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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Textbook Questions and Answers

कविता के साथ

प्रश्न 1.
कविता एक ओर जग-जीवन का भार लिए घूमने की बात करती है और दूसरी ओर मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ विपरीत से लगते इन कथनों का क्या आशय है?
उत्तर:
सर्वप्रथम कवि जग-जीवन का भार ढोने की बात कहता है। इसका भाव यह है कि कवि संसार से पूर्णतया अलग नहीं हुआ। संसार की समस्याओं के प्रति वह भी सचेत है। परंतु वह अपनी कविता द्वारा संसार के कष्टों तथा दुखों को दूर करना चाहता है। वह संसार को सुखद बनाना चाहता है।

इस रास्ते पर चलते-चलते कवि को यह अनुभव होता है कि संसार उसकी उपेक्षा कर रहा है। वह संसार के व्यवहार से दुखी है। संसार की जड़-परंपराएँ तथा रूढ़ियाँ कवि के मार्ग को रोकना चाहती हैं, परंतु कवि इन बाधाओं की परवाह नहीं करता। वह अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ता है।

प्रश्न 2.
जहाँ पर दाना रहते हैं, वहीं नादान भी होते हैं कवि ने ऐसा क्यों कहा होगा?
उत्तर:
कवि समझता है कि जो लोग सांसारिक सुख-सुविधाओं का संग्रह करने में सक्रिय हैं, उनको ‘दाना’ अर्थात् बुद्धिमान कहा जाता है। परंतु कवि का अपना दृष्टिकोण अलग है। वह ऐसे लोगों को मूर्ख समझता है। कवि सांसारिक सफलताओं को व्यर्थ समझता है। वह ऐसे लोगों को नादान कहता है जो धन-संपत्ति के पीछे भाग रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 3.
मैं और, और जग और कहाँ का नाता-पंक्ति में और शब्द की विशेषता बताइए।
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति में प्रयुक्त ‘और’ शब्द में यमक अलंकार का प्रयोग हुआ है। प्रथम एवं तृतीय ‘और’ का अर्थ ‘अन्य’ है अर्थात् भिन्न या अलग। कवि स्वयं के साथ जोड़कर भावनाओं से जुड़े हुए व्यक्ति को संकेतित करता है। तीसरा ‘और’ सांसारिक मोह-माया से लिप्त आम व्यक्ति के लिए प्रयुक्त हुआ है। दूसरे ‘और’ का प्रयोग ‘तथा’ के लिए प्रयुक्त हुआ है।

प्रश्न 4.
शीतल वाणी में आग के होने का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘शीतल वाणी में आग’ से कवि का अभिप्राय यह है कि उसका अपना स्वभाव और स्वर कोमल एवं शांत है। परंतु उसके मन में विद्रोह की भावना विद्यमान है। कवि प्रेमहीन तथा स्वार्थी संसार से घृणा करता है। वह तो प्रेममय संसार से ही प्यार करता है।

प्रश्न 5.
बच्चे किस बात की आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे?
उत्तर:
बच्चे इस आशा में नीड़ों से झाँक रहे होंगे कि उनके माता-पिता उनके लिए चुग्गा (भोजन सामग्री) लेकर आ रहे होंगे। वे शीघ्र घर पहुँचकर उन्हें भोजन देंगे और साथ ही प्यार भी करेंगे।

प्रश्न 6.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ की आवृत्ति से कविता की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
यह पद्य पंक्ति गीत का मुखड़ा है। इसकी आवृत्ति से प्रेमजन्य व्याकुलता का पता चलता है। प्रेम के क्षण बड़े प्रिय लगते हैं। अतः प्रेम के क्षणों के बीतने का पता ही नहीं चल पाता।

कविता के आसपास

प्रश्न.
संसार में कष्टों को सहते हुए भी खुशी और मस्ती का माहौल कैसे पैदा किया जा सकता है?
उत्तर:
यह संसार निश्चय से काँटों की बाड़ है। यहाँ सुख और दुख दोनों साथ-साथ चलते हैं। कष्टों को सहकर भी हम खुशी से जीवन व्यतीत कर सकते हैं। यदि हमारे मन में सच्चे प्रेम की मस्ती है तो नित-नवीन कल्पनाओं को साकार करके हम सुखद जीवन जी सकते हैं। हमें यह स्वीकार करके कर्म करना चाहिए कि सांसारिक धन-वैभव क्षण-भंगुर हैं। प्रेम ही जीवन को खशी देता है।

आपसदारी
जयशंकर प्रसाद की आत्मकथ्य कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। क्या पाठ में दी गई आत्मपरिचय कविता से इस कविता का आपको कोई संबंध दिखाई देता है? चर्चा करो।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी,
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
आरोह (भाग 2) हरिवंश राय बच्चन]
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मै मौन रहूँ?
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा?
अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथा।
-जयशंकर प्रसाद

‘आत्मकथ्य’ जयशंकर प्रसाद द्वारा छायावाद के परिपेक्ष्य में रचित कविता है। परंतु बच्चन जी की ‘आत्मपरिचय’ कविता छायावाद से हटकर व्यक्तिगत प्रेम को आधार बनाकर रची गई कविता है। जहाँ प्रसाद जी अपने प्रेम को छिपाकर रखते हैं, वहाँ बच्चन जी सहज, सरल भाषा में बड़ी ईमानदारी के साथ प्रेमाभिव्यक्ति करते हैं। भले ही इन दोनों कविताओं के भाव लगभग समान हो, परंतु इनकी अभिव्यंजना शैली अलग-अलग है। बच्चन द्वारा यह कहना कि ‘मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ’ में प्रेम की स्पष्ट अभिव्यक्ति है। परंतु प्रसाद जी द्वारा यह कहना –
“यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास ।
तब भी कहते हो कह डालूँ दुर्बलता अपनी बीती।”
यहाँ प्रसाद जी ने छायावादी अभिव्यंजना शैली द्वारा अपनी प्रेमाभिव्यक्ति का संदेश दिया है।

HBSE 12th Class Hindi आत्म-परिचय, एक गीत Important Questions and Answers

सराहना संबंधी प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!
उत्तर:
इन पद्य-पंक्तियों में कवि ने निजी प्रेम की अभिव्यक्ति की है। कवि का हृदय प्रिया के स्नेह से सराबोर है। वह हमेशा अपने मन में प्रिया के स्नेह को अनुभव किया करता है। इसीलिए वह संसार की परवाह नहीं करता।

  1. कवि ने सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. ‘किया करता’ में अनुप्रास अलंकार है तथा ‘स्नेह-सुरा’ में रूपक अलंकार है।
  3. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव दिखाई देता है।
  4. किया करता हूँ की आवृत्ति के कारण गीत में मधुर संगीत की उत्पत्ति हुई है।
  5. माधुर्य गुण है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  6. आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ!
उत्तर:
इसमें कवि निजी प्रेम को स्वीकार करता हुआ कहता है कि कवि के हृदय में नवीन मनोभाव हैं जिन्हें वह संसार को उपहार के रूप में भेंट करना चाहता है। कवि को यह अधूरा संसार अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार में खोया रहता है।

  1. प्रस्तुत गीत में विषयानुकूल, सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  2. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावभिव्यक्ति में सहायक है।
  3. कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  4. ‘लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण इस पद्य में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. माधुर्य गुण है तथा श्रृंगार रस का परिपाक हुआ है।

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प्रश्न 3.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसका संसार के साथ निर्वाह नहीं हो सकता। कवि प्रतिदिन नए संसार की रचना करता है, परंतु अगले क्षण ही वह उसे नष्ट कर देता है। यह संसार धन-वैभव के पीछे पागल बना हुआ है परंतु कवि को इस धन-वैभव की कोई इच्छा नहीं है।

  1. कवि सांसारिक जीवन से अलग-थलग आदर्श लोक में विचरण करना चाहता है।
  2. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण-विपर्यय अलंकार है।
  3. ‘कहाँ का नाता’ में प्रश्न अलंकार है तथा ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. ‘और’ शब्द की आवृत्ति चमत्कार उत्पन्न करती है। इस शब्द में यमक अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा कोमलकांत पदावली का प्रयोग है।
  6. शब्द-योजना सार्थक तथा सटीक बन पड़ी है।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए
मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि उसके रुदन से भी प्रेम झलकता है, परंतु उसकी वाणी में एक कोमल ऊर्जा है। कवि का जीवन निराशा के कारण खंडहर बन चुका है, परंतु कवि अपने जीवन में उस प्रेम को महत्त्व देता है जिस पर बड़े-बड़े राजा महल को भी न्योछावर कर देते हैं।

  1. इसमें कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  2. शब्द-योजना सार्थक एवं सटीक बन पड़ी है।
  3. ‘मैं’ शब्द के प्रयोग के कारण आत्मकथात्मक शैली का प्रयोग किया गया है।
  4. ‘रोदन में आग’ तथा ‘शीतल वाणी में आग’ दोनों में विरोधाभास अलंकार का सफल प्रयोग है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. लिए फिरता हूँ की आवृत्ति के कारण मधुरता की मस्ती उत्पन्न हो गई है।
  7. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पंक्तियों में निहित काव्य-सौंदर्य पर प्रकाश डालिए-
मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!
उत्तर:
यहाँ कवि स्वीकार करता है कि दुनिया में उसका कोई नहीं है और न ही उसकी कोई प्रतीक्षा कर रहा है। प्रेम के अभाव के कारण कवि के कदम शिथिल पड़ जाते हैं और उसके मन में उदासी छा जाती है।

  1. इसमें कवि ने खड़ी बोली के साहित्यिक रूप का वर्णन किया है।
  2. ‘मझसे मिलने को कौन विकल’ और ‘किसके हित चंचल’ दोनों में प्रश्न अलंकार है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4.  प्रसाद गुण है तथा वियोग शृंगार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. आत्मकथात्मक तथा भावात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विषय-वस्तु पर आधारित लघूत्तरात्मक प्रश्न (आत्मपरिचय)

प्रश्न 1.
‘आत्मपरिचय’ कविता के आधार पर कवि के व्यक्तित्व का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कवि प्रेम और मस्ती का जीवन जीना चाहता है। वह हमेशा प्रेम तथा स्नेह के काल्पनिक संसार में खोया रहता है। प्रेम ही उसके जीवन का प्राण है। इसलिए वह हमेशा स्नेह की सुरा का पान करता रहता है। परंतु प्रिया ने उसके प्रेम का अनुकूल उत्तर नहीं दिया। इसीलिए उसके हृदय में विरह-जन्य पीड़ा व अवसाद है। इसके साथ-साथ कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग प्रेममय संसार की रचना करना चाहता है। वह इस संपूर्ण संसार को मस्ती में डुबा देना चाहता है।

प्रश्न 2.
कवि को यह संसार अच्छा क्यों नहीं लगता?
उत्तर:
कवि इस संसार को अपूर्ण मानता है। कवि का विचार है कि संसार एक भार है। लोग व्यर्थ ही दुनियादारी में उलझे हैं। कवि सांसारिक मोह-माया से अलग-थलग आदर्श समाज की स्थापना करना चाहता है। वह स्वयं को संसार से अलग मानता है। इसीलिए वह कहता भी है
“जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग से उस पृथ्वी को ठुकराता।”

प्रश्न 3.
‘जग पूछा रहा उनको, जो जग की गाते’-इस पंक्ति द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
कवि स्पष्ट करता है कि संसार केवल उन लोगों का सम्मान करता है जो लोग धन-वैभव के संग्रह में संलग्न हैं और संपन्न हैं। धनवान व्यक्ति का सभी आदर करते हैं, निर्धन को कोई नहीं पूछता। विशेषकर कवि जैसे सत्यनिष्ठ व्यक्ति की कोई परवाह भी नहीं करता। परन्तु कवि तो अपने मन में प्रेम के गीत लिए फिरता है।

प्रश्न 4.
कवि ने जग को मूढ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार के सभी लोग धन-वैभव के संग्रह में अपना जीवन बर्बाद कर रहे हैं। वे सांसारिक विषय-वासनाओं में लीन हैं। अज्ञानता के कारण उनके जीवन से सच्चा प्रेम लुप्त हो चुका है। इसलिए यह संसार तथा इसके लोग मूढ़ हैं।

प्रश्न 5.
‘जग भक्-सागर तरने को नाव बनाए’ कथन का क्या आशय है?
उत्तर:
कवि की दृष्टि में संसार रूपी सागर महाभयंकर है। इसे पार करने के लिए मनुष्य को कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। संसार समझता है कि वह धन-संपत्ति द्वारा इस सागर को पार कर जाएगा, परंतु ऐसा संभव नहीं है। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नाव बनाकर यह संसार पार करना चाहता है।

प्रश्न 6.
‘आत्मपरिचय’ गीत के आधार पर कवि के मन की दशा पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कवि मौज और मस्ती का कवि है। वह प्रेम पाने और देने में विश्वास रखता है और एक प्यार भरी जिंदगी जीना चाहता है इसलिए वह अपने हार्दिक प्रेम को प्रिया के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि प्रेम के बिना इस संसार को अधूरा मानता है और अपने मन में प्रेममय संसार की कल्पना करता है।

प्रश्न 7.
कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर क्यों जलता रहता है?
उत्तर:
कवि के मन में अपने प्रिय के लिए अत्यधिक प्रेम है। प्रिय की मधुर यादें उसे सुखानुभूति प्रदान करती हैं। अतः वह संयोग की दशा में भी प्रिय के वियोग की अग्नि जलाकर उसमें जलता रहता है। इससे कवि को आनंद मिलता रहता है।

प्रश्न 8.
कवि के अन्दर और बाहर कौन-सी असंगति है और यह असंगति क्यों है?
उत्तर:
कवि संसार के लोगों के सामने हँसता और खेलता दिखाई देता है। ऐसा लगता है कि मानों वह अपने प्रेम की असफलता पर हँस रहा है, परंतु वह अपनी विरह-व्यथा के कारण मन-ही-मन रोता रहता है। बाहर से कवि प्रसन्न नज़र आता है, लेकिन मन-ही-मन वह विरह-जनित पीड़ा को अनुभव करता रहता है। इसलिए कवि का जीवन अन्दर और बाहर से असंगत हो जाता है।

प्रश्न 9.
कवि कौन-कौन से संसार बनाकर रोज़ मिटाता रहता है?
उत्तर:
कवि मन-ही-मन प्रेममय संसार की कल्पना करता है। परन्तु कवि का यह प्रेममय संसार प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। इसलिए कवि उसे मिटा देता है। वह फिर से प्रेममय संसार की रचना में लीन हो जाता है। परंतु संसार के लोग इससे बेखबर होकर धन-संपदा के संग्रह में लगे रहते हैं।

प्रश्न 10.
कवि की शीतल वाणी में आग क्यों है?
उत्तर:
कवि के मन में विरह-वेदना की आग जलती रहती है, लेकिन उसकी वाणी बड़ी कोमल, मधुर और शीतल है। वह अपनी विरह-जनित पीड़ा को कोमलकांत पदावली द्वारा व्यक्त करता है। परंतु प्रिय के वियोग की आग उसके मन में हमेशा जलती रहती है। अतः शीतलता और वियोग बड़ा विचित्र बन पड़ा है।

प्रश्न 11.
‘मैं और, और जग और, कहाँ का नाता’ के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
इस पद्य पंक्ति द्वारा कवि संसार और अपने स्वभाव के अंतर को स्पष्ट करता है। कवि स्वयं तो प्रेम भावना के लोक में विचरण करता रहता है, परंतु संसार के लोग स्वार्थ को पूरा करने में संलग्न हैं। इसलिए कवि का मेल नहीं खाता।

प्रश्न 12.
कवि दीवानों का वेश क्यों लिए फिरता है?
उत्तर:
कवि को प्रेम के क्षेत्र में असफलता मिली है। इसलिए वह प्रेम-दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। कवि का एकमात्र लक्ष्य अपने प्रिय को पाना है, परंतु वह उसे मिल नहीं पा रहा। इसलिए वह दीवानों का वेश धारण करके घूमता रहता है।

एक गीत

प्रश्न 1.
‘एक गीत’ कविता का प्रतिपाद्य/मूलभाव क्या है?
उत्तर:
यह गीत प्रेम के महत्त्व पर प्रकाश डालता है। कवि कहता है कि प्रेम मानव जीवन को उत्साह, उमंग और उल्लास प्रदान करता है। प्रेम के कारण मनुष्य को लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है। इसलिए प्रेमी अपनी प्रिय से मिलने के लिए तेज कदमों से चल पड़ता है। यही नहीं, पक्षियों के पंखों में गतिशीलता आ जाती है। जिस किसी व्यक्ति का प्रिय उसकी प्रतीक्षा नहीं करता, उसका जीवन निष्क्रिय और शिथिल हो जाता है। इसलिए प्रेम ही जीवन का मूल आधार है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

प्रश्न 2.
‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’, के आधार पर आशा और निराशा के क्रम को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
निश्चय ही यह गीत आशा और निराशा के भावों को क्रम से अभिव्यक्त करता है। प्रथम दो काव्यांशों में कवि ने आशा के भावों को जागृत किया है जिससे प्रेरित होकर दिन का पंथी अपने प्रियजनों से मिलने की आशा में शीघ्रता से चलना आरम्भ कर देता है। जब चिड़िया को यह ध्यान आया कि उसके बच्चे उसकी प्रतीक्षा में होंगे तो वह भी तेज गति से उड़ने लगती है। किन्तु जब कवि यह सोचता है कि उसका चाहने वाला कोई नहीं है और कोई उसकी प्रतीक्षा करने वाला नहीं है तो उसके मन का उत्साह नष्ट हो जाता है और उसके मन में निराशा का भाव समा जाता है। अतः स्पष्ट है कि प्रस्तुत गीत में कवि ने आशा और निराशा के भावों को क्रमशः अभिव्यक्ति किया है।

प्रश्न 3.
कवि के मन में शिथिलता उत्पन्न क्यों हो जाती है?
उत्तर:
कवि जानता है कि इस दुनिया में उसका कोई अपना नहीं है। कोई प्रियजन उसकी प्रतीक्षा नहीं करता है। इसलिए वह सोचता है कि मैं किसके लिए अपने को चंचल करूँ। उसका सारा उत्साह तथा उमंग नष्ट हो जाती है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं। परंतु यह स्थिति कवि के मन में आतुरता का भाव भी उत्पन्न करती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. हरिवंश राय बच्चन का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1909 में
(B) सन् 1908 में
(C) सन् 1907 में
(D) सन् 1912 में
उत्तर:
(C) सन् 1907 में

2. ‘आत्मपरिचय’ कविता के रचयिता हैं _________.
(A) माखनलाल चतुर्वेदी
(B) रघुवीर सहाय
(C) कुँवर नारायण
(D) हरिवंश राय बच्चन
उत्तर:
(D) हरिवंश राय बच्चन

3. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस नगर में हुआ?
(A) प्रयाग में
(B) बनारस में
(C) लखनऊ में
(D) कानपुर में
उत्तर:
(A) प्रयाग में

4. हरिवंश राय बच्चन का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) कायस्थ परिवार में
(C) क्षत्रिय परिवार में
(D) राजपूत परिवार में
उत्तर:
(B) कायस्थ परिवार में

5. बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा कहाँ पर हुई?
(A) काशी में
(B) लखनऊ में
(C) प्रयाग में
(D) मुम्बई में
उत्तर:
(A) काशी में

6. बच्चन जी ने स्नातकोत्तर परीक्षा कहाँ से उत्तीर्ण की?
(A) दिल्ली विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) कलकत्ता विश्वविद्यालय
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
उत्तर:
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय

7. बच्चन जी ने पी० एचण्डी की उपाधि कहाँ प्राप्त की?
(A) इलाहाबाद विश्वविद्यालय
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय
(C) मुम्बई विश्वविद्यालय
(D) दिल्ली विश्वविद्यालय
उत्तर:
(B) कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय

8. बच्चन जी की पहली पत्नी का नाम क्या था?
(A) श्यामा।
(B) तेजी
(C) मनोरमा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) श्यामा

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9. 1942 में बच्चन जी ने दूसरा विवाह किससे किया?
(A) मनोरमा से
(B) कमला देवी से
(C) तेजी से
(D) राधा से
उत्तर:
(C) तेजी से

10. बच्चन जी को किस मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया गया?
(A) वित्त मंत्रालय
(B) शिक्षा मंत्रालय
(C) कृषि मंत्रालय
(D) विदेश मंत्रालय
उत्तर:
(D) विदेश मंत्रालय

11. किस वर्ष बच्चन जी को राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया गया?
(A) 1969 में
(B) 1965 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में

12. भारत सरकार ने बच्चन जी को किस उपाधि से विभूषित किया?
(A) पद्म श्री
(B) पद्म विभूषण
(C) ज्ञान पीठ पुरस्कार
(D) व्यास सम्मान
उत्तर:
(B) पद्म विभूषण

13. ‘मधुशाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935
(B) सन् 1936
(C) सन् 1938
(D) सन् 1937
उत्तर:
(A) सन् 1935

14. ये रचनाएँ हरिवंश राय बच्चन की हैं-
(A) मधुशाला, मधुबाला और अपरा
(B) मधुशाला, कामायनी, मधुबाला
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला
(D) मधुकुशल, मधु, मधुबाला
उत्तर:
(C) मधुकलश, मधुबाला, मधुशाला

15. ‘मधुबाला’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1938 में
(B) सन् 1935 में
(C) सन् 1939 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(A) सन् 1938 में

16. ‘मधुकलश’ का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1935 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1938 में
उत्तर:
(D) सन् 1938 में

17. हरिवंश राय बच्चन किस भावना के कवि हैं?
(A) रहस्यवाद भावना के
(B) छायावादी भावना के
(C) प्रेम और मस्ती के
(D) प्रगतिवादी भावना के
उत्तर:
(C) प्रेम और मस्ती के

18. ‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, किस विधा की रचना है?
(A) प्रबंध काव्य
(B) गीति काव्य
(C) जीवनी
(D) निबंध
उत्तर:
(C) जीवनी

19. हरिवंश राय बच्चन की आधुनिक काव्य रचनाओं पर किसका प्रभाव पड़ा?
(A) स्वच्छंदतावाद का
(B) उमर खय्याम का
(C) रहस्यवाद का
(D) प्रगतिवाद का
उत्तर:
(B) उमर खय्याम का

20. बच्चन जी द्वारा रचित गीत ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!’ उनके किस काव्य-संग्रह से संकलित है?
(A) निशा निमंत्रण
(B) मधुशाला
(C) सतरंगिणी
(D) मिलनयामिनी
उत्तर:
(A) निशा निमंत्रण

21. ‘भव-सागर’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) उत्प्रेक्षा
(B) उपमा
(C) रूपक
(D) अनुप्रास
उत्तर:
(C) रूपक

22. ‘सीखा ज्ञान भुलाना’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) विरोधाभास
(B) असंगति
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) विरोधाभास

23: ‘साँसों के तार में कौन-सा अलंकार है?
(A) उपमा
(B) उत्प्रेक्षा
(C) अनुप्रास
(D) रूपक
उत्तर:
(A) उपमा

24. ‘स्नेह-सुरा’ में कौन-सा अलंकार है?
(A) रूपक
(B) यमक
(C) उपमा
(D) उत्प्रेक्षा
उत्तर:
(A) रूपक

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25. ‘एक गीत’ नामक कविता में दिन का पंथी किसे माना गया है?
(A) ‘चिड़िया को
(B) कवि को
(C) सूर्य को
(D) प्रत्याशा को
उत्तर:
(B) कवि को

26. अपने बच्चों के विषय में सोचकर पक्षियों की चंचलता किन अंगों में सबसे अधिक व्यक्त होती है?
(A) आँखों में
(B) हृदय में
(C) पैरों में
(D) पंखों में
उत्तर:
(D) पंखों में 27.

27. मुझसे मिलने को कौन विकल? पंक्ति में कौन-सा भाव है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विह्वलता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) विह्वलता

28. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ गीत में नीड़ों से झांक रहे बच्चों का ध्यान चिड़िया के परों में क्या भरता है?
(A) शिथिलता
(B) चंचलता
(C) विकलता
(D) विह्वलता
उत्तर:
(B) चंचलता

29. ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है’ कविता में कवि हताश और दुखी क्यों है?
(A) पत्नी से तलाक होने के कारण
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण
(C) संतान-सुख से वंचित होने के कारण
(D) परिवार से पिछड़ने के कारण
उत्तर:
(B) प्रियतमा की निष्ठुरता के कारण

30. किसके बच्चे प्रत्याशा में हैं?
(A) गाय के
(B) कवि के
(C) पंथी के
(D) चिड़िया के
उत्तर:
(D) चिड़िया के

31. ‘एक गीत’ नामक कविता में कवि की पंक्ति ‘मुझसे मिलने को कौन विकल’? किस भाव को व्यक्त करती है?
(A) प्रश्न
(B) प्रसन्नता
(C) आश्चर्य
(D) हताशा
उत्तर:
(D) हताशा

32. ‘हो जाए न पथ में रात कहीं’ सोचकर कौन जल्दी-जल्दी चलता है?
(A) चिड़िया के बच्चे
(B) पंथी
(C) चिड़िया
(D) तोता
उत्तर:
(B) पंथी

33. दिन ढलने के साथ ही बच्चे कहाँ से झाँकने लगे होंगे?
(A) दरवाजे से
(B) छत से
(C) नीड़ों से
(D) खिड़की से
उत्तर:
(C) नीड़ों से

34. मैं होऊँ किसके हित चंचल?- यह प्रश्न पैरों को कैसा कर देता है?
(A) शिथिल
(B) चंचल
(C) विह्वल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शिथिल

35. ‘एक गीत’ कविता में किस भाव की प्रधानता है?
(A) रतिभाव
(B) उत्साह भाव
(C) हास्य भाव
(D) वात्सल्य भाव
उत्तर:
(D) वात्सल्य भाव

आत्म-परिचय पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ
कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर
मैं साँसों के दो तार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-जग-जीवन = सांसारिक गतिविधियाँ। भार = बोझ। झंकृत = तारों को बजाकर स्वर निकालना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

व्याख्या-यद्यपि मेरा जीवन सांसारिक बाधाओं और कष्टों के बोझ से दबा हुआ है, लेकिन फिर भी मैं अपने जीवन से प्रेम करता हूँ। मुझे अपने सामाजिक कर्तव्यों का बोध है। मेरा हृदय प्रेम से लबालब भरा है। किसी प्रिया ने मेरे हृदय के तारों को छूकर झंकृत कर दिया था, जिससे मेरी साँसों में संगीत के तार बजने लगे। फलस्वरूप मैं आज भी उसी प्रेम की झंकार में लीन रहता हूँ। भाव यह है कि भले ही मेरे सामने कुछ बाधाएँ और रुकावटें हैं, लेकिन मैं उनकी परवाह न करके प्रेम के सहारे अपना जीवन सुखपूर्वक जी रहा हूँ।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है। उसके मन में किसी प्रकार की कुंठा नहीं है।
  2. सहज, सरल, प्रवाहमयी तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. ‘साँसों के तार’ में रूपक अलंकार का सुंदर प्रयोग हुआ है, फिर भी’ के प्रयोग से पता चलता है कि कवि सांसारिक बाधाओं से ग्रस्त है।
  4. इसी में ‘रहस्यात्मकता’ देखी जा सकती है। यह कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन अथवा कोई दैवीय शक्ति।
  5. संपूर्ण पद्य में श्रृंगार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  6. प्रस्तुत गीत पर उमर खय्याम् की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  7. गीत की भाषा में विषय के अनुसार मस्ती, कोमलता, मादकता और मधुरता विद्यमान है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) कवि एवं कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) यहाँ कवि ने ‘किसी ने के द्वारा किस ओर संकेत किया है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि-हरिवंश राय बच्चन कविता-आत्मपरिचय

(ख) ‘जग-जीवन के भार’ से कवि का आशय है कि सांसारिक दायित्व और जीवन की जिम्मेदारियाँ, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को निभाना पड़ता है।

(ग) ‘फिर भी’ द्वारा कवि यह बताना चाहता है कि सामाजिक कर्तव्यों तथा दायित्वों के बोझ से उसका जीवन दब गया है। प्रायः संसार के प्राणी इन दायित्वों को निभाते-निभाते प्रेमशून्य हो जाते हैं, परंतु कवि फिर भी अपने जीवन में प्रेम को अत्यधिक महत्त्व देता है और उसी के सहारे जिंदा है।

(घ) यहाँ ‘किसी ने’ शब्द कवि के प्रिय का प्रतीक है। यह प्रिय कवि की प्रेमिका भी हो सकती है या कोई प्रियजन भी हो सकता है। यही नहीं, ‘किसी ने’ के द्वारा कवि परमात्मा की ओर भी संकेत कर सकता है।

(ङ) प्रस्तुत पद्यांश में कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि जीवन के दायित्वों और कर्तव्यों को निभाते हुए भी वह प्रेम के सहारे जीवनयापन कर रहा है। कवि खुले शब्दों में अपने प्रिय के प्रेम की घोषणा करता है।

[2] मैं स्नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ,
जग पूछ रहा उनको, जो जग की गाते,
मैं अपने मन का गान किया करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-सुरा = मदिरा, शराब । पान करना = पीना। जग = संसार । ध्यान करना = परवाह करना । जग की गाते = संसार की स्तुति करते।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन पर प्रकाश डाला है। इस पद्यांश में कवि स्वीकार करता है कि वह हमेशा अपने प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं हमेशा प्रेम रूपी मदिरा का पान करता रहा हूँ। भाव यह है कि मैं हमेशा प्रेम के भावों में डूबा रहा हूँ। इसलिए मुझे सांसारिक बाधाओं की कोई चिंता नहीं है। मुझे इस बात की कोई चिंता नहीं कि संसार के लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं? संसार हमेशा उन लोगों की स्तुति करता है जो सदैव सामाजिक दायित्वों में उलझे रहते हैं तथा निजी सुख-दुख की परवाह नहीं करते, परंतु मैं तो अपने गीतों द्वारा अपने मन के भावों को व्यक्त करता हूँ। आशय यह है कि मेरी कविताओं में मेरे प्रेममय व्यक्तित्व की ही अभिव्यक्ति हुई है।

विशेष-

  1. कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की है और सांसारिक बाधाओं की परवाह न करने का वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. अनुप्रास तथा रूपक अलंकारों का स्वाभाविक प्रयोग है।
  5. प्रवाहमयी भाषा के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, कोमलता तथा मधुरता देखी जा सकती है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि जग का ध्यान क्यों नहीं करता?
(ख) ‘स्नेह-सुरा’ से कवि का क्या आशय है?
(ग) जग किसको पूछता है?
(घ) कवि ने अपने गीतों में किस प्रकार के भावों को व्यक्त किया है?
(ङ) इस पद्यांश में किस प्रकार की भाषा का प्रयोग हुआ है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय के प्रेम में रम गया है। वह हमेशा अपने प्रिय को पाना चाहता है। इसलिए वह संसार के झंझटों की परवाह नहीं करता और उससे दूर रहना चाहता है।

(ख) ‘स्नेह-सुरा’ का अर्थ है प्रेम की मस्ती अथवा प्यार का दीवानापन। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती का पान करता रहता है। इसलिए उसे संसार की कोई चिंता नहीं है।

(ग) यह संसार केवल उसी को पूछता है जो उसकी चिंता करता है। यहाँ कवि यह कहना चाहता है कि सांसारिक प्राणी केवल उसी व्यक्ति को महत्त्व देते हैं जो अपनी कविताओं में सांसारिक बातों का वर्णन करते हैं।

(घ) कवि अपने गीतों में स्वच्छंद प्रेम की भावनाओं को व्यक्त करता है। कवि हमेशा प्रेम की मस्ती में डूबा रहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज, सरल, तत्समनिष्ठ तथा संगीतात्मक भाषा का प्रयोग किया है।

[3] मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,
मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ
है यह अपूर्ण संसार न मुझको भाता
मैं स्वप्नों का संसार लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-निज = अपने। उर = हृदय। उद्गार = भाव। उपहार = भेंट। अपूर्ण = अधूरा। भाना = अच्छा लगना। स्वप्नों का संसार = नवीन इच्छाओं का संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने अपने प्रेममय जीवन का वर्णन किया है। इसमें कवि निजी प्रेम को खुले शब्दों में स्वीकार करता हुआ कहता है

याख्या-मेरे निजी हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। हमेशा वे मनोभाव मेरे हृदय में उमडते-घमडते रहते हैं। इसलिए मैं इस संसार को अपने हृदय के कोमल भाव देना चाहता हूँ। यह बाह्य संसार अधूरा है, क्योंकि इसमें प्रेम का अभाव है। इस अधूरे संसार को मैं पसंद नहीं करता। मेरे मन में प्रेममय संसार का सपना निवास करता है, मैं उसी सपने को साकार करने के लिए भटकता रहता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रेममय संसार में ही लीन रहना चाहता हूँ।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है तथा खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।
  7. लिए फिरता हूँ के प्रयोग से काव्य में मस्ती का वातावरण उत्पन्न हो गया है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:
प्रश्न-
(क) कवि के हृदय में किस प्रकार के उद्गार हैं?
(ख) कवि संसार को अपूर्ण क्यों कहता है?
(ग) “स्वप्नों के संसार’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(घ) कवि के मन की दशा कैसी है?
(ङ) इस पयांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि के हृदय में प्रेममय उद्गार हैं। वह अपने प्रिय को भरपूर प्रेम देना चाहता है और प्रेममय जीवन-यापन करना चाहता है।

(ख) कवि के अनुसार प्रेमशून्य संसार अपूर्ण और अधूरा है। परन्तु यदि जीवन में प्रेम की प्राप्ति हो जाती है तो जीवन मधुर लगने लगता है।

(ग) स्वप्नों के संसार’ से कवि का तात्पर्य है-प्रेममय जीवन। जो लोग प्रेम की भावना से परिपूर्ण होकर जीते हैं, वे ही जीवन का आनंद उठाना जानते हैं।

(घ) कवि अपने हृदयगत प्रेम को अपने प्रिय के समक्ष प्रकट करना चाहता है। कवि को यह संसार प्रेम के बिना अपूर्ण लगता है। इसलिए वह प्रेममय जीवन जीना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने खुले शब्दों में अपने प्रेम को स्वीकार किया है और प्रेम को मानव-जीवन की मूल भावना माना है।

[4] मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,
सुख-दुख दोनों में मग्न रहा करता हूँ
जग भव-सागर तरने को नाव बनाए,
मैं भव मौजों पर मस्त बहा करता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-हृदय = मन। अग्नि = आग (भावों का आवेग)। दहा = जला। मग्न रहना = मस्त रहना। भव-सागर = संसार रूपी सागर। मौजों = किनारा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को अधिक महत्त्व प्रदान किया है। कवि प्रेम की दीवानगी को ही अपना जीवन मानता है और प्रेम की मस्ती में जीना चाहता है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं स्वयं अपने हृदय में प्रेम की आग जलाता हूँ और उसी में जलता रहता हूँ। आशय यह है कि कवि को प्रेममय जीवन ही सुखद लगता है। वह प्रेम की दीवानगी में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को निरंतर भोगता रहता है। लोग इस संसार को मुसीबतों का सागर कहते हैं और उस पार उतरने के लिए कोई-न-कोई माध्यम अपनाते हैं। परंतु कवि प्रेम रूपी नाव के द्वारा ही सांसारिक बाधाओं को पार कर लेता है। इस प्रकार कवि संसार रूपी सागर के किनारे पर पहुँच जाता है। कवि यह सारा कार्य मौज और मस्ती के साथ करता है। प्रेम के कारण उसके मन में किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम को जीवन का आधार स्वीकार किया है। वह प्रेम की मस्ती को ही अपना जीवन मानता है।
  2. ‘अग्नि’, ‘नाव’ में रूपकातिशयोक्ति एवं भवसागर’ और ‘भव मौजों में रूपक तथा ‘सुख-दुख’ में अनुप्रास अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. प्रवाहमयी भाषा होने के कारण गीत में विषयानुकूल मस्ती, मादकता, मधुरता तथा कोमलता विद्यमान है।
  6. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव देखा जा सकता है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है तथा शृंगार रस का परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि अपने हृदय में अग्नि जलाकर उसमें क्यों जला करता है?
(ख) कवि सुख-दुख में कैसे मग्न रहता है?
(ग) भव-सागर से पार उतरने के लिए नाव बनाने का क्या अर्थ है?
(घ) ‘भव मौजों से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अपने प्रिय से अत्यधिक प्रेम करता है। प्रिय की यादें कवि को आनंद प्रदान करती हैं। इसलिए वियोगावस्था में भी कवि अपने प्रिय की विरहाग्नि में जलकर आनंद प्राप्त करता है।

(ख) अपने प्रिय की मधुर यादों में लीन रहने के कारण कवि सुख-दुख में भी मस्त रहता है, उसे सांसारिक चिंताएँ नहीं सतातीं।

(ग) इस संसार को भयंकर सागर कहा गया है। इसे पार करने के लिए कोई-न-कोई नौका अवश्य चाहिए। कवि अपने प्रिय के प्रेम को नौका बनाकर इस भव-सागर को पार करना चाहता है।

(घ) ‘भव मौजों से कवि का अभिप्राय है संसार रूपी सागर का किनारा। कवि का आशय यह है कि संसार के आकर्षणों में उसकी कोई रुचि नहीं है। वह संसार में प्रवेश ही नहीं करना चाहता। सांसारिक विषय-वासनाओं को त्यागकर ही वह प्रेम का सच्चा आनंद प्राप्त करना चाहता है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि वह प्रेम की उन्मत्तता में मस्त होकर जीवन के सुख-दुख को भोगना चाहता है। वह अपनी प्रेम रूपी नौका द्वारा ही इस संसार रूपी सागर को पार करना चाहता है।

[5] मैं यौवन का उन्माद लिए फिरता हूँ,
उन्मादों में अवसाद लिए फिरता हूँ,
जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,
मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-5]

शब्दार्थ-यौवन = जवानी। उन्माद = मस्ती, पागलपन। अवसाद = दुख तथा निराशा।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेममय संसार को ही श्रेष्ठ माना है। इसमें कवि प्रेम के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति करता है तथा प्रेम की दीवानगी तथा निराशा का वर्णन करता है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मेरे जीवन में यौवन की एक मस्ती है। मैं अपनी प्रिया को मिलने के लिए हमेशा व्याकुल रहता हूँ। मैं प्रिया के प्रेम का दीवाना हूँ। यद्यपि वियोगावस्था के कारण मेरे अंदर निराशा तथा दुख के भाव उत्पन्न हो गए हैं, लेकिन मैं लोगों के सामने हमेशा हँसता रहता हूँ। वियोग की पीड़ा मेरे हृदय को परेशान कर देती है। मेरे मन में प्रिया की याद ऐसे समा चुकी है कि मैं उसे याद करके मन ही मन रोता रहता हूँ, परंतु लोगों के सामने हँसने का अभिनय करता हूँ। भाव यह है कि प्रिया का वियोग हमेशा मुझे अन्दर-ही-अन्दर कचोटता रहता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने श्रृंगार के वियोग पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि ने वियोगावस्था से उत्पन्न अपनी दीवानगी, निराशा तथा बेचैनी का स्वाभाविक वर्णन किया है।।
  2. कवि ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. यह पद्यांश विषयानकल मस्ती, मादकता, मधुरता, कोमलता से परिपूर्ण है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का स्पष्ट प्रभाव है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता है तथा वियोग शृंगार का सफल वर्णन हुआ है।
  7. ‘हाय’ शब्द से कवि की विरह वेदना साकार हो उठी है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर:

प्रश्न-
(क) ‘यौवन के उन्माद’ द्वारा कवि क्या कहना चाहता है?
(ख) कवि अवसाद से ग्रस्त क्यों है?
(ग) कवि के भीतर तथा बाहर कैसी असंगति है?
(घ) इस पद्यांश में किस प्रकार के श्रृंगार रस का चित्रण हुआ है और क्यों?
(ङ) इस पयांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) ‘यौवन के उन्माद’ से कवि का अभिप्राय है-यौवनकालीन अल्हड़ जवानी में मन में प्रेम का जोश। लगता है कि कवि नए-नए प्रेम के कारण अत्यधिक व्याकुल है, प्रिया का वियोग उसे व्यथित कर देता है।

(ख) कवि की प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः कवि प्रेमजन्य निराशा के कारण अत्यधिक व्यथित है। इसलिए वह अवसाद से ग्रस्त है।

(ग) भले ही कवि विरह-व्यथा के कारण अन्दर-ही-अन्दर कसमसाता रहता है, परन्तु वह संसार के सामने हमेशा हँसता तथा मुस्कुराता रहता है। वह नहीं चाहता कि लोग उसकी विरह-व्यथा का मज़ाक बनाए। इसलिए कवि का मन अन्दर से सुंदर तथा बाहर से अंसगत दिखाई देता है।

(घ) इस पद्यांश में शृंगार रस के वियोग पक्ष का मार्मिक चित्रण हुआ है। कवि अपनी प्रिया के प्रेम से वंचित है इसलिए वह निराशा और अवसाद से ग्रस्त है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-व्यथा की मार्मिक अभिव्यक्ति की है। कवि सहज, सरल शब्दावली में अपनी वियोग जनित अभिलाषा और पीड़ा को व्यक्त करता है।

[6] कर यत्न मिटे सब, सत्य किसी ने जाना?
नादान वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!
फिर मूढ़ न क्या जग, जो इस पर भी सीखे?
मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भुलाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-यत्न = कोशिश। नादान = भोला-भाला। दाना = लाभ। मूढ = मूर्ख। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस कविता में कवि ने प्रेम की दीवानगी तथा मस्ती का संवेदनशील वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि सांसारिक दौड़-धूप को व्यर्थ बताता हुआ यही सलाह देता है कि मनुष्य को मस्ती के साथ जीना चाहिए।

व्याख्या कवि कहता है कि संसार के सभी लोग अनेक प्रयास करके थक चुके हैं। सभी ने सत्य को जानने की बड़ी कोशिश की, परंतु कोई सत्य को नहीं जान सका। इसका प्रमुख कारण यह है कि जो लोग संसार के धन-वैभव अथवा भोग-विलास की सामग्री एकत्रित करने में लगे हैं, वे सभी मूर्ख हैं। वे इस सच्चाई को भूल जाते हैं कि संसार के जाल में उलझकर कोई सच्चा सुख प्राप्त नहीं कर सकता। कवि सोचता है कि मैं ऐसे लोगों को मूर्ख क्यों न कहूँ जो सांसारिक लाभ तथा लोभ में उलझे हुए हैं। मैं तो इस मूर्खता को समझ चुका हूँ। इसलिए मैं तो इस सांसारिक ज्ञान को भुलाकर प्रेम की मस्ती में जीना चाहता हूँ।

विशेष-
(1) इस पद्यांश में कवि ने सांसारिक सुख-वैभव की व्यर्थता को सिद्ध करने का प्रयास किया है।

(2) ‘कर यत्न मिटे सब सत्य’ में अनुप्रास अलंकार ‘सत्य किसी ने जाना’ में प्रश्नालंकार तथा “सीखा ज्ञान भुलाना’ में विरोधाभास अलंकारों का संदर व स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। इस संदर्भ में ‘कबीरदास’ ने भी कहा है
‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ पंडित भया न कोय’।

(3) कवि ने संसार को मूर्ख सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क दिए हैं।

(4) सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।

(5) शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

(6) इस पद्यांश में आत्मकथात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है तथा मुक्त छंद है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि किसे नादान कहता है और क्यों?
(ख) ‘दाना’ से कवि का क्या अभिप्राय है?
(ग) कवि ‘जग को मूढ़’ क्यों कहता है?
(घ) कवि किस प्रकार के ज्ञान को भलाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का प्रमुख भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि उन लोगों को नादान कहता है जो सांसारिक धन-वैभव को प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन भाग-दौड़ करते रहते हैं। कवि का विचार है कि अज्ञानता के कारण लोग प्रेम मार्ग को त्यागकर धन-वैभव तथा भोग-विलास में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं।

(ख) ‘दाना’ से कवि का अभिप्राय है सांसारिक धन-वैभव और भोग-विलास जो मनुष्य को सच्चा सुख प्रदान नहीं करते।

(ग) जो लोग सांसारिक सुख भोग की संपत्ति का संग्रह करने में लगे हुए हैं, कवि उन्हें मूढ़ कहता है क्योंकि ऐसे लोग ही अज्ञान के कारण प्रेम को प्राप्त नहीं कर पाते।

(घ) कवि सांसारिक विषय-वासनाओं के ज्ञान को भुलाना चाहता है, क्योंकि यह ज्ञान कवि को सच्चा सुख प्रदान नहीं करता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सत्य पर प्रकाश डाला है कि संसार में जीवन के सत्य को कोई नहीं पहचान सका। जो लोग सांसारिक मोह-माया के शिकार बने हुए हैं, वह निश्चित ही मूर्ख हैं। कवि ने इस प्रकार के ज्ञान को भुलाने की कामना की है।

[7] मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,
मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;
जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव,
मैं प्रति पग में उस पृथ्वी को ठुकराता! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-जग = संसार। नाता = संबंध। रोज़ = प्रतिदिन। वैभव = धन-संपत्ति। प्रतिपग = हर कदम।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस गीत में कवि ने निजी प्रेम का खुले शब्दों में वर्णन किया है। इस पद्यांश में कवि ने स्वयं को सांसारिक मोह-माया से भिन्न बताया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरा इस संसार में कोई लंबा-चौड़ा संबंध नहीं है। मैं भावनाओं का कवि हूँ और संसार की रीति-नीति से सर्वथा भिन्न हूँ। संसार के लोग दुनियादारी निभाने में लगे रहते हैं, लेकिन मैं अपने जीवन में भावनाओं को महत्त्व देता हूँ। इसलिए मेरा संसार से कोई मेल नहीं है। मैं प्रतिदिन न जाने कितने संसार बनाता हूँ और न जाने कितने मिटा डालता हूँ। भाव यह है कि मैं प्रतिदिन एक आदर्श समाज बनाने की कल्पना करता हूँ। परंतु जब मेरी कल्पना साकार नहीं होती तो मैं नई कल्पना करने लगता हूँ। इस संसार के लोग धन-संपत्ति का संग्रह करने में लगे हैं, लेकिन मेरे मन में धन-वैभव के लिए कोई लालसा नहीं है। मैं हर कदम पर धन-वैभव में लगे हुए इस संसार को ठुकराता हुआ चलता हूँ। मेरे मन में सुख-समृद्धि की कोई इच्छा नहीं है।

विशेष-

  1. कवि ने सांसारिक धन-वैभव को त्यागकर भावनाओं के प्रति अपनी आसक्ति को व्यक्त किया है।
  2. कवि का यह चिंतन पूर्णतया मौलिक और दार्शनिक है।
  3. ‘जग जिस पृथ्वी पर जोड़ा करता वैभव’ में विशेषण विपर्यय अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘कहाँ का माता’ में प्रश्नालंकार, ‘जग जिस पृथ्वी पर’, ‘प्रति पग में अनुप्रास, ‘बना-बना’ में पुनरुक्ति अलंकार, ‘और’ में यमक (भिन्न तथा ‘व’ के अर्थ में) इन अलंकारों की छटा दर्शनीय है।
  5. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  6. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  7. इस पद्यांश में प्रसाद गुण है तथा संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि स्वयं को संसार से अलग क्यों समझता है?
(ख) ‘और जग और’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) कवि किस प्रकार के संसार को मिटाता रहता है?
(घ) कवि स्वयं को संसार से क्यों नहीं जोड़ पाता?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के अन्य लोगों के समान धन-संपत्ति के संग्रह में विश्वास नहीं करता। वह तो निजी भावनाओं में ही खोया रहता है। इसलिए वह स्वयं को संसार से अलग समझता है।

(ख) ‘और जग और’ का भावार्थ यह है कि संसार के लोग कवि की भावनाओं को समझ नहीं पाते। सांसारिक प्राणी धन-संपत्ति के पीछे भागते रहते हैं, लेकिन कवि प्रेम और प्यार के संसार में खोया रहता है।

(ग) कवि तो प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है। इसलिए वह कल्पना द्वारा एक आदर्श समाज बनाने का प्रयास करता है परंतु जब वह प्रेम की कसौटी पर खरा नहीं उतरता तो वह उसे नष्ट कर देता है। इस प्रकार वह फिर से प्रेममय संसार की कल्पना करने लगता है।

(घ) कवि प्रेम और प्यार में विश्वास करने वाला व्यक्ति है, परंतु संसार के लोग धन-वैभव के संग्रह में लगे हुए हैं। इसलिए कवि और संसार के लक्ष्य अलग-अलग हैं। इसी कारण कवि स्वयं को संसार से जोड़ नहीं पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि स्वयं को संसार से अलग समझता है। वह प्रेम और प्यार की भावनाओं को अलग महत्त्व देता है। इसलिए वह एक ऐसा संसार बनाना चाहता है जो प्रेम और प्यार पर आधारित हो। इसलिए कवि सांसारिक धन-वैभव को ठोकर मारकर प्रेममय संसार बनाने की कामना करता है।

[8] मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,
शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,
हों जिस पर भूपों के प्रासाद निछावर,
मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ। [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-निज = अपना। रोदन = रोना। राग = प्रेम। आग = जोश, आवेश। भूप = राजा। प्रासाद = महल। खंडहर = टूटा-फूटा भवन। निछावर = कुर्बान करना।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से लिया गया है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मेरे रोने में प्रेम छिपा हुआ है अर्थात् मैं अपने गीत में प्रेम के आँसू बहाता रहता हूँ। भले ही मेरी वाणी कोमल तथा शीतल है फिर भी उसमें प्रेम-विरह की आग है। मेरे गीतों में एक ऐसा जोश है जो मुझे कविता लिखने की प्रेरणा देता है। प्रेम पर तो बड़े-बड़े राजा-महाराजा अपने महलों को न्योछावर कर देते हैं, परंतु मेरा प्रेम निराशा के कारण टूटे-फूटे भवन जैसा हो गया है। फिर भी मैं अपने मन में उस मल्यवान प्रेम को लिए फिरता हूँ। मैं अपनी इस विरह-भावना से अत्यधिक प्रेम करता

विशेष-

  1. इसमें कवि ने अपनी विरह-वेदना को मुखरित किया है तथा साथ ही स्पष्ट किया है कि उसकी वाणी कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें विरहाग्नि छिपी हुई है। कवि ने अपने विरह जनित प्रेम को खंडहर बताकर अपनी निराशा को व्यक्त किया
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  5. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्यांश में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि अपने ‘रोदन में राग को क्यों लिए फिरता है?
(ख) ‘शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ’ का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) राजाओं के प्रासाद किस पर न्यौछावर होते हैं?
(घ) कवि के अनुसार खंडहर का भाव क्या है?
(ङ) इस पद्यांश का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि के स्वर में निराशा और व्यथा है। लेकिन कवि के इस रुदन में सच्चे प्रेम की भावना है। वह वियोग जनित वेदना को इसलिए अपने हृदय में लिए हुए है, क्योंकि वह अपने प्रेम को भुला नहीं सकता।

(ख) विरह-वेदना के कारण कवि का स्वर कोमल तथा शीतल है, परंतु उसमें अपने प्रिय को न पा सकने की बेचैनी भी प्रबल है। यहाँ शीतलता और अग्नि का संयोग अद्भुत है। कवि अपनी विरहाग्नि को अपने गीतों में छिपाए हुए है। बडे राजा भी प्रेम के लिए अपना सब कछ त्याग देते हैं। यहाँ तक कि वे अपनी प्रिया को पाने के लिए राजगद्दी भी छोड़ देते हैं और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन व्यतीत करने लगते हैं।

(घ) जिस प्रकार महल टूटकर खंडहर हो जाता है, उसी प्रकार कवि के प्रेम का महल भी टूट चुका है, अब उसके हृदय में केवल उसकी प्रिया की यादें ही बसी हैं जिसकी तुलना कवि खंडहर के साथ करता है।

(ङ) कवि ने अपने कोमल गीतों द्वारा अपनी विरह वेदना को व्यक्त किया है। यह वेदना अग्नि के समान कवि को गीत लिखने की प्रेरणा देती है।

[9] मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-फूट पड़ा = अत्यधिक आवेग से रोना। छंद बनाना = कविता लिखना। दीवाना = पागल।

प्रसंग प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके रचयिता श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने सरल शब्दों में यह समझाने का प्रयास किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-वेदना की अभिव्यक्ति हुई है।

व्याख्या कवि कहता है कि तुम मेरी कविता को गीत कहते हो। यह कोई गाना नहीं है, बल्कि मेरे हृदय का रुदन है, मेरी विरह-वेदना है। प्रेम की निराशा के कारण ही मेरी भावनाएँ अत्यधिक आवेग के साथ व्यक्त हुई हैं, परंतु तुम इसे कविता की संज्ञा देते हो। सच्चाई तो यह है कि मेरे गीतों के माध्यम से मेरा क्रंदन फूट पड़ा है। संसार मुझे कवि समझकर क्यों अपनाना चाहता है? सच्चाई तो यह है कि मैं कवि नहीं हूँ, मैं तो प्रेम का दीवाना हूँ। मेरे हृदय में प्रेम की मस्ती भरी हुई है। मैं गीतों के माध्यम से प्रेम-विरह की भावनाओं को प्रकट करता हूँ।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्वीकार किया है कि उसके प्रत्येक गीत में विरह-व्यथा का रुदन है। यह कोई गीत नहीं है।
  2. कवि स्पष्ट करता है कि उसकी आवेगपूर्ण भावनाओं के कारण ही गीत की उत्पत्ति होती है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. ‘क्यों कवि कहकर’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. इस पद्यांश पर उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. संबोधन शैली के प्रयोग के कारण इस पद्य में नाटकीयता तथा सजीवता उत्पन्न हो गई है।
  7. माधुर्य गुण है तथा वियोग-शृंगार का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) लोग कवि के रुदन को गाना क्यों कहते हैं?
(ख) छंद बनाना और फूट पड़ना में क्या संबंध है?
(ग) कवि स्वयं को एक नया दीवाना क्यों कहता है?
(घ) संसार कवि को कवि कहकर क्यों अपनाना चाहता है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) भले ही कवि अपनी कविताओं के द्वारा अपनी विरह-व्यथा को व्यक्त करता है, लेकिन लोग उसकी कविता से प्यार करते हैं। इसीलिए उसे गाना कहते हैं।

(ख) जब कवि अपनी तीव्र विरह-व्यथा को काव्य में शब्दों द्वारा व्यक्त करता है तो उसे छंद बनाना कहते हैं। वस्तुतः एक उत्कृष्ट कविता में भावनाओं का आवेग अवश्य होना चाहिए तभी वह कविता पाठक को भाव-विभोर करती है।

(ग) कवि स्वयं को नया दीवाना इसलिए कहता है क्योंकि उसके हृदय में प्रेम की मस्ती है और अपने गीतों द्वारा प्रेममयी भावनाओं को व्यक्त करता है।

(घ) संसार कवि को कवि कहकर इसलिए अपनाना चाहता है क्योंकि कवि की भावनाएँ छंदोबद्ध रचना के माध्यम से व्यक्त हुई है। संसार के लोग कवि को मात्र कवि समझते हैं, परंतु कोई भी उसकी प्रेम भावनाओं को नहीं समझ पाता।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने सहज तथा स्पष्ट शब्दावली में यह स्पष्ट कर दिया है कि उसके प्रत्येक गीत के पीछे उसकी विरह-वेदना छिपी हुई है। इस विरह-वेदना के कारण ही कवि के गीत उत्पन्न हुए हैं।

[10] मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ,
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ
जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ! [पृष्ठ-6]

शब्दार्थ-मादकता = मस्ती। निःशेष = पूर्ण। जग = संसार।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘आत्मपरिचय’ से अवतरित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी प्रेम भावना को मुखरित किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि मैं इस संसार में प्रेम के दीवानों की वेशभूषा धारण करके विचरण कर रहा हूँ। इसलिए लोग मुझे दीवाना समझते हैं। परंतु मैं अपनी दीवानगी से सबको मस्त बना देता हूँ। मेरे संपूर्ण काव्य में एक मस्ती और उल्लास है। इसीलिए मैं प्रेम और यौवन के गीत गाता हूँ। यही कारण है कि लोग मेरे गीतों को सुनकर झूम उठते हैं। प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती से लहराने लगते हैं। मैं अपने पाठकों को मौज और मस्ती का संदेश देना चाहता हूँ। मेरी कविता में केवल प्रेममयी भावनाओं का ही वर्णन अभिव्यक्त हुआ है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने स्पष्ट किया है कि वह प्रेम के कारण दीवाना हो चुका है और सभी को प्रेम की मस्ती का संदेश देना चाहता है।
  2. ‘झूम झुके’ में अनुप्रास अलंकार का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश में उमर खय्याम की रुबाइयों का प्रभाव है।
  6. ‘लिए फिरता हूँ शब्दों के प्रयोग के कारण इस पद्यांश में संगीत और मस्ती समाहित हो गई है।
  7. प्रसाद गुण है तथा शृंगार रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि संसार को क्या संदेश देना चाहता है?
(ख) कवि की किस बात को सुनकर संसार के लोग झूमते, झुकते और लहराने लगते हैं?
(ग) ‘मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ’ इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) कवि के गीतों में मादकता क्यों है?
(ङ) इस पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि संसार के लोगों को यह संदेश देना चाहता है कि वे सांसारिक झंझटों को त्यागकर प्रेम और मस्ती के साथ जीवन-यापन करें। इसी से उन्हें सच्चे आनंद की प्राप्ति होगी।

(ख) कवि के गीतों में प्रेम की मस्ती और मादकता है जिसे सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं, प्रेम से झुक जाते हैं और मस्ती में लहराने लगते हैं।

(ग) यहाँ कवि यह स्पष्ट करना चाहता है कि वह प्रेम के दीवानों के समान अपना जीवन व्यतीत कर रहा है। उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य अपनी प्रिया के प्रेम को प्राप्त करना है।

(घ) कवि प्रेम की मस्ती में आकंठ डूबा हुआ है। वह हमेशा प्रेम और यौवन के गीत गाता है। इसलिए हमेशा प्रेम और मस्ती में ही डूबा रहता है। उसे सांसारिक मोह-माया से कोई लगाव नहीं है।

(ङ) इस पद्यांश में कवि ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम की मस्ती के कारण वह दीवाना बन चुका है। उसकी इसी मादकता पर संसार के लोग झूम उठते हैं और वह लोगों को इसी मस्ती का संदेश देना चाहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

एक गीत पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या एवं अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

[1] हो जाए न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-पथ = रास्ता। मंजिल = लक्ष्य। पंथी = मुसाफिर । ढलना = समाप्त होना।

प्रसंग प्रस्तत पद्यांश हिंदी की पाठयपस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का अत्यंत सूक्ष्म चित्रण किया है।

व्याख्या-कवि कहता है कि मुसाफिर बार-बार यह सोचता है कि कहीं उसे रास्ते में रात न हो जाए। मंजिल अब उस नहीं है। वह पास ही आने वाली है। भाव यह है कि वह अपने प्रिय को प्राप्त करने वाला है। बार-बार अपने प्रिय के बारे में सोचकर वह जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता है, ताकि वह अपने प्रिय से मिल सके। प्रिय-मिलन की बेचैनी के कारण उसे लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है और कभी भी छिप सकता है।

विशेष-

  1. इस पद्यांश में कवि ने प्रेम की बेचैनी का बड़ा ही सजीव, सूक्ष्म वर्णन किया है।
  2. प्रेमी को दिन के छिपने का डर लगा रहता है इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है। इस प्रकार प्रेमी की व्यग्रता को व्यक्त किया गया है।
  3. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  4. सहज, सरल, साहित्यिक और प्रवाहमयी हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  5. शब्द-चयन सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  6. कोमलकांत पदावली के कारण इस गीत में संगीतात्मकता का समावेश हुआ है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-

प्रश्न-
(क) कवि और कविता का नाम लिखिए।
(ख) ‘थका हुआ पंथी’ किस कारण जल्दी-जल्दी चलता है?
(ग) ‘पंथी’ किस आशा से प्रेरित होकर जल्दी-जल्दी चलता है?
(घ) ‘दिन जल्दी-जल्दी ढलता है। कवि को यह कथन बेचैन क्यों करता है?
(ङ) इस,पद्यांश का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) कवि का नाम हरिवंशराय बच्चन कविता का नाम एक गीत

(ख) थका हुआ मुसाफिर अपने लक्ष्य को पास देखकर उसे जल्दी से प्राप्त करना चाहता है, इसीलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(ग) पंथी के मन में यह आशा उत्पन्न हो चुकी है कि उसकी मंजिल पास आ चुकी है इसलिए अब जल्दी से उसका प्रिय से मिलन होगा। इसलिए वह जल्दी-जल्दी चलता है।

(घ) कवि अपनी मंजिल को पाने के लिए बेचैन है। वह चाहता है कि दिन छिपने से पहले अपने प्रिय को प्राप्त कर ले, लेकिन दिन जल्दी-जल्दी अस्त होने जा रहा है इसलिए वह बेचैन हो उठता है।

(ङ) कवि ने यह स्पष्ट किया है कि लक्ष्य को पाने वाला व्यक्ति हमेशा व्यग्र रहता है। उसे लगता है कि समय जल्दी से बीतता जा रहा है। इसलिए वह बड़ी तीव्र गति से अपने काम को पूरा करना चाहता है। इस प्रकार के व्यक्ति का मन बड़ा बेचैन हो उठता है।

[2] बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है! [पृष्ठ-7]

शब्दार्थ-प्रत्याशा = आशा। नीड़ = घोंसला। झाँकना = बाहर देखना। पर = पंख। चंचलता = तीव्रता। .

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इसमें कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा अपनी मन की व्याकुलता को व्यक्त किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि जब चिड़ियाँ आकाश में उड़ती हुई अपने घोंसलों में लौटती हैं तो उनके मन में बार-बार यह विचार उठता है कि उनके बच्चे बेचैन होकर उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। वह बार-बार घोंसलों से मुँह बाहर निकालकर झाँक रहे होंगे। चिड़ियों को अपने बच्चों की चिंता सताने लगती है। इसलिए वे तीव्र गति से अपने पंखों को फड़फड़ाते हुए घोंसलों की तरफ बढ़ने लगती हैं। उनके मन में यह भय सताता रहता है कि कहीं दिन न छिप जाए। इसलिए वह तीव्र गति से उड़ने लगती है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने चिड़िया के बिंब द्वारा प्रेमी के हृदय की बेचैनी को व्यक्त किया है।
  2. जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार का प्रयोग हुआ है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. इस पद्यांश का बिंब-विधान तथा चित्र-विधान दोनों ही आकर्षक बन पड़े हैं।
  6. प्रसाद गुण है तथा वात्सल्य भाव का सुन्दर परिपाक हुआ है।
  7. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) बच्चे किस आशा से नीड़ों से बाहर झाँक रहे होंगे?
(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा किस दृश्य की कल्पना की गई है?
(ग) चिड़ियों के पंखों में चंचलता क्यों उत्पन्न हो जाती है?
(घ) चिड़ियों को क्यों लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है?
(ङ) इस कविता द्वारा कवि क्या संदेश देना चाहता है?
उत्तर:
(क) चिड़ियों के बच्चे इसलिए घोंसलों से बाहर झांक रहे हैं, क्योंकि वे माँ के आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि माँ लौटकर उन्हें चुग्गा देगी। इसलिए वे माँ की ममता के लिए बेचैन हैं।

(ख) चिड़ियों के घोंसलों द्वारा उस दृश्य की कल्पना की है जब चिड़ियों के बच्चे अपने माँ के आने की प्रतीक्षा के कारण घोंसलों से बाहर झाँकने लगते हैं। एक ओर उनके मन में माँ की ममता होती है और दूसरी ओर वे भूखे होते हैं।

(ग) चिड़िया अपने बच्चों से शीघ्र मिलना चाहती है। बच्चों की ममता उन्हें पुकारती है। वे शीघ्र ही बच्चों को भोजन व सुरक्षा देना चाहती है। इसीलिए उनके पंखों में चंचलता उत्पन्न हो गई है।

(घ) चिड़ियों के मन में बेचैनी है। वे जल्दी-जल्दी अपने शावकों के पास पहुँच जाना चाहती हैं। परंतु उनकी मंजिल दूर है। इसी बेचैनी के कारण उन्हें लगता है कि दिन जल्दी-जल्दी ढल रहा है।

(ङ) कवि ने माँ की ममता का सजीव चित्रण किया है। वात्सल्य और प्रेम के कारण ही शावकों का मन बेचैन हो उठता है। चिड़ियों के माध्यम से कवि ने मानवीय ममता तथा वात्सल्य का सजीव वर्णन किया है।

[3] मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल?
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

शब्दार्थ-विकल = व्याकुल। हित = के लिए। चंचल = बेचैन, क्रियाशील। शिथिल = ढीला करना। पद = पाँव। उर = हृदय। विह्वलता = आतुरता का भाव।

प्रसंग-प्रस्तुत पद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित कविता ‘एक गीत’ से अवतरित है। यह गीत कवि के काव्य-संग्रह ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसके कवि श्री हरिवंश राय बच्चन हैं। इस पद्यांश में कवि ने अपनी हृदयगत निराशा, उदासी तथा प्रेम की असफलता का सजीव वर्णन किया है।

व्याख्या कवि कहता है कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो मुझसे मिलने के लिए बेचैन हो। इसलिए मेरा मन किसी के लिए भी चंचल नहीं होता। आशय यह है कि मेरे मन में किसी के प्रति प्रेम की भावना नहीं है। यह स्थिति मेरे कदमों को शिथिल कर देती है। प्रेम के अभाव के कारण मैं ढीला पड़ जाता हूँ और मेरे हृदय में निराशा तथा उदासी की भावना उत्पन्न होकर मुझे व्याकुल कर देती है। फिर भी मैं प्रेम की तरंग में खो जाता हूँ और दिन जल्दी-जल्दी ढल जाता है।

विशेष-

  1. इसमें कवि ने प्रेम के क्षेत्र में असफल होने के कारण अपने हृदयगत निराशा और उदासी का संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. ‘जल्दी-जल्दी’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है तथा प्रथम दो पंक्तियों में प्रश्नालंकार है।
  3. सहज, सरल, साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित व सटीक है।
  5. प्रसाद गुण है तथा वियोग-शृंगार का परिपाक हुआ है।
  6. संपूर्ण पद्य में संगीतात्मकता का समावेश है।

पद पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर

प्रश्न-
(क) कवि के मन में यह प्रश्न क्यों उठता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल है?
(ख) कवि किसके लिए चंचलता को त्याग देता है?
(ग) कवि के कदम शिथिल क्यों हो जाते हैं?
(घ) कवि के मन में कैसी विह्वलता उत्पन्न होती है?
(ङ) इस पद्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर:
(क) कवि अब अकेला रह गया है, क्योंकि उसका प्रिय उसे छोड़कर चला गया है। इसीलिए वह सोचता है कि उससे मिलने के लिए कोई व्याकुल नहीं है।

(ख) कवि के मन में अब अपने प्रिय को मिलने की बेचैनी नहीं है। इसलिए वह चंचलता को त्याग देता है।

(ग) कवि अब समझ चुका है कि जिसे वह प्रेम करता था, अब वह उसे मिलने वाला नहीं है। इसलिए उसके कदम शिथिल हो जाते हैं और वह तटस्थ भाव से चलने लगता है।

(घ) कवि के मन में यह विह्वलता उत्पन्न होती है कि वह इस प्रेममय संसार में अकेला रह गया है। कोई भी व्यक्ति अब उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहा, इसलिए कवि निराश व उदास है।

(ङ) कवि ने यह स्वीकार किया है कि उसकी प्रिया उसे छोड़कर चली गई है। अतः वह अब अकेला रह गया है। इसलिए इस पद्यांश में कवि की वियोगजन्य पीड़ा का मार्मिक वर्णन हुआ है।

आत्म-परिचय, एक गीत Summary in Hindi

आत्म-परिचय, एक गीत कवि-परिचय

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी काव्यगत विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री हरिवंश राय बच्चन का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री हरिवंश राय बच्चन का आधुनिक हिंदी कवियों में महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका जन्म सन् 1907 में इलाहाबाद (प्रयाग) के कटरा मुहल्ले के एक कायस्थ परिवार में हुआ। उनके पिता का नाम प्रताप नारायण था जो अपने मधुर स्वभाव के कारण सभी लोगों में प्रिय थे। बच्चन जी की आरंभिक शिक्षा काशी में हुई। सन् 1938 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पीएच०डी० की उपाधि प्राप्त की। तत्पश्चात् वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य करने लगे। वे आकाशवाणी के साहित्यिक कार्यक्रमों से भी संबद्ध रहे। भारत सरकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उनको विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के रूप में नियुक्त किया। सन् 1966 में बच्चन जी राज्यसभा के सदस्य मनोनीत हुए।

बच्चन जी को अपने आरंभिक जीवन में अनेक संघर्षों का सामना करना पड़ा। उनकी आर्थिक स्थिति सुखद नहीं थी। वे अध्यापक के पद पर कार्यरत थे। तभी उनकी पत्नी श्यामा असाध्य रोग से ग्रस्त होकर मृत्यु का शिकार हो गई। पत्नी की मृत्यु से कवि को गहरा आघात लगा। जिससे उनके जीवन में केवल निराशा एवं दुख छा गया। सन् 1942 में कवि ने तेजी बच्चन से दूसरा विवाह किया। तेजी बच्चन के आने से उनके जीवन का भाग्योदय हुआ और वे निरंतर प्रगति करते चले गए। भारत सरकार ने बच्चन जी को ‘पद्म विभूषण’ की उपाधि से विभूषित किया।

2. प्रमुख रचनाएँ बच्चन जी की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं-‘मधुशाला’ (सन् 1935), ‘मधुबाला’ (सन् 1938), ‘मधुकलश’ (सन् 1938), ‘निशा निमंत्रण’, ‘आकुल-अंतर’, ‘एकांत संगीत’, ‘प्रणय पत्रिका’, ‘सतरंगिणी’, ‘दो चट्टानें’, ‘मिलनयामिनी’, ‘आरती’ और ‘अंगारे’, ‘नये पुराने झरोखे’, ‘टूटी-फूटी कड़ियाँ’ आदि। उनकी कुछ आत्मकथामूलक रचनाओं से उनके संपूर्ण जीवन का विशद वर्णन मिलता है। ये रचनाएँ हैं-‘क्या भूलूँ क्या याद करूँ’, ‘नीड़ का निर्माण फिर’, ‘बसेरे से दूर’, ‘दशद्वार से सोपान तक।
सन् 2003, में मुंबई में इस महान् साहित्यकार का निधन हो गया।

3. काव्यगत विशेषताएँ उत्तर छायावादी कवियों में बच्चन जी को विशेष प्रसिद्धि मिली। वे हिंदी साहित्य में हालावाद के प्रवर्तक माने जाते हैं। उन्होंने उमर खय्याम की रुबाइयों का अत्यंत सुन्दर अनुवाद किया था। ‘मधुशाला’ बच्चन जी की एक उल्लेखनीय रचना है, जिसमें प्रेम की मस्ती देखी जा सकती है। ‘मधुशाला’, ‘मधुबाला’ तथा ‘मधुकलश’ उनकी कीर्ति की आधार-स्तंभ काव्य-रचनाएँ हैं। उनके काव्य में प्रेम भावना, मदमस्त जीवन तथा भाग्यवाद का समर्थन देखने को मिलता है। उनके काव्य की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं
(i) व्यक्तिनिष्ठता श्री हरिवंश राय बच्चन आधुनिक हिंदी काव्य की वैयक्तिक काव्यधारा के प्रमुख कवि के रूप में जाने जाते हैं। उनकी विचारधारा व्यक्तिनिष्ठ है। उन्होंने वैयक्तिक यथार्थ की भूमिका पर ही जीवन एवं जगत को देखने व समझने का प्रयास किया है। वे समाज-हित के साथ-साथ व्यक्ति-हित को भूलने के पक्ष में नहीं हैं। कहीं-कहीं उनके साहित्य में वैयक्तिकता के नाम पर पलायनवादिता का स्वर भी सुनाई पड़ता है।

(ii) प्रेम,और सौंदर्य-वस्तुतः हरिवंश राय बच्चन प्रेम और सौंदर्य के कवि हैं। उनके अन्य साहित्य में भी उनकी यह भावना देखी जा सकती है। उनके साहित्य में प्रेम और सौंदर्य के साथ जीवन के प्रति पूर्ण आस्था अभिव्यक्त हुई है। उनकी रचनाओं में गहन अनुभूतियों को भी सर्वत्र देखा जा सकता है
“इस पार प्रिये, तुम हो, मधु है,
उस पार न जाने क्या होगा।”

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 1 आत्म-परिचय, एक गीत

(iii) मानवतावाद-बच्चन जी की रचनाओं में मानवतावादी भावना भी मुखरित हुई है। उनकी रचनाओं में मानव मात्र के प्रति प्रेम का भाव सर्वत्र व्याप्त है। वे मानव की करता को देखकर व्यथित हो उठते हैं।

(iv) सामाजिक यथार्थ बच्चन जी की गद्य रचनाओं में सामाजिक यथार्थ का चित्रण अत्यंत सजीवता से हुआ है। सामाजिक यथार्थ के साथ-साथ उनकी रचनाओं की प्रक्रिया भी अनायास ही मुखरित हो उठी है। उनकी आत्मकथात्मक रचनाओं में उनके संघर्षशील जीवन के दर्शन होते हैं।

(v) आशा और सूजन का स्वर-बच्चन जी की कविताओं में केवल प्रणय और निराशा ही नहीं, बल्कि आशा और सृजन का स्वर भी सुनाई पड़ता है। ‘पथ की पहचान’ नामक कविता में कवि ने मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी है। वे पाठकों को सृजन की कल्पना करने तथा यथार्थ को स्वीकार करने का संदेश भी देते हैं। ‘बंगाल का अकाल’ शीर्षक कविता तथा ‘परवर्ती’ काव्य में कवि ने जन-जीवन को प्रतिस्थापित किया है और नए संदर्भो को प्रस्तुत किया है। एक स्थल पर कवि कहता है
“किंतु जग के पथ पर यदि
स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो,
सत्य का भी ज्ञान कर लो।”

4. भाषा, छंद एवं अलंकार-बच्चन जी ने अपनी काव्य रचनाओं में आडंबरहीन भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में यदि प्रवाह है, तो चित्र विधान की शक्ति तथा प्रतीक शब्द योजना भी है। वे हमेशा सीधे ढंग से अपनी बात कहते हैं। वे भाषा में अभिधा-शक्ति का प्रयोग करते हुए अपने मन के भाव पाठकों तक पहुँचाते हैं। गेय होने के कारण उनकी रचनाओं को गीत के रूप में मान्यता प्राप्त है। यही कारण है कि आधुनिक गीतकारों में उनका प्रमुख स्थान है।
बच्चन जी की कविताओं में अलंकारों का प्रयोग स्वाभाविक रूप में हुआ है। अनुप्रास, रूपक, यमक, उत्प्रेक्षा, मानवीकरण आदि उनके प्रिय अलंकार हैं। उदाहरण के लिए
अनुप्रास-“है अनिश्चित, कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे।”
रूपक-“ये उदय होते, लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में।”
उपमा-“घूमती नूरमहल थी एक दिवस बन जिन महलों की नूर।
खड़े हैं खंडहर से वे आज किसी दिन हो जाएँगे धूर।”
मानवीकरण-“रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता।”
बच्चन जी के कवि-रूप पर विचार करते हुए डॉ० मत्येंद्र नाथ शुक्ल ने अपनी पुस्तक ‘कविता का आधुनिक परिप्रेक्ष्य में लिखा है
“छायावादी संस्कारों से अलग हटकर बच्चन ने कविता को नितांत नवीन संदर्भ प्रदान किया है। इनकी रचना-यात्रा में व्यष्टि-समष्टि, सूक्ष्म-स्थूल, सामान्य-विशेष तथा विभिन्न सामाजिक रूपों का सफल चित्रण हुआ है।”

आत्म-परिचय कविता का सार

प्रश्न-
श्री हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित कविता ‘आत्मपरिचय’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘आत्मपरिचय’ श्री हरिवंश राय बच्चन की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें कवि ने अपने प्रेममय व्यक्तित्व पर प्रकाश डाला है। कवि अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदा सजग है। वह जीवन के कष्टों तथा बाधाओं चाहता है। प्रेम से उसका हृदय झंकृत है। वह हमेशा अपनी प्रिया के स्नेह में लीन रहता है। संसार के अन्य लोग हमेशा अपनी समस्याओं में उलझे रहते हैं, परंतु कवि का हृदय प्रेम से सदा सराबोर रहता है। वह संसार की कभी चिंता नहीं करता। सांसारिक जीवन के बोझ को ढोता हुआ भी वह जीवन में प्यार को अधिक महत्त्व प्रदान करता है। कवि के हृदय में नए-नए मनोभाव हैं। ये मनोभाव उसके लिए उपहारस्वरूप हैं। यह अधूरा संसार कवि को अच्छा नहीं लगता। इसलिए वह सपनों के संसार मे डूबा रहता है। सुख-दुख दोनों कवि के लिए एक समान हैं। वह अपने प्रेम की मस्ती और उमंग से जीवनयापन करना ही ठीक समझता है और इस प्रकार प्रेम रूपी नाव के द्वारा संसार की मुसीबतों को पार करता है। कवि के मन में सदा यौवन का पागलपन सवार रहता है। इसीलिए वह अपनी प्रेमिका से मिलने के लिए बेचैन रहता है। प्रिया का वियोग कवि को पीड़ित करता है, लेकिन वह संसार के सामने हँसता रहता है। संसार के अनेक लोगों ने सत्य को जानने की कोशिश की, परंतु कोई भी सत्य को जान नहीं पाया। लोग संसार के भौतिक साधनों का संग्रह करने के चक्कर में उलझकर रह गए हैं। परंतु कवि जान चुका है कि इससे दूर रहने में ही भलाई है।

संसार जिसे हर रोज़ जोड़ने का प्रयास करता है, कवि उसे हर कदम पर ठुकराता हुआ चलता है। वह तो हमेशा भावनाओं के संसार में जीना चाहता है। कवि को अपने रोने में भी संगीत सुनाई देता है, उसकी शीतल वाणी में विद्रोह की आग है। उसका प्रेम भले ही खंडहर के समान टूटा-फूटा है, पर वह उस प्रेम पर राजाओं के महलों को भी न्योछावर करना चाहता है। अंत में कवि कहता है कि उसका रुदन ही गीत बन गया है। कवि ने खुलकर अपनी भावनाएँ व्यक्त की, पर लोग उसे छंद की संज्ञा देते हैं। सचमुच कवि एक दीवाना है, उसके गीतों में एक मस्ती है, उसके गीतों को सुनकर संसार के लोग झूम उठते हैं। इसलिए कवि सबके लिए प्रेम की मस्ती का संदेश लिए गीत लिखता है।

एक गीत कविता का सार

प्रश्न-
‘एक गीत’ कविता का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत गीत ‘एक गीत’ ‘बच्चन जी’ का एक प्रसिद्ध प्रेमगीत है जो कि ‘निशा निमंत्रण’ में संकलित है। इसमें कवि ने अपने प्रेम की व्याकुलता का वर्णन किया है। कवि अपने प्रियजन से मिलने के लिए अत्यधिक बेचैन है। वह तीव्र गति से चलकर अपने प्रियजन तक पहुँच जाना चाहता है। उसे लगता है कि अब उसका लक्ष्य दूर नहीं है। कवि चिड़ियों का रूपक बाँधते हुए कहता है कि चिड़ियों के बच्चे अपने माता-पिता की प्रतीक्षा कर रहे होंगे और वह अपने घोंसलों से बाहर झांककर देख रहे होंगे। यह सोच चिड़िया के पंखों में चंचलता उत्पन्न कर देती है। परन्तु कवि सोचता है कि इस संसार में कोई भी उसका अपना नहीं है जो उसे मिलने के लिए व्याकुल हो रहा है। इसलिए उसके कदम शिथिल पड़ जाते हैं। अंत में कवि स्पष्ट करता है कि प्रेम के कारण मनुष्य के जीवन में गतिशीलता का संचरण होता है।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh & Vitan Bhag 2 Haryana Board

Haryana Board HBSE 12th Class Hindi Solutions आरोह & वितान भाग 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh काव्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh गद्य-खण्ड

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Bhag 2

HBSE 12th Class Hindi अभिव्यक्ति और माध्यम

HBSE 12th Class Hindi व्याकरण

HBSE 12th Class Hindi अपठित बोध

HBSE 12th Class Hindi Anivarya (Compulsory) Question Paper Design

Class: 12th
Subject: Hindi
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 80
Time: 3 Hours

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUASTotal
Percentage of Marks354520100
Marks28361680

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions44106 (4sub part)24
Marks Allotted2016202480
Estimated Time60564024180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. आरोह भाग-2 (पद्य भाग)25
2. आरोह भाग-2 (गद्य भाग)20
3. वितान पूरक पुस्तक10
4. अभिव्यक्ति और माध्यम15
5. पाठ आधारित व्याकरण : संधि, समास, वाक्य शोधन, अलंकार (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास यमक, मानवीकरण, श्लेष, पुनरूक्ति प्रकाश)10
Total80

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice in Long Answer Question i.e. Essay Type in Two Questions

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 12th Class Solutions in Hindi Medium & English Medium Haryana Board

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

HBSE 12th Class Physical Education राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
देश के महत्त्वपूर्ण खेल पुरस्कार कौन-कौन से हैं? किन्हीं तीन का वर्णन करें।
अथवा
किन्हीं दो राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
देश के महत्त्वपूर्ण खेल पुरस्कार हैं
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(3) अर्जुन पुरस्कार
(4) ध्यानचंद पुरस्कार आदि।
1. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार (Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
भारत सरकार द्वारा देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1991-92 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार (Rajiv Gandhi Khel Ratna Award) शुरू किया गया। इस पुरस्कार में 25 लाख रुपए नकद, एक पदक तथा एक प्रशस्ति पत्र और दिल्ली आकर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए टी० ए०/डी० ए० (TA/DA) दिया जाता है। जिस वर्ष पुरस्कार दिया जाता है, उस वर्ष आयकर में छूट होती है। पहले इस पुरस्कार में 5 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी। प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार ग्रैण्ड मास्टर विश्वनाथन आनंद (शतरंज) को दिया गया। यह पुरस्कार देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की याद में दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी खिलाड़ी को जीवन में एक बार प्रदान किया जाता है।

2. द्रोणाचार्य पुरस्कार (Dronacharya Award):
भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में एक ताँबे की मूर्ति, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

3. अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award):
अर्जुन पुरस्कार सन् 1961 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में काँस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

प्रश्न 2.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार पर विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के उद्देश्यों एवं सामान्य नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार सर्वोत्तम राष्ट्रीय खेल पुरस्कार है। यह पुरस्कार सन् 1991-92 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार ऐसे खिलाड़ी को प्रदान किया जाता है जिसका खेल के क्षेत्र में उस वर्ष उत्तम एवं उत्कृष्ठ प्रदर्शन रहा हो। यह पुरस्कार एक खिलाड़ी से अधिक खिलाड़ियों को भी प्रदान किया जा सकता है, परन्तु संबंधित खिलाड़ी किसी टीम गेम्स से हो। इस पुरस्कार में एक मैडल, एक प्रशंसा पत्र तथा 25 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। इस राशि पर उस वर्ष कोई आय-कर या संपत्ति कर नहीं लगता। पहले इस पुरस्कार में 5 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी। इस पुरस्कार के लिए जिस खिलाड़ी का चुनाव होता है उसे एक ब्लेजर, एक टाई और पुरस्कार लेने के लिए दिल्ली आने-जाने के लिए सरकार के द्वारा निश्चित TA/DA का भुगतान भी किया जाता है।

राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के उद्देश्य (Objectives of Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
इस पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) खिलाड़ियों का समाज एवं देश में आदर बढ़ाने हेतु।
(2) देश में खेल संस्कृति को विस्तृत करने एवं फैलाने हेतु।
(3) खेलों में खिलाड़ियों को प्रेरित करने हेतु ताकि वे खेल प्रतिस्पर्धाओं या प्रतियोगिताओं में उच्चतम प्रदर्शन कर सकें।

राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के सामान्य नियम (General Rules of Rajiv Gandhi Khel Ratna Award):
इस पुरस्कार के सामान्य नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार द्वारा गठित कमेटी के सदस्य अन्तिम निर्णय के लिए प्रार्थना-पत्रों पर विचार तथा उनके बारे में पूरी छानबीन करते हैं।
(2) गठित कमेटी का निर्णय अन्तिम होता है। इसके विरुद्ध कोई भी सुनवाई नहीं हो सकती।
(3) खिलाड़ी को यह पुरस्कार अपने खेल जीवन में एक बार ही मिल सकता है।
(4) यह पुरस्कार मरणोपरान्त भी प्रदान किया जा सकता है।
(5) भारत सरकार द्वारा यह पुरस्कार रद्द भी किया जा सकता है।
(6) भारत सरकार चाहे तो रद्द किए गए पुरस्कार को पुनः प्रदान भी कर सकती है।

प्रश्न 3.
द्रोणाचार्य पुरस्कार क्या है? इस पुरस्कार की पात्रता हेतु सामान्य योग्यताएँ बताएँ।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार (Dronacharya Award) पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में, गुरु द्रोणाचार्य की काँस्य की प्रतिभा, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

द्रोणाचार्य पुरस्कार की पात्रता हेतु योग्यताएँ (Eligibility Rules for Dronacharya Award):
इस पुरस्कार की पात्रता के लिए प्रशिक्षकों में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिएँ-
1. व्यक्तिगत इवेंट्स (Individual Events):
वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में खिलाड़ी/खिलाड़ियों ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(2) जिस खिलाड़ी ने ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(3) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा हो और उसको अंतर्राष्ट्रीय खेल संघ द्वारा मान्यता मिल चुकी हो।
(4) जिस खिलाड़ी ने एशियाई या राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता हो।

2. टीम इवेंट्स (Team Events):
वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में टीम ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस टीम ने विश्व कप, विश्व चैम्पियनशिप, ओलम्पिक खेलों या अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदत जीता हो और पिछले वर्ष से उसके प्रदर्शन का स्तर ऊँचा हो।
(2) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में और दूसरा एशियाई चैम्पियनशिप में जीता हो।
(3) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में तथा दूसरा राष्ट्रमंडल खेलों में जीता हो।

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प्रश्न 4.
‘अर्जुन अवार्ड’ (Arjuna Award) का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-अर्जुन अवार्ड सन् 1961 में शुरू किया गया। यह अवार्ड उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में कांस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

अर्जुन अवार्ड के लिए पात्रता संबंधित नियम (Eligibility Rules for Arjuna Award)-
अर्जुन अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निश्चित तारीख तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। सरकार द्वारा निश्चित तारीख
बढ़ाई भी जा सकती है।
(2) यदि भारत सरकार को खिलाड़ियों की सूची न मिले तो सरकार किसी विशेष खिलाड़ी को इस पुरस्कार से विभूषित कर सकती है।
(3) राष्ट्रीय खेल संघ अपने-अपने क्षेत्रों से तीन खिलाड़ियों के नाम भेज सकता है।
(4) संघ द्वारा भेजे गए तीन खिलाड़ियों में से भारत सरकार केवल एक खिलाड़ी को इस पुरस्कार से सम्मानित करती है लेकिन महिला खिलाड़ी की स्थिति में भारत सरकार इस नियम में संशोधन कर सकती है।
(5) यह पुरस्कार कहाँ और किस दिन देना है, इसका अंतिम फैसला भारत सरकार द्वारा किया जाता है।
(6) किसी भी खिलाड़ी को इस पुरस्कार से केवल एक बार ही सम्मानित किया जाता है अर्थात् दूसरी बार उसकी पात्रता रद्द कर दी जाती है।
(7) भारत सरकार के फैसले के विरुद्ध किसी प्रकार की कोई सुनवाई नहीं हो सकती।
(8) यह पुरस्कार भारत सरकार रद्द भी कर सकती है।
(9) खिलाड़ी के मरणोपरांत भी यह पुरस्कार प्रदान किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
भीम अवार्ड क्या है? भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम बताएँ।
उत्तर:
परिचय (Introduction)-भीम अवार्ड की शुरुआत सन् 1996 में हुई। यह अवार्ड अपने-अपने क्षेत्रों में ख्याति प्राप्त सामाजिक कार्यकर्ताओं, खिलाड़ियों और ग्रामीण डॉक्टरों को प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में महाभारत के पात्र भीम की एक काँस्य की प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, पाँच लाख रुपए, एक रंगीन जैकेट तथा टाई आदि प्रदान की जाती है। इस अवार्ड के लिए वे खिलाड़ी आवेदन कर सकते हैं जो पिछले तीन वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता तथा सीनियर राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त किया हो या अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया हो।

भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम (Eligibility Rules for Bhim Award):
भीम अवार्ड के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक नियम अनलिखित हैं
(1) एक ही वर्ग के खेल में एक से ज्यादा खिलाड़ी को पुरस्कृत नहीं किया जाएगा, परन्तु यदि चयनित खिलाड़ी महिला हो तो एक वर्ग के लिए एक से ज्यादा अवार्ड दिया जा सकता है।
(2) यह अवार्ड केवल उन्हीं खिलाड़ियों को दिया जाएगा, जिन्होंने हरियाणा राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय फेडरेशन या राष्ट्रीय खेलों में कम-से-कम एक बार भाग लिया हो।
(3) खिलाड़ी की उपलब्धि का प्रमाण-पत्र खेल संघ के अध्यक्ष या सचिव द्वारा प्रमाणित एवं हस्ताक्षरित किया गया हो।
(4) वे खिलाड़ी जिनके विरुद्ध नशाखोरी व मादक द्रव्यों के प्रयोग इत्यादि की जाँच लम्बित हो या दण्डित किया गया हो, ऐसेखिलाड़ी इस पुरस्कार के पात्र नहीं होंगे।
(5) खेल पॉलिसी में दिए गए सभी खेलों की चैम्पियनशिप में पिछले चार वित्तीय वर्षों के सीनियर अन्तर्राष्ट्रीय तथा सीनियर फेडरेशन कप/सीनियर राष्ट्रीय चैम्पियनशिप एवं राष्ट्रीय खेलों में खिलाड़ियों की उपलब्धियों का इस पुरस्कार के लिए मूल्यांकन किया जाएगा।
(6) जिन्हें यह अवार्ड एक बार मिल चुका है वे दोबारा इस पुरस्कार के पात्र नहीं होंगे।
(7) इस अवार्ड के सम्बन्ध में हरियाणा सरकार का निर्णय अंतिम होगा और इसके विरूद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों का महत्त्व इस प्रकार है
(1) खिलाड़ियों को उत्कृष्ट व श्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु प्रेरित करना।
(2) खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों के सम्मान व स्तर को बढ़ाना।
(3) राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
(4) युवाओं को खेल के लिए प्रेरित करना।
(5) सद्भाव, मित्रता व शांति की भावना विकसित करना।
(6) राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय भावना के लिए प्रेरित करना।

प्रश्न 2.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब और कैसे दिया जाता है?
उत्तर:
भारत सरकार द्वारा देश में खेलों को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1991-92 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार शुरू किया गया। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में 25 लाख रुपए नकद, एक पदक तथा एक प्रशस्ति पत्र और दिल्ली आकर पुरस्कार प्राप्त करने के लिए टी० ए०/डी० ए० दिया जाता है। जिस वर्ष पुरस्कार दिया जाता है, उस वर्ष आय-कर में छूट होती है। प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार ग्रैण्ड मास्टर विश्वनाथन आनंद (शतरंज) को दिया गया। यह पुरस्कार देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की याद में दिया जाता है। यह पुरस्कार किसी खिलाड़ी को जीवन में एक बार प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 3.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के कोई चार सामान्य नियम बताएँ।
उत्तर;
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के चार सामान्य नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार द्वारा गठित कमेटी के सदस्य अन्तिम निर्णय के लिए प्रार्थना-पत्रों पर विचार तथा उनके बारे में पूरी छानबीन करते हैं।
(2) गठित कमेटी का निर्णय अन्तिम होता है। इसके विरुद्ध कोई भी सुनवाई नहीं हो सकती।
(3) खिलाड़ी को यह पुरस्कार अपने खेल जीवन में एक बार ही मिल सकता है।
(4) यह पुरस्कार मरणोपरान्त भी प्रदान किया जा सकता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

प्रश्न 4.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) खिलाड़ियों का समाज व देश में सम्मान बढ़ाना।
(2) खेलों में खिलाड़ियों को प्रेरित करने हेतु ताकि वे खेल प्रतिस्पर्धाओं में उच्चतम प्रदर्शन कर सकें।
(3) देश में खेल संस्कृति का विस्तार करना।
(4) राष्ट्रीयता की भावना को बढ़ाना आदि।

प्रश्न 5.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किन्हीं दस खिलाड़ियों और उनके खेलों की सूची बनाएँ।
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित दस खिलाड़ियों और उनके खेलों की सूची निम्नलिखित हैं-

खिलाड़ीखेल
1. कर्णम मल्लेश्वरीभारोत्तोलन
2. लिएंडर पेसटेनिस
3. सचिन तेंदुलकरक्रिकेट
4. धनराज पिल्लैहॉकी
5. अभिनव बिन्द्रानिशानेबाजी
6. एम०एस० धौनीक्रिकेट
7. सानिया मिर्जाकुश्ती
8. टेनिस साक्षी मलिकपैरा-एथलेटिक्स
9. देवेंद्र झाझरियाक्रिकेट
10. विराट कोहलीखेल

प्रश्न 6.
द्रोणाचार्य पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार कब और क्यों दिया जाता है?
उत्तर:
भारत सरकार ने प्रशिक्षकों को सन् 1985 से द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित करना शुरू किया। महाभारत के पात्र गुरु द्रोणाचार्य की याद में यह पुरस्कार प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जो किसी टीम या खिलाड़ियों को स्थायी या अस्थायी रूप से प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। यह पुरस्कार ऐसे प्रसिद्ध प्रशिक्षकों को प्रदान किया जाता है जिनकी टीम या खिलाड़ियों ने पिछले तीन वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार श्रेष्ठ प्रदर्शन किया हो। नियमित रूप से इस पुरस्कार में एक ताँबे की मूर्ति, एक प्रशंसा-पत्र तथा 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर द्रोणाचार्य पुरस्कार का उद्देश्य प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना है।

प्रश्न 7.
अर्जुन अवार्ड संबंधी पात्रता के कोई चार नियम बताएँ।
उत्तर:
अर्जुन अवार्ड संबंधी पात्रता के चार नियम निम्नलिखित हैं
(1) भारत सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निश्चित तारीख तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। सरकार द्वारा निश्चित तारीख बढ़ाई भी जा सकती है।
(2) यदि भारत सरकार को खिलाड़ियों की सूची न मिले तो सरकार किसी विशेष खिलाड़ी को इस पुरस्कार से विभूषित कर सकती है।
(3) राष्ट्रीय खेल संघ अपने-अपने क्षेत्रों से तीन खिलाड़ियों के नाम भेज सकता है।
(4) संघ द्वारा भेजे गए तीन खिलाड़ियों में से भारत सरकार केवल एक खिलाड़ी को इस पुरस्कार से सम्मानित करती है लेकिन महिला खिलाड़ी की स्थिति में भारत सरकार इस नियम में संशोधन कर सकती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 9 राष्ट्रीय खेल पुरस्कार

प्रश्न 8.
ध्यानचंद पुरस्कार पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
खेलकूद में आजीवन उपलब्धियों के लिए ध्यानचंद पुरस्कार सन् 2002 में आरंभ किया गया। यह पुरस्कार हॉकी के महान् खिलाड़ी मेजर ध्यानचंद की याद में प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है, जिन्होंने अपने प्रदर्शन से खेलों में उत्कृष्ट योगदान दिया है और जो सक्रिय खेल कैरियर से निवृत्त (Retired) होने के बाद भी खेल जगत को बढ़ावा देने में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। इस पुरस्कार में एक सर्टिफिकेट, एक प्रतिभा और 10 लाख रुपए का नकद पुरस्कार प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 9.
अर्जुन पुरस्कार के लिए चयन पद्धति के बारे में लिखें।
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार भारत सरकार द्वारा खेलों में उत्कृष्ट एवं सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को दिया जाता है। इस पुरस्कार के चयन के लिए सरकार राष्ट्रीय खेल संघों से निर्धारित समय अवधि तक खिलाड़ियों की सूची मँगवाती है। यह पुरस्कार उस खिलाड़ी को दिया जाता है जिसका पिछले तीन वर्षों में उत्कृष्ट एवं श्रेष्ठ प्रदर्शन रहा हो और उस वर्ष जिस वर्ष यह पुरस्कार दिया जाना हो, खिलाड़ी की असाधारण उपलब्धियाँ हों। भारत सरकार द्वारा गठित समिति खिलाड़ियों के प्रदर्शन और उपलब्धियों पर बारीकी से अध्ययन करके सूची बनाकर भारत सरकार के पास भेज देती है।

प्रश्न 10.
भीम अवार्ड पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भीम अवार्ड की शुरुआत सन् 1996 में हुई। यह अवार्ड अपने-अपने खेलों में ख्याति प्राप्त खिलाड़ियों को प्रदान किया जाता है। इस अवार्ड में महाभारत के पात्र भीम की एक काँस्य की प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, पाँच लाख रुपए, एक रंगीन जैकेट तथा टाई आदि प्रदान की जाती है। इस अवार्ड के लिए वे खिलाड़ी आवेदन कर सकते हैं जो पिछले तीन वर्षों से अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता तथा सीनियर राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में प्रथम, दूसरा तथा तीसरा स्थान प्राप्त किया हो या अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता में हिस्सा लिया हो।

प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए पात्रता संबंधी आवश्यक योग्यताओं या उपलब्धियों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए क्या-क्या पात्रता होती है? वर्णन करें।
उत्तर:
द्रोणचार्य पुरस्कार की पात्रता के लिए प्रशिक्षकों में निम्नलिखित योग्यताएँ होनी चाहिएँ
1. व्यक्तिगत इवेंट्स-वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में खिलाड़ी/खिलाड़ियों ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड चैम्पियनशिप में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(2) जिस खिलाड़ी ने ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो।
(3) जिस खिलाड़ी ने वर्ल्ड रिकॉर्ड तोड़ा हो और उसको अंतर्राष्ट्रीय खेल संघ द्वारा मान्यता मिल चुकी हो।
(4) जिस खिलाड़ी ने एशियाई खेलों या राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता हो।

2. टीम इवेंट्स-वह प्रशिक्षक द्रोणाचार्य पुरस्कार का पात्र होता है जिसके प्रशिक्षण में टीम ने निम्नलिखित उपलब्धियाँ प्राप्त की हों
(1) जिस टीम ने विश्व कप, विश्व चैम्पियनशिप, ओलम्पिक खेलों या अन्य अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में स्वर्ण या रजत या काँस्य पदक जीता हो और पिछले वर्ष से उसके प्रदर्शन का स्तर ऊँचा हो।
(2) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में और दूसरा एशियाई चैम्पियनशिप में जीता हो।
(3) जिस टीम ने दो स्वर्ण पदक अर्थात् पहला एशियाई खेलों में तथा दूसरा राष्ट्रमंडल खेलों में जीता हो।

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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
देश के महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय खेल पुरस्कार कौन-कौन-से हैं? अथवा राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार,
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार,
(3) अर्जुन पुरस्कार,
(4) ध्यानचंद पुरस्कार।

प्रश्न 2.
पहले प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों की इनामी राशि क्या थी?
उत्तर:
(1) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार-₹7 लाख
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार (जीवन-पर्यंत व नियमित)-₹ 5 लाख
(3) अर्जुन पुरस्कार-₹5 लाख
(4).ध्यानचंद पुरस्कार (जीवन-पर्यंत व नियमित)-₹ 5 लाख।

प्रश्न 3.
अब प्रमुख राष्ट्रीय पुरस्कारों की इनामी राशि क्या है?
उत्तर:
(1) राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार-₹ 25 लाख
(2) द्रोणाचार्य पुरस्कार (जीवन-पर्यंत (Lifetime)-₹ 15 लाख
(3) द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित)-₹ 10 लाख
(4) अर्जुन पुरस्कार-₹ 15 लाख
(5) ध्यानचंद पुरस्कार (जीवन-पर्यंत)–₹ 15 लाख
(6) ध्यानचंद पुरस्कार (नियमित)-₹ 10 लाख।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार वे पुरस्कार हैं जो उन खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों को दिया जाता है जिनका गत वर्षों में प्रदर्शन उत्कृष्ट रहा हो। ये पुरस्कार उनको प्रोत्साहित करने के लिए दिए जाते हैं। ये पुरस्कार खिलाड़ियों एवं प्रशिक्षकों की सामान्य स्थिति को सुधारने और उन्हें समाज में उचित सम्मान एवं स्थान देने के उद्देश्य से दिए जाते हैं। अर्जुन अवार्ड एवं द्रोणाचार्य अवार्ड राष्ट्रीय खेल पुरस्कार के उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.
द्रोणाचार्य पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है? अथवा द्रोणाचार्य अवार्ड प्राप्त करने वाले प्रशिक्षकों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार प्राप्त करने वाले प्रशिक्षकों को नियमित रूप से गुरु द्रोणाचार्य की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र, ब्लेजर और 10 लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है। यह पुरस्कार प्रशिक्षकों को राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है। इस पुरस्कार की जीवन-पर्यंत राशि 15 लाख रुपए है।

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प्रश्न 6.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार का मुख्य उद्देश्य खिलाड़ियों को सम्मानित कर उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाना है ताकि वे समाज में सम्मान प्राप्त कर सकें।

प्रश्न 7.
अर्जुन पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है?
अथवा
अर्जुन अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार प्राप्त करने वालों को अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र और 15 लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है। यह पुरस्कार खिलाड़ियों को राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 8.
भीम पुरस्कार प्राप्त करने के लिए खिलाड़ी की कोई दो पात्रता बताएँ।
उत्तर:
(1) एक ही वर्ग के खेल में एक से ज्यादा खिलाड़ी को पुरस्कृत नहीं किया जाएगा, परन्तु यदि चयनित खिलाड़ी- महिला हो तो एक वर्ग के लिए एक से ज्यादा पुरस्कार दिया जा सकता है।
(2) यह पुरस्कार केवल उन्हीं खिलाड़ियों को दिया जाएगा, जिन्होंने हरियाणा राज्य की ओर से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय फैडरेशन या राष्ट्रीय खेलों में कम-से-कम एक बार भाग लिया हो।

प्रश्न 9.
भीम अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार खिलाड़ियों के नाम व खेल बताएँ।
उत्तर:
(1) मनोज कुमार (कुश्ती में)
(2) सुमित सांगवान (बॉक्सिंग में)
(3) साक्षी मलिक (कुश्ती में)
(4) विकास कृष्ण कुमार (बॉक्सिंग में)।

प्रश्न 10.
अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार खिलाड़ियों के नाम व खेल बताएँ।
उत्तर:
(1) कृष्णा पूनिया (एथलेटिक्स में)
(2) राजपाल सिंह (हॉकी में)
(3) विराट कोहली (क्रिकेट में)
(4) बजरंग पूनिया (कुश्ती में)।

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प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किन्हीं चार प्रशिक्षकों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) के०पी० थॉमस (एथलेटिक्स में)
(2) पुलेला गोपीचंद (बैडमिंटन में)
(3) फादके गोपाल पुरुषोत्तम (खो-खो में)
(4) नरेंद्र सिंह सैनी (हॉकी में)।

प्रश्न 12.
भीम पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है?
अथवा
भीम अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
भीम पुरस्कार प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को भीम स्मृति चिह्न, सम्मान-पत्र, ब्लेज़र, टाई/स्कार्फ और पाँच लाख रुपए नकद इनाम दिया जाता है।

प्रश्न 13.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में क्या-क्या दिया जाता है? अथवा राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड प्राप्त करने वाले खिलाड़ियों को क्या-क्या दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार प्राप्तकर्ता को एक मैडल, एक सम्मान-पत्र और 25 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है। यह पुरस्कार भारतीय राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 14.
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार किन्हें और क्यों दिए जाते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कार भारत सरकार के खेल मंत्रालय द्वारा दिए जाते हैं। ये पुरस्कार उन खिलाड़ियों को सम्मानित करने के लिए दिए जाते हैं, जिनका खेलों के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन रहा हो। ये पुरस्कार खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने तथा उनकी क्षमता, योग्यता या प्रतिभा आदि को उजागर करने के लिए दिए जाते हैं।

प्रश्न 15.
हरियाणा की किन्हीं आठ महिला खिलाड़ियों के नाम बताएँ जिन्हें भीम अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तर:
(1) बबीता कुमारी,
(2) साक्षी मलिक,
(3) दीपा मलिक,
(4) विनेश फोगाट,
(5) रानी रामपाल,
(6) पूजा रानी,
(7) शिवानी कटारिया,
(8) प्रियंका।

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प्रश्न 16.
हरियाणा के उन खिलाड़ियों के नाम बताएँ जिन्हें अब तक राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
उत्तर:
2009 में मुक्केबाज विजेंद्र सिंह, 2012 में पहलवान योगेश्वर दत्त, 2016 में रेसलर साक्षी मलिक, 2017 में हॉकी खिलाड़ी सरदार सिंह, 2019 में कुश्ती में बजरंग पुनिया व पैरा-एथलेटिक्स में दीपा मलिक और 2020 में हॉकी में रानी रामपाल व कुश्ती में विनेश फोगाट को राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

प्रश्न 17.
अर्जुन पुरस्कार (Arjuna Award) का संक्षिप्त रूप में वर्णन कीजिए।
अथवा
अर्जुन पुरस्कार कब और क्यों दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार सन् 1961 में शुरू किया गया। यह पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता है। यह पुरस्कार उन खिलाड़ियों को दिया जाता है जिनकी उस वर्ष (जिस वर्ष के लिए यह दिया जाना है) उत्कृष्ट व असाधारण उपलब्धि हो और पिछले तीन वर्षों में प्रदर्शन का स्तर उत्कृष्ट व श्रेष्ठ रहा हो। यह अवार्ड ‘महाभारत’ के पात्र अर्जुन की याद में भारत सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है। इस पुरस्कार में काँस्य की अर्जुन की एक प्रतिमा, एक सम्मान-पत्र व 15 लाख रुपए से खिलाड़ियों को पुरस्कृत किया जाता है।

प्रश्न 18.
सन् 2020 के लिए राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) रोहित शर्मा (क्रिकेट)
(2) मरियप्पन थंगवेलु (पैरा-एथलेटिक्स)
(3) मनिका बतरा (टेबल टेनिस)
(4) विनेश फोगाट (कुश्ती)
(5) रानी रामपाल (हॉकी)।

प्रश्न 19.
सन् 2020 के लिए अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किन्हीं छः खिलाड़ियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) दुती चंद (एथलेटिक्स)
(2) मनीष कौशिक (मुक्केबाजी)
(3) दीप्ति शर्मा (क्रिकेट)
(4) आकाशदीप सिंह (हॉकी)
(5) दीपक (कबड्डी)
(6) सौरभ चौधरी (निशानेबाजी)।

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प्रश्न 20.
सन् 2020 के लिए द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किन्हीं छः प्रशिक्षकों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) धर्मेंद्र तिवारी (लाइफटाइम-तीरंदाजी)
(2) कृष्ण कुमार हुड्डा (लाइफटाइम-कबड्डी)
(3) ओमप्रकाश दहिया (लाइफटाइम-कुश्ती)
(4) योगेश मालवीय (मल्लखंब)
(5) जसपाल राणा (निशानेबाजी)
(6) गौरव खन्ना (पैरा-बैडमिंटन)।

HBSE 12th Class Physical Education राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-1: एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष 29 अगस्त को मनाया जाता है।

प्रश्न 2.
राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
राष्ट्रीय खेल प्रोत्साहन पुरस्कार की शुरुआत सन् 2009 में हुई।

प्रश्न 3.
पहले विदेशी कोच का नाम बताइए, जिसे सन् 2012 में ‘द्रोणाचार्य अवार्ड’ दिया गया।
उत्तर:
श्री०बी०आई० फर्नाडिज।

प्रश्न 4.
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ कब दिया जाता है?
उत्तर:
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ 29 अगस्त को दिया जाता है।

प्रश्न 5.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किसके द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

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प्रश्न 6.
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ कब शुरू किया गया?
अथवा
किस वर्ष में द्रोणाचार्य अवार्ड शुरू किया गया था?
उत्तर:
‘द्रोणाचार्य पुरस्कार’ वर्ष 1985 में शुरू किया गया।

प्रश्न 7.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किस भावना पर आधारित है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार गुरुओं के आदर एवं सम्मान की भावना पर आधारित है।

प्रश्न 8.
द्रोणाचार्य पुरस्कार से किन्हें नवाजा जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार से प्रशिक्षकों को नवाजा जाता है।

प्रश्न 9.
सन् 2018 में द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित किसी एक प्रशिक्षक का नाम बताएँ।
उत्तर:
सुखदेव सिंह पन्नू (एथलेटिक्स में)।

प्रश्न 10.
द्रोणाचार्य पुरस्कार का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रशिक्षकों का खेल के क्षेत्र में महत्त्व बढ़ाना।

प्रश्न 11.
द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत सरकार के किस मंत्रालय द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
युवा कल्याण एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा।

प्रश्न 12.
द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित ) में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में 10 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है।

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प्रश्न 13.
द्रोणाचार्य पुरस्कार किसकी याद में दिया जाता है?
उत्तर:
द्रोणाचार्य पुरस्कार गुरु द्रोणाचार्य की याद में दिया जाता है।

प्रश्न 14.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार किसके द्वारा दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

प्रश्न 15.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विजेता को कितनी राशि नकद प्रदान की जाती है?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विजेता को 25 लाख रुपए की राशि नकद प्रदान की जाती है।

प्रश्न 16.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब शुरू किया गया?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार वर्ष 1991-1992 में शुरू किया गया।

प्रश्न 17.
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार कब दिया जाता है?
उत्तर:
राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार 29 अगस्त को भारत के राष्ट्रपति द्वारा दिया जाता है।

प्रश्न 18.
पहले किस पुरस्कार में 77 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती थी?
उत्तर:
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में।

प्रश्न 19.
प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार किसको दिया गया था?
उत्तर:
प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार विश्वनाथन आनंद को दिया गया था।

प्रश्न 20.
एक खिलाड़ी अपने जीवनकाल में कितनी बार राजीव गाँधी खेल रत्न अवार्ड ले सकता है?
उत्तर:
एक खिलाड़ी अपने जीवनकाल में एक बार राजीव गांधी खेल रत्न अवार्ड ले सकता है।

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प्रश्न 21.
खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार कौन-सा है?
उत्तर:
खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार है।

प्रश्न 22.
‘अर्जुन पुरस्कार’ कब प्रारंभ किया गया?
उत्तर:
‘अर्जुन पुरस्कार’ सन् 1961 में प्रारंभ किया गया।

प्रश्न 23.
अर्जुन पुरस्कार किसके द्वारा वितरित किया जाता है?
अथवा
खिलाड़ियों को अर्जुन पुरस्कार किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार भारत के राष्ट्रपति द्वारा वितरित किया जाता है।

प्रश्न 24.
अर्जुन पुरस्कार किस तारीख को दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार 29 अगस्त को दिया जाता है।

प्रश्न 25.
अर्जुन पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार में 15 लाख रुपए की राशि प्रदान की जाती है।

प्रश्न 26.
अर्जुन पुरस्कार किस समिति की सिफारिशों पर दिया जाता है?
उत्तर:
अर्जुन पुरस्कार अखिल भारतीय खेल सलाहकार समिति की सिफारिशों पर दिया जाता है।

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प्रश्न 27.
हिमा दास को सन् 2018 में किस राष्ट्रीय खेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
उत्तर:
हिमा दास को सन् 2018 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

प्रश्न 28.
सन् 2012 में कितने खिलाड़ियों को ‘अर्जुन अवार्ड से नवाजा गया?
उत्तर:
सन् 2012 में 25 खिलाड़ियों को ‘अर्जुन अवार्ड’ से नवाजा गया।

प्रश्न 29.
भीम अवार्ड की शुरुआत कब हुई?
उत्तर:
भीम अवार्ड की शुरुआत वर्ष 1996 में हुई।

प्रश्न 30.
‘भीम पुरस्कार’ किसके द्वारा प्रदान किया जाता है?
उत्तर:
भीम पुरस्कार’ हरियाणा के राज्यपाल द्वारा प्रदान किया जाता है।

प्रश्न 31.
भीम अवार्ड में कितनी नकद राशि प्रदान की जाती है?
उत्तर:
भीम अवार्ड में 5 लाख रुपए की नकद राशि प्रदान की जाती है।

प्रश्न 32.
ध्यानचंद पुरस्कार कब शुरू किया गया?
उत्तर:
ध्यानचंद पुरस्कार सन् 2002 में शुरू किया गया।

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भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार कब आरंभ किया गया?
(A) सन् 1985-86 में
(B) सन् 1991-92 में
(C) सन् 1983-84 में
(D) सन् 1994-95 में
उत्तर:
(B) सन् 1991-92 में

2. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 25 लाख रुपए
(B) 20 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लाख रुपए
उत्तर:
(A) 25 लाख रुपए

3. अर्जुन पुरस्कार कब शुरू किया गया था?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1961 में
(C) सन् 1971 में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) सन् 1961 में

4. निम्नलिखित में से कौन-सा पुरस्कार प्रशिक्षकों को दिया जाता है?
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) ध्यानचंद पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) द्रोणाचार्य पुरस्कार
उत्तर:
(D) द्रोणाचार्य पुरस्कार

5. द्रोणाचार्य पुरस्कार कब देना आरंभ किया गया?
(A) सन् 1984 में
(B) सन् 1985 में
(C) सन् 1980 में
(D) सन् 1998 में
उत्तर:
(B) सन् 1985 में

6. अर्जुन पुरस्कार में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 15 लाख रुपए
(B) 12 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लाख रुपए
उत्तर:
(A) 15 लाख रुपए

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7. द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में कितनी राशि प्रदान की जाती है?
(A) 15 लाख रुपए
(B) 10 लाख रुपए
(C) 7 लाख रुपए
(D) 7.5 लख रुपए
उत्तर:
(B) 10 लाख रुपए

8. प्रथम राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार प्राप्तकर्ता हैं
(A) विश्वनाथन आनंद
(B) साक्षी मलिक
(C) अभिनव बिन्द्रा
(D) सचिन तेन्दुलकर
उत्तर:
(A) विश्वनाथन आनंद

9. किस खेल पुरस्कार को हरियाणा के राज्यपाल द्वारा प्रदान किया जाता है?
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) भीम पुरस्कार
उत्तर:
(D) भीम पुरस्कार

10. निम्नलिखित में से राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ी हैं
(A) अभिनव बिन्द्रा
(B) दीपा कर्माकर
(C) महेंद्र सिंह धोनी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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11. खेलों का राष्ट्रीय स्तर का सर्वोच्च पुरस्कार है
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
(B) द्रोणाचार्य पुरस्कार
(C) अर्जुन पुरस्कार
(D) ध्यानचंद पुरस्कार
उत्तर:
(A) राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार

12. सन् 2020 में द्रोणाचार्य पुरस्कार से सम्मानित प्रशिक्षक हैं
(A) जसवंत सिंह
(B) बलवान सिंह
(C) ओमप्रकाश दहिया
(D) महाबीर प्रसाद
उत्तर:
(C) ओमप्रकाश दहिया

13. सन् 2020 में अर्जुन अवार्ड से सम्मानित प्राप्तकर्ता हैं
(A) दीप्ति शर्मा
(B) कृष्णा पूनिया
(C) खुशबीर कौर
(D) हिमा दास
उत्तर:
(A) दीप्ति शर्मा

14. निम्नलिखित में से राष्ट्रीय खेल पुरस्कार नहीं है
(A) आइफा अवार्ड
(B) अर्जुन अवार्ड
(C) द्रोणाचार्य अवार्ड
(D) ध्यानचंद अवार्ड
उत्तर:
(A) आइफा अवार्ड

15. भीम पुरस्कार किस राज्य की सरकार द्वारा प्रदान किया जाता है?
(A) हरियाणा
(B) पंजाब
(C) राजस्थान
(D) तमिलनाडु
उत्तर:
(A) हरियाणा

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भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. खिलाड़ियों को अर्जुन अवार्ड ………………… के द्वारा वितरित किए जाते हैं।
2. द्रोणाचार्य पुरस्कार (नियमित) में दी जाने वाली नकद राशि ………………… रुपए है।
3. द्रोणाचार्य पुरस्कार भारत सरकार द्वारा ………………… को दिया जाता है।
4. राष्ट्रीय खेल दिवस प्रतिवर्ष ………………… को मनाया जाता है।
5. अर्जुन पुरस्कार भारत के ………………. द्वारा प्रदान किया जाता है।
6. देश का सर्वोच्च राष्ट्रीय खेल पुरस्कार ………………… है।
7. भीम अवार्ड की शुरुआत सन् ………………… में हुई।
8. अर्जुन पुरस्कार में दी जाने वाली नकद राशि ………………… रुपए है।
9. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार भारत के ………………… द्वारा वितरित किया जाता है।
10. कोचों को दिए जाने वाला सर्वोच्च पुरस्कार ………………….. है।
उत्तर:
1. राष्ट्रपति
2. 10 लाख
3. प्रशिक्षकों
4. 29 अगस्त
5. राष्ट्रपति
6. राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार
7. 1996
8. 15 लाख
9. राष्ट्रपति
10. द्रोणाचार्य पुरस्कार।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार Summary

राष्ट्रीय खेल पुरस्कार परिचय

खिलाड़ियों को जीवन-पर्यंत सुख-सुविधाएँ प्रदान की जाती हैं, अगर वे अपने-अपने क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय पहचान प्राप्त करने में सक्षम हो जाते हैं। ये प्रलोभन या पुरस्कार, नकद धनराशि और इनाम राज्य व केंद्र सरकारों द्वारा प्रदान किए जाते हैं। इसके अतिरिक्त खिलाड़ी के अपने विभाग द्वारा पदोन्नति, घर के लिए प्लाट, मुफ्त वस्तुएँ आदि प्रदान की जाती हैं। पदक विजेता खिलाड़ियों तथा उनके कोच को विशेष पुरस्कार प्रदान करना आने वाली पीढ़ियों को खेल में अपना कैरियर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने का एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

प्रमुख खेल पुरस्कार (Main Sports Awards):
राजीव गाँधी खेल रत्न पुरस्कार, द्रोणाचार्य पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार, भीम पुरस्कार, ध्यानचंद पुरस्कार आदि।

राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों के महत्त्व (Importance of National Sports Awards)-:
राष्ट्रीय खेल पुरस्कारों का महत्त्व निम्नलिखित कारणों से है-

  • खिलाड़ियों को उत्कृष्ट व श्रेष्ठ प्रदर्शन हेतु प्रेरित करना।
  • खिलाड़ियों व प्रशिक्षकों के सम्मान व स्तर को बढ़ाना।
  • राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित करना।
  • युवाओं को खेल के लिए प्रेरित करना।
  • सद्भाव, मित्रता व शांति की भावना विकसित करना।
  • राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय भावना के लिए प्रेरित करना।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

HBSE 12th Class Physical Education ओलम्पिक आंदोलन Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
ओलम्पिक मूवमेंट के द्वारा किन गुणों को उन्नत किया जा सकता है?
अथवा
ओलम्पिक आंदोलन के माध्यम से किन-किन नैतिक मूल्यों को विकसित किया जा सकता है? वर्णन करें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
ओलम्पिक खेल सर्वप्रथम यूनान के ओलम्पिया नगर में 776 ईसा पूर्व आयोजित किए गए थे। प्राचीनकाल में ओलम्पिक खेल धार्मिक त्योहारों तथा समारोहों से संबंधित थे जो जीयस देवता के प्रति समर्पित थे। इन प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों को भगवान को दी जाने वाली प्रार्थना समझा जाता था। विजेताओं को जैतून की शाखाओं से सम्मानित किया जाता था। विजेता लोगों की नजरों में नायक बन जाते थे। उनको पुरस्कार के तौर पर कोई धनराशि नहीं दी जाती थी। खिलाड़ी स्पष्ट रूप से सम्मान प्राप्त करने के लिए खेल को प्रतिस्पर्धात्मक भावना से खेलते थे। रोमनवासियों ने 393 ईस्वी में ओलम्पिक खेलों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि वे खेल मुकाबलों की बजाय खून भरी लड़ाइयों में विश्वास करते थे। अंतत: रोमन सम्राट थियोडोसियस ने इन खेलों को बंद करवा दिया।

लम्बे अंतराल के बाद ओलम्पिक खेलों में एक नए युग का आरंभ हुआ। आधुनिक ओलम्पिक खेल 1896 ई० में आरंभ हुए। तब से अब तक ओलम्पिक खेलों का आयोजन निश्चित अंतराल पर हो रहा है। हालांकि विश्वयुद्धों के कारण 1916, 1940 व 1944 में आयोजित होने वाले खेलों का आयोजन नहीं हो सका।

ओलम्पिक आंदोलन द्वारा नैतिक मूल्यों का विकास (Development of Moral Values Through Olympic Movement):
यदि हम बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन द्वारा निर्मित ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य पर दृष्टिपात करें तो हमें ज्ञात होता है कि वे ओलम्पिक आंदोलन के द्वारा वैश्विक मूल्यों को विकसित करना चाहते थे। वास्तव में ओलम्पिक आंदोलन के माध्यम से निम्नलिखित प्रमुख मूल्यों/गुणों को विकसित किया जा सकता है

1. मित्रता (Friendship):
ओलम्पिक आंदोलन ऐसे अनेक मौके प्रदान करता है जिससे प्रतियोगियों में आपसी मित्रता की भावना विकसित होती है। जब कभी भी ओलम्पिक खेलों का आयोजन होता है, तो विभिन्न देशों के खिलाड़ी एक-दूसरे के निकट आते हैं और वे मित्र बन जाते हैं।

2. सहयोग की भावना (Spirit of Co-ordination):
ओलम्पिक आंदोलन ऐसे अनेक अवसर प्रदान करता है जिनके द्वारा न केवल प्रतियोगियों के बीच, अपितु राष्ट्रों के बीच भी सहयोग की भावना विकसित होती है। सहयोग की भावना से खिलाड़ियों में एक-दूसरे के प्रति विश्वास उत्पन्न होता है। ओलम्पिक खेलों के उद्देश्यों में भी सहयोग की भावना को महत्त्व दिया गया है।

3. बंधुभाव (Solidarity):
ओलम्पिक आंदोलन बंधुत्व या भाईचारे की भावना को विकसित करने में भी सहायक है। यह खिलाड़ियों को बहुत-से ऐसे अवसर प्रदान करता है जिससे विभिन्न देशों के खिलाड़ियों में परस्पर बंधुभाव उत्पन्न हो जाता है।

4. भेदभाव.से मुक्ति (Free of Discrimination):
आधुनिक ओलम्पिक आंदोलन के उद्देश्य में यह भी कहा गया है कि जाति, नस्ल, रंग व धर्म के आधार पर किसी से भी किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होगा। अतः ओलम्पिक आंदोलन इस पक्ष पर काफी जोर देता है।

5. निष्पक्षतापूर्ण खेल (Fairful Game):
ओलम्पिक आंदोलन निष्पक्षतापूर्ण खेल के अवसरों को बढ़ाते हैं। निष्पक्ष खेल न्याय पर आधारित होता है। ओलम्पिक आंदोलन के अंतर्गत प्रत्येक खिलाड़ी या टीम के साथ निष्पक्षतापूर्ण न्याय होना चाहिए। किसी से भी किसी प्रकार का अन्याय नहीं होना चाहिए। इस प्रकार की खेल से खेल-भावना विकसित होती है।

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प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्देश्यों एवं नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत 776 ईसा पूर्व में हुई थी। ये खेल यूनान के ओलम्पिया’ नगर में आयोजित किए जाते थे। इन खेलों का आयोजन प्रत्येक चार साल बाद किया जाता था। ये खेल यूनानियों की देन थी जो उनके देवी-देवताओं खासकर जीयस देवता के सम्मान में आयोजित की जाती थीं। प्राचीन ओलम्पिक खेलें तीन से पाँच दिन तक चलती थीं, जिनमें केवल यूनानी ही भाग लेते थे।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य (Objectives of Ancient Olympic Games):
जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े समाप्त हो जाते थे। वे वैर-भावना को त्यागकर ओलम्पिक खेल देखने जाते थे। यूनानी लोग खुशी-खुशी इन खेलों में भाग लेते थे। अतः इन खेलों का मुख्य उद्देश्य यूनान के नगर-राज्यों में आपसी लड़ाई एवं वैर-भावना समाप्त करके उनमें एकता, मित्रता एवं सद्भावना स्थापित करना था।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के नियम (Rules of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के मुख्य नियम निम्नलिखित थे-
(1) ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के नागरिक ही भाग ले सकते थे।
(2) ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी को 10 मास का प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक था और इन खेलों में भाग
लेते समय उसे सौगंध लेनी पड़ती थी कि उसने प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
(3) खिलाड़ियों को ओलम्पिक्स आरंभ होने से एक मास पूर्व ओलम्पिया शहर में पहुँचना होता था।
(4) सभी खिलाड़ियों को खेलों में शांतिपूर्वक भाग लेने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(5) व्यावसायिक खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकता था।
(6) केवल ऊँचे चरित्र वाले खिलाड़ियों को ही इन खेलों में भाग लेने की आज्ञा थी।
(7) जजों को भी ठीक निर्णय देने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(8) पहला और अंतिम दिन धार्मिक गीतों और बलियों के लिए होता था।
(9) गुलाम एवं दंडित खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकते थे।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों के पुरस्कार (Awards of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों में विजेता खिलाड़ियों को बहुत मान-सम्मान दिया जाता था। विजेता खिलाड़ियों को जीयस देवता के मन्दिर में लगे पवित्र जैतून वृक्ष की टहनियों का मुकुट बनाकर भेंट किया जाता था। लोग विजेताओं को धन दौलत और पशु उपहार के रूप में देते थे। कवि लोग उनके नामों से गीत गाते थे। शहर की दीवारों और दरवाज़े उनके स्वागत के लिए सजाए जाते थे। वे देश के हीरो होते थे। प्रत्येक यूनान निवासी की इच्छा इन खेलों में विजेता बनने की होती थी।

प्राचीन खेलों का महत्त्व (Importance of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को यूनानी लोग एक धार्मिक उत्सव की भान्ति मनाते थे। जब ये आरम्भ होते थे तो सारे देश में लड़ाई-झगड़े बन्द कर दिए जाते थे। ओलम्पिया के मैदान में शत्रु मित्रों की भान्ति घूमते थे। प्रत्येक ओर शान्ति, पवित्रता, मित्रता वाला वातावरण पैदा हुआ दिखाई देता था। ये खेलें शान्ति पवित्रता और मित्रता का संदेश देती थीं।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक खेल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन कीजिए। इसकी अवनति व निष्कासन के कारणों को भी बताइए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के एक छोटे से नगर ओलम्पिया से आरम्भ हुईं। यह नगर एलफिस नदी के किनारे बसा था। यह नगर एलिस राज्य का एक जाना-पहचाना नगर था। यहाँ बहुत सारे मन्दिर थे जहाँ पवित्र अग्नि के दीप सदा जलते रहते थे। इन मन्दिरों में एक मन्दिर जीयस देवता का था जिसको यूनानियों की समृद्धि, सुरक्षा और तन्दुरुस्ती का देवता माना जाता था। इस मन्दिर के आंगन में एक जैतून का वृक्ष लगा हुआ था, जिसको बहुत ही पवित्र माना जाता था। एक जानकारी के अनुसार यह वृक्ष हरकुलिस ने स्वर्गी धरती से लाकर जीयस देवता के मन्दिर में लगाया था। इस मन्दिर के निकट ढलानदार पहाड़ियाँ थीं जिनके बीच खेल के लिए समतल मैदान प्राकृतिक तौर पर बना हुआ था। यूनानियों ने इन पहाड़ियों को काटकर दर्शकों के बैठने के लिए स्थान बनाया और इसको प्राकृतिक स्टेडियम का रूप दिया। इस स्टेडियम में प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेलें आरम्भ करवाई गईं।

प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के ओलम्पिया नगर में अगस्त, सितम्बर माह की पूर्णिमा की रात को आरम्भ हुईं। ये खेलें जीयस देवता को समर्पित की गईं। इन खेलों के आरम्भ होने के पक्के सबूत लिखित रूप में नहीं हैं परन्तु इनको 776 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ माना जाता है। ये खेलें 1000 वर्ष से अधिक समय तक चलती रहीं। जब रोमन निवासियों ने यूनान पर कब्जा किया तो रोमन बादशाह थियोडिसियस ने इनको बन्द करवाने के आदेश दे दिए। यूनान निवासियों के दिलों में इन खेलों के प्रति बसी भावना को कोई भी रोमन बादशाह मिटा न सका।

प्राचीन ओलम्पिक खेलों की अवनति व निष्कासन के कारण (Causes of Decline or Eviction of Ancient Olympic Games):
प्राचीन ओलम्पिक खेलें बहुत ही शानदार एवं सम्मानपूर्वक ढंग से लम्बे वर्षों तक अर्थात् 776 ईसा पूर्व से 393 ईस्वी तक चलती रहीं, लेकिन यूनान पर रोम का अधिकार होते ही इन खेलों में गतिरोध उत्पन्न हो गया। प्राचीन ओलम्पिक खेलों की अवनति व निष्कासन के कारण निम्नलिखित थे-
(1) यूनानियों के अतिरिक्त बाहर के लोगों का इन खेलों में भाग लेना और किसी भी प्रकार से इन खेलों में जीत प्राप्त करना अपना उद्देश्य बना लिया था। उनके अन्दर अपनी विजय खोने का डर सदा बना रहता था।
(2) यूनान पर रोम का अधिकार होने के बाद रोमवासियों का इन खेलों के प्रति कोई विशेष उत्साह एवं लगाव नहीं रहा।
(3) रोम ने इन खेलों में अधिक जोखिम एवं उत्तेजना वाले खेलों को शामिल कर लिया। इसके कारण खिलाड़ी बुरी तरह से घायल होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छे खिलाड़ियों ने इनमें भाग लेना बंद कर दिया।
(4) इन खेलों में कुछ बुराइयों; जैसे रिश्वतखोरी का आ जाना भी इनके पतन का कारण था। खिलाड़ी जीतने के लिए जजोंको रिश्वत देने लगे थे।
(5) रोमन यूनानियों की खेलों को अच्छा नहीं समझते थे। इस कारण भी इन खेलों का पतन हुआ। अंतत: 393 ईस्वी में रोम के तत्कालीन सम्राट् थियोडोसियस ने एक आज्ञा-पत्र जारी कर इन खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया।

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प्रश्न 4.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों (Modern Olympic Games) के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को प्रारंभ किसने किया? इनके उद्देश्यों एवं नियमों का वर्णन करें।
अथवा
नवीन ओलम्पिक खेलों के इतिहास और नियमों का वर्णन करें।
अथवा
1896 में आधुनिक ओलम्पिक खेल कैसे शुरू हुए? स्पर्धा के नियमों का भी वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समाप्त होने के अनेक वर्षों बाद सन् 1829 में फ्रांसीसी व जर्मन दल के पुरातत्व वैज्ञानिकों ने यूनान के ओलम्पिया नगर में खुदाई आरंभ करवाई। अनेक वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 4 अक्तूबर, 1875 को अर्नेस्ट कर्टियस को खुदाई से कुछ सफलता प्राप्त हुई। उसे खुदाई से ओलम्पिया नगर के मंदिरों व स्टेडियम के अवशेष प्राप्त हुए। इन अवशेषों के अध्ययन से आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आधुनिक या नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष · प्रस्तुत किया। सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एक तारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी। खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया।

सर्वसम्मति से प्रथम नवीन ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया। इन खेलों के संबंध में कोबर्टिन ने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि “ओलम्पिक में सबसे आवश्यक बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि भाग लेना है। जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि संघर्ष करना है। आवश्यक यह नहीं कि आप जीते हैं, बल्कि यह है कि आप अच्छी तरह खेलें।” (The important thing in the olympics is not to win but to take part. As the important thing in life is not the triumph but the struggle. The essential thing is not to have conquered but to have fought well.)

आधुनिक ओलम्पिक खेलों के उद्देश्य (Objectives of Modern Olympic Games):
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) खिलाड़ियों में सामाजिक व नैतिक गुणों का विकास करना।
(2) खिलाड़ियों में विश्व-शान्ति, आपसी सद्भाव एवं मित्रता को बढ़ावा देना।
(3) खिलाड़ियों में खेल-भावना और आपसी सहयोग की भावना का विकास करना।
(4) युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करना तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करना।
(5) खिलाड़ियों में देशभक्ति व भाईचारे की भावना का विकास करना।
(6) जाति, रंग, धर्म व नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव न होने देना।
(7) खिलाड़ियों का शारीरिक एवं चारित्रिक विकास करना।
(8) खिलाड़ियों में अच्छी आदतों का निर्माण करना।

आधुनिक ओलम्पिक खेलों में प्रवेश के नियम (Entry Rules of Modern Olympic Games):
ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ओलम्पिक खेल समिति द्वारा भेजे जाते हैं। राष्ट्रीय खेल संस्थाएँ अपने-अपने खिलाड़ियों को चुनती हैं तथा उनके प्रवेश के लिए उनके नाम अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति को भेजती हैं। इन खेलों का नियमानुसार आयोजन करवाने की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की होती है। सन् 1908 में लंदन में हुए ओलम्पिक खेलों में कुछ नियम बनाए गए, जो इस प्रकार हैं
(1) वह हर देश जो ओलम्पिक संघ का सदस्य है, अपने देशवासियों को खेलों में भाग लेने के लिए भेज सकता है।
(2) एक खिलाड़ी एक ही देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(3) खिलाड़ी नशा करके इन खेलों में भाग नहीं ले सकते।
(4) यदि किसी खिलाड़ी ने एक देश की ओर से इन खेलों में भाग लिया हो तो दूसरे देश की ओर से इन खेलों में भाग नहीं ले सकता। परंतु नए बने देश के खिलाड़ियों के लिए यह शर्त लागू नहीं होती।
(5) ओलम्पिक खेलों में भाग लेते समय खिलाड़ी के लिंग की जाँच की जाती है।
(6) खिलाड़ी किसी आयु, लिंग, धर्म एवं जाति का हो सकता है। उसके साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

ओलम्पिक मॉटो (Olympic Motto):
ओलम्पिक मॉटो लैटिन भाषा के तीन शब्दों से मिलकर बना है
(1) सीटियस (Citius)-बहुत तेज (Faster)
(2) अल्टियस (Altius)-बहुत ऊँचा (Higher)
(3) फॉर्टियस (Fortius)-बहुत शक्तिशाली (Stronger)।

इनका अर्थ है-बहुत तेज दौड़ना, बहुत ऊँची कूद लगाना और बहुत जोर (शक्ति) से गोला (थ्रो) फेंकना। ये शब्द खिलाड़ियों में उत्साह भरते हैं और वे अच्छा प्रदर्शन करने हेतु प्रेरित होते हैं।

ओलम्पिक सौगंध (Olympic Oath):
ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह सौगंध (शपथ) लेता है कि-“हम सौगंध लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए इन खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।” (We swear that we shall take part in these olympic games in the true spirit of sportsmanship and that we will respect and abide by the rules which govern them for the glory of sport and the honour of our country.)

ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag):
बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag) का निर्माण किया गया और सन् 1914 में इसे जारी किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प (Antwerp) शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जैसे नीला, पीला, काला, हरा व लाल। ये विश्व के पाँच महाद्वीपों; जैसे नीला रंग-यूरोप, पीला रंग-एशिया, काला रंग-अफ्रीका, हरा रंग-ऑस्ट्रेलिया और लाल रंग-अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं। ओलम्पिक ध्वज के ये चक्र उत्साह, आस्था, विजय, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।
HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन 1
ओलम्पिक मशाल (Olympic Flame):
ओलम्पिक मशाल या ज्योति ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। ओलम्पिक मशाल जलाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई। यह ज्ञान, खुशी, शांति की प्रतीक है। पहले इस मशाल को खेल शुरू होने से कुछ दिन पूर्व यूनान के ओलम्पिया में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से प्रज्वलित किया जाता था। अब इसे सूर्य की किरणों से नहीं बल्कि शीशे से प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही इसे मेजबानी करने वाले देश की दक्षता के आधार पर कुछ अलग आधार दिया जाता है। हालांकि इसके मूल रूप में आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मशाल को विभिन्न खिलाड़ियों या व्यक्तियों द्वारा उस स्थान पर पहुँचाया जाता है जहाँ ओलम्पिक खेलों का आयोजन होना होता है । जितने दिन ओलम्पिक खेल चलते हैं, उतने दिनों तक यह मशाल निरंतर प्रज्वलित रहती है और खेल समाप्ति पर इसे बुझा दिया जाता है।
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ओलम्पिक पदक (Olympic Awards):
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या तमगे (Medals) दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को कांस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जीतने वाले खिलाड़ी को डिप्लोमा भी दिया जाता है।

उद्घाटन समारोह (Opening Ceremony):
ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का समारोह बहुत प्रभावशाली होता है। एक मशाल जो ओलम्पिया (Olympia) नगर में सूर्य की किरणों के द्वारा प्रज्वलित की जाती है, उस नगर में लाई जाती है, जहाँ ओलम्पिक होना होता है तथा उस नगर के राजा या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री द्वारा खेलों के आरंभ होने की घोषणा की जाती है। इसके साथ ही एथलीटों द्वारा मार्च-पास्ट (March Fast) तथा शपथ लेने (Oath-Taking) की रस्में अदा की जाती हैं, ओलम्पिक ध्वज फहराया जाता है और स्टेडियम में ओलम्पिक मशाल जला दी जाती है, जो खेलों के अंत तक जलती रहती है। मनोरंजनात्मक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा खेल अधिकारियों, खिलाड़ियों एवं दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। इसके बाद खेल आरंभ कर दिए जाते हैं।

समापन समारोह (Closing Ceremony):
ओलम्पिक खेलों का समापन समारोह बहुत साधारण होता है। अंतिम इवेंट के पश्चात् एथलीट या खिलाड़ी स्टेडियम में एकत्रित होते हैं। शहर का मेयर तथा प्रबंधक समिति का अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष को स्टेडियम तक ले जाते हैं। वह इन खेलों की समाप्ति की घोषणा करता है। तत्पश्चात् ओलम्पिक ध्वज को नीचे उतार लिया जाता है तथा अध्यक्ष द्वारा यह ध्वज मेयर को संभालने के लिए दिया जाता है। ओलम्पिक मशाल (ज्वाला) को बुझा दिया जाता है और फिर ओलम्पिक गीत के साथ खेलें समाप्त हो जाती हैं।

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प्रश्न 5.
नवीन ओलम्पिक खेलें किसने शुरू करवाईं? उसके विषय में आप क्या जानते हैं?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को प्रारंभ करने में बैरन पियरे-डी-कोबर्टिन के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को रोमन बादशाह की ओर से बन्द करवा दिया गया था परन्तु वे खेलें समूचे विश्व के लिए एक पवित्र सन्देश छोड़ गई थीं कि सच्ची विजय मित्रता, प्यार और शान्ति से दिलों को जीतने में है। यह पवित्र भावना लोगों के दिलों में कोई भी बादशाह न मिटा सका। प्राचीन ओलम्पिक खेलों में पवित्र जोत जलती थी जो लोगों के मन में शताब्दियों तक जलती रही। एक दिन यह ज्योति नवीन ओलम्पिक खेलों के रूप में विश्व में प्रकाशमान हुई और आज तक जगमगा रही है। नवीन ओलम्पिक खेलों को आरम्भ करने का श्रेय एक पवित्र आत्मा को जाता है, जिसका नाम बैरन पियरे डी कोबर्टिन था।
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लगभग चौदह शताब्दियों तक ओलम्पिक खेलें विश्व के खेल नक्शे से अदृश्य रहीं। सन् 1829 को जापान और फ्रांसीसी पुरातत्व वैज्ञानिकों ने ओलम्पिया स्थान की खुदाई करवाई तो वहाँ मन्दिर और ओलम्पिक स्टेडियम के निशान मिल गए जहाँ प्राचीन ओलम्पिक खेलें हुआ। करती थीं। ये वैज्ञानिक केवल खोजकर्ता थे। इनका कार्य पुरानी घटनाओं, स्थानों और वस्तुओं को बैरन पियरे डी कोबर्टिन ढूँढने पर आधारित था। परन्तु इन ऐतिहासिक स्थानों की निशानदेही ने लोगों के अन्दर ओलम्पिक खेलों की भावना को और जागृत कर दिया।

कोबर्टिन नवीन ओलम्पिक खेलों के निर्माता माने जाते हैं, जिनका जन्म सन् 1863 में फ्रांस में हुआ था। वे फ्रांस में शिक्षा विभाग में कार्य करते थे। इनका खास झुकाव शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र की ओर था। उन्होंने सन् 1887 में बर्तानिया का दौरा किया। उन्हें हैरो और रंगबी के स्कूलों की पढ़ाई और प्रबन्ध बहुत पसन्द आए। उसने अनुभव किया कि पढ़ाई केवल कक्षा में बिठा कर ही प्रभावशाली नहीं बनाई जा सकती। बच्चों को पूर्ण रूप में शिक्षित करने के लिए कक्षा से बाहर मैदानों में ले जाकर भी शिक्षित किया जा सकता है। इसलिए शिक्षा और खेलों को भिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता। उसने इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी।

सन् 1889 में वे अमेरिका गए। वहाँ उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ओलम्पिक्स आरम्भ करने की सलाह दी। बहुत सारे खेल प्रेमियों ने उनके विचारों की प्रशंसा की और उनकी सहायता करने का वचन दिया। वे खेलों द्वारा सुन्दरता, स्वास्थ्य, मनोरंजन और भाईचारा बढ़ाना चाहते थे। बेशक इनकी कोशिश से पहले भी दो बार इसी प्रकार की ओलम्पिक खेल आरम्भ करने की कोशिश की गई, परन्तु असफल हुई। कोबर्टिन ने इसी संबंध में भिन्न-भिन्न देशों के दौरे किए। अपने देश में फ्रांसीसी खेल संघ स्थापित किए। 16 जून, 1894 को एक अन्तर्राष्ट्रीय कांग्रेस के सामने ओलम्पिक योजना रखी गई, जिसके लिए सब ने सहमति प्रदान की। इन खेलों को आरम्भ करने के लिए वही देश यूनान चुना गया जहाँ प्राचीन ओलम्पिक खेलें हुआ करती थीं। सन् 1896 को प्रथम ओलम्पिक खेलें यूनान के शहर एथेंस में आरम्भ की गईं, जिसमें 14 राष्ट्रों के 289 खिलाड़ियों ने भाग लिया।

प्रश्न 6.
नवीन या आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत की स्थिति पर प्रकाश डालिए।
अथवा
अब तक हुए आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत का सफर कैसा रहा? क्या यह संतोषजनक है?
अथवा
भारतीय खिलाड़ियों ने ओलम्पिक खेलों में क्या स्थान प्राप्त किए?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों में भारत का सफर वर्ष 1900 के पेरिस ओलम्पिक से शुरू हुआ। इसमें कोलकाता के रहने वाले एंग्लो इण्डियन नॉर्मन गिलबर्ड प्रिटिहार्ड ने भारत का प्रतिनिधित्व किया था और 200 मीटर बाधा (हर्डल) दौड़ में रजत पदक जीता था। वर्ष 1900 के बाद लगभग 20 वर्षों तक भारत ने ओलम्पिक खेलों में भाग नहीं लिया। सन् 1920 के बेल्जियम (एंटवर्प) ओलम्पिक खेलों में भारत ने पहली बार अधिकृत रूप से अपनी ओलम्पिक टीम भेजी। इसके बाद से भारत का ओलम्पिक खेलों में भाग लेने का सफर निरंतर जारी है। लेकिन ओलम्पिक खेलों के इतिहास पर नजर डालें तो अब तक भारत का सफर संतोषजनक नहीं रहा है। भारत ने इन खेलों में अभी तक केवल 28 पदक ही प्राप्त किए हैं जिनमें से 11 पदक तो केवल हॉकी में प्राप्त हुए हैं।

ओलम्पिक खेलों में भारत का पहला स्वर्ण पदक सन् 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में जयपाल सिंह के नेतृत्व में हॉकी टीम ने प्राप्त किया। ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम का प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा है। ओलम्पिक खेलों में लगातार छ: बार (1928, 1932, 1936, 1948, 1952, 1956) भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीते। इस दौरान टीम ने अनेक रिकॉर्ड तोड़े और स्थापित किए। यही वह दौर था जब ओलम्पिक खेलों में हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का जादू चलता था। अनेक वर्षों तक भारतीय हॉकी टीम ने ओलम्पिक खेलों में एकछत्र राज किया।

सन् 1952 के हेलसिंकी ओलम्पिक खेलों में भारत के पहलवान के० डी० जाधव ने कुश्ती स्पर्धा में कांस्य पदक जीता। सन् 1960 के रोम ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम को हार का सामना करना पड़ा, परन्तु सन् 1964 के टोकियो ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने फिर से पाकिस्तान को हराकर पदक प्राप्त किया। सन् 1980 के मॉस्को ओलम्पिक में भारतीय हॉकी ने पदक प्राप्त किया। सन् 1996 के एटलांटा ओलम्पिक खेलों में भारत के लिएंडर पेस ने टेनिस स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किया। सन् 2000 के सिडनी ओलम्पिक में पहली बार किसी भारतीय महिला खिलाड़ी कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किया। सन् 2004 के एथेंस ओलम्पिक खेलों में भारतीय निशानेबाज राज्यवर्द्धन राठौर ने रजत पदक प्राप्त किया।

सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में पहली बार भारतीय निशानेबाज खिलाड़ी अभिनव बिंद्रा ने शूटिंग स्पर्धा में व्यक्तिगत रूप से भारत के लिए स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इसी वर्ष विजेंद्र सिंह ने बॉक्सिंग स्पर्धा में और सुशील कुमार ने कुश्ती स्पर्धा में कांस्य पदक प्राप्त किए। सन् 2012 के लंदन ओलम्पिक खेलों में भारत ने अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में सबसे अधिक अर्थात् 6 पदक प्राप्त किए हैं। गगन नारंग व विजय कुमार ने निशानेबाजी में, सुशील कुमार व योगेश्वर दत्त ने कुश्ती में, साइना नेहवाल ने बैडमिंटन में और एम०सी० मैरीकॉम ने बॉक्सिंग में पदक प्राप्त किए। सन् 2016 में रियो डी जेनेरियो (ब्राजील) में हुए ओलम्पिक खेलों में भारत का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। इस ओलम्पिक में भारत के 119 खिलाड़ियों ने भाग लिया, परन्तु हमारे केवल दो खिलाड़ी ही पदक जीत पाए; जैसे साक्षी मलिक ने कुश्ती में कांस्य पदक और पी०वी० सिन्धू ने बैडमिंटन में रजत पदक जीते।

दिए गए विवरण से स्पष्ट होता है कि 121 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले देश का ओलम्पिक खेलों में प्रदर्शन संतोषजनक व उत्साहजनक नहीं रहा है। ओलम्पिक पदक तालिका में हम बहुत नीचे हैं। ओलम्पिक खेलों में हमें अपनी स्थिति को लगन व मेहनत से और मजबूत करना होगा, तभी हम ओलम्पिक खेलों में अपनी स्थिति अच्छी व संतोषजनक कर पाएँगे और विश्व को दिखा पाएँगे कि हम भी बहुत कुछ कर सकते हैं।

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प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति क्या है? इसके उद्देश्यों व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (International Olympic Committee) पर विस्तृत नोट लिखें।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति/संघ बनाए जाने का श्रेय आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जनक बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है। उनके अथक प्रयासों से 23 जून, 1894 को यह समिति अस्तित्व में आई। यह समिति प्रत्येक चार साल बाद ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन करती है। इस समिति में विभिन्न देशों के सदस्य शामिल होते हैं। इस समिति के प्रथम अध्यक्ष देमित्रिस विकेलस थे। इसका मुख्यालय लोसाने (स्विट्ज़रलैण्ड) में है।

अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के उद्देश्य व कार्य (Objectives and Functions of International Olympic Committee):
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्य व कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ओलम्पिक खेलों का आयोजन स्थान एवं तारीख आदि निश्चित करती है।
(2) यह खेलों का प्रबंध करती है।
(3) यह खेलों व खिलाड़ियों के लिए आवश्यक नियम बनाती है।
(4) यह खिलाड़ियों को विश्व-शांति, सहयोग एवं भाईचारे की भावना बनाए रखने हेतु प्रेरित करती है।
(5) यह खेलों में नैतिकता को बनाए रखने और युवाओं को खेलों के लिए प्रोत्साहित करती है।
(6) यह खेलों में डोपिंग का विरोध करती है। यदि कोई खिलाड़ी डोपिंग में सकारात्मक रूप से भागीदार पाया जाता है तो उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई करती है।
(7) यह खिलाड़ियों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
(8) यह खेलों और खिलाड़ियों में किसी भी प्रकार के वाणिज्यकरण व राजनीतिकरण का विरोध करती है।

प्रश्न 8.
अब तक कितनी आधुनिक ओलम्पिक खेलें हुई हैं? ये कब और कहाँ-कहाँ आयोजित हुईं?
उत्तर:
अब तक 31 आधुनिक ओलम्पिक खेल हुए हैं। 31वें ओलम्पिक खेल ब्राजील के रियो डी जेनेरियो शहर में आयोजित हुए, जिसमें भारत ने कुल 2 पदक प्राप्त किए। 32वें ओलम्पिक खेल 2020 में जापान के टोकियो शहर में आयोजित होने थे, परंतु कोविड-19 नामक महामारी के कारण रद्द हो गए। 23 जुलाई से 8 अगस्त, 2021 तक इन खेलों का पुनः आयोजन किया जाएगा। अब तक हुए ओलम्पिक खेलों के आयोजित शहर (देश) तथा वर्ष का विवरण निम्नलिखित तालिका में दिया गया है-

क्र०सं०वर्षशहर/देश
11896एथेंस (यूनान/ग्रीस)
21900पेरिस (फ्राँस)
31904सेंट लूइस (अमेरिका)
41908लंदन (इंग्लैण्ड)
51912स्टॉकहोम (स्वीडन)
61916बर्लिन (जर्मनी)
71920एंटवर्प (बेल्जियम)
81924पेरिस (फ्राँस)
91928एम्सटर्डम (नीदरलैण्ड)
101932लॉस एंजिल्सि (अमेरिका)
111936बर्लिन (जर्मनी)
121940टोकियो (जापान)
131944लंदन (इंग्लैण्ड)
141948लंदन (इंग्लैण्ड)
151952हेलसिंकी (फिनलैण्ड)
161956मेलबोर्न (ऑस्ट्रेलिया)
171960रोम (इटली)
181964टोकियो (जापान)
191968मैक्सिको सिटी (मैक्सिको)
201972म्यूनिख (जर्मनी)
211976मांट्रियल (कनाडा)
221980मॉस्को (सोवियत संघ)
231984लॉस एंजिल्सि (अमेरिका)
241988सियोल (दक्षिण कोरिया)
251992बार्सीलोना (स्पेन)
261996एटलांटा (अमेरिका)
272000सिडनी (ऑस्ट्रेलिया)
282004एथेंस (यूनान)
292008बीजिंग (चीन)
302012लंदन (इंग्लैण्ड)
312016रियो डी जेनेरियो (ब्राजील)

आधुनिक ओलम्पिक खेलों में काफी उतार-चढ़ाव पाए जाते हैं। पहले और दूसरे विश्वयुद्ध की छाया, फिर म्यूनिख ओलम्पिक में इजराइल खिलाड़ियों का कत्लेआम और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण सन् 1980 में मॉस्को और सन् 1984 में लॉस एंजिल्सि खेलों का बहिष्कार करने से खेलों के औपचारिक नियमों को बहुत ठेस लगी। सन् 1916, 1940 और 1944 के ओलम्पिक खेल प्रथम और दूसरे विश्वयुद्ध के कारण आयोजित नहीं हो सके। कितना अच्छा होगा यदि खेलों को इन घटनाओं से दूर रखा जाए, ताकि खेलों का वास्तविक उद्देश्य जो कि अन्तर्राष्ट्रीय भ्रातृत्व व विश्व-शांति है, उसको प्रफुल्लित किया जा सके।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के इतिहास का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के एक छोटे से नगर ओलम्पिया से आरम्भ हुईं। यह नगर एलफिस नदी के किनारे बसा था। यह नगर एलिस राज्य का एक जाना-पहचाना नगर था। यहाँ बहुत सारे मन्दिर थे जहाँ पवित्र अग्नि के दीप सदा जलते रहते थे। इन मन्दिरों में एक मन्दिर जीयस देवता का था जिसको यूनानियों की समृद्धि, सुरक्षा और तन्दुरुस्ती का देवता माना जाता था। इस मन्दिर के आंगन में एक जैतून का वृक्ष लगा हुआ था, जिसको बहुत ही पवित्र माना जाता था। एक जानकारी के अनुसार यह वृक्ष हरकुलिस ने स्वर्गी धरती से लाकर जीयस देवता के मन्दिर में लगाया था।

इस मन्दिर के निकट ढलानदार पहाड़ियाँ थीं जिनके बीच खेल के लिए समतल मैदान प्राकृतिक तौर पर बना हुआ था। यूनानियों ने इन पहाड़ियों को काटकर दर्शकों के बैठने के लिए स्थान बनाया और इसको प्राकृतिक स्टेडियम का रूप दिया। इस स्टेडियम में प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेलें आरम्भ करवाई गईं। प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनान के ओलम्पिया नगर में अगस्त, सितम्बर माह की पूर्णिमा की रात को आरम्भ हुईं। ये खेलें जीयस देवता को समर्पित की गईं। इन खेलों के आरम्भ होने के पक्के सबूत लिखित रूप में नहीं हैं परन्तु इनको 776 ईसा पूर्व में आरम्भ हुआ माना जाता है। ये खेलें लम्बे वर्षों तक चलती रहीं। जब रोमन निवासियों ने यूनान पर कब्जा किया तो रोमन बादशाह थियोडिसियस ने इनको बद करवाने के आदेश दे दिए। यूनान निवासियों के मन में इन खेलों के प्रति बसी भावना को कोई भी रोमन बादशाह मिटा न सका।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें क्यों आरम्भ हुईं? अथवा प्राचीन ओलम्पिक खेल शुरू करने के क्या कारण थे?
उत्तर:
प्राचीन खेलों से पहले यूनान के अन्दर छोटे-छोटे आत्म-निर्भर राज्य आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे जिनसे यूनान निवासियों की नस्ल, धन-दौलत, समृद्धि और शक्ति समाप्त होती जा रही थी। एलिस के बादशाह इफीटस इन लड़ाई-झगड़ों को बन्द करना और देशवासियों को आपसी जंग से बचाना चाहते थे। उसने अपने मन्त्रियों और खेल प्रेमियों को देश की मन्दी की स्थिति से भरी समस्याओं के हल ढूँढने के लिए अपने सुझाव देने के लिए कहा। उनके सुझावों के अनुसार ऐसी खेलें करवाई जाएँ जिनकी पवित्रता के लिए लड़ाइयाँ बन्द हों, प्रत्येक प्रकार की धोखेबाज़ी बन्द हो, खेलों के दौरान कोई भी नशे वाली वस्तु का प्रयोग न करें।

इन खेलों को धार्मिक दर्जा देने के लिए यह जीयस देवता को समर्पित किया जाए। बादशाह को सुझाव पसन्द आए जिसके फलस्वरूप प्रथम प्राचीन ओलम्पिक आरम्भ होने की संभावना मानी जाती है। बादशाह इफीटस ने एक ऐलाननामा जारी किया। सारे राज्यों को इन खेलों में भाग लेने के लिए निमन्त्रण पत्र भेजे गए जिनको एक धार्मिक निमन्त्रण पत्र समझकर मान लिया गया और ओलम्पिया नगर में ओलम्पिक खेलों की शुरुआत हुई। ये खेलें चार वर्षों के पश्चात् आयोजित हुआ करती थीं।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक तथा आधुनिक ओलम्पिक खेलों में क्या अंतर है? अथवा आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की समानताओं व असमानताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
समानताएँ-आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों में निम्नलिखित समानताएँ रही हैं-
(1) आधुनिक व प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत यूनान से हुई।
(2) दोनों ही तरह के ओलम्पिक्स चार साल के अंतराल में आयोजित हुए।

असमानताएँ/अंतर:
यद्यपि आधुनिक ओलम्पिक खेल प्राचीन ओलम्पिक खेलों का ही विकसित रूप है फिर भी इनमें काफी अंतर है –
(1) प्राचीन ओलम्पिक खेलों का आयोजन केवल यूनान के ‘ओलम्पिया’ नगर में ही किया जाता था लेकिन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन विश्व के किसी भी शहर में किया जा सकता है।
(2) प्राचीन ओलम्पिक खेल तीन से पाँच दिन ही चलते थे, लेकिन आधुनिक ओलम्पिक खेल लगभग 16 दिन तक चलते हैं।
(3) प्राचीन ओलम्पिक खेलों में व्यक्तिगत स्पर्धा वाले खेल शामिल थे, जबकि आधुनिक ओलम्पिक खेलों में व्यक्तिगत व सामूहिक (टीम) दोनों प्रकार के खेल शामिल हैं।
(4) प्राचीन ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के निवासी ही भाग ले सकते थे जबकि आधुनिक ओलम्पिक में ऐसा नहीं है।

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प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह (Opening Ceremony) का वर्णन करें।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह के दिन सभी खिलाडी, उनके पिता, भाई व प्रशिक्षण देने वाले सभा-भवन में इकट्ठे होते थे। खेलों के विशेषज्ञ द्वारा खिलाड़ियों को शपथ दिलवाई जाती थी कि वे खेलों में नियमानुसार भाग लेंगे। उसके बाद हरकुलिस नामक देवता के सामने पशु की बलि दी जाती थी। इसके बाद सभी खिलाड़ी एक-एक करके मार्च-पास्ट करते हुए खेल के मैदान से बाहर आते थे। इसी दौरान उनका परिचय दर्शकों को दिया जाता था। इसके बाद खेलों को प्रारंभ करने की घोषणा होती थी।

प्रश्न 5.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के प्रमुख नियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के प्रमुख नियम निम्नलिखित थे
(1) ओलम्पिक खेलों में केवल यूनान के नागरिक ही भाग ले सकते थे।
(2) ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी को 10 मास का प्रशिक्षण प्राप्त करना आवश्यक था और इन खेलों में भाग लेते समय उसे सौगंध लेनी पड़ती थी कि उसने प्रशिक्षण प्राप्त किया है।
(3) खिलाड़ियों को ओलम्पिक्स आरंभ होने से एक मास पूर्व ओलम्पिया शहर में पहुँचना होता था।
(4) सभी खिलाड़ियों को खेलों में शांतिपूर्वक भाग लेने की सौगंध लेनी पड़ती थी।
(5) महिलाएँ इन खेलों में भाग नहीं ले सकती थीं तथा उन्हें खेलें देखने की भी आज्ञा नहीं थी।
(6) पहला और अंतिम दिन धार्मिक गीतों और बलियों के लिए होता था।
(7) गुलाम एवं दंडित खिलाड़ी इन खेलों में भाग नहीं ले सकते थे।

प्रश्न 6.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पतन कैसे हुआ?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के बंद होने के मुख्य कारण बताएँ।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के पतन के मुख्य कारण निम्नलिखित थे
(1) यूनानियों के अतिरिक्त बाहर के लोगों का इन खेलों में भाग लेना और किसी भी प्रकार से इन खेलों में जीत प्राप्त करना अपना उद्देश्य बना लिया था। उनके अन्दर अपनी विजय खोने का डर सदा बना रहता था।
(2) यूनान पर रोम का अधिकार होने के बाद रोमवासियों का इन खेलों के प्रति कोई विशेष उत्साह एवं लगाव नहीं रहा।
(3) रोम ने इन खेलों में अधिक जोखिम एवं उत्तेजना वाले खेलों को शामिल कर लिया। इसके कारण खिलाड़ी बुरी तरह से घायल होने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि अच्छे खिलाड़ियों ने इनमें भाग लेना बंद कर दिया।
(4) इन खेलों में कुछ बुराइयों; जैसे रिश्वतखोरी का आ जाना भी इनके पतन का कारण था। खिलाड़ी जीतने के लिए जजों को रिश्वत देने लगे थे।
(5) रोमन यूनानियों की खेलों को अच्छा नहीं समझते थे। इस कारण भी इन खेलों का पतन हुआ। अंततः 393 ईस्वी में रोम के तत्कालीन सम्राट थियोडोसियस ने एक आज्ञा-पत्र जारी कर इन खेलों पर प्रतिबंध लगा दिया।

प्रश्न 7.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के इतिहास पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समाप्त होने के अनेक वर्षों बाद सन् 1829 में फ्रांसीसी व जर्मन दल के पुरातत्व वैज्ञानिकों ने यूनान के ओलम्पिया नगर में खुदाई आरंभ करवाई। अनेक वर्षों की कठिन मेहनत के बाद 4 अक्तूबर, 1875 को अर्नेस्ट कर्टियस को खुदाई से कुछ सफलता प्राप्त हुई। उसे खुदाई से ओलम्पिया नगर के मंदिरों व स्टेडियम के अवशेष प्राप्त हुए। इन अवशेषों के अध्ययन से आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करने का मार्ग प्रशस्त हुआ।

आधुनिक/नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया। सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एक तारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी। खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सर्वसम्मति से प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया।

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प्रश्न 8.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्यों व कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के मुख्य उद्देश्य व कार्य निम्नलिखित हैं
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ओलम्पिक खेलों का आयोजन स्थान एवं तारीख आदि निश्चित करती है।
(2) यह खेलों का प्रबंध करती है। यह खेलों व खिलाड़ियों के लिए आवश्यक नियम बनाती है।
(3) यह खिलाड़ियों को विश्व-शांति, सहयोग एवं भाईचारे की भावना बनाए रखने हेतु प्रेरित करती है।
(4) यह खेलों में नैतिकता को बनाए रखने और युवाओं को खेलों के लिए प्रोत्साहित करती है।
(5) यह खेलों में डोपिंग का विरोध करती है। यदि कोई खिलाड़ी डोपिंग में सकारात्मक रूप से भागीदार पाया जाता है तो उसके विरुद्ध उचित कार्रवाई करती है।
(6) यह खिलाड़ियों को बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करती है।
(7) यह खेलों और खिलाड़ियों में किसी भी प्रकार के वाणिज्यकरण व राजनीतिकरण का विरोध करती है।

प्रश्न 9.
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के गठन पर सक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
भारत में ओलम्पिक लहर का आरंभ सर दोराबजी टाटा द्वारा खेलों का प्रोत्साहन करने के लिए दिए गए पैसों से हुआ। 5 फरवरी, 1927 में उन्होंने ए०सी० नौहरन की सहायता से खेलों के स्तर को ऊँचा उठाने के लिए प्रांतों के प्रतिनिधियों को कलकत्ता (कोलकाता) में इकट्ठा किया। इस सभा की अध्यक्षता सर दोराबजी टाटा द्वारा की गई। इसमें एक एसोसिएशन बनाने का निर्णय लिया गया। इस तरह भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन का गठन हुआ। इसका अध्यक्ष सर दोराबजी टाटा, महासचिव ए०सी० नौहरन तथा सहायक सचिव जी०डी० सौंधी को बनाया गया। यह एसोसिएशन वर्ष 1927 में अन्तर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की हिस्सा बनी।

भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के साथ-ही प्रांतों में भी अनेक खेल एसोसिएशन बनाई गईं; जैसे प्रांतीय ओलम्पिक एसोसिएशन, रेलवे कंट्रोल बोर्ड तथा सर्विस स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड आदि। इन सभी को भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के साथ जोड़ा गया। भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन का चुनाव चार वर्षों में एक बार होता है। इसमें शामिल अधिकारी व सदस्य होते हैं-एक अध्यक्ष, एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष, आठ उपाध्यक्ष, एक महासचिव, छः सहायक सचिव, एक कोषाध्यक्ष, लगभग 21 प्रान्तीय ओलम्पिक एसोसिएशन के सदस्य और 9 राष्ट्रीय खेल एसोसिएशन के सदस्य, रेलवे स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड व सर्विस स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड आदि।

प्रश्न 10.
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के मुख्य कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय ओलम्पिक एसोसिएशन के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सभी नियमों को जारी करना।
(2) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खिलाड़ियों व टीमों का चयन करके उन्हें मुकाबले के लिए भेजना।
(3) देश में राष्ट्रीय स्तर के खेलों का प्रबंध करना।
(4) भारत के विभिन्न प्रांतों में प्रांतीय ओलम्पिक एसोसिएशन बनाना।
(5) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में भेजी गई टीमों/खिलाड़ियों की जिम्मेदारी लेना।
(6) प्रांतीय स्तरीय ओलम्पिक एसोसिएशन के कार्यों पर निगरानी रखना।
(7) खेलों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा देना तथा युवाओं को खेलों में भाग लेने हेतु प्रेरित करना।
(8) ओलम्पिक मामलों को सुलझाना तथा ओलम्पिक चार्टर का पालन करना।

प्रश्न 11.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियमों का उल्लेख करें।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने के नियम लिखें।
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी राष्ट्रीय ओलम्पिक खेल समिति द्वारा भेजे जाते हैं। राष्ट्रीय खेल संस्थाएँ अपने-अपने खिलाड़ियों को चुनती हैं तथा उनके प्रवेश के लिए उनके नाम अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति को भेजती हैं। इन खेलों का नियमानुसार आयोजन करवाने की जिम्मेदारी अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति की होती है। सन् 1908 में लंदन में हुए ओलम्पिक खेलों में कुछ नियम बनाए गए, जो इस प्रकार हैं
(1) वह हर देश जो ओलम्पिक संघ का सदस्य है, अपने देशवासियों को खेलों में भाग लेने के लिए भेज सकता है।
(2) एक खिलाड़ी एक ही देश का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
(3) खिलाड़ी नशा करके इन खेलों में भाग नहीं ले सकते।
(4) यदि किसी खिलाड़ी ने एक देश की ओर से इन खेलों में भाग लिया हो तो दूसरे देश की ओर से इन खेलों में भाग नहीं ले सकता। परंतु नए बने देश के खिलाड़ियों के लिए यह शर्त लागू नहीं होती।
(5) ओलम्पिक खेलों में भाग लेते समय खिलाड़ी के लिंग की जाँच की जाती है।
(6) खिलाड़ी किसी आयु, लिंग, धर्म एवं जाति का हो सकता है। उसके साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

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प्रश्न 12.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के कौन-कौन-से उद्देश्य हैं?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
कोबर्टिन के अनुसार आधुनिक ओलम्पिक खेलों के द्वारा निम्नलिखित उद्देश्यों की प्राप्ति हो सकती है
(1) खिलाड़ियों में सामाजिक व नैतिक गुणों का विकास करना।
(2) खिलाड़ियों में विश्व-शान्ति, आपसी सद्भाव एवं मित्रता को बढ़ावा देना।
(3) खिलाड़ियों में टीम-भावना की भावना का विकास करना।
(4) युवाओं को खेलों के लिए प्रेरित करना तथा उनके व्यक्तित्व का विकास करना।
(5) खिलाड़ियों में देशभक्ति व भाईचारे की भावना का विकास करना।
(6) जाति, रंग, धर्म व नस्ल के आधार पर कोई भेदभाव न होने देना।
(7) खिलाड़ियों का शारीरिक एवं चारित्रिक विकास करना।।

प्रश्न 13.
शीतकालीन ओलम्पिक खेलों (Winter Olympic Games) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
शीतकालीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत सन् 1924 में हुई। शीतकालीन ओलम्पिक खेलों में आईस हॉकी, स्केटिंग आदि के खेल मुकाबले होते हैं। ये खेलें भी प्रति चार वर्ष के पश्चात् होती हैं। ये केवल उन देशों के खिलाड़ियों द्वारा खेली जाती हैं, जिन देशों की जलवायु ठंडी होती है। इसमें ओलम्पिक खेलों की भाँति कोई तमगे नहीं दिए जाते तथा न ही इन्हें ओलम्पिक खेलों के समान समझा जाता है। ये केवल मुकाबले तक ही सीमित मानी जाती हैं। शीतकालीन ओलम्पिक खेलें तथा ओलम्पिक खेलें एक समय पर नहीं होती।

प्रश्न 14.
ओलम्पिक झण्डे की पृष्ठभूमि तथा इसका महत्त्व बताइए। अथवा ओलम्पिक ध्वज पर संक्षेप में टिप्पणी लिखिए।
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक झंडा क्या है? इसका क्या महत्त्व है?
अथवा
ओलम्पिक ध्वज के चक्रों (Rings) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज (Olympic Flag) का निर्माण किया गया और सन् 1914 में इसे जारी किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प (Antwerp) शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जैसे नीला, पीला, काला, हरा व लाल। ये विश्व के पाँच महाद्वीपों; जैसे नीला रंग-यूरोप, पीला रंग-एशिया, काला रंग-अफ्रीका, हरा रंग-ऑस्ट्रेलिया और लाल रंग-अमेरिका का प्रतिनिधित्व करते हैं। ओलम्पिक ध्वज के ये चक्र उत्साह, आस्था, विजय, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

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प्रश्न 15.
ओलम्पिक मशाल (Olympic Flame) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
ओलम्पिक ज्योति (Olympic Torch) के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक मशाल या ज्योति ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। ओलम्पिक मशाल जलाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई। यह ज्ञान, खुशी, शांति की प्रतीक है। पहले इस मशाल को खेल शुरू होने से कुछ दिन पूर्व यूनान के ओलम्पिया में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से प्रज्वलित किया जाता था। अब इसे सूर्य की किरणों से नहीं बल्कि शीशे से प्रज्वलित किया जाता है। साथ ही इसे मेजबानी करने वाले देश की दक्षता के आधार पर कुछ अलग आधार दिया जाता है। हालांकि इसके मूल रूप में आज तक कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मशाल को विभिन्न खिलाड़ियों या व्यक्तियों द्वारा उस स्थान पर पहुँचाया जाता है जहाँ ओलम्पिक खेलों का आयोजन होना होता है। जितने दिन ओलम्पिक खेल चलते हैं, उतने दिनों तक यह मशाल निरंतर प्रज्वलित रहती है और खेल समाप्ति पर इसे बुझा दिया जाता है।

प्रश्न 16.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के उद्घाटन समारोह पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का समारोह (Opening Ceremony) अत्यधिक प्रभावशाली होता है। एक मशाल जो ओलम्पिया (Olympia) नगर में सूर्य की किरणों के द्वारा प्रज्वलित की जाती है, उस नगर में लाई जाती है, जहाँ ओलम्पिक होना होता है तथा उस नगर के राजा या राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री द्वारा खेलों के आरंभ होने की घोषणा की जाती है। इसके साथ ही एथलीटों द्वारा मार्च-पास्ट (March Past) तथा शपथ लेने (Oath-Taking) की रस्में अदा की जाती हैं, ओलम्पिक ध्वज फहराया जाता है और स्टेडियम में ओलम्पिक मशाल जला दी जाती है, जो खेलों के अंत तक जलती रहती है। मनोरंजनात्मक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों द्वारा खेल अधिकारियों, खिलाड़ियों एवं दर्शकों का मनोरंजन किया जाता है। इसके बाद खेल आरंभ कर दिए जाते हैं।

प्रश्न 17.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के समापन समारोह पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों का समापन समारोह (Closing Ceremony) बहुत साधारण होता है। अंतिम इवेंट के पश्चात् एथलीट या खिलाड़ी स्टेडियम में एकत्रित होते हैं। शहर का मेयर तथा प्रबंधक समिति का अध्यक्ष अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के अध्यक्ष को स्टेडियम तक ले जाते हैं। वह इन खेलों की समाप्ति की घोषणा करता है। तत्पश्चात् ओलम्पिक ध्वज को नीचे उतार लिया जाता है तथा अध्यक्ष द्वारा यह ध्वज मेयर को संभालने के लिए दिया जाता है। ओलम्पिक मशाल (ज्वाला) को बुझा दिया जाता है और फिर ओलम्पिक गीत के साथ खेलें समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 18.
ओलम्पिक्स के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आधुनिक संदर्भ में ओलम्पिक्स का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। ओलम्पिक्स खिलाड़ियों या टीमों को अनेक ऐसे अवसर प्रदान करते हैं जिनसे उनमें अनेक मूल्यों का विकास होता है। उनमें सद्भाव, मित्रता, सहानुभूति, बंधुत्व आदि जैसे गुण विकसित हो जाते हैं। इनके माध्यम से ही कोई खिलाड़ी न केवल अपना, बल्कि अपने माता-पिता व देश का नाम गौरवान्वित करता है। जब कभी भी ओलम्पिक्स का आयोजन होता है तो न केवल विभिन्न देशों के खिलाड़ियों, बल्कि राष्ट्रों में भी मैत्री या मित्रता की भावना विकसित होती है । इन खेलों के माध्यम से खिलाड़ी अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं और देश का सम्मान बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार आधुनिक संदर्भ में इनका बहुत अधिक महत्त्व है।

प्रश्न 19.
ओलम्पिक शपथ, ओलम्पिक ध्वज तथा ओलम्पिक पुरस्कार पर नोट लिखें।
उत्तर:
ओलम्पिक शपथ-ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह शपथ लेता है कि “हम शपथ लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।”

ओलम्पिक ध्वज-बैरन पियरे डी कोबर्टिन के सुझाव पर सन् 1913 में ओलम्पिक ध्वज का निर्माण किया गया। ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम सन् 1920 में बेल्जियम के एंटवर्प शहर में आयोजित हुए खेलों में फहराया गया। यह ध्वज सफेद रंग का होता है। इसमें पाँच चक्र (Rings) परस्पर जुड़े हुए भिन्न-भिन्न रंगों के होते हैं; जो विश्व के पाँच महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इन चक्रों का आपस में जुड़े होना इन पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

ओलम्पिक पुरस्कार-ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या पुरस्कार दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को काँस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 8 ओलम्पिक आंदोलन

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
ओलम्पिक मूवमेंट (आंदोलन) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ओलम्पिक मूवमेंट (आंदोलन) का अर्थ उन प्रयासों या प्रयत्नों से है जो प्राचीन ओलम्पिक खेलों और एक लम्बे अंतराल के बाद आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने में शामिल थे। यह एक ऐसा शब्द है जो हमें ओलम्पिक खेलों की प्रगति से लेकर आधुनिक युग तक की विशेष जानकारी प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े समाप्त हो जाते थे। वे वैर-भावना को त्यागकर ओलम्पिक खेलें देखने जाते थे। यूनानी लोग खुशी-खुशी इन खेलों में भाग लेते थे। अतः इन खेलों का मुख्य उद्देश्य यूनान के नगर-राज्यों में आपसी लड़ाई एवं वैर-भावना समाप्त करके उनमें एकता, मित्रता एवं सद्भावना स्थापित करना था।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक में खिलाड़ियों को क्या पुरस्कार दिए जाते थे?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक पुरस्कारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक में पुरस्कार हेतु विजेता खिलाड़ियों को बहुत मान-सम्मान दिया जाता था। उन्हें जीयस देवता के मन्दिर में लगे पवित्र जैतून वृक्ष की टहनियों का मुकुट बनाकर भेंट किया जाता था। लोग विजेताओं को धन-दौलत और पशु उपहार के रूप में देते थे। कवि लोग उनके नामों से गीत गाते थे। शहर की दीवारों और दरवाज़े उनके स्वागत के लिए सजाए जाते थे। वे देश के हीरो होते थे। प्रत्येक यूनानी की इच्छा इन खेलों में विजयी बनने की होती थी।

प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें किसने और क्यों बन्द करवा दी थीं?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें रोमन बादशाह थियोडिसियस ने एक हुक्मनामे द्वारा बन्द करवा दी थीं। उनके अनुसार जीयस देवता का मन्दिर और ओलम्पिक खेलें यूनानियों को नवीन शक्ति प्रदान करती थीं। ये खेलें देशवासियों को देश-प्रेमी, दृढ़ इरादे वाले, स्वस्थ, हुनरमंद और जोशीले बनाती थीं जो रोमनों की ओर से यूनानियों से प्राप्त की विजय के लिए चुनौती पैदा कर सकते थे। इसलिए रोम-वासियों ने यूनानियों के साहसिक स्रोत ओलम्पिक खेलों को बन्द करवा दिया।

प्रश्न 5.
प्राचीन ओलम्पिक में कैसी खेलें करवाई जाती थीं?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेलों में कौन-कौन-से इवेन्ट्स होते थे?
उत्तर:
शुरुआत में प्राचीन ओलम्पिक खेलों में केवल 200 गज़ की सीधी दौड़ थी जिसको पहली बार कोलोइस धावक ने जीता था। चौदहवीं ओलम्पिक्स में 400 गज़ की दौड़ की वृद्धि की गई। पन्द्रहवीं ओलम्पिक्स में तीन मील लम्बी दौड़ और अठारहवीं ओलम्पिक्स में पेंटाथलॉन (200 गज दौड़, लम्बी छलांग, नेज़ाबाज़ी, डिस्कस और कुश्तियों) की वृद्धि की गई। इसके पश्चात् तेइसवीं, पच्चीसवीं और तीसवीं ओलम्पिक्स में मुक्केबाजी, रथ दौड़ें, कुश्तियाँ और पानी की खेलें शामिल की गईं।

प्रश्न 6.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।।
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें यूनानियों की देन थीं। यूनानियों के लिए इन खेलों का बहुत महत्त्व था। जिस महीने या वर्ष में इन खेलों का आयोजन होता था, उसको यूनानी पवित्र मानते थे। यूनान के राज्यों के राजाओं के आपसी झगड़े और वैर-भाव समाप्त हो जाती थी और एकता, मित्रता एवं सहयोग की भावना का विकास होता था। इन खेलों में जीतने वाले खिलाड़ी समाज में आदर एवं सम्मान पाते थे। उन्हें समाज में उच्च स्थान प्राप्त होता था।

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प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ क्या है?
अथवा
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के बारे में बताएँ।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति/संघ बनाए जाने का श्रेय आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जनक बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है। उनके अथक प्रयासों से 23 जून, 1894 ई० को यह समिति अस्तित्व में आई। यह समिति प्रत्येक चार साल बाद ग्रीष्मकालीन व शीतकालीन आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन करती है। इस समिति में विभिन्न देशों के सदस्य शामिल होते हैं। इस समिति के प्रथम अध्यक्ष देमित्रिस विकेलस थे। इसका मुख्यालय लोसाने (स्विट्ज़रलैण्ड) में है।

प्रश्न 8.
बैरन पियरे डी कोबर्टिन (Baron Pierre de Coubertin) कौन थे?
अथवा
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म 1 जनवरी, 1863 को फ्रांस में हुआ था। वे फ्रांस के प्रसिद्ध भाषाविद् एवं समाजशास्त्री थे। उनकी सामाजिक कार्यों, खेलों एवं शिक्षा के क्षेत्र में विशेष रुचि थी। उन्हें आधुनिक ओलम्पिक खेलों का जन्मदाता माना जाता है।

प्रश्न 9.
ओलम्पिक आंदोलन के कोई दो उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
(1) विश्व-शांति एवं बंधुता की भावना का विकास करना।
(2) राष्ट्रों में सहयोग की भावना बढ़ना और भेदभाव की भावना समाप्त करना।

प्रश्न 10.
भारतीय ओलम्पिक संघ के कोई दो कार्य बताएँ।
उत्तर:
(1) अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति के सभी नियमों को जारी करना।
(2) अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लिए खिलाड़ियों व टीमों का चयन करके उन्हें मुकाबले के लिए भेजना।

प्रश्न 11.
आधुनिक ओलम्पिक का जनक कौन था? इसकी स्थापना कब, कहाँ और क्यों हुई?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेल क्यों शुरू हुए?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेल कब, कहाँ और क्यों आरंभ हुए?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने का श्रेय कोबर्टिन को जाता है। इसलिए उनको आधुनिक ओलम्पिक खेलों का जनक माना जाता है। उन्होंने विश्व के राष्ट्रों को एक-दूसरे के निकट लाने और विश्व के युवाओं को युद्ध में लड़ने की बजाय खेल मुकाबलों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु इन खेलों को शुरू करने का सुझाव दिया। उन्होंने सोचा कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं को ओलम्पिक खेलों के माध्यम से आसानी से सुलझाया जा सकता है। काफी प्रयासों के बाद कोबर्टिन को प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करने में सफलता मिली।

प्रश्न 12.
ओलम्पिक खेलों के प्रमुख प्रतीक (Symbols) कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) ओलम्पिक मशाल,
(2) ओलम्पिक ध्वज,
(3) ओलम्पिक आदर्श (मॉटो),
(4) ओलम्पिक शपथ।

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प्रश्न 13.
आधुनिक ओलम्पिक पुरस्कारों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में पहले तीन स्थानों पर आने वाले खिलाड़ियों या टीमों को पदक या तमगे (Medals) दिए जाते हैं। पहले स्थान प्राप्तकर्ता को स्वर्ण पदक (Gold Medal), दूसरे स्थान प्राप्तकर्ता को रजत पदक (Silver Medal) और तीसरे स्थान प्राप्तकर्ता को काँस्य पदक (Bronze Medal) दिया जाता है। इसके अतिरिक्त जीतने वाले खिलाड़ी को प्रमाण-पत्र भी दिया जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक कर्मचारी को जो ओलम्पिक खेलों के प्रबन्ध में सहायता करता है, तमगा (Medal) दिया जाता है।

प्रश्न 14.
ओलम्पिक ध्वज के वलय (चक्र) क्या प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज के वलय पाँच महाद्वीपों के प्रतीक हैं। ये पाँचों वलय उत्साह, आस्था, सद्भाव, काम की नैतिकता और खेल-भावना को प्रदर्शित करते हैं। इन वलयों या चक्रों का आपस में जुड़े होना पाँच महाद्वीपों की मित्रता एवं सद्भावना का प्रतीक है।

प्रश्न 15.
ओलम्पिक प्रतिज्ञा या शपथ (Olympic oath) क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों के शुरू होने से पहले मेजबान देश का खिलाड़ी यह प्रतिज्ञा लेता है कि “हम प्रतिज्ञा लेते हैं कि हम इन ओलम्पिक खेलों में सच्चे खिलाड़ीपन की भावना से भाग लेंगे तथा अपने देश के सम्मान एवं खेलों के गौरव के लिए खेलों के सारे नियमों का आदर एवं पालन करेंगे।”

प्रश्न 16.
ओलम्पिक मॉटो (Olympic Motto) क्या है?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में ‘मॉटो’ का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ओलम्पिक मॉटो निम्नलिखित तीन शब्दों से बना है
(1) सीटियस-बहुत तेज।
(2) अल्टियस-बहुत ऊँचा।
(3) फॉर्टियस-बहुत मज़बूत।
ये तीनों शब्द खिलाड़ियों को प्रेरित करने के लिए हैं, जिनका अर्थ क्रमशः तेज दौड़ना, ऊँचा कूदना और जोर से फेंकना होता है। ये शब्द खिलाड़ियों में उत्साह भरते हैं और वे अच्छा प्रदर्शन करने हेतु प्रेरित होते हैं।

प्रश्न 17.
ओलम्पिक आदर्श क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों के संबंध में कोबर्टिन ने एक आदर्श प्रस्तुत किया कि “ओलम्पिक में सबसे आवश्यक बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि भाग लेना है। जीवन में सबसे महत्त्वपूर्ण बात जीत प्राप्त करना नहीं, बल्कि संघर्ष करना है। आवश्यक यह नहीं कि आप जीते हैं, बल्कि यह है कि आप अच्छी तरह खेलें।”

प्रश्न 18.
आधुनिक या नवीन ओलम्पिक खेलों में कौन-कौन-सी मुख्य खेलें शामिल की गई हैं?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में निम्नलिखित मुख्य खेलें शामिल की गई हैं
(1) एथलेटिक्स
(2) फुटबॉल
(3) हैंडबॉल
(4) निशानेबाजी
(5) तैराकी और डाईविंग
(6) तीरंदाजी
(7) बास्केटबॉल
(8) रोइंग
(9) वाटर-पोलो
(10) हॉकी
(11) कैनोइंग
(12) याचिंग
(13) मुक्केबाज़ी
(14) तलवारबाजी
(15) पेंटाथलॉन
(16) वॉलीबॉल
(17) जूडो
(18) बैडमिंटन
(19) भारोत्तोलन
(20) कुश्ती
(21) टेबल टेनिस
(22) साइक्लिग
(23) घुड़सवारी
(24) लॉन टेनिस
(25) जिम्नास्टिक आदि।

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प्रश्न 19.
ओलम्पिक खेलों का महत्त्वपूर्ण चिह्न क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलों का चिहन पाँच छल्लों या चक्रों का बना होता है जो आपस में जुड़े होते हैं। इनका रंग क्रमशः नीला, पीला, काला, लाल व हरा है जो पाँच महाद्वीपों अर्थात् यूरोप, एशिया, अफ्रीका, अमेरिका व ऑस्ट्रेलिया को दर्शाते हैं। ओलम्पिक चिह्न निष्पक्ष व मुक्त स्पर्धा का प्रतीक है।

प्रश्न 20.
ओलम्पिक चार्टर क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक का अपना एक चार्टर है। ओलम्पिक चार्टर में इस खेल के उद्देश्य वर्णित हैं। इस चार्टर में अग्रलिखित उद्देश्य वर्णित हैं
(1) खेलों के लिए आवश्यक शारीरिक व नैतिक गुणों का विकास करना।।
(2) विश्व-शांति को अधिक सशक्त बनाने हेतु खेलों के माध्यम से युवाओं में आपसी सद्भाव व मित्रता बढ़ाना।
(3) अंतर्राष्ट्रीय सद्भावना उत्पन्न करना।
(4) विश्व के सभी खिलाड़ियों को प्रति चार वर्ष बाद एक स्थान पर एकत्र करना।

HBSE 12th Class Physical Education ओलम्पिक आंदोलन Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1. प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल कब शुरू हुए थे?
उत्तर:
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल 776 ईसा पूर्व में शुरू हुए थे।

प्रश्न 2.
प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने दिनों तक चलते थे?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेल पाँच दिनों तक चलते थे।

प्रश्न 3.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को कब और किसने बंद करवाया था?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेल किसने बन्द किए थे?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक खेल कब खत्म हुए थे?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को 393 ईस्वी में रोमन सम्राट थियोडोसियस ने बंद करवाया था।

प्रश्न 4.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों को आरम्भ करने का श्रेय किसको जाता है?
उत्तर:
ऐलिस के बादशाह इफीटस (Ifetus) और क्लीओसथैनिस (Calliosthenes) को।

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प्रश्न 5.
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए गए थे?
उत्तर:
प्रथम प्राचीन ओलम्पिक खेल यूनान के ओलम्पिया नगर में आयोजित किए गए थे।

प्रश्न 6.
प्रत्येक यूनानी का स्वप्न क्या होता था?
उत्तर:
प्रत्येक यूनानी का स्वप्न ओलम्पिक खेलों में विजयी बनने का होता था।

प्रश्न 7.
ओलम्पिक खेलें हमें क्या सन्देश देती हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक खेलें हमें शान्ति, पवित्रता, मित्रता और आपसी भाईचारे का सन्देश देती हैं।

प्रश्न 8.
प्राचीन ओलम्पिक खेलें कितने वर्ष बाद करवाई जाती थीं?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलें चार वर्ष बाद करवाई जाती थीं।

प्रश्न 9.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के समय यूनान में लड़ाइयाँ कब तक बन्द कर दी जाती थीं?
उत्तर:
सारे यूनान में ओलम्पिक खेलों के आरम्भ होने से लेकर खिलाड़ियों के घर वापिस जाने तक लड़ाइयाँ बन्द कर दी जाती थीं।

प्रश्न 10.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की पहली स्पर्धा क्या थी?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों की पहली स्पर्धा दौड़ थी।

प्रश्न 11.
क्या प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेलों में भाग लेने की इजाजत थी?
उत्तर:
नहीं, प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेलों में भाग लेने की इजाजत नहीं थी।

प्रश्न 12.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों के विजेताओं को किस वृक्ष के पत्तों से बनी माला पहनाई जाती थी?
अथवा
प्राचीन ओलम्पिक में विजेता को कैसे सम्मानित किया जाता था?
उत्तर:
जैतून (Olive) वृक्ष के पत्तों से बनी माला पहनाकर।

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प्रश्न 13.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता या जनक कौन थे?
अथवा
आधुनिक ओलम्पिकि खेलों को शुरू करने का श्रेय किसे जाता है?
उत्तर:
‘बैरन पियरे डी कोबर्टिन।

प्रश्न 14.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत ने अपना पहला स्वर्ण पदक कब जीता था?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भारत ने अपना पहला स्वर्ण पदक वर्ष 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक खेलों में जीता था।

प्रश्न 15.
भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम कब भाग लिया?
उत्तर:
भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम सन् 1900 के पेरिस ओलम्पिक खेलों में भाग लिया।

प्रश्न 16.
भारत में ओलम्पिक एसोसिएशन कब स्थापित हुई?
उत्तर:
भारत में ओलम्पिक एसोसिएशन सन् 1927 में स्थापित हुई।

प्रश्न 17.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियम कब और कहाँ बनाए गए?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के नियम सन् 1908 के लंदन ओलम्पिक खेलों में बनाए गए।

प्रश्न 18.
ओलम्पिक खेल कितने वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित की जाती हैं?
अथवा
ओलम्पिक खेल कितने वर्ष बाद आयोजित किए जाते हैं?
उत्तर:
चार वर्षों के अंतराल के बाद ।

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प्रश्न 19.
IOC का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
International Olympic Committee.

प्रश्न 20.
ओलम्पिक ध्वज का रंग क्या है?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज का रंग सफेद है।

प्रश्न 21.
ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम किस ओलम्पिक खेलों में फहराया गया था?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज को सर्वप्रथम वर्ष 1920 के एंटवर्प ओलम्पिक खेलों में फहराया गया था।

प्रश्न 22.
किस महाद्वीप में किसी भी आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ है?
उत्तर:
अफ्रीका महाद्वीप में किसी भी आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हुआ है।

प्रश्न 23.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ की स्थापना कब हुई? ।
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक संघ की स्थापना सन् 1894 में हुई।

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प्रश्न 24.
ओलम्पिक मशाल को विभिन्न देशों में ले जाने की प्रथा कब शुरू हुई?
उत्तर:
ओलम्पिक मशाल को विभिन्न देशों में ले जाने की प्रथा सन् 1936 के बर्लिन ओलम्पिक खेलों से शुरू हुई।

प्रश्न 25.
ओलम्पिक खेल समारोह में किस देश के खिलाड़ियों का दल सर्वप्रथम स्टेडियम में प्रवेश करता है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल समारोह में यूनान के खिलाड़ियों का दल सर्वप्रथम स्टेडियम में प्रवेश करता है।

प्रश्न 26.
ओलम्पिक खेल समारोह में किस देश के खिलाड़ियों का दल अन्त में स्टेडियम में प्रवेश करता है?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल समारोह में मेजबान देश के खिलाड़ियों का दल अन्त में स्टेडियम में प्रवेश करता है।

प्रश्न 27.
अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने कितने स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं?
उत्तर:
अभी तक हुए ओलम्पिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम ने 8 स्वर्ण पदक प्राप्त किए हैं।

प्रश्न 28.
किस भारतीय खिलाड़ी ने सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था?
उत्तर:
अभिनव बिन्द्रा ने सन् 2008 के बीजिंग ओलम्पिक खेलों में स्वर्ण पदक जीता था।

प्रश्न 29.
सन् 2016 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन किस देश में हुआ?
उत्तर:
सन् 2016 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन ब्राजील में हुआ।

प्रश्न 30.
ओलम्पिक ध्वज को कब निर्मित किया गया?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज को वर्ष 1913 में निर्मित किया गया।

प्रश्न 31.
ओलम्पिक शपथ कब शुरू हुई?
उत्तर:
ओलम्पिक शपथ सन् 1920 में शुरू हुई।

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प्रश्न 32.
छठे, बारहवें, तेरहवें ओलम्पिक खेल क्यों रद्द किए गए?
उत्तर:
प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्धों के कारण।

प्रश्न 33.
महिलाओं ने ओलम्पिक्स में भाग लेना कब शुरू किया?
उत्तर:
महिलाओं ने ओलम्पिक्स में भाग लेना सन् 1900 में हुए पेरिस ओलम्पिक्स से शुरू किया।

प्रश्न 34.
ओलम्पिक मशाल को कहाँ और कैसे प्रज्वलित किया जाता था?
उत्तर:
यूनान के ओलम्पिया शहर में हेरा मंदिर के सामने सूर्य की किरणों से।

प्रश्न 35.
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर:
बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म फ्रांस में हुआ था।

प्रश्न 36.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता कोबर्टिन की मृत्यु किस सन में हुई?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के जन्मदाता कोबर्टिन की मृत्यु सन् 1937 में हुई।

प्रश्न 37.
ओलम्पिया नगर में किस देवता का प्रसिद्ध मन्दिर था?
उत्तर:
ओलम्पिया नगर में जीयस देवता का प्रसिद्ध मन्दिर था।

प्रश्न 38.
ओलम्पिक झण्डे में छल्ले कितने महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं?
उत्तर:
पाँच महाद्वीपों का।

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प्रश्न 39.
ओलम्पिक ध्वज में कितने छल्ले (चक्र) होते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज में पाँच छल्ले (चक्र) होते हैं।

प्रश्न 40.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी कौन था?
उत्तर:
आधुनिक ओलम्पिक खेलों में भाग लेने वाला प्रथम भारतीय खिलाड़ी एंग्लो इण्डियन नॉर्मन गिलबर्ड प्रिटिहार्ड था।

प्रश्न 41.
ओलम्पिक खेलों का प्रबंध कौन करता है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (International Olympic Committee)।

प्रश्न 42.
पहली नवीन ओलम्पिक खेलें कहाँ पर हुए थे?
उत्तर:
पहली नवीन ओलम्पिक खेलें यूनान के शहर एथेंस में हुए थे।

प्रश्न 43.
भारतीय हॉकी टीम ने प्रथम बार किस ओलम्पिक में सोने का मैडल जीता?
अथवा
भारतीय हॉकी टीम ने पहली बार सोने का तमगा कब और कहाँ जीता?
उत्तर:
भारतीय हॉकी टीम ने प्रथम बार सन् 1928 के एम्सटर्डम ओलम्पिक्स में सोने का मैडल (तमगा) जीता।

प्रश्न 44.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों की पहली महिला चैंपियन का नाम बताएँ।
उत्तर:
ब्रिटेन की टेनिस खिलाड़ी चार्लोट कूपर (Charlotte Cooper)।

प्रश्न 45.
भारत की किस महिला खिलाड़ी ने 2000 के सिडनी ओलम्पिक्स में तृतीय स्थान प्राप्त किया?
उत्तर:
कर्णम मल्लेश्वरी ने 69 किलो भार वर्ग में 2000 सिडनी ओलम्पिक्स में भारत्तोलन (Weightlifting) में तृतीय स्थान प्राप्त किया।

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प्रश्न 46.
2012 की ओलम्पिक खेलें कहाँ हई?
उत्तर:
2012 की ओलम्पिक खेलें इंग्लैण्ड के लंदन शहर में हुईं।

प्रश्न 47.
ओलम्पिक झण्डे की बनावट किसने बनाई?
उत्तर:
ओलम्पिक झण्डे की बनावट बैरन पियरे डी कोबर्टिन ने बनाई।

प्रश्न 48.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों के प्रथम विजेता खिलाड़ी का नाम बताएँ।
उत्तर:
जेम्स बी०कोनोली (James B. Connolly) जो एक धावक था।

प्रश्न 49.
टोकियो में ओलम्पिक खेल कब आयोजित होंगे?
उत्तर:टोकियो में ओलम्पिक खेल सन् 2020 में आयोजित होंगे।

प्रश्न 50.
सन् 2020 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए जाएंगे?
उत्तर:
सन् 2020 के ओलम्पिक खेल जापान के टोकियो शहर में आयोजित किए जाएंगे।

प्रश्न 51.
ओलम्पिक झण्डे के पाँच चक्र किस बात के प्रतीक हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक झण्डे के पाँच चक्र पाँच महाद्वीपों की आपसी मित्रता और सद्भावना के प्रतीक हैं।

प्रश्न 52.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय किस देश में स्थित है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय स्विट्ज़रलैण्ड में स्थित है।

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प्रश्न 53.
शीतकालीन ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुई?
उत्तर:
शीतकालीन ओलम्पिक खेलें सन् 1924 में शुरू हुईं।

प्रश्न 54.
विकास व शांति के लिए किस दिन को अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में चुना गया?
उत्तर:
विकास व शांति के लिए 6 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में चुना गया।

प्रश्न 55.
ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, आल्टियस, फॉर्टियस’ किसने बनाया था?
उत्तर:
ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, आल्टियस, फॉर्टियस’ फादर डिडोन ने बनाया था।

प्रश्न 56.
सन् 1896 के प्रथम आधुनिक ओलम्पिक में कितने देशों ने भाग लिया था?
उत्तर:
सन् 1896 के प्रथम आधुनिक ओलम्पिक में 14 देशों ने भाग लिया था।

प्रश्न 57.
I.O.A. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
Indian Olympic Association.

प्रश्न 58.
भारतवर्ष ने कुश्ती में ओलम्पिक खेलों में अभी तक कितने पदक जीते हैं?
उत्तर:
पाँच पदक।

प्रश्न 59.
उन भारतीय पुरुष खिलाड़ियों के नाम लिखें जिन्होंने लंदन ओलम्पिक्स में पदक प्राप्त किए थे।
उत्तर:
(1) गगन नारंग,
(2) विजय कुमार,
(3) सुशील कुमार,
(4) योगेश्वर दत्त।

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प्रश्न 60.
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पहला चैंपियन कौन था?
उत्तर:
प्राचीन ओलम्पिक खेलों का पहला चैंपियन कोरोइबस था।

प्रश्न 61.
ओलम्पिक खेलों का दोबारा आयोजन कब शुरू हुआ?
अथवा
नवीन या आधुनिक ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुई?
उत्तर:
वर्ष 1896 में।

प्रश्न 62.
ओलम्पिक ध्वज के पाँच छल्ले किसकी एकता को प्रदर्शित करते हैं?
उत्तर:
ओलम्पिक ध्वज के पाँच छल्ले पाँच महाद्वीपों की एकता को प्रदर्शित करते हैं।

प्रश्न 63.
ओलम्पिक झंडे का सफेद रंग किसका प्रतीक है?
उत्तर:
ओलम्पिक झंडे का सफेद रंग विश्व-शान्ति का प्रतीक है।

प्रश्न 64.
ओलम्पिक अवार्ड क्या हैं?
उत्तर:
स्वर्ण पदक, रजत पदक व काँस्य पदक ओलम्पिक अवार्ड हैं।

प्रश्न 65.
रियो ओलम्पिक खेलों ( 2016) में भारत ने कितने पदक प्राप्त किए?
उत्तर:
रियो ओलम्पिक खेलों (2016) में भारत ने दो पदक प्राप्त किए।

प्रश्न 66.
आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन कब-कब नहीं हुआ?
अथवा
आधुनिक खेल कितनी बार नहीं हुए?
उत्तर:
ओलम्पिक खेल तीन बार 1916, 1940 व 1944 में नहीं हुए। सन् 2020 के टोकियो ओलम्पिक खेल रद्द हुए, लेकिन इनके पुनः आयोजन होने की संभावाना है।

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प्रश्न 67.
अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का पहला अध्यक्ष कौन था?
उत्तर:
देमित्रिस विकेलस (Demetrios Vikelas)।

प्रश्न 68.
33वें ओलम्पिक खेल (2024) किस देश में होंगे?
अथवा
सन् 2024 में ओलम्पिक खेल कहाँ होंगे? उत्तर:फ्रांस (पेरिस) में।

प्रश्न 69.
सन् 2028 में ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित होंगे?
अथवा
34वें ओलम्पिक खेल (2028) किस देश में होंगे?
उत्तर:
अमेरिका (लॉस एंजिल्सि) में।

प्रश्न 70.
टोकियो ओलम्पिक खेल (2020) क्यों रद्द किए गए?
उत्तर:
कोविड-19 नामक महामारी के कारण।

प्रश्न 71.
स्थगित हुए टोकियो ओलम्पिक खेल (2020) कब आयोजित किए जाएंगे?
उत्तर:
ये खेल 23 जुलाई से 8 अगस्त, 2021 तक आयोजित किए जा सकते हैं। ये खेल 24 जुलाई से 9 अगस्त, 2020 तक आयोजित होने थे, लेकिन कोविड-19 नामक महामारी के कारण स्थगित (रद्द) कर दिए गए थे।

प्रश्न 72.
एथेंस का कौन-सा स्टेडियम प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का गवाह बना था?
उत्तर:
एथेंस का पनाथिनाइको स्टेडियम प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का गवाह बना था।

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प्रश्न 73.
किंस एकमात्र ओलम्पिक में क्रिकेट को शामिल किया गया था?
उत्तर:
पेरिस ओलम्पिक (1900) में क्रिकेट को शामिल किया गया था।

प्रश्न 74.
दूसरा आधुनिक ओलम्पिक कब और कहाँ आयोजित हुआ था?
उत्तर:
दूसरा आधुनिक ओलम्पिक 1900 में पेरिस में आयोजित हुआ था।

प्रश्न 75.
खिलाड़ियों को पदक देने की परम्परा किस ओलम्पिक से शुरू हुई?
उत्तर:
खिलाड़ियों को पदक देने की परम्परा सेंट लूइस ओलम्पिक (1904) से शुरू हुई।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें-

1. प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने वर्षों तक जारी रहे थे?
(A) लगभग 1194 वर्षों तक
(B) लगभग 1258 वर्षों तक
(C) लगभग 1170 वर्षों तक
(D) लगभग 1165 वर्षों तक
उत्तर:
(C) 1170 वर्षों तक

2. किस रोमन सम्राट् ने प्राचीन ओलम्पिक खेलों पर रोक लगाई थी?
(A) थियोडोसियस ने
(B) पैल्पोस ने
(C) सिकंदर ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) थियोडोसियस ने

3. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.C.) का मुख्यालय किस देश में स्थित है?
(A) अमेरिका में
(B) फ्राँस में
(C) स्विट्ज़रलैण्ड में
(D) इंग्लैण्ड में
उत्तर:
(C) स्विट्ज़रलैण्ड में

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4. प्राचीन ओलम्पिक खेलों से संबंधी निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
(A) प्रारंभ में महिलाओं को ओलम्पिक खेल देखने की इजाजत नहीं थी
(B) प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत रोम में हुई थी
(C) प्राचीन ओलम्पिक खेल तीन से पाँच दिन तक चलते थे
(D) प्राचीन ओलम्पिक खेलों को रोमन सम्राट थियोडोसियस ने बंद करवाया था
उत्तर:
(B) प्राचीन ओलम्पिक खेलों की शुरुआत रोम में हुई थी

5. शीतकालीन ओलम्पिक खेलें कब शुरू हुईं?
(A) सन् 1920 में
(B) सन् 1924 में
(C) सन् 1928 में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) सन् 1924 में

6. भारत में ओलम्पिक खेलों का आयोजन कितनी बार हुआ?
(A) दो बार
(B) चार बार
(C) एक बार
(D) एक बार भी नहीं
उत्तर:
(D) एक बार भी नहीं

7. ओलम्पिक ध्वज का रंग है
(A) ,सफेद
(B) हरा
(C) पीला
(D) नीला
उत्तर:
(A) सफेद

8. ओलम्पिक मॉटो Citius-Altius-Fortius’ का अर्थ है
(A) Faster-Higher-Stronger
(B) Higher-Stronger-Faster
(C) Stronger-Faster-Higher
(D) Faster-Stronger-Higher
उत्तर:
(A) Faster-Higher-Stronger

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9. आधुनिक ओलम्पिक खेलों को पुनः आरंभ करवाने का श्रेय किसे जाता है?
(A) पैल्पोस को
(B) थियोडोसियस को
(C) बैरन पियरे डी कोबर्टिन को
(D) यूनान की जनता को
उत्तर:
(C) बैरन पियरे डी कोबर्टिन को

10. प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों का आयोजन कहाँ किया गया?
(A) सेंट लूइस में
(B) एथेंस में
(C) एम्सटर्डम में
(D) लंदन में
उत्तर:
(B) एथेंस में

11. ओलम्पिक ध्वज के पाँच वलय (Rings) प्रतीक हैं
(A) पाँच नदियों के
(B) पाँच महाद्वीपों के
(C) पाँच महासागरों के
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पाँच महाद्वीपों के

12. किस वर्ष ओलम्पिक में भारतीय राष्ट्रीय गान पहली बार बजा?
(A) सन् 1948 में
(B) सन् 1952 में
(C) सन् 1928 में
(D) सन् 1932 में
उत्तर:
(A) सन् 1948 में

13. बैरन पियरे डी कोबर्टिन का जन्म कहाँ हुआ था?
(A) रूस में
(B) इंग्लैण्ड में
(C) फ्राँस में
(D) अमेरिका में
उत्तर:
(C) फ्राँस में

14. सन् 2000 के ओलम्पिक खेल कहाँ पर आयोजित हुए थे?
(A) लंदन में
(B) पेरिस में
(C) सिडनी में
(D) टोकियो में
उत्तर:
(C) सिडनी में

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15. भारत ने ओलम्पिक खेलों में सर्वप्रथम कब भाग लिया?
(A) सन् 1936 में
(B) सन् 1900 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1986 में
उत्तर:
(B) सन् 1900 में

16. ‘अल्टियस’ ओलम्पिक मॉटो बताता है
(A) गति
(B) मजबूत
(C) ऊँचा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) ऊँचा

17. ओलम्पिक खेलों में कबूतर छोड़ना कब बंद किया गया?
(A) सन् 1936 में
(B) सन् 1996 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1986 में
उत्तर:
(B) सन् 1996 में

18. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विश्व के सबसे बड़े खेल हैं
(A) ओलम्पिक खेल
(B) एशियाई खेल
(C) राष्ट्रमण्डल खेल
(D) एफ्रो खेल
उत्तर:
(A) ओलम्पिक खेल

19. विशिष्ट ओलम्पिक में कौन प्रतिभागी होते हैं?
(A) शारीरिक रूप से अस्वस्थ
(B) मानसिक रूप से अस्वस्थ
(C) (A) एवं (B) दोनों
(D) बुजुर्ग
उत्तर:
(C) (A) एवं (B) दोनों

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20. ओलम्पिक खेलों का प्रारंभिक प्रतीक है
(A) ओलम्पिक मशाल
(B) ओलम्पिक ध्वज
(C) ओलम्पिक शपथ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ओलम्पिक मशाल

21. निम्नलिखित वर्ष के ओलम्पिक खेलों का आयोजन नहीं हो सका
(A) वर्ष 1916 के
(B) वर्ष 1940 के
(C) वर्ष 1944 के
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

22. ओलम्पिक मॉटो ‘सिटियस, अल्टियस, फॉर्टियस’ किसने बनाया था?
(A) फादर विलियम ने
(B) फादर रॉय ने
(C) फादर डिडोन ने
(D) कोबर्टिन ने
उत्तर:
(C) फादर डिडोन ने

23. सन् 1896 के पहले आधुनिक ओलम्पिक में कितने देशों ने भाग लिया था?
(A) 11
(B) 12
(C) 13
(D) 14
उत्तर:
(D) 14

24. 1896 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए गए थे?
(A) एथेन्स में
(B) स्पार्टा में
(C) पेरिस में
(D) लंदन में
उत्तर:
(A) एथेन्स में

25. भारतीय ओलम्पिक संघ (I.O.A.) का गठन कब किया गया?
(A) सन् 1925 में
(B) सन् 1926 में
(C) सन् 1927 में
(D) सन् 1928 में
उत्तर:
(C) सन् 1927 में

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26. हॉकी के अंदर कौन-से ओलम्पिक खेल में भारत अंतिम बार मेडल जीता?
(A) 1980, मॉस्को
(B) 1988, बार्सिलोना
(C) 1988, सियोल
(D) 2004, एथेन्स
उत्तर:
(A) 1980, मॉस्को

27. I.O.A. का पूरा नाम है
(A) Indian Olympic Acadmic
(B) International Olympic Association
(C) Indian Olympic Association
(D) International Olympic Acadmic
उत्तर:
(C) Indian Olympic Association

28. सन् 2024 में ओलम्पिक खेलों का आयोजन होगा
(A) टोकियो में
(B) लंदन में
(C) पेरिस में
(D) लॉस एंजिल्स
उत्तर:
(C) पेरिस में

29. सन् 2020 के ओलम्पिक खेल किस कारण स्थगित हुए?
(A) विश्व महायुद्ध के कारण
(B) विश्व महामंदी के कारण
(C) कोरोना-19 महामारी के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कोरोना-19 महामारी के कारण

30. ओलम्पिक खेल कितने वर्ष के अन्तराल पर होते हैं?
(A) एक वर्ष
(B) दो वर्ष
(C) तीन वर्ष
(D) चार वर्ष
उत्तर:
(D) चार वर्ष

31. ओलम्पिक शपथ का सर्वप्रथम प्रयोग ओलम्पिक खेलों में कब किया गया था?
(A) 1916 में
(B) 1920 में
(C) 1924 में
(D) 1928 में
उत्तर:
(B) 1920 में

32. 1916, 1940 व 1944 के ओलम्पिक खेलों का आयोजन किस कारण नहीं हुआ?
(A) विश्वयुद्धों के कारण ।
(B) धन के अभाव के कारण
(C) राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) विश्वयुद्धों के कारण

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33. ओलम्पिक ध्वज में कितने वलय/चक्र होते हैं?
(A) 5
(B) 4
(C) 6
(D) 3
उत्तर:
(A)5

34. प्राचीन ओलम्पिक खेल कितने वर्षों बाद आयोजित किए जाते थे?
(A) 2
(B) 3
(C) 4
(D) 7
उत्तर:
(C)4

35. 2028 के ओलम्पिक खेल कहाँ आयोजित किए जाएंगे?
(A) लॉस एंजिल्सि में
(B) पेरिस में
(C) टोकियो में
(D) बार्सिलोना में
उत्तर:
(A) लॉस एंजिल्सि में

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. प्रथम ओलम्पिक खेल ………………. में आयोजित किए गए थे।
2. ओलम्पिक ध्वज में. ……………….. छल्ले हैं।
3. ओलम्पिक शपथ वर्ष ………………… में शुरू की गई।
4. महिलाओं ने ओलम्पिक में भाग लेना वर्ष …………………. में शुरू किया।
5. सन् 1896 में हुए प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों में कुल ………………… देशों ने भाग लिया था।
6. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (I.O.A) का गठन वर्ष ………………… में किया गया।
7. ओलम्पिक खेल ………………… वर्ष बाद आयोजित किए जाते हैं।
8. प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेल सन् ………………… में शुरू हुए थे।
9. ओलम्पिक ध्वज का रंग ………………… है।
10. ……………….. ओलम्पिक (1920) में पहली बार ओलम्पिक शपथ का आयोजन हुआ।
11. अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति का कार्यालय ………………… में स्थित है।
12. ………………… में ओलम्पिक खेलों का आयोजन फ्रांस के पेरिस शहर में होगा।
उत्तर:
1. यूनान
2. पाँच
3. 1920
4. 1900
5. 14
6. 1894
7. चार
8. 1896
9. सफेद
10. एंटवर्प
11. स्विट्जरलैंड (लोसाने)
12. सन् 2024।

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ओलम्पिक आंदोलन Summary

ओलम्पिक आंदोलन परिचय

ओलम्पिक आंदोलन या मूवमेंट (Olympic Movement):
ओलम्पिक आंदोलन या मूवमेंट का अर्थ उन प्रयासों या प्रयत्नों से है जो प्राचीन ओलम्पिक खेलों और एक लम्बे अंतराल के बाद आधुनिक ओलम्पिक खेलों को शुरू करने में शामिल थे। यह एक ऐसा शब्द है जो हमें ओलम्पिक खेलों की प्रगति से लेकर आधुनिक युग तक की विशेष जानकारी प्रदान करता है। . प्राचीन ओलम्पिक खेल (Ancient Olympic Games)-प्राचीन ओलम्पिक खेल सर्वप्रथम यूनान के ओलम्पिया नगर में 776 ईसा पूर्व आयोजित किए गए थे।

प्राचीनकाल में ओलम्पिक खेल धार्मिक त्योहारों तथा समारोहों से संबंधित थे जो जीयस देवता के प्रति समर्पित थे। इन प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों को भगवान को दी जाने वाली प्रार्थना समझा जाता था। विजेताओं को जैतून की शाखाओं से सम्मानित किया जाता था। विजेता लोगों की नजरों में नायक बन जाते थे। खिलाड़ी स्पष्ट रूप से सम्मान प्राप्त करने के लिए खेल को प्रतिस्पर्धात्मक भावना से खेलते थे। रोमनवासियों ने 393 ईस्वी में ओलम्पिक खेलों पर रोक लगा दी थी, क्योंकि वे खेल मुकाबलों की बजाय खून भरी लड़ाइयों में विश्वास करते थे। अंततः रोमन सम्राट् थियोडोसियस ने इन खेलों को बंद करवा दिया।

आधुनिक ओलम्पिक खेल (Modern Olympic Games):
आधुनिक/नवीन ओलम्पिक खेलों को आरंभ करने का सारा श्रेय फ्रांसीसी विद्वान् बैरन पियरे डी कोबर्टिन को जाता है, जिनके अथक प्रयासों के कारण ही इन खेलों का पुनः आरंभ हो सका। उन्होंने इन खेलों को पुनः आरंभ करने के लिए 18 जून, 1894 को पेरिस में सोरबोन सम्मेलन आयोजित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खेल से संबंधित योजनाओं को 11 देशों के प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया।सम्मेलन द्वारा उनके प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद, प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों के लिए एकतारीख सुनिश्चित करने की आवश्यकता थी।खेलों के आयोजन एवं नियंत्रण हेतु अंतर्राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति (IOC) का गठन किया गया। देमित्रिस विकेलस को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया। सर्वसम्मति से प्रथम आधुनिक ओलम्पिक खेलों को 6 अप्रैल, 1896 को यूनान के शहर एथेंस में आयोजित करना सुनिश्चित किया गया।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

HBSE 12th Class Physical Education योग शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग के बारे में आप क्या जानते हैं? इसका क्या उद्देश्य है?
अथवा
योग का अर्थ, परिभाषा तथा उद्देश्य पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
योग का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Yoga): ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मन:स्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य। सामान्य शब्दों में, योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है। यह व्यक्ति के गुणों व शक्तियों का आपस में मिलना है।

1. कठोपनिषद् (Kathopnishad) के अनुसार, “जब हमारी ज्ञानेंद्रियाँ स्थिर अवस्था में होती हैं, जब मस्तिष्क स्थिर अवस्था में होता है, जब बुद्धि भटकती नहीं, तब बुद्धिमान कहते हैं कि इस अवस्था में पहुँचने वाले व्यक्ति ने सर्वोत्तम अवस्था वाले चरण को प्राप्त कर लिया है। ज्ञानेंद्रियों व मस्तिष्क के इस स्थायी नियंत्रण को ‘योग’ की परिभाषा दी गई है। वह जो इसे प्राप्त कर लेता है, वह भ्रम से मुक्त हो जाता है।”

2. महर्षि पतंजलि (Maharshi Patanjali) के अनुसार, “योग: चित्तवृत्ति निरोधः” अर्थात् “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।”
3. श्री याज्ञवल्क्य (Shri Yagyavalkya) के अनुसार, “जीवात्मा से परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।”
4. महर्षि वेदव्यास (Maharshi Vedvyas) के अनुसार, “योग समाधि है।”
5. डॉ० संपूर्णानंद (Dr. Sampurmanand) के अनुसार, “योग आध्यात्मिक कामधेनु है।”
6. श्रीमद्भगवद् गीता (Shrimad Bhagvad Gita) के अनुसार, “बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते। तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्।” अर्थात् समबुद्धि युक्त मनुष्य इस जीवन में ही अच्छे और बुरे कार्यों से अपने को मुक्त कर लेता है। अतः योग के लिए प्रयत्न करो क्योंकि सारा कार्य-कौशल यही है।
7. भगवान श्रीकृष्ण (Lord Shri Krishna) ने कहा-“योग कर्मसुकौशलम्।” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। 8. स्वामी कृपालु जी (Swami Kripaluji) के अनुसार, “हर कार्य को बेहतर कलात्मक ढंग से करना ही योग है।”

इस प्रकार योग आत्मा एवं परमात्मा का संयोजन है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है और संपूर्ण शांति प्रदान करता है। योग हम को उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको भुगतने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता। बी०के०एस० आयंगर (B.K.S. Iyengar) के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य (Objective of Yoga):
योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है। योग व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक तथा आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति वैज्ञानिक ढंगों से करता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

प्रश्न 2.
अष्टांग योग क्या है? अष्टांग योग के विभिन्न अंगों या अवस्थाओं का वर्णन करें।
अथवा
महर्षि पतंजलि ने अष्टांग योग के कौन-कौन-से आठ अंग बताए हैं? उनके बारे में लिखें।
अथवा
अष्टांग योग के आठ अंगों या घटकों के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तारपूर्वक लिखें।
उत्तर:
अष्टांग योग का अर्थ (Meaning of Ashtanga Yoga):
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है। अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ या अंग। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ (Stages) होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। अष्टांग योग का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का नाश होता है, जिससे ज्ञान का प्रकाश चमकता है और विवेक (ख्याति) की प्राप्ति होती है।

अष्टांग योग के अंग या घटक (Components of Ashtanga Yoga): महर्षि पतंजलि ने इसके आठ अंग (अवस्थाएँ) बताए हैं; जैसे
1. यम (Yama, Forbearance):
यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है।

2.नियम (Niyama, Observance):
नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं-शौच या शुद्धि (Purity), संतोष (Contentment), तप (Endurance), स्व-अध्याय (Self-Study) और ईश्वर प्राणीधान (Worship with Complete Faith)। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है और आचारिक रूप से शक्तिशाली बनता है।

3. आसन (Asana, Posture): :
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है। आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महषि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है।

4. प्राणायाम (Pranayama, Control of Breath):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम । प्राण का अर्थ है- श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। इसके तीन भाग हैं-(1) पूरक (Inhalation), (2) रेचक (Exhalation) और (3) कुंभक (Holding of Breath)।

5. प्रत्याहार (Pratyahara, Restraint of the Senses):
अष्टांग योग प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों व मन को अपने नियंत्रण में रखने से है। साधारण शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ मन व इन्द्रियों को उनकी संबंधित क्रियाओं से हटकर परमात्मा की ओर लगाना है।

6. धारणा (Dharna, Steadying of the Mind):
अपने मन के निश्चल भाव को धारणा कहते हैं । अष्टांग योग में ‘धारणा’ का बहुत महत्त्व है। धारणा का अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है। इस प्रकार ध्यान लगाने से व्यक्ति में एक महान् शक्ति उत्पन्न हो जाती है, साथ ही उसके मन की इच्छा भी पूरी हो जाती है।

7.ध्यान (Dhyana, Contemplation):
जब मन पूरी तरह से नियंत्रण में हो जाता है तो ध्यान लगना आरंभ हो जाता है अर्थात् मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता ही ध्यान कहलाती है।

8. समाधि (Samadhi, Trance):
समाधि योग की सर्वोत्तम अवस्था है। यह सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर की अवस्था है। समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है।

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प्रश्न 3.
दैनिक जीवन में योग के महत्त्व पर विस्तारपूर्वक नोट लिखें।
अथवा
आधुनिक संदर्भ में योग की महत्ता एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
“आधुनिक युग में योग सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक है।” इस कथन के बारे में अपने बहुमूल्य विचार दीजिए।
अथवा
‘योग’ आधनिक जीवन में स्वस्थपूर्ण जीवन के लिए कैसे सहायक होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
हमारा पूरा जीवन ही योगमय है। हमें योग को अपनाकर इसका निरंतर अभ्यास करना चाहिए, क्योंकि योग उन्नति का द्योतक है। यह चाहे शारीरिक उन्नति हो या आध्यात्मिक। अध्यात्म की मान्यताओं की बात करें तो कहा जाता है कि संसार पाँच महाभूतों/तत्त्वों; जैसे पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु के मिश्रण या संयोग से बना है। हमारा शरीर भी पाँच महाभूतों के संयोग से बना है। अध्यात्म में मान्यता है कि पुरुष एवं प्रकृति के योग से ब्रह्मांड का निर्माण हुआ। जड़ एवं चेतन के योग से जीव जगत् की रचना हुई। प्राणियों के आपस में योग से परिवार का निर्माण हुआ। अतः योग विकास का मूल मंत्र है जिससे हमारे अंतस्थ की उन्नति संभव है। महर्षि पतंजलि ने कहा-“योग मन को मौन करने की प्रक्रिया है। जब यह संभव हो जाता है, तब हमारा मूल प्राकृतिक स्वरूप सामने आता है।” अतः योग हमारे भीतर की चेतना को जगाकर हमें ऊर्जावान एवं हृष्ट-पुष्ट बनाता है। योग के महत्त्व या उपयोगिता का वर्णन निम्नलिखित है
(1) योग मन के विकारों को दूर कर उसे शांत करता है। हमारा मन चंचल और अस्थिर होता है। योग का सतत् अभ्यास, लोभ एवं मोह को त्याग कर मन को शांत एवं निर्विकार बनाया जा सकता है।
(2) कर्म स्वयं में एक योग है। कर्त्तव्य से विमुख न होना ही कर्म योग है। पूरी एकाग्रता एवं निष्ठा के साथ कर्म करना ही योग का उद्देश्य है। अतः योग से कर्म करने की शक्ति मिलती है।
(3) हमारी वाणी से जो विचार निकलते हैं, वे मन एवं मस्तिष्क की उपज होते हैं। यदि मन में कलुष भरा है तो हमारे विचार भी कलुषित होंगे। जब हम योग से मन को नियंत्रित कर लेते हैं तो हमारे विचार सकारात्मक रूप में हमारी वाणी से प्रवाहित होने लगते हैं।
(4) योग से नकारात्मक विचार सकारात्मक प्रवृत्ति में बदल जाते हैं।
(5) योग में सर्वस्व कल्याण हित है। यह धर्म-मजहब से परे की विधा है।
(6) योग आध्यात्मिक व मानसिक विकास में सहायक होता है।
(7) योग हमको उन कष्टों का इलाज करने की सीख देता है जिनको सहन करने की जरूरत नहीं है और उन कष्टों का इलाज करता है जिनको ठीक नहीं किया जा सकता।
(8) योग हमारे जीवन का आधार है। यह हमारी अंतर चेतना जगाकर विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की हिम्मत देता है। यह हमारी जीवन-शैली में बदलाव करने में सहायक है।
(9) योग धर्म, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, ऊँच-नीच तथा अमीर-गरीब आदि से परे है। किसी के साथ किसी भी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं करता।
(10) योग स्वस्थ रहने की कला है जो ध्यान, साधना, एकाग्रता एवं व्यायाम है। आज सभी का मूल फिट रहना है और यही चाह सभी को योग के प्रति आकर्षित करती है, क्योंकि योग हमारी फिटनेस में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
(11) योग मन एवं शरीर में सामंजस्य स्थापित करता है अर्थात् यह शरीर एवं मस्तिष्क के ऐक्य का विज्ञान है।
(12) योग से शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।
(13) योग से शरीर में रक्त का संचार तीव्र होता है। इससे शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(14) योग मोटापे को नियन्त्रित करने में मदद करता है।
(15) योग से शारीरिक मुद्रा (Posture) में सुधार होता है।
(16) योग से मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है। इससे मनो-भौतिक विकारों में सुधार आता है।
(17) योग रोगों की रोकथाम व बचाव में सहायता करता है।
(18) यह शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता को सुचारु रखने में सहायक होता है।
(19) योग आत्म-विश्वास तथा मनोबल निर्माण में सहायता करता है।
(20) योग शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक पहलुओं में एकीकरण करने में सहायक होता है।
आधुनिक युग में, योग की महत्ता को देखते हुए आज योग विश्व-भर में फैल रहा है। योग दिवस को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनाए जाने से इसकी उपयोगिता या महत्ता और अधिक बढ़ गई है। प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस (21 जून, 2015) मनाए जाने से यह सिद्ध हो चुका है कि आधुनिक संदर्भ में योग का महत्त्व दिन-प्रतिदिन निरंतर बढ़ रहा है।

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प्रश्न 4.
योगाभ्यास के मुख्य सिद्धांत कौन-कौन-से हैं? वर्णन करें।
अथवा
योगासन करते समय किन-किन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
योग एक विभिन्न प्रकार के शारीरिक व्यायामों व आसनों का संग्रह है। यह ऐसी विधा है जिससे मनुष्य को अपने अंदर छिपी हुई शक्तियों को बढ़ाने का अवसर मिलता है। योग धर्म, दर्शन, शारीरिक सभ्यता और मनोविज्ञान का समूह है। योगासन करते समय निम्नलिखित सिद्धांतों अथवा बातों को ध्यान में रखना चाहिए
(1) योगासन का अभ्यास प्रात:काल करना चाहिए।
(2) योगासन एकाग्र मन से करना चाहिए, इससे अधिक लाभ होता है।
(3) योगासन का अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।
(4) योगासन करते समय शरीर पर कम-से-कम कपड़े होने चाहिएँ, परन्तु सर्दियों में उचित कपड़े पहनने चाहिएँ।
(5) योगासनों का अभ्यास प्रत्येक आयु में कर सकते हैं, परन्तु अभ्यास करने से पहले किसी अनुभवी व्यक्ति से जानकारी लेनी चाहिए।
(6) योगासन खाली पेट करना चाहिए। योगासन करने के दो घण्टे पश्चात् भोजन करना चाहिए।
(7) योगासन प्रतिदिन करना चाहिए।
(8) यदि शरीर अस्वस्थ या बीमार है तो आसन न करें।
(9) प्रत्येक आसन निश्चित समयानुसार करें।
(10) योग आसन करने वाला स्थान साफ-सुथरा और हवादार होना चाहिए।
(11) योग आसन किसी दरी अथवा चटाई पर किए जाएँ। दरी अथवा चटाई समतल स्थान पर बिछी होनी चाहिए।
(12) योगाभ्यास शौच क्रिया के पश्चात् व सुबह खाना खाने से पहले करना चाहिए।
(13) प्रत्येक अभ्यास के पश्चात् विश्राम का अंतर होना चाहिए। विश्राम करने के लिए शवासन करना चाहिए।
(14) प्रत्येक आसन करते समय फेफड़ों के अंदर भरी हुई हवा बाहर निकाल दें। आसन करने में सरलता होगी।
(15) योग करते समय जब भी थकावट हो तो श्वासन या मकरासन कर लेना चाहिए।
(16) योग आसन अपनी शक्ति के अनुसार ही करना चाहिए।
(17) योग अभ्यास से पूरा लाभ उठाने के लिए शरीर को पौष्टिक व संतुलित आहार देना बहुत जरूरी है।
(18) आसन करते समय श्वास हमेशा नाक द्वारा ही लें।
(19) हवा बाहर निकालने (Exhale) के उपरांत श्वास क्रिया रोकने का अभ्यास किया जाए।
(20) एक आसन करने के पश्चात् दूसरा आसन उस आसन के विपरीत किया जाए; जैसे धनुरासन के पश्चात् पश्चिमोत्तानासन करें। इस प्रकार शारीरिक ढाँचा ठीक रहेगा।

प्रश्न 5.
“योग भारत की एक विरासत है।” इस कथन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका है कि योग की उत्पत्ति कब हुई? लेकिन प्रामाणिक रूप से यह कहा जा सकता है कि योग का इतिहास भारत के इतिहास जितना ही पुराना है अर्थात् योग भारत की ही देन या विरासत है। इसलिए हमें योग की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिए भारतीय इतिहास के कालों को जानना होगा, जिनसे स्पष्ट हो जाएगा कि योग भारत की एक विरासत है।
1. पूर्व वैदिक काल (Pre-Vedic Period): हड़प्पा सभ्यता के दो प्रसिद्ध नगरों-हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की खुदाई से प्राप्त मूर्तियों व प्रतिमाओं से पता चलता है कि उस काल के दौरान भी योग किसी-न-किसी रूप में प्रचलित था।

2. वैदिक काल (Vedic Period): वैदिक काल में रचित वेद ‘ऋग्वेद’ में लिखित ‘युनजते’ शब्द से यह अर्थ स्पष्ट होता है कि लोग इंद्रियों को नियंत्रित करने के लिए योग क्रियाएँ किया करते थे। हालांकि वैदिक ग्रंथों में ‘योग’ और ‘योगी’ शब्दों का स्पष्ट रूप से प्रयोग नहीं किया गया है।

3. उपनिषद् काल (Upnishad Period): योग की उत्पत्ति का वास्तविक आधार उपनिषदों में पाया जाता है। उपनिषद् काल में रचित ‘कठोपनिषद्’ में ‘योग’ शब्द का प्रयोग तकनीकी रूप से किया गया है। उपनिषदों में यौगिक क्रियाओं का भी वर्णन किया गया है।

4. काव्य काल (Epic Period): काव्य काल में रचित महाकाव्यों में योग के विभिन्न रूपों या शाखाओं के नामों का उल्लेख किया गया है। महाकाव्यों; जैसे ‘रामायण’ व ‘महाभारत’ में यौगिक क्रियाओं के रूपों की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। रामायण के समय योग प्रक्रिया काफी प्रसिद्ध थी। भगवद्गीता’ में भी योग के तीन प्रकारों का वर्णन है।

5. सूत्र काल (Sutra Period): योग का पितामह महर्षि पतंजलि को माना जाता है, जिन्होंने योग पर आधारित प्रथम पुस्तक ‘योगसूत्र’ की रचना की। उन्होंने इस पुस्तक में योग के अंगों का व्यापक वर्णन किया है।

6. मध्यकाल (Medieval Period): इस काल में दो संप्रदाय; जैसे नाथ और संत (भक्ति) काफी प्रसिद्ध थे जिनमें यौगिक क्रियाएँ काफी प्रचलित थीं। नाथ हठ योग का और संत विभिन्न यौगिक क्रियाओं का अभ्यास करते थे। इस प्रकार इन संप्रदायों या पंथों में योग काफी प्रसिद्ध था।

7.आधुनिक या वर्तमान काल (Modern Period): इस काल में स्वामी विवेकानंद, स्वामी योगेन्द्र, श्री अरबिन्दो और स्वामी रामदेव आदि ने योग के ज्ञान को न केवल भारत में बल्कि भारत से बाहर भी फैलाने का प्रयास किया है। स्वामी रामदेव आज भी योग को सारे विश्व में लोकप्रिय बनाने हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त वर्णित कालों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि योग भारतीय विरासत है। योग की उत्पत्ति भारत में ही हुई और विकास भी भारत में हुआ है। आज योग विश्व के विभिन्न देशों में फैल रहा है। इसी फैलाव के कारण प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है।

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प्रश्न 6.
योग स्वास्थ्य का साधन है-इस विषय में अपने विचार प्रकट करें।
अथवा
“योगाभ्यास तंदुरुस्ती का साधन है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट करें।
अथवा
योगाभ्यास की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
योग का उद्देश्य है कि व्यक्ति को शारीरिक तौर पर तंदुरुस्त, मानसिक स्तर पर दृढ़ और चेतन, आचार-विचार में अनुशासित करना है। अतः योगाभ्यास तंदुरुस्ती का साधन है। इसकी मुख्य विशेषताएँ अग्रलिखित हैं
(1) योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की मानसिक जटिलताएँ मिट जाती हैं। वह मानसिक तौर से संतुष्ट और शक्तिशाली हो जाता है।
(2) शरीर के आंतरिक अंगों की सफाई के लिए योगाभ्यास में खास क्रिया विधि अपनाई जाती है। धौती क्रिया से जिगर, बस्ती क्रिया से आंतड़ियों व नेती क्रिया से पेट की सफाई की जाती है।
(3) योग द्वारा कई बीमारियों का इलाज किया जा सकता है; जैसे चक्रासन द्वारा हर्निया रोग, शलभासन द्वारा मधुमेह का रोग दूर किए जाते हैं । योगाभ्यास द्वारा रक्त के उच्च दबाव (High Blood Pressure) तथा दमा (Asthma) जैसे रोग ठीक हो जाते हैं।
(4) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक विकृतियों अर्थात् आसन को ठीक किया जा सकता है; जैसे रीढ़ की हड्डी का कूबड़, घुटनों का आपस में टकराना, टेढ़ी गर्दन, चपटे पैर आदि विकृतियों को दूर करने में योगासन लाभदायक हैं।
(5) योगासनों द्वारा मनुष्य को अपने संवेगों और अन्य अनुचित इच्छाओं पर नियंत्रण पाने की शक्ति मिलती है।
(6) योगाभ्यास द्वारा शारीरिक अंगों में लचक आती है; जैसे धनुरासन तथा हलासन रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाते हैं।
(7) योग का शारीरिक संस्थानों की कार्यक्षमता पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यह इनकी कार्यक्षमता को सुचारु करता है।
(8) योगाभ्यास करने से बुद्धि तीव्र होती है। शीर्षासन करने से दिमाग तेज़ और स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(9) योग आसन करने से शरीर में चुस्ती और ताज़गी पैदा होती है।
(10) योग आसन मन को प्रसन्नता प्रदान करता है। मन सन्तुलित रहता है। जहां भोजन शरीर का आहार है, वहीं प्रसन्नता मन का आहार है। शारीरिक स्वास्थ्य के लिए दोनों की आवश्यकता होती है।
(11) योगाभ्यास द्वारा शरीर ताल में आ जाता है जो शरीर को कम शारीरिक बल खर्च करके अधिक कार्य करने का ढंग बताता है। योगाभ्यास करने वाले व्यक्ति की कार्यक्षमता बढ़ जाती है।
(12) योगाभ्यास करने वाला व्यक्ति देर तक कार्य करते रहने तक भी थकावट अनुभव नहीं करता। वह अधिक कार्य कर सकता है और अपने लिए अच्छे आहार के बढ़िया साधन प्राप्त कर सकता है। अतः योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है। अतः योग शारीरिक तथा मानसिक थकावट दूर करने में सहायक होता है।

प्रश्न 7.
प्राणायाम से क्या अभिप्राय है? इसके विभिन्न प्रकार बताते हुए उनके लाभ बताएँ।
अथवा
प्राणायाम क्या है? प्राणायाम के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
अथवा
प्राणायाम क्या है? किन्हीं तीन प्राणायामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम का अर्थ (Meaning of Pranayama):
प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम।प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन । इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं। अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्राणायाम के प्रकार और उनके लाभ (Types of Pranayama and their Benefits):
प्राणायाम में कई प्रकार की क्रियाएँ हैं; जैसे लंबे-लंबे श्वास खींचना, आराम से श्वास क्रिया करना, सैर करते समय प्राणायाम करना, समाधि लगाकर प्राणायाम करना, सूर्यभेदी प्राणायाम, उज्जई प्राणायाम, शीतकारी प्राणायाम, शीतली प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम, नाड़ी-शोधन प्राणायाम और कपालभाती प्राणायाम आदि। परंतु हठ योग में आठ प्राणायामों का वर्णन है। संक्षेप में, इनका वर्णन निम्नलिखित है-
1.सूर्यभेदी प्राणायाम (Suryabhedi Pranayama):
सूर्यभेदी प्राणायाम में बाएँ हाथ की उंगली के साथ नाक का बायाँ छेद बंद कर लिया जाता है। दाईं नाक से श्वास लिया जाता है। श्वास अंदर खींचकर कुम्भक किया जाता है। जब तक श्वास रोका जा सके, रोकना चाहिए। इसके पश्चात् दाएँ अंगूठे के साथ दाएँ छेद को दबाकर बाएँ छेद से आवाज़ करते हुए श्वास को बाहर निकालना चाहिए। इसमें श्वास धीरे-धीरे लेना चाहिए। कुम्भक से श्वास रोकने का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। इसमें पूरक दाईं नाक से करते हैं और दाईं नाक सूर्य नाड़ी से जुड़ी होती है। इसी कारण इसको सूर्यभेदी प्राणायाम कहते हैं।

लाभ (Benefits): यह प्राणायाम शरीर के सैलों को शुद्ध करता है और इनको शक्तिशाली बनाता है। इससे पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं और आंतड़ियों का रोग दूर हो जाता है। यह प्राणायाम शरीर में गर्मी पैदा करता है।

2. उज्जई प्राणायाम (Ujjayi Pranayama):
श्वास को शक्ति से बाहर निकालने और अंदर खींचने को उज्जई प्राणायाम कहते हैं। उज्जई प्राणायाम को पद्मासन लगाकर करना चाहिए। श्वास लेते समय खर्राटों जैसी आवाज़ आनी चाहिए। यह अभ्यास 10-15 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): उज्जई प्राणायाम करने से टांसल, गला, नाक और कान की बीमारी से आराम मिलता है। इसके करने से आवाज़ में मधुरता आ जाती है।

3. शीतकारी प्राणायाम (Sheetkari Pranayama):
इस प्राणायाम से शरीर को ठंडक पहुँचती है। इसको करते समय सी-सी की आवाज़ निकलती है। इसके कारण ही इसका नाम शीतकारी प्राणायाम है। सिद्धासन में बैठकर दोनों हाथों को घुटनों पर रख लिया जाता है। आँखें बंद करके दाँत मिलाकर जीभ का अगला भाग दाँतों को लगाकर बाकी का भाग तालु के साथ लगा लिया जाता है। होंठ खुले रखे जाते हैं और मुँह द्वारा जोर से श्वास खींचा जाता है। श्वास खींचने के पश्चात् श्वास रोक लिया जाता है। इसके पश्चात् नाक के छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है।

लाभ (Benefits): इससे गले, दाँतों की बीमारियों और शरीर की गर्मी दूर होती है। इससे मन स्थिर और गुस्से पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

4. शीतली प्राणायाम (Shitali Pranayama):
इस प्राणायाम से शरीर में ठंडक बढ़ती है। पद्मासन लगाकर नाक के दोनों छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। जीभ को मुँह से बाहर निकालकर दोनों किनारे मोड़कर नाली-सी बना ली जाती है। श्वास अंदर खींचते हुए नाली का प्रयोग करना चाहिए। फिर जीभ मुँह में करके श्वास रोक लिया जाता है। श्वास रोकने के पश्चात् नाक के दोनों छेदों में से श्वास बाहर निकाला जाता है। इस अभ्यास को 8-10 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): शीतली प्राणायाम रक्त को शुद्ध करता है। यह चमड़ी के रोग, क्षय रोग तथा पित्त की अधिकता जैसे रोगों को दूर करने में सहायक होता है।

5. भस्त्रिका प्राणायाम (Bhastrika Pranayama):
भस्त्रिका प्राणायाम में लुहार की धौंकनी की तरह श्वास अंदर और बाहर निकाला जाता है। पहले नाक के एक छेद द्वारा श्वास लेकर दूसरे छेद द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इसके पश्चात् दोनों छेदों से श्वास अंदर और बाहर किया जाता है। भस्त्रिका प्राणायाम शुरू में धीरे-धीरे करना चाहिए और बाद में इसकी रफ्तार बढ़ाई जानी चाहिए। पूरक व रेचक करते समय पेट अवश्य क्रियाशील रहना चाहिए।

लाभ (Benefits): यह प्राणायाम करने से मनुष्य का मोटापा कम होता है। मन की इच्छा बलवान होती है। इससे गले की सूजन ठीक होती है। यह प्राणायाम करने से पेट के अंग मजबूत होकर सुचारु रूप से कार्य करते हैं और हमारी पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

6. भ्रामरी प्राणायाम (Bhramari Pranayama):
भ्रामरी प्राणायाम को किसी भी आसन में बैठकर कोहनियों को कंधों के बराबर करके श्वास लिया जाता है। थोड़ी देर श्वास रोकने के पश्चात् श्वास बाहर निकालते समय गले से भंवरे जैसी आवाज़ निकाली जाती है। फिर रेचक (श्वास को बाहर छोड़ना) करते समय भी भंवरे जैसी आवाज़ उत्पन्न होती है। इस प्राणायाम का अभ्यास 5-10 बार तक दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम से आवाज़ साफ और मधुर होती है। गले की बीमारियाँ दूर होती हैं। यह मस्तिष्क के रोगों को दूर करने में लाभदायक है।

7.मूर्छा (नाड़ी शोधन) प्राणायाम (Moorchha or Nadi Sodhana Pranayama):
इस प्राणायाम से नाड़ियों की सफाई होती है। सिद्धासन में बैठकर नाक के बाईं ओर से श्वास लेना चाहिए। श्वास लेकर कुम्भक करना चाहिए। इसके पश्चात् दूसरी ओर से श्वास धीरे-धीरे बाहर निकाला जाता है। इस तरह से फिर दाईं नाक से श्वास अंदर भरा जाता है। कुछ समय के लिए कुम्भक किया जाता है और साथ ही बाएँ नाक द्वारा श्वास बाहर निकाल दिया जाता है। कुंभक से ऑक्सीजन फेफड़ों के सारे छेदों में पहुँच जाती है। रेचक से फेफड़े सिकुड़ जाते हैं और हवा बाहर निकल जाती है। इस क्रिया को 10-15 बार दोहराना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम से फेफड़ों की बीमारियाँ और दिल की कमजोरी को दूर किया जा सकता है। यह मन स्थिर रखने में सहायक होता है।

8. कपालभाती प्राणायाम (Kapalbhati Pranayama): कपालभाती प्राणायाम और भस्त्रिका प्राणायाम में यही अंतर है कि इसमें रेचक करते समय जोर लगाया जाता है परंतु भस्त्रिका प्राणायाम में पूरक और रेचक दोनों में ही जोर लगाना पड़ता है। सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर श्वास को बाहर छोड़ने व अंदर लेने की क्रिया करनी चाहिए। साँस को बाहर छोड़ते या अंदर लेते समय पेट को अंदर-बाहर की ओर धकेलना चाहिए।

लाभ (Benefits): इस प्राणायाम के अभ्यास से श्वास प्रणाली ठीक हो जाती है और फेफड़े विकसित होते हैं। रक्त साफ होता है और दमे के रोगी को आराम मिलता है। कब्ज, गैस की समस्याओं को दूर करने में यह प्राणायाप लाभदायक होता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

प्रश्न 8.
योग क्रियाओं के शारीरिक प्रणालियों पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
योगाभ्यास शरीर के संस्थानों की शक्तियों का विकास करने में कैसे सहायक होते हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
योग क्रियाओं के शारीरिक प्रणालियों या संस्थानों पर पड़ने वाले प्रभाव निम्नलिखित हैं
1. रक्त संचार प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Circulatory System):
रक्त संचार प्रणाली (संस्थान) ही मनुष्य के शरीर में ठीक ढंग से रक्त का संचालन करती है। रक्त में प्लाज्मा, लाल कण, सफेद कण और बिम्बाणु होते हैं। लाल कणों में हीमोग्लोबिन होता है जिसका मुख्य कार्य ऑक्सीजन को लेकर जाना है। सफेद कण जो कम गिनती में होते हैं, वे बाहरी बीमारी के बैक्टीरिया के साथ लड़ते हैं और उनसे शरीर की रक्षा करते हैं। योग क्रियाओं से शरीर का तापमान एक समान बना रहता है। इनसे फेफड़ों में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है। ऑक्सीजन रक्त में मिलकर व्यर्थ पदार्थ फेफड़ों में लाकर तेज़ी से बाहर निकाल देती है। इनसे व्यक्ति के शरीर में रक्त की गति तेज़ होती है। योग क्रिया करने से रक्त की रचना में अंतर आ जाता है। रक्त में हीमोग्लोबिन और लाल रक्ताणुओं की मात्रा में वृद्धि होती है। लाल रक्ताणु की गिनती बढ़ने के कारण ऑक्सीजन की अधिक मात्रा मिलती है। सफेद रक्ताणुओं के बढ़ने से हमारा शरीर रोगों का मुकाबला करने के योग्य होता है।

2. श्वास प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Respiratory System):
योग क्रियाएँ करने से श्वास की गति तेज़ हो जाती है, जिससे कार्बन-डाइऑक्साइड अधिक मात्रा में बाहर निकलती है और ऑक्सीजन की मात्रा फेफड़ों में बढ़ती है। योग क्रियाओं से फेफड़ों की क्षमता (Lung Capacity) में वृद्धि होती है। इनसे श्वास क्रिया ठीक होने के कारण हम कई रोगों से बच जाते हैं; जैसे जुकाम, सिरदर्द आदि। इनसे श्वास क्रिया तेज़ होती है, परिणामस्वरूप फेफड़ों को अधिक कार्य करना पड़ता है जिस कारण छाती फैल जाती है। योग क्रियाएँ करने से श्वसन प्रणाली संबंधी विकार दूर होते हैं।

3. पाचन प्रणाली पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Digestive System):
योग क्रियाएँ करते समय शरीर के अंगों को अधिक रक्त की आवश्यकता होती है क्योंकि क्रियाओं/गतिविधियों को अधिक शक्ति की आवश्यकता होती हैं। भोजन से शरीर को शक्ति व ऊर्जा प्राप्त होती है। हम जो भोजन खाते हैं, उसको शरीर में पचाने का कार्य पाचन प्रणाली करती है। यह भोजन को पेस्ट की शक्ल में बदलकर आँतड़ियों में पहुँचाती है। योग क्रियाओं से भूख बढ़ जाती है। इनसे पाचन अंगों की क्षमता और शक्ति में वृद्धि होती है। इनसे आंतड़ियों की मालिश हो जाती है जिससे मल-त्याग ठीक ढंग से होता है। इनसे कब्ज व पेट संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं। इनसे आंतड़ियों में विकार पैदा करने वाले तत्त्वों का अंत हो जाता है। इनसे लार गिल्टियों के कार्य करने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

4. स्नायु या नाड़ी संस्थान पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Nervous System):
योग क्रियाएँ तभी अच्छी तरह संभव हो सकती हैं यदि हमारा मस्तिष्क भली-भाँति शरीर के अंगों को आदेश दे सके। योग क्रियाओं से हमारे शरीर के अंगों में गति आ जाती है जिससे हमारा नाड़ी संस्थान तीव्र गति से कार्य करने लग जाता है। योग क्रियाओं से नाड़ी संस्थान संबंधी दोष दूर किए जा सकते हैं। नाड़ी संस्थान के ठीक कार्य करने से माँसपेशियों में ठीक तालमेल हो जाता है। इनसे मनुष्य के शरीर में प्रतिवर्त क्रियाओं की संख्या बढ़ जाती है। योग क्रियाओं से शरीर में भिन्न-भिन्न प्रणालियों के कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है जिस कारण थकावट देर से होती है।

5. माँसपेशी संस्थान पर योग क्रियाओं का प्रभाव (Effects of Yogic Exercises on Muscular System):
योग क्रियाएँ करते समय हमारी माँसपेशियों को शक्ति की आवश्यकता होती है। यह शक्ति उनको रक्त संचार प्रणाली से प्राप्त होती है। इससे माँसपेशियों में रासायनिक परिवर्तन आता है। इस परिवर्तन के कारण पैदा हुई ऊर्जा का कुछ भाग माँसपेशियों के सिकुड़ने और फैलने में समाप्त हो जाता है। योग क्रियाएँ करने से हमारी प्रणालियों की गति में वृद्धि होती है। योग क्रियाएँ तभी संभव हैं जब माँसपेशियों में तालमेल हो। क्रियाएँ करने से माँसपेशियों में तालमेल बढ़ जाता है और वे कार्य करने के योग्य बन जाती हैं । योग क्रियाओं द्वारा माँसपेशियों को ठीक ढंग से कार्य करने के योग्य बनाया जा सकता है। ये क्रियाएँ करने से शरीर के प्रत्येक भाग में रक्त की उचित मात्रा पहुँचती है और दिल की मांसपेशियाँ भी शीघ्रता से कार्य करने लगती हैं। इनसे माँसपेशियों में लचकता आ जाती है। माँसपेशियों में तालमेल होने से ये उत्तेजना अथवा प्रोत्साहन से प्रतिक्रिया करने में समर्थ हो जाती हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
योग के इतिहास पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन या विरासत है। भारत में योग लगभग तीन हजार ईसा पूर्व पहले शुरू हुआ। आधुनिक समय में योग का आदि गुरु महर्षि पतंजलि को माना गया है। हजारों वर्ष पहले हिमालय में कांति सरोवर झील के किनारे पर आदि योगी ने अपने योग सम्बन्धी ज्ञान को पौराणिक सात ऋषियों को प्रदान किया। इन ऋषियों ने योग का विश्व के विभिन्न भागों में प्रचार किया। परन्तु व्यापक स्तर पर योग को सिन्धु घाटी सभ्यता के एक अमित सांस्कृतिक परिणाम के रूप में समझा जाता है। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। हिंदू धर्म के ग्रंथ उपनिषद्’ में योग के सिद्धांतों या नियमों का वर्णन किया गया है। महर्षि पतंजलि के बाद अनेक योग गुरुओं एवं ऋषियों ने इसके विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। इसने मानवता के भौतिक और आध्यात्मिक विकास में अहम् भूमिका निभाई है।

प्रश्न 2.
योग क्या है? योग ने किन व्यापक श्रेणियों को जन्म दिया है?
अथवा
‘योग’ का शाब्दिक अर्थ क्या है? इसकी चार श्रेणियों का उल्लेख करें।
उत्तर:
योग-‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘युज’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ है-जुड़ना या एक होना। जुड़ना या एक होने का अर्थ है-व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जुड़ना।
योग की श्रेणियाँ-योग व्यक्ति के शरीर, मन, भावना एवं शक्ति के स्तर पर कार्य करता है। योग ने चार व्यापक श्रेणियों को जन्म दिया है। जैसे
1. कर्म योग-कर्म योग जिसमें हम अपने शरीर का उपयोग करते हैं।
2. ज्ञान योग-ज्ञान योग जिसमें हम अपने मन या मस्तिष्क का उपयोग करते हैं।
3. भक्ति योग-भक्ति योग जिसमें हम अपने संवेगों या भावनाओं का उपयोग करते हैं।
4. क्रिया योग-क्रिया योग जिसमें हम अपनी शारीरिक ऊर्जा या शक्ति का उपयोग करते हैं।

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प्रश्न 3.
आसन से क्या तात्पर्य है? इसके प्रकारों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आसन-जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है। आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है। आसन के प्रकार-आसन के प्रकारों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है-
1. ध्यानात्मक आसन-ध्यानात्मक आसन वे आसन होते हैं जिनको करने से व्यक्ति की ध्यान करने की क्षमता विकसित होती है; जैसे
(1) पद्मासन,
(2) सिद्धासन,
(3) गोमुखासन आदि।

2. विश्रामात्मक आसन-विश्रामात्मक आसन करने से शारीरिक एवं मानसिक थकावट दूर होती है और शरीर को पूर्ण विश्राम मिलता है; जैसे
(1) शवासन,
(2) मकरासन,
(3) शशांकासन आदि।

3. संवर्धनात्मक आसन-संवर्धनात्मक आसन शरीर की सभी क्रियाओं को व्यवस्थित करके प्राणायाम, प्रत्याहार व धारणा को सामर्थ्य देते है; जैसे
(1) शीर्षासन,
(2) सर्वांगासन,
(3) हलासन आदि।

प्रश्न 4.
योग के लाभों या महत्त्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जिस तरह से सूर्य अपनी रोशनी करने में किसी भी प्रकार का कोई भेद नहीं करता, उसी प्रकार से योग करके कोई भी इसका लाभ प्राप्त कर सकता है। दुनिया के प्रत्येक मनुष्य को योग के लाभ समभाव से प्राप्त होते हैं; जैसे
(1) योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है अर्थात् इससे मानसिक शान्ति प्राप्त होती है।
(2) योग से बीमारियों से छुटकारा मिलता है और हमारे स्वास्थ्य में सुधार होता है।
(3) योग एक साधना है जिससे न सिर्फ शरीर बल्कि मन भी स्वस्थ रहता है।
(4) योग से मानसिक तनाव को भी दूर किया जा सकता है।
(5) योग से सकारात्मक प्रवृत्ति में वृद्धि होती है।
(6) योग तन-मन, चित्त-वृत्ति और स्वास्थ्य-सोच को विकार मुक्त करता है।
(7) योग से आत्मिक सुख एवं शान्ति प्राप्त होती है।

प्रश्न 5.
रक्त संचार प्रणाली पर योग क्रियाओं के क्या प्रभाव पड़ते हैं?
अथवा
योग क्रियाओं का रक्त प्रवाह तंत्र पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
योग क्रियाओं के रक्त संचार प्रणाली पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
(1) योग क्रियाओं से शरीर का तापमान एक समान बना रहता है।
(2) योग करने से फेफड़ों में ऑक्सीजन की वृद्धि होती है। ऑक्सीजन रक्त में मिलकर व्यर्थ पदार्थ फेफड़ों में लाकर तेज़ी से बाहर निकाल देती है।
(3) इनसे व्यक्ति के शरीर में रक्त की गति तेज़ होती है।
(4) इनसे कोशिकाएँ फूल जाती हैं जिससे शरीर में रक्त का संचार बढ़ जाता है।
(5) योग क्रिया करने से रक्त की रचना में अंतर आ जाता है। रक्त में हीमोग्लोबिन और लाल रक्ताणुओं की मात्रा में वृद्धि होती है। लाल रक्ताणु की संख्या बढ़ने के कारण ऑक्सीजन की अधिक मात्रा मिलती है। सफेद रक्ताणुओं के बढ़ने से हमारा शरीर रोगों का मुकाबला करने के योग्य होता है।

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प्रश्न 6.
यम क्या हैं ? इनका संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
अष्टांग योग के यमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यम: यम योग की वह अवस्था है जिसमें सामाजिक व नैतिक गुणों के पालन से इंद्रियों व मन को आत्म-केंद्रित किया जाता है। यह अनुशासन का वह साधन है जो प्रत्येक व्यक्ति के मन से संबंध रखता है। इसका अभ्यास करने से व्यक्ति अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता तथा त्याग करना सीखता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार यम पाँच होते हैं-
1. सत्य-सत्य से अभिप्राय मन की शुद्धता या सच बोलने से है। हमें हमेशा अपने विचार, शब्द, मन और कर्म से सत्यवादी होना चाहिए।
2. अहिंसा-मन, वचन व कर्म आदि से किसी को भी शारीरिक-मानसिक स्तर पर कोई हानि या आघात न पहुँचाना अहिंसा कहलाता है। हमें हमेशा हिंसात्मक और नकारात्मक भावनाओं से दूर रहना चाहिए।
3. अस्तेय-मन, वचन व कर्म से दूसरों की कोई वस्तु या चीज न चाहना या चुराना अस्तेय कहलाता है।
4. अपरिग्रह-इंद्रियों को प्रसन्न रखने वाले साधनों तथा धन-संपत्ति का अनावश्यक संग्रह न करना, कम आवश्यकताओं व इच्छाओं के साथ जीवन व्यतीत करना, अपरिग्रह कहलाता है। हमें कभी भी न तो गलत तरीकों से धन कमाना चाहिए और न ही एकत्रित करना चाहिए।
5. ब्रह्मचर्य-यौन संबंधों में नियंत्रण, चारित्रिक संयम ब्रह्मचर्य है। ऐसी चीजों का प्रयोग न करना जो यौन संबंधी इच्छाओं को उत्तेजित करती हैं। इसके अंतर्गत हमें कामवासना का पूर्णत: त्याग करना पड़ता है।

प्रश्न 7.
नियम से क्या तात्पर्य है? नियमों को सूचीबद्ध कीजिए।
अथवा
नियमों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नियम-नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है। जो व्यक्ति नियमों के विरुद्ध आचरण करता है, समाज उसे सम्मान नहीं देता। इसके विपरीत जो व्यक्ति समाज द्वारा स्वीकृत नियमों के अनुसार आचरण करता है, समाज उसको सम्मान देता है। नियम के पाँच भाग होते हैं। इन पर अमल करके व्यक्ति परमात्मा को पा लेता है।
1.शौच-शौच का अर्थ है-शुद्धता। हमें हमेशा अपना शरीर आंतरिक व बाहरी रूप से साफ व स्वस्थ रखना चाहिए।
2. संतोष-संतोष का अर्थ है-संतुष्टि। हमें उसी में संतुष्ट रहना चाहिए जो परमात्मा ने हमें दिया है।
3. तप-हमें प्रत्येक स्थिति में एक-सा व्यवहार करना चाहिए। जीवन में आने वाली मुश्किलों व परिस्थितियों को धैर्यपूर्वक सहन करना तथा लक्ष्य-प्राप्ति की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहना तप कहलाता है।
4. स्वाध्याय-ग्रंथों, वेदों, उपनिषदों, गीता व अन्य महान् पुस्तकों का निष्ठा भाव से अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है।
5. ईश्वर प्राणीधान-ईश्वर प्राणीधान नियम की महत्त्वपूर्ण अवस्था है। ईश्वर को अपने सभी कार्मों को अर्पित करना ईश्वर प्राणीधान कहलाता है।

प्रश्न 8.
योग के रक्षात्मक एवं चिकित्सीय प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
योग के नैदानिक व उपचारात्मक प्रभावों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
योग एक शारीरिक व्यायाम ही नहीं, बल्कि जीवन का दर्शनशास्त्र भी है। यह वह क्रिया है जो शारीरिक क्रियाओं तथा आध्यात्मिक क्रियाओं में संतुलन बनाए रखती है। वर्तमान भौतिक समाज आध्यात्मिक शून्यता के बिना रह रहा है, जहाँ योग सहायता कर सकता है। आधुनिक समय में योग के निम्नलिखित उपचार तथा रोकथाम संबंधी प्रभाव पड़ते हैं
(1) योग पेट तथा पाचन तंत्र की अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता करता है।
(2) योग क्रियाओं के द्वारा कफ़, वात व पित्त का संतुलन बना रहता है।
(3) यौगिक क्रियाएँ शारीरिक अंगों को शुद्ध करती हैं तथा साधक के स्वास्थ्य में सुधार लाती हैं।
(4) योग के माध्यम से मानसिक शांति व स्व-नियंत्रण उत्पन्न होता है।
(5) योग अनेक मुद्रा-विकृतियों को ठीक करने में सहायता करता है।
(6) नियमित व निरंतर यौगिक क्रियाएँ, मस्तिष्क के उच्चतर केंद्रों को उद्दीप्त करती हैं, जो विभिन्न प्रकार के विकारों की रोकथाम करते हैं।
(7) योग से मानसिक शांति तथा संतुलन बनाए रखा जा सकता है।

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प्रश्न 9.
पद्मासन व धनुरासन के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
पद्मासन के लाभ:
(1) पद्मासन से पाचन शक्ति बढ़ती है,
(2) यह मन की एकाग्रता के लिए सर्वोत्तम उपाय है,
(3) यह दिल तथा पेट के रोगों को दूर करने में सहायक होता है,
(4) यह कब्ज और फाइलेरिया जैसे रोगों को दूर करता है।

धनुरासन के लाभ:
(1) यह कब्ज, अपच, और जिगर की गड़बड़ी को दूर करने में लाभकारी होता है,
(2) इससे रीढ़ को मजबूती मिलती है,
(3) यह शरीर के पाचन संस्थान, उत्सर्जन संस्थान और प्रजनन संस्थान को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 10.
चक्रासन व शवासन के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
चक्रासन के लाभ-
(1) चक्रासन से शरीर में लचक पैदा होती है,
(2) इससे पेट की चर्बी कम होती है,
(3) रीढ़ की हड्डी लचकदार बनती है,
(4) पेट की बहुत-सी बीमारियाँ दूर होती हैं।

शवासन के लाभ-
(1) शवासन के अभ्यास से रक्तचाप ठीक होता है,
(2) यह हृदय को संतुलित स्थिति में रखता है,
(3) इससे मन शांत रहता है,
(4) इससे तनाव, निराशा, दबाव और थकान दूर होती है।

प्रश्न 11.
पाचन प्रणाली पर योग क्रियाओं का क्या असर पड़ता है?
अथवा
योग क्रियाएँ पाचन प्रणाली को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
उत्तर:
योग क्रियाएँ पाचन प्रणाली को निम्नलिखित प्रकार से प्रभावित करती हैं
(1) योग क्रियाओं से भूख बढ़ जाती है।
(2) योग क्रियाओं से पाचन अंगों की क्षमता और शक्ति में वृद्धि होती है।
(3) योग क्रियाओं से आंतड़ियों की मालिश हो जाती है जिससे मल-त्याग ठीक ढंग से होता है।
(4) योग क्रियाओं से कब्ज व पेट संबंधी बीमारियाँ दूर हो जाती हैं।
(5) योग क्रियाओं से आंतड़ियों में विकार पैदा करने वाले तत्त्वों का अंत हो जाता है।
(6) योग क्रियाओं से लार गिल्टियों के कार्य करने की क्षमता भी बढ़ जाती है।

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प्रश्न 12.
अष्टांग योग में ध्यान का क्या महत्त्व है?
अथवा
ध्यान के हमारे लिए क्या-क्या लाभ हैं?
उत्तर:
ध्यान के हमारे लिए लाभ या महत्त्व निम्नलिखित हैं
(1) ध्यान हमारे भीतर की शुद्धता के ऊपर पड़े क्रोध, ईर्ष्या, लोभ, कुंठा आदि के आवरणों को हटाकर हमें सकारात्मक बनाता है।
(2) ध्यान से हमें शान्ति एवं प्रसन्नता की प्राप्ति होती है।
(3) ध्यान सर्वस्व प्रेम की भावना एवं सृजन शक्ति को जगाता है।
(4) ध्यान से मन शान्त एवं शुद्ध होता है।

प्रश्न 13.
प्राणायाम क्या है? इसकी तीन अवस्थाओं का वर्णन करें।
अथवा
‘प्राणायाम’ पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
प्राणायाम का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा इसके अंगों का भी उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम का अर्थ-प्राणायाम में दो शब्द हैं-प्राण व आयाम। प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ हैनियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्राणायाम की अवस्थाएँ या अंग-प्राणायाम को तीन अवस्थाओं में बाँटा जा सकता है
1. पूरक-श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को पूरक कहते हैं।
2. रेचक-श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं।
3. कुम्भक-श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

प्रश्न 14.
प्राणायाम की महत्ता पर टिप्पणी कीजिए।
अथवा
प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में श्री श्री रविशंकर ने जीवन जीने की जो शैली सुझाई है, वह प्राणायाम पर आधारित है। आधुनिक जीवन में प्राणायाम की आवश्यकता एवं महत्त्व निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाती है
(1) प्राणायाम से शरीर का रक्तचाप व तापमान सामान्य रहता है।
(2) इससे शरीर की आंतरिक शुद्धता बढ़ती है।
(3) इससे रक्त के तेज़ दबाव से नाड़ी संस्थान की शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) इससे सामान्य स्वास्थ्य व शारीरिक कार्य-कुशलता का विकास होता है।
(5) इससे मानसिक तनाव व चिंता दूर होती है।
(6) इससे हमारी श्वसन प्रक्रिया में सुधार होता है।
(7) इससे आँखों व चेहरे में चमक आती है और आवाज़ मधुर हो जाती है।
(8) इससे आध्यात्मिक व मानसिक विकास में मदद मिलती है।
(9) इससे कार्य करने की शक्ति में वृद्धि होती है।
(10) इससे फेफड़ों का आकार बढ़ता है और श्वास की बीमारियों तथा गले, मस्तिष्क की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(11) इससे इच्छा-शक्ति व स्मरण-शक्ति बढ़ती है।
(12) प्राणायाम करने से पेट तथा छाती की मांसपेशियाँ मज़बूत बनती हैं।

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प्रश्न 15.
प्राणायाम करने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम श्वास पर नियंत्रण करने की एक विधि है। प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ होती हैं-
(1) पूरक (श्वास को अंदर खींचना),
(2) रेचक (श्वास को बाहर निकालना),
(3) कुंभक (श्वास को कुछ देर अंदर रोकना) ।

प्राणायाम में श्वास अंदर की ओर खींचकर रोक लिया जाता है और कुछ समय रोकने के पश्चात् फिर श्वास बाहर निकाला जाता है। इस तरह श्वास को धीरे-धीरे नियंत्रित करने का समय बढ़ा लिया जाता है। अपनी बाईं नाक को बंद करके दाईं नाक द्वारा श्वास खींचें और थोड़े समय तक रोक कर छोड़ें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके बाईं नाक द्वारा पूरा श्वास बाहर निकाल दें। अब फिर दाईं नाक को बंद करके बाईं नाक द्वारा श्वास खींचें र थोड़े समय तक रोक कर छोड़ें। इसके पश्चात् दाईं नाक बंद करके पूरा श्वास बाहर निकाल दें। इस प्रकार इस प्रक्रिया को कई बार दोहराना चाहिए।

प्रश्न 16.
सूर्यभेदी प्राणायाम से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
सूर्यभेदन प्राणायाम क्या है? इससे होने वाले फायदे बताएँ।
उत्तर:
सूर्यभेदी या सूर्यभेदन प्राणायाम में बाएँ हाथ की उंगली के साथ नाक का बायाँ छेद बंद कर लिया जाता है। दाईं नाक से श्वास लिया जाता है। श्वास अंदर खींचकर कुम्भक किया जाता है। जब तक श्वास रोका जा सके, रोकना चाहिए। इसके पश्चात् दाएँ अंगूठे के साथ दाएँ छेद को दबाकर बाएँ छेद से आवाज़ करते हुए श्वास को बाहर निकालना चाहिए। इसमें श्वास धीरे-धीरे लेना चाहिए। कुम्भक से श्वास रोकने का समय धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए। इसमें पूरक दाईं नाक से करते हैं और दाईं नाक सूर्य नाड़ी से जुड़ी होती है। इसी कारण इसको सूर्यभेदी प्राणायाम कहते हैं। यह प्राणायाम शरीर के सैलों को शुद्ध करता है और इसको शक्तिशाली बनाता है। इससे पेट के कीड़े भी समाप्त हो जाते हैं और आंतड़ियों का रोग दूर हो जाता है। यह प्राणायाम शरीर में गर्मी पैदा करता है।

प्रश्न 17.
शीतकारी प्राणायाम से आप क्या समझते हैं?
अथवा
शीतकारी प्राणायाम का हमारे शरीर पर क्या लाभदायक प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
शीतकारी प्राणायाम से शरीर को ठंडक पहुँचती है। इसको करते समय सी-सी की आवाज़ निकलती है। इसके कारण ही इसका नाम शीतकारी प्राणायाम है। सिद्धासन में बैठकर दोनों हाथों को घुटनों पर रख लिया जाता है। आँखें बंद करके दाँत मिलाकर जीभ का अगला भाग दाँतों को लगाकर बाकी का भाग तालु के साथ लगा लिया जाता है। होंठ खुले रखे जाते हैं और मुँह द्वारा जोर से श्वास खींचा जाता है। श्वास खींचने के पश्चात् श्वास रोक लिया जाता है। इसके पश्चात् नाक के छेदों द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इससे गले, दाँतों की बीमारियों और शरीर की गर्मी दूर होती है। इससे मन स्थिर और गुस्से पर नियंत्रण पाया जा सकता है।

प्रश्न 18.
भस्त्रिका प्राणायाम से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
भस्त्रिका प्राणायाम क्या है? इससे होने वाले प्रमुख फायदे बताएँ।
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम में लुहार की धौंकनी की तरह श्वास अंदर और बाहर निकाला जाता है। पहले नाक के एक छेद द्वारा श्वास लेकर दूसरे छेद द्वारा श्वास बाहर निकाला जाता है। इसके पश्चात् दोनों छेदों से श्वास अंदर और बाहर किया जाता है। भस्त्रिका प्राणायाम शुरू में धीरे-धीरे करना चाहिए और बाद में इसकी रफ्तार बढ़ाई जानी चाहिए। पूरक वरेचक करते समय पेट अवश्य क्रियाशील रहना चाहिए। यह प्राणायाम करने से मनुष्य का मोटापा कम होता है। मन की इच्छा बलवान होती है। इससे गले की सूजन ठीक होती है। इस प्राणायाम को करने से पेट के अंग मजबूत होकर सुचारु रूप से कार्य करते हैं और हमारी पाचन शक्ति भी बढ़ती है।

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प्रश्न 19.
सूर्य नमस्कार का अभ्यास कब और कैसे करना चाहिए?
उत्तर:
सूर्य उदय के समय सूर्य नमस्कार करना अति उत्तम होता है क्योंकि यह समय पूर्ण रूप से शांतिमय होता है। इसका अभ्यास खुली हवा या वातावरण में सूर्य की ओर मुख करके करना चाहिए। अभ्यास करते समय अपनी आँखों को बंद कर लेना चाहिए और अपने पैरों के बीच में थोड़ी-सी दूरी रखकर खड़े होना चाहिए। अपने शरीर का भार दोनों पैरों पर बराबर होना चाहिए और सूर्य की ओर कुछ देर हाथ जोड़कर नमस्कार करने के बाद, हाथों को पीछे की ओर करना चाहिए। शरीर पर हल्के कपड़े धारण होने चाहिएँ।

प्रश्न 20.
प्राण के विभिन्न प्रकार कौन-कौन-से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
प्राण के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
1. प्राण-यह गले से दिल तक है। इसी प्राण की शक्ति के साथ श्वास शरीर में नीचे जाता है।
2. अप्राण-नाभि से निचले भाग में प्राण को अप्राण कहते हैं। छोटी और बड़ी आंतड़ियों में यही प्राण होता है।
3. समाण-दिल और नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को समाण कहते हैं। यह प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाते हैं।
4. उदाण-गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं । आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों का कार्य इसी के द्वारा होता है।
5. ध्यान-यह प्राण शरीर के सारे भागों में रहता है और शरीर के दूसरे प्राणों के साथ मेल करता है।

प्रश्न 21.
खिलाड़ियों के लिए योग किस प्रकार लाभदायक है?
अथवा
एक खिलाड़ी को योग किस प्रकार सहायता करता है?
उत्तर:
खिलाड़ियों के लिए योग निम्नलिखित प्रकार से लाभदायक है
(1) योग खिलाड़ियों को स्वस्थ एवं चुस्त रखने में सहायक होता है।
(2) योग से उनके शरीर में लचीलापन आ जाता है।
(3) योग से उनकी क्षमता एवं शक्ति में वृद्धि होती है।
(4) योग खिलाड़ियों के मानसिक तनाव को भी कम करने में सहायक होता है।
(5) योग खिलाड़ियों के मोटापे को नियंत्रित करता है।

प्रश्न 22.
प्राणायाम के मुख्य चिकित्सीय प्रभाव बताइए।
उत्तर:
प्राणायाम के मुख्य चिकित्सीय प्रभाव निम्नलिखित हैं
(1) प्राणायाम से स्मरण-शक्ति बढ़ती है और मस्तिष्क की बीमारियाँ समाप्त होती हैं।
(2) इससे श्वास तथा गले की बीमारियों से छुटकारा मिलता है।
(3) इससे कफ़, वात व पित का संतुलन बना रहता है।
(4) यह पाचन-तंत्र की अनेक बीमारियों की रोकथाम में सहायता करता है।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
‘योग’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
योग क्या है?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की मूल धातु ‘युज’ से हुई है जिसका अर्थ है-जोड़ या एक होना। जोड़ या एक होने का अर्थ है व्यक्ति की आत्मा को ब्रह्मांड या परमात्मा की चेतना या सार्वभौमिक आत्मा के साथ जोड़ना। महर्षि पतंजलि (योग के पितामह) के अनुसार, ‘युज’ धातु का अर्थ है-ध्यान-केंद्रण या मन:स्थिति को स्थिर करना और आत्मा का परमात्मा से ऐक्य। साधारण शब्दों में, हम कह सकते हैं-योग व्यक्ति की आत्मा का परमात्मा से मिलन का नाम है। योग का अभ्यास मन को परमात्मा पर केंद्रित करता है। इस प्रकार से यह आत्मा को संपूर्ण शांति प्रदान करता है।

प्रश्न 2.
योग की कोई दो परिभाषाएँ दीजिए।
अथवा
योग को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. महर्षि पतंजलि के अनुसार, “मनोवृत्ति के विरोध का नाम योग है।”
2. श्री याज्ञवल्क्य के अनुसार, “जीवात्मा से परमात्मा के मिलन को योग कहते हैं।”

प्रश्न 3.
योग के विभिन्न प्रकारों (शाखाओं) के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) ज्ञान योग
(2) भक्ति योग
(3) अष्टांग योग
(4) कर्म योग
(5) राज योग
(6) हठ योग
(7) कुण्डली योग
(8) मंत्र योग
(9) सांख्य योग
(10) ध्यान योग आदि।

प्रश्न 4.
योग और प्राणायाम में क्या अंतर है?
उत्तर:
योग केवल शारीरिक व्यायामों की एक प्रणाली ही नहीं, बल्कि यह संपूर्ण और भरपूर जीवन जीने की कला भी है। यह शरीर और मन का मिलन है। जबकि प्राणायाम का अर्थ है-श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण करना, जिसका उपयोग ध्यान केंद्रित करने के लिए किया जाता है। योग का क्षेत्र विस्तृत है। यह संपूर्ण शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित करता है, जबकि प्राणायाम का क्षेत्र सीमित है। यह श्वसन प्रणाली को अधिक प्रभावित करता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 7 योग शिक्षा

प्रश्न 5.
योग का क्या उद्देश्य है?
उत्तर:
योग का उद्देश्य आत्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला और छिपी हुई शक्तियों का विकास करने, मन को जीतना है। यह शरीर, मन तथा आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का एक अच्छा साधन है।

प्रश्न 6.
अष्टांग योग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अष्टांग योग का अर्थ है-योग के आठ पथ। वास्तव में योग के आठ पथ योग की आठ अवस्थाएँ होती हैं जिनका पालन करते हुए व्यक्ति की आत्मा या जीवात्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है। महर्षि पतंजलि ने योग-सूत्र’ में जिन आठ अंगों का उल्लेख किया है, उन्हें ही अष्टांग योग कहा जाता है।

प्रश्न 7.
योग को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन क्यों माना जाता है?
उत्तर:
योगाभ्यास को पूर्ण तंदुरुस्ती का साधन माना जाता है, क्योंकि इस अभ्यास द्वारा जहाँ शारीरिक शक्ति या ऊर्जा पैदा होती है, वहीं मानसिक शक्ति का भी विकास होता है । इस अभ्यास द्वारा शरीर की आंतरिक सफाई और शुद्धि की जा सकती है। व्यक्ति मानसिक तौर पर संतुष्ट, संयमी और त्यागी हो जाता है जिस कारण वह सांसारिक उलझनों से बचा रहता है।

प्रश्न 8.
प्राणायाम का क्या अर्थ है?
अथवा
प्राणायाम को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्राणायाम में दो शब्द हैं- प्राण व आयाम । प्राण का अर्थ है-श्वास और आयाम का अर्थ है-नियंत्रण व नियमन। इस प्रकार जिसके द्वारा श्वास के नियमन व नियंत्रण का अभ्यास किया जाता है, उसे प्राणायाम कहते हैं अर्थात् साँस को अंदर ले जाने व बाहर निकालने पर उचित नियंत्रण रखना ही प्राणायाम है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “श्वास-प्रश्वास की स्वाभाविक गति को रोकना ही प्राणायाम है।”

प्रश्न 9.
आसन के कोई आठ भेद बताएँ। अथवा आसन के कोई चार उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(1) हलासन
(2) धनुरासन
(3) भुजंगासन
(4) ताड़ासन
(5) सिद्धासन
(6) वज्रासन
(7) शलभासन
(8) मयूरासन।

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प्रश्न 10.
लोग प्राणायाम क्यों करते हैं?
उत्तर:
योग में प्राणायाम का अर्थ है-श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण करना। प्राणायाम करने से शरीर से चिंता एवं तनाव दूर होता है। इससे व्यक्ति को मानसिक तनाव व चिंता नहीं रहती। इससे उनके शरीर में स्फूर्ति का संचार होता है। इसलिए लोग प्राणायाम करते हैं।

प्रश्न 11.
प्राणायाम के शारीरिक मूल्य क्या हैं?
उत्तर:
प्राणायाम के मुख्य शारीरिक मूल्य हैं–प्राणायाम करने से शारीरिक कार्यकुशलता का विकास होता है। इससे मोटापा नियंत्रित होता है। इससे आँखों व चेहरे पर चमक आती है और शारीरिक मुद्रा (Posture) विकसित होती है।

प्रश्न 12.
प्राण क्या है?
उत्तर:
प्राण एक ऐसी शक्ति है जो जीवन के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्राण का अर्थ मस्तिष्क पर नियंत्रण है। मस्तिष्क प्राण की सहायता के बिना कार्य नहीं कर सकता।

प्रश्न 13.
योग के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) मानसिक व आत्मिक शांति व खुशी प्राप्त होना,
(2) शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य हेतु लाभदायक।

प्रश्न 14.
आसन का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
अथवा
अष्टांग योग में आसन का क्या अर्थ है?
अथवा
आसन को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जिस अवस्था में शरीर ठीक से बैठ सके, वह आसन है।आसन का अर्थ है-बैठना। योग की सिद्धि के लिए उचित आसन में बैठना बहुत आवश्यक है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “स्थिर सुख आसनम्।” अर्थात् जिस रीति से हम स्थिरतापूर्वक, बिना हिले-डुले और सुख के साथ बैठ सकें, वह आसन है। ठीक मुद्रा में रहने से मन शांत रहता है।

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प्रश्न 15.
आसन एवं व्यायाम में अंतर बताइए।
उत्तर:
(1) आसन में सभी शारीरिक क्रियाएँ असक्रिय अवस्था (Passive Condition) में की जाती है; जबकि व्यायाम में सभी शारीरिक क्रियाएँ सक्रिय अवस्था (Active Condition) में की जाती है।
(2) आसन करने से आध्यात्मिक विकास में अधिक वृद्धि होती है लेकिन व्यायाम में शारीरिक विकास को अधिक बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 16.
प्राणायाम के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) प्राणायाम से गला, नाक और कान से संबंधित बीमारियों से आराम मिलता है।
(2) प्राणायाम से फेफड़ों की बीमारियाँ दूर होती हैं।

प्रश्न 17.
मोटापे को कम करने के लिए कोई चार आसनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) त्रिकोणासन
(2) पद्मासन
(3) भुजंगासन
(4) पश्चिमोत्तानासन।

प्रश्न 18.
प्रत्याहार क्या है?
उत्तर:
प्रत्याहार से अभिप्राय ज्ञानेंद्रियों को अपने नियंत्रण में रखने से है। सामान्य शब्दों में, प्रत्याहार का अर्थ है ‘मुड़ना’ अर्थात् मन का सांसारिक इच्छाओं से मुड़ना और इच्छाओं पर नियंत्रण करना।

प्रश्न 19.
अष्टांग योग में समाधि क्या है?
उत्तर:
समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है।

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प्रश्न 20.
समाधि से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
समाधि योग की सर्वोत्तम अवस्था है। यह सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर की अवस्था है। समाधि योग की वह अवस्था है जिसमें साधक को स्वयं का भाव नहीं रहता। वह पूर्ण रूप से अचेत अवस्था में होता है। इस अवस्था में वह उस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जहाँ आत्मा व परमात्मा का मिलन होता है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनि काफी लम्बे समय तक समाधि में बैठते थे। इस विधि द्वारा हम दिमाग पर पूरी तरह अपना नियंत्रण कर सकते हैं।

प्रश्न 21.
प्राणायाम के प्रमुख प्रकार क्या हैं?
अथवा
किन्हीं चार प्राणायाम के नाम लिखें।
उत्तर:
(1) सूर्यभेदी प्राणायाम,
(2) उज्जई प्राणायाम,
(3) शीतकारी प्राणायाम,
(4) शीतली प्राणायाम,
(5) भस्त्रिका प्राणायाम,
(6) भ्रामरी प्राणायाम,
(7) नाड़ी-शोधन प्राणायाम,
(8) कपालभाती प्राणायाम आदि।

प्रश्न 22.
धारणा से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
अपने मन के निश्चल भाव को धारणा कहते हैं। अष्टांग योग में ‘धारणा’ का बहुत महत्त्व है। धारणा का अर्थ मन को किसी इच्छित विषय में लगाना है। धारणा की स्थिति में हमारा मस्तिष्क बिल्कुल शांत होता है। इस प्रकार ध्यान लगाने से व्यक्ति में एक महान् शक्ति उत्पन्न हो जाती है, साथ ही उसके मन की इच्छा भी पूरी हो जाती है।

प्रश्न 23.
शीतली प्राणायाम के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) यह रक्त को शुद्ध रखने में सहायक होता है,
(2) यह तनाव को कम करता है।

प्रश्न 24.
भ्रामरी प्राणायाम के दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) यह शिथिलता दूर करने में सहायता करता है,
(2) इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 25.
पश्चिमोत्तानासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है,
(2) इससे मोटापा घटता है।

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प्रश्न 26.
शलभासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) शलभासन से रक्त संचार क्रिया सही रहती है,
(2) इससे रीढ़ की हड्डी में लचक आती है।

प्रश्न 27.
ताड़ासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) ताड़ासन से शरीर का मोटापा कम होता है,
(2) इससे कब्ज दूर होती है।

प्रश्न 28.
सर्वांगासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) सर्वांगासन से कब्ज दूर होती है,
(2) इससे भूख बढ़ती है और पाचन क्रिया ठीक रहती है।

प्रश्न 29.
शीर्षासन के कोई दो लाभ बताइए।
उत्तर:
(1) शीर्षासन से मोटापा कम होता है,
(2) इससे स्मरण-शक्ति बढ़ती है।

प्रश्न 30.
मयूरासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) यह कब्ज एवं अपच को दूर करता है,
(2) यह आँखों के दोषों को दूर करने में उपयोगी होता है।

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प्रश्न 31.
सिद्धासन के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) इससे मन एकाग्र रहता है,
(2) यह मानसिक तनाव को दूर करता है।

प्रश्न 32.
मत्स्यासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) इससे माँसपेशियों में लचकता बढ़ती है,
(2) इससे पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत होती हैं।

प्रश्न 33.
भुजंगासन के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) यह रीढ़ की हड्डी में लचक बढ़ाता है,
(2) यह रक्त संचार को तेज करता है।

प्रश्न 34.
सूर्य नमस्कार के मुख्य लाभ बताएँ।
उत्तर:
(1) सूर्य नमस्कार से मन शांत होता है,
(2) इससे सभी शारीरिक संस्थान संतुलित हो जाते हैं,
(3) इससे शरीर की माँसपेशियों व हड्डियों में लचीलापन आता है,
(4) इससे शरीर में प्राण ऊर्जा का संचार होता है।

प्रश्न 35.
सूर्य नमस्कार की दो स्थितियाँ बताइए।
उत्तर:
(1) दोनों हाथ और पैर जोड़कर नमस्कार की मुद्रा में सीधे खड़े होना।
(2) साँस छोड़ते हुए दोनों हाथों से जमीन को स्पर्श करना।

प्रश्न 36.
अष्टांग योग के तत्त्वों या भागों को सूचीबद्ध कीजिए।
अथवा
योग के अंगों के बारे में बताएँ।
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने ‘योग-सूत्र’ में योग के आठ तत्त्वों या अंगों का वर्णन किया है जिन्हें अष्टांग या आठ पथ कहा जाता है; जैसे-
(1) यम (Forbearance),
(2) नियम (Observance),
(3) आसन (Posture),
(4) प्राणायाम (Control of Breath),
(5) प्रत्याहार (Restraint of the Senses),
(6) धारणा (Steading of the Mind),
(7) ध्यान (Contemptation),
(8) समाधि (Trance)।

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प्रश्न 37.
ध्यान प्राण क्या है?
उत्तर:
ध्यान प्राण शरीर के सारे भागों में रहता है और शरीर के दूसरे प्राणों के साथ मेल करता है। शरीर के हिलने-डुलने पर इसका नियंत्रण होता है।

प्रश्न 38.
समाण किसे कहते हैं?
उत्तर:
दिल और नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को समाण कहते हैं । यह प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि की शक्ति को बढ़ाता है।

प्रश्न 39.
उदाण किसे कहते हैं? उत्तर:गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं। आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों का कार्य इसी के द्वारा होता है।

HBSE 12th Class Physical Education योग शिक्षा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I: एक शब्द वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
उत्तर:
‘योग’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा से हुई।

प्रश्न 2.
भारत में योग का इतिहास कितना पुराना है?
उत्तर:
भारत में योग का इतिहास लगभग 3000 ईसा पूर्व पुराना है।

प्रश्न 3.
प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं का वर्णन किया है?
अथवा
पतंजलि ने योग के कितने सोपान बताए हैं?
उत्तर:
प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की आठ अवस्थाओं/सोपानों का वर्णन किया है।

प्रश्न 4. किस आसन से स्मरण शक्ति बढ़ती है?
उत्तर:
शीर्षासन से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

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प्रश्न 5.
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को प्रत्याहार कहते हैं।

प्रश्न 6.
प्राण के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
प्राण के पाँच प्रकार होते हैं।

प्रश्न 7.
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है।

प्रश्न 8.
‘वज्रासन’ कब करना चाहिए?
उत्तर:
वज्रासन भोजन करने के बाद करना चाहिए।

प्रश्न 9.
योग का जन्मदाता किस देश को माना जाता है?
उत्तर:
योग का जन्मदाता भारत को माना जाता है।

प्रश्न 10.
मधुमेह रोग को ठीक करने वाले कोई दो आसनों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) शलभासन,
(2) वज्रासन।

प्रश्न 11.
छोटी व बड़ी आँत में कौन-सा प्राण होता है?
उत्तर:
छोटी व बड़ी आँत में अप्राण होता है।

प्रश्न 12.
किस आसन से बुढ़ापा दूर होता है?
उत्तर:
चक्रासन से बुढ़ापा दूर होता है।

प्रश्न 13.
दिल तथा नाभि तक रहने वाले प्राण को क्या कहते हैं?
उत्तर:
दिल तथा नाभि तक रहने वाले प्राण को समाण कहते हैं।

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प्रश्न 14.
गले से सिर तक रहने वाले प्राण को क्या कहते हैं?
उत्तर:
गले से सिर तक रहने वाले प्राण को उदाण कहते हैं।

प्रश्न 15.
‘प्राणायाम’ किस भाषा का शब्द है?
उत्तर:
‘प्राणायाम’ संस्कृत भाषा का शब्द है।

प्रश्न 16.
प्राणायाम की तीन अवस्थाओं के नाम बताएँ।
अथवा
‘प्राणायाम’ के तीन स्तर क्या हैं?
अथवा
प्राणायाम की कितनी अवस्थाएँ हैं?
उत्तर:
प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ या स्तर हैं-
(1) पूरक,
(2) रेचक,
(3) कुम्भक।

प्रश्न 17.
किस प्राणायाम से मोटापा घटता है?
उत्तर:
भस्त्रिका प्राणायाम से मोटापा घटता है।

प्रश्न 18.
यौगिक व्यायाम करने के लिए कैसा स्थान होना चाहिए?
उत्तर:
यौगिक व्यायाम करने के लिए एकांत, हवादार और स्वच्छ स्थान होना चाहिए।

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प्रश्न 19.
योग क्रिया का रक्त पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
रक्त तीव्र एवं सुचारु रूप से प्रवाहित होता है।

प्रश्न 20.
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस कब मनाया गया?
उत्तर:
प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून, 2015 को मनाया गया।

प्रश्न 21.
नाड़ी-शोधन प्राणायाम के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:
(1) यह नाड़ियों के स्वास्थ्य हेतु लाभदायक होता है,
(2) इससे रक्त संचार सही रहता है।

प्रश्न 22.
भुजंगासन का कोई एक लाभ लिखें।
उत्तर:
यह रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है।

प्रश्न 23.
रेचक क्या है?
उत्तर:
श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को रेचक कहते हैं।

प्रश्न 24.
पूरक क्या है?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को पूरक कहते हैं।

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प्रश्न 25.
कुम्भक क्या है?
उत्तर:
श्वास को अंदर खींचकर कुछ समय तक अंदर ही रोकने की क्रिया को कुम्भक कहते हैं।

प्रश्न 26.
भगवान् श्रीकृष्ण ने योग के बारे में क्या कहा?
उत्तर:
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-“योग कर्मसु कौशलम्” अर्थात् कर्म को कुशलतापूर्वक करना ही योग है।

प्रश्न 27.
“मनोवृत्ति के विरोध का नाम योग है।” यह किसका कथन है?
उत्तर:
यह कथन महर्षि पतंजलि का है।

प्रश्न 28.
‘युज’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
युज का अर्थ है-जोड़ या एक होना।

प्रश्न 29.
नियम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
नियम पाँच प्रकार के होते हैं।

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प्रश्न 30.
पेट के बल किए जाने वाले आसन का नाम बताइए।
उत्तर:
पेट के बल किए जाने वाले आसन का नाम धनुरासन है।

प्रश्न 31.
क्या योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है?
उत्तर:
हाँ, योग एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसमें शरीर, मन और आत्मा को एक साथ लाने का कार्य होता है।

प्रश्न 32.
प्राणायाम को किसकी आत्मा कहा जाता है?
उत्तर:
प्राणायाम को योग की आत्मा कहा जाता है।

प्रश्न 33.
“योग समाधि है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन महर्षि वेदव्यास ने कहा।

प्रश्न 34.
यम के अभ्यास द्वारा व्यक्ति क्या सीखता है?
उत्तर:
यम का अभ्यास व्यक्ति को अहिंसा, सच्चाई, चोरी न करना, पवित्रता और त्याग करना सिखाता है।

प्रश्न 35.
नियम क्या सिखाता है?
उत्तर:
नियम द्वारा शरीर और मन की शुद्धि, संतोष, दृढ़ता और परमात्मा की आराधना करने का ढंग सीखा जाता है।

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प्रश्न 36.
कौन-सा प्राण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है?
उत्तर:
समाण पाचन क्रिया और ऐड्रीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है।

प्रश्न 37.
शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण कौन-सा है?
उत्तर:
शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण ध्यान है।

प्रश्न 38.
आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य किस प्राण के कारण होते हैं?
उत्तर:
आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य उदाण के कारण होते हैं।

प्रश्न 39.
कौन-सा प्राणायाम रक्त को शुद्ध करने में सहायक होता है?
उत्तर:
शीतली प्राणायाम रक्त को शुद्ध करने में सहायक होता है।

प्रश्न 40.
मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता क्या कहलाती है?
उत्तर:
मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता ध्यान कहलाती है।।

प्रश्न 41.
योग से कब्ज दूर होती है। इसका संबंध किस प्रणाली से है?
उत्तर:
योग से कब्ज दूर होती है। इसका संबंध पाचन प्रणाली से है।

प्रश्न 42.
“योग आध्यात्मिक कामधेनु है।” योग की यह परिभाषा किसने दी?
उत्तर:
यह परिभाषा डॉ० संपूर्णानंद ने दी।

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प्रश्न 43.
“योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है” यह किसने कहा?
उत्तर:
यह महर्षि पतंजलि ने कहा।

प्रश्न 44.
गरुढ़ासन का कोई एक लाभ बताएँ।
उत्तर:
यह आसन टाँगों व बाजुओं की थकावट दूर करने में सहायक होता है।

प्रश्न 45.
योग अभ्यास कब करना चाहिए?
उत्तर:
योग अभ्यास शौच के पश्चात् और सुबह खाना खाने से पहले करना चाहिए।

प्रश्न 46.
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा कौन-सी है?
उत्तर:
भारतीय व्यायाम की प्राचीन विधा योग है।

प्रश्न 47.
योग व्यक्ति को किस प्रकार का बनाता है?
उत्तर:
योग व्यक्ति को शक्तिशाली, नीरोग और बुद्धिमान बनाता है।

प्रश्न 48.
योग किन मानसिक व्याधाओं या रोगों का इलाज है?
उत्तर:
योग तनाव, चिन्ताओं और परेशानियों का इलाज है।

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प्रश्न 49.
योग आसन कब नहीं करना चाहिए?
उत्तर:
किसी बीमारी की स्थिति में योग आसन नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 50.
नियम क्या है?
उत्तर:
नियम से अभिप्राय व्यक्ति द्वारा समाज स्वीकृत नियमों के अनुसार ही आचरण करना है।

प्रश्न 51.
शीर्षासन में शरीर की स्थिति कैसी होती है?
उत्तर:
शीर्षासन में सिर नीचे और पैर ऊपर की ओर सीधे होने चाहिएँ।

प्रश्न 52.
शवासन कब करना चाहिए?
उत्तर:
प्रत्येक आसन करने के उपरान्त शरीर को ढीला करने के लिए शवासन करना चाहिए।

प्रश्न 53.
राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग क्या हैं?
उत्तर:
ये योग के प्रकार हैं।

प्रश्न 54.
‘योग-सूत्र’ पुस्तक किसने लिखी?
उत्तर:
महर्षि पतंजलि ने।

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प्रश्न 55.
योग किन शक्तियों का विकास करता है?
उत्तर:
योग व्यक्तियों में मौजूदा आंतरिक शक्तियों का विकास करता है।

प्रश्न 56.
योग किसका मिश्रण है?
उत्तर:
योग धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यता का मिश्रण है।

प्रश्न 57.
योग का लक्ष्य लिखें।
उत्तर:
योग का लक्ष्य स्वास्थ्य में सुधार करना और मोक्ष प्राप्त करना है।

प्रश्न 58.
21 जून, 2020 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया?
उत्तर:
21 जून, 2020 में छठा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया।

प्रश्न 59.
21 जून, 2022 में कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा?
उत्तर:
21 जून, 2022 में आठवाँ अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाएगा।

प्रश्न 60.
योग किन मानसिक व्यधाओं या रोगों का इलाज है?
उत्तर:
योग तनाव, चिन्ताओं और परेशानियों का इलाज है।

प्रश्न 61.
शवासन में शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
शवासन में पीठ के बल सीधा लेटकर शरीर को पूरी तरह ढीला छोड़ना चाहिए।

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प्रश्न 62.
पद्मासन में कैसे बैठा जाता है?
उत्तर:
पद्मासन में टाँगों की चौकड़ी लगाकर बैठा जाता है।

प्रश्न 63.
ताड़ासन में शरीर की स्थिति कैसी होनी चाहिए?
उत्तर:
ताड़ासन में शरीर की स्थिति ताड़ के वृक्ष जैसी होनी चाहिए।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. ‘योग’ शब्द की उत्पत्ति किस भाषा से हुई?
(A) संस्कृत से
(B) लैटिन से
(C) फारसी से
(D) उर्दू से
उत्तर:
(A) संस्कृत से

2. ‘योग’ शब्द का उद्भव हुआ
(A) ‘युग’ शब्द से
(B) ‘योग’ शब्द से
(C) ‘योज’ शब्द से
(D) ‘युज’ शब्द से
उत्तर:
(D) ‘युज’ शब्द से

3. ‘युज’ का क्या अर्थ है?
(A) जुड़ना
(B) एक होना
(C) मिलन अथवा संयोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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4. निम्नलिखित में से प्राण क्या है?
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण
(B) साँस पर नियंत्रण
(C) शरीर पर नियंत्रण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण

5. निम्नलिखित में से प्राणायाम का अर्थ है
(A) मस्तिष्क पर नियंत्रण
(B) श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण
(C) शरीर पर नियंत्रण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) श्वास प्रक्रिया पर नियंत्रण

6. “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।” यह परिभाषा दी
(A) महर्षि पतंजलि ने
(B) महर्षि वेदव्यास ने
(C) भगवान् श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि पतंजलि ने

7. प्रसिद्ध महर्षि पतंजलि ने योग की कितनी अवस्थाओं (सोपानों) का उल्लेख किया है?
(A) पाँच
(B) आठ
(C) सात
(D) चार
उत्तर:
(B) आठ

8. योग का जन्मदाता देश है
(A) अमेरिका
(B) चीन
(C) इंग्लैंड
(D) भारत
उत्तर:
(D) भारत

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9. भारत में योग का इतिहास कितना पुराना है?
(A) लगभग 3600 ईसा पूर्व
(B) लगभग 2400 ईसा पूर्व
(C) लगभग 3000 ईसा पूर्व
(D) लगभग 3400 ईसा पूर्व
उत्तर:
(C) लगभग 3000 ईसा पूर्व

10. श्वास पर नियंत्रण रखने की प्रक्रिया को कहते हैं
(A) योग
(B) प्राणायाम
(C) उदाण
(D) सप्राण
उत्तर:
(B) प्राणायाम

11. शरीर में ठीक ढंग से रक्त प्रवाह कौन-सी प्रणाली से होता है?
(A) रक्त संचार प्रणाली से
(B) पाचन प्रणाली से
(C) श्वास प्रणाली से
(D) माँसपेशी प्रणाली से
उत्तर:
(A) रक्त संचार प्रणाली से

12. योग आत्मा कहा जाता है
(A) योग को
(B) प्राणायाम को
(C) प्राण को
(D) व्यायाम को
उत्तर:
(B) प्राणायाम को

13. प्राणायाम के भाग या चरण हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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14. श्वास को अंदर खींचने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पूरक

15. श्वास को अंदर खींचने के कुछ समय पश्चात् श्वास को अंदर ही रोकने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कुम्भक

16. श्वास को बाहर निकालने की क्रिया को कहते हैं
(A) पूरक
(B) कुम्भक
(C) रेचक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) रेचक

17. नाभि से निचले भाग में प्राण को कहते हैं
(A) अप्राण
(B) समाण
(C) उदाण
(D) ध्यान
उत्तर:
(A) अप्राण

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18. निम्नलिखित में से योग के प्रकार हैं
(A) अष्टांग योग व राज योग
(B) हठ योग व कर्म योग
(C) कुण्डली योग व सोम योग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

19. कौन-सा प्राण पाचन क्रिया और ऐडीनल ग्रंथि के कार्य करने की शक्ति को बढ़ाता है?
(A) समाण
(B) उदाण
(C) अप्राण
(D) प्राण
उत्तर:
(A) समाण

20. गले से दिल तक को क्या कहते हैं?
(A) प्राण
(B) अप्राण
(C) समाण
(D) उदाण
उत्तर:
(A) प्राण

21. भगवद्गीता के अनुसार योग की परिभाषा है
(A) तमसो मा ज्योतिर्गमय
(B) योग-कर्मसु कौशलम्
(C) सत्यमेव जयते
(D) अहिंसा परमोधर्म
उत्तर:
(B) योग-कर्मसु कौशलम्

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22. किस प्राणायाम से मोटापा कम होता है?
(A) नाड़ी-शोधन प्राणायाम से
(B) भस्त्रिका प्राणायाम से
(C) शीतकारी प्राणायाम से
(D) कपालभाती प्राणायाम से
उत्तर:
(B) भस्त्रिका प्राणायाम से

23. सूर्यभेदी प्राणायाम लाभदायक है
(A) शरीर के सैलों को शुद्ध करने में
(B) शरीर में गर्मी बढ़ाने में
(C) आंतड़ियों के रोग दूर करने में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. छोटी और बड़ी आँतड़ियों में कौन-सा प्राण होता है?
(A) अप्राण
(B) उदाण
(C) समाण
(D) प्राण
उत्तर:
(A) अप्राण

25. शरीर के सभी भागों में पाया जाने वाला प्राण है
(A) उदाण
(B) ध्यान
(C) समाण
(D) अप्राण
उत्तर:
(B) ध्यान

26. आँख, कान, नाक, मस्तिष्क आदि अंगों के कार्य किस प्राण के कारण होते हैं?
(A) ध्यान
(B) उदाण
(C) समाण
(D) अप्राण
उत्तर:
(B) उदाण

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27. “योग समाधि है।” यह कथन है
(A) महर्षि वेदव्यास का
(B) महर्षि पतंजलि का
(C) भगवान् श्रीकृष्ण का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि वेदव्यास का

28. आसन का अर्थ है
(A) श्वास लेने की प्रक्रिया
(B) शरीर की स्थिति
(C) मन की एकाग्रता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) शरीर की स्थिति

29. मस्तिष्क की पूर्ण एकाग्रता क्या कहलाती है?
(A) नियम
(B) धारणा
(C) ध्यान
(D) प्रत्याहार
उत्तर:
(C) ध्यान

30. यम कितने प्रकार के होते हैं?
(A) 4
(B) 3
(C) 5
(D) 2
उत्तर:
(C)5

31. अष्टांग योग का प्रथम अंग है-
(A) यम
(B) नियम
(C) आसन
(D) धारणा
उत्तर:
(A) यम

32. “योग मस्तिष्क को शांत करने का अभ्यास है।” यह किसने कहा? ।
(A) महर्षि वेदव्यास ने
(B) महर्षि पतंजलि ने
(C) भगवान श्रीकृष्ण ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) महर्षि पतंजलि ने

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33. परम चेतना या दिव्य मन में पूरी तरह से लीन होना कहलाती है-
(A) धारणा
(B) समाधि
(C) यम
(D) प्राणायाम
उत्तर:
(B) समाधि

34. किसके सतत् अभ्यास से तन एवं मन दोनों को रूपांतरित किया जा सकता है?
(A) योग के
(B) आसन के
(C) प्राण के
(D) प्राणायाम के
उत्तर:
(A) योग के

35. 21 जून, 2021 को कौन-सा अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाया गया?
(A) छठा
(B) चौथा
(C) पाँचवाँ
(D) सातवाँ
उत्तर:
(D) सातवाँ

36. “योग चितवृत्ति निरोध है।” यह किसका कथन है?
(A) पतंजलि का
(B) श्रीवेदव्यास का
(C) आगम का
(D) स्वामी रामदेव का
उत्तर:
(A) पतंजलि का

37. निम्नलिखित में से कौन-सा यम नहीं है?
(A) अहिंसा
(B) तप
(C) सत्य
(D) अस्तेय
उत्तर:
(B) तप

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38. निम्नलिखित में से कौन-सा अंग अष्टांग योग का नहीं है?
(A) यम’
(B) नियम
(C) प्रत्याहार
(D) परमात्मा
उत्तर:
(D) परमात्मा

39. निम्नलिखित में से कौन-सा उदाहरण नियम का नहीं है?
(A) शौच
(B) तप
(C) सत्य
(D) सन्तोष
उत्तर:
(C) सत्य

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. योग का जन्मदाता देश ……………….. को माना जाता है।
2. ……………….. को योग का पितामह माना जाता है।
3. योग हमेशा ……………….. जगह पर करना चाहिए।
4. प्राणायाम की ……………….. अवस्थाएँ होती हैं।
5. दिल से नाभि तक रहने वाली प्राण क्रिया को ……………. कहते हैं।
6. गले से सिर तक रहने वाले प्राण को ……………….. कहते हैं।
7. श्वास पर नियंत्रण रखने वाली क्रिया को ……………….. कहते हैं।
8. राज योग, अष्टांग योग, कर्म योग, ……………….. के प्रकार हैं।
9. साँस को अंदर खींचने के बाद उसे वहीं रोकने की क्रिया को ……………….. कहते हैं।
10. ………………… आसन करने से मधुमेह रोग नहीं होता।
11. अपनी इंद्रियों को नियंत्रण में रखने को ……………….. कहते हैं।
12. अष्टांग योग की रचना ……………….. द्वारा की गई।
13. अभ्यास करते समय श्वास ……………….. से लेना चाहिए।
14. अष्टांग योग में अपने मन को पूरी तरह से नियंत्रण में रखना ……………….. कहलाता है।
15. ……………….. धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान और शारीरिक सभ्यता का मिश्रण है।।
उत्तर:
1. भारत
2. महर्षि पतंजलि
3. साफ-सुथरी एवं हवादार
4. तीन
5. समाण
6. उदाण
7: प्राणायाम
8. योग
9. कुम्भक
10. शलभ
11. प्रत्याहार
12. महर्षि पतंजलि
13. नाक
14. धारणा
15. योग।

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योग शिक्षा Summary

योग शिक्षा परिचय

योग का इतिहास उतना ही प्राचीन है, जितना कि भारत का इतिहास। इस बारे में अभी तक ठीक तरह से पता नहीं लग सका कि योग कब शुरू हुआ? परंतु योग भारत की ही देन है। सिंधु घाटी में मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चलता है कि 3000 ईसा पूर्व में इस घाटी के लोग योग का अभ्यास करते थे। महर्षि पतंजलि द्वारा योग पर प्रथम पुस्तक ‘योग-सूत्र’ लिखी गई, जिसमें उन्होंने योग की अवस्थाओं एवं प्रकारों का विस्तृत उल्लेख किया है। योग के आदि गुरु महर्षि पतंजलि को माना जाता है। महर्षि पतंजलि के अनुसार, “योग: चित्तवृति निरोधः”अर्थात् “मनोवृत्ति के विरोध का नाम ही योग है।” भारत के मध्यकालीन युग में कई योगियों ने योग के बारे में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। आज भी अनेक महा-पुरुष योग को संपूर्ण विश्व में फैलाने हेतु निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
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महर्षि पतंजलि हमारे जीवन में शारीरिक तंदुरुस्ती का अपना विशेष महत्त्व है। शरीर को स्वस्थ एवं नीरोग रखने में योग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। योग एक ऐसी विधा है, जो शरीर तथा दिमाग पर नियंत्रण रखती है। वास्तव में योग शब्द संस्कृत भाषा के ‘युज’ शब्द से बना है, जिसका अर्थ है- जोड़ या मेल। योग वह क्रिया है जिसमें जीवात्मा का परमात्मा से मेल होता है। भारतीय संस्कृति, साहित्य तथा हस्तलिपि के अनुसार, योग जीवन के दर्शनशास्त्र के बहुत नजदीक है। बी०के०एस० आयंगर के अनुसार, “योग वह प्रकाश है जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता। जितना अच्छा आप अभ्यास करेंगे, लौ उतनी ही उज्ज्वल होगी।”

योग का उद्देश्य जीवात्मा का परमात्मा से मिलाप करवाना है। इसका मुख्य उद्देश्य शरीर को नीरोग, फुर्तीला, जोशीला, लचकदार और विशिष्ट क्षमताओं या शक्तियों का विकास करके मन को जीतना है। यह ईश्वर के सम्मुख संपूर्ण समर्पण हेतु मन को तैयार करता है।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 6 पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 6 पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 6 पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा

HBSE 12th Class Physical Education पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
परिवार का अर्थ एवं परिभाषा लिखें। इसके प्रकारों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परिचय (Introduction):
परिवार की उत्पत्ति कब हुई? इस संदर्भ में कोई निश्चित समय अथवा काल नहीं बताया जा सकता, पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे आवश्यकताओं की बढ़ोतरी हुई, वैसे-वैसे परिवार का विकास हुआ। परिवार की उत्पत्ति के विषय में अरस्तू जैसे विद्वान् ने कहा था कि, “परिवार का जन्म अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है।” परिवार को अंग्रेजी भाषा में ‘Family’ कहते हैं, जो रोमन भाषा के ‘Famulus’ से बना है। लैटिन भाषा में परिवार को फेमिलिआ (Familia) कहा जाता है, जिसका अर्थ है-माता-पिता, बच्चे, श्रमिक और गुलाम।

परिवार की परिभाषाएँ (Definitions of Family):
परिवार के संबंध में कुछ धारणाएँ इस प्रकार हैं-
(1) परिवार दो व्यक्तियों (स्त्री व पुरुष) का प्रेम स्वरूप बंधन है जो एक साथ सहवास, सहयोग की भावना पर आधारित है तथा प्रजनन की क्रिया को जन्म देता है,
(2) परिवार दो व्यक्तियों का ऐसा स्वरूप है जिससे सामाजिक प्रेरणाओं को रचनात्मक रूप देने का प्रयास किया जाता है। भिन्न-भिन्न समाजशास्त्रियों ने परिवार के बारे में अलग-अलग परिभाषाएँ दी हैं, जो निम्नलिखित हैं
1. क्लेयर (Clare) का कथन है, “परिवार से अभिप्राय उन संबंधों से है जो माता-पिता और बच्चों में मौजूद होते हैं।”
2. बैलार्ड (Ballard) के अनुसार, “परिवार एक मौलिक सामाजिक संस्था है, जिससे अन्य सभी संस्थाओं का विकास होता है।”
3. मजूमदार (Majumdar) के अनुसार, “परिवार व्यक्तियों का एक समूह है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं जो क्षेत्र, रुचि, आपसी बंधन और सूझ-बूझ के अनुसार स्नेह और खून के रिश्ते में बंधे होते हैं।”
4. बर्गेस और लॉक (Burgess and Lock) के अनुसार , “परिवार ऐसे व्यक्तियों का एक समूह है जो विवाह, खून या अपनाए गए रिश्तों या सम्बन्धों में बंधकर एक घर का निर्माण करता है। पति-पत्नी, माता-पिता, बेटा-बेटी, बहन-भाई आदि से सम्बन्धित सामाजिक बन्धनों से उनके आपसी सम्बन्ध बनते हैं और इस प्रकार से वे साधारण सभ्यता का निर्माण और उसको कायम रखते हैं।”

ऊपर दिए गए वर्णन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परिवार एक आन्तरिक क्रियाशील व्यक्तियों का समूह है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति का निश्चित कर्त्तव्य और निश्चित स्थान होता है। यह समूह अच्छी तरह संगठित होता है और इसकी अपनी पहचान होती है। मित्रता, प्यार, सहयोग और हमदर्दी परिवार के आधार हैं। परिवार सभी सामाजिक गठनों का आधार है। परिवार बच्चों की शिक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

परिवार के प्रकार (Types of Family):
परिवार समाज की एक मौलिक, सार्वभौमिक संस्था है। परिवार सभी स्तरों के समाज में किसी-न-किसी रूप में सदैव विद्यमान रहा है। विद्वानों ने परिवार के स्वरूपों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया है; जैसे निवास-स्थान, सत्ता, वंश, विवाह, सदस्यों की संख्या के आधार पर आदि।

सदस्यों की संख्या के आधार पर निम्नलिखित प्रकार के परिवार पाए जाते हैं
1. एकल या मूल परिवार (Single Family)
2. संयुक्त परिवार (Joint Family)
1. एकल या मूल परिवार (Single Family):
केंद्रीय परिवार को प्राथमिक, व्यक्तिगत, केंद्रीय, मूल अथवा नाभिक परिवार भी कहते हैं। यह परिवार का सबसे छोटा और आधारभूत स्वरूप है जिसमें सदस्यों की संख्या बहुत कम होती है। आमतौर पर पति-पत्नी तथा उसके अविवाहित बच्चे ही इस परिवार के सदस्य होते हैं। ऐसे परिवार में सदस्य भावात्मक आधार पर एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। परिवार का आकार सीमित होने के कारण इसका बच्चों के जीवन पर काफी रचनात्मक प्रभाव पड़ता है।

2. संयुक्त परिवार (Joint Family):
संयुक्त परिवार में दो या दो से अधिक पीढ़ियों के सदस्य; जैसे पति-पत्नी, उनके बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाची, चचेरे भाई, बच्चों की पत्नियाँ आदि. एक साथ एक घर में निवास करते हैं। उनकी संपत्ति साँझी होती है। वे एक ही चूल्हे पर भोजन बनाते हैं, सामूहिक धार्मिक कार्यों का निर्वाह करते हैं और परस्पर किसी-न-किसी नातेदारी व्यवस्था से जुड़े होते हैं। संयुक्त परिवार के सदस्य परस्पर अधिकारों व कर्तव्यों को निभाते हैं।

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प्रश्न 2.
परिवार का अर्थ बताते हुए इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
परिवार का अर्थ (Meaning of Family):
परिवार एक सामाजिक संगठन है जिसके अंतर्गत पति-पत्नी एवं उनके बच्चे तथा अन्य सदस्य आ जाते हैं जो उत्तरदायित्व व स्नेह की भावना से परस्पर बंधे रहते हैं।

परिवार की मुख्य विशेषताएँ (Main Features of Family):
परिवार की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
1. सामाजिक आधार (Social Basis):
परिवार के नियम सामाजिक नियंत्रण करने में सहायक होते हैं। परिवार में रहकर सदस्य सहनशीलता, सहयोग, सद्व्यवहार, रीति-रिवाज़ और धर्म जैसे नियमों का पालन करते हैं। परिवार सामाजिक नियमों का पालन करने में बहुत बड़ा योगदान देता है।

2. भावनात्मक आधार (Emotional Basis):
परिवार के सभी सदस्य भावनात्मक आधार पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। पति-पत्नी का प्यार, बच्चों तथा बहन-भाइयों का प्यार विशेष महत्त्व रखता है। इसी कारण परिवार के सभी सदस्य प्यार की माला में पिरोए होते हैं।

3. आर्थिक आधार (Economical Basis):
परिवार में कमाने वाले सदस्य बाकी सदस्यों; जैसे बच्चे, बूढे, स्त्रियों आदि के पालन-पोषण की व्यवस्था करते हैं। वह परिवार के सदस्यों की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। इस प्रकार परिवार के सभी सदस्य अधिकार और कर्तव्यों से बंधे होते हैं।

4. जिम्मेवारी या उत्तरदायित्व (Responsibility):
परिवार में रहते हुए प्रत्येक सदस्य अपनी जिम्मेवारी या उत्तरदायित्व को पूरा करता है। इनमें किसी सदस्य का निजी स्वार्थ नहीं होता। परिवार में आई प्रत्येक कठिनाई का सामना वे सामूहिक रूप से करते हैं।

5. सर्वव्यापकता (Universality): परिवार का अस्तित्व प्राचीनकाल से सर्वव्यापक है। इसी कारण परिवार को सर्वव्यापक सामाजिक संगठन कहा जाता है।

6. स्थायी लैंगिक संबंध (Permanent Sexual Relation):
स्त्री-पुरुष के स्थायी लैंगिक संबंध समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं। इसी कारण ही उनकी संतान वैध और सामाजिक रूप से परिवार की सदस्य होती है। संबंधों के स्थायी होने से बच्चों का पालन-पोषण ठीक प्रकार से होता है।

7.खून का रिश्ता (Blood Relation):
परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इसके सदस्यों का आपस में खून का रिश्ता होता है। इसी नाते सभी सदस्य परिवार में आई मुश्किल को सामूहिक रूप से हल करने की कोशिश करते हैं। परिवार में सदस्यों का ऐसा रिश्ता उनमें विश्वास व निःस्वार्थ की भावना पैदा करता है।

प्रश्न 3.
परिवार के कार्यों और उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
परिवार के प्राथमिक या आधारभूत कार्य कौन-कौन से हैं? विस्तारपूर्वक लिखें।
अथवा
परिवार के मूल मौलिक तथा गौण कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानव-जीवन में परिवार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। परिवार मानव की आज तक सेवा करता रहा है और कर रहा है जो किसी अन्य संस्था या समिति द्वारा संभव नहीं है। परिवार समाज की एक स्थायी व मौलिक सामाजिक संस्था है। अतः इसके कार्यों अथवा कर्तव्यों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जा सकता है-
(क) मौलिक या आधारभूत कार्य (Basic Functions)
(ख) द्वितीयक या गौण कार्य (Secondary Functions)

(क) मौलिक या आधारभूत कार्य (Basic Functions):
मौलिक कार्यों को प्राथमिक या आधारभूत कार्य भी कहते हैं। ये सार्वभौमिक होते हैं।
1. बच्चे का पालन-पोषण (Infant Rearing):
बच्चों के माता-पिता का उनके पालन-पोषण में बहुत बड़ा योगदान होता है। बच्चे को दूसरे लोगों की बजाय अपने माता-पिता का साथ ज्यादा मिलता है क्योंकि बच्चे के ऊपर माता-पिता का काफ़ी लम्बे समय तक गहरा प्रभाव रहता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बच्चे में जीवन के बहुमूल्य पाँच सालों में अच्छे गुणों को प्राप्त करने की आध्यात्मिक शक्ति होती है। दूसरे लोगों का प्रभाव बच्चे पर इस अवस्था के बाद में ही होता है।

2. प्रजनन क्रिया (Birth Process):
प्रजनन क्रिया परिवार का एक महत्त्वपूर्ण बुनियादी कार्य है। इस सम्बन्ध में वुड्सवर्थ का विचार है, “यह एक प्राणी का बुनियादी कार्य है जो परिवार करता है। यह कार्य किसी भी व्यक्ति या समाज के लिए आवश्यक है।”

3. परिवार के सदस्यों की सुरक्षा (Security of Family Members):
परिवार का बुनियादी कार्य केवल संतान पैदा करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि परिवार के सदस्यों की सुरक्षा अच्छे ढंग से करना भी उसका कार्य है। माता-पिता की देखभाल में रहकर बच्चा अपने व्यक्तित्व को निखार सकता है।

4. रोटी, कपड़ा और मकान की व्यवस्था करना (To Manage the Basic Necessities):
रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की मुख्य जरूरतें हैं। इनकी व्यवस्था करना परिवार का बुनियादी कार्य है। परिवार के सदस्यों की शारीरिक शिक्षा और उसके लिए स्थान की व्यवस्था भी परिवार ही करता है।

5. बच्चे की देखभाल (Care of Child):
बच्चे की देखभाल और संतुलित विकास में माता-पिता का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है। परिवार में रहते हुए बच्चे पर परिवार और परिवार के सदस्यों के व्यवहार का असर पड़ना भी स्वाभाविक होता है। माता-पिता से मेल-मिलाप, हमदर्दी और प्यार आदि मिलने से उसमें आत्म-सम्मान बढ़ता है। यह गुण बच्चे को जिंदगी में सफल बनाने में मदद करते हैं। बच्चे देश या परिवार के भविष्य की आशा की किरण होते हैं। इस कारण माता-पिता को बच्चों की देखभाल अच्छी तरह से करनी चाहिए।

6. परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखना (To Take Care of Family Health):
परिवार का सबसे मुख्य कर्त्तव्य परिवार के सदस्यों की सेहत का ध्यान रखना है। बच्चे की साफ-सफाई की तरफ ध्यान देना भी परिवार की मुख्य जिम्मेदारी होती है। उसको संतुलित खुराक, आवश्यक वस्त्र, आराम, नींद, खेल, कसरत और डॉक्टरी सहायता की व्यवस्था करना परिवार का मुख्य कर्तव्य है।

7. शिक्षा की व्यवस्था करना (Arrangement of Education):
परिवार बच्चों के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था करता है। वह बच्चों की शिक्षा संबंधी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

(ख) द्वितीयक या गौण कार्य (Secondary Functions):
इन कार्यों को अधिक प्राथमिकता नहीं दी जाती, इसलिए इन्हें द्वितीयक या गौण कार्य कहा जाता है। समाज विशेष के अनुसार, इन कार्यों में परिवर्तन होता रहता है।
1. आमोद-प्रमोद संबंधी कार्य (Recreative Functions)-परिवार पारिवारिक सदस्यों के मनोरंजन या आमोद-प्रमोद हेतु भी कार्य करता है। इससे वे संतुष्टि व राहत महसूस करते हैं।

2. मनोवैज्ञानिक कार्य (Psychological Functions)-परिवार सदस्यों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करता है। परिवार में सदस्यों का परस्पर प्रेम, सहानुभूति, त्याग, धैर्य आदि भावनाएँ देखने को मिलती हैं। परिवार में सदस्यों के संबंध पूर्ण व घुले-मिले होते हैं। इसलिए सदस्य सुख-दुःख आदि में एक-दूसरे को सहयोग देते हैं।

3. व्यक्तित्व का विकास (Personality Development)-एक बच्चे का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक और आध्यात्मिक विकास करने का अवसर प्रदान करना परिवार का एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। परिवार का मुख्य उद्देश्य बच्चे का बहुमुखी विकास करना है। इसलिए बच्चे के व्यक्तित्व के विकास में माता-पिता को बहुत अधिक ध्यान देना चाहिए।

4. सामाजिक कार्य (Social Work):
परिवार के प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) स्थिति प्रदान करना-सबसे पहले परिवार में ही व्यक्ति को उसकी प्रथम स्थिति प्राप्त होती है। पैदा होते ही वह एक पुत्र, भाई आदि की स्थिति प्राप्त कर लेता है। स्थिति के अनुसार ही व्यक्ति की भूमिका होती है। अतः हम कह सकते हैं कि परिवार ही सबसे पहले व्यक्ति की स्थिति और भूमिका निश्चित करता है।

(2) सामाजिक नियंत्रण-परिवार अपने सदस्यों के व्यवहार पर नियंत्रण रखकर सामाजिक नियंत्रण में भी सहायक होता है। परिवार ही सबसे पहले व्यक्ति को सामाजिक व्यवहार के स्वीकृत मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।

(3) मानवीय अनुभवों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाना-आज तक के मानवीय अनुभवों को परिवार बच्चों को कुछ ही वर्षों में सिखा देता है। इस प्रकार ये अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी अविराम गति से पहुँचते रहते हैं।

(4) मानवता का विकास-परिवार के सदस्य तीव्र भावात्मक संबंधों में बँधे होने के कारण सदैव एक-दूसरे के लिए त्याग तथा बलिदान हेतु तत्पर रहते हैं । पारस्परिक सहयोग, त्याग, बलिदान, प्रेम, स्नेह आदि के गुणों का विकास करके परिवार अपने सदस्यों में मानवता का विकास करता है।

5. आर्थिक कार्य (Economical Functions)-
परिवार के आर्थिक कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) उत्तराधिकार का नियमन-प्रत्येक समाज में संपत्ति एवं पदों की पुरानी पीढ़ी में हस्तांतरण की व्यवस्था पाई जाती है। यह कार्य परिवार के द्वारा ही किया जाता है। पितृ-सत्तात्मक परिवार में उत्तराधिकार पिता से पुत्र को तथा मातृ-सत्तात्मक परिवार में माता से पुत्री या मामा से भाँजे को मिलता है। इस प्रकार परिवार संपत्ति एवं पद के उत्तराधिकार संबंधी कार्यों की देख-रेख करता है। परिवार द्वारा यह निश्चित होता है कि संपत्ति का उत्तराधिकारी कौन-कौन होगा।

(2) श्रम-विभाजन-श्रम-विभाजन परिवार से आरंभ होता है। परिवार में श्रम-विभाजन उसके सदस्यों की स्थिति, आयु, कार्य-शक्ति एवं कुशलता के अनुसार ही होता है। परिवार में महिलाओं, बच्चों, पुरुषों, बूढ़ों आदि में श्रम-विभाजन होता है; जैसे महिलाएँ गृह-कार्य करती हैं, पुरुष शक्ति या परिश्रम संबंधी बाहरी कार्य तथा बच्चे छोटा-मोटा घरेलू कार्य करते हैं। परिवार के सदस्यों में श्रम-विभाजन आर्थिक सहयोग का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

(3) आय तथा संपत्ति का प्रबंध-परिवार अपने सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन (आय) का प्रबंध करता है। परिवार की आय से ही उसकी गरीबी या अमीरी का आकलन किया जाता है। परिवार का मुखिया, आय को कैसे खर्च करना है, तय करता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक परिवार के पास अपनी चल तथा अचल संपत्ति; जैसे जमीन, सोना, गहने, नकद, पशु, दुकान आदि होती है। उसकी देखभाल एवं सुरक्षा परिवार के द्वारा की जाती है।

6. राजनीतिक कार्य (Political Funcitons):
राज्य के अनुसार, आदर्श नागरिक बनाने का सर्वप्रथम कार्य परिवार में ही होता है। परिवार ही परिवार के सदस्यों को देश व राज्य की राजनीतिक गतिविधियों से अवगत करवाता है। कन्फ्यूशियस के अनुसार, “मनुष्य सर्वप्रथम परिवार का तथा उसके बाद उस राज्य का सदस्य होता है जो परिवार के स्वरूप के अनुरूप ही निर्मित होता है।”

7. सांस्कृतिक व धार्मिक कार्य (Cultural and Religious Functions):
बच्चे को समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को सौंपने में परिवार महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। परिवार अपने सदस्यों को अपने कार्य के अनुसार पूजा-पाठ, आराधना, इबादत, भक्ति आदि धार्मिक कार्यों के लिए तैयार करता है जिससे धर्म का महत्त्व बना रहता है। परिवार सदस्यों में परिश्रम, ईमानदारी, सहयोग, सहानुभूति, सच बोलना आदि गुण विकसित करने में सहायक होता है।

परिवार की उपयोगिता (Utility of Family);
परिवार को बच्चे का पालना कहा जाता है । यह बच्चे और अन्य सदस्यों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। बच्चों व अन्य सदस्यों को पालने में परिवार की उपयोगिता या भूमिका निम्नलिखित है-
(1) परिवार बच्चों व अन्य सदस्यों के लिए संतुलित भोजन, समयानुसार वस्त्र, आवास एवं चिकित्सा सुविधा आदि का प्रबंध करता है।
(2) परिवार में बच्चों के धार्मिक एवं आध्यात्मिक विकास की ओर ध्यान दिया जाता है।
(3) परिवार को सामाजिक गुणों का पालना कहा जाता है। परिवार बच्चे के सामाजिक विकास में सहायक होता है।
(4) परिवार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए अवसर जुटाता है।
(5) परिवार बच्चों के मूल्यपरक अर्थात् नैतिक गुणों के विकास में सहायक होता है। परिवार उनमें परिश्रम, ईमानदारी, सहयोग एवं सहानुभूति आदि गुणों को विकसित करता है। इनके अतिरिक्त बच्चा परिवार के संरक्षण में रहकर चिंताओं एवं मानसिक तनाव से मुक्त रहता है, उसमें इंसानियत या मानवता जागृत होती है, आत्मविश्वास जागृत होता है, सहनशीलता की भावना उत्पन्न होती है। बच्चा अपने परिवार से दूसरे परिवारों के साथ ‘सहकारिता की भावना व घर के कार्य में सहयोग का पाठ पढ़ता है। अंत में, हम कह सकते हैं कि परिवार अनेक नैतिक व सामाजिक गुणों का पालना है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 6 पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा

प्रश्न 4.
“परिवार एक सामाजिक संस्था के रूप में उपयोगी है।” वर्णन करें।
अथवा
क्या परिवार एक समाजिक संस्था के रूप में कार्य करता है? इस विषय का विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
उत्तर:
परिवार एक सामाजिक संस्था है जो सामाजिक संस्था के रूप में कार्य करता है। सामाजिक क्षेत्र में परिवार की उपयोगिता निम्नलिखित कार्यों से सिद्ध होती है- .
1. रहन-सहन के गुणों का विकास करना (To Develop the Qualities of Living):
परिवार एक ऐसी संस्था है जो अपने सदस्यों को विशेषकर बच्चों को समाज में रहन-सहन, खाने-पीने और बोलने आदि के ढंग सिखाता है। परिवार ही ऐसा स्थान है जहाँ पर बच्चे अपने भविष्य के लिए स्वयं को तैयार करते हैं और स्वयं में सामाजिकता के गुणों को विकसित करके अपने रहन-सहन के गुणों को विकसित करते हैं।

2. व्यक्तित्व निखारने वाली संस्था (Organisation of Personality Development);
परिवार को यदि व्यक्तित्व निखारने वाली संस्था कहा जाए तो कोई गलत बात नहीं होगी। परिवार में रहकर बच्चे अपने व्यक्तित्व को निखार सकते हैं।

3. परिवार एक मौलिक इकाई के रूप में (Family as Basic Unit):
परिवार एक मौलिक इकाई है। परिवार में रहकर सदस्यों के सम्बन्धों की रचना होती है। सभी सदस्य एक-दूसरे के इशारों पर चलते हैं। सामाजिक रीति-रिवाजों की रक्षा करना और सदस्यों के किसी भी तरह के व्यवहार पर काबू रखना परिवार का ही फर्ज है।

4. बच्चे पैदा करना (To Give Birth to Infant):
इस सम्बन्ध में वुडवर्थ का मानना है कि यह एक प्राणी का बुनियादी कर्तव्य है जिसे परिवार करता रहता है। इस तरह का कार्य किसी भी व्यक्ति या समाज के लिए आवश्यक है।

5. बच्चों का पालन-पोषण करना (Infant Rearing):
परिवार का बुनियादी कार्य केवल बच्चे पैदा करना ही नहीं बल्कि बच्चे का पालन-पोषण माता-पिता की तरफ से सबसे अच्छे ढंग से किया जा सकता है। माता-पिता की देखरेख में रहकर ही बच्चा अपने व्यक्तित्व का अच्छी तरह से विकास कर सकता है।

6. पारिवारिक सभ्याचार पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाने वाली संस्था (Organisation of Spread Family Culture Step-wise-step):
हमारे बजुर्गों के पास अनुभव होता है। माता-पिता अपने बजुर्गों से जो ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी बांटने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार पारिवारिक सभ्याचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने वाली संस्था के रूप में कार्य करता है।

7. मनोवैज्ञानिक कार्यों का केन्द्र बिन्दु (Central Point of Psychological Functions):
परिवार मनोवैज्ञानिक कार्यों का केन्द्र है। परिवार अपने सदस्यों के आपसी प्यार और सद्भावना का संचार करता है। कोई भी व्यक्ति परिवार में रहकर हमदर्दी, त्याग और प्रेम आदि मनोवैज्ञानिक गुणों को प्राप्त करता है। आदर्श रूप में परिवार एक प्रभावशाली मनोविज्ञान का आधार स्तम्भ है। यहां रहकर एक व्यक्ति को दुनिया की चिन्ताओं से मुक्ति मिल जाती है।

8. मनोरंजन का केन्द्र (Centre of Entertainment):
कामकाज से थका हुआ व्यक्ति परिवार में आकर बच्चों के साथ अपना मन बहला लेता है। बच्चों के साथ खेलकर तथा उनकी मधुर और तोतली आवाज सुनकर व्यक्ति की सारे दिन की थकावट दूर हो जाती है तथा वह अपनी सभी चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है।

9. आर्थिक कार्यों का केन्द्र (Centre of Economic Functions):
परिवार हमेशा से ही आर्थिक कार्यों का केन्द्र-बिन्दु रहा है। वस्तुओं को बनाना और उन्हें ज़रूरत के अनुसार बांटना ही परिवार का मुख्य कार्य है। परिवार में सदस्यों को अपने काम की जानकारी होती है। इसीलिए कहा जाता है कि परिवार अपने कार्य स्वयं ही निश्चित करता है। परिवार ही यह फैसला लेता है कि उसकी धन-दौलत तथा सम्पत्ति का मालिक कौन होगा और कौन-कौन इस सम्पत्ति का हिस्सेदार होगा।

प्रश्न 5.
किशोरावस्था को परिभाषित करें। इस अवस्था में कौन-कौन-से परिवर्तन होते हैं? वर्णन करें।
अथवा
“किशोरावस्था परिवर्तन का काल है।” इस कथन को विस्तारपूर्वक स्पष्ट करें।
अथवा
किशोरावस्था का क्या अर्थ है? किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
किशोरावस्था का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Adolescence):
किशोरावस्था अंग्रेज़ी शब्द ‘Adolescence’ का हिंदी रूपांतरण है। ‘Adolescence’ लैटिन भाषा के शब्द ‘Adolesceker’ (एडोलेसेकर) से बना है जिसका अर्थ है-परिपक्वता की ओर अग्रसर होना। किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था है जिसमें बालक बाल्यावस्था का त्याग करता है। यह अवस्था बाल्यावस्था के बाद और युवावस्था से पहले की अवस्था है। यह अवस्था लगभग 12 से 18 वर्ष के बीच की होती है।
1. स्टेनले हाल (Stanley Hall) के अनुसार, “किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।”
2. जरसील्ड (Jersield) के अनुसार, “किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर बढ़ता है।”
3. सैडलर (Sadler) के मतानुसार, “किशोरावस्था एक ऐसी अवस्था होती है जिसमें बच्चा अपने-आप ही प्रत्येक कार्य करने की कोशिश करता है।”

किशोरावस्था में होने वाले परिवर्तन (Changes of Adolescence):
उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट है कि इस अवस्था में किशोरों में अनेक शारीरिक-मानसिक परिवर्तन होते हैं जिस कारण वे चिंतित एवं बेचैन होते हैं। अनेक परिवर्तन होने के कारण इस अवस्था को परिवर्तन का काल कहा जाता है। इस अवस्था में होने वाले मुख्य परिवर्तन निम्नलिखित हैं

1.शारीरिक परिवर्तन (Physical Changes):
किशोरावस्था में किशोरों में दो प्रकार के शारीरिक परिवर्तन होते हैं-आंतरिक एवं बाहरी। किशोरों की ऊँचाई में तेजी से परिवर्तन होते हैं। भार में भी पर्याप्त वृद्धि होती है। किशोरों की आवाज में बहुत परिवर्तन होता है। लड़कों की आवाज में भारीपन तथा लड़कियों की आवाज कोमल व सुरीली हो जाती है।

2. मानसिक परिवर्तन (Mental Changes):
किशोरावस्था में किशोरों में अनेक बौद्धिक या मानसिक परिवर्तन होते हैं। उनमें स्मरण-शक्ति एवं कल्पना-शक्ति विकसित हो जाती है। किशोरों में तर्क एवं विचार-शक्ति का तीव्र विकास होने लगता है। उनमें किसी वस्तु या विषय के प्रति ध्यान केंद्रित करने की शक्ति विकसित हो जाती है। उनमें प्रदर्शन व मुकाबले की भावना का भी विकास होता है।

3. सामाजिक परिवर्तन (Social Changes):
इस अवस्था में किशोरों में सामाजिक भावना का विकास तीव्र गति से होता है। वे किसी-न-किसी सामाजिक संस्था का सदस्य बनने में रुचि लेने लगते हैं। उनमें सद्भाव, सहयोग, प्रेम, वफादारी, मित्रता तथा सहानुभूति आदि गुणों के लक्षण अधिक विकसित होने लगते हैं। वे खेलकूद व क्रियाशील कार्यों में भी अधिक रुचि लेने लगते हैं। .

4. संवेगात्मक परिवर्तन (Emotional Changes):
इस अवस्था में किशोरों में जिज्ञासा-प्रवृत्ति तीव्र हो जाती है। उनमें काल्पनिकता एवं भावुकता का पूर्ण विकास हो जाता है। उनमें विद्रोह की भावना तीव्र हो जाती है। वे स्वाभिमानी हो जाते हैं। उनमें आत्म-सम्मान की भावना का पूरी तरह विकास होने लगता है। वे विभिन्न प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं या क्रियाकलापों में भाग लेने के लिए तैयार रहते हैं। उनमें संवेगात्मक तनाव तीव्र हो जाता है। उनमें उपेक्षा के भावों के कारण विद्रोह व अपराध करने की प्रवृत्तियाँ भी अधिक विकसित होने लगती हैं । इस अवस्था में उनका अपने संवेगों पर नियंत्रण नहीं रहता। वे छोटी-छोटी बातों से भी अपना संवेगात्मक या भावनात्मक संतुलन खो देते हैं।

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प्रश्न 6.
किशोरावस्था क्या है? इसकी समस्याओं या कठिनाइयों का विस्तारपूर्वक वर्णन करें।
अथवा
किशोरावस्था में होने वाले शारीरिक-मानसिक परिवर्तनों के कारण किशोरों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है? वर्णन करें।
अथवा
किशोरावस्था एक गंभीर, तनावपूर्ण तथा समीक्षात्मक अवस्था है-स्पष्ट करें।
अथवा
“किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।” इस कथन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
किशोरावस्था काअर्थ (Meaning of Adolescence):
किशोरावस्था एक गंभीर, तनावपूर्ण तथा समीक्षात्मक अवस्था है। इस अवस्था में शारीरिक वृद्धि और विकास तीव्र गति से होता है। इस अवस्था के आरंभ होते ही शरीर में अनेक अंतर आ जाते हैं। इसी कारण इस अवस्था को तनावपूर्ण व विरोध करने की अवस्था कहा जाता है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक स्टेनले हाल का कथन है, “किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।”

किशोरावस्था की समस्याएँ या कठिनाइयाँ (Problems or Difficulties of Adolescence);
किशोरावस्था में शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और व्यवहार में बहुत जल्दी परिवर्तन आते हैं। इस कारण किशोरों को कई प्रकार की कठिनाइयों या समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि उनको बचपन की आदतों को छोड़कर किशोरावस्था की आदतों में ढलना पड़ता है। इसी कारण किशोरावस्था में माता-पिता और अध्यापकों का दायित्व और भी बढ़ जाता है। इस अवस्था में किशोरों को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है

1. शारीरिक समस्याएँ (Physical Problems):
किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तन स्पष्ट नज़र आते हैं। कुछ शारीरिक परिवर्तनों के कारण उनमें बेचैनी होती है, क्योंकि उनको इन बातों की पूर्ण

2. मानसिक समस्याएँ (Mental Problems):
किशोरावस्था में शारीरिक परिवर्तनों के साथ-साथ अनेक मानसिक परिवर्तन भी होते हैं। इन परिवर्तनों के कारण कई प्रकार की मानसिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं; जैसे तनाव, चिंता, बेचैनी, खिंचाव आदि।मानसिक तनाव के कारण वे किसी दूसरे से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते।

3. आत्म-चेतना में वृद्धि (Increase in Self-consciousness):
बचपन में आत्म-चेतना कम होती है। जैसे ही बच्चा किशोरावस्था में कदम रखता है, उसकी चेतना में एकदम परिवर्तन आता है। वह लोगों को बताना चाहता है कि वह अब बच्चा नहीं रहा, बल्कि हर बात को भली-भाँति समझने लगा है। इस अवस्था में लड़के-लड़कियाँ कुछ बनने के लिए तत्पर रहते हैं। कई बार इस आत्म-चेतना के कारण वे गलत रास्ते पर चल पड़ते हैं।

4. भावनात्मक या संवेगात्मक समस्याएँ (Emotional Problems):
किशोरावस्था में किशोरों का भावनात्मक होना एक साधारण बात है, क्योंकि इस अवस्था में उनमें संवेगात्मकता चरम-सीमा पर होती है। इसका मुख्य कारण उसकी शारीरिक और लिंग ग्रंथियों में जरूरत से अधिक वृद्धि है। किशोरावस्था में प्यार और नफरत दोनों बहुत ताकतवर होते हैं । इस अवस्था में उनका अपने संवेगों पर नियंत्रण नहीं रहता। वे छोटी-छोटी बातों से भी अपना भावात्मक संतुलन खो देते हैं।

5. व्यवसाय और विषयों की समस्याएँ (Problems of Career and Subjects):
किशोरावस्था में व्यवसाय और विषयों का चुनाव एक आम समस्या है। इस अवस्था में बच्चा स्कूल की पढ़ाई समाप्त करने के बाद कॉलेज की पढ़ाई के लिए तैयार होता है। विषयों का चुनाव और व्यवसाय के चुनाव पर उसका आने वाला भविष्य निर्भर करता है। उसके भविष्य की उज्ज्वलता अथवा अंधकारमयता उसके चुनाव पर निर्भर करती है।

6. चिड़चिड़ेपन में वृद्धि (Increase in Irritation):
किशोरावस्था में किशोर स्वतंत्र होना चाहते हैं ताकि वे अपना फैसला स्वयं कर सकें, परंतु माता-पिता उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं। उनमें भावुकता बहुत अधिक होती है। इसी कारण माता-पिता उनकी प्रत्येक क्रिया पर नज़र रखते हैं ताकि वे भटक न जाएँ। परंतु बच्चे इन बातों से चिड़चिड़े हो जाते हैं और माता-पिता से सवाल-जवाब करने शुरू कर देते हैं। कई बार तो लड़ाई-झगड़े तक की नौबत आ जाती है।

7. बौद्धिक चेतना संबंधी समस्याएँ (Problems of Intellectual Consciousness):
किशोरावस्था में बौद्धिक चेतना अपनी चरम-सीमा पर होती है। उसकी बात को समझने की शक्ति तेज हो जाती है। वह माता-पिता से कई ऐसे सवाल करता है कि माता-पिता चकित रह जाते हैं । वह हर बात की छानबीन करना चाहता है। उनके बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करना चाहता है। वह सदैव इसी ताक में रहता है कि वह किसी समूह अथवा अपनी मित्र-मंडली में बौद्धिक चेतना का प्रदर्शन करके अपने सम्मान में वृद्धि कर सके। बौद्धिक चेतना में वृद्धि होने के कारण किशोर स्वयं को दूसरों से अधिक बुद्धिमान एवं चालाक समझने लगते हैं। उन्हें स्वयं पर इतना अधिक विश्वास होता है कि वे दूसरों को मूर्ख समझने लगते हैं।

8. यौन संबंधी समस्याएँ (Sexual Problems): इस अवस्था में यौन संबंधी समस्याओं का होना भी एक आम बात है।

9. स्थिरता की कमी (Lack of Stability):
किशोरावस्था में किशोरों में स्थिरता की कमी होती है अर्थात् उनका व्यवहार स्थिर नहीं रहता। इसी कारण वे दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। स्थिरता की कमी के कारण किशोरों का व्यवहार आक्रामक हो जाता है। वे घर व बाहर पूर्ण रूप से स्वतंत्रता चाहते हैं।

10. नशीली दवाइयों का सेवन (Use of Drug Abuses):
किशोरावस्था में सिगरेट, शराब, नशीली दवाइयों आदि का सेवन सामान्य बात हो गई है। किशोर इस अवस्था में अपनी पढ़ाई की तरफ कम ध्यान देता है। वह नशीली दवाइयों का सेवन अपने दोस्तों के साथ बिना उसकी हानि जाने शुरू कर देता है जो कि उसके जीवन के लिए बहुत घातक सिद्ध होता है।

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प्रश्न 7.
हमें किशोरावस्था की समस्याओं का समाधान प्रबंध किस प्रकार करना चाहिए?
अथवा
किशोरों की समस्याओं को अध्यापकों व संरक्षकों या अभिभावकों को कैसे हल करना चाहिए?
अथवा
किशोरों को तनाव व चिंता से कैसे बचाया जा सकता है? वर्णन करें।
उत्तर:
किशोरावस्था में बच्चों को शारीरिक, मानसिक, भावात्मक और अन्य कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यद्यपि इनका हल इतना आसान नहीं है, परंतु असंभव भी नहीं है। किशोरावस्था की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न प्रत्येक वर्ग के सदस्यों को करना चाहिए ताकि बच्चों का पूर्ण विकास हो सके। अध्यापकों व अभिभावकों द्वारा किशोरावस्था की समस्याओं को निम्नलिखित तथ्यों के अंतर्गत सुलझाया जा सकता है

1. व्यक्तित्व को समझना (Recognition of Individuals):
किशोरावस्था में किशोर अपना निर्णय स्वयं लेना चाहते हैं । वे समाज में अपनी अलग पहचान बनाना चाहते हैं। परंतु कई बार माता-पिता उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं। माता-पिता को किशोरों की सलाह को चाहे वह गलत हो अथवा ठीक हो उसे तुरंत नकारना नहीं चाहिए। यदि माता-पिता उनके विचारों की उपेक्षा करेंगे तो उनमें हीनता की भावना आ जाएगी और वे भविष्य में कोई भी निर्णय लेने में असमर्थता महसूस करेंगे।

2. मनोविज्ञान की शिक्षा (Education of Psychology):
अध्यापकों व अभिभावकों को मनोविज्ञान की मौलिक जानकारी होनी चाहिए। किशोरों को मनोविज्ञान के संबंध में संपूर्ण जानकारी देनी चाहिए, ताकि वे अपनी समस्याओं को दूर करने में समर्थ हो सकें।

3. वृद्धि और विकास के बारे में पूर्ण जानकारी (ProperKnowledge of Growth and Development):
किशोरावस्था में लड़के और लड़कियों में वृद्धि और विकास अलग-अलग चरणों में होता है। लड़कियाँ लड़कों से जल्दी वयस्क हो जाती हैं और जल्दी परिपक्वता में आ जाती हैं। माता-पिता और अध्यापकों को वृद्धि और विकास के अलग-अलग चरणों की पूरी जानकारी होनी चाहिए। किशोरों को वृद्धि और विकास के दौरान संतुलित भोजन, आराम, अच्छा वातावरण, मानसिक आजादी देना बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। इन बातों से बच्चों में अच्छे गुण विकसित किए जा सकते हैं जो परिवार और समाज के लिए लाभदायक होते हैं।

4.धार्मिक शिक्षा (Religious Education):
किशोरावस्था में आ रहे शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक परिवर्तनों से किशोर अनभिज्ञ होते हैं। ये परिवर्तन उनके मन में हलचल पैदा कर देते हैं। इसलिए माता-पिता को उनकी ओर विशेष ध्यान देना चाहिए और अच्छा चरित्र-निर्माण करने के लिए उनको धार्मिक शिक्षा देनी चाहिए। माता-पिता को अपने बच्चों को मंदिर, गुरुद्वारे, मस्जिद और चर्च आदि में लेकर जाना चाहिए ताकि वे गुरु, संतों, पीर पैगंबरों आदि की गाथाएँ सुनकर अपने अंदर अच्छे गुण विकसित कर सकें। इस प्रकार उनके सामाजिक व्यवहार में भी परिवर्तन आएगा।

5. किशोरों के प्रति उचित व्यवहार (Proper Behaviour with Adolescence):
किशोरों के साथ उचित व्यवहार करना अति-आवश्यक है। यह आयु तनाव और खिंचाव वाली होती है। शरीर में आए परिवर्तनों के कारण बच्चे भावुक होते हैं। माता-पिता, बड़े भाई-बहन और समाज के सदस्यों को उनके साथ उचित व्यवहार करना चाहिए। उनकी आदतों, रुचियों और जरूरतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। इस प्रकार का व्यवहार बच्चे के चहुँमुखी विकास पर प्रभाव डालता है।

6. व्यावसायिक मार्गदर्शन (Vocational Guidance):
अध्यापकों को चाहिए कि वे किशोरों को व्यावसायिक शिक्षा संबंधी आवश्यक निर्देश दें। ये निर्देश उनकी आयु, वृद्धि एवं रुचि के अनुसार होने चाहिएँ। माता-पिता को उनका उचित व्यावसायिक मार्गदर्शन करना चाहिए अर्थात् निस व्यवसाय या कोर्स में उनकी रुचि है, उसमें माता-पिता को पूरा सहयोग करना चाहिए।

7.संवेगों का प्रशिक्षण और संतुष्टि (Training and Satisfaction of Emotions):
किशोरावस्था में संवेगों में परिपक्वता न होने के कारण व्यवहार में उतार-चढ़ाव बहुत जल्दी आता है। माता-पिता के लिए संवेगों के बारे में जानकारी प्राप्त करना अति-आवश्यक है। अगर बच्चा भावुक होकर अपने उद्देश्यों से भटक जाता है तो वह जीवन के हर पहलू में पिछड़ जाता है। अगर उसकी भावनाओं को उचित मोड़ दिया जाए तो वह एक अच्छा नागरिक बन सकता है। संवेगों में परिवर्तन प्रेरणा द्वारा ही लाया जा सकता है।

8. माता-पिता का संबंध और सहयोग (Relationship and Co-operation of Parents):
किशोरावस्था में किशोर प्रत्येक बात को बारीकी से सोचता है और उसकी छानबीन करता है। माता-पिता के आपसी अच्छे संबंध उस पर गहरा प्रभाव डालते हैं। उसका बहिर्मुखी और अंतर्मुखी होना माता-पिता के संबंधों पर निर्भर करता है। माता-पिता का सहयोग बच्चों के लिए वरदान साबित होता है। इस अवस्था में स्कूल, कॉलेज और अन्य कई प्रकार की समस्याएँ माता-पिता के सहयोग से जल्दी निपटाई जा सकती हैं। माता-पिता की तरफ से दिया गया अच्छा वातावरण बच्चे को तनावमुक्त बनाता है।
अंत में हम यह कह सकते हैं कि किशोरावस्था दबाव, संघर्ष, संवेगात्मक तूफान की अवस्था होती है। इस अवस्था में बालकों की आवश्यकताओं और समस्याओं की ओर उचित ध्यान देना चाहिए।

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प्रश्न 8.
शादी तथा पितृत्व (Marriage and Parenthood) के लिए की जाने वाली तैयारी के आधारों का वर्णन करें।
अथवा
विवाह तथा पारिवारिक जीवन के लिए की जाने वाली आधारभूत तैयारियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
वैवाहिक तथा पारिवारिक जीवन की तैयारी का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विवाह से परिवार की नींव बनती है और यहीं से पारिवारिक जीवन प्रारंभ होता है। उस जीवन को सुखद बनाने के लिए प्रारंभिक तैयारी तथा देखभाल की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि पारिवारिक जीवन सुखद बनाने पर भी व्यक्ति का जीवन अनेक समस्याओं से घिरा रहता है, जिनका समाधान करने से ही वैवाहिक और पारिवारिक जीवन भली-भाँति आगे बढ़ सकता है। अतः विवाह और पारिवारिक जीवन की तैयारी के मुख्य आधार या विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
1. आर्थिक आधार (Economic Basis):
आर्थिक आधार विवाह तथा पारिवारिक जीवन की तैयारी के लिए प्रमुख आधार है। इससे अभिप्राय यह है कि इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को आर्थिक रूप से पूर्णतया आत्मनिर्भर होना चाहिए। उसके पास आजीविका कमाने के पर्याप्त साधन होने चाहिएँ। आधुनिक युग में संयुक्त परिवार प्रणाली के विघटन से इस आधार के महत्त्व में और भी वृद्धि हो गई है।

2. सहयोग की भावना (Spirit of Co-operation):
पारिवारिक जीवन देखने में जितना आकर्षक एवं सुखद होता है, वास्तव में वैसा नहीं है। पारिवारिक जीवन का बोझ उठाने के लिए व्यक्ति को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से पूर्णतया तैयार होना चाहिए। मानसिक रूप से कमजोर तथा मनोवैज्ञानिक रूप से अशिक्षित व्यक्ति को पारिवारिक जीवन में अनेक प्रकार की जटिलताओं या समस्याओं का समाधान करना पड़ता है। इस प्रकार की समस्याओं का समाधान व्यक्ति अकेला नहीं कर सकता। इसलिए उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। दूसरे शब्दों में, हम यह भी कह सकते हैं कि सुखद विवाहित जीवन के लिए सहयोग की भावना एक महत्त्वपूर्ण आधार है।

3. आवास का आधार (Basis of Dwelling):
एक अनुचित स्थान पर इकट्ठे रहने के कारण अनेक समस्याएँ एवं झगड़े पैदा होने का भय रहता है। अतः परिवार की प्रसन्नता, सुख और शान्ति के लिए पृथक् आवास की व्यवस्था होना परमावश्यक है। वर्तमान युग में पृथक् रहने की प्रवृत्ति के कारण आवास की समस्या और भी गंभीर रूप धारण कर रही है। आवास स्वच्छ वातावरण के आस-पास होना चाहिए। अच्छे व स्वच्छ वातावरण का पारिवारिक सदस्यों पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है और विवाहित जीवन संतुलित रहता है।

4. नियोजित परिवार (Planned Family):
एक नियोजित परिवार की नींव और उससे प्राप्त होने वाले लाभों की इच्छा, पारिवारिक जीवन को प्रभावित करने वाला महत्त्वपूर्ण दृष्टिकोण है। परिवार नियोजन के महत्त्व को आज प्रत्येक व्यक्ति समझने लगा है। परिवार के सभी सदस्यों की आर्थिक, सामाजिक और मानसिक प्रगति अथवा सुख, नियोजित परिवार पर निर्भर करता है। इन्हें प्राप्त करने के लिए नियोजित परिवार तथा परिवार कल्याण को अधिक महत्त्व दिया जाना चाहिए।

5. चिकित्सा परीक्षण (Medical Check-up):
विवाहित जीवन और पारिवारिक जीवन में प्रवेश हेतु दंपतियों को अपने स्वास्थ्य का पूर्ण रूप से चिकित्सा परीक्षण (Medical Check-up) करा लेना चाहिए। इस प्रकार के निरीक्षण से शारीरिक विकारों का पता चल जाता है और उनकी रोकथाम की जा सकती है। सत्य तो यह है कि इस प्रकार का चिकित्सा परीक्षण सुखी जीवन तथा भविष्य में होने वाली संतान के लिए अत्यधिक लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

प्रश्न 9.
शिशु या बालक की देखभाल व विकास में माता-पिता की किस प्रकार की भूमिका होनी चाहिए?
अथवा
माता-पिता का शिशु की देखभाल में क्या योगदान होता है?
उत्तर:
शिशु के पालन-पोषण में माता-पिता की विशेष भूमिका होती है। जीवों में मानव ही एक ऐसा जीव है जिसमें बच्चों को काफी लंबे समय तक अपने माता-पिता के संरक्षण में रहना पड़ता है। इससे माता-पिता के व्यवहार का उन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। शिशु के जीवन के प्रारंभिक पाँच वर्ष बहुत ही लचीले होते हैं। इस अवस्था में उसमें बातों को ग्रहण करने की अत्यधिक क्षमता होती है। वैसे तो बच्चों के संपर्क अथवा जीवन में आने वाले सभी व्यक्तियों का उन पर प्रभाव पड़ता है; जैसे दादा-दादी, भाई-बहन, पड़ोसी, अध्यापक, मित्र-मण्डली और समाज के अन्य वर्गों के लोग, किंतु उनकी देखभाल और उनके सम्पूर्ण विकास में माता-पिता का योगदान महत्त्वपूर्ण होता है।
1. घर का वातावरण (Atmosphere of House):
बच्चों पर घर के वातावरण की सबसे अधिक छाप होती है। इस अवस्था में ग्रहण की गई अच्छी बातें अथवा आदतें उनका जीवन-भर साथ देती हैं। माता-पिता के आपसी संबंध, उनका व्यवहार, स्थिति, उनका आर्थिक एवं सामाजिक स्तर और उनकी रुचियाँ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों के व्यक्तित्व अथवा व्यवहार को प्रभावित करती हैं।

2. माता-पिता का स्नेह (Parents Affection):
माता-पिता के आपसी संबंध अच्छे होने का बच्चों के मन पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। बच्चे को माता-पिता से मिलने वाला स्नेह उसके जीवन की अनेक समस्याओं अथवा जटिलताओं को सुलझाने में सहायक सिद्ध होता है। माता-पिता से उचित स्नेह, सहानुभूति और सहयोग इत्यादि मिलने से उसका आत्म-सम्मान और आत्म-गौरव बढ़ता है।

3. मार्गदर्शन (Guidance):
माता-पिता का कर्त्तव्य बच्चों को केवल स्नेह देना ही नहीं, बल्कि उनके व्यवहार के उचित विकास के लिए मार्गदर्शन करना भी है। यदि माता-पिता अपने बच्चों का सही मार्गदर्शन नहीं करते तो वे अपने रास्ते से भटक जाते हैं, जिससे उन्हें असफलता एवं निराशा का मुँह देखना पड़ता है। इसलिए माता-पिता का यह कर्त्तव्य है कि वे अपने बच्चों का मार्गदर्शन करके उन्हें भटकने से बचाएँ।

4. शैक्षिक सुविधाएँ (Educational Facilities):
माता-पिता को अपने बच्चों को सभी प्रकार की अच्छी शैक्षिक सुविधाएँ देने का प्रयास करना चाहिए। अच्छी शिक्षा से बच्चों की वृद्धि तथा विकास पर ही प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि उनका भविष्य भी उज्ज्वल होता है। कई माता-पिता समय के अभाव या निरक्षरता के कारण बच्चों की शिक्षा की ओर ज्यादा ध्यान नहीं देते जिससे उनके बच्चों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वे अन्य बच्चों की तुलना में पिछड़ जाते हैं। माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा के उत्तरदायित्व से पीछे नहीं हटना चाहिए।

5. शारीरिक समस्याएँ (Physical Problems):
किशोरावस्था में बच्चों में शारीरिक परिवर्तन आने के कारण उनमें काम-चेतना काफी प्रबल हो जाती है जिससे उनके सामने अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। माता-पिता अपने बच्चों की शारीरिक समस्याओं को अच्छी प्रकार समझकर उनका उचित समाधान करने के लिए प्रयास कर सकते हैं। वे बच्चों के सर्वांगीण विकास में अच्छी भूमिका निभा सकते हैं।

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प्रश्न 10.
एक अच्छे नागरिक के तौर पर व्यक्ति की क्या भूमिका होनी चाहिए?
अथवा
‘नागरिक’ को परिभाषित कीजिए। एक अच्छे नागरिक में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ?

के बिना नहीं रह सकता और समाज में रहकर ही वह अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है। समाज का निर्माण भी नागरिकों से ही संभव है।
1.अरस्तू (Aristotle) नागरिक की परिभाषा देते हुए लिखते हैं, “जिस व्यक्ति विशेष के पास राज्य की समीक्षा अथवा न्याय
2. श्रीनिवास शास्त्री (Sriniwas Shastari) के अनुसार, “नागरिक वही है जो राज्य का सदस्य है और समाज की भलाई के लिए बनाए गए नियमों का पालन करता है। राष्ट्र का निर्माण नागरिकों के द्वारा होता है और समाज का निर्माण व्यक्ति के द्वारा होता है।”

एक अच्छे नागरिक के गुण व भूमिका (Qualities and Role of aGood Citizen):
प्रत्येक बच्चे को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए कि वह समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपना विशेष कर्त्तव्य समझ सके और उसके विकास में अपना योगदान दे सके। उसमें वे सभी गुण होने चाहिएँ, जो न केवल उसके लिए अपितु समाज व देश के लिए भी लाभदायक हों। एक अच्छे नागरिक में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) प्रत्येक नागरिक में ईमानदारी, सहयोग, सहनशीलता आदि गुणों का होना अनिवार्य है। ये गुण सामाजिक कर्तव्यों को निभाने में सहायक होते हैं।
(2) नागरिक का चरित्र उच्चकोटि का होना चाहिए। उसे सादे जीवन के निर्वाह में विश्वास रखना चाहिए।
(3) प्रत्येक नागरिक में देशभक्ति की भावना होनी चाहिए। उसे अपनी रुचियों की अपेक्षा देश की रुचियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उसे अपने देश को ही सबसे ऊपर समझना चाहिए।
(4) उसे खेलकूद के नियमों का पालन करना चाहिए। यह नियम भी एक अच्छा नागरिक बनाने में सहायक होता है।
कोई भी व्यक्ति तब तक अपने राष्ट्र के प्रति वफादार नहीं हो सकता, जब तक वह स्वयं अपने माता-पिता, परिवार, समाज आदि के प्रति वफादार नहीं है। जब तक हम एक अच्छे पड़ोसी की भाँति नहीं रहेंगे, तब तक हम शांति से नहीं रह सकते।
(6) प्रजातांत्रिक देश में नागरिक को जाति, रंग, भाषा या धर्म में भेदभाव नहीं करना चाहिए। यदि प्रत्येक नागरिक अनुशासित होगा तो देश अनुशासित होगा।
(7) उसे समाज में भाईचारे, सहयोग, बंधुत्व की भावनाओं का विकास करने में अपना योगदान देना चाहिए।
एक अच्छे नागरिक के गुणों को महात्मा गाँधी ने इस प्रकार से व्यक्त किया-“एक अच्छे नागरिक में सत्य, अहिंसा एवं निर्भीकता के गुण होने चाहिएँ ताकि वह उच्च एवं अच्छे समाज की स्थापना कर सके।”

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
गर्भधारण और जन्म से पूर्व सावधानियों का वर्णन करें।
अथवा
गर्भ में तथा बच्चा पैदा होने से पहले की देखभाल का वर्णन करें।
उत्तर:
गर्भ में तथा बच्चा पैदा होने से पहले की देखभाल माँ या गर्भवती महिला पर निर्भर करती है। गर्भावस्था के दौरान गर्भवती महिला ‘कुछ सावधानियाँ बरतकर न सिर्फ अपने होने वाले शिशु को स्वस्थ पैदा कर सकती है, बल्कि वह स्वयं को भी स्वस्थ रख सकती है। मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि गर्भकाल में प्रकट होने वाले अनेक विकार और व्याधि मानसिक कारणों से होते हैं। इसलिए गर्भवती महिला को अपनी मानसिक स्थिति ठीक रखनी चाहिए। गर्भवती को अपने भोजन में सभी आवश्यक एवं पौष्टिक तत्त्वों को शामिल करना चाहिए। हरी सब्जियों और मौसम के अनुसार ताजे फल भी बहुत आवश्यक होते हैं, क्योंकि इनसे माँ और बच्चे को शरीर के जरूरी खनिज लवण और विटामिन्स प्राप्त होते हैं।

परिवार को भी गर्भवती महिला के भोजन की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि बच्चा अपनी वृद्धि एवं विकास के लिए माँ के शरीर से भोजन प्राप्त करता है। अपने भोजन के प्रति माँ (गर्भवती) को विशेष सावधानी रखनी चाहिए। उसे अपने भोजन में उन्हीं भोजन अवयवों का चयन करना चाहिए जिनसे गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर अनुकूल असर हो। गर्भवती महिला को किसी बीमारी के कारण औषधियों या दवाइयों के सेवन में भी विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। गर्भवती महिला को विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही औषधियों या दवाइयों का सेवन करना चाहिए। गर्भावस्था के आखिरी दिनों में मधुमेह और थाइराइड के लिए ली जाने वाली औषधियों से बचना चाहिए क्योंकि इन औषधियों का शिशु के स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता। इसलिए माँ को अपने गर्भावस्था के दौरान सभी आवश्यक सावधानियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि उसका बच्चा सुंदर एवं स्वस्थ पैदा हो सके और उसका स्वयं का स्वास्थ्य भी ठीक रहे।

प्रश्न 2.
परिवार कितने प्रकार के होते हैं? वर्णन करें।
अथवा
व्यक्तिगत परिवार तथा संयुक्त परिवार से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
परिवार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-
1. व्यक्तिगत या एकल परिवार-व्यक्तिगत या एकल परिवार को प्राथमिक, मूल अथवा नाभिक परिवार भी कहते हैं। यह परिवार का सबसे छोटा और आधारभूत स्वरूप है जिसमें सदस्यों की संख्या बहुत कम होती है। आमतौर पर पति-पत्नी तथा उसके अविवाहित बच्चे ही इस परिवार के सदस्य होते हैं। ऐसे परिवार में सदस्य भावात्मक आधार पर एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। परिवार का आकार सीमित होने के कारण इसका बच्चों के जीवन पर काफी रचनात्मक प्रभाव पड़ता है।

2. संयुक्त परिवार-संयुक्त परिवार में तीन या तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य; जैसे पति-पत्नी, उनके बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाची, चचेरे भाई, बच्चों की पत्नियाँ आदि साथ-साथ एक घर में निवास करते हैं, उनकी संपत्ति सांझी होती है। संयुक्त परिवार के सदस्य परस्पर अधिकारों व कर्तव्यों को निभाते हैं।

प्रश्न 3.
बच्चों को पालने में परिवार की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
बच्चों व अन्य सदस्यों को पालने में परिवार की भूमिका निम्नलिखित है
(1) परिवार बच्चों व अन्य सदस्यों के लिए संतुलित भोजन, समयानुसार वस्त्र, आवास एवं चिकित्सा सुविधा आदि का प्रबंध करता है।
(2) परिवार में बच्चों के धार्मिक एवं आध्यात्मिक विकास की ओर ध्यान दिया जाता है।
(3) परिवार को सामाजिक गुणों का पालना कहा जाता है। परिवार बच्चे के सामाजिक विकास में सहायक होता है।
(4) परिवार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए अवसर जुटाता है।
(5) परिवार बच्चों के मूल्यपरक अर्थात् नैतिक गुणों के विकास में सहायक होता है। परिवार उनमें परिश्रम, ईमानदारी, सहयोग एवं सहानुभूति आदि गुणों को विकसित करता है।

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प्रश्न 4.
परिवार के आधारभूत या बुनियादी कार्य कौन-कौन-से हैं?
अथवा
परिवार के कोई चार प्राथमिक या मूल कार्य बताएँ।
उत्तर:
परिवार के आधारभूत या बुनियादी कार्य निम्नलिखित हैं
(1) बच्चों के माता-पिता का उनके पालन-पोषण में बहुत बड़ा योगदान होता है। बच्चे को दूसरे लोगों की बजाय अपने माता-पिता का साथ ज्यादा मिलता है क्योंकि बच्चे के ऊपर माता-पिता का काफ़ी लम्बे समय तक गहरा प्रभाव रहता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बच्चे में जीवन के बहुमूल्य पाँच सालों में अच्छे गुणों को प्राप्त करने की आध्यात्मिक शक्ति होती है। दूसरे लोगों का प्रभाव बच्चे पर इस अवस्था के बाद में ही होता है।
(2) परिवार बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था करता है। वह बच्चों की शिक्षा संबंधी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।
(3) परिवार का बुनियादी कार्य केवल संतान पैदा करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि परिवार के सदस्यों की सुरक्षा अच्छे ढंग से करना भी उसका कार्य है। माता-पिता की देखभाल में रहकर बच्चा अपने व्यक्तित्व को निखार सकता है।
(4) रोटी, कपड़ा और मकान जीवन की मुख्य जरूरतें हैं। इनकी व्यवस्था करना परिवार का बुनियादी कार्य है।

प्रश्न 5.
परिवार के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परिवार के मुख्य तत्त्व निम्नलिखित हैं
1. लैंगिक संबंध-परिवार का मुख्य तत्त्व लैंगिक संबंध होता है। यह संबंध स्थायी होता है।
2. समान अधिकार-निवास स्थान पर हर सदस्य का समान अधिकार होना चाहिए।
3. सामूहिक दायित्व-परिवार के प्रत्येक सदस्य का घर के किसी भी काम के प्रति सामूहिक दायित्व होता है। प्रत्येक सदस्य की आवश्यकता मिल-जुलकर पूरी की जाए तो परिवार का हर सदस्य कुछ-न-कुछ सहयोग ज़रूर देगा।
4. वंशावली-राज्य और समाज वंशावली को मान्यता देता है और भविष्य में कोई भी परिवार वंश के नाम से ही जाना जाएगा।

प्रश्न 6.
परिवार के प्रमुख सामाजिक कार्य लिखिए।
उत्तर:
परिवार के प्रमुख सामाजिक कार्य निम्नलिखित हैं
1. स्थिति प्रदान करना-सबसे पहले परिवार में ही व्यक्ति को उसकी प्रथम स्थिति प्राप्त होती है। पैदा होते ही वह एक पुत्र, भाई आदि की स्थिति प्राप्त कर लेता है। स्थिति के अनुसार ही व्यक्ति की भूमिका होती है। अतः हम कह सकते हैं कि परिवार ही सबसे पहले व्यक्ति की स्थिति और भूमिका निश्चित करता है।

2. सामाजिक नियंत्रण-परिवार अपने सदस्यों के व्यवहार पर नियंत्रण रखकर सामाजिक नियंत्रण में भी सहायक होता है। परिवार ही सबसे पहले व्यक्ति को सामाजिक व्यवहार के स्वीकृत मानदंडों के अनुरूप व्यवहार करने के लिए प्रेरित करता है।

3. मानवीय अनुभवों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुँचाना-आज तक के मानवीय अनुभवों को परिवार बच्चों को कुछ ही वर्षों में सिखा देता है। इस प्रकार ये अनुभव पीढ़ी-दर-पीढ़ी अविराम गति से पहुँचते रहते हैं।

4. मानवता का विकास-परिवार के सदस्य तीव्र भावात्मक संबंधों में बँधे होने के कारण सदैव एक-दूसरे के लिए त्याग तथा बलिदान हेतु तत्पर रहते हैं। पारस्परिक सहयोग, त्याग, बलिदान, प्रेम, स्नेह आदि के गुणों का विकास करके परिवार अपने सदस्यों में मानवता का विकास करता है।

प्रश्न 7.
परिवार के महत्त्व का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
परिवार की उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
परिवार को बच्चे का पालना कहा जाता है। यह बच्चे और अन्य सदस्यों की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हमारे जीवन में परिवार का बहुत महत्त्व है। इसके महत्त्व को निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट किया जा सकता है
(1) परिवार की वजह से हम बहुत-सी परेशानियों से दूर रहते हैं, क्योंकि पारिवारिक सदस्य एक-दूसरे की हर तरह की सहायता करते हैं।
(2) परिवार से ही हमें जीवन जीने का मकसद मिलता है और हम अपने परिवार के साथ खुश रहकर जीवन का निर्वाह करते हैं।
(3) परिवार से ही हमारा समाज आगे बढ़ता है और समाज का निर्माण होता है।
(4) परिवार ही हमें सामाजिकता सिखाता है और हमारी सभी मूल जरूरतों को पूरा करता है।
(5) परिवार ही पारिवारिक सदस्यों में नैतिक गुणों का विकास करता है। (6) परिवार से ही हमें आत्म-रक्षा, संस्कृति व भाषा का ज्ञान प्राप्त होता है।

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प्रश्न 8.
“किशोरावस्था एक समस्या की उम्र है।” स्पष्ट करें।
अथवा
“किशोरावस्था एक गंभीर अवस्था है।” स्पष्ट करें।
अथवा
किशोरावस्था में किशोरों को किन-किन प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर:
किशोरावस्था एक गंभीर एवं समस्या की उम्र (अवस्था) है। इसमें किशोरों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इस उम्र में किशोरों को निम्नलिखित प्रमुख समस्याओं का सामना करना पड़ता है
(1) किशोरावस्था में अनेक शारीरिक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों के कारण किशोरों को चिंता एवं बेचैनी होती है।
(2) इस अवस्था में किशोर दूसरों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते। वे अनेक मानसिक तनावों से प्रभावित होते हैं।
(3) इस अवस्था में किशोरों को अपने व्यवसाय या विषय का चयन करने में भी समस्या आती है।
(4) किशोरावस्था में भावुकता बहुत होती है। इसी कारण माता-पिता उनकी प्रत्येक क्रिया पर नज़र रखते हैं ताकि वे भटक न जाएँ। परन्तु बच्चे इन बातों से चिड़चिड़े हो जाते हैं और माता-पिता से सवाल-जवाब करने शुरू कर देते हैं। कई बार तो लड़ाई-झगड़े तक की नौबत आ जाती है।

प्रश्न 9.
किशोरावस्था की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
अथवा
किशोरावस्था की कोई चार विशेषताएँ या लक्षण लिखें।
उत्तर:
किशोरावस्था की मुख्य विशेषताएँ या लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) बाहरी व आंतरिक शारीरिक भागों का विकास,
(2) मानसिक या बौद्धिक चेतना का विकास,
(3) सामाजिक चेतना में वृद्धि,
(4) भावी जीवन की योजनाएँ बनाने में रुचि,
(5) स्मरण शक्ति व कल्पना-शक्ति का तीव्र विकास,
(6) सामाजिक वातावरण के प्रति जागरूकता,
(7) विपरीत लिंग से संबंधित चर्चा एवं साहित्य में अधिक रुचि।

प्रश्न 10.
किशोरावस्था को परिवर्तन की अवस्था क्यों कहा जाता है?
अथवा
किशोरावस्था तनाव एवं खिंचाव की अवस्था है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
किशोरावस्था तनाव एवं खिंचाव तथा परिवर्तन की अवस्था है। इसमें किशोरों में वृद्धि की गति तीव्र होती है। उनके बाहरी व आंतरिक अंगों का विकास तीव्र गति से होना आरंभ हो जाता है। लड़कियों की आवाज कोमल व मधुर तथा लड़कों की आवाज भारी हो जाती है । इस अवस्था में लड़कों को दाढ़ी-मूंछ आ जाती है। किशोरों में शारीरिक परिवर्तन के साथ मानसिक परिवर्तन भी तीव्र गति से होते हैं। इसी कारण इस अवस्था को परिवर्तन की अवस्था भी कहा जाता है । इस अवस्था में उनमें मानसिक तनाव, खिंचाव व चिंता आदि बढ़ने लगती है । वे दूसरों के साथ समायोजन नहीं कर पाते । स्वयं को ही अधिक महत्ता देने लगते हैं। जिस कारण उनको अनेक मानसिक तनावों का सामना करना पड़ता है । इस प्रकार किशोरावस्था तनाव एवं खिंचाव तथा परिवर्तन की अवस्था है।

प्रश्न 11.
किशोर आयु के बालक/बालिकाओं के तनाव व खिंचाव को किस प्रकार दूर करेंगे?
अथवा
किशोरावस्था की समस्याओं के निवारण का संक्षेप में उल्लेख करें।
अथवा
किशोरों की समस्याओं को अध्यापक को कैसे दूर करना चाहिए?
अथवा
माता-पिता को किशोरों की समस्याओं का निपटारा कैसे करना चाहिए?
अथवा
किशोरावस्था की समस्याएँ आप कैसे नियंत्रित करेंगे?
उत्तर:
किशोरावस्था की समस्याओं को समझना तथा उनकी संतुष्टि का प्रयास करना अति आवश्यक है। माता-पिता और अध्यापक को किशोरों के प्रति अपना उत्तरदायित्व निभाना चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित सुझाव लाभदायक सिद्ध हो सकते हैं-
(1) किशोरों को लिंग संबंधी शिक्षा देना,
(2) किशोरों को मनोविज्ञान के संबंध में पूर्ण जानकारी देना,
(3) उन्हें पर्याप्त स्वतंत्रता देना,
(4) उनकी भावनाओं का आदर करना,
(5) घर-परिवार का वातावरण उचित बनाना,
(6) व्यावसायिक पथ-प्रदर्शन करना,
(7) नैतिक व मूल्य-बोध की शिक्षा देना,
(8) सहसंबंध एवं सहयोग की भावना रखना,
(9) उचित व्यवहार करना,
(10) उनकी विभिन्न आवश्यकताओं व इच्छाओं की पूर्ति करना,
(11) संवेगों का प्रशिक्षण तथा संवेगात्मक आवश्यकताओं की पूर्ति करना आदि।

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प्रश्न 12.
किशोरों की शिक्षा-व्यवस्था करते समय किन-किन बातों की ओर ध्यान देना चाहिए?
उत्तर:
किशोरों की शिक्षा-व्यवस्था करते समय निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देना चाहिए
(1) किशोरावस्था को परिवर्तन की अवस्था कहा जाता है। इसमें किशोरों में अनेक परिवर्तन होते हैं। माता-पिता एवं अध्यापकों द्वारा उन्हें उचित दिशा का बोध कराने का दायित्व निभाया जाना चाहिए।
(2) इस अवस्था में उनमें किसी विषय से संबंधित जानकारी प्राप्त करने की उत्तेजना होती है। इसलिए माता-पिता व अध्यापकों के द्वारा उन्हें ऐसे विषय दिए जाने चाहिएँ जिनसे उनकी जिज्ञासा की पूर्ति हो और उनकी स्मरण शक्ति का विकास हो।
(3) किशोरों के संतुलित विकास के लिए, खेलकूद व व्यायाम आदि पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
(4) उनके मानसिक या बौद्धिक विकास हेतु उनकी बुद्धि, स्मरण-शक्ति, तर्क-शक्ति, चिंतन-शक्ति, कल्पना-शक्ति आदि का विकास उनकी रुचि, इच्छा, क्षमता एवं योग्यता के अनुसार किया जाना चाहिए।
(5) उन्हें शुद्ध पढ़ने, बोलने और लिखने का अभ्यास करवाना चाहिए, क्योंकि इस अवस्था में स्मरण शक्ति काफी विकसित होती है।
(6) विषयों को पढ़ाते समय उनकी रुचि एवं इच्छाओं पर अवश्य ध्यान दिया जाना चाहिए। इस अवस्था में इनमें स्वतंत्र पठन करने की रुचि भी विकसित हो जाती है। इसलिए अध्यापकों को उनकी इस रुचि को अधिक-से-अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए।

प्रश्न 13.
एक अच्छे नागरिक के कोई चार गुण बताएँ। अथवा एक नागरिक में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ?
उत्तर:
एक अच्छे नागरिक में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) प्रत्येक नागरिक में ईमानदारी, सहयोग, सहनशीलता आदि गुणों का होना अनिवार्य है। ये गुण सामाजिक कर्तव्यों को निभाने में सहायक होते हैं।
(2) नागरिक का चरित्र उच्चकोटि का होना चाहिए। उसे सादे जीवन के निर्वाह में विश्वास रखना चाहिए।
(3) प्रत्येक नागरिक में देशभक्ति की भावना होनी चाहिए। उसे अपनी रुचियों की अपेक्षा देश की रुचियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उसे अपने देश को ही सबसे ऊपर समझना चाहिए।
(4) उसे समाज में भाईचारे, सहयोग, बंधुत्व की भावनाओं का विकास करने में अपना योगदान देना चाहिए।

प्रश्न 14.
बच्चे के सामाजिक विकास में परिवार की क्या भूमिका होनी चाहिए?
अथवा
बालक के सामाजिक विकास में माता-पिता का क्या योगदान होता है?
उत्तर:
बच्चे का पालन-पोषण परिवार में होता है। माता-पिता उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। वे उसके लिए भोजन, कपड़े व सुरक्षा आदि की व्यवस्था करते हैं। वे उसके मनोरंजन, खेलकूद व सामाजिक विकास संबंधी सभी जरूरतों को भी पूरा करते हैं। वे लड़का-लड़की दोनों के साथ समान व्यवहार करते हैं। वे परिवार में ऐसे वातावरण का निर्माण करते हैं जिसमें बच्चों का सर्वांगीण विकास हो। वे बच्चों की इच्छाओं की पूर्ति के प्रति सजग रहते हैं। अतः परिवार या माता-पिता का बच्चे के सामाजिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है।

प्रश्न 15.
किशोरावस्था की रुचियों का संक्षेप में उल्लेख करें।
उत्तर:
किशोरावस्था में किशोरों में अनेक रुचियों का तेजी से विकास होता है। इस अवस्था में लड़के सामूहिक खेल खेलने में रुचि रखते हैं; जैसे क्रिकेट, कबड्डी, हॉकी आदि। लड़कियाँ गीत, संगीत, नाटक, नृत्य आदि में रुचि रखती हैं। इनमें प्रदर्शन करने की भावना भी विकसित हो जाती है। लड़कियाँ शृंगार के सामान का अच्छी तरह से प्रयोग करने लगती हैं। वे विज्ञान, साहित्य, देश-प्रेम साहित्य, यौन साहित्य आदि को पढ़ने में रुचि रखते हैं। इनमें सिनेमा, टी०वी० देखने, फिल्मी गीत सुनने और घूमने-फिरने की आदत विकसित हो जाती है। वे सामाजिक कार्यों में भी रुचि लेने लगते हैं। लड़कियाँ अपनी सहेलियों से अपनी व्यक्तिगत समस्याओं से संबंधित वार्तालाप

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प्रश्न 16.
एक अच्छे नागरिक के कोई तीन वैधानिक कर्त्तव्य लिखें।
उत्तर:
एक अच्छे नागरिक के प्रमुख वैधानिक कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं-
1. कानून का पालन करना-इसके अन्तर्गत हमें कानून द्वारा दिए गए हर आदेशों का पालन करना चाहिए। कभी भी कानून के नियमों की उल्लंघना नहीं करनी चाहिए।
2. करों का भुगतान-हर नागरिक का यह परम कर्त्तव्य है कि वह अपने करों को पूरी ईमानदारी के साथ उसका भुगतान करे क्योंकि करों द्वारा इकट्ठी की गई राशि देश के विकास में खर्च की जाती है। सड़क बनाना, बिजली प्रदान करना तथा अन्य कई प्रकार की सुविधाएँ सरकार हमें इन्हीं करों के माध्यम से प्रदान करती है। इसलिए हर नागरिक को अपने करों का भुगतान करना चाहिए।
3. मत का उचित प्रयोग-मत ही आम नागरिक का एक ऐसा हथियार है जिसके द्वारा वह सरकार की काया पलट सकता है। हमें अपने मतों का प्रयोग अच्छी सरकार के चयन हेतु करना चाहिए। इसलिए मत का उचित प्रयोग हर नागरिक का परम कर्त्तव्य है।

प्रश्न 17.
एक अच्छे नागरिक के किन्हीं तीन नैतिक कर्तव्यों या उत्तरदायित्वों का वर्णन कीजिए। उत्तर:एक अच्छे नागरिक के तीन नैतिक कर्त्तव्य या उत्तरदायित्व निम्नलिखित प्रकार से हैं
1. परिवार के प्रति कर्त्तव्य-एक नागरिक का नैतिक तथा प्रमुख कर्त्तव्य उसके परिवार के प्रति है; जैसे कि शिशु पालन, बच्चों की देखभाल, शिक्षा प्रदान करना, सुरक्षा प्रदान करना, जीवन की मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति इत्यादि। इन कर्तव्यों का पालन करके एक नागरिक देश को विकास की तरफ ले जा सकता है।

2. समाज के प्रति कर्त्तव्य-एक नागरिक का नैतिक कर्त्तव्य समाज के प्रति बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसे अपने समाज के विरुद्ध कोई कार्य नहीं करना चाहिए। उसे समाज के साथ सहयोग, सहनशीलता, सद्भावना, आज्ञा पालन, अनुशासन में रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

3. मानवता के प्रति कर्त्तव्य-एक नागरिक को मानवता को ध्यान में रखकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। अपने फायदे के लिए मानव जाति को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। अक्सर हम अपने निजी फायदों के लिए मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों को भूल जाते हैं। जैसे कि लगातार जंगलों को अपने निजी फायदे के लिए काटते जा रहे हैं जिससे वातावरण दूषित हो रहा है। दूषित वातावरण मानव जीवन के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें मानवता के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चा

प्रश्न 18.
परिवार के कोई तीन गौण या द्वितीयक कार्य बताएँ।
उत्तर:
इन कार्यों को अधिक प्राथमिकता नहीं दी जाती, इसलिए इन्हें द्वितीयक या गौण कार्य कहा जाता है। समाज विशेष के अनुसार इन कार्यों में परिवर्तन होता रहता है।
1. आमोद-प्रमोद संबंधी कार्य-परिवार पारिवारिक सदस्यों के मनोरंजन या आमोद-प्रमोद हेतु कार्य करता है। इससे वे संतुष्टि व राहत महसूस करते हैं।
2. मनोवैज्ञानिक कार्य-परिवार सदस्यों को मानसिक सुरक्षा प्रदान करने का कार्य करता है। परिवार में सदस्यों का परस्पर प्रेम, सहानुभूति, त्याग, धैर्य आदि भावनाएँ देखने को मिलती हैं। परिवार में सदस्यों के संबंध पूर्ण व घुले-मिले होते हैं। इसलिए सदस्य सुख-दुःख आदि में एक-दूसरे को सहयोग देते हैं।
3. आर्थिक कार्य-परिवार अपने सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धन (आय) का प्रबंध करता है। परिवार की आय से ही उसकी गरीबी या अमीरी का आकलन किया जाता है। परिवार का मुखिया, आय को कैसे खर्च करना है, तय करता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक परिवार के पास अपनी चल तथा अचल संपत्ति; जैसे जमीन, सोना, गहने, नकद, पशु, दुकान आदि होती है। उसकी देखभाल एवं सुरक्षा परिवार के द्वारा की जाती है।

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प्रश्न 19.
“विवाह से पूर्व बच्चों के पालन-पोषण एवं देखभाल की जानकारी अत्यन्त आवश्यक है।” संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक परिवार या माता-पिता की खुशी, इच्छा व भविष्य बच्चों के साथ जुड़ा होता है। शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बच्चे ही देश के भविष्य को उज्ज्वल बना सकते हैं। बच्चों के पालन-पोषण व देखभाल का मूल उत्तरदायित्व माता-पिता का होता है जो उसके शारीरिक, मानसिक, नैतिक व व्यावहारिक विकास में अपना योगदान देते हैं। अतः विवाह से पूर्व बच्चों के पालन-पोषण एवं देखभाल की जानकारी अत्यन्त आवश्यक है। यह कथन निम्नलिखित तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है
(1) बच्चों को पालना बहुत कठिन कार्य है। यदि पहले ही बच्चों के पालन-पोषण व देखभाल की पूर्ण जानकारी प्राप्त की जाए तो यह कार्य आसान हो जाता है।
(2) बच्चों की आवश्यकताओं व इच्छाओं का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। इससे बच्चों के स्वास्थ्य का शुरू से ही ध्यान रखा जा सकता है।
(3) विवाह से पूर्व बच्चों का मनोविज्ञान अच्छे से समझ सकते हैं। बाद में इसकी सहायता से उनके लिए ऐसा वातावरण प्रदान कर सकते हैं जिसमें रहकर वे प्रसन्नता व खुशी महसूस कर सकें।
(4) बच्चों के उचित विकास हेतु हमें वंश व वातावरण संबंधी विशेष जानकारी मिल सकती है। ये दोनों पक्ष बच्चों के पालन पोषण व विकास के लिए बहुत आवश्यक होते हैं।
(5) शुरू में छोटे बच्चों को कई टीके की बूस्टर या खुराक निश्चित समय पर दी जाती है। इनसे बच्चे रोगों से बचे रहते हैं। यदि बच्चों को लगने वाले टीकों की पूर्ण जानकारी पहले से ही हो तो यह बूस्टर या खुराक बच्चों को निश्चित समय पर दी जा सकती है। इसमें देरी होने से या न लगवाने से बच्चे के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और उसकी रोग प्रतिरोधक शक्ति कम हो सकती है। इस प्रकार विवाह से पूर्व ही बच्चों के पालन-पोषण की पूर्ण जानकारी होने से हम बच्चे के सभी पक्षों व अवस्थाओं का उचित विकास कर सकते हैं।

प्रश्न 20.
किशोरों की ऊर्जा को उचित ढंग से प्रयोग करने में शारीरिक शिक्षा क्या भूमिका निभा सकती है ? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किशोरावस्था को तनाव, खिंचाव व परिवर्तन की अवस्था कहा जाता है। इस अवस्था में किशोरों में अनेक शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक परिवर्तन होते हैं जिनके कारण किशोर बेचैन व चिंतित रहते हैं। उनमें तीव्र उत्साह एवं व्याकुलता की भावना प्रबल होती है। वे हर कार्य को जल्दी-से-जल्दी करने के लिए व्याकुल रहते हैं और किसी प्रकार का कोई नियम नहीं मानते। परन्तु शारीरिक शिक्षा किशोरों की ऊर्जा को उचित ढंग से प्रयोग करने में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है
(1) शारीरिक शिक्षा खेलकूद व व्यायाम क्रियाओं पर बल देती है। किशोर खेलकूद व व्यायाम क्रियाओं के माध्यम से स्वयं को समायोजित कर सकते हैं और अपनी ऊर्जा या शक्ति का सही दिशा में इस्तेमाल कर सकते हैं। इस कार्य में शारीरिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। अतः खेलों में किशोरों की ऊर्जा का उचित इस्तेमाल हो जाता है।

(2) शारीरिक शिक्षा संबंधी खेल गतिविधियाँ नियमों में बंधी होती हैं। जब किशोर इन खेल गतिविधियों में भाग लेते हैं तो उन्हें इन नियमों का पालन करना पड़ता है। अतः किशोरों में भी सामाजिक जीवन में नियमों का पालन करने की आदत विकसित हो सकती है। वे अपनी ऊर्जा को अच्छे कार्यों की ओर लगाते हैं।

(3) योग व ध्यान शारीरिक शिक्षा के महत्त्वपूर्ण विषय हैं। योग एवं ध्यान से किशोरों का मानसिक संतुलन स्थापित होता है। योग एवं ध्यान उन्हें अपने मन को नियंत्रित करना सिखाता है।

(4) शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य एवं भोजन संबंधी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से किशोरों को अपने शरीर को स्वस्थ एवं तंदुरुस्त रखने हेतु महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

(5) शारीरिक शिक्षा के माध्यम से अनेक नैतिक व सामाजिक गुणों को विकसित किया है; जैसे-
(i) सकारात्मक क्रियाओं को प्रोत्साहित करना,
(ii) नकारात्मक क्रियाओं के लिए दंड देना,
(ii) न्याय व समानता को प्रोत्साहित करना,
(iv) सहयोगियों व दूसरों का आदर-सम्मान करना आदि।

ये सभी गुण किशोरों को बहुत प्रभावित करते हैं। अतः उनमें अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगाने की प्रेरणा आती है।

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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
परिवार का शाब्दिक अर्थ क्या है? अथवा परिवार का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
परिवार को अंग्रेज़ी भाषा में ‘Family’ कहते हैं। ‘Family’ शब्द लैटिन भाषा के ‘Famulus’ शब्द से निकला है। ‘Famulus’ शब्द का प्रयोग एक ऐसे समूह के लिए किया गया है जिसमें माता-पिता, बच्चे, नौकर एवं दास हों। परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो रक्त तथा वैवाहिक संबंध के कारण परस्पर जुड़े होते हैं।

प्रश्न 2.
परिवार की कोई दो परिभाषा लिखें। अथवा परिवार को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. मजूमदार के अनुसार, “परिवार व्यक्तियों का एक समूह है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं जो क्षेत्र, रुचि, आपसी बंधन और सूझ-बूझ के अनुसार केंद्रीय और खून के रिश्ते में बंधे होते हैं।”
2. क्लेयर के अनुसार, “परिवार से अभिप्राय उन संबंधों से है जो माता-पिता और बच्चों में विद्यमान होते हैं।”

प्रश्न 3.
रिवार की उत्पत्ति के आधार कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) स्त्री-पुरुष का आपसी प्रेम,
(2) संतान उत्पन्न करने की इच्छा,
(3) लंबी शैशवकाल की अवस्था,
(4) माता का बच्चे के लिए वात्सल्य,
(5) शिक्षा की व्यवस्था करना।

प्रश्न 4.
परिवार के उद्गम के बारे में अरस्तू के विचारों का उल्लेख करें।
उत्तर:
परिवार के उद्गम के बारे में अरस्तू ने कहा, “परिवार का जन्म अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है।”

प्रश्न 5.
पारिवारिक जीवन के आधारों या आवश्यकताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विवाह से परिवार की नींव बनती है और यहीं से पारिवारिक जीवन की शुरुआत होती है। उस जीवन को सुखद बनाने के लिए प्रारंभिक तैयारी एवं देखभाल की आवश्यकता पड़ती है; जैसे आवास की व्यवस्था, नियोजित परिवार, चिकित्सा परीक्षण, सहयोग की भावना तथा आर्थिक स्थिति आदि। ये सभी पारिवारिक जीवन के मुख्य आधार या आवश्यकताएँ हैं।

प्रश्न 6.
परिवार बच्चे के सांस्कृतिक विकास में कैसे सहायक है?
उत्तर:
परिवार बच्चों को समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को सौंपने का महत्त्वपूर्ण कार्य करता है। जिस परिवार में माता-पिता बच्चों के प्रति अपना सहयोगपूर्ण व दोस्तानापूर्ण व्यवहार करते हैं, उस परिवार के बच्चों में अनेक सांस्कृतिक-सामाजिक गुणों का विकास होता है; जैसे सहानुभूति, स्नेह, अनुकरण की भावना, सद्भाव, शिष्यचार और सहिष्णुता आदि। ये गुण बच्चे के सांस्कृतिक विकास में सहायक हैं।

प्रश्न 7.
परिवार के कोई दो आध्यात्मिक कार्य लिखिए।
उत्तर:
(1) परिवार बच्चों को महापुरुषों की जीवनियों से परिचित करवाकर उनमें आध्यात्मिक गुण विकसित करता है।
(2) परिवार बच्चों को सत्यम्-शिवम्-सुंदरम् जैसी बहुमूल्य भावना से परिचित करवाता है।

प्रश्न 8.
परिवार के कोई दो नागरिक कार्य लिखें।
उत्तर:
(1) परिवार बच्चों में अच्छे नागरिकों के गुण; जैसे सत्य, अहिंसा, ईमानदारी, अनुशासन, सहानुभूति, सहयोग की भावना, आज्ञा पालन आदि से परिचित करवाता है।
(2) परिवार बच्चों में रहन-सहन, बोलचाल, बड़ों का आदर करना, अतिथि सत्कार करना आदि गुणों का विकास करता है।

प्रश्न 9.
किशोरावस्था से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किशोरावस्था (Adolescence) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द ‘Adolesceker’ से हुई है जिसका अर्थ हैपरिपक्वता की ओर अग्रसर होना। यह अवस्था बाल्यावस्था के बाद और युवावस्था से पहले की अवस्था है जिसमें किशोरों में अनेक शारीरिक व मानसिक परिवर्तन होते हैं। प्राणी विज्ञान की दृष्टि से इस अवस्था को उत्पादन प्रक्रिया या प्रजनन की शुरुआत की अवस्था कहते हैं। आम भाषा में इसे परिवर्तन की अवस्था भी कहा जाता है।

प्रश्न 10.
किशोरावस्था की कोई दो परिभाषा लिखें। अथवा किशोरावस्था को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
1. स्टेनले हाल के अनुसार, “किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।”
2. जरसील्ड के अनुसार, “किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर बढ़ता है।”

प्रश्न 11.
किशोरों में कौन-कौन-से शारीरिक परिवर्तन होते हैं?
उत्तर:
किशोरावस्था में किशोरों में दो प्रकार के शारीरिक परिवर्तन होते हैं-आंतरिक एवं बाहरी । किशोरों की ऊँचाई में तेजी से परिवर्तन होते हैं। भार में भी पर्याप्त वृद्धि होती है। किशोरों की आवाज में बहुत परिवर्तन होता है। लड़कों की आवाज में भारीपन तथा लड़कियों की आवाज कोमल व सुरीली हो जाती है। इस अवस्था में हड्डियों का लचीलापन समाप्त होने लगता है।

प्रश्न 12.
किशोरों में कौन-कौन-से संवेगात्मक परिवर्तन आते हैं? ।
उत्तर:
किशोरावस्था में किशोरों में जिज्ञासा-प्रवृत्ति तीव्र हो जाती है। उनमें काल्पनिकता एवं भावुकता का पूर्ण विकास हो जाता है। उनमें विद्रोह की भावना तीव्र हो जाती है। वे छोटी-छोटी आवश्यकताओं की पूर्ति न होने के कारण माता-पिता से झगड़ पड़ते हैं। उनमें संवेगात्मक तनाव तीव्र हो जाता है। उनमें उपेक्षा के भावों के कारण विद्रोह व अपराध करने की प्रवृत्तियाँ भी अधिक विकसित होने लगती हैं। इस अवस्था में उनका अपने संवेगों पर नियंत्रण नहीं रहता। वे छोटी-छोटी बातों से भी अपना भावात्मक संतुलन खो देते हैं।

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प्रश्न 13.
किशोरावस्था की समस्याओं को सूचीबद्ध कीजिए।
अथवा
किशोरावस्था की कोई चार समस्याएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) शारीरिक व मानसिक समस्याएँ,
(2) आक्रामक व्यवहार की समस्या,
(3) भावनात्मक समस्याएँ,
(4) व्यवसाय संबंधी समस्या,
(5) विषय चयन संबंधी समस्या,
(6) यौन संबंधी समस्याएँ,
(7) सामंजस्य व स्थिरता की कमी आदि।

प्रश्न 14.
वैवाहिक जीवन की तैयारी के बारे में लिखें।
उत्तर:
विवाह परिवार का आधार स्तंभ है। इससे पारिवारिक जीवन की शुरुआत होती है। वैवाहिक जीवन वास्तव में सुख-दुःख का मिश्रण है । विवाह के उपरांत पति-पत्नी को कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यदि बालिग लड़का-लड़की स्वयं को विवाह के लिए अच्छे से तैयार कर लें तो वैवाहिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान भी आसानी से किया जा सकता है। अतः वैवाहिक जीवन को आनन्दमयी एवं सुखमय बनाने के लिए विशेष तैयारी की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 15.
आप किशोरों को सफलता की ओर कैसे मार्गदर्शित कर सकते हैं?
उत्तर:
किशोरावस्था तनावपूर्ण एवं परिवर्तन की अवस्था होती है। इस अवस्था में किशोरों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि हमारे द्वारा उन्हें उचित प्रशिक्षण अर्थात् उनकी भावनाओं व विचारों का आदर किया जाए, व्यवसाय हेतु उनका उचित पथ प्रदर्शन किया जाए, उनके साथ अच्छा व्यवहार किया जाए तो वे सफलता की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

प्रश्न 16.
किशोरावस्था के बालक/बालिकाओं की क्या आवश्यकताएँ हैं?
अथवा
किशोरों की मुख्य मांगों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
किशोरावस्था के बालकों की आवश्यकताएँ (माँगें) हैं-
(1) स्वतंत्रता,
(2) आत्मनिर्भरता,
(3) व्यावसायिक चयन संबंधी स्वेच्छा,
(4) शैक्षिक सुविधाएँ,
(5) आर्थिक सुविधाएँ,
(6) माता-पिता का स्नेह,
(7) फैशनपरस्ती।

प्रश्न 17.
विवाह/शादी क्या है?
अथवा
विवाह को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
विवाह या शादी से परिवार की नींव बनती है और यहीं से पारिवारिक जीवन प्रारंभ होता है। यह एक ऐसी सामाजिक संरचना है जिसमें स्त्री-पुरुष कानूनी रूप से इकट्ठे रहते हैं और पारिवारिक जीवन की शुरुआत करते हैं।
1. होर्टन व हंट के अनुसार, “विवाह एक सामाजिक मान्यता है जिसके द्वारा दो या दो से अधिक परिवार के सदस्यों का संबंध स्थापित होता है।”
2. मैलिनोस्वास्की के अनुसार, “विवाह एक ऐसा समझौता है जिसमें बच्चों को पैदा करना और उनकी देखभाल करना है।” प

प्रश्न 18.
माता-पिता को अपने बच्चों से कैसा व्यवहार करना चाहिए?
उत्तर:
माता-पिता को अपने बच्चों से अच्छा व्यवहार करना चाहिए। बच्चों द्वारा गलती करने पर उन्हें प्यार से समझाना चाहिए। उनकी सभी मूल आवश्यकताओं एवं इच्छाओं की पूर्ति करनी चाहिए। माता-पिता को उनके संवेगों को अच्छे से समझना चाहिए। बच्चों से माता-पिता का व्यवहार धैर्यमय एवं शांतिमय होना चाहिए।

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प्रश्न 19.
सफल विवाहित जीवन की क्या जरूरतें हैं?
उत्तर:
सफल विवाहित जीवन के लिए सबसे जरूरी बात दंपति में आपसी समझदारी होनी चाहिए। उन्हें एक-दूसरे पर पूर्ण विश्वास होना चाहिए। उनमें एक-दूसरे के प्रति अपने उत्तरदायित्व का पूर्ण अहसास होना चाहिए। उनमें सहयोग की भावना भी होनी चाहिए। परिवार की सभी आवश्यक जरूरतें पूरी होनी चाहिएँ।

प्रश्न 20.
नागरिक को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
अरस्तू के अनुसार, “जिस व्यक्ति विशेष के पास राज्य की समीक्षा अथवा न्यास संबंधी प्रशासन में भाग लेने की शक्ति है, वही उस राज्य का नागरिक कहलाता है।”

प्रश्न 21.
महात्मा गाँधी जी के अनुसार एक अच्छे नागरिक में क्या गुण होने चाहिएँ? .
उत्तर:
एक अच्छे नागरिक में सत्य, अहिंसा एवं निर्भीकता के गुण होने चाहिएँ, ताकि वह एक उच्च एवं अच्छे समाज की स्थापना कर सके। उसमें सद्भावना, आपसी प्रेम, देश-भक्ति और साहस के गुण भी होने चाहिएँ।

प्रश्न 22.
समान अधिकार क्या होता है?
उत्तर:
प्रत्येक समाज या परिवार अपने नागरिकों या सदस्यों को कर्तव्यों के साथ-साथ कुछ अधिकार या सुविधाएँ भी प्रदान करता है। नागरिकों या सदस्यों का कर्त्तव्य होता है कि वे इन अधिकारों को समझने का प्रयास करें। परिवार का भी परम कर्त्तव्य है कि वह परिवार के प्रत्येक सदस्य को समान अधिकार प्रदान करे, जैसे निवास स्थान पर हर सदस्य का समान अधिकार होना चाहिए।

प्रश्न 23.
वंशावली (Geneology) से क्या भाव है?
उत्तर:
वंशावली जिसे पारिवारिक इतिहास भी कहा जाता है, में परिवारों का अध्ययन तथा वंश व इतिहास का पता लगाया जाता है। राज्य एवं समाज वंशावली को मान्यता देता है। भविष्य में कोई भी परिवार वंश के नाम से ही जाना जाता है।

प्रश्न 24.
संयुक्त जिम्मेदारी (Joint Responsibility) क्या होती है?
उत्तर:
संयुक्त जिम्मेदारी से अभिप्राय परिवार के प्रत्येक सदस्य का घर के किसी काम के प्रति सामूहिक दायित्व से होता है। परिवार के सभी सदस्यों में एक-दूसरे की आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संयुक्त जिम्मेदारी होनी चाहिए। सभी पारिवारिक सदस्यों को मिलजुल कर काम करना चाहिए और अपने-अपने दायित्व को निभाना चाहिए।

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प्रश्न 25.
किशोरावस्था के मानसिक विकास की कोई तीन विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) स्मरण-शक्ति व कल्पना-शक्ति का तीव्र विकास,
(2) तर्क-शक्ति व चिंतन-शक्ति का विकास,
(3) प्रदर्शन या मुकाबले की भावना का विकास।

प्रश्न 26.
किशोरावस्था के सामाजिक विकास की कोई तीन विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) रुचियों व अभिरुचियों की भावना,
(2) सामाजिक वातावरण के प्रति जागरूकता,
(3) विपरीत लिंग से संबंधित चर्चा एवं साहित्य में अधिक रुचि रखना।

प्रश्न 27.
परिवार के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिवार मुख्यत: दो प्रकार के होते हैं
1. व्यक्तिगत या एकल परिवार-व्यक्तिगत या एकल परिवार को प्राथमिक, मूल अथवा नाभिक परिवार भी कहते हैं। यह परिवार का सबसे छोटा और आधारभूत स्वरूप है जिसमें सदस्यों की संख्या बहुत कम होती है। आमतौर पर पति-पत्नी तथा उसके अविवाहित बच्चे ही इस परिवार के सदस्य होते हैं। ऐसे परिवार में सदस्य भावात्मक आधार पर एक-दूसरे से घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं।

2. संयुक्त परिवार-संयुक्त परिवार में तीन या तीन से अधिक पीढ़ियों के सदस्य; जैसे पति-पत्नी, उनके बच्चे, दादा-दादी, चाचा-चाची, आदि साथ-साथ एक घर में निवास करते हैं, उनकी संपत्ति सांझी होती है। संयुक्त परिवार के सदस्य परस्पर अधिकारों व कर्तव्यों को निभाते हैं।

HBSE 12th Class Physical Education पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I: एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
भारतीय साहित्य में बच्चे का प्रथम गुरु किसे माना गया है?
उत्तर:
भारतीय साहित्य में बच्चे का प्रथम गुरु माता को माना गया है।

प्रश्न 2.
नियोजित परिवार का क्या लाभ है?
उत्तर:
नियोजित परिवार में परिवार के सभी सदस्य आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से खुशहाल एवं प्रसन्न रहते हैं।

प्रश्न 3.
किस अवस्था को साज-श्रृंगार की आयु’ कहा जाता है?
उत्तर:
किशोरावस्था को ‘साज-शृंगार की आयु’ कहा जाता है।

प्रश्न 4.
क्लेयर के अनुसार परिवार क्या है?
उत्तर:
क्लेयर के अनुसार, “परिवार से अभिप्राय उन संबंधों से है जो माता-पिता और बच्चों में मौजूद होते हैं।”

प्रश्न 5.
परिवार क्या है?
उत्तर:
परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो रक्त तथा वैवाहिक संबंध के कारण परस्पर जुड़े होते हैं।

प्रश्न 6.
परिवार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
परिवार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं।

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प्रश्न 7.
परिवार क्या सिखाता है?
उत्तर:
परिवार सामाजिकता का पाठ सिखाता है।

प्रश्न 8.
एकल परिवार (Single Family) क्या है?
उत्तर:
वह परिवार जिसमें माता-पिता और उनके अविवाहित बच्चे रहते हों, एकल परिवार कहलाता है।

प्रश्न 9.
संयुक्त परिवार (Joint Family) क्या है?
उत्तर:
वह परिवार जिसमें दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची और उनके बच्चे एक साथ रहते हैं, संयुक्त परिवार कहलाता है।

प्रश्न 10.
शैशवकाल/बाल्यावस्था के बाद तथा युवावस्था से पहले की अवस्था क्या कहलाती है?
उत्तर:
किशोरावस्था।

प्रश्न 11.
लड़कों की किशोरावस्था कब-से-कब तक होती है?
उत्तर:
लड़कों की किशोरावस्था लगभग 13 वर्ष से 18 वर्ष तक होती है।

प्रश्न 12.
लड़कियों की किशोरावस्था कब-से-कब तक होती है?
उत्तर:
लड़कियों की किशोरावस्था लगभग 12 वर्ष से 16 वर्ष तक होती है।

प्रश्न 13.
तनावपूर्ण व परिवर्तन की अवस्था किसे कहा जाता है?
उत्तर:
तनावपूर्ण व परिवर्तन की अवस्था किशोरावस्था को कहा जाता है।

प्रश्न 14.
कौन-सा सामजिक संगठन बच्चों के मानसिक विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
परिवार बच्चों के मानसिक विकास में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है।

प्रश्न 15.
परिवार के दो कार्य बताएँ।
उत्तर:
(1) बच्चों का पालन-पोषण करना, (2) सुरक्षा प्रदान करना।

प्रश्न 16.
परिवार के कोई दो आमोद-प्रमोद संबंधी कार्य बताएँ।
उत्तर:
(1) पार्क आदि में घुमाने ले जाना,
(2) सिनेमा या सर्कस आदि दिखाने ले जाना।

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प्रश्न 17.
शिशु के जीवन के कौन-से वर्ष सबसे अधिक लचीले होते हैं?
उत्तर:
शिशु के जीवन के प्रारंभिक पाँच वर्ष सबसे अधिक लचीले होते हैं।

प्रश्न 18.
किशोरावस्था में लड़कों में होने वाले कोई दो शारीरिक परिवर्तन बताइए।
उत्तर:
(1) दाढ़ी-मूंछ आना,
(2) आवाज का भारी होना।

प्रश्न 19.
किस अवस्था में स्मरण व तर्क शक्ति अधिक विकसित होती है?
उत्तर:
किशोरावस्था में स्मरण व तर्क शक्ति अधिक विकसित होती है।

प्रश्न 20.
भारत में विवाह के लिए लड़के-लड़कियों की आयु क्या निर्धारित की गई है?
उत्तर:
भारत में विवाह के लिए लड़के की 21 वर्ष तथा लड़कियों की 18 वर्ष आयु निर्धारित की गई है।

प्रश्न 21.
जरसील्ड के अनुसार किशोरावस्था क्या है?
उत्तर:
जरसील्ड के अनुसार, “किशोरावस्था वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाल्यावस्था से परिपक्वता की ओर बढ़ता है।”

प्रश्न 22.
किशोरावस्था का समय कैसा होता है?
उत्तर:
किशोरावस्था का समय तनावपूर्ण होता है।

प्रश्न 23.
गर्भावस्था में मदिरापान से होने वाली एक हानि बताइए।
उत्तर:
शारीरिक एवं मानसिक कमजोरी।

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प्रश्न 24.
एडोलसेकर का क्या अर्थ है?
उत्तर:
परिपक्वता की ओर अग्रसर होना।

प्रश्न 25.
बच्चे की प्रथम पाठशाला किसे कहते हैं?
उत्तर:
बच्चे की प्रथम पाठशाला परिवार को कहते हैं।

प्रश्न 26.
“शिशु का पालन-पोषण करो, बच्चों को सुरक्षा दो और वयस्क को स्वतंत्र कर दो।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन एडम स्मिथ का है।

प्रश्न 27.
12 से 18 वर्ष की अवस्था को क्या कहा जाता है?
उत्तर:
12 से 18 वर्ष की अवस्था को किशोरावस्था कहा जाता है।

प्रश्न 28.
किस भाषा में परिवार को फैम्युलस (Famulus) कहा जाता है?
उत्तर:
रोमन भाषा में।

प्रश्न 29.
परिवार की कोई एक विशेषता लिखें।
उत्तर:
परिवार एक सर्वव्यापक सामाजिक संगठन होता है।

प्रश्न 30.
फेमिली (Family) शब्द की उत्पत्ति किस रोमन शब्द से हुई?
उत्तर:
फेमिली शब्द की उत्पत्ति ‘फैम्युलस’ शब्द से हुई।

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प्रश्न 31.
ग्रीक भाषा में परिवार को क्या कहते हैं?
उत्तर:
ग्रीक भाषा में परिवार को एकोनोमिया कहते हैं।

प्रश्न 32.
“किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान और विरोध की अवस्था है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन स्टेनले हाल का है।

प्रश्न 33.
कन्फ्यूशियस के अनुसार, मनुष्य राज्य के सदस्य से पहले किसका सदस्य है?
उत्तर:
कन्फ्यूशियस के अनुसार, मनुष्य राज्य के सदस्य से पहले परिवार का सदस्य है।

प्रश्न 34.
बच्चे का प्रथम गुरु कौन है?
उत्तर:
बच्चे का प्रथम गुरु माता है।

प्रश्न 35.
बच्चे की किस अवस्था में मानसिक विकास हेतु उचित परामर्श की आवश्यकता होती है?
उत्तर:
बच्चे की किशोरावस्था में मानसिक विकास हेतु उचित परामर्श की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 36.
बच्चों में विद्रोह एवं मुकाबले की भावना किस अवस्था में सर्वाधिक होती है?
उत्तर:
बच्चों में विद्रोह एवं मुकाबले की भावना किशोरावस्था में सर्वाधिक होती है।

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भाग-II : सही विकल्प का चयन करें

1. फेमिली (Family) शब्द की उत्पत्ति किस रोमन शब्द से हुई?
(A) फेमिलिआ
(B) फैम्युलस
(C) एकोनोमिया
(D) इको
उत्तर:
(B) फैम्युलस

2. ग्रीक भाषा में परिवार को क्या कहते हैं?
(A) फेमिलिआ
(B) फैम्युलस
(C) एकोनोमिया
(D) इको
उत्तर:
(C) एकोनोमिया

3. लैटिन भाषा में परिवार को क्या कहा जाता है?
(A) फेमिलिआ
(B) फैम्युलस
(C) एकोनोमिया
(D) इको
उत्तर:
(A) फेमिलिआ

4. भारत में विवाह के लिए लड़कियों की आयु निर्धारित की गई है
(A) 21 वर्ष
(B) 18 वर्ष
(C) 26 वर्ष
(D) 24 वर्ष
उत्तर:
(B) 18 वर्ष

5. “किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान और विरोध की अवस्था है।” यह कथन है
(A) रॉस का
(B) स्टेनले हाल का
(C) मैजिनी का
(D) एडम स्मिथ का
उत्तर:
(B) स्टेनले हाल का

6. ‘फैम्युलस’ शब्द का अर्थ है
(A) नौकर या दास
(B) माता-पिता
(C) श्रमिक
(D) बच्चे
उत्तर:
(A) नौकर या दास

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7. ‘फेमिलिआ’ शब्द का अर्थ है
(A) माता-पिता
(B) बच्चे
(C) श्रमिक और गुलाम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के अनुसार, एक अच्छे नागरिक में अच्छे समाज के निर्माण के लिए गुण होने चाहिएँ
(A) सत्य
(B) अहिंसा
(C) निर्भीकता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

9. किस अवस्था को साज-श्रृंगार की अवस्था कहा जाता है?
(A) बाल्यावस्था
(B) शैशवावस्था
(C) किशोरावस्था
(D) युवावस्था
उत्तर:
(C) किशोरावस्था

10. कन्फ्यूशियस के अनुसार, “मनुष्य राज्य के सदस्य के पहले सदस्य है”-
(A) देश का
(B) समाज का
(C) गाँव का
(D) परिवार का
उत्तर:
(D) परिवार का

11. परिवार मार्ग प्रशस्त करता है
(A) उन्नति का
(B) समृद्धि का
(C) सामाजीकरण का
(D) परिवार का
उत्तर:
(C) सामाजीकरण का

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12. “शिशु का पालन-पोषण करो, बच्चों को सुरक्षा दो और वयस्क को स्वतंत्र कर दो।” यह कथन है
(A) एडम स्मिथ का
(B) मैजिनी का
(C) रॉस का
(D) महात्मा गाँधी का
उत्तर:
(A) एडम स्मिथ का

13. पारिवारिक जीवन का आरंभ होता है
(A) जन्म से
(B) विवाह से
(C) पढ़ाई से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) विवाह से

14. किशोरावस्था का अर्थ है
(A) परिपक्वता की ओर बढ़ना
(B) बाल्यावस्था से युवावस्था की ओर बढ़ना
(C) शिशु-अवस्था से बाल्यावस्था की ओर बढ़ना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) परिपक्वता की ओर बढ़ना

15. निम्नलिखित में से किसमें परिवार के सभी सदस्य आर्थिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से खुशहाल एवं सुखी रहते हैं?
(A) एकल परिवार में
(B) संयुक्त परिवार में
(C) नियोजित परिवार में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) नियोजित परिवार में

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16. जो संबंध माता-पिता और बच्चों में होता है, उसे कहते हैं-
(A) परिवार
(B) घर
(C) समाज
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) परिवार

17. परिवार की विशेषता है
(A) सार्वभौमिक
(B) स्थायी संस्था
(C) लैंगिक संबंध
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

18. विवाह की बुनियादी आवश्यकता है
(A) घर का प्रबंध
(B) बच्चों का पालन-पोषण
(C) प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

19. “बच्चा नागरिकता का प्रथम पाठ माता के चुम्बन और पिता के दुलार से सीखता है।” यह कथन है
(A) एडम स्मिथ का
(B) महात्मा गाँधी का
(C) मैजिनी का
(D) मॉण्टगुमरी का
उत्तर:
(C) मैजिनी का

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20. निम्नलिखित में से परिवार का मूलभूत कार्य है
(A) बच्चों का पालन-पोषण करना
(B) उचित शिक्षा देना
(C) वस्त्र एवं आवास की व्यवस्था करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. किशोरों की समस्याओं के निवारण हेतु उपाय है
(A) नैतिक एवं धार्मिक शिक्षा
(B) लिंग शिक्षा
(C) मनोविज्ञान एवं व्यावसायिक शिक्षा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

22. “परिवार एक मौलिक सामाजिक संस्था है, जिससे अन्य सभी संस्थाओं का विकास होता है।” यह कथन है
(A) स्टेनले हाल का
(B) एडम स्मिथ का
(C) बैलार्ड का
(D) अरस्तू का
उत्तर:
(C) बैलार्ड का

23. बच्चे की किस अवस्था में मानसिक विकास हेतु उचित परामर्श की आवश्यकता होती है?
(A) शैशवावस्था में
(B) युवावस्था में
(C) किशोरावस्था में
(D) प्रौढ़ावस्था में
उत्तर:
(C) किशोरावस्था में

24. ‘Adolescence’ किस भाषा के शब्द से बना है?
(A) अंग्रेज़ी भाषा
(B) लैटिन भाषा
(C) फ्रैंच भाषा
(D) ग्रीक भाषा
उत्तर:
(B) लैटिन भाषा

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25. उन व्यक्तियों का समूह, जो रक्त एवं वैवाहिक संबंधों के कारण परस्पर जुड़े होते हैं, क्या कहलाता है?
(A) जाति
(B) समाज
(C) समूह
(D) परिवार
उत्तर:
(D) परिवार

26. सामाजिक संगठनों का आधार है
(A) शादी
(B) परिवार
(C) समाज
(D) जाति
उत्तर:
(B) परिवार

27. भारतीय साहित्य में बच्चे का प्रथम गुरु किसे माना गया है?
(A) माता को
(B) पिता को
(C) शिक्षक को
(D) समाज को
उत्तर:
(A) माता को

28. अर्थशास्त्र का पिता किसे कहा जाता है?
(A) एडम स्मिथ को
(B) बील्स को
(C) मॉर्गन को
(D) कीट्स को
उत्तर:
(A) एडम स्मिथ को

29. “परिवार का जन्म अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है।” यह कथन किसका है?
(A) स्टेनले हॉल का
(B) अरस्तू का
(C) बैलार्ड का
(D) क्लेयर का
उत्तर:
(B) अरस्तू का

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30. किशोरावस्था ………… की ओर बढ़ने की अवस्था है।
(A) परिपक्वता
(B) अपरिपक्वता
(C) असमायोजन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) परिपक्वता

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. लड़कों में किशोरावस्था ………….. से …………… तक होती है।
2. भारत में विवाह के लिए लड़कियों की आयु ………….. वर्ष निर्धारित की गई है।
3. “परिवार का जन्म अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है।” यह कथन ……………….. ने कहा।
4. …………….. के अनुसार सत्य, अहिंसा एवं निर्भीकता एक अच्छे नागरिक के गुण हैं।
5. परिवार मानवीय समाज की ……………….. इकाई है।
6. मैकाइवर के अनुसार परिवार ……………….. होना चाहिए।
7. परिवार की उत्पत्ति का आधार …………… है।
8. किशोरावस्था की मुख्य माँग ……………….. है।
9. शैशवकाल या बाल्यावस्था के बाद तथा युवावस्था से पहले की अवस्था को …… कहते हैं।
10. किशोरावस्था ……………….. की ओर बढ़ने की अवस्था है।
11. परिवार को सामाजिक गुणों का ……………… कहा जाता है।
12. अंग्रेज़ी में किशोरों को ………………. कहा जाता है।
उत्तर:
1. 13, 18,
2. 18,
3. अरस्तू,
4. महात्मा गाँधी,
5. मौलिक,
6. छोटा व स्थायी,
7. विवाह,
8. स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता,
9. किशोरावस्था,
10. परिपक्वता,
11. पालना,
12. टीनेजर्स (Teenagers)।

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पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा Summary

पारिवारिक जीवन संबंधी शिक्षा परिचय

परिवार (Family):
परिवार की उत्पत्ति कब हुई? इस संदर्भ में कोई निश्चित समय अथवा काल नहीं बताया जा सकता, पर इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जैसे-जैसे आवश्यकताओं की बढ़ोतरी हुई, वैसे-वैसे परिवार का विकास हुआ। परिवार की उत्पत्ति के विषय में अरस्तू जैसे विद्वान् ने कहा था कि परिवार का जन्म अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु हुआ है। परिवार एक ऐसा स्थायी संगठन है जिसके अंतर्गत पति-पत्नी एवं उनके बच्चे तथा अन्य सदस्य आ जाते हैं जो उत्तरदायित्व व स्नेह की भावना से परस्पर बंधे रहते हैं। बैलार्ड (Ballard) के अनुसार, “परिवार एक मौलिक सामाजिक संस्था है, जिससे अन्य सभी संस्थाओं का विकास होता है।”

मानव-जीवन में परिवार का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। परिवार मानव की आज तक सेवा करता रहा है और कर रहा है, जो किसी अन्य संस्था या समिति द्वारा संभव नहीं है। परिवार बच्चों व अन्य सदस्यों के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करता है; जैसे-
(1) पालन-पोषण करना
(2) आहार उपलब्ध करवाना
(3) सुरक्षा करना
(4) स्वास्थ्य का ध्यान रखना
(5) कपड़े एवं आवास की व्यवस्था करना
(6) आर्थिक व धार्मिक कार्यों की पूर्ति करना आदि।

किशोरावस्था (Adolescence):
किशोरावस्था में शारीरिक वृद्धि और विकास तीव्र गति से होता है। यह वह अवस्था है जो बाल्यावस्था के बाद तथा युवावस्था से पहले शुरू होती है। प्राणी विज्ञान की दृष्टि से इस अवस्था को उत्पादन प्रक्रिया अथवा प्रजनन की शुरुआत कहते हैं। साधारण भाषा में, किशोरावस्था को परिवर्तन की अवस्था भी कहा जा सकता है, क्योंकि इसमें शारीरिक, मानसिक व संवेगात्मक परिवर्तन तीव्र गति से होते हैं। स्टेनले हाल (Stanley Hall) के अनुसार, “किशोरावस्था तीव्र दबाव एवं तनाव, तूफान एवं विरोध की अवस्था है।”

विवाह तथा पारिवारिक जीवन के लिए तैयारी (Preparation for Marriage and Family Life):
विवाह से परिवार की नींव बनती है और यहीं से पारिवारिक जीवन की शुरुआत होती है। यह एक ऐसी सामाजिक संरचना है जिसमें स्त्री-पुरुष कानूनी रूप से इकट्ठे होते हैं और पारिवारिक जीवन की शुरुआत करते हैं। इस जीवन को सुखद बनाने के लिए प्रारंभिक तैयारियों तथा देखभाल की आवश्यकता पड़ती है, क्योंकि पारिवारिक जीवन सुखद लगने पर भी अनेक समस्याओं से घिरा रहता है जिनका समाधान करने से ही विवाहित और पारिवारिक जीवन भली-भाँति आगे बढ़ सकता है।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

HBSE 12th Class Physical Education शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र से आप क्या समझते हैं? शारीरिक शिक्षा व खेलों में इसके महत्त्व का उल्लेख करें।
अथवा
समाजशास्त्र को परिभाषित कीजिए।शारीरिक शिक्षा एवं खेलों में समाजशास्त्र की महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
समाजशास्त्र का अर्थ स्पष्ट कीजिए। शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद के क्षेत्र में इसके महत्त्व का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य सामाजिक प्राणी होने के कारण समाज में रहता है, क्योंकि मनुष्य के दिमाग में समाज की कल्पना बहुत पहले से ही रही होगी, इसलिए समाजशास्त्र की कल्पना और रचना भी बहुत पहले ही हो चुकी होगी, परंतु एक सामाजिक विज्ञान के रूप में समाजशास्त्र की उत्पत्ति 1838 ई० में ऑगस्ट कॉम्टे (Auguste Comte) के द्वारा की गई। इसी कारण ऑगस्ट कॉम्टे को ‘समाजशास्त्र का पिता’ कहा जाता है। आज समाजशास्त्र को एक नया विकासशील सामाजिक विज्ञान माना जाता है। मिचेल (Mitchell) ने, “समाजशास्त्र को चिंतनशील जगत् का बच्चा माना है।” इसके बाद सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित अध्ययन करने वाले विज्ञान को समाजशास्त्र के नाम से ही संबोधित किया जाने लगा।

समाजशास्त्र का शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning of Sociology):
‘समाजशास्त्र’ शब्द अंग्रेजी भाषा के ‘Sociology’ शब्द का हिंदी रूपांतरण है। ‘Sociology’ शब्द लैटिन भाषा के ‘Socius’ और ग्रीक (Greek) भाषा के ‘Logos’ शब्दों से मिलकर बना है। इन दोनों का अर्थ क्रमशः समाज व विज्ञान या शास्त्र है अर्थात् समाजशास्त्र समाज का विज्ञान है । ‘Socius’ और ‘Logos’ दो भाषाओं के शब्द होने के कारण ही संभवतः प्रो० बीरस्टीड ने समाजशास्त्र को दो भाषाओं की अवैध संतान माना होगा।

समाजशास्त्र की परिभाषाएँ (Definitions of Sociology):
1. विद्वानों ने समाजशास्त्र की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं1. आई० एफ० वार्ड (I. F. Ward) के अनुसार, “समाजशास्त्र, समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
2. मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक संबंधों के विषय में है, संबंधों के इसी जाल को हम समाज कहते हैं।”
3. गिलिन व गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “व्यक्तियों के एक-दूसरे के संपर्क में आने के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली अंतःक्रियाओं के अध्ययन को ही समाजशास्त्र कहा जा सकता है।” 4. गिन्सबर्ग (Ginesbarg) ने कहा है, “समाजशास्त्र मानवीय अंतःक्रियाओं तथा अंतर्संबंधों, उनके कारणों और परिणामों का अध्ययन है।”
5. जॉनसन (Johnson) का कथन है, “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का विज्ञान है-सामाजिक समूह सामाजिक अंतःक्रियाओं की ही एक व्यवस्था है।”
6. मैक्स वेबर (Max Weber) के शब्दों में, “समाजशास्त्र वह विज्ञान है जो सामाजिक क्रियाओं का व्याख्यात्मक बोध करवाता है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि ‘समाजशास्त्र’ एक ऐसा विषय है जो समाज का वैज्ञानिक अध्ययन या चिंतन करता है। यह समाज में मानवीय व्यवहार का भी चिंतन करता है।

शारीरिक शिक्षा एवं खेलों में समाजशास्त्र की महत्ता (Importance of Sociology in Physical Education and Sports):
खेल समाज का दर्पण कहलाती हैं। वर्तमान समय में किसी देश या राष्ट्र की सर्वोच्चता उसके द्वारा ओलंपिक तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों में जीते गए पदकों में झलकती है। इसी कारण भारत सहित प्रत्येक देश अधिकतम संख्या में पदक जीतने की होड़ में शामिल हैं। समाजशास्त्र की शारीरिक शिक्षा तथा खेलों में महत्ता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) समाजशास्त्र शारीरिक शिक्षा तथा खेलों का वैज्ञानिक अध्ययन करने में सहायक है। चूँकि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है और शारीरिक शिक्षा और खेल समाज के अभिन्न अंग हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं। इसलिए हम समाजशास्त्र में अपनाए गए वैज्ञानिक साधनों तथा ढंगों की सहायता इनको समझने हेतु ले सकते हैं।

(2) यह शारीरिक शिक्षा तथा खेलों को समाज की एक महत्त्वपूर्ण संस्था के रूप में अध्ययन करने में सहायता करता है। आधुनिक समय में खेलें संस्थागत बन गई हैं जो समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

(3) यह शारीरिक शिक्षा तथा खेलों द्वारा समाज को दी गई नई दिशा के योगदान को समझने में हमारी सहायता करता है। चूंकि यह समाज की समझ तथा नियोजन से संबंधित है।

(4) यह व्यक्ति की महिमा तथा गरिमा से संबंधित है और शारीरिक शिक्षा तथा खेल व्यक्ति की महिमा तथा गरिमा में वृद्धि करने के यंत्र हैं।

(5) यह शारीरिक शिक्षा तथा खेलों द्वारा बच्चों की समस्याओं तथा खिलाड़ियों की अनियमितताओं को दूर करने में सहायता करता है।

(6) समाजशास्त्र मानवता या समाज की सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन को समझने में मदद करता है।

(7) शारीरिक शिक्षा तथा खेल समाजशास्त्र से बहुत-से शिक्षाप्रद साधन तथा ढंग ग्रहण करती हैं ताकि उनका प्रयोग समाज के हित के लिए किया जाए।

(8) यह सामूहिक मनोबल तथा सामूहिक एकता को बढ़ाने में सहायक होता है जिससे खेलों में मदद मिलती है।

(9) यह सामाजिक गुणों; जैसे ईमानदारी, आत्म-संयम, सहनशीलता, सद्भाव आदि को विकसित करने में सहायक होता है। इन गुणों का खेल के क्षेत्र में विशेष महत्त्व है।

(10) यह उचित मार्गदर्शन प्रदान करने में भी हमारी मदद करता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 2.
सामाजीकरण क्या है? शारीरिक शिक्षा की सामाजीकरण की प्रक्रिया में क्या उपयोगिता है?
अथवा
सामाजीकरण को परिभाषित करें। शारीरिक शिक्षा व खेलों में सामाजीकरण के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सामाजीकरण का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Socialization):
सामाजीकरण एक ऐसी धारणा है जिससे व्यक्ति अपने समुदाय या वर्ण का सदस्य बनकर उसकी परंपराओं व कर्तव्यों का पालन करता है। वह स्वयं को सामाजिक वातावरण के अनुरूप ढालना सीखता है। सामाजीकरण की प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति सामाजिक व्यवहारों को स्वीकार करता है और उनसे अनुकूलन करना भी सीखता है। विभिन्न विद्वानों ने सामाजीकरण की निम्नलिखित परिभाषाएँ दी हैं

1.गिलिन व गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “सामाजीकरण से हमारा तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जिसके द्वारा व्यक्ति समूह में एक क्रियाशील सदस्य बनता है, समूह की कार्य-विधियों से समन्वय स्थापित करता है, इसकी परंपराओं का ध्यान रखता है और सामाजिक परिस्थितियों से अनुकूलन करके अपने साथियों के प्रति सहनशक्ति की भावना को विकसित करता है।”

2. प्रो० ए० डब्ल्यू० ग्रीन (Prof. A. W. Green) के अनुसार, “सामाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति सांस्कृतिक विशेषताओं और आत्म-व्यक्तित्व को प्राप्त करता है।”

3. जॉनसन (Johnson) के अनुसार, “सामाजीकरण एक प्रकार की शिक्षा है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने के योग्य बना देती है।”

4. अरस्तू (Aristotle) के अनुसार, “सामाजीकरण संस्कृति के बचाव के लिए सामाजिक मूल्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं से स्पष्ट होता है कि सामाजीकरण की प्रक्रिया महत्त्वपूर्ण तीन पक्षों पर आधारित है-
(1) जीव रचना (Organism),
(2) व्यक्ति (Human Being),
(3) समाज (Society)।

शारीरिक शिक्षा व खेलों में सामाजीकरण का महत्त्व (Importance of Socialization in Physical Education and Sports):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, क्योंकि वह जीवन-भर अपने ही जैसे आचार-विचार रखने वाले जीवों के बीच रहता है। सामाजीकरण की सहायता से मनुष्य अपनी पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर सभ्य मनुष्य का स्थान ग्रहण करता है। शिक्षा द्वारा उसके व्यक्तित्व में संतुलन स्थापित हो जाता है। सामाजीकरण के माध्यम से वह अपने निजी हितों को समाज के हितों के लिए न्योछावर करने को तत्पर हो जाता है। उसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो जाती है और वह समाज का सक्रिय सदस्य बन जाता है।

शारीरिक शिक्षा सामाजीकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। विद्यार्थी खेल के मैदान में अपनी टीम के हितों को सम्मुख रखकर खेल के नियमों का भली-भाँति पालन करते हुए खेलते हैं। वे पूरी लगन से खेलते हुए अपनी टीम को विजय-प्राप्ति के लिए पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। वे हार-जीत को एक-समान समझने के योग्य हो जाते हैं और उनमें सहनशीलता व धैर्यता का गुण विकसित हो जाता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक पीढ़ी आगामी पीढ़ियों के लिए खेल-संबंधी कुछ नियम व परंपराएँ छोड़ जाती है, जो विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा के माध्यम से परिचित करवाई जाती हैं।

ज़िला, राज्य, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर की खेल प्रतियोगिताओं में समाज की विभिन्न श्रेणियों से आकर खिलाड़ी भाग लेते हैं। इन अवसरों पर उन्हें परस्पर मिलकर रहने, इकट्ठे भोजन करने तथा विचारों का आदान-प्रदान करने का अवसर प्राप्त होता है। वे यह बात भूल जाते हैं कि उनका संबंध किस समाज या राष्ट्र से है। खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता के समय खेल-भावना कायम रखना आवश्यक होता है। खिलाड़ी एक ऐसी भावना से ओत-प्रोत हो जाते हैं जो उन्हें सामाजीकरण एवं मानवता के उच्च शिखरों तक ले जाती है। शारीरिक शिक्षा अनेक सामाजिक गुणों; जैसे आत्म-विश्वास, आत्म-अभिव्यक्ति, आत्म-संयम, भावनाओं पर नियंत्रण, नेतृत्व की भावना, चरित्र-निर्माण, सहयोग की भावना व बंधुत्व आदि का विकास करने में उपयोगी होती है। अतः शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के सामाजीकरण में उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा अथवा खेल व स्पर्धा किस तरह से सामाजिक मूल्यों को बढ़ावा देते हैं? वर्णन करें।
अथवा
उन सामाजिक गुणों का वर्णन करें, जिन्हें शारीरिक शिक्षा के माध्यम से उन्नत किया जा सकता है।
अथवा
शारीरिक शिक्षा, सामाजिक मूल्यों को किस प्रकार बढ़ाती है?
अथवा
“सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, सहनशीलता और धैर्यता शारीरिक शिक्षा के सकारात्मक/धनात्मक प्रभाव हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार, सहनशीलता, सहयोग व धैर्यता बढ़ाने में किस प्रकार आवश्यक है? वर्णन करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का सामाजीकरण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। खिलाड़ी खेल के दौरान खेल के नियमों का पालन करता है, खेल में टीम के बाकी सदस्यों को सहयोग देता है और जीत-हार को बराबर समझकर अच्छे खेल का प्रदर्शन करता है। इससे उसमें समाज के आवश्यक गुण विकसित होते हैं। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य खिलाड़ी या व्यक्ति में ऐसे सामाजिक मूल्यों को विकसित करना है जिससे समाज में रहते हुए वह सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से निम्नलिखित सामाजिक गुणों या मूल्यों को उन्नत या प्रोत्साहित किया जा सकता है

1. व्यवहार में परिवर्तन (Change in Behaviour):
खेल या शारीरिक शिक्षा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाती है। खेल मनुष्य की बुरी प्रवृत्तियों को बाहर निकालकर उसमें सहयोग, अनुशासन, नियमों का पालन करना और बड़ों का कहना मानना आदि जैसे गुण विकसित करते हैं। खेलों द्वारा व्यवहार में आए परिवर्तन जीवन के साथ-साथ चलते हैं।

2. त्याग की भावना (Feeling of Sacrifice):
शारीरिक शिक्षा से त्याग की भावना पैदा होती है। खेलों में कई तरह की मुश्किलें आती हैं। खिलाड़ी अपनी मुश्किलों को भूलकर टीम की खातिर बड़े-से-बड़ा त्याग करने के लिए तैयार हो जाते हैं। इस तरह खिलाड़ी में त्याग की भावना पैदा होने के कारण वह समाज के दूसरे सदस्यों के प्रति हमदर्दी का व्यवहार रखता है।

3. तालमेल की भावना (Feeling of Co-ordination):
शारीरिक शिक्षा व खेलों से खिलाड़ी एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। जब खिलाड़ी अपने राज्य या दूसरे राज्यों में खेलने के लिए जाते हैं तो वे आपसी मेल-मिलाप और अच्छे संबंध बनाकर, उनकी भाषा और संस्कृति को जानते हैं। इस तरह खिलाड़ियों में तालमेल की भावना जागरूक होती है।

4.सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार में वृद्धि (Increase in Sympathize Behaviour):
खेल के दौरान यदि कोई खिलाड़ी घायल हो जाता है तो दूसरे सभी खिलाड़ी उसके प्रति हमदर्दी की भावना रखते हैं। ऐसा हॉकी अथवा क्रिकेट खेलते समय देखा भी जा सकता है। जब भी किसी खिलाड़ी को चोट लगती है तो सभी खिलाड़ी हमदर्दी प्रकट करते हुए उसकी सहायता के लिए दौड़ते हैं । यह गुण व्यक्तित्व निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। .

5.सहनशीलताव धैर्यता में वृद्धि (Increase in Tolerance and Patience):
मानव के समुचित विकास के लिए सहनशीलता व धैर्यता अत्यन्त आवश्यक मानी जाती है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता व धैर्यता होती है वह स्वयं को समाज में भली-भाँति समायोजित कर सकता है। शारीरिक शिक्षा अनेक ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे उसमें इन गुणों को बढ़ाया जा सकता है।

6. अनुशासन की भावना (Feeling of Discipline):
अनुशासन को शारीरिक शिक्षा की रीढ़ की हड्डी कहा जा सकता है। अनुशासन की सीख द्वारा शारीरिक शिक्षा न केवल व्यक्ति के विकास में सहायक है, बल्कि यह समाज को अनुशासित नागरिक प्रदान करने में भी सक्षम है।

7. सहयोग की भावना (Feeling of Co-operation):
समाज में रहकर हमें एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से सहयोग की भावना में वृद्धि होती है। सामूहिक खेलों या गतिविधियों से व्यक्तियों या खिलाड़ियों में सहयोग की भावना बढ़ती है। यदि कोई खिलाड़ी अपने सहयोगी खिलाड़ियों से सहयोग नहीं करेगा तो उसका नुकसान न केवल उसको होगा बल्कि पूरी टीम को होगा। शारीरिक शिक्षा इस भावना को सुदृढ़ करने में सहायक होती है।

8. चरित्र-निर्माण में सहायक (Helpful in Character Formation):
शारीरिक शिक्षा चरित्र-निर्माण में भी सहायक है। यह व्यक्ति में अनेक नैतिक, मूल्य-बोधक, सामाजिक गुणों को बढ़ाने में सहायक होती है। यह व्यक्ति को अच्छा चरित्रवान नागरिक बनाने में सहायक होती है।

9.सामूहिक उत्तरदायित्व (Collective Responsibility):
शारीरिक शिक्षा खिलाड़ी में सामूहिक उत्तरदायित्व जैसे गुण पैदा करती है। खेलों में बहुत-सी ऐसी क्रियाएँ हैं जिनमें खिलाड़ी एक-जुट होकर इन क्रियाओं को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं।

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प्रश्न 4.
विभिन्न सामाजिक संस्थाओं का व्यक्ति व समूह व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है? पुष्टि कीजिए।
अथवा
सामाजिक मूल्यों को विकसित करने वाली विभिन्न सामाजिक संस्थाओं की भूमिका का वर्णन करें।
अथवा
व्यक्तिगत व समूह व्यवहार को सामाजिक संस्थाएँ किस प्रकार प्रभावित करती हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
उन सामाजिक संस्थाओं का वर्णन करें जिनमें हम सामाजिक मूल्यों को विकसित कर सकते हैं।
उत्तर:
विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के व्यक्ति एवं समूह व्यवहार पर निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
1. परिवार (Family):
परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है। बच्चा इसी संस्था में जन्म लेता है और इसी में पलता है। परिवार में बच्चा अपने माता-पिता तथा भाई-बहनों से सामाजीकरण का प्रथम पाठ पढ़ता है। परिवार में माता-पिता और दूसरे सदस्यों के आपसी संबंध, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियाँ, पारिवारिक मूल्य और परंपराएँ बच्चों के व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इसलिए कहते हैं कि परिवार में अच्छे वातावरण का होना बहुत आवश्यक है। अगर परिवार में सदस्यों के आपसी संबंध ठीक न हों, तनाव बना रहता हो तथा सभी सदस्यों की प्राथमिक जरूरतें पूरी न होती हों तो बच्चे बुरी आदतों के शिकार हो सकते हैं। इसलिए जरूरी है कि परिवार में माता-पिता अच्छे वातावरण का निर्माण करें जिससे बच्चे में अच्छे गुणों व आदतों का विकास हो सके।

परिवार एक ऐसी संस्था है जो अपने सदस्यों को विशेषकर बच्चों को समाज के रहन-सहन एवं खाने-पीने के ढंग सिखाती है। यह वह स्थान है जहाँ पर बच्चा अपने आने वाले जीवन के लिए स्वयं को तैयार करता है। इसीलिए कहा जाता है कि बच्चों को बनाने या बिगाड़ने में माता-पिता का काफी हाथ होता है। अगर परिवार को व्यक्तित्व निखारने की संस्था कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा। आमतौर पर यह देखने में आया है कि जिस परिवार की रुचि संगीत कला, नृत्य-कला, खेलकूद या किसी और विशेष क्षेत्र में होती है, उस परिवार के बच्चे की रुचि प्राकृतिक रूप से उसी क्षेत्र में हो जाती है। अगर परिवार की रुचि खेलकूद के क्षेत्र में या किसी विशेष खेल में है तो उस परिवार में बढ़िया खिलाड़ी पैदा होना या उस खेल के प्रति दिलचस्पी रखना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी। इस प्रकार परिवार व्यक्तिगत व समूह व्यवहार को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

2. धार्मिक संस्थाएँ (Religious Institutions):
आज से कुछ समय पहले विद्यालयों में अधिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। बहुत-से लोग धार्मिक संस्थाओं में ही विद्या प्राप्त करते थे। चाहे वह विद्या आगे बढ़ने में इतनी सहायक नहीं होती थी परंतु मनुष्य में सकारात्मक सोच लाने के लिए काफी थी। परंतु आज के युग में स्कूल तथा कॉलेज खुलने से विद्या का स्वरूप ही बदल गया है। चाहे अब विद्या धार्मिक संस्थानों में नहीं दी जाती, पर फिर भी धार्मिक संस्थाएँ व्यक्ति के जीवन पर बहुत प्रभाव डालती हैं। धार्मिक संस्थानों में जाकर व्यक्ति कई अच्छे नैतिक गुण सीखता है। धार्मिक संस्थाओं में महापुरुषों की कहानियाँ सुनने के कारण वे अपने-आपको उन जैसा बनाने की कोशिश करते हैं।

धार्मिक संस्थाओं का मानवीय व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ये संस्थाएँ प्रत्येक धर्म का सम्मान करना, प्रत्येक धर्म के अच्छे गुणों को अपनाना, प्रत्येक मनुष्य से अच्छा व्यवहार करना, भगवान की रज़ा में रहना, सत्य बोलना, चोरी न करना, बड़ों का आदर करना, महिलाओं का सम्मान करना, हक की कमाई में विश्वास करना और जरूरतमंदों व गरीबों की सहायता करना आदि अच्छी आदतें सिखाती हैं।

3.शैक्षिक संस्थाएँ (Educational Institutions):
संस्था के रूप में शैक्षिक संस्थाएँ बच्चे के सामाजीकरण पर प्रभाव डालती हैं। इन संस्थाओं का बच्चों या मनुष्य के व्यवहार पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अगर बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ता है तो उसका प्रभाव अच्छा पड़ता है। स्कूल का अनुशासन, स्वच्छ वातावरण तथा अच्छे अध्यापकों का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आज के युग में प्रत्येक माता-पिता हर स्थिति में अपने बच्चे को अच्छी-से-अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं। इस तरह शैक्षिक संस्थाओं का बच्चों या छात्रों के विकास पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि शैक्षिक संस्थाओं का वातावरण अच्छा है तो उनमें अच्छे गुण विकसित होंगे और यदि इन संस्थाओं का वातावरण अच्छा न हो, तो वे अच्छे गुणों से वंचित रह जाएँगे।

4.समुदाय या समूह (Society or Group):
बच्चा परिवार के बाद समुदाय या समूह के संपर्क में आता है। समुदाय या समूह में जिस तरह का वातावरण और परंपराएँ होंगी, बच्चे का ध्यान उस तरफ ही हो जाता है। अगर समुदाय में खेलों का वातावरण होगा तो बच्चा जरूर खेलों में रुचि लेने लगेगा। इस तरह कई खेल समुदाय से जुड़े हुए हैं; जैसे कि बंगाली फुटबॉल और पंजाबी हॉकी खेलना अधिक पसंद करता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि हर अच्छी-बुरी चीज़ का व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है। अगर वह अच्छे समुदाय में रह रहा है तो उस पर अच्छा असर पड़ता है। अगर वह बुरे समुदाय में रह रहा है तो उस पर बुरा असर पड़ेगा। इस तरह समुदाय या समूह व्यक्ति व समूह व्यवहार पर गहरी छाप छोड़ता है।

5. राष्ट्र (Nation):
हम लोकतंत्र और धर्म-निरपेक्ष देश के निवासी हैं। इसलिए हमारी हर संस्था लोकतांत्रिक है। इसका हमारे व्यक्तित्व व समूह व्यवहार पर गहरा प्रभाव है। हमारे देश में हर प्रकार की आज़ादी है। कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को अपना सकता है। जिस तरह का काम करना चाहता है, कर सकता है। उसको कोई नहीं रोक सकता। केवल परिवार, शैक्षिक संस्थाएँ, समुदाय और धार्मिक संस्थाएँ ही व्यक्ति व समूह व्यवहार पर असर नहीं डालतीं बल्कि राष्ट्र का भी उन पर गहरा असर पड़ता है।

जिस देश में जिस प्रकार की सरकार और उसकी सोच होगी, उसी प्रकार देश के समूचे लोगों पर उसका प्रभाव होगा। अगर देश लोकतांत्रिक है, तो वहाँ के लोग स्वतंत्र निर्णय लेने वाले, प्रत्येक धर्म को मानने वाले, मिल-जुलकर रहने वाले तथा प्रत्येक जाति, रंग, धर्म का सम्मान करने वाले होंगे। परंतु जहाँ पर तानाशाही सरकार होती है, वहाँ के लोगों की सोच संकीर्ण होती है। इसीलिए जिस प्रकार का राष्ट्र होता है, उसी प्रकार का ही लोगों का रहन-सहन और सोच-शक्ति होती है । अतः राष्ट्र का व्यक्तियों के व्यवहार पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
इस प्रकार हम कह सकते हैं कि सामाजिक संगठनों का व्यक्तिगत तथा सामूहिक व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 5.
संस्कृति को परिभाषित करें। खेलकूद व स्पर्धाओं द्वारा सांस्कृतिक विरासत को विभिन्न देशों ने कैसे बनाए रखा?
अथवा
संस्कृति किसे कहते हैं? विभिन्न देशों ने खेल व स्पर्धाओं में सांस्कृतिक विरासत कैसे प्राप्त की?
अथवा
सांस्कृतिक विरासत को खेल व स्पोर्ट्स द्वारा बताइए।
उत्तर:
संस्कृति का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Culture):
मनुष्य जहाँ प्राकृतिक वातावरण में अनेक सुविधाओं का उपभोग करता है तो दूसरी ओर उसे अनेक असुविधाओं या बाधाओं का सामना भी करना पड़ता है। आदिकाल से अब तक इन बाधाओं के समाधानों के अनेक उपाय भी खोजे गए हैं। इन खोजे गए उपायों को मनुष्य ने भावी पीढ़ी को भी हस्तांतरित किया। प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान व कला का और अधिक विकास किया है और नवीन ज्ञान व अनुभवों का भी अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत प्रथाएँ, विचार व मूल्य आते हैं, इन्हीं के संग्रह को संस्कृति कहा जाता है। अत: संस्कृति एक विशाल शब्द है जो किसी भी देश के समाज, संप्रदाय, धर्म को दर्शाती है। संस्कृति किसी भी देश की कला की छवि, ज्ञान, भाव, विचार, शक्ति तथा सामाजिक योग्यता को उभारती है। विद्वानों ने संस्कृति को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है
1. रॉबर्ट बीरस्टीड (Robert Bierstedt) के अनुसार, “संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ शामिल हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”
2. टेलर (Taylor) के अनुसार, “संस्कृति में वे सभी जटिलताएँ जैसे कि ज्ञान, विश्वास कला, कानून तथा वे सभी योग्यताएँ पाई जाती हैं जो व्यक्ति को समाज में रहने के लिए आवश्यक होती हैं।”
3. मैथ्यू (Mathew) का कहना है, “किसी भी देश की समृद्धि का गवाह उसकी संस्कृति है।”
4. मैकाइवर एवं पेज (Maclver and Page) के शब्दों में, “संस्कृति हमारे दैनिक व्यवहार में कला, साहित्य, धर्म, मनोरंजन और आनंद में पाए जाने वाले रहन-सहन और विचार के ढंगों में हमारी प्रकृति की अभिव्यक्ति है।”

खेलवस्पर्धाओं द्वारा सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage Through Games and Sports):
हमारे जीवन में खेलकूद का इतिहास उतना ही पुराना है जितना कि पृथ्वी पर मानव-जीवन।शारीरिक गतिविधियों का दूसरा नाम ही खेलकूद है। ये गतिविधियाँ ही मानव-जीवन की आधार हैं। जब से मनुष्य ने इस पृथ्वी पर जन्म लिया है तभी से वह विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ करता आया है। प्राचीन युग में हमारे पूर्वजों की अनेक गतिविधियाँ आत्मरक्षा के लिए होती थीं, जिनमें भागना, शिकार करना, भाले का प्रयोग करना, तीर चलाना आदि प्रमुख थीं। संस्कृति किसी भी देश की विरासत हो सकती है। सभी देश अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने का प्रयत्न करते हैं क्योंकि संस्कृति विरासत हर देश का गर्व होती है। खेलों को भी संस्कृति माना जाता है तथा कुछ देशों ने तो खेलों को अपनी सांस्कृतिक विरासत माना है।

सांस्कृतिक विरासत का अर्थ उचित परिवर्तनों के साथ मूल्यों, परंपराओं और प्रथाओं आदि का भूत से वर्तमान तक तथा वर्तमान से भविष्य में स्थानांतरण करना है। सांस्कृतिक विरासत प्रत्येक राष्ट्र का गौरव है। कुछ राष्ट्र शारीरिक गतिविधियों या क्रीड़ाओं को संस्कृति का रूप मानते हैं और कुछ सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखते हैं। हमारे पूर्वज इन क्रियाओं में अपने बच्चों को निपुण बनाना अपना धर्म समझते थे और इन्हें जीवन का अभिन्न अंग मानते थे। इस प्रकार के प्रयास के कारण हमारे पूर्वज जो क्रियाएँ करते थे वे आधुनिक युग में किसी-न-किसी रूप में अभी भी प्रचलित हैं। विभिन्न देशों ने खेल व स्पर्धाओं में सांस्कृतिक विरासत को निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त किया है

1. ग्रीस/यूनान (Greece):
यूनानी सभ्यता सबसे पुरानी सभ्यता है। यूनान के लोग खेल-प्रेमी थे। उनकी खेलों में विशेष रुचि थी। खेलकूद को सर्वप्रथम मान्यता और प्राथमिकता इसी देश ने प्रदान की। उन्होंने खेलों के महत्त्व को समझा और इन्हें प्रोत्साहित किया। प्राचीन व आधुनिक ओलंपिक खेलों की शुरुआत भी इसी देश से हुई। यूनानी दार्शनिक प्लेटो ने कहा था, “शरीर के लिए जिम्नास्टिक तथा आत्मा के लिए संगीत का विशेष महत्त्व है।”

2. रोम (Rome):
रोम के लोग कुशल योद्धा तथा खेल-प्रेमी थे। वे तलवार चलाना, दौड़ना, कुश्ती लड़ना, कूदना आदि गतिविधियों में विशेष रुचि लेते थे। लेकिन धीरे-धीरे रोम से खेल गतिविधियों का पतन होने लगा। ये गतिविधियाँ आनंद व मस्ती हेतु खेली जाने लगीं। लेकिन वर्तमान में रोम में खेलकूद गतिविधियों की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

3. इंग्लैंड (England):
इंग्लैंड को आधुनिक बॉलगेम्स का जन्मदाता कहा जाता है । इंग्लैंड की संस्कृति ने हमें बहुत-सी खेल स्पर्धाएँ दी हैं जो वर्तमान में काफी लोकप्रिय हैं; जैसे फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, कुश्ती आदि।

4. अमेरिका (America): अमेरिका ने विश्व को विभिन्न खेलों से परिचित करवाया है। अमेरिका ने ही हमें बेसबॉल और वॉलीबॉल जैसी खेलों का ज्ञान दिया।

5. भारत (India):
खेलकूद की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। प्राचीनकाल में शिष्य अपने गुरुओं से धार्मिक ग्रंथों तथा दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने के अतिरिक्त युद्ध एवं खेल कौशल में भी प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। इनमें मुख्य रूप से तीरंदाजी, घुड़सवारी, भाला फेंकना, तलवार चलाना, मल्लयुद्ध आदि क्रियाएँ सम्मिलित थीं। भगवान श्रीकृष्ण, कर्ण, अर्जुन आदि धनुर्विद्या में कुशल थे। भीम एक महान् पहलवान था। दुर्योधन मल्लयुद्ध में कुशल था। इसी प्रकार चौपड़, शतरंज, खो-खो, कुश्ती और कबड्डी आदि खेलों का उल्लेख भी भारतीय इतिहास में मिलता है। आधुनिक भारत में भी खेलों की ओर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। क्रिकेट यहाँ बहुत लोकप्रिय खेल बन गया है।

6. अन्य देश (Other Countries):
खेल जगत् में जर्मनी का भी विशेष योगदान है। जर्मनी ने हमें आधुनिक जिम्नास्टिक खेल सिखाए हैं। इसी प्रकार स्वीडन तथा डेनमार्क ने जिम्नास्टिक के साथ संगीत पद्धति द्वारा चिकित्सा प्रणाली विकसित की। चीन ने हमें डाइविंग तथा जापान ने जूडो व ताइक्वांडो जैसी खेलों से परिचित करवाया।

निष्कर्ष (Conclusion):
यूनान (Greece) ने खेलों के महत्त्व को समझते हुए खेलकूद को शिक्षा के रूप में सबसे पहले मान्यता प्रदान की और बच्चों को इनके प्रति उत्साहित किया। सभी खेलें हमें अपने पूर्वजों से ही प्राप्त हुई हैं और हमारी संस्कृति पर प्रकाश डालती हैं। खेल जगत् की नई-नई खेलों ने हमारे जीवन को प्रभावित किया। इनमें निरन्तर परिवर्तन और सुधार होता रहा है। वर्तमान युग में ये खेलें वैज्ञानिक ढंग से खेली और सिखाई जा रही हैं । इन खेलों को आधुनिक स्वरूप धारण करने के लिए एक लम्बे समय की लम्बी यात्रा तय करनी पड़ी है।

हमारे खेल जगत् की गतिविधियाँ थोड़े समय की पैदाइश नहीं हैं अपितु इन्हें यह रूप धारण करने के लिए मीलों लम्बा रास्ता तय करना पड़ा है। ये खेलें एक लम्बे समय के संघर्ष की देन हैं और हमें पूर्वजों से विरासत के रूप में प्राप्त हुई हैं। ये खेल हमारे समाज का न केवल सांस्कृतिक अंग हैं, अपितु प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन चुके हैं। खेलें एक प्रकार से हमारी सांस्कृतिक धरोहर या बपौती हैं।

प्रश्न 6.
शारीरिक शिक्षा से आप क्या समझते हैं? इसके लक्ष्यों एवं उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा को परिभाषित कीजिए। इसके लक्ष्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा का अर्थ तथा परिभाषा लिखें। इसके उद्देश्यों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Physical Education):
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से व्यक्ति में एक चुनी हुई दिशा में परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है अर्थात् शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक, सामाजिक एवं संवेगात्मक आदि) व्यक्तित्व का विकास होता है। शारीरिक शिक्षा ऐसी शिक्षा है जो वैयक्तिक जीवन को समृद्ध बनाने में प्रेरक सिद्ध होती है। शारीरिक शिक्षा, शारीरिक विकास के साथ शुरू होती है और मानव-जीवन को पूर्णता की ओर ले जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह एक हृष्ट-पुष्ट और मजबूत शरीर, अच्छा स्वास्थ्य, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक संतुलन रखने वाला व्यक्ति बन जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी प्रकार की चुनौतियों अथवा परेशानियों से प्रभावी तरीके से लड़ने में सक्षम होता है। शारीरिक शिक्षा के विषय में विभिन्न शारीरिक शिक्षाशास्त्रियों के विचार निम्नलिखित हैं
1.सी० सी० कोवेल (C.C.Cowell) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा व्यक्ति-विशेष के सामाजिक व्यवहार में वह परिवर्तन है जो बड़ी माँसपेशियों तथा उनसे संबंधित गतिविधियों की प्रेरणा से उपजता है।”
2.जे० बी० नैश (J. B. Nash) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा के संपूर्ण क्षेत्र का वह भाग है जो बड़ी माँसपेशियों से होने वाली क्रियाओं तथा उनसे संबंधित प्रतिक्रियाओं से संबंध रखता है।”
3. ए० आर० वेमैन (A. R: Wayman) के मतानुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह भाग है जिसका संबंध शारीरिक गतिविधियों द्वारा व्यक्ति के संपूर्ण विकास एवं प्रशिक्षण से है।”
4. आर० कैसिडी (R. Cassidy) के अनुसार, “शारीरिक क्रियाओं पर केंद्रित अनुभवों द्वारा जो परिवर्तन मानव में आते हैं, वे ही शारीरिक शिक्षा कहलाते हैं।”
5. जे० एफ० विलियम्स (J. F. Williams) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा मनुष्य की उन शारीरिक क्रियाओं को कहते हैं, जो किसी विशेष लक्ष्य को लेकर चुनी और कराई गई हों।”
6. सी० एल० ब्राउनवेल (C. L. Brownwell) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा उन परिपूर्ण एवं संतुलित अनुभवों का जोड़ है जो व्यक्ति को बहु-पेशीय प्रक्रियाओं में भाग लेने से प्राप्त होते हैं तथा उसकी अभिवृद्धि और विकास को चरम-सीमा तक बढ़ाते हैं।”
7. निक्सन व कोजन (Nixon and Cozan) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा, शिक्षा की पूर्ण क्रियाओं का वह भाग है जिसका संबंधशक्तिशाली माँसपेशियों की क्रियाओं और उनसे संबंधित क्रियाओं तथा उनके द्वारा व्यक्ति में होने वाले परिवर्तनों से है।”
8. डी०ऑबरटियूफर (D.Oberteuffer) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा उन अनुभवों का जोड़ है जो व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों से प्राप्त हुई है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह महत्त्वपूर्ण एवं उपयोगी पहलू है जिसमें शारीरिक गतिविधियों या व्यायामों द्वारा व्यक्ति के विकास के प्रत्येक पक्ष प्रभावित होते हैं। यह व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन करती है। इसका उद्देश्य न केवल व्यक्ति का शारीरिक विकास है, बल्कि यह मानसिक विकास, सामाजिक विकास, भावनात्मक विकास, बौद्धिक विकास, आध्यात्मिक विकास एवं नैतिक विकास में भी सहायक होती है अर्थात् यह व्यक्ति का संपूर्ण या सर्वांगीण विकास करती है।

शारीरिक शिक्षा के लक्ष्य (Aims of Physical Education):
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को इस प्रकार तैयार करना है कि वह एक सफल एवं स्वस्थ नागरिक बनकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता या योग्यता उत्पन्न कर सके और समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनकर सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके। विभिन्न विद्वानों के अनुसार शारीरिक शिक्षा के लक्ष्य निम्नलिखित हैं

1.जे० एफ० विलियम्स (J. F. Williams) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य एक प्रकार का कुशल नेतृत्व तथा पर्याप्त समय प्रदान करना है, जिससे व्यक्तियों या संगठनों को इसमें भाग लेने के लिए पूरे-पूरे अवसर मिल सकें, जो शारीरिक रूप से आनंददायक, मानसिक दृष्टि से चुस्त तथा सामाजिक रूप से निपुण हों।”

2.जे० आर० शर्मन (J. R. Sherman) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य है कि व्यक्ति के अनुभव को इस हद तक प्रभावित करे कि वह अपनी क्षमता से समाज में अच्छे से रह सके, अपनी जरूरतों को बढ़ा सके, उन्नति कर सके तथा अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए सक्षम हो सके।”

3. केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय (Central Ministry of Education) के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा को प्रत्येक बच्चे को शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ बनाना चाहिए और उसमें ऐसे व्यक्तिगत एवं सामाजिक गुणों का विकास करना चाहिए ताकि वह दूसरों के साथ प्रसन्नता व खुशी से रह सके और एक अच्छा नागरिक बन सके।”

दिए गए तथ्यों या परिभाषाओं का अध्ययन करने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास करना है। इसके लक्ष्य पर प्रकाश डालते हुए जे०एफ० विलियम्स (J.F. Williams) ने भी कहा है कि “शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य मनुष्य के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास करना है।”

शारीरिक शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Physical Education)-शारीरिक शिक्षा के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. शारीरिक विकास (Physical Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शारीरिक विकास का माध्यम हैं। शारीरिक क्रियाएँ माँसपेशियों को मजबूत करने, रक्त का बहाव ठीक रखने, पाचन-शक्ति में बढ़ोतरी करने और श्वसन क्रिया को ठीक रखने में सहायक होती हैं । शारीरिक क्रियाएँ न केवल भिन्न-भिन्न प्रणालियों को स्वस्थ और ठीक रखती हैं, बल्कि उनके आकार, शक्ल
और कुशलता में भी बढ़ोतरी करती हैं। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक तौर पर स्वस्थ बनाना और उसके व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलू को निखारना है।

2. गतिज विकास (Motor Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी क्रियाएँ शरीर में ज्यादा-से-ज्यादा तालमेल बनाती हैं। अगर शारीरिक शिक्षा में उछलना, दौड़ना, फेंकना आदि क्रियाएँ न हों तो कोई भी उद्देश्य पूरा नहीं किया जा सकता। मानवीय शरीर में सही गतिज विकास तभी हो सकता है जब नाड़ी प्रणाली और माँसपेशीय प्रणाली का संबंध ठीक रहे। इससे कम थकावट और अधिक-से-अधिक कुशलता प्राप्त करने में सहायता मिलती है।

3. भावनात्मक विकास (Emotional Development):
शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर पैदा करती है, जिनसे शरीर का भावनात्मक या संवेगात्मक विकास होता है । खेल में बार-बार जीतना या हारना दोनों हालातों में भावनात्मक पहलू प्रभावित होते हैं। इससे खिलाड़ियों में भावनात्मक स्थिरता उत्पन्न होती है। इसलिए उन पर जीत-हार का बहुत ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता। शारीरिक शिक्षा खिलाड़ियों को अपनी भावनाओं पर काबू रखना सिखाती है।

4. सामाजिक व नैतिक विकास (Social and Moral Development):
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज में मिल-जुलकर रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा कई प्रकार के ऐसे अवसर प्रदान करती है, जिससे खिलाड़ियों के सामाजिक व नैतिक विकास हेतु सहायता मिलती है; जैसे उनका एक-दूसरे के साथ मिल-जुलकर रहना, एक-दूसरे का सम्मान करना, दूसरों की आज्ञा का पालन करना, नियमों का पालन करना, सहयोग देना, एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना आदि।

5. मानसिक विकास (Mental Development):
शारीरिक शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास भी होता है। जब बालक या खिलाड़ी शारीरिक क्रियाओं में भाग लेता है तो इनसे उसके शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक विकास में भी बढ़ोतरी होती है।

6. सांस्कृतिक विकास (Cultural Development):
शारीरिक शिक्षा संबंधी खेल और क्रियाकलापों के दौरान विभिन्न संस्कृतियों के व्यक्ति आपस में मिलते हैं और एक-दूसरे के बारे में जानते हैं व उनके रीति-रिवाजों, परंपराओं और जीवन-शैली के बारे में परिचित होते हैं, जिससे सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा मिलता है।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों का क्षेत्र बहुत विशाल है। शारीरिक शिक्षा को व्यक्ति का विकास सामाजिक, भावनात्मक, शारीरिक तथा अन्य कई दृष्टिकोणों से करना होता है ताकि वह एक अच्छा नागरिक बन सके। एक अच्छा नागरिक बनने के लिए टीम भावना, सहयोग, दायित्व का एहसास और अनुशासन आदि गुणों की आवश्यकता होती है। शारीरिक शिक्षा, एक सामान्य शिक्षा के रूप में शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक होती है। यह व्यक्ति में आंतरिक कुशलताओं का विकास करती है और उसमें अनेक प्रकार के छुपे हुए गुणों को बाहर निकालती है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 7.
आधुनिक युग में शारीरिक शिक्षा के महत्त्व का वर्णन कीजिए।
अथवा
दैनिक जीवन में शारीरिक शिक्षा की महत्ता तथा उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
आज का युग एक मशीनी व वैज्ञानिक युग है, जिसमें मनुष्य स्वयं मशीन बनकर रह गया है। इसकी शारीरिक शक्ति खतरे में पड़ गई है। मनुष्य पर मानसिक तनाव और कई प्रकार की बीमारियों का संक्रमण बढ़ रहा है। आज के मनुष्य को योजनाबद्ध खेलों और शारीरिक शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। शारीरिक शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए रूसो ने कहा-“शारीरिक शिक्षा शरीर का एक मजबूत ढाँचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित तथा आसान करता है।”
1. शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है (Physical Education is useful for Health):
अच्छा स्वास्थ्य अच्छी जलवायु की उपज नहीं, बल्कि यह अनावश्यक चिंताओं से मुक्ति और रोग-रहित जीवन है। आवश्यक डॉक्टरी सहायता भी स्वास्थ्य को अच्छा रखने के लिए जरूरी है। बहुत ज्यादा कसरत करना, परन्तु आवश्यक खुराक न खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जो व्यक्ति खेलों में भाग लेते हैं, उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है। खेलों में भाग लेने से शरीर की सारी शारीरिक प्रणालियाँ सही ढंग से काम करने लग जाती हैं। ये प्रणालियाँ शरीर में हुई थोड़ी-सी कमी या बढ़ोतरी को भी सहन कर लेती हैं। इसलिए जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति खेलों में अवश्य भाग ले।

2. शारीरिक शिक्षा हानिकारक मनोवैज्ञानिक व्याधियों को कम करती है (Physical Education decreases harmful Psychological Disorders):
आधुनिक संसार में व्यक्ति का ज्यादा काम दिमागी हो गया है; जैसे प्रोफैसर, वैज्ञानिक, गणित-शास्त्री, दार्शनिक आदि सारे व्यक्ति मानसिक कामों से जुड़े हुए हैं। मानसिक काम से हमारे स्नायु संस्थान (Nervous System) पर दबाव बढ़ता है। इस दबाव को कम करने के लिए काम में परिवर्तन आवश्यक है। यह परिवर्तन मानसिक शांति पैदा करता है। जे०बी० नैश का कहना है कि “जब कोई विचार दिमाग में आ जाता है तो हालात बदलने पर भी दिमाग में चक्कर लगाता रहता है।”

3. शारीरिक शिक्षा भीड़-भाड़ वाले जीवन के दुष्प्रभाव को कम करती है (Physical Education decreases the side effects of Congested Life):
आजकल शहरों में जनसंख्या निरंतर बढ़ रही है जिसके कारण शहरों में कई समस्याएँ उत्पन्न हो गई हैं। शहरों में कारों, बसों, गाड़ियों, मोटरों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। मोटर-गाड़ियों और फैक्टरियों का धुआँ निरंतर पर्यावरण को प्रदूषित करता है। अत: शारीरिक शिक्षा से लोगों की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है। विभिन्न क्षेत्रों में शारीरिक शिक्षा संबंधी खेल क्लब बनाकर लोगों को अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

4. आधुनिक शिक्षा को पूर्ण करने के लिए शारीरिक शिक्षा की आवश्यकता (Physical Education Necessities for Supplements the Modern Education):
पुराने समय में शिक्षा का प्रसार बहुत कम था। पिता पुत्र को पढ़ा देता था या ऋषि-मुनि पढ़ा देते थे। परन्तु आजकल प्रत्येक व्यक्ति के पढ़े-लिखे होने की आवश्यकता है। बच्चा भिन्न-भिन्न क्रियाओं में भाग लेकर अपनी वृद्धि और विकास करता है। इसलिए खेलें बच्चों के लिए बहुत आवश्यक हैं। शारीरिक शिक्षा केवल शरीर के निर्माण तक ही सीमित नहीं है। वास्तव में, यह बच्चों का मानसिक, भावात्मक और सामाजिक विकास भी करती है।

5. शारीरिक शिक्षा और सामाजिक एकता (Physical Education and Social Cohesion):
सामाजिक जीवन में कई तरह की भिन्नताएँ होती हैं; जैसे अलग भाषा, अलग संस्कृति, रंग-रूप, अमीरी-गरीबी आदि । इन भिन्नताओं के बावजूद मनुष्य को सामाजिक इकाई में रहना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा भिन्न-भिन्न प्रकार के लोगों को एक स्थान पर इकट्ठा करती है। उनमें एकता व एकबद्धता लाती है। खेल में धर्म, जाति, श्रेणी, वर्ग या क्षेत्र आदि के आधार पर किसी भी तरह का कोई भेदभाव नहीं किया जाता।

6.शारीरिक शिक्षावसाम्प्रदायिकता (Physical Education and Communalism):
शारीरिक शिक्षा जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, रंग-रूप, धर्म, वर्ग, समुदाय के भेदभाव को स्वीकार नहीं करती। साम्प्रदायिकता हमारे देश के लिए बहुत घातक है। शारीरिक शिक्षा इस खतरे को राष्ट्र हित की ओर अग्रसर कर देती है। खिलाड़ी सभी बंधनों को तोड़कर एक राष्ट्रीय टीम में भाग लेकर अपने देश का नाम ऊँचा करते हैं। खिलाड़ी किसी प्रकार के देश-विरोधी दंगों में नहीं पड़ते । अतःशारीरिक शिक्षा लोगों में साम्प्रदायिकता की भावना को खत्म करके राष्ट्रीयता की भावना में वृद्धि करती है।

7. शारीरिक शिक्षा मनोरंजन प्रदान करती है (Physical Education provides the Recreation):
मनोरंजन जीवन का महत्त्वपूर्ण अंग है। मनोरंजन व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक खुशी प्रदान करता है। इसमें व्यक्ति निजी प्रसन्नता और संतुष्टि के कारण अपनी इच्छा से भाग लेता है। शारीरिक शिक्षा मनुष्य को कई प्रकार की क्रियाएँ प्रदान करती हैं जिससे उसको मनोरंजन प्राप्त होता है।

8.शारीरिक शिक्षा व प्रान्तवाद (Physical Education and Provincialism):
शारीरिक शिक्षा में प्रान्तवाद या क्षेत्रवाद का कोई स्थान नहीं है। जब कोई खिलाड़ी शारीरिक क्रियाएँ करता है तो उस समय उसमें प्रान्तवाद की कोई भावना नहीं होती कि वह अमुक प्रान्त का निवासी है। उसको केवल मानव-कल्याण का लक्ष्य ही दिखाई देता है। विभिन्न प्रान्तों या राज्यों के खिलाड़ी खेलते समय आपस में सहयोग करते हुए एक-दूसरे की भावनाओं का सत्कार करते हैं, जिससे उनमें राष्ट्रीय एकता की वृद्धि होती है। राष्ट्रीय एकता समृद्ध होती है और देश शक्तिशाली बनता है।

9. शारीरिक शिक्षा सुस्त जीवन के बुरे प्रभावों को कम करती है (Physical Education corrects the harmful effects of Lazy Life):
आज का युग मशीनी है। दिनों का काम कुछ घण्टों में हो जाता है जिसके कारण मनुष्य के पास काफी समय बच जाता है। ऐसी हालत में लोगों को दौड़ने-भागने के मौके देकर उनका स्वास्थ्य ठीक रखा जा सकता है। जब तक व्यक्ति योजनाबद्ध तरीके से खेलों और शारीरिक क्रियाओं में भाग नहीं लेगा, तब तक वह अपने स्वास्थ्य को अधिक दिन तक तंदुरुस्त नहीं रख पाएगा। अतः शारीरिक शिक्षा जीवन के बुरे प्रभावों को कम करती है।

10. शारीरिक शिक्षा व भाषावाद (Physical Education and Linguism):
भारतवर्ष में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। देश में कई राज्यों में भाषा के लिए झगड़े हो रहे हैं। कहीं पर हिन्दी, कहीं तमिल भाषा का झगड़ा तो कहीं पर बंगला, पंजाबी एवं ओड़िया
भाषाओं के नाम पर झगड़ा उत्पन्न हुआ है। एक स्थान की भाषा दूसरे स्थान पर समझने में कठिनाई आती है परन्तु शारीरिक शिक्षा भाषावाद को स्वीकार नहीं करती। अच्छा खिलाड़ी चाहे वह पंजाबी बोलता हो या तमिल सभी को अपना साथी मानता है और सभी भाषाओं का सम्मान करता है। सभी खिलाड़ी राष्ट्रीय टीम के रूप में मैदान में आते हैं। आपसी सहयोग से अपने देश की मान-मर्यादा को बढ़ाने का प्रयास करते हैं। इस तरह शारीरिक शिक्षा भाषाओं के झगड़े को समाप्त करके राष्ट्रीय एकता में वृद्धि करने का प्रयास करती है।

प्रश्न 8.
नेतृत्व को परिभाषित कीजिए।शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में एक नेता के गुणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
नेतृत्व क्या है? शारीरिक शिक्षा में एक नेता के गुणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
नेतृत्व का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Leadership):
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि या विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करती है। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है। नेतृत्व को विद्वानों ने निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-
1. मॉण्टगुमरी (Montgomery) के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा व योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।”
2. ला-पियरे व फा!वर्थ (La-Pierre and Farmowerth) के अनुसार, “नेतृत्व एक ऐसा व्यवहार है जो लोगों के व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है, न कि लोगों के व्यवहार का प्रभाव उनके नेता पर।”
3. पी० एम० जोसेफ (P. M. Joseph) के अनुसार, “नेतृत्व वह गुण है जो व्यक्ति को कुछ वांछित काम करने के लिए, मार्गदर्शन करने के लिए पहला कदम उठाने के योग्य बनाता है।”

एक अच्छे नेतां के गुण (Qualities of aGood Leader):
प्रत्येक समाज या राज्य के लिए अच्छे नेता की बहुत आवश्यकता होती है क्योंकि वह समाज और राज्य को एक नई दिशा देता है। नेता में एक खास किस्म के गुण होते हैं जिनके कारण वह सभी को एकत्रित कर काम करने के लिए प्रेरित करता है। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में अच्छे नेता का होना बहुत आवश्यक है क्योंकि शारीरिक क्रियाएँ किसी योग्य नेता के बिना संभव नहीं हैं। किसी नेता में निम्नलिखित गुण या विशेषताएँ होना आवश्यक हैं तभी वह कुशलता से व्यक्तियों या खिलाड़ियों को प्रेरित कर सकता है
1. ईमानदारी एवं कर्मठता (Honesty and Energetic): शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में ईमानदारी एवं कर्मठता एक नेता के महत्त्वपूर्ण गुण हैं । ये उसके व्यक्तित्व में निखार और सम्मान में वृद्धि करते हैं।
2. वफादारी एवं नैतिकता (Loyality and Morality): शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में वफादारी एवं नैतिकता एक नेता के महत्त्वपूर्ण गुण हैं । उसे अपने शिष्यों या अनुयायियों (Followers) के प्रति वफादार होना चाहिए और विपरीत-से-विपरीत परिस्थितियों में भी उसे अपनी नैतिकता का त्याग नहीं करना चाहिए।
3. सामाजिक समायोजन (Social Adjustment): एक अच्छे नेता में अनेक सामाजिक गुणों; जैसे सहनशीलता, धैर्यता, सहयोग, सहानुभूति व भाईचारा आदि का समावेश होना चाहिए।
4. बच्चों के प्रति स्नेह की भावना (Affection Feeling for Children): नेतृत्व करने वाले में बच्चों के प्रति स्नेह की भावना होनी चाहिए। उसकी यह भावना बच्चों को अत्यधिक प्रभावित करती है।
5. तर्कशील एवं निर्णय-क्षमता (Logical and Decision-Ability): उसमें समस्याओं पर तर्कशील ढंग से विचार-विमर्श करने की योग्यता होनी चाहिए। वह एक अच्छा निर्णयकर्ता भी होना चाहिए। उसमें उपयुक्त व अनायास ही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए।
6. शारीरिक कौशल (Physical Skill): उसका स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए। वह शारीरिक रूप से कुशल एवं मजबूत होना चाहिए, ताकि बच्चे उससे प्रेरित हो सकें।
7. बुद्धिमान एवं न्यायसंगत (Intelligent and Fairness): एक अच्छे नेता में बुद्धिमता एवं न्यायसंगतता होनी चाहिए। एक बुद्धिमान नेता ही विपरीत-से-विपरीत परिस्थितियों का समाधान ढूँढने की योग्यता रखता है। एक अच्छे नेता को न्यायसंगत भी होना चाहिए ताकि वह निष्पक्ष भाव से सभी को प्रभावित कर सके।
8. शिक्षण कौशल (Teaching Skill): नेतृत्व करने वाले को विभिन्न शिक्षण कौशलों का गहरा ज्ञान होना चाहिए। उसे
कुशल होना चाहिए।
9. सृजनात्मकता (Creativity): एक अच्छे नेता में सृजनात्मकता या रचनात्मकता की योग्यता होनी चाहिए, ताकि वह नई तकनीकों या कौशलों का प्रतिपादन कर सके।
10. समर्पण व संकल्प की भावना (Spirit of Dedication and Determination): उसमें समर्पण व संकल्प की भावना होना बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसे विपरीत-से-विपरीत परिस्थिति में भी दृढ़-संकल्पी या दृढ़-निश्चयी होना चाहिए। उसे अपने व्यवसाय के प्रति समर्पित भी होना चाहिए।
11. अनुसंधान में रुचि (Interest in Research): एक अच्छे नेता की अनुसंधानों में विशेष रुचि होनी चाहिए।
12. आदर भावना (Respect Spirit): उसमें दूसरों के प्रति आदर-सम्मान की भावना होनी चाहिए। यदि वह दूसरों का आदर नहीं करेगा, तो उसको भी दूसरों से सम्मान नहीं मिलेगा।
13. पेशेवर गुण (Professional Qualities): एक अच्छे नेता में अपने व्यवसाय से संबंधित सभी गुण होने चाहिएँ।
14. भावनात्मक संतुलन (Emotional Balance): नेतृत्व करने वाले में भावनात्मक संतुलन का होना बहुत आवश्यक है। उसका अपनी भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए।
15. तकनीकी रूप से कुशल (Technically Skilled): उसे तकनीकी रूप से कुशल या निपुण होना चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 9.
नेतृत्व (Leadership) क्या है? इसके महत्त्व का विस्तार से वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व प्रशिक्षण की उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डालें।
उत्तर:
नेतृत्व का अर्थ (Meaning of Leadership)-मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि व विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करते हैं। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है।

नेतृत्व का महत्त्व (Importance of Leadership):
नेतृत्व की भावना को बढ़ावा देना शारीरिक शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है, क्योंकि इस प्रकार की भावना से मानव के व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास होता है। क्षेत्र चाहे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक अथवा शारीरिक शिक्षा का हो या अन्य, हर क्षेत्र में नेता की आवश्यकता पड़ती है। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है, जिससे उसकी शारीरिक शक्ति, सोचने की शक्ति, व्यक्तित्व में निखार और कई प्रकार के सामाजिक गुणों का विकास होता है। मानव में शारीरिक क्षमता बढ़ने के कारण निडरता आती है जो नेतृत्व का एक विशेष गुण माना जाता है। इसी प्रकार खेलों के क्षेत्र में हम दूसरों के साथ सहयोग के माध्यम से लक्ष्य प्राप्त करना सीख जाते हैं। व्यक्तिगत एवं सामूहिक खेलों में व्यक्ति को अच्छे नेता के सभी गुणों को ग्रहण करने का अवसर मिलता है।

आज के वैज्ञानिक युग में पूर्ण व्यावसायिक योग्यता के बिना काम नहीं चल सकता, क्योंकि नेताओं की योग्यता पर ही किसी व्यवसाय की उन्नति निर्भर करती है। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए शारीरिक शिक्षा के क्षेत्रों में कई प्रशिक्षण केंद्र स्थापित किए गए हैं; जैसे ग्वालियर, चेन्नई, पटियाला, चंडीगढ़, लखनऊ, हैदराबाद, मुंबई, अमरावती और कुरुक्षेत्र आदि। इन केंद्रों में शारीरिक शिक्षा के अध्यापकों को इस क्षेत्र के नेताओं के रूप में प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे शारीरिक शिक्षा की ज्ञान रूपी ज्योति को अधिक-से-अधिक फैला सकें और अपने नेतृत्व के अधीन अधिक-से-अधिक विद्यार्थियों में नेतृत्व के गुणों को विकसित कर सकें। विद्यार्थी देश का भविष्य होते हैं और एक कुशल व आदर्श अध्यापक ही शारीरिक शिक्षा के द्वारा अच्छे समाज व राष्ट्र के निर्माण में सहायक हो सकता है। शारीरिक शिक्षा का क्षेत्र और मैदान नेतृत्व के गुण को उभारने में कितना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यह प्रस्तुत कथन से सिद्ध होता है”वाटरलू का प्रसिद्ध युद्ध, ईटन के खेल के मैदान में जीता गया।” यह युद्ध अच्छे नेतृत्व के कारण जीता गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि नेतृत्व का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 10.
समूह की गतिशीलता से क्या अभिप्राय है? इसको समझने के महत्त्वपूर्ण बिंदुओं का वर्णन करें।
अथवा
समूह गत्यात्मक के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तार से समझाइए।
उत्तर:
समूह की गतिशीलता का अर्थ (Meaning of Group Dynamics):
समूह की गतिशीलता (गत्यात्मक) का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1924 में मैक्सवर्थीमर (Max Wertheimer) ने किया। डायनैमिक’ शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है’शक्ति’। इस प्रकार समूह की गतिशीलता का अर्थ उन शक्तियों या गतिविधियों से होता है जो एक समूह के अंदर कार्य करती हैं।

हम इस तथ्य को जानते हैं कि शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति के व्यवहार में यह वांछनीय परिवर्तन लाती है। जब एक बच्चे का विद्यालय में प्रवेश होता है, तो वह विद्यालय तथा अपनी कक्षा के वातावरण को समझने की कोशिश करता है। वह दूसरे बच्चों से मिलने की इच्छा करता है। वह अपने अध्यापकों से भी प्रशंसा चाहता है ताकि दूसरे बच्चे उसके बारे में अच्छा दृष्टिकोण या विचार रख सकें। इस प्रकार उसका व्यवहार लगातार प्रभावित होता रहता है। विशेष रूप से वह अपने समूह के सदस्यों द्वारा प्रभावित होता है। अत: वे शक्तियाँ या गतिविधियाँ जो विद्यालय के वातावरण से उसको प्रभावित करती हैं, उसके उचित व्यवहार के प्रतिरूप के विकास में सहायक होती हैं, समूह गत्यात्मकता की प्रक्रिया कहलाती है।

समूह की गतिशीलता को समझने के महत्त्वपूर्ण बिंदु (Important Points to Understand Group Dynamics):
एक समूह की गतिशीलता को समझने के महत्त्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं
(1) एक व्यक्ति की प्रवृत्ति सदा उन समूहों के द्वारा प्रभावित होती है, जिनका वह सदस्य होता है। यदि कोई अध्यापक, किसी

बच्चे की प्रवृत्ति में परिवर्तन चाहता है तो उसे, उसके समूह की विशेषताओं में परिवर्तन लाना होगा।
(2) समूहों में कुछ बाधाओं के कारण सीखने में रुकावट आ जाती है। यदि अध्यापक शिक्षण और सीखने को प्रभावी बनाना चाहता है तो उसे इन बाधाओं को हटाना होगा।
(3) सामाजिक क्रियाओं के प्रदर्शन में व्यक्तिगत प्रशिक्षण की अपेक्षा समूह के रूप में प्रशिक्षण अधिक अच्छा होता है।
(4) एक कक्षा में विद्यार्थियों के बीच प्रतिक्रियाओं को सामाजिक कारकों के द्वारा किसी एक सीमा तक जाना जा सकता है।
उदाहरण के लिए, विद्यार्थियों के आपसी लगाव वाले समूह में एक विद्यार्थी, जो अपने समूह के विचार से अपना अलग विचार रखता है, प्रायः उस समूह से उसका बहिष्कार कर दिया जाता है अर्थात् समूह उसे अस्वीकार कर देता है। लेकिन
विद्यार्थियों के एक व्यापक समूह में, वह विद्यार्थी, जिसके अलग विचार हैं, समूह का ध्यान अधिक आकर्षित करेगा।
(5) समूह का वातावरण व सामूहिक जीवन की प्रणाली की क्रिया समूह के सदस्यों के व्यक्तित्व को प्रभावित करती है।
(6) कक्षा के व्यवहार के कुछ प्रतिरूप, तनाव व दबाव को कम कर देते हैं।
(7) विद्यार्थी का विश्वास और उसकी क्रियाएँ कक्षा के छोटे समूहों द्वारा प्रभावित होती हैं।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 11.
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक के व्यक्तिगत गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक के व्यक्तिगत गुण निम्नलिखित हैं
1. व्यक्तित्व (Personality):
अच्छा व्यक्तित्व शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का सबसे बड़ा गुण है, क्योंकि व्यक्तित्व बहुत सारे गुणों का समूह है। एक अच्छे व्यक्तित्व वाले अध्यापक में अच्छे गुण; जैसे कि सहनशीलता, पक्का इरादा, अच्छा चरित्र, सच्चाई, समझदारी, ईमानदारी, मेल-मिलाप की भावना, निष्पक्षता, धैर्य, विश्वास आदि होने चाहिएँ।

2. चरित्र (Character):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक एक अच्छे चरित्र वाला व्यक्ति होना चाहिए, क्योंकि उसका सीधा संबंध विद्यार्थियों से होता है। अगर उसके अपने चरित्र में कमियाँ होंगी तो वह कभी भी विद्यार्थियों के चरित्र को ऊँचा नहीं उठा पाएगा।

3. नेतृत्व के गुण (Qualities of Leadership):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक में एक अच्छे नेता के गुण होने चाहिएँ क्योंकि उसने ही विद्यार्थियों से शारीरिक क्रियाएँ करवानी होती हैं और उनसे क्रियाएँ करवाने के लिए सहयोग लेना होता है। यह तभी संभव है जब शारीरिक शिक्षा का अध्यापक अच्छे नेतृत्व वाले गुण अपनाए।

4. दृढ़ इच्छा-शक्ति (Strong Will Power):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक दृढ़ इच्छा-शक्ति या पक्के इरादे वाला होना चाहिए। वह विद्यार्थियों में दृढ़ इच्छा-शक्ति की भावना पैदा करके उन्हें मुश्किल-से-मुश्किल प्रतियोगिताओं में भी जीत प्राप्त करने के लिए प्रेरित करे।

5. अनुशासन (Discipline):
अनुशासन एक बहुत महत्त्वपूर्ण गुण है और इसकी जीवन के हर क्षेत्र में जरूरत है। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य भी बच्चों में अनुशासन की भावना पैदा करना है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों में निडरता, आत्मनिर्भरता, दुःख में धीरज रखना जैसे गुण पैदा करता है। इसलिए जरूरी है कि शारीरिक शिक्षा का अध्यापक खुद अनुशासन में रहकर बच्चों में अनुशासन की आदतों का विकास करे ताकि बच्चे एक अच्छे समाज की नींव रख सकें।

6. आत्म-विश्वास (Self-confidence):
किसी भी कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए आत्म-विश्वास का होना बहुत आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों में आत्म-विश्वास की भावना पैदा करके उन्हें निडर, बलवान और हर दुःख में धीरज रखने वाले गुण पैदा कर सकता है।

7. सहयोग (Co-operation):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का सबसे बड़ा गुण सहयोग की भावना है। शारीरिक शिक्षा के अध्यापक का संबंध केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं है बल्कि मुख्याध्यापक, बच्चों के माता-पिता और समाज से भी है।

8. सहनशीलता (Tolerance):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक बच्चों से अलग-अलग क्रियाएँ करवाता है। इन क्रियाओं में बच्चे बहुत सारी गलतियाँ करते हैं। उस वक्त शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को धैर्य से उनकी गलतियाँ दूर करनी चाहिएँ। यह तभी हो सकता है अगर शारीरिक शिक्षा का अध्यापक सहनशीलता जैसे गुण का धनी हो।

9. त्याग की भावना (Spirit of Sacrifice):
शारीरिक शिक्षा के अध्यापक में त्याग की भावना का होना बहुत जरूरी है। त्याग की भावना से ही अध्यापक बच्चों को प्राथमिक प्रशिक्षण अच्छी तरह देकर उन्हें अच्छे खिलाड़ी बना सकता है।

10. न्यायसंगत (Fairness):
शारीरिक शिक्षा का अध्यापक न्यायसंगत या न्यायप्रिय होना चाहिए, क्योंकि अध्यापक को न केवल शारीरिक क्रियाएँ ही करवानी होती हैं बल्कि अलग-अलग टीमों में खिलाड़ियों का चुनाव करने जैसे निर्णय भी लेने होते हैं। न्यायप्रिय और निष्पक्ष रहने वाला अध्यापक ही बच्चों से सम्मान प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 12.
“शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रमों द्वारा राष्ट्रीय एकीकरण का विकास होता है।” इस कथन की विवेचना कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ाने में शारीरिक शिक्षा की भूमिका का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने में शारीरिक शिक्षा का क्या योगदान है? वर्णन करें।
उत्तर:
भारत एक विशाल देश है। इसमें अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं। लोगों का रहन-सहन और रीति-रिवाज अलग-अलग हैं। उनकी भाषा और पहनावा भी अलग-अलग है। इतना कुछ भिन्न-भिन्न होते हुए राष्ट्रीय एकता को विकसित करना एक बड़ी समस्या है। देखने वाली बात यह है कि वह कौन-सी शक्ति है जो इतना कुछ भिन्न-भिन्न होते हुए भी लोगों को इकट्ठा रहने के लिए प्रेरित करती है। यह शक्ति राष्ट्रीय एकता की शक्ति है। राष्ट्रीय एकता के बिना कोई भी देश उन्नति नहीं कर सकता।

शारीरिक शिक्षा एक ऐसा साधन है जिससे राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा मिलता है। यूनान में ओलम्पिक खेलें शुरू कराने का अर्थ भी राष्ट्रीय एकता को ही बढ़ाना था। खेलों द्वारा मनुष्य एक-दूसरे के सम्पर्क में आता है। खेलों द्वारा लोगों को एक-दूसरे की भाषा, रहन-सहन, विचारों का आदान-प्रदान और एक-दूसरे की समस्या को समझने का अवसर मिलता है। खेलें एकता और सद्भावना जैसे गुणों को विकसित करके राष्ट्र की कई समस्याओं को सुलझाने में सहायता करती हैं।

इस उद्देश्य को लेकर ही अलग-अलग तरह के खेल मुकाबले अलग-अलग प्रान्तों में आयोजित किए जाते हैं, जिन्हें राष्ट्रीय खेलों के नाम से जाना जाता है। इस तरह के खेल मुकाबले अलग-अलग प्रान्तों के खिलाड़ियों को एक मंच पर इकट्ठा करते हैं, ताकि हर खिलाड़ी एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सके। इस तरह के प्रयत्न वास्तव में राष्ट्रीय एकता लाने में सहायक होते हैं। शारीरिक शिक्षा द्वारा निम्नलिखित ढंगों से राष्ट्रीय एकता को बढ़ाया जा सकता है

1.शारीरिक शिक्षा और भाषावाद (Physical Education and Linguism):
भारत एक विशाल देश है। इसमें अलग-अलग धर्मों के लोग रहते हैं। उनका अलग-अलग पहनावा, विचारधारा और भाषाएँ हैं परन्तु फिर भी भारत एक है। शारीरिक शिक्षा इन सभी भिन्नताओं के बावजूद राष्ट्रीय एकता में अपना योगदान देती है।

2. अनुशासन और सहनशीलता (Discipline and Toleration):
शारीरिक शिक्षा अनुशासन और सहनशीलता जैसे गुणों को उभारती है। खेलें अनुशासन के बिना नहीं खेली जा सकतीं। इनकी पालना करते हुए ही मनुष्य साधारण ज़िन्दगी में अनुशासन में रहना सीख जाता है। खेलों में सहनशीलता का बहुत महत्त्व है। जिन देशों के लोगों में अनुशासन और सहनशीलता जैसे गुण विकसित हो जाते हैं वे देश सदैव उन्नति की राह पर चलते रहते हैं। राष्ट्रीय एकता के लिए इन गुणों का होना अति आवश्यक है।

3. राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान (Solution of National Problems):
खेलें राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान करने में सबसे अधिक योगदान देती हैं। खेलों द्वारा खिलाड़ी एक-दूसरे के सम्पर्क में आ जाते हैं। उन्हें एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति, पहनावा आदि समझने में मदद मिलती है। खिलाड़ी एक-दूसरे के दोस्त बन जाते हैं जिससे कई प्रकार की समस्याएं हल हो जाती हैं। इसलिए प्रत्येक देश को चाहिए कि वह अलग-अलग खेलों को उत्साहित करे ताकि खेलों द्वारा राष्ट्रीय समस्याएं सुलझाई जा सकें।

4. शारीरिक शिक्षा और राष्ट्रीय आचरण (Physical Education and National Character):
जिस देश और राष्ट्र में आचरण की कमी आ जाती है वह देश और राष्ट्र कभी भी उन्नति नहीं कर सकते। शारीरिक शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा राष्ट्रीय आचरण बनाया जा सकता है। खेल मनुष्य में अच्छे गुण (सहनशीलता, सहयोग, अनुशासन, बड़ों की आज्ञा का पालन करना, समय का महत्त्व जानना, जीवन के उतार-चढ़ाव में हिम्मत न हारना आदि) पैदा करके राष्ट्रीय आचरण में वृद्धि करते हैं।

5.शारीरिक शिक्षा और साम्प्रदायिकता (Physical Education and Communalism):
शारीरिक शिक्षा और साम्प्रदायिकता का आपस में कोई मेल नहीं है । खेलें किसी नस्ल, रंग, धर्म, जात-पात को नहीं मानतीं । खिलाड़ी सभी बन्धनों को तोड़कर एक राष्ट्रीय टीम में भाग लेकर अपने देश का नाम ऊँचा करते हैं। खेलों में साम्प्रदायिकता की कोई जगह नहीं है।

6. शारीरिक शिक्षा और असमानता (Physical Education and Inequality):
शारीरिक शिक्षा का कोई भी कार्यक्रम असमानता पर आधारित नहीं है। खेलों में सभी खिलाड़ी चाहे वे अमीर-गरीब, छोटा-बड़ा हो, सभी एक-समान होते हैं। खेल जीतने के लिए सभी खिलाड़ी योगदान देते हैं।

7. शारीरिक शिक्षा और खाली समय (Physical Education and Leisure Time):
कहावत है कि खाली समय झगड़े की जड़ है। खाली समय में लोग बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं जिससे कई समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं । शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के खाली समय को व्यतीत करने का साधन है। व्यक्ति छोटी-छोटी खेलों में भाग लेकर अपने अन्दर की अतिरिक्त शक्ति को प्रयोग में लाकर तन्दुरुस्त जीवन व्यतीत कर सकता है। इस प्रकार खेलों में खाली समय का उचित प्रयोग हो जाता है।

8. शारीरिक शिक्षा और व्यक्तित्व (Physical Education and Personality):
शारीरिक शिक्षा मनुष्य के पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती है। इस प्रकार वह अपने जीवन की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने के योग्य हो जाता है। इस प्रकार अच्छे आचरण एवं व्यक्तित्व वाला व्यक्ति समाज का अच्छा नागरिक बनकर खुशी भरा जीवन व्यतीत करने के योग्य हो जाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
शारीरिक शिक्षा में सामाजिकता का महत्त्व बताइए।
अथवा
शारीरिक शिक्षा किस प्रकार सामाजीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित करती है?
अथवा
सामाजीकरण में शारीरिक शिक्षा की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, क्योंकि वह जीवन-भर अपने ही जैसे आचार-विचार रखने वाले जीवों के बीच रहता है।सामाजीकरण की सहायता से मनुष्य अपनी पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर सभ्य मनुष्य का स्थान ग्रहण करता है। सामाजीकरण के माध्यम से वह अपने निजी हितों को समाज के हितों के लिए न्योछावर करने को तत्पर हो जाता है। उसमें समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित हो जाती है और वह समाज का सक्रिय सदस्य बन जाता है।

शारीरिक शिक्षा सामाजीकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। विद्यार्थी खेल के मैदान में अपनी टीम के हितों को सम्मुख रखकर खेल के नियमों का भली-भाँति पालन करते हुए खेलते हैं। वे पूरी लगन से खेलते हुए अपनी टीम को विजय-प्राप्ति के लिए पूर्ण सहयोग प्रदान करते हैं। उनमें सहनशीलता व धैर्यता का गुण विकसित होता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक पीढ़ी आगामी पीढ़ियों के लिए खेल-संबंधी कुछ नियम व परंपराएँ छोड़ जाती है, जो विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा के माध्यम से परिचित करवाई जाती हैं। .. खिलाड़ियों के लिए प्रतियोगिता के समय खेल-भावना कायम रखना आवश्यक होता है। खिलाड़ी एक ऐसी भावना से ओत-प्रोत हो जाते हैं जो उन्हें सामाजीकरण एवं मानवता के उच्च शिखरों तक ले जाती है। शारीरिक शिक्षा अनेक सामाजिक गुणों; जैसे आत्म-विश्वास, आत्म-अभिव्यक्ति, आत्म-संयम, भावनाओं पर नियंत्रण, नेतृत्व की भावना, चरित्र-निर्माण, सहयोग की भावना व बंधुत्व आदि का विकास करने में उपयोगी होती है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के सामाजीकरण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र के महत्त्व का वर्णन करें।
अथवा
शारीरिक शिक्षा में समाजशास्त्र के महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
समाजशास्त्र शारीरिक शिक्षा तथा खेलों का वैज्ञानिक अध्ययन करने में सहायक है। चूँकि समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है और शारीरिक शिक्षा और खेलें समाज के अभिन्न अंग हैं, इसलिए दोनों एक-दूसरे से संबंधित हैं। इसलिए हम समाजशास्त्र में अपनाए गए वैज्ञानिक साधनों तथा ढंगों की सहायता इनको समझने हेतु ले सकते हैं। आधुनिक समय में खेलें संस्थागत बन गई हैं जो समाज के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। समाजशास्त्र शारीरिक शिक्षा तथा खेलों द्वारा समाज को दी गई नई दिशा के योगदान को समझने में हमारी सहायता करता है। यह समाज की समझ तथा नियोजन से संबंधित है, इसलिए यह शारीरिक शिक्षा तथा खेलों की समझ तथा नियोजन के रूप में सहायता करता है। यह व्यक्ति की महिमा तथा गरिमा में वृद्धि करने में सहायक है। यह शारीरिक शिक्षा तथा खेलों द्वारा बच्चों की समस्याओं तथा खिलाड़ियों की अनियमितताओं को दूर करने में भी सहायता करता है। यह मानवता या समाज की सांस्कृतिक विरासत के अध्ययन में भी हमारी सहायता करता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा में समाजशास्त्र विशेष योगदान देता है।

प्रश्न 3.
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का अभिन्न अंग है-इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
आज से कुछ ही दशक पूर्व शिक्षा का लक्ष्य केवल मानसिक विकास माना जाता था और इसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल किताबी ज्ञान पर ही बल दिया जाता था। लेकिन आधुनिक युग में यह अनुभव होने लगा कि मानसिक व शारीरिक विकास एक-दूसरे से किसी भी प्रकार अलग नहीं हैं । जहाँ मानसिक ज्ञान से बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य इस ज्ञान का उपयोग विभिन्न क्षेत्रों में करके सुखी जीवन के लिए साधन जुटाने में सक्षम हो पाता है, वहीं शारीरिक शिक्षा उसे अतिरिक्त समय को बिताने की विधियाँ, अच्छा स्वास्थ्य रखने का रहस्य तथा चरित्र-निर्माण के गुणों की जानकारी प्रदान करती है। शारीरिक शिक्षा स्वास्थ्य में सुधार लाकर कार्य-कुशलता को बढ़ाने में सहायता करती है और शिक्षा मानसिक विकास के उद्देश्यों की पूर्ति करने में विशेष भूमिका निभाती है।अतः आज के समय में शारीरिक शिक्षा (Physical Education) शिक्षा का अभिन्न अंग है जिससे व्यक्ति के जीवन का प्रत्येक पक्ष प्रभावित होता है।

प्रश्न 4.
व्यक्ति के व्यवहार पर सामाजिक संस्थाओं के प्रभावों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
व्यक्ति के व्यवहार पर सामाजिक संस्थाओं के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं
1. परिवार-परिवार एक ऐसी संस्था है जो अपने सदस्यों को विशेषकर बच्चों को समाज के रहन-सहन एवं खाने-पीने के ढंग सिखाती है। यह वह स्थान है जहाँ पर बच्चा अपने आने वाले जीवन के लिए स्वयं को तैयार करता है। इसलिए कहा जाता है कि बच्चों को बनाने या बिगाड़ने में माता-पिता का काफी हाथ होता है। अगर परिवार को व्यक्तित्व निखारने की संस्था कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा। अतः परिवार व्यक्तिगत व्यवहार को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

2. धार्मिक संस्थाएँ-आज के युग में स्कूल तथा कॉलेज खुलने से विद्या का स्वरूप ही बदल गया है। चाहे अब शैक्षिक विद्या धार्मिक संस्थानों में नहीं दी जाती, पर फिर भी धार्मिक संस्थाएँ व्यक्ति के जीवन पर बहुत प्रभाव डालती हैं। धार्मिक संस्थानों में जाकर व्यक्ति कई अच्छे नैतिक गुण सीखता है।

3. शैक्षिक संस्थाएँ-संस्था के रूप में शैक्षिक संस्थाएँ व्यक्ति के सामाजीकरण पर प्रभाव डालती हैं। इन संस्थाओं का व्यक्ति के व्यवहार पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अगर बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ता है तो उसका प्रभाव अच्छा पड़ता है। स्कूल का अनुशासन, स्वच्छ वातावरण तथा अच्छे अध्यापकों का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यदि इन संस्थाओं का वातावरण अच्छा न हो, तो वे अच्छे गुणों से वंचित रह जाएँगे।

4. समुदाय या समूह-सभी अच्छी-बुरी चीज़ों का व्यक्ति पर प्रभाव पड़ता है। अगर वह अच्छे समुदाय में रह रहा है तो उस पर अच्छा असर पड़ता है। अगर वह बुरे समुदाय में रह रहा है तो उस पर बुरा असर पड़ेगा। इस तरह समुदाय या समूह व्यक्ति के व्यवहार पर गहरी छाप छोड़ता है।

5. राष्ट्र-हम लोकतंत्र और धर्म-निरपेक्ष देश के निवासी हैं । इसलिए हमारी हर संस्था लोकतांत्रिक है। इसका हमारे व्यक्तित्व व्यवहार पर गहरा प्रभाव है। हमारे देश में हर प्रकार की आजादी है। कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को अपना सकता है। जिस तरह का काम करना चाहता है, कर सकता है। उसको कोई नहीं रोक सकता। केवल परिवार, शैक्षिक संस्थाएँ, समुदाय और धार्मिक संस्थाएँ ही व्यक्ति के व्यवहार पर असर नहीं डालतीं, बल्कि राष्ट्र का भी उस पर गहरा असर पड़ता है।

प्रश्न 5.
शारीरिक शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु एक शिक्षक क्या भूमिका निभा सकता है?
उत्तर:
वर्तमान में स्कूल ही एकमात्र ऐसी प्राथमिक संस्था है, जहाँ शारीरिक शिक्षा प्रदान की जाती है। विद्यार्थी स्कूलों में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान शिक्षकों से सीखते हैं। मुख्याध्यापक व शिक्षक-वर्ग विद्यार्थियों के लिए शारीरिक शिक्षा का कार्यक्रम बनाकर उन्हें शिक्षा देते हैं जिनसे विद्यार्थी यह जान पाते हैं कि किन तरीकों और साधनों से वे अपने शारीरिक संस्थानों व स्वास्थ्य को सुचारु व अच्छा बनाए रख सकते हैं। शिक्षकों द्वारा ही उनमें अपने शरीर व स्वास्थ्य के प्रति एक स्वस्थ और वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित किया जा सकता है और उनको अच्छे स्वास्थ्य हेतु प्रेरित किया जा सकता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 6.
खेलकूद द्वारा राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा कैसे मिलता है? अथवा शारीरिक शिक्षा का राष्ट्र के उत्थान में क्या योगदान है?
उत्तर:
खेल एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा व्यक्ति या खिलाड़ी एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। खेल के मैदान में मित्रता पनपती है तथा कई बार गहरे रिश्ते तक स्थापित हो जाते हैं । खेलों में एक-दूसरे के साथ मिलकर चलने में ही सफलता प्राप्त होती है। जब एक टीम राष्ट्र के लिए खेलती है तो उसमें एक प्रांत या जाति के लोग नहीं होते। सभी खिलाड़ी एक परिवार के सदस्यों की भाँति खेलते हैं। इनमें कोई जाति-पाति, रंग-भेद नहीं होता। सभी खिलाड़ी पूर्ण शक्ति लगाकर देश की जीत में बराबर के हिस्सेदार होते हैं । अतः खेलों के प्रसार से आपसी सद्भावना एवं एकता को बढ़ावा मिलता है तथा देश की अनेक समस्याओं का समाधान हो जाता है। राजनीतिक भावना से खेल खेलना विश्व-बंधुत्व को समाप्त करना है। रूस द्वारा ओलंपिक खेलों का आयोजन करने पर अमेरिका द्वारा उसका बहिष्कार किया जाना इसका एक उदाहरण है। इसी प्रकार अमेरिका द्वारा आयोजित खेलों में रूस तथा उसके सहयोगी देशों का भाग न लेना ओलंपिक खेलों के मूल आधार को ठेस पहुंचाता है । ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए कड़े कदम उठाना हम सबके लिए अति-आवश्यक है।

प्रश्न 7.
खेलकूद द्वारा संस्कृति का विकास कैसे संभव है?
अथवा
क्या खेलकूद मनुष्य की सांस्कृतिक विरासत हैं? स्पष्ट करें। अथवा
“खेलकूद, मनुष्य की एक सांस्कृतिक विरासत है।” इस कथन पर अपने विचार प्रकट कीजिए।
अथवा
मानव की सांस्कृतिक विरासत के रूप में खेलकूद’ पर एक लेख लिखें।
उत्तर:
संस्कृति मनुष्य की सबसे बड़ी धरोहर है। यह संस्कृति ही है जो मनुष्य को पशुओं से पृथक् करती है। संस्कृति व्यक्ति के समूह में रहन-सहन के ढंग, जीवन-विधि, विचारधारा आदि से संबंधित मानी जाती है। जीवन में खेलकूद का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना कि पृथ्वी पर मानव-जीवन। खेलकूद शारीरिक गतिविधियों का दूसरा रूप है। जब से मनुष्य ने धरती पर जन्म लिया है, वह किसी-न-किसी प्रकार की गतिविधियाँ करता ही आया है। प्राचीनकाल में शिकार खेलना, भाले का प्रयोग करना, तीर चलाना, शिकार के पीछे भागना आदि एक प्रकार से खेल ही थे। धीरे-धीरे इन क्रियाओं में बढ़ोतरी हुई तथा नाच-गाना आदि सम्मिलित होने लगा। खेलों के प्रति इसी रुझान से यूनान में ओलंपिक खेलों का जन्म हुआ।

सांस्कृतिक विरासत का अर्थ उचित परिवर्तनों के साथ मूल्यों, परंपराओं और प्रथाओं आदि का भूत से वर्तमान तक तथा वर्तमान से भविष्य में स्थानांतरण करना है। सांस्कृतिक विरासत प्रत्येक राष्ट्र का गर्व है। कुछ राष्ट्र शारीरिक गतिविधियों या क्रीड़ाओं को संस्कृति का रूप मानते हैं और कुछ सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखते हैं। हमारे पूर्वज इन क्रियाओं में अपने बच्चों को निपुण बनाना अपना धर्म समझते थे और इन्हें जीवन का अभिन्न अंग मानते थे। इस प्रकार के प्रयास के कारण हमारे पूर्वज जो क्रियाएँ करते थे वे आधुनिक युग में किसी-न-किसी रूप में अभी भी प्रचलित हैं।

प्रश्न 8.
समूह की गतिशीलता की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
अथवा
समूह की गत्यात्मकता (Group Dynamic) पर संक्षिप्त चर्चा करें।
उत्तर:
समूह की गतिशीलता (गत्यात्मकता) का सर्वप्रथम प्रयोग सन् 1924 में मैक्सवर्थीमर (Max Wertheimer) ने किया। डायनैमिक (Dynamic) शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ होता है-शक्ति । इस प्रकार समूह की गतिशीलता/गत्यात्मकता का अर्थ उन शक्तियों या गतिविधियों से होता है जो एक समूह के अंदर कार्य करती हैं।

हम इस तथ्य को जानते हैं कि शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है। किसी व्यक्ति के व्यवहार में यह वांछनीय परिवर्तन लाती है। जब एक बच्चे का विद्यालय में प्रवेश होता है, तो वह विद्यालय तथा अपनी कक्षा के वातावरण को समझने की कोशिश करता है। वह दूसरे बच्चों से मिलने की इच्छा करता है, और उनमें से कुछ एक की तरह व्यवहार करने की भी इच्छा करता है। वह अपने अध्यापकों से भी प्रशंसा चाहता है ताकि दूसरे बच्चे उसके बारे में अच्छा दृष्टिकोण या विचार रख सकें। इस प्रकार उसका व्यवहार लगातार प्रभावित होता रहता है। विशेष रूप से वह अपने समूह के सदस्यों द्वारा प्रभावित होता है। वे शक्तियाँ, जो विद्यालय के वातावरण में उसको प्रभावित करती हैं, उसके उचित व्यवहार के प्रतिरूप के विकास के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण होती हैं।

प्रश्न 9.
मानव का विकास समाज से संभव है। व्याख्या करें।
अथवा
मनुष्य और समाज का परस्पर क्या संबंध है?
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। आधुनिक युग में मानव-संबंधों की आवश्यकता पहले से अधिक अनुभव की जाने लगी है। कोई भी व्यक्ति अपने-आप में पूर्ण नहीं है। किसी-न-किसी कार्य के लिए उसे दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। इन्हीं जरूरतों के कारण समाज में अनेक संगठनों की स्थापना की गई है। समाज द्वारा ही मनुष्य की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। अतः मनुष्य समाज पर आश्रित रहता है तथा इसके द्वारा ही उसका विकास संभव है।

प्रश्न 10.
स्कूल या शैक्षिक संस्थाओं का सामाजीकरण में क्या योगदान है?
उत्तर:
स्कूल या शैक्षिक संस्थाएँ बच्चे के सामाजीकरण पर प्रभाव डालती हैं। इन संस्थाओं का बच्चों के व्यवहार पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। अगर बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़ता है तो उसका प्रभाव अच्छा पड़ता है। इसके विपरीत यदि बच्चा ऐसे स्कूल में पढे जहाँ पढ़ाई पर अधिक ध्यान न दिया जाए तो उसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। स्कूल के अनुशासन, स्वच्छ वातावरण और अच्छे शिक्षकों का बच्चे पर गहरा प्रभाव पड़ता है। आज के भौतिक एवं वैज्ञानिक युग में प्रत्येक माता-पिता अपने बच्चे को हर स्थिति में अच्छी-से-अच्छी शिक्षा दिलाना चाहते हैं ताकि वह अच्छी शिक्षा प्राप्त कर अपने जीवन में सफलता प्राप्त कर सके। इस प्रकार स्कूल या शैक्षिक संस्थाओं का सामाजीकरण में महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 11.
शारीरिक शिक्षा में नेतृत्व के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा में निम्नलिखित दो प्रकार का नेतृत्व होता है
1.अध्यापक का नेतृत्व-शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापक का नेतृत्व बहुत ही आवश्यक है। शारीरिक शिक्षा का अध्यापक या शिक्षक कुशल होना चाहिए तभी वह शिक्षण संस्थान के लिए व विद्यार्थियों के लिए वरदान सिद्ध हो सकता है। भारतवर्ष में शारीरिक शिक्षा के बहुत से संस्थान हैं। इसलिए शारीरिक शिक्षा के अध्यापक को अब अपना नेतृत्व ठीक ढंग से करना पड़ेगा, अन्यथा विद्यार्थियों पर इसका नकारात्मक प्रभाव हो सकता है। उनको अब अधिक कार्य करना पड़ेगा तथा सुनियोजित ढंग से शारीरिक शिक्षा के कार्यक्रम चलाने होंगे। तभी वे शारीरिक शिक्षा के अच्छे नेता सिद्ध हो सकते हैं। शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में एक शिक्षक के नेतृत्व का बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है क्योंकि वह विद्यार्थियों के काफी समीप होता है। उसके व्यक्तित्व व गुणों का प्रभाव अवश्य ही विद्यार्थियों पर पड़ता है।

2. विद्यार्थी का नेतृत्व-कॉलेज के स्तर पर शारीरिक शिक्षा ऐच्छिक विषय के रूप में शुरू होने से विद्यार्थी के नेतृत्व को बढ़ावा मिल गया है। खेलकूद एवं शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी को बहुत-से कार्य करने पड़ते हैं। उन्हें कई बार अपने शारीरिक शिक्षक की सहायता भी करनी पड़ती है। वास्तव में, प्रशिक्षण या प्रतियोगिताओं के दौरान ऐसे विद्यार्थियों की बहुत आवश्यकता होती है। पिकनिक पर जाते हुए, लंबी दूरी की दौड़ों में और कॉलेजों तथा महाविद्यालयों में अनुशासन ठीक रखने के लिए उनकी काफी हद तक जिम्मेदारी होती है। इसके अतिरिक्त खेलों के समय जब अभ्यास किया जाता है या किसी प्रतियोगिता के लिए टीम बाहर जाती है तो उस समय भी विद्यार्थियों के नेतृत्व की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 12.
विद्यार्थी नेता को कैसे चुना जाता है?
अथवा
विद्यार्थी नेता को किन-किन ढंगों या तरीकों से चुना जा सकता है?
उत्तर:
विद्यार्थी नेता को निम्नलिखित ढंग अपनाकर चुना जा सकता है
1. मनोनीत करना-इस ढंग के अनुसार विद्यार्थी अपना नेता स्वयं नहीं चुनते, क्योंकि छोटी कक्षा के बच्चे अपना नेता चुनने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए अध्यापक सब विद्यार्थियों के गुणों को ध्यान में रखकर उस विद्यार्थी को नेता बनाते हैं, जिसमें नेतृत्व वाले गुण होते हैं।

2. चुनाव करवाना-यह ढंग आमतौर पर बड़े विद्यार्थियों में अपनाया जाता है, क्योंकि यह उस स्थिति में होता है जिसमें वे अपना बुरा-भला खुद समझ सकते हैं। इस तरह सभी विद्यार्थी अपनी जिम्मेवारी समझकर अपना नेता चुनते हैं। यह ठीक है कि इस तरीके में बहुत मुश्किलें आती हैं । विद्यार्थी अलग-अलग दलों में बँट जाते हैं जोकि बाद में झगड़े का रूप धारण कर लेते हैं। परंतु योग्य अध्यापक के नेतृत्व में ये झगड़े जल्दी सुलझाए जा सकते हैं।

3. लॉटरी द्वारा-इसके अनुसार नेता की चुनाव प्रक्रिया लॉटरी निकालकर की जाती है। इसका उपयोग उस समय किया जाता है जब कक्षा में सारे विद्यार्थी एक ही प्रकार के गुण आदि रखते हों। इसमें किस्मत का बहुत हाथ होता है। इसमें नुकसान भी हो सकता है। कभी-कभी तो पर्ची या लॉटरी ऐसे विद्यार्थी की निकल जाती है, जिसमें नेतृत्व के गुण नहीं होते। इससे सारी कक्षा को नुकसान उठाना पड़ता है।

4. बारी-बारी लीडर बनना-इसका उपयोग उस समय किया जाता है जब सारे विद्यार्थी नेतृत्व की योग्यता रखते हों। इसमें प्रत्येक विद्यार्थी को बारी-बारी से मॉनीटर या अगवाई का मौका दिया जाता है। इसमें सबसे बड़ा नुकसान यह है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपने तरीके से कक्षा का प्रबंध आदि करता है, जिससे कक्षा में अनुशासन की कमी आ जाती है।

5. योग्यतानुसार चयन-इसके अनुसार कक्षा में सबसे अधिक योग्यता रखने वाले विद्यार्थी को ही नेता बनाया जाता है। कई खेलों में तो यह तरीका बहुत महत्त्वपूर्ण है; जैसे जिम्नास्टिक, तैराकी आदि में। इस तरह विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर अपना योगदान दे सकते हैं।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 13.
सामाजिक मूल्यों को विकसित करने में शारीरिक शिक्षा की भूमिका का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का सामाजीकरण में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान है। शारीरिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य खिलाड़ी या व्यक्ति में ऐसे सामाजिक मूल्यों को विकसित करना है जिससे समाज में रहते हुए वह सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से निम्नलिखित सामाजिक गुणों या मूल्यों को विकसित किया जा सकता है
(1) खेल या शारीरिक शिक्षा मनुष्य के व्यवहार में परिवर्तन लाती है।
(2) शारीरिक शिक्षा से त्याग की भावना पैदा होती है।
(3) शारीरिक शिक्षा व खेलों से खिलाड़ियों में तालमेल की भावना जागरूक होती है।
(4) मानव के समुचित विकास के लिए सहनशीलता व धैर्यता अत्यन्त आवश्यक है। जिस व्यक्ति में सहनशीलता व धैर्यता होती है वह स्वयं को समाज में भली-भाँति समायोजित कर सकता है। शारीरिक शिक्षा अनेक ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे उसमें इन गुणों को बढ़ाया जा सकता है।
(5) समाज में रहकर हमें एक-दूसरे के साथ मिलकर कार्य करना पड़ता है। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से सहयोग की भावना में वृद्धि होती है।
(6) शारीरिक शिक्षा खिलाड़ी में सामूहिक उत्तरदायित्व जैसे गुण पैदा करती है। खेलों में बहुत-सी ऐसी क्रियाएँ हैं जिनमें खिलाड़ी एक-जुट होकर इन क्रियाओं को पूरा करने का प्रयत्न करते हैं।

प्रश्न 14.
परिवार, व्यक्ति के व्यवहार पर किस प्रकार प्रभाव डालता है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण संस्था है। बच्चा इसी संस्था में जन्म लेता है और इसी में पलता है। परिवार में बच्चा अपने माता-पिता तथा भाई-बहनों से सामाजीकरण का प्रथम पाठ पढ़ता है। परिवार में माता-पिता और दूसरे सदस्यों के आपसी संबंध, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियाँ, पारिवारिक मूल्य और परंपराएँ बच्चों के व्यवहार पर गहरा प्रभाव डालती हैं। इसलिए कहते हैं कि परिवार में अच्छे वातावरण का होना बहुत आवश्यक है। अगर परिवार में सदस्यों के आपसी संबंध ठीक न हों, तनाव बना रहता हो तथा सभी सदस्यों की प्राथमिक जरूरतें पूरी न होती हों तो बच्चे बुरी आदतों के शिकार हो सकते हैं । इसलिए जरूरी है कि परिवार में माता-पिता अच्छे वातावरण का निर्माण करें जिससे बच्चे या व्यक्ति में अच्छे गुणों व आदतों का विकास हो सके।

अगर परिवार को व्यक्तित्व निखारने की संस्था कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा। आमतौर पर यह देखने में आया है कि जिस परिवार की रुचि संगीत कला, नृत्य-कला, खेलकूद या किसी और विशेष क्षेत्र में होती है, उस परिवार के बच्चे की रुचि प्राकृतिक रूप से उसी क्षेत्र में हो जाती है। अगर परिवार की रुचि खेलकूद के क्षेत्र में या किसी विशेष खेल में है तो उस परिवार में बढ़िया खिलाड़ी पैदा होना या उस खेल के प्रति दिलचस्पी रखना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं होगी। इस प्रकार परिवार व्यक्तिगत व समूह व्यवहार को सबसे अधिक प्रभावित करता है।

प्रश्न 15.
ग्रीस में खेल के ऐतिहासिक विकास का उल्लेख करें।
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का जन्मदाता यूनान/ग्रीस को माना जाता है। ग्रीस में सैनिकों को शारीरिक दृष्टि से मजबूत करने हेतु प्रशिक्षण दिया जाता था। धीरे-धीरे कुछ नियम बनते गए, जिससे ये शारीरिक प्रशिक्षण खेलकूद या शारीरिक शिक्षा में परिवर्तित होते गए। ग्रीस के लोगों को खेलों में विशेष रुचि थी। उन्होंने ही ओलंपिक खेल विश्व को प्रदान किए।आज ओलंपिक खेलों की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई है कि प्रत्येक देश इनमें भाग लेने और अच्छे-से-अच्छा प्रदर्शन करने के लिए प्रयास करता है, ताकि वह विश्व पर अपना प्रभाव छोड़ सके। वे खेलों की उपयोगिता को अच्छे से जानते थे। इसी कारण ग्रीस में खेलकूद को शिक्षा का अभिन्न अंग समझा जाता था। खेलों की दृष्टि से यूनानी सभ्यता को खेलों का स्वर्ण काल कहा जा सकता है। प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक प्लेटो के अनुसार, “शरीर के लिए जिम्नास्टिक और आत्मा के लिए संगीत का विशेष महत्त्व है।”

प्रश्न 16.
भारत में खेलों के ऐतिहासिक विकास का उल्लेख करें।
उत्तर:
खेलकूद की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। प्राचीनकाल में शिष्य अपने गुरुओं से धार्मिक ग्रंथों तथा दर्शनशास्त्र का अध्ययन करने के अतिरिक्त युद्ध एवं खेल कौशल में भी प्रशिक्षण प्राप्त करते थे। इनमें मुख्य रूप से तीरंदाजी, घुड़सवारी, भाला फेंकना, तलवार चलाना, मल्लयुद्ध आदि क्रियाएँ सम्मिलित थीं। भगवान श्रीकृष्ण, कर्ण, अर्जुन आदि धनुर्विद्या में प्रसिद्ध थे। भीम एक महान् पहलवान था। दुर्योधन मल्लयुद्ध में कुशल था। इसी प्रकार चौपड़, शतरंज, खो-खो, कुश्ती और कबड्डी आदि खेलों का उल्लेख भी भारतीय इतिहास में मिलता है। आधुनिक भारत में क्रिकेट बहुत लोकप्रिय खेल बन गई है। आज लगभग सभी आधुनिक खलों में भारत का विशेष योगदान है। संक्षेप में भारत में खेलों का इतिहास बहुत पुराना और विकसित है।।

प्रश्न 17.
नेतृत्व के विभिन्न प्रकार कौन-कौन-से हैं?
अथवा
नेता के प्रकारों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नेतृत्व/नेता के विभिन्न प्रकार निम्नलिखित हैं
1.संस्थागत नेता-इस प्रकार के नेता संस्थाओं के मुखिया होते हैं। स्कूल, कॉलेज, परिवार, फैक्टरी या दफ्तर आदि को मुखिया की आज्ञा का पालन करना पड़ता है।
2. प्रभुता-संपन्न या तानाशाही नेता-इस प्रकार का नेतृत्व एकाधिकारवाद पर आधारित होता है। इस प्रकार का नेता अपने आदेशों का पालन शक्ति से करवाता है और यहाँ तक कि समूह का प्रयोग भी अपने हित के लिए करता है। यह नेता नियम और आदेशों को समूह में लागू करने का अकेला अधिकारी होता है। स्टालिन, नेपोलियन और हिटलर इस प्रकार के नेता के उदाहरण हैं।
3. आदर्शवादी या प्रेरणात्मक नेता-इस प्रकार का नेता समूह पर अपना प्रभाव तर्क-शक्ति से डालता है और समूह अपने नेता के आदेशों का पालन अक्षरक्षः (ज्यों-का-त्यों) करता है। समूह के मन में अपने नेता के प्रति सम्मान होता है। नेता समूह या लोगों की भावनाओं का आदर करता है। महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन, जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री इस तरह के नेता थे।
4. विशेषज्ञ नेता-समूह में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनको किसी विशेष क्षेत्र में कुशलता हासिल होती है और वे अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। ये नेता अपनी कुशल सेवाओं को समूह की बेहतरी के लिए इस्तेमाल करते हैं और समूह इन कुशल सेवाओं से लाभान्वित होता है। इस तरह के नेता अपने विशेष क्षेत्र; जैसे डॉक्टरी, प्रशिक्षण, इंजीनियरिंग तथा कला-कौशल के विशेषज्ञ होते हैं।

प्रश्न 18.
एक अच्छे नेता में कौन-कौन से गुण होने चाहिएँ? अथवा
उत्तर:
एक अच्छे नेता में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) एक अच्छे नेता में पेशेवर प्रवृत्तियों का होना अति आवश्यक है। अच्छी पेशेवर प्रवृत्तियों का होना न केवल नेता के लिए आवश्यक है बल्कि समाज के लिए भी अति-आवश्यक है।
(2) एक अच्छे नेता की सोच सकारात्मक होनी चाहिए, ताकि बच्चे और समाज उससे प्रभावित हो सकें।
(3) उसमें ईमानदारी, निष्ठा, समय-पालना, न्याय-संगतता एवं विनम्रता आदि गुण होने चाहिएँ।
(4) उसके लोगों के साथ अच्छे संबंध होने चाहिएं।
(5) उसमें भावनात्मक संतुलन एवं सामाजिक समायोजन की भावना होनी चाहिए।
(6) उसे खुशमिजाज तथा कर्मठ होना चाहिए।
(7) उसमें बच्चों के प्रति स्नेह और बड़ों के प्रति आदर-सम्मान की भावना होनी चाहिए।
(8) उसका स्वास्थ्य भी अच्छा होना चाहिए, क्योंकि अच्छा स्वास्थ्य अच्छी आदतें विकसित करने में सहायक होता है।
(9) उसका मानसिक दृष्टिकोण सकारात्मक एवं उच्च-स्तर का होना चाहिए।

प्रश्न 19.
खेल व स्पर्धा कैसे व्यक्ति व समूह व्यवहार को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
खेलों में भाग लेने से व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होता है। उसमें नेतृत्व, आत्म-अभिव्यक्ति, सहयोग, अनुशासन, धैर्य आदि अनेक गुण विकसित हो जाते हैं । जीवन की चिंताओं से मुक्ति पाने हेतु भी खेल व स्पर्धा बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये खिलाड़ियों के मनोभावों, रिवाजों, संस्कृतियों व व्यवहार को समझने हेतु अवसर प्रदान करते हैं। अतः इनके कारण व्यक्ति व समूह व्यवहार काफी प्रभावित होता है। व्यक्ति एवं समूह का व्यवहार सकारात्मक एवं विस्तृत होता है और उनमें अनेक नैतिक एवं सामाजिक गुणों का विकास होता है। ये गुण जीवन में सफल एवं उपलब्धि प्राप्त करने हेतु आवश्यक होते हैं।

प्रश्न 20.
खेल व स्पर्धा से सामाजीकरण को कैसे सुधारा या बढ़ाया जा सकता है?
उत्तर:
खेल व स्पर्धा का संबंध व्यक्ति से होता है। अतः ये प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । ये स्वतंत्र व्यवहार का विकास करने में सहायक होते हैं। ये हमें समाज की चिंताओं से भी स्वतंत्र करते हैं। इनके द्वारा हम कोई भी प्रशासनिक, नैतिक एवं सामाजिक गुण विकसित कर सकते हैं अर्थात् संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास खेल व स्पर्धा से संभव है। इनके माध्यम से समाज के प्रति सकारात्मक व सामाजिक दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता है। इस तरह खेल व स्पर्धा से सामाजीकरण को सुधारा जा सकता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

प्रश्न 21.
शारीरिक शिक्षा, स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में कैसे सहायता करती है?
उत्तर:
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे समाज के साथ रहना पड़ता है। यदि व्यक्ति को सफल जीवन व्यतीत करना है तो उसे स्वयं को पूर्ण रूप से स्वस्थ रखना होगा। इस कार्य में शारीरिक शिक्षा उसको महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान करती है। शारीरिक शिक्षा व्यक्ति के प्रत्येक पहलू को प्रभावित करती है और उन्हें विकसित करने में सहायक होती है। शारीरिक शिक्षा कई ऐसे अवसर प्रदान करती है जिससे व्यक्ति में अनेक सामाजिक एवं नैतिक गुणों का विकास होता है। इसके माध्यम से वह अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहता है, एक-दूसरे को सहायता करता है, दूसरों की भावनाओं की कदर करता है और मनोविकारों व बुरी आदतों से दूर रहता है। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा, स्वस्थ जीवन व्यतीत करने में सहायता करती है।

प्रश्न 22.
शारीरिक शिक्षा खाली समय का सदुपयोग करना कैसे सिखाती है ?
उत्तर:
किसी ने ठीक ही कहा है कि “खाली दिमाग शैतान का घर होता है।” (An idle brain is a devil’s workshop.) यह आमतौर पर देखा जाता है कि खाली या बेकार व्यक्ति को हमेशा शरारतें ही सूझती हैं। कभी-कभी तो वह इस प्रकार के अनैतिक कार्य करने लग जाता है, जिनको सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं समझा जा सकता। खाली या बेकार समय का सदुपयोग न करके उसका दिमाग बुराइयों में फंस जाता है। शारीरिक शिक्षा में अनेक शारीरिक क्रियाएँ शामिल होती हैं। इन क्रियाओं में भाग लेकर हम अपने समय का सदुपयोग कर सकते है। अतः शारीरिक शिक्षा व्यक्ति को खाली समय का सदुपयोग करना सिखाती है।

खाली समय का प्रयोग यदि खेल के मैदान में खेलें खेलकर किया जाए तो व्यक्ति के हाथ से कुछ नहीं जाता, बल्कि वह कुछ प्राप्त ही करता है। खेल का मैदान जहाँ खाली समय का सदुपयोग करने का उत्तम साधन है, वहीं व्यक्ति की अच्छी सेहत बनाए रखने का भी उत्तम साधन है। इसके अतिरिक्त व्यक्ति को एक अच्छे नागरिक के गुण भी सिखा देता है।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
सोशिओलॉजी (Sociology) शब्द का शाब्दिक अर्थ बताएँ।
अथवा
समाजशास्त्र का अर्थ स्पष्ट करें।
अथवा
‘सोशिओलॉजी’ शब्द लैटिन भाषा के किस शब्द से लिया गया है?
उत्तर:
सोशिओलॉजी (Sociology) शब्द लैटिन भाषा के ‘Socios’ और ग्रीक भाषा के ‘Logos’ शब्द से मिलकर बना है। ‘Socios’ का अर्थ-समाज और ‘Logos’ का अर्थ-शास्त्र या विज्ञान है। अतः समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।

प्रश्न 2.
समाजशास्त्र को परिभाषित कीजिए।
अथवा
समाजशास्त्र की कोई दो परिभाषा लिखें।
उत्तर:
1. आई०एफ० वार्ड के अनुसार, “समाजशास्त्र, समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।”
2. गिलिन व गिलिन के कथनानुसार, “व्यक्तियों के एक-दूसरे के संपर्क में आने के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली अंतःक्रियाओं के अध्ययन को ही समाजशास्त्र कहा जाता है।”

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प्रश्न 3.
सामाजीकरण (Socialization) का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सामाजीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति अपने समुदाय या वर्ग का सक्रिय सदस्य बनकर उसकी परंपराओं या कर्तव्यों का पालन करता है | स्वयं को सामाजिक वातावरण के अनुरूप ढालना सीखता है । यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा वह सांस्कृतिक और व्यक्तिगत विशेषताओं को प्राप्त कर लेता है।

प्रश्न 4.
सामाजीकरण को परिभाषित कीजिए।
अथवा
सामाजीकरण की कोई दो परिभाषा लिखें।
उत्तर:
1, जॉनसन के अनुसार, “सामाजीकरण एक प्रकार की शिक्षा है जो सीखने वाले को सामाजिक कार्य करने के योग्य बना देती है।”
2. अरस्तू के अनुसार, “सामाजीकरण संस्कृति के बचाव के लिए सामाजिक मूल्यों को प्राप्त करने की प्रक्रिया है।”

प्रश्न 5.
देश में स्थापित उन प्रमुख केंद्रों के नाम लिखिए जो नेतृत्व प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।
अथवा
भारत में नेतृत्व प्रशिक्षण संस्थानों के नाम बताइए।
उत्तर:
(1) Y.M.C.A., चेन्नई,
(2) L.N.C.P.E., ग्वालियर,
(3) गवर्नमैंट कॉलेज फिज़िकल एज्यूकेशन, पटियाला,
(4) नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पो, पटियाला।
इसके अतिरिक्त अनेक प्रशिक्षण कॉलेज तथा विभाग देश के विभिन्न भागों; जैसे अमृतसर, चंडीगढ़, कोलकाता, नागपुर, दिल्ली, अमरावती, कुरुक्षेत्र आदि में कार्यरत हैं।

प्रश्न 6.
समाजशास्त्र किस प्रकार अनुशासन बनाने में सहायता करता है?
उत्तर:
समाजशास्त्र समग्र समाज का अध्ययन है। इसके अंतर्गत सामाजिक संबंधों के संपूर्ण क्षेत्र का अध्ययन आ जाता है। इसके अध्ययन द्वारा सामाजिक जीवन में आने वाली बाधाओं को भली-भांति समझा जाता है और उनको दूर करने का व्यावहारिक प्रयास किया जाता है, ताकि व्यक्ति के व्यक्तित्व का समुचित एवं सर्वांगीण विकास हो सके। जब समाज में व्यक्ति को उचित एवं अनुकूल वातावरण मिलेगा तो वे निश्चित रूप में अपने-आपको अनुशासित एवं संगठित करने का प्रयास करेंगे। इस प्रकार समाजशास्त्र अनुशासन बनाने में सहायता करता है।

प्रश्न 7.
सामाजिक संस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सामाजिक संस्थाएँ वे संस्थाएँ होती हैं जो व्यक्ति में सामाजिक गुणों के विकास में बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं और उसे सामाजीकरण का ज्ञान प्रदान करती हैं।

प्रश्न 8.
शारीरिक शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा, शिक्षा का वह अभिन्न अंग है, जो खेलकूद तथा अन्य शारीरिक क्रियाओं के माध्यम से, व्यक्तियों में एक चुनी हुई दिशा में, परिवर्तन लाने का प्रयास करता है। इससे केवल बुद्धि तथा शरीर का ही विकास नहीं होता, बल्कि यह व्यक्ति के स्वभाव, चरित्र एवं आदतों के निर्माण में भी सहायक होती है। अतः शारीरिक शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति के संपूर्ण (शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक) व्यक्तित्व का विकास होता है।

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प्रश्न 9.
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य क्या है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा का लक्ष्य विद्यार्थी को इस प्रकार तैयार करना है कि वह एक सफल एवं स्वस्थ नागरिक बनकर अपने परिवार, समाज व राष्ट्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता या योग्यता उत्पन्न कर सके और समाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बनकर सफलता से जीवनयापन करते हुए जीवन का पूरा आनंद उठा सके।

प्रश्न 10.
शारीरिक शिक्षा में ग्रीस को महत्त्वपूर्ण स्थान क्यों दिया जाता है?
उत्तर:
ग्रीस को शारीरिक शिक्षा का जन्मदाता माना जाता है। ग्रीस ने ही सर्वप्रथम शिक्षा में इस विषय को स्थान दिया है। ग्रीस के लोगों ने ही विश्व को खेलों का ज्ञान प्रदान किया। आज विश्व जो ओलंपिक खेल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित करता है, वह ग्रीस की देन है। ग्रीसवासियों की खेलों में विशेष रुचि के कारण ही खेलों को शिक्षा में शामिल किया गया। इसी कारण शारीरिक शिक्षा में ग्रीस को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है।

प्रश्न 11.
सांस्कृतिक विरासत (Cultural Heritage) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सांस्कृतिक विरासत का अर्थ उचित परिवर्तनों के साथ मूल्यों, परंपराओं और प्रथाओं आदि का भूत से वर्तमान तक तथा वर्तमान से भविष्य में स्थानांतरण करना है। सांस्कृतिक विरासत प्रत्येक राष्ट्र का गर्व है। कुछ राष्ट्र शारीरिक गतिविधियों या क्रीड़ाओं को संस्कृति का रूप मानते हैं और कुछ सांस्कृतिक विरासत के रूप में देखते हैं। हमारे पूर्वज इन क्रियाओं में अपने बच्चों को निपुण बनाना अपना धर्म समझते थे और इन्हें जीवन का अभिन्न अंग मानते थे। इस प्रकार के प्रयास के कारण हमारे पूर्वज जो क्रियाएँ करते थे वे आधुनिक युग में किसी-न-किसी रूप में अभी भी प्रचलित हैं।

प्रश्न 12.
खेल व स्पर्धाओं में भाग लेने से नेतृत्व के गुणों का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में नेतृत्व करने के अनेक अवसर प्राप्त होते हैं। जब कोई खिलाड़ी या व्यक्ति किसी शारीरिक गतिविधि या खेल व स्पर्धा में भाग लेता है तो वह किसी प्रशिक्षक के नेतृत्व में खेल संबंधी नियम प्राप्त करता है। वह प्रशिक्षक से गतिविधि व स्पर्धा संबंधी सभी आवश्यक निर्देश प्राप्त करता है। इससे उसमें नेतृत्व के गुण विकसित होते हैं। कई बार प्रतियोगिताओं का प्रतिनिधित्व करना भी नेतृत्व के गुणों के विकास में सहायक होता है।

प्रश्न 13.
संस्कृति (Culture) किसे कहते हैं? अथवा संस्कृति को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
प्रत्येक पीढ़ी ने अपने पूर्वजों से प्राप्त ज्ञान व कला का अधिक-से-अधिक विकास किया है और नवीन ज्ञान व अनुभवों का भी अर्जन किया है। इस प्रकार के ज्ञान व अनुभव के अंतर्गत प्रथाएँ, विचार व मूल्य आते हैं, इन्हीं के संग्रह को संस्कृति कहा जाता है। रॉबर्ट बीरस्टीड के अनुसार, “संस्कृति वह संपूर्ण जटिलता है जिसमें वे सभी वस्तुएँ शामिल हैं जिन पर हम विचार करते हैं, कार्य करते हैं और समाज के सदस्य होने के नाते अपने पास रखते हैं।”

प्रश्न 14.
शारीरिक शिक्षा के मूलभूत सिद्धांत बताएँ।
उत्तर:
(1) समाजशास्त्रीय/सामाजिक सिद्धांत (Sociological Principles)।
(2) मनोवैज्ञानिक सिद्धांत (Psychological Principles)।
(3) जैविक सिद्धांत (Biological Principles)।

प्रश्न 15.
समूह निर्माण के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
(1) सामूहिक जीवन व वातावरण के विकास हेतु।
(2) व्यक्तिगत प्रशिक्षण की अपेक्षा सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से बाधाओं को दूर करने हेतु।

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प्रश्न 16.
शारीरिक शिक्षा के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले सामाजिक मूल्य बताइए।
उत्तर:
(1) नेतृत्व की भावना,
(2) अनुशासन की भावना,
(3) धैर्यता,
(4) सहनशीलता,
(5) त्याग की भावना,
(6) सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार,
(7) आत्म-विश्वास की भावना,
(8) सामूहिक एकता,
(9) सहयोग की भावना,
(10) खेल-भावना।

प्रश्न 17.
समूह क्या है?
अथवा
समूह (Group) को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
समूह एक ऐसी सामाजिक अवस्था है जिसमें सभी इकट्ठे होकर कार्य करते हैं और अपने-अपने विचारों या भावनाओं को संतुष्ट करते हैं। इसके द्वारा एकीकरण, मित्रता, सहयोग व सहकारिता के विचारों को बढ़ावा मिलता है। समूह में समान उद्देश्यों की पूर्ति हेतु इकट्ठे होकर कार्य किया जाता है।

प्रश्न 18.
प्राथमिक समूह से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्राथमिक समूह वह पारिवारिक समूह है जिसमें भावनात्मक संबंध, घनिष्ठता, प्रेम-भाव प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसमें सशक्त सामाजीकरण, अच्छे चरित्र तथा आचरण का विकास होता है। इस समूह के सदस्य एक-दूसरे से अपनी गतिविधियों व संस्कृति संबंधी वार्तालाप करते हैं।

प्रश्न 19.
द्वितीयक समूह से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
द्वितीयक समूह प्राथमिक समूह से अधिक विस्तृत होता है। यह एक ऐसा समूह है जिसमें अप्रत्यक्ष, प्रभावरहित, औपचारिक संबंध होते हैं। इस समूह में सम्मिलित सदस्यों में कोई भावनात्मक संबंध नहीं होता। ऐसे समूहों में स्वार्थ-प्रवृत्तियाँ अधिक पाई जाती हैं।

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प्रश्न 20.
शारीरिक शिक्षा साम्प्रदायिकता को कैसे रोकने में सहायक होती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, रंग-रूप, धर्म, वर्ग, समुदाय के भेदभाव को स्वीकार नहीं करती।साम्प्रदायिकता हमारे देश के लिए बहुत घातक है। शारीरिक शिक्षा इस खतरे को समाप्त कर राष्ट्र हित की ओर अग्रसर कर देती है। खिलाड़ी सभी बंधनों को तोड़कर एक राष्ट्रीय टीम में भाग लेकर अपने देश का नाम ऊँचा करते हैं। किसी प्रकार के देश विरोधी दंगों में नहीं पड़ते। शारीरिक शिक्षा लोगों में साम्प्रदायिकता की भावना को खत्म करके राष्ट्रीयता की भावना में वृद्धि करती है।

प्रश्न 21.
शारीरिक शिक्षा समूह के आपसी लगाव व एकता में कैसे सहायता करती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा समूह के आपसी लगाव और एकता को बढ़ाने में मदद करती है। यदि एक टीम में आपसी संबंध या लगाव हो और एकता न हो तो उस टीम का खेल स्तर अच्छा होने पर भी, उसका जीतना मुश्किल होता है । शारीरिक शिक्षा से सामाजिक गुणों का विकास होता है और यही सामाजिक गुण आपसी संबंधों और एकता को बढ़ावा देते हैं।

प्रश्न 22.
शारीरिक शिक्षा प्रान्तवाद या क्षेत्रवाद को कैसे रोकने में सहायक होती है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा में प्रान्तवाद या क्षेत्रवाद का कोई स्थान नहीं है। जब कोई खिलाड़ी शारीरिक क्रियाएँ करता या कोई खेल खेलता है तो उस समय उसमें क्षेत्रवाद की कोई भावना नहीं होती। विभिन्न प्रान्तों या राज्यों के खिलाड़ी खेलते समय आपस में सहयोग करते हुए एक-दूसरे की भावनाओं का सत्कार करते हैं, जिससे उनमें राष्ट्रीय एकता की वृद्धि होती है। राष्ट्रीय एकता समृद्ध होती है और देश शक्तिशाली बनता है।

प्रश्न 23.
नेतृत्व (Leadership) से आप क्या समझते हैं?
अथवा
नेतृत्व की कोई दो परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
मानव में नेतृत्व की भावना आरंभ से ही होती है। किसी भी समाज की वृद्धि या विकास उसके नेतृत्व की विशेषता पर निर्भर करती है। नेतृत्व व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह दूसरे व्यक्तियों के जीवन के विभिन्न पक्षों में मार्गदर्शन करता है।
1. मॉण्टगुमरी के अनुसार, “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा तथा योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।”
2. ला-पियरे व फा!वर्थ के अनुसार, “नेतृत्व एक ऐसा व्यवहार है जो लोगों के व्यवहार पर अधिक प्रभाव डालता है, न कि लोगों के व्यवहार का प्रभाव उनके नेता पर।” ।

प्रश्न 24.
हमें एक नेता की आवश्यकता क्यों होती है?
उत्तर:
नेता जनता का प्रतिनिधि होता है। वह सरकार या प्रशासन को लोगों की आवश्यकताओं व समस्याओं से अवगत करवाता है। वह लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रयास करता है। एक नेता के माध्यम से ही जनता अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं समस्याओं के निवारण हेतु प्रयास करती है। इसलिए हमें अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एवं समस्याओं के निवारण हेतु एक नेता की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 25.
सुनागरिक बनाने में शारीरिक शिक्षा का क्या योगदान है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा मनुष्य के शरीर, मन और बुद्धि तीनों का एक-साथ विकास करती है जो व्यक्ति के सुनागरिक बनने के लिए आवश्यक हैं। यह स्वाभाविक है कि शरीर के विकास के साथ-साथ मानसिक या बौद्धिक विकास भी होता है। शारीरिक शिक्षा के माध्यम से श्रेष्ठ विचारों की पूर्ति होती है। इसलिए शारीरिक शिक्षा एक अच्छे नागरिक के गुणों का विकास करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है। मॉण्टेग्यू के अनुसार, “शारीरिक शिक्षा न तो मस्तिष्क का और न ही शरीर का प्रशिक्षण करती है, बल्कि यह संपूर्ण . व्यक्ति का प्रशिक्षण करती है।”

प्रश्न 26.
एक अच्छे नेता का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
प्रत्येक समाज या देश के लिए एक अच्छा नेता बहुत महत्त्वपूर्ण होता है क्योंकि वह समाज और देश को एक नई दिशा देता है। अच्छे नेता में एक खास किस्म के गुण होते हैं जिनके कारण वह सभी को एकत्रित कर काम करने के लिए प्रेरित करता है। वह प्रशासन को लोगों की आवश्यकताओं से अवगत करवाता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

HBSE 12th Class Physical Education शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न] [Objective Type Questions]

भाग-I: एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
समाज क्या है?
उत्तर:
समाज सामाजिक संबंधों का एक जाल है।

प्रश्न 2.
मनुष्य को कैसा प्राणी कहा गया है?
अथवा
मनुष्य कैसा प्राणी है?
उत्तर:
मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है।

प्रश्न 3.
‘समाजशास्त्र’ किस भाषा का शब्द है?
उत्तर:
‘समाजशास्त्र’ लैटिन भाषा का शब्द है।

प्रश्न 4.
‘समाजशास्त्र, समाज का वैज्ञानिक अध्ययन है।’ यह किसका कथन है?
उत्तर;
आई० एफ० वार्ड का।

प्रश्न 5.
जॉनसन द्वारा दी गई समाजशास्त्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
जॉनसन के अनुसार, “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का विज्ञान है-सामाजिक समूह सामाजिक अंतःक्रियाओं की ही एक व्यवस्था है।”

प्रश्न 6.
“समाजशास्त्र का अतीत अत्यधिक लंबा है लेकिन इतिहास उतना ही छोटा है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन रॉबर्ट बीरस्टीड ने कहा।

प्रश्न 7.
समाजशास्त्र का पिता या जनक किसे कहा जाता है?
उत्तर:
समाजशास्त्र का पिता या जनक ऑगस्ट कॉम्टे को कहा जाता है।

प्रश्न 8.
बच्चा सामाजीकरण का प्रथम पाठ कहाँ से सीखता है?
उत्तर:
बच्चा सामाजीकरण का प्रथम पाठ परिवार से सीखता है।

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प्रश्न 9.
‘डायनैमिक’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया था?
उत्तर:
‘डायनैमिक’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग मैक्स वर्थीमर ने किया था।

प्रश्न 10.
डायनैमिक (Dynamic) शब्द किस भाषा से लिया गया है?
उत्तर:
डायनैमिक (Dynamic) शब्द ग्रीक भाषा से लिया गया है।

प्रश्न 11.
क्या समाजशास्त्र अच्छे खिलाड़ी बनाने में सहायक है?
उत्तर:
हाँ, समाजशास्त्र अच्छे खिलाड़ी बनाने में सहायक है।

प्रश्न 12.
किस देश को बॉल गेम्स का जन्मदाता कहा जाता है?
उत्तर:
इंग्लैंड को बॉल गेम्स का जन्मदाता कहा जाता है।

प्रश्न 13.
बेसबॉल और वॉलीबॉल का प्रारंभ किस देश से हुआ?
उत्तर:
बेसबॉल और वॉलीबॉल का प्रारंभ अमेरिका से हुआ।

प्रश्न 14.
शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद से किस प्रकार के मूल्यों का विकास होता है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा एवं खेलकूद से सामाजिक व नैतिक मूल्यों का विकास होता है।

प्रश्न 15.
कोई चार सामाजिक मूल्य बताइए।
उत्तर:
(1) धैर्य,
(2) सहयोग की भावना,
(3) बंधुत्व,
(4) सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार।

प्रश्न 16.
“मजबूत शारीरिक नींव के बिना कोई राष्ट्र महान् नहीं बन सकता।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन डॉ० राधाकृष्णन का है।

प्रश्न 17.
“शरीर के लिए जिम्नास्टिक तथा आत्मा के लिए संगीत का विशेष महत्त्व है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन प्लेटो ने कहा।

प्रश्न 18.
मनुष्य में पाई जाने वाली मूल प्रवृत्तियाँ कौन-कौन-सी हैं?
उत्तर:
(1) शिशु रक्षा,
(2) आत्म प्रदर्शन,
(3) सामूहिकता।

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प्रश्न 19.
समूह की सबसे छोटी इकाई कौन-सी है?
उत्तर:
समूह की सबसे छोटी इकाई परिवार है।

प्रश्न 20.
“समाज के बिना मनुष्य पशु है या देवता।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन अरस्तू का है।

प्रश्न 21.
एक राष्ट्र कैसी संस्था है?
उत्तर:
सामाजिक संस्था।

प्रश्न 22.
उन शक्तियों को क्या कहते हैं जो एक समूह के अंदर कार्य करती हैं?
उत्तर:
समूह की गतिशीलता।

प्रश्न 23.
परिवार कैसी संस्था है?
उत्तर:
सामाजिक संस्था

प्रश्न 24.
नेता का प्रमुख गुण क्या होना चाहिए?
उत्तर:
नेता का प्रमुख गुण ईमानदारी एवं कर्मठता होना चाहिए।

प्रश्न 25.
समूह कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
समूह दो प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 26.
सन् 1961 में राष्ट्रीय खेल संस्था कहाँ स्थापित की गई?
उत्तर:
सन् 1961 में राष्ट्रीय खेल संस्था पटियाला में स्थापित की गई।

प्रश्न 27.
Y.M.C.A. की स्थापना किसने और कहाँ की थी?
उत्तर:
Y.M.C.A. की स्थापना शारीरिक शिक्षा के भारतीय प्रचारक श्री एच०सी० बँक ने चेन्नई में की थी।

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प्रश्न 28.
सामाजिक संगठनों का आधार क्या है?
उत्तर:
सामाजिक संगठनों का आधार परिवार है।

प्रश्न 29.
“समाजशास्त्र को चिंतनशील जगत् का बच्चा माना जाता है।” यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन मिचेल का है।

प्रश्न 30.
व्यक्ति का व्यक्तित्व किन पक्षों पर आधारित है?
उत्तर:
(1) शारीरिक पक्ष,
(2) मानसिक पक्ष,
(3) सामाजिक पक्ष।

प्रश्न 31.
किस देश ने जिम्नास्टिक पर बल दिया था?
उत्तर:
जर्मनी ने जिम्नास्टिक पर बल दिया था।

प्रश्न 32.
Y.M.C.A. कहाँ पर स्थित है?
उत्तर:
चेन्नई में।

प्रश्न 33.
Y.M.C.A. का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
Young Men’s Christian Association.

प्रश्न 34.
खेलों द्वारा किस विशाल भावना का विकास होता है?
उत्तर:
खेलों द्वारा विश्व-शक्ति एवं बंधुत्व की भावना का विकास होता है।

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प्रश्न 35.
विद्यालय कैसी संस्था है?
उत्तर:
सामाजिक संगठन।

प्रश्न 36.
व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करने वाले कारक कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) परिवार,
(2) समाज,
(3) मित्र-मण्डली,
(4) सामाजिक वातावरण।

प्रश्न 37.
घर, परिवार, विद्यालय व महाविद्यालय किस प्रकार के संगठन हैं?
उत्तर:
घर, परिवार, विद्यालय व महाविद्यालय सामाजिक संगठन हैं।

प्रश्न 38.
खेलों द्वारा विकसित होने वाले कोई दो गुण लिखें।
उत्तर:
(1) आत्म-विश्वास,
(2) धैर्यता।

प्रश्न 39.
परिवार किसके सिद्धान्त पर आधारित है?
उत्तर:
परिवार सामाजीकरण (Socilaization) के सिद्धान्त पर आधारित है।

प्रश्न 40.
वे गुण क्या हैं जो खेलकूद द्वारा प्राप्त किए जाते हैं?
उत्तर:
सामाजिक एवं नैतिक गुण। ।

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भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. ‘समाजशास्त्र’ किस भाषा का शब्द है?
(A) फ्रैंच भाषा का
(B) अंग्रेजी भाषा का
(C) लैटिन भाषा का
(D) जर्मन भाषा का
उत्तर:
(C) लैटिन भाषा का

2. “समाजशास्त्र का अतीत अत्यधिक लंबा है लेकिन इतिहास उतना ही छोटा है।” यह कथन किसने कहा?
(A) मैकाइवर ने
(B) रॉबर्ट बीरस्टीड ने
(C) मिचेल ने
(D) ऑगस्ट कॉम्टे ने
उत्तर:
(B) रॉबर्ट बीरस्टीड ने

3. “समाजशास्त्र समाज का वैज्ञानिक अध्ययन अथवा समाज दृष्टि का विज्ञान है” यह कथन है
(A) डेविड पोर्ट का
(B) स्टालिन का
(C) मैक्स वेबर का
(D) आई० एफ० वार्ड का
उत्तर:
(D) आई० एफ० वार्ड का

4. समाजशास्त्र का पिता किसे कहा जाता है?
(A) मिचेल को
(B) ऑगस्ट कॉम्टे को
(C) मैकाइवर व पेज को
(D) रॉबर्ट बीरस्टीड को
उत्तर:
(B) ऑगस्ट कॉम्टे को

5. खेलों द्वारा किस विशाल भावना का विकास होता है?
(A) राष्ट्रीय भावना का
(B) स्थानीय भावना का
(C) अंतर्राष्ट्रीय भावना का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंतर्राष्ट्रीय भावना का

6. जिम्नास्टिक के साथ संगीत पद्धति द्वारा चिकित्सा प्रणाली का जन्म किस देश में हुआ?
(A) स्वीडन और डेनमार्क में
(B) यूनान में
(C) इंग्लैंड में
(D) अमेरिका में
उत्तर:
(A) स्वीडन और डेनमार्क में

7. अमेरिका ने हमें किन खेलों का ज्ञान दिया?
(A) बास्केटबॉल का
(B) बेसबॉल का
(C) वॉलीबॉल का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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8. व्यक्ति का व्यक्तित्व किन पक्षों पर आधारित है?
(A) शारीरिक पक्ष पर
(B) मानसिक पक्ष पर
(C) सामाजिक पक्ष पर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

9. रूस द्वारा ओलंपिक खेलों के आयोजन के समय किस देश ने बहिष्कार किया था?
(A) जापान ने
(B) अमेरिका तथा उसके सहयोगी राष्ट्रों ने
(C) स्वीडन ने
(D) हॉलैंड ने
उत्तर:
(B) अमेरिका तथा उसके सहयोगी राष्ट्रों ने

10. उन शक्तियों को क्या कहते हैं जो एक समूह के अंदर कार्य करती हैं?
(A) सामूहिकता
(B) समूह
(C) समूह की गतिशीलता
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) समूह की गतिशीलता

11. समूह के कितने प्रकार होते हैं?
(A) चार
(B) दो
(C) तीन
(D) पाँच
उत्तर:(B) दो

12. “समाजशास्त्र सामाजिक समूहों का विज्ञान है-सामाजिक समूह सामाजिक अंतःक्रियाओं की ही एक व्यवस्था है।” यह कथन किसने कहा?
(A) जॉनसन ने
(B) फा!वर्थ ने
(C) ला-पियरे ने
(D) मॉण्टगुमरी ने
उत्तर:
(A) जॉनसन ने

13. ‘समाजशास्त्र’ की उत्पत्ति ऑगस्ट कॉम्टे द्वारा की गई
(A) वर्ष 1838 में
(B) वर्ष 1850 में
(C) वर्ष 1938 में
(D) वर्ष 1950 में
उत्तर:(A) वर्ष 1838 में

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14. सामाजीकरण की प्रक्रिया में निम्नलिखित पक्ष सम्मिलित होते हैं
(A) जीव रचना
(B) समाज
(C) व्यक्ति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

15. समाजशास्त्र का अर्थ है
(A) व्यक्ति का अध्ययन
(B) समाज का वैज्ञानिक अध्ययन
(C) समाज का आर्थिक अध्ययन
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) समाज का वैज्ञानिक अध्ययन

16. बॉलगेम्स का जन्मदाता किसे कहा जाता है?
(A) स्वीडन को
(B) इंग्लैंड को
(C) डेनमार्क को
(D) अमेरिका को
उत्तर:
(B) इंग्लैंड को

17. बच्चा सामाजीकरण का प्रथम पाठ कहाँ से सीखता है?
(A) विद्यालय से
(B) महाविद्यालय से
(C) मठ से
(D) परिवार से
उत्तर:
(D) परिवार से

18. सामाजीकरण का सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है
(A) आध्यात्मिक शिक्षा
(B) शारीरिक शिक्षा
(C) मनोवैज्ञानिक शिक्षा
(D) यौन शिक्षा
उत्तर:
(B) शारीरिक शिक्षा

19. ‘डाइनैमिक्स’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया
(A) चार्ल्स कूले ने
(B) बरदँड रसल ने
(C) मैक्स वर्थीमर ने
(D) जॉनसन ने
उत्तर:
(C) मैक्स वर्थीमर ने

20. ‘डाइनैमिक्स’ (Dynamic) शब्द किस भाषा से लिया गया है?
(A) ग्रीक भाषा से
(B) जर्मन भाषा से
(C) फ्रैंच भाषा से
(D) अंग्रेजी भाषा से
उत्तर:
(A) ग्रीक भाषा से

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21. ‘डाइनैमिक्स’ शब्द से आप क्या समझते हैं?
(A) ऊर्जा
(B) परिवर्तन
(C) शक्ति
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) शक्ति

22. सन् 1961 में राष्ट्रीय खेल संस्था कहाँ स्थापित की गई?
(A) पटियाला में
(B) ग्वालियर में
(C) चेन्नई में
(D) दिल्ली में
उत्तर:
(A) पटियाला में

23. “समाजशास्त्र को चिंतनशील जगत् का बच्चा माना जाता है।” यह कथन है-
(A) मैकाइवर का
(B) मिचेल का
(C) जॉनसन का
(D) रॉबर्ट बीरस्टीड का
उत्तर:
(B) मिचेल का

24. मनुष्य में पाई जाने वाली मूल प्रवृत्तियाँ हैं
(A) शिशु रक्षा
(B) आत्म प्रदर्शन
(C) सामूहिकता
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. सामाजिक संबंधों का जाल क्या कहलाता है?
(A) समाज
(B) परिवार
(C) समुदाय
(D) समूह
उत्तर:
(A) समाज

26. “समाज के बिना मनुष्य पशु है या देवता।” ये शब्द किसके हैं?
(A) अरस्तू
(B) रोजर
(C) थॉमस
(D) वुड्स
उत्तर:
(A) अरस्तू

27. Y.M.C.A. कहाँ पर स्थित है?
(A) कोलकाता में
(B) चेन्नई में
(C) नई दिल्ली में
(D) चण्डीगढ़ में
उत्तर:
(B) चेन्नई में

28. सामाजिक संगठन है
(A) परिवार
(B) धार्मिक व शैक्षणिक संस्थाएँ
(C) राष्ट्र
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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29. घर, परिवार, विद्यालय व महाविद्यालय किस प्रकार के संगठन हैं?
(A) आर्थिक संगठन
(B) सामाजिक संगठन
(C) राजनैतिक संगठन
(D) भावनात्मक संगठन
उत्तर:
(B) सामाजिक संगठन

30. स्कूल/विद्यालय कैसी संस्था है?
(A) व्यक्तिगत
(B) राजनीति
(C) सामाजिक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सामाजिक

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. ……………….. के अनुसार समाजशास्त्र को चिंतनशील जगत् का बच्चा माना जाता है।
2. समाजशास्त्र का पिता या जनक ……………….. को माना जाता है।
3. “शारीरिक शिक्षा शरीर का एक मजबूत ढाँचा है जो मस्तिष्क के कार्य को निश्चित तथा आसान करता है।” यह कथन ………………. ने कहा।
4. Y.M.C.A. की स्थापना ……………….. ने की।
5. “शरीर के लिए जिम्नास्टिक तथा आत्मा के लिए संगीत का विशेष महत्त्व है।” यह कथन ……………….. ने कहा।
6. समूह की सबसे छोटी इकाई ……….
7. “किसी विशिष्ट उद्देश्य के लिए व्यक्तियों को इकट्ठा करने की इच्छा तथा योग्यता को ही नेतृत्व कहा जाता है।” यह कथन
……………….. ने कहा।
8. सामाजिक संबंधों का व्यवस्थित और क्रमबद्ध रूप से अध्ययन करने वाले विज्ञान को ……………….. कहते हैं।
9. मनुष्य एक ……………….. प्राणी है।
10. सामाजीकरण का महत्त्वपूर्ण साधन ……………….. है।
11. सामाजिक संगठनों का आधार ………………… है।
12. खेलों के मूल उद्देश्यों ने रोमवासियों की ……………….. गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।
उत्तर:
1. मिचेल
2. ऑगस्ट कॉम्टे
3. रूसो
4. श्री एच०सी० बॅक
5. प्लेटो
6. दंपति
7. मॉण्टगुमरी
8. समाजशास्त्र
9. सामाजिक
10. शारीरिक शिक्षा
11. परिवार
12. खेल।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 5 शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष

शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष Summary

शारीरिक शिक्षा के सामाजिक पक्ष परिचय

प्राचीनकाल में विचारों के आदान-प्रदान का सर्वव्यापी माध्यम शारीरिक गतिविधियाँ व शारीरिक अंगों का हाव-भाव होता था। आदि-मानव शारीरिक गतिविधियों के माध्यम से ही अपने बच्चों को शारीरिक शिक्षा देते थे, क्योंकि प्राचीनकाल में शारीरिक शिक्षा लोगों के जीवित रहने के लिए आवश्यक मानी जाती थी। शारीरिक शिक्षा पर सबसे अधिक बल यूनान ने दिया। सुकरात, अरस्तू व प्लेटो जैसे महान् दार्शनिकों का विचार था कि शारीरिक प्रशिक्षण युवाओं के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। शारीरिक शिक्षा एक ऐसी शिक्षा है जो वैयक्तिक जीवन को समृद्ध बनाने में प्रेरक व सहायक सिद्ध होती है। यह शारीरिक विकास के साथ शुरू होती है और मानव-जीवन को पूर्णता की ओर ले जाती है, जिसके परिणामस्वरूप वह एक हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ, मानसिक, सामाजिक एवं भावनात्मक संतुलन रखने वाला व्यक्ति बन जाता है। ऐसा व्यक्ति किसी भी प्रकार की चुनौतियों अथवा मुश्किलों से प्रभावी तरीके से लड़ने में सक्षम होता है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। यह जन्म से मृत्यु तक अपने ही जैसे आचार-विचार रखने वाले जीवों के बीच रहता है। सामाजीकरण की सहायता से वह अपनी पशु-प्रवृत्ति से ऊपर उठकर सभ्य मनुष्य का स्थान ग्रहण करता है। अतः सामाजीकरण वह प्रक्रिया है जिससे व्यक्ति अपने समुदाय का सक्रिय सदस्य बनकर उसकी परंपराओं का पालन करता है एवं स्वयं को सामाजिक वातावरण के अनुरूप ढालना सीखता है।

शारीरिक शिक्षा सामाजीकरण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। विद्यार्थी खेल के मैदान में अपनी टीम के हितों को सम्मुख रखकर खेल के नियमों का भली-भाँति पालन करते हुए खेलने की कोशिश करता है। वह पूरी लगन से खेलता हुआ अपनी टीम को विजय-प्राप्ति के लिए पूर्ण सहयोग प्रदान करता है। वह हार-जीत को एक-समान समझने के योग्य हो जाता है और उसमें सहनशीलता व धैर्यता का गुण विकसित होता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक पीढ़ी आगामी पीढ़ियों के लिए खेल संबंधी कुछ नियम व परंपराएँ छोड़ जाती है, जो विद्यार्थियों को शारीरिक शिक्षा के माध्यम से परिचित करवाई जाती हैं। इस प्रकार शारीरिक शिक्षा व खेलें व्यक्ति के सामाजीकरण में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

HBSE 12th Class Physical Education एथलेटिक देखभाल Textbook Questions and Answers

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
एथलेटिक देखभाल से क्या अभिप्राय है? इसके मुख्य क्षेत्रों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एथलेटिक देखभाल का अर्थ (Meaning ofAthletic Care):
मानव जीवन अनेक मुश्किलों से भरा हुआ है और शारीरिक गतिविधियों में भाग लेना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आसान नहीं है। शारीरिक गतिविधियों में अनेक चोटें या दुर्घटनाएँ होने की संभावना निरंतर बनी रहती है। यदि उचित देखभाल, सुरक्षा व सावधानी अपनाई जाए तो इनसे बचा जा सकता है। सावधानी हमेशा दवाइयों या औषधियों से बेहतर होती है। इसलिए सावधानी के तरीके खेलों में प्रयोग किए जाते हैं।

एथलेटिक देखभाल हमें यह जानकारी देती है कि कैसे खेल समस्याओं या चोटों को कम किया जाए, कैसे खेल के स्तर को सुधारा जाए। यदि खिलाड़ी की देखभाल पर ध्यान न दिया जाए तो खिलाड़ी का खेल-जीवन या कैरियर समाप्त हो सकता है। इसलिए हर खिलाड़ी के लिए एथलेटिक देखभाल एक महत्त्वपूर्ण पहलू है।

एथलेटिक देखभाल के क्षेत्र (Scope of Athletic Care):
एथलेटिक देखभाल के क्षेत्र निम्नलिखित हैं-
1. खेल चोटें (Sports Injuries):
प्रतिदिन प्रत्येक आयु के खिलाड़ी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक तैयारी करते हैं, ताकि वे अपने खेल में अच्छी कुशलता दिखा सकें। खेलों में प्रायः चोटें लगती रहती हैं। कुछ चोटें सामान्य होती हैं तथा कुछ चोटें घातक होती हैं। साधारणतया चोटें उन खिलाड़ियों को लगती हैं जो परिपक्व नहीं होते। उनमें खेलों में आने वाले उतार-चढ़ाव की परिपक्वता नहीं होती और कई बार मैदान का स्तर भी उच्च-कोटि का नहीं होता जिसके कारण मोच, खिंचाव और फ्रैक्चर जैसी चोटें लग जाती हैं। इन चोटों से बचने के लिए एथलेटिक देखभाल जरूरी है। खिलाड़ी हर समय शारीरिक रूप से स्वस्थ रहे, इसके लिए हमेशा फिजियोथेरेपिस्ट उनके साथ रहते हैं। वे खिलाड़ियों को चोट लगने पर उपयुक्त सलाह तथा दवाई देते हैं ताकि खिलाड़ी स्वस्थ रहें।

2. पोषण (Nutrition):
उचित एवं पौष्टिक आहार से हमारा शरीर स्वस्थ रहता है। इससे न केवल खेलकूद के क्षेत्र में, बल्कि दैनिक जीवन में भी हमारी कार्यकुशलता एवं कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। उचित व पौष्टिक आहार से हमारा तात्पर्य उन पोषक तत्त्वों; जैसे वसा, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स, खनिज-लवणों, विटामिनों एवं वसा आदि से है जो आहार में उचित मात्रा में उपस्थित होते हैं तथा शरीर का संतुलित विकास करते हैं। आजकल मोटापा एक गंभीर समस्या की भाँति फैल रहा है, जिसको उचित एवं पौष्टिक आहार लेने से तथा उचित व्यायाम करने से नियंत्रित किया जा सकता है। अगर खिलाड़ी को उपयुक्त और पौष्टिक आहार दिया जाए तो खेलों में उसके प्रदर्शन में अच्छा सुधार होगा।

3. प्रशिक्षण विधियाँ (Training Methods):
खिलाड़ियों की देखभाल में जिस प्रकार खेल चोटों से बचना और संतुलित व पौष्टिक आहार लेने का महत्त्व है उतना ही महत्त्व प्रशिक्षण विधियों का है। प्रशिक्षण की विभिन्न विधियाँ; जैसे निरंतर प्रशिक्षण विधि, अंतराल प्रशिक्षण विधि, वजन प्रशिक्षण विधि, सर्किट प्रशिक्षण विधि तथा फार्टलेक प्रशिक्षण विधि बहुत उपयोगी हैं, अगर इनको सही तरीके तथा उपयुक्त समय पर किया जाए तो इनसे खिलाड़ी शारीरिक रूप से तंदुरुस्त रहता है। अतः विभिन्न प्रशिक्षण विधियाँ एथलेटिक देखभाल में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता या चिकित्सा की आवश्यकता तथा महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
प्राथमिक चिकित्सा क्या है? इसकी आवश्यकता व उपयोगिता का वर्णन करें।
अथवा
प्राथमिक सहायता क्या होती है? इसकी हमें क्यों आवश्यकता पड़ती है?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता का अर्थ (Meaning of First Aid):
वह सहायता जो किसी रोगी या जख्मी व्यक्ति को घटना स्थल पर डॉक्टर के आने से पहले नियमानुसार दी जाए, उसे प्राथमिक सहायता कहते हैं। किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को वही प्राथमिक सहायता दे सकता है जिसे प्राथमिक सहायता का पूरा ज्ञान हो। परन्तु कई बार ऐसी परिस्थितियाँ भी आ जाती है कि किसी अनजान व्यक्ति को भी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की प्राथमिक सहायता करनी पड़ सकती है। प्राथमिक सहायता प्रदान करने वाला व्यक्ति जख्मी व्यक्ति को तुरंत नजदीक के किसी डॉक्टर या अस्पताल में पहुचाएँ, ताकि जख्मी का तुरंत इलाज करवाया जा सकें।

प्राथमिक सहायता की आवश्यकता (Need of FirstAid):
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को ओर अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है।

इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि घायल अथवा रोगी व्यक्ति को तुरन्त प्राथमिक सहायता मिल जाए तो उसका जीवन बचाया जा सकता है। कुछ चोटें तो इस प्रकार की हैं, जो खेल के मैदान में लगती रहती हैं, जिनको मौके पर प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, यदि हमें प्राथमिक सहायता सम्बन्धी उचित जानकारी हो। इस प्रकार रोगी की स्थिति बिगड़ने से बचाने और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्राथमिक सहायता की बहुत आवश्यकता होती है। इसलिए प्राथमिक सहायता की आज के समय में बहुत आवश्यकता हो गई है। प्रत्येक नागरिक को इसका ज्ञान होना चाहिए।

प्राथमिक सहायता की महत्ता (Importance of First Aid):
प्राथमिक सहायता रोगी के लिए वरदान की भाँति होती है और प्राथमिक सहायक भगवान की ओर से भेजा गया दूत माना जाता है। आज के समय में कोई किसी के दुःख-दर्द की परवाह नहीं करता। एक प्राथमिक सहायक ही है जो दूसरों के दर्द को समझने और उनके दुःख में शामिल होने की भावना रखता है। आज प्राथमिक सहायता की महत्ता बहुत बढ़ गई है; जैसे
(1) प्राथमिक सहायता द्वारा किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति की बहुमूल्य जान बच जाती है।
(2) प्राथमिक सहायता देने वाले व्यक्ति में दूसरों के प्रति स्नेह और दया की भावना और तीव्र हो जाती है।
(3) प्राथमिक सहायता प्राथमिक सहायक को समाज में सम्मान दिलाती है।
(4) प्राथमिक सहायता लोगों को दूसरों के काम आने की आदत सिखाती है जिससे मानसिक संतुष्टि मिलती है।
(5) प्राथमिक सहायता देने वाला व्यक्ति डॉक्टर के कार्य को सरल कर देता है।
(6) प्राथमिक सहायता द्वारा लोगों के आपसी रिश्तों में सहयोग की भावना बढ़ती है।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायता के नियमों या सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक सहायता आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में बहुत महत्त्व रखती है। इसकी जानकारी बहुत आवश्यक है। प्राथमिक सहायता के नियम निम्नलिखित हैं
(1) रोगी अथवा घायल को विश्राम की स्थिति में रखना।
(2) घाव से बह रहे रक्त को बंद करना।
(3) घायल की सबसे जरूरी चोट की ओर अधिक ध्यान देगा।
(4) दुर्घटना के समय जिस प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तुरंत उपलब्ध करवाना।
(5) घायल की स्थिति को खराब होने से बचाना।
(6) घायल की अंत तक सहायता करना।
(7) घायल के नजदीक भीड़ एकत्रित न होने देना।
(8) घायल को हौसला देना। (9) घायल को सदमे से बचाकर रखना।
(10) प्राथमिक सहायता देते समय संकोच न करना।
(11) घायल को सहायता देते समय सहानुभूति और विनम्रता वाला व्यवहार करना।
(12) प्राथमिक सहायता देने के बाद शीघ्र ही किसी अच्छे डॉक्टर के पास पहुँचाने का प्रबंध करना।
(13) यदि घायल व्यक्ति की साँस नहीं चल रही हो तो उसे कृत्रिम श्वास (Artificial Respiration) देना चाहिए।
(14) रोगी को आराम से लेटे रहना देना चाहिए, जिससे उसकी तकलीफ़ ज़्यादा न बढ़ सके।
(15) यदि यह पता लगे कि रोगी ने जहर पी लिया है तो उसे उल्टी करवानी चाहिए।
(16) यदि घायल व्यक्ति को साँप या ज़हरीले कीट ने काट लिया हो तो काटे हुए स्थान को ऊपर की तरफ से कसकर बाँध देना चाहिए ताकि ज़हर सारे शरीर में न फैले।
(17) यदि घायल व्यक्ति पानी में डूब गया है तो उसे बाहर निकालकर सबसे पहले उसे पेट के बल लिटाकर पानी निकालना चाहिए तथा उसे कम्बल आदि में लपेटकर रखना चाहिए।

प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायता का अर्थ स्पष्ट कीजिए तथा एक अच्छे प्राथमिक चिकित्सक या उपचारक (First Aider) के गुणों का वर्णन करें।
अथवा
प्राथमिक चिकित्सा देने वाले व्यक्ति में कौन-कौन-से गुण होने चाहिएँ?
उत्तर:
घायल या मरीज को तत्काल दी जाने वाली सहायता प्राथमिक सहायता कहलाती है। घायल व्यक्ति को गंभीर स्थिति में जाने से रोकने के लिए और उसका जीवन बचाने के लिए प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी हो सकता है यदि प्राथमिक उपचारक बुद्धिमान और होशियार हो और प्राथमिक सहायता के नियमों से परिचित हो। प्राथमिक सहायता देने वाले व्यक्ति में निम्नलिखित गुण होने चाहिएँ
(1) प्राथमिक उपचारक चुस्त और बुद्धिमान होना चाहिए, ताकि घायल के साथ घटी हुई घटना के बारे में समझ सके।
(2) प्राथमिक उपचारक निपुण एवं सूझवान होना चाहिए, ताकि प्राप्त साधनों के साथ ही घायल को बचा सके।
(3) वह बड़ा फुर्तीला होना चाहिए, ताकि घायल व्यक्ति को शीघ्र संभाल सके।
(4) प्राथमिक उपचारक योजनाबद्ध व्यवहार कुशल होना चाहिए, जिससे वह घटना संबंधी जानकारी जल्द-से-जल्द प्राप्त करते हुए रोगी का विश्वास प्राप्त कर सके।
(5) उसमें सहानुभूति की भावना होनी चाहिए, ताकि वह घायल को आराम और हौसला दे सके।
(6) प्राथमिक उपचारक सहनशील, लगन और त्याग की भावना वाला होना चाहिए।
(7) प्राथमिक उपचारक अपने काम में स्पष्ट होना चाहिए, ताकि लोग उसकी सहायता के लिए स्वयं सहयोग करें।
(8) वह स्पष्ट निर्णय वाला होना चाहिए, ताकि वह निर्णय कर सके कि कौन-सी चोट का पहले इलाज करना है।
(9) प्राथमिक उपचारक दृढ़ इरादे वाला व्यक्ति होना चाहिए, ताकि वह असफलता में भी सफलता को ढूँढ सके।
(10) उसका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए, ताकि घायल को ज़ख्मों से आराम मिल सके।
(11) प्राथमिक उपचारक दूसरों के प्रति विनम्रता वाला और मीठा बोलने वाला होना चाहिए।
(12) प्राथमिक उपचारक स्वस्थ और मजबूत दिल वाला होना चाहिए, ताकि मौजूदा स्थिति पर नियंत्रण पा सके।

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प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायता क्या है? एक प्राथमिक सहायक के कर्त्तव्यों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक सहायता का अर्थ (Meaning of First Aid):
किसी रोग के होने या चोट लगने पर किसी प्रशिक्षित या अप्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा जो तुरंत सीमित उपचार किया जाता है, उसे प्राथमिक चिकित्सा या सहायता (First Aid) कहते हैं। यह अप्रशिक्षित व्यक्तियों द्वारा कम-से-कम साधनों में किया गया सरल व तत्काल उपचार है। कभी-कभी यह जीवन रक्षक भी सिद्ध होता है। अत: प्राथमिक सहायता का तात्पर्य उस सहायता से है जो कि रोगी अथवा जख्मी को चोट लगने पर अथवा किसी अन्य दुर्घटना के तुरंत बाद डॉक्टर के आने से पूर्व दी जाती है।

प्राथमिक सहायक के कर्त्तव्य (Duties of First Aider):
्राथमिक सहायक के प्रमुख कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं
(1) प्राथमिक सहायक को आवश्यकतानुसार घायल का रोगनिदान करना चाहिए।
(2) उसको इस बात पर विचार करना चाहिए कि घायल को कितनी, कैसी और कहाँ तक सहायता दी जाए।
(3) प्राथमिक सहायक को रोगी या घायल को अस्पताल ले जाने के लिए उचित सहायता का उपयोग करना चाहिए।
(4) उसको घायल की पूरी देखभाल की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
(5) प्राथमिक सहायक को घायल के शरीरगत चिह्नों; जैसे सूजन, कुरूपता आदि को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानना चाहिए और उचित सहायता देनी चाहिए।
(6) क्या हुआ, इसके बारे में समझने के लिए प्राथमिक सहायक को स्थिति का जल्दी व शांति से मूल्यांकन करना चाहिए। यदि आप स्थिति को सुरक्षित करने में असमर्थ हैं, तो आपातकालीन सहायता के लिए संपर्क करें।
(7) प्राथमिक सहायक को स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन करना चाहिए, ताकि संक्रमण से बचा जा सके।
(8) प्राथमिक सहायक को सर्वप्रथम स्वयं को खतरे से सुरक्षित रखना चाहिए। कभी भी जोखिम में कार्य नहीं करना चाहिए।
(9) प्राथमिक सहायक को प्राथमिक सहायता देते समय विभिन्न परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उसे मुश्किल-से-मुश्किल परिस्थितियों का सामना बड़ी हिम्मत के साथ करना चाहिए। यदि प्राथमिक सहायक ही हिम्मत हार जाए तो जख्मी या रोगी की हालत और भी बिगड़ सकती है। उसे जख्मी की हालत देखकर कभी भी घबराना नहीं चाहिए।
(10) प्राथमिक सहायक को कभी भी अपने आप को डॉक्टर नहीं समझना चाहिए अपितु उसे जख्मी या रोगी को डॉक्टर के आने या डॉक्टर तक पहुँचने से पहले अपेक्षित प्राथमिक सहायता प्रदान करनी चाहिए।

प्रश्न 6.
रगड़/खरोंच क्या है? इसके कारण, बचाव के उपाय तथा इलाज लिखें।
अथवा
खरोंच के कारण, लक्षण एवं उपचार के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
रगड़ (Abrasion):
रगड़ त्वचा की चोट है। प्रायः रगड़ एक मामूली चोट होती है लेकिन कभी-कभी यह गंभीर भी साबित हो जाती है। अगर रगड़ का चोटग्रस्त क्षेत्र विस्तृत हो जाए और उसमें बाहरी कीटाणु हमला कर दें तो यह भयानक हो जाती है।
कारण (Causes):
रगड़ आने के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं
(1) कठोर धरातल पर गिर पड़ना।
(2) कपड़ों में रगड़ पैदा करने वाले तंतुओं के कारण।
(3) जूतों का पैरों में सही प्रकार से फिट न आना।।
(4) हैलमेट और कंधों के पैडों का असुविधाजनक होना।

लक्षण (Symptoms):
रगड़ के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) त्वचा पर रगड़ दिखाई देती है और वहाँ पर जलन महसूस होती है।
(2) रगड़ वाले स्थान से खून बहने लगता है।
(3) सत्काल दर्द शुरू हो जाता है जो पल-भर के लिए होता है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
रगड़ से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) सुरक्षात्मक कपड़े पहनने चाहिएँ, इनमें पूरी बाजू वाले कपड़े, बड़ी-बड़ी जुराबें, घुटनों व कुहनी के पैड शामिल हैं।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता वाले होने चाहिएँ और प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को गर्मा लेना चाहिए।
(3) फिट जूते पहनने चाहिएँ।
(4) ऊबड़-खाबड़ खेल के मैदान से बचना चाहिए।

इलाज (Treatment):
रगड़ के इलाज या उपचार के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाने चाहिएँ
(1) चोटग्रस्त स्थान को ऊँचा रखना चाहिए।
(2) चोटग्रस्त स्थान को जितनी जल्दी हो सके गर्म पानी व नीम के साबुन से धोना चाहिए।
(3) यदि रगड़ अधिक हो तो उस स्थान पर पट्टी करवानी चाहिए। पट्टी खींचकर नहीं बाँधनी चाहिए।
(4) चोटग्रस्त स्थान को प्रत्येक दिन गर्म पानी से साफ करना चाहिए।
(5) चोट के तुरंत बाद एंटी-टैटनस का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
(6) दिन के समय चोट पर पट्टी बाँधनी चाहिए और रात को चोट खुली रखनी चाहिए।
(7) चोट लगने के बाद, तुरंत नहीं खेलना चाहिए। अगर खिलाड़ी खेलता है तो उसे दोबारा उसी जगह पर चोट लग सकती है जो खतरनाक सिद्ध हो सकती है।

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प्रश्न 7.
मोच (Sprain) क्या है? इसके कारण एवं उपचार के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
मोच कितने प्रकार की होती है? इसके लक्षण व इलाज के बारे में बताएँ।
अथवा
मोच किसे कहते हैं? इसके लिए प्राथमिक सहायता क्या हो सकती है?
अथवा
मोच के कारणों, लक्षणों व बचाव एवं उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मोच (Sprain):
किसी जोड़ के अस्थि-बंधक तन्तु (Ligaments) के फट जाने को मोच आना कहते हैं अर्थात् जोड़ के आसपास के जोड़-बंधनों तथा तन्तु वर्ग (Tissues) फट जाने या खिंच जाने को मोच कहते हैं। सामान्यतया घुटनों तथा गुटों में ज्यादा मोच आती है। इसकी प्राथमिक चिकित्सा जल्दी शुरू कर देनी चाहिए।

प्रकार (Types):
मोच तीन प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है-
1. नर्म मोच (Mold or Minor Sprain): इसमें जोड़-बंधनों (Ligaments) पर खिंचाव आता है। जोड़ में हिल-जुल करने पर दर्द अनुभव होता है। इस हालत में कमजोरी तथा दर्द महसूस होता है।
2. मध्यम मोच (Medicate or Moderate Sprain): इसमें जोड़-बंधन काफी मात्रा में टूट जाते हैं । इस हालत में सूजन तथा दर्द बढ़ जाता है।
3. पूर्ण मोच (Complete or Several Sprain): इसमें जोड़ की हिल-जुल शक्ति समाप्त हो जाती है। जोड़-बंधन पूरी तरह टूट जाते हैं। इस हालत में दर्द असहनीय हो जाता है।

कारण (Causes):
मोच आने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-
(1) खेलते समय सड़क पर पड़े पत्थरों पर पैर आने से मोच आ जाती है।
(2) किसी गीली अथवा चिकनी जगह पर; जैसे ओस वाली घास, खड़े पानी में पैर रखने से मोच आ जाती है।
(3) खेल के मैदान में यदि किसी गड्ढे में पैर आ जाए तो यह मोच का कारण बन जाता है।
(4) अनजान खिलाड़ी यदि गलत तरीके से खेले तो भी मोच आ जाती है।
(5) अखाड़ों की गुड़ाई ठीक तरह न होने के कारण भी मोच आ जाती है।
(6) असावधानी से खेलने पर भी मोच आ जाती है।

लक्षण (Symptoms): मोच के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) सूजन वाले स्थान पर दर्द शुरू हो जाता है।
(2) थोड़ी देर बाद जोड़ के मोच वाले स्थान पर सूजन आने लगती है।
(3) सुजन वाले भाग में कार्य की क्षमता कम हो जाती है।
(4) सख्त मोच की हालत में जोड़ के ऊपर की चमड़ी का रंग नीला हो जाता है।

बचाव (Prevention): खेलों में मोच से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं-
(1) पूर्ण रूप से शरीर के सभी जोड़ों को गर्मा लेना चाहिए।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता के होने चाहिएँ।
(3) मैदान समतल व साफ होना चाहिए।
(4) सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment): मोच के उपचार हेतु निम्नलिखित प्राथमिक सहायता की जा सकती है
(1) मोच वाली जगह को हिलाना नहीं चाहिए। आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए।
(2) मोच वाले स्थान पर पानी की पट्टी रखनी चाहिए तथा मालिश करनी चाहिए।
(3) यदि मोच टखने पर हो तो आठ के आकार की पट्टी बाँध देनी चाहिए। प्रत्येक मोच वाले स्थान पर पट्टी बाँध देनी चाहिए।
(4) मोच वाले स्थान पर भार नहीं डालना चाहिए बल्कि मदद के लिए कोई सहारा लेना चाहिए।
(5) हड्डी टूटने के शक को दूर करने के लिए एक्सरा करवा लेना चाहिए।
(6) मोच वाले स्थान का हमेशा ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि उसी स्थान पर बार-बार मोच आने का डर रहता है।

प्रश्न 8.
माँसपेशियों या पट्ठों का तनाव क्या होता है? यह किस कारण होता है?
अथवा
खिंचाव से क्या अभिप्राय है? इसके कारणों, लक्षणों व बचाव एवं उपचार का वर्णन कीजिए।
अथवा
माँसपेशियों के तनाव से आपका क्या अभिप्राय है? इसके चिह्न तथा इलाज के बारे में लिखें।
उत्तर:
माँसपेशियों का तनाव/खिंचाव (Pull in Muscles/Strain):
खिंचाव माँसपेशी की चोट है। खेलते समय कई बार खिलाड़ियों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिसके कारण खिलाड़ी अपना खेल जारी नहीं रख सकता। कई बार तो माँसपेशियाँ फट भी जाती हैं, जिसके कारण काफी दर्द महसूस होता है। प्रायः खिंचाव वाले हिस्से में सूजन आ जाती है। खिंचाव का मुख्य कारण खिलाड़ी का खेल के मैदान में अच्छी तरह गर्म न होना है। इसे पट्ठों का खिंच जाना भी कहते हैं।

कारण (Causes):
खिंचाव आने के निम्नलिखित कारण हैं
(1) शरीरं के सभी अंगों का आपसी तालमेल ठीक न होना।
(2) अधिक शारीरिक थकान।
(3) पट्ठों को तेज़ हरकत में लाना।
(4) शरीर में से पसीने द्वारा पानी का बाहर निकलना।
(5) खिलाड़ी द्वारा शरीर को बिना गर्म किए खेल में हिस्सा लेना।
(6) खेल का समान ठीक न होना।
(7) खेल का मैदान अधिक सख्त या नरम होना।
(8) माँसपेशियों तथा रक्त केशिकाओं का टूट जाना।

चिह्न/लक्षण (Symptoms):
माँसपेशियों या पट्ठों में खिंचाव आने के लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) खिंचाव वाले स्थान पर बहुत तेज दर्द होता है।
(2) खिंचाव वाले स्थान पर माँसपेशियाँ फूल जाती हैं, जिसके कारण दर्द अधिक होता है।
(3) शरीर के खिंचाव वाले अंग को हिलाने से भी दर्द होता है।
(4) चोट वाला स्थान नरम हो जाता है।
(5) खिंचाव वाले स्थान पर गड्डा-सा दिखता है।

बचाव (Prevention):
खेल में खिंचाव से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करना चाहिए
(1) गीले व चिकने ग्राऊंड, ओस वाली घास पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(2) ऊँची तथा लंबी छलाँग हेतु बने अखाड़ों की जमीन सख्त नहीं होनी चाहिए।
(3) खेलने से पहले कुछ हल्का व्यायाम करके शरीर को अच्छी तरह गर्म करना चाहिए। इससे खेलने के लिए शरीर तैयार हो जाता है।
(4) चोटों से बचने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
(5) खिलाड़ी को सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
खिंचाव के उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) खिंचाव वाली जगह पर पट्टी बाँधनी चाहिए।
(2) खिंचाव वाले स्थान पर ठंडे पानी अथवा बर्फ की मालिश करनी चाहिए।
(3) ‘माँसपेशियों में खिंचाव आ जाने के कारण खिलाड़ी को आराम करना चाहिए।
(4) खिंचाव वाले स्थान पर 24 घंटे बाद सेक देनी चाहिए।
(5) चोटग्रस्त क्षेत्र को आराम देने तथा सूजन कम करने के लिए मालिश करनी चाहिए।

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प्रश्न 9.
जोड़ उतरना क्या है? इसके कारण, लक्षण तथा इलाज बताएँ।
अथवा
जोड़ उतरने के कारण, चिह्न तथा उपचार के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
जोड़ों के विस्थापन (Dislocation) से आप क्या समझते हैं? इनके प्रकारों, कारणों, लक्षणों तथा बचाव व उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जोड़ उतरना या जोड़ों का विस्थापन (Dislocation):
एक या अधिक हड्डियों के जोड़ पर से हट जाने को जोड़ उतरना कहते हैं। कुछ ऐसी खेलें होती हैं जिनमें जोड़ों की मज़बूती अधिक होनी चाहिए; जैसे जिम्नास्टिक, फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी आदि। इन खेलों में हड्डी का उतरना स्वाभाविक है। प्रायः कंधे, कूल्हे तथा कलाई आदि की हड्डी उतरती है।

प्रकार (Types):
जोड़ों का विस्थापन मुख्यतः तीन प्रकार का होता है
(1) कूल्हे का विस्थापन।
(2) कन्धे का विस्थापन।
(3) निचले जबड़े का विस्थापन।

कारण (Causes):
जोड़ उतरने के निम्नलिखित कारण हैं
(1) खेल मैदान का ऊँचा-नीचा होना अथवा अधिक सख्त या नरम होना।
(2) खेल सामान का शारीरिक शक्ति से भारी होना।
(3) खेल से पहले शरीर को हल्के व्यायामों द्वारा गर्म न करना।
(4) खिलाड़ी का अचानक गिरने से हड्डी का हिल जाना।

लक्षण या चिह्न (Symptoms):
जोड़ उतरने के निम्नलिखित लक्षण हैं
(1) जोड़ों में तेज़ दर्द होती है तथा सूजन आ जाती है।
(2) जोड़ों का रूप बदल जाता है।
(3) जोड़ में खिंचाव-सा महसूस होता है।
(4) जोड़ में गति बन्द हो जाती है। थोड़ी-सी गति से दर्द होता है।
(5) उतरे हुए स्थान से हड्डी बाहर की ओर उभरी हुई नज़र आता है।

बचाव (Prevention):
इससे बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) असमतल मैदान या जगह पर संभलकर चलना चाहिए।
(2) गीली या फिसलने वाली जगह पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(3) खेलने से पूर्व शरीर को गर्मा लेना चाहिए।
(4) प्रतियोगिता के दौरान सतर्क व सावधान रहना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
जोड़ उतरने का इलाज निम्नलिखित है
(1) घायल को आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए।
(2) घायल अंग को गद्दियों या तकियों से सहारा देकर स्थिर रखें। हड्डी पर प्लास्टिक वाली पट्टी बाँधनी चाहिए।
(3) उतरे जोड़ को चढ़ाने का प्रयास कुशल प्राथमिक सहायक को सावधानी से करना चाहिए।
(4) जोड़ पर बर्फ या ठण्डे पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए।
(5) घायल को प्राथमिक सहायता के बाद तुरंत अस्पताल या डॉक्टर के पास ले जाएँ।
(6) चोट वाले स्थान पर भार नहीं पड़ना चाहिए।
(7) चोट वाले स्थान पर शलिंग (Sling) डाल देनी चाहिए, ताकि हड्डी न हिले।

प्रश्न 10.
फ्रैक्चर (Fracture) की कितनी किस्में होती हैं? सबसे खतरनाक कौन-सा फ्रैक्चर है?
अथवा
फ्रैक्चर क्या है? फ्रैक्चर या टूट कितने प्रकार की होती है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फ्रैक्चर का अर्थ (Meaning of Fracture):
किसी हड्डी का टूटना, फिसलना अथवा दरार पड़ जाना टूट (Fracture) कहलाता है। हड्डी पर जब दुःखदायी स्थिति में दबाव पड़ता है तो हड्डी से सम्बन्धित माँसपेशियाँ उस दबाव को सहन नहीं कर सकतीं, जिस कारण हड्डी फिसल अथवा टूट जाती है। अतः फ्रैक्चर का अर्थ है-हड्डी का टूटना या दरार पड़ जाना।

हड्डी टूटने या प्रैक्चर के प्रकार (Types of Fracture):
हड्डी टूटने या फ्रैक्चर के प्रकार निम्नलिखित हैं
1. साधारण या बंद फ्रैक्चर (Simple or Closed Fracture): जब हड्डी टूट जाए, परन्तु घाव न दिखाई दे, तो वह बंद टूट होता है।

2. जटिल फ्रैक्चर (Complicated Fracture):
इस फ्रैक्चर से कई बार हड्डी की टूट के साथ जोड़ भी हिल जाते हैं। कई बार हड्डी टूटकर शरीर के किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचा देती है; जैसे रीढ़ की हड्डी की टूट मेरुरज्जु को, सिर की हड्डी की टूट दिमाग को और पसलियों की हड्डियों की टूट दिल, फेफड़े और जिगर को नुकसान पहुँचाती है। ऐसी स्थिति में टूट काफी जटिल टूट बन जाती है।

3. विशेष या खुली टूट या फ्रैक्चर (Compound or Open Fracture): जब हड्डी त्वचा को काटकर बाहर दिखाई दे तो वह खुली टूट होती है। इस स्थिति में बाहर से मिट्टी के रोगाणुओं को शरीर के अंदर जाने का रास्ता मिल जाता है।

4. बहुसंघीय या बहुखंड टूट या फ्रैक्चर (Comminuted or Multiple Fracture): जब हड्डी कई भागों से टूट जाए तो इसे बहुसंघीय या बहुखंड टूट कहा जाता है।

5. चपटा या संशोधित टूट या फ्रैक्चर (Impacted Fracture): जब टूटी हड्डियों के सिरे एक-दूसरे में घुस जाते हैं तो वह चपटी टूट कहलाती है।

6. कच्चा फ्रैक्चर (Green-stick Fracture): यह छोटे बच्चों में होता है क्योंकि छोटी आयु के बच्चों की हड्डियाँ बहुत नाजुक होती हैं जो शीघ्र मुड़ जाती हैं। यही कच्चा फ्रैक्चर होता है।

7. दबी हुई टूट या फ्रैक्चर (Depressed Fracture): सामान्यतया यह टूट सिर की हड्डियों में होती है। जब खोपड़ी के ऊपरी भाग या आस-पास से हड्डी टूट जाने पर अंदर फंस जाती है तो ऐसी टूट दबी हुई टूट कहलाती है।

सबसे अधिक खतरनाक टूट या फ्रैक्चर जटिल फ्रैक्चर होता है क्योंकि इसमें हड्डी टूटकर किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचाती है। इस फ्रैक्चर में घायल की स्थिति बहुत नाजुक हो जाती है उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

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प्रश्न 11.
हड्डी टूटने (Fracture) के कारण, लक्षण, बचाव तथा इलाज या उपचार के बारे में लिखें।
अथवा
अस्थि-भंग (Fracture) कितने प्रकार के होते हैं? इनके कारणों, लक्षणों तथा बचाव व उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अस्थि-भंग (Fracture) मुख्यतः सात प्रकार के होते हैं। फ्रैक्चर के कारण (Causes of Fracture):
हड्डी टूटने या फ्रैक्चर के कारण निम्नलिखित हैं
(1) हड्डी पर कोई भारी सामान गिरना।
(2) खेल का मैदान ऊँचा-नीचा होना अथवा असमतल होना।
(3) खेल सामान का शारीरिक शक्ति से भारी होना।
(4) खिलाड़ी के अचानक गिरने से हड्डी का हिल जाना।
(5) माँसपेशियों में कम शक्ति के कारण अकसर हड्डियाँ टूटना।
(6) किसी भी दशा में गिरने से सम्बन्धित जोड़ के पास की मांसपेशियों का सन्तुलन ठीक न होना।

लक्षण (Symptoms):
हड्डी टूटने के मुख्य लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर दर्द होता है। ।
(2) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर सूजन आ जाती है।
(3) टूटी हुई हड्डी के स्थान वाले अंग कुरूप हो जाते हैं।
(4) टूट वाले स्थान में ताकत नहीं रहती।
(5) हाथ लगाकर हड्डी की टूट की जाँच की जा सकती है।

बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
अस्थि-भंग (फ्रैक्चर) से बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) असमतल मैदान पर ठीक से चलना चाहिए।
(2) ‘फिसलने वाले स्थान पर सावधानी से चलना चाहिए।
(3) कभी भी अधिक भावुक होकर नहीं खेलना चाहिए।
(4) खेल-भावना तथा धैर्य के साथ खेलना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
फ्रैक्चर के इलाज या उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं-
(1) टूट वाले स्थान को हिलाना-जुलाना नहीं चाहिए।
(2) टूट के उपचार को करने से पहले रक्तस्राव एवं अन्य तीव्र घावों का उपचार करना चाहिए।
(3) टूटी हड्डी को पट्टियों व कमठियों के द्वारा स्थिर कर देना चाहिए।
(4) टूटी हड्डी पर पट्टियाँ पर्याप्त रूप से कसी होनी चाहिए। पट्टियाँ इतनी न कसी हो कि रक्त संचार में बाधा पैदा हो जाए।
(5) कमठियाँ इतनी लम्बी होनी चाहिएँ कि वे टूटी हड्डी का एक ऊपरी तथा एक निचला जोड़ स्थिर कर दें।
(6) घायल की पट्टियों को इस प्रकार से सही स्थिति में लाए कि उसको कोई तकलीफ न हो।
(7) घायल व्यक्ति को कम्बल या किसी कपड़े के द्वारा गर्म करना चाहिए, ताकि उसे कोई सदमा न पहुँचे।
(8) प्राथमिक सहायता या उपचार देने के बाद घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुँचा देना चाहिए, ताकि उसका उचित उपचार किया जा सके।

प्रश्न 12.
भीतरी घाव या कंट्यूशन से क्या अभिप्राय है? इसके लक्षण तथा बचाव व उपचार के उपाय लिखें।
उत्तर:
भीतरी घाव या कंट्यूशन (Contusion):
भीतरी घाव को अंदरुनी चोट भी कहते हैं। यह माँसपेशी की चोट होती है। एक प्रत्यक्ष मुक्का या कोई खेल उपकरण शरीर को लग जाए तो कंट्यूशन का कारण बन सकता है। मुक्केबाजी, कबड्डी और कुश्ती आदि में कंट्यूशन होना स्वाभाविक है। कंट्यूशन में माँसपेशियों में रक्त कोशिकाएँ टूट जाती हैं और कभी-कभी माँसपेशियों से रक्त भी बहने लगता है। भीतरी घाव या कंट्यूशन की जगह पर अकड़न और सूजन आ जाना स्वाभाविक है। कई बार माँसपेशियाँ भी काम करना बंद कर देती हैं। कभी-कभी गंभीर दशा में माँसपेशियाँ पूर्णतया निष्क्रिय हो जाती हैं। कंट्यूशन से शरीर के अनेक अंगों; जैसे रक्त कोशिकाओं, माँसपेशियों, नाड़ियों तथा ऊतकों आदि को नुकसान पहुँचता है।

लक्षण (Symptoms):
भीतरी घाव के लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) अंगों में सूजन आ जाना।
(2) अंगों में पीड़ा होना।
(3) शरीर को दबाने पर अकड़न का अनुभव होना।
(4) चमड़ी का रंग बदलना।
(5) शरीर के अंगों का शिथिल पड़ जाना।

बचाव व उपचार (Prevention and Treatment):
भीतरी घाव के बचाव व उपचार के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) पी०आर०आई०सी०ई० (P.R.I.C.E.) प्रयोग के प्राथमिक सहायता निर्देशों का पालन करना चाहिए।
(2) चोटग्रस्त अंग पर पट्टी लपेट देनी चाहिए।
(3) प्रतिदिन 3-4 बार चोटग्रस्त अंग पर लगभग 10 मिनट तक बर्फ की मालिश करनी चाहिए।
(4) अगर 48 घंटे के बाद यह ठीक होने लगे तो बर्फ की बजाए गर्म पट्टी से सेकना चाहिए।
(5) गर्म लैंप, गर्म जुराबें तथा पैड का प्रयोग करना चाहिए।
(6) हृदय की ओर थपथपाना चाहिए।
(7) सुरक्षात्मक उपकरणों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

प्रश्न 13.
खेल के मैदान में किन-किन सावधानियों पर ध्यान देना चाहिए?
अथवा
खेल चोटों से बचने के लिए किन-किन बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
अथवा
हम खेल में आने वाली चोटों से कैसे बच सकते हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
आजकल खेल के मैदान में जितना महत्त्वपूर्ण खेलना है, उतना ही महत्त्वपूर्ण है अपने-आपको चोटों से बचाना। खेल के मैदान में चोटों से बचाव हेतु निम्नलिखित सावधानियों/बातों पर ध्यान देना चाहिए
1. बचाव संबंधी सूचनाएँ (Instructions as Regards Protection):
खिलाड़ियों, प्रबंधकों तथा दर्शकों को बचाव के तरीकों के बारे में अच्छी तरह सूचनाएँ दी जानी चाहिएँ। ये सूचनाएँ लिखित रूप में भी भेजी जा सकती हैं और खेल शुरू होने से पहले मौखिक रूप से भी बतानी चाहिएँ। खिलाड़ियों को खेल खेलने के सही ढंग का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए। उनको यह भी अच्छी तरह बताना चाहिए कि कबड्डी में कैंची से, फुटबॉल में पाँव पर पाँव रख देने से और बॉक्सिंग में मुँह पर पड़ने वाले मुक्के से स्वयं को कैसे बचाना है। इसी तरह कुश्ती में खुद दाव लगाने तथा विरोधी दाव से बचने की पूरी-पूरी जानकारी होनी चाहिए। ऊँची और लंबी छलाँग लगाने में भी इस बात का पता होना चाहिए कि छलाँग लगाने के बाद धरती पर कैसे गिरना है।

2. खेल के मैदान की योजनाबंदी और प्रबंध (Planning and Management of Play Grounds):
खुली जगह में अलग-अलग खेलों के मैदान की योजनाबंदी करते समय भी खिलाड़ियों और दर्शकों के बचाव पर उचित ध्यान देना चाहिए। मैदान इस ढंग से बनाने चाहिएँ कि एक खेल का सामान दूसरे खेल के मैदान में न जाए। इसके लिए मैदानों के बीच तथा आस-पास काफी खुली जगह छोड़ी जानी चाहिए। मैदानों के लिए बाड़ या दीवार भी मैदान की सीमा रेखा से काफी दूर होनी चाहिएँ, ताकि तेज़ दौड़ने वाले खिलाड़ियों को बाड़ या दीवार से टकराकर चोट आदि न लग सके। खेल के मैदान में जाने के लिए एक रास्ता भी होना चाहिए, जिससे गुज़रते हुए व्यक्ति को चोट न लगे। मैदान को समय के अनुसार पानी देकर और फिर जरूरत के अनुसार रोलर फिराकर समतल रखा जाना चाहिए। मैदान में गड्डे और कंकर-पत्थर भी नहीं होने चाहिएँ । छलाँग वाले अखाड़ों को अच्छी तरह खोदना चाहिए। इस तरह मैदान की ठीक देखभाल करने से खिलाड़ियों को खतरनाक चोटों से बचाया जा सकता है।

3.सामान (Equipments):
खेल का सामान बढ़िया किस्म का ही खरीदना चाहिए। घटिया किस्म के सामान से खिलाड़ियों और दर्शकों को चोटें लगने का भय रहता है। बैट, पोल वॉल्ट के पोल, नेज़े, डिस्कस, हैमर, हर्डल, छलाँगों के स्टैंड और जिम्नास्टिक्स का सामान आदि सभी अच्छी किस्म के होने चाहिएँ। सामान को इस्तेमाल से पहले अच्छी तरह परखना चाहिए। नीकैप, थिनगार्ड, दस्ताने, बूट और जुराबें, लैग-गार्ड आदि निजी सामान खिलाड़ी के शरीर की रक्षा करते हैं। जिम्नास्टिक्स और कुश्ती के लिए बढ़िया किस्म के गद्दों का प्रबंध भी खिलाड़ियों के लिए होना चाहिए।

4. दर्शकों के लिए उचित प्रबंध (Fair Arrangement of Spectators):
मैच के समय दर्शकों के बैठने या खड़े होने का उचित प्रबंध किया जाना चाहिए। खेल के मैदान से बाहर कुछ दूरी पर किसी-न-किसी प्रकार की बनावटी हदबंदी बना लेनी चाहिए, ताकि दर्शक खिलाड़ियों से काफी दूर-दूर ही रहें। मैदान की हदबंदी के निकट साइकिल या स्कूटर आदि को खड़े करने की आज्ञा नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इनसे खिलाड़ियों को चोट लगने का डर रहता है।

5. खेल की निगरानी (Inspection of Sports):
खेलों के कोच, अध्यापक, रैफरी और अम्पायर भी योग्यता प्राप्त और अनुभवशील होने चाहिएँ, क्योंकि मैच में कमज़ोर रैफरियों या अम्पायरों से खेल काबू में नहीं रहते। कई बार हॉकी या फुटबॉल के मैच में लड़ाई हो जाती है, जिनमें खिलाड़ियों को चोटें भी लग जाती हैं। इसलिए रैफरी को चाहिए कि खिलाड़ियों से नियमों की पालना करवाकर उनका बचाव करे।

6. खिलाड़ियों को प्रशिक्षण (Training of Sportsmen):
खिलाड़ियों को अधिकतर खेल को खेल की दृष्टि से खेलने’ का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए न कि बदले की भावना से खेलने का। कमज़ोर टीमों को हँसते हुए हार स्वीकार करने का प्रशिक्षण मिलना चाहिए। खिलाड़ियों को बचाव वाली ड्रैस के बारे में भी जानकारी दी जानी चाहिए।

7.खेलने से पहले गर्म होना (Warming up before Playing):
खेलने से पहले हल्की कसरत करने से शरीर गर्म होकर चुस्त हो जाता है। इससे शरीर की सोई हुई शक्ति जाग पड़ती है। इस तरह शरीर का चोटों से बचाव हो जाता है। गर्म हुए शरीर की माँसपेशियों के फटने या खिंच जाने का कोई डर नहीं रहता।

8. डॉक्टरी परीक्षा (Medical Examination):
बहुत सख्त, तेज़ी से थका देने वाली और खतरनाक खेलों में भाग लेने वाले सारे खिलाड़ियों और एथलीटों की डॉक्टरी परीक्षा खेल आरंभ होने से पहले आवश्यक रूप से की जानी चाहिए। जिन खिलाड़ियों और एथलीटों को दिल की बीमारियाँ, खून का अधिक दबाव और हर्निया आदि बीमारियाँ हों, उन्हें इन खेलों के मुकाबले में भाग लेने की आज्ञा नहीं दी जानी चाहिए।

प्रश्न 14.
टखने की मोच के चिह्न, बचाव के उपाय तथा उपचार के बारे में लिखें।
अथवा
टखने की मोच (Sprain of Ankles) के कारण, लक्षण तथा रोकथाम व इलाज के बारे में लिखें।
उत्तर:
टखने की मोच के कारण (Causes of Sprain of Ankles):
टखने में मोच आने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
(1) पाँव का अचानक फिसल जाना।
(2) चलते अथवा दौड़ते हुए अचानक पाँव का किसी गड्ढे में आना।
(3) खेल से पहले शरीर को अच्छी प्रकार से गर्म न करना।
(4) ‘खेल का मैदान समतल न होना।
(5) टखनों के जोड़ों के तंतुओं का मजबूत न होना।
(6) फुटबॉल को किक मारते हुए पाँव के पंजे का जोर से जमीन अथवा विरोधी खिलाड़ी के जूते से टकराना।

चिह्न/लक्षण (Symptoms):
टखने की मोच के लक्षण निम्नलिखित हैं
(1) मोच वाले स्थान पर दर्द होता है।
(2) मोच वाले स्थान पर सूजन आ जाती है।
(3) दर्द बढ़ जाता है तथा जोड़ों में काम करने की शक्ति कम हो जाती है।
(4) गंभीर मोच की स्थिति में ऊपरी चमड़ी का रंग नीला हो जाता है।

रोकथाम/बचाव के उपाय (Measures of Prevention):
इसकी रोकथाम या बचाव के उपाय निम्नलिखित हैं
(1) खेलने से पहले शरीर को अच्छी प्रकार गर्म कर लेना चाहिए।
(2) खेल का मैदान समतल होना चाहिए तथा खेल आरंभ करने से पहले मैदान से कंकड़, पत्थर आदि उठाकर बाहर फेंक देने चाहिएँ।
(3) खेल का सही प्रशिक्षण प्राप्त करने के पश्चात् ही खेलों में भाग लेना चाहिए।

उपचार/इलाज (Treatment):
टखने की मोच का इलाज निम्नलिखित अनुसार करना चाहिए
(1) पाँव के व्यायाम करने चाहिएँ।
(2) पहले 24 अथवा 48 घंटे तक गीले कपड़े की पट्टी रखनी चाहिए।
(3) मोच वाले स्थान पर आठ के आकार की पट्टी बाँधनी चाहिए।
(4) पैर के नीचे कोई वस्तु रखनी चाहिए ताकि बाहरी भाग ऊपर की ओर उठ सके।
(5) जिस व्यक्ति को मोच आई हो, उसके जूते उतार देने चाहिएँ।
(6) मोच को आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
एथलेटिक देखभाल से आप क्या समझते हैं?
अथवा
एथलेटिक केयर का अर्थ व संप्रत्यय बताइए। अथवा
एथलेटिक केयर का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एथलेटिक का अर्थ है-सभी प्रकार की खेलें तथा स्पोर्ट्स। एथलेटिक्स खेलों के प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों में उन क्रियाओं (गतिविधियों) का प्रभुत्व रहता है जिनमें कुशल तथा योग्य खिलाड़ी भाग लेते हैं। एथलेटिक्स के विभिन्न क्षेत्र होते हैं, उदाहरणस्वरूप शिक्षण संस्थाएँ; जैसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय जहाँ पर युवा वर्ग एथलेटिक्स गतिविधियों में भाग लेते हैं। प्रत्येक खेल तथा स्पोर्ट्स की राष्ट्रीय फेडरेशन राष्ट्रीय स्तर पर एथलेटिक्स मुकाबले करवाती हैं और अंतर्राष्ट्रीय संघ या इकाई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एथलेटिक्स मुकाबले करवाती हैं। जब कोई युवा एथलेटिक्स खेलों (प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों) में भाग लेता है तो उसे एक अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतने के लिए कई वर्षों तक कड़े परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण के भार की मात्रा तथा तीव्रता बढ़ती जाती है तो वैसे ही एथलीट के घायल होने का भय अधिक बढ़ जाता है।

एथलेटिक देखभाल या केयर हमें यह जानकारी देती है कि कैसे खेल समस्याओं या चोटों को कम किया जाए, कैसे खेल के स्तर को सुधारा जाए। यदि खिलाड़ी की देखभाल पर ध्यान न दिया जाए तो खिलाड़ी का खेल-जीवन या कैरियर समाप्त हो जाता है। इसलिए हर खिलाड़ी के लिए एथलेटिक देखभाल बहुत महत्त्वपूर्ण पहलू है।

प्रश्न 2.
आजकल प्राथमिक सहायता की पहले से अधिक आवश्यकता क्यों है?
उत्तर:
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं । साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को ओर अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है। इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति.को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। यदि घायल अथवा रोगी व्यक्ति को तुरन्त प्राथमिक सहायता मिल जाए तो उसका जीवन बचाया जा सकता है। कुछ चोटें तो इस प्रकार की हैं, जो खेल के मैदान में बहुत लगती रहती हैं, जिनको मौके पर प्राथमिक सहायता देना बहुत आवश्यक है। यह तभी सम्भव है, यदि हमें प्राथमिक सहायता सम्बन्धी उचित जानकारी हो। इस प्रकार रोगी की स्थिति बिगड़ने से बचाने और उसके जीवन की रक्षा के लिए प्राथमिक सहायता की बहुत आवश्यकता होती है। इसलिए प्राथमिक सहायता की आज के समय में बहुत आवश्यकता हो गई है। प्रत्येक नागरिक को इसका ज्ञान होना चाहिए।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायक को किन तीन मुख्य बातों को ध्यान में रखना चाहिए?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता देने की विधि रोगी की स्थिति के अनुसार देनी चाहिए, जिसके लिए तीन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है
1. चोट की स्थिति-ध्यान रखा जाए कि चोट से शरीर का कौन-सा अंग और कौन-सी प्रणाली प्रभावित हुई है। उसके अनुसार उपचार विधि अपनाई जाए।
2. चोट का ज़ोर-जहाँ चोट का अधिक ज़ोर हो, पहले उसको संभालने का प्रयत्न किया जाए।
3. प्राथमिक सहायता की विधि-जिस प्रकार की चोट लगी हो, उपचार विधि उसी के अनुसार अपनाई जाए। मौके पर उपलब्ध साधनों के अनुसार प्राथमिक सहायता देने की विधि अपनाई जानी चाहिए।

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प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायक या चिकित्सक के कर्तव्यों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
प्राथमिक सहायक या चिकित्सक के प्रमुख कर्त्तव्य निम्नलिखित हैं
(1) प्राथमिक सहायक या चिकित्सक को आवश्यकतानुसार घायल को रोगनिदान करना चाहिए।
(2) उसको इस बात पर विचार करना चाहिए कि घायल को कितनी, कैसी और कहाँ तक सहायता दी जाए।
(3) प्राथमिक चिकित्सक को रोगी या घायल को अस्पताल ले जाने के लिए योग्य सहायता का उपयोग करना चाहिए।
(4) उसको घायल की पूरी देखभाल की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।
(5) घायल के शरीरगत चिह्नों; जैसे सूजन, कुरूपता आदि को प्राथमिक चिकित्सक को अपनी ज्ञानेंद्रियों से पहचानकर उचित सहायता देनी चाहिए।

प्रश्न 5. खेलों में चोटों के प्राथमिक उपचार का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
खेलों में चोट लगने पर क्या उपचार करना चाहिए?
उत्तर:
खेलों में चोट लगने पर निम्नलिखित उपचार करने चाहिएँ
(1) खेलों में चोट लगने पर सबसे पहले बर्फ की मालिश करनी चाहिए। बर्फ सूजन और रक्त के बहाव को रोकती है।
(2) दबाव का प्रयोग करके भी सूजन को घटाया जा सकता है। बर्फ की मालिश के बाद पट्टी को उस स्थान पर इस प्रकार बाँधना चाहिए कि जिससे रक्त का प्रवाह भी न रुके तथा न ही इतनी ढीली होनी चाहिए जिससे कि दोबारा सूजन हो जाए।
(3) खेलों में चोट लगने पर यह जरूरी है कि आराम किया जाए। जब भी शरीर के किसी हिस्से पर चोट लगती है तो चोट वाले स्थान पर दर्द, सूजन जैसे चिह्न बन जाते हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए आराम करना जरूरी है।
(4) चोट लगने पर उस स्थान का उसी के अनुसार इलाज करना चाहिए। यदि शरीर के निचली तरफ चोट लगी है तो उसे दर्द और सूजन से बचाने के लिए आराम और सोते समय चोट लगने वाला हिस्सा ऊँचा रखना चाहिए। यदि चोट शरीर के ऊपरी हिस्से में लगी है तो दर्द और सूजन से बचने के लिए ऊपरी हिस्सा थोड़ा ऊँचा कर देना चाहिए। इससे चोट वाले स्थान को आराम मिलता है।

प्रश्न 6.
खेल में खिंचाव से कैसे बचा जा सकता है?
अथवा
खिंचाव से बचाव की विधियाँ बताइए।
उत्तर:
खिंचाव मांसपेशी की चोट है। खेलते समय कई बार खिलाड़ियों की माँसपेशियों में खिंचाव आ जाता है। कई बार तों माँसपेशियाँ फट भी जाती हैं, जिसके कारण काफी दर्द होता है। प्रायः खिंचाव वाले हिस्से में सूजन आ जाती है।
खेल में खिंचाव से बचने के लिए निम्नलिखित उपायों का प्रयोग करना चाहिए
(1) गीले व चिकने ग्राऊंड, ओस वाली घास पर कभी नहीं खेलना चाहिए।
(2) खेलने से पहले कुछ हल्का व्यायाम करके शरीर को अच्छी तरह गर्म करना चाहिए। इससे खेलने के लिए शरीर तैयार हो जाता है।
(3) चोटों से बचने के लिए प्रत्येक खिलाड़ी को आवश्यक शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
(4) खिलाड़ी को सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 7.
रगड़ लगने पर क्या इलाज किया जाना चाहिए?
अथवा
रगड़ की प्राथमिक चिकित्सा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रगड़ लगने पर इसके इलाज के लिए निम्नलिखित तरीके अपनाने चाहिएँ
(1) चोटग्रस्त स्थान को जितनी जल्दी हो सके गर्म पानी व नीम के साबुन से धोना चाहिए।
(2) यदि रगड़ अधिक हो तो उस स्थान पर पट्टी करवानी चाहिए। पट्टी खींचकर नहीं बाँधनी चाहिए।
(3) चोट के तुरंत बाद एंटी-टैटनस का टीका अवश्य लगवाना चाहिए।
(4) दिन के समय चोट पर पट्टी बाँधनी चाहिए और रात को चोट खुली रखनी चाहिए।
(5) चोट लगने के बाद, तुरंत नहीं खेलना चाहिए। अगर खिलाड़ी खेलता है तो दोबारा उसी जगह पर चोट लग सकती है जो खतरनाक सिद्ध हो सकती है।

प्रश्न 8.
मोच कितने प्रकार की होती है? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मोच तीन प्रकार की होती है जो निम्नलिखित है-
1. नर्म मोच-इसमें जोड़-बंधनों (Ligaments) पर खिंचाव आता है। जोड़ में हिल-जुल करने पर दर्द अनुभव होता है। इस हालत में कमजोरी तथा दर्द महसूस होता है।
2. मध्यम मोच-इसमें जोड़-बंधन काफी मात्रा में टूट जाते हैं। इस हालत में सूजन तथा दर्द बढ़ जाता है।
3. पूर्ण मोच-इसमें जोड़ की हिल-जुल शक्ति समाप्त हो जाती है। जोड़-बंधन पूरी तरह टूट जाते हैं। इस हालत में दर्द असहनीय हो जाता है।

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प्रश्न 9.
मोच (Sprain) क्या है? इसके बचाव की विधियाँ बताएँ।
अथवा
खेल में मोच से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर:
मोच-मोच लिगामेंट्स की चोट होती है। सामान्यतया मोच कोहनी के जोड़ या टखने के जोड़ पर अधिक आती है। किसी जोड़ के संधिस्थल के फट जाने को मोच आना कहते हैं।
बचाव की विधियाँ-मोच से बचाव की विधियाँ निम्नलिखित हैं
(1) पूर्ण रूप से शरीर के सभी जोड़ों को गर्मा लेना चाहिए।
(2) खेल उपकरण अच्छी गुणवत्ता के होने चाहिएँ।
(3) मैदान समतल व साफ होना चाहिए।
(4) थकावट के समय खेल रोक देना चाहिए।
(5) सुरक्षात्मक कपड़े, जूते व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 10.
खेल की चोटों को कम करने के आधारभूत चरण क्या हैं?
अथवा
क्या खेलों की चोटों में बचाव के पक्ष, उपचार से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
खेल की चोटों को कम करने के आधारभूत चरण निम्नलिखित हैं
(1) प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को गर्माना।
(2) सुरक्षात्मक उपकरण का प्रयोग खेल की आवश्यकता के अनुसार करना।
(3) तैयारी के समय उचित अनुकूलन बनाए रखना।
(4) प्रतियोगिता के दौरान सतर्क व सावधान रहना।
(5) सुरक्षात्मक कपड़ों व जूतों का प्रयोग करना।
इस प्रकार उपर्युक्त विवरण के आधार पर खेलों की चोटों में बचाव के पक्ष, उपचार से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं क्योंकि हमेशा सावधानी सभी औषधियों या दवाइयों से बेहतर होती है।

प्रश्न 11.
खेलों में लगने वाली चोटों से बचाव के महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
खेलों में लगने वाली चोटों से बचाव के महत्त्व निम्नलिखित प्रकार से हैं
(1) खिलाड़ी बिना किसी तकलीफ के खेलों में अच्छा प्रदर्शन कर सकता है।
(2) खेलों का संचालन अच्छा होता है।
(3) खिलाड़ी का शरीर स्वस्थ व संतुलित रहता है।
(4) अधिक समय तक खिलाड़ी अपने खेल में अच्छा प्रदर्शन कर सकता है।
(5) खिलाड़ी अपनी पूर्ण शक्ति या ऊर्जा से खेल जारी रख सकता है।

प्रश्न 12.
टखने की मोच (Sprain of Ankles) के कारण लिखें।
उत्तर:
टखने में मोच आने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं
(1) पाँव का अचानक फिसल जाना।
(2) चलते अथवा दौड़ते हुए अचानक पाँव का किसी गड्ढे में आना।
(3) खेल से पहले शरीर को अच्छी प्रकार से गर्म न करना।
(4) खेल का मैदान समतल न होना।
(5) टखनों के जोड़ों के तंतुओं का मजबूत न होना।
(6) फुटबॉल को किक मारते हुए पाँव के पंजे का जोर से जमीन अथवा विरोधी खिलाड़ी के जूते से टकराना।

प्रश्न 13.
घावों के प्राथमिक उपचार पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
घावों के प्राथमिक उपचार हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं
(1) सबसे पहले रोगी को अनुकूल आसन में बैठाए।
(2) रक्त बहते हुए अंग को थोड़ा ऊपर उठाकर रखें।
(3) घाव में यदि कोई बाहरी चीज दिखाई पड़े जो आसानी से हटाई जाए तो साफ पट्टी से हटा दीजिए।
(4) घाव को जहाँ तक हो सके खुला रखे अर्थात् कपड़े आदि से न ढके।
(5) घाव पर मरहम पट्टी लगाएँ और घायल अंग को स्थिर रखें। ।
(6) घाव पर पट्टी इस प्रकार से बाँधनी चाहिए जिससे बहता रक्त रुक सके।
(7) घायल के घाव को आयोडीन टिंक्चर या स्प्रिट से भली भाँति धो देना चाहिए।
(8) घायल को प्राथमिक उपचार के बाद तुरंत डॉक्टर के पास ले जाए।

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प्रश्न 14.
जोड़ या हड्डी के उतर जाने (Dislocation) की प्राथमिक सहायता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
जोड़ या हड्डी के उतर जाने की प्राथमिक सहायता निम्नलिखित प्रकार से करनी चाहिए
(1) घायल को आरामदायक या सुखद स्थिति में रखना चाहिए।
(2) घायल अंग को गद्दियों या तकियों से सहारा देकर स्थिर रखें।
(3) उतरे जोड़ को चढ़ाने का प्रयास कुशल प्राथमिक सहायक को सावधानी से करना चाहिए।
(4) यदि दर्द अधिक हो तो गर्म पानी की टकोर करनी चाहिए।
(5) जोड़ पर बर्फ या ठण्डे पानी की पट्टी बाँधनी चाहिए।
(6) घायल को प्राथमिक सहायता के बाद तुरंत अस्पताल या डॉक्टर के पास ले जाएँ।

प्रश्न 15.
जोड़ों के विस्थापन से क्या तात्पर्य है? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हड्डी का अपने जोड़ वाले स्थान से हट जाना या खिसक जाना, जोड़ का विस्थापन कहलाता है। कुछ ऐसे खेल होते हैं जिनमें हड्डी का उतरना स्वाभाविक है। प्रायः कंधे, कूल्हे तथा कलाई आदि की हड्डी उतरती है। जोड़ों के विस्थापन निम्नलिखित प्रकार के होते हैं
1. निचले जबड़े का विस्थापन-सामान्यतया इस प्रकार का विस्थापन तब होता है, जब ठोडी किसी वस्तु से टकरा जाए। अधिक मुँह खोलने से भी निचले जबड़े का विस्थापन हो सकता है।
2. कन्धे के जोड़ का विस्थापन-कन्धे के जोड़ का विस्थापन अचानक झटके या कठोर सतह पर गिरने से हो सकता है। इस चोट में मांसल की हड्डी (Humerous) का सिरा सॉकेट से बाहर आ जाता है।
3. कूल्हे के जोड़ का विस्थापन-अनायास ही अधिक शक्ति लगाने से कूल्हे के जोड़ का विस्थापन हो सकता है। इस चोट में फीमर का ऊपरी सिरा सॉकेट से बाहर आ जाता है।

प्रश्न 16.
हड्डी टूटने या अस्थि-भंग (Fracture) के प्राथमिक उपचार या सहायता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
टूटी हड्डी के उपचार हेतु किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
टूटी हड्डी के प्राथमिक उपचार के लिए निम्नलिखित उपायों या नियमों को अपनाना चाहिए
(1) टूटी हड्डी का उसी स्थान पर प्राथमिक उपचार करना चाहिए।
(2) टूट के उपचार को करने से पहले रक्तस्राव एवं अन्य तीव्र घावों का उपचार करना चाहिए।
(3) टूटी हड्डी को पट्टियों व कमठियों के द्वारा स्थिर कर देना चाहिए।
(4) टूटी हड्डी पर पट्टियाँ पर्याप्त रूप से कसी होनी चाहिए। पट्टियाँ इतनी न कसी हो कि रक्त संचार में बाधा पैदा हो जाए।
(5) कमठियाँ इतनी लम्बी होनी चाहिएँ कि वे टूटी हड्डी का एक ऊपरी तथा एक निचला जोड़ स्थिर कर दें।
(6) घायल की पट्टियों को इस प्रकार से सही स्थिति में लाए कि उसको कोई तकलीफ न हो।
(7) घायल व्यक्ति को कंबल या किसी कपड़े के द्वारा गर्म करना चाहिए ताकि उसे कोई सदमा न पहुंचे।
(8) प्राथमिक सहायता या उपचार देने के बाद घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुँचा देना चाहिए, ताकि उसका उचित उपचार किया जा सके।

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प्रश्न 17.
खेल चोटें क्या हैं? ये कितने प्रकार की होती हैं?
उत्तर:
खेल चोटें-प्रतिदिन प्रत्येक आयु के खिलाड़ी शारीरिक, मानसिक तथा भावात्मक तैयारी करते हैं, ताकि वे अपने खेल में अच्छी कुशलता दिखा सकें। खेलों में प्रायः चोटें लगती रहती हैं। साधारणतया चोटें उन खिलाड़ियों को लगती हैं जो परिपक्व नहीं होते। उनमें खेलों में आने वाले उतार-चढ़ाव की परिपक्वता नहीं होती और कई बार मैदान का स्तर भी उच्च-कोटि का नहीं होता जिसके कारण चोटें लग जाती हैं। ऐसी चोटों को खेल-चोटें कहा जाता है।

प्रकार-खेल चोटें मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं-
(1) मुलायम या कोमल ऊतकों की चोटें
(2) अस्थियों की चोटें
(3) जोड़ों की चोटें।

प्रश्न 18.
खेलों में चोट लगने के कोई चार कारण बताइए।
अथवा
खेल में चोटें कैसे लगती हैं?
उत्तर:
खेल के मैदान में खेलते समय चोट लगने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) खेलों का घटिया सामान तथा घटिया निगरानी
(2) ऊँचे-नीचे या असमतल खेल के मैदान
(3) बचाव संबंधी उचित सामान की कमी
(4) खिलाड़ियों द्वारा लापरवाही तथा बदले की भावना से खेलना।

प्रश्न 19.
खिंचाव के प्रकार व प्रबन्ध का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
खिंचाव के प्रकार-
(1) सामान्य खिंचाव
(2) मध्यम खिंचाव
(3) गंभीर खिंचाव।

खिंचाव के प्रबन्ध-खिंचाव के प्रबन्ध इस प्रकार हैं-
(1) जिस जगह चोट लगी हो, उसे आरामदायक स्थिति में रखना चाहिए
(2) खिंचाव वाले स्थान पर ठण्डे पानी या बर्फ की मालिश करनी चाहिए। बर्फ का प्रयोग सीधे न करके किसी कपड़े में लपेटकर करना चाहिए
(3) पूर्ण रूप से आराम करना चाहिए
(4) चोट-ग्रस्त अंग को थोड़ा ऊपर रखना चाहिए
(5) अधिक दर्द होने की स्थिति में डॉक्टर की सलाहनुसार उचित दवा लेनी चाहिए।

प्रश्न 20.
चोटों के उपचार के लिए पी०आर०आई०सी०ई० (P.R.I.C.E.) प्रक्रिया का पालन क्यों करना चाहिए? स्पष्ट करें।
उत्तर:
1. सुरक्षा (Protection-P): इसका उद्देश्य घायल व्यक्ति को आगे लगने वाली चोट से सुरक्षा करना है तथा दूसरे एथलीटों और जोखिमों से दूर रखना है।
2. विश्राम (Rest-R): घायल अंग को स्थिरता प्राप्त कराने के यंत्र से स्थिर रखना चाहिए। व्यायाम में वापसी धीमी और क्रमिक होनी चाहिए, यदि घायल व्यक्ति प्रभावित क्षेत्र को बिना किसी दर्द के हिलाने की क्षमता रखता है।
3. बर्फ (Ice-I): खून के बहाव और तरल पदार्थ के नुकसान के कारण होने वाली सूजन और दर्द को चोट लगने के 72 घंटों के बाद बर्फ लगाकर कम किया जा सकता है।
4. संपीड़न (Compression-C): यह प्रारंभिक खून के बहाव को नियंत्रित करने में सहायता करता है और अवशिष्ट सूजन को कम करता है। संपीड़न साधारणतया लोचदार लपेटों के रूप में आता है।
5. ऊँचाई (Elevation-E): घायल अंग की ऊँचाई का दिल के स्तर से ऊपर होना ऊतक में खून के प्रारंभिक बहाव को कम करने में सहायता करता है, जब यह बर्फ और संपीड़न के साथ संयोजन में प्रयोग किया जाता है।

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अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
पराथमिक सहायता (First Aid) से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता का तात्पर्य उस सहायता से है जो कि रोगी अथवा जख्मी को चोट लगने पर अथवा किसी अन्य दुर्घटना के तुरंत बाद डॉक्टर के आने से पूर्व दी जाती है। इसको प्राथमिक चिकित्सा भी कहा जाता है।

प्रश्न 2.
प्राथमिक सहायता के उपकरण (First Aid Equipments) कैसे होने चाहिएँ?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता के बॉक्स में जो उपकरण या सामग्री हो वह काम के अनुकूल होनी चाहिए। उसका आधार स्वास्थ्य के नियमों तथा समय की आवश्यकतानुसार ही होना चाहिए। प्राथमिक सहायता के बॉक्स में सभी आवश्यक उपकरण होने चाहिएँ।

प्रश्न 3.
प्राथमिक सहायता बॉक्स में कौन-कौन-से उपकरण या चीजें होनी चाहिएँ?
उत्तर:
(1) मिली-जुली चिपकने वाली पट्टियाँ,
(2) पतला कागज,
(3) आवश्यक दवाइयाँ,
(4) रूई का बंडल,
(5) कैंची,
(6) सेफ्टी पिन,
(7) तैयार की हुई आकार के अनुसार कीटाणुरहित पट्टियाँ,
(8) कमठियों का एक सैट,
(9) चिपकने वाली पलस्तर,
(10) मरहम पट्टियाँ,
(11) डैटॉल आदि।

प्रश्न 4.
प्राथमिक सहायक के कोई दो गुण बताएँ।
उत्तर:
(1) प्राथमिक सहायक में उचित निर्णय लेने का साहस होना चाहिए।
(2) उसमें सेवा भावना और सहानुभूति की भावना होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
प्राथमिक सहायक किसे कहा जाता है?
उत्तर:
यद्यपि प्रारंभ में प्राथमिक सहायक’ की भूमिका के बारे में कोई वर्णन नहीं मिलता, परन्तु सन् 1994 के बाद प्राथमिक सहायक’ शब्द का प्रयोग शुरू हुआ। जिस व्यक्ति ने किसी आधिकारिक संस्था से प्राथमिक सहायता की शिक्षा प्राप्त की हो, उसे प्राथमिक सहायक कहा जाता है।

प्रश्न 6.
प्राथमिक सहायता के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
(1) रोगी की जिंदगी बचाना,
(2) रोगी की हालत को बिगड़ने से रोकना,
(3) रोगी की हालत को सुधारना,
(4) रोगी को समीप के अस्पताल में पहुँचाना या डॉक्टर के पास लेकर जाना।

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प्रश्न 7.
खिंचाव से क्या अभिप्राय है?
अथवा
माँसपेशियों या पट्ठों का तनाव क्या है?
उत्तर:
खिंचाव या तनाव माँसपेशी की चोट है। खेलते समय कई बार खिलाड़ियों की माँसपेशियों या पट्ठों में खिंचाव आ जाता है जिसके कारण खिलाड़ी अपना खेल जारी नहीं रख सकता। कई बार तो माँसपेशियाँ फट भी जाती हैं, जिसके कारण काफी दर्द महसूस होता है। प्रायः खिंचाव वाले हिस्से में सूजन आ जाती है। खिंचाव का मुख्य कारण खिलाड़ी का खेल के मैदान में अच्छी तरह गर्म न होना है। इसे पट्ठों का खिंच जाना भी कहते हैं।

प्रश्न 8.
मोच से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
किसी जोड़ के अस्थि-बंधक तन्तु (Ligaments) के फट जाने को मोच आना कहते हैं अर्थात् जोड़ के आसपास के जोड़-बंधनों तथा तन्तु वर्ग (Tissues) फट जाने या खिंच जाने को मोच कहते हैं । सामान्यत: घुटनों, रीढ़ की हड्डी तथा गुटों में ज्यादा मोच आती है।

प्रश्न 9.
चोटों की देखरेख में पी०आर०आई०सी०ई० (P.R.I.C.E.) का क्या अर्थ है?
उत्तर:
चोटों की देखरेख में पी०आर०आई०सी०ई० (P.R.I.C.E.) का अर्थ है-P = Protection (सुरक्षा/बचाव), R=Rest (विश्राम), I = Ice (बर्फ),C=Compression (दबाना), E= Elevation (ऊँचा रखना)।अत: पी० आर०आई०सी०ई० का अर्थ है-सुरक्षा/बचाव करना, विश्राम करना, बर्फ लगाना, दबाना व ऊँचा रखना।

प्रश्न 10.
रगड़ या छिलना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
रगड़ त्वचा की चोट है। खेलते समय त्वचा पर ऐसी चोटें लग जाती हैं। प्रायः रगड़ एक मामूली चोट होती है, लेकिन कभी-कभी यह गंभीर भी साबित हो जाती है। अगर रगड़ का चोटग्रस्त भाग अधिक घातक हो जाए और उसमें बाहरी कीटाणु हमला कर दें तो यह भयानक हो जाती है।

प्रश्न 11. रगड़ के क्या कारण हैं?
उत्तर:
(1) कठोर धरातल पर गिर पड़ना
(2) कपड़ों में रगड़ पैदा करने वाले तंतुओं के कारण
(3) जूतों का पैरों में सही प्रकार से फिट न आना
(4) हैलमेट और कंधों के पैडों का असुविधाजनक होना।

प्रश्न 12. घाव कितने प्रकार के होते हैं?
अथवा
जख्मों की कितनी किस्में होती हैं?
उत्तर:
घाव या जख्म चार प्रकार के होते हैं
(1) कट जाने से घाव
(2) फटा हुआ घाव
(3) छिपा हुआ घाव
(4) कुचला हुआ घाव।

प्रश्न 13.
जोड़ उतर जाने (Dislocation) से क्या अभिप्राय है? अथवा जोड़ उतरना क्या है?
उत्तर:
हड्डी का अपने जोड़ वाले स्थान से हट जाना या खिसक जाना, जोड़ उतरना कहलाता है। कुछ ऐसे खेल होते हैं जिनमें हड्डी का उतरना स्वाभाविक है। प्रायः कंधे, कूल्हे तथा कलाई आदि की हड्डी उतरती है।

प्रश्न 14.
अल्प चोटें (Minor Injuries) क्या होती हैं?
उत्तर:
अल्प चोटें वे चोटें होती हैं जिन्हें प्राथमिक चिकित्सा सहायता द्वारा कम समय में ठीक किया जा सकता है। ऐसी चोटें खेलों में खिलाड़ियों को अकसर लगती रहती हैं। ये अधिक घातक तो नहीं होतीं, पर समय पर प्राथमिक चिकित्सा न लिए जाने के कारण घातक सिद्ध हो सकती हैं।

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प्रश्न 15.
गंभीर चोटें (Serious Injuries) क्या होती हैं?
उत्तर:
गंभीर चोटें वे चोटें होती हैं जिसके कारण खिलाड़ी या व्यक्ति अपनी पूरी क्षमता को खेल या कार्य में प्रयोग करने में असमर्थ हो जाता है। ऐसी चोटों में तुरंत डॉक्टरी जाँच की आवश्यकता होती है। कई बार ऐसी चोटें लगने से खिलाड़ियों का जीवन खतरे में पड़ जाता है।

प्रश्न 16.
जटिल फ्रैक्चर क्या होता है? गुंझलदार टूट (Complicated Fracture) क्या है?
उत्तर:
जटिल फ्रैक्चर से कई बार हड्डी की टूट के साथ जोड़ भी हिल जाते हैं। कई बार हड्डी टूटकर शरीर के किसी नाजुक अंग को नुकसान पहुँचा देती है; जैसे रीढ़ की हड्डी की टूट मेरुरज्जु को, सिर की हड्डी की टूट दिमाग को और पसलियों की हड्डियों की टूट दिल, फेफड़े और जिगर को नुकसान पहुँचाती हैं। ऐसी स्थिति में टूट काफी जटिल टूट बन जाती है।

प्रश्न 17.
हड्डी टूटने के दो लक्षण बताएँ। अथवा शरीर के भाग में फ्रैक्चर होने के किन्हीं दो सामान्य लक्षणों का उल्लेख करें।
उत्तर:
(1) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर दर्द होता है
(2) टूटी हुई हड्डी वाले स्थान पर सूजन आ जाती है।

प्रश्न 18.
एथलेटिक देखभाल के विभिन्न कारकों या तत्त्वों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) सुरक्षात्मक कपड़े व जूते
(2) सुरक्षात्मक उपकरण
(3) संतुलित आहार
(4) वैज्ञानिक ढंग से प्रशिक्षण
(5) सामान्य सजगता
(6) वातावरण
(7) गर्माना व ठंडा करना आदि।

प्रश्न 19.
खेलों के सामान्य चोटों के नाम बताइए।
अथवा
खेलों में लगने वाली चार चोटों के नाम लिखिए।
अथवा
उत्तर:
(1) मोच (Sprain)
(2) खिंचाव (Strain)
(3) हड्डी का उतर जाना (Dislocation)
(4) हड्डी का टूटना (Fracture)
(5) भीतरी घाव (Contusion)
(6) रगड़ (Abrasion)।

प्रश्न 20.
कंट्यूशन या भीतरी घाव से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
कंट्यूशन माँसपेशी की चोट होती है। यदि एक प्रत्यक्ष मुक्का या कोई खेल उपकरण शरीर को लग जाए तो कंट्यूशन का कारण बन सकता है। मुक्केबाजी, कबड्डी और कुश्ती आदि में कंट्यूशन होना स्वाभाविक है। कंट्यूशन में माँसपेशियों में रक्त कोशिकाएँ टूट जाती हैं और कभी-कभी मांसपेशियों से रक्त भी बहने लगता है।

प्रश्न 21.
भीतरी घाव की रोकथाम के कोई दो उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) सुरक्षात्मक उपकरणों; जैसे दस्ताने, हैलमेट आदि का प्रयोग करके इससे बचा जा सकता है।
(2) अभ्यास या प्रतियोगिता में भाग लेने से पूर्व शरीर को गर्माकर इससे बचा जा सकता है।

प्रश्न 22.
नील (Bruise) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
ऊपरी त्वचा पर कोई निशान या चिह्न न पड़ने के कारण यह चोट स्पष्टतया दिखाई नहीं पड़ती, लेकिन आंतरिक ऊतक नष्ट हो जाते हैं। इस चोट से प्रभावित स्थान नीला पड़ जाता है अर्थात् त्वचा के नीचे रक्त फैल जाता है।

प्रश्न 23.
नील के क्या कारण हैं?
उत्तर:
(1) अभ्यास व प्रतियोगिता से पूर्व खिलाड़ियों द्वारा शरीर को न गर्माना
(2) खेल मैदान का समतल न होना
(3) खेलों में अच्छी गुणवत्ता के उपकरणों का प्रयोग न करना
(4) थकावट की स्थिति में खेल को जारी रखना।

प्रश्न 24.
खेलों में चोटें कितने प्रकार की होती हैं? उनके नाम लिखिए।
उत्तर:
खेलों में चोटें दो प्रकार की होती हैं-
(1). कोमल ऊतकों की चोटें
(2) कठोर ऊतकों की चोटें।

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प्रश्न 25.
नील से बचाव के कोई दो उपाय बताएँ।
उत्तर:
(1) अभ्यास, प्रशिक्षण व प्रतियोगिता के दौरान खिलाड़ियों को सतर्क व सावधान रहना चाहिए।
(2) सुरक्षात्मक कपड़ों, जूतों व उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए।

प्रश्न 26.
जोड़ उतरने के कोई दो लक्षण बताएँ।
उत्तर:
(1) जोड़ों में तेज़ दर्द होती है तथा सूजन आ जाती है
(2) जोड़ में गति बन्द हो जाती है। थोड़ी-सी गति से दर्द होती है।

प्रश्न 27.
जोड़ उतरने के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:(1) खेल मैदान का ऊँचा नीचा होना अथवा अधिक सख्त या नरम होना।
(2) अचानक गिरने से हड्डी का हिल जाना।

प्रश्न 28.
मोच के लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) सूजन वाले स्थान पर दर्द शुरू हो जाता है।
(2) थोड़ी देर बाद जोड़ के मोच वाले स्थान पर सूजन आने लगती है।
(3) सूजन वाले भाग में कार्य की क्षमता कम हो जाती है।

प्रश्न 29.
जोड़ों का विस्थापन (Dislocation) कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
जोड़ों का विस्थापन मुख्यतः तीन प्रकार का होता है-
(1) कूल्हे का विस्थापन,
(2) कन्धे का विस्थापन,
(3) निचले जबड़े का विस्थापन।

प्रश्न 30.
दबा हुआ फ्रैक्चर (Depressed Fracture) क्या होता है?
उत्तर:
सामान्यतया यह फ्रैक्चर सिर की हड्डियों में होता है। जब खोपड़ी के ऊपरी भाग या आस-पास से हड्डी टूट जाने पर अंदर फंस जाती है तो ऐसा फ्रैक्चर दबा हुआ फ्रैक्चर कहलाता है।

प्रश्न 31.
अस्थि-भंग के क्या कारण हैं? अथवा हड्डी टूटने के मुख्य कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) यदि कोई भार तेजी से आकर हड्डी में लगे तो हड्डी अपने स्थान से खिसक जाती है
(2) खेल मैदान का ऊँचा-नीचा होना अथवा असमतल होना
(3) खेल सामान का शारीरिक शक्ति से भारी होना।

प्रश्न 32.
कन्धे के जोड़ का विस्थापन किसे कहते हैं ?
उत्तर:
कन्धे के जोड़ का विस्थापन एक ऐसी चोट है जिसमें आपकी ऊपरी बाजू की हड्डी कप के आकार की सॉकेट (Cup-shaped Socket) से निकलती है जो आपके कन्धे के जोड़ का हिस्सा है। कन्धे का जोड़ शरीर का ऐसा जोड़ है जो विस्थापन के लिए अति संवेदनशील होता है।

प्रश्न 33.
फ्रैक्चर का क्या अर्थ है? अथवा हड्डी का टूटना क्या है?
उत्तर:
किसी हड्डी का टूटना, फिसलना अथवा दरार पड़ जाना टूट (Fracture) कहलाता है। हड्डी पर जब दुःखदायी स्थिति में दबाव पड़ता है तो हड्डी से सम्बन्धित माँसपेशियाँ उस दबाव को सहन नहीं कर सकतीं, जिस कारण हड्डी फिसल अथवा टूट जाती है। अतः फ्रैक्चर का अर्थ है-हड्डी का टूटना या दरार पड़ जाना।

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प्रश्न 34.
बहुसंघीय फ्रैक्चर या बहुखंडीय अस्थि-भंग (Comminuted or Multiple Fracture) क्या होता है?
उत्तर:
जब हड्डी कई भागों से टूट जाए तो इसे बहुसंघीय या बहुखंड फ्रैक्चर कहा जाता है।

प्रश्न 35.
पच्चड़ी अस्थि-भंग किसे कहते हैं?
उत्तर:
पच्चड़ी अस्थि-भंग (Impacted Fracture) को अन्य नामों से भी जाना जाता है; जैसे बहुसंघीय अस्थि-भंग, बहुखंड अस्थि-भंग, चपटा अस्थि-भंग आदि। जब किसी घायल व्यक्ति के टूटे अस्थि-भंगों (Fractures) के सिरे एक-दूसरे में घुस जाते हैं तो उसे पच्चड़ी अस्थि-भंग कहा जाता है।

प्रश्न 36.
कच्चा फ्रैक्चर (Greenstick Fracture) क्या होता है?
उत्तर:
यह छोटे बच्चों में होता है क्योंकि छोटी आयु के बच्चों की हड्डियाँ बहुत नाजुक होती हैं जो शीघ्र मुड़ जाती हैं। यही कच्चा फ्रैक्चर होता है।

HBSE 12th Class Physical Education एथलेटिक देखभाल Important Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
लिगामेंट्स की चोट कौन-सी होती है?
उत्तर:
लिगामेंट्स की चोट मोच होती है।

प्रश्न 2.
चोट के तुरंत बाद खिलाड़ी को कौन-सा टीका लगवाना चाहिए?
उत्तर:
चोट के तुरंत बाद खिलाड़ी को एंटी-टैटनस का टीका लगवाना चाहिए।

प्रश्न 3.
कंट्यूशन का प्राथमिक उपचार क्या है?
उत्तर:
पी०आर०आई०सी०ई० (P.R.I.C.E.) का पालन करना।

प्रश्न 4.
किस दुर्घटना में सेक (हीट) थेरेपी का बहुत महत्त्व है?
उत्तर:
भीतरी चोट लगने पर।

प्रश्न 5.
हड्डी की टूट का सही इलाज करवाने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर:
हड्डी की टूट का सही इलाज करवाने के लिए टूट वाली हड्डी का एक्सरा करवाना चाहिए।

प्रश्न 6.
कंट्यूशन किस अंग की चोट है?
उत्तर:
कंट्यूशन माँसपेशियों की चोट है।

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प्रश्न 7.
खिलाड़ी को प्रशिक्षण व प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को क्या करना चाहिए?
उत्तर:
खिलाड़ी को प्रशिक्षण व प्रतियोगिता से पूर्व शरीर को भली-भाँति गर्मा लेना चाहिए।

प्रश्न 8.
मुक्केबाजी में प्रायः कैसी चोट लगती है?
उत्तर:
मुक्केबाजी में प्रायः कंट्यूशन या भीतरी घाव नामक चोट लगती है।

प्रश्न 9.
खिंचाव कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
खिंचाव तीन प्रकार की होती है-
(1) सामान्य खिंचाव
(2) मध्यम खिंचाव
(3) गंभीर खिंचाव।

प्रश्न 10.
कच्ची अस्थि-भंग प्रायः किन्हें होता है?
उत्तर:
कच्ची अस्थि-भंग प्रायः बच्चों को होता है।

प्रश्न 11.
खिंचाव किस अंग की चोट है?
उत्तर:
खिंचाव माँसपेशियों की चोट है।

प्रश्न 12.
किस प्रकार की मोच में दर्द असहनीय होता है?
उत्तर:
पूर्ण मोच में दर्द असहनीय होता है।

प्रश्न 13.
इलाज से अच्छा क्या होता है?
उत्तर:
इलाज से अच्छा परहेज होता है।

प्रश्न 14.
टूटी हड्डी को हिलने से बचाने के लिए किस चीज़ का सहारा देना चाहिए?
उत्तर:
टूटी हड्डी को हिलने से बचाने के लिए पट्टियाँ और बाँस की फट्टियों का सहारा देना चाहिए।

प्रश्न 15.
कंट्यूशन में शीत दबाव दिन में कितनी बार करना चाहिए?
उत्तर:
कंट्यूशन में शीत दबाव दिन में 5 या 6 बार करना चाहिए।

प्रश्न 16.
किस प्रकार की टूट (Fracture) अधिक खतरनाक होती है?
उत्तर:
जटिल टूट अधिक खतरनाक होती है।

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प्रश्न 17.
ऑस्टिओपोरोसिस (Oesteoporosis) के कारण किस प्रकार की चोट लग सकती है?
उत्तर:
फ्रैक्चर या हड्डी टूटना।

प्रश्न 18.
पट्टों (माँसपेशियों) में खिंचाव आने का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर:माँसपेशियों को अधिक तेज हरकत में लाना।

प्रश्न 19.
खेल चोटों से बचाव हेतु किस प्रकार का मैदान होना चाहिए?
उत्तर:
खेल चोटों से बचाव हेतु समतल व साफ-सुथरा मैदान होना चाहिए।

प्रश्न 20.
रगड़/खरोंच किस अंग की चोट है?
उत्तर:
रगड़/खरोंच त्वचा की चोट है।

प्रश्न 21.
प्राथमिक सहायता में ABC का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
A= Airways,
B = Breathing,
C = Compression

प्रश्न 22.
खेलों में दौड़ने, कूदने और फेंकने को क्या कहते हैं?
उत्तर:
खेलों में दौड़ने, कूदने और फेंकने को एथलेटिक्स कहते हैं।

प्रश्न 23.
हड्डी टूटने (Fracture) के कितने प्रकार हैं?
उत्तर:
हड्डी टूटने (Fracture) के सात प्रकार हैं।

प्रश्न 24.
कंट्यूशन चोट लगने पर शरीर को क्या नुकसान होता है?
उत्तर:
कंट्यूशन चोट से शरीर के अनेक अंगों या भागों; जैसे रक्त कणों, माँसपेशियों, नाड़ियों तथा ऊतकों को नुकसान होता है।

प्रश्न 25.
मोच से बचाव का कोई एक उपाय बताएँ।
उत्तर:
मोच से बचाव हेतु शरीर को पूर्णतया विशेष रूप से गर्मा लेना चाहिए।

प्रश्न 26.
सामान्य खेल चोटों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
(1) नील पड़ना
(2) रगड़।

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प्रश्न 27.
डॉक्टर के पहुंचने से पूर्व घायल व्यक्ति को कौन-सी सहायता दी जाती है?
अथवा
घायल या मरीज को तुरंत दी जाने वाली सहायता क्या कहलाती है?
उत्तर:
प्राथमिक सहायता या चिकित्सा।।

प्रश्न 28.
किस प्रकार के अस्थि-भंग में एक अस्थि दो या दो से अधिक टुकड़ों में टूट जाती है?
उत्तर:
बहुखंडीय टूट या फ्रैक्चर में एक अस्थि दो या दो से अधिक टुकड़ों में टूट जाती है।

प्रश्न 29.
किन खेलों में कंट्यूशन का खतरा अधिक होता है?
उत्तर:
सीधे संपर्क वाले खेलों में कंट्यूशन का खतरा अधिक होता है।

प्रश्न 30.
जोड़ उतरने का कोई एक चिह्न या लक्षण बताएँ।
उत्तर:
चोट वाले स्थान पर सूजन आ जाना।

प्रश्न 31.
सामान्यतया किन अंगों को ज्यादा मोच आती है?
उत्तर:
घुटनों तथा टखनों को।

प्रश्न 32.
मोच आने पर उस स्थान को कितने समय बाद गर्म करना (सेकना) चाहिए?
उत्तर:
मोच आने पर उस स्थान को 48 घंटे बाद गर्म करना (सेकना) चाहिए।

प्रश्न 33.
अस्थियों की चोटों (Bone Injuries) के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
(1) साधारण अस्थि -भंग (Simple Fracture)
(2) जटिल अस्थि -भंग (Complicated Fracture)।

प्रश्न 34.
जोड़ों की चोटों के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:
(1) कूल्हे के जोड़ का विस्थापन,
(2) कंधे के जोड़ का विस्थापन।

प्रश्न 35.
किन खेलों में कंट्यूशन का खतरा अधिक होता है?
उत्तर:
सीधे संपर्क वाले खेलों; जैसे मुक्केबाजी में कंट्यूशन का खतरा अधिक होता है।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. एथलेटिक का अर्थ है
(A) खेलकूद संबंधी
(B) मनोरंजन संबंधी
(C) पोषण संबंधी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) खेलकूद संबंधी

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2. एथलेटिक देखभाल के मुख्य क्षेत्र कौन-कौन-से हैं?
(A) खेल चोटें
(B) पोषण
(C) प्रशिक्षण विधियाँ
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. क्या खिंचाव की स्थिति में मालिश करनी चाहिए?
(A) नहीं
(B) हाँ
(C) कभी-कभी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) नहीं

4. किसी जोड़ के संधि-स्थल के फट जाने या लिगामेंट के टूटने को क्या कहते हैं?
(A) खिंचाव
(B) कंट्यूशन
(C) मोच
(D) रगड़
उत्तर:
(C) मोच

5. कंट्यूशन किसकी चोट है?
(A) हड्डी की
(B) दिमाग की
(C) जोड़ की
(D) माँसपेशी की
उत्तर:
(D) माँसपेशी की

6. मोच आने पर क्या इलाज अपनाना चाहिए?
(A) ठंडे पानी से धोना चाहिए
(B) बर्फ लगाना चाहिए
(C) पट्टी बाँधनी चाहिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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7. खिंचाव किसकी चोट है?
(A) माँसपेशी की
(B) त्वचा की
(C) मुलायम ऊतकों की
(D) जोड़ों की
उत्तर:
(A) माँसपेशी की

8. खिंचाव वाले स्थान पर कितने घंटे बाद सेक देनी चाहिए?
(A) 24 घंटे बाद
(B) 36 घंटे बाद
(C) 48 घंटे बाद
(D) 2 घंटे बाद
उत्तर:
(C) 48 घंटे बाद

9. खिलाड़ी को खिंचाव आने पर क्या इलाज करवाना चाहिए?
(A) चोटग्रस्त अंग पर पट्टी बाँधनी चाहिए
(B) सूजन कम करने के लिए मालिश करनी चाहिए
(C) सामान्य क्रिया धीरे-धीरे जारी रखनी चाहिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

10. पी० आर० आई० सी० ई० (P.R.I.C.E.) का क्या अर्थ है?
(A) सुरक्षा, बर्फ, विश्राम, दबाना और ऊँचा उठाना
(B) दबाना, ऊँचा रखना, विश्राम, बर्फ और सुरक्षा
(C) सुरक्षा, विश्राम, बर्फ, दबाना और ऊँचा रखना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सुरक्षा, विश्राम, बर्फ, दबाना और ऊँचा रखना

11. प्रत्यक्ष मुक्का या कोई खेल उपकरण शरीर में लग जाने से कौन-सी चोट लगती है?
(A) भीतरी घाव (कंट्यूशन)
(B) खिंचाव
(C) मोच
(D) रगड़
उत्तर:
(A) भीतरी घाव (कंट्यूशन)

12. किस दुर्घटना में सेक (हीट) थेरेपी का बहुत महत्त्व है?
(A) भीतरी चोट लगने पर
(B) करंट लगने पर
(C) बेहोश होने पर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) भीतरी चोट लगने पर

13. खिंचाव आ जाने के कारण कई बार मांसपेशियाँ ………………… जाती हैं।
(A) फट
(B) सिकुड़
(C) फैल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) फट

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14. निम्नलिखित में से कौन-सा मोच का लक्षण नहीं है?
(A) जोड़ में दर्द होना
(B) माँसपेशियाँ फूल जाना
(C) चलने-फिरने में तकलीफ होना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) माँसपेशियाँ फूल जाना।

15. सामान्य खेल चोटें कितने प्रकार की होती हैं?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच
उत्तर:
(B) तीन

16. खेल चोटों के प्रकार हैं
(A) मुलायम ऊतकों की चोटें
(B) अस्थियों की चोटें
(C) जोड़ों की चोटें
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. कंट्यूशन, खिंचाव, मोच, रगड़ या खरोंच किस प्रकार की चोटें हैं?
(A) अस्थियों की चोटें
(B) मुलायम ऊतकों की चोटें
(C) जोड़ों की चोटें
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) मुलायम ऊतकों की चोटें

18. निम्नलिखित में से कौन-सा रगड़ का कारण नहीं है?
(A) कठोर धरातल पर गिर पड़ना
(B) खिलाड़ी द्वारा शरीर को बिना गर्म किए खेल में हिस्सा लेना
(C) जूतों का पैरों में सही प्रकार से फिट न आना
(D) हैलमेट और कंधों के पैडों का असुविधाजनक होना
उत्तर:
(B) खिलाड़ी द्वारा शरीर को बिना गर्म किए खेल में हिस्सा लेना

19. ऑस्टियोपोरोसिस के कारण किस प्रकार की चोट लग सकती है?
(A) खिंचाव
(B) मोच
(C) रगड़
(D) अस्थि-भंग
उत्तर:
(D) अस्थि-भंग

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

20. वह कौन-सा अस्थि-भंग है जिसमें टूटी हुई अस्थि आन्तरिक अंग या अंगों को भी हानि पहुँचा देती है?
(A) पच्चड़ी अस्थि-भंग
(B) साधारण अस्थि -भंग
(C) जटिल अस्थि-भंग
(D) कच्ची अस्थि-भंग
उत्तर:(C) जटिल अस्थि-भंग

21. निम्नलिखित में से किसे मुलायम ऊतकों की चोटों में शामिल किया जाता है?
(A) कंट्यूशन
(B) मोच
(C) रगड़
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

भाग-III: रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. खिंचाव वाले अंग को ………………… स्थिति में रखना चाहिए।
2. चोट लगने के बाद तुरंत ………………… का टीका लगवाना चाहिए।
3. कंट्यूशन से पीड़ित अंग को ………………… तक दबाना चाहिए।
4. खिंचाव आ जाने के कारण कई बार माँसपेशियाँ ………………… जाती हैं।
5. मोच ………………….. प्रकार की होती है।।
6. सुरक्षात्मक उपकरण का प्रयोग ……… की आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए।
7. अभ्यास व प्रतियोगिता से पूर्व खिलाड़ी को अपने शरीर को ………………… लेना चाहिए।
8. मोच. ……………….. की चोट होती है।
9. रगड़ या छिलना ………………… की चोट है।
10. थकावट की स्थिति में खिलाड़ी को खेल ………………… रखना चाहिए।
11. घायल या मरीज को तत्काल दी जाने वाली सहायता ………………… कहलाती है।
12. खेल चोटें मुख्यतः …………….. प्रकार की होती है।
उत्तर:
1. आरामदायक
2. एंटी-टैटनस,
3. 72 घंटे
4. फट
5. तीन
6. खेल
7. गर्मा
8. लिगामेंट
9. त्वचा
10. जारी नहीं
11. प्राथमिक सहायता
12. तीन।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 4 एथलेटिक देखभाल

एथलेटिक देखभाल Summary

एथलेटिक देखभाल परिचय

एथलेटिक देखभाल या केयर (Athletic Care):
एथलेटिक का अर्थ है– सभी प्रकार की खेलें तथा स्पोर्ट्स। एथलेटिक्स खेलों के प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों में उन क्रियाओं (गतिविधियों) का प्रभुत्व रहता है जिनमें कुशल तथा योग्य खिलाड़ी भाग लेते हैं। एथलेटिक्स के विभिन्न क्षेत्र होते हैं, उदाहरणस्वरूप शिक्षण संस्थाएँ; जैसे स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय जहाँ पर युवा वर्ग एथलेटिक्स गतिविधियों में भाग लेते हैं। प्रत्येक खेल तथा स्पोर्ट्स की राष्ट्रीय फेडरेशन राष्ट्रीय स्तर पर एथलेटिक्स मुकाबले करवाती हैं और अंतर्राष्ट्रीय संघ या इकाई अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एथलेटिक्स मुकाबले करवाती हैं। जब कोई युवा एथलेटिक्स खेलों (प्रतिस्पर्धात्मक मुकाबलों) में भाग लेता है तो उसे एक अंतर्राष्ट्रीय पदक जीतने के लिए कई वर्षों तक कड़े परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। जैसे-जैसे प्रशिक्षण के.भार की मात्रा तथा तीव्रता बढ़ती जाती है तो वैसे ही एथलीट के घायल होने का भय अधिक बढ़ जाता है।

एथलेटिक देखभाल हमें यह जानकारी देती है कि कैसे खेल समस्याओं या चोटों को कम किया जाए, कैसे खेल के स्तर को सुधारा जाए। यदि खिलाड़ी की देखभाल पर ध्यान न दिया जाए तो खिलाड़ी का खेल-जीवन या कैरियर समाप्त हो जाता है। इसलिए हर खिलाड़ी के लिए एथलेटिक देखभाल बहुत महत्त्वपूर्ण पहलू है।

प्राथमिक सहायता (First Aid):
आज की तेज रफ्तार ज़िंदगी में अचानक दुर्घटनाएं होती रहती हैं। साधारणतया घरों, स्कूलों, कॉलेजों, दफ्तरों तथा खेल के मैदानों में दुर्घटनाएँ देखने में आती हैं। मोटरसाइकिलों, बसों, कारों, ट्रकों आदि में टक्कर होने से व्यक्ति घायल हो जाते हैं। मशीनों की बढ़ रही भरमार और जनसंख्या में हो रही निरंतर वृद्धि ने भी दुर्घटनाओं को ओर अधिक बढ़ा दिया है। प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर डॉक्टरी सहायता मिलना कठिन होता है। इसलिए ऐसे संकट का मुकाबला करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को प्राथमिक सहायता का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है। आज प्राथमिक सहायता की महत्ता बहुत बढ़ गई है। प्राथमिक सहायता रोगी के लिए वरदान की भाँति होती है और प्राथमिक सहायक भगवान की ओर से भेजा दूत माना जाता है। आज के समय में कोई किसी के दुःख-दर्द की परवाह नहीं करता। एक प्राथमिक सहायक ही है जो दूसरों के दर्द को समझने और उनके दुःख में शामिल होने की भावना रखता है।

खेलों में लगने वाली सामान्य चोटें (Some Common Injuries in Sports):
(1) भीतरी घाव या कंट्यूशन
(2) मोच
(3) खिंचाव
(4) रगड़
(5) हड्डी टूटना
(6) जोड़ उतरना।

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HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

HBSE 12th Class Physical Education स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Questions and Answers

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न [Long Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य क्या है? इसके महत्त्व या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य से क्या अभिप्राय है? हमारे जीवन में अच्छे स्वास्थ्य की क्या उपयोगिता है?
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ (Meaning of Health):
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं । सामान्यतया पारस्परिक व रूढ़िगत संदर्भ में स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिसमें वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है।

स्वास्थ्य का महत्त्व या उपयोगिता (Importance or Utility of Health):
अच्छे स्वास्थ्य के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर सकता। अस्वस्थ व्यक्ति समाज की एक लाभदायक इकाई होते हुए भी बोझ-सा बन जाता है। एक प्रसिद्ध कहावत है-“स्वास्थ्य ही धन है।” यदि हम संपूर्ण रूप से स्वस्थ हैं तो हम जिंदगी में बहुत-सा धन कमा सकते हैं। अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्ति को लाभ होता है, बल्कि जिस समाज या देश में वह रहता है, उस पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। साइरस (Syrus) के अनुसार, “अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी समझ-दोनों जीवन के सबसे बड़े आशीर्वाद हैं।” इसलिए स्वास्थ्य का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है; जैसे
(1) स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह वास्तव में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
(3) स्वास्थ्य के महत्त्व के बारे में अरस्तू ने कहा-“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” इस कथन से भी हमारे जीवन में स्वास्थ्य की उपयोगिता व्यक्त हो जाती है।
(4) स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
(5) स्वास्थ्य से हमारा जीवन संतुलित, आनंदमय एवं सुखमय रहता है।
(6) स्वास्थ्य हमारी जीवन-शैली को बदलने में हमारी सहायता करता है।
(7) किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे तो उस देश का आर्थिक विकास भी उचित दिशा में होगा।
(8) स्वास्थ्य से हमारी कार्यक्षमता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(9) अच्छे स्वास्थ्य से हमारे शारीरिक अंगों की कार्य-प्रणाली सुचारू रूप से चलती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारे शारीरिक संस्थानों को प्रभावित करती है और हमारी जीवन-शैली में आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण बदलाव करती है। अच्छा स्वास्थ्य रोगों से मुक्त होने के अतिरिक्त किसी व्यक्ति की मानसिक, शारीरिक और सामाजिक खुशहाली एवं प्रसन्नता को व्यक्त करता है। यह हमेशा अच्छा महसूस करवाता है। वर्जिल के अनुसार, “सबसे बड़ाधन स्वास्थ्य है।” इस तरह हमारे जीवन में स्वास्थ्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। स्वास्थ्य की महत्ता बताते हुए महात्मा गाँधी ने कहा”स्वास्थ्य ही असली धन है न कि सोने एवं चाँदी के टुकड़े।” स्वास्थ्य ही हमारा असली धन है। जब हम इसे खो देते हैं तभी हमें इसका असली मूल्य पता चलता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य का क्या अर्थ है? इसके पहलुओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? इसके आयामों का वर्णन कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषा लिखें। इसके रूपों का भी वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health):
स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिससे वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है। विभिन्न विद्वानों ने स्वास्थ्य को निम्नलिखित प्रकार से परिभाषित किया है-
1. जे०एफ० विलियम्स (J.F. Williams) के अनुसार, “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।”
2. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”
3. वैबस्टर्स विश्वकोष (Webster’s Encyclopedia) के कथनानुसार, “उच्चतम जीवनयापन के लिए व्यक्तिगत, भावनात्मक और शारीरिक स्रोतों को संगठित करने की व्यक्ति की अवस्था को स्वास्थ्य कहते हैं।”
4. रोजर बेकन (Roger Bacon) के अनुसार, “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।”
5. इमर्जन (Emerson) के अनुसार, “स्वास्थ्य प्रथम पूँजी है।”
संक्षेप में, स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है जिसमें वह मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसमें उसके शारीरिक अंग, आंतरिक तथा बाहरी रूप से अपने पर्यावरण से व्यवस्थित होते हैं।

स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या आयाम (Aspects or Dimensions of Health):
स्वास्थ्य एक गतिशील प्रक्रिया है जो हमारी जीवन-शैली को प्रभावित करता है। इसके विभिन्न आयाम या पहलू निम्नलिखित हैं-
1. शारीरिक स्वास्थ्य (Physical Health):
शारीरिक स्वास्थ्य संपूर्ण स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसके अंतर्गत हमें व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी प्राप्त होती है। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि उसके सभी शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हों। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों की रचना एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, अपितु उनको स्वस्थ रखने की भी जानकारी होनी चाहिए। शारीरिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति समाज व देश के विकास एवं प्रगति में भी सहायक होता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाने हेतु संतुलित एवं पौष्टिक भोजन, व्यक्तिगत सफाई, नियमित व्यायाम व चिकित्सा जाँच और नशीले पदार्थों के निषेध आदि की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।

2. मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health):
मानसिक या बौद्धिक स्वास्थ्य के बिना सभी स्वास्थ्य अधूरे हैं, क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य का संबंध मन की प्रसन्नता व शांति से है अर्थात् इसका संबंध तनाव व दबाव मुक्ति से है। यदि व्यक्ति का मन चिंतित एवं अशांत रहेगा तो उसका कोई भी विकास पूर्ण नहीं होगा। आधुनिक युग में मानव जीवन इतना व्यस्त हो गया है कि उसका जीवन निरंतर तनाव, दबाव व चिंताओं से घिरा रहता है। परन्तु जिन व्यक्तियों का मानसिक स्वास्थ्य उत्तम होता है वे आधुनिक संदर्भ में भी स्वयं को चिंतामुक्त अनुभव करते हैं। मानसिक स्वास्थ्य से व्यक्ति के बौद्धिक विकास और जीवन के अनुभवों को सीखने की क्षमता में वृद्धि होती है। लेकिन मानसिक अस्वस्थता के कारण न केवल मानसिक रोग हो जाते हैं, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य भी गिर जाता है और शारीरिक कार्य-कुशलता में भी कमी आ जाती है। इसलिए व्यक्ति को अपने मानसिक स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए तनाव व दबाव से दूर रहना चाहिए, उचित विश्राम करना चाहिए और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।

3. सामाजिक स्वास्थ्य (Social Health):
सामाजिक स्वास्थ्य भी स्वास्थ्य का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है । यह व्यक्ति की सामाजिक सुरक्षा पर निर्भर करता है । यह व्यक्ति में संतोषजनक व्यक्तिगत संबंधों की क्षमता में वृद्धि करता है। व्यक्ति सामाजिक प्राणी होने के नाते समाज के नियमों, मान-मर्यादाओं आदि का पालन करता है । यदि एक व्यक्ति अपने परिवार व समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के प्रति सचेत है तो उसे सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति कहा जाता है। सामाजिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति सैद्धांतिक, वैचारिक, आत्मनिर्भर व जागरूक होता है। वह अनेक सामाजिक गुणों; जैसे आत्म-संयम, धैर्य, बंधुत्व, आत्म-विश्वास आदि से पूर्ण होता है। समाज, देश, परिवार व जीवन के प्रति उसका दृष्टिकोण रचनात्मक व सकारात्मक होता है।

4. संवेगात्मक या भावनात्मक स्वास्थ्य (Emotional Health):
संवेगात्मक स्वास्थ्य में व्यक्ति के अपने संवेग; जैसे डर, गुस्सा, सुख, क्रोध, दुःख, प्यार आदि शामिल होते हैं। इसके अंतर्गत स्वस्थ व्यक्ति का अपने संवेगों पर पूर्ण नियंत्रण होता है। वह प्रत्येक परिस्थिति में नियंत्रित व्यवहार करता है। हार-जीत पर वह अपने संवेगों को नियंत्रित रखता है और अपने परिवार, मित्रों व अन्य व्यक्तियों से मिल-जुलकर रहता है। जिस व्यक्ति को अपने संवेगों पर नियंत्रण होता है वह बड़ी-से-बड़ी परिस्थितियों में भी स्वयं को संभाल सकता है और निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर हो सकता है।

5. आध्यात्मिक स्वास्थ्य (Spiritual Health):
आध्यात्मिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जो नैतिक नियमों का पालन करता हो, दूसरों के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता हो, सत्य व न्याय में विश्वास रखने वाला हो और जो दूसरों को किसी भी प्रकार का कोई नुकसान न पहुँचाता हो आदि। ऐसा व्यक्ति व्यक्तिगत मूल्यों से संबंधित होता है। दूसरों के प्रति सहानुभूति एवं सहयोग की भावना रखना, सहायता करने की इच्छा आदि आध्यात्मिक स्वास्थ्य के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं । आध्यात्मिक स्वास्थ्य की प्राप्ति हेतु मुख्यत: योग व ध्यान सबसे उत्तम माध्यम हैं। इनके द्वारा आत्मिक शांति व आंतरिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है।

प्रश्न 3.
स्वस्थ रहने के लिए व्यक्ति को किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
अथवा
अच्छे स्वास्थ्य हेतु हमें किन-किन नियमों का पालन करना चाहिए?
उत्तर:
स्वस्थ रहने के लिए हमें निम्नलिखित आवश्यक नियम या सिद्धांत ध्यान में रखने चाहिएँ
1. शारीरिक संस्थानों या अगों का ज्ञान (Knowledge of Body System or Organs): हमें अपने शरीर के संस्थानों या अंगों; जैसे दिल, आमाशय, फेफड़े, तिल्ली, गुर्दे, कंकाल संस्थान, माँसपेशी संस्थान, उत्सर्जन संस्थान आदि का ज्ञान होना चाहिए।

2. डॉक्टरी जाँच (Medical Checkup): समय-समय पर अपने शरीर की डॉक्टरी जाँच करवानी चाहिए। इससे हम अपने स्वास्थ्य को बनाए रख सकते हैं। डॉक्टरी जाँच या चिकित्सा जाँच से हम समय पर अपने शारीरिक विकारों या बीमारियों को दूर कर सकते हैं।

3. निद्रा व विश्राम (Sleep and Rest): रात को समय पर सोना चाहिए और शरीर को पूरा विश्राम देना आवश्यक है।

4. व्यायाम (Exercises): प्रतिदिन व्यायाम या सैर आदि करनी आवश्यक है। हमें नियमित योग एवं आसन आदि भी करने चाहिएँ।

5. नाक द्वारा साँस लेना (Breathing by Nose): हमें हमेशा नाक द्वारा साँस लेनी चाहिए। नाक से साँस लेने से हमारे शरीर को शुद्ध हवा प्राप्त होती है, क्योंकि नाक के बाल हवा में उपस्थित धुल-कणों को शरीर के अंदर जाने से रोक लेते हैं।

6. साफ वस्त्र (Clean Cloth): हमें हमेशा साफ-सुथरे और ऋतु के अनुसार कपड़े पहनने चाहिएँ।

7. शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण (Pure and Clean Environment): हमें हमेशा शुद्ध एवं स्वच्छ वातावरण में रहना चाहिए।

8. संतुलित भोजन (Balanced Diet): हमें ताजा, पौष्टिक और संतुलित आहार खाना चाहिए।

9. शुद्ध आचरण (Good Conduct): हमेशा अपना आचरण व विचार शुद्ध व सकारात्मक रखने चाहिएँ और हमेशा खुश एवं संतुष्ट रहना चाहिए। कभी भी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए। हमेशा बड़ों का आदर करना चाहिए।

10. मादक वस्तुओं से परहेज (Away from Intoxicants): मादक वस्तुओं का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। इसलिए हमें नशीली वस्तुओं से स्वयं को बचाना चाहिए। दूसरों को भी नशीली वस्तुओं के दुष्प्रभावों से अवगत करवाना चाहिए।

11. उचित मनोरंजन (Proper Recreation): आज के इस दबाव एवं तनाव-युक्त युग में स्वास्थ्य को बनाए रखने हेतु मनोरंजनात्मक क्रियाओं का होना अति आवश्यक है। हमें मनोरंजनात्मक क्रियाओं में अवश्य भाग लेना चाहिए। इनसे हमें आनंद एवं संतुष्टि की प्राप्ति होती है।

12. नियमित दिनचर्या (Daily Routine): समय पर उठना, समय पर सोना, समय पर खाना, ठीक ढंग से खड़े होना, बैठना, चलना, दौड़ना आदि क्रियाओं से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। व्यक्तिगत स्वच्छता, कपड़ों की सफाई व आस-पास की सफाई दिनचर्या के आवश्यक अंग होने चाहिएँ।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 4.
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों या तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं
1. वंशानुक्रमण (Heredity):
व्यक्ति के मानसिक व शारीरिक गुण जीन (Genes) द्वारा निर्धारित होते हैं । जीन या गुणसूत्र को ही वंशानुक्रमण की इकाई माना जाता है। इसी कारण वंशानुक्रमण द्वारा व्यक्ति का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वंशानुक्रमण संबंधी गुण; जैसे ऊँचाई, चेहरा, रक्त समूह, रंग आदि माता-पिता के गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। बहुत-सी ऐसी बीमारियाँ हैं जो वंशानुक्रमण द्वारा आगामी पीढ़ी को भी हस्तान्तरित हो जाती हैं।

2. वातावरण (Environment):
अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक होता है। यदि वातावरण प्रदूषित है तो ऐसे वातावरण में व्यक्ति अनेक बीमारियों से ग्रस्त हो जाते हैं।

3. संतुलित व पौष्टिक भोजन (Balanced and Nutritive Diet): भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर को विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचाता है। यदि हमारा भोजन संतुलित एवं पौष्टिक है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा और यदि भोजन में पौष्टिक तत्त्वों का अभाव है तो इसका हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा।

4. सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण (Social and Cultural Conditions):
वातावरण के अतिरिक्त व्यक्ति का अपना सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण भी उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। यदि व्यक्ति और उसके सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण के बीच असामंजस्य है तो इसका उसके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसीलिए व्यक्ति को अपने अच्छे स्वास्थ्य हेतु सामाजिक व सांस्कृतिक वातावरण के साथ सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। इसमें न केवल उसका हित है बल्कि समाज व देश का भी हित है।

5. आर्थिक दशाएँ (Economic Conditions):
स्वास्थ्य आर्थिक दशाओं से भी प्रभावित होता है। यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है अर्थात् गरीब है तो वह अपने परिवार के सदस्यों के लिए न तो संतुलित आहार की व्यवस्था कर पाएगा और न ही उन्हें चिकित्सा सुविधाएँ दे पाएगा। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति अच्छी है तो वह अपने परिवार के सदस्यों की सभी आवश्यकताएँ पूर्ण कर पाएगा।

6. अन्य कारक (Other Factors):
स्वास्थ्य को जीवन-शैली भौतिक व जैविक वातावरण, स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर, मनोवैज्ञानिक कारक और पारिवारिक कल्याण सेवाएँ भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 5.
स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए। इसके मुख्य उद्देश्यों पर प्रकाश डालें।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है? इसके लक्ष्य तथा उद्देश्यों का सविस्तार वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ व परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाने में सहायता करते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में विभिन्न विद्वानों ने अपने-अपने विचार निम्नलिखित प्रकार से व्यक्त किए हैं

1.डॉ० थॉमस वुड (Dr. Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”
2. सोफी (Sophie) के कथनानुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।”
3. विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation-W.H.O.) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ रहने की स्थिति को कहते हैं न कि केवल शारीरिक रूप से स्वस्थ या रोगमुक्त होने को।”
इस प्रकार स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय उन सभी बातों और आदतों से है जो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं।

स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य (Aim of Physical Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य न केवल शारीरिक विकास या वृद्धि तक सीमित है बल्कि इसका महत्त्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्ति के मानसिक, भावनात्मक, सामाजिक आदि पक्षों को भी विकसित करना है। इसका लक्ष्य शरीर को हानि पहुँचाने वाली बुरी आदतों से अवगत करवाना और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों हेतु अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में सहायता करना है।

स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य (Objectives of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
1. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति में अच्छे सामाजिक गुणों का विकास करके अच्छा नागरिक बनाना है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छे व्यक्तित्व को निखारती है, वहीं कई प्रकार के सामाजिक गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

2. सर्वपक्षीय विकास (All Round Development):
सर्वपक्षीय विकास से अभिप्राय व्यक्ति के सभी पक्षों का विकास करना है। वह शारीरिक पक्ष से बलवान, मानसिक पक्ष से तेज़, भावात्मक पक्ष से संतुलित, बौद्धिक पक्ष से समझदार और सामाजिक पक्ष से निपुण हो। सर्वपक्षीय विकास से व्यक्ति के व्यक्तित्व में बढ़ोतरी होती है। वह परिवार, समाज और राष्ट्र की संपत्ति बन जाता है।

3. उचित मनोवृत्ति का विकास (Development of RightAttitude):
स्वास्थ्य शिक्षा का मुख्य उद्देश्य केवल निर्देश देकर ही पूरा नहीं किया जा सकता बल्कि इसे पूरा करने के लिए सकारात्मक सोच की अति-आवश्यकता होती है। स्वास्थ्य संबंधी उचित मनोवृत्ति का विकास तभी अस्तित्व में आ सकता है, यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी आदतें और व्यवहार इस प्रकार परिवर्तित करे कि वे उसकी आवश्यकताओं का अंग बन जाएँ, तो इससे एक अच्छे समाज और राष्ट्र की नींव रखी जा सकती है।

4. स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान (Knowledge about Health):
पुराने समय में स्वास्थ्य संबंधी बहुत अज्ञानता थी, परन्तु समय बदलने से रेडियो, टी०वी०, अखबारों और पत्रिकाओं ने संक्रामक बीमारियों और उनकी रोकथाम, मानसिक चिंताओं और उन पर नियंत्रण और संतुलित भोजन के गुणों के बारे में वैज्ञानिक ढंग से जानकारी साधारण लोगों तक पहुँचाई है। यह ज्ञान उन्हें अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित करता है।

5. स्वास्थ्य संबंधी नागरिक जिम्मेदारी का विकास (To Develop Civic Sense about Health):
स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य छात्रों या व्यक्तियों में स्वास्थ्य संबंधी नागरिक जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व की भावना का विकास करना है। उन्हें नशीली वस्तुओं का सेवन करना, जगह-जगह पर थूकना, खुली जगह पर मल-मूत्र करना और सामाजिक अपराध आदि जैसी बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए।

6. आर्थिक कुशलता का विकास (Development of Economic Efficiency):
आर्थिक कुशलता का विकास तभी हो सकता है अगर स्वस्थ व्यक्ति अपने कामों को सही ढंग से करें। अस्वस्थ मनुष्य अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी नहीं कर सकता। स्वस्थ व्यक्ति जहाँ अपनी आर्थिक कुशलता में बढ़ोतरी करता है, वहीं उससे देश की आर्थिक कुशलता में भी बढ़ोतरी होती है। इसीलिए स्वस्थ नागरिक समाज व देश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होते हैं। उनको देश की बहुमूल्य संपत्ति कहना गलत नहीं होगा।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है? इसकी महत्ता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा क्या है? इसकी हमारे जीवन में क्या उपयोगिता है? वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ (Meaning of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनने में सहायता करते हैं। यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है। इस प्रकार स्वास्थ्य शिक्षा से अभिप्राय उन सभी बातों और आदतों से है जो व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं।

स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता या उपयोगिता (Importance orUtility of Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda) ने कहा था-“एक व्यक्ति जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मजबूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” इसलिए स्वास्थ्य की हमारे जीवन में विशेष उपयोगिता है। स्वस्थ व्यक्ति ही समाज, देश आदि के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकता है। अरस्तू ने कहा था कि “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है।” इसलिए हमें अपने स्वास्थ्य की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति को स्वास्थ्य से संबंधित विशेष जानकारियाँ प्रदान करती है, जिनकी पालना करके व्यक्ति संतुष्ट एवं सुखदायी जीवन व्यतीत कर सकता है। अतः स्वास्थ्य शिक्षा हमारे लिए निम्नलिखित कारणों से महत्त्वपूर्ण है

1.स्वास्थ्यप्रद आदतों का विकास (Development of Healthy Habits):
बचपन में बालक जैसी आदतों का शिकार हो जाता है वो आदत बालक के साथ जीवनपर्यन्त चलती है। अतः बालक को स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर साफ-सफाई का ध्यान, सुबह जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, खाने-पीने तथा शौच का समय निश्चित होना ऐसी स्वास्थ्यप्रद आदतों को अपनाने से व्यक्ति स्वस्थ तथा दीर्घायु रह सकता है। यह स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही सम्भव है।

2. सामाजिक गुणों का विकास (Development of Social Qualities):
स्वास्थ्य शिक्षा व्यक्ति में सामाजिक गुणों का विकास करके उसे अच्छा नागरिक बनाने में सहायक होती है। स्वास्थ्य शिक्षा जहाँ सर्वपक्षीय विकास करके अच्छा व्यक्तित्व निखारती है, वहीं इसके साथ-साथ यह और कई प्रकार के गुणों; जैसे सहयोग, त्याग-भावना, साहस, विश्वास, संवेगों पर नियंत्रण एवं सहनशीलता आदि का भी विकास करती है।

3. प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान करना (To Provide FirstAid Information):
स्वास्थ्य शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को प्राथमिक चिकित्सा प्रदान की जा सकती है जिसके अन्तर्गत व्यक्तियों को प्राथमिक चिकित्सा के सामान्य सिद्धान्तों की तथा विभिन्न परिस्थितियों में जैसे-साँप के काटने पर, डूबने पर, जलने पर, अस्थि टूटने आदि पर प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी प्रदान की जाती है क्योंकि इस प्रकार की दुर्घटनाएँ कहीं भी, कभी भी तथा किसी के भी साथ घट सकती है तथा व्यक्ति का जीवन खतरे में पड़ सकता है। ऐसी जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा ही दी जा सकती है।

4. स्वास्थ्य संबंधी आवश्यक आदतों को बढ़ाने में सहायक (Helpful in increase the Desirable Health Habits):
स्वास्थ्य शिक्षा जीवन के सिद्धांतों एवं स्वास्थ्य की अच्छी आदतों का विकास करती है; जैसे स्वच्छ वातावरण में रहना, पौष्टिक व संतुलित भोजन करना आदि।

5. जागरूकता एवं सजगता का विकास (Development of Awareness and Alertness):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा एक स्वस्थ व्यक्ति सजग एवं जागरूक रह सकता है। उसके चारों तरफ क्या घटित हो रहा है उसके प्रति वह हमेशा सचेत रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों के प्रति सजग एवं जागरूक रहता है।

6.बीमारियों से बचाव में सहायक (Helpful to Prevention of Diseases):
स्वास्थ्य शिक्षा संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों से बचाव व उनकी रोकथाम के विषय में हमारी सहायता करती है। इन बीमारियों के फैलने के कारण, लक्षण तथा उनसे बचाव व इलाज के विषय में जानकारी स्वास्थ्य शिक्षा से ही मिलती है।

7. शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक (Helpful in Discovering Physical Deformities):
स्वास्थ्य शिक्षा शारीरिक विकृतियों को खोजने में सहायक होती है। यह विभिन्न प्रकार की शारीरिक विकृतियों के समाधान में सहायक होती है।

8. मानवीय संबंधों को सुधारना (Improvement in Human Relations):
स्वास्थ्य शिक्षा अच्छे मानवीय संबंधों का निर्माण करती है। स्वास्थ्य शिक्षा विद्यार्थियों को यह ज्ञान देती है कि किस प्रकार वे अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों व समुदाय के स्वास्थ्य के लिए कार्य कर सकते हैं।

9.सकारात्मक दृष्टिकोण (Positive View):
स्वास्थ्य शिक्षा से व्यक्ति की सोच काफी विस्तृत होती है। वह दूसरे व्यक्तियों के दृष्टिकोण को भली भाँति समझता है। उसकी सोच संकीर्ण न होकर व्यापक दृष्टिकोण वाली होती है।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आज का बालक कल का भविष्य है। उसको इस बात का ज्ञान होना बहुत आवश्यक है कि वह अपने तन व मन को किस प्रकार से स्वस्थ रख सकता है। एक पुरानी कहावत है-“स्वास्थ्य ही जीवन है।” अगर धन खो दिया तो कुछ खास नहीं खोया, लेकिन यदि स्वास्थ्य खो दिया तो सब कुछ खो दिया। अतः सुखी व प्रसन्नमय जीवन व्यतीत करने के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना बहुत आवश्यक है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने परिवार, समाज तथा देश के लिए हर प्रकर से सेवा प्रदान कर सकता है, जबकि अस्वस्थ या बीमार व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। तन व मन को स्वस्थ व प्रसन्न रखने में स्वास्थ्य शिक्षा महत्त्वपूर्ण योगदान देती है, क्योंकि स्वास्थ्य शिक्षा में वे सभी क्रियाएँ सम्मिलित होती हैं जिनसे व्यक्ति में स्वास्थ्य के प्रति सजगता बढ़ती है, और इनके परिणामस्वरूप उसका स्वास्थ्य तंदुरुस्त रहता है।
स्वास्थ्य शिक्षा को बहुत-से कारक प्रभावित करते हैं जिनमें से प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं-
1.संतुलित भोजन (Balance Diet):
संसार में प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ जीवन व्यतीत करना चाहता है और स्वस्थ जीवन हेतु भोजन ही मुख्य आधार है। वास्तव में हमें भोजन की जरूरत न केवल ऊर्जा या शक्ति की पूर्ति हेतु होती है बल्कि शरीर की वृद्धि, उसकी क्षतिपूर्ति और उचित शिक्षा प्राप्त करने हेतु भी होती है। अतः स्पष्ट है कि संतुलित भोजन स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करता है।

2.शारीरिक व्यायाम (Physical Exercise):
स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा व्यक्ति अपने शरीर को शारीरिक व्यायामों द्वारा लचीला एवं सुदृढ़ बनाता है। शारीरिक व्यायाम की क्रियाओं द्वारा पूरे शरीर को तंदुरुस्त बनाया जा सकता है। कौन-से व्यायाम कब करने चाहिएँ और कब नहीं करने चाहिएँ, का ज्ञान स्वास्थ्य शिक्षा द्वारा प्राप्त होता है।

3. आदतें (Habits):
आदतें भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति का स्वभाव व आदतें अलग-अलग होती हैं। बालक की स्वास्थ्य शिक्षा उसके स्वभाव एवं आदत पर निर्भर करती है। बच्चों में अच्छी आदतों का विकास किया जाए, ताकि वह एक सफल नागरिक बन सके। अच्छी आदतों वाला व्यक्ति उचित मार्ग पर अग्रसर होकर तरक्की करता है। स्वास्थ्य शिक्षा अच्छी आदतों का विकास करने में महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

4. बीमारी (Disease):
स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा है कि “एक व्यक्ति जिसका शरीर या मन कमजोर है वह कभी भी मज़बूत काया का मालिक नहीं बन सकता।” अतः बीमारी भी स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है। एक बीमार बालक कोई भी शिक्षा प्राप्त करने में पूर्ण रूप से समर्थ नहीं होता। स्वास्थ्य शिक्षा के माध्यम से एक स्वस्थ व्यक्ति या बालक प्रायः बीमारियों से मुक्त रहता है।

5. जीवन-शैली (Lifestyle):
जीवन-शैली जीवन जीने का एक ऐसा तरीका है जो व्यक्ति के नैतिक गुणों या मूल्यों और दृष्टिकोणों को प्रतिबिम्बित करता है। यह किसी व्यक्ति विशेष या समूह के दृष्टिकोणों, व्यवहारों या जीवन मार्ग का प्रतिमान है। स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु एक स्वस्थ जीवन-शैली बहुत आवश्यक होती है। एक स्वस्थ जीवन-शैली व्यक्तिगत रूप से पुष्टि के स्तर को बढ़ाती है। यह हमें बीमारियों से बचाती है और हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करती है। इसके माध्यम से आसन संबंधी विकृतियों में सुधार होता है। इसके माध्यम से मनोवैज्ञानिक शक्ति या क्षमता में वृद्धि होती है जिससे तनाव, दबाव व चिंता को कम किया जाता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि एक स्वस्थ जीवन-शैली स्वास्थ्य शिक्षा को प्रभावित करती है।

6. वातावरण (Environment):
स्वास्थ्य शिक्षा का ज्ञान प्राप्त करने हेतु स्वच्छ वातावरण का होना बहुत आवश्यक है। वातावरण दो प्रकार के होते हैं-(1) आन्तरिक वातावरण, (2) बाह्य वातावरण। दोनों प्रकार के वातावरण बालक को प्रभावित करते हैं। शिक्षा प्राप्त करने हेतु स्कूली वातावरण विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। बिना वातावरण के कोई भी विद्यार्थी किसी प्रकार का ज्ञान अर्जित नहीं कर सकता। इसलिए स्कूल प्रबन्धों को स्कूली वातावरण की ओर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए, ताकि विद्यार्थी बिना किसी बाधा के ज्ञान अर्जित कर सकें।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 8.
‘विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम’ क्या है? विद्यार्थियों के लिए इसके महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
अथवा
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं? इसकी उपयोगिता या महत्ता पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का अर्थ (Meaning of School Health Programme):
बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं। स्कूल में जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को सशक्त व मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्त राष्ट्र का उत्तरदायित्व उनके कंधों पर टिका होता है । इसलिए स्कूली बच्चों का स्वास्थ्य ही स्कूल प्रणाली का महत्त्वपूर्ण तथा प्राथमिक मुद्दा है।
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तीन चरण होते हैं-
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services)
(2) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment) तथा
(3) स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions)।
अतः स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम को इस प्रकार से परिभाषित किया जा सकता है-“स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम वह ग्रहणित प्रक्रिया है जिसको स्कूल स्वास्थ्य सेवाएँ, स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन और स्वास्थ्य अनुदेशन के रूप में बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए अपनाया जाता है।”

स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्त्व (Importance of School Health Programme):
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
(1) इससे स्कूल में जाने वाले बच्चों में स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों को आसानी से विकसित किया जा सकता है।
(2) इससे बच्चे अनेक बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) स्वास्थ्य तथा स्वच्छता की जानकारी स्वस्थ समाज के निर्माण में सहायक है।
(4) स्कूली दिनों में बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति अति तीव्र होती है। उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ये कार्यक्रम अति-आवश्यक होते हैं।
(5) सभी स्कूली छात्र कक्षा के अनुसार लगभग समान आयु के होते हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी लगभग एक-जैसी होती हैं और उनके निदान के प्रति दृष्टिकोण भी एक-जैसा ही होता है। इसलिए स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी होते हैं।
(6) स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को पोषक तत्त्वों एवं खनिज-लवणों की जानकारी की महत्ता बताई जाती है जो उनकी संपूर्ण जिंदगी में सहायक होती है।
(7) स्कूल के दिनों के दौरान विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम अनेक अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक हैं जो समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।
(8) ये कार्यक्रम स्कूल के वातावरण को स्वास्थ्यप्रद रखने में स्कूल के अधिकारियों व कर्मचारियों की सहायता करते हैं।

प्रश्न 9.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न तत्त्व या घटक कौन-कौन-से हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंगों के आपसी संबंधों का वर्णन करें।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के तीनों अंगों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के मुख्य क्षेत्रों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का क्षेत्र बहुत विशाल है। यह केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं है। इसमें स्वास्थ्य ज्ञान के अतिरिक्त और बहुत-से घटक शामिल हैं, जिनका आपस में गहरा संबंध होता है। ये सभी घटक या तत्त्व बच्चों के स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव डालते हैं। स्वास्थ्य शिक्षा कार्यक्रम के विभिन्न घटक या क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services):
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। स्वास्थ्य सेवाएँ वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है।

आधुनिक युग में स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत महत्ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता से बच्चे और वयस्क अपने स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं । साधारण जनता को ये सेवाएँ सरकार की ओर से मिलनी चाहिएँ। जबकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल की ओर से ये सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ। स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य बच्चों में संक्रामक रोगों को ढूँढकर उनके माता-पिता की सहायता से ठीक करना है। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए डॉक्टर, नर्स, मनोरोग चिकित्सक और स्कूलों के अध्यापक विशेष योगदान दे सकते हैं।

2. स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment):
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

बच्चे के स्कूल का वातावरण, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं । जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं वह देश हमेशा प्रगति के रास्ते पर चलता रहता है, क्योंकि आने वाला भविष्य उनसे बंधा होता है। बच्चा अपना अधिकांश समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के वातावरण पर निर्भर करता है। यह तभी संभव हो सकता है, अगर साफ़-सुथरा एवं स्वच्छ स्कूल हो।स्वच्छ वातावरण बच्चे और वयस्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वच्छ वातावरण केवल छात्रों के ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक और नैतिक विकास में भी सहायक होता है।

3. स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions):
स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना। बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। ये बच्चों को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक बनाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी सभी महत्त्वपूर्ण पहलुओं से अवगत करवाना है ताकि वे स्वयं को स्वस्थ रख सकें। स्वास्थ्य संबंधी निर्देशन में वे सभी बातें आ जाती हैं जो स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होती हैं; जैसे अच्छी आदतें, स्वास्थ्य को ठीक रखने के तरीके और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना आदि। शरीर की बनावट या संरचना, संक्रामक रोगों के लक्षण एवं कारण, इनकी रोकथाम या बचाव के उपायों के लिए बच्चों को फिल्मों या तस्वीरों आदि के माध्यम से अपने स्वास्थ्य को ठीक रखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। स्वास्थ्य निर्देशन की जानकारी प्राप्त कर बच्चे अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बच सकते हैं।

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प्रश्न 10.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन से आप क्या समझते हैं? इसके क्षेत्र एवं प्रभाव पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का अर्थ (Meaning of Healthful School Living):
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वस्थ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वस्थ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक व भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का क्षेत्र (Scope of Healthful School Living):
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन के क्षेत्र में निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान दिया जाता है-

1. स्कूल अध्यापक का अनुभव (Experience of School Teacher): अध्यापकों को अपना पाठ्यक्रम बच्चों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, रुचियों के अनुसार बनाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक को अपने अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।

2. विद्यालय की स्थिति (Situation of School): बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विद्यालय का भवन रेलवे स्टेशनों, सिनेमाघरों, कारखानों, यातायात सड़कों आदि से दूर होना चाहिए।

3. छात्र एवं अध्यापक में संबंध (Relationship between Student & Teacher): बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु अध्यापकों एवं छात्रों में सहसंबंध होना चाहिए।

4. समय-सारणी (Time-Table): विद्यालय की समय-सारणी का विभाजन छात्रों के स्तर के अनुसार होना चाहिए।

स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन का प्रभाव (Effect of Healthful School Living):
व्यक्ति या बच्चे के स्वास्थ्य पर अच्छा-बुरा वातावरण बहुत अधिक प्रभाव डालता है। बच्चे के स्कूल का माहौल, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं, वह देश हमेशा प्रगति के पथ पर अग्रसर रहता है। बच्चा अपना बहुत ज्यादा समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के वातावरण पर निर्भर करता है। यह तभी हो सकता है, अगर साफ-सुथरा स्कूल हो अर्थात् साफ व आकर्षक बगीचे, साफ-सुथरे व हवादार कमरे, कुर्सियाँ, डैस्क और अधिक-से-अधिक पेड़-पौधे लगाकर स्वच्छ वातावरण बनाया जाए। स्वच्छ वातावरण छात्रों को बहुत प्रभावित करता है। स्वच्छ वातावरण केवल छात्रों की ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों की शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक और बौद्धिक क्षमता व योग्यता को भी प्रभावित करता है।

प्रश्न 11.
विद्यालयी स्वास्थ्य अनुदेशन या शिक्षण पर विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
स्वास्थ्य निर्देशन या अनुदेशन क्या है? इसके उद्देश्य एवं आवश्यकता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
स्वास्थ्य अनुदेशन क्या है? विद्यालय में इसकी आवश्यकता एवं महत्त्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन या अनुदेशन का अर्थ (Meaning of School Health Instruction):
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। ये हमें स्वास्थ्य से संबंधित बाधाओं या समस्याओं के बुरे प्रभावों से बचाव के लिए मार्गदर्शन करते हैं।

विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के उद्देश्य (Objectives of School Health Instruction):
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।
(3) स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धांतों की जानकारी देना।
(4) संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी देना।
(5) बच्चों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने हेतु प्रेरित करना।
(6) स्वास्थ्य को ठीक रखने के उपाय बताना।

faculteit Farren faldera ant rape cont a Hera (Need and Importance of School Health Instruction):
स्वास्थ्य के बिना मानव जीवन अधूरा है। वह अपने जीवन के उद्देश्य को तभी प्राप्त कर सकता है यदि वह शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ हो। अपने स्वास्थ्य को अच्छा बनाने के लिए हमें स्वास्थ्य निर्देशन का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य के सभी पहलुओं की जानकारी प्रदान करते हैं। इसलिए विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन की हमें बहुत आवश्यकता है। अत: इनका हमारे लिए निम्नलिखित प्रकार से विशेष महत्त्व है-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन बच्चों को संक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की उचित जानकारी प्रदान करते हैं।
(2) ये बच्चों को संक्रामक रोगों से बचाव या रोकथाम के उपायों की जानकारी देते हैं।
(3) ये बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की उपयोगिता से अवगत करवाते हैं।
(4) इनकी सहायता से बच्चे स्वयं को स्वस्थ रखने हेतु प्रेरित होते हैं।
(5) ये व्यक्तिगत स्वास्थ्य या स्वच्छता के साथ-साथ सार्वजनिक व पर्यावरण स्वच्छता की जानकारी भी देते हैं।
(6) ये बच्चों को अनावश्यक विकृतियों या कमजोरियों का शिकार होने से बचाने में सहायक होते हैं।

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प्रश्न 12.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं से आप क्या समझते हैं? इसके महत्त्व या उपयोगिता पर प्रकाश डालिए।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का अर्थ (Meaning of School Health Services):
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। स्वास्थ्य सेवाएँ वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है। इनके अंतर्गत छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती है और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियों के लक्षणों, कारणों, रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी दी जाती है। विद्यालय में ऐसी सुविधाओं को विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ (School Health Services) कहा जाता है।

विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता एवं महत्त्व (Need and Importance of School Health Services):
आधुनिक युग में स्वास्थ्य सेवाओं की बहुत महत्ता है। स्वास्थ्य सेवाओं की सहायता से बच्चे और वयस्क अपने स्वास्थ्य का स्तर ऊँचा उठा सकते हैं। आम जनता को ये सेवाएँ सरकार की ओर से मिलनी चाहिएँ, जबकि स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को स्कूल की ओर से ये सुविधाएँ मिलनी चाहिएँ। स्वास्थ्य सेवाओं का कार्य बच्चों में संक्रामक रोगों, कुपोषण जैसी बीमारियों को ढूँढकर उनके माता-पिता की सहायता से ठीक करना है। इस कार्य को पूर्ण करने के लिए डॉक्टर, नर्स, मनोवैज्ञानिक और स्कूलों के अध्यापक विशेष योगदान दे सकते हैं। ये सेवाएँ न केवल छात्रों के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होती हैं, बल्कि स्कूल के अन्य कर्मचारियों व शिक्षकों के लिए भी उपयोगी हैं। विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ निम्नलिखित प्रकार से आवश्यक व महत्त्वपूर्ण हैं-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ छात्रों के रोगों का पता लगाने और उनकी रोकथाम व बचाव में सहायक होती हैं।
(2) ये संक्रामक व असंक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की जानकारी देती हैं।
(3) इनसे इन रोगों की रोकथाम व बचाव के उपाय करने में सहायता मिलती है।
(4) इन,सेवाओं से छात्रों, अध्यापकों व अन्य स्कूल कर्मचारियों के स्वास्थ्य के निरीक्षण में सहायता मिलती है।
(5) इनके माध्यम से रोगी बच्चों के उपचार में मदद मिलती है।
(6) ये अकस्मात् दुर्घटना या रोगों के दौरान छात्रों को आपातकालीन सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

प्रश्न 13.
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के विभिन्न सिद्धांतों या नियमों का ब्योरा दें।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रमों के लिए किन-किन बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
अथवा
आप अपने स्कूल में स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम को कैसे अधिक प्रभावशाली बनाएँगे?
अथवा
उन विभिन्न माध्यमों का वर्णन कीजिए, जिनका प्रयोग आप अपने स्कूल में वस्तुतः प्रभावशाली स्वास्थ्य शिक्षण कार्यक्रम के लिए करेंगे।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों के लिए आवश्यक बातें या सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आयु और लिंग के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रहनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों या छात्रों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।
(5) मनुष्य का व्यवहार ही उसका सबसे बड़ा गुण है, जिसमें उसकी रुचि ज्यादा है वह उसे सीखने और करने के लिए तैयार रहता है। इसलिए कार्यक्रम बनाते समय बच्चों की उत्सुकता, रुचियों और इच्छाओं का ध्यान रखना चाहिए।
(6) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देते समय जीवन से संबंधित मुश्किलों पर भी वार्तालाप होनी चाहिए।
(7) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों के शारीरिक और मानसिक स्तर के अनुसार बनाना चाहिए।
(8) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम ऐसे होने चाहिएँ जो बच्चों की अच्छी आदतों को उत्साहित कर सकें, ताकि वे अपने सोचने के तरीके को बदल सकें।
(9) स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रमों में बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छी आदतों को ग्रहण करने हेतु फिल्में, चार्ट, टी०वी०, रेडियो आदि माध्यमों के प्रयोग द्वारा बच्चों को प्रेरित किया जाना चाहिए।
(10) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल स्कूलों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंग होना चाहिए।
(11) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम रुचिपूर्ण, शिक्षा से भरपूर और मनोरंजनदायक होना चाहिए।
(12) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम प्रस्तुत करते समय लोगों में प्रचलित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। यह भाषा उनकी आयु और समझने की क्षमता के अनुसार होनी चाहिए।
(13) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बनाते समय संक्रामक-असंक्रामक बीमारियों के बारे में तथा उनकी रोकथाम के उपायों के बारे में जानकारी देनी चाहिए।
(14) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम केवल एक व्यक्ति तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका क्षेत्र विशाल होना चाहिए।
(15) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम लोगों की आंतरिक भावनाओं को जानकर ही बनाना चाहिए।
(16) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम में पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय स्तर के विषय शामिल होने चाहिएँ।

प्रश्न 14.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण/जीवन से आपका क्या अभिप्राय है? स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक को क्या करना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण/जीवन का अर्थ (Meaning of Healthful School Environment/Living):
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण या जीवन का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने में स्कूल अध्यापक की भूमिका (Role of School Teacher in Creating Healthful Environment in School):
स्कूल अध्यापक को छात्रों को पढ़ाते समय कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है; जैसे अध्यापक द्वारा पढ़ाया जाने वाला कोई विषय या पाठ छात्रों की समझ में न आना, बच्चों द्वारा शरारतें करना, बच्चों द्वारा अध्ययन कार्य में रुचि न लेना आदि। यदि स्कूल अध्यापक छात्रों की रुचि, इच्छाओं एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर अपना पाठ्यक्रम बनाए तभी वह अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है अर्थात् वह छात्रों को पढ़ाए गए विषय को अच्छे से समझा सकता है।

कोई भी स्कूल अध्यापक तब तक अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता, जब तक वह छात्रों को पढ़ने या अध्ययन करने हेतु प्रेरित न करे। यदि छात्रों की पढ़ने में रुचि है तो अध्यापक अपने उद्देश्य में सफल होगा और यदि छात्रों की रुचि नहीं है तो अध्यापक पढ़ाकर भी छात्रों को पढ़ाए गए विषय का ज्ञान नहीं करा पाएगा। इसलिए स्कूल अध्यापक को अपना पाठ्यक्रम छात्रों की रुचि एवं आवश्यकतानुसार बनाना चाहिए। तभी वह स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने में सफल होगा और उसे पढ़ाने के दौरान किसी भी समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। स्कूल अध्यापक को अपने अनुभवों का भी प्रयोग करना चाहिए। उसको समय-सारणी का विभाजन भी छात्रों के स्तर के अनुसार निश्चित करना चाहिए।

बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु छात्रों और स्कूल अध्यापक में परस्पर सहसंबंध अवश्य होना चाहिए, तभी बच्चों का सर्वांगीण विकास संभव होगा। इसलिए अध्यापक को कक्षा का वातावरण एवं पाठ्यक्रम रुचिकर बनाना चाहिए और उनके स्वास्थ्य के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। इसके साथ-साथ उसे छात्रों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, आदतों तथा समस्याओं आदि का भी पूरा ज्ञान होना चाहिए। अध्यापक को छात्रों को सभी सामाजिक गुणों के प्रति प्रेरित करना चाहिए, ताकि ये गुण उनके सामाजिक जीवन में उनकी सहायता कर सकें और उन्हें समाज का एक अच्छा नागरिक बना सकें। इस प्रकार स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक महत्त्वपूर्ण भूमिका अंदा कर सकता है।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 15.
आधुनिक समय में जन स्वास्थ्य कल्याण हेतु कौन-कौन-सी मुख्य संस्थाएँ कार्य कर रही हैं?
अथवा
भारत में स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत प्रमुख संस्थानों या संघों का वर्णन करें।
उत्तर:
आधुनिक युग में किसी देश की शक्ति का अनुमान वहाँ के स्वस्थ नागरिकों से लगाया जा सकता है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या किसी व्यक्ति के सही शारीरिक पक्ष से की जा सकती है। स्वास्थ्य की पूर्ण व्याख्या से अभिप्राय व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक पक्ष के पूर्ण होने से है। प्रत्येक पक्ष से स्वस्थ व्यक्ति अच्छे समाज का निर्माण करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य का ज्ञान अति-आवश्यक है। विकासशील देशों में सरकार और अन्य संगठन लोगों के स्वास्थ्य के लिए भरपूर सेवाएँ उपलब्ध करवाते हैं। भारत में निम्नलिखित प्रमुख संघ या संस्थान स्वास्थ्य कल्याण हेतु कार्यरत हैं-
1. भारतीय तपेदिक रोग संगठन (Tuberculosis Association of India):
भारतीय तपेदिक रोग संगठन वर्ष 1939 में अस्तित्व में आया। इसका मुख्य कार्य टी०बी० से पीड़ित लोगों को इससे राहत देना है। भारत की बहुत-सी जनसंख्या इस रोग से पीड़ित है। भारत सरकार ने इस रोग पर नियंत्रण पाने के लिए कई बड़े-बड़े अस्पताल और अन्वेषण केंद्र स्थापित किए हैं, ताकि इस घातक बीमारी से लोगों को निजात दिलाई जा सके। यह संगठन डॉक्टरों, नौं और अन्य संगठन जो इस रोग के निवारण हेतु योगदान दे रहे हैं, उन्हें प्रशिक्षण की सुविधाएँ प्रदान करता है।

2. भारत सेवक समाज (Bharat Sewak Samaj):
भारत सेवक समाज संस्था वर्ष 1952 में अस्तित्व में आई। यह एक गैर-सरकारी संस्था है। इसका मुख्य कार्य लोगों को स्वस्थ रहने के तौर-तरीके बताना है। यह संस्था समय-समय पर शहरों और गाँवों में शिविर लगाकर लोगों को स्वास्थ्य चेतना या जागरूकता के बारे में जानकारी देती है।

3. अखिल भारतीय नेत्रहीन सहायक सोसायटी (All India Blind Relief Society):
यह सोसायटी वर्ष 1945 में स्थापित की गई। यह नेत्रहीन लोगों की सहायता के लिए कार्य कर रही है। यह अन्य कई संस्थाओं जोकि नेत्रहीनता को दूर करने के लिए कार्य कर रही हैं, उनकी सहायता करती है। इसका अस्तित्व सरकार की आर्थिक सहायता पर अधिक निर्भर करता है। यह समय-समय पर आँखों के शिविर लगाकर लोगों को आँखों की गंभीर बीमारियों से अवगत करवाती है और उन्हें इनके प्रति सुविधाएँ प्रदान करती है। यह लोगों को आँखें दान हेतु प्रेरित करती है, ताकि नेत्रहीनता के शिकार लोगों को रोशनी दी जा सके।

4. हिंद कुष्ठ निवारण संघ (Hind Kusht Niwaran Sangh):
हिंद कुष्ठ निवारण संघ वर्ष 1947 में स्थापित की गई। कुष्ठ रोग जैसी घातक बीमारी को रोकने के लिए यह संघ दिन-रात प्रयासरत है। यह संघ वैज्ञानिक खोजों से इस बीमारी के कारण और उपयुक्त इलाज संबंधी जानकारी लोगों को प्रदान कर रहा है।

5.भारतीय परिवार नियोजन संघ (Family Planning Association of India):
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई। भारत में बढ़ रही जनसंख्या पर रोक लगाने हेतु यह संघ प्रयासरत है। थोड़े ही समय में इसकी शाखाएँ पूरे भारत में खुल गई हैं। इस संघ ने अनेक डॉक्टरों और समाज-सुधारकों को प्रशिक्षण देकर लोगों को परिवार नियोजन के बारे में जागरूक किया है।

6. भारतीय बाल कल्याण परिषद् (Indian Council for Child Welfare):
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना वर्ष 1952 में हुई। इसका मुख्य कार्य बच्चों संबंधी समस्याओं का हल और उनके कल्याण संबंधी योजनाएं बनाना है। इस परिषद् ने भारत के पहले प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू के जन्म दिवस 14 नवंबर को बच्चों का दिन (बाल-दिवस) मनाने का निर्णय लिया। अब भारत में प्रत्येक वर्ष 14 नवंबर को यह दिन मनाया जाता है। यह परिषद् अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़ी हुई है। यह प्रत्येक वर्ष बच्चों के कल्याण के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती है।

7. भारतीय चिकित्सा संघ (Indian Medical Association):
इस संघ का मुख्य कार्य सरकार का ध्यान राष्ट्रीय स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की ओर दिलाना और उन्हें हल करने के लिए सहयोग देना है। यह संघ समय-समय पर सरकार से अपने वार्षिक बजट में आर्थिक सहायता की वृद्धि के लिए माँग करता है। भारतीय चिकित्सा संघ वैज्ञानिक अन्वेषण करके सरकार को घातक बीमारियों के फैलने और बचाव के बारे में सिफारिश करता रहता है। इस संघ की सिफारिश पर ही सरकार लोगों के स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार, अच्छी दवाइयाँ और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए नई-नई योजनाएँ बनाती रहती है।

8. भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी (Indian Redcross Society):
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी एक राष्ट्रीय संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय सोसायटी का सदस्य है। भारत में यह वर्ष 1920 में अस्तित्व में आई। यह सोसायटी मानवता की सेवा में संलग्न है। यह लोगों को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान, बीमारियों के बचाव और उपाय, युद्ध के दौरान घायलों की सहायता, प्राकृतिक आपदाओं के समय दवाइयाँ और आवश्यकतानुसार सुविधाएँ उपलब्ध करवाती है। भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी जन-कल्याण के लिए निम्नलिखित कार्य करती है-
(1) रक्त बैंक की स्थापना करना और आवश्यकता पड़ने पर रक्त की सुविधाएँ उपलब्ध करना।
(2) युद्ध के दौरान घायल हुए और रोगी सैनिकों की देखभाल करना।
(3) यह भूकंप, बाढ़, प्लेग और सूखा पड़ने से पीड़ित लोगों की सहायता करती है।
(4) यह बाल कल्याण और उनकी भलाई के लिए विशेष योगदान देती है।
(5) यह तपेदिक, कुष्ठ, एड्स और अन्य कई बीमारियों की रोकथाम के लिए मुफ्त दवाइयाँ प्रदान करती है।
(6) यह उन अन्य संगठनों, जो मानवता की सेवा में संलग्न हैं, की आर्थिक सहायता करती है।
(7) यह असमर्थ लोगों को नकली अंग देकर उनकी मदद करती है।

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लघूत्तरात्मक प्रश्न [Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य की अवधारणा से आप क्या समझते हैं? अथवा ‘स्वास्थ्य’ से आप क्या समझते हैं?
अथवा
स्वास्थ्य का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर:
स्वास्थ्य से सभी परिचित हैं। स्वास्थ्य से अभिप्राय बीमारी की अनुपस्थिति से लगाया जाता है, परंतु यह स्वास्थ्य का विस्तृत अर्थ नहीं है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है, जिससे वह मानसिक व शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है तथा जिसके सभी शारीरिक संस्थान व्यवस्थित रूप से सुचारू होते हैं। इसका अर्थ न केवल बीमारी अथवा शारीरिक कमजोरी की अनुपस्थिति है, अपितु शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ होना भी है। यह एक ऐसी अवस्था है जिसमें व्यक्ति का मन या आत्मा प्रसन्नचित्त और शरीर रोग-मुक्त रहता है। जे०एफ० विलियम्स के अनुसार, “स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।” रोजर बेकन के अनुसार, “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।”

प्रश्न 2.
विद्यालय में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में चिकित्सा परीक्षण की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालय में विद्यार्थियों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में चिकित्सा परीक्षण की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है, जैसे-
(1) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने शारीरिक स्वास्थ्य और विकारों की जानकारी प्राप्त होती है। अतः समय रहते वे अपने विकारों को दूर कर सकते हैं।
(2) चिकित्सा परीक्षण से बच्चों के अभिभावकों को अपने बच्चों के स्वास्थ्य की पूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। वे उनके स्वास्थ्य के प्रति अधिक सचेत हो जाते हैं।
(3) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की प्रेरणा मिलती है और वे अपने व्यक्तिगत स्वास्थ्य व स्वच्छता की ओर ध्यान देने लगते हैं।
(4) चिकित्सा परीक्षण विद्यार्थियों के लिए भविष्य के संदर्भ में आधार देता है, क्योंकि स्वस्थ बालक ही कल के राष्ट्र-निर्माण में सहयोग दे सकता है।
(5) चिकित्सा परीक्षण विद्यार्थियों को नीरोग जीवन जीने हेतु प्रोत्साहित करता है।
(6) चिकित्सा परीक्षण से विद्यार्थियों को अपने सभी अंगों की पूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है।
इस प्रकार स्पष्ट है कि चिकित्सा परीक्षण सभी विद्यार्थियों के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। वर्ष में कम-से-कम एक बार विद्यार्थियों का चिकित्सा परीक्षण अवश्य करवाना चाहिए, ताकि उन्हें अपने स्वास्थ्य की पूर्ण जानकारी मिलती रहे।

प्रश्न 3.
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) विद्यालय में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण बनाए रखना।
(2) बच्चों में ऐसी आदतों का विकास करना जो स्वास्थ्यप्रद हों।
(3) रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करना तथा प्राथमिक चिकित्सा की जानकारी देना।
(4) सभी विद्यार्थियों के स्वास्थ्य का निरीक्षण करना व निर्देश देना।
(5) सभी विद्यार्थियों में स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान तथा अभिव्यक्ति का विकास करना।
(6) व्यक्तिगत सफाई तथा स्वच्छता के बारे में जानकारी देना।
(7) स्वास्थ्य संबंधी आदतों का विकास करना।
(8) रोगों से बचने का उपाय करना और शारीरिक रोगों की जाँच करना।

प्रश्न 4.
स्वस्थ व्यक्ति किसे कहते हैं? अच्छे स्वास्थ्य के कोई तीन लाभ बताएँ।
उत्तर:
स्वस्थ व्यक्ति-स्वस्थ व्यक्ति वह होता है जिसकी सभी शारीरिक प्रणाली सुचारू रूप से कार्य करती हैं। अतः स्वस्थ व्यक्ति के शरीर के सभी अंगों की बनावट और उसके शारीरिक संस्थानों की क्रिया सुचारू रूप से चलती है। वह हर प्रकार के मनोवैज्ञानिक, मानसिक व सामाजिक तनावों से मुक्त होता है। केवल शारीरिक रोगों से मुक्त व्यक्ति पूर्ण स्वस्थ नहीं होता, बल्कि स्वस्थ व्यक्ति को रोग घटकों से भी मुक्त होना चाहिए।
अच्छे स्वास्थ्य के लाभ-
(1) अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति का जीवन सुखमय व आनंदमय होता है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य का न केवल व्यक्तिगत लाभ होता है, बल्कि इसका सामूहिक लाभ होता है। इसका समाज व देश पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।
(3) अच्छे स्वास्थ्य से व्यक्ति अपने जीवन को सफल बना सकता है। स्वस्थ व्यक्ति कोई भी लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।

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प्रश्न 5.
अच्छा स्वास्थ्य बनाए रखने में शिक्षा किस प्रकार सहायक होती है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक तौर पर विकारों तथा तनावों को दूर करने की आवश्यकता है, परंतु भारतवर्ष में बहुत-से लोग इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि कौन-कौन-से रोग किस-किस कारण से होते हैं? उनकी रोकथाम कैसे की जा सकती है तथा उनके बचाव के क्या उपाय हैं? केवल रोगों के निदान से ही स्वास्थ्य कायम नहीं होता। इसके लिए बाह्य कारक; जैसे प्रदूषण तथा सूक्ष्म-जीवों के संक्रमण से भी बचाव अत्यंत आवश्यक है। शिक्षा संतुलित आहार और उनमें पौष्टिक तत्त्व की कितनी-कितनी मात्रा होनी चाहिए आदि की जानकारी देने में हमारी सहायता करती है। शिक्षा के द्वारा ही हमें किसी रोग के कारण, लक्षण और उनकी रोकथाम के उपायों का पता चलता है। शिक्षा ही हमें पर्यावरण से संबंधित आवश्यक जानकारी देती है। इन सब बातों को जानने के लिए उचित शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम व पाठ्यक्रम बच्चों की आयु और रुचि के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के बारे में जानकारी देने का तरीका साधारण और जानकारी से भरपूर होना चाहिए।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा पढ़ने-लिखने तक ही सीमित नहीं रखनी चाहिए अपितु उसकी प्राप्तियों के बारे में कार्यक्रम बनाने चाहिएँ।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम छात्रों की आवश्यकताओं, इच्छाओं और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।
(5) स्वास्थ्य शिक्षा में स्वास्थ्य के सभी पक्षों की विस्तृत जानकारी दी जानी चाहिए।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा में सुधार के प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं-
(1) स्वास्थ्य शिक्षा का पाठ्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं एवं रुचियों के अनुसार होना चाहिए।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा संबंधी कार्यक्रम व्यावहारिक जीवन से संबंधित होने चाहिएँ।
(3) स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी आदतें, पर्यावरण प्रदूषण, प्राथमिक उपचार, बीमारियों की रोकथाम आदि को चित्रों या फिल्मों की सहायता से समझाया या दिखाया जाना चाहिए।
(4) स्वास्थ्य शिक्षा में वाद-विवाद और भाषण आदि को अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
(5) स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्यपूर्ण कार्यक्रमों को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि बच्चों को नियमित डॉक्टरी जाँच और अन्य सुविधाओं से लाभ हो सके।
(6) स्वास्थ्य शिक्षा में उन सभी पक्षों को शामिल करना चाहिए, जो छात्रों के सर्वांगीण विकास में सहायक हों।

प्रश्न 8.
शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में क्या संबंध है?
उत्तर:
शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर गहरा संबंध पाया जाता है। हमारा शरीर मन और आत्मा का संगठित रूप है और शिक्षा इसको सुदृढ़ करने में सहायक होती है। आज प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि उसकी वृद्धि एवं विकास शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। स्वास्थ्य शिक्षा इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक होती है, क्योंकि कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का वास होता है। स्वास्थ्य व्यक्ति का वह गुण है जिससे वह मानसिक तथा शारीरिक रूप से स्वस्थ होता है। स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य बच्चों में स्वास्थ्य के प्रति चेतना जागृत करना है तथा उनमें स्वास्थ्य संबंधी विचारधाराओं में रुचि विकसित करना है। शिक्षा का उद्देश्य भी छात्रों का सर्वांगीण विकास करना है और स्वास्थ्य शिक्षा के सभी उद्देश्य शिक्षा के उद्देश्यों में ही निहित हैं क्योंकि शिक्षा का क्षेत्र बहुत व्यापक है। शिक्षा की तरह ही स्वास्थ्य शिक्षा भी लोगों या छात्रों के ज्ञान, भावनाओं व व्यवहार में परिवर्तन करने से संबंधित है। यह स्वास्थ्य संबंधी ऐसी आदतों को विकसित करने की ओर ध्यान देती है जो उनमें (छात्रों) तंदुरुस्त होने का अहसास उत्पन्न कर सके।

शिक्षा और स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर संबंध इस तथ्य से भी स्पष्ट होता है कि आज खेल के मैदान को एक छोटा कक्षा-कक्ष’ माना जाता है, जिससे सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होते हैं। खेल के मैदान में बच्चों को अनेक सामाजिक-नैतिक गुण सीखने को मिलते हैं; जैसे सहयोग की भावना, सहानुभूति, नेतृत्व, मानवतावाद, देशभक्ति, भाईचारा, मित्रता, अनुशासन की भावना आदि। सामान्यतया शिक्षा नागरिक दायित्व का प्रशिक्षण देकर लक्ष्य को पूरा करने का प्रयास करती है। अतःस्वास्थ्य शिक्षा को शिक्षा का महत्त्वपूर्ण अंग कहा जाता है जो व्यक्ति के सभी पक्षों; जैसे शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक एवं आध्यात्मिक आदि पक्षों में योगदान प्रदान करती है।

प्रश्न 9.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:बच्चे राष्ट्र की धरोहर हैं। स्कूल में जाने वाले बच्चे किसी राष्ट्र को सशक्त व मजबूत बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समस्त राष्ट्र का उत्तरदायित्व उनके कोमल कंधों पर टिका होता है। इसलिए स्कूल के बच्चों का स्वास्थ्य ही स्कूल प्रणाली का महत्त्वपूर्ण तथा प्राथमिक मुद्दा है। अत: स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम वह ग्रहणित प्रक्रिया है जिसको स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं, स्वास्थ्यप्रद स्कूल जीवन और स्वास्थ्य निर्देश में बच्चों के स्वास्थ्य के विकास के लिए अपनाया जाता है। इस प्रकार स्कूल स्वास्थ्य कर्यक्रम के तीन चरण होते हैं-
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ (Health Services),
(2) स्वास्थ्यप्रद स्कूली जीवन या वातावरण (Healthful School Living or Environment) तथा
(3) स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन (Health Instructions)।

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प्रश्न 10.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम के महत्त्व पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम का महत्त्व निम्नलिखित है
(1) स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम से बच्चे अनेक बीमारियों की रोकथाम तथा उपचार के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
(2) स्कूल के दिनों में बच्चों में जिज्ञासा की प्रवृत्ति अति तीव्र होती है। उनकी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ये कार्यक्रम अति-आवश्यक होते हैं।
(3) सभी स्कूली छात्र कक्षा के अनुसार लगभग समान आयु के होते हैं, इसलिए उनकी समस्याएँ भी लगभग एक-जैसी होती हैं और उनके निदान के प्रति दृष्टिकोण भी एक-जैसा ही होता है। इसलिए स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम सभी छात्रों के लिए समान रूप से उपयोगी होते हैं।
(4) स्वास्थ्य कार्यक्रम के अंतर्गत बच्चों को पोषक तत्त्वों एवं खनिज लवणों की जानकारी की महत्ता बताई जाती है जो उनकी संपूर्ण जिंदगी में सहायक होती है।
(5) स्कूल के दिनों के दौरान विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम अनेक अच्छी आदतों के निर्माण में सहायक हैं जो समाज के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 11.
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु किन-किन मुख्य बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए?
अथवा
स्कूल में स्वास्थ्यपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए स्कूल अध्यापक को क्या करना चाहिए?
अथवा
विद्यालय के वातावरण को स्वास्थप्रद बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाने चाहिएँ?
उत्तर:
स्कूल/विद्यालय छात्रों का सर्वांगीण विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए स्कूल का वातावरण स्वास्थ्यपूर्ण होना चाहिए। अत: स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी वातावरण हेतु निम्नलिखित बातों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए-
(1) अध्यापकों को अपना पाठ्यक्रम बच्चों की इच्छाओं, आवश्यकताओं, रुचियों के अनुसार बनाना चाहिए। इसके लिए अध्यापक को अपने अनुभव का प्रयोग करना चाहिए।
(2) बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए विद्यालय का भवन रेलवे स्टेशनों, सिनेमाघरों, कारखानों, यातायात सड़कों आदि से दूर होना चाहिए।
(3) बच्चों के सर्वांगीण विकास हेतु अध्यापकों को हमेशा तत्पर रहना चाहिए। बच्चों के संपूर्ण विकास हेतु अध्यापकों एवं छात्रों में सहसंबंध होना चाहिए।
(4) अध्यापक को विद्यालय की समय-सारणी का विभाजन छात्रों के स्तर के अनुसार करना चाहिए।
(5) स्कूल में नियमित खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन करना चाहिए और छात्रों को इन प्रतियोगिताओं में भाग लेने हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए।

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प्रश्न 12.
स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक/अध्यापक की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
स्कूल के स्वास्थ्य कार्यक्रम में शिक्षक/अध्यापक निम्नलिखित प्रकार से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है-
(1) शिक्षक छात्रों को स्वास्थ्य कार्यक्रम की उपयोगिता बताकर उन्हें अपने स्वास्थ्य हेतु प्रेरित कर सकता है।
(2) वह छात्रों को व्यक्तिगत सफाई के लिए प्रेरित कर सकता है, ताकि छात्र स्वयं को नीरोग एवं स्वस्थ रख सकें।
(3) शिक्षक छात्रों को संक्रामक रोगों के कारणों एवं रोकथाम के उपायों की जानकारी दे सकता है।
(4) शिक्षक को चाहिए कि वह स्वास्थ्य शिक्षा की विषय-वस्तु से संबंधित विभिन्न सेमिनारों का आयोजन करे।
(5) वह छात्रों को अच्छी आदतें अपनाने के लिए प्रेरित करे।

प्रश्न 13.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
छात्रों को शिक्षा देने के साथ-साथ उनके स्वास्थ्य की रक्षा करना भी विद्यालय का मुख्य उत्तरदायित्व माना जाता है। विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ, वे सेवाएँ हैं जिनके माध्यम से छात्रों के स्वास्थ्य की जाँच की जाती है और उनमें पाए जाने वाले दोषों से माता-पिता को अवगत करवाया जाता है ताकि समय रहते उन दोषों का उपचार किया जा सके। इन सेवाओं के अंतर्गत स्कूल के अन्य कर्मचारियों एवं अध्यापकों के स्वास्थ्य की भी जाँच की जाती है। इनके अंतर्गत छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा प्रदान की जाती है और उन्हें सभी प्रकार की बीमारियों के लक्षणों, कारणों, रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी प्रदान की जाती है। स्कूल/विद्यालय में ऐसी सुविधाओं को विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ (School Health Services) कहा जाता है। आधुनिक युग में इन सेवाओं की बहुत आवश्यकता है।

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प्रश्न 14.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं की क्यों आवश्यकता होती है?
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ निम्नलिखित प्रकार से आवश्यक हैं
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ छात्रों के रोगों का पता लगाने और उनकी रोकथाम व बचाव में सहायक होती हैं।
(2) ये संक्रामक व असंक्रामक रोगों के लक्षणों एवं कारणों की जानकारी देती हैं।
(3) इनसे इन रोगों की रोकथाम व बचाव के उपाय करने में सहायता मिलती है।
(4) इन सेवाओं से छात्रों, अध्यापकों व अन्य स्कूल कर्मचारियों के स्वास्थ्य के निरीक्षण में सहायता मिलती है।
(5) इनके माध्यम से रोगी बच्चों के उपचार में मदद मिलती है। (6) ये अकस्मात् दुर्घटना या रोगों के दौरान छात्रों को आपातकालीन सुविधाएँ प्रदान करती हैं।

प्रश्न 15.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के विभिन्न कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के विभिन्न कार्य निम्नलिखित हैं-
(1) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ विद्यार्थियों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।
(2) ये विद्यार्थियों के स्वास्थ्य हेतु उचित वातावरण प्रदान करती हैं और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास करती है।
(3) ये विद्यार्थियों के स्वास्थ्य हेतु उचित अभिवृत्तियों को विकसित करने का कार्य करती हैं।
(4) ये विद्यार्थियों को अनेक प्रकार के संक्रामक व असंक्रामक रोगों की जानकारी प्रदान करती हैं और उनसे बचने के उपायों की जानकारी प्रदान करती हैं।।
(5) ये अभिभावकों को बच्चों के स्वास्थ्य की जानकारी प्रदान करती हैं।
(6) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ रोगों का पता लगाने और उनके उपचार व इलाज में सहायता करती हैं।

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प्रश्न 16.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

व्यक्ति या बच्चे के स्वास्थ्य पर अच्छा-बुरा माहौल बहुत अधिक प्रभाव डालता है। बच्चे के स्कूल का माहौल, रहने का स्थान और काम करने का स्थान स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। जिस देश के बच्चे और नवयुवक स्वस्थ होते हैं वह देश हमेशा प्रगति के रास्ते पर चलता रहता है, क्योंकि आने वाला भविष्य उनसे बंधा होता है। बच्चा अपना बहुत ज्यादा समय स्कूल में गुजारता है। बच्चे का उचित विकास स्कूल के माहौल पर निर्भर करता है। यह तभी संभव हो सकता है, अगर साफ़-सुथरा एवं स्वच्छ स्कूल हो। स्वस्थ माहौल बच्चे और वयस्क दोनों को प्रभावित करता है। स्वस्थ माहौल केवल छात्रों का ही नहीं, बल्कि अन्य लोगों के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावात्मक, नैतिक और बौद्धिक विकास में भी सहायक होता है।

प्रश्न 17.
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
स्कूल में स्वास्थ्य निर्देशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।
(3) स्वास्थ्य संबंधी महत्त्वपूर्ण नियमों या सिद्धांतों की जानकारी देना।
(4) संक्रामक रोगों की रोकथाम के उपायों की जानकारी देना।
(5) बच्चों को अपने स्वास्थ्य की ओर ध्यान देने हेतु प्रेरित करना।
(6) अच्छी आदतें एवं सेहत को ठीक रखने के उपाय बताना।

प्रश्न 18.
स्वास्थ्य निर्देशन के क्षेत्र पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
स्वास्थ्य निर्देशन के क्षेत्र निम्नलिखित हैं
1. वाद-विवाद-वाद-विवाद, स्वास्थ्य निर्देशन प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण तरीका है। इसके अंतर्गत बच्चों को कोई विषय देकर वाद-विवाद करवाया जाता है।
2. भाषण-भाषण द्वारा भी बच्चों को निर्देशन प्रदान किए जाते हैं। बच्चों को एक विषय देकर अपने विचार व्यक्त करने को कहा जाता है, ताकि सुनने वाले बच्चों को भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्राप्त हो सके।
3. रेडियो, सिनेमा, टी०वी०-बच्चों को रेडियो, सिनेमा, टी०वी० के माध्यम से भी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी प्रदान की जा सकती है।
4. प्रदर्शन व प्रदर्शनी-प्रदर्शन व प्रदर्शनी द्वारा भी स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान प्रदान किया जा सकता है। प्रदर्शनी में अनेक प्रकार की हृदय-श्रव्य सामग्री का प्रदर्शन किया जा सकता है।
5. स्वास्थ्य संबंधी भ्रमण एवं साहित्य-समय-समय पर छात्र-छात्राओं के स्वास्थ्य हेतु शैक्षणिक भ्रमणों की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसे भ्रमणों से उन्हें प्रत्यक्ष रूप से ज्ञान प्रदान किया जा सकता है। इसके साथ ही हमें स्वास्थ्य संबंधी साहित्य की व्यवस्था स्कूल पुस्तकालय में करवानी चाहिए।

HBSE 12th Class Physical Education Solutions Chapter 3 स्वास्थ्य शिक्षा

प्रश्न 19.
स्वास्थ्य का महत्त्व बताएँ।
उत्तर:
स्वास्थ्य का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है; जैसे-
(1) स्वास्थ्य मानव व समाज का आधार स्तंभ है। यह वास्तव में खुशी, सफलता और आनंदमयी जीवन की कुंजी है।
(2) अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी होते हैं।
(3) स्वास्थ्य व्यक्ति के व्यक्तित्व को सुधारने व निखारने में सहायक होता है।
(4) स्वास्थ्य से हमारा जीवन संतुलित, आनंदमय एवं सुखमय रहता है।
(5) स्वास्थ्य हमारी जीवन-शैली को बदलने में हमारी सहायता करता है।
(6) किसी भी देश के नागरिकों के स्वास्थ्य व आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष संबंध पाया जाता है। यदि किसी देश के नागरिक शारीरिक रूप से स्वस्थ होंगे तो उस देश का आर्थिक विकास भी उचित दिशा में होगा।
(7) स्वास्थ्य से हमारी कार्यक्षमता पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 20.
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं के अभिकरण बताएँ।
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य सेवा का उद्देश्य स्वास्थ्य विकास और कल्याण को बढ़ावा देना है, ताकि छात्र अपनी पूरी क्षमता तक पहुंच सकें। स्वास्थ्य सेवाएँ संयुक्त रूप से स्वास्थ्य विभाग और शिक्षा विभाग द्वारा प्रदान की जाती हैं। स्कूल स्वास्थ्य सेवा टीम में सामुदायिक स्वास्थ्य नर्स और अन्य स्वास्थ्य पेशेवर शामिल होते हैं । एक सामुदायिक स्वास्थ्य नर्स आमतौर पर स्कूल की यात्रा करती है और छात्रों के स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्राप्त करती है। सामुदायिक स्वास्थ्य टीम में सहयोगी स्वास्थ्य पेशेवर भी स्कूल में चल रहे कार्यक्रमों में शामिल हो सकते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न [Very Short Answer Type Questions]

प्रश्न 1.
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ लिखते हुए कोई एक परिभाषा लिखें। अथवा स्वास्थ्य शिक्षा को परिभाषित कीजिए।
अथवा
स्वास्थ्य शिक्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों या पहलुओं के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्मनिर्भर बनने में सहायता करते हैं। डॉ० थॉमस वुड के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

प्रश्न 2.
स्वास्थ्य शिक्षा का क्या लक्ष्य है?
उत्तर:स्वास्थ्य शिक्षा का लक्ष्य न केवल शारीरिक विकास या वृद्धि तक सीमित है बल्कि इसका महत्त्वपूर्ण लक्ष्य व्यक्ति के मानसिक, भावात्मक, सामाजिक आदि पक्षों को भी विकसित करना है। इसका लक्ष्य शरीर को हानि पहुँचाने वाली बुरी आदतों से अवगत करवाना और स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों हेतु अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में सहायता करना है।

प्रश्न 3.
विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम के विभिन्न अंग या तत्त्व कौन-कौन-से हैं?
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य सेवाएँ,
(2) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण,
(3) स्वास्थ्य निर्देश ।

प्रश्न 4.
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में क्या अंतर है?
उत्तर:
शारीरिक शिक्षा एवं स्वास्थ्य शिक्षा में परस्पर अटूट संबंध है। दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं, क्योंकि आज एक ओर जहाँ स्वास्थ्य शिक्षा को शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत पढ़ाया जाता है, वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य शिक्षा के अध्ययन में भी शारीरिक शिक्षा के पक्षों पर जोर दिया जाता है। फिर भी इनमें कुछ अंतर है। शारीरिक शिक्षा के अंतर्गत शारीरिक गतिविधियों या क्रियाओं पर विशेष बल दिया जाता है, जबकि स्वास्थ्य शिक्षा के अंतर्गत स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

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प्रश्न 5.
विभिन्न स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) चिकित्सा परीक्षण,
(2) प्राथमिक चिकित्सा/सहायता सेवाएँ,
(3) आहार-पोषण पर विशेष ध्यान,
(4) माता-पिता को छात्रों की स्वास्थ्य रिपोर्ट की जानकारी देना,
(5) बीमार छात्रों का उपचार आदि।

प्रश्न 6.
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम मुख्यतः कैसे होने चाहिएँ?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम रुचिकर, मनोरंजक तथा शिक्षाप्रद होने चाहिएँ, ताकि इनमें सभी बढ़-चढ़कर भाग ले सकें। ये बच्चों की रुचि, स्वास्थ्य के स्तर तथा वातावरण की आवश्यकता के अनुसार तथा व्यावहारिक भी होने चाहिएँ, ताकि इनसे स्वास्थ्य संबंधी सभी पहलुओं की उचित जानकारी प्राप्त हो सके।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य के विभिन्न पहलू या मापक बताइए।
उत्तर:
(1) शारीरिक स्वास्थ्य
(2) मानसिक स्वास्थ्य,
(3) सामाजिक स्वास्थ्य,
(4) आध्यात्मिक स्वास्थ्य,
(5) संवेगात्मक स्वास्थ्य।

प्रश्न 8.
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण की परिभाषा दीजिए।
अथवा
स्वास्थ्यपूर्ण विद्यालयी जीवन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली जीवन या वातावरण का अर्थ है कि स्कूल में संपूर्ण स्वच्छ वातावरण का होना या ऐसे वातावरण का निर्माण करना जिससे छात्रों की सभी क्षमताओं एवं योग्यताओं को विकसित किया जा सके। स्कूल का स्वच्छ वातावरण ही छात्रों के सामाजिक-भावनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है और साथ-ही-साथ उन्हें अधिक-से-अधिक सीखने हेतु प्रेरित करता है।

प्रश्न 9.
स्कूल में स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारक क्या हैं?
अथवा
विद्यालयी छात्रों के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले कारकों को बताइए।
अथवा
अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए आवश्यक कारक बताएँ।
उत्तर:
(1) वातावरण
(2) संतुलित व पौष्टिक आहार
(3) व्यक्तिगत स्वच्छता
(4) सामाजिक व आर्थिक कारक ।

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प्रश्न 10.
स्वास्थ्य अनुदेशन या निर्देशन क्या है?
उत्तर:
स्वास्थ्य निर्देशन का आशय है-स्कूल के बच्चों को स्वास्थ्य संबंधी ऐसी जानकारी देना कि वे स्वयं को स्वस्थ एवं नीरोग बना सकें। स्वास्थ्य निर्देशन स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों एवं दृष्टिकोणों का विकास करते हैं। स्वास्थ्य से संबंधित बाधाओं या समस्याओं के बुरे प्रभावों से बचाव के लिए ये हमारा मार्गदर्शन करते हैं।

प्रश्न 11.
विद्यालयी स्वास्थ्य निर्देशन के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) बच्चों को व्यक्तिगत स्वास्थ्य की महत्ता की जानकारी देना।
(2) बच्चों को स्वास्थ्य के विषय में पर्याप्त ज्ञान देना।

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प्रश्न 12.
स्वास्थ्य अनुदेशन के कोई दो मार्गदर्शक सिद्धांत बताइए।
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य संबंधी किसी विषय पर वाद-विवाद प्रतियोगिता करवाना।
(2) स्वास्थ्य के सभी पहलुओं से संबंधित साहित्य स्कूल पुस्तकालय में उपलब्ध करवाना।

प्रश्न 13.
शारीरिक स्वास्थ्य से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
शारीरिक स्वास्थ्य वह स्वास्थ्य है जिसमें शारीरिक पक्ष संबंधी विशेष जानकारी दी जाती है। शारीरिक स्वास्थ्य में शारीरिक संस्थान व उनके अंगों या भागों को शामिल किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति को न केवल शरीर के विभिन्न अंगों या भागों की बनावट एवं उनके कार्यों की जानकारी होनी चाहिए, बल्कि शारीरिक अंगों या भागों को उत्तम स्वास्थ्य की स्थिति में रखने का भी ज्ञान होना चाहिए।

प्रश्न 14.
राष्ट्रीय स्वास्थ्य से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय स्वास्थ्य से अभिप्राय है कि हम अपने आस-पास के वातावरण को ऐसा बनाएँ, जिससे हम उसका अधिक-से-अधिक लाभ समाज व देश को दे सकें, ताकि हमारा समाज व देश स्वच्छ एवं नीरोग हो सके। अत: यह ऐसा स्वास्थ्य है जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य संबंधी पक्षों पर बल दिया जाता है। अतः हम सभी को स्वास्थ्य संबंधी पक्षों में विशेष रुचि लेनी चाहिए, ताकि देश का स्वास्थ्य उचित बना रहे।

प्रश्न 15.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) छात्रों को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी देना अर्थात् उन्हें स्वास्थ्य के नियमों से अवगत कराना। (2) उन्हें संक्रामक-असंक्रामक रोगों के कारणों और उनकी रोकथाम या बचाव के उपायों की जानकारी देना।

प्रश्न 16.
स्कूल में स्वास्थ्य शिक्षा के क्या उद्देश्य हैं?
उत्तर:
(1) बच्चों में ऐसी स्वाभाविक आदतों का विकास करना जो स्वास्थ्यप्रद हो
(2) छात्रों के स्वास्थ्य का निरीक्षण करना
(3) छात्रों को रोगों के बारे में विस्तृत जानकारी देना
(4) छात्रों को रोगों से बचने के उपायों की जानकारी देना।

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प्रश्न 17.
स्वास्थ्य शिक्षा के कोई दो आधारभूत नियम बताएँ।
उत्तर:
(1) स्वास्थ्य शिक्षा छात्रों में अच्छी आदतों का विकास करती है।
(2) स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम व्यावहारिक, स्वास्थ्य के स्तर एवं वातावरण की आवश्यकतानुसार होने चाहिएँ।

प्रश्न 18.
जन-साधारण को स्वास्थ्य-संबंधी उपयोगी जानकारी देने वाले माध्यम या साधन बताएँ।
उत्तर:
(1) टेलीविजन,
(2) रेडियो,
(3) वार्तालाप,
(4)भाषण,
(5) अखबार,
(6) पत्रिकाएँ एवं विज्ञापन आदि।

प्रश्न 19.
स्वस्थ व्यक्ति की क्या पहचान है? अथवा स्वस्थ व्यक्ति की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
(1) स्वस्थ व्यक्ति अपने सभी कार्य अच्छे से एवं तीव्रता से करने में समर्थ होता है,
(2) उसके शरीर में फूर्ति एवं लचकता होती है,
(3) उसके शारीरिक संस्थान सुचारू रूप से कार्य करते हैं और उनकी कार्यक्षमता अधिक होती है,
(4) उसका मन शांत और शरीर स्वस्थ होता है।

प्रश्न 20.
विद्यार्थियों के लिए स्वस्थ रहना क्यों अधिक महत्त्वपूर्ण है?
उत्तर:
विद्यार्थी का मुख्य उद्देश्य शिक्षा प्राप्त करना होता है। शिक्षा प्राप्त करने हेतु विद्यार्थी का स्वास्थ्य बहुत महत्त्वपूर्ण होता है, इसलिए विद्यार्थियों के लिए स्वस्थ रहना अधिक महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अस्वस्थ विद्यार्थी के लिए शिक्षा प्राप्त करना कठिन होता है। किसी ने ठीक ही लिखा है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है। अच्छे स्वास्थ्य के द्वारा ही विद्यार्थी अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकता है। अच्छी शिक्षा प्राप्त करके वह देश के विकास में अपना योगदान देता है।

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HBSE 12th Class Physical Education स्वास्थ्य शिक्षा Textbook Questions and Answers

वस्तुनिष्ठ प्रकार के प्रश्न [Objective Type Questions]

भाग-I : एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें-

प्रश्न 1.
किस शिक्षा में स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा में स्वास्थ्य के बारे में जानकारी प्रदान की जाती है।

प्रश्न 2.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) ने स्वास्थ्य को कैसे परिभाषित किया है?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”

प्रश्न 3.
“स्वास्थ्य जीवन का वह गुण है, जिससे व्यक्ति दीर्घायु होकर उत्तम सेवाएं प्रदान करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन जे०एफ० विलियम्स ने कहा।

प्रश्न 4.
“स्वास्थ्यप्रद शरीर आत्मा के लिए आरामगृह, परन्तु कमजोर व बीमार व्यक्ति के लिए कारागृह है।” यह किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन रोजर बेकन ने कहा।

प्रश्न 5.
“स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क वास करता है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कंथन अरस्तू ने कहा।

प्रश्न 6.
किसी देश का कल्याण किसके स्वास्थ्य पर निर्भर करता है?
उत्तर:
किसी देश का कल्याण उस देश के नागरिकों के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है।

प्रश्न 7.
स्वास्थ्य सेवाओं के अंतर्गत आने वाले कोई दो कार्यक्रमों के नाम बताएँ।
उत्तर:
(1) एड्स जागरूकता संबंधी कार्यक्रम
(2) मेडिकल निरीक्षण कार्यक्रम।

प्रश्न 8.
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
उत्तर:
प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध स्वास्थ्य निर्देशन से था।

प्रश्न 9.
आनन्दमय जीवन की कुँजी क्या है?
उत्तर:
आनन्दमय जीवन की कुँजी स्वस्थ शरीर है।

प्रश्न 10.
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना वर्ष 1952 में हुई।

प्रश्न 11.
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को मनाया जाता है।

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प्रश्न 12.
भारत सेवक समाज संस्था कब अस्तित्व में आई?
उत्तर:
भारत सेवक समाज संस्था वर्ष 1952 में अस्तित्व में आई।

प्रश्न 13.
प्रारंभ में स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत किस विषय पर बल दिया जाता था?
उत्तर:
प्रारंभ में स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत स्वास्थ्य शिक्षा पर बल दिया जाता था।

प्रश्न 14.
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य सेवाओं का प्रमुख उद्देश्य स्वास्थ्य विकास कल्याण को बढ़ावा देना है ताकि छात्र अपनी संपूर्ण क्षमता तक पहुँच सकें।

प्रश्न 15.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) की स्थापना अप्रैल, 1948 में हुई।

प्रश्न 16.
स्कूली बच्चों को स्वास्थ्य शिक्षा देने की कोई दो विधियाँ बताएँ।
उत्तर:
(1) भ्रमण द्वारा
(2) स्वास्थ्य संबंधी भाषण।

प्रश्न 17.
W.H.0. का क्या अर्थ है?
उत्तर:
World Health Organisation.

प्रश्न 18.
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम मुख्यतः कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण के अनुसार होना चाहिए।

प्रश्न 19.
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
उत्तर:
स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम बच्चों की आवश्यकताओं, रुचियों और पर्यावरण को ध्यान में रखकर तय करना चाहिए।

प्रश्न 20.
“स्वास्थ्य प्रथम पूँजी है।” यह कथन किसने कहा?
उत्तर:
यह कथन इमर्जन ने कहा।

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प्रश्न 21.
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम तीन प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 22.
क्या स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत शरीर के संस्थानों की जानकारी प्रदान की जाती है?
उत्तर:
हाँ, स्वास्थ्य निर्देशन के अन्तर्गत शरीर के संस्थानों की जानकारी प्रदान की जाती है।

प्रश्न 23.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य कार्य क्या है?
उत्तर:
रोगों का पता लगाना और उनके उपचार में सहायता करना।

प्रश्न 24.
विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाओं का कोई एक उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
छात्र-छात्राओं को स्वास्थ्य से संबंधी नियमों से अवगत करवाना।

प्रश्न 25.
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन कैसा होता है?
उत्तर:
अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन शांत एवं सुखमय होता है।

प्रश्न 26.
मानसिक स्वास्थ्य का क्या अर्थ है?
उत्तर:
दबाव व तनाव से मुक्ति।

प्रश्न 27.
शहरों में स्वास्थ्य संबंधी एक प्रमुख समस्या क्या है?
उत्तर:
यातायात वाहनों की अधिकता के कारण बढ़ता प्रदूषण।

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प्रश्न 28.
‘प्रोटीन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
उत्तर:
‘प्रोटीन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम बरजेलियास ने किया।

प्रश्न 29.
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय परिवार नियोजन संघ की स्थापना वर्ष 1949 में हुई।

प्रश्न 30.
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
भारतीय रेडक्रॉस सोसायटी की स्थापना वर्ष 1920 में हुई।

भाग-II: सही विकल्प का चयन करें

1. स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ है
(A) स्वस्थ शरीर
(B) स्वस्थ दिमाग
(C) स्वस्थ आत्मा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. “स्वास्थ्य हृष्ट-पुष्ट होने की एक दशा है।” यह कथन किसके अनुसार है?
(A) डॉ० थॉमस वुड के ।
(B) विश्व स्वास्थ्य संगठन के
(C) अंग्रेज़ी पद के
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंग्रेज़ी पद के

3. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) बच्चों की आयु और लिंग को
(B) बच्चे के स्वास्थ्य को
(C) केवल आयु को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) बच्चों की आयु और लिंग को

4. “स्वस्थ शरीर आत्मा का अतिथि-भवन और दुर्बल तथा रुग्ण शरीर आत्मा का कारागृह है।” यह कथन है
(A) रोजर बेकन का
(B) डॉ० थॉमस वुड का
(C) हरबर्ट स्पेंसर का
(D) जे०एफ०विलियम्स का
उत्तर:
(A) रोजर बेकन का

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5. निम्नलिखित में से कौन-सा विद्यालयी स्वास्थ्य कार्यक्रम का अंग (चरण) है?
(A) विद्यालयी स्वास्थ्य सेवाएँ
(B) स्वास्थ्यपूर्ण स्कूली वातावरण
(C) स्वास्थ्य निर्देश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

6. स्वास्थ्य का आयाम है
(A) शारीरिक स्वास्थ्य
(B) मानसिक स्वास्थ्य
(C) सामाजिक व आध्यात्मिक स्वास्थ्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. किसने स्वास्थ्य को ‘प्रथम पूँजी’ कहा?
(A) स्वामी विवेकानंद ने
(B) इमर्जन ने

(D) डॉ० थॉमस वुड ने
उत्तर:
(B) इमर्जन ने

8. स्वास्थ्य शिक्षा का उद्देश्य है
(A) स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान देना
(B) उचित मार्गदर्शन करना
(C) स्वास्थ्य संबंधी अच्छी आदतों का विकास करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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9. प्राचीनकाल में स्वास्थ्य शिक्षा का संबंध किससे था?
(A) स्वास्थ्य सेवाओं से
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से
(C) स्वास्थ्य निरीक्षण से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) स्वास्थ्य अनुदेशन से

10. भारत में राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति कब बनाई गई?
(A) वर्ष 1983 में
(B) वर्ष 1988 में
(C) वर्ष 1992 में
(D) वर्ष 1999 में
उत्तर:
(A) वर्ष 1983 में

11. भारतीय बाल कल्याण परिषद् की स्थापना हुई
(A) वर्ष 1950 में
(B) वर्ष 1951 में
(C) वर्ष 1952 में
(D) वर्ष 1955 में
उत्तर:
(C) वर्ष 1952 में

12. विश्व स्वास्थ्य संगठन का मुख्यालय कहाँ स्थित है?
(A) न्यूयॉर्क में
(B) पेरिस में
(C) जेनेवा में
(D) लंदन में
उत्तर:
(C) जेनेवा में

13. साधारण जनता को स्वास्थ्य संबंधी जानकारी दी जाती है
(A) रेडियो द्वारा
(B) टेलीविजन द्वारा
(C) अखबार द्वारा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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14. स्कूल स्वास्थ्य प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं प्राथमिक मुद्दा है
(A) स्कूल का प्रबंधन
(B) बच्चों का स्वास्थ्य
(C) बच्चों की पढ़ाई
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बच्चों का स्वास्थ्य

15. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का जीवन कैसा होता है?
(A) सुखमय
(B) आरामदायक
(C) दुखदायी
(D) (A) व (B) दोनों
उत्तर:
(D) (A) व (B) दोनों

16. स्कूल स्वास्थ्य कार्यक्रम कितने चरणों में पूरा होता है?
(A) 1
(B) 2
(C) 3
(D) 4
उत्तर:
(C)3

17. विश्व स्वास्थ्य दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
(A) 7 अप्रैल को
(B) 8 मार्च को
(C) 14 अप्रैल को
(D) 15 मार्च को
उत्तर:
(A)7 अप्रैल को

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18. पोषण से होता है
(A) वृद्धि एवं विकास
(B) सहनशीलता
(C) रफ्तार
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) वृद्धि एवं विकास

19. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम मुख्यतः किसको ध्यान में रखकर तय करना चाहिए?
(A) शिक्षकों को
(B) स्कूल के अन्य कर्मचारियों को
(C) छात्रों को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) छात्रों को

20. स्वास्थ्य शिक्षा का कार्यक्रम होना चाहिए
(A) रुचिपूर्ण
(B) शिक्षा से भरपूर
(C) मनोरंजनात्मक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

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भाग-III : रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

1. स्वास्थ्य एक ………………. उत्तरदायित्व है।
2. स्वास्थ्य शिक्षा के कार्यक्रम ……………….. की आवश्यकता के अनुसार होने चाहिएँ।
….. के बिना हमारा शारीरिक स्वास्थ्य अधूरा है।
4. स्वास्थ्य शिक्षा छात्रों को ……………….. संबंधी जानकारी देने वाला विषय है।
5. “स्वास्थ्य शिक्षा लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े व्यवहार से संबंधित है।” यह कथन ……………. ने कहा।
6. स्वास्थ्य शिक्षा ……………….. प्रक्रिया है।
7. विद्यालय स्वास्थ्य कार्यक्रम . ……………… चरणों में पूरा होता है।
……… के बिना कोई भी व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कार्य नहीं कर सकता।
9. ………………….. शिक्षा से अभिप्राय उन सभी साधनों से है जो व्यक्ति को स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान प्रदान करते हैं।
10. अच्छे स्वास्थ्य वाले व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन ……………….. होता है।
उत्तर:
1. व्यक्तिगत
2. बच्चों
3. मानसिक स्वास्थ्य
4. स्वास्थ्य
5. सोफी
6. जन स्वास्थ्य संबंधी
7. तीन
8. अच्छे स्वास्थ्य
9. स्वास्थ्य
10. आनंदमय एवं सुखमय।

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स्वास्थ्य शिक्षा Summary

स्वास्थ्य शिक्षा परिचय

स्वास्थ्य (Health):
अच्छा स्वास्थ्य होना जीवन की सफलता के लिए बहुत आवश्यक है, क्योंकि अच्छे स्वास्थ्य से कोई व्यक्ति किसी निर्धारित उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। आरोग्य व्यक्ति को स्वस्थ कहना बहुत बड़ी भूल है। स्वस्थ व्यक्ति उसे कहा जाता है जिसकी सभी शारीरिक प्रणालियाँ ठीक ढंग से कार्य करती हों और वह स्वयं को वातावरण के अनुसार ढालने में सक्षम हो। अलग-अलग लोगों के लिए स्वास्थ्य का अर्थ भिन्न-भिन्न होता है। कुछ लोगों के लिए यह बीमारी से छुटकारा है तो कुछ के लिए शरीर और दिमाग का सुचारू रूप से कार्य करना। स्वास्थ्य का शाब्दिक अर्थ-स्वस्थ शरीर, दिमाग तथा आत्मा से चुस्त-दुरुस्त होने की अवस्था है, विशेष रूप से किसी बीमारी या पीड़ा से मुक्त रहना। अत: स्वास्थ्य कोई लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन में उपलब्धि प्राप्त करने का साधन है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation) के अनुसार, “स्वास्थ्य केवल रोग या विकृति की अनुपस्थिति को नहीं, बल्कि संपूर्ण शारीरिक, मानसिक व सामाजिक सुख की स्थिति को कहते हैं।”

स्वास्थ्य शिक्षा (Health Education):
स्वास्थ्य शिक्षा का अर्थ उन सभी आदतों से है जो किसी व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के बारे में ज्ञान देती हैं। इसका संबंध मनुष्य के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से है। यह शिक्षा मनुष्य को स्वास्थ्य के उन सभी मौलिक सिद्धांतों के बारे में जानकारी देती है जो स्वस्थ जीवन के अच्छे ढंगों, आदतों और व्यवहार का निर्माण करके मनुष्य को आत्म-निर्भर बनाने में सहायता करते हैं। अतः यह एक ऐसी शिक्षा है जिसके बिना मनुष्य की सारी शिक्षा अधूरी रह जाती है। डॉ० थॉमस वुड (Dr Thomas Wood) के अनुसार, “स्वास्थ्य शिक्षा उन अनुभवों का समूह है, जो व्यक्ति, समुदाय और सामाजिक स्वास्थ्य से संबंधित आदतों, व्यवहारों और ज्ञान को प्रभावित करते हैं।”

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