Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

HBSE 12th Class Hindi कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
इस कविता के बहाने बताएँ कि ‘सब घर एक कर देने के माने क्या हैं?
उत्तर:
“सब घर एक कर देने का अभिप्राय है-आपसी भेदभाव तथा ऊँच-नीच के भेद को समाप्त कर देना और एक-दूसरे के प्रति आत्मीयता का अनुभव करना। गली-मोहल्ले में खेलते बच्चे अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं। वे अन्य घरों को अपने घर जैसा मानने लगते हैं। इसी प्रकार कवि भी काव्य रचना करते समय सामाजिक भेदभाव को भूलकर कविता के माध्यम से अपनी बात कहता है।

प्रश्न 2.
‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से क्या संबंध बनता है?
उत्तर:
‘उड़ने’ और ‘खिलने’ का कविता से गहरा संबंध है। कवि कल्पना की उड़ान द्वारा नए-नए भावों की अभिव्यंजना करता है परंतु कवि की उड़ान पक्षियों की उड़ान से अधिक ऊँची होती है। उसकी उड़ान अनंत तथा असीम होती है। जिस प्रकार फूल कर अपनी सुगंध और रंग को चारों ओर फैलाता है, उसी प्रकार कवि भी अपनी कविता के भावों के आनंद को सभी पाठकों में बाँटता है। कवि की कविता सभी पाठकों को आनंदानुभूति प्रदान करती है।

प्रश्न 3.
कविता और बच्चे को समानांतर रखने के क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
कवि कल्पना के संसार की सृष्टि करके आनंद प्राप्त करता है और बच्चे आनंद प्राप्त करने के लिए क्रीड़ा करते हैं। खेलते समय सभी बच्चे आपस में जुड़ जाते हैं और छोटे-बड़े तथा अपने-पराए के भेद को भूल जाते हैं। कवि भी भेदभाव को भूलकर सबके कल्याणार्थ कविता की रचना करता है। खेल खेलते समय बच्चों का संसार बड़ा हो जाता है और साहित्य-रचना करते समय कवि का। इसीलिए कविता और बच्चे को समानांतर रखा गया है।

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प्रश्न 4.
कविता के संदर्भ में ‘बिना मुरझाए महकने के माने’ क्या होते हैं?
उत्तर:
फूल कुछ समय अपनी सुगंध और रंग का सौंदर्य बिखेरता है, फिर वह मुरझा जाता है। उसकी कोमल पत्तियाँ सूख कर बिखर जाती हैं, लेकिन कविता एक ऐसा फूल है जो कभी नहीं मुरझाता। कविता की महक अनंतकाल तक पाठकों को आनंद विभोर करती रहती है। हम हज़ारों साल पूर्व रचे गए साहित्य का आज भी आनंद प्राप्त करते रहते हैं।

प्रश्न 5.
‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘भाषा को सहूलियत’ से बरतने का अभिप्राय है-सहज, सरल तथा बोधगम्य भाषा का प्रयोग करना ताकि श्रोता भावाभिव्यक्ति को आसानी से ग्रहण कर सके। कवि को कृत्रिम तथा चमत्कृत करने वाली भाषा से बचना चाहिए। सरल बात, सरल भाषा में कही गई ही अच्छी लगती है।

प्रश्न 6.
बात और भाषा परस्पर जुड़े होते हैं, किंतु कभी-कभी भाषा के चक्कर में ‘सीधी बात भी टेढ़ी हो जाती है। कैसे?
उत्तर:
बात और भाषा का गहरा संबंध होता है। मानव अपने मन की भावनाएँ शब्दों के द्वारा ही व्यक्त करता है। यदि हम अपनी अनुभूति को सहज और सरल भाषा में व्यक्त कर दें तो किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती। परंतु कवि प्रायः अपनी बात को कहने के लिए सुंदर भाषा और चमत्कृत करने वाली भाषा का प्रयोग करने लगते हैं जिससे कवि का कथ्य अस्पष्ट हो जाता है। कवि जो कुछ कहना चाहता है, वह ठीक से कह नहीं पाता। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि हम उन शब्दों को पढ़ रहे होते हैं जो हमारी समझ के बाहर होते हैं अर्थात् कविता का मूल भाव हमारी समझ में नहीं आ पाता। हिंदी साहित्य के रीतिकालीन कवियों ने प्रायः कविता के कलापक्ष को अधिक महत्त्व दिया है जिससे उनकी कविता के भाव अस्पष्ट होकर रह गए।

प्रश्न 7.
बात (कथ्य) के लिए नीचे दी गई विशेषताओं का उचित बिंबों/महावरों से मिलान करें।

बिंब/मुहावराविशेषता
(क) बात की चूड़ी मर जानाकथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना
(ख) बात की पेंच खोलनाबात का पकड़ में न आना
(ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलनाबात का प्रभावहीन हो जाना
(घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देनाबात में कसावट का न होना
(ङ) बात का बन जानाबात को सहज और स्पष्ट करना

उत्तर:

बिंब/मुहावराविशेषता
(क) बात की चूड़ी मर जानाबात का पकड़ में न आना
(ख) बात की पेंच खोलनाबात का प्रभावहीन हो जाना
(ग) बात का शरारती बच्चे की तरह खेलनाबात में कसावट का न होना
(घ) पेंच को कील की तरह ठोंक देनाबात को सहज और स्पष्ट करना
(ङ) बात का बन जानाकथ्य और भाषा का सही सामंजस्य बनना

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
बात से जुड़े कई मुहावरे प्रचलित हैं। कुछ मुहावरों का प्रयोग करते हुए लिखें।
उत्तर:

  1. बातें बनाना केवल बातें बनाते रहोगे या मेरा काम भी करोगे।
  2. बात का धनी होना-यह अधिकारी बात का धनी है। यह जरूर हमारा काम करेगा।
  3. बात का बतंगड़ बनाना हमारा पड़ोसी तो हमेशा बात का बतंगड़ बना देता है। कभी-कभी तो झगड़े की नौबत भी आ जाती है।
  4. बात से मुकर जाना-जो लोग बात से मुकर जाते हैं, उन पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
  5. बात-बात पर मुँह बनाना तुम्हारी पत्नी तो बात-बात पर मुँह बनाने लगती है। यह कोई अच्छी बात नहीं है।

व्याख्या करें

“ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी।
उत्तर:
जब कोई कवि अपनी भावाभिव्यक्ति को व्यक्त करने के लिए जटिल भाषा का प्रयोग करने लगता है तो उसकी व्यंजना कुंद हो जाती है। कवि द्वारा प्रयुक्त जटिल भाषा के कारण कविता का मूल कथ्य नष्ट हो जाता है। अन्ततः कवि-कथ्य कृत्रिम भाषा में फँसकर रह जाता है और श्रोता कवि के भाव को समझ नहीं पाता।

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चर्चा कीजिए

आधुनिक युग में कविता की संभावनाओं पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
आज के वैज्ञानिक युग में कविता की रचना करना काफी कठिन हो गया है, क्योंकि भौतिकवादी दृष्टिकोण को अपनाने के कारण आधुनिक युग अत्यधिक बेचैन और व्याकुल रहता है। ऐसी स्थिति में केवल कविता ही मानव-मन को सुख-शांति प्रदान कर सकती है। आज भी हमारे समक्ष प्रकृति का विशाल प्रांगण है। आज समाज में अनेक समस्याएँ जटिल होती जा रही हैं। अतः कविता की संभावनाएँ काफी बढ़ चुकी हैं। आज प्रेम, मोहब्बत पर कविता लिखना व्यर्थ है, बल्कि जन-जीवन से जुड़ी कविता कवि-सम्मेलनों में वाह-वाही लूटती है। एक अच्छी कविता को पढ़कर आज का उलझा हुआ मानव कुछ राहत महसूस करता है। केवल आवश्यकता इस बात की है कि कविता हमारे जीवन से संबंधित होनी चाहिए।

चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त उपमानों के माध्यम से कवि ने कथ्य की अमूर्तता को साकार किया है। भाषा को समृद्ध एवं संप्रेषणीय बनाने में, बिंबों और उपमानों के महत्त्व पर परिसंवाद आयोजित करें।
उत्तर:
कविता के बहाने’ कविता में चूड़ी, कील, पेंच आदि मूर्त उपमानों का प्रयोग किया है तथा कथ्य की अमूर्तता को साकार करने का प्रयास किया है इस पर यह संवाद कुछ इस प्रकार आयोजित किया जा सकता है
(क) आज के कवि सहज, सरल भाषा में अपनी बात क्यों नहीं कहते? वे कील, चूड़ी, पेंच आदि मूर्त उपमानों को माध्यम क्यों बनाते हैं?

(ख) एक सफल कवि अपनी बात को हमेशा सरल तथा प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में समर्थ होता है। कभी-कभी वह प्रतीकों, उपमानों तथा बिंबों का प्रयोग भी करता है। ऐसा करने से कविता के अर्थ में गंभीरता उत्पन्न हो जाती है।

(ग) कवि को जटिल प्रतीकों तथा उपमानों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। उसका यह प्रयास रहना चाहिए कि कविता में कही गई बात उलझकर न रह जाए।

आपसदारी

1. सुंदर है सुमन, विहग सुंदर
मानव तुम सबसे सुंदरतम।
पंत की इस कविता में प्रकृति की तुलना में मनुष्य को अधिक सुंदर और समर्थ, बताया गया है। ‘कविता के बहाने’ कविता में से इस आशय को अभिव्यक्त करने वाले बिंदुओं की तलाश करें।
उत्तर:
कविता के बहाने में कवि ने बच्चे को चिड़िया और फूल की अपेक्षा श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास किया है। इसके लिए निम्नलिखित पंक्तियाँ उद्धृत हैं –
“कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।”

2. प्रतापनारायण मिश्र का निबंध ‘बात’ और नागार्जुन की कविता ‘बातें’ ढूँढ़ कर पढ़ें।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से पुस्तकालय से पुस्तकें लेकर इन दोनों रचनाओं को पढ़ें।

HBSE 12th Class Hindi कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

कविता के बहाने

प्रश्न 1.
निम्नलिखित काव्य पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने?
उत्तर:

  1. प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने कविता और चिड़िया की उड़ान की तुलना करते हुए यह स्पष्ट किया है कि चिड़िया की उड़ान कविता की उड़ान की उपेक्षा ससीम है, जबकि कविता की उड़ान अनंत और असीम है।
  2. ‘कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने’ में वक्रोक्ति अलंकार है।
  3. ‘चिड़िया क्या जाने’ में प्रश्नालंकार के साथ-साथ मानवीकरण का भी पुट है।
  4. ‘कविता के पंख लगा उड़ने’ में रूपक अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. ‘बाहर-भीतर इस घर, उस घर’ में अनुप्रास अलंकार का सुंदर प्रयोग है।
  6. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हआ है तथा शब्द-चयन सर्वथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने।
उत्तर:

  1. प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने बच्चों के सरल स्वभाव पर प्रकाश डाला है। बच्चे आपस में खेलते समय अपने-पराए के भेदभाव को नहीं जानते।
  2. बच्चे की क्रीड़ाओं तथा कवियों की काव्य रचनाओं में काफी समानता होती है, क्योंकि न तो बच्चे भेदभाव को समझते हैं और न ही कवि। इसीलिए कवि ने कहा है कि सब घर एक कर देना।।
  3. ‘बाहर भीतर’, ‘इस घर, उस घर’ तथा ‘बच्चों के बहाने’ में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. प्रस्तुत पद्य में सहज, सरल तथा प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-योजना सार्थक व सटीक है।
  6. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

बात सीधी थी पर

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए –
1. बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
जरा टेढ़ी फंस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए-
उत्तर:
(1) प्रस्तुत पद्यांश में कवि ने इस बात पर बल दिया है कि कथ्य के अनुसार कविता की अभिव्यंजना होनी चाहिए। ऐसा करने से अभिव्यक्ति बड़ी सरलता के साथ स्वयं प्रकट हो जाती है।

(2) ‘उलटा-पलटा’, ‘तोड़ा-मरोड़ा’, ‘घुमाया-फिराया’ आदि शब्दों का सटीक प्रयोग हुआ है। ये शब्द भाषा की कृत्रिमता और जटिलता पर व्यंग्य करते हैं।

(3) ‘उलटा-पलटा’, ‘तोड़ा-मरोड़ा’, ‘घुमाया-फिराया’ आदि में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।

(4) भाषा का चक्कर’ तथा ‘टेढ़ी-फँसी’, जैसे लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग हुआ है जोकि अभिव्यंजना-शिल्प को सौंदर्य प्रदान करते हैं।

(5) सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(6) शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं सटीक है।

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प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य को स्पष्ट कीजिए –
ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?”
उत्तर:

  1. यहाँ कवि ने भाषा के द्वारा भाव को सजाने का प्रयास किया है लेकिन वह भाव स्पष्ट नहीं हो पाया।
  2. यहाँ बात का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
  3. कवि द्वारा ‘पसीना पोंछना’ एक सुंदर दृश्य बिंब है जो परिश्रम की व्यर्थता को सिद्ध करता है।
  4. ‘शरारती बच्चे की तरह’ में उपमा अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. ‘पसीना पोंछते’ में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  6. इस पद्य में संवादात्मक शैली का बहुत ही प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
  7. सहज, सरल, बोधगम्य तथा प्रवाहमयी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  8. शब्द-योजना सार्थक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘कविता के बहाने’ कविता का प्रतिपाद्य (उद्देश्य) स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस कविता के माध्यम से कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि कविता की उड़ान आकाश में उड़ने वाली चिड़िया तथा फूल की सुगंध से भी अधिक ऊँची और विस्तृत होती है। चिड़िया की उड़ान ससीम है तथा फूल की महक भी ससीम है। पुनः ये दोनों नश्वर हैं तथा इनके क्रियाकलाप भी नश्वर हैं। परंतु कविता का प्रभाव अनंत और स्थाई होता है। कविता बच्चों के खेल के समान भेदभाव से मुक्त होती है और श्रोता को असीम आनंद प्रदान करती है। इसलिए कविता का प्रभाव अनंत, व्यापक तथा आनंदपूर्ण माना गया है।

प्रश्न 2.
कविता और चिड़िया की उड़ान में क्या अंतर है स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कविता और चिड़िया दोनों ऊँची उड़ान भर सकते हैं, परंतु चिड़िया की अपेक्षा कविता की उड़ान अनंत तथा असीम होती है। चिड़िया एक सीमित दायरे में ही उड़ सकती है, परंतु कवि अपनी कल्पना द्वारा कहीं भी पहुंच सकता है। इसलिए कहा भी गया है
“जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि”।

प्रश्न 3.
कविता और फूल की तुलना करें।
उत्तर:
फूल और उसकी महक ससीम है। पुनः ये दोनों ही नश्वर हैं। फूल क्षण भर के लिए खिलकर अपनी महक फैलाता है और फिर नष्ट हो जाता है, परंतु कवि की कल्पना, उसका भाव और सौंदर्य अनंत काल तक श्रोताओं को आनंद दे सकते हैं।

प्रश्न 4.
बच्चों और कविता में क्या समानता है?
उत्तर:
बच्चे आपसी भेदभाव तथा अपने-पराए के अंतर को भूलकर खेलते हुए आनंद प्राप्त करते हैं। कविता भी अपने-पराए की भावना को भूलकर भावों को ग्रहण करती है। जिस प्रकार बच्चों को खेल से आनंद मिलता है, उसी प्रकार कविता भी आनंदानुभूति के लिए लिखी जाती है।

प्रश्न 5.
‘बात सीधी थी पर’ कविता का प्रतिपाद्य (उद्देश्य)/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘बात सीधी थी पर कविता के माध्यम से कवि यह बताना चाहता है कि हमें सहज, सरल तथा बोधगम्य भाषा द्वारा अपनी बात को कहना चाहिए। यदि कवि अपनी बात को जटिल तथा चमत्कृत करने वाली भाषा के द्वारा कहता है तो उसकी बात श्रोता तक ठीक से नहीं पहुँच पाती। प्रायः कुछ कवि अपने कथ्य को चमत्कारी बनाने के लिए भाषा को जान-बूझकर तोड़ते-मरोड़ते और घुमाते-फिराते हैं। इससे कविता का भाव-सौंदर्य तथा कलागत सौंदर्य दोनों नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 6.
‘बात की चूड़ी मरने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘बात की चूड़ी मरने’ का यह अभिप्राय है कि बेवजह बात को घुमाने-फिराने से उसका प्रभाव समाप्त हो जाता है। जिस प्रकार पेंच की चूड़ी मरने के बाद उसका कसाव ढीला पड़ जाता है, उसी प्रकार भाषा के अनावश्यक विस्तार से मूल बात शब्द-जाल में उलझ जाती है। वह श्रोता तक ठीक से नहीं पहुँच पाती।

प्रश्न 7.
‘बात और अधिक पेचीदा’ क्यों होती चली गई?
उत्तर:
कवि ने भाषा को अनावश्यक विस्तार देते हुए अपनी बात को कहने का प्रयास किया। उसने चमत्कृत करने वाली कृत्रिम भाषा का अधिक प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप बात और भी पेचीदा होती चली गई।

प्रश्न 8.
कवि ने हारकर उसे कील की तरह उसी जगह क्यों ठोंक दिया?
उत्तर:
पहले तो कवि ने चमत्कृत भाषा के प्रयोग द्वारा अपनी बात को प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया परंतु इससे कवि का कथ्य उलझकर रह गया। वस्तुतः कवि अपना धैर्य खो बैठा। इसलिए उसने निराश होकर अपनी बात को उसी कृत्रिम भाषा में प्रकट कर दिया।

प्रश्न 9.
कवि को पसीना क्यों आ रहा था?
उत्तर:
कवि अपनी बात को सरलता से नहीं कह पा रहा था। वह प्रभावशाली भाषा के प्रयोग में उलझकर रह गया। कवि जो कुछ कहना चाहता था, वह कह नहीं पाया। वह बार-बार काव्य भाषा को बदल रहा था। इस कारण उसकी बात जटिल भाषा में उलझकर रह गई। इसलिए उसे थकावट के कारण पसीना आ रहा था।

प्रश्न 10.
बात ने एक शरारती बच्चे की तरह कवि से क्या कहा?
उत्तर:
बात एक शरारती बच्चे की तरह कवि से क्रीड़ा कर रही थी। वह जानती थी कि कवि उसे ठीक से अभिव्यक्त नहीं कर पा रहा है। इसलिए उसने कवि से कहा कि तुम अभी तक यह भी नहीं सीख पाए कि भाषा का सहज प्रयोग किस प्रकार किया जाता है? अर्थात् कवि को यह समझना चाहिए था कि सहज शब्दावली में भी सहज विचारों को व्यक्त किया जा सकता है। उसके लिए जटिल अथवा उलझी हुई शब्दावली की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 11.
आखिर कवि को डर किस बात का था?
उत्तर:
कवि अपनी ओर से बात को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करना चाहता था। इसके लिए उसने आडंबर प्रधान भाषा का या। लेकिन बलपूर्वक कृत्रिम भाषा का प्रयोग करने से कवि का कथ्य इस प्रकार प्रभावहीन हो गया जैसे जोर जबरदस्ती करने से चूड़ी मर जाती है।

प्रश्न 12.
बात पेचीदा क्यों होती चली गई?
उत्तर:
कवि सहज एवं सरल भाषा में अपनी बात को कह सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह भाषा को तोड़ने-मरोड़ने लगा ताकि उसका कथन अधिक प्रभावशाली हो सके। इसका परिणाम यह हुआ कि उस कृत्रिम भाषा के फलस्वरूप कवि का कथन उलझता चला गया और बात पेचीदा होती चली गई।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. कुँवर नारायण का जन्म कब हुआ?
(A) 19 सितंबर, 1927
(B) 19 सितंबर, 1937
(C) 19 दिसंबर, 1927
(D) 19 अक्तूबर, 1927
उत्तर:
(A) 19 सितंबर, 1927

2. कुँवर नारायण का जन्म कहाँ पर हुआ?
(A) मुरादाबाद
(B) मेरठ
(C) बरेली
(D) फैज़ाबाद
उत्तर:
(D) फैज़ाबाद

3. कुँवर नारायण ने किस विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) आगरा विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय

4. कुँवर नारायण ने चेकोस्लोवाकिया, पौलेंड, रूस तथा चीन का भ्रमण कब किया?
(A) सन् 1954 में
(B) सन् 1955 में
(C) सन् 1956 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(B) सन् 1955 में

5. सन् 1956 में कुँवर नारायण किस पत्रिका के संपादक मंडल से जुड़ गए?
(A) धर्म युग
(B) दिनमान
(C) नवनीत
(D) युग चेतना
उत्तर:
(D) युग चेतना

6. भारतेंदु नाटक अकादमी में वे किस पद पर नियुक्त हुए?
(A) सचिव
(B) उपाध्यक्ष
(C) अध्यक्ष
(D) सलाहकार
उत्तर:
(C) अध्यक्ष

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7. कुँवर नारायण को ‘हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1971 में
(B) सन् 1973 में
(C) सन् 1969 में
(D) सन् 1968 में
उत्तर:
(A) सन् 1971 में

8. कुँवर नारायण को ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1973 में
(B) सन् 1975 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1977 में
उत्तर:
(A) सन् 1973 में

9. कुँवर नारायण को मध्य प्रदेश का ‘तुलसी पुरस्कार’ कब मिला?
(A) सन् 1981 में
(B) सन् 1982 में
(C) सन् 1984 में
(D) सन् 1984 में
उत्तर:
(B) सन् 1982 में

10. ‘कविता के बहाने’ के कवि का नाम क्या है?
(A) आलोक धन्वा
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(C) कुँवर नारायण

11. ‘कविता के बहाने कविता कवि के किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
(A) चक्रव्यूह
(B) अपने सामने
(C) इन दिनों
(D) आत्मजयी
उत्तर:
(C) इन दिनों

12.
‘बात सीधी थी पर कविता के कवि का नाम क्या है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) मुक्तिबोध
(C) आलोक धन्वा
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

13. ‘बात सीधी थी पर’ किस काव्य-संग्रह में संकलित है?
(A) इन दिनों
(B) कविता के बहाने
(C) कोई दूसरा नहीं
(D) चक्रव्यूह
उत्तर:
(C) कोई दूसरा नहीं

14. ‘तीसरा सप्तक’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1961 में
(B) सन् 1958 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(C) सन् 1959 में

15. ‘परिवेश : हम तुम’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) हरिवंश राय बच्चन
(B) रघुवीर सहाय
(C) आलोक धन्वा
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

16. ‘परिवेश : हम तुम’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1961 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1963 में
उत्तर:
(A) सन् 1961 में

17. ‘इन दिनों का प्रकाशन वर्ष कौन-सा है?
(A) सन् 1962 में
(B) सन् 1963 में
(C) सन् 1965 में
(D) सन् 1964 में
उत्तर:
(D) सन् 1964 में 18. ‘अपने सामने के रचयिता का नाम क्या है?

18. ‘अपने सामने’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) कुँवर नारायण
(C) मुक्तिबोध
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) कुँवर नारायण

19. ‘अपने सामने का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1996 में
(B) सन् 1995 में
(C) सन् 1997 में
(D) सन् 1999 में
उत्तर:
(C) सन् 1997 में

20. ‘आकारों के आस-पास’ के रचयिता कौन हैं?
(A) आलोक धन्वा
(B) रघुवीर सहाय
(C) मुक्ति बोध
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(D) कुँवर नारायण

21. ‘आकारों के आस-पास’ किस विधा की रचना है?
(A) काव्य-संग्रह
(B) कहानी संग्रह
(C) निबंध संग्रह
(D) कविता संग्रह
उत्तर:
(B) कहानी संग्रह

22. ‘आज और आज से पहले किस विधा की रचना है?
(A) निबंध संग्रह
(B) उपन्यास
(C) एकांकी संग्रह
(D) समीक्षा
उत्तर:
(D) समीक्षा

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23. ‘कविता के पंख लगाने में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) रूपक
(C) उत्प्रेक्षा
(D) उपमा
उत्तर:
(B) रूपक

24. सीधी बात भी किसके चक्कर में फंस गई थी?
(A) निपुणता
(B) शैतानी
(C) भाषा
(D) भय
उत्तर:
(C) भाषा

25. ‘कवि की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) उपमा
(C) श्लेष
(D) काकुवक्रोक्ति
उत्तर:
(A) रूपक

26. ‘कविता के बहाने’ कविता में किस छंद का प्रयोग हआ है?
(A) कवित्त छंद
(B) सवैया छंद
(C) मुक्त छंद
(D) दोहा छंद
उत्तर:
(C) मुक्त छंद

27. ‘बाहर भीतर इस घर, उस घर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) श्लेष
(B) यमक
(C) अनुप्रास
(D) वक्रोक्ति
उत्तर:
(C) अनुप्रास

28. भाषा के क्या करने से बात और अधिक पेचीदा हो गई?
(A) तोड़ने-मरोड़ने
(B) उलटने-पलटने
(C) घुमाने-फिराने
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

29. ‘बात की चूड़ी मर जाना’ का अर्थ है
(A) स्पष्ट होना
(B) प्रभावहीन होना
(C) प्रभावपूर्ण होना
(D) तर्कपूर्ण होना
उत्तर:
(B) प्रभावहीन होना

30. ‘बात की पेंच खोलना’ का अर्थ है
(A) बात उलझा देना
(B) बात का प्रभावहीन होना
(C) बात को सहज और स्पष्ट करना
(D) बात को घुमाकर कहना
उत्तर:
(B) बात का प्रभावहीन होना

31. ‘बात का शरारती बच्चे की तरह खेलना’ का अर्थ है
(A) बात का प्रभावहीन होना
(B) कोई ठीक उत्तर न देना
(C) बात द्वारा शरारत करना
(D) बात को सहज स्पष्ट करना
उत्तर:
(B) कोई ठीक उत्तर न देना

32. बिन मुरझाए महकना का अर्थ है
(A) कविता का प्रभाव अनंत काल तक रहता है
(B) कविता कभी नहीं मुरझाती
(C) कविता का प्रभाव शीघ्र नष्ट हो जाता है
(D) कविता को लोग पढ़ना नहीं चाहते
उत्तर:
(A) कविता का प्रभाव अनंत काल तक रहता है

33. बात कवि के साथ किसके समान खेल रही थी?
(A) शरारती बच्चे के
(B) खिलौने के
(C) भाषा के
(D) पेंच के
उत्तर:
(A) शरारती बच्चे के

34. बात बाहर निकलने की अपेक्षा कैसी हो गई थी?
(A) पेचीदा
(B) सरल
(C) वक्र
(D) व्यर्थ
उत्तर:
(A) पेचीदा

35. ‘बात सीधी थी पर’ नामक कविता में कवि ने किस पर बल दिया है?
(A) भाषा की जटिलता
(B) भावों की सरसता
(C) भाषा की सहजता
(D) भावों की गरिमा
उत्तर:
(C) भाषा की सहजता

36. ‘बात सीधी थी पर’ कविता में कवि ने कौन-सी कोशिश नहीं की थी?
(A) उलटा पलटा
(B) तोड़ा मरोड़ा
(C) हिलाया सरकाया
(D) घुमाया फिराया
उत्तर:
(C) हिलाया सरकाया

37. भाषा को घुमाने फिराने से बात कैसी हो जाती है?
(A) पेचीदा
(B) सरल
(C) दिव्य
(D) सौम्य
उत्तर:
(A) पेचीदा

कविता के बहाने पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर 

[1] कविता एक उड़ान है चिड़िया के बहाने
कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
कविता के पंख लगा उड़ने के माने
चिड़िया क्या जाने? [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-सरल हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है तथा इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि स्पष्ट करता है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का अस्तित्व समाप्त हो गया है

व्याख्या-कवि कविता की शक्ति का वर्णन करता हुआ कहता है कि कविता एक उड़ान है। जहाँ चिड़िया की उड़ान सीमित होती है, परन्तु कविता की उड़ान असीमित होती है। उसमें नए-नए भाव, नए-नए रंग तथा नए-नए विचार उत्पन्न होते रहते हैं। कविता की उड़ान बड़ी ऊँची होती है। चिड़िया भी कविता की उड़ान के उस छोर तक नहीं पहुँच पाती। कविता के भाव असीम होते हैं। कविता न केवल घर के भीतर की गतिविधियों का वर्णन करती है, बल्कि वह बाहर के क्रियाकलापों को भी व्यक्त करती है। भाव यह है कि कभी तो कविता घर-परिवार की समस्याओं का उद्घाटन करती है तो कभी घर के बाहर के वातावरण का मार्मिक वर्णन करती है। कविता के साथ कल्पना के पंख लगे होते हैं। इसलिए उसकी उड़ान असीम है। बेचारी चिड़िया कविता की असीम शक्ति को कैसे पहचान सकती है। जहाँ प्रकृति का क्षेत्र ससीम है, वहाँ कविता का क्षेत्र अनंत और असीम है।

विशेष –

  1. यहाँ कवि ने कविता और चिड़िया की उड़ान की मनोहारी तुलना की है। चिड़िया एक सीमित क्षेत्र में ही उड़ान भर सकती है, परंतु कविता की उड़ान असीमित है।
  2. ‘चिड़िया क्या जाने’ में प्रश्नालंकार है तथा इसमें मानवीकरण का भी पुट है।
  3. ‘कविता के पंख’ में रूपक अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘बाहर भीतर इस घर, उस घर’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-योजना सार्थक व सटीक है।
  7. वर्णनात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग है, लेकिन छंद में लयबद्धता भी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) कविता की उड़ान भला चिड़िया क्या जाने इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ग) कविता चिड़िया के बहाने एक उड़ान क्यों है?
(घ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि-कुँवर नारायण कविता- कविता के बहाने’

(ख) इस पंक्ति द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि चिड़िया तो प्रकृति के प्रांगण में ही उड़ान भरती है। उसकी अपनी कुछ सीमाएँ हैं। वह केवल आकाश में ही उड़ सकती है, परंतु वह मानव-मन की सूक्ष्म भावनाओं में प्रवेश नहीं कर पाती। इसलिए वह कविता की उड़ान को नहीं जान सकती।

(ग) जिस प्रकार चिड़िया खुले आकाश में उड़ान भरती है, उसी प्रकार कवि की कल्पना चिड़िया की ऊँची उड़ान को देखकर कल्पना लोक में विचरण करने लगती है। कवि केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही वर्णन नहीं करता, बल्कि वह मानव मन की सूक्ष्म भावनाओं का वर्णन भी करता है। अतः चिड़िया की उड़ान कविता के लिए प्रेरणा का काम करती है।

(घ) इस पद्यांश में कवि ने चिड़िया की उड़ान और कविता की उड़ान की तुलना की है। चिड़िया की उड़ान की अपेक्षा कविता की उड़ान अधिक प्रभावशाली, शक्तिशाली तथा व्यापक है। कविता की उड़ान का संबंध मानव मन की सूक्ष्म भावनाओं से भी है।

[2] कविता एक खिलना है फूलों के बहाने
कविता का खिलना भला फूल क्या जाने!
बाहर भीतर
इस घर, उस घर
बिना मुरझाए महकने के माने
फूल क्या जाने? [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-महकना = सुगंध बिखेरना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने’ से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है। इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का वजूद समाप्त हो गया है। इस पद्य में कवि कविता की तुलना फूल के साथ करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि कविता फूलों को देखकर खिलती है और पुष्पित होती है। फूलों के समान कविता में भी नए-नए रंग भर जाते हैं। कविता का खिलना असीम है, जबकि फूल का खिलना ससीम है। फल केवल खिलकर अपने चारों ओर स तथा सुंदरता को बिखेर देता है, परंतु फूल कविता के खिलने को ठीक से समझ नहीं पाता। फूल का क्षेत्र सीमित है। एक समय ऐसा आता है जब फूल मुरझाकर नष्ट हो जाता है। उसके साथ-साथ उसकी सुगंध तथा सुंदरता भी समाप्त हो जाती है, परंतु कविता की सुगंध तथा सुंदरता कभी समाप्त नहीं होती। वह न केवल घर के बाहर तथा भीतर अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरती है, बल्कि वह प्रत्येक घर में अपने भाव-सौंदर्य को बिखेरती रहती है। फूल तो केवल इतना जानता है कि बस सुगंध उत्पन्न करना तथा एक दिन झर जाना। फूल बिना मुरझाए महकने के अर्थ को नहीं जान सकता। कविता हमेशा अपने भावों की सुगंध बिखेरती रहती है। उसका भाव शाश्वत होता है तथा वह कभी नष्ट नहीं होता।

विशेष –

  1. इस पद्यांश में कवि ने कविता तथा फूल की तुलना बहुत सुंदर ढंग से की है। कविता की तुलना में फूल ससीम है परंतु कविता अनंत और असीम है।
  2. ‘कविता का खिलना फूल क्या जाने’ इस पद्य पंक्ति में काकूवक्रोक्ति अलंकार का वर्णन हुआ है।
  3. ‘फूल क्या जाने’ में प्रश्नालंकार है तथा मानवीकरण अलंकार का पुट भी है।
  4. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. वर्णनात्मक शैली है तथा मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है, लेकिन छंद में लयबद्धता भी है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कविता का खिलना फूल क्या जाने-पंक्ति में कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कविता और फूल के खिलने में क्या अंतर है?
(ग) कविता बिना मुरझाए बाहर भीतर कैसे महकती है?
(घ) इस पद्य का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि फूल की सीमाओं पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि भले ही वह खिलकर चारों ओर सुगंध बिखेरता है, परंतु उसका खिलना सीमित होता है। वह कविता के मर्म को नहीं जान पाता। निश्चय से कविता फूल से अधिक मूल्यवान है। उसकी प्रभावोत्पादकता असीम है।

(ख) फूल खिलकर एक सीमित क्षेत्र में अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरता है। परंतु कविता का क्षेत्र असीमित होता है। कविता की कल्पना सर्वत्र पहुँच सकती है। फूल कविता के समान व्यापक नहीं है। इसलिए कहा भी गया है
“जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि।”

(ग) कविता एक ऐसा फूल है जो कभी नहीं मुरझाता और हमेशा अपनी महक को बिखेरता रहता है। कविता बाह्य प्रकृति और आंतरिक प्रकृति दोनों का वर्णन करने में समर्थ है। वह अनंत काल तक अपनी सुगंध को बिखेरती रहती है। कविता का प्रभाव अनंत तथा असीम है।

(घ) इस पद्यांश द्वारा कवि कविता और फूल की तुलना करते हुए कहता है कि फूल एक सीमित दायरे में अपनी सुगंध तथा सुंदरता को बिखेरता है। कुछ समय के बाद शीघ्र ही वह नष्ट हो जाता है। परंतु कविता मानव मन के बाहर तथा भीतर दोनों को सुगंधित करती है। इसलिए फूल की शक्ति ससीम है, परंतु कविता की शक्ति असीम है।

[3] कविता एक खेल है बच्चों के बहाने
बाहर भीतर
यह घर, वह घर
सब घर एक कर देने के माने
बच्चा ही जाने। [पृष्ठ-17]

शब्दार्थ-सरल हैं।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘कविता के बहाने से लिया गया है। यह कविता ‘इन दिनों काव्य-संग्रह से ली गई है। इसके कवि कुँवर नारायण हैं। इस कविता में कवि ने स्पष्ट किया है कि कविता के द्वारा अपार संभावनाओं को खोजा जा सकता है। अतः यह कहना गलत है कि कविता का वजूद समाप्त हो गया है। इसमें कवि ने बच्चों में पाई जाने वाली स्वाभाविक आत्मीयता और निष्कलुषता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या-कवि का कथन है कि कवि बच्चों की क्रीड़ाओं को देखकर अपनी कविता द्वारा शब्द-क्रीड़ा करता है। वह शब्दों के माध्यम से नए-नए भावों तथा विचारों के खेल खेलता है। जिस प्रकार बच्चे कभी घर में खेलते हैं, कभी बाहर खेलते हैं और अपने-पराए का भेदभाव नहीं करते, उसी प्रकार कवि भी कविता के द्वारा सभी के भावों का वर्णन करता है। बच्चों के खेल कवि को भी प्रेरणा देते हैं। खेल-खेल में बच्चे एक-दूसरे को अपना बना लेते हैं और वे एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। कवि भी बच्चों के समान बाहर और भीतर के मनोभावों का वर्णन करता है। वह समान भाव से सभी लोगों की सूक्ष्म भावनाओं का चित्रण करता है। भाव यह है कि जिस प्रकार बच्चे एक-दूसरे को जोड़ते हैं, उसी प्रकार कवि भी अपनी कविता द्वारा जोड़ने का प्रयास करता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने बच्चों में पाई जाने वाली स्वाभाविक आत्मीयता तथा निष्कलुषता का उद्घाटन किया है।
  2. कवि यह स्पष्ट करता है कि बच्चे आपस में खेलते हुए अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं।
  3. संपूर्ण पद्य में अनुप्रास अलंकार की छटा दर्शनीय है।
  4. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  6. वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है तथा मुक्त छंद है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि ने कविता को खेल क्यों कहा है?
(ख) बच्चे खेल-खेल में कौन-सा महत्त्वपूर्ण कार्य करते हैं?
(ग) बच्चों के खेलने तथा कविता रचने में क्या समानता है?
(घ) इस पद्य से हमें क्या संदेश मिलता है?
उत्तर:
(क) बच्चे मनोरंजन तथा आत्माभिव्यक्ति के लिए आपस में खेलते हैं। खेलों के पीछे उनका कोई गंभीर उद्देश्य नहीं होता, परंतु क्रीड़ाएँ बच्चों को आनंदानुभूति प्रदान करती हैं। इसी प्रकार कविता की रचना करना भी एक खेल है। कविता के द्वारा कवि न केवल श्रोताओं का मनोरंजन करता है, बल्कि उन्हें आनंदानुभूति भी प्रदान करता है।

(ख) बच्चे खेल-खेल में अपने-पराए के भेदभाव को भूल जाते हैं। खेलों द्वारा उनमें आत्मीयता की भावना उत्पन्न होती है। बच्चे खेलों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।

(ग) बच्चों के खेलने तथा कविता रचने में सबसे बड़ी समानता यह है कि दोनों ही आनंदानुभूति प्रदान करते हैं। दोनों ही समाज को जोड़ने का काम करते हैं, तोड़ने का नहीं। दूसरा, दोनों से ही मनोरंजन होता है।

(घ) इस पद्यांश से हमें यह संदेश मिलता है कि बच्चों के समान कविता भी हमें आपस में जोड़ती है। कविता अपने-पराए के भेदभाव को भूलकर सबकी अनुभूतियों को व्यक्त करती है। कविता का क्षेत्र बड़ा ही विस्तृत व व्यापक है। इसका प्रभाव भी शाश्वत और अनंत है।

बात सीधी थी पर पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर 

[1] बात सीधी थी पर एक बार
भाषा के चक्कर में
जरा टेढ़ी फँस गई।
उसे पाने की कोशिश में
भाषा को उलटा पलटा
तोड़ा मरोड़ा
घुमाया फिराया
कि बात या तो बने
या फिर भाषा से बाहर आए
लेकिन इससे भाषा के साथ साथ
बात और भी पेचीदा होती चली गई। [पृष्ठ-18]

शब्दार्थ-चक्कर = प्रभाव दिखाने की कोशिश। टेढ़ा फँसना = बुरी तरह फँसना। पेचीदा = जटिल, उलझी हुई।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए। सीधी बात को हम सहज एवं सरल भाषा द्वारा प्रभावशाली बना सकते हैं।

व्याख्या-कवि कहता है कि मैं कविता द्वारा एक सहज, सरल बात कहना चाहता था। एक बार ऐसा करते समय मैं भाषा के भ्रम का शिकार बन गया। मैंने सोचा कि मैं बढ़िया-से-बढ़िया भाषा का प्रयोग करूँ, परंतु ऐसा करते समय मेरा कथ्य उलझकर रह गया और बात की सरलता और स्पष्टता नष्ट हो गई। सरल-सी बात भी सुलझकर रह गई। तब मैंने एक बड़ी भारी भूल की। मैंने भाषा के शब्दों को काटना-छाँटना तथा तोड़ना-मरोड़ना आरंभ कर दिया। उसे कभी इधर घुमाया, कभी उधर घुमाया। वस्तुतः मैं अपनी मूल बात को सहज तथा सरल रूप से व्यक्त करना चाहता था, परंतु मेरी बात उलझकर रह गई। तब मैंने यह कोशिश की कि या तो मेरे मन की बात सहजता से व्यक्त हो जाए या मेरी बात को भाषा के उलट-फेर से स्वतंत्रता मिल जाए। परंतु दोनों काम नहीं हो सके। इस प्रयास में भाषा जटिल से जटिलतर होती चली गई और मेरी मूल बात भी सरलता खोकर जटिल बन गई। भाव यह है कि कविता का कथ्य और माध्यम दोनों उलझकर रह गए।

विशेष-

  1. इस पद्य में कवि ने सहज, सरल कथ्य को सहज और सरल माध्यम (भाषा) द्वारा अभिव्यक्त करने की प्रक्रिया पर बल दिया है। ऐसा करने से अभिव्यक्ति की सरलता का भाव स्वतः प्रकट हो जाता है।
  2. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है जिसे लयात्मक गद्य कहा जा सकता है।
  3. प्रस्तुत पद्य में उलटा-पलटा, तोड़ा-मरोड़ा, घुमाया-फिराया आदि शब्दों का सटीक प्रयोग किया गया है। इन शब्द-युग्मों में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  4. ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
  5. ‘भाषा का चक्कर’ तथा ‘टेढ़ी फँसी’ आदि लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  6. ज़रा, पेचीदा आदि उर्दू शब्दों का सहज प्रयोग है।
  7. मुक्त छंद है तथा आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘भाषा के चक्कर’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि द्वारा भाषा के तरोड़ने-मरोड़ने का क्या दुष्परिणाम हुआ?
(घ) कवि भाषा के चक्कर में क्यों फँस गया?
(ङ) इस पद्यांश का संदेश क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-कुँवर नारायण कविता-बात सीधी थी पर (ख) जब कवि कविता की भाषा में अलंकार-सौंदर्य, शब्द-शक्तियों आदि को बलपूर्वक लूंसने का प्रयास करता है तो भाषा में जटिलता उत्पन्न हो जाती है। परिणामस्वरूप मूल संदेश शब्दों में उलझकर रह जाता है। कवि कथ्य के चारों ओर भाषा का ऐसा जंजाल खड़ा हो जाता है कि सीधी बात भी नहीं कही जा सकती।

(ग) कवि द्वारा भाषा को तरोड़ने-मरोड़ने तथा उलटने-पलटने के फलस्वरूप बात और उलझकर रह गई और कवि-कथ्य जटिल और पेचीदा बन गया।

(घ) कवि अपनी सीधी बात को प्रभावशाली ढंग से कहना चाहता था। इसलिए उसने बढ़िया-से-बढ़िया भाषा का प्रयोग करने का प्रयास किया, परंतु उसकी बात और उलझकर रह गई।

(ङ) इस पद्य द्वारा कवि यह संदेश देना चाहता है कि कवि को जान-बूझकर भाषा जटिल नहीं बनानी चाहिए, बल्कि सीधी बात सरल शब्दों में व्यक्त करनी चाहिए। भाषा की जटिलता कथ्य को उलझाकर रख देती है और कविता पाठक को आनंदानुभूति नहीं दे पाती।

[2] सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना
मैं पेंच को खोलने के बजाए
उसे बेतरह कसता चला जा रहा था
क्यों कि इस करतब पर मुझे
साफ सुनाई दे रही थी
तमाशबीनों की शाबाशी और वाह वाह। [पृष्ठ-18]

शब्दार्थ-मुश्किल = कठिनाई। बेतरह = बुरी तरह। करतब = चमत्कार। तमाशबीन = तमाशा देखने वाले (पाठक)। शाबाशी = प्रशंसा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए। इसमें कवि स्पष्ट करता है कि जटिल भाषा का प्रयोग करने वाला कवि लोगों की वाह-वाही तो लूट लेता है, परंतु वह अपने भाव तथा भाषा को जटिल बना देता है

व्याख्या कवि कहता है कि मेरी सहज, सरल बात भाषा के चक्कर में फंस गई थी। मैं इस कठिनाई को धैर्यपूर्वक समझ नहीं पाया, बल्कि मैं समस्या के कारण को समझे बिना ही उसे और जटिल बनाता चला गया। जिस प्रकार कोई कारीगर पेंच को खोलने की बजाए उसे बुरी तरह कसता चला जाता है, उसी प्रकार मैं भी भाषा के साथ ज़बरदस्ती करने लगा। मेरी इस बेवकूफी पर वाह-वाही करने वाले लोग भी अधिक थे जो मुझे शाबाशी दे रहे थे। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि मेरी कविता के भाव और भाषा दोनों जटिल बनते चले गए और कविता का कथ्य उलझकर रह गया।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि कवि का कथ्य जब जटिल भाषा में उलझकर रह जाता है तो वह अपना धैर्य खो बैठता है तब वह जटिल से जटिलतर भाषा का प्रयोग करने लगता है।
  2. ‘तमाशबीन’ शब्द में व्यंग्य छिपा हुआ है। प्रायः दर्शक, श्रोता अथवा प्रशंसक अकारण प्रशंसा द्वारा कवि को भ्रमित कर देते हैं और वह कविता में जटिल भाषा का प्रयोग करने का आदी बन जाता है।
  3. ‘करतब’ शब्द में व्यंग्यात्मकता है। जान-बूझकर भाषा को जटिल बनाना करतब ही कहा जाएगा।
  4. पेंच कसने के बिंब द्वारा कवि अपनी बात को स्पष्ट करता है। यहाँ उद्देश्य बिंब के साथ रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-योजना सर्वथा उचित व सटीक है।
  7. मुश्किल, करतब, साफ, तमाशबीन, शाबाशी आदि उर्दू के शब्दों का सफल प्रयोग है जिससे इस पद्यांश की भाषा लोक प्रचलित हिंदी बन गई है।
  8. पेंच खोलने की बजाए उसे कसने में दृश्य बिंब की योजना सुंदर बन पड़ी है।
  9. मुक्त छंद का प्रयोग है तथा आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) पेंच खोलने का क्या अर्थ है?
(ख) कवि सारी मुश्किल को धैर्य से समझे बिना पेंच को खोलने की बजाए कसता क्यों चला गया?
(ग) तमाशबीन वाह-वाह क्यों कर रहे थे?
(घ) कवि के कार्य को करतब क्यों कहा गया है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) यहाँ पेंच खोलने से अभिप्राय अभिव्यक्ति की जटिलता को और अधिक बढ़ाना है। कवि अपना धैर्य खो चुका था। इस कारण वह मूल समस्या को समझे बिना जटिल से जटिलतर भाषा का प्रयोग करता चला गया।

(ख) कवि अपने कथ्य को अत्यधिक प्रभावशाली बनाना चाहता था। इसलिए वह धैर्यपूर्वक समस्या को नहीं समझ पाया और कविता के अभिव्यक्ति पक्ष को जटिल बनाता चला गया।

(ग) तमाशबीन कवि की प्रशंसा करके उसका उत्साह बढ़ा रहे थे। वे अभिव्यक्ति के सौंदर्य को जानते नहीं थे। वे तो केवल कवि की जटिल भाषा से प्रभावित होकर कवि की पीठ ठोंक रहे थे।

(घ) कवि ने सोचे-समझे बिना अपनी बात को उलझाने तथा जटिल बनाने का प्रयास किया। इसलिए कवि के कार्य को करतब कहा गया है।

(ङ) इस पद्यांश के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि कवि को धैर्यपूर्वक सरल अभिव्यक्ति का ही प्रयोग करना चाहिए। सरल भाषा में कही गई बात श्रोता की समझ में शीघ्र आ जाती है और वह कवि की अभिव्यंजना शिल्प से प्रभावित भी होता है। परंतु जो कवि सोचे-समझे बिना बात को उलझाकर जटिल बना देते हैं, उनकी कविता वांछित प्रभाव

[3] आखिरकार वही हुआ जिसका मुझे डर था
ज़ोर ज़बरदस्ती से
बात की चूड़ी मर गई
और वह भाषा में बेकार घूमने लगी!
हार कर मैंने उसे कील की तरह
उसी जगह ठोंक दिया
ऊपर से ठीकठाक
पर अंदर से
न तो उसमें कसाव था
न ताकत!
बात ने, जो एक शरारती बच्चे की तरह
मुझसे खेल रही थी,
मुझे पसीना पोंछते देख कर पूछा
“क्या तुमने भाषा को
सहूलियत से बरतना कभी नहीं सीखा?” [पृष्ठ-18-19]

शब्दार्थ- ज़ोर ज़बरदस्ती = बलपूर्वक। चूड़ी मरना = पेंच कसने के लिए बनाई गई चूड़ी का नष्ट होना (कथ्य की प्रभावोत्पादकता)। कसाव = कसावट। ताकत = शक्ति। सहूलियत = आसानी, सरलता। बरतना = प्रयोग करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘बात सीधी थी पर’ में से अवतरित है। यह कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस पद्यांश के कवि कुँवर नारायण हैं। इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि कथ्य के अनुसार कविता की भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य होनी चाहिए।

व्याख्या कवि स्पष्ट करता है कि यहाँ अन्ततः वही परिणाम निकला जिसका कवि को भय था। भाषा को तोड़ने-मरोड़ने तथा जटिल बनाने से कविता की भावाभिव्यक्ति का प्रभाव ही नष्ट हो गया। उसकी अभिव्यंजना कंद हो र भाषा भावहीन होकर पीड़ा करने लगी अर्थात् कविता का मूल कथ्य तो नष्ट हो गया, केवल भाषा की उछल-कूद ही दिखाई देने लगी। अंत में कवि तंग आ गया। उसने निराश होकर अभिव्यक्ति को चमत्कारी शब्दों से बलपूर्वक लूंस दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि ऊपर से वह कविता ठीक लग रही थी, परंतु उसका कथ्य पक्ष बड़ा ही कमज़ोर तथा प्रभावहीन बनकर रह गया। कवि के कथन में न कोई प्रभाव था और न ही भावों की गंभीरता थी। कवि की कविता पूर्णतः प्रभावहीन बनकर रह गई थी।

अंत में कविता के कथ्य ने (बात ने) बच्चे की तरह कवि के साथ क्रीड़ा करते हुए उससे कहा कि तुम मुझ पर व्यर्थ में ही मेहनत कर रहे थे और अपनी इस मूर्खता पर पसीना बहा रहे थे। हैरानी की बात यह है कि तुम्हें आज तक सहज तथा सरल भाषा का प्रयोग करना ही नहीं आया। इससे पता चलता है कि तुम एक अयोग्य और बेकार कवि हो। तुम इस तथ्य को नहीं जान पाए कि सहज तथा सरल भाषा में कही बात ही प्रभावशाली सिद्ध होती है।

विशेष-

  1. कवि ने स्वीकार किया है कि जटिल तथा चमत्कारी भाषा का प्रयोग करने से कविता का मूल भाव प्रभावहीन हो जाता है।
  2. पेंच कसने में दृश्य बिंब की योजना सजीव बन पड़ी है। यहाँ रूपकातिशयोक्ति अलंकार का भी प्रयोग हुआ है।
  3. ‘बात की चूड़ी मरना’ में भी रूपकातिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कील की तरह ठोंकना’ से अभिप्राय है भाषा का बलपूर्वक प्रयोग करना।
  5. प्रस्तुत पद्य में बात का सुंदर और प्रभावशाली मानवीकरण हुआ है।
  6. ‘कील की तरह’, ‘शरारती बच्चे की तरह’ दोनों में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
  7. ‘पसीना पोंछना’, ‘ज़ोर-ज़बरदस्ती’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।
  8. ‘कवि का पसीना पोंछना’ में सुंदर बिंब योजना है। यह पद परिश्रम की व्यर्थता को सिद्ध करता है।
  9. इसमें कवि ने सहज, सरल एवं बोधगम्य भाषा का प्रयोग किया है। इसमें आखिर, ज़ोर-ज़बरदस्ती, ताकत, पसीना, सहूलियत आदि उर्दू शब्दों का बड़ा ही सुंदर मिश्रण किया गया है।
  10. शब्द-योजना बड़ी सार्थक व सटीक है।
  11. मुक्त छंद तथा संवादात्मक शैली का प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कवि को किस बात का डर था?
(ख) कवि के सामने कथ्य तथा माध्यम की क्या समस्या थी?
(ग) क्या कवि इस समस्या का हल निकाल सका?
(घ) बात ने शरारती बच्चे के समान कवि से क्या कहा?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि को इस बात का डर था कि जटिल भाषा का प्रयोग करने से कविता का मुख्य भाव प्रभावहीन तथा अस्पष्ट हो जाएगा और अंत में ऐसा ही हुआ।

(ख) कवि अपने कथ्य को प्रभावशाली माध्यम के द्वारा व्यक्त करना चाहता था। परंतु कवि इस सच्चाई से अनभिज्ञ था कि सहज तथा बोधगम्य भाषा में कही गई बात ही अधिक प्रभावशाली और गंभीर होती है।

(ग) कवि इस समस्या का हल नहीं निकाल पाया। जटिल भाषा के प्रयोग के कारण कवि की बात उलझकर रह गई। अंततः कवि ने निराश होकर अभिव्यक्ति को चमत्कारी शब्दों से लूंस दिया।

(घ) बात ने शरारती बच्चे के समान कवि से कहा कि तुम व्यर्थ में ही परिश्रम कर रहे हो और अपनी बेवकूफी की मेहनत पर पसीना बहा रहे हो। तुम आज तक समझ नहीं पाए कि कविता में हमेशा सहज, सरल, बोधगम्य भाषा का ही प्रयोग करना चाहिए।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह अपने कथ्य को सहज, सरल भाषा के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पाया। जटिल भाषा के प्रयोग के कारण उसकी बात उलझकर रह गई और प्रभावहीन हो गई।

कविता के बहाने, बात सीधी थी पर Summary in Hindi

कविता के बहाने, बात सीधी थी पर कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री कुँवर नारायण का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री कुँवर नारायण का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-कुँवर नारायण उत्तर शती के एक महत्त्वपूर्ण नए कवि हैं। उनका जन्म 19 सितंबर, 1927 को फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ। इंटर तक उन्होंने विज्ञान विषय में शिक्षा प्राप्त की। बाद में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें आरंभ से ही घूमने-फिरने का शौक था। उन्होंने सन् 1955 में चेकोस्लोवाकिया, पौलैंड, रूस तथा चीन का भ्रमण किया। वे सन् 1956 में ‘युग चेतना’ के संपादक मंडल से जुड़ गए। बाद में ‘नया प्रतीक’ तथा ‘धायानट’ के संपादक मंडल में भी रहे तथा उत्तर प्रदेश नाटक मंडली के अध्यक्ष भी बने। कालांतर में वे भारतेंदु नाटक अकादमी के अध्यक्ष बन गए। आरंभ में उन्होंने अंग्रेज़ी में कविताएँ लिखीं। परंतु बाद में हिंदी में कविता लिखने लगे। उनको सन् 1971 में हिंदुस्तानी अकादमी पुरस्कार, 1973 में ‘प्रेमचंद पुरस्कार’ तथा 1982 में मध्यप्रदेश का ‘तुलसी पुरस्कार’ तथा केरल का ‘कुमारन आशान पुरस्कार’ भी प्राप्त हुए। उनके इस काम के लिए उत्तर प्रदेश संस्थान ने भी सम्मानित किया तथा 1955 में ‘व्यास सम्मान’, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, ‘शतदल’ पुरस्कार मिले। इन्हें ‘कबीर’ सम्मान भी मिला।

2. प्रमुख रचनाएँ-अज्ञेय के संपादन में निकले ‘तीसरा सप्तक’ 1959 में संकलित कविताएँ ‘चक्रव्यूह’ (1956), ‘परिवेश : हम तुम’ (1961), ‘आत्मजयी’ (1965), ‘इन दिनों अपने सामने’ (1997), ‘कोई दूसरा नहीं’ (1993) आदि इनकी प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं। इसके अतिरिक्त ‘आकारों के आस-पास’ (कहानी संग्रह); ‘आज और आज से पहले’ (समीक्षा); ‘मेरे साक्षात्कार’ (सामान्य) उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-कुँवर नारायण जी की काव्य-यात्रा निरंतर विकास की ओर हुई है। ‘तार सप्तक’ की कविताओं के बाद कवि ने व्यक्ति के मन की स्थिति के चित्रों का अंकन किया है। इनकी काव्यगत विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(i) सामाजिक चेतना-कुँवर नारायण की कविताओं में सामाजिक चेतना का विकास देखा जा सकता है। ‘चक्रव्यूह’ में जहाँ जीवन के प्रति सामाजिक जीवन का प्रवाह है, वहाँ जीवन-संघर्षों के अनेक प्रश्नों की तलाश भी दिखाई देती है। इस काव्य रचना में कवि ने जीवन व जगत की अनेक स्थितियों का वर्णन किया है। जीवन के संघर्षों को कवि अपनी नियति नहीं मानता, बल्कि वह टुकड़ों में बँटी हुई जिंदगी के सुनहरे क्षणों को देखता है; यथा
जरा ठहरो, जिंदगी के इन टुकड़ों को फिर से सँवार लूँ,
और उन सुनहले क्षणों को जो भागे जा रहे हैं।
पुकार लू …………….
आगे चलकर कवि मानव के अस्तित्व का चित्रण करते हुए उसके सामने उपस्थित भयानक स्थितियों का वर्णन करता है। कवि स्वीकार करता है कि विषम परिस्थितियों में आदमी जानवर बन जाता है। इसका कारण यह है कि परिस्थितियों की जकड़न से बाहर निकलकर उसके स्वभाव में बदलाव आ जाता है। ‘तब भी कुछ नहीं हुआ’, ‘पूरा जंगल’ आदि कविताएँ इसी तथ्य को उजागर करती हैं।

(ii) क्रूर व्यवस्था का वर्णन- कवि ‘अपने सामने’, काव्य-संग्रह में उस क्रूर व्यवस्था का वर्णन करता है जो मनुष्य की स्वतंत्रता, उसके अस्तित्व को जकड़ लेना चाहती है। लेकिन इसके साथ-साथ वह मुक्ति की भी चर्चा करता है। कवि आस्थाशील है। उसके विचारानुसार सत्ता की यह क्रूरता सार्वकालिक नहीं है, इसे हटाया भी जा सकता है। इसके लिए कवि नैतिकता से जुड़ने की सलाह देता है। कवि का विचार है कि हमें क्रूर व्यवस्था का डट कर विरोध करना चाहिए, अन्यथा यह संपूर्ण मानवता को निगल जायेगी।
उनके अफसर, सिपाही और कोतवाल-
उनके सलाहकार, मसखरे और नक्काल-
…………………………………………………
छा गये हैं।
वे सबके सब वापस आ गये हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 3 कविता के बहाने, बात सीधी थी पर

(iii) सही मार्ग की खोज-कवि चारों ओर फैली हुई छीना-झपटी और दुनियादारी में विश्वास नहीं करता। वह मानव-जीवन को अंधकारमय होने से बचाना चाहता है। वह एक ऐसा मार्ग खोजना चाहता है जो जीवन को गतिशील बनाए रखे और बाधाओं का सामना कर सके। कवि कहता है
मुझको इस छीना-झपटी में विश्वास नहीं।
मुझको इस दुनियादारी में विश्वास नहीं
……………………………………………………….
एक दृष्टि चाहिए मुझे –
भौतिक जीवन बच सके।

(iv) प्रकृति-वर्णन-कवि ने ‘जाड़े की एक सुबह’, ‘बसंत की लहर’, ‘बसंत आ’, ‘सूर्यास्त’ आदि कविताओं में प्रकृति के पूरे निखार का वर्णन किया है। कवि प्रकृति-वर्णन द्वारा उपदेश नहीं देना चाहता, बल्कि उसके सौंदर्य का स्वाभाविक वर्णन करना चाहता है; यथा
नदी की गोद में नादान शिशु-सा
अर्द्ध सोया द्वीप।
झिलमिल चाँदनी में नाचती परियाँ
लहर पर लहर लहराती
बजाकर तालियाँ गाती।

(v) प्रेम के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण-प्रेम के प्रति कुँवर नारायण का दृष्टिकोण पूर्णतया स्वस्थ एवं वैयक्तिक है। उनके विचारानुसार प्रेम मनुष्य के लिए शक्ति का काम करता है। यह निराश तथा कुचले जीवन में भी सजीवता उत्पन्न करता है। इसलिए प्रेम को आत्मा में स्थान देना चाहिए।
जिंदा रहने के लिए
प्यार एक खूबसूरत वजह है
लेकिन जिंदगी के लिए
दिल से कहीं अधिक आत्मा में जग है।

4. भाषा-शैली-कुँवर नारायण ने खड़ी बोली के स्वाभाविक रूप का अधिक प्रयोग किया है। उन्होंने न तो बलपूर्वक लोक भाषा का प्रयोग किया है और न ही संस्कृतनिष्ठ पदावली का। कवि ने सहज, सरल तथा भावानुकूल छंदों, बिंबों, प्रतीकों तथा अलंकारों का ही प्रयोग किया है। उनकी कविता को पढ़कर पाठक आत्मीयता का अनुभव करता है। छंदों के बारे में उनकी दृष्टि खुली है, क्योंकि वे सभी प्रकार के छंदों का प्रयोग करते हैं। यही नहीं उनकी कविताओं में अनुप्रास, उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि अलंकारों का भी सहज प्रयोग हुआ है; यथा-
उपमा –
जहरीली फफूंदी-सी उदासी
छीलकर मन से अलग कर दो।
मानवीकरण-धूप चुपचाप एक कुर्सी पर बैठी
किरणों के ऊन का स्वेटर बुनती रही।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि कुँवर नारायण नयी कविता के प्रसिद्ध हस्ताक्षर हैं। भाव और भाषा दोनों दृष्टिकोणों से उनका काव्य आधुनिक युगबोध से जुड़ा हुआ है।

कविता के बहाने कविता का सार 

प्रश्न-
कुँवर नारायण द्वारा रचित कविता ‘कविता के बहाने’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आधुनिक कवि कुँवर नारायण द्वारा रचित एक छोटी-सी कविता है। यह कविता कवि के काव्य-संग्रह ‘इन दिनों में संकलित है। आज के वैज्ञानिक युग में कविता का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। यद्यपि पाश्चात्य काव्यशास्त्री आई०ए० रिचर्डस् ने आज के भौतिकवादी युग के लिए कविता को आवश्यक माना है, लेकिन काव्य प्रेमियों में एक डर-सा समा गया है कि आज के यांत्रिक युग में कविता का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। इस संदर्भ में प्रस्तुत कविता अपार संभावनाओं को टटोलने का प्रयास करती है। ‘कविता के बहाने’ कविता चिड़िया की यात्रा से आरंभ होती है और फूल का स्पर्श करते हुए बच्चे पर आकर समाप्त हो जाती है। कवि कविता के महत्त्व का प्रतिपाद्य करते हुए कहता है कि चिड़िया की उड़ान सीमित है। वह एक निश्चित समय में निश्चित दायरे में ही उड़ान भर सकती है। इसी प्रकार फूल भी एक निश्चित समय के बाद मुरझा जाता है। परंतु बालक के मन और मस्तिष्क में असीम सपने होते हैं। बच्चों के खेलों की कोई सीमा नहीं होती। इसी प्रकार कविता के शब्दों का खेल भी अनंत और शाश्वत है। कवि जड़, चेतन, अतीत, वर्तमान और भविष्य सभी को स्पर्श करता हुआ अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करता है। कविता में एक रचनात्मक ऊर्जा होती है। इसलिए वह घर, भाषा तथा समय के बंधनों को तोड़कर प्रवाहित होती है। कविता का क्षेत्र अनंत और असीम है।

बात सीधी थी पर कविता का सार 

प्रश्न-
कुँवर नारायण द्वारा रचित ‘बात सीधी थी पर कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता कुँवर नारायण द्वारा रचित काव्य-संग्रह ‘कोई दूसरा नहीं’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने कथ्य और माध्यम के द्वंद्व को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। कवि हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि हमें काव्य के विषय को सहज तथा सरल भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना चाहिए। परंतु प्रायः कवि कविता में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए उसे पेचीदा बना देते हैं। इस प्रकार के कवि इस भ्रम के शिकार हो जाते हैं कि इस क्लिष्ट भाषा का प्रयोग करने से उन्हें अधिकाधिक लोकप्रियता प्राप्त होगी। कुछ क्षणों के लिए ऐसा हो भी जाता है। पाठक अथवा श्रोता भी कवि के भ्रम का शिकार हो जाते हैं, परंतु बाद में कवि द्वारा कही गई बात प्रभावहीन हो जाती है क्योंकि चमत्कार के चक्कर में कवि की भाषा पर पकड़ ढीली पड़ जाती है। इस संदर्भ में कवि उदाहरण भी देता है। वह कहता है कि पेंच को निर्धारित चूड़ियों पर ही कसा जाना चाहिए। यदि चूड़ियाँ समाप्त होने पर पेंच को घूमाएँगे तो चूड़ियाँ मर जाएँगी और उसकी पकड़ ढीली पड़ जाएगी। भले ही उसे बलपूर्वक ठोक दिया जाए, पर वह पहली जैसी बात नहीं रहती। सहज शब्दावली में सहजता के साथ ही भावों की अभिव्यक्ति होनी चाहिए। सहजता की पकड़ मजबूत और स्थाई होती है। इसमें न अधिक परिश्रम करना पड़ता है और न ही अधिक दवाब डालना पड़ता है। इसलिए कवि को अपनी सहज एवं सीधी बात को सहज भाषा के साथ अभिव्यक्त करना चाहिए।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

HBSE 12th Class Hindi पतंग Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
‘सबसे तेज़ बौछारें गयीं, भादो गया’ के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन कवि ने दिखाया है, उसका वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
भादो महीने के काले बादल अब छंट गए हैं और सारा आकाश साफ हो गया है। मूसलाधार वर्षा अब समाप्त हो गई है। इसके बाद खरगोश की लाल-भूरी आँखों जैसा शरदकालीन सवेरा उदय हो गया है। संपूर्ण प्राकृतिक वातावरण उज्ज्वल तथा धुला-धुला सा लग रहा है। चारों तरफ धूप चमक रही है और प्रकृति में उज्ज्वल निखार आ गया है। धीमी-धीमी हवा चल रही है और आकाश भी कोमल लगने लगा है। बच्चे समझ गए हैं कि पतंगबाजी की ऋतु आ गई है।

प्रश्न 2.
सोचकर बताएँ कि पतंग के लिए सबसे हलकी और रंगीन चीज, सबसे पतला कागज, सबसे पतली कमानी जैसे विशेषणों का प्रयोग क्यों किया है?
उत्तर:
यहाँ कवि पाठकों के सामने पतंग के रूप-रंग और उसके हलकेपन का वर्णन करना चाहता है। कवि पतंग की विशेषता बताते हुए लिखता है कि वह सबसे हलकी, सबसे रंगीन और सबसे पतली है। पतंग में सबसे पतले कागज़ और बाँस की सबसे पतली कमानी का प्रयोग किया गया है। पतंग की ये विशेषताएँ बच्चों को बलपूर्वक अपनी ओर आकर्षित कर लेती हैं और उनके मन में पतंग के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न करती हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

प्रश्न 3.
बिंब स्पष्ट करें –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके।
उत्तर:

  1. आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए – स्पर्श बिंब
  2. सवेरा हुआ – दृश्य (स्थिर) बिंब
  3. पतंग ऊपर उठ सके – दृश्य (स्थिर) बिंब
  4. घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से – श्रव्य बिंब
  5. तेज़ बौछारें – दृश्य (गतिशील) बिंब
  6. पुलों को पार करते हुए। – दृश्य (गतिशील) बिंब
  7. चमकीले इशारों से बुलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब
  8. खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा – दृश्य (स्थिर) बिंब
  9. अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए – दृश्य (गतिशील) बिंब

प्रश्न 4.
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास-कपास के बारे में सोचें कि कपास से बच्चों का क्या संबंध बन सकता है?
उत्तर:
कपास बड़ी कोमल, गद्देदार और हलकी होती है। वह चोट को आसानी से सहन कर लेती है। बच्चों में कपास के गुण देखे जा सकते हैं। वे हलके-फुलके शरीर वाले होते हैं। उनका कोमल तथा छरहरा शरीर आसानी से चोट को सहन कर लेता है। उनके पाँवों की तलियाँ कपास जैसी कोमल होती हैं। ऊँचाई से कूदने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती, बल्कि उन्हें कठोर छत भी कोमल लगने लगती है।

प्रश्न 5.
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं बच्चों का उड़ान से कैसा संबंध बनता है?
उत्तर:
जिस प्रकार पतंग आकाश में उड़ती हुई ऊँचाइयों का स्पर्श कर लेती है, उसी प्रकार बच्चे भी छतों पर उड़ते हुए दिखाई देते हैं। पतंग को उड़ता देखकर बच्चों में उत्साह तथा उमंग भर जाती है। ऐसी स्थिति में बच्चे खतरनाक ऊँचाइयों की भी परवाह नहीं करते। उन्हें दीवारों से गिरने का भी डर नहीं होता। वे अपने शरीर के तरंगित संगीत की लय पर पतंग के समान उड़ते हुए दिखाई देते हैं। छत पर वे यहाँ से वहाँ भागते दिखाई देते हैं। इसलिए कवि को लगता है कि बच्चे पतंगों के साथ उड़ रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

प्रश्न 6.
निम्नलिखित पंक्तियों को पढ़कर प्रश्नों का उत्तर दीजिए
(क) छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए

(ख) अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं।
→ दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का क्या तात्पर्य है?
→ जब पतंग सामने हो तो छतों पर दौड़ते हुए क्या आपको छत कठोर लगती है?
→ खतरनाक परिस्थितियों का सामना करने के बाद आप दुनिया की चुनौतियों के सामने स्वयं को कैसा महसूस करते हैं?
उत्तर:
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाने का तात्पर्य है कि जब बच्चे पतंग उड़ाते समय ऊँची दीवारों से छतों पर कूदते हैं तो उनके पैरों से एक मनोरम संगीत उत्पन्न होता है। ऐसा लगता है कि आस-पास मृदंग बज रहा है और उसकी मधुर ध्वनि सभी ओर गूंज रही है।
→ पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान केवल पतंग उड़ाने में लगा रहता है। उनका उत्साह, उमंग तथा निराशा पतंग के साथ जुड़ी होती है। अन्य बातों का बच्चों से कोई मतलब नहीं होता। जब वे कठोर छतों पर कूदते हैं तो उन्हें छतों की कठोरता अनुभव नहीं होती। ऐसा लगता है कि मानों वे पतंग के साथ उड़ रहे हैं।

→ जब मनुष्य एक बार खतरनाक परिस्थितियों का सामना कर लेता है तब उसमें निर्भीकता उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य सुनहले सूर्य के समान चमकने लगता है। उसका आत्मविश्वास कई गुणा बढ़ जाता है तथा वह कठिन-से-कठिन परिस्थिति का सामना करने में समर्थ हो जाता है।

कविता के आसपास

प्रश्न 1.
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को देखकर आपके मन में कैसे ख्याल आते हैं? लिखिए।
उत्तर:
आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ता देखकर मेरे मन में विचार आता है कि मैं भी पतंग की तरह पक्षी के समान उन्मत्त होकर उड़ता रहूँ। पतंग के उड़ने में कुछ सीमाएँ हैं, क्योंकि उसकी डोर किसी के हाथ में होती है। वह आकाश में अपनी इच्छा से नहीं उड़ सकती। परंतु पक्षी तो अपनी इच्छानुसार आकाश में उड़ सकता है तथा खुली हवाओं का आनंद लेता है। मैं भी पक्षी बनकर हवा में उड़ना चाहता हूँ। ऐसी स्थिति में मुझे न स्कूल की चिंता होगी, न ही किताबों की।

प्रश्न 2.
‘रोमांचित शरीर का संगीत’ का जीवन के लय से क्या संबंध है?
उत्तर:
रोमांचित शरीर का संगीत’ जीवन की लय से उत्पन्न होता है। जब बच्चे पतंग उड़ाने में लीन हो जाते हैं तो उनके शरीर में एक लय आ जाती है। वे एकाग्र मन से पतंग उड़ाते हैं और उनका शरीर भी रोमांचित हो उठता है। उस समय उनके मन में उत्पन्न होने वाले संगीत में लय होती है और एक गति होती है जिसका वे पूरा आनंद उठाते हैं।

प्रश्न 3.
‘महज एक धागे के सहारे, पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ’ उन्हें (बच्चों को) कैसे थाम लेती हैं? चर्चा करें।
उत्तर:
पतंग उड़ाते समय बच्चों का ध्यान पतंग की ऊँचाइयों पर केंद्रित होता है, परंतु पतंग की डोर उनके हाथ में होती है जिससे वे पतंग पर पूरा नियंत्रण रखते हैं। उनका मन पतंग पर टिक जाता है। बच्चों का शरीर यंत्र के समान निरंतर पतंग के साथ-साथ चलता है। पतंग का धागा न केवल पतंग को नियंत्रित करता है, बल्कि पतंग उड़ाने वाले बच्चों को भी नियंत्रित करता है।

आपकी कविता

प्रश्न 1.
हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों में तुलसी, जायसी, मतिराम, द्विजदेव, मैथिलीशरण गुप्त आदि कवियों ने भी शरद ऋतु का सुंदर वर्णन किया है। आप उन्हें तलाश कर कक्षा में सुनाएँ और चर्चा करें कि पतंग कविता में शरद ऋतु वर्णन उनसे किस प्रकार भिन्न है?

प्रश्न 2.
आपके जीवन में शरद ऋतु क्या मायने रखती है?
उत्तर:
ये प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है। विद्यार्थी इन्हें अध्यापक/अध्यापिका की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi पतंग Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
कि पतंग ऊपर उठ सके –
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके –
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके –
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके –
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाजुक दुनिया
उत्तर:
(i) कवि की कल्पनाशीलता सराहनीय है। पतंग के ऊपर उठने की मनोरम कल्पना की गई है।
(ii) ‘उड़ सके’ की आवृत्ति से कविता में गतिशीलता उत्पन्न हो गई है।
(iii) सीटियों, किलकारियों, तितलियों आदि बहुवचनात्मक शब्दों के प्रयोग के कारण भाषा शिल्प में सौंदर्य उत्पन्न हो गया है।
(iv) संपूर्ण पद्य में बिंबात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।
‘पतंग ऊपर उठ सके’ में दृश्य बिंब है।
‘दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके’ में भी दृश्य बिंब है।
‘तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया’ में श्रव्य बिंब है।
(v) पतली कमानी, सीटियों, किलकारियों तथा तितलियों में स्वर मैत्री है।
(vi) सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
(vii) शब्द-योजना सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए –
जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
उत्तर:
(i) यहाँ कवि ने स्पष्ट किया है कि बच्चों में जन्म से ही चोट, खरोंच आदि सहन करने की क्षमता विकसित हो जाती है। उनके शरीर की हड्डियाँ लचीली होती हैं। अतः कपास के समान किसी चीज़ से टकराने पर भी उन्हें चोट नहीं लगती और वे ज़मीन पर यहाँ-वहाँ अबाध गति से बेसुध होकर भागते हैं।

(ii) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास’, तथा ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।

(iii) संपूर्ण पद्यांश में ‘बेचैन पैर’, ‘पेंग भरते हुए’, ‘डाल की तरह लचीले वेग’ आदि का सार्थक एवं प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।

(iv) इन तीनों में उपमा अलंकार का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है जिसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम पृथ्वी, दिशा, मृदंग, वेग आदि
तद्भव-अपने, साथ, कपास, घूमती आदि
उर्दू-नरम, बेचैन, बेसुध

(vi) शब्द-योजना सर्वथा सटीक एवं सार्थक है।

(vii) बिंबात्मकता के कारण भाव खिल उठे हैं
(क) ‘पृथ्वी घूमती हुई आती है, जब वे दौड़ते हैं बेसुध’ में दृश्य बिंब का प्रयोग हुआ है।
(ख) ‘दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए’ में श्रव्य बिंब है।

(viii) मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है तथा प्रसाद गुण है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित काव्य-पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे
अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है
उनके बेचैन पैरों के पास।
उत्तर:
(i) इस पद्य में कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा ही मनोहारी वर्णन किया है।
(ii) संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक पदावली का प्रयोग है। उदाहरण के लिए बच्चों का पतंग के साथ-साथ उड़ना लाक्षणिक प्रयोग कहा जा सकता है। ‘सूरज के सामने आने पर’ का लक्ष्यार्थ है-उमंग तथा उल्लास के साथ आगे बढ़ना।
(iii) ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार है।
(iv) ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार और ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार की छटा देखने योग्य है।
(v) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें संस्कृत तथा उर्दू शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
(vi) पृथ्वी और भी तेज़ घूमती आती है तथा उनके बेचैन पैरों के पास आदि में दृश्य बिंब की सुंदर योजना हुई है।
(vii) मुक्त छंद का प्रयोग है तथा प्रसाद गुण है।

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘पतंग’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘पतंग’ कविता के माध्यम से कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् शरद ऋतु के आगमन के अवसर पर पतंग उड़ाने वाले बच्चों के उत्साह का सजीव वर्णन किया है। शरद ऋतु एक खिलखिलाती हुई सुंदर ऋतु होती है। इस ऋतु में आकाश निर्मल और स्वच्छ हो जाता है। चमकीली धूप मानों उत्साही बच्चों को अपनी नई साइकिल को तेज़ चलाते हुए चमकीले इशारे करती है। आकाश में हल्की रंगीन, पतली कमानी वाली पतंगें उड़ने लगती हैं। चारों ओर बच्चों के झुंड किलकारियाँ तथा सीटियाँ बजाते नज़र आते हैं। ऐसा लगता है मानों आकाश में रंगीन तितलियों के समूह उड़ रहे हैं। छतों तथा दीवारों पर कूदते तथा फाँदते बच्चे कपास के समान कोमल लगते हैं। उनके कदमों से छतें भी नरम हो जाती हैं तथा दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। बच्चों के शरीर पेंग भरते हुए तीव्र गति से यहाँ-वहाँ कूदते रहते हैं। रोमांचित शरीर के फलस्वरूप वे खतरनाक किनारों से भी बच जाते हैं। लगता है कि वे पतंग के साथ उड़े जा रहे हैं। यदि कभी-कभार वे छत से गिर भी जाते हैं तो वे निर्भीक होकर उठ खड़े होते हैं। उनके पैर सारी धरती पर घूमने के लिए बेचैन नज़र आते हैं।

प्रश्न 2.
पठित कविता के आधार पर भादो और शरद ऋतु में क्या अंतर है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भादो के महीने में आकाश काले बादलों से घिरा रहता है और अकसर मूसलाधार वर्षा होती रहती है। काले बादलों के कारण दिन में भी अंधकार होता है। परंतु शरद ऋतु आते ही आकाश स्वच्छ और निर्मल हो जाता है। शरद ऋतु का सवेरा खरगोश की आँखों की तरह लाल होता है। आकाश में सूर्य की तेज धूप चमकती है तथा आकाश स्वच्छ तथा निर्मल होता है।

प्रश्न 3.
पतंगबाजों की मानसिकता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
‘पतंग’ आलोक धन्वा की सुप्रसिद्ध काव्य रचना है। इसके माध्यम से कवि ने पतंग उड़ाने वाले बच्चों की मानसिकता को उजागर किया है। पतंग उड़ाते समय बच्चों की बाल सुलभ इच्छाओं और उमंगों को कल्पनाओं के पंख लग जाते हैं। पतंग की उड़ान के साथ-साथ वे भी आकाश में उड़ान को अनुभव करते हैं। पतंग उड़ाने वाले बच्चे अपेक्षाकृत अधिक उत्साही और निडर होते हैं। वे छतों के खतरनाक किनारों पर खड़े होकर भी अपनी पतंग उड़ाते हैं। पतंग उड़ाते समय खुरदरी छतें भी उन्हें कोमल लगती हैं। इस प्रकार पतंगबाज बच्चों की मानसिकता उत्साह, उमंग और निडरता से परिपूर्ण रहती है।

प्रश्न 4.
प्रस्तुत कविता में कवि ने किस प्रकार के प्रतीकों का प्रयोग किया है? सोदाहरण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता में तीन प्रकार के बिंबों का सफल प्रयोग देखा जा सकता है। तेज़ बौंछारें, सवेरा हुआ, खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा, पुलों को पार करते हुए, अपनी नई तेज़ साइकिल चलाते हुए आदि गतिशील बिंबों की योजना है। इसी प्रकार घंटी बजाते हुए, ज़ोर-ज़ोर से, शुरू हो सके, शोर मचाते हुए, सीटियाँ बजाते हुए में श्रव्य बिंबों की योजना हुई है। आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए, छतों को भी नरम बनाते हुए आदि में स्पर्श बिंबों की योजना है।

प्रश्न 5.
पतंग उड़ाते हुए बच्चे बेसुध कैसे हो जाते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
बच्चों को पतंग उड़ाने का बड़ा शौक होता है। पतंग उड़ाते समय वे मानों आकाश में पतंग के साथ उड़ने लगते हैं। इस अवसर पर न उन्हें दीन-दुनिया की खबर होती है, न उन्हें धूप, गरमी लगती है और न ही भूख-प्यास। वे खतरनाक दीवारों पर निडर होकर उछलते-कूदते चलते हैं। यदि वे कभी खतरनाक छतों से गिर भी जाते हैं तो और भी निर्भीक हो जाते हैं और फिर से पतंग उड़ाने लगते हैं।

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प्रश्न 6.
छत से गिरने पर उन्हें कौन बचाता है?
उत्तर:
पतंगबाज़ी करते समय बच्चों का छत से गिरने का भय बना रहता है। वे इस कदर बेसुध होकर दौड़ते हैं कि छत के किनारों पर खतरा भी उन्हें विचलित नहीं कर पाता। बच्चे लचीली डाल के समान छत के किनारे पर आकर झुक जाते हैं। इस अवसर पर भीतर का रोमांच ही उन्हें बचा लेता है। पतंग की नाजुक डोर मानों बच्चों को थाम लेती है और वे गिरने से बच जाते हैं।

प्रश्न 7.
“किशोर और युवा वर्ग समाज का मार्गदर्शक हैं”-‘पतंग’ कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
किशोर और युवा वर्ग में खतरा उठाने की शक्ति होती है। वे अपने लक्ष्य को पाने के लिए हर संभव कोशिश करते हैं। वे अपनी धुन में मस्त होकर काम करते हैं। उनके मन में गगन की ऊँचाइयों को पा लेने की क्षमता होती है। उनमें उत्साह, उमंग तथा आत्मविश्वास होता है। बच्चे हमारे समाज के लिए प्रेरणा का काम करते हैं। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम ने स्वीकार किया है-“बच्चों की आँखों में महाशक्ति भारत की नींव है।” निश्चय से बच्चे हमारे देश का उज्ज्वल भविष्य हैं।

प्रश्न 8.
पृथ्वी का घूमते हुए बच्चों के पैरों के पास आने का क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
यह एक सच्चाई है कि पृथ्वी निरंतर घूमती रहती है। बच्चे भी अपने सपनों को पूरा करने के लिए पतंग के पीछे भागते रहते हैं। ऐसा लगता है कि मानों बच्चे दौड़कर सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। पतंगबाज़ी करते हुए बच्चे इतने रोमांचकारी हो उठते हैं कि वे अपनी उमंग तथा उल्लास में सारी पृथ्वी को नापकर आनंद प्राप्त करना चाहते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. आलोक धन्वा का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1947 में
(B) सन् 1948 में
(C) सन् 1946 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(B) सन् 1948 में

2. आलोक धन्वा का जन्म किस राज्य में हुआ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) दिल्ली
(C) बिहार
(D) मध्य प्रदेश
उत्तर:
(C) बिहार

3. ‘पतंग’ कविता के रचयिता का नाम बताइए।
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

4. आलोक धन्वा का जन्म बिहार के किस जनपद में हुआ?
(A) मुंगेर
(B) सारसा
(C) पटना
(D) मुज़फ्फरनगर
उत्तर:
(A) मुंगेर

5. आलोक धन्वा की प्रथम कविता का नाम क्या है?
(A) पतंग
(B) ब्रूनो की बेटियाँ
(C) जनता का आदमी
(D) नदी दौड़ती है
उत्तर:
(C) जनता का आदमी

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6. ‘जनता का आदमी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) 1973 में
(B) 1972 में
(C) 1975 में
(D) 1971 में
उत्तर:
(B) 1972 में

7. आलोक धन्वा के एकमात्र काव्य संग्रह का नाम क्या है?
(A) दुनिया रोज़ बनती है
(B) भागी हुई लड़कियाँ
(C) ब्रूनो की बेटियाँ
(D) आत्महत्या के विरुद्ध
उत्तर:
(A) दुनिया रोज़ बनती है

8. ‘भागी हुई लड़कियाँ के कवि का नाम है
(A) मुक्तिबोध
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) आलोक धन्वा
उत्तर:
(D) आलोक धन्वा

9. बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् ने आलोक धन्वा को किस पुरस्कार से सम्मानित किया?
(A) पहल सम्मान
(B) राहुल सम्मान
(C) साहित्य सम्मान
(D) भोजपुरी सम्मान
उत्तर:
(C) साहित्य सम्मान

10. किस कवि को ‘पहल सम्मान’ प्राप्त हुआ?
(A) कुँवर नारायण
(B) हरिवंश राय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

11. ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य रचना किस कवि द्वारा रचित है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) हरिवंशराय बच्चन
(C) आलोक धन्वा
(D) मुक्तिबोध
उत्तर:
(C) आलोक धन्वा

12. किस कवि की रुचि काव्य रचना की अपेक्षा सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक है?
(A) रघुवीर सहाय
(B) आलोक धन्वा
(C) कुँवर नारायण
(D) सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
उत्तर:
(B) आलोक धन्वा

13. ‘पतंग’ कविता में किस छंद का प्रयोग हुआ है?
(A) मुक्त छंद
(B) सवैया छंद
(C) दोहा छंद
(D) कवित्त छंद
उत्तर:
(A) मुक्त छंद

14. ‘पतंग’ कविता किसके लिए प्रसिद्ध है?
(A) प्रतीकों के लिए
(B) व्यंग्यार्थ के लिए
(C) चित्र-विधान के लिए।
(D) बिंब-विधान के लिए
उत्तर:
(D) बिंब-विधान के लिए

15. ‘भादो’ महीना किस ऋतु में आता है?
(A) शरद
(B) ग्रीष्म
(C) हेमंत
(D) वर्षा
उत्तर:
(D) वर्षा

16. पतंग उड़ाते हुए बच्चे किसके सहारे स्वयं भी उड़ते से हैं?
(A) फेफड़ों के
(B) रंध्रों के
(C) साहस के
(D) शक्ति के
उत्तर:
(B) रंध्रों के

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17. उड़ाई जाने वाली सबसे हलकी और रंगीन चीज क्या है?
(A) पतंग
(B) तितली
(C) वायुयान
(D) राकेट
उत्तर:
(A) पतंग

18. पतंगों की ऊँचाइयाँ कैसी कही गई हैं?
(A) फड़कती
(B) कड़कती
(C) धड़कती
(D) सरकती
उत्तर:
(C) धड़कती

19. ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ किसे कहा गया है?
(A) लाल सवेरा
(B) बौछार
(C) पतंग
(D) पतला कागज
उत्तर:
(A) लाल सवेरा

20. ‘पतंग’ कविता में तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय क्या है?
(A) आकाश में रंगीन तितलियाँ उड़ रही हैं।
(B) तितलियाँ आकाश में उड़कर इसे कोमल बनाती हैं
(C) तितलियों का शरीर कोमल होता है ।
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार
उत्तर:
(D) रंगीन पतंगों का कोमलमय संसार

21. ‘पतंग’ नामक कविता में ‘चमकीले’ विशेषण किसके लिए प्रयुक्त किया गया है?
(A) पतंगों के लिए
(B) शरद के लिए
(C) दिशाओं के लिए
(D) इशारों के लिए
उत्तर:
(B) शरद के लिए

22. ‘सुनहले सूरज’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) अनुप्रास
(B) यमक
(C) वक्रोक्ति
(D) उपमा
उत्तर:
(A) अनुप्रास

23. छत से गिरने और बचने के बाद बच्चे क्या बन जाते हैं?
(A) निडर
(B) डरपोक
(C) ईर्ष्यालु
(D) सहनशील
उत्तर:
(A) निडर

24. ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ में ‘कपास’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
(A) रूई
(B) कोमलता
(C) चंचलता
(D) हलकापन
उत्तर:
(B) कोमलता

25. पतंग उड़ाने वाले बच्चे दिशाओं को किसके समान बजाते हैं?
(A) ढोलक के समान
(B) वीणा के समान
(C) बाँसुरी के समान
(D) मृदंग के समान
उत्तर:
(D) मृदंग के समान

26. पतंगबाजों के पैर कैसे कहे गए हैं?
(A) साफ
(B) बेचैन
(C) सुन्दर
(D) सपाट
उत्तर:
(B) बेचैन

पतंग पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए
अपनी नयी चमकीली साइकिल तेज़ चलाते हुए
घंटी बजाते हुए ज़ोर-ज़ोर से
चमकीले इशारों से बुलाते हुए
पतंग उड़ाने वाले बच्चों के झुंड को
चमकीले इशारों से बुलाते हुए और
आकाश को इतना मुलायम बनाते हुए
कि पतंग ऊपर उठ सके
दुनिया की सबसे हलकी और रंगीन चीज़ उड़ सके
दुनिया का सबसे पतला कागज़ उड़ सके-
बाँस की सबसे पतली कमानी उड़ सके-
कि शुरू हो सके सीटियों, किलकारियों और
तितलियों की इतनी नाज़क दुनिया [पृष्ठ-11]

शब्दार्थ-भादो = एक महीना जिसमें मूसलाधार वर्षा होती है। शरद = सर्दी का प्रथम माह। झुंड = समूह । मुलायम = कोमल। किलकारी = खुशी से चिल्लाना। नाजुक = कोमल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के पश्चात् बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के उत्साह का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि भादो का महीना अब बीत गया है। उसके साथ-साथ मूसलाधार वर्षा भी अब बंद हो गई है। अब अंधेरे के बाद एक नवीन सवेरा हो गया है अर्थात् अब आकाश साफ है। खरगोश की आँखों के समान शरदकालीन लाल-भूरा सवेरा हो गया है। शरद ऋतु आरंभ हो चुकी है। चारों ओर उमंग तथा उत्साह का वातावरण फैल गया है। पुलों को पार करते हुए नई चमकीली साइकिलों पर सवार होकर बच्चे ज़ोर-ज़ोर से घंटियाँ बजाते हुए बड़ी तीव्र गति से चले आ रहे हैं। वे बड़े ही आकर्षक इशारों से पतंग उड़ाने वाले बच्चों को निमंत्रण देते हुए आकाश को अत्यधिक कोमल बना रहे हैं। भाव यह है कि बच्चे साइकिलों पर सवार होकर एक-दूसरे को पतंगबाज़ी के लिए बुला रहे हैं। बच्चों में अद्भुत उत्साह और उमंग है। धूप चमक रही है। बच्चे बड़े खुश नज़र आ रहे हैं और एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए बुला रहे हैं।

शरद ऋतु रूपी बालक ने आकाश को अत्यधिक कोमल और उज्ज्वल बना दिया है, ताकि आकाश की ऊँचाइयों को पतंग स्पर्श कर सकें। आकाश भी चाहता है कि पतंग ऊपर उठकर हवा के साथ तैरने लगे। पतंग संसार की सर्वाधिक हलकी और रंगीन वस्तु है जो कि बहुत ही पतले कागज़ से बनाई जाती है। आकाश रूपी बालक चाहता है कि वह उड़कर ऊपर उठे और उसके साथ बाँस की पतली कमानी भी उड़ने लगे। जब आकाश में पतंग उड़ने लगी तो बच्चे खुशी के मारे सीटियाँ बजाएँगे और किलकारियाँ मारने लगेंगे। सारा आकाश पतंगों से भर जाएगा। तब ऐसा लगेगा मानों रंग-बिरंगी कोमल तितलियों का संसार आकाश में उड़ रहा है। तात्पर्य यह है कि सारा आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाएगा और बच्चे सीटियाँ बजाकर तथा किलकारियाँ मारकर एक-दूसरे का उत्साह बढ़ाएँगे।

विशेष-
(1) कवि ने शरद ऋतु में बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने के दृश्य का मनोरम वर्णन किया है।
(2) ‘खरगोश की आँखों जैसा लाल’ में उपमा अलंकार का प्रयोग है।
(3) प्रकृति का सुंदर मानवीकरण किया गया है।
(4) संपूर्ण पद्य में दृश्य, श्रव्य तथा स्पर्श बिंबों की सुंदर योजना हुई है।
(5) ‘ज़ोर-ज़ोर से’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग है।
(6) सहज, सरल तथा आडम्बरहीन सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
(7) शब्द-प्रयोग सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
(8) संपूर्ण पद्य में मुक्त छंद की सुंदर योजना है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर –

प्रश्न-
(क) कवि तथा कविता का नाम बताइए।
(ख) कवि ने शरद ऋतु के आगमन को किस प्रकार प्रस्तुत किया है?
(ग) कवि ने पतंग की क्या-क्या विशेषताएँ बताई हैं?
(घ) शरद ऋतु के आने पर बच्चे किस प्रकार की क्रियाएँ करते हैं?
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) कवि का नाम-आलोक धन्वा। कविता का नाम ‘पतंग’।
(ख) शरद ऋतु का आगमन बच्चों में एक नवीन उत्साह व उमंग भर देता है। इस ऋतु में चारों ओर चहल-पहल बढ़ जाती है। बच्चे साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हुए एक-दूसरे को पतंग उड़ाने के लिए इशारे करते हैं।
(ग) पतंग रंग-बिरंगे तथा पतले कागज़ से बनी होती है, उनमें बांस की सबसे पतली कमानी लगी रहती है और वे सुंदर तितलियों के समान आकाश में उड़ती हैं।
(घ) शरद ऋतु के आते ही चारों ओर बच्चों की चहल-पहल मच जाती है। वे खेल-कूद करते हैं और नई-नई साइकिलों पर सवार होकर घंटियाँ बजाते हैं। पतंग उड़ाते समय किलकारियाँ मारते हैं तथा सीटियाँ बजाते हैं। इस ऋतु में बच्चों को आकाश बड़ा ही कोमल और सुंदर लगता है।
(ङ) तितलियों की नाज़क दुनिया से कवि का अभिप्राय है-रंगीन पतंगों का आकर्षक संसार। रंगीन पतंगें कोमल आकाश में तितलियों की तरह मँडराती हैं और हवा में लहराती हैं।

[2] जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास
पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
जब वे दौड़ते हैं बेसुध
छतों को भी नरम बनाते हुए
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए
जब वे पेंग भरते हुए चले आते हैं
डाल की तरह लचीले वेग से अकसर
छतों के खतरनाक किनारों तक
उस समय गिरने से बचाता है उन्हें
सिर्फ उनके ही रोमांचित शरीर का संगीत
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं महज़ एक धागे के सहारे
पतंगों के साथ-साथ वे भी उड़ रहे हैं
अपने रंध्रों के सहारे [पृष्ठ 11-12]

शब्दार्थ-कपास = कोमल तथा गद्देदार अनभतियाँ। बेसध = मस्त और लापरवाह। नरम = कोमल। मृदंग = एक वाद्य यंत्र जिसकी ध्वनि बड़ी मधुर होती है। पेंग भरना = झूले झूलना। लचीले वेग = लचीली चाल। रोमांचित= प्रसन्न। संगीत = मस्त गति। थाम लेना = पकड़ लेना। महज = केवल। रंध्र = छिद्र।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इस कविता में कवि ने लाक्षणिक भाषा का प्रयोग करते हुए बच्चों की क्रियाओं पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या कवि कहता है कि बच्चे जन्म से ही अपने साथ कपास जैसी कोमलता लेकर आते हैं। भाव यह है कि उनके शरीर में हर प्रकार की चोट और खरोंच सहन करने की शक्ति होती है। उनके पैरों में एक बेचैनी होती है जिसके कारण वे संपूर्ण पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं। जब बच्चे बेपरवाह होकर दौड़ने लगते हैं तो वे छतों को भी कोमल समझने लगते हैं। उनकी गति के कारण दिशाएँ मृदंग के समान मधुर ध्वनि उत्पन्न करने लगती हैं। जब वे तीव्र गति के साथ झूला झूलते हुए चलते हैं, तो वे पेड़ की शाखा के समान ढीले पड़ जाते हैं। उस समय उनकी गति में एक प्रखर वेग होता है, उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं होता। छतों के

खतरनाक किनारों पर भी वे कदम रखते हुए आगे बढ़ते हैं। उस समय उनका प्रसन्न शरीर ही उन्हें गिरने से बचाता है। पतंग उड़ाते समय उनका संपूर्ण शरीर रोमांचित हो उठता है। पतंग की ऊपर जाती धड़कनें उन्हें गिरने से रोक लेती हैं। उस समय ऐसा प्रतीत होता है मानों पतंग का केवल एक धागा बच्चों को संभाल लेता है और वे नीचे गिरने से बच जाते हैं। यहाँ कवि पतंग उड़ाने वाले बच्चों का वर्णन करता हुआ कहता है कि कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि बच्चे भी पतंगों के साथ उड़ने लगे हैं। वे अपने शरीर के रोम-कूपों से निकलने वाले संगीत का सहारा लेकर उड़ने लगते हैं।

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विशेष:
(1) इस पद्यांश में कवि ने पतंग उड़ाते हए बच्चों की बेसुध मस्ती का सजीव वर्णन किया है।
(2) बच्चों की तीव्र गति, झूलता हुआ शरीर, उनके रोमांचित अंग तथा लचीला वेग, उनके उत्साह और उमंग को व्यक्त करता है।
(3) ‘कपास’ शब्द का विशेष प्रयोग हुआ है। इस शब्द द्वारा कवि बच्चों के शरीर की लोच, नरमी तथा सहनशीलता की ओर संकेत करता है।
(4) संपूर्ण पद्य में मानवीकरण अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है; यथा-
‘पृथ्वी घूमती हुई आती है उनके बेचैन पैरों के पास
पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें थाम लेती हैं।
दिशाओं को मृदंग की तरह बजाते हुए।
(5) संपूर्ण पद्य में दृश्य, स्पर्श तथा श्रव्य बिंबों की सुंदर योजना हुई है। कवि ने सहज, सरल अथवा सामान्य प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। इसमें तत्सम, तद्भव तथा उर्दू के शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है।
तत्सम-पृथ्वी, मृदंग, दिशा, रोमांचित, संगीत।
उर्दू-नरम, खतरनाक, अकसर, सिर्फ, महज़।
(6) शब्द-योजना सटीक और भावानुकूल है।
(7) मुक्त छंद का सफल प्रयोग है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) ‘जन्म से ही वे अपने साथ लाते हैं कपास’ इस पंक्ति का बच्चों के साथ क्या संबंध है?
(ख) बच्चे बेसुध होकर क्यों दौड़ते हैं?
(ग) छतों के खतरनाक किनारों से बच्चे कैसे बच जाते हैं?
(घ) पतंगों की धड़कती ऊँचाइयाँ उन्हें कैसे थाम लेती हैं?
उत्तर:
(क) बच्चों का शरीर बड़ा ही कोमल होता है। उनका शरीर कोमलता के साथ-साथ सहनशील भी होता है। वे चोट और खरोंच लगने के आदी हो जाते हैं। उनके शरीर में लचीलापन होता है। किसी चीज से टकराने पर उन्हें बहुत कम चोट लगती है। इसलिए कवि ने बच्चों की तुलना कपास से की है।

(ख) बच्चों के मन में पतंग उड़ाने की बेचैनी होती है। पतंगबाजी करते समय बच्चों को धूप, गर्मी, कठोर छत आदि का ध्यान नहीं रहता। वे उछलते-कूदते और पतंग की डोर को थामे हुए पतंग उड़ाने में मस्त हो जाते हैं। इसलिए वे बेसुध होकर दौड़ते हैं।

(ग) प्रायः सभी को दीवार से गिरने का डर लगा रहता है, परंतु बच्चे बेसुध होकर अपने शरीर को लहराते हुए छतों के किनारों पर झुक जाते हैं, इस अवसर पर उनके अन्दर का उत्साह और उमंग उनकी रक्षा करता है और वे गिरने से बच जाते हैं।

(घ) पतंग की ऊपर उड़ती हुई धड़कनें बच्चों को गिरने से रोक लेती हैं। उस समय पतंग की डोर बच्चों के लिए सहारे का काम करती है और वे स्वयं को सँभाल लेते हैं।

[3] अगर वे कभी गिरते हैं छतों के खतरनाक किनारों से
और बच जाते हैं तब तो
और भी निडर होकर सुनहले सूरज के सामने आते हैं
पृथ्वी और भी तेज़ घूमती हुई आती है। उनके बेचैन पैरों के पास। [पृष्ठ-12]

शब्दार्थ-खतरनाक = भयानक। निडर = निर्भय। बेचैन = व्याकुल।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्य हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘पतंग’ से अवतरित है। इसके कवि आलोक धन्वा हैं। यह कविता कवि के एकमात्र काव्यसंग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में संकलित है। इसमें कवि ने बच्चों द्वारा पतंग उड़ाने का बहुत ही सजीव व मनोहारी वर्णन किया है।

व्याख्या-बच्चे प्रायः पतंग उड़ाते समय कभी नहीं गिरते, परंतु दुर्भाग्य से कभी वे छतों के खतरनाक किनारों से गिर भी जाते हैं तो वे बच जाते हैं और वे अधिक निर्भय हो जाते हैं। अत्यधिक उत्साह के साथ वे सुनहले सूर्य के समान प्रकाशमान हो उठते हैं। ऐसा लगता है कि वे अपने बेचैन पैरों के साथ सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं, वे दुगुने उत्साह के साथ घूमते-फिरते हैं और भाग-भागकर पतंग उड़ाते हैं।

विशेष-

  1. कवि ने पतंग उड़ाते हुए बच्चों की उमंग तथा मस्ती का बड़ा प्रभावशाली वर्णन किया है।
  2. संपूर्ण पद्य में लाक्षणिक भाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  3. उदाहरण के रूप में ‘सुनहले सूरज के सामने’ आदि में लाक्षणिकता विद्यमान है।
  4. ‘पृथ्वी का तेज़ घूमते हुए बच्चों के पास आना’ में मानवीकरण अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  5. ‘सुनहले सूरज’ में अनुप्रास अलंकार तथा ‘साथ-साथ’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का सुंदर वर्णन हुआ है।
  6. सहज, सरल एवं प्रवाहमयी हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  7. शब्द-योजना सटीक एवं भावानुकूल है।।
  8. संपूर्ण पद्य में दृश्य बिंब की सफल योजना हुई है।
  9. मुक्त छंद का सफल प्रयोग हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम बताइए।
(ख) छतों के खतरनाक किनारों से बच जाने पर बच्चों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
(ग) सुनहले सूरज के सामने आने का क्या अर्थ है?
(घ) पृथ्वी बच्चों के बेचैन पैरों के पास घूमती हुई आती है, इसका आशय क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-आलोक धन्वा कविता-‘पतंग’।
(ख) जब बच्चे छतों के खतरनाक किनारों से बच जाते हैं तो वे और अधिक निडर हो जाते हैं। उनमें किसी भी विपत्ति और कष्ट को सहन करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। तब वे खुले आसमान में तपते हुए सुनहले सूर्य के समान दिखाई देने लगते हैं।
(ग) सुनहले सूर्य के सामने आने का अर्थ है सूर्य के समान तेज़ से युक्त होकर सक्रिय हो जाना। जिस प्रकार सूर्य अपना तीव्र प्रकाश पृथ्वी के कोने-कोने पर फैलाता है उसी प्रकार बच्चे भी पतंग उड़ाते हुए मौज-मस्ती में चारों ओर फैल जाना चाहते हैं। उनके मन का भय समाप्त हो जाता है।
(घ) ‘पृथ्वी तेज़ घूमती हुई बच्चों के बेचैन पैरों के पास आती है’ का तात्पर्य है बच्चों के पैरों में गतिशीलता पैदा होना। बच्चे पतंग उड़ाते समय मानों सारी पृथ्वी को नाप लेना चाहते हैं।

पतंग Summary in Hindi

पतंग कवि-परिचय

प्रश्न-
आलोक धन्वा का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
आलोक धन्वा का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय आलोक धन्वा सातवें-आठवें दशक के कवि हैं। इनका नाम नई कविता से जुड़ा हुआ है। इनका जन्म सन् 1948 में बिहार के मुंगेर जनपद के एक साधारण परिवार में हुआ। बहुत छोटी अवस्था में अपनी कुछ गिनी-चुनी कविताओं के फलस्वरूप इन्होंने अपार लोकप्रियता अर्जित की। 1972-73 में इनकी जो आरम्भिक कविताएँ प्रकाशित हुईं, उन्होंने काव्य-प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित कर लिया। कुछ आलोचकों का तो यह भी दावा है कि इन कविताओं का अभी तक सही मूल्यांकन ही नहीं हुआ। इसका प्रमुख कारण यह है कि आलोक धन्वा ने लीक से हटकर एक नवीन शिल्प द्वारा भावाभिव्यक्ति की है। भले ही उनको अल्पकाल ही में ख्याति प्राप्त हो गई है, लेकिन उन्होंने अधिक काव्य रचना नहीं की।

पिछले दो दशकों से वे देश के विभिन्न भागों में सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं। काव्य रचना की अपेक्षा उनकी रुचि सामाजिक कार्यक्रमों में अधिक रही है। जमशेदपुर में उन्होंने अध्ययन मंडलियों का संचालन किया। यही नहीं, उन्होंने अनेक राष्ट्रीय संस्थानों तथा विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्याता की भूमिका भी निभाई है।

2. प्रमुख रचनाएँ-आलोक धन्वा की प्रथम कविता सन् 1972 में ‘जनता का आदमी’ शीर्षक से प्रकाशित हुई। तत्पश्चात् ‘भागी हुई लड़कियाँ’ तथा ‘ब्रूनो की बेटियाँ’ काव्य-रचनाओं से इनको विशेष प्रसिद्धि मिली। ‘गोली दागो पोस्टर’ इनकी प्रसिद्ध कविता है। इनका एकमात्र संग्रह है-‘दुनिया रोज़ बनती है।

आलोक धन्वा को अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। राहुल सम्मान, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का साहित्य सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान तथा पहल सम्मान आदि से इस कवि को सम्मानित किया गया है। आलोक धन्वा सहज, सरल तथा सामान्य भाषा द्वारा आकर्षक तथा मनोहारी बिंबों की रचना करने में सिद्धहस्त हैं।

3. काव्यगत विशेषताएँ-आलोक धन्वा समकालीन कविता के एक महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनके काव्य में लगभग वे सभी प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं जो समकालीन कवियों की काव्य रचनाओं में हैं। आलोक धन्वा की काव्य रचनाओं में सामाजिक चेतना के प्रति सरोकार है। आरंभ में तो वे समाज के शोषितों के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त करते हुए दिखाई देते हैं। इनकी कविताएँ वर्तमान समाज के ढाँचे की विडम्बनाओं को उद्घाटित करती हैं और मानवीय संबंधों पर भी प्रकाश डालती हैं। कुछ स्थलों पर वे आज की राजनीति पर करारा व्यंग्य भी करती हैं और बुनियादी मानसिकताओं पर चोट भी करती हैं। उनकी काव्य रचनाओं में बार-बार आम आदमी का स्वरूप भी उभरकर आता है। इसके साथ-साथ कवि ने युगीन रुचियों, आवेगों तथा वर्ग-संघर्ष का भी वर्णन किया है। ईश्वर के प्रति उनकी कविता में कोई खास स्थिरता नहीं है। मार्क्सवाद के प्रति आस्था होने के कारण ईश्वर के प्रति उनका विश्वास उठ गया है। हाँ, मानव के प्रति वे निरन्तर अपना सरोकार दिखाते हैं।

आज दिन-प्रतिदिन की निराशा, खटास, दुःख, पीड़ा आदि के फलस्वरूप मानव-जीवन अलगावबोध का शिकार बनता जा रहा है। आलोक धन्वा सच्चाई से पूर्णतया अवगत रहे हैं। वे मानव-जीवन की इस त्रासदी को उकेरने में भी सफल रहे हैं। ‘जनता का आदमी’ में वे कहते हैं

क्यों पूछा था एक सवाल मेरे पुराने पड़ोसी ने
मैं एक भूमिहीन किसान हूँ
क्या मैं कविता को छू सकता हूँ?
इसके अतिरिक्त उनकी काव्य रचनाओं में आधुनिक युग की विसंगतियों का वर्णन भी देखा जा सकता है। कहीं-कहीं वे महानगरीय बोध से जुड़ी हुई भावनाएँ व्यक्त करते हैं। लेकिन सच्चाई तो यह है कि आलोक धन्वा ने आम आदमी के जीवन से जुड़ी समस्याओं का अधिक वर्णन किया है। ‘पतंग’ नामक लम्बी कविता में उन्होंने पतंग जैसी साधारण वस्तु को काव्य का विषय बनाया है और उसके माध्यम से बच्चों में उमंग और उल्लास का मनोहारी वर्णन किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 2 पतंग

4. अभिव्यंजना शिल्प-आलोक धन्वा एक जनवादी कवि हैं। अतः उन्होंने सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया है जो आधुनिक परिस्थितियों को व्यक्त करने में समर्थ है। उन्होंने देशी-विदेशी शब्दों से कोई
परहेज़ नहीं किया। मानवीय संवेदना को उकेरने के लिए उन्होंने मुहावरों में भी नयापन लाने की कोशिश की है। उनकी भाषा नवीन बिंबों तथा नवीन चित्रों के लिए प्रसिद्ध है। भले ही कवि ने अलंकारों के प्रयोग पर अधिक बल नहीं दिया, लेकिन उन्होंने अलंकार प्रयोग से परहेज़ भी नहीं किया और यत्र-तत्र स्वाभाविक रूप से अलंकारों का प्रयोग किया है। भले ही उनकी कविता मुक्त छंद में लिखी गई हो, लेकिन उसमें लयात्मकता भी है। उनकी लंबी कविता ‘पतंग’ से एक उदाहरण देखिए –
सबसे तेज़ बौछारें गयीं भादो गया
सवेरा हुआ
खरगोश की आँखों जैसा लाल सवेरा
शरद आया पुलों को पार करते हुए

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि आलोक धन्वा ने जो थोड़ा-बहुत काव्य लिखा है। वह पाठक को संवेदनशील बना देता हैं। उनके काव्य में वर्ग-संघर्ष, मानवतावाद, राजनीतिक दोगलापन, आधुनिक व्यवस्था की टूटन, युगीन चेतना आदि पर समुचित प्रकाश डाला गया है। लेकिन यह एक कटु सत्य है कि इस समकालीन कवि के काव्य का अभी तक समुचित मूल्यांकन नहीं हो पाया।

पतंग कविता का सार

प्रश्न-
आलोक धन्वा द्वारा रचित कविता ‘पतंग’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कविता आलोक धन्वा कवि के एकमात्र काव्य संग्रह ‘दुनिया रोज़ बनती है’ में से संकलित है। यह पूरी कविता न होकर ‘पतंग’ नामक कविता का एक अंश मात्र है। इसमें कवि ने पतंग के माध्यम से बच्चों की उमंग, उल्लास तथा खुशियों का मनोहारी वर्णन किया है। यह कविता दृश्य एवं श्रव्य बिंबों के लिए प्रसिद्ध है। कवि लिखता है कि भादो के महीने के बीत जाने के बाद शरद ऋतु का सवेरा होता है। आकाश से काले बादल छंट जाते हैं। शरद ऋतु मानों नई चमकीली साइकिल चलाकर बच्चों को पतंग उड़ाने का निमंत्रण देती है। बच्चों के पास ऊर्जा है और पतंग उनके सपनों का प्रतीक है। पतंग के समान बच्चों के सपने बड़े हलके होते हैं। शीघ्र ही पतंग उड़ाने वाले बच्चों का एक समूह साकार हो उठता है। पतंग उड़ाने वाले बच्चे जन्म से ही कोमल तथा हलके शरीर वाले होते हैं। पृथ्वी उनके पैरों के पास घूमती हुई आती है तथा वे अपनी मस्ती में छतों तथा दीवारों पर पतंग उड़ाते हुए नज़र आते हैं। छतों की कठोरता उनके लिए नरम हो जाती है। बच्चों को गिरने का भय नहीं होता। यदि वे कहीं गिर भी जाते हैं तो उनमें क्षमता और अधिक मजबूत हो जाती है। ऐसा लगता है मानों वे अपनी पतंग की डोर के सहारे पतंगों के साथ उड़ते नज़र आते हैं। वे उन्मत्त होकर आगे बढ़ते हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए उड़ान भरते रहते हैं। पतंग उड़ाने से बच्चों का आत्मविश्वास और अधिक बढ़ जाता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर:
सर्वप्रथम कवि जग-जीवन का भार ढोने की बात कहता है। इसका भाव यह है कि कवि संसार से पूर्णतया अलग नहीं हुआ। संसार की समस्याओं के प्रति वह भी सचेत है। परंतु वह अपनी कविता द्वारा संसार के कष्टों तथा दुखों को दूर करना चाहता है। वह संसार को सुखद बनाना चाहता है।

इस रास्ते पर चलते-चलते कवि को यह अनुभव होता है कि संसार उसकी उपेक्षा कर रहा है। वह संसार के व्यवहार से दुखी है। संसार की जड़-परंपराएँ तथा रूढ़ियाँ कवि के मार्ग को रोकना चाहती हैं, परंतु कवि इन बाधाओं की परवाह नहीं करता। वह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता है।

प्रश्न 2.
जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर:
कवि समझता है कि जो लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं का संग्रह करने में सक्रिय हैं, उनको ‘दाना’ अर्थात् बुद्धिमान कहा जाता है। परंतु कवि का अपना दृष्टिकोण अलग है। वह ऐसे लोगों को मूर्ख समझता है। कवि सांसारिक सफलताओं को व्यर्थ समझता है। वह ऐसे लोगों को नादान कहता है जो धन-संपत्ति के पीछे भाग रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
मैं और, और जग और कहाँ का नाता-पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति में प्रयुक्त ‘और’ शब्द में यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है। प्रथम एवं तृतीय ‘और’ का अर्थ ‘अन्य’ है अर्थात् भिन्न या अलग। कवि स्वयं के साथ जोड़कर भावनाओं से जुड़े हुए व्यक्ति को संकेतित करता है। तीसरा ‘और’ सांसारिक मोह-माया से लिप्त आम व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। दूसरे ‘और’ का प्रयोग ‘तथा’ के लिए प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 4.
शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘शीतल वाणी में आग’ से कवि का अभिप्राय यह है कि उसका अपना स्वभाव और स्वर कोमल एवं शांत है। परंतु उसके मन में विद्रोह की भावना विद्यमान है। कवि प्रेमहीन तथा स्वार्थी संसार से घृणा करता है। वह तो प्रेममय संसार से ही प्यार करता है।

प्रश्न 5.
बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?
उत्तर:
बच्चे इस आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे कि उनके माता-पिता उनके लिए चुग्गा (भोजन सामग्री) लेकर आ रहे होंगे। वे शीघ्र घर पहुँचकर उन्हें भोजन देंगे और साथ ही प्यार भी करेंगे।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
यह पद्य पंक्ति गीत का मुखड़ा है। इसकी आवृत्ति से प्रेमजन्य व्याकुलता का पता चलता है। प्रेम के क्षण बड़े प्रिय लगते हैं। अतः प्रेम के क्षणों के बीतने का पता ही नहीं चल पाता।

कविता के आसपास

प्रश्न.
संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?
उत्तर:
यह संसार निश्चय से काँटों की बाड़ है। यहाँ सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। कष्टों को सहकर भी हम खुशी से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यदि हमारे मन में सच्चे प्रेम की मस्ती है तो नित-नवीन कल्पनाओं को साकार करके हम सुखद जीवन जी सकते हैं। हमें यह स्वीकार करके कर्म करना चाहिए कि सांसारिक धन-वैभव क्षण-भंगुर हैं। प्रेम ही जीवन को खशी देता है।

आपसदारी
जयशंकर प्रसाद की आत्मकथ्य कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गई आत्मपरिचय कविता से इस कविता का आपको कोई संबंध दिखाई देता है? चर्चा करो।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
आरोह (भाग 2) हरिवंश राय बच्चन]
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मै मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
-जयशंकर प्रसाद

‘आत्मकथ्य’ जयशंकर प्रसाद द्वारा छायावाद के परिपेक्ष्य में रचित कविता है। परंतु बच्चन जी की ‘आत्मपरिचय’ कविता छायावाद से हटकर व्यक्तिगत प्रेम को आधार बनाकर रची गई कविता है। जहाँ प्रसाद जी अपने प्रेम को छिपाकर रखते हैं, वहाँ बच्चन जी सहज, सरल भाषा में बड़ी ईमानदारी के साथ प्रेमाभिव्यक्ति करते हैं। भले ही इन दोनों कविताओं के भाव लगभग समान हो, परंतु इनकी अभिव्यंजना शैली अलग-अलग है। बच्चन द्वारा यह कहना कि ‘मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ’ में प्रेम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। परंतु प्रसाद जी द्वारा यह कहना –
“यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास ।
तब भी कहते हो कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।”
यहाँ प्रसाद जी ने छायावादी अभिव्यंजना शैली द्वारा अपनी प्रेमाभिव्यक्ति का संदेश दिया है।

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
उत्तर:
इन पद्य-पंक्तियों में कवि ने निजी प्रेम की अभिव्यक्ति की है। कवि का हृदय प्रिया के स्नेह से सराबोर है। वह हमेशा अपने मन में प्रिया के स्नेह को अनुभव किया करता है। इसीलिए वह संसार की परवाह नहीं करता।

  1. कवि ने सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. ‘किया करता’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है।
  3. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव दिखाई देता है।
  4. किया करता हूँ की आवृत्ति के कारण गीत में मधुर संगीत की उत्पत्ति हुई है।
  5. माधुर्य गुण है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  6. आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
उत्तर:
इसमें कवि निजी प्रेम को स्वीकार करता हुआ कहता है कि कवि के हृदय में नवीन मनोभाव हैं जिन्हें वह संसार को उपहार के रूप में भेंट करना चाहता है। कवि को यह अधूरा संसार अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार में खोया रहता है।

  1. प्रस्तुत गीत में विषयानुकूल, सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  2. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावभिव्यक्ति में सहायक है।
  3. कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  4. ‘लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण इस पद्य में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. माधुर्य गुण है तथा श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसका संसार के साथ निर्वाह नहीं हो सकता। कवि प्रतिदिन नए संसार की रचना करता है, परंतु अगले क्षण ही वह उसे नष्ट कर देता है। यह संसार धन-वैभव के पीछे पागल बना हुआ है परंतु कवि को इस धन-वैभव की कोई इच्छा नहीं है।

  1. कवि सांसारिक जीवन से अलग-थलग आदर्श लोक में विचरण करना चाहता है।
  2. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण-विपर्यय अलंकार है।
  3. ‘कहाँ का नाता’ में प्रश्न अलंकार है तथा ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘और’ शब्द की आवृत्ति चमत्कार उत्पन्न करती है। इस शब्द में यमक अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  6. शब्द-योजना सार्थक तथा सटीक बन पड़ी है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसके रुदन से भी प्रेम झलकता है, परंतु उसकी वाणी में एक कोमल ऊर्जा है। कवि का जीवन निराशा के कारण खंडहर बन चुका है, परंतु कवि अपने जीवन में उस प्रेम को महत्त्व देता है जिस पर बड़े-बड़े राजा महल को भी न्योछावर कर देते हैं।

  1. इसमें कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शब्द-योजना सार्थक एवं सटीक बन पड़ी है।
  3. ‘मैं’ शब्द के प्रयोग के कारण आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  4. ‘रोदन में आग’ तथा ‘शीतल वाणी में आग’ दोनों में विरोधाभास अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण मधुरता की मस्ती उत्पन्न हो गई है।
  7. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि दुनिया में उसका कोई नहीं है और न ही उसकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है। प्रेम के अभाव के कारण कवि के कदम शिथिल पड़ जाते हैं और उसके मन में उदासी छा जाती है।

  1. इसमें कवि ने खड़ी बोली के साहित्यिक रूप का वर्णन किया है।
  2. ‘मझसे मिलने को कौन विकल’ और ‘किसके हित चंचल’ दोनों में प्रश्न अलंकार है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4.  प्रसाद गुण है तथा वियोग शृंगार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. आत्मकथात्मक तथा भावात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न (आत्मपरिचय)

प्रश्न 1.
‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर कवि के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कवि प्रेम और मस्ती का जीवन जीना चाहता है। वह हमेशा प्रेम तथा स्नेह के काल्पनिक संसार में खोया रहता है। प्रेम ही उसके जीवन का प्राण है। इसलिए वह हमेशा स्नेह की सुरा का पान करता रहता है। परंतु प्रिया ने उसके प्रेम का अनुकूल उत्तर नहीं दिया। इसीलिए उसके हृदय में विरह-जन्य पीड़ा व अवसाद है। इसके साथ-साथ कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग प्रेममय संसार की रचना करना चाहता है। वह इस संपूर्ण संसार को मस्ती में डुबा देना चाहता है।

प्रश्न 2.
कवि को यह संसार अच्छा क्यों नहीं लगता?
उत्तर:
कवि इस संसार को अपूर्ण मानता है। कवि का विचार है कि संसार एक भार है। लोग व्यर्थ ही दुनियादारी में उलझे हैं। कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग आदर्श समाज की स्थापना करना चाहता है। वह स्वयं को संसार से अलग मानता है। इसीलिए वह कहता भी है
“जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता।”

प्रश्न 3.
‘जग पूछा रहा उनको, जो जग की गाते’-इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
कवि स्पष्ट करता है कि संसार केवल उन लोगों का सम्मान करता है जो लोग धन-वैभव के संग्रह में संलग्न हैं और संपन्न हैं। धनवान व्यक्ति का सभी आदर करते हैं, निर्धन को कोई नहीं पूछता। विशेषकर कवि जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई परवाह भी नहीं करता। परन्तु कवि तो अपने मन में प्रेम के गीत लिए फिरता है।

प्रश्न 4.
कवि ने जग को मूढ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार के सभी लोग धन-वैभव के संग्रह में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। वे सांसारिक विषय-वासनाओं में लीन हैं। अज्ञानता के कारण उनके जीवन से सच्चा प्रेम लुप्त हो चुका है। इसलिए यह संसार तथा इसके लोग मूढ़ हैं।

प्रश्न 5.
‘जग भक्-सागर तरने को नाव बनाए’ कथन का क्या आशय है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार रूपी सागर महाभयंकर है। इसे पार करने के लिए मनुष्य को कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। संसार समझता है कि वह धन-संपत्ति द्वारा इस सागर को पार कर जाएगा, परंतु ऐसा संभव नहीं है। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नाव बनाकर यह संसार पार करना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘आत्मपरिचय’ गीत के आधार पर कवि के मन की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि मौज और मस्ती का कवि है। वह प्रेम पाने और देने में विश्वास रखता है और एक प्यार भरी जिंदगी जीना चाहता है इसलिए वह अपने हार्दिक प्रेम को प्रिया के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि प्रेम के बिना इस संसार को अधूरा मानता है और अपने मन में प्रेममय संसार की कल्पना करता है।

प्रश्न 7.
कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर क्यों जलता रहता है?
उत्तर:
कवि के मन में अपने प्रिय के लिए अत्यधिक प्रेम है। प्रिय की मधुर यादें उसे सुखानुभूति प्रदान करती हैं। अतः वह संयोग की दशा में भी प्रिय के वियोग की अग्नि जलाकर उसमें जलता रहता है। इससे कवि को आनंद मिलता रहता है।

प्रश्न 8.
कवि के अन्दर और बाहर कौन-सी असंगति है और यह असंगति क्यों है?
उत्तर:
कवि संसार के लोगों के सामने हँसता और खेलता दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि मानों वह अपने प्रेम की असफलता पर हँस रहा है, परंतु वह अपनी विरह-व्यथा के कारण मन-ही-मन रोता रहता है। बाहर से कवि प्रसन्न नज़र आता है, लेकिन मन-ही-मन वह विरह-जनित पीड़ा को अनुभव करता रहता है। इसलिए कवि का जीवन अन्दर और बाहर से असंगत हो जाता है।

प्रश्न 9.
कवि कौन-कौन से संसार बनाकर रोज़ मिटाता रहता है?
उत्तर:
कवि मन-ही-मन प्रेममय संसार की कल्पना करता है। परन्तु कवि का यह प्रेममय संसार प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसलिए कवि उसे मिटा देता है। वह फिर से प्रेममय संसार की रचना में लीन हो जाता है। परंतु संसार के लोग इससे बेखबर होकर धन-संपदा के संग्रह में लगे रहते हैं।

प्रश्न 10.
कवि की शीतल वाणी में आग क्यों है?
उत्तर:
कवि के मन में विरह-वेदना की आग जलती रहती है, लेकिन उसकी वाणी बड़ी कोमल, मधुर और शीतल है। वह अपनी विरह-जनित पीड़ा को कोमलकांत पदावली द्वारा व्यक्त करता है। परंतु प्रिय के वियोग की आग उसके मन में हमेशा जलती रहती है। अतः शीतलता और वियोग बड़ा विचित्र बन पड़ा है।

प्रश्न 11.
‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति द्वारा कवि संसार और अपने स्वभाव के अंतर को स्पष्ट करता है। कवि स्वयं तो प्रेम भावना के लोक में विचरण करता रहता है, परंतु संसार के लोग स्वार्थ को पूरा करने में संलग्न हैं। इसलिए कवि का मेल नहीं खाता।

प्रश्न 12.
कवि दीवानों का वेश क्यों लिए फिरता है?
उत्तर:
कवि को प्रेम के क्षेत्र में असफलता मिली है। इसलिए वह प्रेम-दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। कवि का एकमात्र लक्ष्य अपने प्रिय को पाना है, परंतु वह उसे मिल नहीं पा रहा। इसलिए वह दीवानों का वेश धारण करके घूमता रहता है।

एक गीत

प्रश्न 1.
‘एक गीत’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव क्या है?
उत्तर:
यह गीत प्रेम के महत्त्व पर प्रकाश डालता है। कवि कहता है कि प्रेम मानव जीवन को उत्साह, उमंग और उल्लास प्रदान करता है। प्रेम के कारण मनुष्य को लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। इसलिए प्रेमी अपनी प्रिय से मिलने के लिए तेज कदमों से चल पड़ता है। यही नहीं, पक्षियों के पंखों में गतिशीलता आ जाती है। जिस किसी व्यक्ति का प्रिय उसकी प्रतीक्षा नहीं करता, उसका जीवन निष्क्रिय और शिथिल हो जाता है। इसलिए प्रेम ही जीवन का मूल आधार है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 2.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’, के आधार पर आशा और निराशा के क्रम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
निश्चय ही यह गीत आशा और निराशा के भावों को क्रम से अभिव्यक्त करता है। प्रथम दो काव्यांशों में कवि ने आशा के भावों को जागृत किया है जिससे प्रेरित होकर दिन का पंथी अपने प्रियजनों से मिलने की आशा में शीघ्रता से चलना आरम्भ कर देता है। जब चिड़िया को यह ध्यान आया कि उसके बच्चे उसकी प्रतीक्षा में होंगे तो वह भी तेज गति से उड़ने लगती है। किन्तु जब कवि यह सोचता है कि उसका चाहने वाला कोई नहीं है और कोई उसकी प्रतीक्षा करने वाला नहीं है तो उसके मन का उत्साह नष्ट हो जाता है और उसके मन में निराशा का भाव समा जाता है। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत गीत में कवि ने आशा और निराशा के भावों को क्रमशः अभिव्यक्ति किया है।

प्रश्न 3.
कवि के मन में शिथिलता उत्पन्न क्यों हो जाती है?
उत्तर:
कवि जानता है कि इस दुनिया में उसका कोई अपना नहीं है। कोई प्रियजन उसकी प्रतीक्षा नहीं करता है। इसलिए वह सोचता है कि मैं किसके लिए अपने को चंचल करूँ। उसका सारा उत्साह तथा उमंग नष्ट हो जाती है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं। परंतु यह स्थिति कवि के मन में आतुरता का भाव भी उत्पन्न करती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. हरिवंश राय बच्चन का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1909 में
(B) सन् 1908 में
(C) सन् 1907 में
(D) सन् 1912 में
उत्तर:
(C) सन् 1907 में

2. ‘आत्मपरिचय’ कविता के रचयिता हैं _________.
(A) माखनलाल चतुर्वेदी
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(D) हरिवंश राय बच्चन

3. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस नगर में हुआ?
(A) प्रयाग में
(B) बनारस में
(C) लखनऊ में
(D) कानपुर में
उत्तर:
(A) प्रयाग में

4. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) कायस्थ परिवार में
(C) क्षत्रिय परिवार में
(D) राजपूत परिवार में
उत्तर:
(B) कायस्थ परिवार में

5. बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा कहाँ पर हुई?
(A) काशी में
(B) लखनऊ में
(C) प्रयाग में
(D) मुम्बई में
उत्तर:
(A) काशी में

6. बच्चन जी ने स्नातकोत्तर परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की?
(A) दिल्ली विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

7. बच्चन जी ने पी० एचण्डी की उपाधि कहाँ प्राप्त की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(C) मुम्बई विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय

8. बच्चन जी की पहली पत्नी का नाम क्या था?
(A) श्यामा।
(B) तेजी
(C) मनोरमा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) श्यामा

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

9. 1942 में बच्चन जी ने दूसरा विवाह किससे किया?
(A) मनोरमा से
(B) कमला देवी से
(C) तेजी से
(D) राधा से
उत्तर:
(C) तेजी से

10. बच्चन जी को किस मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया?
(A) वित्त मंत्रालय
(B) शिक्षा मंत्रालय
(C) कृषि मंत्रालय
(D) विदेश मंत्रालय
उत्तर:
(D) विदेश मंत्रालय

11. किस वर्ष बच्चन जी को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया?
(A) 1969 में
(B) 1965 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में

12. भारत सरकार ने बच्चन जी को किस उपाधि से विभूषित किया?
(A) पद्म श्री
(B) पद्म विभूषण
(C) ज्ञान पीठ पुरस्कार
(D) व्यास सम्मान
उत्तर:
(B) पद्म विभूषण

13. ‘मधुशाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935
(B) सन् 1936
(C) सन् 1938
(D) सन् 1937
उत्तर:
(A) सन् 1935

14. ये रचनाएँ हरिवंश राय बच्चन की हैं-
(A) मधुशाला, मधुबाला और अपरा
(B) मधुशाला, कामायनी, मधुबाला
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला
(D) मधुकुशल, मधु, मधुबाला
उत्तर:
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला

15. ‘मधुबाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1938 में
(B) सन् 1935 में
(C) सन् 1939 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(A) सन् 1938 में

16. ‘मधुकलश’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1938 में
उत्तर:
(D) सन् 1938 में

17. हरिवंश राय बच्चन किस भावना के कवि हैं?
(A) रहस्यवाद भावना के
(B) छायावादी भावना के
(C) प्रेम और मस्ती के
(D) प्रगतिवादी भावना के
उत्तर:
(C) प्रेम और मस्ती के

18. ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, किस विधा की रचना है?
(A) प्रबंध काव्य
(B) गीति काव्य
(C) जीवनी
(D) निबंध
उत्तर:
(C) जीवनी

19. हरिवंश राय बच्चन की आधुनिक काव्य रचनाओं पर किसका प्रभाव पड़ा?
(A) स्वच्छंदतावाद का
(B) उमर खय्याम का
(C) रहस्यवाद का
(D) प्रगतिवाद का
उत्तर:
(B) उमर खय्याम का

20. बच्चन जी द्वारा रचित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ उनके किस काव्य-संग्रह से संकलित है?
(A) निशा निमंत्रण
(B) मधुशाला
(C) सतरंगिणी
(D) मिलनयामिनी
उत्तर:
(A) निशा निमंत्रण

21. ‘भव-सागर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उत्प्रेक्षा
(B) उपमा
(C) रूपक
(D) अनुप्रास
उत्तर:
(C) रूपक

22. ‘सीखा ज्ञान भुलाना’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) विरोधाभास
(B) असंगति
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) विरोधाभास

23: ‘साँसों के तार में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) उत्प्रेक्षा
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) उपमा

24. ‘स्नेह-सुरा’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) यमक
(C) उपमा
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(A) रूपक

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

25. ‘एक गीत’ नामक कविता में दिन का पंथी किसे माना गया है?
(A) ‘चिड़िया को
(B) कवि को
(C) सूर्य को
(D) प्रत्याशा को
उत्तर:
(B) कवि को

26. अपने बच्चों के विषय में सोचकर पक्षियों की चंचलता किन अंगों में सबसे अधिक व्यक्त होती है?
(A) आँखों में
(B) हृदय में
(C) पैरों में
(D) पंखों में
उत्तर:
(D) पंखों में 27.

27. मुझसे मिलने को कौन विकल? पंक्ति में कौन-सा भाव है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विह्वलता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) विह्वलता

28. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत में नीड़ों से झांक रहे बच्चों का ध्यान चिड़िया के परों में क्या भरता है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विकलता
(D) विह्वलता
उत्तर:
(B) चंचलता

29. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में कवि हताश और दुखी क्यों है?
(A) पत्नी से तलाक होने के कारण
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण
(C) संतान-सुख से वंचित होने के कारण
(D) परिवार से पिछड़ने के कारण
उत्तर:
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण

30. किसके बच्चे प्रत्याशा में हैं?
(A) गाय के
(B) कवि के
(C) पंथी के
(D) चिड़िया के
उत्तर:
(D) चिड़िया के

31. ‘एक गीत’ नामक कविता में कवि की पंक्ति ‘मुझसे मिलने को कौन विकल’? किस भाव को व्यक्त करती है?
(A) प्रश्न
(B) प्रसन्नता
(C) आश्चर्य
(D) हताशा
उत्तर:
(D) हताशा

32. ‘हो जाए न पथ में रात कहीं’ सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?
(A) चिड़िया के बच्चे
(B) पंथी
(C) चिड़िया
(D) तोता
उत्तर:
(B) पंथी

33. दिन ढलने के साथ ही बच्चे कहाँ से झाँकने लगे होंगे?
(A) दरवाजे से
(B) छत से
(C) नीड़ों से
(D) खिड़की से
उत्तर:
(C) नीड़ों से

34. मैं होऊँ किसके हित चंचल?- यह प्रश्न पैरों को कैसा कर देता है?
(A) शिथिल
(B) चंचल
(C) विह्वल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शिथिल

35. ‘एक गीत’ कविता में किस भाव की प्रधानता है?
(A) रतिभाव
(B) उत्साह भाव
(C) हास्य भाव
(D) वात्सल्य भाव
उत्तर:
(D) वात्सल्य भाव

आत्म-परिचय पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-जग-जीवन = सांसारिक गतिविधियाँ। भार = बोझ। झंकृत = तारों को बजाकर स्वर निकालना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

व्याख्या-यद्यपि मेरा जीवन सांसारिक बाधाओं और कष्टों के बोझ से दबा हुआ है, लेकिन फिर भी मैं अपने जीवन से प्रेम करता हूँ। मुझे अपने सामाजिक कर्तव्यों का बोध है। मेरा हृदय प्रेम से लबालब भरा है। किसी प्रिया ने मेरे हृदय के तारों को छूकर झंकृत कर दिया था, जिससे मेरी साँसों में संगीत के तार बजने लगे। फलस्वरूप मैं आज भी उसी प्रेम की झंकार में लीन रहता हूँ। भाव यह है कि भले ही मेरे सामने कुछ बाधाएँ और रुकावटें हैं, लेकिन मैं उनकी परवाह न करके प्रेम के सहारे अपना जीवन सुखपूर्वक जी रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है। उसके मन में किसी प्रकार की कुंठा नहीं है।
  2. सहज, सरल, प्रवाहमयी तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘साँसों के तार’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, फिर भी’ के प्रयोग से पता चलता है कि कवि सांसारिक बाधाओं से ग्रस्त है।
  4. इसी में ‘रहस्यात्मकता’ देखी जा सकती है। यह कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन अथवा कोई दैवीय शक्ति।
  5. संपूर्ण पद्य में श्रृंगार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  6. प्रस्तुत गीत पर उमर खय्याम् की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  7. गीत की भाषा में विषय के अनुसार मस्ती, कोमलता, मादकता और मधुरता विद्यमान है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) यहाँ कवि ने ‘किसी ने के द्वारा किस ओर संकेत किया है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-हरिवंश राय बच्चन कविता-आत्मपरिचय

(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का आशय है कि सांसारिक दायित्व और जीवन की जिम्मेदारियाँ, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को निभाना पड़ता है।

(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि सामाजिक कर्तव्यों तथा दायित्वों के बोझ से उसका जीवन दब गया है। प्रायः संसार के प्राणी इन दायित्वों को निभाते-निभाते प्रेमशून्य हो जाते हैं, परंतु कवि फिर भी अपने जीवन में प्रेम को अत्यधिक महत्त्व देता है और उसी के सहारे जिंदा है।

(घ) यहाँ ‘किसी ने’ शब्द कवि के प्रिय का प्रतीक है। यह प्रिय कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन भी हो सकता है। यही नहीं, ‘किसी ने’ के द्वारा कवि परमात्मा की ओर भी संकेत कर सकता है।

(ङ) प्रस्तुत पद्यांश में कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जीवन के दायित्वों और कर्तव्यों को निभाते हुए भी वह प्रेम के सहारे जीवनयापन कर रहा है। कवि खुले शब्दों में अपने प्रिय के प्रेम की घोषणा करता है।

[2] मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-सुरा = मदिरा, शराब । पान करना = पीना। जग = संसार । ध्यान करना = परवाह करना । जग की गाते = संसार की स्तुति करते।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह हमेशा अपने प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं हमेशा प्रेम रूपी मदिरा का पान करता रहा हूँ। भाव यह है कि मैं हमेशा प्रेम के भावों में डूबा रहा हूँ। इसलिए मुझे सांसारिक बाधाओं की कोई चिंता नहीं है। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि संसार के लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं? संसार हमेशा उन लोगों की स्तुति करता है जो सदैव सामाजिक दायित्वों में उलझे रहते हैं तथा निजी सुख-दुख की परवाह नहीं करते, परंतु मैं तो अपने गीतों द्वारा अपने मन के भावों को व्यक्त करता हूँ। आशय यह है कि मेरी कविताओं में मेरे प्रेममय व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति हुई है।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की है और सांसारिक बाधाओं की परवाह न करने का वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  5. प्रवाहमयी भाषा के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, कोमलता तथा मधुरता देखी जा सकती है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करता?
(ख) ‘स्नेह-सुरा’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) जग किसको पूछता है?
(घ) कवि ने अपने गीतों में किस प्रकार के भावों को व्यक्त किया है?
(ङ) इस पद्यांश में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय के प्रेम में रम गया है। वह हमेशा अपने प्रिय को पाना चाहता है। इसलिए वह संसार के झंझटों की परवाह नहीं करता और उससे दूर रहना चाहता है।

(ख) ‘स्नेह-सुरा’ का अर्थ है प्रेम की मस्ती अथवा प्यार का दीवानापन। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती का पान करता रहता है। इसलिए उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।

(ग) यह संसार केवल उसी को पूछता है जो उसकी चिंता करता है। यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि सांसारिक प्राणी केवल उसी व्यक्ति को महत्त्व देते हैं जो अपनी कविताओं में सांसारिक बातों का वर्णन करते हैं।

(घ) कवि अपने गीतों में स्वच्छंद प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करता है। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज, सरल, तत्समनिष्ठ तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग किया है।

[3] मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भाव। उपहार = भेंट। अपूर्ण = अधूरा। भाना = अच्छा लगना। स्वप्नों का संसार = नवीन इच्छाओं का संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन का वर्णन किया है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

याख्या-मेरे निजी हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। हमेशा वे मनोभाव मेरे हृदय में उमडते-घमडते रहते हैं। इसलिए मैं इस संसार को अपने हृदय के कोमल भाव देना चाहता हूँ। यह बाह्य संसार अधूरा है, क्योंकि इसमें प्रेम का अभाव है। इस अधूरे संसार को मैं पसंद नहीं करता। मेरे मन में प्रेममय संसार का सपना निवास करता है, मैं उसी सपने को साकार करने के लिए भटकता रहता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रेममय संसार में ही लीन रहना चाहता हूँ।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है तथा खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  7. लिए फिरता हूँ के प्रयोग से काव्य में मस्ती का वातावरण उत्पन्न हो गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि के हृदय में किस प्रकार के उद्गार हैं?
(ख) कवि संसार को अपूर्ण क्यों कहता है?
(ग) “स्वप्नों के संसार’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) कवि के मन की दशा कैसी है?
(ङ) इस पयांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि के हृदय में प्रेममय उद्गार हैं। वह अपने प्रिय को भरपूर प्रेम देना चाहता है और प्रेममय जीवन-यापन करना चाहता है।

(ख) कवि के अनुसार प्रेमशून्य संसार अपूर्ण और अधूरा है। परन्तु यदि जीवन में प्रेम की प्राप्ति हो जाती है तो जीवन मधुर लगने लगता है।

(ग) स्वप्नों के संसार’ से कवि का तात्पर्य है-प्रेममय जीवन। जो लोग प्रेम की भावना से परिपूर्ण होकर जीते हैं, वे ही जीवन का आनंद उठाना जानते हैं।

(घ) कवि अपने हृदयगत प्रेम को अपने प्रिय के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि को यह संसार प्रेम के बिना अपूर्ण लगता है। इसलिए वह प्रेममय जीवन जीना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है और प्रेम को मानव-जीवन की मूल भावना माना है।

[4] मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-हृदय = मन। अग्नि = आग (भावों का आवेग)। दहा = जला। मग्न रहना = मस्त रहना। भव-सागर = संसार रूपी सागर। मौजों = किनारा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। कवि प्रेम की दीवानगी को ही अपना जीवन मानता है और प्रेम की मस्ती में जीना चाहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं स्वयं अपने हृदय में प्रेम की आग जलाता हूँ और उसी में जलता रहता हूँ। आशय यह है कि कवि को प्रेममय जीवन ही सुखद लगता है। वह प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को निरंतर भोगता रहता है। लोग इस संसार को मुसीबतों का सागर कहते हैं और उस पार उतरने के लिए कोई-न-कोई माध्यम अपनाते हैं। परंतु कवि प्रेम रूपी नाव के द्वारा ही सांसारिक बाधाओं को पार कर लेता है। इस प्रकार कवि संसार रूपी सागर के किनारे पर पहुँच जाता है। कवि यह सारा कार्य मौज और मस्ती के साथ करता है। प्रेम के कारण उसके मन में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम को जीवन का आधार स्वीकार किया है। वह प्रेम की मस्ती को ही अपना जीवन मानता है।
  2. ‘अग्नि’, ‘नाव’ में रूपकातिशयोक्ति एवं भवसागर’ और ‘भव मौजों में रूपक तथा ‘सुख-दुख’ में अनुप्रास अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर उसमें क्यों जला करता है?
(ख) कवि सुख-दुख में कैसे मग्न रहता है?
(ग) भव-सागर से पार उतरने के लिए नाव बनाने का क्या अर्थ है?
(घ) ‘भव मौजों से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय से अत्यधिक प्रेम करता है। प्रिय की यादें कवि को आनंद प्रदान करती हैं। इसलिए वियोगावस्था में भी कवि अपने प्रिय की विरहाग्नि में जलकर आनंद प्राप्त करता है।

(ख) अपने प्रिय की मधुर यादों में लीन रहने के कारण कवि सुख-दुख में भी मस्त रहता है, उसे सांसारिक चिंताएँ नहीं सतातीं।

(ग) इस संसार को भयंकर सागर कहा गया है। इसे पार करने के लिए कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नौका बनाकर इस भव-सागर को पार करना चाहता है।

(घ) ‘भव मौजों से कवि का अभिप्राय है संसार रूपी सागर का किनारा। कवि का आशय यह है कि संसार के आकर्षणों में उसकी कोई रुचि नहीं है। वह संसार में प्रवेश ही नहीं करना चाहता। सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर ही वह प्रेम का सच्चा आनंद प्राप्त करना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि वह प्रेम की उन्मत्तता में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को भोगना चाहता है। वह अपनी प्रेम रूपी नौका द्वारा ही इस संसार रूपी सागर को पार करना चाहता है।

[5] मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-यौवन = जवानी। उन्माद = मस्ती, पागलपन। अवसाद = दुख तथा निराशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को ही श्रेष्ठ माना है। इसमें कवि प्रेम के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति करता है तथा प्रेम की दीवानगी तथा निराशा का वर्णन करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मेरे जीवन में यौवन की एक मस्ती है। मैं अपनी प्रिया को मिलने के लिए हमेशा व्याकुल रहता हूँ। मैं प्रिया के प्रेम का दीवाना हूँ। यद्यपि वियोगावस्था के कारण मेरे अंदर निराशा तथा दुख के भाव उत्पन्न हो गए हैं, लेकिन मैं लोगों के सामने हमेशा हँसता रहता हूँ। वियोग की पीड़ा मेरे हृदय को परेशान कर देती है। मेरे मन में प्रिया की याद ऐसे समा चुकी है कि मैं उसे याद करके मन ही मन रोता रहता हूँ, परंतु लोगों के सामने हँसने का अभिनय करता हूँ। भाव यह है कि प्रिया का वियोग हमेशा मुझे अन्दर-ही-अन्दर कचोटता रहता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने श्रृंगार के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि ने वियोगावस्था से उत्पन्न अपनी दीवानगी, निराशा तथा बेचैनी का स्वाभाविक वर्णन किया है।।
  2. कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. यह पद्यांश विषयानकल मस्ती, मादकता, मधुरता, कोमलता से परिपूर्ण है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता है तथा वियोग शृंगार का सफल वर्णन हुआ है।
  7. ‘हाय’ शब्द से कवि की विरह वेदना साकार हो उठी है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) ‘यौवन के उन्माद’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कवि अवसाद से ग्रस्त क्यों है?
(ग) कवि के भीतर तथा बाहर कैसी असंगति है?
(घ) इस पद्यांश में किस प्रकार के श्रृंगार रस का चित्रण हुआ है और क्यों?
(ङ) इस पयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) ‘यौवन के उन्माद’ से कवि का अभिप्राय है-यौवनकालीन अल्हड़ जवानी में मन में प्रेम का जोश। लगता है कि कवि नए-नए प्रेम के कारण अत्यधिक व्याकुल है, प्रिया का वियोग उसे व्यथित कर देता है।

(ख) कवि की प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः कवि प्रेमजन्य निराशा के कारण अत्यधिक व्यथित है। इसलिए वह अवसाद से ग्रस्त है।

(ग) भले ही कवि विरह-व्यथा के कारण अन्दर-ही-अन्दर कसमसाता रहता है, परन्तु वह संसार के सामने हमेशा हँसता तथा मुस्कुराता रहता है। वह नहीं चाहता कि लोग उसकी विरह-व्यथा का मज़ाक बनाए। इसलिए कवि का मन अन्दर से सुंदर तथा बाहर से अंसगत दिखाई देता है।

(घ) इस पद्यांश में शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है। कवि अपनी प्रिया के प्रेम से वंचित है इसलिए वह निराशा और अवसाद से ग्रस्त है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि सहज, सरल शब्दावली में अपनी वियोग जनित अभिलाषा और पीड़ा को व्यक्त करता है।

[6] कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-यत्न = कोशिश। नादान = भोला-भाला। दाना = लाभ। मूढ = मूर्ख। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेम की दीवानगी तथा मस्ती का संवेदनशील वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि सांसारिक दौड़-धूप को व्यर्थ बताता हुआ यही सलाह देता है कि मनुष्य को मस्ती के साथ जीना चाहिए।

व्याख्या कवि कहता है कि संसार के सभी लोग अनेक प्रयास करके थक चुके हैं। सभी ने सत्य को जानने की बड़ी कोशिश की, परंतु कोई सत्य को नहीं जान सका। इसका प्रमुख कारण यह है कि जो लोग संसार के धन-वैभव अथवा भोग-विलास की सामग्री एकत्रित करने में लगे हैं, वे सभी मूर्ख हैं। वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि संसार के जाल में उलझकर कोई सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकता। कवि सोचता है कि मैं ऐसे लोगों को मूर्ख क्यों न कहूँ जो सांसारिक लाभ तथा लोभ में उलझे हुए हैं। मैं तो इस मूर्खता को समझ चुका हूँ। इसलिए मैं तो इस सांसारिक ज्ञान को भुलाकर प्रेम की मस्ती में जीना चाहता हूँ।

विशेष-
(1) इस पद्यांश में कवि ने सांसारिक सुख-वैभव की व्यर्थता को सिद्ध करने का प्रयास किया है।

(2) ‘कर यत्न मिटे सब सत्य’ में अनुप्रास अलंकार ‘सत्य किसी ने जाना’ में प्रश्नालंकार तथा “सीखा ज्ञान भुलाना’ में विरोधाभास अलंकारों का संदर व स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। इस संदर्भ में ‘कबीरदास’ ने भी कहा है
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’।

(3) कवि ने संसार को मूर्ख सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क दिए हैं।

(4) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(5) शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

(6) इस पद्यांश में आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है तथा मुक्त छंद है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि किसे नादान कहता है और क्यों?
(ख) ‘दाना’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि ‘जग को मूढ़’ क्यों कहता है?
(घ) कवि किस प्रकार के ज्ञान को भलाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि उन लोगों को नादान कहता है जो सांसारिक धन-वैभव को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन भाग-दौड़ करते रहते हैं। कवि का विचार है कि अज्ञानता के कारण लोग प्रेम मार्ग को त्यागकर धन-वैभव तथा भोग-विलास में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं।

(ख) ‘दाना’ से कवि का अभिप्राय है सांसारिक धन-वैभव और भोग-विलास जो मनुष्य को सच्चा सुख प्रदान नहीं करते।

(ग) जो लोग सांसारिक सुख भोग की संपत्ति का संग्रह करने में लगे हुए हैं, कवि उन्हें मूढ़ कहता है क्योंकि ऐसे लोग ही अज्ञान के कारण प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाते।

(घ) कवि सांसारिक विषय-वासनाओं के ज्ञान को भुलाना चाहता है, क्योंकि यह ज्ञान कवि को सच्चा सुख प्रदान नहीं करता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सत्य पर प्रकाश डाला है कि संसार में जीवन के सत्य को कोई नहीं पहचान सका। जो लोग सांसारिक मोह-माया के शिकार बने हुए हैं, वह निश्चित ही मूर्ख हैं। कवि ने इस प्रकार के ज्ञान को भुलाने की कामना की है।

[7] मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग में उस पृथ्वी को ठुकराता! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-जग = संसार। नाता = संबंध। रोज़ = प्रतिदिन। वैभव = धन-संपत्ति। प्रतिपग = हर कदम।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने निजी प्रेम का खुले शब्दों में वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि ने स्वयं को सांसारिक मोह-माया से भिन्न बताया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरा इस संसार में कोई लंबा-चौड़ा संबंध नहीं है। मैं भावनाओं का कवि हूँ और संसार की रीति-नीति से सर्वथा भिन्न हूँ। संसार के लोग दुनियादारी निभाने में लगे रहते हैं, लेकिन मैं अपने जीवन में भावनाओं को महत्त्व देता हूँ। इसलिए मेरा संसार से कोई मेल नहीं है। मैं प्रतिदिन न जाने कितने संसार बनाता हूँ और न जाने कितने मिटा डालता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रतिदिन एक आदर्श समाज बनाने की कल्पना करता हूँ। परंतु जब मेरी कल्पना साकार नहीं होती तो मैं नई कल्पना करने लगता हूँ। इस संसार के लोग धन-संपत्ति का संग्रह करने में लगे हैं, लेकिन मेरे मन में धन-वैभव के लिए कोई लालसा नहीं है। मैं हर कदम पर धन-वैभव में लगे हुए इस संसार को ठुकराता हुआ चलता हूँ। मेरे मन में सुख-समृद्धि की कोई इच्छा नहीं है।

विशेष-

  1. कवि ने सांसारिक धन-वैभव को त्यागकर भावनाओं के प्रति अपनी आसक्ति को व्यक्त किया है।
  2. कवि का यह चिंतन पूर्णतया मौलिक और दार्शनिक है।
  3. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण विपर्यय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कहाँ का माता’ में प्रश्नालंकार, ‘जग जिस पृथ्वी पर’, ‘प्रति पग में अनुप्रास, ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति अलंकार, ‘और’ में यमक (भिन्न तथा ‘व’ के अर्थ में) इन अलंकारों की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. इस पद्यांश में प्रसाद गुण है तथा संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि स्वयं को संसार से अलग क्यों समझता है?
(ख) ‘और जग और’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवि किस प्रकार के संसार को मिटाता रहता है?
(घ) कवि स्वयं को संसार से क्यों नहीं जोड़ पाता?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के अन्य लोगों के समान धन-संपत्ति के संग्रह में विश्वास नहीं करता। वह तो निजी भावनाओं में ही खोया रहता है। इसलिए वह स्वयं को संसार से अलग समझता है।

(ख) ‘और जग और’ का भावार्थ यह है कि संसार के लोग कवि की भावनाओं को समझ नहीं पाते। सांसारिक प्राणी धन-संपत्ति के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन कवि प्रेम और प्यार के संसार में खोया रहता है।

(ग) कवि तो प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। इसलिए वह कल्पना द्वारा एक आदर्श समाज बनाने का प्रयास करता है परंतु जब वह प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो वह उसे नष्ट कर देता है। इस प्रकार वह फिर से प्रेममय संसार की कल्पना करने लगता है।

(घ) कवि प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है, परंतु संसार के लोग धन-वैभव के संग्रह में लगे हुए हैं। इसलिए कवि और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। इसी कारण कवि स्वयं को संसार से जोड़ नहीं पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वयं को संसार से अलग समझता है। वह प्रेम और प्यार की भावनाओं को अलग महत्त्व देता है। इसलिए वह एक ऐसा संसार बनाना चाहता है जो प्रेम और प्यार पर आधारित हो। इसलिए कवि सांसारिक धन-वैभव को ठोकर मारकर प्रेममय संसार बनाने की कामना करता है।

[8] मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ। [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-निज = अपना। रोदन = रोना। राग = प्रेम। आग = जोश, आवेश। भूप = राजा। प्रासाद = महल। खंडहर = टूटा-फूटा भवन। निछावर = कुर्बान करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरे रोने में प्रेम छिपा हुआ है अर्थात् मैं अपने गीत में प्रेम के आँसू बहाता रहता हूँ। भले ही मेरी वाणी कोमल तथा शीतल है फिर भी उसमें प्रेम-विरह की आग है। मेरे गीतों में एक ऐसा जोश है जो मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देता है। प्रेम पर तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपने महलों को न्योछावर कर देते हैं, परंतु मेरा प्रेम निराशा के कारण टूटे-फूटे भवन जैसा हो गया है। फिर भी मैं अपने मन में उस मल्यवान प्रेम को लिए फिरता हूँ। मैं अपनी इस विरह-भावना से अत्यधिक प्रेम करता

विशेष-

  1. इसमें कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है तथा साथ ही स्पष्ट किया है कि उसकी वाणी कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें विरहाग्नि छिपी हुई है। कवि ने अपने विरह जनित प्रेम को खंडहर बताकर अपनी निराशा को व्यक्त किया
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि अपने ‘रोदन में राग को क्यों लिए फिरता है?
(ख) ‘शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) राजाओं के प्रासाद किस पर न्यौछावर होते हैं?
(घ) कवि के अनुसार खंडहर का भाव क्या है?
(ङ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि के स्वर में निराशा और व्यथा है। लेकिन कवि के इस रुदन में सच्चे प्रेम की भावना है। वह वियोग जनित वेदना को इसलिए अपने हृदय में लिए हुए है, क्योंकि वह अपने प्रेम को भुला नहीं सकता।

(ख) विरह-वेदना के कारण कवि का स्वर कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें अपने प्रिय को न पा सकने की बेचैनी भी प्रबल है। यहाँ शीतलता और अग्नि का संयोग अद्भुत है। कवि अपनी विरहाग्नि को अपने गीतों में छिपाए हुए है। बडे राजा भी प्रेम के लिए अपना सब कछ त्याग देते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी प्रिया को पाने के लिए राजगद्दी भी छोड़ देते हैं और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

(घ) जिस प्रकार महल टूटकर खंडहर हो जाता है, उसी प्रकार कवि के प्रेम का महल भी टूट चुका है, अब उसके हृदय में केवल उसकी प्रिया की यादें ही बसी हैं जिसकी तुलना कवि खंडहर के साथ करता है।

(ङ) कवि ने अपने कोमल गीतों द्वारा अपनी विरह वेदना को व्यक्त किया है। यह वेदना अग्नि के समान कवि को गीत लिखने की प्रेरणा देती है।

[9] मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-फूट पड़ा = अत्यधिक आवेग से रोना। छंद बनाना = कविता लिखना। दीवाना = पागल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने सरल शब्दों में यह समझाने का प्रयास किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या कवि कहता है कि तुम मेरी कविता को गीत कहते हो। यह कोई गाना नहीं है, बल्कि मेरे हृदय का रुदन है, मेरी विरह-वेदना है। प्रेम की निराशा के कारण ही मेरी भावनाएँ अत्यधिक आवेग के साथ व्यक्त हुई हैं, परंतु तुम इसे कविता की संज्ञा देते हो। सच्चाई तो यह है कि मेरे गीतों के माध्यम से मेरा क्रंदन फूट पड़ा है। संसार मुझे कवि समझकर क्यों अपनाना चाहता है? सच्चाई तो यह है कि मैं कवि नहीं हूँ, मैं तो प्रेम का दीवाना हूँ। मेरे हृदय में प्रेम की मस्ती भरी हुई है। मैं गीतों के माध्यम से प्रेम-विरह की भावनाओं को प्रकट करता हूँ।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्वीकार किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-व्यथा का रुदन है। यह कोई गीत नहीं है।
  2. कवि स्पष्ट करता है कि उसकी आवेगपूर्ण भावनाओं के कारण ही गीत की उत्पत्ति होती है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘क्यों कवि कहकर’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. संबोधन शैली के प्रयोग के कारण इस पद्य में नाटकीयता तथा सजीवता उत्पन्न हो गई है।
  7. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) लोग कवि के रुदन को गाना क्यों कहते हैं?
(ख) छंद बनाना और फूट पड़ना में क्या संबंध है?
(ग) कवि स्वयं को एक नया दीवाना क्यों कहता है?
(घ) संसार कवि को कवि कहकर क्यों अपनाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) भले ही कवि अपनी कविताओं के द्वारा अपनी विरह-व्यथा को व्यक्त करता है, लेकिन लोग उसकी कविता से प्यार करते हैं। इसीलिए उसे गाना कहते हैं।

(ख) जब कवि अपनी तीव्र विरह-व्यथा को काव्य में शब्दों द्वारा व्यक्त करता है तो उसे छंद बनाना कहते हैं। वस्तुतः एक उत्कृष्ट कविता में भावनाओं का आवेग अवश्य होना चाहिए तभी वह कविता पाठक को भाव-विभोर करती है।

(ग) कवि स्वयं को नया दीवाना इसलिए कहता है क्योंकि उसके हृदय में प्रेम की मस्ती है और अपने गीतों द्वारा प्रेममयी भावनाओं को व्यक्त करता है।

(घ) संसार कवि को कवि कहकर इसलिए अपनाना चाहता है क्योंकि कवि की भावनाएँ छंदोबद्ध रचना के माध्यम से व्यक्त हुई है। संसार के लोग कवि को मात्र कवि समझते हैं, परंतु कोई भी उसकी प्रेम भावनाओं को नहीं समझ पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज तथा स्पष्ट शब्दावली में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके प्रत्येक गीत के पीछे उसकी विरह-वेदना छिपी हुई है। इस विरह-वेदना के कारण ही कवि के गीत उत्पन्न हुए हैं।

[10] मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-मादकता = मस्ती। निःशेष = पूर्ण। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी प्रेम भावना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं इस संसार में प्रेम के दीवानों की वेशभूषा धारण करके विचरण कर रहा हूँ। इसलिए लोग मुझे दीवाना समझते हैं। परंतु मैं अपनी दीवानगी से सबको मस्त बना देता हूँ। मेरे संपूर्ण काव्य में एक मस्ती और उल्लास है। इसीलिए मैं प्रेम और यौवन के गीत गाता हूँ। यही कारण है कि लोग मेरे गीतों को सुनकर झूम उठते हैं। प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती से लहराने लगते हैं। मैं अपने पाठकों को मौज और मस्ती का संदेश देना चाहता हूँ। मेरी कविता में केवल प्रेममयी भावनाओं का ही वर्णन अभिव्यक्त हुआ है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्पष्ट किया है कि वह प्रेम के कारण दीवाना हो चुका है और सभी को प्रेम की मस्ती का संदेश देना चाहता है।
  2. ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. ‘लिए फिरता हूँ शब्दों के प्रयोग के कारण इस पद्यांश में संगीत और मस्ती समाहित हो गई है।
  7. प्रसाद गुण है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि संसार को क्या संदेश देना चाहता है?
(ख) कवि की किस बात को सुनकर संसार के लोग झूमते, झुकते और लहराने लगते हैं?
(ग) ‘मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) कवि के गीतों में मादकता क्यों है?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के लोगों को यह संदेश देना चाहता है कि वे सांसारिक झंझटों को त्यागकर प्रेम और मस्ती के साथ जीवन-यापन करें। इसी से उन्हें सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी।

(ख) कवि के गीतों में प्रेम की मस्ती और मादकता है जिसे सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं, प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती में लहराने लगते हैं।

(ग) यहाँ कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह प्रेम के दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपनी प्रिया के प्रेम को प्राप्त करना है।

(घ) कवि प्रेम की मस्ती में आकंठ डूबा हुआ है। वह हमेशा प्रेम और यौवन के गीत गाता है। इसलिए हमेशा प्रेम और मस्ती में ही डूबा रहता है। उसे सांसारिक मोह-माया से कोई लगाव नहीं है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम की मस्ती के कारण वह दीवाना बन चुका है। उसकी इसी मादकता पर संसार के लोग झूम उठते हैं और वह लोगों को इसी मस्ती का संदेश देना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

एक गीत पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-पथ = रास्ता। मंजिल = लक्ष्य। पंथी = मुसाफिर । ढलना = समाप्त होना।

प्रसंग प्रस्तत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मुसाफिर बार-बार यह सोचता है कि कहीं उसे रास्ते में रात न हो जाए। मंजिल अब उस नहीं है। वह पास ही आने वाली है। भाव यह है कि वह अपने प्रिय को प्राप्त करने वाला है। बार-बार अपने प्रिय के बारे में सोचकर वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता है, ताकि वह अपने प्रिय से मिल सके। प्रिय-मिलन की बेचैनी के कारण उसे लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है और कभी भी छिप सकता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का बड़ा ही सजीव, सूक्ष्म वर्णन किया है।
  2. प्रेमी को दिन के छिपने का डर लगा रहता है इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है। इस प्रकार प्रेमी की व्यग्रता को व्यक्त किया गया है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल, साहित्यिक और प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. कोमलकांत पदावली के कारण इस गीत में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘थका हुआ पंथी’ किस कारण जल्दी-जल्दी चलता है?
(ग) ‘पंथी’ किस आशा से प्रेरित होकर जल्दी-जल्दी चलता है?
(घ) ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। कवि को यह कथन बेचैन क्यों करता है?
(ङ) इस,पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि का नाम हरिवंशराय बच्चन कविता का नाम एक गीत

(ख) थका हुआ मुसाफिर अपने लक्ष्य को पास देखकर उसे जल्दी से प्राप्त करना चाहता है, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(ग) पंथी के मन में यह आशा उत्पन्न हो चुकी है कि उसकी मंजिल पास आ चुकी है इसलिए अब जल्दी से उसका प्रिय से मिलन होगा। इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(घ) कवि अपनी मंजिल को पाने के लिए बेचैन है। वह चाहता है कि दिन छिपने से पहले अपने प्रिय को प्राप्त कर ले, लेकिन दिन जल्दी-जल्दी अस्त होने जा रहा है इसलिए वह बेचैन हो उठता है।

(ङ) कवि ने यह स्पष्ट किया है कि लक्ष्य को पाने वाला व्यक्ति हमेशा व्यग्र रहता है। उसे लगता है कि समय जल्दी से बीतता जा रहा है। इसलिए वह बड़ी तीव्र गति से अपने काम को पूरा करना चाहता है। इस प्रकार के व्यक्ति का मन बड़ा बेचैन हो उठता है।

[2] बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-प्रत्याशा = आशा। नीड़ = घोंसला। झाँकना = बाहर देखना। पर = पंख। चंचलता = तीव्रता। .

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इसमें कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा अपनी मन की व्याकुलता को व्यक्त किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि जब चिड़ियाँ आकाश में उड़ती हुई अपने घोंसलों में लौटती हैं तो उनके मन में बार-बार यह विचार उठता है कि उनके बच्चे बेचैन होकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह बार-बार घोंसलों से मुँह बाहर निकालकर झाँक रहे होंगे। चिड़ियों को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। इसलिए वे तीव्र गति से अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए घोंसलों की तरफ बढ़ने लगती हैं। उनके मन में यह भय सताता रहता है कि कहीं दिन न छिप जाए। इसलिए वह तीव्र गति से उड़ने लगती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा प्रेमी के हृदय की बेचैनी को व्यक्त किया है।
  2. जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश का बिंब-विधान तथा चित्र-विधान दोनों ही आकर्षक बन पड़े हैं।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य भाव का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) बच्चे किस आशा से नीड़ों से बाहर झाँक रहे होंगे?
(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा किस दृश्य की कल्पना की गई है?
(ग) चिड़ियों के पंखों में चंचलता क्यों उत्पन्न हो जाती है?
(घ) चिड़ियों को क्यों लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है?
(ङ) इस कविता द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
(क) चिड़ियों के बच्चे इसलिए घोंसलों से बाहर झांक रहे हैं, क्योंकि वे माँ के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि माँ लौटकर उन्हें चुग्गा देगी। इसलिए वे माँ की ममता के लिए बेचैन हैं।

(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा उस दृश्य की कल्पना की है जब चिड़ियों के बच्चे अपने माँ के आने की प्रतीक्षा के कारण घोंसलों से बाहर झाँकने लगते हैं। एक ओर उनके मन में माँ की ममता होती है और दूसरी ओर वे भूखे होते हैं।

(ग) चिड़िया अपने बच्चों से शीघ्र मिलना चाहती है। बच्चों की ममता उन्हें पुकारती है। वे शीघ्र ही बच्चों को भोजन व सुरक्षा देना चाहती है। इसीलिए उनके पंखों में चंचलता उत्पन्न हो गई है।

(घ) चिड़ियों के मन में बेचैनी है। वे जल्दी-जल्दी अपने शावकों के पास पहुँच जाना चाहती हैं। परंतु उनकी मंजिल दूर है। इसी बेचैनी के कारण उन्हें लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है।

(ङ) कवि ने माँ की ममता का सजीव चित्रण किया है। वात्सल्य और प्रेम के कारण ही शावकों का मन बेचैन हो उठता है। चिड़ियों के माध्यम से कवि ने मानवीय ममता तथा वात्सल्य का सजीव वर्णन किया है।

[3] मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ-विकल = व्याकुल। हित = के लिए। चंचल = बेचैन, क्रियाशील। शिथिल = ढीला करना। पद = पाँव। उर = हृदय। विह्वलता = आतुरता का भाव।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी हृदयगत निराशा, उदासी तथा प्रेम की असफलता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो मुझसे मिलने के लिए बेचैन हो। इसलिए मेरा मन किसी के लिए भी चंचल नहीं होता। आशय यह है कि मेरे मन में किसी के प्रति प्रेम की भावना नहीं है। यह स्थिति मेरे कदमों को शिथिल कर देती है। प्रेम के अभाव के कारण मैं ढीला पड़ जाता हूँ और मेरे हृदय में निराशा तथा उदासी की भावना उत्पन्न होकर मुझे व्याकुल कर देती है। फिर भी मैं प्रेम की तरंग में खो जाता हूँ और दिन जल्दी-जल्दी ढल जाता है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम के क्षेत्र में असफल होने के कारण अपने हृदयगत निराशा और उदासी का संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा प्रथम दो पंक्तियों में प्रश्नालंकार है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  5. प्रसाद गुण है तथा वियोग-शृंगार का परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि के मन में यह प्रश्न क्यों उठता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल है?
(ख) कवि किसके लिए चंचलता को त्याग देता है?
(ग) कवि के कदम शिथिल क्यों हो जाते हैं?
(घ) कवि के मन में कैसी विह्वलता उत्पन्न होती है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अब अकेला रह गया है, क्योंकि उसका प्रिय उसे छोड़कर चला गया है। इसीलिए वह सोचता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं है।

(ख) कवि के मन में अब अपने प्रिय को मिलने की बेचैनी नहीं है। इसलिए वह चंचलता को त्याग देता है।

(ग) कवि अब समझ चुका है कि जिसे वह प्रेम करता था, अब वह उसे मिलने वाला नहीं है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं और वह तटस्थ भाव से चलने लगता है।

(घ) कवि के मन में यह विह्वलता उत्पन्न होती है कि वह इस प्रेममय संसार में अकेला रह गया है। कोई भी व्यक्ति अब उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा, इसलिए कवि निराश व उदास है।

(ङ) कवि ने यह स्वीकार किया है कि उसकी प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः वह अब अकेला रह गया है। इसलिए इस पद्यांश में कवि की वियोगजन्य पीड़ा का मार्मिक वर्णन हुआ है।

आत्म-परिचय, एक गीत Summary in Hindi

आत्म-परिचय, एक गीत कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री हरिवंश राय बच्चन का आधुनिक हिंदी कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद (प्रयाग) के कटरा मुहल्ले के एक कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था जो अपने मधुर स्वभाव के कारण सभी लोगों में प्रिय थे। बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा काशी में हुई। सन् 1938 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य करने लगे। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। भारत सरकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनको विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया। सन् 1966 में बच्चन जी राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए।

बच्चन जी को अपने आरंभिक जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति सुखद नहीं थी। वे अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। तभी उनकी पत्नी श्यामा असाध्य रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु का शिकार हो गई। पत्नी की मृत्यु से कवि को गहरा आघात लगा। जिससे उनके जीवन में केवल निराशा एवं दुख छा गया। सन् 1942 में कवि ने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह किया। तेजी बच्चन के आने से उनके जीवन का भाग्योदय हुआ और वे निरंतर प्रगति करते चले गए। भारत सरकार ने बच्चन जी को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया।

2. प्रमुख रचनाएँ बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-‘मधुशाला’ (सन् 1935), ‘मधुबाला’ (सन् 1938), ‘मधुकलश’ (सन् 1938), ‘निशा निमंत्रण’, ‘आकुल-अंतर’, ‘एकांत संगीत’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘सतरंगिणी’, ‘दो चट्टानें’, ‘मिलनयामिनी’, ‘आरती’ और ‘अंगारे’, ‘नये पुराने झरोखे’, ‘टूटी-फूटी कड़ियाँ’ आदि। उनकी कुछ आत्मकथामूलक रचनाओं से उनके संपूर्ण जीवन का विशद वर्णन मिलता है। ये रचनाएँ हैं-‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान तक।
सन् 2003, में मुंबई में इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

3. काव्यगत विशेषताएँ उत्तर छायावादी कवियों में बच्चन जी को विशेष प्रसिद्धि मिली। वे हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों का अत्यंत सुन्दर अनुवाद किया था। ‘मधुशाला’ बच्चन जी की एक उल्लेखनीय रचना है, जिसमें प्रेम की मस्ती देखी जा सकती है। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’ तथा ‘मधुकलश’ उनकी कीर्ति की आधार-स्तंभ काव्य-रचनाएँ हैं। उनके काव्य में प्रेम भावना, मदमस्त जीवन तथा भाग्यवाद का समर्थन देखने को मिलता है। उनके काव्य की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) व्यक्तिनिष्ठता श्री हरिवंश राय बच्चन आधुनिक हिंदी काव्य की वैयक्तिक काव्यधारा के प्रमुख कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा व्यक्तिनिष्ठ है। उन्होंने वैयक्तिक यथार्थ की भूमिका पर ही जीवन एवं जगत को देखने व समझने का प्रयास किया है। वे समाज-हित के साथ-साथ व्यक्ति-हित को भूलने के पक्ष में नहीं हैं। कहीं-कहीं उनके साहित्य में वैयक्तिकता के नाम पर पलायनवादिता का स्वर भी सुनाई पड़ता है।

(ii) प्रेम,और सौंदर्य-वस्तुतः हरिवंश राय बच्चन प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। उनके अन्य साहित्य में भी उनकी यह भावना देखी जा सकती है। उनके साहित्य में प्रेम और सौंदर्य के साथ जीवन के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है। उनकी रचनाओं में गहन अनुभूतियों को भी सर्वत्र देखा जा सकता है
“इस पार प्रिये, तुम हो, मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।”

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

(iii) मानवतावाद-बच्चन जी की रचनाओं में मानवतावादी भावना भी मुखरित हुई है। उनकी रचनाओं में मानव मात्र के प्रति प्रेम का भाव सर्वत्र व्याप्त है। वे मानव की करता को देखकर व्यथित हो उठते हैं।

(iv) सामाजिक यथार्थ बच्चन जी की गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सजीवता से हुआ है। सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ उनकी रचनाओं की प्रक्रिया भी अनायास ही मुखरित हो उठी है। उनकी आत्मकथात्मक रचनाओं में उनके संघर्षशील जीवन के दर्शन होते हैं।

(v) आशा और सूजन का स्वर-बच्चन जी की कविताओं में केवल प्रणय और निराशा ही नहीं, बल्कि आशा और सृजन का स्वर भी सुनाई पड़ता है। ‘पथ की पहचान’ नामक कविता में कवि ने मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। वे पाठकों को सृजन की कल्पना करने तथा यथार्थ को स्वीकार करने का संदेश भी देते हैं। ‘बंगाल का अकाल’ शीर्षक कविता तथा ‘परवर्ती’ काव्य में कवि ने जन-जीवन को प्रतिस्थापित किया है और नए संदर्भो को प्रस्तुत किया है। एक स्थल पर कवि कहता है
“किंतु जग के पथ पर यदि
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर लो।”

4. भाषा, छंद एवं अलंकार-बच्चन जी ने अपनी काव्य रचनाओं में आडंबरहीन भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में यदि प्रवाह है, तो चित्र विधान की शक्ति तथा प्रतीक शब्द योजना भी है। वे हमेशा सीधे ढंग से अपनी बात कहते हैं। वे भाषा में अभिधा-शक्ति का प्रयोग करते हुए अपने मन के भाव पाठकों तक पहुँचाते हैं। गेय होने के कारण उनकी रचनाओं को गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही कारण है कि आधुनिक गीतकारों में उनका प्रमुख स्थान है।
बच्चन जी की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप में हुआ है। अनुप्रास, रूपक, यमक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरण के लिए
अनुप्रास-“है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे।”
रूपक-“ये उदय होते, लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में।”
उपमा-“घूमती नूरमहल थी एक दिवस बन जिन महलों की नूर।
खड़े हैं खंडहर से वे आज किसी दिन हो जाएँगे धूर।”
मानवीकरण-“रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता।”
बच्चन जी के कवि-रूप पर विचार करते हुए डॉ० मत्येंद्र नाथ शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘कविता का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में लिखा है
“छायावादी संस्कारों से अलग हटकर बच्चन ने कविता को नितांत नवीन संदर्भ प्रदान किया है। इनकी रचना-यात्रा में व्यष्टि-समष्टि, सूक्ष्म-स्थूल, सामान्य-विशेष तथा विभिन्न सामाजिक रूपों का सफल चित्रण हुआ है।”

आत्म-परिचय कविता का सार

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘आत्मपरिचय’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘आत्मपरिचय’ श्री हरिवंश राय बच्चन की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें कवि ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। कवि अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदा सजग है। वह जीवन के कष्टों तथा बाधाओं चाहता है। प्रेम से उसका हृदय झंकृत है। वह हमेशा अपनी प्रिया के स्नेह में लीन रहता है। संसार के अन्य लोग हमेशा अपनी समस्याओं में उलझे रहते हैं, परंतु कवि का हृदय प्रेम से सदा सराबोर रहता है। वह संसार की कभी चिंता नहीं करता। सांसारिक जीवन के बोझ को ढोता हुआ भी वह जीवन में प्यार को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। कवि के हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। ये मनोभाव उसके लिए उपहारस्वरूप हैं। यह अधूरा संसार कवि को अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार मे डूबा रहता है। सुख-दुख दोनों कवि के लिए एक समान हैं। वह अपने प्रेम की मस्ती और उमंग से जीवनयापन करना ही ठीक समझता है और इस प्रकार प्रेम रूपी नाव के द्वारा संसार की मुसीबतों को पार करता है। कवि के मन में सदा यौवन का पागलपन सवार रहता है। इसीलिए वह अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए बेचैन रहता है। प्रिया का वियोग कवि को पीड़ित करता है, लेकिन वह संसार के सामने हँसता रहता है। संसार के अनेक लोगों ने सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य को जान नहीं पाया। लोग संसार के भौतिक साधनों का संग्रह करने के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। परंतु कवि जान चुका है कि इससे दूर रहने में ही भलाई है।

संसार जिसे हर रोज़ जोड़ने का प्रयास करता है, कवि उसे हर कदम पर ठुकराता हुआ चलता है। वह तो हमेशा भावनाओं के संसार में जीना चाहता है। कवि को अपने रोने में भी संगीत सुनाई देता है, उसकी शीतल वाणी में विद्रोह की आग है। उसका प्रेम भले ही खंडहर के समान टूटा-फूटा है, पर वह उस प्रेम पर राजाओं के महलों को भी न्योछावर करना चाहता है। अंत में कवि कहता है कि उसका रुदन ही गीत बन गया है। कवि ने खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त की, पर लोग उसे छंद की संज्ञा देते हैं। सचमुच कवि एक दीवाना है, उसके गीतों में एक मस्ती है, उसके गीतों को सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं। इसलिए कवि सबके लिए प्रेम की मस्ती का संदेश लिए गीत लिखता है।

एक गीत कविता का सार

प्रश्न-
‘एक गीत’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गीत ‘एक गीत’ ‘बच्चन जी’ का एक प्रसिद्ध प्रेमगीत है जो कि ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसमें कवि ने अपने प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है। कवि अपने प्रियजन से मिलने के लिए अत्यधिक बेचैन है। वह तीव्र गति से चलकर अपने प्रियजन तक पहुँच जाना चाहता है। उसे लगता है कि अब उसका लक्ष्य दूर नहीं है। कवि चिड़ियों का रूपक बाँधते हुए कहता है कि चिड़ियों के बच्चे अपने माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और वह अपने घोंसलों से बाहर झांककर देख रहे होंगे। यह सोच चिड़िया के पंखों में चंचलता उत्पन्न कर देती है। परन्तु कवि सोचता है कि इस संसार में कोई भी उसका अपना नहीं है जो उसे मिलने के लिए व्याकुल हो रहा है। इसलिए उसके कदम शिथिल पड़ जाते हैं। अंत में कवि स्पष्ट करता है कि प्रेम के कारण मनुष्य के जीवन में गतिशीलता का संचरण होता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh & Vitan Bhag 2 Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Hindi Solutions आरोह & वितान भाग 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh काव्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh गद्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi अभिव्यक्ति और माध्यम

HBSE 12th Class Hindi व्याकरण

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध

HBSE 12th Class Hindi Anivarya (Compulsory) Question Paper Design

Class: 12th
Subject: Hindi
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks354520100
Marks28361680

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions44106 (4sub part)24
Marks Allotted2016202480
Estimated Time60564024180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. आरोह भाग-2 (पद्य भाग)25
2. आरोह भाग-2 (गद्य भाग)20
3. वितान पूरक पुस्तक10
4. अभिव्यक्ति और माध्यम15
5. पाठ आधारित व्याकरण : संधि, समास, वाक्य शोधन, अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास यमक, मानवीकरण, श्लेष, पुनरूक्ति प्रकाश)10
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

HBSE 10th Class Sanskrit अन्योक्तयः Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृतभाषा में लिखिए-)
(क) सरसः शोभा केन भवति ?
(ख) चातकः कं याचते ?
(ग) मीनः कदा दीनां गतिं प्राप्नोति ?
(घ) कानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति ?
(ङ) वृष्टिभिः वसुधां के आर्द्रयन्ति ?
उत्तराणि
(क) सरसः शोभा एकेन राजहंसेन भवति।
(ख) चातकः पुरन्दरं याचते।
(ग) मीनः सरसि सङ्कोचम् अञ्चति दीनां गतिं प्राप्नोति।
(घ) नानानदीनदशतानि पूरयित्वा जलदः रिक्तः भवति।
(ङ) वृष्टिभिः वसुधां अम्भोदाः आर्द्रयन्ति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 2.
अधोलिखितवाक्येषु रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(अधोलिखित वाक्यों में रेखांकित पदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) मालाकारः तोयैः तरोः पुष्टिं करोति।
(ख) भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
(ग) पतङ्गाः अम्बरपथम् आपेदिरे।
(घ) जलदः नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति।
(ङ) चातकः वने वसति।
(च) अम्भोदाः वृष्टिभिः वसुधां आर्द्रयन्ति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) मालाकार: कैः तरोः पुष्टिं करोति ?
(ख) भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते ?
(ग) के अम्बरपथम् आपेदिरे ?
(घ) क: नानानदीनदशतानि पूरयित्वा रिक्तोऽस्ति ?
(ङ) चातक: कुत्र वसति ?
(च) अम्भोदाः वृष्टिभिः काम् आर्द्रयन्ति ?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 3.
उदाहरणमनुसृत्य सन्धिं/सन्धिविच्छेदं वा कुरुत
(उदाहरण के अनुसार सन्धि/सन्धिविच्छेद कीजिए-)
(i) यथा-अन्य + उक्तयः = अन्योक्तयः
(क) …… + ….. = निपीतान्यम्बूनि
(ख) ……. + उपकारः = कृतोपकारः
(ग) तपन + ……. = तपनोष्णतप्तम्।
(घ) तव + उत्तमा = ………..
(ङ) न + एतादृशाः = …………
उत्तराणि
(क) निपीतानि + अम्बूनि = निपीतान्यम्बूनि
(ख) कृत + उपकारः = कृतोपकारः
(ग) तपन + उष्णतप्तम् = तपनोष्णतप्तम्।
(घ) तव + उत्तमा = तवोत्तमा
(ङ) न + एतादृशाः = नैतादृशाः।

(ii) यथा-पिपासितः + अपि = पिपासितोऽपि
(क) …….. …….. = कोऽपि
(ख) ….. + ….. = रिक्तोऽसि (ग) मीनः + अयम्
(घ) ….. + आर्द्रयन्ति = वृष्टिभिरार्द्रयन्ति।
उत्तराणि
(क) कः + अपि = कोऽपि
(ख) रिक्तः + असि = रिक्तोऽसि
(ग) मीनः + अयम् = मीनोऽयम्
(घ) वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति = वृष्टिभिरार्द्रयन्ति।

(iii) यथा-सरसः + भवेत् = सरसोवेत्
(क) खगः + मानी = ……………….
(ख) ……….. +नु = मीनो नु
उत्तराणि
(क) खगः + मानी – खगो मानी
(ख) मीनः + नु = मीनो नु।

(iv) यथा-मुनिः + अपि = मुनिरपि
(क) तोयैः + अल्पः
(ख) ….. + अपि = अल्पैरपि
(ग) तरोः + अपि = ………..
उत्तराणि
(क) तोयैः + अल्पैः = तोयैरल्पैः
(ख) अल्पैः + अपि = अल्पैरपि
(ग) तरोः + अपि = तरोरपि

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

प्रश्न 4.
उदाहरणनुसृत्य अधोलिखितैः विग्रहपदैः समस्तपदानि रचयत
(उदाहरण के अनुसार अधोलिखित विग्रहपदों से समस्तपदों की रचना कीजिए-)
विग्रहपदानि समस्तपदानि
यथा-पीतं च तत् पड्कजम् = पीतपङ्कजम्
(क) राजा च असौ हंसः – ………………………………
(ख) भीमः च असौ भानुः – ………………………………
(ग) अम्बरम् एव पन्थाः – ………………………………
(घ) उत्तमा च इयम् श्री: – ………………………………
(ङ) सावधानं च तत् मनः, तेन – ………………………………
उत्तराणि
विग्रहपदानि समस्तपदानि
यथा-पीतं च तत् पङ्कजम् = पीतपड्कजम्
(क) राजा च असौ हंसः = राजहंसः
(ख) भीमः च असौ भानुः = भीमभानुः
(ग) अम्बरम् एव पन्थाः = अम्बरपन्थाः
(घ) उत्तमा च इयम् श्री: = उत्तमाश्री:
(ङ) सावधानं च तत् मनः, तेन = सावधानमनसा।

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प्रश्न 5.
उदाहरणमनुसृत्य निम्नलिखिताभिः धातुभिः सह यथानिर्दिष्टान् प्रत्ययान् संयुज्य शब्दरचनां कुरुत
(उदाहरण के अनुसार निम्नलिखित धातुओं के साथ यथानिर्दिष्ट प्रत्यय जोड़कर शब्दरचना कीजिए-)
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प्रश्न 6.
पाठमनुसृत्य अधोलिखितानां मूलशब्दानां यथानिर्दिष्टेषु विभक्तिवचनेषु रूपाणि लिखत
(पाठ के अनुसार अधोलिखित मूलशब्दों के यथानिर्दिष्ट विभक्ति और वचनों में रूप लिखिए-)
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उत्तराणि
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प्रश्न 7.
अधोलिखितयोः श्लोकयोः भावार्थं हिन्दीभाषया आंग्लभाषया वा लिखत
(अधोलिखित श्लोकों के भावार्थ हिन्दी भाषा या अंग्रेजी भाषा में लिखिए-)
(क) आपेदिरे ……. कतमां गतिमभ्युपैति।
(ख) आश्वास्य …… सैव तवोत्तमा श्रीः॥
उत्तराणि
(क) भावार्थ:-कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को पक्षियों या भौरों की तरह अवसरवादी नहीं होना चाहिए, अपितु जिन व्यक्तियों या संसाधनों का भले दिनों में हम लाभ उठाते हैं, उन पर विपत्ति आ जाने पर हमें भी उनका सहभागी बनना चाहिए। यह सहभागिता या सहयोग सूखे सरोवर में मछली की भाँति हमारी विवशता से उपजी नहीं होना चाहिए; अपितु कृतज्ञता के भाव से ही हमें ऐसा सहयोग करना चाहिए।
(ख) भावार्थ:-परोपकारी मनुष्य परहित के कार्यों में अपनी सारी सम्पत्ति व्यय कर स्वयं अतिसाधारण जीवन व्यतीत करते हैं। उन्हें इस अभावग्रस्त अवस्था में देखकर लगता ही नहीं कि ये कभी धनसम्पन्न रहे होंगे। कवि कहता है कि ऐसे परोपकारी मनुष्यों की अभावग्रस्तता ही उनकी शोभा और यशस्विता का कारण बन जाती है। जैसे जल बरसा कर बादल शोभायमान होता है।

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योग्यताविस्तारः

पाठपरिचय:
अन्येषां कृते या उक्तयः कथ्यन्ते ता उक्तयः (अन्योक्तयः) अत्र पाठे सङ्कलिता वर्तन्ते। अस्मिन् पाठे षष्ठश्लोकम् सप्तमश्लोकम् च अतिरिच्य ये श्लोकाः सन्ति ते पण्डितराजजगन्नाथस्य भामिनीविलास’ इति गीतिकाव्यात् सङ्कलिताः सन्ति। षष्ठः श्लोकः महाकवि-माघस्य ‘शिशुपालवधम्’ इति महाकाव्यात् गृहीतः अस्ति। सप्तमः श्लोकः महाकविभर्तृहरेः नीतिशतकात् उद्धृतः अस्ति।
पाठपरिचय-दूसरों के लिए जो उक्तियाँ कही जाती हैं, वे उक्तियाँ (अन्योक्तियाँ) इस पाठ में संकलित हैं। इस पाठ में छठे श्लोक और सातवें श्लोक को छोड़कर जो श्लोक हैं, वे पण्डितराज जगन्नाथ की ‘भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित हैं। छठा श्लोक महाकवि माघ के ‘शिशुपालवधम्’ महाकाव्य से लिया गया है। सातवाँ श्लोक महाकवि भर्तृहरि के ‘नीतिशतकम्’ से उद्धृत है।

कविपरिचय:
पण्डितराजजगन्नाथः संस्कृतसाहित्यस्य मूर्धन्यः सरसश्च कविः आसीत्। सः शाहजहाँ-नामकेन मुगल-शासकेन स्वराजसभायां सम्मानितः। पण्डितराजजगन्नाथस्य त्रयोदश कृतयः प्राप्यन्ते।

  1. गङ्गालहरी
  2. अमृतलहरी
  3. सुधालहरी
  4. लक्ष्मीलहरी
  5. करुणालहरी
  6. आसफविलासः
  7. प्राणाभरणम्
  8. जगदाभरणम्
  9. यमुनावर्णनम्
  10. रसगङ्गाधरः
  11. भामिनीविलासः
  12. मनोरमाकुचमर्दनम्
  13. चित्रमीमांसाखण्डनम्।

एतेषु ग्रन्थेषु ‘भामिनीविलासः’ इति तस्य विविधपद्यानां सङ्ग्रहः।
महाकविमाधः-महाकविमाघस्य एकमेव महाकाव्यं प्राप्यते “शिशुपालवधम्” इति। भर्तृहरिः-महाकविभर्तृहरेः, त्रीणि शतकानि सन्ति-नीतिशतकम्, शृङ्गारशतकम् वैराग्यशतकं च।
कविपरिचय-पण्डितराज जगन्नाथ संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य और सरस कवि थे। वे शाहजहाँ नामक मुगलशासक द्वारा उनकी राजसभा में सम्मानित थे। पण्डितराज जगन्नाथ की 13 कृतियाँ मिलती हैं-

  1. गंगालहरी,
  2. अमृतलहरी,
  3. सुधालहरी,
  4. लक्ष्मीलहरी,
  5. करुणालहरी,
  6. आसफविलास
  7. प्राणाभरणम्,
  8. जगदाभरणम्
  9. यमुनावर्णनम्,
  10. रसगङ्गाधरः,
  11. भामिनीविलासः,
  12. मनोरमा-कुचमर्दनम्
  13. चित्रमीमांसाखण्डनम्।

इन ग्रन्थों में भामिनीविलासः’ इनके विविध पद्यों का संग्रह है। महाकवि माघ-महाकवि माघ का एक ही महाकाव्य मिलता है-‘शिशुपालवधम्’ इति। भर्तृहरि-महाकवि भर्तृहरि के तीन शतक हैं-

  1. नीतिशतकम्
  2. शृङ्गारशतकम् और
  3. वैराग्यशतकम्।

अधोदत्ताः विविधविषयकाः श्लोकाः अपि पठनीयाः स्मरणीयाश्च(नीचे दिए गए विविध विषयों के श्लोक भी पाठ करने से योग्य तथा याद करने योग्य हैं।)

हंसः हंसः श्वेतः बकः श्वेतः को भेदो बकहंसयोः।
नीरक्षीरविभागे तु हंसो हंसः बको बकः॥

हंस-हंस भी सफेद होता है और बगुला भी फिर बगुले और हंस में क्या भेद ? परन्तु दूध से पानी को अलग करने में तो हंस हंस ही होता है और बगुला बगुला ही। अर्थात् नीरक्षीर विवेक में ही दोनों की अलग पहचान होती है, हंस पानी को दूध से अलग कर लेता है और बगुला नहीं कर पाता।

एकमेव पर्याप्तम्-एकेनापि सुपुत्रेण सिंही स्वपिति निर्भयम्।
सहैव दशभिः पुत्रैः भारं वहति रासभी॥

एक ही पर्याप्त-अकेले योग्य पुत्र के द्वारा (पुत्रवती होकर) सिंहनी निर्भय सोती है, (दस पुत्रों के द्वारा पुत्रवती होकर) भी गधी अपने दस पुत्रों के साथ भार ही ढोती है। अर्थात् बहुत से अयोग्य पुत्रों की अपेक्षा एक योग्य पुत्र उत्तम होता है।

पिकः-काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥

कोयल-कौआ काला होता है, कोयल भी काली होती है, फिर कोयल और कौए में क्या भेद ? वसन्त का समय आने पर (जब कोयल कूकती है तो) कौआ, कौआ पहचाना जाता है और कोयल कोयल पहचानी जाती है।

चातक-वर्णनम्-यद्यपि सन्ति बहूनि सरांसि,
स्वादुशीतल-सुरभि-पयांसि।
चातकपोतस्तदपि च तानि,
त्यक्त्वा याचति जलदजलानि॥

चातक-वर्णन-यद्यपि स्वादिष्ट, सुगन्धित जल वाले बहुत से सरोवर हैं तो भी चातक का बच्चा उन्हें छोड़कर बादलों के जल की ही याचना करना है।

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HBSE 10th Class Sanskrit अन्योक्तयः Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां वाक्यानां/सूक्तीनां भावार्थं हिन्दीभाषायां लिखत
(अधोलिखित वाक्यों/सूक्तियों के भावार्थ हिन्दीभाषा में लिखिए-)

(क) एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत् ।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना ॥

(एक राजहंस के द्वारा सरोवर की जो शोभा होती है; वैसी शोभा उसके चारों ओर रहने वाले हजारों बगुलों से भी नहीं होती है।)

भावार्थ :-एकेन राजहंसेन —इत्यादि सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में संकलित ‘अन्योक्तयः’ पाठ से उद्धृत की गई है। इसमें संख्या आधिक्य की अपेक्षा गुणाधिक्य के चयन की बात कही गई है।
उपर्युक्त सूक्ति का भाव यह है कि एक गुणी व्यक्ति जिस कार्य को सिद्ध कर सकता है। हजारों निर्गुणी भी उसे नहीं कर सकते हैं। जैसे चन्द्रमा अकेला ही रात्रि के अन्धकार को दूर कर सकता है जबकि असंख्य तारे उस कार्य को नहीं कर सकते। अतः हमें परिमाण की अपेक्षा गुणवत्ता (Quantity की अपेक्षा Quality ) को महत्त्व देना चाहिए।

(ख) एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम् ॥

(वन में एक ही स्वाभिमानी पक्षी ‘चातक’ वन में रहता है जो प्यासा होते हुए भी या तो प्यासा ही मर जाता है या

भावार्थ :-‘एक एव खगो मानी —-‘ इत्यादि सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में संकलित ‘अन्योक्तयः’ पाठ से उद्धृत है। इसमें स्वाभिमान के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है।
भावार्थ यह है कि स्वाभिमानी व्यक्ति प्राणों के संकट में पड़ जाने पर अपनी स्वाभिमानी वृत्ति का परित्याग नहीं करता है। वह दीन-हीन होकर जीने की अपेक्षा स्वाभिमानपूर्वक प्राण त्याग करना अधिक अच्छा समझता है। जैसे चातक को प्यासे रहकर मर जाना स्वीकार है परन्तु मेघ के अतिरिक्त तालाब, नदी आदि अन्य किसी स्रोत का पानी पीना स्वीकार नहीं है।

(ग) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ।
(हे चातक ! तुम आकाश में प्रकट होने वाले सभी मेघों के समक्ष याचना मत किया करो।)

भावार्थ :- प्रस्तुत सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमुषी भाग-2′ में संकलित ‘अन्योक्तयः’ पाठ से उद्धृत है। इसमें चातक को सभी मेघों के आगे पानी के लिए प्रार्थना करने से रोका गया है।
सूक्ति का भाव यह है कि संसार में भले और बूरे हर प्रकार के मनुष्य रहते हैं। हमें हर व्यक्ति के समक्ष अपनी समस्या को नहीं रखना चाहिए। क्योंकि जहाँ आपकी करुण पुकार को सुनने वाला कोई नहीं ऐसे अरण्यरोदन से कोई लाभ नहीं होता है।

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प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) राजहंसेन सरसः शोभा भवेत्।
(ख) राजहंसेन मृणालपटली भुक्ता।
(ग) मालाकारेण तरोः पुष्टि: भीमभानौ निदाघे व्यरचि।
(घ) चातकः पुरन्दरं याचते।
(ङ) अम्भोदाः वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) केन सरसः शोभा भवेत् ?
(ख) राजहंसेन का भुक्ता?
(ग) मालाकारेण कस्य पुष्टि: भीमभानौ निदाघे व्यरचि?
(घ) कः पुरन्दरं याचते?
(ङ) अम्भोदाः वृष्टिभिः काम् आर्द्रयन्ति?

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प्रश्न 3.
अधोलिखित-प्रश्नानां प्रदत्तोत्तरविकल्पेषु शुद्धं विकल्पं विचित्य लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से शुद्ध विकल्प चुनकर लिखिए-)
(क) ‘अल्पैरपि’ पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति.
(i) अल्पै + रपि
(ii) अल्पः + अपि
(iii) अल्पैः + अपि
उत्तरम्:
(iii) अल्पैः + अपि।

(ख) ‘तव + उत्तमा’ अत्र सन्धियुक्तपदम्-
(i) तवुत्तमा
(ii) तवोत्तमा
(iii) तवौत्तमा
(iv) तवेत्तमा।
उत्तरम्:
(ii) तवोत्तमा।

(ग) ‘राजहंसः’ अस्मिन् पदे कः समासोऽस्ति ?
(i) कर्मधारयः
(ii) तत्पुरुषः
(iii) अव्ययीभावः
(iv) द्वन्द्वः ।
उत्तरम्:
(i) कर्मधारयः

(घ) ‘पर्वतकुलम्’ इति पदस्य समास-विग्रहः
(i) पर्वतस्य कुलम्
(ii) पर्वतं च कुलं च तयोः समाहारः
(iii) पर्वतं च तत् कुलम्
(iv) पर्वतानां कुलम्।
उत्तरम्:
(iv) पर्वतानां कुलम्।
(ङ) ‘पूरयित्वा’ इति पदे कः प्रत्ययः ?
(i) त्व
(ii) तल्
(iii) क्त्वा
(iv) क्त।
उत्तरम्:
(iii) क्त्वा

(च) एक …… खगो मानी वने वसति चातकः।
(रिक्तस्थानपूर्तिः अव्ययपदेन)
(i) एव
(ii) ह्यः
(iii) न
(iv) च।
उत्तरम्:
(i) एव

(छ) उपवने ……… बालिकाः क्रीडन्ति।
(रिक्तस्थानपूर्तिः उचितसंख्यापदेन)
(i) त्रयः
(iii) तिस्रः
(iv) तृतीया।
उत्तरम्:
(ii) तिस्रः।

(ज) वृष्टिभिः वसुधां के आर्द्रयन्ति ?
(i) गगनाः
(ii) अम्भोदाः
(iii) चातकाः
(iv) बहवः।
उत्तरम्:
(ii) अम्भोदाः।

(झ) सरसः शोभा केन भवति ?
(i) राजहंसेन
(ii) चातकेन
(iii) बकसहस्रेण
(iv) महामत्स्ये न।
उत्तम्
(i) राजहंसेन।।

(ब) ‘वने’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(i) प्रथमा
(ii) सप्तमी
(iii) तृतीया
(iv) चतुर्थी।
उत्तर
(i) सप्तमी।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

यथामिन् उत्तरत
(ट) “पठितव्यः’ इति पदस्य प्रकृति-प्रत्ययौ लिखत।
(ठ) ‘मा ब्रूहि दीनं वचः । (अत्र किम् अव्ययपदं प्रयुक्तम्)
(ड) रे राजहंस ! वद तस्य सरोवरस्य’ (‘वद’ अत्र क: लकारः प्रयुक्तः?)
(ढ) दिसम्बरमासे 31 दिनानि भवन्ति । (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचक-विशेषणं लिखत)
(ण) वेदा: 4 सन्ति। (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचकविशेषणं लिखत)
(त) पताः अम्बरपथम् आपेदिरे। (रेखाङ्कितपदेन प्रश्ननिर्माणं कुरुत)
उत्तराणि-
(ट) ‘पठितव्यः’ = पठ् + तव्यत्।
(ठ) ” इति अव्ययपदं प्रयुक्तम्।
(ड) यद’ अत्र लोट् लकारः प्रयुक्तः ।
(ढ) दिसम्बरमासे एकत्रिंशत् दिनानि भवन्ति ।
(ण) वेदाः पाचारः सन्ति।
(त) के अम्बरपथम् आपेदिरे?

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अन्योक्ति पठित-अवबोधनम्

1. निर्देश:-अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितान् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृत-पूर्णवाक्येन लिखत
(अधोलिखित गद्यांश को पढ़कर इन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्य में लिखिए-)
एकेन राजहंसेन या शोभा सरसो भवेत्।
न सा बकसहस्रेण परितस्तीरवासिना॥1॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) केन सरसः शोभा भवेत् ?
(ii) तीरवासि किमस्ति ?
(iii) बकसहस्रेण कस्य शोभा न भवेत् ?
उत्तराणि
(i) राजहंसेन सरसः शोभा भवेत्।
(ii) तीरवासि बकसहस्रम् अस्ति।
(iii) बकसहस्रेण सरस: शोभा न भवेत् ।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) अत्र ‘सरसः’ इति पदे का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(ii) ‘परितस्तीरवासिना’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iii) ‘बकसहस्त्रेण’ इति पदस्य प्रयुक्तं विशेषणं किम् ?
(iv) ‘भवेत्’ अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ? ।
(v) ‘तद्’ इति सर्वनामशब्दस्य अत्र श्लोके प्रयुक्तं पदं किमस्ति ?
उत्तराणि:
(i) षष्ठी + विभक्तिः ।
(ii) परितः + तीरवासिना।
(iii) तीरवासिना।
(iv) विधिलिङ्लकारः।
(v) सा। (तद् – स्त्रीलिङ्गम्, प्रथमाविभक्तिः, एकवचनम्) ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः-एकेन राजहंसेन सरसः या शोभा भवेत्। परितः तीरवासिना बकसहस्रेण सा (शोभा) न (भवति) ॥
शब्दार्थाः-सरस = (तडागस्य) तालाब का। बकसहस्रेण = (बकानां सहस्रेण) हज़ारों बगुलों से। परितः = (सर्वतः) चारों ओर। तीरवासिना = (तटनिवासिना) किनारे पर रहनेवालों के द्वारा।
सन्दर्भः-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ के भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित है।)
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में राजहंस को प्रतीक बनाकर गुणियों की प्रशंसा की गई है और बगुलों को प्रतीक बनाकर गुणहीनों की निन्दा। __सरलार्थः-एक राजहंस के द्वारा सरोवर की जो शोभा होती है, उसके चारों ओर किनारे पर रहने वाले हज़ारों बगुलों के द्वारा भी वह शोभा नहीं होती है।
भावार्थ:- कुल या राष्ट्र की प्रतिष्ठा एवं मान-मर्यादा को बनाए रखने के लिए हज़ारों गुणहीनों की अपेक्षा कुछ गुणी व्यक्ति अधिक उपयोगी होते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

2. भुक्ता मृणालपटली भवता निपीता
न्यम्बूनि यत्र नलिनानि निषेवितानि।
रे राजहंस ! वद तस्य सरोवरस्य,
कृत्येन केन भवितासि कृतोपकारः ॥2॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) का भुक्ता ?
(ii) कानि निपीतानि ?
(iii) कानि सेवितानि ?
(iv) अत्र कः सम्बोधित: ?
(v) कस्य कृतोपकारः भवितुं कथितः ?
उत्तराणि:
(i) मृणालपटली भुक्ता।
(ii) अम्बूनि निपीतानि।
(iii) नलिनानि सेवितानि।
(iv) अत्र राजहंसः सम्बोधितः ।
(v) सरोवरस्य कृतोपकारः भवितुं कथितः ।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) “निपीतान्यम्बूनि’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) ‘सरसः’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iii) ‘भविष्यसि’ इत्यर्थे प्रयुक्तं क्रियापदं किम् ?
(iv) ‘कृतः उपकारः येन सः’-इति स्थाने प्रयुक्तं समस्तपदं किम् ?
(v) ‘रे राजहंस ! वद तस्य सरोवरस्य’-अत्र क्रियापदं किमस्ति।
उत्तराणि:
(i) निपीतानि + अम्बूनि।
(ii) सरोवरस्य।
(iii) भवितासि। (लुट्लकारः, मध्यमपुरुषः, एकवचनम्)
(iv) कृतोपकारः।
(v) वद।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-रे राजहंस ! यत्र भवता मृणालपटली भुक्ता, अम्बूनि निपीतानि नलिनानि निषेवितानि। तस्य सरोवरस्य केन कृत्येन कृतोपकारः भविता असि, वद॥
शब्दार्थाः-भुक्ता = (खादिता) खाए गए। मृगालपटली = (कमलनालसमूहः) कमलनाल का समूह। निपीतानि = (निः शेषेण पीतानि) भली-भाँति पीया गया। अम्बूनि = (जलानि) जल। नलिनानि = (कमलानि) कमलनियों को। निषेवितानि = (सेवितानि) सेवन किए गए। भविता = (भविष्यति) होगा। कृत्येन = (कार्येण) कार्य से। कृतोपकारः = (कृतः उपकारः येन सः) उपकार किया हुआ (प्रत्युपकार करने वाला)।
सन्दर्भः-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ के भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित है।)
प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में राजहंस को प्रतीक बनाकर मातृभूमि का ऋण चुकाने के लिए प्रेरित किया गया है।
सरलार्थ:-अरे राजहंस ! जहाँ तुमने कमलनाल खाए हैं, कमलनियों का सेवन किया है, जल पीया है, उस सरोवर का प्रत्युपकार आपके द्वारा किस प्रकार किया जाएगा, बताओ।
भावार्थ:-कवि का तात्पर्य है कि मनुष्य को कृतज्ञ होना चाहिए। जिस मातृभूमि ने हमें अपने आंचल में आवास, भोजन के लिए अन्न, पीने के लिए मधुर जल, फल-फूल, वनस्पतियाँ तथा अन्य सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं, उसका ऋण चुकाने के लिए हमें कुछ ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे मातृभूमि और उसके पर्यावरण की सुरक्षा में सहयोग हो सके।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

3. तोयैरल्पैरपि करुणया भीमभानौ निदाघे,
मालाकार ! व्यरचि भवता या तरोरस्य पुष्टिः।
सा किं शक्या जनयितुमिह प्रावृषेण्येन वारां,
धारासारानपि विकिरता विश्वतो वारिदेन॥3॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) अत्र कः सम्बोधितः ?
(ii) मालाकारेण तरोः पुष्टिः कैः व्यरचि ?
(ii) मालाकारेण तरोः पुष्टिः कदा व्यरचि ?
(iv) विश्वतः वारिदः कान् विकिरति ?
(v) वारिदः कीदृशः कथितः ?
उत्तराणि
(i) अत्र मालाकारः सम्बोधितः ।
(ii) मालाकारेण तरोः पुष्टिः अल्पैः तोयैः व्यरचि।
(iii) मालाकारेण तरो: पुष्टिः भीमभानौ निदाघे व्यरचि।
(iv) वारिदः विश्वतः वारां धारासारान् विकिरति।
(v) वारिदः प्रावृषेण्यः कथितः।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘तोयैरल्यैरपि’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(ii) तरोः + अस्य – अस्य सन्धिं कुरुत।
(iii) ‘जलदः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः ?
(iv) ‘जनयितुम्’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(v) ‘सा किं शक्या……’ अत्र सा इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
उत्तराणि:
(i) तोयैः + अल्पैः + अपि।
(ii) तरोरस्य।
(iii) वारिदः।
(iv) तुमुन्।
(v) पुष्ट्यै।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः-हे मालाकार ! भीमभानौ निदाघे अल्पैः तोयैः अपि भवता करुणया अस्य तरोः या पुष्टिः व्यरचि। प्रावृषेण्येन विश्वतः वारां धारासारान् अपि विकिरता वारिदेन इह जनयितुम् सा (पुष्टिः) किम् शक्या॥ __ शब्दार्था:-तोयैः = (जलैः) जल से। भीमभानौ = (भीमः भानुः यस्मिन् सः भीमभानुः तस्मिन्) ग्रीष्मकाल में (सूर्य के अत्यधिक तपने पर)। निदाघे = (ग्रीष्मकाले) ग्रीष्मकाल में। मालाकार = (हे मालाकार !) हे माली!। व्यरचि = (रचयति) रचता है। तरोः = (वृक्षस्य) वृक्ष की। पुष्टिः = (पुष्टता, वृद्धिः) पोषण। जनयितुम् = (उत्पादयितुम्) उत्पन्न करने के लिए। प्रावृषेण्येन = (वर्षाकालिकेन) वर्षाकालिक। वाराम् = (जलानाम्) जलों के। धारासारान् = (धाराणाम् आसारान्) धाराओं का प्रवाह। विकिरता = (जलं वर्षयता) जल बरसाते हुए। वारिदेन = (जलदेन) बादल के द्वारा।
सन्दर्भ:-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ के भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित है।)
प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में माली को प्रतीक बनाकर आवश्यकता के समय दी गई अल्प सहायता को भी बहुमूल्य बताया गया है।
सरलार्थ:-हे माली ! आपके द्वारा ग्रीष्मकाल में भयंकर गर्मी में करुणावश थोड़े से जल से भी वृक्षों का जो पोषण किया जाता है; वह पोषण वर्षाकाल में चारों ओर से जलों की धारा प्रवाह वर्षा करने वाले बादल के द्वारा भी क्या इस संसार में किया जा सकता है ? अर्थात् नहीं।
भावार्थ:-कठिन परिस्थितियों में घोर आवश्यकता पड़ने पर की गई अल्प सहायता अनावश्यक रूप में की गई बड़ी सहायता की अपेक्षा कहीं अधिक प्रशंसनीय एवं उपादेय होती है। प्यास के कारण मरणासन्न व्यक्ति को पिलाया गया दो बूंट पानी यदि उस व्यक्ति के प्राण बचा देता है तो किसी पर्व पर लगाई गई पानी की छबील से वह दो घंट पानी पिलाना कहीं अधिक पुण्यकारी एवं तुष्टीकारक होता है।

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4. आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गाः ,
भृङ्गा रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
सङ्कोचमञ्चति सरस्त्वयि दीनदीनो,
मीनो नु हन्त कतमां गतिमभ्युपैतु॥4॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) अम्बरपथं के आपेदिरे ?
(ii) भृङ्गाः कानि समाश्रयन्ते ?
(iii) मीन: कदा दीनदीनः भवति ?
(iv) सङ्कोचं किम् अञ्चति ?
(v) अत्र कः सम्बोधितः ?
उत्तराणि
(i) अम्बरपथं पतङ्गाः आपेदिरे।
(ii) भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते।
(iii) सरसि सङ्कोचम् अञ्चति मीन: दीनदीनः भवति।
(iv) सङ्कोचं सरः अञ्चति।
(v) अत्र सरः सम्बोधितः।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘खगाः’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘आपेदिरेऽम्बरपथं परितः पतङ्गाः ‘ अत्र क्रियापदं किम् ?
(iii) ‘विकासम्’ इत्यस्य विपरीतार्थकपदम् अत्र किम् ?
(iv) ‘सरस्त्वयि’ अत्र त्वयि इति सर्वनामपदं कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) अत्र श्लोके ‘अञ्चति’ इति पदे का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
उत्तराणि:
(i) पतङ्गाः ।
(ii) आपेदिरे।
(iii) सङ्कोचम्।
(iv) सरसे।
(v) सप्तमी विभक्तिः ।
[ √अञ्च् + शतृ = अञ्चत्, नपुंसकलिङ्गम्, सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्]

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-सरः त्वयि सङ्कोचम् अञ्चति, पतङ्गाः परितः अम्बरपथम् आपेदिरे, भृङ्गाः रसालमुकुलानि समाश्रयन्ते। हन्त, दीनदीनः मीनः नु कतमां गतिम् अभ्युपैतु॥ .
शब्दार्था:-आपेदिरे = (प्राप्तवन्तः) प्राप्त कर लिए। अम्बरपथम् = (आकाशमार्गम्) आकाश-मार्ग को। पतङ्गाः = (खगाः) पक्षी। भृङ्गा = (भ्रमराः) भौरे। रसालमुकुलानि = (रसालानां मुकुलानि) आम की मञ्जरियों को। सङ्कोचम् अञ्चति = (सङ्कोचं गच्छति) संकुचित होने पर। मीनः = (मत्स्यः) मछली। अभ्युपैतु = (प्राप्नोतु) प्राप्त करें।
सन्दर्भ:-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ के ‘भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित है।)
प्रसंग-प्रस्तुत पद्य में सरोवर को सम्बोधित करते हुए, दुर्दिनों में उसमें रहने वाली मछलियों की दुर्दशा पर दुःख व्यक्त किया गया है।
सरलार्थ:-हे सरोवर ! तेरे सूख जाने पर पक्षी आकाश में चारों ओर चले जाते हैं, भौरे आम की मंजरियों का आश्रय ले लेते हैं। हाय ! अत्यन्त दीन अवस्था को प्राप्त बेचारी मछली किस गति को प्राप्त करे।
भावार्थ:-कवि के कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को पक्षियों या भौरों की तरह अवसरवादी नहीं होना चाहिए, अपितु जिन व्यक्तियों या संसाधनों का भले दिनों में हम लाभ उठाते हैं, उन पर विपत्ति आ जाने पर हमें भी उनका सहभागी बनना चाहिए। यह सहभागिता या सहयोग सूखे सरोवर में मछली की भाँति हमारी विवशता से उपजी नहीं होना चाहिए; अपितु कृतज्ञता के भाव से ही हमें ऐसा सहयोग करना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

5. एक एव खगो मानी वने वसति चातकः।
पिपासितो वा म्रियते याचते वा पुरन्दरम् ॥5॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) चातकः कीदृशः खगः अस्ति ?
(ii) पिपासितः चातकः किं करोति ?
(iii) चातकः कुत्र वसति ?
(iv) चातकः कं याचते ?
उत्तराणि
(i) चातकः एकः मानी खगः अस्ति ?
(ii) पिपासितः चातक: म्रियते वा पुरन्दरं याचते वा।
(iii) चातकः वने वसति।
(iv) चातकः पुरन्दरं याचते।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘इन्द्रम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘दीनः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘पिपासितः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘एक एव’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘याचते’ इति क्रियापदस्य कर्मपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) पुरन्दरम्।
(ii) मानी।
(iii) क्त।
(iv) एकः + एव।
(v) पुरन्दरम्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः-एक एव मानी खगः चातक: वने वसति। वा पिपासितः म्रियते पुरन्दरम् याचते वा॥ शब्दार्थाः-मानी = (स्वाभिमानी) स्वाभिमानी। पुरन्दरम् = (इन्द्रम्) इन्द्र को। पिपासितः = (तृषितः) प्यासा।
सन्दर्भ:-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य पण्डितराज जगन्नाथ के भामिनीविलासः’ नामक गीतिकाव्य से संकलित है।)
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में चातक को प्रतीक बनाकर स्वाभिमानिता की प्रशंसा की गई है।
सरलार्थ:-एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक वन में निवास करता है, वह प्यासा होते हुए भी या तो मर जाता है या इन्द्र से जल याचना करता है। चातक के सम्बन्ध में यह माना जाता है कि वह केवल आकाश से बरसती हुई वर्षा की बूंदों से ही अपनी प्यास बुझाता है, तालाब आदि का पानी नहीं पीता।
भावार्थ:-स्वाभिमानी व्यक्ति प्राणों के संकट में पड़ जाने पर भी अपनी स्वाभिमानिता का त्याग नहीं करता। वह दीन-हीन होकर जीने की अपेक्षा स्वाभिमानपूर्वक प्राण त्याग करना अधिक उत्तम समझता है। जैसे चातक को प्यासे रहकर मर जाना स्वीकार है, परन्तु तालाब आदि का जल पीकर जीवन धारण करना नहीं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

6. आश्वास्य पर्वतकुलं तपनोष्णतप्त
मुद्दामदावविधुराणि च काननानि।
नानानदीनदशतानि च पूरयित्वा,
रिक्तोऽसि यजलद ! सैव तवोत्तमा श्रीः ॥6॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) एकपदेन उत्तरत
(i) पर्वतकुलं कीदृशम् अस्ति ?
(ii) जलदः कीदृशानि काननानि आश्वास्यति ?
(iii) उत्तमा श्रीः कस्य अस्ति ?
(iv) अत्र कः सम्बोधितः ?
(v) जलदः रिक्तः कथं भवति ?
उत्तराणि
(i) पर्वतकुलं तपनोष्णतप्तम् अस्ति।
(ii) जलद; उद्दामवविधुराणि काननानि आश्वास्यति।
(iii) उत्तमा श्रीः जलदस्य अस्ति।
(iv) अत्र जलदः सम्बोधितः।
(v) जलद: नाना-नदी-नदशतानि पूरयित्वा रिक्तः भवति।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘पूर्णः’ इत्यस्य विलोमपदम् अत्र किम् ?
(ii) ‘तपनोष्णतप्तम्’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(iii) ‘आश्वास्य’ अत्र कः उपसर्गः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘पूरयित्वा’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(v) ‘रिक्तोऽसि यजलद !’ अत्र क्रियापदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) रिक्तः ।
(ii) तपन + उष्णतप्तम्।
(iii) आ।
(iv) क्त्वा।
(v) असि।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

अन्वयः-हे जलद ! तपनोष्णतप्तं पर्वतकुलम् आश्वास्य उद्दामदावविधुराणि काननानि च (आश्वास्य) नानानदीनदशतानि पूरयित्वा च यत् रिक्तः असि तव सा एव उत्तमा श्रीः॥
शब्दार्थाः-आश्वास्य = (समाश्वास्य) सन्तुष्ट करके। पर्वतकुलम् = (पर्वतानां कुलम्) पर्वतों के समूह को। तपनोष्णतप्तम् = (तपनस्य उष्णेन तप्तम्) सूर्य की गर्मी से तपे हुए को। उद्दामदावविधुराणि = (उन्नतकाष्ठरहितानि) ऊँचे काष्ठों (वृक्षों) से रहित । काननानि = (वनानि) वन। नानानदीनदशतानि = (नाना नद्यः, नदानां शतानि च) अनेक नदियों और सैंकड़ों नदों को। पूरयित्वा = (पूर्णं कृत्वा) पूर्ण करके, भरकर। श्रीः = शोभा।
सन्दर्भ:-सन्दर्भ:-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य महाकवि माघ द्वारा रचित ‘शिशुपालवधम्’ से संकलित है।)
प्रसंग:-प्रस्तुत पद्य में दानशीलता की प्रशंसा की गई है।
सरलार्थ:-हे बादल ! सूर्य की गर्मी से तपे हुए पर्वतों के समूह को और ऊँचे वृक्षों से रहित वनों को सन्तुष्ट करके अनेक नदी-नालों को जल से परिपूर्ण करके तुम स्वयं रिक्त हो गए हो, वही तुम्हारी सर्वोत्तम शोभा है।
आशय यही है कि परोपकारी पुरुष दूसरों को सुखी और सम्पन्न बनाने के लिए सर्वस्व लुटा देते हैं और स्वयं अभावग्रस्त रह जाते हैं, यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता है, यही उनके यश को बढ़ाने वाला कारक है।
भावार्थ:-परोपकारी मनुष्य परहित के कार्यों में अपनी सारी सम्पत्ति व्यय कर स्वयं अतिसाधारण जीवन व्यतीत करते हैं। उन्हें इस अभावग्रस्त अवस्था में देखकर लगता ही नहीं कि ये कभी धनसम्पन्न रहे होंगे। कवि कहता है कि ऐसे परोपकारी मनुष्यों की अभावग्रस्तता ही उनकी शोभा और यशस्विता का कारण बन जाती है। जैसे जल बरसा कर बादल शोभायमान होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

7. रे रे चातक ! सावधानमनसा मित्र क्षणं श्रूयता
मम्भोदा बहवो हि सन्ति गगने सर्वेऽपि नैतादृशाः।
केचिद् वृष्टिभिरार्द्रयन्ति वसुधां गर्जन्ति केचिद् वृथा,
यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः ॥7॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) सावधान मनसा कः शृणोतु ?
(ii) गगने बहवः के सन्ति ?
(iii) कीदृशं वचः मा ब्रूहि ?
(iv) अम्भोदाः वृष्टिभिः काम् आर्द्रयन्ति ?
(v) अत्र कवेः मित्रं कः अस्ति ?
(vi) कविः चातकं किं कर्तुं कथयति ?
(vii) गगने कीदृशाः अम्भोदाः सन्ति ?
उत्तराणि
(i) सावधान मनसा चातकः शृणोतु ।
(ii) गगने बहवः अम्भोदाः सन्ति।
(iii) दीनं वचः मा ब्रूहि।
(iv) अम्भोदाः वृष्टिभिः वसुधाम् आर्द्रयन्ति।
(v) अत्र कवेः मित्रं चातकः अस्ति।
(vi) कविः चातकं किं कर्तुं कथयति ?
(vii) गगने कीदृशाः अम्भोदाः सन्ति ?

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘अम्भोदाः बहवः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(ii) ‘शोषयन्ति’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘व्यर्थम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं पर्यायपदं किम् ?
(iv) अत्र श्लोके सम्बोधनपदं किमस्ति ?
(v) ‘वृष्टभिरार्द्रयन्ति’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) अम्भोदाः ।
(ii) आर्द्रयन्ति।
(iii) वृथा।
(iv) चातक।
(v) वृष्टिभिः + आर्द्रयन्ति।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
अन्वयः- रे रे मित्र चातक ! सावधानमनसा क्षणं श्रूयताम्, गगने हि बहवः अम्भोदाः सन्ति, सर्वे अपि एतादृशाः न (सन्ति) केचित् धरिणीं वृष्टिभिः आर्द्रयन्ति, केचिद् वृथा गर्जन्ति, (त्वम्) यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतः दीनं वचः मा ब्रूहि ॥
शब्दार्थाः-सावधानमनसा = (ध्यानेन) ध्यान से। अम्भोदाः = (मेघाः) बादल। गगने = (आकाशे) आकाश में। आर्द्रयन्ति = (जलेन क्लेदयन्ति) जल से भिगो देते हैं। वसुधाम् = (पृथ्वीम्) पृथ्वी को। गर्जन्ति = [गर्जनं (ध्वनिम्) कुर्वन्ति] गर्जना करते हैं। पुरतः = (अग्रे) आगे, सामने। मा = (न) नहीं, मत। वचः = (वचनम्) वचन।
अन्योक्तयः
सन्दर्भ:–सन्दर्भ:-प्रस्तुत पद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘अन्योक्तयः’ नामक पाठ से लिया गया है। (यह पद्य कवि भर्तहरि के नीतिशतक से संकलित है।)
प्रसंगः-प्रस्तुत पद्य में चातक के माध्यम से बताया गया है कि प्रत्येक से माँगना उचित नहीं होता; क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति दानी नहीं होता।
सरलार्थ:-हे मित्र चातक! सावधान मन से क्षणभर सुनो। आकाश में अनेक बादल रहते हैं, पर सभी ऐसे उदार नहीं होते। कुछ तो वर्षा से पृथ्वी को गीला कर देते हैं, परन्तु कुछ व्यर्थ ही गरजते हैं। अतः तुम जिस-जिसको देखते हो, उस-उसके सामने दीन वचन कहकर अपनी दीनता प्रकट मत करो।
भावार्थ:-किसी से माँगना दीनता को प्रकट करना है। स्वाभिमानी व्यक्ति को पहले तो माँगना ही नहीं चाहिए। यदि जीवन में कोई माँगने की स्थिति बन भी जाए तो अच्छी तरह सोच-विचार कर केवल उसी से माँगना चाहिए, जिससे देने का सामर्थ्य और देने की प्रवृत्ति हो। सबके सामने हाथ फैला-फैला कर अपनी दीनता का ढिंढोरा नहीं पीटना चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 12 अन्योक्तयः

अन्योक्ति Summary in Hindi

अन्योक्ति पाठ-परिचय

अन्योक्ति का तात्पर्य है किसी की प्रशंसा अथवा निन्दा अप्रत्यक्ष रूप से अथवा किसी बहाने से करना। जब किसी प्रतीक या माध्यम से किसी के गुण की प्रशंसा या दोष की निन्दा की जाती है, तब वह पाठकों के लिए अधिक ग्राह्य होती है। प्रस्तुत पाठ ‘अन्योक्तयः’ में ऐसी ही सात अन्योक्तियों का संकलन है जिनमें राजहंस, कोकिल, मेघ, मालाकार, सरोवर तथा चातक के माध्यम से मानव को सवृत्तियों एवं सत्कर्मों के प्रति प्रवृत्त होने की प्रेरणा दी गई है। इन अन्योक्तियों में तीसरी और सातवीं अन्योक्ति को छोड़कर शेष सभी अन्योक्तियाँ पाण्डवराज जगन्नाथ कृत ‘भामिनीविलासः’ से संकलित की गई हैं। तीसरी अन्योक्ति महाकवि माघ की रचना है और सातवीं अन्योक्ति कवि भर्तृहरि द्वारा रचित ‘नीतिशतकम्’ से संकलित है।
पण्डितराज जगन्नाथ संस्कृत साहित्य के मूर्धन्य कवि हुए हैं। ये आन्ध्र प्रदेश के तैलङ्ग ब्राह्मण थे। ये मुग़ल सम्राट शाहजहाँ की राजसभा में सम्मानित कवि थे। ये शाहजहाँ के बड़े पुत्र दाराशिकोह के शिक्षक रहे तथा ‘पण्डितराज’ की उपाधि से विभूषित किए गए। भामिनी विलास’ इनका प्रसिद्ध मुक्तक काव्य है। जिसके सभी पद्य प्रायः अन्योक्तिमूलक हैं। इस काव्य के चार विभाग हैं-

  1. अन्योक्तिविलासः,
  2. प्रास्ताविकविलासः,
  3. शृंगारविलासः तथा
  4. शान्तविलासः ।

अन्योक्तयः पाठरस्य सारांश:

‘अन्योक्तयः’ इस पाठ में संस्कृत के प्रसिद्ध ग्रन्थों से कुछ पद्य संकलित किए गए हैं। इन पद्यों की विशेषता यह है कि इनमें किसी बहाने से या अप्रत्यक्ष रूप में किसी की प्रशंसा या निन्दा की गई है। इसीलिए इन्हें अन्योक्ति कहा जाता है। इन अन्योक्तियों का सारांश इस प्रकार है
अकेले राजहंस के द्वारा सरोवर की जो शोभा होती है वह हज़ारों बगुलों से नहीं होती, इसका आशय यही है कि किसी परिवार या देश की प्रतिष्ठा के लिए गुणहीनों की अपेक्षा कुछ एक गुणी व्यक्ति ही पर्याप्त होते हैं।
कवि राजहंस से पूछता है कि जिस सरोवर से तुमने कमलनाल खाए, कमलनियों का सेवन किया, पानी पिया उसका उपकार तुम कैसे चुकाओगे ? कवि के कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य को अपनी मातृभूमि का ऋण चुकाने के लिए यत्नशील रहना चाहिए।
कवि माली की प्रशंसा करते हुए कहता है कि भयंकर गर्मी में जो तुमने थोड़े से जल से इन वृक्षों को सींचकर पुष्ट किया वैसी पुष्टि तो वर्षा ऋतु में घनघोर बादलों के बरसने से भी नहीं होती, अर्थात् आवश्यकता पड़ने पर थोड़ी सहायता भी बहुत होती है।
कवि सरोवर को सम्बोधित करते हुए कहता है कि तुम्हारा जल कम हो जाने पर पक्षी और भौरे तो इधर-उधर नया आश्रय खोज लेते हैं परन्तु बेचारी मछलियाँ कहाँ जाएँगी ? कवि इस अन्योक्ति के माध्यम से कहना चाहता है कि मनुष्य को अवसरवादी न होकर कृतज्ञ होना चाहिए।
चातक को स्वाभिमान का प्रतीक बनाते हुए कवि कहता है कि वन में केवल एक ही स्वाभिमानी पक्षी चातक है। जो प्यासा रहकर मर तो सकता है परन्तु वर्षा की बूँद के अलावा वह किसी भी तालाब आदि का पानी ग्रहण नहीं करता। दूसरे शब्दों में कवि कहना चाहता है कि मनुष्य को अपने स्वाभिमान की रक्षा प्राणों का मूल्य चुकाकर भी करनी चाहिए।
कवि बादल को प्रतीक बनाकर कहता है कि जो तुमने अपनी वर्षा के द्वारा तपते पर्वतों को शीतलता दी, जंगलों को हरा-भरा किया, नदी नालों को जल से भर दिया और स्वयं खाली हो गए यही तुम्हारी सर्वोत्तम शोभा है। कहने का तात्पर्य है कि परोपकार के कार्यों में अपना सर्वस्व लुटाकर जो लोग निर्धन हो जाते हैं, उनका यश उन लोगों से कहीं अधिक होता है, जो धन पर कुंडली मारे बैठे रहते हैं। अन्तिम अन्योक्ति में चातक को माध्यम बनाकर कहा गया है कि हर किसी को देखकर माँगने के लिए हाथ नहीं फैला देना चाहिए, माँगने से पहले दाता की योग्यता का विचार अवश्य कर लेना चाहिए। आकाश में बहुत से बादल होते हैं उनमें से कुछ ही वर्षा करने वाले होते हैं अन्यथा शेष तो व्यर्थ में गरजते ही हैं। अतः कवि चातक से कहता है कि सबके सामने अपनी दीनता प्रकट न करके केवल बरसने वाले बादलों से तुम्हें जल की याचना करनी चाहिए।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

HBSE 10th Class Sanskrit प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृतभाषा में लिखिए-)
(i) चन्दनदासः कस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षति स्म ?
(ii) तृणानां केन सह विरोधः अस्ति ?
(iii) कः चन्दनदासं द्रष्टुमिच्छति ?
(iv) पाठेऽस्मिन् चन्दनदासस्य तुलना केन सह कृता ?
(v) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियं के इच्छन्ति ?
(vi) कस्य प्रसादेन चन्दनदासस्य वणिज्या अखण्डिता ?
उत्तराणि:
(i) चन्दनदासः अमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षति स्म।
(ii) तृणानानाम् अग्निना सह विरोधः अस्ति।
(iii) चाणक्यः चन्दनदासं द्रष्टुमिच्छति।
(iv) पाठेऽस्मिन् चन्दनदासस्य तुलना शिविना सह कृता।
(v) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियं राजानः इच्छन्ति।
(vi) आर्यस्य प्रसादेन चन्दनदासस्य वणिज्या अखण्डिता।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्रश्न 2.
स्थूलाक्षरपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(i) शिविना विना इदं दुष्करं कार्यं कः कुर्यात्।
(ii) प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृत्।।
(ii) आर्यस्य प्रसादेन मे वणिज्या अखण्डिता।
(iv) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः राजानः प्रतिप्रियमिच्छन्ति।
(v) तृणानाम् अग्निना सह विरोधो भवति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(i) केन विना इदं दुष्करं कार्यं कः कुर्यात् ?
(ii) प्राणेभ्योऽपि प्रियः कः ?
(iii) कस्य प्रसादेन मे वणिज्या अखण्डिता ?
(iv) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः के प्रतिप्रियमिच्छन्ति ?
(v) केषाम् अग्निना सह विरोधो भवति ?

प्रश्न 3.
निर्देशानुसारं सन्धिं/सन्धिविच्छेदं कुरुत
(निर्देशानुसार सन्धि/सन्धिविच्छेद कीजिए-)
(क) यथा- कः + अपि – कोऽपि
प्राणेभ्यः + अपि – …………….
…………….. + अस्मि – सज्जोऽस्मि।
आत्मनः + …………….. – आत्मनोऽधिकारसदृशम्
(ख) यथा- सत् + चित् – सच्चित्
शरत् + चन्द्रः – कदाचित् + च
उत्तराणि
(क) यथा- कः + अपि – कोऽपि
प्राणेभ्यः + अपि – प्राणेभ्योऽपि
सज्जः + अस्मि – सज्जोऽस्मि।
आत्मनः + अधिकारसदृशम् – आत्मनोऽधिकारसदृशम्
(ख) यथा-. सत् + चित्
सच्चित् शरत् + चन्द्रः – शरच्चन्द्रः
कदाचित् + च – कदाचिच्च।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्रश्न 4.
अधोलिखितवाक्येषु निर्देशानुसारं परिवर्तनं कुरुत
(अधोलिखित वाक्यों में निर्देश के अनुसार परिवर्तन कीजिए-)
यथा-प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः। प्रतिप्रियमिच्छति राजा। (एकवचने)
(i) सः प्रकृतेः शोभां पश्यति (बहुवचने)
(ii) अहं न जानामि। (मध्यमपुरुषैकवचने)
(iii) त्वं कस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षसि ? (उत्तमपुरुषैकवचने)
(iv) कः इदं दुष्करं कुर्यात् ? (प्रथमपुरुषैबहुवचने)
(v) चन्दनदासं द्रष्टुमिच्छामि। (प्रथमपुरुषैकवचने)
(vi) राजपुरुषाः देशान्तरं व्रजन्ति। (प्रथमपुरुषैकवचने)
उत्तराणि
(i) ते प्रकृतेः शोभां पश्यन्ति।
(ii) त्वं न जानासि।
(iii) अहं कस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षामि ?
(iv) के इदं दुष्करं कुर्युः ?
(v) चन्दनदासं द्रष्टुमिच्छति।
(vi) राजपुरुषः देशान्तरं व्रजति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्रश्न 5.
कोष्ठकेषु दत्तयोः पदयोः शुद्धं विकल्पं विचित्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(कोष्ठक में दिए गए पदों में से शुद्ध विकल्प चुन कर रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए-)
(i) ……….. विना इदं दुष्करं कः कुर्यात्। (चन्दनदासस्य / चन्दनदासेन)
(ii) …………… इदं वृत्तान्तं निवेदयामि। (गुरवे / गुरोः)
(ii) आर्यस्य ………… अखण्डिता मे वणिज्या। (प्रसादात् / प्रसादेन)
(iv) अलम् ………..। (कलहेन / कहलात्)
(v) वीरः ………. बालं रक्षति। (सिंहेन / सिंहात्)
(vi) ………… भीतः मम भ्राता सोपानात् अपतत्। (कुक्कुरेण / कुक्कुरात्)
(vii) छात्रः …………….. प्रश्नं पृच्छति। (आचार्यम् / आचार्येण)
उत्तराणि
(i) चन्दनदासेन विना इदं दुष्करं कः कुर्यात् ।
(ii) गुरवे इदं वृत्तान्तं निवेदयामि।
(iii) आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या।
(iv) अलं कलहेन।
(v) वीरः सिंहात् बालं रक्षति।
(vi) कुक्कुरात् भीतः मम भ्राता सोपानात् अपतत्।
(vii) छात्रः आचार्य प्रश्नं पृच्छति।।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्रश्न 6.
अधोदत्तमञ्जूषातः समुचितपदानि गृहीत्वा विलोमपदानि लिखत
(नाचे दी गई मञ्जूषा से समुचित पद लेकर विलोम पद लिखिए-)
आदरः असत्यम् गुणः पश्चात् तदानीम् तत्र
(i) अनादरः ………………………………..
(ii) दोषः ………………………………..
(iii) पूर्वम् ………………………………..
(iv) सत्यम् ………………………………..
(v) इदानीम् ………………………………..
(vi) अत्र ………………………………..
उत्तराणि
(i) अनादरः – आदरः
(ii) दोषः – गुणः
(iii) पूर्वम् – पश्चात्
(iv) सत्यम् – असत्यम्
(v) इदानीम् – तदानीम्
(vi) अत्र – तत्र

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्रश्न 7.
उदाहरणमनुसृत्य अधोलिखितानि पदानि प्रयुज्य पञ्चवाक्यानि रचयत
(उदाहरण के अनुसार अधोलिखित पदों का प्रयोग करके पाँच वाक्य बनाइए-)
यथा निष्क्रम्य- शिक्षिका पुस्तकालयात् निष्क्रम्य कक्षां प्रविशति।
(i) उपसृत्य ………………………………..
(ii) प्रविश्य ………………………………..
(iii) द्रष्टुम् ………………………………..
(iv) इदानीम् ………………………………..
(v) अत्र ………………………………..
उत्तराणि-(वाक्यप्रयोगः)
(i) उपसृत्य – बालक: मातरम् उपसृत्य प्रणमति।
(ii) प्रविश्य – बालकाः उद्याने प्रविश्य क्रीडन्ति।
(iii) द्रष्टुम् – त्वं किं द्रष्टुम् इच्छसि ?
(iv), इदानीम् – इदानीम् अहं चलचित्रं द्रष्टुम् इच्छामि।
(v) अत्र – अत्र चलचित्रगृहं नास्ति।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

योग्यताविस्तारः
कविपरिचयः’मुद्राराक्षसम्’ इति नाम्नः नाटकस्य प्रणेता विशाखदत्तः आसीत्। सः राजवंशे उत्पन्नः आसीत्। तस्य पिता भास्करदत्तः महाराजस्य पदवी प्राप्नोत्। विशाखदत्तः राजनीतेः न्यायस्य ज्योतिषविषयस्य च विद्वान् आसीत्। वैदिकधर्मावलम्बी भूत्वाऽपि सः बौद्धधर्मस्य अपि आदरमकरोत्।

कवि परिचय-‘मुद्राराक्षसम्’ इस नाम के नाटक के रचयिता विशाखदत्त थे। वे राजवंश में उत्पन्न हुए थे। उनके पिता भास्करदत्त ने महाराज की पदवी प्राप्त की थी। विशाखदत्त राजनीति, न्याय और ज्योतिष विषय के विद्वान् थे। वैदिक धर्मावलम्बी होकर भी वे बौद्धधर्म का भी आदर करते थे।

ग्रन्थपरिचयः- ‘मुद्राराक्षसम्’ एकम् ऐतिहासिकं नाटकम् अस्ति। दशाङ्केषु विरचिते अस्मिन्नाटके चाणक्यस्य राजनीतिककौशलस्य बुद्धिवैभवस्य राष्ट्रसञ्चालनार्थम् कूटनीतीनाम् निदर्शनमस्ति। अस्मिन्नाटके चाणक्यस्यामात्यराक्षसस्य च कूटनीत्योः संघर्षः।

‘मुदाराक्षसम्’ एक ऐतिहासिक नाटक है। दश अंकों में रचित इस नाटक में चाणक्य के राजनीतिक कौशल, बुद्धि वैभव और राष्ट्र संचालन के लिए उनकी कूटनीतियों का निदर्शन है। इस नाटक में चाणक्य और अमात्य राक्षस की कूटनीतियों का संघर्ष है।

भावविस्तार:
चाणक्य-चाणक्यः एकः विद्वान् ब्राह्मणः आसीत्। तस्य पितृप्रदत्तं नाम विष्णुगुप्तः आसीत्। अयमेव ‘कौटिल्य’ इति नाम्ना प्रसिद्धः केषाञ्चित् विदुषाम् इदमपि मतमस्ति यत् राजनीतिशास्त्रे कुटिलनीतेः प्रतिष्ठापनाय तस्याः स्व-जीवने उपयोगाय च अयं ‘कौटिल्यः’ इत्यपि कथ्यते। चणकनामकस्य कस्यचित् आचार्यस्य पुत्रत्वात् ‘चाणक्यः’ इति नाम्ना स प्रसिद्धः जातः । नन्दानां राज्यकालः शतवर्षाणि पर्यन्तम् आसीत्। तेषु अन्तिमेषु द्वादशवर्षे एतेन सुमाल्यादीनाम् अष्टनन्दानां संहारः कारितः तथा च चन्द्रगुप्तमौर्यः नृपत्वेन राजसिंहासने स्थापितः। अयमेकः महान् राजनीतिज्ञः आसीत्। एतेन भारतीयशासनव्यवस्थायाः प्रामाणिकतत्त्वानां वर्णनेन युक्तं “अर्थशास्त्रम्” इति अतिमहत्त्वपूर्णः ग्रन्थः रचितः।

चन्द्रगुप्तमौर्यः-चन्द्रगुप्तः महापद्मनन्दस्य मुरायाः च पुत्रः आसीत्। चाणक्यस्य मार्गदर्शने अनेन चतुर्विंशतिवर्षपर्यन्तं राज्यं कृतम्।। राक्षसः-नन्दराज्ञः स्वामिभक्तः चतुरः प्रधानामात्यः आसीत्। चन्दनदासः-कुसुमपुर-नाम्नि नगरे महामात्यस्य राक्षसस्य प्रियतमं पात्रं मित्रञ्च आसीत्। स मणिकारः श्रेष्ठी च आसीत्। अस्यैव गृहात् राक्षसः सपरिवार: नगरात् बहिरगच्छत्।
चाणक्य-चाणक्य एक विद्वान ब्राह्मण था। उसके पिता द्वारा दिया गया नाम विष्णुगुप्त था। यह ही कौटिल्य इस नाम से प्रसिद्ध हुआ। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि राजनीति शास्त्र में कूटनीति की प्रतिष्ठापना के लिए और उसका अपने जीवन में उपयोग करने के लिए इन्हें ‘कौटिल्य’ कहा जाता है।

चणक नामक किसी आचार्य का पुत्र होने के कारण वे ‘चाणक्य’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए। नन्दों का राज्य काल 100 वर्षों तक रहा। उनमें अन्तिम 12 वर्षों में इन (चाणक्य) के द्वारा सुमाल्य आदि आठ नन्दों का विनाश करवाया गया और चन्द्रगुप्त मौर्य को राजा के रूप में राजसिंहासन पर बैठाया गया। ये एक महान् राजनीतिज्ञ थे। इन्होंने भारतीय शासन व्यवस्था का प्रामाणिक तत्त्वों के वर्णन से युक्त अर्थशास्त्र नामक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ की रचना की। चन्द्रगुप्त मौर्य-चन्द्रगुप्त महापद्मनन्द और मुरा का पुत्र था। चाणक्य के मार्गदर्शन में इसने 24 वर्ष तक राज्य किया।
राक्षस-राजा नन्द का स्वामीभक्त चतुर प्रधान अमात्य था। चन्दनदास-कुसुमपुर नामक नगर में महामात्य राक्षस का सबसे प्रिय पात्र और मित्र था। वह सुवर्णकार और सेठ था। इसी के घर से राक्षस परिवार सहित नगर से बाहर गया था।

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भाषिक विस्तारः
1. पृथक् और विना शब्दों के योग में द्वितीया तृतीया और पंचमी तीनों विभक्तियों का प्रयोग
यथा-जलं विना जीवनं न सम्भवति। द्वितीया
जलेन विना जीवनं न सम्भवति । तृतीया
जलात् विना जीवनं न सम्भवति। पञ्चमी
परिश्रमं पृथक् नास्ति सुखम्। द्वितीया
परिश्रमात् पृथक् नास्ति सुखम्। पञ्चमी

2. अनीयर् प्रत्ययप्रयोगः
अत्यादरः – शङ्कनीयः
जन्तुशाला – दर्शनीया
याचकेभ्यः दानं – दानीयम्
वेदमन्त्राः – स्मरणीयाः
पुस्तकमेलापके पुस्तकानि – क्रयणीयानि।
(क) अनीयर् प्रत्ययस्य प्रयोगः योग्यार्थे भवति।
(ख) अनीयर् प्रत्यये ‘अनीय’ इति अवशिष्यते।
(ग) अस्य रूपाणि त्रिषु लिङ्गेषु चलन्ति।
यथा-
पुंल्लिङ्गे स्त्रीलिङ्गे नपुंसकलिङ्गे
पठनीयः पठनीया पठनीयम्
इनके रूप क्रमशः देववत्, लतावत् तथा फलवत् चलेंगे।

3. उभ सर्वनामपदम् पुल्लिङ्गे नपुंसकलिङ्गे
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HBSE 10th Class Sanskrit प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां वाक्यानां/सूक्तीनां भावार्थं हिन्दीभाषायां लिखत
(अधोलिखित वाक्यों/सूक्तियों के भावार्थ हिन्दीभाषा में लिखिए-)
(क) अत्यादरः शङ्कनीयः’।
(अत्यधिक आदर सन्देह पैदा करता है)
भावार्थ :-‘अत्यादरः शङ्कनीयः’ यह सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में संकलित ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से उद्धृत की गयी है। यह पाठ महाकवि विशाखदत्त के ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक से लिया गया है। उपर्युक्त सूक्ति में अत्यधिक आदर को सन्देह का कारण बतलाया गया है।
इस सूक्ति का भावार्थ यह है कि यदि कोई व्यक्ति बिना कारण आपके प्रति अत्यधिक आदर प्रदर्शित करता है या जो व्यक्ति अब तक आपके प्रति तटस्थ या शत्रुतापूर्ण व्यवहार करता था और अब अचानक अतीव आदर प्रदर्शित करने लगा है तो समझ लो कि दाल में कुछ काला है। अर्थात् आदर प्रदर्शित करने वाला व्यक्ति कोई न कोई चाल चलने वाला है। पाठ में जब चाणक्य अपने शत्रु (राक्षस) के मित्र चन्दनदास के प्रति अतीव आदरपूर्ण व्यवहार करने लगता है तब चन्दनदास यह कहता है कि चाणक्य में एकाएक आया यह परिवर्तन अवश्य ही इनकी कोई कपटी चाल का हिस्सा है।
भाव यह कि हमें अचानक अत्यधिक आदर करने वाले व्यक्ति के प्रति सचेत होकर रहना चाहिए।

(ख) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः।
(प्रसन्न हुई प्रजाओं से राजा लोग बदले में अपना हित भी करवाना चाहता है)
भावार्थ :-उपर्युक्त सूक्ति हमारी पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में संकलित ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से उद्धृत की गयी है। यह पाठ महाकवि विशाखदत्त के नाटक ‘मुद्राराक्षसम्’ से संकलित है। सूक्ति में राजा और प्रजा के पारस्परिक सम्बन्धों के विषय में बतलाया गया है।
प्रदत्त सूक्ति का भाव यह है कि राजा अपनी प्रजाओं की हर प्रकार की रक्षा करता है और यदि प्रजाएँ राजा के प्रशासन से सर्वथा प्रसन्न हैं तो राजा भी यह आशा करता है कि प्रजायें भी राजा की इच्छा के अनुसार कार्य करें। पाठ में चाणक्य चन्दनदास से पूछता है कि क्या आपका व्यापार ठीक चल रहा है। चन्दनदास कहता है कि बिल्कुल ठीक चल रहा है। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य में हमें कोई कठिनाई नहीं है। चाणक्य कहता है कि यदि आप उनके प्रशासन से प्रसन्न हैं; तो आप भी राजा का कुछ हित कीजिए। अर्थात् राजा नन्द के मन्त्री राक्षस के जो परिवार चन्दनदास के पास रह रहा है; वह उस परिवार को वर्तमान के राजा चन्द्रगुप्त मौर्य को सौंप दे।
भाव यह कि राजा और प्रजा का पारस्परिक सम्बन्ध उपकार एवं प्रत्युपकार “Give and take” पर आधारित होता है।

कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः।
प्रसंग :-“कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोधः” यह सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमुषी भाग-2′ में मुद्राराक्षस नाटक से संकलित पाठ “प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्” से उद्धृत की गयी है। इसमें बड़ों के साथ छोटे कैसे शत्रुता मोल ले सकते हैं; इस तथ्य को प्रकट किया गया है।
सरलार्थ :-तिनकों का अग्नि के साथ विरोध सम्भव नहीं है।
भावार्थ :-ऊपर लिखित सक्ति का भावार्थ यह है कि बड़े छोटों से वैर करें यह तो समझ आ जाता है क्योंकि ऐसा करने पर वे उन्हें सजा आदि देने का सामर्थ्य रखते हैं; परन्तु छोटे बड़ों के साथ वैर या द्वेष रखें यह सम्भव नहीं है क्योंकि उनके पास बड़ों को दण्डित करने का सामर्थ्य नहीं होता है। पाठ में चाणक्य चन्दनदास को कहता है कि आप राजा अर्थात् चन्द्रगुप्त मौर्य का विरोध करना छोड़ दो तब चन्दनदास कहता है कि आप यह क्या कह रहे हैं; मैं राजा का विरोध क्यों करूँगा क्योंकि क्या कभी तिनके अग्नि का विरोध कर सकते हैं अर्थात् कभी नहीं।
अतः जहाँ सूर्य को दीपक दिखाने जैसी बात हो या दो पक्षों में बहुत बड़ा अन्तर हो वहाँ उपर्युक्त सूक्ति का प्रयोग किया जाता है।

(ग) शिरसि भयम् अतिदूरं प्रतिकारः।
(चाणक्य चन्दनदास को धमकी देते हुए कहता है कि-भय आपके सिर पर मण्डरा रहा है और उसका उपाय बहुत दूर है)
भावार्थ :-‘शिरसि भयम् अतिदूरे प्रतिकारः’ यह सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में संकलित पाठ ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ पाठ से उद्धृत की गयी है। इसमें अप्रस्तुत की अपेक्षा प्रस्तुत से लाभ उठाने की बात कही गयी है।
सूक्ति का भावार्थ यह है कि चन्दनदास तुम जिस व्यक्ति (मन्त्री राक्षस) के लिए कार्य कर रहे हो; वह यहाँ नहीं है और आपकी इस समय कोई सहायता भी नहीं कर सकता है जबकि यदि तुम अपने घर पर छुपे हुए मन्त्री के परिवार को हमें सौंप देते हो तो हम आपको सजा देने की अपेक्षा पुरस्कृत भी कर सकते हैं। अब आप निर्णय करो कि वर्तमान का लाभ उठाना है या भविष्य के साथ चिपके रहना है। इस सूक्ति का प्रयोग वर्तमान और भविष्य में से एक का चुनाव करने के विकल्प के रूप में किया जाता है।

सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने ।
क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना ॥

प्रसंग :-उपर्युक्त सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक ‘शेमुषी भाग-2’ में मुद्राराक्षस नाटक से उद्धृत पाठ ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ से ली गयी है। इसमें चन्दनदास की मित्र के प्रति निष्ठा को देखकर उसकी प्रशंसा में कहता है कि आपने तो परोपकार में राजा शिवि की भान्ति आदर्श प्रस्तुत कर दिया।
सरलार्थ :-चाणक्य चन्दनदास की मित्र के प्रति निष्ठा को देखकर कहता है कि-दूसरों की वस्तु के समर्पित करने पर बहुत धन प्राप्त होने की स्थिति में भी दूसरों की वस्तु के सुरक्षा रूपी कठिन कार्य को ‘शिवि’ को छोड़कर तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन कर सकता है।
भावार्थ :-ऊपर लिखित सूक्ति का भाव यह है कि धन लोभ का त्याग करके भी धरोहर की रक्षा करना किसी विरले ही महापुरुष के वश की बात होती है। चाणक्य कहता है कि चन्दनदास मन्त्री राक्षस के परिवार को चन्द्रगुप्त मौर्य को सौंप देने पर आप धन और पद की प्राप्ति कर सकते हैं तथापि आप अपनी धरोहर की रक्षा के प्रति वचनबद्ध हैं। ऐसी निष्ठा या तो हमने शिवि द्वारा कबूतर रक्षण में देखी थी या फिर आज आप में देख रहे हैं।
संसार में ऐसे लोग भी विद्यमान हैं जो सब कुछ त्याग कर भी अपने वचन पर अडिग रहते हैं।

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प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) अत्यादरः शङ्कनीयः।
(ख) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः।
(ग) राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव।
(घ) सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षस्य गृहजनं न समर्पयामि।
(ङ) नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिम् उत्पादयति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) अत्यादरः कीदृशः?
(ख) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति के?
(ग) कस्मिन् अविरुद्धवृत्तिर्भव?
(घ) सन्तमपि गेहे कस्य गृहजनं न समर्पयामि?
(ङ) नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः किम् उत्पादयति?

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प्रश्न 3.
अधोलिखित-प्रश्नानां प्रदत्तोत्तरविकल्पेषु शुद्धं विकल्पं विचित्य लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से शुद्ध विकल्प चुनकर लिखिए-)
(क) ‘कदाचिच्च’ पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(i) कदाचित् + च
(ii) कदाचिच् + च
(iii) कदा + चिच्च
(iv) कदाचित + च।
उत्तरम्:
(i) कदाचित् + च।

(ख) ‘प्राणेभ्यः + अपि’ अत्र सन्धियुक्तपदम्
(i) प्राणेभ्योरपि
(ii) प्राणेभ्योऽअपि
(iii) प्राणेभ्योष्वपि
(iv) प्राणेभ्योऽपि।
उत्तरम्:
(iv) प्राणेभ्योऽपि।

(ग) ‘गृहजनम्’ अस्मिन् पदे कः समासोऽस्ति ?
(i) बहुव्रीहिः
(ii) तत्पुरुषः
(ii) अव्ययीभावः
(iv) द्वन्द्वः ।
उत्तरम्:
(ii) तत्पुरुषः

(घ) ‘अपरिक्लेशः’ इति पदस्य समास-विग्रहः
(i) अपरः क्लेशः
(ii) क्लेशम् अनतिक्रम्य
(iii) न परिक्लेशः
(iv) अपरिहार्यः क्लेशः।
उत्तरम्:
(iii) न परिक्लेशः

(ङ) ‘द्रष्टुम्’ इति पदे कः प्रत्ययः ?
(i) त्व
(ii) तल्
(iii) तुमुन्
(iv) क्ता।
उत्तरम्:
(iii) तुमुन्

(च) ………. प्रचीयन्ते संव्यवहारणां वृद्धिलाभाः ?
(रिक्तस्थानपूर्तिः अव्ययपदेन)
(i) अपि
(ii) ह्यः
(iii) न
(iv) च।
उत्तरम्:
(i) अपि

(छ) मम विद्यालये ……… प्रमुखं प्रवेशद्वारम् अस्ति।
(रिक्तस्थानपूर्तिः उचितसंख्यापदेन)
(i) एकम्
(ii) एका
(iii) चतस्रः
(iv) शताधिकम्।
उत्तरम्:
(i) एकम्।

(ज) आर्यस्य प्रसादेन कस्य वणिज्या अखण्डिता ?
(i) अमात्यराक्षसस्य
(ii) चाणक्यस्य
(iii) चन्दनदासस्य
(iv) चन्द्रगुप्तस्य।
उत्तरम्
(iii) चन्दनदासस्य।

(झ) तृणानां केन सह विरोधः भवति ?
(i) जलेन
(ii) अग्निना
(iii) वायुना
(iv) पशुना।
उत्तरम्:
(i) अग्निना

(ज) ‘आर्येण’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(i) प्रथमा
(ii) सप्तमी
(iii) तृतीया
(iv) चतुर्थी।
उत्तरम्:
(iii) तृतीया।

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यथानिर्देशम् उत्तरत
(ट) ‘भीताः’ इति पदस्य प्रकृति-प्रत्ययौ लिखत।
(ठ) ‘ननु भवता प्रष्टव्याः स्मः। (अत्र किम् अव्ययपदं प्रयुक्तम्)
(ड) ‘राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव। (‘भव’ अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ?)
(ढ) अयम् विद्यालयः 12 कक्षापर्यन्तः अस्ति। (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचक-विशेषणं लिखत)
(ण) प्राचार्यस्य 2 सहायकौ उपप्राचार्यों स्तः। (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचकविशेषणं लिखत)
(त) शिविना विना इदं दुष्करं कः कुर्यात्। (रेखाङ्कितपदेन प्रश्ननिर्माणं कुरुत)
उत्तराणि-
(ट) ‘भीताः’ – भी + क्त।
(ठ) ‘ननु’ इति अव्ययपदं प्रयुक्तम्।
(ड) ‘भव’ अत्र लोट् लकारः प्रयुक्तः ।
(ढ) अयम् विद्यालयः द्वादश-कक्षापर्यन्तः अस्ति।
(ण) प्राचार्यस्य द्वौ सहायकौ उपप्राचार्यों स्तः।
(त) केन विना इदं दुष्करं कः कुर्यात् ?

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प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः पठित-अवबोधनम्

निर्देशः-अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितान् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृत-पूर्णवाक्येन लिखत
(अधोलिखित गद्यांश को पढ़कर इन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्य में लिखिए-)

1. चाणक्यः – वत्स ! मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि। शिष्यः
शिष्यः – तथेति (निष्क्रम्य चन्दनदासेन सह प्रविश्य) इतः इतः श्रेष्ठिन् (उभौ परिक्रामत:)
शिष्यः – (उपसृत्य) उपाध्याय ! अयं श्रेष्ठी चन्दनदासः।
चन्दनदासः -जयत्वार्यः।
चाणक्यः – श्रेष्ठिन् ! स्वागतं ते। अपि प्रचीयन्ते संव्यवहारणां वृद्धिलाभाः ?
चन्दनदासः – (आत्मगतम्) अत्यादरः शङ्कनीयः। (प्रकाशम्) अथ किम्। आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या।
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजानः।
चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः, किं कियत् च अस्मजनादिष्यते इति।
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! चन्द्रगुप्तराज्यमिदं न नन्दराज्यम्। नन्दस्यैव अर्थसम्बन्धः प्रीतिमुत्पादयति। चन्द्रगुप्तस्य तु भवतामपरिक्लेश एव।
चन्दनदासः – (सहर्षम्) आर्य ! अनुगृहीतोऽस्मि।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) चाणक्यः कं द्रुष्टुम् इच्छति ?
(ii) आर्यस्य प्रसादेन कस्य वणिज्या अखण्डिता ?
(iii) अनुगृहीतः कः भवति ?
(iv) कस्य एव अर्थसम्बन्धः प्रीतिम् उत्पादयति ?
(v) अत्यादरः कीदृशः ?
(vi) चन्दनदासः कः अस्ति ?
(vii) किम् इच्छन्ति राजानः ?
उत्तराणि:
(i) चाणक्यः चन्दनदासं द्रुष्टुम् इच्छति।
(ii) आर्यस्य प्रसादेन चन्दनदासस्य वणिज्या अखण्डिता।
(iii) अनुगृहीतः चन्दनदासः भवति।
(iv) नन्दस्य एव अर्थसम्बन्धः प्रीतिम् उत्पादयति।
(v) अत्यादरः शङ्कनीयः।
(vi) चन्दनदासः मणिकारश्रेष्ठी अस्ति।
(vii) प्रीताभ्यः प्रकृतिभ्यः प्रतिप्रियम् इच्छन्ति राजानः ।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘परिक्रामतः’ अत्र कः उपसर्गः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘अखण्डिता वणिज्या’-अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(ii) ‘व्यापाराणाम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘अस्मज्जनादिष्यते’-अत्र ‘अस्मत्’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) ‘दरिद्रः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) परि।
(ii) वणिज्या।
(iii) संव्यवहाराणाम्।
(iv) चन्दनदासाय।
(v) श्रेष्ठी।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

शब्दार्था:-मणिकारश्रेष्ठिनम् = (रत्नकारं वणिजम्) मणियों का व्यापारी । निष्क्रम्य = (बहिर्गत्वा) बाहर निकलकर। परिक्रामतः = (परिभ्रमणं कुर्वतः) (दोनों) परिभ्रमण करते है। उपसृत्य = (समीपं गत्वा) पास जाकर। प्रचीयन्ते =(वृद्धिं प्राप्नुवन्ति) बढ़ते हैं । संव्यवहाराणाम् = (व्यापाराणाम्) व्यापारों का। आत्मगतम् = (स्वगतम्) मन-ही-मन। प्रकाशम् = (प्रकटरूपे) प्रकट रूप में। शङ्कनीयः = (सन्देहास्पदम्) शंका करने योग्य। प्रसादेन = (कृपया) कृपा से। अखण्डिता = (निर्बाधा) बाधारहित । वणिज्या = (वाणिज्यम्) व्यापार । प्रीताभ्यः = (प्रसन्नाभ्यः) प्रसन्नजनों के प्रति। प्रतिप्रियम् = (प्रत्युपकारम्) उपकार के बदले किया गया उपकार। अपरिक्लेशः = (दु:खाभाव:) दुःख का अभाव।

प्रसंगः-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ नामक पाठ से लिया गया है। चाणक्य से भेंट करने के लिए उनकी अनुमति से सेठ चन्दनदास को चाणक्य के सामने लाया जाता है और चाणक्य उसका बहुत आदर करते हुए चन्द्रगुप्त के राज्य में उसके व्यापार की वृद्धि के बारे में पूछता है। इसी का वर्णन प्रस्तुत नाटयांश में है।

सरलार्थः
चाणक्य – पुत्र ! मैं इस समय सुवर्ण व्यापारी सेठ चन्दनदास को देखना (मिलना) चाहता हूँ।
शिष्य – ठीक ही (बाहर निकलकर चन्दनदास के साथ प्रवेश करके) इधर से इधर से सेठ जी ( दोनों घूमते हैं)।
शिष्य – (पास जाकर) उपाध्यायजी ! ये सेठ चन्दनदास हैं।
चन्दनदास – आर्य की जय हो।
चाणक्य – सेठ जी ! आपका स्वागत है। क्या आपके व्यापार-कार्यों की लाभवृद्धियाँ हो रही हैं ?
चन्दनदास – (मन-ही-मन) अत्यधिक आदर शङ्का (सन्देह) के योग्य है। (प्रकट रूप में) और क्या! आर्य की कृपा से मेरा व्यापार परिपूर्ण है।
चाणक्य – अरे सेठ जी ! राजा प्रसन्न हुई अपनी प्रजा से बदले में प्रिय चाहते हैं। अर्थात् राजा का तुम्हारे प्रति जो मृदु व्यवहार है, उसके बदले में वे भी आपसे कुछ प्रिय व्यवहार चाहते हैं।
चन्दनदास – आर्य आज्ञा करें, इस व्यक्ति से क्या और कितना चाहते हैं ?
चाणक्य – अरे सेठजी ! यह चन्द्रगुप्त का राज्य है, न कि नन्द का राज्य। धन का सम्बन्ध नन्द के लिए ही प्रीति उपजाता है। चन्द्रगुप्त के लिए तो आपका दुःख रहित होना ही प्रीतिदायक है।
चन्दनदास – (हर्ष के साथ) आर्य ! अनुगृहीत हुआ हूँ।

भावार्थ:-भाव यह है कि चाणक्य चन्दनदास को आदरपूर्वक मिलने के लिए बुलाता है। चन्दनदास अपने प्रति चाणक्य के अति आदर को शंका की दृष्टि से देखता है। चाणक्य उससे पूछता है कि चन्द्रगुप्त के राज्य में उसका व्यापार फल-फूल रहा है या नहीं। चन्दनदास कहता है कि बिल्कुल ठीक चल रहा है। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्य में हमें कोई कठिनाई नहीं है। चाणक्य कहता है कि यदि आप उनके प्रशासन से प्रसन्न हैं; तो आप भी राजा का कुछ हित कीजिए। क्योंकि राजा और प्रजा का पारस्परिक सम्बन्ध उपकार एवं प्रत्युपकार “Give and take” पर आधारित होता है।
नोट-संस्कृत में वाक्य के आरम्भ में आने वाला ‘अपि’ शब्द प्रश्नवाचक होता है-अपि = किम्। जैसे-अपि कुशलोऽसि ?
‘क्या आप कुशल हैं ?’

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

2. चाणक्यः भो श्रेष्ठिन् ! स चापरिक्लेशः कथमाविर्भवति इति ननु भवता प्रष्टव्याः स्मः।
चन्दनदासः – आज्ञापयतु आर्यः।
चाणक्यः – राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव।
चन्दनदासः – आर्य ! कः पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते ?
चन्दनदासः – (कर्णो पिधाय) शान्तं पापम्, शान्तं पापम्। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोध: ?
चाणक्यः – अयमीदृशो विरोधः यत् त्वमद्यापि राजापथ्यकारिणोऽमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षसि।
चन्दनदासः – आर्य ! अलीकमेतत्। केनाप्यनार्येण आर्याय निवेदितम्।
चाणक्यः – भो श्रेष्ठिन् ! अलमाशङ्कया। भीताः पूर्वराजपुरुषाः पौराणामनिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति। ततस्तत्प्रच्छादनं दोषमुत्पादयति।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) कस्मिन् अविरुद्धवृत्तिः भवेत् ?
(ii) तृणानां केन सह विरोधः भवति ?
(ii) राजापथ्यकारी कः अस्ति ? ।
(iv) चन्दनदासः कस्य गृहजनं रक्षति ?
(v) के देशान्तरं व्रजन्ति?
(vi) चाणक्येन राज्ञः विरुद्धः अधन्यः कः अवगम्यते ?
(vii) केषां गृहजनं स्वगृहे प्रच्छादनं दोषम् उत्पादयति ?
उत्तराणि
(i) राजनि अविरुद्धवृत्तिः भवेत्।
(ii) तृणानां अग्निना सह विरोधः भवति।
(iii) राजापथ्यकारी अमात्यराक्षसः अस्ति।
(iv) चन्दनदासः कस्य गृहजनं रक्षति।
(v) पूर्वराजपुरुषाः देशान्तरं व्रजन्ति।
(vi) चाणक्येन राज्ञः विरुद्धः अधन्यः चन्दनदासः अवगम्यते।
(vii) पूर्वराजपुरुषाणां गृहजनं स्वगृहे प्रच्छादनं दोषम् उत्पादयति।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘असत्यम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘राजहितकारिणः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘भीताः पूर्वराजपुरुषाः’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(iv) ‘निक्षिप्य’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(v) ‘केनाप्यनार्येण’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि
(i) अलीकम्।
(ii) राजापथ्यकारिणः ।
(iii) भीताः ।
(iv) ल्यप् ।
(v) केन + अपि + अनार्येण।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-आविर्भवति = (अवतारणाम् करोति) अवतरित करना, उपस्थित करना। आज्ञापयतु = (आदिशतु) आदेश कीजिए। अर्थसम्बन्धः = (धनस्य सम्बन्धः) धन का सम्बन्ध । परिक्लेशः = (दुःखम्) दुःख । प्रष्टव्याः = (प्रष्टुं योग्याः) पूछने योग्य। अविरुद्धवृत्तिः = (अविरुद्धस्वभाव:) विरोधरहित स्वभाववाला। अवगम्यते = (ज्ञायते) जाना जाता है। पिधाय = (आच्छाद्य) बन्दकर। राजापथ्यकारिणः = (नृपापकारकारिणः) राजाओं का अहित करने वाले। अलीकम् = (असत्यम्) झूठ। अनार्येण = (दुष्टेन) दुष्ट के द्वारा। पौराणाम् = (नगरवासिनाम्) नगर के लोगों के। अनिच्छताम् = (न इच्छताम्) न चाहते हुओं का। निक्षिप्य = (स्थापयित्वा) रखकर। व्रजन्ति = (गच्छन्ति) जाते हैं। प्रच्छादनम् = (आच्छादनम्) छिपाना।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ नामक पाठ से लिया गया है। चाणक्य सेठ चन्दनदास से बातचीत करते हुए स्पष्ट करता है कि राजा का अहित करने वाले के परिवार को अपने घर में आश्रय देना दण्डनीय अपराध है और अमात्य राक्षस के परिवार को छिपाकर तुमने भी यह अपराध किया है। इसी का वर्णन प्रस्तुत नाट्यांश में है।

सरलार्थ:
चाणक्य – अरे सेठ जी ! और वह दुःख का अभाव कैसे पैदा होता है, बस यही आपसे पूछा जाना है।
चन्दनदास – आज्ञा कीजिए आर्य।
चाणक्य – राजा के प्रति उसके अनुकूल व्यवहार वाले होओ।
चन्दनदास – आर्य ! फिर कौन अभागा राजा के विरुद्ध आचरण करने वाला जाना गया है ?
चाणक्य – पहले तो आप ही हैं।
चन्दनदास – (कानों पर हाथ रखकर) पाप शान्त हो, पाप शान्त हो-अग्नि के साथ तिनकों का कैसा विरोध ?
चाणक्य – यह विरोध ऐसे है कि तुम आज भी राजा का अहित करने वाले अमात्य राक्षस के परिवार के लोगों की अपने घर में रक्षा कर रहे हो।
चन्दनदास – आर्य, यह झूठ है। किस दुष्ट के द्वारा आर्य को निवेदन किया गया है।
चाणक्य – अरे सेठ जी । आशका मत करो। डरे हुए पूर्व राजपुरुष नगरवासियों के न चाहते हुए भी उनके घरों में (अपने) परिवार के लोगों को रखकर परदेश को चले जाते हैं। इसी से उनको छिपाना दोष उत्पन्न करता है। अर्थात् इस प्रकार राजा के अहितैषी राजपुरुषों के परिवारजनों को छिपाना अपराध है।

भावार्थ:-भाव यह है कि चाणक्य चन्दनदास को कहता है कि वह आज भी राजा का अहित करने वाले अमात्य राक्षस के परिवार के लोगों की अपने घर में रक्षा कर रहा है और इस प्रकार राजा का अहित चाहने वाले राजपुरुषों के परिवारजनों को छिपाना अपराध है।

3. चन्दनदासः – एवं नु इदम्। तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति।
चाणक्यः – पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीम् “आसीत्” परस्परविरुद्ध वचने।
चन्दनदासः – आर्य ! तस्मिन् समये आसीदस्मद्गृहे अमात्यराक्षस्य गृहजन इति।
चाणक्यः – अथेदानी क्व गतः ?
चन्दनदासः – न जानामि।
चाणक्यः – कथं न ज्ञायते नाम ? भो श्रेष्ठिन् शिरसि भयम् अतिदूरं तत्प्रतिकारः।
चन्दनदासः – आर्य ! किं मे भयं दर्शयसि ? सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षस्य गृहजनं न समर्पयामि, किं पुनरसन्तम् ?
चाणक्यः – चन्दनदास ! एष एव ते निश्चयः ?
चन्दनदासः – बाढम् एष एव मे निश्चयः।
चाणक्यः – (स्वगतम् ) साधु ! चन्दनदास साधु। सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने। क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना॥

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) तस्मिन् समये कस्य गृहे अमात्य-राक्षसस्य गृहजनः आसीत् ?
(ii) पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीं किम् ?
(iii) कस्य प्रतिकारः अतिदूरम् अस्ति ?
(iv) भयं कः दर्शयति ?
(v) केन विना इदं दुष्करं कुर्यात् ?
उत्तराणि:
(i) तस्मिन् समये चन्दनदासस्य गृहे अमात्य-राक्षसस्य गृहजनः आसीत्।
(ii) पूर्वम् ‘अनृतम्’, इदानीं किम् ‘आसीत्’ ।
(iii) भयस्य प्रतिकारः अतिदूरम् अस्ति।
(iv) भयं चाणक्यः दर्शयति।
(v) शिविना विना इदं दुष्करं कुर्यात्।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘परस्परविरुद्धे वचने’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(ii) ‘कुत्र’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तम् अव्ययपदं किम् ?
(iii) ‘सन्तम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iv) ‘एष एव मे निश्चयः’ अत्र ‘मे’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) ‘सुलभेष्वर्थलाभेषु’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) परस्परविरुद्ध।
(ii) क्व।
(ii) असन्तम्।
(iv) चन्दनदासाय।
(v) सुलभेषु + अर्थलाभेषु।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-अमात्यः = (मन्त्रीं) मन्त्री। प्रतिकारः = (प्रतिशोधार्थं कृता क्रिया) बदले की कार्यवाही। असन्तम् = (न निवसन्तम्) न रहने वाले। बाढम् = (आम्) हाँ। संवेदने = (समर्पणे कृते सति) समर्पण कर देने पर। जने = (लोके) संसार में। शिविना = (शिवि-नृपेण) राजा शिवि के द्वारा।

प्रसंगः-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ नामक पाठ से लिया गया है। चन्दनदास के परस्पर विरुद्ध वचनों में भी चाणक्य जब यह स्पष्ट कर देते हैं कि अमात्य राक्षस के परिवार को उसने अपनी सुरक्षा में रखा हुआ हैं तो चन्दनदास राजदण्ड की बात सुनकर भी निर्भय होकर कहता है कि घर में होने पर भी मैं अमात्य राक्षस के परिवार को राजा के लिए समर्पित न करता। फिर घर में न होने पर उसे दिया ही कैसे जा सकता है ? इसी का वर्णन प्रस्तुत नाट्यांश में है।

सरलार्थः
चन्दनदास – हाँ ऐसा ही है। तब मेरे घर में अमात्य राक्षस का परिवार था।
चाणक्य -पहले ‘झूठ’, अब ‘था’ ऐसे दो परस्पर विपरीत वचन।
चन्दनदास – आर्य ! उस समय मेरे घर में अमात्य राक्षस का परिवार था।
चाणक्य – तो अब कहाँ गया ?
चन्दनदास – नहीं जानता हूँ।
चाणक्य – क्यों नहीं जानते। अरे सेठ जी ! (भय) सिर पर है, उसका प्रतिकार (निवारण) बहुत दूर।
चन्दनदास – आर्य ! क्या मुझे भय दिखा रहे हो ? घर में होने पर भी अमात्य राक्षस के परिजन को नहीं देता, फिर न होने पर तो बात ही क्या ?
चाणक्य – चन्दनदास ! यही तुम्हारा निश्चय है ?
चन्दनदास – हाँ यही मेरा निश्चय है।
चाणक्य – (मन-ही-मन) धन्य ! चन्दनदास धन्य!
श्लोकान्वयः – परस्य संवेदने अर्थलाभेषु सुलभेषु इदं दुष्करं कर्म जने (लोके) शिविना विना कः कुर्यात् ।
संस्कृतेऽर्थः – परस्य परकीयस्य अर्थस्य संवेदने समर्पणे कृते सति अर्थलाभेषु सुलभेषु सत्सु स्वार्थं तृणीकृत्य
परसंरक्षणरूपमेवं दुष्करं कर्म जने (लोके) एकेन शिविना विना त्वदन्यः कः कुर्यात् । शिविरपि कृते युगे कृतवान् त्वं तु इदानीं कलौ युगे करोषि इति ततोऽप्यतिशयित-सुचरितत्वमिति भावः।

श्लोक का सरलार्थ:-दूसरों की वस्तु को समर्पित करने पर बहुत धन प्राप्त होने की स्थिति में भी दूसरों की वस्तु की सुरक्षा रूपी कठिन कार्य को एक शिवि को छोड़कर तुम्हारे अलावा दूसरा कौन कर सकता है ?

भावार्थ:-भाव यह है कि चन्दनदास के परस्पर विरुद्ध वचनों के आधार पर चाणक्य जब यह स्पष्ट कर देता है कि अमात्य राक्षस के परिवार को उसने अपनी सुरक्षा में रखा हुआ है तो चन्दनदास राजदण्ड की बात सुनकर भी निर्भय होकर कहता है कि घर में होने पर भी मैं अमात्य राक्षस के परिवार को राजा के लिए समर्पित न करता। फिर घर में न होने पर उसे दिया ही कैसे जा सकता है ?
प्रस्तुत श्लोक के माध्यम से महाकवि विशाखदत्त ने बड़े ही संक्षिप्त शब्दों में चन्दनदास के गुणों का वर्णन किया है। इसमें कवि ने कहा है कि दूसरों की वस्तु की रक्षा करनी कठिन होती है। यहाँ चन्दनदास के द्वारा अमात्य राक्षस के परिवार की रक्षा का कठिन काम किया गया है। न्यायसंरक्षण को महाकवि भास ने भी दुष्कर कार्य मानते हुए स्वप्नवासवदत्तम् में कहा है-‘दुष्करं न्यासरक्षणम्’।

निष्कर्षः- चन्दनदास अगर अमात्य राक्षस के परिवार को राजा को समर्पित कर देता, तो राजा उससे प्रसन्न भी होता और बहुत-सा धन पारितोषिक के रूप में देता, पर उसने भौतिक लाभ व लोभ को दरकिनार करते हुए अपने प्राणप्रिय मित्र के परिवार की रक्षा को अपना कर्तव्य माना और इसे निभाया भी। कवि ने चन्दनदास के इस कार्य की तुलना राजा शिवि के कार्यों से की है जिन्होंने अपने शरणागत कपोत की रक्षा के लिए अपने शरीर के अंगों को काटकर दे दिया था। राजा शिवि ने तो सत्युग में ऐसा किया था, परन्तु चन्दनदास ने ऐसा कार्य इस कलियुग में किया है, इसलिए वह और भी अधिक प्रशंसा का पात्र है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 11 प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः

प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः (प्राणों से भी प्यारा मित्र) Sumarry in Hindi

प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः पाठ-परिचय

‘मुद्राराक्षसम्’ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित राजनीति पर केन्द्रित एक महत्त्वपूर्ण नाटक है। इस नाटक में आठ अंक हैं। जिनमें चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन को चाणक्य द्वारा स्थापित करने का कथानक है। कूटनीतिज्ञ चाणक्य की बुद्धि से चन्द्रगुप्त न केवल पाटलिपुत्र का राज्य प्राप्त करता है अपितु अपनी कूटनीति के बल पर ही चाणक्य नन्द वंश के अति गुणवान् स्वामिभक्त महा-मन्त्री राक्षस को भी चन्द्रगुप्त का मन्त्री बनाने के लिए विवश कर देता है। राक्षस को वश में करने में चाणक्य की कूटनीति, गुप्तचर व्यवस्था तथा राक्षस की मुद्रा से अंकित एक पत्र की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। मुद्रा के द्वारा राक्षस को वश में करने के कारण ही इस नाटक का नाम ‘मुद्राराक्षसम्’ रखा गया है।
पाठ के रूप में प्रस्तुत नाट्यांश ‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ इसी ‘मुद्राराक्षसम्’ नाटक के प्रथम अङ्क से उद्धृत किया गया है। नन्दवंश का विनाश करने के बाद उसके हितैषियों को खोज-खोजकर पकड़वाने के क्रम में चाणक्य, अमात्य राक्षस एवं उसके कुटुम्बियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए चन्दनदास से वार्तालाप करता है, किन्तु चाणक्य को अमात्य राक्षस के विषय में कोई सुराग न देता हुआ चन्दनदास अपनी मित्रता पर दृढ़ रहता है। उसके मैत्री-भाव से प्रसन्न होता हुआ भी चाणक्य जब उसे राजदण्ड का भय दिखाता है, तब चन्दनदास राजदण्ड भोगने के लिए भी सहर्ष प्रस्तुत हो जाता है। इस प्रकार अपने सुहृद् के लिए प्राणों का भी उत्सर्ग करने के लिए तत्पर चन्दनदास अपनी सुहृद्-निष्ठा का एक ज्वलन्त उदाहरण प्रस्तुत करता है।

प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृदः पाठस्य सारांश:

‘प्राणेभ्योऽपि प्रियः सुहृद्’ यह पाठ महाकवि विशाखदत्त द्वारा रचित ‘मुद्राराक्षसम्’ नामक नाटक से लिया गया है। प्रस्तुत पाठ में राक्षस के मित्र सेठ चन्दनदास का अपने मित्र के प्रति प्रगाढ़ प्रेम दर्शाया गया है। पाठ का सार इस प्रकार है

चाणक्य को अपने गुप्तचरों द्वारा यह पता चल जाता है कि पूर्व राजा नंद के विश्वासपात्र मन्त्री राक्षस के परिवार को राजधानी के एक सेठ चन्दनदास ने अपने घर में छिपाकर रखा हुआ है। चाणक्य अपने शिष्यों के द्वारा पूछताछ के लिए सेठ चन्दनदास को बुलवाता है और बड़े आदर के साथ उसके व्यापार का कुशल पूछता है। उत्तर में चन्दनदास अपने व्यापार वृद्धि पर प्रसन्नता प्रकट करता है। चाणक्य चन्दनदास से कहता है कि अमात्य राक्षस राजा चन्द्रगुप्त का हितैषी नहीं है और विद्रोही राजपुरुषों के परिवार को अपने घर में छिपाकर रखना एक अपराध है।

आपने अमात्य राक्षस के परिवार को अपने घर में छिपाकर यह अपराध किया है। जिसके दंड से बचना कठिन है। चन्दनदास निर्भयतापूर्वक कहता है कि यदि मेरे पास अमात्य राक्षस का परिवार हो भी, तो भी मैं उसे राजा के लिए समर्पित नहीं करूँगा, फिर मेरे पास तो है ही नहीं। चाणक्य मन ही मन चन्दनदास की मित्रता पर प्रसन्न होता है और उसे बधाई देता है कि अपने मित्र के जिस परिवार को सौंपकर इस सेठ को पर्याप्त धन लाभ हो सकता है यह सेठ चन्दनदास उस परिवार को सौंपने को तैयार नहीं है शरण में आए हुए की रक्षा अपने प्राणों से भी बढ़कर करना यह राजा शिवि के अतिरिक्त और कौन कर सकता है। दूसरे शब्दों में सेठ चन्दनदास को राजा शिवि के समान शरणागत की रक्षा करने वाला मानकर चाणक्य ने उसकी प्रशंसा की है और चन्दनदास ने भी अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने मित्र के परिवार की रक्षा करके सिद्ध कर दिया कि मित्र प्राणों से भी प्रिय होता है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

HBSE 10th Class Sanskrit भूकम्पविभीषिका Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृतभाषा में लिखिए-)
(क) समस्तराष्ट्र कीदृक् उल्लासे मग्नम् आसीत् ?
(ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कः जनपदः आसीत् ?
(ग) पृथिव्याः स्खलनात् किं जायते ?
(घ) समग्रो विश्वः कैः आतंकितः दृश्यते ?
(ङ) केषां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते ?
(च) कीदृशानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते ?
उत्तराणि
(क) समस्तराष्ट्रं नृत्य-गीतवादित्राणाम् उल्लासे मग्नम् आसीत् ।
(ख) भूकम्पस्य केन्द्रबिन्दुः कच्छजनपदः आसीत्।।
(ग) पृथिव्याः स्खलनात् बहुभूमिकानि भवनानि क्षणेनैव धराशायीनि जायन्ते।
(घ) समग्रो विश्वः भूकम्पैः आतंकित: दृश्यते।
(ङ) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते।
(च) बहुभूमिकानि भवनानि धराशायीनि जायन्ते।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 2.
सन्धिं/सन्धिविच्छेदं च कुरुत (सन्धि/सन्धिविच्छेद कीजिए-)
(अ) परसवर्णसन्धिनियमानुसारम् (परसवर्ण सन्धि के नियम के अनुसार-)
(क) किञ्च = ……………….. + च
(ख) ……… = नगरम् + तु
(ग) विपन्नञ्च = ……………….. + ………………..
(घ) ……………….. = किम् + नु
(ङ) भुजनगरन्तु = ……………….. + ………………..
(च) ……………….. = सम् + चयः।
उत्तराणि
(क) किञ्च = किम् + च
(ख) नगरन्तु = नगरम् + तु
(ग) विपन्नञ्च = विपन्नम् + च
(घ) किन्नु = किम् + नु
(ङ) भुजनगरन्तु = भुजनगरम् + तु
(च) सञ्चयः = सम् + चयः।

(आ) विसर्गसन्धिनियमानुसारम् (विसर्ग सन्धि के नियम के अनुसार-)
(क) शिशवस्तु = ……………….. + ………………..
(ख) ……………….. = विस्फोटैः + अपि
(ग) सहस्त्रशोऽन्ये = ……………….. + अन्ये
(घ) विचित्रोऽयम् = विचित्रः + ………………..
(ङ) ……………….. = भूकम्पः + जायते
(च) वामनकल्प एव = ……………….. + ………………..
उत्तराणि
(क) शिशवस्तु = शिशवः + तु
(ख) विस्फोटैरपि = विस्फोटैः + अपि
(ग) सहस्रशोऽन्ये = सहस्त्रशः + अन्ये
(घ) विचित्रोऽयम् = विचित्रः + अयम्
(ङ) भूकम्पो जायते = भूकम्पः + जायते
(च) वामनकल्प एव = वामनकल्पः + एव

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 3.
(अ) ‘क’ स्तम्भे पदानि दत्तानि ‘ख’ स्तम्भे विलोमपदानि, तयोः संयोगं कुरुत
(‘क’ स्तम्भ में दिए गए पदों का ‘ख’ स्तम्भ में दिए गए विलोम पदों के साथ संयोग कीजिए-)
क – ख
सम्पन्नम् – प्रविशन्तीभिः
ध्वस्तभवनेषु – सुचिरेणैव
निस्सरन्तीभिः – विपन्नम्
निर्माय – नवनिर्मित-भवनेषु
क्षणेनैव – विनाश्य
उत्तराणि
पदम् – विलोमपदम्
क – ख
सम्पन्नम् – विपन्नम्
ध्वस्तभवनेषु – नवनिर्मित-भवनेषु
निस्सरन्तीभिः – प्रविशन्तीभिः
निर्माय – विनाश्य
क्षणेनैव – सुचिरेणैव।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(आ) ‘क’ स्तम्भे पदानि दत्तानि ‘ख’ स्तम्भे समानार्थकपदानि तयोः संयोगं कुरुत
(‘क’ स्तम्भ में दिए गए पदों का ‘ख’ स्तम्भ में दिए गए समानार्थक पदों के साथ संयोग कीजिए-)
क – ख
पर्याकुलम् – नष्टाः
विशीर्णाः – क्रोधयुक्ताम्
उगिरन्तः – संत्रोट्य
विदार्य – व्याकुलम्
प्रकुपिताम् – प्रकटयन्तः
उत्तराणि
पदम् – समानार्थकपदम्
क – ख
पर्याकुलम् – व्याकुलम्
विशीर्णाः – नष्टाः
उद्गिरन्तः – प्रकटयन्तः
विदार्य – संत्रोट्य
प्रकुपिताम् – क्रोधयुक्ताम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 4.
(अ) उदाहरणमनुसृत्य प्रकृति-प्रत्यययोः विभागं कुरुत
(उदाहरण के अनुसार प्रकृति-प्रत्यय का विभाजन कीजिए-)
यथा-परिवर्तितवती – परि + वृत् + क्तवतु + डीप् (स्त्री)
धृतवान् – …………………… + ……………………
हसन् – …………………… + ……………………
विशीर्णाः – वि + शृ + क्त + ………..
प्रचलन्ती – …………………… + शतृ + डीप् (स्त्री)
हतः – …………………… + ……………………
उत्तराणि
परिवर्तितवती – परि + वृत् + क्तवतु + डीप् (स्त्री)
धृतवान् – धृ + क्तवतु
हसन् – हस् + शतृ
विशीर्णाः – वि + शृ + क्त + टाप
प्रचलन्ती – प्र + चल् + शतृ + ङीप् (स्त्री)
हतः – हन् + क्त।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

(आ) पाठात् विचित्य समस्तपदानि लिखत
महत् च तत् कम्पनं = …………………………..
दारुणा च सा विभीषिका = …………………………..
ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु = …………………………..
प्राक्तने च तस्मिन् युगे = …………………………..
महत् च तत् राष्ट्र तस्मिन् = …………………………..
उत्तराणि
विग्रहः – समस्तपदम्
महत् च तत् कम्पनं = महत्कम्पनम्
दारुणा च सा विभीषिका = दारुणविभीषिका
ध्वस्तेषु च तेषु भवनेषु = ध्वस्तभवनेषु
प्राक्तने च तस्मिन् युगे = प्राक्तनयुगे
महत् च तत् राष्ट्रं तस्मिन् = महाराष्ट्रे।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 5.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं ध्वंसावशेषेषु परिवर्तितवती।
(ख) वैज्ञानिकाः कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते।
(ग) विवशाः प्राणिनः आकाशे पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते।
(घ) एतादृशी भयावहघटना गढ़वालक्षेत्रे घटिता।
(ङ) तदिदानीम् भूकम्पकारणं विचारणीयं तिष्ठति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) भूकम्पविभीषिका विशेषेण कच्छजनपदं केषु परिवर्तितवती ?
(ख) के कथयन्ति यत् पृथिव्याः अन्तर्गर्भे, पाषाणशिलानां संघर्षणेन कम्पनं जायते ?
(ग) विवशाः प्राणिनः कुत्र पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते ?
(घ) कीदृशी भयावहघटना गढ़वालक्षेत्रे घटिता ?
(ङ) तदिदानीम् किं विचारणीयं तिष्ठति ?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 6.
‘भूकम्पविषये’ पञ्चवाक्यमितम् अनुच्छेदं लिखत।
(‘भूकम्प’ विषय पर पाँच वाक्यों का एक अनुच्छेद लिखिए)
उत्तरम्
(i) भूमिकम्पनम् एव भूकम्पनं कथ्यते।
(ii) भूकम्पेन जनजीवनम् अस्त-व्यस्तं भवति, महाविनाशः च जायते।
(iii) भूमिगर्भे शिलासंघात-स्खलनात् भूकम्पः जायते-इति भूगर्भवैज्ञानिकाः कथयन्ति।
(iv) ज्वालामुखविस्फोटैः अपि भूकम्प: जायते।
(v) भूकम्पः प्राकृतिक-विपदा वर्तते अतः अस्याः निवारणाय न कोऽपि उपायः ।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 7.
कोष्ठकेषु दत्तेषु धातुषु निर्देशानुसारं परिवर्तनं विधाय रिक्तस्थानानि पूरयत
(कोष्ठक में दी गई धातुओं में निर्देश के अनुसार परिवर्तन करके रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए-)
(क) समग्रं भारतं उल्लासे मग्नः ……….. ( अस् + लट् लकारे)
(ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं ……. (कृ + क्तवतु + डीप्)
(ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीना: ….. (भू + लङ् प्र० पु०, बहु०)
(घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां ……… (भू + लट्, प्र० पु०, बहु०)
(ङ) मानवाः ……… यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयम् न वा ? (पृच्छ् + लट्, प्र० पु०, बहु०)
(च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे ……. ( सम् + आ + विश् + विधिलिङ् प्र० पु०, बहु० )
उत्तराणि
(क) समग्रं भारतं उल्लासे मग्नः अस्ति।
(ख) भूकम्पविभीषिका कच्छजनपदं विनष्टं कृतवती।
(ग) क्षणेनैव प्राणिनः गृहविहीनाः अभवन्।
(घ) शान्तानि पञ्चतत्त्वानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां भवन्ति।
(ङ) मानवाः पृच्छन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं करणीयम् न वा ?
(च) नदीवेगेन ग्रामाः तदुदरे समाविशेयुः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

योग्यताविस्तारः
भूकम्प-परिचय- भूमि का कम्पन भूकम्प कहलाता है। वह बिन्दु भूकम्प का उद्गम केन्द्र कहा जाता है, जिस बिन्दु पर कम्पन की उत्पत्ति होती है। कम्पन तरंग के रूप में विविध दिशाओं में आगे चलता है। ये तरंगें सभी दिशाओं में उसी प्रकार फैलती हैं जैसे किसी शान्त तालाब में पत्थर के टुकड़ों को फेंकने से तरंगें उत्पन्न होती है।

धरातल पर कुछ स्थान ऐसे हैं जहाँ भूकम्प प्रायः आते ही रहते हैं। उदाहरण के अनुसार-प्रशान्त महासागर के चारों ओर के प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, गङ्गा, ब्रह्मपुत्र का तटीय भाग इन क्षेत्रों में अनेक भूकम्प आए जिनमें से कुछ तो अत्यधिक भयावह और विनाशकारी थे। सुनामी भी एक प्रकार का भूकम्पन ही है जिसमें भूमि के भीतर अत्यन्त गहराई से तीव्र कम्पन उत्पन्न होता है। यही कम्पन समुद्र के जल को काफी ऊँचाई तक तीव्रता प्रदान करता है। फलस्वरूप तटीय क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित होते हैं। सुनामी का भीषण प्रकोप 26 दिसम्बर 2004 को हुआ। जिसकी चपेट में भारतीय प्रायद्वीप सहित अनेक देश आ गए। क्षिति, जलं, पावक, गगन और समीर इन पञ्चतत्वों में सन्तुलन बनाए रखकर प्राकृतिक आपदाओं से बचा जा सकता है। इसके विपरीत असन्तुलित पञ्चतत्त्वों से सृष्टि विनष्ट हो सकती है ?

भूकम्पविषये प्राचीनमतम् प्राचीनैः ऋषिभिः अपि स्वस्वग्रन्थेषु भूकम्पोल्लेखः कृतः येन स्पष्टं भवति यत् भूकम्पाः प्राचीनकालेऽपि आयान्ति स्म।

वराहसंहितायाम्
क्षितिकम्पमाहुरेके मह्यन्तर्जलनिवासिसत्त्वकृतम्
भूभारखिन्नदिग्गजनिःश्वास-समुद्भवं चान्ये।
अनिलोऽनिलेन निहितः क्षितौ पतन् सस्वनं करोत्यन्ये
केचित् त्वदृष्टकारितमिदमन्ये प्राहुराचार्याः॥

मयूरचित्रे
कदाचित् भूकम्पः श्रेयसेऽपि कल्पते। एतादृशाः अपि उल्लेखाः अस्माकं साहित्ये समुपलभ्यन्ते यथा वारुणमण्डलमौशनसे

प्रतीच्यां यदि कम्पेत वारुणे सप्तके गणे,
द्वितीययामे रात्रौ तु तृतीये वारुणं स्मृतम्।
अत्र वृष्टिश्च महती शस्यवृद्धिस्तथैव च,
प्रज्ञा धर्मरताश्चैव भयरोगविवर्जिताः॥
उल्काभूकम्पदिग्दाहसम्भवः शस्यवृद्धये।
क्षेमारोग्यसुभिक्षायै वृष्टये च सुखाय च।।
भूकम्पसमा एव अग्निकम्पः, वायुकम्पः, अम्बुकम्पः इत्येवमन्येऽपि भवन्ति।

भूकंपविभीषिका
भूकम्प के विषय में प्राचीन मत-प्राचीन ऋषियों ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में भूकम्प का उल्लेख किया है। जिससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल में भी भूकम्प आया करते थे। जैसे कि वराहसंहिता में (कहा गया है)

कुछ विद्वानों ने धरती के अन्दर जल में निवास करने वाले प्राणियों के द्वारा किया गया भूकम्प कहा है। कुछ दूसरे विद्वानों के मतानुसार पृथ्वी के भार से खिन्न दिग्गजों के विश्वास से उत्पन्न भूकम्प कहा गया है। कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि वायु का वायु के साथ जब टकराव होता है तो पृथ्वी पर दबाव डालते हुए वायु भयंकर शब्द करता है, जिससे भूकम्प पैदा होता है। कुछ दूसरे आचार्यों के अनुसार भूकम्प अज्ञात कारणों से होता है।

मयूर चित्र में कभी भूकम्प कल्याण के लिए भी होता है, ऐसे भी उल्लेख हमारे साहित्य में मिलते हैं। जैसे कि औशनस वारुणमण्डल में (कहा गया है)-यदि वरुण द्वारा अधिष्ठित पश्चिम दिशाओं सप्तम गण में रात्रि के द्वितीय और तृतीय प्रहर में भूकम्प होता है, तो उसे वारुण भूकम्प कहा गया है। इस भूकम्प के होने पर पर्याप्त वर्षा होती है, जिससे धन-धान्य की वृद्धि होती है। बुद्धि धर्मकार्यों में लगती है और सब लोग भय तथा रोग से मुक्त हो जाते हैं। उल्कापात, भूकम्प तथा दिग्दाह का होना धान्य-वृद्धि, क्षेत्र = अप्राप्त की प्राप्ति, आरोग्य, सुभिक्षा = समृद्धि, वर्षा तथा सुख के लिए माना गया है। भूकम्प के समान ही अग्निकम्प, वायुकम्प, जलकम्प तथा ऐसे ही दूसरे कम्पन भी होते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

HBSE 10th Class Sanskrit भूकम्पविभीषिका Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां वाक्यानां/सूक्तीनां भावार्थं हिन्दीभाषायां लिखत
(अधोलिखित वाक्यों/सूक्तियों के भावार्थ हिन्दीभाषा में लिखिए-)

(क) दैवः प्रकोपो भूकम्पो नाम।
(भूकम्प एक दैवीय आपदा है) भावार्थ – प्रस्तुत वाक्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी भाग-2 के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत किया गया है। इसमें भूकम्प को दैवीय आपत् कहा गया है। विद्वानों ने विपत्तियों को आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक इन तीन श्रेणियों में बाँटा है। जीव-जन्तुओं के कारण आने वाली विपदाओं को आधिभौतिक, मानसिक चिन्ताओं को आध्यात्मिक और प्राकृतिक कारणों से आने वाली विपत्तियों को आधिदैविक या दैवीय आपदाएँ कहा जाता है। भूकम्प भी क्योंकि मानवीय सीमाओं से परे की बात है अतः इसे प्रकृति का प्रकोप माना जाता है। जिसका कोई स्थायी हल मानव के पास नहीं है। तथापि कतिपय सावधानियाँ रखने से भूकम्प से होने वाली हानि को कम किया जा सकता है।

(ख) प्रकृतिसमक्षमद्यापि विज्ञानगर्वितो मानवः वामनकल्पः एव’।
(प्रकृति के समक्ष विज्ञान की खोजों से गर्वित मनुष्य आज भी अतीव तुच्छ है) भावार्थ -प्रस्तुत वाक्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी भाग-2 के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत किया गया है। इसमें विज्ञान के ज्ञान से गर्वित मनुष्य को प्रकृति के आगे बौना बताया गया है। मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से आज अनेकानेक अद्भुत सुख-सुविधाएँ तैयार कर ली हैं। उसने घातक बीमारियों के उपचार ढूंढ निकाले हैं, ध्वनि की गति से भी तेज चलने वाले विमान तैयार कर लिए हैं, मोबाइल और कम्प्यूटर जैसे यन्त्र तैयार कर लिए हैं, चन्द्र और मंगल तक पहुँच बना ली है तथापि प्रकृति जब कभी मनुष्य बाढ़, ज्वालामुखी विस्फोट, आन्धी तूफान आदि के रूप में अपना भयानक स्वरूप प्रकट करती है तो मानव उसके आगे निःसहाय और बेचारा बनकर रह जाता है।

भाव यह है कि मानव सृष्टि की चेतनसत्ता का अंशमात्र है; उसे कतिपय अनुसन्धान करके पूर्ण होने का गर्व नहीं करना चाहिए। प्रकृति या दैवीय शक्तियों का पार पाना उसके लिए सम्भव नहीं है।

(ग) ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते इति कथयन्ति भूकम्पविशेषज्ञाः।
(ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फाटों से भी भूकम्प पैदा होता है, ऐसा भूकम्प-विशेषज्ञ कहते हैं)

अथवा
(घ) ज्वालामुगिरन्त एते पर्वता अपि भीषणं भूकम्पं जनयन्ति।
(ज्वाला उगलते हुए ये ज्वालामुखी पर्वत भी भीषण भूकम्प को पैदा करते हैं)
भावार्थ – प्रस्तुत वाक्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी भाग-2 के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत किया गया है। इसमें बताया गया है कि ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोट के कारण भी भूकम्प पैदा होते हैं। भूकम्प-विशेषज्ञों का मत है कि ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फाटों से भी भूकम्प पैदा होता है। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब खनिज, मिट्टी, चट्टान आदि के संचयों को उबालती है, तब वे सभी लावा बनकर न रोकी जा सकनेवाली गति से पृथ्वी अथवा पर्वत को फोड़कर बाहर निकलते हैं। तब धुंए और धूल से सारा आकाश ढक जाता है। ताप की मात्रा 800° सेल्सियस तक पहँचकर यह लावा नदी के वेग से बहता है, तब पास में स्थित गाँव अथवा नगर उसके पेट में क्षणभर में ही समा जाते हैं। विवश प्राणी मारे जाते हैं। इस प्रकार ज्वाला उगलते हुए ये ज्वालामुखी पर्वत भी भीषण भूकम्प पैदा करने में प्रमुख कारण बन जाते हैं।

(ङ) वस्तुतः शान्तानि एव पञ्चतत्त्वानि क्षितिजलपावकसमीरगगनानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां कल्पन्ते।
(वास्तव में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँचों तत्त्व शान्त रहने पर ही भूतल के योग-क्षेम की रचना करते हैं)
भावार्थ – प्रस्तुत वाक्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक शेमुषी भाग-2 के ‘भूकम्पविभीषिका’ पाठ से उद्धृत किया गया है। इसमें बताया गया है कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँचों तत्त्व शान्त रखकर ही धरती को भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाया जा सकता है। यद्यपि भूकम्प दैवी प्रकोप (प्राकृतिक आपदा) है। इसको रोकने का कोई भी स्थिर उपाय दिखाई नहीं पड़ता, प्रकृति के सामने आज भी विज्ञान-गर्वित मनुष्य बौना सा ही है, फिर भी भूकम्प के रहस्यों को जाननेवाले कहते हैं कि पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँचों तत्त्व शान्त रहने पर ही भूतल के योग-क्षेम की रचना होती है। भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं को कम करने के लिए इन पाँचों तत्त्वों का सन्तुलित होना अति आवश्यक है। इन पाँचों तत्त्वों के अशान्त होने पर निश्चय ही ये महाविनाश का कारण बनते हैं। अतः अपनी धरती को भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाने के लिए हमें पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – इन पाँचों तत्त्वों में सन्तुलन बनाए रखने का सार्थक प्रयास करते रहना चाहिए।

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प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) फालद्वये विभक्ता भूमिः ।
(ख) लक्षपरिमिताः जनाः अकालकालकवलिताः ।
(ग) पृथिव्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निः ।
(घ) धूमभस्मावृतं जायते तदा गगनम्।
(ङ) अशान्तानि पञ्चतत्त्वानि महाविनाशम् उपस्थापयन्ति।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) फालद्वये विभक्ता का?
(ख) लक्षपरिमिताः के अकालकालकवलिता:?
(ग) कस्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निः?
(घ) धूमभस्मावृतं जायते तदा किम्?
(ङ) अशान्तानि कानि महाविनाशम् उपस्थापयन्ति ?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

प्रश्न 3.
अधोलिखित-प्रश्नानां प्रदत्तोत्तरविकल्पेषु शुद्धं विकल्पं विचित्य लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से शुद्ध विकल्प चुनकर लिखिए-)
(क) ‘सञ्चयः’ पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति
(i) सम् + चयः
(ii) सम + चयः
(iii) सं + चयः
(iv) सत्र + चयः।
उत्तरम्:
(i) सम् + चयः

(ख) ‘शिशवः + तु’ अत्र सन्धियुक्तपदम्
(i) शिशवष्टु
(ii) शिशवष्तु
(iii) शिशवर्तु
(iv) शिशवस्तु।
उत्तरम्:
(iv) शिशवस्तु

(ग) ‘महत्कम्पनम्’ अस्मिन् पदे कः समासोऽस्ति ?
(i) बहुव्रीहिः
(ii) कर्मधारयः
(iii) अव्ययीभावः
(iv) द्वन्द्वः ।
उत्तरम्:
(ii) कर्मधारयः

(घ) ‘दारुणविभीषिका’ इति पदस्य समास-विग्रहः
(i) दारुणस्य विभीषिका
(ii) दारुणायाः विभीषिका
(iii) दारुणा च सा विभीषिका
(iv) दारुण विभीषिका।
उत्तरम्:
(iii) दारुणा च सा विभीषिका

(ङ) ‘विभक्ता’ इति पदे कः प्रत्ययः ?
(i) त्व
(ii) तल्
(iii) क्त
(iv) क्ता।
उत्तरम्:
(ii) क्त

(च) निहन्यन्ते ………… विवशाः प्राणिनः ।
(रिक्तस्थानपूर्तिः अव्ययपदेन)
(i) पुरा
(ii) ह्यः
(iii) न
(iv) च।
उत्तरम्
(iv) च

(छ) ………. द्वाराणि केवलं छात्राणां गमनागमनकाले एव अनावृतानि भवन्ति।
(i) चत्वारि
(ii) एका
(iii) चतस्रः
(iv) चतुः।
उत्तरम्
(iv) चत्वारि

(ज) कीदृशः मानवः वामनकल्पः ?
(i) विज्ञानगर्वितः
(ii) धनिकः
(iii) वैज्ञानिक:
(iv) पशुतुल्यः ।
उत्तरम्:
(i) विज्ञानगर्वितः

(झ) कस्य उपशमनस्य स्थिरोपायः न दृश्यते ?
(i) शत्रोः
(ii) शोकस्य
(iii) भूकम्पस्य
(iv) दुर्वचनस्य।
उत्तरम्:
(iii) भूकम्पस्य

(ञ) ‘विषये’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(i) प्रथमा
(ii) सप्तमी
(iii) तृतीया
(iv) चतुर्थी।
उत्तरम्:
(ii) सप्तमी

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

यथानिर्देशम् उत्तरत
(ट) ‘करणीयम्’ इति पदस्य प्रकृति-प्रत्ययौ लिखत।
(ठ) ‘धूमभस्मावृतं जायते तदा गगनम्।’ (अत्र किम् अव्ययपदं प्रयुक्तम्)
(ड) सम्पीडिताः सहायतार्थं करुणकरुणं क्रन्दन्ति’ (‘क्रन्दन्ति’ अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ?)
(ढ) अधीक्षकेण सर्वकार्यं 3 लिपिकेषु विभक्तं कृतम्। (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचकविशेषणं लिखत)
(ण) प्रति अनुभागं 56 छात्राः सन्ति। .. (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचकविशेषणं लिखत)
(त) विवशाः प्राणिनः आकाशे पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते। (रेखाङ्कितपदेन प्रश्ननिर्माणं कुरुत)
उत्तराणि
(ट) ‘करणीयम्’ = कृ + अनीयर् ।
(ठ) ‘तदा’ इति अव्ययपदम्।
(ड) ‘क्रन्दन्ति’ अत्र लट् लकारः प्रयुक्तः ।
(ढ) अधीक्षकेण सर्वकार्यं त्रिषु लिपिकेषु विभक्तं कृतम्।
(ण) प्रति अनुभागं षट्पञ्चाशत् छात्राः सन्ति।
(त) विवशाः प्राणिनः कुत्र पिपीलिकाः इव निहन्यन्ते ?

भूकम्पविभीषिका पठित-अवबोधनम्

1. निर्देश:-अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितान् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृत-पूर्णवाक्येन लिखत
(अधोलिखित गद्यांश को पढ़कर इन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्य में लिखिए-)
एकोत्तर-द्विसहस्रख्रीष्टाब्दे (2001 ईस्वीये वर्षे) गणतन्त्र-दिवस-पर्वणि यदा समग्रमपि भारतराष्ट्रं नृत्यगीतवादित्राणाम् उल्लासे मग्नमासीत् तदाकस्मादेव गुर्जर-राज्यं पर्याकुलं, विपर्यस्तम्, क्रन्दनविकलं, विपन्नञ्च जातम्। भूकम्पस्य दारुण-विभीषिका समस्तमपि गुर्जरक्षेत्रं विशेषेण च कच्छजनपदं ध्वंसावशेषु परिवर्तितवती। भूकम्पस्य केन्द्रभूतं भुजनगरं तु मृत्तिकाक्रीडनकमिव खण्डखण्डम् जातम्। बहुभूमिकानि भवनानि क्षणेनैव धराशायीनिजातानि। उत्खाता विद्युद्दीपस्तम्भाः। विशीर्णाः गृहसोपानमार्गाः। फालद्वये विभक्ता भूमिः। भूमिग दुपरि निस्सरन्तीभिः दुर्वार-जलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम्।सहस्रमिता: प्राणिनस्तु क्षणेनैव मृताः।ध्वस्तभवनेषु सम्पीडिता सहस्त्रशोऽन्ये सहायतार्थ करुणकरुणं क्रन्दन्ति स्म। हा दैव! क्षुत्क्षामकण्ठाः मृतप्रायाः केचन शिशवस्तु ईश्वरकृपया एव द्विवाणि दिनानि जीवनं धारितवन्तः।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) कस्मिन् पर्वणि भारतराष्ट्रम् उल्लासे मग्नम् आसीत् ?
(ii) अकस्मादेव किं राज्यं पर्याकुलं जातम् ?
(ii) कस्य दारुणविभीषिका कच्छजनपदं ध्वंसावशेषु परिवर्तितवती ?
(iv) गुर्जर-राज्ये भूकम्पस्य केन्द्रभूतं किं नगरम् आसीत् ?
(v) फालद्वये का विभक्ता ?
उत्तराणि
(i) गणतन्त्र-दिवस-पर्वणि भारतराष्ट्रम् उल्लासे मग्नम् आसीत्।
(ii) अकस्मादेव गुर्जर-राज्यं पर्याकुलं जातम्।
(iii) भूकम्पस्य दारुणविभीषिका कच्छजनपदं ध्वंसावशेषु परिवर्तितवती।
(iv) गुर्जर-राज्ये भूकम्पस्य केन्द्रभूतं भुजनगरम् आसीत्।
(v) फालद्वये भूमिः विभक्ता।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत – (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) गुर्जरराज्ये भूकम्प-विभीषिका कदा जाता ?
(ii) भूकम्पेन भुजनगरं कीदृशं जातम् ?
(iii) काभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम् ?
(iv) भूकम्पेन क्षणेनैव कानि धराशायिनी जातानि ?
(v) ईश्वरकृपया किम् अभवत् ?
उत्तराणि
(i) गुर्जरराज्ये भूकम्प-विभीषिका एकोत्तर-द्विहसहस्रख्रीष्टाब्दे जाता।
(ii) भूकम्पेन भुजनगरं मृत्तिकाक्रीडनकामिव खण्डखण्डं जातम्।
(iii) भूमिग दुपरि निस्सरन्तीभिः दुर्वार-जलधाराभिः महाप्लावनदृश्यम् उपस्थितम्।
(iv) भूकम्पेन क्षणेनैव बहुभूमिकानि भवनानि धराशायिनी जातानि।
(v) ईश्वरकृपया क्षुत्क्षामकण्ठाः मृतप्रायाः केचन शिशवः द्वित्राणि दिनानि जीवनं धारितवन्तः।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘केन्द्रभूतं भुजनगरम्’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(ii) ‘सम्पन्नम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘उपस्थितम्’-अत्र प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत।
(iv) ‘क्षणेनैव’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘समग्रम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं समानार्थकं किम् ?
उत्तराणि:
(i) केन्द्रभूतम्।
(ii) विपन्नम्।
(iii) उप + √स्था + क्त।
(iv) क्षणेन + एव।
(v) समस्तम् ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-समग्रमपि = (सम्पूर्णमपि) सम्पूर्ण भी। पर्याकुलम् = (परितः व्याकुलम्) चारों ओर से बेचैन। विपर्यस्तम् = (अस्तव्यस्तम्) अस्त-व्यस्त। विपन्नम् = (विपत्तियुक्तम्, विपत्तिग्रस्तम्) मुसीबत में। दारुणविभीषिका = (भयङ् करत्रासः) भयंकर भय। ध्वंसावशेषु = (नाशोपरान्तम् अवशिष्टेषु) विनाश के बाद बची हुई वस्तुओं में। मृत्तिकाक्रीडनकमिव = (मृत्तिकायाः क्रीडनकम् इव) मिट्टी के खिलौने के समान। बहुभूमिकानि भवनानि = (बह्वयः भूमिकाः येषु तानि भवनानि) बहुमंजिले मकान। उत्खाताः = (उत्पाटिताः) उखड़ गए। विशीर्णाः = (नष्टाः) बिखर गए। फालद्वये = (खण्डद्वये) दो खण्डों में। निस्सरन्तीभिः = (निर्गच्छन्तीभिः) निकलती हुई। दुर्वार = (दुःखेन निवारयितुं योग्यम्) जिनको हटाना कठिन है। महाप्लावनम् = (महत् प्लावनम्) विशाल बाढ़। सहस्त्रमिताः = (सहस्र परिमिताः) हजारों। ध्वस्तः = (नष्ट:) नष्ट। क्षुत्क्षामकण्ठाः = (क्षुधया क्षामः कण्ठाः येषाम् ते) भूख से दुर्बल कण्ठवाले।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘भूकम्पविभिषिका’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में 2001 ई० में गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में आए भूकम्प से उत्पन्न भयंकर विनाश का कारुणिक वर्णन है।

सरलार्थ:-सन् 2001 ईस्वी वर्ष में गणतन्त्र दिवस के पर्व पर जब समस्त भारत देश नाचने-गाने, बजाने आदि के उल्लास में मग्न था, तब अकस्मात् ही गुजरात राज्य व्याकुल, अस्त-व्यस्त, क्रन्दन से व्याकुल और विपत्तिग्रस्त हो गया। भूकम्प की दारुण विभीषिका ने समस्त गुजरात क्षेत्र और विशेष रूप से कच्छ जिले को विनाश के अवशेषों में बदल
दिया। भूकम्प का केन्द्र बना भुजनगर तो मिट्टी के खिलौने की भाँति खण्ड-खण्ड हो गया। बहुमंजिले भवन क्षणभर में ही धराशायी हो गए। बिजली के खम्भे उखड़ गए। घर और सीढ़ियाँ बिखर गए। भूमि दो खण्डों में बँट गई अर्थात् दरारें पड़ गईं। भूमि के गर्भ से ऊपर निकलती अनियन्त्रित जलधाराओं से भयंकर बाढ़ का दृश्य उपस्थित हो गया। हजारों प्राणी क्षणभर में ही मारे गए। गिरे भवनों में फंसे हुए अन्य लोग सहायता के लिए अत्यन्त करुण क्रन्दन कर रहे थे। हाय दुर्भाग्य/भूख-प्यास से व्याकुल मृतप्रायः कुछ बच्चे तो ईश्वर की कृपा से ही दो-तीन दिनों तक जीवित बचे रहे।

भावार्थ:-भाव यह है कि भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है जो सबसे अधिक विनाशकारी है। भूमि का कम्पन भूकम्प कहलाता है। कम्पन की उत्पत्ति का बिन्दु भूकम्प का उद्गम केन्द्र कहा जाता है। उद्गम केन्द्र से ही यह कम्पन तरंगों के रूप में विविध दिशाओं में बढ़ता है और महाविनाश करता है। ऐसा ही एक महाविनाशकारी भूकम्प 2001 ई० में गुजरात राज्य के कच्छ क्षेत्र में आया था। इस भूकम्प का उद्गम केन्द्र भुज नगर था। इस भूकम्प में भुज नगर का तो पूरी तरह विनाश हो गया था। इसने पूरे कच्छ जनपद को भी खण्डहर में बदल दिया था।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

2. इयमासीत् भैरवविभीषिका कच्छ-भूकम्पस्य। पञ्चोत्तर द्विसहस्रख्रीष्टाब्दे (2005 ईस्वीये वर्षे) अपि कश्मीर-प्रान्ते पाकिस्तान-देशे च धरायाः महत्कम्पनं जातम्। यस्मात्कारणात् लक्षपरिमिताः जनाः अकालकालकवलिताः । पृथ्वी कस्मात्प्रकम्पते वैज्ञानिकाः इति विषये कथयन्ति यत् पृथिव्या अन्तर्गर्भे विद्यमानाः बृहत्यः पाषाणशिला यदा संघर्षणवशात् त्रुट्यन्ति तदा जायते भीषणं संस्खलनम्, संस्खलनजन्यं कम्पनञ्च। तदैव भयावहकम्पनं धराया उपरितलमप्यागत्य महाकम्पनं जनयति येन महाविनाशदृश्यं समुत्पद्यते।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) कश्मीरप्रान्ते महत् कम्पनं कदा जातम् ?
(ii) भूकम्पेन कति जना: अकालकवलिताः ?
(iii) संघर्षणवशात् काः त्रुट्यन्ति ?
(iv) महाकम्पने किं समुत्पद्यते ?
(v) 2005 ईस्वीये वर्षे कस्मिन् देशे महत् कम्पनं जातम् ?
उत्तराणि
(i) कश्मीरप्रान्ते महत् कम्पनं पञ्चोत्तर-द्विसहस्रख्रीष्टाब्दे जातम्।
(ii) भूकम्पेन लक्षपरिमिताः जनाः अकालकवलिताः ।
(iii) संघर्षणवशात् पाषाणशिलाः त्रुट्यन्ति।
(iv) महाकम्पने महाविनाशदृश्यम् समुत्पद्यते।
(v) 2005 ईस्वीये वर्षे पाकिस्तानदेशे महत् कम्पनं जातम्।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘लक्षपरिमिताः जनाः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(ii) ‘निर्माणम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम्।
(iii) ‘भीषणं संस्खलनम्’-अत्र विशेषणपदं किम् ?
(iv) ‘पृथिव्याः’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पर्यायपदं किमस्ति ?
(v) ‘विद्यमानाः’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(i) जनाः।
(ii) विनाशम्।
(iii) भीषणम्।
(iv) धरायाः।
(v) शानच्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-कालकवलिताः = (दिवंगताः) मृत्यु को प्राप्त हुए। संस्खलनम् = (विचलनम्) स्थान से हटना। स्खलनजन्यम् = (विचलनात् उत्पन्नम्) विचलन से उत्पन्न। जनयति = (उत्पन्नं करोति) उत्पन्न करती है।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘भूकम्पविभिषिका’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में सन् 2005 में कश्मीर और पाकिस्तान में आए हुए भूकम्प और भूकम्प के वैज्ञानिक कारण का वर्णन किया गया है।

सरलार्थः- यह भीषण विभीषिका कच्छ भूकम्प की थी। दो हजार पाँच (2005 ई०) वर्ष में भी कश्मीर प्रान्त में और पाकिस्तान देश में बहुत बड़ा भूकम्प आया था, जिस कारण से लाखों लोग असमय ही मृत्यु का ग्रास बन गए थे। पृथ्वी किस कारण काँपती है, वैज्ञानिक इस विषय में कहते हैं कि पृथ्वी के भीतर विद्यमान बहुत बड़ी पत्थरशिलाएँ (चट्टानें) जब संघर्षवश टूटती हैं, तब भीषण स्खलन और स्खलन से उत्पन्न कम्पन होता है। वही भयंकर कम्पन धरती के ऊपरी तल पर आकर महाकम्पन पैदा करता है, जिससे महाविनाश का दृश्य उत्पन्न होता है।

भावार्थ:-भाव यह है कि कच्छ भूकम्प की की भाँति ही 2005 ई० में कश्मीर और पाकिस्तान में बहुत बड़ा भूकम्प आया था, जिसमें लाखों लोग मृत्यु का ग्रास बन गए थे। भूकम्प क्यों आते हैं ? इस सम्बन्ध में भूगर्भ वैज्ञानिकों की मान्यता है कि पृथ्वी के भीतर विद्यमान चट्टानों के खिसकने से कम्पन पैदा होता है। यह कम्पन ही धरती के ऊपरी तल पर आकर भूकम्प को जन्म देता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

3. ज्वालामुखपर्वतानां विस्फोटैरपि भूकम्पो जायते इति कथयन्ति भूकम्पविशेषज्ञाः। पृथिव्याः गर्भे विद्यमानोऽग्निर्यदा खनिजमृत्तिकाशिलादिसञ्चयं क्वथयति तदा तत्सर्वमेव लावारसताम् उपेत्य दुर्वारगत्या धरां पर्वतं वा विदार्य बहिर्निष्क्रामति। धूमभस्मावृतं जायते तदा गगनम्। सेल्सियश-ताप-मात्राया अष्टशताङ्कतामुपगतोऽयं लावारसो यदा नदीवेगेन प्रवहति तदा पार्श्वस्थग्रामा नगराणि च तदुदरे क्षणेनैव समाविशन्ति। निहन्यन्ते च विवशाः प्राणिनः । ज्वालामुगिरन्त एते पर्वता अपि भीषणं भूकम्पं जनयन्ति।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर

(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) केषां विस्फोटैः भूकम्पः जायते ?
(ii) अग्निः शिलादिसञ्चयं किं करोति ?
(iii) तदा गगनं कीदृशं जायते ?
(iv) विवशाः के निहन्यन्ते ?
(v) कीदृशः पर्वता: भीषणं भूकम्पं जनयन्ति ?
उत्तराणि
(i) ज्वालामुखपर्वतानाम् विस्फोटैः भूकम्पः जायते।
(ii) अग्निः शिलादिसञ्चयं क्वथयति।
(iii) तदा गगनं धूमभस्मावृतम् जायते।
(iv) विवशाः प्राणिनः निहन्यन्ते।
(v) ज्वालामुगिरन्तः पर्वताः भीषणं भूकम्पं जनयन्ति।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘विदार्य’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(ii) ‘उत्खननात् प्राप्तं द्रव्यं यत्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iii) ‘तत्सर्वमेव’ अत्र ‘तत्’ इति सर्वनामपदे किं निर्दिष्टम् ?
(iv) ‘बहिनिष्क्रामति’ अत्र सन्धिच्छेदं करुत।
(v) ‘निर्वशाः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) ल्यप्।
(ii) खनिजम्।
(iii) खनिज-मृत्तिका-शिलादिसञ्चयम्।
(iv) बहिः + निष्क्रामति।
(v) विवशाः।

हिन्दीभाषया पाठबोधः

शब्दार्थाः-भूकम्पविशेषज्ञाः = (भुवः कम्पनरहस्यस्य ज्ञातारः) भूमि के कम्पन्न के रहस्य को जाननेवाले। खनिजम् = (उत्खननात् प्राप्तं द्रव्यम् ) भूमि को खोदने से प्राप्त वस्तु। क्वथयति = (उत्तप्तं करोति) उबालती है, तपाती है। विदार्य = (विदीर्णं कृत्वा, भित्वा) फाड़कर। पार्श्वस्थ-ग्रामाः = (निकटस्थ ग्रामाः) समीप के गाँव। उदरे = (कुक्षौ) पेट में। समाविशन्ति = (अन्तः गच्छन्ति) समा जाती हैं। उगिरन्तः = (प्रकटयन्तः) प्रकट करते हुए।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘भूकम्पविभिषिका’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोट के कारण भी भूकम्प पैदा होते हैं। – सरलार्थः-ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फाटों से भी भूकम्प पैदा होता है, ऐसा भूकम्प-विशेषज्ञ कहते हैं। पृथ्वी के गर्भ में स्थित अग्नि जब खनिज, मिट्टी, चट्टान आदि के संचयों को उबालती है, तब वे सभी लावा बनकर न रोकी जा सकनेवाली गति से पृथ्वी अथवा पर्वत को फोड़कर बाहर निकलते हैं। तब धुंए और धूल से सारा आकाश ढक जाता है। ताप की मात्रा 800° सेल्सियस तक पहुँचकर यह लावा नदी के वेग से बहता है, तब पास में स्थित गाँव अथवा नगर उसके पेट में क्षणभर में ही समा जाते हैं। विवश प्राणी मारे जाते हैं। ज्वाला उगलते हुए ये पर्वत भी भीषण भूकम्प को पैदा करते हैं।

भावार्थ:-भाव यह है कि ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोट के कारण भी भूकम्प पैदा होते हैं। इन विस्फोटों के ताप की मात्रा 800° सेल्सियस तक पहुँचकर इनका लावा नदी के वेग से बहता है और आस-पास के सुदूर क्षेत्र को तबाह कर देता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

4. यद्यपि दैवः प्रकोपो भूकम्पो नाम, तस्योपशमनस्य न कोऽपि स्थिरोपायो दृश्यते। प्रकृति-समक्षमद्यापि विज्ञानगर्वितो मानवः वामनकल्प एव तथापि भूकम्परहस्यज्ञाः कथयन्ति यत् बहुभूमिकभवननिर्माणं न करणीयम्। तटबन्धं निर्माय बृहन्मानं नदीजलमपि नैकस्मिन् स्थले पुञ्जीकरणीयम् अन्यथा असन्तुलनवशाद् भूकम्पस्सम्भवति। वस्तुतः शान्तानि एव पञ्चतत्त्वानि क्षितिजलपावकसमीरगगनानि भूतलस्य योगक्षेमाभ्यां कल्पन्ते। अशान्तानि खलु तान्येव महाविनाशम् उपस्थापयन्ति।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) अत्र दैवः प्रकोपः कः कथितः ?
(ii) कीदृशः मानवः वामनकल्पः ?
(iii) भूकम्परहस्यज्ञ-मतानुसारं कीदृशं निर्माणं न करणीयम् ?
(iv) पञ्चतत्त्वानि कानि सन्ति ?
(v) भूकम्पः कस्मात् सम्भवति ?
उत्तराणि
(i) अत्र दैवः प्रकोपः भूकम्पः कथितः।
(ii) विज्ञानगर्वितः मानवः वामनकल्पः ।
(iii) भूकम्परहस्यज्ञ-मतानुसारं बहुभूमिक-निर्माणं न करणीयम्।
(iv) पञ्चतत्त्वानि क्षिति-जल-पावक-समीर-गगनानि सन्ति।
(v) भूकम्पः असन्तुलनवशात् सम्भवति।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत- (पूर्ण वाक्य में उत्तर दीजिए)
(i) कस्य उपशमनस्य स्थिरोपाय: न दृश्यते ?
(ii) प्रकृतिसमक्षम् अद्यापि कः वामनकल्पः अस्ति ?
(ii) एकस्मिन् स्थले किं न पुञ्जीकरणीयम् ?
(iv) कानिं अशान्तानि महाविनाशम् उपस्थापयन्ति ?
उत्तराणि
(i) भूकम्पस्य उपशमनस्य स्थिरोपायः न दृश्यते।
(ii) प्रकृति-समक्षम् अद्यापि विज्ञानगर्वितः मानवः वामनकल्पः अस्ति।
(iii) तटबन्ध निर्माय बृहन्मानं नदीजलम् एकस्मिन् स्थले न पुञ्जीकरणीयम्।
(iv) क्षिति-जल-पावक-समीर-गगनानि-एतानि अशान्तानि महाविनाशम् उपस्थापयन्ति।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘अशान्तानि’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘एकत्रीकरणीयम्’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम्।
(iii) ‘अशान्तानि खलु तान्येव’ अत्र ‘तानि’ इति सर्वनाम केभ्यः प्रयुक्तम् ?
(iv) ‘स्थिरोपायः’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरुत।
(v) ‘दैवः प्रकोपः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) शान्तानि ।
(ii) पुञ्जीकरणीयम्।
(iii) क्षितिजलपावकसमीरगगनेभ्यः ।
(iv) स्थिर + उपायः ।
(v) प्रकोपः।

हिन्दीभाषया पाठबोध:

शब्दार्था:-उपशमनस्य = (शान्ते:) शान्त करने का। वामनकल्पः = (वामनसदृशः). बौना। निर्माय = (निर्माणं कृत्वा) बनाकर। पुञ्जीकरणीयम् = (संग्रहणीयम्) इकट्ठा करना चाहिए। योगक्षेमाभ्याम् = (अप्राप्तस्य प्राप्तिः योगः प्राप्तस्य रक्षणं क्षेमः ताभ्याम्) अप्राप्त की प्राप्ति योग है, प्राप्त की रक्षा क्षेम है। कल्पन्ते = (रचयन्ति) रचना करते हैं।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘भूकम्पविभिषिका’ नामक पाठ से लिया गया है। प्रस्तुत गद्यांश में बताया गया है कि भूकम्प की रोकथाम का कोई भी निश्चित उपाय नहीं है परन्तु इससे उत्पन्न महाविनाश को कुछ सीमा तक कम किया जा सकता है उसी के उपायों की चर्चा इस गद्यांश में की गई है।

सरलार्थः- यद्यपि भूकम्प दैवी प्रकोप (प्राकृतिक आपदा) है। उसको रोकने का कोई भी स्थिर उपाय दिखाई नहीं देता, प्रकृति के सामने आज भी विज्ञान-गर्वित मनुष्य बौना सा ही है, फिर भी भूकम्प के रहस्यों को जाननेवाले कहते हैं कि बहुमंजिले भवनों का निर्माण नहीं करना चाहिए। बाँध बनाकर बड़ी मात्रा में नदियों के जल को भी एक स्थान पर एकत्रित नहीं करना चाहिए, नहीं तो असन्तुलन के कारण भूकम्प आना सम्भव है। वास्तव में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पाँचों तत्त्व शान्त रहने पर ही भूतल के योग-क्षेम की रचना करते है। इन पाँचों तत्त्वों के अशान्त होने पर निश्चय ही ये महाविनाश को उपस्थित करते हैं।

भावार्थ:-भाव यह है कि भूकम्प एक दैवीय प्रकोप है जिसे रोकने का कोई स्थिर उपाय तो नहीं है परन्तु भूमिकम्पन की सम्भावना को बढ़ाने वाले कारणों पर यदि अंकुश लग जाए तो प्राकृतिक तौर पर होने वाले भूकम्प के विनाश को पर्याप्त सीमा तक कम किया जा सकता है। बहुमंजिले भवनों के निर्माण तथा नदियों पर बनाए जा रहे बाँधों से पृथ्वी का सन्तुलन बिगड़ता है और इस असन्तुलन से भूमिकम्पन की सम्भावनाएँ बढ़ती हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पञ्चमहाभूतों का सन्तुलन ही भूकम्प के विनाश को कम कर सकता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 10 भूकम्पविभीषिका

भूकम्पविभीषिका (भूकम्प की विभीषिका) Summary in Hindhi

भूकम्पविभीषिका पाठ-परिचय

प्राकृतिक आपदाएँ किस देश में कब आ जाएँ इसे कोई नहीं जानता। ऐसे प्राकृतिक उपद्रवों में बाढ़, भूस्खलन, भूकम्प, तुफान आदि उल्लेखनीय है। इन उपद्रवों से मानव जीवन बुरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। चारों ओर विनाश लीला का क्रूर नृत्य होता है। ऐसी ही प्राकृतिक आपदाओं में भूकम्प भी एक आपदा है।
भूमि का कम्पन भूकम्प कहलाता है यह कम्पन इतना जबरदस्त होता है कि इसका प्रभाव अपने केन्द्र बिन्दु से सैंकड़ों मील दूर तक पहुँचता है और इसकी तरंगों से प्रभावित भू-क्षेत्र पर निर्मित बहुमंजिले भवन, सड़कें, बिजली के खंभे, बड़े-बड़े टावर आदि देखते ही देखते महाविनाश में बदल जाते हैं। हम इन प्राकृतिक आपदाओं को रोक तो नहीं सकते, इनसे होने वाली हानि को कम अवश्य ही कर सकते हैं।
प्रस्तुत पाठ ‘भूकम्पविभीषिका’ के माध्यम से भी यही बताया गया है कि किसी भी आपदा में बिना किसी घबराहट के, हिम्मत के साथ किस प्रकार हम अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकते हैं।

भूकम्पविभीषिका पाठस्य सारांश:
‘भूकम्पविभिषिका’ यह पाठ भूकम्प द्वारा होने वाले भयंकर विनाश को केन्द्रित करके रचा गया है। सन् 2001 में जब सम्पूर्ण भारत गणतन्त्रता दिवस की खुशियाँ मना रहा था तभी गुजरात राज्य अचानक भूकम्प की चपेट में आ गया।

और संपूर्ण राज्य का जनजीवन चीख पुकार में बदल गया। इस भूकम्प का केन्द्र कच्छ जनपद में भुजनगर था जिसका नाम भी शेष नहीं रहा। बहुमंजिले मकान धराशायी होकर मलबे का ढेर बन गए। बिजली के खम्भे और वृक्ष आदि उखड़

गए, धरती में दरार बन गई। हजारों प्राणी मारे गए। हजारों ध्वस्त मकानों के मलबे में फँस गए। ऐसे में भी ईश्वर की विचित्र लीला देखिए कि बहुत से बच्चे बिना कुछ खाए-पिए दो-तीन बाद भी मलबे में से जीवित मिले। 2005 में कश्मीर और पाकिस्तान में भी ऐसा ही भयंकर भूकम्प आया था जिसमें लाखों लोग मौत की नींद सो गए थे। भू वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में कहते हैं कि धरती के अन्दर विद्यमान चट्टानें जब आपसी घर्षण से टूटती और खिसकती है तब भूकम्प आते है और उस धरती के ऊपरी तल पर रहने वाले जनजीवन को अस्त व्यस्त कर महाविनाश का दृश्य उत्पन्न करते हैं।

ज्वालामुखी पर्वतों के विस्फोट से भी भूकम्प पैदा होते हैं। पृथ्वी के गर्भ में विद्यमान अग्नि जब खनिज मिट्टी पत्थर आदि को 800 डिग्री से भी अधिक तापमान पर पिघलाती है तो वे लावा बनकर बाहर की और नदी वेग से बह निकलते हैं और विनाशलीला करते हैं। यद्यपि भूकम्प एक प्राकृतिक आपदा है इसका कोई स्थायी उपाय नहीं है। फिर भी इन्हें कम करने के कुछ प्रयत्न सुरक्षा की दृष्टि से अवश्य कर लेने चाहिए। भूकम्प वैज्ञानिकों का मानना है कि धरती पर असन्तुलन न हो इसके लिए नदियों पर बहुत बड़े-बड़े बाँध नहीं बनाने चाहिए और न ही बहुमंजिलें भवन बनाने चाहिए ; क्योंकि इनमें असन्तुलन के कारण भूकम्प की संभावनाएँ कई गुणा बढ़ जाती हैं।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

HBSE 10th Class Sanskrit सूक्तयः शोभा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रश्नानाम् उत्तरम् एकपदेन दीयताम्
( मौखिक-अभ्यासार्थम्)
(क) पिता पुत्राय बाल्ये किं यच्छति ?
(ख) मूढमतिः कीदृशीं वाचं परित्यजति ?
(ग) अस्मिन् लोके के एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः ?
(घ) प्राणेभ्योपि को रक्षणीयः ?
(ङ) आत्मनः श्रेयः इच्छन् नरः कीदृशं कर्म न कुर्यात् ?
(च) वाचि किं भवेत् ?
उत्तराणि
(क) विद्याधनम्,
(ख) धर्मप्रदाम्,
(ग) विद्वांसः,
(घ) सदाचारः,
(ङ) अहितम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
यथा- विमूढधीः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते ।
कः पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं फलं भुङ्क्ते।
(क) संसारे विद्वांसः ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते।
(ख) जनकेन सुताय शैशवे विद्याधनं दीयते ।
(ग) तत्त्वार्थस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः ।
(घ) धैर्यवान् लोके परिभवं न प्राप्नोति।
(ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः परेषाम् अनिष्टं न कुर्यात् ।
उत्तराणि:
(क) संसारे के ज्ञानचक्षुभिः नेत्रवन्तः कथ्यन्ते?
(ख) जनकेन कस्मै शैशवे विद्याधनं दीयते?
(ग) कस्य निर्णयः विवेकेन कर्तुं शक्यः?
(घ) धैर्यवान् कुत्र परिभवं न प्राप्नोति?
(ङ) आत्मकल्याणम् इच्छन् नरः केषाम् अनिष्टं न कुर्यात् ?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 3.
पाठात् चित्वा अधोलिखितानां श्लोकानाम् अन्वयम् उचितपदक्रमेण पूरयत
(क) पिता…………..बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति, अस्य पिता किं तपः तेपे इत्युक्तिः ……………।
(ख) येन…………. यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं…………भवेत्, सः…………इति ………….
(ग) य आत्मनः श्रेयः…………..सुखानि च इच्छति, परेभ्यः अहितं…………..कदापि च न ………………
उत्तराणि:
(क) पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनम् यच्छति, अस्य पिता किं तपः तेपे, इत्युक्तिः तत् कृतज्ञता।
(ख) येन केनापि यत् प्रोक्तं तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत्, सः विवेकः इति ईरितः।
(ग) य आत्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, सः परेभ्यः अहितं कर्म कदापि च न कुर्यात्।

प्रश्न 4.
अधोलिखितम् उदाहरणद्वयं पठित्वा अन्येषां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत
प्रश्नाः
(क) श्लोक संख्या-3 यथा-सत्या मधुरा च वाणी का ? धर्मप्रदा
(क) धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति ? विमूढधीः
(ख) मूढपुरुष: कां वाणीं वदति ? परुषाम्
(ग) मन्दमतिः कीदृशं फलं खादति ? अपक्वम्
उत्तराणि
(क) धर्मप्रदां वाचं कः त्यजति ? विमूढधीः
(ख) मूढपुरुषः कां वाणीं वदति ? परुषाम्
(ग) मन्दमतिः कीदृशं फलं खादति ? अपक्वम्

(ख) श्लोक संख्या-7
यथा-बुद्धिमान् नरः किम् इच्छति ? आत्मनः श्रेयः
(क) सः कियन्ति सुखानि इच्छति ? प्रभूतानि
(ख) सः कदापि किं न कुर्यात् ? अहितम् कर्म
(ग) सः केभ्यः अहितं न कुर्यात् ? परेभ्यः
उत्तराणि:
(क) सः कियन्ति सुखानि इच्छति ? प्रभूतानि
(ख) सः कदापि किं न कुर्यात् ? अहितम् कर्म
(ग) सः केभ्यः अहितं न कुर्यात् ? परेभ्यः

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 5.
मञ्जूषायाः तद्भावात्मकसूक्ती: विचित्य अधोलिखितकथनानां समक्षं लिखत-
(क) विद्याधनं महत्
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

(ख) आचारः प्रथमो धर्मः
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्
………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………………..

आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग्भवेत्।
मनसि एकं वचसि एकं कर्मणि एकं महात्मनाम्।
विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।
सं वो मनांसि जानताम्।
विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्।
आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणाः।
उत्तराणि
(क)विद्याधनं महत

  • विद्याधनंसर्वधनप्रधानम्।
  • विद्याधनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद् धनम्।

(ख)आचारः प्रथमो धर्मः

  • आचारेण तु संयुक्तः सम्पूर्णफलभाग् भवेत्।
  • आचारप्रभवो धर्मः सन्तश्चाचारलक्षणः ।

(ग) चित्ते वाचि च अवक्रता एव समत्वम्

  • मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
  • सं वो मनांसि जानताम्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 6.
(अ) अधोलिखितानां शब्दानां पुरतः उचितं विलोमशब्दं कोष्ठकात् चित्वा लिखत
शब्दाः विलोमशब्दः
(क) पक्वः ……………….. (परिपक्वः, अपक्वः, क्वथितः)
(ख) विमूढधीः ……………. (सुधीः, निधिः, मन्दधीः)
(ग) कातरः ……………. (अकरुणः, अधीरः, अकातरः)
(घ) कृतज्ञता ……………….. (कृपणता, कृतघ्नता, कातरता)
(ङ) आलस्यम् ……………….. (उद्विग्नता, विलासिता, उद्योगः)
(च) परुषा ……………….. (पौरुषी, कोमला, कठोरा)
उत्तराणि-
शब्दाः – विलोमशब्दः
(क) पक्वः – अपक्वः ।
(ख) विमूढधी: – मन्दधीः।
(ग) कातरः – अकातरः।
(घ) कृतज्ञता – कृतघ्नता।
(ङ) आलस्यम् – उद्योगः।
(च) परुषा – कठोरा।

(आ) अधोलिखितानां शब्दानां त्रयः समानार्थकाः शब्दाः मञ्जूषायाः चित्वा लिख्यन्ताम्
(क) प्रभूतम् ……………. ……………. …………….
(ख) श्रेयः ……………. ……………. …………….
(ग) चित्तम् ……………. ……………. …………….
(घ) सभा ……………. ……………. …………….
(ङ) चक्षुष् ……………. ……………. …………….
(च) मुखम् ……………. ……………. …………….

शब्द-मञ्जूषा
लोचनम् – नेत्रम् – भूरि
शुभम् – परिषद् – मानसम्
मनः – सभा – नयनम्
आननम् – चेतः – विपुलम्
संसद् – बहु – वक्त्रम्
वदनम् – शिवम् – कल्याणम्
उत्तराणि
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः img-1

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

प्रश्न 7.
अधस्ताद् समासविग्रहाः दीयन्ते तेषां समस्तपदानि पाठाधारेण दीयन्ताम्विग्रहः
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः img-2
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः img-2.1
उत्तराणि-विग्रहः
HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः img-3

योग्यताविस्तारः
क. “तिरुक्कुरल्-सूक्तिसौरभम्’ इति पाठस्य तमिल मूलपाठः (देवनागरी – लिपौ)
सोर्कोट्टम् इल्लदु सेप्पुम् ओरू तलैया उळूकोट्टम इन्मै पेरिन्।
मगन् तन्दैवक्काटुम् उद्रवि इवन् तन्दै एन्नोटान् कौमू एननुम सोक्त।
इनिय उळवाग इन्नाद कूरल् कनि इरूप्पक् काय कवरंदट्र ।
कण्णुडैयर् एन्पवर् कट्रोर मुहत्तिरण्डु पुण्णुडैयर कल्लादवर् ।
एप्पोरूल यार यार वाय् केपिनुम् अप्पोरूल मेय् पोरूल काण्पदरितु।
सोललवल्लन् सोरविलन् अन्जान् अवनै इहलवेल्लल् यारुक्कुम् अरितु ।
नोय एल्लाम् नोय् सेयदार मेलवान् नोय् सेययार नोय् इन्मै वेण्डुभवर्।
ओषुक्कम् विषुष्पम् तरलान् ओषुक्कम् उयिरिनुम् ओभ्भप्पडुम्।

ख. ग्रन्थपरिचयः
तिरुक्कुरल तमिलभाषायां रचिता तमिलसाहित्यस्य उत्कृष्टा कृतिः अस्ति।
अस्य प्रणेता तिरुवल्लुवरः अस्ति।
ग्रन्थस्य रचनाकालः अस्ति-ईशवीयाब्दस्य प्रथमशताब्दी।
अस्मिन् ग्रन्थे सकलमानवाजातेः कृते जीवनोपयोगिसत्यम् प्रतिपादितम्। तिरु शब्द: ‘श्री’ वाचकः ।
‘तिरुक्कुरल’ पदस्य अभिप्रायः अस्ति श्रिया युक्तं कुरल् छन्दः अथवा श्रिया युक्ता वाणी।
अस्मिन् ग्रन्थे धर्म-अर्थ-काम-संज्ञकाः त्रयः भागाः सन्ति।
त्रयाणां भागानां पद्यसंख्या 1330 अस्ति ।

ग. भाव-विस्तारः
सदाचारः
किं कुलेन विशालेन शीलमेवात्र कारणम्।
कृमयः किं न जायन्ते कुसुमेषु सुगन्धिषु ।।
आगमानां हि सर्वेषामाचारः श्रेष्ठ उच्यते।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मादायुर्विवर्धते ।।

मधुरा वाक्
प्रियवाक्यप्रदानेन तुष्यन्ति सर्व जन्तवः ।
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता ।।
वाणी रसवती यस्य यस्य श्रमवती क्रिया।
लक्ष्मी: दानवती यस्य सफलं तस्य जीवितम्।।

विद्याधनम्
विद्याधनम् धनं श्रेष्ठं तन्मूलमितरद्धनम्।
दानेन वर्धते नित्यं न भाराय न नीयते।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः ।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।

विद्वांसः
नास्ति यस्य स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ।
विद्वत्त्वं च नृपत्वं च नैव तुल्यं कदाचन।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

HBSE 10th Class Sanskrit सूक्तयः Important Questions and Answers

सूक्तयः पाठबोधः

1. पिता यच्छति पत्राय बाल्ये विद्याधनं महत।
पिताऽस्य किं तपस्तेपे इत्युक्तिस्तत्कृतज्ञता॥1॥
अन्वयः-पिता पुत्राय बाल्ये महत् विद्याधनं यच्छति। पिता अस्य किं तपः तेपे, इति उक्तिः तत् कृतज्ञता।

हिन्दी अनुवाद

शब्दार्थ-बाल्ये = बचपन में। यच्छति = देता है। तेपे = (तपस्या कृता) तप किया। उक्तिः = कथन। तम् = उस पिता के प्रति। कृतज्ञता = उपकार मानने का भाव। पिता अपने पुत्र को बचपन में महान् विद्यारूपी धन को देता है। पिता ने इस पुत्र के लिए कितना तप किया ? यह कथन ही उस पिता के प्रति कृतज्ञता है।

भावार्थ-भाव यह है कि बाल्यकाल में पिता अपनी सन्तान के लिए जो कष्ट सहता है, योग्य पुत्र उसके इस तप को अनुभव करता है और पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करता है।

2. अवक्रता यथा चित्ते तथा वाचि भवेद् यदि।
तदेवाहुः महात्मानः समत्वमिति तथ्यतः॥2॥
अन्वयः-यदि तथा चित्ते अवक्रता तथा वाचि भवेत् महात्मानः तत् एव समत्वम् इति तथ्यत: आहुः।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-अवक्रता = (न-वक्रता/ऋजुता) सरलता। यथा = जैसी।वाचि = (वाण्याम्) वाणी में। तदेव = उसे ही। समत्वम् = समानता। तथ्यतः = (यथार्थरूपेण) सच्चे रूप में, वास्तव में। यदि जैसी सरलता मन में हो, वैसी ही वाणी में भी हो तो महात्मा लोग, उसे सच्चे रूप में समानता (मन और वचन की समानता) कहते हैं। .

भावार्थ-महापुरुषों का मन जैसा निष्कपट होता है, वैसे ही उनकी वाणी भी निष्कपट होती है।

3. त्यक्त्वा धर्मप्रदां वाचं परुषां योऽभ्युदीरयेत्।
परित्यज्य फलं पक्वं भुड्कतेऽपक्वं विमूढधीः ॥3॥
अन्वयः-यः विमूढधी: धर्मप्रदां वाचं त्यक्त्वा परुषां वाचं अभ्युदीरयेत्। (सः) पक्वं फलं परित्यज्य अपक्वं भुंक्त।

हिन्दी अनुवाद

शब्दार्थ-धर्मप्रदाम् = धर्म को प्रदान करने वाली।वाचम् = वाणी में। परुषाम् = (कठोराम्) कठोर।अभ्युदीरयेत् = (वदेत्) बोले, बोलता है। परित्यज्य = छोड़कर। पक्वम् = पका हुआ। भुक्ते = खाता है। अपक्वम् = कच्चा। विमूढधीः = (मूर्खः/बुद्धिहीनः) मूर्ख बुद्धिवाला। वाचम् = वाणी को।

जो मूढ़ बुद्धि वाला (अज्ञानी), धर्म को प्रदान करने वाली वाणी को छोड़कर, कठोर वाणी बोलता है, वह पके हुए फल को छोड़कर कच्चे फल को खाता है। भावार्थ-भाव यह है कि कठोरवाणी को त्यागकर, मधुरवाणी को अपनाना चाहिए।

4. विद्वांस एव लोकेऽस्मिन् चक्षुष्यन्तः प्रकीर्तिताः।
अन्येषां वदने ये तु ते चक्षुनामिनी मते॥4॥
अन्वयः-अस्मिन् लोके विद्वांस एव चक्षुष्मन्तः प्रकीर्तिताः । ये अन्येषां वदने ते तु चक्षुनामिनी मते।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-लोके = संसार में। चक्षुष्मन्तः = (नेत्रवन्तः) आँखों वाले। प्रकीर्तिताः = कहे गए हैं। ये = जो।तु = तो। अन्येषाम् = दूसरों के।वदने = (आनने/मुखे) मुख में। ते = वे। चक्षुनामिनी = नाममात्र की आँखें। मते = मानी गई हैं। इस संसार में विद्वान् लोग ही आँखों वाले कहे गए हैं। दूसरों के मुख पर जो आंखें हैं, वे तो नाममात्र की आँखें मानी गई हैं।

भावार्थ-भाव यह है कि ज्ञानचक्षु ही मनुष्य की असली आँख हैं, जिनसे जीवन का दर्शन होता है। भौतिक आँख अतीत और भविष्य को नहीं दिखा सकती।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

5. यत् प्रोक्तं येन केनापि तस्य तत्त्वार्थनिर्णयः।
कर्तुं शक्यो भवेद्येन सः विवेक इतीरितः॥5॥
अन्वयः-येन केन अपि यत् प्रोक्तं, तस्य तत्त्व-अर्थनिर्णयः येन कर्तुं शक्यः भवेत् सः विवेकः इति ईरितः।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-येन केन अपि = जिस किसी के भी द्वारा। यत् प्रोक्तम् = जो कुछ कहा गया है। तत्त्वार्थः = वास्तविक अर्थ। इति इस प्रकार, यह। ईरितः = (कथितः/प्रेरितः) कहा गया है।

जिस किसी के भी द्वारा जो कुछ कहा गया है, उसके वास्तविक अर्थ का निर्णय जिसके द्वारा किया जा सकता है, उसे ‘विवेक’ कहा गया है।
भावार्थ-भाव यह है कि अच्छे-बुरे की निर्णायक विवेक बुद्धि होती है।

6. वाक्पटुः धैर्यवान् मन्त्री सभायामप्यकातरः।
स केनापि प्रकारेण परैर्न परिभूयते॥6॥
अन्वयः-(यः) वाक्पटुः धैर्यवान् सभायाम् अपि अकातरः मन्त्री सः परैः केन अपि प्रकारेण न परिभूयते।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-वाक्पटुः = (वाचि/सम्भाषणे पटुः) वाणी में कुशल। अकातरः = (वीर:/साहसी) निडर। मन्त्री = मन्त्र (परामर्श) देने वाला। परैः = शत्रुओं द्वारा। परिभूयते = (तिरस्क्रियते/अवमान्यते) पराजित होता है।

जो बोलने में कुशल (वक्ता), धैर्यशाली , सभा में भी निर्भीक रहकर, अपना परामर्श देने वाला होता है, वह शत्रुओं के द्वारा किसी भी प्रकार पराजित नहीं होता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

7. य इच्छत्यात्मनः श्रेयः प्रभूतानि सुखानि च।
न कुर्यादहितं कर्म सः परेभ्यः कदापि च॥7॥
अन्वयः-य: आत्मनः श्रेयः, प्रभूतानि सुखानि च इच्छति, स: च कदापि परेभ्यः अहितं कर्म न कुर्यात्।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-आत्मनः = अपने लिए। श्रेयः = (कल्याणम्) कल्याण। प्रभूतानि = (अत्यधिकानि) अत्यधिक। परेभ्यः = दूसरों के लिए। अहितम् = बुरा अकल्याणकारक। कुर्यात् = करे।
जो अपने लिए कल्याण तथा अत्यधिक सुखों को चाहता है, वह कभी भी दूसरों के लिए बुरा काम नहीं करे। भावार्थ-भाव यह है कि अपनी आत्मा के प्रतिकूल दूसरों के लिए व्यवहार न करें। दूसरों के हित में ही अपना हित होता है।

8. आचारः प्रथमो धर्मः इत्येतद् विदुषां वचः।
तस्माद् रक्षेत् सदाचारं प्राणेभ्योऽपि विशेषतः॥8॥
अन्वयः-आचारः प्रथमः धर्मः, इति एतत् विदुषां वचः । तस्मात् प्राणेभ्यः अपि विशेषतः सदाचारम् रक्षेत्।

हिन्दी अनुवाद
शब्दार्थ-आचारः = सदाचार। प्रथमः = पहला, सर्वप्रथम। विदुषाम् = (विद्वद्जनानाम्) विद्वानों का। वचः = वचन। प्राणेभ्यः अपि = प्राणों से भी, प्राण देकर भी। विशेषतः = विशेषरूप से।
सदाचार सर्वप्रथम धर्म है, ऐसा विद्वानों का वचन है। इसलिए प्राणों से भी विशेषकर सदाचार की रक्षा करनी चाहिए। भावार्थ-अच्छा आचरण धर्म की पहली सीढ़ी है, अतः जीवन में सफलता पाने के लिए प्राणों का बलिदान करके भी, सत् आचरण का पालन करना चाहिए।

निबन्धात्मक प्रश्न
पाठ का सार-चेन्नई के समुद्र तट पर तिरुवल्लुवर महाकवि की प्रतिमा को देखकर छात्रों को, उनके विषय में तथा उनके ग्रन्थ के विषय में जानने की इच्छा जागृत होती है। उस ग्रन्थ के कुछ पद्यों का सार इस प्रकार वर्णित हुआ हैपिता अपनी सन्तान के लिए जो तप करता है, पुत्र को उसके प्रति कृतज्ञता का भाव होना चाहिए। मन, वचन और कर्म में समानता होनी चाहिए, महात्माओं में ऐसा ही गुण होता है। मनुष्य को मधुरवाणी बोलकर उसके मीठे फल को खाना चाहिए, कठोरवाणी मूर्ख व्यक्ति बोलते हैं।
विद्वान् विवेकशील होते हैं, जिसके कारण उन्हें आँखों वाला कहा जाता है। अन्य लोगों की आँखों तो चर्म-चक्षु हैं, जिनसे यथार्थवस्तु को देखा नहीं जा सकता। विवेक का अर्थ है-अच्छे-बुरे के निर्णय करने की क्षमता। परामर्शदायक व्यक्ति वाक्पटु, निर्भीक तथा धैर्यवान् बनकर शत्रुओं से भी अपराजेय रहता है। यदि मनुष्य अपना कल्याण चाहता है, तो उसे दूसरों की हानि नहीं करनी चाहिए। सदाचार का पालन सबसे बड़ा धर्म है। इस सदाचार की रक्षा प्राण देकर भी करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 9 सूक्तयः

सूक्तयः summary in Hindhi

सूक्तयः पाठ – परिचय

“सूक्तयः” पाठ तिरुवल्लुवर महाकवि के “तिरुक्कुरल” नामक ग्रन्थ से लिया गया है और संस्कृत में देवनागरी लिपि में अनूदित हुआ है। मूलरूप से यह ग्रन्थ तमिलभाषा में है और इसके लेखक भी तमिलभाषी महाकवि हैं। तिरुक्कुरल तमिलभाषा में रचित “तमिल साहित्य” की उत्कृष्ट कृति है। इसे तमिल भाषा का ‘वेद’ माना जाता है। इसके प्रणेता तिरुवल्लुवर हैं। ग्रन्थ का रचनाकाल प्रथम ईस्वी शताब्दी है। इस ग्रन्थ में समस्त मानव जाति के लिए जीवनोपयोगी सत्य का प्रतिपादन हुआ है। तिरु’ शब्द ‘श्री’ का वाचक है।’तिरुक्कुरल’ पद का अभिप्राय है ‘श्रिया युक्तं कुरत् छन्दः’ अथवा ‘श्री युक्तवाणी’। इस ग्रन्थ में धर्म-अर्थ-काम नामक तीन भाग हैं। तीनों भागों में पद्य संख्या 1330 है। प्रस्तुत श्लोक सरस, सरल भाषायुक्त तथा प्रेरणाप्रद है।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

HBSE 10th Class Sanskrit विचित्रः साक्षी Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृतभाषा में लिखिए-)
(क) निर्धनः जनः कथं वित्तम् उपार्जितवान् ?
(ख) जनः किमर्थं पदातिः गच्छति ?
(ग) प्रसृते निशान्धकारे स किम् अचिन्तयत् ?
(घ) वस्तुतः चौरः कः आसीत् ?
(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी किमुक्तवान् ?
(च) मतिवैभवशालिनः दुष्कराणि कार्याणि कथं साधयन्ति ?
उत्तराणि
(क) निर्धनः जनः भूरिपरिश्रम्य वित्तम् उपार्जितवान्।
(ख) जनः परमर्थकार्येन पीडितः पदातिः गच्छति।
(ग) ‘प्रसृते निशान्धकारे विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा’ स इति अचिन्तयत्।
(घ) वस्तुत: चौरः आरक्षी आसीत् ?
(ङ) जनस्य क्रन्दनं निशम्य आरक्षी उक्तवान्–’हे दुष्ट ! तस्मिन् दिने त्वयाऽहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद् वारितः । इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुझ्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे।’
(च) मतिवैभवशालिन: दुष्कराणि कार्याणि नीतियुक्तिं समालम्ब्य लीलयैव साधयन्ति।

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प्रश्न 2.
रेखाङ्कितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(रेखांकित पद के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) पुत्रं द्रष्टुं सः प्रस्थितः।
(ख) करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।
(ग) चोरस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः।
(घ) न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।
(ङ) स भारवेदनया क्रन्दति स्म।
(च) उभौ शवं चत्वरे स्थापितवन्तौ।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम)
(क) कं द्रष्टुं सः प्रस्थितः ?
(ख) करुणापरो गृही कस्मै आश्रयं प्रायच्छत् ?
(ग) कस्य पादध्वनिना अतिथिः प्रबुद्धः ?
(घ) न्यायाधीशः कः आसीत्। ?
(ङ) स कया क्रन्दति स्म ?
(च) उभौ शवं कुत्र स्थापितवन्तौ ?

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प्रश्न 3.
सन्धिछेदं/सन्धिविच्छेदं च कुरुत
(सन्धि/सन्धिविच्छेद कीजिए-)
(क) पदातिरेव – ………………….. + ………………………
(ख) निशान्धकारे – ………………….. + ………………………
(ग) अभि + आगतम् – ………………….. + ………………………
(घ) भोजन + अन्ते – ………………….. + ………………………
(ङ) चौरोऽयम् – ………………….. + ………………………
(च) गृह + अभ्यन्तरे – ………………….. + ………………………
(छ) लीलयैव – ………………….. + ………………………
(ज) यदुक्तम् – ………………….. + ………………………
(झ) प्रबुद्धः + अतिथिः – ………………….. + ………………………
उत्तराणि – ………………….. + ………………………
(क) पदातिरेव = पदाति: + एव
(ख) निशान्धकारे = निशा + अन्धकारे
(ग) अभि + आगतम् = अभ्यागतम्
(घ) भोजन + अन्ते = भोजनान्ते
(ङ) चौरोऽयम् = चौरः + अयम्
(च) गृह + अभ्यन्तरे = गृहाभ्यान्तरे
(छ) लीलयैव = लीलया + एव
(ज) यदुक्तम् = यद् + उक्तम्
(झ) प्रबुद्धः + अतिथिः = प्रबुद्धोऽतिथि:

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प्रश्न 4.
अधोलिखितानि पदानि भिन्न-भिन्नप्रत्ययान्तानि सन्ति। तानि पृथक् कृत्वा निर्दिष्टानां प्रत्ययानामधः लिखत
(अधोलिखित पद भिन्न-भिन्न प्रत्यय वाले हैं। इन्हें पृथक् करके निर्दिष्ट प्रत्ययों के नीचे लिखिए-)
परिश्रम्य, उपार्जितवान्, दापयितुम्, प्रस्थितः, द्रष्टुम्, विहाय, पृष्टवान्, प्रविष्टः, आदाय, क्रोशितुम्, नियुक्तः, नीतवान्, निर्णेतुम्, आदिष्टवान्, समागत्य, निशम्य, प्रोच्य, अपसार्य।
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उत्तराणि
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प्रश्न 5.
भिन्नप्रकृतिकं पदं चिनुत
(भिन्न प्रकृति वाला पद चुनिए-)
(क) विचित्रा, शुभावहा, शङ्कया, मञ्जूषा
(ख) कश्चन, किञ्चित्, त्वरितं, यदुक्तम्
(ग) पुत्रः तनयः, व्याकुलः, तनूजः
(घ) करुणापरः, अतिथिपरायणः, प्रबुद्धः, जनः
उत्तराणि:
(क) शङ्कया।
(ख) त्वरितं ।
(ग) व्याकुलः।
(घ) जनः ।

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प्रश्न 6.
(क) ‘निकषा’ ‘प्रति’ इत्यनयोः शब्दयोः योगे द्वितीया-विभक्तिः भवति। उदाहरणमनुसृत्य द्वितीया-विभक्तेः प्रयोगं कृत्वा रिक्तस्थानपूर्तिं कुरुत
(‘निकषा’ ‘प्रति’ इन दो शब्दों के योग में द्वितीया-विभक्ति होती है। उदाहरण के अनुसार द्वितीया विभक्ति का प्रयोग करके रिक्तस्थान की पूर्ति कीजिए-)
यथा- राजमार्ग निकषा मृतशरीरं वर्तते।
(क) ……………. निकषा नदी वहति। (ग्राम)
(ख) ……….. निकषा औषधालयं वर्तते। (नगर)
(ग) तौ ……………… प्रति प्रस्थिती। (न्यायाधिकारिन्)
(घ) मौहनः …………. प्रति गच्छति। (गृह)
उत्तराणि
(क) ग्रामं निकषा नदी वहति।
(ख) नगरं निकषा औषधालयं वर्तते।
(ग) तौ न्यायाधिकारिणं प्रति प्रस्थितौ।
(घ) मोहनः गृहं प्रति गच्छति।

(ख) कोष्ठकेषु दत्तेषु पदेषु यथानिर्दिष्टां विभक्तिं प्रयुज्य रिक्तस्थानानि पूरयत
(कोष्ठक में दिए गए पदों में से यथानिर्दिष्ट विभक्ति का प्रयोग करके रिक्तस्थानों की पूर्ति कीजिए-)
(क) सः ……………. निष्क्रम्य बहिरगच्छत्। (गृह-शब्दे पञ्चमी)
(ख) चौरशंकया अतिथि: …………. अन्वधावत्। (चौरशब्दे द्वितीया)
(ग) गृहस्थः …………….. आश्रयं प्रायच्छत्। (अतिथि-शब्दे चतुर्थी)
(घ) तौ ………….. प्रति प्रस्थितौ। (न्यायाधीश-शब्दे द्वितीया)
उत्तराणि
(क) स: गृहात् निष्क्रम्य बहिरगच्छत्।
(ख) चौरशंकया अतिथिः चौरम् अन्वधावत्।
(ग) गृहस्थः अतिथये आश्रयं प्रायच्छत।
(घ) तौ न्यायाधीशं प्रति प्रस्थितौ।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

प्रश्न 7.
अधोलिखितानि वाक्यानि बहुवचने परिवर्तयत
(अधोलिखित वाक्यों का बहुवचन में परिवर्तन कीजिए-)
(क) स बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवान्।
(ख) चौरः ग्रामे नियुक्तः राजपुरुषः आसीत्।
(ग) कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः।
(घ) अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं स्थापितवन्तौ।
उत्तराणि
(क) ते बसयानं विहाय पदातिरेव गन्तुं निश्चयं कृतवन्तः।
(ख) चौराः ग्रामे नियुक्ताः राजपुरुषाः आसन्।
(ग) केचन चौराः गृहाभ्यान्तरं प्रविष्टाः ।
(घ) अंन्येद्युः ते न्यायालये स्व-स्व पक्षं स्थापितवन्तः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

योग्यताविस्तारः
(क) विचित्रः साक्षी न्यायो भवति प्रमाणाधीनः। प्रमाणं विना न्यायं कर्तुं न कोऽपि क्षमः सर्वत्र । न्यायालयेऽपि न्यायाधीशाः यस्मिन् कस्मिन्नपि विषये प्रमाणाभावे न समर्थाः भवन्ति। अतएव, अस्मिन् पाठे चौर्याभियोगे न्यायाधीशः प्रथमतः साक्ष्यं (प्रमाणम्) विना निर्णेतुं नाशक्नोत्। अपरेद्यः यदा स शवः न्यायाधीशं सर्वं निवेदितवान् सप्रमाणं तदा सः आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्। अस्य पाठस्य अयमेव सन्देशः।

विचित्र गवाह-न्याय प्रमाणों के अधीन होता है। सभी जगह प्रमाण (सबूत) के बिना कोई भी न्याय करने में समर्थ नहीं है। न्यायालय में भी न्यायाधीश प्रत्येक अभियोग में प्रमाणों के न मिलने पर (न्याय करने में) समर्थ नहीं हो पाते हैं। इसीलिए इस पाठ में चोरी के अभियोग में न्यायाधीश पहली ही दृष्टि में प्रमाण न मिलने पर निर्णय नहीं कर सका। दूसरे दिन जब उस शव ने न्यायाधीश को सब कुछ बता दिया, तब प्रमाण सहित उसने आरक्षक (चौकीदार) को जेल की सजा देकर उस व्यक्ति को सम्मान पूर्वक छोड़ दिया। इस पाठ का यही सन्देश है।

(ख) मतिवैभवशालिनः – बुद्धिसम्पत्ति-सम्पन्नाः ।
ये विद्वांसः बुद्धिस्वरूपविभवयुक्ताः ते मतिवैभवशालिन: भवन्ति।
ते एव बुद्धिचातुर्यबलेन असम्भवकार्याणि अपि सरलतया कर्वन्ति। बुद्धिवैभव से सम्पन्न-बुद्धिरूपी सम्पत्ति से सम्पन्न। जो विद्वान लोग बुद्धि रूपी सम्पत्ति से युक्त होते हैं। वे मतिवैभव-शाली कहलाते हैं। वे ही बुद्धि की चतुरता के बल पर असंभव कार्यों को भी सरलता से कर लेते हैं।

(ग) स शवः
न्यायाधीश बंकिमचन्द्रमहोदयैः अत्र प्रमाणस्य अभावे किमपि प्रच्छन्नः जनः साक्ष्यं प्राप्तुं नियुक्तः जातः। यद् घटितमासीत् सः सर्वं सत्यं ज्ञात्वा साक्ष्यं प्रस्तुतवान्। पाठेऽस्मिन् शवः एव ‘विचित्रः साक्षी’ स्यात्।
वह शव (लाश)-न्यायाधीश बंकिमचन्द्र महोदय के द्वारा यहाँ प्रमाण के अभाव में कोई गोपनीय व्यक्ति प्रमाण प्राप्त करने के लिए नियुक्त किया गया था। जो घटित हुआ था, उसने सब सत्य जानकर प्रमाण प्रस्तुत किया। इस पाठ में शव ही ‘विचित्र साक्षी’ है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

भाषिकविस्तारः
उपार्जितवान् – उप + √ अर्ज् + ल्युट्, युच् वा
दापयितुम् – √दा + णिच् + तुमुन्

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HBSE 10th Class Sanskrit विचित्रः साक्षी शोभा Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां वाक्यानां/सूक्तीनां भावार्थ हिन्दीभाषायां लिखत
(अधोलिखित वाक्यों/सूक्तियों के भावार्थ हिन्दीभाषा में लिखिए-)
(क) “परमर्थकार्येन पीडितः स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।”
(धनाभाव से पीड़ित वह निर्धन व्यक्ति बस को छोड़कर पैदल ही चल पड़ा।)
भावार्थ :-उपर्युक्त पंक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमुषी भाग-2” में संकलित पाठ “विचित्रः साक्षी” से उद्धृत की गयी है। इसमें बताया गया है कि धनाभाव से पीड़ित व्यक्ति सुख-सुविधाओं की ओर ध्यान न देकर अपने कर्तव्य पालन में लगे रहते हैं।

कथा में वर्णित निर्धन व्यक्ति ने पुत्र को अच्छी शिक्षा देने के लिए कठोर परिश्रम से धन कमाया और अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया। एक बार छात्रावास में रहते हुए उसका पुत्र बीमार पड़ गया। पुत्र की बीमारी का समाचार पाकर उसे देखने के लिए वह घर से पैदल ही निकल पड़ा; क्योंकि धनाभाव के कारण वह बस का किराया नहीं दे सकता था।

उपर्युक्त पंक्ति का भाव यह है कि दरिद्रता सबसे बड़ा अभिशाप है। माता-पिता स्वयं कष्ट उठाकर भी सन्तान के भरण-पोषण और शिक्षण का उत्तरदायित्व निभाते हैं। वे व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं की ओर ध्यान न देकर अपने कर्तव्य पालन में लगे रहते हैं।

(ख) “निशान्धकारे प्रसृते विजनप्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा।”
(रात्रि जनित अन्धकार के फैल जाने पर और मार्ग के निर्जन होने पर यात्रा करना हितकर नहीं होता है।)
भावार्थ :-निशान्धकारे प्रसृते —– इत्यादि सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमुषी भाग-2” में संकलित पाठ “विचित्र: साक्षी” से उद्धृत की गयी है। इसमें बताया गया है कि यात्रा से पूर्व उचित-अनुचित समय का विचार अवश्य कर लेना चाहिए।

उपर्युक्त सूक्ति का भाव यह है कि हम जब भी कोई कार्य आरम्भ करें तो पूर्वापर पर अवश्य विचार कर लें अर्थात् दिन-रात, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि आदि परिणामों पर अवश्य विचार कर लें क्योंकि ‘बिना विचारे जो काम होगा कभी न अच्छा परिणाम होगा’। यही सोचकर ‘विचित्रः साक्षी’ पाठ में यात्री ने यात्रा स्थगित करके रात को गाँव में ठहर जाने का निर्णय लिया था।

(ग) “प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं नाशक्नोत्।”।
(प्रमाण के अभाव में वह न्यायाधीश निर्णय नहीं कर सकता था।)
भावार्थ:-प्रस्तुत पंक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमषी भाग-2” में संकलित पाठ “विचित्रः साक्षी” से उद्धृत की गयी है। इसमें बताया गया है कि प्रमाण के अभाव में सच्चे न्यायाधीश के लिए निर्णय करना कठिन होता है।
न्याय प्रमाणों के अधीन होता है। प्रमाण (सबूत) के बिना कोई भी व्यक्ति न्याय करने में समर्थ नहीं हो सकता। न्यायालय में भी न्यायाधीश किसी भी अभियोग में प्रमाणों के न मिलने पर न्याय करने में समर्थ नहीं हो पाते हैं। प्रस्तुत पाठ में चोरी के अभियोग में न्यायाधीश बंकिम चन्द्र पहली ही दृष्टि में प्रमाण न मिलने पर निर्णय नहीं कर सका। दूसरे दिन जब उस शव ने न्यायाधीश को सब कुछ बता दिया, तब प्रमाण सहित उसने आरक्षक (चौकीदार) को जेल की सजा देकर उस व्यक्ति को सम्मान पूर्वक छोड़ दिया। पंक्ति का भाव यही है कि ‘न्यायो भवति प्रमाणाधीनः’ न्याय प्रमाणों के अधीन होता है; क्योंकि सबूत के बिना न्याय नहीं किया जा सकता।

(घ) “विचित्रा दैवगतिः”।
(भाग्य के खेल न्यारे (अनोखे) होते हैं।)
भावार्थ:-“विचित्रा दैवगति” यह सूक्ति हमारी संस्कृत की पाठ्यपुस्तक “शेमुषी भाग-2” में संकलित पाठ “विचित्र: साक्षी” से उद्धृत की गयी है। इसमें भाग्य के आश्चर्यजनक होने की बात कही गयी है।
“विचित्रा दैवगतिः” इस सूक्ति के माध्यम से कवि यह कहना चाहता है कि भाग्य कब किस करवट पलट जाए इसका कोई भरोसा नहीं है। क्षणभर में ही अपना पराया और पराया अपना बन जाता है। विपरीत भाग्य के चलते सच्चा झूठा प्रमाणित हो जाता है और झूठा सच्चा सिद्ध हो जाता है। ‘विचित्रः साक्षी’ इस कहानी में भी यह दिखाया गया है कि चोर को पकड़ने वाला ही चोर सिद्ध हो गया था। परन्तु भाग्य ने फिर करवट ली और न्यायाधीश के बुद्धिकौशल से दूध का दूध और पानी का पानी हो गया। सच है भाग्य की गति विचित्र है।

(ङ) दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः ।
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते ॥

(बुद्धिमान व्यक्ति नीति और युक्ति का आश्रय लेकर दुष्कर कार्यों को भी आसानी से ही सिद्ध कर लेते हैं।)
भावार्थ :-दुष्कराण्यपि कर्माणि —- इत्यादि सूक्ति “शेमुषी भाग-2” के “विचित्रः साक्षी” पाठ से उद्धृत की गयी है। इसमें बताया गया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अपने बुद्धिकौशल से कठिन कार्यों को भी आसानी से ही कर लेते हैं।
उपर्युक्त सूक्ति का भाव यह है कि साधारण मनुष्यों के लिए जो कार्य असाध्य और दुष्कर होते हैं बुद्धिमान व्यक्ति नीति और युक्ति का सहारा लेकर उन्हें भी बड़ी सरलता से सिद्ध कर लेते हैं। जैसे “विचित्रः साक्षी” पाठ में ऐसा लग रहा था कि चोर बड़ी चालाकी से बच गया और चोर को पकड़ने वाला चोर सिद्ध हो गया परन्तु न्यायाधीश बंकिमचन्द्र चटर्जी ने युक्ति के सहारे से सही निर्णय करके सबको हतप्रभ कर दिया। इसीलिए तो कहा जाता है-“बुद्धिर्यस्य बलं तस्य”।

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प्रश्न 2.
स्थूलपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(स्थूलपदों के आधार पर प्रश्ननिर्माण कीजिए-)
(क) स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।
(ख) निशान्धकारे पदयात्रा न शुभावहा।
(ग) ग्रामस्य आरक्षी एव चौर आसीत्।
(घ) प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं नाशक्नोत्।
(ङ) स भारवेदनया क्रन्दति स्म।
उत्तराणि-(प्रश्ननिर्माणम्)
(क) स किं विहाय पदातिरेव प्राचलत् ?
(ख) कदा पदयात्रा न शुभावहा ?
(ग) कस्य आरक्षी एव चौर आसीत् ?
(घ) कस्मात् स निर्णेतुं नाशक्नोत् ?
(ङ) स कया क्रन्दति स्म ?

प्रश्न 3.
अधोलिखित-प्रश्नानां प्रदत्तोत्तरविकल्पेषु शुद्धं विकल्पं विचित्य लिखत
(अधोलिखित प्रश्नों के उत्तर के लिए दिए गए विकल्पों में से शुद्ध विकल्प चुनकर लिखिए-)
(क) ‘अभ्यागतम्’ पदस्य सन्धिविच्छेदोऽस्ति.
(i) अभि + आगतम्
(ii) अभ्या + आगतम्
(iii) अभि + यागतम्
(iv) अभी + आगतम्।
उत्तरम्:
(i) अभि + आगतम्।

(ख) ‘लीलया + एव’ अत्र सन्धियुक्तपदम्
(i) लीलयौव
(ii) लीलयैव
(iii) लीलयाव
(iv) लीलयेव।
उत्तरम्-
(ii) लीलयैव।

(ग) ‘निशान्धकारे’ अस्मिन् पदे कः समासोऽस्ति ?
(i) कर्मधारयः
(ii) तत्पुरुषः
(iii) अव्ययीभावः
(iv) द्वन्द्वः।
उत्तरम्:
(i) तत्पुरुषः

(घ) ‘सुपुष्टदेहः’ इति पदस्य समास-विग्रहः
(i) शोभनं पुष्टं देहम्
(ii) सुपुष्टः च देहः च तयोः समाहारः
(iii) सुपुष्टस्य देहः
(iv) सुपुष्ट: देहः यस्य सः।
उत्तरम्:
(iv) सुपुष्ट: देहः यस्य सः।

(ङ) ‘उक्तवान्’ इति पदे कः प्रत्ययः ?
(i) त्व .
(ii) तल्
(iii) क्त्वा
(iv) क्तवतु।
उत्तरम्:
(iv) क्तवतु।

(च) तौ न्यायाधीशं …….. प्रस्थितौ।
(रिक्तस्थानपूर्तिः अव्ययपदेन)
(i) एव
(ii) ह्यः
(iii) प्रति
(iv) च।
उत्तरम्
(iii) प्रति।

(छ) उपवने ………. युवकाः भ्रमणं कुर्वन्ति।
(रिक्तस्थानपूर्तिः उचितसंख्यापदेन)
(i) चतुरः
(ii) चत्वारः
(iii) चतस्रः
(iv) चत्वारि।
उत्तरम्:
(ii) चत्वारः।

(ज) जनः किमर्थं पदाति: गच्छति ?
(i) धनाभावात्
(ii) धनक्षयात्
(ii) धनरक्षणार्थम्
(iv) अज्ञानात्।
उत्तरम्:
(i) धनाभावात्।

(झ) वस्तुतः चौरः कः आसीत् ?
(i) न्यायाधीशः
(ii) निर्धनः
(iii) गृहस्थः
(iv) आरक्षी।
उत्तरम्:
(iv) आरक्षी।

(अ) “दिने’ अत्र का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(i) प्रथमा
(ii) सप्तमी
(ii) तृतीया
(iv) चतुर्थी।
उत्तरम्:
(ii) सप्तमी।

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यथानिर्देशम् उत्तरत
(ट) ‘प्रस्थितौ’ इति पदस्य प्रकृति-प्रत्ययौ लिखत।
(ठ) ‘चौरः उच्चैः क्रोशितुमारभत । (अत्र किम् अव्ययपदं प्रयुक्तम्)
(ड) ‘तस्य मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते। (‘वर्तते’ अत्र कः लकारः प्रयुक्तः ?)
(ढ) नवम्बरमासे 30 दिनानि भवन्ति। (अङ्कस्थाने संस्कृतसंख्यावाचक-विशेषणं लिखत)
(ण) मम जननी प्रातः 4.45 वादने ध्यानं करोति। (अंकस्थाने समयवाचकं संस्कृतशब्दं लिखत।)
(त) ‘तच्छ्रुत्वा’ इति पदस्य सन्धिविच्छेदं कुरुत।
उत्तराणि
(ट) ‘प्रस्थितौ’ = प्र + स्था + क्त।
(ठ) ‘उच्चैः’ इति अव्ययपदं प्रयुक्तम्।
(ड) ‘वर्तते’ अत्र लट् लकारः प्रयुक्तः ।
(ढ) नवम्बरमासे त्रिंशत् दिनानि भवन्ति ।
(ण) मम जननी प्रातः पादोनचतुर्वादने ध्यानं करोति।
(त) ‘तच्छ्रुत्वा’ = तत् + श्रुत्वा।

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विचित्रः साक्षी पठित-अवबोधनम्
1. निर्देश:-अधोलिखितं गद्यांशं पठित्वा एतदाधारितान् प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृत-पूर्णवाक्येन लिखत
(अधोलिखित गद्यांश को पढ़कर इन पर आधारित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत के पूर्ण वाक्य में लिखिए-)
कश्चन निर्धनो जनः भूरि परिश्रम्य किञ्चिद् वित्तमुपार्जितवान्। तेन स्वपुत्रम् एकस्मिन् महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलो जातः। तत्तनयः तत्रैव छात्रावासे निवसन् अध्ययने संलग्नः समभूत्। एकदा स पिता तनूजस्य रुग्णतामाकर्ण्य व्याकुलो जातः पुत्रं द्रष्टुं च प्रस्थितः। परमर्थकार्येन पीडितः स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्।
पदातिक्रमेण संचलन् सायं समयेऽप्यसौ गन्तव्याद् दूरे आसीत्। निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा। एवं विचार्य स पार्श्वस्थिते ग्रामे रात्रिनिवासं कर्तुं कञ्चिद् गृहस्थमुपागतः। करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्।

पाठ्यांश प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) निर्धन: जनः परिश्रम्य किम् उपार्जितवान् ?
(ii) निर्धनः स्वपुत्रम् कुत्र प्रवेशं दापयितुं सफलः जातः ?
(ii) पिता कस्य रुग्णताम् आकर्ण्य व्याकुलः जातः ?
(iv) निर्धन: केन पीडितः आसीत् ?
(v) निशान्धकारे का न शुभावहा ?
उत्तराणि
(i) निर्धनः जनः परिश्रम्य क्वित्तम् उपार्जितवान्।
(ii) निर्धनः स्वपुत्रम् एकस्मिन् महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलः जातः ।
(iii) पिता तनूजस्य (पुत्रस्य) रुग्णताम् आकर्ण्य व्याकुलः जातः ।
(iv) निर्धनः अर्थकार्येन पीडितः आसीत्।
(v) निशान्धकारे पदयात्रा न शुभावहा।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘परिश्रम्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत।
(ii) ‘निष्फलः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(iii) ‘तनूजः’ इत्यस्य अत्र कः पर्यायः प्रयुक्तः ?
(iv) ‘करुणापरो गृही’ अत्र विशेषणपदं किम् ?
(v) ‘स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्’ अत्र क्रियापदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) परि + श्रम् + ल्यप्।
(ii) सफलः ।
(iii) तनयः ।
(iv) करुणापरः ।
(v) प्राचलत् ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-भूरि = (पर्याप्तम्) अत्यधिक। वित्तम् = (धनम्)धन। उपार्जितवान् = (अर्जितवान्) कमाया। दापयितुम् = (प्रापयितुम्) प्राप्त करने में। तनयः = (पुत्रः) पुत्र। निवसन् = (वासं कुर्वन्) रहते हुए। तनूजस्य = (पुत्रस्य) पुत्र की। प्रस्थितः = (गतः) चला गया। अर्थकार्येन = (धनस्य अभावेन) धनाभाव के कारण। पदातिरेव = (पादाभ्याम् एव) पैदल ही। प्रसृते = (विस्तृत) फैलने पर। विजने प्रदेशे = (एकान्तप्रदेशे) एकान्त प्रदेश में। शुभावहा = (कल्याणप्रदा) कल्याणकारी। गृही = (गृहस्वामी) गृहस्थ।।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘विचित्रः साक्षी’ नामक पाठ से लिया गया है। कोई निर्धन व्यक्ति छात्रावास में अपने बीमार पुत्र को देखने के लिए गया। मार्ग में अंधेरा होने से एक दयालु गृहस्थ ने रात्रि-निवास के लिए उसे आश्रय दे दिया। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में है।

सरलार्थ:-किसी निर्धन व्यक्ति ने अत्यधिक परिश्रम करके कुछ धन अर्जित किया। उससे अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाने में सफल हुआ। उसका पुत्र वहीं छात्रावास में रहकर अध्ययन में संलग्न हो गया। एक बार वह पिता पुत्र की बीमारी को सुनकर व्याकुल हुआ और पुत्र को देखने के लिए चल पड़ा। परन्तु धन की अत्यधिक कमी से पीड़ित वह बस को छोड़कर पैदल ही चल दिया। __ लगातार पैदल चलता हुआ शाम के समय भी वह गन्तव्य से दूर था। रात का अंधेरा फैलने पर एकान्त प्रदेश में पैदल-यात्रा कल्याणकारी नहीं है, इस प्रकार सोचकर वह पास में स्थित ग्राम में रात्रि-निवास करने के लिए किसी गृहस्थ के पास गया। करुणापरायण गृहस्थी ने उसको आश्रय प्रदान कर दिया।

भावार्थ:-भाव यह है कि निर्धन व्यक्ति ने पुत्र को अच्छी शिक्षा देने के लिए कठोर परिश्रम से धन कमाया और अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया। एक बार छात्रावास में रहते हुए उसका पुत्र बीमार पड़ गया। पुत्र की बीमारी का समाचार पाकर उसे देखने के लिए वह घर से पैदल ही निकल पड़ा; क्योंकि धनाभाव के कारण वह बस का किराया नहीं दे सकता था। माता-पिता स्वयं कष्ट उठाकर भी सन्तान के भरण-पोषण और शिक्षण का उत्तरदायित्व निभाते हैं।

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2. विचित्रा दैवगतिः। तस्यामेव रात्रौ तस्मिन् गृहे कश्चन चौरः गृहाभ्यन्तरं प्रविष्टः। तत्र निहितामेकां मञ्जूषाम् आदाय पलायितः। चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धोऽतिथि: चौरशङ्कया तमन्वधावत् अगृणाच्च, परं विचित्रमघटत। चौरः एव उच्चैः क्रोशितुमारभत “चौरोऽयं चौरोऽयम्” इति। तस्य तारस्वरेण प्रबुद्धाः ग्रामवासिनः स्वगृहाद् निष्क्रम्य तत्रागच्छन् वराकमतिथिमेव च चौरं मत्वाभर्त्सयन्। यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौर आसीत्। तत्क्षणमेव रक्षापुरुषः तम् अतिथिं चौरोऽयम् इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत्।

पाठ्यांश प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) गृहाभ्यन्तरं कः प्रविष्टः ?
(ii) अतिथिः केन प्रबुद्धः ?
(ii) ‘चौरोऽयं चौरोऽयम्’ इति क्रोशितुं कः आरभत ?
(iv) के स्वगृहात् निष्क्रम्य तत्रागच्छन् ?
(v) वस्तुतः चौरः कः आसीत् ?
(vi) आरक्षी किम् अकरोत् ?
उत्तराणि
(i) गृहाभ्यन्तरं चौरः प्रविष्टः।
(ii) अतिथि: पादध्वनिना प्रबुद्धः।
(iii) ‘चौरोऽयं चौरोऽयम्’ इति क्रोशितुं चौरः आरभत।
(iv) ग्रामवासिनः स्वगृहात् निष्क्रम्य तत्रागच्छन्।
(v) वस्तुतः चौरः आरक्षी आसीत्।
(vi) आरक्षी तम् अतिथिं ‘चौरोऽयम्’ इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत् ।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘रक्षापुरुषः’ इत्यस्य पर्यायः अत्र कः ?
(ii) ‘विचित्रा दैवगतिः’ अत्र विशेष्यपदं किम् ?
(iii) ‘उच्चैः स्वरेण’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘चौरोऽयम्’ अत्र ‘अयम्’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) ‘अभर्त्सयन्’ इति क्रियापदस्य कर्तृपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) आरक्षी।
(ii) दैवगतिः ।
(iii) तारस्वरेण ।
(iv) अतिथये।
(v) ग्रामवासिनः ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-दैवगतिः = (भाग्यस्थितिः) भाग्य की लीला। पलायितः = (वेगेन निर्गतः/पलायनमकरोत्) भाग गया, चला गया। प्रबुद्धः = (जागृतः) जागा हुआ। अन्वधावत् = (अन्वगच्छत्) पीछे-पीछे गया। क्रोशितुम् = (चीत्कर्तुम्) ज़ोर-ज़ोर से कहने/चिल्लाने। तारस्वरेण = (उच्चस्वरेण) ऊँची आवाज़ में। वराकः = (विवशः) बेचारा। अभर्त्सयन् = (भर्त्सनाम् अकुर्वन्) भला-बुरा कहा। पुंसः = (पुरुषस्य) मनुष्य का। निहिताम् = (स्थापिताम्) रखी हुई। प्रख्याप्य = (स्थाप्य) स्थापित करके।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘विचित्रः साक्षी’ नामक पाठ से लिया गया है। रात्री में उस गृहस्थ के घर एक चोर घुस आया और उसके पैरों की आहट से जागे हुए उस अतिथि ने भागते हुए चोर को पकड़ लिया। चोर ने चतुराई दिखाई और अतिथि को ही चोर कहकर पकड़वा दिया। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में है।

सरलार्थः-भाग्य की गति विचित्र है। उसी रात्रि में उस घर में कोई चोर घर के भीतर घुस गया। वहाँ रखी एक सन्दूकची (पेटी) को लेकर भाग गया। चोर के पैरों की ध्वनि से जागा हुआ अतिथि चोर की आशंका से उसके पीछे दौड़ा और उसे पकड़ लिया, परन्तु विचित्र घटना घटी। चोर ने ही ऊँची आवाज़ में चिल्लाना आरम्भ किया “यह चोर है, यह चोर है।” उसके तेज़ स्वर से जागे ग्रामवासी अपने घर से निकलकर वहाँ आ गए और बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर भला-बुरा कहने लगे। यद्यपि गाँव का चौकीदार ही चोर था। उसी क्षण रक्षा-पुरुष (चौकीदार) ने उस अतिथि को ‘यह चोर है’, ऐसा मानकर जेल में डाल दिया।

भावार्थ:-भाव यह है कि जब निर्धन व्यक्ति रात बिताने के लिए एक दयालु गृहस्थी के घर में ठहर गया तो दुर्भाग्यवश उसी रात्री गाँव का चौकीदार ही उस गृहस्थी के घर चोरी करने के लिए घुस आया। निर्धन व्यक्ति ने उसे पकड़ने का प्रयास भी किया परन्तु चौकीदार ने शोर मचाकर उस निर्धन को ही चोर बताकर कारावास भिजवा दिया। भाग्य की गति विचित्र है।

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3. अग्रिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्। न्यायाधीशो बंकिमचन्द्रः उभाभ्यां पृथक्पृथक् विवरणं श्रुतवान्। सर्वं वृत्तमवगत्य स तं निर्दोषम् अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्। किन्तु प्रमाणाभावात् स निर्णेतुं नाशकतोत्। ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम् आदिष्टवान्। अन्येधुः तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं पुनः स्थापितवन्तौ। तदैव कश्चिद् तत्रत्यः कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत् यत् इतः क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जनः केनापि
हतः। तस्य मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते। आदिश्यतां किं करणीयमिति। न्यायाधीशः आरक्षिणम् अभियुक्तं च तं शवं न्यायालये आनेतुमादिष्टवान्।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) न्यायाधीशः कः आसीत् ?
(ii) सर्वं वृत्तम् अवगम्य न्यायाधीशः दोषभाजनम् कम् अमन्यत ?
(i) न्यायाधीशः कस्मात् निर्णेतुं नाशक्नोत् ?
(iv) मृतशरीरं कं निकषा वर्तते ?
(v) न्यायाधीशः शवं कुत्र आनेतुम् आदिष्टवान् ?
उत्तराणि
(i) न्यायाधीशः बंकिमचन्द्रः आसीत्।
(ii) सर्वं वृत्तम् अवगम्य न्यायाधीश: दोषभाजनम् आरक्षिणम् अमन्यत।
(iii) न्यायाधीशः प्रमाणाभावात् निर्णेतुं नाशक्नोत्।
(iv) मृतशरीरं राजमार्ग निकषा वर्तते।
(v) न्यायाधीशः शवं न्यायालये आनेतुम् आदिष्टवान्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) अग्रिमे दिने आरक्षी किम् अकरोत् ?
(ii) अन्येद्युः तौ न्यायालये किम् अकुरुताम् ?
(iii) कर्मचारी समागत्य किं न्यवेदयत् ?
(iv) न्यायाधीशः आरक्षिणम् अभियुक्तं च किं कर्तुम् आदिष्टवान् ?
उत्तराणि
(i) अग्रिमे दिने आरक्षी चौर्याभियोगे तम् अतिथिं न्यायालयं नीतवान्।
(ii) अन्येद्युः तौ न्यायालये स्व-स्व पक्षं पुनः स्थापितवन्तौ।
(iii) कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत् यत् इतः क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जनः केनापि हतः ।
(iv) न्यायाधीश: आरक्षिणम् अभियुक्तं च शवं न्यायालये आनेतुम् आदिष्टवान्।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘दोषभाजनम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘निर्णेतुम्’ अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
(iii) ‘अग्रिमे दिने’ इत्यर्थे प्रयुक्तं पदं किम् ?
(iv) ‘स निर्णेतुं नाशक्नोत्’ अत्र सः इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(v) ‘न्यायाधीशः’ इति पदस्य विशेष्यपदं किम् ?
उत्तराणि:
(i) निर्दोषम्।
(ii) तुमुन्।
(iii) अन्येद्युः ।
(iv) न्यायाधीशाय।
(v) बंकिमचन्द्रः।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-चौर्याभियोगे = (चौरकर्मणि, चौर्यदोषारोपे) चोरी के आरोप में। नीतवान् = (अनयत्) ले गया। वृत्तम् = (वृत्तान्तम्) सब समाचार। अवगत्य = (ज्ञात्वा) जानकर। आरक्षिणम् = [(सैनिकम् (रक्षक पुरुष)] सैनिक। दोषभाजनम् = (दोषपात्रम्) दोषी। निर्णेतुम् = (निर्णयं कर्तुम्) निर्णय करने में। उपस्थातुम् = (उपस्थापयितुम्) उपस्थित होने के लिए। आदिष्टवान् = (आज्ञां दत्तवान्) आज्ञा दी। स्थापितवन्तौ = (स्थापनां कृतवन्तौ) स्थापना करके। तत्रत्यः = (तत्र भव:) वहाँ का। न्यवेदयत् = (प्रार्थयत्) प्रार्थना की। क्रोशद्वयान्तराले = (द्वयोः क्रोशयोः मध्ये) दो कोस के मध्य। आदिश्यताम् (आदेशं दीयताम्) आज्ञा दीजिए।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘विचित्रः साक्षी’ नामक पाठ से लिया न्यायालय में लाने का आदेश दिया गया। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में है।

सरलार्थ:-अगले दिन वह चौकीदार चोरी के अभियोग में उसको न्यायालय ले गया। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ने उन दोनों से अलग-अलग विवरण सुना। सब समाचार जानकर उन्होंने उस (अतिथि) को निर्दोष माना और चौकीदार को अपराध का भागी, किन्तु प्रमाणों के अभाव में वे निर्णय न कर सके। तब उन्होंने दोनों को अगले दिन उपस्थित होने का आदेश दिया। दूसरे दिन उन दोनों ने न्यायालय में अपना-अपना पक्ष फिर से प्रस्तुत किया। तभी वहीं के किसी कर्मचारी ने आकर निवेदन किया कि यहाँ से दो कोश की दूरी पर कोई व्यक्ति किसी के द्वारा मार दिया गया है। उसका मृतशरीर राजमार्ग के समीप ही है। आदेश दें कि क्या किया जाए। न्यायाधीश ने चौकीदार और अभियुक्त को उस शव को न्यायालय में लेकर आने का आदेश दिया।

भावार्थ:-भाव यह है कि न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ‘आरक्षी ही चोर है’ यह वास्तविकता जानते हुए भी प्रमाण के अभाव में अपना निर्णय देने में असमर्थ था। न्यायाधीश ने साक्ष्य जुटाने के लिए एक विवेकपूर्ण योजना बनाई।

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4. आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम्। तत्रोपेत्य काष्ठपटले निहितं पटाच्छादितं देहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ। आरक्षी सुपुष्टदेह आसीत, अभियुक्तश्च अतीव कृशकायः। भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहनं तत्कृते दुष्करम् आसीत्। स भारवेदनया क्रन्दति स्म। तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदित आरक्षी तमुवाच-रे दुष्ट! तस्मिन् दिने त्वयाऽहं चोरिताया मञ्जूषाया ग्रहणाद् वारितः। इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुइक्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे” इति प्रोच्य उच्चैः अहसत्। यथाकथञ्चिद् उभौ शवमानीय एकस्मिन् चत्वरे स्थापितवन्तौ।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) काष्ठपटले कः निहितः आसीत् ?
(ii) आरक्षी कीदृशः आसीत् ?
(iii) अभियुक्तः कीदशः आसीत् ?
(iv) भारवेदनया कः क्रन्दति स्म ?
(v) उच्चैः कः अहसत् ?
उत्तराणि
(i) काष्ठपटले देहः निहितः आसीत्।
(ii) आरक्षी सुपुष्टदेहः आसीत्।
(iii) अभियुक्तः कृशकायः आसीत्।
(iv) भारवेदनया अभियुक्तः क्रन्दति स्म।
(v) उच्चैः आरक्षी अहसत्।

(ख) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) तो मृतदेहं स्कन्धेन वहन्ती कुत्र प्रस्थिती ?
(ii) अभियुक्तस्य कृते दुष्करं किम् आसीत् ?
(iii) आरक्षी किं निशम्य मुदितः आसीत् ?
(iv) उभौ शवम् आनीय कुत्र स्थापितवन्तौ ?
उत्तराणि
(i) तौ मृतदेहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ।
(ii) भारवतः शवस्य स्कन्धेन वहनम् अभियुक्तस्य कृते दुष्करम् आसीत्।
(iii) आरक्षी अभियुक्तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदितः आसीत्।
(iv) उभौ शवम् आनीय एकस्मिन् चत्वरे स्थापितवन्तौ।

(ग) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘कृशकायः’ इत्यस्य प्रयुक्तं विलोमपदं किम् ?
(ii) ‘कठिनम्’ इत्यस्य प्रयुक्तं समानार्थकपदं किम् ?
(iii) ‘स भारवेदनया क्रन्दति स्म’ अत्र ‘स’ इति सर्वनाम कस्मै प्रयुक्तम् ?
(iv) ‘त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ अत्र क्रियापदं किमस्ति ?
(v) ‘निशम्य’ अस्य प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत।
उत्तराणि:
(i) सुपुष्टदेहः।
(ii) दुष्करम्।
(iii) अभियुक्ताय।
(iv) लप्स्यसे।
(v) नि + शम् + ल्यप् ।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
शब्दार्थाः-उपेत्य = (समीपं गत्वा) पास जाकर। काष्ठपटले = (काष्ठस्य पटले) लकड़ी के तख्ते पर। निहितम् = (स्थापितम्) रखा गया। पटाच्छादितम् = (वस्त्रेणावृतम्) कपड़े से ढका हुआ। वहन्तौ = (धारयन्तौ) धारण करते हुए, वहन करते हुए। कृशकायः = (दुर्बलं शरीरम्) कमज़ोर शरीरवाला। भारवतः = (भारवाहिनः) भारवाही। भारवेदनया = (भारपीडया) भार की पीड़ा से। क्रन्दनम् = (रोदनम्) रोने को। निशम्य = (श्रुत्वा) सुन करके। मुदितः = (प्रसन्नः) प्रसन्न। वारितः = (निवारितः) रोका गया। भुक्ष्व = (अनुभवतु) अनुभव करो, भोगो। लप्स्यसे = (प्राप्स्यसे) प्राप्त करोगे। चत्वरे = (प्राङ्गणे) चबूतरे पर। __ प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘विचित्रः साक्षी’ नामक पाठ से लिया गया है। न्यायाधीश ने चौकीदार और अभियुक्त को वह शव लाने के लिए भेज दिया। शव भारी था अभियुक्त शरीर से कमज़ोर था। अतः शव के भार के कारण वह रोने लगा और बड़ी कठिनता से वे दोनों उस शव को न्यायालय तक ला सके। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में हैं।

सरलार्थः-आदेश पाकर दोनों चल दिए। वहाँ पहुँचकर लकड़ी के तख्ते पर रखे कपड़े से ढके शरीर को कन्धे पर ढोते हुए दोनों न्यायालय की ओर चल दिए। चौकीदार शरीर से बहुत तन्दरुस्त था और अभियुक्त अत्यधिक दुबले शरीर वाला। भारी शव को कन्धे पर ढोना उसके लिए कठिन था। वह भार की पीड़ा से रो रहा था। उसका रोना सुनकर प्रसन्न चौकीदार ने उससे कहा-“अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की पेटी लेने से रोका था। इस समय अपनी करनी का फल भोग। इस चोरी के अभियोग में तू तीन वर्ष की जेल की सजा पाएगा।” ऐसा कहकर जोर से हँसा। जिस किसी प्रकार से दोनों ने शव को लाकर एक चबूतरे पर रख दिया।

भावार्थः-भाव यह है कि न्यायाधीश बंकिमचन्द्र के आदेश पर जब आरक्षी और निर्धन व्यक्ति शव को उठाकर न्यायालय की ओर ला रहे थे तो रास्ते में सुपुष्ट शरार वाले आरक्षी ने शव के भार से पीड़ित तथा कमजोर शरीर वाले निर्धन व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुए कहा-“अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की पेटी लेने से रोका था। इस समय अपनी करनी का फल भोग। इस चोरी के अभियोग में तू तीन वर्ष की जेल की सजा पाएगा।” यह कहकर शव का नाटक कर रहे व्यक्ति के सामने आरक्षी ने चोरी करने की बात स्वीकार कर ली थी।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

5. न्यायाधीशेन पुनस्तौ घटनायाः विषये वक्तुमादिष्टौ। आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यमघटत स शवः प्रावारकमपसार्य न्यायाधीशमभिवाद्य निवेदितवान्-मान्यवर! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद वर्णयामि ‘त्वयाऽहं चोरितायाः मञ्जूषायाः ग्रहणाद् वारितः, अतः निजकृत्यस्य फलं भुइक्ष्व। अस्मिन् चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति। न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्। अतएवोच्यते –
दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः।
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(क) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(i) आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति किम् अघटत ?
(ii) शवः कम् अभिवाद्य निवेदितवान् ?
(iii) कस्य फलं भुक्ष्व ?
(iv) न्यायाधीशः कस्मै कारादण्डम् आदिष्टवान् ?
(v) दुष्कराणि अपि कर्माणि के कुर्वन्ति ?
उत्तराणि
(i) आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यम् अघटत।
(ii) शवः न्यायाधीशम् अभिवाद्य निवेदितवान्।
(iii) निजकृत्यस्य फलं भुझ्व।।
(iv) न्यायाधीशः आरक्षिणे कारादण्डम् आदिष्टवान्।
(v) दुष्कराणि अपि कर्माणि मतिवैभवशालिनः कुर्वन्ति।

(ख) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(i) ‘आवरणम्’ इत्यर्थे अत्र प्रयुक्तं पदं किम् ?
(ii) ‘अध्वनि’ इति पदे का विभक्तिः प्रयुक्ता ?
(ii) ‘वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ अत्र कर्मपदं किमस्ति ?
(iv) ‘लीलयैव’ अत्र सन्धिच्छेदं कुरूत।
(v) ‘समालम्ब्य’ अत्र प्रकृति-प्रत्यय-निर्देशं कुरुत।
उत्तराणि:
(i)प्रावारकम्।
(ii) सप्तमी विभक्तिः ।
(iii) कारादण्डम्।
(iv) लीलया + एव।
(v) सम् + आ + लज्ज् + ल्यप्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-प्रावारकम् = (उत्तरीयवस्त्रम्) ओढ़ने की चादर। अपसार्य = (अपवार्य) दूर करके। अभिवाद्य = (अभिवादनं कृत्वा) अभिवादन करके। अध्वनि = (मार्गे) रास्ते में। यदुक्तम् = (यत् कथितम्) जो कहा गया। आदिश्य = (आदेशं दत्वा) आदेश देकर। मुक्तवान् = (अत्यजत्) छोड़ दिया। मतिवैभवशालिनः = (बुद्धिसम्पत्ति सम्पन्नाः) बुद्धिरूपी सम्पत्ति से सम्पन्न। समालम्ब्य = (आश्रयं गृहीत्वा) सहारा लेकर। लीलयैव = [(कौतुकेन (सुगमतया)] खेल-खेल में।

प्रसंग:-प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘विचित्रः साक्षी’ नामक पाठ से लिया गया है। न्यायाधीश ने शव के आ जाने पर चौकीदार के पक्ष को फिर से सुना। तभी अचानक शव उठ खड़ा हुआ और जो रास्ते में भार से रोते हुए अभियुक्त को चौकीदार ने कहकर उसकी हँसी उड़ाई थी वह ज्यों का त्यों शव ने न्यायाधीश के सामने कह दिया। जिसके आधार पर निर्णय सुनाया गया। इसी का वर्णन प्रस्तुत गद्यांश में है।

सरलार्थ:-न्यायाधीश ने दोनों को पुनः घटना के विषय में बताने का आदेश दिया। चौकीदार द्वारा अपना पक्ष प्रस्तुत करते आश्चर्य घटित हो गया, उस शव ने कफन को हटाकर न्यायाधीश को नमस्कार करके निवेदन किया-मान्यवर! इस चौकीदार द्वारा मार्ग में जो कहा गया, उसका वर्णन करता हूँ-मुझे तूने चोरी की पेटी लेने से रोका था; अतः अपनी करनी का फल भोग। इस चोरी के अभियोग में तू तीन वर्ष की जेल की सजा पाएगा।”
न्यायाधीश ने चौकीदार को जेल की सजा का आदेश देकर उस व्यक्ति को सम्मानपूर्वक मुक्त कर दिया। इसीलिए कहा गया है-बुद्धि की सम्पत्ति वाले व्यक्ति नीति और युक्ति का सहारा लेकर लीलापूर्वक दुष्कर कार्यों को भी कर लेते हैं।

भावार्थ:-न्यायालय में न्यायाधीश के सामने शव ने कफन को हटाकर चौकीदार ने मार्ग में जो कहा गया था वह सब सच-सच बता दिया। इसी गवाही के आधार पर अपराधी सिद्ध हुए आरक्षी को दण्डित किया गया और निर्धन व्यक्ति को सम्मान पूर्वक मुक्त कर दिया गया। भाव यह है कि ठीक निर्णय तक पहुँचने के लिए यदि योजनाबद्ध ढंग से प्रमाण जुटाने का कार्य किया जाए तो चालाक से चालाक अपराधी को भी दण्डित किया जा सकता है।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 8 विचित्रः साक्षी

विचित्रः साक्षी Summary in Hindi

विचित्रः साक्षी (विचित्र गवाह) पाठ-परिचय

अनेक बार विवाद इस सीमा तक बढ़ जाता है कि उसके निवारण के लिए न्याय करने में निपुण, विवेकशील, पक्षपात से रहित किसी धैर्यवान् न्यायाधीश की आवश्यकता होती है। वह भी न्याय करते समय प्रत्यक्ष गवाहों की अपेक्षा रखता है। परन्तु अनेक बार गवाह ही सम्बन्धित विषय को इतना उलझा देते हैं कि निर्णय करना बड़ा कठिन हो जाता है। प्रसिद्ध बांगला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी ने साहित्य रचना के साथ-साथ न्यायाधीश के पद पर कार्य करते हुए ऐसे अनेक उचित निर्णय लिए जिनमें गवाही (साक्ष्य) इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी, जितना महत्त्वपूर्ण चटर्जी का बुद्धिकौशल था। इन्हीं फैसलों पर आधारित निर्णयों को लेकर श्री ओमप्रकाश ठाकुर ने संस्कृत में अनेक आधुनिक कथाएँ लिखीं। उन्हीं में से एक कथा का सम्पादित अंश प्रस्तुत पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ है।
सत्यासत्य के निर्णय के लिए न्यायाधीश कभी-कभी ऐसी युक्तियों का प्रयोग करते हैं जिससे साक्ष्य के अभाव में भी न्याय हो सके। इस कथा में भी विद्वान् न्यायाधीश ने ऐसी ही युक्ति का प्रयोग कर न्याय करने में सफलता पाई है।

विचित्रः साक्षी पाठस्य सारांश:

श्री ओमप्रकाश ठाकुर ने संस्कृत में अनेक आधुनिक कथाएँ लिखीं। उन्हीं में से एक कथा का सम्पादित अंश प्रस्तुत पाठ ‘विचित्रः साक्षी’ है। प्रसिद्ध बांगला साहित्यकार बंकिमचन्द्र चटर्जी ने साहित्य रचना के साथ-साथ न्यायाधीश
के पद पर कार्य करते हुए ऐसे अनेक उचित निर्णय लिए जिनमें गवाही (साक्ष्य) इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं थी, जितना महत्त्वपूर्ण चटर्जी का बुद्धिकौशल. था। इस कथा में एक ऐसे ही विवेकपूर्ण निर्णय को चित्रित किया गया है।
किसी निर्धन व्यक्ति ने पुत्र को अच्छी शिक्षा देने के लिए कठोर परिश्रम से धन कमाया और अपने पुत्र को एक महाविद्यालय में प्रवेश दिलाया। एक बार छात्रावास में रहते हुए उसका पुत्र बीमार पड़ गया। पुत्र की बीमारी का समाचार पाकर उसे देखने के लिए वह घर से पैदल ही निकल पड़ा; क्योंकि धनाभाव के कारण वह बस का किराया नहीं दे सकता था। भाग्य की गति विचित्र है। जब निर्धन व्यक्ति रात बिताने के लिए एक दयालु गृहस्थी के घर में ठहर गया तो दुर्भाग्यवश उसी रात्री गाँव का चौकीदार ही उस गृहस्थी के घर चोरी करने के लिए घुस आया। निर्धन व्यक्ति ने उसे पकड़ने का प्रयास भी किया परन्तु चौकीदार ने शोर मचाकर उस निर्धन को ही चोर बताकर कारावास भिजवा दिया। विवाद न्यायालय तक पहुँचा। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र ‘आरक्षी ही चोर है’ यह वास्तविकता जानते हुए भी प्रमाण के अभाव में अपना निर्णय देने में असमर्थ था। न्यायाधीश ने साक्ष्य जुटाने के लिए एक विवेकपूर्ण योजना बनाई। राजमार्ग के निकट एक शव रखवाकर उसे न्यायालय में लाने का आदेश उन दोनों को दिया गया।

न्यायाधीश बंकिमचन्द्र के आदेश पर जब आरक्षी और निर्धन व्यक्ति शव को उठाकर न्यायालय की ओर ला रहे थे तो रास्ते में सुपुष्ट शरार वाले आरक्षी ने शव के भार से पीड़ित तथा कमजोर शरीर वाले निर्धन्न व्यक्ति पर कटाक्ष करते हुए कहा-“अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की पेटी लेने से रोका था। इस समय अपनी करनी का फल भोग। इस चोरी के अभियोग में तू तीन वर्ष की जेल की सजा पाएगा।” यह कहकर शव का नाटक कर रहे व्यक्ति के सामने आरक्षी ने चोरी करने की बात स्वीकार कर ली। जिस किसी प्रकार से दोनों ने शव को लाकर एक चबूतरे पर रख दिया। न्यायाधीश के सामने शव ने कफन को हटाकर चौकीदार ने मार्ग में जो कहा गया था वह सब सचसच बता दिया। इसी गवाही के आधार पर अपराधी सिद्ध हुए आरक्षी को दण्डित किया गया और निर्धन व्यक्ति को सम्मान पूर्वक मुक्त कर दिया गया।

कथा का सार यह है कि यदि ठीक निर्णय तक पहुँचने के लिए योजनाबद्ध ढंग से प्रमाण जुटाने का कार्य किया जाए तो चालाक से चालाक अपराधी को भी दण्डित किया जा सकता है; क्योंकि अपराधी कोई न कोई गलती कर ही बैठता है और वह गलती ही उसे अपराधी सिद्ध करने के लिए प्रमाण बन जाती है। न्यायाधीश बंकिमचन्द्र चटर्जी ने युक्ति के सहारे सही निर्णय करके सबको हतप्रभ कर दिया। इसीलिए तो कहा जाता है-“बुद्धिर्यस्य बलं तस्य”।

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HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

Haryana State Board HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

HBSE 10th Class Sanskrit सौहार्द प्रकृते: शोभा Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
अधोलिखितप्रश्नानामुत्तराणि एकपदेन लिखत
(क) वनराजः कैः दुरवस्थां प्राप्तः?
(ख) कः वातावरणं कर्कशध्वनिना आकुलीकरोति?
(ग) काकचेष्टः विद्यार्थी कीदृशः छात्रः मन्यते ?
(घ) कः आत्मानं बलशाली, विशालकायः, पराक्रमी च कथयति।
(ङ) बकः कीदृशान् मीनान् क्रूरतया भक्षयति?
(च) मयूरः कथं नृत्यमुद्रायां स्थितः भवति? ।
(छ) अन्ते सर्वे मिलित्वा कस्य राज्याभिषेकाय तत्पराः भवति?
(ज) अस्मिन्नाटके कति पात्राणि सन्ति?
उत्तराणि:
(क) वानरैः,
(ख) काकः,
(ग) आदर्शच्छात्रः,
(घ) गजः,
(ङ) वराकान् मीनान्
(च) पिच्छान् उद्घाट्य ।
(छ) संवादे न निर्दिष्टः।
(ज) दश पात्राणि (सर्वे पक्षणः च)।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

प्रश्न 2.
अधोलिखितप्रश्नानामुत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत
(क) नि:संशयं कः कृतान्तः मन्यते?
(ख) बकः वन्यजन्तूनां रक्षोपायान् कथं चिन्तयितुं कथयति?
(ग) अन्ते प्रकृतिमाता प्रविश्य सर्वप्रथमं किं वदति ?
(घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा कथं विप्लवेत् ?
उत्तराणि:
(क) यः राजा पीडितान् जन्तून् न रक्षति सः निःसंशयं कृतान्तः मन्यते ।
(ख) बकः शीतले जले बहुकालपर्यन्तम् अविचल: ध्यानमग्नः स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा वन्यजन्तूनां रक्षोपायान् चिन्तयितुं कथयति?
(ग) अन्ते प्रकृतिमाता प्रविश्य सर्वप्रथमं वदति- ‘अहं युष्माकं सर्वेषां जननी’।
(घ) यदि राजा सम्यक् न भवति तदा प्रजा अगाधजलसञ्चारी नौरिव विप्लवेत्।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

प्रश्न 3.
रेखांकितपदमाधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत
(क) सिंहः वानराभ्यां स्वरक्षायाम् असमर्थ एवासीत्।
(ख) गजः वन्यपशून् तुदन्तं शुण्डेन पोथयित्वा मारयति।
(ग) वानरः आत्मानं वनराजपदाय योग्य मन्यते।
(घ) मयूरस्य नृत्यं प्रकृतेः आराधना।
(ङ) सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति।
उत्तराणि:
(क) सिंहः वानराभ्यां कस्याम् असमर्थ एवासीत् ?
(ख) गजः वन्यपशून् तुदन्तं केन पोथयित्वा मारयति?
(ग) वानरः आत्मानं कस्मै योग्य मन्यते?
(घ) मयूरस्य नृत्यं कस्याः आराधना?
(ङ) सर्वे कां प्रणमन्ति?

प्रश्न 4.
शुद्धकथनानां समक्षम् आम् अशुद्धकथनानां च समक्षं न इति लिखत
(क) सिंहः आत्मानं तुदन्तं वानरं मारयति।
(ख) का-का इति बकस्य ध्वनिः भवति।
(ग) काकपिकयोः वर्णः कृष्णः भवति।
(घ) गजः लघुकायः निर्बलः च भवति।
(ङ) मयूरः बकस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानित मन्यते।
(च) अन्योन्यसहयोगेन प्राणिनाम् लाभः जायते।
उत्तराणि:
(क) सिंहः आत्मानं तुदन्तं वानरं मारयति । – न
(ख) का-का इति बकस्य ध्वनिः भवति। – आम्
(ग) काकपिकयोः वर्णः कृष्णः भवति। – आम्
(घ) गजः लघुकायः निर्बलः च भवति। – न
(ङ) मयूरः बकस्य कारणात् पक्षिकुलम् अवमानितं मन्यते। – आम्
(च) अन्योन्यसहयोगेन प्राणिनाम् लाभ: जायते। – आम्

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

प्रश्न 5.
मञ्जूषातः समुचितं पदं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत
स्थितप्रज्ञः, यथासमयम्, मेध्यामध्यभक्षकः, अहिभुक्, आत्मश्लाघाहीनः, पिकः।
(क) काकः …………. भवति।
(ख) …………. परभूत् अपि कथ्यते।
(ग) बकः अवचलः …………. इव तिष्ठति।
(घ) मयूरः …………. इति नाम्नाऽपि ज्ञायते।
(ङ) उलूकः …………. पदनिर्लिप्तः चासीत्।
(च) सर्वेषामेव महत्त्वं विद्यते …………. ।
उत्तराणि:
(क) काकः मेध्यामध्यभक्षकः भवति।
(ख) पिकः परभूत् अपि कथ्यते।
(ग) बकः अविचलः स्थितप्रज्ञः इव तिष्ठति।
(घ) मयूरः अहिभुक् इति नाम्नाऽपि ज्ञायते ।
(ङ) उलूकः आत्मश्लाघाहीनः पदनिर्लिप्तः चासीत्।
(च) सर्वेषामेव महत्त्वं विद्यते यथासमयम् ।

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प्रश्न 6.
परिचयं पठित्वा पात्रस्य नाम लिखत
(क) अहं शुण्डेन कमपि पोथयित्वा मारयितुं समर्थः।
(ख) मम सत्यप्रियता सर्वोषां कृते उदाहरणस्वरूपा।
(ग) मम पिच्छानामपूर्व सौन्दर्यम्।
(घ) अहं पराक्रमिणं भयंकरं वापि जन्तुं पराजेतुं समर्थः ।
(ङ) अहं वनराजः । कथं सर्वे मिलित्वा मां तुदन्ति?
(च) अहम् अगाधजलसञ्चारी अपि गर्वं न करोमि?
(छ) अहं सर्वेषां प्राणिनां जननी अस्मि।
(ज) एषः तु करालवक्त्रः दिवान्धः चास्ति।
उत्तराणि-:
(क) अहं शुण्डेन कमपि पोथयित्वा मारयितुं समर्थः । – गजः
(ख) मम सत्यप्रियता सर्वोषां कृते उदाहरणस्वरूपा। – काकः
(ग) मम पिच्छानामपूर्व सौन्दर्यम्। – मयूरः
(घ) अहं पराक्रमिणं भयंकरं वापि जन्तुं पराजेतुं समर्थः। – वानरः
(ङ) अहं वनराजः । कथं सर्वे मिलित्वा मां तुदन्ति? – सिंहः
(च) अहम् अगाधजलसञ्चारी अपि गर्वं न करोमि? – रोहितः
(छ) अहं सर्वेषां प्राणिनां जननी अस्मि। – प्रकृतिः
(ज) एषः तु करालवक्त्रः दिवान्धः चास्ति। – गजः

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

प्रश्न 7.
वाच्यपरिवर्तनं कृत्वा लिखत
उदाहरणम्-क्रद्धः सिंहः इतस्ततः धावति गर्जति च।
– कुद्धेन सिंहेन इतस्ततः धाव्यते गय॑ते च।
(क) त्वया सत्यं कथितम्।
(ख) सिंहः सर्वजन्तून् पृच्छति।
(ग) काकः पिकस्य संततिं पालयति।
(घ) मयूरः विधात्रा एव पक्षिराजः वनराजः वा कृतः।
(ङ) सर्वैः खगैः कोऽपि खगः एव वनराजः कर्तुमिष्यते स्म।
(च) सर्वे मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय प्रयत्नं कुर्वन्तु।
उत्तराणि:
(क) त्वं सत्यं कथयसि।
(ख) सिंहेन सर्वजन्तवः पृच्छ्यन्ते।
(ग) काकेन पिकस्य संततिः पाल्यते।
(घ) मयूरं विधाता एव पक्षिराज वनराजं वा कृतवान्।
(ङ) सर्वे खगाः कमपि खगम् एव वनराजं कर्तुमिच्छन्ति स्म।
(च) सर्वैः मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय प्रयत्नः क्रियते।

प्रश्न 8.
समासविग्रहं समस्तपदं वा लिखत
(क) तुच्छजीवैः (ख) वृक्षोपरि ………………….।
(ग) पक्षिणां सम्राट ………………….।
(घ) स्थिता प्रज्ञा यस्य सः ………………….।
(ङ) अंपूर्वम् ………………….।
(च) व्याघ्रचित्रका ………………….।
उत्तराणि:
(क) तुच्छजीवैः – तुच्छाः एव जीवाः तैः।
(ख) वृक्षोपरि – वृक्षस्य उपरि।
(ग) पक्षिणां सम्राट – पक्षिसम्राट्।
(घ) स्थिता प्रज्ञा यस्य सः – स्थितप्रज्ञः।
(ङ) अपूर्वम् – न पूर्वम्।
(च) व्याघ्रचित्रको – व्याघ्रः च चित्रकः च तयोः समाहारः।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

प्रश्न 9.
प्रकृतिप्रत्ययविभागं कुरुत/योजयित्वा वा पदं रचयत
(क) क्रुध्+क्त ………………….।
(ख) आकृष्य ………………….।
(ग) सत्यप्रियता ………………….।
(घ) पराक्रमी …………………..।
(ङ) कू+क्त्वा …………………..।
(च) शृण्वन् ………………….।
उत्तराणि:
(क) क्रुध्+क्त – क्रुद्धः ।
(ख) आकृष्य – आ + कृ + ल्यप।
(ग) सत्यप्रियता – सत्यप्रिय + तल्।
(घ) पराक्रमी – पराक्रम + इन्।
(ङ) कूर्दक्त्वा – कुर्दित्वा ।
(च) शृण्वन् – श्रु + शतृ।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

योग्यताविस्तारः

विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चित् निरर्थकम्।
अश्वश्चेत् धावने वीरः, भारस्य वहने खरः॥
महान्तं प्राप्त सद्बुद्धे! संत्यजेन्न लघु जनम्।
यत्रास्ति सूचिकाकार्यं कृपाणः किं करिष्यति॥

‘शाण्डिल्यशतकम्’ से उद्धृत ये दोनों श्लोक भी इसी बात की पुष्टि करते हैं कि संसार में कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है, सभी का अपना-अपना महत्त्व है जैसे-घोड़ा यदि दौड़ने में निपुण है तो गधा भारवहन में, सुई जोड़ने का कार्य करती है तो कृपाण काटने का। अतः संसार की क्रियाशीलता और गतिशीलता में सभी का अपना-अपना महत्त्व है। सभी के अपने-अपने कार्य हैं, अपना-अपना योगदान है। अतः हमें न तो किसी कार्य को छोटा या बड़ा, तुच्छ या महान् समझना चाहिए और न ही किसी प्राणी को। आपस में मिलजुल कर सौहार्द-पूर्ण तरीके से जीवन यापन करने में ही प्रकृति का सौन्दर्य है। विभिन्न प्राणियों से सम्बन्धित निम्नलिखित श्लोकों को भी पढ़िए और रसास्वादन कीजिए

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥
काकचेष्टः बकध्यानी श्वाननिद्रः तथैव च।
अल्पाहारः गृहत्यागः विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजङ्गमः ।
हसन्नपि नृपो हन्ति, मानयन्नपि दुर्जनः॥
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो, देवोऽपि तं लङ्घयितुं न शक्तः।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम्॥
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

वस्तुतः मित्रों के बिना कोई भी जीना पसन्द नहीं करता चाहे उसके पास बाकी सभी अच्छी चीजें क्यों न हों अतः हमें सभी के साथ मिलजुल कर, अपने आस-पास के वातावरण की तथा प्रकृति की सुरक्षा और सुन्दरता में सदैव सहयोग करना चाहिए वस्तुतः तभी हमारी ये कामनाएँ भी सार्थक हो सकती हैं

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चित् दुःखभाग्भवेत्॥
तथा च अधुना रमणीया हि सृष्टिरेषा जगत्पतेः।
जीवाः सर्वेऽत्र मोदन्तां भावयन्तः परस्परम्॥

HBSE 10th Class Sanskrit सौहार्द प्रकृते: शोभा Important Questions and Answers

सौहार्द प्रकृते: शोभा पठित-अवबोधनम्

1. निर्देशः-अधोलिखितं पाठ्यांशं पठित्वा तदाधारितान् प्रश्नान् उत्तरत
(वनस्य दृश्यम्, समीपे एवैका नदी अपि वहति।) एकः सिंहः सुखेन विश्राम्यते तदैव एकः वानरः आगत्य तस्य पुच्छं धुनोति । क्रुद्धः सिंहः तं प्रहर्तुमिच्छति परं वानरस्तु कूदित्वा वृक्षामारूढः । तदैव अन्यस्मात् वृक्षात् अपरः वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः वृक्षोपरि आरोहति एवमेव वानराः वारं वारं सिंहं तुदन्ति । क्रुद्धः सिंहः इतस्ततः धावति, गर्जति परं किमपि कर्तुमसमर्थः एव तिष्ठति। वानराः हसन्ति वृक्षोपरि च विविधाः पक्षिणः अपि सिंहस्य एतादृशीं दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) पुच्छं कः धुनोति?
(ख) वानरः कुत्र आरूढः?
उत्तराणि:
(क) वानरः,
(ख) वृक्षम्।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः किं करोति?
(ख) पक्षिणः किं दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति?
उत्तराणि:
(क) वानरः सिंहस्य कर्णमाकृष्य पुनः वृक्षोपरि आरोहति।
(ख) पक्षिणः सिंहस्य दशां दृष्ट्वा हर्षमिश्रितं कलरवं कुर्वन्ति।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) धावति-इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
(ख) कूदितुम् अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि
(क) सिंहः,
(ख) तुमुन् ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-धुनोति = (धु-गृहीत्वा आन्दोलयति) पकड़ कर घुमा देता है । कर्णमाकृष्य = ( श्रोत्रं कर्षयित्वा, कर्णम्+आकृष्य) कान खींच कर । तुदन्ति = ( अवसादयन्ति) तंग करते हैं। कलरवम् = ( पक्षिणां कूजनम्) चहचहाहट।
हिन्दी में अनुवाद-(यह वन का दृश्य है, समीप में ही एक नदी बह रही है) एक शेर सुखपूर्वक विश्राम कर रहा है, तभी एक बंदर आकर उसकी पूंछ को हिलाता है। क्रोधित हुआ सिंह उसे मार देना चाहता है परंतु बंदर कूदकर वृक्ष पर चढ़ गया। तभी दूसरे वृक्ष से एक दूसरा बंदर शेर के कान को खींचकर फिर वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है। इस प्रकार बंदर बार-बार शेर को तंग करते हैं। क्रोधित हुआ शेर इधर-उधर दौड़ता है, गरजता है, परंतु कुछ भी करने में वह असमर्थ रहता है। बंदर हंसते हैं और वृक्ष के ऊपर अनेक प्रकार के पक्षी भी शेर की ऐसी दशा को देखकर प्रसन्नतापूर्वक चहचहाते हैं।

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

2. निद्राभङ्गदुःखेन वनराजः सन्नपि तुच्छजीवैः आत्मनः एतादृश्या दुरवस्थया श्रान्तः सर्वजन्तून् दृष्ट्वा पृच्छति
सिंहः – (क्रोधेन गर्जन्) भोः! अहं वनराजः किं भयं न जायते ? किमर्थं मामेवं तुदन्ति सर्वे मिलित्वा?
एकः वानरः – यतः त्वं वनराजः भवितुं तु सर्वथाऽयोग्यः। राजा तु रक्षकः भवति परं भवान् तु भक्षकः। अपि च स्वरक्षायामपि समर्थः नासि तर्हि कथमस्मान् रक्षिष्यसि?
अन्यः वानरः – किं न श्रुतां त्वया पञ्चतन्त्रोक्तिः
यो न रक्षति वित्रस्तान् पीड्यमानान्परैः सदा।
जन्तून् पार्थिवरूपेण स कृतान्तो न संशयः॥
(अन्वयः- यः पार्थिवरूपेण सदा परैः पीड्यमानान् वित्रस्तान् जन्तून् न रक्षति स कृतान्तः न संशयः॥)
काकः – आम् सत्यं कथितं त्वया- वस्तुतः वनराजः भवितुं तु अहमेव योग्यः ।
पिकः . – (उपहसन्) कथं त्वं योग्यः वनराजः भवितुं, यत्र तत्र का-का इति कर्कशध्वनिना
वातावरणमाकुलीकरोषि । न रूपं न ध्वनिरस्ति। कृष्णवर्णं, मेध्यामेध्यभक्षकं त्वां कथं वनराजं मन्यामहे वयम् ?

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) क्रोधेन कः गर्जति?
(ख) काकं कः उपहसति?
उत्तराणि:
(क) सिंहः,
(ख) पिकः।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) सर्वे मिलित्वा कं तुदन्ति ?
(ख) राजा कीदृशः भवति?
उत्तराणि:
(क) सर्वे मिलित्वा सिंहं तुदन्ति।
(ख) राजा रक्षकः भवति ।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) मन्यामहे-इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
(ख) भवितुम् अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(क) वयम्,
(ख) तुमुन् ।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्था:-सन्नपि = (सन्+अपि) होते हुए भी। वित्रस्तान् = (विशेषेण भीतान्) विशेष रूप से डरे हुओं को। कृतान्तः = (यमराजः) मृत्यु का देवता-यमराज, जीवन का अन्त करने वाले।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में बन्दर वनराज सिंह को तंग करते हैं तथा उसे अपनी रक्षा में भी असमर्थ रहने के कारण वन का राजा होने के लिए अयोग्य सिद्ध करते हैं।
हिन्दी-अनुवाद-नींद के टूट जाने से दुखी हुआ शेर वन का राजा होते हुए भी तुच्छ प्राणियों के द्वारा अपनी ऐसी दुर्दशा से थका हुआ सभी प्राणियों को देख कर पूछता है
सिंह-(क्रोध पूर्वक गरजते हुए) अरे ! मैं तो वन का राजा हूं, क्या तुम्हें भय नहीं लगता है ? क्यों मुझे इस प्रकार से सभी मिलकर दुखी कर रहे हो?
एक वानर-क्योंकि तुम वन के राजा होने के किसी भी तरह से योग्य नहीं हो। राजा तो रक्षक होता है परंतु आप तो भक्षक हैं। और तो क्या, तुम तो अपनी रक्षा करने में भी समर्थ नहीं हो फिर हमारी रक्षा कैसे करोगे?
दूसरा वानर-क्या तुमने पंचतंत्र की यह उक्ति नहीं सुनी है
जो प्राणी राजा के रूप में सदैव दूसरों के द्वारा सताए गए तथा विशेष रूप से भयभीत प्राणियों की रक्षा नहीं करता है ऐसा प्राणी राजा के रूप में साक्षात् यमराज ही है इसमें कोई संशय नहीं।
कौआ-हां, यह तो बिल्कुल सच कहा है। वास्तव में वनराज होने के लिए तो मैं ही योग्य हूं।
कोयल-(उपहास करता हुआ) तुम वन के राजा होने के लिए कैसे योग्य हो? जहां -तहां काय-काय की कठोर ध्वनि से सारे वातावरण को व्याकुल ही करते हो। न तुम्हारा रूप है, न आवाज। काले रंग वाले तथा पवित्र-अपवित्र सभी कुछ खा लेने वाले तुझ को हम किस प्रकार वन का राजा मानें?

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3. काकः – अरे! अरे! किं जल्पसि? यदि अहं कृष्णवर्णः तर्हि त्वं किं गौराङ्गः?
अपि च विस्मयते किं यत् मम सत्यप्रियता तु जनानां कृते
उदाहरणस्वरूपा-‘अनृतं वदसि चेत् काकः दशेत्’-इति प्रकारेण।
अस्माकं परिश्रमः ऐक्यं च विश्वप्रथितम्, अपि च काकचेष्ट: विद्यार्थी एव आदर्शच्छात्रः मन्यते।
पिकः – अलम् अलम् अतिविकत्थनेन। किं विस्मर्यते यत्
काकः कृष्णः पिकः कृष्णः को भेदः पिककाकयोः।
वसन्तसमये प्राप्ते काकः काकः पिकः पिकः॥
काकः – रे परभृत्! अहं यदि तव संततिं न पालयामि तर्हि कुत्र स्युः पिकाः? अतः अहम् एव करुणापरः पक्षिसम्राट् काकः।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) कस्य सत्यप्रियता तु जनानां कृते उदाहरणस्वरूपा?
(ख) कयोः भेदः नास्ति?
उत्तराणि:
(क) काकस्य,
(ख) पिककाकयोः ।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) कीदृशः विद्यार्थी आदर्शच्छात्रः मन्यते?
(ख) परभृत् कः अस्ति?
उत्तराणि:
(क) काकचेष्टः विद्यार्थी आदर्शच्छात्रः मन्यते।
(ख) परभृत् पिकः अस्ति।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) पालयामि-इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
(ख) सत्यप्रियता-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) अहम्,
(ख) तल्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-अनृतम् = (न ऋतम्, अलीकम्) असत्य। अतिविकत्थनम् = (आत्मश्लाघा) डींगें मारना।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में बन्दर और कोयल अपने आप को वन का राजा होने के लिए योग्य सिद्ध करते हैं।
हिन्दी-अनुवाद
कौआ-अरे ! अरे! क्या बकवास कर रहे हो? यदि मेरा काला रंग है तो क्या तू गोरे रंग का है? और भी, क्या तुम्हें याद है कि मेरी सत्यप्रियता लोगों के लिए उदाहरण रूप है-‘झूठ बोले तो कौवा काटे’ इस प्रकार से। हमारा परिश्रम और एकता तो विश्व प्रसिद्ध है। और कौए जैसी चेष्टा करने वाला विद्यार्थी ही आदर्श छात्र माना जाता है।
कोयल-बस करो, बस करो, बहुत अधिक अपनी प्रशंसा मत करो। क्या भूल गए हो कौआ काला होता है, कोयल भी काला होता है – कोयल और कौए में रंग की दृष्टि से कोई भेद नहीं है परंतु वसंत का समय आने पर (अपने कटु या मधुर स्वर के कारण) कौआ कौआ रह जाता है और कोयल कोयल।
कौआ-अरे! दूसरों के आश्रय पर जीने वाले (कोयल)! मैं यदि तुम्हारी संतान की पालना न करूं तो कोयल कहां से आएगा। इसीलिए मैं सबसे बड़ा करुणावान् और पक्षियों का राजा कौआ हूँ।

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4. गजः – (समीपतः एवागच्छन्) अरे! अरे! सर्वां वार्ता शृण्वन्नेवाहम् अत्रागच्छम्। अहं विशालकायः, बलशाली, पराक्रमी च। सिंहः वा स्यात् अथवा अन्यः कोऽपि। वन्यपशून् तु तुदन्तं जन्तुमहं स्वशुण्डेन पोथयित्वा मारयिष्यामि। किमन्यः कोऽप्यस्ति एतादृशः पराक्रमी। अतः अहमेव योग्यः वनराजपदाय।

वानरः – अरे! अरे! एवं वा (शीघ्रमेव गजस्यापि पुच्छं विधूय वृक्षोपरि आरोहति।)
(गजः तं वृक्षमेव स्वशुण्डेन आलोडयितुमिच्छति परं वानरस्तु कूर्दित्वा अन्यं वृक्षमारोहति। एवं गजं वृक्षात् वृक्षं प्रति धावन्तं दृष्ट्वा सिंहः अपि हसति वदति च।)

सिंहः – भोः गज! मामप्येवमेवातुदन् एते वानराः।
वानरः – एतस्मादेव तु कथयामि यदहमेव योग्य: वनराजपदाय येन विशालकायं पराक्रमिणं, भयंकरं चापि सिहं गजं वा पराजेतुं समर्था अस्माकं जातिः। अतः वन्यजन्तूनां रक्षायै वयमेव क्षमाः।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) सर्वां वार्ता कः शृणोति?
(ख) वानराः, केषां रक्षायै क्षमाः?
उत्तराणि:
(क) गजः,
(ख) वन्यजन्तूनाम् ।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) गजः कीदृशः अस्ति?
(ख) वानरः गजस्यापि पुच्छं विधूय किं करोति?
उत्तराणि:
(क) गजः विशालकायः, बलशाली, पराक्रमी च अस्ति।
(ख) वानरः गजस्यापि पुच्छं विधूय वृक्षोपरि आरोहति।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) आगच्छम्-इति क्रियापदस्य कर्तृपदं लिखत।
(ख) पराजेतुम् अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) अहम्,
(ख) तुमुन्।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-शृण्वन्नेवाहम् = ( शृण्वन् एव अहम्-आकर्णयन्) सुनते हुए ही मैं । पोथयित्वा = (पीडयित्वा हनिष्यामि)पटक-पटक कर मार डालूंगा। मारयिष्यामि = (हनिष्यामि) मार डालूँगा। विधूय = (आकर्ण्य) खींच कर। आलोडयितुम् = हिलाना चाहता है। पराजेतुम् = हराने के लिए।
सन्दर्भः- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में हाथी और बन्दर अपने आप को वन का राजा होने के लिए योग्य सिद्ध करते हैं।
हिन्दी-अनुवाद: हाथी-(पास में आते हुए) अरे! अरे ! संपूर्ण बातचीत को सुनते हुए ही मैं यहां आया हूं। मैं विशाल शरीर वाला, बलशाली और पराक्रम वाला हूँ। शेर हो या कोई दूसरा प्राणी, वन में रहने वाले पशुओं को तंग करने वालों को तो मैं अपनी सूंड से से पटक-पटक कर मार दूंगा। है कोई कोई दूसरा इतना पराक्रमी। इसीलिए मैं ही वन का राजा होने के लिए योग्य हूं।
बंदर-अरे! अरे ! ऐसे ही। (और जल्दी से हाथी की पूंछ खींचकर वृक्ष के ऊपर चढ़ जाता है।) (हाथी उस वृक्ष को ही अपनी सूंड से हिलाना चाहता है, परंतु बंदर तो कूदकर दूसरे वृक्ष पर चढ़ जाता है। इस प्रकार बन्दर को एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर दौड़ते हुए देखकर शेर भी हंस पड़ता है और कहता हैअरे हाथी! मुझे भी इसी तरह से ये बंदर तंग कर रहे थे।
बंदर-इसीलिए तो मैं कहता हूं कि मैं ही वन का राजा होने के लिए योग्य हूँ, क्योंकि बड़े से बड़े शरीर वाले, पराक्रमी और भयंकर शेर या हाथी को भी पराजित करने में यह हमारी वानर जाति समर्थ है। इसीलिए वन में रहने वाले प्राणियों की रक्षा करने के लिए हम ही समर्थ हैं।

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5. (एतत्सर्वं श्रुत्वा नदीमध्ये एक: बकः)
बकः – अरे! अरे! मां विहाय कथमन्यः कोऽपि राजा भवितुमर्हति अहं तु शीतले जले
बहुकालपर्यन्तम् अविचलः ध्यानमग्नः स्थितप्रज्ञ इव स्थित्वा सर्वेषां रक्षायाः उपायान चिन्तयिष्यामि, योजनां निर्मीय च स्वसभायां विविधपदमलंकुर्वाणैः जन्तुभिश्च मिलित्वा रक्षोपायान् क्रियान्वितान् कारयिष्यामि अतः अहमेव वनराजपदप्राप्तये योग्यः।
मयूरः-(वृक्षोपरितः-साट्टहासपूर्वकम्) विरम विरम आत्मश्लाघायाः किं न जानासि यत्
यदि न स्यान्नरपतिः सम्यङ्नेता ततः प्रजा।
अकर्णधारा जलधौ विप्लवेतेह नौरिव।।
को न जानाति तव ध्यानावस्थाम्। ‘स्थितप्रज्ञ’ इति व्याजेन वराकान् मीनान् छलेन अधिगृह्य क्रूरतया भक्षयसि।धिक् त्वाम्। तव कारणात् तु सर्वं पक्षिकुलमेवावमानितं जातम्।

वानरः – (सगर्वम्) अतएव कथयामि यत् अहमेव योग्यः वनराजपदाय।शीघ्रमेव मम राज्याभिषेकाय तत्पराः भवन्तु सर्वे वन्यजीवाः।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) शीतले जले ध्यानमग्नः कः तिष्ठति ?
(ख) बकः क्रूरतया कान् भक्षयति?
उत्तराणि:
(क) बकः,
(ख) मीनान्।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) बकस्य कारणात् किम् अवमानितं जातम् ?
(ख) सर्वे वन्यजीवाः कस्मै तत्पराः भवन्तु?
उत्तराणि:
(क) बकस्य कारणात् सर्वं पक्षिकुलम् अवमानितं जातम् ।
(ख) सर्वे वन्यजीवाः वानरस्य राज्याभिषेकाय तत्पराः भवन्तु। ।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) आत्मप्रशंसा-इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं पर्यायपदं लिखत।
(ख) जातम्-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) आत्मश्लाघा,
(ख) क्त।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-चिन्तयिष्यामि = (विचारयिष्यामि) विचार करूँगा। विप्लवेतेह = (विप्लवेत+इह –इह निमज्जेत् /विशीर्येत) डूब जाती है । जलधौ = (सागरे) समुद्र में । नौरिव = (नौः+इव-नौकायाः समानम्) नौका के समान। अधिगृह्य = (गृहीत्वा) पकड़ कर। आत्मश्लाघा = (आत्मप्रशंसा) अपनी प्रशंसा। तत्पराः = (संलग्नाः) तैयार, संलग्न।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्दै प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में बगुला और बन्दर अपने आप को वन का राजा होने के लिए योग्य सिद्ध करते हैं।
हिन्दी-अनुवाद- (यह सब सुनकर नदी के बीच से ही एक बगुला-)।
बगुला-अरे ! अरे ! मुझे छोड़कर कोई दूसरा वन का राजा कैसे हो सकता है? मैं ही तो शीतल जल में बहुत समय तक एकाग्र होकर, ध्यान मग्न होकर, स्थितप्रज्ञ के समान ठहर कर सभी की रक्षा के उपायों का चिंतन करूंगा और योजना बनाकर अपनी सभा में अनेक पदों को सुशोभित करने वाले प्राणियों के साथ मिलकर रक्षा के उपायों को क्रियान्वित करवाऊंगा। इसीलिए मैं ही वन का राजा होने के लिए योग्य हूं।
मोर-(वृक्ष के ऊपर से ही ठहाके के साथ हँसकर) बस करो! बस करो! अपनी प्रशंसा से बस करो। क्या नहीं जानते हो कि –
यदि अच्छा नेता राजा न बने तो प्रजा बिना किनारों वाली नौका की तरह समुद्र में डूब जाया करती है।
तुम्हारे ध्यान की अवस्था को कौन नहीं जानता, स्थितप्रज्ञ होने के बहाने से बेचारी मछलियों को छल से पकड़कर बड़ी क्रूरता से खा जाते हो। धिक्कार है तुम्हें, तुम्हारे कारण से ही तो सभी पक्षी समूह अपमानित होते हैं।
बंदर-(बड़े गर्व के साथ) इसीलिए तो कहता हूं कि वनराज के पद को सुशोभित करने के योग्य मैं ही हूं। सभी वन्य प्राणी मेरे राज्याभिषेक के लिए तैयार हो जाएं।

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6. मयूरः – अरे वानर! तूष्णीं भव। कथं त्वं योग्यः वनराजपदाय? पश्यतु पश्यतु मम शिरसि राजमुकुटमिव शिखां स्थापयता विधात्रा एवाहं पक्षिराजः कृतः अतः वने निवसन्तं माम् वनराजरूपेणापि द्रष्टुं सज्जाः भवन्तु अधुना यतः कथं कोऽप्यन्यः विधातुः निर्णयम् अन्यथाकर्तुं क्षमः।
काकः – (सव्यङ्ग्यम्) अरे अहिभुक्! नृत्यातिरिक्तं का तव विशेषता यत् त्वां वनराजपदाय योग्यं मन्यामहे वयम्।
मयूरः – यतः मम नृत्यं तु प्रकृतेः आराधना। पश्य! पश्य! मम पिच्छानामपूर्वं सौंदर्यम् (पिच्छानुद्घाट्य नृत्यमुद्रायां स्थितः सन् ) न कोऽपि त्रैलोक्याम् मत्सदृशः सुन्दरः। वन्यजन्तूनामुपरि आक्रमणं कर्तारं तु अहं स्वसौन्दर्येण नृत्येन च आकर्षितं कृत्वा वनात् बहिष्करिष्यामि। अतः अहमेव योग्यः वनराजपदाय।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) विधात्रा पक्षिराजः कः कृतः?
(ख) मयूरस्य पिच्छानां सौन्दर्य कीदृशम्?
उत्तराणि:
(क) मयूरः,
(ख) अपूर्वम्।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) मयूरस्य शिरसि किं विराजते ?
(ख) मयूरः कथं नृत्यमुद्रायां स्थितः भवति?
उत्तराणि:
(क) मयूरस्य शिरसि राजमुकुट इव शिखा विराजते।
(ख) मयूरः पिच्छान् उद्घाट्य नृत्यमुद्रायां स्थितः भवति।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) अहिभुक् – इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं पर्यायपदं लिखत।
(ख) कृत्वा-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) मयूरः,
(ख) क्त्वा।

हिन्दीभाषया पाठबोधः
शब्दार्थाः-शिरसि = (मस्तके)सिर पर। अहिभुक् = (मयूर) साँप को खाने वाला, मोर। विधात्रा = (भगवता) विधाता ने।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:-प्रस्तुत नाट्यांश में मोर अपने आप को वन का राजा होने के लिए योग्य सिद्ध करता है।
हिन्दी-अनुवाद-मोर-अरे बंदर! चुप हो जा। तू किस प्रकार से वनराज के पद के योग्य है? देखो देखो, मेरे सिर पर राजमुकुट की तरह इस शिखा को स्थापित करते हुए स्वयं विधाता ने ही मुझे पक्षीराज बना दिया है। इसीलिए वन में रहते हुए मुझे वन के राजा के रूप में देखने के लिए तैयार हो जाओ। अब कोई भी दूसरा विधाता के निर्णय को विपरीत करने में समर्थ नहीं है।
कौआ-(व्यंग्य के साथ) अरे सांपों को खाने वाले मोर! नृत्य को छोड़कर तुम्हारी कोई विशेषता है कि तुमको वनराज के पद के योग्य हम मान लें।
मोर-क्योंकि मेरा नृत्य तो प्रकृति की आराधना है। देखो देखो, मेरी पूँछ का अपूर्व सौंदर्य। ( पंखों को ऊपर उठा कर नृत्य की मुद्रा में खड़े होतेहुए) तीनों लोकों में भी कोई मेरे समान सुंदर नहीं है। वन्य प्राणियों के ऊपर आक्रमण करने वाले को तो मैं अपने सौंदर्य से और नृत्य से ही आकर्षित करके जंगल से बाहर कर दूंगा। इसीलिए मैं ही वनराज के पद को पाने के लिए योग्य हूं।

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7. (एतस्मिन्नेव काले व्याघ्रचित्रको अपि नदीजलं पातुमागतौ एतं विवादं शृणुत: वदतः च)
व्याघ्रचित्रको – अरे किं वनराजपदाय सुपात्रं चीयते?
एतदर्थं तु आवामेव योग्यौ। यस्य कस्यापि चयनं कुर्वन्तु सर्वसम्मत्या।
सिंह -. तूष्णीं भव भोः। युवामपि मत्सदृशौ भक्षको न तु रक्षको। एते वन्यजीवाः भक्षकं रक्षकपदयोग्यं न मन्यन्ते अतएव विचारविमर्शः प्रचलति।
बकः – सर्वथा सम्यगुक्तम् सिंहमहोदयेन। वस्तुतः एव सिंहेन बहुकालपर्यन्तं शासनं कृतम् परमधुना तु कोऽपि पक्षी एव राजेति निश्चेतव्यम् अत्र तु संशीतिलेशस्यापि अवकाशः एव नास्ति।
सर्वे पक्षिणः – (उच्चैः)- आम् आम् – कश्चित् खगः एव वनराजः भविष्यति इति।
( परं कश्चिदपि खगः आत्मानं विना नान्यं कमपि अस्मै पदाय योग्यं चिन्तयति तर्हि कथं निर्णयः भवेत् तदा तैः सर्वैः गहननिद्रायां निश्चिन्तं स्वपन्तम् उलूकं वीक्ष्य विचारितम् यदेषः आत्मश्लाघाहीनः पदनिर्लिप्तः उलूक एवास्माकं राजा भविष्यति। परस्परमादिशन्ति च तदानीयन्तां नृपाभिषेकसम्बन्धिनः सम्भाराः इति।)
सर्वे पक्षिणः सज्यायै गन्तुमिच्छन्ति तर्हि अनायास एव
काकः – (अट्टाहसपूर्णेन-स्वरेण)-सर्वथा अयुक्तमेतत् यन्मयूर- हंस- कोकिल-चक्रवाकशुक-सारसादिषु पक्षिप्रधानेषु विद्यमानेषु दिवान्धस्यास्य करालवक्त्रस्याभिषेकार्थं सर्वे सजाः। पूर्णं दिनं यावत् निद्रायमाणः एषः कथमस्मान् रक्षिष्यति। वस्तुतस्तु
स्वभावरौद्रमत्युग्रं क्रूरमप्रियवादिनम्।
उलूकं नृपतिं कृत्वा का नु सिद्धिर्भविष्यति।।

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) वन्यजीवाः कं रक्षकपदयोग्यं न मन्यन्ते?
(ख) पूर्ण दिनं यावत् निद्रायमाणः कः तिष्ठति ?
उत्तराणि:
(क) भक्षकम्,
(ख) उलूकः ।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) सिंहेन कदा यावत् शासनं कृतम्?
(ख) कीदृशः उलूकः पक्षिणां राजा भविष्यति?
उत्तराणि:
(क) सिंहेन बहुकालपर्यन्तं शासनं कृतम्।
(ख) आत्मश्लाघाहीनः पदनिर्लिप्तः उलूकः पक्षिणां राजा भविष्यति।

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) अनुचितम् -इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं पर्यायपदं लिखत ।
(ख) निद्रायमाण:-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः ?
उत्तराणि:
(क) अयुक्तम्,
(ख) शानच् ।

हिन्दीभाषया पाठबोध:
शब्दार्थाः-संशीतिलेशस्य = (सन्देहमात्रस्य) ज़रा से भी सन्देह की। अवकाशः= (स्थानम्) जगह । वीक्ष्य = (विलोक्य/दृष्ट्वा) देखकर। सम्भाराः = (सामग्र्यः) सामग्रियाँ। करालवक्त्रस्य = (भयंकरमुखस्य) भयंकर मुख वाले का।
सन्दर्भ:- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य-पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।
प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में पक्षीसमूह उल्लू को वन का राजा बनाने के लिए प्रस्ताव करते हैं, कौआ इसका निषेध करता है।
हिन्दी-अनुवाद – (इसी समय बाघ और चीता ये दोनों भी नदी के जल को पीने के लिए आते हैं, इस विवाद को सुनते हैं और कहते हैं)
बाघ और चीता-अच्छा, राजा के पद के लिए किसी सुपात्र का चयन किया जा रहा है ? इसके लिए तो हम दोनों ही योग्य हैं, जिस किसी का भी सर्वसम्मति से चुनाव कर लो ।
शेर-अरे चुप हो जा। तुम दोनों भी मेरी तरह भक्षक हो रक्षक नहीं, ये वन के प्राणी भक्षक को रक्षक के पद के योग्य नहीं मानते हैं। इसीलिए तो विचार चल रहा है।
बगुला-शेर महोदय ने सर्वथा उचित बात कही। वास्तव में शेर ने बहुत समय तक शासन कर लिया, परंतु अब तो कोई पक्षी ही राजा हो यह निश्चय किया जाना चाहिए, इसमें तो लेशमात्र भी संशय नहीं है।
सभी पक्षी-(जोर से) हां हां, कोई पक्षी ही राजा बनेगा।
(परंतु कोई भी पक्षी अपने बिना दूसरे को इस पद के योग्य विचार नहीं करता है, तो कैसे निर्णय हो। तब सभी ने गहन निद्रा में निश्चिंत होकर सोते हुए उल्लू को देखकर विचार किया कि जो आत्मप्रशंसा से हीन है, जिसे पद का भी कोई लोभ नहीं है- ऐसा उल्लू ही हमारा राजा होगा। सभी पक्षी आपस में आदेश करते हैं और राजा के अभिषेक संबंधी सामग्री को ले आते हैं।)
सभी पक्षी तैयारी के लिए जाना चाहते हैं तभी अचानक ही कौआ भयंकर हंसी हंसते हुए कहता है
कौआ- यह तो बिल्कुल ही गलत है। क्योंकि मोर, हंस, कोयल, चकवा, तोता, सारस आदि मुख्य पक्षियों के विद्यमान रहते हुए यह दिन का अंधा डरावने मुख वाले उल्लू के राज्य-अभिषेक के लिए सभी तैयार हो रहे हैं। सारा दिन सोते हुए यह किस प्रकार हमारी रक्षा करेगा? वास्तव में तो
जो स्वभाव से अत्यंत भयंकर हो, अत्यंत उग्र हो, क्रूर हो और प्रेमपूर्ण बातचीत न करता हो ऐसे इस उल्लू को राजा बनाकर कौन सी सिद्धि होगी?

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

8. (ततः प्रविशति प्रकृतिमाता)
(सस्नेहम्) भोः भोः प्राणिनः। यूयम् सर्वे एव मे सन्ततिः। कथं मिथः कलहं कुर्वन्ति। वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः। सदैव स्मरत
D:\MBD Class 10 Sanskrit (Haryana) Part 2\Ch 7\HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7
ददाति प्रतिगृह्णाति, गुह्यमाख्याति पृच्छति।
भुङ्क्ते योजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्॥
(सर्वे प्राणिनः समवेतस्वरेण) मातः।
कथयति तु भवती सर्वथा सम्पक परं
वयं भवतीं न जानीमः। भवत्याः परिचयः कः?

प्रकृतिमाता – अहं प्रकृतिः युष्माकं सर्वेषां जननी? यूयं सर्वे एव मे प्रियाः सर्वेषामेव मत्कृते महत्त्वं विद्यते यथासमयम् न तावत् कलहेन समयं वृथा यापयन्तु अपितु मिलित्वा एव मोदध्वं जीवनं च रसमयं कुरुध्वम्। तद्यथा कथितम्

प्रजासुखे सुखं राज्ञः, प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः, प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

अपि च-

अगाधजलसञ्चारी न गर्व याति रोहितः ।
अङ्गुष्ठोदकमात्रेण शफरी फु(रायते॥

अतः भवन्तः सर्वेऽपि शफरीवत् एकैकस्य गुणस्य चर्चा विहाय मिलित्वा प्रकृतिसौन्दर्याय वनरक्षायै च प्रयतन्ताम्। सर्वे प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति मिलित्वा दृढसंकल्पपूर्वकं च गायन्ति

प्राणिनां जायते हानिः परस्परविवादतः।
अन्योन्यसहयोगेन लाभस्तेषां प्रजायते ॥

पाठ्यांश-प्रश्नोत्तर
(अ) एकपदेन उत्तरत
(क) कतिविधं प्रीतिलक्षणम्?
(ख) प्राणिनां लाभः केन प्रजायते ?
उत्तराणि:
(क) षड्विधम्,
(ख) अन्योन्यसहयोगेन।

(आ) पूर्णवाक्येन उत्तरत
(क) प्रकृतिः केषां जननी?
(ख) वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः कीदृशाः?
(ग) सर्वे मिलित्वा कां प्रणमन्ति?
उत्तराणि:
(क) प्रकृतिः सर्वेषां प्राणिनां जननी।
(ख) वस्तुतः सर्वे वन्यजीविनः अन्योन्याश्रिताः।
(ग) सर्वे मिलित्वा प्रकृतिमातरं प्रणमन्ति?

(ई) निर्देशानुसारम् उत्तरत
(क) परस्परम् -इति पदस्य अत्र प्रयुक्तं पर्यायपदं लिखत।
(ख) महत्त्वम्-अत्र कः प्रत्ययः प्रयुक्तः?
उत्तराणि:
(क) मिथः,
(ख) त्व।

हिन्दीभाषया पाठबोधः ।
शब्दार्थाः-मिथः = (परस्परम्) आपस में । गुह्यमाख्याति = (रहस्यं वदति) रहस्य कहता है । मोदध्वम् = (प्रसन्नाः भवत)(तुम सब) प्रसन्न हो जाओ। अगाधजलसञ्चारी = (असीमितजलधारायां भ्रमन्) अथाह जलधारा में संचरण करने वाला। रोहितः = (रोहित नाम मत्स्य:) रोहित (रोह) नामक बड़ी मछली। अंगुष्ठोदकमात्रेण = (अंगुष्ठमात्रजले)अंगूठे के बराबर जल में अर्थात् थोड़े से जल में। शफरी = (लघुमत्स्यः ) छोटी सी मछली।

सन्दर्भः- प्रस्तुत नाट्यांश हमारी ‘पाठ्य पुस्तक ‘शेमुषी द्वितीयो भागः’ के ‘सौहार्द प्रकृतेः शोभा’ नामक पाठ से उद्धृत है।

प्रसंग:- प्रस्तुत नाट्यांश में वन्य प्राणियों के विवाद को देख-सुनकर प्रकृति माता स्वयं उपस्थित होकर उनके विवाद का निवारण करती है।

हिन्दी-अनुवाद: (तभी प्रकृति माता मंच पर प्रवेश करती है) (स्नेहपूर्वक) अरे अरे प्राणियो! तुम सभी मेरी संतान हो। क्यों आपस में झगड़ा करते हो। वास्तव में वन में रहने वाले सभी प्राणी एक दूसरे के आश्रित हैं। हमेशा याद रखो जो प्राणी देता है, लेता है, गोपनीय बात को बताता है, गोपनीय बात को पूछता है, खाता है और खिलाता है -प्रेम के ये छः लक्षण हैं।

(सभी प्राणी एक’ स्वर में) आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं, परंतु हम आपको नहीं जानते। आपका परिचय क्या है? प्रकृति माता-मैं तुम सब की मां प्रकृति हूँ। तुम सब मेरे प्रिय हो, समय के अनुसार मेरे लिए सभी का महत्व है। इसीलिए आपस में झगड़ा करके समय व्यर्थ मत करो, अपितु मिलकर ही आनंदित होओ और अपने जीवन को आनंदमय बनाओ क्योंकि कहा भी है

प्रजा के सुख में ही राजा का सुख होता है, प्रजा के हित में ही राजा का हित होता है, राजा का हित अपनी प्रिय वस्तु में भी नहीं होता अपितु प्रजाओं का कल्याण करने में ही राजा का प्रिय और राजा का हित होता है।
और भी
गहरे जल में विचरण करने वाला रोहित (रोहू नामक बड़ी मछली) घमंड नहीं करता। जबकि अंगूठे के समान थोड़ी गहराई रखने वाले शफरी नामक छोटी मछली बहुत उछला करती है, इसीलिए आप सभी शफरी की तरह एक-एक के गुण की चर्चा छोड़ कर, एक साथ मिलकर प्रकृति के सौंदर्य के लिए और इस वन की रक्षा करने के लिए प्रयत्न करो।

सभी प्रकृति माता को प्रणाम करते हैं और मिलकर दृढ़ संकल्प पूर्वक गाते हैंआपसी विवाद से प्राणियों की हानि होती है एक दूसरे के सहयोग करने से उनका लाभ होता है

HBSE 10th Class Sanskrit Solutions Shemushi Chapter 7 सौहार्द प्रकृते: शोभा

सौहद प्रकृतेः शोभा Summary in Hindi

सौहार्द प्रकृते: शोभा पाठ-परिचय

समाज में आज चारों ओर अपनी श्रेष्ठता और दूसरों का तिरस्कार करने की एक परम्परा-सी बन गई है। इसी कारण हम यत्र-तत्र सर्वत्र देखते हैं कि समाज में प्रायः विघटन और भेद-भाव का वातावरण पल्लवित हो रहा है। पारस्परिक व्यवहार में दूसरे के कल्याण का सद्भाव तो विनष्ट-सा ही हो गया है। जीवन का एक मात्र लक्ष्य जिस-किसी भी तरह से स्वार्थ-सिद्धि करना बन गया है। उत्तम हो या निकृष्ट अथवा घोर निकृष्ट हर प्रकार के साधन से केवल अपने स्वार्थ को ही सिद्ध करना चाहिए- मानो यह ही मनुष्य का एकमात्र लक्ष्य रह गया है। संभवतः यहे पंक्तियां किसी कवि ने ऐसे ही लोगों के लिए कही हैं

“नीचैरनीचैरतिनीचनीचैः सर्वैः उपायैः फलमेव साध्यम्”
प्रस्तुत पाठ में समाज में आपसी मेलजोल को बढ़ाने की दृष्टि से पशु पक्षियों के माध्यम से बहुत ही उत्तम शिक्षा दी गई है और यह बताया गया है कि प्रकृति रूपी माता आपस में सौहार्द का सबसे सुंदर प्रतीक है। जहां पर प्रकृति का प्रत्येक अंग चाहे वह छोटा पक्षी हो या कोई बड़ा हिंसक प्राणी सभी का अपने अपने स्थान पर बड़ा महत्व है। सभी एक दूसरे पर आश्रित हैं। पाठ में इन पशु पक्षियों का आपस में संवाद दिखाया गया है, जिसमें वहे अपनी-अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करना चाह रहे हैं। अंत में प्रकृति रूपी माता उन्हें मिलजुल कर रहने का कल्याणकारी संदेश देती है।

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