड़े शूरवीर योद्धा भी धराशायी हो जाते हैं। उनके शरीर क्षत-विक्षत हो जाते हैं और चट्टानें खिसकने लगती हैं। जबकि बादल आपस में होड़ लगाकर निरंतर आगे बढ़ते हैं, परंतु छोटे-छोटे पौधे बादलों को देखकर अत्यधिक प्रसन्न होते हैं। वे बार-बार अपना हाथ हिलाकर बादलों को अपने पास बुलाते हैं। कवि कहता है कि क्रांति की गर्जना से छोटे अथवा गरीब लोगों को लाभ प्राप्त होता है। परंतु ऊँची-ऊँची अट्टालिकाएँ आतंक-भवन के समान हैं। उनमें रहने वाले अमीर लोग समाज का सारा पैसा इकट्ठा करके उस पर कुंडली मारकर बैठे हुए हैं। वे डर के मारे काँप रहे हैं, क्योंकि क्रांति की गर्जना सुनकर वे डर जाते हैं और अपनी पत्नी के अंगों से चिपटकर काँपने लगते हैं। परंतु दूसरी ओर कीचड़ में तो उत्सव मनाया जा रहा है। कीचड़ से पैदा होने वाले कमल से पानी छलकता रहता है क्योंकि वह कमल शोषित और गरीब का प्रतीक है। गरीबों के बच्चे रोग, शोक और इस विप्लव में हँसते रहते हैं। अब कवि भारतीय किसानों की चर्चा करता हुआ कहता है कि किसान की भुजाएँ दुबली-पतली हैं और शरीर कमज़ोर हो चुका है और वह बेचैन होकर बादल को अपने पास बुलाता है। पूँजीपति ने उसके जीवन के रस को छीन लिया है। अब तो उसके शरीर में मात्र हड्डियाँ बची हैं। अतः कवि बादलों को क्रांति का दूत मानकर किसानों की सहायता करने के लिए कहता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 6 उषा

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 6 उषा Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 12th Class Hindi उषा Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता के किन उपमानों को देखकर यह कहा जा सकता है कि ‘उषा’ कविता गाँव की सुबह का गतिशील शब्दचित्र है?
उत्तर:
कविता में वर्णित राख से लीपा हुआ चौका, काली सिल, स्लेट पर लाल खड़िया चाक आदि उपमानों से यह पता चलता है कि कवि ने गाँव के परिवेश को आधार बनाकर उषाकालीन प्रकृति का सुंदर चित्रण किया है। महानगरों में कहीं भी न तो लीपा हुआ चौका देखा जा सकता है, न ही स्लेट और न ही खड़िया चाक। ये सभी शब्द-चित्र गाँव से संबंधित हैं। गाँव के प्रत्येक घर में प्रातःकाल होने के बाद पहले चौका लीपा जाता है। तत्पश्चात् सिल का प्रयोग होता है फिर कुछ देर बाद बालक को स्लेट पट्टी दी जाती है। अतः यहाँ कवि ने ग्रामीण जन-जीवन के गतिशील चित्र अंकित किए हैं। इससे पता चलता है कि ये तीनों शब्दचित्र स्थिर न होकर गतिशील हैं क्योंकि एक क्रिया के समाप्त होने के बाद दूसरी क्रिया का आरंभ होता है।

प्रश्न 2.
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)
नई कविता में कोष्ठक, विराम चिह्नों और पंक्तियों के बीच का स्थान भी कविता को अर्थ देता है। उपर्युक्त पंक्तियों में कोष्ठक से कविता में क्या विशेष अर्थ पैदा हुआ है? समझाइए।
उत्तर:
नई कविता अपने प्रयोगों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ कवि ने भाषा शिल्प के स्तर पर नए प्रयोग करके अर्थ की अभिव्यक्ति की है। सर्वप्रथम कवि ने कोष्ठक में ‘अभी गीला पड़ा है’ पंक्ति का प्रयोग किया है जो कि अतिरिक्त ज्ञान की सूचक है। यह पंक्ति आकाश रूपी चौके की ताज़गी और नमी को सूचित करती है। यह जानकारी पहले भी दी जा चुकी है। राख से लीपा हुआ चौका अपने आप में गीलेपन को सूचित करता है परंतु अतिरिक्त जानकारी के लिए कवि ने कोष्ठक का प्रयोग किया है जोकि गीलेपन को पूर्णतः स्पष्ट करता है।

अपनी रचना

अपने परिवेश के उपमानों का प्रयोग करते हुए सूर्योदय और सूर्यास्त का शब्दचित्र खींचिए।
उत्तर:
प्रातःकालीन सूर्योदय हो रहा है जिसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि मानों वह नीले सरोवर में स्नान करके बाहर निकला है। सूर्य लाल रंग का पक्षी है जो नीले आकाश के तारों को चुगकर खा जाता है और ओस कणों से अपनी प्यास बुझाता है। धीरे-धीरे यह सूर्य आकाश के मध्य विराजमान हो जाता है तथा अपने प्रकाश द्वारा संपूर्ण संसार को प्रकाशमान कर देता है। परंतु धीरे-धीरे यह सूर्य पर्वतों के शिखरों, वृक्षों, भवनों को पार करता हुआ पश्चिम दिशा की ओर अग्रसर होता है। लगता है कि सूर्य एक थका हुआ मुसाफिर है जो दिन भर यात्रा करने के बाद थक गया है तथा थकान के कारण उसका चेहरा लाल रंग का हो गया है। विश्राम करने के लिए वह पश्चिम दिशा रूपी गुफा में प्रवेश करने लगता है। उसकी गति मंद हो जाती है। अन्ततः वह अपनी थकान को दूर करने के लिए विश्राम करने लगता है तथा दूसरी ओर सूर्यास्त के बाद अँधेरा संसार को अपनी आगोश में ले लेता है।

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आपसदारी

सूर्योदय का वर्णन लगभग सभी बड़े कवियों ने किया है। प्रसाद की कविता ‘बीती विभावरी जाग री’ और अज्ञेय की ‘बावरा अहेरी’ की पंक्तियाँ आगे बॉक्स में दी जा रही हैं। ‘उषा’ कविता के समानांतर इन कविताओं को पढ़ते हुए नीचे दिए गए बिंदुओं पर तीनों कविताओं का विश्लेषण कीजिए और यह भी बताइए कि कौन-सी कविता आपको ज्यादा अच्छी लगी और क्यों ?
→ उपमान
→ शब्दचयन
→ परिवेश
बीती विभावरी जाग री!
अंबर पनघट में डुबो रही-
तारा-घट ऊषा नागरी।
खग-कुल कुल-कुल-सा बोल रहा,
किसलय का अंचल डोल रहा,
लो यह लतिका भी भर लाई-
मधु मुकुल नवल रस गागरी।
अधरों में राग अमंद पिए,
अलकों में मलयज बंद किए
तू अब तक सोई है आली आँखों में भरे विहाग री। -जयशंकर प्रसाद
उत्तर:
उपमान-“अंबर पनघट में डुबो रही
तारा-घट ऊषा नागरी।”
यहाँ कवि ने आकाश को ‘पनघट’, तारों को ‘घट’ (घड़ा) तथा ऊषा को ‘नागरी’ कहा है।

शब्दचयन-यहाँ कवि ने शृंगारिक शब्दों का सुंदर प्रयोग किया है। प्रस्तुत गीत की शब्दावली पाठक के मन में प्रेम के संयोग और वियोग दोनों पक्षों को उभारती है। शब्दचयन बड़ा ही सटीक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है। कविता को एक बार पढ़कर पुनः पढ़ने का मन करता है।

परिवेश-कविता पढ़कर ऐसा लगता है कि मानो किसी सुंदर उपवन में बैठकर कवि गीत लिख रहा है, वहीं पर सुंदर युवती सोई हुई है जिसे जगाने के लिए कवि प्रकृति को आधार बनाता है।
भोर का बावरा अहेरी
पहले बिछाता है आलोक की
लाल-लाल कनियाँ
पर जब खींचता है जाल को
बाँध लेता है सभी को साथः
छोटी-छोटी चिड़ियाँ, मँझोले परेवे, बड़े-बड़े पंखी
डैनों वाले डील वाले डौल के बेडौल
उड़ते जहाज़,
कलस-तिसूल वाले मंदिर-शिखर से ले
तारघर की नाटी मोटी चिपटी गोल धुस्सों वाली उपयोग-सुंदरी
बेपनाह काया कोः
गोधूली की धूल को, मोटरों के धुएँ को भी
पार्क के किनारे पुष्पिताग्र कर्णिकार की आलोक-खची तन्चि रूप-रेखा को
और दूर कचरा जलानेवाली कल की उदंड चिमनियों को, जो
धुआँ यों उगलती हैं मानो उसी मात्र से अहेरी को हरा देंगी। -सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’
उत्तर:
उपमान बावरा अहेरी, चिड़ियाँ जाल, मंझोले परेवे, उड़ते जहाज़, उदंड चिमनियाँ आदि सर्वथा नवीन उपमान हैं।

शब्दचयन-यहाँ कवि ने सटीक तथा भावानुकूल शब्दों का चयन किया है जिससे कविता बड़ी सजीव बन पड़ी है। कविता का प्रत्येक शब्द बड़ा ही गतिशील एवं सक्रिय दिखाई देता है।

परिवेश-यह कविता नगरीय परिवेश का चित्रण करती है और सूर्य की किरणों द्वारा नगर पर फैलने का यथार्थ वर्णन करती है। दोनों कविताओं में से मुझे “बीती विभावरी जाग री” कविता अच्छी लगी है क्योंकि यह कविता महानगरों से दूर किसी ग्रामीण आँचल का सुंदर वर्णन करती है। इस कविता का प्रकृति वर्णन बहुत ही स्वाभाविक बन पड़ा है परंतु ‘बावरा अहेरी’ कविता शहरी जन-जीवन के धूल और धुएँ से ढकी हुई है। इसलिए यह कविता मुझे अच्छी नहीं लगती।

HBSE 12th Class Hindi उषा Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों का काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
“प्रात नभ या बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है)”
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने प्रातःकालीन प्रकृति का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण किया है जिसमें सुंदर तथा नवीन उपमानों का प्रयोग किया है।
  2. ‘शंख जैसे’, ‘राख ………………. पड़ा है। दोनों में उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. इस पद्यांश में मौलिक कल्पना के साथ-साथ नवीन उपमानों का प्रयोग किया गया है।
  4. (अभी गीला पड़ा है) पंक्ति कोष्ठक में रखी गई है जो कि आकाश रूपी चौके की नमी तथा ताज़गी को सूचित करती है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

2. “नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।”
उत्तर:

  1. इस पद्यांश में कवि ने सूर्योदय की बेला में क्षण-क्षण परिवर्तित प्रकृति का सूक्ष्म चित्रण किया है।
  2. ‘नीला जल’ नीले आकाश को सांकेतिक करता है और ‘गौर झिलमिल देह’ उगते हुए सूर्य के प्रकाश की ओर संकेत करती है।
  3. ‘नील जल’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘नील जल ……………. हिल रही हो’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. यहाँ नीले जल में झिलमिलाती गोरी देह उगते हुए सूर्य की द्योतक है।
  6. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

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3. “बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने”
उत्तर:

  1. इसमें कवि ने नीले नभ से उदित होते हुए सूर्य के सौंदर्य का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है।
  2. ‘बहुत काली सिल ……………. गई हो’ तथा ‘स्लेट पर …………… किसी ने’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘काली सिल’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. लाल केसर से धुली काली सिल, भोर कालीन गीले वातावरण में सूर्योदय की लालिमा का द्योतन करती है।
  5. ‘स्लेट पर लाल खड़िया चाक’ प्रातःकालीन गीले वातावरण में उगते हुए सूर्य के लिए प्रयुक्त किया गया है।
  6. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-चयन सर्वथा अनुकूल व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. संपूर्ण पद्यांश में चित्रात्मक व बिंबात्मक शैलियों का प्रयोग हुआ है।
  9. मुक्त छंद का सफल प्रयोग है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भोर के नभ को राख से लीपा चौका क्यों कहा गया है?
उत्तर:
भोरकालीन आकाश गीली राख के रंग के समान गहरा स्लेटी रंग का होता है। उस समय के वातावरण में नमी के साथ-साथ पवित्रता भी होती है। अतः स्लेटी रंग को नमी तथा पवित्रता के कारण ही भोर के नभ की राख से लीपा गया गीला चौका कहा गया है। कवि सूर्योदयकालीन वातावरण की तुलना रसोई की पावनता के साथ करता है।

प्रश्न 2.
नील जल में हिलती झिलमिलाती देह के द्वारा कवि क्या स्पष्ट करना चाहता है?
उत्तर:
कवि ने नील जल शब्द का प्रयोग नीले आकाश के लिए किया है। जिस प्रकार नीले जल में कोई गौरवर्णी नारी धीरे-धीरे बाहर निकलकर आती है, उसी प्रकार नीले आकाश से सूर्य की श्वेत किरणें विकीर्ण होकर प्रकाश फैलाने लगती हैं।

प्रश्न 3.
स्लेट पर लाल खड़िया चाक मलने से क्या अभिप्राय है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
यदि काली स्लेट पर लाल खड़िया चाक को लीप दिया जाए तो वह गीली होने के साथ-साथ थोड़ी-सी लालिमा लिए हुए रहती है। उसका रंग भोरकालीन गहरे आकाश में सूर्य की लालिमा जैसा हो जाता है। यहाँ कवि का अभिप्राय उस नीले आकाश से है जिसमें सूर्य की लालिमा धीरे-धीरे व्याप्त होने लगती है।

प्रश्न 4.
सिल और स्लेट शब्दों का प्रयोग कहाँ तक सार्थक है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
सिल तथा स्लेट शब्दों का प्रयोग कवि ने भोरकालीन आकाश के गहरे नीले रंग के लिए किया है जिसमें सूर्योदय की थोड़ी-सी लालिमा भी मिली हुई होती है।

प्रश्न 5.
‘उषा’ कविता में निहित प्रकृति-सौंदर्य की विवेचना कीजिए। [H.B.S.E. March, 2019 (Set-B, C)]
उत्तर:
रात्रि के समय आकाश में कालिमा और नीली आभा फैली हुई होती है जिसमें झिलमिलाते हुए तारे अपना सौंदर्य बिखेरते हैं। सूर्योदय से पूर्व के काल में हल्का-हल्का प्रकाश चमकने लगता है और तारे लुप्त होने लगते हैं। इस अवसर पर आकाश में थोड़ी-सी नमी होती है तथा पौ फटने पर केसरिया रंग छिटक जाता है। फलस्वरूप पक्षी जाग जाते हैं और प्रकृति अंगड़ाई लेकर मुखरित होने लगती है। धीरे-धीरे लालिमा पूरे संसार पर छा जाती है। सूर्योदय के पश्चात् सारा संसार प्रकाश से जगमगाने लगता है और संसार के सभी प्राणी अपने-अपने क्रिया-कलाप आरंभ कर देते हैं।

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प्रश्न 6.
सूर्योदय से उषा का कौन-सा जादू टूट जाता है?
उत्तर:
सर्योदय के कारण उषा का अलौकिक रंग-रूप टने लगता है। सर्योदय से पहले प्रातःकालीन प्रकति क्षण-क्षण में परिवर्तित होती हुई दिखाई देती है। रात्रिकालीन कालिमा लुप्त हो जाती है और हल्की-हल्की लालिमा पूर्व दिशा में फैलने लगती है। इस प्रकार उषा का अद्वितीय रूप-सौंदर्य लुप्त हो जाता है और आकाश में सूर्य का प्रकाश फैलने लगता है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. शमशेर बहादुर सिंह का जन्म कब हुआ?
(A) 13 जनवरी, 1921
(B) 13 जनवरी, 1911
(C) 15 जनवरी, 1912
(D) 26 जनवरी, 1913
उत्तर:
(B) 13 जनवरी, 1911

2. शमशेर बहादुर सिंह का जन्म किस प्रदेश में हुआ?
(A) उत्तराखंड में
(B) मध्य प्रदेश में
(C) पंजाब में
(D) राजस्थान में
उत्तर:
(A) उत्तराखंड में

3. शमशेर बहादुर सिंह का जन्म किस जनपद में हुआ?
(A) हरिद्वार में
(B) ऋषिकेश में
(C) देहरादून में
(D) मसूरी में
उत्तर:
(C) देहरादून में

4. शमशेर बहादुर सिंह का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1992 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1990 में
(D) सन् 1993 में
उत्तर:
(D) सन् 1993 में

5. ‘कुछ कविताएँ’ के रचयिता हैं-
(A) शमशेर बहादुर सिंह
(B) आलोक धन्वा
(C) हरिवंश राय बच्चन
(D) रघुवीर सहाय
उत्तर:
(A) शमशेर बहादुर सिंह

6. ‘बात बोलेगी’ के रचयिता हैं-
(A) कुंवर नारायण
(B) विष्णु खरे
(C) शमशेर बहादुर सिंह
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(C) शमशेर बहादुर सिंह

7. शमशेर बहादुर सिंह को ‘दो मोती के दो चंद्रमा होते’ रचना पर कौन-सा राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(A) ज्ञानपीठ
(B) साहित्य अकादेमी
(C) शिखर सम्मान
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) साहित्य अकादेमी

8. ‘उर्दू-हिंदी कोश’ के संपादक कौन थे?
(A) आलोक धन्वा
(B) हरिवंश राय बच्चन
(C) रघुवीर सहाय
(D) शमशेर बहादुर सिंह
उत्तर:
(D) शमशेर बहादुर सिंह

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9. ‘उषा’ कविता में किस काल की परिवर्तित प्रकृति का वर्णन किया गया है?
(A) सूर्योदय पूर्व काल की
(B) सूर्योदय के बाद की
(C) रात्रिकाल की
(D) सूर्योदय काल की
उत्तर:
(A) सूर्योदय पूर्व काल की

10. ‘उषा’ कविता के रचयिता हैं-
(A) कुँवर नारायण
(B) आलोक धन्वा
(C) शमशेर बहादुर सिंह
(D) रघुवीर सहाय
उत्तर:
(C) शमशेर बहादुर सिंह

11. ‘प्रातः नभ था बहुत नीला शंख जैसे’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) अनुप्रास अलंकार
(D) मानवीकरण अलंकार
उत्तर:
(A) उपमा अलंकार

12. ‘उषा’ कविता में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) दोहा छंद
(B) मुक्त छंद
(C) सवैया छंद
(D) कवित्त छंद
उत्तर:
(B) मुक्त छंद

13. ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार’ के अतिरिक्त शमशेर बहादुर सिंह को अन्य कौन-सा सम्मान प्राप्त हुआ?
(A) शिखर सम्मान
(B) ज्ञानपीठ पुरस्कार
(C) कबीर सम्मान
(D) तुलसी सम्मान
उत्तर:
(C) कबीर सम्मान

14. शमशेर बहादुर सिंह कहाँ पर पेंटिंग सीखने लगे?
(A) उकील बंधुओं के कला विद्यालय में
(B) साहित्य अकादमी में
(C) कला केंद्र में
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय में
उत्तर:
(A) उकील बंधुओं के कला विद्यालय में

15. ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1970 में
(B) सन् 1972 में
(C) सन् 1971 में
(D) सन् 1975 में
उत्तर:
(D) सन् 1975 में

16. ‘कुछ कविताएँ’ काव्य-संग्रह का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1960 में
(B) सन् 1959 में
(C) सन् 1958 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(B) सन् 1959 में

17. ‘शमशेर’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1970 में
(B) सन् 1969 में
(C) सन् 1971 में
(D) सन् 1972 में
उत्तर:
(C) सन् 1971 में

18. ‘इतने पास अपने’ के रचयिता हैं-
(A) कुँवर नारायण
(B) हरिवंश राय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) शमशेर बहादुर सिंह
उत्तर:
(D) शमशेर बहादुर सिंह

19. ‘इतने पास अपने का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1980 में
(B) सन् 1979 में
(C) सन् 1975 में
(D) सन् 1977 में
उत्तर:
(A) सन् 1980 में

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20. ‘उषा’ कविता में किस रंग की खड़िया चाक मलने की बात कही गई है?
(A) लाल
(B) पीली
(C) सफेद
(D) नीली
उत्तर:
(A) लाल

21. ‘उषा’ दिन का कौन-सा समय होता है?
(A) प्रभात
(B) मध्याह्न
(C) संध्या
(D) रात्रि
उत्तर:
(A) प्रभात

22. कविता में चौका किससे लीपा हुआ होने की बात कही गई है?
(A) गोबर
(B) राख
(C) मिट्टी
(D) लाल खड़िया
उत्तर:
(B) राख

23. ‘उषा’ का जादू टूटने का समय क्या है?
(A) सूर्यास्त
(B) प्रदोश
(C) सूर्योदय
(D) प्रहर
उत्तर:
(C) सूर्योदय

24. कविता में राख से लीपा हुआ क्या बताया है?
(A) आकाश
(B) चन्द्र
(C) काली सिल
(D) चौका
उत्तर:
(D) चौका

25. ‘राख से लीपा हुआ चौका’ आकाश की किस स्थिति की व्यंजना करता है?
(A) पवित्रता की
(B) ताज़गी की
(C) विशालता की
(D) गंभीरता की
उत्तर:
(A) पवित्रता की

26. राख से लीपा हुआ चौका गीला पड़ा होने से क्या अभिप्राय है?
(A) वर्षा
(B) पानी
(C) वातावरण की नमी
(D) रात शेष रहना
उत्तर:
(C) वातावरण की नमी

27. ‘बहुत काली सिल’ से क्या अभिप्राय है?
(A) रसोई की काली सिल
(B) रात की कालिमा
(C) प्रातःकाल की कालिमा
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रात की कालिमा

28. ‘लाल खड़िया चाक’ क्या व्यंजित करती है?
(A) सूर्योदय से पूर्व की लालिमा
(B) खड़िया चाक का लाल रंग
(C) सूर्यास्त के बाद की लालिमा
(D) दोपहर की लालिमा
उत्तर:
(A) सूर्योदय से पूर्व की लालिमा

29. ‘नील जल में …………… हिल रही हो’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास अलंकार
(B) रूपक अलंकार
(C) उपमा अलंकार
(D) उत्प्रेक्षा अलंकार
उत्तर:
(D) उत्प्रेक्षा अलंकार

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30. शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित ‘उषा’ कविता में किस शैली का प्रयोग हुआ है?
(A) विवरणात्मक शैली का
(B) चित्रात्मक शैली का
(C) संबोधन शैली का
(D) वर्णनात्मक शैली का
उत्तर:
(B) चित्रात्मक शैली का

31. प्रातःकालीन आकाश का रंग कैसा था?
(A) लाल
(B) सुनहरा
(C) नीला
(D) काला
उत्तर:
(C) नीला

32. ‘लाल केसर से धुली काली सिल’ किसे कहा गया है?
(A) आकाश
(B) तारे
(C) सूर्य
(D) चंद्रमा
उत्तर:
(A) आकाश

33. नीले आकाश में उदय होता हुआ सूर्य किसके समान दिखाई देता है?
(A) गौरवर्णीय सुंदरी के समान
(B) शंख के समान
(C) झील के समान
(D) सिंदूर के समान
उत्तर:
(A) गौरवर्णीय सुंदरी के समान

34. ‘उषा’ कविता में प्रातःकालीन नीला आकाश किसके जैसा बताया गया है?
(A) केसर
(B) शंख
(C) सिंदूर
(D) झील
उत्तर:
(B) शंख

35. ‘लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने स्लेट पर’ पंक्ति में स्लेट क्या है?
(A) तारे
(B) सूर्य
(C) धरती
(D) आकाश
उत्तर:
(D) आकाश

36. ‘उषा’ कविता में बहुत काली सिल की किससे धुलने की बात कही गई है?
(A) खड़िया
(B) पानी
(C) लाल केसर
(D) वर्षा
उत्तर:
(C) लाल केसर

37. सूर्योदय से पहले किसका जादू होता है?
(A) उषा का
(B) निशा का
(C) निशिचर का
(D) भूत का
उत्तर:
(A) उषा का

उषा पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे
भोर का नभ
राख से लीपा हुआ चौका
(अभी गीला पड़ा है) [पृष्ठ-36]

शब्दार्थ-भोर = सवेरा, सवेरा होने से पहले का झुटपुटा वातावरण। नभ = आकाश। चौका = रसोई बनाने का स्थान।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘उषा’ से अवतरित है। इसके कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। इस लघु कविता में कवि ने सूर्योदय से पूर्व की प्रकृति का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या-प्रातःकालीन सूर्योदय का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि पौ फटने से पहले आकाश का रंग गहरा नीला था। यह शंख के समान गहरा नीला दिखाई दे रहा था। जैसे शंख की कांति स्वच्छ व नीली होती है वैसे ही आकाश भी स्वच्छ और नीली आभा लिए हुए था। उसके बाद भोर हुई तथा आकाश का गहरा नीला रंग थोड़ा मंद पड़ गया और वातावरण में नमी आ गई। उस समय आकाश ऐसा लग रहा था कि मानों राख से लीपा हुआ कोई गीला चौका हो अर्थात् नमी के कारण उसमें थोड़ा गीलापन आ गया था, लेकिन अभी भी उसमें थोड़ा नीलापन और थोड़ा मटमैलापन था।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने भोर के वातावरण का बहुत ही सूक्ष्म तथा मनोहारी वर्णन किया है।
  2. ‘शंख जैसे’ और ‘राख से लीपा हुआ चौका’ में उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सहज प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-प्रयोग सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रस्तुत पद्यांश नवीन उपमानों तथा मौलिक कल्पना के लिए प्रसिद्ध है।
  6. चित्रात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग किया गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) कवि ने प्रातःकालीन नभ की तुलना नीले शंख से क्यों की है?
(ग) भोर के नभ को राख से लीपा चौका क्यों कहा है?
(घ) चौके के गीले होने का प्रतीकार्थ क्या है?
(ङ) इस पद्यांश के आधार पर प्रातःकालीन प्रकृति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(क) कविता – उषा कवि – शमशेर बहादुर सिंह

(ख) भोरकालीन वातावरण न अधिक काला होता है और न ही उजला। इसलिए कवि ने उसकी तुलना नीले शंख के साथ की है जिसका रंग बुझा-बुझा-सा होता है।

(ग) भोरकालीन वातावरण सुरमयी रंग का होता है और राख से लीपे जाने पर भी आँगन का रंग गहरा सुरमयी हो जाता है। इसलिए कवि ने भोर के नभ को राख से लीपा हुआ चौका कहा है।

(घ) प्रातःकालीन वातावरण में ओस की नमी होती है तथा इसका रंग गहरा परमयी होता है। इसलिए कवि ने इसकी तुलना चौके के साथ की है जोकि बड़ा ही पवित्र माना गया है। अतः चौके के गीले होने का प्रतीकार्थ है-प्रातःकालीन वातावरण में पवित्रता का होना।

(ङ) प्रातःकालीन वातावरण बड़ा ही शांत तथा ओस की नमी के कारण कुछ-कुछ गीला होता है। उस समय आकाश की पूर्व दिशा में हल्की लालिमा होती है जिसमें पेड़-पौधे, खेत-खलिहान बड़े ही मनोहारी प्रतीत होते हैं। धीरे-धीरे सूर्य की लाल-लाल किरणें संपूर्ण प्रकृति पर फैल जाती हैं और कुछ देर बाद यह लालिमा उजाले में परिवर्तित हो जाती है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 6 उषा

[2] बहुत काली सिल ज़रा से लाल केसर से
कि जैसे धुल गई हो
स्लेट पर या लाल खड़िया चाक
मल दी हो किसी ने [पृष्ठ-36]

शब्दार्थ-सिल = मसाला, चटनी आदि पीसने वाला पत्थर जो रसोई में रखा जाता है। लाल केसर = फूल का सुगंधित पदार्थ, पराग = केसर के फूल का मध्य भाग जो औषधि में डाला जाता है।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘उषा’ से अवतरित है। इसके कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। इस लघु कविता में कवि ने सूर्योदय से पूर्व की प्रकृति का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है। यहाँ कवि उषा की लालिमा का वर्णन करते हुए कहता है कि

व्याख्या-भोर के अस्पष्ट अँधेरे में उगते हुए सूर्य की लाली का धीरे-धीरे मिश्रण होने लगता है। उस समय आकाश ऐसा लगता है कि मानों बहुत गहरी काली सिल लाल केसर से धुल गई हो अर्थात् संपूर्ण आकाश में सूर्य की लालिमा फैलकर उसको हल्के लाल रंग का बना देती है। उस समय यह वातावरण ऐसा दिखाई देता है कि मानों स्लेट पर लाल खड़िया चाक मिट्टी लगा दी गई है। यहाँ कवि ने नीले-काले आकाश की तुलना काली स्लेट के साथ की है और सूर्य की लालिमा की तुलना लाल खड़िया चाक के साथ की है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने प्रातःकालीन प्रकृति के क्षण-क्षण बदलते हुए वातावरण का मनोहारी वर्णन किया है।
  2. रात की कालिमा, ओस का गीलापन तथा सूर्य की लालिमा तीनों का मिश्रण करके एक सुंदर चित्र प्रस्तुत किया है।
  3. ‘बहुत काली सिल …………….. गई हो’ तथा ‘स्लेट पर ……………. किसी ने दोनों में उत्प्रेक्षा अलंकार का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  4. ‘काली सिल’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग किया गया है।
  5. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग किया गया है।
  6. मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है तथा बिंब-योजना आकर्षक बन पड़ी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) इस पद्यांश में कवि ने किस प्रकार के दृश्य का चित्रण किया है?
(ग) ‘काली सिल’, ‘स्लेट’ किस दृश्य को अंकित करती हैं?
(घ) ‘लाल केसर’ तथा ‘लाल खड़िया चाक’ से किस चित्र को अंकित किया गया है?
उत्तर:
(क) कवि – शमशेर बहादुर सिंह कविता – उषा

(ख) इस पद्यांश में कवि ने भोर के अँधेरे वातावरण में सूर्योदय की हल्की लालिमा के मिश्रण का दृश्य अंकित किया है जोकि बड़ा ही मनोहारी बन पड़ा है।

(ग) भोर के समय आकाश का रंग सुरमयी काला होता है। इस समय का अंधकार काली सिल या काली स्लेट जैसा होता है। इसलिए कवि ने काली सिल अथवा काली स्लेट द्वारा भोरकालीन सुरमयी अँधेरे का सुंदर चित्रण किया है।

(घ) ‘लाल केसर’ तथा ‘लाल खड़िया चाक’ सूर्योदय की लालिमा को चित्रित करने में समर्थ हैं। ये दोनों उपमान सर्वथा मौलिक तथा जनरुचि के अनुकूल हैं।

[3] नील जल में या किसी की
गौर झिलमिल देह
जैसे हिल रही हो।
और….
जादू टूटता है इस उषा का अब
सूर्योदय हो रहा है। [पृष्ठ-36]

शब्दार्थ-नील जल = नीले रंग का पानी। गौर = गोरे रंग की। झिलमिल देह = चमकता हुआ शरीर। सूर्योदय = सूर्य का उदित होना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘उषा’ से अवतरित है। इसके कवि शमशेर बहादुर सिंह हैं। इस लघु कविता में कवि ने सूर्योदय से पूर्व की प्रकृति का बहुत ही मनोहारी वर्णन किया है। यहाँ कवि सूर्योदय का वर्णन करते हुए कहता है कि-

व्याख्या-प्रातःकाल में पहले तो आकाश में गहरा नीला रंग होता है फिर सूर्य की श्वेत आभा दिखाई देने लगती है। उस समय का प्राकृतिक सौंदर्य ऐसा दिखाई देता है मानों किसी सुंदर युवती की गोरी देह नीले रंग के पानी में झिलमिला रही हो परंतु कुछ समय बाद आकाश में सूर्य उदित हो जाता है। पता भी नहीं लग पाता कि उषा का क्षण-क्षण में बदलता हुआ सौंदर्य लुप्त हो जाता है अर्थात् क्षण भर में ही आकाश में सूर्योदय हो जाता है और प्रकृति का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने सूर्योदयकालीन प्राकृतिक शोभा का बहुत ही सूक्ष्म चित्रण किया है।
  2. ‘नील जल ……………….. हिल रही हो’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘नीला जल’, ‘हो रहा है’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. संपूर्ण पद्यांश चित्रात्मक भाषा के लिए प्रसिद्ध है।
  7. मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) नीले जल में गौर देह के झिलमिलाने में कौन सा दृश्य चित्रित किया है?
(ख) नीले जल द्वारा कवि प्रातःकाल के किस दृश्य का अंकन करना चाहता है?
(ग) गोरी देह की झिलमिलाने की समानता किस दृश्य से की गई है?
(घ) उषा का जादू टूटने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) नीले जल में गौर देह के झिलमिलाने के माध्यम से कवि नीले आकाश में सूर्य की कांति के झिलमिलाने का दृश्य अंकित करता है। प्रातःकाल के समय आकाश नीला होता है तथा सूर्य की पहली किरणें झिलमिलाकर उसको अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं।

(ख) नीले जल के उपमान द्वारा कवि प्रातःकालीन नीले आकाश की निर्मलता और स्वच्छता को अंकित करता है।

(ग) प्रातःकाल में सूर्य की लालिमा धीरे-धीरे श्वेत होने लगती है। उस समय के वातावरण में कुछ नमी तथा कुछ चमक होती है। इसके लिए कवि ने नीले जल में स्नान करने वाली गोरी देह का वर्णन किया है जोकि सर्वथा उचित एवं प्रभावशाली बन पड़ा है।

(घ) उषा के जादू टूटने से अभिप्राय है प्रातःकालीन प्रकृति के अद्वितीय सौंदर्य का कम होना। उस समय प्रकृति क्षण-क्षण में परिवर्तित होती रहती है। भोर के समय आकाश नीला तथा काला होता है फिर पूर्व दिशा में हल्की लालिमा छा जाती है जिससे प्रकृति में नीलिमा व लालिमा का मिश्रण हो जाता है और अन्ततः दय के संपूर्ण आकाश में श्वेत लालिमा फैल जाती है।

उषा Summary in Hindi

उषा कवि-परिचय

प्रश्न-
शमशेर बहादुर सिंह का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा शमशेर बहादुर सिंह का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-नई कविता में शमशेर बहादुर सिंह का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका काव्य तथा व्यक्तित्व बहुमुखी तथा विविधतापूर्ण है। उनका जन्म 13 जनवरी, 1911 ई० को देहरादून में एक जाट परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम बाबू सिंह था जोकि बडे ही निष्ठावान सरकारी नौकर थे। उनकी माता का नाम प्रभुदई था। वे बड़ी ही धार्मिक विचारों वाली स्त्री थी। माता के देहांत के बाद पूरा परिवार बिखर गया और पिता ने दूसरी शादी कर ली। शमशेर का विवाह धर्मवती से हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा देहरादून में हुई। उन्होंने 1928 ई० में हाई स्कूल तथा 1933 ई० में प्रयाग विश्वविद्यालय से बी०ए० की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की। उन्होंने अंग्रेजी विषय में एम०ए० करनी चाही, परंतु सफल नहीं हो पाए। बाद में दिल्ली के उकील बंधुओं के ‘कला विद्यालय’ में पेंटिंग सीखने लगे, लेकिन शीघ्र ही वापिस देहरादून लौट गए और अपने ससुर की कैमिस्ट की दुकान में कंपाउडर का काम करने लगे। उनका संपूर्ण जीवन प्रायः अस्थिर ही रहा। 1993 ई० में अहमदाबाद में उनका देहांत हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-शमशेर ने गद्य तथा पद्य दोनों में कुशलतापूर्वक लिखा है। ‘कुछ कविताएँ’ (1959), ‘शमशेर’ (1971), ‘चुका भी हूँ नहीं मैं’ (1975), ‘इतने पास अपने’ (1980), ‘उदिता’ (1980), ‘बात बोलेगी’ (1981) आदि उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं। उन्होंने सन् 1932-33 में लिखना आरंभ किया था तथा उनकी आरंभिक रचनाएँ ‘सरस्वती’ तथा ‘रूपाभ’ में प्रकाशित हुईं। सन् 1951 में प्रकाशित दूसरे तार सप्तक में उनकी रचनाएँ भी सम्मिलित की गईं। सन् 1977 में उन्हें ‘दो मोती के दो चंद्रमा होते’ रचना पर साहित्य अकादेमी पुरस्कार द्वारा सम्मानित किया गया।

3. काव्यगत विशेषताएँ-उनके काव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(क) राष्ट्रीय चेतना-शमशेर जी की आरंभिक कविताओं में देश-प्रेम की भावना देखी जा सकती है। कवि ने स्वतंत्रता पूर्व अंग्रेज़ी शासकों के अत्याचारों को समीप से देखा था। उन्होंने अपनी कविताओं में अंग्रेज़ी राज्य की क्रूरता तथा हिंसा का यथार्थ वर्णन किया है। सन् 1944 में अंग्रेज़ी सरकार ने मजदूरों पर गोलियाँ चलवाई थीं। इस संदर्भ में कवि लिखता है
“ये शाम है
कि आसमान खेत है पके हुए अनाज का
लपक उठी लहू से भरी दरातियाँ
कि आग है धुआँ-धुआँ
सुलग रहा
ग्वालियर के मजूर का हृदय।”

(ख) मार्क्सवादी चेतना-शमशेर जी सन् 1938 में मार्क्सवाद की ओर आकृष्ट हुए थे और 1945 में कम्युनिस्ट पार्टी के कम्यून में रहे। वहीं पर रहते हुए उन्होंने ‘नया साहित्य’ का संपादन भी किया। वे मानवता के उज्ज्वल भविष्य के लिए मार्क्सवाद को आवश्यक मानते थे। इसीलिए एक स्थल पर वे लिखते हैं-
“वाम-वाम-वाम दिशा
समय साम्यवादी”

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 6 उषा

(ग) सामाजिक चेतना-शमशेर जी के काव्य में सामाजिक चेतना भी देखी जा सकती है। उनका कहना था कि व्यक्ति अपने आप में समाज का ही एक अंश है। अतः कवि को अपनी भावनाएँ समाज के सत्य के संदर्भ में व्यक्त करनी चाहिएँ। इसीलिए वे समाज के कटुतम अनुभवों को अपनी कविताओं में प्रस्तुत करते हुए दिखाई देते हैं
“मैं समाज तो नहीं, न मैं कुल
जीवन,
कण-समूह में हूँ मैं केवल एक कण”।

(घ) वैयक्तिक अनुभूति-शमशेर जी ने अपनी कविताओं में अपनी निजी संवेदना को भी व्यक्त किया है। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ भोगा और जो कुछ पाया, उन्हीं अनुभूतियों को वे यत्र-तत्र अनुभव करते रहे। उन्होंने अपने प्रणय संबंधों को स्वीकार किया और प्रेमी तथा प्रेमिका के एकत्व की स्थापना पर बल दिया। वे एक स्थल पर लिखते हैं
“मैं तो साये में बँधा सा
दामन में तुम्हारे ही कहीं ग्रह सा
साथ तुम्हारे।”

(ङ) प्रेम और सौंदर्य मूलतः शमशेर जी प्रेम और सौंदर्य के कवि माने जाते हैं। उनकी कविता में प्रेम का रंग बड़ा ही गहरा है। वे प्रेम और सौंदर्य का परस्पर संबंध स्थापित करते नज़र आते हैं। वे प्रेयसी को जीवन का सर्वस्व मानते हैं तथा वादा करके मुकर भी जाते हैं।
“वो कल आयेंगे वादे पर
मगर कल देखिए कब हो?
गलत फिर हज़रते-दिल
आपका तख्मीना होना है।”

(च) मानवतावाद-शमशेर जी का काव्य देश और काल की सीमा में बँधा नहीं है। वे मानवीय चेतना में अधिक विश्वास रखते थे और विश्व-बंधुत्व की भावना को अधिक महत्त्व देते थे। कवि ने नवीन तथा प्राचीन और पूर्व-पश्चिम में कोई भेद स्वीकार नहीं किया। कारण यह था कि वे अपनी कविता में मानव को ही अधिक महत्त्व देते हैं। एक स्थल पर वे लिखते हैं
“बहुत हौले-हौले नाच रहा हूँ
सब संस्कृतियाँ मेरे सरगम में विभोर हैं
क्योंकि मैं हृदय की सच्ची सुख-शांति का राग हूँ
बहुत आदिम, बहुत अभिनव।”
इसी प्रकार कवि ने अपनी कविताओं में जहाँ एक ओर प्रकृति-चित्रण किया है वहीं दूसरी ओर बाह्य आडंबरों तथा रूढ़ियों का भी विरोध किया है। वे जीवन में मृत्यु की हस्ती को भी स्वीकार करते हैं और मृत्यु को अपनी प्रेमिका मानते हैं।

4. कला-पक्ष-शमशेर बहादुर सिंह ने अपने साहित्य में सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। कहीं-कहीं वे उर्दू भाषा के शब्दों का अधिक प्रयोग करने लगते हैं। उन्होंने भाषा तथा छंद की दृष्टि से अनेक प्रयोग किए हैं। उनकी भाषा में चित्रात्मकता, ध्वन्यात्मकता, लयात्मकता, नाद-सौंदर्य आदि गुण देखे जा सकते हैं। मूलतः उनका काव्य प्रतीकों तथा बिंबों के लिए प्रसिद्ध है। उनके बारे में रंजना अरगड़े लिखती हैं-“शमशेर को कवियों का कवि इसी अर्थ में कहते हैं कि उनकी कविता में हिंदी भाषा की अभिव्यक्ति-क्षमता खिलती-खुलती नज़र आती है। ऐसी बात नहीं है कि उन्होंने हिंदी भाषा को अभिव्यक्ति के उच्चतम शिखर तक पहुँचा दिया है पर आने वाले कवियों के समक्ष उन्होंने अनेक संभावनाएँ खोल दी हैं।”

उषा कविता का सार

प्रश्न-
शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित कविता ‘उषा’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘उषा’ कविता कविवर शमशेर बहादुर सिंह द्वारा रचित एक लघु कविता है जिसमें कवि ने सूर्योदय से पूर्व पल-पल परिवर्तित प्रकृति का शब्द-चित्र प्रस्तुत किया है : भोर होने से पहले आकाश का रंग गहरा नीला होता है। इसकी तुलना कवि शंख के साथ करता है परंतु कुछ ही क्षणों के बाद उसमें नमी आ जाती है जिसमें वह राख से लीपे हुए चौके के समान दिखने लगता है। अगले क्षणों में उसमें सूर्य की लालिमा मिल जाती है जिसके फलस्वरूप ऐसा लगता है कि मानों लाल केसर से धुली काली सिल हो अथवा ऐसे लगता है कि मानों काली सिल पर किसी ने लाल खड़िया चाक लगा दी है। थोड़ी ही देर में सूर्य का प्रकाश प्रकट होने लगता है। इस स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि मानों नीले जल में किसी की गोरी देह झिलमिला रही हो। इस प्रकार उषा का जादू समाप्त हो जाता है और सूर्योदय होने पर सारा आकाश प्रकाश से जगमगाने लगता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि उषा का सौंदर्य प्रति क्षण बदलता रहता है। यहाँ कवि ने उषा के सौंदर्य को देखने का प्रयास नहीं किया, बल्कि उसे पृथ्वी के परिवेश से जोड़कर प्रस्तुत किया है।

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Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 5 सहर्ष स्वीकारा है Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 12th Class Hindi सहर्ष स्वीकारा है Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
टिप्पणी कीजिए; गरबीली गरीबी, भीतर की सरिता, बहलाती सहलाती आत्मीयता, ममता के बादल।
उत्तर:
(क) गरबीली गरीबी कवि को अपने गरीब होने का कोई दुख नहीं है, बल्कि वह अपनी गरीबी पर भी गर्व करता है। उसे गरीबी के कारण न तो हीनता की अनुभूति होती है और न ही कोई ग्लानि। कवि स्वाभिमान के साथ जी रहा है।

(ख) भीतर की सरिता-इसका अभिप्राय यह है कि कवि के हृदय में असंख्य कोमल भावनाएँ हैं। नदी के पानी के समान ये कोमल भावनाएँ उसके हृदय में प्रवाहित होती रहती हैं।

(ग) बहलाती सहलाती आत्मीयता कवि के हृदय में प्रियतम की आत्मीयता है। इस आत्मीयता के दो विशेषण हैं बहलाती एवं सहलाती। यह आत्मीयता कवि को न केवल बहलाने का काम करती है, बल्कि उसके दुख-दर्द और
पीड़ा को सहलाती भी है और उसकी सहनशक्ति को बढ़ाती है।

(घ) ममता के बादल-जैसे ग्रीष्म ऋतु में बादल बरसकर हमें आनंदित करते हैं उसी प्रकार प्रेम की कोमल भावनाएँ कवि को आनंदानुभूति प्रदान करती हैं।

प्रश्न 2.
इस कविता में और भी टिप्पणी-योग्य पद-प्रयोग हैं। ऐसे किसी एक प्रयोग का अपनी ओर से उल्लेख कर उस पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
(क) दक्षिणी ध्रुवी अंधकार-अमावस्या-जिस प्रकार दक्षिणी ध्रुव में अमावस्या जैसा धना काला अंधकार छाया रहता है, उसी प्रकार कवि अपने प्रियतम के वियोग रूपी घनघोर अंधकार में डूबना चाहता है। कवि की इच्छा है कि वियोग की गहरी अमावस उसके चेहरे, शरीर और हृदय में व्याप्त हो जाए।

(ख) विचार वैभव-यहाँ कवि स्पष्ट करता है कि धन का वैभव तो स्थायी नहीं होता, लेकिन विचारों की संपत्ति स्थायी होने के साथ-साथ मानवता का कल्याण करती है। कबीर, तुलसी, सूरदास आदि अपनी विचार संपदा के ही कारण महान कवि कहलाते हैं।

(ग) रमणीय उजेला-उजाला हमेशा प्रिय लगता है। कवि भी अपने प्रियतम के स्नेह उजाले से आच्छादित है। परंतु कवि के लिए यह मनोरम उजाला भी अब असहनीय हो गया है। कवि उससे मुक्त होना चाहता है।

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प्रश्न 3.
व्याख्या कीजिए-
जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!
उपर्युक्त पंक्तियों की व्याख्या करते हुए यह बताइए कि यहाँ चाँद की तरह आत्मा पर झुका चेहरा भूलकर अंधकार-अमावस्या में नहाने की बात क्यों की गई है?
उत्तर:
कवि उस अनंत सत्ता को संबोधित करता हुआ कहता है कि मुझे यह भी पता नहीं है कि तुम्हारे और मेरे बीच स्नेह का न जाने ऐसा कौन-सा रिश्ता और संबंध है कि मैं जितना भी अपने हृदय के स्नेह को व्यक्त करता हूँ अथवा लोगों में उसे बाँटता हूँ, उतना ही वह बार-बार भर जाता है। ऐसा लगता है कि मानों मेरे हृदय में कोई मधुर झरना है जिससे लगातार स्नेह की वर्षा होती रहती है अथवा मेरे भीतर प्रेम की कोई नदी (झरना) है जो हमेशा स्नेह रूपी जल से छलकती रहती है। मेरे हृदय में तो तुम्हारा ही प्रेम विद्यमान है। मेरे हृदय में तुम्हारा यह प्रसन्न चेहरा इस प्रकार विद्यमान रहता है, जैसे पृथ्वी पर रात के समय चंद्रमा मुस्कुराता रहता है अर्थात् जैसे चाँद रात को रोशनी देता है, उसी प्रकार हे मेरे ईश्वर! तुम मेरे हृदय को प्रेम से प्रकाशित करते रहते हो।

प्रश्न 4.
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।
(क) यहाँ अंधकार-अमावस्या के लिए क्या विशेषण इस्तेमाल किया गया है और उससे विशेष्य में क्या अर्थ जुड़ता है? (ख) कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में किस स्थिति को अमावस्या कहा है?

(ग) इस स्थिति से ठीक विपरीत ठहरने वाली कौन-सी स्थिति कविता में व्यक्त हुई है? इस वैपरीत्य को व्यक्त करने वाले शब्द का व्याख्यापूर्वक उल्लेख करें।

(घ) कवि अपने संबोध्य (जिसको कविता संबोधित है कविता का ‘तुम’) को पूरी तरह भूल जाना चाहता है, इस बात को प्रभावी तरीके से व्यक्त करने के लिए क्या युक्ति अपनाई है? रेखांकित अंशों को ध्यान में रखकर उत्तर दें।
उत्तर:
(क) कवि ने ‘अंधकार-अमावस्या के लिए दक्षिण ध्रुवी विशेषण का प्रयोग किया है। इस विशेषण के प्रयोग से विशेष्य अंधकार की सघनता का पता चलता है अर्थात् अंधकार घना और काला है। कवि अपने प्रियतम को भूलकर इसी घने अंधकार में लीन हो जाना चाहता है।

(ख) कवि ने व्यक्तिगत संदर्भ में अपने प्रियतम की वियोग-जन्य वेदना एवं निराशा की स्थिति को अमावस्या की संज्ञा दी है। अतः इस स्थिति के लिए ‘अमावस्या’ शब्द का प्रयोग सर्वथा उचित एवं सटीक है।

(ग) वर्तमान स्थिति है-दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या की। यह स्थिति कवि वियोगावस्था से उत्पन्न पीड़ा की परिचायक है। इसकी विपरीत स्थिति है-‘तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित रहने का रमणीय उजेला’ जो कि कवि के संयोग प्रेम को व्यंजित करता है। एक ओर कवि ने वियोग-जन्य निराशा को गहरी अमावस्या के माध्यम से व्यक्त किया है। प्रथम स्थिति निराशा को व्यक्त करती है। इसीलिए कवि ने अमावस के अंधकार की बात की है। द्वितीय स्थिति आशा को व्यक्त करती है जो कि प्रेम की संयोगावस्था से संबंधित है। इसलिए कवि ने ‘रमणीय उजेला’ की बात की है।

(घ) कवि अपने संबोध्य को पूरी तरह भूल जाना चाहता है। इस स्थिति की तुलना कवि ने अमावस्या के साथ की है जहाँ चंद्रमा नहीं होता बल्कि घना काला अंधकार होता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि कवि अपने प्रियतम रूपी चाँद से सर्वथा अलग-थलग एकाकी जीवन व्यतीत करना चाहता है। कवि अपने प्रियतम के बिना अंधकार में डूब जाना चाहता है। वह अब वियोग से उत्पन्न पीड़ा को झेलना चाहता है। इस स्थिति के लिए कवि ने ‘शरीर पर चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं झेलू मैं/ उसी में नहा लूँ मैं’ आदि शब्दों का प्रयोग किया है अर्थात् कवि विरह को अपने शरीर तथा हृदय में झेलना चाहता है, उसमें नहा लेना चाहता है। कवि अपने प्रियतम के वियोग की पीड़ा के अंधकार में नहा लेना चाहता है।

प्रश्न 5.
बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है-और कविता के शीर्षक ‘सहर्ष स्वीकारा है’ में आप कैसे अंतर्विरोध पाते हैं। चर्चा कीजिए।
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में कवि ने दो विपरीत स्थितियों की चर्चा की है। कवि अपने उस प्रियतम की प्रत्येक वस्तु अथवा दृष्टिकोण को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता है। प्रथम स्थिति वह है जब कवि प्रेम के संयोग पक्ष को भोग रहा है। लेकिन अब कवि के लिए यह स्थिति असहनीय बन गई है। कवि प्रियतम की आत्मीयता को त्यागना चाहता है और उससे दूर रहकर वियोग आरोह (भाग 2) [गजानन माधव मुक्तिबोध] के अंधकार में डूब जाना चाहता है। अतः बहलाती सहलाती आत्मीयता से कवि दूर जाना चाहता है। यहाँ स्वीकार और अस्वीकार का भाव होने के कारण अंतर्विरोध है।

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कविता के आसपास

प्रश्न 1.
अतिशय मोह भी क्या त्रास का कारक है? माँ का दूध छूटने का कष्ट जैसे एक ज़रूरी कष्ट है, वैसे ही कुछ और ज़रूरी कष्टों की सूची बनाएँ।
उत्तर:
अतिशय मोह निश्चय से दुखदायक होता है। सांसारिक मोह-माया के कारण ही मनुष्य अनेक गलत काम कर बैठता है। संतान-मोह के कारण लोग भ्रष्ट तरीकों से धन कमाते हैं और प्रिया के कारण माँ-बाप को भी त्याग देते हैं।

बच्चा माँ का दूध छोड़ना नहीं चाहता है। लेकिन बच्चे को माँ का दूध छोड़ना पड़ता है। धीरे-धीरे बच्चा इस कष्ट को भूल जाता है। कुछ विद्यार्थी घर-परिवार त्यागकर दूर देश में शिक्षा-प्राप्ति के लिए जाते हैं। घर का मोह छोड़ना उन्हें पीड़ादायक लगता है, लेकिन भावी जीवन का निर्माण करने के लिए उन्हें यह कष्ट सहना पड़ता है। लोग रोजगार पाने के लिए विदेशों में जाते हैं। घर का मोह उन्हें भी कुछ समय के लिए कष्ट पहुंचाता है। इसी प्रकार सैनिक युद्ध में भाग लेने के लिए उत्साहित रहता है। परंतु घर त्यागते समय उसे भी कष्ट की अनुभूति होती है। लेकिन वह इस कष्ट की परवाह न करके युद्ध लड़ने के लिए जाता है और देश के लिए कभी अपने प्राण तक न्योछावर कर देता है।

प्रश्न 2.
‘प्रेरणा’ शब्द पर सोचिए और उसके महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए जीवन के वे प्रसंग याद कीजिए जब माता-पिता, दीदी-भैया, शिक्षक या कोई महापुरुष/महानारी आपके अँधेरे क्षणों में प्रकाश भर गए।
उत्तर:
प्रेरणा का अर्थ है-आगे बढ़ने अथवा उन्नति करने की भावना उत्पन्न करना। संसार का प्रत्येक महापुरुष किसी-न-किसी महान् व्यक्ति, शिक्षक अथवा माता-पिता से प्रेरणा प्राप्त करके महान् काम करने में सफल हुआ। वीर शिवाजी ने अपनी माता जीजाबाई से प्रेरणा प्राप्त करके औरंगजेब के अत्याचारों से देश के एक भाग को मुक्त कराया और मराठा राज्य की स्थापना की। हम सब किसी-न-किसी से प्रेरणा प्राप्त करके कोई अच्छा काम कर जाते हैं। श्रीराम का आदर्श आज भी हमारे लिए प्रेरणा-स्रोत है। मैंने अपने बड़े भाई से प्रेरणा प्राप्त करके ही पढ़ना शुरू किया। पहले मैं दिन-भर खेल-कूद में लगा रहता था। मेरी बड़ी बहन पिता जी से प्रेरणा प्राप्त करके डॉक्टर बन सकी। हम सभी किसी-न-किसी से प्रेरणा प्राप्त करके ही आगे बढ़ते हैं।

प्रश्न 3.
‘भय’ शब्द पर सोचिए। सोचिए कि मन में किन-किन चीजों का भय बैठा है? उससे निबटने के लिए आप क्या करते हैं और कवि की मनःस्थिति से अपनी मनःस्थिति की तुलना कीजिए।
उत्तर:
भय का अर्थ है-डर। भय के अनेक प्रकार हैं। आज के भौतिकवादी युग में भय कदम-कदम पर हमारे साथ लगा रहता है। भय का क्षेत्र अत्यधिक व्यापक एवं विस्तृत है। विद्यार्थियों को परीक्षा में फेल होने का भय लगा रहता है अथवा अच्छे अंक प्राप्त न करने का भी भय लगा रहता है। किसी विशेष विद्यालय अथवा महाविद्यालय में प्रवेश न मिलने का भय अथवा शिक्षा-प्राप्ति के पश्चात् उचित रोजगार न मिलने का भय हमारे पीछे लगा रहता है। लेकिन यदि हम जीवन में सकारात्मक दृष्टिकोण लेकर काम करते हैं तो भय से छुटकारा पाया जा सकता है। भय तो कदम-कदम पर हमारे सामने खड़ा है, लेकिन इसका डट कर सामना करना चाहिए। यदि हम सोच-समझकर योजनाबद्ध तरीके से काम करेंगे तो ही भय से बचा जा सकेगा। फिर भी हमें जीवन की प्रत्येक स्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। इस मनःस्थिति के साथ हम बुरे-से-बुरे परिणाम का भी सामना कर सकते हैं।

कवि की मनःस्थिति से हमारी मनःस्थिति सर्वथा अलग है। हमें आज के जीवन में कदम-कदम पर संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन हम विद्यार्थी बुरी-से-बुरी स्थिति के लिए तैयार हैं। हमें तो आगे बढ़ना है, परिश्रम करना है और आने वाले काल में अपने देश के गौरव को ऊँचा उठाना है।

HBSE 12th Class Hindi सहर्ष स्वीकारा है Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
जिंदगी में जो कुछ है, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है;
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है।
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है

विशेष-

  1. यहाँ कवि स्पष्ट करता है कि जीवन के सुख-दुख, गरीबी, गंभीरता, वैचारिक मौलिकता आदि से कवि को इसलिए प्यार है क्योंकि उसका प्रिय भी इनसे प्यार करता है।
  2. कवि का प्रिय अज्ञात है।
  3. ‘गरबीली गरीबी’ का प्रयोग कवि के स्वाभिमान को व्यंजित करता है।
  4. ‘भीतर की सरिता’ एक सफल लाक्षणिक प्रयोग है जो कि कवि की गहन आंतरिक अनुभूतियों को व्यंजित करता है। ‘अभिनव’ विशेषण अनुभूतियों की मौलिकता की ओर संकेत करता है।
  5. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार (सहर्ष स्वीकारा, गरबीली गरीबी, विचार-वैभव) की छटा दर्शनीय है।
  8. ‘भीतर की सरिता’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  9. संबोधनात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का प्रयोग है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए-
जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है!

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने अज्ञात प्रिय के प्रति अपनी प्रेमानुभूति व्यक्त की है।
  2. संपूर्ण पद्य में प्रश्न तथा संदेह अलंकारों के प्रयोग के कारण रहस्यात्मकता का समावेश हो गया है।
  3. ‘भर-भर फिर’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
  4. ‘झरना’ तथा ‘मीठे पानी का सोता’ दोनों में रूपकातिशयोक्ति अलंकार है।
  5. ‘मुसकाता चाँद ……………….चेहरा है’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  7. शब्द-चयन सर्वथा सटीक एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. संबोधन शैली है तथा मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
  9. माधुर्य गुण है तथा श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
ममता के बादल की मँडराती कोमलता-
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है!!

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने स्वीकार किया है कि उसके प्रिय की ममता उसके हृदय को पीड़ा पहुँचाने लगी है। अतः प्रिय का स्नेह उसके लिए असहय हो गया है।
  2. ‘ममता के बादल’ में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘आत्मीयता’ तथा ‘कोमलता’ दोनों भावनाओं का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
  4. ‘छटपटाती छाती’ में अनुप्रास अलंकार है तथा संपूर्ण पद्यांश में स्वर मैत्री है।
  5. ‘मँडराती कोमलता भीतर पिराती’ में भी अनुप्रास अलंकार है।।
  6. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-योजना सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  8. प्रसाद गुण है तथा मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य सौंदर्य स्पष्ट कीजिए
सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिलकुल मैं लापता
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है !!

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने प्रिय के प्रति पूर्णतया समर्पित होने का वर्णन किया है। उसके प्रेम में अनन्य गहराई है। लेकिन वह प्रेम के संयोग पक्ष को छोड़कर वियोग पक्ष को भोगना चाहता है।
  2. ‘दंड दो’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘पाताली अँधेरे की गुहाओं …………………बादलों में’ में लाक्षणिकता है।
  4. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सरल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. संबोधन शैली है तथा कवि की आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति हुई है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सहर्ष स्वीकारा है’ शीर्षक कविता का प्रतिपाद्य (उद्देश्य) मूलभाव संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ मुक्तिबोध की एक महत्त्वपूर्ण कविता है। इसमें कवि ने जीवन के सुख-दुख तथा कोमल-कठोर स्थितियों को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करने का वर्णन किया है। कवि कहता है कि वह स्वयं को हमेशा अपने प्रिय से जुड़ा हुआ अनुभव करता है। कारण यह है कि यह सब उसके प्रिय की ही देन है। उसका पूरा जीवन अपने प्रिय की संवेदनाओं से संबद्ध है। कवि के मन में प्रेम का जो झरना प्रवाहित हो रहा है, वह उसके प्रिय की ही देन है। परंतु कवि स्वयं को प्रिय के प्रेम को निभाने में असमर्थ अनुभव करता है, जिसके लिए वह दंड भोगना चाहता है। वह कहता है कि उसे अंधेरी गुफाओं का निर्वासन मिल जाए, जहाँ वह प्रिय से अलग होकर उसकी यादों के सहारे अपने जीवन को व्यतीत कर सकेगा। ऐसी स्थिति में भी वह अपने प्रिय से जुड़ सकेगा।

प्रश्न 2.
कवि ने किसे सहर्ष स्वीकारा है?
उत्तर:
कवि ने अपने जीवन के सुख-दुख, गरबीली गरीबी, जीवन के गहरे अनुभवों आदि सब को सहर्ष स्वीकार किया है। कवि ने अपने भीतर प्रवाहित होने वाली नूतन भावनाओं के प्रवाह और प्रिय के संयोग तथा वियोग दोनों को सहर्ष स्वीकार किया है।

प्रश्न 3.
कवि के पास जो अच्छा-बुरा है, उसमें कौन-सी विशिष्टता तथा मौलिकता है?
उत्तर:
कवि के पास अच्छा-बुरा बहुत कुछ है। उसके पास गरबीली गरीबी है। गहरे अनुभव तथा प्रौढ़ विचार भी हैं। इसके साथ-साथ उसके पास कुछ नूतन भावनाएँ भी हैं। कवि की ये सब उपलब्धियाँ मौलिक तथा विशिष्ट हैं। कारण यह है कि कवि ने इन्हें अपने प्रिय के प्रेम के कारण प्राप्त किया है। ये इसलिए भी मौलिक हैं कि कवि ने इनको अपने जीवन में खूब भोगा है।

प्रश्न 4.
मुसकाता चाँद किसका प्रतीक है?
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में चाँद कवि के प्रिय के आलोक अथवा उसके खिले हुए चेहरे का प्रतीक है। इसलिए कवि कहता है कि जिस प्रकार चाँद रात भर धरती पर अपना प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार प्रिय का चेहरा कवि को आनंद प्रदान करता है।

प्रश्न 5.
कवि पाताली अँधेरे की गुफाओं के विवरों में लापता होने का दंड क्यों भोगना चाहता है?
उत्तर:
कवि अब प्रिय के अत्यधिक प्रेम को सहन नहीं करना चाहता। वह सोचता है कि प्रिय के प्यार के बिना विरह-वेदना सहकर उसका व्यक्तित्व अत्यधिक सुदृढ़ हो जाएगा। प्रिय के प्रेम के संयोग पक्ष को भोगकर उसकी आत्मा तथा उसकी संकल्प-शक्ति दोनों ही कमजोर हो गए हैं। इसलिए वह विरह के पाताली अँधेरे की गुहाओं में लापता हो जाना चाहता है।

प्रश्न 6.
जितना भी उड़ेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
इन पद्य पंक्तियों का भावार्थ क्या है?
उत्तर:
कवि यह कहना चाहता है कि उसने स्नेह को खुलकर लोगों में बाँटा है। लेकिन जितना वह इसे बाँटता है, उतना ही और बढ़ता जाता है। लगता है कि कवि के हृदय में प्रेम का एक झरना प्रवाहित हो रहा है। यह झरना मानों मीठे पानी का सोता है, जो भी नहीं सूखता। कवि अन्य लोगों में इस स्नेह को जितना अधिक बाँटता है, उतना ही वह झरना और भरता चला जाता है।

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प्रश्न 7.
कवि के लिए प्रेम का सुखद पक्ष असह्य क्यों बन गया है?
उत्तर:
कवि सोचता है कि प्रेम के सुखद पक्ष के कारण उसके मन में प्रिय की ममता बादलों के समान मँडराती रहती है जिससे उसकी आत्मा कमजोर और असमर्थ हो गई है। प्रिय के प्रेम के कारण उसका अपना व्यक्तित्व भी कमज़ोर होता जा रहा है। इसलि कवि प्रिय के वियोग का दंड भोगना चाहता है। वह यह भी सोचता है कि प्रिय की प्रेममयी यादें अकेलेपन में भी उसे प्रसन्न रखेंगी।

प्रश्न 8.
कवि ने अपने जीवन में सब कुछ सहर्ष क्यों स्वीकार किया है?
उत्तर:
कवि ने अपने जीवन में जो कुछ भी भोगा है अर्थात् सुख-दुख जो कुछ भी पाया है चाहे वह गरीबी हो या विचार वैभव; वह सब उसके प्रिय को भी प्यारा है। कवि की इन उपलब्धियों के पीछे उसके प्रिय की प्रेरणा काम करती रही है। इसलिए उसने अपने जीवन में सब कुछ सहर्ष स्वीकार किया है।

प्रश्न 9.
कवि पाताली अँधेरे की गुहाओं में और विवरों में तथा धुएँ के बादलों में लापता क्यों होना चाहता है?
उत्तर:
कवि अपने प्रिय के स्नेह के संयोग पक्ष से अब छुटकारा चाहता है। वह सोचता है कि उसके प्रेम में ग्लानि छिपी हुई है। अतः वह प्रिय के प्रेम के संयोग पक्ष के उजाले को सहन नहीं कर पाता। इसलिए वह पाताली अंधेरे की गुफाओं अर्थात् वियोग के धुएँ के बादलों में लापता हो जाना चाहता है।

प्रश्न 10.
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए कि कवि एक स्वाभिमानी व्यक्ति है।
उत्तर:
कवि ने अपनी गरीबी को गरबीली कहा है। वह अपनी गरीबी के कारण स्वयं को लाचार अनुभव नहीं करता और न ही किसी की सहानुभूति चाहता है, बल्कि कवि ने गरीबी की बजाय अपनी मौलिक वैचारिकता को अधिक महत्त्व दिया है।

प्रश्न 11.
‘जाने क्या रिश्ता है?’ का गूढ़ अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि और उसके प्रिय के बीच एक विचित्र प्रकार का संबंध है। जितना वह अपने प्रेम को व्यक्त करता है, उतना ही वह भर-भर आता है। भाव यह है कि कवि का प्रेम अनंत और गहरा है। कवि पूर्णतया अपने प्रिय के प्रति समर्पित है। उसका प्रेम प्रगाढ़ है।

प्रश्न 12.
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता के आधार पर कविवर मुक्तिबोध के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इस कविता के पढ़ने से पता चलता है कि मुक्तिबोध का व्यक्तित्व गंभीर, विचारशील, सुदृढ़ होने के साथ-साथ मौलिक चिंतन की छाप लिए हुए है। भले ही कवि गरीब है, लेकिन उसे अपनी गरीबी पर भी गर्व है। कवि ने धन का संग्रह करने के लिए अनुचित साधनों का कभी भी प्रयोग नहीं किया। वे विचार-वैभव की तुलना में धन-वैभव को तुच्छ मानते थे। उनके पास एक गहरी सोच और समृद्ध विचार सपंदा थी। कवि की अभिव्यक्ति पूर्णतया मौलिक थी।

प्रश्न 13.
क्या प्रेम के संयोग पक्ष के साथ-साथ वियोग पक्ष भी आवश्यक है? कविता के आधार पर सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में मुक्तिबोध ने प्रेम के संयोग पक्ष के साथ-साथ वियोग पक्ष को भी आवश्यक माना है। इसीलिए तो वह कहता है कि “जो कुछ भी मेरा है, वह तुम्हें प्यारा है।” आगे चलकर कवि अपने विभिन्न रिश्ते की बात करता है। वह प्रिय के प्रसन्न चेहरे की तुलना मुसकाते चाँद के साथ करता है। परंतु अगली पंक्तियों में वह प्रिय को भूलने का दंड भोगना चाहता है। वह प्रिय के रमणीय उजाले को सहन नहीं कर पाता और उसके वियोग को पाना चाहता है, क्योंकि कवि को लगता है कि इस स्थिति में उसे प्रिय का सहारा प्राप्त होगा। कवि के विचारानुसार प्रेम के संयोग और वियोग दोनों पक्षों में ही प्रेम की संपूर्णता है।

प्रश्न 14.
ममता सदा हितकर क्यों नहीं होती?
उत्तर:
ममता मनुष्य को पंगु कर देती है। ममता देने वाला व्यक्ति अपने प्रिय को प्रेम के उजाले से आच्छादित कर देता है जिससे प्रिय-पात्र का आत्मविश्वास कमज़ोर पड़ जाता है। वह प्रिय की कृपा पर ही निर्भर हो जाता है। उसका आत्मबल नष्ट हो जाता है। अतः ममता के सहारे अधिक समय तक निर्भर न रहकर मनुष्य को अपने व्यक्तित्व को दृढ़ करना चाहिए।

प्रश्न 15.
कवि दंड किसे और क्यों कहता है?
उत्तर:
अपने प्रिय से वंचित होने के अनुभव को ही कवि ने दंड कहा है। इसीलिए कवि ने अपने प्रिय से विमुक्त होने की कामना की है। प्रथम स्थिति में कवि को प्रिय की आत्मीयता बहलाती और सहलाती है। उसे लगता है कि वह प्रिय के बिना जी नहीं पाएगा। अतः दूसरी स्थिति में वियोग का दंड भोगना चाहता है ताकि वह अपने व्यक्तित्व को सुदृढ़ कर सके।

प्रश्न 16.
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है-इस पंक्ति का भावार्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
कवि को प्रिय के संयोग जनित प्रकाश अर्थात् सुखानुभूति से भविष्य की आशंकाएँ डराने लगी हैं। यह सोचकर कवि की छाती अर्थात् हृदय छटपटाने लगता है कि यदि भविष्य में उसे प्रिय का प्रेम नहीं मिलेगा तो वह कैसे जी सकेगा? प्रिय के बिना उसका क्या होगा?

प्रश्न 17.
कवि अपने प्रिय को क्यों नहीं भूल पाता?
उत्तर:
कवि अपने प्रिय को इसलिए नहीं भूल पाता, क्योंकि उसका जीवन प्रिय से अत्यधिक प्रभावित रहा है। प्रिय ने उसके जीवन की सभी कमजोरियों तथा उपलब्धियों को स्वीकार किया है और गरीबी में भी उसका साथ दिया है। कवि के प्रत्येक संवेदन को जागृत करने में उसके प्रिय का सहयोग रहा है। उसके बिना तो वह जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।

प्रश्न 18.
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता किसको व क्यों स्वीकारने की प्रेरणा देती है?
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता हमें जीवन के सुख-दुख, क्षमता अक्षमता तथा गरीबी-अमीरी आदि सभी उपलब्धियों को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है। हमारा प्रेरणा-स्रोत अर्थात् प्रिय इन सब स्थितियों को स्वीकार कर लेता है। इसलिए हमारे प्रेरणा-स्रोत अर्थात् प्रिय हमारे लिए वरदान के समान हैं। अतः कवि के अनुसार गरबीली गरीबी, मौलिक विचार तथा गहरे अनुभव सभी स्वीकार करने योग्य हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. मुक्तिबोध का जन्म कब हुआ?
(A) 13 नवंबर, 1918
(B) 13 नवंबर, 1917
(C) 13 दिसंबर, 1920
(D) 10 नवंबर, 1922
उत्तर:
(B) 13 नवंबर, 1917

2. मुक्तिबोध का पूरा नाम क्या है?
(A) गजानन माधव मुक्तिबोध
(B) गजाधर मुक्तिबोध
(C) राम माधव मुक्तिबोध
(D) दयानंद माधव मुक्तिबोध
उत्तर:
(A) गजानन माधव मुक्तिबोध

3. मुक्तिबोध का जन्म किस प्रदेश में हुआ?
(A) उत्तरप्रदेश में
(B) दिल्ली में
(C) मध्यप्रदेश में
(D) राजस्थान में
उत्तर:
(C) मध्यप्रदेश में

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4. मुक्तिबोध का जन्म कहाँ हुआ?
(A) मुरैना जनपद के शिवपुर कस्बे में
(B) मुरैना जनपद के रामपुर कस्बे में
(C) ग्वालियर जनपद के श्योपुर में
(D) भिंड जनपद के कृष्णापुरा में
उत्तर:
(C) ग्वालियर जनपद के श्योपुर में

5. मुक्तिबोध के पिता का नाम क्या था?
(A) कृष्णकुमार मुक्तिबोध
(B) रामकुमार मुक्तिबोध
(C) कृष्णमाधव मुक्तिबोध
(D) माधव मुक्तिबोध
उत्तर:
(D) माधव मुक्तिबोध

6. मुक्तिबोध के पिता किस पद पर नियुक्त थे?
(A) आयकर इंस्पैक्टर
(B) पुलिस इंस्पैक्टर
(C) सिविल सप्लाई इंस्पैक्टर
(D) स्वास्थ्य इंस्पैक्टर
उत्तर:
(B) पुलिस इंस्पैक्टर

7. मुक्तिबोध ने किस विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) मुंबई विश्वविद्यालय
(B) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(C) नागपुर विश्वविद्यालय
(D) लखनऊ विश्वविद्यालय
उत्तर:
(C) नागपुर विश्वविद्यालय

8. मुक्तिबोध ने किस वर्ष एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) सन् 1953 में
(B) सन् 1954 में
(C) सन् 1951 में
(D) सन् 1952 में
उत्तर:
(A) सन् 1953 में

9. मुक्तिबोध ने किस विषय में एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) अंग्रेज़ी
(B) भाषा विज्ञान
(C) इतिहास
(D) हिंदी
उत्तर:
(D) हिंदी

10. मुक्तिबोध का निधन कब हुआ?
(A) 12 सितंबर, 1963
(B) 11 सितंबर, 1964
(C) 18 जनवरी, 1960
(D) 11 सितंबर, 1965
उत्तर:
(B) 11 सितंबर, 1964

11. मुक्तिबोध का निधन किस रोग से हुआ?
(A) मलेरिया
(B) क्षय रोग
(C) मधुमेह
(D) मैनिनजाइटिस
उत्तर:
(D) मैनिनजाइटिस

12. मुक्तिबोध का निधन कहाँ हुआ?
(A) नयी दिल्ली
(B) नागपुर
(C) ग्वालियर
(D) मुरैना
उत्तर:
(A) नयी दिल्ली

13. मुक्तिबोध की आरंभिक रचनाएँ किस पत्रिका में प्रकाशित हुईं?
(A) नवजीवन
(B) दिनमान
(C) सरिता
(D) कर्मवीर
उत्तर:
(D) कर्मवीर

14. मुक्तिबोध ने कहाँ पर ‘मध्य भारत प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना की?
(A) नागपुर
(B) उज्जैन
(C) ग्वालियर
(D) मुरैना
उत्तर:
(B) उज्जैन

15. हँस पत्रिका’ के संपादकीय विभाग में मुक्तिबोध ने कब स्थान प्राप्त किया?
(A) सन् 1943 में
(B) सन् 1942 में
(C) सन् 1945 में
(D) सन् 1946 में
उत्तर:
(C) सन् 1945 में

16. मुक्तिबोध ने किस कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया?
(A) दिग्विजय कॉलेज
(B) एस०डी० कॉलेज
(C) डी०ए०वी० कॉलेज
(D) नागपुर कॉलेज
उत्तर:
(A) दिग्विजय कॉलेज

17. ‘तार सप्तक’ में मुक्तिबोध की कितनी कविताएँ प्रकाशित हुईं?
(A) बारह कविताएँ
(B) सत्रह कविताएँ
(C) अट्ठाईस कविताएँ
(D) पंद्रह कविताएँ
उत्तर:
(B) सत्रह कविताएँ

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18. ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में कुल कितनी कविताएँ सम्मिलित हैं?
(A) 18
(B) 16
(C) 28
(D) 27
उत्तर:
(C) 28

19. ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ के रचयिता हैं
(A) धर्मवीर भारती
(B) रघुवीर सहाय
(C) शमशेर बहादुर सिंह
(D) मुक्तिबोध
उत्तर:
(D) मुक्तिबोध

20. ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ किस विधा की रचना है?
(A) कविता संग्रह
(B) प्रबंध काव्य
(C) नाटक
(D) निबंध
उत्तर:
(A) कविता संग्रह

21. ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ के कवि का नाम है
(A) हरिवंश राय बच्चन
(B) मुक्तिबोध
(C) रघुवीर सहाय
(D) निराला
उत्तर:
(B) मुक्तिबोध

22. ‘काठ का सपना’ के रचयिता हैं
(A) अज्ञेय
(B) नागार्जुन
(C) मुक्तिबोध
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(C) मुक्तिबोध

23. ‘सतह से उठता आदमी किस विधा की रचना है?
(A) नाटक
(B) काव्य संग्रह
(C) निबंध संग्रह
(D) कथा साहित्य
उत्तर:
(D) कथा साहित्य

24. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ मुक्तिबोध की किस काव्य रचना में संकलित है?
(A) भूरी-भूरी खाक धूल
(B) चाँद का मुँह टेढ़ा है
(C) काठ का सपना
(D) विपात्र
उत्तर:
(A) भूरी-भूरी खाक धूल

25. ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’ के रचयिता हैं
(A) हरिवंशराय बच्चन
(B) रघुवीर सहाय
(C) आलोक धन्वा
(D) मुक्तिबोध
उत्तर:
(D) मुक्तिबोध

26. ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) कथा साहित्य
(C) आलोचना
(D) काव्य संग्रह
उत्तर:
(C) आलोचना

27. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता किसे संबोधित है?
(A) कवि के प्रिय को
(B) पाठकों को
(C) साहित्यकारों को
(D) ईश्वर को
उत्तर:
(A) कवि के प्रिय को

28. ‘भीतर की सरिता’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) रूपक
(C) अनुप्रास
(D) रूपकातिशयोक्ति
उत्तर:
(D) रूपकातिशयोक्ति

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29. ‘गरबीली गरीबी’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) अनुप्रास
(C) श्लेष
(D) रूपक
उत्तर:
(B) अनुप्रास

30. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) चौपाई
(B) सवैया
(C) मुक्त
(D) दोहा
उत्तर:
(C) मुक्त

31. ‘मीठे पानी का सोता’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) रूपकातिशयोक्ति
(C) रूपक
(D) उपमा
उत्तर:
(B) रूपकातिशयोक्ति

32. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में कवि ने मुख्यतः किस शैली का प्रयोग किया है?
(A) वर्णनात्मक शैली
(B) संबोधन शैली
(C) आलोचनात्मक शैली
(D) गीति शैली
उत्तर:
(B) संबोधन शैली

33. ‘मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) रूपक
(C) उपमा
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(D) उत्प्रेक्षा

34. ‘ममता के बादल’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) उपमा
(C) रूपकातिशयोक्ति
(D) मानवीकरण
उत्तर:
(A) रूपक

35. ममता के बादल की मँडराती कोमलता कहाँ पिराती है?
(A) बाहर
(B) सर्वत्र
(C) भीतर
(D) बीच में
उत्तर:
(C) भीतर

36. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में कवि ने गरीबी को कैसा बताया है?
(A) शर्मीली
(B) सुखदायक
(C) दुखभरी
(D) गरबीली
उत्तर:
(D) गरबीली

37. प्रस्तुत कविता में बहलाती सहलाती आत्मीयता क्या नहीं होती?
(A) बरदाश्त
(B) फालतू
(C) कम
(D) जहरीली
उत्तर:
(A) बरदाश्त

38. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता में कवि की आत्मा कैसी हो गई है?
(A) कमज़ोर
(B) दृढ़
(C) संवेदनशील
(D) सक्षम
उत्तर:
(A) कमज़ोर

39. ‘काठ का सपना’ किस विधा की रचना है?
(A) काव्य संग्रह
(B) कथा साहित्य
(C) नाटक
(D) निबंध संग्रह
उत्तर:
(B) कथा साहित्य

40. ‘सहर्ष स्वीकारा है। कविता में कवि कहाँ लापता होना चाहता है?
(A) वायु में
(B) आकाश में
(C) बादलों में
(D) धुएँ के बादलों में
उत्तर:
(D) धुएँ के बादलों में

41. ‘पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में यहाँ ‘विवरों का क्या अर्थ है?
(A) बादल
(B) बिल
(C) गुफा
(D) शिविर
उत्तर:
(B) बिल

42. ‘सहर्ष स्वीकारा है’ शीर्षक कविता में किस भाव की प्रधानता है?
(A) क्रूरता
(B) रुक्षता
(C) कठोरता
(D) विनय
उत्तर:
(D) विनय

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 5 सहर्ष स्वीकारा है

43. ‘परिवेष्टित’ शब्द का क्या अर्थ है?
(A) पगड़ी
(B) परिजन
(C) चारों ओर से घिरा हुआ
(D) परिक्रमा
उत्तर:
(C) चारों ओर से घिरा हुआ

44. भवितव्यता किसे डराती है?
(A) संपाती को
(B) छाती को
(C) बिलखाती को
(D) पराती को
उत्तर:
(B) छाती को

सहर्ष स्वीकारा है पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर |

[1] ज़िंदगी में जो कुछ है, जो भी है
सहर्ष स्वीकारा है।
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है वह तुम्हें प्यारा है।
गरबीली गरीबी यह, ये गंभीर अनुभव सब
यह विचार-वैभव सब
दृढ़ता यह, भीतर की सरिता यह अभिनव सब
मौलिक है, मौलिक है
इसलिए कि पल-पल में
जो कुछ भी जाग्रत है अपलक है
संवेदन तुम्हारा है!! [पृष्ठ-30]

शब्दार्थ-जिंदगी = जीवन। सहर्ष = प्रसन्नता के साथ। स्वीकारा = मन से माना। गरबीली = अभिमान से भरी हुई। गंभीर = गहरा। विचार-वैभव = विचारों की संपत्ति। दृढ़ता = मजबूती। सरिता = नदी (भावनाओं का प्रवाह)। अभिनव = नया। मौलिक = नया। पल = क्षण। जाग्रत = जागा हुआ जीवित। अपलक = बिना पलकें झपकाए हुए। संवेदन = अनुभूति।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से अवतरित है। इसके कवि गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। इस कविता में कवि यह बताना चाहता है कि जीवन में उसे जो कुछ प्राप्त हुआ है, उसने उसे बड़ी प्रसन्नता के साथ स्वीकार कर लिया है। कवि को किसी प्रकार की शिकायत नहीं है। यहाँ कवि ईश्वर को संबोधित करता हुआ कहता है कि

व्याख्या-मुझे जीवन में जो कुछ मिला है अथवा पाया है, उसे मैंने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया है। मुझे जीवन की उपलब्धियों पर बहुत गर्व है। इसलिए जीवन में मेरा जो कुछ अपना है, वह सब उस अनंत सत्ता को भी प्रिय है। कवि पुनः स्पष्ट करता है कि यह मेरी गर्व भरी गरीबी, मेरे जीवन के गहरे अनुभव, मेरी यह विचार संपदा, मेरे मन की यह मजबूती और मेरे हृदय में जो भावनाओं का एक नया प्रवाह है, वह सब कुछ नया है और मौलिक है। भाव यह है कि उस ईश्वर के कारण ही मैं प्रत्येक स्थिति में खुशी-खशी जी रहा हूँ। तुमने ही मुझे अपनी गरीबी पर गर्व करना सिखाया है। मैंने जीवन के गंभीर अनुभवों तथा विचारों की संपन्नता तुमसे ही प्राप्त की है। मैं अपने इन मौलिक विचारों के साथ दृढ़तापूर्वक जी रहा हूँ। मेरे मन में नवीन विचारों की एक नदी हमेशा प्रवाहित होती रहती है। अतः प्रत्येक क्षण में जो कुछ मेरे अंदर जागता रहता है और लगातार मेरे जीवन को गतिशील बनाता है, उसके पीछे तुम्हारी प्रेरणा ही काम कर रही है। भाव यह है कि मैंने अपने जीवन में उस असीम सत्ता से प्रेरणा प्राप्त करके ही अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने असीम सत्ता को संबोधित किया है। साथ ही जीवन में मिलने वाली उपलब्धियों तथा कमियों को सहर्ष स्वीकार किया है।
  2. रहस्यवादी भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
  3. ‘भीतर की सरिता’ कवि की आंतरिक गहन अनुभूतियों का प्रतीक है।
  4. ‘भीतर की सरिता’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग है तथा ‘पल-पल’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  5. इस पद्य में कवि ने साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है जिसमें संस्कृत के तत्सम् शब्दों के अतिरिक्त उर्दू के शब्दों का मिश्रण किया गया है।
  6. संबोधनात्मक शैली है तथा संपूर्ण कविता में लाक्षणिक पदावली का भी प्रयोग है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) इस कविता में कवि ने किसे संबोधित किया है?
(ग) कवि अपने जीवन को सहर्ष स्वीकार क्यों करता है?
(घ) कवि अपनी उपलब्धियों के लिए किसे श्रेय देता है और क्यों?
(ङ) कवि अपनी किस उपलब्धि पर गर्व करता है?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-गजानन माधव मुक्तिबोध कविता का नाम-सहर्ष स्वीकारा है।

(ख) इस कविता के द्वारा कवि असीम सत्ता को संबोधित करता है।

(ग) कवि अपनी प्रत्येक उपलब्धि को इसलिए प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता है, क्योंकि असीम सत्ता की प्रेरणा से ही उसे यह सब प्राप्त हुआ है। दूसरा, उसकी प्रत्येक उपलब्धि उस असीम सत्ता को भी प्रिय लगती है।

(घ) कवि अपनी उपलब्धियों के लिए उस असीम सत्ता प्रियतम अर्थात् परमात्मा को श्रेय देता है। कारण यह है कि उसी से प्रेरणा पाकर ही कवि अपनी कविताओं में मौलिक अनुभव, विचार तथा अनुभूतियाँ प्राप्त कर पाया है। इसलिए कवि अपनी गरीबी के साथ इन सब पर गर्व करता है।

(ङ) कवि अपनी गरीबी, जीवन के गहरे अनुभव, गंभीर चिंतन, व्यक्तित्व की दृढ़ता तथा मन में प्रवाहित होने वाली भावनाओं की नदी पर गर्व करता है।

[2] जाने क्या रिश्ता है, जाने क्या नाता है
जितना भी उँडेलता हूँ, भर-भर फिर आता है
दिल में क्या झरना है?
मीठे पानी का सोता है
भीतर वह, ऊपर तुम
मुसकाता चाँद ज्यों धरती पर रात-भर
मुझ पर त्यों तुम्हारा ही खिलता वह चेहरा है! [पृष्ठ-30]

शब्दार्थ-रिश्ता = संबंध। उँडेलना = खाली करना, देना। सोता = झरना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से अवतरित है। इसके कवि गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। इसमें कवि स्वीकार करता है कि वह रहस्यात्मक शक्ति ही उसकी प्रेरणा का स्रोत है।

व्याख्या कवि उस अनंत सत्ता को संबोधित करता हुआ कहता है कि मुझे यह भी पता नहीं है कि तुम्हारे और मेरे बीच स्नेह का न जाने ऐसा कौन-सा रिश्ता और संबंध है कि मैं जितना भी अपने हृदय के स्नेह को व्यक्त करता हूँ अथवा लोगों में उसे बाँटता हूँ, उतना ही वह बार-बार भर जाता है। ऐसा लगता है कि मानों मेरे हृदय में कोई मधुर झरना है जिससे लगातार स्नेह की वर्षा होती रहती है अथवा मेरे भीतर प्रेम की कोई नदी (झरना) है जो हमेशा स्नेह रूपी जल से छलकती रहती है। मेरे हृदय में तो तुम्हारा ही प्रेम विद्यमान है। मेरे रा यह प्रसन्न चेहरा इस प्रकार विद्यमान रहता है, जैसे पृथ्वी पर रात के समय चंद्रमा मुस्कुराता रहता है अर्थात् जैसे चाँद रात को रोशनी देता है, उसी प्रकार हे मेरे ईश्वर! तुम मेरे हृदय को प्रेम से प्रकाशित करते रहते हो।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने परमात्मा को संबोधित किया है, क्योंकि वही कवि के लिए प्रेरणा का काम करता है।
  2. संपूर्ण पद्य में प्रश्न तथा संदेह अलंकारों का सफल प्रयोग हुआ है जिसके कारण रहस्यात्मकता उत्पन्न हो गई है।
  3. ‘झरना’ तथा ‘मीठे पानी का सोता’ में रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘मुसकाता चाँद’ ………………. चेहरा है’ में उत्प्रेक्षा अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. ‘भर-भर फिर’ में अनुप्रास तथा पुनरुक्ति प्रकाश अलंकारों का सफल प्रयोग है। इसी प्रकार ‘धरती पर रात-भर’ में अनुप्रास अलंकार है।
  6. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है तथा साथ ही भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. संबोधन शैली का प्रयोग हुआ है तथा मुक्त छंद है।
  8. माधुर्य गुण होने के कारण शृंगार रस का परिपाक हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 5 सहर्ष स्वीकारा है

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) कवि ने अपने प्रिय अर्थात परमात्मा के प्रति अपने रिश्ते को किस प्रकार व्यक्त किया है?
(ग) ‘जितना भी उँडेलता हूँ, उतना ही भर-भर आता है’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(घ) कवि ने अपने दिल के झरने को ‘मीठे पानी का सोता’ क्यों कहा है?
(ङ) कवि ने कौन-से अटूट रिश्ते को प्रकट किया है?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-गजानन माधव मुक्तिबोध कविता का नाम-सहर्ष स्वीकारा है।

(ख) कवि और परमात्मा के मध्य एक कथनीय प्रेम है। कवि ने उस अनंत सत्ता के प्रेम की तुलना एक झरने के साथ की है जो उसे बार-बार भिगोकर आनंद प्रदान करता रहता है। भाव यह है कि कवि का प्रेम रूपी झरना कभी सूखने वाला नहीं है।

(ग) यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि वह अपने हृदय के स्नेह को जितना बाँटता है, वह उतना अधिक बढ़ता जाता है, वह कभी भी कम नहीं होता। इसलिए कवि ने स्वीकार किया है कि उसके हृदय में प्रेम का झरना प्रवाहित हो रहा है।

(घ) ‘मीठे पानी का सोता’ कहने का अभिप्राय यह है कि कवि को अपने मालिक (ईश्वर) के प्रति प्रगाढ़ प्रेम है जो कि कभी समाप्त नहीं हो सकता। यह प्रेम मधुर भी है।

(ङ) इन पंक्तियों में कवि ने आत्मा और परमात्मा के अटूट रिश्ते को प्रकट किया है।

[3] सचमुच मुझे दंड दो कि भूलूँ मैं भूलूँ मैं
तुम्हें भूल जाने की
दक्षिण ध्रुवी अंधकार-अमावस्या
शरीर पर, चेहरे पर, अंतर में पा लूँ मैं
झेलूँ मैं, उसी में नहा लूँ मैं
इसलिए कि तुमसे ही परिवेष्टित आच्छादित
रहने का रमणीय यह उजेला अब
सहा नहीं जाता है।
नहीं सहा जाता है।
ममता के बादल की मँडराती कोमलता-
भीतर पिराती है
कमज़ोर और अक्षम अब हो गई है आत्मा यह
छटपटाती छाती को भवितव्यता डराती है
बहलाती सहलाती आत्मीयता बरदाश्त नहीं होती है!! [पृष्ठ 30-31]

शब्दार्थ-दक्षिण ध्रवी अंधकार = दक्षिण ध्रुव पर गहरा अंधकार। अमावस्या = काली रात। अंतर = हृदय। परिवेष्टित = चारों ओर से घिरा हुआ। आच्छादित = ढका हुआ, छाया हुआ। रमणीय = सुंदर, मनोहर। उजेला = रोशनी, प्रकाश। ममता = मोह-प्रेम । मँडराती = फैली हुई। पिराती = पीड़ा पहुँचाती हुई। अक्षम = कमजोर। भवितव्यता = भविष्य की आशंका। बहलाती मन को प्रसन्न करती हुई। सहलाती = पीड़ा को कम करती हुई। आत्मीयता = अपनापन। बरदाश्त = सहन करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से अवतरित है। इसके कवि गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। इस पद्यांश द्वारा कवि ने अपने परमात्मा से वियोग के दंड का वर्णन किया है। इसके साथ ही अपने आशीर्वाद रूपी प्रकाश को स्वयं से हटाने की बात की है।

व्याख्या-कवि अपने परमात्मा को संबोधित करता हुआ कहता है कि वह अपने जीवन में अहंकार के भाव में आकर उसे भूल गया था। अब वह उससे इस भूल की सजा पाना चाहता है। कवि स्वयं के लिए दक्षिणी ध्रुव पर अमावस की रात्रि के समान फैलने वाले अंधकार जैसी सजा पाना चाहता है। वह उस गहरे अंधकार को अपने शरीर, चेहरे और अन्तर्मन में झेलना चाहता है और इसी में नहाना चाहता है।

कवि सोचता है कि उसका वर्तमान जीवन उस ईश्वर के प्रेम से पूर्णतया घिरा हुआ है। उसके प्रेम का यह उजाला बड़ा ही मनोहर एवं आकर्षक है। परन्तु यह उजाला कवि के लिए असहनीय बन गया है। वह उसे सहन नहीं कर सकता। उस अनंत सत्ता की ममता कवि के मन में बादल के समान छाई हुई है जो उसके हृदय को पीड़ित करती है। इसलिए अब कवि की आत्मा दुर्बल और असमर्थ हो गई है। भविष्य की आशंका उसे डरा रही है और उसकी छाती छटपटा रही है। उस प्रियतम की ममता कवि के हृदय को बहलाती, सहलाती और अपनापन दिखाती है, वह कवि से अब सहन नहीं हो पा रही है। भाव यह है कि कवि अपने अहंकार की सजा पकार अपने पापों से मुक्त होना चाहता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने स्वीकार किया है कि वह अपने ही गर्व के बहाव में बहकर उस परमात्मा को भूल गया है जिसकी वह उस परमात्मा से सजा पाना चाहता है।
  2. ममता के बादल, तुमसे ही …………………. उजेला तथा दक्षिणी ध्रुवी अंधकार-अमावस्या आदि में रूपक अलंकार का सफल प्रयोग है।
  3. आत्मीयता तथा कोमल भावनाओं का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
  4. ‘शरीर पर, चेहरे पर’, ‘मँडराती कोमलता-भीतर पिराती’ और ‘छटपटाती छाती’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. ‘ई’ स्वर के कारण स्वर मैत्री का प्रयोग है।
  6. यहाँ कवि ने संस्कृतनिष्ठ साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है, साथ ही कुछ नवीन शब्दों का भी प्रयोग किया है।
  7. संबोधन शैली है तथा मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।
  8. शांत रस का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि अपने प्रियतम (परमात्मा) से कौन-सा दंड पाना चाहता है और क्यों?
(ख) कवि किस रमणीय उजाले की बात कर रहा है जो उसके लिए असहनीय है?
(ग) कौन-सी भावना कवि को पीड़ा पहुँचाती है?
(घ) कवि अपने भविष्य के प्रति आशंकित क्यों है?
(ङ) कवि ने अपने प्रियतम को भूलने के दुख की तुलना किससे की है? .
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रियतम (परमात्मा) से वियोग का दंड पाना चाहता है। कवि को लगता है कि उस प्रियतम के प्रेम और कोमलता ने उसकी आत्मा को कमजोर बना दिया है। अतः अब वह उसकी ममता को सहन करने में असमर्थ हो गया है। त्ता का प्रेम ही कवि के लिए रमणीय उजाला है जिसे कवि अब सहन नहीं कर पा रहा है। इसलिए कवि अब वियोग का दंड भोगना चाहता है।

(ग) उस अनंत सत्ता की ममता उसके मन में बादल के समान छाई हुई है। यही भावना अब कवि को पीड़ा पहुँचाती है जिससे वह अब मुक्त होना चाहता है।

(घ) कवि अपने भविष्य के प्रति इसलिए आशंकित है, क्योंकि अपराधी होने के कारण उसकी आत्मा छटपटाती रहती है।

(ङ) कवि ने अपने प्रियतम को भूलने के दुख की तुलना दक्षिणी ध्रुवी अमावस्या के साथ की है, जहाँ हमेशा घना काला और गहरा अंधकार छाया रहता है।

[4] सचमुच मुझे दंड दो कि हो जाऊँ
पाताली अँधेरे की गुहाओं में विवरों में
धुएँ के बादलों में
बिलकुल मैं लापता
लापता कि वहाँ भी तो तुम्हारा ही सहारा है!
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
या मेरा जो होता-सा लगता है, होता-सा संभव है
सभी वह तुम्हारे ही कारण के कार्यों का घेरा है, कार्यों का वैभव है
अब तक तो जिंदगी में जो कुछ था, जो कुछ है
सहर्ष स्वीकारा है
इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है
वह तुम्हें प्यारा है। [पृष्ठ-32]

शब्दार्थ-पाताली अँधेरा = धरती के नीचे पाताल में पाया जाने वाला अंधकार। गुहा = गुफा। विवर = बिल। लापता होना = गायब हो जाना। कारण = मूल प्रेरणा। घेरा = फैलाव। वैभव = संपदा, समृद्धि।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ से अवतरित है। इसके कवि गजानन माधव मुक्तिबोध हैं। इसमें कवि कहता है कि उसने अपने प्रियतम भाव परमात्मा की प्रेरणा से आज तक जो प्राप्त किया है उसे उसने प्रसन्नतापर्वक स्वीकार कर लिया है। प्रस्तत पद्यांश द्वारा कवि स्वयं को उस ईश्वर देता है।

व्याख्या-कवि अपनी उस अनंत सत्ता को संबोधित करता हुआ कहता है कि तुम मुझे अपने वियोग का ऐसा दंड दो कि मैं पाताल लोक की अंधेरी गुफाओं की सूनी सुरंगों में और दम घोंटने वाले धुएँ के बादलों में बिल्कुल खो जाऊँ अर्थात् उनमें विलीन हो जाऊँ। मेरा जीवन उस घुटन से भले ही समाप्त हो जाए, पर मुझे इसकी कोई चिंता नहीं है। मैं इस खो जाने वाले अकेलेपन में भी खुश रहूँगा, क्योंकि वहाँ भी मुझे तुम्हारा आश्रय मिलता रहेगा। तुम्हारी यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी। अतः मैंने अपने जीवन में जो कुछ प्राप्त किया है अर्थात् मेरी जो उपलब्धियाँ हैं अथवा स्थितियाँ हैं या जो संभव हो सकती हैं अर्थात् मेरे जीवन के विकास तथा ह्रास की जो संभावनाएँ हैं वे मुझे तुम्हारी ही प्रेरणास्वरूप प्राप्त हुई हैं। तुम्हारे प्रेम से प्रेरणा पाकर मैंने जो काम किए हैं या मेरे कामों का जो परिणाम है, मेरा जो कुछ बना है अथवा बिगड़ा है वह सब कुछ तुम्हारी ही देन है। मैं इन सभी स्थितियों को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करता हूँ कि मेरे जीवन के सुखों तथा दुखों से तुम्हें अत्यधिक प्यार है। अतः मैं खुशी-खुशी इनको स्वीकार
करता हूँ।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने अपने प्रियतम (परमात्मा) पर अत्यधिक विश्वास व्यक्त किया है तथा उसके प्रेम की अनन्यता को उजागर किया है।
  2. संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक पदावली का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा सटीक एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. मुक्त छंद का प्रयोग है तथा संबोधन शैली है।
  6. संपूर्ण पद्य में वियोग शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि अपने प्रियतम से दंड क्यों पाना चाहता है?
(ख) कवि ने अपने जीवन में उस अनंत सत्ता को क्या स्थान दिया है?
(ग) कवि पाताली अंधेरों की गुफाओं में क्यों लापता होना चाहता है?
(घ) कवि अपने जीवन के प्रत्येक सुख-दुख को प्रसन्नता से क्यों स्वीकार करना चाहता है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रियतम से इसलिए दंड पाना चाहता है कि वह अपने उस मालिक के वियोग को सहन कर सके और उसके बिना भी जीना सीख सके।

(ख) कवि के जीवन में उस अनंत सत्ता का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह सोचता है कि वियोगावस्था में भी वह उस परमात्मा की यादों के सहारे सुखद जीवन जी सकेगा और उसे वियोगजन्य पीड़ा दुख नहीं देगी।

(ग) कवि पाताल की अभेद्य अंधेरी गुफाओं में इसलिए विलीन होना चाहता है कि ताकि वह अपने प्रियतम के बिना अकेला रह सके और उसके वियोग को सह सके।

(घ) कवि अपने जीवन के प्रत्येक सुख-दुख को प्रसन्नता से स्वीकार करना चाहता है कि उसका सुख-दुख भी उस प्रियतम की देन है तथा वह भी उसके सुख-दुख से प्यार करता है। कवि भी उस प्रियतम की यादों के सहारे जीना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 5 सहर्ष स्वीकारा है

सहर्ष स्वीकारा है Summary in Hindi

सहर्ष स्वीकारा है कवि-परिचय

प्रश्न-
गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
गजानन माधव मुक्तिबोध का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म मध्यप्रदेश के मुरैना जनपद के श्योपुर नामक कस्बे में 13 नवंबर, 1917 को हुआ। उनके किसी पूर्वज को मुक्तिबोध की उपाधि प्राप्त हुई थी। इसलिए कुलकर्णी के स्थान पर मुक्तिबोध कहलाने लगे। उनके पिता का नाम माधव मुक्तिबोध था, जो कि पुलिस इंस्पैक्टर थे। वे एक न्यायप्रिय अधिकारी होने के साथ-साथ धर्म तथा दर्शन में अत्यधिक रुचि रखते थे। गजानन माधव का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। वे एक योग्य विद्यार्थी नहीं थे। 1930 में वे मिडिल की परीक्षा में असफल रहे तथा 1937 में प्रथम प्रयास में बी०ए० की परीक्षा भी उत्तीर्ण नहीं कर सके। उन्होंने सन् 1953 में नागपुर विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। विद्यार्थी जीवन से ही वे काव्य रचना करने लगे थे। उनकी आरंभिक रचनाएँ माखनलाल चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘कर्मवीर’ में प्रकाशित हुई थीं। आरंभ में उन्होंने ‘बड़नगर’ के मिडिल स्कूल में चार महीने तक अध्यापन का कार्य किया। तत्पश्चात् शुजालपुर में नगरपालिका के विद्यालय में एक सत्र तक पढ़ाते रहे। 1942 में उज्जैन चले गए और वहाँ रहते हुए उन्होंने ‘मध्य भारत प्रगतिशील लेखक संघ’ की स्थापना की। सन् 1945 में ‘हंस’ पत्रिका के संपादकीय विभाग में स्थान पाया। सन् 1946-47 में वे जबलपुर में रहे और 1948 में नागपुर चले गए। 1958 में मुक्तिबोध राजनांदगाँव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य करने लगे। 11 सितंबर, 1964 को इस प्रगतिशील कवि का निधन ‘मैनिनजाइटिस’ रोग के कारण दिल्ली में हुआ।

2. प्रमुख रचनाएँ मुक्तिबोध मुख्यतः कवि-रूप में प्रसिद्ध हुए लेकिन उन्होंने आलोचना, कहानी एवं डायरी लेखन में भी सफलता प्राप्त की। उनकी रचनाओं का विवरण इस प्रकार है-‘तार सप्तक’ में संकलित सत्रह कविताएँ (1943)–’चाँद का मुँह टेढ़ा है’, ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ (कविता संग्रह), ‘काठ का सपना’, ‘विपात्र’, ‘सतह से उठता आदमी’ (कथा साहित्य); ‘कामायनी-एक पुनर्विचार’, ‘नयी कविता का आत्मसंघर्ष’, ‘नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र’, ‘समीक्षा की समस्याएँ’, ‘एक साहित्यिक की डायरी’ (आलोचना); तथा ‘भारत : इतिहास और संस्कृति’ आदि उनकी मुख्य अन्य रचनाएँ हैं। परंतु इनकी कीर्ति का आधार-स्तंभ ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ है, जिसमें कुल 28 कविताएँ संकलित हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-उनकी काव्यगत विशेषताएँ इस प्रकार हैं-
(i) वैयक्तिकता तथा सामाजिकता का उद्घाटन मुक्तिबोध की अधिकांश कविताएँ छायावादी शिल्प लिए हुए हैं। लेकिन वे वैयक्तिकता से सामाजिकता की ओर प्रस्थान करते दिखाई देते हैं। इसलिए उनका कथ्य प्रगतिशील है। कवि की वैयक्तिकता सामाजिकता से जुड़ती प्रतीत होती है। परंतु कुछ कविताओं में कवि की निराशा तथा कुंठा अभिव्यक्त हुई है। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है’ में कवि लिखता है-
“याद रखो
कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती
यदि वह है तो सबके साथ ही।”
मुक्तिबोध ने स्वयं को विश्व-मानव के सुख-दुख के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। कवि यत्र-तत्र आम आदमी की निराशा, कुंठा, अवसाद तथा वेदना का वर्णन करता हुआ दिखाई देता है। कवि स्वीकार करता है कि आज की व्यवस्था के नीचे दबा मानव नितांत निराश तथा हताश है। कवि कहता है-
“दुख तुम्हें भी है,
दुख मुझे भी है,
हम एक ढहे हुए मकान के नीचे
दबे हैं
चीख निकालना भी मुश्किल है।”

(ii) पूँजीवादी व्यवस्था का विरोध-आरंभ से ही मुक्तिबोध का झुकाव मार्क्सवाद की तरफ रहा है। कवि शोषण व्यवस्था से जुड़े व्यक्तियों से घृणा करता है। कवि का विचार है कि उसका जीवन पूँजीवादी व्यवस्था की देन है। जहाँ के लोग झूठी चमक-दमक तथा झूठी शान से निर्मित दोगली जिंदगी जी रहे हैं। कवि इस पूँजीवादी व्यवस्था को शीघ्र-से-शीघ्र नष्ट करना चाहता है तथा उसके स्थान पर समाजवाद लाना चाहता है।

(iii) शोषित वर्ग के प्रति सहानुभूति-मुक्तिबोध ने स्वयं अभावग्रस्त जीवन व्यतीत किया और गरीबों के जीवन को निकट से देखा। इसलिए कवि अपनी कविताओं में जहाँ एक ओर शोषित वर्ग के प्रति सहानभति व्यक्त करता है, वहीं दूसरी ओर शोषितों को आर्थिक तथा सामाजिक शोषण से मुक्त भी करना चाहता है। कवि ने अपनी कविताओं में शोषित समाज के अनेक चित्र अंकित किए हैं तथा जनहित के दृष्टिकोण को अपनाया है।

(iv) व्यंग्यात्मकता-मुक्तिबोध के काव्य में तीखा तथा चुभने वाला व्यंग्य देखा जा सकता है। कवि सामाजिक रूढ़ियों पर करारा व्यंग्य करता है और यथार्थ चित्रण में विश्वास रखता है। कवि का यह चित्रण अपना ही भोगा यथार्थ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 5 सहर्ष स्वीकारा है

(v) वर्गहीन समाज की स्थापना पर बल-मुक्तिबोध एक ऐसा वर्गहीन समाज स्थापित करना चाहते थे जिसमें समाज तथा संस्कृति के लिए स्वस्थ मूल्यों का पोषण हो सके। वे स्वार्थपरता, संकीर्णता तथा भाई-भतीजावाद को समाप्त करना चाहते थे। में साम्यवाद की स्थापना अवश्य होगी और भारतवासी शोषण के चक्र से मुक्त हो सकेंगे। इसलिए कवि कहता है-
“कविता में कहने की आदत नहीं, पर कह दूँ,
वर्तमान समाज चल नहीं सकता,
पूँजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता,
स्वातंत्र्य व्यक्ति का वादी
छल नहीं सकता मुक्ति के मन को,
जन को”

4. भाषा-शैली-मुक्तिबोध के काव्य का कलापक्ष भी काफी समृद्ध है। परंतु बिंबात्मकता का अधिक सहारा लेने के कारण उनकी कविता कुछ स्थलों पर जटिल-सी हो गई है। वे अनेक प्रकार के कल्पना-चित्रों तथा फैटसियों का निर्माण करते हुए चलते हैं।

वस्तुतः मुक्तिबोध ने साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। यदि इसमें संस्कृत के तत्सम् प्रधान शब्द हैं तो अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी के शब्द भी हैं। उनकी कविता प्रतीकों के लिए प्रसिद्ध है। उनके प्रतीक पारंपरिक भी हैं और नवीन भी। मुक्तिबोध ने अपनी काव्य भाषा में उपमा, मानवीकरण, रूपक, उत्प्रेक्षा तथा अनुप्रास आदि अलंकारों का स्वाभाविक रूप से वर्णन किया है। कवि शमशेर सिंह बहादुर ने उनकी काव्य कला के बारे में सही ही लिखा है-“अद्भुत संकेतों भरी, जिज्ञासाओं से अस्थिर, कभी दूर से शोर मचाती, कभी कानों में चुपचाप राज़ की बातें कहती चलती है। हमारी बातें हमको सुनाती हैं। हम अपने को एकदम चकित होकर देखते हैं और पहले से अधिक पहचानने लगते हैं।”

सहर्ष स्वीकारा है कविता का सार

प्रश्न-
गजानन माधव मुक्तिबोध द्वारा रचित कविता ‘सहर्ष स्वीकारा है’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘सहर्ष स्वीकारा है’ कविता कविवर मुक्तिबोध की एक उल्लेखनीय कविता है। यह उनकी काव्य-रचना ‘भूरी-भूरी खाक धूल’ में संकलित है। यहाँ कवि ने असीम सत्ता को अपनी प्रेरणा का स्रोत माना है। कवि स्वीकार करता हुआ कहता है कि उसे प्रकृति से जो सुख-दुःख, राग-विराग आदि प्राप्त हुए हैं, उन्हें उसने सहर्ष स्वीकार कर लिया है। कवि की गरबीली गरीबी, गंभीर अनुभूतियाँ, विचार, चिंतन तथा भावनाओं की नदी-सब कुछ मौलिक हैं। कवि अपने ईश्वर से पूर्णतयाः संबद्ध है। वह कहता है कि वह उस अनंत सत्ता के स्नेह को अपने भीतर से जितना उड़ेलता है, उतना ही वह फिर से भर जाता है। कवि को लगता है कि उसके भीतर कोई मधुर स्नेह रूपी झरना है। उसे ऐसा अनुभव होता है कि परमात्मा चाँद की तरह उसके हृदय को प्रकाशित करता रहता है।

कवि अपनी उस अनंत सत्ता से उसको भूलने की कठोर सजा पाना चाहता है। कवि के लिए उजाला असहनीय है। उसकी आत्मा कमजोर होने के कारण छटपटाती रहती है। वह धएँ के बादलों में लापता हो जाना चाहता है। कवि को आभास है कि उसके लापता होने पर ही उसे उस असीम सत्ता का सहारा प्राप्त होगा। अंत में कवि कहता है कि उसके पास जो कुछ भी है वह उस अनंत सत्ता को बहुत प्रिय है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

HBSE 12th Class Hindi कैमरे में बंद अपाहिज Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता में कुछ पंक्तियाँ कोष्ठकों में रखी गई हैं आपकी समझ से इसका क्या औचित्य है?
उत्तर:
कोष्ठकों में रखी गई पंक्तियाँ अलग-अलग लोगों को संबोधित की गई हैं जैसे
(क) कैमरामैन का कथन –
(1) कैमरा दिखाओ इसे बड़ा-बड़ा

(2) कैमरा

  • बस करो
  • नहीं हुआ
  • रहने दो
  • परदे पर वक्त की कीमत है।

(ख) दर्शकों को कही गई पंक्तियाँ-

  • हम खुद इशारे से बताएंगे कि क्या ऐसा?
  • यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा।

(ग) स्वयं से कथन –

  • यह अवसर खो देंगे?
  • बस थोड़ी कसर रह गई।

ये पंक्तियाँ अलग-अलग लोगों को संबोधित की गई हैं जिससे यह कविता रोचक बन गई है तथा इसमें नाटकीयता उत्पन्न हो गई है।

प्रश्न 2.
कैमरे में बंद अपाहिज करुणा के मुखौटे में छिपी क्रूरता की कविता है-विचार कीजिए।
उत्तर:
कैमरे में बंद अपाहिज’ कार्यक्रम में जिस करुणा को दिखाने का प्रयास किया गया है, वह कृत्रिम है। इसका उद्देश्य चैनल के लिए एक लोकप्रिय तथा बिकाऊ कार्यक्रम तैयार करना है। कार्यक्रम-संचालक अपाहिज से बड़े बेहूदे तथा अस्वाभाविक प्रश्न पूछता है जिसमें करुणा लेशमात्र है, परंतु क्रूरता-ही-क्रूरता है। उदाहरण के रूप में अपाहिज से यह बार-बार कहना कि वह अपने दुख के बारे में जल्दी-जल्दी बताए, नहीं तो वह इस अवसर को खो देगा। नीचे कुछ पंक्तियाँ इसी बात को प्रमाणित करती हैं-

  1. तो आप क्या अपाहिज हैं?
  2. क्यों अपाहिज हैं?
  3. अपाहिजपन तो दुख देता होगा?
  4. दुख क्या है?
  5. अपाहिज होकर कैसा लगता है?

प्रश्न 3.
हम समर्थ शक्तिवान और हम एक दुर्बल को लाएँगे पंक्ति के माध्यम से कवि ने क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर:
‘हम समर्थ शक्तिवान’ के माध्यम से कवि ने यह व्यंग्य किया है कि दूरदर्शनकर्मी स्वयं को शक्तिशाली और समर्थ समझते हैं। वे सोचते हैं कि वे चाहें तो किसी को भी ऊपर उठा सकते हैं और किसी को भी नीचे गिरा सकते हैं। वस्तुतः आज के समाचार चैनलों पर काम करने वाले व्यक्तियों की यही मानसिकता देखी जा सकती है। इसका एक अर्थ यह भी हो सकता है कि जो व्यक्ति अपंग नहीं हैं, वह अपाहिजों की तुलना में अधिक समर्थ व शक्तिशाली होता है।

‘हम दुर्बल को लाएँगे’ के माध्यम से यह व्यंग्य किया है कि दूरदर्शनकर्मी किसी अपंग व्यक्ति को दूरदर्शन के पर्दे पर दिखाकर उसकी मजबूरी का फायदा उठाने का प्रयास करते हैं। कभी-कभी तो लगता है कि वे दर्शकों के सामने अपाहिज व्यक्ति का मज़ाक उड़ा रहे हैं और उसकी व्यथा को द्विगुणित कर रहे हैं। उनके मन में न तो अपाहिज के प्रति सहानुभूति है और न ही वह उसकी सहायता करना चाहते हैं। वे तो केवल एक असहाय व्यक्ति को पर्दे पर दिखाकर धन कमाना चाहते हैं।

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प्रश्न 4.
यदि शारीरिक रूप से चुनौती का सामना कर रहे व्यक्ति और दर्शक, दोनों एक साथ रोने लगेंगे, तो उससे प्रश्नकर्ता का कौन-सा उद्देश्य पूरा होगा?
उत्तर:
यदि कोई अपाहिज और दर्शक एक साथ रोने लगेंगे तो प्रश्नकर्ता को यह लगने लगेगा कि उसका कार्यक्रम सफल रहा। क्योंकि उसने अपने कार्यक्रम में करुणा की स्थिति को उत्पन्न कर दिया है। वह यह चाहता है कि अपंग व्यक्ति का दुख-दर्द छलक कर दर्शकों के सामने आए और दर्शकों की आँखें भी नम हो जाएँ। ऐसा करने से उसका कार्यक्रम लोकप्रिय होगा। उसे खूब वाह-वाही मिलेगी और मीडिया को अधिक-से-अधिक विज्ञापन मिलेंगे जिससे उसकी अच्छी कमाई हो सकेगी।

प्रश्न 5.
परदे पर वक्त की कीमत है कहकर कवि ने पूरे साक्षात्कार के प्रति अपना नज़रिया किस रूप में रखा है?
उत्तर:
‘परदे पर वक्त की कीमत है’ इस कथन से कार्यक्रम-संचालक की सच्चाई का पता चल जाता है। उसके लिए कार्यक्रम दिखाने के बदले में मिलने वाले पैसे का अधिक महत्त्व है। दूरदर्शन पर एक-एक मिनट से भारी आय होती है। दूरदर्शनकर्मी धन कमाने के लिए ही दुखियों तथा अपंगों के दुख को दिखाने का प्रयास करते हैं। कवि यहाँ पर यह व्यंग्य करना चाहता है कि दूरदर्शनकर्मी व्यवसायी लोग हैं। उनके मन में दुखी लोगों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। पर्दे पर दिखाई जा रही करुणा तथा वेदना से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। उनका एकमात्र लक्ष्य अधिक धन कमाना और अपने व्यवसाय को चमकाना है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
यदि आपको शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे किसी मित्र का परिचय लोगों से करवाना हो तो किन शब्दों में करवाएँगे?
उत्तर:
मैं शारीरिक चुनौती का सामना कर रहे अपने मित्र का परिचय लोगों को इस प्रकार दूँगा ये मेरे घनिष्ठ मित्र मोहनलाल शर्मा हैं। ये एक प्रतिभा सम्पन्न विद्यार्थी है और हमेशा कक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करते हैं। एक सड़क-दुर्घटना के कारण इनका बायां हाथ कट गया था। इसके बावजूद भी ये हमेशा बड़े परिश्रम से काम करते हैं तथा अन्य विद्यार्थी इनका सहयोग प्राप्त करते हैं। ये हम सब को निःशुल्क पढ़ाते भी हैं और हर प्रकार से हमारी सहायता करते हैं। इन्हें अपने बाएं हाथ की कमी कभी नहीं खलती।

प्रश्न 2.
सामाजिक उद्देश्य से युक्त ऐसे कार्यक्रम को देखकर आपको कैसा लगेगा? अपने विचार संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम दिखाने का बहाना करके जो दूरदर्शनकर्मी लोगों की वाह-वाही लूटना चाहते हैं और धन कमाना चाहते हैं, मुझे उनकी बुद्धि पर तरस आता है। मेरा विचार है कि लोगों को इस प्रकार की मानसिकता का विरोध करना चाहिए और सच्चे हृदय से अपाहिजों की सहायता करनी चाहिए। इस प्रकार के कार्यक्रम दिखाने वाले चैनल को मैं देखना नहीं चाहूँगा।

प्रश्न 3.
यदि आप इस कार्यक्रम के दर्शक हैं तो टी०वी० पर ऐसे सामाजिक कार्यक्रम को देखकर एक पत्र में अपनी प्रतिक्रिया दूरदर्शन निदेशक को भेजें।
उत्तर:
सेवा में
निदेशक,
दूरदर्शन, प्रसार समिति
नई दिल्ली।
महोदय,
मैंने कल दूरदर्शन पर प्रसारित ‘पीड़ा’ नामक सामाजिक कार्यक्रम देखा। मुझे यह सब देखकर बड़ी निराशा हुई। कार्यक्रम-संचालक ने इस कार्यक्रम द्वारा अपंगों, अपाहिजों की करुणा को उभारने के लिए उनसे बड़े ही बेहूदे, बेतुके प्रश्न पूछे। ऐसा लगा कि मानों वह अपाहिजों तथा लूले-लंगड़ों का मज़ाक उड़ा रहा था। मैं समझती हूँ कि इस प्रकार के कार्यक्रम दिखाने से हमारे मन में अपाहिजों के प्रति करुणा की भावना उत्पन्न नहीं होती अपितु दूरदर्शनकर्मी के प्रति घृणा की भावना उत्पन्न होती है। कृपया अपने कार्यक्रम की प्रस्तुति का सही ढंग अपनाएँ। यदि किसी अपाहिज को पर्दे पर प्रस्तुत भी किया जाता है तो उसके दुख-दर्द के साथ उसकी उपलब्धियों की चर्चा भी की जानी चाहिए। यदि अपाहिजों की समस्या को सचमुच प्रस्तुत करना चाहते हैं तो किसी मनोवैज्ञानिक की सहायता लें। आशा है कि आप अपने कार्यक्रम के प्रस्तुतीकरण में आवश्यक सुधार करेंगे।
भवदीय
एकता खन्ना

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प्रश्न 4.
नीचे दिए गए खबर के अंश को पढ़िए और बिहार के इस बुधिया से एक काल्पनिक साक्षात्कार कीजिए
उम्र पाँच साल, संपूर्ण रूप से विकलांग और दौड़ गया पाँच किलोमीटर। सुनने में थोड़ा अजीब लगता है, लेकिन यह कारनामा कर दिखाया है पवन ने। बिहारी बुधिया के नाम से प्रसिद्ध पवन जन्म से ही विकलांग है। इसके दोनों हाथों का पुलवा नहीं है, जबकि पैर में सिर्फ एड़ी ही है।
पवन ने रविवार को पटना के कारगिल चौक से सुबह 8.40 पर दौड़ना शुरू किया। डाकबंगला रोड, तारामंडल और आर ब्लाक होते हुए पवन का सफ़र एक घंटे बाद शहीद स्मारक पर जाकर खत्म हुआ। पवन द्वारा तय की गई इस दूरी के दौरान ‘उम्मीद स्कूल’ के तकरीबन तीन सौ बच्चे साथ दौड़ कर उसका हौसला बढ़ा रहे थे। सड़क किनारे खड़े दर्शक यह देखकर हतप्रभ थे कि किस तरह एक विकलांग बच्चा जोश एवं उत्साह के साथ दौड़ता चला जा रहा है। जहानाबाद जिले का रहने वाला पवन नवरसना एकेडमी, बेउर में कक्षा एक का छात्र है। असल में पवन का सपना उड़ीसा के बुधिया जैसा करतब दिखाने का है। कुछ माह पूर्व बुधिया 65 किलोमीटर दौड़ चुका है। लेकिन बुधिया पूरी तरह से स्वस्थ है जबकि पवन पूरी तरह से विकलांग। पवन का सपना कश्मीर से कन्याकुमारी तक की दूरी पैदल तय करने का है। -9 अक्तूबर, 2006 हिंदुस्तान से साभार
उत्तर:
काल्पनिक साक्षात्कार में बुधिया से निम्नलिखित प्रश्न पूछे जा सकते हैं-

  1. आपका नाम क्या है?
  2. आप कहाँ के निवासी हैं?
  3. र्वप्रथम आपने दौड़ना कब शुरू किया?
  4. क्या आप जन्म से विकलांग हैं?
  5. आज आपने किस स्थान से दौड़ना आरंभ किया?
  6. आपकी यह दौड़ कितने घंटे बाद समाप्त हुई?
  7. आप किस कक्षा में पढ़ते हैं?
  8. आपको दौड़ने की प्रेरणा किससे मिली?
  9. पकी दौड़ कहाँ जाकर समाप्त हुई?
  10. आप बिहार के किस जनपद के रहने वाले हैं?
  11. आपके साथ लगभग तीन सौ बच्चे क्यों भाग रहे थे?
  12. भविष्य में आपका क्या सपना है?

HBSE 12th Class Hindi कैमरे में बंद अपाहिज Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए।
हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में
उससे पूछेगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
उत्तर:

  1. इसमें कवि ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि दूरदर्शनकर्मी समर्थ और शक्तिवान होते हैं। वे किसी असहाय और दुर्बल व्यक्ति की पीड़ा दिखाकर अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना चाहते हैं और धन कमाना चाहते हैं।
  2. कवि ने दूरदर्शनकर्मियों की हृदयहीनता पर प्रकाश डाला है।
  3. ‘तो आप क्यों अपाहिज हैं?’ में प्रश्नालंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. मुक्त छंद का प्रयोग है तथा संबोधनात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे
इंतजार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न पूछा नहीं जाएगा)
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने दूरदर्शन के कार्यक्रम-संचालकों की कार्यप्रणाली पर करारा व्यंग्य किया है।
  2. कोष्ठकों में अंकित वाक्यों का प्रयोग एक अभिनव प्रयोग है।
  3. ‘पूछ-पूछकर’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल एवं सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है तथा संबोधनात्मक शैली है।

प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए-
फिर हम परदे पर दिखलाएँगे।
फूली हुई आँख की एक बड़ी तसवीर
बहुत बड़ी तसवीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी।
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि दूरदर्शनकर्मी पर्दे पर अपाहिज की फूली आँख की बहुत बड़ी तसवीर दिखाकर अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना चाहते हैं तथा धन कमाना चाहते हैं।
  2. कवि ने कार्यक्रम-संचालकों की व्यवसायी प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है।
  3. ‘बहुत बड़ी तसवीर’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग है।
  4. सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में कवि रघुवीर सहाय ने दूरदर्शनकर्मियों की व्यवसायी प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य किया है। दूरदर्शनकर्मी दूरदर्शन के कार्यक्रमों द्वारा अपाहिजों के दुख-दर्द को बेचते हैं। उनके मन में न तो अपाहिजों के प्रति सहानुभूति है और न ही संवेदना। वे अपने कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए अपाहिजों से बेतुके प्रश्न पूछते हैं। कवि दूरदर्शनकर्मियों की इस मानसिकता का विरोध करता है।

प्रश्न 2.
दूरदर्शनकर्मी कैमरे के सामने अपाहिज व्यक्ति को क्यों लाते हैं?
उत्तर:
दूरदर्शनकर्मी इस कथ्य से भली प्रकार परिचित हैं कि प्रायः लोग किसी दुखी व्यक्ति को देखकर स्वयं भी दुखी हो जाते हैं। आम आदमी अधिक संवेदनशील होता है। दूरदर्शन वाले आम लोगों की संवेदना के माध्यम से धन कमाना चाहते हैं।

प्रश्न 3.
आपकी दृष्टि में अपाहिज से पूछे जाने वाले प्रश्न बेहूदे कैसे हैं?
उत्तर:
दूरदर्शनकर्मी द्वारा अपाहिज से ये प्रश्न पूछना कि क्या आप अपाहिज हैं? अथवा आप क्यों अपाहिज हैं? इससे आपको दुःख तो होता होगा? ये प्रश्न बेहूदे हैं। इनका कोई उत्तर नहीं है। दर्शक भी देख रहे हैं कि वह व्यक्ति अपाहिज है और किसी-न-किसी दुर्घटना के कारण वह अपाहिज हुआ होगा। इस प्रकार के बेहूदे तथा बेतुके प्रश्न पूछकर अपाहिज व्यक्ति का अपमान करना है। उससे यह पूछना कि वह अपाहिज क्यों है? सचमुच उसके प्रति किया गया क्रूर मज़ाक है और यह पूछना कि आपका अपाहिजपन आपको दुख तो देता होगा, सचमुच उसके जले पर नमक छिड़कने जैसा है। इस प्रकार के प्रश्न अपाहिज से नहीं पूछे जाने चाहिएँ, बल्कि उससे यह पूछा जाना चाहिए कि वह अपने दुख-दर्द का किस प्रकार सामना कर रहा है।

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प्रश्न 4.
अपाहिज व्यक्ति अपने दुख को छिपाना चाहता है अथवा दिखाना चाहता है। सोचकर बताएँ।
उत्तर:
कोई भी अपाहिज व्यक्ति अपनी अपंगता को दिखाना नहीं चाहता और न ही उसकी चर्चा करना चाहता है। यदि हम अंधे व्यक्ति को अंधा कहते हैं तो वह हमारी बातों का बुरा मान जाता है। कुबड़े को कुबड़ा कहना या गंजे को गंजा कहना सर्वथा अनुचित है, अपाहिज व्यक्ति यही चाहता है कि लोग उसके साथ बराबरी का व्यवहार करें और समाज उसे ऐसा रोजगार दे जिससे वह अपने व अपने परिवार का लालन-पालन कर सके।

प्रश्न 5.
टेलीविजन कैमरे में बंद अपाहिज के माध्यम से कार्यक्रम को कैसे रोचक बनाया गया?
उत्तर:
टेलीविजन वाले लोग अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना चाहते हैं। इसलिए वे जरूरी समझते हैं कि हम अपाहिज की पीड़ा को अच्छी तरह से समझें और लोगों को खुलकर बताएँ। मीडिया के कर्मचारियों को विकलांग व्यक्ति की पीड़ा और कष्ट मात्र एक कार्यक्रम नज़र आता है। इसलिए वे उससे इतने प्रश्न पूछते हैं कि वह रोने लगता है। इस प्रकार दूरदर्शन के लोग विकलांग के रो पड़ने की प्रतीक्षा करते हैं। दर्शक भी उसकी पीड़ा को ही देखना चाहते हैं।

प्रश्न 6.
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में समर्थ तथा शक्तिवान विशेषण किसके लिए प्रयुक्त किए गए हैं और क्यों?
उत्तर:
यहाँ कवि ने समर्थ तथा शक्तिवान विशेषण दूरदर्शनकर्मियों के लिए प्रयुक्त किए हैं। आज हमारा मीडिया अत्यधिक शक्तिशाली हो चुका है। बड़े-से-बड़े राजनीतिज्ञ भी इससे डरते हैं। दूरदर्शनकर्मी अपने चैनल द्वारा किसी भी व्यक्ति पर कीचड़ उछाल सकते हैं। ये लोग दुर्बल व्यक्ति को भी बलवान बना सकते हैं। यही नहीं, कभी-कभी तो ये लोग न्यायालय की भूमिका निभाने लगते हैं और मनमाने ढंग से किसी बेकसूर को भी अपराधी सिद्ध कर देते हैं।

प्रश्न 7.
अपाहिज के होंठों की कसमसाहट को दिखाने का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
सर्वप्रथम कार्यक्रम-संचालक अपाहिज से तरह-तरह के बेतुके प्रश्न पूछता है। तत्पश्चात् उसके होंठों की पीड़ा को दिखा कर दर्शक को यह बताने की कोशिश करता है कि वह अपनी अपंगता के कारण दुखी एवं निराश है। कार्यक्रम-संचालक ऐसा करके अपाहिज के लिए दर्शकों की सहानुभूति प्राप्त करना चाहता है तथा अपने लिए वाह-वाही तथा धन अर्जित करना चाहता है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. रघुवीर सहाय का जन्म कहाँ हुआ?
(A) सहारनपुर
(B) लखनऊ
(C) कानपुर
(D) इलाहाबाद
उत्तर:
(B) लखनऊ

2. रघुवीर सहाय का जन्म कब हुआ?
(A) 4 जनवरी, 1938
(B) 2 मार्च, 1937
(C) 9 दिसंबर, 1929
(D) 6 दिसम्बर, 1928
उत्तर:
(C) 9 दिसंबर, 1929

3. रघुवीर सहाय के पिता का नाम क्या था?
(A) राम सहाय
(B) कृष्ण सहाय
(C) मोहनदेव सहाय
(D) हरदेव सहाय
उत्तर:
(D) हरदेव सहाय

4. रघुवीर सहाय ने किस विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) आगरा विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय

5. रघुवीर सहाय ने किस वर्ष अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1957 में
(C) सन् 1954 में
(D) सन् 1953 में
उत्तर:
(A) सन् 1951 में

6. दिल्ली आकर रघुवीर सहाय किस पत्रिका के सहायक संपादक बन गए?
(A) दिनमान
(B) प्रतीक
(C) धर्मयुग
(D) आलोचना
उत्तर:
(B) प्रतीक

7. सन् 1949 में रघुवीर सहाय किस दैनिक समाचार-पत्र को अपनी सेवाएँ देने लगे?
(A) नवभारत
(B) दैनिक हिंदुस्तान
(C) नवयुग
(D) दैनिक नवजीवन
उत्तर:
(D) दैनिक नवजीवन

8. पहली बार रघुवीर सहाय ने आकाशवाणी को कब-से-कब तक सेवाएँ दी?
(A) 1953 से 1957 तक
(B) 1951 से 1953 तक
(C) 1954 से 1958 तक
(D) 1949 से 1953 तक
उत्तर:
(A) 1953 से 1957 तक

9. रघुवीर सहाय किस पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य बने?
(A) प्रतीक
(B) कल्पना
(C) नवजीवन
(D) धर्मयुग
उत्तर:
(B) कल्पना

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10. रघुवीर सहाय पुनः आकाशवाणी से कब जुड़े?
(A) सन् 1960 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1961 में
(D) सन् 1963 में
उत्तर:
(C) सन् 1961 में

11. सन् 1967 में रघुवीर सहाय किस प्रमुख पत्रिका को अपनी सेवाएँ देने लगे?
(A) धर्मयुग
(B) दैनिक हिंदुस्तान
(C) नवजीवन
(D) दिनमान
उत्तर:
(D) दिनमान

12. रघुवीर सहाय का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1991 में
(B) सन् 1989 में
(C) सन् 1990 में
(D) सन् 1992 में
उत्तर:
(C) सन् 1990 में

13. रघुवीर सहाय ने किस काव्य-संग्रह के प्रकाशन द्वारा साहित्य में प्रवेश किया?
(A) प्रथम तार सप्तक द्वारा
(B) दूसरा सप्तक द्वारा
(C) दिनमान द्वारा
(D) नवजीवन द्वारा
उत्तर:
(B) दूसरा सप्तक द्वारा

14. ‘दूसरा सप्तक’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1949 में
(C) सन् 1953 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(A) सन् 1951 में

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15. ‘सीढ़ियों पर धूप में काव्य-संग्रह के रचयिता हैं
(A) भारत भूषण अग्रवाल
(B) केदारनाथ अग्रवाल
(C) रघुवीर सहाय
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(C) रघुवीर सहाय

16. ‘सीढ़ियों पर धूप में’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1960 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1963 में
उत्तर:
(A) सन् 1960 में

17. ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ काव्य-संग्रह का प्रकाशन वर्ष कौन-सा है?
(A) सन् 1962
(B) सन् 1965
(C) सन् 1966
(D) सन् 1967
उत्तर:
(D) सन् 1967

18. ‘हँसो-हँसो जल्दी हँसो’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1971 में
(B) सन् 1973 में
(C) सन् 1975 में
(D) सन् 1974 में
उत्तर:
(C) सन् 1975 में

19. ‘लोग भूल गए हैं’ के रचयिता हैं
(A) मुक्ति बोध
(B) रघुवीर सहाय
(C) केदारनाथ अग्रवाल
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(B) रघुवीर सहाय

20. ‘लोग भूल गए हैं’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1982 में
(B) सन् 1981 में
(C) सन् 1979 में
(D) सन् 1980 में
उत्तर:
(A) सन् 1982 में

21. ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1992 में
(B) सन् 1994 में
(C) सन् 1993 में
(D) सन् 1995 में
उत्तर:
(B) सन् 1994 में

22. रघुवीर सहाय का संपूर्ण साहित्य किस शीर्षक से प्रकाशित हुआ है?
(A) रघुवीर साहित्य
(B) रघुवीर काव्य
(C) रघुवीर का नया साहित्य
(D) रघुवीर सहाय रचनावली
उत्तर:
(D) रघुवीर सहाय रचनावली

23. ‘कुछ पते, कुछ चिट्ठियाँ’ के रचयिता हैं-
(A) निराला
(B) कुँवर नारायण
(C) रघुवीर सहाय
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(C) रघुवीर सहाय

24. कार्यक्रम कैसा होना चाहिए?
(A) अद्भुत
(B) दिव्य
(C) रोचक
(D) अलौकिक
उत्तर:
(C) रोचक

25. कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(A) व्यवस्था पर
(B) दूरदर्शन वालों पर
(C) दर्शक पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) दूरदर्शन वालों पर

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

26. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में किस शैली का प्रयोग हुआ है?
(A) नाटकीय शैली
(B) वर्णनात्मक शैली
(C) विवेचना शैली
(D) प्रतीकात्मक शैली
उत्तर:
(A) नाटकीय शैली

27. दूरदर्शन वाले बंद कमरे में किसे लाए थे?
(A) सबल को
(B) दुर्बल को
(C) बीमार को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) दुर्बल को

28. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में दूरदर्शनकर्मियों की किस प्रवृत्ति का उद्घाटन किया गया है?
(A) संवेदनशीलता का
(B) दयालुता का
(C) दुर्बलता का
(D) संवेदनहीनता तथा क्रूरता का
उत्तर:
(D) संवेदनहीनता तथा क्रूरता का

29. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ करुणा के मुखौटे में छिपी किसकी कविता है?
(A) दया की
(B) परोपकार की
(C) क्रूरता की
(D) वात्सल्य की
उत्तर:
(C) क्रूरता की

30. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है?
(A) संस्कृतनिष्ठ भाषा का
(B) सहज, सरल या सामान्य भाषा का
(C) साहित्यिक ब्रज भाषा का
(D) साहित्यिक अवधी भाषा का
उत्तर:
(B) सहज, सरल या सामान्य भाषा का

31. अपाहिज के होंठों पर कैसे भाव दिखाई देते हैं?
(A) आशा के
(B) पीड़ा के
(C) कसमसाहट के
(D) उत्साह के
उत्तर:
(C) कसमसाहट के

32. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में कैमरा एक-साथ क्या दिखाना चाहता है?
(A) नए और पुराने कार्यक्रम
(B) दर्शक और अपाहिज रोते हुए
(C) सामान्य व्यक्ति की दुर्दशा और खशी
(D) समाचार और खेल
उत्तर:
(B) दर्शक और अपाहिज रोते हुए।

33. ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में ‘समर्थ शक्तिवान’ किसे कहा गया है?
(A) अपाहिज को
(B) कैमरामैन को
(C) दूरदर्शन वालों को
(D) निर्देशक को
उत्तर:
(C) दूरदर्शन वालों को

34. रघुवीर सहाय ने अपनी कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ में किसे रेखांकित करने का तरीका अपनाया है?
(A) क्रूरता
(B) संवेदनहीनता
(C) प्रताड़ना
(D) हताशा
उत्तर:
(A) क्रूरता

कैमरे में बंद अपाहिज पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] हम दूरदर्शन पर बोलेंगे
हम समर्थ शक्तिवान
हम एक दुर्बल को लाएँगे
एक बंद कमरे में
उससे पूछेगे तो आप क्या अपाहिज हैं?
तो आप क्यों अपाहिज हैं?
आपका अपाहिजपन तो दुख देता होगा
देता है?
(कैमरा दिखाओ इसे बड़ा बड़ा)
हाँ तो बताइए आपका दुख क्या है
जल्दी बताइए वह दुख बताइए
बता नहीं पाएगा [पृष्ठ-23]

शब्दार्थ-समर्थ = शक्तिशाली। शक्तिवान = ताकतवर। दर्बल = कमजोर। अपाहिज = विकलांग।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ से अवतरित है। इसके कवि रघुवीर सहाय हैं। यह कविता उनके काव्य-संग्रह ‘लोग भूल गए हैं’ में से ली गई है। इस कविता में कवि ने दूरदर्शन कर्मियों की संवेदनहीनता तथा क्रूरता पर प्रकाश डाला है। इस पद्यांश में कवि दूरदर्शन के संचालक की क्रूरता का वर्णन करते हुए कहता है

व्याख्या-दूरदर्शनकर्मी स्वयं को समर्थ और शक्तिशाली समझते हैं, क्योंकि वे अपनी बात को सब लोगों तक पहुँचाने में समर्थ हैं। दूरदर्शन का संचालक अपने साथियों से कहता है कि हम स्टूडियो के बंद कमरे में एक कमजोर तथा मजबूर व्यक्ति को लेकर आएँगे। वह व्यक्ति एक विकलांग होगा जो अपनी आजीविका नहीं चला सकता। बंद कमरे में हम उससे पूछेगे कि क्या आप विकलांग हो? इससे पहले कि वह हमारे प्रश्न का उत्तर दे, इस पर हम एक और प्रश्न दाग देंगे कि आप विकलांग क्यों हुए? हमारा यह प्रश्न बेतुका होगा और वह अपाहिज कुछ समय तक चुप रहेगा। फिर से हम उसे कुरेदकर पूछेगे कि आपका विकलांग होना आपको दुख तो देता होगा। वह बेचारा इस पर भी चुप रहेगा। हम पुनः वही प्रश्न पूछेगे कि आपको अपाहिज होना क्या सचमुच दुख देता है? बताइए, क्या सचमुच आप विकलांग होने से दुखी हैं?

इस प्रश्न के साथ ही दूरदर्शन संचालक अपने साथी से कहेगा कि वह अपाहिज के दुखी चेहरे को और बड़ा करके दिखाए ताकि लोग उसके दुखी चेहरे को आसानी से व ध्यान से देख सकें। विकलांग को पुनः उत्तेजित करके पूछा जाएगा कि हाँ, उसे बताओ कि आपका दुख क्या है? समय बीता जा रहा है, हमें जल्दी से अपने दुख के बारे में बताओ। अन्ततः संचालक को लगेगा कि यह अपाहिज अपने दुख के बारे में कुछ नहीं बता सकता।

विशेष-

  1. प्रस्तुत पद्यांश में दूरदर्शनकर्मियों की संवेदनहीनता तथा हृदयहीन कार्य-शैली का यथार्थ वर्णन किया गया है।
  2. दूरदर्शन के चैनलों की बढ़ती स्पर्धा का वर्णन किया गया है जो अपाहिज की वेदना को कुरेदकर अपने कार्यक्रम को अधिक रोचक बनाना चाहते हैं।
  3. सहज, सरल तथा सामान्य भाषा का प्रयोग किया गया है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. संपूर्ण पद्य में प्रश्नालंकारों की छटा दर्शनीय है।
  6. नाटकीय शैली का सफल प्रयोग हुआ है।।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

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पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) इस कविता के माध्यम से किस पर व्यंग्य किया गया है?
(ग) अपाहिज से पूछे गए प्रश्न क्या सिद्ध करते हैं?
(घ) समर्थ शक्तिवान लोग कौन हैं? और वे दूरदर्शन पर निर्बल को क्यों लाते हैं?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-रघुवीर सहाय – कविता का नाम कैमरे में बंद अपाहिज।

(ख) इस कविता के माध्यम से दूरदर्शन कर्मियों की संवेदनहीनता और क्रूरता पर करारा व्यंग्य किया गया है। ये लोग अपने कार्यक्रम को आकर्षक और प्रभावशाली बनाने के लिए विकलांगों की पीड़ा से खिलवाड़ करते हैं तथा उनसे बेतुके सवाल पूछकर उनकी भावनाओं से खेलते हैं।

(ग) अपाहिज से पूछे गए प्रश्न यह सिद्ध करते हैं कि उनसे पूछे गए प्रश्न बेकार और व्यर्थ हैं तथा जो अपाहिजों को संवेदना प्राप्त करने के स्थान पर उनको पीड़ा पहुंचाते हैं।

(घ) समर्थ शक्तिवान लोग दूरदर्शन के संचालक हैं। वे विकलांगों तथा दुर्बलों की पीड़ाओं को दर्शक के सामने रखकर अपने कार्यक्रम को इसलिए रोमांचित बनाते हैं ताकि वे अधिक-से-अधिक पैसा कमा सकें।

[2]
सोचिए
बताइए
आपको अपाहिज होकर कैसा लगता है
कैसा
यानी कैसा लगता है
(हम खुद इशारे से बताएँगे कि क्या ऐसा?)
सोचिए
बताइए
थोड़ी कोशिश करिए
(यह अवसर खो देंगे?)
आप जानते हैं कि कार्यक्रम रोचक बनाने के वास्ते
हम पूछ-पूछकर उसको रुला देंगे।
इंतज़ार करते हैं आप भी उसके रो पड़ने का
करते हैं?
(यह प्रश्न नहीं पूछा जाएगा) [पृष्ठ 23-24]

शब्दार्थ-अपाहिज = विकलांग। यानी = अर्थात् । अवसर = मौका। रोचक = दिलचस्प। इंतज़ार = प्रतीक्षा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ से अवतरित है। इसके कवि रघुवीर सहाय हैं। यह कविता उनके काव्य-संग्रह ‘लोग भूल गए हैं। में से ली गई है। इस पद्य में कवि उस स्थिति का वर्णन करता है जब कार्यक्रम संचालक अपने कार्यक्रम को रोचक बनाने के लिए अपाहिज से बेतुके सवाल पूछता है।

व्याख्या-कार्यक्रम-संचालक अपाहिज से पूछता है कि आप अच्छी प्रकार सोचकर हमें बताइए कि आपको विकलांग होना कैसा लगता है? अर्थात् क्या आपको विकलांग होने का दुख है, यदि है तो यह कैसा दुख है? आप सोचकर दर्शकों को बताइए कि आपको कितना दुख है और यह कितना बुरा लगता है। इस पर विकलांग व्यक्ति चुप रह जाता है। वह कुछ बोल नहीं पाता। वह मन-ही-मन बड़ा दुखी है। तब कार्यक्रम संचालक बेहूदे इशारे करके पूछता है कि आपका दुख कैसा है? फिर वह कहता है कि आप तनिक अच्छी तरह सोचिए, सोचने की कोशिश कीजिए तथा सोचकर हमें बताइए कि आपका दुख कैसा है? यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो यह मौका आपके हाथ से निकल जाएगा।

कार्यक्रम-संचालक पुनः कहता है कि हमें तो अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना है। इसलिए यह जरूरी है कि हम अपाहिज की पीड़ा को अच्छी तरह समझें और लोगों को खुलकर बताएँ। इसलिए हम उससे इतने प्रश्न पूछेगे कि वह रोने लगेगा। इस प्रकार दूरदर्शन के व्यक्ति विकलांग व्यक्ति के रो पड़ने की प्रतीक्षा करते हैं। वे उस क्षण का इंतज़ार करते हैं जब अपाहिज अपनी पीड़ा बताते-बताते रो पड़े, क्योंकि दर्शक भी यही सब देखना चाहते हैं।

विशेष-

  1. इस पद्य में कवि ने दूरदर्शनकर्मियों की हृदयहीनता तथा क्रूरता का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. दूरदर्शन के चैनलों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा का वर्णन किया है जो विकलांगों से बेतुके प्रश्न पूछकर अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना चाहते हैं।
  3. सहज, सरल तथा सामान्य भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-योजना सटीक तथा भावानुकूल है।
  5. संपूर्ण पद्य में प्रश्नालंकारों का सफल प्रयोग किया गया है।
  6. मुक्त छंद का प्रयोग है तथा प्रसाद गुण है।
  7. कोष्ठकों में वाक्यों का प्रयोग करना एक अभिनव प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) यह कविता कवि के किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
(ख) कार्यक्रम संचालक अपाहिजों के दुख को बार-बार प्रश्न पूछकर गंभीर क्यों बनाना चाहता है?
(ग) कार्यक्रम संचालक श्रोताओं को क्या विश्वास दिलाता है।
(घ) अपाहिजों के कार्यक्रम में दर्शक किस बात की प्रतीक्षा करते हैं?
(ङ) इस पद्यांश में कवि ने दूरदर्शन के संचालकों पर क्या व्यंग्य किया है?
उत्तर:
(क) प्रस्तुत कविता रघुवीर सहाय के लोग भूल गए हैं’ काव्य-संग्रह से संकलित है।

(ख) कार्यक्रम संचालक अपाहिज के दुखों के बारे में प्रश्न पूछकर उनके दुख को इसलिए गंभीर बनाना चाहता है ताकि वह अपने कार्यक्रमों को अधिक रोचक बना सके और कार्यक्रम द्वारा अधिकाधिक धन कमा सके।

(ग) कार्यक्रम का संचालक श्रोताओं को यह विश्वास दिलाता है कि विकलांग से इस प्रकार के प्रश्न पूछेगा कि वह अपनी पीड़ा को याद करके रोने लगेगा।

(ङ) इस पद्यांश के द्वारा कवि ने दूरदर्शन के कार्यक्रम-संचालकों की कार्य-शैली पर करारा व्यंग्य किया है। उनके मन में अपाहिजों के प्रति कोई संवेदनशीलता नहीं है। वे तो अपाहिजों से तरह-तरह के बेतुके प्रश्न पूछकर अपने कार्यक्रम को रोचक बनाना चाहते हैं ताकि वे अधिकाधिक धन प्राप्त कर सकें और लोकप्रियता अर्जित कर सकें।

[3] फिर हम परदे पर दिखलाएँगे
फूली हुई आँख की एक बड़ी तसवीर
बहुत बड़ी तसवीर
और उसके होंठों पर एक कसमसाहट भी
(आशा है आप उसे उसकी अपंगता की पीड़ा मानेंगे)
एक और कोशिश
दर्शक
धीरज रखिए
देखिए
हमें दोनों एक संग रुलाने हैं
आप और वह दोनों
(कैमरा
बस करो
नहीं हुआ
रहने दो
परदे पर वक्त की कीमत है)
अब मुसकुराएँगे हम आप देख रहे थे सामाजिक उद्देश्य से युक्त कार्यक्रम (बस थोड़ी ही कसर रह गई) धन्यवाद। [पृष्ठ 24-25]

शब्दार्थ-कसमसाहट = पीड़ा, छटपटाहट। अपंगता = अपाहिज होना। धीरज = धैर्य। संग = साथ। वक्त = समय। सामाजिक उद्देश्य = समाज को बेहतर बनाने का लक्ष्य । युक्त = जुड़ा हुआ। कसर = कमी।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कैमरे में बंद अपाहिज’ से अवतरित है। इसके कवि रघुवीर सहाय हैं। यह कविता उनके काव्य-संग्रह ‘लोग भूल गए हैं’ में से ली गई है। इस पद्यांश में कार्यक्रम-संचालक अपाहिज की पीड़ा और व्यथा को उभारकर दर्शकों को दिखाने का प्रयास करता है। इस संदर्भ में कवि कहता है

व्याख्या-पहले तो कार्यक्रम-संचालक अपाहिज व्यक्ति से तरह-तरह के प्रश्न पूछकर उसकी पीड़ा से दर्शकों को अवगत कराना चाहते हैं। बाद में वे दूरदर्शन के पर्दे पर अपाहिज की सूजी हुई आँख की बहुत बड़ी तस्वीर दिखाने का प्रयास करते हैं। वे वस्तुतः अपाहिज की पीड़ा को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना चाहते हैं और वे उसके होंठों पर विद्यमान मजबूरी और छटपटाहट को भी उभारकर दिखाना चाहते हैं। उनका लक्ष्य होता है कि दर्शक अपंग व्यक्ति की पीड़ा को समझें। इसके बाद संचालक कहते हैं कि हम एक और कोशिश करके देखते हैं। वे दर्शकों से धैर्य रखने की अपील करते हैं।

कार्यक्रम-संचालक कहते हैं कि हमें अपाहिज के दर्द को इस प्रकार दिखाना है कि एक साथ अपाहिज और दर्शक रो पड़ें। परंतु ऐसा हो नहीं पाता। कार्यक्रम-संचालक अपने लक्ष्य में असफल रह जाते हैं। इसलिए वे कैमरामैन को आदेश देते हैं कि वह कैमरे को बंद कर दे। यदि अपाहिज रो नहीं सका तो न सही, क्योंकि पर्दे पर समय का अत्यधिक महत्त्व है। यहाँ तो एक-एक क्षण मूल्यवान होता है। समय के साथ-साथ धन का भी व्यय हो जाता है। इसलिए वे अपाहिज को दूरदर्शन के पर्दे पर दिखाना बंद कर देते हैं और दर्शकों से कहते हैं कि अब हम मुस्कुराएंगे और दर्शकों से कहेंगे कि आप इस समय सामाजिक पीड़ा को दिखाने वाला कार्यक्रम देख रहे थे। इसका लक्ष्य था कि हम और आप दोनों अपाहिजों की पीड़ा को समझें और अनुभव करें। लेकिन वे कार्यक्रम संचालक मन-ही-मन सोचते होंगे कि उसका कार्यक्रम पूर्णतया सफल नहीं हो सका क्योंकि वे अपाहिज और दर्शकों को संग-संग रुला नहीं सके।

यदि दोनों एक-साथ रो पड़ते तो निश्चय से उसका कार्यक्रम सफल हो जाता। अंत में कार्यक्रम-संचालक दर्शकों को धन्यवाद करके कार्यक्रम समाप्त कर देते हैं। इसके पीछे भी कवि का करारा व्यंग्य है। वह कार्यक्रम-संचालक की हृदयहीनता को स्पष्ट करना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 4 कैमरे में बंद अपाहिज

विशेष-

  1. प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने दूरदर्शनकर्मियों की हृदयहीनता पर करारा व्यंग्य किया है और दूरदर्शन के सामाजिक कार्यक्रमों का पर्दाफाश किया है।
  2. दूरदर्शनकर्मी किसी सामाजिक समस्या को उभारने के चक्कर में निर्मम और कठोर हो जाते हैं और अपंग व्यक्ति की पीड़ा को समझ नहीं पाते।
  3. ‘बहुत बड़ी तसवीर’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग किया गया है।
  5. शब्द-योजना सर्वथा सटीक एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. प्रस्तुत पद्यांश में नाटकीय, संबोधनात्मक तथा व्यंग्यात्मक शैलियों का सफल प्रयोग किया गया है।
  7. प्रसाद गुण है तथा मुक्त छंद का प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) प्रस्तुत पद्यांश में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(ख) कार्यक्रम संचालक पर्दे पर अपाहिज व्यक्ति की फूली हुई आँख की तसवीर क्यों दिखाता है?
(ग) कार्यक्रम-संचालक एक साथ किसे और क्यों रुलाना चाहता है?
(घ) क्या कार्यक्रम संचालक अपने लक्ष्य में सफल रहा? यदि नहीं तो क्यों?
उत्तर:
(क) इस पद्यांश में दूरदर्शन के कार्यक्रम-संचालकों की हृदयहीनता पर करारा व्यंग्य किया गया है। वे अपंगों तथा दीन-दुखियों की पीड़ा को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना चाहते हैं ताकि उनका कार्यक्रम रोचक तथा लोकप्रिय बन सके धन कमा सकें।

(ख) कार्यक्रम-संचालक पर्दे पर अपाहिज व्यक्ति की फूली हुई आँख को बड़ा करके इसलिए दिखाता है ताकि वह लोगों के सामने अपाहिजों के दुख-दर्द को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सके और अपने कार्यक्रम को प्रभावशाली बना सके।

(ग) कार्यक्रम-संचालक अपाहिज तथा दर्शकों को एक साथ रुलाना चाहता है ताकि वह अपने कार्यक्रम को लोकप्रिय बना सके और लोगों में अपाहिजों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न कर सके।

(घ) कार्यक्रम संचालक अपनी अनेक कोशिशों के बावजूद भी पर्दे पर अपाहिज को रोते हुए न दिखा सका। न उसकी आँखों में आँसू आए, न ही वह ज़ोर-ज़ोर से रोया। कारण यह था कि अपाहिज व्यक्ति भली प्रकार जानता था कि दूरदर्शनकर्मियों का उसके दुख-दर्द से कोई लेना-देना नहीं है, न ही उनके मन में अपाहिजों के प्रति सच्ची सहानुभूति की भावना है।

कैमरे में बंद अपाहिज Summary in Hindi

कैमरे में बंद अपाहिज कवि-परिचय

प्रश्न-
रघुवीर सहाय का संक्षिप्त जीवन परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। अथवा रघुवीर सहाय का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-रघुवीर सहाय दूसरा सप्तक तथा बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध के एक महत्त्वपूर्ण कवि हैं। उनका जन्म 9 दिसंबर, 1929 को लखनऊ में हुआ। उनके पिता हरदेव सहाय साहित्य के अध्यापक थे। सन् 1951 में कवि ने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। परंतु उनका रचना कार्य सन् 1946 से ही आरंभ हो चुका था। वे आरंभ से ही पत्रकारिता से जुड़ गए। 1949 में उन्होंने ‘दैनिक नवजीवन’ को अपनी सेवाएँ देनी आरंभ कर दीं। सन् 1951 तक वे इस दैनिक समाचार पत्र के संपादक तथा सांस्कृतिक संवाददाता के रूप में कार्य करते रहे। परंतु इसी वर्ष वे दिल्ली चले गए तथा ‘प्रतीक’ पत्रिका के सहायक संपादक बन गए। 1953 से 1957 तक वे आकाशवाणी में काम करते रहे। बाद में वे ‘कल्पना’ पत्रिका के संपादक मंडल के सदस्य बन गए। परंतु सन् 1961 में वे पुनः आकाशवाणी को अपनी सेवाएँ देने लगे। बाद में 1967 में वे ‘दिनमान’ साप्ताहिक पत्रिका से जुड़ गए। 1982 तक वे इसके प्रधान संपादक रहे, परंतु बाद में वे स्वतंत्र लेखन करने लगे। 30 दिसंबर, 1990 को उनका निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ वस्तुतः रघुवीर सहाय सन् 1951 में अज्ञेय द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के कारण प्रकाश में आए। ‘सीढ़ियों पर धूप में इनका पहला काव्य-संग्रह है। उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं-
‘दूसरा सप्तक’ 1951 में संकलित कविताएँ-‘सीढ़ियों पर धूप में’ (1960), ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ (1967), ‘हँसो-हँसो जल्दी हँसो’ (1975), ‘लोग भूल गए हैं’ (1982), ‘कुछ पते, कुछ चिट्ठियाँ’ (1989), ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ (1994)। रघुवीर सहाय का संपूर्ण साहित्य ‘रघुवीर सहाय रचनावली’ के नाम से प्रकाशित है।।

3. काव्यगत विशेषताएँ-पहले बताया जा चुका है कि रघुवीर सहाय आजीवन पत्रकारिता से जुड़े रहे। इसलिए उनकी काव्य रचनाओं में राजनीतिक चेतना के अतिरिक्त आधुनिक युग की विभिन्न समस्याओं पर समुचित प्रकाश डाला गया है। उनकी काव्यगत विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) राजनीतिक चेतना पत्रकारिता से जुड़े रहने के कारण रघुवीर सहाय की कविताओं में राजनीतिक चेतना सहज रूप में व्यक्त हुई है। कवि ने राजनीति की क्रूरताओं तथा गतिविधियों का सहज वर्णन किया है। कवि स्वीकार करता है कि राजनीति ने देश को अवसरवादिता, जातिवाद, हिंसा तथा भ्रष्टाचार जैसी बुराइयाँ प्रदान की हैं। इस संदर्भ में कवि के काव्य में मंत्री मुसद्दी लाल लोकतंत्र के भ्रष्टाचार का प्रतीक है। इसलिए डॉक्टर बच्चन सिंह ने रघुवीर सहाय को पोलिटिकल कवि कहा है। देश की दयनीय दशा देखकर कवि बड़े-से-बड़े राजनेता का नाम लेने में संकोच नहीं करता
“गया वाजपेयी जी से पूछ आया देश का हाल,
पर उढ़ा नहीं सका एक नंगी औरत को
कम्बल रेलगाड़ी में बीस अजनबियों के सामने।”

(ii) सामाजिक चेतना पत्रकार तथा संपादक होने के कारण रघुवीर सहाय के काव्य में सामाजिक चेतना भी देखी जा सकती है। कहीं-कहीं कवि जनसाधारण का पक्षधर दिखाई देता है। कवि ने अपनी अधिकांश कविताओं में सामाजिक विरोधों तथा अंतर्विरोधों एवं विसंगतियों का उद्घाटन किया है। कवि मध्यवर्गीय जीवन के दबाव और लोकतांत्रिक जीवन की विडंबना का यथार्थ वर्णन करता है। यही नहीं, वह आम आदमी के साथ खड़ा दिखाई देता है। इसलिए वह कहता है
“मैं तुम्हें रोटी नहीं दे सकता।।
न उसके साथ खाने के लिए गम्।
न मैं मिटा सकता हूँ ईश्वर के विषय में सब भ्रम।”

(iii) मानवीय संबंधों का वर्णन कवि ने अपनी कुछ कविताओं में मानवीय संबंधों का वर्णन करते हुए मानवीय व्यथा के विविध आयामों पर प्रकाश डाला है। कवि ने स्त्री जीवन की पीड़ा को अधिक मुखरित किया है। ‘बैंक में लड़कियाँ’ शीर्षक कविता में कवि स्त्री तथा पुरुष के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालता है। इसी प्रकार ‘चेहरा’ कविता में गरीब लड़की का जो वर्णन किया है, वह बड़ा ही सजीव बन पड़ा है। कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता में कवि ने एक अपाहिज की पीड़ा के प्रति संवेदना व्यक्त की है।

(iv) आक्रोश और व्यंग्य का उद्घाटन-रघुवीर सहाय सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्रों में व्याप्त विसंगतियों के प्रति अपने आक्रोश को व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। कहीं-कहीं उनके व्यंग्य की धार बड़ी तीखी तथा चुभने वाली लगती है। आज की अवसरवादिता, समझौतापरस्ती, जातिवाद, मध्यवर्गीय आडंबर को देखकर कवि की वाणी में आक्रोश भर जाता है। कवि लोकतंत्र पर भी व्यंग्य करने से नहीं चूकता। इस संदर्भ में ‘रामदास’ नामक कविता विशेष महत्त्व रखती है जो कि समाज के ताकतवरों की बढ़ती हुई हैसियत का एहसास कराती है। लोकतंत्र पर व्यंग्य करता हुआ कवि कहता है-..
“अपराधी से आते हैं राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधायक
बख्शे हुए से जाते हैं।”

4. भाषा-शैली-अखबारों से जुड़े रहने के कारण रघुवीर सहाय की कविता में सहज, सरल तथा बोलचाल की भाषा का प्रयोग देखा जा सकता है। उनकी भाषा की अपनी शैली है। उसमें कहीं पर भी विद्वत्ता का मुलम्मा नहीं चढ़ा। परंतु इनकी बोलचाल की भाषा परिनिष्ठित हिंदी भाषा से जुड़ी हुई है। कुछ स्थलों पर कवि संस्कृतनिष्ठ शब्दों के साथ-साथ उर्दू के शब्दों का मिश्रण करते हुए चलते हैं। उदाहरण देखिए
“कितने सही हैं ये गुलाब कुछ कसे हुए और कुछ झरने-झरने को
और हल्की-सी हवा में और भी, जोखम से
निखर गया है उसका रूप जो झरने को है।”
कवि की आरंभिक कविताओं में प्रकृति के बिंब देखे जा सकते हैं, परंतु परवर्ती कविताओं में वे जनसाधारण के जीवन के चित्र उकेरते हैं। उनकी कविताओं में नेहरू, वाजपेयी, मोरारजी देसाई के नाम प्रतीक रूप में प्रयुक्त हुए हैं। आरंभ में उन्होंने छंद का निर्वाह करते हुए कविताएँ लिखीं। परंतु आगे चलकर वे छंद मुक्त कविता करने लगे।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि भाव और भाषा दोनों दृष्टियों से रघुवीर सहाय का काव्य नई कविता से लेकर समकालीन कविता की प्रवृत्तियाँ लिए हुए हैं। उनकी कविताएँ प्रेम, प्रकृति, परिवार, समाज तथा राजनीति का यथार्थ वर्णन करने में सक्षम रही हैं।

कैमरे में बंद अपाहिज कविता का सार

प्रश्न-
रघुवीर सहाय द्वारा रचित कविता कैमरे में बंद अपाहिज’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता रघुवीर सहाय द्वारा रचित ‘लोग भूल गए हैं। काव्य-संग्रह में संकलित है। इस कविता में कवि ने साधारण भाषा-शैली में अपाहिज व्यक्ति की विडंबना को पकड़ने का प्रयास किया है। विकलांगता निश्चय से मनुष्य को कमजोर तथा दुखी कर देती है। परंतु हमारा आज का मीडिया दुखदायी विकलांगता को अपनी लोकप्रियता का माध्यम बनाना चाहता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि मीडिया में लोकप्रियता प्राप्त करने की स्पर्धा लगी हुई है। वे विकलांग व्यक्ति को मीडिया के समक्ष रखकर उससे इस प्रकार के प्रश्न पूछते हैं कि जवाब देना भी कठिन हो जाता है। संवेदनहीन कार्यक्रम संचालक विकलांग क बढ़ा देता है। जब विकलांग की वेदना फूट पड़ती है तो दर्शक भी उसे देखकर रोने लगते हैं। ऐसी स्थिति में कार्यक्रम संचालक यह देखकर प्रसन्न हो जाता है कि उसका कार्यक्रम सफल रहा। मीडिया के कर्मचारियों को विकलांग व्यक्ति की पीड़ा और कष्ट मात्र एक कार्यक्रम ही नज़र आता है।

यह कविता दूरदर्शन तथा स्टूडियो की भीतरी दुनिया को रेखांकित करती है। कवि यह संदेश देना चाहता है कि पर्दे के पीछे तथा पर्दे के बाहर पीड़ा का व्यापार नहीं होना चाहिए। हमें उस स्थिति से बचना चाहिए जो दूसरों के मर्म को आहत करती है। विकलांग व्यक्ति के प्रति संवेदना तथा सहानुभूति रखनी चाहिए ताकि उसके आहत हृदय में आत्मविश्वास उत्पन्न हो सके।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

HBSE 12th Class Hindi कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
इस कविता के बहाने बताएँ कि ‘सब घर एक कर देने के माने क्या हैं?
उत्तर:
“सब घर एक कर देने का अभिप्राय है-आपसी भेदभाव तथा ऊँच-नीच के भेद को समाप्त कर देना और एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता का अनुभव करना। गली-मोहल्ले में खेलते बच्चे अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं। वे अन्य घरों को अपने घर जैसा मानने लगते हैं। इसी प्रकार कवि भी काव्य रचना करते समय सामाजिक भेदभाव को भूलकर कविता के माध्यम से अपनी बात कहता है।

प्रश्न 2.
‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से क्या संबंध बनता है?
उत्तर:
‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से गहरा संबंध है। कवि कल्पना की उड़ान द्वारा नए-नए भावों की अभिव्यंजना करता है परंतु कवि की उड़ान पक्षियों की उड़ान से अधिक ऊँची होती है। उसकी उड़ान अनंत तथा असीम होती है। जिस प्रकार फूल कर अपनी सुगंध और रंग को चारों ओर फैलाता है, उसी प्रकार कवि भी अपनी कविता के भावों के आनंद को सभी पाठकों में बाँटता है। कवि की कविता सभी पाठकों को आनंदानुभूति प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
कवि कल्पना के संसार की सृष्टि करके आनंद प्राप्त करता है और बच्चे आनंद प्राप्त करने के लिए क्रीड़ा करते हैं। खेलते समय सभी बच्चे आपस में जुड़ जाते हैं और छोटे-बड़े तथा अपने-पराए के भेद को भूल जाते हैं। कवि भी भेदभाव को भूलकर सबके कल्याणार्थ कविता की रचना करता है। खेल खेलते समय बच्चों का संसार बड़ा हो जाता है और साहित्य-रचना करते समय कवि का। इसीलिए कविता और बच्चे को समानांतर रखा गया है।

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प्रश्न 4.
कविता के संदर्भ में ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ क्या होते हैं?
उत्तर:
फूल कुछ समय अपनी सुगंध और रंग का सौंदर्य बिखेरता है, फिर वह मुरझा जाता है। उसकी कोमल पत्तियाँ सूख कर बिखर जाती हैं, लेकिन कविता एक ऐसा फूल है जो कभी नहीं मुरझाता। कविता की महक अनंतकाल तक पाठकों को आनंद विभोर करती रहती है। हम हज़ारों साल पूर्व रचे गए साहित्य का आज भी आनंद प्राप्त करते रहते हैं।

प्रश्न 5.
‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने का अभिप्राय है-सहज, सरल तथा बोधगम्य भाषा का प्रयोग करना ताकि श्रोता भावाभिव्यक्ति को आसानी से ग्रहण कर सके। कवि को कृत्रिम तथा चमत्कृत करने वाली भाषा से बचना चाहिए। सरल बात, सरल भाषा में कही गई ही अच्छी लगती है।

प्रश्न 6.
बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में ‘सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। कैसे?
उत्तर:
बात और भाषा का गहरा संबंध होता है। मानव अपने मन की भावनाएँ शब्दों के द्वारा ही व्यक्त करता है। यदि हम अपनी अनुभूति को सहज और सरल भाषा में व्यक्त कर दें तो किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। परंतु कवि प्रायः अपनी बात को कहने के लिए सुंदर भाषा और चमत्कृत करने वाली भाषा का प्रयोग करने लगते हैं जिससे कवि का कथ्य अस्पष्ट हो जाता है। कवि जो कुछ कहना चाहता है, वह ठीक से कह नहीं पाता। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हम उन शब्दों को पढ़ रहे होते हैं जो हमारी समझ के बाहर होते हैं अर्थात् कविता का मूल भाव हमारी समझ में नहीं आ पाता। हिंदी साहित्य के रीतिकालीन कवियों ने प्रायः कविता के कलापक्ष को अधिक महत्त्व दिया है जिससे उनकी कविता के भाव अस्पष्ट होकर रह गए।

प्रश्न 7.
बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/महावरों से मिलान करें।

बिंब/मुहावराविशेषता
(क) बात की चूड़ी मर जानाकथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना
(ख) बात की पेंच खोलनाबात का पकड़ में न आना
(ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलनाबात का प्रभावहीन हो जाना
(घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देनाबात में कसावट का न होना
(ङ) बात का बन जानाबात को सहज और स्पष्ट करना

उत्तर:

बिंब/मुहावराविशेषता
(क) बात की चूड़ी मर जानाबात का पकड़ में न आना
(ख) बात की पेंच खोलनाबात का प्रभावहीन हो जाना
(ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलनाबात में कसावट का न होना
(घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देनाबात को सहज और स्पष्ट करना
(ङ) बात का बन जानाकथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
बात से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं। कुछ मुहावरों का प्रयोग करते हुए लिखें।
उत्तर:

  1. बातें बनाना केवल बातें बनाते रहोगे या मेरा काम भी करोगे।
  2. बात का धनी होना-यह अधिकारी बात का धनी है। यह जरूर हमारा काम करेगा।
  3. बात का बतंगड़ बनाना हमारा पड़ोसी तो हमेशा बात का बतंगड़ बना देता है। कभी-कभी तो झगड़े की नौबत भी आ जाती है।
  4. बात से मुकर जाना-जो लोग बात से मुकर जाते हैं, उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
  5. बात-बात पर मुँह बनाना तुम्हारी पत्नी तो बात-बात पर मुँह बनाने लगती है। यह कोई अच्छी बात नहीं है।

व्याख्या करें

“ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।
उत्तर:
जब कोई कवि अपनी भावाभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए जटिल भाषा का प्रयोग करने लगता है तो उसकी व्यंजना कुंद हो जाती है। कवि द्वारा प्रयुक्त जटिल भाषा के कारण कविता का मूल कथ्य नष्ट हो जाता है। अन्ततः कवि-कथ्य कृत्रिम भाषा में फँसकर रह जाता है और श्रोता कवि के भाव को समझ नहीं पाता।

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चर्चा कीजिए

आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आज के वैज्ञानिक युग में कविता की रचना करना काफी कठिन हो गया है, क्योंकि भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाने के कारण आधुनिक युग अत्यधिक बेचैन और व्याकुल रहता है। ऐसी स्थिति में केवल कविता ही मानव-मन को सुख-शांति प्रदान कर सकती है। आज भी हमारे समक्ष प्रकृति का विशाल प्रांगण है। आज समाज में अनेक समस्याएँ जटिल होती जा रही हैं। अतः कविता की संभावनाएँ काफी बढ़ चुकी हैं। आज प्रेम, मोहब्बत पर कविता लिखना व्यर्थ है, बल्कि जन-जीवन से जुड़ी कविता कवि-सम्मेलनों में वाह-वाही लूटती है। एक अच्छी कविता को पढ़कर आज का उलझा हुआ मानव कुछ राहत महसूस करता है। केवल आवश्यकता इस बात की है कि कविता हमारे जीवन से संबंधित होनी चाहिए।

चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में, बिंबों और उपमानों के महत्त्व पर परिसंवाद आयोजित करें।
उत्तर:
कविता के बहाने’ कविता में चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त उपमानों का प्रयोग किया है तथा कथ्य की अमूर्तता को साकार करने का प्रयास किया है इस पर यह संवाद कुछ इस प्रकार आयोजित किया जा सकता है
(क) आज के कवि सहज, सरल भाषा में अपनी बात क्यों नहीं कहते? वे कील, चूड़ी, पेंच आदि मूर्त उपमानों को माध्यम क्यों बनाते हैं?

(ख) एक सफल कवि अपनी बात को हमेशा सरल तथा प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में समर्थ होता है। कभी-कभी वह प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों का प्रयोग भी करता है। ऐसा करने से कविता के अर्थ में गंभीरता उत्पन्न हो जाती है।

(ग) कवि को जटिल प्रतीकों तथा उपमानों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उसका यह प्रयास रहना चाहिए कि कविता में कही गई बात उलझकर न रह जाए।

आपसदारी

1. सुंदर है सुमन, विहग सुंदर
मानव तुम सबसे सुंदरतम।
पंत की इस कविता में प्रकृति की तुलना में मनुष्य को अधिक सुंदर और समर्थ, बताया गया है। ‘कविता के बहाने’ कविता में से इस आशय को अभिव्यक्त करने वाले बिंदुओं की तलाश करें।
उत्तर:
कविता के बहाने में कवि ने बच्चे को चिड़िया और फूल की अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है। इसके लिए निम्नलिखित पंक्तियाँ उद्धृत हैं –
“कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।”

2. प्रतापनारायण मिश्र का निबंध ‘बात’ और नागार्जुन की कविता ‘बातें’ ढूँढ़ कर पढ़ें।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर इन दोनों रचनाओं को पढ़ें।

HBSE 12th Class Hindi कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

कविता के बहाने

प्रश्न 1.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने?
उत्तर:

  1. प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने कविता और चिड़िया की उड़ान की तुलना करते हुए यह स्पष्ट किया है कि चिड़िया की उड़ान कविता की उड़ान की उपेक्षा ससीम है, जबकि कविता की उड़ान अनंत और असीम है।
  2. ‘कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने’ में वक्रोक्ति अलंकार है।
  3. ‘चिड़िया क्या जाने’ में प्रश्नालंकार के साथ-साथ मानवीकरण का भी पुट है।
  4. ‘कविता के पंख लगा उड़ने’ में रूपक अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. ‘बाहर-भीतर इस घर, उस घर’ में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
  6. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हआ है तथा शब्द-चयन सर्वथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।
उत्तर:

  1. प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बच्चों के सरल स्वभाव पर प्रकाश डाला है। बच्चे आपस में खेलते समय अपने-पराए के भेदभाव को नहीं जानते।
  2. बच्चे की क्रीड़ाओं तथा कवियों की काव्य रचनाओं में काफी समानता होती है, क्योंकि न तो बच्चे भेदभाव को समझते हैं और न ही कवि। इसीलिए कवि ने कहा है कि सब घर एक कर देना।।
  3. ‘बाहर भीतर’, ‘इस घर, उस घर’ तथा ‘बच्चों के बहाने’ में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. प्रस्तुत पद्य में सहज, सरल तथा प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-योजना सार्थक व सटीक है।
  6. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

बात सीधी थी पर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए –
1. बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
जरा टेढ़ी फंस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-
उत्तर:
(1) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने इस बात पर बल दिया है कि कथ्य के अनुसार कविता की अभिव्यंजना होनी चाहिए। ऐसा करने से अभिव्यक्ति बड़ी सरलता के साथ स्वयं प्रकट हो जाती है।

(2) ‘उलटा-पलटा’, ‘तोड़ा-मरोड़ा’, ‘घुमाया-फिराया’ आदि शब्दों का सटीक प्रयोग हुआ है। ये शब्द भाषा की कृत्रिमता और जटिलता पर व्यंग्य करते हैं।

(3) ‘उलटा-पलटा’, ‘तोड़ा-मरोड़ा’, ‘घुमाया-फिराया’ आदि में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।

(4) भाषा का चक्कर’ तथा ‘टेढ़ी-फँसी’, जैसे लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग हुआ है जोकि अभिव्यंजना-शिल्प को सौंदर्य प्रदान करते हैं।

(5) सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(6) शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं सटीक है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए –
ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने भाषा के द्वारा भाव को सजाने का प्रयास किया है लेकिन वह भाव स्पष्ट नहीं हो पाया।
  2. यहाँ बात का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
  3. कवि द्वारा ‘पसीना पोंछना’ एक सुंदर दृश्य बिंब है जो परिश्रम की व्यर्थता को सिद्ध करता है।
  4. ‘शरारती बच्चे की तरह’ में उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. ‘पसीना पोंछते’ में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  6. इस पद्य में संवादात्मक शैली का बहुत ही प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
  7. सहज, सरल, बोधगम्य तथा प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  8. शब्द-योजना सार्थक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कविता के बहाने’ कविता का प्रतिपाद्य (उद्देश्य) स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस कविता के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि कविता की उड़ान आकाश में उड़ने वाली चिड़िया तथा फूल की सुगंध से भी अधिक ऊँची और विस्तृत होती है। चिड़िया की उड़ान ससीम है तथा फूल की महक भी ससीम है। पुनः ये दोनों नश्वर हैं तथा इनके क्रियाकलाप भी नश्वर हैं। परंतु कविता का प्रभाव अनंत और स्थाई होता है। कविता बच्चों के खेल के समान भेदभाव से मुक्त होती है और श्रोता को असीम आनंद प्रदान करती है। इसलिए कविता का प्रभाव अनंत, व्यापक तथा आनंदपूर्ण माना गया है।

प्रश्न 2.
कविता और चिड़िया की उड़ान में क्या अंतर है स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता और चिड़िया दोनों ऊँची उड़ान भर सकते हैं, परंतु चिड़िया की अपेक्षा कविता की उड़ान अनंत तथा असीम होती है। चिड़िया एक सीमित दायरे में ही उड़ सकती है, परंतु कवि अपनी कल्पना द्वारा कहीं भी पहुंच सकता है। इसलिए कहा भी गया है
“जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि”।

प्रश्न 3.
कविता और फूल की तुलना करें।
उत्तर:
फूल और उसकी महक ससीम है। पुनः ये दोनों ही नश्वर हैं। फूल क्षण भर के लिए खिलकर अपनी महक फैलाता है और फिर नष्ट हो जाता है, परंतु कवि की कल्पना, उसका भाव और सौंदर्य अनंत काल तक श्रोताओं को आनंद दे सकते हैं।

प्रश्न 4.
बच्चों और कविता में क्या समानता है?
उत्तर:
बच्चे आपसी भेदभाव तथा अपने-पराए के अंतर को भूलकर खेलते हुए आनंद प्राप्त करते हैं। कविता भी अपने-पराए की भावना को भूलकर भावों को ग्रहण करती है। जिस प्रकार बच्चों को खेल से आनंद मिलता है, उसी प्रकार कविता भी आनंदानुभूति के लिए लिखी जाती है।

प्रश्न 5.
‘बात सीधी थी पर’ कविता का प्रतिपाद्य (उद्देश्य)/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘बात सीधी थी पर कविता के माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि हमें सहज, सरल तथा बोधगम्य भाषा द्वारा अपनी बात को कहना चाहिए। यदि कवि अपनी बात को जटिल तथा चमत्कृत करने वाली भाषा के द्वारा कहता है तो उसकी बात श्रोता तक ठीक से नहीं पहुँच पाती। प्रायः कुछ कवि अपने कथ्य को चमत्कारी बनाने के लिए भाषा को जान-बूझकर तोड़ते-मरोड़ते और घुमाते-फिराते हैं। इससे कविता का भाव-सौंदर्य तथा कलागत सौंदर्य दोनों नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
‘बात की चूड़ी मरने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘बात की चूड़ी मरने’ का यह अभिप्राय है कि बेवजह बात को घुमाने-फिराने से उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार पेंच की चूड़ी मरने के बाद उसका कसाव ढीला पड़ जाता है, उसी प्रकार भाषा के अनावश्यक विस्तार से मूल बात शब्द-जाल में उलझ जाती है। वह श्रोता तक ठीक से नहीं पहुँच पाती।

प्रश्न 7.
‘बात और अधिक पेचीदा’ क्यों होती चली गई?
उत्तर:
कवि ने भाषा को अनावश्यक विस्तार देते हुए अपनी बात को कहने का प्रयास किया। उसने चमत्कृत करने वाली कृत्रिम भाषा का अधिक प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप बात और भी पेचीदा होती चली गई।

प्रश्न 8.
कवि ने हारकर उसे कील की तरह उसी जगह क्यों ठोंक दिया?
उत्तर:
पहले तो कवि ने चमत्कृत भाषा के प्रयोग द्वारा अपनी बात को प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया परंतु इससे कवि का कथ्य उलझकर रह गया। वस्तुतः कवि अपना धैर्य खो बैठा। इसलिए उसने निराश होकर अपनी बात को उसी कृत्रिम भाषा में प्रकट कर दिया।

प्रश्न 9.
कवि को पसीना क्यों आ रहा था?
उत्तर:
कवि अपनी बात को सरलता से नहीं कह पा रहा था। वह प्रभावशाली भाषा के प्रयोग में उलझकर रह गया। कवि जो कुछ कहना चाहता था, वह कह नहीं पाया। वह बार-बार काव्य भाषा को बदल रहा था। इस कारण उसकी बात जटिल भाषा में उलझकर रह गई। इसलिए उसे थकावट के कारण पसीना आ रहा था।

प्रश्न 10.
बात ने एक शरारती बच्चे की तरह कवि से क्या कहा?
उत्तर:
बात एक शरारती बच्चे की तरह कवि से क्रीड़ा कर रही थी। वह जानती थी कि कवि उसे ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा है। इसलिए उसने कवि से कहा कि तुम अभी तक यह भी नहीं सीख पाए कि भाषा का सहज प्रयोग किस प्रकार किया जाता है? अर्थात् कवि को यह समझना चाहिए था कि सहज शब्दावली में भी सहज विचारों को व्यक्त किया जा सकता है। उसके लिए जटिल अथवा उलझी हुई शब्दावली की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 11.
आखिर कवि को डर किस बात का था?
उत्तर:
कवि अपनी ओर से बात को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करना चाहता था। इसके लिए उसने आडंबर प्रधान भाषा का या। लेकिन बलपूर्वक कृत्रिम भाषा का प्रयोग करने से कवि का कथ्य इस प्रकार प्रभावहीन हो गया जैसे जोर जबरदस्ती करने से चूड़ी मर जाती है।

प्रश्न 12.
बात पेचीदा क्यों होती चली गई?
उत्तर:
कवि सहज एवं सरल भाषा में अपनी बात को कह सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह भाषा को तोड़ने-मरोड़ने लगा ताकि उसका कथन अधिक प्रभावशाली हो सके। इसका परिणाम यह हुआ कि उस कृत्रिम भाषा के फलस्वरूप कवि का कथन उलझता चला गया और बात पेचीदा होती चली गई।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. कुँवर नारायण का जन्म कब हुआ?
(A) 19 सितंबर, 1927
(B) 19 सितंबर, 1937
(C) 19 दिसंबर, 1927
(D) 19 अक्तूबर, 1927
उत्तर:
(A) 19 सितंबर, 1927

2. कुँवर नारायण का जन्म कहाँ पर हुआ?
(A) मुरादाबाद
(B) मेरठ
(C) बरेली
(D) फैज़ाबाद
उत्तर:
(D) फैज़ाबाद

3. कुँवर नारायण ने किस विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) आगरा विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय

4. कुँवर नारायण ने चेकोस्लोवाकिया, पौलेंड, रूस तथा चीन का भ्रमण कब किया?
(A) सन् 1954 में
(B) सन् 1955 में
(C) सन् 1956 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(B) सन् 1955 में

5. सन् 1956 में कुँवर नारायण किस पत्रिका के संपादक मंडल से जुड़ गए?
(A) धर्म युग
(B) दिनमान
(C) नवनीत
(D) युग चेतना
उत्तर:
(D) युग चेतना

6. भारतेंदु नाटक अकादमी में वे किस पद पर नियुक्त हुए?
(A) सचिव
(B) उपाध्यक्ष
(C) अध्यक्ष
(D) सलाहकार
उत्तर:
(C) अध्यक्ष

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7. कुँवर नारायण को ‘हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1971 में
(B) सन् 1973 में
(C) सन् 1969 में
(D) सन् 1968 में
उत्तर:
(A) सन् 1971 में

8. कुँवर नारायण को ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1973 में
(B) सन् 1975 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1977 में
उत्तर:
(A) सन् 1973 में

9. कुँवर नारायण को मध्य प्रदेश का ‘तुलसी पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1981 में
(B) सन् 1982 में
(C) सन् 1984 में
(D) सन् 1984 में
उत्तर:
(B) सन् 1982 में

10. ‘कविता के बहाने’ के कवि का नाम क्या है?
(A) आलोक धन्वा
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(C) कुँवर नारायण

11. ‘कविता के बहाने कविता कवि के किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
(A) चक्रव्यूह
(B) अपने सामने
(C) इन दिनों
(D) आत्मजयी
उत्तर:
(C) इन दिनों

12.
‘बात सीधी थी पर कविता के कवि का नाम क्या है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) मुक्तिबोध
(C) आलोक धन्वा
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

13. ‘बात सीधी थी पर’ किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
(A) इन दिनों
(B) कविता के बहाने
(C) कोई दूसरा नहीं
(D) चक्रव्यूह
उत्तर:
(C) कोई दूसरा नहीं

14. ‘तीसरा सप्तक’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1961 में
(B) सन् 1958 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(C) सन् 1959 में

15. ‘परिवेश : हम तुम’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) हरिवंश राय बच्चन
(B) रघुवीर सहाय
(C) आलोक धन्वा
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

16. ‘परिवेश : हम तुम’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1961 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1963 में
उत्तर:
(A) सन् 1961 में

17. ‘इन दिनों का प्रकाशन वर्ष कौन-सा है?
(A) सन् 1962 में
(B) सन् 1963 में
(C) सन् 1965 में
(D) सन् 1964 में
उत्तर:
(D) सन् 1964 में 18. ‘अपने सामने के रचयिता का नाम क्या है?

18. ‘अपने सामने’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) कुँवर नारायण
(C) मुक्तिबोध
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) कुँवर नारायण

19. ‘अपने सामने का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1996 में
(B) सन् 1995 में
(C) सन् 1997 में
(D) सन् 1999 में
उत्तर:
(C) सन् 1997 में

20. ‘आकारों के आस-पास’ के रचयिता कौन हैं?
(A) आलोक धन्वा
(B) रघुवीर सहाय
(C) मुक्ति बोध
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

21. ‘आकारों के आस-पास’ किस विधा की रचना है?
(A) काव्य-संग्रह
(B) कहानी संग्रह
(C) निबंध संग्रह
(D) कविता संग्रह
उत्तर:
(B) कहानी संग्रह

22. ‘आज और आज से पहले किस विधा की रचना है?
(A) निबंध संग्रह
(B) उपन्यास
(C) एकांकी संग्रह
(D) समीक्षा
उत्तर:
(D) समीक्षा

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

23. ‘कविता के पंख लगाने में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) रूपक
(C) उत्प्रेक्षा
(D) उपमा
उत्तर:
(B) रूपक

24. सीधी बात भी किसके चक्कर में फंस गई थी?
(A) निपुणता
(B) शैतानी
(C) भाषा
(D) भय
उत्तर:
(C) भाषा

25. ‘कवि की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) उपमा
(C) श्लेष
(D) काकुवक्रोक्ति
उत्तर:
(A) रूपक

26. ‘कविता के बहाने’ कविता में किस छंद का प्रयोग हआ है?
(A) कवित्त छंद
(B) सवैया छंद
(C) मुक्त छंद
(D) दोहा छंद
उत्तर:
(C) मुक्त छंद

27. ‘बाहर भीतर इस घर, उस घर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) श्लेष
(B) यमक
(C) अनुप्रास
(D) वक्रोक्ति
उत्तर:
(C) अनुप्रास

28. भाषा के क्या करने से बात और अधिक पेचीदा हो गई?
(A) तोड़ने-मरोड़ने
(B) उलटने-पलटने
(C) घुमाने-फिराने
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

29. ‘बात की चूड़ी मर जाना’ का अर्थ है
(A) स्पष्ट होना
(B) प्रभावहीन होना
(C) प्रभावपूर्ण होना
(D) तर्कपूर्ण होना
उत्तर:
(B) प्रभावहीन होना

30. ‘बात की पेंच खोलना’ का अर्थ है
(A) बात उलझा देना
(B) बात का प्रभावहीन होना
(C) बात को सहज और स्पष्ट करना
(D) बात को घुमाकर कहना
उत्तर:
(B) बात का प्रभावहीन होना

31. ‘बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना’ का अर्थ है
(A) बात का प्रभावहीन होना
(B) कोई ठीक उत्तर न देना
(C) बात द्वारा शरारत करना
(D) बात को सहज स्पष्ट करना
उत्तर:
(B) कोई ठीक उत्तर न देना

32. बिन मुरझाए महकना का अर्थ है
(A) कविता का प्रभाव अनंत काल तक रहता है
(B) कविता कभी नहीं मुरझाती
(C) कविता का प्रभाव शीघ्र नष्ट हो जाता है
(D) कविता को लोग पढ़ना नहीं चाहते
उत्तर:
(A) कविता का प्रभाव अनंत काल तक रहता है

33. बात कवि के साथ किसके समान खेल रही थी?
(A) शरारती बच्चे के
(B) खिलौने के
(C) भाषा के
(D) पेंच के
उत्तर:
(A) शरारती बच्चे के

34. बात बाहर निकलने की अपेक्षा कैसी हो गई थी?
(A) पेचीदा
(B) सरल
(C) वक्र
(D) व्यर्थ
उत्तर:
(A) पेचीदा

35. ‘बात सीधी थी पर’ नामक कविता में कवि ने किस पर बल दिया है?
(A) भाषा की जटिलता
(B) भावों की सरसता
(C) भाषा की सहजता
(D) भावों की गरिमा
उत्तर:
(C) भाषा की सहजता

36. ‘बात सीधी थी पर’ कविता में कवि ने कौन-सी कोशिश नहीं की थी?
(A) उलटा पलटा
(B) तोड़ा मरोड़ा
(C) हिलाया सरकाया
(D) घुमाया फिराया
उत्तर:
(C) हिलाया सरकाया

37. भाषा को घुमाने फिराने से बात कैसी हो जाती है?
(A) पेचीदा
(B) सरल
(C) दिव्य
(D) सौम्य
उत्तर:
(A) पेचीदा

कविता के बहाने पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर 

[1] कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने? [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-सरल हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है तथा इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि स्पष्ट करता है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का अस्तित्व समाप्त हो गया है

व्याख्या-कवि कविता की शक्ति का वर्णन करता हुआ कहता है कि कविता एक उड़ान है। जहाँ चिड़िया की उड़ान सीमित होती है, परन्तु कविता की उड़ान असीमित होती है। उसमें नए-नए भाव, नए-नए रंग तथा नए-नए विचार उत्पन्न होते रहते हैं। कविता की उड़ान बड़ी ऊँची होती है। चिड़िया भी कविता की उड़ान के उस छोर तक नहीं पहुँच पाती। कविता के भाव असीम होते हैं। कविता न केवल घर के भीतर की गतिविधियों का वर्णन करती है, बल्कि वह बाहर के क्रियाकलापों को भी व्यक्त करती है। भाव यह है कि कभी तो कविता घर-परिवार की समस्याओं का उद्घाटन करती है तो कभी घर के बाहर के वातावरण का मार्मिक वर्णन करती है। कविता के साथ कल्पना के पंख लगे होते हैं। इसलिए उसकी उड़ान असीम है। बेचारी चिड़िया कविता की असीम शक्ति को कैसे पहचान सकती है। जहाँ प्रकृति का क्षेत्र ससीम है, वहाँ कविता का क्षेत्र अनंत और असीम है।

विशेष –

  1. यहाँ कवि ने कविता और चिड़िया की उड़ान की मनोहारी तुलना की है। चिड़िया एक सीमित क्षेत्र में ही उड़ान भर सकती है, परंतु कविता की उड़ान असीमित है।
  2. ‘चिड़िया क्या जाने’ में प्रश्नालंकार है तथा इसमें मानवीकरण का भी पुट है।
  3. ‘कविता के पंख’ में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘बाहर भीतर इस घर, उस घर’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-योजना सार्थक व सटीक है।
  7. वर्णनात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग है, लेकिन छंद में लयबद्धता भी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ग) कविता चिड़िया के बहाने एक उड़ान क्यों है?
(घ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि-कुँवर नारायण कविता- कविता के बहाने’

(ख) इस पंक्ति द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि चिड़िया तो प्रकृति के प्रांगण में ही उड़ान भरती है। उसकी अपनी कुछ सीमाएँ हैं। वह केवल आकाश में ही उड़ सकती है, परंतु वह मानव-मन की सूक्ष्म भावनाओं में प्रवेश नहीं कर पाती। इसलिए वह कविता की उड़ान को नहीं जान सकती।

(ग) जिस प्रकार चिड़िया खुले आकाश में उड़ान भरती है, उसी प्रकार कवि की कल्पना चिड़िया की ऊँची उड़ान को देखकर कल्पना लोक में विचरण करने लगती है। कवि केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही वर्णन नहीं करता, बल्कि वह मानव मन की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन भी करता है। अतः चिड़िया की उड़ान कविता के लिए प्रेरणा का काम करती है।

(घ) इस पद्यांश में कवि ने चिड़िया की उड़ान और कविता की उड़ान की तुलना की है। चिड़िया की उड़ान की अपेक्षा कविता की उड़ान अधिक प्रभावशाली, शक्तिशाली तथा व्यापक है। कविता की उड़ान का संबंध मानव मन की सूक्ष्म भावनाओं से भी है।

[2] कविता एक खिलना है फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने!
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने? [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-महकना = सुगंध बिखेरना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने’ से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है। इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का वजूद समाप्त हो गया है। इस पद्य में कवि कविता की तुलना फूल के साथ करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि कविता फूलों को देखकर खिलती है और पुष्पित होती है। फूलों के समान कविता में भी नए-नए रंग भर जाते हैं। कविता का खिलना असीम है, जबकि फूल का खिलना ससीम है। फल केवल खिलकर अपने चारों ओर स तथा सुंदरता को बिखेर देता है, परंतु फूल कविता के खिलने को ठीक से समझ नहीं पाता। फूल का क्षेत्र सीमित है। एक समय ऐसा आता है जब फूल मुरझाकर नष्ट हो जाता है। उसके साथ-साथ उसकी सुगंध तथा सुंदरता भी समाप्त हो जाती है, परंतु कविता की सुगंध तथा सुंदरता कभी समाप्त नहीं होती। वह न केवल घर के बाहर तथा भीतर अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरती है, बल्कि वह प्रत्येक घर में अपने भाव-सौंदर्य को बिखेरती रहती है। फूल तो केवल इतना जानता है कि बस सुगंध उत्पन्न करना तथा एक दिन झर जाना। फूल बिना मुरझाए महकने के अर्थ को नहीं जान सकता। कविता हमेशा अपने भावों की सुगंध बिखेरती रहती है। उसका भाव शाश्वत होता है तथा वह कभी नष्ट नहीं होता।

विशेष –

  1. इस पद्यांश में कवि ने कविता तथा फूल की तुलना बहुत सुंदर ढंग से की है। कविता की तुलना में फूल ससीम है परंतु कविता अनंत और असीम है।
  2. ‘कविता का खिलना फूल क्या जाने’ इस पद्य पंक्ति में काकूवक्रोक्ति अलंकार का वर्णन हुआ है।
  3. ‘फूल क्या जाने’ में प्रश्नालंकार है तथा मानवीकरण अलंकार का पुट भी है।
  4. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. वर्णनात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है, लेकिन छंद में लयबद्धता भी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कविता का खिलना फूल क्या जाने-पंक्ति में कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कविता और फूल के खिलने में क्या अंतर है?
(ग) कविता बिना मुरझाए बाहर भीतर कैसे महकती है?
(घ) इस पद्य का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि फूल की सीमाओं पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि भले ही वह खिलकर चारों ओर सुगंध बिखेरता है, परंतु उसका खिलना सीमित होता है। वह कविता के मर्म को नहीं जान पाता। निश्चय से कविता फूल से अधिक मूल्यवान है। उसकी प्रभावोत्पादकता असीम है।

(ख) फूल खिलकर एक सीमित क्षेत्र में अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरता है। परंतु कविता का क्षेत्र असीमित होता है। कविता की कल्पना सर्वत्र पहुँच सकती है। फूल कविता के समान व्यापक नहीं है। इसलिए कहा भी गया है
“जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।”

(ग) कविता एक ऐसा फूल है जो कभी नहीं मुरझाता और हमेशा अपनी महक को बिखेरता रहता है। कविता बाह्य प्रकृति और आंतरिक प्रकृति दोनों का वर्णन करने में समर्थ है। वह अनंत काल तक अपनी सुगंध को बिखेरती रहती है। कविता का प्रभाव अनंत तथा असीम है।

(घ) इस पद्यांश द्वारा कवि कविता और फूल की तुलना करते हुए कहता है कि फूल एक सीमित दायरे में अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरता है। कुछ समय के बाद शीघ्र ही वह नष्ट हो जाता है। परंतु कविता मानव मन के बाहर तथा भीतर दोनों को सुगंधित करती है। इसलिए फूल की शक्ति ससीम है, परंतु कविता की शक्ति असीम है।

[3] कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने। [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-सरल हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है। इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का वजूद समाप्त हो गया है। इसमें कवि ने बच्चों में पाई जाने वाली स्वाभाविक आत्मीयता और निष्कलुषता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि का कथन है कि कवि बच्चों की क्रीड़ाओं को देखकर अपनी कविता द्वारा शब्द-क्रीड़ा करता है। वह शब्दों के माध्यम से नए-नए भावों तथा विचारों के खेल खेलता है। जिस प्रकार बच्चे कभी घर में खेलते हैं, कभी बाहर खेलते हैं और अपने-पराए का भेदभाव नहीं करते, उसी प्रकार कवि भी कविता के द्वारा सभी के भावों का वर्णन करता है। बच्चों के खेल कवि को भी प्रेरणा देते हैं। खेल-खेल में बच्चे एक-दूसरे को अपना बना लेते हैं और वे एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। कवि भी बच्चों के समान बाहर और भीतर के मनोभावों का वर्णन करता है। वह समान भाव से सभी लोगों की सूक्ष्म भावनाओं का चित्रण करता है। भाव यह है कि जिस प्रकार बच्चे एक-दूसरे को जोड़ते हैं, उसी प्रकार कवि भी अपनी कविता द्वारा जोड़ने का प्रयास करता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बच्चों में पाई जाने वाली स्वाभाविक आत्मीयता तथा निष्कलुषता का उद्घाटन किया है।
  2. कवि यह स्पष्ट करता है कि बच्चे आपस में खेलते हुए अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं।
  3. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  6. वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है तथा मुक्त छंद है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि ने कविता को खेल क्यों कहा है?
(ख) बच्चे खेल-खेल में कौन-सा महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं?
(ग) बच्चों के खेलने तथा कविता रचने में क्या समानता है?
(घ) इस पद्य से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर:
(क) बच्चे मनोरंजन तथा आत्माभिव्यक्ति के लिए आपस में खेलते हैं। खेलों के पीछे उनका कोई गंभीर उद्देश्य नहीं होता, परंतु क्रीड़ाएँ बच्चों को आनंदानुभूति प्रदान करती हैं। इसी प्रकार कविता की रचना करना भी एक खेल है। कविता के द्वारा कवि न केवल श्रोताओं का मनोरंजन करता है, बल्कि उन्हें आनंदानुभूति भी प्रदान करता है।

(ख) बच्चे खेल-खेल में अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं। खेलों द्वारा उनमें आत्मीयता की भावना उत्पन्न होती है। बच्चे खेलों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

(ग) बच्चों के खेलने तथा कविता रचने में सबसे बड़ी समानता यह है कि दोनों ही आनंदानुभूति प्रदान करते हैं। दोनों ही समाज को जोड़ने का काम करते हैं, तोड़ने का नहीं। दूसरा, दोनों से ही मनोरंजन होता है।

(घ) इस पद्यांश से हमें यह संदेश मिलता है कि बच्चों के समान कविता भी हमें आपस में जोड़ती है। कविता अपने-पराए के भेदभाव को भूलकर सबकी अनुभूतियों को व्यक्त करती है। कविता का क्षेत्र बड़ा ही विस्तृत व व्यापक है। इसका प्रभाव भी शाश्वत और अनंत है।

बात सीधी थी पर पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर 

[1] बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
जरा टेढ़ी फँस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई। [पृष्ठ-18]

शब्दार्थ-चक्कर = प्रभाव दिखाने की कोशिश। टेढ़ा फँसना = बुरी तरह फँसना। पेचीदा = जटिल, उलझी हुई।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए। सीधी बात को हम सहज एवं सरल भाषा द्वारा प्रभावशाली बना सकते हैं।

व्याख्या-कवि कहता है कि मैं कविता द्वारा एक सहज, सरल बात कहना चाहता था। एक बार ऐसा करते समय मैं भाषा के भ्रम का शिकार बन गया। मैंने सोचा कि मैं बढ़िया-से-बढ़िया भाषा का प्रयोग करूँ, परंतु ऐसा करते समय मेरा कथ्य उलझकर रह गया और बात की सरलता और स्पष्टता नष्ट हो गई। सरल-सी बात भी सुलझकर रह गई। तब मैंने एक बड़ी भारी भूल की। मैंने भाषा के शब्दों को काटना-छाँटना तथा तोड़ना-मरोड़ना आरंभ कर दिया। उसे कभी इधर घुमाया, कभी उधर घुमाया। वस्तुतः मैं अपनी मूल बात को सहज तथा सरल रूप से व्यक्त करना चाहता था, परंतु मेरी बात उलझकर रह गई। तब मैंने यह कोशिश की कि या तो मेरे मन की बात सहजता से व्यक्त हो जाए या मेरी बात को भाषा के उलट-फेर से स्वतंत्रता मिल जाए। परंतु दोनों काम नहीं हो सके। इस प्रयास में भाषा जटिल से जटिलतर होती चली गई और मेरी मूल बात भी सरलता खोकर जटिल बन गई। भाव यह है कि कविता का कथ्य और माध्यम दोनों उलझकर रह गए।

विशेष-

  1. इस पद्य में कवि ने सहज, सरल कथ्य को सहज और सरल माध्यम (भाषा) द्वारा अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया पर बल दिया है। ऐसा करने से अभिव्यक्ति की सरलता का भाव स्वतः प्रकट हो जाता है।
  2. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है जिसे लयात्मक गद्य कहा जा सकता है।
  3. प्रस्तुत पद्य में उलटा-पलटा, तोड़ा-मरोड़ा, घुमाया-फिराया आदि शब्दों का सटीक प्रयोग किया गया है। इन शब्द-युग्मों में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
  5. ‘भाषा का चक्कर’ तथा ‘टेढ़ी फँसी’ आदि लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  6. ज़रा, पेचीदा आदि उर्दू शब्दों का सहज प्रयोग है।
  7. मुक्त छंद है तथा आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘भाषा के चक्कर’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि द्वारा भाषा के तरोड़ने-मरोड़ने का क्या दुष्परिणाम हुआ?
(घ) कवि भाषा के चक्कर में क्यों फँस गया?
(ङ) इस पद्यांश का संदेश क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-कुँवर नारायण कविता-बात सीधी थी पर (ख) जब कवि कविता की भाषा में अलंकार-सौंदर्य, शब्द-शक्तियों आदि को बलपूर्वक लूंसने का प्रयास करता है तो भाषा में जटिलता उत्पन्न हो जाती है। परिणामस्वरूप मूल संदेश शब्दों में उलझकर रह जाता है। कवि कथ्य के चारों ओर भाषा का ऐसा जंजाल खड़ा हो जाता है कि सीधी बात भी नहीं कही जा सकती।

(ग) कवि द्वारा भाषा को तरोड़ने-मरोड़ने तथा उलटने-पलटने के फलस्वरूप बात और उलझकर रह गई और कवि-कथ्य जटिल और पेचीदा बन गया।

(घ) कवि अपनी सीधी बात को प्रभावशाली ढंग से कहना चाहता था। इसलिए उसने बढ़िया-से-बढ़िया भाषा का प्रयोग करने का प्रयास किया, परंतु उसकी बात और उलझकर रह गई।

(ङ) इस पद्य द्वारा कवि यह संदेश देना चाहता है कि कवि को जान-बूझकर भाषा जटिल नहीं बनानी चाहिए, बल्कि सीधी बात सरल शब्दों में व्यक्त करनी चाहिए। भाषा की जटिलता कथ्य को उलझाकर रख देती है और कविता पाठक को आनंदानुभूति नहीं दे पाती।

[2] सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह। [पृष्ठ-18]

शब्दार्थ-मुश्किल = कठिनाई। बेतरह = बुरी तरह। करतब = चमत्कार। तमाशबीन = तमाशा देखने वाले (पाठक)। शाबाशी = प्रशंसा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए। इसमें कवि स्पष्ट करता है कि जटिल भाषा का प्रयोग करने वाला कवि लोगों की वाह-वाही तो लूट लेता है, परंतु वह अपने भाव तथा भाषा को जटिल बना देता है

व्याख्या कवि कहता है कि मेरी सहज, सरल बात भाषा के चक्कर में फंस गई थी। मैं इस कठिनाई को धैर्यपूर्वक समझ नहीं पाया, बल्कि मैं समस्या के कारण को समझे बिना ही उसे और जटिल बनाता चला गया। जिस प्रकार कोई कारीगर पेंच को खोलने की बजाए उसे बुरी तरह कसता चला जाता है, उसी प्रकार मैं भी भाषा के साथ ज़बरदस्ती करने लगा। मेरी इस बेवकूफी पर वाह-वाही करने वाले लोग भी अधिक थे जो मुझे शाबाशी दे रहे थे। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मेरी कविता के भाव और भाषा दोनों जटिल बनते चले गए और कविता का कथ्य उलझकर रह गया।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि कवि का कथ्य जब जटिल भाषा में उलझकर रह जाता है तो वह अपना धैर्य खो बैठता है तब वह जटिल से जटिलतर भाषा का प्रयोग करने लगता है।
  2. ‘तमाशबीन’ शब्द में व्यंग्य छिपा हुआ है। प्रायः दर्शक, श्रोता अथवा प्रशंसक अकारण प्रशंसा द्वारा कवि को भ्रमित कर देते हैं और वह कविता में जटिल भाषा का प्रयोग करने का आदी बन जाता है।
  3. ‘करतब’ शब्द में व्यंग्यात्मकता है। जान-बूझकर भाषा को जटिल बनाना करतब ही कहा जाएगा।
  4. पेंच कसने के बिंब द्वारा कवि अपनी बात को स्पष्ट करता है। यहाँ उद्देश्य बिंब के साथ रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-योजना सर्वथा उचित व सटीक है।
  7. मुश्किल, करतब, साफ, तमाशबीन, शाबाशी आदि उर्दू के शब्दों का सफल प्रयोग है जिससे इस पद्यांश की भाषा लोक प्रचलित हिंदी बन गई है।
  8. पेंच खोलने की बजाए उसे कसने में दृश्य बिंब की योजना सुंदर बन पड़ी है।
  9. मुक्त छंद का प्रयोग है तथा आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) पेंच खोलने का क्या अर्थ है?
(ख) कवि सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना पेंच को खोलने की बजाए कसता क्यों चला गया?
(ग) तमाशबीन वाह-वाह क्यों कर रहे थे?
(घ) कवि के कार्य को करतब क्यों कहा गया है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) यहाँ पेंच खोलने से अभिप्राय अभिव्यक्ति की जटिलता को और अधिक बढ़ाना है। कवि अपना धैर्य खो चुका था। इस कारण वह मूल समस्या को समझे बिना जटिल से जटिलतर भाषा का प्रयोग करता चला गया।

(ख) कवि अपने कथ्य को अत्यधिक प्रभावशाली बनाना चाहता था। इसलिए वह धैर्यपूर्वक समस्या को नहीं समझ पाया और कविता के अभिव्यक्ति पक्ष को जटिल बनाता चला गया।

(ग) तमाशबीन कवि की प्रशंसा करके उसका उत्साह बढ़ा रहे थे। वे अभिव्यक्ति के सौंदर्य को जानते नहीं थे। वे तो केवल कवि की जटिल भाषा से प्रभावित होकर कवि की पीठ ठोंक रहे थे।

(घ) कवि ने सोचे-समझे बिना अपनी बात को उलझाने तथा जटिल बनाने का प्रयास किया। इसलिए कवि के कार्य को करतब कहा गया है।

(ङ) इस पद्यांश के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि कवि को धैर्यपूर्वक सरल अभिव्यक्ति का ही प्रयोग करना चाहिए। सरल भाषा में कही गई बात श्रोता की समझ में शीघ्र आ जाती है और वह कवि की अभिव्यंजना शिल्प से प्रभावित भी होता है। परंतु जो कवि सोचे-समझे बिना बात को उलझाकर जटिल बना देते हैं, उनकी कविता वांछित प्रभाव

[3] आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी!
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया
ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?” [पृष्ठ-18-19]

शब्दार्थ- ज़ोर ज़बरदस्ती = बलपूर्वक। चूड़ी मरना = पेंच कसने के लिए बनाई गई चूड़ी का नष्ट होना (कथ्य की प्रभावोत्पादकता)। कसाव = कसावट। ताकत = शक्ति। सहूलियत = आसानी, सरलता। बरतना = प्रयोग करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश के कवि कुँवर नारायण हैं। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

व्याख्या कवि स्पष्ट करता है कि यहाँ अन्ततः वही परिणाम निकला जिसका कवि को भय था। भाषा को तोड़ने-मरोड़ने तथा जटिल बनाने से कविता की भावाभिव्यक्ति का प्रभाव ही नष्ट हो गया। उसकी अभिव्यंजना कंद हो र भाषा भावहीन होकर पीड़ा करने लगी अर्थात् कविता का मूल कथ्य तो नष्ट हो गया, केवल भाषा की उछल-कूद ही दिखाई देने लगी। अंत में कवि तंग आ गया। उसने निराश होकर अभिव्यक्ति को चमत्कारी शब्दों से बलपूर्वक लूंस दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ऊपर से वह कविता ठीक लग रही थी, परंतु उसका कथ्य पक्ष बड़ा ही कमज़ोर तथा प्रभावहीन बनकर रह गया। कवि के कथन में न कोई प्रभाव था और न ही भावों की गंभीरता थी। कवि की कविता पूर्णतः प्रभावहीन बनकर रह गई थी।

अंत में कविता के कथ्य ने (बात ने) बच्चे की तरह कवि के साथ क्रीड़ा करते हुए उससे कहा कि तुम मुझ पर व्यर्थ में ही मेहनत कर रहे थे और अपनी इस मूर्खता पर पसीना बहा रहे थे। हैरानी की बात यह है कि तुम्हें आज तक सहज तथा सरल भाषा का प्रयोग करना ही नहीं आया। इससे पता चलता है कि तुम एक अयोग्य और बेकार कवि हो। तुम इस तथ्य को नहीं जान पाए कि सहज तथा सरल भाषा में कही बात ही प्रभावशाली सिद्ध होती है।

विशेष-

  1. कवि ने स्वीकार किया है कि जटिल तथा चमत्कारी भाषा का प्रयोग करने से कविता का मूल भाव प्रभावहीन हो जाता है।
  2. पेंच कसने में दृश्य बिंब की योजना सजीव बन पड़ी है। यहाँ रूपकातिशयोक्ति अलंकार का भी प्रयोग हुआ है।
  3. ‘बात की चूड़ी मरना’ में भी रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कील की तरह ठोंकना’ से अभिप्राय है भाषा का बलपूर्वक प्रयोग करना।
  5. प्रस्तुत पद्य में बात का सुंदर और प्रभावशाली मानवीकरण हुआ है।
  6. ‘कील की तरह’, ‘शरारती बच्चे की तरह’ दोनों में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
  7. ‘पसीना पोंछना’, ‘ज़ोर-ज़बरदस्ती’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
  8. ‘कवि का पसीना पोंछना’ में सुंदर बिंब योजना है। यह पद परिश्रम की व्यर्थता को सिद्ध करता है।
  9. इसमें कवि ने सहज, सरल एवं बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया है। इसमें आखिर, ज़ोर-ज़बरदस्ती, ताकत, पसीना, सहूलियत आदि उर्दू शब्दों का बड़ा ही सुंदर मिश्रण किया गया है।
  10. शब्द-योजना बड़ी सार्थक व सटीक है।
  11. मुक्त छंद तथा संवादात्मक शैली का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि को किस बात का डर था?
(ख) कवि के सामने कथ्य तथा माध्यम की क्या समस्या थी?
(ग) क्या कवि इस समस्या का हल निकाल सका?
(घ) बात ने शरारती बच्चे के समान कवि से क्या कहा?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि को इस बात का डर था कि जटिल भाषा का प्रयोग करने से कविता का मुख्य भाव प्रभावहीन तथा अस्पष्ट हो जाएगा और अंत में ऐसा ही हुआ।

(ख) कवि अपने कथ्य को प्रभावशाली माध्यम के द्वारा व्यक्त करना चाहता था। परंतु कवि इस सच्चाई से अनभिज्ञ था कि सहज तथा बोधगम्य भाषा में कही गई बात ही अधिक प्रभावशाली और गंभीर होती है।

(ग) कवि इस समस्या का हल नहीं निकाल पाया। जटिल भाषा के प्रयोग के कारण कवि की बात उलझकर रह गई। अंततः कवि ने निराश होकर अभिव्यक्ति को चमत्कारी शब्दों से लूंस दिया।

(घ) बात ने शरारती बच्चे के समान कवि से कहा कि तुम व्यर्थ में ही परिश्रम कर रहे हो और अपनी बेवकूफी की मेहनत पर पसीना बहा रहे हो। तुम आज तक समझ नहीं पाए कि कविता में हमेशा सहज, सरल, बोधगम्य भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह अपने कथ्य को सहज, सरल भाषा के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पाया। जटिल भाषा के प्रयोग के कारण उसकी बात उलझकर रह गई और प्रभावहीन हो गई।

कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Summary in Hindi

कविता के बहाने, बात सीधी थी पर कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री कुँवर नारायण का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री कुँवर नारायण का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-कुँवर नारायण उत्तर शती के एक महत्त्वपूर्ण नए कवि हैं। उनका जन्म 19 सितंबर, 1927 को फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इंटर तक उन्होंने विज्ञान विषय में शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें आरंभ से ही घूमने-फिरने का शौक था। उन्होंने सन् 1955 में चेकोस्लोवाकिया, पौलैंड, रूस तथा चीन का भ्रमण किया। वे सन् 1956 में ‘युग चेतना’ के संपादक मंडल से जुड़ गए। बाद में ‘नया प्रतीक’ तथा ‘धायानट’ के संपादक मंडल में भी रहे तथा उत्तर प्रदेश नाटक मंडली के अध्यक्ष भी बने। कालांतर में वे भारतेंदु नाटक अकादमी के अध्यक्ष बन गए। आरंभ में उन्होंने अंग्रेज़ी में कविताएँ लिखीं। परंतु बाद में हिंदी में कविता लिखने लगे। उनको सन् 1971 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1973 में ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ तथा 1982 में मध्यप्रदेश का ‘तुलसी पुरस्कार’ तथा केरल का ‘कुमारन आशान पुरस्कार’ भी प्राप्त हुए। उनके इस काम के लिए उत्तर प्रदेश संस्थान ने भी सम्मानित किया तथा 1955 में ‘व्यास सम्मान’, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘शतदल’ पुरस्कार मिले। इन्हें ‘कबीर’ सम्मान भी मिला।

2. प्रमुख रचनाएँ-अज्ञेय के संपादन में निकले ‘तीसरा सप्तक’ 1959 में संकलित कविताएँ ‘चक्रव्यूह’ (1956), ‘परिवेश : हम तुम’ (1961), ‘आत्मजयी’ (1965), ‘इन दिनों अपने सामने’ (1997), ‘कोई दूसरा नहीं’ (1993) आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त ‘आकारों के आस-पास’ (कहानी संग्रह); ‘आज और आज से पहले’ (समीक्षा); ‘मेरे साक्षात्कार’ (सामान्य) उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-कुँवर नारायण जी की काव्य-यात्रा निरंतर विकास की ओर हुई है। ‘तार सप्तक’ की कविताओं के बाद कवि ने व्यक्ति के मन की स्थिति के चित्रों का अंकन किया है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) सामाजिक चेतना-कुँवर नारायण की कविताओं में सामाजिक चेतना का विकास देखा जा सकता है। ‘चक्रव्यूह’ में जहाँ जीवन के प्रति सामाजिक जीवन का प्रवाह है, वहाँ जीवन-संघर्षों के अनेक प्रश्नों की तलाश भी दिखाई देती है। इस काव्य रचना में कवि ने जीवन व जगत की अनेक स्थितियों का वर्णन किया है। जीवन के संघर्षों को कवि अपनी नियति नहीं मानता, बल्कि वह टुकड़ों में बँटी हुई जिंदगी के सुनहरे क्षणों को देखता है; यथा
जरा ठहरो, जिंदगी के इन टुकड़ों को फिर से सँवार लूँ,
और उन सुनहले क्षणों को जो भागे जा रहे हैं।
पुकार लू …………….
आगे चलकर कवि मानव के अस्तित्व का चित्रण करते हुए उसके सामने उपस्थित भयानक स्थितियों का वर्णन करता है। कवि स्वीकार करता है कि विषम परिस्थितियों में आदमी जानवर बन जाता है। इसका कारण यह है कि परिस्थितियों की जकड़न से बाहर निकलकर उसके स्वभाव में बदलाव आ जाता है। ‘तब भी कुछ नहीं हुआ’, ‘पूरा जंगल’ आदि कविताएँ इसी तथ्य को उजागर करती हैं।

(ii) क्रूर व्यवस्था का वर्णन- कवि ‘अपने सामने’, काव्य-संग्रह में उस क्रूर व्यवस्था का वर्णन करता है जो मनुष्य की स्वतंत्रता, उसके अस्तित्व को जकड़ लेना चाहती है। लेकिन इसके साथ-साथ वह मुक्ति की भी चर्चा करता है। कवि आस्थाशील है। उसके विचारानुसार सत्ता की यह क्रूरता सार्वकालिक नहीं है, इसे हटाया भी जा सकता है। इसके लिए कवि नैतिकता से जुड़ने की सलाह देता है। कवि का विचार है कि हमें क्रूर व्यवस्था का डट कर विरोध करना चाहिए, अन्यथा यह संपूर्ण मानवता को निगल जायेगी।
उनके अफसर, सिपाही और कोतवाल-
उनके सलाहकार, मसखरे और नक्काल-
…………………………………………………
छा गये हैं।
वे सबके सब वापस आ गये हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

(iii) सही मार्ग की खोज-कवि चारों ओर फैली हुई छीना-झपटी और दुनियादारी में विश्वास नहीं करता। वह मानव-जीवन को अंधकारमय होने से बचाना चाहता है। वह एक ऐसा मार्ग खोजना चाहता है जो जीवन को गतिशील बनाए रखे और बाधाओं का सामना कर सके। कवि कहता है
मुझको इस छीना-झपटी में विश्वास नहीं।
मुझको इस दुनियादारी में विश्वास नहीं
……………………………………………………….
एक दृष्टि चाहिए मुझे –
भौतिक जीवन बच सके।

(iv) प्रकृति-वर्णन-कवि ने ‘जाड़े की एक सुबह’, ‘बसंत की लहर’, ‘बसंत आ’, ‘सूर्यास्त’ आदि कविताओं में प्रकृति के पूरे निखार का वर्णन किया है। कवि प्रकृति-वर्णन द्वारा उपदेश नहीं देना चाहता, बल्कि उसके सौंदर्य का स्वाभाविक वर्णन करना चाहता है; यथा
नदी की गोद में नादान शिशु-सा
अर्द्ध सोया द्वीप।
झिलमिल चाँदनी में नाचती परियाँ
लहर पर लहर लहराती
बजाकर तालियाँ गाती।

(v) प्रेम के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण-प्रेम के प्रति कुँवर नारायण का दृष्टिकोण पूर्णतया स्वस्थ एवं वैयक्तिक है। उनके विचारानुसार प्रेम मनुष्य के लिए शक्ति का काम करता है। यह निराश तथा कुचले जीवन में भी सजीवता उत्पन्न करता है। इसलिए प्रेम को आत्मा में स्थान देना चाहिए।
जिंदा रहने के लिए
प्यार एक खूबसूरत वजह है
लेकिन जिंदगी के लिए
दिल से कहीं अधिक आत्मा में जग है।

4. भाषा-शैली-कुँवर नारायण ने खड़ी बोली के स्वाभाविक रूप का अधिक प्रयोग किया है। उन्होंने न तो बलपूर्वक लोक भाषा का प्रयोग किया है और न ही संस्कृतनिष्ठ पदावली का। कवि ने सहज, सरल तथा भावानुकूल छंदों, बिंबों, प्रतीकों तथा अलंकारों का ही प्रयोग किया है। उनकी कविता को पढ़कर पाठक आत्मीयता का अनुभव करता है। छंदों के बारे में उनकी दृष्टि खुली है, क्योंकि वे सभी प्रकार के छंदों का प्रयोग करते हैं। यही नहीं उनकी कविताओं में अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि अलंकारों का भी सहज प्रयोग हुआ है; यथा-
उपमा –
जहरीली फफूंदी-सी उदासी
छीलकर मन से अलग कर दो।
मानवीकरण-धूप चुपचाप एक कुर्सी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कुँवर नारायण नयी कविता के प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं। भाव और भाषा दोनों दृष्टिकोणों से उनका काव्य आधुनिक युगबोध से जुड़ा हुआ है।

कविता के बहाने कविता का सार 

प्रश्न-
कुँवर नारायण द्वारा रचित कविता ‘कविता के बहाने’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आधुनिक कवि कुँवर नारायण द्वारा रचित एक छोटी-सी कविता है। यह कविता कवि के काव्य-संग्रह ‘इन दिनों में संकलित है। आज के वैज्ञानिक युग में कविता का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। यद्यपि पाश्चात्य काव्यशास्त्री आई०ए० रिचर्डस् ने आज के भौतिकवादी युग के लिए कविता को आवश्यक माना है, लेकिन काव्य प्रेमियों में एक डर-सा समा गया है कि आज के यांत्रिक युग में कविता का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस संदर्भ में प्रस्तुत कविता अपार संभावनाओं को टटोलने का प्रयास करती है। ‘कविता के बहाने’ कविता चिड़िया की यात्रा से आरंभ होती है और फूल का स्पर्श करते हुए बच्चे पर आकर समाप्त हो जाती है। कवि कविता के महत्त्व का प्रतिपाद्य करते हुए कहता है कि चिड़िया की उड़ान सीमित है। वह एक निश्चित समय में निश्चित दायरे में ही उड़ान भर सकती है। इसी प्रकार फूल भी एक निश्चित समय के बाद मुरझा जाता है। परंतु बालक के मन और मस्तिष्क में असीम सपने होते हैं। बच्चों के खेलों की कोई सीमा नहीं होती। इसी प्रकार कविता के शब्दों का खेल भी अनंत और शाश्वत है। कवि जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी को स्पर्श करता हुआ अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है। कविता में एक रचनात्मक ऊर्जा होती है। इसलिए वह घर, भाषा तथा समय के बंधनों को तोड़कर प्रवाहित होती है। कविता का क्षेत्र अनंत और असीम है।

बात सीधी थी पर कविता का सार 

प्रश्न-
कुँवर नारायण द्वारा रचित ‘बात सीधी थी पर कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने कथ्य और माध्यम के द्वंद्व को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि हमें काव्य के विषय को सहज तथा सरल भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना चाहिए। परंतु प्रायः कवि कविता में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए उसे पेचीदा बना देते हैं। इस प्रकार के कवि इस भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि इस क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करने से उन्हें अधिकाधिक लोकप्रियता प्राप्त होगी। कुछ क्षणों के लिए ऐसा हो भी जाता है। पाठक अथवा श्रोता भी कवि के भ्रम का शिकार हो जाते हैं, परंतु बाद में कवि द्वारा कही गई बात प्रभावहीन हो जाती है क्योंकि चमत्कार के चक्कर में कवि की भाषा पर पकड़ ढीली पड़ जाती है। इस संदर्भ में कवि उदाहरण भी देता है। वह कहता है कि पेंच को निर्धारित चूड़ियों पर ही कसा जाना चाहिए। यदि चूड़ियाँ समाप्त होने पर पेंच को घूमाएँगे तो चूड़ियाँ मर जाएँगी और उसकी पकड़ ढीली पड़ जाएगी। भले ही उसे बलपूर्वक ठोक दिया जाए, पर वह पहली जैसी बात नहीं रहती। सहज शब्दावली में सहजता के साथ ही भावों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। सहजता की पकड़ मजबूत और स्थाई होती है। इसमें न अधिक परिश्रम करना पड़ता है और न ही अधिक दवाब डालना पड़ता है। इसलिए कवि को अपनी सहज एवं सीधी बात को सहज भाषा के साथ अभिव्यक्त करना चाहिए।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

HBSE 12th Class Hindi पतंग Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
‘सबसे तेज़ बौछारें गयीं, भादो गया’ के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
भादो महीने के काले बादल अब छंट गए हैं और सारा आकाश साफ हो गया है। मूसलाधार वर्षा अब समाप्त हो गई है। इसके बाद खरगोश की लाल-भूरी आँखों जैसा शरदकालीन सवेरा उदय हो गया है। संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण उज्ज्वल तथा धुला-धुला सा लग रहा है। चारों तरफ धूप चमक रही है और प्रकृति में उज्ज्वल निखार आ गया है। धीमी-धीमी हवा चल रही है और आकाश भी कोमल लगने लगा है। बच्चे समझ गए हैं कि पतंगबाजी की ऋतु आ गई है।

प्रश्न 2.
सोचकर बताएँ कि पतंग के लिए सबसे हलकी और रंगीन चीज, सबसे पतला कागज, सबसे पतली कमानी जैसे विशेषणों का प्रयोग क्यों किया है?
उत्तर:
यहाँ कवि पाठकों के सामने पतंग के रूप-रंग और उसके हलकेपन का वर्णन करना चाहता है। कवि पतंग की विशेषता बताते हुए लिखता है कि वह सबसे हलकी, सबसे रंगीन और सबसे पतली है। पतंग में सबसे पतले कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी का प्रयोग किया गया है। पतंग की ये विशेषताएँ बच्चों को बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और उनके मन में पतंग के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

प्रश्न 3.
बिंब स्पष्ट करें –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके।
उत्तर:

  1. आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए – स्पर्श बिंब
  2. सवेरा हुआ – दृश्य (स्थिर) बिंब
  3. पतंग ऊपर उठ सके – दृश्य (स्थिर) बिंब
  4. घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से – श्रव्य बिंब
  5. तेज़ बौछारें – दृश्य (गतिशील) बिंब
  6. पुलों को पार करते हुए। – दृश्य (गतिशील) बिंब
  7. चमकीले इशारों से बुलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब
  8. खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा – दृश्य (स्थिर) बिंब
  9. अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब

प्रश्न 4.
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास-कपास के बारे में सोचें कि कपास से बच्चों का क्या संबंध बन सकता है?
उत्तर:
कपास बड़ी कोमल, गद्देदार और हलकी होती है। वह चोट को आसानी से सहन कर लेती है। बच्चों में कपास के गुण देखे जा सकते हैं। वे हलके-फुलके शरीर वाले होते हैं। उनका कोमल तथा छरहरा शरीर आसानी से चोट को सहन कर लेता है। उनके पाँवों की तलियाँ कपास जैसी कोमल होती हैं। ऊँचाई से कूदने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती, बल्कि उन्हें कठोर छत भी कोमल लगने लगती है।

प्रश्न 5.
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं बच्चों का उड़ान से कैसा संबंध बनता है?
उत्तर:
जिस प्रकार पतंग आकाश में उड़ती हुई ऊँचाइयों का स्पर्श कर लेती है, उसी प्रकार बच्चे भी छतों पर उड़ते हुए दिखाई देते हैं। पतंग को उड़ता देखकर बच्चों में उत्साह तथा उमंग भर जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चे खतरनाक ऊँचाइयों की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दीवारों से गिरने का भी डर नहीं होता। वे अपने शरीर के तरंगित संगीत की लय पर पतंग के समान उड़ते हुए दिखाई देते हैं। छत पर वे यहाँ से वहाँ भागते दिखाई देते हैं। इसलिए कवि को लगता है कि बच्चे पतंगों के साथ उड़ रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर प्रश्नों का उत्तर दीजिए
(क) छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए

(ख) अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं।
→ दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का क्या तात्पर्य है?
→ जब पतंग सामने हो तो छतों पर दौड़ते हुए क्या आपको छत कठोर लगती है?
→ खतरनाक परिस्थितियों का सामना करने के बाद आप दुनिया की चुनौतियों के सामने स्वयं को कैसा महसूस करते हैं?
उत्तर:
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का तात्पर्य है कि जब बच्चे पतंग उड़ाते समय ऊँची दीवारों से छतों पर कूदते हैं तो उनके पैरों से एक मनोरम संगीत उत्पन्न होता है। ऐसा लगता है कि आस-पास मृदंग बज रहा है और उसकी मधुर ध्वनि सभी ओर गूंज रही है।
→ पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान केवल पतंग उड़ाने में लगा रहता है। उनका उत्साह, उमंग तथा निराशा पतंग के साथ जुड़ी होती है। अन्य बातों का बच्चों से कोई मतलब नहीं होता। जब वे कठोर छतों पर कूदते हैं तो उन्हें छतों की कठोरता अनुभव नहीं होती। ऐसा लगता है कि मानों वे पतंग के साथ उड़ रहे हैं।

→ जब मनुष्य एक बार खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर लेता है तब उसमें निर्भीकता उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सुनहले सूर्य के समान चमकने लगता है। उसका आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ जाता है तथा वह कठिन-से-कठिन परिस्थिति का सामना करने में समर्थ हो जाता है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर आपके मन में कैसे ख्याल आते हैं? लिखिए।
उत्तर:
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ता देखकर मेरे मन में विचार आता है कि मैं भी पतंग की तरह पक्षी के समान उन्मत्त होकर उड़ता रहूँ। पतंग के उड़ने में कुछ सीमाएँ हैं, क्योंकि उसकी डोर किसी के हाथ में होती है। वह आकाश में अपनी इच्छा से नहीं उड़ सकती। परंतु पक्षी तो अपनी इच्छानुसार आकाश में उड़ सकता है तथा खुली हवाओं का आनंद लेता है। मैं भी पक्षी बनकर हवा में उड़ना चाहता हूँ। ऐसी स्थिति में मुझे न स्कूल की चिंता होगी, न ही किताबों की।

प्रश्न 2.
‘रोमांचित शरीर का संगीत’ का जीवन के लय से क्या संबंध है?
उत्तर:
रोमांचित शरीर का संगीत’ जीवन की लय से उत्पन्न होता है। जब बच्चे पतंग उड़ाने में लीन हो जाते हैं तो उनके शरीर में एक लय आ जाती है। वे एकाग्र मन से पतंग उड़ाते हैं और उनका शरीर भी रोमांचित हो उठता है। उस समय उनके मन में उत्पन्न होने वाले संगीत में लय होती है और एक गति होती है जिसका वे पूरा आनंद उठाते हैं।

प्रश्न 3.
‘महज एक धागे के सहारे, पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ’ उन्हें (बच्चों को) कैसे थाम लेती हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान पतंग की ऊँचाइयों पर केंद्रित होता है, परंतु पतंग की डोर उनके हाथ में होती है जिससे वे पतंग पर पूरा नियंत्रण रखते हैं। उनका मन पतंग पर टिक जाता है। बच्चों का शरीर यंत्र के समान निरंतर पतंग के साथ-साथ चलता है। पतंग का धागा न केवल पतंग को नियंत्रित करता है, बल्कि पतंग उड़ाने वाले बच्चों को भी नियंत्रित करता है।

आपकी कविता

प्रश्न 1.
हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों में तुलसी, जायसी, मतिराम, द्विजदेव, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों ने भी शरद ऋतु का सुंदर वर्णन किया है। आप उन्हें तलाश कर कक्षा में सुनाएँ और चर्चा करें कि पतंग कविता में शरद ऋतु वर्णन उनसे किस प्रकार भिन्न है?

प्रश्न 2.
आपके जीवन में शरद ऋतु क्या मायने रखती है?
उत्तर:
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है। विद्यार्थी इन्हें अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi पतंग Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
कि पतंग ऊपर उठ सके –
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके –
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके –
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके –
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया
उत्तर:
(i) कवि की कल्पनाशीलता सराहनीय है। पतंग के ऊपर उठने की मनोरम कल्पना की गई है।
(ii) ‘उड़ सके’ की आवृत्ति से कविता में गतिशीलता उत्पन्न हो गई है।
(iii) सीटियों, किलकारियों, तितलियों आदि बहुवचनात्मक शब्दों के प्रयोग के कारण भाषा शिल्प में सौंदर्य उत्पन्न हो गया है।
(iv) संपूर्ण पद्य में बिंबात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।
‘पतंग ऊपर उठ सके’ में दृश्य बिंब है।
‘दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके’ में भी दृश्य बिंब है।
‘तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया’ में श्रव्य बिंब है।
(v) पतली कमानी, सीटियों, किलकारियों तथा तितलियों में स्वर मैत्री है।
(vi) सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
(vii) शब्द-योजना सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
उत्तर:
(i) यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि बच्चों में जन्म से ही चोट, खरोंच आदि सहन करने की क्षमता विकसित हो जाती है। उनके शरीर की हड्डियाँ लचीली होती हैं। अतः कपास के समान किसी चीज़ से टकराने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती और वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ अबाध गति से बेसुध होकर भागते हैं।

(ii) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास’, तथा ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।

(iii) संपूर्ण पद्यांश में ‘बेचैन पैर’, ‘पेंग भरते हुए’, ‘डाल की तरह लचीले वेग’ आदि का सार्थक एवं प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

(iv) इन तीनों में उपमा अलंकार का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है जिसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम पृथ्वी, दिशा, मृदंग, वेग आदि
तद्भव-अपने, साथ, कपास, घूमती आदि
उर्दू-नरम, बेचैन, बेसुध

(vi) शब्द-योजना सर्वथा सटीक एवं सार्थक है।

(vii) बिंबात्मकता के कारण भाव खिल उठे हैं
(क) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है, जब वे दौड़ते हैं बेसुध’ में दृश्य बिंब का प्रयोग हुआ है।
(ख) ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में श्रव्य बिंब है।

(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।
उत्तर:
(i) इस पद्य में कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।
(ii) संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक पदावली का प्रयोग है। उदाहरण के लिए बच्चों का पतंग के साथ-साथ उड़ना लाक्षणिक प्रयोग कहा जा सकता है। ‘सूरज के सामने आने पर’ का लक्ष्यार्थ है-उमंग तथा उल्लास के साथ आगे बढ़ना।
(iii) ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार है।
(iv) ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार की छटा देखने योग्य है।
(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें संस्कृत तथा उर्दू शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
(vi) पृथ्वी और भी तेज़ घूमती आती है तथा उनके बेचैन पैरों के पास आदि में दृश्य बिंब की सुंदर योजना हुई है।
(vii) मुक्त छंद का प्रयोग है तथा प्रसाद गुण है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘पतंग’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् शरद ऋतु के आगमन के अवसर पर पतंग उड़ाने वाले बच्चों के उत्साह का सजीव वर्णन किया है। शरद ऋतु एक खिलखिलाती हुई सुंदर ऋतु होती है। इस ऋतु में आकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। चमकीली धूप मानों उत्साही बच्चों को अपनी नई साइकिल को तेज़ चलाते हुए चमकीले इशारे करती है। आकाश में हल्की रंगीन, पतली कमानी वाली पतंगें उड़ने लगती हैं। चारों ओर बच्चों के झुंड किलकारियाँ तथा सीटियाँ बजाते नज़र आते हैं। ऐसा लगता है मानों आकाश में रंगीन तितलियों के समूह उड़ रहे हैं। छतों तथा दीवारों पर कूदते तथा फाँदते बच्चे कपास के समान कोमल लगते हैं। उनके कदमों से छतें भी नरम हो जाती हैं तथा दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। बच्चों के शरीर पेंग भरते हुए तीव्र गति से यहाँ-वहाँ कूदते रहते हैं। रोमांचित शरीर के फलस्वरूप वे खतरनाक किनारों से भी बच जाते हैं। लगता है कि वे पतंग के साथ उड़े जा रहे हैं। यदि कभी-कभार वे छत से गिर भी जाते हैं तो वे निर्भीक होकर उठ खड़े होते हैं। उनके पैर सारी धरती पर घूमने के लिए बेचैन नज़र आते हैं।

प्रश्न 2.
पठित कविता के आधार पर भादो और शरद ऋतु में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भादो के महीने में आकाश काले बादलों से घिरा रहता है और अकसर मूसलाधार वर्षा होती रहती है। काले बादलों के कारण दिन में भी अंधकार होता है। परंतु शरद ऋतु आते ही आकाश स्वच्छ और निर्मल हो जाता है। शरद ऋतु का सवेरा खरगोश की आँखों की तरह लाल होता है। आकाश में सूर्य की तेज धूप चमकती है तथा आकाश स्वच्छ तथा निर्मल होता है।

प्रश्न 3.
पतंगबाजों की मानसिकता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘पतंग’ आलोक धन्वा की सुप्रसिद्ध काव्य रचना है। इसके माध्यम से कवि ने पतंग उड़ाने वाले बच्चों की मानसिकता को उजागर किया है। पतंग उड़ाते समय बच्चों की बाल सुलभ इच्छाओं और उमंगों को कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। पतंग की उड़ान के साथ-साथ वे भी आकाश में उड़ान को अनुभव करते हैं। पतंग उड़ाने वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक उत्साही और निडर होते हैं। वे छतों के खतरनाक किनारों पर खड़े होकर भी अपनी पतंग उड़ाते हैं। पतंग उड़ाते समय खुरदरी छतें भी उन्हें कोमल लगती हैं। इस प्रकार पतंगबाज बच्चों की मानसिकता उत्साह, उमंग और निडरता से परिपूर्ण रहती है।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता में कवि ने किस प्रकार के प्रतीकों का प्रयोग किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में तीन प्रकार के बिंबों का सफल प्रयोग देखा जा सकता है। तेज़ बौंछारें, सवेरा हुआ, खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा, पुलों को पार करते हुए, अपनी नई तेज़ साइकिल चलाते हुए आदि गतिशील बिंबों की योजना है। इसी प्रकार घंटी बजाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से, शुरू हो सके, शोर मचाते हुए, सीटियाँ बजाते हुए में श्रव्य बिंबों की योजना हुई है। आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए, छतों को भी नरम बनाते हुए आदि में स्पर्श बिंबों की योजना है।

प्रश्न 5.
पतंग उड़ाते हुए बच्चे बेसुध कैसे हो जाते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों को पतंग उड़ाने का बड़ा शौक होता है। पतंग उड़ाते समय वे मानों आकाश में पतंग के साथ उड़ने लगते हैं। इस अवसर पर न उन्हें दीन-दुनिया की खबर होती है, न उन्हें धूप, गरमी लगती है और न ही भूख-प्यास। वे खतरनाक दीवारों पर निडर होकर उछलते-कूदते चलते हैं। यदि वे कभी खतरनाक छतों से गिर भी जाते हैं तो और भी निर्भीक हो जाते हैं और फिर से पतंग उड़ाने लगते हैं।

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प्रश्न 6.
छत से गिरने पर उन्हें कौन बचाता है?
उत्तर:
पतंगबाज़ी करते समय बच्चों का छत से गिरने का भय बना रहता है। वे इस कदर बेसुध होकर दौड़ते हैं कि छत के किनारों पर खतरा भी उन्हें विचलित नहीं कर पाता। बच्चे लचीली डाल के समान छत के किनारे पर आकर झुक जाते हैं। इस अवसर पर भीतर का रोमांच ही उन्हें बचा लेता है। पतंग की नाजुक डोर मानों बच्चों को थाम लेती है और वे गिरने से बच जाते हैं।

प्रश्न 7.
“किशोर और युवा वर्ग समाज का मार्गदर्शक हैं”-‘पतंग’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किशोर और युवा वर्ग में खतरा उठाने की शक्ति होती है। वे अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। वे अपनी धुन में मस्त होकर काम करते हैं। उनके मन में गगन की ऊँचाइयों को पा लेने की क्षमता होती है। उनमें उत्साह, उमंग तथा आत्मविश्वास होता है। बच्चे हमारे समाज के लिए प्रेरणा का काम करते हैं। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम ने स्वीकार किया है-“बच्चों की आँखों में महाशक्ति भारत की नींव है।” निश्चय से बच्चे हमारे देश का उज्ज्वल भविष्य हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी का घूमते हुए बच्चों के पैरों के पास आने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह एक सच्चाई है कि पृथ्वी निरंतर घूमती रहती है। बच्चे भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए पतंग के पीछे भागते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मानों बच्चे दौड़कर सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। पतंगबाज़ी करते हुए बच्चे इतने रोमांचकारी हो उठते हैं कि वे अपनी उमंग तथा उल्लास में सारी पृथ्वी को नापकर आनंद प्राप्त करना चाहते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. आलोक धन्वा का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1947 में
(B) सन् 1948 में
(C) सन् 1946 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(B) सन् 1948 में

2. आलोक धन्वा का जन्म किस राज्य में हुआ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) दिल्ली
(C) बिहार
(D) मध्य प्रदेश
उत्तर:
(C) बिहार

3. ‘पतंग’ कविता के रचयिता का नाम बताइए।
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

4. आलोक धन्वा का जन्म बिहार के किस जनपद में हुआ?
(A) मुंगेर
(B) सारसा
(C) पटना
(D) मुज़फ्फरनगर
उत्तर:
(A) मुंगेर

5. आलोक धन्वा की प्रथम कविता का नाम क्या है?
(A) पतंग
(B) ब्रूनो की बेटियाँ
(C) जनता का आदमी
(D) नदी दौड़ती है
उत्तर:
(C) जनता का आदमी

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6. ‘जनता का आदमी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) 1973 में
(B) 1972 में
(C) 1975 में
(D) 1971 में
उत्तर:
(B) 1972 में

7. आलोक धन्वा के एकमात्र काव्य संग्रह का नाम क्या है?
(A) दुनिया रोज़ बनती है
(B) भागी हुई लड़कियाँ
(C) ब्रूनो की बेटियाँ
(D) आत्महत्या के विरुद्ध
उत्तर:
(A) दुनिया रोज़ बनती है

8. ‘भागी हुई लड़कियाँ के कवि का नाम है
(A) मुक्तिबोध
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

9. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने आलोक धन्वा को किस पुरस्कार से सम्मानित किया?
(A) पहल सम्मान
(B) राहुल सम्मान
(C) साहित्य सम्मान
(D) भोजपुरी सम्मान
उत्तर:
(C) साहित्य सम्मान

10. किस कवि को ‘पहल सम्मान’ प्राप्त हुआ?
(A) कुँवर नारायण
(B) हरिवंश राय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

11. ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य रचना किस कवि द्वारा रचित है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) मुक्तिबोध
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

12. किस कवि की रुचि काव्य रचना की अपेक्षा सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) आलोक धन्वा
(C) कुँवर नारायण
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) आलोक धन्वा

13. ‘पतंग’ कविता में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) मुक्त छंद
(B) सवैया छंद
(C) दोहा छंद
(D) कवित्त छंद
उत्तर:
(A) मुक्त छंद

14. ‘पतंग’ कविता किसके लिए प्रसिद्ध है?
(A) प्रतीकों के लिए
(B) व्यंग्यार्थ के लिए
(C) चित्र-विधान के लिए।
(D) बिंब-विधान के लिए
उत्तर:
(D) बिंब-विधान के लिए

15. ‘भादो’ महीना किस ऋतु में आता है?
(A) शरद
(B) ग्रीष्म
(C) हेमंत
(D) वर्षा
उत्तर:
(D) वर्षा

16. पतंग उड़ाते हुए बच्चे किसके सहारे स्वयं भी उड़ते से हैं?
(A) फेफड़ों के
(B) रंध्रों के
(C) साहस के
(D) शक्ति के
उत्तर:
(B) रंध्रों के

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17. उड़ाई जाने वाली सबसे हलकी और रंगीन चीज क्या है?
(A) पतंग
(B) तितली
(C) वायुयान
(D) राकेट
उत्तर:
(A) पतंग

18. पतंगों की ऊँचाइयाँ कैसी कही गई हैं?
(A) फड़कती
(B) कड़कती
(C) धड़कती
(D) सरकती
उत्तर:
(C) धड़कती

19. ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ किसे कहा गया है?
(A) लाल सवेरा
(B) बौछार
(C) पतंग
(D) पतला कागज
उत्तर:
(A) लाल सवेरा

20. ‘पतंग’ कविता में तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय क्या है?
(A) आकाश में रंगीन तितलियाँ उड़ रही हैं।
(B) तितलियाँ आकाश में उड़कर इसे कोमल बनाती हैं
(C) तितलियों का शरीर कोमल होता है ।
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार
उत्तर:
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार

21. ‘पतंग’ नामक कविता में ‘चमकीले’ विशेषण किसके लिए प्रयुक्त किया गया है?
(A) पतंगों के लिए
(B) शरद के लिए
(C) दिशाओं के लिए
(D) इशारों के लिए
उत्तर:
(B) शरद के लिए

22. ‘सुनहले सूरज’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) यमक
(C) वक्रोक्ति
(D) उपमा
उत्तर:
(A) अनुप्रास

23. छत से गिरने और बचने के बाद बच्चे क्या बन जाते हैं?
(A) निडर
(B) डरपोक
(C) ईर्ष्यालु
(D) सहनशील
उत्तर:
(A) निडर

24. ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ में ‘कपास’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
(A) रूई
(B) कोमलता
(C) चंचलता
(D) हलकापन
उत्तर:
(B) कोमलता

25. पतंग उड़ाने वाले बच्चे दिशाओं को किसके समान बजाते हैं?
(A) ढोलक के समान
(B) वीणा के समान
(C) बाँसुरी के समान
(D) मृदंग के समान
उत्तर:
(D) मृदंग के समान

26. पतंगबाजों के पैर कैसे कहे गए हैं?
(A) साफ
(B) बेचैन
(C) सुन्दर
(D) सपाट
उत्तर:
(B) बेचैन

पतंग पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया [पृष्ठ-11]

शब्दार्थ-भादो = एक महीना जिसमें मूसलाधार वर्षा होती है। शरद = सर्दी का प्रथम माह। झुंड = समूह । मुलायम = कोमल। किलकारी = खुशी से चिल्लाना। नाजुक = कोमल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के उत्साह का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि भादो का महीना अब बीत गया है। उसके साथ-साथ मूसलाधार वर्षा भी अब बंद हो गई है। अब अंधेरे के बाद एक नवीन सवेरा हो गया है अर्थात् अब आकाश साफ है। खरगोश की आँखों के समान शरदकालीन लाल-भूरा सवेरा हो गया है। शरद ऋतु आरंभ हो चुकी है। चारों ओर उमंग तथा उत्साह का वातावरण फैल गया है। पुलों को पार करते हुए नई चमकीली साइकिलों पर सवार होकर बच्चे ज़ोर-ज़ोर से घंटियाँ बजाते हुए बड़ी तीव्र गति से चले आ रहे हैं। वे बड़े ही आकर्षक इशारों से पतंग उड़ाने वाले बच्चों को निमंत्रण देते हुए आकाश को अत्यधिक कोमल बना रहे हैं। भाव यह है कि बच्चे साइकिलों पर सवार होकर एक-दूसरे को पतंगबाज़ी के लिए बुला रहे हैं। बच्चों में अद्भुत उत्साह और उमंग है। धूप चमक रही है। बच्चे बड़े खुश नज़र आ रहे हैं और एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए बुला रहे हैं।

शरद ऋतु रूपी बालक ने आकाश को अत्यधिक कोमल और उज्ज्वल बना दिया है, ताकि आकाश की ऊँचाइयों को पतंग स्पर्श कर सकें। आकाश भी चाहता है कि पतंग ऊपर उठकर हवा के साथ तैरने लगे। पतंग संसार की सर्वाधिक हलकी और रंगीन वस्तु है जो कि बहुत ही पतले कागज़ से बनाई जाती है। आकाश रूपी बालक चाहता है कि वह उड़कर ऊपर उठे और उसके साथ बाँस की पतली कमानी भी उड़ने लगे। जब आकाश में पतंग उड़ने लगी तो बच्चे खुशी के मारे सीटियाँ बजाएँगे और किलकारियाँ मारने लगेंगे। सारा आकाश पतंगों से भर जाएगा। तब ऐसा लगेगा मानों रंग-बिरंगी कोमल तितलियों का संसार आकाश में उड़ रहा है। तात्पर्य यह है कि सारा आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाएगा और बच्चे सीटियाँ बजाकर तथा किलकारियाँ मारकर एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाएँगे।

विशेष-
(1) कवि ने शरद ऋतु में बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के दृश्य का मनोरम वर्णन किया है।
(2) ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
(3) प्रकृति का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
(4) संपूर्ण पद्य में दृश्य, श्रव्य तथा स्पर्श बिंबों की सुंदर योजना हुई है।
(5) ‘ज़ोर-ज़ोर से’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
(6) सहज, सरल तथा आडम्बरहीन सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
(7) शब्द-प्रयोग सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(8) संपूर्ण पद्य में मुक्त छंद की सुंदर योजना है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम बताइए।
(ख) कवि ने शरद ऋतु के आगमन को किस प्रकार प्रस्तुत किया है?
(ग) कवि ने पतंग की क्या-क्या विशेषताएँ बताई हैं?
(घ) शरद ऋतु के आने पर बच्चे किस प्रकार की क्रियाएँ करते हैं?
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-आलोक धन्वा। कविता का नाम ‘पतंग’।
(ख) शरद ऋतु का आगमन बच्चों में एक नवीन उत्साह व उमंग भर देता है। इस ऋतु में चारों ओर चहल-पहल बढ़ जाती है। बच्चे साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हुए एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए इशारे करते हैं।
(ग) पतंग रंग-बिरंगे तथा पतले कागज़ से बनी होती है, उनमें बांस की सबसे पतली कमानी लगी रहती है और वे सुंदर तितलियों के समान आकाश में उड़ती हैं।
(घ) शरद ऋतु के आते ही चारों ओर बच्चों की चहल-पहल मच जाती है। वे खेल-कूद करते हैं और नई-नई साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हैं। पतंग उड़ाते समय किलकारियाँ मारते हैं तथा सीटियाँ बजाते हैं। इस ऋतु में बच्चों को आकाश बड़ा ही कोमल और सुंदर लगता है।
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय है-रंगीन पतंगों का आकर्षक संसार। रंगीन पतंगें कोमल आकाश में तितलियों की तरह मँडराती हैं और हवा में लहराती हैं।

[2] जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छतों के खतरनाक किनारों तक
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे [पृष्ठ 11-12]

शब्दार्थ-कपास = कोमल तथा गद्देदार अनभतियाँ। बेसध = मस्त और लापरवाह। नरम = कोमल। मृदंग = एक वाद्य यंत्र जिसकी ध्वनि बड़ी मधुर होती है। पेंग भरना = झूले झूलना। लचीले वेग = लचीली चाल। रोमांचित= प्रसन्न। संगीत = मस्त गति। थाम लेना = पकड़ लेना। महज = केवल। रंध्र = छिद्र।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने लाक्षणिक भाषा का प्रयोग करते हुए बच्चों की क्रियाओं पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या कवि कहता है कि बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास जैसी कोमलता लेकर आते हैं। भाव यह है कि उनके शरीर में हर प्रकार की चोट और खरोंच सहन करने की शक्ति होती है। उनके पैरों में एक बेचैनी होती है जिसके कारण वे संपूर्ण पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। जब बच्चे बेपरवाह होकर दौड़ने लगते हैं तो वे छतों को भी कोमल समझने लगते हैं। उनकी गति के कारण दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। जब वे तीव्र गति के साथ झूला झूलते हुए चलते हैं, तो वे पेड़ की शाखा के समान ढीले पड़ जाते हैं। उस समय उनकी गति में एक प्रखर वेग होता है, उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं होता। छतों के

खतरनाक किनारों पर भी वे कदम रखते हुए आगे बढ़ते हैं। उस समय उनका प्रसन्न शरीर ही उन्हें गिरने से बचाता है। पतंग उड़ाते समय उनका संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठता है। पतंग की ऊपर जाती धड़कनें उन्हें गिरने से रोक लेती हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानों पतंग का केवल एक धागा बच्चों को संभाल लेता है और वे नीचे गिरने से बच जाते हैं। यहाँ कवि पतंग उड़ाने वाले बच्चों का वर्णन करता हुआ कहता है कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बच्चे भी पतंगों के साथ उड़ने लगे हैं। वे अपने शरीर के रोम-कूपों से निकलने वाले संगीत का सहारा लेकर उड़ने लगते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

विशेष:
(1) इस पद्यांश में कवि ने पतंग उड़ाते हए बच्चों की बेसुध मस्ती का सजीव वर्णन किया है।
(2) बच्चों की तीव्र गति, झूलता हुआ शरीर, उनके रोमांचित अंग तथा लचीला वेग, उनके उत्साह और उमंग को व्यक्त करता है।
(3) ‘कपास’ शब्द का विशेष प्रयोग हुआ है। इस शब्द द्वारा कवि बच्चों के शरीर की लोच, नरमी तथा सहनशीलता की ओर संकेत करता है।
(4) संपूर्ण पद्य में मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है; यथा-
‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं।
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए।
(5) संपूर्ण पद्य में दृश्य, स्पर्श तथा श्रव्य बिंबों की सुंदर योजना हुई है। कवि ने सहज, सरल अथवा सामान्य प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। इसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम-पृथ्वी, मृदंग, दिशा, रोमांचित, संगीत।
उर्दू-नरम, खतरनाक, अकसर, सिर्फ, महज़।
(6) शब्द-योजना सटीक और भावानुकूल है।
(7) मुक्त छंद का सफल प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ इस पंक्ति का बच्चों के साथ क्या संबंध है?
(ख) बच्चे बेसुध होकर क्यों दौड़ते हैं?
(ग) छतों के खतरनाक किनारों से बच्चे कैसे बच जाते हैं?
(घ) पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें कैसे थाम लेती हैं?
उत्तर:
(क) बच्चों का शरीर बड़ा ही कोमल होता है। उनका शरीर कोमलता के साथ-साथ सहनशील भी होता है। वे चोट और खरोंच लगने के आदी हो जाते हैं। उनके शरीर में लचीलापन होता है। किसी चीज से टकराने पर उन्हें बहुत कम चोट लगती है। इसलिए कवि ने बच्चों की तुलना कपास से की है।

(ख) बच्चों के मन में पतंग उड़ाने की बेचैनी होती है। पतंगबाजी करते समय बच्चों को धूप, गर्मी, कठोर छत आदि का ध्यान नहीं रहता। वे उछलते-कूदते और पतंग की डोर को थामे हुए पतंग उड़ाने में मस्त हो जाते हैं। इसलिए वे बेसुध होकर दौड़ते हैं।

(ग) प्रायः सभी को दीवार से गिरने का डर लगा रहता है, परंतु बच्चे बेसुध होकर अपने शरीर को लहराते हुए छतों के किनारों पर झुक जाते हैं, इस अवसर पर उनके अन्दर का उत्साह और उमंग उनकी रक्षा करता है और वे गिरने से बच जाते हैं।

(घ) पतंग की ऊपर उड़ती हुई धड़कनें बच्चों को गिरने से रोक लेती हैं। उस समय पतंग की डोर बच्चों के लिए सहारे का काम करती है और वे स्वयं को सँभाल लेते हैं।

[3] अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है। उनके बेचैन पैरों के पास। [पृष्ठ-12]

शब्दार्थ-खतरनाक = भयानक। निडर = निर्भय। बेचैन = व्याकुल।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र काव्यसंग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इसमें कवि ने बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने का बहुत ही सजीव व मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या-बच्चे प्रायः पतंग उड़ाते समय कभी नहीं गिरते, परंतु दुर्भाग्य से कभी वे छतों के खतरनाक किनारों से गिर भी जाते हैं तो वे बच जाते हैं और वे अधिक निर्भय हो जाते हैं। अत्यधिक उत्साह के साथ वे सुनहले सूर्य के समान प्रकाशमान हो उठते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने बेचैन पैरों के साथ सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं, वे दुगुने उत्साह के साथ घूमते-फिरते हैं और भाग-भागकर पतंग उड़ाते हैं।

विशेष-

  1. कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. उदाहरण के रूप में ‘सुनहले सूरज के सामने’ आदि में लाक्षणिकता विद्यमान है।
  4. ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सुंदर वर्णन हुआ है।
  6. सहज, सरल एवं प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-योजना सटीक एवं भावानुकूल है।।
  8. संपूर्ण पद्य में दृश्य बिंब की सफल योजना हुई है।
  9. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम बताइए।
(ख) छतों के खतरनाक किनारों से बच जाने पर बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(ग) सुनहले सूरज के सामने आने का क्या अर्थ है?
(घ) पृथ्वी बच्चों के बेचैन पैरों के पास घूमती हुई आती है, इसका आशय क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-आलोक धन्वा कविता-‘पतंग’।
(ख) जब बच्चे छतों के खतरनाक किनारों से बच जाते हैं तो वे और अधिक निडर हो जाते हैं। उनमें किसी भी विपत्ति और कष्ट को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। तब वे खुले आसमान में तपते हुए सुनहले सूर्य के समान दिखाई देने लगते हैं।
(ग) सुनहले सूर्य के सामने आने का अर्थ है सूर्य के समान तेज़ से युक्त होकर सक्रिय हो जाना। जिस प्रकार सूर्य अपना तीव्र प्रकाश पृथ्वी के कोने-कोने पर फैलाता है उसी प्रकार बच्चे भी पतंग उड़ाते हुए मौज-मस्ती में चारों ओर फैल जाना चाहते हैं। उनके मन का भय समाप्त हो जाता है।
(घ) ‘पृथ्वी तेज़ घूमती हुई बच्चों के बेचैन पैरों के पास आती है’ का तात्पर्य है बच्चों के पैरों में गतिशीलता पैदा होना। बच्चे पतंग उड़ाते समय मानों सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं।

पतंग Summary in Hindi

पतंग कवि-परिचय

प्रश्न-
आलोक धन्वा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
आलोक धन्वा का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय आलोक धन्वा सातवें-आठवें दशक के कवि हैं। इनका नाम नई कविता से जुड़ा हुआ है। इनका जन्म सन् 1948 में बिहार के मुंगेर जनपद के एक साधारण परिवार में हुआ। बहुत छोटी अवस्था में अपनी कुछ गिनी-चुनी कविताओं के फलस्वरूप इन्होंने अपार लोकप्रियता अर्जित की। 1972-73 में इनकी जो आरम्भिक कविताएँ प्रकाशित हुईं, उन्होंने काव्य-प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कुछ आलोचकों का तो यह भी दावा है कि इन कविताओं का अभी तक सही मूल्यांकन ही नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि आलोक धन्वा ने लीक से हटकर एक नवीन शिल्प द्वारा भावाभिव्यक्ति की है। भले ही उनको अल्पकाल ही में ख्याति प्राप्त हो गई है, लेकिन उन्होंने अधिक काव्य रचना नहीं की।

पिछले दो दशकों से वे देश के विभिन्न भागों में सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं। काव्य रचना की अपेक्षा उनकी रुचि सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक रही है। जमशेदपुर में उन्होंने अध्ययन मंडलियों का संचालन किया। यही नहीं, उन्होंने अनेक राष्ट्रीय संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता की भूमिका भी निभाई है।

2. प्रमुख रचनाएँ-आलोक धन्वा की प्रथम कविता सन् 1972 में ‘जनता का आदमी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। तत्पश्चात् ‘भागी हुई लड़कियाँ’ तथा ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य-रचनाओं से इनको विशेष प्रसिद्धि मिली। ‘गोली दागो पोस्टर’ इनकी प्रसिद्ध कविता है। इनका एकमात्र संग्रह है-‘दुनिया रोज़ बनती है।

आलोक धन्वा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान तथा पहल सम्मान आदि से इस कवि को सम्मानित किया गया है। आलोक धन्वा सहज, सरल तथा सामान्य भाषा द्वारा आकर्षक तथा मनोहारी बिंबों की रचना करने में सिद्धहस्त हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-आलोक धन्वा समकालीन कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनके काव्य में लगभग वे सभी प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं जो समकालीन कवियों की काव्य रचनाओं में हैं। आलोक धन्वा की काव्य रचनाओं में सामाजिक चेतना के प्रति सरोकार है। आरंभ में तो वे समाज के शोषितों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। इनकी कविताएँ वर्तमान समाज के ढाँचे की विडम्बनाओं को उद्घाटित करती हैं और मानवीय संबंधों पर भी प्रकाश डालती हैं। कुछ स्थलों पर वे आज की राजनीति पर करारा व्यंग्य भी करती हैं और बुनियादी मानसिकताओं पर चोट भी करती हैं। उनकी काव्य रचनाओं में बार-बार आम आदमी का स्वरूप भी उभरकर आता है। इसके साथ-साथ कवि ने युगीन रुचियों, आवेगों तथा वर्ग-संघर्ष का भी वर्णन किया है। ईश्वर के प्रति उनकी कविता में कोई खास स्थिरता नहीं है। मार्क्सवाद के प्रति आस्था होने के कारण ईश्वर के प्रति उनका विश्वास उठ गया है। हाँ, मानव के प्रति वे निरन्तर अपना सरोकार दिखाते हैं।

आज दिन-प्रतिदिन की निराशा, खटास, दुःख, पीड़ा आदि के फलस्वरूप मानव-जीवन अलगावबोध का शिकार बनता जा रहा है। आलोक धन्वा सच्चाई से पूर्णतया अवगत रहे हैं। वे मानव-जीवन की इस त्रासदी को उकेरने में भी सफल रहे हैं। ‘जनता का आदमी’ में वे कहते हैं

क्यों पूछा था एक सवाल मेरे पुराने पड़ोसी ने
मैं एक भूमिहीन किसान हूँ
क्या मैं कविता को छू सकता हूँ?
इसके अतिरिक्त उनकी काव्य रचनाओं में आधुनिक युग की विसंगतियों का वर्णन भी देखा जा सकता है। कहीं-कहीं वे महानगरीय बोध से जुड़ी हुई भावनाएँ व्यक्त करते हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि आलोक धन्वा ने आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्याओं का अधिक वर्णन किया है। ‘पतंग’ नामक लम्बी कविता में उन्होंने पतंग जैसी साधारण वस्तु को काव्य का विषय बनाया है और उसके माध्यम से बच्चों में उमंग और उल्लास का मनोहारी वर्णन किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

4. अभिव्यंजना शिल्प-आलोक धन्वा एक जनवादी कवि हैं। अतः उन्होंने सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया है जो आधुनिक परिस्थितियों को व्यक्त करने में समर्थ है। उन्होंने देशी-विदेशी शब्दों से कोई
परहेज़ नहीं किया। मानवीय संवेदना को उकेरने के लिए उन्होंने मुहावरों में भी नयापन लाने की कोशिश की है। उनकी भाषा नवीन बिंबों तथा नवीन चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। भले ही कवि ने अलंकारों के प्रयोग पर अधिक बल नहीं दिया, लेकिन उन्होंने अलंकार प्रयोग से परहेज़ भी नहीं किया और यत्र-तत्र स्वाभाविक रूप से अलंकारों का प्रयोग किया है। भले ही उनकी कविता मुक्त छंद में लिखी गई हो, लेकिन उसमें लयात्मकता भी है। उनकी लंबी कविता ‘पतंग’ से एक उदाहरण देखिए –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आलोक धन्वा ने जो थोड़ा-बहुत काव्य लिखा है। वह पाठक को संवेदनशील बना देता हैं। उनके काव्य में वर्ग-संघर्ष, मानवतावाद, राजनीतिक दोगलापन, आधुनिक व्यवस्था की टूटन, युगीन चेतना आदि पर समुचित प्रकाश डाला गया है। लेकिन यह एक कटु सत्य है कि इस समकालीन कवि के काव्य का अभी तक समुचित मूल्यांकन नहीं हो पाया।

पतंग कविता का सार

प्रश्न-
आलोक धन्वा द्वारा रचित कविता ‘पतंग’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आलोक धन्वा कवि के एकमात्र काव्य संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में से संकलित है। यह पूरी कविता न होकर ‘पतंग’ नामक कविता का एक अंश मात्र है। इसमें कवि ने पतंग के माध्यम से बच्चों की उमंग, उल्लास तथा खुशियों का मनोहारी वर्णन किया है। यह कविता दृश्य एवं श्रव्य बिंबों के लिए प्रसिद्ध है। कवि लिखता है कि भादो के महीने के बीत जाने के बाद शरद ऋतु का सवेरा होता है। आकाश से काले बादल छंट जाते हैं। शरद ऋतु मानों नई चमकीली साइकिल चलाकर बच्चों को पतंग उड़ाने का निमंत्रण देती है। बच्चों के पास ऊर्जा है और पतंग उनके सपनों का प्रतीक है। पतंग के समान बच्चों के सपने बड़े हलके होते हैं। शीघ्र ही पतंग उड़ाने वाले बच्चों का एक समूह साकार हो उठता है। पतंग उड़ाने वाले बच्चे जन्म से ही कोमल तथा हलके शरीर वाले होते हैं। पृथ्वी उनके पैरों के पास घूमती हुई आती है तथा वे अपनी मस्ती में छतों तथा दीवारों पर पतंग उड़ाते हुए नज़र आते हैं। छतों की कठोरता उनके लिए नरम हो जाती है। बच्चों को गिरने का भय नहीं होता। यदि वे कहीं गिर भी जाते हैं तो उनमें क्षमता और अधिक मजबूत हो जाती है। ऐसा लगता है मानों वे अपनी पतंग की डोर के सहारे पतंगों के साथ उड़ते नज़र आते हैं। वे उन्मत्त होकर आगे बढ़ते हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए उड़ान भरते रहते हैं। पतंग उड़ाने से बच्चों का आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर:
सर्वप्रथम कवि जग-जीवन का भार ढोने की बात कहता है। इसका भाव यह है कि कवि संसार से पूर्णतया अलग नहीं हुआ। संसार की समस्याओं के प्रति वह भी सचेत है। परंतु वह अपनी कविता द्वारा संसार के कष्टों तथा दुखों को दूर करना चाहता है। वह संसार को सुखद बनाना चाहता है।

इस रास्ते पर चलते-चलते कवि को यह अनुभव होता है कि संसार उसकी उपेक्षा कर रहा है। वह संसार के व्यवहार से दुखी है। संसार की जड़-परंपराएँ तथा रूढ़ियाँ कवि के मार्ग को रोकना चाहती हैं, परंतु कवि इन बाधाओं की परवाह नहीं करता। वह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता है।

प्रश्न 2.
जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर:
कवि समझता है कि जो लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं का संग्रह करने में सक्रिय हैं, उनको ‘दाना’ अर्थात् बुद्धिमान कहा जाता है। परंतु कवि का अपना दृष्टिकोण अलग है। वह ऐसे लोगों को मूर्ख समझता है। कवि सांसारिक सफलताओं को व्यर्थ समझता है। वह ऐसे लोगों को नादान कहता है जो धन-संपत्ति के पीछे भाग रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
मैं और, और जग और कहाँ का नाता-पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति में प्रयुक्त ‘और’ शब्द में यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है। प्रथम एवं तृतीय ‘और’ का अर्थ ‘अन्य’ है अर्थात् भिन्न या अलग। कवि स्वयं के साथ जोड़कर भावनाओं से जुड़े हुए व्यक्ति को संकेतित करता है। तीसरा ‘और’ सांसारिक मोह-माया से लिप्त आम व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। दूसरे ‘और’ का प्रयोग ‘तथा’ के लिए प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 4.
शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘शीतल वाणी में आग’ से कवि का अभिप्राय यह है कि उसका अपना स्वभाव और स्वर कोमल एवं शांत है। परंतु उसके मन में विद्रोह की भावना विद्यमान है। कवि प्रेमहीन तथा स्वार्थी संसार से घृणा करता है। वह तो प्रेममय संसार से ही प्यार करता है।

प्रश्न 5.
बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?
उत्तर:
बच्चे इस आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे कि उनके माता-पिता उनके लिए चुग्गा (भोजन सामग्री) लेकर आ रहे होंगे। वे शीघ्र घर पहुँचकर उन्हें भोजन देंगे और साथ ही प्यार भी करेंगे।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
यह पद्य पंक्ति गीत का मुखड़ा है। इसकी आवृत्ति से प्रेमजन्य व्याकुलता का पता चलता है। प्रेम के क्षण बड़े प्रिय लगते हैं। अतः प्रेम के क्षणों के बीतने का पता ही नहीं चल पाता।

कविता के आसपास

प्रश्न.
संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?
उत्तर:
यह संसार निश्चय से काँटों की बाड़ है। यहाँ सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। कष्टों को सहकर भी हम खुशी से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यदि हमारे मन में सच्चे प्रेम की मस्ती है तो नित-नवीन कल्पनाओं को साकार करके हम सुखद जीवन जी सकते हैं। हमें यह स्वीकार करके कर्म करना चाहिए कि सांसारिक धन-वैभव क्षण-भंगुर हैं। प्रेम ही जीवन को खशी देता है।

आपसदारी
जयशंकर प्रसाद की आत्मकथ्य कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गई आत्मपरिचय कविता से इस कविता का आपको कोई संबंध दिखाई देता है? चर्चा करो।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
आरोह (भाग 2) हरिवंश राय बच्चन]
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मै मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
-जयशंकर प्रसाद

‘आत्मकथ्य’ जयशंकर प्रसाद द्वारा छायावाद के परिपेक्ष्य में रचित कविता है। परंतु बच्चन जी की ‘आत्मपरिचय’ कविता छायावाद से हटकर व्यक्तिगत प्रेम को आधार बनाकर रची गई कविता है। जहाँ प्रसाद जी अपने प्रेम को छिपाकर रखते हैं, वहाँ बच्चन जी सहज, सरल भाषा में बड़ी ईमानदारी के साथ प्रेमाभिव्यक्ति करते हैं। भले ही इन दोनों कविताओं के भाव लगभग समान हो, परंतु इनकी अभिव्यंजना शैली अलग-अलग है। बच्चन द्वारा यह कहना कि ‘मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ’ में प्रेम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। परंतु प्रसाद जी द्वारा यह कहना –
“यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास ।
तब भी कहते हो कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।”
यहाँ प्रसाद जी ने छायावादी अभिव्यंजना शैली द्वारा अपनी प्रेमाभिव्यक्ति का संदेश दिया है।

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
उत्तर:
इन पद्य-पंक्तियों में कवि ने निजी प्रेम की अभिव्यक्ति की है। कवि का हृदय प्रिया के स्नेह से सराबोर है। वह हमेशा अपने मन में प्रिया के स्नेह को अनुभव किया करता है। इसीलिए वह संसार की परवाह नहीं करता।

  1. कवि ने सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. ‘किया करता’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है।
  3. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव दिखाई देता है।
  4. किया करता हूँ की आवृत्ति के कारण गीत में मधुर संगीत की उत्पत्ति हुई है।
  5. माधुर्य गुण है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  6. आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
उत्तर:
इसमें कवि निजी प्रेम को स्वीकार करता हुआ कहता है कि कवि के हृदय में नवीन मनोभाव हैं जिन्हें वह संसार को उपहार के रूप में भेंट करना चाहता है। कवि को यह अधूरा संसार अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार में खोया रहता है।

  1. प्रस्तुत गीत में विषयानुकूल, सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  2. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावभिव्यक्ति में सहायक है।
  3. कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  4. ‘लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण इस पद्य में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. माधुर्य गुण है तथा श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसका संसार के साथ निर्वाह नहीं हो सकता। कवि प्रतिदिन नए संसार की रचना करता है, परंतु अगले क्षण ही वह उसे नष्ट कर देता है। यह संसार धन-वैभव के पीछे पागल बना हुआ है परंतु कवि को इस धन-वैभव की कोई इच्छा नहीं है।

  1. कवि सांसारिक जीवन से अलग-थलग आदर्श लोक में विचरण करना चाहता है।
  2. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण-विपर्यय अलंकार है।
  3. ‘कहाँ का नाता’ में प्रश्न अलंकार है तथा ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘और’ शब्द की आवृत्ति चमत्कार उत्पन्न करती है। इस शब्द में यमक अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  6. शब्द-योजना सार्थक तथा सटीक बन पड़ी है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसके रुदन से भी प्रेम झलकता है, परंतु उसकी वाणी में एक कोमल ऊर्जा है। कवि का जीवन निराशा के कारण खंडहर बन चुका है, परंतु कवि अपने जीवन में उस प्रेम को महत्त्व देता है जिस पर बड़े-बड़े राजा महल को भी न्योछावर कर देते हैं।

  1. इसमें कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शब्द-योजना सार्थक एवं सटीक बन पड़ी है।
  3. ‘मैं’ शब्द के प्रयोग के कारण आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  4. ‘रोदन में आग’ तथा ‘शीतल वाणी में आग’ दोनों में विरोधाभास अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण मधुरता की मस्ती उत्पन्न हो गई है।
  7. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि दुनिया में उसका कोई नहीं है और न ही उसकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है। प्रेम के अभाव के कारण कवि के कदम शिथिल पड़ जाते हैं और उसके मन में उदासी छा जाती है।

  1. इसमें कवि ने खड़ी बोली के साहित्यिक रूप का वर्णन किया है।
  2. ‘मझसे मिलने को कौन विकल’ और ‘किसके हित चंचल’ दोनों में प्रश्न अलंकार है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4.  प्रसाद गुण है तथा वियोग शृंगार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. आत्मकथात्मक तथा भावात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न (आत्मपरिचय)

प्रश्न 1.
‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर कवि के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कवि प्रेम और मस्ती का जीवन जीना चाहता है। वह हमेशा प्रेम तथा स्नेह के काल्पनिक संसार में खोया रहता है। प्रेम ही उसके जीवन का प्राण है। इसलिए वह हमेशा स्नेह की सुरा का पान करता रहता है। परंतु प्रिया ने उसके प्रेम का अनुकूल उत्तर नहीं दिया। इसीलिए उसके हृदय में विरह-जन्य पीड़ा व अवसाद है। इसके साथ-साथ कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग प्रेममय संसार की रचना करना चाहता है। वह इस संपूर्ण संसार को मस्ती में डुबा देना चाहता है।

प्रश्न 2.
कवि को यह संसार अच्छा क्यों नहीं लगता?
उत्तर:
कवि इस संसार को अपूर्ण मानता है। कवि का विचार है कि संसार एक भार है। लोग व्यर्थ ही दुनियादारी में उलझे हैं। कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग आदर्श समाज की स्थापना करना चाहता है। वह स्वयं को संसार से अलग मानता है। इसीलिए वह कहता भी है
“जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता।”

प्रश्न 3.
‘जग पूछा रहा उनको, जो जग की गाते’-इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
कवि स्पष्ट करता है कि संसार केवल उन लोगों का सम्मान करता है जो लोग धन-वैभव के संग्रह में संलग्न हैं और संपन्न हैं। धनवान व्यक्ति का सभी आदर करते हैं, निर्धन को कोई नहीं पूछता। विशेषकर कवि जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई परवाह भी नहीं करता। परन्तु कवि तो अपने मन में प्रेम के गीत लिए फिरता है।

प्रश्न 4.
कवि ने जग को मूढ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार के सभी लोग धन-वैभव के संग्रह में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। वे सांसारिक विषय-वासनाओं में लीन हैं। अज्ञानता के कारण उनके जीवन से सच्चा प्रेम लुप्त हो चुका है। इसलिए यह संसार तथा इसके लोग मूढ़ हैं।

प्रश्न 5.
‘जग भक्-सागर तरने को नाव बनाए’ कथन का क्या आशय है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार रूपी सागर महाभयंकर है। इसे पार करने के लिए मनुष्य को कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। संसार समझता है कि वह धन-संपत्ति द्वारा इस सागर को पार कर जाएगा, परंतु ऐसा संभव नहीं है। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नाव बनाकर यह संसार पार करना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘आत्मपरिचय’ गीत के आधार पर कवि के मन की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि मौज और मस्ती का कवि है। वह प्रेम पाने और देने में विश्वास रखता है और एक प्यार भरी जिंदगी जीना चाहता है इसलिए वह अपने हार्दिक प्रेम को प्रिया के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि प्रेम के बिना इस संसार को अधूरा मानता है और अपने मन में प्रेममय संसार की कल्पना करता है।

प्रश्न 7.
कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर क्यों जलता रहता है?
उत्तर:
कवि के मन में अपने प्रिय के लिए अत्यधिक प्रेम है। प्रिय की मधुर यादें उसे सुखानुभूति प्रदान करती हैं। अतः वह संयोग की दशा में भी प्रिय के वियोग की अग्नि जलाकर उसमें जलता रहता है। इससे कवि को आनंद मिलता रहता है।

प्रश्न 8.
कवि के अन्दर और बाहर कौन-सी असंगति है और यह असंगति क्यों है?
उत्तर:
कवि संसार के लोगों के सामने हँसता और खेलता दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि मानों वह अपने प्रेम की असफलता पर हँस रहा है, परंतु वह अपनी विरह-व्यथा के कारण मन-ही-मन रोता रहता है। बाहर से कवि प्रसन्न नज़र आता है, लेकिन मन-ही-मन वह विरह-जनित पीड़ा को अनुभव करता रहता है। इसलिए कवि का जीवन अन्दर और बाहर से असंगत हो जाता है।

प्रश्न 9.
कवि कौन-कौन से संसार बनाकर रोज़ मिटाता रहता है?
उत्तर:
कवि मन-ही-मन प्रेममय संसार की कल्पना करता है। परन्तु कवि का यह प्रेममय संसार प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसलिए कवि उसे मिटा देता है। वह फिर से प्रेममय संसार की रचना में लीन हो जाता है। परंतु संसार के लोग इससे बेखबर होकर धन-संपदा के संग्रह में लगे रहते हैं।

प्रश्न 10.
कवि की शीतल वाणी में आग क्यों है?
उत्तर:
कवि के मन में विरह-वेदना की आग जलती रहती है, लेकिन उसकी वाणी बड़ी कोमल, मधुर और शीतल है। वह अपनी विरह-जनित पीड़ा को कोमलकांत पदावली द्वारा व्यक्त करता है। परंतु प्रिय के वियोग की आग उसके मन में हमेशा जलती रहती है। अतः शीतलता और वियोग बड़ा विचित्र बन पड़ा है।

प्रश्न 11.
‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति द्वारा कवि संसार और अपने स्वभाव के अंतर को स्पष्ट करता है। कवि स्वयं तो प्रेम भावना के लोक में विचरण करता रहता है, परंतु संसार के लोग स्वार्थ को पूरा करने में संलग्न हैं। इसलिए कवि का मेल नहीं खाता।

प्रश्न 12.
कवि दीवानों का वेश क्यों लिए फिरता है?
उत्तर:
कवि को प्रेम के क्षेत्र में असफलता मिली है। इसलिए वह प्रेम-दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। कवि का एकमात्र लक्ष्य अपने प्रिय को पाना है, परंतु वह उसे मिल नहीं पा रहा। इसलिए वह दीवानों का वेश धारण करके घूमता रहता है।

एक गीत

प्रश्न 1.
‘एक गीत’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव क्या है?
उत्तर:
यह गीत प्रेम के महत्त्व पर प्रकाश डालता है। कवि कहता है कि प्रेम मानव जीवन को उत्साह, उमंग और उल्लास प्रदान करता है। प्रेम के कारण मनुष्य को लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। इसलिए प्रेमी अपनी प्रिय से मिलने के लिए तेज कदमों से चल पड़ता है। यही नहीं, पक्षियों के पंखों में गतिशीलता आ जाती है। जिस किसी व्यक्ति का प्रिय उसकी प्रतीक्षा नहीं करता, उसका जीवन निष्क्रिय और शिथिल हो जाता है। इसलिए प्रेम ही जीवन का मूल आधार है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 2.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’, के आधार पर आशा और निराशा के क्रम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
निश्चय ही यह गीत आशा और निराशा के भावों को क्रम से अभिव्यक्त करता है। प्रथम दो काव्यांशों में कवि ने आशा के भावों को जागृत किया है जिससे प्रेरित होकर दिन का पंथी अपने प्रियजनों से मिलने की आशा में शीघ्रता से चलना आरम्भ कर देता है। जब चिड़िया को यह ध्यान आया कि उसके बच्चे उसकी प्रतीक्षा में होंगे तो वह भी तेज गति से उड़ने लगती है। किन्तु जब कवि यह सोचता है कि उसका चाहने वाला कोई नहीं है और कोई उसकी प्रतीक्षा करने वाला नहीं है तो उसके मन का उत्साह नष्ट हो जाता है और उसके मन में निराशा का भाव समा जाता है। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत गीत में कवि ने आशा और निराशा के भावों को क्रमशः अभिव्यक्ति किया है।

प्रश्न 3.
कवि के मन में शिथिलता उत्पन्न क्यों हो जाती है?
उत्तर:
कवि जानता है कि इस दुनिया में उसका कोई अपना नहीं है। कोई प्रियजन उसकी प्रतीक्षा नहीं करता है। इसलिए वह सोचता है कि मैं किसके लिए अपने को चंचल करूँ। उसका सारा उत्साह तथा उमंग नष्ट हो जाती है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं। परंतु यह स्थिति कवि के मन में आतुरता का भाव भी उत्पन्न करती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. हरिवंश राय बच्चन का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1909 में
(B) सन् 1908 में
(C) सन् 1907 में
(D) सन् 1912 में
उत्तर:
(C) सन् 1907 में

2. ‘आत्मपरिचय’ कविता के रचयिता हैं _________.
(A) माखनलाल चतुर्वेदी
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(D) हरिवंश राय बच्चन

3. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस नगर में हुआ?
(A) प्रयाग में
(B) बनारस में
(C) लखनऊ में
(D) कानपुर में
उत्तर:
(A) प्रयाग में

4. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) कायस्थ परिवार में
(C) क्षत्रिय परिवार में
(D) राजपूत परिवार में
उत्तर:
(B) कायस्थ परिवार में

5. बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा कहाँ पर हुई?
(A) काशी में
(B) लखनऊ में
(C) प्रयाग में
(D) मुम्बई में
उत्तर:
(A) काशी में

6. बच्चन जी ने स्नातकोत्तर परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की?
(A) दिल्ली विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

7. बच्चन जी ने पी० एचण्डी की उपाधि कहाँ प्राप्त की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(C) मुम्बई विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय

8. बच्चन जी की पहली पत्नी का नाम क्या था?
(A) श्यामा।
(B) तेजी
(C) मनोरमा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) श्यामा

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

9. 1942 में बच्चन जी ने दूसरा विवाह किससे किया?
(A) मनोरमा से
(B) कमला देवी से
(C) तेजी से
(D) राधा से
उत्तर:
(C) तेजी से

10. बच्चन जी को किस मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया?
(A) वित्त मंत्रालय
(B) शिक्षा मंत्रालय
(C) कृषि मंत्रालय
(D) विदेश मंत्रालय
उत्तर:
(D) विदेश मंत्रालय

11. किस वर्ष बच्चन जी को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया?
(A) 1969 में
(B) 1965 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में

12. भारत सरकार ने बच्चन जी को किस उपाधि से विभूषित किया?
(A) पद्म श्री
(B) पद्म विभूषण
(C) ज्ञान पीठ पुरस्कार
(D) व्यास सम्मान
उत्तर:
(B) पद्म विभूषण

13. ‘मधुशाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935
(B) सन् 1936
(C) सन् 1938
(D) सन् 1937
उत्तर:
(A) सन् 1935

14. ये रचनाएँ हरिवंश राय बच्चन की हैं-
(A) मधुशाला, मधुबाला और अपरा
(B) मधुशाला, कामायनी, मधुबाला
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला
(D) मधुकुशल, मधु, मधुबाला
उत्तर:
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला

15. ‘मधुबाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1938 में
(B) सन् 1935 में
(C) सन् 1939 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(A) सन् 1938 में

16. ‘मधुकलश’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1938 में
उत्तर:
(D) सन् 1938 में

17. हरिवंश राय बच्चन किस भावना के कवि हैं?
(A) रहस्यवाद भावना के
(B) छायावादी भावना के
(C) प्रेम और मस्ती के
(D) प्रगतिवादी भावना के
उत्तर:
(C) प्रेम और मस्ती के

18. ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, किस विधा की रचना है?
(A) प्रबंध काव्य
(B) गीति काव्य
(C) जीवनी
(D) निबंध
उत्तर:
(C) जीवनी

19. हरिवंश राय बच्चन की आधुनिक काव्य रचनाओं पर किसका प्रभाव पड़ा?
(A) स्वच्छंदतावाद का
(B) उमर खय्याम का
(C) रहस्यवाद का
(D) प्रगतिवाद का
उत्तर:
(B) उमर खय्याम का

20. बच्चन जी द्वारा रचित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ उनके किस काव्य-संग्रह से संकलित है?
(A) निशा निमंत्रण
(B) मधुशाला
(C) सतरंगिणी
(D) मिलनयामिनी
उत्तर:
(A) निशा निमंत्रण

21. ‘भव-सागर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उत्प्रेक्षा
(B) उपमा
(C) रूपक
(D) अनुप्रास
उत्तर:
(C) रूपक

22. ‘सीखा ज्ञान भुलाना’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) विरोधाभास
(B) असंगति
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) विरोधाभास

23: ‘साँसों के तार में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) उत्प्रेक्षा
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) उपमा

24. ‘स्नेह-सुरा’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) यमक
(C) उपमा
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(A) रूपक

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

25. ‘एक गीत’ नामक कविता में दिन का पंथी किसे माना गया है?
(A) ‘चिड़िया को
(B) कवि को
(C) सूर्य को
(D) प्रत्याशा को
उत्तर:
(B) कवि को

26. अपने बच्चों के विषय में सोचकर पक्षियों की चंचलता किन अंगों में सबसे अधिक व्यक्त होती है?
(A) आँखों में
(B) हृदय में
(C) पैरों में
(D) पंखों में
उत्तर:
(D) पंखों में 27.

27. मुझसे मिलने को कौन विकल? पंक्ति में कौन-सा भाव है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विह्वलता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) विह्वलता

28. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत में नीड़ों से झांक रहे बच्चों का ध्यान चिड़िया के परों में क्या भरता है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विकलता
(D) विह्वलता
उत्तर:
(B) चंचलता

29. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में कवि हताश और दुखी क्यों है?
(A) पत्नी से तलाक होने के कारण
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण
(C) संतान-सुख से वंचित होने के कारण
(D) परिवार से पिछड़ने के कारण
उत्तर:
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण

30. किसके बच्चे प्रत्याशा में हैं?
(A) गाय के
(B) कवि के
(C) पंथी के
(D) चिड़िया के
उत्तर:
(D) चिड़िया के

31. ‘एक गीत’ नामक कविता में कवि की पंक्ति ‘मुझसे मिलने को कौन विकल’? किस भाव को व्यक्त करती है?
(A) प्रश्न
(B) प्रसन्नता
(C) आश्चर्य
(D) हताशा
उत्तर:
(D) हताशा

32. ‘हो जाए न पथ में रात कहीं’ सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?
(A) चिड़िया के बच्चे
(B) पंथी
(C) चिड़िया
(D) तोता
उत्तर:
(B) पंथी

33. दिन ढलने के साथ ही बच्चे कहाँ से झाँकने लगे होंगे?
(A) दरवाजे से
(B) छत से
(C) नीड़ों से
(D) खिड़की से
उत्तर:
(C) नीड़ों से

34. मैं होऊँ किसके हित चंचल?- यह प्रश्न पैरों को कैसा कर देता है?
(A) शिथिल
(B) चंचल
(C) विह्वल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शिथिल

35. ‘एक गीत’ कविता में किस भाव की प्रधानता है?
(A) रतिभाव
(B) उत्साह भाव
(C) हास्य भाव
(D) वात्सल्य भाव
उत्तर:
(D) वात्सल्य भाव

आत्म-परिचय पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-जग-जीवन = सांसारिक गतिविधियाँ। भार = बोझ। झंकृत = तारों को बजाकर स्वर निकालना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

व्याख्या-यद्यपि मेरा जीवन सांसारिक बाधाओं और कष्टों के बोझ से दबा हुआ है, लेकिन फिर भी मैं अपने जीवन से प्रेम करता हूँ। मुझे अपने सामाजिक कर्तव्यों का बोध है। मेरा हृदय प्रेम से लबालब भरा है। किसी प्रिया ने मेरे हृदय के तारों को छूकर झंकृत कर दिया था, जिससे मेरी साँसों में संगीत के तार बजने लगे। फलस्वरूप मैं आज भी उसी प्रेम की झंकार में लीन रहता हूँ। भाव यह है कि भले ही मेरे सामने कुछ बाधाएँ और रुकावटें हैं, लेकिन मैं उनकी परवाह न करके प्रेम के सहारे अपना जीवन सुखपूर्वक जी रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है। उसके मन में किसी प्रकार की कुंठा नहीं है।
  2. सहज, सरल, प्रवाहमयी तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘साँसों के तार’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, फिर भी’ के प्रयोग से पता चलता है कि कवि सांसारिक बाधाओं से ग्रस्त है।
  4. इसी में ‘रहस्यात्मकता’ देखी जा सकती है। यह कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन अथवा कोई दैवीय शक्ति।
  5. संपूर्ण पद्य में श्रृंगार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  6. प्रस्तुत गीत पर उमर खय्याम् की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  7. गीत की भाषा में विषय के अनुसार मस्ती, कोमलता, मादकता और मधुरता विद्यमान है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) यहाँ कवि ने ‘किसी ने के द्वारा किस ओर संकेत किया है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-हरिवंश राय बच्चन कविता-आत्मपरिचय

(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का आशय है कि सांसारिक दायित्व और जीवन की जिम्मेदारियाँ, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को निभाना पड़ता है।

(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि सामाजिक कर्तव्यों तथा दायित्वों के बोझ से उसका जीवन दब गया है। प्रायः संसार के प्राणी इन दायित्वों को निभाते-निभाते प्रेमशून्य हो जाते हैं, परंतु कवि फिर भी अपने जीवन में प्रेम को अत्यधिक महत्त्व देता है और उसी के सहारे जिंदा है।

(घ) यहाँ ‘किसी ने’ शब्द कवि के प्रिय का प्रतीक है। यह प्रिय कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन भी हो सकता है। यही नहीं, ‘किसी ने’ के द्वारा कवि परमात्मा की ओर भी संकेत कर सकता है।

(ङ) प्रस्तुत पद्यांश में कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जीवन के दायित्वों और कर्तव्यों को निभाते हुए भी वह प्रेम के सहारे जीवनयापन कर रहा है। कवि खुले शब्दों में अपने प्रिय के प्रेम की घोषणा करता है।

[2] मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-सुरा = मदिरा, शराब । पान करना = पीना। जग = संसार । ध्यान करना = परवाह करना । जग की गाते = संसार की स्तुति करते।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह हमेशा अपने प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं हमेशा प्रेम रूपी मदिरा का पान करता रहा हूँ। भाव यह है कि मैं हमेशा प्रेम के भावों में डूबा रहा हूँ। इसलिए मुझे सांसारिक बाधाओं की कोई चिंता नहीं है। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि संसार के लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं? संसार हमेशा उन लोगों की स्तुति करता है जो सदैव सामाजिक दायित्वों में उलझे रहते हैं तथा निजी सुख-दुख की परवाह नहीं करते, परंतु मैं तो अपने गीतों द्वारा अपने मन के भावों को व्यक्त करता हूँ। आशय यह है कि मेरी कविताओं में मेरे प्रेममय व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति हुई है।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की है और सांसारिक बाधाओं की परवाह न करने का वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  5. प्रवाहमयी भाषा के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, कोमलता तथा मधुरता देखी जा सकती है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करता?
(ख) ‘स्नेह-सुरा’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) जग किसको पूछता है?
(घ) कवि ने अपने गीतों में किस प्रकार के भावों को व्यक्त किया है?
(ङ) इस पद्यांश में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय के प्रेम में रम गया है। वह हमेशा अपने प्रिय को पाना चाहता है। इसलिए वह संसार के झंझटों की परवाह नहीं करता और उससे दूर रहना चाहता है।

(ख) ‘स्नेह-सुरा’ का अर्थ है प्रेम की मस्ती अथवा प्यार का दीवानापन। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती का पान करता रहता है। इसलिए उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।

(ग) यह संसार केवल उसी को पूछता है जो उसकी चिंता करता है। यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि सांसारिक प्राणी केवल उसी व्यक्ति को महत्त्व देते हैं जो अपनी कविताओं में सांसारिक बातों का वर्णन करते हैं।

(घ) कवि अपने गीतों में स्वच्छंद प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करता है। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज, सरल, तत्समनिष्ठ तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग किया है।

[3] मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भाव। उपहार = भेंट। अपूर्ण = अधूरा। भाना = अच्छा लगना। स्वप्नों का संसार = नवीन इच्छाओं का संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन का वर्णन किया है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

याख्या-मेरे निजी हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। हमेशा वे मनोभाव मेरे हृदय में उमडते-घमडते रहते हैं। इसलिए मैं इस संसार को अपने हृदय के कोमल भाव देना चाहता हूँ। यह बाह्य संसार अधूरा है, क्योंकि इसमें प्रेम का अभाव है। इस अधूरे संसार को मैं पसंद नहीं करता। मेरे मन में प्रेममय संसार का सपना निवास करता है, मैं उसी सपने को साकार करने के लिए भटकता रहता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रेममय संसार में ही लीन रहना चाहता हूँ।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है तथा खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  7. लिए फिरता हूँ के प्रयोग से काव्य में मस्ती का वातावरण उत्पन्न हो गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि के हृदय में किस प्रकार के उद्गार हैं?
(ख) कवि संसार को अपूर्ण क्यों कहता है?
(ग) “स्वप्नों के संसार’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) कवि के मन की दशा कैसी है?
(ङ) इस पयांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि के हृदय में प्रेममय उद्गार हैं। वह अपने प्रिय को भरपूर प्रेम देना चाहता है और प्रेममय जीवन-यापन करना चाहता है।

(ख) कवि के अनुसार प्रेमशून्य संसार अपूर्ण और अधूरा है। परन्तु यदि जीवन में प्रेम की प्राप्ति हो जाती है तो जीवन मधुर लगने लगता है।

(ग) स्वप्नों के संसार’ से कवि का तात्पर्य है-प्रेममय जीवन। जो लोग प्रेम की भावना से परिपूर्ण होकर जीते हैं, वे ही जीवन का आनंद उठाना जानते हैं।

(घ) कवि अपने हृदयगत प्रेम को अपने प्रिय के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि को यह संसार प्रेम के बिना अपूर्ण लगता है। इसलिए वह प्रेममय जीवन जीना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है और प्रेम को मानव-जीवन की मूल भावना माना है।

[4] मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-हृदय = मन। अग्नि = आग (भावों का आवेग)। दहा = जला। मग्न रहना = मस्त रहना। भव-सागर = संसार रूपी सागर। मौजों = किनारा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। कवि प्रेम की दीवानगी को ही अपना जीवन मानता है और प्रेम की मस्ती में जीना चाहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं स्वयं अपने हृदय में प्रेम की आग जलाता हूँ और उसी में जलता रहता हूँ। आशय यह है कि कवि को प्रेममय जीवन ही सुखद लगता है। वह प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को निरंतर भोगता रहता है। लोग इस संसार को मुसीबतों का सागर कहते हैं और उस पार उतरने के लिए कोई-न-कोई माध्यम अपनाते हैं। परंतु कवि प्रेम रूपी नाव के द्वारा ही सांसारिक बाधाओं को पार कर लेता है। इस प्रकार कवि संसार रूपी सागर के किनारे पर पहुँच जाता है। कवि यह सारा कार्य मौज और मस्ती के साथ करता है। प्रेम के कारण उसके मन में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम को जीवन का आधार स्वीकार किया है। वह प्रेम की मस्ती को ही अपना जीवन मानता है।
  2. ‘अग्नि’, ‘नाव’ में रूपकातिशयोक्ति एवं भवसागर’ और ‘भव मौजों में रूपक तथा ‘सुख-दुख’ में अनुप्रास अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर उसमें क्यों जला करता है?
(ख) कवि सुख-दुख में कैसे मग्न रहता है?
(ग) भव-सागर से पार उतरने के लिए नाव बनाने का क्या अर्थ है?
(घ) ‘भव मौजों से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय से अत्यधिक प्रेम करता है। प्रिय की यादें कवि को आनंद प्रदान करती हैं। इसलिए वियोगावस्था में भी कवि अपने प्रिय की विरहाग्नि में जलकर आनंद प्राप्त करता है।

(ख) अपने प्रिय की मधुर यादों में लीन रहने के कारण कवि सुख-दुख में भी मस्त रहता है, उसे सांसारिक चिंताएँ नहीं सतातीं।

(ग) इस संसार को भयंकर सागर कहा गया है। इसे पार करने के लिए कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नौका बनाकर इस भव-सागर को पार करना चाहता है।

(घ) ‘भव मौजों से कवि का अभिप्राय है संसार रूपी सागर का किनारा। कवि का आशय यह है कि संसार के आकर्षणों में उसकी कोई रुचि नहीं है। वह संसार में प्रवेश ही नहीं करना चाहता। सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर ही वह प्रेम का सच्चा आनंद प्राप्त करना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि वह प्रेम की उन्मत्तता में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को भोगना चाहता है। वह अपनी प्रेम रूपी नौका द्वारा ही इस संसार रूपी सागर को पार करना चाहता है।

[5] मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-यौवन = जवानी। उन्माद = मस्ती, पागलपन। अवसाद = दुख तथा निराशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को ही श्रेष्ठ माना है। इसमें कवि प्रेम के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति करता है तथा प्रेम की दीवानगी तथा निराशा का वर्णन करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मेरे जीवन में यौवन की एक मस्ती है। मैं अपनी प्रिया को मिलने के लिए हमेशा व्याकुल रहता हूँ। मैं प्रिया के प्रेम का दीवाना हूँ। यद्यपि वियोगावस्था के कारण मेरे अंदर निराशा तथा दुख के भाव उत्पन्न हो गए हैं, लेकिन मैं लोगों के सामने हमेशा हँसता रहता हूँ। वियोग की पीड़ा मेरे हृदय को परेशान कर देती है। मेरे मन में प्रिया की याद ऐसे समा चुकी है कि मैं उसे याद करके मन ही मन रोता रहता हूँ, परंतु लोगों के सामने हँसने का अभिनय करता हूँ। भाव यह है कि प्रिया का वियोग हमेशा मुझे अन्दर-ही-अन्दर कचोटता रहता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने श्रृंगार के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि ने वियोगावस्था से उत्पन्न अपनी दीवानगी, निराशा तथा बेचैनी का स्वाभाविक वर्णन किया है।।
  2. कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. यह पद्यांश विषयानकल मस्ती, मादकता, मधुरता, कोमलता से परिपूर्ण है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता है तथा वियोग शृंगार का सफल वर्णन हुआ है।
  7. ‘हाय’ शब्द से कवि की विरह वेदना साकार हो उठी है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) ‘यौवन के उन्माद’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कवि अवसाद से ग्रस्त क्यों है?
(ग) कवि के भीतर तथा बाहर कैसी असंगति है?
(घ) इस पद्यांश में किस प्रकार के श्रृंगार रस का चित्रण हुआ है और क्यों?
(ङ) इस पयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) ‘यौवन के उन्माद’ से कवि का अभिप्राय है-यौवनकालीन अल्हड़ जवानी में मन में प्रेम का जोश। लगता है कि कवि नए-नए प्रेम के कारण अत्यधिक व्याकुल है, प्रिया का वियोग उसे व्यथित कर देता है।

(ख) कवि की प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः कवि प्रेमजन्य निराशा के कारण अत्यधिक व्यथित है। इसलिए वह अवसाद से ग्रस्त है।

(ग) भले ही कवि विरह-व्यथा के कारण अन्दर-ही-अन्दर कसमसाता रहता है, परन्तु वह संसार के सामने हमेशा हँसता तथा मुस्कुराता रहता है। वह नहीं चाहता कि लोग उसकी विरह-व्यथा का मज़ाक बनाए। इसलिए कवि का मन अन्दर से सुंदर तथा बाहर से अंसगत दिखाई देता है।

(घ) इस पद्यांश में शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है। कवि अपनी प्रिया के प्रेम से वंचित है इसलिए वह निराशा और अवसाद से ग्रस्त है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि सहज, सरल शब्दावली में अपनी वियोग जनित अभिलाषा और पीड़ा को व्यक्त करता है।

[6] कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-यत्न = कोशिश। नादान = भोला-भाला। दाना = लाभ। मूढ = मूर्ख। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेम की दीवानगी तथा मस्ती का संवेदनशील वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि सांसारिक दौड़-धूप को व्यर्थ बताता हुआ यही सलाह देता है कि मनुष्य को मस्ती के साथ जीना चाहिए।

व्याख्या कवि कहता है कि संसार के सभी लोग अनेक प्रयास करके थक चुके हैं। सभी ने सत्य को जानने की बड़ी कोशिश की, परंतु कोई सत्य को नहीं जान सका। इसका प्रमुख कारण यह है कि जो लोग संसार के धन-वैभव अथवा भोग-विलास की सामग्री एकत्रित करने में लगे हैं, वे सभी मूर्ख हैं। वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि संसार के जाल में उलझकर कोई सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकता। कवि सोचता है कि मैं ऐसे लोगों को मूर्ख क्यों न कहूँ जो सांसारिक लाभ तथा लोभ में उलझे हुए हैं। मैं तो इस मूर्खता को समझ चुका हूँ। इसलिए मैं तो इस सांसारिक ज्ञान को भुलाकर प्रेम की मस्ती में जीना चाहता हूँ।

विशेष-
(1) इस पद्यांश में कवि ने सांसारिक सुख-वैभव की व्यर्थता को सिद्ध करने का प्रयास किया है।

(2) ‘कर यत्न मिटे सब सत्य’ में अनुप्रास अलंकार ‘सत्य किसी ने जाना’ में प्रश्नालंकार तथा “सीखा ज्ञान भुलाना’ में विरोधाभास अलंकारों का संदर व स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। इस संदर्भ में ‘कबीरदास’ ने भी कहा है
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’।

(3) कवि ने संसार को मूर्ख सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क दिए हैं।

(4) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(5) शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

(6) इस पद्यांश में आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है तथा मुक्त छंद है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि किसे नादान कहता है और क्यों?
(ख) ‘दाना’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि ‘जग को मूढ़’ क्यों कहता है?
(घ) कवि किस प्रकार के ज्ञान को भलाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि उन लोगों को नादान कहता है जो सांसारिक धन-वैभव को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन भाग-दौड़ करते रहते हैं। कवि का विचार है कि अज्ञानता के कारण लोग प्रेम मार्ग को त्यागकर धन-वैभव तथा भोग-विलास में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं।

(ख) ‘दाना’ से कवि का अभिप्राय है सांसारिक धन-वैभव और भोग-विलास जो मनुष्य को सच्चा सुख प्रदान नहीं करते।

(ग) जो लोग सांसारिक सुख भोग की संपत्ति का संग्रह करने में लगे हुए हैं, कवि उन्हें मूढ़ कहता है क्योंकि ऐसे लोग ही अज्ञान के कारण प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाते।

(घ) कवि सांसारिक विषय-वासनाओं के ज्ञान को भुलाना चाहता है, क्योंकि यह ज्ञान कवि को सच्चा सुख प्रदान नहीं करता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सत्य पर प्रकाश डाला है कि संसार में जीवन के सत्य को कोई नहीं पहचान सका। जो लोग सांसारिक मोह-माया के शिकार बने हुए हैं, वह निश्चित ही मूर्ख हैं। कवि ने इस प्रकार के ज्ञान को भुलाने की कामना की है।

[7] मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग में उस पृथ्वी को ठुकराता! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-जग = संसार। नाता = संबंध। रोज़ = प्रतिदिन। वैभव = धन-संपत्ति। प्रतिपग = हर कदम।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने निजी प्रेम का खुले शब्दों में वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि ने स्वयं को सांसारिक मोह-माया से भिन्न बताया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरा इस संसार में कोई लंबा-चौड़ा संबंध नहीं है। मैं भावनाओं का कवि हूँ और संसार की रीति-नीति से सर्वथा भिन्न हूँ। संसार के लोग दुनियादारी निभाने में लगे रहते हैं, लेकिन मैं अपने जीवन में भावनाओं को महत्त्व देता हूँ। इसलिए मेरा संसार से कोई मेल नहीं है। मैं प्रतिदिन न जाने कितने संसार बनाता हूँ और न जाने कितने मिटा डालता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रतिदिन एक आदर्श समाज बनाने की कल्पना करता हूँ। परंतु जब मेरी कल्पना साकार नहीं होती तो मैं नई कल्पना करने लगता हूँ। इस संसार के लोग धन-संपत्ति का संग्रह करने में लगे हैं, लेकिन मेरे मन में धन-वैभव के लिए कोई लालसा नहीं है। मैं हर कदम पर धन-वैभव में लगे हुए इस संसार को ठुकराता हुआ चलता हूँ। मेरे मन में सुख-समृद्धि की कोई इच्छा नहीं है।

विशेष-

  1. कवि ने सांसारिक धन-वैभव को त्यागकर भावनाओं के प्रति अपनी आसक्ति को व्यक्त किया है।
  2. कवि का यह चिंतन पूर्णतया मौलिक और दार्शनिक है।
  3. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण विपर्यय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कहाँ का माता’ में प्रश्नालंकार, ‘जग जिस पृथ्वी पर’, ‘प्रति पग में अनुप्रास, ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति अलंकार, ‘और’ में यमक (भिन्न तथा ‘व’ के अर्थ में) इन अलंकारों की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. इस पद्यांश में प्रसाद गुण है तथा संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि स्वयं को संसार से अलग क्यों समझता है?
(ख) ‘और जग और’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवि किस प्रकार के संसार को मिटाता रहता है?
(घ) कवि स्वयं को संसार से क्यों नहीं जोड़ पाता?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के अन्य लोगों के समान धन-संपत्ति के संग्रह में विश्वास नहीं करता। वह तो निजी भावनाओं में ही खोया रहता है। इसलिए वह स्वयं को संसार से अलग समझता है।

(ख) ‘और जग और’ का भावार्थ यह है कि संसार के लोग कवि की भावनाओं को समझ नहीं पाते। सांसारिक प्राणी धन-संपत्ति के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन कवि प्रेम और प्यार के संसार में खोया रहता है।

(ग) कवि तो प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। इसलिए वह कल्पना द्वारा एक आदर्श समाज बनाने का प्रयास करता है परंतु जब वह प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो वह उसे नष्ट कर देता है। इस प्रकार वह फिर से प्रेममय संसार की कल्पना करने लगता है।

(घ) कवि प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है, परंतु संसार के लोग धन-वैभव के संग्रह में लगे हुए हैं। इसलिए कवि और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। इसी कारण कवि स्वयं को संसार से जोड़ नहीं पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वयं को संसार से अलग समझता है। वह प्रेम और प्यार की भावनाओं को अलग महत्त्व देता है। इसलिए वह एक ऐसा संसार बनाना चाहता है जो प्रेम और प्यार पर आधारित हो। इसलिए कवि सांसारिक धन-वैभव को ठोकर मारकर प्रेममय संसार बनाने की कामना करता है।

[8] मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ। [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-निज = अपना। रोदन = रोना। राग = प्रेम। आग = जोश, आवेश। भूप = राजा। प्रासाद = महल। खंडहर = टूटा-फूटा भवन। निछावर = कुर्बान करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरे रोने में प्रेम छिपा हुआ है अर्थात् मैं अपने गीत में प्रेम के आँसू बहाता रहता हूँ। भले ही मेरी वाणी कोमल तथा शीतल है फिर भी उसमें प्रेम-विरह की आग है। मेरे गीतों में एक ऐसा जोश है जो मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देता है। प्रेम पर तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपने महलों को न्योछावर कर देते हैं, परंतु मेरा प्रेम निराशा के कारण टूटे-फूटे भवन जैसा हो गया है। फिर भी मैं अपने मन में उस मल्यवान प्रेम को लिए फिरता हूँ। मैं अपनी इस विरह-भावना से अत्यधिक प्रेम करता

विशेष-

  1. इसमें कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है तथा साथ ही स्पष्ट किया है कि उसकी वाणी कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें विरहाग्नि छिपी हुई है। कवि ने अपने विरह जनित प्रेम को खंडहर बताकर अपनी निराशा को व्यक्त किया
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि अपने ‘रोदन में राग को क्यों लिए फिरता है?
(ख) ‘शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) राजाओं के प्रासाद किस पर न्यौछावर होते हैं?
(घ) कवि के अनुसार खंडहर का भाव क्या है?
(ङ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि के स्वर में निराशा और व्यथा है। लेकिन कवि के इस रुदन में सच्चे प्रेम की भावना है। वह वियोग जनित वेदना को इसलिए अपने हृदय में लिए हुए है, क्योंकि वह अपने प्रेम को भुला नहीं सकता।

(ख) विरह-वेदना के कारण कवि का स्वर कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें अपने प्रिय को न पा सकने की बेचैनी भी प्रबल है। यहाँ शीतलता और अग्नि का संयोग अद्भुत है। कवि अपनी विरहाग्नि को अपने गीतों में छिपाए हुए है। बडे राजा भी प्रेम के लिए अपना सब कछ त्याग देते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी प्रिया को पाने के लिए राजगद्दी भी छोड़ देते हैं और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

(घ) जिस प्रकार महल टूटकर खंडहर हो जाता है, उसी प्रकार कवि के प्रेम का महल भी टूट चुका है, अब उसके हृदय में केवल उसकी प्रिया की यादें ही बसी हैं जिसकी तुलना कवि खंडहर के साथ करता है।

(ङ) कवि ने अपने कोमल गीतों द्वारा अपनी विरह वेदना को व्यक्त किया है। यह वेदना अग्नि के समान कवि को गीत लिखने की प्रेरणा देती है।

[9] मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-फूट पड़ा = अत्यधिक आवेग से रोना। छंद बनाना = कविता लिखना। दीवाना = पागल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने सरल शब्दों में यह समझाने का प्रयास किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या कवि कहता है कि तुम मेरी कविता को गीत कहते हो। यह कोई गाना नहीं है, बल्कि मेरे हृदय का रुदन है, मेरी विरह-वेदना है। प्रेम की निराशा के कारण ही मेरी भावनाएँ अत्यधिक आवेग के साथ व्यक्त हुई हैं, परंतु तुम इसे कविता की संज्ञा देते हो। सच्चाई तो यह है कि मेरे गीतों के माध्यम से मेरा क्रंदन फूट पड़ा है। संसार मुझे कवि समझकर क्यों अपनाना चाहता है? सच्चाई तो यह है कि मैं कवि नहीं हूँ, मैं तो प्रेम का दीवाना हूँ। मेरे हृदय में प्रेम की मस्ती भरी हुई है। मैं गीतों के माध्यम से प्रेम-विरह की भावनाओं को प्रकट करता हूँ।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्वीकार किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-व्यथा का रुदन है। यह कोई गीत नहीं है।
  2. कवि स्पष्ट करता है कि उसकी आवेगपूर्ण भावनाओं के कारण ही गीत की उत्पत्ति होती है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘क्यों कवि कहकर’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. संबोधन शैली के प्रयोग के कारण इस पद्य में नाटकीयता तथा सजीवता उत्पन्न हो गई है।
  7. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) लोग कवि के रुदन को गाना क्यों कहते हैं?
(ख) छंद बनाना और फूट पड़ना में क्या संबंध है?
(ग) कवि स्वयं को एक नया दीवाना क्यों कहता है?
(घ) संसार कवि को कवि कहकर क्यों अपनाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) भले ही कवि अपनी कविताओं के द्वारा अपनी विरह-व्यथा को व्यक्त करता है, लेकिन लोग उसकी कविता से प्यार करते हैं। इसीलिए उसे गाना कहते हैं।

(ख) जब कवि अपनी तीव्र विरह-व्यथा को काव्य में शब्दों द्वारा व्यक्त करता है तो उसे छंद बनाना कहते हैं। वस्तुतः एक उत्कृष्ट कविता में भावनाओं का आवेग अवश्य होना चाहिए तभी वह कविता पाठक को भाव-विभोर करती है।

(ग) कवि स्वयं को नया दीवाना इसलिए कहता है क्योंकि उसके हृदय में प्रेम की मस्ती है और अपने गीतों द्वारा प्रेममयी भावनाओं को व्यक्त करता है।

(घ) संसार कवि को कवि कहकर इसलिए अपनाना चाहता है क्योंकि कवि की भावनाएँ छंदोबद्ध रचना के माध्यम से व्यक्त हुई है। संसार के लोग कवि को मात्र कवि समझते हैं, परंतु कोई भी उसकी प्रेम भावनाओं को नहीं समझ पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज तथा स्पष्ट शब्दावली में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके प्रत्येक गीत के पीछे उसकी विरह-वेदना छिपी हुई है। इस विरह-वेदना के कारण ही कवि के गीत उत्पन्न हुए हैं।

[10] मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-मादकता = मस्ती। निःशेष = पूर्ण। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी प्रेम भावना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं इस संसार में प्रेम के दीवानों की वेशभूषा धारण करके विचरण कर रहा हूँ। इसलिए लोग मुझे दीवाना समझते हैं। परंतु मैं अपनी दीवानगी से सबको मस्त बना देता हूँ। मेरे संपूर्ण काव्य में एक मस्ती और उल्लास है। इसीलिए मैं प्रेम और यौवन के गीत गाता हूँ। यही कारण है कि लोग मेरे गीतों को सुनकर झूम उठते हैं। प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती से लहराने लगते हैं। मैं अपने पाठकों को मौज और मस्ती का संदेश देना चाहता हूँ। मेरी कविता में केवल प्रेममयी भावनाओं का ही वर्णन अभिव्यक्त हुआ है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्पष्ट किया है कि वह प्रेम के कारण दीवाना हो चुका है और सभी को प्रेम की मस्ती का संदेश देना चाहता है।
  2. ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. ‘लिए फिरता हूँ शब्दों के प्रयोग के कारण इस पद्यांश में संगीत और मस्ती समाहित हो गई है।
  7. प्रसाद गुण है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि संसार को क्या संदेश देना चाहता है?
(ख) कवि की किस बात को सुनकर संसार के लोग झूमते, झुकते और लहराने लगते हैं?
(ग) ‘मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) कवि के गीतों में मादकता क्यों है?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के लोगों को यह संदेश देना चाहता है कि वे सांसारिक झंझटों को त्यागकर प्रेम और मस्ती के साथ जीवन-यापन करें। इसी से उन्हें सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी।

(ख) कवि के गीतों में प्रेम की मस्ती और मादकता है जिसे सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं, प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती में लहराने लगते हैं।

(ग) यहाँ कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह प्रेम के दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपनी प्रिया के प्रेम को प्राप्त करना है।

(घ) कवि प्रेम की मस्ती में आकंठ डूबा हुआ है। वह हमेशा प्रेम और यौवन के गीत गाता है। इसलिए हमेशा प्रेम और मस्ती में ही डूबा रहता है। उसे सांसारिक मोह-माया से कोई लगाव नहीं है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम की मस्ती के कारण वह दीवाना बन चुका है। उसकी इसी मादकता पर संसार के लोग झूम उठते हैं और वह लोगों को इसी मस्ती का संदेश देना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

एक गीत पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-पथ = रास्ता। मंजिल = लक्ष्य। पंथी = मुसाफिर । ढलना = समाप्त होना।

प्रसंग प्रस्तत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मुसाफिर बार-बार यह सोचता है कि कहीं उसे रास्ते में रात न हो जाए। मंजिल अब उस नहीं है। वह पास ही आने वाली है। भाव यह है कि वह अपने प्रिय को प्राप्त करने वाला है। बार-बार अपने प्रिय के बारे में सोचकर वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता है, ताकि वह अपने प्रिय से मिल सके। प्रिय-मिलन की बेचैनी के कारण उसे लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है और कभी भी छिप सकता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का बड़ा ही सजीव, सूक्ष्म वर्णन किया है।
  2. प्रेमी को दिन के छिपने का डर लगा रहता है इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है। इस प्रकार प्रेमी की व्यग्रता को व्यक्त किया गया है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल, साहित्यिक और प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. कोमलकांत पदावली के कारण इस गीत में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘थका हुआ पंथी’ किस कारण जल्दी-जल्दी चलता है?
(ग) ‘पंथी’ किस आशा से प्रेरित होकर जल्दी-जल्दी चलता है?
(घ) ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। कवि को यह कथन बेचैन क्यों करता है?
(ङ) इस,पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि का नाम हरिवंशराय बच्चन कविता का नाम एक गीत

(ख) थका हुआ मुसाफिर अपने लक्ष्य को पास देखकर उसे जल्दी से प्राप्त करना चाहता है, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(ग) पंथी के मन में यह आशा उत्पन्न हो चुकी है कि उसकी मंजिल पास आ चुकी है इसलिए अब जल्दी से उसका प्रिय से मिलन होगा। इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(घ) कवि अपनी मंजिल को पाने के लिए बेचैन है। वह चाहता है कि दिन छिपने से पहले अपने प्रिय को प्राप्त कर ले, लेकिन दिन जल्दी-जल्दी अस्त होने जा रहा है इसलिए वह बेचैन हो उठता है।

(ङ) कवि ने यह स्पष्ट किया है कि लक्ष्य को पाने वाला व्यक्ति हमेशा व्यग्र रहता है। उसे लगता है कि समय जल्दी से बीतता जा रहा है। इसलिए वह बड़ी तीव्र गति से अपने काम को पूरा करना चाहता है। इस प्रकार के व्यक्ति का मन बड़ा बेचैन हो उठता है।

[2] बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-प्रत्याशा = आशा। नीड़ = घोंसला। झाँकना = बाहर देखना। पर = पंख। चंचलता = तीव्रता। .

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इसमें कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा अपनी मन की व्याकुलता को व्यक्त किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि जब चिड़ियाँ आकाश में उड़ती हुई अपने घोंसलों में लौटती हैं तो उनके मन में बार-बार यह विचार उठता है कि उनके बच्चे बेचैन होकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह बार-बार घोंसलों से मुँह बाहर निकालकर झाँक रहे होंगे। चिड़ियों को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। इसलिए वे तीव्र गति से अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए घोंसलों की तरफ बढ़ने लगती हैं। उनके मन में यह भय सताता रहता है कि कहीं दिन न छिप जाए। इसलिए वह तीव्र गति से उड़ने लगती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा प्रेमी के हृदय की बेचैनी को व्यक्त किया है।
  2. जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश का बिंब-विधान तथा चित्र-विधान दोनों ही आकर्षक बन पड़े हैं।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य भाव का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) बच्चे किस आशा से नीड़ों से बाहर झाँक रहे होंगे?
(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा किस दृश्य की कल्पना की गई है?
(ग) चिड़ियों के पंखों में चंचलता क्यों उत्पन्न हो जाती है?
(घ) चिड़ियों को क्यों लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है?
(ङ) इस कविता द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
(क) चिड़ियों के बच्चे इसलिए घोंसलों से बाहर झांक रहे हैं, क्योंकि वे माँ के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि माँ लौटकर उन्हें चुग्गा देगी। इसलिए वे माँ की ममता के लिए बेचैन हैं।

(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा उस दृश्य की कल्पना की है जब चिड़ियों के बच्चे अपने माँ के आने की प्रतीक्षा के कारण घोंसलों से बाहर झाँकने लगते हैं। एक ओर उनके मन में माँ की ममता होती है और दूसरी ओर वे भूखे होते हैं।

(ग) चिड़िया अपने बच्चों से शीघ्र मिलना चाहती है। बच्चों की ममता उन्हें पुकारती है। वे शीघ्र ही बच्चों को भोजन व सुरक्षा देना चाहती है। इसीलिए उनके पंखों में चंचलता उत्पन्न हो गई है।

(घ) चिड़ियों के मन में बेचैनी है। वे जल्दी-जल्दी अपने शावकों के पास पहुँच जाना चाहती हैं। परंतु उनकी मंजिल दूर है। इसी बेचैनी के कारण उन्हें लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है।

(ङ) कवि ने माँ की ममता का सजीव चित्रण किया है। वात्सल्य और प्रेम के कारण ही शावकों का मन बेचैन हो उठता है। चिड़ियों के माध्यम से कवि ने मानवीय ममता तथा वात्सल्य का सजीव वर्णन किया है।

[3] मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ-विकल = व्याकुल। हित = के लिए। चंचल = बेचैन, क्रियाशील। शिथिल = ढीला करना। पद = पाँव। उर = हृदय। विह्वलता = आतुरता का भाव।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी हृदयगत निराशा, उदासी तथा प्रेम की असफलता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो मुझसे मिलने के लिए बेचैन हो। इसलिए मेरा मन किसी के लिए भी चंचल नहीं होता। आशय यह है कि मेरे मन में किसी के प्रति प्रेम की भावना नहीं है। यह स्थिति मेरे कदमों को शिथिल कर देती है। प्रेम के अभाव के कारण मैं ढीला पड़ जाता हूँ और मेरे हृदय में निराशा तथा उदासी की भावना उत्पन्न होकर मुझे व्याकुल कर देती है। फिर भी मैं प्रेम की तरंग में खो जाता हूँ और दिन जल्दी-जल्दी ढल जाता है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम के क्षेत्र में असफल होने के कारण अपने हृदयगत निराशा और उदासी का संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा प्रथम दो पंक्तियों में प्रश्नालंकार है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  5. प्रसाद गुण है तथा वियोग-शृंगार का परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि के मन में यह प्रश्न क्यों उठता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल है?
(ख) कवि किसके लिए चंचलता को त्याग देता है?
(ग) कवि के कदम शिथिल क्यों हो जाते हैं?
(घ) कवि के मन में कैसी विह्वलता उत्पन्न होती है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अब अकेला रह गया है, क्योंकि उसका प्रिय उसे छोड़कर चला गया है। इसीलिए वह सोचता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं है।

(ख) कवि के मन में अब अपने प्रिय को मिलने की बेचैनी नहीं है। इसलिए वह चंचलता को त्याग देता है।

(ग) कवि अब समझ चुका है कि जिसे वह प्रेम करता था, अब वह उसे मिलने वाला नहीं है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं और वह तटस्थ भाव से चलने लगता है।

(घ) कवि के मन में यह विह्वलता उत्पन्न होती है कि वह इस प्रेममय संसार में अकेला रह गया है। कोई भी व्यक्ति अब उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा, इसलिए कवि निराश व उदास है।

(ङ) कवि ने यह स्वीकार किया है कि उसकी प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः वह अब अकेला रह गया है। इसलिए इस पद्यांश में कवि की वियोगजन्य पीड़ा का मार्मिक वर्णन हुआ है।

आत्म-परिचय, एक गीत Summary in Hindi

आत्म-परिचय, एक गीत कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री हरिवंश राय बच्चन का आधुनिक हिंदी कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद (प्रयाग) के कटरा मुहल्ले के एक कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था जो अपने मधुर स्वभाव के कारण सभी लोगों में प्रिय थे। बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा काशी में हुई। सन् 1938 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य करने लगे। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। भारत सरकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनको विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया। सन् 1966 में बच्चन जी राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए।

बच्चन जी को अपने आरंभिक जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति सुखद नहीं थी। वे अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। तभी उनकी पत्नी श्यामा असाध्य रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु का शिकार हो गई। पत्नी की मृत्यु से कवि को गहरा आघात लगा। जिससे उनके जीवन में केवल निराशा एवं दुख छा गया। सन् 1942 में कवि ने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह किया। तेजी बच्चन के आने से उनके जीवन का भाग्योदय हुआ और वे निरंतर प्रगति करते चले गए। भारत सरकार ने बच्चन जी को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया।

2. प्रमुख रचनाएँ बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-‘मधुशाला’ (सन् 1935), ‘मधुबाला’ (सन् 1938), ‘मधुकलश’ (सन् 1938), ‘निशा निमंत्रण’, ‘आकुल-अंतर’, ‘एकांत संगीत’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘सतरंगिणी’, ‘दो चट्टानें’, ‘मिलनयामिनी’, ‘आरती’ और ‘अंगारे’, ‘नये पुराने झरोखे’, ‘टूटी-फूटी कड़ियाँ’ आदि। उनकी कुछ आत्मकथामूलक रचनाओं से उनके संपूर्ण जीवन का विशद वर्णन मिलता है। ये रचनाएँ हैं-‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान तक।
सन् 2003, में मुंबई में इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

3. काव्यगत विशेषताएँ उत्तर छायावादी कवियों में बच्चन जी को विशेष प्रसिद्धि मिली। वे हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों का अत्यंत सुन्दर अनुवाद किया था। ‘मधुशाला’ बच्चन जी की एक उल्लेखनीय रचना है, जिसमें प्रेम की मस्ती देखी जा सकती है। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’ तथा ‘मधुकलश’ उनकी कीर्ति की आधार-स्तंभ काव्य-रचनाएँ हैं। उनके काव्य में प्रेम भावना, मदमस्त जीवन तथा भाग्यवाद का समर्थन देखने को मिलता है। उनके काव्य की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) व्यक्तिनिष्ठता श्री हरिवंश राय बच्चन आधुनिक हिंदी काव्य की वैयक्तिक काव्यधारा के प्रमुख कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा व्यक्तिनिष्ठ है। उन्होंने वैयक्तिक यथार्थ की भूमिका पर ही जीवन एवं जगत को देखने व समझने का प्रयास किया है। वे समाज-हित के साथ-साथ व्यक्ति-हित को भूलने के पक्ष में नहीं हैं। कहीं-कहीं उनके साहित्य में वैयक्तिकता के नाम पर पलायनवादिता का स्वर भी सुनाई पड़ता है।

(ii) प्रेम,और सौंदर्य-वस्तुतः हरिवंश राय बच्चन प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। उनके अन्य साहित्य में भी उनकी यह भावना देखी जा सकती है। उनके साहित्य में प्रेम और सौंदर्य के साथ जीवन के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है। उनकी रचनाओं में गहन अनुभूतियों को भी सर्वत्र देखा जा सकता है
“इस पार प्रिये, तुम हो, मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।”

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

(iii) मानवतावाद-बच्चन जी की रचनाओं में मानवतावादी भावना भी मुखरित हुई है। उनकी रचनाओं में मानव मात्र के प्रति प्रेम का भाव सर्वत्र व्याप्त है। वे मानव की करता को देखकर व्यथित हो उठते हैं।

(iv) सामाजिक यथार्थ बच्चन जी की गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सजीवता से हुआ है। सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ उनकी रचनाओं की प्रक्रिया भी अनायास ही मुखरित हो उठी है। उनकी आत्मकथात्मक रचनाओं में उनके संघर्षशील जीवन के दर्शन होते हैं।

(v) आशा और सूजन का स्वर-बच्चन जी की कविताओं में केवल प्रणय और निराशा ही नहीं, बल्कि आशा और सृजन का स्वर भी सुनाई पड़ता है। ‘पथ की पहचान’ नामक कविता में कवि ने मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। वे पाठकों को सृजन की कल्पना करने तथा यथार्थ को स्वीकार करने का संदेश भी देते हैं। ‘बंगाल का अकाल’ शीर्षक कविता तथा ‘परवर्ती’ काव्य में कवि ने जन-जीवन को प्रतिस्थापित किया है और नए संदर्भो को प्रस्तुत किया है। एक स्थल पर कवि कहता है
“किंतु जग के पथ पर यदि
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर लो।”

4. भाषा, छंद एवं अलंकार-बच्चन जी ने अपनी काव्य रचनाओं में आडंबरहीन भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में यदि प्रवाह है, तो चित्र विधान की शक्ति तथा प्रतीक शब्द योजना भी है। वे हमेशा सीधे ढंग से अपनी बात कहते हैं। वे भाषा में अभिधा-शक्ति का प्रयोग करते हुए अपने मन के भाव पाठकों तक पहुँचाते हैं। गेय होने के कारण उनकी रचनाओं को गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही कारण है कि आधुनिक गीतकारों में उनका प्रमुख स्थान है।
बच्चन जी की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप में हुआ है। अनुप्रास, रूपक, यमक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरण के लिए
अनुप्रास-“है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे।”
रूपक-“ये उदय होते, लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में।”
उपमा-“घूमती नूरमहल थी एक दिवस बन जिन महलों की नूर।
खड़े हैं खंडहर से वे आज किसी दिन हो जाएँगे धूर।”
मानवीकरण-“रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता।”
बच्चन जी के कवि-रूप पर विचार करते हुए डॉ० मत्येंद्र नाथ शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘कविता का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में लिखा है
“छायावादी संस्कारों से अलग हटकर बच्चन ने कविता को नितांत नवीन संदर्भ प्रदान किया है। इनकी रचना-यात्रा में व्यष्टि-समष्टि, सूक्ष्म-स्थूल, सामान्य-विशेष तथा विभिन्न सामाजिक रूपों का सफल चित्रण हुआ है।”

आत्म-परिचय कविता का सार

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘आत्मपरिचय’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘आत्मपरिचय’ श्री हरिवंश राय बच्चन की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें कवि ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। कवि अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदा सजग है। वह जीवन के कष्टों तथा बाधाओं चाहता है। प्रेम से उसका हृदय झंकृत है। वह हमेशा अपनी प्रिया के स्नेह में लीन रहता है। संसार के अन्य लोग हमेशा अपनी समस्याओं में उलझे रहते हैं, परंतु कवि का हृदय प्रेम से सदा सराबोर रहता है। वह संसार की कभी चिंता नहीं करता। सांसारिक जीवन के बोझ को ढोता हुआ भी वह जीवन में प्यार को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। कवि के हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। ये मनोभाव उसके लिए उपहारस्वरूप हैं। यह अधूरा संसार कवि को अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार मे डूबा रहता है। सुख-दुख दोनों कवि के लिए एक समान हैं। वह अपने प्रेम की मस्ती और उमंग से जीवनयापन करना ही ठीक समझता है और इस प्रकार प्रेम रूपी नाव के द्वारा संसार की मुसीबतों को पार करता है। कवि के मन में सदा यौवन का पागलपन सवार रहता है। इसीलिए वह अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए बेचैन रहता है। प्रिया का वियोग कवि को पीड़ित करता है, लेकिन वह संसार के सामने हँसता रहता है। संसार के अनेक लोगों ने सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य को जान नहीं पाया। लोग संसार के भौतिक साधनों का संग्रह करने के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। परंतु कवि जान चुका है कि इससे दूर रहने में ही भलाई है।

संसार जिसे हर रोज़ जोड़ने का प्रयास करता है, कवि उसे हर कदम पर ठुकराता हुआ चलता है। वह तो हमेशा भावनाओं के संसार में जीना चाहता है। कवि को अपने रोने में भी संगीत सुनाई देता है, उसकी शीतल वाणी में विद्रोह की आग है। उसका प्रेम भले ही खंडहर के समान टूटा-फूटा है, पर वह उस प्रेम पर राजाओं के महलों को भी न्योछावर करना चाहता है। अंत में कवि कहता है कि उसका रुदन ही गीत बन गया है। कवि ने खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त की, पर लोग उसे छंद की संज्ञा देते हैं। सचमुच कवि एक दीवाना है, उसके गीतों में एक मस्ती है, उसके गीतों को सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं। इसलिए कवि सबके लिए प्रेम की मस्ती का संदेश लिए गीत लिखता है।

एक गीत कविता का सार

प्रश्न-
‘एक गीत’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गीत ‘एक गीत’ ‘बच्चन जी’ का एक प्रसिद्ध प्रेमगीत है जो कि ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसमें कवि ने अपने प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है। कवि अपने प्रियजन से मिलने के लिए अत्यधिक बेचैन है। वह तीव्र गति से चलकर अपने प्रियजन तक पहुँच जाना चाहता है। उसे लगता है कि अब उसका लक्ष्य दूर नहीं है। कवि चिड़ियों का रूपक बाँधते हुए कहता है कि चिड़ियों के बच्चे अपने माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और वह अपने घोंसलों से बाहर झांककर देख रहे होंगे। यह सोच चिड़िया के पंखों में चंचलता उत्पन्न कर देती है। परन्तु कवि सोचता है कि इस संसार में कोई भी उसका अपना नहीं है जो उसे मिलने के लिए व्याकुल हो रहा है। इसलिए उसके कदम शिथिल पड़ जाते हैं। अंत में कवि स्पष्ट करता है कि प्रेम के कारण मनुष्य के जीवन में गतिशीलता का संचरण होता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh & Vitan Bhag 2 Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Hindi Solutions आरोह & वितान भाग 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh काव्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh गद्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi अभिव्यक्ति और माध्यम

HBSE 12th Class Hindi व्याकरण

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध

HBSE 12th Class Hindi Anivarya (Compulsory) Question Paper Design

Class: 12th
Subject: Hindi
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks354520100
Marks28361680

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions44106 (4sub part)24
Marks Allotted2016202480
Estimated Time60564024180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. आरोह भाग-2 (पद्य भाग)25
2. आरोह भाग-2 (गद्य भाग)20
3. वितान पूरक पुस्तक10
4. अभिव्यक्ति और माध्यम15
5. पाठ आधारित व्याकरण : संधि, समास, वाक्य शोधन, अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास यमक, मानवीकरण, श्लेष, पुनरूक्ति प्रकाश)10
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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