HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ

HBSE 12th Class Hindi जूझ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथानायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?
उत्तर:
इस पाठ का शीर्षक ‘जूझ’ संपूर्ण कथानक का केंद्र-बिंदु है। ‘जूझ’ का अर्थ है-‘संघर्ष’ । कथानायक आनंद इस पाठ में हमें आदि से अंत तक संघर्ष करता दिखाई देता है। पाठशाला जाने के लिए आनंद को एक लंबे संघर्ष इस संघर्ष में उसकी माँ तथा दत्ता जी राव देसाई का सहयोग भी उल्लेखनीय है। पाठशाला में प्रवेश लेने के बाद अपने अस्तित्व के लिए आनंद को जूझना पड़ा। तब कहीं जाकर वह कक्षा का मॉनीटर बना। उसने कवि बनने के लिए भी निरंतर संघर्ष किया। वह कागज़ के छोटे टुकड़े अथवा पत्थर की शिला या भैंस की पीठ पर कविता लिखा करता था। उसके संघर्ष में मराठी अध्यापक न.वा.सौंदलगेकर ने साथ दिया। वस्तुतः कथानायक के दादा के अतिरिक्त अन्य सभी पात्रों ने उसका साथ दिया। अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि इस उपन्यास का शीर्षक ‘जूझ’ एकदम तर्कसंगत है।

उपन्यास का यह शीर्षक कथानायक की संघर्षमयी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। जब दादा ने उसे पाठशाला जाने से रोक दिया तो वह चुपचाप नहीं बैठता। सर्वप्रथम वह अपनी माँ को अपने पक्ष में करता है और उसके बाद वह दत्ता जी राव देसाई का सहयोग प्राप्त करता है। यही नहीं, वह अपनी बात को दृढ़तापूर्वक रखते हुए दादा द्वारा लगाए गए आरोपों का डटकर उत्तर देता है और अन्ततः दादा को आश्वस्त करने के बाद पाठशाला में प्रवेश लेता है। पाठशाला की परिस्थितियाँ भी उसके सर्वथा विपरीत थीं, परंतु उसने हार नहीं मानी। अपने जुझारूपन के कारण वह कक्षा का मॉनीटर बन जाता है और स्वयं कविता भी लिखने लग जाता है। यह सब कुछ कथानायक की जूझ का ही परिणाम है।

प्रश्न 2.
स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?
उत्तर:
लेखक मराठी भाषा के अध्यापक न.वा.सौंदलगेकर से अत्यधिक प्रभावित हुआ। वे स्वयं कविता लिखते थे और कक्षा में कविता पढ़ाते समय कविता का सस्वर पाठ करते थे। उन्हें लय, छंद, यति-गति, आरोह-अवरोह आदि का समुचित ज्ञान था। जब वे कविता पाठ करते थे तो उनके मुख पर कविता के भाव झलकने लग जाते थे। जिसका कथानायक पर अनुकूल प्रभाव पड़ा। जब उसे पता चला कि अध्यापक ने अपने घर के दरवाजे पर लगी मालती नामक लता पर कविता लिख दी है, तब उसे अनुभव हुआ कि कवि भी अन्य मनुष्यों के समान ही हाड़-माँस, क्रोध, लोभ आदि प्रवृत्तियों का दास होता है। कथानायक ने वह मालती लता देखी थी और उस पर लिखी कविता को भी पढ़ा था। इसके बाद उसे यह महसूस हुआ कि वह अपने गाँव, खेत तथा आसपास के अनेक दृश्यों पर कविता लिख सकता है। शीघ्र ही वह तुकबंदी करने लगा और अध्यापक ने भी उसका उत्साह बढ़ाया। अध्यापक से छठी-सातवीं के विद्यार्थियों के सामने कविता पाठ करने का मौका मिला। यही नहीं, उसने विद्यालय के एक समारोह में कविता का गान भी किया। इससे उसके मन में यह आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ कि वह भी कवि बन सकता है।

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प्रश्न 3.
श्री सौंदलगेकर की अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।
उत्तर:
श्री सौंदलगेकर लेखक की कक्षा में मराठी पढ़ाते थे। वे बड़े सुचारु ढंग से कविता पढ़ाया करते थे। उनका गला बड़ा सुरीला था उन्हें छंद की यति, कविता की गति, आरोह-अवरोह का समुचित ज्ञान था। वे प्रायः कविता गाकर सुनाते थे और साथ-साथ अभिनय भी करते थे। उन्होंने कुछ अंग्रेज़ी कविताएँ भी कंठस्थ कर रखी थीं। मराठी के अनेक कवियों के साथ उनका निकट का संबंध था। अतः कविता पढ़ाते समय कवि यशवंत, बा.भ.बोरकर, भा.रा ताँबे, गिरीश, केशव कुमार, आदि के साथ हुई अपनी मुलाकातों के संस्मरण भी सुनाया करते थे। कभी-कभी स्वरचित कविता को कक्षा में भी सुनाते थे।

कविता सुनाते समय उनके चेहरे पर भावों के अनुकूल हाव-भाव देखे जा सकते थे। श्री सौंदलगेकर ने लेखक की तुकबंदी का अनेक बार संशोधन किया और बार-बार उसे प्रोत्साहित भी किया। वे लेखक को यह बताते थे कि कविता की भाषा कैसी होनी चाहिए, संस्कृत भाषा का प्रयोग कविता के लिए किस प्रकार होता है और छंद की जाति कैसे पहचानी जाती है। यही नहीं, उन्होंने लेखक को अलंकार ज्ञान से भी परिचित करवाया और शुद्ध लेखन पर भी बल दिया। वे कभी-कभी लेखक को पुस्तकें तथा कविता-संग्रह भी दे देते थे। इस प्रकार सौंदलगेकर कथानायक को कविता लिखने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते रहे और लेखक भी कविता लेखन में रुचि लेने लगा।

प्रश्न 4.
कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की अवधारणा में क्या बदलाव आया?
उत्तर:
कविता के प्रति लगाव से पहले कथानायक को ढोर चराते समय, खेत में पानी लगाते समय अथवा कोई दूसरा काम करते समय अकेलापन अत्यधिक खटकता था। यही नहीं, किसी के साथ बातचीत करना, गपशप करना, हँसी मज़ाक करना भी उसे अच्छा लगता था, परंतु अब अकेलापन उसे खटकता नहीं था। कविता लिखते समय वह अपने-आप से खेलता था। अब वह अकेला रहना पसंद करता था। इस अकेलेपन के कारण वह ऊँची आवाज़ में कविता का गान करता था। कभी-कभी वह कविता पाठ करते समय अभिनय करता था और थुई-थुई करके नाचता भी था। इस अकेलेपन के लगाव के कारण उसने अनेक बार नाचकर कविता का गान किया।

प्रश्न 5.
आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें।
उत्तर:
हमारे विचार में पढ़ाई-लिखाई के संबंध में दत्ता जी राव का रवैया बिल्कुल सही था और लेखक के पिता का रवैया गलत था। लेखक का यह सोचना बिल्कुल सही है कि पढ़ लिखकर कोई नौकरी मिल जाएगी और चार पैसे हाथ में आने से विठोबा आण्णा के समान कोई व्यापार किया जा सकता है। उसका सोचना यह भी सही था कि जन्म भर खेत में काम करने से कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। इसी प्रकार दत्ता जी राव का रवैया बिल्कुल सही कहा जा सकता है। उसी ने लेखक के पिता को धमकाया तथा लेखक को पढ़ने के लिए पाठशाला भिजवाया। लेखक के पिता का यह कहना-“तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू?” यह सर्वथा अनुचित है, परंतु आज के हालात को देखते हुए आज का पढ़ा-लिखा व्यक्ति वैज्ञानिक ढंग से खेती करके अच्छे पैसे कमा सकता है और समाज के निर्माण में समुचित योगदान दे सकता है।

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प्रश्न 6.
दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता? अनुमान लगाएँ।।
उत्तर:
कथानायक और उसकी माँ दत्ता जी राव के पास इसलिए गए थे कि वे लेखक के पिता पर दबाव डालकर लेखक को पाठशाला भिजवाया जा सके। उठते समय माँ ने दत्ता जी राव से कहा था-“हमने यहाँ आकर ये सभी बातें कहीं हैं, यह मत बता देना, नहीं तो हम दोनों की खैर नहीं है। माँ अकेली साग-भाजी देने आई थी। यह बता देंगे तो अच्छा होगा।” ऐसा ही झूठ लेखक की माँ ने अपने पति से बोला और उसे दत्ता जी राव के यहाँ मिलने के लिए भेजा।

यदि लेखक की माँ यह झूठ नहीं बोलती तो लेखक के दादा (पिता) बहुत नाराज़ हो जाते और माँ-बेटे की खूब पिटाई करते। दत्ता जी राव को इस बात का पता नहीं चलता कि लेखक का पिता स्वयं अय्याशी करने के लिए बेटे को खेत में झोंके हुए है। इसी प्रकार लेखक ने यह झूठ न बोला होता कि दादा (पिता) को बुलाने आया हूँ, उन्होंने अभी खाना नहीं खाया है। तब लेखक वहाँ जा नहीं पाता और दादा (पिता) लेखक पर झूठे आरोप लगाकर दत्ता जी राव को चुप करा देता। यदि माँ-बेटे यह तीन झूठ न बोलते तो इसका दुष्परिणाम यह होता कि लेखक जीवन-भर पढ़ाई न कर पाता और कोल्हू के बैल के समान खेती में पिसता रहता।

HBSE 12th Class Hindi जूझ Important Questions and Answers

बोधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आनंद अर्थात् कथानायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
कथानायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कथानायक में पाठशाला जाकर पढ़ने की बड़ी ललक थी। लेकिन वह अपने दादा के डर से यह नहीं कह पाता कि वह पढ़ने जाएगा। अतः अपनी पढ़ाई को लेकर वह अपनी माँ के सामने अपने मन की इच्छा को प्रकट करता है और माँ को यह सुझाव देता है कि उसे दत्ता जी राव सरकार की सहायता लेनी चाहिए। वस्तुतः यह बालक बड़ा ही दूरदर्शी और बुद्धिमान है। वह इस बात को अच्छी प्रकार जानता है कि उसके दादा न तो उसकी माँ की सुनेंगे और न लेखक की। लेकिन वह दत्ता जी राव के आदेश का पालन अवश्य करेंगे। इसलिए वह माँ को साथ लेकर दत्ता जी राव के सामने सारी सच्चाई खोल देता है।

इसके लिए वह माँ के सहयोग से झूठ का सहारा भी लेता है। गाँव का यह छोटा-सा लड़का इस तथ्य को भली प्रकार जानता है कि पढ़ाई-लिखाई करके कोई नौकरी प्राप्त की जा सकती है अथवा कोई व्यापार भी किया जा सकता है। इसके साथ-साथ यह बालक बड़ा ही परिश्रमी है। सवेरा होते ही वह खेत में जाता है और ग्यारह बजे तक खेत में काम करने के बाद पाठशाला जाता है। यही नहीं, पाठशाला से लौटकर वह ढोर भी चराता है। यद्यपि कक्षा में उसे अपने अस्तित्व के लिए जूझना पड़ता है, लेकिन वह खेती तथा पढ़ाई दोनों को बड़ी मेहनत एवं लगन के साथ करता है।

शीघ्र ही कक्षा के होशियार बच्चों में उसकी गिनती होने लग जाती है तथा मॉनीटर के समान वह दूसरे बच्चों के सवाल जाँचने लगता है। शीघ्र ही यह बालक अध्यापकों को प्रभावित करने लगता है तथा गणित के मास्टर उसे मॉनीटर का कार्य सौंप देते हैं। मराठी अध्यापक के संपर्क में आने के बाद कविता लेखन में उसकी रुचि उत्पन्न होती है। वह छठी-सातवीं के बालकों के सामने कविता गान करता है तथा पाठशाला के समारोह में भी भाग लेता है। मराठी अध्यापक के सहयोग से शुरू में वह तुकबंदी करता है, लेकिन बाद में वह अच्छी कविता लिखने लग जाता है।

प्रश्न 2.
‘जूझ’ कहानी के आधार पर दत्ता जी राव का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
दत्ता जी राव गाँव का एक सफल ज़मींदार है। गाँव वाले उनका बड़ा आदर करते हैं। एक समय लेखक के दादा उन्हीं के खेतों पर काम करते थे। वे बड़े ही नेकदिल तथा प्रभावशाली व्यक्ति हैं। दूसरों के दुख में वे सहायता करने वाले व्यक्ति हैं। बच्चों तथा स्त्रियों के प्रति उनका व्यवहार बड़ा ही कोमल और अनुकूल है। जो भी व्यक्ति उनके दरवाजे पर सहायता के लिए आता है वे उसकी सहायता करते हैं। कथानायक उनकी इस प्रवृत्ति से पूरी तरह परिचित है। इसलिए वह अपनी माँ के साथ उनकी सहायता लेने जाता है।

दत्ता जी राव साम, दाम, दंड, भेद आदि सभी तरीके अपनाकर काम निकालना जानते हैं। इसलिए लेखक तथा उसकी माँ के कहने पर दादा को अपने पास बुलाया। लेखक भी बहाने से वहाँ पहुँच गया। इस अवसर पर हुई बातचीत से दादा की सारी कलई खुल गई। राव जी ने उसे खूब फटकारा और खरी-खोटी सुनाई। उसे इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह लेखक को पढ़ने के लिए पाठशाला अवश्य भेजे। वस्तुतः दत्ता जी राव एक कुशल कुम्हार की भाँति पहले तो उसे खूब ठोकते-पीटते हैं, बाद में अपनी उदारता एवं करुणा द्वारा उसे प्यार से अच्छी प्रकार से समझाते हैं। इसलिए वह लेखक के दादा को सही रास्ते पर ले आता है।

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प्रश्न 3.
लेखक के दादा की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
लेखक का दादा इस उपन्यास का खल पात्र है। वह एक आलसी, निकम्मा तथा ऐय्याश व्यक्ति है। उसकी पत्नी के अनुसार वह दिन भर एक वेश्या के घर पर पड़ा रहता है तथा एक आवारा साँड की तरह गाँव की गलियों में घूमता रहता है। अपने पुत्र के भावी जीवन के बारे में उसके मन में कोई चिंता नहीं है। उसने अपने छोटे-से लड़के को पाठशाला से हटाकर खेती में डाल दिया है। न उसे घर-परिवार की चिंता है और न अपनी पत्नी एवं बेटे की। वह हमेशा आवारागर्दी करता रहता है। बात-बात पर पत्नी को डाँटना एवं मारना उसके लिए एक सामान्य बात है। उसकी पत्नी उसे बरहेला सूअर कहती है।

यदि कोई घर का आदमी उसकी आवारागर्दी में बाधा उत्पन्न करता है तो वह उसे कुचल देता है। वस्तुतः दादा गाँव के आम शराबियों तथा मक्कारों के समान है। अपनी रक्षा के लिए वह बड़े-से-बड़ा झूठ बोल सकता है। यही नहीं, वह अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए अपने मेहनती तथा होनहार बालक पर आरोप लगाने से बाज नहीं आता। लेकिन दादा एक बुरा व्यक्ति होते हुए भी दत्ता जी राव का पूरा आदर-मान करता है और उसकी डाँट-फटकार को सुनकर सीधे रास्ते पर आ जाता है।

प्रश्न 4.
डेढ़ साल तक घर बैठे रहने के बाद भी कथानायक फिर से पाठशाला कैसे पहुँचता है?
उत्तर:
कथानायक जब पाँचवीं कक्षा में था, तब उसके दादा ने उसे पाठशाला से हटाकर खेती के काम में लगा दिया। परंतु कथानायक के मन में पढ़ाई के लिए बड़ी ललक थी। वह सोचता था कि मैं अब भी पाठशाला चला गया तो पाँचवीं कक्षा अवश्य पास कर लूँगा। परंतु वह दादा से अपने मन की बात नहीं कर सकता। इसीलिए उसने माँ की सहायता ली और दोनों माँ-बेटे दत्ता जी राव के पास गए। साथ ही दोनों ने दत्ता जी राव से यह भी कहा कि उनके यहाँ आने की बात दादा से न कहे। उधर माँ ने भी यह बहाना बनाया कि वह दत्ता जी के यहाँ साग-भाजी देने गई थी। इस प्रकार झूठ का सहारा लेकर कथानायक ने अपने दादा पर दत्ता जी राव का दबाव डलवाया। अन्ततः दादा इन शर्तों पर कथानायक को पाठशाला भेजने को तैयार हो गया कि वह सवेरे ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा, फिर पाठशाला जाएगा और पाठशाला से लौटकर उसे खेत में पशु भी चराने पड़ेंगे। इन सब संघर्षों से जूझने के बाद लेखक पाठशाला जा सका।

प्रश्न 5.
पाठशाला जाने पर लेखक को किन परेशानियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
कक्षा में गली के केवल दो लड़के ही लेखक के परिचित थे, बाकी सभी अपरिचित थे। लेखक को कमजोर बच्चों के साथ बैठने के लिए मजबूर किया गया। उसके कपड़े पाठशाला के अनुकूल नहीं थे। लट्टे के थैले में पिछली कक्षा की कुछ किताबें और कापियाँ थीं। उसने सिर पर गमछा पहना था और लाल रंग की मटमैली धोती पहनी थी। शरारती लड़के उसका मज़ाक उड़ाने लगे। एक शरारती लड़के ने उसका गमछा छीन लिया और मास्टर जी की मेज पर रख दिया। छुट्टी के मध्यकाल में उसकी धोती की लाँग को भी खींचने का प्रयास किया गया। कक्षा के एक किनारे पर वह एक अपरिचित तथा उपेक्षित विद्यार्थी के समान बैठा था।

छुट्टी के बाद जब वह घर लौटा तो मन-ही-मन सोचा कि लड़के यहाँ मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, मेरा गमछा उतारते हैं, मेरी धोती खींचते हैं। इस तरह मैं कैसे निर्वाह कर पाऊँगा। इससे तो खेत का काम ही अच्छा है। परंतु अगले दिन वह पुनः उत्साहित होकर पाठशाला पहुँच गया। उसे आठ दिन तक एक नई टोपी तथा दो नई नाड़ी वाली मैलखाऊ रंग की चड्डियाँ मिलीं। वस्तुतः यही स्कूल की ड्रेस थी। अन्ततः मंत्री नामक कक्षा के अध्यापक के डर के कारण लेखक शरारती लड़कों के अत्याचार से बच पाया और वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा।

प्रश्न 6.
कथानायक की माँ की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
लेखक की माँ एक शोषित तथा प्रताड़ित नारी है। उसके पति ने उसे डरा-धमका कर कुंठित कर दिया है। पति की हिंसक प्रवृत्ति के समक्ष वह हार चुकी है। मन से तो वह अपने पुत्र का कल्याण चाहती है, लेकिन पति के डर के कारण कुछ कर नहीं पाती। वह भी चाहती है कि उसका बेटा पढ़ाई करे, लेकिन वह लाचार है। पुत्र द्वारा पढ़ाई करने का प्रस्ताव रखने पर वह कहती है-“अब तू ही बता, मैं क्या करूँ? पढ़ने-लिखने की बात की तो वह बरहेला सूअर की तरह गुर्राता है।”

अन्ततः लेखक द्वारा दत्ता जी राव के पास चलने के प्रस्ताव को वह स्वीकार कर लेती है। फिर भी उसे विश्वास नहीं है कि उसका पति आनंदा को पाठशाला जाने देगा। परंतु वहाँ जाकर उसकी हिम्मत बढ़ जाती है और वह सारी सच्चाई दत्ता जी राव को बता देती है। लेकिन वह दत्ता जी राव को यह भी कहती है कि वह उसके आने के बारे में उसके पति से कुछ न कहे।

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प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि आनंदा एक जुझारू बालक है।
उत्तर:
‘जूझ’ कथांश को पढ़ने से पता चलता है कि आनंदा अर्थात् लेखक एक सच्चा जुझारू है। उसमें निरंतर संघर्ष करने की प्रवृत्ति है। वह प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करता है। वह अपनी मेहनत के द्वारा असंभव काय वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करके माँ को दत्ता जी राव का सहयोग लेने के लिए कहता है और सफल भी होता है। पाठशाला में प्रवेश लेने के बाद उसे पुनः घोर निराशा तथा तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। लेकिन वह घबराता नहीं। शरारती बच्चों से बचता हुआ वह न केवल अध्यापक का प्रिय विद्यार्थी बन जाता है, बल्कि कवि भी बन जाता है। लेकिन यह सब करने के लिए वह पाठशाला की पढ़ाई तथा खेतों में निरंतर जूझता रहता है। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि आनंदा एक जुझारू बालक है।

प्रश्न 8.
सिद्ध कीजिए कि लेखक एक बुद्धिमान और प्रतिभा संपन्न बालक है।
उत्तर:
बचपन से ही लेखक में एक बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण देखे जा सकते हैं। अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए वह अपनी माँ को समझाता है और उसे दत्ता जी राव के पास ले जाता है। यही नहीं, वह राव साहब को विश्वास दिलाकर अपने पिता को बाध्य कर लेता है। पाठशाला की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह अपनी बुद्धि के बल पर अध्यापकों का प्रिय छात्र बन जाता है और गणित तथा साहित्य में अग्रणी स्थान पा लेता है। उसे कक्षा का मॉनीटर भी बना दिया जाता है। मराठी-अध्यापक का सहयोग पाकर वह अच्छी कविता लिखने और गाने लगता है। लेकिन पढ़ाई के काम के साथ-साथ वह अपने पिता द्वारा रखी गई शर्तों के अनुसार खेत के कार्य को पूरी ईमानदारी से संपन्न करता है। अतः यह कहना अनुचित न होगा कि आनंदा एक प्रतिभाशाली तथा बुद्धिमान बालक है।

प्रश्न 9.
‘जूझ’ कहानी में पिता को मनाने के लिए माँ और दत्ता जी राव की सहायता से एक चाल चली गई है। क्या ऐसा कहना ठीक है? क्यों?
उत्तर:
‘जूझ’ कहानी में एक पिता अपने बेटे को पढ़ाने की बजाए खेती के काम में लगाता है और स्वयं दिन भर गाँव में आवारागर्दी करता है। यदि उसे बेटे को पढ़ाने के लिए कहा जाए तो वह बरहेला सूअर की तरह गुर्राता है। लेखक अपनी माँ के साथ मिलकर दत्ता जी राव की शरण में जाता है। तीनों ने मिलकर एक ऐसा उपाय निकाला, ताकि कथानायक की पढ़ाई आरंभ हो सके। यदि यह उपाय न अपनाया जाता तो लेखक आजीवन अनपढ़ ही रहता। अतः इस उपाय को चाल नहीं कह सकते, क्योंकि ‘चाल’ शब्द से षड्यंत्र की बू आती है। इसे युक्ति या उपाय कह सकते हैं।

प्रश्न 10.
किस घटना से पता चलता है कि लेखक की माँ उसके मन की पीड़ा समझ रही थी? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए।
उत्तर:
लेखक ने अपनी माँ से निवेदन किया कि वह आगे पढ़ाई करना चाहता है। पहले तो उसने अपनी लाचारी दिखाई, लेकिन जब लेखक ने माँ को दत्ता जी राव के पास चलने का सुझाव दिया तो वह लेखक की बात को मान गई। उसे लगा कि बेटे की पढ़ाई आरंभ कराने का यही सही रास्ता है। वह तत्काल पुत्र को साथ लेकर राव साहब के पास गई और उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर सारी बात उनके सामने रखी। इस घटना से पता चलता है कि माँ अपने बेटे के मन की पीड़ा को समझती थी।

प्रश्न 11.
लेखक को पढ़ाने के लिए उसके पिता ने क्या शर्ते रखी?
उत्तर:
लेखक के पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अनेक शर्ते रखीं। उसने कहा कि पाठशाला जाने से पूर्व वह ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा, पानी लगाएगा और वहीं से पाठशाला जाएगा। सवेरे ही बस्ता लेकर पहले वह खेत में जाएगा। पाठशाला से छुट्टी होने के बाद वह घर पर बस्ता छोड़कर सीधा खेत में आएगा और घंटा भर ढोर चराएगा। जिस दिन खेत में काम अधिक होगा, वह पाठशाला नहीं जाएगा। आखिर लेखक ने दादा की सभी शर्ते मान लीं और पाठशाला जाना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 12.
पाठशाला में पहले ही दिन लेखक के साथ कक्षा में क्या शरारतें हुईं? लेखक ने यह क्यों सोचा कि वह आगे से स्कूल नहीं जाएगा?
उत्तर:
पहले ही दिन कक्षा में लेखक को खूब तंग किया गया। चह्वाण नाम के लड़के ने लेखक का गमछा छीनकर अपने सिर पर लपेट लिया और फिर उसे अध्यापक की मेज पर रख दिया। बीच की छुट्टी में उसकी धोती की लाँग को भी खोलने का प्रयास किया। अन्य बच्चों ने उसकी खूब खिल्ली उड़ाई और मनमानी छेड़खानी की। उसकी हालत कौओं की चोंचों से घायल किसी खिलौने जैसी हो गई, जिससे लेखक का मन निराश हो गया। इसलिए उसने मन-ही-मन सोचा कि वह आगे से स्कूल नहीं जाएगा। इससे तो खेती का काम ही ठीक होगा।

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प्रश्न 13.
दत्ता जी राव की सहायता के बिना कहानी का ‘मैं पात्र वह सब नहीं पा सकता था जो उसे मिला। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
यह कथन सर्वथा सही है कि दत्ता जी राव की सहायता के बिना कथानायक न तो आगे पढ़ सकता था और न ही कवि बन सकता था। लेखक और उसकी माँ के कहने पर दत्ता जी राव समझ गए कि ‘मैं’ पात्र में आगे पढ़ने की लगन है। अतः उसने ही उसके पिता (दादा) को डाँट फटकारकर लेखक को आगे पढ़ने के लिए तैयार किया। अतः लेखक के लिए दत्ता जी राव की सहायता का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 14.
दुबारा पाठशाला जाने पर लेखक का पहले दिन का अनुभव किस प्रकार का था?
उत्तर:
दुबारा पाठशाला जाने पर लेखक का पहले दिन का अनुभव कोई अच्छा नहीं था क्योंकि एक तो उसे कम उम्र के साथ बैठना पड़ा। दूसरा, वह इन बालकों को अपने से कम अक्ल का मानता था। कक्षा के सबसे शरारती लड़के चाण ने उसकी खिल्ली उड़ाई और उसका गमछा छीनकर मास्टर की मेज पर रख दिया। वह यह सोचकर डर गया कि कहीं उसका गमछा फट न जाए। बीच की छुट्टी में उसी शरारती लड़के ने उसकी धोती के लंगोट को भी खींचने का प्रयास किया। उसे कक्षा में बेंच के एक कोने पर अलग बैठना पड़ा। इस प्रकार लेखक का दुबारा पाठशाला जाने का पहला दिन कोई खास नहीं था।

प्रश्न 15.
पाँचवीं कक्षा में पास न होने के बाद लेखक को कैसा लगा? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
जो लड़के चौथी कक्षा पास करके पाँचवीं में आए थे, उनमें से गली के दो लड़कों को छोड़कर लेखक किसी को नहीं जानता था। जो लड़के कक्षा में उसके साथ थे, वे कम अक्ल तथा मंद बुद्धि के थे। अपनी पुरानी कक्षा का विद्यार्थी होकर भी वह अजनबी के रूप में कक्षा में बैठा था। पुराने सहपाठी उसे अच्छी तरह जानते थे, परंतु नए लड़के उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे। कोई उसका गमछा छीन रहा था, कोई उसकी धोती की लाँग को खींचने की कोशिश कर रहा था, कोई उसके थैले का मज़ाक उड़ा रहा था। उसे पश्चाताप हो रहा था कि अवसर मिलने पर वह पाँचवीं कक्षा पास न कर सका और उसे फिर से पढ़ना पड़ रहा है।

प्रश्न 16.
लेखक का पाठशाला में विश्वास कैसे बढ़ा? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में लेखक के लिए दो घटनाओं का विशेष महत्त्व है। उसने कक्षा के मॉनीटर के समान गणित के सवाल निकालने आरंभ कर दिए। इससे मास्टर जी ने उसे भी अन्य लड़कों के सवाल जाँचने पर लगा दिया। इससे लेखक का आत्मविश्वास बढ़ने लगा। दूसरी घटना यह हुई कि वह भी मराठी अध्यापक के समान लय तथा गति के साथ कविता का गान करने लगा। इससे उसे प्रार्थना सभा में कविता गान करने का अवसर प्राप्त हुआ। उसका विश्वास अब इतना बढ़ गया कि वह स्वयं भी कविता लिखने लगा।

प्रश्न 17.
कथानायक को मास्टर की छड़ी की मार अच्छी क्यों लगती थी?
उत्तर:
लेखक कोई भी कीमत चुका कर पढ़ना चाहता था। इसीलिए वह अपने पिता की सभी शर्ते मान लेता है। वह जानता है कि खेती में उसका भविष्य अंधकारमय है। पढ़-लिख कर वह कोई नौकरी पा सकता है अथवा कोई व्यवसाय भी कर सकता है। इसीलिए वह अपनी पढ़ाई को पूरा करने के लिए पिता की सभी शर्ते मान लेता है। खेती के काम की अपेक्षा वह मास्टर की छड़ी की मार को सहन करना अच्छा समझता है। छड़ी की मार से कम-से-कम उसका भविष्य तो सुधर जाएगा। यही सोच कर वह छड़ी की मार को सहना श्रेयस्कर समझता है।

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प्रश्न 18.
कथानायक ने बचपन में किस प्रकार की कविताएँ लिखने का प्रयास किया?
उत्तर:
कथानायक को जब यह पता चला कि उसके मराठी के अध्यापक सौंदलगेकर ने अपने घर के दरवाज़े पर लगी मालती की लता पर कविता लिखी है, तो उसे लगा कि वह भी अपने आस-पास, अपने खेतों तथा अपने गाँव पर कविता बना सकता है। वह ढोर चराते समय फसलों पर या जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। इस कार्य के लिए वह अपने पास कागज़ का टुकड़ा तथा पैंसिल रखने लगा। कभी-कभी वह कंकड़ से पत्थर की शिला पर या लकड़ी से भैंस की पीठ पर कविता लिख लेता था। फिर उसे याद करके लिखकर अपने मास्टर को दिखाता था।

प्रश्न 19.
मराठी के अध्यापक से कविता पढ़कर कथानायक को क्या लाभ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
मराठी के अध्यापक से कविता पढ़ने के बाद कथानायक में कविता के प्रति अत्यधिक रुचि जागृत हुई। वह गति, लय, आरोह-अवरोह तथा अभिनय के साथ काव्य पाठ करने लगा। धीरे-धीरे वह इस काम में इतना पारंगत हो गया कि उसका काव्य पाठ अध्यापक से अधिक आकर्षक था। फलतः उसे कक्षा के सामने कविता गाने का अवसर मिला और स्कूल के समारोह में भाग लेने का मौका मिला। इससे कथानायक उत्साहित हो गया। वह अकेले में ऊँचे स्वर में कविता का गान करता था, नाचता था और अभिनय करता था। धीरे-धीरे उसे स्वयं कविता लिखने का शौक लग गया।

प्रश्न 20.
लेखक को अकेलेपन में आनंद क्यों आता था?
उत्तर:
जब लेखक अपने खेत में अकेला लय, गीत और ताल के साथ कविता का गान करता था और अभिनय करता था तो अकेलेपन में उसे अत्यधिक आनंद प्राप्त होता था। अकेलेपन में वह खुलकर गा सकता था, अभिनय कर सकता था और नाच भी सकता था। ऐसा करने में उसे बड़ा आनंद मिलता था।

प्रश्न 21.
‘जूझ’ कहानी के माध्यम से लेखक ने क्या सीख दी है?
अथवा
‘जूझ’ कहानी का उद्देश्य (प्रतिपाद्य) स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘जूझ’ कहानी पाठकों को निरंतर संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। मानव-जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों अथवा कितनी बाधाएँ और संकट क्यों न हों, उसे निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि धैर्य, हिम्मत तथा संघर्ष के साथ मुसीबतों का सामना करना चाहिए। इस कहानी का कथानायक पढ़ना चाहता है, लेकिन उसका पिता उसे पढ़ने नहीं देता। लेखक इस बाधा का हल निकालता है। वह अपनी माता का सहयोग लेकर दत्ता जी राव के पास जाता है और अन्ततः अपने पिता को राजी कर लेता है। इसके बाद भी बाधाएँ समाप्त नहीं होतीं। स्कूल के शरारती बच्चे उसे तंग करते हैं तथा उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। परंतु वह धैर्यपूर्वक उनका भी सामना करता है। अन्त में वह अपने अध्यापकों का चहेता बन जाता है और कक्षा में मॉनीटर बन जाता है।

प्रश्न 22.
‘जूझ’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इस कहानी का शीर्षक ‘जूझ’ पूर्णतया सार्थक है। यह शीर्षक कहानी की मूल भावना के सर्वथा अनुकूल है। कहानी का नायक आनंदा कहानी के आदि से अंत तक लगातार संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। अन्ततः वह सफलता प्राप्त करता है। लेखक ने कथानायक की जुझारू प्रवृत्ति का उद्घाटन करने के लिए यह कहानी लिखी है और उसका नामकरण ‘जूझ’ किया है। दूसरा यह शीर्षक संक्षिप्त, सटीक तथा सार्थक है। यह शीर्षक जिज्ञासावर्धक होने के कारण पाठकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। अतः यह शीर्षक सर्वथा तर्कसंगत एवं सार्थक है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कथानायक पढ़ना क्यों चाहता था?
उत्तर:
कथानायक को लगा कि खेती में उसके लिए कोई भविष्य नहीं है। यदि वह सारा जीवन खेती-बाड़ी में लगा रहा तो उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाएगा। पढ़-लिखकर वह नौकरी कर सकता है या कारोबार कर सकता है। यही सोचकर वह खेती छोड़कर पढ़ना चाहता था।

प्रश्न 2.
लेखक का दादा कोल्हू जल्दी क्यों चलाता था?
उत्तर:
लेखक का दादा खेती के धंधे को अच्छी तरह समझता था। वह इस बात को अच्छी तरह समझता था कि यदि उसके द्वारा बनाया गया गुड़ जल्दी बाज़ार में आएगा तो उसे अच्छे पैसे मिल जाएँगे। इसलिए दादा जल्दी से कोल्हू चलाता था।

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प्रश्न 3.
लेखक का पिता (दादा) राव साहब का नाम सुनते ही उनसे मिलने के लिए क्यों गया?
उत्तर:
पूरे गाँव में दत्ता जी राव का अत्यधिक मान सम्मान था। दादा जी उनके बुलावे को कैसे ठुकरा सकता था, बल्कि वह तो यह जानकर प्रसन्न हो गया कि उन्होंने उसे अपने घर बुलाया है। अतः वह रोटी खाए बिना ही दत्ता जी राव से मिलने के लिए चल दिया।

प्रश्न 4.
कथानायक ने दत्ता जी राव को क्या विश्वास दिलाया?
उत्तर:
कथानायक ने अपनी पढ़ाई के बारे में दत्ता जी राव को विश्वास दिलाया। उसने कहा कि अभी जनवरी का महीना है और दो महीने में वह परीक्षा की पूरी तैयारी कर लेगा और परीक्षा में अवश्य पास हो जाएगा। इस तरह उसका एक साल बच जाएगा। उसने यह भी विश्वास दिलाया कि उसकी पढ़ाई का खेती के काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

प्रश्न 5.
लेखक ने दत्ता जी राव की उपस्थिति में अपने दादा से निडर होकर बातचीत क्यों की?
उत्तर:
लेखक पहले अपनी माँ के साथ दत्ता जी राव के पास गया था। तब माँ ने अपने पति की आवारागर्दी की सारी बात दत्ता जी राव को बता दी थी। उस समय दत्ता जी राव ने लेखक से कहा कि वह उसके दादा के आने के थोड़ी देर बाद ही वहाँ आ जाए और निडर होकर अपनी सारी बात कहे। इसलिए लेखक ने बड़ी निडरता के साथ अपने पढ़ने की बात को रखा।

प्रश्न 6.
लेखक के पिता ने दत्ता जी राव के समक्ष उसकी पढ़ाई बंद करने के क्या कारण बताए?
उत्तर:
लेखक के पिता ने दत्ता जी राव से झूठ बोलते हुए कहा कि लेखक (कथानायक) को गलत आदतें पड़ गई हैं। वह कंडे बेचता है, चारा बेचता है और सिनेमा देखने जाता है। यही नहीं, वह खेती और घर के काम की ओर उसकी पढ़ाई रोक दी गई है और उसे खेत के काम पर लगा दिया है।

प्रश्न 7.
मंत्री नामक मास्टर के व्यक्तित्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मंत्री नामक मास्टर गणित पढ़ाते थे। लड़कों के मन में उनकी दहशत बैठी हुई थी। वे छड़ी का उपयोग नहीं करते थे। हाथ से गरदन पकड़कर पीठ पर घूसा मारते थे। पढ़ने वाले लड़कों को शाबाशी भी मिलती थी। एकाध सवाल गलत हो जाते तो उसे वे समझा देते थे। किसी लड़के की कोई मूर्खता दिखाई दे तो उसे वहीं ठोंक देते। इसलिए सभी का पसीना छूटने लगता और सभी छात्र घर से पढ़ाई करके आने लगे।

प्रश्न 8.
पाठशाला जाते ही लेखक का मन खट्टा क्यों हो गया?
उत्तर:
पाठशाला जाते ही लेखक को पता चला कि वहाँ का सारा वातावरण बदल चुका है। उसके सभी साथी अगली कक्षा में चले गए थे। उसकी कक्षा के सभी बच्चे उससे कम उम्र के थे और कुछ मंद बुद्धि के थे। गली के दो लड़कों के सिवाय कोई भी कक्षा में उसका परिचित नहीं था। यह सब देखकर उसका मन खट्टा हो गया।

प्रश्न 9.
लेखक को पाँचवीं कक्षा में ही दाखिला क्यों लेना पड़ा?
उत्तर:
जब लेखक पाँचवीं कक्षा में पढ़ रहा था तो दादा ने उसका स्कूल जाना बंद कर दिया और उसे खेती के काम में लगा दिया। अतः पाँचवीं में पास न होने के कारण लेखक को फिर से उसी कक्षा में दाखिला लेना पड़ा।

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प्रश्न 10.
वसंत पाटील के व्यक्तित्व अथवा विद्यार्थी जीवन का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
वसंत पाटील लेखक का सहपाठी था। वह पतला-दुबला, किन्तु पढ़ने में होशियार था। उसका स्वभाव शांत था। उसके गणित के सभी सवाल ठीक निकलते थे। गणित के अध्यापक ने उसे कक्षा का मॉनीटर बना दिया था। लेखक भी उसे देखकर खूब मेहनत करने लगा था। लेखक पर वसंत पाटील का गहरा प्रभाव पड़ा था।

प्रश्न 11.
वसंत पाटिल की नकल करने से कथानायक को क्या लाभ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
वसंत पाटील कक्षा में सबसे होशियार विद्यार्थी था। वह कक्षा का मॉनीटर भी था। उसकी नकल करने से कथानायक भी गणित के सवाल हल करने लगा। धीरे-धीरे वह भी कक्षा में वसंत पाटील के समान सम्मान प्राप्त करने लगा। यही नहीं, अध्यापक भी उसका उत्साह बढ़ाने लगे।

प्रश्न 12.
मास्टर सौंदलगेकर की साहित्यिक चेतना/काव्य-ज्ञान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मास्टर सौंदलगेकर मराठी भाषा का अध्यापक था। वह बहुत तन्मय होकर कक्षा में बच्चों को पढ़ाता था। उस में साहित्य के प्रति गहन आस्था थी। उसे मराठी व अंग्रेज़ी की बहुत-सी कविताएँ कण्ठस्थ थीं। उसका गला बहुत सुरीला था। उसे छंद और लय का भी पूर्ण ज्ञान था। वह कविता के साथ ऐसे जुड़ता कि अभिनय करके भाव बोध करा देता। वह स्वयं भी बहुत सुन्दर कविता रचना करता था। वह कभी-कभी अपनी कविताएँ भी कक्षा में सुनाता था। लेखक ऐसे क्षणों में बहुत तन्मय हो जाता

प्रश्न 13.
गुड़ के विषय में दादा के व्यापारिक ज्ञान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
दादा के अनुसार अगर कोल्हू जल्दी शुरू किया जाता तो ईख की अच्छी-खासी कीमत मिल जाती और उनकी यह सोच सही थी। क्योंकि जब चारों ओर कोल्हू चलने शुरू हो जाते तब बाज़ार में गुड़ की अधिकता हो जाती और भाव नीचे उतर आते। अच्छी कीमत वसूलने के लिए दादा गाँव भर से पहले अपना कोल्हू शुरू करवाते।

प्रश्न 14.
आनंदा के दादा की क्रूरता का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:’
जूझ’ कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि आनंदा के दादा (पिता) एक क्रूर व्यक्ति हैं। उसे अपने छोटे-से बालक के प्रति जरा भी सहानुभूति नहीं है। वह उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेजने की अपेक्षा खेत मे काम करवाना चाहता है। वह उसकी पढ़ाई का विरोध करता है। वह दत्ता जी राव के कहने से आनंदा को स्कूल भेजने के लिए मान जाता है। उसके लिए भी कई कड़ी शर्ते रखता है। वह आप काम न करके बालक से खेत का काम करवाना चाहता है। यह उसकी क्रूरता का ही प्रमाण है।

प्रश्न 15.
लेखक को यह कब लगा मानो उसके पंख लग गए हों?
उत्तर:
मराठी, अध्यापक के कहने पर लेखक ने अपने द्वारा बनाई गई मनोरम लय को बच्चों के सामने गाया। यही नहीं, उसने स्कूल के समारोह में भी गीत को गाकर सुनाया, जिसे सभी ने पसंद किया। इससे लेखक का उत्साह बढ़ गया। इस प्रकार लेखक को लगा मानो उसके पंख लग गए हों।

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प्रश्न 16.
लेखक के कवियों के बारे में क्या विचार थे? अब वह उन्हें आदमी क्यों समझने लगा?
उत्तर:
पहले लेखक कवियों को किसी अन्य लोक के प्राणी समझता था। किंतु जब उसने देखा कि मराठी के मास्टर जी भी कविता लिखते हैं तब लेखक को समझ में आया कि ये कवि भी उसी के समान हाड़-माँस के आदमी होते हैं। अतः उसके मन का भ्रम दूर हो गया।

प्रश्न 17.
लेखक को मास्टर जी से किन विषयों पर कविताएँ लिखने की प्रेरणा मिली?
उत्तर:
मास्टर जी के घर के द्वार पर मालती की एक लता थी। उन्होंने उस पर एक अच्छी कविता लिखी थी। उसे सुनकर लेखक को भी प्रेरणा मिली। उसने अपने आस-पास के वातावरण, गाँव, खेत, फसल, फल-फूल और पशुओं आदि पर कविताएँ लिखनी आरंभ कर दी।

प्रश्न 18.
आनंदा के काव्य-प्रेम का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आनंदा एक होनहार छात्र था। वह अपने मराठी भाषा के अध्यापक सौंदलगेकर से बहुत प्रभावित था। वह मराठी भाषा में काव्य रचना करता था। आनन्दा ने अपने अध्यापक से प्रेरित होकर काव्य रचना आरम्भ की थी। वह कभी-कभी अपनी कविता को कक्षा में भी पढ़कर सुना देता था। उसे कविता के प्रति इतना प्रेम था कि वह भैंस को चराते समय भैंस की कमर पर भी कविता लिख देता था। कभी-कभी जमीन पर भी कविता लिखने का अभ्यास करता था। बाद में बड़ा होकर उसने अपने परिश्रम से अनेक कविताओं की रचना की थी। इससे उसके काव्य-प्रेम का बोध होता है।

जूझ Summary in Hindi

जूझ लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री आनंद यादव का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री आनंद यादव का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
श्री आनंद यादव का पूरा नाम आनंद रतन यादव है। इनका जन्म सन् 1935 में कागल कोल्हापुर में हुआ जो कि महाराष्ट्र में स्थित है। पाठकों में वे आनंद यादव के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्होंने मराठी तथा संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की और बाद में पी.एच.डी. भी की। बहुत समय तक आनंद यादव पुणे विश्वविद्यालय में मराठी विभाग में कार्यरत रहे। अब तक आनंद यादव की लगभग पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उपन्यास के अतिरिक्त इनके कविता-संग्रह तथा समालोचनात्मक निबंध भी प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी रचना ‘नटरंग’ का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा किया गया। सन 1990 में साहित्य अकादमी ने इनके द्वारा रचित उपन्यास ‘जूझ’ को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। आनंद यादव की साहित्यिक रचनाएँ मराठी साहित्यकारों तथा पाठकों में काफी लोकप्रिय हैं।।

‘जूझ’ एक बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित आत्मकथात्मक उपन्यास है। इसमें एक किशोर के देखे और भोगे हुए गंवई जीवन के खुरदरे यथार्थ की विश्वसनीय गाथा का वर्णन है। इसके साथ-साथ लेखक ने अस्त-व्यस्त निम्न मध्यवर्गीय ग्रामीण समाज तथा संघर्ष करते हुए किसान-मजदूरों के जीवन की यथार्थ झांकी प्रस्तुत की है।

उपन्यास के इस अंश की भाषा सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा है, जिसमें तत्सम, तदभव तथा देशज शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है। आत्मकथात्मक शैली के प्रयोग के कारण उपन्यास का यह अंश काफी रोचक एवं प्रभावशाली बन पड़ा है।

जूझ पाठ का सार

प्रश्न-
आनंद यादव द्वारा रचित ‘जूझ’ नामक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
जूझ’ मराठी के प्रसिद्ध कथाकार आनंद यादव के बहुचर्चित उपन्यास का एक अंश है। इसमें एक संघर्षशील किशोर के जीवन का यथार्थ वर्णन किया गया है। किशोर के पिता ने उसे कक्षा चार के बाद पाठशाला नहीं जाने दिया और खेती के काम में लगा लिया। किशोर को खेतों पर पानी लगाने और कोल्हू पर कार्य करना पड़ता है। दिनभर वह खेतों और घर के काम में जुटा रहता है। उसे पता है कि खेतों में कार्य करने से उसे कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। पढ़कर उसे नौकरी मिल सकती है। परंतु वह यह बात अपने दादा से कह नहीं पाता। यदि दादा को इस बात का पता लगेगा तो दादा उसकी बुरी तरह से पिटाई करेंगे। आखिर किशोर अपनी माँ के सहयोग से एक योजना बनाता है। कोल्हू का कार्य लगभग समाप्त हो चुका था। उसकी माँ कंडे थाप रही थी और किशोर बाल्टी में पानी भर-भर कर माँ को दे रहा था। उसने सोचा कि माँ से अकेले में बात करना उचित होगा। आखिर उसने हौंसला करके माँ से बात की। परंतु माँ ने कहा कि जब भी तेरी पढ़ाई की बात चलती है तो तुम्हारे दादा जंगली सूअर के सामान गुर्राने लगता है।

तब किशोर ने अपनी माँ से कहा कि वह दत्ता जी राव देसाई से इस बारे में बात करे। अन्ततः यह तय हुआ कि माँ-बेटा रात को उनसे बात करने जाएँगे। माँ चाहती थी कि उसका पुत्र सातवीं तक पढ़ाई तो अवश्य कर ले। इसलिए दोनों माँ-बेटा दत्ता जी राव के घर गए। दीवार के साथ बैठकर माँ ने दत्ता जी राव को घर की सभी बातें बता दी। उसने यह भी कहा कि उसका पति सारा दिन रखमाबाई के पास रहता है और खेत में खुद काम करने की बजाय उसके लड़के को इस काम पर लगा रखा है। इसलिए उसने उसके पुत्र की पढ़ाई बंद करवा दी है। दत्ता जी का रुख काफी अनुकूल था। यह देखकर किशोर ने कहा कि अब जनवरी का महीना चल रहा है, यदि उसे पाठशाला भेज दिया गया तो वह दो महीने में अच्छी तरह से पढ़कर पाँचवीं कक्षा पास कर लेगा। इस प्रकार उसका एक साल बच जाएगा। किशोर के पिता के काले कारनामे सुनकर राव जी क्रोधित हो उठे और कहा कि वह उसे आज ही ठीक कर देंगे।

राव ने किशोर से यह भी कहा कि जैसे ही तुम्हारे दादा घर पर आएँ तो उसे मेरे यहाँ भेज देना और घड़ी भर बाद तुम भी कोई बहाना करके यहाँ आ जाना। माँ-बेटा दोनों ने मिलकर यह भी निवेदन किया कि उनके यहाँ आने की बात दादा जी को पता न चले। इस पर दत्ता जी राव ने कहा कि तुमसे जो कुछ पूछूगा वह तुम बिना डर के बता देना। आखिर माँ-बेटे घर लौट गए। माँ ने दादा को राव साहब के यहाँ भेज दिया। साथ ही यह बहाना बनाया कि वह उनके यहाँ साग-भाजी देने गई थी। किशोर का दादा राव के बुलावे को अपना सम्मान समझकर तत्काल पहुँच गया। लगभग आधे घंटे बाद माँ ने बच्चे को यह कहकर भेजा कि दादा को खाने पर घर बुलाया है। दत्ता जी ने किशोर को देखकर कहा कि तू कौन-सी कक्षा में पढ़ता है। इस पर किशोर ने उत्तर दिया कि पहले वह पाँचवीं में पढ़ता था। अब पाठशाला नहीं जाता। क्योंकि दादा ने उसे स्कूल जाने से मना कर दिया है और खेतों में पानी देने के काम पर लगा दिया है। दादा ने रतनाप्पा राव को अपनी सारी बात बता दी।

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इस पर राव साहब ने दादा को फटकारते हुआ कहा “खुद खुले साँड की तरह घूमता है, लुगाई और बच्चों को खेती में जोतता है, अपनी मौज-मस्ती के लिए लड़के की बलि चढ़ा रहा है । इसके बाद दत्ता जी ने किशोर से कहा-“तू कल से पाठशाला जा, मास्टर को फीस दे दे, मन लगाकर पढ़, साल बचाना है। यदि यह तुझे पाठशाला न जाने दे, तो मेरे पास चले आना, मैं पढ़ाऊँगा तुझे।” इसके बाद दादा ने किशोर पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह दिन भर जुआ खेलता है, कंडे बेचता है, चारा बेचता है, सिनेमा देखता है, खेती और घर का काम बिल्कुल भी नहीं करता है। परंतु यह सब आरोप झूठे थे। अन्ततः दत्ता जी ने दादा को संतुष्ट कर दिया और किशोर को अच्छी प्रकार समझाया। इस पर दादा ने यह स्वीकार कर लिया कि वह अपने बेटे को पाठशाला भेजेगा। परंतु दादा ने यह भी शर्त लगा दी कि वह सुबह ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा और सीधा खेत से ही पाठशाला जाएगा। यही नहीं, छुट्टी के बाद वह घंटा भर पशु चराएगा।

यदि खेत में अधिक काम हुआ तो वह कभी-कभी स्कूल से छुट्टी भी ले लेगा। किशोर ने यह सभी शर्ते मान लीं।। किशोर पाठशाला की पाँचवीं कक्षा में जाकर बैठ गया। कक्षा में दो लड़के उसकी गली के थे और बाकी सब अपरिचित थे। वे किशोर से कम उम्र के थे। वह बैंच के एक कोने पर जाकर बैठ गया। कक्षा के एक शरारती लड़के ने उसका मजाक उड़ाया। यही नहीं, उसका गमछा छीनकर मास्टर जी की मेज पर रख दिया। छुट्टी के समय उस शरारती लड़के ने किशोर की धोती की लाँग खोल दी। यह सब देखकर किशोर घबरा गया और उसका मन निराश हो गया। उसने अपनी माँ से कह कर बाज़ार से नई टोपी और चड्डी मंगवा ली, जिन्हें पहनकर वह स्कूल जाने लगा। इधर अध्यापक कक्षा के शरारती बच्चों को खूब मारते थे, इससे कक्षा का वातावरण कुछ सुधर गया। कक्षा का वसंत पाटील नाम का लड़का उम्र में छोटा था, परंतु पढ़ने में बहुत होशियार था। वह स्वभाव से शांत था और घर से पढ़कर आता था। इसलिए शिक्षक ने उसे कक्षा का मॉनीटर बना दिया। किशोर भी उसी के समान मन लगाकर पढ़ने लगा। धीरे-धीरे गणित उसकी समझ में आने लगा। अब वह भी वसंत पाटील के समान बच्चों के सवाल जांचने लगा। यही नहीं वसंत अब उसका दोस्त बन चुका था। अध्यापक खुश होकर उसे ‘आनंदा’ के नाम से पुकारते थे। अध्यापक के अपनेपन और वसंत की दोस्ती के कारण धीरे-धीरे उसका मन पढ़ाई में लगने लगा।

पाठशाला में न.वा.सौंदलगेकर नाम के मराठी के अध्यापक थे। उन्हें बहुत-सी मराठी और अंग्रेज़ी कविताएँ आती थीं। वे स्वर में कविताएँ गाते थे और छंदलय के साथ कविता का पाठ करते थे। कभी-कभी वे स्वयं भी अपनी कविता लिखते थे और कक्षा में सुनाते थे। धीरे-धीरे किशोर लेखक को उससे प्रेरणा मिलने लगी। जब भी वह खेत पर पानी लगाता या ढोर चराता, तब वह मास्टर के ही हाव-भाव, यति-गति और आरोह-अवरोह आदि के साथ कविता का गान करता था। यही नहीं, वह स्वयं भी कविताएँ लिखने लगा। अब उसे खेत का अकेलापन अच्छा लगता था। वह ऊँची आवाज़ में कविता का गान करता, अभिनय करता और कभी-कभी नांचने भी लगता। मास्टर जी को भी किशोर लेखक का कविता ज्ञान बहुत अच्छा लगा। उनके कहने पर ही किशोर लेखक ने छठी-सातवीं के बालकों के सामने कविता का गान किया। पाठशाला के एक समारोह में उसे कविता पाठ करने का अवसर मिला।

मास्टर सौंदलगेकर भी स्वयं कविता करते थे और उनके घर में भी कुछ कवियों के काव्य-संग्रह रखे हुए थे। वे अकसर लेखक को कवियों के संस्मरण भी सुनाते रहते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि किशोर लेखक को यह पता चल गया कि कवि भी हमारे समान एक मानव है। वह भी हमारे समान कविता कर सकता है। लेखक ने मास्टर जी के घर के दरवाजे पर लगी मालती की लता और उस पर लिखी कविता भी देखी थी।

उसे लगा कि वह भी अपने खेतों पर, गाँव पर, गाँव के लोगों पर कविताएँ लिख सकता है। इसलिए भैंस चराते समय वह पशुओं तथा जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। कभी-कभी वह अपनी लिखी हुई कविता मास्टर जी को दिखा देता था। इस काम के लिए वह अपने पास एक कागज़ और पैन रखने लगा। जब भी कागज़ और पैल न होती तो वह कंकर से पत्थर की शिला पर या छोटी लकड़ी से भैंस की पीठ पर कविता लिख देता था। कभी-कभी वह अपनी लिखी हुई कविता मास्टर जी को दिखाने के लिए उनके घर पहुँच जाता था। मास्टर जी भी उसे अच्छी कविता लिखने की प्रेरणा देने लगे और छंद, लय तथा अलंकारों का ज्ञान देने लगे। यही नहीं, वे किशोर युवक को पढ़ने के लिए पुस्तकें भी देने लगे। धीरे-धीरे मास्टर जी और किशोर लेखक में समीपता बढ़ती गई और उसकी मराठी भाषा में सुधार होने लगा। अब किशोर लेखक को शब्द के महत्त्व का पता लगा और वह अलंकार छंद, लय आदि को समझने लगा।

कठिन शब्दों के अर्थ

मन तड़पना = व्याकुल होना। हिम्मत = हौंसला। गड्ढे में धकेलना = पतन की ओर ले जाना। कोल्हू = एक ऐसी मशीन जिसके द्वारा गन्नों का रस निकाला जाता है। बहुतायत = अत्यधिक। मत = विचार। भाव नीचे उतरना = कीमत घटना। अपेक्षा तुलना। जन = मनुष्य। कडे = गोबर के उपले या गौसे। स्वर = वाणी। मन रखना = ध्यान देना। तड़पन = बेचैनी। जोत देना = लगा देना। छोरा = लड़का। निडर = निर्भीक। मालिक = स्वामी। बाड़ा = अहाता। जीमने = खाना खाने। राह देखना = प्रतीक्षा करना। जिरह = बहस । हजामत बनाना = डाँटना, फटकारना। श्रम = मेहनत। लागत = खर्च। लुगाई = स्त्री, पत्नी। काम में जोतना = खूब काम लेना। खुद = स्वयं । बर्ताव = व्यवहार। गलत-सलत = उल्टा-सीधा। ज़रा = तनिक। ना पास = फेल, अनुतीर्ण । वक्त = समय। ढोर = पशु। बालिस्टर = वकील। रोते-धोते = जैसे-तैसे। अपरिचित = अनजान। इंतज़ार = प्रतीक्षा। खिल्ली उड़ाना = मज़ाक उड़ाना। पोशाक = तन के कपड़े। मटमैली = गंदगी। गमछा = पतले कपड़े का तौलिया। काछ = धोती का लाँग।

चोंच मार-मार कर घायल करना = बार-बार पीड़ा पहुँचाना। निबाह = गुज़ारा। उमंग = उत्साह । मैलखाऊ = जिसमें मैल दिखाई न देता हो। दहशत = डर । ऊधम = कोलाहल मचाना। शाबाशी = प्रशंसा। ठोंक देना = पिटाई करना। पसीना छूटना = भयभीत होना। होशियार = चतुर। सवाल = प्रश्न। सही = ठीक। जाँच = परीक्षण। सम्मान = आदर। मुनासिब = उचित। व्यवस्थित = ठीक तरह से। एकाग्रता = ध्यानपूर्वक। मुलाकात = भेंट। दोस्ती जमना = मित्रता होना। कंठस्थ = जबानी याद होना। संस्मरण = पुरानी घटनाओं को याद करना। दम रोककर = तन्मय होकर। मान = आभास। यति-गति = कविता में रुकने तथा आगे बढ़ने के नियम। आरोह-अवरोह = स्वर का ऊँचा-नीचा होना। खटकना = महसूस होना। गपशप = इधर-उधर की बातें। समारोह = उत्सव। तुकबंदी = छंद में बंधी हुई कविता। महफिल = सभा। कविता का शास्त्र = कविता के नियम। ढर्रा = शैली। अपनापा = अपनापन, अपनत्व। सूक्ष्मता = बारीकी से।

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