Author name: Prasanna

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

HBSE 10th Class Sanskrit सुभाषितानि Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) केन समः बन्धुः नास्ति ?
(ख) वसन्तस्य गुणं कः जानाति।
(ग) बुद्धयः कीदृश्यः भवन्ति ?
(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः कः ?
(ङ) सुधियः सख्यं केन सह भवति ?
(च) अस्माभिः कीदृशः वृक्षः सेवितव्यः ?
उत्तराणि:
(क) उद्यमेन समः बन्धुः नास्ति।
(ख) वसन्तस्य गुणं पिक: जानाति।
(ग) बुद्धयः परेङ्गितज्ञानफलाः।
(घ) नराणां प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः अस्ति।
(ङ) सुधियः सख्यं सुधीभिः सह भवति।
(च) अस्माभिः फलच्छाया-समन्वित: महावृक्षः वृक्ष: सेवितव्यः ।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

प्रश्न 2.
अधोलिखिते अन्वयद्वये रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत
(क) य………. उद्दिश्य प्रकुप्यति तस्य . … सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मन: अकारणद्वेषि अस्ति, तं कथं ………. परितोषयिष्यति ?
(ख) ………… खलु संसारे ………… निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् ………… वीरः, खरः ………. (वीरः) (भवति)
उत्तराणि-(अन्वयः)
(क) यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति तस्य अपगमे सः ध्रुवं प्रसीदति। यस्य मनः अकारणद्वेषि अस्ति, तं कथं जनः परितोषयिष्यति ?
(ख) विचित्रे खलु संसारे किञ्चित् निरर्थकम् नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, खरः भारस्य (वीरः) (भवति)

प्रश्न 3.
अधोलिखितानां पदानां विलोमपदानि पाठात् चित्वा लिखत.
(क) प्रसीदति ………………………
(ख) मूर्खः ………………………
(ग) बली ………………………
(घ) सुलभः ………………………
(ङ) संपत्ती ………………………
(च) अस्ते ………………………
(छ) सार्थकम् ………………………
उत्तरताणि
पदम् विलोमपदम्
(क) प्रसीदति अवसीदति
(ख) मूर्खः पण्डितः
(ग) बली निर्बलः
(घ) सुलभः दुर्लभः
(ङ) संपत्ती विपत्ती
(च) अस्ते उदये
(छ) सार्थकम् निरर्थकम्।

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प्रश्न 4.
अधोलिखितानां वाक्यानां कृते समानार्थकान् श्लोकांशान् पाठात् चित्वा लिखत
(क) विद्वान् स एव भवति यः अनुक्तम् अपि तथ्यं जानाति।
(ख) मनुष्यः समस्वभावैः जनैः सह मित्रतां करोति।
(ग) परिश्रमं कुर्वाण: नरः कदापि दुःखं न प्राप्नोति।
(घ) महान्तः जनः सर्वदैव समप्रकृतयः भवन्ति।
उत्तराणि
(क) अनुक्तमप्यूहति पण्डितोजनः।
(ख) समान-शील-व्यसनेषु सख्यम्।
(ग) नास्त्युद्यमसो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ।
(घ) सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।

प्रश्न 5.
यथानिर्देशं परिवर्तनं विधाय वाक्यानि रचयत
(क) गुणी गुणं जानाति। (बहुवचने)
(ख) पशुः उदीरितं अर्थं गहणाति। (कर्मवाच्ये)
(ग) मृगाः मृगैः सह अनुव्रजन्ति। (एकवचने)
(घ) कः छायां निवारयति। (कर्मवाच्ये)
उत्तराणि
(क) गुणिनः गुणान् जानन्ति।
(ख) पशुना उदीरितः अर्थः गृह्यते।
(ग) मृगः मृगेण सह अनुव्रजति।
(घ) केन छाया निवार्यते।

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प्रश्न 6.
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं कुरुत
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि img-1
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि img-2

प्रश्न 7.
संस्कृतेन वाक्यप्रयोगं कुरुत
(क) वायसः
(ख) निमित्तम्
(ग) सूर्यः
(घ) पिकः
(ङ) वह्निः
उत्तराणि: (वाक्यनिर्माणम्)
(क) वायसः काँ काँ इति शब्दं करोति।
(ख) निमित्तं विचार्य एव कार्यं करणीयम्।
(ग) सूर्यः संसारस्य प्रकाशकः अस्ति।
(घ) पिकः मधुरस्वरेण कूजति।
(ङ) क्रोधः वह्निः इव दाहकः भवति।

परियोजनाकार्यम्
(क) उद्यमस्य महत्त्वं वर्णयतः पञ्चश्लोकान् लिखत।
उत्तरम्-(उद्यमस्य महत्त्वम्)
1. उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।

2. उत्साहसम्पन्नमदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्।
शूरं कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मी: स्वयं याति निवासहेतोः॥

3. न दैवमपि सञ्चिन्त्य त्यजेदुद्योगमात्मनः ।
अनुद्योगेन कस्तैलं तिलेभ्यः प्राप्तुमर्हति ॥

4. गच्छन् पिपीलिको याति योजनानां शतान्यपि।
अगच्छन् वैनतेयोऽपि पदमेकं न गच्छति ।।

5. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मी:,
दैवेन देयमिति कापुरुषाः वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या,
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥

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अथवा
कापि कथा या भवद्भिः पठिता स्यात् यस्यां उद्यमस्य महत्त्वं वर्णितम् तां स्वभाषया लिखत।
उत्तरम्-एक किसान के पास बहुत संपत्ति थी। इसीलिए वह आलसी बनकर घर में ही पड़ा रहता था। खेत खलिहान नौकर-चाकरों के भरोसे पर थे। रिश्तेदार भी मौका पाकर हाथ साफ करते रहते थे। उसके एक मित्र को यह सब अच्छा न लगा। उसने किसी महात्मा को किसान के बारे में बताया और उसे सही रास्ते पर लाने का निवेदन किया। महात्मा जी के कहने पर वह अपने किसान मित्र को आश्रम में ले आया। महात्मा जी ने किसान को बताया कि बहुत सवेरे तुम्हारे खेतों के बीच एक हंस आता है परन्तु दिखने से पहले ही वह गायब हो जाता है। यदि तुम उस हंस का दर्शन कर लो, तो तुम्हारी धन सम्पत्ति लगातार बढ़ती जाएगी। किसान ने महात्मा जी का सुझाव स्वीकार कर लिया और बहुत सवेरे उठकर अपने खेतों की ओर निकल पड़ा। वहाँ उसे हंस तो दिखाई नहीं पड़ा लेकिन उसने देखा कि उसका ही एक रिश्तेदार उसके खलिहान से अनाज चुरा रहा है। किसान ने उसे रंगे हाथों पकड़ लिया और वह बहुत लज्जित हुआ। लौटते हुए वह गौशाला में पहुँचा तो वहाँ पर नौकर दूध चोरी कर रहे थे। इस प्रकार वह रोज़ सवेरे उठता, उसे हंस के दर्शन तो नहीं होते परन्तु मुफ्तखोरों और चोरों से उसकी भेंट हो जाती। अब रोज़ सुबह उठने और घूमने से किसान का स्वास्थ्य भी अच्छा हो गया था। महीने से भी अधिक बीत जाने पर किसान महात्मा जी के पास पहँचा और शिकायत करने लगा कि महाराज हंस के दर्शन तो अब तक भी नहीं हुए, परन्तु मेरी सम्पत्ति अवश्य बढ़ रही है। मेरा स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा हो गया है। महात्मा जी ने मुस्कराकर कहा-हंस तो तुम्हें मिल गया परन्तु तुम पहचान

नहीं पाए हो, जो तुम्हारी धन सम्पत्ति बढ़ रही है या तुम्हारा स्वास्थ्य उत्तम हो रहा है-यह सब उस हंस के कारण ही है। वह हंस है-‘परिश्रम’। तुम्हें जो भी लाभ हो रहा है, वह सब तुम्हारे परिश्रम का ही परिणाम है, जो सुबह उठते ही तुम शुरू कर देते हो। महात्मा का उपदेश सुनककर किसान ने पहले से भी अधिक परिश्रम करना आरम्भ कर दिया।

(ख) निमत्तिमुद्दिश्य यः प्रकुप्यति ध्रुवं स तस्यापगमे प्रसीदति। यदि भवता कदापि ईदृशः अनुभवः कृतः तर्हि स्वभाषया लिखत।

उत्तरम्-छात्र अपना अनुभव स्वयं लिखें। एक अनुभव अधोलिखित हो सकता है-दूसरे दिन ही मेरा साइंस का प्रैक्टिकल था। मुझे मेरी प्रैक्टीकल की नोट बुक नहीं मिल रही थी। घर में पूछने पर पता लगा कि मेरी छोटी बहन के हाथ में वह नोट बुक देखी गई थी। मुझे लगा कि कहीं उसने वह नोटबुक इधर-उधर न फैंक दी हो और मैं क्रोध में आग बबूला हो गया। छोटी बहन को पता चलते ही वह तुरन्त नोट बुक ले आई और कहने लगी भैया इसका कवर फट गया था, मेरे पास एक कवर बचा हुआ था। वह कवर मैंने आपकी नोट बुक पर चढ़ा दिया है, आप इसे ले लीजिए। नोट-बुक देखकर मेरी जान में जान आ गई। नये कवर में अपनी नोट बुक पाकर मैं मन ही मन प्रसन्न हुआ और इसके लिए मैंने अपनी बहन का धन्यवाद भी किया। इसीलिए यह ठीक ही कहा गया है कि किसी प्रयोजनवश यदि क्रोध पैदा होता है तो वह प्रयोजन पूरा होते ही वह क्रोध गायब ही नहीं होता मन में प्रसन्नता भी होती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

योग्यताविस्तारः

1. तत्पुरुषसमास
शरीरस्थः – शरीरे स्थितः
गृहस्थः – गृहे स्थितः
मनस्स्थ – मनसि स्थितः
तटस्थः – तटे स्थितः
कूपस्थः – कूपे स्थितः
वृक्षस्थः – वृक्षे स्थितः
विमानस्थः – विमाने स्थितः

2. अव्ययीभाव समास
निर्गुणम् – गुणानाम् अभावः
निर्मक्षिकम् – मक्षिकाणाम् अभावः
निर्जलम – जलस्य अभावः
निराहारम् – आहारस्य अभावः

3. पर्यायवाचिपदानि
शत्रुः – रिपुः, अरिः, वैरिः
मित्रम् – सखा, बन्धुः, सुहृद्
वह्निः – अग्निः, दाहकः, पावकः
सुधियः – विद्वांसः, विज्ञाः, अभिज्ञाः
अश्वः – तुरगः, हयः, घोटक:
गजः – करी, हस्ती, दन्ती, नागः।
वृक्षः – द्रुमः तरुः, महीरुहः।
सविता – सूर्यः, मित्रः, दिवाकरः, भास्करः ।

मन्त्रः ‘मननात् त्रायते इति मन्त्रः।
अर्थात् वे शब्द जो सोच-विचार कर बोले जाएँ। सलाह लेना, मन्त्रणा करना। मन्त्र + अच् (किसी भी देवता को सम्बोधित) वैदिक सूक्त या प्रार्थनापरक वैदिक मन्त्र। वेद का पाठ तीन प्रकार का है-यदि छन्दोबद्ध और उच्च स्वर से बोला जाने वाला है तो ‘ऋक्’ है, यदि गद्यमय और मन्दस्वर में बोला जाने वाला है तो ‘यजुस्’ है, और यदि छन्दोबद्धता के साथ गेयता है तो ‘सामन्’ है, (प्रार्थनापरक) यजुस् जो किसी देवता को उद्दिष्ट करके बोला गया हो–’ओं नमः शिवायः’ आदि। पंचतंत्र में भी मंत्रणा, परामर्श, उपदेश तथा गुप्त मंत्रणा के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग हुआ है।

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HBSE 10th Class Sanskrit सुभाषितानि Important Questions and Answers

सुभाषितानि ठित-अवबोधनम्

1. आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ॥1॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) शरीरस्थः रिपुः कः अस्ति ?
(ii) महान् कः कथित: ?
(iii) आलस्यं केषां रिपुः अस्ति ?
(iv) अत्र बन्धुः कः कथितः ?
उत्तराणि:
(i) आलस्यम्।
(ii) रिपुः ।
(iii) मनुष्याणाम्।
(iv) उद्यमः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) आलस्यं कीदृशः रिपुः अस्ति ?
(ii) केन समः बन्धुः नास्ति ?
(iii) किं कृत्वा मनुष्य: नावसीदति ?
उत्तराणि
(i) आलस्यं मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः अस्ति।
(ii) उद्यमेन समः बन्धुः नास्ति।
(iii) उद्यमं कृत्वा मनुष्यः नावसीदति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘शरीरस्थः’ इति पदस्य विशेष्यपदं किम् ?
(ii) ‘नास्त्युद्यमसमः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत ?
(iii) ‘कृत्वा’- अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘रिपुः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(v) ‘दुःखम् अनुभवति’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) रिपुः ।
(ii) न + अस्ति + उद्यमसमः ।
(iii) क्त्वा।
(iv) बन्धुः।
(v) अवसीदति।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- मनुष्याणां शरीरस्थ: महान् शत्रुः आलस्यम्। उद्यमसमः बन्धुः न अस्ति यं कृत्वा (मनुष्यः) न अवसीदति।
शब्दार्था:-रिपुः = (शत्रुः) दुश्मन। उद्यमसमः = (परिश्रमसदृशः) परिश्रम के समान । बन्धुः = (मित्रम्) मित्र। शरीरस्थः = (शरीरे स्थितः) शरीर में स्थित। अवसीदति = (दुःखम् अनुभवति) दुःखी होता है।
सन्दर्भः-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सुभाषितानि’ नामक पाठ से लिया गया है।
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि मनुष्य को कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए। क्योंकि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
सरलार्थः-आलस्य मनुष्यों के शरीर में स्थित महान् शत्रु है। परिश्रम के समान बन्धु नहीं है, जिसको करके मनुष्य दुःखी नहीं होता है।
भावार्थ:-आलस्य से बढ़कर मनुष्य का कोई शत्रु नहीं होता क्योंकि आलस्य के कारण ही मनुष्य अपनी शारीरिक व मानसिक शक्तियों का समुचित उपयोग नहीं कर पाता। इसी प्रकार सभी कार्यों को सिद्ध करने वाले परिश्रम के समान मनुष्य का कोई मित्र नहीं होता। क्योंकि परिश्रम मनुष्य को सदैव सुख और सफलता के शिखर पर ले जाता है और आलस्य मनुष्य के जीवन को नरक बना देता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

2. गुणी गुणं वेत्ति न वेति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः,
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः ॥2॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) गुणी कं वेत्ति ?
(ii) निर्बलः किं न वेत्ति ?
(ii) वसन्तस्य गुणं कः न वेत्ति ?
(iv) करी कस्य बलं वेत्ति ?
उत्तराणि:
(i) गुणम्।
(ii) बलम्।
(iii) वायसः ।
(iv) सिंहस्य।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) निर्गुणः कं न वेत्ति ?
(ii) बलं कः वेत्ति कः च न वेत्ति ?
(iii) सिंहस्य बलं कः वेत्ति कः च न वेत्ति ?
उत्तराणि
(i) निर्गुणः गुणं न वेत्ति।
(ii) बलं बली वेत्तिं निर्बलः च न वेत्ति।
(iii) सिंहस्य बलं करी वेत्ति, मूषकः च न वेत्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘गुणी’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘जानाति’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम्?
(iii) ‘बली बलं वेत्ति’ अत्र कर्मपदं किम् ?
(iv) ‘काकः’ इत्यस्य अत्र प्रयुक्तः पर्यायः कः?
(v) अस्मिन् श्लोके णिनि-प्रत्ययान्ताः शब्दाः के के सन्ति ?
उत्तराणि:
(i) निर्गुणः ।
(ii) वेत्ति।
(iii) बलम्।
(iv) वायसः ।
(v) गुणी, करी, बली। .

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-गुणी गुणं वेत्ति, निर्गुणः न वेत्ति। बली बलं वेत्ति, निर्बलः न वेत्ति। पिक: वसन्तस्य गुणं (वेत्ति), वायसः न। करी सिंहस्य बलं (वेत्ति), मूषक: न। शब्दार्थाः-वेत्ति = जानता है। निर्गुणः = गुणहीन। बली = बलवान [बल + णिनि] । पिकः = कोयल। वायसः = कौआ। करी = हाथी [कर + णिनि] । मूषकः = चूहा।
सन्दर्भः- पूर्ववत्। प्रसंग:-इस पद्य में बताया गया है कि गुणों की पहचान गुणी तथा बल की पहचान बलवान् ही कर सकते हैं।
सरलार्थः-गुणवान् मनुष्य ही गुण के विषय में जानता है, गुणहीन नहीं जानता। बलवान् ही बल के विषय में जानता है, बलहीन नहीं जानता। कोयल ही वसन्त के गुण को जानती है, कौआ नहीं। हाथी ही सिंह के बल को जानता है, चूहा नहीं।
भावार्थ:-गुणों की पहचान के लिए स्वयं गुणवान् होना आवश्यक है क्योंकि गुणहीन व्यक्ति गुणों की पहचान नहीं कर सकता। जैसे वसन्त ऋतु की मस्ती क्या होती है, इसे कोयल ही पहचानती है और वसन्त आने पर स्वयं भी कुहुकुहु के स्वर से सारे वातावरण को आनन्दमय बना देती है। दूसरी ओर कौआ वसन्त में भी वैसी ही कां-कां करके लोगों को बेचैन बना करता है जैसा कि वह अन्य ऋतुओं में करता है। इसी प्रकार किसी के बल की परीक्षा भी कोई बलवान् ही कर सकता है, निर्बल नहीं कर सकता। क्योंकि निर्बल को यह पता ही नहीं होता कि बल क्या होता है ? चूहा स्वयं निर्बल एवं डरपोक है, उसे सिंह के बल का क्या पता। सिंह से तो बलवान् हाथी ही टक्कर ले सकता है।

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3. निमित्तमुद्दिश्य हि यः प्रकुप्यति,
धुवं स तस्यापगमे प्रसीदति।
अकारणद्वेषि मनस्तु यस्य वै,
कथं जनस्तं परितोषयिष्यति ॥3॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) मनुष्यः किम् उद्दिश्य प्रकुप्यति ?
(ii) मनुष्यः निमित्तस्य अपगमे किं करोति ?
(iii) अत्र मनः कीदृशं कथितम् ?
(iv) मनुष्यः कस्मिन् अपगते प्रसीदति
उत्तराणि:
(i) निमित्तम्।
(ii) प्रसीदति ।
(iii) अकारणद्वेषि।
(iv) कोपनिमित्ते।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) जनः कदा प्रसीदति ?
(ii) यस्य मनः अकारणद्वेषि स जनः किं न अनुभवति ?
उत्तराणिं
(i) जनः कोपस्य निमित्ते अपगते प्रसीदति।
(ii) यस्य मनः अकारणद्वेषि सः जनः परितोषं न अनुभवति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘प्रकुप्यति’ इति पदस्य विलोमपदं किमस्ति ?
(ii) ‘प्रसीदति’ इति क्रियापदस्य विशेषणं किम् अत्र प्रयुक्तम् ?
(iii) ‘उद्दिश्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iv) अत्र ‘मनः’ इति पदस्य विशेषणं किमस्ति ?
(v) ‘समाप्ते’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) प्रसीदति।
(ii) धुवम्।
(iii) उद् √दिश् + ल्यप् ।
(iv) अकारणद्वेषि।
(v) अपगमे।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-हि यः निमित्तम् उद्दिश्य प्रकुप्यति सः तस्य अपगमे ध्रुवं प्रसीदति यस्य मनः अकारणद्वेषि वै (अस्ति) तं जनः कथं परितोषयिष्यति।
शब्दार्थाः-निमित्तम् = (कारणम्) कारण। प्रकुप्यति = (अतिकोपं करोति) अत्यधिक क्रोध करता है। ध्रुवम् = (निश्चितम्) निश्चित रूप से। अपगमे = (समाप्ते) समाप्त होने पर। प्रसीदति = (प्रसन्नः भवति) प्रसन्न होता है। अकारणद्वेषिमनः = (अकारणं द्वेषं करोति इति अकारणद्वेषि तद्वद्मनः यस्य सः) अकारण ही द्वेष करनेवाला मन है जिसका। परितोषयिष्यति = (परितोषं दास्यति) सन्तुष्ट करेगा।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्।
प्रसंग:-प्रस्तुत सुभाषित में बताया गया है कि अकारण द्वेष करने वाले मनुष्य को कभी संतुष्ट नहीं किया जा सकता।
सरलार्थ:-जो मनुष्य किसी कारण को उद्देश्य करके अत्यधिक क्रोध करता है, वह उसके समाप्त हो जाने पर निश्चित रूप से प्रसन्न होता है। जिसका मन बिना कारण के द्वेष करनेवाला होता है, उसको व्यक्ति कैसे सन्तुष्ट करेगा।
भावार्थ:-क्रोध दो प्रकार का हो सकता है सकारण क्रोध और अकारण क्रोध। जब किसी कार्य में बाधा को देखकर मनुष्य के मन में क्रोध पैदा होता है तो उस बाधा के दूर होते ही वह क्रोध भी दूर हो जाता है और कार्य सफल हो जाने के कारण मनुष्य प्रसन्न हो उठता है। परन्तु अकारण क्रोध बड़ा भयंकर होता है। ऐसे मनोरोगी मनुष्य को किसी भी तरह से प्रसन्न नहीं किया जा सकता।

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4. उदीरितोऽर्थः पशनापि गृह्यते,
हयाश्च नागाश्च वहन्ति बोधिताः।
अनुक्तमप्यूहति पण्डितो जनः,
परेङ्गितज्ञानफला हि बुद्धयः ॥4॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) पशुना कीदृशः अर्थः गृह्यते ?
(ii) कीदृशाः नागाः वहन्ति ?
(iii) बोधिताः हयाः किं कुर्वन्ति ?
(iv) अनुक्तमपि कः अस्ति ?
(v) बुद्धयः कीदृश्यः कथिताः?
उत्तराणि:
(i) उदीरितः ।
(ii) बोधिताः ।
(iii) वहन्ति ।
(iv) पण्डितः ।
(v) परेगितज्ञानफलाः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) पशुना कः गृह्यते ?
(ii) बोधिताः के के वहन्ति ?
(iii) पण्डितो जनः किम् ऊहति ?
उत्तराणि
(i) पशुना उदीरितोऽर्थः गृह्यते।
(ii) बोधिताः हयाः नागाः च वहन्ति।
(iii) पण्डितो जनः अनुक्तमपि ऊहति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत.
(i) ‘उदीरितः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘पण्डितो जनः’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(iii) ‘उक्तम्’ इति पदस्य अत्र विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘स्पष्टरूपेण कथितः’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(v) ‘अनुक्तमप्यूहति’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) क्त।
(ii) पण्डितः ।
(iii) अनुक्तम्।
(iv) उदीरितः।
(v) अनुक्तम् + अपि + ऊहति।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- पशुना अपि उदीरितः अर्थः गृह्यते, हयाः नागाः च बोधिताः (भारं) वहन्ति, पण्डितः जनः अनुक्तम् अपि ऊहति, पण्डितानां बुद्धयः परेङ्गितज्ञानफलाः भवन्ति।
शब्दार्था:-उदीरितः = (उक्तः, कथितः) कहा हुआ। गृह्यते = (प्राप्यते) प्राप्त किया जाता है। हयाः = (अश्वाः) घोड़े। नागाः = (हस्तिनः) हाथी। ऊहति = (निर्धारयति) अनुमान लगाता है। इगितज्ञानफलाः = (इङ्गितं ज्ञानम्, इङ्गितज्ञानमेव फलं यस्याः सा, ताः) सङ्केतजन्य ज्ञानरूपी फलवाले। पण्डितः = (विद्वान, बुद्धिमान्) बुद्धिमान्।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्।
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि बुद्धिमान् मनुष्य की बुद्धियाँ दूसरों के संकेत से ही ज्ञान प्राप्त कर लेती हैं। उन्हें स्पष्ट रूप से कहने या दण्डित करने की आवश्यकता नहीं है।
सरलार्थः- पशुओं के द्वारा भी कहा हुआ अर्थ ग्रहण किया जाता है; हाथी और घोड़े बताए हुए निर्धारित (भार) को ढोते हैं, विद्वान् व्यक्ति बिना कहे भी अनुमान लगाता है, क्योंकि विद्वान् मनुष्यों की बुद्धियाँ दूसरों के संकेतों से ही ज्ञान प्राप्त करने वाली होती हैं।
भावार्थ:-संसार में तीन प्रकार के मनुष्य होते हैं। एक वे जिन्हें स्पष्ट रूप से कोई बात कही जाए तो समझ आती है; ऐसे मनुष्य पशु तुल्य होते हैं। दूसरे प्रकार के वे प्राणी हैं जो प्रताड़ित करने पर समझते हैं; जैसे घोड़ा या हाथी। तीसरे प्रकार के मनुष्य बुद्धिमान् कहे जाते हैं जो बिना कहे ही संकेत मात्र से दूसरे के मन की बात को पढ़ लेते हैं। क्योंकि बुद्धिमान् मनुष्य की यही पहचान है कि उनकी बुद्धियाँ संकेत मात्र से सम्बन्धित विषय का ज्ञान कर लेती हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

5. क्रोधो हि शत्रुः प्रथमो नराणां,
देहस्थितो देहविनाशनाय।
यथा स्थितः काष्ठगतो हि वह्निः,
स एव वह्निर्दहते शरीरम् ॥ 5 ॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) नराणां प्रथमः शत्रुः कः ?
(ii) देहस्थितः कः कथितः ?
(iii) क्रोधः किमर्थं भवति ?
(iv) वह्निः कुत्र स्थितः ?
उत्तराणि:
(i) क्रोधः ।
(ii) क्रोधः।
(iii) देहविनाशाय।
(iv) काष्ठगतः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) क्रोधः नराणां कीदृशः शत्रुः ?
(ii) शरीरं कः दहते ?
(iii) काष्ठं कः दहते ?
उत्तराणि
(i) क्रोधः नराणां देहस्थितः प्रथमः शत्रुः ।
(ii) शरीरं देहस्थितः क्रोधः दहते।
(iii) काष्ठं काष्ठगतः स्थितः वह्निः दहते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘अग्निः ‘ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(ii) ‘स्थितः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘मित्रम्’ इत्यस्य अत्र प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘देहस्थितः’ इति विशेषणस्य प्रयुक्तं विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) वह्निः ।
(ii) क्त।
(iii) शत्रुः।
(iv) क्रोधः।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-हि नराणां देहविनाशनाय प्रथमः शत्रुः देहस्थितः क्रोधः । यथा हि काष्ठगतः स्थितः वह्निः काष्ठम् एव दहते (तथैव शरीरस्थः क्रोधः) शरीरं दहते।
शब्दार्थाः-काष्ठम् = (इन्धनम्) लकड़ी। वह्निः = (अग्निः) आग। दहते = (ज्वालयति) जलाता है। सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि क्रोध क्रोधी के ही शरीर को जला देता है।
सरलार्थ:-मनुष्यों के शरीर-नाश के लिए प्रथम शत्रु शरीर में स्थित क्रोध ही है। जिस प्रकार लकड़ी में स्थित अग्नि लकड़ी को ही जला देती है, उसी प्रकार शरीर में स्थित क्रोध शरीर को जला डालता है।
भावार्थ:-क्रोध मनुष्य के शरीर में रहने वाला ऐसा घातक शत्रु है कि यह जिस शरीर में रहता है उसी शरीर को जला डालता है। जैसे आग लकड़ी में छिपी रहती है और वही आग उस लकड़ी को जला डालती है अतः मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक क्रोध से बचना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

6. मृगा मृगैः सङ्गमनुव्रजन्ति,
गावश्च गोभिः तुरगास्तुरङ्गैः।
मूर्खाश्च मूखैः सुधियः सुधीभिः,
समान-शील-व्यसनेषु सख्यम् ॥6॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत-
(i) मृगाः कैः सङ्गम् अनुव्रजन्ति ?
(ii) गोभिः सङ्ग काः अनुव्रजन्ति ?
(iii) मूर्खाः कैः सह सङ्गतिं कुर्वन्ति ?
(iv) सुधियः सख्यं केन सह भवति ?
उत्तराणि:
(i) मृगैः।
(ii) गावः ।
(iii) मूखैः ।
(iv) सुधीभिः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) के कैः सङ्गम् अनुव्रजन्ति ?
(i) संख्यं केषु भवति ?
उत्तराणि:
(i) मृगाः मृगैः, गावः गोभिः, तुरगाः, तुरङ्गः, मूर्खाः मूखैः, सुधियः सुधीभिः सङ्गम् अनुव्रजन्ति।
(ii) सख्यं समान-शील-व्यसनेषु भवति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘अनुसरणं कुर्वन्ति’ इत्यर्थे प्रयुक्तं क्रियापदं किम् ?
(ii) ‘सुधियः’ इत्यस्य अत्र प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘मैत्री’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(iv) ‘तुरगास्तुरङ्गः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) अनुव्रजन्ति ।
(ii) मूर्खाः ।
(iii) सख्यम्।
(iv) तुरगाः + तुरङ्गः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-मृगाः मृगैः सह, गावश्च गोभिः सह, तुरगाः तुरङ्गैः सह, मूर्खा: मूखैः सह, सुधियः सुधीभिः सह अनुव्रजन्ति। सख्यम् समानशीलव्यसनेषु (भवति)।
शब्दार्था:-अनुव्रजन्ति = (पश्चात् गच्छन्ति) अनुसरण करते हैं, पीछे-पीछे जाते हैं। तुरगाः = (अश्वाः) घोड़े। सुधियः = (विद्वासः) विद्वान्, मनीषी। व्यसनेषु = (स्वभाव) आदत, स्वभाव में। सख्यम् = (मैत्री) मित्रता।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि मित्रता समान स्वभाव वाले मनुष्यों में ही सफल होती है।
सरलार्थ:-हिरण-हिरणों के साथ, गउएँ-गउओं के साथ और घोड़े-घोड़ों के साथ उनके पीछे-पीछे घूमते हैं। मूर्ख-मूर्तों के साथ और बुद्धिमान्-बुद्धिमानों के साथ रहकर उनका अनुसरण करते हैं; क्योंकि एकसमान आचरण और स्वभाववालों में ही मित्रता होती है।
भावार्थ:-संसार में जिन मनुष्यों का आचार-विचार और व्यवहार परस्पर एक समान होता है, उनका एक मित्र संघ बन जाता है यह आपसी मित्रता उनकी शक्ति का मुख्य कारण बनती है। मूर्ख-मूखों की संगति करते हैं और बुद्धिमानबुद्धिमानों की। कवि का तात्पर्य है कि हमें अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए बुद्धिमानों की ही संगति करनी चाहिए, मूों की नहीं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

7. सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः।
यदि दैवात् फलं नास्ति छाया केन निवार्यते॥7॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) सेवितव्यः कः ?
(ii) केन समन्वितः वृक्षः ?
(iii) दैवात् किं नास्ति ?
(iv) का न निवार्यते ?
उत्तराणि:
(i) महावृक्षः।
(ii) फल-छायाभिः ।
(iii) फलम्।
(iv) छाया।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशः महावृक्षः सेवितव्यः?
(ii) महावृक्षः एव कथं सेवितव्यः ?
उत्तराणि:
(i) फल-छाया-समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः।’
(ii) यदि महावृक्षे दैवात् फलं नास्ति तर्हि छाया केनापि न निवार्यते; अतएव महावृक्षः सेवितव्यः ।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत-
(i) ‘सेवितव्यः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘दैवात्’ इति पदे का विभक्तिः ? ।
(iii) ‘फलछायासमन्वितः’ इत्यस्य विशेष्यपदं किम् ?
(iv) ‘निवारणं क्रियते’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं क्रियापदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) तव्यत्।
(ii) पञ्चमी विभक्तिः।
(iii) महावृक्षः ।
(iv) निवार्यते।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-फलच्छाया-समन्वितः महावृक्षः सेवितव्यः । दैवात् यदि फलं नास्ति छाया केन निवार्यते।।
शब्दार्थाः-सेवितव्यः = (आश्रयितव्यः) आश्रय लेना चाहिए। दैवात् = (भाग्यात्) भाग्य से; निवार्यते = (निवारणं क्रियते) रोका जाता है।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि बड़े वृक्षों की भाँति बड़े लोगों की ही शरण में जाना चाहिए।
सरलार्थः-फल और छाया से युक्त किसी महावृक्ष का आश्रय ही लेना चाहिए। दुर्भाग्य से यदि उस वृक्ष पर फल नहीं है वृक्ष की छाया किसके द्वारा रोकी जाती है अर्थात् छाया तो अवश्य ही मिल जाती है।
भावार्थ:-मनुष्य को महान् लोगों का ही अनुसरण करना चाहिए। उन्हीं की संगति और उन्हीं का आश्रय कल्याणकारी होता है। महान् लोग किसी बड़े फलदार और छायादार वृक्ष की भाँति होते हैं। जैसे कभी वह वृक्ष यदि फल भी नहीं देता तो कम से कम उसकी छाया तो मिल ही जाती है। वैसे ही बड़े लोगों से यदि कोई सांसारिक वस्तु नहीं भी मिलती तो उनके साथ रहने के कारण मिलने वाला सम्मान तो मिल ही जाता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

8. अमन्त्रमक्षरं नास्ति, नास्ति मूलमनौषधम्।
अयोग्यः पुरुषः नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः॥8॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) अमन्त्रं किं नास्ति ?
(ii) अनौषधं किं नास्ति ?
(iii) कीदृशः पुरुषः नास्ति ?
(iv) दुर्लभः कः ?
उत्तराणि:
(i) अक्षरम्।
(ii) मूलम्।
(iii) अयोग्यः ।
(iv) योजकः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशं मूलं नास्ति ?
(ii) कं योजकः दुर्लभः ?
उत्तराणि
(i) अनौषधं मूलं नास्ति।
(ii) अमन्त्रम् अक्षरम्, अनौषधं मूलम् अयोग्यं च पुरुषं योजकः दुर्लभः ।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘योग्यः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘न औषधम्’-अत्र समासं कुरुत।
(iii) ‘सुलभः’ इत्यस्य विपरीतार्थकपदं किम् ?
(iv) ‘नास्ति मूलमनौषधम्’ अत्र क्रियापदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) अयोग्यः ।
(ii) अनौषधम् (अव्ययीभावः)।
(iii) दुर्लभः ।
(iv) अस्ति।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-अमन्त्रम् अक्षरं नास्ति, अनौषधम् मूलं नास्ति, अयोग्यः पुरुषः नास्ति, तत्र योजकः दुर्लभः ।
शब्दार्थाः-अमन्त्रम् = (न मन्त्रम्, अमन्त्रम् इति) मन्त्रहीन। मन्त्रम् = (मननयोग्यम्) मनन योग्य/सार्थक/सारवान्। मूलम् = (अध:भागम्) जड़। औषधम् = (ओषधि + अण्-वनस्पतिनिर्मितम्) दवा, जड़ी-बूटी। योजकः = (युज् + ण्वुल्) जोड़ने वाला, रचना करने वाला।
सन्दर्भः- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि संसार में कोई भी वस्तु अनुपयोगी, गुणहीन या निरर्थक नहीं है।
सरलार्थ:-कोई ऐसा अक्षर अथवा अक्षरसमूह वाला शब्द नहीं है, जिसमें विचार करने योग्य कुछ भी न हो। किसी वृक्ष या वनस्पति की कोई ऐसी मूल (जड़) नहीं है, जिसमें औषधीय गुण न हों। संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य नहीं है, जिसमें कोई भी योग्यता न हो। सर्वथा निरर्थक रचना करने वाला भी दुर्लभ है। .
भावार्थ:-वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर का अपना स्वतन्त्र अर्थ होता है, उन अक्षरों से बने शब्दों का भी अर्थ होता है। अतः सभी अक्षर और उनसे निर्मित शब्द मन्त्र अर्थात् मनन करने योग्य होते हैं। संसार में जो भी वृक्ष या वनस्पतियाँ हैं, सभी औषधीय गुणों से युक्त हैं, सब में रोगनिवारण की क्षमता है, कोई भी निरर्थक नहीं है। इसी प्रकार किसी भी मनुष्य को अयोग्य नहीं समझना चाहिए, कोई न कोई योग्यता प्रत्येक मनुष्य में होती है। क्योंकि संसार में ऐसे रचनाकार को ढूँढ पाना कठिन है, जो हर प्रकार से अनुपयोगी वस्तु की रचना कर सके। जब मनुष्य की रचना ही निरर्थक नहीं हो सकती तो ईश्वर की सृष्टि को निरर्थक कैसे कहा जा सकता है ? केवल ऐसी सकारात्मक सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है, जो उनमें छिपे गुणों को पहचान सके।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

9. संपत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ॥१॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) केषाम् एकरूपता भवति ?
(ii) उदये सविता कीदृशः भवति ?
(iii) अस्तसमये कः रक्तः भवति ?
(iv) सम्पत्तौ विपत्ती च महतां कीदृशी अवस्था भवति ?
उत्तराणि:
(i) महताम्।
(ii) रक्तः ।
(iii) सविता।
(iv) एकरूपता।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) महताम् एकरूपता कदा भवति ?
(ii) सविता कदा-कदा रक्तः भवति ?
उत्तराणि:
(i) महताम् एकरूपता सम्पत्तौ विपत्तौ च भवति।
(ii) सविता उदये अस्तमये च रक्तः भवति ?

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘विपत्तौ’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘रक्तश्चास्तमये’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iii) ‘रक्तः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘सम्पत्ती’ अत्र का विभक्तिः ?
उत्तराणि:
(i) सम्पत्तौ।
(ii) रक्तः + च + अस्तमये।
(iii) क्त।
(iv) सप्तमी विभक्तिः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-संपत्तौ विपत्तौ च महताम् एकरूपता भवति। यथा-सविता उदये रक्तः भवति, तथा अस्तमये च रक्तः भवति।
शब्दार्थाः-सविता = (सूर्यः) सूर्य। रक्तः = लाल। सम्पत्ती = (सुखे, समृद्धौ) सुख-समृद्धि में। विपत्तौ = (दुःखे, धनहीनावस्थायाम्) दुःख में।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि महान् लोग प्रत्येक परिस्थिति में अपना संतुलन बनाए रखते हैं।
सरलार्थ:-सुख और दुःख दोनों अवस्थाओं में महापुरुषों में एकरूपता बनी रहती है। जैसे सूर्य उदयकाल में रक्तवर्ण होता है, वैसा ही अस्तकाल में भी रक्तवर्ण होता है।
भावार्थ:-महापुरुष सुख-दुख दोनों स्थितियों में एकसमान रहते हैं। वे सुख में न तो प्रसन्न होते हैं और न दुःख में दुःखी होते हैं। उनकी यह एकरूपता सूर्य के तुल्य होती है। जिस प्रकार सूर्य उदयकाल में लाल होता है, उसी प्रकार अस्तकाल में भी उसकी लालिमा बनी रहती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

10. विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम्।
अश्वश्चेद् धावने वीरः भारस्य वहने खरः ॥ 10॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) विचित्रः कः कथितः ?
(ii) किञ्चित् अपि निरर्थकं कुत्र नास्ति ?
(iii) खरः कस्य वहने वीरः भवति ?
(iv) अश्वः कस्मिन् वीरः भवति ?
उत्तराणि:
(i) संसारः ।
(ii) संसारे।
(iii) भारस्य।
(iv) धावने।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) विचित्र संसारे किं नास्ति ?
(ii) कः कस्मिन् वीरः भवति ?
उत्तराणि:
(i) विचित्रे संसारे किञ्चिदपि निरर्थकं नास्ति।
(ii) अश्वः धावने भारस्य वहने च खर: वीरः भवति ?

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘सार्थकम्’ इत्यस्य विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘गर्दभः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(iii) “किञ्चिन्निरर्थकम्’-अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iv) ‘विचित्रे संसारे’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) निरर्थकम्।
(ii) खरः।
(iii) किञ्चित् + निरर्थकम्।
(iv) संसारे।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 6 सुभाषितानि

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-विचित्रे संसारे खलु किञ्चित् निरर्थकं नास्ति। अश्वः चेत् धावने वीरः, (तर्हि) भारस्य वहने खरः (वीरः) अस्ति ।
शब्दार्था:-विचित्रे = (आश्चर्यपरिपूर्णे) अश्चर्य से परिपूर्ण। निरर्थकम् = (व्यर्थ) बेकार, व्यर्थ। खरः = (गर्दभः) गधा।
सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि संसार में कोई भी वस्तु, व्यक्ति या प्राणी निरर्थक नहीं है।
सरलार्थ:-आश्चर्यों से भरे हुए इस संसार में निश्चय ही कोई भी वस्तु निरर्थक नहीं है। घोड़ा यदि दौड़ने में वीर है तो भार को ढोने में गधा है।
भावार्थ:-यह संसार बड़ा अद्भुत है, जहाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तु, व्यक्ति व प्राणी रहते हैं; परन्तु हम किसी को भी अनुपयोगी नहीं कह सकते क्योंकि प्रत्येक की कोई न कोई आवश्यकता अवश्य है; जैसे घोड़े की अपेक्षा गधे को सामान्य व्यक्ति नीच समझता है परन्तु घोड़े की उपयोगिता यदि तेज़ दौड़ने में है तो भार उठाने में हम गधे का मूल्य कम नहीं आँक सकते। इसीलिए समझदार मनुष्य को किसी वस्तु या व्यक्ति को व्यर्थ या अनुपयोगी नहीं समझना चाहिए।

सुभाषितानि Summary in Hindi

सुभाषितानि पाठ परिचय:

(श्रेष्ठ वचन)
संस्कृत साहित्य के जिन पद्यों या पद्यांशों में सार्वभौम सत्य को बड़े मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है, उन पद्यों को सुभाषित कहते हैं। विश्वसाहित्य में संस्कृत के सुभाषितों का विशेष महत्त्व है। इन सुभाषितों में जीवन के अनुभव, सारगर्भित नैतिक शिक्षा परक संदेश तथा सामाजिक व्यवहार आदि का शाश्वत उपदेश निहित होता है। ये आकार में छोटे शीघ्रता से स्मरण करने योग्य, प्रभावशाली, सरल, हृदयस्पर्शी और भावपूर्ण होते हैं। ये सुभाषित भावी पीढ़ी का सन्मार्ग दर्शन करते हैं। वस्तुतः इन्हीं सुभाषितों या सूक्तियों से ही किसी भाषा की समृद्धि प्रकट होती है। प्रस्तुत पाठ ‘सुभाषितानि’ में 10 सुभाषितों का संग्रह किया गया है, जो संस्कृत के विभिन्न ग्रन्थों से संकलित हैं। इनमें परिश्रम का महत्त्व, क्रोध का दुष्प्रभाव, सभी वस्तुओं की उपादेयता और बुद्धि की विशेषता आदि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।

हिन्दी-भाषया पाठस्य सारांश:
संस्कृत के प्रायः सभी कवियों ने अपने जीवन में अनुभूत सार्वभौमिक सत्यों को अत्यन्त मार्मिक शैली में अभिव्यक्त किया। ये नैतिक सन्देश ही संस्कृत में सुभाषितानि के नाम से जाने जाते हैं।
सुभाषितानि नामक पाठ में 10 सुभाषितों को संग्रहीत किया गया है। जिनमें सारभूत तथ्यों को इस प्रकार वर्णित किया गया है-परिश्रम के महत्त्व को प्रदर्शित करते हुए कहा गया है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और परिश्रम सबसे बड़ा मित्र। एक ऐसा सच्चा मित्र जिस मित्र अर्थात् परिश्रम को अपनाकर मनुष्य को कभी दुःख नहीं उठाना पड़ता। गुणों का महत्व गुणी लोग तथा बल का महत्त्व बलवान् ही जानते हैं। क्रोध करने वाले मनुष्य को क्रोध उसी प्रकार जला डालता है जैसे लकड़ी में छिपी आग लकड़ी को जला डालती है। बुद्धिमान मनुष्यों की बुद्धियाँ संकेत मात्र से ही

सुभाषितानि ज्ञान प्राप्त कर लेती हैं। संसार में जो एक समान आचरण और स्वभाव वाले प्राणी हैं उन्हीं की मित्रता सफलीभूत होती है। मनुष्य को यदि आश्रय की आवश्यकता पड़े तो फल और छाया से युक्त महावृक्ष की भाँति किसी धन सम्पन्न और यशस्वी मनुष्य का ही आश्रय लेना चाहिए ; क्योंकि महावृक्ष फल के अभाव में छाया तो अवश्य ही देता है। महापुरुष सुख और दुःख दोनों प्रकार की परिस्थितियों में एक समान रहते हैं। न सुख में अधिक प्रसन्न होते हैं और न अधिक दुःख में घबराते हैं। यह संसार बड़ा विचित्र है इसमें सभी वस्तुओं की उपादेयता है कोई भी वस्तु निरर्थक नहीं है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

HBSE 10th Class Sanskrit जननी तुल्यवत्सला Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) कृषकः किं करोति स्म ? ।
(ख) माता सुरभिः किमर्थं अश्रूणि मुञ्चति स्म ?
(ग) सुरभिः इन्द्रस्य प्रश्नस्य किमुत्तरं ददाति ?
(घ) मातुः अधिका कृपा कस्मिन् भवति ?
(ङ) इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुम् किं कृतवान् ?
(च) जननी कीदृशी भवति ?
(छ) पाठेऽस्मिन् कयोः संवादः विद्यते ? ।
उत्तराणि:
(क) कृषक: बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं करोति स्म।
(ख) माता सुरभिः भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा अश्रूणि मुञ्चति स्म।
(ग) सुरभिः उत्तरं ददाति- हे इन्द्र! पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि।
(घ) मातुः अधिका कृपा दीने पुत्रे भवति।
(ङ) इन्द्रः दुर्बलवृषभस्य कष्टानि अपाकर्तुम् प्रचण्ड-वर्षां कृतवान् ।
(च) जननी तुल्यवत्सला भवति।
(छ) पाठेऽस्मिन् सुरभि-इन्द्रयोः संवादः विद्यते।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

प्रश्न 2.
‘क’ स्तम्भे दत्तानां पदानां मेलनं ‘ख’ स्तम्भे दत्तैः समानार्थकपदैः करुत
क स्तम्भः ख स्तम्भः
(क) कृच्छ्रेण (i) वृषभः
(ख) चक्षुभ्याम् (ii) वासवः
(ग) जवेन (iii) नेत्राभ्याम्
(घ) इन्द्रः (iv) अचिरम्
(ङ) पुत्राः (v) द्रुतगत्या
(च) शीघ्रम् (vi) काठिन्येन
(छ) बलीवर्दः (vii) सुताः
उत्तराणि:
क स्तम्भः ख स्तम्भः
(क) कृच्छ्रेण (vi) काठिन्येन
(ख) चक्षुभ्याम् (iii) नेत्राभ्याम्
(ग) जवेन (v) द्रुतगत्या
(घ) इन्द्रः (i) वासवः
(ङ) पुत्राः (vii) सुताः
(च) शीघ्रम् (iv) अचिरम्
(छ) बलीवर्दः (i) वृषभः

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

प्रश्न 3.
स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) सः कृच्छ्रेण भारम् उद्वहति ।
(ख) सुराधिपः ताम् अपृच्छत् ।
(ग) अयम् अन्येभ्यो दुर्बलः।
(घ) धेनूनाम् माता सुरभिः आसीत्।
(ङ) सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत्।
उत्तराणि:
(क) सः कथं भारम् उद्वहति?
(ख) कः ताम् अपृच्छत् ?
(ग) अयम् केभ्यो दुर्बल:?
(घ) केषाम् माता सुरभिः आसीत् ?
(ङ) कति पुत्रेषु सत्स्वपि सा दुःखी आसीत् ?

प्रश्न 4.
रेखांकितपदे यथास्थानं सन्धि विच्छेदं वा कुरुत
(क) कृषक: क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्+आसीत्
(ख) तयोरेकः वृषभः दुर्बलः आसीत्।
(गं) तथापि वृषः न+उत्थितः
(घ) सत्स्वपि बहुषु पुत्रेषु अस्मिन् वात्सल्यं कथम् ?
(ङ) तथा+अपि+अहम् एतस्मिन् स्नेहम् अनुभवामि।
(च) मे बहूनि+अपत्यानि सन्ति।
(छ) सर्वत्र जलोपप्लवः संजातः।
उत्तराणि:
(क) कृषकः क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्
(ख) तयोः + एकः वृषभः दुर्बलः आसीत्।
(ग) तथापि वृषः नोत्थितः
(घ) सत्सु + अपि बहुषु पुत्रेषु अस्मिन् वात्सल्यं कथम् ?
(ङ) तथाप्यहमेतस्मिन् स्नेहम् अनुभवामि।
(च) मे बहून्यपत्यानि सन्ति।
(छ) सर्वत्र जल + उपप्लवः संजातः ।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

प्रश्न 5.
अधोलिखितेषु वाक्येषु रेखांकितसर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम्
(क) सा च अवदत् भो वासव! अहम् भृशं दुःखिता अस्मि।
(ख) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहम् रोदिमि।
(ग) सः दीनः इति जानन् अपि कृषक: तं पीडयति।
(घ) मे बहूनि अपत्यानि सन्ति।
(ङ) सः च ताम् एवम् असान्त्वयत्।
(च) सहस्रेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन् प्रीतिः अस्ति ।
उत्तराणि:
(क) सुरभिः- इति पदस्य कृते ।
(ख) सुरभिः- इति पदस्य कृते।
(ग) कृषकः- इति पदस्य कृते।
(घ) सुरभेः- इति पदस्य कृते।
(ङ) इन्द्रः- इति पदस्य कृते।
(च) सुरभेः- इति पदस्य कृते।

प्रश्न 6.
उदाहरणमनुसृत्य पाठात् चित्वा प्रकृति प्रत्यय विभागं कुरुतःयथा – सुरभिवचनं श्रुत्वा इन्द्रः विस्मितः । (श्रु+क्त्वा)
(क) बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्
(ख) स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः नेत्राभ्यां अश्रूणि आविरासन्।
(ग) सः दीनः इति जानन् अपि पीडयति।
(घ) धुरं वोढुं सः न शक्नोति।
(ङ) विशिष्य आत्मवेदनानुभवामि।
(च) वृषभो नीत्वा गृहमगात्।
उत्तराणि:
(क) कुर्वन् = कृ + शतृ।
(ख) दृष्ट्वा = दृश् + क्त्वा।
(ग) जानन् = कृ + शतृ।
(घ) वोढुम् = वह् + तुमुन् ।
(ङ) विशिष्य = वि + शिष् + ल्यप्।
(च) नीत्वा = नी + क्त्वा।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

प्रश्न 7.
‘क’ स्तम्भे विशेषणपदं लिखितम्, ‘ख’ स्तम्भे पुनः विशेष्यपदम्। तयोः मेलनं कुरुत
क स्तम्भ ख स्तम्भ
(क) कश्चित् (i) वृषभम्
(ख) दुर्बलम् (ii) कृपा
(ग) क्रुद्धः , (iii) कृषीवल:
(घ) सहस्राधिकेषु (iv) आखण्डल:
(ङ) अभ्यधिका (v) जननी
(च) विस्मितः (vi) पुत्रेषु
(छ) तुल्यवत्सला (vii) कृषक:
उत्तराणि-
क स्तम्भ ख स्तम्भ
(क) कश्चित् (vii) कृषकः
(ख) दुर्बलम् (i) वृषभम्
(ग) क्रुद्धः (iii) कृषीवलः
(घ) सहस्राधिकेषु (vi) पुत्रेषु
(ङ) अभ्यधिका (ii) कृपा
(च) विस्मितः (iv) आखण्डल:
(छ) तुल्यवत्सला (v) जननी

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

योग्यताविस्तारः

प्रस्तुत पाठ्यांश महाभारत से उद्धृत है, जिसमें मुख्यतः व्यास द्वारा धृतराष्ट्र को एक कथा के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया है कि तुम पिता हो और एक पिता होने के नाते अपने पुत्रों के साथसाथ अपने भतीजों के हित का खयाल रखना भी उचित है। इस प्रसंग में गाय के मातृत्व की चर्चा करते हुए गोमाता सुरभि और इन्द्र के संवाद के माध्यम से यह बताया गया है कि माता के लिए सभी सन्तान बराबर होती हैं। उसके हृदय में सबके लिए समान स्नेह होता है। इस कथा का आधार महाभारत, वनपर्व, दशम अध्याय, श्लोक संख्या 8 से श्लोक संख्या 16 तक है। महाभारत के विषय में एक श्लोक प्रसिद्ध है,

धर्मे अर्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्।।

अर्थात्- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन पुरुषार्थ-चतुष्टय के बारे में जो बातें यहाँ हैं वे तो अन्यत्र मिल सकती हैं, पर जो कुछ यहाँ नहीं है, वह अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
उपरोक्त पाठ में मानवीय मूल्यों की पराकाष्ठा दिखाई गई है। यद्यपि माता के हृदय में अपनी सभी सन्ततियों के प्रति समान प्रेम होता है, पर जो कमज़ोर सन्तान होती है उसके प्रति उसके मन में अतिशय प्रेम होता है।

मातृमहत्त्वविषयक श्लोकनास्ति
मातृसमा छाया, नास्ति मातृसमा गतिः। – वेदव्यास
नास्ति मातृसमं त्राणं, नास्ति मातृसमा प्रिया।।
उपाध्यायान्दशाचार्य, आर्चायेभ्यः शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन् माता, गौरवेणातिरिच्यते।। – मनुस्मृति
माता गुरुतरा भूमेः, खात् पितोच्चतरस्तथा।
मनः शीघ्रतरं वातात्, चिन्ता बहुतरी तृणात्।। – महाभारत
निरतिशयं गरिमाणं तेन जनन्याः स्मरन्ति विद्वांसः।
यत् कमपि वहति गर्भे महतामपि स गुरुर्भवति।।

भारतीय संस्कृति में गौ का महत्त्व अनादिकाल से रहा है। हमारे यहाँ सभी इच्छित वस्तुओं को देने की क्षमता गाय में है, इस बात को कामधेनु की संकल्पना से समझा जा सकता है। कामधेनु के बारे में यह माना जाता है कि उनके सामने जो भी इच्छा व्यक्त की जाती है वह तत्काल फलवती हो जाती है।

काले फलं यल्लभते मनुष्यो
न कामधेनोश्च समं द्विजेभ्यः।।
कन्यारथानां करिवाजियुक्तैः
शतैः सहस्रैः सततं द्विजेभ्यः॥
दत्तैः फलं यल्लभते मनुष्यः ।
समं तथा स्यान्नतु कामधेनोः॥

गाय के महत्त्व के संदर्भ में महाकवि कालिदास के रघुवंश में, सन्तान प्राप्ति की कामना से राजा दिलीप द्वारा ऋषि वशिष्ठ की कामधेनु नन्दिनी की सेवा और उनकी प्रसन्नता से प्रतापी पुत्र प्राप्त करने की कथा भी काफ़ी प्रसिद्ध है। आज भी गाय की उपयोगिता प्रायः सर्वस्वीकृत ही है।

एकत्र पृथ्वी सर्वा, सशैलवनकानना।
तस्याः गौायसी, साक्षादेकत्रोभयतोमुखी।।
गावो भूतं च भव्यं च, गावः पुष्टिः सनातनी।
गावो लक्ष्म्यास्तथाभूतं, गोषु दत्तं न नश्यति।।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

HBSE 10th Class Sanskrit जननी तुल्यवत्सला Important Questions and Answers

जननी तुल्यवत्सला पठित-अवबोधनम्

1. निर्देशः-अधोलिखितं पाठ्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
कश्चित् कृषकः बलीवाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। तयोः बलीवर्दयोः एकः शरीरेण दुर्बल: जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत्। अतः कृषकः तं दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुद्यमानः अवर्तत। सः ऋषभः हलमूढ्वा गन्तुमशक्तः क्षेत्रे पपात। क्रुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारम् यत्नमकरोत्। तथापि वृषः नोत्थितः। भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्। सुरभेरिमामवस्थां दृष्ट्वा सुराधिपः तामपृच्छत्-“अयि शुभे! किमेवं रोदिषि ? उच्यताम्” इति। सा च

विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिपः ।
अहं तु पुत्रं शोचामि, तेन रोदिमि कौशिक!॥

“भो वासव! पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि। सः दीन इति जानन्नपि कृषकः तं बहुधा पीडयति। सः कृच्छ्रेण भारमुद्वहति। इतरमिव धुरं वोढुं सः न शक्नोति। एतत् भवान् पश्यति न ?’ इति प्रत्यवोचत्।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) शरीरेण दुर्बलः कः आसीत् ?
(ख) पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा का रोदिति ?
उत्तराणि:
(क) बलीवर्दः,
(ख) माता सुरभिः ।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) कृषकः बलीवर्दाभ्यां किं कुर्वन्नासीत् ?
(ख) सुरभिः केषां माता अस्ति?
उत्तराणि:
(क) कृषक: बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत् ।
(ख) सुरभिः सर्वधेनूनां माता अस्ति।

(ई) निर्देशानुसारम्
उत्तरत
(क) पीडयति-इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।

(ख) जानन्-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि
(क) कृषकः, (ख) शतृ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्था:-बलीवर्दाभ्याम् = (वृषभाभ्याम्) दो बैलों से। क्षेत्रकर्षणम् = (क्षेत्रस्य कर्षणम्) खेत की जुताई। जवेन = (तीव्रगत्या) तीव्रगति से। तोदनेन = (कष्टप्रदानेन) कष्ट देने से । नुद्यमानः = (बलेन नीयमानः) धकेला जाता हुआ, हाँका जाता हुआ। हलमूढ्वा = (हलम् आदाय) हल उठाकर, हल ढोकर। पपात = (भूमौ अपतत्) गिर गया। कृषीवलः = (कृषकः) किसान। उत्थापयितुम = उपरि नेतुम्) उठाने के लिए। वृषः (वृषभः) बैल। धेनूनाम् = (गवाम्) गायों की। नेत्राभ्याम् (चक्षुाम्, नयनाभ्याम्) दोनों आँखों से। अणि (नयनजलम्) आँसू। आविरासन् (आगताः) आने लगे, आए। सुराधिपः (सुराणां राजा, देवताओं के राजा (इन्द्र)। (देवानाम् अधिपः) उच्यताम् = (कथ्यताम्) कहें, कहा जाए। वासव = इन्द्रः, देवराजः) इन्द्र। कृच्छेण = (काठिन्येन) कठिनाई से। इतरमिव = (भिन्नम् इव दूसरों के समान। धरम् = (धुरम्) जुए को (गाड़ी के जुए का वह भाग। जो बैलों के कंधों पर रखा रहता है)। वोदुम् = (वहनाय योग्यम्) ढोने के लिए। प्रत्यवोचत = (उत्तरं दत्तवान्) जवाब दिया।

हिन्दी में अनुवाद- कोई किसान दो बैलों से अपना खेत की जुताई कर रहा था। उन दोनों बैलों में से एक शरीर से दुर्बल था और वह है तेज गति से चलने में असमर्थ था। इसीलिए किसान उस दुबले बैल को हाँकने वाली छड़ी से हाँक रहा था। वह बैल हल को लेकर जाने में असमर्थ था इसलिए खेत में गिर पड़ा। क्रोधित किसान ने उसको उठाने के लिए बहुत बार यत्न किया। तो भी बैल नहीं उठा।

भूमि पर गिरे हुए अपने पुत्र को देखकर सभी गायों की माता सुरभि की आंखों से आंसू गिर रहे थे। सुरभि की इस अवस्था को देखकर देवताओं के राजा इन्द्र ने सुरभि से पूछा – “हे कल्याणी! इस प्रकार क्यों रो रही हो? बताओ।” और उसने भी (उत्तर देते हुए कहा)

“देवताओं के राजा इन्द्र! आपने कभी अपने किसी परिवारजन का पतन होता हुआ नहीं देखा। (मैंने देखा है, इसीलिए) मैं अपने पुत्र का शोक मना रही हूं और इसी कारण मैं रो रही हूं ॥” ।

“हे इन्द्र! मैं अपने पुत्र की दीनता को देखकर रो रही हूँ। वह दीन (अति दुर्बल) है यह जानते हुए भी किसान उसे अनेक प्रकार से पीड़ित कर रहा है। वह बड़ी कठिनता से भार को उठा रहा है। वह दूसरे जुए को उठाने में समर्थ नहीं है। यह तो आप देख रहे हैं न।” – ऐसा उसने उत्तर दिया।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

2. निर्देशः-अधोलिखितं पाठ्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
“भद्रे! नूनम्। सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन्नेव एतादृशं वात्सल्यं कथम् ?” इति इन्द्रेण पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत् –

यदि पुत्रसहस्रं मे, सर्वत्र सममेव मे।
दीनस्य तु सतः शक्र! पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥

“बहून्यपत्यानि मे सन्तीति सत्यम्। तथाप्यहमेतस्मिन् पुत्रे विशिष्य आत्मवेदनामनुभवामि। यतो हि अयमन्येभ्यो दुर्बलः। सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव। तथापि दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव” इति। सुरभिवचनं श्रुत्वा भृशं विस्मितस्याखण्डलस्यापि हृदयमद्रवत्। स च तामेवमसान्त्वयत्-” गच्छ वत्से! सर्वं भद्रं जायेत।”
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला
अचिरादेव चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षः समजायत। पश्यतः एव सर्वत्र जलोपप्लवः सञ्जातः। कृषक: हर्षतिरेकेण कर्षणाविमुखः सन् वृषभौ नीत्वा गृहमगात्।

अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।
पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) केन पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत्?
(ख) सर्वेष्वपत्येषु जननी कीदृशी भवति?
उत्तराणि:
(क) इन्द्रेण,
(ख) तुल्यवत्सला।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) सुरभिवचनं श्रुत्वा कस्य हृदयमद्रवत् ?
(ख) केन सह प्रवर्षः समजायत?
उत्तराणि:
(क) सुरभिवचनं श्रुत्वा विस्मितस्य आखण्डलस्य हृदयमद्रवत्।
(ख) चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षः समजायत।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) इन्द्रस्य-इति पदस्य अत्र कः पर्यायः ?
(ख) नीत्वा-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) आखण्डलस्य,
(ख) क्त्वा।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

शब्दार्थाः-
नूनम् =(निश्चयेन) निश्चय ही। सहस्रम् = (दशशतम्) हजार। वात्सल्यम् = (स्नेहभावः) वात्सल्य (प्रेमभाव)। अपत्यानि = (सन्ततयः) सन्तान। विशिष्य = (विशेषतः) विशेषकर। वेदनाम् = (पीड़ाम्, दुःखम्) कष्ट को। तुल्यवत्सला = (समस्नेहयुता) समान रूप से प्यार करने वाली। सुतः = (पुत्रः। तनयः) पुत्र। भृशम् = (अत्यधिकम्) बहुत अधिक। आखण्डलस्य = (देवराजस्य इन्द्रस्य) इन्द्र का। असान्त्वयत् =(सान्त्वना दत्तवान्, सान्त्वना दी (दिलासा दी)। समाश्वासयत्) अचिरात् = (शीघ्रम्) शीघ्र ही। चण्डवातेन =(वेगयुता वायुना) प्रचण्ड (तीव्र) हवा से। मेघरवैः = (मेघस्य गर्जनेन) बादलों के गर्जन से। प्रवर्षः = (वृष्टिः) वर्षा । जलोपप्लवः (जलस्य विपत्तिः) जलसंकट (उपप्लवः विपत्ति)। कर्षणविमुखः = (कर्षणकर्मणा विमुखः)

जोतने के काम से विमुख होकर। वृषभौ (वृषौ) दोनों बैलों को। अगात् = (गतवान्, अगच्छत्) गया। त्रिदशाधिपः = (त्रिदशानाम् अधिपः-इन्द्रः,) देवताओं का राजा इन्द्र। प्रतोदेन = (अत्यधिकेन कष्टप्रददण्डेन) कष्टदायक डण्डे से। अभिघ्नन्तम् = (मारयन्तम्) मारते हुए। लाङ्गलेन = (हलेन) हल से। निपीडितम् = (पीड़ितोऽभवत्) पीड़ित होते हुए।

हिन्दी में अनुवाद: “(इन्द्र ने कहा-) हे कल्याणी! अवश्य । तुम्हारे हजारों पुत्रों के रहते हुए भी इस दुर्बल पुत्र के प्रति ऐसा वात्सल्य क्यों?” -इस प्रकार इन्द्र के द्वारा पूछे जाने पर सुरभि ने उत्तर दिया- “यद्यपि मेरे हजारों पुत्र हैं परंतु मेरा प्रेम सब के प्रति एक समान है। परन्तु हे इन्द्र! जो दीन अर्थात् असहाय पुत्र है उसके प्रति तो और भी अधिक कृपा का भाव होना (स्वाभावकि ही) है।॥”

“मेरे बहुत से पुत्र हैं यह बात सत्य है। तो भी इस पुत्र के प्रति मैं विशेष रूप से अपनी पीड़ा का अनुभव कर रही हूं। क्योंकि यह दूसरों की अपेक्षा दुर्बल है। सभी पुत्रों में माता की ममता एक समान ही होती है। तो भी दुर्बल पुत्र में माता का अत्यधिक प्रेम अथवा उसकी कृपा होना स्वाभाविक ही है।” सुरभि के इस वचन को सुनकर अत्यधिक आश्चर्यचकित इन्द्र देवता का हृदय भी द्रवित हो गया। और उसने सांत्वना देते हुए कहा “हे पुत्री ! जाओ तुम्हारा सब प्रकार से कल्याण ही हो।” शीघ्र ही प्रचंड वायु के वेग और बादलों की गर्जना के साथ वर्षा हुई। देखते-देखते सभी जगह जल ही जल हो गया। किसान अत्यधिक खुशी के कारण हल जोतने के कार्य से विमुख होकर दोनों बैलों को लेकर घर की ओर चला गया।

“सभी पुत्रों में माता का प्रेम समान होता है। असहाय पुत्र के प्रति तो वह माता और भी अधिक दयालु हृदय वाली हो जाया करती है।”

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 5 जननी तुल्यवत्सला

जननी तुल्यवत्सला (माँ का प्रेम सबके प्रति एक समान) Summary in Hindhi

जननी तुल्यवत्सला पाठ-परिचय

महाभारत भारतीय संस्कृति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें केवल भारत की संस्कृति ही नहीं झलकती अपितु भारतीय इतिहास का भी विशाल भंडार इस पुस्तक में विद्यमान है। महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग हैं जो आज के युग में भी उतने ही उपादेय हैं, जिसने कभी पहले थे। महाभारत के वनपर्व से ली गई यह कथा न केवल मनुष्यों के प्रति अपितु सभी जीव जन्तुओं के प्रति समदृष्टि पर बल देती है। समाज में असहाय, गरीब, दुर्बल लोगों अथवा जीवों के प्रति भी मां का स्नेह और उसकी ममता उतनी ही प्रगाढ़ होती है जितनी सबल लोगों के प्रति, यही इस पाठ का मुख्य संदेश है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

HBSE 10th Class Sanskrit शिशुलालनम् Textbook Questions and Answers

प्रश्न1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः कीदृशः आसीत् ?
(ख) रामः लवकुशौ कुत्र उपवेशयितुं कथयति ?
(ग) बालभावात् हिमकरः, कुत्र विराजते ?
(घ) कुशलवयोः वंशस्य कर्ता कः?
(ङ) केन सम्बन्धेन वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरुः आसीत् ?
(च) कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः केन नाम्ना आह्वयति ?
उत्तराणि:
(क) रामाय कुशलवयोः कण्ठाश्लेषस्य स्पर्शः हृदयग्राही आसीत् ?
(ख) रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयितुं कथयति ?
(ग) बालभावात् हिमकरः पशुपति-मस्तके विराजते ?
(घ) कुशल प्रयोः वंशस्य कर्ता सहस्रदीधितिः।
(ङ) उपनयनोपदेशेन वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरुः आसीत् ?
(च) कुशलवयोः मातरं वाल्मीकिः ‘वधू’ इति नाम्ना आह्वयति ?

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प्रश्न 2.
रेखाङ्कितेषु पदेषु विभक्तिकारणं निर्दिशत
(क) राजन् ! अलम् अतिदाक्षिण्येन।
(ख) रामः लवकुशौ आसनार्धम् उपवेशयति।
(ग) धिङ्माम् एवंभूतम्।
(घ) अकव्यवहितम् अध्यास्यतां सिंहासनम्।
(ङ) अलम् अतिविस्तरेण।
उत्तराणि:
(क) ‘अलम्’ के योग में निषेधार्थ में ‘अतिदाक्षिण्येन’ में तृतीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
(ख) उप उपसर्गपूर्वक विश् धातु के योग में बैठाने के अर्थ में ‘आसनार्धम्’ में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
(ग) “धिक्’ के योग में ‘माम्’ में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
(घ) ‘अधि’ उपसर्गपूर्वक ‘आस्’ धातु के योग में बैठने के अर्थ में ‘सिंहासनम्’ में द्वितीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है।
(ङ) ‘अलम्’ के योग में निषेधार्थ में ‘अतिविस्तरेण’ में तृतीया विभक्ति प्रयुक्त हुई है।

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प्रश्न 3.
मञ्जूषातः पर्यायद्वयं चित्वा पदानां समक्षं लिखतशिवः शिष्टाचारः शशिः चन्द्रशेखरः सुतः इदानीम् अधुना पुत्रः सूर्यः सदाचारः निशाकरः भानुः।
(क) हिमकरः – ……………………….. ………………………..
(ख) सम्प्रति – ……………………….. ………………………..
(ग) समुदाचारः – ……………………….. ………………………..
(घ) पशुपतिः – ……………………….. ………………………..
(ङ) तनयः – ……………………….. ………………………..
(च) सहस्रदीधितिः – ……………………….. ………………………..
उत्तराणि-(पर्यायवाचिनः)
(क) हिमकरः – शशिः – निशाकरः
(ख) सम्प्रति – इदानीम् – अधुना
(ग) समुदाचारः – शिष्टाचारः – सदाचारः
(घ) पशुपतिः – शिवः – चन्द्रशेखरः
(ङ) तनयः – सुतः – पुत्रः
(च) सहस्रदीधितिः – सर्यः – भानुः।

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प्रश्न 4.
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितेषु पदेषु प्रयुक्त-प्रकृति-प्रत्ययञ्च लिखतयथा-
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम् img-1
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम् img-2

प्रश्न 5.
विशेषण-विशेष्यपदानि योजयत
यथा-विशेषण-पदानि विशेष्य-पदानि
श्लाघ्या – कथा
(1) उदात्तरम्यः (क) समुदाचारः
(2) अतिदीर्घः (ख) स्पर्शः
(3) समरूपः (ग) कुशलवयोः
(4) हृदयग्राही (घ) प्रवासः
(5) कुमारयोः (ङ) कुटुम्बवृत्तान्तः
उत्तराणि
यथा-विशेषण – पदानि विशेष्य-पदानि
(1) उदात्तरम्यः (क) समुदाचारः
(2) अतिदीर्घः (घ) प्रवासः
(3) समरूप: (ङ) कुटुम्बवृत्तान्तः
(4) हृदयग्राही (ख) स्पर्शः
(5) कुमारयोः (ग) कुशलवयोः

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प्रश्न 6.
अधोलिखितपदेषु सन्धिं कुरुत:
(क) द्वयोः + अपि – ………………………………..
(ख) द्वौ + अपि – ………………………………..
(ग) कः + अत्र – ………………………………..
(घ) अनभिज्ञः + अहम् – ………………………………..
(ङ) इति + आत्मानम् – ………………………………..
उत्तराणि
सन्धिच्छेदम् सन्धिः
(क) द्वयोः + अपि – द्वयोरपि
(ख) द्वौ + अपि – द्वावपि
(ग) क: + अत्र – कोऽत्र
(घ) अनभिज्ञः + अहम् – अनभिज्ञोऽहम्
(ङ) इति + आत्मानम् – इत्यात्मानम्

(ख) अधोलिखितपदेषु विच्छेदं कुरुत-
(क) अहमप्येतयोः – ………………………………..
(ख) वयोऽनुरोधात् – ………………………………..
(ग) समानाभिजनौ – ………………………………..
(घ) खल्वेतत् – ………………………………..
उत्तराणि
सन्धिः – सन्धिच्छेदम्
(क) अहमप्येतयोः – अहम् + अपि + एतयोः।
(ख) वयोऽनुरोधात् . – वयः + अनुरोधात्।
(ग) समानाभिजनौ – समान + अभिजनौ।
(घ) खल्वेतत् – खलु + एतत्।

प्रश्न 7.
अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति
कः कम्
(क) सव्यवधानं न चारित्र्यलोपाय ………………. ……………….
(ख) किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था ? ………………. ……………….
(ग) जानाम्यहं तस्य नामधेयम्। ………………. ……………….
(घ) तस्या द्वे नाम्नी। ………………. ……………….
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम् img-3

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

योग्यताविस्तारः
नाट्य-प्रसङ्गः
कुन्दमाला के लेखक दिङ्नाग ने प्रस्तुत नाटक में रामकथा के करुण अवसाद भरे उत्तरार्ध की नाटकीय सम्भावनाओं को मौलिकता से साकार किया है। इसी कथानक पर प्रसिद्ध नाटककार भवभूति का उत्तररामचरित भी आश्रित है।
कुन्दमाला के छहों अड्कों का दृश्यविधान वाल्मीकि-तपोवन के परिसर में ही केन्द्रित है। प्रस्तुत नाटकांश पञ्चम अङ्क से सम्पादित कर सङ्कलित किया गया है। लव और कुश से मिलने पर राम के हृदय में उनसे आलिंगन की लालसा होती है। उनके स्पर्शमुख से अभिभूत हो राम, उन्हें अपने सिंहासन पर, अपनी गोद में बिठाकर लाड़ करते हैं। इसी भाव की पुष्टि से नाटक में यह श्लोक उद्धृत है

भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद्
गुणमहतामपि लालनीय एव।
व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात्
पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्।।

अत्यधिक गुणी लोगों के लिए भी छोटी उम्र होने के कारण शिशु लालनीय ही होता है। चन्द्रमा बालभाव के कारण ही भगवान शंकर के मस्तक का आभूषण बनकर केतकी के पुष्पों से निर्मित शिरोमणि की भाँति शोभायमान होता है। शिशुस्नेहसमभावश्लोकाः-(शिशु के प्रति स्नेह के समभाव को प्रकट करने वाले श्लोक)

अनेन कस्यापि कुलाकुरेण
स्पृष्टस्य गात्रेषु सुखं ममैवम्।
कां निर्वतिं चेतसि तस्य कुर्याद्
यस्यायमकात् कृतिनः प्ररूढः॥ (कालिदासस्य)

दुष्यन्त शकुन्तला से उत्पन्न अपने पुत्र भरत जिसको कि वह नहीं पहचानता है, उसका स्पर्श करते हुए श्लोक में वर्णित भाव के अनुसार आनन्द का अनुभव करता है। __यह किसके कुल में उत्पन्न हुआ बालक है जिसके अंगों का स्पर्श करने मात्र से मुझे इस प्रकार की सुख की अनुभूति हो रही है। वह बालक जिस सौभाग्यशाली की गोद से उत्पन्न हुआ, उसके मन को यह कितना आनन्दित करना होगा ?

अन्तःकरणतत्त्वस्य दम्पत्योः स्नेहससंश्रयात्।
आनन्दग्रन्थिरेकोऽयमपत्यमिति पठ्यते। (भवभूतेः)

पति और पत्नी के मन और चित्त के स्नेहवश मिल जाने से आनन्द के समूह के रूप में जो प्रकट होता है उसे ही अपत्य अर्थात् पुत्र कहा जाता है।

धूलीधूसरतनवः
क्रीडाराज्ये स्वके च रममाणाः।
कृतमुखवाद्यविकाराः
क्रीडन्ति सुनिर्भरं बालाः॥ (कस्यचित्)

अपने ही क्रीडाराज्य में रमण करने वाले, जिनके शरीर धूल से धूसरित हैं, जो अपने मुख से वाद्य की सी आवाजें निकाल रहे हैं, ऐसे ये बालक जी भरकर खेल रहे हैं।

अनियतरुदित-स्मित-विराजत्
कतिपयकोमलदन्तकुड्मलाग्रम्।
वदनकमलकं शिशोः स्मरामि ।
स्खलदसमञ्जस-मञ्जुजल्पितं ते।।

मैं तेरे पुत्र के उस मुख कमल का स्मरण कर रहा हूँ जो अनियमित रूप से कभी रो देने और कभी मुस्करा देने से सुशोभित होता है। जिसका कोई-कोई कोमल दाँत कली के अग्र भाग की भाँति प्रतीत होता है और तुतलाते हुए स्वर में कोई कोमल सा शब्द करता है।

HBSE 10th Class Sanskrit शिशुलालनम् Important Questions and Answers

शिशुलालनम्प पठित-अवबोधनम्

1. निर्देश:-अधोलिखितं नाट्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
सिंहासनस्थः रामः । ततः प्रविशतः विदूषकेनोपदिश्यमानमार्गी तापसौ कुशलवी)
विदूषकः – इत इत आर्यो!
कुशलवी – (रामस्य समीपम् उपसृत्य प्रणम्य च) अपि कुशलं महाराजस्य?
रामः – युष्मदर्शनात् कुशलमिव। भवतोः किं वयमत्र कुशलप्रश्नस्य भाजनम् एव, न पुनरतिथिजनसमुचितस्य कण्ठाश्लेषस्य। (परिष्वज्य) अहो हृदयग्राही स्पर्शः। (आसनार्धमुपवेशयति)
उभौ – राजासनं खल्वेतत्, न युक्तमध्यासितुम्।।
रामः – सव्यवधानं न चारित्रलोपाय तस्मादक-व्यवहितमध्यास्यतां सिंहासनम्। (अङ्कमुपवेशयति) –
उभौ – (अनिच्छां नाटयतः) राजन्! अलमतिदाक्षिण्येन।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) सिंहासने कः तिष्ठति ?
(ii) द्वौ तापसौ कौ स्तः ?
(iii) कम् अध्यासितुं न युक्तम् ?
(iv) कीदृशं राजासनं चरित्रलोपाय न भवति ?
(v) कुशलवौ का नाटयतः ?
उत्तराणि:
(i) रामः ।
(ii) कुशलवौ।
(iii) राजासनम्।
(iv) सव्यवधानम्।
(v) अनिच्छाम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) केन उपदिश्यमानमार्गौ कुशलवौ प्रविशतः ?
(ii) कुशलवौ कथं रामस्य कुशलं पृच्छतः ?
(iii) रामः कयोः स्पर्श हृदयग्राही इति अनुभवति ?
(iv) रामः अड्कव्यवहितं सिंहासनं कौ उपवेशयति ?
उत्तराणि
(i) विदूषकेन उपदिश्यमानमार्गों कुशलवौ प्रविशतः ।
(ii) कुशलवौ रामस्य समीपम् उपसृत्य प्रणम्य च तस्य कुशलं पृच्छतः ।
(iii) रामः लवकुशयोः स्पर्श हृदयग्राही इति अनुभवति।
(iv) रामः अङ्कव्यवहितं सिंहासनं कुशलवौ उपवेशयति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) अलिङ्ग्य इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) स्पर्शः इति पदस्य प्रयुक्तं विशेषणं किम्?
(iii) ‘अध्यासितम्’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत?
(iv) ‘इच्छाम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(v) ‘अलम्’ इति पदस्य अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता?
उत्तराणि:
(i) परिष्वज्य।
(ii) ह्दयग्राही।
(iii) अधि + आस् + तुमुन्।
(iv) अनिच्छाम्।
(v) तृतीया विभिक्तिः (अतिदाक्षिण्येन)।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

शब्दार्थाः-
सिंहासनस्थः = (सिंहासने स्थितः) सिंहासन पर बैठा हुआ। उपसृत्य = (उपगम्य, समीपम् आगत्य) समीप आकर। कण्ठाश्लेषस्य = (कण्ठे आश्लेषस्य) गले लगाने का। भाजनम् = (पात्रम्, स्थानम्) पात्र, योग्य। परिष्वज्य = (आलिङ्गनं कृत्वा) आलिङ्गन करके, गले लगाकर। उपवेशयति = (उपस्थापयति) पास बैठाता है। अध्यासितुम् = (उपवेष्टुम्) बैठने के लिए। सव्यवध्यानम् = (व्यवधानेन सहितम्) रुकावट सहित। अड्कम् = (क्रोडम्) गोद। अलमतिदाक्षिण्येन = (अलमितकौशलेन) अति चतुराई मत दिखाओ।

सन्दर्भः- प्रस्तुत नाट्यांश संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग द्वारा रचित ‘कुन्दमाला’ नामक नाटक के पंचम अंक से सम्पादित तथा हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ में संकलित ‘शिशुलालनम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में सिंहासन पर विराजमान राम लव और कुश को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं परन्तु वे अतिशालीनतापूर्वक मना कर देते हैं। इसी का वर्णन प्रस्तुत नाट्यांश में है।

हिन्दी अनुवाद: (राम सिंहासन पर विराजमान हैं। तभी विदूषक के द्वारा मार्ग दिखाए गए कुश-लव नामक दो तपस्वी प्रवेश करते हैं।)

विदूषक: इधर से, इधर से आर्य!

कुश और लव: (राम के समीप जाकर और प्रणाम करके) क्या महाराज कुशल से हैं?

राम: तुम्हारा दर्शन करने से कुशल-सा ही है। क्या यहाँ आप दोनों का हमसे केवल कुशल प्रश्न करना ही उचित है ? अतिथि जन के लिए उचित तुम्हारा गले लग जाना ठीक क्यों नहीं? (गले लगाकर) अरे! इनका स्पर्श तो हृदय को छू जाने वाला है।

(आधे आसन पर बैठाता है)
दोनों: यह तो राजासन है, इस पर बैठना उचित नहीं है।
राम: यदि व्यवधानपूर्वक बैठा जाए तो चरित्र हानि नहीं होगी, इसलिए गोद में सिंहासन बनाकर बैठ जाइए।

(गोद में बैठाता है।)
दोनों-(अनिच्छा का दिखावा करते हुए) हे राजन्! अधिक चतुराई मत दिखाइए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

2. रामः , – अलमतिशालीनतया।
भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद्
गुणमहतामपि लालनीय एव।
व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात् पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्॥
एष भवतोः सौन्दर्यावलोकजनितेन कौतूहलेन-क्षत्रियकुल-पितामहयोः सूर्यचन्द्रयोः को वा भवतोर्वंशस्य कर्ता?
लवः – भगवन् सहस्रदीधितिः।
रामः – कथमस्मत्समानाभिजनौ संवृत्तौ ?
विदूषकः – किं द्वयोरप्येकमेव प्रतिवचनम?
लवः – भ्रातरावावां सोदीं।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत:
(i) गुणमहतामपि कः लालनीयः भवति?
(ii) पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वं कः व्रजति?
(iii) लवकुशयोः वंशस्य कर्ता कः अस्ति ?
(iv) क्षत्रियकुल-पितामही को कथितौ?
(v) अत्र संवादे कति पात्राणि सन्ति ?
उत्तराणि:
(i) शिशुजनः ।
(ii) हिमकरः।
(iii) सहस्रदीधितिः ।
(iv) सूर्यचन्द्रौ।
(v) त्रीणि।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) शिशुजनः कस्मात् लालनीयः भवति?
(ii) हिमकरः बालभावात् कुत्र व्रजति ?
(iii) लवः स्व-कुलपितामहं कं निर्दिशति ?
(iv) रामः कुशलवी कीदृशेन कौतूहलेन पृच्छति?
उत्तराणि
(i) शिशुजनः वयोऽनुरोधात् लालनीयः भवति।
(ii) हिमकरः बालभावात् पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वं व्रजति।
(iii) लवः स्व-कुलपितामहं सहस्रदीधितिं कथयति।
(iv) रामः कुशलवौ तयोः सौन्दर्यावलोकजनितेन कौतुहलेन पृच्छति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) उत्तरम् इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम्?
(ii) ‘द्वयोरप्येकमेव’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iii) ‘चन्द्रः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः?
(iv) ‘ताडनीयः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ? ।
(v) ‘अस्मत्समानाभिजनौ संवृत्तौ’ अत्र ‘अस्मत्’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम्।
उत्तराणि:
(i) प्रतिवचनम्।
(ii) द्वयोः + अपि + एकम् + एव।
(iii) हिमकरः।
(iv) लालनीयः ।
(v) रामाय।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
श्लोकान्वयः गुणमहताम् अपि वयोऽनुरोधात् शिशुजनः लालनीयः एव भवति। बालभावात् हि
हिमकरः अपि पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम् व्रजति।।

शब्दार्थाः- अलमतिशालीनतया = (अलमतिशष्टतया) अत्यधिक शिष्टता मत करें। दिनकरः = (चन्द्रः) चन्द्रमा। पशुपतिः = (शिवः) शिव। केतकच्छदत्वम् = (केतकस्य छदत्वम्) केतकी (केवड़े) के पुष्प से बना मस्तक का शेखर
(जूड़ा)। पितामहः = (पितुः पिता) दादा, आदिमूल । सहस्रदीधितिः = (सूर्यः) सूर्य। आत्मगतम् = (स्वगतम्) मन ही मन। समानाभिजनी = (समानकुलोत्पन्नौ) एक कुल में पैदा होने वाले। संवृत्तौ = (संजातौ) हो गए। प्रतिवचनम् = (उत्तरम्) उत्तर। सोद? = (सहोदरौ) सदोहर/सगे भाई।

सन्दर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग-प्रस्तुत नाट्यांश में राम लव-कुश के सौन्दर्य से और उनके भोलेपन से आकृष्ट होकर उनका कुल परिचय पूछते हैं।

हिन्दी अनुवाद-राम-अधिक शालीन मत बनिए। अत्यधिक गुणवान लोगों के लिए भी शिशु छोटी आयु के कारण लालन करने योग्य ही होता है। चन्द्रमा भी इसी बालभाव के कारण भगवान शंकर के मस्तक का आभूषण बन कर केतकी पुष्पों से निर्मित चूडामणि की भाँति सुशोभित होता है।

यह मैं आप दोनों की सुन्दरता को देखने से उत्पन्न कौतुहल के कारण पूछ रहा हूँ-क्षत्रिय कुल के पितामह रूप सूर्य और चन्द्रमा में से आप दोनों के वंश का कर्ता कौन है?
लव-श्रीमान्! सूर्य। राम-अरे क्या! हमारे समान कुल में ही उत्पन्न हुए हो? विदूषक-क्या आप दोनों का एक ही उत्तर है? लव-हम दोनों सगे भाई हैं।

श्लोक-भावार्थः- अत्यधिक गुणी लोगों के लिए भी छोटी उम्र के कारण बालक लालनीय ही होता है। चन्द्रमा बालभाव के कारण ही शकर के मस्तक का आभूषण बनकर केतकी पुष्पों से निर्मित चूड़ा की भाँति शोभित होता है।

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(3) रामः – समरूपः शरीरसन्निवेशः। वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्।
लवः – आवां यमलौ।
रामः – सम्प्रति युज्यते। किं नामधेयम् ?
लवः – आर्यस्य वन्दनायां लव इत्यात्मानं श्रावयामि (कुशं निर्दिश्य) आर्योऽपि गुरुचरणवन्दनायाम् ……………
कुशः – अहमपि कुश इत्यात्मानं श्रावयामि।
रामः – अहो! उदात्तरम्यः समुदाचारः। किं नामधेयो भवतोगुरुः?
लवः – ननु भगवान् वाल्मीकिः।
रामः – केन सम्बन्धेन?
लवः – उपनयनोपदेशेन।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कुशलवी कीदृशौ भ्रातरौ स्तः ?
(ii) शरीरसन्निवेशः कीदृशः कथितः ?
(iii) यमलौ को स्तः?
(iv) समुदाचारः कीदृशः अस्ति?
(v) अत्र गुरुः कोऽस्ति?
उत्तराणि:
(i) सोदयौँ।
(ii) समरूपः ।
(iii) कुशलवौ।
(iv) उदात्तरम्यः ।
(v) वाल्मीकिः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) किञ्चित् अन्तरं कुत्र नास्ति?
(ii) कुशं कः निर्दिशति?
(iii) वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरुः केन सम्बन्धेन अस्ति?
उत्तराणि
(i) कुशलवयोः वयसः किञ्चित् अन्तरं नास्ति।
(ii) कुशं लवः निर्दिशति।
(iii) वाल्मीकिः कुशलवयोः गुरु: उपनयनोपदेशेन सम्बन्धेन अस्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘भ्रातरावाम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सहोदरौ’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम्?
(iii) ‘निर्दिश्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iv) ‘आवां यमलौ’-अत्र ‘आवाम्’ इति सर्वनामस्थाने संज्ञापदं लिखत।
(v) ‘समुदाचारः’ अत्र के उपसर्गाः प्रयुक्ताः ?
उत्तराणि:
(i) भ्रातरौ + आवाम्।
(ii) सोदयौँ ।
(iii) निर् + दिश् + ल्यप् ।
(iv) कुशलवौ।
(v) सम, उत्, आ – इति त्रयः उपसर्गाः प्रयुक्ताः ।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
शब्दार्थाः- शरीरसन्निवेशः = (अङ्गरचनाविन्यासः) शरीर की बनावट। यमलौ = (युगलौ) जुड़वा। नामधेयम् = (नामा) नाम। उदात्तरम्यः = (अत्यन्तरमणीयः) अत्यधिक मनोहर। समुदाचारः = शिष्टाचारः) शिष्टाचार । उपनयनोपदेशेन = (उपनयनस्य उपदेशेन) उपनयन की दीक्षा के कारण। (उपनयन-संस्कारदीक्षया)

सन्दर्भ = पूर्ववत्। प्रसंगः-राम-समान आकृति वाले लव और कुश को देखकर उनका तथा उनके गुरु का नाम पूछते हैं। इसी का वर्णन प्रस्तुत नाट्यांश में है।
हिन्दी अनुवाद-राम-शरीर की बनावट भी एक समान है। आयु का भी कोई अन्तर नहीं है।
लव-हम दोनों जुड़वा भाई हैं।
राम-अब ठीक है। क्या नाम है?
लव-आर्य की वन्दना में लव इस नाम से अपने आपको सुनाता हूँ। (कुश की ओर (संकेत करके) आर्य भी गुरुचरण वन्दना में…….
कुश-मैं भी कुश इस नाम से अपने आपको सुनाता हूँ। राम-अरे! बड़ा ही उदात्त और रमणीय शिष्टाचार है। आप दोनों के गुरु का क्या नाम है? लव-भगवान् वाल्मीकि।
राम-किस संबन्ध से ?
लव-उपनयन संस्कार के सम्बन्ध से।

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(4) रामः – अहमत्रभवतोः जनकं नामतो वेदितुमिच्छामि।
लवः – न हि जानाम्यस्य नामधेयम्। न कश्चिदस्मिन् तपोवने तस्य नाम व्यवहरति।
रामः – अहो माहात्म्यम्।
कुशः – जानाम्यहं तस्य नामधेयम्।
रामः – कथ्यताम्।
कुशः – निरनुक्रोशो नाम…..
रामः – वयस्य, अपूर्वं खलु नामधेयम्।
विदूषकः – (विचिन्त्य) एवं तावत् पृच्छामि निरनुक्रोश इति क एवं भणति ?
कुशः – अम्बा।
विदूषकः – किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था ?
कुशः, – यद्यावयोर्बालभावजनितं किञ्चिदविनयं पश्यति तदा एवम् अधिक्षिपति-निरनुक्रोशस्य पुत्रौ, मा चापलम् इति।
विदूषकः – एतयोर्यदि पितुर्निरनुक्रोश इति नामधेयम् एतयोर्जननी तेनावमानिता निर्वासिता एतेन वचनेन दारको निर्भर्त्सयति।
रामः – (स्वगतम्) धिङ् मामेवंभूतम्। सा तपस्विनी मत्कृतेनापराधेन स्वापत्यमेवं मन्युगभैरक्षरैर्निर्भर्त्तयति।

(सवाष्पमवलोकयति)
पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कुशलवयोः जनकं नामतः कः वेदितुम् इच्छति ?
(ii) नामधेयं कः जानाति ?
(iii) अपूर्वं नामधेयं किमस्ति ?
(iv) दारकौ का निर्भर्त्सयति ?
(v) निरनुक्रोश इति क एवं भणति ? इति पृष्टे कुशः किम् उत्तरति।
उत्तराणि:
(i) रामः ।
(ii) कुशः।
(iii) निरनुक्रोशः ।
(iv) जननी।
(v) अम्बा।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) लवकुशयोः जनकस्य नाम कुत्र न कश्चिदपि व्यवहरति ?
(ii) तपस्विनी कीदृशैः अक्षरैः स्वापत्यं निर्भर्त्सयति ?
(iii) रामः कथम् अवलोकयति ?
(iv) लवकुशयोः कीदृशी जननी तौ निर्भर्त्सयति ?
उत्तराणि:
(i) लवकुशयोः जनकस्य नाम तपोवने न कश्चिदपि व्यवहरति।
(ii) तपस्विनी मन्युग|ः अक्षरैः स्वापत्यं निर्भर्त्सयति।
(iii) रामः सवाष्पम् अवलोकयति।
(iv) लवकुशयोः अवमानिता निर्वासिता च जननी तौ निर्भर्त्सयति ।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘सानुक्रोशः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम ?
(ii) ‘प्रकृतिस्था’ इत्यस्य प्रयुक्तं विपरीतार्थकपदं किम् ?
(iii) ‘अवमानिता’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘यद्यावयोः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘बालभावजनितम्’ इति विशेषणस्य विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) निरनुक्रोशः ।
(ii) कुपिता।
(ii) क्त।
(iv) यदि + आवयोः ।
(v) अविनयम्।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
शब्दार्थाः- निरनुक्रोशः = (निर्दयः) दया रहित। वयस्य = (मित्र) मित्र। भणति = (कथयति) कहता है। अम्बा = (जननी) माता। उत = (अथवा) अथवा। प्रकृतिस्था = (सामान्य-मनस्थितिः) स्वाभाविक रूप से। अधिक्षिपति = (अधिक्षेपं करोति) फटकारती है। चापलम् = (चपलताम्) चंचलता। अवमानिता = (तिरस्कृता) अपमानित । दारको = (पुत्रौ) पुत्र । निर्भर्त्सयति = (तर्जयति) धमकाती है। निःश्वस्य = (दीर्घ श्वासं गृहीत्वा) दीर्घ श्वास लेकर। स्वापत्यम् = (स्वसन्ततिम्) अपनी सन्तान की। सवाष्पम् = (अश्रुसहितम्) आँसुओं के साथ।

संदर्भ:-पूर्ववत्।। प्रसंग:-जब राम को लव-कुश से यह पता चलता है कि उनकी माता क्रोधवश उनके पिता के लिए ‘निर्दय’ विशेषण का प्रयोग करती है तो राम को स्वयं पर आत्मग्लानि होती है। इसी का वर्णन प्रस्तुत नाट्यांश में है।

हिन्दी अनुवाद
राम – मैं आप दोनों के पिता को नाम से जानना चाहता हूँ।
लव – इनका (पिता का) नाम तो मैं नहीं जानता हूँ। इस तपोवन में कोई भी उनका नाम नहीं लेता।
राम – अहो (आश्रम की) श्रेष्ठता।
कुश – मैं उनका नाम जानता हूँ।
राम – कहो।
कुश – निर्दय ……
राम – मित्र, विचित्र नाम है।
विदूषक – (विचारकर) तो इस प्रकार पूछता हूँ। ‘निर्दय’ ऐसा कौन कहता है ?
कुश – माता।
विदूषक – क्या इस प्रकार क्रोध में कहती है अथवा स्वाभाविक रूप से ?
कुश – यदि हम दोनों के बालभाव से उत्पन्न कोई अविनय देखती हैं, तब इस प्रकार फटकारती हैं ‘निर्दय के पुत्रो ! चञ्चलता मत करो।
विदूषक – इन दोनों के पिता का नाम यदि निर्दय है, तो इनकी माता उसके द्वारा अपमानित और घर से निकाली गई हैं ; इसीलिए ऐसे वचनों से दोनों पुत्रों को धमकाती है।
राम – (मन ही मन) ऐसे ही (निर्दय आचरण वाले) मुझको धिक्कार है। वह तपस्विनी मेरे द्वारा किए गए अपराध के कारण अपनी ही सन्तान को मन में दबे हुए क्रोध पूर्ण शब्दों से धमकाती है। (आँखों में आँसू भरकर देखता है।)

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5. रामः – अतिदीर्घः प्रवासोऽयं दारुणश्च। (विदूषकमवलोक्य जनान्तिकम्) कुतूहलेनाविष्टो मातरमनयो मतो वेदितुमिच्छामि। न युक्तं च स्त्रीगतमनुयोक्तुम्, विशेषतस्तपोवने। तत् कोऽत्राभ्युपायः ?
विदूषकः – (जनान्तिकम्) अहं पुनः पृच्छामि। (प्रकाशम्) किं नामधेया युवयोर्जननी ?
लवः – तस्याः द्वे नामनी।
विदूषकः – कथमिव ?
लवः – तपोवनवासिनो देवीति नाम्नाह्वयन्ति, भगवान् वाल्मीकिर्वधूरिति। अपि च इतस्तावद् वयस्य !
विदूषकः – (उपसृत्य) आज्ञापयतु भवान्।
रामः – अपि कुमारयोरनयोरस्माकं च सर्वथा समरूपः कुटुम्बवृत्तान्तः ?

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) अतिदीर्घः दारुणश्च कः ?
(ii) कुशलवयोः मातरं नामतः कः वेदितुम् इच्छति ?
(ii) विदूषकः कम् उपसृत्य ‘आज्ञापयतु भवान्’ इति कथयति ?
(iv) ‘देवी’ इति के आह्वयन्ति ?
(v) कुशलवी कः त्वरयति ?
उत्तराणि:
(i) प्रवासः।
(ii) रामः ।
(iii) रामम्।
(iv) तपोवनवासिनः ।
(v) उपाध्यायदूतः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) किं युक्तं नास्ति ?
(ii) द्वे नामनी कस्याः स्त: ?
(iii) कुशलवयोः मातरं वधू’ इति नाम्ना कः आह्वयति ?
(iv) कुशलवयोः रामस्य च कुटुम्ब-वृत्तान्तः कीदृशः अस्ति ?
उत्तराणि
(i) स्त्रीगतमनुयोक्तुं युक्तं नास्ति।
(ii) द्वे नामनी कुशलवयोः मातुः स्तः ।
(iii) कुशलवयोः मातरं ‘वधू’ इति नाम्ना वाल्मीकिः आह्वयति।
(iv) कुशलवयोः रामस्य च कुटुम्ब-वृत्तान्तः सर्वथा समरूपः अस्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘ज्ञातुम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) अति दारुणः कः ?
(iii) ‘आज्ञापयतु भवान्’ इति कः कथयति ?
(iv) ‘सामान्यतः’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(v) ‘कुमारनयोरस्माकम्’-अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) वेदितुम्।
(ii) प्रवासः।
(iii) विदूषकः।
(iv) विशेषतः ।
(v) कुमारयोः + अनयोः + अस्माकम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-दारुणः = (कठोरः) कठोर। जनान्तिकम् = (नाटके अन्योन्यम् आमन्त्रणं यत् स्यात् जनान्ते तत् जनान्तिकम्) नाटक में किसी पात्र का दूसरी ओर मुख करके इस प्रकार बात कहना कि रंगमंच पर उपस्थित दूसरा पात्र उसकी बात नहीं सुन रहा है। वेदितुम् = (ज्ञातुम्) जानने के लिए। स्त्रीगतम् = (स्त्रीविषयकम्) स्त्रियों से सम्बन्धित। अनुयोक्तुम् = (परीक्षितुम्, अन्ये विषये पृष्टाः प्रश्नाः) दूसरे के सम्बन्ध में की गई पूछताछ। अभ्युपायः = (उपायः, संसाधनम्) उपाय, संसाधन। आह्वयन्ति = (आकारयन्ति) पुकारते हैं। कुटुम्ब-वृत्तान्तः = (कुल-परिचयः) पारिवारिक वृत्तान्त।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत नाट्यांश में राम और विदूषक लव-कुश से उनकी माता का नाम जानना चाहते हैं।

हिन्दी अनुवाद: राम: – यह प्रवास बहुत लम्बा और कठोर है। (विदूषक को देखकर एक ओर मुँह करके) कुतूहल से घिरा मैं इनकी माता को नाम से जानना चाहता हूँ। स्त्रियों के विषय में पूछताछ उचित नहीं है, विशेष रूप से तपोवन में। तो यहाँ कौन-सा उपाय है ? ।
विदूषक – (एक ओर को मुँह करके) मैं फिर पूछता हूँ। (प्रकट रूप में) तुम दोनों की माता का क्या नाम है ?
लव – उसके दो नाम हैं। विदूषक कैसे ? लव तपोवन के निवासी ‘देवी’ इस नाम से पुकारते हैं, भगवान् वाल्मीकि ‘वधू’ इस नाम से।
राम – और भी तो मित्र ! इधर क्षण भर के लिए (आना)।
विदूषक – (पास आकर) आप आज्ञा कीजिए।
राम – क्या दोनों कुमारों का और हमारा कुटुम्ब वृत्तान्त सब प्रकार से एक समान है ? (अर्थात् अवश्य ही एक समान है।) (नेपथ्ये)

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6. इयती वेला सञ्जाता रामायणगानस्य नियोगः किमर्थं न विधीयते ?
उभौ – राजन् ! उपाध्यायदूतोऽस्मान् त्वरयति।
रामः – मयापि सम्माननीय एव मुनिनियोगः। तथाहिभवन्तौ गायन्तौ कविरपि पुराणो व्रतनिधिर् गिरां सन्दर्भोऽयं प्रथममवतीर्णो वसुमतीम्। कथा चेयं श्लाघ्या सरसिरुहनाभस्य नियतं, पुनाति श्रोतारं रमयति च सोऽयं परिकरः॥ वयस्य ! अपूर्वोऽयं मानवानां सरस्वत्यवतारः, तदहं सुहृज्जनसाधारणं श्रोतुमिच्छामि। सन्निधीयन्तां सभासदः, प्रेष्यतामस्मदन्तिकं सौमित्रिः, अहमप्येतयोश्चिरासनपरिखेदं विहरणं कृत्वा अपनयामि। (इति निष्क्रान्ताः सर्वे)

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कस्य नियोगः न विधीयते ?
(ii) रामेण माननीयः कः अस्ति ?
(iii) कथा कीदृशी अस्ति ?
(iv) अयं मानवानां सरस्वत्यवतारः कीदृशः ?
(v) रामस्य अन्तिकं कः प्रेष्यताम् ?
उत्तराणि:
(i) रासायणगानस्य।
(ii) मुनि-नियोगः।
(iii) श्लाघ्या।
(iv) अपूर्वः ।
(v) सौमित्रिः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कः कुशलवयोः त्वरयति ?
(ii) रामायणस्य कविः कीदृशः अस्ति ?
(iii) इयं कथा कस्य अस्ति ?
(iv) अयं परिकरः श्रोतारं किं करोति ?
उत्तराणि:
(i) उपाध्यायदूतः कुशलवयोः त्वरयति।
(ii) रामायणस्य कविः पुराणः व्रतनिधिः अस्ति।
(iii) इयं कथा सरसिरुहनाभस्य अस्ति ?
(iv) अयं परिकरः श्रोतारं पुनाति रमयति च।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘लक्ष्मणः’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘अवतीर्णः’ इति पदे प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iii) ‘दूरम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘सरस्वत्यवतारः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘कविरपि पुराणो व्रतनिधिः’-अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) सौमित्रिः।
(ii) अव + तु + क्त।
(iii) अन्तिकम्।
(iv) सरस्वती + अवतारः।
(v) कविः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
श्लोकान्वयः-भवन्तौ गायन्तौ, पुराणः व्रतनिधिः कविः अपि, वसुमतीम् प्रथम अवतीर्णः गिराम् अयं, सन्दर्भः सरसिरुहनाभस्य च इयं श्लाघ्या कथा, सः च अयं परिकरः नियतं श्रोतारं पुनाति रमयति च।

शब्दार्थाः-नियोगः = (कार्ये नियुक्तः) कार्य में लगाना। गिराम् = (वाणीम्) वाणी को। श्लाघ्या (प्रशंसनीया)
= प्रशंसा के योग्य। सरसिरुहनाभस्य = (सरसिरुहं कमलं नाभ्यां यस्य सः, तस्य) कमलनाभि, भगवान् विष्णु। परिकरः = (संयोगः) संयोग। पुनाति = (पवित्रं करोति) पवित्र करता है। अन्तिकम् = (समीपम्) पास में।

संदर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत नाट्यांश में लव-कुश द्वारा रामायण-गान किए जाने का वर्णन किया गया है।

हिन्दी अनुवाद: (नेपथ्य में) यह रामायण-गान का समय हो गया है। फिर निर्धारित कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है ?
दोनों – राजन् ! उपाध्याय का दूत इससे शीघ्रता करवा रहा है।
राम – मुनियों द्वारा निर्धारित कार्य मेरे लिए भी सम्माननीय है। क्योंकि

श्लोकार्थः- आप दोनों (कुश और लव) इस कथा का गान करने वाले हैं, तपोनिधि पुराण मुनि (वाल्मीकि) इस रचना के कवि हैं, धरती पर प्रथम बार अवतरित होने वाला स्फुट वाणी का यह काव्य है और इसकी कथा कमलनाभि विष्णु से सम्बद्ध है, इस प्रकार निश्चय ही यह संयोग श्रोताओं को पवित्र और आनन्दित करने वाला है।
मित्र ! मनुष्यों में यह सरस्वती का अवतार अद्भुत है। इसीलिए मित्रजनों के लिए सामान्य मनुष्य की भाँति इसे सुनना चाहता हूँ। सभासद् बैठ जाएँ, सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण को हमारे पास भेज दिया जाए, मैं भी इन दोनों को देर तक गोद रूपी आसन पर बैठाए रखने की थकावट को घूम कर दूर करता हूँ।

(इस प्रकार सब निकल जाते हैं।)
श्लोक-भावार्थ:-भगवान् वाल्मीकि द्वारा निबद्ध पुराणपुरुष की कथा, कुश लव द्वारा श्री राम को सुनाई जानी थी, उसी की सूचना देते हुए नेपथ्य से कुश और लव को बिना समय नष्ट किए अपने कर्तव्य का पालन करने का निर्देश दिया जाता है। दोनों राम से आज्ञा लेकर जाना चाहते हैं, तब श्री राम उपर्युक्त श्लोक के माध्यम से उस रचना का सम्मान करते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 4 शिशुलालनम्

शिशुलालनम् Summary in Hindi

शिशुलालनम् पाठ परिचय:
(बालक से लाड़-प्यार)
संस्कृत साहित्य के विकास में दक्षिण भारतीय विद्वानों का विशिष्ट योगदान रहा है। ऐसे ही एक विद्वान ‘दिङ्नाग’ संस्कृत में प्रसिद्ध नाटककार हुए हैं। ‘कुन्दमाला’ नामक नाटक दिङ्नाग की ही प्रसिद्ध रचना है। छ: अंकों के इस नाटक की कथा वाल्मीकीय रामायण पर आधारित है। इस नाटक में सीता के निर्वासन की करुण कथा वर्णित हुई है। सम्पूर्ण नाटक का घटनास्थल महर्षि वाल्मीकि का आश्रम है। राम गंगा में बहती हुई कुन्दपुष्पों की एक माला देखते हैं। यह माला सीता द्वारा गूंथी हुई थी। राम इस माला को देखकर सीता का स्मरण करते हैं और बीते दिनों की याद में खो जाते हैं। नाटक में राम अपने पुत्रों कुश और लव को पहचानते हुए कौतुहल वर्धक परिकल्पना करते हैं।
इस नाटक का मुख्य रस करुण है। राम कथा के करुण एवं दुःखपूर्ण उत्तरार्ध की नाटकीय संभावनाओं को दिङ्नाग ने अपने इस कुन्दमाला नाटक में रूपान्तरित किया है। प्रस्तुत पाठ ‘शिशुपालनम्’ संस्कृतवाङ्मय के इसी प्रसिद्ध नाटक ‘कुन्दमाला’ के पंचम अङ्क से सम्पादित किया गया है। इस नाटकांश में राम कुश और लव को सिंहासन पर बैठाना चाहते हैं किन्तु वे दोनों अतिशालीनतापूर्वक मना करते हैं। सिंहासनारूढ़ राम कुश और लव के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर उन्हें अपनी गोद में बैठा लेते हैं और आनन्दित होते हैं। पाठ में शिशु स्नेह का अत्यन्त मनोहारी वर्णन किया गया है।

शिशुलालनम् पाठस्य सारांशः
प्रस्तुत पाठ ‘शिशुलालनम्’ संस्कृत के प्रसिद्ध नाटककार दिङ्नाग द्वारा रचित कुन्दमाला नामक नाटक से लिया गया है। नाटक के इस अंश में शिशु स्नेह का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया गया है। पाठ का सारांश इस प्रकार हैं
राम सिंहासन पर विराजमान हैं, तपस्वी के रूप में कुश और लव का प्रवेश होता है। वे प्रणामपूर्वक राजा राम का कुशल पूछते हैं परन्तु दोनों बालक इतने भोले और मोहक आकृति वाले हैं कि राम उनके सौन्दर्य में खो जाते हैं।
उनका मन करता है कि इन दोनों को गले से लगा लूँ, इन्हें अपनी गोद में बिठाकर प्यार करूँ। इसलिए राम कहते हैं कि क्या कुशल ही पूछते रहेंगे, आकर गले नहीं मिलोगे ? राम उन्हें गले भी लगाते हैं, परन्तु उनका मन नहीं भरता इसलिए आधा आसन खाली छोड़ कर उन दोनों को उस पर बैठने के लिए कहते हैं। दोनों बालक जानते हैं कि राज सिंहासन पर बैठना अनुचित है। इसीलिए मना कर देते हैं। फिर राम कहते हैं कि यदि गोद में सिंहासन बनाकर बैठे जाओगे तो इससे शिष्टाचार का उल्लंघन नहीं होगा। दोनों बालक अनिच्छा के साथ गोद में बैठ जाते हैं। राम के पूछने पर वे अपने आपको सूर्यवंशी बताते हैं और यह भी प्रकट करते हैं कि वे दोनों जुड़वा भाई हैं। सूर्यवंशी सुनकर राम का कौतूहल और भी बढ़ जाता है क्योंकि राम सूर्यवंशी है।

राम के पुनः पूछने पर लव अपने गुरु का नाम वाल्मीकि बताता है। जिन्होंने उनका उपनयन संस्कार किया है। पिता का नाम पूछने पर लव तो अनभिज्ञता प्रकट करता है परन्तु बालसुलभ चंचलता वश कुश अपने पिता का नाम निर्दय बताता है। इस अपूर्व नाम को सुनकर राम और विदूषक एक दूसरे की ओर आश्चर्यपूर्वक देखते हैं। विदूषक उससे पूछता है कि तुम्हारे पिता के लिए निर्दय ऐसा सम्बोधन कौन करता है ? कुश कहता है कि जब हम दोनों ढिठाई करते हैं तो माँ हमें निर्दय कहकर डाँटती है। राम यह सब सुनकर मन ही मन पश्चात्ताप करते हैं ; क्योंकि वे विचारते हैं कि इन सब परिस्थितियों का कारण मैं हूँ।

राम के कहने पर जब विदूषक उन दोनों की माता का नाम पूछता है,तो लव बताता है कि तपोवन वासी मेरी माँ को ‘देवी’ कहकर बुलाते हैं, महर्षि वाल्मीकि ‘वधू’ कहकर पुकारते हैं। इस तरह मेरी माँ के दो नाम हैं। दोनों बालकों से परिचय पाकर राम विदूषक महर्षि वाल्मीकि से कहते हैं कि इनके परिवार का वृतान्त तो हमारे परिवार के वृतान्त से मिलता है। तभी पर्दे के पीछे से आवाज़ आती है कि रामायण के गान का समय हो गया है। अत: गुरु जी की आज्ञानुसार तुरन्त यह गायन करना चाहिए। राम भी इससे सहमत होते हैं और मंच से सब चले जाते हैं। इस प्रकार शिशु स्नेह के स्वाभाविक प्रदर्शन के साथ यह नाट्यांश समाप्त हो जाता है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

HBSE 10th Class Sanskrit व्यायामः सर्वदा पथ्यः Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) कीदृशं कर्म व्यायामसंज्ञितम् कथ्यते ?
(ख) व्यायामात् किं किमुपजायते ?
(ग) जरा कस्य सकाशं सहसा न समधिरोहति ?
(घ) कियता बलेन व्यायामः कर्तव्यः ?
(ङ) अर्धबलस्य लक्षणं किम् ?
उत्तराणि
(क) शरीरायाससजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम् कथ्यते।
(ख) व्यायामात् शरीरोपचयः कान्तिः गात्राणां सुविभक्तता दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं लाघवं, मजा, श्रम-क्लम-पिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता आरोग्यं च उपजायते।
(ग) जरा व्यायामाभिरतस्य सकाशं सहसा न समधिरोहति।
(घ) अर्धेन बलेन व्यायामः कर्तव्यः।
(ङ) यदा व्यायाम कुर्वतः हृदि स्थानास्थितो वायुः वक्त्रं प्रपद्यते, तद् अर्धबलस्य लक्षणम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

प्रश्न 2.
उदाहरणमनुसृत्य कोष्ठकगतेषु पदेषु तृतीयाविभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयतयथा – व्यायामः …….. हीनमपि सुदर्शनं करोति (गुण)
व्यायामः गुणैः हीनमपि सुदर्शनं करोति।
(क) ……………… व्यायामः कर्तव्यः। (बलस्यार्ध)
(ख) …………….. सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति। (व्यायाम)
(ग) ……………… विना जीवनं नास्ति। (विद्या)
(घ) सः …………….. खञ्जः अस्ति । (चरण)
(ङ) सूपकारः ……………. भोजनं जिघ्रति। (नासिका)
उत्तराणि
यथा – व्यायामः ……………….. हीनमपि सुदर्शनं करोति (गुण)
व्यायाम: गुणैः हीनमपि सुदर्शनं करोति।
(क) बलस्यार्धेन व्यायामः कर्तव्यः । (बलस्यार्ध)
(ख) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति। (व्यायाम)
(ग) विद्यया विना जीवनं नास्ति। (विद्या)
(घ) सः चरणेन खञ्जः अस्ति। (चरण)
(ङ) सूपकारः नासिकया भोजनं जिघ्रति। (नासिका)

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

प्रश्न 3.
स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) शरीरस्य आयासजननं कर्म व्यायामः इति कथ्यते।
(ख) अरयः व्यायामिनं न अर्दयन्ति।
(ग) आत्महितैषिभिः सर्वदा व्यायामः कर्तव्यः ।
(घ) व्यायामं कुर्वतः विरुद्धं भोजनम् अपि परिपच्यते।
(ङ) गात्राणां सुविभक्तता व्यायामेन संभवति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) कस्य आयासजननं कर्म व्यायामः इति कथ्यते ?
(ख) के व्यायामिनं न अर्दयन्ति ?
(ग) कैः सर्वदा व्यायामः कर्तव्यः ?
(घ) व्यायाम कुर्वतः कीदृशं भोजनम् अपि परिपच्यते ?
(ङ) केषां सुविभक्तता व्यायामेन संभवति ?

प्रश्न 4.
निम्नलिखितानाम् अव्ययानाम् रिक्तस्थानेषु प्रयोगं कुरुत
सहसा, अपि, सदृशं, सर्वदा, यदा, सदा, अन्यथा
(क) ……………… व्यायामः कर्तव्यः।
(ख) ………………….. मनुष्यः सम्यक् रूपेण व्यायामं करोति तदा सः …. स्वस्थः तिष्ठति।
(ग) व्यायामेन असुन्दरा: ………………. सुन्दराः भवन्ति।
(घ) व्यायामिनः जनस्य सकाशं वार्धक्यं ……………….. नायाति।
(ङ) व्यायामेन ……….. किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(च) व्यायाम समीक्ष्य एव कर्तव्यम् . ….. व्याधयः आयान्ति।
उत्तराणि
(क) सदा व्यायामः कर्तव्यः।
(ख) यदा मनुष्यः सम्यक्पेण व्यायाम करोति तदा सः सर्वदा स्वस्थः तिष्ठति।
(ग) व्यायामेन असुन्दराः अपि सुन्दराः भवन्ति।
(घ) व्यायामिनः जनस्य सकाशं वार्धक्यं सहसा नायाति।
(ङ) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(च) व्यायाम समीक्ष्य एव कर्तव्यम् अन्यथा व्याधयः आयान्ति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

प्रश्न 5.
(क) अधोलिखितेषु तद्धितपदेषु प्रकृति/प्रत्ययं च पृथक् कृत्वा लिखत
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-1
उत्तराणि
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(ख) अधोलिखितकृदन्तपदेषु मूलधातुं प्रत्ययं च पृथक् कृत्वा लिखतमूलशब्दः
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-3
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-4

प्रश्न 6.
अधोलिखितेभ्यः पदेभ्यः उपसर्गान् पृथक् कृत्वा लिखत
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-5
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः img-6

प्रश्न 7.
(क) षष्ठ-श्लोकस्य भावमाश्रित्य रिक्तस्थानानि पूरयत
यथा – ……….. समीपे उरगा: न ………… एवमेव व्यायामिनः जनस्य समीपं ……….. न गच्छन्ति। व्यायामः वयोरूपगुणहीनम् अपि जनम् …………. करोति।
उत्तरम्-यथा वैनतेयस्य समीपे उरगाः न गच्छन्ति एवमेव व्यायामिनः जनस्य समीपं व्याधयः न गच्छन्ति। व्यायामः वयोरूपगुणहीनम् अपि जनं सुदर्शनं करोति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

(ख) उदाहरणमनुसृत्य वाच्यपरिवर्तनं कुरुत
कर्मवाच्यम् कर्तृवाच्यम्
यथा-आत्महितैषिभिः व्यायामः क्रियते आत्महितैषिणः व्यायाम कुर्वन्ति।
(1) बलवता विरुद्धमपि भोजनं पच्यते ……………………………..
(2) जनैः व्यायामेन कान्तिः लभ्यते ……………………………..
(3) मोहनेन पाठः पठ्यते ……………………………..
(4) लतया गीतं गीयते ……………………………..
उत्तराणि
कर्मवाच्यम् कर्तृवाच्यम्
यथा-आत्महितैषिभिः व्यायामः क्रियते – आत्महितैषिण: व्यायाम कुर्वन्ति। .
(1) बलवता विरुद्धमपि भोजनं पच्यते – बलवान् विरुद्धमपि भोजनं पचति।
(2) जनैः व्यायामेन कान्तिः लभ्यते – जनाः व्यायामेन कान्तिं लभन्ते।
(3) मोहनेन पाठः पठ्यते – मोहनः पाठं पठति।
(4) लतया गीतं गीयते । – लता गीतं गायति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

(ग) ‘व्यायामस्य लाभाः’ इति विषयमधिकृत्य पञ्चवाक्येषु एकम् अनुच्छेदं लिखत।
उत्तरम्
(1) स्वास्थ्यरक्षायाः सर्वोत्तमः उपायः व्यायामः अस्ति।
(2) व्यायामाः बहुविधाः भवन्ति, यथा-धावनम्, कूर्दनम्, तरणम्, मल्लयुद्धम् इत्यादयः।
(3) व्यायामेन शरीरं हृष्टं पुष्टं स्वस्थं बलिष्ठं च भवति।
(4) शरीरस्य सर्वांगीणविकासाय व्यायाम: आवश्यकः भवति।
(5) व्यायामेन शरीरम् एव आरोग्यं न लभते, मनः अपि प्रसन्नं भवति, अतः यथाबलं व्यायामः कर्तव्यः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

योग्यताविस्तारः
(क) सुश्रुतः आयुर्वेदस्य ‘सुश्रुतसंहिता’ इत्याख्यस्य ग्रन्थस्य रचयिता। अस्मिन् ग्रन्थे शल्यचिकित्सायाः । प्राधान्यमस्ति। सुश्रुतः शल्यशास्त्रज्ञस्य दिवोदासस्य शिष्यः आसीत्। दिवोदासः सुश्रुतं वाराणस्याम् आयुर्वेदम् अपाठयत्। सुश्रुतः दिवोदासस्य उपदेशान् स्वग्रन्थेऽलिखत्
सुश्रुत आयुर्वेद के ‘सुश्रुतसंहिता’ नामक ग्रन्थ के रचयिता हैं। इस ग्रन्थ में शल्यचिकित्सा की प्रधानता है। सुश्रुत शल्य शास्त्र के ज्ञाता दिवोदास के शिष्य थे। दिवोदास ने सुश्रुत को वाराणसी में आयुर्वेद बढ़ाया था। सुश्रुत ने दिवोदास के उपदेशों को अपने ग्रन्थ में लिखा।

(ख) उपब्धासु आयुर्वेदीय-संहितासु ‘सुश्रुतसंहिता’ सर्वश्रेष्ठः शल्यचिकित्साप्रधानो ग्रन्थः। अस्मिन् ग्रन्थे 120 अध्यायेषु क्रमेण सूत्रस्थाने मौलिकसिद्धान्तानां शल्यकर्मोपयोगि-यन्त्रादीनां, निदानस्थाने प्रमुखाणां रोगाणां, शरीरस्थाने शरीरशास्त्रस्य चिकित्सास्थाने शल्यचिकित्सायाः, कल्पस्थाने च विषाणां प्रकरणानि वर्णितानि। अस्य उत्तरतन्त्रे 66 अध्यायाः सन्ति।
उपलब्ध आयुर्वेद की संहिताओं में सुश्रुत संहिता सर्वश्रेष्ठ शल्यचिकित्सा-प्रधान ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में 120 अध्यायों में क्रमशः सूत्र स्थान में मौलिक सिद्धान्तों का शल्य कर्म के लिए उपयोगी यन्त्र आदि का, निदान-स्थान में प्रमुख रोगों का, शरीर-स्थान में शरीर शास्त्र का, चिकित्सा-स्थान में शल्य चिकित्सा का और कल्प-स्थान में विषों के प्रकरण वर्णित हैं। इसके उत्तर तन्त्र में 66 अध्याय है।

(ग) वैनतेयमिवोरगा:-कश्यप ऋषि की दो पत्नियाँ थीं-कट्ठ और विनता। विनता का पुत्र गरुड़ था और कद्रु का पुत्र सर्प। विनता का पुत्र होने के कारण गरुड़ को वैनतेय कहा जाता है। (विनतायाः अयम् वैनतेयः, अण् प्रत्यये कृते)। गरुड़ सर्प से अधिक ताकतवर होता है, भयवश साँप गरुड़ के पास जाने का साहस नहीं करता। यहाँ व्यायाम करने वाले मनुष्य की तुलना गरुड़ से तथा व्याधियों की तुलना साँप से की गई है। जिस प्रकार गरुड़ के समक्ष साँप नहीं जाता। उसी प्रकार व्यायाम करने वाले व्यक्ति के पास रोग नहीं फटकते।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

भाषिकविस्तारः
गुणवाचक शब्दों से भाव अर्थ में ष्यञ् अर्थात् य प्रत्यय लगाकर भाववाची पदों का निर्माण किया जाता है। शब्द के प्रथम स्वर में वृद्धि होती है और अन्तिम अ का लोप होता है।
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थाल्-प्रत्ययः-‘प्रकार’ अर्थ में थाल् प्रत्यय का प्रयोग होता है।
जैसेतेन प्रकारेण – तथा
येन प्रकारेण – यथा
अन्येन प्रकारेण – अन्यथा
सर्व-प्रकारेण – सर्वथा
उभय-प्रकारेण – उभयथा

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

भावविस्तारः
(क) शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्
शरीर ही सर्वप्रथम धर्म-साधन है।

(ख) लाघवं कर्मसामर्थ्य स्थैर्यं क्लेशसहिष्णुता।
दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते॥
स्फूर्ति कार्य करने की सामर्थ्य, दृढ़ निश्चयता (स्थिरता) कष्टों को सहने की क्षमता, दोषों का नाश और (पाचन) अग्नि में वृद्धि व्यायाम से उत्पन्न होती है।

(ग) यथा शरीरस्य रक्षायै उचितं भोजनम् उचितश्च व्यवहारः आवश्यकोऽस्ति तथैव शरीरस्य स्वास्थ्याय व्यायामः अपि आवश्यकः।
जिस प्रकार शरीर की रक्षा के लिए उचित भोजन और उचित व्यवहार आवश्यक है, उसी प्रकार शरीर के स्वास्थ्य के लिए व्यायाम भी आवश्यक है।

(घ) युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। .
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥

योग आहार-विहार से युक्त, कर्मों में प्रयत्नशीलता से युक्त, स्वप्न तथा जागरण से युक्त मनुष्य के दुःखों का हरण करने वाला होता है।

(ङ) पक्षिणः आकाशे उड्डीयन्ते तेषाम् उड्डयनमेव तेषां व्यायामः। पशवोऽपि इतस्ततः पलायन्ते, पलायनमेव तेषां व्यायामः । शैशवे शिशुः स्वहस्तपादौ चालयति, अयमेव तस्य व्यायामः । वि + आ + यम् धातोः घञ् प्रत्ययात् निष्पन्नः व्यायाम शब्दः विस्तारस्य विकासस्य च वाचकः। यतो हि व्यायामेन अङ्गानां विकासः भवति। अतः सुखपूर्वकं जीवनं यापयितुं मनुष्यैः नित्यं व्यायामः करणीयः।
पक्षी आकाश में उड़ते हैं, उनके उड़ने में ही उनका व्यायाम है। पशु भी इधर-उधर घूमते है, घूमना ही उनका व्यायाम है। बचपन में बालक अपने हाथ-पैर चलाता है, यही ही उसका व्यायाम है। वि + आ + यम् धातु से घञ् प्रत्यय से निष्पन्न व्यायाम शब्द विस्तार और विकास का वाचक है। क्योंकि व्यायाम से अंगों का विकास होता है, अतः सुखपूर्वक जीवन बिताने के लिए मनुष्य को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

HBSE 10th Class Sanskrit व्यायामः सर्वदा पथ्यः Important Questions and Answers

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पठित-अवबोधनम्

1. निर्देशः- अधोलिखितं पद्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्।
तत्कृत्वा तु सुखं देहं विमृद्नीयात् समन्ततः ॥1॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कीदृशं कर्म व्यायामसंज्ञितम् ?
(ii) देहं समन्ततः किं कुर्यात् ?
(iii) देहं कथं विमदनीयात् ?
(iv) केन आयासजननं कर्म ‘व्यायामः’ इति कथितम् ?
उत्तराणि:
(i) शरीरायासजननम्।
(ii) विमृदुनीयात् ।
(iii) सुखम्।
(iv) शरीरेण।

(ख) पूर्णवाक्येन:
(i) व्यायामसंज्ञितं कर्म किम् अस्ति ?
(ii) व्यायामं कृत्वा किं कुर्यात् ? उत्तराणि
उत्तरत:
(i) व्यायामसंज्ञितं कर्म शरीरायासजननम् अस्ति।
(ii) व्यायामं कृत्वा समन्ततः देहं विमृद्नीयात् ।

(ग) निर्देशानुसारम्:
(i) ‘शरीरम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं पर्यायपदं किम् ?
(ii) ‘कृत्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘दुःखम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किमस्ति ?
(iv) ‘शरीरायासजननम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) देहम्।
(ii) क्त्वा।
(iii) सुखम्।
(iv) शरीर + आयासजननम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- शरीरायासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम् (भवति) तत् कृत्वा तु देहं समन्ततः सुख विमृनीयात् ।

शब्दार्थाः- शरीर-आयास-जननम् = शरीर में थकावट पैदा करने वाला। आयासः = (परिश्रमः, प्रयत्नः, प्रयासः, श्रमः) परिश्रम, मेहनत। देहम् = (शरीरम्) शरीर। विमृद्नीयात् = (मर्दयेत्) मालिश करनी चाहिए। समन्ततः = (सर्वतः) सब ओर से।

संदर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सुश्रुत संहिता’ के 24 वें अध्याय से हमारी पाठ्य- पुस्तक ‘शेमुषी-द्वितीयो भागः’ में संकलित ‘व्यायामः सर्वदा पथ्यम्’ नामक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग:- प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम की परिभाषा बताई गई है। –

सरलार्थः- शरीर में थकावट करने वाला अर्थात् परिश्रम वाला कार्य व्यायाम कहलाता है। उस व्यायाम को करके शरीर की सभी ओर से सुखपूर्वक मालिश करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

2. भावार्थ:- परिश्रम वाले कार्य को व्यायाम कहते हैं। इसके पश्चात् पूरे शरीर की भली-भाँति मालिश करनी चाहिए।
शरीरोपचयः कान्तित्राणां सुविभक्तता।
दीप्ताग्नित्वमनालस्यं स्थिरत्वं लाघवं मजा॥2॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायामात् कस्य उपचयः भवति ?
(ii) अत्र केषां सुविभक्तता कथिता ?
(iii) व्यायामात् कीदृशं अग्नित्वं जायते ?
(iv) अनालस्यं कस्मात् जायते ?
उत्तराणि-:
(i) शरीरस्य।
(ii) गात्राणाम्।
(iii) दीप्तम्।
(iv) व्यायामात्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत:
(i) व्यायामात् किम् उपजायते ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामात् शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यम्, स्थिरत्वम्, लाघवं मजा च उपजायते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत:
(i) ‘शरीरोपचयः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सुविभक्तता’-अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iii) ‘आलस्यम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘स्थायित्वम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) शरीर + उपचयः ।
(ii) सु + वि + √भज् + क्त + तल्।
(iii) अनालस्यम्।
(iv) स्थिरत्वम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- (व्यायामात्) शरीरोपचयः, कान्तिः, गात्राणां सुविभक्तता, दीप्ताग्नित्वम्, अनालस्यं, स्थिरत्वं, लाघवं, मजा (उपजायते)।

शब्दार्थाः- उपचयः = (अभिवृद्धिः) वृद्धि। कान्तिः = (आभा) चमक। गात्रम् = (शरीरम्) शरीर । सुविभक्तता = (शारीरिकं सौष्ठवम्) शारीरिक सौन्दर्य । दीप्ताग्नित्वम् = (जठराग्नेः प्रवर्धनम्) जठराग्नि का प्रदीप्त होना अर्थात् भूख लगना। मृजा = (स्वच्छीकरणम्) स्वच्छ करना।

संदर्भ:-पूर्ववत्।

प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम के लाभ वर्णित किए गए हैं।

सरलार्थ:- व्यायाम से शरीर की वृद्धि, चमक, शारीरिक सौन्दर्य, जठराग्नि की वृद्धि, आलस्यहीनता, स्थिरता, फुर्ती और स्वच्छता (उत्पन्न होती है।)

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर का समुचित विकास होता है, चेहरे पर स्वाभाविक चमक आ जाती है, शरीर सडौल बनता है, पेट में भोजन को पचाने वाली अग्नि प्रदीप्त होने से अच्छी भूख लगती है, आलस्य दूर होता है; शरीर में स्थायित्व, स्फूर्ति तथा स्वच्छता आती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

3. श्रमक्लमपिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता।
आरोग्यं चापि परमं व्यायामादुपजायते ॥3॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) आरोग्यं कस्मात् उपजायते ?
(ii) कीदृशम् आरोग्यम् उपजायते ?
(iii) व्यायामात् शीतादीनां का उपजायते ?
(iv) श्रमस्य सहिष्णुता कस्मात् उपजायते ?
उत्तराणि-:
(i) व्यायामात्।
(ii) परमम्।
(iii) सहिष्णुता।
(iv) व्यायामात् ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामात् केषां सहिष्णुता उपजायते ?
(ii) व्यायामात् परमं किम् उपजायते ?
उत्तराणि
(i) व्यायामात् श्रम-क्लम-पिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता उपजायते।
(ii) व्यायामात् परमम् आरोग्यम् उपजायते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘उष्णम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘सहिष्णुता’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘रोगराहित्यम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘व्यायामात्’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
उत्तराणि-:
(i) शीतम्।
(ii) तल्।
(iii) आरोग्यम्।
(iv) पञ्चमी विभक्तिः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- व्यायामात् श्रमक्लमपिपासोष्ण-शीतादीनां सहिष्णुता,परमम् आरोग्यं च अपि उपजायते।

शब्दार्था:- क्लमः = (श्रमजनितं शैथिल्यम्) थकान। पिपासा = (पातुम् इच्छा) प्यास। उष्णः = (तापः) गर्मी। सहिष्णुता = (सहत्वं क्षमता) सहन करने की सामर्थ्य।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थ:- व्यायाम करने से परिश्रम से होने वाली थकान, प्यास, गर्मी-सर्दी आदि को सहन करने का सामर्थ्य और अच्छा स्वास्थ्य भी उत्पन्न होता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से गर्मी-सर्दी, श्रम जन्य थकावट, प्यास आदि को सहन करने की क्षमता बढ़ती है और उत्तम आरोग्य प्राप्त होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

4. न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षणम्।
न च व्यायामिनं मर्त्यमर्दयन्त्यरयो बलात् ॥4॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) स्थौल्यापकर्षणं किमस्ति ?
(ii) अरयः कं न अर्दयन्ति ?
(ii) अरयः कीदृशं मर्यं न अर्दयन्ति ?
(iv) अरयः कथं न अर्दयन्ति ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामः ।
(ii) मर्त्यम्।
(iii) व्यायामिनम्।
(iv) बलात्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) केन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति ?
(ii) व्यायामिनं मर्यं के न अर्दयन्ति ?
उत्तराणि
(i) व्यायामेन सदृशं किञ्चित् स्थौल्यापकर्षणं नास्ति।
(ii) व्यायामिनं मर्त्यम् अरयः न अर्दयन्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘तुल्यम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘तेन’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(iii) ‘अमर्त्यम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘शत्रवः’ इत्यस्य कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(v) ‘अर्दयन्त्यरयः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) सदृशम्।
(ii) व्यायामाय।
(iii) मर्त्यम्।
(iv) अरयः ।
(v) अर्दयन्ति + अरयः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- तेन सदृशं स्थौल्यापकर्षणं च किञ्चित् न अस्ति। अरयः च व्यायामिनं मर्यं बलात् न अर्दयन्ति।

शब्दार्थाः- स्थौल्यम् = (अतिमांसलत्वं, पीनता) मोटापा। अपकर्षणम् = (दूरीकरणम्) दूर करना, कम करना। अर्दयन्ति = (अर्दनं कुर्वन्ति) कुचल डालते हैं। अरयः = (शत्रवः) शत्रुगण। मय॑म् = (मनुष्यम्) व्यक्ति को।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ वर्णित किए गए हैं।

सरलार्थः- उस व्यायाम के समान मोटापे को कम करने वाला और कोई साधन नहीं है। शत्रु भी व्यायाम करने वाले व्यक्ति को बलपूर्वक पीड़ित नहीं करते हैं।

भावार्थः- व्यायाम से शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है, शरीर का थुलथुलापन दूर हो जाता है। व्यायाम करने वाले मनुष्य के हृष्ट-पुष्ट बलि शरीर को देखकर शत्रु भी दुम दबा कर भाग जाते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

5. न चैनं सहसाक्रम्य जरा समधिरोहति।
स्थिरीभवति मांसं च व्यायामाभिरतस्य च ॥5॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायामिनं का न समधिरोहति ?
(ii) व्यायामिनं जरा कथं न आक्रमते ?
(iii) किं स्थिरीभवति ?
(iv) कस्य मांसं स्थिरीभवति ?
उत्तराणि:
(i) जरा।
(ii) सहसा।
(iii) मांसम्।
(iv) व्यायामाभिरतस्य।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामाभिरतस्य मांसं कीदृशं भवति ?
उत्तराणि
(i) व्यायामाभिरतस्य मांसं स्थिरी भवति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘चैनम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘आक्रम्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(iii) “एनम्’ इति सर्वनामपदस्य स्थाने संज्ञापदं लिखत।
(iv) ‘अकस्मात्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) च + एनम्।
(ii) आ + क्रम् + ल्यप्।
(iii) व्यायामिनम्।
(iv) सहसा।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- जरा च सहसा आक्रम्य एनं न समधिरोहति। व्यायामाभिरतस्य हि मांसं च स्थिरीभवति।

शब्दार्थाः- आक्रम्य = (आक्रमणं कृत्वा) हमला करके। जरा = (वार्धक्यम्) बुढ़ापा। समधिरोहति = (आरूढं भवति) सवार होता है। अभिरतस्य = (संलग्नस्य) तल्लीन होने वाले का।

संदर्भ:- पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थः- व्यायाम करने वाले व्यक्ति पर बुढ़ापा सहसा आक्रमण कर सवार नहीं होता है। व्यायाम में लगे रहने वाले व्यक्ति का मांस भी पुष्ट हो जाता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर की मांस, मज्जा आदि सभी धातुएँ परिपुष्ट होने के कारण बुढ़ापा देर से आता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

6. व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्यामुवर्तितस्य च।
व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः वयोरूपगुणैीनमपि कुर्यात्सुदर्शनम् ॥6॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्यायमस्विन्नगात्रस्य के न उपसर्पन्ति ?
(ii) काभ्यां उद्वर्तितस्य व्याधयः नोपसर्पन्ति ?
(iii) व्याधयः के इव न उपसर्पन्ति ?
(iv) व्यायामः किं करोति ?
उत्तराणि:
(i) व्याधयः ।
(ii) पद्भ्याम्।
(iii) उरगाः ।
(iv) सुदर्शनम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्याधयः कस्य न उपसर्पन्ति ?
(ii) कैः हीनमपि सुदर्शनं कुर्यात् ?
(iii) व्यायामः अत्र व्याधीनां तुलना कैः सह कृता ?
उत्तराणि:
(i) व्याधयः व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य च न उपसर्पन्ति ।
(ii) व्यायामः वयोरूपगुणैः हीनमपि सुदर्शनं कुर्यात् ।
(iii) अत्र व्याधीनां तुलना उरगैः सह कृता।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘नोपसर्पन्ति’ अत्र सन्धिविच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सर्पाः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘वैनतेयमिवोरगाः’-अत्र प्रयुक्तम् अव्ययपदं किम् ?
(iv) ‘सुदर्शनम्’ अत्र कः उपसर्गः प्रयुक्तः ?
(v) ‘गरुडम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) न + उपसर्पन्ति ।
(ii) उरगाः ।
(iii) इव।
(iv) सु।
(v) वैनतेयम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- व्यायामस्विन्नगात्रस्य पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य च व्याधयः वैनतेयम् उरगाः इव न उपसर्पन्ति। वयोरूपगुणैः हीनम् अपि सुदर्शनं कुर्यात्।

शब्दार्थाः- स्विन्नगात्रस्य = (स्वेदेन सिक्तस्य शरीरस्य) पसीने से लथपथ शरीर का। पद्भ्याम् उद्वर्तितस्य = (पद्भ्याम् उन्नमितस्य) दोनों पैरों से ऊपर उठने वाले व्यायाम। व्याधयः = (रोगा:) बीमारियाँ। वैनतेयः = (गरुड:) गरुड़। उरगः = (सर्प) साँप।

संदर्भ:- पूवर्वत् प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में व्यायाम के लाभ बताए गए हैं।

सरलार्थः- शरीर को पसीने से लथपथ कर देने वाले तथा पैरों को ऊपर उठाने वाले व्यायाम करने वाले व्यक्ति के समीप रोग उसी प्रकार नहीं आते जैसे गरुड़ के समीप साँप नहीं आते हैं। व्यायाम आयु, रूप और अन्य गुणों से हीन व्यक्ति को भी सुन्दर बना देता है।

भावार्थ:- व्यायाम करने से शरीर से पसीना निकलता है। जिससे शरीर के रोमछिद्र पूरी तरह खुल जाते हैं, शरीर पूर्णतया स्वस्थ हो जाता है। जो मनुष्य व्यायाम द्वारा शरीर से पसीना निकालता है और ‘पादोत्तान’ आदि आसन करके अपने रक्तचाप को नियन्त्रित रखता है ; रोग उसके पास नहीं फटकते और शरीर में सौन्दर्य की अभिवृद्धि भी होती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

7. व्यायाम कुर्वतो नित्यं विरुद्धमपि भोजनम्।
विदग्धमविदग्धं वा निर्दोषं परिपच्यते ॥7॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) किं कुर्वत: भोजनं परिपच्यते ?
(ii) भोजनं कथं परिपच्यते ?
(iii) कदा व्यायामं कुर्वत: भोजनं परिपच्यते ?
(iv) व्यायामेन विरुद्धमपि किं परिपच्यते ?
उत्तराणि-:
(i) व्यायामम् ।
(ii) निर्दोषम् ।
(iii) नित्यम् ।
(iv) भोजनम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्यायामं कुर्वतः कीदृशं भोजनं निर्दोषं परिपच्यते ?
उत्तराणि
(i) व्यायामं कुर्वतः विरुद्धम्, विदग्धम् अविदग्धं वा अपि भोजनं निर्दोषं परिपच्यते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘कुर्वतः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘प्रतिदिनम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iii) ‘विदग्धम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘विरुद्धम्’ इति विशेषणस्य अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(v) ‘निर्दोषम्’ इति क्रियाविशेषणस्य क्रियापदं किमत्र प्रयुक्तम् ?
उत्तराणि:
(i) शतृ। कृ + शतृ = कुर्वत् + षष्ठी विभक्तिः एकवचनम्।
(ii) नित्यम्।
(iii) अविदग्धम्।
(iv) भोजनम्।
(v) परिपच्यते।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- नित्यं व्यायामं कुर्वतः विदग्धम् अविदग्धम् वा विरुद्धम् अपि भोजनं निर्दोषं परिपच्यते।

शब्दार्थाः- विरुद्धम् = (प्रतिकूलम्) विपरीत। विदग्धम् = (सुपक्वम्) भली प्रकार पका हुआ। अविदग्धम् = (अपक्वम्, अर्धपक्वम्) आधा पका हुआ, न पका हुआ। निर्दोषम् = दोषरहित। परिपच्यते = (जीर्यते) पच जाता है।

संदर्भ:- पूर्ववत् प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में बताया गया है कि व्यायाम से शरीर की पाचनक्षमता बढ़ जाती है।

सरलार्थ:- नित्य-प्रति व्यायाम करने वाले व्यक्ति को शरीर की प्रकृति के विपरीत,भली-भाँति पका हुआ अथवा न पका हुआ भोजन भी बिना किसी दोष के पच जाता है।

भावार्थ:- व्यायाम से मनुष्य की पाचक अग्नि इतनी तीव्र हो जाती है कि उसे हर प्रकार का भोजन बिना कोई रोग उत्पन्न किए पच जाता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

8. व्यायामो हि सदा पथ्यो बलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।
स च शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः ॥8॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) सदा कः पथ्यः ?
(ii) व्यायामः केषां पथ्यः ?
(iii) शीते व्यायामः कीदृशः स्मृतः ?
(iv) वसन्ते व्यायामः कीदृशः कथितः ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामः ।
(ii) बलिनाम्।
(iii) पथ्यतमः।
(iv) पथ्यतमः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशानां बलिनां व्यायामः सदा पथ्यः ?
(ii) व्यायामः कदा पथ्यतमः स्मृतः ?
उत्तराणि
(i) स्निग्धभोजिनां बलिनां व्यायामः सदा पथ्यः।
(ii) व्यायामः शीते वसन्ते च पथ्यतमः स्मृतः।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘पथ्यतमः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘स च शीते’ अत्र ‘सः’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(iii) ‘हितकारी’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘स्मृतः’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययौ विभजत।
(v) ‘बलिनां स्निग्धभोजिनाम्’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) तमप् ।
(ii) व्यायामः ।
(iii) पथ्यः ।
(iv) √स्म + क्त।
(v) बलिनाम्।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
अन्वयः- हि व्यायामः स्निग्धभोजिनां बलिनां सदा पथ्यः (भवति) सः शीते वसन्ते च तेषां पथ्यतमः स्मृतः।

शब्दार्था:- स्निग्धभोजिनाम् = चिकनाई से युक्त भोजन करने वाले। पथ्यः = (अनूकूलः) उचित, स्वास्थ्यकारी। पथ्यतमः = (अनुकूलतमः) सर्वाधिक हितकारी। स्मृतः = (कथितः) कहा गया है।
संदर्भ:-पूर्ववत्
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में वर्णित किया गया है कि व्यायाम शीत ऋतु तथा वसन्त ऋतु में सर्वाधिक स्वास्थ्य प्रदान करने वाला होता है।
सरलार्थ:-निश्चय ही यह व्यायाम चिकनाईयुक्त भोजन खानेवाले बलवान् व्यक्तियों के लिए सदैव हितकर होता है। परन्तु वही व्यायाम शीत और वसन्त ऋतुओं में सबसे अधिक हितकारी कहा गया है।
भावार्थ:-व्यायाम करने वाले मनुष्य को चिकनाईयुक्त भोजन दूध आदि अवश्य लेना चाहिए, क्योंकि व्यायाम करने से पसीना अधिक आता है, वसा जल जाती है। इसका संतुलन चिकनाईयुक्त भोजन से ही हो पाता है। यद्यपि व्यायाम सभी ऋतुओं में हितकारी होता है, परन्तु शीत और वसन्त ऋतुओं में व्यायाम का लाभ सर्वाधिक होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

9. सर्वेष्वतुष्वहरहः पुम्भिरात्महितैषिभिः।
बलस्यार्धेन कर्त्तव्यो व्यायामो हन्त्यतोऽन्यथा ॥१॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कीदृशैः पुम्भिः व्यायामः कर्तव्यः ?
(ii) केषु ऋतुषु व्यायामः कर्तव्यः ?
(iii) कस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः ?
(iv) अहरहः कः कर्तव्यः ?
उत्तराणि:
(i) आत्महितैषिभिः ।
(ii) सर्वेषु ।
(iii) बलस्य।
(iv) व्यायामः ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) अहरहः कैः व्यायामः कर्तव्यः ?
(ii) व्यायामः कदा हन्ति ?
(iii) व्यायामः कदा कर्तव्यः ?
उत्तराणि
(i) अहरहः आत्महितैषिभिः पम्भिः व्यायामः कर्तव्यः।
(ii) बलस्यार्धेन व्यायामः कर्तव्यः अतोऽन्यथा व्यायामः हन्ति।
(iii) व्यायामः सर्वेषु ऋतुषु अहरहः कर्तव्यः।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘प्रतिदिनम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘कर्तव्यः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(iii) ‘कर्तव्यः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘हन्त्यतोऽन्यथा’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत ?
(v) ‘मनुष्यैः’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) अहरहः ।
(ii) ऋतुषु।
(iii) तव्यत्।
(iv) हन्ति + अतः + अन्यथा।
(v) पुम्भिः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-आत्महितैषिभिः पुम्भिः सर्वेषु ऋतुषु अहरह: बलस्य अर्धेन व्यायामः कर्तव्यः अत: अन्यथा हन्ति।
शब्दार्था:- अहरहः = (प्रतिदिनम्) प्रत्येक दिन। पुम्भिः = (पुरुषैः) पुरुषों के द्वारा। आत्महितैषिभिः = (आत्मनः हितेच्छुकैः) अपना हित चाहने वालों द्वारा।
संदर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि मनुष्य को अपने बल का आधा व्यायाम ही करना उचित है।
सरलार्थः-अपना हित चाहनेवाले मनुष्यों को सब ऋतुओं में प्रतिदिन अपने शरीर-बल का आधा व्यायाम करना चाहिए; इससे भिन्न अर्थात् आधे बल से अधिक व्यायाम करने पर यह व्यायाम हानिकारक होता है।
भावार्थ:-व्यायाम कितना करना चाहिए? इसके उत्तर में सुश्रुत ऋषि का मत है कि मनुष्य का जितना बल हो उससे आधा व्यायाम करना ही हितकारी होता है, अन्यथा व्यायाम मनुष्य को स्वस्थ करने के स्थान पर रोगी बना देता है। कहा भी है-‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’-अति किसी भी विषय में नहीं करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

10. हृदिस्थानास्थितो वायुर्यदा वक्त्रं प्रपद्यते।
व्यायाम कुर्वतो जन्तोस्तबलार्धस्य लक्षणम् ॥ 10 ॥ .

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) वायुः कुत्र स्थितः भवति ?
(ii) वायु कं प्रपद्यते ?
(ii) अत्र कस्य लक्षणं कथितम् ?
(iv) अत्र किं कुर्वत: जन्तोः लक्षणं कथितम् ?
उत्तराणि:
(i) हृदि।
(ii) वक्त्रम्।
(iii) बलार्धस्य।
(iv) व्यायामम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कीदृशः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते ?
(ii) अत्र बलार्धस्य किं लक्षणं कथितम् ?
उत्तराणि
(i) हृदिस्थानास्थितः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते।
(ii) यदा व्यायाम कुर्वतः जन्तोः हृदिस्थानास्थितः वायुः वक्त्रं प्रपद्यते, तत् बलार्धस्य लक्षणं कथितम्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘मुखम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(ii) ‘व्यायाम कुर्वतो जन्तोः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(iii) ‘आस्थितः’ अत्र प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत ?
(iv) ‘जन्तोः’ इति पदे का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(v) ‘परिभाषा’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) वक्त्रम्।
(ii) जन्तोः ।
(iii) आ + √स्था + क्त ।
(iv) षष्ठी विभक्तिः ।
(v) लक्षणम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-व्यायामं कुर्वतः जन्तोः हृदिस्थानास्थितः वायुः यदा वक्त्रं प्रपद्यते तद् बलार्धस्य लक्षणम्।
शब्दार्थाः- हृदि = (हृदये) हृदय में। आस्थितः = (विद्यमानः) ठहरा हुआ। वक्त्रम् = (मुखम्) मुख को। प्रपद्यते = (प्राप्नोति) प्राप्त करता है। जन्तोः = (प्राणिनः) व्यक्ति का।
संदर्भः-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में व्यायाम के प्रसंग में व्यक्ति के अच्छे बल की पहचान बताई गई है।
सरलार्थ:-व्यायाम को करते हुए व्यक्ति के हृदय में उचित स्थान पर स्थित श्वास वायु जब मुख तक पहुँचने लगती है, तब आधे बल का लक्षण होता है।
भावार्थः-व्यायाम करते हुए हृदय में स्थित वायु प्रबलता से मुख में पहुँचने लगती है अर्थात् मनुष्य हाँपने लगता है, इस अवस्था को उस मनुष्य का आधा बल समझना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

11. वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च।
समीक्ष्य कुर्याद् व्यायाममन्यथा रोगमाप्नुयात् ॥ 11॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) वयोबलशरीराणि समीक्ष्य किं कुर्यात् ?
(ii) देशकालाशनानि किं कृत्वा व्यायाम कुर्यात् ?
(iii) अन्यथा कम् आप्नुयात् ?
(iv) ‘लभेत’ इति स्थाने प्रयुक्तं पदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) व्यायामम्।
(ii) समीक्ष्य।
(iii) रोगम्।
(iv) प्राप्नुयात् ।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) किं समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् ?
(ii) रोगं कदा आप्नुयात् ?
उत्तराणि
(i) वयोबलशरीराणि देशकालाशनानि च समीक्ष्य व्यायाम कुर्यात् ।
(ii) यदि वयोबलादीनि न समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् तदा रोगम् आप्नुयात्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘सम्यक् विचार्य इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘भोजनम्’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(iii) ‘अविचार्य’ इत्यस्य प्रयुक्तं विपरीतार्थकपदं किम् ?
(iv) ‘समीक्ष्य’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(v) ‘आयुः’ इत्यस्य कः पर्यायः अत्र प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) समीक्ष्य।
(ii) अशनम्।
(iii) समीक्ष्य।
(iv) ल्यप् ।
(v) वयः।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
अन्वयः-वयः बलशरीराणि देश-काल-अशनानि च समीक्ष्य व्यायामं कुर्यात् अन्यथा रोगम् आप्नुयात्।
शब्दार्थाः- देशकालाशनानि = देश और काल के अनुरूप भोजन। अशनानि = (आहाराः/भोजनानि) भोजन। समीक्ष्य = (परीक्ष्य) परीक्षण करके।
संदर्भ:-पूर्ववत्। प्रसंग:-प्रस्तुत पद्यांश में बताया गया है कि व्यायाम कितना करना चाहिए।
सरलार्थः- मनुष्य को अपनी आयु, बल, शरीर, स्थान, समय तथा भोजन का सोच-विचार करके व्यायाम करना चाहिए, अन्यथा रोगों को प्राप्त होता है।
भावार्थ:-व्यायाम करते समय कुछ सावधानियाँ आवश्यक हैं। व्यायाम करने वाले मनुष्य को यह ध्यान करना बहुत आवश्यक है कि उसकी आयु क्या है, उसका शरीर बल कितना है, शरीर की प्रकृति कैसी है, व्यायाम वाला स्थान कैसा है, व्यायाम किस समय या किस ऋतु में किया जा रहा है। यदि कोई मनुष्य इन बातों पर ध्यान दिए बिना व्यायाम करेगा तो यह व्यायाम ही उसे रोगी बना देगा।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 3 व्यायामः सर्वदा पथ्यः

व्यायामः सर्वदा पथ्यःSummary in Hindi

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पाठ-परिचय

(व्यायाम सदा हितकारी होता है)
‘सुश्रुत संहिता’ आयुर्वेद का अत्यन्त प्राचीन चिकित्सा शास्त्र है। इसकी रचना ईसा पर्व तीसरी शताब्दी में मानी जाती है। सुश्रुत संहिता में मुख्य रूप से शल्य चिकित्सा, विष, चिकित्सा तथा स्वास्थ्य के नियमों का निरुपण किया गया है। सुश्रुत संहिता छः खण्डों में विभाजित है.
(1) सूत्र स्थान (46 अध्याय, (2) निदान स्थान (16 अध्याय), (3) शारीर स्थान (10 अध्याय), (4) चिकित्सा स्थान (40 अध्याय), (5) कल्प स्थान (8 अध्याय), उत्तर तन्त्र (66 अध्याय)। सुश्रुत संहिता के लेखक आचार्य सुश्रुत हैं, जिनकी ख्याति चरक संहिता के रचयिता आचार्य चरक के तुल्य ही है।
प्रस्तुत पाठ ‘व्यायामः सर्वदा पथ्यः’ आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सुश्रुतसंहिता’ के चिकित्सा स्थान में वर्णित 24 वें अध्याय से संकलित है। इसमें आचार्य सुश्रुत ने व्यायाम की परिभाषा बताते हुए उससे होने वाले लाभों की चर्चा की है। शरीर में सुगठन, कान्ति, स्फूर्ति, सहिष्णुता, नीरोगता आदि व्यायाम के प्रमुख लाभ हैं। इनकी प्राप्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर के अनुकूल व्यायाम अवश्य करना चाहिए।

व्यायामः सर्वदा पथ्यः पाठस्य सारांश:
‘व्यायामः सर्वदा पथ्यः’ यह पाठ चरक मुनि द्वारा रचित चरक संहिता से लिया गया है। इस पाठ में व्यायाम से होने वाले लाभ व्यायाम की मात्रा आदि के बारे में बताया गया है। पाठ का सारांश इस प्रकार है
जिससे शरीर में थकावट पैदा हो उस कर्म को व्यायाम कहते हैं। ऐसा परिश्रम वाला कार्य करके पूरे शरीर का भलीभाँति मर्दन करना चाहिए। व्यायाम से शरीर की वृद्धि, सुडौलता, जठराग्नि का प्रदीप्त होना, आलस्यहीनता, स्फूर्ति तथा मोटापे को दूर करने आदि अनेक लाभ होते हैं। जो व्यक्ति नियमपूर्वक व्यायाम करता है ; उसका शरीर बलिष्ठ होता है और उसे बुढ़ापा भी देर से आता है। उसकी पाचक अग्नि इतनी तेज़ हो जाती है कि उसे पका, अधपका यहाँ तक कि कच्चा भोजन भी बिना किसी दोष के पच जाता है। व्यायाम करने से शरीर से पसीना निकलता है और पसीने के साथ कुछ खनिज भी बाहर निकल जाते हैं। अत: व्यायाम करने वाले व्यक्ति को दूध घी आदि चिकनाईयुक्त पदार्थों का सेवन करना चाहिए । व्यायाम यद्यपि सभी ऋतुओं में लाभकारी होता है परन्तु शीत और वसन्त ऋतु में व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिए सर्वोत्तम होता है। व्यायाम की मात्रा अपने बल के आधे से अधिक नहीं होनी चाहिए। जब व्यायाम करते हुए फेफड़ों में स्थित वायु बलपूर्वक मुँह के रास्ते बाहर आने लगती है तब समझना चाहिए कि आधा बल हो चुका है। व्यायाम करते समय स्थानीय वातावरण, शरीर के बल, आयु तथा उपलब्ध भोजन का भी ध्यान रखना चाहिए ; अन्यथा व्यायाम स्वास्थ्य देने के स्थान पर शरीर को रोगों का घर बना देता है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2  बुद्धिर्बलवती सदा

HBSE 10th Class Sanskrit बुद्धिर्बलवती सदा Textbook Questions and Answers

प्रश्न  1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) बुद्धिमती केन उपेता पितगृहं प्रति चलिता ?
(ख) व्याघ्रः किं विचार्य पलायितः ?
(ग) लोके महतो भयात् कः मुच्यते ?
(घ) जम्बुकः किं वदन् व्याघ्रस्य उपहासं करोति ?
(ङ) बुद्धिमती शृगालं किम् उक्तवती।
उत्तराणि
(क) बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता पितृगृहं प्रति चलिता।
(ख) व्याघ्रः व्याघ्रमारी काचिदियमिति विचार्य पलायितः ।
(ग) लोके महतो भयात् बुद्धिमान् मुच्यते।
(घ) जम्बुक: “भवान् कुत: भयात् पलायितः।” इति वदन् व्याघ्रस्य उपहासं करोति।
(ङ) बुद्धिमती शृगालं “रे रे धूर्त ! पुरा त्वया मह्यं व्याघ्रत्रयं दत्तं विश्वास्याद्यैकमानीय कथं यासि,
वदाधुना।” इति उक्तवती।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  2.
स्थूलपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) तत्र राजसिंहो नाम राजपुत्रः वसति स्म।
(ख) बुद्धिमती चपेटया पुत्रौ प्रहृतवती।
(ग) व्याघ्रं दृष्ट्वा धूर्तः शृगालः अवदत्।
(घ) त्वं मानुषात् बिभेषि।
(ङ) पुरा त्वया मह्यं व्याघ्रत्रयं दत्तम्।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) तत्र क: नाम राजपुत्रः वसतिस्म ?
(ख) बुद्धिमती कया पुत्रौ प्रहृतवती ?
(ग) कं दृष्ट्वा धूर्तः शृगालः अवदत् ?
(घ) त्वं कस्मात् बिभेषि ?
(ङ) पुरा त्वया कस्मै व्याघ्रत्रयं दत्तम् ?

प्रश्न  3.
उदाहरणमनुसृत्य कर्तरि प्रथमा विभक्तेः क्रियायाञ्च ‘क्तवतु’ प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा वाच्यपरिवर्तनं.
कुरुत:
यथा-तया अहं हन्तुम् आरब्धः – सा मां हन्तुम् आरब्धवती।
(क) मया पुस्तकं पठितम्। – …………………………..
(ख) रामेण भोजनं कृतम्। – …………………………..
(ग) सीतया लेखः लिखितः। – …………………………..
(घ) अश्वेन तृणं भुक्तम्। – …………………………..
(ङ) त्वया चित्रं दृष्टम्। – …………………………..
उत्तराणि
(क) मया पुस्तकं पठितम्।- अहं पुस्तकं पठितवती।
(ख) रामेण भोजनं कृतम्। – रामः भोजनं कृतवान्।
(ग) सीतया लेख: लिखितः। – सीता लेखं लिखितवती।
(घ) अश्वेन तृणं भुक्तम्। – अश्वः तृणं भुक्तवान्।
(ङ) त्वया चित्रं दृष्टम्। – त्वं चित्रं दृष्टवान्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  4.
अधोलिखितानि वाक्यानि घटनाक्रमेण संयोजयत:
(क) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।
(ख) प्रत्युत्पन्नमतिः सा शृगालम् आक्षिपन्ती उवाच।
(ग) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।
(घ) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।
(ङ) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताडयन्ती उवाच-अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यत।
(च) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितुर्गहं प्रति चलिता।
(छ) ‘त्वं व्याघ्रत्रयं आनयितुं’ प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।
(ज) गलबद्धशृगालकः व्याघ्रः पुन: पलायितः।
उत्तरम्-(घटनाक्रमानुसारं वाक्ययोजनम्):
1. (च) बुद्धिमती पुत्रद्वयेन उपेता पितुर्गृह प्रति चलिता।
2. (घ) मार्गे सा एकं व्याघ्रम् अपश्यत्।
3. (ङ) व्याघ्रं दृष्ट्वा सा पुत्रौ ताडयन्ती उवाच-अधुना एकमेव व्याघ्रं विभज्य भुज्यत।
4. (क) व्याघ्रः व्याघ्रमारी इयमिति मत्वा पलायितः।
5. (ग) जम्बुककृतोत्साहः व्याघ्रः पुनः काननम् आगच्छत्।
6. (ख) प्रत्युत्पन्नमतिः सा शृगालम् आक्षिपन्ती उवाच।
7. (छ) ‘त्व व्याघ्रत्रयं आनयितुं’ प्रतिज्ञाय एकमेव आनीतवान्।
8. (ज) गलबद्धशृगालक: व्याघ्रः पुनः पलायितः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  5.
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत:
(क) पितुर्गृहम् – ……………… + ………………
(ख) एकैकः (ग) – ……………. + ………………
(ग) ……………. – अन्यः + अपि
(घ) ……………. – इति + उक्त्वा
(ङ) ……………. – यत्र + आस्ते
उत्तराणि
(क) पितुर्गृहम् – पितुः + गृहम्
(ख) एकैकः – एक + एकः
(ग) अन्योऽपि – अन्यः + अपि
(घ) इत्युक्त्वा – इति + उक्त्वा
(ङ) यत्रास्ते – यत्र + आस्ते

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  6.
(क) अधोलिखितानां पदानाम् अर्थः कोष्ठकात् चित्वा लिखत:
(क) ददर्श – (दर्शितवान्, दृष्टवान्)
(ख) जगाद – (अकथयत्, अगच्छत्)
(ग) ययौ – (याचितवान्, गतवान्)
(घ) अत्तुम् – (खादितुम्, आविष्कर्तुम्)
(ङ) मुच्यते – (मुक्तो भवति, मग्नो भवति)
(च) ईक्षते – (पश्यति, इच्छति)
उत्तराणि-पदम् – अर्थः
(क) ददर्श – दृष्टवान्,
(ख) जगाद – अकथयत्,
(ग) ययौ – गतवान्,
(घ) अत्तुम् – खादितुम्,
(ङ) मुच्यते – मुक्तो भवति,
(च) ईक्षते – पश्यति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  7.
(ख) पाठात् चित्वा पर्यायपदं लिखत
(क) वनम् – ………………..
(ख) शृगालः – ………………..
(ग) शीघ्रम् – ………………..
(घ) पत्नी – ………………..
(ङ) गच्छसि – ………………..
उत्तराणि:
पदम् – पर्यायपदम्
(क) वनम् – काननम्
(ख) शृगालः – जम्बुकः
(ग) शीघ्रम् – सत्वरम्
(घ) पत्नी – भार्या
(ङ) गच्छसि – यासि।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

प्रश्न  8.
प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत
(क) चलितः – ………………..
(ख) नष्टः – ………………..
(ग) आवेदितः – ………………..
(घ) दृष्टः – ………………..
(ङ) गतः – ………………..
(च) हतः – ………………..
(छ) पठितः – ………………..
(ज) लब्धः – ………………..
उत्तराणि
(क) चलितः – चल् + क्त
(ख) नष्टः – नश् + क्त
(ग) आवेदितः – आ + विद् + क्त
(घ) दृष्टः – दृश् + क्त
(ङ) गतः – गम् + क्त
(च) हतः – हन् + क्त
(छ) पठितः – पठ् + क्त
(ज) लब्धः लभ् + क्त।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

परियोजनाकार्यम्
बुद्धिमत्याः स्थाने आत्मानं परिकल्प्य तद्भावनां स्वभाषया लिखत।
(बुद्धिमती के स्थान पर अपने आप को रखकर उसकी भावना अपनी भाषा में लिखिए)
उत्तरम्: बुद्धिमती इस कथा की पात्र है। प्राचीन काल में जो कथाएँ लिखी जाती थी, वे उद्देश्यपूर्ण हुआ करती थी। इस कथा का उद्देश्य में केवल इतना ही है कि कठिन से कठिन समय में भी मनुष्य को घबराना नहीं चाहिए। क्योंकि घबराने पर मनुष्य की बुद्धि विचलित हो जाती है और समस्या का समाधान नहीं निकलता। यह कथा बालकों के मनोरंजन को मुख्य रूप में सामने रखकर तथा इसी बहाने बुद्धिमत्तापूर्ण शिक्षा देने के उद्देश्य से रची गई है। क्योंकि बालकों को वे ही कहानियाँ अधिक पसन्द होती है जिनमें पशु पक्षी भी पात्र हो। इस कहानी का कोमलमती बालकों पर तो सीधा प्रभाव पड़ता है, परन्तु यह व्यावहारिक नहीं है।

यदि बुद्धिमती के स्थान पर मुझे ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ता तो मैं बाघ की क्रूरता को देखकर अपनी सुरक्षा के लिए भिन्न प्रकार से कदम उठाता। उदाहरण के लिए

1. हिंसक जानवरों से परिपूर्ण मार्ग तय करने से पहले मैं अपने साथ कोई ऐसा हथियार लेकर चलता जिससे मैं उनका सामना कर सकता।
2. हिंसक जानवर आग से बहुत डरते हैं, मैं मसाल आदि के रूप में तेज आग जलाकर उन्हें भगाने का प्रयास करता।
3. हिंसक जानवर तेज ध्वनि से भी डर जाते हैं तो मैं किसी विस्फोटक को पहले ही साथ लेकर चलता जिसका उपयोग समय पड़ने पर करता। प्रायः भारी भरकम हिंसक जानवर वृक्षों की ऊँचाई पर चढ़ नहीं पाते, इस
तथ्य को समझते हुए मैं किसी वृक्ष पर काफी ऊँचे चढ़कर अपनी जान बचाता।
परन्तु ये सब उपाय करने के लिए बुद्धिमत्ता और साहस की परम आवश्यकता होती है। जिसकी शिक्षा बुद्धिमती के चरित्र से मिलती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

योग्यताविस्तार:
भाषिकविस्तारः
ददर्श – दृश् धातु, लिट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन
बिभेषि – ‘भी’ धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन।
प्रहरन्ती – प्र + ह्र धातु, शतृ प्रत्यय, स्त्रीलिङ्ग।
गम्यताम् – गम् धातु, कर्मवाच्य, लोट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।
ययौ – ‘या’ धातु, लिट् लकार, प्रथमपुरुष, एकवचन।
यासि – गच्छसि।

समास
गलबद्धशृगालकः – गले बद्धः शृगालः यस्य सः।
प्रत्युत्पन्नमतिः – प्रत्युत्पन्ना मतिः यस्य सः।
जम्बुककृतोत्साहात् – जम्बुकेन कृत: उत्साहः – जम्बुककृतोत्साहः तस्मात्।
पुत्रद्वयोपेता – पुत्रद्वयेन उपेता।
भयाकुलचित्तः – भयेन आकुल: चित्तम् यस्य सः।
व्याघ्रमारी – व्याघ्रं मारयति इति।
गृहीतकरजीवितः – गृहीतं करे जीवितं येन सः।
भयकरा – भयं करोति या इति।

ग्रन्थ-परिचय:
शुकसप्ततिः के लेखक और उसके काल के विषय में यद्यपि भ्रान्ति बनी हुई है, तथापि इसका काल 1000 ई. से 1400 ई. के मध्य माना जाता है। हेमचन्द्र ने (1088-1172) में शुकसप्ततिः का उल्लेख किया है। चौदहवीं शताब्दी में फारसी भाषा में ‘तूतिनामह’ नाम से अनूदित हुआ था।
शुकसप्ततिः का ढाँचा अत्यन्त सरल और मनोरंजक है। हरिदत्त नामक सेठ का मदनविनोद नामक एक पुत्र था। वह विषयासक्त और कुमार्गगामी था। सेठ को दुःखी देखकर उसके मित्र त्रिविक्रम नामक ब्राह्मण ने अपने घर से नीतिनिपुण शुक और सारिका लेकर उसके घर जाकर कहा-इस सपत्नीक शुक का तुम पुत्र की भाँति पालन करो। इसका संरक्षण करने से तुम्हारा दुःख दूर होगा। हरिदत्त ने मदनविनोद को वह तोता दे दिया। तोते की कहानियों ने मदनविनोद का हृदय परिवर्तन कर दिया और वह अपने व्यवसाय में लग गया।

व्यापार प्रसंग में जब वह देशान्तर गया तब शुक अपनी मनोरंजक कहानियों से उसकी पत्नी का तब तक विनोद करता रहा, जब तक उसका पति वापस नहीं आ गया। संक्षेप में शुकसप्ततिः अत्यधिक मनोरंजक कथाओं का संग्रह है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

हन् (मारना) धातोः रुपम्।
लट्लकारः

एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
मध्यमपुरुषहन्तिहतःघ्नन्ति
उत्तमपुरुषःहन्सिहथःहथ
प्रथमपुरुषःहन्मिहन्वःहन्मः

लुट्लकारः

मध्यमपुरुषहनिष्यतिहनिष्यतःहनिष्यन्ति
उत्तमपुरुषःहनिष्यसिहनिष्यथ:हनिष्यथ
प्रथमपुरुषःहनिष्यामिहनिष्यावःहनिष्यामः

लङ्लकारः

मध्यमपुरुषअहन्अहताम्अहत
उत्तमपुरुषःअहःअहतम्अहत
प्रथमपुरुषःअहनम्अहन्वअहन्म

लोट्लकारः

मध्यमपुरुषहन्तुहताम्घ्नन्तु
उत्तमपुरुषःजहिहतम्हत
प्रथमपुरुषःहनानिहनावहनाम

विधिलिङ्लकारः

मध्यमपुरुषहन्यात्हन्याताम्हन्युः
उत्तमपुरुषःहन्याःहन्यातम्हन्यात
प्रथमपुरुषःहन्याम्हन्यावहन्याम।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

HBSE 10th Class Sanskrit बुद्धिर्बलवती सदा Important Questions and Answers

बुद्धिर्बलवती सदा पठित-अवबोधनम्

1. निर्देश:-अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
अस्ति देउलाख्यो ग्रामः।
तत्र राजसिंहः नाम राजपुत्रः वसति स्म। एकदा केनापि आवश्यककार्येण तस्य भार्या बुद्धिमती पुत्रद्वयोपेता पितुर्गुहं प्रति चलिता। मार्गे गहनकानने सा एकं व्याघ्रं ददर्श। सा व्याघ्रमागच्छन्तं दृष्ट्वा धाट्यात् पुत्रौ चपेटया प्रहृत्य जगाद-“कथमेकैकशो व्याघ्रभक्षणाय कलहं कुरुथः? अयमेकस्तावद्विभज्य भुज्यताम्। पश्चाद् अन्यो द्वितीयः कश्चिल्लक्ष्यते।”
इति श्रुत्वा व्याघ्रमारी काचिदियमिति मत्वा व्याघ्रो भयाकलचित्तो नष्टः।
निजबुद्ध्या विमुक्ता सा भयाद् व्याघ्रस्य भामिनी।
अन्योऽपि बुद्धिमाल्लोके मुच्यते महतो भयात्॥
भयाकुलं व्यानं दृष्ट्रवा कश्चित् धूर्तः।
शृगालः हसन्नाह-“भवान् कुत: भयात् पलायित: ?”

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत:
(i) देउलाख्यः कः अस्ति ?
(ii) राजपुत्रस्य नाम किमस्ति ?
(ii) पितुर्गुहं प्रति का चलिता ?
(iv) कीदृशः व्याघ्रः नष्टः ?
(v) भयाकुलं व्यानं दृष्ट्वा कः हसति ?
उत्तराणि:
(i) ग्रामः।
(ii) राजसिंहः।
(iii) बुद्धिमती।
(iv) भयाकुलचित्तः।
(v) शृगालः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) बुद्धिमती कीदृशे मार्गे व्याघ्नं ददर्श ?
(ii) किं मत्वा व्याघ्रः नष्टः ?
(iii) भामिनी कया व्याघ्रस्य भयात् मुक्ता ?
(iv) बुद्धिमान् निजबुद्ध्या कस्मात् विमुच्यते ?
उत्तराणि:
(i) बुद्धिमती गहनकानने मार्गे व्याघ्र ददर्श।
(ii) व्याघ्रमारी काचिदियम्-इति मत्वा व्याघ्रः नष्टः।
(iii) भामिनी निजबुद्ध्या व्याघ्रस्य भयात् मुक्ता।
(iv) निजबुद्ध्या बुद्धिमान् महतो भयात् विमुच्यते ?

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘पलायितः इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?’
(ii) ‘बुद्धिमान्’ इत्यस्य स्त्रीलिङ्गे पदं किमस्ति ?
(iii) ‘पितुहम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iv) ‘पितुहम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘मार्गे गहनकानने’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) नष्टः।
(ii) बुद्धिमती।
(iii) प्र √ह + ल्यप्।
(iv) पितुः + गृहम्।
(v) मार्गे।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-भार्या = (पत्नी) पत्नी। पुत्रद्वयोपेता = (पुत्रद्वयेन सहिता) दोनों पुत्रों के साथ। उपेता = (युक्ता) युक्त। गहनम् = (सघनम्) घने। कानने = (वने) जंगल में। ददर्श = (अपश्यत्) देखा। धाष्ट्यात् = (धृष्टभावात्) ढिठाई से। चपेटया = (करप्रहारेण) थप्पड़ से। प्रहृत्य = (चपेटिकां दत्वा) थप्पड़ मारकर। जगाद = (उक्तवती) कहा। एकैकश = (एकम एकं कृत्वा) एक-एक करके। कलहम् = विवादम्) झगड़ा। विभज्य = विभक्त कृत्वा) अलगअलग करके, (बाँटकर)। लक्ष्यते = (अन्विष्यते) देखा जाएगा, ढूँढा जाएगा। व्याघ्रमारी = व्याघ्रं मारयति (हन्ति) इति] बाघ को मारने वाली। नष्टः = (पलायितः) आँखों से ओझल हो गया, भाग गया। [/नश् अदर्शने + क्त ] । निजबुद्ध्या = (स्वमत्या) अपनी बुद्धि से। भामिनी = (भामिनी, रूपवती स्त्री) रूपवती स्त्री। भयाकुलम् = (भयात् आकुलम्) भय से बेचैन।

सन्दर्भ: प्रस्तुत गद्यांश संस्कृत के प्रसिद्ध कथा ग्रन्थ शुकसप्ततिः से सम्पादित करके हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो-भागः’ में संकलित ‘बुद्धिर्बलवती सदा’ नामक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग: राजपुत्र राजसिंह की पत्नी बुद्धिमती अपने दोनों पुत्रों के साथ अपने पिता के घर जाती है। रास्ते में अपनी बुद्धिमत्ता से बाघ को भगाकर भयमुक्त होती है। इसी का वर्णन प्रस्तुत अंश में है।

हिन्दी अनुवाद: देउल नामक ग्राम है। वहाँ राजसिंह नाम का राजपूत रहता था। एक बार किसी आवश्यक कार्य से इसकी पत्नी बुद्धिमती दो पुत्रों के साथ पिता के घर की ओर चल पड़ी। मार्ग में घने वन में उसने एक बाघ देखा। वह बाघ को आता हुआ देखकर ढिठाई से दोनों पुत्रो को चाँटों से मारकर बोली-“क्यों अकेले-अकेले बाघ को खाने के लिए झगड़ा कर रहे हो ? यह एक है तो बाँटकर खा लो। बाद में अन्य कोई दूसरा ढूँढा जाएगा।”

ऐसा सुनकर, यह कोई व्याघ्रमारी (बाघ को मारने वाली) है, यह मानकर भय से व्याकुल चित्तवाला बाघ आँखों से ओझल हो गया।

वह रूपवती स्त्री अपनी बुद्धि के द्वारा बाघ के भय से मुक्त हो गई। संसार में दूसरे बुद्धिमान् लोग भी (इसी प्रकार अपने बुद्धिकौशल के कारण) अत्यधिक भय से छूट जाते हैं।
भय से व्याकुल बाघ को देखकर कोई दुष्ट सियार (गीदड़) हँसता हुआ बोला-“आप भय से कहाँ भागे जाते हैं ?”

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

2. व्याघ्रः- गच्छ, गच्छ जम्बुक! त्वमपि किञ्चिद् गूढप्रदेशम्। यतो व्याघ्रमारीति या शास्त्रे श्रूयते तयाहं हन्तुमारब्धः परं गृहीतकरजीवितो नष्टः शीघ्रं तदग्रतः।
शगाल: – व्याघ्र! त्वया महत्कौतुकम् आवेदितं यन्मानुषादपि बिभेषि ?
व्याघ्रः – प्रत्यक्षमेव मया सात्मपुत्रावेकैकशो मामत्तुं कलहायमानौ चपेटया प्रहरन्ती दृष्टा।
जम्बुक: – स्वामिन्! यत्रास्ते सा धूर्ता तत्र गम्यताम्। व्याघ्र! तव पुनः तत्र गतस्य सा सम्मुखमपीक्षते यदि, तर्हि त्वया अहं हन्तव्यः इति।
व्याघ्रः – शृगाल! यदि त्वं मां मुक्त्वा यासि तदा वेलाप्यवेला स्यात्।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत:
(i) शास्त्रे का श्रूयते ?
(ii) गृहीतकरजीवितः शीघ्रं कः नष्टः ?
(iii) मानुषात् कः बिभेति ?
(iv) व्याघ्रमारी सात्मपुत्रो कया प्रहरन्ती दृष्टा ?
उत्तराणि:
(i) व्याघ्रमारी।
(ii) व्याघ्रः ।
(iii) व्याघ्रः ।
(iv) चपेटया।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) गूढप्रदेशं गन्तुं कः कं कथयति ?
(ii) व्याघ्रमारी कीदृशौ पुत्री प्रहरन्ती दृष्टा ?
(iii) जम्बुकः व्याघ्नं कुत्र गन्तुं कथयति ?
(iv) यदि शृगालः व्याघ्र मुक्त्वा याति तदा किं स्यात् ?
उत्तराणि
(i) गूढप्रदेशं गन्तुं व्याघ्रः शृगालं कथयति।
(ii) व्याघ्रमारी एकैकश: व्याघ्रम् अत्तुं कलहायमानौ पुत्रौ प्रहरन्ती दृष्टा।
(iii) जम्बुक: व्याघ्रं कथयति- ‘यत्रास्ते सा धूर्ता तत्र गम्यताम्’
(iv) यदि शृगालः व्याघ्रं मुक्त्वा याति तदा वेलापि अवेला स्यात् ?

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘शृगालः’ इत्यस्य कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘त्वया अहं हन्तव्यः’ अत्र ‘त्वया’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम्।
(iii) ‘भक्षयितुम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘परोक्षम्’ इत्यस्य किमत्र विलोमपदम् ?
(v) ‘हन्तव्यः’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययौ निर्दिशत ?
उत्तराणि:
(i) जम्बुक: ।
(ii) व्याघ्राय।
(iii) अत्तुम् ।
(iv) प्रत्यक्षम्।
(v) हन् + तव्यत्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः जम्बुकः = (शृगालः) सियार, गीदड़। गूढप्रदेशम् = (गुप्तप्रदेशम् गुप्त प्रदेश में। गृहीतकरजीवितः = (हस्ते प्राणान् नीत्वा) हथेली पर प्राण लेकर। आवेदितम् = (विज्ञापितम्) बताया। प्रत्यक्षम् = (समक्षम्) सामने। सात्मपुत्रौ = (सा आत्मनः पुत्रौ) वह अपने दोनों पुत्रों को। अत्तुम् = (भक्षयितुम्) खाने के लिए।। कलहायमानौ = (कलहं कुर्वन्तौ) झगड़ा करते हुए (दो) को। प्रहरन्ती = (प्रहारं कुर्वन्ती) मारती हुई। ईक्षते = (पश्यति) देखती है। वेला = (समयः) शर्त। अवेला = असामयिक, व्यर्थ।

सन्दर्भ:-पूर्ववत्।
प्रसंग: बुद्धिमती से डरकर भागते हुए व्याघ्र को एक गीदड़ साहस बँधाता है और उसे पुनः उसी स्त्री के पास भेजने के लिए उत्साहित करता है। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में है।

हिन्दी अनुवाद:
बाघ: जाओ गीदड़! तुम भी किसी गुप्तस्थान पर चले जाओ। क्योंकि व्याघ्रमारी, जो शास्त्र में सुनी जाती है। वह मुझ पर हमला करने लगी परन्तु जान हथेली पर रखकर उसके सामने से शीघ्र ओझल हो गया।

गीदड़: बाघ! तुमने बहुत आश्चर्य की बात कही है कि तुम मनष्य से भी डर गए हो ?

बाघ: वह मेरी आँखों के सामने ही एक-एक करके मुझे खाने के लिए झगड़ते अपने दोनों पुत्रों को चाँटों से पीटती हुई दिखाई पड़ी।

गीदड़: स्वामी ! जहाँ वह दुष्टा है, वहाँ चलो। हे बाघ! यदि तुम्हारे पुनः वहाँ जाने पर वह सामने दिखती है तो तुम मुझे मार देना।

बाघ: गीदड! यदि तम मझको छोड़कर चले गए, तब यह शर्त भी व्यर्थ हो जाएगी।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

3. जम्बुकः- यदि एवं तर्हि मां निजगले बद्ध्वा चल सत्वरम्। स व्याघ्रः तथाकृत्वा काननं ययौ। शृगालेन सहितं पुनरायान्तं व्याघ्र दूरात् दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती-जम्बुककृतोत्साहाद् व्याघ्रात् कथं मुच्यताम् ? परं प्रत्युत्पन्नमतिः सा जम्बुकमाक्षिपन्त्यगुल्या तर्जयन्त्युवाच
रे रे धूर्त त्वया दत्तं मह्यम् व्याघ्रत्रयं पुरा।
विश्वास्याद्यैकमानीय कथं यासि वदाधुना॥
इत्युक्त्वा धाविता तूर्णं व्याघ्रमारी भयड्करा।
व्याघ्रोऽपि सहसा नष्टः गलबद्धशृगालकः॥
एवं प्रकारेण बुद्धिमती व्याघ्रजाद भयात् पुनरपि मुक्ताऽभवत्।
अत एव उच्यतेबुद्धिर्बलवती तन्वि सर्वकार्येषु सर्वदा॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) व्याघ्रः कं निजगले बद्ध्वा चलेत् ?
(ii) जम्बुककृतोत्साहः कः अस्ति ?
(iii) प्रत्युत्पन्नमतिः का अस्ति ?
(iv) पुरा व्याघ्रत्रयं केन दत्तम् ?
(v) सदा बलवती का कविता ?
उत्तराणि:
(i) शृगालम्।
(ii) व्याघ्रः ।
(iii) बुद्धिमती।
(iv) शृगालेन।
(v) बुद्धिः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) व्याघ्रः किं कृत्वा काननं ययौ ?
(ii) किं दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती ?
(iii) कीदृशः व्याघ्रः सहसा नष्टः ?
(iv) बुद्धिमती पुनरपि कस्मात् मुक्ता अभवत् ?
उत्तराणि
(i) व्याघ्रः शृगालं निजगले बद्ध्वा काननं ययौ।
(ii) शृगालेन सहितं पुनरायान्तं व्याघ्रं दृष्ट्वा बुद्धिमती चिन्तितवती।
(iii) गलबद्धशृगालक: व्याघ्रः सहसा नष्टः ।
(iv) बुद्धिमती पुनरपि व्याघ्रजात् भयात् मुक्ता अभवत्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘वनम्’ इत्यस्य कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘मूढमतिः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘इत्युक्त्वा ‘ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iv) ‘व्याघ्रमारी भयङ्करा’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(v) ‘बलवती’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) काननम्।
(ii) प्रत्युत्पन्नमतिः ।
(iii) इति + उक्त्वा ।
(iv) भयङ्करा ।
(v) मतुप्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
श्लोकस्य अन्वयः रे रे धूर्त! त्वया मह्यं पुरा व्याघ्रत्रयं दत्तम्। विश्वास्य (अपि) अद्य एकम् आनीय कथं यासि इति अधुना वद। इति उक्त्वा भयङ्करा व्याघ्रमारी तूर्णं धाविता। गलबद्धशृगालक: व्याघ्रः अपि सहसा नष्टः । तन्वि! सर्वदा सर्वकार्येषु बुद्धिर्बलवती।

शब्दार्थाः निजगले = (स्वग्रीवायाम्) अपने गले में। सत्वरम् = (शीघ्रम्) शीघ्र। काननम् = (वनम्) वन। आक्षिपन्ती = (आक्षेपं कुर्वन्ती) आक्षेप करती हुई, झिड़कती हुई, भर्त्सना करती हुई। तर्जयन्ती = (तर्जनं कुर्वन्ती) धमकाती हुई, डाँटती हुई। पुरा = (पूर्वम्) पहले। विश्वास्य = (समाश्वास्य) विश्वास दिलाकर। तूर्णम् = (शीघ्रम्) जल्दी, शीघ्र। भयडकरा = (भयं करोति इति) भयोत्पादिका। गलबद्ध-शगालकः = (गले बद्धः शृगालः यस्य सः) गले में बँधे हुए शृगालवाला। तन्वि = (कोमलांगी स्त्री) सुन्दर, कोमल अंगोंवाली स्त्री।

संदर्भ:-पूर्ववत्
प्रसंग: जब गीदड़ को अपने गले में बाँधकर बाघ जंगल में पुनः बुद्धिमती स्त्री की ओर जाने लगता है तो बुद्धिमती अपनी वाक् चातुरी से बाघ को पुनः भगा देती है। इसी का वर्णन प्रस्तुत अंश में है।

हिन्दी अनुवाद:
गीदड़: यदि ऐसा है तो मुझको अपने गले में बाँधकर शीघ्र चलो। वह बाघ वैसा करके वन में गया। गीदड़सहित बाघ को फिर आए हुए बाघ को दूर से ही देखकर बुद्धिमती सोचने लगी-गीदड़ द्वारा उकसाए बाघ से छुटकारा कैसा हो ? परन्तु हाजिरजवाब स्त्री ने अंगुली उठाकर गीदड़ को फटकारते हुए कहा अरे धूर्त! पहले तेरे द्वारा मुझे तीन बाघ दिए गए थे। विश्वास दिलाकर भी आज एक को ही लाकर क्यों जा रहे हो, अब बताओ। ऐसा कहकर भयंकर व्याघ्रमारी तेजी से दौड़ी। गले में गीदड़ बँधा बाघ भी अचानक भाग गया। इस प्रकार बुद्धिमती बाघ के भय से दूसरी बार भी मुक्त हो गई। इसलिए ही कहा गया है-हे सुन्दरी ! सदैव सब कार्यों में बुद्धि ही बलवती होती है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 2 बुद्धिर्बलवती सदा

बुद्धिर्बलवती सदा Summary in Hindi

बुद्धिर्बलवती सदा पाठ परिचय:

संस्कृत साहित्य में कथा लेखन की परम्परा अति प्राचीन है। पंचतंत्र और हितोपदेश की कथाएँ आज भी कोमल मति बालकों का उचित मार्ग दर्शन करती हैं। इनका आरम्भिक रूप मौखिक ही था। रात को सोते समय बच्चे अपनी नानीदादी से कथाएँ सुनते थे और उसके बाद ही उनकी आँखों में नींद आती थी। ये कथाएँ मनोरंजन के साथ-साथ उनका नैतिक विकास भी करती थी। बाद में लेखन कला का विकास होने पर इन कथाओं को साहित्यिक रूप दिया गया। ‘शुकसप्ततिः’ ऐसे ही कथा ग्रन्थों में एक महत्त्वपूर्ण कथा संग्रह है।

‘शुकसप्ततिः’ संस्कृत कथा साहित्य की परवर्ती रचना है। भारतीय आख्यान परम्परा में ‘किस्सा तोता मैना’ की कथाएँ प्रसिद्ध हैं। शुकसप्ततिः उन्हीं कथाओं का एक रूपान्तर है। इसमें एक शुक (Parrot) एक अकेली स्त्री का मन बहलाने के लिए रोचक कथाएँ कहता है। ये कथाएँ मनोरंजन होने के साथ-साथ बुद्धि कौशल से परिपूर्ण हैं।

प्रस्तुत पाठ इसी ‘शुकसप्ततिः’ नामक प्रसिद्ध कथाग्रन्थ से सम्पादित कर लिया गया है। इसमें अपने दो छोटे-छोटे पुत्रों के साथ जंगल के रास्ते से पिता के घर जा रही बुद्धिमती नामक नारी के बुद्धिकौशल को दिखाया गया है, जो सामने आए हुए शेर को डरा कर भगा देती है। इस कथाग्रन्थ में नीतिनिपुण शुक और सारिका की कहानियों के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से सद्वृत्ति का विकास कराया गया है।

बुद्धिर्बलवती सदा पाठस्य सारांश:

‘बुद्धिर्बलवती सदा’ यह पाठ संस्कृत के कथा ग्रन्थ ‘शुकसप्ततिः’ से लिया गया है। इस पाठ में नारी के बुद्धि कौशल को दिखाया गया है। देउला नामक ग्राम में राजसिंह नामक एक राजपूत रहता था। उसकी पत्नी बुद्धिमती किसी आवश्यक कार्य से अपने दोनों पुत्रों को साथ लेकर अपने पिता के घर जा रही थी। जंगल का रास्ता था, अचानक एक बाघ दिखाई पड़ा बाघ को देखते ही उसने अपने पुत्रों को पीटते हुए जोर से बोली तुम अकेले-अकेले ही बाघ को खाने के लिए क्यों झगड़ते हो यदि यह एक ही है तो इसे बाँट कर खा लो बाद में कोई दूसरा ढूँढ लेंगे। बुद्धिमती के इन वचनों को सुनकर बाघ डर कर भाग गया और सोचने लगा कि यह कोई बाघमारी है।

भय से व्याकुल बाघ को देखकर रास्ते में एक गीदड़ ने हँसते हुए पूछा कि तुम क्यों दौड़े जा रहे हो ? बाघ ने उत्तर में कहा कि तू भी कहीं जाकर छिप जा। जिसके बारे में सुना जाता है, वह बाघमारी हमें मारने के लिए आ पहुँची है। गीदड़ ने बाघ को विश्वास दिलाया कि मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ और फिर देखना कि वह तुम्हें सामने दिखाई भी नहीं पड़ेगी, यदि ऐसा न हुआ तो तुम मुझे मार देना। विश्वास को दृढ़ करने के लिए गीदड़ ने कहा कि तुम मुझे अपने गले में रस्सी से बाँधकर ले जाओ। बाघ तैयार हो गया। गीदड़ सहित आए हुए बाघ को देखकर बुद्धिमती ने बड़ी चतुराई

और साहस से काम लेते हुए गीदड़ को डाँटते हुए कहा-अरे धूर्त गीदड़ ! तूने पहले तीन बाघ दिए थे और आज एक ही लाकर तू कहाँ जा रहा है ? इतना कहकर बुद्धिमती बड़ी तेजी से उनकी तरफ दौड़ी। बाघ भी यह सुनकर गीदड़ को गले में बाँधे हुए ही वहाँ से दौड़ गया। इस प्रकार बुद्धिमती ने अपनी बुद्धि और साहस के बल पर बाघ से अपनी रक्षा कर ली। अत: ठीक ही कहा है कि सदा सभी कार्यों में बुद्धि बलवती होती है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

HBSE 10th Class Sanskrit शुचिपर्यावरणम् Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(क) कविः किमर्थ प्रकृतेः शरणम् इच्छति ?
(ख) कस्मात् कारणात् महानगरेषु संसरणं कठिनं वर्तते ?
(ग) अस्माकं पर्यावरणे किं किं दूषितम् अस्ति ?
(घ) कविः कुत्र सञ्चरणं कर्तुम् इच्छति ?
(ङ) स्वस्थजीवनाय कीदृशे वातावरणे भ्रमणीयम् ?
(च) अन्तिमे पद्यांशे कवेः का कामना अस्ति ?
उत्तराणि:
(क) महानगरस्य जीवनं दुर्वहं जातम्, अतः कविः प्रकृतेः शरणम् इच्छति।
(ख) महानगरेषु यानानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः भवन्ति, अतः तत्र संसरणं कठिनं वर्तते।
(ग) अस्माकं पर्यावरणे वायुमण्डलं, जलं, भक्ष्यं धरातलं च दूषितम् अस्ति।
(घ) कवि: ग्रामान्ते एकान्ते कान्तारे च सञ्चरणं कर्तुम् इच्छति। (ङ) स्वस्थजीवनाय प्रदूषणरहित वातावरणे भ्रमणीयम्।
(च) अन्तिमे पद्यांशे कवे: कामना अस्ति यत् निसर्गे पाषाणी सभ्यता समाविष्टा न स्यात्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

प्रश्न 2.
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं कुरुत …………..
(क) प्रकृतिः + ………….. = प्रकृतिरेव
(ख) स्यात् + ……….. + …………. = स्यान्नैव
(ग) ………. + अनन्ताः = हानन्ताः
(घ) बहिः + अन्तः + जगति = …………………
(ङ) ……………… + नगरात् = अस्मान्नगरात्
(च) सम् + चरणम् = ……………
(छ) धूमम् + मुञ्चति
उत्तराणि:
(क) प्रकृतिः + एव = प्रकृतिरेव
(ख) स्यात् +न +एव = स्यान्नैव
(ग) हि + अनन्ताः = ह्यनन्ताः
(घ) बहिः + अन्तः + जगति = बहिरन्तर्जगति
(ङ) अस्मात् + नगरात् = अस्मान्नगरात्
(च) सम् + चरणम् = सञ्चरणम्
(छ) धूमम् + मुञ्चति = धूमं मुञ्चति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

प्रश्न 3.
अधोलिखितानाम् अव्ययानां सहायतया रिक्तस्थानानि पूरयत:
भृशम्, यत्र, तत्र, अत्र, अपि, एव, सदा, बहिः
(क) इदानीं वायुमण्डलं ……………. प्रदूषितमस्ति।
(ख) …………….जीवनं दुर्वहम् अस्ति ।
(ग) प्राकृतिक-वातावरणे क्षणं सञ्चरणम् ……… लाभदायकं भवति।
(घ) पर्यावरणस्य संरक्षणम् … … प्रकृतेः आराधना।
(ङ) ……………समयस्य सदुपयोगः करणीयः।
(च) भूकम्पित-समये……………गमनमेव उचितं भवति।
(छ) ……….हरीतिमा ………… शुचि-पर्यावरणम्।
उत्तराणि:
(क) इदानीं वायुमण्डलं भृशं प्रदूषितमस्ति।
(ख) अत्र जीवनं दुर्वहम् अस्ति।
(ग) प्राकृतिक-वातावरणे क्षणं सञ्चरणम् अपि लाभदायकं भवति।
(घ) पर्यावरणस्य संरक्षणम् एव प्रकृतेः आराधना।
(ङ) सदा समयस्य सदुपयोगः करणीयः।
(च) भूकम्पित-समये बहिः गमनमेव उचितं भवति।
(छ) यत्र हरीतिमा तत्र शुचि-पर्यावरणम्।।

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प्रश्न 4.
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखित-पदेषु प्रकृतिप्रत्ययविभागं/संयोगं कुरुतयथा:
जातम् = जन् + क्त
(क) प्र + कृ + क्तिन् = ……………….
(ख) नि + सृ + क्त + टाप = ……………
(ग) …………………… + क्त = दूषितम्
(घ) …………………… + …………………. = करणीयम्
(ङ) ……………… + यत् = भक्ष्यम्
(च) रम् + …………………… + ……………… = रमणीया
(छ) ……………. + …………………… + ……………… = वरणीया
(ज) पिष् + …………………. = पिष्टाः।
उत्तराणि:
(क) प्र + कृ + क्तिन् = प्रकृतिः
(ख) नि + सृ + क्त + टाप् = निसृता
(ग) दूष् + क्त = दूषितम्
(घ) कृ + अनीयर् = करणीयम्
(ङ) भक्ष् + यत् = भक्ष्यम्
(च) रम् + अनीयर् + टाप = रमणीया
(छ) वृ + अनीयर् + टाप् = वरणीया
(ज) पिष् + क्त = पिष्टाः।

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प्रश्न 5.
अधोलिखितानां पदानां पर्यायपदं लिखत
(क) सलिलम् ……………….
(ख) आम्रम् ……………….
(ग) वनम् ……………….
(घ) शरीरम् ……………….
(ङ) कुटिलम् ……………….
(च) पाषाणम् ……………….
उत्तराणि
(क) सलिलम् – जलम्
(ख) आम्रम् – रसालम्
(ग) वनम् – कान्तारम्
(घ) शरीरम् – तनुः ।
(च) पाषाणम् – प्रस्तरम्।

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प्रश्न 6.
उदाहरणमनुसृत्य पाठात् चित्वा च समस्तपदानि लिखतय:
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम् img-1
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम् img-2

प्रश्न 7.
रेखाङ्कित-पदमाधुत्य प्रश्ननिर्माणं करुत:
(क) शकटीयानं कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति।
(ख) उद्याने पक्षिणां कलरवं चेतः प्रसादयति।
(ग) पाषाणीसभ्यतायां लतातरुगुल्माः प्रस्तरतले पिष्टाः सन्ति।
(घ) महानगरेषु वाहनानाम् अनन्ताः पतयः धावन्ति।
(ङ) प्रकृत्याः सन्निधौ वास्तविकं सुखं विद्यते।
उत्तराणि – (प्रश्ननिर्माणम्)
(क) शकटीयानं कीदृशं धूमं मुञ्चति ?
(ख) उद्याने केषां कलरवं चेतः प्रसादयति ?
(ग) पाषाणीसभ्यतायां के प्रस्तरतले पिष्टाः सन्ति ?
(घ) कुत्र वाहनानाम् अनन्ताः पङ्क्तयः धावन्ति ?
(ङ) कस्याः सन्निधौ वास्तविकं सुखं विद्यते ?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

योग्यताविस्तारः

समास – समसनं समासः
समास का शाब्दिक अर्थ होता है-संक्षेप। दो या दो से अधिक शब्दों के मिलने से जो तीसरा नया और संक्षिप्त रूप बनता है, वह समास कहलाता है। समास के मुख्यत: चार भेद हैं

  1. अव्ययीभाव समास
  2. तत्पुरुष
  3. बहुब्रीहि
  4. द्वन्द्व

1. अव्ययीभाव
इस समास में पहला पद अव्यय होता है और वही प्रधान होता है।
यथा – निर्मक्षिकम् मक्षिकाणाम् अभावः ।
यहाँ प्रथमपद निर् है और द्वितीयपद मक्षिकम् है। यहाँ मक्षिका की प्रधानता न होकर मक्षिका का अभाव प्रधान है, अत: यहाँ अव्ययीभाव समास है। कुछ अन्य उदाहरण देखें
(i) उपग्रामम् – ग्रामस्य समीपे – (समीपता की प्रधानता)
(ii) निर्जनम् – जनानाम् अभावः – (अभाव की प्रधानता)
(iii) अनुरथम् – रथस्य पश्चात् – (पश्चात् की प्रधानता)
(iv) प्रतिगृहम् – गृहं गृहं प्रति – (प्रत्येक की प्रधानता)
(v) यथाशक्ति – शक्तिम् अनतिक्रम्य – (सीमा की प्रधानता)
(vi) सचक्रम् – चक्रेण सहितम् – (सहित की प्रधानता)

2. तत्पुरुष:
‘प्रायेण उत्तरपदप्रधान: तत्पुरुषः’ इस समास में प्राय: उत्तरपद की प्रधानता होती है और पूर्व पद उत्तरपद के विशेषण का कार्य करता है। समस्तपद में पूर्वपद की विभक्ति का लोप हो जाता है।

यथा – राजपुरुषः अर्थात् राजा का पुरुष। यहाँ राजा की प्रधानता न होकर पुरुष की प्रधानता है, और राजा शब्द पुरुष के विशेषण का कार्य करता है।
(i) ग्रामगत: – ग्रामं गतः।
(ii) शरणागतः – शरणम् आगतः।
(ii) देशभक्तः – देशस्य भक्तः।
(iv) सिंहभीत: – सिंहात् भीतः।
(v) भयापन्न: – भयम् आपन्नः।
(vi) हरित्रातः – हरिणा त्रातः ।
तत्पुरुष समास के दो भेद हैं-कर्मधारय और द्विगु।

(i) कर्मधारय:
इस समास में एक पद विशेष्य तथा दूसरा पद पहले पद का विशेषण होता है।
यथा:
पीताम्बरम् – पीतं च तत् अम्बरम्।
महापुरुषः – महान् च असौ पुरुषः।
कज्जलमलिनम् – कज्जलम् इव मलिनम्।
नीलकमलम् – नीलं च तत् कमलम्।
मीननयनम् – मीन: इव नयनम्।
मुखकमलम् – कमलम् इव मुखम्।

(ii) द्विगु:
‘संख्यापूर्वो द्विगुः’ इस समास में पहला पद संख्यावाची होती है और समाहार (अर्थात् एकत्रीकरण या समूह) अर्थ की प्रधानता होती है।
यथा-त्रिभुजम् – त्रयाणां भुजानां समाहारः। इसमें पूर्वपद ‘त्रि’ संख्यावाची है।
पञ्चपात्रम् – पञ्चानां पात्राणां समाहारः।
पञ्चवटी – पञ्चानां वटानां समाहारः।
सप्तर्षिः – सप्तानाम् ऋषीणां समाहारः।
चतुर्युगम् – चतुर्णा युगानां समाहारः।

3. बहुब्रीहि-‘अन्यपदप्रधान: बहुब्रीहिः’
इस समास में पूर्व तथा उत्तर पदों की प्रधानता न होकर किसी अन्य पद की प्रधानता होती है।
यथा –
पीताम्बरः – पीतम् अम्बरम् यस्य सः (विष्णुः)। यहाँ न तो पीतम् शब्द की प्रधानता है और न अम्बरम् शब्द को अपितु पीताम्बरधारी किसी अन्य व्यक्ति (विष्णु) की प्रधानता है।
नीलकण्ठः – नीलः कण्ठः यस्य सः (शिवः)।
दशाननः – दश आननानि यस्य सः (रावणः)।
अनेककोटिसारः – अनेककोटि: सारः (धनम्) यस्य सः।
विगलितसमृद्धिम् – विगलिता समृद्धिः यस्य तम्।
प्रक्षलितपादम् – प्रक्षालितौ पादौ यस्य तम्।

4. द्वन्द्व:
‘उभयपदप्रधान: द्वन्द्वः’ इस समास में पूर्वपद और उत्तरपद दोनों की समान रूप से प्रधानता होती है।
पदों के बीच में ‘च’ का प्रयोग विग्रह में होता है।
यथा:
रामलक्ष्मणौ – रामश्च लक्ष्मणश्च।
पितरौ – माता च पिता च।
धर्मार्थकाममोक्षाः – धर्मश्च, अर्थश्च, कामश्च, मोक्षश्च।
वसन्तग्रीष्मशिशिराः – वसन्तश्च ग्रीष्मश्च शिशिरश्च।

कविपरिचय:
प्रो० हरिदत्त शर्मा सम्प्रति इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में संस्कृत में आचार्य हैं। इनके कई संस्कृत काव्य प्रकाशित हो चुके हैं। जैसे-गीतकंदलिका, त्रिपथगा, उत्कलिका, बालगीताली, आक्रन्दनम्, लसल्लतिका इत्यादि। इनकी रचनाओं में समाज की विसंगतियों के प्रति आक्रोश तथा स्वस्थ वातावरण के प्रति दिशानिर्देश के भाव प्राप्त होते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

भावविस्तारः
पृथिवी, जलं, तेजो वायुराकाशश्चेति पञ्चमहाभूतानि प्रकृतेः प्रमुखतत्त्वानि। एतैः तत्त्वैरेव पर्यावरणस्य रचना भवति। आवियते परितः समन्तात् लोकोऽनेनेति पर्यावरणं परिष्कृतं प्रदूषणरहितं च पर्यावरणमस्मभ्यं सर्वविधजीवनसुखं ददाति। अस्माभिः सदैव तथा प्रयतितव्यं यथा जलं स्थलं गगनञ्च निर्मलं स्यात्। पर्यावरणसम्बद्धाः केचन श्लोकाः अधोलिखिताः सन्ति

यथा
पृथिवीं परितो व्याप्य तामाच्छाद्य स्थितं च यत्
जगदाधाररूपेण, पर्यावरणमुच्यते॥
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश में पाँच महाभूत प्रकृति के मुख्य तत्त्व है। इन्हीं तत्त्वों से ही पर्यावरण की रचना होती है। ‘आवियते परितः समन्तात् लोकः अनेन इति पर्यावरणम्’ – यह सारा संसार इन तत्त्वों के द्वारा चारों ओर से आवरण कर लिया जाता है, इसीलिए यह पर्यावरण कहलाता है।
शुद्ध एवं प्रदूषण रहित पर्यावरण हमें सब प्रकार का जीवन सुख देता है। हमें भी सदा वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए ; जिससे जल, स्थल और आकाश स्वच्छ रहें। पर्यावरण से सम्बन्धित कुछ श्लोक निम्नलिखित हैं. जैसे – पृथिवी को चारों ओर से व्याप्त कर और उसे आच्छादित करके जो स्थित रहता है, संसार का आधार रूप होने से उसे ही ‘पर्यावरण’ कहा जाता है।

प्रदूषणविषये
सृष्टौ स्थितौ विनाशे च नृविज्ञैर्बहुनाशकम्।
पञ्चतत्त्वविरुद्धं यत्साधितं तत्प्रदूषणम्॥

प्रदूषण के विषय में:
सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश प्रक्रिया में बुद्धिमान् मनुष्यों द्वारा जिसे पाँच तत्त्वों के विरुद्ध तथा विनाशकारी जाना गया, उसे ही ‘प्रदूषण’ कहा जाता है।

वायुप्रदूषणविषये:
प्रक्षिप्तो वाहनैधूमः कृष्णो बह्वपकारकः ।
दुष्टै!सायनैर्युक्तो घातकः श्वासरुग्वहः॥

वायु प्रदूषण के विषय में:
वाहनों द्वारा उगल दिया गया काला धुंआ बहुत अपकारी, दूषित (विषैला) रसायनों से युक्त, घातक तथा श्वासजन्य रोगों को उत्पन्न करने वाला होता है।

जलप्रदूषणविषये:
यन्त्रशाला – परित्यक्तैर्नगरे दूषितद्रवैः ।
नदीनदौ समुद्राश्च प्रक्षिप्तैर्दूषणं गताः ॥

जलप्रदूषण के विषय में-नगर में कारखानों द्वारा छोड़े गए तथा डाले गए दूषित द्रव्यों (जलों) से नदी-नाले और समुद्र प्रदूषित हो गए हैं।

प्रदूषण-निवारणाय संरक्षणाय च:
शोधनं रोपणं रक्षा वर्धनं वायुवारिणः ।
वनानां वन्यवस्तूनां भूमेः संरक्षणं वरम्॥
(एते श्लोकाः पर्यावरणकाव्यात् संकलिताः सन्ति।)

प्रदूषण के निवारण और संरक्षण के लिए:
वायु और जल को शुद्ध रखना, वृक्षारोपण करना और रक्षापूर्वक उनकी वृद्धि करना-ये वनों, वन्य वस्तुओं तथा भूमि के संरक्षण के लिए श्रेष्ठ उपाय हैं।
(ये श्लोक पर्यावरण काव्य से संकलित किए गए हैं।)

तत्सम-तद्भव-शब्दानामध्ययनम्:
अधोलिखितानां तत्समशब्दानां तदुद्भूतानां च तद्भवशब्दानां परिचयः करणीयः
(अधोलिखित तत्सम शब्दों और उनसे उत्पन्न तद्भव शब्दों का परिचय करना चाहिए-)
तत्सम – तद्भव
प्रस्तर – पत्थर
वाष्प – भाप
दुर्वह – दूभर
वक्र – बाँका
कज्जल – काजल
चाकचिक्य – चकाचक, चकाचौंध
धूमः – धुआँ
शतम् – सौ (100)
बहिः – बाहर

छन्दः परिचयः
अस्मिन् गीते शुचि पर्यावरणम् इति ध्रुवकं (स्थायी) वर्तते। तदतिरिक्तं सर्वत्र प्रतिपक्ति 26 मात्राः सन्ति। इदं गीतिकाच्छन्दसः रूपमस्ति।

छन्द-परिचय:
इस गीत में ‘शुचिपर्यावरणम्’ यह ध्रुव (स्थायी) स्वर पंक्ति है। इसके अतिरिक्त पूरे गीत में प्रत्येक पङ्क्ति में 26 मात्राएँ हैं। यह ‘गीतिका’ छन्द का स्वरूप है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

HBSE 10th Class Sanskrit शुचिपर्यावरणम् Important Questions and Answers

शुचिपर्यावरणम् पठित-अवबोधनम्

1. निर्देश:-अधोलिखितं पद्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
दुर्वहमत्र जीवितं जातं प्रकृतिरेव शरणम्।
शुचि-पर्यावरणम्॥
महानगरमध्ये चलदनिशं कालायसचक्रम्।
मनः शोषयत् तनुः पेषयद् भ्रमति सदा वक्रम्॥
दुर्दान्तैर्दशनैरमुना स्यान्नैव जनग्रसनम्। शुचि……. ॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:

(क) एकपदेन उत्तरत
(i) अत्र जीवितं कीदृशं जातम् ?
(ii) पर्यावरणं कीदृशं भवितव्यम् ?
(ii) अनिशं किं चलत् अस्ति ?
(iv) कालायसचक्रं कुत्र भ्रमति ?
(v) दुर्दान्तैः दशनैः किं न स्यात् ?
उत्तराणि:
(i) दुर्वहम्।
(ii) शुचि।
(iii) कालायसचक्रम्।
(iv) महानगरमध्ये।
(v) जनग्रसनम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) प्रकृतिरेव शरणं किमर्थमस्ति ?
(ii) कालायसचक्रं कथं भ्रमति ?
(iii) जनग्रसनं केन न स्यात् ?
उत्तराणि:
(i) अत्र जीवितं दुर्वहं जातम्, अतः प्रकृतिरेव शरणम् अस्ति।
(ii) कालायसचक्रम् अनिशं चलत्, मनः शोषयत, तनुः पेषयत् सदा वक्रं भ्रमति।
(iii) अमुना कालायसचक्रेण दुर्दान्तैः दशनैः जनग्रसनं न स्यात्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘कठिनम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘प्रदूषितम्’ इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं विपरीतार्थकपदं किम् ?
(iii) ‘दुर्दान्तैर्दशनैः’-अत्र विशेष्यपदं किमस्ति ?
(iv) ‘प्रकृतिरेव’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘जातम्’-अत्र प्रकृति-प्रत्ययौ विभजत।
उत्तराणि:
(i) दुर्वहम्।
(ii) शुचि।
(iii) दशनैः।
(iv) प्रकृतिः + एव।
(v) √जन् + क्त।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः अत्र जीवितं दुर्वहं जातम्, प्रकृतिः एव शरणम्। शुचि-पर्यावरणम् (एव शरणम्)। महानगरमध्ये अनिशं चलत् कालायसचक्रं मनः शोषयत्, तनुः पेषयत् सदा वक्रं भ्रमति। अमुना दुर्दान्तैः दशनैः जनग्रसनम् एव न स्यात् (अतः शुचि-पर्यावरणम् एव शरणम्)॥

शब्दार्थाः दुर्वहम् = (दुष्करम्) कठिन, दूभर। जीवितम् = (जीवनम्) जीवन। अनिशम् = (अहर्निशम्) दिनरात। कालायसचक्रम् = (लौहचक्रम्) लोहे का चक्र।शोषयत् = (शुष्कीकुर्वत्) सुखाते हुए। तनुः = (शरीरम्) शरीर। पेषयद् = (पिष्टीकुर्वत्) पीसते हुए। वक्रम् = (कुटिलम्) टेढ़ा। दुर्दान्तः = (भयकरैः) भयानक से। दशनैः = (दन्तैः) दाँतों से। अमुना = (अनेन) इससे।

भावार्थ: इस नगरीय वातावरण में आज जीवन दूभर हो गया है। प्रकृति ही एक मात्र शरण है। शुद्ध-पर्यावरण ही एकमात्र शरण है। महानगरों में दिन-रात चलता हुआ लौह-चक्र (कारखानों और वाहनों के पहिए) मन का शोषण करता हुआ तथा तन को पीसता हुआ निरन्तर टेढ़ी गति से घूम रहा है। कहीं इसके दुर्दान्त दाँतों द्वारा मनुष्यों को खा ही न लिया जाए। (अतः इस मानव-नाश से बचने का एक ही उपाय है-शुद्ध पर्यावरण की शरण)।

व्याख्या: प्रस्तुत पद्यांश में पर्यावरण की भयावहता पर प्रकाश डालते हुए कवि कहता है कि आज नगरीय वातावरण इतना अधिक प्रदूषित हो चुका है कि जिसमें जीवन धारण करना दुष्कर हो गया। महानगरों में दिन-रात लौह चक्र चल रहा है। यहाँ लौह चक्र से कवि का तात्पर्य कारखानों की मशीनों के चक्रों, रेलगाड़ियों के चक्रों तथा सभी प्रकार के वाहनों के चक्रों से है।

जो न केवल ध्वनि प्रदूषण फैलाते हैं अपितु इन वाहनों तथा कारखानों से निकलने वाला गैसीय धुआँ भी वायुमण्डल को दूषित करता है, इसका दुष्प्रभाव मन और शरीर दोनों पर पड़ता है। कवि को यह चिन्ता है कि कहीं इस दूषित वातावरण रूप भयानक दानव के दाँतों से मानव समुदाय कुचल न दिया जाए इसलिए कवि की कामना है कि इस महाविनाश से बचने का उपाय समय रहते ही कर लेना चाहिए अन्यथा बाद में पछताना पड़ेगा और वह उपाय है शुद्ध पर्यावरण वाली प्रकृति की शरण में जाना।

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2. कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति शतशकटीयानम्।
वाष्पयानमाला संधावति वितरन्ती ध्वानम्॥
यानानां पड्क्तयो ह्यनन्ताः कठिनं संसरणम्। शुचि……. ॥2॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) शतशकटीयानं किं मुञ्चति ?
(ii) कज्जलमलिनं किमस्ति ?
(iii) ध्वानं का वितरति ?
(iv) संसरणं कीदृशम् अभवत् ?
(v) अनन्ताः काः सन्ति ?
उत्तराणि:
(i) धूमम्।
(ii) धूमम्।
(iii) वाष्पयानमाला।
(iv) कठिनम्।
(v) पक्तयः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) शतशकटीयानं किं करोति ?
(ii) वाष्पयानमाला कथं संधावति ?
(iii) केषां पतयः अनन्ताः सन्ति।
उत्तराणि
(i) शतशकटीयानं कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति।
(ii) वाष्पयानमाला ध्वानं वितरन्ती संधावति।
(iii) यानानां पतयः अनन्ताः सन्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘त्यजति’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘धूमम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं विशेषणं किम् अस्ति ?
(iii) ‘कोलाहलम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं पर्यायपदं किम् अस्ति ?
(iv) ‘सरलम्’ इति पदस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(v) ‘मुञ्चति’ इति क्रियापदस्य प्रयुक्तं कर्तृपदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) मुञ्चति।
(ii) कज्जलमलिनम्।
(iii) ध्वानम्।
(iv) कठिनम्।
(v) शतशकटीयानम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः शतशकटीयानं कज्जलमलिनं धूमं मुञ्चति । वाष्पयानमाला ध्वानं वितरन्ती संधावति। यानानां हि अनन्ताः पतयः (धावन्ति, अतः) संसरणम् (अपि) कठिनं (भवति)। शुचि……….।

शब्दार्थाः जनग्रसनम् = (जनभक्षणम्) मानव विनाश। कज्जलमलिनम् = (कज्जलम् इव मलिनम्) काजल-सा मलिन (काला)।धूमः = (वाष्पः) धुआँ । मुञ्चति = (त्यजति) छोड़ता है। शतशकटीयानम् = (शकटीयानानां शतम्) सैकड़ों मोटर गाड़ियाँ। वाष्पयानमाला = (वाष्पयानानां पंक्तिः) रेलगाड़ी की पंक्ति। वितरन्ती = (ददती) देती हुई। ध्वानम् = (ध्वनिम्) कोलाहाल। संसरणम् = (सञ्चलनम्) चलना।

भावार्थ: सैंकड़ों मोटर गाड़ियाँ काजल जैसा मलिन धुआँ छोड़ रही हैं। रेलगाड़ियाँ शोर करती हुई दौड़ी चली जा रही हैं। वाहनों की अनगिनत पंक्तियाँ सड़कों पर दौड़ रही हैं। जिनके कारण चलना-सरकना भी कठिन हो गया है। अब तो शान्तिमय एवं स्वस्थ जीवन के लिए पवित्र पर्यावरण ही एक मात्र शरण है। – व्याख्या-दूषित पर्यावरण से चिन्तित कवि कहता है कि महानगरीय सुविधा भोगी जीवन शैली में सड़कों को मोटर गाड़ियों का गढ़ बना दिया गया है। रेलगाड़ियों की संख्या दिन प्रतिदिनि बढ़ रही है। इनसे निकलने वाला धुआँ और शोर दोनों ही जनजीवन को त्रस्त कर रहे हैं। सड़क पर वाहन इतनी मात्रा में हो गए कि चलना तो दूर सरकना भी कठिन हो गया है। शायद पैदल चलने वाले का जीवन कोई मानव जीवन न होकर कीट पतंगों का जीवन बन गया, जिसकी कोई परवाह ही नहीं करता। अत: जीवन रक्षा का एक ही उपाय है, शुद्ध पर्यावरण। जिसके लिए हम सबको प्रयत्नशील होना चाहिए।

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3. वायुमण्डलं भृशं दूषितं न हि निर्मलं जलम्।
कुत्सितवस्तुमिश्रितं भक्ष्यं समलं धरातलम्॥
करणीयं बहिरन्तर्जगति तु बहुशुद्धीकरणम्। शुचि…॥3॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:

(क) एकपदेन उत्तरत
(i) भृशं किं दूषितम् ?
(ii) निर्मलं किं न अस्ति ?
(iii) भक्ष्यं कीदृशम् अभवत् ?
(iv) समलं किमस्ति ?
(v) बहु किं करणीयम् ?
उत्तराणि:
(i) वायुमण्डलम्।
(ii) जलम्।
(iii) कुत्सितवस्तुमिश्रितम्।
(iv) धरातलम्।
(v) शुद्धीकरणम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) वायुमण्डलं जलं च कीदृशे अभवताम् ?
(ii) जगति किं करणीयम् अस्ति ?
उत्तराणि
(i) वायुमण्डलं भृशं दूषितं जलं च समलम् अभवताम्।
(ii) जगति बहिरन्त: बहुशुद्धिकरणं करणीयम् अस्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘अत्यधिकम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘समलम्’ इत्यस्य अत्र प्रयुक्तं विलोमपदं किमस्ति ?
(iii) ‘धरातलम्’ इत्यस्य अत्र प्रयुक्तं विशेषणं किम् अस्ति ?
(iv) ‘करणीयम्’ अत्र प्रकृति-प्रत्ययविभागं कुरुत।
(v) ‘जगति’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
उत्तराणि:
(i) भृशम्।
(ii) निर्मलम्।
(iii) समलम्।
(iv) कृ + अनीयर् ।
(v) सप्तमी विभक्तिः।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः वायुमण्डलं भृशं दूषितम्, न हि निर्मलं जलम् । भक्ष्यं कुत्सितवस्तुमिश्रितं, धरातलं समलं (जातम्) । जगति तु बहिः-अन्तः बहुशुद्धीकरणं करणीयम्। शुचि…… ॥

शब्दार्थाः भृशम् = (अत्यधिकम्) बहुत अधिक। निर्मलम् = (अमलम्) स्वच्छ। कुत्सित-वस्तुमिश्रितम् = (कुत्सितैः वस्तुभिः मिश्रितम्, निन्दनीय-पदार्थमिश्रितम्), निन्दनीय वस्तु की मिलावट से युक्त। जगति = (संसारे) संसार में। करणीयम् = (कर्तव्यम्) करना चाहिए, करना उचित है। समलम् = (मलयुक्तम्) गन्दा। धरातलम् = धरती का ऊपरी उपजाऊ भाग।

भावार्थ: यहाँ नगरों में वायुमण्डल अत्यधिक दूषित हो गया है, न ही स्वच्छ जल है। भक्ष्य पदार्थों में निन्दनीय वस्तुओं की मिलावट है। धरातल गंदगी से व्याप्त है। संसार में अब तो बाहर-अंदर बहुत प्रकार के शुद्धीकरण की आवश्यकता है (क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध पर्यावरण ही एकमात्र शरण है)।

व्याख्या: दूषित पर्यावरण से व्याकुलचित्त कवि कहता है कि नगरीय वातावरण आज पूरी तरह से दूषित हो चुका है, जिसमें साँस लेना भी कठिन है। दूसरी ओर स्वच्छ पेयजल का संकट खड़ा हो गया है। बाज़ार में मिलने वाली सभी खाने की चीजें मिलावट से भरी हुई हैं। शुद्ध वस्तु पैसा खर्च करके भी नहीं मिल पाती। धरती के कण-कण में प्रदूषण समा गया है, इसलिए कवि आह्वान करता है कि अब तो समस्त संसार के लोगों को वातावरण की शुद्धता के प्रयास में लग जाना चाहिए। घर के बाहर, घर के अन्दर, पृथ्वी आदि पदार्थों के बाहर, उनके अन्दर तथा मनुष्य के बाहर और अन्दर अनेक प्रकार के शुद्धिकरण की आवश्यकता है क्योंकि शुद्ध पर्यावरण ही जीवन का आधार है।

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4. कञ्चित् कालं नय मामस्मान्नगराद् बहुदूरम्।
प्रपश्यामि ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरम्॥
एकान्ते कान्तारे क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम्। शुचि… ॥4॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कविः नगरात् कुत्र गन्तुम् इच्छति ?
(ii) कविः निर्झर-नदी-पयःपूरं कुत्र द्रष्टुम् इच्छति ?
(iii) क्षणमपि किं स्यात् ?
(iv) एकान्तः कः कथितः ?
उत्तराणि:
(i) बहुदूरम्।
(ii) ग्रामान्ते।
(ii) सञ्चरणम्।
(iv) कान्तारः।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कविः किं नेतुं कथयति ?
(ii) कवि: ग्रामान्ते किं प्रपश्यति ?
(ii) क्षणमपि सञ्चरणं कुत्र स्यात् ?
उत्तराणि
(i) कविः नगरात् बहुदूरं कञ्चित् कालं नेतुं कथयति।
(ii) कविः ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरं प्रपश्यति।
(iii) क्षणमपि सञ्चरणम् एकान्ते कान्तारे स्यात्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘ग्रामान्ते’-अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘नय’-अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ।
(iii) ‘एकान्ते कान्तारे’-अत्र विशेष्यपदं किमस्ति ?
(iv) ‘क्षणमपि मे स्यात् सञ्चरणम्’-इति वाक्ये ‘मे’ इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) ‘नय’ इति क्रियापदस्य अत्र प्रयुक्तं कर्मपदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) ग्राम + अन्ते।
(ii) लोट्लकारः ।
(iii) कान्तारे।
(iv) कवये।
(v) माम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः कञ्चित् कालं माम् अस्मात् नगरात् बहुदूरं नय। ग्रामान्ते निर्झर-नदी-पयःपूरं प्रपश्यामि। एकान्ते कान्तारे मे क्षणम् अपि सञ्चरणं स्यात्। शुचि…… ॥

शब्दार्था: प्रपश्यामि = (अवलोकयामि) देखू। ग्रामान्ते = गाँव की सीमा पर। निर्झरः = झरना। जलाशयम् = तालाब। पयःपूरम् = जल से लबालब भरा हुआ। कान्तारे = (वने) जंगल में। सञ्चरणम् = चलना-फिरना, घूमना।

भावार्थ: (कवि नगरीय वातावरण से संत्रस्त है, वह इसे छोड़कर कहीं दूर गाँव और वन में प्रकृति का आनन्द लेना चाहता है।) कवि कहता है कि कुछ समय के लिए मुझे इस नगर से बहुत दूर ले जाओ, जिससे मैं गाँवों की सीमा पर जल से परिपूर्ण झरने, नदी और तालाब को देख सकूँ। एकान्त वन प्रदेश में क्षण भर के लिए मेरा चलना-फिरना हो सके (क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध-पर्यावरण ही एकमात्र शरण है)।

व्याख्या: कवि नगरीय वातावरण में रहकर थक चुका है। वह शान्ति और विश्राम पाने के लिए किसी गाँव या वन की शरण में जाना चाहता है। कवि कहता है कि नगरीय वातावरण में मेरा दम घुट रहा है चाहे थोड़े समय के लिए ही परन्तु मुझे इस नगर से बहुत दूर किसी ऐसे स्थान पर ले चलो, जहाँ गाँव की सीमा से जुड़ी हुई नदी, झरने, जल से परिपूरित तालाब मेरे मन को आनन्दित कर सकें। जहाँ के एकान्त वन में क्षण भर के लिए ही सही मुझे स्वतन्त्रता पूर्वक विहरण करने का अवसर प्राप्त हो; क्योंकि शुद्ध पर्यावरण ही मानव समुदाय के जीवन का एकमात्र आधार है।

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5. हरिततरूणां ललितलतानां माला रमणीया।
कुसमावलिः समीरचालिता स्यान्मे वरणीया॥
नवमालिका रसालं मिलिता रुचिरं संगमनम्। शुचि… ॥5॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) ललित-लतानां माला कीदृशी अस्ति ?
(ii) वरणीया का कथिता ?
(iii) का रसालं मिलिता ?
(iv) रुचिरं किम् अस्ति ?
(v) हरिततरूणां का रमणीया ?
उत्तराणि:
(i) रमणीया।
(ii) कुसुमावलिः।
(iii) नवमालिका।
(iv) संगमनम्।
(v) माला।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) केषां माला रमणीया अस्ति ?
(ii) कीदृशी कुसुमावलिः वरणीया स्यात् ?
(iii) रुचिरं संगमनं किमस्ति ?
उत्तराणि
(i) हरिततरूणां ललितलतानां च माला रमणीया अस्ति।
(ii) समीरचालिता कुसुमावलिः वरणीया स्यात्।
(iii) नवमालिका रसालं मिलिता-इति एव रुचिरं संगमनम् अस्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘रमणीया’-अत्र प्रकृति-प्रत्यय-विभागं निर्दिशत।
(ii) ‘रुचिरं संगमनम्’ अत्र विशेषणपदं किमस्ति ?
(iii) ‘आम्रवृक्षम्’-इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किमस्ति ?
(iv) ‘कुसुमावलिः’-अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘स्यान्मे वरणीया’-अत्र ‘मे’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
उत्तराणि:
(i) √रम् + अनीयर् + टाप्।
(ii) रुचिरम्।
(iii) रसालम्।
(iv) कुसुम + अवलिः ।
(v) कवये।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः (यत्र वने) हरिततरूणां ललितलतानां (च) रमणीया माला (स्यात्) । समीरचालिता कुसुमावलिः मे वरणीया स्यात्। नवमालिका रसालं मिलिता (स्यात्), (यत्र मम) रुचिरं संगमनं (स्यात्)। शुचि ……. ॥

शब्दार्थाः कान्तारे = (वने) जंगल में। कुसुमावलिः = (कुसुमानां पंक्तिः) फूलों की पंक्ति । समीरचालिता = (वायुचालिता) हवा से चलाई हुई। रसालम् = (आम्रम्) आम। रुचिरम् = (सुन्दरम्) सुन्दर। संगमनम् = (संगमः, सञ्चरणम्, विहरणम्) मेल, विचरण।

भावार्थ: (कवि ऐसे एकान्त वन में विहरण करना चाहता है, जिस वन में) हरे-भरे वृक्षों और सुन्दर लताओं की रमणीय पंक्ति हो। वायु से आन्दोलित की जा रहे पुष्पों का ऐसा समूह हो, जिसका मैं वरण कर सकूँ। ‘नवमालिका’ नामक लता आम के वृक्ष से गले मिल रही हो और मेरा रुचिपूर्ण संगमन हो सके (क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध पर्यावरण ही एकमात्र शरण है)।

व्याख्या: नगरीय वातावरण से व्यथित कवि कामना करता है कि मुझे तो किसी ऐसे एकान्त वन में चले जाना चाहिए जहाँ हरे-भरे वृक्ष हों, सुन्दर लताओं की पंक्तियाँ हों, जिन्हें देखते ही मन पुलकित हो जाए। वायु के संग डोलता हुआ ऐसा पुष्प समूह हो जिसे देखते ही उसे छू लेने को मन मचल उठे। ऐसे आमों के वृक्ष हों, जिनसे नवमालिका नामक लता लिपटी हुई हो, मानो कोई प्रेमी-प्रेमिका लिपटकर सुन्दर संगम कर रहे हों। कवि कहता है मुझे भी ऐसा वन मिले जहाँ मैं भी अपनी इच्छानुसार संगमन अर्थात् विहरण कर सकूँ क्योंकि शुद्ध पर्यावरण वाला ऐसा प्राकृतिक वातावरण ही मुझे जीवन दान दे सकता है। .

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6. अयि चल बन्धो ! खगकुलकलरव-गुञ्जितवनदेशम्।
पुर-कलरव-सम्भ्रमितजनेभ्यो धृतसुखसन्देशम्॥
चाकचिक्यजालं नो कुर्याजीवितरसहरणम्। शुचि….॥6॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) कलरवः कस्य अस्ति ?
(ii) वनदेशः केन गुञ्जितः ?
(iii) जनाः केन सम्भ्रमिताः ?
(iv) चाकचिक्यजालं किं न कुर्यात् ?
उत्तराणि:
(i) खगकुलस्य।
(ii) खगकुल-कलरवेण।
(iii) पुर-कलरवेण।
(iv) जीवितरसहरणम्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कविः कुत्र गन्तुम् इच्छति ?
(ii) वनदेशः केभ्यः धृतसुखसन्देशः अस्ति ?
(iii) कविः नगरात् कथं गन्तुम् इच्छति ?
उत्तराणि
(i) कविः खगकुलरव-गुञ्जित-वनदेशं गन्तुम् इच्छति।
(ii) वनदेशः पुर-कलरव-सम्भ्रमित-जनेभ्यः धृतसुखसन्देशः अस्ति।
(iii) क्वचित् नगरस्य चाकचिक्यजालं जीवितरसहरणं न कुर्यात्-अतएव कविः नगरात् वनदेशं गन्तुम् इच्छति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘चल’-अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘न’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘नगर-कोलाहलः’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तः शब्दः कोऽस्ति।
(iv) ‘सम्भ्रमितः’ इत्यस्य प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत।
(v) ‘कुर्यात्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) लोट्लकारः ।
(ii) नो।
(iii) पुर-कलरवः ।
(iv) सम् + √भ्रम् + क्त।
(v) चाकचिक्यजालम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः अयि बन्धो ! पुर-कलरव-सम्भ्रमितजनेभ्यः धृतसुखसंदेशं खगकुल-कलरव-गुञ्जित-वनदेशं चल। (नगरस्य) चाकचिक्यजालं जीवितरसहरणं नो कुर्यात्। शुचि……….. ॥

शब्दार्थाः खगकुलकलरवः = (खगकुलानां कलरवः, पक्षिसमूहध्वनिः) पक्षियों के समूह की ध्वनि। चाकचिक्यजालम् = (कृत्रिमं प्रभावपूर्ण जगत्) चकाचौंध भरी दुनिया। नो = (नहि) नहीं। जीवित-रसहरणम् = (जीवनानन्दविनाशम्) जीवन से आनन्द का हरण। पुर-कलरवः = (नगरे भवः कोलाहलः) नगर में होने वाला कोलाहल।

भावार्थ: (कवि अपने मित्र को पुकारते हुए कहता है-) हे मित्र ! नगरों के शोरगुल से सम्भ्रमित लोगों के लिए जहाँ धारण करने योग्य सुख की झलक मिलती है, ऐसे पक्षिसमूह के कलरव से गुञ्जायमान वन-स्थल की ओर मुझे ले चल। कहीं नगर की चकाचौंध हमारे जीवन के आनन्द का हरण न कर ले (क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध पर्यावरण ही एक मात्र शरण है।

व्याख्या: कवि अपने मित्र को पुकारते हुए कहता है कि नगरीय वातावरण के शोरगुल से मानव समुदाय की सोचने
और समझने की शक्ति क्षीण हो गई है। गाँव और वन की ओर लौटने जाने का सन्देश ही सुख प्रदान करने वाला है। ऐसे गाँव और वन जहाँ पक्षियों की चहचाहट से सारा वातावरण गुंजायमान हो रहा हो। हे मित्र ! हमें शीघ्रता से ऐसे सुखमय शुद्ध पवित्र वातावरण वाले वन समूह से व्याप्त स्थान की ओर प्रस्थान कर देना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि नगरीय जीवन की चकाचौंध का यह जाल हमारे जीवन के आनन्द रूपी हिरण का हरण कर ले। इस जीवन नाश से पहले ही हमें शुद्ध पर्यावरण की शरण में चले जाना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

7. प्रस्तरतले लता तरुगुल्मा नो भवन्तु पिष्टाः।
पाषाणी सभ्यता निसर्गे स्यान्न समाविष्टा॥
मानवाय जीवनं कामये नो जीवन्मरणम्। शुचि…..॥7॥ .

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर:
(क) एकपदेन उत्तरत
(i) पिष्टाः के न भवन्तु ?
(ii) पाषाणी-सभ्यता कुत्र समाविष्टा न स्यात् ?
(iii) कविः जीवनं कस्मै कामयते ?
(iv) कविः किं न कामयते ?
(v) सभ्यता कीदृशी कथिता ?
उत्तराणि:
(i) लतातरुगुल्माः ।
(ii) निसर्गे।
(iii) मानवाय।
(iv) जीवन्मरणम्।
(v) पाषाणी।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) लतातरुगुल्माः कुत्र पिष्टाः न भवन्तु ?
(ii) निसर्गे कस्याः समावेशः न स्यात् ?
(iii) कविः किं कामयते ?
उत्तराणि
(i) लतातरुगुल्माः प्रस्तरतले पिष्टाः न भवन्तु।
(ii) निसर्गे पाषाणी-सभ्यतायाः समावेश: न स्यात्।
(iii) कविः मानवाय जीवनं कामयते।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) “शिलातले’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘प्रकृतौ’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किमस्ति ?
(iii) ‘मरणम्’ इति पदस्य विशेषणं किमस्ति ?
(iv) ‘समाविष्टा’-अत्र प्रकृति-प्रत्ययनिर्देशं कुरुत।
(v) ‘जीवनम्’-इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) प्रस्तरतले।
(ii) निसर्गे।
(iii) जीवत्।
(iv) सम् + आ + √विश् + क्त + टाप्।
(v) मरणम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 1 शुचिपर्यावरणम्

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः लतातरुगुल्मा प्रस्तरतले पिष्टाः नो भवन्तु। निसर्गे पाषाणी सभ्यता समाविष्टा न स्यात्। मानवाय जीवनं कामये न जीवन्मरणं (कामये)। शुचि……….।

शब्दार्था: प्रस्तरतले = (शिलातले) पत्थरों के तल पर। लतातरुगुल्माः = (लताश्च तरवश्च गुल्माश्च) लता, वृक्ष और झाड़ी। पाषाणी = (पर्वतमयी) पथरीली। निसर्गे = (प्रकृत्याम्) प्रकृति में। जीवन्मरणम् = जीते-जी मृत्यु, चलती फिरती लाश।

भावार्थ: लता, वृक्ष और झाड़ियाँ कहीं पत्थरों के नीचे पिस न जाएँ। संसार में कहीं पाषाणी सभ्यता का समावेश न हो जाए। मैं तो मनुष्य के जीवन की कामना करता हूँ, जीते-जी मरण की नहीं (क्योंकि जीवन के लिए शुद्ध पर्यावरण ही एकमात्र शरण है)।

व्याख्या: आज घास-फूस और वनस्पतियों वाली धरती का दर्शन भी दुर्लभ हो गया । कहीं मकान हैं तो कहीं फैक्ट्रियाँ और इनसे जो भाग बच गया उस पर कंकरीट से बनी सड़कें बिछी पड़ी हैं। वृक्ष लता और झाड़ियाँ इस पथरीली सभ्यता के नीचे पिसकर रह गई हैं। प्रकृति में कहीं इस पाषाणप्रिय सभ्यता का समावेश न हो जाए। क्योंकि ऐसी पत्थर

दिल सभ्यता प्रदूषण के नित्य नये अम्बार खड़े करके कोमल प्रकृति को ही नष्ट कर देगी। जिसमें मनुष्य एक चलतीफिरती लाश की तरह होगा। कवि कहता है कि मुझे मृत्यु से कोई भय नहीं है, परन्तु प्रदूषित पर्यावरण के कारण जो जीते-जी मरण की स्थिति बन रही है वह भी मुझे स्वीकार नहीं है। मैं तो मनुष्य समुदाय के लिए जीवन की कामना करता हूँ, जो शुद्ध पर्यावरण में ही संभव है।

शुचिपर्यावरणम् Summary in Hindi

शुचिपर्यावरणम् पाठ परिचय:

मनुष्य के सामने पर्यावरण की सुरक्षा आज सबसे बड़ी समस्या है। महानगरीय जीवन शैली की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए दिन-प्रतिदिन कल-कारखाने बढ़ते चले जा रहे हैं। कारखानों की चिमनियों तथा वाहनों से उगलते धुएँ ने समस्त वायुमण्डल दूषित कर दिया है। फ्रिज, एयरकंडीशनर आदि से उत्सृजित घातक गैसों ने प्राणवायु को विषैला बना दिया है। कारखानों से निकलने वाले कचरे तथा एसिड ने नदी, नाले, समुद्र आदि के जल को प्रदूषित कर दिया है। ध्वनिप्रसारक यन्त्रों की प्रयोग-बहुलता, वाहनों तथा कारखानों के भयंकर शोर ने मनुष्य-मन को अशान्त तथा रोगी बना दिया है। घातक कीटनाशकों तथा रसायनों की अधिकता ने अन्न, फल तथा सब्जियों को विषमय कर दिया है। पर्यावरण के प्रहरी वृक्ष-वनों पर निर्दयतापूर्वक कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं। फलतः समुद्रों का जल स्तर बढ़ने से समुद्र तटों के निकटवर्ती क्षेत्र के जलमग्न हो जाने का खतरा बढ़ गया है।

आज न श्वास लेने के लिए शुद्ध प्राणवायु उपलब्ध है, न पीने के लिए शुद्ध जल। मनुष्य, पशु-पक्षी, जल-जन्तुओं सभी का जीवन संकट में पड़ गया है। हम भूल गए हैं कि पर्यावरण के संरक्षण में ही हमारी सुरक्षा का रहस्य छिपा है। अतः आवश्यकता पर्यावरण-सुरक्षा के प्रति जागरूक होने की है। यही ‘शुचिपर्यावरणम्’ कविता की रचना में कवि का उद्देश्य है।

प्रस्तुत पाठ ‘शुचिपर्यावरणम्’ आधुनिक संस्कृत कवि हरिदत्त शर्मा के रचना संग्रह ‘लसल्लतिका’ से संकलित है। इसमें कवि ने महानगरों की यांत्रिक-बहुलता से बढ़ते प्रदूषण पर चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा है कि यह लौहचक्र तनमन का शोषक है, जिससे वायुमण्डल और भूमण्डल दोनों मलिन हो रहे हैं। कवि महानगरीय जीवन से दूर, नदी-निर्झर, वृक्षसमूह, लताकुञ्ज एवं पक्षियों से गुञ्जित वनप्रदेशों की ओर चलने की अभिलाषा व्यक्त करता है।

शुचिपर्यावरणम् पाठस्य सारांश:

‘शुचिपर्यावरणम्’ पाठ पर्यावरण प्रदूषण पर आधारित है। कवि हरिदत्त शर्मा नगरीय वातावण से व्याकुल है। महानगरों के बीच रात-दिन चलती हुई मशीनों के पहिये मनुष्य के तन को ही नहीं उसके मन को भी पीस रहे हैं। कवि को चिंता है कि मानव जाति कहीं इनका ग्रास न बन जाए। अत: शुद्ध पर्यावरण वाली प्रकृति की शरण में जाना चाहता है।

मोटर, रेलगाड़ियाँ धुआँ छोड़कर और शोर करके प्रदूषण फैला रही हैं। न साँस लेने के लिए शुद्ध वायु है न पीने के लिए शुद्ध जल, खाद्य वस्तुओं में मिलावट की भरमार है। इसीलिए कवि इस वातावरण से खिन्न होकर गाँव और वन में घूम फिर कर जीवन का आनन्द लेना चाहता है। जहाँ जल से परिपूर्ण झरने, नदी-नाले हरे-भरे वृक्ष, सुन्दर लताएँ हों। जहाँ नगर में होने वाले कोलाहल से व्याकुल लोगों के लिए पक्षियों के समूह से गुंजायमान वन प्रदेश सुख का सन्देश दे रहे हैं। जहाँ नगर में पाई जाने वाली चकाचौंध जीवन के आनन्द का विनाश नहीं करती है।

कवि कामना करता है कि कहीं लता, वृक्ष और झाड़ियाँ पत्थर की शिलाओं के नीचे न समा जाए। लगातार सड़कों, भवनों और कारखानों के निर्माण से भूमि पथरीली बनती चली जा रही है। कृषि योग्य भूमि घट रही है। कवि की चिंता है कि प्रकृति में इस पत्थर दिल सभ्यता का स्थायी निवास न हो जाए। कवि कहता है कि यदि ऐसा हो गया तो यह मनुष्य समाज के लिए जीते-जी मरण के तुल्य होगा और मुझे मानव का मरण नहीं अपितु जीवन अपेक्षित है। इसीलिए हमें बढ़-चढ़कर अपने पर्यावरण को प्रदूषण से रहित बनाना चाहिए तथा अधिक से अधिक प्राकृतिक वातावरण में जीने का प्रयास करना चाहिए।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ?

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ? Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 मैं क्यों लिखता हूँ?

HBSE 10th Class Hindi मैं क्यों लिखता हूँ? Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अधिक मदद करती है, क्यों?
उत्तर-
लेखक का मत है कि सच्चा लेखन भीतरी मज़बूरी या विवशता से ही उत्पन्न होता है। यह मजबूरी मन के भीतर से उत्पन्न अनुभूति से ही जगती है। बाहरी घटनाओं या दबाव से उत्पन्न नहीं होती। जब तक किसी लेखक का हृदय अनुभव के कारण पूरी तरह संवेदनशील नहीं हो उठता, उसमें अभिव्यक्ति की आकुलता पैदा नहीं होती, तब तक वह कुछ लिख नहीं पाता।

प्रश्न 2.
लेखक ने अपने आपको हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता कब.और किस तरह महसूस किया?
उत्तर-
लेखक हिरोशिमा गया और वहाँ के विस्फोट के दुष्परिणामों को प्रत्यक्ष रूप में देखकर भी विस्फोट का भोक्ता नहीं बन सका था। किंतु एक दिन जब लेखक जापान के हिरोशिमा नगर की सड़क पर घूम रहा था, अचानक उसकी नज़र एक पत्थर पर पड़ी। उस पत्थर पर एक मानव की छाया छपी हुई थी। वास्तविकता यह है कि विस्फोट के समय कोई मनुष्य उस पत्थर के समीप खड़ा होगा। रेडियम-धर्मी किरणों ने उस मनुष्य को भाप की तरह उड़ाकर उसकी छाया पत्थर पर डाल दी। उसे देखकर लेखक के मन में एक अनुभूति जगी थी। उसके मन में विस्फोट का प्रत्यक्ष दृश्य साकार हो उठा। उस समय वह विस्फोट का भोक्ता बन गया था।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 3.
‘मैं क्यों लिखता हूँ” के आधार पर बताइए कि
(क) लेखक को कौन-सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं?
(ख) किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं?
उत्तर-
(क) लेखक के अनुसार वह स्वयं जानना चाहता है कि वह क्यों लिखना चाहता है? यही जानने की इच्छा ही उसे लिखने की प्रेरणा देती है। वह अपने भीतर उत्पन्न होने वाली विवशता से मुक्ति पाने के लिए भी लिखता है। यह विवशता ही वह भावना है जो उसे लिखने के लिए मजबूर करती है। वस्तुतः लेखक अपने भीतर उत्पन्न विवशता से मुक्ति पाने की इच्छा और तटस्थ होकर उसे देखने और पहचानने की भावना ही लेखक को लिखने की प्रेरणा देती है।

(ख) यह बात काफी हद तक सही है कि एक ही रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को कुछ भी रचने के लिए उत्साहित करते हैं। जापान के हिरोशिमा नामक स्थान पर अणु-बम गिराने वाले ने भी अपना दुष्कर्म करके लेखक को लिखने के लिए प्रेरित किया। कभी-कभी व्यक्ति संपादकों, प्रकाशकों व आर्थिक लाभ से उत्साहित होकर भी लेखन कार्य करता है। किंतु यह कारण कोई जरूरी नहीं है। किंतु वास्तविक एवं सच्चा कारण तो लेखक के भीतर उत्पन्न आकुलता या विवशता ही होती है।

प्रश्न 4.
कुछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ-साथ बाह्य दबाव भी महत्त्वपूर्ण होता है। ये बाह्य दबाव कौन-कौन से हो सकते हैं? .
उत्तर-
ये बाह्य दबाव निम्नलिखित हो सकते हैं(1) संपादकों का आग्रह। (2) प्रकाशकों का तकाजा। (3) आर्थिक लाभ। . (4) किसी विषय-विशेष पर प्रचार-प्रसार करने का दबाव।

प्रश्न 5.
क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुड़े कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, कैसे?
उत्तर-
बाह्य दबाव तो सभी क्षेत्रों से जुड़े लोगों या कलाकारों को प्रभावित करते हैं। यदि कोई व्यक्ति कला के किसी क्षेत्र में प्रसिद्धि प्राप्त कर लेता है तो लोगों की उससे अपेक्षाएँ और भी बढ़ जाती हैं। इसके साथ-साथ आर्थिक लाभ की लालसा भी हर व्यक्ति पर दबाव बनाती है। वह लोगों के दबाव व धन के लालच में आकर कार्य करता है। वर्तमान युग में धन के बिना कोई कार्य संपन्न नहीं होता। इसी कारण धन की आवश्यकता जैसा बाह्य दबाव तो हर क्षेत्र के व्यक्ति से जुड़ा रहता है। अतः स्पष्ट है कि केवल रचनाकारों को ही नहीं, अपितु हर क्षेत्र से जुड़े कलाकारों को भी बाह्य दबाव प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 6.
हिरोशिमा पर लिखी कविता लेखक के अंतः व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप कैसे कह सकते हैं?
उत्तर-
हिरोशिमा पर लिखी लेखक की कविता को हम उनके आंतरिक दबाव का परिणाम कह सकते हैं। उसके लिए उन्हें किसी संपादक या प्रकाशक ने तकाजा नहीं किया था और न ही उनके सामने कोई आर्थिक अभाव था। इस कविता को उन्होंने अपनी आंतरिक अनुभूति की जागृति के प्रकाश से प्रभावित होकर लिखा है। अतः यह कविता कवि की आंतरिक अनुभूति का परिणाम है।

प्रश्न 7.
हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्टि में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ-कहाँ और – किस तरह से हो रहा है?
उत्तर-
निश्चय ही हिरोशिमा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है, किंतु आज भी विज्ञान का दुरुपयोग करके मानव, मानव का विनाश करने पर तुला हुआ है। परमाणु बम, एटम बम, हाइड्रोजन बम, मिसाइल्स तथा अनेक ऐसे विनाशकारी अस्त्र-शस्त्र बनाकर मानव विज्ञान का दुरुपयोग कर रहा है। इन अस्त्र-शस्त्रों से संसार कभी भी नष्ट हो सकता है। आज एक से बढ़कर एक विषैली गैसें तैयार की जा रही हैं जिससे किसी भी देश का जलवायु विषाक्त किया जा सकता है। जिससे लोगों का जीवन पलक झपकते ही नष्ट हो सकता है। आज विश्व भर में आतंकवादी विस्फोटक पदार्थों का प्रयोग कर आतंक फैला रहे हैं। शक्तिशाली देश विज्ञान से प्राप्त शक्ति से कमज़ोर देशों पर आक्रमण करके वहाँ के जीवन को नष्ट कर रहे हैं।

विज्ञान के दुरुपयोग से चिकित्सक बच्चों का गर्भ में भ्रूण-परीक्षण कर रहे हैं। इससे जनसंख्या संतुलन बिगड़ता जा रहा है। कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करने से अनाज की पैदावार तो बढ़ जाती है, किंतु उनसे उत्पन्न अनाज स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। आज विज्ञान के परीक्षणों से वातावरण भी दूषित हो रहा है।

प्रश्न 8.
एक सवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है?
उत्तर-
आज के युग में विज्ञान के बिना जीवन संभव नहीं है, किंतु विज्ञान का दुरुपयोग भी बराबर किया जा रहा है। मैं विज्ञान के दुरुपयोग को रोकने के लिए चाहूँगा कि उन सब कार्यों के विरुद्ध प्रचार करूँ जो मानवता के लिए हानिकारक हैं। उदाहरणार्थ पोलिथीन का निर्माण न हो क्योंकि इसके अनेक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। पोलिथीन से वातावरण तो दूषित हो ही रहा है इससे पशुओं की जान भी चली जाती है। इसी प्रकार कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग भी सोच-समझकर करना चाहिए। इनके प्रयोग से बहुत सारा जहर हमारे शरीर में जाता है, जिससे कैंसर जैसी बीमारी लग जाती है। खेतों में अधिक रासायनिक खादों की अपेक्षा गोबर से बनी खाद का प्रयोग करना चाहिए। इन सब कार्यों से कुछ सीमा तक विज्ञान के दुरुपयोग को रोका जा सकता है।

HBSE 10th Class Hindi मैं क्यों लिखता हूँ? Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य स्पष्ट करें।
उत्तर-
इस पाठ में लेखन कार्य की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है। लेखक ने बताया है कि लेखन कार्य वास्तव में आंतरिक . अनुभूति से उत्पन्न भावों की व्याकुलता से होता है। कभी-कभी बाहरी दबाव के कारण भी लेखन कार्य किया जाता है। किंतु जो लेखन कार्य आंतरिक अनुभूति की प्रेरणा से लिखा जाता है, वह ही वास्तविक कृति होती है और उसके लेखक को कृतिकार कहा जाता है। लेखक ने इस बात को हिरोशिमा में घटित घटना के वर्णन से सिद्ध किया है। लेखक ने जब वहाँ एक पत्थर पर मनुष्य की आकृति को देखा जो विस्फोट के समय भाप बनकर उड़ गया था, तब लेखक ने विस्फोट से उत्पन्न भयानक दृश्य को साक्षात रूप में अनुभव किया था और उसकी अनुभूति की प्रेरणा से ही हिरोशिमा नामक कविता लिखी थी।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 2.
लेखक और कृतिकार में क्या अंतर बताया गया है?
उत्तर-
श्री अज्ञेय ने लेखक और कृतिकार में अंतर करते हुए बताया है कि कुछ भी लिखना लेखन कार्य नहीं होता। सच्चा लेखन वही होता है जो आंतरिक दबाव से लिखा जाए। मन की छटपटाहट को व्यक्त करने के लिए लिखा जाए ऐसा लेखन ही कृति कहलाता है और ऐसे लेखक को कृतिकार कहा जाता है। इसके विपरीत जिस लेखन में धन या यश की प्रेरणा रहती है, वह सामान्य लेखन कार्य कहलाता है।

प्रश्न 3.
अज्ञेय जी ने अपने लिखने का क्या कारण बताया है?
उत्तर-
अज्ञेय जी ने अपने लिखने के कारण पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि वह अपने भीतर (मन की) की विवशता से मुक्ति पाने के लिए लिखता है। वह भी अपनी आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए तथा तटस्थ होकर उसे देखने और पहचानने के लिए लिखता है। अज्ञेय जी स्वीकार करते हैं कि वह बाह्य दबाव में आकर बहुत कम लिखता है। उसके लिखने का प्रमुख कारण तो उसकी आंतरिक विवशता है। लिखकर ही वह अपनी विवशता से मुक्ति प्राप्त करता है।

प्रश्न 4.
लेखक ने अणु बम द्वारा होने वाले व्यर्थ जीवनाश को कैसे अनुभव किया?
उत्तर-
लेखक ने युद्ध के समय देखा कि पूर्वी सीमा पर सैनिक ब्रह्मपुत्र नदी में बम फेंककर हजारों मछलियाँ मार रहे थे। जबकि उनकी आवश्यकता कम थी। इस प्रकार लेखक ने अनुभव किया न केवल मछलियाँ ही, अपितु जल में रहने वाले दूसरे जीवों को बिना किसी कारण मारा जा रहा था। यह देखकर लेखक ने अनुभव किया कि अणु बम के द्वारा असंख्य लोगों को व्यर्थ ही मारा जा रहा है। हिरोशिमा पर गिराया गया अणु बम इसका स्पष्ट उदाहरण है।

प्रश्न 5.
अज्ञेय जी के लेखन के लिए बाहरी दबावों का कितना सहयोग रहता है?
उत्तर-
अज्ञेय ऐसे कवि हैं जो लेखन कार्य के लिए आंतरिक अनुभूति से उत्पन्न आकुलता के कारण ही रची गई, रचना को उत्तम साहित्य या काव्य मानते हैं। किंतु वे बाहरी दबावों को भी अस्वीकार नहीं करते। उन्होंने अपने लेखन कार्य के लिए बाहरी दबावों को कभी. महत्त्व नहीं दिया। यदि बाहरी दबावों की प्रेरणा उन पर दबाव बनाए तो भी इसमें उन्हें कोई बाधा प्रतीत नहीं होती। वे कहते भी हैं, “मुझे इस सहारे की आवश्यकता नहीं पड़ती लेकिन कभी इससे बाधा भी नहीं होती।”

प्रश्न 6.
प्रत्यक्ष अनुभव और अनुभूति के अंतर को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
प्रत्यक्ष अनुभव सामने घटी घटना से प्राप्त होता है। यह आवश्यक नहीं कि सामने घटने वाली घटना देखने वाले के मन में अनुभूति जगा दे। अनुभूति आंतरिक भाव है। जब किसी घटना के अनुभव से मन में किसी भाव की गहरी आकुलता जाग उठती है तो वह ही अनुभूति होती है। वास्तव में यह अनुभूति ही लेखन कार्य की प्रेरणा बनती है।

प्रश्न 7.
लेखक ने बाहरी दबाव की तुलना किससे की है?
उत्तर-
लेखक ने बताया है कि कुछ लेखक बाहरी दबाव के बिना नहीं लिख पाते। उन लोगों की स्थिति कुछ ऐसी होती है कि कोई व्यक्ति प्रातःकाल नींद खुल जाने पर भी अलार्म बजने तक बिस्तर पर पड़ा रहता है। अलार्म बजता है, तभी उठता है। कुछ लेखक ऐसे होते हैं कि जब तक उन पर बाहरी दबाव न पड़े, तब तक वे लेखन कार्य नहीं करते। ऐसे लेखक बाहरी दबाव के बिना लिख नहीं सकते।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘मैं क्यों लिखता हूँ’ पाठ के लेखक का क्या नाम है?
(A) अज्ञेय
(B) शिवपूजन सहाय
(C) मधु कांकरिया
(D) कमलेश्वर
उत्तर-
(A) अज्ञेय

प्रश्न 2.
लेखक के अनुसार कोई लेखक लिखता क्यों है?
(A) शौक के लिए
(B) अभ्यांतर विवशता के लिए
(C) दिखावे के लिए
(D) प्रसिद्धि के लिए
उत्तर-
(B) अभ्यांतर विवशता के लिए

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 3.
कोई भी लेखक लिखने के पश्चात् क्या अनुभव करता है?
(A) निराशा
(B) भय
(C) मुक्ति
(D) बंधन
उत्तर-
(C) मुक्ति

प्रश्न 4.
भीतरी उन्मेष किसे कहते हैं?
(A) मानसिक ज्ञान
(B) भीतरी शक्ति
(C) मानसिक विकास
(D) अनुशासन
उत्तर-
(A) मानसिक ज्ञान

प्रश्न 5.
आत्मानुशासन किसे कहते हैं?
(A) आत्मा को अनुशासन में रखना
(B) अपने आप अपनाए गए नियम
(C) किसी भी आत्मा पर दबाव डालना
(D) अपना अनुशासन
उत्तर-
(B) अपने आप अपनाए गए नियम

प्रश्न 6.
हिरोशिमा नगर किस देश में स्थित है?
(A) जापान
(B) फ्रांस
(C) भारत
(D) जर्मनी
उत्तर-
(A) जापान

प्रश्न 7.
लेखक द्वितीय विश्व युद्ध के समय कहाँ था?
(A) भारत की पश्चिमी सीमा पर
(B) पूर्वीय सीमा पर
(C) दक्षिण भारत में
(D) उत्तरी सीमा पर
उत्तर-
(B) पूर्वीय सीमा पर

प्रश्न 8.
जापान में किसे देखकर लेखक की अनुभूति को बल मिला था?
(A) जापान के लोगों को
(B) जापान की सड़कों को
(C) पत्थर पर बनी छाया को
(D) जापान की घटना के वर्णन को
उत्तर-
(C) पत्थर पर बनी छाया को

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

मैं क्यों लिखता हूँ? Summary in Hindi

मैं क्यों लिखता हूँ? पाठ का सार

प्रश्न-
में क्यों लिखता हूँ?’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत लघु निबंध में श्री अज्ञेय ने बताया है कि रचनाकार की भीतरी विवशता ही उसे लिखने के लिए मजबूर करती है तथा रचनाकार लिखने पर ही अपनी उस विवशता से मुक्ति पाता है।

लेखक का मत है कि जब प्रत्यक्ष अनुभव ही अनुभूति का रूप धारण करता है तभी रचना की उत्पत्ति होती है। यह आवश्यक नहीं कि हर अनुभव अनुभूति बने। अनुभव जब भाव-जगत और संवेदना का भाग बनता है तभी वह कलात्मक अनुभूति में बदल जाता है।

लेखक ने लिखने के कारणों के साथ-साथ लेखक के प्रेरणा स्रोतों को भी उजागर किया है। हर रचनाकार की आत्मानुभूति ही उसे लिखने के लिए प्रेरित करती है। इसके अतिरिक्त कुछ बाहरी दबाव भी होते हैं जिनके कारण लेखक लिखता है। बाहरी दबावों में संपादक का आग्रह, प्रकाशक का तकाजा तथा आर्थिक आवश्यकता होती है। वास्तव में बाहरी दबाव से लेखक कम प्रभावित है। उसकी आंतरिक अनुभूति ही उसे लिखने के लिए अधिक प्रेरित करती है। लेखक का मत है कि प्रत्यक्ष अनुभव एवं अनुभूति गहरी चीज़ है। अनुभव तो सामने घटित एक रचनाकार के लिए घटना को देखकर होता है, किंतु अनुभूति संवेदना और कल्पना के द्वारा उस सत्य को भी ग्रहण कर लेती है जो रचनाकार के सामने घटित नहीं हुआ। फिर वह सत्य आत्मा के सामने ज्वलंत प्रकाश में आ जाता है और रचनाकार उसका वर्णन करता है। लेखक बताता है कि उनके द्वारा लिखी ‘हिरोशिमा’ नामक कविता भी ऐसी ही है। एक बार जब वह जापान गयां तो वहाँ हिरोशिमा में उसने देखा कि एक पत्थर बुरी तरह झुलसा हुआ है और उस पर एक व्यक्ति की लंबी उजली छाया है। उसे देखकर उसने अनुमान लगाया कि जब हिरोशिमा पर अणु-बम गिराया गया तो उस समय वह व्यक्ति इस पत्थर के पास खड़ा होगा और अणु-बम के प्रभाव से वह भाप बनकर उड़ गया, किंतु उसकी छाया उस पत्थर पर ही रह गई।

उस छाया को देखकर लेखक को थप्पड़-सा लगा। मानो उसके मन में एक सूर्य-सा उगा और डूब गया। यही प्रत्यक्ष अनुभूति थी। इसी क्षण वह हिरोशिमा के विस्फोट का भोक्ता बन गया। इसी से कविता लिखने की विवशता जगी। मन की आकुलता बुद्धि से आगे बढ़कर संवेदना का विषय बनी। धीरे-धीरे कवि ने उसे अनुभव से अलग कर लिया। एक दिन कवि ने हिरोशिमा पर एक कविता लिख दी। यह कविता जापान में नहीं, अपितु भारत में रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए लिखी। कवि को कविता के अच्छे-बुरे होने से कोई सरोकार नहीं। यह कविता अनुभूति प्रसूत है यही कवि के लिए प्रमुख बात है।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ–42) आंतरिक = भीतरी, हृदय संबंधी। कठिन = मुश्किल। संक्षेप = छोटा। स्पर्श = छूना। आभ्यंतर = भीतरी। विवशता = मजबूरी। मुक्त = स्वतंत्र, आज़ाद। तटस्थ = अलग। कृतिकार = रचना लिखने वाला। ख्याति = प्रसिद्धि। संपादक = पत्र या पत्रिका की सामग्री व्यवस्थित करने वाला। प्रकाशक = छापने वाला। तकाजा = कहना। भेद = अंतर। आर्थिक = धन से संबंधित। भीतरी उन्मेष = मानसिक प्रकाश, मानसिक ज्ञान। निमित्ति = कारण।

(पृष्ठ-43) आत्मानुशासन = अपने आप अपनाए गए नियम। बिछौना = बिस्तर। समर्पित होना = पूरी तरह लग पाना। यंत्र = मशीन। भौतिक यथार्थ = संसार की वास्तविकता। बखानना = वर्णन कर पाना। कदाचित् = शायद। रेडियम-धर्मी तत्त्व = रेडियम किरणों का फैलना। अध्ययन = पढ़ना। भेदन = तोड़ना। सैद्धांतिक = सिद्धांत संबंधी। परवर्ती प्रभाव = बाद में पड़ने वाला प्रभाव। विवरण = ब्योरा। ऐतिहासिक प्रमाण = इतिहास में घटित वास्तविकता। दुरुपयोग = गलत उपयोग। विद्रोह = विरोध। अनुभूति का स्तर = मन में अपने-आप भावों का उमड़ना। बौद्धिक पकड़ = बुद्धि की पकड़।
तर्क संगति = तर्क-परंपरा। अपव्यय = फिजूलखर्ची। व्यथा = दुःख। अनुभव = बोध, ज्ञान। आहत = घायल। प्रत्यक्ष = आँखों के सामने, सीधा। घटित = घटा हुआ। संवेदना = भावना। आत्मसात् करना = मन में धारण करना।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 5 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

(पृष्ठ-44-45) ज्वलंत प्रकाश = तेज़ प्रकाश। अनुभूति प्रत्यक्ष = मन-ही-मन किसी दृश्य का साकार हो उठना। तत्काल = तुरंत । कसर = कमी। रुद्ध = रुकी हुई। समूची = सारी। ट्रेजडी = दुखद घटना। अवाक् = मौन। सहसा = एकाएक। भोक्ता = भोगने वाला। आकुलता = बेचैनी। अनुभूति-प्रसूत = अनुभूति से उत्पन्न।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!

HBSE 10th Class Hindi एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
हमारी आज़ादी की लड़ाई में समाज के उपेक्षित माने जाने वाले वर्ग का योगदान भी कम नहीं रहा है। इस कहानी में ऐसे लोगों के योगदान को लेखक ने किस प्रकार उभारा है?
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में लेखक ने उपेक्षित समाज के लोगों द्वारा आज़ादी की लड़ाई में योगदान पर प्रकाश डाला है। दुलारी एक गीत गाने वाली स्त्री है, जिसे समाज हेय दृष्टि से देखता है। टुन्नू एक किशोर युवक है। वह भी गीत गाता है तथा राष्ट्रीय आंदोलन और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार के आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लेता है। दुलारी को फेंकू सरदार मानचेस्टर तथा लंका शायर की मिलों में बनी मखमली किनारे वाली कोरी धोतियों का बंडल लाकर देता है। दुलारी को बढ़िया-बढ़िया साड़ियाँ पहनने का चाव भी है। किंतु दुलारी के मन में देश-प्रेम की भावना भी है। वह उस बंडल को विदेशी वस्त्रों का संग्रह कर उनकी होली जलाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को दे देती है। वह टुन्नू के द्वारा दी हुई खादी आश्रम में बनाई साड़ी को पहनती है। वह फेंकू सरदार, जो अंग्रेज़ों का मुखबर है, को झाड़ मार-मार कर घर से निकाल देती है। टुन्नू विदेशी वस्त्रों को जला देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का साथ देता है और इसी कारण अंग्रेज़ पुलिस द्वारा मारा जाता है। इस प्रकार लेखक ने प्रस्तुत कहानी में समाज में उपेक्षित समझे जाने वाले लोगों द्वारा स्वतंत्रता आंदोलन में दिए गए सहयोग का सजीव चित्रण किया है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 2.
कठोर हृदयी समझी जाने वाली दुलारी टुन्नू की मृत्यु पर क्यों विचलित हो उठी?
उत्तर-
दुलारी एक गौनहारी है। उसे अत्यंत कठोर हृदय वाली स्त्री समझा जाता है। होली के अवसर पर साड़ी लाने पर वह टुन्नू को डाँट देती है। इतना ही नहीं, वह साड़ी को फैंक देती है। किंतु जब टुन्नू उसे कहता है कि “मन पर किसी का बस नहीं, वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” उसके ये शब्द सुनकर कठोर दिखने वाली दुलारी का मन ही नहीं, आत्मा भी पिघल जाती है। टुन्नू के चले जाने पर वह साड़ी को उठाकर बार-बार चूमती है। इसी प्रकार दुलारी जब टुन्नू की मृत्यु का समाचार सुनती है तो व्याकुल हो उठती है और उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगती है। उसने जान लिया था कि टुन्नू उसके शरीर से नहीं, आत्मा से प्रेम करता है। वह उसकी गायन कला का प्रेमी था। ऐसे व्यक्ति की मृत्यु पर गौनहारिन दुलारी का विचलित होना स्वाभाविक था।

प्रश्न 3.
कजली दंगल जैसी गतिविधियों का आयोजन क्यों हुआ करता होगा? कुछ और परंपरागत लोक आयोजनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर-
कजली लोक गायन की एक शैली है। इसे भादो मास की तीज़ के अवसर पर गाया जाता है। कजली दंगल में दो कजली-गायकों के बीच प्रतियोगिता होती थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसके आयोजन पर खूब भीड़ जमा होती थी। यह आम जनता के मनोरंजन का प्रमुख साधन भी था। मनोरंजन के लिए ही ऐसे दंगलों का आयोजन किया जाता था। इसके माध्यम से जन प्रचार भी किया जाता था तथा गायन शैली में नए प्रयोग भी किए जाते थे। स्वतंत्रता के आंदोलनों के समय तो इन दंगलों के माध्यम से जनता में देश-भक्ति की भावना का संचार किया जाता था। हरियाणा में रागनी प्रतियोगिता व सांग भी लोक नाट्य परंपरा के प्रमुख उदाहरण हैं। ‘आल्हा- उत्सव’ राजस्थान की लोक गायन कला है। आजकल क्षेत्रीय लोक-गायकी के आयोजन किए जाते हैं। लोक-गायक इनमें बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

प्रश्न 4.
दुलारी विशिष्ट कहे जाने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे से बाहर है फिर भी अति विशिष्ट है। -इस कथन को ध्यान में रखते हुए दुलारी की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर-
गौनहारिन होने के कारण दुलारी को समाज अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। वह समाज की दृष्टि में उपेक्षित और तिरस्कृत है। दूसरे शब्दों में विशिष्ट कहे जाने वाले सामाजिक व सांस्कृतिक दायरे से बाहर है। किंतु उसके व्यक्तिगत गुण इतने अच्छे हैं कि वह अति विशिष्ट समझी जाती है। उसके अग्रलिखित गुण व व्यक्तिगत विशेषताएँ ही उसे यह दर्जा दिलवाते हैं

  • कुशल गायिका-दुलारी एक कुशल गायिका थी। हर व्यक्ति उसके सामने गीत -गाने की हिम्मत नहीं रखता था। उसका स्वर मधुर एवं आकर्षक था। वह मौके के अनुसार हर प्रकार का गीत गा सकती थी।
  • कवयित्री-दुलारी एक कुशल गायिका ही नहीं, अपितु सफल कवयित्री भी थी। वह आशु कवयित्री थी। वह तुरंत ऐसा पद्य तैयार कर देती थी कि सुनने वाले दंग रह जाते थे।
  • स्वाभिमानी-दुलारी को भले ही समाज उपेक्षा के भाव से देखता था, किंतु वह कभी किसी वस्तु के लिए दूसरों के सामने हाथ नहीं फैलाती थी। जब कभी उसके स्वाभिमान पर चोट की गई तो उसने अपने स्वाभिमान की स्वयं साहसपूर्वक रक्षा की।
  • सच्ची प्रेमिका-दुलारी एक गौनहारिन है। उसे समाज में उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। किंतु उसके हृदय में सच्चे प्रेम के प्रति आदर का भाव है। वह टुन्नू के हृदय की भावना को समझ जाती है। वह उससे मन-ही-मन प्रेम करने लगती है। जब फेंकू सरदार टुन्नू के विषय में कुछ गलत कहता है, तो वह उसे झाड़ से पीटती हुई घर से बाहर निकाल देती है।

प्रश्न 5.
दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय कहाँ और किस रूप में हुआ?
उत्तर-
दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय तीज के अवसर पर आयोजित ‘कजली दंगल’ में हुआ था। इस कंजली दंगल का आयोजन खोजवाँ बाजार में हो रहा था। दुलारी खोजवाँ वालों की ओर से प्रतिद्वंद्वी थी, तो दूसरे पक्ष यानि बजरडीहा वालों ने टुन्नू को अपना प्रतिद्वंद्वी बनाया था। इसी प्रतियोगिता में दुलारी का टुन्नू से पहली बार परिचय हुआ था।

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प्रश्न 6.
दुलारी का टुन्नू को यह कहना कहाँ तक उचित था-“तें सरबउला बोल ज़िन्नगी में कब देखले लोट?…” दुलारी ‘ के इस आक्षेप में आज के युवा वर्ग के लिए क्या संदेश छिपा है? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
दुलारी इस कथन के माध्यम से टुन्नू पर यह आक्षेप लगाती है कि वह बढ़-चढ़कर बोलता है। उसके कथनों में सत्यता नहीं है। इसी प्रसंग में आगे वह उस पर बगुला भगत होने का भी आक्षेप लगाती है। वह आज के युवा-वर्ग को बड़बोलापन त्यागकर गंभीर बनने का संदेश देती है। उन्हें आडंबरों को त्यागकर गाँधी जी जैसा सीधा-सादा जीवन जीना चाहिए। देश के लिए त्यागशीलता की भावना होना अनिवार्य है।

प्रश्न 7.
भारत के स्वाधीनता आंदोलन में दुलारी और टुन्नू ने अपना योगदान किस प्रकार दिया ?
उत्तर-
दुलारी और टुन्नू ने अपने-अपने ढंग से भारत के स्वाधीनता आंदोलन में योगदान दिया। टुन्नू ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाने में भाग लेकर विदेशी शासकों का विरोध किया। उसने विदेशी वस्त्र इकट्ठे करके उनकी होली जलाई जिससे लोगों में देशभक्ति की भावना का संचार हुआ। इसी आंदोलन में भाग लेने के कारण उसे अपने प्राणों से भी हाथ धोने पड़े।
दुलारी एक गौनहारिन थी, किंतु उसके हृदय में देशभक्ति की भावना भी विद्यमान थी। उसने फेंकू सरदार द्वारा दी गई कीमती साड़ियों को विदेशी वस्त्रों की होली में फेंक दिया और खादी की साड़ी धारण की। टुन्नू की निर्मम हत्या से वह व्याकुल हो उठी और उसके बलिदान पर आँसू बहाने लगी।

प्रश्न 8.
दुलारी और टुन्नू के प्रेम के पीछे उनका कलाकार मन और उनकी कला थी। यह प्रेम दुलारी को देश प्रेम तक कैसे पहुंचाता है?
उत्तर-
कहानी से पता चलता है कि दुलारी और टुन्नू के बीच शारीरिक प्रेम नहीं था। उनका प्रेम आत्मिक प्रेम था। दुलारी के गायन और उसकी काव्य कला से टुन्नू बहुत प्रभावित था। टुन्नू अभी सोलह-सत्रह वर्ष का किशोर था और दुलारी यौवन की अंतिम सीमा भी लाँघने वाली थी। वह उसे फटकारती भी है कि मैं तुम्हारी माँ से भी एक-आध वर्ष बड़ी हूँ। उसके मन के किसी एकांत कोने में टुन्नू ने अपना स्थान बना लिया था। यह सब दोनों के कलाकार मन और कला के कारण ही हुआ। टुन्नू द्वारा विदेशी कपड़ों के स्थान पर खादी पहनना और देश के लिए मर-मिटना दुलारी को भी देश-प्रेम के बहाव में बहाकर ले जाता है। वह टुन्नू की कुर्बानी से इतनी प्रभावित हुई कि उसने अपनी कीमती साड़ियों का बंडल अग्नि के हवाले कर दिया। स्वयं भी खादी की धोती पहनकर उस स्थान पर जाने के लिए तत्पर हो गई, जहाँ टुन्नू का कत्ल किया गया था। कहने का भाव है कि टुन्नू का महान् त्याग ही दुलारी को देश-प्रेम के मार्ग पर ले आता है।

प्रश्न 9.
जलाए जाने वाले विदेशी वस्त्रों के ढेर में अधिकांश वस्त्र फटे-पुराने थे परंत दुलारी द्वारा विदेशी मिलों में बनी कोरी साड़ियों का फेंका जाना उसकी किस मानसिकता को दर्शाता है? ..
उत्तर-
विदेशी वस्त्रों को जलाने वाले आंदोलनकारियों द्वारा फैलाई गई चादर पर लोग फटे-पुराने वस्त्र ही फेंक रहे थे। अच्छे वस्त्र उनमें बहुत ही कम थे। किंतु दुलारी ने फेंकू सरदार द्वारा लाई गई विदेशी साड़ियों को ही आग के हवाले करने के लिए दे दिया था। इससे पता चलता है कि उसके मन में देश-प्रेम की सच्ची भावना थी।

प्रश्न 10.
“मन पर किसी का बस नहीं है; वह रूप या उमर का कायल नहीं होता।” टुन्नू के इस कथन में उसका दुलारी के प्रति किशोर जनित प्रेम व्यक्त हुआ है, परंतु उसके विवेक ने उसके प्रेम को किस दिशा की ओर मोड़ा? ?
उत्तर-
निश्चय ही टुन्नू का यह कथन सत्य है। मन पर किसी का बस नहीं चलता। वैसे भी टुन्नू का दुलारी के प्रति आत्मिक प्रेम था। उसे दुलारी के रूप व आयु से कोई सरोकार नहीं था, क्योंकि यह प्रेम शरीर की भूख की तृप्ति के लिए नहीं था। इसलिए उसने इसे देश-प्रेम के मार्ग की ओर मोड़ दिया था जो स्वार्थहीन और प्रेम का सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोच्च स्वरूप है। देश-प्रेम के रूप में व्यक्ति की आत्मा का उदात्तीकरण होता है। टुन्नू देश के लिए अपना बलिदान कर देता है। दुलारी में देश के प्रति सद्भावना जागती है। वह विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर खादी आश्रम में बनी सूती धोती धारण करती है और टुन्नू की मृत्यु पर बेचैन हो उठती है। कहने का भाव है कि दोनों का प्रेम देश-प्रेम में बदल गया था।

प्रश्न 11.
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ का प्रतीकार्थ समझाइए।
उत्तर-
यह पंक्ति लोकगीत की प्रथम पंक्ति है। इसका शाब्दिक अर्थ है-इसी स्थान पर मेरी नाक की लोंग खो गई है। इसका प्रतीक अत्यंत गंभीर है। नाक में पहना जाने वाला झुलनी नामक आभूषण सुहाग का प्रतीक है। दुलारी एक गौनहारिन है। वह किसके नाम की झुलनी अपने नाक में पहने। किंतु आत्मिक स्तर पर वह टुन्नू से प्रेम करती थी और उसी के नाम की झुलनी उसने मानसिक व आत्मिक स्तर पर पहन ली थी। जिस स्थान पर वह यह गीत गा रही थी, उसी स्थान पर टुन्नू की हत्या की गई थी। अतः इस पंक्ति का भावार्थ यह हुआ कि यही वह स्थान है जहाँ उसका सुहाग लुटा था।

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HBSE 10th Class Hindi एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
“एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!” पाठ का उद्देश्य/मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
इस पाठ में लेखक का परम उद्देश्य उपेक्षित कहे जाने वाले लोगों के द्वारा स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए महान् सहयोग को उजागर करना है। इस लक्ष्य में लेखक पूर्ण रूप से सफल रहा है। इस पाठ में लेखक ने टुन्नू और दुलारी के आत्मिक प्रेम को देश-प्रेम जैसी उदात्त भावना में परिवर्तित करके इस लक्ष्य की पूर्ति की है। टुन्नू किशोरावस्था में है और दुलारी यौवन के अंतिम छोर पर खड़ी है। टुन्नू का दुलारी के प्रति प्रेम आत्मिक प्रेम है। उसे उसके रूप-सौंदर्य से कुछ लेना-देना नहीं है। वह उसके कलाकार मन से प्रेम करता है। दुलारी भी उससे इसी भाव से प्रेम करती है। उसको फटकार कर उसका हित चाहती है। किंतु उसके जाने के बाद अपने मन में एक अजीब-सा भाव अनुभव करती है। टुन्नू के प्रति फेंकू सरदार द्वारा कहे गए अपशब्द सुनकर वह उसे झाड़ से पीटकर घर से बाहर निकाल देती है। फेंकू सरदार द्वारा दी गई कीमती साड़ियों को विदेशी वस्त्रों की होली में फैंक देती है और खादी की साड़ी धारण कर लेती है तथा टुन्नू की हत्या करने वालों पर व्यंग्य करती है। अतः इस कहानी का प्रमुख उद्देश्य देश-प्रेम और त्याग की भावना की प्रेरणा देना है।

प्रश्न 2.
दुलारी के दिन का आरंभ कैसे होता था?
उत्तर-
दुलारी के दिन का आरंभ कसरत से होता था। वह मराठी महिलाओं की भाँति धोती तथा कच्छा-बाँधकर प्रतिदिन प्रातःकाल कसरत करती थी। वह इतनी कठोर कसरत करती थी कि उसके शरीर से पसीना बहने लगता था। कसरत करने के पश्चात् वह अंगोछे से अपना पसीना पोंछती थी। वह सिर पर बंधे बालों के जूड़े को खोलकर बालों को सुखाती थी। उसके पश्चात् वह आदम कद शीशे के सामने खड़ी होकर पहलवानों की भाँति अपने भुजदंडों को मुग्ध दृष्टि से देखती थी। उसका प्रातःकाल का नाश्ता प्याज, हरी मिर्च व भीगे हुए चनों से होता था।

प्रश्न 3.
पठित पाठ के आधार पर टुन्नू के चरित्र पर प्रकाश डालिए। अथवा [H.B.S.E. March, 2018 (Set-A)] टुन्नू के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर-
टुन्नू “एही छैयां झुलनी हेरानी हो रामा!” कहानी का प्रमुख पात्र है। उसे कहानी का नायक भी कहा जा सकता है। उसके चरित्र की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • गायक-वह एक उच्चकोटि का गायक कलाकार है। वह एक किशोर है, किंतु अपनी गायिकी से सुप्रसिद्ध गौनहारिन दुलारी का मुकाबला ही नहीं करता, अपितु उसे मात भी दे देता है।
  • गुण ग्राहक वह दूसरों के गुणों को शीघ्र ही पहचान लेता है और उन्हें अपने जीवन में उतारने का प्रयास करता है। जब उसे पता चलता है कि दुलारी महान् गायिका है तो वह श्रद्धापूर्वक उसके पास गायिकी सीखने के लिए जाता है। वह उसकी कला का पुजारी बन जाता है।
  • देशभक्त निश्चय ही टुम्नू एक देशभक्त था। वह देश के राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लेता है और देश के लिए अपना बलिदान भी देता है।
  • सच्चा प्रेमी-टुन्नू एक सच्चा प्रेमी है। वह दुलारी को एक कलाकार होने के नाते प्रेम करता है। उसका प्रेम आत्मिक है। इसलिए वह कहता भी है कि मन पर किसी का कोई बसें नहीं चलता। इससे सिद्ध हो जाता है कि उसके मन में दुलारी के प्रति सच्चा एवं पवित्र प्रेम भाव था।

प्रश्न 4.
दुलारी द्वारा टुन्नू के उपहार को ठुकराने के पीछे क्या भावना थी?
उत्तर-
दुलारी एक गौनहारिन स्त्री थी। वह नाच-गाकर लोगों का मन बहलाव करती थी। उसे समाज उपेक्षा की दृष्टि से देखता था। टुन्नू एक संस्कारी ब्राह्मण का पुत्र था। वह अभी किशोरावस्था में था। वह दुलारी की गायन कला से बेहद प्रभावित था। उसकी उम्र भी ऐसी न थी कि उसे समाज की ऊँच-नीच का पता हो। वह दुलारी के पास कभी-कभार आकर बैठ जाता था। उसने कभी कोई हल्की बात नहीं कही और न ही अपने मन की भावना ही प्रकट की। होली के त्योहार पर वह दुलारी को खादी की धोती उपहारस्वरूप देना चाहता था, किंतु दुलारी ने उसे फटकार दिया और उसके द्वारा लाई गई धोती को भी पटक दिया। दुलारी ने यह सब उसको अपमानित करने के लिए नहीं किया था। वह टुन्नू के प्रेम की सात्विकता की भावना को पहचानती थी। वह नहीं चाहती थी, टुन्नू उसकी बदनाम बस्ती में आए और समाज उसे और टुन्नू को लेकर ऊँगली उठाए। उसने टुन्नू के द्वारा लाए गए उपहार को इसलिए ठुकरा दिया था ताकि वह कभी उसकी ओर रुख न करे। वास्तव में वह टुन्नू की भलाई चाहती थी।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

प्रश्न 5.
टुन्नू के पद्यात्मक आक्षेप का दुलारी ने क्या उत्तर दिया था?
उत्तर-
टुन्नू द्वारा दुलारी को साँवले रंग की और दूसरों द्वारा पोषित होने का आक्षेप लगाया गया था। इस आक्षेप को दुलारी ने हँसते-हँसते झेला और इसका उत्तर देती हुई वह गीत के माध्यम से कहती है, “अरे कोढ़ी अपने मुख पर लगाम दे, यहाँ तू बड़ी-बड़ी बातें बना रहा है। तेरा बाप तो घाट पर बैठा-बैठा सारा दिन कौड़ी-कौड़ी जोड़ता है। त सिर-फिरा है। तने कभी जिंदगी में नोट देखे भी हैं। कब देखे हैं, बता तू मुझसे परमेसरी नोट (वादा) माँग रहा है, जरा अपनी औकात तो देख।” इस प्रकार दुलारी ने टुन्नू की दयनीय आर्थिक दशा और अनुभवहीनता पर आक्षेप करके उसके आक्षेप का तगड़ा उत्तर दिया जिसे सुनकर सभा में उपस्थित लोगों ने उसकी खूब प्रशंसा की।

प्रश्न 6.
शर्मा जी द्वारा लिखित रिपोर्ट को सार रूप में लिखिए।
उत्तर-
शर्मा जी अखबार के रिपोर्टर थे। उन्होंने टुन्नू के कत्ल की घटना वाले दिन होने वाली वारदात पर रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उसका सार इस प्रकार है
उन्होंने “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!” शीर्षक रिपोर्ट में लिखा कि कल छह अप्रैल को नेताओं की अपील पर नगर में पूर्ण हड़ताल रही। विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और जुलूस निकाला। इस जुलूस में टुन्नू ने भी भाग लिया था। जिसे पुलिस के जमादार अली सगीर ने पकड़ा और गालियाँ दीं। विरोध करने पर उसे ठोकर मारी। टुन्नू गिर पड़ा और उसके मुख से खून आने लगा। गोरे सिपाहियों ने उसे अस्पताल ले जाने का बहाना किया, किंतु उसे वरुणा के जल में प्रवाहित कर दिया। संवाददाता ने गाड़ी का पीछा करके पता लगाया था कि टुन्नू मर चुका था। टुन्नू और दुलारी के संबंधों की चर्चा करते हुए संवाददाता ने दुलारी को पुलिस के द्वारा बलपूर्वक टाऊन हॉल में उसी स्थान पर नाचने के लिए विवश करने का विवरण भी दिया जहाँ टुन्नू की हत्या की गई थी। वह नाचते हुए. आँखों से आँसू बहाती रही।

प्रश्न 7.
कजली दंगल की मजलिस के बदमज़ा होने का क्या कारण था? सार रूप में उत्तर दीजिए।
उत्तर-
खोजवाँ बाजार में कजली दंगल का आयोजन किया गया था। ‘कजली दंगल’ में दुलारी का मुकाबला टुन्नू कर रहा था। लोग दोनों के तेवर देखकर आनंद ले रहे थे। टुन्नू ने दुलारी पर कोयल की भांति दूसरों पर पोषित होने का आक्षेप किया, तो दुलारी ने भी उसे बगुला भक्त कहकर उसकी औकात की याद दिला दी। उसे बगुलाभक्त कहकर किसी बुरे नतीजे के लिए तैयार रहने के लिए चेताया। इस पर टुन्नू ने भी बढ़कर चोट करते हुए कहा कि तुम कितनी भी गालियाँ दो हम तो अपने मन की बात को डंके की चोट पर कहेंगे। इस बात पर फेंकू सरदार लाठी लेकर टुन्नू को मारने दौड़े। दुलारी ने टुन्नू को बचाया। इसके बाद कोई गाने के लिए तैयार नहीं हुआ और मजलिस बदमज़ा हो गई।

प्रश्न 8.
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा, कासो मैं पूढूँ’-दुलारी के इस गीत का दूसरा चरण क्या है?
उत्तर-
‘सास से पूछू, ननदिया से पूछू, देवर से पूछत लजानी हो रामा’।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ शीर्षक पाठ के लेखक का क्या नाम है?
(A) शिवपूजन सहाय
(B) कमलेश्वर
(C) मधु कांकरिया .
(D) शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’
उत्तर-
(D) शिवप्रसाद मिश्र ‘रुद्र’

प्रश्न 2.
दुलारी ने किस प्रदेश की महिलाओं की भाँति धोती बाँधी हुई थी?
(A) महाराष्ट्र की महिलाओं की भाँति
(B) उत्तर प्रदेश की महिलाओं की भाँति
(C) हरियाणा की महिलाओं की भाँति
(D) पंजाब की महिलाओं की भाँति
उत्तर-
(A) महाराष्ट्र की महिलाओं की भाँति

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प्रश्न 3.
पाठ के आरंभ में दुलारी को क्या करते हुए दिखाया गया है?
(A) सोते हुए
(B) गीत गाते हुए
(C) दंड लगाते हुए
(D) प्राणायाम करते हुए
उत्तर-
(C) दंड लगाते हुए

प्रश्न 4.
दुलारी को मिलने के लिए कौन आता है?
(A) दुलारी का भाई
(B) टुन्नू
(C) दुलारी का पिता
(D) पुलिस का सिपाही
उत्तर-
(B) टुन्नू

प्रश्न 5.
टुन्नू दुलारी के लिए क्या लेकर आया था?
(A) भोजन
(B) आभूषण
(C) खादी की साड़ी
(D) छाता
उत्तर-
(C) खादी की साड़ी

प्रश्न 6.
“मन पर किसी का बस नहीं। वह उमर या रूप का कायल नहीं।” ये शब्द किसने कहे हैं?
(A) दुलारी ने
(B) दुलारी की सखी ने
(C) किसी अजनबी ने
(D) टुन्नू ने
उत्तर-
(D) टुन्नू ने

प्रश्न 7.
दुलारी का मुख्य धंधा क्या था?
(A) काव्य रचना
(B) नृत्य करना
(C) कजली गीत गाना
(D) कीर्तन करना
उत्तर-
(C) कजली गीत गाना

प्रश्न 8.
‘तीर कमान होना’ का क्या अर्थ है?
(A) लड़ने के लिए तैयार होना
(B) तीर की भाँति तेज गति से जाना
(C) कमान की भाँति गोल होना..
(D) कमान से तीर चलाना
उत्तर-
(A) लड़ने के लिए तैयार होना

प्रश्न 9.
टुन्नू के पिता क्या कार्य करते थे?
(A) अध्यापन
(B) पंडिताई
(C) वकालत
(D) व्यापार
उत्तर-
(B) पंडिताई

प्रश्न 10.
दुलारी किस की ओर से कजली गाने आई थी?
(A) बजरडीहा की ओर से
(B) सुंदरगढ़ की ओर से
(C) खोजवाँ बाजार की ओर से
(D) राम नगर की ओर से
उत्तर-
(C) खोजवाँ बाजार की ओर से

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एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! Summary in Hindi

एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा! पाठ का सार

प्रश्न-
‘एही छैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा!’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने यथार्थ और आदर्श, दंत कथा और इतिहास, मानव मन की कमजोरियों और उदात्तताओं को उजागर किया है। लेखक ने इन सबको क्षेत्रीय भाषा की रंगत में रंगकर अभिव्यक्त किया है। यह एक प्रेम कहानी-सी लगती है, किंतु इसमें प्रेम भाव के अतिरिक्त आदर्श, यथार्थ और व्यंग्य का संगम कुछ इस प्रकार हुआ है कि इन्हें अलग-अलग करके देखना संभव नहीं है। पाठ का सार इस प्रकार है

बनारस में चार-पाँच के समूह में गाने वालियों की एक परंपरा रही है-‘गौनहारिन परंपरा’ । कहानी की मुख्य नारी पात्र दुलारी बाई उसी परंपरा की एक कड़ी रही है। दुलारी दनादन दंड लगा रही थी और उसका पसीना भूमि पर पसीने का पुतला बना रहा था। वह कसरत समाप्त कर पसीना पोंछ रही थी कि तभी किसी ने उसके दरवाजे की कुंडी खटखटाई। दुलारी ने स्वयं को व्यवस्थित किया, धोती पहनी, केश बाँधे और दरवाज़ा खोल दिया। बगल में बंडल दबाए बाहर टुन्नू खड़ा था। टुन्नू भी एक गायक था। उसकी आँखों में शर्म और होंठों पर झेंप भरी मुस्कराहट थी। दुलारी ने आते ही उसे फटकरा, “ मैंने तुम्हें यहाँ आने के लिए मना किया था न?” गिरे हुए मन से टुन्नू बोला, “साल भर का त्योहार था इसीलिए मैंने सोचा कि ……….,” कहते हुए उसने बगल से बंडल निकालकर दुलारी को दे दिया। इसमें खद्दर की एक साड़ी थी। दुलारी का रुख और कड़ा हो गया और बोली, लेकिन तुम इसे यहाँ क्यों लाए हो। तुम्हें जलने के लिए कोई और चिता नहीं मिली। तुम मेरे मालिक हो, बेटे हो, भाई हो क्या हो? उसने साड़ी टुन्नू के पैरों के पास फैंक दी। टुन्नू सिर झुकाए हुए ही बोला, “पत्थर की देवी भी अपने भक्त द्वारा दी गई भेंट को नहीं ठुकराती, फिर तुम तो हाड़-माँस की बनी हो। उसकी कज्जल भरी आँखों से आँसू टपक-टपककर धोती पर गिरने लगे। दुलारी कहती रही कि हाड़-माँस की बनी हूँ, तभी तो कहती हूँ कि अभी तुम्हारे दूध के दाँत भी नहीं टूटे। बाप तो कौड़ी-कौड़ी जुटाकर गृहस्थी चलाता है और बेटा आशिकी के घोड़े पर सवार है। यह गली तुम्हारे लिए नहीं है। मैं तो शायद तुम्हारी माँ से भी वर्ष भर बड़ी हूँ।

पत्थर की तरह मूर्तिवत खड़ा टुन्नू बोला, ‘मन पर किसी का बस नहीं। वह उमर या रूप का कायल नहीं।’ वह धीरे-धीरे . सीढ़ियाँ उतरने लगा। उसके जाने के बाद दुलारी के भाव बदले उसने धोती उठाई जिस पर टुन्नू के आँसू गिरे हुए थे। एक बार गली में टुन्नू को जाते देखा और धोती पर पड़े आँसुओं के धब्बों को बार-बार चूमने लगी।

भादो की तीज पर खोजवाँ बाजार में गाने का कार्यक्रम था। दुलारी गाने में निपुण थी। उसमें पद में सवाल – जवाब करने की अद्भुत क्षमता थी। बड़े-बड़े शायर भी उसके सामने गाते हुए घबराते थे। खोजवाँ बाजार वाले दुलारी को अपनी तरफ से खड़ा करके अपनी जीत सुनिश्चित कर चुके थे। उसके विपक्ष में सोलह-सत्रह वर्ष का टुन्नू किशोर था। टुन्नू के पिता यजमानी करके अपनी घर-गृहस्थी चलाते थे। किंतु टुन्नू को गायकी और शायरी का चस्का लग गया था। टुन्नू ने उस दिन जमकर दुलारी का मुकाबला किया। दुलारी को भी टुन्नू का गाना अच्छा लग रहा था। मुकाबले में टुन्नू के मुख से दुलारी की तारीफ सुनकर सुंदर के ‘मालिक’ फेंकू सरदार ने टुन्नू पर लाठी का वार किया। दुलारी ने टुन्नू की उस वार से रक्षा की थी। टुन्नू के चले जाने के बाद भी दुलारी. उसी के विषय में सोचती रही। टुन्नू उस दिन अत्यंत सभ्य लग रहा था। दुलारी ने घर जाकर टुन्नू द्वारा दी हुई साड़ी को संदूक में रख दिया। उसके मन में भी टुन्नू के प्रति कोमल भाव जागृत होने लगे थे। टुन्नू कई दिनों से उसके पास आने लगा था और उसकी बातों को बड़े गौर से सुनने लगा था। दुलारी का यौवन ढल रहा था। टुन्नू सोलह-सत्रह वर्ष का था जबकि दुलारी दुनिया देख चुकी थी। वह समझ गई थी कि टुन्नू और उसका संबंध शारीरिक नहीं, आत्मा का था। वह यह बात टुन्नू के सामने स्वीकार करने से डर रही थी। उसी समय फेंकू धोतियों का एक बंडल लेकर उसके पास आता है। फेंकू सरदार उसे तीज पर बनारसी साड़ी दिलवाने का वादा करता है। जब ये दोनों बातचीत कर रहे थे, तभी गली में नीचे विदेशी कपड़ों की होली जलाने वाली टोली निकली। लोग पुराने विदेशी कपड़े जलाने के लिए फैंक रहे थे। किंतु दुलारी ने फेंकू सरदार द्वारा दी गई बढ़िया साड़ियों का बंडल फैंक दिया। दुलारी द्वारा फैंके गए बंडल को देखकर सबकी आँखें उसकी ओर उठ गईं। जुलूस के पीछे चल रही खुफिया पुलिस के रिपोर्टर अली सगीर ने भी दुलारी को देख लिया।

दुलारी फेंकू सरदार की किसी बात पर बिगड़ गई और झाड़ से मारती हुई बोली निकल यहाँ से। यदि मेरी देहरी पर डाँका तो दाँत से तेरी नाक काट लूँगी। आँगन में खड़ी संगनियों और पड़ोसिनों ने दुलारी को अत्यंत हैरानी से देखा। चूल्हे पर चढ़ी दाल को दुलारी ने ठोकर मारकर गिरा दिया। दाल के गिरने से चूल्हे की आग तो बुझ गई, किंतु दुलारी के दिल की आग न बुझ सकी। पड़ोसिनों के मीठे वचनों की जलधारा से दुलारी के हृदय की आग कुछ ठंडी हुई। उनकी आपस की बातचीत से पता चला कि फेंकू सरदार टुन्नू से जलन रखता था। इसी बात को लेकर दुलारी ने फेंकू पर झाड़ बरसाए थे। तभी नौ वर्षीय झींगुर आकर बताता है कि टुन्नू महाराज को गोरे सिपाहियों ने मार डाला और लाश को उठा ले गए। टुन्नू की मौत की खबर सुनते ही दुलारी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली। अब पड़ोसिनें दुलारी के दिल का हाल जान गई थीं। सभी ने उसके रोने को नाटक समझा किंतु दुलारी अपने मन की सच्चाई जानती थी। उसने टुन्नू द्वारा दी गई साधारण साड़ी पहन ली। वह झींगुर से टुन्नू की शहीदी के स्थान का पता पूछकर वहाँ जाने के लिए घर से निकली ही थी कि तभी थाने के मुंशी और फेंकू सरदार ने उसे थाने चलकर अमन सभा के समारोह में गाने के लिए कहा। न चाहते हुए भी उसे उनके साथ जाना पड़ा।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 4 यह दंतुरहित मुस्कान और फसल

उधर अखबार के दफ्तर में प्रधान संवाददाता शर्मा जी की लिखी रिपोर्ट को पढ़कर क्रोध से लाल हो रहे थे। संपादक जी के आदेश पर शर्मा जी रिपोर्ट पढ़ने लगे, शीर्षक दिया था, “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा,” रिपोर्ट में लिखा था कि कल नगर भर में हड़ताल थी। यहाँ तक कि खोमचे वाले भी बाजार में दिखाई नहीं दिए थे।

सुबह से ही विदेशी कपड़ों को एकत्रित करके उनकी होली जलाने वालों के जुलूस निकलते रहे। उनके साथ प्रसिद्ध गायक टुन्नू भी था। जुलूस टाऊन हॉल पर पहुंचकर समाप्त हो गया। जब सब अपने-अपने घरों को लौट रहे थे तो पुलिस के जमादार अली सगीर ने टुन्नूं को गालियाँ दीं। प्रतिवाद करने पर उसे जमादार ने खूब पीटा और बूट से ठोकर मारी। इससे उसकी पसली पर चोट आई। वह गिर पड़ा और उसके मुख से खून निकलने लगा। गोरे सिपाहियों ने उसे अस्पताल में ले जाने की अपेक्षा वरुणा में प्रवाहित कर दिया, जिसे संवाददाता ने भी देखा था। इस टुन्नू नामक गायक का दुलारी से भी संबंध बताया जाता है।

शाम को टाऊन हॉल में आयोजित अमन सभा में जहाँ जनता का एक भी प्रतिनिधि उपस्थित नहीं था, दुलारी को नचाया व गवाया गया था। टुन्नू की मृत्यु से दुलारी बहुत उदास थी। उसने खद्दर की साधारण धोती पहनी हुई थी। वह उस स्थान पर गाना नहीं चाहती थी, जहाँ आठ घंटे पहले उसके प्रेमी की हत्या कर दी गई थी। फिर भी उसने कुख्यात जमादार अली सगीर के कहने पर गाया, किंतु उसके स्वर में दर्द स्पष्ट रूप में अनुभव किया जा सकता था। उसके गीत के बोल थे “एही ठैयाँ झुलनी हेरानी हो रामा। कासों मैं पूछू।” उसने सारा गीत उस स्थान पर नज़र गड़ाकर गाया जहाँ टुन्नू का कत्ल किया गया था। गाते-गाते उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी थी। उसके आसुओं की बूंदें ऐसी लग रही थीं जैसे टुन्नू की लाश को वरुणा के जल में फैंकने से उस जल की बूंदें छिटक गई थीं।” संपादक महोदय को रिपोर्ट तो सत्य लगी, किंतु इसे वे छाप न सके।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-31) दनादन = तेज़ गति से। चणक-चर्वण-पर्व = चने चबाने का त्योहार। बाकायदे = ठीक ढंग से। विलोल = असली। विलीन = गायब होना, नष्ट होना।

(पृष्ठ-33) शीर्ण वदन = कमज़ोर शरीर। खैरियत = कुशल। उपेक्षापूर्ण = निरादर के भाव से। कज्जल-मलिन = काजल से मैली हुई। पाषाण = पत्थर। प्रतिमा = मूर्ति। वक्र = टेढ़ी। दुक्कड़ = शहनाई के साथ बजाया जाने वाला यंत्र। महती = अत्यधिक। पद्य = कविता। क्षमता = शक्ति। कजली = एक प्रकार का लोकगीत। कायल = मानने वाला। कोर दबना = लिहाज करना।

(पृष्ठ-34) गौनहारियों की गोल = गाने वालों का समूह। प्रतिकूल = उलट। स्वर = आवाज़ । मुग्ध = मोहित। सार्वजनिक आविर्भाव = मंच पर लोगों के सामने अपनी कला दिखाने का अवसर। यजमानी = पुरोहित की जीविका। चस्का = स्वाद। रंग उतर गया = निराश हो गए। मद-विह्वल = अहंकार से पूर्ण। कोढ़ियल = कुरूप, कोढ़ के रोग से पीड़ित।

(पृष्ठ-35) सरबउला = पागल। व्यर्थ = बेकार। मजलिस = महफिल। बदमज़ा = बेस्वाद। प्रकृतिस्थ = स्वाभाविक। आबरवाँ = बहुत महीन मलमल। चंचल = अस्थिर, व्याकुल । दुर्बलता = कमज़ोरी।

(पृष्ठ-36) मनोयोग = लगन। यौवन का अस्ताचल = जवानी के समाप्त होने की दशा। उन्माद = पागलपन। कृशकाय = दुबला-पतला। पाँडुमुख = पीला मुख। करुणा = दया। आसक्त = मोहित, ललचाया हुआ। कृत्रिम = बनावटी। निभृत = एकांत। प्रस्तुत = तैयार। सहसा = एकाएक।

(पृष्ठ-37-38) आकृति = रूप, शक्ल । मुखबर = वह अपराधी जो अपराध स्वीकार करके सरकारी गवाह बन जाता है। तमोली = पान बेचने वाला। शपाशप = निरंतर। देहरी डाँकना = दहलीज पार करना। उत्कट = प्रबल। अधर = होंठ। कुतूहल = हैरानी। बटलोही = दाल पकाने का बर्तन। कातर = व्याकुल। स्तब्ध = हक्का-बक्का रह जाना। आँखों में मेघमाला घिर आना = आँखों से निरंतर आँसू बहना।

(पृष्ठ-39) कर्कशा = कटु वचन बोलने वाली। वनिता-सुलभ = सद् गृहिणियों के अनुरूप। दिल्लगी = मज़ाक। सहकर्मी = साथ काम करने वाला। बूते की बात नहीं = वश का काम नहीं। बड़ा घर = यहाँ जेल के लिए प्रयोग हुआ है। सजग = सावधान, चौकन्ने। झेंप = लज्जा। मुद्रा = भाव।

(पृष्ठ-40-41) विघटित = छंट गया, अलग-अलग हो गया। शव = मृत शरीर। विवश = मजबूर। आमोदित = प्रसन्न। उद्घांत दृष्टि = उड़ती-सी बेचैन नज़रें। अधर-प्रांत पर = होंठों पर। स्मित = हल्की-सी मुसकान। आविर्भाव = उदय होना।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

HBSE 10th Class Hindi साना साना हाथ जोड़ि Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था?
उत्तर-
झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका के मन में सम्मोहन उत्पन्न कर रहा था। वहाँ की सुंदरता ने लेखिका पर एक जादू सा कर दिया था, कि वह एकटक उसे देखती ही रह गई। उसे उस समय सब कुछ ठहरा हुआ-सा लग रहा था। उसके आस-पास व उसके अंतर्मन में एक शून्य-सा समा गया था।

प्रश्न 2.
गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया?
उत्तर-
मेहनतकश से यहाँ अभिप्राय है, कड़ा परिश्रम करने वाले लोग। ‘बादशाह’ से तात्पर्य है अपनी इच्छानुसार काम करने वाले। गंतोक पहाड़ी स्थल है। पहाड़ी क्षेत्र का जीवन कठिन होता है। अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यहाँ के लोग कड़ी मेहनत करने से घबराते नहीं, अपितु मेहनत करते हुए भी मस्त रहते हैं। उन्हें किसी की परवाह नहीं होती और न ही वे दूसरों की सहायता के लिए किसी के आगे हाथ फैलाते हैं। इसीलिए लेखिका ने गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ कहा है।

प्रश्न 3.
कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है?
उत्तर-
श्वेत पताकाएँ किसी बौद्ध धर्म के अनुयायी की मृत्यु पर फहराई जाती हैं। किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाने पर नगर से बाहर वीरान स्थान पर मंत्र-लिखित एक सौ आठ पताकाएँ फहराई जाती हैं। उन्हें उतारा नहीं जाता। वे धीरे-धीरे स्वयं नष्ट हो जाती हैं। रंगीन पताकाएँ काम के शुभारंभ के समय फहराई जाती हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 4.
जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति के बारे में, वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ दीं। लिखिए।
उत्तर-
जितेन नार्गे सिक्किम का नागरिक था। वह ड्राइवर और गाइड दोनों का कार्य अकेले ही करता था। लेखिका ने जितेन नार्गे के साथ ही सिक्किम की यात्रा की थी। वह लेखिका को यात्रा के दौरान वहाँ की प्राकृतिक, भौगोलिक व जनजीवन की महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ देता रहता था। उसने बताया कि सिक्किम में प्राकृतिक नज़ारे अत्यंत सुंदर हैं। गंतोक से यूमथांग 149 किलोमीटर दूर है। यह मार्ग खूबसूरत प्राकृतिक दृश्यों से भरा पड़ा है। कहीं घाटियाँ फूलों से भरी हुई हैं। अनेक झरने कल-कल की ध्वनि करते हुए बहते हैं। कहीं घाटियों को फूलों की वादियाँ भी कहते हैं। सिक्किम की सीमा चीन से सटी हुई है। पहले यहाँ राजा का शासन था किंतु अब वह भारत का अंग है।

यहाँ बौद्ध धर्म का बोल-बाला है। यदि किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाए तो उसकी आत्मा की शांति के लिए एक सौ आठ सफेद पताकाएँ फहराई जाती हैं। जब किसी कार्य का शुभारंभ किया जाता है तो रंगीन पताकाएँ फहराई जाती हैं। यहाँ की औरतें बहुत मेहनत करती हैं। यहाँ बच्चों की पढ़ाई के लिए स्कूल कम हैं। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए आवागमन के साधन भी कम हैं। यहाँ की नारियाँ रंगीन कपड़े पहनना पसंद करती हैं। उनका परंपरागत परिधान ‘बोकु’ है।

प्रश्न 5.
लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक-सी क्यों दिखाई दी?
उत्तर-
लोंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र के विषय में जितेन नार्गे ने बताया कि इसे घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं। लेखिका उस घूमते हुए चक्र को देखकर सोचने लगती हैं कि पूरे भारत में ऐसे विश्वास पाए जाते हैं। इसलिए भारत के लोगों की आत्मा एक-जैसी है, विज्ञान ने चाहे कितनी ही तरक्की क्यों न कर ली हो फिर भी लोगों की पाप-पुण्य संबंधी मान्यताएँ एक-जैसी ही हैं। वह चाहे पहाड़ी क्षेत्र हो अथवा मैदानी क्षेत्र। इन मान्यताओं में कहीं कोई अंतर नहीं है।

प्रश्न 6.
जितेन नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं?
उत्तर-
जितेन नार्गे केवल गाइड ही नहीं, अपितु कुशल ड्राइवर भी था। एक कुशल गाइड की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि उसे उस क्षेत्र का पूरा ज्ञान होना चाहिए जिसमें वह गाइड का काम कर रहा है। जितेन एक कुशल गाइड है क्योंकि उसे सिक्किम के सारे पहाड़ी क्षेत्र का पूरा ज्ञान था। वह सैलानियों को उस क्षेत्र की पूरी जानकारी देता है। वह छोटी-से-छोटी जानकारी भी यात्रियों को देता है। इसके अतिरिक्त एक कुशल गाइड यात्रियों को कभी निराश नहीं होने देता। जितेन भी लेखिका और उसके सहयात्रियों को दिलासा दिलाता है कि उन्हें आगे चलकर बर्फ अवश्य देखने को मिलेगी। वह यात्रियों के साथ मित्र जैसा व्यवहार करता है। वह संगीत का ज्ञान भी रखता है। यात्रियों की थकान को दूर करने के लिए उनकी पसंद का संगीत सुनाता है। एक गाइड को अपने क्षेत्र के इतिहास और संस्कृति का पूरा ज्ञान होना चाहिए। जितेन इस दृष्टि से एक कुशल गाइड है। उसे सिक्किम के इतिहास और संस्कृति का पूरा ज्ञान है। वह लेखिका और अन्य यात्रियों को उससे अवगत कराता है। इसी प्रकार एक कुशल गाइड अपने क्षेत्र के जन-जीवन, वहाँ के प्रमुख व्यवसाय आदि की भी जानकारी रखता है। जितेन नार्गे को भी यह जानकारी थी। मार्ग में काम करने वाली सिक्किम नारियों के जीवन के बारे में वह पूर्ण जानकारी देता है। वहाँ के लोगों के धार्मिक स्थलों और लोगों के विश्वास व आस्थाओं की भी जानकारी देता है। अतः स्पष्ट है कि जितेन एक कुशल गाइड है। उसके मार्गदर्शन में यात्रा करने वाले यात्रियों का आनंद दुगुना हो जाता है। वह आस-पास के वातावरण को प्रसन्नतायुक्त बना देता है।

प्रश्न 7.
इस यात्रा-वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
लेखिका की पहाड़ी यात्रा गंतोक से यूमथांग जाने के लिए आरंभ होती है। वे अपने पूरे दल के साथ जीप में बैठकर यात्रा शुरु करती है। जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे ऊँचाई भी बढ़ती जाती है। उन्होंने देखा कि हिमालय का प्राकृतिक दृश्य पल-पल में बदलता है। हिमालय का विराट रूप सामने आता है। अब हिमालय अपने विशाल रूप में दिखाई देने लगता है। आसमान में घटाएँ फैली हुई हैं। घाटियों में दूर – दूर तक खिले हुए फूल फैले हुए हैं। चारों ओर एक गहन शांति पसरी हुई थी। लेखिका हिमालय के उस चमत्कारी रूप को अपनी आत्मा में समेट लेना चाहती है। वह उस दृश्य से एकात्म हो उठती है। वह हिमालय को मेरे नगपति, मेरे विशाल कहकर सलामी देती है। हिमालय कहीं हरे रंग का कालीन ओढ़े हुए नज़र आता है तो कहीं सफेद बर्फ की चादर ओढ़े हुए और कहीं-कहीं बादल में लुका-छिपी का खेल खेलता सा लगता है। लेखिका को पर्वत क्षेत्र ‘जादू की छाया’ ‘माया एवं खेल लगता है तो कहीं लेखिका उसे देखकर गहन विचारों में डूब जाती है। उसे वह परम् सत्य का अनुभव होने लगता है। इसी प्रकार वह वहाँ के जन-जीवन का चित्र अंकित करने लगती है।

प्रश्न 8.
प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?
उत्तर-
हिमालय,की प्राकृतिक छटा पल-पल बदलती है। लेखिका हिमालय पर प्रकृति के अनंत और विराट रूप को देखकर अवाक् रह जाती है। वह प्रकृति के ‘माया’ और ‘छाया’ के रूप को देखकर सम्मोहित हो जाती है। उसे ऐसा लगता है कि प्रकृति उसे अपना परिचय दे रही है। वह उसे अधिक सयानी बनाने के लिए उसके सामने अपने रहस्यों का उद्घाटन कर रही है। प्रकृति के उस विराट रूप को देखकर उसे अनेक अनुभूतियाँ होती हैं। उसे अनुभव होता है कि जीवन की सार्थकता झरनों और फूलों की भाँति स्वयं को दे देने में है। झरनों की भांति निरंतर गतिशील रहना और फूलों की भांति सदा मुस्कुराते रहने में ही जीवन की जीवंतता है। जीवन में दूसरों के लिए कुछ कर गुज़रना ही जीवन को सार्थक बनाता है। ऐसी अनुभूति लेखिका को प्रकृति के विराट और अनंत स्वरूप को देखकर ही होती है।

प्रश्न 9.
प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए?
उत्तर-
प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को सड़क बनाने वाली पहाड़ी औरतों के द्वारा पत्थर तोड़ने के दृश्य झकझोर गए। लेखिका ने देखा कि उस प्राकृतिक सौंदर्य के दृश्यों से बेपरवाह कुछ अत्यंत सुंदर एवं कोमलांगी पहाड़ी औरतें पत्थर तोड़ने में लीन थीं। उनके हाथों में कुदाल व हथौड़े थे। कईयों की पीठ पर तो डोको (बड़ी टोकरी) में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। यह विचार लेखिका को बार-बार झकझोरता था कि नदियों, फूलों, झरनों, वादियों के प्राकृतिक नज़ारों के बीच भूख, प्यास, मौत और मानव के जीने की इच्छा के बीच कड़ा संघर्ष चल रहा था। वे नारियाँ उस संघर्ष से जीतने के लिए जीतोड़ परिश्रम कर रही थीं। मानव ने सदा कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की है।

प्रश्न 10.
सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें।
उत्तर-
सैलानियों को प्राकृतिक छटा का अनुभव कराने में अनेक लोगों का योगदान रहता है। सर्वप्रथम सैलानियों को पर्यटन-स्थलों पर ठहराने का प्रबंध करने वाले लोगों का योगदान रहता है। इसके पश्चात् उनके लिए वाहनों का प्रबंध करने वाले लोगों का योगदान रहता है। वाहनों के चालकों व गाइडों का योगदान भी सराहनीय होता है। मार्गदर्शक (गाइड) की भूमिका तो और भी महत्त्वपूर्ण रहती है, क्योंकि वह सैलानियों को वहाँ के स्थानों की जानकारी के साथ – साथ वहाँ के इतिहास व सांस्कृतिक परंपराओं में विश्वास, जन-जीवन व परंपराओं की जानकारी देकर उनकी यात्रा को रोचक बनाता है। इनके अतिरिक्त वहाँ स्थानीय लोगों व सरकारी रख-रखाव के प्रबंध की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 11.
“कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती है।” इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?
उत्तर-
निश्चय ही देश की आर्थिक प्रगति में आम जनता की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। देश की महत्त्वपूर्ण योजनाओं को सफल बनाने में आम जनता सहयोग देती है। सड़कों का निर्माण करने हेतु पत्थर तोड़ने व पत्थर जोड़ने से लेकर बहुमंजली अट्टालिकाएँ खड़ी करने में आम-जनता का परिश्रम ही काम करता है। किंतु आम जनता के इस कार्य के बदले में उन्हें बहुत कम पैसे मिलते हैं। बड़े-बड़े कामों को अंजाम देने वाली यह आम जनता अपनी दैनिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति भी बड़ी मुश्किल से कर पाती है। सड़कों के निर्माण, बाँध-बाँधने, बड़ी- बड़ी फैक्टरियों के निर्माण की नींव आम जनता के खून-पसीने पर रखी जाती है। सड़कों के निर्माण से आवागमन सुगम हो जाता है। समान एक स्थान से दूसरे स्थान पर सरलता से पहुंचाया जा सकता है। इससे देश में आर्थिक प्रगति होती है। बड़ी-बड़ी फैक्टरियों के द्वारा वस्तुओं का निर्माण किया जाता है। बाँधों से बिजली का उत्पादन होता है। फसलों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध होता है। इन सब कार्यों में आम-जनता का पूर्ण योगदान रहता है। आम-जनता के सहयोग व भूमिका के बिना देश का आर्थिक विकास संभव नहीं है।

प्रश्न 12.
आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह खिलवाड़ किया जा रहा है? इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?
उत्तर-
आज की पीढ़ी का विश्वास भौतिक उन्नति तक सीमित हो गया है। वह अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ भी करने के लिए तत्पर है। वह केवल आज के विषय में सोचती है। इसलिए वह प्रकृति के प्रति भी निर्ममता का व्यवहार करती है। वह भूल चुकी है, कि प्रकृति को नष्ट करके हम भी नष्ट हो जाएँगे। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, नदियों के जल का दुरुपयोग तथा कृषि योग्य भूमिका बड़े-बड़े नगर बसाने व औद्योगिक संस्थान खड़े करने से प्राकृतिक संतुलन समाप्त हो जाएगा।

आज हमें देखना होगा कि हम ऐसा कोई कार्य न करें, जिससे प्रकृति को हानि पहुँचती है या हम वे कार्य कम-से-कम करें जिससे प्रकृति का नुकसान हो। हमें वृक्षों के काटने पर ही रोक नहीं लगानी चाहिए, अपितु अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने का प्रयास भी करना चाहिए। हम विद्यार्थी भी अपने आँगन या घर के आस-पास की खाली पड़ी धरती पर छायादार वृक्षों के पौधे लगाकर प्रकृति को बचाने में योगदान दे सकते हैं। अपने विद्यालय में खड़े वृक्षों की देखभाल करके व और वृक्ष लगाकर प्रकृति के प्रति किए जा रहे खिलवाड़ को रोकने में सहायता दे सकते हैं। हमें जल के उचित प्रयोग के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करनी होगी, ताकि जल का सही प्रयोग हो। हमें नदियों में गंदगी नहीं फैंकनी चाहिए। कारखानों से निकले गंदे पानी को नदियों के पानी में नहीं बहाना चाहिए। कृषि योग्य भूमि का भी सदुपयोग करने का प्रचार करके हम प्रकृति को हानि पहुँचने से रोक सकते हैं। सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करके भी हम इस नेक कार्य में योगदान दे सकते हैं।

प्रश्न 13.
प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है। प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।
उत्तर-
प्रदूषण के कारण सबसे बड़ा दुष्परिणाम तो प्रकृति का संतुलन बिगड़ना है। प्रदूषण से मानव स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है। प्रदूषण से सारे देश व समाज का आर्थिक और सामाजिक वातावरण बिगड़ रहा है। खेती के उगाने के कृत्रिम उपायों, खादों आदि के प्रयोग से जहाँ धरती की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो रही है, वहीं खराब फसलें उत्पन्न हो रही हैं, जिनके खाने से मानव के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है। इसी प्रकार ध्वनि व वायु-प्रदूषण ने भी हमारे प्राकृतिक वातावरण को विकलांग बना दिया है। वायु-प्रदूषण से फेफड़ों की बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। ध्वनि-प्रदूषण से मन की शांति नष्ट हो रही है और तनाव बढ़ता जा रहा है। ध्वनि-प्रदूषण से बहरेपन की बीमारी बढ़ रही है। इस प्रदूषण की बढ़ती समस्या के प्रति हर व्यक्ति का जागरूक होना अति अनिवार्य है। सरकार को चाहिए की प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े नियम बनाए और उनको सख्ती से लागू करे।

प्रश्न 14.
‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए?
उत्तर-
‘कटाओ’ को भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा जाता है। वह स्विटज़रलैंड से भी अधिक सुंदर स्थान है, जिसे देखकर लोग अपने आपको ईश्वर के निकट समझते हैं। वहाँ उन्हें अद्भुत शांति मिलती है। यदि वहाँ पर दुकानें खुल जातीं, तो लोगों की भीड़ बढ़ जाती। गंदगी फैल जाती। वहाँ का प्राकृतिक वातावरण नष्ट हो जता। उसे भारत का स्विट्ज़रलैंड नहीं कहा जा सकता था। इसलिए ‘कटाओ’ पर किसी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है।

प्रश्न 15.
प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है?
उत्तर-
प्रकृति के नियम अनोखे हैं। वह हर कार्य की व्यवस्था अपने ही ढंग से करती है। उसकी जल संचय व्यवस्था भी अत्यंत रोचक है। सर्दियों में बर्फ के रूप में जल एकत्रित होता है। गर्मियों में जब लोग प्यास से व्याकुल होते हैं तो प्रकृति के द्वारा एकत्रित बर्फ रूपी जल पिघलकर जलधारा बनकर बहने लगता है। जिसे प्राप्त करके लोग अपनी प्यास को बुझाते हैं।

प्रश्न 16.
देश की सीमा पर बैठे फौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?
उत्तर-
देश की सीमाओं पर बैठे फौजी विशेषकर पहाड़ी क्षेत्र की सीमाओं पर उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वहाँ वे बर्फीली हवाओं और तूफानों का सामना करते हैं। पौष और माघ की ठंड में तो पेट्रोल के अतिरिक्त सब कुछ जम जाता है। फौजी बड़ी मुश्किल से अपने शरीर का तापमान सामान्य रखते हुए देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं। वहाँ तक पहुँचने के मार्ग अत्यंत संकरे और खतरनाक हैं। कहीं-कहीं पर तो कोई वाहन भी नहीं जा सकता। वहाँ फौजी अपना सामान अपनी पीठ पर लादकर ले जाते हैं। वहाँ कभी भी किसी के भी प्राण जाने की संभावना बनी रहती है। किंतु फौजी अपने आपको खतरे में डालकर हमारे आने वाले कल को सुरक्षित करते हैं।

देश की सीमाओं की सुरक्षा करने वाले फौजियों के प्रति हमारा उत्तरदायित्व बनता है, कि हम उनका हौसला बढ़ाएँ और उनके परिवार की खुशहाली के लिए प्रयत्नशील रहें ताकि फौजी अपने परिवार की चिंता से मुक्त होकर सीमाओं की रक्षा कर सकें। समय-समय पर उनका साहस बढ़ाने के लिए उनके बीच जाकर उनका मनोरंजन करना चाहिए। हमें अपने फौजियों का सम्मान करना चाहिए।

HBSE 10th Class Hindi जॉर्ज पंचम की नाक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखिका को गंतोक से कंजनजंघा की पहाड़ियाँ क्यों नहीं दिखाई दे रही थीं?
उत्तर-
लेखिका प्रातःकाल जब जगी तो वह तुरंत बाहर आकर कंचनजंघा की पहाड़ियाँ देखने लगी। किंतु उसे वे पहाड़ियाँ दिखाई नहीं दीं, क्योंकि उस प्रातः मौसम साफ नहीं था। मौसम के साफ रहने पर ही कंचनजंघा की पहाड़ियाँ दिखाई दे सकती हैं। किंतु उस दिन आकाश में हल्के-हल्के बादल छाए हुए थे। ..

प्रश्न 2.
लेखिका को लायुंग में बर्फ देखने को क्यों नहीं मिली?
उत्तर-
लेखिका अपने सहयात्रियों के साथ आगे बढ़ती जा रही थी। उन्हें उम्मीद थी कि वे लायुग में बर्फ देख सकेंगे। किंतु वहाँ उन्हें बर्फ के दर्शन नहीं हुए। किंतु जैसे ही लेखिका प्रातः उठी उन्हें विश्वास था, कि उन्हें बर्फ देखने को मिलेगी। किंतु ऐसा नहीं हुआ और लेखिका निराश हो गई। वहाँ बर्फ का एक भी कतरा न था। वहाँ स्थानीय लोगों ने बताया कि प्रदूषण के बढ़ने के कारण वहाँ बर्फ नहीं पड़ती। जिस प्रकार तेजगति से प्रदूषण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे प्रकृति के साधनों में भी कमी आती जा रही है।

प्रश्न 3.
लेखिका के गाइड ने उसे कैसा स्थान बताया था, जहाँ बर्फ मिल सकती थी? उसका वर्णन कीजिए।
उत्तर-
लेखिका के गाइड जितेन नार्गे ने लेखिका को बताया था, कि कटाओ में बर्फ अवश्य देखने को मिलेगी। कटाओ को अभी टूरिस्ट स्थान नहीं बनाया गया। वह अपने प्राकृतिक रूप में विद्यमान है। उसे भारत का स्विट्ज़रलैंड कहा जाता है। कटाओ लायुंग से 500 फुट की ऊँचाई पर है। लायुंग से कटाओ पहुँचने के लिए लगभग दो घंटे लग जाते हैं। यहाँ के रास्ते अत्यंत संकरे एवं खतरनाक हैं।

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 3 साना साना हाथ जोड़ि

प्रश्न 4.
लायुंग के विषय में सार रूप में लिखते हुए बताइए, कि यहाँ आजकल बर्फ कम क्यों पड़ने लगी है?
उत्तर-
लायुंग सिक्किम राज्य का एक छोटा-सा कस्बा है। यह गंतोक और यूमथांग के बीच का मुख्य पड़ाव है। यहाँ के लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और शराब का व्यापार हैं। यद्यपि यह कस्बा समुद्र-तल से 14000 फुट की ऊँचाई पर है, किंतु यहाँ हिमपात बहुत कम होता है। इसका प्रमुख कारण पर्वतीय क्षेत्र में बढ़ता प्रदूषण है।

प्रश्न 5.
‘साना-साना हाथ जोड़ि……’ पाठ में झरने के संगीत में विलीन आत्मा के संगीत पर प्रकाश डालिए।
उत्तर-
लेखिका मार्ग में आने वाले एक खूबसूरत झरने के पास रुकी। उसका नाम था ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’। लेखिका वहाँ पत्थरों पर बैठकर झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत भी सुनने लगी थी। उसका मन भी झरने के संगीत को सुनकर काव्यमय हो उठा। आत्मा सत्य व सौंदर्य का छूने लगी। आत्मा को झरना अनंतता का प्रतीक अनुभव हो रहा था। उससे उसे जीवन की शक्ति का भी एहसास होने लगा था। ऐसा लगा कि उसके जीवन से सभी कुटिलताएँ और दुष्ट भावनाएँ इस निर्मल धारा में बह गई हैं। उसका . जीवन असीम बनकर बहने लगा हो। वह कामना करती है कि मैं भी अनंत समय तक ऐसे ही बहती रहूँ और इस झरने की पुकार को सुनती रहूँ।

प्रश्न 6.
पताकाओं को लेखिका ने बौद्ध संस्कृति का अंग क्यों कहा है? अथवा घाटी में दिखाई देने वाली रंगीन पताकाएँ कब लगाई जाती हैं?
उत्तर-
लेखिका को जितेन ने बताया है कि जब किसी बौद्ध अनुयायी की मृत्यु हो जाती है, तो उसकी आत्मा की शांति हेतु मंत्र-लिखित एक सौ आठ पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। इन्हें उतारा नहीं जाता, अपितु ये स्वयं नष्ट हो जाती हैं। जब कोई नया कार्य आरंभ किया जाता है, तो रंगदार पताकाएँ फहराई जाती हैं। अतः स्पष्ट है कि पताकाएँ बौद्ध संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। ये बौद्ध संस्कृति की पहचान भी कही जा सकती हैं।

प्रश्न 7.
सिक्किमी नवयुवक ने ‘कटाओ’ के बारे में लेखिका को क्या जानकारी दी?
उत्तर-
युवक ने लेखिका को बताया कि कटाओ जाने पर लेखिका को शर्तिया बर्फ मिल जाएगी-कटाओ यानि भारत का स्विट्जरलैंड! जो कि अभी तक टूरिस्ट स्पॉट नहीं बनने के कारण सुर्खियों में नहीं आया था और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था।

प्रश्न 8.
किस कारण से कटाओ के मार्ग में सभी यात्री मौन हो गए थे, केवल उनकी साँसों की ध्वनि ही सुनाई देती थी?
उत्तर-
लायुंग और कटाओ के बीच का मार्ग अत्यंत संकरा और खतरनाक था। वाहन चालक को एक-एक इंच का ध्यान रखना पड़ता है। उसकी ज़रा- सी भूल से न जाने क्या हो जाए। जब लेखिका और उसके सहयात्री आगे बढ़े तो उस समय हल्की-हल्की वर्षा हो रही थी और धुंध भी छाई हुई थी। रास्ते के खतरे के अहसास ने सभी को खामोश कर दिया था। उस धुंध और फिसलन भरे रास्ते में कुछ भी घटित हो सकता था। इसलिए वे सब सारी मस्ती भूलकर अपना दम साधे बैठे थे।

प्रश्न 9.
कटाओ के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य को देखकर लेखिका क्या सोचने लगी थी?
उत्तर-
कटाओ का प्राकृतिक सौंदर्य जहाँ अनुपम एवं पवित्र था, वहीं उसका प्रभाव भी जादू की भाँति असरदार था। लेखिका उसकी सम्मोहन शक्ति से न बच पाई थी। वह उसे अपनी आत्मा में समा लेना चाहती थी। वह अनुभव करने लगी, कि विभोर कर देने वाली उस दिव्यता के बीच बैठकर हमारे ऋषि-मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। उन्होंने ऐसे ही दिव्य प्राकृतिक वातावरण में बैठकर जीवन के सत्य को खोजा होगा। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः के महामंत्र का उच्चारण किया होगा।

प्रश्न 10.
जितेन ने सैलानियों से गुरु नानक देव जी से संबंधित किस घटना का वर्णन किया है?
उत्तर-
जितेन को उस क्षेत्र के इतिहास और भौगोलिक स्थिति का पूरा ज्ञान था। वह लेखिका और उसके सहयात्रियों को रास्ते में अनेक जानकारियाँ देता रहता है। एक स्थान पर उसने बताया कि यहाँ पर एक पत्थर पर गुरु नानक देव जी के पैरों के निशान हैं। जब गुरु नानक देव जी यहाँ आए थे उस समय उनकी थाली से कुछ चावल छिटककर बाहर गिर गए थे। जहाँ-जहाँ चावल छिटके थे, वहाँ-वहाँ चावलों की खेती होने लगी थी।

प्रश्न 11.
सिक्किम के अधिकतर लोगों की जीविका का साधन क्या है?
उत्तर-
सिक्किम के अधिकतर लोग मेहनत मजदूरी करते हैं। उनके खेत छोटे होते हैं तथा वे पशु-पालन का काम भी करते हैं।

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बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ नामक पाठ की रचयिता का क्या नाम है?
(A) महादेवी वर्मा
(B) मधु कांकरिया
(C) कमलेश्वर
(D) शिवपूजन सहाय
उत्तर-
(B) मधु कांकरिया

प्रश्न 2.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ नामक पाठ साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आता है?
(A) कहानी
(B) निबंध
(C) यात्रा वृत्तांत
(D) संस्मरण
उत्तर-
(C) यात्रा वृत्तांत

प्रश्न 3.
‘गैंगटॉक’ नगर किस राज्य की राजधानी है?
(A) आसाम
(B) सिक्किम
(C) बंगाल
(D) अरुणाचल
उत्तर-
(B) सिक्किम

प्रश्न 4.
सिक्किम भारत की किस दिशा में स्थित है?
(A) पश्चिम
(B) पश्चिमोत्तर
(C) पूर्व
(D) पूर्वोत्तर
उत्तर-
(D) पूर्वोत्तर

प्रश्न 5.
लेखिका ने गैंगटॉक को किन लोगों का शहर बताया है?
(A) मेहनतकश बादशाहों को
(B) गरीबों का
(C) नवाबों का
(D) राजाओं का
उत्तर-
(A) मेहनतकश बादशाहों को

प्रश्न 6.
‘साना-साना हाथ जोड़ि’ प्रार्थना लेखिका ने किस देश की युवती से सीखी थी?
(A) वर्मा की
(B) श्रीलंका की
(C) नेपाल की
(D) चीन की
उत्तर-
(C) नेपाल की

प्रश्न 7.
‘कंचनजंघा’ किस पर्वत की चोटी का नाम है?
(A) हिमालय पर्वत
(B) कंचन पर्वत
(C) सुमेरू पर्वत
(D) नीलमणि पर्वत
उत्तर-
(A) हिमालय पर्वत

प्रश्न 8.
गैंगटॉक से यूमथांग कितनी दूर है?
(A) 139 किलोमीटर
(B) 149 किलोमीटर
(C) 159 किलोमीटर
(D) 169 किलोमीटर
उत्तर-
(B) 149 किलोमीटर

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प्रश्न 9.
लेखिका के ड्राइवर-कम-गाइड का क्या नाम है?
(A) रामदीन
(B) विक्रम थापा
(C) जितेन नार्गे
(D) उथापा
उत्तर-
(C) जितेन नार्गे

प्रश्न 10.
लेखिका को मार्ग में सफेद रंग के जो ध्वज दिखाई दिए थे, वे किस धर्म से संबंधित थे?
(A) बौद्धधर्म
(B) जैनधर्म
(C) ईसाई धर्म
(D) मुस्लिम धर्म
उत्तर-
(A) बौद्धधर्म

प्रश्न 11.
बौद्ध धर्म में किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु पर उसकी आत्मा की शांति के लिए कितनी पताकाएँ फहराई जाती हैं?
(A) 130
(B) 140
(C) 150
(D) 108
उत्तर-
(D) 108

प्रश्न 12.
जितेन नार्गे की जीप में किसकी तस्वीर लगी हुई थी?
(A) महात्मा गाँधी की
(B) दलाई लामा की
(C) महात्मा बुद्ध की
(D) महावीर की
उत्तर-
(B) दलाई लामा की

प्रश्न 13.
‘कवी-लोंगस्टॉक’ नामक स्थान पर कौन-सी हिंदी फिल्म की शूटिंग हुई थी?
(A) गाइड
(B) क्रांति
(C) उपकार
(D) देश प्रेमी
उत्तर-
(A) गाइड

प्रश्न 14.
लेखिका को पूरे देश में एक जैसी कौन-सी वस्तु दिखाई दी थी?
(A) आस्थाएँ
(B) धर्म
(C) वेशभूषा
(D) खानपान
उत्तर-
(A) आस्थाएँ

प्रश्न 15.
सिलीगुड़ी के पास लेखिका को कौन-सी नदी दिखाई दी थी? ।
(A) गंगा
(B) यमुना
(C) तिस्ता
(D) ब्यास
उत्तर-
(C) तिस्ता

प्रश्न 16.
‘मशगूल’ शब्द का अर्थ है-
(A) मशहूर
(B) व्यस्त
(C) प्रसिद्ध
(D) सुंदर
उत्तर-
(B) व्यस्त

प्रश्न 17.
लेखिका ने किस जंगल में पत्ते तलाशती हुई युवतियाँ देखीं थीं?
(A) पलामू
(B) सतपूड़ा
(C) पलाश के जंगल
(D) गीर के जंगल
उत्तर-
(A) पलामू

प्रश्न 18.
प्रकृति के विराट रूप को देकर लेखिका को क्या प्रेरणा मिलती है?
(A) सदा काम में लगा रहना चाहिए।
(B) सदा मुस्कराते रहना चाहिए
(C) चिंता नहीं करनी चाहिए
(D) लक्ष्य प्राप्त करना चाहिए
उत्तर-
(B) सदा मुस्कराते रहना चाहिए

प्रश्न 19.
लायुंग समुद्रतल से कितनी ऊँचाई पर है?
(A) 10000 फीट
(B) 11000 फीट
(C) 12000 फीट
(D) 14000 फीट
उत्तर-
(D) 14000 फीट

प्रश्न 20.
कटाओ लायुग से कितनी ऊँचाई पर स्थित है?
(A) 500 फीट
(B) 400 फीट
(C) 300 फीट
(D) 200 फीट
उत्तर-
(A) 500 फीट

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प्रश्न 21.
कटाओ को हिंदुस्तान का क्या कहा जाता है?
(A) इंग्लैंड
(B) अमेरिका
(C) स्विट्ज़रलैंड
(D) जर्मनी
उत्तर-
(C) स्विट्ज़रलैंड

जॉर्ज पंचम की नाक Summary in Hindi

जॉर्ज पंचम की नाक पाठ का सार

प्रश्न-
‘साना साना हाथ जोड़ि…….’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
‘साना साना हाथ जोड़ि…….’ ‘मधु कांकरिया’ द्वारा रचित यात्रा-वृत्तांत है। इस पाठ में लेखिका ने सिक्किम राज्य की राजधानी गैंगटॉक से हिमालय तक की यात्रा का सजीव एवं भावपूर्ण वर्णन किया है। लेखिका का मत है कि यात्राओं से मनोरंजन, ज्ञानवर्धन एवं अज्ञात स्थलों की जानकारी के साथ-साथ भाषा और संस्कृति का आदान-प्रदान होता है। प्रस्तुत पाठ में लेखिका ने हिमालय के अनंत – सौंदर्य का अत्यंत अद्भुत एवं काव्यात्मक वर्णन किया है कि मानो हिमालय का पल-पल बदलता सौंदर्य हम अपनी आँखों से देख रहे हों। इस यात्रा वृत्तांत में महिला यायावरी विशिष्टता भी देखी जा सकती है। प्रस्तुत यात्रा-वृत्तांत में प्राकृतिक नज़ारों के साथ-साथ वहाँ के जीवन का भी यथार्थ चित्र अंकित किया गया है।

लेखिका गैंगटॉक में रात को तारों से जगमगाते आसमान को देखती है। रात में ऐसा सम्मोहन था कि कोई भी देखने वाला उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। लेखिका भी ऐसे दृश्य को देखकर उसमें खो जाती है। उसकी आत्मा भाव-शून्य हो जाती है। वह प्रातः उठकर नेपाली भाषा में प्रातःकालीन की जाने वाली प्रार्थना करती है। उसी सुबह उन्हें यूमथांग जाना था। यदि मौसम ‘साफ हो तो वहाँ से हिमालय की सबसे ऊँची चोटी दिखाई देती है। मौसम साफ था, किंतु आकाश में हल्के-हल्के बादल थे इसलिए हिमालय की ऊँची चोटी कंचनजंघा दिखाई न दे सकी। यूमथांग गैंगटॉक से लगभग 149 किलोमीटर दूर था। उनके ड्राइवर-कम-गाइड का नाम जितेन नार्गे था। यूमथांग का मार्ग फूलों भरी घाटियों वाला था। मार्ग में उन्हें एक स्थान पर सफेद रंग की बौद्ध पताकाएँ दिखाई दीं। ये पताकाएँ अहिंसा और शांति की प्रतीक थीं।

नार्गे ने बताया कि जब कोई बुद्धिस्ट मर जाता है तो एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ फहराई जाती हैं। जिन्हें उतारा नहीं जाता। किसी नए कार्य के आरंभ के समय रंगीन पताकाएँ फहराई जाती हैं। जितेन नार्गे ने बताया कि कवी-लोंग स्टॉक नामक स्थान पर ‘गाइड’ फिल्म की शूटिंग हुई थी। उन लोगों ने मार्ग में एक घूमता हुआ चक्र भी देखा जिसे धर्म चक्र कहते हैं। वहाँ के लोगों का विश्वास है कि उसे घुमाने से घुमाने वाले के सभी पाप धुल जाते हैं। लेखिका को लगा कि सब स्थानों के लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वासों और पाप- पुण्य संबंधी धारणाएँ लगभग एक समान हैं ज्यों-ज्यों उनकी जीप ऊपर बढ़ती जा रही थी, त्यों- त्यों, बाज़ार, लोग, बस्तियाँ पीछे छूटते जा रहे थे। बड़ी-बड़ी पहाड़ियाँ सामने अपने विराट रूप में दिखाई देने लगी थीं। पास जाकर देखने से लगता था कि वे सौंदर्य के वैभव से मंडित थीं।

धीरे-धीरे मार्ग घुमावदार होते जा रहे थे। चारों ओर हरियाली-ही-हरियाली दिखाई देती थी। लगता था कि वे किसी हरी-भरी गुफा में प्रवेश कर रहे हैं। वहाँ के अत्यंत सुंदर मौसम का प्रभाव सब पर हो रहा था किंतु लेखिका चुपचाप बैठी हुई वहाँ के संपूर्ण दृश्यों को अपने में समा लेना चाहती थी। सिलीगुड़ी से साथ चल रही तिस्ता नदी का सौंदर्य अब देखते ही बनता था। लेखिका नदी के सौंदर्य को देखकर रोमांचित हो रही थी। साथ ही मन-ही-मन हिमालय को सलामी दे रही थी। जीप ‘सेवन सिस्टर्स वॉटर फॉल’ पर जाकर रुकती है। सभी लोग वहाँ के अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य को अपने-अपने कैमरों में बंद करने लगते हैं किंतु लेखिका अत्यंत तल्लीनता के साथ झरने से बह रहे संगीत को आत्मलीन होकर सुन रही थीं। उन्हें लगता था कि जैसे उन्होंने सत्य एवं सौंदर्य को छू लिया हो। झरने का बहता पानी उनमें एक जोश, शक्ति और अहसास भर रहा था। उन्हें लग रहा था कि उनके अंतःकरण की सारी कुटिलताएँ और बुरी इच्छाएँ पानी की धारा के साथ बह गई थीं। वे वहाँ से हटने के लिए तैयार नहीं थीं।

जब जितेन ने आकर कहा कि आगे इससे भी सुंदर दृश्य हैं, तब वे आगे चलने को तैयार हुईं। मार्ग में आँखों और आत्मा को आनंद प्रदान करने वाले अनेक दृश्य बिखरे हुए थे। मार्ग में प्राकृतिक दृश्य पल-पल में अपना रंग बदलते थे। लगता था कि कोई जादू की छड़ी घुमाकर जल्दी-जल्दी दृश्य बदल रहा है। माया और छाया का यह अनूठा खेल लेखिका को जीवन के रहस्य समझा रहा था। चारों ओर के दृश्य रहस्यों से भरे हुए थे। उनकी जीप थोड़ी देर के लिए रुक जाती है, जहाँ जीप रुकी थी वहाँ लिखा हुआ था ‘थिंक ग्रीन’ । वहाँ पूरे, ब्रह्मांड का दृश्य मानो एक साथ देखने को मिल रहा था। वहाँ बहते झरने, तिस्ता नदी का तीव्र वेग, धुंध का आवरण, ऊपर आकाश में बादल थे और हवा धीरे-धीरे बह रही थी। आस-पास खिले हुए फूलों की हँसी बिखरी हुई थी। संपूर्ण अद्भुत वातावरण को देखकर तो ऐसा प्रतीत हो रहा था कि हमारा अस्तित्व भी इस वातावरण के साथ ही बहता जा रहा है।

धुंधली चादर के हटते ही सामने विपरीत दिशाओं में खड़े पहाड़ दिखाई दिए। इन पहाड़ों के बीच स्वर्ग के समान सुंदर दृश्य बिखरे हुए थे। पर्वत, झरने, फूलों, घाटियों और वादियों के दुर्लभ नज़ारे लेखिका को कहीं बहुत गहरे अपने आपसे जोड़ रहे थे। उसकी आत्मा उदार होती जा रही थी। उसे लगा कि वह ईश्वर के बहुत समीप है। उसके होंठों पर फिर वही प्रार्थना “साना-साना हाथ जोड़ि ….” आने लगी। कुछ ही दूर चलने पर, लेखिका की दृष्टि पहाड़ी औरतों पर पड़ी। वे औरतें पत्थर तोड़ रही थीं, उनकी काया कोमल थी, किंतु उनके हाथों में हथौड़े और कुदाल थे। कुछ की पीठ पर तो उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। वे पूरी ताकत के साथ पत्थर तोड़ रही थीं। वे उस अलौकिक सौंदर्य से निरपेक्ष अपनी जीविका के संघर्ष में लगी हुई थीं। लेखिका को एकाएक लगा मानो किसी समाधि भाव से नाचती नृत्यांगना के धुंघरू टूट गए हों। स्वर्गीय सौंदर्य के बीच मौत, भूख और जिंदा रहने की लड़ाई उनके सामने थी।

पूछने पर पता चला कि ये पहाड़िने सड़क को चौड़ा करने का काम कर रही थीं। यह बहुत ही खतरे से भरा हुआ कार्य है। आपको हैरानी होगी, किंतु इस काम को करने में बहुत-से लोगों ने तो मौत को भी झुठला दिया है। लेखिका गहरी चिंता में डूब गई थी। उन्हें देखकर जितेन नार्गे ने कहा, “मैडम, ये मेरे देश की आम जनता है। इन्हें तो आप कहीं भी देख सकती हो। आप पहाड़ों की सुंदरता को देखिए जिनको देखने के लिए आप पैसे खर्च करके आई हैं।” किंतु लेखिका सोच रही थी कि मेरे देश की जनता कितना कम लेकर कितना अधिक देती है। तभी वे श्रम-सुंदरियाँ किसी बात पर खिलखिला पड़ी। लेखिका को लगा कि खंडहर ताजमहल बन गया हो।

जीप चढ़ाई चढ़ती जा रही थी। हेयर पिन बेंट से पहले एक पड़ाव पर बहुत सारे पहाड़ी बच्चे स्कूल से लौट रहे थे। वे लिफ्ट माँग रहे थे। जितेन ने बताया कि यहाँ स्कूल बस की कोई व्यवस्था नहीं है। नीचे तराई में एक ही स्कूल है। दूर-दूर से बच्चे वहीं पढ़ने आते हैं। ये बच्चे पढ़ते ही नहीं, अपितु अपनी माताओं के साथ मवेशी चराते हैं, पानी भरते हैं और लकड़ियों के गट्ठर भी उठाकर लाते हैं। अब आगे का मार्ग और भी संकरा (तंग) हो गया था। जगह-जगह चेतावनी के बोर्ड लगाए हुए थे।

सूरज ढलने पर पहाड़ी औरतें और बच्चे गाय चराकर लौट रहे थे। कुछ के सिर पर लकड़ियों के गट्ठर थे। शाम का समय हो गया था। जीप चाय के बागानों से गुज़र रही थी। बागानों में कुछ युवतियाँ सिक्किमी परिधान पहने चाय की पत्तियाँ तोड़ रही थीं। उनके चेहरे ढलती शाम के सूरज की रोशनी में चमक रहे थे। चारों ओर इंद्रधनुषी रंग छटा बिखेर रहे थे। लेखिका इतना अधिक प्राकृतिक सौंदर्य देखकर खुशी से चीख उठी थी। यूमथांग पहुँचने से पूर्व लोग कुछ समय के लिए लायुंग रुके थे। लायुंग में लकड़ी से बने छोटे-छोटे घर थे। लेखिका थकान उतारने के लिए तिस्ता नदी के पत्थरों पर जाकर बैठ गई थी। वहाँ का वातावरण शांत था। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति अपनी लय, ताल और गति में कुछ कह रही हो। इस सफर में लेखिका दार्शनिक-सी बन गई थी। रात होने पर जितेन व अन्य साथियों ने नाच-गाना आरंभ कर दिया था। लेखिका की सहयात्री मणि ने अति सुंदर नृत्य किया। लागुंग के लोगों का मुख्य व्यवसाय आलू, धान की खेती और शराब था। लेखिका, की इच्छा वहाँ बर्फ देखने की थी, किंतु वहाँ बर्फ दिखाई नहीं दे रही थी।

वे लोग इस समय 14000 फीट की ऊँचाई पर थे। एक स्थानीय युवक का मानना था कि यहाँ प्रदूषण के कारण स्नोफाल नहीं होता। उसने बताया ‘कटाओ’ नामक स्थान पर बर्फ देखने को मिल सकती है। ‘कटाओ’ को भारत का स्विट्जरलैंड कहते हैं। ‘कटाओ’ को अभी तक टूरिस्ट स्थान नहीं बनाया गया था। इसलिए वह अपने प्राकृतिक स्वरूप में था। लागुंग से ‘कटाओ’ का सफर केवल दो घंटे का था। अब रास्ता और भी खतरनाक था। सब लोग खामोश बैठे हुए थे। जितेन अंदाज़ से गाड़ी चला रहा था। वहाँ के सारे वातावरण में बादल छाए हुए थे। जरा-सी असावधानी से कोई भी दुर्घटना हो सकती थी। थोड़ी दूर चलने पर मौसम साफ हो गया। मणि स्विट्ज़रलैंड देख चुकी थी।

इसलिए उसने एकाएक कहा यह स्थान तो स्विट्ज़रलैंड से भी अधिक सुंदर है। ‘कटाओ’ दिखने लगा था। चारों ओर बर्फ रूपी चाँदी की चादर फैली हुई थी। कटाओ पहुँचते ही थोड़ी-थोड़ी बर्फ पड़ने लगी थी। बर्फ को देखकर सभी के हृदय खिल गए थे। सभी यात्री वहाँ की बर्फ के फोटो खींच रहे थे। लेखिका बर्फ में जाना चाहती थी किंतु उनके पास बर्फ में पहनने वाले जूते नहीं थे। लेखिका फोटो खींचने की अपेक्षा वहाँ के वातावरण को अपनी साँसों में समा लेना चाहती थी। उन्हें लग रहा था कि यहाँ के वातावरण ने ही ऋषि-मुनियों को वेदों की रचना करने की प्रेरणा दी होगी। ऐसे अनुपम सौंदर्य को यदि कोई अपराधी भी देख ले तो वह भी कुछ समय के लिए आध्यात्मिक हो जाएगा। मणि के मन में भी आध्यात्मिकता का भाव जागने लगा था। लेखिका सोचती है कि ये हिमशिखर ही पूरे एशिया को पानी देते हैं। प्रकृति अपने ढंग से सर्दियों में हमारे लिए पानी एकत्रित करती है और गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएँ पिघलकर जलधारा बनकर हमारी प्यास को शांत करती हैं। प्रकृति की जल संचय की यह विधि भी अद्भुत है। हम इन हिमशिखरों और नदियों के ऋणी हैं।

लेखिका और उसके सहयोगी यात्री कुछ आगे बढ़ते हैं तो वहाँ उन्हें फौजी छावनियाँ दिखाई देती हैं। वहाँ से कुछ ही दूरी पर चीन की सीमा है। फौजी जवान कड़कती ठंड में अपने आपको कष्ट देकर हमारी सुरक्षा करते हैं। लेखिका फौजियों को देखकर कुछ उदास हो जाती है कि जहाँ बैशाख के महीने में भी इतनी अधिक ठंड है तो वे लोग पौष – माघ की ठंड में किस तरह रहते होंगे। वहाँ जाने का रास्ता भी मुसीबतों से भरा हुआ है। वास्तव में फौजी अपना सुख त्यागकर हमारे लिए शांतिपूर्वक कल का निर्माण करते हैं।

वे लोग वहाँ के प्राकृतिक दृश्यों को अपनी आत्मा में संजोकर लौट पड़े थे। यूमथांग की संपूर्ण घाटी फूलों से भरी हुई थी। जितेन नार्गे ने बताया कि यहाँ के लोग बंदर का माँस भी खाते हैं। बंदर का माँस खाने से कैंसर नहीं होता। उसकी बातों पर लेखिका के अतिरिक्त किसी को विश्वास नहीं हो रहा था, क्योंकि उसने पठारी इलाकों की भयानक गरीबी देखी थी। लोगों को सूअर का दूध पीते देखा था। यूमथांग पहुँचकर लोगों को सब कुछ फीका- फीका लग रहा था। वहाँ के लोग अपने आपको भारतीय कहलवाने में गर्व अनुभव करते हैं। पहले सिक्किम स्वतंत्र राज्य था। अब वह भारत का ही एक हिस्सा बन गया है। ऐसा होने से वहाँ के लोग बहुत खुश हैं। मणि ने बताया कि पहाड़ी कुत्ते केवल चाँदनी रात में ही भौंकते हैं। यह सुनकर लेखिका हैरान हुई। उसे लगा कि पहाड़ी कुत्तों पर भी ज्वारभाटे की तरह पूर्णिमा की चाँदनी का प्रभाव पड़ता है। लौटते समय जितेन नार्गे ने और भी बहुत-सी जानकारियाँ उन्हें दी थीं। मार्ग में उन्हें एक ऐसा स्थान दिखाया, जहाँ पूरे एक किलोमीटर के क्षेत्र में देवी-देवताओं का निवास है। जो वहाँ गंदगी फैलाएंगा वह मर जाएगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। उसने यह भी बताया कि वे पहाड़ों पर गंदगी नहीं फैलाते। वे लोग गंतोक बोलते हैं। गंतोक का अर्थ है-पहाड़। सिक्किम में अधिकतर क्षेत्रों को टूरिस्ट स्पॉट बनाने का श्रेय भारतीय आर्मी के कप्तान शेखर दत्ता को जाता है। लेखिका को इस यात्रा के पश्चात् लगा कि मनुष्य की कभी न समाप्त होने वाली खोज का नाम ही सौंदर्य है।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-17) संधि-स्थल = मिलने का स्थान। सम्मोहन = मोहित होने का भाव। स्थगित = कुछ समय के लिए टाला गया। अतींद्रियता = इंद्रियों से परे जाने का भाव। उजास = प्रकाश।

(पृष्ठ-18) रकम-रकम के = तरह- तरह के। गहनतम = सबसे गहरा। गाइड = मार्गदर्शक। जायज़ा = अनुभव और अनुमान। पताकाएँ = झंडे। बुद्धिस्ट = बौद्ध धर्म को मानने वाले। संधि-पत्र = समझौते के लिए लिखा गया पत्र। अवधारणाएँ = मानसिक विचार।

(पृष्ठ-19) परिदृश्य = नज़ारा। रफ्ता-रफ़्ता = धीरे-धीरे। वीरान = सुनसान। सँकरे = तंग। विशालकाय = बहुत बड़े आकार वाला। परिवर्तन = बदलाव। काम्य = मन की चाहत। वादियाँ = पर्वतों के बीच फैला हुआ भाग।

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(पृष्ठ-20) मुंडकी = सिर। सैलानी = सैर करने आए यात्री। पराकाष्ठा = पूरी ऊँचाई पर। फेन = झाग। जल-प्रपात = जल का ऊँचाई से गिरना। मशगूल = व्यस्त। अभिशप्त = जिसे अभिशाप दिया गया हो। काव्यमय = कविता से संबंधित। सरहद = सीमा। अनंतता = अंत न होने का भाव। लम्हे = पल। तामसिकताएँ = बुरी भावनाएँ।

(पृष्ठ-21) सतत = निरंतर। वजूद = होने का भाव। छोर तक = किनारे तक। तंद्रिल अवस्था = नींद जैसी स्थिति में होना। आत्मलीन = अपने-आप में लीन। निरपेक्ष = जो किसी से पक्ष-पात न करे। समाधिस्थ = समाधि की दशा में।

(पृष्ठ-22-23) अकस्मात = अचानक। संजीदा = गंभीर। डाइनामाइट = एक प्रकार का विस्फोटक पदार्थ । चुहलबाजी = हंसी मज़ाक। वंचना = वंचित होने का भाव (कमी)। गमगीन = गम में डूबा हुआ। हेयर पिन बेंट = बालों में लगाने वाली सूई के आकार का। पड़ाव = ठहराव, ठहरने का स्थान।

(पृष्ठ-24-25) सात्विक = पवित्र। आभा = चमक। असहाय = असहनीय। संकल्प = निश्चय। हलाहल = ज़हर। जन्नत = स्वर्ग। परिदे = पक्षी। अनायास = अचानक।

(पृष्ठ-26-27) अहसास = अनुभव । गर्व = अभिमान। डाइवोर्स = तलाक। ख्वाहिश = इच्छा। विभोर = लीन होना। सर्वे भवंतु सुखिनः, = सभी सुखी हों। अमंगल = बुरा। वृत्ति = स्वभाव। अभिभूत = भावना से भरकर। बार्डर = सीमा।

(पृष्ठ-28-29) टुडे = आज। टुमारो = आने वाला कल। मीआद = समय-सीमा। अपेक्षाकृत = की बजाय। रोमांचक = रोमांच से भर देने वाला। फुटप्रिंट = पाँवों के निशान।

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HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 2 जॉर्ज पंचम की नाक

Haryana State Board HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 2 जॉर्ज पंचम की नाक Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 2 जॉर्ज पंचम की नाक

HBSE 10th Class Hindi जॉर्ज पंचम की नाक Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है वह उनकी किस मानसिकता को दर्शाती है?
उत्तर-
सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता या बदहवासी दिखाई देती है, वह उनकी गुलाम मानसिकता को दर्शाती है। उनकी इस मानसिकता से पता चलता है कि वे स्वतंत्र होकर भी अंग्रेजों के प्रभाव से प्रभावित हैं। उन्हें अपने उस मेहमान की नाक बहुमूल्व लगती है जिसने भारतवर्ष को गुलाम बनाया और अपमानित किया। उनके पास जॉर्ज पंचम जैसे लोगों के बरे कार्यों को उजागर कर विरोध करने का साहस नहीं है। वे उन्हें सम्मान देकर अपनी दासता की भावना को प्रमाणित करना चाहते हैं। इस पाठ में लेखक ने भारतीय संस्कृति की ‘अतिथि देवोभव’ की परंपरा पर प्रश्नचिह्न अवश्य लगा दिया। उसका कथन है कि अतिथि का सम्मान करना उचित है, किंतु अपने सम्मान की बलि देकर नहीं।

प्रश्न 2.
रानी एलिज़ाबेथ के दरज़ी की परेशानी का क्या कारण था? उसकी परेशानी को आप किस तरह तर्कसंगत ठहराएँगे?
उत्तर-
रानी एलिज़ाबेथ के दरजी की परेशानी का कारण रानी के द्वारा भारत, नेपाल और पाकिस्तान के दौरे के समय पहनी जाने वाली पोशाकों की विविधता, सुंदरता और आकर्षण था। इन पोशाकों में रानी कैसी लगेगी? दरज़ी की परेशानी उसकी अपनी दृष्टि से तर्कसंगत थी। हर व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्य को सर्वश्रेष्ठ रूप में प्रस्तुत करना चाहता है ताकि वह दूसरों द्वारा की गई प्रशंसा को सहज रूप में बटोर सके। एलिज़ाबेथ उस देश की रानी थी जिसने उन देशों पर राज्य किया था जहाँ अब वह दौरे पर आ रही थी। हर व्यक्ति की दृष्टि में पहली झलक शारीरिक सुंदरता एवं वेशभूषा की होती है। इसी कारण वह बाहर से आने वाले व्यक्ति के विषय में अपना मत बनाता है। यही कारण है कि दरज़ी रानी के लिए अति सुंदर एवं आकर्षक पोशाक बनाना चाहता था। यही उसकी परेशानी का कारण भी था।

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प्रश्न 3.
‘और देखते ही देखते नयी दिल्ली का काया पलट होने लगा’-नयी दिल्ली के काया पलट के लिए क्या-क्या प्रयत्न किए गए होंगे?
उत्तर-
जब इंग्लैंड की रानी एलिज़ाबेथ ने भारत की यात्रा करने का निश्चय किया तो भारत सरकार की प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा। नई दिल्ली की शोभा के माध्यम से सारे देश की झलक दिखाने का भाव उत्पन्न हो गया। नई दिल्ली की सड़कें टूटी-फूटी और धूल से भरी हुई थीं। उन्हें साफ करके उनकी मुरम्मत की गई होगी। पुराने भवनों को भी संवारा व सजाया गया होगा। हर चौराहे को रानी के स्वागत हेतु बंदनवार और फूलों से सजाया गया होगा। रानी के स्वागत के लिए रंग-बिरंगे बोर्ड तैयार किए गए होंगे। सड़कों के किनारे सुंदर-सुंदर पौधों से सजे हुए गमलों को रखा गया होगा। सड़कों पर पानी का छिड़काव किया गया होगा।

प्रश्न 4.
आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान संबंधी आदतों आदि के वर्णन का दौर चल पड़ा है
(क) इस प्रकार की पत्रकारिता के बारे में आपके क्या विचार हैं? (ख) इस तरह की पत्रकारिता आम जनता विशेषकर युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव डालती है?
उत्तर-
(क) आज की पत्रकारिता चर्चित हस्तियों के पहनावे और खान-पान संबंधी आदतों के बारे में कुछ-न-कुछ लिखने में गर्व अनुभव करती है। ऐसी पत्रकारिता से सामान्य लोगों को उन लोगों के निजी जीवन के संबंध में शाब्दिक जानकारी तो अवश्य मिलती है, जिनके बारे में वे न जाने क्या-क्या सोचते रहते हैं। उनके जीवन के विषय में कुछ-न-कुछ जानने का अहसास अवश्य कर सकते हैं। ऐसी पत्रकारिता से मनोरंजन भी होता है। किंतु ऐसी खबर को अखबार की प्रमुख खबर के रूप में नहीं छापना चाहिए।

(ख) इस प्रकार की पत्रकारिता आम जनता को रहन-सहन के तौर-तरीके और फैशन के प्रति अवश्य जागरूक करती है किंतु इसका कभी-कभी इतना अधिक प्रभाव पड़ता है कि युवक-युवतियाँ पढ़ाई-लिखाई की अपेक्षा फैशन की ओर अधिक ध्यान देने लगते हैं। ऐसे युवक व युवतियाँ वास्तविकता की अपेक्षा दिखावे पर अधिक विश्वास करने लगते हैं।

प्रश्न 5.
जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने क्या-क्या यत्न किए?
उत्तर-
जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने अनेक यत्न किए। उसने सबसे पहले वैसा ही पत्थर खोजने के लिए देश-भर के पर्वत छान डाले जिससे उसकी मूर्ति बनी हुई थी। सरकारी फाइलें भी ढूँढी ताकि वहाँ से कोई अता-पता चल सके। देश भर के महान् पुरुषों की बनी प्रतिमाओं की नाकों का नाप भी लिया गया पर वे उससे बड़ी थीं। अंत में किसी की जीवित नाक काटकर जॉर्ज पंचम की मूर्ति पर लगा दी गई।

प्रश्न 6.
प्रस्तुत कहानी में जगह-जगह कुछ ऐसे कथन आए हैं जो मौजूदा व्यवस्था पर करारी चोट करते हैं। उदाहरण के लिए ‘फाइलें सब कुछ हजम कर चुकी हैं।’ ‘सब हुक्कामों ने एक-दूसरे की तरफ ताका।’ पाठ में आए ऐसे अन्य कथन छाँटकर लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में मौजूदा व्यवस्था पर चोट करने वाले निम्नलिखित कथन आए हैं-
(क) शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूंज हिंदुस्तान में आ रही थी।
(ख) गश्त लगती रही और लाट की नाक चली गई।
(ग) सभी सहमत थे कि यदि लाट की नाक नहीं तो हमारी भी नाक नहीं रह जाएगी।
(घ) फाइलों के पेट चीरे गए परंतु कुछ भी पता न चला।
(ङ) हर हालत में इस नाक का होना बहुत ज़रूरी है।
(च) लानत है आपकी अक्ल पर। विदेशों की सारी चीजें हम अपना चुके हैं।
(छ) लेकिन बड़ी होशियारी से।

प्रश्न 7.
नाक मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है। यह बात पूरी व्यंग्य रचना में किस तरह उभरकर आई है? लिखिए।
उत्तर-
लेखक का प्रमुख लक्ष्य ही नाक को मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक सिद्ध करना रहा है। जॉर्ज पंचम भारत पर विदेशी शासन का प्रतीक है। उनकी लाट यानि प्रतिमा से नाक चली जाना उनका अपमान है। इसका अर्थ यह हुआ कि स्वतंत्र भारत में जॉर्ज पंचम की नीतियों को भारत विरोधी मानकर उनका खंडन किया गया है।
रानी एलिज़ाबेथ के भारत आगमन पर सभी सरकारी अधिकारी अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध अपनी नाराजगी जाहिर करने की अपेक्षा उसकी आराधना में जुट गए। यह कार्य भारत की नाक कटने के समान था। जॉर्ज पंचम विदेशी शासक था। उसकी नीतियाँ भारत-विरोधी थीं। इसलिए उसकी नाक किसी भारतीय सेनानी से छोटी थी। इसके बावजूद सरकारी अधिकारी उसकी नाक लगाने के लिए कटिबद्ध दिखाई देते हैं। उसकी नाक लगाने के लिए हज़ारों-लाखों रुपए खर्च कर दिए। अंत में कोई जीवित नाक उस पर लगा दी गई। इससे तो भारतीयों की नाक और भी कट गई।

प्रश्न 8.
जॉर्ज पंचम की लाट पर किसी भी भारतीय नेता, यहाँ तक कि भारतीय बच्चे की नाक फिट न होने की बात से लेखक किस ओर संकेत करना चाहता है?
उत्तर-
जॉर्ज पंचम की नाक सभी भारतीय नेताओं और भारतीय बच्चों की नाक से छोटी थी, के माध्यम से लेखक ने बताया है कि भारतीय नेताओं और बलिदान देने वाले बच्चों का मान-सम्मान जॉर्ज पंचम की नाक से अधिक था। गाँधी, लाला लाजपतराय, सुभाषचंद्र बोस, नेहरू आदि नेता तो निश्चित रूप से जॉर्ज पंचम से कहीं अधिक सम्माननीय थे। यह संकेत करना ही यहाँ लेखक का लक्ष्य रहा है।

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प्रश्न 9.
अखबारों ने जिंदा नाक लगाने की खबर को किस तरह से प्रस्तुत किया?
उत्तर-
अखबारों ने जिंदा नाक लगाने की खबर को केवल इतना ही प्रस्तुत किया कि नाक का मसला हल हो गया है। राजपथ पर इंडियागेट के पास वाली जॉर्ज पंचम लाट के नाक लग रही है।

प्रश्न 10.
“नयी दिल्ली में सब था……..सिर्फ नाक नहीं थी।” इस कथन के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर-
इस कथन के माध्यम से लेखक ने बताया है कि देश में स्वतंत्रता के पश्चात् दिल्ली में हर प्रकार की सुख-सुविधा थी। केवल जॉर्ज पंचम का अभिमान और मान-मर्यादा की ऊँची नाक नहीं थी। अंग्रेजी राज्य में उनकी यहाँ तूती बोलती थी। उन्हीं का आदेश चलता था, किंतु अब इंडिया गेट के पास वाली उनकी मूर्ति की नाक भी शेष नहीं बची थी।

प्रश्न 11.
जॉर्ज पंचम की नाक लगने वाली खबर के दिन अखबार चुप क्यों थे?
उत्तर-
जॉर्ज पंचम की मूर्ति को चालीस करोड़ भारतीयों में से किसी एक की जिंदा नाक लगाने की जिम्मेदारी मूर्तिकार ने ली थी। अखबारों में खबर छप गई कि नाक लगा दी गई। उस दिन भारतीयों को लगा कि उन सबकी नाक कट गई। संपूर्ण भारतीय जनता का बहुत बड़ा अपमान हुआ। आज देश में उस व्यक्ति की मूर्ति को जिंदा नाक लगा दी गई, जिसने सारे भारत को गुलामी की जंजीरों में बाँधे रखा था। इसलिए इस अपमानजनक घटना के बाद अखबार चुप थे। अपमान की पीड़ा से व्याकुल होने के कारण उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। इसलिए उस दिन सभी अखबार चुप रहे।

HBSE 10th Class Hindi जॉर्ज पंचम की नाक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
मूर्तिकार लाट की नाक लगाने के लिए तैयार क्यों हुआ था?
उत्तर-
मूर्तिकार भारतीय था। प्रत्येक भारतीय की भाँति उसमें भी भारतीयता की भावना विद्यमान थी। किंतु वह धन की दृष्टि से विवश था अर्थात् उसके पास धन का अभाव था। खाली-पेट मनुष्य से कौन-सा काम नहीं करवाया जा सकता। अपनी गरीबी की विवशता के कारण ही मूर्तिकार लाट की नाक लगाने के लिए तैयार हुआ था।

प्रश्न 2.
इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ के भारत आगमन के समय भारतीय अखबारों में क्या छप रहा था?
उत्तर-
इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ के भारत आगमन पर भारतीय अखबारों में यहाँ की जाने वाले तैयारियों की खबरें छप रही थीं। रानी के द्वारा पहने जाने वाले वस्त्रों का वर्णन भी अखबारों में पढ़ा जा सकता था। रानी की जन्म-पत्री, प्रिंस फिलिप के कारनामे, शाही नौकरों, बावरचियों और अंगरक्षकों की लंबी-लंबी चर्चा छपती थी। साथ ही शाही महल के कुत्तों की तस्वीरें भी छपती थीं।

प्रश्न 3.
जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक कैसे और कहाँ चली गई थी?
उत्तर-
एक समय था कि दिल्ली में इस विषय पर जोरदार बहस होती थी कि हिंदुस्तान को गुलामी देने वाले जॉर्ज पंचम की नाक रहे या न रहे। इस संबंध में राजनीतिक दलों ने प्रस्ताव पास किए, नेताओं ने लंबे-चौड़े भाषण झाड़े, गर्मागर्म बहसें हुईं और अखबारों के पन्ने रंग गए। कुछ लोग इस पक्ष में थे कि नाक नहीं रहनी चाहिए और कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहे थे। इस आंदोलन को देखते हुए जॉर्ज पंचम की लाट (मूर्ति) पर पहरेदार तैनात कर दिए गए। किसी की क्या मज़ाल कि कोई नाक तक पहुँच भी सकता। किंतु उन्हीं हथियारबंद पहरेदारों की उपस्थिति में लाट की नाक चली गई। पहरेदारों के द्वारा गश्त लगाते हुए उनकी नाक के नीचे से लाट की नाक कौन ले गया और कहाँ गई, यह पता न चल सका।

प्रश्न 4.
‘प्रस्तुत पाठ में सरकारी सुरक्षा तंत्र का मज़ाक उड़ाया गया है’-सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
लेखक ने सरेआम सरकारी सुरक्षा तंत्र का मज़ाक उड़ाया है। यह कैसा आश्चर्य है कि हथियारबंद पहरेदार हर वक्त मूर्ति का पहरा देते रहे, उनकी गश्त चलती रही। फिर भी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक चोरी हो गई। किसी को इस बात की भनक तक नहीं लगी। इससे पता चलता है कि सरकारी सुरक्षा तंत्र कितना बेकार एवं निकम्मा है।

प्रश्न 5.
रानी एलिज़ाबेथ के भारत आगमन के समय कौन-सी मुसीबत आ पड़ी थी?
उत्तर-
रानी एलिज़ाबेथ के आगमन से कुछ समय पहले जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक चोरी हो गई थी। रानी आकर जब उस मूर्ति को देखती तो भारतीयों के विषय में क्या सोचती। बस यह नाक-कटना ही उस समय भारतीय प्रशासन की सबसे बड़ी समस्या बन गई थी। उस कटी हुई नाक के स्थान पर वैसी ही नाक कैसे लगाई जाए? ।

प्रश्न 6.
आपकी दृष्टि में नई दिल्ली की कायापलट क्यों और कैसे होने लगी थी?
उत्तर-
भारतवर्ष में इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ का दौरा होने वाला था। वह भारत में अपने पति के साथ आ रही थी। भारत के शासक उनका शाही स्वागत करना चाहते थे। इसलिए नई दिल्ली को पूरी तरह सजा देना चाहते थे। वहाँ की धूल भरी
और टूटी सड़कों की मुरम्मत करवाई गई, पुराने भवनों को भी सजाया गया, स्थान-स्थान पर बंदनवार बनाए गए। इस प्रकार नई दिल्ली की कायापलट हो गई थी।

प्रश्न 7.
मूर्तिकार जॉर्ज के नाप की नाक की खोज में देश-दौरे पर किस-किस प्रांत में पहुँचा?
उत्तर-
मूर्तिकार जॉर्जे के नाम की नाक की खोज के लिए गुजरात, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, मद्रास, पंजाब, दिल्ली आदि प्रदेशों में पहुंचा था, किन्तु उसे कुछ नहीं मिला था।

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प्रश्न 8.
सभापति ने किस आधार पर कहा था कि हम भारतवासियों ने अंग्रेजी सभ्यता को स्वीकार कर लिया है?
उत्तर-
भारत देश पूर्णतः आजाद हो गया है। अंग्रेज़ी शासन भी यहाँ से जा चुका है। किंतु अब भी यहाँ पर अंग्रेज़ों का प्रभाव पूरी तरह से बना हुआ है। जब मूर्तिकार ने सभापति को बताया कि जिस पत्थर से जॉर्ज पंचम की मूर्ति बनी है, वह पत्थर विदेशी है और यहाँ के पर्वतों के पत्थरों से वह मेल नहीं खाता। तो तैश में आकर सभापति ने कहा था कि लानत है आपकी अक्ल पर। विदेशों की सारी चीजें हम अपना चुके हैं-दिल दिमाग, तौर-तरीके और रहन-सहन, जब हिंदुस्तान में बाल डांस तक मिल जाता है तो पत्थर क्यों नही मिल सकता? अंग्रेज़ी सभ्यता के प्रभाव के कारण ही शुभचिंतक लाट की टूटी हुई नाक की जगह नई नाक लगवाना चाहते हैं।

प्रश्न 9.
मूर्तिकार ने मूर्ति की नाक के लिए उपयुक्त पत्थर प्राप्त ना कर पाने का क्या कारण बताया था?
उत्तर-
मूर्तिकार ने लाट की नाक के लिए उचित पत्थर प्राप्त करने के लिए देश के सभी पर्वतीय क्षेत्रों का भ्रमण किया था। पत्थरों की खादानों में भी खोजबीन की थी, पर उसे मूर्ति की नाक के लिए उपयुक्त पत्थर नहीं मिला था। तो उसने इसका कारण बताते हुए कहा कि वह पत्थर विदेशी था ।

प्रश्न 10.
‘जॉर्ज पंचम की नाक’ शीर्षक पाठ का उद्देश्य निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।
उत्तर-
‘जॉर्ज पंचम की नाक’ नामक पाठ में लेखक का प्रमुख उद्देश्य स्वाभिमानशून्य भारतीय शासकों पर करारा व्यंग्य करना है। लेखक स्वतंत्र भारत के उन शासकों को मज़ाक करता है जो अपने आत्म-सम्मान को भूल चुके हैं। वे अतीत में हुए अपने अपमान को भूलकर अन्यायी एवं हमें गुलाम बनाने वाले अंग्रेजों के सम्मान में लगे हुए हैं। उन्हें भारतीय महापुरुषों, शहीदों, संघर्ष करने वालों, बच्चों तथा स्त्रियों की कोई चिंता नहीं है। उन्हें चिंता है तो बस इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ के स्वागत की। वे भूल चुके हैं कि इसी महारानी ने हमें कभी गुलाम बनाया था। साथ ही लेखक ने सरकारी कार्य-प्रणाली पर भी व्यंग्य किया है। सरकार के सभी कार्य सरसरी तौर पर किए जाते हैं। सभी अधिकारी अपनी ज़िम्मेदारी दूसरों पर डाल देते हैं। अंत में गाज गिरती है छोटे कर्मचारियों पर। वे मौके पर क्षमा माँगकर ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ देते हैं। अतः स्पष्ट है कि लेखक का उद्देश्य भारतीयों में आत्म – सम्मान की भावना जगाना और कर्त्तव्यनिष्ठ बनाने की प्रेरणा देना भी है।

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बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1.
‘जॉर्ज पंचम की नाक’ पाठ के लेखक का क्या नाम है?
(A) धर्मवीर भारती
(B) कमलेश्वर
(C) शिवपूजन सहाय
(D) प्रेमचंद
उत्तर-
(B) कमलेश्वर

प्रश्न 2.
समाज में ‘नाक’ किसका प्रतीक मानी जाती है?
(A) धन का
(B) महानता का
(C) इज्जत का
(D) सुंदरता का
उत्तर-
(C) इज्जत का

प्रश्न 3.
जॉर्ज पंचम कौन था?
(A) अंग्रेज़ अधिकारी
(B) अंग्रेज़ लेखक
(C) अंग्रेज़ व्यापारी
(D) अंग्रेज़ पत्रकार
उत्तर-
(A) अंग्रेज़ अधिकारी

प्रश्न 4.
‘जॉर्ज पंचम की नाक’ नामक कहानी के अनुसार कहाँ की रानी भारत में आने वाली थी?
(A) अमेरिका की
(B) इंग्लैंड की
(C) नेपाल की
(D) श्रीलंका की
उत्तर-
(B) इंग्लैंड की

प्रश्न 5.
रानी के पहुंचने से पहले किन लोगों की फौज तैयार की गई थी?
(A) सिपाहियों की
(B) नौकरों की
(C) फोटोग्राफरों की
(D) पत्रकारों की
उत्तर-
(C) फोटोग्राफरों की

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प्रश्न 6.
‘कायापलट होना’ का क्या अर्थ है?
(A) शरीर बदल जाना
(B) काया का समाप्त होना
(C) नियम बदल देना
(D) पूर्णतः परिवर्तन होना
उत्तर-
(D) पूर्णतः परिवर्तन होना

प्रश्न 7.
लेखक के अनुसार कुछ नाकों को उतारकर कहाँ पहुँचा दिया गया?
(A) अजायब घरों में
(B) विद्यालयों में
(C) कैद खानों में
(D) कार्यालयों में
उत्तर-
(A) अजायब घरों में

प्रश्न 8.
‘फाइलों के पेट चीरना’ का क्या अभिप्राय है?
(A) फाइलों को फाड़ देना ।
(B) फाइलों को काट देना
(C) फाइलों को आदि से अंत तक पढ़ना
(D) फाइलों को बंद करना
उत्तर-
(C) फाइलों को आदि से अंत तक पढ़ना

प्रश्न 9.
प्रस्तुत कहानी में मूर्तिकार ने किन बच्चों का उल्लेख किया है?
(A) नालायक बच्चों का
(B) सन् 1942 में शहीद होने वाले बच्चों का
(C) खेल में प्रथम आने वाले बच्चों का
(D) शिक्षा के क्षेत्र में नाम कमाने वाले बच्चों का
उत्तर-
(B) सन् 1942 में शहीद होने वाले बच्चों का

प्रश्न 10.
अंत में मूर्तिकार ने जॉर्ज पंचम की लाट पर कैसी नाक लगाने का निर्णय लिया था?
(A) जिंदा नाक लगाने का
(B) पत्थर की नाक लगाने का।
(C) कागज़ की नाक लगाने का
(D) प्लास्टिक की नाक लगाने का
उत्तर-
(A) जिंदा नाक लगाने का

प्रश्न 11.
जॉर्ज पंचम की नाक लगाने की परेशानी से भारतीयों की कैसी मानसिकता झलकती है?
(A) आत्म सम्मान की
(B) गुलामी की
(C) कायरता की
(D) गर्व की
उत्तर-
(B) गुलामी की

प्रश्न 12.
‘नाक कट जाना’ का क्या अर्थ है?
(A) बेइज्जती होना
(B) नाक न रहना
(C) नाक पर ज़ख्म होना
(D) नाक पर चोट आना
उत्तर-
(A) बेइज्जती होना

प्रश्न 13.
जॉर्ज पंचम की लाट कहाँ स्थित थी?
(A) राजपथ पर
(B) मध्य पथ पर
(C) उत्तरी पथ पर
(D) रिंग रोड़ पर
उत्तर-
(A) राजपथ पर

प्रश्न 14.
मूर्तिकार की विवशता का क्या कारण था?
(A) लालच
(B) गरीबी
(C) बीमारी
(D) आत्मप्रशंसा
उत्तर-
(B) गरीबी

HBSE 10th Class Hindi Solutions Kritika Chapter 2 जॉर्ज पंचम की नाक

प्रश्न 15.
जॉर्ज पंचम की नाक काटने के पीछे प्रमुख कारण क्या रहा होगा?
(A) धन का लालच
(B) जॉर्ज पंचम का अपमान करना
(C) भारतीयों के अपमान का बदला लेना
(D) अंग्रेजों की नाक को पसंद न करना
उत्तर-
(C) भारतीयों के अपमान का बदला लेना

जॉर्ज पंचम की नाक Summary in Hindi

जॉर्ज पंचम की नाक पाठ का सार

प्रश्न-
जॉर्ज पंचम की नाक’ शीर्षक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर-
प्रस्तुत कहानी में श्री कमलेश्वर जी ने भारतीयों की गुलाम मानसिकता पर करारा व्यंग्य किया है। भले ही आज हम स्वतंत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं, किंतु आज भी हम विदेशी लोगों की जी-हुजूरी करने में अपना बड़प्पन समझते हैं। समाज में नाक इज्जत व सम्मान की प्रतीक मानी गई है। नाक को लेकर अनेक मुहावरों की रचना की गई है, यथा-नाक कटवाना, नाक कटना, ऊँची नाक, नाक रखना आदि। यहाँ ‘नाक कटना’ मुहावरे के अर्थ का विस्तार करते हुए इसका प्रयोग किया गया है। सारा व्यंग्य इस मुहावरे के इर्द-गिर्द घूमता है। प्रस्तुत पाठ में सत्ता से जुड़े हुए लोगों की गुलाम मानसिकता और विदेशी आकर्षण पर गहरी चोट की गई है। पाठ का सार इस प्रकार है

बात उन दिनों की है, जब इंग्लैंड की महारानी एलिज़ाबेथ द्वितीय अपने पति के साथ भारत आ रही है। महारानी के भारत दौरे की खबरें प्रतिदिन अखबारों में छपती थीं। एलिज़ाबेथ के दरज़ी उसकी पोशाक को लेकर परेशान थे। इंग्लैंड के अखबारों की कतरनें यहाँ के अखबारों में खूब प्रकाशित हो रही थीं कि रानी के लिए कौन-सी पोशाक बनाई जा रही हैं? रानी की जन्मपत्री, प्रिंस फिलिप के कारनामे, नौकरों, बावरचियों आदि के साथ-साथ शाही महल के कुत्तों की तस्वीरें भी छप रही थी। रानी के आगमन को लेकर भारतवर्ष में सनसनी मची हुई थी। रानी के स्वागत के लिए तैयारियाँ धूम-धाम से हो रही थीं। देखते-ही-देखते दिल्ली की कायापलट हो रही थी। सड़कों की सफाई व मुरम्मत भी हो रही थी। सभी मुख्य इमारतें भी सजाई जा रही थीं।

एकाएक समस्या सामने आ खड़ी हुई कि जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक गायब थी। पहले भी इस संबंध में राजनीतिक आंदोलन और बहसें हो चुकी थीं, किंतु राजनीतिक आंदोलन कभी किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकते। कुछ दल नाक लगवाने के पक्ष में थे तो कुछ कटवाने के। इसलिए समस्या ज्यों-की-त्यों बनी रही। किंतु एक हादसा हो गया कि हथियार-बंद जवानों के पहरे के होते हुए भी जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक कट गई। किंतु रानी के आगमन के समय नाक के कटने का अर्थ तो अपनी नाक कटाने के समान हो गया।

देश के विभिन्न स्थानों पर शुभचिंतकों की मीटिंग बुलाई गई और एक मत होकर कहा गया कि रानी के आने से पहले नाक लग जानी चाहिए। इसी संदर्भ में तुरंत एक मूर्तिकार को बुलाया गया। मूर्तिकार पैसों के मामले में कुछ लाचार था। उसने अधिकारियों के चेहरों की घबराहट को जान लिया। तभी उसने एक आवाज़ सुनी कि जॉर्ज पंचम की नाक लगानी है। मूर्तिकार ने सहज भाव से उत्तर दिया, “नाक लग जाएगी। पर मुझे यह मालूम होना चाहिए कि यह लाट कब और कहाँ बनी थी। इस लाट के लिए पत्थर कहाँ से लाया गया था?” अधिकारियों के चेहरों की हवाइयाँ उड़ गईं। अंततः पुरातत्त्व विभाग की फाइलों के ढेर-के-ढेर खोले गए, किंतु कुछ भी पता न चल सका। अधिकारी गण फिर परेशान हो गए। एक खास कमेटी का गठन किया गया, उसे नाक लगाने का काम सौंप दिया गया।

मूर्तिकार ने कमेटी को सुझाव दिया कि मैं देशभर के पर्वतों पर जाकर पत्थर की किस्म का पता लगाऊँगा। कमेटी के सदस्यों की जान-में-जान आ गई। सभापति ने भाषण भी जारी कर दिया, “ऐसी क्या चीज़ है जो हिंदुस्तान में मिलती नहीं। हर चीज़ इस देश के गर्भ में छिपी है, ज़रूरत खोज करने की है। खोज करने के लिए मेहनत करनी होगी, इस मेहनत का फल हमें मिलेगा ……आने वाला ज़माना खुशहाल होगा।” यह भाषण हर अखबार में छप गया। मूर्तिकार हर एक पहाड़ की खाक छान आया, किंतु वह कीमती पत्थर न मिल सका। उसने कहा कि यह विदेशी पत्थर है। सभापति उत्तेजित होकर बोला, “लानत है आपकी अक्ल पर! विदेशों की सारी चीजें हम अपना चुके हैं…………तो पत्थर क्यों नहीं मिल सकता?” मूर्तिकार चुप खड़ा रहा।

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बहुत सोचने पर मूर्तिकार के मन में एक विचार कौंध गया। उसने अखबार वालों तक खबर न पहुँचाने की शर्त पर एक सुझाव दिया। देश में अपने नेताओं की मूर्तियाँ भी तो बनाई गई हैं। उनमें से किसी भी नेता की नाक जॉर्ज पंचम की नाक से मिलती-जुलती हो तो उसे ले लिया जाए। पहले तो सभा में सन्नाटा-सा छा गया। फिर सभापति ने कहा कि यह काम ज़रा होशियारी से करना।

मूर्तिकार ने देश का भ्रमण किया। जॉर्ज पंचम की नाक का नाप उसके पास था। उसने दादा भाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी, सुभाषचंद्र बोस, गाँधीजी, सरदार पटेल, गुरुदेव रवींद्रनाथ, राजा राममोहन राय, चंद्रशेखर आज़ाद, मदनमोहन मालवीय, लाला लाजपतराय, भगतसिंह आदि सबकी मूर्तियों को भली-भाँति देखा और परखा। सबके नाक की माप ली गई पर सबकी नाक जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ी थी। वे इस पर फिट नहीं बैठती थी। इस बात से अधिकारी वर्ग में खलबली मच गई। अगर जॉर्ज की नाक न लग पाई तो रानी के स्वागत का कोई अर्थ नहीं था।

अंत में मूर्तिकार ने एक और सुझाव प्रस्तुत किया। एक ऐसा सुझाव जिसका पता किसी को नहीं लगना चाहिए था। देश की चालीस करोड़ जनता में से किसी की जिंदा नाक काटकर मूर्ति पर लगा देनी चाहिए। यह सुनकर सभापति महोदय परेशान हो गए। किंतु उसे इसकी अनुमति दे दी गई। अखबारों में केवल इतना ही छपा कि नाक का मसला हल हो गया है और जॉर्ज पंचम की लाट की नाक लग रही है। नाक लगाने से पहले पहरे का पूरा बंदोबस्त कर दिया गया। मूर्ति के आस-पास का तालाब सुखाकर साफ कर दिया गया। उसकी रवाब (काई) निकाली गई और ताज़ा पानी डाल दिया गया ताकि लगाई जाने वाली नाक जिंदा रह सके, सूख न जाए।

अखबारों में छप गया कि जॉर्ज पंचम की जिंदा नाक लगाई गई है, जो बिल्कुल पत्थर की नहीं लगती। उस दिन अखबारों . में किसी प्रकार के उल्लास और उत्साह की खबर नहीं छपी। किसी का ताज़ा चित्र भी नहीं छपा। ऐसा लगता था कि जॉर्ज पंचम की जिंदा नाक लगने से सारे देशवासियों की नाक कट गई थी। किसी की नाक नहीं बची थी। जिन विदेशियों ने हमारे देश को इतने लंबे समय तक गुलाम बनाकर रखा था, उनकी नाक के लिए हम अपनी नाक कटवाने को क्यों तैयार रहते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ

(पृष्ठ-10) मय = साथ। चर्चा = बातें होना। शाही-दौरा = राजा-महाराजा का आगमन। सेक्रेटरी = सचिव। तूफानी = तेज़। फौज-फाटा = सेना तथा अन्य शाही कर्मचारी। कतरन = अखबार से काटा हुआ अंश। कारनामे = कार्य। बावरची = रसोइया। खानसामा = शाही महल के रसोईघर का प्रबंधक। सनसनी फैलाना = खलबली मचाना।

(पृष्ठ-11) जान हथेली पर रखना = जीवन को खतरे में डालना। शान-शौकत = ठाठ-बाट। रहमत = कृपा, दया। कायापलट होना = पूर्णतः परिवर्तन होना। करिश्मा = जादू। जवान होना = पुनः सुधार होना। नाज़नीन = कोमल स्त्री। शृंगार = सजावट । उम्मीद = आशा। दास्तान = कहानी। प्रस्ताव पास करना = किसी मत या विचार को समर्थन देना। पन्ने रंगना = बहुत सारा लिखना। विपक्ष = विरोध। अजायबघर = वह स्थान जहाँ पुरानी वस्तुओं को रखा जाता है। लाट = खंभा, मूर्ति। गुरिल्ला युद्ध = जिस युद्ध में छिपकर वार किया जाता है। हादसा = दुर्घटना । एकाएक = अचानक । गश्त लगाना = पहरेदार का घूमना। खैरख्वाह = शुभ कामना करने वाला। मसला = समस्या।

(पृष्ठ-12) मशवरा = सलाह। दिमाग खरोंचना = दिमाग लगाना। फौरन = तुरंत । हाज़िर = उपस्थित । लाचार = मजबूर। हुक्काम = शासक । बदहवास = घबराए हुए। ताका = देखा। छानबीन = जाँच। खता = गलती, दोष। हज़म करना = खा जाना।

(पृष्ठ-13) दारोमदार = जिम्मेदारी। जान में जान आना = आशा के कारण आनंद आना। हताश = उदास, निराश । लानत बरसना = धिक्कार का भाव होना। सिर लटकाना = उदास और हताश होना। चप्पा-चप्पा खोजना = हर जगह ढूँढ़ना। तैश = आवेश। बाल डांस = विदेशी नृत्य का एक प्रकार। आँखों में चमक आना = आशा का भाव जागना। होशियारी = सावधानी।

(पृष्ठ-14) परिक्रमा = चारों ओर चक्कर लगाना। ढाढ़स बँधाना = हिम्मत देना। हैरतअंगेज़ खयाल = हैरान कर देने वाला विचार। कौंधा = अचानक आया। सन्नाटा = चुप्पी। अचकचाना = चौंक उठना। कानाफूसी होना = कानों-ही-कानों में धीमी-धीमी बातें होना।

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(पृष्ठ-15) राजपथ = दिल्ली संसद-भवन के पास का एक राजमार्ग। हिदायत = निर्देश। उद्घाटन = शुरुआत। फीता काटना = शुरुआत करना । सार्वजनिक सभा = आम जनता की सभा। अभिनंदन = स्वागत । मानपत्र भेंट = किसी को सम्मान भेट करना।

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