Author name: Prasanna

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. अन्तिम मुगल बादशाह था
(A) औरंगजेब
(B) शाहजहाँ
(C) बहादुरशाह जफर
(D) जहांगीर
उत्तर:
(C) बहादुरशाह जफ़र

2. कानपुर में विद्रोहियों का नेता था
(A) शाहमल
(B) बिरजिस कद्र
(C) नाना साहिब
(D) बहादुरशाह जफ़र
उत्तर:
(C) नाना साहिब

3. वाजिद अलीशाह नवाब था
(A) दिल्ली का
(B) अवध का
(C) हैदराबाद का
(D) बंगाल का
उत्तर:
(B) अवध का

4. पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था
(A) नाना साहिब
(B) तात्या टोपे
(C) कुंवर सिंह
(D) रावतुला राम
उत्तर:
(A) नाना साहिब

5. बिहार में विद्रोहियों का नेता था
(A) कुंवर सिंह
(B) बख्त खाँ
(C) नाना साहिब
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) कुंवर सिंह

6. लॉर्ड डलहौजी ने धार्मिक अयोग्यता अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

7. लॉर्ड केनिंग ने सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

8. ‘ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा। ये शब्द लॉर्ड डलहौजी ने किस रियासत के बारे में कहे?
(A) दिल्ली
(B) अवध
(C) बंगाल
(D) मद्रास
उत्तर:
(B) अवध

9. अवध का अन्तिम नवाब था
(A) शुजाउद्दौला
(B) सिराजुद्दौला
(C) वाजिद अली शाह
(D) बख्त खां
उत्तर:
(C) वाजिद अली शाह

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

10. अवध का अधिग्रहण किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

11. अवध में विद्रोह की शुरूआत हुई
(A) 10 मई, 1857 को
(B) 4 जून, 1857 को
(C) 8 अप्रैल, 1857 को
(D) 17 जून, 1857 को
उत्तर:
(B) 4 जून, 1857 को

12. अवध का औपचारिक अधिग्रहण के बाद वहाँ भू-राजस्व बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) स्थायी बन्दोबस्त
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त
(C) ठेकेदारी बन्दोबस्त
(D) महालवाड़ी बन्दोबस्त
उत्तर:
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त

13. सिंहभूम में कोल आदिवासियों का नेता था
(A) गोनू
(B) बिरसा मुंडा
(C) सिधू मांझी
(D) बिरजिस कद्र
उत्तर:
(A) गोनू

14. मंगल पाण्डे को फाँसी हुई
(A) 8 अप्रैल, 1857 को
(B) 10 मई, 1857 को
(C) 31 मई, 1857 को
(D) 30 जून, 1858 को
उत्तर:
(A) 8 अप्रैल, 1857 को

15. मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर भेजा गया
(A) कलकत्ता
(B) रंगून
(C) बम्बई
(D) लंदन
उत्तर:
(B) रंगून

16. अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके भेजा गया
(A) रंगून
(B) लंदन
(C) मद्रास
(D) कलकत्ता
उत्तर:
(D) कलकत्ता

17. लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था?
(A) तात्या टोपे
(B) लक्ष्मीबाई
(C) बेगम हजरत महल
(D) नाना साहिब
उत्तर:
(C) बेगम हजरत महल

18. 1857 ई० के विद्रोह का सबसे अधिक व्यापक रूप था
(A) पंजाब में
(B) दिल्ली में
(C) बंगाल में
(D) अवध में
उत्तर:
(D) अवध में

19. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अवध पर पुनः अधिकार किया
(A) जून, 1857 में
(B) मार्च, 1858 में
(C) सितम्बर, 1858 में
(D) जनवरी, 1858 में
उत्तर:
(B) मार्च, 1858 में

20. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर नियन्त्रण स्थापित किया
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 17 जून, 1857 को
(C) 20 सितम्बर, 1857 को
(D) 8 अप्रैल, 1858 को
उत्तर:
(C) 20 सितम्बर, 1857 को

21. तात्या टोपे को फांसी हुई
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 18 अप्रैल, 1859 को
(C) 10 मई, 1859 को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) 18 अप्रैल, 1859 को

22. आज़मगढ़ घोषणा की गई
(A) 15 मई, 1857 को
(B) 15 जून, 1857 को
(C) 15 जुलाई, 1857 को
(D) 25 अगस्त, 1857 को
उत्तर:
(D) 25 अगस्त, 1857 को.

23. विद्रोही क्या चाहते थे?
(A) अंग्रेजी राज का अन्त
(B) हिन्दू व मुसलमानों में एकता
(C) वैकल्पिक सत्ता की तलाश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेज़ों ने क्या कदम उठाए?
(A) विद्रोहियों पर अमानवीय अत्याचार किए
(B) वफादार शासकों व जमींदारों को भारी इनाम दिए
(C) सारे उत्तरी भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. ‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र ब्रिटेन की पंच नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ
(A) 1854 ई० में
(B) 1856 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ई० में
उत्तर:
(D) 1858 ई० में

26. ‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन ने बनाया
(A) 1857 ई० में
(B) 1858 ई० में
(C) 1859 ई० में
(D) 1860 ई० में
उत्तर:
(C) 1859 ई० में 27. सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया
(A) 1820 ई० में
(B) 1824 ई० में
(C) 1825 ई० में
(D) 1829 ई० में
उत्तर:
(D) 1829 ई० में

28. ‘उत्तराधिकार कानून पास किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

29. 1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल था
(A) लॉर्ड रिपन
(B) लॉर्ड केनिंग
(C) लॉर्ड डलहौजी
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) लॉर्ड केनिंग

30. 1857 ई० के विद्रोह का तत्कालीन कारण था
(A) अवध का विलय
(B) झांसी का विलय
(C) चर्बी वाले कारतूस
(D) उत्तराधिकार कानून
उत्तर:
(C) चर्बी वाले कारतूस

31. झांसी का अंग्रेजी राज्य में विलय किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1854 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1854 ई० में

32. अवध का विलय किस गवर्नर जनरल ने किया?
(A) लॉर्ड डलहौजी
(B) लॉर्ड वेलेजली
(C) लॉर्ड केनिंग
(D) लॉर्ड रिपन
उत्तर:
(A) लॉर्ड डलहौजी

33. अवध में एकमुश्त बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

34. लखनऊ में विद्रोहियों ने अवध के किस चीफ कमीश्नर को मौत के घाट उतार दिया?
(A) जनरल नील
(B) हैनरी लॉरेंस
(C) कोलिन कैम्पबेल
(D) जनरल हैवलॉक
उत्तर:
(B) हैनरी लॉरेंस

35. ‘बाग डंका शाह’ के नाम से प्रसिद्ध था
(A) शाहमल
(B) नाना साहिब
(C) कुंवर सिंह
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह
उत्तर:
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह

36. विद्रोह को कुचलने में देशी रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया
(A) पटियाला
(B) ग्वालियर
(C) हैदराबाद
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

37. भारत का प्रथम शहीद कौन था?
(A) नाना साहिब
(B) मंगल पांडे
(C) बहादुरशाह
(D) रानी लक्ष्मीबाई
उत्तर:
(B) मंगल पांडे

38. अंग्रेज़ों ने कुशासन की आड़ में किस राज्य को अधिकार में लिया था?
(A) झांसी
(B) सतारा
(C) अवध
(D) हैदराबाद
उत्तर:
(C) अवध

39. ‘फिरंगी’ शब्द किस भाषा का है?
(A) फारसी
(B) अरबी
(C) उर्दू
(D) संस्कृत
उत्तर:
(A) फारसी

40. ब्रिटिश ईस्ट-इण्डिया कंपनी के अधीन सेवारत भारतीय सैनिकों का पहला सैनिक विद्रोह कहाँ हुआ?
(A) मेरठ
(B) बैरकपुर
(C) पटना
(D) वेल्लोर
उत्तर:
(D) वेल्लोर

41. 1857 ई० के विद्रोह के लिए लॉर्ड डलहौजी का वह कौन-सा प्रशासकीय कदम था जो सर्वाधिक उत्तरदायी सिद्ध हुआ ?
(A) भारत में रेलवे. डाक और तार व्यवस्था का प्रचलन
(B) कुशासन के नाम पर देशी राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन
(D) भारतीय शासकों की पेंशन को बन्द या कम कर देना।
उत्तर:
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन

42. 1857 ई० का विद्रोह ‘एक राष्ट्रीय विद्रोह’ था न कि ‘एक सैनिक विद्रोह’ यह शब्द किस अंग्रेज़ सांसद और राजनीतिज्ञ “के हैं?
(A) लॉर्ड केनिंग
(B) लॉर्ड डलहौजी
(C) लॉर्ड डिजरायली
(D) लॉर्ड एलनबरो
उत्तर:
(C) लॉर्ड डिजरायली

43.1857 ई० के विद्रोह का आरम्भ कब हुआ?
(A) लखनऊ
(B) मेरठ
(C) बैरकपुर
(D) कानपुर
उत्तर:
(B) मेरठ

44. अंग्रेज़ों ने विद्रोह के किस मुख्य केंद्र पर सबसे पहले पुनर्धिकार किया?
(A) कानपुर
(B) दिल्ली
(C) लखनऊ
(D) झाँसी
उत्तर:
(B) दिल्ली

45. दिल्ली में विद्रोही सेना का सेनानायक कौन था?
(A) अजीमुल्ला
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बाबा कुँवर सिंह
(D) जनरल बख्त खाँ
उत्तर:
(A) अजीमुल्ला

46. 1857 ई० के विद्रोह का कौन-सा नेता बचकर नेपाल भाग गया और बाद में उसकी गतिविधियों का कभी पता नहीं चल पाया?
(A) नाना साहिब
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बेगम हज़रत अली
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) नाना साहिब

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली में विद्रोहियों को किसने रोकने का प्रयास किया?
उत्तर:
कर्नल रिप्ले ने विद्रोहियों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया।

प्रश्न 2.
सिपाही जब लाल किले पर पहुंचे तो बहादुरशाह जफर क्या कर रहे थे?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर प्रातःकालीन नमाज पढ़कर और सहरी खाकर उठे थे।

प्रश्न 3.
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफर से क्या अनुरोध किया?
उत्तर:
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफ़र से नेतृत्व के लिए अनुरोध किया।

प्रश्न 4.
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफर ने क्या किया?
उत्तर:
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफ़र ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया।

प्रश्न 5.
बहादुरशाह जफर द्वारा नेतृत्व स्वीकार करने पर विद्रोह का स्वरूप कैसा हो गया?
उत्तर:
बहादुरशाह के नेतृत्व स्वीकार करने पर यह विद्रोह केवल सिपाहियों का विद्रोह नहीं रहा, बल्कि विदेशी सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक विद्रोह बन गया।

प्रश्न 6.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिन्दुओं व मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिन्दुओं व मुसलमानों को देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया।

प्रश्न 7.
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहिब ने किया।

प्रश्न 8.
नाना साहिब को अन्य किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
नाना साहिब को धोंधू पंत के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 9.
इलाहाबाद में विद्रोहियों का नेता कौन था?
उत्तर:
मौलवी लियाकत खाँ, जो पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता थे, ने विद्रोह का नेतृत्व व प्रशासन की कमान संभाली।

प्रश्न 10.
बिहार में विद्रोह का नेतृत्व किसके हाथ में था?
उत्तर:
जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवरसिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने बिहार में विद्रोह का नेतृत्व सँभाला।

प्रश्न 11.
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तांत्या टोपे ने किया।

प्रश्न 12.
विद्रोह में सिंधिया राजा की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ दिया।

प्रश्न 13.
बंगाल की बैरकपुर छावनी में बगावत का आह्वान किसने किया?
उत्तर:
29 मार्च, 1857 को परेड के समय बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डे ने बगावत का आह्वान किया।

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प्रश्न 14.
मंगल पाण्डे को फांसी पर कब लटकाया गया?
उत्तर:
8 अप्रैल, 1857 को मंगल पाण्डे को फांसी पर लटकाया गया।

प्रश्न 15.
लैप्स का सिद्धान्त किस गवर्नर जनरल ने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रश्न 16.
लैप्स के सिद्धान्त द्वारा कौन-कौन से राज्यों का विलय किया गया?
उत्तर:
सतारा, नागपुर, झाँसी तथा उदयपुर राज्यों का लैप्स के सिद्धान्त से अंग्रेज़ी राज्य में विलय किया गया।

प्रश्न 17.
मंगल पाण्डे कौन था?
उत्तर:
मंगल पाण्डे 34वीं नेटिव इन्फ्रेंट्री में एक सैनिक था।

प्रश्न 18.
अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर कहाँ भेजा?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र को बन्दी बनाकर रंगून भेजा गया।

प्रश्न 19.
बहादुरशाह जफर की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
रंगून में 1862 में बहादुरशाह जफर की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 20.
रानी लक्ष्मीबाई को वीरगति कब व कहाँ प्राप्त हुई?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई को 17 जून, 1858 को ग्वालियर में वीरगति प्राप्त हुई।

प्रश्न 21.
नाना साहिब ने कानपुर पर अधिकार कब किया?
उत्तर:
नाना साहिब ने कानपुर पर 26 जून, 1857 को अधिकार किया।

प्रश्न 22.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र कब तथा किसने बनाया?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 में बनाया गया।

प्रश्न 23.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दर्शाया गया है?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि संकट की घड़ी का अन्त हो चुका है।

प्रश्न 24.
‘इन मेमोरियम’ चित्र कब व किसने बनाया?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन द्वारा 1859 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 25.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र में अंग्रेज़ औरतें व बच्चे एक-दूसरे से लिपटे दिखाई दे रहे हैं। वे असहाय प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 26.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र कब प्रकाशित हुआ?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र 24 अक्तूबर, 1857 को ब्रिटिश पत्रिका ‘पंच’ में प्रकाशित हुआ।

प्रश्न 27.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ में क्या दिखाने का प्रयास किया गया है?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र में केनिंग को दयालु दिखाने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 28.
शाह मल कहाँ का रहने वाला था?
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना का रहने वाला था।

प्रश्न 29.
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर कौन था?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर हैनरी लॉरैस था।

प्रश्न 30.
बंगाल आर्मी की पौधशाला किसे कहा गया?
उत्तर:
अवध को बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा गया।

प्रश्न 31.
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम कब पारित किया गया?
उत्तर:
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम 1850 में पारित किया गया।

प्रश्न 32.
1857 ई० के विद्रोह के समय वहाँ का नवाब कौन था?
उत्तर:
अवध विलय के समय नवाब वाजिद अली शाह वहाँ का नवाब था।

प्रश्न 33.
आज़मगढ़ घोषणा कब की गई?
उत्तर:
25 अगस्त, 1857 को आज़मगढ़ घोषणा की गई।

प्रश्न 34.
झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में कब मिलाया गया?
उत्तर:
लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार 1854 में झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 35.
1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के समय केनिंग भारत का गवर्नर जनरल था।

प्रश्न 36.
अवध में लोगों ने अपना नेता किसे घोषित किया?
उत्तर:
अवध के अपदस्थ नवाब के बेटे बिरजिस कद्र को लोगों ने अपना नेता घोषित किया।

प्रश्न 37.
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त और कौन-सी अफवाह उड़ रही थी?
उत्तर:
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट एक अन्य अफवाह थी।

प्रश्न 38.
अवध में विद्रोह कब प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
4 जून, 1857 को अवध में विद्रोह प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 39.
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कहाँ भेजा गया?
उत्तर:
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कलकत्ता भेज दिया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 40.
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व बख्त खाँ ने किया।

प्रश्न 41.
विद्रोहियों ने विद्रोह को शुरू करने का क्या तरीका अपनाया?
उत्तर:
सिपाहियों ने विद्रोह शुरू करने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या बिगुल बजाकर किया।

प्रश्न 42.
बरेली में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 43.
दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए विद्रोहियों ने क्या किया?
उत्तर:
दिल्ली में प्रशासन चलाने के लिए एक प्रशासनिक कौंसिल बनाई गई। इसके कुल 10 सदस्य थे।

प्रश्न 44.
पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बु-अली शाह कलंदर मस्जिद के मौलवी ने पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 45.
विद्रोह की शुरूआत किस अफवाह से हुई?
उत्तर:
विद्रोह की शुरूआत चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह से हुई।

प्रश्न 46.
सामान्य सेवा अधिनियम किस गवर्नर-जनरल के काल में पारित हुआ?
उत्तर:
सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम 1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के काल में पास किया गया।

प्रश्न 47.
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स की नीति के तहत कौन-कौन से राज्य हड़पे?
उत्तर:
सतारा, संभलपुर, जैतपुर, उदयपुर, नागपुर तथा झांसी राज्य डलहौजी ने ‘राज्य हड़पने की नीति’ के तहत हड़पे।

प्रश्न 48.
अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कैसे किया गया?
उत्तर:
अवध पर ‘कुशासन’ का आरोप लगाकर उसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 49.
“यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” लॉर्ड डलहौजी ने यह शब्द किस राज्य के बारे में कहे?
उत्तर:
यह शब्द अवध राज्य के बारे में कहे गए।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेरठ छावनी में विद्रोह कब शुरू हुआ?
उत्तर:
10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में विद्रोह शुरू हुआ। भारतीय पैदल सेना के सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। कोर्ट मार्शल हुआ और 85 भारतीय सिपाहियों को 8 से लेकर 10 वर्ष तक की कठोर सज़ा दी गई।

प्रश्न 2.
देशी नरेशों के नाम पत्र में बहादुरशाह जफर ने क्या इच्छा प्रकट की?
उत्तर:
देशी नरेशों के नाम पत्र लिखते हुए बहादुरशाह जफ़र ने कहा मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि जिस तरीके से भी हो और जिस कीमत पर हो सके फिरंगियों को हिन्दुस्तान से बाहर निकाल दिया जाए। मेरी यह तीव्र इच्छा है कि तमाम हिन्दुस्तान आज़ाद हो जाए। अंग्रेज़ों को निकाल दिए जाने के बाद अपने निजी लाभ के लिए हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने की मुझ में जरा भी ख्वाहिश नहीं है। यदि आप सब देशी नरेश दुश्मन को निकालने की गरज से अपनी-अपनी तलवार खींचने के लिए तैयार हों तो मैं अपनी तमाम राजसी शक्तियाँ (Royal Powers) और अधिकार देशी नरेशों के किसी चुने हुए संघ को सौंपने के लिए राजी हूँ।

प्रश्न 3.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिंदुओं और मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिंदुओं और मुसलमानों के नाम एक अपील जारी की। इसमें सभी से देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। बहादुर शाह ने राजपूताना व दिल्ली के आस-पास के देशी शासकों को भी विद्रोह में शामिल होने के लिए पत्र लिखे। विद्रोहियों ने सभी जगह बहादुर शाह को अपना नेता मान लिया। कानपुर में मराठा सरदार नाना साहिब स्वयं को बहादुरशाह का पेशवा घोषित करके उसका प्रशासन चलाने लगा।

प्रश्न 4.
मध्य भारत में विद्रोह के प्रसार के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मध्य भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपुर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मुख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों की वफादारी निभाते रहे। उदाहरण के लिए ग्वालियर के अधिकांश सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।

प्रश्न 5.
विद्रोही सिपाही मेरठ से दिल्ली क्यों पहुँचे?
उत्तर:
विद्रोही जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता था। यह बात सही है कि विद्रोह के दौरान छावनियों में सैनिकों ने अपने स्तर पर भी कुछ निर्णय लिए थे। फिर भी सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुंचे। वहाँ उन्होंने बहादुर शाह को अपना नेता बनाया।

प्रश्न 6.
कानपुर में नाना साहिब की अंग्रेज़ों से नाराजगी का क्या कारण था?
उत्तर:
कानपुर में नाना साहिब अपने अपमान से सख्त नाराज थे। क्योंकि उनसे ‘पेशवा’ की पदवी छीन ली गई थी, साथ ही 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन भी अंग्रेज़ों ने बंद कर दी थी।

प्रश्न 7.
शासक व ज़मींदार विद्रोह में भाग क्यों ले रहे थे?
उत्तर:
मुख्यतः अपदस्थ शासक और उजड़े हुए ज़मींदार विद्रोह में भाग ले रहे थे, क्योंकि शासक तो पुनः अपनी राजशाही स्थापित करना चाहते थे और ज़मींदार अपनी जमीनों के लिए लड़ रहे थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो प्रशासनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रशासनिक कारण निम्नलिखित थे

  1. लैप्स के सिद्धान्त के द्वारा झांसी, सतारा, नागपुर आदि रियासतों को अंग्रेजी राज में मिलाना तथा कुशासन का आरोप लगाकर अवध जैसे राज्य को हड़पना।
  2. देशी राजाओं पर सहायक सन्धि थोपना तथा नई भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू करना व जटिल कानून व्यवस्था बनाना।

प्रश्न 9.
अवध का विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? दो कारण बताओ।
उत्तर:

  1. अवध के नवाब को हटाए जाने पर लोगों में असन्तोष था।
  2. अंग्रेज़ों की भारतीय सेना में अवध के सैनिकों की संख्या अधिक थी। वे अवध की घटनाओं से दुःखी थे।
  3. अवध को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाए जाने के कारण वहाँ के दरबारी व कर्मचारी वर्ग बेरोज़गार हो गए। उनमें अंग्रेजों के विरुद्ध भारी रोष था।

प्रश्न 10.
सहायक सन्धि ने देशी राजाओं को किस प्रकार पंगु बना दिया? ।
उत्तर:
सहायक सन्धि की शर्तों के अनुसार देशी राजाओं को सैनिक शक्ति से वंचित कर दिया गया। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए देशी राजा को अंग्रेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता था। अंग्रेजों के परामर्श के बिना वह शासक किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध या सन्धि नहीं कर सकता था।

प्रश्न 11.
अवध में अंग्रेज़ों की रुचि बढ़ने के क्या कारण थे?
उत्तर:
अवध की उपजाऊ जमीन को अंग्रेज़ नील व कपास की खेती के लिए प्रयोग करना चाहते थे तथा अवध को उत्तरी भारत का एक बड़े बाजार के रूप में विकसित करना चाहते थे।

प्रश्न 12.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सैनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के दो सैनिक कारण निम्नलिखित हैं

  1. सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उसके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।
  2. सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भी भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों की पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सामाजिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए कानून बनाने की दिशा में पहलकदमी की। सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए गए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास करके विधवाओं के विवाह को कानूनी मान्यता दी गई।
निःसंदेह ये कदम प्रगतिशील तथा भारतीयों के हित में थे। परंतु रूढ़िवादी भारतीयों ने इन सुधारों को सामाजिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप समझा।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-1835 ई० में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत में लाग किया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव बढ़ रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। वह अन्य भारतीयों से स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगा। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं, हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

प्रश्न 14.
बहादुरशाह जफर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र मुगलों का अन्तिम शासक था। वह 1837 ई० में सिंहासन पर बैठा। 1857 ई० के विद्रोह के समय विद्रोहियों ने उसे सम्राट घोषित करके अपना नेता घोषित किया। विद्रोहियों का साथ देने के कारण उसे कैद करके रंगून भेज दिया गया। 1862 ई० में वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 15.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का चरित्र विदेशी था।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

प्रश्न 16.
कम्पनी की न्याय व्यवस्था भी असंतोष का कारण थी, कैसे?
उत्तर:
कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय-व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र अमीर वर्ग के हाथ में गरीब आदमी के शोषण का एक हथियार बन गया था।

प्रश्न 17.
मौलवी अहमदुल्ला शाह कौन था?
उत्तर:
फैज़ाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह ने 1857 ई० के विद्रोह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया। अनेक मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानते थे। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। 1857 ई० में उन्हें अंग्रेज़ विरोधी प्रचार के कारण जेल में बन्द कर दिया गया। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हैनरी लॉरेंस को पराजित किया।

प्रश्न 18.
अवध अधिग्रहण से ताल्लुकदारों के सम्मान व सत्ता को क्षति पहुँची, कैसे?
उत्तर:
अंग्रेजी राज से ताल्लुकदारों की सत्ता व सम्मान को भी जबरदस्त क्षति हुई। ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों में रहते थे। अपनी-अपनी जागीर में सत्ता व जमीन पर उनका पिछली कई सदियों से नियंत्रण था। ताल्लुकदार नवाब की संप्रभुत्ता (Sovereignty) को स्वीकार करते हुए पर्याप्त स्वायत्तता (Autonomy) रखते थे। इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

प्रश्न 19.
किसानों में असंतोष के क्या कारण थे?
उत्तर:
अंग्रेज़ी राज से संपूर्ण ग्रामीण समाज व्यवस्था भंग हो गई। अंग्रेज़ों की भू-राजस्व व्यवस्था में कोई लचीलापन नहीं था। न तो लगान तय करते वक्त और न ही वसूली में। मुसीबत के समय भी सरकार किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखती थी।

प्रश्न 20.
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका किस हद तक उत्तरदायी थी?
उत्तर:
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका निम्नलिखित कारणों से उत्तरदायी थी

  1. भारत में बढ़ते हुए ईसाई धर्म के प्रसार को खतरा माना जा रहा था।
  2. सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856) के अनुसार किसी भी भारतीय सैनिक को समुद्र पार भेजा जा सकता था। हिन्दू लोग इसे धर्म भ्रष्ट होना समझते थे।
  3. 1856 ई० में सैनिकों को नई एनफील्ड राइफल दी गई। इसमें डालने वाले कारतूसों की सील को मुँह से खोलना पड़ता था। सैनिकों ने इसमें चर्बी लगी समझा और इसे धर्म भ्रष्ट करने का षड्यन्त्र बताया।

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प्रश्न 21.
किसान व सैनिकों में क्या संबंध थे?
उत्तर:
किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गाँवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी अर्थात वह भी वर्दीधारी ‘किसान’ ही था। वह भी गाँव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था।

प्रश्न 22.
यूरोपीय अधिकारी सैनिकों के साथ कैसा व्यवहार करते थे?
उत्तर:
यूरोपीय अधिकारियों में नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ जाने से अफवाहों की भमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 23.
आजमगढ़ घोषणा में व्यापारियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
षड्यंत्रकारी ब्रिटिश सरकार ने नील, कपड़े, जहाज व्यवसाय जैसी सभी बेहतरीन एवं मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। व्यापारियों को दो कौड़ी के आदमी की शिकायत पर गिरफ्तार किया जा सकता है। बादशाही सरकार स्थापित होने पर इन सभी फरेबी तौर-तरीकों को समाप्त कर दिया जाएगा। जल व थल दोनों मार्गों से होने वाला सारा व्यापार भारतीय व्यापारियों के लिए खोल दिया जाएगा। इसलिए प्रत्येक व्यापारी का यह उत्तरदायित्व है कि वह इस संघर्ष में भाग ले।

प्रश्न 24.
आजमगढ़ घोषणा में सरकारी कर्मचारियों के बारे में क्या कहा गया?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत प्रशासनिक एवं सैनिक सेवाओं में भर्ती होने वाले भारतीय लोगों को सम्मान नहीं मिलता। उनका वेतन कम होता है और उनके पास कोई शक्ति नहीं होती। प्रशासनिक और सैनिक में प्रतिष्ठा और धन वाले सारे पद केवल गोरों को ही दिए जाते हैं। इसलिए ब्रिटिश सेवा में कार्यरत सभी भारतीयों को अपने धर्म और हितों की ओर ध्यान देना चाहिए तथा अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी को त्यागकर बादशाही सरकार का साथ देना चाहिए।

प्रश्न 25.
आजमगढ़ घोषणा में पंडितों, फकीरों एवं अन्य ज्ञानी व्यक्तियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
पंडित और फ़कीर क्रमशः हिंदू और मुस्लिम धर्मों के संरक्षक हैं। यूरोपीय इन दोनों धर्मों के शत्रु हैं। जैसाकि सब जानते हैं अब धर्म के कारण ही अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छिड़ा हुआ है, इसलिए फ़कीरों और पंडितों का कर्त्तव्य है कि “वो मेरे पास आएँ और इस पवित्र संघर्ष में अपना योगदान दें।”

प्रश्न 26.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
टॉमस जोन्स बार्कर के चित्र ‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ में कोलिन कैम्पबैल के पहुंचने पर खुशी झलक रही है। मध्य में कैम्पबैल के साथ अभिनन्दन की मुद्रा में औट्रम व हैवलॉक दिखाई दे रहे हैं। घटना-क्षण लखनऊ का है। उनके सामने थोड़ी दूरी पर शव और घायल पड़े हैं जो विद्रोहियों की पराजय और मार-काट के साक्षी हैं। नायकों के पास ही घोड़े काफी शांत मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि संकट समाप्त हो चुका है।

प्रश्न 27.
हेनरी हार्डिंग के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हेनरी हार्डिंग ने सेना के साजो-सामान के आधुनिकीकरण का प्रयास किया। उसने सेना में एनफील्ड राइफल का इस्तेमाल शुरू किया जिनमें चिकने कारतूस प्रयोग होते थे और सिपाही उनमें चर्बी लगी होने की अफवाह के कारण विद्रोही हो गए।

प्रश्न 28.
कुँवर सिंह कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कुँवर सिंह बिहार में जगदीशपुर की आरा रियासत का ज़मींदार था। वह लोगों में राजा के नाम से विख्यात था। कुँवर सिंह ने आजमगढ़ व बनारस में अंग्रेज़ी फौज को पराजित किया। उसने छापामार युद्ध पद्धति से अंग्रेज़ों से लोहा लिया। अप्रैल, 1858 में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 29.
नाना साहिब कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
नाना साहिब अन्तिम पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था। पेशवा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने नाना साहिब को पेशवा नहीं माना और न ही उसे पेंशन दी। 1857 ई० के विद्रोह में विद्रोहियों के आग्रह से वे विद्रोह में शामिल हो गए। कानपुर में उन्होंने सेनापति नील और हेवलॉक को पराजित करके किले पर पुनः अधिकार कर लिया, लेकिन कोलिन कैम्पबेल की सेना के आने बाद नाना साहिब को पुनः पराजित कर दिया गया। वे भागकर नेपाल चले गए। प्रशंसकों ने इसे भी उनकी बहादुरी बताया।

प्रश्न 30.
तात्या टोपे कौन था? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
तात्या टोपे नाना साहिब की सेना का एक बहादुर व विश्वसनीय सेनापति था। उसने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध गुरिल्ला नीति अपनाकर उनकी नाक में दम कर दिया। उसने अंग्रेज़ जनरल बिन्द्रहैम को परास्त किया। उसने रानी लक्ष्मीबाई का पूर्ण निष्ठा के साथ सहयोग दिया। 1858 ई० में अंग्रेजों ने तात्या टोपे को फाँसी दे दी।

प्रश्न 31.
रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी थी। राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया। 1857 ई० के विद्रोह में स्वयं रानी ने अंग्रेज़ी सेनाओं से टक्कर ली। नाना साहिब के विश्वसनीय सेनापति तात्या टोपे और अफगान सरदारों की मदद से उन्होंने ग्वालियर पर पुनः अधिकार कर लिया। कालपी के स्थान पर अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हई। उसकी वीरता हमेशा आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रही।

प्रश्न 32.
शाह मल कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने के जाट परिवार से सम्बन्ध रखते थे। बड़ौत में 84 गाँवों की ज़मींदारी थी। जमीन उपजाऊ थी। लेकिन ऊँची लगान दर के कारण जमीन महाजनों व व्यापारियों के हाथों में जा रही थी। शाहमल ने किसानों को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित किया। व्यापारियों व महाजनों के घर लूटे। बही-खाते जलाए, पुल व सड़कें तोड़ीं। शाह मल ने एक अंग्रेज़ अधिकारी के बंगले पर कब्जा करके उसे अपना कार्यालय बनाया और उसे न्याय भवन का नाम दिया। जहाँ वह लोगों के विवादों का निपटारा करने लगा। जुलाई, 1858 में शाह मल अंग्रेजों के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया।

प्रश्न 33.
विद्रोह को राजनीतिक वैधता कैसे मिली?
उत्तर:
बहादुशाह जफर ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया। इससे सिपाहियों के विद्रोह को राजनीतिक वैधता मिल गई। एक सुप्रसिद्ध इतिहासकार के शब्दों में इससे विद्रोह को ‘एक सकारात्मक राजनीतिक अर्थ” (A positive political meaning’) मिल गया।

प्रश्न 34.
1857 का विद्रोह किस अफवाह से शुरू हुआ?
उत्तर:
1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। उल्लेखनीय है कि यह कारतूस नई ‘एनफील्ड राइफल’ के लिए विशेषतौर पर तैयार किए गए थे।

प्रश्न 35.
‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम क्या था?
उत्तर:
1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के शासन काल में ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम’ पास किया गया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष पैदा हुआ।

प्रश्न 36.
‘लेक्स लोसी एक्ट’ (Lex Loci Act, 1850) क्या था?
उत्तर:
1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास किया। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

प्रश्न 37.
महालवाड़ी भूमि कर प्रणाली विद्रोह के लिए क्यों उत्तरदायी थी?
उत्तर:
भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर की बढ़ौतरी व उसे न अदा कर पाने पर सारा गांव-ज़मींदार व किसान प्रभावित होते थे और सभी पर सरकारी जुल्म बरपता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

प्रश्न 38.
लैप्स की नीति क्या थी?
उत्तर:
जिन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा इत्यादि राज्यों में यह नीति विद्रोह को हवा देने में एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

प्रश्न 39.
‘यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।’ यह शब्द किसने क्यों कहे थे?
उत्तर:
1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” (“A cherry that will drop into our mouth one day”) डलहौज़ी उग्र साम्राज्यवादी नीति का पोषक था। उसने नैतिकता को दाव पर रखते हुए, देशी नरेशों के अस्तित्व को मिटाने तथा उनके राज क्षेत्रों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का निर्णय कर लिया था।

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प्रश्न 40.
एकमुश्त बन्दोबस्त का ताल्लुकदारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1856 ई० में अधिग्रहण के बाद एकमुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement of 1856) नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जो इस मान्यता पर आधारित थी कि ताल्लुकदार जमीन के वास्तविक मालिक नहीं हैं। वे भू-राजस्व एकत्रित करने वाले बिचौलिये ही रहे हैं, जो किसानों से कर वसूल करके नवाब को देते थे। उन्होंने ज़मीन पर कब्जा धोखाधड़ी व शक्ति के बल पर किया हुआ है। इस मान्यता के आधार पर ज़मीनों की जाँच की गई और ताल्लुकदारों की ज़मीनें उनसे लेकर किसानों को दी जाने लगीं और उन्हें मालिक घोषित किया गया।

प्रश्न 41.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में कैसी भावनाओं को चित्रांकित किया गया है?
उत्तर:
1859 में जोसेफ नोएल पेटन (Joseph Noel Paton) का चित्र ‘इन मेमोरियम’ यानी ‘स्मृति में प्रकाशित हआ। इसमें अंग्रेज़ औरतें और बच्चे लाचार और मासूम स्थिति में परस्पर लिपटे हुए हैं। चित्र में भीषण हिंसा नहीं है फिर भी उस तरफ एक विशेष खामोशी संकेत कर रही है जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है, जिसमें मृत्यु और बेइज्जती कुछ भी हो सकता है। दर्शक के मन में बेचैनी और क्रोध की भावना चित्र को निहारने से सहज रूप में उभरती है।

प्रश्न 42.
‘जस्टिस’ नामक चित्र के नीचे पंक्ति में क्या लिखा गया है?
उत्तर:
12 सितंबर, 1857 को पन्च नामक एक पत्रिका में ‘जस्टिस’ नामक प्रकाशित हुए एक चित्र में एक ब्रिटिश स्त्री को हाथ में तलवार और ढाल लिए आक्रामक मुद्रा में दिखाया गया है। प्रतिशोध से तड़पती हुई वह विद्रोहियों को कुचल रही हैं। भारतीय स्त्री-बच्चे डर से दुबके हुए हैं।
चित्र के नीचे एक पंक्ति में लिखा गया है कि “कानपुर में हुए भीषण जन-संहार के समाचार ने समूचे ब्रिटेन में बदले की गहरी इच्छा और भयानक अपमान के भाव को उत्पन्न कर दिया है।”

प्रश्न 43.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग” कॉर्टून में किस चीज को दिखाया गया है?
उत्तर:
24 अक्तूबर, 1857 को पन्च नामक पत्रिका में प्रकाशित एक कॉर्टून (‘The Clemency of Canning’) में कैंनिग को एक सैनिक को क्षमा करते हुए दिखाया गया है। इसमें एक साथ कई भाव प्रकट होते हैं। भारतीय सिपाही को बौना और फटी पैंट में अपमानजनक स्थिति में दिखाया गया है। वहीं अभी भी उसकी तलवार से खून टपक रहा है यानी उसमें बर्बरता कायम है। फिर भी केनिंग एक दयावान बुजुर्ग (उपहास पात्र) के रूप में उसके सिर पर हाथ रखकर उसे क्षमा कर रहा है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के विद्रोह की शुरूआत व प्रसार में अफवाहों व भविष्यवाणियों पर प्रकाश डालिए? लोग इन पर क्यों विश्वास कर रहे थे?
उत्तर:
‘चर्बी वाले कारतूस’ तथा कुछ अन्य अफवाहों व भविष्यवाणियों से विद्रोह की शुरूआत व प्रसार हुआ। लेकिन अ तभी फैलती हैं जब उन अफवाहों में लोगों के मन में गहरे बैठे भय और संदेह की आवाज़ सुनाई देती है। अतः भय और संदेह पैदा करने वाली परिस्थितियों में ही किसी ऐसी घटना के दूसरे कारण छिपे होते हैं।
अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-1857 का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। लेकिन अन्य कई और अफवाहों का भी इसमें योगदान था :

1. ‘चर्बी वाले कारतूस’ (Greased Cartridges)-1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफ़वाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड़यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराजगी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

2. अन्य अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-अन्य अफ़वाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट । इसे लोग अंग्रेज़ों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। बल्कि रेल व तार जैसी व्यवस्था के बारे में यही भ्रांति एवं अफवाह थी कि यह भी ईसाई बनाने का एक षड्यंत्र ही है। इसी बीच ‘फूल और चपाती’ बाँटने की रिपोर्ट आ रही थीं और साथ ही यह भविष्यवाणी भी जोर पकड़ रही थी कि अंग्रेजी राज भारत में अपनी स्थापना के सौ वर्ष बाद समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 2.
सहायक संधि प्रणाली की विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
लॉर्ड वेलेजली ने 1798 ई० में भारत में सहायक संधि प्रणाली को अपनाया। इसकी प्रमुख शर्ते इस प्रकार थीं

  • देशी शासक को अपने दरबार में एक अंग्रेज़ रेजीडेंट रखना होता था और इसके परामर्शनुसार ही शासन का संचालन करना था।
  • देशी शासक को अपने राज्य में एक अंग्रेज़ी सहायक सेना को रखना होता था और इस सहायक सेना का व्यय देशी शासक को ही करना था।
  • देशी शासक अंग्रेजों के परामर्श के बिना किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध अथवा संधि नहीं कर सकता था।
  • देशी शासक अंग्रेज़ों के अतिरिक्त किसी अन्य यूरोपीय जाति के व्यक्ति को राज्य में नौकरी पर नहीं रख सकता था।
  • देशी शासक को राज्य में सहायक सेना रखने के बदले में एक निश्चित धनराशि कंपनी को देनी होती थी। धनराशि न देने की स्थिति में देशी शासक को अपने राज्य का कुछ भू-भाग अंग्रेजों को देना होता था।

प्रश्न 3.
अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई न्याय व्यवस्था विद्रोह के लिए कैसे उत्तरदायी थी?
उत्तर:
ब्रिटिश कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र गरीब आदमी के शोषण का अमीर वर्ग के हाथ में एक हथियार बन गया अभियोग वर्षों तक चलता रहता था। कोर्ट फीस और वकीलों के खर्चे किसी आम आदमी के बस की बात नहीं थी। इसके अलावा न्यायालयों में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। अमीर व चालाक आदमी झूठे गवाह बनाकर भी अभियोग का निर्णय अपने पक्ष में करवाने में सफल हो जाते थे।

उल्लेखनीय है कि विद्रोह से पहले के वर्षों में अंग्रेजों द्वारा स्थापित नई भूमिकर व्यवस्था तथा भूमि के स्वामित्व को लेकर ग्रामीण वर्गों में कई तरह के अंतर्विरोध उभर आए थे। इसके लिए उन्हें अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे थे। लेकिन गरीब किसान को न्याय नहीं मिल रहा था। उसकी जमीन महाजनों के हाथों में जा रही थी। अवध में तो किसान, ज़मींदार एवं ताल्लुकदार सभी भूमि के स्वामित्व को लेकर परेशान थे। धड़ाधड़ एक-दूसरे के विरुद्ध मुकद्दमें दायर कर रहे थे। इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए सादिक-उल-अखबार नामक एक समाचार-पत्र ने लिखा, “वे अपना धन व्यर्थ गंवा रहे हैं और सरकार के खजाने को भर रहे हैं।” वास्तव में, इन परिस्थितियों में यह न्याय-व्यवस्था भी विद्रोह के कारणों में से एक थी।

प्रश्न 4.
विद्रोह की असफलता के कोई पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
विद्रोह की असफलता के कारण निम्नलिखित थे
1. केनिंग की कूटनीति और साम्राज्य बनाए रखने का दृढ़ संकल्प-अंग्रेज़ अधिकारियों की रणनीति और उनके दृढ़ संकल्प की विद्रोह के दमन में विशेष भूमिका रही।

2. संगठन व योजना का अभाव-विद्रोहियों के पास संगठन और योजना का अभाव था। 31 मई की योजना के भी पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। यदि थी भी तो कार्यान्वित नहीं हो पाई।

3. अस्त्र-शस्त्रों की कमी-उनके पास केवल वो ही गोला-बारूद व बंदूकें थीं जो उन्होंने ब्रिटिश शस्त्रागारों से लूटे थे। नए हथियारों की आपूर्ति ज्यादा संभव नहीं थी।

4. यातायात व संचार-साधनों पर अंग्रेजों का नियंत्रण-विशेषतः रेल व तार व्यवस्था पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण था।जिनके बारे में एक अंग्रेज़ लेखक ने लिखा था-रेल व तार व्यवस्था ने 1857 ई० की क्रांति में हमारे लिए हजारों मनुष्यों का काम किया।

5. सभी सैनिकों का विद्रोह में शामिल होना-अंग्रेज़ फौज में लगभग आधे भारतीय सिपाही तो विद्रोही हो गए थे, लेकिन शेष सिपाहियों ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेज़ों का पूरा-पूरा साथ दिया।

6. अंग्रेज़ों को देशी शासकों का सहयोग–अधिकांश देशी नरेशों (हैदराबाद, ग्वालियर, पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, बड़ौदा तथा राजपूताना के अधिकार शासक इत्यादि) विद्रोह के दमन कार्य में अंग्रेज़ों की सहायता की।

7. सीमित जन-समर्थन-उत्तर:भारत के काफी क्षेत्रों में सैनिक विद्रोहियों को व्यापक जन-समर्थन मिला। फिर भी पंजाब, पूर्वी बंगाल, राजस्थान व गुजरात इत्यादि क्षेत्रों में विद्रोह न के बराबर था। दक्षिणी भारत इससे लगभग अछूता रहा। शिक्षित मध्य वर्ग की सहानुभूति भी अंग्रेज़ों के साथ थी।

प्रश्न 5.
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं

1. भारत का आर्थिक शोषण भारत में अंग्रेज़ों की व्यवस्था शोषणकारी थी। अपनी राजनीतिक सत्ता का दुरुपयोग करते हुए अंग्रेजों ने कृषकों से अधिकाधिक लगान वसूल किया। कारीगरों को कोड़ियों के भाव अपना माल बेचने के लिए विवश किया। इस प्रकार भारतीय कारीगरों व किसानों की दुनिया देखते-ही-देखते उजड़ गई। बेरोजगारी, बदहाली और भुखमरी छा गई। इसी ने किसान, कारीगर और जन-सामान्य को विद्रोही बना दिया था।

2. महालवाड़ी भूमि-कर व्यवस्था-भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था को इरफान हबीब ने इस विद्रोह के लिए मुख्य तौर पर दोषी बताया है। इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर न अदा कर पाने पर सारा गांव प्रभावित होता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

3. भूमि-कर की सख्ती से उगाही-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अधिक-से-अधिक भूमि-कर वसूलना चाहती थी। अकाल और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय भी भारतीय किसान को अंग्रेजी हुकूमत कोई रियायत नहीं देती थी। सख्ती से डंडे के बल पर पैसा वसूला जाता था। भारतीय किसान भुखमरी की स्थिति में था। कर अदा करने के लिए वह कर्ज-पर-कर्ज लेता था। वास्तव में यही वह जुल्म था जिससे किसान विद्रोही हो गए थे।

4. बेरोजगारी और भुखमरी कंपनी शासन की शोषणकारी नीतियों से जन-सामान्य निरंतर गरीब होता रहा। कई स्थानों पर भुखमरी की स्थिति थी। सर सैयद अहमद खाँ लिखते हैं, “कुछ लोग इतने गरीब थे कि वे एक-एक आने अथवा एक-एक सेर आटे के लिए प्रसन्नतापूर्वक विद्रोहियों के साथ मिल गए।”

प्रश्न 6.
1857 के जनविद्रोह के पूर्व के कुछ वर्षों में अंग्रेज़ अधिकारियों और भारतीय सिपाहियों के बीच सम्बन्ध किस प्रकार बदल गए?
उत्तर:
1857 के जनविद्रोह से पहले, लगभग 15 वर्षों में अधिकारियों और सैनिकों (सिपाहियों) के बीच परस्पर सम्बन्धों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उभरे। यह परिवर्तन भी सेना में आक्रोश का एक बड़ा कारण था। 1820 तक के दशक में गोरे अधिकारियों व भारतीय सिपाहियों के बीच संबंधों में काफी मित्रतापूर्ण भाव था। अधिकारी सिपाहियों के साथ तलवारबाज़ी, मल्ल-युद्ध इत्यादि खेलों में भाग लेते थे। इकट्ठे शिकार पर जाते थे। वे भारतीय रीति-रिवाज व संस्कृति में भी रुचि लेते थे और भारतीय भाषाओं से परिचय रखते थे। उनमें अभिभावक का स्नेह और अधिकारी का रौब दोनों था। परंतु 1840 के बाद आए नए अधिकारियों में ये सब बातें नहीं थीं। उनमें नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ़ जाने से अफवाहों की भूमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए किस प्रकार के कानूनों का सहारा लिया गया?
उत्तर:
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए प्रत्येक ‘गोरे व्यक्ति’ को सर्वोच्च न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए। इसके लिए कई कानून पारित किए गए। मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए। एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया। इसके अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी। अतः यह स्पष्ट कर दिया था कि विद्रोह की केवल एक ही सजा है सजा-ए-मौत।

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम बताएँ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम भारतीयों तथा अंग्रेज़ों दोनों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थे। अंग्रेज़ इसके बाद सजग हो गए। जबकि भारतीयों में यह राष्ट्रवाद के लिए एक प्रेरक तत्त्व बन गया। इस विद्रोह के संक्षेप में निम्नलिखित परिणाम निकले

1. प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन-1858 में ब्रिटिश संसद में एक एक्ट पारित करके भारत में कंपनी शासन को समाप्त कर दिया। भारत पर नियंत्रण के लिए लंदन में गृह-विभाग (भारत सचिव तथा उसकी 15 सदस्यीय परिषद्) बनाया गया। भारत में गवर्नर-जनरल (मुख्य प्रशासक) को भारतीय रियासतों के लिए वायसराय (प्रतिनिधि) कहा जाने लगा।

2. उच्च वर्गों के प्रति नई नीति-भारतीय नरेशों को अंग्रेजों ने पर्णतः अधीन रखते हए जनता के आंदोलनों के विरोध में ही नीति जागीरदारों और जमींदारों के साथ अपनाई गई। अतः 1858 के बाद यह भारतीय उच्च वर्ग ब्रिटिश सत्ता का आधार स्तंभ हो गया।

3. फूट डालो और राज करो की नीति-जन संघर्षों के विरुद्ध यह नीति ब्रिटिश प्रशासकों की एक मुख्य शस्त्र बन गई, सैनिकों में भी यही नीति अपनाई गई। हिंदू-मुसलमानों में फूट डलवाने का प्रयास विद्रोह के दौरान और भविष्य में जारी रहा। यह नीति भारत के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हुई।

4. समाज-सुधारों के परित्याग की नीति-विद्रोह से पूर्व के कुछ दशकों में ‘समाज-सुधार’ की नीति (उदाहरण के लिए उन्होंने सती-प्रथा, कन्या-वध, बाल-विवाह आदि को अवैध घोषित किया, विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दी) को इसके बाद पूर्णतः त्याग दिया गया।

5. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरणा-1857 का विद्रोह आजादी के दीवानों के लिए एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत बना।

प्रश्न 9.
“अफवाहें तभी फैलती हैं जब उनसे लोगों में भय और संदेह की अनुगूंज सुनाई दे।” स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के शुरू होने तथा उसके घटनाक्रम को निर्धारित करने में अफवाहों की बहुत बड़ी भूमिका थी। उदाहरण के लिए चर्बी लगे कारतूसों की बात या आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट पर सैनिकों सहित लोगों ने मन से विश्वास किया। इन अफवाहों के बारे में अधिकारियों ने अपने स्पष्टीकरण दिए और समझाने-बुझाने का प्रयास भी किया। लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया। इसका कारण था अफवाहों के पीछे का सच, जिसमें लोगों के मन में गहरे बैठे डर और संदेह की गूंज सुनाई देती है। ब्रिटिश नीतियों ने लोगों के मन में गहरे डर को जन्म दिया। उदाहरण के लिए कुछ नीतियों को देखें- .

(1) भारतीय हिन्दू सैनिकों को दूसरे देशों (अफगानिस्तान, मिस्र, तिब्बत, बर्मा आदि) में लड़ने के लिए भेजा जाता था। ये सैनिक मुख्यतः उच्च जातियों से थे और बाहर जाने में अपने धर्म की क्षति समझते थे। जब उन्होंने विरोध किया तो कानून बनाकर उन्हें मजबूर किया गया। इससे यह विश्वास हआ कि सरकार उनके धर्म को नष्ट करना चाहती है।

(2) सामाजिक सुधार कानूनों और पाश्चात्य शिक्षा प्रसार से भी यही प्रकट हो रहा था कि अंग्रेज़ ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं।

(3) ईसाई मिशनरियों को स्कूलों, छावनियों एवं जेलों सभी जगह अपने धर्म प्रचार की खुली छूट दी गई थी। वास्तव में यहीं अंग्रेजों की नीतियाँ व गतिविधियाँ थीं जो अफवाहों के माध्यम से गूंज रही थीं।

प्रश्न 10.
विद्रोहियों के प्रति अंग्रेज़ों ने दहशत का प्रदर्शन किस प्रकार किया?
उत्तर:
विद्रोह को सख्ती से कुचल दिया गया था, लेकिन इसके उपरान्त ‘दहशत के प्रदर्शन’ की नीति अपनाई गई। इसका उद्देश्य था कि भारतीय भविष्य में विद्रोह को स्मरण करते ही काँप उठे और वे पुनः विद्रोह करने की कभी न सोच सकें। इसलिए यह प्रदर्शन दो स्तरों पर किया गया

1. ब्रिटेन में प्रदर्शन-ब्रिटिश समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी अत्यधिक लोमहर्षक शब्दों में विद्रोह से संबंधित विवरण व कहानियाँ प्रकाशित की गईं। विशेषतः विद्रोहियों की हिंसात्मक कार्रवाइयों को भड़काऊ एवं ‘बर्बर’ रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनको पढ़कर ब्रिटेन के आम लोगों में प्रतिशोध व ‘सबक सिखाने की मांग’ उठी। फलतः विद्रोहियों को कुचलने वाले, घरों व गांवों को जलाने वाले उन लोगों की दृष्टि में नायक बनकर उभरे। इंग्लैण्ड में कितने ही चित्र, रेखाचित्र, पोस्टर, कार्टून आदि बने और प्रकाशित हुए जिनसे प्रतिशोध की भावना को प्रोत्साहन मिला।

2. भारत में प्रदर्शन-इंग्लैण्ड में तो प्रतिशोध (बदला) के लिए मांग उठ रही थी तो भारत में दिल दहला देने वाली मार-काट और पाश्विक अत्याचार किए गए। प्रतिशोध के लिए सार्वजनिक दंड की नीति अपनाई गई। गांव के बाहर पेड़ों पर सरे आम फांसी दी गई। विद्रोही सिपाहियों को तोप के गोलों से उड़ाया गया। इसका उद्देश्य सैनिकों और आम लोगों को सबक सिखाना था।

प्रश्न 11.
दिल्ली पर अंग्रेज़ों के पुनः नियन्त्रण को संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
लॉर्ड केनिंग ने शुरू से ही दिल्ली पर पुनः अधिकार करने की रणनीति अपनाई। क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली को विद्रोहियों से छीन लेने से उनकी कमर टूट जाएगी। इसके लिए 8 जून को अंबाला की ओर से आगे बढ़कर अंग्रेज़ी सेना ने दिल्ली को घेर लिया और अंतिम आक्रमण के लिए पंजाब से आने वाली एक दूसरी सैनिक टुकड़ी का इंतजार करने लगी। विद्रोही सिपाहियों ने मिर्जा मुगल तथा बख्त खाँ के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना पर कई धावे बोले, परंतु कोई जोरदार बड़ा आक्रमण नहीं कर पाए, क्योंकि सिपाहियों में अनुशासन व समन्वय का अभाव था। खजाना खाली था।

सिपाहियों को वेतन देने के लिए भी धन नहीं था। दिल्ली में विद्रोहियों में सर्वाधिक प्रभावशाली सैनिक नेता बख्त खाँ था। नजफगढ़ में उसकी सेना अंग्रेजों से हार गई जो विद्रोहियों के लिए गहरा आघात था। इसी बीच सितंबर के आरंभ तक जॉन निकलसन के नेतृत्व में पंजाब से एक बड़ी सैनिक टुकड़ी पहुँचने से अंग्रेज़ी सेना की शक्ति में और भी वृद्धि हो गई। अंत में पाँच दिन के घमासान संघर्ष के बाद 20 सितंबर, 1857 ई० को अंग्रेज़ी सेना ने विजयी होकर दिल्ली में प्रवेश किया, परंतु निकलसन इस लड़ाई में मारा गया। दिल्ली पर पुनः अधिकार करते ही अंग्रेज़ी सेना ने दिल्लीवासियों पर असीम अत्याचार किए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 12.
कला व साहित्य ने 1857 के घटनाक्रम को जीवित रखने में योगदान दिया। झांसी की रानी के उदाहरण से स्पष्ट करें।
उत्तर:
साहित्य तथा चित्रों में विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया है जिन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध हथियार उठाये। उन्हें महान देशभक्त माना गया। देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में वे हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। अनेक चित्रों व साहित्य में रानी लक्ष्मीबाई की छवि को एक मर्दाना योद्धा के रूप में स्थापित किया गया है। उसे सैनिक वेशभूषा में घोड़े पर सवार, एक हाथ में तलवार व एक हाथ में लगाम थामे युद्ध के मैदान में जाते हुए दिखाया गया है। इससे रानी लक्ष्मीबाई की छवि एक वीरांगना के रूप में उभरकर सामने आई। सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ और अधिक जोश भर देती हैं, “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह ने भारतीय राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव डालें। समीक्षा कीजिए।
अथवा
1857 ई० के विद्रोह की विरासत की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई० का विद्रोह असफल रहा लेकिन भारतीय राजनीति पर इसके दीर्घकालीन प्रभाव पड़े। वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लिए भारतीय जनता का यह पहला शक्तिशाली विद्रोह था जिसमें हिन्दुओं व मुसलमानों ने सारे भेद भुलाकर समान रूप से भाग लिया। भारतीय जनता के मन पर इसने अमिट छाप छोड़ी। आधुनिक राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास का आधार तैयार करने में इस विद्रोह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में 1857 के नायक हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। वीरों की गाथाएं घर-घर गाई जाने लगीं। उनके नाम जन-शक्ति का प्रतीक बनें और आज भी उन्हें स्मरण किया जाता है। पूरे देश में इस विद्रोह के 150 वर्ष पूरे होने पर स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक के कार्यक्रम आयोजित किए गए।

प्रश्न 14.
1857 ई० के विद्रोह के दौरान हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच एकता के महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। दोनों समुदायों की एकता सैनिकों, जनता और नेताओं सभी में देखी गई। बहादुरशाह जफ़र को सभी हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना नेता माना। हिंदुओं की भावनाओं को ठेस न पहुँचे इसलिए कई स्थानों पर गो हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया गया। स्वयं बादशाह बहादशाह जफ़र की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद व महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस एकता को तोड़ने के भरसक प्रयास किए। उदाहरण के लिए बरेली में विद्रोह के नेता खान बहादुर के विरुद्ध हिन्दू प्रजा को भड़काने के लिए वहाँ के अधिकारी जैम्स औट्रम द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया।

प्रश्न 15.
मौलवी अहमदुल्ला शाह पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मौलवी अहमदुल्ला शाह नेताओं में ऐसा ही एक नाम है जिन्हें लोग पैगंबर मानने लगे थे। सन् 1856 में उन्हें अंग्रेज विरोधी प्रचार करते हुए गांव-गांव जाते देखा गया था। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके हजारों समर्थक चलते थे। 1857 में उन्हें फैजाबाद की जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। वे बहादुर व ताकतवर थे। साथ ही उनकी ‘पैगंबर’ होने की छवि ने उन्हें लोगों का विश्वास जीतने में सहायता की। बहुत सारे लोगों का विश्वास था कि उन्हें कोई हरा नहीं सकता। उनके पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हेनरी लारेंस को पराजित किया। मौलवी अहमदुल्ला का वास्तविक नाम सैयद अहमदखान (जियाऊद्दीन) था। वह सूफी संत सैयद फरकान अली का शिष्य था। इसी संत ने उसे अहमदुल्ला शाह का नाम दिया था। उसके विचार जेहादी बनते गए और वह अंग्रेज़ विरोधी प्रचारक बन गया।

प्रश्न 16.
विद्रोहियों के नेता के रूप में राव तुलाराम के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
राव तुलाराम ने रेवाड़ी क्षेत्र में विद्रोहियों को उल्लेखनीय नेतृत्व प्रदान किया। यह इसी क्षेत्र की एक छोटी रियासत के मालिक थे। इनका जन्म 1825 ई० में रामपुरा (रवाड़ी) के स्थान पर हुआ। 1839 ई० में पिता की मृत्यु के बाद इन्होंने रियासत को सँभाला। वह इस बात से नाराज थे कि अंग्रेजों ने अपनी नीति से इस रियासत को एक इस्तमरारी जागीर में बदल दिया अर्थात् ऐसी रियासत जिसमें सत्ता के अधिकार सीमित कर दिए गए हों, केवल भू-राजस्व एकत्र करने का अधिकार छोड़ा गया हो। राव तुलाराम ने 16 नवम्बर, 1857 को नारनौल के स्थान पर अंग्रेज़ों से जमकर लड़ाई की। इसमें हारने के बाद वे राजस्थान के कई राजाओं से सहायता माँगने के लिए गए। फिर सहायता के लिए ईरान व अफगानिस्तान गए। उन्होंने रूस के जार से भी सम्पर्क स्थापित किया। 23 सितंबर, 1863 में काबुल में 38 वर्ष की उम्र में इनका देहान्त हो गया।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के प्रमुख राजनीतिक कारणों पर संक्षेप में प्रकाश डालें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी प्रमुख राजनीतिक कारण इस प्रकार थे

1. विस्तार की नीति-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए भारतीय राज्यों को पराजित करके उन्हें सहायक संधि स्वीकार करने के लिए विवश किया। सहायक संधि भारतीय नरेशों को गुलाम बनाने का एक तरीका था। इसे स्वीकार करने वाले देशी राज्य की सैन्य-शक्ति को समाप्त कर दिया जाता था। फिर धीरे-धीरे उसका राज्य-क्षेत्र कंपनी के राज्य में मिलाया जाने लगता था। लेकिन 19वीं शताब्दी के मध्य पहुँचते-पहुँचते इन ‘अधीन’ भारतीय नरेशों को यह भय लगने लगा कि अंग्रेज़ धीरे-धीरे उनके राज्यों का अस्तित्व ही मिटा देंगे। क्योंकि अंग्रेज़ उग्र विस्तार की नीति अपना चुके थे।

2. राज्य हड़पने की नीति-लॉर्ड डलहौजी ने सात भारतीय राज्यों का विलय राज्य हड़पने की नीति के अंतर्गत कर लिया था अर्थात् इन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा में यह नीति विद्रोह का एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

3. पेंशन व उपाधियों की समाप्ति-कर्नाटक व तंजौर के शासक तथा पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए हुए पुत्र नाना साहिब (धोंधू पंत) की पेंशन व उपाधि दोनों छीन लिए थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु (1852 ई०) के पश्चात् नाना साहिब को न तो ‘पेशवा’ स्वीकार किया गया और न ही उसे 8 लाख रुपए वार्षिक पेंशन प्रदान की गई। नाना साहिब इस असहनीय अपमान से सख्त नाराज़ हुए। इसी नाराज़गी के कारण उन्होंने विद्रोह में भाग लिया तथा सिपाहियों व जन-विद्रोहियों का अदम्य साहस के साथ नेतृत्व किया।

4. बहादुर शाह जफर के प्रति अनादर भाव-मुगल साम्राज्य का सूर्यास्त तो बहुत पहले ही हो चुका था। उसके पास न तो सैन्य शक्ति थी और न ही राज्य। फिर भी भारत के लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति व आदर-सम्मान दोनों ही था। कंपनी के प्रशासक तब तक मुगल सम्राट के प्रति सम्मान करने का दिखावा करते रहे, जब तक उन्होंने भारत में अपनी स्थिति को मजबूत न कर लिया। लॉर्ड डलहौजी ने मुगल बादशाह बहादुर शाह की उपाधि को समाप्त करके उसे राजमहल व किले से वंचित करने का सुझाव दिया था। लॉर्ड केनिंग ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात् मुगल बादशाह का पद समाप्त कर दिया जाएगा। इसके उत्तराधिकारी को महल व किले में रहने का अधिकार नहीं होगा। सम्राट् के प्रति यह दुर्व्यवहार बहुत-से लोगों के असंतोष का कारण बना।

5. विदेशी सत्ता कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

ब्रिटिश सत्ता का भारत में लक्ष्य जन-कल्याण कभी नहीं रहा। इसका लक्ष्य इंग्लैंड के आर्थिक हितों को लाभ पहुंचाने में निहित था। स्पष्ट है कि इन राजनीतिक कारणों का भी जन-विद्रोह के विस्तार में योगदान रहा है।

प्रश्न 2.
विद्रोहियों के दृष्टिकोण पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखें।
अथवा
विद्रोही क्या चाहते थे? स्पष्ट करें।
उत्तर:
पर्याप्त स्रोतों के अभाव में विद्रोहियों के दृष्टिकोण को समझना इतना सरल नहीं है। वैसे तो इस विद्रोह से संबंधित दस्तावेजों की कमी नहीं है। परन्तु यह सब सरकारी रिकॉर्डस हैं। इनसे अंग्रेज़ अधिकारियों की सोच का तो पता चलता है लेकिन विद्रोहियों का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं होता।

अंग्रेज़ इसमें विजेता थे और विजेताओं का अपना ही दृष्टिकोण होता है। हारने वालों का दृष्टिकोण तो वैसे भी उनके द्वारा दबा दिया जाता है। 19वीं सदी के मध्य में हुए इस विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश लोग अनपढ़ थे। जो कोई पढ़े-लिखे भी थे, उन्हें भी, जिस तरीके से विद्रोह को कुचला गया उसके चलते, कोई ब्यान दर्ज करवाने का अवसर नहीं मिला। फिर भी विद्रोहियों . द्वारा जारी की गई कुछ घोषणाएँ व इश्तहार मिलते हैं, जिनसे हमें विद्रोहियों के दृष्टिकोण की कुछ झलक मिलती है।

1. एकता की सोच-विद्रोही भारत के सभी सामाजिक समुदायों में एकता (Unity) चाहते थे। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज़ के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया। अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का उल्लेख किया गया। बादशाह बहादुरशाह जफर की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई। बरेली में विद्रोह के नेता खानबहादुर के विरुद्ध हिंदू प्रजा को भड़काने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स औट्रम (James Outram) द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया था। अंततः हारकर उसे 50,000 रुपये वापस ख़जाने में जमा करवाने पड़े जो इस उद्देश्य के लिए निकाले गए थे। इसी प्रकार दिल्ली में बकरीद के अवसर पर भी सांप्रदायिक तनाव पैदा करवाने की असफल कोशिश की गई थी।

2. विदेशी सत्ता को समाप्त करने की कोशिश-विद्रोहियों की घोषणाओं में ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक होने का आह्वान किया गया। ब्रिटिश राज को एक विदेशी शासन के रूप में शोषणकारी माना गया। इससे संबंधित प्रत्येक चीज़ को पूर्ण तौर पर खारिज किया जा रहा था। अंग्रेजी सत्ता को निरंकुश के साथ-साथ षड़यं के लिए अंग्रेजी राज में कंपनी व्यापार तबाही का मुख्य कारण था। जबकि छोटे-बड़े भूस्वामियों के लिए अंग्रेज़ों द्वारा लागू भू-राजस्व व्यवस्था बर्बादी का कारण थी। अतः व्यापार की नई व्यवस्था तथा भू-राजस्व व्यवस्था को निशाना बनाया गया। अंग्रेज़ी व्यवस्था के कारण जो जीवन-शैली प्रभावित हुई उसे भी उन्होंने इंगित किया। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करना चाहते थे।

धर्म, सम्मान व रोजगार के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। इस लड़ाई को एक ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ घोषित किया गया। विद्रोहियों की घोषणाओं में सर्वाधिक डर इसी बात को लेकर अभिव्यक्त हुआ कि अंग्रेज़ हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। वे हमारी जाति व धर्म को भ्रष्ट करके अंततः हमें ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस डर और संदेह के कारण अफवाहें जोर पकड़ने लगीं। लोग इनमें विश्वास करने लगे।

3. अन्य उत्पीड़कों के विरुद्ध विद्रोह के दौरान विद्रोहियों के व्यवहार से कुछ एक ऐसा भी लगता है कि वे अंग्रेजी राज़ के साथ-साथ अन्य उत्पीड़कों के भी विरुद्ध थे। वे उन्हें भी नष्ट करना चाहते थे। उदाहरण के लिए उन्होंने सूदखोरों के बही-खाते जला दिये और उनके घरों में तोड़-फोड़ व आगजनी की। शहरी संभ्रांत लोगों को जानबूझ कर अपमानित भी किया। वे उन्हें अंग्रेजों के वफादार और उत्पीड़क मानते थे।

4. विकल्प की तलाश-निःसंदेह अंग्रेजी राज व्यवस्था को विद्रोही उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसे उखाड़ने के बाद उनके पास भविष्य की नई राजनीतिक व्यवस्था की योजना नहीं थी। इसलिए वे पुरानी व्यवस्था को ही विकल्प के रूप में देख रहे थे। वे देशी राजा-रजवाड़ा शाही ही पुनः स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे। वे 18वीं सदी की पूर्व ब्रिटिश दुनिया को ही दोबारा स्थापित देखना चाहते थे। इसलिए पुराने ढर्रे पर दरबार और दरबारी नियुक्तियाँ की गईं। आदेश जारी किए गए। भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन भुगतान का प्रबंध किया गया। अंग्रेज़ों से लड़ने की योजना बनाने तथा सेना की कमान श्रृंखला निश्चित करने में भी प्रेरणा स्रोत 18वीं सदी का मुगल जगत ही था।

प्रश्न 3.
सन् 1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी धार्मिक कारणों का संक्षिप्त में वर्णन करें।
उत्तर:
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक कारणों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। कई तरह की अफवाहें इस विद्रोह के शुरू होने और इसके फैलने से जुड़ी हुई थीं। इन अफवाहों के विश्वास के पीछे भी धार्मिक भावनाएं थीं। सैनिक और सामान्य लोग सभी इनसे आहत थे। 19वीं सदी के दूसरे दशक से कम्पनी सरकार ने भारतीय समाज को ‘सुधारने के लिए कई कानून बनाए और साथ ही ईसाई प्रचारकों को ईसाई धर्म प्रचार की छूट दी। इनसे विद्रोह की भावनाएं उत्पन्न हुईं। संक्षेप में हम इस संदर्भ में धार्मिक विश्वासों की भूमिका को इस प्रकार रेखांकित कर सकते हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास किया। इन कानूनों का रूढ़िवादी भारतीयों ने विरोध किया क्योंकि वे इन्हें सामाजिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बता रहे थे। चूंकि ये एक विदेशी सत्ता द्वारा बनाए गए कानून थे। इसलिए भी लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक था।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-अंग्रेज़ी शिक्षण संस्थाओं में ईसाई धर्म व पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार धड़ल्ले से किया जा रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं और वे हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

3. ईसाई धर्म का प्रचार-धर्म के मामले में तो भारतीय भयभीत हो गए थे। लोगों में यह डर बैठ गया था कि अंग्रेज़ उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं। मिशनरियों द्वारा स्कूलों में धड़ल्ले से धर्म-प्रचार किया जाता था। जेलों में भी पादरी कैदियों में ईसाई धर्म का प्रचार करते थे। सेना में सरकार की ओर से पादरी नियुक्त किए जाने लगे जो धर्म-प्रचार करते थे। धर्म परिवर्तन करने वाले भारतीय सिपाहियों को पदोन्नति का प्रलोभन दिया जाता था।

4. उत्तराधिकार कानून-1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास करके लोगों की शंका को विश्वास में बदल दिया था। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

5. सामान्य सेवा अधिनियम-1856 ई० में अंग्रेजों ने ‘सामान्य सेवा भती अधिनियम’ पास किया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष हुआ क्योंकि वे (अधिकांश उच्च जाति के हिन्दू सैनिक) समझते थे कि वे समुद्र पार जाने से उनकी जाति और धर्म दोनों नष्ट हो जाएंगे।

6. ‘चर्बी वाले कारतूस’ व अन्य अफवाहें-1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा।

अन्य कई तरह की अफवाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट। इसे लोग अंग्रेजों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। स्पष्ट है कि 1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में बहुत-से धार्मिक विश्वासों की भूमिका रही है, क्योंकि अंग्रेजों की नीतियों से यह विश्वास आहत हो रहे थे।

प्रश्न 4.
जन विद्रोह के प्रसार का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
विद्रोह 10 मई को मेरठ से शुरू हुआ। 11 मई को बहादुरशाह जफर ने स्वयं को विद्रोह का नेता घोषित करके समर्थन दे दिया। 12 और 13 मई को उत्तर भारत में शांति नज़र आई। लेकिन दिल्ली में विद्रोहियों के कब्जे और बहादुर शाह के नेतृत्व की सूचना जहाँ-जहाँ पहुंचती गई, वहाँ-वहाँ उत्तर भारत में विद्रोह तेज होता गया। एक महीने के भीतर ही उत्तर भारत की सैन्य छावनियों, शहर व. देहात में बड़े स्तर पर विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। भारत में अंग्रेज़ी सेना में लगभग 2 लाख 32 हजार भारतीय सैनिक थे। इनमें से लगभग आधे. इसमें कूद पड़े। विद्रोह शुरू करने का तरीका (Pattern) लगभग सभी जगह एक जैसा ही था।

सिपाहियों ने विद्रोह शुरू होने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या फिर बिगुल बजाकर दिया। फिर जेल, सरकारी खजाने, टेलीग्राफ दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, अंग्रेज़ों के बंगलों सहित तमाम सरकारी भवनों पर हमले किए गए। रिकॉर्ड रूम जलाए गए। ‘मारो फिरंगियों को’ नारों के साथ हिंदी, उर्दू व फारसी में अपीलें जारी की गईं। बड़े स्तर पर गोरे लोगों पर आक्रमण हुए। हिंदुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर विद्रोह में आह्वान किया। लोग अंग्रेजी शासन के प्रति नफरत से भरे हुए थे। वे लाठी, दरांती, तलवार, भाला तथा देशी बंदूकों जैसे अपने परंपरागत हथियारों के साथ विद्रोह में कूद पड़े। इनमें किसान, कारीगर, दकानदार व नौकरी पेशा तथा धर्माचार्य इत्यादि सभी लोग शामिल थे।
सिपाहियों का यह विद्रोह एक व्यापक ‘जन-विद्रोह’ बन गया।

  • क्षेत्रीय विस्तार-सामाजिक व क्षेत्रीय दोनों तरह से निम्नलिखित क्षेत्र इसकी चपेट में आए

1. उत्तर प्रदेश-इस प्रदेश में लगभग समस्त गांवों, कस्बों और शहरों में यह फैल गया था। जून के पहले सप्ताह तक बरेली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, बनारस जैसे बड़े-बड़े नगर स्वतंत्र हो चुके थे। विद्रोहियों ने इन पर अधिकार जमा लिया था। बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ, कानपुर में नाना साहिब (धोंधू पंत) तथा इलाहाबाद में पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता मौलवी लियाकत खाँ ने प्रशासन की कमान संभाल ली। लखनऊ में अवध के नवाबों के राजवंश ने सत्ता संभाल ली थी परंतु यहाँ विद्रोह का असली नेता अहमदुल्ला शाह था।

2. बिहार में विद्रोह-बिहार में पटना, दानापुर, शाहबाद तथा छोटा नागपुर में काफी बड़े स्तर पर जन-विद्रोह के रूप में फूटा। यहाँ नेतृत्व जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवर सिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने किया।

3. मध्य भारत में विद्रोह-मध्य-भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों के वफादार बने रहे। परंतु कई स्थानों पर जनता और सेना अपने शासकों का साथ छोड़कर विद्रोही हो गई थी। उदाहरण के लिए ग्वालियर के सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों का साथ दिया।

4. पंजाब व हरियाणा में विद्रोह-पंजाब में तो अंग्रेज़ों के विरुद्ध जेहलम, स्यालकोट आदि इलाकों में कुछ छिट-पुट घटनाएँ ही हुईं, लेकिन हरियाणा के हांसी, हिसार, रोहतक, रिवाड़ी और दिल्ली के साथ लगते मेवात क्षेत्र में बड़े स्तर पर लोगों ने हथियार उठाए। रिवाड़ी में राव तुला राम व उसके चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल ने इसका नेतृत्व किया। झज्जर में अब्दुल रहमान खाँ, मेवात में सरदार अली हसन खाँ तथा बल्लभगढ़ में राव नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब फौजदार खाँ विद्रोहियों के नेता थे।
यह विद्रोह मुख्यतः उत्तर भारत में ही था लेकिन कुछ छुट-पुट घटनाएँ दक्षिण व पूर्वी भारत में भी घटीं। पूर्व में दूर-दराज के क्षेत्र आसाम में भी इस विद्रोह की हवा पहुंची।
इस प्रकार यह उत्तर भारत में एक व्यापक विद्रोह था। बहुत-से अंग्रेज़ अधिकारियों में इससे घबराहट फैल गई थी। उन्हें लगने लगा था कि भारत उनके हाथ से निकल रहा है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 5.
अवध में विद्रोह की व्यापकता के कारण स्पष्ट करें।
अथवा
अवध में विद्रोह अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक ‘लोक प्रतिरोध’ में कैसे बदल गया? स्पष्ट करें।
उत्तर:
अन्य स्थानों की अपेक्षा अंग्रेजों के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध अवध में अधिक था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है। वह सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वे प्यार करते थे। अंग्रेजी राज की नीतियों ने किसानों, दस्तकारों, सिपाहियों, ताल्लुकदारों और राजकुमारों को परस्पर जोड़ दिया था। फलस्वरूप यह एक लोक-प्रतिरोध बनकर उभरा।

1. अवध का विलय-अवध का विलय 1856 में विद्रोह फूटने से लगभग एक वर्ष पहले ‘कुशासन’ का आरोप लगाते हुए किया गया था। इसे लोगों ने न्यायसंगत नहीं माना। बल्कि वे इसे अंग्रेज़ों का एक विश्वासघात पूर्ण कदम मान रहे थे। अवध को ब्रिटिश राज में मिलाने की इच्छा काफी पहले से बन चुकी थी। 1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” उसकी दिलचस्पी अवध की उपजाऊ जमीन को हड़पने में भी थी। यह जमीन नील और कपास की खेती के लिए उपयुक्त थी। अवध के विलय से एक भावनात्मक उथल-पुथल शुरू हो गई। लोगों में नवाब व उसके परिवार से गहरी सहानुभूति थी। वे उन्हें दिल से चाहते थे। जब नवाब लखनऊ से विदा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग उनके पीछे विला

2. उच्च वर्गों के हितों को हानि-देशी रियासतों के पतन के बाद परंपरागत दरबारी कुलीन उच्च वर्ग भी बर्बाद हो गया। राजा-नवाबों की ओर से इन परिवारों के सदस्यों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। जन-सामान्य में यह प्रतिष्ठित लोग थे। देशी राज्यों के विलय के बाद इनकी सुख-सुविधा, विशेषाधिकार व प्रतिष्ठा सब खत्म हो गई। इससे असंतोष पनपा और वे विद्रोहियों के सहयोगी बन गए।

3. आश्रित वर्गों को हानि-देशी राज्यों के विलय से सेना व सामान्य वर्ग के लोगों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा। हज़ारों सैनिक बेरोज़गार हो गए। कुछ तो रोजी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। अवध की सेना में से 45,000 सिपाहियों को मामूली पेंशन देकर बर्खास्त कर दिया गया था। मात्र 1000 को ब्रिटिश सेना में रखा गया और वे भी कंपनी की नौकरी से खुश नहीं थे। दरबार व उसकी संस्कृति खत्म होने के साथ ही कवि, कारीगर, बावर्ची, संगीतकार, नर्तक, सरकारी कर्मचारी व अन्य बहुत सारे लोगों की आजीविका समाप्त हो गई।

4. ताल्लुकदारों को क्षति-ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

जिनके पास ज़मीन के कागज-पत्र ठीक नहीं थे, उनकी ज़मीनें छीन ली गई थीं। लगभग 21,000 ताल्लुकदारों से ज़मीनें छीन ली गईं। सबसे बुरी मार दक्षिणी अवध के ताल्लुकदारों पर पड़ी। कुछ तो रोज़ी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। उनका सामाजिक सम्मान, स्थिति सब चली गई। ऐसी स्थिति में इन. जागीरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया।

5. किसानों में असंतोष-विद्रोह में बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इससे अंग्रेज़ अधिकारी काफी परेशान हुए थे। उन्हें यह आशा थी कि जिन किसानों को हमने ज़मीन का मालिक घोषित किया है वे तो अंग्रेज़ समर्थक रहेंगे ही। परंतु ऐसा नहीं हुआ। ब्रिटिश व्यवस्था की अपेक्षा वे ताल्लुकदारी को ही बेहतर मान रहे थे। ज़मींदार बुरे वक्त में उनकी सहायता भी करता था। लोगों की दृष्टि में इन ताल्लुकदारों की छवि दयालु अभिभावकों की थी। तीज-त्योहारों पर भी उन्हें कर्जा अथवा मदद मिल जाती थी, फसल खराब होने पर भी उनकी दया-दृष्टि किसानों पर रहती थी। मुसीबत के समय यह नई सरकार कोई सहानुभूति की भावना कृषकों से नहीं रखती थी।

किसान ये जान चुके थे कि अवध में भू-राजस्व की दर का आकलन बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया गया है। कुछ स्थानों पर तो भू-राजस्व की माँग में 30 से 70% तक की वृद्धि हुई थी। इस राजस्व व्यवस्था से सरकार के राजस्व में तो वृद्धि हुई लेकिन किसानों का शोषण कम होने की बजाय बढ़ गया। वस्तुतः इन्हीं कारणों से किसानों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध शस्त्र उठाए।

6. किसान व सेना में संबंध-अवध में किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गांवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी। वह भी गांव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था। स्वाभाविक तौर पर उसमें भी इससे आक्रोश पैदा होता था। भूमि-कर की बढ़ी दरों व कठोरता से उसकी उगाही से किसान त्राही-त्राही कर रहा था। यहीं से अधिकांश सैनिक भर्ती किए हुए थे। नए भू-राजस्व कानूनों से जहाँ किसान, जमींदार ताल्लुकदार सभी पीड़ित थे वहीं सैनिक भी कम दुखी नहीं थे। स्पष्ट हैं कि इन सभी कारणों के संयोजन से ही अवध में विद्रोह एक जबरदस्त लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर गया।

प्रश्न 6.
1857 की घटना के बारे में प्रचलित दो मुख्य विचारधाराओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
अथवा
1857 की घटना ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ था या मात्र एक ‘सैनिक विद्रोह’ था? स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 की घटना की प्रकृति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है। भारतीय देशभक्तों ने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए इसे ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ की संज्ञा दी, जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ अधिकारियों और लेखकों ने इसे शुद्ध रूप में एक ‘सैनिक विद्रोह’ बताया। आजकल इतिहासकार इसे ‘जन-विद्रोह’ अथवा ‘1857 का आंदोलन’ के नाम से पुकारते हैं। यहाँ हम इन्हीं दो विचारों के तर्कों पर विचार करेंगे कि यह सैनिक विद्रोह था अथवा प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम।

1. सैनिक विद्रोह-अंग्रेज लेखक सर जॉन लारेंस तथा जॉन सीले इत्यादि ने 1857 की घटना को एक सैनिक विद्रोह बताया है। सीले का विचार है कि “यह देशभक्ति की भावना से रहित स्वार्थपूर्ण सैनिक विद्रोह था।” इस विचार के पक्ष में इन लेखकों ने निम्नलिखित तर्क दिए हैं

  • विद्रोह की शुरूआत मेरठ सैनिक छावनी से हुई और इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः सैनिकों में था। विशेषतः उत्तर भारत की छावनियों में ही रहा।
  • कुछ स्वार्थी लोगों को छोड़कर आम लोगों ने सैनिकों का साथ नहीं दिया।
  • विद्रोहियों में देश प्रेम , की भावना नहीं थी।
  • सैनिक वेतन, भत्ते व अन्य कुछ छोटी-मोटी समस्याओं से नाराज थे। साथ ही उनकी धार्मिक भावनाओं को ध्यान में न रखने के कारण वे भड़क उठे।
  • सभी जगह विद्रोह पहले सैनिकों ने शुरू किया और बाद में वे शासक उनके साथ मिल गए जिनकी सत्ता छीन ली गई थी।
    अतः इन तर्कों के आधार पर पश्चिमी लेखकों का मत है कि 1857 की घटना एक सैनिक विद्रोह’ से अधिक कुछ नहीं था।

2. प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम-इस मत के समर्थकों में वीर सावरकर, अशोक मेहता, पट्टाभि सीतारमैय्या तथा इतिहासकार ईश्वरीप्रसाद सरीखे महानुभाव हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1909 में वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम’ आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई थी। इन लेखकों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं

1. विद्रोही देश भक्ति से प्रेरित थे। वे स्वधर्म और स्वराज के लिए लड़े।,

2. विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए यह एक सामूहिक प्रयास था। इसमें हिन्दू, मुसलमान और विभिन्न जातियों के लोगों ने मिलकर संघर्ष किया और बलिदान दिया।
धर्बी वाले कारतूसों’ ने तो मात्र चिंगारी का काम किया। वास्तव में यह ब्रिटिश नीतियों से पैदा हुए दीर्घकालीन असंतोष का परिणाम था। यदि ये ‘कारतूस’ न भी होते तो भी यह मुक्ति का आंदोलन तो चलना ही था। यद्यपि उपरोक्त तर्कों के आधार पर इसे आजादी की पहली लड़ाई बताया गया। तथापि कुछ इतिहासकारों ने इस विचार को भी उचित नहीं माना है। उदाहरण के लिए आर०सी० मजूमदार ने लिखा है, “तथाकथित राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम न तो पहला था, न राष्ट्रीय था और न ही मुक्ति का संग्राम था।”

निष्कर्ष-उपरोक्त दोनों मत अपनी-अपनी दृष्टि का परिणाम हैं। अंग्रेज़ लेखक कभी यह मानने को तैयार नहीं थे कि ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण यह संग्राम पैदा हुआ। वे अपनी छोटी-मोटी गलतियों; जैसे कि कारतूसों का मामला आदि से ही इसे जोड़कर देखते थे। दूसरी ओर ‘पहला स्वतन्त्रता संग्राम’ बताने वाले लेखक देशभक्ति की भावना से प्रेरित थे और यही भावना पैदा करना चाहते थे। इसलिए उस जमाने में राष्ट्रीय विचारधारा के अभाव में भी उन्होंने इसे राष्ट्रीय आंदोलन बताया। इसकी सबसे बड़ी कमी थी कि विद्रोहियों के सामने भविष्य की स्पष्ट योजना नहीं थी। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की सोच रहे थे।

प्रश्न 7.
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिक क्यों शामिल हुए?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिकों के शामिल होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उनके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।

(2) सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

(3) सिपाहियों को अपनी जाति तथा धर्म के खोने का भय सता रहा था। सिपाहियों के धर्म और जाति से सम्बन्धित चिह्न पहनने पर रोक लगा दी गई थी। सैनिकों के लिए विदेश में कुछ समय काम करना अनिवार्य कर दिया गया था।

(4) 1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेजों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराज़गी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

(5) सिपाहियों को अपने देशवासियों तथा गाँव के लोगों से बहुत प्रेम था। अतः बहुत-से स्थानों पर सिपाही गाँव की जनता का साथ देने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए।

(6) अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों से दुर्व्यवहार किया करते थे। वे उन्हें अंग्रेज सिपाहियों की तुलना में हीन समझते थे। वे भारतीय सिपाहियों के रहन-सहन तथा उनकी परम्पराओं का मजाक उड़ाते थे। इसी कारण भारतीय सैनिकों में रोष बढ़ने लगा और वे 1857 ई० में हुए विद्रोह में शामिल हो गए।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए.

1. वास्कोडिगामा भारत पहुँचा-
(A) 1857 ई० में
(B) 1498 ई० में
(C) 1492 ई० में
(D) 1600 ई० में
उत्तर:
(B) 1498 ई० में

2. प्लासी की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(A) 1757 ई० में

3. प्लासी की लड़ाई में हार हुई
(A) नवाब सिराजुद्दौला
(B) नवाब वाजिद अली शाह
(C) अलीवर्दी खाँ
(D) लॉर्ड क्लाइव
उत्तर:
(A) नवाब सिराजद्दौला

4. बक्सर की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1764 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1764 ई० में

5. इलाहाबाद की संधि कब हुई?
(A) 1757 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1765 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(C) 1765 ई० में

6. ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी का अधिकार कब प्राप्त हुए?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1784 ई० में
(D) 1800 ई० में
उत्तर:
(A) 1765 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

7. भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई
(A) गोवा से
(B) बंगाल प्रांत से
(C) मद्रास से
(D) बंबई से
उत्तर:
(B) बंगाल प्रांत से

8. बंगाल में ठेकेदारी प्रणाली की शुरुआत की
(A) लॉर्ड क्लाइव ने
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने
(C) लॉर्ड कॉनवालिस ने
(D) लॉर्ड डलहौजी ने
उत्तर:
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने

9. ब्रिटिश काल में लागू की जाने वाली भू-राजस्व प्रणालियाँ कौन-सी थीं ?
(A) स्थाई बन्दोबस्त
(B) रैयतवाड़ी व्यवस्था
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

10. कलेक्टर का मुख्य काम था
(A) दंड देना
(B) चुनाव करवाना
(C) कर एकत्र करवाना
(D) धन बाँटना
उत्तर:
(C) कर एकत्र करवाना

11. बंगाल में स्थायी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने
(B) लॉर्ड डलहौजी ने
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने
(D) लॉर्ड वेलेज्ली ने
उत्तर:
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने

12. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1793 ई० में
(D) 1820 ई० में
उत्तर:
(C) 1793 ई० में

13. स्थायी बन्दोबस्त किसके साथ किया गया?
(A) जमींदारों के साथ
(B) मुजारों के साथ
(C) किसानों के साथ
(D) गाँवों के साथ
उत्तर:
(A) जमींदारों के साथ

14. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को मिलता था-
(A) \(\frac{1}{2}\) भाग
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग
(C) \(\frac{10}{11}\) भाग
(D) बिल्कुल भी नहीं
उत्तर:
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग

15. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था
(A) \(\frac{1}{5}\) भाग
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग
(C) \(\frac{1}{11}\) भाग
(D) \(\frac{1}{2}\) भाग
उत्तर:
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग

16. बंगाल में जोतदार थे
(A) गाँव के मुखिया
(B) प्रांत के नवाब
(C) भूमि पर काम करने वाले
(D) कर एकत्र करने वाले
उत्तर:
(A) गाँव के मुखिया

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

17. जमींदार का वह अधिकारी जो गाँव से भू-राजस्व इकट्ठा करता था, क्या कहलाता था?
(A) मंडल
(B) अमला
(C) लठियात
(D) साहूकार
उत्तर:
(B) अमला

18. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(B) पिट्स इंडिया एक्ट
(C) 1858 ई० का एक्ट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट

19. रेग्यूलेटिंग एक्ट पास किया गया
(A) 1858 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1757 ई० में
उत्तर:
(C) 1773 ई० में

20. रेग्यूलेटिंग के दोषों को दूर करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) पिट्स इंडिया एक्ट
(B) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(C) चार्टर एक्ट
(D) रोलेट एक्ट
उत्तर:
(A) पिट्स इंडिया एक्ट

21. पिट्स इंडिया एक्ट पास किया गया
(A) 1773 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1813 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1784 ई० में

22. मद्रास प्रेसीडेंसी में मुख्यतः कौन-सी भू-राजस्व प्रणाली लागू की गई?
(A) स्थायी बंदोबस्त
(B) ठेकेदारी प्रणाली
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली
उत्तर:
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली

23. दक्कन में किसान विद्रोह कब हुआ?
(A) 1818 ई० में
(B) 1820 ई० में
(C) 1875 ई० में
(D) 1855 ई० में
उत्तर:
(C) 1875 ई० में

24. मद्रास में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस
(B) थॉमस मुनरो
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) थॉमस मुनरो

25. रैयत कौन थे?
(A) किसान
(B) ज़मींदार
(C) साहूकार
(D) जोतदार
उत्तर:
(A) किसान

26. औपनिवेशिक काल में लागू किए जाने वाले भू-राजस्व थे
(A) इस्तमरारी बंदोबस्त
(B) रैयतवाड़ी बंदोबस्त
(C) महालवाड़ी बंदोबस्त
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

27. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त को कहाँ लागू किया गया?
(A) बंगाल में
(B) पंजाब में
(C) असम में
(D) मद्रास में
उत्तर:
(D) मद्रास में

28. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1820 ई० में
(B) 1793 ई० में
(C) 1795 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(A) 1820 ई० में

29. ब्रिटिश संसद में पाँचवीं रिपोर्ट कब प्रस्तुत की गई?
(A) 1813 ई० में
(B) 1713 ई० में
(C) 1613 ई० में
(D) 1913 ई० में
उत्तर:
(A) 1813 ई० में

30. पहाड़िया लोग कहाँ रहते थे?
(A) कश्मीर की पहाड़ियों में
(B) राजमहल की पहाड़ियों में
(C) मनाली की पहाड़ियों में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) राजमहल की पहाड़ियों में

31. पहाड़िया लोग खेती के लिए क्या प्रयोग करते थे?
(A) हल
(B) कुदाल
(C) नहर
(D) ट्रैक्टर
उत्तर:
(B) कुदाल

32. संथालों ने दामिन-इ-कोह की स्थापना कब की?
(A) 1812 ई० में
(B) 1832 ई० में
(C) 1822 ई० में
(D) 1932 ई० में
उत्तर:
(B) 1832 ई० में

33. संथार्लों का अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह कब हुआ?
(A) 1845 ई० में
(B) 1855 ई० में
(C) 1865 ई० में
(D) 1875 ई० में
उत्तर:
(B) 1855 ई० में

34. संथाल किन लोगों को घृणा से ‘दिकू’ कहते थे?
(A) साहूकार
(B) जमींदार
(C) जोतदार
(D) सभी बाहरी लोगों को
उत्तर:
(D) सभी बाहरी लोगों को

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35. डेविड रिकॉर्डो कौन था?
(A) इंग्लैण्ड का चिकिस्सक
(B) कम्पनी का इंजीनियर
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री
(D) फ्रांस का समाजशास्त्री
उत्तर:
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री

36. परितीमन कानून कब पारित किया गया?
(A) 1858 ई० में
(B) 1875 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

37. अमेरिका में गृह युद्ध कब आरंभ हुआ था?
(A) 1857 ई० में
(B) 1864 ई० में
(C) 1861 ई० में
(D) 1865 ई० में
उत्तर:
(C) 1861 ई० में

38. 1875 ई० का दक्कन विद्योह कहाँ से प्रारंभ हुआ?
(A) सूपा से
(B) हम्पी से
(C) अहमदनगर से
(D) बम्बई से
उत्तर:
(A) सूपा से

39. रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक माना गया-
(A) ज़मींदार को
(B) रैयत को
(C) नवाब को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रैयत को

40. रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया?
(A) 30 वर्षों के लिए
(B) 50 वर्षों के लिए
(C) 20 वर्षों के लिए
(D) हमेशा के लिए
उत्तर:
(A) 30 वर्षों के लिए

41. बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त शुरू किया-
(A) 1793 ई० में
(B) 1818 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1818 ई० में

42. ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई-
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ‘ई० में
उत्तर:
(C) 1857 ई० में

43. मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनी-
(A) 1853 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1858 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

44. अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हुआ-
(A) 1861 ई० में
(B) 1865 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1865 ई० में

45. पहाड़िया लोग खेती करते थे-
(A) स्थायी खेती
(B) झूम खेती
(C) बागों की खेती
(D) मिश्रित खेती
उत्तर:
(B) झूम खेती

46. दामिन-इ-कोह नामक भू-भाग पर बसाया गया-
(A) संथालों को
(B) ज़मींदारों को
(C) पहाड़ियों को
(D) अंग्रेज़ों को
उत्तर:
(A) संथालों को

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
वास्कोडिगामा भारत कब आया?
उत्तर:
वास्कोडिगामा 1498 ई० में भारत पहुंचा।

प्रश्न 2.
प्लासी की लड़ाई कब हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई 1757 ई० में हुई।

प्रश्न 3.
प्लासी की लड़ाई किस-किसके मध्य हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला व अंग्रेजों के बीच लड़ी गई।

प्रश्न 4.
बक्सर का युद्ध कब हुआ?
उत्तर:
बक्सर का युद्ध 1764 ई० में हुआ।

प्रश्न 5.
भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत किस प्रांत में हुई?
उत्तर:
भारत में बंगाल प्रांत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों को दीवानी का अधिकार किस संधि से प्राप्त हुआ?
उत्तर:
1765 ई० में इलाहाबाद की संधि से अंग्रेज़ों को दीवानी का अधिकार प्राप्त हुआ।

प्रश्न 7.
दीवानी के अधिकार का क्या अर्थ था?
उत्तर:
दीवानी के अधिकार का अर्थ था-राजस्व वसूली का अधिकार।

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प्रश्न 8.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब व किसने शुरू किया?
उत्तर:
बंगाल में 1793 ई० में गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त शुरू किया। इसे ज़मींदारी बंदोबस्त भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
बंगाल में भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली किसने लागू की?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की।

प्रश्न 10.
ठेकेदारी (इजारेदारी) प्रणाली को और अन्य किस नाम से पुकारा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली को फार्मिंग प्रणाली (Farming System) भी कहा गया।

प्रश्न 11.
ठेकेदारी प्रणाली का नियंत्रण किसे सौंपा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली जिला कलेक्टरों के नियंत्रण में लागू की गई।

प्रश्न 12.
कलेक्टर का मुख्य काम क्या था?
उत्तर:
कलेक्टर का मुख्य काम कर ‘इकट्ठा’ करना था।

प्रश्न 13.
बंगाल में ग्राम-मुखिया को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम-मुखिया को जोतदार या मंडल कहा जाता था।

प्रश्न 14.
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त किसके साथ किया?
उत्तर:
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त बंगाल के छोटे राजाओं एवं ताल्लुकेदारों के साथ किया।

प्रश्न 15. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त किसने लागू किया?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया।

प्रश्न 16.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
उत्तर:
1793 ई० में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 17.
स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रथा) कहाँ-कहाँ लागू किया गया?
उत्तर:
बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस व उत्तरी कर्नाटक में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 18.
स्थायी बंदोबस्त में बंगाल के छोटे राजाओं और ताल्लुकेदारों को किस रूप में वर्गीकृत किया गया?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में छोटे राजाओं व ताल्लुकेदारों को ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

प्रश्न 19.
स्थायी बंदोबस्त की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई।

प्रश्न 20.
ज़मींदार को वसूल किए गए लगान में से कितना भाग अपने पास रखना होता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{1}{11}\) भाग अपने पास रखना होता था।

प्रश्न 21. जमींदार को वसूल किए लगान में से कितना भाग सरकारी खजाने में जमा करवाना पड़ता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{10}{11}\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।

प्रश्न 22.
ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर रिपोर्ट किस नाम से जानी जाती है?
उत्तर:फरमिंगर रिपोर्ट पाँचवीं रिपोर्ट के नाम से जानी जाती है।

प्रश्न 23.
फरमिंगर रिपोर्ट का संबंध किससे था?
उत्तर:
फरमिंगर रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 24.
सूर्यास्त विधि (Sunset Law) से क्या तात्पर्य था?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि का तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी।

प्रश्न 25.
जोतदार कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार (मंडल) कहा जाता था।

प्रश्न 26.
जमीदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी क्या कहलाता था?
उत्तर:
ज़मींदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी ‘अमला’ कहलाता था।

प्रश्न 27.
बंगाल में बटाईदार को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बटाईदार को अधियार या बरगादार कहा जाता था।

प्रश्न 28.
शास्त्रीय (क्लासिकल) अर्थशास्त्री एडम स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम बताओ।
उत्तर:
शास्त्रीय अर्थशास्त्रीय एड्म स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ (Wealth of Nations) थी।

प्रश्न 29.
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में किस प्रकार के व्यापार का विरोध किया गया?
उत्तर:
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में व्यापारिक एकाधिकार का विरोध किया गया।

प्रश्न 30.
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों की क्या कहकर खिल्ली उड़ाई जाती थी?
उत्तर:
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों को ‘नवाब’ कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।

प्रश्न 31.
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कौन-सा एक्ट पास किया गया?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण के लिए सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 32.
‘इलाहाबाद की संधि’ कब की गई थी?
उत्तर:
‘इलाहाबाद की संधि’ 12 अगस्त, 1765 को की गई थी।

प्रश्न 33.
रैयत’ शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘रैयत’ शब्द को किसान के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन क्या थे?
उत्तर:
झूम की खेती, जंगल के उत्पाद व शिकार पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
चार्टर एक्ट पास करने का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
चार्टर एक्ट के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 36.
पहाडिया लोगों की खेती का तरीका क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे।

प्रश्न 37.
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई ज़मीन का पहाड़िया लोग किस रूप में प्रयोग करते थे?
उत्तर:
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई परती भूमि को पहाड़िया लोग पशु चराने के लिए प्रयोग करते थे।

प्रश्न 38.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ क्यों शुरू की?
उत्तर:
संसाधनों का दोहन व प्रशासनिक दृष्टि से कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 39. किस ब्रिटिश अधिकारी ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए?
उत्तर:
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड (Augustus Cleveland) ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए।

प्रश्न 40.
रैयतवाड़ी व्यवस्था कब और कहाँ अपनाई गई ?
उत्तर:
रैयतवाड़ी व्यवस्था सन् 1820 में मद्रास प्रेसीडेंसी में अपनाई गई। इस व्यवस्था का जन्मदाता थॉमस मुनरो को माना जाता है। यह व्यवस्था 30 वर्षों के लिए लागू की गई।

प्रश्न 41.
फ्रांसिस बुकानन ने पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा कब की?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन ने 1810-11 ई० की सर्दियों में पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा की।

प्रश्न 42.
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक कुदाल था।

प्रश्न 43.
‘दामिन-इ-कोह’ किसे कहा गया?
उत्तर:
‘दामिन-इ-कोह’ उस विस्तृत भू-भाग को कहा गया जो कंपनी सरकार द्वारा संथालों को दिया गया।

प्रश्न 44.
कंपनी सरकार का संथालों के साथ क्या अनुबंध हुआ?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों के साथ यह अनुबंध किया कि उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर खेती करनी थी।

प्रश्न 45.
संथाल लोग दिकू किसे कहते थे?
उत्तर:
सरकारी अधिकारियों, ज़मींदारों व साहूकारों को संथाल दिकू (बाहरी लोग) कहते थे।

प्रश्न 46.
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता कौन था?
उत्तर:
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता सिधू मांझी था।

प्रश्न 47.
सीदो (सिधू) ने स्वयं को क्या बताया?
उत्तर:
सीदो ने स्वयं को देवी पुरुष और संथालों के भगवान् ‘ठाकुर’ का अवतार घोषित किया।

प्रश्न 48.
सीदो की हत्या कब की गई?
उत्तर:
1855 ई० में सीदो को पकड़कर मार दिया गया।

प्रश्न 49.
दक्कन क्षेत्र किसे कहा गया?
उत्तर:
बंबई व महाराष्ट्र के क्षेत्र को दक्कन कहा गया।

प्रश्न 50.
साहूकार किसे कहा गया?
उत्तर:
साहूकार, उसे कहा गया जो महाजन और व्यापारी दोनों हो, यानी धन उधार भी देता हो तथा व्यापार भी करता हो।

प्रश्न 51.
दक्कन को अंग्रेज़ी राज क्षेत्र में कब मिलाया गया?
उत्तर:
1818 ई० में पेशवा को हराकर दक्कन को अंग्रेजी राज क्षेत्र में मिला लिया गया।

प्रश्न 52.
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता किसे माना जाता है?
उत्तर:
थॉमस मुनरो को रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता माना जाता है।

प्रश्न 53.
रैयतवाड़ी प्रणाली किन प्रांतों में लागू की गई?
उत्तर:
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली को मद्रास प्रेसीडेंसी में लागू किया गया।

प्रश्न 54.
रैयतवाड़ी प्रणाली में बंदोबस्त किसके साथ किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में सीधा किसानों या रैयत से ही बंदोबस्त किया गया।

प्रश्न 55.
रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक किसे माना गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में किसान को कानूनी तौर पर भूमि का मालिक मान लिया गया। जिस पर वह खेती कर रहा था।

प्रश्न 56.
रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया।

प्रश्न 57.
बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त कब शुरु किया गया?
उत्तर:
बंबई दक्कन में 1818 ई० में रैयत बंदोबस्त शुरु किया गया।

प्रश्न 58.
दक्कन में भयंकर अकाल कब पड़ा?
उत्तर:
1832-34 में दक्कन में भयंकर अकाल पड़ा।

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प्रश्न 59.
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कौन-सी थी?
उत्तर:
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कपास थी।

प्रश्न 60.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
ब्रिटेन में 1857 ई० में ‘क़पास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई।

प्रश्न 61.
‘मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ कब बनाई गई?
उत्तर:
मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ 1859 ई० में बनाई गई।

प्रश्न 62.
अमेरिका में गृह युद्ध कब शुरु हुआ?
उत्तर:
अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया जो उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के बीच था।

प्रश्न 63.
अमेरिका का गृह युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर:
सन् 1865 में अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हो गया।

प्रश्न 64.
ब्रिटिश सरकार ने परिसीमन कानून कब बनाया?
उत्तर:
1859 ई० में सरकार ने परिसीमन कानून पास किया।

प्रश्न 65.
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था।

प्रश्न 66.
परिसीमन कानून के अनुसार ऋणपत्रों को कितने समय के लिए मान्य माना गया?
उत्तर:
परिसीमन कानून के अनुसार किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋण पत्र तीन वर्ष के लिए मान्य माना गया।

प्रश्न 67.
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने ब्रिटिश संसद में अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की?
उत्तर:
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने 1878 ई० में अपनी रिपोर्ट ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ के नाम से प्रस्तुत की।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठेकेदारी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बंगाल के नए गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स (1772-85) ने भूमि-कर वसूली की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की। इसे ‘फार्मिंग प्रणाली’ (Farming System) भी कहा गया है। इसके अंतर्गत उच्चतम बोली लगाने वालों (Bidders) को कर वसूल करने का ठेका दे दिया जाता था। शुरू में ये ठेके पाँच वर्षों के लिए दिए गए, परंतु बाद में वार्षिक ठेके नीलाम किए जाने लगे।

प्रश्न 2.
‘दीवानी’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘दीवानी’ मुगल कालीन प्रशासन में एक महत्त्वपूर्ण पद था। इसका मुख्य कार्य आय-व्यय की व्यवस्था को सुनिश्चित करना था। भू-राजस्व प्रणाली निर्धारण भी दीवान ही करता था। अकबर काल में राजा टोडरमल एक बड़े चतुर, बुद्धिमान दीवान थे।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1793 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भू-राजस्व की एक नई प्रणाली अपनाई जिसे ‘ज़मींदारी प्रथा’ ‘स्थायी बंदोबस्त’ अथवा ‘इस्तमरारी-प्रथा’ कहा गया। यह प्रणाली बंगाल, बिहार, उडीसा तथा बनारस व उत्तरी कर्नाटक में लाग की गई थी।

प्रश्न 4.
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के निम्नलिखित कारण थे

1. व्यापार व राजस्व संबंधी समस्याओं का समाधान (Solution of Problems Relating to Trade and Land Revenue)-कंपनी के अधिकारियों को यह आशा थी कि भू-राजस्व को स्थायी करने से व्यापार तथा राजस्व से संबंधित उन सभी समस्याओं का समाधान निकल आएगा जिनका सामना वे बंगाल विजय के समय से ही करते आ रहे थे।

2. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट (Crisis in the Bengal Economy)-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

प्रश्न 5.
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर ऊँची रखने के क्या कारण थे?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी। इसके दो कारण थे : पहला भू-राजस्व किसानों के अधिशेष (surplus) को हड़पने का मुख्य स्रोत था। किसानों से प्राप्त यह धन प्रशासन चलाने के साथ-साथ व्यापार करने के लिए भी उपयोगी था। दूसरा, राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोतरी होने से आय में वृद्धि होगी, उसमें कंपनी सरकार अपना दावा कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अधिकतम स्तर तक भू-राजस्वों की माँग को निर्धारित किया।

प्रश्न 6.
सूर्यास्त विधि क्या थी?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि से तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों की नीलामी की जा सकती थी। इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो या फिर ज़मींदार रैयत से लगान एकत्र कर पाए या ना कर पाए उसे तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था से पहले बंगाल में ज़मींदारों के पास क्या-क्या अधिकार थे?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी। साथ ही उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया।

प्रश्न 8.
बंगाल में ज़मींदारों की शक्ति सीमित करने के लिए कंपनी सरकार ने क्या किया?
उत्तर:
ज़मींदारों के सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया। साथ ही उनके सीमा शुल्क के अधिकार को भी खत्म कर दिया गया। उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया।

प्रश्न 9.
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के कारण निम्नलिखित थे

1. विशाल ज़मीनों के मालिक (Became Owner of VastAreas of Land)-जोतदार गाँव में ज़मीनों के वास्तविक मालिक थे। कईयों के पास तो हजारों एकड़ भूमि थी। वे बटाइदारों से खेती करवाते थे।

2. व्यापार व साहूकारी पर नियंत्रण (Control over Trade and Money Landing)-जोतदार केवल भू-स्वामी ही नहीं थे। उनका स्थानीय व्यापार व साहूकारी पर भी नियंत्रण था। वे एक व्यापारी, साहूकार तथा भूमिपति के रूप में अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 10.
बंगाल में बटाईदारों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में बटाइदारों को अधियार अथवा बरगादार कहा जाता था। वे जोतदार के खेतों में अपने हल और बैल के साथ काम करते थे। वे फसल का आधा भाग अपने पास और आधा जोतदार को दे देते थे।

प्रश्न 11.
बेनामी खरीददारी क्या थी?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी का अपनाया। इसमें प्रायः जमींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे।

प्रश्न 12.
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट या दस्तावेजों का अध्ययन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट एवं दस्तावेजों को काफी ध्यान से और सावधानीपूर्वक पढ़ना चाहिए। विशेषतः यह सवाल मस्तिष्क में सदैव रहना चाहिए कि यह किसने एवं किस उद्देश्य के लिए लिखी है। बिना सवाल उठाए तथ्यों को वैसे-के वैसे स्वीकार नहीं कर लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 13.
ईस्ट इंडिया कंपनी पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए?
उत्तर:
भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण एवं उसे रेग्युलेट’ करने के लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया। फिर 1784 ई० में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे हर बीस वर्ष के बाद ‘चार्टर एक्टस’ पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम के कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 14.
पहाडिया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण के दो कारण बताओ।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

1. अभाव अथवा अकाल (Famine)-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2.शक्ति-प्रदर्शन (To Show Power)-उनका एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

प्रश्न 15.
पहाड़िया लोगों के प्रति कंपनी अधिकारियों का दृष्टिकोण कैसा था?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर और उपद्रवी समझते थे। अतः तब तक उनके इलाकों में शासन करना आसान नहीं था जब तक उन्हें सभ्यता की परिधि में न लाया जाए। ऐसे जनजाति लोगों को सुसभ्य बनाने के लिए वो समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए।

प्रश्न 16.
संथालों और पहाड़िया लोगों के संघर्ष को क्या नाम दिया जाता है?
उत्तर:
संथालों और पहाड़िया जनजाति के इस संघर्ष को कुदाल और हल का संघर्ष का नाम दिया जाता है। कुदाल पहाड़िया जनजाति की जीवन-शैली का प्रतीक था तो हल संथालों के जीवन का प्रतीक था। पहाड़िया की तुलना में संथालों में स्थायी जीवन की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति अधिक थी।

प्रश्न 17.
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को निम्नलिखित लाभ हुए

  • दीवानी मिलने पर कंपनी बंगाल में सर्वोच्च शक्ति बन गई।
  • कंपनी की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। उसके व्यापार में भी वृद्धि हुई। सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण कंपनी के पास विशाल सेना हो गई।

प्रश्न 18.
विलियम होजेज कौन था?
उत्तर:
विलियम होजेज कैप्टन कुक के साथ प्रशांत महासागर की यात्रा करते हुए भारत आया था। वह भागलपुर के कलेक्टर आगस्टस क्लीवलैंड के जंगल के गाँवों पर भ्रमण पर गया था। इन गाँवों और प्राकृतिक सौंदर्य स्थलों के उसने कई एक्वाटिंट (Aquatint) तैयार किए थे। यह ऐसी तस्वीर होती है जो ताम्रपट्टी में अम्ल (Acid) की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके बनाई जाती है।

प्रश्न 19.
कंपनी अधिकारी ने संथाल जनजाति को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसने का निमंत्रण क्यों दिया ?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों की घाटियों और निचली पहाड़ियों पर करना चाहते थे। पहाड़िया लोग हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। ऐसी परिस्थितियों में ही अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ जो पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे पहाड़िया लोगों की अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिंदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया।

प्रश्न 20.
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों की विजय के क्या कारण थे?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन तथा बसाव का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। पहाड़िया लोगों ने संथालों का प्रबल प्रतिरोध किया। परन्तु उन्हें संथालों के मुकाबले पराजित होकर पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय हुई क्योंकि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे। संथाल जनजाति के लोग शक्तिशाली लड़ाकू थे।

प्रश्न 21.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
संथालों के आगमन से पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो वे शिकार पर्याप्त घास व वन-उत्पादों से वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी। वें बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 22.
संथाल विद्रोह के दो कारण बताओ।
उत्तर:
संथाल विद्रोह के दो कारण निम्नलिखित थे

  • बंगाल में अपनाई गई स्थायी भू-राजस्व प्रणाली के कारण संथालों की जमीनें धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलकर ज़मींदारों और साहूकारों के हाथों में जाने लगीं।
  • सरकारी अधिकारी, पुलिस, थानेदार सभी महाजनों का पक्ष लेते थे। वे स्वयं भी संथालों से बेगार लेते थे। यहाँ तक कि संथाल कृषकों की स्त्रियों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं थी। अतः दीकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध संथालों का विद्रोह फूट पड़ा।

प्रश्न 23.
विद्रोह के दौरान संथालों ने महाजनों और साहूकारों को निशाना क्यों बनाया?
उत्तर:
संथालों ने महाजनों एवं ज़मींदारों के घरों को जला दिया, उन्होंने जमकर लूटपाट की तथा उन बही-खातों को भी बर्बाद कर दिया जिनके कारण वे गुलाम हो गए थे। चूंकि अंग्रेज़ सरकार महाजनों और ज़मींदारों का पक्ष ले रही थी। अतः संथालों ने सरकारी कार्यालयों, पुलिस कर्मचारियों पर भी हमले किए।

प्रश्न 24.
कंपनी सरकार ने संथाल विद्रोह का दमन कैसे किया?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए एक मेजर जनरल के नेतृत्व में 10 टुकड़ियाँ भेजीं। विद्रोही नेताओं को पकड़वाने पर 10 हजार का इनाम रखा गया। सेना ने कत्लेआम मचा दिया। गाँव-के-गाँव जलाकर राख कर दिए।

प्रश्न 25.
बुकानन विवरण की दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर:बुकानन विवरण की विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अबरक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए वाणिज्यिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

(2) बुकानन मात्र भू-खंडों का वर्णन ही नहीं करता अपितु वह सुझाव भी देता है कि इन्हें किस तरह कृषि-क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं।

प्रश्न 26.
दक्कन विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने क्या किया?
उत्तर:
इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी घबरा गए। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई।

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प्रश्न 27.
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर:
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तन इस प्रकार थे

  • दामिन-इ-कोह में संथालों ने खानाबदोश जिंदगी छोड़ दी और स्थायी रूप से बस गए।
  • वे कई प्रकार की वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करने लगे और साहूकारों तथा व्यापारियों से लेन-देन करने लगे।

प्रश्न 28.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ व मैनचेस्टर कॉटन कंपनी की स्थापना के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
1857 ई० में ‘कपास आपूर्ति संघ’ तथा 1859 ई० में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी (Menchester Cotton Company) बनाई गई जिसका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था।

प्रश्न 29.
रैयतवाड़ी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रैयतवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्था की वह प्रणाली थी जिसके अन्तर्गत रैयत (किसानों) का सरकार से सीधा सम्बन्ध होता था। इस व्यवस्था में बिचौलिये समाप्त कर दिए गए।

प्रश्न 30.
डेविड रिकार्डो कौन था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो 1820 के दशक में इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री था। उसके अनुसार भू-स्वामी को उस समय प्रचलित ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो वह भू-स्वामी की अधिशेष आय होगी। जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 31.
पहाड़िया लोग मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण क्यों करते रहते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण अभाव व अकाल से बचने के लिए, मैदानों में बसे समुदायों पर अपनी शक्ति दिखाने के लिए तथा बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने के लिए भी किए जाते थे।

प्रश्न 32.
जमींदारों पर नियन्त्रण के उद्देश्य से कम्पनी ने कौन-से कदम उठाए?
उत्तर:
ज़मींदारों की शक्ति पर नियंत्रण रखने के लिए उनकी सैन्य टुकड़ियों को भंग कर दिया गया। ज़मींदारों से पुलिस एवं न्याय व्यवस्था का अधिकार छीन लिया गया तथा उनके द्वारा लिया जाने वाला सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 33.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ महत्त्वपूर्ण क्यों थी?
उत्तर:
1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर की एक रिपोर्ट है। यह ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई, यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोग कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को ‘पहाड़िया’ के नाम से जाना जाता था। ये लोग सदियों से प्रकृति की गोद में निवास करते आ रहे थे। झूम की खेती, जंगल के उत्पाद तथा शिकार उनके जीविकोपार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।
(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया। .

प्रश्न 36.
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ लिखो।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ निम्नलिखित हैं
(1) इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई।

(2) इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में कृषि उत्पादों में हुई वृद्धि के बावजूद भी सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

प्रश्न 37.
पहाड़िया लोगों द्वारा अपनाई गई झूम खेती क्या थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोग जंगल में झाड़ियों को काटकर व घास-फूस को जलाकर ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा निकाल लेते थे। यह छोटा-सा खेत पर्याप्त उपजाऊ होता था। घास व झाड़ियों के जलने से बनी राख उसे और भी उपजाऊ बना देती थी। कुछ वर्षों तक उसमें खाने के लिए विभिन्न तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगाते और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे खाली (परती) छोड़ देते। ताकि यह पुनः उर्वर हो जाए। ऐसी खेती को स्थानांतरित खेती (Shifting Cultivation) अथवा झूम की खेती कहा जाता है।

प्रश्न 38.
संथाल परगना क्यों बनाया गया?
उत्तर:
संथाल विद्रोह को दबाने के बाद अलग संथाल परगना बनाया गया ताकि आक्रोश कम हो सके। इस परगने में भागलपुर और वीरभूम जिलों का 5500 वर्गमील शामिल किया गया। संथाल परगना में कुछ विशेष कानून लागू किए गए जैसे कि यहाँ यूरोपीय मिशनरियों के अतिरिक्त अन्य बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

प्रश्न 39.
फ्रांसिस बुकानन कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था। इसने 1794 से 1815 तक एक चिकित्सक के रूप में बंगाल में कंपनी सरकार में नौकरी की। कुछ वर्ष वह लॉर्ड वेलजली (गवर्नर-जनरल) का शल्य चिकित्सक भी रहा। उसने कलकत्ता में अलीपुर चिड़ियाघर की स्थापना की।

प्रश्न 40.
जंगलों के विनाश के सम्बन्ध में स्थानीय लोगों व बुकानन के दृष्टिकोण में क्या अन्तर था?
उत्तर:
स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। उनका दृष्टिकोण जीवनयापन तक सीमित था। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण आधुनिक पश्चिमी विचारधारा तथा कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था।

प्रश्न 41.
महालवाड़ी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
महालवाड़ी प्रणाली मुख्यतः संयुक्त प्रांत, आगरा, अवध, मध्य प्रांत तथा पंजाब के कुछ भागों में लागू की गई थी। ब्रिटिश भारत की कुल 30 प्रतिशत भूमि इसके अंतर्गत आती थी। इस बंदोबस्त में महाल अथवा गाँव को इकाई माना गया। भू-राजस्व देने के लिए यह इकाई उत्तरदायी थी। .

प्रश्न 42.
‘पूना सार्वजनिक सभा’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1873 में मध्यजीवी बुद्धिजीवियों का एक नया संगठन ‘पूना सार्वजनिक सभा’ ने किसानों के मामले में हस्तक्षेप किया। भू-राजस्व दरों पर पुनः विचार करने के लिए एक याचिका दायर की गई। नई भू-राजस्व दरों के विरुद्ध कुनबी कृषकों को जागृत करने के लिए इस संगठन के कार्यकर्ता दक्कन देहात के गाँवों में भी गए।।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) के दो लाभ बताएँ।।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त (ज़मींदारी प्रथा) काफी विचार-विमर्श के बाद शुरू की गई थी। इसलिए इससे कुछ अपेक्षित लाभ हुए, जो इस प्रकार हैं
1. सरकार की आय का निश्चित होना-सरकार की वार्षिक आय निश्चित हो गई जिससे प्रशासन व व्यापार दोनों को नियमित करने में लाभ हुआ।

2. धन व समय की बचत-इससे कंपनी सरकार को धन व समय दोनों की बचत हुई। प्रतिवर्ष बंदोबस्त निश्चित करने में धन व समय दोनों ही बर्बाद होते. थे।

3. वफादार वर्ग-स्थायी बंदोबस्त से ज़मींदारों का वर्ग अंग्रेजों की नीतियों से धनी हुआ। अतः यह उनका एक वफादार सहयोगी बनता गया। लेकिन यह बात सभी ज़मींदारों पर लागू नहीं हुई।

4. कंपनी के व्यापार में वृद्धि-स्थायी बंदोबस्त से बंगाल में कंपनी की आय सुनिश्चित हो गई। अब वह अपना ध्यान व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाने में लगा पाई। फलतः इससे उसे व्यापारिक लाभ मिला।

5. ज़मींदारों की समृद्धि-जो ज़मींदार सख्ती के साथ किसानों से लगान वसूलने में सफल हुए, वे समृद्ध होते गए।

प्रश्न 2.
स्थायी बंदोबस्त की हानियों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के कुछ लाभ कंपनी को मिले। परन्तु यह बंगाल की अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं कर सकी। कालांतर में यह कंपनी के लिए भी आर्थिक तौर पर घाटे का सौदा सिद्ध हुई। अतः कुछ विद्वानों ने इस बंदोबस्त की कड़ी आलोचना की है। इसके कुछ निम्नलिखित दुष्परिणाम हुए

1. सरकार को हानि-निःसंदेह इससे सरकार को एक निश्चित वार्षिक आय तो होने लगी। परंतु इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

2. रैयत के हितों की अनदेखी-इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई। वे किसान की संपत्ति को बेचकर लगान की पूरी रकम वसूल कर सकते थे। तथापि यह तरीका आसान नहीं था क्योंकि कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी थी।

3. कृषि में पिछड़ापन-ज़मींदारी प्रथा से कृषि अर्थव्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि उसका पिछड़ापन और भी बढ़ता गया। ज़मींदार वर्ग ने कृषि सुधारों में कोई रुचि नहीं दिखाई। दूसरी ओर किसान पर लगान का बोझ बढ़ता गया। उसे चुकाने के लिए वह साहूकारों के चंगुल में फँसता गया। किसान के पास कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ बच ही नहीं पाता था। फलतः कृषि का पिछड़ापन बढ़ता गया।

4. अनुपस्थित ज़मींदार-इस व्यवस्था में नए जमींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियां खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक ज़मींदार के मध्य परजीवी ज़मींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

5. जमींदारों को हानि-प्रारंभ में स्थायी बंदोबस्त ज़मींदारों के लिए भी काफी हानिप्रद सिद्ध हुआ। बहुत-से ज़मींदार सरकार को निर्धारित भूमि-कर का भुगतान समय पर नहीं कर सके। परिणामस्वरूप उन्हें उनकी ज़मींदारी से वंचित कर दिया गया। समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि बर्दवान के राजा (शक्तिशाली ज़मींदार) की ज़मींदारी के अनेक महाल (भू-संपदाएँ) सार्वजनिक तौर पर नीलाम किए गए थे। उस पर राजस्व की एक बड़ी राशि बकाया थी। लेकिन यह कहानी अकेले बर्दवान (अब बर्द्धमान) ” की नहीं थी। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में काफी बड़े स्तर पर ऐसी भू-संपदाओं की नीलामी हुई थी।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदार राजस्व राशि के भुगतान में क्यों असमर्थ हुए?
उत्तर:
राजस्व राशि का भुगतान करने में ज़मींदार कई कारणों से असमर्थ रहे। ये कारण सरकार की नीतियों एवं ज़मींदारों की स्थिति से जुड़े हुए थे। संक्षेप में ये कारण इस प्रकार थे

1. राजस्व की ऊँची दर-भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी क्योंकि राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोत्तरी होने से ज़मींदारों की आय में वृद्धि होगी, लेकिन सरकार अपना दावा उसमें से कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। उनकी यह दलील थी कि शुरू-शुरू में यह माँग ज़मींदारों को कुछ अधिक लगेगी परन्तु आगे आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे यह सहज हो जाएगी।

2. मंदी में ऊँचा राजस्व-स्थायी बंदोबस्त के लिए राजस्व दर का निर्धारण 1790 के दशक में किया गया। यह मंदी का दशक था। कृषि उत्पादों की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं। ऐसे में रैयत (किसानों) के लिए ऊँची दर का राजस्व चुकाना कठिन था। इस प्रकार ज़मींदार किसानों से राजस्व इकट्ठा नहीं कर पाए और वह सरकार को देय राशि का भुगतान करने में भी असमर्थ रहे।

3. सूर्यास्त विधि-इस व्यवस्था में केवल राजस्वों की दर ही ऊँची नहीं थी वरन वसूली के तरीके भी अत्यंत सख्त थे। इसके लिए सूर्यास्त विधि का अनुसरण किया गया, जिसका तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों को नीलाम कर दिया जाए। ध्यान रहे इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो जमींदार को तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी। इसलिए लगान एकत्र न करने वाले बर्बाद हो गए।

4. ज़मींदारों की शक्तियों में कमी-बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी थीं। उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया। उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार प्रशासन का केंद्र बिंदु ज़मींदार नहीं बल्कि कलेक्टर बनता गया। ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया। समकालीन सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि किस प्रकार सरकारी माँग पूरी न कर पाने वाले ज़मींदारों को ज़मींदारी से वंचित कर दिया जाता था।

5. ग्राम मुखियाओं का व्यवहार-बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार अथवा मंडल कहा जाता था। यह काफी सम्पन्न किसान (रैयत) थे। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी। अच्छी फसल न होने या फिर सम्पन्न रैयत जान-बूझकर समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे। दोनों ही अवसरों पर ज़मींदार मुसीबत में फंसता था। शक्तियाँ सीमित कर दिए जाने के कारण अब वे आसानी से बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था। परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 4.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ क्या थी?
उत्तर:
कंपनी के प्रशासन और बंगाल की स्थिति पर सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई विशेष रिपोर्ट ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई। क्योंकि इससे पूर्व चार रिपोर्ट इस संदर्भ में पहले भी प्रस्तुत हो चुकी थीं। लेकिन यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के बारे में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी। इसमें 1002 पृष्ठ थे जिनमें से 800 से अधिक पृष्ठों में परिशिष्ट लगाए गए थे। इन परिशिष्टों में भू-राजस्व से संबंधित आंकड़ों की तालिकाएँ, अधिकारियों की बंगाल व मद्रास में राजस्व व न्यायिक प्रशासन पर लिखी गई टिप्पणियाँ शामिल थीं।

साथ ही जिला कलेक्टरों की अपने अधीन भू-राजस्व व्यवस्था पर रिपोर्ट तथा ज़मींदारों एवं रैयतों के आवेदन पत्रों को सम्मिलित किया गया था। यह साक्ष्य इतिहास लेखन के लिए बहुमूल्य हैं। उल्लेखनीय है कि 1760 से 1800 ई० के बीच चार दशकों में बंगाल के देहात में हुए विभिन्न परिवर्तनों की जानकारी का आधार पाँचवीं रिपोर्ट में शामिल यह तथ्य ही रहे हैं। यह रिपोर्ट हमारे विचारों एवं अवधारणाओं का एक मुख्य आधार रही है।

प्रश्न 5.
ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के क्या कारण थे?
उत्तर:
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भारत में कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों पर एक विस्तृत रिपोर्ट थी। ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण थे

1. कंपनी का सत्ता बनना-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। परन्तु वे बक्सर के युद्ध के पश्चात् भारत में एक राजनीतिक सत्ता बन गई। फलस्वरूप उसकी गतिविधियों पर सूक्ष्म नज़र रखी जाने लगी। इंग्लैंड में अनेक राजनीतिक समूहों का मत था कि बंगाल की विजय का लाभ केवल ईस्ट इंडिया कंपनी को नहीं मिलना चाहिए, बल्कि ब्रिटिश राष्ट्र को भी मिलना चाहिए।

2. अन्य व्यापारियों का दबाव-ब्रिटेन के अनेक व्यापारिक समूह कंपनी के व्यापार के एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। निजी व्यापार करने वाले ऐसे व्यापारियों की संख्या बढ़ रही थी। वे भी भारत के साथ व्यापार में हिस्सेदारी के इच्छुक थे। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एकाधिकार प्रदान करने वाले शाही फरमान को रद्द करवाना चाहते थे। ब्रिटेन के उद्योगपति भी भारत में ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए अवसर देख रहे थे। अतः वे भी भारत के बाजार उनके लिए खुलवाने को उत्सुक थे।

3. कंपनी के भ्रष्टाचार व प्रशासन पर बहस कंपनी के कर्मचारी तथा अधिकारी निजी व्यापार तथा रिश्वतखोरी से बहुत-सा धन लेकर ब्रिटेन लौटते थे। उनकी यह धन संपत्ति अन्य निजी व्यापारियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करती थी क्योंकि यह व्यापारी भी भारत से शुरू हुई लूट में हिस्सा पाने के इच्छुक थे। कई राजनीतिक समूह ब्रिटिश संसद में भी इस मुद्दे को उठा रहे थे। साथ ही ब्रिटेन के समाचार पत्रों में भी कंपनी अधिकारियों के लोभ व लालच का पर्दाफाश कर रहे थे। इंग्लैंड में कंपनी के बंगाल में अराजक व अव्यवस्थित शासन की सूचनाएँ भी पहुँच रही थी। अतः कंपनी के अधिकारियों में भ्रष्टाचार तथा कुशासन पर इंग्लैंड में बहस छिड़ चुकी थी।

4. कंपनी पर नियंत्रण-स्पष्ट है कि ब्रिटेन में आर्थिक एवं राजनीतिक दबावों के चलते भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण आवश्यक हो गया था। इसके लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ फिर 1784 में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे और कई एक्ट पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे। साथ ही कंपनी के काम-काज का निरीक्षण करने के लिए कई समितियों का गठन किया गया। ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भी एक ऐसी ही रिपोर्ट थी जिसे एक प्रवर समिति (Select Committee) द्वारा तैयार किया गया था।

प्रश्न 6.
क्या ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ पूर्णतः निष्पक्ष थी?
अथवा
‘पाँचवी रिपोर्ट’ की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
पाँचवीं रिपोर्ट साक्ष्यों की दृष्टि से काफी समृद्ध थी, लेकिन पूर्णतः निष्पक्ष नहीं थी। 8वीं सदी के अंतिम दशकों में यह बंगाल में कंपनी सत्ता के बारे में जानकारी का महत्त्वपूर्ण आधार भी रही। इस आधार पर यह समझा जाता रहा कि बड़े स्तर पर बंगाल के परंपरागत ज़मींदार बर्बाद हो गए थे। उनकी ज़मींदारियाँ नीलाम हो गई थीं। इन पर देय राशि का बकाया सदैव बना रहता था। परन्तु ऐसे सारे निष्कर्ष ठीक नहीं थे। शोधकर्ताओं ने ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के अतिरिक्त समकालीन बंगाल के ज़मींदारों के अभिलेखागारों तथा कलेक्टर कार्यालयों के अन्य अभिलेखों का गहन और सावधानीपूर्वक अध्ययन करके रिपोर्ट के बारे में निम्नलिखित नए निष्कर्ष निकाले

1. पहला–यह रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं थी। जो प्रवर समिति के सदस्य इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले थे उनका प्रमुख उद्देश्य कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करना था। राजस्व प्रशासन की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।

2. दूसरा-परंपरागत ज़मींदारों की शक्ति का पतन काफी बढ़ा-चढ़ाकर और आंकड़ों के जोड़-तोड़ के साथ पेश किया गया।

3. तीसरा-इसमें ज़मींदारों द्वारा ज़मीनें गँवाने और उनकी बर्बादी का उल्लेख भी अतिशयोक्तिपूर्ण है। ऊपर बताया गया है ज़मींदार नीलामी में अपनी जमीन को बचाने के लिए भी कई तरह के हथकंडे अपनाता था।

प्रश्न 7.
पहाड़िया लोगों के मैदानी लोगों के साथ संबंधों की चर्चा करें।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। मुख्यतः यह संबंध निम्नलिखित तीन बातों पर आधारित थे

1. अभाव अथवा अकाल-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2. शक्ति-प्रदर्शन-पहाड़िया जनजाति के लोग जब बाहरी लोगों पर आक्रमण करते थे तो उनमें एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

3. राजनीतिक संबंध-इन आक्रमणों का लाभ पहाड़िया मुखियाओं अथवा सरदारों को बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापना में मिलता था। आक्रमणों से वे मैदानी ज़मींदारों व व्यापारियों में भय उत्पन्न करते थे। भयभीत हुए ज़मींदार बचाव के लिए मुखियाओं को नियमित खिराज़ का भुगतान करते थे। इसी प्रकार व्यापारियों से वह पथ-कर वसूल करते थे। जो व्यापारी उन्हें यह कर देते थे उनकी जान-माल की सुरक्षा का आश्वासन दिया जाता था। इस प्रकार पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच कुछ संघर्ष और कुछ अल्पकालीन शांति-संधियों से संबंध चलते आ रहे थे।

18वीं सदी के अंतिम दशकों से संबंध परिवर्तन-18वीं सदी के अंतिम दशकों में पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच संबंधों में बदलाव आने लगा। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक हित थे। यह पूर्वी बंगाल में अधिक-से-अधिक कृषि क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थी। इसके लिए जंगलों को साफ करके कृषि क्षेत्र के विस्तार को प्रोत्साहन दिया। परिणाम यह हुआ कि जमींदारों और जोतदारों ने उन क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया जो पहले पहाड़िया लोगों के पास थे। यह लोग उनके परती खेतों पर कब्जा करके उनमें धान की खेती करने लगे। इसके लिए उन्हें कंपनी सत्ता का समर्थन प्राप्त था।

प्रश्न 8.
कंपनी सरकार ने राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन क्यों दिया ?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार ने निम्नलिखित कारणों से राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन दिया
1. राजस्व वृद्धि-उस काल में बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। इसलिए राजस्व का स्रोत भी कृषि उत्पादन ही था। अतः राजस्व में वृद्धि के लिए उन्होंने कृषि विस्तार पर जोर दिया।

2. कृषि उत्पादों का निर्यात-18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो रही थी। बड़े-बड़े उद्योग लग रहे थे। इनमें काम करने वाले लोगों के भोजन व अन्य जरूरतों के लिए कृषि उत्पादों की जरूरत थी। इसलिए कंपनी सरकार कृषि क्षेत्र के विस्तार में रुचि ले रही थी।

3. पहाड़िया के प्रति अधिकारियों का दृष्टिकोण-कंपनी के अधिकारी पहाड़िया लोगों को बर्बर और उपद्रवी समझते थे। ऐसे जनजाति लोगों को सभ्य बनाने के लिए वे समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए। ताकि पहाड़िया लोग कृषि जीवन अपना सकें, जो उनकी दृष्टि में एक सभ्य सामाजिक जीवन था। वास्तविकता यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक (संसाधनों का दोहन) और प्रशासनिक दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पहाड़िया के क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 9.
अधिकारियों ने पहाड़िया क्षेत्र में संथालों को प्राथमिकता क्यों दी?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्रों में करना चाहते थे। इसके लिए पहाड़ियों की तुलना में संथाल उन्हें अग्रणी बाशिंदे लगे। इसलिए उन्होंने संथालों को प्राथमिकता दी। उन्होंने पहले ज़मींदारों से इस क्षेत्र में खेती करवाना चाहा परन्तु पहाड़ियों के उपद्रव होने लगे। वे इसके लिए पहाड़िया लोगों को भी स्थायी किसान बनाना चाहते थे। परन्तु इसमें भी उन्हें सफलता नहीं मिली। क्योंकि पहाड़िया लोग प्रकृति-प्रेमी थे। प्रकृति के प्रति उनका दृष्टिकोण आक्रामक नहीं था। वे जंगलों को बर्बाद करके उस क्षेत्र में हल नहीं चलाना चाहते थे। वे छोटे-छोटे खेतों में कुदाली से ही खुरच कर थोड़ी-बहुत फसल लगाने के अभ्यस्त थे। इस फसल से ही उनका जीवन निर्वाह हो जाता था। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। वे हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे।

अतः अंग्रेजों को पहाड़ियों को कृषक बनाने में सफलता नहीं मिली। ऐसी परिस्थितियों में अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ। यह पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया। संथालों के गीतों और मिथकों से पता चलता है कि वे तो खेती के लिए ज़मीन की तलाश में ही भटक रहे थे। अतः उन्होंने अधिकारियों के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में उन्हें बड़े स्तर पर जंगल क्षेत्र की ज़मीनें आबंटित की गईं।

प्रश्न 10.
‘दामिन-इ-कोह का सीमांकन’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
दामिन-इ-कोह नाम उस विस्तृत भू-भाग को दिया गया था जो संथालों को दिया गया था। सन् 1832 तक इस पूरे क्षेत्र का नक्शा बनाया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित की गई। इस परिसीमित क्षेत्र को संथाल भूमि घोषित किया गया। संथालों को इसी में रहते हुए हल से खेती करनी थी। उन्हें अपने जनजातीय जीवन को त्यागना था। कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों से एक अनुबंध किया था। इसके अनुसार उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर उसमें खेती करनी थी।

संथालों को यह अनुबंध पसंद आया। सीमांकन के बाद दामिन-इ-कोह में काफी तेजी से संथालों की बस्तियों में वृद्धि हुई। सन् 1851 में मात्र 13 वर्षों में उनके गाँवों की संख्या 40 से बढ़कर 1473 तक पहुँच चुकी थी। इसी अवधि में उनकी जनसंख्या 3000 से 82,000 तक पहुंच गई। इस प्रकार संथालों को मानो उनकी दुनिया ही मिल गई थी। वे अलग सीमांकित क्षेत्र में काफी परिश्रम से जमीन निकालकर कृषि करने लगे।

प्रश्न 11.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। जब उनके जंगल, खेतों तथा गाँवों पर कब्जा किया जा रहा था तो उन्होंने संथालों का तीव्र विरोध किया। परन्तु वे संथालों के मुकाबले पराजित हो गये। उन्हें पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय का कारण यह भी था कि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे।

पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो उन्हें शिकार संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनके पशुओं के लिए पर्याप्त घास नहीं रही। वे अन्य वन-उत्पादों से भी वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी क्योंकि वहाँ ज़मीन गीली नहीं रहती थी। उपजाऊ जमीनें अब उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि उन्हें संथाल क्षेत्र में शामिल कर दिया गया था। वे बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 12.
बुकानन के विवरण की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक कंपनी कर्मचारी था। उसने भारत में 1810-11 में कंपनी के भू-क्षेत्र का सर्वे करके विवरण तैयार किया था। इस विवरण में निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ झलकती हैं

1. खनिजों के बारे में-बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया. जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अभ्ररक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। लोहा व नमक बनाने की स्थानीय पद्धतियों का भी उसने अध्ययन किया। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

2. कृषि विस्तार के बारे में-बुकानन ने सुझाव दिए कि किस तरह भू-खंडों को कृषि क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं। कीमती इमारती लकड़ी के पेड़ों का जंगल कहाँ है, उसे कैसे काटा जा सकता है। नए पेड़ कौन-से लगाए जा सकते हैं जिनसे कंपनी को लाभ होगा।

3. स्थानीय निवासियों से अलग दृष्टिकोण-इस विवरण में उसका दृष्टिकोण स्थानीय लोगों से भिन्न था। उदाहरण के लिए स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था। इसलिए वह वनवासी लोगों की जीवन-शैली का आलोचक था। वह जंगल के भू-भागों को कृषि क्षेत्र में बदलने का पक्षधर था।

प्रश्न 13.
डेविड रिकार्डो का भू-राजस्व सिद्धांत क्या था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो (David Ricardo) एक प्रमुख अर्थशास्त्री थे। 19वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से उनके आर्थिक सिद्धांत विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के नए अधिकारी इन सिद्धांतों से प्रभावित थे। अतः बंबई प्रांत (दक्कन) में नई राजस्व प्रणाली अपनाते समय उन्होंने रिकाडों के लगान सिद्धांत को भी ध्यान में रखा। इस सिद्धांत के अनुसार एक भू-स्वामी (चाहे किसान हो या फिर जमींदार) को किसी तत्कालिक अवधि में प्रचलित ‘औसत लगान’ (Average Rent) ही मिलना चाहिए। उसके अनुसार लगान एक भूमिपति की फसल पर हुए कुल खर्च को (श्रम तथा बीज, खाद, पानी सभी तरह का) अलग करने के बाद शुद्ध आय (Net Profit) था। इसलिए इस पर सरकार द्वारा कर लगाना वैध माना गया।

इस सिद्धांत के अनुसार ज़मींदारों को एक किरायाजीवी (Rentier) के रूप में देखा गया। ऐसा वर्ग जो अपनी संपत्ति पर मिलने वाले लगान से विलासी जीवन बिताता है। इसे प्रगति विरोधी प्रवृत्ति माना गया क्योंकि ज़मीन से होने वाले अधिशेष का यह उचित उपयोग नहीं था। रिकार्डो का विचार था कि इस आय पर कर लगाकर उस धन से सरकार स्वयं कृषि विकास को प्रोत्साहन दे। अर्थात् यह उपयोगितावादी विचारधारा (Utilitarianism) के अंतर्गत उत्पन्न एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन में हो रहे औद्योगिकीकरण के लिए भारत में कृषि विकास महत्त्वपूर्ण होता जा रहा था।

प्रश्न 14.
रैयतवाड़ी प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त सीधा रैयत (किसानों) से ही किया गया था। सरकार और किसान के बीच कोई बिचौलिया ज़मींदार नहीं था। किसान को कानूनी तौर पर उस भूमि का मालिक मान लिया गया था जिस पर वह खेती कर रहा था। ज़मीन की उपजाऊ शक्ति के अनुरूप सरकार का हिस्सा तय किया गया। यह बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया था। इस अवधि के बाद सरकार पुनः ‘एसैसमेंट’ के द्वारा इसे बढ़ा सकती थी।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इसमें ज़मींदारों की भूमिका तो नहीं थी, फिर भी व्यवहार में किसानों को इससे कोई लाभ नहीं पहुँचा। क्योंकि इसमें ज़मींदार का स्थान स्वयं सरकार ने ले लिया था अर्थात् सरकार ही ज़मींदार बन गई थी। किसान को अपनी उपज का लगभग आधा भाग कर के रूप में सरकार को देना पड़ता था। इतना भूमिकर (Revenue) नहीं लगान (Rent) ही होता है। इस अर्थ में तो सरकार ही भूमि की वास्तविक स्वामी थी। जिसे बाद में सरकार ने स्वयं भी स्वीकार कर लिया था।

प्रश्न 15.
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कृषि उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कपास उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
औद्योगिक युग में वाणिज्यिक फसलों में सबसे अधिक महत्त्व कपास का था। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों के लिए इसे अधिकतर अमेरिका से मँगवाया जाता था। ब्रिटेन में आयात की जाने वाली कुल कपास का लगभग 3/4 भाग यहीं से आता था। वस्त्र निर्माताओं के लिए यह एक चिंता का विषय भी था। यदि कभी अमेरिका से आपूर्ति बंद हो गई तो क्या होगा। इसलिए 1857 ई० में कपास आपूर्ति संघ तथा 1859 ई० में मानचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। इनका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास करना था। इस उद्देश्य के लिए भारत को विशेषतौर पर रेखांकित किया गया। अब तक भारत इंग्लैंड का उपनिवेश बन चुका था। इसके कुछ भागों में कपास के लिए उपयुक्त मिट्टी और जलवायु मौजूद थी। उदाहरण के लिए दक्कन की काली मिट्टी और पंजाब के कुछ भाग में कपास पैदा होती थी। इसके साथ-साथ यहाँ सस्ता श्रम भी था। अतः किसी भी स्थिति में अमेरिका से कपास आपूर्ति बंद होने पर भारत से आपूर्ति की जा सकती थी।

अमेरिका में गृह युद्ध-अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया। इससे ब्रिटेन की कपास आपूर्ति को अचानक आघात पहुँचा। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों में तहलका मच गया। 1862 ई० में अमेरिका से मात्र 55000 गाँठों का आयात हुआ। जबकि 1861 ई० में 20 लाख कपास की गाँठों का आयात हुआ था। इस स्थिति में भारत से ब्रिटेन को कपास निर्यात के लिए सरकारी आदेश दिया गया। कपास सौदागरों की तो मानों चाँदी ही हो गई। बंबई दक्कन के जिलों में उन्होंने कपास उत्पादन का आँकलन किया। किसानों को अधिक कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। कपास निर्यातकों ने शहरी साहूकारों को पेशगी राशियाँ दी ताकि वे ये राशियाँ ग्रामीण ऋणदाताओं को उपलब्ध करवा सकें और वे आगे किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें उधार दे सकें।

ऋण समस्या का समाधान-अब किसानों के लिए ऋण की समस्या नहीं थी। साहूकार भी अपनी उधर राशि की वापसी के लिए आश्वस्त था। दक्कन के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। किसानों को लंबी अवधि के ऋण प्राप्त हुए। कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ भूमि पर सौ रुपये तक की पेशगी राशि किसानों को दी गई। चार साल के अंदर ही कपास पैदा करने वाली ज़मीन दोगुणी हो गई। 1862 ई० तक स्थिति यह थी कि इंग्लैंड में आयात होने वाले कुल कपास आयात का 90% भाग भारत से जा रहा था। बंबई में दक्कन में कपास उत्पादक क्षेत्रों में इससे समृद्धि आई। यद्यपि इस समृद्धि का लाभ मुख्य तौर पर धनी किसानों को ही हुआ।

प्रश्न 16.
परिसीमन कानून (1859) क्या था?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार ने रैयत की शिकायतों पर विचार करते हुए 1859 ई० में एक परिसीमन कानून पास किया। जिसका उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था। इसलिए इसमें प्रावधान किया गया कि किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र तीन वर्ष के लिए ही मान्य होगा। यह रैयत को साहूकार के शिकंजे से निकालने का प्रयास था। परन्तु इस कानून का व्यवहार में लाभ रैयत को नहीं, बल्कि साहूकार को होने लगा। क्योंकि ऋण लेना किसान की मजबूरी थी। इसलिए तीन साल के बाद जब वह साहूकार से आगे उधार की माँग करता था तो साहूकार किसान से नए ऋण अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाता था। इसमें वह पिछले तीन साल का ब्याज जोड़कर मूलधन में शामिल कर देता था और फिर इस पर नए सिरे से ब्याज शुरू हो जाता था। इस प्रकार साहूकार ने बड़ी चालाकी से इस नए कानून का दुरुपयोग अपने हित के लिए करना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया की जानकारी भी रैयत ने ‘दक्कन दंगा आयोग’ को दी। ‘दक्कन दंगा आयोग’ में किसानों ने दर्ज अपनी शिकायतों में जबरन वसूली से संबंधित अन्याय को भी दर्ज करवाया।

प्रश्न 17.
दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
1857 के जन-विद्रोह की यादें अभी पुरानी नहीं पड़ी थीं। इसलिए कोई भी कृषक-विद्रोह ब्रिटिश सरकार को खतरे की घंटी जान पड़ता था। दक्कन में हुए कृषक विद्रोह (1875) को बंबई सरकार ने सफलतापूर्वक कुचल दिया था। यद्यपि शांति स्थापित करने में उसे कई महीने लगे। बंबई सरकार में प्रारंभ में तो 1875 के इस कृषक विद्रोह को इतनी गंभीरता से नहीं लिया। परन्तु जब तत्कालिक भारत सरकार (ब्रिटिश) ने दबाव डाला तो इसके लिए एक जाँच आयोग बैठाया गया। इसे ‘दक्कन दंगा आयोग’ नाम दिया गया। 1878 में ब्रिटिश संसद से प्रस्तुत इसकी रिपोर्ट को ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ कहा गया। यह रिपोर्ट काफी जाँच-पड़ताल के बाद तैयार की गई थी। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित सूचनाएँ जुटाई गईं

  • दंगाग्रस्त जिलों में किसानों, साहूकारों तथा चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज किए गए;
  • फसल मूल्यों, मूलधन तथा ब्याज से संबंधित आँकड़े जुटाए गए;
  • भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की राजस्व दरों का अध्ययन किया गया;
  • प्रशासन की भूमिका तथा जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों को संकलित किया गया।

अतः यह रिपोर्ट दक्कन विद्रोह को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 18.
इतिहास-लेखन में इतिहासकार सरकारी अभिलेखों का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
उत्तर:
इतिहास लेखन के लिए स्रोत आवश्यक हैं। कानून संबंधी रिपोर्ट, दंगा आयोगों की रिपोर्ट तथा अन्य सभी तरह की सरकारी रिपोर्ट इतिहासकार के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। अंग्रेजी राज व्यवस्था के काल की ये रिपोर्ट इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस काल में ‘फाइल कल्चर’ आ चुका था। संविदाओं और अनुबंधों का महत्त्व बढ़ गया था। सरकारी अभिलेखों के बारे में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि ये स्वयं में इतिहास नहीं होते। ये इतिहास के पुनर्निर्माण के स्रोत होते हैं। इसलिए इनका उपयोग करते समय इतिहासकार अग्रलिखित बातों को ध्यान में रखते हैं

(1) वे सरकारी रिपोर्टों का अध्ययन अत्यधिक सावधानीपूर्वक करते हैं। विशेषतः इस बात को देखते हैं कि कोई रिपोर्ट किन परिस्थितियों में और क्यों तैयार की गई है। तैयार करने वाले की सोच क्या रही होगी।

(2) सरकारी रिपोर्टों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होता है अर्थात् किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन रिपोर्टों से प्राप्त साक्ष्यों को गैर-सरकारी विवरणों, समाचार-पत्रों, संबंधित मामले की ‘कोर्ट’ में दर्ज याचिकाओं व न्यायाधीशों के निर्णयों इत्यादि के ‘साथ मिलान कर लेना चाहिए।

प्रश्न 19.
बेनामी खरीददारी पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी को अपनाया। इसमें प्रायः ज़मींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे। ऐसे बेनामी सौदों का विस्तृत विवरण बर्दवान के राजा की ज़मींदारी के मिलते हैं। इस राजा ने सबसे पहले तो अपनी ज़मींदारी का कुछ भाग अपनी माता के नाम कर दिया था क्योंकि कंपनी ने यह घोषित कर रखा था कि स्त्रियों की संपत्ति । नहीं छीनी जाएगी। दूसरा जान-बूझकर भू-राजस्व सरकार के खजाने में जमा नहीं करवाया। फलतः बकाया राशि में वृद्धि होती रही।

अन्ततः नीलामी की नौबत आ गई तो राजा ने अपने ही कुछ आदमियों को बोली के लिए खड़ा कर दिया। उन्होंने सबसे अधिक बोली देकर संपत्ति को खरीद लिया और फिर खरीद की राशि सरकार को देने से मना कर दिया। सरकार को पुनः उस ज़मीन की नीलामी करनी पड़ी और इस बार ज़मींदार के दूसरे एजेंटों ने वैसा ही किया और सरकार को फिर राशि जमा नहीं करवाई। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती रही जब तक सरकार और बोली लगाने वाले दोनों ने हार नहीं मान ली।

बोली लगाने वाले नीलामी के समय आना ही छोड़ गए। अन्ततः सरकार को यह संपदा कम कीमत पर पुनः उसी राजा (बर्दवान के ज़मींदार) को ही देनी पड़ी। लेकिन यह तरीका केवल बर्दवान के ज़मींदार ने ही नहीं अपनाया था। बेनामी खरीददारों के सहारे अपनी भू-संपदा दचाने वाले और भी ज़मींदार थे। उल्लेखनीय है कि 1790 के दशक में बंगाल में 12 बड़ी ज़मींदारियाँ थीं। स्थायी बंदोबस्त लागू होने के पहले 8 वर्षों (1793-1801) में इनमें से उत्तरी बंगाल की बर्दवान सहित 4 ज़मींदारियों की बहुत-सी सम्पत्ति नीलाम हुई। लेकिन जितने सौदे हुए, उनमें से 85 प्रतिशत असली थे। सरकार को कुल मिलाकर इनसे 30 लाख की प्राप्ति हुई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 20.
अनुपस्थित ज़मींदार व्यवस्था क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत नए ज़मींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। नए ज़मींदारों में बहुत से लोग शहरी धनिक वर्ग से थे। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। प्रो० बिपिन चन्द्र के अनुसार, “1815 ई० तक बंगाल की लगभग आधी भू-संपत्ति पुराने ज़मींदारों के हाथ से निकलकर सौदागरों तथा अन्य धनी वर्गों के पास जा चुकी थी।”

इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक जमींदार के मध्य परजीवी जमींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। यह श्रृंखला बंगाल में कई बार तो 50 तक पहुँच गई थी। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

प्रश्न 21.
‘स्थायी बंदोबस्त के कारण बंगाल के जोतदारों की शक्ति में वृद्धि हुई।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
जोतदार बंगाल के गाँवों में संपन्न किसानों के समूह थे। गाँव के मुखिया भी इन्हीं में से होते थे। 18वीं सदी के अंत में ज्यों-ज्यों परंपरागत ज़मींदार स्थायी बंदोबस्त के कारण संकटग्रस्त हुए, त्यों-त्यों इन संपन्न किसानों को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता गया।

आर्थिक व सामाजिक दोनों स्तरों में यह गाँवों में प्रभावशाली वर्ग था। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी, जिसे सामान्यतः ‘अमला’ कहा जाता था, गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी। सम्पन्न रैयत जान-बूझकर भी समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे।

ज़मींदार की इस स्थिति के लिए मुख्य तौर पर स्थायी बंदोबस्त उत्तरदायी था। इसमें राजस्व की ऊँची दर तय की गई थी। जमींदार को निश्चित समय पर राजस्व सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था। इसके लिए सूर्यास्त विधि कानून लागू किया गया था। साथ ही ज़मींदारों की शक्तियाँ उनसे छीन ली गईं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया गया। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। वास्तव में अंग्रेज़ सरकार ज़मींदारों को महत्त्व तो दे रही थी लेकिन साथ ही वह इन्हें अपने पूर्ण नियंत्रण में रखना चाहती थी। परिणामस्वरूप उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया।

उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। अब वे बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी। इसका अहसास इस तथ्य से किया जा सकता है कि अकेले बर्दवान जिले में ही सन् 1798 में 30,000 से अधिक मुकद्दमें बकायेदारों के विरुद्ध लंबित थे।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू करने के क्या कारण थे? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने निम्नलिखित कारणों से स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रणाली) को लागू किया

1. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

2. कृषि में निवेश को प्रोत्साहन अधिकारी वर्ग यह सोच रहा था कि कृषि में निजी रुचि और निवेश के प्रोत्साहन से खेती, व्यापार और राज्य के राजस्व संसाधनों को विकसित किया जा सकता है।

3. कंपनी सरकार की नियमित आय-कंपनी सरकार अपनी वार्षिक आय को सुनिश्चित करना चाहती थी ताकि प्रशासन व व्यापार की व्यवस्था को वार्षिक बजट बनाकर व्यवस्थित किया जा सके।

4. उद्यमकर्ताओं को लाभ-इससे यह भी उम्मीद थी कि राज्य (कंपनी सरकार) के साथ-साथ उद्यमकर्ता (भूमि व साधनों का मालिक) को भी पर्याप्त लाभ होगा। राज्य की आय नियमित हो जाएगी और वह उद्यमकर्ता से और अधिक माँग नहीं करेगी तो उसका लाभ भी सुनिश्चित होगा।

5. वसूली सुविधाजनक-ज़मींदारी बंदोबस्त लागू करने के पीछे एक व्यावहारिक कारण यह भी था कि रैयत की बजाय ज़मींदारों से कर वसूलना सुविधाजनक था। इसके लिए कम अधिकारियों व कर्मचारियों से भी व्यवस्था की जा सकती थी।

6. वफादार वर्ग-अधिकारियों को यह कारियों को यह उम्मीद थी कि सरकार की नीतियों से पोषित और प्रोत्साहित छोटे (Yeomen Farmers) व बड़े शक्तिशाली ज़मींदारों का वर्ग, सरकार के प्रति वफादार रहेगा।

विशेषताएँ-स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया।

(3) ये ज़मींदार अपनी ज़मींदारी अथवा ‘इस्टेट’ के तब तक पूर्ण तौर पर मालिक थे जब तक वे सरकार को निर्धारित भूमि-कर नियमित रूप से अदा करते रहते थे। उनका यह अधिकार वंशानुगत तौर पर स्वीकार कर लिया गया।

(4) निर्धारित भूमि-कर राशि का समय पर भुगतान न किए जाने पर सरकार उनकी ज़मींदारी अथवा उसका कुछ भाग नीलाम कर सकती थी और इससे वह लगान की वसूली कर सकती थी।

(5) ज़मींदार अपनी ज़मींदारी का मालिक तो था परन्तु व्यवहार में वह गाँव में भू-स्वामी नहीं था बल्कि राजस्व-संग्राहक (समाहत्ता) मात्र था। उसे किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac { 1 }{ 11 }\) भाग अपने पास रखना होता था और शेष \(\frac { 10 }{ 11 }\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 Img 3

(6) एक ज़मींदारी में बहुत-से गाँव और कभी-कभी तो 400 गाँव तक होते थे। कुल मिलाकर यह ज़मींदारी की एक ‘राजस्व-संपदा’ (Revenue Estate) थी, जिस पर कंपनी सरकार कर निश्चित करती थी।

(7) अलग-अलग गाँवों पर कर निर्धारण व उसे एकत्र करने का कार्य ज़मींदार का था।

(8) इस व्यवस्था में सरकार का रैयत (किसानों) से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। उसका संबंध ज़मींदारों से था।

प्रश्न 2.
सन् 1875 के दक्कन विद्रोह का वर्णन करें। यहाँ के किसान साहूकार के कर्जदार क्यों होते जा रहे थे?
उत्तर:
यह विद्रोह 12 मई, 1875 को महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरू हुआ। यह गाँव जिला पूना (अब पुणे) में पड़ता था। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। उन्हें ‘बाहरी’ और अधिक अत्याचारी समझा गया।

सूपा में व्यापारी और साहूकार रहते थे। यहीं सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्र के कुनबे किसान एकत्र हुए और उन्होंने साहूकारों से उनके ऋण-पत्र (debt bonds) और बही-खाते (Account books) छीन लिए और उन्हें जला दिया। जिन साहूकारों ने बही-खाते और ऋण-पत्र देने का विरोध किया, उन्हें मारा-पीटा गया। उनके घरों को भी जला दिया गया। इसके अलावा अनाज की दुकानें लूट ली गईं। आश्चर्य की बात यह थी कि सूपा के अतिरिक्त दूसरे गाँवों व कस्बों में भी किसानों की यही प्रतिक्रिया सामने आई। इससे साहूकार भयभीत हो गए। वे अपना गाँव छोड़कर भाग गए। यहाँ तक कि वे अपनी संपत्ति और धन भी पीछे छोड़ गए।

स्पष्ट है कि यह मात्र ‘अनाज के लिए दंगा’ (Grain Riots) नहीं था। किसानों का निशाना साफ तौर पर ‘कानूनी दस्तावेज’ अर्थात् बहीखाते और ऋण पत्र थे। इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी भी घबराए। विशेषतः उन्हें 1857 की जनक्रांति की याद ताजा हो आई। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई। उस समय के समाचार पत्रों की रिपोर्ट से पता चलता है कि किसान योजना बनाकर अपनी कार्यवाही करते थे ताकि अधिकारियों की पकड़ में न आए। क्योंकि किसान अवसर मिलते ही साहूकार के घरों पर हमला बोल देते थे। वास्तव में अंग्रेज़ों की नीतियों के चलते साहूकारों और कृषकों के मध्य परंपरागत संबंध समाप्त हो गए। बदली हुई परिस्थितियों में साहूकार ग्रामीण क्षेत्रों में एक शोषक तत्त्व बनकर उभरा।

ऋणग्रस्तता के कारण-दक्कन में किसान कर्ज के बोझ तले दबता चला गया। सन् 1840 तक स्थिति यह पैदा हो गई थी किसान फसल का खर्च पूरा करने तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी साहूकार से ऊँची दर पर कर्ज़ के लिए विवश हो गया, जो वापिस करना आसान नहीं था। कर्ज़ बढ़ने के कारण किसान की स्थिति खराब होती गई। वह साहूकार पर निर्भर होता गया। संक्षेप में किसान के ऋणग्रस्त होने के निम्नलिखित कारण थे

1. ऊँची भू-राजस्व दर-सन् 1818 में बंबई दक्कन में पहला रैयत से बंदोबस्त किया गया। इसमें राजस्व की माँग इतनी अधिक थी कि लोग अनेक स्थानों पर अपने गाँव छोड़कर भाग गए। वे अपेक्षाकृत बंजर और कम उपजाऊ भूमि पर जाकर खेती करने लगे। वर्षा न होने पर अकाल पड़ जाता और बिना फसल के भूमिकर चुकाना संभव नहीं था। फसल हो या न हो यह कर तो सरकार को चुकाना ही होता था।

2. राजस्व वसूली में सख्ती-कर एकत्रित करवाने वाले जिला कलेक्टरों की किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी। उनकी फसलें बेचकर राजस्व वसूल किया जाता था। यहाँ तक कि गाँव पर सामूहिक तौर पर जुर्माना भी कर दिया जाता था। प्रायः कलेक्टर अपने जिले का सारा भूमि-कर एकत्रित करके बड़े अधिकारियों के समक्ष अपनी कार्यकुशलता का परिचय देता था। इसके लिए उसकी नीति सदैव कठोर रहती थी। अतः मुसीबत के दिनों में भूमि-कर चुकाने के लिए किसानों को साहूकार की शरण में जाना पड़ा।

3. कृषि-उत्पाद मूल्यों में गिरावट-1830 के आस-पास तक रैयतवाड़ी प्रथा बंबई दक्कन में शुरू हुई जिसमें भूमि-कर की माँग काफी ऊँची थी। इसी दशक में ही मंदी का दौर आ गया जो लगभग 1845 तक चला। फसलों की कीमतों में भारी गिरावट आ गई। यह किसान के लिए बड़ी समस्या के रूप में आया। इसलिए वह कर्ज लेने के लिए विवश हुआ।

4. 1832-34 का अकाल-इस अकाल में लगभग एक-तिहाई पशु धन दक्कन में खत्म हो गया। यहाँ तक कि 50 प्रतिशत मानव जनसंख्या मौत का ग्रास बन गई। जो किसान इस अकाल से किसी तरह जीवित बच गए थे, उन्हें बीज खरीदने, बैल खरीदने, राजस्व चुकाने तथा जीविका चलाने के लिए ऋण लेना ही पड़ा।

सन् 1840 के बाद स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। राजस्व की माँग में कुछ कमी की गई। मंदी का दौर भी खत्म हुआ। धीरे-धीरे कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगी, तो किसानों ने नए खेत निकालकर खेती में अधिक रुचि ली। परन्तु इसके लिए भी किसानों को बीज व बैलों की जरूरत थी। अतः साहूकार से ऋण उसे इन परिस्थितियों में भी लेना पड़ा।

प्रश्न 3.
दक्कन में किसान विद्रोह के क्या कारण थे? इसमें किसानों ने साहूकारों के बहीखाते क्यों जला डाले?
उत्तर:
दक्कन मुख्यतः बंबई और महाराष्ट्र के क्षेत्र को कहा गया है। बंबई दक्कन में किसानों ने साहूकारों तथा अनाज के व्यापारियों के खिलाफ़ अनेक विद्रोह किए। इनमें से 1875 का विद्रोह सबसे भयंकर था। यह विद्रोह महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरु हुआ। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। 100 कि०मी० पूर्व से पश्चिम तथा 65 कि०मी० उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। दक्कन के इन किसान विद्रोहों के निम्नलिखित कारण थे

1. रैयतवाड़ी प्रणाली-इस प्रणाली में किसानों को उस भूमि का मालिक माना गया था जिन पर वे खेती करते आ रहे थे। इसमें ज़मींदार तो नहीं थे परंतु सरकार फसल का लगभग आधा भाग किसानों से वसूलती थी। इस प्रणाली में भू-राजस्व की दर भी बहुत ऊँची थी।

2. किसान का ऋणग्रस्त होना-सरकार का लगान किसान पूरा नहीं कर पाता था। इसलिए उसे साहूकार से उधार लेना पड़ता था। कई बार तो उसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी ऋण लेना पड़ता था जो उसके लिए वापिस करना आसान नहीं था।

अमेरिका के गृह-युद्ध (1861-65) के दिनों में कपास की माँग में अचानक उछाल आया। कपास के मूल्य में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस स्थिति में साहूकार व्यापारियों ने किसानों को खूब अग्रिम धनराशि दी। लेकिन ज्योंहि युद्ध समाप्त हुआ ‘ऋण का यह स्रोत सूख गया’ । युद्ध के बाद कपास के निर्यात में गिरावट आ गई। कपास की माँग खत्म हो गई। किसानों को ऋण मिलना बन्द हो गया और पहले दिए हुए ऋण को लौटाने के लिए दबाव बढ़ गया। 1870 ई० के आस-पास यह स्थिति किसान विद्रोहों के लिए काफी हद तक उत्तरदायी कही जा सकती है।

3. अन्याय का अनुभव-जब साहूकारों ने उधार देने से मना किया तो किसानों को बहुत गुस्सा आया। क्योंकि परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में न तो अधिक ब्याज लिया जाता था और न ही मुसीबत के समय उधार से मनाही की जाती थी। किसान विशेषतः इस बात पर अधिक नाराज़ थे कि साहूकार वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनके हालात पर रहम नहीं खा रहा है। सन् 1874 में साहूकारों ने भू-राजस्व चुकाने के लिए किसानों को उधार देने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। वे सरकार के इस कानून को नहीं मान रहे थे कि चल-सम्पत्ति की नीलामी से यदि उधार की राशि पूरी न हो तभी साहूकार जमीन की नीलामी करवाएँ। अब उधार न मिलने से मामला और भी जटिल हो गया और किसान विद्रोही हो उठे।

बही-खातों का जलना-दक्कन विद्रोह तथा देश के अन्य भागों में भी किसानों ने विद्रोहों में बही-खातों को निशाना बनाया। वास्तव में ऋण-प्राप्ति और उसकी वापसी दोनों ही दक्कन के किसानों के लिए एक जटिल प्रक्रिया थी। परंपरागत साहूकारी कारोबार में कानूनी दस्तावेजों का इतना झंझट नहीं था। जुबान अथवा वायदा ही पर्याप्त था। क्योंकि किसी सौदे के लिए परस्पर सामाजिक दबाव रहता था। ब्रिटिश अधिकारी वर्ग बिना विधिसम्मत अनुबंधों के सौदों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। विवाद छिड़ने की स्थिति में न्यायालयों में भी ऐसे बंधपत्रों, संविदाओं और दस्तावेजों का ही महत्त्व होता था, जिनमें शर्ते साफ-साफ हस्ताक्षरित होती थीं।

जुबानी लेन-देन कानून के दायरे में कोई महत्त्व नहीं रखता था जबकि परंपरागत प्रणाली में गाँव की पंचायत महत्त्व देती थी। कर्ज़ से डूबे किसान को जब और उधार की जरूरत पड़ती तो केवल एक ही तरीके से यह संभव हो पाता कि वह ज़मीन, गाड़ी, हल-बैल ऋण दाता को दे दे। फिर भी जीवन के लिए तो उसे कुछ-न-कुछ साधन चाहिए थे। अतः वह इन साधनों को साहूकार से किराए पर लेता था। जो वास्तव में उसके अपने ही होते थे। अब उसे अपने ही साधनों का किराया साहूकार को देना होता था। अपनी विवशता के कारण उसे भाडापत्र अथवा किराया नामा में स्पष्ट करना होता कि यह पशु, बैलगाड़ी उसके अपने नहीं हैं।

उसने इन्हें किराए पर लिया है और इसके लिए वह इनका निश्चित किराया प्रदान करेगा। स्पष्ट है कि यह दस्तावेज न्यायालय में साहूकार का पक्ष ही सुदृढ़ करता था। गगजिन अनुबंधों पर वह हस्ताक्षर करता था या अंगूठा लगाता था उनमें क्या लिखा है, वह नहीं जानता था। उधार लेने के लिए हस्ताक्षर जरूरी थे। इसके बिना उन्हें कहीं कर्ज नहीं मिल सकता था। हस्ताक्षरित दस्तावेज़ कोर्ट में प्रायः साहूकार के ही पक्ष में जाता था। अतः इस नई व्यवस्था के कारण किसान बंधपत्रों और दस्तावेजों को अपनी दुःख-तकलीफों का मुख्य कारण मानने लगा। वह तो लिखे हुए शब्दों से डरने लगा। यही वह कारण था कि जब भी कृषक विद्रोह होता था तभी किसान दस्तावेजों को जलाते थे। बहीखाते व ऋण अनुबंध पत्र, उनका पहला निशाना होता था। उसने साहूकार का घर बाद में जलाया, पहले दस्तावेजों को फूंका।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए-

1. मुग़ल शब्द की उत्पत्ति हुई है
(A) मंगोल से
(B) मोगोल से
(C) मोगिल से
(D) मोगोर से
उत्तर:
(A) मंगोल से

2. मुगलों की मातृभाषा क्या थी?
(A) तुर्की
(B) अरबी
(C) फारसी
(D) उर्दू
उत्तर:
(C) फारसी

3. बाबर ने भारत पर आक्रमण किया
(A) 1490 ई० में
(B) 1526 ई० में
(C) 1497 ई० में
(D) 1504 ई० में
उत्तर:
(B) 1526 ई० में

4. ‘तुक-ए-बाबरी’ का लेखक कौन है?
(A) बाबर
(B) जहाँगीर
(C) अबुल फज़्ल
(D) मामुरी
उत्तर:
(A) बाबर

5. बाबर का उत्तराधिकारी कौन था?
(A) हुमायूँ
(B) अकबर
(C) अस्करी
(D) हिन्दाल
उत्तर:
(A) हुमायूँ

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

6. अकबर की पहली सफलता थी
(A) पानीपत की पहली लड़ाई
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई
(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई

7. राजकुमार सलीम ने शासक बनने के बाद अपना नाम रखा
(A) अकबर
(B) जहाँगीर
(C) शाहजहाँ
(D) आलमगीर
उत्तर:
(B) जहाँगीर

8. जहाँगीर ने न्याय की जंजीर किस किले में लगवाई ?
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) लाहौर
(D) अजमेर
उत्तर:
(A) आगरा

9. किस मुगल शासक को अपने अन्तिम दिनों में अपने पुत्र की कैद में रहना पड़ा?
(A) जहाँगीर को
(B) औरंगजेब को
(C) बहादुरशाह द्वितीय को
(D) शाहजहाँ को
उत्तर:
(D) शाहजहाँ को

10. किस मुगल शासक ने अपने पिता के रहते हुए उत्तराधिकार के युद्ध में सफलता पाई ?
(A) जहाँगीर ने
(B) शाहजहाँ ने
(C) औरंगजेब ने
(D) फरुखसियर ने
उत्तर:
(C) औरंगजेब ने

11. उत्तर मुगलकाल में सैयद बन्धुओं को लोग किस नाम से पुकारते थे ?
(A) वफादार सेवक
(B) राजा बनाने वाले
(C) मित्र मण्डली
(D) देशद्रोही
उत्तर:
(B) राजा बनाने वाले

12. इतिवृत्त किस अंग्रेजी शब्द का हिन्दी अनुवाद है ?
(A) डाक्यूमेन्ट्स
(B) क्रॉनिकल्स
(C) ऑफिशियल लेटर
(D) फरमानज
उत्तर:
(B) क्रॉनिकल्स

13. निम्नलिखित में से कौन-सी लड़ाई बाबर ने नहीं लड़ी ?
(A) कन्वाह का युद्ध
(B) चन्देरी का युद्ध
(C) घाघरा का युद्ध
(D) पानीपत का दूसरा युद्ध
उत्तर:
(A) कन्वाह का युद्ध

14. बाबरनामा किस भाषा में लिखा गया है ?
(A) अरबी
(B) फारसी
(C) उर्दू
(D) तुर्की
उत्तर:
(D) तुर्की

15. मुगलकाल में निम्नलिखित पुस्तक का अनुवाद नहीं हुआ
(A) बाबरनामा
(B) महाभारत
(C) रामायण
(D) हुमायूँनामा
उत्तर:
(D) हुमायूँनामा

16. मुगलकाल में पांडुलिपियों का रचनास्थल कहलाता था
(A) शाही दरबार
(B) कारखाना
(C) दीवान-ए-आम
(D) किताबखाना
उत्तर:
(D) किताबखाना

17. किस मुगल शासक ने गैर-मुसलमानों पर दोबारा जजिया कर लगाया?
(A) हुमायूँ
(B) अकबर
(C) शाहजहाँ
(D) औरंगजेब
उत्तर:
(D) औरंगजेब

18. फतेहपुर सीकरी किस मुगल बादशाह की नई राजधानी थी?
(A) बाबर
(B) हुमायूँ
(C) शेरशाह सूरी
(D) अकबर
उत्तर:
(D) अकबर

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19. अकबर ने ‘जरीन कलम’ सोने की कलम का पुरस्कार किसे दिया ?
(A) अबुल फज़ल को
(B) बदायूँनी को
(C) मुहम्मद हुसैन को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(C) मुहम्मद हुसैन को

20. इतिवृत्तों की चित्रकारी का उद्देश्य था
(A) पुस्तक की सुन्दरता
(B) शासक व राज्य की पहचान प्रदर्शन
(C) जनता को सन्देश देना।
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. इस्लाम की चित्रकारी के बारे में धारणा है
(A) इसका विकास होना चाहिए
(B) खुदा के सृजन के अधिकार को चुनौती है
(C) चित्रकारी करने वाला व्यक्ति अपराधी है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) खुदा के सृजन के अधिकार को चुनौती है

22. ईरान का वह दरबारी चित्रकार कौन था जिसको पूरे इस्लाम जगत से मान्यता मिली ? वह बाद में भारत आ गया।
(A) विहजाद
(B) अब्दुस समद
(C) मीर सैयद अली
(D) बसावन
उत्तर:
(A) विहजाद

23. अबुल फज़ल के बारे में सत्य है
(A) वह शेख मुबारक नागौरी का पुत्र था
(B) वह फैजी का भाई था
(C) वह अरबी, फारसी, यूनानी व तुर्की का ज्ञाता था
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. अबुल फज़ल की हत्या करवाई थी
(A) अकबर ने
(B) सलीम (जहाँगीर ने)
(C) मानसिंह ने
(D) फैजी ने
उत्तर:
(B) सलीम (जहाँगीर ने)

25. अब्दुल हमीद लाहौरी की प्रमुख रचना कौन-सी थी?
(A) अकबरनामा
(B) आइन-ए-अकबरी
(C) बादशाहनामा
(D) आलमगीरनामा
उत्तर:
(C) बादशाहनामा

26. मुगलकाल का कौन-सा इतिवृत्त अभी तक भी फारसी से अनुवादित नहीं हो पाया है ?
(A) अकबरनामा
(B) जहाँगीरनामा
(C) बादशाहनामा
(D) आलमगीरनामा
उत्तर:
(C) बादशाहनामा

27. “हुमायूँनामा” का लेखक कौन था?
(A) अबुल फजल
(B) अब्दुल हमीद
(C) गुलबदन बेगम
(D) नूरजहाँ
उत्तर:
(C) गुलबदन बेगम

28. जज़िया किस मुगल शासक ने हटाया था?
(A) औरंगजेब ने
(B) अकबर ने
(C) शाहजहाँ ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(B) अकबर ने

29. हुमायूँ की पत्नी का नाम था
(A) सुल्तान जहाँ बेगम
(B) जहाँआरा
(C) गुलबदन बेगम
(D) नादिरा
उत्तर:
(D) नादिरा

30. गैर-इस्लामी जनता का विश्वास पाने के लिए अकबर ने कदम उठाया
(A) तीर्थयात्रा व जजिया कर की समाप्ति
(B) सम्मानपूर्वक वैवाहिक संबंध
(C) बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की मनाही
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. अकबर ने इस स्थान को राजधानी के रूप में प्रयोग नहीं किया
(A) अजमेर
(B) आगरा
(C) दिल्ली
(D) फतेहपुर सीकरी
उत्तर:
(A) अजमेर

32. अकबर ने लाल किले का निर्माण करवाया
(A) दिल्ली में
(B) लाहौर में
(C) आगरा में
(D) इलाहाबाद मे
उत्तर:
(C) आगरा में

33. अकबर के पिता का नाम था
(A) बाबर
(B) हुमायूँ
(C) औरंगजेब
(D) जहाँगीर
उत्तर:
(B) हुमायूँ

34. अकबर ने फतेहपुर सीकरी में किस विश्व-प्रसिद्ध इमारत का निर्माण करवाया ?
(A) शेख सलीम चिश्ती की दरगाह
(B) बुलन्द दरवाजा
(C) बीरबल का महल
(D) तानसेन का भवन
उत्तर:
(B) बुलन्द दरवाजा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

35. शाहजहाँ ने दिल्ली में मुख्य रूप से बनवाया
(A) जामा मस्जिद
(B) लाल किला
(C) चाँदनी चौक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

36. औरंगजेब की मृत्यु हुई
(A) दिल्ली में
(B) आगरा में
(C) औरंगाबाद में
(D) लाहौर में
उत्तर:
(C) औरंगाबाद में

37. मुगल दरबार के शिष्टाचार में शामिल था
(A) किसी व्यक्ति के खड़े होने की जगह
(B) अभिवादन का तरीका
(C) शासक से मिलने के लिए नजराना भेंट करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

38. मुगलकाल में कौन-सी एकमात्र महिला झरोखा दर्शन देती थी ?
(A) गुलबदन बेगम
(B) नूरजहाँ
(C) मुमताज महल
(D) जहाँआरा
उत्तर:
(B) नूरजहाँ

39. मुगलकाल में सबसे खर्चीला दरबारी उत्सव था
(A) शब-ए-बारात
(B) नौरोज
(C) शासक का जन्म दिन
(D) ईद
उत्तर:
(C) शासक का जन्म दिन

40. सिंहासनों के निर्माण पर सबसे अधिक धन खर्च किसने किया ?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहाँगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(D) शाहजहाँ ने

41. अकबर ने तीर्थयात्रा कर कब समाप्त किया?
(A) 1563 ई० में
(B) 1564 ई० में
(C) 1565 ई० में
(D) 1569 ई० में
उत्तर:
(A) 1563 ई० में

42. अकबर ने किस नए धर्म की स्थापना की ?
(A) दीन-ए-इलाही
(B) सूफी मत
(C) सुलह-ए-कुल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) दीन-ए-इलाही

43. हरम में सबसे उच्च स्थान प्राप्त महिला को कहा जाता था
(A) अगहा
(B) अगाचा
(C) बेगम
(D) पादशाह बेगम
उत्तर:
(D) पादशाह बेगम

44. नूरजहाँ के अतिरिक्त कौन-सी महिला ऐसी थी जिसने राजनीति में खूब हस्तक्षेप किया?
(A) गुलबदन बेगम
(B) जहाँआरा
(C) मुमताज महल
(D) रोशनआरा
उत्तर:
(B) जहाँआरा

45. मुगलकालीन नौकरशाही में शामिल नहीं थे
(A) दरबारी
(B) मनसबदार
(C) जमींदार
(D) जागीरदार
उत्तर:
(C) जमींदार

46. मुगल शासक नौकरशाहों पर नियंत्रण रखते थे
(A) सख्त व्यवहार द्वारा
(B) स्थानांतरण से
(C) मृत्यु के बाद सम्पत्ति जब्त करके
(D) उपर्युक्त सभी से
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी से

47. किस मुगल शासक के काल में प्रांतों की संख्या सबसे अधिक थी ?
(A) अकबर
(B) जहाँगीर
(C) शाहजहाँ
(D) औरंगजेब
उत्तर:
(C) शाहजहाँ

48. ईरानी शासकों के लिए सामान्य रूप से शब्द प्रयोग किया जाता था
(A) सफावी
(B) तुरानी
(C) उजबेग
(D) मंगोलियन
उत्तर:
(A) सफावी

49. मुगलों व ईरानी शासकों के बीच टकराव का मुख्य कारण था
(A) काबुल पर कब्जा
(B) कन्धार पर कब्जा
(C) हैरात का शहर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) कन्धार पर कब्जा

50. थल मार्ग से व्यापार के लिए किस समीपवर्ती राज्य की मुग़लों को आवश्यकता थी ?
(A) चीन
(B) बर्मा
(C) ऑटोमन
(D) ईरान
उत्तर:
(C) ऑटोमन

51. मुगलों के लिए ऑटोमन (तुर्की) साम्राज्य का धार्मिक महत्त्व था
(A) मक्का व मदीना के कारण
(B) धर्म युद्धों के कारण
(C) धर्म की स्वीकृति के लिए
(D) खलीफा के कारण
उत्तर:
(A) मक्का व मदीना के कारण

52. अकबर के काल में जेसुइट मिशन आया
(A) 1580-82 ई० में
(B) 1591 ई० में
(C) 1595 ई० में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

53. जेसुइट का सबसे प्रमुख प्रतिनिधि मण्डल था
(A) एक्या वीणा का
(B) मान्सेरेट का
(C) राल्फ फिन्च का
(D) उपरोक्त सभी का
उत्तर:
(B) मान्सेरेट का

54. मुगलकाल में प्रधानमंत्री को क्या कहा जाता था ?
(A) खानखाना
(B) दीवान
(C) वकील
(D) सदर
उत्तर:
(C) वकील

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

55. मुगलकाल में झरोखा दर्शन का अधिकार किसको था ?
(A) काज़ी को
(B) वज़ीर को
(C) सम्राट को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(C) सम्राट को

56. मुगलकाल में शाही घरानों के घरेलू कार्यों का मंत्री था
(A) खान-ए-सामा
(B) मीर-ए-बहर
(C) मीरबख्शी
(D) नाज़िम
उत्तर:
(A) खान-ए-सामा

57. अकबर ने शासन प्रबन्ध में किस शासक का अनुकरण किया था ?
(A) बहलोल लोधी
(B) शेरशाह सूरी
(C) इब्राहिम लोधी
(D) सिकन्दर लोधी
उत्तर:
(B) शेरशाह सूरी

58. निम्नलिखित में से जहाँगीर के समय का नया मुगल प्रान्त था/थे
(A) उड़ीसा
(B) सिन्ध
(C) कश्मीर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

59. ‘बादशाहनामा’ का लेखक कौन था ?
(A) गुलबदन बेगम
(B) अब्दुल हमीद लाहौरी
(C) अबुल फज़ल
(D) इब्न-बतूता
उत्तर:
(B) अब्दुल हमीद लाहौरी

60. मुगलकाल में परगने का मुखिया कौन होता था ?
(A) आमिल
(B) मीर-ए-सदर
(C) दीवान-ए-आला
(D) मीर-ए-बहर
उत्तर:
(A) आमिल

61. अन्तिम मुगल बादशाह कौन था?
(A) औरंगजेब
(B) बहादुरशाह
(C) अकबर द्वितीय
(D) बहादुरशाह जफर द्वितीय
उत्तर:
(D) बहादुरशाह जफ़र द्वितीय

62. बुलंद दरवाज़ा का निर्माण फतेहपुर सीकरी में किसने कराया?
(A) अकबर ने
(B) शाहजहाँ ने
(C) औरंगजेब ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(A) अकबर ने

63. अकबर ने सभी धर्मों का सार ग्रहण कर किस नए मत की नींव डाली ?
(A) सूफी मत की
(B) भक्ति मत की
(C) दीन-ए-इलाही मत की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दीन-ए-इलाही मत की

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
भारत में मुग़ल साम्राजय की स्थापना 1526 ई० में बाबर ने की थी।

प्रश्न 2.
मुग़ल शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई ?
उत्तर:
मुग़ल शब्द की उत्पत्ति मंगोल शब्द से हुई।

प्रश्न 3.
मुगल शासक स्वयं को क्या कहते थे ?
उत्तर:
मुगल शासक स्वयं को तैमूरी वंशज कहते थे।

प्रश्न 4.
बाबर का जन्म स्थान कौन-सा है ?
उत्तर:
फरगाना बाबर का जन्म स्थान है।

प्रश्न 5.
हुमायूँ को भारत से बाहर किसने निकाला ?
उत्तर:
हमा को भारत से बाहर शेरशाह सरी ने निकाला।

प्रश्न 6.
अकबर का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर:
अकबर का जन्म 1542 ई० में सिन्ध के पास अमरकोट नामक स्थान पर हुआ।

प्रश्न 7.
हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर कहाँ पर था ?
उत्तर:
हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर था।

प्रश्न 8.
अकबर ने तीर्थ यात्रा कर व जजिया कर कब हटाया ?
उत्तर:
अकबर ने तीर्थ यात्रा कर 1563 ई० तथा जजिया कर 1564 ई० में हटाया।

प्रश्न 9.
1611 ई० में शादी के बाद जहाँगीर ने मेहरुनिसा को क्या नाम दिया ?
उत्तर:
1611 ई० में शादी के बाद जहाँगीर ने मेहरुनिसा को ‘नूरजहाँ’ नाम दिया।

प्रश्न 10.
खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि किसने और क्यों दी ?
उत्तर:
खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि जहाँगीर ने मेवाड़-विजय के उपलक्ष्य में दी।

प्रश्न 11.
औरंगजेब का शासन काल कब-से-कब तक था ?
उत्तर:
औरंगज़ेब का शासन काल 1658 से 1707 ई० तक रहा।

प्रश्न 12.
उत्तर मुगलकाल का समय क्या था ?
उत्तर:
उत्तर मुगलकाल 1707 से 1857 ई० तक था।

प्रश्न 13.
नादिरशाह ने भारत पर कब आक्रमण किया तथा किसे पराजित किया ?
उत्तर:
नादिरशाह ने भारत पर 1739 ई० में आक्रमण कर मुहम्मदशाह को पराजित किया।

प्रश्न 14.
अन्तिम मुगल सम्राट की मृत्यु कब व कहाँ हुई ?
उत्तर:
अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की मृत्यु 1862 ई० में रंगून. में हुई।

प्रश्न 15.
मुगलकाल में इतिवृत्त कहाँ रचे गए ?
उत्तर:
मुगलकाल में इतिवृत्त शाही दरबार के संरक्षण में ‘किताबखाना’ में रचे गए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 16.
हुमायूँनामा किसकी रचना है ?
उत्तर:
हुमायूँनामा गुलबदन बेगम की रचना है।

प्रश्न 17.
अकबरनामा का लेखक कौन था ?
उत्तर:
अबुल फज़्ल अकबरनामा का लेखक था।

प्रश्न 18.
शाहजहाँनामा किसकी रचना है ?
उत्तर:
शाहजहाँनामा अब्दुल हमीद लाहौरी की रचना है।

प्रश्न 19.
मुहम्मद काजिम की रचना का नाम लिखें।
उत्तर:
मुहम्मद काजिम की रचना ‘आलमगीरनामा’ है।

प्रश्न 20.
तुक-ए-जहाँगीरी या जहाँगीरनामा का लेखक कौन है ?
उत्तर:
जहाँगीरनामा का लेखक स्वयं जहाँगीर है।

प्रश्न 21.
मुगलकाल में दरबारी भाषा कौन-सी थी ?
उत्तर:
मुगलकाल में दरबार की भाषा फारसी थी।

प्रश्न 22.
महाभारत का फारसी भाषा में अनुवाद किस नाम से हुआ ?
उत्तर:
महाभारत का फारसी भाषा में अनुवाद ‘रज्मनामा’ के नाम से हुआ।

प्रश्न 23.
पाण्डुलिपियों का लेखन स्थल क्या कहलाता था ?
उत्तर:
पाण्डुलिपियों का लेखन स्थल ‘किताबखाना’ कहलाता था।

प्रश्न 24.
अकबर के समय में लेखन की सर्वाधिक पसंद की जाने वाली शैली का क्या नाम था ?
उत्तर:
अकबर के समय में लेखन की सर्वाधिक पसंद की जाने वाली शैली ‘नस्तलिक’ कहलाती थी।

प्रश्न 25.
अकबर ने मुहम्मद हुसैन को क्या खिताब दिया था ?
उत्तर:
अकबर ने मुहम्मद हुसैन को ‘जरीन कलम (सोने की कलम)’ का खिताब दिया।

प्रश्न 26.
ईरानी दरबार का सबसे अधिक चर्चित चित्रकार कौन था ?
उत्तर:
ईरानी दरबार का सबसे अधिक चर्चित चित्रकार विहजाद था।

प्रश्न 27.
अकबरनामा व बादशाहनामा में लगभग कितने चित्र हैं ?
उत्तर:
इन दोनों में से प्रत्येक में लगभग 150 से अधिक चित्र हैं।

प्रश्न 28.
अबुल फज्ल ने अकबरनामा कब लिखा ?
उत्तर:
अबुल फज़्ल ने अकबरनामा 1589 से 1602 के बीच लिखा।

प्रश्न 29.
मुगलकाल के इतिवृत्तों के अनुवाद का कार्य किस संस्थान द्वारा करवाया गया ?
उत्तर:
मुगलकाल के इतिवृत्तों के अनुवाद का कार्य एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (1784) द्वारा करवाया गया।

प्रश्न 30.
अकबरनामा का सबसे अच्छा अंग्रेजी अनुवाद किसका माना जाता है ?
उत्तर:
अकबरनामा का सबसे अच्छा अंग्रेजी अनुवाद हेनरी बेवरिज का माना जाता है।

प्रश्न 31.
मुगल राज्य को दैवीय राज्य सर्वप्रथम किसने वर्णित किया ?
उत्तर:
मुग़ल राज्य को दैवीय राज्य सर्वप्रथम अबुल फज्ल ने वर्णित किया।

प्रश्न 32.
चित्रकारों ने मुग़लों के राज्य को दैवीय राज्य कैसे स्पष्ट किया ?
उत्तर:
चित्रकारों ने मुग़ल शासकों के चेहरे को विशेष प्रभामंडल में दिखाया जैसे देवताओं को दिखाते हैं।

प्रश्न 33.
अकबर ने अपनी सारी जनता को एक जैसा स्वीकार करते हुए कौन-सी नीति अपनाई ?
उत्तर:
अकबर ने सभी के साथ मतभेद न करते हुए ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति अपनाई।

प्रश्न 34.
‘न्याय की जंजीर’ किस शासक ने लगवाई ?
उत्तर:
‘न्याय की जंजीर’ जहाँगीर ने लगवाई।

प्रश्न 35.
आगरा शहर की नींव कब व किसने रखी ?
उत्तर:
आगरा शहर की नींव सिकंदर लोधी ने 1504 ई० में रखी।

प्रश्न 36.
आगरा का लालकिला किसने बनवाया ?
उत्तर:
आगरा का लालकिला अकबर ने बनवाया।

प्रश्न 37.
फतेहपुर सीकरी मुग़लों की राजधानी कब रही ?
उत्तर:
फतेहपुर सीकरी मुग़लों की राजधानी 1570 ई० से 1585 ई० तक रही।

प्रश्न 38.
जहाँगीर की मनपसंद जगह कौन-सी थी ?
उत्तर:
जहाँगीर की मनपसंद जगह लाहौर थी।

प्रश्न 39.
शाहजहाँ की दिल्ली को क्या नाम दिया गया?
उत्तर:
शाहजहाँ की दिल्ली को शाहजहाँनाबाद का नाम दिया गया।

प्रश्न 40.
शाहजहाँ के काल में अभिवादन के कौन-से नए तरीके जुड़े ?
उत्तर:
शाहजहाँ के काल में अभिवादन के नए तरीके ‘तसलीम’ व ‘जमींबोस’ जुड़े।

प्रश्न 41.
मुगल शासकों द्वारा प्रातःकाल जनता को दर्शन देने की प्रथा क्या कहलाती थी ?
उत्तर:
मुगल शासकों द्वारा प्रातःकाल जनता को दर्शन देने की प्रथा ‘झरोखा’ कहलाती थी।

प्रश्न 42.
मुगलशाही दरबार में कौन-सा ईरानी त्योहार धूमधाम से मनाया जाता था ?
उत्तर:
मुगलशाही दरबार में ‘नौरोज’ नामक ईरानी त्योहार धूमधाम से मनाया जाता था।

प्रश्न 43.
मयूर सिंहासन को कौन लूटकर ले गया ?
उत्तर:
मयूर सिंहासन को नादिरशाह लूटकर ले गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 44.
शाही परिवार के अतिरिक्त अन्य लोगों के लिए मुग़ल दरबार की सर्वोच्च पदवी कौन-सी थी ?
उत्तर:
शाही परिवार के अतिरिक्त मुग़ल दरबार की सर्वोच्च पदवी ‘आसफखां’ की थी।

प्रश्न 45.
मुगल शासकों से मिलने के लिए दी जाने वाली भेंट क्या कहलाती थी ?
उत्तर:
मुग़ल शासकों से मिलने के लिए दी जाने वाली भेंट ‘नज़राना’ कहलाती थी।

प्रश्न 46.
‘हरम’ का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर:
हरम का शाब्दिक अर्थ है ‘पवित्र स्थान’

प्रश्न 47.
मुगलकाल में राजनीति में महिलाओं की शुरुआत किससे हुई ?
उत्तर:
मुगलकाल में राजनीति में महिलाओं की शुरुआत नूरजहाँ से हुई।

प्रश्न 48.
किस राजपूत शासक ने मुगलों से वैवाहिक संबंधों की शुरुआत की ?
उत्तर:
आमेर के राजा बिहारी मल (भारमल) ने मुग़लों से वैवाहिक संबंधों की शुरुआत की।

प्रश्न 49.
मुगलकाल में दरबार की कार्रवाई को किस नाम से दर्ज किया जाता था ?
उत्तर:
मुगलकाल में दरबारी कार्रवाई ‘अखबारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ के नाम से दर्ज की जाती थी।

प्रश्न 50.
मुगलकाल में प्रांत को क्या कहते थे ? इसका मुखिया कौन होता था ?
उत्तर:
मुगलकाल में प्रांत को सूबा कहते थे। सूबे का मुखिया सूबेदार कहलाता था।

प्रश्न 51.
‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर:
‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना 1582 ई० में की गई थी।

प्रश्न 52.
मुगलों व ईरान के बीच झगड़े की जड़ कौन-सा शहर था ?
उत्तर:
मुगलों व ईरान के बीच झगड़े की जड़ कन्धार शहर था।

प्रश्न 53.
कन्धार मुगलों के हाथ से अन्तिम बार कब निकल गया ?
उत्तर:
कन्धार अन्तिम बार मुगलों के हाथ से 1649 ई० में निकल गया।

प्रश्न 54.
मुगलकाल में ‘मक्का व मदीना’ किस साम्राज्य का हिस्सा थे ?
उत्तर:
मुगलकाल में मक्का व मदीना तुर्की साम्राज्य ‘ऑटोमन साम्राज्य’ का हिस्सा थे।

प्रश्न 55.
अकबर के दरबार में पहला जेसुइट मिशन कब आया ?
उत्तर:
अकबर के दरबार में पहला जेसुइट मिशन 1580-82 ई० में आया।

प्रश्न 56.
अकबर ने अपने बेटे मुराद का शिक्षक किसे नियुक्त किया ?
उत्तर:
अकबर ने अपने बेटे मुराद का शिक्षक फादर मान्सेरेट को नियुक्त किया।

प्रश्न 57.
अकबर ने इबादतखाना की स्थापना कब व कहाँ की ?
उत्तर:
अकबर ने इबादतखाना की स्थापना 1575 ई० में फतेहपुर सीकरी में की।

प्रश्न 58.
मनसबदारों की भर्ती कौन करता था ?
उत्तर:
मनसबदारों की भर्ती स्वयं सम्राट करता था।

प्रश्न 59.
मनसबदार की भर्ती सम्बन्धी रिकॉर्ड को क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
उसे हकीकत कहा जाता था।

प्रश्न 60.
मनसबदारों की कितनी श्रेणियाँ थीं ?
उत्तर:
अबुल फल के अनुसार मनसबदारों की 60 श्रेणियाँ थीं, परन्तु वास्तविक श्रेणियाँ 33-34 से ऊपर नहीं थीं।

प्रश्न 61.
अकबर के समय में भूमि को मापने के लिए किस उपकरण का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
अकबर के समय में भूमि को मापने के लिए 33 इंच का गज प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 62.
मनसबदारी प्रणाली किसने शुरू की थी ?
उत्तर:
मनसबदारी प्रणाली अकबर ने आरम्भ की थी।

प्रश्न 63. सबसे बड़ा मनसबदार पद कितने सैनिकों पर था ?
उत्तर:
सबसे बड़ा मनसबदार पद 10000 सैनिकों पर था।

प्रश्न 64.
किन सम्राटों की चित्रकला में रुचि थी ?
उत्तर:
अकबर तथा जहाँगीर की चित्रकला में रुचि थी।

प्रश्न 65.
बाबर ने हैरात में क्या देखा था ?
उत्तर:
बाबर ने हैरात में ईरानी चित्रकला के नमूने देखे थे।

प्रश्न 66.
हमजानामा को चित्रित करने का काम कब पूरा हुआ था ?
उत्तर:
हमजानामा को चित्रित करने का काम अकबर के समय में पूरा हुआ था।

प्रश्न 67.
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था किसने नियन्त्रित की?
उत्तर:
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था राजा टोडरमल ने नियन्त्रित की।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जहाँगीर कौन था?
उत्तर:
अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से शासक बना । उसने अकबर की नीतियों को आगे बढ़ाया। उसने अपने जीवन का अधिकतर समय लाहौर में बिताया। 1611 ई० में उसने मेहरूनिसा (बाद में नूरजहाँ) से शादी की। नूरजहाँ शासन में इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने शासन व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। विजयों की दृष्टि से जहाँगीर मेवाड़ व कांगड़ा जैसे क्षेत्रों को जीत पाया, जिनको प्राप्त करने में अकबर को सफलता नहीं मिली थी परन्तु 1622 ई० में वह कन्धार को खो बैठा। उसके काल में उसके बेटे खुर्रम ने विद्रोह कर दिया जिससे वह काफी कमजोर हुआ। 1627 ई० में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई। जहाँगीर अपनी न्याय की जंजीर के कारण काफी विख्यात हुआ जो उसने आगरे के किले में लगवाई थी जिसको कोई भी फरियादी खींचकर न्याय की माँग कर सकता था।

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प्रश्न 2.
शाहजहाँ कौन था?
उत्तर:
जहाँगीर के बाद उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। खुर्रम ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण किया। अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद उसने ताजमहल का निर्माण प्रारंभ करवाया। दक्षिण के बारे में उसने बीजापुर, गोलकुण्डा व अहमदनगर के सन्दर्भ में सन्तुलित नीति अपनाई। ईरान के शासक से वह 1638 ई० में कैन्धार जीतने में सफल रहा। 1640-45 ई० तक उसने मध्य एशिया की विजय का अभियान चलाया जिसको वह जीत तो पाया परन्तु यह विजय अस्थायी रही। इसके बाद ईरानी शासक ने 1649 ई० में कन्धार पर फिर कब्जा कर लिया जिसको औरंगजेब के दो तथा दारा शिकोह के एक अभियान द्वारा जीता नहीं जा सका। उसके शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध था जो 1657-58 ई० में लड़ा गया। इसमें उसके तीन पुत्र दारा शिकोह, मुराद व शुजा मारे गए तथा औरंगजेब सफल रहा। उसने 1658 ई० में शाहजहाँ को गद्दी से हटाकर जेल में डाल दिया। इस तरह शाहजहाँ की मृत्यु 7 वर्ष जेल में रहने के बाद हुई।

प्रश्न 3.
मुगलों की हरम व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शाही परिवार के हरम में महिलाओं की प्रमुखता थी। इसमें सभी महिलाएँ बराबर की तथा एक-जैसी हैसियत वाली नहीं थीं। हरम में प्रमुख महिलाओं को मोटे तौर पर तीन नामों से जाना जाता था।

  • बेगम-शाही परिवार में सबसे ऊँचा स्थान बेगमों का था। बेगम प्रायः कुलीन परिवार से संबंधित होती थी।
  • अगहा-ये सामान्य कुलीन परिवारों से थीं। ये भी शादी की परंपरा के बाद ही हरम में आती थीं।
  • अगाचा-हरम में इनका दर्जा तीसरा था। इन्हें उपपत्नियों का दर्जा प्राप्त था। इन्हें इनके खर्चे के अनुरूप मासिक भत्ता व दर्जे के अनुरूप उपहार इत्यादि मिलते थे।

प्रश्न 4.
इतिवृत्त के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
मुगलकाल में रचे गए इतिवृत्त बहुत सोची-समझी नीति का उद्देश्य थे। विभिन्न इतिहासकारों व विद्वानों ने इस बारे में अपने-अपने मतों की अभिव्यक्ति की है जिनमें से ये पक्ष उभरकर सामने आते हैं

  • इतिवृत्तों के माध्यम से मुग़ल शासक अपनी प्रजा के सामने एक प्रबुद्ध राज्य की छवि बनाना चाहते थे।
  • इतिवृत्तों के वृत्तांत के माध्यम से शासक उन लोगों को संदेश देना चाहते थे जिन्होंने राज्य का विरोध किया था तथा भविष्य में भी कर सकते थे। उन्हें यह बताना चाहते थे कि यह राज्य बहुत शक्तिशाली है तथा उनका विद्रोह कभी सफल नहीं होगा।
  • इतिवृत्तों के माध्यम से शासक अपने राज्य के विवरणों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहते थे।

प्रश्न 5.
अकबरनामा की विषयवस्तु पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
अकबरनामा में राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया गया है। लेखक ने किसी घटना का पूरा विवरण प्राप्त करने के लिए संबंधित पक्षों की जानकारी भी दी है। उसने अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक व सांस्कृतिक पक्षों को स्पष्ट रूप से लिखा है। उसने अपने वर्णन में समय व तिथियों के अनुरूप परिवर्तन को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने अकबर के साम्राज्य में रहने वाले मुस्लिमों, हिंदुओं, जैनों व बौद्धों की जीवन-शैली, परम्पराओं तथा आपसी तालमेल को काफी महत्त्व दिया है। उसने अकबर के साम्राज्य को मिश्रित संस्कृति के केन्द्र के रूप में प्रस्तुत किया है।

अबुल फल का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। उसे अपना साप्ताहिक लेखन दरबार में पढ़ना होता था। इसलिए उसने अलंकृत भाषा को महत्त्व दिया। इस भाषा में लय व कथन शैली विशेष रूप से उभरकर सामने आई है। क्षेत्र-विशेष का वर्णन करते हुए उसने उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में किया है। उसके इस प्रयास से भारतीय फारसी शैली का विकास हुआ।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुलह-ए-कुल की नीति के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अकबर ने सुलह-ए-कुल (Absolute peace) की नीति अर्थात् सभी के साथ सुलह (किसी से मतभेद नहीं) की नीति अपनाई। यह अकबर की सोची-समझी नीति थी। इसे बाद के शासकों ने भी इसे अपनाया। औरंगज़ेब ने इस नीति में बदलाव करने के प्रयास किए तो परिणाम घातक रहे। …

(i) नीति का अर्थ-मुगल कालीन इतिवृत्तों ने इस नीति को अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त किया है। हाँ, इतना सभी मानते हैं कि मुगल साम्राज्य में भिन्न-भिन्न जातियों व समुदायों के लोग रहते थे। शासक इस साम्राज्य में शान्ति व स्थायित्व का स्रोत था। इसलिए वह सभी नृजातीय समूहों व समुदायों से ऊपर था तथा वह इन सभी वर्गों के बीच मध्यस्थता करता था। क्योंकि न्याय व शान्ति का मार्ग तालमेल से निकलता था। अतः यह नीति मुगल शासकों व साम्राज्य के लिए आदर्श बनी। अबुल फज़्ल, सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। उसके अनुसार सुलह-ए-कुल इस सिद्धांत पर आधारित था कि राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुंचे तथा प्रजा शांति से रहे।

(ii) नीति को व्यवहार में लाना-मुग़ल शासक विशेषकर अकबर ने धर्म व राजनीति दोनों के संबंधों को समझने का प्रयास किया। उसने इनकी सीमा व महत्त्व को समझा। इस समझ के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूरी तरह धर्म का त्याग संभव नहीं है लेकिन धर्म की कट्टरता को त्यागकर अवश्य चला जाए। उसने धर्म को राजनीति से भी थोड़ा दूर करने का प्रयास किया। इस कड़ी में उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर, यह सन्देश दिया कि गैर इस्लामी प्रजा से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। उसने युद्ध में पराजित सैनिकों को दास बनाने पर रोक लगाई तथा जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन को गैर-कानूनी घोषित किया। अकबर ने अपने साम्राज्य में गौ -वध को देश द्रोह घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी।

अकबर ने इन फैसलों के माध्यम से धार्मिक पक्षपात को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो साथ ही बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं का सम्मान भी किया। उसने राज्य के सभी अधिकारियों को सुलह-ए-कुल के नियमों के पालन करने के निर्देश दिए। इस तरह अकबर अपनी इस नीति के द्वारा राज्य में शांति व स्थायित्व का आधार बनाने में सफल रहा।

प्रश्न 2.
मनसबदारी प्रथा के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मुग़ल नौकरशाही में मनसबदारी प्रमुख थी। यह सैनिक व असैनिक दोनों के लिए थी। मनसब शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है-पद। इस शब्द की व्याख्या के अनुसार जो भी व्यक्ति मुगलों की सेवा में आता था तो उसे एक मनसब दिया जाता था। वह मनसब उसकी दरबार में पहचान, जिम्मेदारी व हैसियत तीनों बातों का अहसास कराता था। मनसब में जात व सवार दो शब्दों . का प्रयोग होता था। जात शब्द व्यक्ति के पद (status) को स्पष्ट करता था जबकि सवार उसके पास ऊँट, घोड़े, बैल इत्यादि सैनिक क्षमता का बोध कराता था। इससे यदि किसी व्यक्ति की 1000 की जात मनसब व 1000 की सवार मनसब है तो वह मनसबदार प्रथम श्रेणी में होता था, यदि जात की तुलना में सवार 500 या इसके आस-पास थे तो वह द्वितीय श्रेणी में आता था तथा यदि उसके सवार नाममात्र थे या थे ही नहीं वह तृतीय श्रेणी में आता था।

इसी श्रेणी के आधार पर उसका वेतन निर्धारित होता था जबकि इसी आधार पर उसे दरबार में जगह मिलती थी। यहाँ तक कि शासक के शिविर में भी उसी अनुरूप उसका तंबूकक्ष (Tent Room) बनता था। मनसबदारी व्यवस्था की खास बात यह थी कि मनसबदार चाहे 20 के रैंक का हो या 5,000 का वह सीधे शासक से जुड़ा होता था। वह किसी अन्य व्यक्ति के लिए जिम्मेदार नहीं होता था। मुगलकाल में सामान्य रूप से 1000 से बड़े पद के मनसबदार को उमरा (अमीर वर्ग का बहुवचन) कहा जाता था। मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति व पद मुक्ति की शक्तियाँ स्वयं शासक के पास होती थीं।

प्रश्न 3.
अकबर के धर्म संबंधी विचारों का वर्णन करें।
उत्तर:
अकबर ने धर्म संबंधी उदारता की धारणा शासन के प्रारंभिक दिनों में ही अपना ली थी। इसके व्यवहार और उदार विचारों से ईसाई पादरियों को तो यहाँ तक लगा कि शासक ने इस्लाम त्याग दिया है तथा वह ईसाई धर्म का सदस्य बन गया है। वास्तव में उनकी यह समझ तत्कालीन यूरोप की धार्मिक असहिष्णुता की नीति को स्पष्ट करती है क्योंकि इस काल में वहाँ धर्म संबंधी तालमेल का अभाव था।

अकबर ने इस तरह का व्यवहार केवल जेसुइट (ईसाई प्रचारकों) के प्रति नहीं किया बल्कि हिंदू, जैन, फारसी, बौद्ध धर्म में विश्वास. करने वाले सभी धर्मों के साथ किया। वह सभी के साथ तालमेल अपनी सुलह-ए-कुल की नीति के तहत करना चाहता रस्कार नहीं बल्कि सभी का एक-दूसरे के साथ मिलकर चलने का भाव था। अकबर की समझ यहाँ हमें और स्पष्ट होती है कि उसने फतेहपुर सीकरी में स्थापित इबादत खाना में मुसलमानों, हिंदुओं, जैन, फारसियों व ईसाइयों सभी की बातें सुनीं। उनके वाद-विवाद व विचार अभिव्यक्ति पर अपने तर्क दिए। इस विचार-विमर्श से उसे सभी धर्मों की अच्छी बातें जानने का मौका मिला। इस्लाम के कुछ लोगों की कट्टरपंथी सोच भी वह समझ पाया।

(i) सूर्य व अग्नि का उपासक (Devotee of Fire and the Sun)-विभिन्न धर्मों के बारे में अपनी समझ विकसित हो के बाद अकबर सूर्य पर केंद्रित स्व-कल्पित दैवीय उपासना के सिद्धांत की ओर बढ़ा जिसे अबुल फज्ल ने अकबरनामा में दैवीय सिद्धांत के साथ जोड़ दिया। अकबर इस सिद्धांत के माध्यम से विभिन्न धर्म व दर्शन के ग्राही (स्वीकारने) वाले रूप की ओर बढ़ा। इस दैवीय सिद्धांत के पीछे प्रेरक शक्ति यह थी कि इस नीति से शत्रुओं पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है। वास्तव में यह सिद्धांत शासक को सबका शासक बनाता है, न कि किसी वर्ग विशेष का।

(ii) दीन-ए-इलाही (Din-I-Ilahi)-अकबर उदारवादी रास्तों पर चलकर इस रास्ते पर पहुँचा कि सभी धर्मों की अच्छी बातों को मिलाकर एक धर्म बनाया जा सकता है जो सभी को स्वीकार हो सकता है। अपने अनुभव के आधार पर उसने 1582 ई० में ‘दीन-ए-इलाही’ (‘तोहिद-ए-इहाली’) की स्थापना की जिसमें सभी धर्मों की अच्छी बातें थीं। अकबर ने इसे अपनाने पर भी किसी को बाध्य नहीं दिया। इसलिए इस नए मत को मानने वालों की संख्या सैकड़ों में रही। इसकी भी अकबर ने परवाह नहीं की।

कुल मिलाकर स्पष्ट है कि अकबर ने औपचारिक धर्म को महत्त्व न देकर साम्राज्य की जरूरत के रूप में धर्म को देखा। इसने अकबर की छवि तो उच्च बनाई साथ ही अन्य लोगों को भी मार्ग दिया कि भारत में धर्म संबंधी कौन-सी नीति कारगर है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगल वंश का परिचय देते हुए मुख्य मुग़ल शासकों के बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल शब्द की उत्पत्ति मंगोल से हुई है। मंगोल से यह शब्द बदलकर मोगोल व मौगिल्ज बना तथा अन्ततः मुगल रूप में स्थापित हो गया। मुगल शासक स्वयं को तैमूरी कहते थे। मुगल तैमूरी इसलिए कहलाते थे क्योंकि वे पितृपक्ष से तैमूर के वंशज थे। बाबर (प्रथम मुगल शासक) मातृपक्ष से चंगेज का वंशज था लेकिन वह चंगेज के साथ अपना नाम जोड़ना उचित नहीं समझता था। वह चंगेज व अन्य मंगोलों को बर्बर (बद्द या यायावर) कहता था।

1. बाबर (Babur)-मुगल वंश के संस्थापक बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 को मध्य-एशिया के फरगाना (वर्तमान में उजबेगिस्तान) में हुआ। 1494 ई० में बाबर अपने पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद फरगाना का शासक बना। आपसी पारिवारिक लड़ाई के कारण उसने 1497 ई० में यह राज्य खो दिया तथा इधर-उधर ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो गया। उसने 1504 ई० में काबुल तथा 1507 ई० में कन्धार को जीता। बाबर ने 1519 से 1526 ई० तक उसने भारत पर पाँच आक्रमण किए तथा वह सभी में सफल रहा। 1526 ई० में उसने पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अन्तिम सुल्तान इब्राहिम लोधी को हराकर मुगल वंश की नींव रखी। उसने 1527 ई० में खानवा, 1528 ई० में चन्देरी तथा 1529 ई० में घाघरा की लड़ाइयाँ जीतकर अपने राज्य को सुदृढ़ आधार दिया। 1530 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

2. हुमायूँ (Humayun)-बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ शासक बना। उसे गुजरात के शासक बहादुर शाह तथा बिहार क्षेत्र के मुखिया शेरशाह से निरन्तर युद्ध करने पड़े। शेरशाह ने उसे 1540 ई० में बेलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में पराजित कर दिया तथा उसे भारत से निर्वासित होना पड़ा। उसने निर्वासन का कुछ समय काबुल, सिन्ध व अमरकोट में बिताया तथा अन्त में ईरान के शासक तहमास्म के पास शरण ली। ईरान के शासक की मदद से उसने काबुल, कन्धार व मध्य एशिया के क्षेत्रों को जीता। उसने 1555 ई० में शेरशाह के कमजोर उत्तराधिकारियों को हराकर एक बार फिर दिल्ली व आगरा पर अधिकार कर लिया। 1556 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।
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3. अकबर (Akbar)-हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र अकबर पंजाब के कलानौर में था। उसे वहीं पर शासक घोषित कर दिया गया। इस बीच रेवाड़ी के हेमू ने दिल्ली में अव्यवस्था का लाभ उठाकर कब्जा कर लिया। इस तरह अकबर व हेमू के बीच 1556 ई० में पानीपत के मैदान में दूसरा युद्ध हुआ तथा अकबर को विजय मिली। अकबर ने अपनी प्रारंभिक सफलताएँ अपने शिक्षक व संरक्षक बैहराम खाँ के नेतृत्व में पाईं। तत्पश्चात् उसने प्रत्येक क्षेत्र में साम्राज्य का विस्तार किया। उसने आन्तरिक दृष्टि से अपने राज्य का विस्तार कर इसे विशाल, सुदृढ़ तथा समृद्ध बनाया। उसने राजपूतों व स्थानीय प्रमुखों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर हटाकर गैर-इस्लामी जनता को यह एहसास करवाने का प्रयास किया कि वह उनका भी शासक है। वह अपने राजनीतिक, प्रशासनिक व उदारवादी व्यवहार के कारण मुगल शासकों में महानतम स्थान प्राप्त करने में सफल रहा। 1605 ई० में उसकी मृत्यु के समय उसका साम्राज्य राजनीतिक दृष्टि से विशाल व शान्त, अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से बहुत शक्तिशाली तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध था।

4. जहाँगीर (Jahangir)-अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से शासक बना। 1611 ई० में उसने मेहरूनिसा (बाद में नूरजहाँ) से शादी की। नूरजहाँ शासन में इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने शासन-व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। 1627 ई० में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई। जहाँगीर अपनी न्याय की जंजीर के कारण काफी विख्यात हुआ जो उसने आगरे के किले में लगवाई थी।

5. शाहजहाँ (Shahajahan)-जहाँगीर के बाद उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद उसने ताजमहल का निर्माण प्रारंभ करवाया। ईरान के शासक से वह 1638 ई० में कन्धार जीतने में सफल रहा। ईरानी शासक ने 1649 ई० में कन्धार पर फिर कब्जा कर लिया। उसके शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध था जो 1657-58 ई० में लड़ा गया। इसमें उसके तीन पुत्र दारा शिकोह, मुराद व शुजा मारे गए तथा औरंगजेब सफल रहा। उसने 1658 ई० में शाहजहाँ को गद्दी से हटाकर जेल में डाल दिया। इस तरह शाहजहाँ की मृत्यु 7 वर्ष जेल में रहने के बाद हुई।

6. औरंगजेब (Aurangzeb)-1658 ई० में अपने भाइयों को हराकर व पिता को बन्दी बनाकर औरंगजेब सत्ता प्राप्त करने में सफल रहा। वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी को पसन्द करता था, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संकीर्ण था। उसकी संकीर्णता के चलते हुए गैर-मुस्लिम प्रजा तथा मुस्लिमों में शिया उसके विरोधी हो गए। उसे जाटों, सतनामियों, राजपूतों, सिक्खों व मराठों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 2.
इतिवृत्त क्या हैं? ये क्यों लिखे गए? मुगलकाल के प्रमुख इतिवृत्त कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
मुग़ल शासकों के दरबार में स्वयं शासकों या दरबारियों द्वारा जिन पुस्तकों की रचना की गई उन्हें इतिवृत्त कहा जाता है। इतिवृत्त (क्रॉनिकल्स) मुगलकालीन इतिहास की जानकारी का बहुत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। सभी मुग़ल शासकों ने इतिवृत्तों के लेखन की ओर विशेष ध्यान दिया जिसके कारण हमें घटनाओं व शासन संबंधी विभिन्न पक्षों की व्यवस्थित

1. रचना के उद्देश्य (Purpose of the Writings)-मुगलकाल में रचे गए इतिवृत्त बहुत सोची-समझी नीति का उद्देश्य थे। विभिन्न इतिहासकारों व विद्वानों ने इस बारे में अपने-अपने मतों की अभिव्यक्ति की है जिनमें से ये पक्ष उभरकर सामने आते हैं

  • इतिवृत्तों के माध्यम से मुगल शासक अपनी प्रजा के सामने एक प्रबुद्ध राज्य की छवि बनाना चाहते थे।
  • इतिवृत्तों के वृत्तांत के माध्यम से शासक उन लोगों को संदेश देना चाहते थे जिन्होंने राज्य का विरोध किया था तथा भविष्य में भी कर सकते थे। उन्हें यह बताना चाहते थे कि यह राज्य बहुत शक्तिशाली है तथा उनका विद्रोह कभी सफल नहीं होगा।
  • इतिवृत्तों के माध्यम से शासक अपने राज्य के विवरणों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहते थे।

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2. इतिवृत्तों की विषय-वस्तु (Subjects of Chronicles)-मुग़ल शासकों ने इतिवृत्त लेखन का कार्य दरबारियों को दिया। अधिकतर इतिवृत्त शासक की देख-रेख में लिखे जाते थे या उसे पढ़कर सुनाए जाते थे। कुछ शासकों ने आत्मकथा लेखन का कार्य स्वयं किया। इस माध्यम से ये शासक स्वयं को प्रबुद्ध वर्ग में स्थापित करना चाहते थे, साथ ही अन्य लेखकों का मार्गदर्शन भी करना चाहते थे। इन सभी पक्षों से यह स्पष्ट होता है कि इन इतिवृत्तों के केन्द्र में स्वयं शासक व उसका परिवार रहता था। इस कारण इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासक, शाही परिवार, दरबार, अभिजात वर्ग, युद्ध व प्रशासनिक संस्थाएँ रहीं। इन इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासकों के नाम अथवा उनके द्वारा धारण उपाधियों की पुष्टि भी करना था। इसलिए इनके नाम सीधे तौर पर इतिवृत्त शासकों के नाम से जुड़े थे।

मुगलकाल के प्रमुख इतिवृत्तों में हैं-बाबरनामा या तुक-ए-बाबरी लेखक बाबर, हुमायूँनामा लेखिका हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम, अकबरनामा-लेखक अबुल फज़्ल, तुज्क-ए-जहाँगीरी लेखक जहाँगीर, शाहजहाँनामा लेखक मामुरी, बादशाहनामा (शाहजहाँ पर आधारित) लेखक-अब्दुल हमीद लाहौरी, आलमगीरनामा लेखक मुहम्मद काजिम इत्यादि हैं। विभिन्न इतिवृत्तों के नामों व लेखकों के नामों से यह स्पष्ट होता है कि मुग़ल शासक स्वयं के इतिहास-लेखन में पूरी रुचि लेते थे। इसके लिए वे इनके लेखकों को प्रत्येक तरह का संरक्षण भी देते थे तथा दरबार में उचित सम्मान भी। अधिकतर स्थितियों में इन इतिवृत्तों के लेखक शासक के अति नजदीकी मित्र होते थे।

प्रश्न 3.
मुगलों की मौलिक भाषा कौन-सी थी? उनके इतिवृत्त किस भाषा में मिलते हैं? इस काल में फारसी कैसे तथा किस-किस रूप में प्रचलन में आई?
उत्तर:
मुग़ल मूलतः मध्य एशिया से थे तथा इनकी मौलिक भाषा तुर्की थी। तुर्की भाषा में भी बाबर चगताई मूल का था, अतः उसकी भाषा ‘चगताई तुर्की’ थी। उसने अपनी आत्मकथा इसी भाषा में लिखी।

अकबर ने फारसी भाषा को दरबार की भाषा घोषित किया। उसने अपने दरबार में उन लोगों को स्थान व सम्मान दिया जो इस भाषा के ज्ञाता थे। शाही परिवार के सदस्यों को इस भाषा को सीखने का वातावरण दिया। फारसी को अपनाने के मुख्य कारण ईरान व मुगलों के संबंध कहे जा सकते हैं। हुमायूँ ने 15 वर्ष ईरान में निर्वासन में बिताए व उन लोगों के संपर्क में आया। उसने सत्ता मिलने के बाद उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप पद दिए। ईरानी दरबार इस काल में सांस्कृतिक विकास व बौद्धिकता का केन्द्र माना जाता था। अकबर उससे भी प्रभावित हुआ। अकबर की मिलनसार छवि के कारण भी ईरान से विद्वानों का एक दल मुगल दरबार में पद पाने के लिए आया। अकबर ने उन्हें समुचित स्थान दिया। इस तरह यह भाषा दरबार में अलग से अपनी पहचान बनाने में सफल रही। इसके बाद प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इसके ज्ञाता हो गए। इस तरह बहुत कम समय में लेखाकारों, प्रशासनिक अधिकारियों व अभिजात वर्ग के लोगों ने इसे सीख लिया।

(i) फारसी का भारतीयकरण-फारसी मुगल दरबार व प्रशासन तंत्र की भाषा तो बन गई, लेकिन इसका स्वरूप ईरान वाला नहीं था। मुगल साम्राज्य काफी विस्तृत था। इस साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्थानी, मराठी, बंगाली व तमिल भाषाएँ बोली जाती थीं। इन क्षेत्रों में जंब फारसी गई तो स्थानीय विद्वानों ने अपने-अपने क्षेत्रों की शब्दावली व मुहावरों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया। फारसी पर सर्वाधिक प्रभाव हिंदवी (उत्तर भारत की जन सामान्य की भाषा) का पड़ा। इन दोनों भाषाओं के संपर्क के कारण एक नई भाषा ‘उर्दू अस्तित्व में आई। यह भाषा हिंदवी में बोली जाती थी तथा फारसी लिपि में लिखी जाती थी।

(ii) अनुवाद कार्य-मुग़लकाल में अकबर के शासन व उसके बाद मौलिक लेखन कार्य फारसी में हुआ। इसके साथ बहुत-सी पुस्तकों का अनुवाद भी फारसी में किया गया। प्रारंभ में बाबरनामा का तुर्की से अनुवाद किया गया। इसके बाद अकबर ने महाभारत व रामायण नामक संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद का आदेश दिया। महाभारत का अनुवाद ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) के रूप में हुआ। यह पुस्तक फारसी के विद्वानों में बहुत लोकप्रिय हुई। अनुवादित रूप में यह पुस्तक ईरान व मध्य एशिया भी गई।

प्रश्न 4.
पांडुलिपियों में चित्रकारी की क्या भूमिका थी? जानकारी दें।
उत्तर:
मुग़ल शासकों ने जहाँ इतिवृत्त लिखने की दिशा में बहुत ध्यान दिया, वहीं उन्होंने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि इतिवृत्त सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति को समझ में आ सके। सामान्य रूप से पुस्तक या किसी रचना में किसी भाव या विषय की अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं हो पाती, बल्कि दृश्य उसको स्पष्ट कर देते हैं। यह बात पांडुलिपियों पर भी लागू होती है। मुग़ल शासकों व पांडुलिपि के लेखकों को इस बात का ज्ञान था। इसलिए हमने किताबखाना में काम करने वाले व्यक्तियों में चित्रकार का वर्णन भी किया है।

जब कोई भी इतिवृत्त लेखक लेखन कार्य करता था एवं यह महसूस करता था कि उक्त स्थान पर दृश्य की आवश्यकता है तो वह उस पृष्ठ पर उतनी जगह खाली छोड़ देता था। यदि बड़े चित्र की आवश्यकता होती तो आस-पास के पृष्ठों को छोड़ दिया जाता था। फिर चित्रकार लेखक से बातचीत कर किसी अन्य कागज पर विषय संबंधी चित्र बनाता था। फिर उसे उस पृष्ठ पर चिपका दिया जाता था या फिर पांडुलिपि के साथ संलग्न कर दिया जाता था। .

1. चित्रकारी का उद्देश्य (Aims of Paintings)-इतिवृत्त पर चित्रकारी मात्र भावों की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि कई और पक्षों को भी स्पष्ट करती थी; जैसे

• चित्रकारी पांडुलिपि के सौन्दर्य का अभिन्न अंग थी। किसी भी पांडुलिपि को उस समय तक पढ़ने के योग्य नहीं माना जाता था जब तक वह चित्रित न हो।

• राजा व राज्य की शक्ति के बारे में जो बात शब्दों में न कही जा सके उसे चित्र के माध्यम से दिखाया जाता था। उदाहरण के लिए शाही दरबार की अधिकतर चित्रकारी में शासक के साथ शेर व गाय अथवा शेर व बकरी के चित्र मिलते हैं। इसका अर्थ साफ है कि शासक शक्तिशाली व निर्बल सभी को संरक्षण देता था।

• जनता तक विभिन्न संदेश भेजने के लिए भी शासक इस कला का प्रयोग करते थे; जैसे कि उनके लिए साम्राज्य में रहने वाले सभी बराबर हैं। वे किसी भी तरह से उनमें अन्तर नहीं देखते।
अकबर के दरबारी लेखक अबुल फज्ल ने चित्रकारी को ‘जादुई कला’ कहा है। वह कहता है कि चित्रकारी निर्जीव को सजीव की भाँति प्रस्तुत करने की क्षमता रखती है।

2. पांडुलिपियों पर चित्रण (Paintings on Manuscripts)-मुग़ल शासकों ने पांडुलिपि चित्रण की ओर विशेष ध्यान दिया। अकबर के काल में चित्रित होने वाली मुख्य पांडुलिपियों में बाबरनामा, हुमायूनामा, अकबरनामा, (महाभारत का अनुवाद), तारीख-ए-अल्फी व तैमूरनामा थीं। बाद के शासकों ने अपने इतिवृत्तों विशेषकर तज्क-ए-जहाँगीरी व शाहजहाँनामा को चित्रित करवाया। इसके साथ ही उन्होंने पहले लिखे गए इतिवृत्तों की और पांडुलिपियों को तैयार करवाकर उन्हें चित्रित करवाया। ये पांडुलिपियाँ सैकड़ों की संख्या में किताबखाना में रखी गई थीं। मुगल शासकों द्वारा जिस तरह से पांडुलिपियों को चित्रित करवाया, उसकी नकल यूरोप के शासकों ने भी की। इस काल में चित्रित पुस्तकों को उपहार में देना एक प्रकार की परंपरा बन गई थी।

प्रश्न 5.
इतिवृत्त अकबरनामा पर संक्षिप्त निबंध लिखें।।
उत्तर:
मुगल वंश की जानकारी देने वाले इतिवृत्तों की संख्या बहुत अधिक है। इनमें जो सर्वाधिक चर्चित तथा सूचनाओं से परिपूर्ण है, वह है अकबरनामा। यह इतिवृत्त बहुत विस्तृत है तथा इसमें 150 से अधिक चित्रों को चित्रित किया गया है। इन चित्रों में दरबार, विभिन्न युद्धों, मोर्चाबन्दी का विवरण, शिकार, विवाह तथा भवन निर्माण के दृश्य हैं।

अकबरनामा का लेखन अबुल फज़्ल द्वारा किया गया। वह शेख नागौरी का पुत्र तथा फैजी का भाई था। वह अरबी, फारसी, तुर्की व यूनानी का ज्ञाता था। वह उदारवादी चिन्तक तथा सूफीवादी विचारधारा से प्रभावित था। अकबर से उसकी भेंट उसके बड़े भाई फैजी ने करवाई तथा वह उन्नति करता हुआ फैजी से काफी आगे निकल गया। अकबर उसके तर्क तथा वाद-विवाद करने की योग्यता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अकबर की विचारधारा को उदारवादी बनाने में बहुत योगदान दिया। वह अकबर के अति नजदीकी मित्रों में से एक रहा।

(1) अकबरनामा का लेखन (Writing of Akbarnama) अकबर ने अबुल फज्ल को अकबरनामा को लिखने का आदेश 1589 ई० में दिया। उसने इसके लिखने में कुल 13 वर्ष का समय लगाया। इस काल में उसने कई बार इस पुस्तक के कई प्रारूप तैयार किए। अन्ततः इसे अन्तिम रूप दिया। इस पुस्तक में घटनाओं का क्रमानुसार विवरण है। लेखक ने इसे अधिक-से-अधिक मौलिक दस्तावेजों तथा जानकार व्यक्तियों के मौलिक प्रमाण लेकर लिखा है।

अकबरनामा तीन खण्डों में विभाजित है। इसके प्रथम दो भाग ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी देते हैं जबकि तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी है। . अबुल फज्ल ने पहले खण्ड में पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति का आधार आदम को मानकर वहीं से लेखन प्रारंभ किया। उसने इस कड़ी में पैगम्बर मोहम्मद, भारत में दिल्ली सल्तनत का संक्षिप्त परिचय देते हुए अकबर के शासन काल के प्रारंभिक 30 वर्षों का वर्णन किया है। अकबरनामा के दूसरे खण्ड में अकबर के 30वें वर्ष से लेकर 46वें वर्ष तक के शासन का वर्णन है। इसके बाद वह अपना लेखन जारी रखना चाहता था लेकिन 1602 ई० में अकबर के पुत्र सलीम (बाद में जहाँगीर) ने विद्रोह कर दिया। इसी दौरान सलीम ने एक षड्यंत्र द्वारा वीर सिंह बुंदेला के हाथों अबुल फज्ल की हत्या करवा दी।

(i) अकबरनामा की विषय-वस्तु (Subject-Matter of Akbarnama)-अकबरनामा में राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया गया है। लेखक ने किसी घटना का पूरा विवरण प्राप्त करने के लिए संबंधित पक्षों की जानकारी भी दी है। उसने अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक व सांस्कृतिक पक्षों को स्पष्ट रूप से लिखा है। उसने अपने वर्णन में समय व तिथियों के अनुरूप परिवर्तन को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने अकबर के साम्राज्य में रहने वाले मुस्लिमों, हिंदुओं, जैनों व बौद्धों की जीवन-शैली, परम्पराओं तथा आपसी तालमेल को काफी महत्त्व दिया है। उसने अकबर के साम्राज्य को मिश्रित संस्कृति के केन्द्र के रूप में प्रस्तुत किया है।

अबुल फज़्ल का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। उसे अपना साप्ताहिक लेखन दरबार में पढ़ना होता था। इसलिए उसने अलंकृत भाषा को महत्त्व दिया। इस भाषा में लय व कथन शैली विशेष रूप से उभरकर सामने आई है। क्षेत्र-विशेष का वर्णन करते हुए उसने उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में किया है। उसके इस प्रयास से भारतीय फारसी शैली का विकास हुआ।

(ii) अकबरनामा का अनुवाद (Translation of Akbarmama)-अकबरनामा के अनुवाद का कार्य बंगाल सिविल सर्विसज़ के अधिकारी हेनरी बेवरिज (Henry Beveridge) ने अपने हाथ में लिया। उसने कड़ी मेहनत के बाद इस पुस्तक का अनुवाद किया।

प्रश्न 6.
मुगलों के राजत्व सिद्धांत के आदर्श क्या थे ? उनकी व्याख्या करें।
उत्तर:
मुगलों ने भारत पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया। उन्होंने अपने शासन में कुछ सिद्धान्तों को महत्त्व दिया। ये सिद्धांत भारत की परंपरागत शासन-व्यवस्था से भी जुड़े तथा दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों से भी। इनके राजत्व के सिद्धांत में मध्य-एशियाई तत्त्व भी थे तो ईरान का प्रभाव भी साफ दिखाई देता है। मुग़ल इतिवृत्तों में मुग़ल राज्य को आदर्श राज्य वर्णित किया है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ प्रस्तुत की गई हैं

1. मुग़ल राज्य : एक दैवीय राज्य (Mughal State :ADivine State)-मुगलकाल के सभी इतिवृत्त इस बात की जानकारी देते हैं कि मुगल शासक राजत्व के दैवीय सिद्धान्त में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उन्हें शासन करने की शक्ति स्वयं ईश्वर ने प्रदान की है। ईश्वर की इस तरह की कृपा सभी व्यक्तियों पर नहीं होती, बल्कि व्यक्ति-विशेष पर ही होती है।

मुगल शासकों के दैवीय राजत्व के सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व अबुल फज़्ल ने दिया। वह इसे फर-ए-इज इज़ादी (ईश्वर से प्राप्त) बताता है। वह इस विचार के लिए प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सहरावर्दी (1191 में मृत्यु) से प्रभावित था। उसने इस तरह के विचार ईरान के शासकों के लिए प्रस्तुत किए थे। भारत में अबुल फल के पिता शेख मुबारक नागौरी ने इसे समझा तथा अपने बेटे फज्ल व फैजी को बताया। अबुल फज्ल ने यह सिद्धांत अकबर के लिए प्रस्तुत किया। अबुल फज्ल का यह मत इतिवृत्तों में विचार बना तथा फिर चित्रकारों ने उन्हें चित्रित किया। चित्रकारों ने मुगल शासकों के चित्रों के चारों ओर प्रभा मण्डल बना दिया। यह प्रभा मण्डल सामान्य रूप से हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की तस्वीरों में होता है जबकि यूरोप में ईसा व वर्जिन मेरी के चित्रों में देखने को मिलता है।

2. सुलह-ए-कुल की नीति (Policy of Sulh-i-Kul)-अकबर की सुलह-ए-कुल (Absolute peace) की नीति अर्थात् सभी के साथ सुलह (किसी से मतभेद नहीं) की थी।

(i) नीति का अर्थ-मुगलकालीन इतिवृत्तों ने इस नीति को अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त किया है। हाँ, इतना सभी मानते हैं कि मुग़ल साम्राज्य में भिन्न-भिन्न जातियों व समुदायों के लोग रहते थे। शासक इस साम्राज्य में शान्ति व स्थायित्व का स्रोत था। इसलिए वह सभी नृजातीय समूहों व समुदायों से ऊपर था तथा वह इन सभी वर्गों के बीच मध्यस्थता करता था। क्योंकि न्याय व शान्ति का मार्ग तालमेल से निकलता था, अतः यह नीति मुग़ल शासकों व साम्राज्य के लिए आदर्श बनी। अबुल फज़्ल, सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। उसके अनुसार सुलह-ए-कुल इस सिद्धांत पर आधारित था कि राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुंचे तथा प्रजा शांति से रहे।

(ii) नीति को व्यवहार में लाना-मुगल शासक विशेषकर अकबर ने धर्म व राजनीति दोनों के संबंधों को समझने का प्रयास किया। उसने इनकी सीमा व महत्त्व को समझा। इस समझ के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूरी तरह धर्म का त्याग संभव नहीं है लेकिन धर्म की कट्टरता को त्यागकर अवश्य चला जाए। उसने धर्म को राजनीति से भी थोड़ा दूर करने का प्रयास किया। इस कड़ी में उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर, यह सन्देश दिया कि गैर-इस्लामी प्रजा से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। उसने युद्ध में पराजित सैनिकों को दास बनाने पर रोक लगाई तथा जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन को गैर-कानूनी घोषित किया। अकबर ने अपने साम्राज्य में गौ-वध को देशद्रोह घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी।

अकबर ने इन फैसलों के माध्यम से धार्मिक पक्षपात को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो साथ ही बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं का सम्मान भी किया। उसने राज्य के सभी अधिकारियों को सुलह-ए-कुल के नियमों के पालन करने के निर्देश दिए। इस तरह अकबर अपनी इस नीति के द्वारा राज्य में शांति व स्थायित्व का आधार बनाने में सफल रहा।

3. सामाजिक अनुबंध पर आधारित न्यायपूर्ण प्रभुसत्ता (Just Sovereignty Based on Social Contract)-मुगल शासकों ने न्याय को विशेष महत्त्व दिया। वे यह मानते थे कि न्याय व्यवस्था ही उनसे सही अर्थों में प्रजा के साथ संबंधों की व्याख्या है। अबुल फज़्ल ने अकबर के प्रभुसत्ता के सिद्धांत को स्पष्ट किया है। उसके अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के चार तत्त्वों-जीवन (जन), धन (माल), सम्मान और विश्वास (दीन) की रक्षा करता है। इसके बदले में जनता से आशा करता है कि वह राजाज्ञा का पालन करे तथा अपनी आमदनी (संसाधनों) में से कुछ हिस्सा राज्य को दे। अबुल फज़्ल स्पष्ट करता है कि इस तरह का चिन्तन किसी न्यायपूर्ण संप्रभु का ही हो सकता है जिसे दैवीय मार्गदर्शन प्राप्त हो।

मगल शासकों ने सामाजिक अनबंध पर आधारित न्याय को अपनाया तथा जनता में प्रचारित भी किया। इसके लिए विभिन्न प्रकार के प्रतीकों को प्रयोग में लाया गया। इसमें सर्वाधिक कार्य चित्रकारों के माध्यम से करवाया गया। मुगल शासकों ने दरबार तथा सिंहासन के आस-पास विभिन्न स्थानों पर जो चित्रकारी करवाई उसमें वो शेर तथा बकरी या शेर तथा गाय साथ-साथ बैठे दिखाई देते हैं। उनकी चित्रकारी जनता को यह सन्देश देने का साधन था कि इस राज्य में सबल या दुर्बल दोनों परस्पर मिलकर रह सकते हैं। इनमें भी कुछ चित्रों में शासक को शेर पर सवार दिखाया गया है जो इस बात का संदेश है कि उसके साम्राज्य में उनसे शक्तिशाली कोई नहीं था। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि मुगलों ने विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से न्याय को प्रदर्शित करने का प्रयास किया तथा स्पष्ट किया कि इसका आधार सामाजिक अनुबंध है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 7.
मुग़लों की राजधानियाँ कौन-कौन सी थीं ? इन राजधानी नगरों का वर्णन करें।
उत्तर:
राजधानी नगर मुगलों की सभी गतिविधियों का केन्द्र थे। मुगलों के राजधानी नगर को राज्य का हृदय-स्थल कह दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुगलों का राजधानी नगर कभी एक नहीं रहा बल्कि समय व स्थिति के अनुरूप उसमें बदलाव आते रहे। मुगलों के आने से पूर्व भारत में दिल्ली सल्तनत थी। स्वाभाविक है कि दिल्ली ही इस काल में राजधानी रहा। 1504 ई० में सिकन्दर लोदी ने आगरा शहर की नींव रखी। इससे सत्ता का एक और केन्द्र बन गया तथा गतिविधियों का संचालन दोनों नगरों से होने लगा। बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई में विजय के बाद पहले दिल्ली पर फिर आगरा पर कब्जा किया।

(i) मुग़ल साम्राज्य का प्रारंभिक काल-बाबर ने अपनी राजधानी आगरा को रखा। वहाँ पर उसने अपनी आवश्यकता के अनुरूप कुछ भवन बनवाए तथा अधिकतर की मुरम्मत करवाई। उसकी मृत्यु के बाद हुमायूँ ने भी आगरा को ही राजधानी बनाया। जिस समय वह शेरशाह से पराजित हुआ तो उसने कुछ समय के लिए दिल्ली को राजधानी बनाया। वहाँ पर उसने ‘दीन-पनाह’ नामक भवन का निर्माण भी करवाया।

(ii) अकबर के काल में राजधानी-पानीपत के दूसरे युद्ध (1556) के बाद अकबर ने दिल्ली व आगरा पर नियंत्रण किया। 1556-60 ई० तक अकबर ने अपने संरक्षक बैहराम खाँ के नेतृत्व में शासन किया। उस समय राजधानी आगरा थी लेकिन शाही वंश के अधिकतर सदस्य दिल्ली में रहते थे।
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1560 ई० के बाद अकबर ने आगरा में लाल किले का निर्माण प्रारंभ करवाया। उसने इसे सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत तथा आवश्यकता की दृष्टि से काफी विशाल बनवाया। उसने इसके लिए आस-पास के क्षेत्रों से लाल-बलुआ पत्थर मंगवाया तथा 1568 ई० तक इस किले का अधिकतर हिस्सा बनकर तैयार हो गया। जिस समय आगरा में किले का निर्माण हो रहा था, उस समय अकबर सूफी मत के प्रभाव में आ गया। इसी कड़ी में उसे आगरा के पास सीकरी नामक स्थान पर एक सूफी सन्त सलीम चिश्ती की जानकारी मिली। उसके बाद वह उसका अनुयायी बन गया। सलीम चिश्ती के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए अकबर ने 1570 ई० में सीकरी का नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी किया तथा इस स्थल को राजधानी घोषित कर दिया। यह स्थान आगरा-अजमेर मार्ग पर था तथा लोगों की पसंदीदा जगह थी। इस तरह फतेहपुर सीकरी राजधानी व तीर्थ स्थल दोनों रूपों में उभरकर सामने आया।

(iii) जहाँगीर व शाहजहाँ के काल में राजधानियाँ-जहाँगीर का राज्यारोहण आगरा में हुआ था तो यही स्थल राजधानी था। 1611 ई० में नूरजहाँ के साथ विवाह के उपरांत वह लाहौर चला गया। उसने वहाँ रावी नदी के तट पर एक लाल किले का निर्माण करवाया। जहाँगीर की मनपसंद जगह लाहौर थी। अतः यह उसकी राजधानी भी रहा तथा उसने अधिकतर समय वहाँ गुजारा। जहाँगीर गर्मियों के दिनों में अपना समय श्रीनगर में बिताया करता था। इस हेतु उसने शालीमार व निशात बागों का निर्माण भी करवाया। इस तरह यह स्थल भी उसकी अस्थायी राजधानी रहे। ‘. जहाँगीर के बाद शाहजहाँ ने प्रारंभ में एक दशक तक अपनी राजधानी आगरा रखी। वहाँ ताजमहल का निर्माण करवाया। 1640 ई० में उसने अपना ध्यान दिल्ली की ओर दिया। उसने दिल्ली के प्राचीन आबादी क्षेत्र के पास नया शहर बसाया जिसे शाहजहानाबाद का नाम दिया। इस क्षेत्र में उसने लालकिला, जामा मस्जिद, चाँदनी-चौक बाजार का निर्माण करवाया। 1648 ई० में शाहजहाँ ने आगरा की बजाय यहाँ अधिक समय बिताना प्रारंभ कर दिया। शाहजहाँ का नया नगर विशाल व भव्य था।

(iv) औरंगजेब काल में राजधानी-औरंगज़ेब ने अपनी राजधानी की गतिविधियाँ दिल्ली से चलाईं, परन्तु उसने आगरा के महत्त्व को कम नहीं होने दिया। प्रारंभ में वह आगरा के किले से इसलिए कटा रहा क्योंकि वहाँ शाहजहाँ बन्दी था। अपने जीवन के अन्तिम 25 वर्ष उसने दक्षिण में बिताए। वहाँ मराठवाड़ा क्षेत्र में वह शिविर से प्रशासन चलाता रहा। अन्ततः औरंगाबाद नामक स्थान पर उसने दम तोड़ दिया।

प्रश्न 8.
मुगलों के शाही दरबार के बारे में आप क्या जानते हो? इस बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य का हृदय दरबार था जिसे शाही दरबार कहा गया है। शाही दरबार में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल राजसिंहासन अथवा तख्त होता था। इस पर बैठकर शासक शासन के कार्यों को संचालित करता था। राजसिंहासन एक ऐसे स्तंभ का प्रतीक माना जाता था मानो इस पर पृथ्वी टिकी हो। राजसिंहासन के ऊपर बनी छतरी, शासक की कांति (चमक) सूर्य की कांति से अलग करने वाली मानी जाती थी। राजसिंहासन को ईश्वर के प्रतीक व उपहार के रूप में देखा जाता था। राजसिंहासन के सामने बहुत बड़ा आँगन होता था, जिसकी भव्यता, सजावट, कालीन व पर्दे शासक व साम्राज्य की पहचान माने जाते थे।
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(i) दरबारी शिष्टाचार-मुगलों का दरबार चाहे काफी बड़ा हो, लेकिन वहाँ भीड़-भाड़ की स्थिति कभी नहीं होती थी। दरबार में कौन कहाँ होगा, किस स्थिति में होगा, कौन प्रवेश करेगा तथा कौन जाएगा सब कुछ एक निश्चित नियम के अनुरूप होता था। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि दरबार में शासक की आज्ञा के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

(ii) दरबार में अभिवादन-दरबार में अभिवादन के तरीके भी व्यक्ति की हैसियत तथा पहुँच को स्पष्ट करते थे। अभिवादन में सामने जितना बड़ा व्यक्ति होता था, उतना ही झुकना दरबारी परंपरा थी। अभिवादन का सबसे उच्चतम रूप ‘सिजदा’ अर्थात् दंडवत लेटना था। यह केवल शासक के समक्ष ही होता था। शाहजहाँ के काल में चार तसलीम (झुककर चार बार हाथ को जमीन से माथे की ओर लाना) तथा जमींबोसी (झुककर जमीन चूमना) भी अपनाए जाने लगे थे। अभिवादन का एक सामान्य तरीका कोर्निश भी था। इसके अनुसार दरबारी अपने दाएँ हाथ की हथेली को अपनी छाती पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाता था। यह इस बात का प्रतीक था कि अभिवादन करने वाला व्यक्ति इंद्रिय व मन स्थल को हाथ लगाते हुए झुककर विनम्रता से अपने को प्रस्तुत कर रहा है।

(iii) झरोखा-झरोखा मुग़ल दरबारी व्यवस्था की अकबर द्वारा जोड़ी गई परंपरा थी। यह प्राचीन भारतीय शासकों से ली गई थी। इसमें शासक प्रातः उठते ही सामान्य प्रार्थना इत्यादि के बाद अपने महल के एक विशेष हिस्से में बनी खिड़की (झरोखे) पर सूर्य की ओर मुँह करके बैठ जाता था। इस जगह के ठीक नीचे काफी खुली जगह होती थी जिसमें सैनिक, व्यापारी, कृषक, शिल्पकार यहाँ तक की बीमार बच्चों के साथ औरतें होती थीं। वे सूर्योदय से पहले वहाँ एकत्रित हो जाते थे तथा शासक की झलक पाते ही ऊँची आवाज में बोलते थे ‘बादशाह सलामत’ । अकबर द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा अटूट चलती रही तथा उसका यह विश्वास था कि इससे जनता का सत्ता में विश्वास बनता था। औरंगज़ेब ने बाद में इसे गैर-इस्लामी घोषित करते हुए बन्द कर दिया था।

(iv) शाही उत्सव व समारोह-मुगल दरबार में सामान्य प्रशासनिक गतिविधियों के अतिरिक्त कुछ विशेष उत्सव व समारोह होते थे। उस दिन दरबार को विशिष्ट ढंग से सजाया जाता था। सजाने के लिए रंग-बिरंगे ढंग से सजे डिब्बों में रखी मोमबत्तियाँ, महल की दीवारों पर विभिन्न तरह के बंदनवार (सज्जा के लिए विशेष रूप से तैयार चीजें) तथा विभिन्न तरह की सुगंधित चीजों का प्रयोग किया जाता था। शाही उत्सव व समारोह तीन तरह के होते थे।

a. सामूहिक सामाजिक समारोहों में ईद, शब-ए-बारात तथा (हिजरी कैलेंडर के 8वें महीने की 14वीं तारीख या सावन की रात्रि का त्योहार) होली व दीवाली प्रमुख होते थे। इनमें जनता के विभिन्न वर्गों के लोग दरबार में शाही परिवार के सदस्यों के साथ भाग लेते थे।

b. शाही विशिष्ट समारोह में सिंहासनारोहण की वर्षगाँठ, सूर्यवर्ष व चंद्रवर्ष के अनुरूप शासक के जन्म का कार्यक्रम तथा वसंतागमन पर फारसी त्योहार नौरोज मुख्य थे। इनमें शासक का जन्मदिन अन्यों की तुलना में अधिक शोभायमान तथा खर्चीला होता था।

c. शाही दरबार का तीसरा समारोह व उत्सव शहजादों की शादियों का होता था। यह इतना मंहगा, मनमोहक व आकर्षक होता था कि सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता था।

प्रश्न 9.
मुग़ल शासकों के परिवार का वर्णन करते हुए शाही परिवार की महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगल शासन-व्यवस्था में शासक प्रमुख होता था। परंतु यह ध्यान रहना चाहिए कि उसका अकेले तौर पर कोई अस्तित्व नहीं था। प्रशासन की प्रत्येक गतिविधि में उसके परिवार के सदस्यों की भूमिका अहम् होती थी। शासक के परिवार को शाही परिवार कहा जाता था। शाही परिवार के सदस्यों को दरबार से अलग वर्णित करते हुए इतिवृत्तों में सर्वाधिक प्रचलित शब्द ‘हरम’ मिलता है। हरम शब्द शासक के निवास की ओर संकेत करता है। शाब्दिक रूप से हरम का अर्थ ‘पवित्र स्थान’ होता है। इतिवृत्तों में हरम के वर्णन में शासक, उसकी पत्नी, उपपत्नी, उसके नजदीक व दूर के रिश्तेदार, वास्तविक माता, धाय माता, सौतेली माता, उपमाता, बहन, पुत्री, चाची, मौसी उनके बच्चे व पुत्रों की पत्नियाँ व उनके सहयोगी होते थे। इसके अतिरिक्त महिला परिचारिकाएँ, गुलाम व दास-दासी भी इस परिवार का अंग होते थे।

अकबर के शासन काल से पहले मुग़लों के शाही परिवार में एक वर्ग विशेष के लोग थे। परन्तु अकबर ने जब राजपूतों के साथ वैवाहिक, राजनीतिक व मैत्री संबंध स्थापित किए तो पारिवारिक संरचना में बदलाव आया। इसमें सबसे बड़ा बदलाव तो यह था कि अब पादशाह बेगम (मुख्य पत्नी) अर्थात् हरम की राजपूत पत्नियाँ बनीं।
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1. हरम की व्यवस्था (System of Haram)-शाही परिवार के हरम में महिलाओं की प्रमुखता थी। इसमें सभी महिलाएँ बराबर की तथा एक जैसी हैसियत वाली नहीं थीं। हरम में प्रमुख महिलाओं को मोटे तौर पर तीन नामों से जाना जाता था।

बेगम-शाही परिवार में सबसे ऊँचा स्थान बेगमों का था। बेगम प्रायः कुलीन परिवार से संबंधित होती थी। उनके साथ विवाह एक निश्चित परंपरा के अनुरूप होता था। वे मेहर (दहेज) के रूप में काफी धन इत्यादि लाती थी। पहले ही दिन से इनका सम्मान होता था। शासक जिस बेगम को सर्वाधिक चाहता था उसे पादशाह

बेगम (मुख्य पत्नी) का खिताब दिया जाता था। उसकी स्थिति अन्य बेगमों की तुलना में अच्छी होती थी।
अगहा-हरम में इनका स्थान दूसरे नंबर पर था। ये सामान्य कुलीन परिवारों से थीं। ये भी शादी की परंपरा के बाद ही हरम में आती थीं।
अगाचा-हरम में इनका दर्जा तीसरा था। इन्हें उपपत्नियों का दर्जा प्राप्त था। इन्हें इनके खर्चे के अनुरूप मासिक भत्ता व दर्जे के अनुरूप उपहार इत्यादि मिलते थे।

2. शाही परिवार की महिलाओं का राजनीति में हस्तक्षेप (Interferance in Politics by the Women of Royal Family)-कई बार शाही परिवार की महिलाएँ भी राजनीति में सक्रिय रहती थीं। उदाहरण के लिए नूरजहाँ के राजनीति में आने के बाद हरम की स्थिति व पहचान दोनों बदल गई। 1611 ई० से 1626 ई० तक जहाँगीर के शासन काल में नूरजहाँ ने प्रत्येक गतिविधि में हिस्सा लिया। वह झरोखे पर बैठती थी तथा सिक्कों पर उसका नाम आता था। ‘नूरजहाँ गुट’ सही अर्थों में जहाँगीर के शासन में सारे फैसले करता था। जहाँगीर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि मैंने बादशाहत नूरजहाँ को दे दी है, मुझे कुछ प्याले शराब तथा आधा सेर माँस के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए। शाहजहाँ के शासन काल में उसकी पुत्री जहाँआरा तथा रोशनआरा लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक फैसलों में शामिल होती थीं। वे उच्च पदों पर आसीन मनसबदारों की भाँति वार्षिक वेतन लेती थीं। जहाँआरा (शाहजहाँ की बड़ी बेटी) तो सूरत की बंदरगाह (भारत की विदेशी व्यापार की उस समय सबसे बड़ी बंदरगाह) से निरंतर राजस्व की वसूली
करती थी।

हरम की प्रमुख महिलाओं ने इमारतों व बागों का निर्माण कार्य करवाया। नूरजहाँ ने आगरा में एतमादुद्दौला (अपने पिता) के मकबरे का निर्माण करवाया। शालीमार व निशात बागों को बनवाने में भी उसकी मुख्य भूमिका थी। इसी प्रकार दिल्ली में शाहजहाँनाबाद की कई कलात्मक योजनाओं में जहाँआरा की भूमिका थी। उसने शाहजहाँनाबाद में आँगन, बाग व एक दोमंजिला कारवाँ-सराय का निर्माण करवाया। दिल्ली के चाँदनी चौक की रूप-रेखा भी उसके द्वारा ही तैयार की गई थी।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में नौकरशाही पर निबंध लिखें।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य एक संतुलित तथा व्यवस्थित राज्य था। इसे यह रूप देने वाला वर्ग नौकरशाहों का था। इन नौकरशाहों पर मुगलों ने विश्वास भी किया तथा इन पर नियंत्रण भी रखा, जिसके कारण मुग़ल प्रशासन संगठित व उच्च आदर्शों वाला बन पाया। मुगलों के प्रशासन में भारतीय व विदेशी तत्त्वों का मिश्रण था। इसमें केंद्रीय व प्रांतीय शासन में ईरानी व मध्य एशियाई तत्त्व .
अधिक थे जबकि स्थानीय प्रशासन के अधिकतर तत्त्व भारतीय थे।

1. नौकरशाहों की नियुक्ति प्रक्रिया-मुग़ल शासन में शासक सबसे ऊपर थे। उनकी शक्तियाँ असीम थीं। अबुल फज्ल स्पष्ट करता है कि मुग़ल साम्राज्य में सत्ता की संपूर्ण क्रिया एकमात्र बादशाह में निहित थी। साम्राज्य के बाकी सभी लोग उसके आदेशों की पालना करते थे। वह व्यवस्था को चलाने के लिए योग्यता के आधार पर अधिकारियों की नियुक्ति करता था। इन्हीं लोगों के सहारे मुगल शासक एक प्रभावशाली तंत्र खड़ा कर सके। नियुक्ति के संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ किसी व्यक्ति के दरबार में आने तथा सेवा से निवृत्त होने की कोई आयु नहीं थी। जिस भी व्यक्ति को सेवा में लेना होता था, शासक उससे बातचीत कर संबंधित विभाग के वरिष्ठ व्यक्ति को कहता था कि उसे दरबार में प्रस्तुत करे। इस तरह आदेश का पालन करते हुए संबंधित व्यक्ति की विस्तृत जाँच-पड़ताल करके सेवा में लेने का फैसला किया जाता था।

2. मनसबदारी प्रथा-मुग़ल नौकरशाही में मनसबदारी प्रमुख थी। यह सैनिक व असैनिक दोनों के लिए थी। मनसब शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है-पद। इस शब्द की व्याख्या के अनुसार जो भी व्यक्ति मुग़लों की सेवा में आता था तो उसे एक मनसब दिया जाता था। वह मनसब उसकी दरबार में पहचान, जिम्मेदारी व हैसियत तीनों बातों का अहसास कराता था। मनसब में जात व सवार दो शब्दों का प्रयोग होता था। जात शब्द व्यक्ति के पद (status) को स्पष्ट करता था जबकि सवार उसके पास ऊँट, घोड़े, बैल इत्यादि सैनिक क्षमता का बोध कराता था। इससे यदि किसी व्यक्ति की 1000 की जात मनसब व 1000 की सवार मनसब है तो वह मनसबदार प्रथम श्रेणी में होता था, यदि जात की तुलना में सवार 500 या इसके आस-पास थे तो वह द्वितीय श्रेणी में आता था तथा यदि उसके सवार नाममात्र थे या थे ही नहीं वह तृतीय श्रेणी में आता था।

इसी श्रेणी के आधार पर उसका वेतन निर्धारित होता था जबकि इसी आधार पर उसे दरबार में जगह मिलती थी। यहाँ तक कि शासक के शिविर में भी उसी अनुरूप उसका तंबूकक्ष (Tent-Room) बनता था। मनसबदारी व्यवस्था की खास बात यह थी कि मनसबदार चाहे 20 के रैंक का हो या 5,000 का वह सीधे शासक से जुड़ा होता था। वह किसी अन्य व्यक्ति के लिए जिम्मेदार नहीं होता था। मुगलकाल में सामान्य रूप से 1000 से बड़े पद के मनसबदार को उमरा (अमीर वर्ग का बहुवचन) कहा जाता था। मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति व पद मुक्ति की शक्तियाँ स्वयं शासक के पास होती थीं।

3. नौकरशाहों के प्रति दरबार का व्यवहार-मुगल दरबार में नौकरी पाना बेहद कठिन कार्य था। दूसरी ओर अभिजात व सामान्य वर्ग के लोग शाही सेवा को शक्ति, धन व उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का एक साधन मानते थे। नौकरी में आने वाले व्यक्ति से आवेदन लिया जाता था, फिर मीरबख्शी की जाँच-पड़ताल के बाद उसे दरबार में प्रस्तुत होना होता था। मीर बख्शी के साथ-साथ दीवान-ए-आला (वित्तमंत्री) तथा सद्र-उस-सुदुर (जन कल्याण, न्याय व अनुदान का मंत्री) भी उस व्यक्ति को कागज तैयार करवाकर अपने-अपने कार्यालयों की मोहर लगाते थे। फिर वे शाही मोहर के लिए मीरबख्शी के द्वारा ले जाए जाते थे। ये तीनों मंत्री दरबार में दाएँ खड़े होते थे, बाईं ओर नियुक्ति व पदोन्नति पाने वाला व्यक्ति खड़ा होता था। शासक उससे कुछ औपचारिक बात करके उसे दरबार के प्रति वफादार रहने की बात कहता था तथा संकेत करता था कि वह किस स्थान पर खड़ा हो। इस तरह उस व्यक्ति की नियुक्ति तथा पदोन्नति मानी जाती थी।

4. नौकरशाहों पर नियंत्रण-शासक द्वारा नौकरशाहों पर नियंत्रण के लिए कुछ नियम बनाए गए थे। उनके अनुसार शासक सामान्य रूप से इनके प्रति कठोर व्यवहार रखता था। नियमित निरीक्षण में इन्हें किसी तरह की छूट नहीं थी। थोड़ा-सा भी शक होने या अनुशासन की उल्लंघना करने पर इन्हें दण्ड दिया जाता था। इनकी कभी भी कहीं भी बदली की जा सकती थी। कोई भी अधिकारी किसी भी कार्य को करने की मनाही नहीं कर सकता था। इन सबके अतिरिक्त यह कि इनका पद पैतृक नहीं होता था अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को नए सिरे से जीवन की शुरुआत करनी होती थी। किसी भी अभिजात वर्ग के व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति, उसकी सन्तान को नहीं दी जाती थी बल्कि यह स्वतः ही बादशाह या दरबार की सम्पत्ति बन जाती थी।

प्रश्न 11.
मुगलों की विदेश नीति का परिचय देते हुए उनकी ईरान व तुर्की साम्राज्य के प्रति नीति का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगल शासकों की विदेश नीति काफी परिपक्व थी। शासक जिस तरह की उपाधियों या पदवियों को धारण करते थे उनका असर पड़ोसी राज्यों पर अवश्य होता था। जहाँगीर (विश्व पर कब्जा करने वाला), शाहजहाँ (विश्व का शासक) तथा आलमगीर (विश्व का स्वामी) द्वारा धारण की गई उपाधियाँ खास थीं। इतिवृत्तों के लेखकों ने इन उपाधियों की व्याख्या व अर्थों का हवाला बार-बार दिया ताकि मुगल अविजित क्षेत्रों पर भी राजनीतिक नियंत्रण बना सकें तथा एक बार विजित करने के उपरांत उनका उस पर हमेशा के लिए हक बना रहे। इस तरह से स्पष्ट होता है कि मुग़ल अपने साम्राज्य की सीमा विस्तार के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। उनकी इस नीति के आधार पर ही उनके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों का निर्धारण होता था। इन रिश्तों में कूटनीतिक चाल व संघर्ष साथ-साथ चलता था। इस कड़ी में पड़ोसी राज्यों के साथ क्षेत्रीय हितों के तनाव व राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चलती रहती थी। इसके साथ-साथ दूतों का . आदान-प्रदान भी होता रहता था।

1. ईरान के प्रति नीति (Policy Towards Perssia)-भौगोलिक दृष्टि से मुगल साम्राज्य की स्थिति वर्तमान भारत से थोड़ी भिन्न थी। उस समय पड़ोसी देशों में सबसे बड़ी सीमा ईरान में लगती थी। ऐसे में स्वाभाविक है कि दोनों के बीच कूटनीतिक संबंध भी रहे, तनाव की स्थितियाँ भी रहीं तथा संघर्ष भी हुआ। भारत व ईरान के बीच सामरिक व व्यापारिक महत्त्व का शहर कन्धार था। यही स्थल मुगलों व सफावियों के बीच झगड़े की जड़ रहा। झगड़े की शुरुआत 1507 ई० में बाबर द्वारा कन्धार पर कब्जा करने से प्रारंभ हुई थी तथा उसके बाद यह इन दोनों वंशों के बीच प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गया जिसके कारण दोनों के बीच लंबे समय तक कंधार पर अधिकार के लिए संघर्ष चला तथा 1649 में ईरान ने अन्ततः इस पर कब्जा कर लिया। शाहजहाँ ने तीन अभियान भेजे, परंतु वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद कन्धार कभी भी मुग़ल साम्राज्य व भारत का हिस्सा नहीं रह सका। औरंगज़ेब ने कन्धार को प्राप्त करने की बजाय क्षेत्र में शान्ति को महत्त्व दिया।

2. तुर्की साम्राज्य से संबंध (Relation with Ottomans Empire)-ईरान से आगे तुर्की साम्राज्य था जिसे सामान्य भाषा में ऑटोमन साम्राज्य के नाम से जाना जाता है। इस साम्राज्य में वर्तमान सऊदी अरब, कुवैत, सीरिया, जॉर्डन, ईरान व पश्चिमी एशिया के कई और देश थे। मुगलकाल में ऑटोमन (तुर्की) साम्राज्य धार्मिक व व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। धार्मिक दृष्टि से इसलिए क्योंकि मक्का व मदीना जैसे ऐतिहासिक शहर इस क्षेत्र में थे जिनके प्रति लोगों में श्रद्धा थी। दूसरा यह कि व्यापार का अन्तर्राष्ट्रीय मार्ग रेशम मार्ग इस क्षेत्र से गुजरता था। भारत का थल मार्ग से होने वाला 80% व्यापार इस क्षेत्र से होता था।

मुगल शासकों ने ऑटोमन साम्राज्य के बारे में यह नीति अपनाई कि उन्हें इस क्षेत्र के विदेशी व्यापार से जो लाभ होता था, उसका काफी हिस्सा वे इस क्षेत्र के धर्म स्थलों के विकास पर लगाते थे तथा कुछ पैसा फकीरों इत्यादि में बाँट देते थे। इसके कारण मुगलों की छवि भी बहुत उच्च बनी। मक्का व मदीना की देख-रेख करने वाले व्यक्तियों को मुगलों से आने वाले धन की प्रतीक्षा रहती थी।

औरंगजेब ने धन भेजने के कारणों व उद्देश्यों के बारे में विस्तृत जाँच करवाई। उसे पता चला कि इसके कारण मुगलों की अन्तर्राष्ट्रीय छवि तो जरूर अच्छी बनती है लेकिन धन का दुरुपयोग भी हो रहा है। इसलिए उसने इस धन को नियंत्रित किया तथा स्पष्ट किया कि इस धन का वितरण भारत में हो। औरंगजेब के इस कदम की प्रतिक्रिया भारत व मक्का-मदीना दोनों जगह हुई। यहाँ के कट्टरपंथियों ने इसे अनुचित करार दिया जबकि उदार लोगों ने सही व संतुलित कार्य कहा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ऑटोमन साम्राज्य धार्मिक व व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। मुगलों ने इसे उचित महत्त्व देकर कार्रवाई की।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. ‘अकबरनामा’ का लेखक कौन था?
(A) अकबर
(B) गुलबदन बेगम
(C) अबुल फज्ल
(D) बाबर
उत्तर:
(C) अबुल फज्ल

2. ‘आइन-ए-अकबरी’ रचना है
(A) अकबर की
(B) बाबर की
(C) अबुल फज्ल की
(D) जहाँगीर की
उत्तर:
(C) अबुल फज्ल की

3. ‘आइन-ए-अकबरी’ का लेखन पूरा हुआ
(A) 1556 ई० में
(B) 1565 ई० में
(C) 1590 ई० में
(D) 1598 ई० में
उत्तर:
(D) 1598 ई० में

4. शाह नहर की मरम्मत किसने करवाई थी?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहाँगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(D) शाहजहाँ ने

5. मुगलकाल में आर्थिक इतिहास की जानकारी देने वाला सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है
(A) बाबरनामा
(B) अकबरनामा
(C) आइन-ए-अकबरी
(D) तुजक-ए-जहाँगीरी
उत्तर:
(C) आइन-ए-अकबरी

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

6. मुगलकालीन स्रोतों में रैयत’ शब्द का अर्थ लिया जाता है
(A) कृषक से
(B) प्रजा से
(C) दोनों से
(D) किसी से नहीं
उत्तर:
(C) दोनों से

7. मुगलकाल में कृषक श्रेणी में नहीं आता था
(A) ज़मींदार
(B) खुद-काश्त
(C) पाहि-काश्त
(D) मुंजारा
उत्तर:
(A) ज़मींदार

8. पानीपत की पहली लड़ाई कब हुई थी?
(A) 1517 ई० में
(B) 1526 ई० में
(C) 1556 ई० में
(D) 1761 ई० में
उत्तर:
(B) 1526 ई० में

9. मुगलकाल में सरकारी भूमि कहलाती थी
(A) जागीर
(B) मदद-ए-मास
(C) खिराज
(D) खालिसा
उत्तर:
(D) खालिसा

10. किसी अधिकारी या मनसबदार को उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला भू-क्षेत्र कहलाता था
(A) जागीर
(B) मदद-ए-मास
(C) खिराज
(D) खालिसा
उत्तर:
(A) जागीर

11. रहट का सामान्य तौर पर सिंचाई के लिए प्रयोग प्रारंभ हुआ
(A) गुप्तकाल में
(B) मौर्य काल में
(C) मुगलकाल में
(D) ब्रिटिश काल में
उत्तर:
(C) मुगलकाल में

12. अकबर की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 1530 ई० में
(B) 1605 ई० में
(C) 1556 ई० में
(D) 1707 ई० में
उत्तर:
(B) 1605 ई० में

13. मुग़लकाल में कौन-सी नई फसल कृषि व्यवस्था का हिस्सा बनी?
(A) तम्बाकू
(B) रेशम
(C) मक्का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. रबी की फसल की कटाई होती थी
(A) जून-जुलाई में
(B) अक्तूबर-नवम्बर में
(C) दिसम्बर-जनवरी में
(D) मार्च-अप्रैल में
उत्तर:
(D) मार्च-अप्रैल में

15. जाति व्यवस्था में महत्त्व दिया जाता था
(A) सामाजिक हैसियत को
(B) पैतृक व्यवसाय को
(C) जातीय बंधनों को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी को

16. ‘आईन-ए-अकबरी’ कितने भागों का संकलन है?
(A) 4
(B) 5
(C) 6
(D) 3
उत्तर:
(D) 3

17. ग्राम पंचायत के फैसले प्रायः किए जाते थे
(A) कृषक वर्ग द्वारा
(B) बहुमत द्वारा
(C) गाँव के प्रभावी लोगों द्वारा
(D) सरकार के निर्देशों द्वारा
उत्तर:
(C) गाँव के प्रभावी लोगों द्वारा

18. ग्राम पंचायत के मुखिया का चुनाव प्रायः होता था
(A) बहुमत के आधार पर
(B) पैतृक आधार पर
(C) सर्वसम्मति से
(D) सरकारी अधिकारियों द्वारा
उत्तर:
(B) पैतृक आधार पर

19. मुगल काल में पंचायत का मुखिया कौन होता था?
(A) मनसबदार
(B) आमिल
(C) दीवान
(D) मुकद्दम या मंडल
उत्तर:
(D) मुकद्दम या मंडल

20. जातीय पंचायत का कठोरतम दंड था
(A) मृत्यु दंड देना
(B) ज़मीन से बेदखल करना
(C) सामाजिक बहिष्कार
(D) कैद में डालना
उत्तर:
(C) सामाजिक बहिष्कार

21. निम्न-वर्ग के व्यक्ति को यदि पंचायत में न्याय नहीं मिलता तो वह क्या करता था?
(A) बदले में सामाजिक बहिष्कार
(B) कोतवाल के पास शिकायत
(C) गाँव छोड़कर भाग जाना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) गाँव छोड़कर भाग जाना

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

22. ग्राम समाज में कृषक एवं गैर-कृषक का अन्तर समाप्त हो जाता था
(A) फसल की कटाई, निराई व बुआई के समय
(B) पंचायत के फैसले करते हुए
(C) किसी सामूहिक कार्यक्रम में
(D) ज़मींदार के आगमन पर
उत्तर:
(A) फसल की कटाई, निराई व बुआई के समय

23. गैर-कृषि कार्य की सेवा के बदले अनाज देने की प्रथा के लिए 18वीं शताब्दी में कौन-सा शब्द अधिक प्रयोग होने लगा?
(A) खरायती
(B) जजमानी
(C) सेवा शुल्क
(D) साझीदारी
उत्तर:
(B) जजमानी

24. पश्चिमी स्रोतों में भारतीय गाँव को कहा गया है
(A) शिविरिम
(B) अविकसित व पिछड़े हुए
(C) एक छोटा गणराज्य
(D) ये सभी
उत्तर:
(C) एक छोटा गणराज्य

25. कृषि के कार्य में महिला साथ देती थी
(A) फसल कटाई में
(B) अनाज से दाना निकालने में
(C) फसल की निराई में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

26. गैर-कृषि कार्य में यह कार्य मात्र महिलाओं का माना जाता था
(A) खाना पकाने का
(B) सूत कातने का
(C) मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी बनाने का
(D) उपर्युक्त सभी का
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी का

27. मुगलकाल में महिलाओं के बारे में प्रमाण मिलते हैं
(A) विधवा पुनर्विवाह के
(B) दुल्हन की कीमत लेने के
(C) महिला का भू-स्वामी होने के
(D) उपर्युक्त सभी के
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी के

28. पंचायतें महिलाओं को न्याय देते समय ध्यान रखती थीं
(A) महिला की जाति का
(B) शिकायतकर्ता का शोषक से रिश्ते का
(C) दोनों का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दोनों का

29. जंगलवासी मुगल राज्य को उपलब्ध कराते थे
(A) हाथी
(B) हथियार
(C) लकड़ी
(D) रेशम
उत्तर:
(A) हाथी

30. जंगलवासियों की व्यवस्था में परिवर्तन का कारण था
(A) जंगल के उत्पादनों का वाणिज्यिक होना
(B) जंगल के सरदारों का सरकारी सेवा में जाना
(C) जंगलों की कटाई से कृषि का विस्तार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. कृषि संबंधों में वह वर्ग कौन-सा था जो कृषि उत्पादन पर कब्जा करता था, लेकिन स्वयं कृषि नहीं करता था?
(A) कृषक
(B) ज़मींदार
(C) राजस्व अधिकारी
(D) बिचौलिए
उत्तर:
(B) ज़मींदार

32. निम्नलिखित ज़मींदार की श्रेणी नहीं थी
(A) प्रारंभिक
(B) मध्यस्थ
(C) स्वायत्त मुखिया
(D) खुद-काश्त
उत्तर:
(D) खुद-काश्त

33. मुगलकाल में भूमि की मिल्कियत होती थी
(A) ज़मींदार के पास
(B) कृषक के पास
(C) सरकार के पास
(D) पटवारी के पास
उत्तर:
(A) ज़मींदार के पास

34. जमींदारी प्राप्त करने का मुख्य स्रोत था
(A) पैतृक पद्धति
(B) युद्ध द्वारा क्षेत्र पर अधिकार
(C) जंगल की सफाई
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

35. राज्य की आर्थिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह किया
(A) कृषकों ने
(B) ज़मींदारों ने
(C) दोनों ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दोनों ने

36. अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था को नाम दिया जाता था
(A) टोडरमल का बन्दोबस्त
(B) स्थायी बन्दोबस्त
(C) महालवाड़ी
(D) रैयतवाड़ी
उत्तर:
(A) टोडरमल का बन्दोबस्त

37. मुगलकाल में कर एकत्रित व निर्धारित करने वाला अधिकारी था
(A) मीर-ए-अर्ज
(B) मीरबक्शी
(C) अमील गुज़ार
(D) दरोगा
उत्तर:
(C) अमील गुज़ार

38. मुगलकाल में सर्वाधिक उपजाऊ जमीन को कहा जाता था
(A) परौती
(B) चचर
(C) पोलज
(D) बंजर
उत्तर:
(C) पोलज

39. मुगलकाल में कर एकत्रित करने की पद्धति थी
(A) जब्ती
(B) गल्ला बक्शी
(C) कनकूत
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

40. मुगलकाल में यूरोप के साथ भारत का अधिकतर व्यापार होने लगा था
(A) जल मार्ग से
(B) थल मार्ग से
(C) दोनों से
(D) किसी से नहीं
उत्तर:
(A) जल मार्ग से

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41. मुगलकाल में भारत में अधिक चाँदी एकत्रित हई
(A) चाँदी खानों से
(B) विदेशी व्यापार से
(C) पुश्तैनी संपत्ति से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) विदेशी व्यापार से

42. 1690 ई० के आस-पास आने वाला इटली का यात्री था
(A) बर्नियर
(B) मनूची
(C) कारेरी
(D) तैवर्नियर
उत्तर:
(C) कारेरी

43. मुद्रा के अधिक प्रसार से मुख्य रूप से परिवर्तन आया
(A) राजस्व एकत्रित के तरीकों में
(B) आन्तरिक व्यापार में
(C) ग्राम व शहर के संबंधों में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

44. तकावी क्या थी?
(A) उर्वर भूमि
(B) किसानों का ऋण
(C) नगदी फसल पर मामूली कर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) किसानों का ऋण

45. करोड़ी कौन थे?
(A) उत्तर भारत में राजस्व वसूलने वाले वे अधिकारी जिनसे एक करोड़ रुपए का राजस्व राजकोष को प्राप्त होता था
(B) वैसे अधिकारी जो कानूनगो द्वारा उपलब्ध कराए गए तथ्यों और आँकड़ों का निरीक्षण करते थे
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उपर्युक्त दोनों

46. किस मुग़ल शासक ने सर्वप्रथम अकाल के समय राहत कार्य को शुरू किया था?
(A) जहाँगीर
(B) शाहजहाँ
(C) औरंगजेब
(D) अकबर
उत्तर:
(D) अकबर

47. अकबर के किस दीवान ने भू-राजस्व उपज के स्थान पर नगद जमा करवाने की प्रथा को आरंभ किया था?
(A) टोडरमल
(B) मानसिंह
(C) मुजफ्फर खाँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) टोडरमल

48. भू-राजस्व के लिए अकबर ने किस संवत को अपनाया?
(A) विक्रमी संवत्
(B) हिजरी संवत्
(C) इलाही संवत्
(D) ईस्वी
उत्तर:
(C) इलाही संवत्

49. माप और उस पर कर निर्धारण की प्रणाली को क्या कहा जाता है?
(A) काकूत
(B) नसक
(C) गल्ला बख्शी
(D) जब्ती
उत्तर:
(D) जब्ती

50. मुकद्दम को माल गुजारी वसूल करने के बदले में दस्तूरी के रूप में उपज का कितने प्रतिशत मिलता था?
(A) 2 1/2%
(B) 5%
(C) 5 1/2%
(D) 7%
उत्तर:
(A) 2 1/2%

51. डॉ० सतीश चन्द्र के अनुसार मुगलों के पतन का मुख्य कारण क्या था?
(A) औरंगज़ेब की धार्मिक नीति
(B) कमज़ोर उत्तराधिकारी
(C) औरंगज़ेब की दक्षिण नीति
(D) जागीरदारी को चलाने का ढाँचा
उत्तर:
(D) जागीरदारी को चलाने का ढाँचा

52. अकबर की राजधानी थी
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) फतेहपुर सीकरी
(D) अजमेर
उत्तर:
(C) फतेहपुर सीकरी

53. कनकूत की विशेषता क्या थी?
(A) यह अपेक्षाकृत कम था
(B) इसमें समय कम लगता था
(C) राजस्व अधिकारी की आवश्यकता नहीं थी
(D) अनाज को खलिहान में देखना नहीं पड़ता था
उत्तर:
(D) अनाज को खलिहान में देखना नहीं पड़ता था

54. आसामी क्या था?
(A) बहुत-से जमींदारी गाँवों का समूह
(B) एक अकेला किसान
(C) भू-राजस्व वसूल करने वाले अधिकारी
(D) जिनकी फसल अच्छी हो
उत्तर:
(B) एक अकेला किसान

55. मुगलकाल के अंत में जमींदारी प्रथा में कुछ परिवर्तन हुआ, निम्नलिखित में से कौन-सा उससे सम्बन्धित नहीं था?
(A) जाट, सिक्ख और सतनामी जैसे किसान विद्रोहों के पीछे जमींदारों का ही हाथ था
(B) जब-जब जाट या मराठा जमींदारों को अपने विद्रोहों में सफलता हाथ लगी, उन्होंने जमींदार और शासक दोनों की भूमिका अदा की
(C) दूसरे भू-राजस्व किसानों ने जमींदारी अधिकारों की मांग नहीं की
(D) ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद जमींदारों के अधिकारों में मुगलकाल की अपेक्षा काफी वृद्धि हो गई
उत्तर:
(C) दूसरे भू-राजस्व किसानों ने जमींदारी अधिकारों की मांग नहीं की

56. जमींदारी प्रथा के बारे में कौन-सा कथन सत्य है?
(A) जमींदारों ने छोटे-छोटे दुर्ग बनाए और इनकी देखभाल के लिए छोटी-सी फौज रखी
(B) जमींदारों में भी उप-विभाजन था जो मध्यस्थ जमींदारों के रूप में जाने जाते थे
(C) मध्यस्थ जमींदार बहुत-से लाभों को प्राप्त करते थे यथा लगान रहित भूमि दलाली, उपकर आदि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

57. मुगलकालीन भारत में दो मुख्य कृषक वर्ग थे
(A) खुद-काश्त व पाहि-काश्त
(B) किसान और जमींदार
(C) जमींदार और जागीरदार
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) खुद-काश्त व पाहि-काश्त

58. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
(A) जागीर कभी भी स्थानांतरित नहीं होती थी
(B) जागीरदारों का अपनी जागीरों पर स्थायी कब्जा होता था
(C) जागीरदारों के पास न्यायिक अधिकार नहीं थे
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) जागीरदारों के पास न्यायिक अधिकार नहीं थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
पानीपत की पहली लड़ाई कब हुई?
उत्तर:
पानीपत की पहली लड़ाई 1526 ई० में हुई।

प्रश्न 2.
मुगलकाल में कितने प्रतिशत लोग गाँव में रहते थे?
उत्तर:
मुगलकाल में 85% से अधिक लोग गाँव में रहते थे।

प्रश्न 3.
अबुल फज्ल की किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखो।
उत्तर:
‘अकबरनामा’ व ‘आइन-ए-अकबरी’

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प्रश्न 4.
आइन-ए-अकबरी का लेखन कब पूरा हुआ?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी का लेखन 1598 ई० में पूरा हुआ।

प्रश्न 5.
आइन-ए-अकबरी कुल कितने खण्डों में प्रकाशित है?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी कुल तीन खण्डों में प्रकाशित है।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में कृषि व्यवस्था को जानने के लिए अधिक पाण्डुलिपियाँ किस क्षेत्र में मिली हैं?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य की कृषि व्यवस्था को जानने वाली पाण्डुलिपियाँ गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र व बंगाल से मिली हैं।

प्रश्न 7.
खुद-काश्त कौन थे?
उत्तर:
जो किसान स्वयं अपनी खेती करते थे, खुद-काश्त कहलाते थे।

प्रश्न 8.
तीन तरह के कृषकों के नाम लिखो।
उत्तर:
खुद-काश्त, पाहि व मुंजारा।

प्रश्न 9.
मुगलकाल में भूमि के दो प्रकार कौन-कौन से थे?
उत्तर:
खालिसा व जागीर।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में सरकारी जमीन क्या कहलाती थी?
उत्तर:
मुगलकाल में सरकारी ज़मीन खालिसा कहलाती थी।

प्रश्न 11.
‘हिंदुस्तान में गाँव व शहर पलभर में उजड़ जाते थे।’ यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन बाबर का है।

प्रश्न 12.
भारत में मुगलकाल में कृषि व्यवस्था सिंचाई के लिए किस पर आश्रित थी?
उत्तर:
मुगलकाल में कृषि सिंचाई के लिए मानसून की वर्षा पर निर्भर थी।

प्रश्न 13.
मुग़लकाल में फसल चक्र को किन दो नामों से जाना जाता था?
उत्तर:
मुगलकाल में फसल चक्र को खरीफ व रबी के नामों से जाना जाता था।

प्रश्न 14.
भारत में तम्बाकू कौन लाए?
उत्तर:
भारत में तम्बाकू पुर्तगाली लाए।

प्रश्न 15.
ग्रामीण व्यवस्था में व्यक्ति के लिए कठोर दण्ड क्या था?
उत्तर:
ग्रामीण व्यवस्था में व्यक्ति को ग्राम तथा जाति से बाहर निकालना सबसे कठोर दंड था।

प्रश्न 16.
मुगलकाल में ग्राम व्यवस्था का संचालन कौन करता था?
उत्तर:
मुगलकाल में ग्राम व्यवस्था का संचालन पंचायत करती थी।

प्रश्न 17.
गाँव में झगड़ों का निपटारा कौन करता था?
उत्तर:
गाँव में झगड़ों का निपटारा पंचायत करती थी।

प्रश्न 18.
ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था का नियमन कैसे किया जाता था?
उत्तर:
ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था का नियमन ‘जाति की पंचायत’ द्वारा किया जाता था।

प्रश्न 19.
गाँव में गैर-कृषि कार्य करने वालों की औसत संख्या क्या थी?
उत्तर:
गाँव में गैर-कृषि कार्य करने वालों की औसत संख्या 25 से 30% थी।

प्रश्न 20.
प्रारंभिक पश्चिमी स्रोतों में गाँव को क्या कहा गया है?
उत्तर:
प्रारंभिक पश्चिमी स्रोतों में गाँव को ‘एक छोटा गणराज्य’ कहा गया है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 21.
मुगलकाल में गाँव में आपस में विनिमय कैसे होता था?
उत्तर:
मुगलकाल में गाँव के लोग आपस में विनिमय वस्तुओं से करते थे।

प्रश्न 22.
क्या महिलाएँ मुगलकाल में भूमि की मालिक हो सकती थीं?
उत्तर:
हाँ, इस काल में महिलाएँ भूमि की मालिक हो सकती थीं।

प्रश्न 23.
जंगलवासियों का जीवन कैसा था?
उत्तर:
जंगलवासियों का जीवन प्रकृतिमूलक था।

प्रश्न 24.
जंगलवासियों पर राज्य किसके लिए आश्रित था?
उत्तर:
जंगलवासियों पर राज्य हाथियों के लिए आश्रित था।

प्रश्न 25.
मुगलकाल में ज़मींदारों को किन-किन नामों से जाना जाता था?
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदार प्रारंभिक, मध्यस्थ व स्वायत्त मुखिया के नाम से जाने जाते थे।

प्रश्न 26.
मुगलकाल में ज़मींदारी का मुख्य आधार क्या था?
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदारी मुख्य रूप से पैतृक आधार पर मिलती थी।

प्रश्न 27.
राज्य के विरुद्ध विद्रोहों में कृषक व ज़मींदार की आपसी स्थिति क्या थी?
उत्तर:
राज्य के विरुद्ध विद्रोहों में कृषक व ज़मींदार साथ-साथ थे।

प्रश्न 28.
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था का मुखिया कौन था?
उत्तर:
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था का मुखिया राजा टोडरमल था।

प्रश्न 29.
मुगलकाल में सबसे अच्छी ज़मीन को क्या कहा गया?
उत्तर:
मुगलकाल में सबसे अच्छी ज़मीन को पोलज कहा गया।

प्रश्न 30.
मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली पद्धति क्या थी?
उत्तर:
मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए प्रयुक्त होने वाली पद्धति जब्ती थी।

प्रश्न 31.
इटली के किस यात्री ने अपने वृत्तांत में यह बताया है कि विश्व का सारा सोना-चाँदी भारत में एकत्रित होता है?
उत्तर:
यह जानकारी इटली के यात्री जोवान्नी कारेरी ने दी।

प्रश्न 32.
मुगल वंश के समकालीन चीन में कौन-सा वंश था?
उत्तर:
मुगल वंश के समकालीन चीन में मिंग वंश था।

प्रश्न 33.
16वीं व 17वीं शताब्दी में ईरान पर किस वंश का शासन था?
उत्तर:
इस काल में ईरान पर सफावी वंश का शासन था।

प्रश्न 34.
गाँव में लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
गाँव में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।

प्रश्न 35.
मुगलकाल में मुख्य फसलें कौन-कौन सी थीं?
उत्तर:
मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, बाजरा, चना, दालें, कपास, गन्ना, नील, तिलहनी फसलें, पोस्त आदि थीं।

प्रश्न 36.
कंधार में किस प्रकार की गेहूँ पैदा होती थी?
उत्तर:
कंधार में एक विशेष प्रकार की श्वेत गेहूँ पैदा होती थी।

प्रश्न 37.
उस समय दलहनी फसलें कौन-कौन सी होती थीं?
उत्तर:
उस समय मूंग, मोठ, माश, अरहर, लोबिया आदि मुख्य दलहनी फसलें पैदा होती थीं।

प्रश्न 38.
सबसे बढ़िया नीलं कहाँ पर पैदा होता था?
उत्तर:
सबसे बढ़िया नील ब्याना तथा खरखेज नामक स्थानों में उत्पन्न होता है।

प्रश्न 39.
उस समय भूमि को कितने भागों में बाँटा जाता था?
उत्तर:
उस समय भूमि को चार भागों में बाँटा जाता था(i) पोलज, (ii) परौती, (ii) चचर, (iv) बंजर।

प्रश्न 40.
पोलज और परौती पर भूमि कर कितना था?
उत्तर:
पोलज और परौती भूमि पर भूमि कर 1/3 भाग था।

प्रश्न 41.
कौन-से शहरों में शाही कारखानों की स्थापना की गई थी?
उत्तर:
उस समय लाहौर, आगरा, फतेहपुर सीकरी, अहमदाबाद आदि नगरों में शाही कारखानों की स्थापना की गई थी।

प्रश्न 42.
उस समय प्रसिद्ध उद्योग कौन-सा था?
उत्तर:
उस समयं सूती कपड़ा उद्योग प्रसिद्ध उद्योग था।

प्रश्न 43.
उस समय दरियाँ कौन-से शहरों में बनाई जाती थीं?
उत्तर:
मुलतान, लाहौर, फतेहपुर सीकरी, अलवर, जौनपुर आदि स्थानों पर दरियाँ बनाई जाती थीं।

प्रश्न 44.
रेशमी कपड़ा तैयार करने के उद्योग कौन-से थे?
उत्तर:
अहमदाबाद, बिहार तथा बंगाल में रेशमी कपड़ा उद्योग थे।

प्रश्न 45.
ऊनी गलीचों तथा शालों का प्रसिद्ध उद्योग कहाँ पर था?
उत्तर:
कश्मीर में।

प्रश्न 46.
रेशमी कागज़ तैयार करने का उद्योग कहाँ पर था?
उत्तर:
रेशमी कागज़ तैयार करने का उद्योग स्यालकोट में था।

प्रश्न 47.
युद्ध शस्त्र बनाने का कारखाना कहाँ पर था?
उत्तर:
लाहौर तथा गुजरात में युद्ध शस्त्र बनाने के उद्योग थे।

प्रश्न 48.
भारत का व्यापार किन-किन देशों से होता था?
उत्तर:
भारत का व्यापार लंका, बर्मा, जावा, सुमात्रा, तिब्बत, नेपाल, ईरान, मध्य एशिया, मिस्र, पूर्वी अफ्रीका, यूरोप आदि देशों से होता था।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आइन-ए-अकबरी क्यों लिखी गई?
अथवा
आइन-ए-अकबरी’ का लेखन क्यों किया गया?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी अकबर के दरबारी अबुल फज़्ल द्वारा लिखी गई। इसका मुख्य उद्देश्य अकबर के शासन काल की घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक पक्ष को जानना था। दूसरों शब्दों में आइन-ए-अकबरी के लेखन का उद्देश्य अकबर के शासन काल के शाही कानूनों को सारांश में लिखना था।

प्रश्न 2.
आइन-ए-अकबरी के खण्डों के नाम लिखो।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी के तीन खण्ड हैं। इसके पहले खण्ड का नाम मंजिल आबादी, दूसरे खण्ड का नाम सिपह आबादी तथा तीसरे का नाम मुल्क आबादी है।

प्रश्न 3.
आइन-ए-अकबरी की किन्हीं दो सीमाओं या दोषों का वर्णन करो।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी की दो सीमाओं का वर्णन इस प्रकार से है
(i) आइन-ए-अकबरी पूरी तरह से दरबारी संरक्षण में लिखी गई है। लेखक कहीं भी अकबर के विरुद्ध कोई शब्द प्रयोग नहीं कर पाया। उसने विभिन्न विद्रोहों के कारणों व दमन को भी एकपक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ii) आइन-ए-अकबरी में विभिन्न स्थानों पर जोड़ में गलतियाँ पाई गई हैं। यहाँ यह माना जाता है कि गलतियाँ अबुल फज़्ल के सहयोगियों की गलती से हुई होगी या फिर नकल उतारने वालों की गलती से।

प्रश्न 4.
खुद-काश्त कौन थे? उनका समाज में क्या स्थान था?
उत्तर:
खुद-काश्त दो शब्दों के मेल से बना है खुद एवं काश्त। जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो अपनी भूमि को स्वयं जोतता हो अर्थात् अपनी भूमि पर स्वयं खेती करने वाला। इस व्याख्या के अनुसार कृषक अपनी भूमि का मालिक होता था। वह अपने गाँव में ही परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर खेती करता था। वह अपनी भूमि को बेचने, गिरवी रखने या हस्तान्तरित करने का अधिकार रखता था। उसे ज़मीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। वे गाँव में सबसे ऊँचे स्थान पर थे।

प्रश्न 5.
मुगलकाल में मिल्कियत के आधार पर भूमि के दो प्रकार लिखें।
उत्तर:
मुगलकाल में भूमि को खालिसा व जागीर में बाँटा गया है।
(i) खालिसा-खालिसा सरकारी भूमि को कहा जाता था अर्थात् ऐसी भूमि जिसका भू-राजस्व सीधे सरकारी कोष में जमा होता था। इस ज़मीन पर कृषि खुद-काश्त, पाहि-काश्त या मुंजारे करते थे तथा राजस्व सरकारी अधिकारी एकत्रित करते थे।

(ii) जागीर-जागीर उस भू-क्षेत्र को कहा जाता था जिसका राजस्व किसी सरकारी अधिकारी या मनसबदार को उसकी सेवा के बदले दिया जाता था। मनसबदार या जागीरदार, इस जमीन के प्रायः मालिक नहीं होते थे। उन्हें राज्य द्वारा समय-समय पर स्थानान्तरित किया जाता था।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में कौन-कौन सी नई फसलें कृषि व्यवस्था का हिस्सा बनीं?
उत्तर:
मुगलकाल में कुछ नई फसलें भी उत्पादित की जाने लगी थीं। इन फसलों में पहला नाम रेशम का था। इस फसल का जीव (कीड़ा) चीन से लाया गया तथा यह बंगाल में बहुत अधिक प्रचलन में आयी। इस काल में नई दूसरी फसल तम्बाकू थी। यह फसल पुर्तगालियों द्वारा 17वीं सदी के प्रारंभ (1603) में अफ्रीकी क्षेत्र से लाई गई। इस काल में अन्य आने वाली फसलों में मक्का, जई, पटसन इत्यादि थीं।

प्रश्न 7.
ग्राम पंचायत का गठन कैसे होता था?
उत्तर:
ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजुर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थीं इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 8.
मुगलकाल के आर्थिक इतिहास की जानकारी के बाह्य स्रोतों का वर्णन करो।
उत्तर:
बाह्य स्रोतों में मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कम्पनी व अन्य यूरोपीय कम्पनियों व व्यापारियों के दस्तावेज हैं। ये दस्तावेज प्रत्यक्ष तौर पर आर्थिक पक्ष की जानकारी कम ही देते हैं, लेकिन बीच-बीच में अच्छा प्रकाश डालते हैं। इन दस्तावेजों में डायरी, संस्मरण, सरकारी व निजी दस्तावेज हैं। इनमें भारत के व्यापार, आयात-निर्यात, विभिन्न क्षेत्रों में होने वाला कृषि व गैर-कृषि उत्पादन का वर्णन भी है। स्थानीय लोगों की जीवन-शैली व आर्थिक जरूरतों पर ये अधिक प्रकाश डालते हैं। इनका वर्णन दरबारी प्रभाव से मुक्त है।

प्रश्न 9.
पाहि-काश्त से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पाहि का अर्थ होता है-पड़ोसी अर्थात् वह व्यक्ति जो पड़ोस के गाँव की ज़मीन पर खेती करता था। वह दूसरे गाँव की ज़मीन ठेके पर लेता था या खरीद लेता था। इसका कारण दूसरे गाँव की भूमि का अच्छा होना था। कृषक अकाल इत्यादि के समय मजबूरी में कृषि करता था। कुछ स्रोतों में पाहि शब्द की व्याख्या अपने ही गाँव में पड़ोसी की खेती जोतने के रूप में भी की गई है। इस कृषक को शर्तों के अनुरूप खेती करनी होती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 10.
मुगलकाल में व्यापारिक फसलों या जिन्स-ए-कामिल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मुगलकाल में जिन्स-ए-कामिल शब्द का अर्थ उन फसलों से लगाया जाता है जिससे राज्य को कर अधिक मिलता था। गन्ना व कपास सबसे अच्छी फसल कही जाती थी। राज्य के द्वारा भी इन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता था। कपास मध्य भारत, दक्षिणी क्षेत्र, बंगाल, गुजरात एवं राजपूताना के क्षेत्रों में उगाई जाती थी। गन्ना पंजाब, दिल्ली, आगरा, बंगाल व अवध क्षेत्र में अधिक मिलता था। तिलहन की फसलें संपूर्ण उत्तरी भारत में उगती थीं। अलीगढ़, ब्याना, आगरा, पटना व बनारस क्षेत्र के नील की विश्व में बहुत अधिक माँग थी। दक्षिण के क्षेत्र में गर्म मसाले पैदा होते थे।

प्रश्न 11.
एक ‘छोटा गणराज्य’ क्या था? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
एक ‘छोटा गणराज्य’ भारतीय गाँव था, जिसे पश्चिमी लेखकों द्वारा यह शब्द दिया गया है। उनके अनुसार भारत में गाँव आत्मनिर्भर, बहुसंस्कृतीय, अपनी आवश्यकताओं की सभी चीजों का उत्पादन करने वाले थे। यह आन्तरिक प्रशासन के लिए किसी पर निर्भर नहीं थे। इस तरह उनका मानना है कि गाँव छोटी इकाई अवश्य है, लेकिन इनका अस्तित्व स्वतंत्र है। गाँव के लोग सामूहिक स्तर पर संसाधनों व श्रम का बँटवारा करते थे, जबकि सभी को मालूम था कि उनमें सामाजिक बराबरी नहीं है। इस समाज में कुछ ज़मीन के मालिक थे, जबकि कुछ दूसरों की कृषि पर सेवा देकर जीवन-यापन करते थे।

प्रश्न 12.
मुगलकाल में जातीय पंचायत की संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल काल में लगभग सभी गाँव में कई जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति की अपनी एक पंचायत होती थी। ये जातीय पंचायत गाँव की परिधि के बाहर भी महत्त्व रखती थीं। इनका अस्तित्व क्षेत्रीय आधार पर भी होता था। ये बहुत शक्तिशाली होती थीं। ये पंचायतें अपनी जाति (बिरादरी) के झगड़ों का निपटारा करती थीं। जातीय परंपरा व बन्धनों के दृष्टिकोण से ये ग्रामीण पंचायतों की तुलना में अधिक कठोर थीं। दीवानी झगड़ों का निपटारा, शादियों के जातिगत मानदंड, कर्मकांडीय गतिविधियों का आयोजन तथा अपने व्यवसाय को मजबूत करना इनके काम थे।

प्रश्न 13.
ग्राम समाज में कृषक व गैर-कृषक वर्ग के आपसी संबंधों का उल्लेख करें।
उत्तर:
मुगलकाल में कृषक व गैर-कृषक समुदाय ग्रामीण संरचना का अटूट हिस्सा था। कृषक समुदाय, फसल की कटाई, जुताई, बिजाई इत्यादि के कार्य स्वयं नहीं कर पाता था। वह इस कार्य के लिए गैर-कृषकों का सहयोग लेता था और ये गैर-कृषक कृषि के मुख्य काम के समय अपने सारे कार्य छोड़कर कृषि कार्य में जुट जाते थे।

प्रश्न 14.
मुगलकाल में ग्रामीण व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर:
मुगलकाल में ग्रामीण व्यवस्था में बदलाव आए। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की।

प्रश्न 15.
दस्तकार के रूप में महिलाएँ क्या-क्या करती थीं?
उत्तर:
मुगलकाल में महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गँधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं।

प्रश्न 16.
जंगलवासियों के जीवन में बदलाव के किन्हीं दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगलकाल में जंगलवासियों के जीवन में बदलाव के दो कारक इस प्रकार हैं

  • वाणिज्यिक खेती व व्यापार के कारण जंगलों की सफाई की गई तथा शहद, मधु व लाख की खरीद-बेच ने उनकी परम्परागत जीवन-शैली को बदला।
  • राज्यों की विस्तारवादी नीति व हाथियों की आवश्यकता ने जंगलवासियों को प्रभावित किया। राज्य ने उन्हें संरक्षण दिया और उन्होंने राज्य को हाथी दिए।

प्रश्न 17.
मुगलकाल में ज़मींदार के अधिकार व कर्त्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगलकाल में जमींदारों के पास अपनी ज़मीन की खरीद, बेच, हस्तांतरण, गिरवी रखने का अधिकार था। विभिन्न तरह के प्रशासनिक पदों पर इन्हें नियुक्त किया जाता था। अपने क्षेत्र में विशेष पोशाक, घोड़ा, वाद्य यन्त्र बजाने का अधिकार इनके पास था। भू-राजस्व से इन्हें एक निश्चित मात्रा में कमीशन मिलता था। इनके पास अपनी सेना होती थी। ज़मींदारों के कर्त्तव्यों के बारे में कहा जा सकता है कि अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी इनकी थी। इनके क्षेत्र से शासक व शाही परिवार का कोई सदस्य गुजरता था तो उन्हें वहाँ उपस्थित होना पड़ता था। राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य था। कुछ ज़मींदार अपने क्षेत्र में धर्मशालाएँ बनवाना व कुएँ खुदवाना भी जरूरी समझते थे।

प्रयन 18.
ज़मींदार व कृषकों के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल के कुछ साक्ष्यों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि जमींदार वर्ग अपने अधीन कृषक वर्ग का शोषण करता था, जिसके कारण इस वर्ग की छवि शोषक वर्ग के रूप में उभरकर सामने आती है। इसके साथ-साथ साक्ष्य इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि कृषकों के साथ इस वर्ग के संबंधों में पैतृकवाद व संरक्षणवाद भी था। इस बात के पक्ष में हम दो तर्क दे सकते हैं

(i) मुगलकाल में भक्ति व सूफी आन्दोलन के संतों व फकीरों ने अपने उपदेशों व गीतों में समाज की बुराइयों, जातिगत समस्याओं व अत्याचारों की कड़ी निन्दा की है। उन्होंने कहीं भी ज़मींदार वर्ग की शोषक के रूप में आलोचना नहीं की, बल्कि राजस्व अधिकारियों के प्रति सामान्य कृषक वर्ग को विद्रोही बताया है।

(ii) 17वीं शताब्दी में भारत के विभिन्न हिस्सों में कृषकों के विद्रोह हुए। इन विद्रोहों में कृषकों ने ज़मींदारों के विरुद्ध कभी बगावत नहीं की, बल्कि इन विद्रोहों में ज़मींदार कृषक के साथ दिखे।

प्रश्न 19.
अकबर के काल में भूमि के विभाजन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
अकबर के काल में उपजाऊपन के आधार पर भूमि को निम्नलिखित चार हिस्सों में विभाजित किया गया

  • पोलज-कृषक की सबसे उपजाऊ भूमि को पोलज कहा गया। इस ज़मीन पर वर्ष में नियमित फसल होती थी। इस पर सिंचाई व्यवस्था भी ठीक थी।
  • परौती यह वह ज़मीन थी जो एक फसल के बाद कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दी जाती थी अर्थात् यह ज़मीन वर्ष में केवल एक फसल देती थी।
  • चाचर (छाछर) यह ज़मीन 2 से 4 वर्षों में एक फसल अच्छी देती थी। प्रायः जब काफी बरसात होती थी तब इसमें फसल ठीक होती थी।
  • बंजर-इस ज़मीन पर कभी-कभार फसल होती थी। कई बार पाँच वर्ष तक जोत में नहीं आती थी। यह ज़मीन रेतीली, उबड़-खाबड़ तथा चरागाह क्षेत्र वाली थी।

प्रश्न 20.
16वीं व 17वीं सदी के एशिया के प्रमुख राजवंशों के नाम लिखें।
उत्तर:
16वीं व 17वीं शताब्दी में एशिया के अलग-अलग क्षेत्रों में शक्तिशाली साम्राज्यों की स्थापना हुई। इस काल में चीन में मिंग साम्राज्य, ईरान में सफावी साम्राज्य, तुर्की में आटोमन साम्राज्य तथा भारत में मुग़ल साम्राज्य स्थापित हुआ।

प्रश्न 21.
मुग़लों की टकसालों पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध-चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इनकी टकसाल शाही राजधानी दिल्ली व आगरा के अतिरिक्त लाहौर, इलाहाबाद, अजमेर, बुरहानपुर में स्थापित की।

प्रश्न 22.
मुद्रा प्रणाली के प्रसार के मजदूरों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
मुगलकाल में मुद्रा-प्रणाली के प्रचलन से वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आई। गाँवों से बिकने के लिए फसलें व अन्य उत्पादन शहर में आने लगा तथा इसी तरह शहर की चीजें गाँवों में जाने लगीं। इससे गाँव व शहर के बीच अन्तर कम हुआ, इसी तरह राज्य द्वारा भी कर एकत्रित करने के लिए जिन्स की तुलना में मुद्रा (नकद) को महत्त्व दिया गया।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आइन-ए-अकबरी कब व क्यों लिखी गई? इसके विभिन्न भागों का वर्णन करें।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी अकबर के शासन काल में अबुल फज्ल द्वारा लिखी गई रचना है। अबुल फज्ल अकबर का दरबारी लेखक था। अकबर के आदेश से अबुल फज़्ल ने ‘अकबरनामा’ को लिखना प्रारम्भ किया। अकबरनामा के तीन खण्ड हैं। इन खण्डों में तीसरा खण्ड आइन-ए-अकबरी है। विस्तृत जानकारी होने के कारण इसे अलग रचना मान लिया गया तथा इस रचना के ही तीन खण्ड बन गए। आइन-ए-अकबरी के लेखन का उद्देश्य अकबर के शासन काल के शाही कानूनों को सारांश में लिखना था। इस तरह आइन-ए-अकबरी इतिहास लेखन का एक हिस्सा थी जो बाद में अकबर के साम्राज्य, प्रान्तों, क्षेत्रों व शाही कानूनों का एक दस्तावेज बन गई। अकबर के शासनकाल के 42वें वर्ष में अर्थात् 1598 में अबुल फज्ल ने इसे पाँच संशोधनों के बाद पूरा किया। आइन-ए-अकबरी पाँच भागों में विभाजित है जिसमें से पहले तीन का एक खण्ड है तथा शेष दो अलग-अलग खण्डों में प्रकाशित है। पाँचों भागों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(i) पहला भाग-आइन-ए-अकबरी के पहले भाग को ‘मंजिल आबादी’, का नाम दिया गया है। इस हिस्से में शाही-आवास, दरबार, कोष, मुद्रा, मूल्यवान वस्तुओं के रख-रखाव व उनके नाप-तोल इत्यादि के बारे में बताया गया है।

(ii) दूसरा भाग-आइन के दूसरे भाग को ‘सिपह आबादी’ के नाम से जाना जाता है। इस भाग में मुगल सेना व उसके विभिन्न अंगों, नागरिक प्रशासन, मनसबदारी व्यवस्था व मनसबों की संख्या के बारे में बताया गया है। इस भाग में विद्वानों, कवियों तथा कलाकारों की जीवनियों को भी संक्षिप्त में दर्ज किया गया है।

(iii) तीसरा भाग-आइन के तीसरे भाग को ‘मुल्क आबादी’ का नाम दिया गया है। इसमें मुग़ल साम्राज्य के 12 प्रान्तों (उत्तर भारत) के बारे में जानकारी दी गई है। इस जानकारी में राजस्व की दरें, उनको एकत्रित करने की पद्धति व प्रान्तों की भौगोलिक स्थिति को विस्तार से स्पष्ट किया है। उसने प्रत्येक प्रान्त को अलग-अलग अध्यायों में विभाजित किया है। बीच-बीच में उसने प्रान्तों की स्थलाकृति व रेखाचित्र भी बनाए हैं।

(iv) चौथा व पाँचवाँ भाग आइन के चौथे व पाँचवें भाग में भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक परम्पराओं का उल्लेख किया गया है। इन दोनों भागों के लिए अबुल फज़्ल ने अधिकतर जानकारी अलबेरुनी के वृत्तांत से ली है। अबुल फज्ल ने आइन के अन्त में अकबर के शुभ वचनों को संकलित किया है।

प्रश्न 2.
आइन-ए-अकबरी कृषि एवं आर्थिक इतिहास लेखन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, इस पर अपने विचार दें।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी सूचना व जानकारी की दृष्टि से बेजोड़ है। इसके लेखन में अबुल-फज़्ल अन्य मध्यकालीन लेखकों की तुलना में काफी आगे निकल गया। उस समय के ज्यादातर लेखक प्रायः युद्ध, राजनीति, दरबारी गतिविधियों व वंशों के गुणगान को महत्त्व देते हैं। जबकि अबुल-फज़्ल ने राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, समाज सभी विषयों को बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है। आइन के महत्त्वपूर्ण पक्ष को निम्नलिखित बिन्दुओं के रूप में समझ सकते हैं

(i) अबुल-फल स्वयं स्वीकार करता है कि उसने पुस्तक को त्रुटि रहित बनाने का प्रयास किया। इस हेतु उसने यह पुस्तक पाँच बार लिखी तथा हर बार जानकारी में संशोधन किया है अर्थात् उसने इसे जल्दी की बजाय अच्छा करने पर जोर दिया।

(ii) उसने सूचनाओं को बड़े स्तर पर एकत्रित किया एवं करवाया। इसके लिए उसने हर तरह के प्रयास किए। उसने उन्हें संकलित कर जिस तरह क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया, वह कोई सरल कार्य नहीं था।

(iii) राज्य की आर्थिक नीतियों, भू-राजस्व को निर्धारित करने की पद्धति, फसलों, सिंचाई इत्यादि पर प्रकाश डालने वाला यह एकमात्र ग्रन्थ है। इस अभाव में मध्यकाल को ठीक तरह से समझना बेहद कठिन कार्य है।

(iv) मुगलकाल में गैर-कृषि उत्पादन, उनका विनिमय, उनके मिलने के स्थल तथा शासक द्वारा उनके प्रोत्साहन के बारे में उसकी जानकारी हमें तत्कालीन व्यापार व उद्योग व्यवस्था को समझने में सहायता करती है।

(v) मुगलकालीन ग्रामीण समाज, मनसबदारी प्रणाली, कृषक-ज़मींदार व राज्य के सम्बन्धों, वस्तुओं के भावों का वर्णन उसने जिस तरह किया है, वह तत्कालीन भारत को समझने में तो मदद करता ही है, साथ में विश्व के अन्य भागों से तुलना करने का आधार भी देता है।

आइन-ए-अकबरी के बारे में यह कहा जा सकता है कि अबुल-फज़्ल द्वारा रचित यह ग्रन्थ हर प्रकार की जानकारी से भरपूर है। इसकी कुछ सीमाएँ भी रहीं, परन्तु ये बहुत कम हैं। इस तरह की कमियाँ लगभग प्रत्येक तरह के स्रोत में होती हैं। निस्सन्देह अबुल-फल अपने समकालीन व अन्य मध्यकालीन लेखकों से आगे था। अपने लेखन में जहाँ वह अच्छी जानकारी दे पाया वही स्वयं का एवं अकबर का नाम भी उचित ढंग से उभार पाया है। आइन-ए-अकबरी ने मुगलकाल के पुनर्निर्माण के लिए शोधकर्ताओं व इतिहासकारों को प्रचुर मात्रा में सामग्री उपलब्ध कराई है।

प्रश्न 3.
मुगलकाल में कृषकों की विभिन्न श्रेणियों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल में कृषक के लिए मोटे तौर पर रैयत या मुज़रियान शब्द का प्रयोग होता था। कई स्थानों पर कृषक के लिए किसान व आसामी शब्द भी प्रचलन में थे। 17वीं शताब्दी के स्रोतों में खुद-काश्त व पाहि-काश्त इत्यादि शब्दों का प्रयोग कृषकों के लिए मिलता है। यह शब्द उनकी प्रकृति में अन्तर को स्पष्ट करता है। कहीं-कहीं यह विभिन्न क्षेत्रों के भाषायी अन्तर के कारण हैं। इन अन्तरों को समझने के लिए इनकी संक्षिप्त व्याख्या को जानना आवश्यक है।

(i) रैयत-रैयत शब्द प्रारम्भिक स्रोतों में प्रजा के लिए प्रयोग हुआ। फिर यह कृषक के लिए ही प्रयुक्त किया जाने लगा तथा कृषक शब्द के बहुवचन (अर्थात् अधिक संख्या) के लिए रिआया शब्द का प्रयोग हुआ। यह शब्द सभी तरह के कृषकों के लिए प्रयोग में लाया गया।
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(ii) खुद-काश्त-कृषक श्रेणी में यह शब्द ऊँचे दर्जे के किसानों के लिए प्रयोग होता है। खुद-काश्त दो शब्दों के मेल से बना है-खुद एवं काश्त। जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो अपनी भूमि को स्वयं जोतता हो अर्थात् अपनी भूमि पर स्वयं खेती करने वाला। इस व्याख्या के अनुसार कृषक अपनी भूमि का मालिक होता था। वह अपने गाँव में ही परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर खेती करता था। वह अपनी भूमि को बेचने, गिरवी रखने या हस्तान्तरित करने का अधिकार रखता था। उसे ज़मीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था।

(iii) पाहि-काश्त-पाहि का अर्थ होता है-पड़ोसी अर्थात् वह व्यक्ति जो पड़ोस के गाँव की ज़मीन पर खेती करता था। वह दूसरे गाँव की ज़मीन ठेके पर लेता था या खरीद लेता था। इसका कारण दूसरे गाँव की भूमि का अच्छा होना था। अकाल इत्यादि के समय मजबूरी में कृषि करता था। कुछ स्रोतों में पाहि शब्द की व्याख्या अपने ही गाँव में पड़ोसी की खेती जोतने के रूप में भी की गई है। इस कृषक को शर्तों के अनुरूप खेती करनी होती थी।

(iv) मुज़रियान या मुंजारा-यह कृषकों की श्रेणी में सबसे निचले दर्जे पर था। उसके पास हल व बैल तो अपने थे लेकिन वह ज़मीन का मालिक नहीं था। उसके पास भूमि खरीदने व ठेके पर लेने की क्षमता भी नहीं थी। अतः वह किसी भी किसान के साथ हिस्सेदार व बँटाईदार के रूप में खेती करता था। उत्पादन को बाद में एक निश्चित मात्रा में बाँट लिया जाता था। इस वर्ग की संख्या काफी थी व इसकी स्थिति हमेशा दयनीय थी। ज़मीन का मालिक उसे प्रतिवर्ष अपनी शर्तों के अनुरूप खेती करने को देता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 4.
मुगलकाल की सिंचाई तकनीक के बारे में आप क्या जानते हैं? अथवा 16वीं-17वीं शताब्दी में कृषि के लिए कौन-से सिंचाई साधनों का इस्तेमाल होता था?
उत्तर:
मुगलकाल में कृषि प्रकृति पर निर्भर थी। जिन क्षेत्रों में जिस तरह की वर्षा होती थी लोग उसी तरह की फसलें पैदा करते थे। कहीं-कहीं नदियों का पानी भी सिंचाई के लिए प्रयोग में आता था। कम वर्षा वाले क्षेत्र में सिंचाई के लिए कृषक को कृत्रिम साधनों का प्रयोग भी करना पड़ा। सिंचाई के कृत्रिम साधन निम्नलिखित थे

(i) रहट-यह रहट लकड़ी या लोहे के पहियों वाला था। स्रोतों में रहट के लिए प्रशियिन बहिल’ शब्द का प्रयोग किया गया है। बाबर ने अपनी आत्मकथा में भारत में सिंचाई प्रणाली व रहट के प्रयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

(ii) जलाशयों से सिंचाई-कृषक कुछ स्थानों पर प्राकृतिक जलाशयों के साथ-साथ कृत्रिम जलाशय भी खोद लेते थे। इन जलाशयों में वर्षा का पानी एकत्रित हो जाता था जो एक सीमित क्षेत्र की सिंचाई करता था।

(iii) नहरों से सिंचाई-राज्य के द्वारा भी जोत क्षेत्र को बढ़ाने के लिए सिंचाई हेतु कुछ मदद की गई। उदाहरण के लिए शाहजहाँ ने पंजाब में शाह नहर का निर्माण करवाया। इसी तरह फिरोज शाह द्वारा जिस नहर का निर्माण करवाकर हिसार पानी लाया गया था उसकी अकबर व शाहजहाँ के काल में फिर से खुदाई करवाई गई।

प्रश्न 5.
मुगलकाल में कौन-कौन सी फसलें किस-किस क्षेत्र में उत्पादित होती थीं?
उत्तर:
मुगलकाल की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार, कपास, बाजरा, तिलहन, ग्वार इत्यादि थीं। सामान्यतः कृषक खाद्यान्नों का ही उत्पादन करते थे। ये फसलें भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उगाई जाती थीं। चावल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता था जहाँ अधिक वर्षा होती थी। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ, ज्वार, बाजरा इत्यादि बोए जाते थे, जबकि गेहूँ लगभग भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बोई जाती थी। फसलों के उत्पादन में सर्वाधिक महत्त्व मानसून पवनों का था। ‘आइन-ए-अकबरी’ में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादित होने वाली फसलों पर प्रकाश डाला गया है। उसके अनुसार आगरा व मालवा क्षेत्र में 39 फसलें तथा दिल्ली, लाहौर, मुलतान व गुजरात क्षेत्र में 43 फसलें प्रचलन में थीं।

मुगलकाल में कुछ फसलों के लिए जिन्स-ए-कामिल शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ उन फसलों से लगाया जाता है जिससे राज्य को कर अधिक मिलता था। गन्ना व कपास सबसे अच्छी फसल कही जाती थी। राज्य के द्वारा भी इन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता था। कपास मध्य भारत, दक्षिणी क्षेत्र, बंगाल, गुजरात एवं राजपूताना के क्षेत्रों में उगाई जाती थी। गन्ना पंजाब, दिल्ली, आगरा, बंगाल व अवध क्षेत्र में अधिक मिलता था। .

मुगलकाल में कुछ नई फसलें भी व्यापार के लिए उत्पादित की जाने लगी थीं। इन फसलों में पहला नाम रेशम का था। इस फसल का जीव (कीड़ा) चीन से लाया गया तथा यह बंगाल में बहुत अधिक प्रचलन में आई। इसी फसल के कारण बंगाल का रेशमी कपड़ा विश्वविख्यात हो गया। इस काल में नई दूसरी फसल तम्बाकू थी। यह फसल पुर्तगालियों द्वारा 17वीं सदी के प्रारंभ (1603) में अफ्रीकी क्षेत्र से लाई गई। इस काल में अन्य आने वाली फसलों में मक्का, जई, पटसन इत्यादि थीं। 17वीं शताब्दी में आने वाली फसलों में टमाटर, आलू व हरी मिर्च कही जा सकती हैं। भारत में ये नई फसलें व सब्जियाँ अफ्रीका, स्पेन व अरब क्षेत्र से आईं।

प्रश्न 6.
ग्राम पंचायत में निम्न वर्ग की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
ग्राम पंचायतों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग का प्रभुत्व था। वह वर्ग अपनी मनमर्जी के फैसले पंचायत के माध्यम से लागू करवाता था। सामान्य-तौर पर निम्न वर्ग के लोग पंचायत की इस तरह की कार्रवाई को झेल लेते थे। परन्तु स्रोतों में विशेषकर महाराष्ट्र व राजस्थान से प्राप्त दस्तावेजों में इस तरह के प्रमाण मिले हैं जिनमें निम्न वर्ग ने विरोध किया हो। इन दस्तावेज़ों में ऊँची जातियों व सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली या गार की शिकायत है। जिसके अनुसार निम्न वर्ग के लोग स्पष्ट करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है तथा उन्हें उनसे न्याय की उम्मीद भी नहीं है। ये शिकायतें बड़े ज़मींदार तथा अधिकारियों के नाम लिखी गई हैं।

शिकायत के अनुसार पंचायत की बैठक होती थी। सबसे पहले पंचायत शिकायतकर्ता को समझाने का प्रयास करती थी। उसके विरोध करने की स्थिति में समझौता करवाने का प्रयास किया जाता। पंचायत के फैसले सभी स्थितियों में एक जैसे नहीं होते थे बल्कि व्यक्ति की जाति व सामाजिक हैसियत का ध्यान रखा जाता था। पंचायत के फैसले से यदि शिकायतकर्ता सन्तुष्ट नहीं होता था तो वह विरोध के कठोर रास्ते अपनाता था। विरोध की शैली में वह विद्रोही हो जाता था या फिर गाँव छोड़कर भाग जाता था। खेतिहर का गाँव से भागना कृषक समुदाय के लिए नुकसानदायक था, क्योंकि इन्हीं मजदूरों के सहारे तो खेती सम्भव थी। इस काल में जमीन की कमी नहीं थी, बल्कि मेहनत करने वाले अर्थात् श्रम शक्ति की कमी थी। श्रम शक्ति कम होने का भय ग्राम के उच्च वर्ग को सताता था। इस तरह पंचायत इस बात का ध्यान रखती थी कि निम्न वर्ग के लोगों को विद्रोही न होना पड़े, इसके लिए विभिन्न तरह के दबाव प्रयोग में लाकर खेतिहरों पर अंकुश रखती थी।

प्रश्न 7.
मुग़लकाल में ग्रामीण दस्तकार से क्या आशय है? इनके कृषक वर्ग से संबंध कैसे होते थे?
उत्तर:
ग्रामीण दस्तकार से अभिप्राय उन लोगों से है जो गाँव में रहकर बुनाई, कताई, रंगरेजी, कपड़े की छपाई, मिट्टी के बर्तनों का बनाना, कृषि के उपकरणों का निर्माण करना, जूते एवं चमड़े की चीज़ों का निर्माण करते थे। 18वीं शताब्दी के दस्तावेज़ों से यह पुष्टि होती है कि ऐसे ग्रामीण दस्तकारों की संख्या काफी थी। औसत रूप में यह संख्या 25 से 30 प्रतिशत तक होती थी।

जैसा कि स्पष्ट है कि कृषक व गैर-कृषक समुदाय (ग्रामीण दस्तकार) ग्रामीण संरचना का अटूट हिस्सा था। इनके बीच में इस तरह के संबंध थे कि कई बार इनमें अन्तर करना कठिन होता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि कृषक समुदाय, फसल की कटाई, जुताई, बिजाई इत्यादि के कार्य स्वयं नहीं कर पाता था। वह इस कार्य के लिए इन दस्तकारों का सहयोग लेता था और ये दस्तकार भी कृषि के मुख्य काम के समय अपने सारे कार्य छोड़कर कृषि कार्य में जुट जाते थे।
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ग्रामीण दस्तकार अपनी सेवाएँ पूरे ग्रामीण समुदाय को देता था। इन दस्तकारों को सेवा के बदले नकद वेतन नहीं मिलता था, बल्कि कृषक फसल आने के बाद एक हिस्सा इन्हें दे देता था। कई बार दस्तकार को स्थायी तौर पर गाँव में बसाने के लिए उसे ज़मीन दे दी जाती थी। ज़मीन कितनी तथा किस तरह की शर्तों में दी जाएगी, यह फैसला गाँव की पंचायत करती थी। महाराष्ट्र में दस्तकारों को पुश्तैनी तौर पर दी जाने वाली भूमि मीरास या (वतन) कहलाती थी। जब कोई दस्तकार इस तरह भूमि का मालिक बन जाता था, तो उसकी सामाजिक हैसियत भी बदल जाती थी। ग्रामीण समाज में दस्तकारों की सेवा-शर्तों का फैसला मुख्य रूप से पंचायत करती थी। कई बार दस्तकार, कृषक व खेतिहर मजदूर आपस में बैठकर फैसला कर लेते थे कि अदायगी कैसे तथा कब होगी।

प्रश्न 8.
ग्राम ‘एक छोटा गणराज्य’ था। इस आशय को स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारतीय ग्राम व्यवस्था को पश्चिमी इतिहासकारों ने अलग-अलग ढंग से अध्ययन की विषय-वस्तु बनाया है। उन्होंने अपने अध्ययनों में गाँव के लिए ‘छोटा गणराज्य’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘छोटा गणराज्य’ कहने वाले लेखकों ने गाँव के बारे में कहा कि भारत में गाँव आत्मनिर्भर, बहुसंस्कृतीय, अपनी आवश्यकताओं की सभी चीज़ों का उत्पादन करने वाले थे। ये आन्तरिक प्रशासन के लिए किसी पर निर्भर नहीं थे। इस तरह उनका मानना है कि गाँव छोटी इकाई अवश्य है, लेकिन इनका अस्तित्व स्वतंत्र है।

प्राचीनकाल से ही ग्रामों की यह व्यवस्था चली आ रही थी। इन लेखकों का मानना है कि गाँव के लोग सामूहिक स्तर पर संसाधनों व श्रम का बँटवारा करते थे, जबकि सभी को मालूम था कि उनमें सामाजिक बराबरी नहीं है। इस समाज में कुछ ज़मीन के मालिक थे, जबकि कुछ दूसरों की कृषि पर सेवा देकर जीवन-यापन करते थे। जाति व सामाजिक चिन्तन (स्त्री-पुरुष) के आधार पर ग्राम में विषमताएँ थीं। गाँव में शक्तिशाली लोग साधनों पर भी नियंत्रण रखते थे, गाँव के फैसले करते थे तथा शोषण भी करते थे। फिर भी सामान्य तौर पर एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते थे।

भारतीय ग्राम प्राचीनकाल से छोटे गणराज्य के रूप में कार्य कर रहे थे। मुगलकाल में इस व्यवस्था में थोड़ा-बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की। शासक की ओर से नकदी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इस काल में विदेशी व्यापार में भी वृद्धि हुई। विदेशों को निर्यात होने वाली चीजें गाँव में बनती थीं। इस व्यापार से नकद धन मिलता था। इस तरह धीरे-धीरे मजदूरी का भुगतान भी नकद किया जाने लगा। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें भी उगाई जाने लगीं, जिसमें कृषक को पर्याप्त मात्रा में लाभ होता था। रेशम तथा नील मुगलकाल में अत्यधिक लाभ देने वाली फसलें मानी जाती थीं।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन कृषि समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकालीन समाज में स्त्री व पुरुष दोनों के बीच श्रम विभाजन काफी हद तक नियोजित था। महिलाएँ पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं।

मुगलकाल में दस्तकार महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गूंधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं। इस काल में इनकी गैर-कृषि कार्यों में माँग लगातार बढ़ी थी। जिन-जिन चीज़ों का वाणिज्यीकरण हो रहा था तथा लाभ के साथ जुड़ती जा रही थीं, उसी के अनुरूप महिलाओं की श्रम शक्ति की माँग भी बढ़ रही थी। इस माँग की पूर्ति के लिए अब महिलाएँ नियोक्ता के घर जाकर काम करने लग गई थीं। यहाँ तक कि बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था होने लगी थी, जहाँ महिलाएँ सामूहिक तौर पर बैठकर कार्य करने लगी थीं। इस तरह से महिलाओं के लिए चारदीवारी के बंधन कुछ कमजोर होने लगे थे।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में जमींदार कौन थे? उनकी प्रमुख श्रेणियों का वर्णन करो।
उत्तर:
मुगलकाल में जो व्यक्ति कृषि व्यवस्था का केंद्र था तथा भूमि का मालिक था, जमींदार कहलाता था। उसे ज़मीन के बारे में सारे अधिकार प्राप्त थे अर्थात् वह अपनी जमीन को बेच सकता था या किसी को हस्तांतरित कर सकता था। वह अपनी भूमि से कर एकत्रित करके राज्य को देता था। इस तरह यह वर्ग अपने से ऊपर तथा नीचे वाले दोनों वर्गों पर प्रभाव रखता था। ज़मींदार के सन्दर्भ में एक खास बात यह भी है कि वह खेती की कमाई खाता था, लेकिन स्वयं खेती नहीं करता था। बल्कि वह अपने अधीन कृषकों व मजदूरों से कृषि करवाता था। . जमींदार अपने अधिकारों के कारण गाँव व क्षेत्र में सामाजिक तौर पर भी पहचान रखता था। उसकी यह स्थिति पैतृक थी तथा राज्य उसकी इस स्थिति में सामान्य-तौर पर बदलाव नहीं कर सकता था। मुगलकाल में ज़मींदार की तीन श्रेणियाँ थीं। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(i) प्रारंभिक ज़मींदार-ये ज़मींदार वो थे जो अपनी ज़मीन का राजस्व स्वयं कोष में जमा कराते थे। एक गाँव में प्रायः ऐसे ज़मींदार 4 या 5 ही हुआ करते थे।

(ii) मध्यस्थ ज़मींदार-ये ज़मींदार वो थे जो अपने आस-पास के क्षेत्रों के ज़मींदारों से कर वसूल करते थे तथा उसमें से कमीशन के रूप में एक हिस्सा अपने पास रखकर कोष में जमा कराते थे। ऐसे ज़मींदार या तो एक गाँव में एक या फिर दो या तीन गाँवों का एक होता था।

(iii) स्वायत्त मुखिया ये ज़मींदार बहुत बड़े क्षेत्र के मालिक होते थे। कई बार इनके पास 200 या इससे अधिक गाँव भी होते थे। इनकी पहचान स्थानीय राजा की तरह होती थी। सरकारी तन्त्र भी उनके प्रभाव में होता था। इनके क्षेत्र में कर एकत्रित करने में सरकार के अधिकारी भी सहयोग देते थे। ये बहुत साधन सम्पन्न होते थे।

प्रश्न 11.
मुगलकाल में ज़मींदारी कैसे-कैसे प्राप्त की जाती थी? इस बारे में किन्हीं पाँच पहलुओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल में कोई व्यक्ति ज़मींदार कैसे बनता था एवं किस तरह से शक्तियाँ हासिल करता था, इस बारे में साक्ष्य प्रकाश डालते हैं। इनमें से कुछ का वर्णन इस प्रकार है

(i) ज़मींदारी प्राप्त करने का पहला कारण पैतृक माना जाता है, जिसके अनुसार वंशीय व जातीय आधार पर जिन लोगों को यह अधिकार था वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता था। अबुल-फल इस बारे में स्पष्ट करता है कि ब्राह्मण, राजपूत व अन्य उच्च जातियों की यह स्थिति थी। कुछ मुस्लिम ज़मींदार भी इस श्रेणी में आ गए थे।

(ii) पश्चिमी भारत के कुछ दस्तावेज युद्ध में जीत कर इसकी उत्पत्ति से जोड़ते हैं। इनके अनुसार शक्तिशाली वर्ग युद्ध जीतकर क्षेत्र पर कब्जा कर लेता था तथा कमजोर लोगों को वहाँ से बेदखल कर देता था। उसके बाद अपनी ताकत के सहारे ये लोग राज्य से मिल्कियत का प्रमाण-पत्र भी ले लेते थे।

(iii) कुछ लोगों ने अपने सहयोगियों से मिलकर जंगलों की सफाई कर अपनी बस्तियाँ बसाईं तथा धीरे-धीरे इनका विस्तार कर लिया। इस तरह इन्हें ज़मींदारी अधिकार मिल गए। ये ज़मींदार प्रायः छोटे रहे।

(iv) कुछ जातियों व परिवारों ने स्वयं को संगठित कर ऐसी राजनीति बनाई कि बड़े भू-क्षेत्र पर उनका कब्जा हो। उसके बाद राज्य को सहयोग देकर उन क्षेत्रों से कर एकत्रित करने का अधिकार ले लिया। इसके बाद अपने-अपने क्षेत्र में जमींदारियाँ स्थापित करने में कामयाब रहे। उत्तर भारत में कुछ राजपूत व जाट परिवार तथा बंगाल में किसान पशुचारी वर्ग से सदगोप जैसी जातियों के लोगों ने ऐसा ही किया।

(v) इनके अतिरिक्त कुछ लोगों ने शाही सेवा करके, व्यापार इत्यादि में लाभ कमाकर ज़मीन खरीदकर, अन्य व्यक्ति से हस्तांतरण करवाकर भी जमींदारियाँ लीं। किसी-किसी व्यक्ति को राज्य द्वारा उसकी सैनिक व असैनिक सेवा से प्रभावित होकर उन्हें जमींदारियाँ दीं। आर्थिक स्थिति के अच्छा होने से कुछ सामान्य वर्ग की जातियों के लोगों द्वारा भी जमींदारियाँ खरीदी गईं।

प्रश्न 12.
मुगलकाल में अकबर ने किस तरह की भू-राजस्व व्यवस्था को महत्त्व दिया? उसने भूमि को किस तरह विभाजित करवाया?
उत्तर:
मुगलकाल में राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था। मुगल शासक अकबर को विरासत में आर्थिक दृष्टि से कमजोर राज्य मिला था। उसने अपने राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए एक प्रशासन तंत्र को खड़ा किया। इस कार्य में उसे टोडरमल जैसा दीवान मिला। उसने जिस तरह से कार्य किए उससे राज्य आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हो गया। तत्कालीन साक्ष्यों में इस व्यवस्था को टोडरमल का बन्दोबस्त बताया है।

अकबर के निर्देशानुसार उसके दीवान टोडरमल ने प्राप्त सूचनाओं का अध्ययन कर विशेषज्ञों की राय ली। फिर उसने यह फैसला किया कि सरकार को पता चले कि उसके साम्राज्य में जोत क्षेत्र कितना है। इसके लिए सारे साम्राज्य की ज़मीन की नपाई की गई। (इसमें काफी जंगली क्षेत्र व पहाड़ी क्षेत्र नहीं आ पाया।) इस नपाई के आधार पर साम्राज्य को 182 परगनों में बाँटा गया। प्रत्येक परगने की आय लगभग एक करोड़ रुपए थी।

जमीन की नपाई के बाद यह सोचा गया कि कर का निर्धारण कैसे हो? इसके लिए दीवान ने कर एकत्रित करने वाले अधिकारी अमील-गुजार को स्पष्ट किया कि राज्य नकद वसूली को महत्त्व देता है। परन्तु यह कृषक की मर्जी पर है कि वह जिन्स (फसल) के रूप में भुगतान करता है तो भी उसे कष्ट नहीं होना चाहिए। इसके बाद कर निर्धारण सभी क्षेत्रों व कृषकों से एक समान नहीं किया गया बल्कि यह भूमि के उपजाऊपन के आधार पर था। उपजाऊपन के आधार पर भूमि को चार हिस्सों में विभाजित किया।

  • पोलज-कृषक की सबसे उपजाऊ भूमि को पोलज कहा गया। इस ज़मीन पर वर्ष में नियमित फसल होती थी। इस पर सिंचाई व्यवस्था भी ठीक थी।
  • परौती-यह वह ज़मीन थी जो एक फसल के बाद कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दी जाती थी अर्थात् यह ज़मीन वर्ष में केवल एक फसल देती थी।
  • चचर (छाछर)-यह ज़मीन 2 से 4 वर्षों में एक फसल अच्छी देती थी। प्रायः जब काफी बरसात होती थी तब इसमें फसल ठीक होती थी।
  • बंजर-इस ज़मीन पर कभी-कभार फसल होती थी। कई बार पाँच वर्ष तक जोत में नहीं आती थी। यह ज़मीन रेतीली, उबड़-खाबड़ तथा चरागाह क्षेत्र वाली थी।

ज़मीन के इस बँटवारे के बाद पहली दोनों किस्म की ज़मीन को फिर तीन भागों में बाँटा जाता था जिसे उत्तम, मध्यम व खराब का नाम दिया जाता था।

प्रश्न 13.
मुगलकाल में कर एकत्रित करने की प्रमुख विधियाँ कौन-सी थीं? वर्णन करें।
उत्तर:
अकबर के काल में भूमि की नपाई व बँटवारे के बाद टोडरमल ने कर एकत्रित करने की ओर ध्यान दिया। सबसे पहले उसने जमा व हासिल के बीच अन्तर के कारणों को समझा, फिर उसके समाधान के लिए कदम उठाए ताकि निर्धारित व वसूल किए. गए कर के बीच का अन्तर समाप्त हो। मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए तीन प्रणालियाँ अपनाई गईं

(i) जन्ती प्रणाली-मुगलकाल में सर्वाधिक प्रचलन इस प्रणाली का रहा। यह प्रणाली पंजाब, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, मालवा, अजमेर, अवध व मुलतान क्षेत्र में अपनाई गई। इस प्रणाली के अनुसार सरकार कृषक से आगामी 5 से 10 वर्ष का समझौता कर लेती थी कि वह आगामी इन दिनों में प्रतिवर्ष इतना कर देता रहेगा। इसके लिए कृषक का पिछले 5 वर्ष का रिकार्ड देखा जाता था। इस नीति से सरकार की आय आगामी कुछ वर्षों के लिए निश्चित हो जाती थी।

(ii) गल्ला बख्शी-कर एकत्रित करने की यह प्रणाली सिंध, कश्मीर, काबुल व गुजरात में अपनाई गई। यह थोड़ी-सी कठिन थी, लेकिन फिर भी इसे अपनाया जाता था। इस प्रणाली के अनुसार कृषक फसल के रोपने के बाद पटवारी को सूचना देता था कि उसने अपने खेत में यह फसल बोई है। सूचना प्राप्ति के महीने तक पटवारी अन्न संबंधित अधिकारियों को लेकर खेत में जाता था तथा खड़ी फसल की स्थिति को देखकर अनुमान लगाता था कि प्रति एकड़ कितनी फसल हो जाएगी। उसी आधार पर कृषक से समझौता किया जाता था।

(iii) कनकूत (नसक) कर एकत्रित करने की यह प्रणाली सबसे अधिक जोखिम वाली थी तथा फसल कटाई के समय अपनाई जाती थी। इसमें एक तो कृषक द्वारा सूचना न देने का भय रहता था। दूसरा फसल पूरे क्षेत्र में एक साथ कटती थी। इससे कई बार अधिकारी मौके पर पहुँच नहीं पाते थे। इस बारे में अलग-अलग साक्ष्य अलग-अलग ढंग से जानकारी देते हैं। परन्तु इन सब में यह स्पष्ट है कि यह मुख्य रूप से फसल कटने पर ली जाती थी। मौके पर सरकारी अधिकारी अपना हिस्सा ले जाते थे और किसान अपना।

प्रश्न 14.
16वीं व 17वीं शताब्दी में व्यापार संबंधी परिवर्तन पर नोट लिखो।
उत्तर:
16वीं व 17वीं शताब्दी में एशिया व यूरोप, दोनों में हो रहे आर्थिक परिवर्तनों से भारत को काफी लाभ हो रहा था। जल व स्थल मार्ग के व्यापार से भारत की चीजें पहले से अधिक दुनिया में फैली तथा नई-नई वस्तुओं का व्यापार भी प्रारंभ हुआ। इस व्यापार की खास बात यह थी कि भारत से विदेशों को जाने वाली मदों में उपयोग की चीजें थीं तथा बदले में भारत में चाँदी आ रही थी। भारत में चाँदी की प्राकृतिक दृष्टि से कोई खान नहीं थी। उसके बाद भी विश्व की चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत में ‘एकत्रित हो रहा था। चाँदी के साथ-साथ व्यापार विनिमय से भारत में सोना भी आ रहा था।

भारत में विश्व-भर से सोना-चाँदी आने के कारण मुगल साम्राज्य समृद्ध हुआ। इसके चलते हुए अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। सूरत इस काल में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के बहुत बड़े (यूरोपीय यात्रियों के अनुसार सबसे बड़े) केन्द्र के रूप में उभरा। बाह्य व्यापार में मुद्रा के प्रचलन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर भी पड़ा। इसमें भी अब वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आने लगी। शहरों में बाजार बड़े आकार के होने लगे। गाँवों से बिकने के लिए फसलें व अन्य उत्पादन शहर में आने लगा तथा इसी तरह शहर की चीजें गाँवों में जाने लगीं।

इससे गाँव व शहर के बीच अन्तर ही कम नहीं हुआ, बल्कि मुद्रा का विस्तार भी तेजी से हुआ। इसी कारण राज्य द्वारा भी कर एकत्रित करने के लिए जिन्स की तुलना में मुद्रा (नकद) को महत्त्व दिया जाने लगा। इस मुद्रा के प्रसार ने, मजदूरों को भी नकद मजदूरी देने की स्थितियाँ दीं। इन सारी स्थितियों में अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिली। इसके कारण कृषक वर्ग ने भी खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलों का उत्पादन करना शुरू किया। इससे कृषक भी समृद्ध हुए जिनके कारण गाँव की स्थिति में भी बदलाव आना प्रारंभ हुआ।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगलकालीन समाज में ग्राम पंचायतों के कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में एक अति महत्त्वपूर्ण पंचायत व्यवस्था थी। गाँव की सारी व्यवस्था, आपसी संबंध तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन पंचायत द्वारा ही किया जाता था। ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजुर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थी इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था। हाँ, इतना अवश्य है कि पंचायत में लिए गए फैसले को मानना सभी के लिए जरूरी था। प्रायः सामान्य दर्जे के काम करने वालों को पंचायत में निर्णय के लिए नहीं बुलाया जाता था, बल्कि फैसले की जानकारी देने व उसे लागू करने के लिए ही बुलाया जाता था।

गाँव की पंचायत मुखिया के नेतृत्व में कार्य करती थी। इसे मुख्य रूप से मुकद्दम या मंडल कहते थे। मुकद्दम या मंडल का चुनाव पंचायत द्वारा किया जाता था। इसके लिए गाँव के पंचायती बुजुर्ग बैठकर किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमत हो जाते थे। मुखिया के कार्यों में पटवारी मदद करता था। गाँव की आमदनी, खर्च व अन्य विकास कार्यों को करवाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। गाँव की जातीय व्यवस्था तथा सामाजिक बंधनों को लागू करने में वह अधिक समय लगाता था।

पंचायत के कार्य-ग्राम पंचायत को गाँव के विकास तथा व्यवस्था की देख-रेख में कार्य करने होते थे। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(a) गाँव की आय व खर्च का नियंत्रण पंचायत करती थी। गाँव का अपना एक खजाना होता था जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का हिस्सा होता था। इस खजाने से पंचायत गाँव में विकास कार्य कराती थी। इसके साथ-साथ पंचायत उन मुख्य अधिकारियों की सेवा (खातिरदारी) पर खर्च करती थी जो गाँव के दौरे पर आते थे।

(b) गाँव में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर बाढ़ व अकाल की स्थिति में भी पंचायत विशेष कदम उठाती थी। इसके लिए वह अपने कोष का प्रयोग तो करती ही थी साथ में सरकार से तकावी (विशेष आर्थिक सहायता) के लिए भी कार्य करती थी।

(c) गाँव के सामुदायिक कार्य जिन्हें कोई एक व्यक्ति या कृषक नहीं कर सकता था तो वह कार्य पंचायत द्वारा किए जाते थे। इनमें छोटे-छोटे बाँध बनाना, नहरों व तालाबों की खुदाई करवाना, गाँव के चारों ओर मिट्टी की बाड़ बनवाना तथा सुरक्षा के लिए कार्य करना इत्यादि प्रमुख थे।

(d) गाँव की सामाजिक संरचना विशेषकर जाति व्यवस्था के बंधनों को लागू करवाना भी पंचायत का मुख्य काम था। पंचायत किसी व्यक्ति को जाति की हदों को पार करने की आज्ञा नहीं देती थी। पंचायत शादी के मामले व व्यवसाय के मामले में इन बंधनों को कठोरता से लागू करती थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 7

(e) गाँव में न्याय करना पंचायत का अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। गाँव में हर प्रकार के झगड़े व सम्पत्ति-विवाद का समाधान पंचायत करती थी। पंचायत दोषी व्यक्ति को कठोर दण्ड दे सकती थी, जिसमें व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक होता था। किसी व्यक्ति को एक सीमित समय (विशेष अवस्था में असीमित भी) के लिए गाँव से बाहर निकाल दिया जाता था। संबंधित व्यक्ति को निर्धारित समय अवधि में गाँव को छोड़ना पड़ता था। इस दण्ड के कारण वह मात्र गाँव में अपमानित नहीं होता था बल्कि उसे जातीय पेशे को भी त्यागना पड़ता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 2.
मुगलकाल में जंगलवासियों का जीवन कैसा था? उसमें किस तरह के परिवर्तन आ रहे थे?
उत्तर:
मुगलकाल में भारत का विशाल भू-क्षेत्र जंगलों से सटा था तथा यहाँ के लोग आदिवासी थे, जो कबीलों की जिन्दगी जीते थे। तत्कालीन स्रोतों व रचनाओं में इन आदिवासियों के लिए ‘जंगली’ शब्द का प्रयोग किया गया है। मुगलकालीन स्रोतों व साहित्य में यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता था, जो जंगलों में प्राकृतिक जीवन-शैली के अनुरूप रह रहे थे। जंगलों के उत्पादों, शिकार व स्थानांतरित कृषि के सहारे वे लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनके कार्य मौसम (जलवायु) के अनुकूल होते थे अर्थात् उन्हें प्रकृति जो उपलब्ध कराती थी, उसे ही ये स्वीकार कर लेते थे। उदाहरण के लिए हम मध्य भारत में रहने वाले भीलों की बात कर सकते हैं।

ये लोग मानसून के दिनों में खेती करते, बसंत के दिनों में जंगल के उत्पाद एकत्रित करते, गर्मियों में मछलियों को पकड़ते तथा सर्दियों के दिनों में शिकार करते थे। ये अपनी इस तरह की गतिविधियाँ सैकड़ों सालों से जंगलों से घूमते-फिरते करते आ रहे थे। सरकार व राज्य का जंगलों व आदिवासियों के बारे में विचार अच्छा नहीं था, क्योंकि राज्य मानता था कि जंगल में राज्य विरोधी व अराजकता वाली गतिविधियाँ चलती थीं। राज्य कभी भी जंगली जीवन जीने वालों को नियंत्रित नहीं कर पाया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 8

मुगलकाल में जंगल की व्यवस्था व जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आया। विभिन्न तरह के व्यापारियों, सरकारी अधिकारियों एवं स्वयं शासक भी विभिन्न अवसरों पर जंगलों में जाया करते थे। इस तरह अब जंगल का जीवन पहले की तरह स्वतंत्र व शान्त नहीं रहा, बल्कि समाज के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा। 16वीं व 17वीं सदी में राज्यों की विस्तारवादी नीति से भी जंगली जनजातियों का जीवन प्रभावित हुआ। वे कबीले शिकार बने जिसके दोनों ओर शक्तिशाली राज्य थे। आइन-ए-अकबरी में स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न स्थानीय राजाओं का जोत क्षेत्र बढ़ा। इसका कारण साफ था कि अकबर के शासन काल में राजनीतिक दृष्टि से शान्ति स्थापित हुई तथा राज्य स्थायी भी हुआ। इस बात का लाभ क्षेत्रीय शक्तियों ने उठाकर विभिन्न जंगली क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।

जंगल के क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों में तेजी आई। जिस तरह से सूफी सन्तों व फकीरों की कार्य प्रणाली से कृषक समुदाय प्रभावित हुआ वैसे ही जंगलवासी भी प्रभावित हुए। इस तरह इस्लाम धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में भी फैलने लगा। इस्लाम अपनाने के बाद इन लोगों की परंपराएँ इत्यादि भी बदलीं। इस तरह जंगलवासियों के जीवन व व्यवस्था में काफी बदलाव आया। इस काल में जंगलवासियों की दूरियाँ गाँव व नगरों से कम हुई वहीं राज्य के साथ भी संबंधों में बदलाव आया।

प्रश्न 3.
मुग़ल काल की उत्पादन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
सामान्य तौर पर किसी भी काल का अध्ययन करते समय पुरुषों का वर्णन मिलता है। महिलाओं के बारे में जानकारी बहुत सीमित होती है। विभिन्न स्रोतों से इस बात का पता चलता है कि मुगल काल की उत्पादन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। कृषक, खेतिहर या दस्तकारों के परिवारों की महिलाएँ विभिन्न कामों में अपनी सेवाएँ देती थीं।

1. कृषि में भूमिका-मुगलकालीन समाज में स्त्री व पुरुष दोनों के बीच श्रम विभाजन काफी हद तक नियोजित था। महिलाएँ पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। कार्य विभाजन की कड़ी में सामाजिक तौर पर यह माना जाता था कि पुरुष बाहर के कार्य करेंगे तथा महिलाएँ चारदीवारी के अन्दर। यहाँ विभिन्न स्रोतों में महिलाएँ कृषि उत्पादन व विशेष कार्य अवसरों पर साथ-साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं। अतः स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन में महिला की भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण थी।

जहाँ महिलाएँ कृषि उत्पादन में बराबर की हिस्सेदारी लेती थीं, वहीं समाज के लोगों के मन में कुछ पूर्वाग्रह देखे जा सकते हैं। जैसे राजस्थान व गुजरात से प्राप्त स्रोतों से पता चलता है कि रजस्वला (मासिक धम) की स्थिति में महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने नहीं दिया जाता था। इसी तरह वे बंगाल में इन्हीं दिनों में पान के बागान में नहीं जा सकती थीं। समाज की इस बारे में धारणा का यह पक्ष हो सकता है कि इस तरह के प्रतिबन्ध के कारण महिला को उन दिनों में अधिक कार्य नहीं करना पड़ता होगा। इसलिए उन पर सामाजिक व धार्मिक बंधन लगा दिए गए।

2. दस्तकार महिलाएँ दस्तकार महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गूंधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं। मुग़ल काल में इनकी गैर-कृषि कार्यों में माँग लगातार बढ़ी थी। जिन-जिन चीज़ों का वाणिज्यीकरण हो रहा था तथा लाभ के साथ जुड़ती जा रही थीं, उसी के अनुरूप महिलाओं की श्रम शक्ति की माँग भी बढ़ रही थी। इस माँग की पूर्ति के लिए अब महिलाएँ नियोक्ता के घर जाकर काम करने लग गई थीं। यहाँ तक कि बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था होने लगी थी, जहाँ महिलाएँ सामूहिक तौर पर बैठकर कार्य करने लगी थीं। इस तरह से महिलाओं के लिए चारदीवारी के बंधन कुछ कमजोर होने लगे थे।

3. परिवार की श्रम शक्ति की वृद्धि-मुग़ल काल में मानव की श्रम शक्ति का बहुत अधिक महत्त्व था। ऐसे में महिलाओं का महत्त्व और अधिक बढ़ गया था क्योंकि उसमें परिवार वृद्धि की क्षमता थी। इसी कारण इस समाज में लोग उसे वंश-वृद्धि (श्रम वृद्धि) के संसाधन के तौर पर देखते थे। दूसरी ओर, बार-बार बच्चों को जन्म देने व कुपोषण के कारण महिलाओं की मृत्यु-दर काफी अधिक थी। इस मृत्यु के कारण महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कम थी। इस कम संख्या के कारण कृषक व दस्तकारी जातियों में तलाकशुदा महिलाओं व विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त था। जबकि साधन-सम्पन्न परिवारों में इस तरह की प्रथा नहीं के बराबर थी। उनमें तो सती प्रथा का प्रचलन काफी अधिक था।

इससे पता चलता है कि साधन-सम्पन्न परिवारों की तुलना में सामान्य वर्ग की महिलाएँ उत्पादन प्रक्रिया में अधिक हिस्सा लेती थीं। इसलिए उनका महत्त्व भी अधिक था। यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि तात्कालिक स्रोतों में दहेज का वर्णन कम है जबकि ‘दुल्हन की कीमत’ का वर्णन अधिक है, अर्थात् वर पक्ष द्वारा शादी करने के लिए खर्च करना एक सामान्य बात थी। इस तरह महिला का महत्त्व परिवार की श्रम शक्ति में वृद्धि के लिए काफी माना जाता था। इस महत्त्व के कारण परिवार में महिला पर नियंत्रण रखना जरूरी समझा जाता था। यह समाज भी वर्तमान की भाँति पुरुष प्रधान समाज था। इसलिए सामाजिक तौर पर परिवार व समुदाय द्वारा महिला पर प्रतिबन्ध लगाए जाते थे। चारित्रिक दृष्टि से मात्र शक के आधार पर ही उन्हें भारी दण्डों का सामना करना पड़ता था।

4. महिलाओं द्वारा अधिकार माँगना-पश्चिमी भारत विशेषकर राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र से इस तरह के स्रोत मिले हैं जिनमें महिलाओं ने अन्याय व शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। महिलाओं ने ग्राम पंचायत के पास प्रार्थना-पत्र भेजकर उससे न्याय व मुआवजे की माँग की है। महिलाओं द्वारा अपने पतियों की बेवफाई का विरोध भी किया गया है। इस तरह की शिकायतों में वे स्पष्ट करती हैं कि पति उनका व बच्चों का ध्यान नहीं रखता है और न ही उन्हें भरण-पोषण की चीजें उपलब्ध कराता है।

महिलाओं के प्रार्थना-पत्रों पर उनके नाम अंकित नहीं मिलते बल्कि वे अपना हवाला परिवार के मुखिया की माँ, पत्नी व बहन के रूप में देती हैं। पंचायत फैसले देते समय उनका कितना पक्ष लेती थी यह विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग था। सामान्य तौर पर पुरुषों को पंचायतें दण्ड नहीं देती थीं। हाँ, इस बात का दबाव जरूर डालती थी कि वे परिवार की देखभाल की सही जिम्मेदारी निभाए।

5. महिला : भू-स्वामिनी के रूप में मुग़ल काल में विभिन्न स्रोतों से यह स्पष्ट है कि यह समाज पुरुष प्रधान था। वहीं कुछ साक्ष्य विशेषकर पंजाब से ऐसे भी मिले है जिनमें महिला को ज़मीन व पुश्तैनी सम्पत्ति का मालिक बताया गया है। इन स्रोतों से स्पष्ट है कि महिलाएँ अपनी सम्पत्ति व ज़मीन के क्रय-विक्रय में अपनी भूमिका निभाती थीं व सक्रिय हिस्सेदारी रखती थीं। कुछ परिवारों (हिन्दू व मुस्लिम) में ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी। वे पूरी सक्रियता के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करती थीं। उस जमींदारी में वे कृषकों, खेतिहरों व कर एकत्रित करने वाले कारिन्दों को दिशा-निर्देश देती थीं। ऐसे मामलों में वे पंचायत के फैसलों में हिस्सा लेने को छोड़कर हर तरह के कार्य करती थीं। बंगाल के कुछ साक्ष्य भी महिलाओं के कुछ स्थानों पर ज़मींदार होने की पुष्टि करते हैं। 18वीं सदी के राज्यों में भी सबसे बड़ी व मशहूर जमींदारियों का वर्णन है। उनमें भी राज-परिवार की एक महिला को सर्वप्रमुख बताया गया है।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसके काल में हुई?
(A) अलाऊद्दीन खिलजी
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) बाबर
(D) अकबर
उत्तर:
(B) मुहम्मद तुगलक

2. विजयनगर साम्राज्य का पहला शासक था
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(A) हरिहर राय

3. विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे
(A) हसन गंगू
(B) कृष्णदेव राय
(C) विजालय
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय
उत्तर:
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय

4. हम्पी के अवशेषों की जानकारी सर्वप्रथम किस व्यक्ति ने दी?
(A) जॉन मार्शल
(B) आर०जी०बैनर्जी
(C) डी०आर० साहनी
(D) कॉलिन मैकेन्जी
उत्तर:
(D) कॉलिन मैकेन्जी

5. ‘गजपति’ की उपाधि किस क्षेत्र के शासक लेते थे?
(A) विजयनगर
(B) बहमनी
(C) उड़ीसा
(D) महाराष्ट्र
उत्तर:
(C) उड़ीसा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

6. किस हथियार के प्रयोग ने पुर्तगालियों को भारत के तटीय क्षेत्रों में शक्तिशाली बनाया?
(A) तलवार
(B) बंदूक
(C) तोपखाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बंदूक

7. विजयनगर का पहला राजवंश था
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(A) संगम वंश

8. तालीकोटा का युद्ध कब लड़ा गया?
(A) 1526 ई० में
(B) 1556 ई० में
(C) 1565 ई० में
(D) 1576 ई० में
उत्तर:
(C) 1565 ई० में

9. विजयनगर के शासकों को कहा जाता था
(A) सुल्तान
(B) राय
(C) सम्राट
(D) महाराजा
उत्तर:
(B) राय

10. संस्कृत साहित्य में यूनानियों तथा उत्तर:पश्चिम से आने वालों को कहा गया है
(A) तुर्क
(B) मलेच्छ
(C) यवन
(D) मंगोल
उत्तर:
(C) यवन

11. विजयनगर साम्राज्य में स्थानीय सैनिक प्रमुखों को कहा जाता था
(A) नायक
(B) विजेता
(C) कुलीन
(D) शहजादा
उत्तर:
(A) नायक

12. 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में विजयनगर में किस जलाशय का निर्माण किया गया?
(A) कमल पुरम
(B) शाही जलाशय
(C) विरुपाक्ष
(D) हम्पी जलाशय
उत्तर:
(A) कमल पुरम

13. अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर में दुर्गों की कितनी पंक्तियाँ बताई हैं?
(A) 5
(B) 7
(C) 8
(D) 10
उत्तर:
(B) 7

14. शहरी क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य में कहाँ स्थित था?
(A) पूर्व में
(B) पश्चिम में
(C) मध्य में
(D) उत्तर:पूर्व में
उत्तर:
(D) उत्तर:पूर्व में

15. डोमिंगो पेस द्वारा ‘विजय का भवन’ किसे कहा गया है?
(A) अस्तबल क्षेत्र को
(B) शाही महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) धार्मिक स्थल को
उत्तर:
(C) महानवमी डिब्बे को

16. हम्पी का नाम किस स्थानीय देवी-देवता से माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष से
(B) विठ्ठल से
(C) पम्पा देवी से
(D) विष्णु से
उत्तर:
(C) पम्पा देवी से

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

17. मंदिरों का प्रवेश द्वार कहलाता था
(A) देव द्वार
(B) शाही द्वार
(C) नगरालय
(D) गोपुरम्
उत्तर:
(D) गोपुरम्

18. धार्मिक केंद्र में सबसे ऊँची इमारत होती थी
(A) गोपुरम्
(B) गर्भ गृह
(C) मंडप
(D) देव स्थल
उत्तर:
(A) गोपुरम्

19. विजयनगर में सबसे बड़ा मंदिर था
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विठ्ठल का
(D) जिन्जी का
उत्तर:
(A) विरुपाक्ष का

20. रथ की आकृति वाला मंदिर किस देवता का माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विट्ठल का
(D) पम्पा देवी का
उत्तर:
(C) विठ्ठल का

21. नायकों द्वारा विजयनगर साम्राज्य में कहाँ गोपुरम् बनवाया गया था?
(A) हम्पी में
(B) मदुरई में
(C) धार्मिक केंद्र में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) मदुरई में

22. विजयनगर की खुदाई में मुख्य रूप से शामिल थे
(A) जॉन एम० फ्रिटज
(B) जॉर्ज मिशेल
(C) एम०एस० नागराज
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

23. बाजार का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है
(A) अब्दुर रज्जाक ने
(B) डोमिंगो पेस ने
(C) वास्कोडिगामा ने
(D) बरबोसा ने
उत्तर:
(B) डोमिंगो पेस ने

24. विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक माना जाता है
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(C) कृष्णदेव राय

25. विजयनगर का समकालीन दक्षिण भारतीय राज्य कौन-सा था?
(A) वारंगल
(B) काकतिया
(C) चोल
(D) बहमनी
उत्तर:
(D) बहमनी

26. किस मुगल शासक ने विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय का वर्णन किया है?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहांगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(A) बाबर ने

27. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
(A) 1320 ई० में
(B) 1336 ई० में
(C) 1350 ई० में
(D) 1380 ई० में
उत्तर:
(B) 1336 ई० में

28. ‘हम्पी’ क्षेत्र में साम्राज्य होने की बात सबसे पहले कब सामने आई?
(A) 1800 ई० में
(B) 1850 ई० में
(C) 1920-21 ई० में
(D) 1956 ई० में
उत्तर:
(A) 1800 ई० में

29. विजयनगर का वर्तमान नाम है
(A) हम्पी
(B) विजयनगर
(C) विजयवाड़ा
(D) बीजापुर
उत्तर:
(A) हम्पी

30. विजयनगर साम्राज्य काल में घोड़ों के व्यापारियों को कहा जाता था
(A) नगर सेठ
(B) तवरम
(C) अश्वपालक
(D) कुदिरई चेट्टी
उत्तर:
(D) कुदिरई चेट्टी

31. भारत में बंदूक लाने का श्रेय दिया जाता है
(A) अंग्रेज़ों को
(B) फ्रांसीसियों को
(C) पुर्तगालियों को
(D) डचों को
उत्तर:
(C) पुर्तगालियों को

32. विजयनगर साम्राज्य का अन्तिम राजवंश कौन-सा था?
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(C) तुलुव वंश

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

33. तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किसने किया?
(A) हरिहर ने
(B) बुक्का राय ने
(C) कृष्णदेव राय ने
(D) राम राय ने
उत्तर:
(D) राम राय ने

34. 1565 ई० में युद्ध तालीकोटा के किस क्षेत्र में हुआ?
(A) राक्षसी-तांगड़ी में
(B) चन्द्रगिरी में
(C) पेनुकोण्डा में
(D) गोलकुण्डा में
उत्तर:
(A) राक्षसी-तांगड़ी में

35. तालीकोटा की हार के बाद विजयनगर के शासकों ने अपनी राजधानी बनाई
(A) विजयनगर
(B) पेनुकोण्डा
(C) गोलकुण्डा
(D) मैसूर
उत्तर:
(B) पेनुकोण्डा

36. कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या सुलझाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी
(A) मुगल शासकों की
(B) विजयनगर के दरबारियों की
(C) बीजापुर के सुल्तान की
(D) जनता की
उत्तर:
(C) बीजापुर के सुल्तान की

37. सैनिक प्रमुख के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य करने वाले वर्ग को विजयनगर में क्या नाम दिया जाता था?
(A) राय
(B) अमीर
(C) नायक
(D) अमर-नायक
उत्तर:
(D) अमर-नायक

38. तुंगभद्रा नदी विजयनगर से किस दिशा में थी?
(A) दक्षिण
(B) दक्षिण पूर्व
(C) पश्चिम
(D) उत्तर पूर्व
उत्तर:
(D) उत्तर पूर्व

39. कालीकट का वर्तमान नाम है
(A) कोजीकोड
(B) मालाबर
(C) त्रिअनन्तपुरम
(D) कोलकट्यम
उत्तर:
(A) कोजीकोड

40. विजयनगर के शासक जल प्रबंधन करते थे
(A) राजकीय क्षेत्र के लिए
(B) धार्मिक केंद्र के लिए
(C) कृषि क्षेत्र के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

41. सुरक्षा दृष्टि से विजयनगर का आश्चर्यजनक पहलू है
(A) मन्दिरों की बेजोड़ सुरक्षा
(B) शाही क्षेत्र की किलेबंदी
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी
(D) हथियारों में बंदूक का प्रयोग
उत्तर:
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी

42. “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं” ये पंक्तियां किस यात्री ने लिखीं?
(A) डोमिंगो पेस मे
(B) बरबोसा ने
(C) अब्दुर रज्जाक ने
(D) नूनिज़ ने
उत्तर:
(B) बरबोसा ने

43. 11000 वर्ग फीट के आधार पर 40 फीट ऊँचे विशाल मंच को पुरातत्वविदों ने क्या नाम दिया है?
(A) महानवमी डिब्बा
(B) शाही केंद्र
(C) कल्याण मंडप
(D) सिंहासन मंडप
उत्तर:
(A) महानवमी डिब्बा

44. राजकीय केंद्र में सबसे सुन्दर भवन किसे माना जाता है?
(A) हजार राम मन्दिर को
(B) कमल महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) कल्याण मंडप को
उत्तर:
(B) कमल महल को

45. कमल भवन के नजदीक बहुत बड़ी संख्या में किस पशु की रख-रखाव की व्यवस्था विजयनगर के शासकों ने की?
(A) हाथी
(B) घोड़ा
(C) ऊँट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हाथी

46. धार्मिक केंद्र में लोगों की श्रद्धा सबसे अधिक किस मन्दिर में थी?
(A) विठ्ठल
(B) विरुपाक्ष
(C) चन्नकेशव
(D) वृहदेश्वर
उत्तर:
(B) विरुपाक्ष

47. विरुपाक्ष मन्दिर का कौन-सा प्रवेश द्वार सबसे ऊँचा, भव्य व मुख्य है?
(A) पूर्वी
(B) पश्चिमी
(C) उत्तरी
(D) दक्षिणी
उत्तर:
(A) पूर्वी

48. विट्ठल देवता का संबंध किस देवता के साथ जोड़ा जाता है?
(A) सूर्य के साथ
(B) शिव के साथ
(C) विष्णु के साथ
(D) जगन्नाथ के साथ
उत्तर:
(C) विष्णु के साथ

49. हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व स्थल कब घोषित किया गया?
(A) 1952 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(C) 1976 ई० में

50. यूनेस्को द्वारा हम्पी को विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
(A) 1960 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(D) 1986 ई० में

51. वर्तमान में हम्पी को कौन संरक्षित कर रहा है?
(A) भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग
(B) कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसने की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर एवं बुक्का ने की।

प्रश्न 2.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई० में हुई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 3.
विजयनगर के शासकों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों को राय कहा जाता था।

प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका किस घटना की मानी जाती है?
उत्तर:
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका तालीकोटा के युद्ध की मानी जाती है।

प्रश्न 5.
विजयनगर साम्राज्य में इटली के किस यात्री ने यात्रा की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में इटली के अब्दुर रज्जाक ने यात्रा की।

प्रश्न 6.
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन किसने किया?
उत्तर:
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन डोमिंगो पेस ने किया।

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच क्या कहलाता था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच ‘महानवमी डिब्बा’ कहलाता था।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन हाथियों का अस्तबल के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9.
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर किस देवता का था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर विरुपाक्ष देवता का था।

प्रश्न 10.
महाराष्ट्र में किस देवता को ‘विट्ठल देव’ कहा जाता था?
उत्तर:
महाराष्ट्र में विष्णु को ‘विठ्ठल देव’ कहा जाता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ किस देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है?
उत्तर:
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ पम्पा देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

प्रश्न 12.
विजयनगर के मानचित्र में किस अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है?
उत्तर:
विजयनगर के मानचित्र में I (आई) अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है।

प्रश्न 13.
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
उत्तर:
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में सन् 1986 में शामिल किया गया।

प्रश्न 14.
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर कौन बताता है?
उत्तर:
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर डोमिंगो पेस बताता है।

प्रश्न 15.
विजयनगर का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विजयनगर का अर्थ है-विजय का शहर।

प्रश्न 16.
कॉलिन मैकेन्ज़ी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी किससे मिली?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी विरुपाक्ष व पम्पा देवी के पुजारियों से मिली।

प्रश्न 17.
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर कब बना?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर 1815 ई० में बना।

प्रश्न 18.
दक्षिण (बहमनी) के शासक क्या कहलाते थे?
उत्तर:
दक्षिण (बहमनी) के शासक सुल्तान कहलाते थे।

प्रश्न 19.
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर किस देवता से जुड़ा है?
उत्तर:
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर बृहदेश्वर देवता से जुड़ा है।

प्रश्न 20.
कुदिरई चेट्टी कौन थे?
उत्तर:
कुदिरई चेट्टी घोड़ों के व्यापारी थे।

प्रश्न 21.
विजयनगर साम्राज्य के प्रथम राजवंश का नाम बताइए।
उत्तर:
विजयनगर का पहला वंश संगम वंश था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 22.
कृष्णदेव राय किस वंश से संबंधित था?
उत्तर:
कृष्णदेव राय तुलुव वंश से संबंधित था।

प्रश्न 23.
विजयनगर का अंतिम वंश कौन-सा था?
उत्तर:
विजयनगर का अंतिम वंश अराविदु वंश था।

प्रश्न 24.
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान किसने करवाया?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान बीजापुर के सुल्तान ने करवाया।

प्रश्न 25.
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन किस यात्री ने दिया है?
उत्तर:
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन डोमिंगो पेस ने दिया है।

प्रश्न 26.
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने क्या नाम दिया है?
उत्तर:
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने इंडो-इस्लामिक नाम दिया है।

प्रश्न 27.
राजकीय केंद्र में लगभग कितने मन्दिर थे?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में लगभग 60 से अधिक मन्दिर थे।

प्रश्न 28.
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर कौन-सा है?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर हजारराम मन्दिर है।

प्रश्न 29.
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत कौन-सी बनाई जाती थी?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत गोपुरम् बनाई जाती थी।

प्रश्न 30.
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल 1976 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 31.
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल 1986 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 32.
‘विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं, यह बात किसने कही?
उत्तर:
विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं’ यह बात यात्री डोमिंगो पेस ने कही।

प्रश्न 33.
‘गजपति’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘गजपति’ का अर्थ हाथियों का स्वामी है।

प्रश्न 34.
विजयनगर के शासक कौन-सी उपाधि धारण करते थे?
उत्तर:
विजयनगर के शासक ‘हिन्दू सूरतराणा’ की उपाधि धारण करते थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की खोज में कॉलिन मैकेन्ज़ी की क्या भूमिका है?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में अभियंता व पुरातत्वविद था। उसने विरुपाक्ष तथा पम्पा देवी के मंदिरों के पुजारियों से जानकारी प्राप्त की। उसने विजयनगर के क्षेत्र का सर्वेक्षण करवाया तथा रिपोर्ट प्रकाशित की। उसने इसके बाद इस क्षेत्र का मानचित्र भी तैयार करवाया। उसकी रिपोर्ट व मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया जिसके फलस्वरूप विजयनगर की खोज हुई।

प्रश्न 2.
अमर-नायक कौन थे? उनके क्या कार्य थे?
उत्तर:
अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे।

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प्रश्न 5.
विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था की चर्चा करें।
उत्तर:
विजयनगर में आवास क्षेत्र शहर के किलेबन्द क्षेत्र में था। सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं थी। शहर में विभिन्न धर्मों के लोग अलग-अलग क्षेत्रों में रहते थे। इस शहर के उत्तर:पूर्व क्षेत्र में साधन-सम्पन्न वर्ग के लोग रहते थे।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य के शाही स्थल की जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

प्रश्न 7.
मंदिरों के मंडपों के प्रकार व महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मंदिरों के अंदर विभिन्न तरह के मंडप होते थे। जिनकी पहचान, उत्सव व अनुष्ठान के आधार पर की जाती थी। ताजपोशी तथा शादी उत्सव का मंडप बड़े सभागार में होता था। समाज के कार्यक्रमों व सामान्य अवसरों की परंपराओं, विवाह, दान, सामाजिक कार्यों सभा इत्यादि के लिए मंडप अलग होते थे। कुछ मंडप धार्मिक केंद्र के बाह्य क्षेत्र में भी थे।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर की खुदाई का नेतृत्व किन-किन लोगों द्वारा किया गया?
उत्तर:
विजयनगर के उत्खनन (खुदाई) कार्य को करने वाले जॉन एम. फ्रिट्ज (John M. Fritz), जॉर्ज मिशेल (George Michell) तथा एम.एस. नागराज राव (M.S. Nagraja Rao) थे जो प्रारंभ से अंत तक खुदाई के कार्य से जुड़े रहे। इन्होंने पत्थरों की बीच की जगह, दरवाजों के छज्जों तथा मीनारों के बीच के विभिन्न बिन्दुओं की कल्पना की। .

प्रश्न 9.
डोमिंगो पेस विजयनगर शहर का वर्णन किस तरह करता है?
उत्तर:
डोमिंगो एक विदेशी यात्री था। उसने 16वीं शताब्दी में विजयनगर की यात्रा की। उसने शहर की बनावट, सड़कों व गलियों को बहुत अच्छा बताया। उसने विजयनगर के बाजार के बारे में लिखा कि यहाँ प्रत्येक वस्तु मिलती थी; जैसे कि अनाज, बहुमूल्य धातुएं तथा मोम इत्यादि।

प्रश्न 10.
विजयनगर शहर में कृषि क्षेत्र की किलेबंदी के लाभ व हानियाँ बताएँ।
उत्तर:
विजयनगर के खेतों को किलेबन्दी में लेने का सबसे बड़ा लाभ यह था कि लोगों के साथ-साथ फसलों की भी सुरक्षा हो जाती थी। इससे युद्ध काल में खाद्यान्न का संकट नहीं आता था। लेकिन इस व्यवस्था का दोष यह था कि यह महँगी थी। दूर-दराज तक के क्षेत्रों को किलेबन्दी में काफी खर्च करना पड़ता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर के बाजार में मिलने वाली चीज़ों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर का बाजार उपयोगी वस्तुओं की दृष्टि से काफी समृद्ध था। इसमें अनाज, दालें विभिन्न तरह के फल व सब्जियाँ, मांस तथा पशु-पक्षी मिलते थे। विभिन्न तरह के आभूषण, कपड़ा तथा अश्व भी यहाँ मिलते थे।

प्रश्न 12.
विजयनगर के हाथियों के अस्तबल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा था। यह कमल महल के समीप था। इतने बड़े अस्तबल को देखकर यह अनुमान लगाया जाना सरल है कि रायों की सेना में हाथियों की संख्या काफी थी।

प्रश्न 13.
विजयनगर साम्राज्य में शासकों व व्यापारियों के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को शासकों द्वारा संरक्षण दिया गया था। व्यापारी साम्राज्य के लिए अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ से ही राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए। 1498 ई० में पुर्तगालियों के भारत के पश्चिमी तट पर आने के बाद इन्होंने व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भाग लिया।
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विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इसके कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी।

प्रश्न 14.
कृष्णदेव राय के व्यापार व व्यापारियों के बारे में क्या विचार थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक था। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने व्यापारियों के बारे में लिखा–“एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात हो सके। उसके अनुसार शासक को रोज बैठक में बुलाकर, व्यापारियों को तोहफे देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहिए।

कृष्णदेव राय के इस चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर, व्यापार को बढ़ावा देना चाहता था।

प्रश्न 15.
हरिहर व बुक्का राय के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हरिहर व बुक्का राय विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने 1336 ई० में इसकी स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का राय (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई।

प्रश्न 16.
विजयनगर का पतन कैसे हुआ?
अथवा विजयनगर साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। इस तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की, जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया।

प्रश्न 17.
विजयनगर साम्राज्य में नायक कौन थे? उनकी गतिविधियाँ क्या थीं?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत सेना प्रमुखों को नायक कहा जाता था। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे।

प्रश्न 18.
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले प्रमुख यात्री कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफानासी निकितिन (Afanaci Niktian), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) है। इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 19.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के रायों ने सुरक्षा व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया। नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी। फारस का दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। उसके अनुसार इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी थी।

प्रश्न 20.
विजयनगर में सड़कों की व्यवस्था की संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने सड़कों को विशेष महत्त्व दिया। विजयनगर की चारदीवारी के अंदर प्रवेश करने के लिए प्रवेश द्वार थे। ये सुरक्षित तो थे ही साथ में स्थापत्य कला की दृष्टि से भी विशेष थे। प्रत्येक प्रकार की दीवार पर अलग-अलग स्थापत्य कला से प्रवेश द्वार बने थे। किलेबंद बस्ती के प्रवेश द्वार पर मेहराब थी जिसके ऊपर गुंबद था। कला इतिहासकार इसे तुर्की प्रभाव का होने के कारण इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) संस्कृति बताते हैं। प्रवेश द्वार से होकर आंतरिक भाग तक पक्की सड़कें थीं। ये सड़कें पहाड़ी व मैदानी दोनों क्षेत्रों में थीं। नगरीय क्षेत्र, धार्मिक व राजकीय क्षेत्र को सड़कों से जोड़ा गया था। इन सड़कों के दोनों ओर बाजार थे। मंदिरों के प्रवेश द्वारों के साथ सड़कों की चौड़ाई थोड़ी अधिक होती थी। सड़कों को पत्थरों द्वारा पक्का किया गया था।

प्रश्न 21.
शाही केंद्र में कौन-कौन से प्रमुख भवन थे?
उत्तर:
शाही केंद्र में शाही महल केंद्र था। विभिन्न अनुष्ठानों का आयोजन स्थल महानवमी डिब्बा भी इसी क्षेत्र में था। सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है। इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल भवन बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

प्रश्न 22.
विजयनगर शहर के धार्मिक केंद्र के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विजयनगर के राय शासकों ने कई मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। एक स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है।

बरबोसा का उल्लेख
बरबोसा ने विजयनगर की प्रजा के धर्म संबंधी आचरण को लिखा है। प्रस्तुत है उसका एक अंश “राजा ने उन्हें इतनी स्वतंत्रता दी है कि प्रत्येक व्यक्ति  अपने उपासना स्थल, पर आ-जा सके और बिना कोई परेशानी झेले अपने धर्म का पालन कर सके। चाहे वह ईसाई हो या यहूदी मूर हो या कोई अन्य। न केवल शासक बल्कि लोग भी एक दूसरे के साथ बराबरी व न्याय का बर्ताव रखते थे।”

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस  बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के | लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का |  प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं।

प्रश्न 23.
गोपुरम् क्या थे? इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम् या राजकीय प्रवेश द्वार कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है। इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था।

प्रश्न 24. विरुपाक्ष मन्दिर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
विरुपाक्ष स्थानीय परंपराओं के अनुरूप शिव के रूप में सबसे महत्त्वपूर्ण देवता था। इस मंदिर का देवस्थल, वर्गाकार था तथा दो प्रवेश द्वार थे। मंदिर का अपना एक जलाशय था। मंदिर में दो बड़े सभागार व मंडप थे जिनको स्तंभों वाले बरामदे से जोड़ा गया था। इस मंदिर का मंडप कृष्णदेव राय के द्वारा राज्यरोहण के अवसर पर बनाया गया था। इसके स्तंभों पर चित्रों को विशेष कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया था। मंदिर का देवालय बीच में था। भले ही वह छोटे से क्षेत्र में था लेकिन आस्था व उपासना की दृष्टि से यही सबसे महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह मंदिर का गर्भ गृह था तथा देवता की परंपरागत मूर्ति भी यहीं थी। .

प्रश्न 25.
विट्ठल मन्दिर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विट्ठल महाराष्ट्र क्षेत्र में विष्णु के रूप में पूजे जाते थे। महाराष्ट्र के बाद यह देवता कर्नाटक में भी लोकप्रिय हुआ। यह मंदिर सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक था। इसमें भी सभागार, मंडप व देवालय था। इसकी विशेष महत्ता इसका स्थापत्य था। यह मंदिर रथ के आकार पर आधारित था।

प्रश्न 26.
मन्दिर क्षेत्र में सभागार की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
मंदिर में सर्वाधिक प्रयोग स्थल सभागार थे। सभागार का आकार उसकी मान्यता व आवश्यकता के अनुरूप था। इन सभागारों में संगीत, नृत्य व नाटक इत्यादि के कार्यक्रम चलते रहते थे। देवताओं की मूर्तियों को स्थापना के समय या विशेष उत्सवों पर बाहर नहीं लाया जाता था। देवी-देवताओं के विवाह उत्सव के अवसर पर सभागारों की छटा बेहद सुंदर होती थी। देवी-देवताओं के सार्वजनिक दर्शन तथा झूला इत्यादि झुलाने के लिए विशिष्ट मूर्तियों का प्रयोग होता था।

प्रश्न 27.
हम्पी का खनन मानचित्र कैसे तैयार किया गया?
उत्तर:
सर्वप्रथम पूरे हम्पी क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें I (आई) शब्द का प्रयोग नहीं किया गया फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया। फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

प्रश्न 28.
हम्पी की खनन प्रक्रिया से हमें किस-किस चीज की जानकारी मिल पाई?
उत्तर:
हम्पी की खनन प्रक्रिया द्वारा हम विजयनगर साम्राज्य के युग को समझ सके। इस क्रिया में हम विभिन्न भवनों, मार्गों, क्षेत्रों व जलाशयों के बारे में जानकारी भी ले सके। स्थापत्य कला तथा उसकी विभिन्न शैली तक भी पहुँच सके। इन भवनों के उद्देश्य तथा सांस्कृतिक महत्त्व के साथ-साथ हम निर्माणकर्ताओं की सोच इत्यादि के बारे में भी अनुमान लगा पाए। साम्राज्य की राजधानी की किलेबंदी तथा प्रतिरक्षा के बारे में भी काफी हद तक हमारी समझ बनी है। शासक तथा नायक वर्ग की विभिन्न चीजें व भवनों के आधार पर उनकी जीवन-शैली का अनुमान लगाया जा सका।

प्रश्न 29.
विजयनगर की जानकारी हेतु अभी किन-किन प्रश्नों का जवाब ढूँढ़ना बाकी है?
उत्तर:
विजयनगर की अभी तक शाही परिवार व भवनों के बारे में मिली जानकारी द्वारा हम उस स्थान पर बसे लोगों, उनके आपसी संबंधों, बच्चों के जीवन तथा उनकी गतिविधियों को नहीं जान पाए हैं, शहरी केंद्र के आस-पास ग्रामीण क्षेत्रों व इनके आपसी संबंधों को समझना अभी बाकी है। भवनों को बनाने वाले विशेषज्ञों की सोच, उनकी दैनिक मजदूरी व समाज में उनका स्थान, की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं है। भवन निर्माण में उनका साथ देने वाले कारीगर, राजगीर, पत्थर काटने वाले व्यक्तियों की जानकारी भी हमारे पास नहीं है, मजदूर, निर्माण सामग्री का स्थल, यातायात व संचार के मुख्य साधन इत्यादि अनेक पक्ष ऐसे हैं जिनकी जानकारी अभी अधूरी है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर की खोज पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर का नाम वर्तमान में हम्पी है जो दक्षिण के एक ऐतिहासिक साम्राज्य विजयनगर की धरोहर से समृद्ध था। परन्तु समय बीतने के साथ यह विस्मृति के गर्भ में चला गया। कंपनी के एक अभियंता कॉलिन मैकेन्जी ने एक प्राचीन स्थल के बारे में खोज-बीन शुरू की। वहाँ पर विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के दो प्राचीन मंदिर थे। इन्हीं मंदिरों के पुजारियों से उसे इस स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त हुई जिसके आधार पर उसने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उसकी रिपोर्ट को प्रकाशित किया। उसने इस क्षेत्र का प्रथम मानचित्र तैयार किया। उसकी हम्पी संबंधी रिपोर्ट और मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया। इस क्षेत्र की खोज के प्रति उनका रुझान बढ़ गया। 1836 ई० में पुरातत्वविदों व अभिलेखज्ञाताओं ने इस क्षेत्र (हम्पी) के मंदिरों तथा अन्य स्थानों से अभिलेख एकत्रित किए। सन् 1856 में छाया चित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने आरंभ किए। इस प्रकार परत-दर-परत विस्मृत नगर सामने आने लगे। इतिहासकारों ने उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री तथा यात्रियों के वृत्तांत और स्थानीय साहित्य (तेलुगु, तमिल, कन्नड़ व संस्कृत में) के आधार पर इस नगर के इतिहास का पुनर्निर्माण किया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 6

प्रश्न 2.
विजयनगर के शासकों व व्यापारियों के बीच संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों के व्यापारियों से संबध काफी अच्छे थे। इस साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को रायों द्वारा संरक्षण दिया गया था। रायों की सफलता में अश्व सेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इनके अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ में राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए।

विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों (रत्नों) के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इस जीवन-शैली व माँग के कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी। कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक कहा जाता है। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। कृष्णदेव राय के चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर व्यापार को बढ़ावा देना चाहते थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 3.
कृष्णदेव राय का विजयनगर साम्राज्य के विकास में क्या योगदान था?
उत्तर:
1336 ई० में हरिहर व बुक्का राय दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई। उसके पश्चात् हरिहर द्वितीय (1377-1405) तथा देवराय प्रथम (1406-22) शासक बने। इन्होंने बहमनी से संघर्ष जारी रखा। साथ ही आर्थिक विकास, कृषि व व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। उनके बाद देवराय द्वितीय (1422-46) शासक बना। उसने इस साम्राज्य की सीमा का खूब विस्तार किया। फारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने उसकी खुले मन से प्रशंसा की है।

इसके बाद इस साम्राज्य में कई कमजोर शासक आए जिनको बहमनी के शासकों ने पराजित कर इनकी सीमा को छोटा कर दिया। विजयनगर अपने चरमोत्कर्ष पर कृष्णदेव राय (1509-29) के शासन काल में पहुँचा। उसने सुलुवों के राज्य को नष्ट कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। उसने 1512 ई० में तुंगभद्रा व कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्र रायचूर, दोआब, 1514 ई० में उड़ीसा तथा 1520 ई० में बीजापुर के शासक को पराजित कर साम्राज्य का विस्तार किया। साथ ही उसने आंतरिक दृष्टि से भी राज्य को सुदृढ़ किया। उसका काल शांति, समृद्धि तथा मंदिरों के निर्माण के लिए जाना जाता है।
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प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन की स्थितियों को अपने शब्दों में लिखें। ,
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बाद में उन्होंने राजधानी चन्द्रगिरी (तिरुपति के पास) से 17वीं शताब्दी तक शासन किया। दक्षिण में कई नई शक्तियाँ भी उभरीं जिन्होंने विजयनगर के राजनैतिक समीकरण को काफी कमजोर किया।

अन्ततः बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया। यह युद्ध तालीकोटा (वास्तव में राक्षसी-तांगड़ी क्षेत्र) में हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की। जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया तथा अराविदु वंश नाम-मात्र के लिए पेनुकोण्डा व चन्द्रगिरी से शासन चलाता रहा।
अतः विजयनगर के पतन का मुख्य कारण बहमनी राज्यों से उसकी हार थी।

प्रश्न 5.
विजयनगर के राय, नायकों व अमर-नायकों के आपसी संबंधों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे।

इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी कौन-सी थी? उसका वृत्तांत किन यात्रियों ने दिया है? किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी स्वयं विजयनगर शहर था। इसकी संरचना व स्थापत्य कला की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण शहर था। यह शहर वे सारी विशेषताएँ रखता था जो किसी भी शक्तिशाली राज्य की राजधानी की जरूरत होती थी। इस शहर के मन्दिर, भवन तथा अन्य अवशेष व्यापक रूप में मिले हैं। नायक व अमर-नायकों के अभिलेख तथा यात्रियों का वृत्तांत ने शहर के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। 15वीं शताब्दी के यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफ़ानासी निकितिन (Afanaci Niktian) मुख्य हैं। 16वीं शताब्दी के यात्रियों में दुआर्ते बरबोसा (Duarate Barbosa), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) के नाम आते हैं।

इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी। उदाहरण के लिए डोमिंगो पेस के वृत्तांत को दिया जा सकता है। उसके अनुसार, “इस शहर का परिमाप मैं यहाँ लिख नहीं रहा हूँ, क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह नहीं देख पाया, क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ और देखने में अत्यंत सुन्दर। इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं। आवासों के बगीचों में तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं। इसमें कई स्थानों पर झीलें भी हैं तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।”

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य की जल आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
उत्तर:
विजयनगर में जल प्रबंधन की एक निश्चित योजना थी। इस ओर शासकों ने विशेष ध्यान दिया। विजयनगर प्राकृतिक दृष्टि से पहाड़ियों के बीच था। इसके उत्तर:पूर्व में तुंगभद्रा नदी बहती थी। पहाड़ियों की जल धाराओं से यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बना है। वहाँ पर शासकों ने बाँधों (जलाशयों) का निर्माण किया। इन बाँधों से पानी लेकर बड़े-बड़े कुण्डों में एकत्रित किया जाता था। इस क्षेत्र में आज भी कमलपुरम् नामक एक जलाशय है जिसका निर्माण 15वीं सदी में किया गया था। इन जलाशयों से कृषि में सिंचाई की जरूरत को पूरा किया।

इसके साथ ही शासकों द्वारा नहर के माध्यम से इस जलाशय का पानी शहर के मुख्य हिस्से ‘राजकीय केंद्र’ तक पहुँचाया गया। इस नहर को संगम वंश के शासकों द्वारा तैयार करवाया गया। यह नहर नगर के शहरी व धार्मिक केंद्र की पानी की आवश्यकता की पूर्ति करती थी। साथ ही यह कृषि क्षेत्र की सिंचाई भी करती थी। शासक विभिन्न जलाशयों का निर्माण करवाना गौरव की बात समझते थे। इसके लिए आर्थिक साधन कहीं बाधा नहीं बनते थे। डोमिंगो पेस ने कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय निर्माण पर भी जानकारी दी जिसमें स्पष्ट किया गया है कि 15 से 20 हजार व्यक्ति वहीं कार्य करते थे। जलाशय एक निश्चित योजना के अनुरूप बना था।

प्रश्न 8.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य व नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी, जिसके बारे में हमें जानकारी फारस के दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक से मिलती है। वह सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। वह बताता है कि सबसे बाहरी दीवार चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती है। उसके अनुसार यह संरचना विशाल तथा शुण्डाकार थी। इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। ये पत्थर खिसकते नहीं थे। दीवारों का आंतरिक भाग मिट्टी व मलबे के मिश्रण से बना था। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। उसे इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी लगी।

विजयनगर भारतीय ऐतिहासिक संदर्भ में पहला ऐसा साम्राज्य है जिसने खेतों की भी किलेबंदी की। यह व्यवस्था महँगी जरूर थी, लेकिन इसके परिणाम सुखद थे। कृषि क्षेत्र के बाद दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग की होती थी तथा तीसरी शासकीय केंद्र की जिसमें शाही महल, दरबार, सेना व अस्तबल इत्यादि होते थे। इस किलेबंदी की विशेष बात यह होती थी कि ज्यों-ज्यों अंदर की ओर आते थे त्यों-त्यों दीवारों की ऊँचाई बढ़ती जाती थी।

प्रश्न 9. विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था कैसी थी? वर्णन करें।
उत्तर:
शहर की आवास व्यवस्था-किलेबंद चारदीवारी के अंदर थी। पुरातत्वविदों को सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं मिली है बल्कि भवन निर्माण पद्धति के आधार पर उन्हें आसानी से समझा जा सकता है। पुरातत्वविदों ने शहर के उत्तर:पूर्वी कोने को भवन-निर्माण के आधार पर ही मुस्लिम रिहायशी मोहल्ला घोषित किया है। इसी क्षेत्र में अच्छी किस्म की चीनी मिट्टी की वस्तुएँ भी मिली हैं। जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यहाँ साधन सम्पन्न लोग रहते होंगे। भवन चाहे मंदिर हों या मस्जिद एक जैसे सामान से बने हैं। मंदिर व मस्जिद की मौलिक विशेषताओं को छोड़कर ये सभी हम्पी के मन्दिरों जैसे ही हैं।

शहरी आवास व्यवस्था में पुरातत्वविदों ने एक नई चीज पाई कि इस क्षेत्र में बहुत-से विविध उपासना स्थल मिले हैं। स्थापत्य कला व शहर की बसावट से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ कई संप्रदायों के लोग रहते थे जो अपने-अपने उपासना स्थलों में उपासना करते थे। वे इनका रख-रखाव भी करते थे। स्थापत्य अवशेषों में कुओं, बरसात के पानी के जलाशयों तथा मंदिर के जलाशयों का काफी मात्रा में मिलना, इस बात का उदाहरण है कि ये पानी के स्रोत स्थानीय लोगों की जल से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

प्रश्न 10.
विजयनगर साम्राज्य के शाही आवास पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। पुरातत्वविदों ने इसे शाही केंद्र तथा राजकीय केंद्र इत्यादि नाम भी दिए हैं। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

विजयनगर के खनन में 30 ऐसे भवन मिले हैं जो आकार में काफी बड़े हैं। इन्हें पुरातत्वविदों ने महलों का नाम दिया है। इन भवनों में धर्म से संबंधित कार्य नहीं किए जाते थे। इन भवनों व उपासना स्थलों के बीच मुख्य अंतर यह था कि उपासना स्थलों में ईंट-पत्थर इत्यादि प्रयोग में लाए गए हैं जबकि इनमें विभिन्न प्रकार की सामग्री का पुनः प्रयोग भी किया गया है। इन भवनों में सामग्री की पवित्रता की अपेक्षा मजबूती पर ध्यान दिया गया है। शाही आवास में महानवमी डिब्बा, सभा मंडप, कमल महल व हाथियों के अस्तबल जैसे भवन थे।
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प्रश्न 11.
शाही आवास में राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त कौन-कौन से भवन थे? वर्णन करें।
उत्तर:
शाही केंद्र या राजकीय केंद्र राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त बहुत-से ऐसे भवन हैं जिनके प्रयोग के बारे में तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अनुमान आकार, स्थापत्य निर्माण शैली व भवन की स्थिति के अनुरूप लगाए गए हैं। इन भवनों में सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है। इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है, इसलिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों व यात्रियों (अंग्रेज) ने इसे यह नाम दिया। इसके उद्देश्य के बारे में स्पष्टता नहीं है, परंतु यह स्वीकार किया जाता है कि शासक यहाँ अपने सलाहकारों को मिलता था। अतः यह एक तरह का परिषदीय भवन था।

विजयनगर में सर्वाधिक मंदिरों वाले स्थल को धार्मिक केंद्र कहा गया है लेकिन राजकीय केंद्र में भी एक अत्यंत दर्शनीय व भव्य स्थल ‘हज़ार राम मंदिर’ है। यह मंदिर केवल शाही परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था। मन्दिर के देवस्थल पर आज मूर्तियाँ नहीं हैं, लेकिन दीवारों पर उत्कीर्ण चित्र सुरक्षित हैं। इन चित्रों में कुछ रामायण के दृश्यों को अभिव्यक्त करते हैं इसलिए इस मंदिर का नाम राम के साथ जोड़ा गया। इसकी दीवारों पर घोड़े व हाथियों के चित्र बने हैं। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 12.
गोपुरम् क्या थे? ऐतिहासिक दृष्टि से इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोपुरम् कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है। इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था। गोपुरम् की ऊँचाई के समान मंदिर या नगर का कोई और भवन नहीं होता था। उदाहरण के लिए विरुपाक्ष मंदिर के मुख्य गोपुरम् को कह सकते हैं कि यह 15 मंजिलों में बना है जिसमें पहली मंजिल की ऊँचाई 23 फीट है तथा सबसे ऊपरी मंजिल 11 फीट ऊँचाई रखती है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य के धार्मिक केंद्र पर नोट लिखो।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने अधिकतर मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। इस स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है। परंपरा अनुसार इस देवी ने इन्हीं पहाड़ियों में शिव के एक रूप माने जाने वाले देवता ‘विरुपाक्ष’ से शादी करने के लिए तपस्या की थी जिसमें वह अन्ततः सफल भी रही।
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इसलिए इस क्षेत्र में आज भी विरुपाक्ष मंदिर में इस विवाह को स्मरण करने के लिए विवाह का आयोजन होता है। इन पहाड़ियों में कुछ जैन मंदिर भी मिले हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र कई मतों में विश्वास करने वाले लोगों (हिंदू, मुस्लिम, जैन इत्यादि) की आस्था का केंद्र था लेकिन स्थानीय तौर पर सबसे अधिक महत्त्व विरुपाक्ष के मंदिर को दिया जाता है।

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं। वह मंदिरों के माध्यम से अपनी सत्ता की राजनैतिक वैधता प्राप्त करता था। वह इन मंदिरों को दान, धन व जमीन दोनों रूपों में देता था।

मंदिर केवल आस्था को ही दिशा नहीं देते थे, बल्कि शिक्षा का केंद्र भी थे। इन स्थानों पर विभिन्न तरह की सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी होती थीं। इन कार्यक्रमों के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग इनसे जुड़ा रहता था। शासकों की देखा-देखी नायक भी अपने क्षेत्रों के मंदिरों का निर्माण करवाते व दान देते थे। इसी तरह जनता भी उनकी नकल करती थी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विजयनगर का धार्मिक केंद्र एक महत्त्वपूर्ण स्थल था।

प्रश्न 2.
विजयनगर की जानकारी के स्रोत कौन-कौन से हैं? इसके खनन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर की जानकारी के स्रोत हमें विभिन्न रूपों में मिलते हैं। इनमें पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत शामिल हैं। इनमें से अध्ययनकर्ताओं ने फोटोग्राफ, मानचित्र, उपलब्ध भवनों की खड़ी संरचनाएँ व मूर्तियों की ओर विशेष ध्यान दिया है। मैकेन्जी द्वारा प्रारंभ के सर्वेक्षण के पश्चात् जो रिपोर्ट दी गई, उसको अभिलेखों के वर्णन तथा यात्रियों के वृत्तांत के साथ जोड़ा गया। 1976 ई० में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित करवा दिया। 1980 के दशक में खनन कार्य और अधिक गहन, व्यापक, योजनाबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप विजयनगर के अवशेष सामने आए। विजयनगर की जानकारी का मुख्य स्रोत पुरातात्विक सामग्री है। यह पुरातात्विक सामग्री एक खुदाई या खनन प्रक्रिया के बाद ही प्रयोग हो सकी है। संक्षेप में हम इस प्रक्रिया को इस तरह समझ सकते हैं

1. खनन मानचित्र–सर्वप्रथम पूरे क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया। जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें (I) (आई) अक्षर का प्रयोग नहीं हुआ। फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे .ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

2. खनन कार्य-पूरे क्षेत्र को इस तरह विभाजित करके खनन कार्य प्रारंभ किया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्र को अलग-अलग विशेषज्ञ की देख-रेख में बांटा गया तथा फिर गहन खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संरचनाएँ बाहर आने लगीं, लेकिन इन्होंने आकार तब लिया जब आपस में इन टुकड़ों को जोड़ दिया गया। फिर यहाँ से देवस्थल, मंडप, विशाल गोपुरम्, शाही स्थल, धार्मिक केंद्र, सड़क, बरामदे, बाजार इत्यादि के अवशेष सामने आए। इन सभी स्थलों की पहचान स्तंभों के आधार पर की गई। प्राप्त अवशेषों में लकड़ी की कोई भी चीज उपलब्ध नहीं हो सकी।

प्रश्न 3.
नायक व अमर नायक व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नायक व अमर नायक व्यवस्था (The System of Nayak and Amar Nayak)-विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। अतः इन्हें शक्ति के सहारे ही नियंत्रित किया जाता था।

नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर शब्द फारसी के अमीर शब्द से मिलता-जुलता है जिसका अर्थ ऊँचे पद के कुलीन व्यक्ति से लिया जाता है। मान्यता अनुसार अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। रायों के भवन निर्माण व स्थापत्य कला के विकास के लिए धन इन्हीं के द्वारा जुटाया गया।

अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था। बाद में कई अमर-नायक बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। इससे जहाँ रायों की राज्य पर पकड़ कमजोर हुई, वहीं राज्य विघटन की ओर गया।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. धार्मिक विश्वास व आचार में समन्वय अधिक देखने को मिला
(A) शिव की उपासना में
(B) विष्णु की उपासना में
(C) देवी की उपासना में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. समाजशास्त्री रेडफील्ड ने सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा को नाम दिया
(A) महान व लघु
(B) उच्च व कमजोर
(C) पूर्वी व पश्चिमी
(D) उत्तरी व दक्षिणी
उत्तर:
(A) महान व लघु

3. देवियों की उपासना को प्रारंभ में किस नाम से जाना गया?
(A) मातृ पूजा
(B) तंत्रवाद
(C) लक्ष्मी पूजा
(D) दुर्गा पूजा
उत्तर:
(B) तंत्रवाद

4. मध्यकाल में बौद्ध धर्म में कौन सी नई शाखा पनपी?
(A) हीनयान
(B) महायान
(C) वज्रयान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) वज्रयान

5. हिन्दू धर्म की परंपरा के अनुसार कौन-सा मार्ग मोक्ष से नहीं जुड़ा?
(A) ज्ञान
(B) कर्म
(C) भक्ति
(D) दान
उत्तर:
(D) दान

6. अलवार व नयनार परंपरा भारत के किस क्षेत्र में पनपी?
(A) गुजरात
(B) तमिलनाडु
(C) महाराष्ट्र
(D) कर्नाटक
उत्तर:
(B) तमिलनाडु

7. तमिल वेद किस रचना को माना जाता है?
(A) नलयिरादिव्यप्रबंधम्
(B) लोक मीमांसा
(C) तोलकापियम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) नलयिरादिव्यप्रबंधम्

8. अंडाल नामक अलवार स्त्रीभक्त किसकी उपासना करती थी?
(A) विष्णु
(B) शिव
(C) देवी
(D) जगन्नाथ
उत्तर:
(A) विष्णु

9. चोल शासकों के मन्दिर नहीं हैं
(A) चिदम्बरम में
(B) गगैकोंडचोलपुरम में
(C) कांचीपुरम में
(D) तंजावुर में
उत्तर:
(C) कांचीपुरम में

10. दसवीं शताब्दी तक कितने अलवारों की कविताओं का संकलन हो गया था?
(A) 10
(B) 12
(C) 14
(D) 16
उत्तर:
(B) 12

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

11. कंधे पर लघु शिवलिंग धारियों को कन्नड़ साहित्य में कहा गया है
(A) जंगम
(B) वीरशैव
(C) लिंगायत
(D) दाता
उत्तर:
(A) जंगम

12. कर्नाटक में भक्ति आंदोलन के प्रमुख माने जाते हैं।
(A) सुन्दरम
(B) बासवन्ना
(C) विश्वेरिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बासवन्ना

13. त्रिपक्षीप संघर्ष में शामिल नहीं थे
(A) पाल
(B) प्रतिहार
(C) चोल
(D) राष्ट्रकूट
उत्तर:
(C) चोल

14. दिल्ली सल्तनत की स्थापना कब हुई?
(A) 1025 ई० में
(B) 1191 ई० में
(C) 1206 ई० में
(D) 1526 ई० में
उत्तर:
(C) 1206 ई० में

15. भारत पर पहला अरब आक्रमण किसने किया?
(A) महमूद गजनवी ने
(B) मुहम्मद-बिन-कासिम ने
(C) मुहम्मद गोरी ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(B) मुहम्मद-बिन-कासिम ने

16. इस्लामी राज्य में गैर-इस्लामी जनता को क्या कहा जाता था?
(A) यवन
(B) मलेच्छ
(C) निम्न
(D) जिम्मी
उत्तर:
(D) जिम्मी

17. अकबर ने जजिया कब हटाया?
(A) 1560 ई० में
(B) 1562 ई० में
(C) 1564 ई० में
(D) 1576 ई० में
उत्तर:
(C) 1564 ई० में

18. मुस्लिम व्यापारियों द्वारा मातृगृहता व मातृकुलीयता की परंपरा किस क्षेत्र में अपनाई गई?
(A) असम
(B) केरल
(C) पंजाब
(D) सिन्ध
उत्तर:
(B) केरल

19. सूफी संतों ने इस्लाम में इन्सान-ए-कामिल किसे घोषित किया?
(A) पैगम्बर मोहम्मद को
(B) खलीफा अबुबकर को
(C) मुइनुद्दीन चिश्ती को
(D) अकबर को
उत्तर:
(A) पैगम्बर मोहम्मद को

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20. इस्लामिक साहित्य में सूफी आंदोलन को क्या नाम दिया गया है?
(A) सिलसिला
(B) खानकाह
(C) दरगाह
(D) तसत्वुफ
उत्तर:
(D) तसत्वुफ

21. सूफी संत के अनुयायी आम भाषा में क्या कहलाते थे?
(A) मुर्शीद
(B) भिक्षु
(C) मुरीद
(D) जोगी
उत्तर:
(C) मुरीद

22. सूफी संत के निवास को क्या कहा जाता था?
(A) आश्रम
(B) खानकाह
(C) दरगाह
(D) मस्जिद
उत्तर:
(B) खानकाह

23. भारत में सूफी आंदोलन का कौन-सा सिलसिला अधिक लोकप्रिय हुआ?
(A) चिश्ती
(B) कादरी
(C) सुहरावर्दी
(D) नक्शबंदी
उत्तर:
(A) चिश्ती

24. मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है?
(A) दिल्ली में
(B) जयपुर में
(C) लाहौर में
(D) अजमेर में
उत्तर:
(D) अजमेर में

25. निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कहाँ है?
(A) दिल्ली में
(B) जयपुर में
(C) लाहौर में
(D) अजमेर में
उत्तर:
(A) दिल्ली में

26. अमीर खुसरो किसे अपना गुरु (श्रद्धेय) मानते थे?
(A) मुइनुद्दीन चिश्ती को
(B) कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को
(C) निजामुद्दीन औलिया को
(D) सलीम चिश्ती को
उत्तर:
(C) निजामुद्दीन औलिया को

27. मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अकबर ने कितनी बार यात्रा की?
(A) 10
(B) 14
(C) 18
(D) 20
उत्तर:
(B) 14

28. ‘वे दिल्ली का चिराग नहीं बल्कि मुल्क का चिराग थे?’ ये किसके बारे में कहा गया?
(A) निजामुद्दीन औलिया के बारे में
(B) नसीरुद्दीन-ए-चिराग के बारे में
(C) दाता-ए-गंज बख्श के बारे में
(D) उपर्युक्त सभी के बारे में
उत्तर:
(B) नसीरुद्दीन-ए-चिराग के बारे में

29. मलिक मुहम्मद जायसी की रचना कौन-सी है?
(A) पृथ्वीराज रासो
(B) तजाकिरा
(C) पद्मावत
(D) तहकीक-ए-हिन्द
उत्तर:
(C) पद्मावत

30. चिश्ती शेख प्रायः पसन्द नहीं करते थे
(A) ऐश्वर्यपूर्ण जीवन
(B) राज दरबार में ऊँचे पद
(C) शासकों की गोष्ठियों में शामिल होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. ‘बीजक’ किसकी रचना मानी जाती है?
(A) सूरदास की
(B) तुलसीदास की
(C) कबीरदास की
(D) मीराबाई की
उत्तर:
(C) कबीरदास की

32. संत कबीर का गुरु किन्हें माना जाता है?
(A) रामानंद को
(B) रामानुज को
(C) शंकराचार्य को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) रामानंद को

33. श्री गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ?
(A) 1398 ई० में
(B) 1419 ई० में
(C) 1469 ई० में
(D) 1526 ई० में
उत्तर:
(C) 1469 ई० में

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34. ‘आदि ग्रंथ’ का संकलन किसने किया?
(A) श्री गुरु नानक देव जी ने
(B) श्री गुरु अर्जुन देव जी ने
(C) श्री गुरु तेग बहादुर जी ने
(D) श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने
उत्तर:
(B) श्री गुरु अर्जुन देव जी ने

35. मीराबाई की शादी किस परिवार में हुई?
(A) जयपुर के परिवार में
(B) जोधपुर के परिवार में
(C) बीकानेर के परिवार में
(D) मेवाड़ के परिवार में
उत्तर:
(D) मेवाड़ के परिवार में

36. मीराबाई किसकी उपासक थी?
(A) विष्णु की
(B) शिवजी की
(C) श्रीकृष्ण की
(D) श्रीराम की
उत्तर:
(C) श्रीकृष्ण की

37. मीराबाई के गुरु कौन माने जाते हैं?
(A) रैदास
(B) दादू
(C) नामदेव
(D) मलुकदास
उत्तर:
(A) रैदास

38. असम क्षेत्र में भक्ति आंदोलन के संत कवि थे
(A) चैतन्य
(B) शंकरदेव
(C) नामदेव
(D) रामानंद
उत्तर:
(B) शंकरदेव

39. सूफी संतों की बातचीत पर आधारित रचना कहलाती है
(A) तजकिरा
(B) मुलफुज़ात
(C) रिहला
(D) रूबाई
उत्तर:
(B) मुलफुज़ात

40. सूफी संतों के जीवनी संस्मरण पर आधारित रचना को कहा जाता है
(A) तजकिरा
(B) मुलफुज़ात
(C) रिला
(D) रूबाई
उत्तर:
(A) तजकिरा

41. जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
(A) शिव का अवतार
(B) विष्णु का अवतार
(C) संपूर्ण विश्व का स्वामी
(D) सभी का संरक्षक
उत्तर:
(C) संपूर्ण विश्व का स्वामी

42. उड़ीसा में जगन्नाथ के साथ पूजा जाने वाला उनका भाई या अन्य देवता कौन-सा है?
(A) विष्णु
(B) बलराम (बलभद्र)
(C) सूर्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बलराम (बलभद्र)

43. श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी कौन थे?
(A) श्री गुरु तेग बहादुर जी
(B) श्री गुरु अंगद देव जी
(C) श्री गुरु अर्जुन देव जी
(D) श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी
उत्तर:
(B) श्री गुरु अंगद देव जी

44. धार्मिक समन्वय की श्रृंखला में भारत के विभिन्न हिस्सों में नए देवी-देवताओं की पूजा होने लगी। ये मुख्य रूप से किस देवी-देवता के प्रतीक थे?
(A) विष्णु
(B) शिव
(C) लक्ष्मी या पार्वती
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

45. तमिलनाडु में भक्ति परंपरा से जुड़े संत कहलाते थे
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

46. अलवार व नयनारों के किस विचार ने उन्हें सामान्य समुदाय में लोकप्रिय बनाया?
(A) वैदिक चिन्तन ने
(B) मन्दिरों के प्रति लगाव ने
(C) धन-सम्पदा पूर्ण जीवन ने
(D) उनके जाति के प्रति दृष्टिकोण ने
उत्तर:
(D) उनके जाति के प्रति दृष्टिकोण ने

47. चोल शासकों द्वारा सर्वाधिक मन्दिर किस देवता के बनाए गए?
(A) शिव
(B) ब्रह्मा
(C) राम
(D) कृष्ण
उत्तर:
(A) शिव

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48. कर्नाटक में भक्ति आन्दोलन की प्रारंभिक परंपरा किस नाम से लोकप्रिय हुई?
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) वीरशैव
(D) सूफी
उत्तर:
(C) वीरशैव

49. वीरशैव परम्परा में लिंग धारण करने वालों को क्या कहा जाता था?
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) धर्म रक्षक
(D) लिंगायत
उत्तर:
(D) लिंगायत

50. लिंगायतों ने विरोध किया
(A) पुनर्जन्म के सिद्धान्त का
(B) कठोर जाति प्रथा का
(C) स्थापित ब्राह्मणीय व्यवस्था की कठोरता का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

51. भारत में इस्लाम ने प्रवेश किया
(A) व्यापार के माध्यम से
(B) विजय अभियान के हिस्से के रूप में
(C) सांस्कृतिक परिवर्तन की अदला-बदली से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

52. सैद्धांतिक रूप में इस्लामिक राज्य में कानून का स्रोत माना जाता है?
(A) शरियत को
(B) खलीफा के आदेश को
(C) शासक के कथन को
(D) काजी के निर्णय को
उत्तर:
(A) शरियत को

53. अकबर ने पहली बार अजमेर में ‘नवाज शरीफ’ की यात्रा कब की?
(A) 1556 ई० में
(B) 1562 ई० में
(C) 1568 ई० में
(D) 1572 ई० में
उत्तर:
(B) 1562 ई० में

54. निम्नलिखित में एक भक्ति आन्दोलन का प्रचारक नहीं था
(A) महात्मा बुद्ध
(B) कबीर
(C) रामानन्द
(D) गुरु नानक
उत्तर:
(A) महात्मा बुद्ध

55. “हिन्दू और मुसलमान एक ही मिट्टी से बने हैं।” ये शब्द किस संत के हैं?
(A) शंकराचार्य
(B) जयदेव
(C) कबीर
(D) गुरु नानक
उत्तर:
(C) कबीर

56. भारत के किस भाग में भक्ति आन्दोलन आरम्भ हुआ?
(A) उत्तरी भारत
(B) दक्षिणी भारत
(C) पूर्वी भारत
(D) पश्चिमी भारत
उत्तर:
(B) दक्षिणी भारत

57. निम्नलिखित में से सूफी मत का प्रचारक कौन था?
(A) विवेकानन्द
(B) रामानन्द
(C) मुईनुद्दीन
(D) कबीर
उत्तर:
(C) मुईनुद्दीन

58. ‘गीत गोविन्द’ का रचयिता कौन था?
(A) जयदेव
(B) नामदेव
(C) सोमदेव
(D) रामानन्द
उत्तर:
(A) जयदेव

59. प्रथम सिक्ख गुरु कौन थे?
(A) गुरु नानक देव जी
(B) गुरु अमर दास
(C) श्री गुरु तेग बहादुर जी
(D) श्री गुरु अर्जुन देव जी
उत्तर:
(A) गुरु नानक देव जी

60. “परमात्मा मन्दिरों और मस्जिदों की चार दीवारियों में बन्द नहीं है, वह तो किसी अच्छे हृदय में वास करता है।” ये किसके शब्द हैं?
(A) महात्मा बुद्ध
(B) कबीर
(C) महावीर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कबीर

61. ‘रामचरितमानस’ की रचना किसने की थी?
(A) सूरदास
(B) जयदेव
(C) कबीर
(D) तुलसीदास
उत्तर:
(D) तुलसीदास

62. “सो क्यों मन्दा आखिये, जित जम्मे राजान।” ये शब्द किसके हैं?
(A) शंकराचार्य
(B) कबीर
(C) गुरु नानक
(D) रामानन्द
उत्तर:
(C) गुरु नानक

63. निम्नलिखित में भक्ति आन्दोलन का कौन प्रचारक नहीं था?
(A) गुरु नानक
(B) कबीर
(C) तुलसीदास
(D) गुरु गोबिन्द सिंह
उत्तर:
(D) गुरु गोबिन्द सिंह

64. सल्तनत काल में सूफी मत का प्रचार निम्नलिखित ने किया
(A) मलिक काफूर ने
(B) निजामुद्दीन औलिया ने
(C) रामानन्द ने
(D) फिरोज़ तुगलक ने
उत्तर:
(B) निजामुद्दीन औलिया ने

65. भक्ति आन्दोलन ने सबसे गहरी चोटी मारी
(A) ब्राह्मणों पर
(B) क्षत्रियों पर
(C) वैश्यों पर
(D) शूद्रों पर
उत्तर:
(A) ब्राह्मणों पर

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66. भक्ति आन्दोलन (निर्गुण भक्ति) में निम्नलिखित में से किस पर अधिक जोर दिया गया?
(A) हिन्दू-मुस्लिम पृथक्-पृथक् हैं
(B) कर्म-काण्डों में विश्वास
(C) मूर्ति-पूजा का विरोध
(D) मूर्ति-पूजा में विश्वास
उत्तर:
(C) मूर्ति-पूजा का विरोध

67. मध्यकाल में अधिक सम्मान होता था
(A) ब्राह्मणों का
(B) राजपूतों का
(C) शूद्रों का
(D) मुसलमानों का
उत्तर:
(A) ब्राह्मणों का

68. दक्षिणी भारत में भक्त प्रचारक थे
(A) एकनाथ व नामदेव
(D) कबीर तथा नानक
(C) रामानन्द तथा चैतन्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) एकनाथ व नामदेव

69. ‘गरीब नवाज’ किस शहर में स्थित है?
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) जयपुर
(D) अजमेर
उत्तर:
(D) अजमेर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
उपासना पद्धति में लघु व महान परंपरा किस चिन्तक का विचार है?
उत्तर:
उपासना पद्धति में लघु व महान परंपरा रॉबर्ट रेडफील्ड का विचार है।

प्रश्न 2.
उड़ीसा का जगन्नाथ मन्दिर किस स्थान पर है?
उत्तर:
उड़ीसा का जगन्नाथ मन्दिर पुरी में है।

प्रश्न 3.
तमिलनाडु में विष्णु भक्तों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
तमिलनाडु में विष्णु भक्तों को अलवार कहा जाता था।

प्रश्न 4.
तमिलनाडु में शिव भक्तों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
तमिलनाडु में शिव भक्तों को नयनार कहा जाता था।

प्रश्न 5.
तमिल क्षेत्र में बहु-चर्चित स्त्रीभक्त कौन थी?
उत्तर:
तमिल क्षेत्र में बहु-चर्चित स्त्रीभक्त अंडाल थी।

प्रश्न 6.
कर्नाटक में नवीन संत आंदोलन किससे माना जाता है?
उत्तर:
कर्नाटक में नवीन संत आंदोलन बासवन्ना से माना जाता है।

प्रश्न 7.
कर्नाटक का भक्ति आंदोलन किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
कर्नाटक का भक्ति आंदोलन वीरशैव लिंगायत के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
मुहम्मद-बिन-कासिम ने भारत पर आक्रमण कब किया?
उत्तर:
मुहम्मद-बिन-कासिम ने भारत पर 711 ई० में आक्रमण किया।

प्रश्न 9.
इस्लामिक राज्य में गैर-इस्लामिक प्रजा को क्या कहते हैं?
उत्तर:
इस्लामिक राज्य में गैर-इस्लामिक प्रजा को जिम्मी कहते हैं।

प्रश्न 10.
भारत में प्रवासी संप्रदायों के लिए संस्कृत साहित्य में क्या नाम दिया गया है?
उत्तर:
भारत में प्रवासी संप्रदायों के लिए संस्कृत साहित्य में मलेच्छ नाम दिया गया है।

प्रश्न 11.
इस्लाम की आदर्श पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर:
इस्लाम की आदर्श पुस्तक कुरान है।

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प्रश्न 12.
शेख (संत) का निवास स्थान क्या कहलाता था?
उत्तर:
शेख (संत) का निवास स्थान खानकाह कहलाता था।

प्रश्न 13.
शेख संत की कब्र पर बना स्मारक क्या कहलाता है?
उत्तर:
शेख संत की कब्र पर बना स्मारक दरगाह कहलाता है।

प्रश्न 14.
मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है?
उत्तर:
मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में है।

प्रश्न 15.
बर्नी व खुसरो किसके शिष्य थे?
उत्तर:
बर्नी व खुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।

प्रश्न 16.
मुगल शासकों द्वारा बार-बार किस दरगाह में यात्रा की गई?
उत्तर:
मुगल शासकों द्वारा बार-बार अजमेर शरीफ की दरगाह में यात्रा की गई।

प्रश्न 17.
श्री गुरु नानक देव जी की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जपु जी साहिब, आसा दी वार ।

प्रश्न 18.
कबीर जी का जन्म स्थान किसे माना जाता है?
उत्तर:
कबीर जी का जन्म काशी में माना जाता है।

प्रश्न 19.
‘कबीर ग्रन्थावली’ का संकलन किसने किया?
उत्तर:
‘कबीर ग्रन्थावली’ का संकलन दादू पंथियों ने किया।

प्रश्न 20.
श्री गुरु नानक देव जी ने उपासना की पद्धति कौन-सी दी?
उत्तर:
श्री गुरु नानक देव जी ने उपासना की नाम जाप पद्धति दी।

प्रश्न 21.
खालसा पंथ की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
खालसा पंथ की स्थापना 1699 ई० में श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने की।

प्रश्न 22.
मीराबाई किस क्षेत्र की राजकुमारी थी?
उत्तर:
मीराबाई मेड़ता की राजकुमारी थी।

प्रश्न 23.
‘जपुजी साहिब’ की रचना किसने की थी?
उत्तर:
‘जपुजी साहिब’ की रचना श्री गुरु नानक देव जी ने की थी।

प्रश्न 24.
शंकरदेव के इष्ट देव कौन थे?
उत्तर:
शंकरदेव के इष्ट देव विष्णु थे।

प्रश्न 25.
श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी कौन थे?
उत्तर:
श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी श्री गुरु अंगद देव जी थे।

प्रश्न 26.
भक्ति आन्दोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन से अभिप्राय भक्ति द्वारा मोक्ष की प्राप्ति करना है।

प्रश्न 27.
सूफी मत के पंजाब में प्रसिद्ध प्रचारक कौन थे?
उत्तर:
सूफी मत के पंजाब में प्रसिद्ध प्रचारक बाबा फरीद थे।

प्रश्न 28.
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रचारक कौन थे?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रचारक शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक तथा चैतन्य थे।

प्रश्न 29.
भक्ति आन्दोलन का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन का जन्म दक्षिणी भारत में हुआ।

प्रश्न 30.
भक्ति आन्दोलन का एक राजनीतिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
अकबर ने सहनशीलता की नीति को अपनाया।

प्रश्न 31.
कोई एक सूफी सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
एकेश्वरवाद तथा रहस्यवाद।

प्रश्न 32.
भक्ति आन्दोलन का एक उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन का एक उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता है।

प्रश्न 33.
भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों की भाषा क्या थी?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों की भाषा सरल स्थानीय भाषा थी।

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प्रश्न 34.
भक्ति आन्दोलन के कारण से पंजाब में कौन-से नए धर्म का जन्म हुआ?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के कारण से पंजाब में सिक्ख धर्म का जन्म हुआ।

प्रश्न 35.
गुरु नानक ने कौन-सी भाषा में प्रचार किया?
उत्तर:
गुरु नानक ने पंजाबी भाषा में प्रचार किया।

प्रश्न 36.
पहली बार हिन्दी भाषा में भक्ति आन्दोलन का प्रचार किसने किया?
उत्तर:
पहली बार हिन्दी भाषा में भक्ति आन्दोलन का प्रचार रामानन्द ने किया।

प्रश्न 37.
सूफी मत का उदय कहाँ हुआ?
उत्तर:
सूफी मत का उदय ईरान में हुआ।

प्रश्न 38.
महाराष्ट्र के सन्तों के नाम लिखो।
उत्तर:
महाराष्ट्र के सन्तों के नाम संत तुकाराम, नामदेव, एकनाथ, रामदास आदि थे।

प्रश्न 39.
चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति आन्दोलन का प्रचार कहाँ किया?
उत्तर:
चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति आन्दोलन का प्रचार बंगाल में किया।

प्रश्न 40.
उत्तरी भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना किसने की?
उत्तर:
उत्तरी भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना शेख बहाउद्दीन जगरिया ने की।

प्रश्न 41.
सूफी मत के नक्शबन्दिया सम्प्रदाय के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
सूफी मत के नक्शबन्दिया सम्प्रदाय के संस्थापक बहाउद्दीन नक्शबन्द थे।

प्रश्न 42.
सूफी मत के कादरी सम्प्रदाय की स्थापना किसने की?
उत्तर:
सूफी मत के कादरी सम्प्रदाय की स्थापना नासिरुद्दीन महमूद जिलानी ने की।

प्रश्न 43.
‘खानकाह’ किसे कहते थे?
उत्तर:
सूफी संतों के आश्रम को ‘खानकाह’ कहते थे।

प्रश्न 44.
सूफी मत में पीर तथा मुरीद से क्या अर्थ था?
उत्तर:
पीर गुरु को तथा मुरीद शिष्य को कहा जाता था।

प्रश्न 45.
जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर कहाँ है?
उत्तर:
जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर पुरी (उड़ीसा) में है।

प्रश्न 46.
जगन्नाथ को किसका रूप माना गया?
उत्तर:
जगन्नाथ को विष्णु का रूप माना गया।

प्रश्न 47.
भक्ति विचारधारा के दो रूप कौन-कौन से थे?
उत्तर:
भक्ति विचारधारा के दो रूप निर्गुण व सगुण थे।

प्रश्न 48.
कर्नाटक में शिव भक्तों को क्या कहा गया?
उत्तर:
कर्नाटक में शिव भक्तों को वीरशैव कहा गया।

प्रश्न 49.
कर्नाटक में शिव के वे भक्त जो लिंग धारण करते थे, क्या कहलाते थे?
उत्तर:
कर्नाटक में शिव के वे भक्त जो लिंग धारण करते थे लिंगायत कहलाते थे।

प्रश्न 50.
पुनर्जन्म के बारे में लिंगायतों का क्या विश्वास था?
उत्तर:
वे इसे अस्वीकार करते थे।

प्रश्न 51.
इस्लाम में धर्मशास्त्री क्या कहलाता है?
उत्तर:
इस्लाम में धर्मशास्त्री उलेमा कहलाता है।

प्रश्न 52.
इस्लाम के मुख्य दो मत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
इस्लाम के मुख्य दो मत शिया व सुन्नी हैं।

प्रश्न 53.
मातृ-गृहता व मातृकुलीयता की परंपरा भारत के किस राज्य में थी?
उत्तर:
मातृ-गृहता व मातृकुलीयता की परंपरा भारत के केरल राज्य में थी।

प्रश्न 54.
चरार-ए-शरीफ की मस्जिद कहाँ है?
उत्तर:
चरार-ए-शरीफ की मस्जिद कश्मीर में है।

प्रश्न 55.
सूफी मत में पीर की आत्मा का परमात्मा से मिलन क्या कहलाता है?
उत्तर:
सूफी मत में पीर की आत्मा का परमात्मा से मिलन उर्स कहलाता है।

प्रश्न 56.
सूफी संत की दरगाह पर की गई प्रार्थना क्या कहलाती है?
उत्तर:
सूफी संत की दरगाह पर की गई प्रार्थना जियारत कहलाती है।

प्रश्न 57.
कबीर इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर अल्लाह, खुदा, हजरत व पीर को किस रूप में देखते है?
उत्तर:
कबीर इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर अल्लाह, खुदा, हजरत व पीर को सत्य के रूप में देखते हैं।

प्रश्न 58.
कबीर ने शब्द व शून्य की अभिव्यंजनाएँ किससे ली हैं?
उत्तर:
कबीर ने शब्द व शून्य की अभिव्यंजनाएँ योगी परंपरा से लीं हैं।

प्रश्न 59.
‘पद्मावत’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
‘पद्मावत’ का लेखक ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 60.
पाँचवें सिक्ख गुरु कौन थे?
उत्तर:
पाँचवें सिक्ख गुरु, गुरु अर्जुन देव जी थे।

प्रश्न 61.
दसवें व अन्तिम सिक्ख गुरु थे?
उत्तर:
दसवें व अन्तिम सिक्ख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी थे।

प्रश्न 62.
सूफी संतों की बातचीत पर आधारित ग्रन्थ क्या कहलाता है?
उत्तर:
सूफी संतों की बातचीत पर आधारित ग्रन्थ मुलफुजात कहलाता है।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांस्कृतिक समन्वय की कड़ी में ‘महान’ व ‘लघु’ परंपरा से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा-जिन आदर्शों को उच्च वर्ग के लोग मानते थे अर्थात् जो परंपरा उच्च वर्ग की थी एवं अधिक प्रभावी थी, उसे ‘महान्’ परंपरा की संज्ञा दी गई। दूसरी ओर स्थानीय जन-साधारण में फली-फूली परंपरा को ‘लघु’ परंपरा कहा गया है। ‘लघु’ व ‘महान्’ के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान से साँझी भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति का विकास हुआ है। लेकिन यह मेल-मिलाप सदैव सौहार्दपूर्ण स्थितियों में नहीं रहा, बल्कि द्वन्द्वपूर्ण था अर्थात् सौहार्द के साथ-साथ मतभेद व तनाव भी इसका हिस्सा थे।

प्रश्न 2.
तंत्रवाद व तंत्रवादी विचारधारा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धार्मिक उपासना पद्धति में देवी की उपासना को तंत्रवाद या तांत्रिक के नाम से भी जाना गया। इस पूजा पद्धति में स्त्री, पुरुष तथा सभी वर्गों व वर्गों के लोग शामिल होते थे। इस विचारधारा का प्रभाव शैव व बौद्ध धर्म पर भी पड़ा। बौद्ध धर्म में भी नई धारा विकसित हुई जिसे वज्रयान का नाम दिया गया तथा इस विचारधारा में महात्मा बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार कर लिया गया। यह बौद्ध धर्म की तंत्रवादी विचारधारा थी।

प्रश्न 3.
अलवार व नयनार परंपरा क्या थी?
उत्तर:
अलवार व नयनार परंपरा का संबंध तमिलनाडु क्षेत्र से था। भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक क्षेत्र में जो भक्त विष्णु की पूजा करते थे, अलवार कहलाते थे। जबकि शिव की पूजा करने वाले नयनार कहलाते थे। अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। वे अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया। इस तरह ये स्थल तीर्थ-स्थलों के रूप में उभरे।

प्रश्न 4.
अलवार नयनार परंपरा में शामिल महिलाओं के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अलवार नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी। नयनार परंपरा में कराइक्काल अम्मइयार नामक महिला को बहुत सम्मान मिला जिसने घोर तपस्या की। इन परंपराओं में शामिल स्त्रियों ने सामाजिक कर्तव्यों को त्याग दिया, लेकिन वे किसी वैकल्पिक व्यवस्था की सदस्या अर्थात् भिक्षुणी इत्यादि नहीं बनीं। इनकी जीवन-शैली व रचनाएँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खुली चुनौती थीं।

प्रश्न 5.
वीरशैव परंपरा पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
वीरशैव परंपरा कर्नाटक क्षेत्र में थी। इसको बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण संत ने नेतृत्व दिया। बासवन्ना चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। वे शिव के उपासक थे। उनकी विचारधारा को बहुत लोकप्रियता मिली। उनके अनुयायी शिव के उपासक अर्थात् वीरशैव कहलाए। उनमें से जो लिंग धारण करते थे, उन्हें लिंगायत कहा जाता था। इस समुदाय के लोग शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं, इन लिंगधारी पुरुषों को लोग बहुत सम्मान देते हैं तथा श्रद्धा व्यक्त करते हैं। कन्नड़ भाषा में इन्हें जंगम या यायावर भिक्षु कहा जाता है।

प्रश्न 6.
नाथ, सिद्ध व जोगी कौन थे? इनकी गतिविधियों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मध्यकालीन नाथ, सिद्ध व जोगी उत्तरी भारत के वे लोग थे जो ब्राह्मणीय पूजा-पद्धति व विचारधारा को स्वीकार नहीं करते थे। इन नाथ, सिद्ध व जोगियों में कुछ शिल्पी या जुलाहे थे। ब्राह्मणीय व्यवस्था में उन्हें ‘निम्न’ दर्जा प्राप्त था। परंतु भक्ति परंपरा में उन्हें बहुत सम्मान मिला। साथ ही उनकी दस्तकारियों को भी प्रोत्साहन मिला। सांस्कृतिक व आर्थिक दोनों स्तरों पर उनका योगदान रहा। दस्तकारी की गतिविधियों के कारण नगरीय क्षेत्रों का विस्तार हुआ तथा इनकी चीजों की माँग मध्य व पश्चिमी एशिया में बहुत अधिक बढ़ी जिससे व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

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प्रश्न 7.
उलेमा से क्या अभिप्राय है? इनकी शासन में क्या भूमिका थी?
उत्तर:
उलेमा इस्लाम में धर्मशास्त्री होता है। यह आलिम का बहुवचन है। आलिम का अर्थ होता है ज्ञानी अर्थात् जिसके पास इलम (ज्ञान) है वह आलिम कहलाएगा तथा आलिमों का समूह उलेमा। इस समूह (उलेमा) का यह कर्त्तव्य था कि शासन-व्यवस्था में शासक को सलाह भी दे तथा इस्लाम धर्म की रक्षा हेतु कार्य भी करे। लेकिन व्यवहार में इस्लाम को कठोरता से प्रचलन में लाना आसान नहीं था क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। शासक को प्रजा की भावना को ध्यान में रखना पड़ता था। इसलिए उलेमा प्रायः शासक का सलाहकार रहा। वह प्रायः शासक को अपने दबाव में नहीं ले पाया। वे ऊँचे पदों पर नियुक्त अवश्य थे।

प्रश्न 8.
मुगल शासकों ने जनता से जुड़ने के लिए कैसी नीति अपनाई?
उत्तर:
मुगल शासक सल्तनत काल के शासकों की तुलना में अधिक व्यावहारिक थे। उन्होंने प्रायः उलेमा वर्ग के दबाव को अस्वीकार करते हुए कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं, बल्कि सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी। वस्तुतः अकबर ने गैर-इस्लामिक (हिंदू) को जिम्मी नहीं वरन् उन्हें बिना किसी भेदभाव के प्रजा स्वीकार किया। इस तरह के कार्य अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा यहाँ तक कि औरंगजेब द्वारा भी किए गए।

प्रश्न 9.
भारत में इस्लाम लोक प्रचलन में कैसे आया? इसका क्या प्रभाव रहा?
उत्तर:
भारत में इस्लाम के आगमन से हुए परिवर्तन मात्र शासक वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के जन-सामान्य के विभिन्न वर्गों; जैसे कृषक, शिल्पी, सैनिक, व्यापारी इत्यादि से भी जुड़े थे। समाज के बहुत-से लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी जीवन-शैली व परंपराओं का पूरी तरह परित्याग नहीं किया, लेकिन इस्लाम की आधार स्तम्भ पाँच बातें अवश्य स्वीकार कर लीं। इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति भी स्थानीय भाषा में ही जारी रखी, जिससे पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिन्दी, गुजराती जैसी भाषाओं को विकास के लिए बल मिला क्योंकि इन भाषाओं के लोगों ने कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इनका प्रयोग किया। इसी तरह नई लिपि भी सामने आई, जिसमें प्रमुख रूप से खोजकी लिपि थी जिसे खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय द्वारा विकसित किया गया। पंजाब, सिन्ध व गुजरात में व्यापारी लोग इसका प्रयोग करते थे जिसे लंडा या लांडी हिन्दी भी कहा जाता था।

प्रश्न 10.
मध्यकालीन समाज व साहित्य में समुदायों के नामकरण का क्या आधार था?
उत्तर:
मध्यकालीन समाज व साहित्य में समुदायों का नामकरण भौगोलिक व भाषायी आधार पर होता था। उस समाज में प्रायः हिन्दू व मुस्लिम जैसे शब्द इस तरह प्रयोग नहीं होते थे। 8वीं से 14वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रन्थों व अभिलेखों में मुसलमान शब्द का प्रयोग शायद ही हुआ हो, बल्कि समुदायों के नाम उनके जन्म के क्षेत्र के आधार पर प्रयोग होते थे; जैसे तुर्की, ताजिक, फारसी, अरबी व अफगान इत्यादि। प्राचीनकाल में भी नाम भौगोलिक आधार पर ही प्रयुक्त होते थे। जैसे अफगानों को शक तथा यूनान के लोगों को यवन इत्यादि। संस्कृत साहित्य में प्रवासियों तथा उन लोगों के लिए, जो वर्ण-व्यवस्था में शामिल नहीं थे, मलेच्छ शब्द का प्रयोग होता है। यह शब्द इस बात की पुष्टि भी करता है कि इन प्रवासियों की भाषा संस्कृत भाषायी परिवार की नहीं है।’

प्रश्न 11.
सूफी सिलसिलों का नामकरण कैसे हुआ?
उत्तर:
सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक खाजा इसहाक, शामी, चिश्ती, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है कि चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

प्रश्न 12.
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे गियासपुर क्षेत्र में थी। इसमें एक बड़ा कमरा तथा कई छोटे कमरे थे। इस खानकाह क्षेत्र में शेख का परिवार, सेवक, अनुयायी स्थायी तौर पर रहते तथा उपासना करते थे। अतिथियों के लिए भी यहाँ विशेष जगह थी। खानकाह एक बड़ा क्षेत्र था जो चारदीवारी से घिरा था, जिसके कारण आस-पास के लोग बाह्य आक्रमण (विशेषकर मंगोल) के समय यहाँ शरण लेते थे। शेख स्वयं एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे। वहीं उनकी अपने विशिष्ट अनुयायियों तथा अतिथियों से भेंट होती थी। खुले आंगन व निवास क्षेत्र एक गलियारे के साथ जुड़ा था। खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी।

प्रश्न 13.
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह पर कौन-कौन आता था?
उत्तर:
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह पर समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन एवं व्यापारी आदि आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने, इबादत करने, ताबीज लेने के लिए भी यहाँ लोग आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आते थे। विशिष्ट व बौद्धिक वर्ग में अमीर खुसरो जैसे गायक, कवि अमीर हसन सिजनी जैसे दरबारी तथा जिआऊद्दीन बरनी जैसे इतिहासकार भी आते थे।

प्रश्न 14.
शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने वाले अति विशिष्ट लोगों में किस-किस का नाम आता है?
उत्तर:
मुहम्मद बिन तुगलक सल्तनत काल का पहला सुल्तान था जिसने मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा की। इसके बाद विभिन्न राज परिवार के लोग तथा शासक यहाँ आते रहे जिसके कारण यह लोकप्रिय होती गई। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया। अकबर अपने जीवन में चौदह बार यहाँ आया। वह यहाँ निरंतर 1580 ई० तक आता रहा। उसने प्रत्येक बार इस दरगाह को दान व भेंट दी। इसके बाद यह दरगाह मुगल परिवार के सदस्यों की यात्रा की पहली पसन्द बन गई। शाहजहाँ की बड़ी पुत्री जहाँआरा की 1643 ई० में इस स्थल की यात्रा काफी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

प्रश्न 15.
चिश्ती सिलसिले की दरगाहों पर संगीत का कार्यक्रम क्यों तथा कैसे होता था?
उत्तर:
चिश्ती सिलसिले की दरगाहों पर उपासना का एक ढंग संगीत भी था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कव्वाली का कार्यक्रम अमीर खुसरो द्वारा किया जाता था। उन्होंने कौल (कव्वाली के प्रारंभ में गाई जाने वाली कहावत) को प्रारंभ कर चिश्ती दरगाह की सभा को नई दिशा दी। दरगाह पर संगीत के कार्यक्रम में पहले कौल, फिर फारसी, हिन्दी या उर्दू में कविता (कई बार तीनों का मिश्रण वाली) गाई जाती थी। फिर कौल से.सभा का समापन होता था। चिश्ती उपासना पद्धति में इस तरह संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई।

प्रश्न 16.
कबीर की जानकारी के प्रमुख साक्ष्य कौन-से हैं?
उत्तर:
कबीर की जानकारी के साक्ष्य उनकी कविताओं या उनकी मृत्यु के उपरान्त लिखी गई जीवनियों में हैं। कबीर की रचनाओं का संकलन भिन्न-भिन्न रूपों में विभिन्न लोगों ने किया है। वाराणसी व उत्तर-प्रदेश के क्षेत्र में कबीर की मुख्य रचना ‘बीजक’ का संकलन कबीर पंथियों द्वारा किया गया है। राजस्थान में कबीर ग्रन्थावली को दादू-पंथियों ने तैयार करवाया है। कबीर के कई पद आदिग्रंथ में भी संकलित हैं। ये सभी संकलन उनकी मृत्यु के बाद हुए। इनका प्रकाशन उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ।

प्रश्न 17.
संत कबीर के साहित्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कबीर का काव्य निर्गुण कवियों की श्रृंखला में संत भाषा व खड़ी बोली में है, जिसे सधुक्कड़ी का नाम दिया जाता है। उनकी कुछ रचनाएँ दैनिक जीवन की भाषा के विपरीत या उल्टे अर्थ वाली भाषा में हैं। उन्हें उलटबाँसी उक्तियाँ कहा जाता है। उलटबाँसी की उक्तियाँ का तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की जटिलता की ओर संकेत करता है। कबीर कई जगह अभिव्यंजना शैली (विपरीत भाव शैली) का प्रयोग भी करते हैं जैसे ‘समदरि लागि आगि’ इस तरह की भाषा को समझना व उसका भाव लगाना भी सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं होता।

प्रश्न 18.
कबीर का अध्ययन वर्तमान में चुनौतीपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
कबीर के बारे में अध्ययन इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई गुटों व.मतों के लोग उन्हें अपनों से जोड़ते हैं तथा उसी के अनुरूप उनके पदों का प्रयोग करते हैं। अभी तक कबीर के बारे में यह प्रमाणित नहीं हो पाया है कि वे जन्म से हिन्दू थे या मुस्लिम। यह विवाद 17वीं शताब्दी में उनकी जीवनी-लेखन के साथ ही प्रारंभ हुआ था तथा आज भी जारी है। जनश्रुति व वैष्णव परंपरा के अनुसार कबीर जन्म से हिन्दू थे तथा उनका पालन-पोषण एक मुस्लिम जुलाहे के द्वारा किया गया। यह मुस्लिम जुलाहा भी कुछ समय पहले ही इस्लाम में आया था। इसी तरह कबीर के गुरु रामानंद माने जाते हैं जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों के समय में काफी अधिक अंतर है।

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी की प्रमुख शिक्षाओं व चिन्तन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ उनके भजनों व उपदेशों में पाई जाती हैं जिनके आधार पर स्पष्ट है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि को नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने भाषा में जटिलता को महत्त्व न देकर अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 20.
मीराबाई का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
मीराबाई प्रमुख राजपूत मेवाड़ परिवार की वधू तथा मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक कन्या थी। उनका विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ। उन्होंने सामाजिक दायित्व व बन्धन तोड़ते हुए एवं पति की आज्ञा न मानते हुए घर त्याग दिया। मीरा ने गृहस्थ जीवन का रास्ता बदलकर विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना पति मानकर घुमक्कड़ जीवन जीना चुना। उन्होंने अपने गीतों व भजनों में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वस्व न्यौछावर करने की बात कही है।

प्रश्न 21.
जाति-प्रथा के बारे में अलवारों का क्या मत है?
उत्तर:
अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। उन्होंने वैदिक ब्राह्मणों की तुलना में विष्णु भक्तों को प्राथमिकता दी, ये भक्त चाहे किसी भी जाति अथवा वर्ण से थे। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे।

प्रश्न 22.
भारत में इस्लाम का प्रारंभ कैसे हुआ?
उत्तर:
7वीं शताब्दी में इसके उदय के पश्चात् यह धर्म पश्चिमी एशिया में तेजी से फैला और कालांतर में यह भारत में भी पहुँचा। भारत में शुरू में यह व्यापारियों के साथ पहुँचा। फिर राजनीतिक व अन्य कारणों से भी इसका विस्तार हुआ। दिल्ली सल्तनत व मुगल साम्राज्य इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 23.
इस्लाम की पाँच मौलिक शिक्षाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
इस्लाम की मौलिक शिक्षाएँ इस प्रकार हैं

  • अल्लाह एकमात्र ईश्वर है।
  • पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत अर्थात् शाहद हैं।
  • दिन में पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
  • खैरात (ज़कात) बाँटनी चाहिए।
  • जीवन में एक बार हज की यात्रा पर मक्का जाना चाहिए।

प्रश्न 24.
सूफी शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। सूफीज्म शब्द हमें प्रकाशित रूप में 19वीं सदी में मिलता है। इस्लामिक साहित्य में इसके लिए तसव्वुफ शब्द मिलता है। कुछ विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कुछ अन्य विद्वान सूफी को सोफिया (यानि वे शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं।

प्रश्न 25.
सूफी आंदोलन में सिलसिला से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सिलसिले का अर्थ है जंजीर अर्थात् वह विचारधारा जो मुर्शीद को मुरीद से जोड़ती है, सिलसिला कहलाता है। सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है।

प्रश्न 26.
‘गरीब नवाज’ की दरगाह के बारे में संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जिन्हें लोग ‘गरीब नवाज़’ की दरगाह कहते हैं। यह शेख के आचरण, धर्मनिष्ठा व आध्यात्मिकता के कारण विख्यात हुए। मुहम्मद बिन तुगलक सल्तनत काल का पहला सुल्तान था जिसने इस दरगाह की यात्रा की। इसके बाद विभिन्न राज परिवार के लोग तथा शासक यहाँ आते रहे जिसके कारण यह लोकप्रिय होती गई। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया।

प्रश्न 27.
भक्ति आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भक्ति शब्द की उत्पत्ति “भज्’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ सेवा से लिया जाता है। भक्ति व्यापक अर्थ में मनुष्य द्वारा ईश्वर या इष्टदेव के प्रति पूर्ण समर्पण होता है जिसके अनुरूप व्यक्ति स्वयं को अपने श्रद्धेय में समा लेता है। इसमें सामाजिक रूढ़ियाँ, ताना-बाना, मर्यादाएँ तथा बंधनों की भूमिका नहीं होती। बल्कि सरलता, समन्वय की भावना तथा पवित्र जीवन पर बल दिया जाता है।

प्रश्न 28.
श्री गुरु नानक देव जी की विचारधारा को फैलाने में श्री गुरु अर्जुन देव जी का क्या योगदान है? ।
उत्तर:
श्री गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी के विचारों को संकलित कर एक ग्रन्थ की रचना की जिसे आदि ग्रंथ के रूप में मान्यता मिली। इनके प्रवचनों को ‘गुरबानी’ कहा गया। सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी आदि ग्रंथ में जोड़ दिया। अब यह ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब के नाम से जाना जाने लगा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 29.
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने किस पंथ की स्थापना की? अथवा ‘खालसा पंथ की स्थापना कैसे हुई?
उत्तर:
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की स्थापना की तथा उन्हें पाँच प्रतीक-बिना कटे केश, कृपाण, कछहरा, कंघा और लोहे का कड़ा धारण करने के लिए कहा। इस तरह दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय यह समुदाय सामाजिक, धार्मिक व सैनिक दृष्टि से संगठित हो गया।

प्रश्न 30.
असम के प्रमुख संत कवि कौन थे? उन्होंने किस मत का प्रचार किया?
उत्तर:
शंकरदेव असम में वैष्णव धर्म के प्रचारक थे। उनके उपदेश भगवद्गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे। इसलिए इनका धर्म ‘भगवती धर्म’ के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने अपना समर्पण भगवान विष्णु के प्रति व्यक्त करते हुए उपदेश दिए। उन्होंने कीर्तन व श्रद्धावान भक्तों, सत्संग में भगवान विष्णु के उच्चारण पर बल दिया। उनके प्रार्थना स्थल सत्र (मठ) तथा नामघर कहे जाते थे।

प्रश्न 31.
धार्मिक परंपरा को जानने के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
धार्मिक परंपराओं के इतिहास की जानकारी के स्रोतों में मूर्तिकला, स्थापत्य कला, धर्मगुरुओं के संदेश व कहानियाँ इसके प्रमुख स्रोत होते हैं। इनके अतिरिक्त धर्म प्रमुख को समझने के लिए बाद की पीढ़ियों व अनुयायियों द्वारा उनके बारे में रचे गए गीत तथा काव्य रचनाएँ भी इतिहास लेखन में महत्त्वपूर्ण होती हैं।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में धार्मिक विश्वास व आचरण में समन्वय से क्या आशय है? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
भारत में विभिन्न विश्वासों व आचरणों में विश्वास करने वाले लोग प्राचीन काल से ही रहे हैं। इनका आपस में जुड़कर चलना ही विश्वास व आचरण का समन्वय है। इस समन्वय से हमें अनेक देवी-देवताओं के बारे में जानकारी मिलती है। इन देवी-देवताओं में से कुछ प्राचीनकाल के हैं और कुछ कालांतर में दृष्टिगत हुए इन देवी-देवताओं में विष्णु, शिव और देवी की आराधना की परिपाटी अधिक विस्तृत हुई। भारत के विभिन्न समुदायों में विचारों व विश्वासों का आदान-प्रदान होता रहा। धार्मिक विश्वासों में दो प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलीं। इनमें एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। यह परंपरा मूल रूप से उच्च वर्गीय परंपरा थी जो वैदिक ग्रंथों में फली-फूली। इन्होंने ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में भी रचे। विशेषतः पौराणिक ग्रंथों में यह परंपरा काफी सरल रूप में सामने आई। वैदिक परंपरा का यह सरल साहित्य सामान्य लोगों के लिए था अर्थात् स्त्रियों व शूद्रों के लिए जो वैदिक ज्ञान से परिचित नहीं थे, वे भी इसे ग्रहण कर सकते थे। दूसरी परंपरा शूद्र, स्त्रियों व अन्य सामाजिक वर्गों के बीच स्थानीय स्तर पर विकसित हुई, विश्वास प्रणालियों पर आधारित थी। अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की ऐसी प्रणालियाँ काफी लंबे समय में विकसित हुईं।

इन दोनों अर्थात् ब्राह्मणीय व स्थानीय परंपराओं के संपर्क में आने से एक-दूसरे में मेल-मिलाप हुआ। यही मेल-मिलाप समाज की गंगा-जमुनी संस्कृति है। ब्राह्मणीय ग्रंथों में शूद्र व अन्य सामाजिक वर्गों के आचरणों व आस्थाओं को स्वीकृति मिली। इससे इस परंपरा को नया रूप मिला। दूसरी ओर सामान्य लोगों ने कुछ सीमा तक ब्राह्मणीय परंपरा को स्थानीय विश्वास परंपरा में शामिल कर लिया। इसका एक बेहतरीन उदाहरण उड़ीसा में पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ स्थानीय देवता जगन्नाथ अर्थात् संपूर्ण विश्व का स्वामी था। बारहवीं सदी तक आते-आते उन्होंने अपने इस देवता को विष्णु के रूप में स्वीकार कर लिया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रतिमा का रूप वही रखा, जो पहले से चला आ रहा था। धार्मिक विश्वास व पूजा पद्धतियों का यह मेल-मिलाप केवल ब्राह्मणीय व स्थानीय पद्धतियों में नहीं था, बल्कि अनेक धार्मिक विचारधाराओं व पद्धतियों के बीच निरंतर चलता रहा। इसने समाज को नई दिशा दी।

प्रश्न 2.
तमिलनाडु की अलवार व नयनार संत परंपरा पर नोट लिखें।
उत्तर:
तमिलनाडु क्षेत्र में छठी शताब्दी भक्ति परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इस परंपरा का नेतृत्व विष्णु भक्त अलवारों तथा शिव भक्त नयनारों ने किया। ये अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। ये अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया। इस तरह ये स्थल तीर्थ स्थलों के रूप में उभरे। संत-कवियों के भजनों को मन्दिरों में अनुष्ठान के समय गाया जाने लगा तथा इन संतों की प्रतिमा भी इष्टदेव के साथ स्थापित कर दी गई। इस तरह इन संतों की भी पूजा प्रारंभ हो गई।

अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे। समाज ने इन संतों व उनकी रचनाओं को पूरा सम्मान दिया तथा उन्हें वेदों जितना प्रतिष्ठित बताया। अलवार संतों के एक मुख्य काव्य ‘नलयिरादिव्यप्रबंधम्’ को तमिल वेद के रूप में मान्यता भी मिली। अलवार नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उदाहरण के लिए अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी। नयनार परंपरा में कराइक्काल अम्मइयार नामक महिला को बहुत सम्मान मिला जिसने घोर तपस्या की। उसकी रचनाओं को सुरक्षित रखा गया। इन परंपराओं में शामिल पुरुषों व स्त्रियों ने सामाजिक बंधनों को त्याग दिया। स्थानीय लोग उनकी उपासना, उनके विचारों व कार्यों के कारण करते थे।

प्रश्न 3.
अलवारों व नयनारों के राज्य के साथ संबंधों का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
तमिल क्षेत्र में अलवार व नयनार संत जब अपनी पहचान बना चुके थे, उस समय पल्लव, पांड्य व चोल वंशों के राज्यों ने अलवार-नयनार भक्ति-परंपरा को भी अनुदान दिया। इस अनुदान के सहारे विष्णु व शिव के मंदिरों का निर्माण काफी अधिक मात्रा में हुआ।

चोल शासकों ने चिदम्बरम, तंजावुर तथा गंगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। इन मन्दिरों में शिव की कांस्य प्रतिमाओं को बड़े स्तर पर स्थापित किया। अलवार व नयनार संत वेल्लाल कृषकों व सामान्य जनता में ही सम्मानित नहीं थे, बल्कि शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। सुन्दर मन्दिरों का निर्माण व उनमें मूर्तियों (कांस्य, लकड़ी, पत्थर व अन्य धातुओं) की स्थापना के अतिरिक्त शासक वर्ग ने संत कवियों के गीतों व विचारों को भी महत्त्व दिया, जिसके कारण वे और अधिक लोकप्रिय हुए। अब उनके भजनों को मन्दिरों में गाने पर महत्त्व दिया जाने लगा। संत कवियों के भजनों के संकलन का एक तमिल ग्रन्थ ‘तवरम’ शासकों के द्वारा संकलित करवाया गया। दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का एक और ग्रन्थ संकलित किया गया। यह ग्रन्थ ‘नलयिरादिव्यप्रबन्धम’ (चार हजार पावन रचनाएँ) के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
कर्नाटक की वीरशैव व लिंगायत परंपरा पर नोट लिखें।
उत्तर:
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक क्षेत्र में एक नए आंदोलन की शुरुआत हुई जिसको बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण संत ने नेतृत्व दिया। बासवन्ना को कर्नाटक क्षेत्र में बहुत लोकप्रियता मिली। वे शिव के उपासक थे। उनके अनुयायी वीरशैव कहलाए। इस समुदाय के लोग शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं तथा पुरुष अपने बाएं कंधे पर, चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग को धारण करते हैं। इन्हें लिंगायत कहा जाता है।

लिंगायत समुदाय के लोगों ने जाति व्यवस्था का विरोध किया। ये लोग पुनर्जन्म का भी विरोध करते हैं। इनका मानना है कि वे मृत्यु के बाद भक्त शिव में विलीन हो जाते हैं और पुनः संसार में नहीं लौटते। वे धर्मशास्त्रों में वर्णित श्राद्ध संस्कार को भी नहीं करते। वे अंतिम संस्कार अपनी स्थानीय विधि अनुसार करते हुए मृत शरीर को दफनाते हैं। इन्होंने ब्राह्मणीय धर्मशास्त्रों की मान्यताओं को नहीं स्वीकारा। उन्होंने वयस्क विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की। इस समुदाय में अधिकतर वे लोग शामिल हुए जिनको ब्राह्मणवादी व्यवस्था में विशेष महत्त्व नहीं मिला। उन्होंने बासवन्ना के वचनों को गीतों व कविताओं के रूप में गाया। इन्हीं गीतों के माध्यम से वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर चोट भी करते हैं।

प्रश्न 5.
भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना के बाद शासक व शासितों के संबंध कैसे रहे?
उत्तर:
अरब क्षेत्र में इस्लाम के उदय के पश्चात् यह विश्व के बहुत बड़े हिस्से में फैल गया और भारत में भी आया। भारत पर पहला अरब आक्रमण 711 ई० में सिन्ध पर हुआ तथा उसके बाद आक्रमणों का सिलसिला जारी रहा। इसी कड़ी में पहले दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। दिल्ली सल्तनत (1206-1526) के बाद 1526 से 1707 तक यहाँ मुगलवंश का शासन रहा। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् 18वीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्य उभर कर आए, उनमें भी कुछ इस्लाम को मानने वाले थे। इस प्रकार भारत में इस्लाम परंपरा में विश्वास रखने वाले शासकों ने दीर्घ अवधि तक अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखा। इस राजनीतिक व्यवस्था के सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आयाम भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रहे। क्योंकि यहाँ शासक इस्लाम में विश्वास करने वाला था तथा जनता का बहुसंख्यक वर्ग गैर-इस्लामी था।

इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले शासक से उम्मीद की जाती थी कि वह सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप में कुरान के दिशा-निर्देशों के अनुरूप शासन करे तथा उलेमा से मार्गदर्शन ले। लेकिन व्यवहार में यह सब प्रचलन में लाना आसान नहीं था। क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। इसलिए शासक को प्रजा की भावना को ध्यान में रखना पड़ता था। सल्तनत काल भारत में इस्लामी राज्य का प्रारंभिक चरण रहा। इन शासकों को बीच की नीति अपनानी पड़ी। मुगल शासकों ने इस बारे में कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं बल्कि

सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 6.
सूफी आंदोलन से क्या अभिप्राय है? इसके विकास में खानकाह व दरगाह की भूमिका पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। हाँ यह स्पष्ट है कि सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग

सूफियों के सामान्य सिद्धांत

  • कुरान में पूर्ण आस्था।
  • हजरत मुहम्मद के जीवन को आदर्श मानना।
  • धर्म सम्मत भोजन ग्रहण करना
  • आराम की वस्तुओं का त्याग करना।
  • दूसरों द्वारा कष्ट पहुँचाने पर कष्ट का अनुभव करना।
  • आदर्शपूर्ण नियम बनाना व उनका पालन करना।

ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कुछ अन्य विद्वान सूफी को सोफिया (यानि वे शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं। इस तरह इस शब्द की | उत्पत्ति के बारे में एक मत तो नहीं हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि इस्लाम में 10वीं सदी के बाद अध्यात्म, वैराग्य व रहस्यवाद में विश्वास करने वाली सूचियों की | संख्या काफी थी तथा ये काफी लोकप्रिय हुए। इस तरह 11वीं शताब्दी तक सूफीवाद एक विकसित आंदोलन बन गया।

सूफी आंदोलन के विकास का केन्द्र खानकाह व दरगाह थी। खानकाह सूफी सिलसिले में शेख (संत, फकीर) अर्थात् पीर या मुर्शीद का निवास होती थी। जहाँ शेख के अनुयायी उनसे आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति व आशीर्वाद प्राप्त करते थे। खानकाहों में ही सिलसिले के नियमों का निर्माण होता था तथा शेख व जन-सामान्य के बीच रिश्तों की सीमा का निर्धारण किया जाता था।

पीर अर्थात् शेख की मृत्यु के बाद उन्हें जिस स्थान पर दफनाया जाता था वह दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) कहलाती थी। दरगाह मुरीदों तथा जन-सामान्य के लिए भक्ति स्थल बन जाती थी। दरगाह पर लोग ज़ियारत (दर्शन) करने आते थे। धीरे-धीरे ज़ियारत विशेष अवसरों विशेषकर बरसी के साथ जुड़ गया। यह ज़ियारत उर्स नाम से जानी जाती थी जिसका अर्थ ईश्वर से पीर की आत्मा के मिलन से लिया जाता था। इस तरह लोग अपनी आध्यात्मिक, ऐहिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु दरगाहों पर आने लगे। इस तरह शेख का लोग वली (ईश्वर के मित्र) के रूप में आदर करने लगे तथा उनके आशीर्वाद से मिली बरकत को विभिन्न प्रकार के करामात से जोड़ने लगे। इस तरह धीरे-धीरे इन केंद्रों पर इस आन्दोलन का बहुत विकास हुआ।

प्रश्न 7.
सिलसिले से क्या अभिप्राय है? इनके नामकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
12वीं शताब्दी तक सूफी आंदोलन वैचारिक तौर पर बँटने लगा तथा इन विभाजित समूहों को सिलसिलों का नाम दिया गया। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख, पीर या मुर्शीद को अपने अनुयायियों (मुरीदों) से जोड़ती है। इस जंजीर में पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद, फिर शेख तथा फिर उनके उत्तराधिकारी खलीफा होते थे। सिलसिले में शामिल होने वाले व्यक्ति को एक अनुष्ठान द्वारा दीक्षा दी जाती थी।

सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म-स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

सिलसिले का नामकरण उनकी शैली व आदर्शों के साथ भी जुड़ा है। कुछ सूफी फकीरों ने सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या कर नवीन मतों की नींव रखी। इन नवीन मतों में जो शरिया में विश्वास करते थे उन्हें बा-शरिया कहते थे तथा जो शरिया की अवहेलना करते थे उन्हें बे-शरिया कहा जाता था।

प्रश्न 8.
खानकाह क्या थी? चिश्ती खानकाह की कार्यप्रणाली अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
सूफी संत, शेख या पीर जिस स्थान पर रहते थे, उसे खानकाह कहा जाता था। चिश्ती सिलसिले को लोकप्रिय बनाने में भी खानकाह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। हमें दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया के समय के खानकाह से उनके जीवन की जानकारी मिलती है, जिसके आधार पर हम चिश्ती सिलसिले को समझ सकते हैं। यह खानकाह दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे गियासपुर क्षेत्र में थी। इस खानकाह क्षेत्र में शेख का परिवार, सेवक, अनुयायी स्थायी तौर पर रहते तथा उपासना करते थे। अतिथियों के लिए भी यहाँ विशेष जगह थी। खानकाह एक बड़ा क्षेत्र था जो चारदीवारी से घिरा हुआ था।

खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी। यहाँ समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन, व्यापारी आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने एवं इबादत करने, ताबीज लेने के लिए यहाँ आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आते थे। विशिष्ट व बौद्धिक वर्ग में अमीर खुसरो जैसे गायक, कवि अमीर हसन सिजनी जैसे दरबारी तथा जिआऊद्दीन बरनी जैसे इतिहासकार आते थे। आने वाले सभी लोग शेख के समक्ष झुककर आदर देते थे। अनुयायी उन्हें पीने को पानी देते थे। नए अनुयायियों को यहाँ दीक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 9.
चिश्ती दरगाह पर जियारत कैसे होती थी? वर्णन करें।
उत्तर:
चिश्ती संतों की दरगाह उनके अनुयायियों तथा जन-सामान्य के लिए तीर्थ-स्थल बन गए। लोग इन स्थानों पर जियारत के लिए जाते हैं तथा संत से आशीर्वाद (बरकत) की कामना करते हैं। लोगों के लिए सर्वाधिक श्रद्धा का स्थल अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी थी जिन्हें लोग ‘गरीब नवाज़’ की दरगाह कहते थे। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया। दिल्ली व गुजरात के मार्ग पर होने के कारण यह दरगाह यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बन गई। अकबर अपने जीवन में कुल चौदह बार यहाँ आया। वह यहाँ निरंतर 1580 ई० तक आता रहा। उसने प्रत्येक बार इस दरगाह को दान व भेंट दी।

चिश्ती सिलसिले की सभी दरगाहों पर उपासना का एक ढंग नृत्य व संगीत भी था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कव्वाली का कार्यक्रम अमीर खुसरो द्वारा किया जाता था। चिश्ती उपासना पद्धति में इस तरह संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई।

प्रश्न 10.
सूफी संतों के राज्य के साथ कैसे संबंध रहे? इस बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
सूफी सिलसिलों की राज्य के साथ संबंध के बारे में धारणा भिन्न-भिन्न थी। चिश्ती संप्रदाय के अनुयायी व शेख संयम व सादगी पसंद थे। वे सत्ता से दूर रहने का प्रयास करते थे। वे राज व्यवस्था से कटते भी नहीं थे। यदि राज्य द्वारा बिना माँगे दान दिया जाता था तो वे स्वीकार करते थे। इस भाव के आधार पर शासकों ने समय-समय पर खानकाहों को भूमि व दान दिया। चिश्ती विभिन्न तरह के दान को एकत्रित रखने की बजाय उन्हें खाने, वस्त्र पहनने एवं बाँटने तथा समा की महफिलों का आयोजन करने पर विश्वास करते थे। वे ऐसा करना नैतिक दायित्व समझते थे।

दूसरी ओर, संतों की लोकप्रियता के कारण शासक उनसे संपर्क रखना चाहते थे, क्योंकि शासक जनता में उनकी पकड़ से शासन को स्थायी करना चाहते थे। शासकों को मालूम था कि प्रजा का बहुसंख्यक वर्ग गैर-इस्लामी है। कभी-कभार सुल्तानों व सूफियों के बीच आचरण व शासन-व्यवस्था को लेकर तनाव भी हो जाता था। दोनों उम्मीद करते थे कि दूसरा उन्हें झुककर प्रणाम करे या कदम चूमे। ऐसे में शेख को उसके अनुयायी आडंबरपूर्ण ऊँची पदवी दे देते थे। जैसे . निजामुद्दीन औलिया के शिष्य व अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख (शेखों में सुल्तान) कहकर संबोधित करते थे। सुहरावर्दी व नक्शबंदी सिलसिले की बात करें तो वे क्रमशः दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल शासकों से जुड़े रहे। उन्होंने शासन का पूरा लाभ उठाया। अतः स्पष्ट है कि सभी सूफी सिलसिलों की राज्य संबंधी धारणा एक-जैसी नहीं थी।

प्रश्न 11.
कबीर की जानकारी के स्रोतों का वर्णन करते हुए, उनकी भाषा-शैली की जानकारी दें।
उत्तर:
कबीरदास भक्ति आंदोलन के संत कवियों में काफी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कबीर की जानकारी के साक्ष्य उनकी कविताओं या उनकी मृत्यु के उपरान्त लिखी गई जीवनियों में हैं। वाराणसी व उत्तर-प्रदेश के क्षेत्र में कबीर की मुख्य रचना ‘बीजक’ का संकलन कबीर पंथियों द्वारा किया गया है, जबकि राजस्थान में कबीर ग्रन्थावली को दादू-पंथियों ने तैयार करवाया है। इसी तरह कबीर के कई पद आदिग्रंथ में भी संकलित हैं। ये सभी संकलन उनकी मृत्यु के बाद हुए। कबीर का काव्य निर्गुण कवियों की श्रृंखला में संत भाषा व खड़ी बोली में है, जिसे सधुक्कड़ी का नाम दिया जाता है। उनकी कुछ रचनाओं में दैनिक जीवन की भाषा के विपरीत या उल्टे अर्थ में प्रयोग किया है, इसलिए उन्हें उलटबाँसी उक्तियाँ कहा जाता है। उलटबाँसी की उक्तियों का तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की जटिलता की ओर संकेत करता है। कबीर कई जगह अभिव्यंजना शैली (विपरीत भाव शैली) का प्रयोग भी करते हैं, जैसे ‘समदरि लागि आगि’ इस तरह की भाषा को समझना व उसका भाव लगाना भी सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं होता।

प्रश्न 12.
कबीर का दर्शन किन-किन विचारधाराओं से प्रभावित है? कबीर का अध्ययन इतिहासकारों के लिए चुनौतीपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
कबीर के विचार विभिन्न धर्मों तथा दर्शन से प्रभावित हैं। इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर वे सत्य को अल्लाह, हजरत, खुदा व पीर कहते थे। इसी दर्शन में वे एकेश्वरवाद व मूर्तिभंजन का खुला समर्थन करते थे। वेदांत दर्शन से वे अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मा व आत्मा इत्यादि पक्षों को लेते थे। योगी परंपरा से शब्द व शून्य इत्यादि भावों को स्वीकार करते थे। सूफी विचारधारा के जिक्र (मन में धारण करना) व इश्क (प्रेम) को महत्त्व देते थे, जबकि हिन्दू दर्शन ‘नाम सिमरन’ परंपरा को जीवन की सफलता का रहस्य कहते थे।

इतिहासकारों के लिए कबीर का अध्ययन चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि विभिन्न भाषाओं व क्षेत्रों में संकलित कबीर-साहित्य में भी मतभेद है। कुछ लोगों का विश्वास है कि इसमें सभी पद कबीर रचित नहीं हैं। फिर भी विद्वान भाषाशैली व विषयवस्तु के आधार पर कबीर के पदों को ढूंढने का प्रयास करते हैं। परन्तु अभी तक इसमें आंशिक सफलता मिली है। कबीर के बारे में अध्ययन और कठिन होने का एक कारण यह भी है कि कई गुटों व मतों के लोग उन्हें अपनों से जोड़ते हैं तथा उसी के अनुरूप उनके पदों का प्रयोग करते हैं। विभिन्न संप्रदाय तथा समूह उन्हें अपना प्रेरक मानते हैं। कबीर की विचारधारा उस युग में समाज में विभिन्न वर्गों के लिए प्रासंगिक थी तथा आज भी अपना अलग महत्त्व रखती है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी पर नोट लिखें।
उत्तर:
गुरु नानक देव जी भक्ति परंपरा में निर्गुण संत कवि परंपरा से जुड़े हैं। उनका जन्म 1469 ई० में एक हिन्दू परिवार में वर्तमान पाकिस्तान के तलवंडी (वर्तमान में ननकाना साहब) नामक स्थान पर हुआ। इनका जन्म-स्थान इस्लाम बहुल क्षेत्र था जिस कारण उन्हें इस समुदाय के लोगों के व्यवहार व जीवन को समझने का भरपूर अवसर मिला। पारिवारिक पृष्ठभूमि व्यापारिक होने के कारण उन्होंने लेखाकार.का प्रशिक्षण लिया तथा फारसी सीखी। उनका विवाह छोटी आयु में हो गया तथा पारिवारिक जिम्मेदारी भी काफी थी, लेकिन वे अपना अधिकतर समय सूफी व भक्त संतों के साथ बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर के क्षेत्रों की यात्रा करके विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त किए।

गुरु नानक के संदेश उनके भजनों व उपदेशों में पाए जाते हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि को नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही। उन्होंने अपने अनुयायियों (संगत) के लिए नियम निर्धारित किए तथा उन्हें संगठित किया। उन्होंने सामूहिक उपासना पर बल दिया तथा अपने अनुयायी अंगद को उत्तराधिकारी मानते हुए उन्हें गुरु पद पर आसीन किया।

प्रश्न 14.
मीराबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मीराबाई भक्ति संत कवि परंपरा में सगुणमार्गी विचारधारा से संबंधित है। वह एक कृष्ण भक्त कवयित्री थी। उनकी जीवनी के स्रोत उनके भजन हैं जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा गाया गया। मीराबाई राजपूताना मेवाड़ परिवार की वधू तथा मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक कन्या थी। उनका विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने सामाजिक दायित्व व बन्धन तोड़ते हुए एवं पति की आज्ञा न मानते हुए घर त्याग दिया। एक जनश्रुति के अनुसार उन्हें मेवाड़ के शाही सिसोदिया वंश द्वारा जहर देकर मारने का प्रयास भी किया गया। मीरा ने गृहस्थ जीवन का रास्ता बदलकर विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना पति मानकर घुमक्कड़ जीवन जीना चुना। उन्होंने अपने गीतों व भजनों में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वस्व न्यौछावर करने की बात कही है।

मीराबाई ने पारिवारिक मर्यादाओं को ही नहीं तोड़ा बल्कि समाज की जातिवादी व्यवस्था की भी परवाह नहीं की। मीरा के गुरु रैदास एक चर्मकार थे। उस रूढ़िवादी समाज में राजपूत परिवार का इस तरह से सामान्य जाति से संबंध होना भी बड़ा अपराध था, परंतु उसने इस बात की परवाह नहीं की। मीराबाई के चारों ओर अनुयायियों की भीड़ नहीं लगी तथा न ही उन्होंने किसी समुदाय की नींव डाली। फिर भी गुजरात, राजस्थान व उत्तर भारत के लोगों द्वारा उनके पद गाए जाते हैं तथा वह समाज के एक बड़े वर्ग का प्रेरणा स्रोत है।

प्रश्न 15.
सूफी परंपरा के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
सूफी परंपरा की जानकारी के स्रोत काफी हैं जिनको इतिहास लेखन में सामग्री के रूप में अधिक प्रयोग किया जा सकता है। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(1) ‘कश्फ-उल-महजुब’ अली बिन उस्मान हुजविरी (मृत्यु 1071) द्वारा सूफी विचार व आचरण पर लिखित प्रारंभिक मुख्य पुस्तक है। इस पुस्तक में यह ज्ञान मिलता है कि बाह्य परंपराओं ने भारत के सूफी चिन्तन को कैसे प्रभावित किया।

(2) मुलफुज़ात (सूफी संतों की बातचीत) फारसी के कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी द्वारा संकलित है। इस कवि द्वारा शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत को आधार बनाकर ‘फवाइद-अल-फुआद’ ग्रन्थ लिखा गया। इसके बाद भी विभिन्न शेखों की अनुमति से इस तरह की रचनाएँ लिखी गईं। इनका उद्देश्य शेखों के उपदेशों एवं कथनों को संकलित करना होता था।

(3) मक्तुबात लिखे हुए पत्रों का संकलन होता है जिसे या तो स्वयं शेख ने लिखा था या उसके किसी करीबी अनुयायी ने। इन पत्रों में धार्मिक सत्य, अनुभव, अनुयायियों के लिए आदर्श जीवन-शैली व शेख की आकांक्षाओं का पता चलता है। शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के लिखे पत्र ‘मक्तुबात-ए-इमाम रब्बानी’ में संकलित हैं जिसमें अकबर की उदारवादी तथा असांप्रदायिक विचारधारा का ज्ञान मिलता है।

(4) ‘तजकिरा’ सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण होता है। भारत में पहला सूफी तजकिरा मीर खुर्द किरमानी का सियार-उल-औलिया है, जो चिश्ती संतों के बारे में है। भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण तजकिरा ‘अख्बार-उल-अखयार’ है। तजकिरा में सिलसिले की प्रमुखता स्थापित करने का प्रयास किया जाता था। इसके साथ ही आध्यात्मिक वंशावली की महिमा को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा जाता था। इस तरह तजकिरा में कल्पनीय अद्भुत व अविश्वसनीय बातें भी होती हैं।

प्रश्न 16.
सूफी आंदोलन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
इस्लाम के रहस्यवाद का दूसरा नाम सूफी है। विद्वानों ने ‘सूफी’ शब्द के अनेक अर्थ बताए हैं। कुछ का मानना है कि सूफी का अर्थ ‘ज्ञानी’ (सोफिया) होता है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति को सूफी कहा जाता है। ‘सूफी’ शब्द ‘सफा’ से बना है जिसका अभिप्राय साफ-सुथरा अथवा पवित्र होता है। सूफी मत के सिद्धान्तों को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है
(1) परमात्मा के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा एक है। उनका मानना था कि वह अद्वितीय पदार्थ निरपेक्ष है, अगोचर है, अपरिमित है और नानात्व से परे है, वही परम सत्य है।

(2) सूफी साधक आत्मा को ईश्वर का अंग मानते हैं। वह सत्य प्रकाश का अभिन्न अंग है, परन्तु मनुष्य के शरीर में उसका अस्तित्व खो जाता है।

(3) जगत के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा की कृपा से ही अग्नि, हवा, जल तथा पृथ्वी का निर्माण हुआ।

(4) मनुष्य के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि मनुष्य परमात्मा के सभी गुणों को अभिव्यक्त करता है।

(5) सूफी साधकों ने पूर्ण मानव को अपना गुरु (मुर्शीद) माना। बिना आध्यात्मिक गुरु के मनुष्य कभी कुछ प्राप्त नहीं कर सकता।

(6) प्रेम को प्रायः सभी धर्मों में परमात्मा को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधक माना है। सूफ़ियों ने भी इसी प्रेम के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने की आशा की।
मुस्लिम सूफी फकीरों ने अपने निवास के लिए हिन्दू पद्धति के अनुसार आश्रम बनवाए, जिन्हें ‘खानकाह’ कहा जाता था। भारत में सूफी सम्प्रदायों का विशेष रूप से प्रभाव था।

प्रश्न 17.
भक्ति आन्दोलन के प्रसार के पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन मध्य काल में बहुत अधिक लोकप्रिय हुआ। इसके लोकप्रिय होने के मुख्य पाँच कारण निम्नलिखित हैं

1. भक्ति मार्ग की सरलता-सामान्य तौर पर यह मान्यता है कि ज्ञान-मार्ग तथा कर्म-मार्ग की तुलना में भक्ति-मार्ग आसान है। हिन्दू धर्म में ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के लिए व्यापक साहित्य उपलब्ध है। आम आदमी के लिए यह मार्ग आसान तथा जटिलता से रहित था। अतः यह लोकप्रिय होता चला गया।

2. जाति व्यवस्था की जटिलता तथा भेदभाव-वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा ने धीरे-धीरे जटिल रूप ग्रहण कर लिया था। इस व्यवस्था में भेदभाव भी विद्यमान था। कुछ जातियों को निम्न माना जाता था। इन निम्न जातियों को धर्म-शास्त्र का अध्ययन करने की अनुमति नहीं थी। भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों कबीर, नानक, नामदेव, रविदास आदि ने इसका विरोध किया। उन्होंने जनता में इन आन्दोलनों को लोकप्रिय होने का आधार प्रदान किया।

3. इस्लाम का प्रभाव-इस्लाम के भाई-चारे की भावना, एकेश्वरवाद की धारणा आदि ने हिन्दू समाज को प्रभावित किया तथा भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने इन बातों को स्वीकार कर आन्दोलन चलाया, परन्तु अनेक विद्वान् इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि वैदिक संस्कृति तथा हिन्दू धर्म में भक्ति मार्ग विद्यमान था।

4. वैष्णव आचार्यों के कार्य-दक्षिण के वैष्णव मत के आचार्यों ने दक्षिण भारत में विष्णु भक्ति को फैलाने का कार्य किया। अलवार सन्तों के बाद रामानुज ने दक्षिण में वैष्णव मत का प्रचार-प्रसार किया। इससे भक्ति ने आन्दोलन का रूप ग्रहण किया।

5. समन्वय की भावना-यह भी बताया जाता है कि सूफी आन्दोलन पर ‘योगियों’ तथा ‘सिद्धों’ का अत्यधिक प्रभाव था। इसी प्रकार भक्ति आन्दोलन पर भी सूफीवाद का प्रभाव स्वीकारा जाता है। दोनों आन्दोलन इस्लाम और हिन्दू धर्मों में बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहते थे तथा आपसी कट्टरता को कम करना चाहते थे।

प्रश्न 18.
भक्ति आन्दोलन की पाँच प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन एक सरल आन्दोलन था। जन-साधारण को इसके विचार अच्छे लगे। इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी विचारधारा थी। इस आन्दोलन की विचारधारा की पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं

1. एकेश्वरवाद में निष्ठा-भक्ति की धारणा का अर्थ एकेश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा माना गया। ईश्वर को अलग-अलग नामों से पुकारा जा सकता है। भक्ति में दो सम्प्रदाय उभरकर आए। एक वे जो सगुण रूप की उपासना करते थे तथा दूसरे वे जो निर्गुण रूप को मानते थे। उनका कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करता है।

2. ईश्वर के प्रति समर्पण तथा प्रेम पर बल-भक्ति का मुख्य साधन ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण-भाव तथा प्रेम-भाव की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया। उपासक अपने आपको प्रभु चरणों में समर्पित कर प्रभु से एकाकार करने का प्रयत्न करता था।

3. गुरु की महत्ता पर बल-गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ बताया जाता है अन्धकार से प्रकाश में ले जाने वाला। भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने ‘गुरु’ की महिमा को स्वीकार किया। गुरु, जिसने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया है और अब जो दूसरे को मार्ग दिखा सकता है, को ईश्वर के समान दर्जा प्रदान किया गया।

4. मानव मात्र की समानता में विश्वास-भक्ति आन्दोलन से जुड़े सभी संतों ने मानव मात्र की समानता पर बल दिया। संसार के सभी मानवों को उस परम शक्ति (ईश्वर) की सन्तान स्वीकार किया गया। उनमें मौलिक समानता स्वीकार करते हुए किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार कर दिया गया।

5. मन की शुद्धता तथा पवित्र जीवन पर बल-भक्ति आन्दोलन के संचालकों ने हृदय की शुद्धता तथा पवित्र जीवन पर बल दिया। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भक्ति के आचरण से सभी बातें जुड़ी हैं तथा सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इससे सभी में प्रेम-भाव पैदा होता है। सर्व से प्रेम-भाव सब प्रकार के भेदों को स्वतः ही समाप्त कर देता है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तमिलनाडु की भक्ति परंपरा के विभिन्न पक्षों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भक्ति परंपरा की शुरुआत वर्तमान तमिलनाडु क्षेत्र में छठी शताब्दी में मानी जाती है। प्रारंभ में इस परंपरा का नेतृत्व विष्णु भक्त अलवारों तथा शिव भक्त नयनारों ने किया। ये अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। ये अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया।

1. जाति-प्रथा के बारे में अलवार-नयनार संतों का दृष्टिकोण-अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। इन्होंने वैदिक ब्राह्मणों की तुलना में विष्णु भक्तों को प्राथमिकता दी। वे भक्त चाहे किसी भी जाति अथवा वर्ण से थे। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे। अलवार समाज ने इन संतों व उनकी रचनाओं को पूरा सम्मान दिया तथा उन्हें वेदों जितना प्रतिष्ठित बताया।
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2. अलवार-नयनार परंपरा में महिला संत-अलवार-नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उदाहरण के लिए अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए तथा आज भी गाए जाते हैं। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी।

3. अलवारों व नयनारों के राज्य के साथ संबंध-जिस समय तमिल क्षेत्र में अलवार व नयनार संत अपनी पहचान बना रहे थे, उस समय पल्लव, पांड्य व चोल वंशों का राज्य इस क्षेत्र पर था। इन राज्यों ने अलवार-नयनार भक्ति-परंपरा को भी फलने-फूलने के भरपूर अवसर दिए। इस अनुदान के सहारे विष्णु व शिव के मंदिरों का निर्माण काफी अधिक मात्रा में हुआ।
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चोल शासकों ने चिदम्बरम, तंजावुर तथा गगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। इन मन्दिरों में शिव की कांस्य प्रतिमाओं
को बड़े स्तर पर स्थापित किया। शासक वर्ग ने संत कवियों के गीतों व विचारों को भी महत्त्व दिया, जिसके कारण वे और अधिक लोकप्रिय हुए। अब उनके भजनों को मन्दिरों में गाने पर महत्त्व दिया जाने लगा। संत कवियों के भजनों के संकलन का एक तमिल ग्रन्थ ‘तवरम’ शासकों के प्रयासों का परिणाम है।

प्रश्न 2.
भारत में इस्लामी राज्य कैसे स्थापित हुआ? यह जन-सामान्य में कैसे लोकप्रिय हुआ?
उत्तर:
अरब क्षेत्र में इस्लाम का उदय विश्व के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। 7वीं शताब्दी में इसके उदय के पश्चात् यह धर्म पश्चिमी एशिया में तेजी से फैला और कालांतर में यह भारत में भी पहुँचा। भारत पर पहला अरब आक्रमण 711 ई० में सिन्ध पर हुआ तथा उसके बाद आक्रमणों का सिलसिला जारी रहा। इसी कड़ी में पहले दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। दिल्ली सल्तनत (1206-1526) में मामुलक, खलजी, तुगलक, सैयद व लोधी वंश के शासकों ने शासन किया। इसके बाद 1526 से 1707 तक यहाँ मुगलवंश का शासन रहा। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् 18वीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्य उभर कर आए, उनमें भी कुछ इस्लाम को मानने वाले थे। इस प्रकार भारत में इस्लाम परंपरा में विश्वास रखने वाले शासकों ने दीर्घ अवधि तक अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखा।
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1. शासन में उलेमा वर्ग की भूमिका-उलेमा इस्लाम में धर्मशास्त्री को बोलते हैं जो आलिम का बहुवचन है। आलिम का अर्थ होता है ज्ञानी अर्थात् जिसके पास इलम (ज्ञान) है वह आलिम कहलाएगा तथा आलिमों का समूह उलेमा। इस समूह (उलेमा) का यह कर्त्तव्य था कि शासन-व्यवस्था में शासक को सलाह भी दे तथा धर्म की रक्षा हेतु संतुलित व्याख्या भी करे। लेकिन व्यवहार में भारत में इस्लाम को कठोरता से प्रचलन में लाना आसान नहीं था। क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। इसलिए शासक ने उलेमा वर्ग को शासन पर हावी नहीं होने दिया।

2. शासकों की नीति-सल्तनत काल तक तो भारत में इस्लामी राज्य का प्रारंभिक चरण रहा। इन शासकों ने व्यावहारिक नीति अपनाकर राज्य को सुरक्षित किया। मुगल शासकों ने इस बारे में कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं बल्कि सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी। वस्तुतः अकबर ने गैर-इस्लामिक (हिंदू) को जिम्मी नहीं वरन् उन्हें बिना किसी भेदभाव के प्रजा स्वीकार किया।
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3. इस्लाम की लोक प्रचलित परंपरा-इस्लाम के भारत में आगमन के पश्चात् जो परिवर्तन हुए वे मात्र शासक वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के जन-सामान्य के विभिन्न वर्गों; जैसे कृषक, शिल्पी, सैनिक, व्यापारी इत्यादि से भी जुड़े थे। समाज के बहुत-से लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी जीवन-शैली व परंपराओं का पूरी तरह परित्याग नहीं किया, लेकिन इस्लाम की आधार स्तम्भ पाँच बातें अवश्य स्वीकार कर लीं।
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4. नई भाषाओं व परंपरा को महत्त्व-सामाजिक संदर्भ में सूफी सन्तों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति स्थानीय भाषा में की गई। . इसी कारण पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिन्दी, गुजराती जैसी भाषाओं को बल मिला क्योंकि इन भाषाओं के लोगों ने कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इनका प्रयोग किया।

5. स्थापत्य कला पर प्रभाव- इस्लाम का लोक प्रचलन जहाँ भाषा व साहित्य में देखने को मिलता है, वहीं स्थापत्य कला (विशेषकर मस्जिद) के निर्माण में भी स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय उपमहाद्वीप में जो मस्जिदें बनीं उनमें मौलिकताएँ तो मस्जिद वाली हैं लेकिन छत की स्थिति, निर्माण का सामान, सज्जा के तरीके व स्तंभों के बनाने की विधि अलग थी। इनको जन-सामान्य ने अपनी भौगोलिक व परंपरा के अनुरूप बनाया। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लामिक स्थापत्य स्थानीय लोक प्रचलन का एक हिस्सा बन गया।

प्रश्न 3.
सूफी आन्दोलन क्या था? भारत में इसका विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। हाँ यह स्पष्ट है कि सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। सूफीज्म शब्द हमें प्रकाशित रूप में 19वीं सदी में मिलता है। इस्लामिक साहित्य में इसके लिए तसव्वुफ शब्द मिलता है। कुछ विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कछ अन्य विद्वान सफी को सोफिया (यानि शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं। इस तरह इस शब्द की उत्पत्ति के बारे में एक मत तो नहीं हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि इस्लाम में 10वीं सदी के बाद अध्यात्म, वैराग्य व रहस्यवाद में विश्वास करने वाली सूचियों की संख्या काफी थी तथा ये काफी लोकप्रिय हुए। इस तरह 11वीं शताब्दी तक सूफीवाद एक विकसित आंदोलन बन गया।

सूफिया के सामान्य सिद्धात

  • करान में पूर्ण आस्था।
  • हजरत मुहम्मद के जीवन को आदर्श मानना।
  • धर्म सम्मत भोजन ग्रहण करना
  • आराम की वस्तुओं का त्याग करना।
  • दूसरों द्वारा कष्ट पहुँचाने पर कष्ट का अनुभव न करना।
  • आदर्शपूर्ण नियम बनाना व उनका पालन करना।

1. सूफी आंदोलन के केन्द्र खानकाह व दरगाह-सूफी आंदोलन के विकास का केन्द्र खानकाह व दरगाह थी। खानकाह सूफी सिलसिले में शेख (संत, फकीर) अर्थात् पीर या मुर्शीद का निवास होती थी, जहाँ शेख के अनुयायी उनसे आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति व आशीर्वाद प्राप्त करते थे। खानकाहों में ही सिलसिले | के नियमों का निर्माण होता था तथा शेख व जन-सामान्य के बीच रिश्तों की सीमा का निर्धारण किया जाता था। पीर अर्थात् शेख की मृत्यु के बाद उन्हें जिस स्थान पर दफनाया जाता था वह दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) कहलाती थी। दरगाह मुरीदों तथा जन-सामान्य के लिए भक्ति-स्थल बन जाती थी। दरगाह पर लोग ज़ियारत (दर्शन) करने आते थे। धीरे-धीरे ज़ियारत विशेष अवसरों विशेषकर बरसी के साथ जुड़ गया। यह ज़ियारत उर्स नाम से जानी जाती थी जिसका अर्थ ईश्वर से पीर की आत्मा के मिलन से लिया जाता था। इस तरह लोग अपनी आध्यात्मिक, ऐहिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु दरगाहों पर आने लगे। इस तरह शेख का लोग वली (ईश्वर के मित्र) के रूप में आदर करने लगे तथा उनके आशीर्वाद से मिली बरकत को विभिन्न प्रकार के करामात से जोड़ने लगे।

2. सिलसिलों की भूमिका भारत में सूफी आन्दोलन विभिन्न सिलसिलों द्वारा फैलाया गया। इन सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक, शामी, चिश्ती, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म-स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

भारत में मुख्य रूप से चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी, नक्शबंदी, शतारी व फिरदोसी सिलसिले स्थापित हुए। परंतु इन सब में सर्वाधिक प्रमुख तथा लोकप्रिय चिश्ती सिलसिला हुआ।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 4.
भारत में सूफी सिलसिला क्यों तथा कैसे लोकप्रिय हुआ?
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप में कई सिलसिलों की स्थापना हुई। इनमें सर्वाधिक सफलता चिश्ती सिलसिले को मिली, क्योंकि जन-मानस इसके साथ अधिक जुड़ पाया। चिश्ती सिलसिले की स्थापना ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती ने की। परंतु भारत में इसकी स्थापना का श्रेय मुईनुद्दीन चिश्ती को जाता है। मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म 1141 ई० में ईरान में हुआ। इस सिलसिले के अन्य संतों में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, हमीदुद्दीन नागौरी, निजामुद्दीन औलिया व शेख सलीम चिश्ती – इत्यादि थे। इनकी कार्य-प्रणाली, जीवन-शैली व ज्ञान ने भारत के जन-सामान्य को आकर्षित किया। इस सिलसिले के लोकप्रिय होने के कारणों का वर्णन इस प्रकार है
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1. चिश्ती खानकाह की कार्य प्रणाली-चिश्ती सिलसिले को लोकप्रिय बनाने में भी खानकाह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। हमें दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया के समय के खानकाह के जीवन की जानकारी विभिन्न साक्ष्यों में मिलती है जिसके आधार पर हम चिश्ती सिलसिले को समझ सकते हैं।

खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी। यहाँ सुबह से शाम तक समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन, व्यापारी आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने, इबादत करने, ताबीज लेने के लिए यहाँ आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आने वाले सभी लोग शेख के समक्ष झुककर आदर देते थे। अनुयायी उन्हें पीने को पानी देते थे। नए अनुयायियों को यहाँ दीक्षा दी जाती थी व यौगिक क्रियाएँ करवाई जाती थीं।

2. चिश्ती दरगाह में उपासना पद्धति-जैसा कि बताया गया है चिश्ती संतों की दरगाह उनके अनुयायियों तथा जन-सामान्य के लिए तीर्थ-स्थल बन गए। लोग इन स्थानों पर जियारत के लिए जाते थे तथा संत से आशीर्वाद (बरकत) की कामना करते थे। विगत शताब्दियों से समाज के सभी वर्गों के लोग इन दरगाहों में आस्था व्यक्त करते रहे हैं। चिश्ती सिलसिले की सभी दरगाहों पर उपासना का एक ढंग नृत्य व संगीत था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। चिश्ती उपासना पद्धति में संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन पर भक्ति परंपरा का प्रभाव था।

3. सूफी परंपरा व भाषा-सूफी फकीरों व संतों की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण यह भी है कि उन्होंने स्थानीय भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी। चिश्ती सिलसिले के शेख व अनुयायी तो मुख्य रूप से हिंदवी में बात करते थे। सूफियों ने ईश्वर के प्रति आस्था व मानवीय-प्रेम को कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। इनकी भाषा भी सामान्य व्यक्ति की थी।

प्रश्न 5.
सूफी मत पर हिन्दू मत का क्या प्रभाव पड़ा? भारतीय समाज में सूफी मत की क्या भूमिका रही?
उत्तर:
सूफी आन्दोलन इस्लाम से जुड़ा था, परन्तु उस पर हिन्दू मत का प्रभाव था। उसने इस मत से कई चीजें ग्रहण की।

(क) सूफी मत पर हिन्दू मत का प्रभाव

1. आत्मा के संबंध में विचार-अलबिरुनी के कथानुसार आत्मा के सम्बन्ध में सूफी सिद्धान्त पतंजलि के ‘योगसूत्र’ के सिद्धान्त की ही तरह है। सूफी रचनाओं में यह विचार अभिव्यक्त है कि “प्रतिदान प्राप्त करने के उद्देश्य से शरीर आत्मा का ही मूर्त रूप होता है।” अलबिरुनी ने आत्म-विकास के रूप में दैवी प्रेम के सूफी सिद्धान्त की पहचान भगवद्गीता के समानान्तर अनुच्छेदों से की है। तेरहवीं शताब्दी तक भारतीय सूफीयों का सामना कनकटे (खंडित कर्ण वाले) योगियों अथवा गोरखनाथ के नाथ अनुयायियों से हुआ। शेख निजामुद्दीन औलिया इस सिद्धान्त से प्रभावित थे कि मानव-शरीर शिव तथा शक्ति के रूप में विभक्त होता है। इस आधार पर सिर से नाभि तक का भाग जो शिव से सम्बद्ध होता है, आध्यात्मिक होता है। नाभि से नीचे का भाग जो शक्ति से सम्बद्ध होता है, लौकिक होता है। शेख निजामुद्दीन औलिया योग के इस सिद्धान्त से प्रभावित थे कि बच्चे के नैतिक चरित्र का निर्धारण बच्चे के गर्भावस्था में आने के समय से ही हो जाता है।

2. योग तथा प्राणायाम का प्रभाव हठयोग की पुस्तक अमृतकुण्ड का तेरहवीं शताब्दी में अरबी तथा फारसी में अनुवाद किया गया था। इसका सूफी मत पर स्थायी प्रभाव पड़ा। शेख नासिरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी ने कहा था कि प्राणायाम सूफी मत का सारतत्व है। प्राणायाम आरम्भ में जानबूझ कर किया गया कार्य होता है, परन्तु बाद में स्वचलित हो जाता है। उन्होंने सिद्धों के रूप में प्रसिद्ध योगियों की भान्ति प्राणायाम का अभ्यास करने पर अधिक बल दिया। यौगिक मुद्राएँ तथा प्राणायाम चिश्तिया सूफी पद्धति का अभिन्न अंग बन गईं। शेख हमीदुद्दीन नागौरी के हिन्दी पदों से भी योग का प्रभाव दृष्टिगत होता है।

3. नाथ सिद्धान्तों (अलख) का प्रभाव-चिश्तिया शेख अब्दुल कुद्स गंगोही पर नाथ सिद्धान्तों का दूरगामी प्रभाव पड़ा था। उनका हिन्दी उपनाम अलख (अगोचर) था। उनका कथन है कि अगोचर भगवान् (अलख निरंजन) अदृश्य है। एक अन्य पद में शेख ने अलख निरंजन की पहचान ईश्वर (खुदा) से की है। रुसदनामा में योगी संत गौरखनाथ के सन्दर्भो में उनकी तुलना परमसत्ता के अन्तिम सत्य से की गई है। इन दृष्टान्तों से प्रकट होता है कि सूफी धार्मिक विश्वासों पर हिन्दू तन्त्रवाद की क्रियाओं का स्पष्ट भाव था।

4. ऋषि परंपरा को स्वीकारना-कश्मीर की शैव महिला योगी लल्ल या लाल देड़ (लल्ल योगेश्वरी) द्वारा व्यक्त विचारों के साथ सूफी धारणाओं का समन्वय शेख नूरुद्दीन ऋषि के ऋषि आन्दोलन में परिलक्षित होता है। नूरुद्दीन और उनके अनुयायियों ने हिन्दू सन्तों के समान ही अपने को ऋषि कहलाना प्रारम्भ किया था। पन्द्रहवीं शताब्दी के बंगाल में नाथपंथी विचारों को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। अकबर के दरबार में फारसी में संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद से मुसलमानों को हिन्दू दर्शन की वेदान्त शाखा का परिचय मिला। सूफी संत जनता की भाषा में उपदेश देते थे तथा हिन्दी, बंगाली, पंजाबी, कश्मीरी आदि सभी प्रान्तीय भाषाओं के विकास में उनका अत्यधिक योगदान रहा।

(ख) भारतीय समाज में सूफी धर्म की भूमिका

मध्ययुगीन भारतीय समाज में सूफी सन्तों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

1. हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में समन्वय-इस धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में समन्वय की भावना पैदा करना था। सूफी सन्तों ने सामाजिक सेवा को व्यावहारिक रूप दिया और उसे परमात्मा की सेवा का एकमात्र साधन बताया।

2. नैतिक आचरण को बढ़ावा-सूफी सन्तों ने अपने शिष्यों में समाज सेवा, सद्व्यवहार और क्षमा आदि गुणों पर जोर दिया। उन लोगों ने जनता के चरित्र तथा उनके दृष्टिकोण को सुधारने का प्रयास किया।

3. राज्य नीति को प्रभावित करना-सुलतानों के रूढ़िवादी इस्लामी विचार भी इन सन्तों को मान्य नहीं थे। अतः उन्होंने शक्ति प्रलोभन तथा तलवार द्वारा धर्म परिवर्तन की नीति का अनुमोदन नहीं किया। वे राजनीति से अलग रहे। उन्होंने लोगों से स्पष्ट कहा कि इस अन्धकारमय युग में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि लेखनी, वाणी, धन तथा पद से दुख संतप्त प्रजा की सेवा करे। इस प्रकार उन्होंने शासकों के हृदय में प्रजा की भलाई की भावना पैदा की।

4. क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में योगदान-एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन करके उन्होंने पारस्परिक मतभेदों को दूर करने की चेष्टा की। खड़ी बोली, जो कि सर्वसाधारण की भाषा थी, के विकास में सूफी सन्तों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त पंजाबी, गुजराती आदि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में योगदान दिया।

प्रश्न 6.
भक्ति आन्दोलन क्या था? इसकी उत्पत्ति व प्रसार के कारणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
भक्ति शब्द की उत्पत्ति ‘भज्’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ सेवा से लिया जाता है। भक्ति व्यापक अर्थ में मनुष्य द्वारा ईश्वर या इष्टदेव के प्रति पूर्ण समर्पण होता है

भक्ति आंदोलन की विशेषताएँ

  • एकेश्वरवाद में निष्ठा।
  • ईश्वर के प्रति समर्पण।
  • गुरु को अत्यधिक महत्त्व देना।
  • मानव मात्र की समानता में विश्वास ।
  • जीवन की पवित्रता को महत्त्व।
  • धर्म की सरलता में विश्वास।
  • समाज की बुराइयों का विरोध।
  • हिन्द-मस्लिम एकता को महत्त्व।
  • प्रेम की शुद्धता को महत्त्व।

जिसके अनुरूप व्यक्ति स्वयं को अपने श्रद्धेय में समा लेता है। इसमें सामाजिक रूढ़ियाँ, ताना-बाना, मर्यादाएँ तथा बंधनों की भूमिका नहीं होती। बल्कि सरलता, समन्वय की भावना तथा पवित्र जीवन पर बल दिया जाता है। भक्ति संत कवियों ने समाज की रूढ़ियों व नकारात्मक चीजों का विरोध कर, उसके प्रत्येक वर्ग को अपने साथ जोड़ा, जिनके चलते हुए समाज का एक बड़ा वर्ग इनका अनुयायी व समर्थक बन गया। सभी भक्त कवियों ने मोटे तौर पर एक ईश्वर में विश्वास, ईश्वर के प्रति निष्ठा व प्रेम तथा गुरु के महत्त्व पर बल दिया। साथ ही मानव मात्र की समानता, जीवन की पवित्रता, सरल धर्म तथा समन्वय की भावना के लिए कहा। इन संत कवियों में सगुण व निर्गुण के आधार पर अंतर था। सगुण के कुछ संत कवि भगवान राम के रूप में लीन थे जबकि कुछ को कृष्ण का रूप पसन्द था। इन्हीं आधारों पर इन्हें राममार्गी तथा कृष्णमार्गी कहा जाता था।

भक्ति आन्दोलन की उत्पत्ति और प्रसार के कारण-यद्यपि भक्ति तथा सूफी आन्दोलनों के संदर्भ में प्रचलित धारणाओं का विश्लेषण करते हुए इन आन्दोलनों की उत्पत्ति के संबंध में भी विचार व्यक्त किए हैं, परन्तु भक्ति आन्दोलन की उत्पत्ति तथा प्रसार के कारण को विस्तार से जानना उपयोगी होगा। विभिन्न विद्वानों द्वारा इसकी उत्पत्ति और प्रसार के बारे में निम्नलिखित कारण बताए जाते हैं

1. भक्ति मार्ग की सरलता-सामान्य तौर पर यह मान्यता है कि ज्ञान-मार्ग तथा कर्म-मार्ग की तुलना में भक्ति-मार्ग आसान है। हिन्दू धर्म में ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के लिए व्यापक साहित्य उपलब्ध है। अनेक दर्शनों (छठ दर्शन) के द्वारा इसकी जानकारी प्राप्त होती है। दूसरा कर्म-काण्डों एवं पूजा-पाठ की क्रियाओं को अपनाना भी जटिल था। यद्यपि गीता में इन तीनों मार्गों का सम्मिलन किया गया तथा एक के बिना दूसरे को अछूत बताया गया है, परन्तु आम आदमी के लिए यह मार्ग आसान तथा जटिलता से रहित था। अतः यह लोकप्रिय होता चला गया।

2. जाति व्यवस्था की जटिलता तथा भेदभाव-वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा ने धीरे-धीरे जटिल रूप ग्रहण कर लिया था। इस व्यवस्था में भेदभाव भी विद्यमान था। कुछ जातियों को निम्न माना जाता था। इन निम्न जातियों को धर्म-शास्त्र अध्ययन की अनुमति नहीं थी। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को दूर करने का प्रयत्न बौद्ध धर्म द्वारा किया गया था, जो कि एक समय में बहुत लोकप्रिय हुआ, परन्तु राजपूतकाल में बौद्ध-धर्म का पतन होता चला गया। अतः इस समय लोग ऐसे मार्ग की ओर देख रहे थे जो उन्हें आसानी से अपनी जीविका कमाते हुए ईश्वर तक पहुँचने का या मोक्ष का मार्ग प्रदान करे। भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों कबीर, नानक, नामदेव, रविदास आदि ने अपने स्वयं के उदाहरणं देते हुए जनता में इन आन्दोलनों को लोकप्रिय होने का आधार प्रदान किया।

3. हिंदुओं द्वारा धर्मान्तरण तथा अछूतों की असहाय अवस्था-इस्लाम के आगमन पर भारत में हिन्दुओं द्वारा इस्लाम मत अपनाया जाने लगा। यह मत बदलने वाले लोग निम्न जातियों तथा अछूत मानी जानी वाली जातियों में से थे, जिनको सवर्ण माने जाने वाले हिन्दुओं द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता था। अछूतों को तो वर्ण व्यवस्था से बाहर ही माना जाता था। उत्तर-वैदिक काल के पश्चात् अछूतों की दशा में बहुत गिरावट आई। बौद्ध मत भी अपने आपको जाति प्रथा से पूर्णरूप से मुक्त नहीं कर सका। ऐसी अवस्था में अछूतों की दशा अधिक असहाय रूप में उभरी। भक्ति आन्दोलन ने जाति के बन्धनों को पूरी तरह से अस्वीकार किया। मात्र ईश्वर-समर्पण तथा ईश्वर-भजन पर जोर दिया। इस प्रकार यह विचार व्यक्त किया जाता है कि हिन्दू धर्म में सुधार लाने, धर्मान्तरण पर रोक लगाने तथा अछूतों को मुक्ति का मार्ग दिलाने की आवश्यकताओं के कारण भक्ति आन्दोलन का उदय तथा प्रसार हुआ।

4. इस्लाम का प्रभाव-ताराचन्द्र, हुमायूँ कबीर आदि इतिहासकारों ने भक्ति आन्दोलन के लिए इस्लाम के सम्पर्कों को महत्त्वपूर्ण माना है। इस्लाम के भाईचारे की भावना, एकेश्वरवाद की धारणा आदि ने हिन्दू समाज को प्रभावित किया तथा भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने इन बातों को स्वीकार कर आन्दोलन चलाया, परन्तु अनेक विद्वान् इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि वैदिक संस्कृति तथा हिन्दू धर्म में भक्ति मार्ग विद्यमान था। उत्तर वैदिक काल में उपनिषदों ने ‘एक’ की बात को स्थापित कर दिया तथा भक्ति को अन्य मार्गों से जोड़ने का कार्य गीता के द्वारा किया गया था।

5. वैष्णव आचार्यों के कार्य दक्षिण के वैष्णव मत के आचार्यों ने दक्षिण भारत में विष्णु भक्ति को फैलाने का कार्य किया। अलवार सन्तों के बाद रामानुज ने दक्षिण में वैष्णव मत का प्रचार व प्रसार किया। ये लोग, विष्णु (बारह अवतारों में से एक ) के अनन्य भक्त थे। उनके सम्प्रदाय में अधिकतर लोग निम्न जातियों से थे, परन्तु ब्राह्मण, स्त्रियाँ तथा कुछ राजा भी इस सम्प्रदाय में शामिल हो गए। भक्ति गीतों के माध्यम से इन्होंने वैष्णव मत का प्रचार व प्रसार किया। इस प्रकार प्रारम्भ में वैष्णव भक्ति दक्षिण में उपजी तथा धीरे-धीरे इसका प्रचार उत्तर में हुआ और इसने भक्ति आन्दोलन का रूप ग्रहण किया जिसमें अनेक सम्प्रदाय शामिल थे। संक्षेप में यह स्वीकार किया जा सकता है कि भक्ति आंदोलन की उत्पत्ति में किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। तत्कालीन परिस्थितियों तथा अनेक कारणों ने इसकी उत्पत्ति और प्रसार में योगदान दिया।

प्रश्न 7.
संत कबीर कौन थे? भक्ति संत परम्परा में उनके महत्त्व को स्पष्ट करें। अथवा संत कबीर के जीवन और उपदेशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के एक प्रमुख संत कबीर का जन्म 1440 ई० में एक विधवा के यहाँ हुआ माना जाता है। लोक-लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तालाब के समीप छोड़ दिया। निःसन्तान जुलाहा नीरु तथा उसकी पत्नी नीमा उसे उठा लाए और उसका नाम कबीर रखा। इस प्रकार कबीर का प्रारम्भिक जीवन एक मुस्लिम परिवार में बीता, लेकिन कबीर ने स्वयं को हिन्दू-मुस्लिम से परे रखकर एक योगी कहा। कबीर की शिक्षा-दीक्षा किसी संस्था में नहीं हुई। उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया, वह उनके जीवन का गहरा अनुभव था। वे भक्ति और सूफी सन्तों के सम्पर्क में आए। रामानन्द का प्रभाव कबीर पर सबसे अधिक था। रामानन्द ने उन्हें रामभक्ति का मन्त्र दिया। हिन्दू धर्म तथा दर्शन सम्बन्धी शिक्षा दी। कबीर की शिक्षा देशाटन, सत्संगति तथा विभिन्न सम्प्रदायों के साथ सम्पर्क का परिणाम था। स्वयं सिकन्दर लोधी ने उनके प्रभाव को स्वीकार किया था।

कबीर ने जो कुछ भी प्राप्त किया था वह सब उन्होंने समाज को अर्पित कर दिया। उनकी भाषा से यह निष्कर्ष निकलता है कि उन्होंने खूब पर्यटन किया होगा। उनकी भाषा में खड़ी बोली, पूर्वी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, अरबी, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है। कबीर ने रमैणी, शब्द, साखी तथा छन्दों में साहित्य की रचना की। उनकी रचनाओं के संकलन को बीजक कहा जाता है। गुरु ग्रन्थ साहिब में उनकी रचनाओं को शामिल किया गया है। संत कबीर ने अपनी शिक्षाओं में निम्नलिखित बातों पर मुख्य तौर पर जोर दिया

1. धर्म की सहजता कबीर ने धर्म को जन-साधारण रूप देने के लिए उसकी सहजता पर बल दिया। कबीर मत में साधन सहज होना चाहिए। प्रतिदिन के जीवन के साथ धर्म साधना का कोई विरोध नहीं होना चाहिए। कबीर ने इस सत्य को खूब समझा था। यही कारण है कि वे संन्यासियों के शिरोमणि होकर भी सहज बने रहे। धर्म में सहजता के कारण कबीर का दर्शन भी सहज हो गया।

2. कर्मयोग पर बल-पहली बार कबीर ने धर्म को अकर्मण्यता से हटाकर कर्मयोग की भूमि पर टिकाया था और उसे सहज बनाकर जन-साधारण के लिए ग्राह्य बनाया।

3. बाह्य आडम्बरों का खण्डन-कबीर ने किसी भी धार्मिक विश्वास, लोक तथा वेद के अन्धानुकरण को स्वीकार नहीं किया। हिन्दू धर्म के आचारों; जैसे पूजा, उत्सव, वेदपाठ, तीर्थयात्रा, व्रत, छुआछूत तथा कर्मकाण्डों पर कबीर ने कस-कसकर व्यंग्य किया। कबीर के अनुसार यदि विचार शुद्ध एवं पवित्र नहीं हैं तो धर्म भी पवित्र नहीं हो सकता। उन्होंने हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा को व्यर्थ कहा तथा दूसरी ओर इन्होंने मुसलमानों के नमाज पढ़ने के ढंग पर तीखा प्रहार किया।

4. कबीर की धर्म-निरपेक्षता कबीर के युग में दो धर्मों, संस्कृतियों एवं सभ्यताओं का संघर्ष था। कबीर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समानता का प्रतिपादन करके तथा पारस्परिक विरोध को समाप्त करके उन्हें एकता के सूत्र में बांधना चाहते थे।

5. भक्ति भावना-कबीर ने भक्ति मार्ग को कर्म मार्ग तथा ज्ञान मार्ग से श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि जब तक आराध्य के प्रति भक्ति भाव नहीं है, तब तक जप, तप, संयम, स्नान, ध्यान आदि सब व्यर्थ हैं। वे आत्म अनुभव को ही एक मात्र ज्ञान मानते हैं जो भक्ति भाव के बिना नहीं हो सकता तथा जिसे वह प्राप्त होता है वह अन्य को यह अनुभव दे नहीं सकते।
कबीर ने लिखा है

“आत्म अनुभव ग्यान की जो कोई पूछे बात।
सो गूंगा गुढ़ खाइके कहै कौन मुख स्वाद।”

कबीर ने भक्ति को पराकाष्ठा पर पहुँचाया। उनके अनुसार, भक्ति आत्म अनुभव है तथा उसमें मुक्ति की मांग का भी समर्पण है। कबीर का यह कथन बहुत गहन तथा गहरा है।

“राता माता नाम का, पीया प्रेम अधाय।
मतवाला दीदार का, मांगे मुक्ति बलाय।”

6. गुरु की महत्ता पर बल-कबीर ने अपनी भक्ति में गुरु को बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। कबीर की दृष्टि में गुरु वह साधु है जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त है। उन्होंने ठीक ही कहा है

“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय।”

7. अद्वैतवाद पर बल-निर्गुणवादी कबीर ईश्वर के सगुण रूप को भले ही न मानते हों किन्तु कण-कण में उस मूल तत्त्व की व्याप्ति को एवं उसकी कृपा के प्रसाद को कभी नहीं नकारते। मानव शरीर जिस तत्त्व से चलायमान है वह आत्मा है। कबीर ने परम ब्रह्म को मूल तत्त्व की संज्ञा दी है। यही अद्वैत तत्त्व है। आत्मा सर्वव्यापी है। वह निराकार, निर्विकार एवं अनन्त है। कबीर के आत्मा सम्बन्धी विचार गीता पर आधारित हैं।

8. कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन-कबीर एक महान् समाज-सुधारक थे। हिन्दू समाज की जाति प्रथा, नारी वर्ग का नैतिक अवमूल्यन, पर्दा प्रथा, बाल विवाह उनके लिए सहानुभूति का विषय बन गया था। निम्न जातियों पर उच्च वर्ग का घोर अत्याचार, शिक्षा के अभाव में जादू-टोना, शकुन-अपशकुन, जीव-हिंसा, मांस भक्षण, वेश्यागमन, अन्धविश्वास आदि कुरीतियाँ समाज की जड़ें खोखली कर रही थीं। कबीर ने तटस्थ होकर सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं को देखा था और अपने प्रबल व्यक्तित्व से इन्हें मिटाने का प्रयास किया।

अतः कहा जा सकता है कि मध्ययुगीन समाज-सुधारकों में कबीर का व्यक्तित्त्व और कृतित्व है। वे मात्र भक्त ही नहीं वरन् एक भविष्यद्रष्टा, युगस्रष्टा, समाज सुधारक, महात्मा तथा एक महान् उच्च गुणों से सम्पन्न मानव भी थे।

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी कौन थे? इनके जीवन व शिक्षाओं पर प्रकाश डालें।
अथवा गुरु नानक देव जी के मुख्य उपदेशों का वणन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ?
उत्तर:
गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म 1469 ई० में आधुनिक पाकिस्तान में तलवंडी (ननकाना साहब) में हुआ। इनका परिवार व्यापार करता था। इनका विवाह छोटी आयु में हो गया तथा पारिवारिक जिम्मेदारी भी काफी थी लेकिन वे अपना काफी समय सूफी व भक्त संतों के साथ बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर के क्षेत्रों की यात्रा करके विभिन्न प्रकार के अनुभव पाए। … गुरु नानक देव जी के संदेश उनके भजनों व उपदेशों में पाए जाते हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही। उन्होंने सामूहिक उपासना पर बल दिया तथा अपने अनुयायी अंगद को उत्तराधिकारी मानते हुए उन्हें गुरु पद पर आसीन किया। इस तरह वे दूसरे गुरु बने तथा उनके बाद गुरु बनाने की परंपरा लगभग दो शताब्दियों तक चलती रही तथा गुरु गोबिंद सिंह दसवें गुरु तक इस परंपरा का निर्वाह किया गया। इनकी शिक्षाओं का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

1. मानव समानता मध्यकालीन एकेश्वरवादी धार्मिक सिद्धान्त में अन्तर्निहित मानवीय समानता के नैतिक विचारों के अनुरूप हैं। इनका विचार था कि जाति के अनुसार सोचना मूर्खता है। किसी व्यक्ति का सम्मान ईश्वर के प्रति उसकी निष्ठा के कारण होना चाहिए, न कि उसकी सामाजिक स्थिति के कारण। इनका कहना है, “ईश्वर व्यक्ति के गुणों को जानता है, पर वह उसकी जाति के बारे में नहीं पूछता, क्योंकि दूसरे लोक में कोई जाति नहीं है।” उनका उद्देश्य अपने अनुयायियों में समानता और बन्धुत्व की भावना का संचार करना था। गुरु नानक देव जी छुआछूत के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते थे जिसने समाज को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया . था।

2. अकाल पुरुष-गुरु नानक देव जी ने निराकार (आकार-रहित) ईश्वर की कल्पना की और इस निराकार ईश्वर को इन्होंने अकाल पुरुष (अनन्त एवं अनादि ईश्वर) की संज्ञा दी।

3. अन्धविश्वासों तथा रूढ़िवाद की निन्दा-गुरु नानक देव जी बड़े गहन और सशक्त विचारों वाले व्यक्ति थे। अतः इन्होंने बड़ी स्पष्टता या सार्वजनिक जीवन के नैतिक मापदण्डों, सामाजिक व्यवहारों एवं विश्वासों का निर्धारण किया। ये धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वासों के भयंकर विरोधी थे और इन्हें सांस्कृतिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानते थे। इन्होंने अन्धविश्वासों को धार्मिक मूल्यों से पृथक् करने के लिए लोगों को शिक्षित किया। हिन्दू और इस्लाम दोनों के अन्धविश्वासों और रूढ़िवाद की निन्दा की गई।

4. एकेश्वर-गुरु नानक देव जी एकेश्वरवादी थे और कुछ अन्य भक्ति सन्तों के विपरीत इनका एकेश्वरवाद अनन्य था। इनका अवतारवाद में विश्वास नहीं था। इन्होंने यह शिक्षा दी कि सम्पूर्ण जगत् में एक ही ईश्वर है, अन्य कोई नहीं है। गुरु नानक

5. सद्गुणों पर बल-गुरु नानक देव जी का कहना है कि सद्गुणों के बिना भक्ति नहीं हो सकती। सच्चाई निःसन्देह बड़ी है, लेकिन सच्चा जीवन उससे भी बढ़कर है। व्यक्ति को विनम्रता, दया, क्षमा और मधुरवाणी जैसे गुणों को कर्मठतापूर्वक अपनाना चाहिए। सत्य की खोज करने वाले व्यक्ति का प्राथमिक कर्त्तव्य ईश्वर का स्मरण है। ईश्वर का नाम याद करो तथा सब कुछ छोड़ दो। सिमरन ईश्वर की भक्ति की पद्धति है। ईश्वर कहीं बाहर नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःस्थल में निवास करता है। ईश्वर सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, शरीर में भी निवास करता है। सत्य बोलो, तब तुम अपने भीतर ईश्वर का अनुभव करोगे। नानक ईश्वर पर सर्वशक्तिमान यथार्थ के रूप में विश्वास करते थे, लेकिन इन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि प्रेम एवं भक्ति के द्वारा व्यक्तिगत मानवीय आत्मा का ईश्वर के साथ मिलन हो सकता है।
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प्रश्न 9.
भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? वर्णन करें।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन मध्यकाल का एक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन था। इसने इस समाज को दिशा दी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं…

1. एकेश्वरवाद में निष्ठा-भक्ति आन्दोलन के संत एक ईश्वर (एकेश्वर) की सत्ता में निष्ठा रखते थे। उनका मानना था कि राम, रहीम, अल्लाह, ईश्वर, ओंकार सब उसी एक सत्ता के मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम हैं। भक्त एक ही ईश्वर की उपासना करते थे। भक्ति में दो सम्प्रदाय उभरकर आए। एक वे जो सगुण रूप की उपासना करते थे तथा दूसरे वे जो निर्गुण रूप को मानते थे। सगुण उपासक वैष्णव के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनके आराध्य देव राम और कृष्ण रहे। निर्गुण मतानुयायी मूर्ति-पूजा को नहीं मानते थे। उनका कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करता है।

2. ईश्वर के प्रति समर्पण तथा प्रेम पर बल-भक्ति का मुख्य साधन ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण-भाव तथा प्रेम-भाव की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया। उपासक अपने आपको प्रभु चरणों में समर्पित कर प्रभु से एकाकार करने का प्रयत्न करता था। इसमें ईश्वर के प्रति प्रेम-भाव को महत्त्वपूर्ण माना जाता था। कबीर ने दिव्य प्रेम पर अत्यधिक बल दिया। सन्तों का मत था कि समर्पण भाव से काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि पर नियन्त्रण किया जा सकता है। अहंकार को मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा माना गया। समर्पण, ईश-कृपा तथा गुरु-भक्ति से अहंकार की समाप्ति संभव मानी गई।

3. गुरु की महत्ता पर बल-गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ अन्धकार से प्रकाश में ले जाने वाला बताया जाता है। भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने ‘गुरु’ की महिमा को स्वीकार किया। गुरु जिसने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया और अब जो मार्ग दिखा सकता हो। गरु को ईश्वर के समान दर्जा प्रदान किया गया। संत कबीर ने गुरु को वह नाव बताई जो शिष्य को भवसागर से पार उतार सकती है। सन्तों ने स्वीकार किया कि गुरु मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का दर्शन करवा सकता है। गुरु वह द्वार है, जहाँ से ईश्वर का मार्ग साफ हो जाता है। गुरु निकटता से ही अहंकार से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार गुरु नानक देव जी ने स्वीकारा “गुरु भक्ति ही नाव है, वह दिव्य घर में पहुँचाने की सीढ़ी है, वह मनुष्य की सोई आत्मा को जगाता है और सेवा, प्रेम तथा भक्ति के मार्ग पर चलने में सहायता देता है।

4. मानव मात्र की समानता में विश्वास-सभी भक्ति आन्दोलन से जुड़े सन्तों ने मानव मात्र की समानता पर बल दिया। उन्होंने जाति, वर्ग, धर्म या लिंग के भेद के आधार पर समाज में मानव की असमानता को अस्वीकार किया। संसार के सभी मनुष्यों को उस परम शक्ति (ईश्वर) की सन्तान स्वीकार किया गया। संतों का विश्वास था कि स्वार्थी लोगों ने (चाहे वे धर्म से जुड़े थे या राजनीति से जुड़े थे) अपने हित साधन के लिए मानव जाति को विभिन्न जातियों या सम्प्रदायों में बांट दिया है। संतों ने प्रेम, भाईचारे तथा शान्ति से रहने का उपदेश दिया। सन्तों ने कहा कि परमात्मा की कृपा से हृदय में प्रेम उपजने पर भक्त के लिए अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जात-पात के भेद स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं तथा इस प्रकार भक्ति-मार्ग मानव मात्र में समानता की स्थापना करने में सहायक सिद्ध हुआ। इस रूप में भक्ति आन्दोलन, समतावादी आन्दोलन था।

5. पवित्र जीवन पर बल–भक्ति आन्दोलन ने पवित्र जीवन पर बल दिया। पवित्र जीवन को आचरण के साथ-साथ खान-पान व शुद्ध एवं मेहनत की कमाई से जोड़ा गया। प्राचीन योग परम्परा से सम्बन्धित नियमों पर बल दिया गया। अनेक संत स्वयं अपने हाथ से काम करते थे तथा सादा जीवन व प्रभु-भक्ति का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे। नानक, कबीर, रविदास, नामदेव का जीवन इस दृष्टि से उल्लेखनीय है जिन्होंने लोगों के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत किया तथा अपने शिष्यों को प्रेरणा प्रदान की।

6. धार्मिक सरलता पर बल-भक्ति आन्दोलन के सभी सन्तों ने धर्म की सरलता पर बल दिया। धर्म के नाम पर चल रहे अनेक आडम्बरों, अन्ध-विश्वासों, दिखावे, कर्म-काण्डों तथा ढकोसलों का खण्डन किया। यहाँ तक कि अनेक सन्तों ने मूर्ति पूजा का भी विरोध किया। कबीर तथा नानक इनमें प्रमुख थे। हिन्दू धर्म तथा इस्लाम के अनेक रीति-रिवाज़ों को अस्वीकार किया गया। पुरोहित वर्ग की अधिसत्ता तथा कर्म-काण्डों की निन्दा की गई। मुल्ला के द्वारा ऊँचे स्वर में अल्लाह को पुकारने को आडम्बर करार दिया गया। धर्म में यज्ञों तथा कर्म-काण्डों के लिए कोई स्थान स्वीकार नहीं किया गया। यहाँ तक कि उपवास, रोजों, तीर्थयात्रा, गेरुए वस्त्रों, शरीर पर राख लगाने, कुण्डल डालने, दाढ़ी-मूंछ रखने, सिर मुंडवाने आदि को बाह्य आडम्बर बताया तथा इनका मजाक भी उड़ाया। सच्चा धर्म उसे स्वीकारा, जिसमें सरलता हो। आडम्बरों के स्थान पर मानवीय गुणों तथा नैतिकता पर जोर दिया गया हो। बाहरी दिखावे को नहीं वरन् आन्तरिक शुद्धता को धर्म का आधार माना गया। कबीर ने कहा वह व्यक्ति अधिक धार्मिक तथा पुण्यात्मा है जिसका मन पवित्र है। ईमानदारी, भाई-चारे, प्रेम, सहयोग, दया, अहिंसा आदि मानवीय गुणों को सरल धर्म का आधार स्वीकार किया।

7. समन्वयवाद की भावना-भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू तथा इस्लाम में समन्वयवादी भावना के आधार पर सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने के प्रयत्न किए। भक्ति और सूफी आन्दोलनों में अनेक सन्तों के शिष्य सभी धर्मों और सम्प्रदायों से संबंध रखने वाले थे। कबीर तथा नानक ने इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य किया। नानक पर इस्लाम की परंपराओं की छाप देखी जा सकती है। इसी प्रकार बल्लभाचार्य राजनीति से अलग रहकर धर्म और संस्कृति के माध्यम से इन दोनों धर्मों के अनुयायियों के बीच सामंजस्य चाहते थे। भक्ति तथा सूफी सन्तों के द्वार शूद्रों, ब्राह्मणों, मुसलमानों, अमीर-गरीब सभी के लिए खुले रहते थे।

8. समाज सुधार-यद्यपि भक्ति आन्दोलन मूलतः एक धार्मिक आन्दोलन था, परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि धर्म और समाज की व्यवस्था आपस में पूरी तरह से जुड़ी होती है। धर्म में सुधार का सीधा प्रभाव समाज पर भी पड़ता रहा है। इस दृष्टि से भक्ति आन्दोलन के द्वारा समाज सुधार के कार्य भी किए गए। भक्ति आन्दोलन ने जाति प्रथा का घोर विरोध किया। अस्पृश्यता को परमात्मा तथा मानवता के खिलाफ अपराध बताया। स्त्रियों की दशा को सुधारने के प्रयत्न भी किए। अनेक संतों ने सती प्रथा, कन्या वध तथा दास प्रथा का भी विरोध किया। यही नहीं, उन्होंने अत्यधिक धन संग्रह तथा आर्थिक असमानता पर भी प्रहार किया। यह महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि एक भक्त की स्थिति में पहुंचने पर भक्त के हृदय से यह सामाजिक दोष स्वतः ही दूर हो जाते हैं। वह जाति-पाति, छुआछूत से ऊपर उठ जाता है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 10.
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्यकालीन भारतीय समाज के सभी क्षेत्रों को भक्ति आन्दोलन ने प्रभावित किया। सभी क्षेत्रों में इसके दूरगामी प्रभाव रहे। भारत में मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture) के निर्माण में भक्ति आन्दोलन ने अहम् भूमिका निभाई।

1. धार्मिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने हिन्दू धर्म की कुरीतियों, बाह्य आडम्बरों, कर्मकाण्डों आदि का खण्डन किया। इससे इस धर्म में सुधार हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने भक्ति आन्दोलन की शिक्षाओं का पालन करना शुरू किया। हिन्दू धर्म तथा दर्शन के वास्तविक स्वरूप को सन्तों ने सारे देश में फैलाने का कार्य किया। भक्ति ने उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के सांस्कृतिक सम्पर्कों को भी बढ़ावा दिया। सगुण तथा निर्गुण भक्ति ने हिन्दू धर्म को नया जोश प्रदान किया। इस तरह भक्ति आन्दोलन, जिसे हिन्दू धर्म में सुधार आन्दोलन भी स्वीकार किया जाता है, ने हिन्दू धर्म को सर्वप्रिय बनाने में सहयोग दिया। इससे धर्मान्तरण में कमी आई। इस्लाम के एकेश्वरवाद, भाई-चारे की भावना व सामाजिक समानता के आदर्शों को भक्ति सन्तों ने अपनी शिक्षाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। निर्गुण उपासकों ने मूर्तिपूजा का खण्डन किया।

भक्ति आंदोलन से कालान्तर में नए-नए सम्प्रदायों का जन्म हुआ। इन सम्प्रदायों का आधार विभिन्न सन्तों द्वारा विशेष सिद्धान्तों पर बल देना या उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना था। उदाहरण के लिए कबीर, दादू, चैतन्य, तुकाराम के अनुयायियों ने कबीरपंथ, दादूपंथ, काली बाबा वरकरी पंथ आदि की स्थापना कर ली। गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं ने सिक्ख धर्म का रूप धारण कर लिया। गुरु नानक देव प्रथम गुरु माने गए तथा गुरु परम्परा में नौ अन्य गुरु हुए और अन्त में गुरु ग्रन्थ साहिब को गुरु का स्थान प्रदान किया गया। गुरु ग्रन्थ साहिब में भक्ति सन्तों और सूफी सन्तों की वाणी को प्रमुख स्थान दिया गया।

2. सामाजिक प्रभाव-सामाजिक स्तर पर सन्तों द्वारा जाति प्रथा को समाप्त तो नहीं किया जा सका, परन्तु सन्तों के जाति प्रथा के विरोध ने यह सिद्ध कर दिया कि मानव अपने अच्छे कर्मों तथा प्रयत्नों से उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो या उसका व्यवसाय कुछ भी हो। रामानन्द निम्न जातियों के लोगों को गुरु मन्त्र देकर अमर हो गए। कबीर जुलाहे थे परन्तु मध्यकाल की महान् संत परम्परा में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त हुआ। रविदास को तथाकथित निम्न जाति से होने पर भी समाज में उच्च स्थान प्राप्त हुआ। कहते हैं कि धन्ना भक्त से भगवान् ने स्वयं अन्न ग्रहण किया। इस प्रकार सन्तों ने अपने आचरण तथा प्रयत्नों के आधार पर जाति प्रथा पर प्रहार किया। भक्ति आंदोलन से सामाजिक समरसता, सुख शान्ति एवं सामाजिक दायित्व की भावना को बल मिला। इससे मानवता की सेवा को बढ़ावा मिला।

3. राजनीतिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन का प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में देखा जा सकता है। अकबर की धार्मिक नीति तथा दीन-ए-इलाही की स्थापना पर भक्ति तथा सूफी आन्दोलन की अमिट छाप रही है। उसने भारतीय समाज के सभी धर्मों तथा सम्प्रदायों से सद्व्यवहार की नीति अपनाई। राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। अकबर की धार्मिक सहनशीलता तथा समानता की नीति ने उसकी राजनीतिक सफलताओं को प्रभवित किया। इसके अतिरिक्त सिक्ख तथा मराठा शक्ति के उदय में भी भक्ति आंदोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

4. सांस्कृतिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन के प्रादेशिक भाषा तथा साहित्य के विकास व कला क्षेत्र में उल्लेखनीय सांस्कृतिक प्रभाव रहे हैं। भक्ति सन्तों का प्रभाव पंजाब से दक्षिण भारत तथा गुजरात से बंगाल तक देखा जा सकता है। जहाँ-जहाँ ये संत उपदेश देते थे, स्थानीय शब्द उनकी भाषा का माध्यम व अंग बन जाते थे। इस रूप में भारतीय प्रादेशिक भाषाओं का विकास तथा उसमें साहित्य की रचना भक्ति आन्दोलन की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक देन है। ब्रजभाषा, खड़ी बोली, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, आसामी, गुजराती, राजस्थानी आदि में उनके उपदेशों तथा रचनाओं ने इन भाषाओं के विकास में योगदान दिया। कबीर, नानक देव, मीरा, दादूदयाल, तुलसीदास, सूरदास, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, जयदेव, नामदेव, तुकाराम आदि सन्तों का प्रादेशिक भाषा और साहित्य की उन्नति में सराहनीय योगदान रहा। भक्ति तथा सूफी आन्दोलन के कारण समाज में सहनशीलता का वातावरण तैयार हुआ। इससे इस्लाम की कला परंपराएँ जिस पर ईरान तथा मध्य एशिया का प्रभाव मुख्य था तथा भारतीय कला परंपराओं का संगम हुआ। स्थापत्य (Architecture) में इसे इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार चित्रकला में भी ईरानी तथा भारतीय चित्रकला ने एक-दूसरे को प्रभावित किया। संगीत के क्षेत्र में भी भक्ति सन्तों का प्रभाव देखा जा सकता है।

सूफी सन्तों ने भी संगीत कला को प्रभावित किया। अमीर खुसरो ने भारतीय धुनों के आधार पर कव्वाली और ख्याल जैसी संगीत शैलियों का आविष्कार किया। वाद्य यत्रों में सितार (ईरानी तम्बूरे तथा भारतीय वीणा का मिश्रण) तबले का आविष्कार हुआ। इस्लामी जगत् के वाद्य यन्त्र (सारंगी, रूबाब, शहनाई) का भारत में प्रचलन हुआ। इसी प्रकार भक्ति तथा सूफी आन्दोलनों के संयुक्त प्रभाव के परिणामस्वरूप कला का विकास हुआ। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि भक्ति आन्दोलन ने सूफी आन्दोलन के साथ मिलकर भारतीय समाज को व्यापक रूप से प्रभावित किया जिसकी अमिट छाप भारतीय संस्कृति, धर्म, राजनीति, समाज, प्रादेशिक भाषाओं एवं साहित्य कला एवं स्थापत्य आदि क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देती है।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. अल-बिरूनी किसके साथ भारत आया?
(A) कासिम के साथ
(B) महमूद के साथ
(C) गौरी के साथ
(D) बाबर के साथ
उत्तर:
(B) महमूद के साथ

2. अल-बिरूनी का जन्म स्थान वर्तमान में किस देश में है?
(A) अफगानिस्तान में
(B) कजाकिस्तान में
(C) तुर्कमेनिस्तान में
(D) उज्बेकिस्तान में
उत्तर:
(D) उज्बेकिस्तान में

3. अल-बिरूनी की रचना का क्या नाम है?
(A) शाहनामा
(B) तारीख-ए-गज़नवी
(C) किताब-उल-हिन्द
(D) चचनामा
उत्तर:
(C) किताब-उल-हिन्द

4. अल-बिरूनी ने अपने लेखन का आधार बनाया?
(A) वेदों को
(B) पुराणों को
(C) मनुस्मृति को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

5. अल-बिरूनी भारत की किस भाषा से अधिक प्रभावित हुआ?
(A) संस्कृत से
(B) पंजाबी से
(C) सिन्धी से
(D) हिन्दी से
उत्तर:
(A) संस्कृत से

6. अल-बिरूनी ज्ञाता था
(A) संस्कृत का
(B) अरबी का
(C) फारसी का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

7. अल-बिरूनी के अनुसार जाति-व्यवस्था से परे लोगों को कहा जाता था
(A) वैश्य
(B) शूद्र
(C) अंत्यज
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(C) अंत्यज

8. इब्न बतूता कहाँ का रहने वाला था?
(A) अरब क्षेत्र का
(B) स्पेन का
(C) मोरक्को का
(D) चीन का
उत्तर:
(C) मोरक्को का

9. रिहला किस भाषा में लिखी गई?
(A) अरबी
(B) फारसी
(C) तुर्की
(D) संस्कृत
उत्तर:
(B) फारसी

10. इब्न बतूता के आगमन के समय भारत का शासक था
(A) गाजी तुगलक
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) फिरोज तुगलक
(D) अलाऊद्दीन खिलजी
उत्तर:
(B) मुहम्मद तुगलक

11. इब्न बतूता भारत कब आया?
(A) 1265 ई० में
(B) 1321 ई० में
(C) 1333 ई० में
(D) 1398 ई० में
उत्तर:
(C) 1333 ई० में

12. इब्न बतूता ने भारत में स्थानों की दूरी बताई है
(A) कि०मी० में
(B) मीलों में
(C) कोसों में
(D) दिन को इकाई मान कर
उत्तर:
(D) दिन को इकाई मान कर

13. मुहम्मद तुगलक ने बतूता को दूत के रूप में कहाँ भेजा?
(A) बर्मा
(B) चीन
(C) रूस
(D) लंका
उत्तर:
(B) चीन

14. इन बतूता ने दिल्ली के किस दरवाजे को सबसे बड़ा बताया है?
(A) बदायूँ
(B) तुगलकाबाद
(C) अजमेरी
(D) गुल
उत्तर:
(A) बदायूँ

15. बतूता की रचना किस नाम से जानी जाती है?
(A) रिला
(B) तजाकिश
(C) मशविरा
(D) तारीख-ए-हिन्द
उत्तर:
(A) रिला

16. बतूता को भारत में विचित्र क्या लगा?
(A) नारियल
(B) पान
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

17. बतूता ने दिल्ली की प्राचीर में दरवाजों की संख्या बताई है
(A) 20
(B) 28
(C) 35
(D) 49
उत्तर:
(B) 28

18. बतूता ने भारत में कपड़े की किस किस्म का वर्णन अधिक किया है?
(A) सूती कपड़े का
(B) ऊनी कपड़े का
(C) जरी वाले कपड़े का
(D) मलमल का
उत्तर:
(D) मलमल का

19. बतूता के अनुसार पैदल डाक-सेवा कहलाती थी?
(A) उलुक
(B) दावा
(C) फरमान
(D) कोई नहीं
उत्तर:
(B) दावा

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20. बतूता ने दौलताबाद के गायकों के बाजार को क्या कहा है?
(A) ताराबबाद
(B) शमशीराबाद
(C) संगीतालय
(D) गुलकेन्द्र
उत्तर:
(A) ताराबबाद

21. बर्नियर भारत कब आया?
(A) 1645 ई० में
(B) 1656 ई० में
(C) 1670 ई० में
(D) 1688 ई० में
उत्तर:
(B) 1656 ई० में

22. ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर किसकी रचना है?
(A) अल-बिरूनी की
(B) बतूता की
(C) बर्नियर की
(D) तैवर्नियर की
उत्तर:
(C) बर्नियर की

23. बर्नियर भारत को किस रूप में वर्णित करता है?
(A) परंपरागत
(B) अविकसित
(C) उद्योग प्रधान
(D) विकसित
उत्तर:
(B) अविकसित

24. बर्नियर के अनुसार व्यापारिक दृष्टि से उन्नत क्षेत्र था
(A) यूरोप
(B) भारत
(C) अरब क्षेत्र.
(D) अफ्रीका
उत्तर:
(B) भारत

25. बर्नियर के विचारों से कौन-सा यूरोपियन लेखक प्रभावित हुआ?
(A) कॉर्ल मार्क्स
(B) मॉन्टेस्क्यू.
(C) (A) और (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

26. फ्रांसिस्को पेलसर्ट किस देश का रहने वाला था?
(A) ब्रिटेन का
(B) फ्रांस का
(C) जर्मनी का
(D) हॉलैण्ड का
उत्तर:
(D) हॉलैण्ड का

27. इन बतूता ने भारत में सर्वप्रथम उपहार किसको दिए?
(A) मुल्तान के गवर्नर को
(B) मुहम्मद तुगलक को
(C) शेख निजामुद्दीन औलिया को
(D) जियाऊद्दीन बर्नी को
उत्तर:
(A) मुल्तान के गवर्नर को

28. बर्नियर ने भारत की किस प्रथा को असभ्यता करार दिया है?
(A) जाति प्रथा को
(B) सूदखोरी को
(C) भूमि स्वामित्व को
(D) सती प्रथा को
उत्तर:
(D) सती प्रथा को

29. बर्नियर ने भारत की किस राजनीतिक घटना का वर्णन अधिक विस्तृत किया है?
(A). शाहजहाँ के बेटों में युद्ध
(B) औरंगजेब की ताजपोशी
(C) औरंगजेब का दक्षिण अभियान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शाहजहाँ के बेटों में युद्ध

30. महमूद गजनवी ने भारत पर कुल कितने आक्रमण किए?
(A) 15
(B) 17
(C) 20
(D) 23
उत्तर:
(B) 17

31. अल-बिरूनी ने शिक्षा कहाँ प्राप्त की?
(A) ख्वारिज्म में
(B) गजनी में
(C) बगदाद में
(D) मक्का में
उत्तर:
(A) ख्वारिज्म में

32. अल-बिरूनी ने अपना अधिकतर लेखन कार्य किस स्थान पर किया?
(A) ख्वारिज्म में
(B) गजनी में
(C) बगदाद में
(D) मक्का में
उत्तर:
(B) गजनी में

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33. अल-बिरूनी ने संस्कृत के अतिरिक्त भारत की कौन सी अन्य भाषाओं का साहित्य पढ़ा?
(A) पाली
(B) प्राकृत
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उपर्युक्त दोनों

34. अल-बिरूनी ने भारतीय क्षेत्र में आम व्यक्ति द्वारा बोली जाने वाली भाषा को क्या कहा?
(A) संस्कृत
(B) हिन्दवी
(C) पंजाबी
(D) खड़ी बोली
उत्तर:
(B) हिन्दवी

35. अल-बिरूनी ने संस्कृत भाषा को समझने की समस्या का समाधान कैसे किया?
(A) सीखकर
(B) अनुवादित ग्रंथों को पढ़कर
(C) द्वि-भाषिए की मदद से
(D) भाषा को महत्त्व देकर
उत्तर:
(A) सीखकर

36. इब्न बतूता भारत के अतिरिक्त अन्य किस देश में काज़ी के पद पर नियुक्त हुआ?
(A) इरान में
(B) चीन में
(C) लंका में
(D) मालद्वीप में
उत्तर:
(D) मालद्वीप में

37. बतूता ने भारत से चीन जाने के लिए किस क्षेत्र का मार्ग प्रयोग किया?
(A) कश्मीर का मार्ग
(B) मध्य एशिया का मार्ग
(C) लंका व मालद्वीप का मार्ग
(D) बर्मा व सुमात्रा का मार्ग
उत्तर:
(D) बर्मा व सुमात्रा का मार्ग

38. बतूता सर्वप्रथम चीन की किस बन्दरगाह पर गया?
(A) जायतुन
(B) कैंटन
(C) पोर्टस माऊथ
(D) तीनस्तीन
उत्तर:
(A) जायतुन

39. बतूता की तरह का चीन से संबंधित वृत्तांत वेनिस के किस अन्य यात्री का माना जाता है?
(A) दूरते बारबोसा का
(B) मनूची का
(C) फ्रैन्को पेलसर्ट का
(D) मार्को पोलो का
उत्तर:
(D) मार्को पोलो का

40. बतूता के यात्रा अनुभवों को संकलित करने का आदेश किस देश के शासक द्वारा दिया गया?
(A) भारत
(B) मोरक्को
(C) चीन
(D) मालद्वीप
उत्तर:
(B) मोरक्को

41. बतूता ने भारत का सबसे बड़ा शहर किसे कहा है?
(A) देहली को
(B) दौलताबाद को
(C) मुल्तान को
(D) सिन्ध को
उत्तर:
(A) देहली को

42. बतूता ने दिल्ली में फलों का बाजार किस स्थान पर बताया है?
(A) बदायूँ के दरवाजे के पास
(B) मांडवी दरवाजे के पास
(C) गुल दरवाजे के पास
(D) तुगलकाबाद के बाहरी क्षेत्र में
उत्तर:
(C) गुल दरवाजे के पास

43. बतूता के अनुसार सिन्ध से दिल्ली तक जाने में 50 दिन का समय लगता था लेकिन गुप्तचरों को सूचना देने में कितना समय लगता था?
(A) 50 दिन
(B) 20 दिन
(C) 10 दिन
(D) 5 दिन
उत्तर:
(D) 5 दिन

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44. भारत में जल मार्ग से पहला पुर्तगाली कौन आया?
(A) वास्कोडिगामा
(B) अल्बुकर्क
(C) मार्निस हस्टमान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) वास्कोडिगामा

45. वास्कोडिगामा भारत कब आया?
(A) 1484 ई० में
(B) 1498 ई० में
(C) 1509 ई० में
(D) 1520 ई० में
उत्तर:
(B) 1498 ई० में.

46. हीरे-जवाहरात का व्यापार करने के लिए फ्रांस से आने वाला प्रमुख यात्री कौन था, जिसने अपना वृत्तांत भी दिया हो? ..
(A) बर्नियर
(B) तैवर्नियर
(C) मनूची
(D) वान-डी-ब्रूस
उत्तर:
(B) तैवर्नियर

47. भारत में आने वाले उस इटली के यात्री का नाम बताओ जो वापिस नहीं गया?
(A) बर्नियर
(B) तैवर्नियर
(C) मनूची
(D) पेलसर्ट
उत्तर:
(C) मनूची

48. बर्नियर ने भूमि के राजकीय स्वामित्व को किसके लिए हानिकारक बताया है?
(A) शासक के लिए
(B) जनता के लिए
(C) उपर्युक्त दोनों के लिए
(D) किसी के लिए नहीं
उत्तर:
(B) जनता के लिए

49. 18वीं सदी में किस यूरोपीय चिन्तक ने बर्नियर के वृत्तांत को आधार मानकर भारत का अध्ययन किया?
(A) कार्ल मार्क्स ने
(B) मॉन्टेस्क्यू ने
(C) (A) और (B) दोनों
(D) किसी ने नहीं
उत्तर:
(C) (A) और (B) दोनों

50. “विश्व की सभी बहुमूल्य वस्तुएँ यहाँ आकर समा जाती हैं।” बर्नियर ने ये पक्तियाँ किस देश के लिए कही हैं?
(A) फ्रांस के लिए
(B) ब्रिटेन के लिए
(C) रूस के लिए
(D) भारत के लिए
उत्तर:
(A) फ्रांस के लिए

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51. विभिन्न शहरों में व्यापारी वर्ग के मुखिया को मुगल काल में क्या कहा जाता था?
(A) नगर सेठ
(B) महाजन
(C) मालिक
(D) वोहरा
उत्तर:
(A) नगर सेठ

52. दासों के बारे में बतूता को भारत में क्या आश्चर्यपूर्ण लगा?
(A) दासों के सांस्कृतिक कार्यक्रम
(B) दासों के कार्य
(C) दासों द्वारा गुप्तचरी करना
(D) दासों का बाजार में बिकना
उत्तर:
(D) दासों का बाजार में बिकना

53. बतूता ने दासों के कार्य को प्रमुख रूप से बताया है
(A) गृह कार्य
(B) कृषि कार्य
(C) गुप्तचर का कार्य करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

54. बर्नियर को भारत में सर्वाधिक अमानवीय कार्य क्या लगा?
(A) सती प्रथा
(B) दासों की खरीद-बेच
(C) कारीगरों की कार्य प्रणाली
(D) कृषक की दशा
उत्तर:
(A) सती प्रथा

55. बतूता को किस शताब्दी का विश्व यात्री कहा जाता है?
(A) 13वीं शताब्दी का
(B) 14वीं शताब्दी का
(C) 15वीं शताब्दी का
(D) 16वीं शताब्दी का
उत्तर:
(B) 14वीं शताब्दी का

56. अल-बिरूनी की पुस्तक ‘किताब-उल-हिन्द’ की भाषा है
(A) फारसी
(B) तुर्की
(C) अरबी
(D) उर्दू
उत्तर:
(C) अरबी

57. इब्न बतूता का मोरक्को में जन्म स्थान था
(A) ओवल
(B) गाजा
(C) तैंजियर
(D) रियाद
उत्तर:
(C) तैंजियर

58. बर्नियर को भारत आने के बाद प्रारंभ में किसका संरक्षण मिला?
(A) औरंगजेब का
(B) दारा का
(C) शाहजहाँ का
(D) मुराद का
उत्तर:
(B) दारा का

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59. मुगल काल में शाही कारखाने थे
(A) शासकों की आवश्यकता की चीजें उत्पादन
(B) सेना के रख-रखाव का स्थल करने वाले स्थल
(C) दरबारी प्रबंध व्यवस्था का स्थल
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) शासकों की आवश्यकता की चीजें उत्पादन करने वाले स्थल

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
अल-बिरूनी का जन्म 973 ई० में हुआ।

प्रश्न 2.
अल-बिरूनी का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
अल-बिरूनी.का जन्म ख्वारिज्म (उज़्बेकिस्तान) में हुआ।

प्रश्न 3.
अल-बिरूनी ने किताब-उल-हिन्द किस भाषा में लिखी?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने किताब-उल-हिन्द अरबी भाषा में लिखी।

प्रश्न 4.
अल-बिरूनी की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
अल-बिरूनी की मृत्यु 1048 ई० में हुई।

प्रश्न 5.
अल-बिरूनी के अनुसार भारतीय समाज में श्रेष्ठ स्थान पर कौन थे?
उत्तर:
अल-बिरूनी के अनुसार भारतीय समाज में श्रेष्ठ स्थान पर ब्राह्मण थे।

प्रश्न 6.
इन बतूता का जन्म कब हुआ?
उत्तर:
इन बतूता का जन्म 1304 ई० में हुआ।

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प्रश्न 7.
इन बतूता कहाँ का रहने वाला था?
उत्तर:
इब्न बतूता मोरक्को का रहने वाला था।

प्रश्न 8.
इब्न बतूता भारत कब आया?
उत्तर:
इन बतूता 1333 ई० में भारत आया।

प्रश्न 9.
भारत से महम्मद तगलक का दूत बनकर चीन कौन गया?
उत्तर:
भारत से मुहम्मद तुगलक का दूत बनकर इब्न बतूता चीन गया।

प्रश्न 10.
बर्नियर भारत में कब-से-कब तक रहा?
उत्तर:
बर्नियर भारत में 1656 से 1668 ई० तक भारत में रहा।

प्रश्न 11.
अल-बिरूनी ने भारत को समझने के लिए किस भाषा को सीखना अनिवार्य बताया?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने भारत को समझने के लिए संस्कृत भाषा को अनिवार्य बताया।

प्रश्न 12.
संस्कृत को अल-बिरूनी कैसी भाषा बताता है?
उत्तर:
संस्कृत को अल-बिरूनी विशाल पहुँच वाली भाषा बताता है।

प्रश्न 13.
इन बतूता नारियल की तुलना किससे करता है?
उत्तर:
इब्न बतूता नारियल की तुलना मानव के सिर से करता है।

प्रश्न 14.
इब्न बतूता दिल्ली के मुकाबले में शहर किसे कहता है?
उत्तर:
इन बतूता दौलताबाद को दिल्ली के मुकाबले में शहर कहता है।

प्रश्न 15.
इन बतूता के अनुसार अश्व डाक व्यवस्था क्या कहलाती थी?
उत्तर:
इब्न बतूता के अनुसार अश्व डाक व्यवस्था उलुक कहलाती थी।

प्रश्न 16.
बतूता ने किस क्षेत्र के संगीत बाजार का वर्णन किया है?
उत्तर:
बतूता ने दौलताबाद क्षेत्र के संगीत बाजार का वर्णन किया है।

प्रश्न 17.
बर्नियर ने अपना भारत से संबंधित वृत्तांत किस रचना में दिया?
उत्तर:
बर्नियर ने अपना भारत से संबंधित वृत्तांत ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर में किया।

प्रश्न 18.
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि का स्वामी कौन था?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि का स्वामी शासक था।

प्रश्न 19.
बर्नियर किस देश का रहने वाला था?
उत्तर:
बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था।

प्रश्न 20.
तैवर्नियर ने भारत की यात्रा कितनी बार की?
उत्तर:
तैवर्नियर ने भारत की यात्रा 6 बार की।

प्रश्न 21.
बर्नियर ने ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर की रचना किस उद्देश्य से की?
उत्तर:
बर्नियर ने ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर की रचना यूरोप को भारत से श्रेष्ठ दिखाने के उद्देश्य से की।

प्रश्न 22.
बतूता सर्वप्रथम भारत में कहाँ पहुँचा?
उत्तर:
बतूता सर्वप्रथम सिन्ध में पहुंचा।

प्रश्न 23.
बतूता ने सुल्तान मुहम्मद तुगलक को उपहार में क्या दिया?
उत्तर:
बतूता ने सुल्तान मुहम्मद तुगलक को उपहार में घोड़े, ऊँट व दास दिए।

प्रश्न 24.
बर्नियर ने किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण क्या बताया है?
उत्तर:
बर्नियर ने किसानों की दुर्दशा का मुख्य कारण भूमि पर राजकीय स्वामित्व बताया है।

प्रश्न 25.
फिरदौसी की रचना का क्या नाम है?
उत्तर:
फिरदौसी की रचना का नाम शाहनामा है।

प्रश्न 26.
अल-बिरूनी किसके साथ भारत आया?
उत्तर:
अल-बिरूनी महमूद के साथ भारत आया।

प्रश्न 27.
इन बतूता ने अपने देश के बाद सबसे पहले किस स्थान की यात्रा की?
उत्तर:
इन बतूता ने अपने देश के बाद सबसे पहले मक्का की यात्रा की।

प्रश्न 28.
सर टॉमस रो किस देश का यात्री था?
उत्तर:
सर टॉमस रो ब्रिटेन का यात्री था।

प्रश्न 29.
दूरते बारबोसा का संबंध किस देश से है?
उत्तर:
दूरते बारबोसा का संबंध पुर्तगाल से है।

प्रश्न 30.
बर्नियर ने अपनी भारत संबंधित रचना को फ्रांस में किसे भेंट किया?
उत्तर:
बर्नियर ने अपनी भारत संबंधित रचना को शासक लुई XIV को भेंट किया।

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प्रश्न 31.
अल-बिरूनी को बन्दी किसने बनाया?
उत्तर:
अल-बिरूनी को महमूद गज़नी ने बन्दी बनाया।

प्रश्न 32.
अल-बिरूनी ने यूनानी भाषा में अनुवादित किस-किस का साहित्य पढ़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने यूनानी भाषा में अनुवादित अरस्तु व प्लेटो का साहित्य पढ़ा।

प्रश्न 33.
अल-बिरूनी की भारत के बारे में समझ के मुख्य आधार क्या थे?
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारत के बारे में समझ के मुख्य आधार ब्राह्मणवादी ग्रन्थ थे।

प्रश्न 34.
अल-बिरूनी समाज में किन दो वर्गों की स्थिति एक जैसी बताते हैं?
उत्तर:
अल-बिरूनी समाज में वैश्य व शूद्र वर्गों की स्थिति एक जैसी बताते हैं।

प्रश्न 35.
बर्नियर ने भारतीय कृषक की दुर्दशा का क्या कारण बताया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारतीय कृषक की दुर्दशा का कारण भारत में भूमि का राजकीय स्वामित्व बताया है।

प्रश्न 36.
बतूता ने भारत में सर्वप्रथम किस स्थान के गवर्नर को उपहार दिए?
उत्तर:
बतूता ने भारत में सर्वप्रथम मुल्तान के गवर्नर को उपहार दिए।

प्रश्न 37.
बतूता के संस्मरणों को किसने लिखा?
उत्तर:
बतूता के संस्मरणों को इब्न जुजाई ने लिखा।

प्रश्न 38.
बतूता ने किस तरह के कपड़े को केवल अमीरों के प्रयोग में आने वाला बताया है?
उत्तर:
बतूता ने मलमल के कपड़ों को केवल अमीरों के प्रयोग में आने वाला बताया है।

प्रश्न 39.
बतूता किस तरह की डाक को अधिक तेज बताता है?
उत्तर:
बतूता पैदल डाक को अधिक तेज बताता है।

प्रश्न 40.
बतूता के अनुसार खुरासान के फल प्रायः भारत कैसे पहुँचते थे?
उत्तर:
बतूता के अनुसार खुरासान के फल पैदल डाक द्वारा भारत पहुँचते थे।

प्रश्न 41.
बतूता ने दौलताबाद में सबसे महत्त्वपूर्ण जगह कौन-सी बताई?
उत्तर:
बतूता ने दौलताबाद में सबसे महत्त्वपूर्ण जगह संगीत बाजार (ताराबबाद) बताई।

प्रश्न 42.
वह कौन-सा यूरोपीय यात्री था जो चिकित्सक के रूप में भारत आया था, लेकिन वापिस नहीं गया?
उत्तर:
मनूची नामक यूरोपीय यात्री जो चिकित्सक के रूप में भारत आया था लेकिन वापिस नहीं गया।

प्रश्न 43.
बर्नियर ने भारत व यूरोप की तुलना के लिए मुख्य रूप से किन शब्दों का प्रयोग किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारत व यूरोप की तुलना के लिए मुख्य पूर्व व पश्चिम शब्दों का प्रयोग किया है।

प्रश्न 44.
बर्नियर किस तरह के भूमि स्वामित्व को अच्छा मानता है?
उत्तर:
बर्नियर निजी स्वामित्व को अच्छा मानता है।

प्रश्न 45.
बर्नियर के विचार किस विचारधारा से प्रभावित लगते हैं?
उत्तर:
बर्नियर के विचार यूरोप में पूंजीवादी धारणा से प्रभावित लगते हैं।

प्रश्न 46.
बर्नियर ने भारतीय नगरों के लिए क्या शब्द प्रयोग किया है?
उत्तर:
बर्नियर ने भारतीय नगरों के लिए शिविर नगर का प्रयोग किया है।

प्रश्न 47.
अल-बिरूनी ने किस-किस भारतीय भाषा के साहित्य को मौलिक या अनुवादित रूप में पढ़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने संस्कृत, पाली, प्राकृत नामक भारतीय भाषा के साहित्य को मौलिक या अनुवादित रूप में पढ़ा।

प्रश्न 48.
बतूता ने मुहम्मद तुगलक को कैसा शासक बताया है?
उत्तर:
बतूता ने मुहम्मद तुगलक विद्वान, कला, साहित्य का संरक्षक बताया है।

प्रश्न 49.
जौहरी के रूप में भारत आने वाले प्रमुख यात्री का नाम बताओ।
उत्तर:
जौहरी के रूप में भारत आने वाले प्रमुख यात्री का नाम ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर था।

प्रश्न 50.
अल-बिरूनी ने समाज की जाति व्यवस्था से बाहर वाले वर्ग को क्या लिखा है?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने समाज की जाति व्यवस्था से बाहर वाले वर्ग को अंत्यज लिखा है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 51.
इन बतूता को भारत में वनस्पति के तौर पर कौन-कौन से पौधे आश्चर्यजनक लगे?
उत्तर:
इन बतूता को भारत में वनस्पति के तौर पर नारियल व पान के पौधे आश्चर्यजनक लगे।

प्रश्न 52.
‘रिहला’ तथा ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एंपायर’ के लेखक कौन थे?
उत्तर:
‘रिहला’ के लेखक इब्नबतूता तथा ‘ट्रेवलस इन द मुगल एंपायर’ के लेखक बर्नियर थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेशी यात्रियों के भारत आने का उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
प्राचीनकाल से ही अनेक यात्री भारत में आते रहे हैं। ये एक देश से लोग दूसरे देशों में व्यापार व रोजगार के लिए जाते थे। कई लोग धर्म-प्रचार या तीर्थ यात्रा के उद्देश्य से दूसरे देश में जाते थे। कई बार ये यात्री विद्या अध्ययन के लिए भी जाते थे। भारत में भी यात्री इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आए।

प्रश्न 2.
इब्न बतूता विश्व यात्रा क्यों करता है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। भारत व चीन की यात्रा करने के उपरांत वह स्पेन, मोरक्को गया।

प्रश्न 3.
फ्रांस्वा बर्नियर कौन था? उसने भारत के बारे में क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने मुगल काल में भारत की यात्रा की। 1656 से 1668 तक का समय उसने भारत में बिताया। वह इन वर्षों में दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखा।

प्रश्न 4.
अल-बिरूनी ने भारत की जाति-व्यवस्था का वर्णन कैसे किया है?
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारतीय समाज के बारे में समझ उसी ऋग्वैदिक पर आधारित थी जिसमें वर्णों की उत्पत्ति बताई गई है। इस समझ के अनुसार ब्राह्मण इस समाज में सर्वोच्च स्थान था। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के सिर से हुई। उसके बाद क्षत्रियों का स्थान था जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कंधों व हाथों से हुई। क्षत्रियों के बाद वैश्यों का स्थान था। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जंघाओं से हुई है। इस कड़ी में चौथा स्थान शूद्रों का है। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के चरणों से हुई है। वह यह भी लिखता है कि तीसरे व चौथे वर्ण में कोई अधिक अंतर नहीं है।

प्रश्न 5.
इन बतूता ने भारत में नारियल व पान के बारे में क्या वर्णन किया है?
उत्तर:
बतूता ने भारतीय नारियल व पान की विशेष चर्चा की है। नारियल के बारे में वह लिखता है कि, “ये हू-ब-हू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं। नारियल के वृक्ष का फल मानव के सिर से मेल खाता है, क्योंकि इसमें मानों दो आँखें तथा एक मुख है और अन्दर का भाग हरा होने के कारण मस्तिष्क जैसा दिखता है। पान के बारे में बतूता बताता है कि, “पान एक ऐसा वृक्ष है जिसे अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है। पान का कोई फल नहीं होता और इसे केवल पत्तियों के लिए ही उगाया जाता है।”

प्रश्न 6.
इन बतूता के दिल्ली से संबंधित वृत्तांत का उल्लेख करें।
उत्तर:
दिल्ली को बतूता ने देहली कहा है। उसके अनुसार, “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है। प्राचीर के अन्दर खाद्य सामग्री, ह घेरेबंदी में काम आने वाली मशीनों के संग्रह के लिए भंडार गृह बने हुए थे।”

प्रश्न 7.
बतूता भारतीय डाक व्यवस्था से क्यों प्रभावित हुआ तथा उसने इसका वर्णन कैसे किया?
उत्तर:
इब्न बतूता भारत की संचार व्यवस्था से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। उसने इसके बारे में विस्तृत जानकारी दी। वह इसे अद्भुत या अनूठी बताता है। उसके अनुसार उस समय दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी जिसे उलुक तथा दावा कहा जाता था। उलुक घोड़ों की डाक सेवा थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित चौंकी में शाही सेना के घोड़े होते थे। इस तरह एक घोड़ा एक समय में चार मील ही जाया करता था। दूसरी तरह की डाक सेवा दावा थी जिसका पैदल व्यवस्था से संबंध था। इस व्यवस्था में प्रति मील तीन व्यक्ति बदले जाते थे। प्रारंभ में एक संदेशवाहक एक हाथ में छड़ी तथा दूसरे में पत्र या माल लेकर अपनी अधिकतम . क्षमतानुसार भागता था। यह क्रिया पत्र में गंतव्य स्थान तक पहुंचने तक चलती रहती थी।

प्रश्न 8.
बर्नियर ने भारतीय किसानों की स्थिति के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
बर्नियर ने कृषकों के विषय में काफी कुछ लिखा है। उसके अनुसार, “हिंदुस्तान के ग्रामीण अंचलों में काफी भूमि रेतीली या बंजर है। यहाँ की खेती भी अच्छी नहीं है। कृषक जीवन-निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता था। निरंकुशता से हताश हो किसान गाँव छोड़कर चले जाते थे।”

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प्रश्न 9.
बर्नियर ने भारत में भूमि स्वामित्व के बारे में क्या विचार दिए हैं?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत में भूमि पर निजी स्वामित्व नहीं था, बल्कि सारे साम्राज्य की भूमि का मालिक स्वयं सम्राट था। उसका यह विचार सोलहवीं व सत्रहवीं सदी के अन्य कुछ यात्रियों ने भी अपनाया है। वर्णन के अनुसार यह व्यवस्था यूरोप से भिन्न थी क्योंकि वहाँ भूमि पर निजी स्वामित्व था। बर्नियर के अनुसार निजी स्वामित्व का अभाव राज्य व जनता दोनों के लिए हानिकारक था। क्योंकि कृषक न तो अपनी जमीन अपनी संतान को दे सकते थे, न ही वे किसी तरह का निवेश कृषि में करते थे। इसके कारण भारत में कृषि व्यवस्था पिछड़ी हुई रही तथा किसानों का असीम शोषण हुआ।

प्रश्न 10.
बर्नियर का भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित वृत्तांत विरोधाभासपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
बर्नियर अपने वृत्तांत के द्वारा यूरोप के शासकों को चेतावनी देता है कि वे निजी स्वामित्व में हस्तक्षेप न करें क्योंकि राज्य के स्वामित्व का सिद्धांत यूरोप के खेतों को विनाश के कगार पर ले जाएगा तथा उनकी पहचान के लिए भी घातक होगा। इसलिए वह भारत की ऐसी तस्वीर बनाता है लेकिन अपने वर्णन में अन्य स्थान पर भारत में व्यापार, कृषि के उद्योगों की प्रशंसा करता है।

प्रश्न 11.
अल-बिरूनी कौन था? उसे कौन-सी दो समस्याओं का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
अल-बिरूनी एक विदेशी यात्री था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया। उसका वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा प्राप्त की। अल-बिरूनी द्वारा वर्णित की गई दो समस्याएँ निम्नलिखित प्रकार से हैं

  • वह बताता है कि सबसे पहली समस्या संस्कृत भाषा थी। जो लिखने, पढ़ने व अनुवाद करने में अरबी व फारसी से बहुत – भिन्न थी। यह भाषा ऊँची पहुँच वाली थी।
  • दूसरी समस्या यहाँ की धार्मिक अवस्था तथा रीति-रिवाज़ थी। जो उसके समाज से भिन्न थी। उन्हें समझना कठिन था।

प्रश्न 12.
इब्न बतूता के भारत में प्रवास की जानकारी दें।
उत्तर:
बतूता 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया। लेकिन बाद में सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने चीन की ओर प्रस्थान किया।

प्रश्न 13.
इब्न बतूता का वृत्तांत किन अन्य लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना?
उत्तर:
इन बतूता का वृत्तांत उच्च लेखकों व यात्रियों के लिए यह मार्गदर्शक पहलू बन गया। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले यात्रियों में समरकंद का अब्दुर रज्जाक (यात्रा लगभग 1440), महमूद वली बलखी (यात्रा लगभग 1620) तथा शेख अली हाजिन (यात्रा लगभग 1740) के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें बलखी तो भारत से इतना प्रभावित हुआ।

प्रश्न 14.
इब्न बतूता के दौलताबाद के बारे में वृत्तांत का वर्णन दें।
उत्तर:
दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबबाद कहते हैं। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है। इस बाजार में इबादत के लिए मस्जिदें बनी हुई हैं।

प्रश्न 15.
बर्नियर की ‘अविकसितं पूर्व की धारणा की व्याख्या करें।
उत्तर:
बर्नियर ने अपनी रचना में भारत का वृत्तांत तुलनात्मक ढंग से किया है। उसने अपनी रचना को आलोचनात्मक, अंतर्दृष्टिपूर्ण व गहन चिन्तन पर आधारित किया है। वह वर्णन में उन चीजों को विशेष महत्त्व देता है जो यूरोप से विपरीत थी। वह यूरोप को भारत से श्रेष्ठ दिखाने पर विशेष जोर देता है। इस आधार पर वह भारत को ‘अविकसित पूर्व के रूप में वर्णित करता है। .

प्रश्न 16.
यात्रियों के वृत्तांत के दो कमजोर पक्ष बताओ।
उत्तर:

  • यात्री वृत्तांत देते समय अपने क्षेत्र, धर्म व देश की परम्पराओं व रीति-रिवाजों को अन्य से श्रेष्ठ बताते हैं।
  • वे स्थानीय लोगों की भाषा से परिचित नहीं होते तथा इन्हें क्षेत्र-विशेष को समझने के लिए द्विभाषीय पर निर्भर रहना पड़ता है।

प्रश्न 17.
यात्रियों के वृत्तांत का सकारात्मक पक्ष क्या होता है?
उत्तर:
यात्रियों के वृत्तांत में स्थानीय व्यक्तियों का प्रभाव नहीं होता, वे जैसा देखते हैं वैसा वर्णन कर देते हैं। जिसमें सच्चाई व यथार्थ की जानकारी की अधिक संभावना रहती है।

प्रश्न 18.
अल-बिरूनी के प्रारंभिक जीवन का वर्णन करें।
उत्तर:
अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा ली। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर वह मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुँच गया।1017 ई० में महमूद गजनी ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था, उसे गजनी लाया गया। बाद में अल-बिरूनी महमूद गज़नी का राजकवि भी बना।

प्रश्न 19.
अल-बिरूनी ने अपनी समस्याओं का समाधान कैसे किया? क्या वह उसमें सफल रहा?
उत्तर:
अल-बिरूनी ने अपनी समस्याओं के समाधान के लिए ब्राह्मणों द्वारा रचित पुस्तकों व अनुवादों को अधिक-से-अधिक पढ़ा। उसका यह पक्ष कमजोर रहा क्योंकि उसने निजी विचारों व अनुभवों को महत्त्व नहीं दिया बल्कि वह पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित साहित्य पर आश्रित रहा। उसने भारतीय समाज के बारे में जानकारी देते हुए वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की रचनाओं तथा मनुस्मृति के अंश यथावत् ही लिख दिए।

प्रश्न 20.
‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हिंदू शब्द की उत्पत्ति सिन्धु से हुई है। फारसी भाषा में ‘स’ शब्द का उच्चारण ‘ह’ से किया जाता है। जिसके कारण वे सिन्धु को हिन्दू या सप्ताह को हप्ताह बोलते हैं। फारस क्षेत्र के लोग सिन्धु नदी के पूर्व रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू का प्रयोग करते हैं तथा उनका क्षेत्र हिन्दोस्तान ईरानी अभिलेखों में ‘हिन्द’ शब्द का प्रयोग छठी सदी ई०पू० में सिन्धु क्षेत्र के लिए मिलता है।

प्रश्न 21.
अल-बिरूनी ने फारस के समाज के विभाजन को किस तरह समझा?
उत्तर:
अल-बिरूनी के अनुसार फारस (वर्तमान ईरान) क्षेत्र चार सामाजिक वर्गों में विभाजित था। इन चार वर्गों में वह पहले वर्ग में शासक व घुड़सवार, दूसरे वर्ग में भिक्षु, तीसरे वर्ग में आनुष्ठानिक पुरोहित, चिकित्सक, खगोल शास्त्री व वैज्ञानिक तथा चौथे में कृषक व शिल्पकार को बताता है।

प्रश्न 22.
इब्न बतूता के प्रारंभिक जीवन का परिचय दें।
उत्तर:
इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। उसने पारिवारिक परंपरा के अनुरूप साहित्यिक व धार्मिक ज्ञान अच्छी तरह से प्राप्त किया। इस तरह वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया। – इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की।

प्रश्न 23.
इब्न बतूता की रिहला का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
रिला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुँचने पर वहाँ के शासक ने इब्न जुज़ाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इब्न जुज़ाई ने बतूता से जानकारी लेकर इसे लिखा। इसमें कुल 13 अध्याय हैं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 24.
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
इब्न बतूता के अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। यहाँ सड़कें तंग, भीड़-भाड़ वाली, रंगीन बाजार तथा बड़े-बड़े भवन थे। इन शहरों में जीवन-यापन की सारी चीजें मिल जाती थीं। वह बताता है कि ये शहर मात्र व्यापार या आर्थिक विनिमय के केन्द्र नहीं थे बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र भी थे। प्रत्येक शहर में मन्दिर व मस्जिद देखने को मिलते थे। अधिकतर नगरों में संगीत एवं नृत्य के लिए विशेष स्थल भी थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 1

प्रश्न 25.
इब्न बतूता ने भारतीय गाँवों के बारे में क्या बताया है?
उत्तर:
इब्न बतूता बताता है कि भारतीय गाँवों की व्यवस्था कृषि पर निर्भर है। यहाँ कृषि उन्नत है। इसके उन्नत होने का मुख्य कारण भूमि का उपजाऊपन है। यहाँ कृषक वर्ष में दो फसलें उगाते हैं। उसके अनुसार शहर की सम्पन्नता का कारण गाँव हैं। उसके अनुसार अधिकतर भारतीय गाँव कच्चे तथा घास-फूस की झोंपड़ी वाले थे। वह गाँवों के लोगों के आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे बताता है।

प्रश्न 26.
इब्न बतूता ने भारतीय व्यापार व वाणिज्य के बारे में क्या विचार दिए हैं?
उत्तर:
बतूता के अनुसार भारत में व्यापार व वाणिज्य काफी विकसित अवस्था में था। मध्य पश्चिमी एशिया व दक्षिण पूर्वी एशिया, जिसमें वह स्पष्ट करता है कि इनके साथ भारत लगभग प्रत्येक चीज का व्यापार करता था। यह व्यापार कारवाँ में होता था। उसके अनुसार भारतीय कपड़ा (सूती, महीन मलमल, रेशमी, जरी वाला व काटन) तथा शिल्पकारी की चीज़ों की लगभग इस . क्षेत्र में पूरी माँग थी जिसमें व्यापारियों को खूब मुनाफा होता था। वह भारतीय मलमल की विभिन्न किस्मों (गंगाजल, मलमलखास, सरकार-ए-आली, शबनम) इत्यादि के बारे में बताता है।

प्रश्न 27.
बर्नियर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
बर्नियर का जन्म फ्रांस में 1620 ई० में हुआ। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। वह चिकित्सक के रूप में 1656 ई० में सूरत पहुँचा। उसे दारा शिकोह ने अपना चिकित्सक बना दिया। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश खान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 2

प्रश्न 28.
बर्नियर की रचना ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
फ्रांस्वा बर्नियर ने 1656 से 1668 तक का समय भारत में बिताया। वह इन वर्षों में मुगल दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया।

प्रश्न 29.
मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत से क्या प्रेरणा ली?
उत्तर:
मॉन्टेस्क्यू 18वीं शताब्दी का फ्रांसीसी चिन्तक था। उसने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग करके यूरोप में निरंकुशता के सिद्धांत को स्थापित करने का प्रयास किया, साथ ही शासकों को अति निरंकुशता से बचने की सलाह दी क्योंकि एशिया के शासकों की अति निरंकुशता के कारण प्रजा को गरीबी व दासता की स्थिति का जीवन जीनां पड़ता है। उसने अपने लेखन में स्पष्ट किया कि एशिया में सारी भूमि का स्वामित्व राजा के पास था तथा निजी सम्पत्ति अस्तित्व में नहीं थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 5 Img 3

प्रश्न 30.
कार्ल मार्क्स ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग करके एशिया को किस प्रकार समझा?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग एशियाई उत्पादन शैली तथा व्यवस्था (ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर) को समझने में किया। उसके अनुसार उपनिवेशवाद से पहले भारत एवं अन्य एशियाई देशों में अधिशेष का अधिग्रहण राज्य करता था। जिसके कारण एक ऐसे समाज का निर्माण हुआ जो काफी हद तक स्वायत्त था तथा आन्तरिक दृष्टि से सामन्तवादी था। वास्तव में यह प्रणाली गतिहीन तथा निष्क्रिय थी क्योंकि शासक व समाज में यह एक समझौता था।

प्रश्न 31.
बर्नियर भारत के ग्रामीण समाज का वर्णन किस तरह देता है?
उत्तर:
बर्नियर के अनुसार भारत के ग्रामीण समाज में सामाजिक व आर्थिक अन्तर बड़े स्तर पर थे। इस समाज में एक ओर बड़े-बड़े जमींदार थे जो भूमि पर उच्चाधिकारों का प्रयोग करते थे, दूसरी ओर अस्पृश्य भूमि विहीन श्रमिक थे। इन दोनों के मध्य कृषक था जो किराए के श्रम का प्रयोग करके माल (उपज) उत्पादित करता था। कृषकों में भी एक वर्ग छोटे किसानों के रूप में था जो मुश्किल से अपने गुजारे योग्य उत्पादन कर पाता था।

प्रश्न 32.
बर्नियर ने राजकीय कारखानों के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
भारत में शाही आवश्यकता की पूर्ति की चीजें जिस स्थान पर बनती थीं, उन्हें राजकीय कारखाने कहा जाता था। इन कारखानों के विभिन्न कक्षों में कारीगर अपना-अपना काम करते थे। ये कारीगर या शिल्पकार अपने कारखानों में हर रोज सुबह आते हैं, जहाँ वे पूरा दिन कार्यरत रहते हैं और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। ये कारीगर जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने के इच्छुक नहीं हैं जिनमें वह पैदा हुए हैं।

प्रश्न 33.
यात्रियों के वृत्तांत में दास व दासियों के मुख्य रूप से क्या कार्य बताए गए हैं?
उत्तर:
यात्रियों के अनुसार, पुरुष दास का प्रयोग घरेलू कार्यों; जैसे बाग-बगीचों की देखभाल, पशुओं की देखरेख, महिलाओं … व पुरुषों को पालकी या डोली में एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए होता था। दासियाँ शाही महल, अमीरों के आवास पर घरेलू कार्य करने व संगीत गायन के लिए खरीदी जाती थीं। सुल्तान अपने अमीरों व दरबारियों पर नियंत्रण रखने के लिए भी दासियों का प्रयोग करता था।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी कौन था? वह भारत कैसे आया?
उत्तर:
अल-बिरूनी एक विदेशी यात्री था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया। उसका वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज़्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। अल-बिरूनी ने ख्वारिज्म में शिक्षा प्राप्त की। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। वह अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुँच गया।

1017 ई० में महमूद गजनवी ने खारिज़्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया। बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया। उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा नदी तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
अल-बिरूनी की प्रमुख समस्याएँ क्या थीं? उसने इनका समाधान कैसे किया?
उत्तर:
अल-बिरूनी को भारत में कई समस्याएँ आईं। उसने इनका वर्णन इस प्रकार किया
(i) वह बताता है कि सबसे पहली बाधा संस्कृत भाषा थी। जो लिखने, पढ़ने व अनुवाद करने में अरबी व फारसी से बहुत भिन्न थी। यह भाषा ऊँची पहुँच वाली थी। इस भाषा में एक चीज के लिए कई शब्द (मूल तथा व्युत्पन्न) प्रयोग होते थे तथा एक शब्द कई चीजों के लिए प्रयुक्त होता था।

(ii) उसके अनुसार दूसरी बाधा यहाँ की धार्मिक अवस्था तथा रीति-रिवाज़ व प्रथाएँ थीं। जो उसके समाज से भिन्न थीं। एक अपरिचित के रूप में उन्हें समझना कठिन था।

(iii) तीसरी बाधा स्थानीय लोगों का अभिमान तथा अलग रहने की प्रवृत्ति थी जिसके कारण वे बाह्य व्यक्ति के साथ इतनी आसानी से नहीं घुलते-मिलते थे।
इन समस्याओं के समाधान के लिए उसने ब्राह्मणों द्वारा रचित पुस्तकों व अनुवादों को अधिक-से-अधिक समझा। वह पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित साहित्य पर आश्रित रहा। उसने भारतीय ग्रन्थों, वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की रचनाओं तथा मनुस्मृति का अध्ययन किया। उसने इसी आधार पर अपनी समस्याएँ सुलझाईं।

प्रश्न 3.
इब्न बतूता कौन था? उसके जीवन के बारे में आप क्या जानते हो? वह भारत क्यों आया?
उत्तर:
इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का एक यात्री था। उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का 1325 से 1354 ई० तक भ्रमण किया। अफ्रीका, एशिया व यूरोप के कुछ हिस्से की यात्रा करने के कारण उसे एक प्रारंभिक विश्व यात्री की संज्ञा दी जाती है। इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार मोरक्को क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। पारिवारिक परंपरा विरासत में मिलने व अपनी लगन के कारण वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया। इब्न बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। वह मध्य-एशिया के रास्ते । से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा।

वह 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। 1342 ई० में उसे मुहम्मद तुगलक ने चीन में भारत का दूत नियुक्त किया।

उसने चीन पहुँचकर विभिन्न स्थानों की यात्रा की। चीनी शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया। 1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तैंजियर पहुँच गया। उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रह्ला या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इसमें 1325-1354 के बीच की उसकी यात्राओं का वर्णन है। इब्न बतूता की मृत्यु 1377 ई० तैंजियर में हुई।

प्रश्न 4.
इब्न बतूता के ‘रिहला’ पर नोट लिखो।
उत्तर:
रिहला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुँचने पर वहाँ के शासक ने इब्न जुजाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इब्न जुजाई रिहला की प्रस्तावना में लिखता है कि मोरक्को में राजा के द्वारा एक निर्देश दिया गया कि वे (इब्न बतूता) अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का तथा अपनी स्मृति में बैठ गई रोचक घटनाओं का एक वृत्तांत लिखवाएँ और साथ ही विभिन्न देशों के शासकों में से जिनसे वे मिले, उनके महान साहित्यकारों के तथा उनके धर्मनिष्ठ संतों के बारे में बताएं। तदनुसार उन्होंने इन सभी विषयों पर एक कथानक लिखवाया जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी। साथ ही उन्होंने कई प्रकार के असाधारण विवरण जिनके प्रतिपादन से लाभप्रद उपदेश मिलते हैं, दिए तथा असाधारण चीजों के बारे में बताया जिनके सन्दर्भ से अभिरुचि जगी।

रिहला में भारत के बारे में विस्तृत वर्णन दिया गया है। इस वर्णन में भारत की प्रकृति, पशु-पक्षी, वन, नदियों, गाँव व शहरों के बारे में बताया गया है। उसने मुहम्मद तुगलक के बारे में भी विस्तृत प्रकाश डाला है। बतूता मुहम्मद तुगलक को सन्तुलित, शिक्षित, न्यायप्रिय, प्रतिभाशाली व दूरदर्शी शासक बताता है।
इब्न बतूता ने भारत में लगभग 14 वर्ष का समय लगाया तथा राज्य, समाज, धर्म, प्रकृति तथा अर्थव्यवस्था से संबंधित हर प्रकार की सूचना एकत्रित की। उसका वृत्तांत उसके समकालीन लेखकों की तुलना में अधिक विश्वसनीय है। उसने सूचनाओं को काफी हद तक दरबार से मुक्त भी रखा है। वह कृषि, उद्योग व व्यापार की दृष्टि से भारत को उन्नत बताता है। सड़कों को असुरक्षित लिखता है। परिवहन के साधनों में पशुओं के प्रयोग को विशेष महत्त्व देता है। भारतीय बाजार के बारे में रिहला का विवरण उल्लेखनीय है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 5.
इब्न बतूता ने भारतीय शहरों व शहरी जीवन पर क्या प्रकाश डाला है? अथवा इब्न बतूता द्वारा वर्णित भारतीय शहरों की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
इब्न बतूता ने भारत में अपना अधिक समय शहरों में बिताया इसलिए उसके वर्णन में शहरों का विशेष उल्लेख है। उसने सिन्ध, मुल्तान, लाहौर, दिल्ली, अजमेर, उज्जैन, काबुल, कन्धार, दौलताबाद इत्यादि; शहरों में अधिक समय बिताया। इसलिए वह इन स्थानों का वर्णन और स्थानों से अलग करता है। उसके अनुसार भारतीय शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे। यहाँ सड़कें तंग, भीड़-भाड़ वाली, रंगीन बाजार तथा बड़े-बड़े भवन थे। इन शहरों में जीवन-यापन की सारी चीजें मिल जाती थीं। वह बताता है कि ये शहर मात्र व्यापार या आर्थिक विनिमय के केन्द्र नहीं थे बल्कि सामाजिक व सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र भी थे। प्रत्येक शहर में मन्दिर व मस्जिद देखने को मिलते थे।
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अधिकतर नगरों में संगीत एवं नृत्य के लिए विशेष स्थल भी थे। जहाँ पर विशेष तरह के आयोजन चलते रहते थे।
इब्न बतूता मुहम्मद तुगलक के शासन काल में भारत आया था। इसलिए वह स्पष्ट करता है कि उसकी दो राजधानियाँ थीं। दोनों ही आकार व सुविधाओं की दृष्टि से एक-दूसरे का पूरा मुकाबला करती थीं। वह यह भी बताता है कि दिल्ली पुराना शहर था जबकि दौलताबाद एक नया शहर था।

दिल्ली-दिल्ली को उसने अन्य तत्कालीन स्रोतों की भाँति देहली कहा है। उसके अनुसार, “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है। शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से बना है जबकि ऊपरी भाग ईंटों से। इस शहर में कुल 28
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द्वार हैं जिन्हें दरवाजा कहा जाता है। इनमें सबसे विशाल बदायूँ दरवाजा है।” दौलताबाद-दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार है जिसे ताराबबाद कहते हैं। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक है। यहाँ बहुत सी दुकानें हैं और प्रत्येक दुकान में एक ऐसा दरवाजा है जो मालिक के आवास में खुलता है। दुकानों को कालीन से सजाया जाता था। बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा है।
इस प्रकार कहा जा सकता है उसने भारतीय शहरों को अलग-अलग ढंग से देखा तथा उसी के अनुरूप वर्णन किया है।

प्रश्न 6.
इब्न बतूता ने भारत की संचार प्रणाली की क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
इब्न बतूता भारत की संचार व्यवस्था से बहुत अधिक प्रभावित हुआ। वह इसे अद्भुत या अनूठी प्रणाली बताता है। उसके अनुसार इस संचार प्रणाली के दो उद्देश्य थे। पहला एक राज्य क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक तत्काल सूचना भेजना तथा दूसरा अल्प सूचना पर सामान भेजना। राज्य के द्वारा इसका विशेष प्रबन्ध किया गया था। बतूता के अनुसार उस समय दो प्रकार की डाक व्यवस्था थी जिसे उलुक तथा दावा कहा जाता था। उलुक घोड़ों की डाक सेवा थी। हर चार मील की दूरी पर स्थापित चौंकी में शाही सेना के घोड़े होते थे। इस तरह एक घोड़ा एक समय में चार मील ही जाया करता था। दूसरी तरह की डाक सेवा दावा थी जिसका पैदल व्यवस्था से संबंध था। इस व्यवस्था में प्रति मील तीन व्यक्ति बदले जाते थे। उसके अनुसार भारत में औसतन तीन मील की दूरी पर गाँव थे। गाँव के बाहर तीन मंडप होते थे।

वहाँ लोग समूह में बैठे होते थे। उनमें से प्रत्येक के पास दो हाथ लम्बी एक छड़ी होती थी जिसके ऊपर तांबे की घंटियाँ लगी होती थीं। जब डाक प्रारंभ होती थी तो एक संदेशवाहक एक हाथ में छड़ी तथा दूसरे में पत्र या माल लेकर अपनी अधिकतम क्षमतानुसार भागता था। मंडप में बैठे लोग घंटी की आवाज सुनते ही तैयार हो जाते थे। जैसे ही संदेशवाहक उनके पास पहुँचता तो उनमें से एक उससे पत्र लेता तथा अगले दावा तक तेज दौड़ता था। यह क्रिया पत्र में गंतव्य स्थान तक पहुँचने तक चलती रहती थी। उसके अनुसार पैदल डाक अश्व डाक से पहले पहुँचती थी। वह स्पष्ट कहता है कि सिन्ध से दिल्ली तक आने के लिए सामान्य रूप से पचास दिन का समय लगता था, लेकिन सुल्तान के पास गुप्तचरों की सूचना मात्र पाँच दिन में पहुँच जाती थी।

प्रश्न 7.
बर्नियर कौन था? उसकी रचना ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ के बारे में आप क्या जानते हैं? अथवा बर्नियर कौन था? उसने भारत के बारे में क्या जानकारी दी है?
उत्तर:
बर्नियर मुगल काल का एक यात्री था। वह फ्रांस से भारत आया। बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के जं नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। इसी व्यवसाय को करते हुए वह 1656 ई० में सूरत पहुँचा तथा इसी वर्ष दारा शिकोह ने उसे अपना चिकित्सक बना दिया। उसने शाहजहाँ के शासनकाल में उत्तराधिकार के युद्ध की कुछ घटनाएँ देखीं हैं। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश खान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया। 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।

उसने भारत में 1656 से 1668 तक का समय बिताया। वह इन वर्षों में दरबार से भी जुड़ा रहा तथा विभिन्न क्षेत्रों की यात्रा भी करता रहा। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया। इस रचना में दिए गए वृत्तांत की विशेष बात यह है कि उसने भारत व यूरोप अर्थात् पूर्व व पश्चिम की तुलना बड़े स्तर पर की है। वह भारत की स्थिति को यूरोप की तुलना में दयनीय बताया है। उसने अपनी रचना में प्रभावशाली लोगों व अधिकारियों के मंत्रियों के पद को विशेष महत्त्व दिया है।

प्रश्न 8.
बर्नियर के भूमि स्वामित्व संबंधी दृष्टिकोण की आलोचनात्मक व्याख्या करें।
उत्तर:
बर्नियर के वृत्तांत में सर्वाधिक चर्चा का मुद्दा उसका भूमि स्वामित्व संबंधी वर्णन है। उसके अनुसार भारत में निजी स्वामित्व नहीं था, बल्कि सारे साम्राज्य की भूमि का मालिक स्वयं सम्राट था। उसके वर्णन के अनुसार भारत में भूमि स्वामित्व व्यवस्था यूरोप से . भिन्न थी क्योंकि वहाँ भूमि पर निजी स्वामित्व था। बर्नियर के अनुसार भारतीय व्यवस्था राज्य व जनता दोनों के लिए हानिकारक थी। बर्नियर इस वर्णन के माध्यम से भारत के बारे में इस तरह की समझ रखने वाले यूरोप के शासकों को चेतावनी देता है कि क्षेप न करें क्योंकि राज्य के स्वामित्व का सिद्धांत यूरोप के खेतों को विनाश के कगार पर ले जाएगा तथा उनकी पहचान के लिए भी घातक होगा।

बर्नियर के इस वृत्तांत से इस बात की पुष्टि होती है कि फ्रांस में निजी स्वामित्व के अधिकार को जारी रखने के लिए वह मुगल साम्राज्य की नकारात्मक तस्वीर खींच रहा है। बर्नियर का वृत्तांत देखकर भारत की दुर्दशा का चित्र आँखों के सामने आता है परन्तु यह स्पष्ट तौर पर एक पक्षीय भी दिखाई देता है। आलोचनात्मक ढंग से देखें तो हमें मुगलकालीन किसी भी दस्तावेज व अन्य स्थानीय स्रोत में इस तरह की जानकारी नहीं मिलती कि शासक ही सारी भूमि का मालिक था। बर्नियर से पहले दबाव में यूरोपीय यात्रियों ने भारत की ऐसी तस्वीर नहीं दी है। अतः बर्नियर का वृत्तांत एक पक्षीय है तथा वह भारत को निम्न तथा यूरोप को श्रेष्ठ बताना चाहता है।

प्रश्न 9.
बर्नियर के वृत्तांत में विरोधाभासपूर्ण सच्चाई क्या है? अपने शब्दों में व्यक्त करो।
उत्तर:
बर्नियर का वर्णन सामाजिक व आर्थिक स्थिति के बारे में काफी विरोधाभासपूर्ण है। वह भारत में दस्तकारी व कृषि उत्पादन प्रणाली को पतनशील मानता है। इसके लिए वह यहाँ की राज्य व्यवस्था को उत्तरदायी मानता है। कृषि इसलिए विकसित नहीं थी क्योंकि राजकीय स्वामित्व था। कृषकों को समुचित प्रोत्साहन नहीं था। इसी तरह दस्तकारों के लिए भी अपने उत्पादन को अच्छा बनाने के लिए प्रोत्साहन की परिस्थितियाँ नहीं थीं क्योंकि उनका अधिकांश मुनाफा भी राज्य ले लेता था। इन सबके बाद भी वह यह भी उल्लेख करता है कि भारत का बड़ा-भू-भाग मिस्र से भी उपजाऊ है तथा यहाँ के शिल्पकार आलसी होते हुए भी अपने बहुत सारे उत्पादन का निर्यात करते हैं। इसके कारण भारत में बड़े पैमाने पर सोना-चाँदी आता है। उल्लेखनीय है कि बर्नियर यूरोप में प्रचलित वाणिज्यवादी विचारधारा से प्रभावित है जो सोना-चाँदी के संचय को प्राथमिकता देती है। भारत में सोना-चाँदी के संचय की बात को इसी पृष्ठभूमि में समझने की आवश्यकता है। अतः भारत की अर्थ-व्यवस्था को पतनशील बताना तथा भारत में धन के संचय की बात करना उसके विरोधाभास को स्पष्ट करती है।

प्रश्न 10.
बर्नियर ने राजकीय कारखाने का वर्णन किस तरह किया है?
उत्तर:
राजकीय कारखाने मुगल काल में शाही आवश्यकता की पूर्ति की चीजें एक स्थान पर बनती थीं जिन्हें राजकीय कारखाने कहा जाता था। वह इन कारखानों की कार्यप्रणाली पर भी अपने विचार देता है जो इस प्रकार हैं, “कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते हैं जिन्हें कारखाना या शिल्पकारों की कार्यशाला कहा जाता है। एक कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में व्यस्तता से कार्यरत रहते हैं। एक अन्य में आप सुनारों को देखते हैं, तीसरे में चित्रकार, चौथे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, पाँचवें में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले, छठे में रेशम, जरी तथा महीन मलमल का कार्य करने वाले शिल्पकार अपने कारखानों में हर रोज सुबह आते हैं, जहाँ वे पूरा दिन कार्यरत रहते हैं और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं। इसी प्रकार निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है, कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ है।”
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प्रश्न 11.
बर्नियर ने भारतीय शहरों का किस प्रकार वर्णन किया है?
उत्तर:
बर्नियर शहर से संबंधित वृत्तांत में बताता है कि भारत में लगभग 15% आबादी नगरों में रहती है। यह शहरी जनसंख्या अनुपात तत्कालीन पश्चिमी यूरोप से अधिक था। वह भारतीय नगरों को शिविर नगर कहता है क्योंकि उसका मानना है कि इन नगरों का अस्तित्व शाही शिविर के साथ था, शिविर लगते ही ये विकसित हो जाते थे जबकि प्रस्थान से नगरों का पतन भी हो जाता था। बर्नियर का शहर से संबंधित वृत्तांत अधूरा तथा अति सरलीकृत प्रतीत होता है, क्योंकि अन्य सभी साक्ष्यों से इस बात की पुष्टि होती है कि भारत में नगर उत्पादन केन्द्र, व्यापारिक, नगर, बन्दरगाह नगर, धार्मिक केन्द्र, तीर्थ स्थान व प्रशासन के केन्द्र थे। इन नगरों में समृद्ध व्यापारिक व व्यावसायिक वर्ग, प्रशासनिक अधिकारी, अमीर (सामन्त) तथा विद्वान स्थायी रूप में रहते थे।

इन नगरों में व्यापारी व व्यावसायिक वर्ग समुदाय में रहते थे। यह संस्थाओं के माध्यम से व्यवस्था को चलाते थे। पश्चिमी भारत में व्यापारिक समूह महाजन कहलाता था तथा उनका मुखिया सेठ। अहमदाबाद, सूरत, भड़ौच जैसे व्यापारिक केन्द्रों पर सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधि भी होता था जिसे ‘नगर सेठ’ कहा जाता था। व्यवसायी तथा व्यापारी वर्ग के अतिरिक्त हकीम, वैद्य (चिकित्सक), पंडित व मौलवी (शिक्षक), वकील, चित्रकार, वास्तुकार, संगीतकार, लेखक इत्यादि भी होते थे। इनमें से कुछ तो शाही संरक्षण में होते थे। कुछ अन्य अमीर वर्गों की सहायता से अपना जीवन-यापन करते थे।

अतः बर्नियर का भारतीय नगरों को ‘शिविर नगर’ कहना उसके सीमित ज्ञान की प्रस्तुति है। उसका यह दृष्टिकोण अन्य यात्रियों के वर्णन से मेल नहीं खाता, जिन्होंने भारत में दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, लाहौर, अजमेर, सूरत इत्यादि नगरों को यूरोप के नगरों से बड़े तथा विकसित बताया है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अल-बिरूनी कौन था? अल-बिरूनी की रचना ‘किताब-उल-हिन्द’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। ख्वारिज्म पर उस समय मामूनी वंश का राज था। इस समय स्थान शिक्षा का अति महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। अल-बिरूनी को इसी स्थान पर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए वह इन भाषाओं में लिखित मौलिक ग्रन्थों को पढ़ पाया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था लेकिन इस भाषा के सभी प्रमुख ग्रन्थ अनुवादित हो चुके थे। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। इस तरह वह अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में ही विभिन्न भाषाओं के साहित्य से परिचित हो गया। उल्लेखनीय यह है कि अपनी योग्यता व प्रतिभा के बल पर वह मामूनी राज व्यवस्था में मंत्री के पद तक पहुंच गया।

1017 ई० में महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया। बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया। उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है जिसे ‘अल बरूनीज इण्डिया’ के नाम से जाना जाता है। उसने अपनी रचनाएँ गजनी में लिखीं। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

अल-बिरूनी ने जो कुछ लिखा वह भारत में बहुत बाद में पहुँचा परन्तु मध्य एशिया के क्षेत्र में यह पहले चर्चा में आ गया। भारत में यह लगभग 1500 ई० में सामने आया। महमूद की ‘1030 ई० में’ मृत्यु के बाद उसके पुत्र मसूद ने भी उसे राजकीय संरक्षण दिया तथा उसके लेखन को सुरक्षित करने की दिशा में कदम उठाए।

किताब-उल-हिन्द (The Kitab-ul-Hind)-‘किताब-उल-हिन्द’, अल-बिरूनी द्वारा रचित सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसे ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के नाम से भी जाना जाता है। मौलिक तौर पर यह ग्रंथ अरबी भाषा में लिखा गया है तथा बाद में यह विश्व की प्रमुख भाषाओं में अनुवादित हुआ। इसमें कुल 80 अध्याय हैं जिनमें भारत के धर्म, दर्शन, समाज, परंपराओं, रीति-रिवाज़ों, नाप-तोल, खगोल-विज्ञान, . चिकित्सा, ज्योतिष, मूर्तिकला, कानून, न्याय इत्यादि विषयों को विस्तृत ढंग से लिखा गया है। भाषा की दृष्टि से लेखक ने इसे सरल व स्पष्ट बनाने का प्रयास किया है। अल-बिरूनी ने इस रचना-लेखन का उद्देश्य इन शब्दों में स्पष्ट किया है कि “यह उन लोगों के लिए सहायक हो जो उनसे (हिन्दुओं से) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए सूचना का संग्रह, जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।” इससे स्पष्ट होता है कि अल-बिरूनी ने इस पुस्तक की रचना इस उपमहाद्वीप के सीमान्त क्षेत्र के लिए की थी, क्योंकि उनका इस क्षेत्र से किसी-न-किसी रूप में संबंध होता रहता था।

अल-बिरूनी ने इस रचना के लेखन में विशेष शैली का प्रयोग किया है। वह प्रत्येक अध्याय को एक प्रश्न से प्रारंभ करता है, फिर उसका उत्तर संस्कृतवादी परंपराओं के अनुरूप विस्तृत वर्णन के साथ करता है। फिर उसका अन्य संस्कृतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है। वह इस कार्य में पाली, प्राकृत इत्यादि भाषाओं के अनुवाद का प्रयोग करता है। वह विभिन्न दन्त कथाओं से लेकर विभिन्न वैज्ञानिक विषयों खगोल-विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान इत्यादि विषयों की रचनाएँ हैं। वह प्रत्येक पक्ष का वर्णन आलोचनात्मक ढंग से करता है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह उनमें सुधार करना चाहता था। उसके लेखन में ज्यामितीय संरचना, स्पष्टता तथा पूर्वानुमान की धारणा विशेष रूप से उभरकर आती है।

हिंदू शब्द की उत्पत्ति सिन्धु से हुई है। फारसी भाषा में ‘स’ शब्द का उच्चारण ‘ह’ से किया जाता है। जिसके कारण वे सिन्धु को हिन्दू या सप्ताह को हप्ताह बोलते हैं। फारस क्षेत्र के लोग सिन्धु नदी के पूर्व रहने वाले लोगों के लिए हिन्दू का प्रयोग करते हैं तथा उनका क्षेत्र हिन्दोस्तान तथा उनकी भाषा को ‘हिंदवी’ के नाम से जानते हैं। ईरानी अभिलेखों में ‘हिन्द’ शब्द का प्रयोग छठी सदी ई०पू० में सिन्धु क्षेत्र के लिए मिलता है। इसी प्रकार ‘हिन्दुस्तान’ शब्द पहली बार तीसरी सदी ई० में ईरानी के शासानी शासकों के अभिलेखों में मिलता है। अल-बिरूनी ने अपनी इस रचना में ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग किया है।

प्रश्न 2.
इन बतूता का जीवन परिचय दें एवं उसकी पुस्तक ‘रिला’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय (Life Sketch)-इब्न बतूता का संक्षिप्त जीवन परिचय निम्न प्रकार से है

(i) पारिवारिक परंपरा (Family Tradition)-इन बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार इस क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। पारिवारिक परंपरा के अनुसार साहित्यिक व धार्मिक ज्ञान उसे विरासत में मिला जिसको उसने न तथा ज्ञान प्राप्त करने की लालसा के कारण और अच्छी तरह से प्राप्त किया। इस तरह वह कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया।

(ii) यात्रा पर (On Pilgrimage)-इन बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। इन देशों की यात्रा के उपरांत वह मध्य-एशिया के रास्ते से भारत की ओर बढा तथा । रास्ते से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा। भारत आने का उसका मुख्य कारण दिल्ली सल्तनत के सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक की ख्याति थी। उसने सुल्तान के कला व साहित्य को संरक्षण देने वाले गुण, विद्वता तथा दया भाव के बारे में सुना था इसलिए वह सिन्ध से दिल्ली की ओर मुल्तान व उच्च के रास्ते से आगे बढ़ा।

(iii) भारत आगमन (Arrived in India)-बतूता सिन्ध से 50 दिन तथा मुल्तान से 40 दिन की यात्रा करने के बाद 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काज़ी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया जिसके कारण उसे पद से हटाकर जेल में डाल दिया गया। परन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही तथा सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बाद समाज के बारे में उनकी समझ बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस समय चीन में मंगोलों का राज्य था। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने नई नियुक्ति स्वीकार कर चीन की ओर प्रस्थान किया।

(iv) चीन में (To China)-बतूता ने चीन जाने के लिए मालाबार से प्रस्थान किया फिर वहाँ से वह मालद्वीप पहुंचा। वहाँ पर उसने 18 महीनों तक काज़ी के पद पर कार्य किया। मालद्वीप से वह श्रीलंका गया तथा फिर मालाबार लौट आया। उसने एक बार फिर चीन जाने का फैसला किया। परन्तु इस बार उसने बंगाल की खाड़ी का मार्ग पकड़ा तथा बंगाल व असम में भी कुछ समय बिताया। इसके पश्चात् वह सुमात्रा पहुँचा एवं वहाँ से चीनी बन्दरगाह जायतुन (वर्तमान नाम क्वानझू) उतरा। उसने यहाँ से चीन के विभिन्न स्थानों की यात्रा की तथा मंगोल शासक को बीजिंग में मुहम्मद तुगलक का पत्र सौंपा। शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया लेकिन बतूता, स्वयं वहाँ लम्बे समय तक नहीं रुक सका।

(v) वतन को वापसी (Returned to the Watan)-1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तैंजियर पहुँच गया। इसके बाद उसने कुछ समय आधु में बिताया तथा मोरक्को के समीपवर्ती देशों की यात्राएँ भी की। मोरक्को के शासक ने उससे अपने अनुभव तथा विभिन्न स्थानों की जानकारी देने के लिए कहा। उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रह्ना या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इसमें 1325-1354 के बीच की उसकी यात्राओं का वर्णन है। इन बतूता ने अपनी मृत्यु 1377 ई० तक का बाकी समय अपने पैतृक स्थान तैंजियर में बिताया तथा शासक ने उसे हर प्रकार की मदद दी।

(vi) संस्मरण (Memoir)-इन बतूता की यात्राओं के बारे में पढ़ते समय हम अहसास कर सकते हैं कि इस विश्व यात्री ने लगभग 30 वर्ष तक विभिन्न महाद्वीपों की यात्रा की। उस युग में यात्राएँ कितनी कठिन थीं, कितनी तरह के संकट थे, यह केवल कल्पना ही की जा सकती है। वह बताता है कि यात्राओं के दौरान उसने कई बार डाकुओं के आक्रमणों को झेला क्योंकि डाकू कारवों पर भी आक्रमण कर देते थे। मुल्तान से दिल्ली मार्ग पर उनके कारवां पर एक खतरनाक आक्रमण हुआ, जिनमें से कई यात्रियों की मृत्यु हो गई तथा कई घायल हो गए। वह स्वयं भी इसमें घायल हुआ। इसके अतिरिक्त उस युग में आवागमन के साधन नहीं के बराबर थे। प्रायः यात्रा पैदल या पशुओं की गाड़ी में होती थी। इससे बहुत समय लगता था। वह बताता है कि उसने मुल्तान से दिल्ली तथा दिल्ली से दौलताबाद की दूरी 40-40 दिन में तय की। इसी तरह ग्वालियर से दिल्ली 10 दिन में तय की।

इन कठिनाई भरी यात्राओं के बाद भी उसने विभिन्न नई-नई संस्कृतियों, लोगों, आस्थाओं, मान्यताओं, चीजों व परम्पराओं को कुशलतापूर्वक लिखा। जो विश्व के बड़े हिस्से की जानकारी का स्रोत बन गया। चीन के वृत्तांत के बारे में तो उसकी तुलना वेनिस (13वीं सदी का) यात्री मार्को पोलो से की जाती है, जिसने हिन्द महासागर के रास्ते चीन व भारत की यात्रा की। भारत व चीन के अतिरिक्त बतूता का वर्णन उत्तरी अफ्रीका, पश्चिम एशिया व मध्य-एशिया के बारे में विस्तृत जानकारी देता है। उससे सुनकर बतूता के अनुभवों का लेखक इन जुजाई लिखता है कि उसकी जानकारी बताने का तरीका इतना अच्छा था कि ऐसा लगता था कि वह उसके साथ यात्रा कर रहा है।

2. रिहला : एक परिचय (Rihla : An Introduction)-रिला या किताब-ए-रला इब्न बतूता के संस्मरणों पर आधारित रचना है। इसे ‘सफरनामा’ के नाम से अनुवादित किया गया है। बतूता के मोरक्को वापिस पहुंचने पर वहाँ के शासक ने इन जुजाई नामक व्यक्ति को यह कार्य दिया कि वह बतूता से बातचीत करे तथा उसकी स्मृति को एक रचना के रूप में प्रस्तुत करे। इन जुजाई रिला की प्रस्तावना में लिखता है

(राजा के द्वारा) एक शालीन निर्देश दिया गया कि वे (इब्न बतूता) अपनी यात्रा में देखे गए शहरों का तथा अपनी स्मृति में बैठ गई रोचक घटनाओं का एक वृत्तांत लिखवाएँ और साथ ही विभिन्न देशों के शासकों में से जिनसे वे मिले, उनके महान् साहित्यकारों के तथा उनके धर्मनिष्ठ संतों के बारे में बताएं। तदनुसार उन्होंने इन सभी विषयों पर एक कथानक लिखवाया जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी। साथ ही उन्होंने कई प्रकार के असाधारण विवरण जिनके प्रतिपादन से लाभप्रद उपदेश मिलते हैं, दिए तथा असाधारण चीजों के बारे में बताया जिनके सन्दर्भ से अभिरुचि जगी।”

इन जुजाई के इस लेखन से इस बात का ज्ञान होता है कि बतूता का वृत्तांत किस तरह, क्यों लिखवाया गया तथा उसने किस-किस प्रकार की जानकारी दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

रिला में भारत के बारे में विस्तृत वर्णन दिया गया है। इस वर्णन में भारत की प्रकृति, पशु-पक्षी, वन, नदियों, गाँव व शहरों के बारे में बताया गया है। उसने मुहम्मद तुगलक के बारे में भी विस्तृत प्रकाश डाला है। उसकी जानकारी कई अर्थों में जियाऊद्दीन बर्नी की तारीख-ए-फिरोज शाही से भिन्न है। बतूता मुहम्मद तुगलक को सन्तुलित, शिक्षित, न्यायप्रिय, प्रतिभाशाली व दूरदर्शी शासक बताता है जबकि बर्नी उसे जल्दबाज, अन्यायी, मूर्ख, जिद्दी तथा अपरिपक्व बताता है।

इब्न बतूता ने जो कुछ बताया वह बाद में इस रचना के रूप में आया जो उच्च लेखकों व यात्रियों के लिए यह मार्गदर्शक पहलू बन गया। इनमें सबसे अधिक प्रभावित होने वाले यात्रियों में समरकंद का अब्दुर रज्जाक (यात्रा लगभग 1440), महमूद वली बलखी (यात्रा लगभग 1620) तथा शेख अली हाजिन (यात्रा लगभग 1740) के नाम लिए जा सकते हैं। इनमें बलखी तो भारत से इतना प्रभावित हुआ कि कुछ समय के लिए संन्यासी बन गया। दूसरी ओर हाजिन भारत से निराश हुआ तथा घृणा भी करने लगा क्योंकि उसे भारत में आशा के अनुरूप स्वागत नहीं मिला। इन सभी यात्रियों के बारे में सामान्य बात यह है कि इन्होंने भारत का वर्णन अचंभों के देश के रूप में किया। इनको इस क्षेत्र के आम व्यक्ति की गतिविधियाँ भी विचित्र लगती थीं। उदाहरण के तौर पर भारतीय किसान का खेती का कार्य करते हुए मात्र लंगोटी बांधना या फिर लोटे से बिना मुँह लगाए पानी-पीना इत्यादि।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम महिला थी
(A) बुद्ध की पत्नी यशोधरा
(B) बुद्ध की उपमाता गौतमी
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) बुद्ध की उपमाता गौतमी

2. महात्मा बुद्ध का बचपन का नाम था
(A) सिद्धार्थ
(B) शुद्धोधन
(C) वर्धमान
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सिद्धार्थ

3. बौद्ध मत में महाभिनिष्क्रिमण से अभिप्राय है
(A) महात्मा बुद्ध द्वारा ज्ञान प्राप्त करना
(B) महात्मा बुद्ध द्वारा तपस्या करना
(C) महात्मा बुद्ध द्वारा गृह त्याग करना
(D) महात्मा बुद्ध द्वारा देह त्याग करना
उत्तर:
(C) महात्मा बुद्ध द्वारा गृह त्याग करना

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

4. बौद्ध धर्म के प्रमुख अंग हैं
(A) बुद्ध
(B) संघ
(C) धम्म
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण से अभिप्राय है
(A) महात्मा बुद्ध द्वारा सच्चा ज्ञान प्राप्त करना
(B) महात्मा बुद्ध द्वारा गृह त्याग करना
(C) महात्मा बुद्ध द्वारा नगर भ्रमण करना
(D) महात्मा बुद्ध द्वारा देहावसान करना
उत्तर:
(D) महात्मा बुद्ध द्वारा देहावसान करना

6. त्रिपिटक किस धर्म से संबंधित है?
(A) हिन्दू धर्म
(B) जैन धर्म
(C) इस्लाम धर्म
(D) बौद्ध धर्म
उत्तर:
(D) बौद्ध धर्म

7. आबू के जैन मन्दिर प्रसिद्ध हैं
(A) दिलवाड़ा के नाम से
(B) अजंता के नाम से
(C) साँची स्तूप के नाम से
(D) महाबलीपुरम के मन्दिर के नाम से
उत्तर:
(A) दिलवाड़ा के नाम से

8. कालान्तर में जैन धर्म किन सम्प्रदायों में विभाजित हुआ ?
(A) श्वेताम्बर
(B) दिगम्बर
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उपर्युक्त दोनों

9. जैन धर्म के कुल तीर्थंकर हुए हैं
(A) 22
(B) 25
(C) 24
(D) 1
उत्तर:
(C) 24

10. जैन धर्म के 24वें व अन्तिम तीर्थंकर थे
(A) महावीर स्वामी
(B) ऋषभदेव
(C) पार्श्वनाथ
(D) अजितनाथ
उत्तर:
(A) महावीर स्वामी

11. महात्मा बुद्ध ने प्रथम उपदेश दिया था
(A) कपिलवस्तु में
(B) सारनाथ में
(C) गया में
(D) कुशीनगर में
उत्तर:
(B) सारनाथ में

12. बौद्ध धर्म में मुक्ति का मार्ग बताया गया
(A) त्रिरत्न को
(B) अष्ट मार्ग को
(C) तपस्या को
(D) अहिंसा को
उत्तर:
(B) अष्ट मार्ग को

13. मद्रास में गवर्नमेंट म्यूजियम की स्थापना हुई
(A) 1905 ई० में
(B) 1805 ई० में
(C) 1851 ई० में
(D) 1914 ई० में
उत्तर:
(C) 1851 ई० में

14. जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया
(A) त्रिरत्न को
(B) अष्ट मार्ग को
(C) वेदों के ज्ञान को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) त्रिरत्न को

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15. निम्नलिखित में से कौन-सा बौद्ध ग्रन्थ नहीं है ?
(A) महावंश
(B) दीपवंश
(C) महाभारत
(D) जातक
उत्तर:
(C) महाभारत

16. महायान का सम्बन्ध किस धर्म से है ?
(A) हिन्दू धर्म
(B) शैव धर्म
(C) जैन धर्म
(D) बौद्ध धर्म
उत्तर:
(D) बौद्ध धर्म

17. प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय की नई दिल्ली में नींव रखी
(A) 1905 ई० में
(B) 1955 ई० में
(C) 1989 ई० में
(D) 1960 ई० में
उत्तर:
(B) 1955 ई० में

18. जातकों की भाषा क्या थी?
(A) पालि
(B) हिन्दी
(C) संस्कृत
(D) प्राकृत
उत्तर:
(B) हिन्दी

19. महावीर स्वामी का देहावसान हुआ
(A) पावापुरी में
(B) कुशीनगर में
(C) कुंडग्रीम में
(D) लुम्बिनी में
उत्तर:
(A) पावापुरी में

20. महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ
(A) लुम्बिनी वन में
(B) पावापुरी में
(C) कुशीनगर में
(D) सारनाथ में
उत्तर:
(A) लुम्बिनी वन में

21. महावीर स्वामी का प्रारम्भिक नाम था
(A) सिद्धार्थ
(B) वर्धमान
(C) सिद्धांत
(D) शुद्धोधन.
उत्तर:
(B) वर्धमान

22. बौद्ध साहित्य की रचना किस भाषा में हुई थी?
(A) पालि भाषा में
(B) संस्कृत भाषा में
(C) प्राकृत भाषा में
(D) मगधी भाषा में
उत्तर:
(A) पालि भाषा में

23. महाबलीपुरम् के मंदिर स्थित हैं
(A) केरल राज्य में
(B) आन्ध्र प्रदेश में
(C) तमिलनाडु में
(D) महाराष्ट्र में
उत्तर:
(C) तमिलनाडु में

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24. महावीर का बचपन में नाम था
(A) सिद्धार्थ
(B) वर्धमान
(C) सिद्धान्त
(D) शुद्धोधन
उत्तर:
(B) वर्धमान

25. कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा मंदिर निम्नलिखित में से कौन-से राज्य में पड़ता है?
(A) बिहार में
(B) महाराष्ट्र में
(C) राजस्थान में
(D) उड़ीसा में
उत्तर:
(B) महाराष्ट्र में

26. पाँचवीं शताब्दी का देवगढ़ विष्णु मंदिर कौन-से राज्य में है ?
(A) उत्तर प्रदेश में
(B) पश्चिमी बंगाल में
(C) उड़ीसा में
(D) मध्य प्रदेश में
उत्तर:
(A) उत्तर प्रदेश में

27. साँची का स्तूप कहाँ पर स्थित है?
(A) भोपाल के निकट
(B) मथुरा के निकट
(C) आगरा के निकट
(D) दिल्ली के निकट
उत्तर:
(A) भोपाल के निकट

28. अमरावती के स्तूप की खोज हुई
(A) 1854 ई० में
(B) 1850 ई० में
(C) 1796 ई० में
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) 1796 ई० में

29. पुन्ना नामक दासी की गाथा (थेरीगाथा) कौन-से बौद्ध ग्रंथ में मिलती है ?
(A) विनयपिटक में
(B) सुत्तपिटक में
(C) अभिधम्मपिटक में
(D) जातक कथाओं में
उत्तर:
(B) सुत्तपिटक में

30. सुल्तान जहाँ बेगम कहाँ की नवाब थी?
(A) दिल्ली
(B) भोपाल
(C) लखनऊ
(D) जयपुर
उत्तर:
(B) भोपाल

31. जातक कथाओं का संबंध किस धर्म से है?
(A) बौद्ध धर्म
(B) शैव धर्म
(C) हिंदू धर्म
(D) जैन धर्म
उत्तर:
(A) बौद्ध धर्म

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
वेदोत्तर साहित्य किसे माना गया है?
उत्तर:
वेदोत्तर साहित्य में वेदांग, स्मृतियाँ, महाकाव्य तथा पुराण शामिल हैं।

प्रश्न 2.
वेदांगों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
वेदांगों की संख्या छः (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष) है।

प्रश्न 3.
स्मृतियों की विषय-वस्तु क्या है?
उत्तर:
स्मृतियाँ मुख्य रूप से कानूनी (वैधानिक) ग्रंथ हैं।

प्रश्न 4.
प्रमुख स्मृतियों के नाम बताएँ।
उत्तर:
मनुस्मृति, नारद स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा पाराशर स्मृति प्रमुख वैधानिक स्मृतियाँ हैं।

प्रश्न 5.
पुराण का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
पुराण का शाब्दिक अर्थ ‘प्राचीन’ है। पुराणों की संख्या 18 है। संस्कृत परंपरा में इन्हें ऐतिहासिक ग्रंथ माना जाता है।

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प्रश्न 6.
प्रमुख पुराण कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
ब्रह्मा, विष्णु, मत्स्य, भागवत, अग्नि, शिव, मार्कण्डेय, गरुड़ पुराण इत्यादि प्रमुख हैं।

प्रश्न 7.
जातक कथाओं की संख्या कितनी है? ये किस भाषा में लिखी गईं?
उत्तर:
जातक कथाएँ 549 हैं जो पालि भाषा में लिखी गई हैं।

प्रश्न 8.
यूनानी राजा मिनांडर व बौद्ध भिक्ष नागसेन में दार्शनिक वार्तालाप किस ग्रंथ में मिलता है?
उत्तर:
‘मिलिन्दपन्हों’ ग्रंथ में मिनांडर व नागसेन में हुआ- दार्शनिक वार्तालाप मिलता है।

प्रश्न 9.
ऋग्वेद काल में प्राकृतिक देवताओं में सर्वोत्तम किसे माना गया?
उत्तर:
ऋग्वेद काल में प्राकृतिक देवताओं में सर्वोत्तम इंद्र को माना गया जो मुख्यतः आकाश का देवता था।

प्रश्न 10.
जैन धर्म के पहले तीर्थंकर कौन थे?
उत्तर:
जैन धर्म के पहले तीर्थंकर स्वामी ऋषभदेव थे।

प्रश्न 11.
महात्मा महावीर को परम ज्ञान की प्राप्ति के बाद क्या कहा गया?
उत्तर:
महात्मा महावीर को परम ज्ञान की प्राप्ति के बाद ‘जिन’ या ‘जैन’ कहा गया।

प्रश्न 12.
जैन धर्म आगे चलकर किन दो मुख्य संप्रदायों में विभाजित हो गया?
उत्तर:
लगभग 300 ई०पू० के काल में जैन धर्म श्वेतांबर और दिगंबर दो मुख्य संप्रदायों में विभाजित हो गया।

प्रश्न 13.
महात्मा बुद्ध द्वारा घर छोड़ने को बौद्ध परंपरा में क्या कहा गया?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध द्वारा घर छोड़ने को बौद्ध परंपरा में महाभिनिष्क्रिमण कहा गया है।

प्रश्न 14.
स्तूप का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
स्तूप का शाब्दिक अर्थ है ढेर अथवा टीला।

प्रश्न 15.
वर्तमान में साँची के स्तूप की देख-रेख किसके पास है?
उत्तर:
वर्तमान में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग साँची के स्तूप की देख-रेख करता है।

प्रश्न 16.
साँची के स्तूप को ‘वर्ल्ड हेरिटेज़ साइट’ कब घोषित किया गया?
उत्तर:
सन 1989 में साँची के स्तुप को ‘वर्ल्ड हेरिटेज साइट’ घोषित किया गया।

प्रश्न 17.
साँची के स्तूप की जानकारी प्राप्त करने के लिए मेजर अलेक्जेंडर ने क्या-क्या कार्य किए ?
उत्तर:
मेजर अलेक्जेंडर ने उस जगह के चित्र बनाए, वहाँ के अभिलेखों को पढ़ा और गुंबदनुमा ढाँचे के बीचों-बीच खुदाई करवाई।

प्रश्न 18.
सुल्तानजहाँ बेगम कहाँ की नवाब थी? उत्तर:सुल्तानजहाँ बेगम भोपाल की नवाब थी। प्रश्न 19. त्रिपिटक किस धर्म से संबंधित हैं? उत्तर:त्रिपिटक बौद्ध धर्म से संबंधित है। प्रश्न 20. प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ किस भाषा में लिखे गए ?
उत्तर:
प्राचीनतम बौद्ध ग्रन्थ पालि भाषा में लिखे गए।

प्रश्न 21.
सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रन्थ त्रिपिटक कौन से हैं ?
उत्तर:
सबसे प्राचीन बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक, विनय पिटक और अभिधम्म पिटक हैं।

प्रश्न 22.
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश किस स्थान पर दिया ?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश सारनाथ के स्थान पर आषाढ़ की पूर्णिमा को दिया।

प्रश्न 23.
महात्मा बुद्ध के पहले उपदेश को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध के पहले उपदेश को धर्म चक्र प्रवर्तन (धर्म के पहिये को घुमाना) के नाम से जाना जाता है।

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प्रश्न 24.
बौद्ध धर्म में स्तूप किस बात के प्रतीक माने गए ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म में स्तूप को बुद्ध के महापरिनिर्वाण का प्रतीक मान लिया गया।

प्रश्न 25.
शैव धर्म में शिव का चित्रांकन किस रूप में किया गया ?
उत्तर:
शैव धर्म में शिव का चित्रांकनं प्रायः उनके प्रतीक लिंग के रूप में किया गया।

प्रश्न 26.
बोधिसत्त किसे कहा गया?
उत्तर:
बौद्ध धर्म में बोधिसत्तों को परम करुणामय जीव माना गया जो अपने सत्त कार्यों से पुण्य कमाते थे।

प्रश्न 27.
बौद्ध चिंतन की नई परंपरा को किस नाम से जाना गया ?
उत्तर:
बौद्ध चिंतन की नई परंपरा को महायान के नाम से जाना गया।

प्रश्न 28.
हिंदू धर्म में वैष्णव किसे कहा गया ?
उत्तर:
वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना गया, वैष्णव परंपरा कहा गया।

प्रश्न 29.
लोग बौद्ध संघ की सदस्यता क्यों प्राप्त करते थे ?
उत्तर:
बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन करने और बौद्ध धर्म का प्रचार करने के लिए लोग बौद्ध संघ में जाते थे।

प्रश्न 30.
बौद्ध संघ में प्रवेश पाने वाली प्रथम महिला कौन थी ?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध की उपमाता प्रजापति गौतमी संघ में प्रवेश पाने वाली पहली महिला भिक्षुणी थी।

प्रश्न 31.
जैन धर्म में संन्यासी को क्या कहा जाता है ?
उत्तर:
जैन धर्म में जैन मुनि और संन्यासी को निर्ग्रन्थ कहा जाता है।

प्रश्न 32.
तीर्थंकर शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
तीर्थंकर शब्द का अर्थ है-‘संसार रूपी सागर से पार उतारने वाला’।

प्रश्न 33.
श्वैन-त्सांग किस देश का रहने वाला था?
उत्तर:
श्वैन-त्सांग चीन देश का रहने वाला था।

प्रश्न 34.
आबू के जैन मन्दिर किस नाम से प्रसिद्ध हैं ?
उत्तर:
आबू के जैन मंदिर ‘दिलवाड़ा’ नाम से प्रसिद्ध हैं।

प्रश्न 35.
महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति कहाँ हुई?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति गया (बिहार) में हुई।

प्रश्न 36.
महात्मा बुद्ध के बचपन का क्या नाम था?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था।

प्रश्न 37.
महात्मा बुद्ध का देहावसान किस स्थान पर हुआ ?
उत्तर:
कुशीनगर अथवा कुशीनारा के स्थान पर महात्मा बुद्ध का देहावसान हुआ।

प्रश्न 38.
बौद्ध परंपरा में महात्मा बुद्ध के देहावसान को क्या कहा गया ?
उत्तर:
बौद्ध परंपरा में महात्मा बुद्ध के देहावसान को ‘महापरिनिर्वाण’ कहा गया।

प्रश्न 39.
‘सुत्तपिटक’ का सम्बन्ध किससे है?
उत्तर:
‘सुत्तपिटक’ का सम्बन्ध बौद्ध साहित्य से है।

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प्रश्न 40.
महात्मा बद्ध ने अपना पहला उपदेश कहाँ दिया था?
उत्तर:
महात्मा बुद्ध ने अपना पहला उपदेश ‘सारनाथ’ में दिया था।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
इतिहासकार मूर्तियों व प्रतीकों की व्याख्या कैसे करते हैं ?
उत्तर:
मूर्तियों व प्रतीकों को समझने के लिए इतिहासकारों को कलाकृति बनाने वालों की परंपरा का ज्ञान होना चाहिए। उदाहरण के लिए महात्मा बुद्ध से जुड़े प्रतीकों को समझने के लिए बुद्ध के जीवन चरित यानी ‘बौद्ध चरित’ के बारे में ज्ञान होना जरूरी है।

प्रश्न 2.
नियतिवादी सम्प्रदाय का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
नियतिवादी सम्प्रदाय का संस्थापक मक्खलि गोसाल था। इसके अनुसार प्राणी नियति (भाग्य) के अधीन है। उसमें न बल है न पराक्रम । वह भाग्य के अधीन सुख-दुख भोगता है।

प्रश्न 3.
कला इतिहासकारों को साहित्यिक परंपराओं का ज्ञान क्यों जरूरी होता है?
उत्तर:
कला इतिहासकार कलाकृतियों को समझकर इतिहास की कुछ लुप्त कड़ियों को जोड़ने का प्रयास करते हैं। लिए उन्हें साहित्यिक परंपराओं से परिचित होना पड़ता है। इसके अभाव में कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है।

प्रश्न 4.
‘धर्म-चक्र-प्रवर्तन’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
धर्मचक्र प्रवर्तन से अभिप्राय है धर्म के चक्र को घुमाना। ज्ञान-प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने सारनाथ के स्थान पर अपना पहला धर्म उपदेश दिया, उसे ‘धर्मचक्र प्रवर्तन’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 5.
बौद्ध धर्म के निर्वाण अथवा निब्बान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बौद्ध धर्म में निर्वाण की अवधारणा से अभिप्राय है मन की पूर्ण व अमिट शांति। इसे अच्छे आचरण और अष्ट मार्ग का अनुसरण करते हुए प्राप्त किया जा सकता था। वस्तुतः अहंकार और इच्छा पर पूर्ण नियंत्रण करते हुए जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त होना ही निर्वाण था।

प्रश्न 6.
गांधार कला शैली की मूर्तिकला की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
यह कला शैली भारतीय और यूनानी कला शैली के परस्पर मिलन से पैदा हुई। इसमें विषय-वस्तु महात्मा बुद्ध और बौद्ध परंपराओं से लिए गए, जबकि मूर्ति बनाने का तरीका यूनानी था। मूर्तियों के तीखे नैन-नक्श, घुघराले बाल, झीने और पारदर्शी उत्कीर्ण वस्त्र इस शैली की मुख्य पहचान है।

प्रश्न 7.
मथुरा कला शैली की विशेषता बताइए।
उत्तर:
मथुरा कला-शैली का केन्द्र मथुरा था। यहाँ लाल बलुआ पत्थर से बौद्ध, जैन व हिंदू धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ बनाई गईं। प्रारंभिक बौद्ध मूर्तियों में बुद्ध को खड़ी मुद्रा में दिखाया गया है। उनका दायां हाथ अभय मुद्रा में है और बायां कूल्हे पर टिका है। वस्त्र शरीर से बिल्कुल सटे हुए हैं।

प्रश्न 8.
आत्मिक ज्ञान से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आत्मिक ज्ञान से अभिप्राय आत्मा और परमात्मा के संबंधों को जानना। परम सत्य ब्रह्म (परमात्मा) है। संपूर्ण जगत उसी से पैदा हुआ। जीवात्मा जो अजर-अमर है ब्रह्म का ही अंश है। जीवात्मा ब्रह्म में लीन होकर मुक्ति को प्राप्त करती है। इसके लिए कर्मकाण्ड नहीं, बल्कि सद्कर्मों की जरूरत है।

प्रश्न 9.
भौतिकवादियों के अनुसार मानव शरीर की रचना कैसे हुई?
उत्तर:
भौतिकवादियों का कहना था कि पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु से मानव शरीर बना है। आत्मा या परमात्मा कोरी कल्पना है। मृत्यु के बाद शरीर में कुछ शेष नहीं बचता।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 10.
महायान विचारधारा की दो विशेषताएँ बताइए। अथवा महायान पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:

  • महायान विचारधारा बौद्ध धर्म का एक संशोधित और नवीन रूप था। इसमें बुद्ध और बोधिसत्तों की ईश्वर के रूप में पूजा होने लगी, जबकि पुरातन परंपरा के बौद्ध अनुयायी महात्मा बुद्ध को ईश्वर नहीं, बल्कि अपना पथ-प्रदर्शक गुरु मानते थे।
  • महायान शाखा की पूजा-पद्धति भी अलग थी। पहले पूजा के प्रतीक चिह्न थे; जैसे बुद्ध के पैर के निशान, स्तूप, उजला हाथी, वृक्ष, चक्र इत्यादि, जबकि महायान शाखा में लोग महात्मा बुद्ध की प्रतिमा बनाकर पूजा करने लगे।

प्रश्न 11.
हिंदू धर्म में वैष्णव व शैव परंपरा क्या है ?
उत्तर:
हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में विष्णु को परमेश्वर माना गया है, जबकि शैव परंपरा में शिव परमेश्वर है अर्थात् दोनों में एक विशेष देवता की आराधना को महत्त्व दिया गया। इस पूजा पद्धति में उपासना और परम देवता के बीच का संबंध समर्पण और प्रेम का स्वीकारा गया इसलिए यह भक्ति कहलाई।

प्रश्न 12.
अवतारवाद क्या है ?
उत्तर:
अवतारवाद वैष्णव धर्म के एक प्रधान अंग के रूप में उभरकर आया। इसके अनुसार विष्णु के 10 अवतारों को स्वीकार किया गया है। ये दस अवतार हैं-मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्की। यह माना जाता था कि सांसारिक कष्टों से भक्तों को मुक्त करने के लिए विष्णु भगवान् समय-समय पर अवतार धारण करते हैं।

प्रश्न 13.
शैव किसे कहा गया है ?
उत्तर:
शिव के धर्मानुयायियों और भक्तों को शैव कहा गया। इस मत के अनुयायी शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में पूजते थे। कई बार शिव को मनुष्य के रूप में भी (मूर्तियों में) दिखाया गया। जहाँ विष्णु के उपासक उसे सृष्टि के पालनहार के रूप में देखते थे, वहीं शिव के उपासक उन्हें सृष्टि के कर्ता और संहारक के रूप में स्वीकार करते थे।

प्रश्न 14.
पौराणिक कथाओं की मुख्य विशेषताएँ क्या थी?
उत्तर:
पौराणिक कथाओं में देवी-देवताओं की भी कहानियाँ हैं। पुराणों की बहुत-सी कथाएँ लोक-कथाएँ बन चुकी थीं। सामान्यतया इन्हें संस्कृत श्लोकों में लिखा गया था। इन श्लोकों को ऊँची आवाज़ में उच्चरित किया जाता था ताकि सभी सुन सकें। महिलाएँ व शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, वे भी पुराणों को सुन सकते थे। इसलिए पौराणिक किस्से लोकधारा के हिस्से थे। पुराणों की कहानियों का विकास और प्रचार-प्रसार लोगों के मेल-मिलाप से हुआ।

प्रश्न 15.
मन्दिर स्थापत्य की दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • मंदिरों का प्रारंभ गर्भ-गृह (देव मूर्ति का स्थान) के साथ हुआ। ये चौकोर कमरे थे। इनमें एक दरवाजा होता था, जिससे उपासक पूजा के लिए भीतर जाते थे।
  • धीरे-धीरे गर्भ-गृह के ऊपर एक ऊँचा ढांचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था।

प्रश्न 16.
अजन्ता की गुफाओं के चिह्नों की विशेषता बताइए।
उत्तर:
अजन्ता की गुफाओं (महाराष्ट्र) से प्राप्त हुए भित्तिचित्र (दीवारों पर बने चित्र) हैं। छतों और कोनों में सजाने के लिए वृक्ष, पुष्प, नदी व झरने आदि बनाए गए हैं। इनके अलावा सर्वाधिक चित्र दो विषयों पर हैं-

  • बद्ध और बोधिसत्तों के चित्र और
  • जातक गाथाओं के दृश्य। इन चित्रों में हर्ष, उल्लास, प्रेम, भय, करुणा, लज्जा व घृणा जैसी मानवीय भावनाओं का अद्भुत प्रदर्शन हुआ है। कुछ चित्र बिल्कुल स्वाभाविक और सजीव दिखते हैं।

प्रश्न 17.
श्रमण कौन थे ?
उत्तर:
शिक्षक और विचारक जो स्थान-स्थान पर घूमकर अपनी विचारधाराओं के विषय में अन्य लोगों से तर्क-वितर्क करते थे, उन्हें श्रमण कहा जाता था।

प्रश्न 18.
‘जैन’ शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जैन’ शब्द संस्कृत के ‘जिन’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘विजेता’ अर्थात् वह व्यक्ति जिसने अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर ली हो। जिन अर्थात् जितेन्द्रिय।

प्रश्न 19.
निर्ग्रन्थ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
निर्ग्रन्थ का अर्थ है बिना ग्रन्थि के अर्थात् बंधन मुक्त। वे मनुष्य जो संसार के सभी बन्धनों से मुक्त हो गए हों। जैन ‘मुनि और संन्यासी निर्ग्रन्थ के नाम से जाने जाते हैं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 20.
त्रिरत्न से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जैन धर्म के अनुसार मोक्ष-प्राप्ति के लिए त्रिरत्न का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। ये त्रिरत्न हैं

  • सम्यक् विश्वास,
  • सम्यक् ज्ञान,
  • सम्यक् चरित्र।

प्रश्न 21.
बौद्ध धर्म में संघ का क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
बौद्ध संघ भिक्षुओं का संगठन था। यह बौद्ध धर्म की शक्ति का प्रमुख आधार था। इसने बौद्ध धर्म के प्रचार व प्रसार में अत्यधिक योगदान दिया।

प्रश्न 22:
जातक कथाओं से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जातक ग्रन्थों में महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं का उल्लेख है। इनकी संख्या लगभग 549 है। ये पालि भाषा में लिखे गए हैं।

प्रश्न 23.
स्तूप क्यों बनाए जाते थे ?
उत्तर:
स्तूप संस्कृत.का शब्द है, जिसका अर्थ है-ढेर। महात्मा बुद्ध या अन्य किसी पवित्र भिक्षु के अवशेषों; जैसे दाँत, भस्म, हड्डियाँ या किसी पवित्र ग्रन्थ पर स्तूप बनाए जाते थे और ये अवशेष स्तूप के केन्द्र में बने एक छोटे कक्ष में एक पेटिका में रखे जाते थे।

प्रश्न 24.
जैन धर्म का विभाजन कौन-से दो उप-संप्रदायों में हुआ?
उत्तर:
300 ई०पू० के आसपास जैन धर्म दो संप्रदायों श्वेतांबर और दिगंबर में विभाजित हो गया। दिगंबर जैन भिक्षु वस्त्र धारण नहीं करते, जबकि श्वेतांबर श्वेत वस्त्र धारण करते हैं।

प्रश्न 25.
बौद्ध धर्म के पतन के कोई दो कारण लिखें।।
उत्तर:
बौद्ध धर्म के पतन के निम्नलिखित दो प्रमुख कारण थे (i) कालांतर में बौद्ध धर्म में आडंबर व दुर्बलताएँ उत्पन्न हो गईं जिनके चलते यह अपनी लोकप्रियता खो बैठा। (ii) समय बीतने के साथ बौद्ध धर्म में विचार मतभेद उत्पन्न हो गए जिससे यह कई संप्रदायों व उपसंप्रदायों में बँट गया।

प्रश्न 26.
सुल्तानजहाँ बेगम ने साँची के स्तूप में कैसे योगदान दिया ?
उत्तर:
सुल्तानजहाँ बेगम ने साँची के स्तूप में विशेष रुचि ली। बेगम ने स्तूप के अवशेषों को यूरोपियनों की गिद्ध दृष्टि से बचाया, संरक्षण के लिए धन उपलब्ध करवाया एवं साथ ही स्तूप-स्थल के पास एक संग्रहालय और अतिथिशाला भी बनवाई।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बौद्ध धर्म के चार सत्य कौन-से हैं तथा ‘धर्म चक्र प्रवर्तन’ से आप क्या समझते हैं ? अथवा बौद्ध धर्म की किन्हीं दो शिक्षाओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
बौद्ध धर्म में निम्नलिखित चार शाश्वत सत्य बताए गए हैं

  • संसार दुःखों का घर है।
  • दुःखों का कारण इच्छाएँ हैं।
  • इच्छाओं को कम करके दुःख कम किए जा सकते हैं।
  • इच्छाओं एवं लालसाओं को अष्ट मार्ग से त्यागा जा सकता है।

धर्म चक्र प्रवर्तन से अभिप्राय है धर्म के चक्र को घुमाना। ज्ञान-प्राप्ति के बाद महात्मा बुद्ध ने सारनाथ के स्थान पर अपना पहला धर्म उपदेश दिया, उसे ‘धर्म चक्र प्रवर्तन’ के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 2.
जैन धर्म की मुख्य तीन शिक्षाएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) त्रिरत्न (Three Jewels) महावीर स्वामी ने मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति बताया। इसके लि जीवन में तीन आदर्श वाक्य अपनाने पर बल दिया। ये तीन वाक्य ही त्रिरत्न कहलाए-

  • सत्य विश्वास अर्थात् मनुष्य को अपने । ऊपर तथा तीर्थंकरों पर विश्वास होना चाहिए।
  • सत्य ज्ञान अर्थात् तीर्थंकरों के उपदेशों का सच्चे मन से अनुसरण करना।
  • सत्य चरित्र अर्थात् महाव्रतों पर आधारित अच्छा आचरण अथवा कर्म करना।

(2) पाँच महाव्रत (Five Mahavartas)-इन व्रतों को अणुव्रत भी कहा गया है। मनुष्यों को पापों से बचने के लिए पाँच महाव्रतों के पालन पर जोर दिया गया। ये व्रत थे- अहिंसा यानी हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, धन संग्रह न करना तथा ब्रह्मचर्य (अमृषा) का पालन। जैन साधु व साध्वी इन पाँचों व्रतों का पालन करते थे।

(3) अहिंसा (Non-Violence)-जैन दर्शन की सबसे महत्त्वपूर्ण अवधारणा यह है कि संपूर्ण विश्व प्राणवान है अर्थात् पेड़-पौधे, मनुष्य, पशु-पक्षियों आदि में ही नहीं, बल्कि पत्थर, चट्टानों, जल इत्यादि सभी में जीवन होता है। जीवों के प्रति अहिंसा अर्थात् मनुष्यों, पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों तथा पेड़-पौधों को क्षति न पहुँचाना जैन धर्म का केन्द्र-बिन्दु है। . जैन दर्शन में अहिंसा के सिद्धान्त का संबंध मन, वचन व क्रम तीनों से है अर्थात् इन तीनों रूपों में किसी भी तरह का हिंसा भाव पैदा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय है कि जैन धर्म के इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है।

प्रश्न 3.
अमरावती स्तूप की खोज और नियति के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अमरावती स्तूप की खोज और उसकी नियति का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है
(i) खोज–अमरावती (महाराष्ट्र) के बौद्ध स्तूप की खोज भी अनजाने में ही हुई। सन् 1796 में एक स्थानीय राजा एक मंदिर बनाना चाहता था, तभी उसे अमरावती के स्तूप के प्राचीन अवशेष मिल गए। उसकी रुचि उन्हें खोद निकालने में और भी बढ़ गई, क्योंकि वह सोचने लगा कि संभवतया इस टीले में कोई खजाना ही दबा पड़ा हो। उन्हीं दिनों में कॉलिन मेकेन्जी नामक अंग्रेज पुरातत्त्वविद् यहाँ पहुँचा और उसने इस स्थान का सर्वेक्षण किया। सन् 1854 में एलियट नामक एक अंग्रेज़ अधिकारी ने अमरावती के स्तूप स्थल की यात्रा की, कुछ खुदाई भी करवाई। अंततः … उन्होंने स्तूप का पश्चिमी तोरणद्वार भी ढूँढ निकाला।

(ii) नियति-अमरावती में जिस स्थान पर यह स्तूप था वहाँ आज मिट्टी के ढेर के सिवा कुछ नहीं है, जबकि यह साँची के स्तूप से भी अधिक सुंदर था और सफेद संगमरमर की नक्काशीदार मूर्तियों से बना था। 1796 ई० में इस स्तूप की खोज के साथ ही इन मूर्तियों को उठाकर ले जाने का सिलसिला चल पड़ा था। इन पुरावशेषों को अलग-अलग स्थानों पर ले जाया गया। एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, इंडिया ऑफिस (मद्रास) और यहाँ तक कि कुछ पत्थर लंदन तक पहुंच गए। ध्यान रहे ये केवल संग्रहालयों की शोभा ही नहीं बने बल्कि बहुत-से ब्रिटिश अधिकारियों के बंगलों और बागों में सुशोभित हुए। अमरावती के स्तूप की यह नियति इसलिए भी हुई क्योंकि इसकी खोज साँची से थोड़ी पहले हुई थी। विद्वान काफी वर्षों तक इस बात के महत्त्व को नहीं समझ पाए कि पुरातात्विक अवशेषों का संरक्षण उनके खोज के स्थानों पर ही होना जरूरी है। संग्रहालयों में उनकी प्लास्टर प्रतिकृतियाँ ही रखी जाएँ।

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प्रश्न 4.
पौराणिक हिंदू धर्म के बारे में आप क्या जानते हैं?
अथवा
वैष्णव व शैव मत के उदय के बारे में एक टिप्पणी लिखें। .
उत्तर:
ब्राह्मण धर्म में भी नई परंपरा पनपी। इस परंपरा को हम पौराणिक हिंदू धर्म के नाम से जानते हैं। इस परंपरा में भी .. महायानों की भाँति ‘मुक्तिदाता’ की कल्पना उभरकर आई। हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में विष्णु को परमेश्वर माना गया है, जबकि शैव परंपरा में शिव परमेश्वर है अर्थात् दोनों में एक विशेष देवता की आराधना को महत्त्व दिया गया। … वैष्णव व शैव धार्मिक परंपराओं का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

1. वैष्णववाद की विशेषताएँ-वैष्णव संप्रदाय के दो मुख्य तत्त्व हैंभक्ति और अहिंसा। भक्ति का अर्थ तो जैसा कि पहले बताया । … गया है कि देवता के प्रति प्रेम और समर्पण का भाव है। अहिंसा किसी जीव का वध न करने का सिद्धांत है। इन दोनों ही सिद्धांतों के फलस्वरूप वैष्णव संप्रदाय का विस्तार हुआ। लोग विष्णु की प्रतिमा बनाकर पूजा करने लगे, जीव-हत्या से घृणा करने लगे और बहुत-से उपासकों ने शाकाहार को अपनाया। इस नए धर्म का स्वरूप उदार था। अवतारवाद वैष्णव धर्म के एक प्रधान अंग के रूप में उभरकर आया। इसके अनुसार विष्णु के 10 अवतारों को स्वीकार किया गया है। ये दस अवतार हैं-मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध व कल्की, यहाँ तक कि इसमें बुद्ध को भी विष्णु का अवतार मान लिया गया।

2. शैव मत-शिव के भक्तों को शैव कहा गया। इस मत के अनुयायी शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में पूजते थे। कई बार शिव को मनुष्य के रूप में भी (मूर्तियों में) दिखाया गया। जहाँ विष्णु के उपासक उसे पालनहार के रूप में देखते थे, वहीं शिव के उपासक उन्हें सृष्टि के संहारक के रूप में स्वीकार करते थे। छठी शताब्दी तक शैव मत की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई तथा इसका दक्षिण भारत में भी प्रसार हुआ।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
महात्मा बुद्ध की शिक्षाएँ सरल थीं। उनके उपदेश तर्क पर आधारित थे। उनकी मुख्य शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन इस . प्रकार है
1. चार सत्य–महात्मा बुद्ध ने निम्नलिखित चार सत्यों की पहचान की

  • मनुष्य के लिए संसार दुःखों का घर है।
  • दुःखों का कारण मनुष्य की तष्णा एवं लालसा है।
  • लालसा पर विजय पाकर दुःखों से मुक्ति पाई जा सकती है।
  • अष्टमार्ग (मध्य माग) लालसाओं पर विजय पाने का तरीका है।

2. अष्टमार्ग-इसे मध्य मार्ग (Middle Path) भी कहा गया है क्योंकि यह दोनों अति विलासिता और कठोर तपस्या के बीच का मार्ग है।
संक्षेप में, अष्ट मार्ग की आठ आदर्श बातें इस प्रकार हैं

  • सत्य दृष्टि अर्थात् सत्य व असत्य (बुराई) की पहचान की दृष्टि।
  • सत्य संकल्प अर्थात् बुराई को त्यागने का पवित्र संकल्प।
  • सत्य वचन अर्थात् मृदु वाणी होना तथा झूठ, निंदा व अप्रिय वचन का परित्याग।
  • सत्य कर्म अर्थात् मनुष्य का कर्म अहिंसा, इंद्रिय संयम और दयाभाव पर आधारित हो।
  • सत्य आजीविका अर्थात् जीवनयापन के लिए उचित एवं पवित्र साधनों का उपयोग।
  • सत्य प्रयत्न अर्थात् शारीरिक एवं मानसिक इच्छाओं को त्यागने का प्रयत्न।
  • सत्य स्मृति अर्थात् मनुष्य को सदैव ध्यान रखना चाहिए कि उसका शरीर भी नश्वर है।
  • सत्य समाधि अर्थात अमिट शांति के लिए चिंतन की समाधि।।

महात्मा बुद्ध का निष्कर्ष था कि मनुष्य इस अष्ट मार्ग का अनुसरण करके पुरोहितों के फेर से व मिथ्या आडंबरों से बच जाएगा तथा मुक्ति भी प्राप्त करेगा।

3. आचरण के नियम-अपने अनुयायियों के लिए बुद्ध ने आचरण के नियम बनाए। उनमें से मुख्य थे

  • अहिंसा का पालन;
  • झूठ का परित्याग;
  • नशे का सेवन न करना;
  • प्रायः धन का लोभ न करना;
  • भोग विलासी न बनना;
  • मन को शुद्ध रखना;
  • किसी से घृणा न करना तथा
  • सबकी भलाई करना और उसके बारे में सोचना।

4. निर्वाण-महात्मा बुद्ध ने मनुष्य के जीवन का मुख्य लक्ष्य निर्वाण प्राप्ति बताया। निर्वाण से अभिप्राय मन की पूर्ण शांति से था। अहम् एवं इच्छा पर पूर्ण नियंत्रण से ही निर्वाण-प्राप्ति होती है।

प्रश्न 2.
बौद्ध संघ पर एक संक्षिप्त निबंध लिखें।
उत्तर:
धर्म का प्रचार सुव्यवस्थित तरीके से करने के लिए पहला बौद्ध संघ सारनाथ में और फिर अन्य स्थानों पर संघ बनाए गए। यह धर्म के शिक्षकों का संघ था। ये शिक्षक (श्रमण) सादा जीवन व्यतीत करते थे। उनके पास जीवनयापन के लिए बहुत ही जरूरी वस्तुओं को छोड़कर और कुछ नहीं होता था। उदाहरण के लिए उनके पास एक कटोरा होता था जिसमें वो दिन में एक बार उपासकों से भोजन की भीख प्राप्त करते थे, इसलिए इन श्रमणों को भिक्खु (भिक्षु) कहा जाता था। बौद्ध संघ में भिक्षु, भिक्षुणियों को गहन अध्ययन करवाया जाता था। आचरण के नियम पालन करवाए जाते थे। वर्षा काल को छोड़कर वर्ष भर में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते हुए धर्म प्रचार करते थे। वर्षा काल के चार महीनों में अध्ययन पर बल दिया जाता था। सभी भिक्षुओं और भिक्षुणियों को संघ के नियमों का सख्ती से पालन करना होता था। इन नियमों का वर्णन ‘विनय पिटक’ नामक ग्रंथ में मिलता है।

1. संघ की सदस्यता-बौद्ध संघ में सभी जाति, वर्ण एवं वर्गों के लोग इसके सदस्य बन सकते थे जिनकी आयु 15 वर्ष से अधिक थी। इसके लिए उन्हें अपने माता-पिता एवं अभिभावकों से अनुमति लेनी जरूरी थी। अपराधी, कुष्ठ रोगी तथा संक्रामक रोग से पीड़ित लोगों के लिए संघ की सदस्यता वर्जित थी। प्रारंभ में महिलाओं को भी संघ की सदस्या नहीं बनाया गया था। परंतु बाद में महिलाओं को भी संघ में शामिल होने की अनुमति दे दी गई थी। बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गौतमी संघ में शामिल होने वाली पहली महिला थी। संघ में प्रवेश पाने वाली कुछ महिलाएँ बौद्ध धर्म का ज्ञान प्राप्त करके इसकी शिक्षक भी बन गईं।

2. संघ की कार्य-प्रणाली-संघ की कार्य-प्रणाली में जनवाद अधिक था। संघ के सदस्य परस्पर बातचीत से सहमति की ओर बढ़ते थे। सभी सदस्यों के अधिकार समान थे। यदि किसी विषय पर सहमति न बन पाती तो मतदान करके बहुमत से निर्णय लिया जाता जो सभी को स्वीकार्य होता। अपराधी अथवा नियमों की उल्लंघना करने वाले भिक्षु को दण्ड मिलता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 3.
भारत में बौद्ध धर्म के प्रसार के विभिन्न कारणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
भारत में इस धर्म के प्रसार के लिए मुख्यतया निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे
1. बुद्ध का व्यक्तित्व-बौद्ध धर्म के प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण बुद्ध का व्यक्तित्व था। उनकी करनी और कथनी में भेद नहीं था। वे भलाई करके बुराई को भगाने का तथा प्रेम से घृणा को जीतने का प्रयास करते थे। निंदा और गाली से उन्हें क्रोध नहीं आता था।

2. वैदिक धर्म से मोहभंग-बौद्ध धर्म के उत्थान के समय वैदिक धर्म कर्मकाण्डी बन चुका था। लोग यज्ञ, बलि और आडंबरों से ऊब चुके थे। जब उन्हें सरल धर्म मिला तो वे उसकी ओर आकर्षित हुए। नए धर्म में समानता की भावना भी

3. सरल भाषा का प्रयोग-बौद्ध मत का प्रचार बुद्ध ने जनसामान्य की भाषा पालि में किया जो संस्कृत की तुलना में लोगों को अधिक आकर्षित कर सकी। आम लोग बौद्ध विचारों को सुगमता से समझ पाए।

4. बौद्ध संघ की भूमिका-बौद्ध संघ में प्रचारकों को न केवल बौद्ध धर्म की उच्च शिक्षा दी जाती थी बल्कि उनके चरित्र निर्माण पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था। पुरोहितों की तुलना में इनके आचरण को. लोगों ने अधिक पसंद किया।

5. अनुकूल परिस्थितियाँ-बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियाँ भी अनुकूल थीं। इसे राजकीय संरक्षण मिला। बिम्बिसार, अजातशत्रु व प्रसेनजित जैसे राजाओं ने इसके प्रचार में सहायता की। अशोक व कनिष्क जैसे शासकों के प्रयासों से यह दूसरे देशों में पहुंचा। नई कृषि व्यवस्था भी ऐसे धर्म के अनुकूल थी जो बलि प्रथा का विरोध करे और पशुधन की सुरक्षा करे। बौद्ध धर्म का अहिंसा का सिद्धांत इस दिशा में महत्त्वपूर्ण था।

6. समानता का भाव-बौद्ध धर्म में अच्छे आचरण व मूल्यों को महत्त्व दिया गया, न कि जन्म के आधार पर किसी तरह की श्रेष्ठता को। बौद्ध धर्म स्वीकार करने वालों को अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी। यहाँ राजा और रंक सब बराबर थे। इसलिए बड़ी संख्या में महिलाएँ व पुरुष इसकी ओर आकर्षित हुए।

7. करुणा भाव-बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी-दया और करुणा। इसमें यह विश्वास किया जाता था कि समाज का निर्माण इंसानों ने किया है, न कि भगवान ने। इसलिए इसमें राजाओं और धनी लोगों को कमज़ोरों के प्रति दयावान और आचारवान होने की सलाह दी गई। वस्तुतः दया और करुणा के भाव को महत्त्व देने के आदर्श बहुत-से लोगों को पसंद आए।

प्रश्न 4.
भारत में बौद्ध धर्म के विलुप्त होने के मुख्य कारण लिखें। .
उत्तर:
12वीं शताब्दी तक पहुँचते-पहुँचते भारत में बौद्ध धर्म प्रायः विलुप्त सा हो गया। इसमें निम्नलिखित कारण उत्तरदायी रहे
(1) धीरे-धीरे बौद्ध धर्म में भी बुराइयाँ व आडंबर आते गए। अतः इन दुर्बलताओं के चलते यह धर्म अपनी लोकप्रियता खो बैठा।

(2) ब्राह्मण धर्म का पौराणिक हिंदू धर्म के रूप में पुनरुत्थान हुआ। इसकी पूजा पद्धति और महायान धर्म की पूजा पद्धति में कोई विशेष अंतर नहीं था। अवतारवाद की धारणा से हिंदू धर्म जनप्रिय होता गया। यहाँ तक कि महात्मा बुद्ध को भी विष्णु का अवतार मान लिया गया। इससे बौद्ध धर्म अपनी पहचान खोने लगा।

(3) कालान्तर में बौद्ध संघ व विहार (मठ) धन एकत्र करने के केन्द्र बन गए। फलतः बहुत-से भिक्षु भोग-विलासी व दुराचारी हो गए। ऐसी परिस्थितियों में मठ और भिक्षु लोगों के श्रद्धा के केन्द्र नहीं रहे।

(4) धीरे-धीरे राजनीतिक संरक्षण से भी यह धर्म वंचित होता गया। अशोक व कनिष्क जैसे शासकों के संरक्षण में इसका खूब प्रसार हुआ था। गुप्त शासकों से इसे संरक्षण नहीं मिला। हर्षवर्धन ने कुछ संरक्षण दिया, शेष राजपूत शासकों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई। हूण व तुर्क आक्रमणकारियों से भी इसे क्षति पहुंची।

(5) समय बीतने के साथ-साथ इस धर्म में फूट पड़ती गई। इसके कई संप्रदाय और उप-संप्रदाय बन गए। अतः इस फूट ने भी इसे पतन के मार्ग पर ला खड़ा किया।

प्रश्न 5.
जैन व बौद्ध धर्म के उदय के कारणों को स्पष्ट करें।
उत्तर:
जैन व बौद्ध धर्मों के उदय के कारणों का वर्णन इस प्रकार है

1. आर्थिक परिवर्तन-बौद्ध व जैन धर्मों के उदय को उत्तर वैदिक काल में हुए आर्थिक परिवर्तनों से जोड़कर देखा जाता है। इस काल में लोहे की कुल्हाड़ियों और हलों से खेती का विस्तार होता जा रहा था जिसमें पशुओं का महत्त्व बढ़ गया था। परंतु प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पशुओं की बलि दी जाती थी। इसलिए नव-उदित धर्मों (जैन व बौद्ध क्योंकि वे बलि प्रथा का विरोध कर रहे थे। कृषि उत्पादन में वृद्धि के फलस्वरूप व्यापार-वाणिज्य को प्रोत्साहन मिला। व्यापारिक वर्ग यानी वैश्य वर्ण का महत्त्व बढ़ने लगा। लेकिन वर्ण व्यवस्था वाले समाज में उनकी सामाजिक स्थिति ब्राह्मण और क्षत्रिय से निम्न थी। अतः वैश्य ऐसे धर्म की आकांक्षा करने लगे जिससे उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची हो सके।

2. नई राजनीतिक परिस्थितियाँ-छठी शताब्दी ईसा पूर्व की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी नए धर्मों के उदय के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया। विशेषतया मगध क्षेत्र में नए धर्मों को फलने-फूलने का अवसर मिला। यहाँ के स्थानीय लोगों को ‘अनार्य’ कहा गया। आर्य लोगों के इस क्षेत्र में प्रवेश से ब्राह्मणवादी व कट्टर परंपराएँ फैलने लगीं। इसका विरोध यहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा किया जा रहा था। इन्हीं परिस्थितियों में यहाँ के लोगों से नए धर्मों को समर्थन मिला। विभिन्न शासकों (बिम्बिसार, अजातशत्रु व अशोक आदि) द्वारा नए धर्मों को संरक्षण दिया और इन धर्मों को स्वयं भी स्वीकार किया। इसका कारण साफ है कि ये शासक ब्राह्मणों के वर्चस्व से मुक्त रहना चाहते थे।

3. वर्ण व्यवस्था में जटिलता-शुरू में यज्ञ सामूहिक तौर पर किए जाते थे। परिवार के सभी सदस्य इसमें शामिल होते थे। परन्तु धीरे-धीरे इसमें बदलाव आता गया। विशेषतः उत्तर वैदिक काल में चतुर्वर्ण व्यवस्था जटिल हो चुकी थी। यह काम पर नहीं बल्कि जन्म पर आधारित हो चुकी थी। शूद्र तो शुरू से ही द्विज वर्ण में नहीं था, वैश्य या क्षत्रिय का प्रतिभाशाली पुत्र भी अब ब्राह्मण नहीं हो सकता था। शूद्रों के प्रति भेदभाव में वृद्धि हो चुकी थी। उनके प्रति उच्च वर्गों में अस्पृश्यता की भावना भी उत्पन्न होने लगी। धर्म में उनके लिए मोक्ष का मार्ग नहीं था। फलतः नए विकल्पों पर विचार की प्रक्रिया शुरू हुई।

4. यज्ञ परंपरा (वैदिक धम) में जटिलता-शुरू में यज्ञ सामूहिक तौर पर किए जाते थे। परिवार के सभी सदस्य इसमें शामिल होते थे। परन्तु धीरे-धीरे इसमें बदलाव आता गया। विशेषतः उत्तर वैदिक काल में इस परंपरा में जटिलता बढ़ती गई। समाज में भी अब पहले जैसी बंधुता नहीं थी। वर्गीय विभाजन होता गया। धर्म पर एक विशेष वर्ग ‘ब्राह्मण’ का प्रभाव स्थापित हो गया। अब खर्चीले यज्ञ, बलि, व्यर्थ के रीति-रिवाजों और आडंबरों को महत्त्व दिया जाने लगा। यज्ञ परंपरा साधारण लोगों की पहुंच से दूर हो गई या उन पर एक भारी बोझ बन गई। फलतः इनके विरुद्ध जन भावनाएँ उत्पन्न होने लगीं। बहुत-से लोग इन पर पुनर्विचार करने लगे।

5. नवीन विचारकों का उदय-उत्तर वैदिक काल के अंतिम दौर में बलि व यज्ञादि कर्मकांडों के खिलाफ जबरदस्त प्रतिक्रिया शुरू हुई। धर्म व दर्शन पर नए प्रश्न खड़े हुए। उपनिषदों में नए सिद्धांतों; जैसे कि कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष इत्यादि का प्रतिपादन हुआ, परंतु यह गूढ़ ज्ञान सामान्य जनता की समझ से बाहर था। इस वैदिक परंपरा को नकारने वाले दार्शनिक सत्य के स्वरूप पर बहस कर रहे थे। वे अपनी-अपनी व्याख्याएँ प्रस्तुत कर रहे थे। विभिन्न संप्रदायों के श्रमण एक-दूसरे से तर्क-वितर्क करते थे। ये वनों, उपवनों में बनी कुटागारशालाओं में ठहरते थे। इनमें ई अपने प्रतिद्वन्द्वी को अपना ज्ञान समझाने में सफल हो जाता था तो वह प्रतिद्वन्द्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था। महात्मा बुद्ध और महावीर स्वामी इसी परंपरा के थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 6.
साँची की बौद्ध मूर्तिकला में लोक परंपराओं के समावेश पर एक संक्षिप्त लेख लिखें।
उत्तर:
साँची की मूर्तियों में कई चिह्न ऐसे हैं जिनका बौद्ध धर्म से सीधा संबंध नहीं है। इनमें से कुछ बुद्ध से पूर्व की परंपराओं से आए हैं या फिर अन्य लोक विश्वासों से इनका समावेश हुआ है। इन लोक विश्वासों या परंपराओं से बौद्ध धार्मिक परंपरा और भी समृद्ध हुई है। बौद्ध धर्म में कुछ लोक परंपराओं के समावेश होने के उदाहरण उल्लेखनीय हैं

1. शालभंजिका की मूर्ति साँची के तोरणद्वार के किनारे एक पेड़ से झूलती हुई सुंदर स्त्रियाँ दिखाई गई हैं। माना जाता है कि ये शालभंजिका की मूर्तियाँ हैं। लोक परंपराओं में ऐसा विश्वास था कि इन स्त्रियों के छूने से वृक्ष फूल और फलों से भर जाते हैं। इससे ये शुभ का प्रतीक बन गईं। संभवतया इसी कारण स्तूप के अलंकरण में इनका प्रयोग किया गया।

2. जानवरों की मूर्तियाँ-साँची स्तूप की मूर्तियों में हाथी, घोड़े, बंदर व गाय-बैल आदि जानवरों की मूर्तियाँ भी शामिल हैं। इतिहासकारों का विश्वास है कि इन जानवरों का मनुष्यों के गुणों के प्रतीक के रूप में उपयोग किया जाता था। उदाहरण के लिए लोक सांस्कृतिक परंपरा में हाथी शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना गया था।

3. माया या गजलक्ष्मी-साँची की एक और मूर्ति बड़ी प्रसिद्ध है जिसमें कमल तथा दो हाथियों के बीच में खड़ी एक महिला है। हाथी उस महिला पर अभिषेक की मुद्रा में जल डाल रहे हैं। यह मूर्ति भी विद्वानों को असमंजस में डालती है। कुछ विद्वान इसे बुद्ध की माता माया मानते हैं जबकि कुछ इसे सौभाग्य की देवी गजलक्ष्मी बताते हैं। कुछ इसका संबंध माता और गजलक्ष्मी दोनों. से जोड़ते हैं। अतः इसमें भी बौद्ध धार्मिक परंपरा का अन्य धार्मिक परंपराओं से मिलन दिखाई पड़ता है।

4. उत्कीर्णित सर्प-साँची के कई स्तंभों पर सर्पो की मूर्तियाँ मिलती हैं। बौद्ध धर्म के साहित्यिक ग्रंथों में सर्प कथाओं का कोई उल्लेख नहीं है। संभवतया इन सौ का प्रतीक भी लोक परंपराओं से लिया गया हो। भारत में ऐसी परंपराएँ रही हैं जिनमें सर्प पूजनीय माने गए हैं।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. ‘भगवद्गीता’ किस धार्मिक पुस्तक का अंग है?
(A) रामायण
(B) ऋग्वेद
(C) महाभारत
(D) मनुस्मृति
उत्तर:
(C) महाभारत

2. रामायण और महाभारत का संस्कृत भाषा में रचनाकाल
(A) लगभग 1000 ई० पू० से 600 ई० पू०
(B) लगभग 600 ई० पू० से 100 ई० पू०
(C) लगभग 500 ई० पू० से 400 ई० पू०
(D) लगभग 200 ई० पू० से 200 ई०
उत्तर:
(C) लगभग 500 ई० पू० से 400 ई० पू०

3. महाभारत का युद्ध किस स्थान पर हुआ था?
(A) इंद्रप्रस्थ
(B) कुरुक्षेत्र
(C) वैशाली
(D) राजगृह
उत्तर:
(B) कुरुक्षेत्र

4. वेदों की संख्या थी
(A) चार
(B) तीन
(C) दो
(D) आठ
उत्तर:
(A) चार

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5. रुद्रदामन किस वंश का था?
(A) कण्व
(B) सातवाहन
(C) मौर्य
(D) शक
उत्तर:
(D) शक

6. प्राचीनतम ग्रन्थों के अनुसार शूद्रों का मुख्य कर्तव्य होता था
(A) ब्राह्मणों की सेवा
(B) वैश्यों की सेवा
(C) क्षत्रियों की सेवा
(D) तीन उच्च वर्गों की सेवा
उत्तर:
(D) तीन उच्च वर्गों की सेवा

7. पांडवों की सहपत्नी थी
(A) प्रभावती
(B) सीता
(C) गौतमी
(D) द्रौपदी
उत्तर:
(D) द्रौपदी

8. बहुपति प्रथा प्रचलित थी
(A) कौरवों में
(B) पांडवों में
(C) सातवाहनों में
(D) शकों में
उत्तर:
(B) पांडवों में

9. ‘मनुस्मृति’ का संकलन कब हुआ था ?
(A) 200 ई० पूर्व – 200 ई० में
(B) 200 ई० पूर्व – 50 ई० में
(C) 100 ई० पूर्व – 100 ई० में
(D) 200 ई०- 300 ई० में
उत्तर:
(A) 200 ई० पूर्व – 200 ई० में

10. एकलव्य की कथा निम्नलिखित में से कौन-से ग्रंथ में मिलती है?
(A) महाभारत
(B) रामायण
(C) मनुस्मृति
(D) जातक कथा
उत्तर:
(A) महाभारत

11. पाणिनि द्वारा लिखित ग्रन्थ का नाम बताएँ
(A) रामायण
(B) महाभारत
(C) अष्टाध्यायी
(D) महावंश
उत्तर:
(C) अष्टाध्यायी

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12. निम्नलिखित में से किस अभिलेख में रेशम बुनकरों की एक श्रेणी द्वारा (437-38 ई० में) सूर्य मंदिर निर्माण का उल्लेख मिलता है?
(A) मंदसौर अभिलेख
(B) गढ़वा अभिलेख
(C) समुद्रगुप्त के प्रयाग अभिलेख
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) मंदसौर अभिलेख

13. हस्तिनापुर गाँव कहाँ स्थित है?
(A) उत्तर:प्रदेश में
(B) मध्यप्रदेश में
(C) बिहार में
(D) बंगाल में
उत्तर:
(A) उत्तर:प्रदेश में

14. महाभारत के लेखक का नाम
(A) महर्षि वेदव्यास
(B) महर्षि वाल्मीकि
(C) महर्षि तुलसीदास
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) महर्षि वेदव्यास

15. गौतमी-पुत्र-सिरी-सातकणि किस वंश का था?
(A) शक
(B) सातवाहन
(C) मौर्य
(D) कण्व
उत्तर:
(B) सातवाहन

16. ‘अष्टाध्यायी’ का लेखक है
(A) मनु
(B) चरक
(C) पाणिनि
(D) शूद्रक
उत्तर:
(C) पाणिनि

17. मनुस्मृति के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् सम्पत्ति का अधिकार किसको दिया जाता था?
(A) ज्येष्ठ पुत्र को
(B) सबसे बड़ी पुत्री को
(C) सबसे छोटे पुत्र को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ज्येष्ठ पुत्र को

18. ‘मृच्छकटिकम्’ नाटक का लेखक था
(A) मनु
(B) पाणिनि
(C) शूद्रक
(D) एकलव्य
उत्तर:
(C) शूद्रक

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
गोत्र बहिर्विवाह से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
गोत्र से बाहर विवाह करने को गोत्र बहिर्विवाह कहा गया है।

प्रश्न 2. अंतर्विवाह से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
एक ही गोत्र, कुल या जाति में विवाह-संबंध को अंतर्विवाह कहा गया है।

प्रश्न 3.
बहुपत्नी प्रथा क्या होती है?
उत्तर:
एक ही पुरुष द्वारा एक से अधिक पत्नियाँ रखना, बहुपत्नी प्रथा कहलाती है।

प्रश्न 4.
एकलव्य की कथा कौन-से ग्रंथ में मिलती है?
उत्तर:
एकलव्य की कथा ‘महाभारत’ में मिलती है।

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प्रश्न 5.
संस्कृत अभिलेखों व ग्रंथों में व्यापारियों के लिए क्या शब्द प्रयुक्त किया गया है?
उत्तर:
संस्कृत अभिलेखों व ग्रंथों में व्यापारियों के लिए वणिक शब्द प्रयुक्त किया गया है।

प्रश्न 6.
विवाह-संस्कार में वर-वधू द्वारा हाथ पकड़ने की प्रथा को क्या कहा गया?
उत्तर:
विवाह-संस्कार में वर-वधू द्वारा हाथ पकड़ने की प्रथा को पाणिग्रहण कहा गया।

प्रश्न 7.
वर-वधू द्वारा अग्नि के समक्ष सात फेरे लेने को क्या संज्ञा दी गई?
उत्तर:
वर-वधू द्वारा अग्नि के समक्ष सात फेरे लेने को सप्तपदी कहा गया।

प्रश्न 8.
वर्ण-व्यवस्था में असंस्कृतभाषी लोगों को क्या कहकर पुकारा गया?
उत्तर:
वर्ण-व्यवस्था में असंस्कृतभाषी लोगों को म्लेच्छ या असभ्य कहकर पुकारा गया।

प्रश्न 9.
वर्ण-व्यवस्था में चाण्डाल किसे कहा गया?
उत्तर:
शवों की अंत्येष्टि और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया।

प्रश्न 10.
पितृवंशिकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पितृवंशिकता से अभिप्राय वह वंश-परंपरा है जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र और प्रपौत्र आदि से चलती है। इसमें पैतृक संपत्ति पुत्रों में विभाजित होती है।

प्रश्न 11.
वर्ण-व्यवस्था वाले समाज में चाण्डाल एवं अपवित्र समझे गए लोगों को कौन-सा स्थान प्राप्त था?
उत्तर:
इनको सबसे निम्न कोटि में रखा गया था।

प्रश्न 12.
मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का बँटवारा किस प्रकार बताया गया है?
उत्तर:
मनुस्मृति के अनुसार, माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक जायदाद का सभी पुत्रों में समान रूप से बँटवारा किया जाना. चाहिए, किंतु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था।

प्रश्न 13.
मनुस्मृति के अनुसार पैतृक संपत्ति में स्त्रियों के क्या अधिकार थे?
उत्तर:
मनुस्मृति के अनुसार स्त्रियाँ पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी की माँग नहीं कर सकती थीं।

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प्रश्न 14.
मनुस्मृति के अनुसार स्त्रीधन क्या था?
उत्तर:
विवाह के समय मिले उपहार तथा पति द्वारा दिए गए उपहार स्त्रीधन था, जिस पर स्त्रियों का स्वामित्व माना। जाता था।

प्रश्न 15.
मातृवंशिकता से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मातृवंशिकता से अभिप्राय वह वंश-परंपरा है, जो माँ से जुड़ी होती है। ऐसी परंपराओं के उदाहरण अति प्राचीन काल में ही मिलते हैं।

प्रश्न 16.
ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार शूद्रों का मुख्य कर्त्तव्य क्या था?
उत्तर:
ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार शूद्रों का मुख्य कर्त्तव्य तीन उच्च वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य) की सेवा थी।

प्रश्न 17.
मनुस्मृति (संस्कृत में) की रचना का काल कौन-सा है?
उत्तर:
मनुस्मृति की रचना लगभग 200 ई० पू० से लेकर 200 ई० के बीच की गई।

प्रश्न 18.
पाणिनि की अष्टाध्यायी (संस्कृत व्याकरण) कब लिखी गई?
उत्तर:
लगभग 500 ई०पू० में पाणिनि द्वारा अष्टाध्यायी लिखी गई।

प्रश्न 19.
प्रारंभिक अभिलेख किस भाषा में खुदे हुए हैं?
उत्तर:
प्राकृत भाषा में।

प्रश्न 20.
महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद किसने और कब शुरू किया?
उत्तर:
जे०ए०बी० वैन बियुटेनेन (J.A.B. Van Buitenen) ने महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेजी अनुवाद सन् 1973 में शुरू किया।

प्रश्न 21.
महाभारत की मूल कथा के रचयिता किसे माना जाता है?
उत्तर:
महाभारत की मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था।

प्रश्न 22.
हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश के कौन-से जिले में है?
उत्तर:
हस्तिनापुर उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में स्थित एक गाँव है।

प्रश्न 23.
‘मृच्छकटिकम्’ नामक नाटक का लेखक कौन है?
उत्तर:
शूद्रक ने ‘मृच्छकटिकम्’ नामक नाटक की रचना की।

प्रश्न 24.
‘मृच्छकटिकम्’ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
‘मृच्छकटिकम्’ का शाब्दिक अर्थ है ‘मिट्टी की गाड़ी’।

प्रश्न 25.
सातवीं शताब्दी में कौन-सा बौद्ध-यात्री चीन से भारत आया?
उत्तर:
ह्यूनसांग नामक चीनी-यात्री राजा हर्षवर्धन के काल में भारत आया।

प्रश्न 26.
‘कुन्ती ओ निषादी’ की लेखिका का नाम बताएँ।
उत्तर:
‘कुन्ती ओ निषादी’ की लेखिका (बांग्ला लेखिका) महाश्वेता देवी हैं।

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प्रश्न 27.
यायावर (घुमन्तु) पशुपालक कबीलों के लोगों को ब्राह्मण ग्रंथों में क्या कहा गया है?
उत्तर:
ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे लोगों को, जिन्हें संस्कृत का ज्ञान नहीं था, म्लेच्छ कहा गया।

प्रश्न 28.
वेदों की भाषा क्या थी?
उत्तर:
संस्कृत।

प्रश्न 29.
महाभारत में कुल कितने पर्व व अध्याय हैं?
उत्तर:
महाभारत में कुल 18 पर्व एवं 1948 अध्याय हैं।

प्रश्न 30.
सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार किसने करवाया?
उत्तर:
सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार शक शासक रूद्रदामन ने करवाया था।

प्रश्न 31.
महाभारत की प्राप्त पांडुलिपियों को कितने भागों में बाँटा गया है?
उत्तर:
महाभारत की पांडुलिपियों को दो भागों, उत्तरी व दक्षिणी भागों में बाँटा गया है।

प्रश्न 32.
विशिष्ट परिस्थितियों में किस स्त्री ने सत्ता का उपभोग किया?
उत्तर:
विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावति गुप्त ने सत्ता का उपभोग किया।

प्रश्न 33.
भारतीय विद्वान् एस०एन० बैनर्जी ने महाभारत पर कौन-सी पुस्तक लिखी?
उत्तर:
एस०एन० बैनर्जी ने महाभारत पर ‘Parties, Politics and the Political ideas of Mahabharata’ नामक पुस्तक लिखी।

प्रश्न 34.
श्रीमद्भगवद् गीता में कितने श्लोक हैं?
उत्तर:
श्रीमद्भगवद् गीता में लगभग 700 श्लोक हैं।

प्रश्न 35.
धर्मशास्त्र (आश्वलायन) में विवाह के कितने प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर:
आश्वलायन में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं।

प्रश्न 36.
रामायण व महाभारत महाकाव्यों की मुख्य कथा का संबंध किससे है?
उत्तर:
रामायण व महाभारत महाकाव्यों की मुख्य कथा का संबंध परिवार में पितृवंशिकता के आदर्श को मजबूत करने से है।

प्रश्न 37.
विवाह संस्कार में ‘पाणिग्रहण’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
वर द्वारा वधू का हाथ पकड़ने की प्रथा को ‘पाणिग्रहण’ संस्कार कहा गया।

प्रश्न 38.
धर्मशास्त्रों में किन ग्रंथों को शामिल किया गया है?
उत्तर:
धर्मसूत्र, स्मृतियाँ और टीकाएँ तीन तरह के ग्रंथों को धर्मशास्त्रों में शामिल किया गया है।

प्रश्न 39.
धर्मशास्त्र का संकलन काल क्या है?
उत्तर:
धर्मशास्त्रों का संकलन काल 500 ई०पू० से 600 ई० के बीच का है।

प्रश्न 40.
आश्वलायन गृहसूत्र के अनुसार ब्रह्म विवाह किसे माना गया?
उत्तर:
ऐसा विवाह जिसमें वेदों को जानने वाले शीलवान वर को घर बुलाकर वस्त्र व आभूषण आदि से सुसज्जित कन्या को पिता द्वारा दान दिया जाता था।

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प्रश्न 41.
पैशाच विवाह किसे माना गया?
उत्तर:
ऐसा विवाह जिसमें सोई हुई, घबराई हुई कन्या के साथ बलात्कार या धोखा देकर विवाह किया जाता था।

प्रश्न 42. ‘फा-शियन’ किस देश का रहने वाला था?
उत्तर:
‘फा-शियन’ चीन का रहने वाला था।

प्रश्न 43.
श्रीमद्भगवद् गीता की शिक्षा का सार क्या है?
उत्तर:
श्रीमद्भगवद् गीता के अनुसार वर्ण व जाति के अनुरूप जिसका जो कर्त्तव्य निर्धारित हुआ है, उसे उस कर्त्तव्य को बिना किसी प्रतिफल की कामना से करना चाहिए।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बौद्ध परंपरा में सामाजिक अनुबंध से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
बौद्ध परंपरा में ‘सामाजिक अनुबंध’ के अनुसार राजपद दैवीय या पैतृक नहीं था, बल्कि एक सामाजिक समझौते का परिणाम था। ऐसे किसी भी उपयुक्त व्यक्ति को राजा चुना जा सकता था जो न्यायप्रिय हो तथा शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्षमता रखता हो।

प्रश्न 2.
फाहियान (Fa-xian) ने चाण्डालों की स्थिति के बारे में क्या बताया है?
उत्तर:
फाहियान एक चीनी यात्री था जो ईसा की पाँचवीं सदी के शुरू में भारत आया। उसने अपने यात्रा वृत्तांत में बताया है कि चाण्डाल शहर और गाँव से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। जब कभी वे नगर या गाँव में आते थे तो उन्हें अपने आने की सूचना किसी वस्तु से आवाज़ करके देनी पड़ती थी।

प्रश्न 3.
लगभग 600 ई०पू० से 600 ई० की अवधि के मध्य भारतीय अर्थव्यवस्था और राजनीति में आए बदलावों के प्रभावों का उल्लेख करें।
उत्तर:
लगभग 600 ई०पू० से 600 ई० के बीच आर्थिक व राजनीतिक जीवन में कई तरह के परिवर्तन हुए, जिनका तत्कालीन समाज पर भी अपना प्रभाव पड़ा। उदाहरण के लिए वन क्षेत्रों में कृषि विस्तार से वहाँ रहने वाले लोगों की जीवन-शैली में परिवर्तन आया। बहुत-से कारीगर समूहों का उदय हुआ। इसके अतिरिक्त संपत्ति के असमान वितरण ने सामाजिक भेदभावों को अधिक प्रखर बनाया।

प्रश्न 4.
कौरव और पांडव कौन थे? उनके बंधुत्व संबंधों में क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर:
कौरव व पांडव बांधव जन (Cousins) थे अर्थात् वे चचेरे भाइयों के समूह थे। यह परिवार कुरु राजवंश का था। महाभारत से पता चलता है कि चचेरे भाइयों में संपत्ति व सत्ता को लेकर युद्ध हुआ। स्पष्ट है कि दोनों समूहों में बंधुत्व के संबंधों में राजसत्ता को लेकर बड़ा भारी परिवर्तन हो गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित पदों की संक्षिप्त व्याख्या करें (क) बहिर्विवाह, (ख) अंतर्विवाह, (ग) बहुपति प्रथा, (घ) बहुपत्नी प्रथा।
उत्तर:
(क) बहिर्विवाह-बहिर्विवाह से अभिप्राय था, गोत्र से बाहर विवाह करना। (ख) अंतर्विवाह-अंतर्विवाह से अभिप्राय था, वर्ण अथवा जाति के अंदर ही विवाह करना। (ग) बहुपति प्रथा-इस प्रथा में एक स्त्री के एक से अधिक पति होने की प्रथा है। (घ) बहुपत्नी प्रथा-बहुपत्नी प्रथा से अर्थ है एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियाँ होने की परिपाटी।

प्रश्न 6.
कौरवों और पांडवों में बंधुत्व मामले का अंततः समाधान कैसे हुआ? इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
कौरवों और पांडवों में बंधुत्व का मसला अंततः एक युद्ध के द्वारा तय हुआ। यह युद्ध महाभारत का युद्ध कहलाया। इसमें पांडवों की विजय हुई। युद्ध के बाद ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर को शासक बनाया गया। इस प्रकार पितृवंशिकता के आदर्श को सुदृढ़ किया गया।

प्रश्न 7.
महाभारत के रचनाकाल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
महाभारत की रचना लगभग 1000 वर्षों में हुई। शुरू में इसमें मात्र 8800 श्लोक थे और यह ‘जयस’ यानी विजय संबंधी ग्रंथ कहलाया था। कालान्तर में यह 24000 श्लोकों के साथ ‘भारत’ नाम से प्रसिद्ध हुआ। अंततः यह महाभारत कहलाया और अब इसमें एक लाख श्लोक हैं।

प्रश्न 8.
बौद्ध ग्रंथों में सामाजिक गतिशीलता के उदाहरण लिखें।
उत्तर:
बौद्ध ग्रंथों में कई स्थानों पर क्षत्रियों या वैश्यों द्वारा दर्जी, कुम्हार, टोकरी बनाने वाले शिल्पी, माली और रसोइए का पेशा अपनाए जाने के उदाहरण मिलते हैं। इस सामाजिक गतिशीलता से उनकी प्रतिष्ठा में कमी नहीं आती थी।

प्रश्न 9.
एकलव्य कथा पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
एकलव्य कथा के माध्यम से निषादों (जंगल में रहने वाली जनजाति) को धर्म का संदेश दिया जा रहा था। धर्म से अभिप्राय था, अपने-अपने वर्ण कर्त्तव्य का पालन। किसी और जाति/वर्ण के काम को मत अपनाओ। ऐसा करना धर्म विरोधी कार्य होगा।

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प्रश्न 10.
एकलव्य कौन था?
उत्तर:
एकलव्य एक निषाद जनजाति का युवक था जो गुरु द्रोणाचार्य से धनुष चलाने की विद्या सीखना चाहता था। गुरु द्रोण केवल क्षत्रियों (विशेषतः कुरु राजवंश) को ही यह विद्या दे रहे थे, इसलिए उन्होंने एक वनवासी निषाद को यह शिक्षा देने से मना कर दिया, लेकिन एकलव्य ने मन से द्रोण को अपना गुरु मानकर प्रतिदिन अभ्यास किया और निपुण धनुर्धर बन गया। उसने कुत्ते के भौंकने की आवाज पर उस कुत्ते के मुँह को बाणों से भर दिया जिसे देखकर अर्जुन और आचार्य द्रोण दोनों को आश्चर्य हुआ। द्रोणाचार्य ने जब एकलव्य से उसके गुरु का नाम पूछा तो उसने स्वयं को उन्हीं का शिष्य बताया। इस बात का पता चलने पर द्रोण ने गुरु-दक्षिणा के रूप में एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा माँगा। एकलव्य ने अपना अंगूठा देकर अपना कर्त्तव्यपालन किया, परंतु वह पहले जैसा धनुर्धर नहीं रहा।

प्रश्न 11.
‘भारतीय समाज में लिंग भेदभाव था।’ इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय समाज में भी लिंग के आधार पर लड़कियों के प्रति भेदभाव विद्यमान था। ‘ऋग्वेद’ में पुत्र कामना को प्राथमिकता दी गई। विशेषतः इंद्र जैसे वीर पुत्र की कामना की गई है। पैतृक पारिवारिक संपत्ति में भी भेदभाव का आभास मिलता है। पैतृक संपत्ति का वारिस पुत्र ही था। लड़की की इसमें हिस्सेदारी नहीं स्वीकारी गई।

प्रश्न 12.
मनुस्मृति के अनुसार पुरुष के धन अर्जन के साधन कौन-से थे?
उत्तर:
औरत के अधिकार में मात्र उपहार से प्राप्त धन ही शामिल था परंतु पुरुष, मनु के अनुसार, सात तरीकों से धन अर्जित कर सकता था। ये तरीके थे- उत्तराधिकार, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश करके, कार्य द्वारा तथा सज्जन मित्रों से उपहारस्वरूप भेंट स्वीकार करके।

प्रश्न 13.
कुलीन परिवारों में स्त्री की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
कुलीन परिवारों में स्त्रियों के लिए भौतिक सुविधाएं तो अधिक थीं, परंतु स्वतंत्रता कम थी। उन पर पुरुष का नियंत्रण अपेक्षाकृत अधिक था, यहाँ तक कि उसे ‘वस्तु-सम’ ही समझा जाता था।

प्रश्न 14.
किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा को दानशीलता कैसे प्रभावित करती थी?
उत्तर:
दानशीलता धनी व्यक्ति के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम रही है। समाज में कंजूस व्यक्ति का सम्मान नहीं था। चारण/कवि दानी व्यक्तियों की प्रतिष्ठा में गीत-काव्य रचते थे। इससे धनी दानदाता की जय-जयकार होती थी।

प्रश्न 15.
विवाह संस्कार में ‘मधुपर्क’ किसे कहा गया?
उत्तर:
वर-वधू की चुनाव की प्रक्रिया के बाद वधू का पिता वर को बारात सहित आमंत्रित करता और उसका सम्मान करता था जिसे ‘मधुपर्क’ कहा गया।

प्रश्न 16.
धर्म-ग्रंथों में विवाह के कितने प्रकार बताए गए हैं?
उत्तर:
धर्म-ग्रंथों में विवाह के आठ प्रकार बताए गए हैं-(i) ब्रह्म विवाह, (ii) प्रजापत्य विवाह, (ii) आर्ष विवाह, (iv) दैव विवाह, (v) असुर विवाह, (vi) गांधर्व विवाह, (vii) राक्षस विवाह, (viii) पैशाच विवाह ।

प्रश्न 17.
‘गोत्र’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
‘गोत्र’ से अभिप्राय है एक ही पूर्वज की संतान या उत्तराधिकारियों का समूह । ऐसा समूह रक्त संबंधों पर आधारित माना जाता है। इसके सदस्य स्वयं को एक ही पूर्वज की संतान स्वीकारते हैं। ब्राह्मण ग्रंथों में ऐसे समूहों के सदस्यों में विवाह संबंधों के वर्जित होने के प्रमाण मिलते हैं।

प्रश्न 18.
महाभारत की विषय-वस्तु को इतिहासकार कैसे बाँटते हैं?
उत्तर:
महाभारत की विषय-वस्तु को इतिहासकार मुख्यतः दो भागों में बाँटते हैं। पहला आख्यान, जिसके अंतर्गत कहानियों का संग्रह है। दूसरा उपदेशात्मक, जिसके अंतर्गत सामाजिक व्यवहार के मानदंड आते हैं।

प्रश्न 19.
स्त्रीधन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मनु के अनुसार स्त्रीधन में शामिल था-(i) कन्यादान के समय मिला धन; (ii) माता-पिता व भाई से मिले उपहार; (ii) विदाई के समय मिली भेंट; (iv) विवाह के बाद पति से मिलने वाले उपहार; और (v) विभिन्न अवसरों पर मिलने वाली भेंट अर्थात् उपहार।

प्रश्न 20.
‘वर्ण’ शब्द के विषय में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘वरी’ धातु से हुई बताई गई है, जिसका अर्थ है वरण (चयन) करना। यानी व्यवसाय का चयन करना। कुछ विद्वान ‘वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति का संबंध ‘रंग’ से भी जोड़ते हैं। उनके अनुसार वर्ण (रंग) का प्रयोग गौण वर्ण के आर्यों को श्याम वर्णीय अनार्यों से अलग करने के संदर्भ में आया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

प्रश्न 21.
वैदिक कालीन ‘यज्ञ परम्परा’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
‘यज्ञ’ एक वैदिक कर्मकांड है जिसमें अग्नि के हवन कुंड के समक्ष बैठकर मंत्रोच्चारण के साथ किसी निश्चित उद्देश्य . की प्राप्ति के लिए हवन कुंड में आहुतियाँ डाली जाती हैं।

प्रश्न 22.
‘आश्रम प्रणाली’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
उत्तर वैदिक काल में व्यक्ति की आयु 100 वर्ष मानकर उसे निम्नलिखित चार भागों (आश्रमों) में बाँटा गया है

  • ब्रह्मचर्य आश्रम पहले 25 वर्ष की आयु तक।
  • गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्ष की आयु तक।
  • वानप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्ष की आयु तक।
  • संन्यास आश्रम 75 से 100 वर्ष की आयु तक।

प्रश्न 23.
महाभारत का रचनाकार किसे माना जाता है?
उत्तर:
महाभारत का रचनाकार महर्षि वेदव्यास को माना जाता है। जनश्रुतियों के अनुसार मुनि वेदव्यास ने यह ग्रंथ श्रीगणेश जी से लिखवाया था।

प्रश्न 24.
ऋग्वेद के ‘दसवें मंडल’ के ‘पुरुषसूक्त’ में दिए वर्ण विभाजन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘पुरुषसूक्त’ के एक मंत्र में कहा गया है कि देवताओं ने आदि पुरुष के चार भाग किए। ब्राह्मण उसका मुख, राजन्य बाहु और जंघा वैश्य थे तथा शूद्र उसके पाँव से उत्पन्न हुए।

प्रश्न 25.
जाति-व्यवस्था की दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
जाति-व्यवस्था की. दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • किसी जाति में सदस्यता केवल उन व्यक्तियों तक ही सीमित थी, जिन्होंने उसी जाति में जन्म लिया हो।
  • एक जाति के सदस्यों का विवाह उसी जाति में अनिवार्य था।

प्रश्न 26.
मौर्य काल में श्रेणियों की स्थिति पर संक्षिप्त टिप्पणी करें।
उत्तर:
मौर्य काल में श्रेणियाँ सरकार के नियंत्रण में काम करती थीं। इन्हें सरकार से लाइसेंस लेना पड़ता था। लगभग प्रत्येक श्रेणी पर एक सरकारी अधिकारी होता था, जिसे श्रेणी का अध्यक्ष कहा जाता था। श्रेणी में शिल्पकारों के प्रधान को ज्येष्ठक कहा जाता था।

प्रश्न 27.
भारत में परिवार व्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • परिवार के सदस्यों का वैवाहिक या रक्त-संबंधों का होना अनिवार्य है।
  • परिवार के सदस्य प्रायः पारिवारिक परंपरा और रीति-रिवाज़ों में बँधे होते हैं। वे धार्मिक अनुष्ठानों (यज्ञ, पूजा, अर्चना आदि) को मिलकर संपादित करते हैं।

प्रश्न 28.
मातृवंशीय परंपरा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मातवंशीय परिवारों में वंश परंपरा माँग से जुड़ी होती है। परिवार में लड़की का महत्त्व अधिक होता है।

प्रश्न 29.
भारत में विवाह संस्था का मूल उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
विवाह संस्था का मूल उद्देश्य विवाह-संबंधों में स्थायित्व कायम करना और पितृवंश को आगे बढ़ाना था। साथ ही भारत में जातीय-व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने में भी इस संस्था की मुख्य भूमिका रही है।

प्रश्न 30.
गांधारी द्वारा अपने सबसे बड़े पुत्र दुर्योधन को दिए गए परामर्श का उल्लेख करें। इसका क्या परिणाम निकला?
उत्तर:
गांधारी कौरवों की माँ थी। वह अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को युद्ध न करने का परामर्श देती है और युद्ध न करने की विनती भी करती है। उसने कहा, “शांति की संधि करके तुम अपने पिता, मेरा और अपने शुभइच्छकों का सम्मान करोगे…….. विवेकी पुरुष जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है वही अपने राज्य की रखवाली करता है। लालच और क्रोध आदमी को लाभ से दूर खदेड़ ले जाते हैं। इन दोनों शत्रुओं को पराजित कर राजा समस्त पृथ्वी को जीत सकता है …………. युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता, न धर्म और न अर्थ की प्राप्ति होती है, और न ही प्रसन्नता की; युद्ध के अंत में सफलता मिले यह भी जरूरी नहीं …………… अपने मन को युद्ध में लिप्त मत करो।” स्पष्ट है कि अपनी माँ की इस सलाह को दुर्योधन ने नहीं माना, फलतः युद्ध हुआ और कौरव परिवार का समूल नाश हो गया।

प्रश्न 31.
‘परिवार’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सामाजिक संगठनों में परिवार समाज की एक महत्त्वपूर्ण मूल इकाई है। संस्कृत ग्रंथों में इसके लिए ‘कल’ शब्द का प्रयोग किया गया है। सामान्यतया रक्त संबंधों पर आधारित परिवार को एक स्वाभाविक सामाजिक इकाई मान लिया जाता है, जो कि ठीक नहीं होता क्योंकि रक्त संबंधों की परिधि में कौन-कौन से सगे-संबंधी शामिल हैं, इस बात से परिवार की परिभाषा भिन्न हो जाती है। आज भी हम देखते हैं कि कुछ लोग चचेरे या मौसेरे भाई-बहनों को रक्त-संबंधों में शामिल करते हैं जबकि कुछ अन्य उन्हें शामिल नहीं करते।

प्रश्न 32.
रामायण महाकाव्य के दो प्रमुख नैतिक तत्त्व कौन-से हैं?
उत्तर:
रामायण महाकाव्य के दो नैतिक तत्त्व हैं

  • भलाई की बुराई पर विजय। कथा में राम भलाई के और रावण बुराई के प्रतीक हैं।
  • परिवार रूपी संस्था का आदर्श।

इसमें किसी भी परिस्थिति में पुत्र को पिता की आज्ञा तथा छोटे भाई को बड़े भाई की आज्ञा का पालन करना और स्त्री को पति के प्रति निष्ठावान होना है।

प्रश्न 33.
प्राचीन भारत में पितृवंशिक आदर्श के अपवाद किन स्थितियों में मिलते हैं?
उत्तर:
पितृवंशिक आदर्श को लेकर यदा-कदा अपवाद भी मिलते हैं। पुत्र के न होने पर कई बार तो एक भाई दूसरे का धेकारी हो जाता था तो कभी चचेरे भाई भी राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लेते थे। कई बार कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियाँ भी सत्ता की उत्तराधिकारी बनीं। प्रभावती गुप्त का शासिका बनने का उदाहरण मिलता है।

प्रश्न 34.
उत्तर भारत में नगरीकरण के विकास का धर्मशास्त्रों से क्या संबंध है?
उत्तर:
उत्तर भारत में 600 ई०पू० से 600 ई० के मध्य नगरों का विकास हुआ। नए नगर हस्तशिल्प उत्पादन व व्यापार के केंद्र थे। इस कारण से यह नगर दूर एवं निकट से आने वाले व्यापारी व अन्य अनेक लोगों के मिलन-स्थल बन गए। फलतः इनमें वस्तुओं के क्रय-विक्रय व उत्पादन के साथ-साथ लोगों में परस्पर विचारों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया भी चली। इससे परंपरागत विचारों एवं विश्वासों पर कई तरह के सवाल उठे। इस कारण से समाज में उथल-पुथल मची। पारिवारिक बंधन कमजोर होने लगे। वर्ण-संकर विवाह (जाति से बाहर दूसरी जाति में) होने लगे तथा प्रेम-विवाह (गांधर्व विवाह) होने लगे। समाज में बढ़ रही इस उथल-पुथल को रोकने के लिए धर्मशास्त्र रचे गए, जिनमें सामाजिक परंपराओं को बनाए रखने पर जोर दिया गया।

प्रश्न 35.
मनुस्मृति में चाण्डालों के क्या कर्त्तव्य बताए गए हैं?
उत्तर:
मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ (Duties) पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। जिन कामों को घृणित माना गया उन्हें करना मनुस्मृति में चाण्डालों के लिए ‘कर्त्तव्य’ बताया गया; जैसे कि वधिक कार्य, चर्म कार्य, मृत पशु उठाना, सफाई, श्मशान कर्म इत्यादि। उनके लिए नियम था कि वे मृतकों के वस्त्र, लोहे के आभूषण व बर्तनों का प्रयोग करें। रात के समय नगर व गाँवों में उनका प्रवेश वर्जित था। नगर व गाँव में उनका निवास भी वर्जित था।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
धर्मशास्त्र में कितने प्रकार के विवाहों का वर्णन मिलता है? इनमें से चार उत्तम विवाह कौन-से थे?
उत्तर:
आश्वलायन नामक ग्रंथ में प्राचीन भारत में आठ प्रकार के विवाहों का वर्णन मिलता है। इनका संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

  • ब्रह्म विवाह में वेदों को जानने वाले शीलवान वर को घर बुलाकर वस्त्र एवं आभूषण आदि से सुसज्जित कन्या को पिता द्वारा दान दिया जाता था।
  • दैव विवाह में यज्ञ करने वाले पुरोहित को यजमान अपनी कन्या का दान करता था।
  • आर्ष विवाह में लड़की का पिता वर पक्ष से गाय और बैल का एक जोड़ा लेकर अपनी कन्या का विवाह करता था।
  • प्रजापत्य विवाह में लड़की का पिता यह आदेश देता था तुम दोनों (वर-वधू) एक साथ रहकर आजीवन धर्म का आचरण करो। इसके बाद कन्यादान करता था।
  • असुर विवाह में वर कन्या के पिता को धन देकर विवाह करता था।
  • गांधर्व विवाह एक प्रकार से युवक-युवती में पारस्परिक प्रेम के आधार पर हुआ विवाह था।
  • राक्षस विवाह में कन्या को जबरन उठाकर विवाह किया जाता था अर्थात् उसे जीतकर अपने अधिकारों में लाया जाता था।
  • पैशाच विवाह में सोई हुई, प्रमत्त, घबराई हुई कन्या के साथ बलात्कार कर या धोखा देकर विवाह किया जाता था।

विवाह के इन आठ प्रकारों में से पहले चार विवाहों-ब्रह्म, प्रजापत्य, आर्ष व दैव को उत्तम माना गया। इन्हें धर्मानुकूल और आदर्श बताया गया है क्योंकि यह ब्राह्मणीय नियमों के अनुकूल थे। जबकि असुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच विवाहों को अच्छा नहीं माना गया परंतु ये प्रचलन में थे। यह इस बात का प्रमाण है कि ब्राह्मणीय नियमों से बाहर विवाह प्रथाएँ अस्तित्व में थीं।

प्रश्न 2.
ब्राह्मणीय पद्धति ‘गोत्र’ के बारे में आप क्या जानते हैं? क्या यह सर्वत्र समान रूप से लागू थी?
उत्तर:
लगभग 1000 ई०पू० के आस-पास से एक ब्राह्मणीय पद्धति अस्तित्व में आई जिसके अनुसार लोगों की पहचान गोत्रों से भी होने लगी। विशेष रूप से यह ब्राह्मणों में पहले प्रचलन में आई। गोत्र का नामकरण किसी वैदिक ऋषि के नाम से होता था। उस गोत्र के सदस्य उस ऋषि के वंशज समझे जाते थे। गोत्र व्यवस्था की दो महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ थीं

  • विवाह के पश्चात् महिला को पिता के गोत्र का नहीं, अपितु पति के गोत्र का माना जाता था।
  • एक ही गोत्र के सदस्य परस्पर विवाह संबंध नहीं कर सकते थे।

उपर्युक्त इन दोनों नियमों का अनुसरण भी अन्य ब्राह्मणीय नियमों की तरह, सभी लोगों द्वारा हर स्थान पर नहीं होता था। व्यवहार में यहाँ भी भिन्नता थी। उदाहरण के लिए यदि हम अभिलेखों से सातवाहन नरेशों के नामों का अध्ययन करें तो यह बात स्पष्ट हो जाती है। इन शासकों की रानियों के नामों से यह प्रतीत होता है कि उनके नाम गौतम और वशिष्ठ गोत्रों से जुड़े थे जो उनके पिता के गोत्र थे। विवाह के बाद भी उन्होंने संभवतः अपने पिता का गोत्र नाम ही कायम रखा। जैसे कि राजा गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि, राजा वसिथि-पुत सिरी-पुलुमायि। संभवतः इन्होंने अपने पति का गोत्र नहीं अपनाया जैसा कि ब्राह्मणीय व्यवस्था में अपेक्षित था। इन नामों के अध्ययन से यह भी पता चलता है कि कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं अर्थात बहिर्विवाह पद्धति की बजाय एक अन्य विवाह पद्धति यहाँ प्रचलन में थी। .

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

प्रश्न 3.
धर्मशास्त्रों ने ‘जाति व्यवस्था’ को किस प्रकार स्थायित्व प्रदान किया? स्पष्ट करें।
उत्तर:
धर्मशास्त्रों ने वर्ण और जाति-व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में विशेष भूमिका निभाई, उसे ‘उचित’ सामाजिक कर्तव्य बताया। उसे व्यवहार में लाने के लिए सामाजिक नियम बनाए। साथ ही उपदेशात्मक शैली में लोक-कथाओं की रचना की। संक्षेप में, धर्मशास्त्रों ने मुख्यतः निम्नलिखित उपायों का अनुसरण किया

1. दैवीय उत्पत्ति-इस सिद्धांत से जन-सामान्य को यह विश्वास दिलाया गया कि जातियों की उत्पत्ति का कारण ईश्वर है। ब्राह्मण ग्रंथों में पुरुष सूक्त को बार-बार दोहराया गया ताकि लोग अपनी-अपनी जातियों में अपना कर्त्तव्य बिना किसी विरोध के निभाते रहें।

2. आत्मा, कर्म व पुनर्जन्म का सिद्धांत-उपनिषद ग्रंथों में आत्मा, कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धांत प्रतिपादित हुआ। इसने जाति-व्यवस्था के लिए एक धार्मिक औचित्य प्रस्तुत किया। किसी विशेष जाति (ऊँची या नीची) में जन्म को पूर्व जन्म के कर्मों का फल बताया गया।

3. राजा का कर्त्तव्य-शास्त्रों में वर्ण-व्यवस्था की रक्षा करना राजा का एक प्रमुख कर्त्तव्य बताया गया। साथ ही इस व्यवस्था की आचार-संहिता दी और शासकों को अपने-अपने राज्य में इसका अनुसरण करने के लिए प्रोत्साहित किया। मनुस्मृति में विभिन्न वर्गों के संबंध में न्याय व दंड-विधान मिलता है।

4. उपदेशात्मक उपाय-वर्णाश्रम धर्म को विभिन्न कथा-गाथाओं के माध्यम से भी व्यवहार में बनाए रखने का प्रयास किया गया। साहित्यिक परंपरा के ग्रंथों में ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं। गुरु द्रोण व एकलव्य की कथा इस संदर्भ में उल्लेखनीय है।

प्रश्न 4.
‘जाति व्यवस्था’ की कोई पाँच सामान्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
‘जाति व्यवस्था’ की निम्नलिखित सामान्य विशेषताएँ हैं …

1. पैतृक व्यवसाय-जाति की पहचान व्यवसाय से हुई। ये व्यवसाय वंशानुगत थे अर्थात् ये पिता से पुत्र तक पहुँचते रहते थे। इसीलिए जाति को आनुवंशिकता (Hereditary) पर आधारित एक वर्ग (Class) बताया गया है।

2. सदस्यता-किसी जाति में सदस्यता केवल उन व्यक्तियों तक ही सीमित थी, जिन्होंने उसी जाति में जन्म लिया। किसी एक जाति से दूसरी जाति में सदस्यता संभव नहीं थी।

3. सजातीय विवाह-एक जाति के सदस्यों का विवाह उसी जाति में अनिवार्य था। जाति से बाहर विवाह पर रोक थी। यद्यपि अनुलोम और प्रतिलोम विवाहों का उल्लेख मिलता है, परंतु इन्हें अच्छा नहीं समझा जाता था। ऐसे विवाहों से अनेक वर्णसंकर जातियों का भी वर्णन ग्रंथों में आया है।

4. श्रेणीबद्धता-जाति-व्यवस्था श्रेणीबद्ध (सोपानात्मक) संगठन है अर्थात् यह सीढ़ीनुमा है, जिसमें ऊपर से नीचे की ओर प्रत्येक जाति का स्थान निर्धारित होता है।

5. पवित्रता व अपवित्रता की धारणा-जाति-व्यवस्था में पवित्रता तथा अपवित्रता की धारणा निहित थी। निचले स्तर की जातियों को अपवित्र माना गया। चर्म कर्म, मरे पशुओं को उठाना तथा साफ़-सफाई करने वाली जातियों को अपवित्र माना गया। यहाँ तक कि उन्हें अछूत कहा गया। उनके स्पर्श और दर्शन-मात्र से अपवित्र होने की बात कही गई।

प्रश्न 5.
क्या जाति व्यवस्था वाले भारतीय समाज में किसी तरह की सामाजिक गतिशीलता थी? यदि थी, तो उदाहरण देकर स्पष्ट करें।
उत्तर:
वर्ग अथवा जाति-व्यवस्था पूर्णतयाः एक जड़-व्यवस्था नहीं रही। इसमें आवश्यकतानुसार कुछ गतिशीलता भी रही है। उदाहरण के लिए, शुरू में वैश्य पशुचारक और किसान थे और शूद्र सेवक थे। धीरे-धीरे उन्नति करके वैश्य व्यापारी व जमींदार हो गए और शूद्र कृषक बन गए, परंतु इस पर भी उन्हें वर्ण-व्यवस्था में द्विज का दर्जा नहीं मिला। विचाराधीन काल के अंत तक आते-आते उन्हें रामायण, महाभारत और पुराण जैसे ग्रंथों को सुनने का अधिकार मिला। उनकी स्थिति में कुछ सुधार आया। – बौद्ध ग्रंथों में सामाजिक गतिशीलता के उदाहरण-बौद्ध-ग्रंथों में कई स्थानों पर क्षत्रियों व वैश्यों द्वारा दर्जी, कुम्हार, टोकरी बनाने वाले शिल्पी, माली और रसोइए आदि का पेशा अपनाए जाने का उल्लेख मिलता है। इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा में कमी नहीं आती थी।

श्रेणी व्यवस्था व सामाजिक गतिशीलता-श्रेणी-व्यवस्था सामाजिक गतिशीलता का एक अन्य उल्लेखनीय उदाहरण है। सामान्य व्यवसाय करने वाली जातियाँ स्वयं को कई बार अपनी ज़रूरतों के अनुरूप श्रेणियों में संगठित कर लेती थीं। ये श्रेणियाँ शिल्पकारों को समाज में प्रतिष्ठा का स्थान प्रदान करती थीं। लगभग पाँचवीं सदी के मंदसौर (मध्य प्रदेश) अभिलेख से रेशम बुनकरों की एक श्रेणी का उल्लेख मिलता है। इस श्रेणी के बुनकर पहले मूलतः गुजरात के लता (Lata) नाम स्थान के रहने वाले थे फिर वे मंदसौर चले आए। इतिहास के इस तथ्य से यह पता चलता है कि श्रेणी जैसे व्यावसायिक संगठन अधिक लाभ की इच्छा से स्थानांतरण भी करते थे अर्थात् इस दृष्टि से भी उनमें गतिशीलता थी।

प्रश्न 6.
वर्ण व्यवस्था का वनवासियों से संपर्क की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
वर्ण व जाति की विचारधारा का प्रभाव भारत में बड़े स्तर पर पड़ा। फिर भी ऐसे बहुत-से वनवासी कबीले थे जो इसके प्रभाव से वंचित थे। संस्कृत ग्रंथों में ऐसे लोगों का उल्लेख प्रायः विचित्र, असभ्य और यहाँ तक कि पशुवत् जैसे विशेषणों के साथ किया गया। मुख्यतः ये ऐसे समुदाय थे जो इसके प्रभाव से वंचित थे। वे पशुपालन और खेतीबाड़ी के व्यवसाय से नहीं जुड़े थे। इनका जीवन मुख्यतः शिकार और कंद-मूल पर निर्भर था। उदाहरण के लिए निषाद इसी वर्ग के अंतर्गत आते थे। एकलव्य संभवतः इसी समुदाय से संबंधित था। इन कबीलों के लोगों की जीवन-शैली भी अलग थी। उनकी भाषा भिन्न थी। ग्रामीण और शहरी लोग प्रायः इन्हें शंका की दृष्टि से देखते थे।

इन लोगों का यदा-कदा ‘सभ्य समाज के लोगों से भी संपर्क होता था। महाभारत व रामायण की कुछ कथाओं से विद्वान ऐसा निष्कर्ष निकालते हैं कि कई बार वर्ण-व्यवस्था के दायरे में आने वाले लोगों तथा जंगल में रहने वाली जनजातियों के मध्य विचारों का आदान-प्रदान होता था। उदाहरण के लिए महाभारत के आदिपर्वन में हिडिंबा और भीम गाथा से यही निष्कर्ष निकाला जाता है।

प्रश्न 7.
प्राचीन भारत में स्त्री के संपत्ति संबंधी अधिकार पर चर्चा करते हुए उसकी स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
प्राचीन भारत में रचे गए अधिकांश धर्मशास्त्र पति व पिता की संपत्ति में औरत की हिस्सेदारी को स्वीकार नहीं करते। समाज पुरुष प्रधान था। इसमें लैंगिक आधार पर भेदभाव था। पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र थे। स्वाभाविक तौर पर इससे समाज में स्त्री की स्थिति पुरुष की तुलना में गौण हो गई।

मनुस्मृति में पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति में सभी पुत्रों का समान अधिकार स्वीकारा गया है। लेकिन पुत्री को पैतृक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं दिया है। यहाँ तक कि पुत्र के अभाव व कोई उत्तराधिकारी न होने की स्थिति में भी यह अधिकार पुत्री को नहीं दिया गया है। मनु ने तो ऐसी संपत्ति को धार्मिक संस्थाओं को देने की बात कही है। सामान्यतया इन शास्त्रकारों ने पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति में विधवा के अधिकार को भी नहीं माना है।

केवल मात्र स्त्रीधन यानी उपहार के रूप में मिलने वाले धन पर स्त्री के अधिकार को स्वीकृति दी गई है। राजपरिवारों तथा अन्य कुलीन परिवारों में औरतों के पास सुविधाओं की कमी नहीं थी, परंतु इस पर भी पुरुष की तुलना में उनकी स्थिति गौण ही रहती थी, क्योंकि सामान्य रूप से धन अर्जन के साधनों (औज़ार, भूमि, पशु, खान, जंगल इत्यादि) पर त्रण पुरुषों का ही रहता था। विद्वानों का मानना है कि जनसाधारण में स्त्रियों की स्थिति’ (Status) कुलीन परिवारों की महिलाओं की तुलना में अच्छी थी, क्योंकि साधारण परिवारों की औरतें अपने परिवार के पुरुष सदस्यों के साथ मिलकर खेत-खलिहानों में काम करती थीं। उन पर ‘पुरुष-नियंत्रण’ अपेक्षाकृत कम था। वे अधिक स्वतंत्र थीं।

प्रश्न 8.
भारत में दानशीलता और सामाजिक प्रतिष्ठा के बीच क्या संबंध रहा है? तमिल साहित्य से कुछ उदाहरणों से स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारत में दान देने की परंपरा रही है। धनी व्यक्तियों के लिए सामाजिक प्रतिष्ठा अर्जित करने का यह एक महत्त्वपूर्ण माध्यम रही है। समाज में कंजूस व्यक्ति का सम्मान नहीं था। उसके पास धन होने के बावजूद भी लोग उसे महत्त्व नहीं देते थे, बल्कि उनसे घृणा करते थे। दानशील व्यक्ति की प्रशंसा की जाती थी। यह काम मुख्यतः उनके चारण एवं कवि करते थे। दानशील व्यक्तियों की प्रतिष्ठा में गीत-काव्य रचे गए। प्राचीन तमिल साहित्य में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। प्राचीन तमिलकम् क्षेत्र में (लगभग 2000 वर्ष पहले) अनेक सरदारियाँ (Chiefdoms) थीं। इनके सरदारों ने चारणों एवं कवियों को आश्रय दिया और उन्होंने अपने आश्रयदाताओं का खूब बखान किया।

कुछ गीत/कविताएँ इनमें से संगम साहित्य में शामिल हुईं जो प्राचीन दक्षिण भारत के सामाजिक व आर्थिक संबंधों को समझने के लिए काफी महत्त्वपूर्ण हैं। दानशीलता पर रचे गए प्राचीन चारण साहित्य से दो बातें स्पष्ट होती हैं-पहली, समाज में व्यापक विषमता उत्पन्न हो चुकी थी। कुछ लोग काफी धनी थे तो कुछ भुखमरी से ग्रस्त थे। दूसरी बात यह स्पष्ट होती है कि समृद्ध लोग निर्धन लोगों की कुछ सहायता करते थे। लोगों की कुछ भूख मिटती थी तो धनवान को जय-जयकार मिलती थी।

प्रश्न 9.
एक साहित्यिक स्रोत के तौर पर इतिहासकार महाभारत को कैसे पढ़ते हैं?
उत्तर:
इतिहासकार साहित्यिक स्रोतों का उपयोग बड़ी सावधानी से करते हैं। वे इस बात का ध्यान करते हैं कि अमुक ग्रंथ का लेखक कौन है, उसका सामाजिक दृष्टिकोण क्या है, क्योंकि इनका लेखक भी अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकता है। वे ग्रंथ की भाषा पर भी विचार करते हैं। इतिहासकारों को महाभारत जैसे विशाल और जटिल ग्रंथ के सामाजिक इतिहास के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल करते हुए इन सभी बातों को ध्यान में रखना पड़ता है। दो तथ्य उल्लेखनीय हैं
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  • भाषा-महाभारत मूलतः संस्कृत में लिखा गया है, परंतु इसकी संस्कृत वेदों और प्रशस्तियों की भाँति जटिल नहीं है। यह उनकी अपेक्षा काफी सरल है।
  • विषय-वस्तु-महाभारत की विषय-वस्तु को इतिहासकार सामान्यतः दो भागों में बाँटते हैं-आख्यान तथा उपदेशात्मक। आख्यान के अंतर्गत कहानियों का संग्रह रखा गया है। जबकि उपदेशात्मक के अंतर्गत सामाजिक आचार-विचार के मानदंड आते हैं। महाभारत का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है। इसमें श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महाभारत की ऐतिहासिकता के संदर्भ में ‘हस्तिनापुर की खोज’ पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
संस्कृत साहित्य परंपरा में महाभारत को ‘इतिहास’ (ऐसा ही हुआ) माना गया है। अतः विद्वानों ने इसकी ऐतिहासिकता के पहलुओं पर विचार किया है, यहाँ तक कि उत्खनन के माध्यम से भी साक्ष्यों की तलाश की। आओ ‘हस्तिनापुर की खोज’ पर विचार करें-

सदृश्यता के आधार पर महाभारत में वर्णित जिन स्थानों की पहचान की जाती है उनमें ‘हस्तिनापुर’ नामक आधुनिक उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित ग्राम भी है। दावा यह किया जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ कभी कुरु राज्य की राजधानी होती थी। ऐसा मानने वालों का यह भी तर्क है कि नाम का तो संयोग संभव है लेकिन इसका कुरु राज्य क्षेत्र में पड़ना मात्र संयोग नहीं हो सकता।

‘हस्तिनापुर’ की ऐतिहासिकता की जाँच के लिए (1951-52) प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता बी.बी. लाल के नेतृत्व में उत्खनन कार्य शुरू किया गया। उन्हें यहाँ आबादी के बसावट के पाँच स्तर मिले। जिनमें दूसरा और तीसरा स्तर विचाराधीन विषय पर महत्त्वपूर्ण है। दूसरे स्तर का काल निर्धारण 12वीं से 7वीं शताब्दी ई०पू० के बीच किया गया है। यह लगभग वही अवधि है जिसमें कभी ‘सूत रचनाकारों’ ने महाभारत की मूल गाथा रची थी। इस दूसरे ‘स्तर’ पर तैयार अपनी रिपोर्ट में प्रो० बी.बी. लाल लिखते हैं, “जिस सीमित क्षेत्र का उत्खनन हुआ वहाँ से घरों की कोई निश्चित परियोजना नहीं मिलती किंतु मिट्टी की बनी दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें अवश्य मिलती हैं। सरकंडे की छाप वाले पलस्तर की खोज इस बात की ओर संकेत करती है कि कुछ घरों की दीवारें सरकंडे की बनी थीं जिन पर मिट्टी का पलस्तर चढ़ा दिया जाता था।” तीसरे स्तर, जिसका काल छठी से तीसरी शताब्दी ई०पू० माना गया, के विषय में बी.बी. लाल निष्कर्ष निकालते हैं, “इस स्तर के घर कच्ची ईंटों तथा पक्की ईंटों से बने हुए थे। गंदे पानी की निकासी के लिए शोषक-घट (Soakage Jar) तथा ईंटों के नालों का प्रयोग किया जाता था। वलय-कूपों (Ring-Wells) का उपयोग कुओं (पीने के पानी के लिए) और मल की निकासी वाले गों, दोनों ही रूपों में किया जाता था।”
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बी.बी. लाल के इन दोनों निष्कर्षों को यदि हम ध्यान से पढ़ें तो पाते हैं कि 7वीं शताब्दी ई०पू० तक तो इस स्थान पर पक्की ईंटों का प्रयोग ही नहीं था। ऐसे में जिस भव्य नगर का वर्णन साहित्य में मिलता है, उसकी संभावना पुरातात्विक साक्ष्यों में दिखाई नहीं पड़ती। या तो यह वर्णन कवियों की कल्पना मात्र था या फिर यह मूल गाथा के साथ बाद के काल (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के बाद) में जोड़ा गया जब इस क्षेत्र में नगरीय विकास हुआ।

प्रश्न 2.
महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण का परिचय देते हुए इसकी दो मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
शुरू में महाभारत की गाथा मौखिक तौर पर एक पीढ़ी से अगली पीढ़ी में चलती रही। कालांतर में इसे ब्राह्मण विद्वानों ने लिखित रूप दिया। वर्तमान में महाभारत के संपूर्ण आदिपर्वन् की कुल 235 हस्तलिपियाँ हैं। इनमें 107 देवनागरी और 26 कन्नड़ लिपि में हैं। शेष कश्मीरी, मैथिली (नेपाल से) बांग्ला, तेलुगु व मलयालम आदि में हैं। इन हस्तलिपियों की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं और कोई भी दो हस्तलिपियाँ एक जैसी नहीं हैं। इसीलिए इस ग्रंथ के एक समालोचनात्मक संस्करण की जरूरत पड़ी।

संस्कृत साहित्य में समालोचनात्मक कार्य मूलकथा के निकट पहुँचने का प्रयास होता है। महाभारत के मूल पाठ (शुद्ध रूप) को स्थापित करने का कार्य साधारण नहीं था। यह एक भारी चुनौती थी। इस चुनौती को सन् 1919 में संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्वान वी.एस. सुकथांकर ने स्वीकार किया। एकत्रित ग्रंथों का वर्गीकरण किया गया और फिर संपूर्ण उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करके 13000 पृष्ठों का एक समालोचनात्मक संस्करण तैयार किया गया। इन्हें 19 खंडों में प्रकाशित किया। इसे पूरा होने में 47 वर्ष लगे। इस परियोजना से महाभारत की निम्नलिखित दो विशेषताएँ उभरकर सामने आईं

  • समानता-संस्कृत के मूल पाठों (ग्रंथों) के बहुत से अंशों में समानता थी।
  • क्षेत्रीय प्रभेद-समानता के साथ इन पांडुलिपियों में काफी अंतर भी हैं। वस्तुतः यह ग्रंथ जैसे-जैसे भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसारित हुआ तो धीरे-धीरे इसमें क्षेत्रीय लोक परंपराओं और विश्वासों का समावेश होता गया।

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HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. कुरु जनपद की राजधानी का क्या नाम था?
(A) वैशाली
(B) इन्द्रप्रस्थ
(C) श्रावस्ती
(D) राजगृह
उत्तर:(B) इन्द्रप्रस्थ

2. बिम्बिसार किस जनपद का सुप्रसिद्ध शासक था?
(A) मगध
(B) कौशल
(C) काशी
(D) अंग
उत्तर:
(A) मगध

3. अंग जनपद की राजधानी थी
(A) चम्पा
(B) वाराणसी
(C) कुशीनगर
(D) वैशाली
उत्तर:
(A) चम्पा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

4. प्रद्योत किस जनपद का शासक था?
(A) कौशल
(B) अवन्ति
(C) अंग
(D) वत्स
उत्तर:
(B) अवन्ति

5. कौटिल्य कहाँ के रहने वाले थे?
(A) मिथिला के
(B) पावा के
(C) रामग्राम के
(D) कपिलवस्तु के
उत्तर:
(C) रामग्राम के

6. निम्नलिखित में से कौन नंद वंश का संस्थापक था?
(A) महापद्मनन्द
(B) घनानन्द
(C) केशवानन्द
(D) महेश्वरानन्द
उत्तर:
(A) महापद्मनन्द

7. साम्राज्य के रूप में मगध का उत्थान आरम्भ हुआ
(A) बिम्बिसार के शासन काल से
(B) अजातशत्रु के शासन काल से
(C) शिशुनाग के शासन काल से
(D) महापद्मनन्द के शासन काल से
उत्तर:
(A) बिम्बिसार के शासन काल से

8. चन्द्रगुप्त मौर्य की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण विजय थी
(A) मगध विजय
(B) पंजाब की विजय
(C) पश्चिमी भारत की विजय
(D) दक्षिणी भारत की विजय
उत्तर:
(A) मगध विजय

9. मौर्य साम्राज्य का संस्थापक था
(A) अशोक
(B) बिन्दुसार
(C) चन्द्रगुप्त मौर्य
(D) बिम्बिसार
उत्तर:
(C) चन्द्रगुप्त मौर्य

10. मौर्य साम्राज्य की राजधानी थी
(A) स्वर्णगिरि
(B) तक्षशिला
(C) पाटलिपुत्र
(D) उज्जैन
उत्तर:
(C) पाटलिपुत्र

11. अशोक के समय का सबसे प्रसिद्ध स्तूप है
(A) रूपनाथ का
(B) सारनाथ का
(C) सांची का
(D) प्रयाग का
उत्तर:
(C) सांची का

12. अशोक ने धम्म प्रचार के लिए विशेष अधिकारी नियुक्त किए, जिन्हें कहा जाता था
(A) अमात्य
(B) सन्निधाता
(C) युक्त
(D) धम्ममहामात्र
उत्तर:
(D) धम्ममहामात्र

13. श्रीनगर और ललितापाटन नामक नगरों की स्थापना की
(A) चन्द्रगुप्त मौर्य ने
(B) अशोक ने
(C) कनिष्क ने
(D) बिन्दुसार ने
उत्तर:
(B) अशोक ने

14. अशोक के समय तीसरी बौद्ध सभा का आयोजन हुआ
(A) वैशाली में
(B) पाटलिपुत्र में
(C) तक्षशिला में
(D) राजगृह में
उत्तर:
(B) पाटलिपुत्र में

15. अशोक के द्वारा कलिंग का युद्ध लड़ा गया
(A) 269 ई०पू० में
(B) 273 ई०पू० में
(C) 261 ई०पू० में
(D) 251 ई०पू० में
उत्तर:
(C) 261 ई०पू० में

16. मैगस्थनीज चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहा
(A) 300 ई०पू० से 295 ई०पू० तक
(B) 305 ई०प० से 298 ई०पू० तक
(C) 302 ई०पू० से 298 ई०पू० तक
(D) 302 ई०पू० से 297 ई०पू० तक
उत्तर:
(C) 302 ई०पू० से 298 ई०पू० तक

17. कौटिल्य ने अर्थशास्त्र की रचना की
(A) हिन्दी भाषा में
(B) पाली भाषा में
(C) संस्कृत भाषा में
(D) प्राकृत भाषा में
उत्तर:
(C) संस्कृत भाषा में

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18. मौर्य-शासनकाल में गोचरन (चरागाह) भूमि की व्यवस्था करने वाला कहलाता था
(A) लवणाध्यक्ष
(B) गोडाध्यक्ष
(C) सूत्राध्यक्ष
(D) विवीताध्यक्ष
उत्तर:
(D) विवीताध्यक्ष

19. बिन्दुसार के दरबार में आने वाला ग्रीक राजदूत था
(A) एरियन
(B) मीनाण्डर
(C) डायमेकस
(D) सेल्यूकस
उत्तर:
(C) डायमेकस

20. कौटिल्य के अनुसार, मौर्यकाल में स्त्री गुप्तचरों में हुआ करती थी
(A) शिल्पकारिका
(B) भिक्षुणी
(C) वेश्या
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. मौर्य साम्राज्य मुख्य रूप से विभक्त था
(A) आठ प्रान्तों में
(B) चार प्रान्तों में
(C) दो प्रान्तों में
(D) पाँच प्रान्तों में
उत्तर:
(D) पाँच प्रान्तों में

22. मौर्यकालीन शासन-व्यवस्था की सर्वाधिक छोटी इकाई थी
(A) प्रान्त
(B) नगर
(C) मुक्ति
(D) ग्राम
उत्तर:
(D) ग्राम

23. उड़ीसा का वह स्थान जहाँ से अशोक के अभिलेख प्राप्त हुए हैं
(A) कलिंग
(B) जौगड़
(C) कटक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) जौगड़

24. अशोक को कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक बताया है
(A) विल्हण ने
(B) कल्हण ने
(C) रविकीर्ति ने
(D) हरिषेण ने
उत्तर:
(B) कल्हण ने

25. अशोक का तेरहवां शिलालेख, जिसमें कलिंग विजय का वर्णन है, प्राप्त हुआ है
(A) धौली से
(B) मानसेहरा से
(C) जौगढ़ से
(D) गिरनार से
उत्तर:
(A) धौली से

26. पाषाण स्तम्भ का ऊपरी भाग जो राष्ट्रीय चिहन के रूप में लिया गया है वह है
(A) सारनाथ का
(B) प्रयाग का
(C) कौशाम्बी का
(D) इलाहाबाद का
उत्तर:
(A) सारनाथ का

27. सातवाहनों की राजभाषा थी
(A) संस्कृत
(B) पाली
(C) तमिल
(D) प्राकृत
उत्तर:
(D) प्राकृत

28. गौतमी पुत्र शातकर्णि ने उपाधि धारण की
(A) स्वामी
(B) महाराज
(C) राजराज
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

29. सातवाहन काल में नगरों में जलपूर्ति का प्रबन्ध करने वाले अधिकारी को कहा जाता था
(A) पनिपहारक
(B) पनिहारक
(C) पनिहार
(D) पनिहारा
उत्तर:
(A) पनिपहारक

30. श्रेणी धर्म क्या था?
(A) निगम सभा
(B) धर्म सभा
(C) व्यापारिक निगम
(D) राजसभा
उत्तर:
(C) व्यापारिक निगम

31. सातवाहन काल में व्यावसायिक संघ की अलग-अलग श्रेणी के प्रधान को कहा जाता था
(A) श्रेष्ठिन
(B) श्रेष्ठ
(C) श्रेणिक
(D) श्रोता
उत्तर:
(A) श्रेष्ठिन

32. कुषाण काल में कला का प्रमुख केन्द्र था
(A) मथुरा
(B) तक्षशिला
(C) वाराणसी
(D) पेशावर
उत्तर:
(A) मथुरा

33. कुषाणों को भारत की किस शक्ति ने हराया?
(A) चोलों ने
(B) राष्ट्रकूटों ने
(C) गुप्तशासकों ने
(D) आन्ध्रशासकों ने
उत्तर:
(C) गुप्तशासकों ने

34. ‘पुरुषपुर’ किस शासक की राजधानी थी?
(A) अशोक की
(B) हर्ष की
(C) समुद्रगुप्त की
(D) कनिष्क की
उत्तर:
(D) कनिष्क की

35. ‘चरक संहिता’ में वर्णन है
(A) रामायण का
(B) महाभारत का
(C) चित्रकला का
(D) भारतीय जड़ी-बूटियों का
उत्तर:
(D) भारतीय जड़ी-बूटियों का

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36. भारतीय व यूनानी कला का मिश्रण थी
(A) गुप्त कला
(B) मथुरा कला
(C) गन्धार कला
(D) अमरावती कला
उत्तर:
(C) गन्धार कला

37. ‘संगम’ किस भाषा का शब्द है?
(A) हिन्दी
(B) संस्कृत
(C) तमिल
(D) कन्नड़
उत्तर:
(B) संस्कृत

38. ‘संगम’ शब्द का अर्थ है
(A) सभा
(B) समिति
(C) राजा
(D) प्रजा
उत्तर:
(A) सभा

39. तमिल संगम थी
(A) तमिल सेना
(B) नदी
(C) कवियों की सभा
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कवियों की सभा

40. प्रथम संगम कहाँ हुआ था?
(A) मदुरा
(B) कपातपुरम्
(C) कांची
(D) चेन्नई
उत्तर:
(A) मदुरा

41. तोलकाप्पियम किस संगम का ग्रन्थ है?
(A) प्रथम
(B) द्वितीय
(C) तृतीय
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) द्वितीय

42. संक्षिप्त वेद कहा जाता है
(A) तोलकाप्पियम
(B) पत्थुप्पात्तु
(C) तिरुकुराल
(D) शिलप्पादिकारम्
उत्तर:
(C) तिरुकुराल

43. वनिगर कहते थे
(A) कृषक को
(B) सैनिक को
(C) व्यापारी को
(D) ब्राह्मण को
उत्तर:
(C) व्यापारी को

44. ‘मा’ व ‘वेलि’ कहते थे
(A) भूमि की माप
(B) पैदल व हस्ति सेना
(C) नृत्य व नृत्यांगना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) पैदल व हस्ति सेना

45. ‘एनाडि’ की उपाधि किसे दी जाती थी?
(A) राजा को
(B) योद्धाओं को
(C) मन्त्रियों को
(D) किसानों को
उत्तर:
(B) योद्धाओं को

46. संगमकाल में ‘अवनम्’ कहते थे
(A) नगर में बाजार को
(B) यवनों के निवास स्थान को
(C) राजदरबार को
(D) सेना को
उत्तर:
(A) नगर में बाजार को

47. संगमकाल में भारत से निर्यात होने वाली प्रमुख वस्तुएँ थीं
(A) रूई व रेशम
(B) मसाले
(C) हाथी दाँत
(D) हथियार
उत्तर:
(B) मसाले

48. समुद्रगुप्त का महाकवि था
(A) हरिषेण
(B) वीरसेन
(C) रुद्रसेन
(D) वागसेन
उत्तर:
(A) हरिषेण

49. गुप्त संवत् आरम्भ हुआ
(A) 320 ई० से
(B) 320 ई०पू० से
(C) 240 ई० से
(D) 335 ई० से
उत्तर:
(A) 320 ई० से

50. चन्द्रगुप्त प्रथम का उत्तराधिकारी था
(A) स्कन्दगुप्त
(B) कुमारगुप्त
(C) समुद्रगुप्त
(D) चन्द्रगुप्त द्वितीय
उत्तर:
(C) समुद्रगुप्त

51. ‘गरुड़’ की उपाधि किस गुप्त सम्राट ने धारण की?
(A) चन्द्रगुप्त प्रथम
(B) चन्द्रगुप्त द्वितीय
(C) समुद्रगुप्त
(D) स्कन्दगुप्त
उत्तर:
(C) समुद्रगुप्त

52. शकारी की उपाधि धारण की
(A) समुद्रगुप्त
(B) चन्द्रगुप्त द्वितीय
(C) चन्द्रगुप्त प्रथम
(D) कुमारगुप्त
उत्तर:
(B) चन्द्रगुप्त द्वितीय

53. इलाहाबाद स्तम्भ लेख का लेखक था?
(A) नागसेन
(B) हरिषेण
(C) कालिदास
(D) विशाखदत्त
उत्तर:
(B) हरिषेण

54. महरौली लौह-स्तम्भ सम्बन्धित है
(A) समुद्रगुप्त से
(B) समगुप्त से
(C) चन्द्रगुप्त द्वितीय से
(D) कुमारगुप्त से
उत्तर:
(C) चन्द्रगुप्त द्वितीय से

55. गुप्तकाल की मूर्तिकला का सर्वोत्तम उदाहरण माना जाता है
(A) सूर्य की मूर्ति
(B) सारनाथ की बुद्ध-मूर्ति
(C) विष्णु की मूर्ति
(D) मथुरा में खड़े हुए बुद्ध की मूर्ति
उत्तर:
(B) सारनाथ की बुद्ध-मूर्ति

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56. पंचतन्त्र का लेखक था
(A) विष्णु शर्मा
(B) शूद्रक
(C) कालिदास
(D) भारवि
उत्तर:
(A) विष्णु शर्मा

57. शकों को पराजित करने वाला गुप्त सम्राट् था
(A) समुद्रगुप्त
(B) चन्द्रगुप्त प्रथम
(C) चन्द्रगुप्त द्वितीय
(D) रामगुप्त
उत्तर:
(C) चन्द्रगुप्त द्वितीय

58. गुप्तकाल में कला, विद्या एवं व्यापार का प्रमुख केन्द्र था
(A) इन्द्रप्रस्थ
(B) थानेसर
(C) उज्जैन
(D) थार
उत्तर:
(C) उज्जैन

59. ‘मुद्राराक्षस’ किस प्रकार का नाटक है?
(A) जासूसी
(B) ऐतिहासिक
(C) रोमांचक
(D) हास्यप्रद
उत्तर:
(B) ऐतिहासिक

60. गुप्त वंश के पतन का निम्नलिखित कारण था
(A) सैनिक दुर्बलता
(B) हूणों के आक्रमण
(C) स्कन्दगुप्त के अयोग्य उत्तराधिकारी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

61. महाजनपदों के शासक किसानों से उनकी उपज का लगभग 1/6 हिस्सा कर के रूप में लेने लगे थे। यह कर कहा जाता था
(A) भू-राजस्व
(B) बलि
(C) भाग
(D) हिस्सा
उत्तर:
(C) भाग

62. अशोक के प्राप्त अभिलेखों की संख्या है
(A) 44
(B) 77
(C) 75
(D) 66
उत्तर:
(A) 44

63. उत्तर पश्चिमी भारत में लगवाए अभिलेखों में अशोक ने किस लिपि का प्रयोग किया?
(A) खरोष्ठी
(B) ब्राह्मी
(C) आरमाईक
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) खरोष्ठी

64. सोलह महाजनपदों का उदय हुआ
(A) ऋग्वैदिक युग में
(B) गुप्त युग में
(C) मौर्य युग में
(D) बुद्ध युग में
उत्तर:
(D) बुद्ध युग में

65. अशोक की कलिंग विजय का उल्लेख किस अभिलेख में मिलता है?
(A) 10वें अभिलेख में
(B) 12वें अभिलेख में
(C) 13वें अभिलेख में
(D) 11वें अभिलेख में
उत्तर:
(C) 13वें अभिलेख में

66. “प्रजा की भलाई में ही उसकी (राजा की) भलाई है।” यह कहा
(A) अशोक ने
(B) कौटिल्य ने
(C) मैगस्थनीज ने
(D) मनु ने
उत्तर:
(B) कौटिल्य ने

67. मैगस्थनीज किस शासक के दरबार में मेहमान बनकर रहा?
(A) सिकन्दर के
(B) चन्द्रगुप्त मौर्य के
(C) कुमारगुप्त के
(D) समुद्रगुप्त के
उत्तर:
(B) चन्द्रगुप्त मौर्य के

68. महाजनपदों की संख्या थी
(A) 20
(B) 18
(C) 26
(D) 16
उत्तर:
(D) 16

69. ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफलता पाई
(A) कनिंघम ने
(B) जेम्स प्रिंसेप ने
(C) जॉन मार्शल ने
(D) व्हीलर ने
उत्तर:
(B) जेम्स प्रिंसेप ने

70. ‘प्रियदस्सी’ की उपाधि धारण की
(A) चंद्रगुप्त में
(B) बिंदुसार ने
(C) अशोक ने
(D) अजातशत्रु ने
उत्तर:
(C) अशोक ने

71. सिक्कों का अध्ययन कहलाता है
(A) पुरातत्व
(B) मुद्राशास्त्र
(C) धर्मशास्त्र
(D) अर्थशास्त्र
उत्तर:
(B) मुद्राशास्त्र

72. प्रिंसेप अशोक के अभिलेखों की ब्राह्मी लिपि को पढ़ने में सफल हुआ
(A) 1828 ई० में
(B) 1938 ई० में
(C) 1838 ई० में
(D) 1848 ई० में
उत्तर:
(C) 1838 ई० में

73. सोने की खानों के लिए महत्त्वपूर्ण था
(A) सुवर्णगिरि
(B) उज्जयिनी
(C) तोसाली
(D) तक्षशिला
उत्तर:
(A) सुवर्णगिरी

74. प्रभावती किस गुप्त शासक की पुत्री थी?
(A) चंद्रगुप्त प्रथम
(B) समुद्रगुप्त
(C) चंद्रगुप्त द्वितीय
(D) स्कंदगुप्त
उत्तर:
(C) चंद्रगुप्त द्वितीय

75. छठी सदी ई०पू० से कृषि उपज बढ़ाने का तरीका था
(A) सिंचाई को बढ़ावा
(B) धान का रोपण
(C) लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

76. धम्म का संदेश देने वाला था
(A) अशोक
(B) चाणक्य
(C) बिंदुसार
(D) चंद्रगुप्त मौर्य
उत्तर:
(A) अशोक

77. शिल्पकारों और व्यापारियों के संघ को कहा जाता था
(A) समूह
(B) श्रेणी
(C) गण
(D) समिति
उत्तर:
(B) श्रेणी

78. धम्म महामात्र नामक विशेष अधिकारी नियुक्त करने वाला था
(A) समुद्रगुप्त
(B) चंद्रगुप्त मौर्य
(C) अशोक
(D) चंद्रगुप्त द्वितीय
उत्तर:
(C) अशोक

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
सर्वप्रथम सिक्कों का चलन कब आरंभ हुआ?
उत्तर:
सर्वप्रथम सिक्कों का चलन पाँचवीं सदी ई०पू० के लगभग से आरंभ हुआ।

प्रश्न 2.
जनपद शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जनपद शब्द का अर्थ है जहाँ लोगों ने अपना पाँव रखा अर्थात् जहाँ बस गए।

प्रश्न 3.
गंगा व सोन नदियों के संगम पर ‘पाटलिपुत्र’ नामक नगर की स्थापना किसने की?
उत्तर:
पाटलिपुत्र नगर की स्थापना बिम्बिसार ने की।

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प्रश्न 4.
अभिलेखों के अध्ययन को क्या कहते हैं?
उत्तर:
अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेख शास्त्र कहते हैं।

प्रश्न 5.
पंचमार्क सिक्कों का आकार कैसा था?
उत्तर:
पंचमार्क सिक्कों का आकार आयताकार या वृत्ताकार होता था।

प्रश्न 6.
जातक क्या है?
उत्तर:
जातक महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाएँ हैं।

प्रश्न 7.
जातकों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
जातकों की संख्या 549 है।

प्रश्न 8.
‘पेरिप्लस’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पेरिप्लस का अर्थ है-समुद्री यात्रा।

प्रश्न 9.
पतिवेदक कौन थे?
उत्तर:
पतिवेदक अशोक के काल में रिपोर्टर थे।

प्रश्न 10.
‘इंडियन एपिग्राफी एंड इंडियन एपिग्राफिकल ग्लोसरी’ नामक पुस्तक किसकी रचना है?
उत्तर:
‘इंडियन एपिग्राफी एंड इंडियन एपिग्राफिकल ग्लोसरी’ डी०सी० सरकार की रचना है।

प्रश्न 11.
बंगाल एशियाटिक सोसायटी का गठन कब हुआ?
उत्तर:
बंगाल एशियाटिक सोसायटी का गठन 1784 ई० में हुआ।

प्रश्न 12.
‘देवानापिय’ किस राजा की उपाधि थी?
उत्तर:
‘देवानांपिय’ राजा अशोक की उपाधि थी।

प्रश्न 13.
ओलीगार्की या समूह शासन किसे कहते हैं?
उत्तर:
ओलीगार्की या समूह शासन उसे कहते हैं जहाँ सत्ता पुरुषों के एक समूह के हाथ में हो।

प्रश्न 14.
राजगाह का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
राजगाह का शाब्दिक अर्थ है ‘राजाओं का घर’।

प्रश्न 15.
सुवर्णगिरि (सोने का पहाड़) कहाँ थी?
उत्तर:
सुवर्णगिरि कर्नाटक में थी।

प्रश्न 16.
महाजनपदों की संख्या कितनी थी?
उत्तर:
महाजनपदों की संख्या 16 थी।

प्रश्न 17.
भारत में सबसे अधिक अभिलेख किस शासक के हैं?
उत्तर:
भारत में सबसे अधिक अभिलेख अशोक के हैं।

प्रश्न 18.
छठी से चौथी सदी ई०पू० में कौन-सा महाजनपद सबसे शक्तिशाली बन गया?
उत्तर:
छठी से चौथी सदी ई०पू० में मगध महाजनपद सबसे शक्तिशाली बन गया।

प्रश्न 19. अपनी सोने की खानों के कारण कौन-सा स्थान उपयोगी था?
उत्तर:
अपनी सोने की खानों के कारण सुवर्णगिरि उपयोगी था।

प्रश्न 20.
अशोक ने धम्म प्रचार के कौन-से विशेष अधिकारी नियुक्त किए?
उत्तर:
अशोक ने धम्म प्रचार के लिए ‘धम्म महामात्र’ नामक विशेष अधिकारी नियुक्त किए।

प्रश्न 21.
भारत के सबसे प्रसिद्ध विधि ग्रंथ का नाम बताएँ।
उत्तर:
भारत का सबसे प्रसिद्ध विधि ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ है।।

प्रश्न 22.
भारत में आधुनिक भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल कौन-सी लिपि है?
उत्तर:
आधुनिक भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी लिपि है।

प्रश्न 23.
‘लिच्छिवी दौहित्र’ कौन था?
उत्तर:
‘लिच्छिवी दौहित्र’ समुद्रगुप्त था।

प्रश्न 24.
गुप्तकालीन धातुकला का उत्कृष्ट नमूना कौन-सा है?
उत्तर:
गुप्तकालीन धातुकला का उत्कृष्ट नमूना महरौली का लौह स्तम्भ है।

प्रश्न 25.
गुप्त काल की राजभाषा क्या थी?
उत्तर:
गुप्त काल की राजभाषा संस्कृत थी।

प्रश्न 26.
गुप्तकाल का महान् खगोलज्ञ व गणितज्ञ कौन था?
उत्तर:
गुप्तकाल का महान खगोलज्ञ व गणितज्ञ आर्यभट्ट था।

प्रश्न 27.
छठी शताब्दी ई० पूर्व में कितने महाजनपद थे? किन्हीं चार के नाम बताएँ।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई०पूर्व में कुल 16 महाजनपद थे। इनमें से मगध, काशी, कौशल तथा कुरू को मुख्य चार के रूप में बता सकते हैं।

प्रश्न 28.
तक्षशिला किस जनपद की राजधानी थी?
उत्तर:
तक्षशिला गांधार जनपद की राजधानी थी।

प्रश्न 29.
बिम्बिसार तथा अजातशत्रु किस महाजनपद के दो प्रसिद्ध शासक थे?
उत्तर:
बिम्बिसार तथा अजातशत्रु मगध जनपद के प्रसिद्ध शासक थे।

प्रश्न 30.
छठी शताब्दी ई०पू० में राजगृह किस महाजनपद की राजधानी थी?
उत्तर:
छठी शताब्दी ई०पू० राजगृह मगध महाजनपद की राजधानी थी।

प्रश्न 31.
मगध के किस शासक ने अवन्ति महाजनपद को अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया?
उत्तर:
शिशुनाग ने अवन्ति को मगध में सम्मिलित किया।

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प्रश्न 32.
घनानंद किस वंश का अन्तिम शासक था?
उत्तर:
घनानंद मगध के नंद वंश का अन्तिम शासक था।

प्रश्न 33.
मत्स्य जनपद की राजधानी कौन-सी थी?
उत्तर:
मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर थी।

प्रश्न 34.
उज्जैन किस जनपद की राजधानी थी?
उत्तर:
उज्जैन अवन्ति जनपद की राजधानी थी।

प्रश्न 35.
श्रावस्ती किस जनपद की राजधानी थी?
उत्तर:
श्रावस्ती कौशल जनपद की राजधानी थी।

प्रश्न 36.
वह कौशल राजा, जिसने काशी को जीता था, का नाम क्या था?
उत्तर:
महाकौशल ने काशी को जीता था।

प्रश्न 37.
इन्द्रप्रस्थ किस जनपद की राजधानी थी?
उत्तर:
इन्द्रप्रस्थ कुरू जनपद की राजधानी थी।

प्रश्न 38.
वज्जि जनपद की राजधानी क्या थी?
उत्तर:
वज्जि जनपद की राजधानी वैशाली थी।

प्रश्न 39.
चन्द्रगुप्त मौर्य ने किस यूनानी शासक को हराया?
उत्तर:
चंद्रगुप्त मौर्य ने सेल्यूकस निकेटर नामक यूनानी शासक को हराया।

प्रश्न 40.
मैगस्थनीज़ कौन था?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में यूनानी शासक सेल्यूकस का राजदूत था।

प्रश्न 41.
अशोक के समय के दो प्रसिद्ध स्तूप कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
सांची तथा भारहुत के स्तूप अशोक के समय के प्रसिद्ध स्तूप हैं।

प्रश्न 42.
इण्डिका का लेखक कौन था?
उत्तर:
इण्डिका का लेखक मैगस्थनीज़ था।

प्रश्न 43.
मैगस्थनीज़ किसके शासन काल में भारत आया?
उत्तर:
मैगस्थनीज़ चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन-काल में भारत आया।

प्रश्न 44.
कौटिल्य कौन था?
उत्तर:
कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रधानमन्त्री था।

प्रश्न 45.
कौटिल्य (चाणक्य) ने राजनीति से सम्बन्धित कौन-सी पुस्तक की रचना की ?
उत्तर:
कौटिल्य (चाणक्य) ने राजनीति से सम्बन्धित ‘अर्थशास्त्र’ की रचना की।

प्रश्न 46.
अशोक ने किस नयी नैतिक विचारधारा का प्रचार किया?
उत्तर:
अशोक ने धम्म नामक विचारधारा का प्रचार किया।

प्रश्न 47.
धम्म के प्रचार के लिए अशोक ने कौन-से विशेष अधिकारी नियुक्त किए?
उत्तर:
धम्म के प्रचार के लिए अशोक ने धम्म महामात्र अधिकारी नियुक्त किए।

प्रश्न 48.
अशोक ने किन दो नए नगरों की स्थापना की?
उत्तर:
अशोक ने श्रीनगर तथा ललितापाटन नामक दो नगरों की स्थापना की।

प्रश्न 49.
कलिंग का युद्ध कब हुआ?
उत्तर:
कलिंग का युद्ध 261 ई०पू० में हुआ।

प्रश्न 50.
वर्तमान भारत के राष्ट्रीय चिह्न कहाँ से लिए गए हैं?
उत्तर:
वर्तमान भारत के राष्ट्रीय चिह्न सारनाथ के अशोक स्तम्भ से लिए गए हैं।

प्रश्न 51.
अशोक के अभिलेख कौन-सी दो लिपियों में मिले हैं?
उत्तर:
अशोक के अभिलेख ब्राह्मी लिपि तथा खरोष्ठी लिपि में मिले हैं।

प्रश्न 52.
हरिषेण कौन था ?
उत्तर:
हरिषेण गुप्त शासक समुद्रगुप्त (335-375 ई०) के दरबार में सेनापति और साथ ही लेखक और कवि था। वह ‘प्रयाग प्रशस्ति’ का लेखक है। इसमें उसने अपने शासक समुद्रगुप्त को ‘परमात्मा तुल्य’ कहते हुए बखान किया है।

प्रश्न 53.
चन्द्रगुप्त मौर्य को ‘एण्ड्रोकोट्स’ किस लेखक ने कहा है?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त मौर्य को ‘एण्ड्रोकोट्स’ प्लूटार्क ने कहा है।

प्रश्न 54.
सिंहासन पर आसीन होने के पश्चात् अशोक ने कौन-सी उपाधि धारण की?
उत्तर:
सिंहासन पर आसीन होने के पश्चात् अशोक ने ‘देवानामप्रिय’ की उपाधि धारण की।

प्रश्न 55.
सारनाथ स्तम्भ के शिरोभाग में सिंह के बीच में एक चक्र है, यह चक्र किसका सूचक है?
उत्तर:
यह चक्र धर्म का सूचक है।

प्रश्न 56.
कारखानों तथा खानों के मन्त्री को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
कारखानों तथा खानों के मन्त्री को कर्मान्तिक कहा जाता था।

प्रश्न 57.
मौर्यशासन काल में कृषि विभाग के अध्यक्ष को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
मौर्यशासन काल में कृषि विभाग के अध्यक्ष को सीताध्यक्ष कहा जाता था।

प्रश्न 58.
अर्थशास्त्र की रचना किस भाषा में हुई?
उत्तर:
अर्थशास्त्र की रचना संस्कृत भाषा में हुई।

प्रश्न 59.
मौर्य-शासनकाल में राजकीय कोष का प्रमुख कौन होता था?
उत्तर:
मौर्य-शासनकाल में राजकीय कोष का प्रमुख सन्निधाता होता था।

प्रश्न 60.
मीनाण्डर का शासनकाल क्या था?
उत्तर:
मीनाण्डर का शासनकाल 165-145 ई०पू० था।

प्रश्न 61.
मीनाण्डर की राजधानी का नाम बताएँ।
उत्तर:
मीनाण्डर की राजधानी का नाम शाकल (श्यालकोट) था।

प्रश्न 62.
मीनाण्डर का किस बौद्ध भिक्षु के साथ वाद-विवाद हुआ?
उत्तर:
मीनाण्डर का नागसेन (नागार्जुन) बौद्ध-भिक्षु के साथ वाद-विवाद हुआ।

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प्रश्न 63.
पहली बार सोने के सिक्के किसने जारी किए?
उत्तर:
पहली बार सोने के सिक्के हिन्द-यूनानी शासकों ने जारी किए।

प्रश्न 64.
विक्रम संवत् का प्रारम्भ कब हुआ?
उत्तर:
विक्रम संवत् का प्रारम्भ 58 ई०पू० से माना जाता था।

प्रश्न 65.
शकों का सबसे शक्तिशाली राजा कौन-था?
उत्तर:
शकों का सबसे शक्तिशाली राजा रुद्रदामा (रुद्रदमन) था।

प्रश्न 66.
सुदर्शन झील की मरम्मत किस शक राजा ने करवाई?
उत्तर:
सुदर्शन झील की मरम्मत रूद्रदमन प्रथम ने करवाई।

प्रश्न 67.
शक संवत् का प्रारम्भ कब से माना जाता है?
उत्तर:
शक संवत् का प्रारम्भ 78 ई० से माना जाता है।

प्रश्न 68.
कुषाणों का सबसे प्रसिद्ध शासक कौन था?
उत्तर:
कुषाणों का सबसे प्रसिद्ध शासक कनिष्क था।

प्रश्न 69.
कनिष्क की राजधानी का नाम बताएँ।
उत्तर:
कनिष्क की राजधानी का नाम पुरुषपुर (पेशावर) था।

प्रश्न 70.
मगध-विजय अभियान में कनिष्क को मिलने वाला बौद्ध विद्वान कौन था?
उत्तर:
मगध-विजय अभियान में कनिष्क को मिलने वाला बौद्ध विद्वान् अश्वघोष था।

प्रश्न 71.
कनिष्क द्वारा बसाए गए नगर का नाम बताएँ।
उत्तर:
कनिष्क द्वारा बसाए गए नगर का नाम कनिष्कपुर था।

प्रश्न 72.
कनिष्क की सबसे महत्त्वपूर्ण विजय कौन-सी थी?
उत्तर:
कनिष्क की सबसे महत्वपूर्ण विजय चीन क्षेत्र की विजय थी।

प्रश्न 73.
कनिष्क द्वारा धारण की गई उपाधि का नाम बताएँ।
उत्तर:
कनिष्क द्वारा धारण की गई उपाधि का नाम देवपुत्र था।

प्रश्न 74.
तमिल संगम से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
तमिल कवियों की सभा या सम्मेलन तमिल संगम होता है।

प्रश्न 75.
टूटे हुए सिर वाली कनिष्क की मूर्ति किस कला का नमूना है?
उत्तर:
टूटे हुए सिर वाली कनिष्क की मूर्ति मथुरा कला का नमूना है।

प्रश्न 76.
‘बुद्ध चरित’ का लेखक कौन था?
उत्तर:
‘बुद्ध चरित’ का लेखक अश्वघोष था।

प्रश्न 77.
सबसे प्रसिद्ध भारतीय-यूनानी शासक कौन था?
उत्तर:
सबसे प्रसिद्ध भारतीय-यूनानी शासक मीनाण्डर था।

प्रश्न 78.
कुषाणकाल में कौन-सी नई मूर्तिकला का आरम्भ हुआ?
उत्तर:
कुषाणकाल में गान्धार कला की मूर्तिकला का आरंभ हुआ।

प्रश्न 79.
शक संवत् किस शासक ने चलाया?
उत्तर:
शक संवत् कनिष्क ने चलाया।

प्रश्न 80. शक कहाँ के मूल निवासी थे?
उत्तर:
शक मध्य एशिया के मूल निवासी थे।

प्रश्न 81.
सातवाहन राज्य में स्थानीय सामंतों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
सातवाहन राज्य में स्थानीय सामंतों को महाभोज कहा जाता था।

प्रश्न 82.
भूमि दान-पत्रों को रखने वाले अधिकारी को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
भूमि दान-पत्रों को रखने वाले अधिकारी को पत्तिक पालक कहा जाता था।

प्रश्न 83.
व्याकरण विषय की तोलकाप्पियम पुस्तक किस भाषा में लिखी गई है?
उत्तर:
व्याकरण विषय की तोलकाप्पियम पुस्तक तमिल भाषा में लिखी गई है।

प्रश्न 84.
संगम साहित्य किस भाषा में लिखा गया है?
उत्तर:
संगम साहित्य तमिल भाषा में लिखा गया है।

प्रश्न 85.
‘बाइबिल ऑफ तमिल’ कौन-सी पुस्तक को कहा जाता है?
उत्तर:
‘बाइबिल ऑफ तमिल’ ‘तिरूक्कुराल’ पुस्तक को कहा जाता है।

प्रश्न 86.
तमिल कविता की आँडिसी कौन-सी पुस्तक है?
उत्तर:
तमिल कविता की आँडिसी मणिमेरवलॅम् पुस्तक है।

प्रश्न 87.
कौन-सी पुस्तक ‘बुक ऑफ मैरिज’ है?
उत्तर:
जीवक चिंतामणि ‘बुक ऑफ मैरिज’ है।

प्रश्न 88.
चोल शासकों में सबसे प्रतापी शासक का नाम बताइए।
उत्तर:
चोल शासकों में सबसे प्रतापी शासक का नाम कारिकाल था।

प्रश्न 89.
पुहार की स्थापना किसने की?
उत्तर:
पुहार की स्थापना राजा कारिकाल ने की।

प्रश्न 90.
चेर राज्य की राजधानी का नाम बताएँ।
उत्तर:
चेर राज्य की राजधानी का नाम वज्जि था।

प्रश्न 91.
चेर राज्य के सबसे महान राजा का नाम तथा राज्य का प्रतीक चिहन बताइए।
उत्तर:
महान् राजा शेनगुटुन लाल चेर तथा राज्य का प्रतीक चिह्न धनुष था।

प्रश्न 92.
पाड्य राज्य की राजधानी का क्या नाम था?
उत्तर:
पांड्य राज्य की राजधानी का नाम मदुरा था।

प्रश्न 93.
रोम से प्रमुख व्यापार कौन-से युग में होता था?
उत्तर:
रोम से प्रमुख व्यापार संगम युग में होता था।

प्रश्न 94.
तिरुक्कुरल के लेखक कौन थे?
उत्तर:
तिरुक्कुरल के लेखक तिरुवल्लुवर थे।

प्रश्न 95.
गुप्त वंश का संस्थापक किसे माना जाता है?
उत्तर:
गुप्त वंश का संस्थापक श्री गुप्त को माना जाता है।

प्रश्न 96.
चन्द्रगुप्त प्रथम का शासनकाल बताएँ।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त प्रथम का शासनकाल 320 ई० से 335 ई० तक था।

प्रश्न 97.
गुप्त संवत् का प्रारम्भ कब हुआ?
उत्तर:
गुप्त संवत् का प्रारम्भ 320 ई० पू० से हुआ।

प्रश्न 98.
गुप्त संवत् किसने चलाया?
उत्तर:
गुप्त संवत् चन्द्रगुप्त प्रथम ने चलाया।

प्रश्न 99.
लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ किस गुप्त सम्राट ने विवाह किया था?
उत्तर:
लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी के साथ चन्द्रगुप्त प्रथम ने विवाह किया था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 100.
चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपना उत्तराधिकारी किसे नियुक्त किया?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपना उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त को नियुक्त किया।

प्रश्न 101.
समुद्रगुप्त गद्दी पर कब बैठा?
उत्तर:
समुद्रगुप्त गद्दी पर 335 ई० में बैठा।

प्रश्न 102.
दक्षिण विजय अभियान में समुद्रगुप्त ने कितने राजाओं के संगठन को पराजित किया?
उत्तर:
दक्षिण विजय अभियान में समुद्रगुप्त ने 12 राजाओं के संघ को पराजित किया।

प्रश्न 103.
किस गुप्त शासक ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की थी?
उत्तर:
चन्द्रगुप्त द्वितीय ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की थी।

प्रश्न 104.
भारतीय नेपोलियन किसे कहा गया?
उत्तर:
भारतीय नेपोलियन समुद्रगुप्त को कहा गया।

प्रश्न 105.
इलाहाबाद स्तम्भ लेख का लेखक कौन था?
उत्तर:
इलाहाबाद स्तम्भ लेख का लेखक हरिषेण था।

प्रश्न 106.
अर्थशास्त्र पुस्तक के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
कौटिल्य।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पुरालेख शास्त्र तथा पुरा लिपिशास्त्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
अभिलेख मोहरों, प्रस्तर स्तंभों, स्तूपों, चट्टानों और ताम्रपत्रों (भूमि अनुदान पत्र) इत्यादि पर मिलते हैं। ये ईंटों या मूर्तियों पर भी मिलते हैं। इनके अध्ययन को पुरालेख शास्त्र (Ephigraphy) कहा जाता है। अभिलेखों तथा अन्य पुराने दस्तावेजों की तिथियों के अध्ययन को पुरालिपि शास्त्र (Palaeography) कहा जाता है।

प्रश्न 2.
600 ई०पू० में भारतीय उपमहाद्वीप पर विकसित हुए शहरों और कस्बों की सूची बनाइए।
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग छठी शताब्दी ई०पू० में विभिन्न क्षेत्रों में कई नगरों का उदय हुआ। ये नगर हड़प्पा सभ्यता के काफी समय बाद हड़प्पा क्षेत्रों से उत्तर:पूर्व में मुख्यतः गंगा-यमुना की घाटी में पैदा हुए। इनमें से अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थीं। प्रमुख नगरों व कस्बों की सूची इस प्रकार से है-(1) पाटलिपुत्र, (2) उज्जयिनी, (3) कौशाम्बी, (4) अयोध्या, (5) श्रावस्ती, (6) काशी, (7) तक्षशिला अस्सपुर, (8) वैशाली, (9) कुशीनगर, (10) कपिलवस्तु, (11) साकेत, (12) मारूकच्छ (भड़ौच), (13) सोपारा, (14) तक्षशिला।

प्रश्न 3.
भूमि अनुदान पत्रों से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भूमि अनुदान पत्र अभिलेखों में ही सम्मिलित किए जाते हैं। इन दान पत्रों में राजाओं, राज्याधिकारियों, रानियों, शिल्पियों, व्यापारियों इत्यादि द्वारा दिए गए धर्मार्थ धन, मवेशी, भूमि आदि का उल्लेख मिलता है। राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमि अनुदान पत्र का विशेष महत्त्व है क्योंकि इनमें प्राचीन भारत की व्यवस्था और प्रशासन से संबंधित जानकारी मिलती है। ईस्वी की आरंभिक शती से ऐसे अनुदान पत्र मिलने लगते हैं। अधिकांशतः ये ताम्रपत्रों पर खुदे हुए हैं। भूमि अनुदानकर्ता इन्हें दान प्राप्तकर्ता को प्रमाण के रूप में देते थे। सामान्यतः इन अनुदान पत्रों में भिक्षुओं, ब्राह्मणों, मंदिरों, विहारों, जागीरदारों और अधिकारियों को दिए गए गाँवों, भूमियों और राजस्व के दानों का विवरण उपलब्ध है।

प्रश्न 4.
अभिलेखों के साक्ष्य की सीमाएँ स्पष्ट करें।
उत्तर:
इतिहास की पुनर्रचना में अभिलेख विश्वस्त स्रोत माने जाते हैं। परंतु इनकी अपनी सीमाएँ भी होती हैं

(1) कभी-कभी अभिलेखों के कुछ भाग नष्ट हो जाते हैं इससे अक्षर लोप हो जाते हैं। जिस कारण शब्दों वाक्यों का अर्थ समझ पाना कठिन हो जाता है।
राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

(2) एक सीमा यह भी रहती है कि अभिलेखों में उनके उत्कीर्ण करवाने वाले के विचारों को बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त किया जाता है। अतः तत्कालीन सामान्य विचारों से इनका संबंध नहीं होता। फलतः कई बार ये जन-सामान्य के विचारों और कार्यकलापों पर प्रकाश नहीं डाल पाते।
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प्रश्न 5.
पंचमार्क सिक्कों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विनिमय के साधन के रूप में सिक्कों का प्रचलन शुरू हुआ। सबसे पहले छठी शती ई०पू० में चाँदी और ताँबे के आयताकार या वृत्ताकार टुकड़े बनाए गए। इन टुकड़ों पर ठप्पा मारकर अनेक प्रकार के चिह्न जैसे कि सूर्य, वृक्ष, मानव, खरगोश, बिच्छु, साँप आदि खोदे हुए थे। इन्हें पंचमार्क या आहत सिक्के कहते हैं। इस प्रकार के पंचमार्क सिक्के भारतीय उपमहाद्वीप के अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 6.
‘प्रयाग प्रशस्ति’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
प्रयाग प्रशस्ति का संबंध गुप्त शासक समुद्रगुप्त से है। इसका लेखक समुद्रगुप्त का राजकवि हरिषेण था। यह अभिलेख 33 लाइनों में संस्कृत भाषा में है। इससे हमें समुद्रगुप्त के चरित्र (गुणों) तथा सफलताओं की जानकारी मिलती है। समुद्रगुप्त के गुणों का बखान करते हुए प्रयाग प्रशस्ति में लिखा है-“धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। अनेक गुणों और शुभकार्यों से संपन्न उन्होंने अपने पैर के तलवे से अन्य राजाओं के यश को खत्म कर दिया है।” समुद्रगुप्त की तुलना परमात्मा से भी की गई है। “वे परमात्मा पुरुष हैं …….वे करुणा से भरे हुए हैं… वे मानवता के लिए दिव्यमान उदारता की प्रतिमूर्ति हैं।”

प्रश्न 7.
कौटिल्य के अर्थशास्त्र पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मौर्यकालीन रचना है। इसके लेखक चाणक्य या विष्णुगुप्त या कौटिल्य हैं। कौटिल्य प्राचीन भारत का एक प्रमुख कूटनीतिज्ञ व नीतिकार था। वह मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य का शिक्षक व प्रधानमन्त्री था। पुस्तक के नाम से ऐसा आभास होता है कि इसकी विषय-सामग्री अर्थव्यवस्था से सम्बन्धित है, परन्तु इसमें शासन-सम्बन्धी विश्लेषण मुख्य है। इसमें शासक, उसकी सलाहकार परिषद्, जनता व शासक सम्बन्ध, न्याय व्यवस्था, शासन चलाने की प्रणाली, युद्ध नीति, विदेशी विशेषकर पड़ोसियों से सम्बन्धों के बारे में बताया है। यह रचना 15 खण्डों में विभाजित है। प्रत्येक खण्ड में लेखक ने तत्कालीन राजनीति, शासन-प्रबन्ध, भारत की स्थिति, समाज व संस्कृति को विस्तृत ढंग से बताया है।

प्रश्न 8.
अशोक के अभिलेखों के ऐतिहासिक महत्त्व पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अशोक के अभिलेखों से हमें महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इन अभिलेखों से अशोक के साम्राज्य विस्तार, उसकी शासन-व्यवस्था, धम्म प्रणाली तथा उसके द्वारा बौद्ध धर्म को फैलाने के लिए किए गए प्रयासों के प्रमाण उपलब्ध होते हैं। ये अभिलेख अशोक के चरित्र, उसकी पड़ोसियों के प्रति नीति तथा मौर्य कला पर भी प्रकाश डालते हैं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 9.
अग्रहार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अग्रहार से हमारा अभिप्राय उस भूमि से है जो अनुदान पत्रों के माध्यम से ब्राह्मणों को दी जाती थी। इस भूमि में ब्राह्मणों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा गया था। दूसरी ओर इस भूमि से जो आय होती थी वह ब्राह्मणों द्वारा धर्म एवं शिक्षा सम्बन्धी कार्यों पर खर्च की जाती थी।

प्रश्न 10.
गुप्तकाल में किए गए भूमि अनुदानों की दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारत में भूमि अनुदान की प्रणाली प्रथम शताब्दी ई० से प्रारंभ हो गई थी। उत्तरी भारत में भूमि अनुदान के उदाहरण गुप्तकाल में स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। गुप्तकाल की भूमि अनुदान के संबंध में निम्नलिखित दो विशेषताएँ उल्लेखनीय हैं

  • भूमि अनुदान मुख्य तौर पर ब्राह्मणों को एवं धार्मिक संस्थाओं को दिया जाता था।
  • दान देते समय दान प्राप्त करने वालों को उनके कर्तव्यों के बारे में स्पष्ट निर्देश दिए जाते थे।

प्रश्न 11.
गुप्तकालीन सिक्कों के बारे में जानकारी दीजिए। अथवा सोने के सिक्के के बारे में एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
प्राचीन काल में सोने के कुछ सर्वाधिक सुंदर सिक्के गुप्त शासकों ने चलाए। अनेक सिक्कों पर विष्णु और गरुड़ के चित्र अंकित हैं। चन्द्रगुप्त प्रथम ने सबसे पहले सोने के सिक्के जारी किए। इन सिक्कों में एक ओर चंद्रगुप्त और कुमार देवी की आकृति और दूसरी ओर एक देवी की आकृति तथा नीचे लिच्छवयः शब्द उत्कीर्ण है। समुद्रगुप्त की वीणा बजाते हुए मुद्रा तथा ‘अश्वमेध पराक्रम’ अंकित मुद्रा इस संबंध में विशेष उल्लेखनीय हैं। चन्द्रगुप्त द्वितीय के चाँदी के सिक्कों से पता चलता है कि उसने शकों को हराया। गुप्तकालीन सिक्कों का वजन कुषाण शासकों के सिक्कों के समान है। परंतु कुछ विद्वानों का विश्लेषण है कि कुषाण सिक्कों में स्वर्ण धातु की मात्रा अधिक थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 2 Img 2

प्रश्न 12.
बाद के गुप्त शासकों के काल में सोने के सिक्कों की कमी आने लगी थी। इतिहासकार इसका क्या अर्थ निकालते हैं?
उत्तर:
भारत में छठी शताब्दी ई० से सोने के सिक्कों के संचय कम मिले हैं। स्कंदगुप्त के राज्य काल (467 ई०) के अन्त में सोने के सिक्कों में सोने की मात्रा कम होने लगी थी। कुछ इतिहासकारों ने यह मत व्यक्त किया है कि इस कमी का मुख्य कारण पश्चिमी रोमन साम्राज्य के पतन के बाद लंबी दूरी के व्यापार में कमी आना था। इससे भारत की संपन्नता प्रभावित हुई तथा इससे भारत में नगरों का पतन होने लगा। परंतु कुछ अन्य इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं। उनका तर्क है कि इस काल में नये नगरों तथा व्यापार के नेटवर्क का उदय हो रहा था। उनका मत है कि यह ठीक है कि सिक्के कम मिलने लगे हैं परंतु अभिलेखों और ग्रंथों में सिक्कों का उल्लेख है तो क्या इसका अर्थ यह लिया जाए कि सिक्के प्रचलन में अधिक थे तथा इनका संग्रहण न हुआ हो।

प्रश्न 13.
अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी लिपि पढ़ने में कौन सफल रहा?
उत्तर:
अशोक के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं। यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी। यह आधुनिक भारतीय लिपियों की उद्गम लिपि भी है। ब्राह्मी लिपि को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1838 में पढ़ने (De cipher) में सफलता पाई। प्रिंसेप ने पाया कि अधिकांश अभिलेखों एवं सिक्कों पर ‘पियदस्सी’ राजा का उल्लेख है। कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम अशोक भी लिखा था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 2 Img 3
भारतीय इतिहासकार भारतीय शासकों की वंशावलियों की रचना के लिए विभिन्न अभिलेखों और ग्रंथों का उपयोग करने लगे थे। फलतः बीसवीं सदी के आरंभ तक भारत के राजनीतिक इतिहास की एक सामान्य रूपरेखा तैयार कर ली गई। इसके बाद इतिहासकार राजनीतिक परिवर्तन के संदर्भो को समझने का प्रयास करने लगे।

प्रश्न 14.
धम्म महामात्र कौन थे?
उत्तर:
अशोक ने धम्म के प्रचार के लिए विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की, इन्हें धम्म महामात्र कहा जाता था। अशोक ने धम्म नीति से अपने साम्राज्य में शांति-व्यवस्था तथा एकता बनाने का प्रयास किया। उसने लोगों में सार्वभौमिक धर्म के नियमों का प्रचार-प्रसार किया। अशोक के अनुसार, धर्म के प्रसार का लक्ष्य, लोगों के इहलोक तथा परलोक को सुधारना था। अशोक ने प्रचार करवाया कि धम्म के पालन से लोगों का जीवन इस संसार में और इसके बाद के संसार में अच्छा रहेगा। धम्म महामात्रों को व्यापक अधिकार दिए गए थे। उन्हें समाज के सभी वर्गों के कल्याण और सुख के लिए कार्य करना था।

प्रश्न 15.
‘कनिष्क ‘ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कनिष्क को इतिहास में एक महान शासक के रूप में जाना जाता है। वह कुषाण वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा था। कनिष्क ने 78 ई० (लगभग) में राजगद्दी ग्रहण की। उसकी राजधानी पुरुषपुर थी। उसने अपने शासनकाल में पंजाब, कश्मीर, उज्जैन, मथुरा, मगध आदि क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। कनिष्क की चीन विजय को सबसे महानतम विजय कहा जाता है। उसने चीन के शासक को युद्ध में पराजित करके काफी बड़े क्षेत्र को अपने राज्य में शामिल किया था। कनिष्क एक धार्मिक प्रवृत्ति का बुद्धिमान शासक था। वह मूल रूप से सूर्य की पूजा किया करता था। कनिष्क ने बाद में बौद्ध धर्म अपनाया तथा उसका अनुसरण किया।

बौद्ध धर्म की नवीन शाखा ‘महायान’ के प्रचार-प्रसार में कनिष्क का महत्त्वपूर्ण योगदान था। उसने बौद्ध धर्म से संबंधित कई स्तूपों तथा मठों का निर्माण करवाया। उसने देश-विदेश में बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए प्रचारक नियुक्त किए। बौद्ध धर्म की चौथी सभा का आयोजन कनिष्क द्वारा ही करवाया गया था। इस सभा में शामिल भिक्षुओं ने अपने विचारों तथा अनुभव के आधार पर बौद्ध धर्म में चल रहे मतभेदों को दूर करने का प्रयास किया। कनिष्क बौद्ध भिक्षुओं की धन से भी सहायता करता था ताकि बौद्ध धर्म का प्रचार निर्बाध गति से चलता रहे।

प्रश्न 16.
अशोक के धर्म के कोई दो सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
(i) सहिष्णुता यह अशोक के धम्म का प्रमुख सिद्धांत है। इसका आधार ‘वाणी पर नियन्त्रण’ है। मनुष्य को अवसर के महत्त्व को देखकर बात करनी चाहिए। अपने स्वयं के धर्म की भी अत्यधिक प्रशंसा तथा दूसरों के प्रति मौन रहने से भी तनाव ही बढ़ता है। मनुष्य को दूसरे आदमी के सम्प्रदाय का आदर भी करना चाहिए।

(ii) अहिंसा-धम्म का दूसरा बुनियादी सिद्धान्त अहिंसा था। इसके मुख्यतः दो पहलू थे-पहला इसके अन्तर्गत पशु-पक्षियों के वध पर रोक लगाई गई। अहिंसा का दूसरा पहलू हिंसात्मक युद्धों (भेरिघोष) को त्यागकर धम्म विजय (धम्मघोष) अपनाना था। वृहद् शिलालेख XIII में उसने कलिंग युद्ध के दौरान हुई विनाशलीला का बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है।

प्रश्न 17.
छठी शताब्दी ई०पू० में नगरों में शिल्पकारों एवं व्यापारियों की श्रेणियों (Guilds) के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
छठी शताब्दी ई०पू० में गंगा-यमुना की घाटी में नगरों का उदय एवं विकास होने लगा। इनमें से अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे। इन नगरों में राजा, सेना, राज्याधिकारियों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में शिल्पकार और व्यापारी भी रहते थे।

इन शिल्पकारों एवं व्यापारियों की श्रेणियों या संघों का भी उल्लेख मिलता है। प्रत्येक श्रेणी का एक अध्यक्ष होता था। इन श्रेणियों में विभिन्न व्यवसायों से जुड़े कारीगर सम्मिलित होते थे। प्रमुख शिल्पकार श्रेणियाँ थीं-धातुकार (लुहार, स्वर्णकार, ताँबा, कांसा व पीतल का काम करने वाले), बढ़ई, राजगीर, जुलाहे, कुम्हार रंगसाज, बुनकर, कसाई, मछुआरे इत्यादि। ये श्रेणियाँ अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करती थीं, उन्हें ऋण प्रदान करती थीं और उनका धन संचय करती थीं। श्रेणियाँ कच्चा माल खरीदती थीं और तैयार माल बाजार में बेचती थीं। ये माल तैयार करने के नियमों का निर्धारण करती थीं। ये श्रेणियाँ अपने सदस्यों के आपसी विवादों को सुलझाती थीं। कई बार ये सिक्के भी जारी करती थीं। ये श्रेणियाँ शिक्षण संस्थाओं या धार्मिक संस्थाओं को दान भी देती थीं। सांची स्तूप पर उत्कीर्ण लेख से पता चलता है कि इसके कलात्मक दरवाजों में से एक दरवाजा हाथी दांत का काम करने वाले शिल्पियों के संघ ने बनवाया था।

प्रश्न 18.
पाटलिपुत्र के उत्कर्ष व पतन के बारे में आप क्या जानते हैं? .
उत्तर:
यह अत्यंत उत्सुकता का विषय है कि पाटलिपुत्र का उत्कर्ष व पतन कैसे हुआ। पहले यह एक छोटा-सा गाँव था जो पाटलि के नाम से जाना जाता था। 5वीं सदी ई०पू० में मगध के शासकों ने यहाँ पर राजधानी बदली तथा इसका नाम पाटलिपुत्र कर दिया। चौथी सदी ई०पू० में यह मौर्य साम्राज्य की राजधानी रहा। इस काल में यह एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक था। बाद में इसका पराभव होने लगा। जब 7वीं सदी ई० में चीनी यात्री ह्यूनसांग ने इस स्थल का दौरा किया तो उसने यहाँ पर नगर के भग्नावशेष को देखा। उसने लिखा कि यहाँ पर बहुत कम लोग रह रहे थे। वर्तमान में यह नगर पटना के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 19.
मैगस्थनीज़ और उसकी पुस्तक इंडिका के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मैगस्थनीज़ को फारस और बेबीलोन के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में राजदूत बनाकर भेजा गया था। वह पाटलिपुत्र में 302 ई० पूर्व से 298 ई०पूर्व तक रहा। इसने भारत के सम्बन्ध में इंडिका नामक पुस्तक लिखी जो मौर्यकालीन भारत के सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विदेशी वृत्तांत है। इसमें उसने तत्कालीन भारत की प्राकृतिक स्थिति, मिट्टी, जलवायु, पशु-पौधे व शासन-प्रणाली तथा सामाजिक एवं धार्मिक अवस्था का विषद वर्णन किया है। यद्यपि इस ग्रंथ में मैगस्थनीज़ ने कुछ बातें सुनी-सुनाई और अविश्वसनीय लिखी हैं, फिर भी ए०एल०बाशम का यह कथन उपयुक्त लगता है, “चाहे मैगस्थनीज़ का लेख उतना पूर्ण एवं यथार्थ नहीं जितना कि हम चाहते हैं, फिर भी इसका महत्त्व है क्योंकि यह एक विदेशी यात्री का भारत के बारे में प्रामाणिक एवं सम्बद्ध वृत्तांत है।” परन्तु दुर्भाग्यवश उसकी मूलकृति (इंडिका) उपलब्ध नहीं है। इसकी जानकारी हमें परवर्ती यूनानी लेखकों (स्ट्रेबो, डियोडोरस, प्लीनी ज्येष्ठ, एरियन, प्लूटार्क आदि) द्वारा अपनी पुस्तकों में दिए गए उद्धरणों से ही मिलती है।

प्रश्न 20.
प्राचीन काल में राजाओं द्वारा भूमि अनुदान क्यों किया जाता था?
उत्तर:
भारत में पहली सदी ई० से शासकों द्वारा भूमि अनुदान देने के प्रमाण मिलने शुरू हो जाते हैं। ये अनुदान धार्मिक संस्था, ब्राह्मणों, भिक्षुओं आदि को दिए जाते थे। इतिहासकारों का मानना है कि भूमि अनुदान अनेक कारणों से दिए गए जो निम्नलिखित अनुसार थे

  • कुछ का मानना है कि शासक अपने धर्म व संस्कृति का प्रसार कर राज्य का विस्तार तथा स्थायित्व चाहते थे।
  • शासक कृषि क्षेत्र का विस्तार करना चाहते थे।
  • इन भूमि अनुदानों से शासक स्थानीय प्रभावशाली और शक्तिशाली वर्ग का समर्थन प्राप्त करना चाहते थे।
  • एक अन्य विचार यह भी है कि शासक अपने आपको समाज के अन्य लोगों से श्रेष्ठ और उच्च मानवीय गुणों वाला दिखाना चाहते थे।

प्रश्न 21.
मौर्यकाल में सैन्य प्रबंध से जडी दूसरी उपसमिति का क्या कार्य था?
उत्तर:
यह उपसमिति यातायात और खानपान की व्यवस्था देखती थी। इसके लिए उसे निम्नलिखित कार्य करने पड़ते थे

  • सेना के हथियार ढोने के लिए बैलगाड़ियों की व्यवस्था करना।
  • सैनिकों के लिए भोजन तथा पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था करना।
  • सैनिकों की देखभाल के लिए सेवकों और शिल्पकारों की नियुक्ति करना।

प्रश्न 22.
राष्ट्रवादी इतिहासकारों के लिए अशोक प्रेरणा का स्रोत क्यों था?
उत्तर:
उपनिवेशिक काल में भारत में राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने इतिहास लिखते हुए अशोक को प्रेरणा का स्रोत माना। उनके सकों की तुलना में काफी शक्तिशाली और परिश्रमी था। उसके राज्य का आदर्श उच्च था। वह उन शासकों की अपेक्षा बहुत ही विनीत था, जो अपने नाम के साथ बड़ी-बड़ी उपाधियाँ लगाते थे। अशोक के इन्हीं गुणों के कारण उसे राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने प्रेरणा का स्रोत माना।

प्रश्न 23.
‘मौर्य साम्राज्य का उतना महत्त्व नहीं है जितना कि बताया गया है’ इसे स्पष्ट करते हुए तीन तर्क दीजिए।
उत्तर:
राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने मौर्य साम्राज्य को अत्यधिक महत्त्व दिया है, परंतु कुछ इतिहासकारों ने इसको नकारा है। उन्होंने इसके लिए निम्नलिखित तर्क दिए हैं

  • मौर्य साम्राज्य केवल 150 वर्ष ही चला जो कोई बड़ा काल नहीं है।
  • मौर्य साम्राज्य भारतीय उपमहाद्वीप के सारे भागों पर फैला हुआ नहीं था।
  • साम्राज्य की सीमा में भी सभी भागों पर एक-सा नियंत्रण नहीं था।

प्रश्न 24.
भारतीय उपमहाद्वीप में छठी सदी ई०पू० में उदय होने वाले नगरों की कोई तीन विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप पर छठी सदी ई०पू० में अनेक नगरों का उदय हुआ। इन नगरों की विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

  • इनमें से अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे।
  • प्रायः ये सभी नगर स्थल या नदी मार्गों पर बसे थे।
  • मथुरा जैसे नगर सांस्कृतिक, राजनीतिक तथा व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र थे।

प्रश्न 25.
सरदार कौन होते थे? इनके क्या कार्य थे?
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद अनेक क्षेत्रों में शक्तिशाली सरदारों का उदय हुआ। इनका पद पैतृक भी हो सकता था और नहीं भी। ये सरदार विशेष धार्मिक अनुष्ठानों का संचालन करते थे। युद्ध के समय ये सेना का नेतृत्व करते थे। साथ ही विवादों को सलझाने में भी मध्यस्थ का काम करते थे। ये सरदार अपने अधीनस्थ लोगों से भेंट प्राप्त करते थे और उसका कछ भाग अपने समर्थकों में बाँटते थे।

प्रश्न 26.
‘छठी शताब्दी ई०पू० में उपमहाद्वीप में पनपे सभी नगर संचार मार्गों पर बसे हुए थे। उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह बात सही है कि इस काल में पनपे नगर संचार मार्गों पर बसे हुए थे। इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित अनुसार है

  • पाटलिपुत्र जैसे नगर नदी मार्ग के किनारे बसे थे।
  • उज्जैन जैसे कुछ नगर भू-तल मार्गों पर बसे थे।
  • पुहार जैसे नगर समुद्रतट पर समुद्री मार्ग पर स्थित थे।

प्रश्न 27.
प्रभावती कौन थी?
उत्तर:
प्रभावती गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त II (375-415 ई०) की पुत्री थी। उसका विवाह वाकाटक शासक से हुआ। प्रभावती के बारे में विशेष बात यह है कि उसने भूमि अनुदान दिया था जो किसी महिला द्वारा भूमिदान का विरला उदाहरण है।

प्रश्न 28.
‘पेरिप्लस ऑफ एरीथ्रियन सी’ नामक पुस्तक किस बात पर प्रकाश डालती है?
उत्तर:
पेरिप्लस’ एक यूनानी शब्द है जिसका अर्थ है समुद्री रास्ता और ‘एरीथ्रियन’ शब्द का यूनानी में अर्थ है ‘लाल सागर’। इसका लेखक कोई यूनानी है। इस रचना में 80-115 ई० के मध्य रोम को निर्यात होने वाली व्यापारिक मदों का विवरण दिया गया है। इन मदों में भारत से निर्यात होने वाली वस्तुएँ थीं काली मिर्च, दाल-चीनी जैसे गर्म मसाले। इसके बदले में भारत में बहुमूल्य वस्तुएँ (पुखराज, मूंगे, हीरे, सोना आदि) आयात की जाती थीं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 29.
अशोक द्वारा धारण की गई दो उपाधियाँ कौन-सी थीं? उनका अर्थ भी बताइए।
उत्तर:
अशोक द्वारा धारण की गई दो उपाधियाँ निम्नलिखित थीं

  • देवानांपिय,
  • पियदस्सी। ‘देवानांपिय’ का अर्थ है-देवताओं का प्रिय तथा ‘प्रियदस्सी’ का अर्थ है-‘देखने में सुंदर’।

प्रश्न 30.
‘शिल्पादिकारम’ के विवरण से पता चलता है कि पांड्य सरदारों को लोग उपहार देते थे। स्पष्ट कीजिए कि लोग उपहार क्यों देते थे तथा ये सरदार उनका उपयोग किसलिए करते होंगे?
उत्तर:
शिल्पादिकारम् में विवरण मिलता है कि लोगों ने पांड्य सरदार को उपहार में अनेक वस्तुएँ (जैसे हाथीदाँत, शहद, चंदन, हल्दी, इलायची, काली मिर्च, बड़े नारियल, आम, फल, जानवरों व पक्षियों के बच्चे) दीं। लोगों का मानना था कि वे राजा के शासन में रह रहे थे। ये उपहार राजा का सम्मान करने के लिए दिए गए। सरदार इन उपहारों का उपयोग स्वयं करते होंगे अथवा इन्हें अपने समर्थकों के बीच बँटवा देते होंगे।

प्रश्न 31.
600 ई०पू० के बाद नद्री घाटियों और समुद्रतट पर विकसित हुए शहरों और कस्बों की सूची बनाइए। इन शहरों को हम भारत के शहरीकरण की अवस्था क्यों कहते हैं?
उत्तर:
इस काल में विकसित हुए नदी घाटियों तथा समुद्र तटीय नगरों के नाम निम्नलिखित प्रकार से हैं

  • नदी घाटियों में विकसित नए शहर थे-राजगृह, राजगीर, पाटलिपुत्र, उज्जयिनी, सारनाथ, वाराणसी, मथुरा, कन्नौज, तक्षशिला, सुवर्णगिरि, नालंदा आदि।
  • समुद्रतट पर विकसित हुए शहर थे-चंपा, पुहार, मालाबार, कोदूमनाल, भृगुकच्छ आदि।

हड़प्पा सभ्यता से जुड़े शहरों के पतन के बाद लगभग 1500 वर्षों तक भारत में नगरों का उल्लेख नहीं मिलता है। 1500 वर्षों के बाद नए नगर उत्तरी भारत व अन्य क्षेत्रों में विकसित हुए तो इन नगरों को इतिहासकारों ने भारत में शहरीकरण की दूसरी अवस्था का नाम दिया है।

प्रश्न 32.
मौर्योत्तर काल में कौन-कौन से प्रमुख शिल्प थे?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल में वस्त्र बनाने, रेशम बुनने, अस्त्रों एवं विलासिता का निर्माण, लोहारों, धातु शिल्पियों, सुनार, रंगरेज (कपड़ा रंगना), दंत शिल्प, मूर्तिकार गंधियों इत्यादि के प्रमुख कार्य थे।

प्रश्न 33.
रेशम मार्ग किसे कहते हैं? भारत इससे कैसे जुड़ा था?
उत्तर:
चीन से रेशम रोमन साम्राज्य को भेजा जाता था। जिस मार्ग से रेशम चीन से रोमन साम्राज्य जाता था, वह मार्ग रेशम मार्ग (Silk Route) के नाम से जाना जाता था। यह मार्ग चीन से शुरु होकर मध्य एशिया से अफगानिस्तान और ईरान होता हुआ रोम साम्राज्य में पहुँचता था। ईरान से पार्थियन साम्राज्य की स्थापना होने से इस मार्ग में बाधा आई। तब यह रेशम मध्य एशिया से अफगानिस्तान और फिर भारत आकर पश्चिम बंदरगाहों से रोमन साम्राज्य को जाने लगा।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अशोक के प्रमुख अभिलेखों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
देश में सबसे पुराने अभिलेख ईसा पूर्व तीसरी सदी के अशोक के शिलालेख-स्तंभ लेख हैं। प्रमुख नगर या व्यापार मार्गों पर स्थित ये अभिलेख सारे भारतवर्ष में पाए गए हैं। अफगानिस्तान में ये अरामेइक और यूनानी लिपि में हैं। पाकिस्तान में खरोष्ठी लिपि में तथा शेष भारत में ब्राह्मी लिपि में हैं। अशोक के ये अभिलेख सामाजिक, धार्मिक तथा प्रशासनिक राज्यादेशों या शासनादेश की श्रेणी में आते हैं। अशोक के प्रमुख अभिलेख निम्नलिखित हैं

1. चौदह वृहद् शिलालेख-बड़े-बड़े शिलाखंडों पर उत्कीर्ण शिलालेख दिए गए स्थानों पर मिले हैं-मानसेहरा (पाकिस्तान), कलसी (देहरादून, उत्तराखंड), गिरनार (गुजरात), शाहबाजगढ़ी (पाकिस्तान), सोपारा (महाराष्ट्र), धौली और जौगड़ (ओडिशा), मास्की और एरगुड़ि (आन्ध्र प्रदेश)।।

2. लघु शिलालेख-ये शिलालेख प्राप्त हुए हैं-रूपनाथ (जबलपुर, मध्यप्रदेश), गुजरो (दतिया, आंध्र प्रदेश)। इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसका प्रारंभ देवनाम् प्रियस अशोक राजस् शब्दों से हुआ है। सहसराम (शाहबाद, बिहार), मास्की (आन्ध्र प्रदेश), ब्रह्मगिरि (कर्नाटक), सिद्धपुर (ब्रह्मगिरि के पश्चिम में), अरहौरा (मिर्जापुर), दिल्ली, भाव-बैराट (राजस्थान)।

3. स्तम्भ लेख-ये छह स्थानों पर हैं-दिल्ली-टोपरा, दिल्ली-मेरठ, प्रयाग, रामपुरवा, लौरिया नंदनगढ़ व लौरिया अरराज। इनमें से प्रयाग स्तंभ लेख काफी महत्त्वपूर्ण हैं। इसमें अशोक द्वारा संघ के नियम पालन के लिए भिक्षु-भिक्षुणियों को निर्देश हैं। इसी स्तंभ पर एक और लेख भी मिला है जिसमें अशोक की रानी कारूवारी के द्वारा बौद्ध संघ को दान का उल्लेख है। इसलिए इसको रानी अभिलेख (Queen Edict) भी कहा जाता है। इन अभिलेखों के अतिरिक्त बैराट, सारनाथ, सांची, कौशाम्बी में लघु स्तंभ लेख, धौली व जौगड़ में कलिंग शिलालेख भी प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 2.
अभिलेखों से ऐतिहासिक साक्ष्य किस प्रकार प्राप्त किए जाते हैं? अशोक के अभिलेखों से उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
इतिहासकार और अभिलेखशास्त्री अभिलेखों से किस प्रकार साक्ष्य प्राप्त करते हैं तथा उन साक्ष्यों की सत्यता को स्थापित करने में उन्हें क्या-क्या समस्याएँ आती हैं? यह इतिहास पुनर्निर्माण की प्रक्रिया की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। अशोक के अभिलेखों में साक्ष्य प्राप्त करने व उससे जुड़ी समस्याओं के अध्ययन से इसको समझा जा सकता है। अशोक के अधिकांश शिलालेखों पर उसका नाम नहीं लिखा है। इन अभिलेखों मैं केवल देवानांपिय (देवताओं का प्रिय) और पियदस्सी (प्रियदर्शी) का उल्लेख है। कुछ अभिलेखों में अशोक का नाम था तथा बौद्ध ग्रंथों में अशो गया था। अभिलेख शास्त्रियों ने शैली, भाषा और पुरालिपि विज्ञान के आधार पर परीक्षण कर निष्कर्ष निकाला कि ये अशोक की ही उपाधियाँ थीं तथा यह एक ही शासक था।

अशोक यह दावा करता है कि उससे पूर्व किसी शासक के द्वारा अपने राज्य में प्रतिवेदन (Reports) प्राप्त करने की व्यवस्था नहीं थी। क्या यह दावा ठीक है? क्या यह सत्य है कि उसके पूर्व के राजनीतिक इतिहास में यह व्यवस्था नहीं थी। अभिलेखों के परीक्षण से पता लगता है कि यह बात बढ़ा-चढ़ा कर कही गई है। अशोक के अभिलेखों में कोष्ठकों (Words Within brackets) में शब्द लिखे गए हैं। अभिलेखशास्त्री कभी-कभार इनके साथ कुछ शब्द जोड़कर इनका अर्थ निकालने का प्रयास करते हैं। परंतु साथ ही यह भी ध्यान में रखते हैं कि कहीं मौलिक अर्थ में परिवर्तन न आ जाए।

अशोक ने अपने अधिकांश अभिलेखों को किसी नगर या व्यापारिक मार्गों के समीप लगवाया। इसका क्या अर्थ निकाला जाए ? क्या सभी गुजरने वाले रुककर इन्हें पढ़ते थे। जबकि अधिकतर लोग अशिक्षित होंगे। क्या सारे उपमहाद्वीप पर प्राकृत भाषाओं को समझा जाता था? क्या सम्राट की आज्ञाओं का सभी लोग पालन करते थे। इन साक्ष्यों के आधार पर प्रश्नों के उत्तर जान पाना आसान नहीं है।

अशोक के अभिलेखों में एक अन्य समस्या उभरती है। अशोक अपने 13वें शिलालेख में कलिंग की विजय तथा उससे होने वाली वेदना का विवरण देता है। इससे युद्ध के प्रति उसके व्यवहार में परिवर्तन आया। उसने धम्म विजय का मार्ग अपनाया। परंतु यह स्थिति जटिल हो जाती है जब हम लेख के ऊपरी अर्थ को छोड़कर आगे बढ़ते हैं। दूसरा, उड़ीसा (ओडिशा) से प्राप्त हुए अभिलेखों में अशोक की वेदना का उल्लेख नहीं है। क्या इसका अर्थ यह है कि ये अभिलेख उस क्षेत्र में नहीं हैं जो जीता गया था या इसका अर्थ यह लिया जाए कि उस क्षेत्र में स्थिति अत्यधिक कष्टप्रद थी। अतः शासक उस मुद्दे को बता ही नहीं पाया।

प्रश्न 3.
मुद्राशास्त्र क्या है?
उत्तर:
सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहा जाता है। मुद्राशास्त्र में सिक्कों की बनावट, लिखावट, दृष्यांक आदि का अध्ययन किया जाता है। साथ ही उनमें प्रयोग की गई धातु तथा उनकी प्राप्ति के स्थान का भी विश्लेषण किया जाता है। पुरातात्विक सामग्री में सिक्कों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शासकों की राज्य सीमा, राज्यकाल, आर्थिक स्थिति तथा धार्मिक विश्वासों के संबंध में सिक्के महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। इनसे सांस्कृतिक और सामाजिक महत्त्व की जानकारी भी प्राप्त होती है। मुद्रा प्रणाली का आरंभ मानव की आर्थिक प्रगति का प्रतीक है। मुद्राशास्त्रियों ने इनका अध्ययन कर प्रमुख राजवंशों के सिक्कों की सूचियाँ तैयार की हैं।

भारत में सबसे पहले छठी सदी ई०पू० में चाँदी व ताँबे के आहत सिक्के प्रयोग में आए। पूरे महाद्वीप में खुदाई के दौरान सिक्के मिले हैं। मौर्य काल में सिक्के जारी किए गए। हिंदू-यूनानी शासकों ने सिक्कों पर प्रतियाँ और नाम लिखवाया। कुषाण शासकों ने सोने के सिक्के जारी किए। दक्षिण भारत में भी शासकों ने सिक्के जारी किए। वहाँ से रोमन सिक्के भी मिले हैं। बड़े पैमाने पर गुप्त शासकों के सोने के सिक्के मिले हैं। ये सिक्के काफी भव्य हैं। भारत के अनेक संग्रहालयों (कोलकाता, पटना, लखनऊ, दिल्ली, मुंबई, चेन्नई आदि) में ये सिक्के सुरक्षित हैं।

प्रश्न 4.
हिन्द-यूनानी व कुषाण सिक्कों की जानकारी दें।
उत्तर:
यूनानी प्रभाव के अन्तर्गत हिन्द-यूनानी शासकों ने मौर्योत्तर काल (लगभग दूसरी सदी ई०पू०) में पहली बार इतने बड़े सिक्के जारी किए जिन पर शासक का नाम तथा चित्र बने थे। इन सिक्कों से यह स्पष्ट था कि ये सिक्के किन-किन राजाओं के हैं। मिनांडर के सिक्के बड़ी मात्रा में पाए गए हैं। मौर्योत्तर काल में कुषाण शासक व्यापार और वाणिज्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।
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उनका साम्राज्य मध्य एशिया से मध्य भारत तक फैला हुआ था। मध्य एशिया के व्यापार मार्गों पर इनका नियंत्रण था। उल्लेखनीय है कि कुषाण शासकों ने पहली बार नियमित रूप से सोने के सिक्के चलाए। कुषाणों के चाँदी के सिक्के नहीं मिलते। संभवतः यूनानियों और शकों के चाँदी के सिक्के कुषाण साम्राज्य में बिना रोक-टोक चलते थे।
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कुषाणों के सिक्कों तथा समकालीन रोमन सिक्कों के वजन में समानता पाई गई है। रोमन और पार्थियन सिक्के उत्तरी और मध्य भारत में अनेक स्थलों से प्राप्त हुए हैं। अधिकांश रोमन सिक्के सोने और चाँदी के हैं।

प्रश्न 5.
महाजनपदों की आय के स्रोतों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
प्रत्येक महाजनपद की अपनी राजधानी (Capital) थी जिसकी किलेबंदी की जाती थी। राज्य को किलेबंद शहर, सेना और नौकरशाही के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती थी। धन के अभाव में राज्य की व्यवस्था का सच पाना कठिन था। तत्कालीन धर्मशास्त्रों में इस संबंध में अनेक उल्लेख पाए गए हैं। इस काल में रचित इन धर्मशास्त्रों में शासक तथा लोगों के लिए नियमों का निर्धारण किया गया है। इन शास्त्रों में राजा को यह सलाह दी गई कि वह कृषकों, व्यापारियों और दस्तकारों से कर तथा अधिकार (Tribute) प्राप्त करे। किन्तु हमें इस बात की जानकारी नहीं मिलती कि राजा वनवासी और पशुचारी समुदायों से भी धन वसूलते थे या नहीं। हाँ पड़ोसी राज्य पर हमला कर धन लूटना या प्राप्त करना वैध (Legitimate) उपाय बताया गया। धीरे-धीरे इनमें से कई राज्यों ने स्थायी सेना और नौकरशाही तंत्र का गठन कर लिया था परंतु कुछ राज्य अभी भी अस्थायी थे।

प्रश्न 6.
मौर्य साम्राज्य के महत्त्व पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य का भारतीय इतिहास में अत्यधिक महत्त्व है। मौर्य साम्राज्य भारतीय इतिहास का पहला ऐतिहासिक साम्राज्य था जो लगभग 150 वर्षों (321 ई०पू० से 185 ई०पू०) तक अस्तित्व में रहा। इस काल की राजनीतिक और भौतिक-सांस्कृतिक उपलब्धियों को लेकर इतिहासकारों के विचारों को निम्नलिखित दो प्रकार से व्यक्त किया जा सकता है

(1) 19वीं सदी में भारत के इतिहासकारों ने जब अपने प्रारंभिक इतिहास का पुनर्निर्माण शुरू किया तो उन्होंने मौर्य साम्राज्य के उदय को महत्त्वपूर्ण सीमा रेखा (land mark) स्वीकारा। 19वीं तथा 20वीं सदी के राष्ट्रवादी इतिहासकार यह संभावना देखकर भाव-विभोर हो उठे कि प्रारंभिक भारत में एक इतने महत्त्वपूर्ण साम्राज्य का जन्म हुआ था। पुरातात्विक प्रमाणों से भी साम्राज्य की पाषाण मूर्तियों का पता लगा कि वे मूर्तियाँ कला के अद्भुत नमूने थीं। इस काल में शिल्पकला का चरम विकास हुआ। इस काल अशोक के पाषाण स्तंभों में सारनाथ का स्तम्भ सर्वाधिक सुंदर नमूना है।

इसमें परस्पर पीठ सटाए बैठे चार शेरों की आकृतियाँ हैं। शीर्ष के नीचे गोलाई पर हाथी, बैल, सिंह व घोड़े की दौड़ती हुई आकृतियाँ हैं। इनके बीच-बीच में चार धर्म-चक्र उत्कीर्ण किए हुए हैं जो बौद्ध धर्म के धर्म-चक्र प्रवर्तन के प्रतीक रूप हैं। स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र ने इस सारनाथ स्तंभ के शीर्ष को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न स्वीकार किया है। इतिहासकारों को यह जानकर भी सुखानुभूति हुई कि अशोक के अभिलेखों के संदेश दूसरे शासकों के आदेशों के बिल्कुल भिन्न थे। ये अभिलेख उन्हें बताते थे कि अशोक बहुत ही शक्तिशाली तथा मेहनती सम्राट था जो विनम्रता से (बिना बड़ी-बड़ी उपाधियों को धारण किए) जनता को पुत्रवत मानकर उनके नैतिक उत्थान में लगा रहा। इस प्रकार इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इन इतिहासकारों ने अशोक को प्रेरणादायक व्यक्तित्व स्वीकारा तथा मौर्य साम्राज्य को अत्यधिक महत्त्व दिया।

(2) स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद के भारतीय इतिहासकार मौर्य साम्राज्य के प्रति राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से थोड़ा अलग मत रखते हैं। वे राष्ट्रवादी इतिहासकारों की महिमामण्डन करने वाली शैली से सहमत नहीं हैं। उनका मत है कि मौर्य साम्राज्य दीर्घकाल तक जीवित नहीं रहा। यह उपमहाद्वीप के इतिहास में लगभग 150 वर्षों तक रहा जो कोई लंबा काल नहीं है। इसके अतिरिक्त इस साम्राज्य में उपमहाद्वीप के संपूर्ण क्षेत्र शामिल नहीं थे। यहाँ तक कि मौर्य साम्राज्य की सीमाओं के भीतर भी साम्राज्य के सारे हिस्सों . पर केंद्रीय सत्ता का पूर्ण नियंत्रण नहीं था। फलतः दूसरी सदी ई०पू० में भारत के अनेक भागों में नए-नए राजवंश तथा राज्य अस्तित्व में आने लगे थे।

प्रश्न 7.
पाटलिपुत्र के प्रशासन पर मैगस्थनीज़ के विवरण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मैगस्थनीज़ ने पाटलिपुत्र के प्रशासन का काफी विस्तृत विवरण दिया है। नगर प्रशासन चलाने के लिए अलग से अधिकारी वर्ग होता था। नगर का सर्वोच्च अधिकारी नागरक अथवा नगराध्यक्ष कहलाता था। नगर में आधुनिक मजिस्ट्रेट का कार्य नगर व्यवहारक महामत करता था। उसके अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों की एक परिषद् करती थी, जो 6 उपसमितियों में विभाजित थी। प्रत्येक समिति में 5-5 सदस्य थे।

1. पहली समिति-यह शिल्प उद्योगों का निरीक्षण करती थी एवं शिल्पकारों के अधिकारों की रक्षा भी करती थी।

2. दसरी समिति-यह विदेशी अतिथियों का सत्कार. उनके आवास का प्रबंध तथा उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का क करती थी। उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करती थी।

3. तीसरी समिति-यह जनगणना तथा कर निर्धारण के लिए, जन्म-मृत्यु का ब्यौरा रखती थी।

4. चौथी समिति-यह व्यापार की देखभाल करती थी। इसका मुख्य काम तौल के बट्टों तथा माप के पैमानों का निरीक्षण तथा सार्वजनिक बिक्री का आयोजन यानी बाजार लगवाना था।

5. पाँचवीं समिति-यह कारखानों और घरों में बनाई गई वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण करती थी। विशेषतः यह ध्यान रखती थी कि व्यापारी नई और पुरानी वस्तुओं को मिलाकर न बेचें। ऐसा करने पर दण्ड की व्यवस्था थी।

6. छठी समिति-इसका कार्य बिक्री कर वसूलना था। जो वस्तु जिस कीमत पर बेची जाती थी, उसका दसवां भाग बिक्री कर के रूप में दुकानदार से वसूला जाता था। यह कर न देने पर मृत्युदण्ड की व्यवस्था थी।

प्रश्न 8.
भूमि अनुदान के फलस्वरूप ग्रामों में उभरे नए संभ्रांत वर्ग कौन-से थे?
उत्तर:
भारत में प्रथम सदी ई० से भूमि अनुदान दिए जाने के प्रमाण मिलने लगते हैं। राजा या बड़े व्यक्तियों द्वारा धार्मिक महत्त्व की संस्था या व्यक्तियों को भूमि अनुदान के साथ-साथ प्रमाण के रूप में दिए गए पत्र को भूमि अनुदान पत्र कहा जाता था। इनमें से कुछ अनुदान पत्र पाषाण पर खुदे हुए हैं तथापि अधिकांश अनुदान पत्र हमें ताम्रपत्रों पर उपलब्ध होते हैं। प्रारंभ में ऐसे भूमि अनुदान पत्र मुख्य रूप से ब्राह्मणों या धार्मिक संस्थाओं; जैसे मंदिर, मठ, विहार आदि को दिए गए। बाद में राजकीय अधिकारियों तथा सेना के अधिकारियों की भी भूमि अनुदान प्रथा शुरू हुई। प्रारंभ में ये अनुदान पत्र संस्कृत भाषा में प्राप्त होते थे बाद में स्थानीय भाषाओं; जैसे तमिल, तेलुगू आदि में भी मिलने लगे। विभिन्न शासकों द्वारा अनुदान पत्र (Land Grants by Different Rulers) मौर्यकाल में कौटिल्य ने लिखा है कि राजा ब्राह्मणों, राज्याधिकारियों, राजकुमारों, रानियों, सेना की टुकड़ी रखने के बदले जमींदारों को भूमि अनुदान कर सकता है।

सातवाहन शासक वासिष्ठी पुत्र पुलाभावी ने गुफा में रहने वाले भिक्षुओं को गाँव अनुदान किया तथा अनुदान पत्र प्रदान किया। साथ ही इस अनुदान पत्र में यह आदेश था कि राजकीय कर्मचारी या पुलिस इस गाँव में प्रवेश न करे। परंतु राजा ऐसे अनुदान को रद्द भी कर सकता था। गौतमी पुत्र सातकर्णी ने भी भूमि अनुदान की। नासिक अभिलेख में भी ऐसा उल्लेख मिलता है कि अनुदान में दिए गए गाँव में कोई सरकारी अधिकारी प्रवेश नहीं करेगा तथा कोई भिक्षुओं को नहीं छुएगा।

गुप्तकाल में अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि सम्राटों ने धार्मिक कार्यों या परोपकार के लिए अनेक गाँव अनुदान में दिए। सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त द्वारा दिए अनुदान पत्र का विवरण हमें प्राप्त होता है। प्रभावती ने अभिलेख में ग्राम कुटुंबिनों (गृहस्थ और कृषक), ब्राह्मणों और दंगुन गाँव के अन्य निवासियों को स्पष्ट आदेश दिया। उस समय गाँवों में अनेक वस्तुओं का उत्पादन होता था। ग्रामों में अन्न उत्पादन के अलावा घास, जानवरों की खाल व कोयला प्राप्त होता था। मदिरा, नमक, खनिज पदार्थ, फल-फूल, दूध आदि भी गाँवों के उत्पादों में मुख्य थे। सरकार इन सबको प्राप्त करने का अधिकार अग्रहार ग्रामों (अनुदानित ग्रामों) में अनुदान प्राप्तकर्ता को दे देती थी।

भूमि अनुदान से स्पष्ट है कि गाँवों में भूमि अनुदान प्राप्त नया वर्ग उभर रहा था। अनुदान पत्र में उल्लेख होता था कि किस व्यक्ति को अनुदान दिया गया है तथा उसे क्या-क्या अधिकार प्राप्त होंगे। गाँवों के लोगों को नए प्रधान (अनुदान प्राप्तकत्ता) के आदेशों के पालन की हिदायत होती थी। गाँव के लोगों को सरकार को दिए जाने वाले कर और अन्य भेंटें अब अनुदान प्राप्तकर्ता को देनी होती थीं। ये ब्राह्मण अपनी इच्छा से गाँवों के लोगों से करों की वसूली भी करते थे। अतः स्पष्ट है प्राप्तकर्ताओं का विशिष्ट वर्ग उभरकर आ रहा था।

प्रश्न 9.
क्षेत्रीय राज्य या महाजनपदों के उदय के लिए उत्तरदायी परिस्थितियाँ क्या थी? 16 महाजनपदों के नाम बताइए।
उत्तर:
छठी सदी ई.पू. के काल को प्रारंभिक भारतीय इतिहास में अति महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इस काल में भारत में व्यापक आर्थिक परिवर्तनों का दौर शुरु हुआ जिसने प्रारंभिक क्षेत्रीय राज्यों या 16 महाजनपदों के उदय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कृषि के क्षेत्र का विस्तार हुआ। कृषि उत्पादन के तरीकों में परिवर्तन आया। इसमें धान की रोपण. विधि मुख्य थी जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई। कृषि में लोहे का प्रयोग बढ़ा। साथ-ही-साथ नगरों की स्थापना हुई। नगरों में शिल्पसंघों (श्रेणी प्रणाली) और व्यापारी वर्ग का उदय हुआ। मुद्रा का प्रसार हुआ। व्यापार व वाणिज्य का प्रसार हुआ। इन आर्थिक परिवर्तनों ने महाजनपदों के उदय की पृष्ठभूमि तैयार की।

अब राजा अपने सैन्य और प्रशासनिक उद्देश्यों के लिए किसानों से उपज का हिस्सा एकत्र कर सकते थे अर्थात् राज्य की आय बढ़ी। इसका यह अर्थ है कि राजा की शक्ति बढ़ी। अब राजा बढ़ी हई आय तथा लोहे के शस्त्रों से जनपद का विस्तार कर सकता था। वस्तुतः यह काल प्रारंभिक राज्यों के उदय का काल था। अब क्षेत्रीय भावनाएँ प्रबल हुईं। लोगों का जो लगाव जन या कबीले से था, वह पहले अपने गाँव-घर से हुआ और बाद में अपने जनपद (अर्थात् जहाँ पर जन ने अपना पाँव रखा बस गया।) से हुआ। धीरे-धीरे यह जनपद ही अपना क्षेत्र विस्तार करके महाजनपदों में बदल गए।

छठी सदी ई० पू० में उदय हुए बौद्ध तथा जैन मत के ग्रंथों में हमें 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथ अंग्रतर निकाय में हमें राज्यों के नामों का उल्लेख इस प्रकार मिलता है(i) अंग, (ii) मगध, (ii) काशी, (iv) कोशल, (v) वज्जि, (vi) मल्ल, (vii) चेदि (चेटी), (viii) वत्स, (ix) कुरू, (x) पांचाल, (xi) मत्स्य, (xii) शूरसेन, (xiii) अश्मक, (xiv) अवन्ति, (v) गांधार, (xvi) कंबोज।

प्रश्न 10.
मगध जनपद की शक्ति के उत्कर्ष में सहायक कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
छठी शताब्दी ई०पू० से चौथी शताब्दी ई०पू० के मध्य में 16 महाजनपदों में से मगध महाजनपद सबसे शक्तिशाली होकर उभरा। आधुनिक इतिहासकारों द्वारा मगध की शक्ति के उत्कर्ष के संबंध में विभिन्न व्याख्याएँ प्रस्तुत की जाती हैं। संक्षेप में मगध के उत्कर्ष के कारणों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. मगध की भौगोलिक अवस्था मगध के उत्थान में वहाँ की भौगोलिक स्थिति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसकी दोनों राजधानियाँ राजगृह व पाटलिपुत्र, सामरिक दृष्टिकोण से पूरी तरह सुरक्षित थीं। राजगृह चारों ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ था। इन पहाड़ियों की चारदीवारी को तोड़कर शत्रु का इसमें प्रवेश कठिन था। इसी तरह से पाटलिपुत्र भी सुरक्षित थी। इसके चारों ओर की नदियों गंगा, गंडक व सोन ने इसे जलदुर्ग बना दिया था।

2. मगध की आर्थिक दशा-जहाँ मगध की भौगोलिक स्थिति ने उसे आक्रमणकारियों से सुरक्षित बनाया, वहीं इसने वहाँ की आर्थिक स्थिति को भी सम्पन्न किया, जिसके बल पर मगध का उत्थान हुआ। मगध की उपयुक्त जलवायु ने उसे उपजाऊ बनाया। यहाँ पर्याप्त मात्रा में वर्षा होती थी जिससे भूमि में उत्पादन अधिक होता था। इसके अतिरिक्त उत्पादन ने उद्योग-धंधों व वाणिज्य का विकास किया। इस विकास के कारण नगरों का उत्थान हुआ। कृषि, व्यापार व उद्योग के उन्नत होने से राज्य की आय बढ़ी। इस आर्थिक सम्पन्नता ने मगध शासकों को अधिक स्थायी सेना रखने की स्थिति में ला दिया, जिससे वे साम्राज्यवादी नीति को अपना सकें।

3. लोहे के विशाल भण्डार-मगध के साम्राज्य विस्तार में लोहे की खानों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण थी। लोहे की अच्छी खानों (आधुनिक झारखंड) से उन्हें पर्याप्त मात्रा में लोहा प्राप्त हुआ। इस लोहे से उन्नत किस्म के शस्त्र बनाए जा सकें तथा खेती का विस्तार हो सका। अपने उत्तम शस्त्रों के प्रयोग से मगध अपने शत्रुओं को सरलता से पराजित कर पाया।

4. मगध की सैन्य व्यवस्था मगध के शासकों ने सैन्य व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया। मगध के शासकों ने अपनी सेना में हाथियों को शामिल किया। मगध के साम्राज्य में बहुत से जंगल थे, जहाँ हाथी पाए जाते थे। दलदली भूमि पर घोड़े की तुलना में हाथी की उपयोगिता अधिक कारगर थी। दुर्गों को भेदने का काम भी केवल हाथी ही कर सकते थे।

5. मगध के शासकों की भूमिका-मगध के उत्थान में उसके शासकों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण थी। मगध में एक के बाद अनेक शक्तिशाली शासक हुए। ये शासक महत्त्वाकांक्षी, योग्य व साहसी थे जिन्होंने अपने सैन्य कार्यों व कूटनीति के आधार पर अपने साम्राज्य की सीमा का विस्तार किया। इस साम्राज्य की नींव बिम्बिसार द्वारा डाली गई। अजातशत्रु जैसे शासकों ने इसका प्रभाव आस-पास के क्षेत्रों में बनाया। उदय भद्र, शिशुनाग व महापद्मनन्द जैसे शासकों ने इसका खुलकर साम्राज्य विस्तार किया।

प्रश्न 11.
अशोक का धम्म क्या था? इसके कोई पाँच सिद्धांत लिखिए।
उत्तर:
1. अर्थ-अशोक ने प्रजा में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा करने का प्रयास किया। सामूहिक रूप से उसकी इसी नीति को धम्म कहा गया है। धम्म का अर्थ स्पष्ट करने के लिए एक स्तंभ लेख में अशोक स्वयं प्रश्न करता है कि ‘कियं चु धम्मे’ (अर्थात् धम्म क्या है) फिर उत्तर देता है, ‘अपासिनवे, बहुकथाने, दया, दान सोचये’ अर्थात् पाप-रहित होना (अपासिनवे), बहुत-से कल्याणकारी कार्य करना (बहुकथाने), प्राणियों पर दया करना, दान देना, सत्यता और शुद्ध कर्म ही धम्म है।

2. सिद्धांत-
1. सहिष्णुता-यह अशोक के धम्म का प्रमुख सिद्धांत है। इसका आधार ‘वाणी पर नियन्त्रण’ है। मनुष्य को अवसर के महत्त्व को देखकर बात करनी चाहिए। अपने स्वयं के धर्म की भी अत्यधिक प्रशंसा तथा दूसरों के प्रति मौन रहने से भी तनाव ही बढ़ता है। मनुष्य को दूसरे आदमी के सम्प्रदाय का आदर भी करना चाहिए। ऐसा करने से उसके अपने धर्म का प्रभाव कम नहीं होगा, बल्कि बढ़ेगा। इसी से सहनशीलता की भावना पैदा होगी। वह कहता है कि सर्वत्र सभी धर्म वाले एक-साथ निवास करें।

2. अहिंसा-धम्म का दूसरा बुनियादी सिद्धान्त अहिंसा था। इसके मुख्यतः दो पहलू थे-पहला इसके अन्तर्गत पशु-पक्षियों के वध पर रोक लगाई गई। सम्राट ने राजमहल में भी भोजन के लिए प्रतिदिन दो मोर तथा एक मृग के अतिरिक्त अन्य पशु-पक्षियों की हत्या पर रोक लगा दी थी। अहिंसा का दूसरा पहलू हिंसात्मक युद्धों (भेरिघोष) को त्यागकर धम्म विजय (धम्मघोष) अपनाना था। वृहद् शिलालेख XIII में उसने कलिंग युद्ध के दौरान हुई विनाशलीला का बड़ा मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। वह अपने उत्तराधिकारियों (पुत्र अथवा प्रपौत्र) को भी युद्ध न लड़ने की सलाह देता है।

3. आत्मनिरीक्षण-अशोक ने आत्मनिरीक्षण के सिद्धान्त पर बल दिया है। इसके अनुसार मनुष्य को अच्छाइयों के साथ-साथ स्वयं की कमजोरियों अथवा कुप्रवृत्तियों (आसिनवों) का ज्ञान होना चाहिए। उग्रता, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष तथा निष्ठुरता जैसी इन बुराइयों का पता आत्म-परीक्षण से ही लग सकता है, जिसमें वह निरन्तर प्रयास करके धीरे-धीरे मुक्त हो सकता है और पाप-रहित जीवन व्यतीत कर सकता है।

4. बड़ों का आदर-अशोक के धम्म के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अपने से बड़ों का आदर (अपरिचित) करना चाहिए। बच्चों को माता और पिता की आज्ञा माननी चाहिए। उनकी भावनाओं का आदर करना चाहिए। इसी प्रकार शिष्यों को अपने गुरुजनों का आदर करना चाहिए तथा सभी को ब्राह्मणों व ऋषियों के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।

5. छोटों के प्रति प्रेम भाव-धम्म का एक अन्य मुख्य सिद्धान्त यह था कि बड़ों को छोटों के साथ और स्वामी को सेवकों के साथ दया व प्रेमपूर्ण का व्यवहार (सम्प्रतिपति) करना चाहिए। उसने दासों, सेवकों तथा आश्रितों के प्रति विशेष तौर पर अच्छा व्यवहार करने का आदेश दिया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 12.
क्या सारे मौर्य साम्राज्य के सभी क्षेत्रों में एकरूप प्रशासन प्रणाली विद्यमान थी?
उत्तर:
यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या मौर्य साम्राज्य के सभी क्षेत्रों में एकरूप प्रशासन प्रणाली विद्यमान थी। आर्थिक आवश्यकताओं ने संभवतः मौर्य साम्राज्य के सभी क्षेत्रों में एक-जैसी प्रशासनिक व्यवस्था पैदा कर दी। अशोक के अभिलेख साम्राज्य के सभी भागों में फैले हुए थे। इनमें एक-जैसे सन्देश उत्कीर्ण थे। क्या इसका अर्थ यह लिया जाए कि इतने विशाल साम्राज्य में एक रूप प्रशासन व्यवस्था पनप गई थी। आवागमन व संचार के साधनों के विकसित अवस्था में होने पर भी क्या साम्राज्य के सभी भागों पर पूर्ण तथा एक रूप नियंत्रण था। वर्तमान में अधिकांश इतिहासकारों का मत है कि साम्राज्य की विशालता और इसमें शामिल प्रदेशों की विविधताओं को देखते हुए यह एकरूपता संभव प्रतीत नहीं होती। उदाहरण के लिए साम्राज्य में अफगानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र, उत्तरी मैदान, उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र व दक्षिण में कर्नाटक जैसे दूरवर्ती क्षेत्र थे।

ऐसी स्थिति में इतिहासकार रोमिला थापर के शब्दों में, स्थानीय स्तरों पर साम्राज्य के सभी भागों में एकरूप प्रशासन होना अनिवार्य नहीं है। संभवतः सर्वाधिक प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण पाटलिपुत्र (साम्राज्य की राजधानी) तथा उसके निकटवर्ती प्रांतीय केंद्रों पर ही रहा होगा। इन प्रांतीय केंद्रों का भी बड़ी सूझबूझ से चुनाव किया गया होगा। उदाहरण के लिए उज्जैन एवं तक्षशिला लम्बी दूरी के व्यापार मार्गों पर स्थित थे। इसी प्रकार दक्षिणी प्रांत की राजधानी सुवर्णगिरी (सोने की पहाड़ी) कर्नाटक में सोने की खदानों की दृष्टि से. महत्त्वपूर्ण थी। नियंत्रण तथा प्रशासन में एकरूपता की दृष्टि से साम्राज्य क्षेत्रों को तीन भागों में बाँटकर देखा जाता है साम्राज्य का नाभिकीय (केंद्रीय) क्षेत्र-यह केंद्रीय प्रदेश था। इसमें मगध क्षेत्र, यानि मुख्यतः गंगा घाटी और उसके आस-पास के इलाकों से लेकर विंध्य पर्वत के उत्तर तक भू-भाग शामिल था। साम्राज्य के इस भाग में प्रशासन पूर्ण रूप से लगभग वैसा ही था जैसा कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ और मैगस्थनीज़ ने अपनी पुस्तक ‘इंडिका’ में बताया है।

(i) विजित समृद्ध क्षेत्र-यह मगध क्षेत्र से बाहर मौर्य शासकों द्वारा जीता हुआ क्षेत्र था। इसमें मुख्यतः उत्तर:पश्चिमी तथा कलिंग का भू-भाग शामिल था। संसाधनों (उपजाऊ भूमि) की दृष्टि से यह समृद्ध भू-भाग था। ऐसे क्षेत्रों में प्रशासन का प्रबंध राजा का प्रतिनिधि (Governor) यानि कुमार करता था। यहाँ प्रशासन मोटे रूप में केंद्रीय क्षेत्र के प्रशासन से मिलता-जुलता था, परन्तु पूरी तरह से समरूप (Identical) नहीं था।

(1) सीमांत राज्य क्षेत्र-ऐसे क्षेत्रों को प्राचीन साहित्य में प्रयन्त कहा गया है। इस क्षेत्र में मौर्य साम्राज्य का व्यवहार में प्रत्यक्ष नियंत्रण भूमि से उस गलियारे तक सीमित था जहाँ से महत्त्वपूर्ण मार्ग गुजरते थे या कीमती कच्ची धातुओं के भंडार थे। इसका उदाहरण दक्कन प्रायद्वीप है। यहाँ मौर्यों का प्रत्यक्ष नियंत्रण कर्नाटक क्षेत्र में कोलार की सोने की खानों वाले क्षेत्र में था या फिर दक्षिण की ओर जाने वाले पूर्वी और पश्चिमी तटीय मार्गों पर था। स्पष्ट है कि साम्राज्य के सभी क्षेत्रों में समरूप प्रशासन प्रणाली नहीं थी।

प्रश्न 13.
मौर्य साम्राज्य के पतन के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य का भारतीय इतिहास में विशेष महत्त्व है। यह भारत का पहला शक्तिशाली साम्राज्य था जिसने देश के एक बड़े भाग पर लगभग 150 वर्षों तक शासन किया। परन्तु धीरे-धीरे मौर्य साम्राज्य की नींव कमजोर पड़ने लगी तथा उसका पतन हो गया। मौर्य साम्राज्य के पतन के कारणों को निम्नलिखित प्रकार से समझा जा सकता है

1. विशाल साम्राज्य– सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में मौर्य साम्राज्य का बहुत अधिक विस्तार किया। इस विशालकाय साम्राज्य की प्रशासन-व्यवस्था संभालना प्रत्येक शासक के बस की बात नहीं थी। परिणामस्वरूप अशोक की मृत्यु के पश्चात् साम्राज्य नियंत्रण से बाहर हो गया।

2. अयोग्य तथा निर्बल प्रशासक मौर्य साम्राज्य के नवीन शासक अपने पूर्वजों की भांति योग्य तथा शक्तिशाली नहीं थे। ये सभी शासक विस्तृत मौर्य साम्राज्य पर पकड़ बनाए न रख सके। साथ ही उनमें कुशल प्रशासन का गुण नहीं था। परिणामस्वरूप मौर्य साम्राज्य का पतन होने लगा।

3. बाहरी हमले-विदेशी हमलावर मानो मौर्य साम्राज्य के कमजोर होने की राह देख रहे थे। उन्होंने अवसर का लाभ उठाया और मौर्य सीमाओं पर हमले करने शुरू कर दिए। इन हमलों में मौर्य साम्राज्य की प्रशासन-व्यवस्था को भारी ठेस पहुँचाई।

4. खराब आर्थिक स्थिति मौर्य साम्राज्य जो पूर्व में धन-संपदा से परिपूर्ण एक साम्राज्य था धीरे-धीरे धन के अभाव से ग्रस्त हो गया। सम्राट अशोक ने हृदय परिवर्तन के पश्चात हृदय खोलकर दान-दक्षिणा दी तथा कई भव्य निर्माण कार्य करवाए। इसका सीधा असर राजकोष पर पड़ा। खराब आर्थिक स्थिति में प्रशासनिक कार्यों का संचालन असंभव हो गया था।

प्रश्न 14.
सुदूर दक्षिण के तीन राज्यों (चेर, चोल व पांड्य) की संक्षिप्त जानकारी दें।।
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद दक्षिण तथा सुदूर दक्षिण में कई. नए राज्यों का उदय हुआ। इन राज्यों को सरदारियों (Chiefdoms) के नाम से भी जाना जाता है। राज्य के मुखिया को सरदार या राजा कहा जाता था। सुदूर दक्षिण में इस काल में तीन राज्यों का उदय हुआ। यह क्षेत्र तमिलकम् (इसमें आधुनिक तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश व केरल के भाग शामिल थे) कहलाता था। तीन राज्यों के नाम हैं-चोल, चेर और पाण्ड्य दक्षिण के ये राज्य संपन्न थे तथा लंबे समय तक अस्तित्व में रहे।

1. चेर-उदियन जेरल पहला प्रमुख शासक था। इसका पुत्र नेदुनजेरल आदन प्रतापी शासक था। उसने अनेक युद्धों में भाग लिया तथा अपना अधिकतर जीवन युद्ध शिविरों में बिताया। कहते हैं कि उसने सात राजाओं को हराकर ‘अधिराज’ की उपाधि धारण की। उसे इमयवरम्बन (Imayavarmban) (हिमालय तक सीमा वाला) भी कहा जाता है। शेनगुटुवन (धर्मपरायण कुटूवन) एक वीर और सबसे महान शासक बताया गया है। उसके पास एक शक्तिशाली बेड़ा था। यह लाल चेर के नाम से भी प्रसिद्ध था। वह संगम कवि परणार का समकालीन था। परणार ने उसके उत्तर भारतीय विजय अभियान का वर्णन किया है। शेनगुटुवन का सौतेला भाई तथा उसका उत्तराधिकारी पेरुंजेरल आदन था। पेरूंजेरल चोल शासक कारिकल का समकालीन था।

2. चोल-दक्षिण के प्राचीनतम शासक राजवंशों में से चोल प्रमुख हैं। चोल राज्य तोण्डेमण्डलम् या चोल मण्डलम् के नाम से जाने जाते हैं। इसकी राजधानी तिरुचिरापल्ली जिले में उरैयूर थी। बाद में इसकी राजधानी पुहार बनी। पुहार को कावेरी पत्तनम् के नाम से भी जाना जाता है। कारिकाल-प्रारम्भिक चोल शासकों में कारिकाल सबसे प्रसिद्ध है। कारिकाल का अर्थ ‘जले हुए पैर वाला व्यक्ति’ होता है। किंवदन्ती है कि बचपन में ही उसका अपहरण करके उसके शत्रुओं ने उसे बन्दी बना लिया था और बाद में कारागार में आग लगा दी थी। कहते हैं कि जब कारिकाल आग से निकलकर भाग रहा था तो उसका पैर झुलस गया। इस कारण उसे कारिकाल के नाम से जाना गया। उसके नाम के सम्बन्ध में अन्य व्याख्या कलिका काल (Death to Kali) अथवा शत्रु के हाथियों का काल (Death of Enemy Elephant) भी दी जाती है। कारिकाल के बाद गृहयुद्ध के कारण इसका पतन हो गया।

3. पाण्ड्य पाण्ड्य भी दक्षिण भारत के इतिहास में प्राचीनतम शासक राजवंशों में से एक थे। उनकी राजधानी मदुराई में तमिल कवियों तथा तमिल भाट कवियों की बड़ी सभाओं (संगमों) का आयोजन हुआ था। प्रथम पाण्ड्य शासक नेडियोन था। इसके बाद पाण्ड्य शासक पल्लशालई मुदृकडुमी था। इसे प्रथम ऐतिहासिक शासक माना जाता है।

पाण्ड्य शासकों में सबसे महान शासक नेइंजेलियन था। इसकी उपाधि से ज्ञात होता है कि इसने किसी आर्य (उत्तर भारत) सेना को पराजित किया। वह तलैयालंगानम् (Talaiyalanganam) के युद्ध को जीतने के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ। नेडुंजेलियन ने दो पड़ोसी शासकों और पाँच छोटे सरदारों के गुट का सफलतापूर्वक सामना किया। ये शत्रु उसकी राज्य सीमा में घुस आए थे। इन्हें उसने वापस खदेड़ दिया तथा तलैयालंगानम् (तंजौर जिले में तिरवालूर से आठ मील दूरी पर) नामक स्थान पर उन्हें हरा दिया। इन पराजित शासकों में चेर राजा शेय को बन्दी बनाकर पाण्डेय राज्य के कारागार में डाल दिया गया। इस विजय से उसका राज्य सुरक्षित हो गया तथा तमिल क्षेत्र के राज्यों पर उसका नियन्त्रण स्थापित हो गया।

प्रश्न 15.
प्रमुख गुप्त शासकों पर संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
चौथी शताब्दी में गुप्त साम्राज्य का उदय और विकास महत्त्वपूर्ण परिघटना है। प्रारंभ में गुप्त शासक कुषाणों के सामन्त थे और धीरे-धीरे उन्होंने अपनी सत्ता बढ़ाकर कुषाणों के स्थान पर बिहार-उत्तरप्रदेश में अपनी सत्ता स्थापित कर ली। इस वंश के प्रमुख शासक निम्नलिखित हैं

1. चंद्रगुप्त प्रथम (319-334 ई०)-चंद्रगुप्त प्रथम इस वंश का पहला प्रसिद्ध राजा हुआ। उससे लिच्छवी राजकुमारी कुमारदेवी से विवाह कर अपने आप को शक्तिशाली बताया। उसने गुप्त संवत् चलाया तथा ‘महाराजाधिराज’ की उपाधि धारण की।

2. समुद्रगुप्त (335-375 ई०) चंद्रगुप्त का उत्तराधिकारी समुद्रगुप्त था। प्रयाग प्रशस्ति में उसका गुणगान किया गया है। हरिषेण इस प्रशस्ति का लेखक, कवि और सेनापति था। समुद्रगुप्त के गुणों का बखान करते हुए प्रयाग प्रशस्ति में लिखा है-“धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था। अनेक गुणों और शुभ कार्यों से संपन्न उन्होंने अपने पैर के तलवे से अन्य राजाओं के यश को खत्म कर दिया है।” समुद्रगुप्त की तुलना परमात्मा से भी की गई है। “वे परमात्मा पुरुष हैं ……..वे करुणा से भरे हुए हैं… वे मानवता के लिए दिव्यमान उदारता की प्रतिमूर्ति हैं।” समुद्रगुप्त ने गुप्त साम्राज्य का विस्तार किया। उसने गंगा-यमुना दोआब के राजाओं को हराकर प्रदेश अपने राज्य में मिला लिया। उसने 9 गणराज्यों को हराया। दक्षिण के 12 शासकों को हराकर अपने अधीन बनाया। विंध्य क्षेत्र के अटाविक राज्यों को अपने वश में किया। सीमावर्ती शासक भी उसकी अधीनता मानते थे।

3. चंद्रगुप्त द्वितीय (380-414 ई०) चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में गुप्त साम्राज्य अपने उत्कर्ष की चोटी पर पहुँचा। उसने वाकाटकों से अपनी कन्या प्रभावती का विवाह किया जो बाद में पति की मृत्यु पर वहाँ की वास्तविक शासिका बनी। भूमिदान संबंधी उसके अभिलेख बतलाते हैं कि उसने अपने पिता के हित में काम किया। चंद्रगुप्त ने पश्चिमी मालवा और गुजरात पर अधिकार कायम कर लिया था। उसने शकों को पराजित किया तथा ‘शकारी’ की उपाधि धारण की। उसने उज्जैन को दूसरी राजधानी बनाया। दिल्ली में कुतुबमीनार के समीप (एक लौह स्तंभ पर खुदे हुए अभिलेख में चंद्र नामक किसी शासक की कीर्ति का वर्णन किया गया है। इस चंद्र को बंदगुप्त माना जाता है। उसने “विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। चंद्रगुप्त द्वितीय के बाद कुमार गुप्त तथा स्कंदगुप्त गुप्त वंश के अन्य प्रमुख शासक रहे।

प्रश्न 16.
अध्ययनकाल में व्यापार से संबंधी जानकारी दीजिए।
उत्तर:
छठी सदी ई०पू० से भारत में नगरों का विकास होने लगा था। ये नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे। साथ ही यहाँ पर शिल्प उत्पाद भी प्रमुख थे। यह भी उल्लेखनीय है कि ये नगर व्यापार मार्गों पर बसे हुए थे। मौर्यकाल, मौर्योत्तर काल और दक्षिण के राज्यों में इस काल में व्यापार तथा वाणिज्य का विकास देखा जा सकता है। संक्षेप में इसकी जानकारी निम्नलिखित प्रकार से है

1. व्यापार मार्ग-छठी शताब्दी ई०पू० से भारतीय उपमहाद्वीप पर भूतल और नदीय व्यापार मागों का विकास होने लगा था। एक-दूसरे को आड़े-तिरछे काटते ये व्यापार मार्ग उपमहाद्वीप के बाहर तक जाते थे। सबसे महत्त्वपूर्ण मार्ग पाटलिपुत्र से तक्षशिला तक जाता था। पूर्व में यह पाटलिपुत्र को ताम्रलिप्ति बंदरगाह से जोड़ता था। दूसरा मार्ग कौशाम्बी से पश्चिम समुद्र तट पर भरुक (भरूच) बंदरगाह तक जाता था। एक दक्षिण-पूर्वी मार्ग पाटलिपुत्र से गोदावरी तट पर प्रतिष्ठान तक जाता था। एक अन्य मार्ग वैशाली से कपिलवस्तु होकर पेशावर तक जाता था। आगे यह स्थल मार्ग पश्चिमी एशिया के क्षेत्रों से होकर भूमध्य सागर तक जाता था। एक मार्ग तक्षशिला से काबुल तथा आगे बैक्ट्रिया से कैस्पियन सागर व काला सागर तक जाता था। इसी प्रकार एक मार्ग कंधार से ईरान तथा ईरान से पूर्वी भूमध्य सागर तक जाता था।

समुद्र तटीय मार्ग भी व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण थे। एक मार्ग भरूच बंदरगाह से सोपारा होते हुए पश्चिमी तट के साथ-साथ श्रीलंका तक जाता था। इसी प्रकार एक मार्ग ताम्रलिप्ति से पूर्वी तट के साथ-साथ जलमार्ग से श्रीलंका पहुँचता था। इस प्रकार समुद्र के माध्यम से व्यापारी दूर देशों तक व्यापार करते थे। उदाहरण के लिए अरब सागर से पूर्वी उत्तरी अफ्रीका तथा पश्चिमी एशिया के देशों से व्यापार होता था। पूर्व की तरफ बंगाल की खाड़ी से व्यापारी दक्षिणी पूर्वी एशिया और चीन से व्यापार करते थे।

2. व्यापार के साधन-यह जानना उपयोगी है कि उन दिनों में व्यापार किन साधनों से होता था। कुछ लोग पैदल सफर करते हुए अपना सामान बेचते थे। बड़े व्यापारी बैलगाड़ियों तथा लदू जानवरों के कारवाँ के साथ यात्रा करते थे। समुद्री नाविकों (Sea barers) का भी उल्लेख मिलता है। समुद्री व्यापार संकटों से भरा होता था परंतु इससे अत्यधिक लाभ प्राप्त होता था। सफल व्यापारियों को तमिल में मासात्तुवन (Masattuvan) कहते थे। प्राकृत में इनके लिए सेट्ठी तथा स्थावाह (Satthavas) शब्द का प्रयोग हुआ है।

3. व्यापारिक वस्तुएँ-तमिल व संस्कृत साहित्य तथा विदेशी वृत्तांतों से जानकारी मिलती है कि भारत में अनेक प्रकार का सामान एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता था। इन वस्तुओं में प्रमुख थीं-नमक, अनाज, वस्त्र, लोहे का सामान, कीमती पत्थर, लकड़ी, औषधीय पौधे इत्यादि। भारत का विदेशी व्यापार रोमन साम्राज्य तक फैला हुआ था। रोमन साम्राज्य में भारतीय मसालों (विशेषतः काली मिच), वस्त्रों और औषधियों की काफी माँग रहती थी। इसके अलावा भारत से इलायची, चावल, मसूर, कपास, फल, नील, मोती इत्यादि भी निर्यात वस्तुओं में शामिल थे। रोम निवासी भारत से रेशम भी मंगवाते थे जो भारतीय व्यापारी चीन से यहाँ लाते थे।

रोम से भारत को बढ़िया किस्म की शराब, चीनी के बर्तनों और सोने-चांदी के सिक्कों का आयात होता था। पेरिप्लस ऑफ एरीथ्रियन सी का लेखक उस काल में (लगभग पहली शताब्दी ई० में) भारत से लालसागर के पार विदेशों में जाने वाली वस्तुओं की सूची देता है। पेरिप्लस ने लिखा है कि भारत से काली मिर्च, दालचीनी, पुखराज, सुरमा, मूंगे, कच्चे शीशे, तांबे, टिन और सीसे का आयात किया जाता है। इसके अतिरिक्त भारत से आने वाला सामान है-मोती, हाथीदाँत, रेशमीवस्त्र, पारदर्शी पत्थर, हीरे, काले नग, कछुए की खोपड़ी आदि।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संगम साहित्य पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
पांड्य राजाओं के संरक्षण में कवियों और भाटों ने तीन-चार सौ वर्षों में विद्या केंद्रों में एकत्र होकर संगम साहित्य का सजन किया। ऐसी साहित्य सभा को संगम कहते थे। इसलिए सारा साहित्य संगम साहित्य के नाम से प्रसिद्ध हुआ। विशाल संगम साहित्य में से आज जो रचनाएँ उपलब्ध हैं उनकी संख्या 2289 है। इनमें से कुछ कविताएँ अत्यन्त छोटी (मात्र पाँच पक्तियों की) हैं और कुछ बहुत लम्बी हैं। ये कविताएँ 473 कवियों द्वारा रचित हैं जिनमें कुछ कवयित्रियाँ भी हैं। कविताओं के अतिरिक्त तमिल व्याकरण तथा महाकाव्य भी उपलब्ध है। वर्तमान में उपलब्ध संगम साहित्य के प्रमुख ग्रन्थों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है

1. पत्थुप्पात्तु-पत्थुप्पात्तु बहुत लम्बे दस काव्यों का संग्रह है। नक्कीकर कृत इस काव्य में मुरूगन नामक युद्ध के एक देवता की स्तुति की गई है। इसी कवि ने एक काव्य में एक राजा का युद्ध भूमि में वीरतापूर्वक युद्ध तथा महलों में रह रही रानी की विरह वेदना का हृदयस्पर्शी वृत्तान्त प्रस्तुत किया है। इसमें चोल राज्य की राजधानी पुहार का विस्तार से वर्णन है

2. एतुत्थोकई-इन कविताओं के आठ संग्रह हैं। हर एक संग्रह में 70 से 500 कविताएँ हैं। इन कविताओं की विषय-वस्तु प्यार और निजी व आन्तरिक मनोभाव हैं या राजाओं और वीरों के कृत्यों का बखान है। कई कविताओं में नगरों (मदुरा शहर) और नदियों के सौंदर्य आदि का भी वर्णन है।

3. पदिनेन कीलकनक्कु इसमें 18 धर्मोपदेशों का संग्रह है। इनमें सबसे प्रसिद्ध तिरुवल्लुवर की रचना ‘कुराल’ या ‘तिरुकुराल’ है। इसमें दस-दस कविताओं के 113 वर्ग-भाग हैं। कराल धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र एवं कामसूत्र तीनों का संगम है। लेकिन ज्ञान और नैतिक मूल्यों की जानकारी के लिए इसका सबसे अधिक महत्त्व है। इसलिए इस पुस्तक को तमिल वेद या संक्षिप्त वेद भी कहा जाता है।

4. शिल्पादिकारम्-शिल्पादिकारम् एक महाकाव्य है। इसका लेखक चोल नरेश कारिकल का पौत्र इंलगोवन था, परन्तु वास्तविक रचनाकार के सम्बन्ध में विवाद है। यह महाकाव्य बहुत यथार्थवादी है। इसमें पुहार या कावेरीपत्तनम् के धनी व्यापारी के पुत्र कोवलन और उसकी अभागी पत्नी कन्नगी का बहुत दुखद और मार्मिक चित्रण है। कन्नगी एक पतिव्रता नारी थी। उसका पति कोवलन एक माधवी नामक वेश्या के चक्कर में अपना धन गंवा बैठता है। वह गरीब के रूप में पुहार से मदुरा चला जाता है। वहाँ पर मदुरा की रानी के हार की चोरी के आरोप में पाण्ड्य राजा शेनगुटुंवि द्वारा उसको प्राणदण्ड दिया जाता है। कन्नगी द्वारा अपने पति को निर्दोष सिद्ध करने पर राजा को पश्चात्ताप हुआ तथा इस आघात से सिंहासन पर ही उसकी मृत्यु हो गई। आज भी कन्नगी की दक्षिण में पूजा प्रचलित है। यह अनेक धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं से परिपूर्ण है।

5. मणिमेखलम-यह भी महाकाव्य है। इसका लेखक मदुराई के कवि सतनार या शातन को बताया जाता है। लेखक बौद्ध धर्म का एक अनुयायी लगता है। इसकी नायिका मणिमेखलम् (शिल्पादिकारम् के नायक कोवलन की पुत्री) है। वह अपने प्रेमी की मृत्यु का समाचार सुनकर बौद्ध भिक्षुणी हो जाती है। इस ग्रन्थ का अन्य उद्देश्य बौद्ध धर्म के उत्थान को दर्शाना है।

6. जीवक चिन्तामणि-यह भी महाकाव्य है। उत्तर संगम साहित्य से जुड़े इस ग्रन्थ का नायक जीवक है। वह अपने पिता के हत्यारे से बदला लेता है और पिता का खोया हुआ राज्य वापस प्राप्त करता है। नायक को युवा अवस्था में ही वैराग्य हो जाता है। अतः वह राज्य छोड़कर जैन मुनि बन जाता है। जीवक चिन्तामणि दक्षिण में जैन मत पर भी प्रकाश डालता है।

7. तोलकाप्पियम-वीर काव्य ग्रन्थों तथा महाकाव्यों के अलावा संगम साहित्य के अन्तर्गत तमिल व्याकरण का ग्रन्थ तोलकाप्पियम भी आता है। इसकी रचना अगस्त्य के शिष्य तोलकाप्पियार तथा 11 अन्य विद्वानों (जो सभी अगस्त्य के ही शिष्य थे) द्वारा की गई है। यह ग्रन्थ तमिल व्याकरण, साहित्य परम्परा तथा समाजशास्त्र की एक रचना है। इसे तमिल साहित्य की सभी साहित्यिक परम्पराओं का स्रोत भी स्वीकार किया जाता है।

प्रश्न 2.
चन्द्रगुप्त की प्रमुख विजयों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
चन्द्रगुप्त की सैनिक कार्रवाइयों का ठीक-ठीक स्पष्ट ब्यौरा किसी भी ग्रंथ में उपलब्ध नहीं है। जो सूचनाएँ मिलती हैं वे यत्र-तत्र कुछ ग्रंथों में बिखरी हुई मिलती हैं। यूनानी लेखकों ने अपने विवरण में चन्द्रगुप्त की पंजाब (उत्तर:पश्चिम) की विजय का ही वर्णन किया है, जबकि अधिकांश भारतीय स्रोतों में मगध-विजय का पता चलता है। चन्द्रगुप्त मौर्य की प्रमुख विजय निम्नलिखित प्रकार से हैं

1. मगध-विजय-321 ई० पू० में 25 वर्ष की आयु में चन्द्रगुप्त मौर्य मगध राज सिंहासन पर बैठा। यह कैसे सम्भव हुआ अपने-आप में बड़ा दिलचस्प है, क्योंकि मगध जैसे शक्तिशाली राज्य से लड़ने के लिए सेना कहाँ से आई? मगध उस समय उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली राज्य था। लेकिन मगध का राजा अत्याचारी और लालची होने के कारण प्रजा-जनों में अलोकप्रिय था। करों के भार से दबे हुए थे। इन परिस्थितियों में चन्द्रगुप्त और चाणक्य के लिए जन-समर्थन जुटाने और सेना संगठित करने में आसानी हुई। इन्होंने मगध साम्राज्य के सीमावर्ती हिमालय के पर्वतीय प्रदेशों में रहने वाली जातियों में से सेना संगठित की। यह लगभग वही समय था जब सिकन्दर (326 ई० पू०) उत्तर:पश्चिम की ओर से पंजाब में जन कबीलों को रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा था।

ऐसी परिस्थिति में विदेशी आक्रमणकारियों के भय के कारण घनानंद जैसे अलोकप्रिय शासक के विरुद्ध कबीलों में सेना भर्ती करना और भी आसान हो गया था। जैसे भी सेना संगठित की हो, इतना निश्चित है कि चन्द्रगुप्त की सेना नंदशासक के मुकाबले बहुत कम थी। ऐसी स्थिति में चाणक्य की कूटनीति कारगर साबित हुई। उन्होंने नंद राज्य के सीमावर्ती क्षेत्रों के साथ छेड़छाड़ से अपना अभियान शुरु किया और धीरे-धीरे राज्य के केन्द्र की ओर बढ़ते गए। नंद नरेश उनकी गतिविधियों की गम्भीरता नहीं भाँप पाया और उन्होंने अन्ततः उसे सिंहासन से उखाड़ फेंका।

2. पंजाब विजय-मगध-विजय के तुरन्त पश्चात् चन्द्रगुप्त और चाणक्य ने पंजाब विजय अभियान शुरु किया, क्योंकि इस क्षेत्र में विस्तार के लिए परिस्थितियाँ पूर्णतः अनुकूल थीं। ये परिस्थितियाँ सिकन्दर के आक्रमण से बनी थीं। सिकन्दर के उत्तर:पश्चिम (पंजाब क्षेत्र) पर किए गए आक्रमण (326 ई०पू०) का तात्कालिक और अप्रत्याशित परिणाम यह हुआ था कि इसने सारे भारत पर मौर्यों की विजय का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। इस आक्रमण से पंजाब के गणराज्य कमज़ोर हो गए थे और 323 ई०पू० में सिकन्दर की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण उसके सेनापतियों में साम्राज्य विभाजन के लिए युद्ध छिड़ गया था। इससे पंजाब क्षेत्र में यूनानियों की शक्ति भी दर्बल पड़ गई थी। इस परिस्थिति में चन्द्रगुप्त बड़ी आसानी से सिंधु नदी तक का क्षे सफल हो गया था।

3. पश्चिमी और मध्य भारत पर विजय पंजाब विजय के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने अपना ध्यान पश्चिम और मध्य भारत की ओर केन्द्रित किया। इन विजय अभियानों की भी पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है, परन्तु रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख (दूसरी शताब्दी ई० के मध्य का) से पता चलता है कि चन्द्रगुप्त ने काठियावाड़ (सौराष्ट्र) को अपने राज्य में मिला लिया था। इस शिलालेख में चन्द्रगुप्त के राजदूत पुष्यगुप्त का उल्लेख है, जिसने सुदर्शन नामक झील बनवाई थी। साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि नर्मदा नदी के उत्तर में मालवा प्रदेश पर भी चन्द्रगुप्त ने अधिकार कर लिया था।

4. सेल्यूकस निकेटर से युद्ध-सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर ने अपने प्रतिद्वन्द्वियों को पछाड़कर पश्चिम एशिया में बेबीलोन से लेकर ईरान और बैक्ट्रिया तक अपना प्रभुत्व जमा लिया था। 305 ई०पू० में वह सिंधु नदी को पार करके पंजाब और सिंध पर पुनः यूनानी प्रभुत्व स्थापित करने के लिए आगे बढ़ा। परन्तु इस बार परिस्थितियाँ बिल्कुल अलग थीं। अब सामना परस्पर विभक्त छोटे-छोटे राज्यों से नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली साम्राज्य से था। 303 ई०पू० में लम्बे युद्ध के बाद इस युद्ध में चन्द्रगुप्त की विजय हुई। इसके बाद दोनों के बीच एक मैत्रीपूर्ण सन्धि हो गई जिसके अनुसार चन्द्रगुप्त ने सेल्यूकस को 500 हाथी दिए। बदले में सेल्यूकस ने अफगानिस्तान, बलूचिस्तान और सिंधु नदी का पश्चिमी क्षेत्र चन्द्रगुप्त को दे दिया।

इसके अतिरिक्त दोनों शासकों के बीच वैवाहिक सम्बन्ध भी स्थापित हुए। समझा जाता है कि सेल्यूकस की एक पुत्री का विवाह चन्द्रगुप्त से हुआ था। इस विवाह का राजनीतिक महत्त्व था। इससे मौर्य साम्राज्य की उत्तर:पश्चिमी सीमा सुरक्षित हो गई थी। दोनों शासकों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने रहे। इसका प्रमाण दोनों के बीच उपहारों और राजनयिकों का आदान-प्रदान है। सेल्यूकस का राजदूत मैगस्थनीज़ कई वर्षों तक चन्द्रगुप्त के दरबार पाटलिपुत्र में रहा था। स्पष्ट है कि चंद्रगुप्त मौर्य का साम्राज्य उत्तर:पश्चिम सीमा से पूर्व में बंगाल तक फैला हुआ था। पश्चिम में गुजरात का क्षेत्र उसके अधिकार में था।

प्रश्न 3.
संगम युगीन सुदूर दक्षिण के राज्यों में व्यापार व वाणिज्य के विकास का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संगम युग में सुदूर दक्षिण व्यापार और वाणिज्य का अप्रत्याशित रूप से विकास हुआ। राज्यों को इस अन्तर्देशीय तथा विदेशी व्यापार से बड़ी मात्रा में आय प्राप्त होती थी। कृषि उत्पादन में वृद्धि, मौर्य साम्राज्य के विस्तार से दक्षिण के साथ व्यापार सम्पर्कों में वृद्धि, भारतीय वस्तुओं की रोमन विश्व में माँग बढ़ना, शहरों का उदय तथा उनमें विशेषज्ञ दस्तकारों का होना आदि इस काल में व्यापार और वाणिज्य के विकास के प्रमुख कारण बताए जा सकते हैं। दक्षिण में संगम युग में व्यापार और वाणिज्य के सन्दर्भ में निम्नलिखित पहलुओं को ध्यान में रखा जा सकता है

1. प्रमुख शहरी केन्द्र व्यापार और वाणिज्य के केन्द्र के रूप में इस काल में शहरों का उदय हुआ। इनमें से कुछ नगर जो आन्तरिक भागों में थे, वे स्थानीय और अन्तर्देशीय व्यापार और वाणिज्य के केन्द्र थे। ऐसे केन्द्रों में उरैयूर, काँची (कांचीपुरम) और मदुराई मुख्य थे। यहाँ पर बाजार अवनम् के नाम से जाने जाते थे, जहाँ लेन-देन होता था। ये राजनीतिक गतिविधियों के केन्द्र भी थे। दूसरे प्रकार के नगरों को पत्तिनम् (बन्दरगाह) कहते थे जो कि दक्षिण के शासकों के संरक्षण में काफी सक्रिय थे। इन पत्तिनमों में पूर्वी तट पर पुहार अथवा कावेरीपत्तिनम् (चोलों का), अरिकमड कोरकाई (पाण्ड्यों का) प्रमुख थे। पश्चिम तट पर मुजरिस, टिनडिस, नेलयंदा प्रसिद्ध व्यापार के केन्द्र थे। यहाँ जहाजरानी, बन्दरगाह निर्माण हुआ तथा गोदाम बने। विदेशी व्यापारी भी बड़ी संख्या में रहने लगे।

2. वाणिज्य संगठन-आन्तरिक क्षेत्रों में नमक का व्यापार करने वाले उमाना समुदाय की जानकारी मिलती है जो ग्रामीण क्षेत्रों में बड़े-बड़े कारवां (उमानवुथ) में जाते थे। नमक के अलावा अनाज (कुलावानेकन), चीनी (पानीटा वनिकन), कपड़े (अरूवैवानिकय), स्वर्ण (पोन वनिकन) आदि के व्यापारी भी थे। सुदूर दक्षिण में तिरूवेल्सारी में व्यापारियों के संगठन के प्रमाण मिलते हैं।

3. वस्तु विनिमय तथा सिक्के स्थानीय व्यापार का आधार वस्तु विनिमय था। संगम साहित्य में हमें पशु, जड़ी-बूटी, मछली के तेल, ताड़ी, गन्ना आदि सामानों की अदला-बदली का उल्लेख मिलता है। विदेशी व्यापार में भी वस्तु विनिमय का चलन होगा। परन्तु रोम से सोने तथा चाँदी के माध्यम से व्यापार के प्रमाण मिलते हैं। कुछ मुद्राशास्त्रियों का मानना है कि संगम काल में आहत सिक्के तथा रोमन सिक्के व्यापार में प्रयोग में लाए जाते थे।

4. स्थानीय तथा अन्तर्देशीय व्यापार-कृषक, चरवाहे, मछुआरे और जनजातीय लोग अपने सामान का लेन-देन करते होंगे। उदाहरण के लिए नमक, मछली, धान, दुग्ध, जड़ें, मृगमांस, शहद, ताड़ी आदि का स्थानीय बाजार में लेन-देन होता था। नमक के बदले में धान, धान के बदले में दुग्ध, दही, घी, मछली तथा शराब के लिए शहद दिया जाता था। मृगमांस और ताड़ी के बदले चावल, पपड़िया और गन्ना दिया जाता था।

मौर्यकाल में उत्तर और दक्षिण में व्यापार सम्पर्क बढ़े। मौर्यों ने दक्षिण से सोना तथा अन्य संसाधन प्राप्त करने के तरीके अपनाए थे। कौटिल्य के अनुसार, दक्षिण राज्य क्षेत्रों में शंख, हीरे, जवाहरात और सोना बड़ी मात्रा में था। दक्षिण में खनिज पदार्थों तथा मूल्यवान धातुओं का व्यापार होता था। उत्तर के व्यापारी बड़ी मात्रा में चाँदी के आहत सिक्के लाते थे। कलिंग से दक्षिण के राज्यों में महीन रेशम का आयात किया जाता था। उरैयूर, कांची, मदुराई इस अन्तर्देशीय व्यापार के प्रमुख केन्द्र थे।

5. विदेशी या समुद्रीय व्यापार-तमिल क्षेत्र के शासकों की आय का एक मुख्य स्रोत विदेशी व्यापार था। इस समद्रीय व्यापार से तटीय बन्दरगाह नगरों में रहने वाले व्यापारी समुदाय बहुत सम्पन्न हो गए थे। भारत से निर्यात की जाने वाली वस्तुओं में मसाले (काली मिर्च, इलायची), औषधीय जड़ी-बूटियाँ, मूल्यवान रत्न (बेरिल, गोमेद, कर्निलियन, जेस्फर) मोती, हाथी दाँत का सामान, कीमती इमारती लकड़ी (तेन्दु, सागौन, चन्दन और बांस आदि), रंगीन सूती वस्त्र, मलमल, नील आदि मुख्य थे। विदेशी लोग भारत में घोड़े लाते थे। इसके अलावा धातुएँ (ताँबा, सीसा), तैयार माल में बढ़िया शराब, आभूषण, सोने, चाँदी के सिक्के तथा मिट्टी के बर्तन भी लाते थे। इस काल में भारत का रोम के साथ व्यापार बढ़ा। प्रारम्भ में, यह व्यापार अरब व्यापारियों के माध्यम से होता था। बाद में हिप्पालुस नामक नाविक द्वारा मॉनसूनी हवाओं की खोज के बाद रोमन व्यापारी भारत से सीधा व्यापार करने लगे।

पुहार या कावेरीपत्तिनम् एक सर्वदेशीय महानगर था जहाँ पर अलग-अलग भाषा बोलने वाले देशी और विदेशी व्यापारी एक साथ रहते थे। पुहार में बड़े-बड़े विदेशी जहाज सोना और सामान भरकर लाते थे तथा यहाँ से सामान ले जाते थे। मदुराई के तट पर सलियर एक महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थी जहाँ अकसर बड़े-बड़े जहाज आते थे। पश्चिमी तट के बन्दरगाहों में मुजरिस सबसे प्रसिद्ध था। पुसा नुरू की एक कविता में धान के बदले में मछलियाँ, काली मिर्च की गाँठों और समुद्र तट पर खड़े बड़े-बड़े जहाजों से कई प्रकार के माल को छोटी नौकाओं में लादने का वर्णन है। इसी तट पर बन्दर आयातित मोतियों एवं कोडुमानम दुर्लभ सामान के आयात के लिए प्रसिद्ध था।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Read More »