Author name: Prasanna

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. मोहनजोदड़ो की खोज कब की गई?
(A) 1910 ई० में
(B) 1922 ई० में
(C) 1932 ई० में
(D) 1947 ई० में
उत्तर:
(B) 1922. ई० में

2. सार्वजनिक स्नानागार के भवन की बाहर की दीवार कितने फुट मोटी है?
(A) 8
(B) 4
(C) 12
(D) 3
उत्तर:
(A) 8

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

3. मोहनजोदड़ो किस नदी के तट पर स्थित है?
(A) चिनाब
(B) सिन्धु
(C) रावी
(D) सतलुज
उत्तर:
(B) सिन्धु

4. हड़प्पावासी किस धातु से अनभिज्ञ थे?
(A) ताँबा
(B) कांस्य
(C) लोहा
(D) पत्थर
उत्तर:
(C) लोहा

5. मोहनजोदड़ो कराची से लगभग कितने मील दूर है?
(A) 300 मील
(B) 500 मील
(C) 150 मील
(D) 225 मील
उत्तर:
(A) 300 मील

6. किस ई० में पुरातत्व विभाग के महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने घोषणा की कि एक नई सभ्यता का पता चला है?
(A) 1912 ई० में
(B) 1900 ई० में
(C) 1924 ई० में
(D) 1928 ई० में
उत्तर:
(C) 1924 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

7. “सिंधुवासियों की सामाजिक प्रणाली मिस्र तथा बेबीलोन के लोगों की सामाजिक प्रणाली से कहीं श्रेष्ठ थी।” ये किसके शब्द हैं?
(A) एन०एन० घोष
(B) आर०पी० त्रिपाठी
(C) एस०आर० शर्मा
(D) वी०ए० स्मिथ
उत्तर:
(C) एस०आर० शर्मा

8. “5000 वर्ष पुराने आभूषण ऐसे दिखाई देते हैं, जैसे किसी जौहरी की दुकान से अभी लाए गए हो।” ये शब्द किसके हैं?
(A) सर जॉन मार्शल
(B) ए०पी० मदान
(C) हेमचन्द्र राय
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सर जॉन मार्शल

9. “मोहरें ही सिंधुवासियों के एकमात्र लेख हैं जिनसे उनकी लिखाई के बारे में कुछ पता चल सकता है।” यह विचार किसने प्रस्तुत किया?
(A) डॉ० मैके
(B) आर०के० मुकर्जी
(C) एन०एन० घोष
(D) ए०एल० बाशम
उत्तर:
(A) डॉ० मैके

10. हड़प्पा संस्कृति के लोग निम्नलिखित पशु से अनभिज्ञ थे
(A) सूअर
(B) कुत्ता
(C) गाय
(D) घोड़ा
उत्तर:
(D) घोड़ा

11. निम्नलिखित भवन हड़प्पा संस्कृति से सम्बन्धित नहीं था
(A) अन्नागार
(B) पिरामिड
(C) स्नानागार
(D) विशाल गोदाम
उत्तर:
(B) पिरामिड

12. हड़प्पावासी कैसे वस्त्र पहनते थे?
(A) पशुओं की खाल के
(B) वृक्षों की छाल के
(C) सूती तथा ऊनी
(D) कागज के
उत्तर:
(C) सूती तथा ऊनी

13. हड़प्पा की खोज की थी
(A) दयाराम साहनी ने
(B) आर०डी० बैनर्जी ने
(C) सर जॉन मार्शल ने
(D) आर०एस० बिष्ट ने
उत्तर:
(A) दयाराम साहनी ने

14. हड़प्पा संस्कृति के लोग पूजा करते थे
(A) विष्णु की
(B) इन्द्र की
(C) वरुण की
(D) मातृदेवी की
उत्तर:
(D) मातृदेवी की

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

15. हड़प्पा सभ्यता किस सभ्यता के समकालीन नहीं थी?
(A) रोमन सभ्यता
(B) मेसोपोटामिया की सभ्यता
(C) नील घाटी की सभ्यता
(D) दजला फरात की सभ्यता
उत्तर:
(A) रोमन सभ्यता

16. हड़प्पा संस्कृति के लोग जहाज निर्माण कला में निपुण थे, इसका पता चलता है
(A) मिट्टी के बर्तनों से
(B) खुदाई से प्राप्त
(C) मोहरों पर जहाज के चित्रों से
(D) गोदामों में प्राप्त अवशेषों के सामान से
उत्तर:
(C) मोहरों पर जहाज के चित्रों से

17. मोहनजोदड़ो की खोज की
(A) सर जॉन मार्शल
(B) आर०डी० बैनर्जी
(C) दयाराम साहनी
(D) सूरजभान
उत्तर:
(B) आर०डी० बैनर्जी

18. बनावली स्थित है
(A) पंजाब में
(B) हरियाणा में
(C) उत्तरप्रदेश में
(D) राजस्थान में
उत्तर:
(B) हरियाणा में

19. हड़प्पा सभ्यता के किस स्थान से डकयार्ड के अवशेष मिले हैं?
(A) लोथल
(B) हड़प्पा
(C) मोहनजोदड़ो
(D) धौलावीरा
उत्तर:
(A) लोथल

20. हड़प्पन मुद्राओं पर रूपायन (चित्र) है
(A) बैल
(B) हाथी
(C) गैंडा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. प्रारम्भिक हड़प्पा की प्रमुख बस्ती है
(A) मेहरगढ़
(B) दंबसादात
(C) अमरी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

22. हड़प्पा सभ्यता का अन्य नाम है
(A) आर्यों की सभ्यता
(B) मिस्र की सभ्यता
(C) उत्तर वैदिक सभ्यता
(D) सिन्धु घाटी की सभ्यता
उत्तर:
(D) सिन्धु घाटी की सभ्यता

23. हड़प्पा संस्कृति के लोग किस अनाज से अनभिज्ञ थे?
(A) दाल
(B) जौ
(C) गेहूँ
(D) चावल
उत्तर:
(A) दाल

24. आर.एस. बिष्ट ने हड़प्पा सभ्यता से संबंधी धौलावीरा स्थल खोजा
(A) 1946 में
(B) 1971 में
(C) 1981 में
(D) 1990 में
उत्तर:
(D) 1990 में

25. धौलावीरा स्थित है
(A) गुजरात में
(B) सिन्ध में
(C) राजस्थान में
(D) महाराष्ट्र में
उत्तर:
(A) गुजरात में

26. चन्हुदड़ो की सर्वप्रथम खोज किसने की?
(A) एच० जी० मजूमदार ने
(B) एन० जी० मजूमदार ने
(C) आर० सी० मजूमदार ने
(D) आर० जी० मजूमदार ने
उत्तर:
(B) एन०जी० मजूमदार ने

27. आर.ई.एम. व्हीलर द्वारा हड़प्पा में खुदाई शुरू की गई
(A) 1941 ई० में
(B) 1931 ई० में
(C) 1946 ई० में
(D) 1951 ई० में
उत्तर:
(C) 1946 ई० में

28. कालीबंगन में बी. बी. लाल तथा बी. के. थापर ने खुदाई कार्य शुरू किया
(A) 1940 ई० में
(B) 1950 ई० में
(C) 1960 ई० में
(D) 1970 ई० में
उत्तर:
(C) 1960 ई० में

29. हड़प्पा किस नदी के तट पर है?
(A) सिंधु
(B) रावी
(C) सरस्वती
(D) झेलम
उत्तर:
(B) रावी

30. हड़प्पा काल में खेतों को हल से जोतने के प्रमाण मिले हैं
(A) मोहनजोदड़ो से
(B) हड़प्पा से
(C) कालीबंगन से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) कालीबंगन से

31. जलाशय के साक्ष्य मिले हैं
(A) मोहनजोदड़ो से
(B) धौलावीरा से
(C) कालीबंगन से
(D) शोर्तुघई से
उत्तर:
(B) धौलावीरा से

32. भारतीय पुरातत्व का जनक कहा जाता है
(A) कनिंघम को
(B) सर जॉन मार्शल को
(C) व्हीलर को
(D) किसी को नहीं
उत्तर:
(A) कनिंघम को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

33. हड़प्पा सभ्यता के शिल्प कार्य थे
(A) मनके बनाना
(B) औजार बनाना
(C) ईंटों का निर्माण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

34. कांसे की नर्तकी की मूर्ति कहाँ से प्राप्त हुई है?
(A) हड़प्पा से
(B) मोहनजोदड़ो से
(C) चन्हुदड़ो से
(D) राखीगढ़ी से
उत्तर:
(B) मोहनजोदड़ो से

35. हड़प्पावासी ताँबा आयात करते थे
(A) खेतड़ी से
(B) कोलार से
(C) ओमान से
(D) शोर्तुघई से
उत्तर:
(A) खेतड़ी से

36. पुरातत्वविदों के अनुसार हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा नगर था
(A) हड़प्पा
(B) मोहनजोदड़ो
(C) कालीबंगन
(D) लोथल
उत्तर:
(B) मोहनजोदड़ो

37. हड़प्पा की बस्तियों में पाई गई मोहरों में से अधिकांश बनी थीं
(A) लोहे की
(B) चाँदी की
(C) फिरोजा पत्थर की
(D) सेलखड़ी की
उत्तर:
(D) सेलखड़ी की

38. विशाल स्नानागार स्थित था
(A) हड़प्पा में
(B) लोथल में
(C) मोहनजोदड़ो में
(D) बनावली में
उत्तर:
(C) मोहनजोदड़ो में

39. हड़प्पा संस्कृति के पतन का क्या कारण था?
(A) बाढ़
(B) सूखा
(C) जलवायु परिवर्तन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

40. मोहनजोदड़ो स्थित ‘प्रथम सड़क’ का माप है
(A) 20 मीटर
(B) 15 मीटर
(C) 10.5 मीटर
(D) 5 मीटर
उत्तर:
(C) 10.5 मीटर

41. हड़प्पा संस्कृति के लोग किस धातु से परिचित नहीं थे?
(A) सोना
(B) ताँबा
(C) लोहा
(D) चाँदी
उत्तर:
(C) लोहा

42. हड़प्पा लिपि लिखी जाती थी
(A) ऊपर से नीचे
(B) बायें से दायें
(C) नीचे से ऊपर
(D) दायें से बायें
उत्तर:
(D) दायें से बायें

43. हड़प्पाई लोग पूजा करते थे
(A) मातृदेवी की
(B) वृक्षों की
(C) पशुओं की
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

44. हड़प्पा सभ्यता में दफनाए गए शवों की दिशा है
(A) उत्तर:दक्षिण
(B) पूर्व-पश्चिम
(C) उत्तर:पूर्व
(D) दक्षिण-पश्चिम
उत्तर:
(A) उत्तर:दक्षिण

45. हड़प्पा सभ्यता का कौन-सा स्थल हरियाणा में है?
(A) बनावली
(B) राखीगढ़ी
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
हड़प्पा सभ्यता का ज्ञान पहली बार कब हुआ?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता का ज्ञान पहली बार 1921 ई० में हुआ।

प्रश्न 2.
हड़प्पा सभ्यता की जानकारी का मुख्य साधन क्या है?
उत्तर:
हडप्पा सभ्यता की जानकारी का मुख्य साधन खदाई से प्राप्त अवशेष है।

प्रश्न 3.
सिन्धु घाटी सभ्यता के किन्हीं चार बड़े शहरों के नाम बताइए।
उत्तर:
सिन्धु घाटी सभ्यता के चार बड़े शहर हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, चन्हुदड़ो तथा कालीबंगन थे।

प्रश्न 4.
आधुनिक हरियाणा में सिन्धु सभ्यता के दो केन्द्रों के नाम बताइए।
उत्तर:
आधुनिक हरियाणा में सिन्धु सभ्यता के दो केन्द्र बनावली तथा राखीगढ़ी हैं।

प्रश्न 5.
हड़प्पा सभ्यता के लोग किस पशु की पूजा करते थे?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के लोग कुबड़े बैल की पूजा करते थे।

प्रश्न 6.
हड़प्पा संस्कृति के समय की लिपि बताइए।
उत्तर:
हड़प्पा संस्कृति के समय की लिपि चित्रमय है।

प्रश्न 7.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय के दो आभूषणों के नाम बताइए।
उत्तर:
सिन्धु घाटी की सभ्यता के समय के दो आभूषण अंगूठी तथा हार थे।

प्रश्न 8.
सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग किन वृक्षों की पूजा करते थे?
उत्तर:
सिन्धु घाटी की सभ्यता के लोग नीम तथा पीपल की पूजा करते थे।

प्रश्न 9.
मोहनजोदड़ो व हड़प्पा नगरों से गन्दे पानी को बाहर निकालने की क्या व्यवस्था थी?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो व हड़प्पा नगरों से गन्दे पानी को बाहर निकालने के लिए पक्की नालियों की व्यवस्था थी।।

प्रश्न 10.
हड़प्पा सभ्यता की किसी समकालीन सभ्यता का नाम बताइए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता की समकालीन सभ्यता का नाम मेसोपोटामिया था।

प्रश्न 11.
हड़प्पा सभ्यता के लोग किस पशु से अनभिज्ञ माने जाते हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के लोग घोड़े से अनभिज्ञ माने जाते हैं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 12.
सिन्धु सभ्यता के लोग किस धातु से परिचित नहीं थे?
उत्तर:
सिन्धु सभ्यता के लोग लोहे से परिचित नहीं थे।

प्रश्न 13.
प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी कहाँ से प्राप्त हुई?
उत्तर:
प्रसिद्ध कांस्य नर्तकी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई।

प्रश्न 14.
हड़प्पा सभ्यता के लोगों का मुख्य भोजन बताइए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के लोगों का मुख्य भोजन गेहूँ तथा चावल था।

प्रश्न 15.
आजकल मोहनजोदड़ो व हड़प्पा किस देश में हैं?
उत्तर:
आजकल मोहनजोदड़ो व हड़प्पा पाकिस्तान में हैं।

प्रश्न 16.
सिन्धु घाटी के लोग ‘सोना’ कहाँ से प्राप्त करते थे ?
उत्तर:
सिन्धु घाटी के लोग ‘सोना’ कर्नाटक से प्राप्त करते थे।

प्रश्न 17.
मोहनजोदड़ो की खोज किस व्यक्ति द्वारा हुई?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो की खोज आर०डी० बैनर्जी द्वारा हुई।

प्रश्न 18.
हड़प्पा की खोज किसने की?
उत्तर:
हड़प्पा की खोज सर दयाराम साहनी ने की।

प्रश्न 19.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की दो सार्वजनिक इमारतों के नाम बताइए।
उत्तर:
सिन्धु घाटी की सभ्यता की दो सार्वजनिक इमारतों के नाम धान्यागार तथा स्नानागार थे।

प्रश्न 20.
हड़प्पा संस्कृति के दो देवताओं के नाम बताइए।।
उत्तर:
हड़प्पा संस्कृति के दो देवताओं के नाम पशपति शिव तथा मातदेवी थे।

प्रश्न 21.
विशाल स्नानागार के भवन की बाहर की दीवार कितने फुट मोटी है?
उत्तर:
विशाल स्नानागार के भवन की बाहर की दीवार 8 फुट मोटी है।

प्रश्न 22.
स्नानागार का भवन बाहर से कितने फुट लम्बा है?
उत्तर:
स्नानागार का भवन बाहर से 180 फुट लम्बा है।

प्रश्न 23.
र्नानागार का भवन बाहर से कितने फुट चौड़ा है?
उत्तर:
स्नानागार का भवन बाहर से 108 फुट चौड़ा है।

प्रश्न 24.
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ क्या है?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो का शाब्दिक अर्थ मृतकों का टीला (मोयाँ-दा-दड़ा) है।

प्रश्न 25.
किस स्थान से खुदाई में एक गोदी के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं?
उत्तर:
लोथल से गोदी के भग्नावशेष मिले हैं।

प्रश्न 26.
गुजरात में हड़प्पा सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल कौन-से हैं?
उत्तर:
लोथल, रंगपुर, सुरकोतदा, धौलावीरा आदि गुजरात में प्रमुख पुरास्थल हैं।

प्रश्न 27.
यह कैसे ज्ञात हुआ है कि हड़प्पाई लोगों का दिलमुन तथा मेसोपोटामिया से व्यापारिक संबंध था?
उत्तर:
दिलमुन व मेसोपोटामिया से प्राप्त हड़प्पाई मोहरों से पता चला कि इन क्षेत्रों से हड़प्पाई लोगों का व्यापारिक संबंध था।

प्रश्न 28.
हड़प्पाई लोग किन पशुओं को पालते थे?
उत्तर:
हड़प्पाई लोग बैल, गाय, भैंस, बकरी, भेड़, सूअर, हाथी, ऊँट, कुत्ता आदि पशुओं को पालते थे।

प्रश्न 29.
हड़प्पा सभ्यता में कौन-सी मूर्तियाँ बहुतायत में मिली हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता में मृण्मयी मूर्तियाँ बहुतायत में मिली हैं।

प्रश्न 30.
हड़प्पाई लोग उपमहाद्वीप के किस स्थान से ताँबा प्राप्त करते थे?
उत्तर:
हड़प्पाई लोग खेतड़ी (राजस्थान) से ताँबा प्राप्त करते थे।

प्रश्न 31.
हड़प्पा सभ्यता के लोग सिंचाई के लिए किन साधनों का प्रयोग करते थे?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के लोग सिंचाई के लिए कुओं, नहरों व जलाशयों का प्रयोग करते थे।

प्रश्न 32.
वैदूर्यमणि किस स्थान से अधिक मात्रा में मिलती थी?
उत्तर:
वैदूर्यमणि शोर्तुघई (अफगानिस्तान) में अधिक मात्रा में पाई जाती थी।

प्रश्न 33.
हड़प्पाई नगरों से मेसोपोटामिया को क्या निर्यात किया जाता था?
उत्तर:
ताँबा, हाथी दाँत, वैदूर्यमणि आदि।

प्रश्न 34.
हड़प्पा सभ्यता में मुख्य कृषि फसलें क्या थीं?
उत्तर:
गेहूँ, जौ, चावल, मटर, कपास आदि मुख्य कृषि फसलें थीं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 35.
हड़प्पा कहाँ स्थित है?
उत्तर:
हड़प्पा पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) के मोंटगुमरी जिले में रावी के बाएँ तट पर स्थित है।

प्रश्न 36.
हड़प्पा सभ्यता में सर्वाधिक चित्र व मूर्तियाँ किसकी मिली हैं?
उत्तर:
सर्वाधिक चित्र व मूर्तियाँ कूबड़दार बैल की मिली हैं।

प्रश्न 37.
कालीबंगन कहाँ स्थित है?
उत्तर:
कालीबंगन राजस्थान में स्थित है।

प्रश्न 38.
मोहनजोदड़ो कहाँ स्थित था?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो सिंध के लरकाना जिले में सिन्धु नदी के तट पर स्थित था।

प्रश्न 39.
हड़प्पा लिपि में कुल कितने चित्राक्षर थे?
उत्तर:
हड़प्पा लिपि में लगभग 250 से 400 तक चित्राक्षर थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
प्रारम्भ में हड़प्पा सभ्यता को ‘सिंधु घाटी की सभ्यता’ का नाम क्यों दिया गया?
उत्तर:
हड़प्पा की खोज के बाद अब तक इस सभ्यता से जुड़ी लगभग 2800 बस्तियों की खोज की जा चुकी है। इन बस्तियों की विशेषताएँ हड़प्पा से मिलती हैं। विद्वानों (सर जॉन मार्शल) ने इस सभ्यता को “सिंधु घाटी की सभ्यता” का नाम दिया क्योंकि शुरू में बहुत-सी बस्तियाँ सिंधु घाटी और उसकी सहायक नदियों के मैदानों में पाई गई थीं। ।

प्रश्न 2.
वर्तमान में पुरातत्वविद् इसे ‘हड़प्पा सभ्यता’ संज्ञा देना उपयुक्त क्यों मानते हैं?
उत्तर:
बाद में इस सभ्यता से जुड़े अनेक स्थानों की खोज हुई जो राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा गुजरात में स्थित थे। अतः इस सभ्यता को केवल सिंधु घाटी की सभ्यता कहना सार्थक नहीं लगा। वर्तमान में पुरातत्ववेत्ता इसे “हड़प्पा की सभ्यता” कहना पसंद करते हैं। यह नामकरण इसलिए उचित है कि इस संस्कृति से संबंधित सर्वप्रथम खुदाई हड़प्पा में हुई थी।

प्रश्न 3.
हड़प्पा सभ्यता की तीन अवस्थाओं के नाम लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता की तीन अवस्थाएँ निम्नलिखित हैं

  • आरंभिक हड़प्पा काल 3500-2600 ई.पू.,
  • विकसित हड़प्पा काल 2600-1900 ई.पू.,
  • उत्तर हड़प्पा काल 1900-1300 ई.पू.।

प्रश्न 4.
मोहनजोदड़ो का क्या अर्थ है? इसकी खोज कब हुई?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो से अभिप्राय है मृतकों का टीला। सिंधी भाषा में इसे ‘मोयां-दा-दड़ा’ कहते हैं। इसकी खोज 1922 में राखालदास बनर्जी ने की।

प्रश्न 5.
हड़प्पा सभ्यता के लोगों के पालतू पशुओं के नाम बताइए।
उत्तर:
सभ्यता से प्राप्त शिल्प तथ्यों तथा पुरा-प्राणिविज्ञानियों (Archaeo-zoologists) के अध्ययनों से ज्ञात हुआ हैं कि हड़प्पन भेड़, बकरी, बैल, भैंस, सुअर आदि जानवरों का पालन करने लगे थे। कूबड़ वाला सांड उन्हें विशेष प्रिय था। गधे और ऊँट का पालन बोझा ढोने के लिए करते थे।

प्रश्न 6.
‘हड़प्पा के लोग एकांतता (Privacy) पर बहुत ध्यान देते थे।’ इस पर अपने विचार प्रकट करें।
उत्तर:
ऐसा भी प्रतीत होता है कि घरों के निर्माण में एकान्तता (Privacy) का ध्यान रखा जाता था। भूमि स्तर (Ground level) पर दीवार में कोई भी खिड़की नहीं होती थी। इसी प्रकार मुख्य प्रवेश द्वार से घर के अन्दर या आंगन में नहीं झांका/देखा जा सकता था।

प्रश्न 7.
हड़प्पा सभ्यता की जानकारी का सबसे प्रमुख स्रोत कौन-सा है?
उत्तर:
यहाँ से प्राप्त हुई सामग्री में सबसे महत्त्वपूर्ण हड़प्पन मुद्राएँ (Seals) हैं। ये एक विशेष पाषाण (Steatite) से बनी हैं तथा इन पर पशुओं (बैल, सांड, हाथी, गैण्डा) के मुद्रांकन (Sealing) हैं। इन पर लिपि के संकेत भी गोदे हुए हैं जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। ये मुद्राएँ सभी स्थलों पर बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त शहरों, दस्तकारी केन्द्रों, दुर्ग स्थानों आदि से अनेक महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं।

प्रश्न 8.
धौलावीरा कहाँ पर है? इसकी दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
धौलावीरा गुजरात में स्थित है। इस नगर की खोज 1967-68 में जे.पी. जोशी द्वारा की गई। यह भारत में हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा नगर पाया गया है। यह नगर विशेष रूप से मनके बनाने के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 9.
हड़प्पा सभ्यता की सड़कों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के नगर सड़कों के लिए प्रसिद्ध हैं। सड़कें और गलियाँ सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मोहनजोदड़ो में निचले नगर में मुख्य सड़क 10.5 मीटर चौड़ी थी, इसे ‘प्रथम सड़क’ कहा गया है। अन्य सड़कें 3.6 से 4 मीटर तक चौड़ी थीं। गलियाँ एवं गलियारे 1.2 मीटर (4 फुट) या उससे अधिक चौड़े थे। घरों के बनाने से पहले ही सड़कों व गलियों के लिए स्थान छोड़ दिया जाता था। उल्लेखनीय है कि मोहनजोदड़ो के अपने लम्बे जीवनकाल में इन सड़कों पर अतिक्रमण (encroachments) या निर्माण कार्य दिखाई नहीं देता।

प्रश्न 10.
सी. ई. तथा बी.सी.ई. का अर्थ लिखें।
उत्तर:
सी.ई. (CE.)-कॉमन एरा (Common Era) आजकल ए.डी. के बजाए सी.ई. का प्रयोग किया जाने लगा है।
बी.सी.ई. (BCE)-बिफोर कॉमन एरा (Before Common Era) आजकल बी.सी. (ई.पू.) के स्थान पर बी.सी ई. का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
हड़प्पा सभ्यता के कोई दो विशेष पहचान बिंदुओं के नाम लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के दो विशेष पहचान बिंदुओं के नाम निम्नलिखित हैं

  • नगर योजना व चबूतरों पर बने दुर्गों में विशेष भवन तथा समकोण पर काटती सीधी सड़कें, गलियाँ व उत्तम निकासी व्यवस्था।
  • चाक से बने पक्के, भारी व मोटी परत वाले मृदभाण्ड (Pottery)। उन पर काले रंग से पीपल के पत्तों, काटते सर्किल व मोर इत्यादि का रूपांकन (Motifs)।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 12.
हड़प्पा सभ्यता से जुड़े किन्हीं तीन उत्पादन केंद्रों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
बालाकोट (बलूचिस्तान में समुद्रतट के समीप) व चन्हुदड़ो (सिंध में) सीपीशिल्प और चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध थे।

  • लोथल (गुजरात) और चन्हुदड़ो में लाल पत्थर (Carmelian) और गोमेद के मनके बनाए जाते थे।
  • चन्हुदड़ो में वैदूर्यमणि के कुछ अधबने मनके मिले हैं जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ पर दूर-दराज से बहुमूल्य पत्थर आयात किया जाता था तथा उन पर काम करके उन्हें बेचा जाता था।

प्रश्न 13.
हड़प्पा सभ्यता की खोज कब हुई? वर्तमान में इसका विस्तार क्षेत्र क्या है?
उत्तर:
पंजाब में रावी नदी के किनारे पर स्थित हड़प्पा पहला नगर था जिसकी 1921 में खुदाई हुई। इसका फैलाव उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बलूचिस्तान से लेकर उत्तर:पूर्व में मेरठ तक का था। यह सारा क्षेत्र त्रिभुज के आधार का था। इसका पूरा क्षेत्रफल लगभग 1,299,600 वर्ग किलोमीटर आंका जाता है। उल्लेखनीय है कि हड़प्पा सभ्यता का विस्तार इसकी समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से काफी बड़ा था।

प्रश्न 14.
हड़प्पा सभ्यता के किन्हीं चार प्रमुख नगरों के नाम बताइए।
उत्तर:
हड़प्पा व मोहनजोदड़ो इस सभ्यता के मुख्य नगर हैं जहाँ से नाना प्रकार के शिल्प तथ्य (Artefact) प्राप्त हुए। यह दोनों नगर अब पाकिस्तान में पड़ते हैं। दोनों के बीच 483 किलोमीटर की दूरी है। सिन्ध क्षेत्र में चन्हुदड़ो नगर प्रकाश में आया . है। यह मोहनजोदड़ो से 130 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। एक अन्य नगर गुजरात लोथल, (कठियावाड़) है। इस स्थल पर बंदरगाह के अवशेष भी पाए गए हैं। इसके अतिरिक्त धौलावीरा (गुजरात के कच्छ क्षेत्र में) उत्तरी राजस्थान में कालीबंगन (काले रंग की चूड़ियाँ), हरियाणा में बनावली व राखीगढ़ी, बलूचिस्तान में सुत्कागेंडोर व सुरकोतदा, रंगपुर (गुजरात) आदि इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण स्थल हैं।

प्रश्न 15.
हड़प्पा सभ्यता के विनाश के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के विनाश के दो कारण निम्नलिखित हैं

1. आर्यों के आक्रमण (Aryan’s Invasions)-व्हीलर ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इसके पक्ष में वे आक्रमण के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। प्रथम, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में सड़कों पर मानव कंकाल पड़े मिले हैं। एक कमरे में 13 स्त्री-पुरुषों . तथा बच्चों के कंकाल मिले हैं। मोहनजोदड़ो के अन्तिम चरण में सड़कों पर तथा घरों में मनुष्यों के कत्लेआम के प्रमाण मिले हैं। एक सँकरी गली को जॉन मार्शल ने डैडमैन लेन का नाम दिया है। ये कंकाल इस बात का संकेत करते हैं कि बाहरी आक्रमणकारियों ‘ (आय) ने हमला किया।

2. बाढ़ और भूकम्प (Flood and Earthquake)-कुछ विद्वानों ने हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण बाढ़ बताया है। मोहनजोदड़ो में मकानों और सड़कों पर गाद (कीचड़युक्त मिट्टी) भरी पड़ी थी। बाढ़ का पानी उतर जाने पर यहाँ के निवासियों ने पहले के मकानों के मलबे पर फिर से मकान और सड़कें बना लीं। बाढ़ आने का सिलसिला कई बार घटा। खुदाई से पता चला है कि 70 फुट गहराई तक मकान बने हुए थे। बार-बार आने वाली बाढ़ों से नगरवासी गरीब हो गए तथा तंग आकर बस्तियों को छोड़कर चले गए।

प्रश्न 16.
दुर्ग क्षेत्र से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो को हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा शहरी केंद्र माना जाता है। इस सभ्यता की नगर-योजना, गृह निर्माण, मुद्रा, मोहरों आदि की अधिकांश जानकारी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है। यह नगर दो भागों में बँटा था। एक भाग में ईंटों से बनाए ऊँचे चबूतरे पर स्थित बस्ती है। इसके चारों ओर ईंटों से बना परकोटा (किला) था, जिसे ‘नगर दुर्ग’ (Citadel) कहा जाता है। ‘नगर दुर्ग’ का क्षेत्रफल निचले नगर से कम था। इसमें पकाई ईंटों से बने अनेक बड़े भवन पाए गए हैं। दुर्ग क्षेत्र में शासक वर्ग के लोग रहते थे। .

प्रश्न 17.
हड़प्पा लिपि पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा की मोहरों पर चित्रों के माध्यम से लिखावट है। विद्वानों का मानना है कि इन चित्रों के रूपांकनों (Motifs) के द्वारा अर्थ समझाया गया था। इन चित्रों से अनपढ़ भी संकेत से अर्थ समझ जाते होंगे। अधिकांश अभिलेख छोटे हैं। सबसे लम्बे अभिलेख में लगभग 26 चिहन हैं। यह लिपि संभवतः वर्णात्मक (Alphabetical) नहीं थी। इसमें बहुत-से चिह्न ही प्रयोग में होते थे जिनकी संख्या 375 तथा 400 के बीच बताई गई है। ऐसा लगता है कि यह लिपि दाईं-से-बाईं ओर लिखी जाती थी।

प्रश्न 18.
हड़प्पा काल में यातायात के दो साधन क्या थे?
उत्तर:
पकाई मिट्टी से बनी बैलगाड़ियों के खिलौने इस बात का संकेत हैं कि बैलगाड़ियों का प्रयोग सामान का आयात करने के लिए होता था। सिन्धु व सहायक नदियों का भी मार्गों के रूप में प्रयोग होता था। समुद्र तटीय मार्गों का इस्तेमाल भी माल लाने के लिए किया जाता था। संभवतः इसके लिए नावों का प्रयोग होता था।

प्रश्न 19.
सर जॉन मार्शल कौन था? उसकी पुस्तक का नाम लिखें।
उत्तर:
सर जॉन मार्शल भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक थे। उन्होंने हड़प्पा की खुदाई में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। हड़प्पा सभ्यता की खोज की योजना मार्शल द्वारा ही की गई। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम है ‘मोहनजोदड़ो एंड द इंडस सिविलाईजेशन’।

प्रश्न 20.
आर.ई.एम. व्हीलर कौन थे? उनकी पुस्तक का नाम लिखें।
उत्तर:
आर.ई.एम. व्हीलर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के महानिदेशक थे। उन्होंने यह पद-भार 1944 में सम्भाला। हड़प्पा सभ्यता के खुदाई में व्हीलर ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक का नाम है-‘माई आर्कियोलॉजिकल मिशन टू इंडिया एंड पाकिस्तान’।

प्रश्न 21.
कनिंघम कौन थे?
उत्तर:
कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पहले महानिदेशक थे। उनकी रुचि छठी सदी ईसा पूर्व से चौथी सदी ईसा पूर्व तथा इसके बाद के प्राचीन इतिहास के पुरातत्व में थी। उन्होंने बौद्धधर्म से संबंधित चीनी यात्रियों के वृत्तांतों का प्रारंभिक बस्तियों की पहचान करने में प्रयोग किया। सर्वेक्षण के कार्य में शिल्प तथ्य एकत्र किए। उनका रिकॉर्ड रखा तथा अभिलेखों का अनुवाद भी किया।

प्रश्न 22.
हड़प्पा लोगों द्वारा शव के अंतिम संस्कार के दो तरीके बताइए। अथवा हड़प्पाकालीन शवाधानों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
हड़प्पा लोगों द्वारा शव के अंतिम संस्कार के दो तरीके इस प्रकार हैं

  • हड़प्पा में भी मृतकों के अन्तिम संस्कार का सबसे ज़्यादा प्रचलित तरीका दफनाना ही था। शव सामान्य रूप से उत्तर:दक्षिण दिशा में रखकर दफनाते थे। कब्रों में कई प्रकार के आभूषण तथा अन्य वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं।
  • कालीबंगन में कब्रों में कंकाल नहीं हैं। वहाँ छोटे-छोटे वृत्ताकार गड्ढों में राखदानियाँ तथा मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं। लोथल में कब्रों में साथ-साथ दफनाए गए महिला और पुरुष मुर्दो के कंकालों के जोड़े मिले हैं।

प्रश्न 23.
भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर उन तीन क्षेत्रों के नाम लिखें जिनसे हड़प्पन व्यापार होता था।
उत्तर:
1. मगान (Magan)-ओमान की खाड़ी पर स्थित रसाल जनैज (Rasal-Junayz) भी व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थी। सुमेर के लोग ओमान को मगान (Magan) के नाम से जानते थे। मगान में हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी वस्तुएँ; जैसे मिट्टी का मर्तबान, बर्तन, इन्द्रगोप के मनके, हाथी-दांत व धातु के कला तथ्य मिले हैं।

2. दिलमुन (Dilmun)-फारस की खाड़ी में भी हड़प्पाई जहाज पहुँचते थे। दिलमुन (Dilmun) तथा पास के तटों पर जहाज जाते थे। दिलमुन से हड़प्पा के कलातथ्य तथा लोथल से दिलमुन की मोहरें प्राप्त हुई हैं।

3. मेसोपोटामिया (Mesopotamain)-वस्तुतः दिलमुन (बहरीन के द्वीपों से बना) मेसोपोटामिया का प्रवेश द्वार था। मेसोपोटामिया के लोग सिंधु बेसिन (Indus Basin) को मेलुहा (Meluhha) के नाम से जानते थे (कुछ विद्वानों के मतानुसार मेलुहा सिंधु क्षेत्र का बिगड़ा हुआ नाम है)। मेसोपोटामिया के लेखों (Texts) में मेलुहा से व्यापारिक संपर्क का उल्लेख है।

प्रश्न 24.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की लिपि की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
सिन्धु घाटी की सभ्यता की लिपि की कोई दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • सिन्धु घाटी की मोहरों पर चित्रों के माध्यम से लिखावट है। इन चित्रों से अनपढ़ भी संकेत से अर्थ समझ लेते होंगे।
  • यह लिपि संभवत: वर्णात्मक नहीं थी। इसमें लगभग 375 से 400 चिह्नों का प्रयोग होता होगा। यह लिपि दाईं से बाईं ओर. लिखी जाती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 25.
हड़प्पा सभ्यता का सबसे पहले खोजा गया स्थल कौन था? इसकी दुर्दशा का क्या कारण था?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता का सबसे पहले उत्खनन तथा खोजा गया स्थल हड़प्पा था। इसकी खुदाई 1921 में दयाराम साहनी ने की थी। इस स्थल की दुर्दशा का मुख्य कारण इस स्थल से ईंटों की चोरी था। ईंटें चुराने वालों ने इसे बुरी तरह से नष्ट कर दिया था। इससे यहाँ की बहुत-सी संरचनाएँ नष्ट हो गईं।

प्रश्न 26.
मोहनजोदड़ो के नियोजन पर प्रकाश डालने वाले कुछ साक्ष्य बताइए।
उत्तर:
मोहनजोदड़ो की वास्तुकला के कई लक्षण इस बात के साक्ष्य हैं कि यह एक नियोजित नगर था

  • नगर का दुर्ग क्षेत्र तथा निचले नगर में विभाजन,
  • समकोण काटती सड़क व गलियाँ,
  • उत्तम जल निकास प्रणाली,
  • समान आकार की ईंटों का प्रयोग,
  • विशाल भवनों का वास्तु,
  • घरों का निश्चित योजना से निर्माण।

प्रश्न 27.
फयॉन्स क्या था? इससे बने पात्र महंगे क्यों थे?
उत्तर:
फ़यॉन्स बालू (घिसी हुए रेत), रंग तथा किसी चिपचिपे पदार्थ के मिश्रण को पकाकर बनाया गया एक प्रकार का पदार्थ था। इसके पात्र चमकदार होते थे। इससे बने छोटे पात्र कीमती इस कारण माने जाते थे कि इन्हें बनाना कठिन होता था।

प्रश्न 28.
नागेश्वर तथा बालाकोट कहाँ थे और क्यों प्रसिद्ध थे?
उत्तर:
नागेश्वर गुजरात तथा बालाकोट बलूचिस्तान में स्थित थे। ये दोनों बस्तियाँ समुद्र तट पर बसी हुई थी। ये दोनों स्थल शंख से वस्तुएँ बनाने के विशिष्ट केंद्र थे। इसका कारण यह था कि यह समुद्र तट पर थे तथा यहाँ पर शंख पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध थे। शंख से चूड़ियाँ, पच्चीकारी की वस्तुएँ आदि बनाई जाती थीं।

प्रश्न 29.
मोहनजोदड़ों के घरों की कोई दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:मोहनजोदड़ों के घरों की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • मोहनजोदड़ों के ज्यादातर घरों में आंगन होता था और चारों तरफ कमरे बने होते थे।
  • मोहनजोदड़ों के लगभग सभी घरों में कमरे होते थे।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हड़प्पा सभ्यता के नामकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्रारंभ में विद्वानों ने इस सभ्यता को “सिंधु घाटी की सभ्यता” का नाम दिया था क्योंकि शुरू में बहुत-सी बस्तियाँ सिंधु घाटी और उसकी सहायक नदियों के मैदानों में पाई गई थीं। परंतु बाद में इस सभ्यता से जुड़े अ राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा तथा गुजरात में स्थित थे। अतः इस सभ्यता को केवल सिंधु घाटी की सभ्यता कहना सार्थक नहीं लगा। वर्तमान में पुरातत्ववेत्ता इसे “हड़प्पा की सभ्यता” कहना पसंद करते हैं। यह नामकरण इसलिए उचित है कि इस संस्कृति से संबंधित सर्वप्रथम खुदाई हड़प्पा में हुई थी। अन्य स्थानों की खुदाई से भी सभ्यता के वही लक्षण प्राप्त हुए जो हड़प्पा से प्राप्त हुए थे। यह भी उल्लेखनीय है कि पुरातत्व-विज्ञान में यह परिपाटी है कि जब किसी प्राचीन सभ्यता या संस्कृति का वर्णन किया जाता है तो उस स्थान के आधुनिक प्रचलित नाम पर उस सभ्यता का नाम रखा जाता है, जहाँ से उसके अस्तित्व का पता चलता है। इसलिए हड़प्पा को आधार मानकर इसे ‘हड़प्पा सभ्यता’ नामकरण देना उपयुक्त है।

प्रश्न 2.
हड़प्पा सभ्यता की पुरातत्वविदों की जानकारी के स्रोतों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता की सारी जानकारी पुरातत्वविदों को इस सभ्यता से जुड़ी बस्तियों (नगरों) से प्राप्त विशेष शिल्प तथ्यों (Artefacts) से प्राप्त हुई है। उत्खनन से प्राप्त हुई सामग्री में सबसे महत्त्वपूर्ण हड़प्पन मुद्राएँ (Seals) हैं। ये एक विशेष पाषाण (Steatite) से बनी हैं तथा इन पर पशुओं (बैल, सांड, हाथी, गैण्डा) के मुद्रांकन हैं। इन पर लिपि के संकेत भी गोदे हुए हैं जिन्हें अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है। ये मुद्राएँ सभी स्थलों पर बड़ी संख्या में प्राप्त हुई हैं। इसके अतिरिक्त शहरों, दस्तकारी केन्द्रों दुर्ग स्थानों आदि से अनेक महत्त्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं। कच्ची और पक्की ईंटों से बने घर और घरों में कुएँ मिले हैं।

ऊँचे तथा निचले स्थलों (दो भागों में) पर बसे नगर एवं नगरों में अन्नागार और बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। मोटे तथा लाल मिट्टी के अलंकृत बर्तन (मृदभाण्ड) तथा मिट्टी की मुख्य मूर्तियाँ पाई गई हैं। तांबे तथा कांस्य के औजार, मूर्तियाँ तथा बर्तन हैं। पत्थर के बाट और कीमती पत्थरों के मनके हैं। समुद्री शैल तथा हाथी-दाँत के गहने भी हैं। इसके अतिरिक्त कांस्य, सोना तथा चाँदी के आभूषण भी मिले हैं। इस प्रकार पुरातत्वविदों की जानकारी के प्रमुख स्रोत हैं-मुद्राएँ, मुद्रांक, नगर दुर्ग, निचले नगर, नगरों की बसावट, मकान, विशाल इमारतें, ईंटें, मृदभाण्ड, तौल, बर्तन, औजार, मनके, गहने, मूर्तियाँ इत्यादि।

प्रश्न 3.
हड़प्पा के लोगों के जीविका निर्वाह के तरीकों पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के आरंभिक चरण में जीविका निर्वाह के तरीके विकसित हो रहे थे। वे अनेक फसलें उगाने लगे थे। इनसे उन्हें खाद्यान्न प्राप्त होते थे। वे कई प्रकार के पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद, जानवरों (मछली सहित) से भोजन प्राप्त करने में सफल थे। अनाज के जले दानों तथा बीजों की खोज से पुरातत्वविदों ने हड़प्पाई लोगों की आहार संबंधी आदतों के बारे में जानकारी प्राप्त की है। पुरावनस्पतिज्ञों के अनुसार हड़प्पाई लोग गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना, तिल आदि अनाज के दानों से परिचित थे। बाजरे के दाने गुजरात से मिले। चावल के भी प्रमाण मिले हैं।

हड़प्पा स्थलों से भेड़, बकरी, भैंस, सूअर आदि की हड्डियाँ मिली हैं। पुरा-प्राणिविज्ञानियों के अनुसार ये सभी जानवर पालतू थे। संभवतः वे इनसे दूध तथा मांस प्राप्त करते थे। इसके अलावा जंगली सूअर (वराह), हिरणं तथा घड़ियाल की हड्डियाँ भी मिली हैं। मुर्गे की हड्डियों के प्रमाण भी हैं। कृषि उपज बढ़ाने के लिए खेतों को जोतते होंगे। हल के प्रमाण बनावली तथा जुते हुए खेत के प्रमाण कालीबंगन से मिले हैं। सिंचाई के प्रमाण मिले हैं। कुएँ, जलाशय, झीलों, नहरों से सिंचाई की जाती होगी। यद्यपि सिंचाई के कम ही प्रमाण मिले हैं।

प्रश्न 4.
मोहनजोदड़ो की सड़कों और गलियों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मोहनजोदड़ो की सड़कें व गलियाँ पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार बनाई गई थीं। सड़कें और गलियाँ सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। सड़कें पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण दिशा में बिछी हुई थीं। इससे नगर कई भागों में बंट जाते थे। मोहनजोदड़ों में मुख्य सड़क 10.5 मीटर चौड़ी थी, इसे ‘प्रथम सड़क’ कहा गया है। इस ‘प्रथम सड़क’ पर एक साथ पहिए वाले सात वाहन गुजर सकते थे। अन्य सड़कें 3.6 से 4 मीटर तक चौड़ी थीं। गलियाँ एवं गलियारे 1.2 मीटर (4 फुट) या । उससे अधिक चौड़े थे। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सड़कों, गलियों तथा नालियों की व्यवस्था लागू करने तथा निरंतर देखभाल के लिए नगरपालिका या नगर प्राधिकरण जैसी कोई प्रशासनिक व्यवस्था रही होगी। स्पष्ट है कि नगर में सड़कें व गलियाँ एक योजना के अनुसार बनाई गई थीं। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाते थे। अन्य सड़कें और गलियाँ मुख्य मार्ग को समकोण पर काटती थीं जिससे नगर वर्गाकार/आयताकार खंडों में विभाजित होता था।

प्रश्न 5.
‘मोहनजोदड़ो एक नियोजित नगर था।’ इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
इस बात के पुख्ता पुरावशेष हैं कि मोहनजोदड़ो एक नियोजित शहरी केंद्र था इसको हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा शहरी केंद्र माना जाता है। इस सभ्यता की नगर-योजना, गृह निर्माण, मुद्रा, मोहरों आदि की अधिकांश जानकारी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है। यह नगर दो भागों में बँटा था। एक भाग में इंटों से बनाए ऊँचे चबूतरे पर स्थित बस्ती है। इसके चारों ओर ईंटों से बना परकोटा (किला) था, जिसे ‘नगर दुर्ग’ (Citadel) कहा जाता है। ‘नगर दुर्ग’ का क्षेत्रफल निचले नगर से कम था। इसमें पकाई ईंटों से बने अनेक बड़े भवन पाए गए हैं। दुर्ग क्षेत्र में शासक वर्ग के लोग रहते थे। निचले नगर के चारों ओर भी दीवार थी। इस क्षेत्र में भी कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था। ये चबूतरे भवनों की आधारशिला (Foundation) का काम करते थे।

दुर्ग क्षेत्र के निर्माण तथा निचले क्षेत्र में चबूतरों के निर्माण के लिए विशाल संख्या में श्रमिकों को लगाया गया होगा। इस नगर की यह भी विशेषता रही होगी कि पहले प्लेटफार्म या चबूतरों का निर्माण किया जाता होगा तथा बाद में इस तय सीमित क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जाता होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि पहले योजना बनाई जाती होगी तथा बाद में उसे योजनानुसार लागू किया जाता था। नगर की पूर्व योजना (Pre-planning) का पता ईंटों से भी लगता है। ये ईंटें पकाई हुई (पक्की) तथा धूप में सुखाई हुई होती थीं। इनका मानक (1:2:4) आकार था। इसी मानक आकार की ईंटें हड़प्पा सभ्यता के अन्य नगरों में भी प्रयोग हुई हैं।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 1

मोहनजोदड़ो का नक्शा हुई हैं। मोहनजोदड़ो के एक नियोजित नगर होने का प्रमाण वहाँ पर सड़कों तथा नालियों की सुव्यवस्था का प्राप्त होना भी है। गृह स्थापत्य से भी स्पष्ट है कि पहले नक्शे बनाए जाते थे तथा बाद में घर का निर्माण किया जाता था।

प्रश्न 6.
हड़प्पा सभ्यता की निकास व्यवस्था (नालियों की व्यवस्था) के बारे में आप क्या जानते हैं? क्या यह नगर योजना की ओर संकेत करती है?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के शहरों की सबसे अनूठी विशिष्टताओं में से एक थी- ध्यानपूर्वक नियोजित जल निकास व्यवस्था (नालियों की व्यवस्था)। नियोजित और व्यापक नालियों की व्यवस्था हमें अन्य किसी भी समकालीन सभ्यता के नगरों में प्राप्त नहीं होती है। प्रत्येक घर में छोटी नालियाँ होती थीं जो घर के पानी को बाहर गली या सड़क के किनारे बनी नाली में पहुँचाती थीं। प्रमुख सड़कों एवं गलियों के साथ 1 से 2 फुट गहरी ईंटों तथा पत्थरों से ढकी नालियाँ होती थीं। मुख्य नालियों में कचरा छानने की व्यवस्था भी होती थी। नालियों में ऐसी व्यवस्था करने के लिए बड़े गड्ढे (शोषगत) होते थे, जो पत्थरों या ईंटों से ढके होते थे जिन्हें सफाई करने के लिए आसानी से हटाया और वापस रख दिया जाता था। मुख्य नालियाँ एक बड़े नाले के साथ जुड़ी होती थीं जो सारे गंदे पानी को नदी में बहा देती थीं। हड़प्पाकालीन नगरों की जल निकास प्रणाली पर टिप्पणी करते हुए ए०एल० बाशम ने लिखा है, नालियों की अद्भुत व्यवस्था सिन्धु घाटी के लोगों की महान सफलताओं में से एक थी।

रोमन सभ्यता के अस्तित्व में आने तक किसी भी प्राचीन सभ्यता की नाली व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं थी।” जल निकासी की यह व्यवस्था केवल बड़े-बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं थी वरन् छोटी बस्तियों में भी इसके प्रमाण मिले हैं। उदाहरण के लिए लोथल में भी पक्की ईंटों की नालियां हैं। नालियों के विषय में मैके ने लिखा है, “निश्चित रूप से यह अब तक खोजी गई सर्वथा संपूर्ण प्राचीन प्रणाली है। नालियों की व्यवस्था से यह स्पष्ट संकेत होता है कि नगर योजनापूर्वक बनाए जाते थे।”

प्रश्न 7.
हड़प्पा सभ्यता के गृह स्थापत्य पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखि
उत्तर:
मोहनजोदड़ो से उपलब्ध आवासीय भवनों के नमूनों से सभ्यता के गृह स्थापत्य का अनुमान लगाया जाता है। घरों की बनावट में समानता पाई गई है। ज्यादातर घरों में आंगन (Courtyard) होता था और इसके चारों तरफ कमरे बने होते थे। ऐसा लगता है कि आंगन परिवार की गतिविधियों का केंद्र था। उदाहरण के लिए गर्म और शुष्क मौसम में आंगन में खाना पकाने व कातने जैसे कार्य किए जाते थे। ऐसा भी प्रतीत होता है कि घरों के निर्माण में एकान्तता (Privacy) का ध्यान रखा जाता था। भूमि स्तर (Ground level) पर दीवार में कोई भी खिड़की नहीं होती थी। इसी प्रकार मुख्य प्रवेश द्वार से घर के अन्दर या आंगन में नहीं झांका/देखा जा सकता था। बड़े घरों में कई-कई कमरे, रसोईघर, शौचालय एवं स्नानघर होते थे। कई मकान तो दो मंजिले थे तथा ऊपर पहुंचने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं। मोहनजोदड़ो में प्रायः सभी घरों में कुएँ होते थे।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 2

प्रश्न 8.
शवाधान के आधार पर सभ्यता में पाई गई चित्र : एक घर का स्थापत्य, मोहनजोदड़ो सामाजिक भिन्नता पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता में शवाधानों में पाए गए अवशेषों के आधार पर पुरातत्ववेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इस सभ्यता में सामाजिक तथा आर्थिक भिन्नताएँ मौजूद थीं। आपको जानकारी होगी कि मिस्र के विशाल पिरामिड वस्तुतः वहाँ के राजाओं की कबें हैं। इन कब्रों में राजाओं के मृत शरीर हैं तथा इनको सोने या अन्य धातुओं के ताबूत में रखा जाता था। उनके साथ बहुमूल्य सामग्री, वस्तुएँ और धन-संपत्ति भी रखी जाती थी। हड़प्पा की सभ्यता मिस्र की सभ्यता के समकालीन थी। हड़प्पा में भी मृतकों के अन्तिम संस्कार का सबसे ज़्यादा प्रचलित तरीका दफनाना ही था। शव सामान्य रूप से उत्तर:दक्षिण दिशा में रखकर दफनाते थे। कब्रों में कई प्रकार के आभूषण तथा अन्य वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। जैसे कुछ कब्रों में ताँबे के दर्पण, सीप और सुरमे की सलाइयाँ पाई गई हैं। कुछ शवाधानों में बहुमूल्य आभूषण और अन्य सामान मिले हैं। कुछ कब्रों में बहुत ही सामान्य सामान मिला है। हड़प्पा की एक कब्र में ताबूत भी मिला है।

यहाँ पर एक कब्र में एक आदमी की खोपड़ी के पास से एक आभूषण मिला है जो शंख के तीन छल्लों, जैस्पर (उपरत्न) के मनकों और सैकड़ों छोटे-छोटे मनकों से बनाया गया है। कालीबंगन में कब्रों में कंकाल नहीं हैं। वहाँ छोटे-छोटे वृत्ताकार गड्ढों में राखदानियाँ तथा मिट्टी के बर्तन प्राप्त हुए हैं। शवाधानों की बनावट से भी विभेद प्रकट होता है। कुछ कळे सामान्य बनी हैं तो कुछ कब्रों में ईंटों की चिनाई की गई है। ऐसा लगता है कि चिनाई वाली कā उच्चाधिकारी वर्ग अथवा अमीर लोगों की हैं। सारांश में हम कह सकते हैं कि शवाधानों से प्राप्त सामग्री से हमें हड़प्पा के समाज की सन्तोषजनक जानकारी अवश्य प्राप्त हो जाती है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 9.
हड़प्पा सभ्यता के स्थलों से प्राप्त विलासिता की वस्तुओं के आधार पर सामाजिक विभेदन का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त कलातथ्यों (Artefacts) से भी सामाजिक विभेदन का अनुमान लगाया जाता है। इन कलातथ्यों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जाता है-पहले ऐसे अवशेष थे जो दैनिक उपयोग (Utility) के थे तथा दूसरे विलासिता . (Luxury) से जुड़े थे। दैनिक उपयोग के सामान में चक्कियाँ, बर्तन, सुइयाँ, झाँवा आदि को शामिल किया जा सकता है। इन्हें मिट्टी या पत्थर से आसानी से बनाया जा सकता था। सामान्य उपयोग की ये वस्तुएं हड़प्पा सभ्यता के सभी स्थलों से प्राप्त हुई हैं। दूसरा विलासिता की वस्तुओं में महँगी तथा दुर्लभ वस्तुएँ शामिल थीं। इनका निर्माण बाहर से प्राप्त सामग्री/पदार्थों से या जटिल तरीकों द्वारा किया जाता था। उदाहरण के लिए फ़यॉन्स (घिसी रेत या सिलिका/बालू रेत में रंग और गोंद मिलाकर पकाकर बनाए बर्तन) के छोटे बर्तन इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। ये फयॉन्स से बने छोटे-छोटे पात्र संभवतः सुगन्धित द्रवों को रखने के लिए प्रयोग में लाए जाते थे।

हड़प्पा के कुछ पुरास्थलों से सोने के आभूषणों की निधियाँ (पात्रों में जमीन में दबाई हुई) भी मिली हैं। उल्लेखनीय है कि जहाँ दैनिक उपयोग का सामान हड़प्पा की सभी बस्तियों में मिला है, वहीं विलासिता का सामान मुख्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े नगरों में ही मिला है जो संभवतः राजधानियाँ भी थीं। उदाहरण के लिए कालीबंगन जैसी छोटी-छोटी बस्तियों से फ़यॉन्स (Faience) से बने कोई भी पात्र नहीं मिले हैं। इस सबका अभिप्राय है कि विलासिता से संबंधित या महँगा सामान अमीर वर्ग के लोगों के पास होता था तथा मुख्यतः बड़े नगर में ही होता था।

प्रश्न 10.
मोहरों व मुद्रांकनों पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
हल्की चमकदार सतह वाली सफेद रंग की आकर्षक मोहरें (Seals) हड़प्पा सभ्यता की अति महत्त्वपूर्ण कलातथ्य हैं। सेलखड़ी की वर्गाकार व आयताकार मुद्राएँ सभी स्थलों से मिली हैं। अकेले मोहनजोदड़ो में 1200 मुद्राएँ प्राप्त हुई हैं। इन पर लेख भी अंकित थे। कूबड़ वाला बैल, कूबड़ रहित बैल, सिंह, हाथी, गैंडे आदि पशु इन मुद्राओं पर चित्रित हैं। पशुपति वाली मुद्रा सबसे अधिक उल्लेखनीय है। इतने बड़े पैमाने पर मुद्रा तथा मुद्रांकनों की प्राप्ति इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि इन मोहरों और मुद्रांकनों का प्रयोग लम्बी दूरी के साथ व्यापार संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता था। सामान से भरे थैले के मुँह को रस्सी से बाँधकर या सिलकर उन पर गीली मिट्टी लगाई जाती थी। इसके बाद इस पर मुद्रांकन छापा जाता था जिसका संबंध सामान की सही व सुरक्षित पहुँच तथा भेजने वाले की पहचान से होता था।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 3

प्रश्न 11.
माप-तौल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता की एक अन्य विशेषता माप और तौल व्यवस्था में समरूपता का पाया जाना था। दूर-दूर तक फैली बस्तियों में एक ही प्रकार के बाट-बट्टे पाए गए हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने तौल की इस प्रणाली से आपसी व्यापार और विनिमय को नियन्त्रित किया होगा। ये बाट (तौल) निम्न मूल्यांकों (Lower Denominations) में द्विचर (binary) प्रणाली के अनुसार हैं-1, 2, 4, 8, 16, 32……… से 12,800 तक। ऊपरी मूल्यांकों (Higher Denominations) में दशमलव प्रणाली का अनुसरण किया जाता था।

ये बाट चकमकी पत्थर, चूना पत्थर, सेलखड़ी आदि से बने होते थे। यह आकार में घनाकार या गोलाकार होते थे। छोटे बाट भी थे जिनका प्रयोग संभवतः आभूषण व मनके तोलने के लिए किया जाता था। धातु के पैमाने जैसे कला तथ्य भी पाए गए हैं। जिनकी लम्बाई 37.6 सेंटीमीटर की एक फुट की इकाई पर आधारित होती थी। ऐसे डंडे भी पाए गए हैं जिन पर माप के निशान लगे हुए हैं। इनमें एक डंडा कांसे का भी है।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 3

प्रश्न 12.
पुरातत्वविद् एक उत्पादन केंद्र की पहचान कैसे करते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
1. पहचान का तरीका-पुरातत्वविद् किसी उत्पादन केंद्र को पहचानने में कुछ चीजों का प्रमाण के रूप में सहारा लेते हैं। पत्थर के टुकड़ों, पूरे शंखों, सीपी के टुकड़ों, तांबा, अयस्क जैसे कच्चे माल, अपूर्ण वस्तुओं, छोड़े गए माल और कूड़ा-कर्कट आदि चीजों से उत्पादन केंद्रों की पहचान की जाती है। कारीगर वस्तुओं को बनाने के लिए पत्थर को काटते समय या शंख-सीपी को काटते हुए अनुपयोगी सामग्री छोड़ देते थे। कार्यस्थलों (Work Shops) से प्राप्त ऐसी सामग्री के ढेर होने पर अनुमान लगाया जाता है कि वह स्थल उत्पादन केंद्र रहा होगा।

2. प्रमुख उत्पादन केंद्र

  • बालाकोट (बलूचिस्तान में समुद्रतट के समीप) व चन्हुदड़ो (सिंध में) सीपीशिल्प और चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध थे।
  • लोथल (गुजरात) और चन्हुदड़ो में लाल पत्थर (Carnelian) और गोमेद के मनके बनाए जाते थे।
  • चन्हुदड़ो में वैदूर्यमणि के कुछ अधबने मनके मिले हैं जिससे अनुमान लगाया जाता है कि यहाँ पर दूर-दराज से बहुमूल्य पत्थर आयात किया जाता था तथा उन पर काम करके उन्हें बेचा जाता था।

प्रश्न 13.
हड़प्पाई लोगों द्वारा माल प्राप्ति की क्या नीतियाँ थीं?
उत्तर:
हड़प्पाई शिल्प उत्पादों के लिए अनेक प्रकार के कीमती व अर्द्ध कीमती पत्थरों, ताँबा, जस्ता, कांसा, सोना, चाँदी, टिन, लकड़ी, कपास आदि सामान की जरूरत पड़ती थी। इसके लिए उन्हें भारतीय उपमहाद्वीप तथा इससे दूरस्थ क्षेत्रों से माल प्राप्त करना पड़ता था। इसके लिए निम्नलिखित नीतियाँ अपनाई जाती थीं

1. बस्तियों की स्थापना-सिन्ध, बलूचिस्तान के समुद्रतट, गुजरात, राजस्थान तथा अफ़गानिस्तान तक के क्षेत्र से कच्चा माल . प्राप्त करने के लिए उन्होंने बस्तियों का निर्माण किया हुआ था। इन क्षेत्रों में प्रमुख बस्तियां थीं-नागेश्वर (गुजरात), बालाकोट, शोर्तुघई (अफगानिस्तान), लोथल आदि। नागेश्वर और बालाकोट से शंख प्राप्त करते थे। शोर्तुघई (अफगानिस्तान) से कीमती लाजवर्द मणि (नीलम) आयात, करते थे। लोथल के संपर्कों से भड़ौच (गुजरात) में पाई जाने वाली इन्द्रगोपमणि (Carnelian) मँगवाई जाती थी। इसी प्रकार उत्तर गुजरात व दक्षिण राजस्थान क्षेत्र से सेलखड़ी का आयात करते थे। .

2. अभियानों से माल प्राप्ति-हड़प्पा सभ्यता के लोग उपमहाद्वीप के दूर-दराज क्षेत्रों तक अभियानों (Expeditions) का आयोजन कर कच्चा माल प्राप्त करने का तरीका भी अपनाते थे। इन अभियानों से वे. स्थानीय क्षेत्रों के लोगों से संपर्क स्थापित करते थे। इन स्थानीय लोगों से वे वस्तु विनिमय से कच्चा माल प्राप्त करते थे। ऐसे अभियान भेजकर राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र से तांबा तथा दक्षिण भारत में कर्नाटक क्षेत्र से सोना प्राप्त करते थे। उल्लेखनीय है कि इन क्षेत्रों से हड़प्पाई पुरा वस्तुओं तथा कला तथ्यों के साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्ववेत्ताओं ने खेतड़ी क्षेत्र से मिलने वाले साक्ष्यों को गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का नाम दिया है जिसके विशिष्ट मृदभांड हड़प्पा के मृदभांडों से भिन्न हैं।

3. दूरस्थ व्यापार-हड़प्पावासी समुद्री मार्गों से दूरस्थ प्रदेश से व्यापार का आयोजन करते थे। इस बात के प्रमाण मिलते हैं कि हड़प्पा के व्यापारी मगान, दिलमुन तथा मेसोपोटामिया से व्यापार कर ताँबा, सोना, चाँदी, कीमती लकड़ी आदि आयात करते थे।

प्रश्न 14.
हड़प्पाई ‘रहस्यमय लिपि’ पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
हड़प्पा की मोहरों पर चित्रों के माध्यम से लिखावट है। मुद्राओं के अतिरिक्त ताम्र उपकरणों व पट्टिकाओं, मिट्टी की लघु पट्टिकाओं, कुल्हाड़ियों, मृदभांडों आभूषणों, अस्थि छड़ों और एक प्राचीन सूचनापट्ट पर भी हड़प्पा लिपि के कई नमूने प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय है कि यह लिपि अभी तक पढ़ी न जा सकने के कारण रहस्य बनी हुई है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि हड़प्पा निवासी कौन-सी भाषा बोलते.थे और उन्होंने क्या लिखा। विद्वानों का मानना है कि इन चित्रों के रूपाकंनों (Motifs) के द्वारा अर्थ समझाया गया था। इन चित्रों से अनपढ़ भी संकेत से अर्थ समझ जाते होंगे।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 5
अधिकांश अभिलेख छोटे हैं। सबसे लम्बे अभिलेख में लगभग 26 चिहन हैं। यह लिपि संभवतः वर्णात्मक (Alphabetical) नहीं थी। इसमें बहुत-से चिह्न ही प्रयोग में होते थे जिनकी संख्या 375 तथा 400 के बीच बताई गई है। ऐसा लगता है कि यह लिपि दाईं-से-बाईं ओर लिखी जाती थी। ऐसा अनुमान इसलिए भी लगाया जाता है कि कुछ मोहरों पर दाईं तरफ चौड़ा अंतराल (Space) है और बाईं तरफ काफी कम अंतराल है।

प्रश्न 15.
हड़प्पा सभ्यता की खोज कैसे हुई?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के प्रकाश में आने की कहानी रोचक है। इस सभ्यता को खोज निकालने में अनेक व्यक्तियों का योगदान है। 1826 में चार्ल्स मेसेन हड़प्पा गाँव में आया तथा उसने यहाँ किसी प्राचीन स्थल के विद्यमान होने का सबसे पहले उल्लेख किया। इसी प्रकार 1834 में बर्नेस ने सिन्धु के किनारे किसी ध्वस्त किले के होने की बात की। 1853 तथा पुनः 1856 में कनिंघम (भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग के महानिदेशक) ने हड़प्पा की यात्रा की तथा वहाँ टीले के नीचे किसी प्राचीन सभ्यता के दबे होने की सम्भावना जताई। कनिंघम ने उक्त स्थल की सीमित खुदाई भी करवाई तथा प्राप्त अवशेषों (मोहरों) एवं उत्खनन स्थल मानचित्र का प्रकाशन भी किया।

1886 में एम०एल० डेम्स एवं 1912 में पलीट ने भी हड़प्पाकालीन कुछ मुद्राओं के चित्र प्रकाशित किए। 1920 के प्रारम्भिक दशक में सिन्ध में जब रेलवे लाईन बिछाई जा रही थी तब खुदाई के दौरान अज्ञात सभ्यता के अवशेष प्रकाश में आए। 1921 में दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा और 1922 में राखाल दास बनर्जी द्वारा मोहनजोदड़ो में किए गए खुदाई कार्यों से इस सभ्यता का अस्तित्व निर्णायक रूप से सिद्ध हो गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने इस उत्खनन में रुचि ली तथा 1924 में लंदन से प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्र में इस सभ्यता की खोज के बारे में घोषणा की। इससे पुरातत्वविदों में सनसनी फैल गई। इन उत्खननों से यह बात उभरकर आई कि यह एक विशिष्ट सभ्यता थी। जिसके अज्ञात निर्माताओं ने नगरों का निर्माण किया। यह सभ्यता मिस्र एवं मेसोपोटामिया की सभ्यताओं के समकालीन थी।

प्रश्न 16.
खोज में कनिंघम के प्रयासों तथा उसकी उलझन पर नोट लिखें।
उत्तर:
कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पहले महानिदेशक थे। 1853 तथा पुनः 1856 में कनिंघम ने हड़प्पा की यात्रा की तथा वहाँ टीले के नीचे किसी प्राचीन सभ्यता के दबे होने की संभावना जताई। उन्होंने वहाँ पर कुछ खुदाई भी करवाई। इसकी रिपोर्ट तथा एक मोहर का चित्र भी छापा। परंतु वे हड़प्पा के स्वतंत्र अस्तित्व को नहीं आंक सके। उनकी रुचि छठी सदी ईसा पूर्व से चौथी सदी ईसा पूर्व तथा इसके बाद के प्राचीन इतिहास के पुरातत्व में थी। उन्होंने बौद्धधर्म से संबंधित चीनी यात्रियों के वृत्तांतों का प्रारंभिक बस्तियों की पहचान करने में प्रयोग किया। सर्वेक्षण के कार्य में शिल्प तथ्य एकत्र किए। उनका रिकॉर्ड रखा। कनिंघम ने उपलब्ध कलातथ्यों के सांस्कृतिक अर्थों को भी समझने का प्रयास किया।

परंतु हड़प्पा जैसे स्थल की इन चीनी वृत्तांतों में न तो विवरण था, न ही इन नगरों की ऐतिहासिकता की कोई जानकारी। अतः यह नगर ठीक प्रकार से उनकी खोजों के दायरे में नहीं समा पा रहे थे। वस्तुतः वे यहाँ से प्राप्त कला-तथ्यों की पुरातनता नगा पाए। उदाहरण के लिए एक अंग्रेज ने कनिंघम को हड़प्पा की एक मोहर दी। कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में इसका चित्र भी दिया परंतु वह इसे इसके समय-संदर्भ में रख पाने में असफल रहे। इसका कारण यह रहा होगा कि अन्य विद्वानों की भांति वह भी यह मानते थे कि भारत में पहली बार नगरों का अभ्युदय गंगा-घाटी में 6 वीं, 7वीं सदी ई०पू० से हुआ। अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वे हड़प्पा के महत्त्व को नजरअंदाज कर गए।

प्रश्न 17.
हड़प्पा की खोज में सर जॉन मार्शल के योगदान का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा स्थल से अनेक मोहरें उत्खनन में प्राप्त की। ऐसा ही कार्य 1922 में राखालदास बनर्जी ने मोहनजोदड़ो में किया। दोनों स्थलों की मोहरों में समानता थी। इससे यह निष्कर्ष निकाल पुरातात्विक संस्कृति का हिस्सा है। इन खोजों के आधार पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने 1924 ई० में (लन्दन में प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्र में) सारी दुनिया के समक्ष इस नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की। सारी दुनिया में इससे सनसनी फैल गई। इस बारे में एस.एन.राव ने ‘द स्टोरी ऑफ़ इंडियन आर्कियोलॉजी’ में लिखा, “मार्शल ने . भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हजार वर्ष पीछे छोड़ा।” उल्लेखनीय है कि हड़प्पा जैसी मोहरें मेसोपोटामिया से भी मिली थीं। अब यह स्पष्ट हुआ कि यह एक नई सभ्यता थी जो मेसोपोटामिया के समकालीन थी।

सर जॉन मार्शल द्वारा हड़प्पा सभ्यता की घोषणा के साथ-साथ उन्होंने उत्खनन प्रणाली में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। वे भारत में कार्य करने वाले पेशेवर पुरातत्वविद् थे। उनके पास यूनान व क्रिट में उत्खननों का अनुभव था। उन्हें आकर्षक खोजों में रुचि थी परंतु वे इन खोजों में दैनिक जीवन पद्धतियों को जानना चाहते थे। सर जॉन मार्शल ने उत्खनन की नई तकनीक को शुरू किया। उन्होंने पुरास्थल के स्तर विन्यास को पूरी तरह अनदेखा कर । पूरे टीले में समान परिमाण वाली नियमित क्षैतिज इकाइयों के साथ-साथ उत्खनन करने का प्रयास किया।

प्रश्न 18.
हड़प्पा सभ्यता से जुड़े उत्खनन में व्हीलर के योगदान को स्पष्ट करें।
उत्तर:
1944 ई० में व्हीलर महोदय भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (Archeological Survey and India) के महानिदेशक बने। उन्होंने पुरानी खुदाई तकनीक व उससे जुड़ी समस्या को ठीक करने का प्रयास किया। उनसे पहले सर जॉन मार्शल ने पुरा स्थल की स्तर विन्यास (Stratigraphy) पर ध्यान न देकर सारे टीले को समान आकार की क्षैतिज इकाइयों में उत्खनन करवाया। फलतः अलग-अलग स्तरों से संबंधित पुरावशेषों को एक इकाई विशेष में वर्गीकृत कर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि इन खोजों के संदर्भ से जुड़ी महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ सदैव के लिए खो गईं। उन्होंने एक समान क्षैतिजीय इकाइयों के आधार पर खुदाई की अपेक्षा स्तर विन्यास (Stratigraphy) का ध्यान रखना भी जरूरी माना। वे सेना में ब्रिगेडियर रह चुके थे। अतः उन्होंने पुरातत्व प्रणाली में एक सैन्य परिशुद्धता (Precision) का भी समावेश किया।

व्हीलर महोदय ने अत्यंत मेहनत व साहस की भावना से कार्य किया। वे सबह 5:30 बजे अपनी टीम के साथ कार्य पर लगते थे तथा गर्मी में सूर्य की तेज रोशनी में कुदालियों और चाकुओं के साथ कठिन परिश्रम करते रहते थे। उन्होंने इस प्रकार संस्मरण अपनी पुस्तक ‘माई आर्कियोलॉजिकल मिशन टू इंडिया एंड पाकिस्तान (1976)’ में दिए हैं।

प्रश्न 19.
शिल्प तथ्यों के वर्गीकरण के आधार स्पष्ट करें।
उत्तर:
पुरातत्वविद् भौतिक अवशेषों को प्राप्त कर, उनका विश्लेषण करते हैं। इससे इस सभ्यता के जीवन का पुनर्निर्माण करते हैं। ये भौतिक अवशेष या कला तथ्य मृदभाण्ड (बर्तन), औजार, गहने, घर का सामान आदि हैं। इसके अलावा कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी का सामान जैसे जैविक पदार्थ हमारे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में गल (Decompose) गए हैं। जो बचे हैं वे हैं पाषाण, जली मिट्टी से बनी टेराकोटा की (मृण्य) मूर्तियाँ, धातु आदि।

शिल्प तथ्यों को खोज लेना पुरातत्व के कार्य में मात्र शुरुआत होती है। बाद में पुरातत्वविद् इन्हें विभिन्न आधार पर वर्गीकृत करते हैं। सामान्यतः निम्नलिखित आधारों पर इनका वर्गीकरण किया जाता है

(i) सामान्यतः वर्गीकरण सामग्री के आधार पर होता है; जैसे पत्थर, मिट्टी, धातु, हड्डी, हाथीदांत आदि।

(ii) वर्गीकरण का अन्य तरीका प्राप्त वस्तु के कार्य (Function) के आधार पर होता है; जैसे एक कला तथ्य औजार है या गहना या वह किसी अनुष्ठान के लिए प्रयोग का एक उपकरण है। यह वर्गीकरण सरल अनुष्ठान नहीं है।

(iii) कई बारं यह वर्गीकरण वर्तमान में चीजों के प्रयोग के आधार पर भी किया जाता है; जैसे मनके, चक्कियाँ, पत्थर के ब्लेड या पात्र आदि।

(iv) मिलने के स्थान के आधार पर भी पुराविद् इनका वर्गीकरण करते हैं। क्या वस्तु घर में मिली है या निकासी या अन्य स्थान पर।

(v) कभी-कभार पुरातत्वविद् परोक्ष तथ्यों का सहारा लेकर वर्गीकरण करते हैं। उदाहरण के लिए कुछ हड़प्पा स्थलों पर कपड़ों के अंश मिले हैं। तथापि कपड़ा होने के प्रमाण के लिए दूसरे स्रोत जैसे मूर्तियों का सहारा लिया जाता है। किसी भी शिल्प तथ्य को समझने के लिए पुरातत्ववेत्ता को उसके संदर्भ की रूपरेखा विकसित करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए हड़प्पा की मोहरों को तब तक नहीं समझा जा सका जब तक उन्हें सही संदर्भ में नहीं रख पाए। वस्तुतः इन मोहरों को उनके सांस्कृतिक अनुक्रम (Cultural Sequence) एवं मेसोपोटामिया में हुई खोजों की तुलना के आधार पर ही सही अर्थों में समझा जा सका।

प्रश्न 20.
हड़प्पा सभ्यता के धर्म के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के लोगों के धार्मिक विश्वासों का पता लगाने के लिए पुरातत्वविदों व इतिहासकारों को उपलब्ध पुरावशेषों से निष्कर्ष निकालने पड़ते हैं। इस प्रकार के पुरावशेषों में विशेषतौर पर मोहरों और मृण्मूर्तियों का सहारा लिया जाता है। मिट्टी की बनी मूर्ति, जिसे मातृदेवी की मूर्ति बताया जाता है, उससे अनुमान लगाया जाता है कि यह भूमि की उर्वरता से जुड़ी है. तथा यह धरती देवी की मूर्ति है। एक पत्थर की मोहर पर पुरुष देवता को विशेष मुद्रा में बैठा दिखाया गया है तथा उसके आसपास कई जानवर हैं, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि यह पशुपति की मूर्ति है जो बाद में शिव के रूप में उभरकर आए। लिंग तथा योनि की पूजा के भी संकेत मिले हैं।

कुछ वृक्षों को पवित्र माना जाता था। कूबड़ सांडों की भी सम्भवतः पूजा की जाती थी। आज भी भारत में सांडों को पवित्र दृष्टि से देखा जाता है। हड़प्पावासी मृतकों को दफनाने के ऐसे प्रमाण कुछ नगरों (हड़प्पा) के समीप प्राप्त कब्रिस्तानों से लगाए जाते हैं जहाँ कब्रों में घर का सामान, गहने तथा शीशे आदि प्राप्त हुए हैं। परंतु मिस्र सभ्यता के समान कब्रों पर किसी प्रकार के बड़े ढाँचे (पिरामिड जैसे) देखने को नहीं मिलते हैं।

प्रश्न 21.
हड़प्पा सभ्यता का आविर्भाव (उदय) किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
यह प्रश्न.रोचक और महत्त्वपूर्ण है कि हड़प्पा सभ्यता के नगरों का आविर्भाव कैसे हुआ। मोर्टियर व्हीलर महोदय ने यह व्याख्या दी थी कि कुछ बाहर से आई जातियों द्वारा इस क्षेत्र को जीतकर नगरों की स्थापना की गई। परंतु बाद के अन्वेषणों के आधार पर विद्वानों ने इस व्याख्या को अस्वीकार कर दिया तथा अब यह आम धारणा बन गई है कि हड़प्पा के नगरों के स्थापित होने से पहले (प्राक हड़प्पा काल में) यहाँ पर कृषि समुदायों के विकास की एक दीर्घ प्रक्रिया रही है। इस प्रक्रिया को समझने के लिए अग्रलिखित प्राक बस्तियों के उदय को जानना जरूरी है

1. मेहरगढ़ (Mehargarh)-ऐसे समुदाय के विकास के प्रमाण मेहरगढ़ नामक स्थान से मिले हैं। यहाँ पर ईसा से पाँच हजार वर्ष पूर्व लोग गेहूँ तथा जौ की खेती करते थे एवं भेड़-बकरियाँ पालते थे। धीरे-धीरे इन्होंने सिंधु की बाढ़ पर नियंत्रण करना सीखा। इसके मैदानों का खेती के लिए उपयोग किया। इससे जनसंख्या में वृद्धि हुई। यह लोग पशु चराने के लिए दूर-दूर तक जाते थे। इससे परस्पर आदान-प्रदान बढ़ा तथा व्यापार शुरू हुआ। मेहरगढ़ के लोग कई प्रकार की मालाएँ बनाते थे। यहाँ से मोहरें भी मिली हैं। इसके अलावा यहाँ से डिजाइनदार मिट्टी के बर्तन, मिट्टी की मूर्तियाँ व तांबे तथा पत्थर की वस्तुएँ भी मिली हैं।

2. दंबसादात (Dambsadat)-मेहरगढ़ की भांति क्वेटाघाटी में दंबसादात से भी प्राक-हड़प्पन सभ्यता के प्रमाण मिले हैं। इनमें चित्रधारी किए बर्तन, पक्की मिट्टी की मोहरें, ईंटें आदि मुख्य हैं।

3. रहमान ढेरी (Rahman Dheri) यहाँ से भी हड़प्पा सभ्यता की शुरुआत के प्रमाण मिलते हैं। यह स्थल सिंधु मैदान के पश्चिम भाग में है। यहाँ योजनाबद्ध बने मकान, सड़कें और गलियाँ मिली हैं। इसके चारों ओर ऊँची दीवार है। टूटे-फूटे बर्तनों की चित्रकला हड़प्पा लिपि की ओर संकेत करती है।

4. अमरी (Amri)-सिंधु मैदान के निचले भाग में अमरी (Amri) नामक स्थल से भी शिल्प तथ्य मिले हैं। यहाँ के लोगों ने अन्नागार बनाए। बर्तनों पर कूबड़ बैल की आकृति भी है। वे अपनी बस्ती की दुर्गबन्दी करने लगे थे। बाद में यही स्थल हड़प्पा सभ्यता के नगर के रूप में उभरा। कुछ अन्य स्थलों, जैसे कोटडीजी (Kot Diji), कालीबंगन (Kalibangn) से भी आरंभिक हड़प्पा काल के प्रमाण मिले हैं।

स्पष्ट है कि प्राक हड़प्पा काल में सिंधु क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न कृषक समुदायों में सांस्कृतिक परम्पराओं में समानता लगती है। इन छोटी-छोटी परंपराओं के मेल से एक बड़ी परंपरा प्रकट हुई। परंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये समुदाय कृषक व पशुचारी थे। कुछ शिल्पों में पारंगत थे। इनकी बस्तियाँ सामान्यतः छोटी थीं तथा कोई भी बड़ी इमारतें नहीं थीं। कुछ प्राक हड़प्पा बस्तियों का परित्याग भी हुआ तथा कुछ स्थलों पर जलाये जाने के भी प्रमाण मिले हैं। तथापि यह स्पष्ट लगता है कि हड़प्पा सभ्यता का आविर्भाव लोक संस्कृति के आधार पर हुआ।

प्रश्न 22.
‘परातत्वविदों को अतीत का पनर्निर्माण करते हए कला तथ्यों (Artefacts) की व्याख्या संबंधी समस्या का सामना करना पड़ता है। उदाहरण सहित इस कथन की पुष्टि कीजिए।
उत्तर:
यह सत्य है कि पुरातत्वविदों को अतीत का पुनर्निर्माण करते हुए कला तथ्यों की व्याख्या संबंधी समस्या का सामना करना पड़ता है। विशेष तौर पर यह समस्या धार्मिक प्रथाओं के पुनर्निर्माण में ज्यादा आती है। आरंभिक पुरातत्वविदों को लगता था कि कुछ वस्तुएँ, जो असामान्य और अपरिचित लगती थीं, संभवतः धार्मिक महत्त्व की होती थीं। कुछ कलातथ्य की धार्मिक व्याख्याओं के उदाहरण निम्नलिखित प्रकार से हैं

(i) हड़प्पा से नारी की मृण्मूर्तियाँ प्राप्त हुईं। ये आभूषणों (हार) से लदी हुई थीं। सिर पर विस्तृत प्रसाधन (मुकुट जैसा) धारण किया हुआ है। इन्हें मातृदेवी की संज्ञा दी गई। इसी प्रकार दुर्लभ पाषाण से बनी पुरुष की मूर्तियाँ, जिनमें उन्हें एक मानकीकृत मुद्रा में एक साथ घुटने पर रख बैठा हुआ दिखाया गया था, ‘पुरोहित राजा’ की भांति, धर्म से जोड़कर वर्गीकृत कर दिया गया।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 6
(ii) इसी प्रकार विशाल ढाँचों को भी धार्मिक आनुष्ठानिक महत्त्व का करार दे दिया गया। इसमें विशाल स्नानागार तथा कालीबंगन और लोथल से मिली वेदियाँ शामिल हैं।

(iii) इसी प्रकार कुछ मोहरों का विश्लेषण कर धार्मिक आस्थाओं व प्रथाओं का पुनर्निर्माण किया गया। इनमें से कुछ मोहरों की आनुष्ठानिक क्रियाओं के रूप में.व्याख्या की गई। दूसरी मोहरें (जिन पर पेड़ों के चित्र उत्कीर्ण किए हुए थे) को प्रकृति की पूजा का संकेत स्वीकार किया गया इसी प्रकार कुछ मोहरों की देवता और पूज्य पशुओं के रूप में व्याख्या दी है।

आद्य शिव-एक मोहर पर एक पुरुष देवता को योगी की मुद्रा में दिखाया गया है। इसके दाईं ओर हाथी तथा बाघ एवं बाईं ओर गैंडा तथा भैंसा हैं। पुरुष देवता के सिर पर दो सींग हैं। पुरातत्वविदों ने इस देवता को ‘आद्य शिव’ की संज्ञा दी है। इस ‘आद्य शिव’ वाली मोहर की ऋग्वेद में उल्लेखित रुद्रदेवता से सम तुलना की गई है।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 7
• एक श्रृंगी पशु-एक मोहर में एक शृंगी पशु उत्कीर्णित है। यह घोड़े जैसा पशु है, जिसके सिर के बीच में एक सींग निकला हुआ है। यह कल्पित तथा संश्लिष्ट लगता है। ऐसा बाद में हिन्दू धर्म के अन्य देवता (नरसिंह देवता) के बारे में कहा जा सकता है।

पुरातत्वविद् ज्ञात से अज्ञात की ओर अर्थात् वर्तमान के ज्ञान के आधार पर अतीत को पुनर्निर्मित करने का तरीका भी अपनाते हैं। हड़प्पा के धर्म की व्याख्या में बाद के काल की परंपराओं के समानांतरों (उसी प्रकार की मिलती-जुलती परंपराओं) का सहारा भी लिया जाता है। पात्रों आदि के संबंध में तो इस प्रकार का सहारा लेना ठीक लगता है परंतु धार्मिक पहचान बिंदुओं (Religion Symbols) को समझने में इस प्रकार का तरीका अपनाना अधिक कल्पनाशील (Speculative) हो जाता है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 23.
हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न केंद्रों से जो मोहरें प्राप्त हुई हैं, उनका क्या महत्त्व है?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों से व्यापक पैमाने पर मोहरें प्राप्त हुई हैं। यह इस सभ्यता की सर्वोत्तम कलाकृतियाँ स्वीकार की गई हैं। अब तक लगभग 2000 से अधिक मोहरें प्राप्त हुई हैं। इनमें से अधिकांश मोहरों पर लघु लेख के साथ-साथ जानवरों (कूबड़ सांड, एक सिंगी जानवर, बाघ, बकरी, हाथी आदि) की आकृतियाँ उकेरी हुई हैं। इन मोहरों का महत्त्व यह है कि इनसे हमें हड़प्पा सभ्यता के संबंध में अनेक प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है। विशेषतौर पर यह हड़प्पा के लोगों के धार्मिक विश्वासों पर प्रकाश डालती है। इनमें से कुछ मोहरों की आनुष्ठानिक क्रियाओं के रूप में व्याख्या की गई। दूसरी मोहरों (जिन पर पेड़ों के चित्र उत्कीर्ण किए हुए थे) को प्रकृति की पूजा का संकेत स्वीकार किया गया इस कुछ मोहरों की देवता और पूज्य पशुओं के रूप में व्याख्या दी है। एक मोहर पर एक पुरुष देवता को योगी की मुद्रा में दिखाया गया है। इसके दाईं ओर हाथी तथा बाघ एवं बाईं ओर गैंडा तथा भैंसा हैं। पुरुष देवता के सिर पर दो सींग हैं। पुरातत्वविदों ने इस देवता को ‘आद्य शिव’ की संज्ञा दी है। एक अन्य मोहर में एक श्रृंगी पश उत्कीर्णित है। यह घोड़े जैसा पश है, जिसके सिर के बीच में एक सींग निकला हुआ है। यह कल्पित तथा संश्लिष्ट लगता है।

ऐसा बाद में हिन्दू धर्म के अन्य देवता (नरसिंह देवता) के बारे में कहा जा सकता है। कला की दृष्टि से भी इनका महत्त्व बताया जाता है। मोहरों पर खुदे हुए सांड, हाथी, बारहसिंगा आदि के चित्र देखते ही बनते हैं। ये चित्र अपनी सुंदरता और वास्तविकता में अद्वितीय हैं। मोहरों का एक अन्य महत्त्व यह है कि इन पर अभिलेख खुदे हुए हैं जो ऐतिहासिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण हैं। यह ठीक है कि अभी तक इन्हें पढ़ा नहीं जा सका है। भविष्य में यदि इन्हें पढ़ लिया जाता है तो इन मोहरों का महत्त्व और भी बढ़ जाएगा।

प्रश्न 24.
मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा के अतिरिक्त हड़प्पा सभ्यता से जुड़े किन्हीं पाँच स्थलों का विवरण कीजिए।
उत्तर:
मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा इस सभ्यता के सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल हैं। सबसे पहले खुदाई भी इन्हीं नगरों की हुई है। हमारी अधिकतर जानकारी का आधार इन स्थानों से प्राप्त पुरावशेष ही हैं। इन स्थानों के अतिरिक्त इस सभ्यता से जुड़े अनेक स्थल प्रकाश में आए हैं। कुछ स्थलों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. चन्हुदडो-सिन्ध क्षेत्र में यह स्थान सिन्धु नदी के बाएँ तट पर स्थित है। इस स्थान पर दुर्ग नहीं था। यह एक शिल्प उत्पादन केन्द्र था। यहाँ मोहरें बनाई जाती थीं। यहाँ से मिट्टी की बनी गाड़ियाँ, काँसे का खिलौना, हड्डियों की वस्तुएँ, सीपी की चूड़ियाँ आदि प्राप्त हुए हैं। मोहनजोदड़ो की तरह यहाँ पर कई बार बाढ़ आने के चिहन हैं।

2. कालीबंगन-यह स्थान राजस्थान में गंगानगर जिले में है। यह सूखे घग्घर नदी के दक्षिणी तट पर था। यहाँ से प्राक हड़प्पा के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पर खेत जोते जाने के प्रमाण हैं। यहाँ पर अग्निकुंड के अवशेष खोजे गए हैं। इसके अलावा यहाँ पर गोमेद तथा स्फटिक फलक, बर्तन तथा चूड़ियों के अवशेष मिले हैं।

3. लोथल-यह स्थल भोगवा तथा साबरमती नदी के मध्य घोलका तालुका (गुजरात) में खंभात खाड़ी से 12 किलोमीटर दूर के प्रमाण भी लोथल से मिले हैं। यहाँ पर एक अन्नागार भी मिला है। इसके अलावा सुमेरियन सभ्यता से संबंधित सोने के मनके, मनका कारखाना, कब्रिस्तान आदि भी यहाँ मिले हैं।

4. बनावली-हरियाणा में फतेहाबाद जिले में सरस्वती तट पर स्थित है। यहाँ पर पूर्व हड़प्पा तथा उत्तर हड़प्पा के अवशेष मिले हैं। यहाँ प्राप्त हुए कलातथ्यों में मिट्टी का हल, हल के टुकड़े, चक्के, ताँबे का मछली पकड़ने का काँटा, सोना परखने की कसौटी आदि प्रमुख हैं।

5. धौलावीरा-हड़प्पा सभ्यता से जुड़ा यह नवीनतम स्थल है, जहाँ हाल ही में खुदाई हुई है। यह इस सभ्यता का एक मात्र स्थल है जो तीन भागों में विभाजित है। यहाँ पर जलाशय के अवशेष मिले हैं। यहाँ पर मनके बनाने की कार्यशालाएँ थीं। यहाँ पर खेल का मैदान भी मिला है। इसके अलावा पत्थर की बनी नेवले की मूर्ति भी प्राप्त हुई है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
हड़प्पा सभ्यता के शिल्प उत्पादों पर लेख लिखें।
उत्तर:
हड़प्पा के लोगों ने शिल्प उत्पादों में महारत हासिल कर ली थी। मनके बनाना, सीपी उद्योग, धातु-कर्म (सोना-चांदी के आभूषण, ताँबा, कांस्य के बर्तन, खिलौने उपकरण आदि), तौल निर्माण, प्रस्तर उद्योग, मिट्टी के बर्तन बनाना, ईंटें बनाना, मद्रा निर्माण आदि हड़प्पा के लोगों के प्रमुख शिल्प उत्पाद थे। कई बस्तियाँ तो इन उत्पादों के लिए ही प्रसिद्ध थीं।

1. मनके बनाना-हड़प्पा सभ्यता के लोग गोमेद, फिरोजा, लाल पत्थर, स्फटिक (Crystal), क्वार्ट्ज (Quartz), सेलखड़ी (Steatite), जैसे बहुमूल्य एवं अर्द्ध-कीमती पत्थरों के अति सुन्दर मनके बनाते थे। मनके व उनकी मालाएं बनाने में ताँबा, कांस्य और सोना जैसी धातुओं का भी प्रयोग किया जाता था। शंख, फयॉन्स (faience), टेराकोटा या पक्की मिट्टी से भी मनके बनाए जाते थे। इन्हें अनेक आकारों चक्राकार, गोलाकार, बेलनाकार और खंडित इत्यादि में बनाया जाता था। कई पर चित्रकारी की जाती थी। रेखाचित्र उकेरे जाते थे। कुछ मनके अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर बनाए जाते थे। पत्थर के ऊपर सोने के टोप वाले सुन्दर मनके भी पाये गए हैं।

2. धातुकर्म हड़प्पा सभ्यता के लोगों को अनेक धातुओं की जानकारी थी। वे इन धातुओं से विविध सामान बनाते थे। तांबे का प्रयोग सबसे ज्यादा किया गया है। इसके उपकरण उस्तरा, छैनी, चाकू, तीर व भाले का अग्रभाग, कुल्हाड़ी, मछली पकड़ने के कांटे, आरी तलवार आदि बनाए जाते थे। तांबे में संखिया व टिन मिलाकर काँसा बनाया जाता था। ताँबे और काँसे के बर्तन भी बनाए जाते थे। कांस्य की मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं। सोने के आभूषणों के संचय मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा से मिले हैं। सोना हल्के रंग का था। इसमें चाँदी की मिलावट काफी मात्रा में थी। भारत में चाँदी का सर्वप्रथम प्रयोग हड़प्पा काल में हुआ। चाँदी के आभूषण और बर्तन बनाए जाते थे। सर जॉन मार्शल लिखते हैं कि सोने-चांदी के आभूषणों को देखकर ऐसा महसूस होता है कि यह पांच हजार वर्ष पूर्व की कला कृतियाँ नहीं, अपितु इन्हें अभी-अभी लन्दन स्थित जौहरी बाजार (बांडस्ट्रीट) से खरीदा गया है।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 8
3. पाषाण उद्योग-इस काल में पत्थर के उपकरण भी बनाए जाते थे। सुक्कूर में इसके प्रमाण मिले हैं। पत्थर के विशेष प्रकार के बरमें, खुरचनियाँ, काटने के उपकरण, दरांती, फलक आदि बनाए जाते थे। ये उपकरण खेती, मणिकारी, दस्तकारी, नक्काशी (लकड़ी, सीपी) छेद करने में प्रयोग किए जाते थे। पत्थर की मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं। इसमें सेलखड़ी तथा चूना पत्थर का उपयोग होता था।

4. मिट्टी के बर्तन-हड़प्पा सभ्यता के सभी स्थलों से सादे और अलंकृत बर्तन प्राप्त हुए हैं। इन बर्तनों पर पहले लाल रंग का घोल चढ़ाया जाता था, फिर काले रंग के गाढ़े घोल से डिजाइन बनाए जाते थे। ये बर्तन चाक पर बनाए जाते थे तथा भट्ठियों में पकाए जाते थे। बर्तनों पर नदी तल की चिकनी मिट्टी का प्रयोग होता था। इस मिट्टी में बालू, अभ्रक या चूना के कण मिलाए जाते थे। बर्तनों पर वृक्ष व. पशु की आकृतियाँ बनी मिली हैं। विकसित हड़प्पा काल में उच्चकोटि के चमकदार मृदभाण्डों का उत्पादन होने लगा था। बर्तनों के अतिरिक्त मिट्टी की मूर्तियाँ, खिलौने, घरेलू सामान, चूड़ियाँ, छोटे मनके एवं पशुओं की छोटी मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 9

5. ईंटें बनाना तथा राजगिरी-हड़प्पा सभ्यता के नगरों में विशाल भवनों का निर्माण तथा बड़े पैमाने पर ईंटों का प्रयोग इस बात की तरफ संकेत करता है कि वहाँ पर ईंटों का निर्माण करने का अलग उद्योग रहा होगा। परकोटों तथा भवनों को बनाने वाले मिस्त्री का काम करने वाला समुदाय भी रहा होगा।

6. सीपी उद्योग-इस सभ्यता के समय सीपी के कई उत्पाद बनाए जाते थे। समुद्री शंख का प्रयोग चूड़ियाँ, मनके, जड़ाऊ वस्तुएँ एवं छोटी आकृतियाँ बनाने में किया जाता था। बालाकोट, लोथल एवं कुतांसी स्थलों से कच्चा माल प्राप्त किया जाता था। यहाँ पर स्थानीय कार्यशालाएँ थीं।

7. कताई और बुनाई-घरों में तकुए तथा तकलियाँ मिली हैं। इनका प्रयोग सूती ऊनी वस्त्रों की बुनाई में किया जाता था। तकलियों को मिट्टी, सीपी और ताँबे से बनाया हुआ था। यहाँ से कपड़े का कोई टुकड़ा नहीं मिला है। परंतु यह तथ्य सत्य है कि कपास का उत्पादन होता था तथा वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था। कपड़ों की रंगाई भी की जाती थी।

प्रश्न 2.
हड़प्पा सभ्यता के अंतर्खेत्रीय व दूरस्थ प्रदेशों से व्यापार-वाणिज्य संबंधी संपर्कों का विवरण दीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण (Urbanisation) में व्यापार का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा होगा। हड़प्पाकालीन नगर हस्तशिल्प उद्योगों के केन्द्र थे। इन हस्तशिल्पों को कच्चा माल उपलब्ध करवाने तथा पक्के माल को विभिन्न नगरों में पहुँचाने में व्यापारी वर्ग की भूमिका थी। इस रूप में ये नगर व्यापारिक केन्द्र भी थे। ये नगर नदियों के किनारे, समुद्र तटों तथा अन्य व्यापार मार्गों पर बसे थे। अन्तर्खेत्रीय व्यापार तथा बाह्य व्यापार के पर्याप्त प्रमाण मिले हैं। मोहरों पर अंकित चित्र, माप-तौल की समान प्रणाली, पत्थरों तथा धातुओं के उपकरण और औजारों का सभी क्षेत्रों में मिलना, मिट्टी की छोटी नावें, लोथल में गोदी (डॉकयाडी सभी उन्नत व्यापार के संकेत हैं।

1. अन्तक्षेत्रीय व्यापार-पत्थर व धातु के उपकरण, सीपियों का सामान, मोहरें, बाट, रसोई का सामान, कलात्मक वस्तुएं, कीमती मनके, अनाज व कपास आदि एक स्थान से दूसरे स्थान (शहरों तथा ग्राम्य बस्तियों में) पर भेजे जाते थे। वस्तु विनिमय पर आधारित इस व्यापार में व्यापारी वर्ग तथा खानाबदोश व्यापारी शामिल होते थे। रोहड़ी तथा सूक्कूर में चकमक पत्थर मिलता था। नदी मार्गों से यह प्रमुख नगरों में भेजा जाता था।

यहाँ पर इस पत्थर से औज़ार और हथियार बनाए जाते थे। बालाकोट और चन्हुदड़ो में सीपियों की चूड़ियाँ तथा अन्य सामान बनता था। यहाँ से सामान अन्य नगरों तथा बस्तियों में भेजा जाता था। मोहनजोदड़ो एवं हड़प्पा में बाट, मोहरें तथा ताँबे का सामान बनाया जाता था। ये वस्तुएं भी सारे क्षेत्र में बेची जाती थीं। औज़ारों और हथियारों के अलावा यहाँ पर रसोई के उपयोग की वस्तुएँ तथा विभिन्न कलात्मक वस्तुएँ भी बनती थीं। लोथल तथा सुरकोतदा से कपास हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि नगरों को भेजी जाती थी। अनाज का भी व्यापार होता था। हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में बने गोदामों से यह संकेत मिलता है कि आन्तरिक भागों से अनाज को नदी मार्गों से यहाँ पर पहुँचाया जाता था।

2. दूरस्थ प्रदेशों से व्यापार-हड़प्पा सभ्यता के नगरों का एशियाई देशों से व्यापारिक संबंध था, इसके पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं। मेसोपोटामिया के सूसा, उए, निप्पुर, किश और उम्मा शहरों से दो दर्जन से अधिक हड़प्पा की मोहरें प्राप्त हुई हैं। फारस की खाड़ी में स्थित फैलका और बैहरेन नामक स्थानों से भी मोहरें मिली हैं। इसके अतिरिक्त हड़प्पाकालीन बाट, मृण्य मूर्तियाँ, कीमती पत्थर आदि अनेक प्रकार का सामान भी फारस की खाड़ी तथा मेसोपोटामिया से प्राप्त हुआ है। मेसोपोटामिया के सम्राट् सारगॉन (Sargon, 2350 B.C.) का यह दावा था कि दिलमुन (Dilmun), मगान (Magan) और मेलुहा (Meluhha) के जहाज उसकी राजधानी में लंगर डालते थे। विद्वान इन नामों (स्थानों) को हड़प्पा सभ्यता के नगरों से जोड़ते हैं। माना जाता है कि मगान तथा मकरान समुद्रतट एक ही था।

(i) निर्यात-हड़प्पाकालीन व्यापारी इन बाह्य देशों में अपने यहाँ उत्पादित पत्थरों के फलकों, मोहरों, मनकों, ताँबे का सामान, हाथी-दाँत व सीपी आदि का निर्यात करते थे। तेल असमार (Tel Asmar) में नक्काशी किए हुए लाल पत्थर के मनके पाए गए हैं। मेसोपोटामिया के नगर निप्पुर में मृण्य मूर्तियाँ मिली हैं। हड़प्पा जैसे बाट भी मिले हैं।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 10

तालिका

हड़्पांकाल में आयातित वस्ताएँ एवं क्षेत्र

आयात की जाने वाली वस्ताएँक्षेत्रआयात की जाने वाली वस्तुएँक्षेत्र
टिनईरान, मध्य एशिया, अफ़गानिस्तान ।चांदीईरान, अफगानिस्तान ।
स्वर्णअफ्गानिस्तान, दक्षिण भारत (कर्नाटक)।लाजवर्दमेसोपोटामिया, बदख्शां।
फिरोजाईरान।सीसाईरान, दक्षिण भारत, अफगानिस्तान ।
शिलाजीतहिमालय क्षेत्र ।शंख एवं कौड़ियाँदक्षिणी भारत।
नील रलबदख्शां-अफगानिस्तान।

(ii) आयात-हड़प्पा सभ्यता के व्यापारी बाहर के क्षेत्रों से कीमती धातुओं का आयात करते थे। चाँदी का आयात अफगानिस्तान या ईरान से किया जाता था। अफगानिस्तान एवं कर्नाटक से सोना लाया जाता था। ताँबे का आयात अरब देशों, पश्चिमी बलूचिस्तान तथा राजस्थान में खेतड़ी से किया जाता होगा। टिन ईरान, मध्य एशिया तथा अफगानिस्तान से मँगाया जाता था। सीसे को ईरान पूर्वी या दक्षिण भारत तथा अफगानिस्तान से लाया जाता होगा। फिरोजा मध्य एशिया या ईरान से मंगाया जाता था। नीलम अफगानिस्तान के बदख्शां से लाया जाता था। सेलखड़ी पत्थर बलूचिस्तान, अरावली एवं दक्षिण भारत से प्राप्त होता था। गोमेद, स्फटिक एवं इन्द्रगोप जैसे कीमती पत्थर भी बाहर से आयात किए जाते थे। अफगानिस्तान से कीमती पत्थर प्राप्त करने के लिए शोर्तुघई नामक स्थान पर हड़प्पा के व्यापारियों ने एक बस्ती बसा रखी थी। बाह्य व्यापार स्थल तथा समुद्री मार्ग दोनों से होता था। लोथल, सुरकोतदा तथा बालाकोट जैसे तटीय नगरों से बाहर देशों से समुद्री व्यापार होता होगा।

3. परिवहन के साधन- परिवहन के साधनों में नौकाएँ, मस्तूल वाले छोटे जहाज, बैलगाड़ियाँ तथा लद्रू जानवर प्रमुख थे। . हड़प्पा और मोहनजोदड़ो से पाई गई मोहरों में जहाजों और नावों को चित्रित किया गया है। लोथल में पक्की मिट्टी से बने जहाज का नमूना पाया गया है जिसमें मस्तूल के लिए एक लकड़ी तथा मस्तूल लगाने के लिए छेद हैं। लोथल में बनी गोदी को जहाजीमाल घाट के रूप में पहचाना जाता है। अरब सागर के तट पर अन्य भी अनेक बन्दरगाह थे; जैसे रंगपुर, सोमनाथ तथा बालाकोट । नदियों में भी छोटी नौकाओं का प्रयोग अनाज लाने के लिए किया जाता होगा। बैलगाड़ी अंतर्देशीय यातायात का साधन थी। बस्तियों से मिट्टी के बने बैलगाड़ी के अनेक नमूने पाए गए हैं। हड़प्पा में एक कांसे की गाड़ी का नमूना पाया गया है जिसमें एक चालक बैठा है। छोटी गाड़ियों के नमूने भी मिले हैं। हाथी, बैल, ऊँटों का भी भार ढोने में प्रयोग होता था। ऐतिहासिक काल में खानाबदोश चरवाहे सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते थे। शायद हड़प्पावासी भी ऐसा करते होंगे। परन्तु उस समय नौ परिवहन ..

प्रश्न 3.
हड़प्पा सभ्यता के लोगों की जीविका निर्वाह प्रणाली पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
परिपक्व हड़प्पा अवस्था में लोगों की आजीविका निर्वाह का मुख्य आधार कृषि प्रणाली थी। साथ ही वे मांस, मछली, फल, दूध भी प्राप्त करते थे। हड़प्पाई जीविका निर्वाह प्रणाली का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. कृषि-इस सभ्यता के लोगों के जीवन-निर्वाह या भरण पोषण का मुख्य आधार कृषि व्यवस्था थी। सिंधु नदी बड़ी मात्रा में जलोढ़ मिट्टी बहाकर लाती तथा इसे बाढ़ वाले मैदानों में छोड़ देती थी। इन मैदानों में यहाँ के किसान अनेक फसलें उगाते थे। सभ्यता के विभिन्न स्थलों से गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना, तिल, राई और मटर जैसे अनाज के दाने मिले हैं। गेहूँ की दो किस्में पैदा की जाती थीं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन से गेहूँ और जौ प्राप्त हुए हैं। गुजरात में ज्वार और रागी का उत्पादन होता था। सौराष्ट्र में बालाकोट में बाजरा व ज्वार के प्रमाण मिले हैं। 1800 ई.पू. में लोथल में चावल उगाने के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोग सम्भवतः दनिया में पहले थे जो कपास का उत्पादन करते थे।

2. कृषि तकनीक-खेती करने के तरीकों को समझना ज़्यादा कठिन है। क्या जोते हुए खेतों में बीजों को बिखेरा जाता था . या अन्य तरीके थे? उपलब्ध साक्ष्यों से कृषि तकनीक से संबंधित कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं। उदाहरण के लिए बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के हल का नमूना मिला है। बहावलपुर से भी ऐसा नमूना मिला है। कालीबंगन (राजस्थान) में प्रारंभिक हड़प्पा काल के खेत को जोतने के प्रमाण मिले हैं। पक्की मिट्टी से बनाए वृषभ (बैल) के खिलौनों के साक्ष्य तथा मोहरों पर पशुओं के चित्रों से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे बैलों का खेतों की जुताई के लिए प्रयोग करते थे।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 11

3. सिंचाई-क्या हड़प्पा के लोग फसलों को सींचते थे? यदि हाँ तो उनके सिंचाई के साधन क्या थे। संभवतः हड़प्पन लोगों ने भूमिगत जल का विश्व में पहले-पहल कुओं के द्वारा प्रयोग किया। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि गाँवों में कच्चे कुएँ खोदे जाते थे। कारीगरों द्वारा निर्मित पक्के कुएँ भी मिले हैं। परंतु इन कुओं का प्रयोग खेतों की सिंचाई के लिए होता था, इसमें सन्देह है। नदियों, ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ झीलों तथा तालाबों के पानी का ढेकली (lever lift) के माध्यम से खेतों में सिंचाई करने की संभावना है। शोर्तुघई (अफगानिस्तान) में नहर के अवशेष उपलब्ध हुए हैं। इससे अनुमान लगाया जाता है कि संभवतः सिंधु मैदानों में भी इसी प्रकार की नहरें खोदी गई होंगी। जलाशयों का निर्माण भी सिंचाई के उद्देश्य से किया जाता होगा। धौलावीरा (गुजरात) से ऐसे जलाशय का साक्ष्य मिला है।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 12
4. फसल काटने के औजार-पुरातत्ववेत्ताओं ने फसल काटने के औजारों की पहचान करने का भी प्रयास किया है। संभवतः लकड़ी के हत्थों में लगाए गए पत्थर के फलकों (Stone blades) का प्रयोग फसलों को काटने के लिए किया जाता था। धातु के औजार (तांबे की हँसिया) भी मिले हैं परंतु महंगी होने की वजह से इसका प्रयोग कम होता होगा।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 13

5. पशुपालन-सभ्यता से प्राप्त शिल्प तथ्यों तथा पुरा-प्राणिविज्ञानियों (Archaeo-zoologists) के अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि हड़प्पन भेड़, बकरी, बैल, भैस, सुअर आदि जानवरों का पालन करने लगे थे। कूबड़ वाला सांड उन्हें विशेष प्रिय था। गधे और ऊँट का पालन बोझा ढोने के लिए करते थे। ऊँटों की हड्डियाँ बड़ी मात्रा में पाई गई है परंतु मोहरों पर उनके चित्र नहीं हैं। इसके अतिरिक्त भालू, हिरण, घड़ियाल जैसे पशुओं की हड्डियाँ भी मिली हैं। मछली व मुर्गे की हड्डियाँ भी प्राप्त हुई हैं। परंतु हमें यह जानकारी नहीं मिलती कि वे इनका स्वयं शिकार करते थे या इन्हें शिकारी समुदायों से प्राप्त करते थे।

प्रश्न 4.
हड़प्पा सभ्यता की राजसत्ता का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा समाज में राजसत्ता के संबंध में विद्वान एक मत नहीं हैं। परन्तु हड़प्पा समाज के सभी पक्षों का अध्ययन करने पर इस बात के पत्ता संकेत मिलते हैं कि समाज से जड़े जटिल निर्णय लेने और उन्हें लागू करवाने के लिए कोई राजसत्ता और उससे जुड़ा अधिकारी वर्ग भी रहा होगा। उल्लेखनीय है कि सारे सभ्यता क्षेत्र (जम्मू से गुजरात तथा पश्चिम उत्तर प्रदेश से बलूचिस्तान) में मानक ईंटें, मानक माप-तौल पाया गया है। विशेष मुद्रा/मुद्रांक, (मृदभांड) तथा उन पर रूपायन (Motifs) विद्यमान है। योजनाबद्ध नगर, नालियों की उत्तम व्यवस्था और व्यापक व्यापार है। यह सब तथ्य इस बात को सुझाते हैं कि कोई जिम्मेदार केंद्रीकृत राजसत्ता रही होगी। हमने यह भी पढ़ा है कि हड़प्पावासियों ने कच्चा माल प्राप्त करने, पक्का माल तैयार करने, व्यापार में सहायता के लिए विशेष स्थलों पर बस्तियों का निर्माण किया हुआ था। साथ ही नगरों में बड़े पैमाने पर निर्माण कार्य करवाने के लिए मानव संसाधनों को संचालित करने के लिए अधिकारी वर्ग अवश्य रहा होगा। कुल मिलाकर इस बारे में विद्वानों ने निम्नलिखित विचार प्रकट किए हैं

1. राजा और राजप्रासाद-पुरातत्वविदों ने पुरावशेषों से सत्ता के चिह्नों को पहचानने का प्रयास किया है। मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल भवन को ‘राजप्रासाद’ का नाम दिया जाता है। यद्यपि विशाल इमारत में अन्य कोई अद्भुत अवशेष नहीं मिले हैं। इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से प्राप्त पत्थर की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसे ‘पुरोहित-राजा’ का नाम दिया जाता रहा है। व्हीलर महोदय ने तो इस आधार पर हड़प्पा की शासन प्रणाली को ‘धर्मतन्त्र’ नाम दिया है। पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा ऐसा निष्कर्ष इसलिए भी निकाला जाता है क्योंकि मेसोपोटामिया की सभ्यता हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थी। वहाँ राजा ही सर्वोच्च पुरोहित होते थे। लेकिन हड़प्पा के संबंध में इस निष्कर्ष पर पहुँच पाना कठिन है क्योंकि हड़प्पा से जुड़े रीति-रिवाजों को अभी तक पूरी तरह नहीं समझा जा सका है। दूसरा, यहाँ पर धार्मिक रीति-रिवाज निभाने वाले लोगों के पास राजसत्ता भी थी यह कह पाना भी कठिन है।

2. एक अन्य मत यह है कि हड़प्पा सभ्यता में कोई एक शासक नहीं था, वरन् कई शासक थे। जैसे मोहनजोदड़ो का अलग शासक था। हड़प्पा का अलग शासक था तथा अन्य नगरों के भी अलग-अलग राजा थे।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 14
3. कुछ विद्वानों का तो यह भी मानना है कि हड़प्पा समाज में कोई राजा ही नहीं था। सभी लोग बराबर की स्थिति में खुश थे। परंतु विलासिता से जुड़े कला तथ्यों व दुर्ग क्षेत्रों में भवनों से ऐसा मान लेना कठिन है।

4. अधिकतर विद्वानों का यह मत है कि कला तथ्यों में समरूपता को देखते हुए यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि यहाँ एक राज्य व्यवस्था विद्यमान थी। शासक वर्ग ने क्षेत्र के संसाधनों पर नियन्त्रण रखने के लिए विशेष बस्तियाँ बसाईं। व्यापार को विनियमित किया। वस्तुतः यह विचार सबसे ठीक लगता है क्योंकि इतने विशाल क्षेत्र में फैले इतने बड़े समाज के समस्त लोगों द्वारा एक साथ जटिल राजनैतिक निर्णय ले पाना तथा उन्हें लागू करवा पाना आसान नहीं था।

प्रश्न 5.
हड़प्पा सभ्यता के अवसान/पतन के कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
1800 B.C.E. के आसपास हड़प्पा नगरों का पतन होने लगा था। लोग नगरों को छोड़कर जाने लगे थे। हड़प्पाई नाप-तौल, मोहरें तथा लिपि गायब होने लगी। पक्की ईंटों के योजनाबद्ध घर बनने बंद हो गए। दस्तकारियाँ; जैसे मनकों तथा अन्य उद्योग समाप्त होने लगे थे। दूरस्थ व्यापार बंद होने लगे थे। वस्तुतः सभ्यता का अवसान शुरू हो चुका था। हड़प्पा सभ्यता के अंत के निम्नलिखित कारण बताए जा सकते हैं

1. बाढ़ और भूकम्प कुछ विद्वानों ने हड़प्पा सभ्यता के पतन का कारण बाढ़ बताया है। मोहनजोदड़ो में मकानों और सड़कों पर गाद (कीचड़युक्त मिट्टी) भरी पड़ी थी। बाढ़ का पानी उतर जाने पर यहाँ के निवासियों ने पहले के मकानों के मलबे पर फिर से मकान और सड़कें बना लीं। बाढ़ आने का सिलसिला कई बार घटा। खुदाई से पता चला है कि 70 फुट गहराई तक मकान बने हुए थे। बार-बार आने वाली बाढ़ों से नगरवासी गरीब हो गए तथा तंग आकर बस्तियों को छोड़कर चले गए।

आर०एल० रेइक्स ने 1965 में अपने लेख ‘The Mohanjodaro Floods’ में लिखा है कि हड़प्पा सभ्यता के ह्रास का कारण महाभयंकर बाढ़ थी। इस बाढ़ से 30 फुट तक पानी भर गया। इस बाढ़ से सिंधु नदी घाटी के नगर लम्बे समय तक डूबे रहे। रेइक्स ने यह बताया कि यह क्षेत्र अशांत भूकम्प क्षेत्र है। बाढ़ के साथ भूकम्प भी आया होगा। इस भूकम्प से नदी का मार्ग भी अवरुद्ध हो गया। इस महाभयंकर बाढ़ तथा भूकम्प ने नदियों का मार्ग रोक दिया, शहर जलमग्न हो गए, व्यापार और वाणिज्य गतिविधियाँ भंग हो गईं। इससे हड़प्पा सभ्यता नष्ट हो गई। परंतु यह व्याख्या सिंधु घाटी के बाहर की बस्तियों के ह्रास को स्पष्ट नहीं करती।।

2. सिंधु नदी का मार्ग बदलना-एच०टी० लैमब्रिक (H.T. Lambrick) का कहना है कि सिंधु नदी मार्ग में परिवर्तन मोहनजोद नगर के विनाश का कारण हो सकता है। यह नदी अपना मार्ग बदलती रहती थी। स्पष्ट है कि नदी नगर से 30 किलोमीटर दूर चली गई। पानी की कमी के कारण शहर और आस-पास के अनाज पैदा करने वाले गाँवों के लोग क्षेत्र छोड़कर पलायन कर गए। इससे मोहनजोदड़ो के लोगों का शहर छोड़ना तो समझाया जा सकता है, परंतु हड़प्पा सभ्यता के पूरी तरह हास को स्पष्ट नहीं किया जा सकता।

3. क्षेत्र में बढ़ती शुष्कता और घग्घर नदी का सूख जाना- डी०पी० अग्रवाल और कुछ अन्य विद्वानों का विचार है कि इस सभ्यता का ह्रास इस क्षेत्र में शुष्कता के बढ़ने के कारण और घग्घर नदी (हाकड़ा क्षेत्र) के सूख जाने के कारण हुआ। ऐसी स्थिति में हड़प्पा जैसे अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र पर सबसे अधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा होगा। इससे कृषि की पैदावार पर प्रभाव पड़ा। पैदावार में कमी आई। परिणामस्वरूप नगरों की अर्थव्यवस्था पर भी प्रभाव पड़ा।

साथ ही यह भी व्याख्या दी जाती है कि धरती में हुए आन्तरिक परिवर्तनों के कारण इस क्षेत्र के नदी तरंगों (मार्गों) पर भी प्रभाव पड़ा। घग्घर एक शक्तिशाली नदी होती थी तथा पंजाब, राजस्थान, कच्छ रन से गुजरकर समुद्र में गिरती थी। सतलुज और यमुना इसकी सहायक नदियाँ थीं। विवर्तनिक विक्षोभ (पृथ्वी के धरातल के बहुत बड़े क्षेत्र का ऊपर उठ जाना) के कारण सतलुज सिंधु में मिल गई तथा यमुना मार्ग बदलकर गंगा में मिल गई। इससे घग्घर जलविहीन हो गई। इससे हाकड़ा क्षेत्र सूख गया जिससे इस क्षेत्र में बसे नगरों के लिए समस्याएँ पैदा हो गईं और ये नगर समाप्त हो गए।

4. आर्यों के आक्रमण-व्हीलर ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। इसके पक्ष में वे आक्रमण के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। प्रथम, हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में सड़कों पर मानव कंकाल पड़े मिले हैं। एक कमरे में 13 स्त्री-पुरुषों तथा बच्चों के कंकाल मिले . हैं। मोहनजोदड़ो के अन्तिम चरण में सड़कों पर तथा घरों में मनुष्यों के कत्लेआम के प्रमाण मिले हैं। एक संकरी गली को जॉन लि ने डैडमैन लेन का नाम दिया है। दूसरा, ऋग्वेद में आर्यों के देवता इन्द्र को ‘पुरन्धर’ कहा जाता था अर्थात् ‘किले तोड़ने वाला’। तीसरा, ऋग्वेदकालीन आर्यों के आवास क्षेत्र में पंजाब एवं घग्घर क्षेत्र भी शामिल था तथा ऋग्वेद में एक स्थान पर ‘हरियूपिया’ नामक स्थान का उल्लेख है। व्हीलर ने कहा है कि यह स्थान हड़प्पा ही है और आर्यों ने यहाँ पर एक युद्ध लड़ा था। अतः हड़प्पा के शहरों को आर्यों ने ही आक्रमण करके नष्ट कर दिया। परंतु यह सिद्धान्त अब मान्य नहीं है। पहली बात तो यह है कि हड़प्पा सभ्यता के ह्रास का समय 1800 ई०पू० माना जाता है। आर्यों के आने का काल लगभग 1500 ई०पू० बताया जाता है।

5. पर्यावरण असन्तुलन तथा आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली का ढहना-हाल ही में पुरातत्वविदों ने हड़प्पा सभ्यता के ह्रास को पारिस्थितिक (Ecological) कारणों में ढूँढना शुरु किया है। पुरातत्त्वविदों द्वारा दिए गए तर्कों की संक्षेप में जानकारी इस प्रकार है

(i) फेयर सर्विस ने हड़प्पा सभ्यता के नगरों की जनसंख्या तथा उसकी खाद्य आवश्यकता का हिसाब लगाया। उनका मानना है कि एक ओर तो जनसंख्या और पशु संख्या बढ़ रही थी, दूसरी ओर इसके दबाव से जंगल समाप्त होने लगे। इससे बाढ़ और सूखे जैसी समस्याएँ बढ़ीं। इसका अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। लोग इस क्षेत्र को छोड़कर जीविका के लिए अच्छे स्थानों पर चले गए।

(ii) बी०के० थापर और रफीक मुगल का विचार है कि घग्घर-हाकड़ा नदी प्रणाली के धीरे-धीरे सूखने या विलुप्त हो जाने से समस्याएँ बढ़ीं। वनों का विनाश होने लगा। पशुओं द्वारा अधिक चराई से जमीन का कटाव तथा क्षारीयता बढ़ी। साथ-ही-साथ जल संसाधनों का सीमा से अधिक प्रयोग हुआ। सरीन रत्नाकर का मानना है कि उत्थापक सिंचाई प्रणाली (Lift Irrigation) द्वारा जल का सीमाओं से अधिक उपयोग से जल-स्तर कम हो गया अर्थात् जिन अनुकूल परिस्थितियों और संसाधनों के कारण सभ्यता का उदय और विकास हुआ, उन्हीं के अभाव में सभ्यता का विनाश हो गया।

(iii) जंगलों की कटाई को भी हड़प्पा सभ्यता के विनाश का कारण बताया गया है। यह सभ्यता कांस्ययुगीन थी। ताँबे तथा काँसे के उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ी का प्रयोग होता था। रत्नागर का कहना है कि लकड़ी के बड़े पैमाने पर प्रयोग के कारण वन नष्ट हो गए होंगे। वनों की कटाई का प्रकृति की छटा, वर्षा, जमीन की उत्पादकता पर प्रभाव पड़ा होगा। इससे पारिस्थितिक असन्तुलन (Ecological Imbalance) हो गया होगा। एम० केनोयर ने भी इसका समर्थन किया है तथा लिखा है, “हड़प्पाकालीन लोग पर्यावरण के प्रति सचेत नहीं थे। उन्होंने अन्य लोगों की भाँति घने वनों को बेपरवाही से कांटकर उनकी लकड़ी का प्रयोग कर लिया।” स्पष्ट है कि हड़प्पा सभ्यता का पतन अनेक कारणों की वजह से हुआ।

प्रश्न 6.
हड़प्पा सभ्यता के अनुसंधान की कहानी पर लेख लिखिए।
उत्तर:
हड़प्पा की खोज की कहानी काफी रोचक है कि आखिर हड़प्पा सभ्यता की खोज हुई कैसे? हड़प्पा के पतन के बाद – लोग धीरे-धीरे इन नगरों को भूल गए। फिर सैकड़ों वर्षों बाद इस क्षेत्र में लोग पुनः रहने लगे। बाढ़, मृदा क्षरण या भूमि जोतते हुए यहाँ से कला-तथ्य निकलने पर स्थानीय लोग यह समझ नहीं पाते थे कि इनका क्या करें। अन्ततः पुरातत्वविदों ने हड़प्पा सभ्यता को खोज निकाला। खोज की कहानी निम्नलिखित प्रकार से है

1. चार्ल्स मोसन तथा बर्नेस के कार्य-हड़प्पा सभ्यता को खोज निकालने में अनेक व्यक्तियों का योगदान है। 1826 ई० में चॉर्ल्स मोसन नामक एक अंग्रेज पश्चिमी पंजाब में हड़प्पा नामक गाँव में आया। उसने वहाँ बहुत पुरानी बस्ती के बुों और अद्भुत ऊँची-ऊँची दीवारों को देखा। उसने यह समझा कि यह शहर सिकन्दर महान् के समय का है। दूसरा, बर्नेस नामक व्यक्ति ने भी . 1834 में सिंधु क्षेत्र की यात्रा की। उसने भी सिंधु नदी के किनारे किसी ध्वस्त किले की बात कही।

2. कनिंघम के प्रयास, रिपोर्ट और उलझन-कनिंघम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पहले महानिदेशक थे। उनकी रूचि छठी सदी ईसा पूर्व से चौथी सदी ईसा पूर्व तथा इसके बाद के प्राचीन इतिहास के पुरातत्व में थी। उन्होंने बौद्धधर्म से संबंधित चीनी यात्रियों के वृत्तांतों का प्रारंभिक बस्तियों की पहचान करने में प्रयोग किया। सर्वेक्षण के कार्य में शिल्प तथ्य एकत्र किए। उनका रिकॉर्ड रखा तथा अभिलेखों का अनुवाद भी किया। कनिंघम ने उपलब्ध कला-तथ्यों के सांस्कृतिक अर्थों को भी समझने का प्रयास किया। परंतु हड़प्पा जैसे स्थल की इन चीनी वृत्तांतों में न तो विवरण था, न ही इन नगरों की ऐतिहासिकता की कोई जानकारी। अतः यह नगर ठीक प्रकार से उनकी खोजों के दायरे में नहीं समा पा रहे थे।
HBSE 12th Class History Important Questions chapter 1 Img 15
वस्तुतः वे यहाँ से प्राप्त कला-तथ्यों की पुरातनता का अनुमान नहीं लगा पाए। उदाहरण के लिए एक अंग्रेज ने कनिंघम को हड़प्पा की एक मोहर दी (चित्र देखें)। कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में इसका चित्र भी दिया परंतु वह इसे इसके समय-संदर्भ में रख पाने में असफल । रहे। इसका कारण यह रहा होगा कि अन्य विद्वानों की भांति वह भी यह मानते । थे कि भारत में पहली बार नगरों का अभ्युदय गंगा-घाटी में 6 वीं, 7वीं सदी ई०पू० से हुआ। अतः यह आश्चर्य की बात नहीं है कि वे हड़प्पा के महत्त्व को नजरअंदाज कर गए।

3. नवीन सभ्यता की खोज-1921 में दयाराम साहनी ने हड़प्पा स्थल से । अनेक मोहरें उत्खनन में प्राप्त की। ऐसा ही कार्य 1922 में राखालदास बनर्जी चित्र : कनिंघम द्वारा दिया मोहर का चित्र ने मोहनजोदड़ो में किया। दोनों स्थलों की मोहरों में समानता थी। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह स्थल एक ही पुरातात्विक संस्कृति का हिस्सा है। इन खोजों के आधार पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने 1924 ई० में (लन्दन में प्रकाशित एक साप्ताहिक पत्र में) सारी दुनिया के समक्ष इस नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की। सारी दुनिया में इससे सनसनी फैल गई। इस बारे में एस.एन.राव ने ‘द स्टोरी ऑफ इंडियन आर्कियोलॉजी’ में लिखा, “मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हजार वर्ष पीछे छोड़ा।” उल्लेखनीय है कि हड़प्पा जैसी मोहरें मेसोपोटामिया से भी मिली थीं। अब यह स्पष्ट हुआ कि यह एक नई सभ्यता थी जो मेसोपोटामिया के समकालीन थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 7.
हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना व भवन निर्माण प्रणाली पर लेख लिखिए।
उत्तर:
नगरीय प्रणाली हड़प्पा की विकसित अवस्था (Mature Stage) से सम्बन्ध रखती है। इस नगरीकरण को विद्वानों ने नगरीय क्रान्ति की संज्ञा दी है। इसका विकास किसी शक्तिशाली केन्द्रीय सत्ता के बिना नहीं हो सकता था। सड़कों की व्यवस्था, बड़े पैमाने पर जल निकास प्रणाली का विकास एवं उसकी देख-रेख, विशाल नगर, किले आदि सभी एक शक्तिशाली केन्द्रीय शासन प्रणाली के मौजूद होने का संकेत देते हैं। हड़प्पा सभ्यता के नगरीकरण की दूसरी मुख्य बात यह थी कि इन नगरों में बड़े पैमाने पर दक्ष शिल्पकार थे। तीसरा इन नगरों के एशिया के सुदूर देशों के साथ व्यापार सम्पर्क थे। मेसोपोटामिया के साथ समुद्री व्यापार उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा था।

1. नगर योजना-हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसकी नगर योजना तथा सफाई व्यवस्था है। नगरों में सड़कें और गलियाँ एक योजना के अनुसार बनाई गई थीं। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाते थे। उनको काटती सड़कें और गलियाँ मुख्य मार्ग को समकोण पर काटती थीं जिससे नगर वर्गाकार या आयताकार खण्डों में विभाजित हो जाते थे।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगन जैसे नगर दो भागों (पूर्वी तथा पश्चिमी) में बंटे थे। पूर्वी भाग में ईंटों से बनाए ऊँचे चबूतरे पर स्थित बस्ती के चारों ओर परकोटा (किला) होता था जिसे ‘नगर दुर्ग’ कहा जाता है। इसके पश्चिम की ओर के आवासीय क्षेत्र को निचला नगर कहा जाता है। नगर दुर्ग का क्षेत्रफल निचले नगर से कम था। मोहनजोदड़ो के नगर दुर्ग में पकाई ईंटों से बने अनेक बड़े भवन पाए गए हैं, जैसे विशाल स्नानागार, प्रार्थना भवन, सभा भवन एवं अन्नागार। हड़प्पा में ‘नगर-दुर्ग’ के उत्तर में कारीगरों के मकान, उनके कार्य-स्थान (चबूतरे) और एक अन्नागार था। कालीबंगन की नगर योजना में दुर्ग क्षेत्र तथा निचले नगर दोनों के परकोटा (मोटी दीवार) था। सुरकोतदा की नगर-योजना कालीबंगन के समान थी। नगर दुर्ग तथा निचला नगर आपस में जुड़े हैं तथा दोनों के चारों ओर परकोटा है। धौलावीरा (कच्छ में) नगर तीन मुख्य भागों (नगर दुर्ग, मध्यम नगर तथा निचला नगर) में विभाजित था। हड़प्पा के नगरों में नगर दुर्ग में पुरोहित एवं शासक रहते थे तथा निचले नगर में व्यापारी, दस्तकार, शिल्पकार एवं अन्य लोग रहते थे।

2. नगर द्वार-जैसा कि ऊपर बताया गया है कि अधिकांश में विशेषकर दुर्ग-नगर के चारों ओर मोटी दीवार होती थी। इस परकोटे में स्थान-स्थान पर प्रवेश द्वार बने होते थे। धौलावीरा और सुरकोतदा में नगर प्रवेश द्वार काफी विशाल एवं सुन्दर थे, जबकि अन्य नगरों में प्रवेश द्वार साधारणं थे। कुछ नगर द्वारों के निकट सुरक्षाकर्मियों के कक्ष भी बने हुए थे जो साधारणतः बहुत छोटे होते थे। हड़प्पा सभ्यता के नगरों के चारों ओर दीवारों तथा नगर द्वारों के निर्माण का उद्देश्य शत्रुओं के आक्रमण से रक्षा, लुटेरों एवं पशुचोरों से सुरक्षा करना तथा बाढ़ों से नगरों की रक्षा करना रहा होगा।

3. सड़कें और गलियाँ-हड़प्पा कालीन नगर पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार बनाए जाते थे। सड़कें और गलियाँ सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। सड़कें पूर्व से पश्चिम या उत्तर से दक्षिण दिशा में बिछी हुई थीं। इससे नगर कई भागों में बंट जाते थे। मोहनजोदड़ो में मुख्य सड़क 10.5 मीटर चौड़ी थी, इसे ‘प्रथम सड़क’ कहा गया है। इस ‘प्रथम सड़क’ पर . एक साथ पहिए वाले सात वाहन गुजर सकते थे। अन्य सड़कें 3.6 से 4 मीटर तक चौड़ी थीं। गलियाँ एवं गलियारे 1.2 मीटर (4 फुट) या उससे अधिक चौड़े थे। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि सड़कों, गलियों और नालियों की व्यवस्था लागू करने तथा निरन्तर देखभाल के लिए नगरपालिका या नगर प्राधिकरण जैसी कोई प्रशासनिक व्यवस्था रही होगी।

4. नालियों की व्यवस्था व्यापक नालियों की व्यवस्था हड़प्पा सभ्यता की अद्वितीय विशेषता थी, जो हमें अन्य किसी भी समकालीन सभ्यता के नगरों में प्राप्त नहीं होती है। प्रत्येक घर में छोटी नालियाँ होती थीं जो घर के पानी को बाहर गली या सड़क के किनारे बनी नाली में पहुँचाती थीं। प्रमुख सड़कों एवं गलियों के साथ 1 से 2 फुट गहरी ईंटों तथा पत्थरों से ढकी नालियाँ होती थीं। मुख्य नालियों में कचरा छानने की व्यवस्था भी होती थी। नालियों में ऐसी व्यवस्था करने के लिए बड़े गड्ढे (शोषगत) होते थे, जो पत्थरों या ईंटों से ढके होते थे जिन्हे सफाई करने के लिए आसानी से हटाया और वापस रख दिया जाता था। मुख्य नालियाँ एक बड़े नाले के साथ जुड़ी होती थीं जो सारे गदे पानी को नदी में बहा देती थीं। हड़प्पाकालीन नगरों की जल निकास प्रणाली पर टिप्पणी करते हुए ए०एल० बाशम ने लिखा है, नालियों की अद्भुत व्यवस्था सिन्धु घाटी के लोगों की महान सफलताओं में से एक थी। रोमन सभ्यता के अस्तित्व में आने तक किसी भी प्राचीन सभ्यता की नाली व्यवस्था इतनी अच्छी नहीं थी।”

5. ईंटें-हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और अन्य प्रमुख नगरों में ईंटों का व्यापक पैमाने पर प्रयोग हुआ है। ये ईंटें कच्ची और पक्की दोनों प्रकार की थीं। मोहदजोदड़ो में चबूतरों पर धूप में सुखाई गई ईंटों का प्रयोग किया गया है। हड़प्पा में कच्ची ईंटों की पर्त पर पक्की ईंटों का इस्तेमाल हुआ है। कालीबंगन में पक्की ईंटों का प्रयोग कुओं, नालियों एवं स्नानगृहों के बनाने में किया गया है। इन ईंटों का मुख्य आकार 20%2″× 10/2″× 31/4″ होता था जो 1 : 2 : 4 अनुपात में है। नालियों को ढकने के लिए काफी बड़ी ईंटों का प्रयोग हुआ है।

6. भवन-हड़प्पा सभ्यता के नगरों के भवन निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किए जा सकते हैं

  1. आवासीय मकान,
  2. विशाल भवन,
  3. सार्वजनिक स्नानागार,
  4. अन्नागार,
  5. जलाशय तथा डॉकयार्ड आदि।

1. आवासीय मकान-हड़प्पा तथा मोहदजोदड़ो स्थानों में नागरिक निचले नगर में भवन समूहों में रहते थे। ये मकान योजनापूर्वक बनाए जाते थे। प्रत्येक मकान के बीच एक खला आंगन तथा चारों तरफ छोटे-बड़े कमरे होते थे। बाढ से सरक्षा हेत मकान ऊँचे चबूतरे पर तथा गहरी नींव के होते थे। दीवारें मोटी एवं पक्की ईंटों तथा गारे की थीं। छतों में लकड़ी और ईंटों तथा फर्श में भी ईंटों का प्रयोग था। प्रकाश व हवा के लिए दरवाजे, खिड़कियाँ तथा रोशनदान बनाए जाते थे। दरवाजे खिड़कियाँ मुख्य सड़क की तरफ न खुलकर गली की तरफ खुलती थी। घर में रसोईघर, शौचालय एवं स्नानघर होते थे। बड़े घरों में कुआँ भी होता था। कई मकान तो दो मंजिलों के बने होते थे। मकानों में भी विविधता थी। गरीब लोगों के मकान छोटे थे। छोटी बैरकों में मजदूर तथा दास रहते थे। निचले शहर के मकानों में बड़ी संख्या में कर्मशालाएँ (कारखाने) (Workshops) भी थीं।

2. विशाल भवन-हड़प्पाकालीन नगरों के दुर्ग वाले भाग में विशाल भवन प्राप्त हुए हैं। मोहनजोदड़ो तथा हड़प्पा में ऐसे अनेक विशाल भवन मिले हैं जो शायद शासक वर्ग के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाते होंगे।

3. सार्वजनिक स्नानागार-हड़प्पाकालीन सबसे प्रसिद्ध भवन मोहनजोदड़ो का विशाल स्नानागार है। आयताकार में बना यह स्नानागार 11.88 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.45 मीटर गहरा है। इसके उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ बनी हैं। ये सीढ़ियाँ स्नानागार के तल तक जाती हैं। यह स्नानागार पक्की ईंटों से बना है। इसे बनाने में चूने तथा तारकोल का प्रयोग किया गया था। इसके साथ ही कुआँ था जिससे इसे पानी से भरा जाता था। साफ करने के लिए इसकी पश्चिमी दीवार में तल पर नालियाँ बनी थीं। स्नानागार के चारों ओर मंडप एवं कक्ष बने हुए थे। विद्वानों का मानना है कि इस स्नानागार और भवन का धार्मिक समारोहों के लिए प्रयोग किया जाता था।

4. अन्नागार-हड़प्पा में 50 × 40 मीटर के आकार का एक भवन मिला है जिसके बीच में 7 मीटर चौड़ा गलियारा था। पुरातत्ववेत्ताओं ने इसे विशाल अन्नागार बताया है जो अनाज, कपास तथा व्यापारिक वस्तुओं के गोदाम के काम आता था।

5. जलाशय तथा डॉकयार्ड-धौलावीरा में एक विशाल जलाशय के अवशेष मिले हैं। यह जलाशय 80.4 मीटर लम्बा, 12 मीटर चौड़ा तथा 7.5 मीटर गहरा था। कच्छ क्षेत्र में पानी की कमी रहती थी अतः ऐसे जलाशय का प्रयोग जल संग्रहण के लिए किया जाता होगा। इसी प्रकार लोथल में अन्नागार तथा डॉकयार्ड (गोदी) मिला है। पक्की ईंटों से बना यह स्थल 214 मीटर लम्बा, 36 मीटर चौड़ा तथा 4.5 मीटर गहरा है। यह डॉकयार्ड एक जलमार्ग से पास की खाड़ी से जुड़ा है।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

HBSE 12th Class History संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
उद्देश्य प्रस्ताव में किन आदर्शों पर जोर दिया गया था?
उत्तर:
13 दिसंबर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के समक्ष उद्देश्य प्रस्ताव रखा। इसमें उन आदर्शों को रेखांकित किया गया जो संविधान निर्माण में अपनाए जाने थे। इस उद्देश्य प्रस्ताव में अग्रलिखित आदर्शों पर बल दिया गया

(1) यह घोषणा की गई कि भारत एक स्वतंत्र प्रभुसत्ता संपन्न गणराज्य होगा।

(2) संविधान में प्रभुसत्ता संपन्न स्वतंत्र भारत तथा उसके घटकों तथा सरकार के अंगों को समस्त शक्ति जनता से प्राप्त होगी।

(3) प्रस्ताव में कहा गया कि भारत के समस्त लोगों के लिए सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रतिष्ठा, अवसर तथा न्याय की समानता, विधि तथा सदाचार के अनुरूप विचार की अभिव्यक्ति, विश्वास, आस्था, व्यवसाय, सहचर्य तथा काम की स्वतंत्रता की गारंटी होगी।

(4) समस्त अल्पसंख्यकों, पिछड़ी जनजातियों तथा दलितों को पर्याप्त संरक्षण प्राप्त होंगे।

(5) भारतीय गणतंत्र के प्रदेश तथा उसकी अखंडता और इसकी भूमि, समुद्र तथा आकाश में सत्ता न्याय तथा सभ्य राष्ट्रों को कानूनों के अनुसार बनाई जाएगी।

प्रश्न 2.
विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को किस तरह परिभाषित कर रहे थे?
उत्तर:
संविधान सभा की बहस में एक प्रमख महा यह था कि भावी संविधान में अल्पसंख्यकों को किस प्रकार के अधिकार होंगे। परंतु यह उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में विभिन्न समूह ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को अलग-अलग प्रकार से परिभाषित कर रहे थे।

(i) संविधान सभा के सदस्य बी० पोकर बहादुर ने मुस्लिम समुदाय को अल्पसंख्यक बताया तथा अल्पसंख्यकों के लिए पृथक् निर्वाचिका प्रणाली को जारी रखने की माँग रखी। उन्होंने जोर दिया कि इस राजनीतिक प्रणाली में अल्पसंख्यकों को पूर्ण प्रतिनिधित्व दिया जाए।

(ii) समाजवादी विचारों के समर्थक व किसान आंदोलन के नेता एन०जी० रंगा ने ‘अल्पसंख्यक’ शब्द की उक्त परिभाषा पर ही सवाल खड़ा किया। उन्होंने अल्पसंख्यक शब्द की व्याख्या आर्थिक स्तर के आधार पर करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा असली अल्पसंख्यक तो इस देश की दबी-कुचली और उत्पीडित जनता है जो अभी तक सामान्य नागरिक के अधिकारों का लाभ भी नहीं उठ पा रही है। रंगा ने कहा कि असली अल्पसंख्यक गरीब, उत्पीड़ित व आदिवासी हैं। उन्हें सुरक्षा का आश्वासन मिलना चाहिए।

(iii) आदिवासी समूह के प्रतिनिधि सदस्य जयपाल सिंह ने आदिवासियों को अल्पसंख्यक बताया। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय जनता में ऐसा कोई समूह है, जिसके साथ उचित बर्ताव नहीं किया गया है, तो वह मेर से अपमानित किया जा रहा है, उपेक्षित किया जा रहा है।

(iv) दलित समूहों के नेताओं ने दलितों को वास्तविक अल्पसंख्यक बताया। इन नेताओं में मद्रास के जे० नागफा, मध्य प्रांत के के०जे० खांडेलकर, मद्रास के वेला युधान मुख्य थे। खाडेलकर ने कहा “हमें हज़ारों वर्षों तक दबाया गया है।.. दबाया गया…इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भाव-शून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।” इस प्रकार ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 3.
प्रांतों के लिए ज्यादा शक्तियों के पक्ष में क्या तर्क दिए गए?
उत्तर:
संविधान सभा में केंद्र व प्रांतों के अधिकारों के प्रश्न पर भी पर्याप्त बहस हुई। कुछ सदस्य केंद्र को शक्तिशाली बनाने के समर्थक थे। कुछ सदस्यों ने राज्यों के अधिक अधिकारों की शक्तिशाली पैरवी की। मद्रास के सदस्य के० सन्तनम उनमें से एक थे। उनका मानना था कि राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्रदान करने से राज्य ही नहीं, केंद्र भी मजबूत होगा। उन्होंने कहा कि “तमाम शक्तियाँ केंद्र को सौंप देने से वह मजबूत हो जाएगा”, यह हमारी गलतफहमी है। अधिक जिम्मेदारियों के होने पर केंद्र प्रभावी ढंग से काम नहीं कर पाएगा। सन्तनम ने तर्क दिया कि शक्तियों का मौजूदा वितरण राज्यों को पंगु बना देगा। राजकोषीय प्रावधान राज्यों को खोखला कर देंगे और यदि पैसा नहीं होगा तो राज्य अपनी विकास योजनाएँ कैसे चलाएगा। – उड़ीसा के एक सदस्य ने भी राज्यों के अधिकारों की वकालत की तथा उन्होंने यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि संविधान में शक्तियों के अति केंद्रीयकरण के कारण “केंद्र बिखर जाएगा”।

प्रश्न 4.
महात्मा गाँधी को ऐसा क्यों लगता था कि हिंदुस्तानी राष्ट्रीय भाषा होनी चाहिए?
उत्तर:
राष्ट्रीय कांग्रेस ने तीस के दशक में यह स्वीकार लिया था कि हिंदुस्तानी (हिंदी और उर्दू के मेल से उपजी) को राष्ट्र की भाषा का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए। गाँधीजी भी हिंदुस्तानी को राष्ट्र की भाषा बनाने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि हरेक को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिंदुस्तानी भारतीय जनता के बड़े भाग की भाषा थी। यह विविध संस्कृतियों के मेल-मिलाप से समृद्ध हुई एक साझी भाषा थी। गाँधीजी को लगता था कि यह बहुसांस्कृतिक भाषा भारत के विभिन्न समुदायों के बीच एक आदर्श संचार भाषा हो सकती है जो हिंदुओं और मुसलमानों को व उत्तर और दक्षिण के लोगों को एकजुट कर सकती है। इससे राष्ट्र निर्माण का कार्य भी आगे बढ़ेगा। 12 अक्तूबर, 1947 को गाँधीजी ने हरिजन सेवक में लिखा कि राष्ट्रीय भाषा की क्या विशेषताएँ होनी चाहिएँ : “यह हिंदुस्तानी न तो संस्कृतनिष्ठ हिंदी होनी चाहिए और न ही फारसीनिष्ठ उर्दू। यह दोनों का सुंदर मिश्रण होना चाहिए।”

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 5.
वे कौन-सी ऐतिहासिक ताकतें थीं जिन्होंने संविधान का स्वरूप तय किया?
उत्तर:
भारतीय संविधान के स्वरूप निर्धारण में अनेक ऐतिहासिक ताकतों ने भूमिका निभाई। इनका संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. अंग्रेज़ी राज-भारत के संविधान पर औपनिवेशिक शासन के दौरान पास किए गए अधिनियम का व्यापक प्रभाव है। उदाहरण के लिए भारतीय संविधान में स्थापित शासन व्यवस्था पर 1935 के भारत सरकार अधिनियम का प्रभाव है।

2. भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन-संविधान में जिस प्रजातांत्रिक, धर्म-निरपेक्ष व समाजवादी सिद्धांतों को अपनाया गया उस पर राष्ट्रीय आंदोलन की गहरी छाप है। राष्ट्रीय आंदोलन में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। कांग्रेस में विभिन्न विचारधाराओं से संबंधित लोग सदस्य थे। उनका प्रभाव संविधान पर देखा जा सकता है।

3. कैबिनेट मिशन व संविधान सभा का चुनाव-संविधान सभा का स्वरूप केबिनेट मिशन ने तय किया। इसके अनुसार

  • इस सभा में कुल 389 सदस्य हों जिसमें से 292 ब्रिटिश प्रांतों के प्रतिनिधि, 93 देशी रियासतों के तथा 4 चीफ कमिश्नरियों के क्षेत्र में से हों।
  • यह निश्चित किया गया कि 10 लाख व्यक्तियों पर संविधान सभा में एक सदस्य होगा।
  • प्रांतों को उनकी जनसंख्या के आधार पर संविधान सभा में प्रतिनिधित्व दिया गया। प्रांतीय विधानसभा में प्रत्येक संप्रदाय को जितने प्रतिनिधि भेजने थे, उनका चुनाव संप्रदाय के आधार पर होगा।
  • निर्वाचन तीन संप्रदायों, मुसलमान, सिक्ख और अन्य (हिंदू व ईसाई आदि) पर आधारित होना था।
  • रियासतों को भी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया। .

4. प्रमुख सदस्यों का प्रभाव-संविधान सभा और राजनीतिज्ञों के साथ-साथ प्रसिद्ध शिक्षाविद, न्यायाधीश, अधिवक्ता, लेखक, पत्रकार, पूँजीपति, श्रमिक नेता आदि सदस्य भी शामिल थे। संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बी०आर० अंबेडकर, के०एम० मुन्शी और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने मुख्य भूमिका निभाई। नेहरू ने ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ रखा तथा साथ ही राष्ट्रीय ध्वज संबंधी प्रस्ताव रखा। पटेल ने अनेक रिपोर्टों के प्रारूप लिखने तथा अनेक परस्पर विरोधी विचारों के मध्य सहमति उत्पन्न करने में सराहनीय योगदान दिया। राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा के अध्यक्ष के रूप में कार्य किया तथा चर्चा को रचनात्मक दिशा दी। सुप्रसिद्ध विधिवेत्ता डॉ०बी०आर० अंबेडकर संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। कुछ प्रमुख व्यक्तियों ने उन्हें संविधान का पिता कहा है। के०एम० मुंशी और कृष्णास्वामी अय्यर प्रारूप समिति के सदस्य थे। इन दोनों ने संविधान के प्रारूप पर महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए। इन सदस्यों को दो प्रशासनिक अधिकारियों बी०एन०राव और एस०एन मुखर्जी ने महत्त्वपूर्ण सहयोग दिया। न्यायाधीश बी०एन० राव भारत सरकार के संवैधानिक सलाहकार थे। उन्होंने अन्य देशों की राजनीतिक प्रणालियों का गहन अध्ययन कर अनेक चर्चा पत्र तैयार किए।

5. जनमत का प्रभाव-संविधान सभा में होने वाली चर्चाओं पर जनमत का पर्याप्त प्रभाव होता था। किसी भी प्रस्ताव पर संविधान सभा में बहस होती थी तो उस बहस में विभिन्न दलीलों को समाचार-पत्रों द्वारा छापा जाता था। साथ ही प्रेस में इन प्रस्तावों पर टीका-टिप्पणी, आलोचना व प्रत्यालोचना होती थी। इसके साथ-साथ संविधान सभा द्वारा जन-सामान्य के सुझाव भी आमंत्रित किए जाते थे। संविधान सभा को सैकड़ों सुझाव प्राप्त हुए थे। इन सुझावों पर संविधान सभा में विचार किया जाता था। इन सुझावों में विभिन्न समुदायों और संगठनों द्वारा अपने हितों की रक्षा के सुझाव दिए गए थे। वस्तुतः संविधान सभा को वास्तविक शक्ति जनता से मिल रही थी। नेहरू जी ने संविधान सभा में स्पष्ट शब्दों में कहा था कि, “आपको उस स्रोत को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, जहाँ से इस सभा को शक्ति मिल रही है।…सरकारें कागजों से नहीं बनतीं। सरकार जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति होती है। हम यहाँ इसलिए जुटे हैं, क्योंकि हमारे पास जनता की ताकत है और हम उतनी दूर तक ही जाएँगे, जितनी दूर तक लोग हमें ले जाना चाहेंगे फिर चाहे वे किसी भी समूह अथवा पार्टी से संबंधित क्यों न हों। इसलिए हमें भारतीय जनता के दिलों में स्थायी तौर पर बसी आकांक्षाओं एवं भावनाओं को हमेशा अपने जेहन में रखना चाहिए और उन्हें पूरा करने का प्रयास करना चाहिए।”

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 6.
दलित समूहों की सुरक्षा के पक्ष में किए गए विभिन्न दावों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
नागरिकों के अधिकारों से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण मसला दलित जातियों के अधिकारों से जुड़ा था। समाज का यह एक बहुत बड़ा वर्ग था जिसे सदियों से समाज के हाशिए पर रहना पड़ा था। समाज इनके श्रम और सेवाओं का प्रयोग तो करता संविधान का निर्माण (एक नए युग की शुरुआत) था, परंतु उन्हें किसी प्रकार के अधिकार प्राप्त नहीं थे। वे अछूत कहलाते थे। अंग्रेजों ने 1932 में दलित जातियों को भी ‘पृथक् निर्वाचिका’ का अधिकार प्रदान किया था, परंतु गाँधी जी ने इसका यह कहकर विरोध किया था कि इससे वे शेष समाज से कट जाएँगे। अंततः गाँधी-अंबेडकर समझौता (पूना पैक्ट) हुआ जिसके तहत सामान्य सीटों में हरिजनों को आरक्षण दिया गया। अब संविधान निर्माण के समय भी यह मुद्दा उभरकर आया कि संविधान में दलितों के अधिकारों को किस तरह परिभाषित किया जाए। उन्हें अपने उत्थान के लिए किस तरह की सुरक्षा और अधिकार दिए जाएँ।

1. मद्रास के सदस्य जे० नागप्पा (J. Nagappa) ने कहा, “हम सदा कष्ट उठाते रहे हैं, पर अब और कष्ट उठाने को तैयार नहीं हैं।” उन्होंने दलितों में शिक्षा न होने तथा प्रशासन में भागीदारी न होने पर चिंता प्रकट की।

2. मध्य प्रांत के सदस्य श्री के०जे० खाडेलकर (K.J.Khandelkar) ने दलितों की स्थिति का मार्मिक शब्दों में बयान करते हुए कहा, “हमें हजारों वर्षों तक दबाया गया है।… दबाया गया…इस हद तक दबाया गया कि हमारे दिमाग, हमारी देह काम नहीं करती और अब हमारा हृदय भी भाव-शून्य हो चुका है। न ही हम आगे बढ़ने के लायक रह गए हैं। यही हमारी स्थिति है।”

3. मद्रास की दक्षायणी वेलायुधान ने दलितों पर थोपी गई सामाजिक अक्षमताओं को हटाने पर जोर दिया। उनके शब्दों में, “हमें सब प्रकार की सुरक्षाएँ नहीं चाहिएँ…। मैं यह नहीं मान सकती कि सात करोड़ हरिजनों को अल्पसंख्यक माना जा सकता है …। जो हम चाहते हैं वह यह है…हमारी सामाजिक अपंगताओं का फौरन खात्मा।” भारत विभाजन के बाद डॉ० अंबेडकर ने भी दलितों के लिए पृथक निर्वाचन प्रणाली की माँग छोड़ दी थी। अंततः संविधान सभा में दलितों के उत्थान के लिए निम्नलिखित सुझाव स्वीकार किए गए

  • अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए;
  • हिंदू मंदिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया जाए; और
  • दलित जातियों को विधानमंडलों व सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए।

यद्यपि कुछ लोगों का मानना था कि इन प्रावधानों से स्थिति में सुधार नहीं आएगा। उन्होंने कानूनी प्रावधानों के साथ-साथ समाज की सोच में बदलाव लाने पर बल दिया, तथापि लोकतांत्रिक जनता ने इन सवैधानिक प्रावधानों का स्वागत किया।

प्रश्न 7.
संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने उस समय की राजनीतिक परिस्थिति और एक मजबूत केंद्र सरकार की ज़रूरत के बीच क्या संबंध देखा?
उत्तर:
13 दिसंबर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू द्वारा रखे गए संविधान के उद्देश्य प्रस्ताव’ में एक कमजोर केंद्र और ऐसी प्रांतीय इकाइयों की बात कही गई थी जिनके पास विस्तृत शक्तियाँ थीं। उद्देश्य प्रस्ताव कैबिनेट मिशन की सिफारिशों को ध्यान में रखकर तथा मुस्लिम लीग को खुश करने के लिए पास किया गया था। परंतु विभाजन के बाद स्थिति में बदलाव आ गया था। सभा के अधिकांश सदस्य उस समय की राजनीतिक परिस्थिति में एक शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में थे, तथापि राज्यों व केंद्र को शक्तियाँ दिए जाने के मामले में जोरदार बहस हुई।

1. शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में नेहरू के विचार-देश के विभाजन के बाद नेहरू जी, अब उन लोगों में से थे जो एक शक्तिशाली केंद्र की आवश्यकता पर बल दे रहे थे। उन्होंने संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखकर शक्तिशाली केंद्र की वकालत करते हुए लिखा-“अब जबकि विभाजन एक वास्तविकता बन चुका है…एक दुर्बल केंद्रीय शासन की व्यवस्था देश के लिए हानिकारक होगी।” उन्होंने कहा कि कमजोर केन्द्र शान्ति स्थापना तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में भारत में जोरदार आवाज़ उठाने में सक्षम नहीं होगा।

2. राज्यों के लिए अधिक अधिकारों की माँग : के० सन्तनम के विचार-संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने राज्यों के अधिक अधिकारों की शक्तिशाली पैरवी की। मद्रास के सदस्य के० सन्तनम उनमें से एक थे। उनका मानना था कि राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्रदान करने से राज्य ही नहीं, केंद्र भी मजबूत होगा। उड़ीसा के एक सदस्य ने भी राज्यों के अधिकारों की वकालत की तथा उन्होंने यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि संविधान में शक्तियों के अति केंद्रीयकरण के कारण “केंद्र बिखर जाएगा”।

3. ‘मजबूत केंद्र की वकालत’-संविधान सभा में प्रांतों के लिए अधिक शक्तियों की माँग से तीखी प्रतिक्रिया उभरकर आयी। संविधान सभा के कुछ सदस्य उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में एक मजबूत केंद्र सरकार की जरूरत को महसूस कर रहे थे तथा इसके पक्ष में अनेक निम्नलिखित तर्क दे रहे थे

(i) बी०आर० अंबेडकर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “वे एक शक्तिशाली और एकीकृत केंद्र; 1935 के गवर्नमेंट एक्ट में हमने जो केंद्र बनाया था उससे भी ज्यादा शक्तिशाली केंद्र” चाहते हैं।

(ii) कुछ अन्य सदस्यों ने हिंसा और देश के विभाजन का हवाला देते हुए शक्तिशाली सरकार की आवश्यकता पर बल दिया ताकि सख्त हाथों से देश में हो रही सांप्रदायिक हिंसा रोक सके। गोपालस्वामी अय्यर ने भी बहस में भाग लेते हुए कहा कि केंद्र ज्यादा-से-ज्यादा मजबूत होना चाहिए।

(iii) संयुक्त प्रांत के एक सदस्य बालकृष्ण शर्मा ने भी शक्तिशाली केंद्र को आवश्यक बताया कि वह संपूर्ण देश के हित में योजना बना सके और उपलब्ध आर्थिक संसाधनों को भली प्रकार जुटा सके।

(iv) औपनिवेशिक दौर के केंद्रवाद की भावना ने भी भारतीय नेताओं को प्रभावित किया था। साथ ही आजादी के बाद अफरा-तफरी पर अंकुश लगाने और देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के लिए शक्तिशाली केंद्र और भी आवश्यक माना जाने लगा।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि भारत के संविधान में तत्कालीन परिस्थितियों के कारण संघ के घटक राज्यों के अधिकारों की तुलना में केंद्र में अधिकारों की ओर साफ झुकाव दिखाई दे रहा था। इसलिए सभा के अनेक सदस्य मजबूत केंद्र सरकार की आवश्यकता पर जोर दे रहे थे।

प्रश्न 8.
संविधान सभा ने भाषा के विवाद को हल करने के लिए क्या रास्ता निकाला?
उत्तर:
संविधान सभा के समक्ष एक अन्य पेचीदा मामला राष्ट्र की भाषा को लेकर था। भारत में अनेक सांस्कृतिक परंपराएँ विद्यमान थीं। विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न-भिन्न भाषाएँ प्रयोग में लाई जाती थीं। इस विशाल देश में सभी स्थानों पर एक भाषा का प्रचलन नहीं था। अतः संविधान सभा में राष्ट्र की भाषा का मुद्दा आया तो इस पर लंबी और आपस में तीखी बहसें हुईं।

1. हिंदी की पक्षधरता-संविधान सभा के कुछ सदस्य हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देना चाहते थे। इन सदस्यों ने हिंदी के लिए जोरदार तरीके से पक्षधरता की। संयुक्त प्रांत के कांग्रेसी सदस्य आर०वी० धुलेकर ने संविधान निर्माण कार्य में हिंदी के प्रयोग पर बल दिया तथा यहाँ तक कह दिया कि “इस सभा में जो लोग भारत का संविधान रचने बैठे हैं और हिंदुस्तानी नहीं जानते वे इस सभा की सदस्यता के पात्र नहीं हैं। उन्हें चले जाना चाहिए।”

2. हिंदी के वर्चस्व का भय-गैर-हिंदी भाषी राज्यों के सदस्य हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें लगता था कि हिंदी का वर्चस्व कायम हो जाएगा। इससे क्षेत्रीय भाषाओं का विकास नहीं होगा तथा वे भारतीय संस्कृति के विकास में अपना योगदान नहीं दे पाएँगी। मद्रास की सदस्य श्रीमती दुर्गाबाई ने सभा को यह भी बताया कि दक्षिण में हिंदी का विरोध बहुत ज्यादा है। उन्होंने कहा कि “विरोधियों का यह मानना शायद सही है कि हिंदी के लिए हो रहा यह प्रचार प्रांतीय भाषाओं की जड़ें खोदने का प्रयास है….।”

3. भाषा समिति की रिपोर्ट-संविधान सभा की भाषा समिति ने विषय की नाजुकता के मद्देनजर एक फार्मूला विकसित किया ताकि भाषा पर गतिरोध को तोड़ा जा सके। समिति ने सुझाव दिया था कि देवनागरी में लिखी हिंदी भाषा भारत की राजकीय भाषा (Official Language) होगी। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिए। इस बीच आगामी 15 वर्षों के लिए सरकारी कार्यों में अंग्रेज़ी का प्रयोग भी जारी रहेगा। साथ ही प्रत्येक प्रांत को अपने कार्यों के लिए एक क्षेत्रीय भाषा चुनने का अधिकार होगा।

4. समायोजन की भावना पर बल-राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर सदस्यों में विवाद तीखा होता जा रहा था। इस पर अनेक सदस्यों ने इस मद्दे पर सभी सदस्यों में समायोजन की भावना विकसित करने पर बल दिया। बंबई के श्री शंकरराव देव (Shri Shankar Rao Dev) ने कहा कि कांग्रेस के एक सदस्य तथा गाँधी जी के अनुयायी होने के नाते वे हिंदुस्तानी को राष्ट्रभाषा स्वीकार कर चुके हैं, परंतु उन्होंने चेताया कि यदि आप हिंदी के लिए दिल से समर्थन चाहते हैं तो आप ऐसा कुछ न करें जिससे संदेह पैदा हो और भय को बल मिले। इसी प्रकार के आपसी समायोजन व सम्मान की भावना की बात मद्रास के श्री टी०ए० रामलिंगम चेट्टियार (T.A. Ramalingam Chettiar) ने भी कही। उन्होंने आग्रह किया कि “जब हम साथ रहना चाहते हैं और एक एकीकृत राष्ट्र की स्थापना करना चाहते हैं तो परस्पर समायोजन होना ही चाहिए और लोगों पर चीजें थोपने का सवाल नहीं उठना चाहिए।” इस समायोजन की भावना का सदस्यों ने स्वागत किया तथा भाषा समिति की रिपोर्ट को स्वीकार कर भाषा विवाद को निपटाने का मार्ग निकाला गया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

मानचित्र कार्य

प्रश्न 9.
वर्तमान भारत के राजनीतिक मानचित्र पर यह दिखाइए कि प्रत्येक राज्य में कौन-कौन सी भाषाएँ बोली जाती हैं। इन राज्यों की राजभाषा को चिह्नित कीजिए। इस मानचित्र की तुलना 1950 के दशक के प्रारंभ के मानचित्र से की दोनों मानचित्रों में आप क्या अंतर पाते हैं? क्या इन अंतरों से आपको भाषा और राज्यों के आयोजन के संबंधों के बारे में कुछ पता चलता है।
उत्तर:
भारत के राज्य और उनमें बोली जाने वाली भाषाएँ व बोलियाँ

  1. असम-असमी, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, बांग्ला और बोडा।
  2. अरुणाचल प्रदेश-निसी, अदि, अंगमी।
  3. आंध्र प्रदेश (सीमांध्र)-तेलुगू, उर्दू, हिंदी।
  4. ओडिशा-उड़िया, तेलुगू, हिंदी।
  5. उत्तर प्रदेश-हिंदी, उर्दू, पंजाबी।
  6. कर्नाटक कन्नड़, तेलुगू, उर्दू।
  7. केरल-मलयालम, तमिल, तेलुगू।
  8. गुजरात-गुजराती, हिंदी, सिंधी।
  9. गोवा-कोंकणी, मराठी, कन्नड़।
  10. तमिलनाडु-तमिल, तेलुगू, कन्नड़।
  11. त्रिपुरा-बांग्ला, हिंदी, मणिपुरी।
  12. नगालैंड हो, ओ, कोन्याक।
  13. पंजाब-पंजाबी, हिंदी, उर्दू।
  14. पश्चिमी बंगाल-बांग्ला, हिंदी, संथाली।
  15. बिहार-हिंदी, उर्दू, संथाली।
  16. मणिपुर-मणिपुरी, भाड़ो, टंगकुट।
  17. मध्यप्रदेश-हिंदी, गोंडी, भीली।
  18. महाराष्ट्र-मराठी, उर्दू, हिंदी।
  19. मिजोरम–लुशाई, बांग्ला।
  20. मेघालय-खासी, गारो, बांग्ला।
  21. राजस्थान-हिंदी, भीली, उर्दू।
  22. सिक्किम-नेपाली, भोटिया, हिंदी।
  23. हरियाणा-हिंदी, पंजाबी, उर्दू, हरियाणवी।
  24. हिमाचल प्रदेश-हिंदी, पंजाबी, किन्नूरी।
  25. उत्तराखंड-हिंदी, पंजाबी, उर्दू।
  26. छत्तीसगढ़-हिंदी, भीली, गोंडी।
  27. झारखंड हिंदी, उर्दू, संथाली। 28. तेलंगाना-तेलुगू, उर्दू।

1950 के बाद भारतीय राज्यों का भाषा या अन्य आधार पर पुनर्गठन हुआ है। इन राज्यों के भाषायी चरित्र में भी महत्त्वपर्ण बदलाव आए हैं। हिंदी भाषी राज्यों में शहरी क्षेत्रों में अंग्रेजी का प्रभाव बढा है। उत्तरी भारत के राज्यों में पंजाबी भी कछ लोग समझने व बोलने लगे हैं। दक्षिण के राज्यों में स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ अंग्रेजी और हिंदी का प्रचार हुआ है।

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 10.
हाल के वर्षों के किसी एक महत्त्वपूर्ण सवैधानिक परिवर्तन को चुनिए। पता लगाइए कि यह परिवर्तन क्यों हुआ, परिवर्तन के पीछे कौन-कौन से तर्क दिए गए और परिवर्तन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि क्या थी? अगर संभव हो, तो संविधान सभा की चर्चाओं को देखने की कोशिश कीजिए। (http: // parliamentofindia.nic.in / Is / debates / debates.htm)। यह पता लगाइए कि मुद्दे पर उस वक्त कैसे चर्चा की गई। अपनी खोज पर संक्षिप्त रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
भारत की संसद, राज्य विधान सभाओं व स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम रहता है जबकि महिलाएँ हमारे समाज का आधा हिस्सा हैं। भारत के सामाजिक व आर्थिक विकास के लिए महिलाओं की राजनीतिक सत्ता व प्रक्रियाओं में भागीदारी आवश्यक है। इस हेतु 1993 में 73वें व 74वें संविधान संशोधन द्वारा पंचायती राज संस्थाओं व नगरपालिकाओं में एक तिहाई स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित कर दिए गए हैं। संसद तथा राज्य विधानसभाओं में भी इस प्रकार के आरक्षण की माँग चल रही है। धीरे-धीरे यह माँग जोर पकड़ रही है परंतु सर्वसम्मति न बनने के कारण जब भी यह विधेयक संसद में लाया गया तो इसका कई राजनीतिक दलों ने अपने पक्ष रखते हुए विरोध किया है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान की तुलना संयुक्त राज्य अमेरिका अथवा फ्रांस अथवा दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से कीजिए। ऐसा करते हुए निम्नलिखित में से किन्हीं दो विषयों पर गौर कीजिए : धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकार और केंद्र एवं राज्यों के बीच संबंध । यह पता लगाइए कि इन संविधानों में अंतर और समानताएँ किस तरह से उनके क्षेत्रों के इतिहासों से जुड़ी हुई हैं।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत HBSE 12th Class History Notes

→ संविधान-एक कानूनी दस्तावेज जिसके अनुसार किसी देश का शासन चलाया जाता है।

→ संविधान सभा-संविधान निर्माण के लिए बनाई गई सभा।

→ संविधान की प्रस्तावना प्रस्तावना अर्थात् संविधान का परिचय। इससे संविधान के संबंधे में मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

→ प्रभुता संपन्न राज्य-एक ऐसा राज्य जो पूर्ण रूप से स्वतंत्र हो तथा किसी बाहरी शक्ति के दबाव से मुक्त हो। भारत 26 जनवरी, 1950 को प्रभुता संपन्न राज्य बना। ।

→ उद्देश्य प्रस्ताव-13 दिसंबर, 1946 को पंडित नेहरू जी द्वारा संविधान सभा के समक्ष प्रस्ताव रखा गया, जिसमें संविधान के मूल आदर्शों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई।

→ धर्म-निरपेक्षता-राज्य द्वारा किसी धर्म को राज्य धर्म के रूप में स्वीकार न करना तथा न ही किसी धर्म का विरोध करना।

→ वयस्क मताधिकार-बिना किसी भेदभाव के वयस्क (18/21 वर्ष की आयु) स्त्री-पुरुषों को मतदान करने का अधिकार।

→ केंद्रीय संघवाद-प्रांतों की तुलना में केंद्र को अधिक शक्तियाँ प्रदान करना। भारत में केंद्रीय संघवाद की स्थापना की गई है। मौलिक अधिकार-संविधान द्वारा प्रदत्त वे अधिकार जिन्हें राज्य सरकार नहीं छीन सकती। ये नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए दिए गए हैं।

→ अल्पसंख्यक-किसी देश/राज्य/प्रांत/क्षेत्र विशेष में कम संख्या में रहने वाले लोगों का समूह।

→ संसदीय सरकार इसमें राज्य अध्यक्ष (राष्ट्रपति) में नाममात्र की शक्ति होती है। वास्तविक शक्ति सरकार के अध्यक्ष (प्रधानमंत्री) में होती है।

→ गणतंत्र दिवस-जिस दिन भारत का संविधान लागू हुआ वह गणतंत्र दिवस कहलाता है। यह 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ। अतः भारत में 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है।

→ जन प्रभुता-जनता को प्रभुता का स्रोत स्वीकारना।

→ वित्तीय संघवाद-वह व्यवस्था जिसमें राजकोष का ज्यादातर हिस्सा केंद्र के पास हो।

संविधान निर्माण से तत्काल पहले के वर्ष भारत में बहुत ही उथल-पुथल भरे थे। जहाँ एक ओर यह समय लोगों की महान् आशाओं को पूरा करने का था, वहीं यह मोहभंग का समय भी था। भारत को स्वतंत्रता तो प्राप्त हो गई थी, परन्तु इसका विभाजन भी हो गया था जिससे भारत में भयावह समस्याएँ खड़ी हो गई थीं। संविधान सभा जब अपना कार्य कर रही थी तो उसके कार्य को इन समस्याओं ने भी प्रभावित किया। स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय भारत के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या देश के विभाजन से जुड़ी थी। इसी समस्या से भारत में अनेक विकराल समस्याएँ पैदा हुईं। जून योजना (विभाजन योजना) को स्वीकार करने के बाद अगस्त, 1947 में पंजाब में भयंकर दंगे शुरू हो गए। लूटपाट, आगजनी, जनसंहार, बलात्कार, औरतों को अगवा करना आदि जैसे भयावह दृश्य आम हो गए।

→ पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। ये सांप्रदायिक दंगे अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 तक चलते रहे। इस महाध्वंस में लगभग 10 लाख लोग मारे गए, 50,000 महिलाएँ अगवा कर ली गईं तथा लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अपने घरों से उजाड़ दिए गए। विभाजन तथा उससे जुड़ी हिंसा के परिणामस्वरूप अपनी जड़ों से उखड़े हुए (Uprooted) लोगों की भयंकर समस्या उभरकर सामने आयी। जान-माल की सुरक्षा न होने के कारण 1 करोड़ 50 लाख हिंदुओं और सिक्खों को पाकिस्तान से तथा मुसलमानों को भारत से बेहद खराब हालात में देशांतरण करना पड़ा। उनका सब कुछ छिन गया था।

→ उनमें से अधिकतर लोगों को दंगों के कारण भयंकर दौर से गुजरना पड़ा था। अतः देश की सरकार के सम्मुख इतने बड़े समुदाय के लिए राहत और पुनर्वास की समस्या सबसे बड़ी थी। स्वतंत्र भारत की एकता को सबसे बड़ा खतरा भारतीय देशी रियासतों की स्थिति से उत्पन्न हुआ। इन रियासतों की संख्या लगभग 554 थी। स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) तक सरदार पटेल और वी०पी० मेनन मै जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर शेष सभी राज्यों के शासकों को भारतीय संघ में विलय के लिए सहमत तथा बाध्य कर दिया था। 1946 में पहले प्रांतीय सभाओं के चुनाव हुए तथा जुलाई, 1946 के अंतिम सप्ताह में संविधान सभा का चुनाव किया गया। सभा के 389 सदस्यों में से 296 सदस्यों पर चुनाव होना था (210 सामान्य, 78 मुस्लिम व 4 सिक्ख) जिनमें से 292 सदस्यों का चुनाव हुआ।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

→ इन 292 सदस्यों में से 212 कांग्रेस और उसके सहयोगी के सदस्य थे। लीग के 73 सदस्य चुने गए तथा 7 सदस्य अन्य दलों से। संविधान सभा में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेंद्र प्रसाद, बी०आर० अंबेडकर, के०एम० मुन्शी और अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर ने मुख्य भूमिका निभाई। 11 दिसंबर, 1946 को संविधान सभा ने अपना स्थायी अध्यक्ष डॉ० राजेंद्र प्रसाद को चुना। 13 दिसंबर, 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के समक्ष उद्देश्य प्रस्ताव रखा जिसको दृष्टि में रखकर भारतीय संविधान का निर्माण किया जाना था। संविधान सभा में ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ प्रस्तुत करते हुए अपने भाषण में नेहरू जी ने अतीत में झाँकते हुए अमेरिकी व फ्रांसीसी क्रांतियों और वहाँ के संविधान निर्माण का उल्लेख किया। उन्होंने इस अवसर पर सोवियत समाजवादी गणराज्य के जन्म को भी याद किया जो दुनिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था।

→ नेहरू ने भारतीय संविधान निर्माण के इतिहास को मुक्ति व स्वतंत्रता के एक लंबे ऐतिहासिक संघर्ष का हिस्सा बताया। नेहरू जी ने विश्वास व्यक्त किया कि “हम सिर्फ नकल करने वाले नहीं हैं।” संविधान सभा के सदस्य बी० पोकर बहादुर ने 27 अगस्त, 1947 को अल्पसंख्यकों के लिए पृथक् निर्वाचिका प्रणाली को जारी रखने की माँग रखी। इस माँग पर प्रभावशाली भाषण देते हुए श्री बहादुर ने तर्क दिया कि “अल्पसंख्यक सब जगह होते हैं; हम उन्हें चाहकर भी नहीं हटा सकते। हमें आवश्यकता एक ऐसे राजनीतिक-ढांचे की है जिसमें अल्पसंख्यक भी अन्य समुदायों के साथ सद्भावना से जी सकें तथा समुदायों के बीच मतभेद कम-से-कम हो।” पृथक् निर्वाचन प्रणाली की उक्त माँग का संविधान सभा में जोरदार विरोध हुआ। हाल ही में देश के विभाजन और सांप्रदायिक दंगों से इस माँग पर अधिकतर राष्ट्रवादी भड़क उठे।

→ सरदार पटेल ने इस माँग की जोरदार शब्दों में आलोचना की। उन्होंने कहा-“अंग्रेज़ तो चले गए, मगर जाते-जाते शरारत का बीज बो. गए। सरदार पटेल ने कहा कि पृथक निर्वाचिका “एक ऐसा विष है जो हमारे देश की पूरी राजनीति में समा चुका है।” गोविंद वल्लभ पंत ने इस माँग को न केवल राष्ट्र के लिए वरन् अल्पसंख्यकों के लिए भी खतरनाक बताया। संविधान सभा में लंबी बहस के बाद इस माँग को अस्वीकार कर दिया गया। उल्लेखनीय है कि सभी मुसलमान सदस्य भी इस माँग का समर्थन नहीं कर रहे थे। समाजवादी विचारों के समर्थक व किसान आंदोलन के नेता एन०जी० रंगा ने जोर देकर कहा कि असली अल्पसंख्यक गरीब, उत्पीड़ित व आदिवासी हैं। उन्हें सुरक्षा का आश्वासन मिलना चाहिए।

→ जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत उद्देश्य प्रस्ताव का स्वागत करते हुए आदिवासी समूह के प्रतिनिधि सदस्य जयपाल सिंह ने भी आदिवासियों की स्थिति को सुधारने तथा समाज के सभी समुदायों से आदिवासियों से मेलजोल की आवश्यकता पर बल दिया। नागरिकों के अधिकारों से संबंधित एक महत्त्वपूर्ण मसला दलित जातियों के अधिकारों से जुड़ा था। समाज का यह एक बहुत बड़ा वर्ग था जिसे सदियों से समाज के हाशिए पर रहना पड़ा था। अंततः संविधान सभा में दलितों के उत्थान के लिए निम्नलिखित सुझाव स्वीकार किए गए

(i) अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाए;

(ii) हिंदू मंदिरों को सभी जातियों के लिए खोल दिया जाए; और

(iii) दलित जातियों को विधानमण्डलों व सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया जाए। संविधान सभा के अधिकांश सदस्य एक शक्तिशाली केंद्र के पक्ष में थे तथापि राज्यों व केंद्र को शक्तियाँ दिए जाने के मामले में जोरदार बहस हुई। केंद्र और राज्यों के मध्य शक्तियों और कार्य का विभाजन करने के लिए संविधान में सभी विषयों की तीन सचियाँ बनाई गई थीं-केंद्रीय सची, राज्य सची और समवर्ती सूची। मद्रास के सदस्य के० सन्तनम उनमें से एक थे। उनका मानना था कि राज्यों को अधिक शक्तियाँ प्रदान करने से राज्य ही नहीं, केंद्र भी मजबूत होगा। उड़ीसा के एक सदस्य ने भी राज्यों के अधिकारों की वकालत की तथा उन्होंने यहाँ तक चेतावनी दे डाली कि संविधान में शक्तियों के अति केंद्रीयकरण के कारण “केंद्र बिखर जाएगा”। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने तीस के दशक में यह स्वीकार लिया था कि हिंदुस्तानी (हिंदी और उर्दू के मेल से उपजी) को राष्ट्र की भाषा का दर्जा प्रदान किया जाना चाहिए।

→ गाँधीजी भी हिंदुस्तानी को राष्ट्र की भाषा बनाने के पक्ष में थे। संविधान सभा के कुछ सदस्य हिंदी को राष्ट्र भाषा का दर्जा देना चाहते थे। इन सदस्यों ने हिंदी के लिए जोरदार तरीके से पक्षधरता की। गैर-हिंदी भाषी राज्यों के सदस्य हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। उन्हें लगता था कि हिंदी का वर्चस्व कायम हो जाएगा। इससे क्षेत्रीय भाषाओं का विकास नहीं होगा तथा वे भारतीय संस्कृति के विकास में अपना योगदान नहीं दे पाएँगी। राष्ट्रभाषा के मुद्दे पर सदस्यों में विवाद तीखा होता जा रहा था। इस पर अनेक सदस्यों ने इस मुद्दे पर सभी सदस्यों में समायोजन की भावना विकसित करने पर बल दिया।

→ 1950 को सभा के सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर किए। कुल 284 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर किए और अंततः भारत का सम्पूर्ण संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया। भारत में संविधान के द्वारा ‘स्वतंत्र सम्प्रभु गणतंत्र’ (Independent Sovereign Republic) की स्थापना की गई थी। इस नए गणतंत्र में सत्ता का स्रोत नागरिकों को होना था। इसको कार्यरूप देने के लिए संविधान निर्माताओं ने भारत में एकमश्त वयस्क मताधिकार प्रदान किया। भारतीय संविधान भारत में धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है। इसका अभिप्राय यह है कि राज्य किसी विशेष धर्म को न तो राज्य धर्म मानता है और न ही किसी विशेष धर्म को संरक्षण तथा समर्थन प्रदान करता है। परंतु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि राज्य नास्तिक है या धर्म-विरोधी है, अपितु वह धर्म के विषय में धर्म-निरपेक्ष है। धर्म-निरपेक्षता का अर्थ केवल धार्मिक सहनशीलता ही है।

काल-रेखा

कालघटना का विवरण
26 जुलाई, 1945ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार सत्ता में आना
दिसम्बर, 1945 व जनवरी, 1946भारत में आम चुनाव
16 मई, 1946कैबिनेट मिशन योजना की घोषणा
16 जून, 1946मुस्लिम लींग द्वारा कैबिनेट मिशन योजना स्वीकारना
16 जून, 1946अन्तरिम सरकार के गठन का प्रस्ताव
2 सितम्बर, 1946नेहरू के नेतृत्व में अन्तरिम सरकार का गठन
13 अक्तूबर, 1946लीग अन्तरिम सरकार में शामिल
9 दिसम्बर, 1946संविधान सभा की पहली बैठक
16 जुलाई, 1947अन्तरिम सरकार की आखिरी बैठक
11 अगस्त, 1947जिन्ना पाकिस्तान की संविधान सभा के अध्यक्ष बने
14 अगस्त, 1947पाकिस्तान की स्वतन्त्रता व कराची में जश्न
14-15 अगस्त, 1947 (मध्यरात्रि)भारत की स्वतन्त्रता
26 जनवरी, 1950भारतीय संविधान को अपनाया जाना

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 114 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

HBSE 12th Class History विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
1940 के प्रस्ताव के जरिए मुस्लिम लीग ने क्या माँग की?
उत्तर:
1937 के चुनावों में असफलता के बाद जिन्ना ने उग्र-साम्प्रदायिक राजनीति को अपना लिया था। 1940 में उन्होंने द्विराष्ट्रों का सिद्धांत मुस्लिम जनता के सामने रखा। इस सिद्धांत की दो मान्यताएँ थीं। पहली मान्यता के अनुसार “हिंदू और मुसलमान बिल्कुल दो समाज थे। धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों अलग-अलग थे. ……..इसलिए ये दोनों कौमें एक राष्ट्र नहीं बन सकती थीं।” दूसरी मान्यता यह थी कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। इसका अर्थ होगा इस्लाम के बहुमूल्य तत्त्व का पूर्ण विनाश और मुसलमानों के लिए स्थायी दासता। धीरे-धीरे पाकिस्तान की स्थापना की माँग ठोस रूप ले रही थी। 23 मार्च, 1940 को लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव ही ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव के नाम से जाना जाता है।

इसमें कहा गया कि भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में जरूरत के हिसाब से इलाकों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिम और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन हिस्सों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, उन्हें इकट्ठा करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए जिनमें शामिल इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी।

प्रश्न 2.
कुछ लोगों को ऐसा क्यों लगता था कि बँटवारा बहुत अचानक हुआ?
उत्तर:
कुछ लोगों का विचार है कि भारत का विभाजन एक बहुत ही अचानक लिया गया निर्णय है। ध्यान देने योग्य तथ्य है कि 1940 में लीग ने ‘लाहौर प्रस्ताव’ या ‘पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया था। इसमें अस्पष्ट शब्दों में एक मुस्लिम बहुल इलाके में स्वायत्त राज्य की स्थापना की माँग रखी गई थी। इस प्रस्ताव के रखने के बाद अगले सात वर्षों में ही विभाजन हो गया। यहाँ तक कि किसी को मालूम नहीं था कि पाकिस्तान के निर्माण का अर्थ क्या होगा, इससे भविष्य में लोगों की जिंदगी किस तरह तय होगी। यहाँ तक कि 1947 में घर-बार छोड़कर गए लोगों को भी लगता था कि वे शांति स्थापित होने पर वापस अपने घरों में लौट सकेंगे। नेताओं ने भी लोगों के भविष्य के बारे में न ही सोचा और न ही जनसंख्या की पारस्परिक अदला-बदली पर कोई विचार किया।

यहाँ तक कि स्वयं लीग ने भी एक संप्रभु राज्य की माँग ज्यादा स्पष्ट और जोरदार ढंग से नहीं उठाई थी। ऐसा लगता है कि माँग सौदेबाजी में एक पैंतरे के रूप में उठाई गई थी ताकि मुस्लिमों के लिए अधिक रियायतें ली जा सकें। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हो गया। इसकी समाप्ति के बाद सरकार को भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण की बातचीत करनी पड़ी, जिसमें अन्ततः भारत का विभाजन अचानक स्वीकार करना पड़ा। इससे लगता है कि भारत का विभाजन अचानक हुई घटना है।

प्रश्न 3.
आम लोग विभाजन को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
यह भी अनुमान लगाया जाता है कि विभाजन के कारण लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 के बीच सीमा पार करने पर विवश हुए। विश्व इतिहास में ऐसा कष्टदायक विस्थापन नहीं मिलता। विस्थापन का अर्थ था लोगों का अपने घरों से उजड़ जाना। पलक झपकते ही इन लोगों की संपत्ति, घर, दुकानें, खेत, रोजी-रोटी के साधन उनके हाथों से निकल गए। वे अपनी जड़ों से उखाड़ दिए गए। उनसे उनकी बचपन की यादें छीन ली गईं। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए। अपनी स्थानीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति से वंचित होकर शरणार्थी बने लोगों को तिनका-तिनका जोड़कर नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ा।

यह मात्र सम्पत्ति और क्षेत्र का विभाजन नहीं था, बल्कि एक महाध्वंस था। 1947 में जो लोग सीमा पार से जिंदा बचकर आ रहे थे, वे विभाजन के फैसले को ‘सरकारी नज़रिए’ से नहीं देख रहे थे। उनके अनुभव भयानक थे और वे उसे ‘मार्शल लॉ’ ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे। वस्तुतः जनहिंसा, आगजनी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार को देखते हए अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और विद्वानों ने इसे ‘महाध्वंस’ (होलोकॉस्ट) कहा है। 1947 का हादसा इतना जघन्य था कि ‘विभाजन’ या ‘बँटवारा’ या, ‘तकसीम’ कह देने मात्र से इसके सारे पहलू प्रकट नहीं होते। मानवीय पीड़ा और दर्द का अहसास नहीं होता। महाध्वंस से सामूहिक नरसंहार की भयानकता और अन्य प्रभावों की भीषणता को कुछ हद तक समझा जा सकता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि आम लोग विभाजन को एक ऐसी घटना समझते थे जिसमें उनका सब कुछ नष्ट हो गया था तथा उनके परिजन मर गए थे या बिछुड़ गए थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 4.
विभाजन के खिलाफ महात्मा गाँधी की दलील क्या थी?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने विभाजन का जोरदार विरोध किया था। उन्होंने विभाजन के खिलाफ यहाँ तक कह दिया था कि विभाजन उनकी लाश पर होगा। गाँधी जी को विश्वास था कि देश में सांप्रदायिक नफरत शीघ्र ही समाप्त हो जाएगी तथा पुनः

आपसी भाईचारा स्थापित हो जाएगा। लोग घृणा और हिंसा का मार्ग छोड़ देंगे तथा सभी आपस में मिलकर अपनी समस्याओं का हल खोज लेंगे। विभाजन के अवसर पर भड़की हिंसा को शांत करने के लिए वे 77 वर्ष की आयु में भी दंगाग्रस्त क्षेत्रों में पहुंचे। उन्होंने सभी स्थानों पर हिंदुओं और मुसलमानों को शांति बनाए रखने और परस्पर स्नेह और एक-दूसरे की रक्षा करने की बात कही। उनका मानना था कि दोनों समुदाय सैकड़ों सालों से एक-साथ रहते आए हैं। 7 सितंबर, 1946 को उन्होंने प्रार्थना सभा में कहा था, “मैं फिर वह दिन देखना चाहता हूँ जब हिंदू और मुसलमान आपसी सलाह के बिना कोई काम नहीं करेंगे। मैं दिन-रात इसी आग में जले जा रहा हूँ कि उस दिन को जल्दी-से-जल्दी साकार करने के लिए क्या करूँ। लीग से मेरी गुजारिश है कि वे किसी भी भारतीय को अपना शत्रु न मानें……….। हिंदू और मुसलमान, दोनों एक ही मिट्टी से उपजे हैं। उनका खून एक है, वे एक जैसा भोजन करते हैं, एक ही पानी पीते हैं और एक ही जबान बोलते हैं।

26 सितंबर, 1946 को गाँधीजी ने इसी प्रकार की बात ‘हरिजन’ नामक साप्ताहिक में दोहराई। उन्होंने लिखा, “लेकिन मुझे पूरा विश्वास है कि मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की जो माँग उठायी है, वह पूरी तरह गैर-इस्लामिक है और मुझे इसको पापपूर्ण कृत्य कहने में कोई संकोच नहीं है। इस्लाम मानवता की एकता और भाईचारे का समर्थक है, न कि मानव परिवार की एकजुटता को तोड़ने का। जो तत्त्व भारत को एक-दूसरे के खून के प्यासे टुकड़ों में बाँट देना चाहते हैं, वे भारत और इस्लाम दोनों के शत्रु हैं। भले ही वे मेरी देह के टुकड़े-टुकड़े कर दें, किंतु मुझसे ऐसी बात नहीं मनवा सकते, जिसे मैं गलत मानता हूँ।”

प्रश्न 5.
विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ क्यों माना जाता है?
उत्तर:
विभाजन को दक्षिणी एशिया के इतिहास में ऐतिहासिक मोड़ की संज्ञा दी जाती है। इसके कारण देश दो सम्प्रभु राज्यों (भारत और पाकिस्तान) में बँट गया। विभाजन ने तात्कालिक रूप से करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित किया। साथ ही विभाजन की स्मृतियों और कहानियों ने रूढ़छवियों (Stereotypes) का निर्माण किया जो आज भी भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को प्रभावित कर रही हैं। यहाँ तक कि भारत में आतंकवाद जैसी समस्या की जड़ें भी कुछ हद तक विभाजन के परिणामों से जुड़ी हैं।

1. जनसंहार और विस्थापन (Massacre and Displace ment)-विभाजन सांप्रदायिक हिंसा, जनसंहार, आगजनी, लूटपाट, अराजकता, अपहरण, बलात्कार आदि का पर्याय बन गया था। ‘दंगाई भीड़ों’ ने दूसरे समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर मारा। गाँव के गाँव जला दिए। ट्रेनों में सफर कर रहे लोगों पर हिंसक
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 Img 2
हमले हुए। ट्रेनें मौत का पिंजरा बन गईं। यद्यपि हिंसा में पाकिस्तान और हिंदुस्तान में मारे गए लोगों की ठीक-ठीक संख्या बता पाना असंभव है, तथापि अनुमान लगाया जाता है कि 2 लाख से 2.5 लाख गैर-मुस्लिम तथा इतने ही मुस्लिम विभाजन की हिंसा में मारे गए।

यह भी अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 के बीच सीमा पार करने पर विवश हुए। विश्व इतिहास में ऐसा कष्टदायक विस्थापन नहीं मिलता। विस्थापन का अर्थ था लोगों का अपने घरों से उजड़ जाना। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए। अपनी स्थानीय एवं क्षेत्रीय संस्कृति से वंचित होकर शरणार्थी बने लोगों को तिनका-तिनका जोड़कर नए सिरे से जीवन शुरू करना पड़ा।

2. महाध्वंस (Holocaust)-यह मात्र सम्पत्ति और क्षेत्र का विभाजन नहीं था, बल्कि एक महाध्वंस था। 1947 में जो लोग सीमा पार से जिंदा बचकर आ रहे थे, वे विभाजन के फैसले को ‘सरकारी नज़रिए’ से नहीं देख रहे थे। उनके अनुभव भयानक थे और वे उसे ‘मार्शल लॉ’, ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे। वस्तुतः जनहिंसा, आगजनी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार को देखते हुए अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और विद्वानों ने इसे ‘महाध्वंस’ कहा है।

3. रूढ़छवियों का निर्माण (Formation of Stereotypes)-बँटवारे की वजह से दोनों देशों में रूढ़छवियों का निर्माण हुआ। इन रूढछवियों ने लोगों की मानसिकता को गहरा प्रभावित किया है। इन छवियों का दुरुपयोग सांप्रदायिक ताकतों के द्वारा तक भी किया जा रहा है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
ब्रिटिश भारत का बँटवारा क्यों किया गया?
उत्तर:
ब्रिटिश भारत का बँटवारा निम्नलिखित कारणों से किया गया

1. अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति (British Policy of Divide and Rule)-अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को भारत में सांप्रदायिकता के उदय व विकास और अन्ततः विभाजन के लिए जिम्मेदार माना गया है। अंग्रेज़ों ने हिंदुओं और मुसलमानों में घृणा पैदा करने को राजनीतिक शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। अंग्रेज़ों ने कांग्रेस को हिंदू आंदोलन बताया तथा सर सैयद अहमद के साथ मिलकर मुसलमानों को कांग्रेस के आंदोलन से दूर रखने का प्रयास किया। साथ ही उच्चवर्गीय मुसलमानों को अपना संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। 1906 में मुस्लिम लीग का निर्माण करवाया। इस नीति पर चलते हुए उन्होंने आगे बहुत से और कदम उठाए जो विभाजन का कारण बने।

2. सांप्रदायिक संगठनों की स्थापना (Formation of Communal Organisations)-20वीं सदी के प्रथम दशक के मध्य से साम्प्रदायिक संगठन बनने लगे। सरकार ने उन्हें प्रोत्साहन दिया। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। लीग का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना तथा मुसलमानों में अंग्रेज़ सरकार के प्रति निष्ठा पैदा करना था। प्रारंभ के वर्षों में लीग ने पृथक् निर्वाचन प्रणाली की मांग की तथा बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

इसी समय 1909 ई० में लाल चंद और बी० एन मुखर्जी के प्रयासों से पंजाब हिंदू महासभा की स्थापना हुई। इनका मूल मंत्र था कि ‘हिंदू पहले हैं और भारतीय बाद में।’ इन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह हिंदुओं के हितों को नजरअंदाज कर रही है और मुसलमानों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपना रही है। 1915 में अखिल भारतीय हिंदू सभा की स्थापना हुई जो हिंदू सांप्रदायिकता को संगठित रूप देने की दिशा में अगला कदम था।

3. सांप्रदायिक तनाव व कलह (Communal Tensions and Conflicts)-1922 में असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद सांप्रदायिक तनावों में वृद्धि हुई। इस समय में मुसलमानों की नाराजगी के प्रमुख कारण हिंदुओं द्वारा त्योहार (होली) पर ‘मस्जिद के सामने संगीत बजाना’, ‘गो रक्षा आंदोलन’ और आर्य समाज का शुद्धि आंदोलन होते थे। हिंदू मुसलमानों के तबलीग (प्रचार) और तंजीम (संगठन) जैसे कार्यक्रमों के विस्तार से उत्तेजित होते थे। ये सांप्रदायिक तनाव इन समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ लामबंद करने का अवसर प्रदान करते थे जिससे आसानी से दंगे भड़क उठते थे।

4. ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव (‘Pakistan’ Resolution)-1937 के बाद जिन्ना की राजनीति पूरी तरह से उग्र-सांप्रदायिकता की राजनीति थी। उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। 1940 में जिन्ना ने अपने ‘द्विराष्ट्रों के सिद्धांत’ को मुस्लिम जनता के समक्ष रखा। इस सिद्धांत की दो मान्यताएँ थीं। पहली मान्यता के अनुसार “हिंदू और मुसलमान बिल्कुल दो समाज थे। धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों अलग-अलग थे………इसलिए ये दोनों कौमें एक राष्ट्र नहीं बन सकती थीं।” दूसरी मान्यता यह थी कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। धीरे-धीरे पाकिस्तान की स्थापना की माँग ठोस रूप ले रही थी। 23 मार्च, 1940 को लीग ने अपने लाहौर अधिवेशन में उपमहाद्वीप के मुस्लिम-बहुल इलाकों के लिए स्वायत्तता की माँग का प्रस्ताव पेश किया।

5. वेवल योजना की विफलता (Failure of Wavell Plan)-1945 में वेवल योजना के तहत शिमला कांफ्रेंस हुई जिसमें वेवल ने मुख्य योजना ‘नयी कार्यकारी परिषद्’ के निर्माण को लेकर रखी। नयी कार्यकारिणी में वायसराय और मुख्य सेनापति को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होने थे तथा सभी समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाना था। हिंदू-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बराबर होनी थी। परंतु नई परिषद् के निर्माण को लेकर भारतीय दलों में कोई सहमारे नहीं बन पाई। कांग्रेस ने लीग की असहमति को योजना की असफलता का मुख्य कारण बताया। इससे कांग्रेस व लीग में कटुता बढ़ी तथा योजना की असफलता से देश में निराशा फैली। इस घटना ने देश को विभाजन की ओर धकेला।

6. कैबिनेट मिशन की असफलता (Failure of the Cabinet Mission)-15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत को जल्दी ही स्वतंत्रता देने की बात कही। अतः मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसका लक्ष्य भारत में एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तथा भावी संविधान के लिए रास्ता तैयार करना था। इस समय सबसे कठिन समस्या सांप्रदायिक समस्या बन गई थी। मुस्लिम लीग ने इसके लिए एकमात्र हल पाकिस्तान की माँग को बताया था, परंतु कैबिनेट मिशन ने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार कर एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। लीग और कांग्रेस में इस पर प्रारंभ में सहमति बनी, परंतु अन्ततः दोनों ने इस योजना को अस्वीकार कर दिया। कैबिनेट मिशन योजना की अस्वीकृति दुर्भाग्यपूर्ण थी। यह भारत को एक बनाए रखने का अंतिम प्रयास था। इसकी अस्वीकृति और असफलता के बाद विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता विभाजन को एक त्रासद परंतु अवश्यम्भावी परिणाम मान चुके थे। केवल महात्मा गाँधी और खान अब्दुल गफ्फार ख़ान ही अंत तक विभाजन का विरोध करते रहे।

7. सीधी कार्रवाई तथा साम्प्रदायिक दंगे (Direct Action and Communal Riots)-कैबिनेट योजना की असफलता के बाद लीग ने 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ घोषित किया तथा ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ का नारा दिया। इसके साथ ही कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए जो 20 अगस्त तक चलते रहे। दंगे अन्य स्थानों पर भी भड़कने लग गए। पूर्वी बंगाल में नोआखली जिले में 10 अक्तूबर को दंगे शुरू हो गए। इन दंगों का असर अन्य स्थानों पर भी हुआ। पंजाब के अनेक नगरों और गाँवों में भी खतरनाक दंगे भड़क गए। साथ ही हजारों लोग विस्थापित हो गए। दंगों ने सारे देश को दहला दिया। कानून और व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई तथा देश में गृह-युद्ध की स्थिति पैदा होती जा रही थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 Img 3

8. माऊन्टबेटेन योजना तथा ब्रिटिश भारत का बँटवारा (Mountbatten plan and Division of British India)-भारत में सांप्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकल पा रहा था। देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। उधर 20 फरवरी, 1947 को एटली ने भारत की सत्ता 30 जून, 1948 तक भारतीयों को सौंपने की घोषणा की। साथ ही वेवल के स्थान पर माऊन्टबेटेन को भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा। माऊन्टबेटेन ने 3 जून, 1947 को भारत के विभाजन की योजना की घोषणा की। इस योजना के अनुसार भारत और पाकिस्तान नाम के दो राज्यों को सत्ता का हस्तांतरण किया गया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 7.
बँटवारे के समय औरतों के क्या अनुभव रहे?
उत्तर:
विभाजन के समय सबसे अधिक पीड़ा महिलाओं को उठानी पड़ी। ‘दूसरे समुदाय’ के सम्मान को रौंदने एवं ठेस पहुँचाने के लिए महिलाओं को ही ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाया गया। उनके साथ बलात्कार हुए, उनको अगवा किया गया, उन्हें बार-बार बेचा-खरीदा गया। उनसे जबरदस्ती विवाह किया गया और उन्हें ‘अजनबी’ व्यक्तियों के साथ रहने को मजबूर होना पड़ा। महिलाएँ मूक एवं निरीह प्राणियों की तरह इन अत्याचारों से गुजरती रहीं। उन्हें गहरे सदमे झेलने पड़े।

इन सदमों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने बदली हुई स्थितियों में नए पारिवारिक बंधन स्थापित किए। किंतु जब भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने गुमशुदा औरतों की ‘बरामदगी’ की मुहिम चलाई तो महिलाओं को पुनः संकट का सामना करना पड़ा। इस बरामदगी की प्रक्रिया में मानवीय संबंधों की जटिलता के विषय पर किसी प्रकार की संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई। दोनों सरकारों के बीच समझौता हुआ था कि “जबरन धर्म परिवर्तन तथा बलपूर्वक विवाहों को मान्यता नहीं दी जाएगी। सरकारों द्वारा अपहरण की गई औरतों को ढूँढ़ने तथा बरामद करने का हर प्रयत्न किया जाएगा तथा उन्हें उनके परिवारों के सुपुर्द किया जाएगा।”

इस बरामदगी की पूरी प्रक्रिया में इन ‘प्रभावित औरतों’ से उनकी किसी प्रकार की राय नहीं ली गई। उन्हें अपनी जिंदगी के संबंध में फैसला लेने के अधिकार से वंचित किया गया। सरकार यह मानकर चल रही थी कि इन महिलाओं को बलपूर्वक बैठा लिया गया था। इसलिए उन्हें उनके नए परिवारों से छीनकर पुराने परिवारों के पास अथवा पुराने स्थान पर भेज दिया गया। एक अनुमान के अनुसार महिलाओं की बरामदगी के अभियान में कुल मिलाकर लगभग 30,000 औरतों को बरामद किया गया। इनमें से 8000 हिंदू व सिक्ख औरतों को पाकिस्तान से तथा 22,000 मुस्लिम औरतों को भारत से बरामद किया गया। यह अभियान 1954 तक जारी रहा।

  • ‘इज्जत’ की रक्षा के लिए औरतों की हत्या-बँटवारे के दौरान ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं जब परिवार के पुरुषों ने ही परिवार की ‘इज्जत’ की रक्षा के नाम पर अपने परिवार की स्त्री सदस्यों को स्वयं ही मार दिया या आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। इन पुरुषों को भय होता था कि शत्रु उनकी औरतों-माँ, बहन, बेटी को नापाक कर सकता था। इसलिए परिवार की मान-मर्यादा को बचाने के लिए खुद ही उनको मार डाला। उर्वशी बुटालिया ने अपनी पुस्तक दि अदर साइड ऑफ साइलेंस (The Other Side of Silence) में रावलपिंडी जिले के थुआ खालसा नामक गाँव की एक इसी प्रकार की दर्दनाक घटना का विवरण दिया है। वे बताती हैं कि बँटवारे के समय सिक्खों के इस गाँव की 90 औरतों ने ‘दुश्मनों’ के हाथों में पड़ने की बजाय ‘अपनी इच्छा से’ एक कुएँ में कूदकर अपनी जान दे दी थी। इस गाँव के लोग इसे आत्महत्या नहीं शहादत मानते हैं और आज भी दिल्ली के एक गुरुद्वारे में हर वर्ष 13 मार्च को उनकी शहादत की याद में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तथा इस घटना को मर्दो, औरतों व बच्चों को विस्तार से सुनाया जाता है। अंतः स्पष्ट है कि बँटवारे के समय औरतों के अनुभव पुरुषों से भिन्न थे। उन्हें असहनीय पीड़ा और संताप से गुजरना पड़ा।

प्रश्न 8.
बँटवारे के सवाल पर कांग्रेस की सोच कैसे बदली?
उत्तर:
कांग्रेस ने 1940 के दशक के प्रारंभ से ही पाकिस्तान के निर्माण या ब्रिटिश भारत के बँटवारे का विरोध किया था। परंतु सांप्रदायिक समस्या का हल न निकलने, सांप्रदायिक दंगे भड़कने तथा लीग की हठधर्मिता के चलते उसकी सोच में बदलाव आने लगा था। अंग्रेजों द्वारा 1946 के बाद भारत को जल्दी छोड़ने के फैसले से भी कांग्रेस के विचारों में बदलाव आया। कांग्रेस की सोच में बदलाव के लिए उत्तरदायी परिस्थितियों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. कांग्रेस मंत्रिमण्डल व लीग से मतभेद (Conflicts in Congress Ministries and League)-1937 के चुनावों में सफलता के बाद कांग्रेस ने प्रांतों में सरकार बनाई परन्तु कुछ प्रांतों (विशेषतः यू०पी० व बिहार) में स्थिति यह थी कि कांग्रेस सत्ता पक्ष में तथा मुस्लिम लीग के सदस्य विपक्ष में थे। ये लीग के सदस्य प्रांतों में कांग्रेसी शासन के पूरे 27 महीनों के काल में कांग्रेस के खिलाफ जोरदार प्रचार करते रहे। आरोप लगाया गया कि काँग्रेसी शासन में मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। फलतः लीग व कांग्रेस में दूरियाँ भी बढ़ीं। यहाँ तक कि जब 22 अक्तूबर, 1939 को कांग्रेस सरकारों ने त्यागपत्र दिया तो लीग ने मुक्ति दिवस (Day of Deliverance) मनाया।

2. ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव (‘Pakistan’ Resolution)-1937 के बाद जिन्ना की राजनीति पूरी तरह से उग्र-सांप्रदायिकता की राजनीति थी। उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। उन्होंने दुष्प्रचार किया कि कांग्रेस का आला कमान दूसरे सभी समुदायों और संस्कृतियों को नष्ट करने तथा हिंदू राज्य कायम करने के लिए पूरी तरह दृढ़ प्रतिज्ञ है। उन्होंने मुस्लिम जनता को भयभीत करना शुरू किया कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम और इस्लाम दोनों के ही अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा। 1940 में जिन्ना ने अपने ‘द्विराष्ट्रों के सिद्धांत’ को मुस्लिम जनता के समक्ष रखा। लीग का कहना था कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। इसका अर्थ होगा इस्लाम के बहुमूल्य तत्त्व का पूर्ण विनाश और मुसलमानों के लिए स्थायी दासता। 1940 में लीग ने लाहौर में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया। इससे स्थितियों में बदलाव आया।

3. वेवल योजना की विफलता (Failure of Wavell Plan)-द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वायसराय वेवल ने अपनी कार्यकारिणी में भारतीयों को शामिल करने के लिए शिमला में सम्मेलन बुलाया। परंतु लीग की हठधर्मिता के कारण यह योजना असफल हो गई। लीग चाहती थी कि परिषद के सभी मुस्लिम सदस्य उसके द्वारा चुने जाएँ। इससे कांग्रेस व लीग में कटुता बढ़ी तथा निराशा फैली।

4. कैबिनेट मिशन की असफलता (Failure of the Cabinet Mission)-15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत को जल्दी ही स्वतंत्रता देने की बात कही। अतः मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसका लक्ष्य भारत में एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तथा भावी संविधान के लिए रास्ता तैयार करना था। इस समय सबसे कठिन समस्या सांप्रदायिक समस्या बन गई थी। मुस्लिम लीग ने इसके लिए एकमात्र हल पाकिस्तान की माँग को बताया था, परंतु कैबिनेट मिशन ने पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार कर एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। इस योजना को कांग्रेस तथा लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया। यह विभाजन का एक संभावित विकल्प था। परन्तु बाद में मतभेद उभर गए तथा लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया। कैबिनेट मिशन योजना की अस्वीकृति दुर्भाग्यपूर्ण थी। इसकी अस्वीकृति और असफलता के बाद विभाजन लगभग अपरिहार्य हो गया था। कांग्रेस के ज्यादातर नेता विभाजन को एक त्रासद परंतु अवश्यम्भावी परिणाम मान चुके थे।

5. सीधी कार्रवाई तथा साम्प्रदायिक दंगे (Direct Action and Communal Riots)-कैबिनेट योजना की असफलता के बाद लीग ने 16 अगस्त, 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस’ घोषित किया तथा ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ का नारा दिया। इसके साथ ही कलकत्ता में सांप्रदायिक दंगे शुरू हो गए जो 20 अगस्त तक चलते रहे। साथ ही हजारों लोग विस्थापित हो गए। दंगों ने सारे देश को दहला दिया। कानून और व्यवस्था बिल्कुल चरमरा गई तथा देश में गृह-युद्ध की स्थिति पैदा होती जा रही थी। इससे कांग्रेस की सोच में पूरी तरह बदलाव आ गया।

6. माऊन्टबेटेन योजना तथा पाकिस्तान का निर्माण (Mountbatten Plan and the Creation of Pakistan)-भारत में सांप्रदायिक समस्या का कोई हल नहीं निकल पा रहा था। देश में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। अन्तरिम सरकार भी लीग की रोड़ा अटकाने की नीति के कारण काम नहीं कर पा रही थी। उधर 20 फरवरी, 1947 को एटली ने भारत की सत्ता 30 जून, 1948 तक भारतीयों को सौंपने की घोषणा की। साथ ही वेवल के स्थान पर माऊन्टबेटेन को भारत का गवर्नर जनरल बनाकर भेजा। माऊन्टबेटेन ने 3 जून, 1947 को भारत के विभाजन की योजना की घोषणा की। इस योजना के अनुसार भारत और पाकिस्तान नाम के दो राज्यों को सत्ता का हस्तांतरण करने का फैसला हुआ। कांग्रेस अब तक लीग की नीतियों के कारण बँटवारे के पक्ष में हो चुकी थी। अतः उसने बँटवारे को स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 9.
मौखिक इतिहास के फायदे व नकसानों की पड़ताल कीजिए। मौखिक इतिहास की पद्धतियों से विभाजन के बारे में हमारी समझ को किस तरह विस्तार मिलता है?
उत्तर:
विभाजन को समझने के लिए हम मौखिक इतिहास का प्रयोग करते हैं। ये स्रोत हमें विभाजन के दौर में सामान्य लोगों के कष्टों और संताप को समझने में मदद करते हैं। लाखों लोगों ने विभाजन को पीडा और चनौती के दौर के रूप में देखा। उनके लिए यह मात्र सवैधानिक बँटवारा या मुस्लिम लीग और कांग्रेस की दलगत राजनीति का मामला नहीं था। उनके लिए यह एक ऐसी घटना थी जिसने उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया; बुरी तरह से झकझोर डाला था। हमें विभाजन को मात्र राजनीतिक घटना के रूप में ही नहीं समझना चाहिए वरन् इस रूप में भी देखना चाहिए कि जिन लोगों ने इस त्रासदी को भुगता वे इसके क्या अर्थ लगा रहे थे। इस घटना की उनकी स्मृतियाँ और अनुभव किस प्रकार के थे। उन स्मृतियों और अनुभवों की तह तक पहुँचकर ही हम विभाजन जैसी घटना के मानवीय आयामों (Human dimensions) को समझ सकते हैं और इसमें मौखिक इतिहास बहुत कारगर है।

1. मौखिक इतिहास के फायदे-मौखिक स्रोत के रूप में व्यक्तिगत स्मृतियों का एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि इनसे हमें लोगों के अनुभवों और स्मतियों को गहराई से समझने में सहायता मिलती है। इन स्मतियों के माध्यम से इतिहासकारों को विभाजन जैसी दर्दनाक घटना के दौरान लोगों को किन-किन शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं को झेलना पड़ा, का बहुरंगी एवं सजीव वृत्तांत लिखने में सहायता मिलती है। यहाँ यह उल्लेख करना भी उपयुक्त है कि सरकारी दस्तावेज़ों में इस तरह की जानकारी नहीं मिलती। ये दस्तावेज नीतिगत और दलगत या विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित होते हैं। इन फाइलों व रिपोर्टों में बँटवारे से पहले की वार्ताओं, समझौतों या दंगों और विस्थापन के आँकड़ों, शरणार्थियों के पुनर्वास इत्यादि के बारे में काफी जानकारी मिलती है। परंतु इनसे देश के विभाजन से प्रभावित होने वाले लोगों के रोजाना के हालात, उनकी अंतीड़ा और कड़वे अनुभवों के बारे में विशेष पता नहीं लगता। यह तो मौखिक स्रोतों से ही जाना जा सकता है।

2. मौखिक इतिहास के नुकसान-बहुत-से इतिहासकार मौखिक इतिहास के बारे में शंकालु हैं। वे इसे यह कहकर खारिज़ करते हैं कि मौखिक जानकारियों में सटीकता नहीं होती। इन जानकारियों से जो क्रम (Choronology) उभरता है. : होता। मौखिक इतिहास के खिलाफ यह भी तर्क दिया जाता है कि निजी अनुभवों की विशिष्टता के सहारे सामान्य नतीजों पर पहुँचना कठिन होता है। मौखिक वृत्तांतों के छोटे-छोटे अनुभवों से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। कई इतिहासकारों को लगता है कि मौखिक वृत्तांत सतही मुद्दों (Surfacial Issues) से संबंध रखते हैं और यादों में बने रहे छोटे-छोटे अनुभव इतिहास की बड़ी प्रक्रियाओं (Larger Processes) का कारण ढूँढ़ने में असफल होते हैं।

3. विभाजन के बारे में हमारी समझ का विस्तार-मौखिक इतिहास से विभाजन के बारे में हमारी समझ का विस्तार संभव है। मौखिक स्रोतों से इतिहासकारों को जन इतिहास को उजागर करने में मदद मिलती है। वे गरीबों और कमजोरों (जन सामान्य, स्त्रियों, बच्चों, दलितों आदि) के अनुभवों को उपेक्षा के अंधकार से बाहर निकाल पाते हैं। ऐसा करके वे इतिहास जैसे विषय की सीमाओं को और फैलाने का अवसर प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए मौखिक स्रोत से हमने अब्दल लतीफ की भावनाएँ, थुआ गाँव की औरतों की कहानी व सद्भावनापूर्ण प्रयासों की कहानियों को जाना। डॉ० खुशदेव सिंह के प्रति कराची में गए मुसलमान अप्रवासियों की मनोदशा को समझ पाए। शरणार्थियों के द्वारा किए गए संघर्ष को भी मौखिक स्रोतों से समझा जा सकता है। इस प्रकार इस स्रोत से इतिहास में समाज के ऊपर के लोगों से आगे जाकर सामान्य लोगों की पड़ताल करने में सफलता मिलती है। सामान्यतः आम लोगों के वजूद को नज़र-अंदाज कर दिया जाता है या इतिहास में चलते-चलते ज़िक्र कर दिया जाता है। संक्षेप में, ये स्रोत हमें जन इतिहास को समझने में मदद प्रदान करते हैं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
दक्षिणी एशिया के नक्शे पर कैबिनेट मिशन प्रस्तावों में उल्लिखित भाग क, ख और ग को चिह्नित कीजिए। यह नक्शा मौजूदा दक्षिण एशिया के राजनैतिक नक्शे से किस तरह अलग है?
उत्तर:
संकेत-1947 से पूर्व के अविभाजित भारत के मानचित्र पर कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों को दर्शाइए।
क समूह-संयुक्त प्रांत, मध्यप्रांत, बंबई, मद्रास, बिहार व उड़ीसा (हिंदू बहुल प्रांत)।
ख समूह-पंजाब, सिंध व उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत (पश्चिम के मुस्लिम बहुल प्रांत)।
ग समूह-असम व बंगाल (पूर्व के मुस्लिम बहुल प्रांत)!

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
यूगोस्लाविया के विभाजन को जन्म देने वाली नृजातीय हिंसा के बारे में पता लगाइए। उसमें आप जिन नतीजों पर पहुँचते हैं उनकी तुलना इस अध्याय में भारत विभाजन के बारे में बताई गई बातों से कीजिए।
उत्तर:
प्रथम विश्व युद्ध के बाद यूगोस्लाविया राज्य का उदय हुआ। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद यहाँ कम्युनिस्ट शासन स्थापित हुआ। इसका 1990 में अंत हुआ। 1992 तक आते-आते यह देश पाँच स्वतंत्र राज्यों में विभाजित हो गया। इस क्षेत्र में नृजातीय हिंसा भी हुई। पाँच राज्य थे-यूगोस्लाविया (सर्विया व मॉनटेनेग्रो को मिलाकर), क्रोशिया, मैकेडोनिया, स्लोवेनिया व बोस्निया-हर्जेगोविना। परंतु बोस्निया-हर्जेगोविना में हिंसा समाप्त नहीं हुई। यहाँ के तीन समुदायों (सर्व, क्रोर व मुसलमान) में आपस में लड़ाई चलती रही। इससे वहाँ की जनता को भारी कष्ट झेलने पड़े हैं। भारत विभाजन में हिंदू, सिक्ख और मुसलमान समुदाय आपस में लड़े। फलतः लाखों लोग मारे गए व करोड़ के करीब लोग उजड़ गए। (भारत विभाजन की हिंसा व विस्थापन पर विस्तार से लिखें।)

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 12.
पता लगाइए कि क्या आपके शहर, कस्बे, गाँव या आस-पास के किसी स्थान पर दूर से कोई समुदाय आकर बसा है (हो सकता है आपके इलाके में बँटवारे के समय आए लोग भी रहते हों)। ऐसे समुदायों के लोगों से बात कीजिए और अपने निष्कर्षों को एक रिपोर्ट में संकलित कीजिए। लोगों से पूछिए कि वे कहाँ से आए हैं, उन्हें अपनी जगह क्यों छोड़नी पड़ी और उससे पहले व बाद में उनके कैसे अनुभव रहे। यह भी पता लगाइए कि उनके आने से क्या बदलाव पैदा हुए।
उत्तर:
संकेत-आपके शहर/कस्बे/गाँव में पाकिस्तान से आकर बसे पंजाबी समुदाय या सिक्ख समुदाय के लोगों का पता लगाइए और उनसे एक प्रश्नावली बनाकर उसके उत्तर जानिए। प्रश्नावली प्रश्न में दिए गए सवालों को शामिल कीजिए। अन्य प्रश्न भी डालें; जैसे वे यहाँ कब आए, पहले कहाँ आए, क्या व्यवसाय शुरू किया, अब आर्थिक स्थिति क्या है? आदि।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

HBSE 12th Class History महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (100-150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी ने खुद को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए क्या किया?
उत्तर:
गाँधी जी ने स्वयं को आम लोगों जैसा दिखाने के लिए अनेक बातें अपने जीवन में अपनाईं-सर्वप्रथम सामान्य जन की दशा को जानने के लिए 1915 में (अफ्रीका से आगे के बाद) सारे देश का भ्रमण किया। उन्होंने भारत में अपना सार्वजनिक फरवरी, 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में दिया। इस भाषण से स्पष्ट होता है कि वे आम जनता से जुड़ना चाहते थे। समारोह में बोलते हुए उन्होंने भारत के गरीबों, किसानों, मजदूरों की ओर ध्यान न देने पर भारतीय धनी और विशिष्ट वर्ग को लताड़ा। उन्होंने समारोह में धनी और सजे-सँवरे भद्रजनों की उपस्थिति और गरीब भारतीयों की अनुपस्थिति को लेकर चिंता प्रकट की।

गाँधी जी ने कहा कि, “हमारे लिए स्वशासन का तब तक कोई अभिप्राय नहीं है जब तक हम किसानों से उनके श्रम का लगभग संपूर्ण लाभ स्वयं या अन्य लोगों को ले लेने की अनुमति देते रहेंगे। हमारी मुक्ति केवल किसानों के माध्यम से ही हो सकती है। न तो वकील, न डॉक्टर, न जमींदार इसे सुरक्षित रख सकते हैं।” इस प्रकार गाँधी जी ने इस अवसर पर भारत के किसानों और मजदूरों को याद किया। असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन-आंदोलन बना दिया था। किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने इसमें भाग लेना शुरू कर दिया था। गाँधी जी उनके प्रिय नेता बन गए थे। गाँधी जी के प्रति आदर व्यक्त करते हुए लोग उन्हें अपना ‘महात्मा’ कहने लगे।

गाँधी जी ने अपनी जीवन-शैली में भी बदलाव किया। गाँधी जी आम लोगों की तरह वस्त्र पहनते थे वे उन्हीं की तरह रहते थे। वे जन-सामान्य की भाषा बोलते थे। गाँधी जी दूसरे नेताओं की तरह जनसमूह से अलग खड़े नहीं होते थे, बल्कि वे उनसे गहरी सहानुभूति रखते थे और उनसे घनिष्ठ संबंध भी बनाते थे। उल्लेखनीय है कि 1921 में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान गाँधी जी ने अपना सिर मुंडवा लिया था और गरीबों के साथ अपना तादात्म्य (Identity) स्थापित करने के लिए सूती वस्त्र पहनने शुरू कर दिए थे। इस प्रकार उनके वस्त्रों से जनता के साथ उनका नाता झलकता था।

प्रश्न 2.
किसान महात्मा गाँधी जी को किस तरह देखते थे?
उत्तर:
भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ की जनसंख्या के अधिकांश लोग किसान थे। किसानों में असहयोग आंदोलन के बाद गाँधी जी, ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजा’ अथवा सामान्य ‘महात्मा जी’ जैसे नामों से लोकप्रिय हुए। किसान उन्हें अपने उद्धारक के रूप में देखते थे। किसानों का मानना था कि महात्मा गाँधी उन्हें लगान की कठोर दरों और अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्मों से बचा सकते हैं। वे उनके मान-सम्मान की रक्षा कर सकते हैं और उन्हें उनकी स्वायत्तता दिला सकते हैं। भारत की गरीब जनता विशेष तौर पर किसान गाँधी जी की सात्विक जीवन-शैली और उनके द्वारा अपनाई गई धोती तथा चरखा जैसी चीजों से अत्यधिक प्रभावित थे। गाँधी जी ने स्वयं एक व्यापारी और पेशे से वकील होने पर भी यह सादी जीवन-शैली अपनाई थी तथा नित्य चरखा कातने जैसे हाथ के काम के प्रति उनका लगाव था। उनमें गरीब श्रमिकों के प्रति गहरी सहानुभूति थी। वे उनके जीवन की दशा को बदलना चाहते थे।

ध्यान देने योग्य बात यह है कि गरीब लोग भी गाँधी जी में आस्था व सहानुभूति रखते थे व दूसरे नेता गरीबों को कृपा की दृष्टि से देखते थे। गाँधी जी न केवल उनके जैसा दिखते थे, बल्कि वे गरीब किसानों, मजदूरों को अच्छी प्रकार से समझना चाहते थे तथा स्वयं को उनके जीवन के साथ जोड़कर उनका उत्थान करना चाहते थे। वस्तुतः किसानों में गाँधी जी की जनछवियों में यह मान्यता बन रही थी कि राजा ने उन्हें किसानों के कष्टों को दूर करने तथा उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए भेजा है और उनके पास इतनी शक्ति थी कि वे सभी अधिकारियों के निर्देशों को अस्वीकृत कर सकते थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

प्रश्न 3.
नमक कानून स्वतंत्रता संघर्ष का महत्त्वपूर्ण मुद्दा क्यों बन गया था?
उत्तर:
नमक हमारे राष्ट्र की संपदा थी जिस पर विदेशी सरकार ने शोषण करने के लिए एकाधिकार जमा लिया था। यह कानून द्वारा स्थापित एकाधिकार भारतीय जनता के लिए एक अभिशाप के समान था। जन-सामान्य तथा प्रत्येक भारतीय से जुड़े हुए इस कानून को गाँधी जी ने अंग्रेज़ शासन के विरोध प्रतीक के रूप में चुना। शीघ्र ही यह मुद्दा, नमक कानून, स्वतंत्रता संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा बन गया। . नमक कानून के चुनाव के निम्नलिखित कारण थे

1. यह कानून भारत में सर्वाधिक घृणित कानून था। इसके अनुसार हमारे देश में नमक के उत्पादन और बेचने पर राज्य का एकाधिकार था।

2. भारतीय विशेषतः जन-साधारण इस कानून को घृणा की नजर से देखते थे। प्रत्येक घर में नमक भोजन में अनिवार्य रूप से प्रयोग किया जाता था, परंतु सरकार ने लोगों के घरेलू प्रयोग के लिए भी नमक बनाने पर प्रतिबंध लगा रखा था। इस कारण सभी को ऊँचे मूल्यों पर दुकानों से नमक खरीदना पड़ता था।

3. जहाँ एक ओर सरकार जनता को नमक उत्पादन से रोकती, वहीं नमक अनेक स्थानों पर बिना श्रम के प्राकृतिक रूप से तैयार होता था। उसे सरकार नष्ट कर देती थी। यह एक प्रकार से राष्ट्र की संपत्ति को नष्ट करना था। इस बात से गाँवों के लोग भी परिचित थे।

4. नमक उत्पादन पर राज्य का एकाधिकार लोगों को बहुमूल्य सुलभ ग्राम उद्योग से वंचित करना था।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के लिए अखबार महत्त्वपूर्ण स्रोत क्यों हैं?
उत्तर:
19वीं सदी के अंत तथा 20वीं सदी के प्रारंभ तक भारत में अनेक भाषाओं में अखबार प्रकाशित होने लगे थे। इनमें से बहुत से समाचार-पत्र अब भी पुस्तकालयों व अभिलेखागारों में सुरक्षित हैं। इन अखबारों में राष्ट्रीय घटनाओं, राष्ट्रीय नेताओं के भाषणों, सरकार की नीतियों तथा जन-सामान्य की दशा पर टिप्पणियाँ और लेख प्रकाशित होते थे। इस रूप में ये अखबार राष्ट्रीय आंदोलन को समझने तथा इसका अध्ययन करने के लिए इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इस संदर्भ में निम्नलिखित बातें उल्लेखनीय हैं

1. इनमें राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ी सभी घटनाओं का विवरण मिल जाता है।

2. इन समाचार-पत्रों में राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं (राष्ट्रीय, प्रांतीय, स्थानीय स्तर के) के विषय में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
3. इन अखबारों से राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति ब्रिटिश सरकार के रुख का भी पता लगता है।
4. ये अखबार महात्मा गाँधी की गतिविधियों पर नजर रखते थे तथा उनसे संबंधित समाचारों को विशेषतः जन-आंदोलनों से जुड़े समाचारों को प्रमुखता से छापते थे। इनसे गाँधी जी व उनके जन-आंदोलन के स्वरूप का पता चलता है।
5. जनता की राष्ट्रीय आंदोलन में भागीदारी के अध्ययन के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। लेकिन इनके अध्ययन में भी सावधानी की जरूरत होती है। इसके लिए विशेषतः हमें दो बातों का ध्यान रखना चाहिए

समाचारों का संकलन एवं रिपोर्टिंग किसी अखबार के लिए, उसके संवाददाता करते हैं। इसलिए संवाददाता की भाषा, उसकी समझ व विचार से यह निर्धारित हुआ है कि उसे गाँधी जी की कौन-सी बात सबसे अहम् लगी, जिसे उसने अखबार में छपने के लिए भेजा होगा।

संकलित समाचारों को संपादक फिर काट-छाँट करके (यानी संपादित करके) प्रकाशित करता है। यहाँ संपादक की समझ और दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण था। उदाहरण के लिए गाँधी जी के विचारों से सहमति और मतभेद रखने वाले संपादकों ने गाँधी जी के भाषणों/वक्तव्यों को अलग-अलग ढंग से प्रस्तुत किया। किसी ने निंदा करते हुए छापा तो किसी ने प्रशंसा करते हुए सरकार समर्थक व सरकार विरोधी समाचार-पत्रों की रिपोर्टिंग एक-जैसी नहीं थी। लंदन से निकलने वाले समाचार-पत्रों के विवरण भारतीय राष्ट्रवादी समाचार-पत्रों के छपने वाले विवरणों से अलग हैं।

प्रश्न 5.
चरखे को राष्ट्रवाद का प्रतीक क्यों चुना गया?
उत्तर:
चरखा जन-सामान्य से संबंधित था और स्वदेशी व आर्थिक प्रगति का प्रतीक था। अतः गाँधी जी ने इसे राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में चुना। गाँधी जी स्वयं प्रतिदिन अपना कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। वे अन्य सहयोगियों को भी चरखा चलाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। वे आधुनिक युग के आलोचक थे, जिसमें मशीनों ने मानव को गुलाम बनाकर श्रम को हटा दिया था। गाँधी जी का मानना था कि चरखा गरीबों को पूरक आमदनी प्रदान कर सकता था तथा उन्हें स्वावलंबी बना सकता था। वे मशीनों के प्रति सनक के आलोचक थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 13 Img 1
वस्तुतः चरखा स्वदेशी तथा राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया। पारंपरिक भारतीय समाज में सूत कातने के काम को अच्छा नहीं समझा जाता था। गाँधी जी द्वारा सूत कातने के काम ने मानसिक श्रम एवं शारीरिक श्रम की खाई को कम करने में भी सहायता की। * निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध कैसे था?
उत्तर:
असहयोग आंदोलन एक तरह का प्रतिरोध था यह बात दो तरह से स्पष्ट होती है। प्रथम, अगर हम इसके कारणों पर दृष्टि डालें तो यह स्पष्ट होता है कि यह औपनिवेशिक सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ संघर्ष था। दूसरा, आंदोलन के स्वरूप तथा जन-सामान्य की भागीदारी से भी यह स्पष्ट है कि आंदोलन लोगों के प्रतिरोध को भी अभिव्यक्त कर रहा था। आंदोलन के कारणों तथा जनभागीदारी का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

A. कारण :
1. प्रथम विश्वयुद्ध के प्रभाव (Effects of the First World War)-प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया था। युद्धकाल में भारत का कर्ज 411 करोड़ से 781 करोड़ हो गया। अनाज महँगा हो गया। वस्तुओं के दाम बढ़ गए। अनाज व कपड़े में कमी आ गई। युद्ध के बाद सरकार ने सैनिकों व मजदूरों की छंटनी कर दी। साथ ही अकाल-प्लेग से लगभग 120-130 लाख लोग मारे गए। इन सब परिस्थितियों से जन-असंतोष पनपा।

2. रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act)-विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिए थे और किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर जेल में डाला जा सकता था। युद्ध के बाद भी सरकार ने रॉलेट एक्ट पास किया। भारतीयों ने इसका विरोध किया। इसे काला कानून (Black Act) करार दिया गया। साधारण लोगों के लिए इस एक्ट का अर्थ था, “कोई वकील नहीं, कोई दलील नहीं, कोई अपील नहीं।”
गाँधी जी ने देशभर में एक्ट के खिलाफ अभियान चलाने का निश्चय किया। एक्ट के विरोध में पहले 30 मार्च तथा बाद में 6 अप्रैल, 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया।

3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre)-गाँधी जी के सत्याग्रह शुरू करने पर पंजाब से भारी समर्थन मिला। 30 मार्च व 6 अप्रैल को अमृतसर में हड़ताल हुई। सरकार ने दमन का सहारा लिया। स्थानीय नेताओं-डॉ० सत्यपाल और डॉ० किचलू को गिरफ्तार कर लिया। लोग उत्तेजित हो गए। 13 अप्रैल को जलियाँवाला बाग में 20 हज़ार लोग एकत्रित हुए। इस पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी के (रास्ता रोककर) गोली चलाने के आदेश दे दिए। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए। जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया।

4. खिलाफत आंदोलन–प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की का खलीफा हार गया तथा 1920 में उसके साथ अपमानजनक संधि की गई। भारतीय मुसलमानों में इससे असंतोष था। उन्होंने मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में अंग्रेज सरकार विरोधी और खलीफा के समर्थन में आंदोलन चलाया। गाँधी जी ने खिलाफ़त मुद्दे पर अपना सहयोग दिया। गाँधी जी हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वराज की प्राप्ति के लिए आवश्यक मानते थे।

B. आंदोलन की प्रगति (Progress of Mass-Movement)-असहयोग आंदोलन ने शीघ्र ही जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। आंदोलन शुरू करते हुए गाँधी जी ने स्वयं ‘केसरी-ए-हिंद’ की उपाधि तथा अन्य पदों का परित्याग कर दिया। टैगोर ने ‘नाइट हुड’ की उपाधि त्याग दी। अनेक अन्य लोगों ने भी अपनी उपाधियाँ और पदवियाँ त्याग दी। विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों में जाना छोड़कर आंदोलन में भाग लिया।

सरकारी कोर्ट के स्थान पर राष्ट्रीय पंचायती अदालतों की स्थापना हुई। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान; जैसे काशी विद्यापीठ, तिलक विद्यापीठ, अलीगढ़ विद्यापीठ, जामिया मिलिया आदि स्थापित हुईं। कई कस्बों और नगरों में मजदूरों ने हड़तालें कीं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सन् 1921 में 396 हड़तालें हुईं जिनमें 6 लाख मज़दूर शामिल हुए तथा 70 लाख कार्य दिवसों (Working Days) का नुकसान हुआ। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार काफी उत्साहवर्धक रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक प्रदर्शन हुआ। चुनावों का बहिष्कार हुआ।

देहातों में आंदोलन फैलने लगा। आंध्र प्रदेश में जनजातियों ने वन कानून की अवहेलना कर दी। राजस्थान में किसानों और जनजातियों ने आंदोलन किया। अवध में किसानों ने कर नहीं चुकाया। आसाम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। पंजाब में गुरुद्वारा आंदोलन शुरू हुआ। यद्यपि नवंबर, 1921 में बंबई में प्रिंस ऑफ वेल्स के बहिष्कार के समय हिंसा हुई थी तथापि दिसंबर, 1921 में (आंदोलन में उत्साह को देखते हुए) गाँधी जी को अधिकार दिया गया कि वे सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडे, परंतु फरवरी, 1922 में चौरी-चौरा घटना के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया। इस प्रकार स्पष्ट है कि आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य औपनिवेशिक शासन का प्रतिरोध करना था। इस प्रतिरोध में जन-सामान्य ने पहली बार व्यापक पैमाने पर भाग लिया।

प्रश्न 7.
गोलमेज सम्मेलन में हुई वार्ता से कोई नतीजा क्यों नहीं निकल पाया?
उत्तर:
1930 से 1932 की अवधि में ब्रिटिश सरकार ने भारत की समस्या पर बातचीत करने तथा नया एक्ट पास करने के लिए लंदन में तीन गोलमेज सम्मेलन बुलाए, परंतु इन सम्मेलनों में किसी मुद्दे पर आम राय नहीं बन पाई। फलतः इन सम्मेलनों में कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय न हो सका। तीनों सम्मेलनों की कार्रवाई का संक्षिप्त ब्यौरा अग्रलिखित प्रकार से है

1. प्रथम गोलमेज सम्मेलन इसका आयोजन 12 नवंबर, 1930 को हुआ। इसका उद्देश्य साइमन कमीशन की रिपोर्ट पर विचार-विमर्श करना था। इस समय काँग्रेस ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया हुआ था। अतः उसने इसका बॉयकाट किया। इसके प्रमुख नेताओं को सरकार ने पहले ही जेलों में डाला हुआ था। सम्मेलन में आए प्रतिनिधियों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई। फलतः यह सम्मेलन असफल रहा।

2. दूसरा गोलमेज सम्मेलन–प्रथम गोलमेज सम्मेलन की असफलता के बाद सरकार ने काँग्रेस को अगले सम्मेलन में शामिल करने का प्रयास किया। फलतः गाँधी-इर्विन समझौता हुआ। काँग्रेस ने सम्मेलन में भाग लेने का फैसला किया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 13 Img 2
काँग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सितंबर, 1931 में लंदन पहुँचे। मुहम्मद अली जिन्ना मुस्लिम लीग के प्रतिनिधि के तौर पर सम्मेलन में शामिल हुए। सम्मेलन में गाँधी जी ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी बताया, परंतु गाँधी जी के इस दावे को तीनों तरफ से चुनौती दी गई। मुस्लिम लीग ने दावा किया कि वह भारत में मुस्लिम हितों के लिए काम करने वाली एकमात्र पार्टी है। भारतीय राज्यों (Indian States) के शासकों का कहना था कि उनके क्षेत्रों पर काँग्रेस का कोई अधिकार नहीं है और न ही वह इन क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करती है। महान् विद्वान और विधिवेत्ता डॉ० बी०आर० अंबेडकर ने भी गाँधी जी के दावे को चुनौती देते हुए जोर देकर कहा कि काँग्रेस निचली जातियों का प्रतिनिधित्व नहीं करती। डॉ० अम्बेडकर ने हरिजन वर्ग के लिए पृथक् प्रतिनिधित्व की माँग रखी। गाँधी जी ने इस माँग का विरोध किया। सांप्रदायिक समस्या को लेकर सम्मेलन में एक राय नहीं बन पाई। इस कारण दूसरा गोलमेज सम्मेलन बिना किसी नतीजे पर पहुँचे ही समाप्त हो गया।

3. 17 नवंबर, 1932 को तीसरा सम्मेलन आयोजित किया गया। इसका इंग्लैंड के ही मज़दूर दल ने बहिष्कार किया। भारत में काँग्रेस ने पुनः आंदोलन छेड़ दिया था। अतः काँग्रेस ने भी इसका बहिष्कार किया। इसमें केवल 46 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इनमें से अधिकतर ब्रिटिश सरकार की हाँ में हाँ मिलाने वाले थे। इस प्रकार स्पष्ट है कि इन सम्मेलनों की वार्ताओं से कोई महत्त्वपूर्ण नतीजा नहीं निकला। हाँ, ब्रिटिश सरकार ने स्वयं ही कुछ निर्णय लिए। सम्मेलनों पर श्वेत-पत्र छापा तथा 1935 में भारत सरकार अधिनियम पास किया।

प्रश्न 8.
महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को किस तरह बदल डाला?
उत्तर:
भारतीय राजनीति में प्रवेश से पूर्व गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में जातीय भेदभाव के विरुद्ध लंबी लड़ाई लड़ी थी। दक्षिण अफ्रीका के आंदोलनों में ही उन्होंने अपने सत्याग्रह के अनूठे राजनीतिक शस्त्र का सफल प्रयोग किया। दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष में यह भी जाना कि जन-सामान्य में संघर्ष तथा बलिदान की अदम्य क्षमता होती है। 1915 में भारत आने पर उन्होंने सारे भारत का दौरा किया। 1917-18 में उन्होंने स्थानीय आंदोलनों-चंपारन, अहमदाबाद व खेड़ा में सत्याग्रह का सफल परीक्षण किया। 1920 से काँग्रेस का नेतृत्व गाँधी जी के हाथों में आ गया। अपने नेतृत्व में गाँधी जी ने अपनी नीतियों, विचारों, कार्यक्रमों और जन-आंदोलनों द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को बहुत हद तक बदल दिया। अब इसे वास्तव में जन-आंदोलन का स्वरूप प्राप्त हुआ।

A. गाँधी जी का तरीका और विचार

1. सत्याग्रह (Satyagraha)-गाँधी जी के राजनीतिक विचारों और उनके दर्शन का केंद्र बिंदु सत्याग्रह है। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। यह विरोध करने का अहिंसात्मक मार्ग था। जन-आंदोलन के लिए इसके कई रूप हो सकते थे; जैसे हड़ताल, प्रार्थना सभा, उपवास, धरना, असहयोग, कानून की अवज्ञा (नागरिक अवज्ञा), पद-यात्रा आदि।

2. अहिंसा (Ahimsa)-सत्याग्रह दो प्रमुख सिद्धांतों पर टिका था- सत्य और अहिंसा। इसलिए गाँधी जी ने संघर्ष में सत्य के साथ-साथ अहिंसा और अहिंसात्मक तरीकों पर बल दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि सशस्त्र हमले का भी सत्याग्रह द्वारा विरोध किया जा सकता है।

3. लोक शक्ति में विश्वास (Faith in the Masses)-गाँधी जी की जन-शक्ति में अटूट श्रद्धा थी। उनके नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। वस्तुतः दक्षिण अफ्रीका में संघर्ष ने गाँधी जी को जन-शक्ति में विश्वास करना सिखाया। उन्हें वहाँ पर गरीब मजदूरों का नेतृत्व करने का मौका मिला। वे उन लोगों की बलिदान करने की क्षमता व साहस को देखकर अचंभित हुए। यह अति महत्त्वपूर्ण बात थी कि उन्होंने गरीब और अनपढ़ लोगों को सत्याग्रह और अहिंसा का पाठ पढ़ाया और अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन चलाया।

4. साधन और साध्य की श्रेष्ठता में विश्वास (Faith in the Purity of Means and Objects)-गाँधी जी साधन और साध्य की श्रेष्ठता में विश्वास रखते थे। देश में स्वराज की स्थापना ही उनका लक्ष्य था और इस पवित्र लक्ष्य की प्राप्ति को वह सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर प्राप्त करना चाहते थे।

B. गाँधी जी और काँग्रेस का विस्तार (Gandhiji and Expansion of the Congress)-गाँधी जी ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक बनाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को सच्चे मायनों में जन आधार वाला संगठन बनाया। उन्होंने इसके लिए सावधानीपूर्वक काँग्रेस का पुनर्गठन किया। भारत के विभिन्न भागों में काँग्रेस की नई शाखाएँ खोली गईं। ग्राम स्तर की काँग्रेस कमेटियाँ भी बनाई गईं। राष्ट्रवादी संदेश को फैलाने के लिए मातृभाषा का प्रयोग करना तय किया गया। इसके साथ ही काँग्रेस की प्रांतीय समितियों का भाषायी क्षेत्रों के आधार पर पुनर्गठन किया गया। काँग्रेस का दिन-प्रतिदिन का कार्य देखने के लिए काँग्रेस कार्य समिति (CWC) का गठन किया गया।

B. रचनात्मक कार्य (Constructive Work)-जन-सामान्य को राष्ट्रीय आंदोलन में लाने में उनके रचनात्मक कार्य की अहम् भूमिका है। रचनात्मक कार्यों को मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान जैसे कार्यक्रमों के रूप में संगठित किया। फरवरी, 1924 में जेल से रिहा होने पर गाँधी जी ने अपना सारा ध्यान रचनात्मक कार्यों पर लगाया। उन्होंने खादी को बढ़ावा देने तथा छुआछूत को समाप्त करने पर ध्यान दिया। वे भारतीयों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। वस्तुतः रचनात्मक कार्यक्रम उनकी व्यापक रणनीति का हिस्सा थे। सक्रिय आंदोलन के अभाव में कार्यकर्ताओं में उत्साह बनाए रखने तथा सत्याग्रह में समर्पण के भाव पैदा करने में ये कार्यक्रम अति महत्त्व के थे। इससे भविष्य के आंदोलन को बड़ी संख्या में सत्याग्रही मिले थे।

C. तीन बड़े जन-आंदोलन-गाँधी जी ने 1920 से 1945 के मध्य तीन बड़े आंदोलन अंग्रेज़ सरकार के खिलाफ चलाए। इन आंदोलनों में भारतीय जनता के सभी वर्गों ने भाग लिया। इन जन-आंदोलनों ने ही राष्ट्रीय आंदोलन को सही मायने में राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। इन आंदोलनों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. असहयोग आंदोलन-अगस्त, 1920 में आंदोलन शुरू करते हुए गाँधी जी ने स्वयं ‘केसरी-ए हिंद’ की उपाधि तथा अन्य पदों का परित्याग कर दिया। विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में जाना छोड़ दिया। वकीलों ने अदालतों में जाना छोड़कर आंदोलन में भाग लिया। इनमें प्रमुख थे सी०आर०दास, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, पटेल राजा जी, राजेन्द्र प्रसाद, आसफ अली आदि।

सरकारी कोर्ट के स्थान पर राष्ट्रीय पंचायती अदालतों की स्थापना हुई। राष्ट्रीय शिक्षण संस्थान जैसे काशी विद्यापीठ, तिलक विद्यापीठ, अलीगढ़ विद्यापीठ, जामिया मिलिया आदि स्थापित हुए। कई कस्बों और नगरों में मजदूरों ने हड़तालें कीं। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार काफी उत्साहवर्धक रहा। हिंदू-मुस्लिम एकता का व्यापक प्रदर्शन हुआ। चुनावों का बहिष्कार हुआ। देहातों में आंदोलन फैलने लगा। आंध्र प्रदेश में जनजातियों ने वन कानून की अवहेलना कर दी। राजस्थान में किसानों और जनजातियों ने आंदोलन किया। अवध में किसानों ने कर नहीं चुकाया। आसाम-बंगाल रेलवे के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी। पंजाब में गुरुद्वारा आंदोलन चला। नवंबर, 1921 में बंबई में प्रिंस ऑफ वेल्स का बहिष्कार हुआ, परंतु 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद आंदोलन स्थगित कर दिया गया। इस आंदोलन ने 1857 के बाद पहली बार अंग्रेज़ी राज की नींव को हिलाया।

2. सविनय अवज्ञा आंदोलन-12 मार्च, 1930 को आंदोलन की शुरूआत गाँधी जी ने दांडी मार्च से की। उनके द्वारा नमक कानून तोड़ने के साथ ही यह आंदोलन सारे देश में फैल गया। राजगोपालाचारी ने त्रिचिनापल्ली से तंजौर तक यात्रा करके नमक सत्याग्रह किया। सरोजिनी नायडू ने 2000 सत्याग्रहियों के साथ धरासान में आंदोलन किया। मालाबार व सिलहट में भी ऐसे आंदोलन हुए। उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान ने अपने अनुयायी खुदाई खिदमतगार (Servant of God) के साथ आंदोलन की अगुवाई की। पेशावर में सत्याग्रहियों पर गढ़वाल सैनिकों ने गोली चलाने से मना कर दिया। मध्य प्रांत, कर्नाटक व महाराष्ट्र में लोगों ने ‘जंगल कानून’ का उल्लंघन किया। उत्तर प्रदेश में किसानों ने लगान देने से मना किया। शोलापुर में मजदूरों ने जोरदार हड़ताल की। वकीलों ने अदालतों का बहिष्कार किया। विद्यार्थियों ने बड़ी संख्या में सरकारी शिक्षा संस्थाओं का बहिष्कार किया। बड़े पैमाने पर विदेशी वस्त्रों के खिलाफ धरना-प्रदर्शन आयोजित हुए। महिलाओं ने आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया।

सरकारी दमन इस आंदोलन के जवाब में सरकार ने दमन चक्र चलाया। नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गाँधी जी को भी हिरासत में ले लिया गया। 1930 ई० तक लगभग 90 हज़ार लोग जेलों में थे। काँग्रेस को गैर-कानूनी संगठन घोषित कर दिया गया। अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। पुलिस द्वारा निहत्थे सत्याग्रहियों और औरतों पर लाठियाँ बरसाना, गोली चलाना तथा प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार करना आम बात थी। 1931 में गाँधी-इर्विन समझौते के बाद आंदोलन स्थगित किया गया तथा गाँधी जी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया परंतु इसका कोई नतीजा नहीं निकला। अतः आंदोलन पुनः शुरू किया गया। आंदोलन 1934 में स्थगित कर दिया गया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

3. भारत छोड़ो आंदोलन-दूसरे विश्वयुद्ध के मुद्दे पर सरकार व काँग्रेस में गतिरोध पैदा हो गया था। अंग्रेज़ सरकार युद्ध के बाद भी भारत को स्वतंत्रता नहीं देना चाहती थी। अंततः 8 अगस्त, 1942 को गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। उन्होंने ‘करो या मरो’ का नारा दिया। सरकार ने गाँधी जी व अन्य बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। 9 अगस्त से 13 अगस्त तक सारे देश में प्रमुख नगरों; जैसे बंबई, अहमदाबाद, दिल्ली, पुणे, इलाहाबाद, लखनऊ, वाराणसी, पटना आदि पर व्यापक उपद्रव हुए, हड़तालें हुईं एवं प्रदर्शन हुए। सरकारी प्रतीकों पर हमले हुए।

संचार साधनों, सेना और पुलिस के खिलाफ तोड़-फोड़ और विध्वंस किए गए। छात्रों ने शहरों से आकर कृषक विद्रोहों को नेतृत्व प्रदान किया। इस दौर में अनेक स्थानों पर अंग्रेजी राज समाप्त हो गया तथा उन स्थानों पर समानांतर राष्ट्रीय सरकारों की स्थापना हुई। इनमें तमलुक (मिदनापुर), तलचर (उड़ीसा), सतारा (महाराष्ट्र), बलिया (पूर्वी संयुक्त प्रांत) की राष्ट्रीय सरकारें प्रमुख थीं। इसके बाद भूमिगत आंदोलन चला। इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे–जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, अचुत्य प्रवर्धन, अरुणा आसफ अली आदि। आंदोलन आतंकवादी गतिविधियों और छापामार संघर्षों से चलाया गया।

सरकारी दमन-आंदोलन को कुचलने के लिए सरकार ने क्रूरता और जंगलीपन की सभी सीमाओं को तोड़ दिया। निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाई गईं। सेना ने हवाई जहाजों से गोलियाँ बरसाईं। मशीनगनों का प्रयोग किया गया। अनेक गाँवों को जलाकर राख कर दिया गया।

निष्कर्ष-स्पष्ट है कि गाँधी जी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन विश्व का सबसे बड़ा आंदोलन बन गया। उन्होंने अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन चलाया जो विश्व में अपने प्रकार का अनूठा आंदोलन था। उन्होंने अपने विचारों, कार्यक्रमों व आंदोलनों से राष्ट्रीय आंदोलन के स्वरूप को नई दिशा प्रदान की।

प्रश्न 9.
निजी पत्रों और आत्मकथाओं से किसी व्यक्ति के बारे में पता चलता है? ये स्रोत सरकारी ब्यौरों से किस तरह भिन्न होते हैं?
उत्तर:
1. निजी पत्र (Private Letterts)-निजी पत्र में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि से महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता। निजी पत्रों में बहुत-सी अन्य बातों के अतिरिक्त लिखने वाले की पीड़ा, आक्रोश, बेचैनी और असंतोष, आशा और हताशा इत्यादि की झलक भी मिल जाती है। राष्ट्रीय आंदोलन के संदर्भ में निजी पत्राचार में ऐसे कितने ही उदाहरण मिल जाएँगे। उदाहरण के लिए 1936 के वर्ष के कुछ पत्रों को ले सकते हैं जो राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और गाँधी जी द्वारा लिखे गए।

इन पत्रों से स्पष्ट होता है कि काँग्रेस में रूढ़िवादियों और समाजवादियों के बीच एक खाई पैदा हो गई थी। नेहरू जी 1928 में यूरोप से लौटने के बाद से ही समाजवादी विचारों से प्रभावित थे। 1936 में काँग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद वे किसान-मजदूरों के समर्थन में तथा विश्व में पैदा हो रहे फासीवाद के खिलाफ जमकर बोले। नेहरू जी का यह व्यवहार रूढ़िवादियों के लिए असहनीय हो गया। यहाँ तक कि राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल सहित काँग्रेस वर्किंग कमेटी के सात सदस्यों ने त्याग-पत्र की धमकी तक दे डाली थी। इसके बाद सरदार पटेल और नेहरू जी दोनों वर्धा में गाँधी जी से मिले। गाँधी जी ने अंततः बीच-बचाव करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन को पहले की तरह एक बार फिर बिखरने से बचा लिया।

निजी लेखन की सीमाएँ (Limits of Private Writing) –निजी लेखन की भी अपनी कुछ सीमाएँ होती हैं। यद्यपि यह व्यक्तिगत लेखन होता है लेकिन कई बार इसमें भी निजी और सार्वजनिक की सीमा खत्म हो जाती है। निजी पत्र या डायरी लिखते समय भी लोगों को यह अहसास रहता है कि संभवतः यह भी प्रकाशित हो सकते हैं। इसी अहसास से बहुत बार इन पत्रों की भाषा और विचारों की सीमाएँ तय होती हैं। उल्लेखनीय है कि गाँधी जी के पास जो पत्र आते थे उन्हें वह अपने हरिजन समाचार-पत्र में प्रकाशित करते रहते थे। जैसा कि ऊपर बताया गया है कि नेहरू जी ने भी अपने पुराने पत्रों को पुस्तक के रूप में सार्वजनिक किया। अतः निजी लेखन का भी अध्ययन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। उनके महत्त्व और सीमाओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।

2. आत्मकथाएँ (Autobiographies)-एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत है आत्मकथाएँ जिनमें मानवीय गतिविधियों का विविध विवरण मिलता है। वस्तुतः यह व्यक्ति के संपूर्ण जीवनकाल, जन्मस्थान, परिवार की पृष्ठभूमि, शिक्षा, वैचारिक प्रभाव, जीवन में कठिनाइयों का उतार-चढ़ाव, प्रमुख घटनाओं आदि से जुड़ी होती हैं। आत्मकथाओं में व्यक्ति की रुचियों और प्राथमिकताओं का भी पता लगता है। इससे व्यक्ति के बौद्धिक स्तर तथा जीवन में सत्यनिष्ठ होने का भी पता लगता है। गाँधी जी ने अपनी आत्मकथा का नाम ही ‘सत्य के साथ मेरे अनुभव’ रखा।
लेकिन आत्मकथा के लेखन को भी आँख मूंद कर स्वीकार नहीं किया जा सकता। विशेषतः इन्हें पढ़ते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए

  1. आत्मकथाएँ प्रायः स्मृति के आधार पर लिखी जाती हैं। अतः इनसे पता चलता है कि लेखक को क्या याद रहा था या फिर उसने क्या याद रखा।
  2. आत्मकथा में प्रायः लेखक वह ही लिखता है जिससे वह स्वयं को दूसरों की नज़रों में दिखाना चाहता है।
  3. आत्मकथा वस्तुतः एक तरह से अपनी छवि गढ़ने (पिक्चर बनाने) के समान होती है। इसमें अकसर लोग अपनी कमियों को इच्छा या अनिच्छा से छुपाने का प्रयास करते हैं।
  4. आत्मकथा पढ़ते समय हमें उन बातों या चुप्पियों को ढूँढना चाहिए जिन्हें लेखक ने इच्छा या अनिच्छा से अभिव्यक्त नहीं किया होता।

3. सरकारी ब्यौरे से भिन्नता-निजी पत्र और आत्मकथाएँ इतिहास के स्रोत के रूप में सरकारी ब्यौरों से पूरी तरह से भिन्न हैं। सरकार राष्ट्रीय आंदोलन और इसके नेताओं पर कड़ी नजर रखती थी। पुलिस और सी०आई०डी० के द्वारा इन पर पाक्षिक रिपोर्ट तैयार की जाती थी। यह ब्यौरा गुप्त रखा जाता था। इन रिपोर्टों को तैयार करने वाले सरकार और स्वयं अपने पूर्वाग्रहों, नीतियों दृष्टिकोण आदि से प्रभावित होते थे। इसके विपरीत निजी पत्रों में दो व्यक्तियों के मध्य आपसी विचारों का आदान-प्रदान और निजी स्तर पर जुड़ी बातों का विवरण होता था। स्पष्ट है कि इन दोनों प्रकार के स्रोतों के विवरण की विशेषता तथा प्रकृति भिन्न होती है।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
दांडी मार्च के मार्ग का पता लगाइए। गुजरात के नक्शे पर इस यात्रा के मार्ग को चिह्नित कीजिए और उस पर पड़ने वाले मुख्य शहरों व गाँवों को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
संकेत-दांडी मार्च; साबरमती आश्रम अहमदाबाद से शुरू हुआ तथा बड़ोदरा, सूरत आदि से होता हुआ समुद्र तट पर स्थित दांडी पहुँचा।

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
दो राष्ट्रवादी नेताओं की आत्मकथाएँ पढ़िए। देखिए कि उन दोनों में लेखकों ने अपने जीवन और समय को किस तरह अलग-अलग प्रस्तुत किया है और राष्ट्रीय आंदोलन की किस प्रकार व्याख्या की है। देखिए कि उनके विचारों में क्या भिन्नता है। अपने अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
संकेत-अपने प्राध्यापक से गाँधी जी व नेहरू जी की आत्मकथा के संबंध में जानकारी प्राप्त कर स्वयं रिपोर्ट लिखें।

प्रश्न 12.
राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान घटी कोई एक घटना चुनिए। उसके विषय में तत्कालीन नेताओं द्वारा लिखे गए पत्रों और भाषणों को खोज कर पढ़िए। उनमें से कुछ अब प्रकाशित हो चुके हैं। आप जिन नेताओं को चुनते हैं उनमें से कुछ आपके इलाके के भी हो सकते हैं। उच्च स्तर पर राष्ट्रीय नेतृत्व की गतिविधियों को स्थानीय नेता किस तरह देखते थे इसके बारे में जानने की कोशिश कीजिए। अपने अध्ययन के आधार पर आंदोलन के बारे में लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन की दांडी मार्च से जुड़ी घटना पर सरकार की गोपनीय रिपोर्ट से स्थानीय नेताओं के विचारों को जाना जा सकता है। कुछ रिपोर्टों के अंश प्रस्तुत हैं मार्च, 1930 के पहले पखवाड़े की रिपोर्ट के कुछ अंश पढ़ें-गुजरात-इस प्रांत की राजनीतिक परिस्थितियों पर किस हद तक और क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका अभी अंदाजा लगाना मुश्किल है। रबी की फसल अच्छी हुई है इसलिए फिलहाल किसान फसलों की कटाई में व्यस्त हैं। विद्याथी आने वाली परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं।

मद्रास-गाँधी जी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने से बाकी मुद्दे हाशिये पर चले गए हैं। आम लोग उनकी यात्रा को नाटकीय और उनके कार्यक्रम को अव्यावहारिक मानते हैं क्योंकि हिंदू जनता उन्हें अगाध श्रद्धा की दृष्टि से देखती है, इसलिए गिरफ्तारी की संभावना, जिसके बारे में वे खुद बहुत उत्सुक हैं और उसके राजनीतिक प्रभावों के बारे में बहुत-सी गलतफहमियाँ हैं।

बंगाल-गाँधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरूआत विगत पखवाड़े की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना रही। श्री जे०एम० सेनगुप्ता ने अखिल बंगाल सविनय अवज्ञा परिषद् का गठन किया है। बंगाल प्रांतीय काँग्रेस कमेटी ने अखिल बंगाल अवज्ञा परिषद् बनाई है। इन परिषदों के गठन के अलावा बंगाल में सविनय अवज्ञा के प्रश्न पर और कोई सक्रिय कदम अभी नहीं उठाया गया है। जिलों से मिली रिपोर्टों से पता चलता है कि जो बैठकें आयोजित की गईं उनमें लोगों ने कोई विशेष उत्साह नहीं दिखाया और आम जनता पर कोई गहरा असर नहीं छोड़ा है। गौरतलब बात यह है कि इन बैठकों में महिलाओं की संख्या बढ़ती जा रही है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

बंबई-केसरी प्रेस ने आक्रामक भाषा और हमेशा की तरह आग उगलने के अंदाज में लिखा है “अगर सरकार सत्याग्रह की ताकत परखना चाहती है तो उसे पता होना चाहिए कि सत्याग्रह की सक्रियता और निष्क्रियता, दोनों से सरकार को ही नुकसान पहुँचेगा। यदि सरकार गाँधी जी को गिरफ्तार करती है तो उसे राष्ट्र के कोप का भाजन बनना पड़ेगा और यदि सरकार ऐसा नहीं करती है तो सविनय अवज्ञा आंदोलन फैलता जाएगा। इसलिए हमारा मानना है कि अगर सरकार श्री गाँधी को दंडित करती है तो भी राष्ट्र की विजय होगी और अगर सरकार उन्हें अपने रास्ते पर चलने देती है तो राष्ट्र की और भी बड़ी विजय होगी।”

दूसरी ओर विविध वृत्त नामक मध्यमार्गी अखबार ने इस आंदोलन की व्यर्थता की ओर संकेत किया है और कहा है कि यह आंदोलन अपना घोषित उद्देश्य प्राप्त नहीं कर पाया है लेकिन उसने सरकार को भी चेतावनी दी है कि दमन का रास्ता उसके उद्देश्य को कमजोर कर देगा। मार्च 1930 में दूसरे पखवाड़े की रिपोर्ट के कुछ अंश बंगाल-सबका ध्यान समुद्र तट तक गाँधी जी की यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने के लिए उनकी तैयारी पर केंद्रित है।

चरमपंथी अखबार उनकी गतिविधियों और भाषणों के बारे में विस्तार से लिख रहे हैं और पूरे बंगाल में हो रही बैठकों तथा उनमें पारित होने वाले प्रस्तावों के बारे में विस्तार से जानकारी दी जा रही है परंतु गाँधी जिस सविनय अवज्ञा की वकालत कर रहे हैं उसके प्रति विशेष उत्साह नहीं दिखाई देता…. । सामान्य रूप से लोग इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि गाँधी जी के साथ क्या किया जाता है और संभावना यही है कि अगर उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई की गई तो बंगाल के ज्वलनशील हालात में चिंगारी भड़क उठेगी। लेकिन फिलहाल ऐसी आग भड़कने के कोई गंभीर आसार दिखाई नहीं देते।

इन रिपोर्टों से विभिन्न क्षेत्रों में मार्च के बारे में जानकारी मिलती है परंतु इन्हें सावधानी से अध्ययन करना चाहिए। इनमें कई बार आशंकाएँ और गलत विचार भी दिए होते हैं। ये रिपोर्ट पूर्वाग्रह युक्त भी हैं। फिर भी इनमें उपयोगी जानकारी है।

महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे HBSE 12th Class History Notes

→ राष्ट्रपिता-भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने तथा अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में सर्वाधिक योगदान के कारण महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहा जाता है।

→ जातीय भेदभाव-दक्षिण अफ्रीका में रंग के आधार पर भारतीयों से नसली भेदभाव किया जाता था। उन पर अनेक प्रतिबंध थे। गाँधी जी ने वहाँ पर जातीय-भेद विरोधी आंदोलन चलाया।

→ सत्याग्रह इसका शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। अहिंसात्मक तरीके से विरोध करना। गाँधी जी के अनुसार सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है।

→ अहिंसा किसी भी प्रकार (मन, कर्म, वचन) से विरोधी को आहत न करना या हानि न पहुँचाना अहिंसा है। अहिंसा वीर और निडर का शस्त्र है न कि कायर और दुर्बल का। सत्याग्रह का आधार सत्य और अहिंसा थे।

→ लोकशक्ति-सामान्य लोगों (किसानों, मज़दूरों, गरीब अनपढ़ लोगों) की असीम बलिदान करने की क्षमता में विश्वास होना। गाँधी जी की लोकशक्ति से अटूट श्रद्धा थी।

→ साधन और साध्य-साध्य वह है जिसे प्राप्त करना होता है; जैसे भारत की स्वतंत्रता साध्य थी। साधन अर्थात् वह तरीका जिसके द्वारा साध्य (object) को प्राप्त किया जाए। गाँधी जी साधन और साध्य दोनों की पवित्रता में विश्वास रखते थे।

→ उदारवादी काँग्रेस के प्रथम दौर (1885 से 1905) के आंदोलन और नेताओं को उदारवादी कहा जाता है। वे सवैधानिक और क्रमिक सुधारों की माँग तथा प्रार्थना की नीति/तरीके पर चल रहे थे।

→ उग्रराष्ट्रवादी-1905 के आस-पास काँग्रेस में उग्रराष्ट्रवादी आंदोलन और नेता प्रभावशाली होने लगे। वे स्वराज्य की माँग में विश्वास रखते थे तथा स्वदेशी और बॉयकाट को शस्त्र के रूप में अपनाना चाहते थे।

→ चंपारन सत्याग्रह-1917 में गाँधी जी द्वारा चंपारण (बिहार) में किसानों की मांगों को लेकर चलाया गया आंदोलन।

→ खेड़ा सत्याग्रह-1918 में गुजरात के खेड़ा जिले में किसानों से लगान वसूली के विरुद्ध गाँधी जी द्वारा चलाया गया सत्याग्रह। खेड़ा में किसानों की फसल बर्बाद हो गई थी, तब भी सरकार लगान की माँग कर रही थी।

→ रॉलेट विरोधी सत्याग्रह-1919 में रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह सभा का गठन कर देशव्यापी अभियान गाँधी जी ने चलाया।

→ असहयोग आंदोलन-ब्रिटिश साम्राज्य की शैतानियत के खिलाफ अहिंसात्मक रूप से असहयोग आंदोलन अर्थात् सरकार से सहयोग न करना। गाँधी जी ने 1920 में असहयोग आंदोलन चलाया।

→ खिलाफत आंदोलन-1920 में अंग्रेज़ सरकार ने (इंग्लैंड की) तुर्की के खलीफा को अपमानजनक संधि पर हस्ताक्षर करने के लिए बाध्य किया। इसके विरुद्ध भारतीय मुसलमानों में असंतोष था। मुहम्मद अली और शौकत अली ने अंग्रेज़ सरकार के विरुद्ध इस मुद्दे पर आंदोलन चलाया जो खिलाफत आंदोलन कहलाता है।

→ चौरी-चौरा की घटना-5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा (गोरखपुर) में लोगों की भीड़ ने एक थाने पर हमला कर आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी मारे गए। इसके तत्काल बाद गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया।

→ चरखा-हाथ से सूत कातने का एक यंत्र। गाँधी जी प्रतिदिन कुछ समय चरखा कातते थे। चरखा स्वदेशी और राष्ट्रवाद का प्रतीक बन गया था।

→ रचनात्मक कार्य-जनता की सेवा करने, जनता को जगाने तथा कार्यकत्ताओं में उत्साह पैदा करने के लिए गाँधी जी ने रचनात्मक कार्य चलाए। इसमें मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान जैसे कार्यक्रम शामिल थे।

→ साइमन कमीशन-1919 के अधिनियम की समीक्षा के लिए इंग्लैंड सरकार द्वारा 1928 में साइमन के नेतृत्व में साइमन कमीशन भेजा गया। कमीशन में सभी सदस्य श्वेत थे। भारत में इसका जोरदार विरोध हुआ। ‘Simon go back’ के नारे लगे थे।

→ दांडी यात्रा-नमक कानून तोड़ने के लिए 12 मार्च, 1930 से 5 अप्रैल, 1930 के मध्य साबरमती आश्रम से दांडी तक गाँधी जी द्वारा आयोजित यात्रा।

→ खुदाई खिदमतगार-उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा बनाया गया संगठन, जिसने गाँधी जी के अहिंसात्मक आंदोलनों में भाग लिया।

→ गाँधी-इर्विन समझौता-गाँधी-इर्विन समझौता या दिल्ली समझौता भारत के वायसराय इर्विन तथा गाँधी जी के मध्य 5 मार्च, 1931 को हुआ।

→ गोलमेज सम्मेलन-भारत की समस्या पर बातचीत करने तथा नया सुधार कानून पास करने के लिए लंदन में इंग्लैंड की सरकार ने 1930, 1931 व 1932 में तीन गोलमेज सम्मेलन बुलाए। गाँधी जी ने दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया।

→ प्रांतीय स्वायत्तता-1935 के एक्ट के अनुसार प्रांतों का शासन भारतीयों के हाथों में दे दिया गया। यह प्रांतीय स्वायत्तता’ के नाम से जाना जाता है।

→ पाकिस्तान प्रस्ताव-लीग द्वारा 1940 के लाहौर अधिवेशन में ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ पास किया गया, जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की स्वतंत्र’ इकाई गठित करने के लिए कहा गया।

→ व्यक्तिगत सत्याग्रह-द्वितीय विश्वयुद्ध के मुद्दे पर सरकार के विरुद्ध काँग्रेस ने 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया।

→ भारत छोड़ो आंदोलन-क्रिप्स मिशन (1942) की असफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया तथा अंग्रेज़ों को तत्काल भारत छोड़कर चले जाने को कहा। अगस्त, 1942 में छेड़े गए इस आंदोलन को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है।

→ निजी लेखन-निजी लेखन में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि शामिल होते हैं। इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता।

→ भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं में महात्मा गाँधी का शीर्ष स्थान है। भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने में उन्होंने सबसे अधिक योगदान दिया, इस कारण उन्हें “राष्ट्र-पिता’ माना गया है। राष्ट्र-निर्माण के इस कार्य में हम उन्हें इटली के गैरीबाल्डी, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम के नेता जार्ज वाशिंगटन और वियतनाम के मुक्ति संघर्ष के नेता हो ची मिन्ह के समकक्ष रख सकते हैं।

→ महात्मा गाँधी का जन्म गुजरात के काठियावाड़ जिले में स्थित पोरबंदर नामक स्थान पर 1869 ई० में हुआ। उनके पिता राजकोट रियासत के दीवान थे। 1888 ई० में कानून की पढ़ाई करने के लिए गाँधी जी इंग्लैंड गए। जल्दी ही वह गुजराती व्यापारी दादा अब्दुला (Dada Abudlla) के कानूनी प्रतिनिधि बनकर 1893 में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे। यहाँ पर गाँधी को जातीय (नसली) भेदभाव का सामना करना पड़ा।

→ गोरे लोगों के हाथों अपमानित होने पर गाँधी जी ने अन्याय के विरुद्ध लड़ना तय किया। यद्यपि गाँधी जी वहाँ पर अपने कार्य के लिए एक वर्ष के लिए गए थे तथापि जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए उन्हें 20 वर्ष रुकना पड़ा। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के विरुद्ध भेदभाव वाले कानूनों के खिलाफ ‘सत्याग्रह’ चलाया। लंबे संघर्ष के दौरान गाँधी जी और उनके साथियों को अनेक बार जेल जाना पड़ा। अंततः आंदोलन से मजबूर होकर सरकार को गाँधी जी से वार्ता करनी पड़ी। सरकार को अपनी नीतियों में परिवर्तन करना पड़ा तथा दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों पर से अनेक प्रतिबंध समाप्त करने पड़े।

→ गाँधी के राजनीतिक विचारों और उनके दर्शन का केंद्र-बिंदु सत्याग्रह है। सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। यह विरोध करने का अहिंसात्मक मार्ग था। गाँधी जी के अनुसार, “सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है। सत्याग्रह असत्य को सत्य से और हिंसा को अहिंसा से जीतने का एक नैतिक शस्त्र है।” सत्याग्रह दो प्रमुख सिद्धांतों पर टिका था-सत्य और अहिंसा। इसलिए गाँधी जी ने संघर्ष में सत्य के साथ-साथ सत्य और अहिंसात्मक तरीकों पर बल दिया। गाँधी जी का जन-शक्ति संगठन में अटूट श्रद्धा थी। उनके नेतृत्व में यह राष्ट्रीय आंदोलन जन-आंदोलन बन गया। भारत में आने पर गोखले ने गाँधी जी को भारत की यात्रा करने की सलाह दी। गाँधी जी जहाँ भी जाते थे, उन्हें देखने के लिए लोगों की भीड़ जुट जाती थी। भारत में गाँधी जी ने अपने ‘सत्याग्रह’ के तरीके का प्रथम अनुभव 1917 में चंपारन (बिहार) में किया। दूसरी बार सत्याग्रह का प्रयोग 1918 में अहमदाबाद (गुजरात) तथा उसी वर्ष तीसरी बार खेड़ा (गुजरात) में ‘सत्याग्रह’ आयोजित किया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

→ ये तीनों ही स्थानीय समस्याओं से जुड़े आंदोलन थे। प्रथम विश्वयुद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयों, रॉलेट एक्ट, खिलाफत आंदोलन तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसे कारणों ने गाँधी जी को अंग्रेजों के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर सत्याग्रह चलाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें विश्वास हो गया था कि “ब्रिटिश साम्राज्य आज शैतानियत का प्रतीक है।” परिणामस्वरूप गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन के रूप में देशव्यापी आंदोलन चलाया। असहयोग आंदोलन ने शीघ्र ही जन-आंदोलन का रूप धारण कर लिया। इस आंदोलन ने जन कार्रवाइयों के लिए रास्ता खोल दिया और यह ब्रिटिश भारत में अभूतपूर्व बात थी। इस आंदोलन से देशभर में उत्साह था। सभी वर्गों ने इसमें भाग लिया था। परंतु इसी बीच 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा में एक हिंसक घटना घटी। इस घटना में 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गाँधी जी को इस घटना से गहरा आघात लगा। उन्होंने तत्काल आंदोलन वापिस ले लिया। असहयोग आंदोलन ने राष्ट्रीय आंदोलन को एक जन-आंदोलन बना दिया था। अब यह सारे देश के सभी भागों में तथा देश के सभी वर्गों व तबकों का आंदोलन बन चुका था। किसानों, श्रमिकों और कारीगरों ने भी इसमें भाग लेना शुरू कर दिया था।

→ गाँधी जी उनके प्रिय नेता बन गए थे। गाँधी जी की जीवन-शैली से लोगों को लगता था कि वे उनके स्वाभाविक नेता हैं। गाँधी जी उन्हीं की तरह वस्त्र पहनते थे व उन्हीं की तरह रहते थे। वे जन-सामान्य की भाषा बोलते थे। गाँधी जी दूसरे नेताओं की तरह जनसमूह से अलग खड़े नहीं होते थे, बल्कि वे उनसे गहरी सहानुभूति रखते थे। गाँधी जी प्रतिदिन अपना कुछ समय चरखा चलाने में व्यतीत करते थे। वे अन्य सहयोगियों को भी चरखा चलाने के लिए प्रोत्साहित करते थे। भारत एक कृषि प्रधान देश होने के कारण यहाँ की जनसंख्या के अधिकांश लोग किसान थे। किसानों में असहयोग आंदोलन के बाद गाँधी जी, ‘गाँधी बाबा’, ‘गाँधी महाराजा’ अथवा सामान्य ‘महात्मा जी’ जैसे नामों से लोकप्रिय हुए। किसानों में उनकी छवि एक उद्धारक के समान थी। गाँधी जी को जन-सामान्य के समीप ले जाने में उनके रचनात्मक कार्य की अहम् भूमिका है। रचनात्मक कार्यों को मुख्यतः खादी व चरखा कातना, ग्रामोद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा, हिंदू-मुस्लिम एकता, हरिजन कल्याण, महिला उत्थान; जैसे कार्यक्रमों के रूप में संगठित किया। साइमन कमीशन को इंग्लैंड
की सरकार ने भारत में 1919 के अधिनियम की कार्य-प्रणाली की समीक्षा करने के लिए भेजा था ताकि आगे सुधारों पर विचार किया जा सके, परंतु इस कमीशन के सभी सदस्य श्वेत थे।

→ भारत के सभी दलों ने इसका जोरदार विरोध किया। 1929 में दिसंबर के अंत में काँग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन लाहौर में किया। इसका अध्यक्ष युवा नेता जवाहरलाल नेहरू को बनाया गया। काँग्रेस ने अपना लक्ष्य ‘पूर्ण स्वराज्य’ अथवा ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को घोषित किया। दांडी यात्रा तथा नमक कानून तोड़ने की योजना गाँधी जी ने बहुत सोच-विचार करके बनाई थी। इस योजना के अनुसार 12 मार्च, 1930 को प्रातः 6 बजकर 30 मिनट पर साबरमती आश्रम से गाँधी जी ने अपने 78 अनुयायियों के साथ 241 मील दूर दांडी नामक स्थान के लिए पद यात्रा शुरू की। 24 दिनों में यात्रा पूरी करके गाँधी जी व उनके सहयोगी 5 अप्रैल को दांडी पहुँचे व 6 अप्रैल को प्रातःकाल में गाँधी जी समुद्र तट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने नमक एकत्र कर नमक कानून को भंग कर दिया और इस प्रकार 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। गाँधी जी द्वारा नमक कानून तोड़ने के साथ ही यह आंदोलन देश के सभी भागों में फैल गया। इस आंदोलन के जवाब में सरकार ने दमन चक्र चलाया। नमक सत्याग्रह के सिलसिले में लगभग 60,000 लोगों को गिरफ्तार किया गया। गाँधी जी को भी हिरासत में ले लिया गया। सर तेज बहादुर सञ्जु तथा डॉ० जयकर की मध्यस्थता से गाँधी जी और वायसराय इर्विन के बीच फरवरी-मार्च 1931 में लंबी बैठकें हुईं। अंत में दोनों में 5 मार्च, 1931 को एक समझौता हुआ जो ‘गाँधी-इर्विन’ समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

→ काँग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधी जी दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए सितंबर, 1931 में लंदन पहुँचे। साइमन कमीशन रिपोर्ट तथा गोलमेज सम्मेलनों के बाद ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों को प्रशासन में भागीदारी के लिए 1935 का अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम के तहत प्रांतों में स्वायत्त शासन की स्थापना की गई थी। भारतीय दल 1935 के एक्ट से संतुष्ट नहीं थे तथापि उन्होंने इस एक्ट के तहत 1937 में प्रांतीय सभाओं के लिए चुनाव हुए तो इनमें भाग लिया। इन चुनावों में काँग्रेस को भारी सफलता प्राप्त हुई। 1937 के चुनावों में मुस्लिम लीग को भारी असफलता हाथ लगी थी। वह संयुक्त प्रांत में सांझी सरकार भी नहीं बना पाई। अब उसे लग रहा था कि पृथक् निर्वाचिका से भी उसे सत्ता नहीं मिलने वाली है तो उसने उग्र रूप अपना लिया। इसके साथ ही मार्च, 1940 में अपने लाहौर अधिवेशन में लीग ने ‘पाकिस्तान प्रस्ताव’ को पारित किया, जिसमें मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्रों की ‘स्वतंत्र’ इकाई गठित करने के लिए कहा गया। 1942 ई० में ब्रिटेन ने भारतीय नेताओं से बातचीत करने तथा भारतीय समस्या को हल करने के लिए क्रिप्स मिशन भारत भेजा। स्टैफर्ड क्रिप्स 22 मार्च, 1942 को भारत पहुँचे तथा अपने प्रस्ताव भारतीयों के समक्ष रखे। क्रिप्स प्रस्ताव अपर्याप्त और असंतोषजनक थे। इसमें सभी दलों को खुश करने का प्रयास किया गया, परंतु सभी भारतीय दलों ने इन प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया।

→ क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ अपना तीसरा बड़ा आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। अगस्त, 1942 में छेड़े गए इस आंदोलन को ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। 7 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक शुरू हुई। इस बैठक में वर्धा में पास किए ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ का अनुमोदन कर दिया गया। साथ ही गाँधी जी को अहिंसक संघर्ष छोड़ने की मंजूरी दी। 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद अपने भाषण में महात्मा गाँधी ने कहा, “आप लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति को अब से स्वयं को स्वतंत्र व्यक्ति समझना चाहिए तथा इस प्रकार का कार्य करना चाहिए कि मानो आप स्वतंत्र हो….. मैं स्वतंत्रता से कम किसी भी वस्तु से संतुष्ट नहीं होऊँगा। हम करेंगे या मरेंगे। हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएँगे या इस प्रयास में मर मिटेंगे।” भारत छोड़ो आंदोलन सही मायनों में एक जनांदोलन था। इसमें लाखों आम लोगों ने स्वयं की प्रेरणा से भाग लिया। इतिहासकार बिपिन चंद्र का मानना है कि, “भारत छोड़ो आंदोलन में आम जनता की हिस्सेदारी तथा समर्थन एक नई सीमा तक पहुँचा।”

→ 1945-47 के मध्य तेजी से वार्ताओं का दौर शुरू हुआ। गाँधी जी सत्ता की इन वार्ताओं से लगभग दूर रहे। उन्होंने आखिर तक विभाजन का विरोध किया। गाँधी जी 15 अगस्त को दिल्ली में उपस्थित नहीं थे। वे कलकत्ता में सांप्रदायिक सद्भाव को बहाल करने के दुष्कर कार्य में लगे हुए थे। उन्होंने 24 घंटे का उपवास रखा। वे अकेले ही स्थान-स्थान पर जाकर हिंदू-मुस्लिमों के आपसी वैर-भाव को समाप्त करने में लगे थे। गाँधी जी की धर्म में गहरी आस्था थी, किंतु साथ ही वे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत में भी दृढ़ आस्था रखते थे। नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी, 1948 की शाम को दैनिक प्रार्थना के समय गाँधी जी पर गोली चलाकर उन्हें मौत की नींद सुला दिया। गाँधी जी एक धर्मांध के हाथों शहीद हो गए। गाँधी जी की शहादत से सारे देश में गहरे शोक की लहर दौड़ गई। उनकी शहादत पर भारत में ही नहीं, विश्वभर में उन्हें भाव-भीनी श्रद्धांजलि दी गई।

→ इतिहासकार समस्त स्रोतों का अध्ययन और विवेचन करते हुए गाँधी जी के राजनीतिक सफर और राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं। इतिहासकार के लिए यह भाषण बड़े महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं क्योंकि इनसे उनकी नीतियों, कार्यक्रमों तथा लोगों को संगठित करने के तरीकों की झलक मिलती है। निजी लेखन में व्यक्तिगत पत्र-व्यवहार तथा दैनिक डायरी इत्यादि शामिल होते हैं। इसमें प्रायः वे बातें भी मिल जाती हैं जिन्हें सार्वजनिक तौर पर अभिव्यक्त नहीं किया गया होता। आत्मकथाएँ एक अन्य महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। आत्मकथाओं में मानवीय गतिविधियों का विविध विवरण मिलता है। भारतीयों की राजनीतिक गतिविधियों के बारे में अंग्रेज़ सरकार कड़ी नज़र रखती थी। इन गतिविधियों के बारे में पुलिस व अन्य अधिकारी अपनी रिपोर्टों और पत्रों से सरकार को अवगत करवाते थे। इन दस्तावेजों को पढ़कर हम जान पाते हैं कि पुलिस व अधिकारियों की नजर में गाँधी जी और उसके सहयोगियों की गतिविधियाँ कैसी थीं। 20वीं सदी के दूसरे दशक के अंत में गाँधी जी राष्ट्रीय नेता बनकर उभरे। इस समय बड़ी संख्या में अंग्रेजी और हिंदी में समाचार-पत्र प्रकाशित हो रहे थे जिन्होंने गाँधी जी की गतिविधियों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। गाँधी जी को समझने के लिए ये महत्त्वपूर्ण साधन हैं।

काल-रेखा

कालघटना का विवरण
2 अक्तूबर, 1869 ई०गाँधी जी का जन्म।
1893 ई०गाँधी जी का दक्षिण अफ्रीका जाना।
जनवरी, 1915गाँधी जी का भारत आगमन।
1916 ई०प० मदन मोहन मालवीय द्वारा बनारस विश्वविद्यालय की स्थापना तथा गाँधी जी द्वारा समारोह में भाषण।
अप्रैल, 1917चंपारन सत्याग्रह का प्रारंभ ।
1918 ई०अहमदाबाद और खेड़ा (गुजरात में सत्याग्रह)
6 अप्रैल, 1919रॉलेट एक्ट पर अखिल भारतीय
13 अप्रैल, 1919जलियाँवाला बाग हत्याकांड।
1918 ई०खिलाफ़त कमेटी का गठन।
1 अगस्त, 1920गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया।
5 फरवरी, 1922चौरी-चौरा की घटना
12 फरवरी, 1922असहयोग आंदोलन का संगठन।
1928 ई०साइमन कमीशन का भारत आना।
31 दिसंबर, 1929लाहौर अधिवेशन में पूर्व स्वतंत्रता प्रस्ताव पास
26 जनवरी, 1930प्रथम स्वतंत्रता दिवस मनाया गया।
12 मार्च, 1930गाँधी जी द्वारा दांडी यात्रा का प्रारंभ
6 अप्रैल, 1930गाँधी जी ने नमक कानून तोड़ा।
5 मार्च, 1931गाँधी-इर्विन पैक्ट हुआ।
1931 ई०दूसरा गोलमेज सम्मेलन तथा गाँधी का लंदन जाना।
1937 ई०प्रांतीय सभाओं के चुनाव
3. सितंबर, 1939वायसराय द्वारा भारत को द्वितीय विश्वयुद्ध में झोंकना
22 अक्तूबर, 1939काँग्रेस सरकारों का त्याग-पत्र देना।
22 दिसंबर, 1939लीग द्वारा ‘मुक्ति दिवस मनाना’।
मार्च, 1940लीग का पाकिस्तान प्रस्ताव।
8 अगस्त, 1940लिनलिथगों द्वारा ‘अगस्त प्रस्ताव’ रखना।
8 अगस्त, 1942भारत छोड़ो प्रस्ताव पास किया।
9 अगस्त, 1942भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ।
14 जून, 1945‘वेवल योजना’ प्रस्ताव प्रस्तुत।
16 अगस्त, 1946लीग द्वारा कार्रवाई दिवस मनाना।
15 अगस्त, 1947भारत का स्वतंत्र होना।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

HBSE 12th Class History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्ड्स सँभालकर क्यों रखे जाते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में प्रत्येक कार्यालय के अपने ‘रिकॉर्डस रूम’ थे जिनमें रिकॉर्डस को सुरक्षित रखा जाता था। इसके निम्नलिखित कारण थे

(1) भारत में ब्रिटिश सत्ता मुख्यतया आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित थी। उसका लक्ष्य भारत के संसाधनों को निरंतर दोहन करते हुए मुनाफा बटोरना था। इसके लिए वह अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुदृढ़ रखना चाहती थी। ये दोनों काम बिना पर्याप्त जानकारियों के संभव नहीं थे।

(2) आंकड़ों का सर्वाधिक महत्त्व उनके लिए वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए था। कंपनी सरकार द्वारा वस्तुओं, संसाधनों व व्यापार की संभावनाओं संबंधी आकलन व ब्यौरे तैयार करवाए जाते थे। कंपनी कार्यालयों में आयात-निर्यात संबंधी विवरण रखे जाते थे।

(3) शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से शहरी जनसंख्या के उतार-चढ़ाव की जानकारी महत्त्वपूर्ण थी। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण, यातायात तथा साफ-सफाई इत्यादि के बारे में निर्णय लेने के लिए विविध जानकारियाँ आवश्यक थीं। अतः सांख्यिकी आँकड़े एकत्रित कर उन्हें सरकारी रिपोर्टों में प्रकाशित किया जाता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना संबंधी आंकड़े किस हद तक उपयोगी होते हैं?
उत्तर:
जनगणना के आँकड़े शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें लोगों के व्यवसायों की जानकारी तथा उनके लिंग, आयु व जाति संबंधी सूचनाएँ मिलती हैं। ये जानकारियाँ आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए काफी उपयोगी हैं। ध्यान रहे कई बार आँकड़ों के इस भारी-भरकम भंडार से सटीकता का भ्रम हो सकता है। यह जानकारी बिल्कुल सटीक नहीं होती। इन आँकड़ों के पीछे भी संभावित पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जैसे कि बहुत-से लोग अपने परिवार की महिलाओं की जानकारी छुपा लेते थे। ऐसे लोगों को किसी श्रेणी विशेष में रखना मुश्किल हो जाता था। वे दो तरह के काम करते थे। उदाहरण के लिए जो खेती भी करता हो और व्यापारी भी हो। ऐसे लोगों को सुविधानुसार ही किसी श्रेणी में रख लिया जाता था।

अपनी इन सीमाओं के बावजूद भी शहरीकरण के रुझानों को समझने में पहले के शहरों की तुलना में ये आँकड़े अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं। उदाहरण के लिए 1900 से 1940 तक की जनगणनाओं से पता चलता है कि इस अवधि में कुल आबादी का 13 प्रतिशत से भी कम हिस्सा शहरों में रहता था। स्पष्ट है कि औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा।

प्रश्न 3.
“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
‘व्हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन शब्द नगर संरचना में नस्ली भेदभाव का प्रतीक थे। अंग्रेज़ गोरे लोग दुर्गों के अंदर बनी बस्तियों में रहते थे, जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर और मज़दूर इन किलों से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। दुर्ग के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। अलग रहने की यह नीति शुरू से ही अपनाई गई थी। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखता है। यह उस समय और भी तीखा हो गया जब अंग्रेज़ों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया। ‘व्हाइट टाउन’ प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केंद्र भी था।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 4.
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?
उत्तर:
18वीं सदी से पहले ही बहुत-से भारतीय व्यापारी यूरोपीय कंपनियों के सहायक के तौर पर काम करते आ रहे थे। उनमें से बहुत सारे दुभाषिए थे, यानि अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा जानते थे। वे अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाते थे। साथ में ये एजेंट या व्यापारी का काम भी करते थे। वे निर्यात होने वाली वस्तुओं के संग्रह में सहायक थे। इन सहायक व्यापारिक गतिविधियों में काम करते हुए कुछ भारतीय व्यापारियों ने काफी धन एकत्रित कर लिया था। 19वीं सदी के मध्य से तो

इन धनी व्यापारियों में से कुछ उद्यमी बनने लगे थे, अर्थात् उन्होंने उद्योग लगाने शुरू किए। उदाहरण के लिए, 1853 ई० में बंबई के कावसजी नाना ने भारतीय पूँजी से पहली कपड़ा मिल लगाई, लेकिन इन उभरते हुए भारतीय उद्योगपतियों को सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से काफी बाधा पहुँची। यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पश्चिमी जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। यह विभिन्न त्योहारों के अवसरों पर रंगीन दावतों का आयोजन करने लगा ताकि अपने स्वामी अंग्रेज़ों को प्रभावित कर सकें। यह अपने देशवासियों को भी अपनी हैसियत का परिचय करवाना चाहता था। इस उद्देश्य से इस वर्ग के लोगों ने बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्त्व किस हद तक घुल-मिल गए थे? [2017, 2019 (Set-D)]
उत्तर:
मद्रास शहर का विकास अंग्रेज़ शासकों की जरूरतों और सुविधाओं के अनुरूप किया गया था। ‘व्हाइट टाउन’ तो था ही गोरे लोगों के लिए। ‘ब्लैक टाउन’ में भारतीय रहते थे। शहर के इस भाग में बहुत-से लोग नौकरी, व्यवसाय और मजदूरी के लिए आकर बसते रहे। इस प्रकार लंबे समय तक शहर में रहते रहे और ग्रामीण और शहरी तत्त्वों का मिश्रण होता रहा। उदाहरण के लिए

  1. ‘वेल्लार’ एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। कंपनी की नौकरियाँ पाने वालों में ये लोग अग्रणी रहे। इन्होंने मद्रास में नए अवसरों का काफी लाभ उठाया।
  2. तेलुगू कोमाटी समुदाय ने मद्रास में व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इन्होंने अनाज के व्यापार पर नियंत्रण कर लिया।
  3. पेरियार और वन्नियार समुदाय शहर में मजदूरी का कार्य करने लगे थे।

धीरे-धीरे ऐसे बहुत-से समुदायों की बस्तियाँ मद्रास शहर का भाग बन गईं। साथ ही बहुत-से गाँवों को मिलाने के कारण मद्रास शहर दूर-दूर तक फैल गया। आस-पास के गाँव नए उप-शहरों में बदल गए। इस प्रकार शहर फैलता चला गया और मद्रास एक अर्ध-ग्रामीण शहर जैसा हो गया।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अठारहवीं सदी में शहरी केंद्रों का रूपांतरण किस तरह हुआ?
उत्तर:
18वीं सदी के शहर नए (New) थे। 16वीं व 17वीं सदी के शहरों की तुलना में इन शहरों की भौतिक संरचना और सामाजिक जीवन भिन्न था। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रदर्शित कर रहे थे। नए शहरों में मद्रास, कलकत्ता और बम्बई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ। 18वीं सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते ये बड़े नगरों के तौर पर उभर चुके थे। इनमें आकर बसने वाले अधिकांश भारतीय अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक गतिविधियों में सहायक के तौर पर काम करने वाले थे। अंग्रेज़ों ने अपने ‘कारखाने’ यानी वाणिज्यिक कार्यालय इन शहरों में स्थापित किए हुए थे।

इनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शरू से ही दिखाई पडता है।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
नए शहर अंग्रेज़ शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिंबित करते थे। कहने का अभिप्राय यह है कि जो नए सार्वजनिक स्थान विकसित हुए वो मुख्यतया नए शासकों की जरूरत के अनुरूप थे। मुख्य नए सार्वजनिक स्थान व उनके उद्देश्य इस प्रकार हैं

  1. नदी और समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास हुआ। इनका उद्देश्य ब्रिटिश व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना था।
  2. ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों के लिए वाणिज्यिक कार्यालय और गोदाम बनाए।
  3. व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं में यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों का विकास हुआ। जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं।
  4. प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना हुई। कलकत्ता में ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।

पुस्तक के प्रश्न

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों में रिकॉर्स सँभालकर क्यों रखे जाते थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक शहरों में प्रत्येक कार्यालय के अपने रिकॉर्डस रूम’ थे जिनमें रिकॉर्डस को सुरक्षित रखा जाता था। इसके निम्नलिखित कारण थे

(1) भारत में ब्रिटिश सत्ता मुख्यतया आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित थी। उसका लक्ष्य भारत के संसाधनों को निरंतर दोहन करते हुए मुनाफा बटोरना था। इसके लिए वह अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुदृढ़ रखना चाहती थी। ये दोनों काम बिना पर्याप्त जानकारियों के संभव नहीं थे।

(2) आंकड़ों का सर्वाधिक महत्त्व उनके लिए वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए था। कंपनी सरकार द्वारा वस्तुओं, संसाधनों व व्यापार की संभावनाओं संबंधी आकलन व ब्यौरे तैयार करवाए जाते थे। कंपनी कार्यालयों में आयात-निर्यात संबंधी विवरण रखे जाते थे।

(3) शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से शहरी जनसंख्या के उतार-चढ़ाव की जानकारी महत्त्वपूर्ण थी। उदाहरण के लिए, सड़क निर्माण, यातायात तथा साफ-सफाई इत्यादि के बारे में निर्णय लेने के लिए विविध जानकारियाँ आवश्यक थीं। अतः सांख्यिकी आँकड़े एकत्रित कर उन्हें सरकारी रिपोर्टों में प्रकाशित किया जाता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक संदर्भ में शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए जनगणना संबंधी आंकड़े किस हद तक उपयोगी होते हैं?
उत्तर:
जनगणना के आँकड़े शहरीकरण के रुझानों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनमें लोगों के व्यवसायों की जानकारी तथा उनके लिंग, आयु व जाति संबंधी सूचनाएँ मिलती हैं। ये जानकारियाँ आर्थिक और सामाजिक स्थिति को समझने के लिए काफी उपयोगी हैं। ध्यान रहे कई बार आँकड़ों के इस भारी-भरकम भंडार से सटीकता का भ्रम हो सकता है। यह जानकारी बिल्कुल सटीक नहीं होती। इन आँकड़ों के पीछे भी संभावित पूर्वाग्रह हो सकते हैं। जैसे कि बहुत-से लोग अपने परिवार की महिलाओं की जानकारी छुपा लेते थे। ऐसे लोगों को किसी श्रेणी विशेष में रखना मुश्किल हो जाता था। वे दो तरह के काम करते थे। उदाहरण के लिए जो खेती भी करता हो और व्यापारी भी हो। ऐसे लोगों को सुविधानुसार ही किसी श्रेणी में रख लिया जाता था।

अपनी इन सीमाओं के बावजूद भी शहरीकरण के रुझानों को समझने में पहले के शहरों की तुलना में ये आँकड़े अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारी देते हैं। उदाहरण के लिए 1900 से 1940 तक की जनगणनाओं से पता चलता है कि इस अवधि में कुल आबादी का 13 प्रतिशत से भी कम हिस्सा शहरों में रहता था। स्पष्ट है कि औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा।

प्रश्न 3.
“व्हाइट” और “ब्लैक” टाउन शब्दों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
‘व्हाइट’ और ‘ब्लैक’ टाउन शब्द नगर संरचना में नस्ली भेदभाव का प्रतीक थे। अंग्रेज़ गोरे लोग दुर्गों के अंदर बनी बस्तियों में रहते थे, जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर और मज़दूर इन किलों से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। दुर्ग के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। अलग रहने की यह नीति शुरू से ही अपनाई गई थी। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखता है। यह उस समय और भी तीखा हो गया जब अंग्रेज़ों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया। ‘व्हाइट टाउन’ प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केंद्र भी था।

प्रश्न 4.
प्रमुख भारतीय व्यापारियों ने औपनिवेशिक शहरों में खुद को किस तरह स्थापित किया?
उत्तर:
18वीं सदी से पहले ही बहुत-से भारतीय व्यापारी यूरोपीय कंपनियों के सहायक के तौर पर काम करते आ रहे थे। उनमें से बहुत सारे दुभाषिए थे, यानि अंग्रेज़ी और स्थानीय भाषा जानते थे। वे अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच मध्यस्थता की भूमिका निभाते थे। साथ में ये एजेंट या व्यापारी का काम भी करते थे। वे निर्यात होने वाली वस्तुओं के संग्रह में सहायक थे। इन सहायक व्यापारिक गतिविधियों में काम करते हुए कुछ भारतीय व्यापारियों ने काफी धन एकत्रित कर लिया था। 19वीं सदी के मध्य से तो इन धनी व्यापारियों में से कुछ उद्यमी बनने लगे थे, अर्थात् उन्होंने उद्योग लगाने शुरू किए। उदाहरण के लिए, 1853 ई० में बंबई के कावसजी नाना ने भारतीय पूँजी से पहली कपड़ा मिल लगाई, लेकिन इन उभरते हुए भारतीय उद्योगपतियों को सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से काफी बाधा पहुंची।

यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पश्चिमी जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। यह विभिन्न त्योहारों के अवसरों पर रंगीन दावतों का आयोजन करने लगा ताकि अपने स्वामी अंग्रेजों को प्रभावित कर सकें। यह अपने देशवासियों को भी अपनी हैसियत का परिचय करवाना चाहता था। इस उद्देश्य से इस वर्ग के लोगों ने बड़े-बड़े मंदिरों का निर्माण करवाया।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक मद्रास में शहरी और ग्रामीण तत्त्व किस हद तक घुल-मिल गए थे?
उत्तर:
मद्रास शहर का विकास अंग्रेज़ शासकों की जरूरतों और सुविधाओं के अनुरूप किया गया था। ‘व्हाइट टाउन’ तो था ही गोरे लोगों के लिए। ‘ब्लैक टाउन’ में भारतीय रहते थे। शहर के इस भाग में बहुत-से लोग नौकरी, व्यवसाय और मजदूरी के लिए आकर बसते रहे। इस प्रकार लंबे समय तक शहर में रहते रहे और ग्रामीण और शहरी तत्त्वों का मिश्रण होता रहा। उदाहरण के लिए
(1) ‘वेल्लार’ एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। कंपनी की नौकरियाँ पाने वालों में ये लोग अग्रणी रहे। इन्होंने मद्रास में नए अवसरों का काफी लाभ उठाया।

(2) तेलुगू कोमाटी समुदाय ने मद्रास में व्यावसायिक सफलता प्राप्त की। धीरे-धीरे इन्होंने अनाज के व्यापार पर नियंत्रण कर लिया।

(3) पेरियार और वन्नियार समुदाय शहर में मजदूरी का कार्य करने लगे थे। धीरे-धीरे ऐसे बहुत-से समुदायों की बस्तियाँ मद्रास शहर का भाग बन गईं। साथ ही बहुत-से गाँवों को मिलाने के कारण मद्रास शहर दूर-दूर तक फैल गया। आस-पास के गाँव नए उप-शहरों में बदल गए। इस प्रकार शहर फैलता चला गया और मद्रास एक अर्ध-ग्रामीण शहर जैसा हो गया।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अठारहवीं सदी में शहरी केंद्रों का रूपांतरण किस तरह हुआ?
उत्तर:
18वीं सदी के शहर नए (New) थे। 16वीं व 17वीं सदी के शहरों की तुलना में इन शहरों की भौतिक संरचना और सामाजिक जीवन भिन्न था। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रदर्शित कर रहे थे।
नए शहरों में मद्रास, कलकत्ता और बम्बई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ। 18वीं सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते ये बड़े नगरों के तौर पर उभर चुके थे। इनमें आकर बसने वाले अधिकांश भारतीय अंग्रेजों की वाणिज्यिक गतिविधियों में सहायक के तौर पर काम करने वाले थे। अंग्रेज़ों ने अपने ‘कारखाने’ यानी वाणिज्यिक कार्यालय इन शहरों में स्थापित किए हुए थे।

इनकी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही दिखाई पड़ता है।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शहर में सामने आने वाले नए तरह के सार्वजनिक स्थान कौन से थे? उनके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
नए शहर अंग्रेज़ शासकों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिंबित करते थे। कहने का अभिप्राय यह है कि जो नए सार्वजनिक स्थान विकसित हुए वो मुख्यतया नए शासकों की जरूरत के अनुरूप थे।
मुख्य नए सार्वजनिक स्थान व उनके उद्देश्य इस प्रकार हैं

  • नदी और समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास हुआ। इनका उद्देश्य ब्रिटिश व्यापारिक गतिविधियों का विस्तार करना था।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी व्यापारिक गतिविधियों के लिए वाणिज्यिक कार्यालय और गोदाम बनाए।
  • व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं में यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों का विकास हुआ। जहाजरानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं।
  • प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना हुई। कलकत्ता में ‘राइटर्स बिल्डिंग’ इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है।
  • पाश्चात्य शिक्षा के लिए अंग्रेज़ी-शिक्षण संस्थान खोले गए। ईसाई लोगों के लिए एंग्लिकन चर्च बनाए गए।
  • रेलवे के विस्तार के साथ बड़े-बड़े रेलवे-जंक्शन बनाए गए।
  • 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बड़े शहरों में नगर निगम तथा अन्य शहरों में नगरपालिकाओं का गठन किया गया। इनका उद्देश्य शहर में सफाई, जल-आपूर्ति तथा चिकित्सा इत्यादि का प्रबंध करना था।

प्रश्न 8.
उन्नीसवीं सदी में नगर-नियोजन को प्रभावित करने वाली चिंताएँ कौन सी थीं?
उत्तर:
19वीं सदी के प्रारंभ से ही नगर-नियोजन की चिंता अंग्रेज़ प्रशासकों को सताने लगी थी। 1857 ई० के विद्रोह के बाद यह चिंता और भी गहरा गई। हैजा और प्लेग जैसी महामारियों के फैलने से वे और भी चिंतित हो उठे थे। सबसे पहले इस ओर ध्यान लॉर्ड वेलेज्ली ने दिया। 1803 में उसका प्रशासकीय आदेश ‘जन-स्वास्थ्य’ व नगर नियोजन में एक प्रमुख विचार बन गया था। प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्यों उन्होंने नगर को व्यवस्थित करने पर जोर दिया? जबकि काफी समय तक उन्होंने शहर में भारतीयों की बस्तियों में सुधार की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। अंग्रेज़ अधिकारियों की नगर को नियोजित करने के पीछे निम्नलिखित चिंताएँ थीं

1. प्रशासकीय नियंत्रण उन्होंने यह महसूस किया कि शहरी जीवन के सभी आयामों पर नियंत्रण के लिए स्थायी व सार्वजनिक नियम बनाना जरूरी है। साथ ही सड़कों व इमारतों के निर्माण के लिए मानक नियमों का होना भी जरूरी है।

2. सुरक्षा-किलों के बाहर उन्होंने विशेषतौर पर खुला मैदान रखा ताकि आक्रमण होने की स्थिति में सीधी गोलीबारी की जा सके। कलकत्ता के किले के बाहर ऐसे मैदान आज भी मौजूद हैं।

3. सुरक्षित आश्रयस्थल-सन् 1857 के विद्रोह के बाद औपनिवेशिक शहरों के नियोजन में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। आतंकित अधिकारी वर्ग ने भविष्य में विद्रोह की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘देशियों’ यानी भारतीयों से अलग ‘सिविल लाइंस’ में रहने की नीति अपनाई।

4. स्वास्थ्य की चिंता–प्लेग व हैजा जैसी महामारियों के प्रसार के डर से नगर-नियोजन की जरूरत और भी महत्त्वपूर्ण होती गई। वे इस बात से परेशान हो उठे कि भीड़-भाड़ वाली भारतीय बस्तियों में गंदगी व दूषित पानी से बीमारियाँ फैल रही हैं। इस विचार से इन बस्तियों में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ गया।

5. सत्ता की ताकत का प्रदर्शन-व्यवस्थित नगरों के माध्यम से अंग्रेज़ अपनी साम्राज्यवादी ताकत का प्रदर्शन करना चाहते थे। इसलिए विशेषतौर पर पहले उन्होंने कलकत्ता, बंबई और मद्रास को नियोजित राजधानियाँ बनाया। फिर दिल्ली को ‘नई दिल्ली’ के रूप में विकसित किया।

प्रश्न 9.
नए शहरों में सामाजिक संबंध किस हद तक बदल गए?
उत्तर:
नए शहरों का सामाजिक संबंध पहले के शहरों से बहुत कुछ अलग था। इसमें जिन्दगी की गति बहुत तेज़ थी। नए सामाजिक वर्ग व संबंध उभर चुके थे। मुख्य परिवर्तन इस प्रकार थे

(1) नए शहर मध्य वर्ग के केन्द्र बन चुके थे। इस वर्ग में शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउंटेंट्स इत्यादि थे। यह वर्ग एक नया सामाजिक समूह था जिसके लिए पुरानी पहचान अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रही थी। इन नए शहरों में पुराने शहरों वाला परस्पर मिलने-जुलने का अहसास खत्म हो चुका था, लेकिन साथ ही मिलने-जुलने के नए स्थल; जैसे कि सार्वजनिक पार्क, टाउन हॉल, रंगशाला और 20वीं सदी में सिनेमा हॉल इत्यादि बन चुके थे।

(2) नए शहरों में नए अर्थतंत्र के विकास से औरतों के लिए नए अवसर उत्पन्न हुए। फलतः सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। वे घरों में नौकरानी, फैक्टरी में मजदूर, शिक्षिका, रंग-कर्मी तथा फिल्मों में कार्य करती हुई दिखाई देने लगीं। उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक स्थानों पर कामकाज करने वाली महिलाओं को लंबे समय तक सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा गया, क्योंकि रूढ़िवादी विचारों के लोग पुरानी परम्पराओं और व्यवस्था को बनाए रखने का समर्थन कर रहे थे। वे परिवर्तन के विरोधी थे।

(3) कामगार लोगों के लिए शहरी जीवन एक संघर्ष था। ये लोग इन नए शहरों की तड़क-भड़क से आकर्षित होकर या रोजी-रोटी की तलाश में आए। शहर में इनकी नौकरी स्थायी नहीं थी। वेतन कम था और खर्चे ज्यादा थे। इसलिए इनके परिवार गाँवों में रहते थे।

इस प्रकार कामगार लोगों का जीवन गरीबी से पीड़ित था। वे गाँव की संस्कृति से वंचित हो गए थे। शहरों में इन्होंने भी एक हद तक ‘एक शहरी संस्कृति’ रच ली थी। वे धार्मिक त्योहारों, मेलों, स्वांगों तथा तमाशों इत्यादि में भाग लेते थे। ऐसे अवसरों पर वे अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों का मज़ाक उड़ाते थे।

परियोजना कार्य

प्रश्न 10.
पता लगाइए कि आपके कस्बे या गाँव में स्थानीय प्रशासन कौन-सी सेवाएँ प्रदान करता है। क्या जलापूर्ति, आवास, यातायात और स्वास्थ्य एवं स्वच्छता आदि सेवाएँ भी उनके हिस्से में आती हैं? इन सेवाओं के लिए संसाधनों की व्यवस्था कैसे की जाती है? नीतियाँ कैसे बनाई जाती हैं? क्या शहरी मज़दूरों या ग्रामीण इलाकों के खेतिहर मजदूरों के पास नीति-निर्धारण में हस्तक्षेप का अधिकार होता है? क्या उनसे राय ली जाती है? अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
संकेत

1. कस्बे, शहर और गाँव के प्रशासन को स्थानीय प्रशासन कहा जाता है।

2. स्थानीय प्रशासन, जलापूर्ति, आवास, यातायात, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता आदि बहुत-सी सेवाओं के लिए उत्तरदायी होता है-अब आपने देखना है कि व्यवहार में स्थिति क्या है? क्या स्वच्छता, सड़क व जलापूर्ति संतोषजनक हैं, बहुत ही बेहतर है या फिर असंतोषजनक।

3. शहर व गाँव से निकलने वाले कचरे व कूड़ा-करकट के लिए क्या व्यवस्था की गई है? खुले में फैंका जाता है, दबाया जाता है, जलाया जाता है या फिर कोई ‘प्लाट’ लगाकर खाद व अन्य उपयोगी वस्तुओं में बदला जाता है। पता लगाएँ।

4. इन सभी सुविधाओं के लिए धन की व्यवस्था कहाँ से होती है, अर्थात् प्रत्यक्ष कर कितना लगाया जाता है और राज्य व केंद्रीय सरकार से कितना अनुदान प्राप्त होता है। क्या विश्व बैंक भी इसमें सहायता कर रहा है-पता लगाएँ। यदि कर रहा है तो क्यों?

5. स्थानीय गरीब लोगों (मजदूर, खेत, मजदूर इत्यादि) का नीति निर्धारण में योगदान इस बात से पता लगाएँ कि गाँव या कस्बे के निकाय के लिए चुनाव होता है या नहीं। दूसरा अधिकारी वर्ग उनकी बात सुनता है या नहीं।

6. उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपने प्राध्यापक के निर्देशन में रिपोर्ट तैयार करें।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 11.
अपने शहर या गाँव में पाँच तरह की इमारतों को चुनिए। प्रत्येक के बारे में पता लगाइए कि उन्हें कब बनाया गया, उनको बनाने का फैसला क्यों लिया गया, उनके लिए संसाधनों की व्यवस्था कैसे की गई, उनके निर्माण का जिम्मा किसने उठाया और उनके निर्माण में कितना समय लगा। उन इमारतों के स्थापत्य या वास्तु शैली संबंधी आयामों का वर्णन करिए और औपनिवेशिक स्थापत्य से उनकी समानताओं या भिन्नताओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
हर शहर व गाँव में सार्वजनिक भवन होते हैं जैसे कि, स्कूल, महाविद्यालय, पंचायतघर, शहर में टाउन हाल, नगरपालिका, अस्पताल, लाइब्रेरी इत्यादि।

  1. इनको बनाने में पंचायत, नगर निगम/पालिका यानी स्थानीय निकायों की भूमिका की जांच करें। सामान्य लोगों की राय किस प्रकार ऐसे निर्णयों का हिस्सा बनती है?
  2. धन के लिए क्या स्थानीय कर लगाया गया या राज्य व केंद्र में ‘ग्रांट’ मिली।
  3. इनमें ‘वास्तुशैली’ अथवा स्थापत्य शैली कौन-सी अपनाई गई है। सत्ता की झलक किस रूप में मिलती है-देखें। कौन-सी संस्कृति झलकती है।
  4. औपनिवेशिक स्थापत्य से यदि तुलना करोगे तो आप पाओगे कि नए स्थापत्य में स्वतंत्र भारत की झलक है।
  5. इन सब पहलुओं को ध्यान में रखते हुए अपने प्राध्यापक के निर्देशन में रिपोर्ट तैयार करें।

औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य HBSE 12th Class History Notes

→ शहरीकरण-शहर का भौतिक व सांस्कृतिक विकास अर्थात शहरी संस्थाओं (प्रशासनिक व शैक्षणिक) का विकास; मध्य वर्ग का विकास; भौतिक संरचना का विस्तार व विकास; नए शहरी तत्त्वों विशेषतः आधुनिक दृष्टिकोण का विकास।

→ कस्बा-मुगलकालीन भारत में एक छोटा ‘ग्रामीण शहर’ जो सामान्यतया किसी विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था।

→ गंज-मुगलकालीन कस्बों में एक स्थायी छोटे बाजार को गंज कहा जाता था।

→ पेठ व पुरम-पेठ एक तमिल शब्द है जिसका अर्थ होता है बस्ती, जबकि पुरम शब्द गाँव के लिए प्रयोग किया जाता है।

→ बस्ती बस्ती (बंगला व हिंदी) का अर्थ मूल रूप में मोहल्ला अथवा बसावट हुआ करता था। परंतु अंग्रेज़ों ने इसका अर्थ संकुचित कर दिया तथा इसे गरीबों की कच्ची झोंपड़ियों के लिए प्रयोग करने लगे। 19वीं सदी में गंदी-झोंपड़ पट्टी को बस्ती कहा जाने लगा।

→ बंगलो (Bunglow)-अंग्रेज़ी भाषा का यह शब्द बंगाल के ‘बंगला’ शब्द से निकला है जो एक परंपरागत फँस की झोंपड़ी होती थी। अंग्रेज़ अधिकारियों ने अपने रहने के बड़े-बड़े घरों को बंगलों नाम देकर इसका अर्थ ही बदल दिया।

→ ढलवाँ छतें -ढलवाँ छतें (Pitched Roofs) स्लोपदार छतों को कहा गया। 20वीं सदी के शुरु से ही बंगलों में ढलवाँ छतों का चलन कम होने लगा था तथापि मकानों की सामान्य योजना में कोई बदलाव नहीं आया था।

→ सिविल लाइंस -पुराने शहर के साथ लगते खेत एवं चरागाह को साफ करके विकसित किए गए शहरी क्षेत्र को ‘सिविल लाइंस’ का नाम दिया गया। इनमें सुनियोजित तरीके से बड़े-बड़े बगीचे, बंगले, चर्च, सैनिक बैरकें और परेड मैदान आदि होते थे।

→ औद्योगिकीकरण यह शब्द औद्योगिक क्रांति की उस प्रक्रिया के लिए उपयोग में लाया गया है जिसमें विज्ञान व तकनीक के क्षेत्र में नए-नए आविष्कार हुए, जिनमें लोहा, स्टील, कोयला एवं वस्त्र आदि सभी उद्योगों का स्वरूप बदल गया। वाष्प ऊर्जा – औद्योगिक क्रांति का मुख्य आधार थी। यह सबसे पहले इंग्लैंड (लगभग 1750 से 1850 के बीच) में हुई।

→ भारत में औपनिवेशिकरण के फलस्वरूप शहरों और उनके चरित्र में परिवर्तन हुए। नए शहरों का उदय हुआ। इनमें पश्चिम तट पर बम्बई व पूर्वी तट पर मद्रास और कलकत्ता तीन प्रमुख बन्दरगाह नगर विकसित हुए। ये तीनों कभी मछुआरों और दस्तकारों के गाँव मात्र थे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के कारण धीरे-धीरे 18वीं सदी के अंत तक भारत के सबसे बड़े शहर बन गए। यहाँ इन तीनों शहरों का गहन अध्ययन किया गया है। औपनिवेशिक और वाणिज्यिक संस्कृति का प्रभुत्व नगरों की बसावट और इनके स्थापत्य में स्पष्ट तौर पर दिखाई दिया। इस दौरान बनी इमारतों में कई तरह की स्थापत्य शैलियाँ अपनाई गईं। नगर नियोजन और स्थापत्य शैलियों का अध्ययन करके औपनिवेशिक शहरों को समझने का प्रयास किया गया है।

→औपनिवेशिक शहर मुगलकालीन शहरों से बहुत भिन्न थे। 16वीं-17वीं सदी के मुगलकालीन शहरों की श्रेणी में कस्बे सबसे छोटे थे। इन्हें ‘ग्रामीण शहर’ भी कहा जाता था। एक छोटे शहर के रूप में ही ये गाँव से अलग होते थे। मुगल काल में कस्बा सामान्यतया किसी स्थानीय विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था। इसमें एक छोटा स्थायी बाज़ार होता था, जिसे गंज कहते थे। यह बाजार विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध इत्यादि सामग्री उपलब्ध करवाता था। कस्बे की मुख्य विशेषता जनसंख्या नहीं थी बल्कि उसकी विशिष्ट आर्थिक व सांस्कृतिक गतिविधियाँ थीं। ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोगों का जीवन-निर्वाह मुख्यतः कृषि, पशुपालन और वनोत्पादों पर निर्भर था। ग्रामीणों की आवश्यकताओं के अनुरूप गाँवों में साधारण स्तर की दस्तकारी थी।

→ दूसरी ओर, शहरी लोगों के आजीविका के साधन अलग थे। उनकी जीवन-शैली गाँव से अलग थी। शहरों में मुख्य तौर पर शासक, प्रशासक तथा शिल्पकार व व्यापारी रहते थे। शहरी शिल्पकार किसी विशिष्ट कला में निपुण होते थे, क्योंकि वे प्रायः अपनी शिल्पकला से संपन्न और सत्ताधारी वर्गों की जरूरतों को पूरा करते थे। शहर में रहने वाले सभी लोगों के लिए खाद्यान्न सदैव गाँव से ही आता था। अन्य कृषि-उत्पाद व जरूरत के लिए वन-उत्पाद भी उन्हें ग्रामीण क्षेत्रों से ही प्राप्त होते थे। शहरों की एक अलग पहचान उनके भव्य भवन, स्थापत्य और उनकी किलेबंदी भी था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 Img 1
18वीं सदी में भारत के बहुत-से पुराने शहरों का महत्त्व कम हो गया। साथ ही कई नए शहरों का भी उदय हुआ। राजनीतिक विकेंद्रीकरण के परिणामस्वरूप लखनऊ, हैदराबाद श्रीरंगापट्टम, पूना (आधुनिक पुणे), नागपुर, बड़ौदा और तंजौर (तंजावुर) जैसी क्षेत्रीय राजधानियों का महत्त्व बढ़ गया। अतः इस राजनीतिक विकेंद्रीकरण के कारण दिल्ली, लाहौर व आगरा इत्यादि मुगल सत्ता के प्रमुख नगर केंद्रों से व्यापारी, प्रशासक, शिल्पकार, साहित्यकार, कलाकार, इत्यादि काम और संरक्षण की तलाश में इन नए नगरों की ओर पलायन करने लगे।

→ यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों ने मुगल काल के दौरान ही भारत के विभिन्न स्थानों पर अपनी बस्तियाँ स्थापित कर ली थीं। उदाहरण के लिए 1510 में पुर्तगालियों ने पणजी में, 1605 में डचों ने मछलीपट्नम में, 1639 में अंग्रेज़ों ने मद्रास में तथा 1673 में फ्रांसीसियों ने पांडिचेरी (आजकल पुद्दचेरी) में शुरू में व्यापारिक कार्यालय (इन्हें कारखाने कहा जाता था) बनाए। इन ‘कारखानों’ के आस-पास धीरे-धीरे बस्तियों का आकार विस्तृत होने लगा। इस प्रकार शहर वाणिज्यवाद तथा पूँजीवाद परिभाषित होने लगे। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के राजनीतिक नियंत्रण स्थापित होने के उपरान्त इन शहरों का पतन शुरु हो गया। नई आर्थिक राजधानियों के रूप में मद्रास, कलकत्ता व बम्बई जैसे औपनिवेशिक बंदरगाह शहरों का उदय तेजी से होने लगा। सन् 1800 के आस-पास तक यह जनसंख्या की दृष्टि से यह सबसे बड़े शहर बन गए। इसका कारण था कि ये औपनिवेशिक प्रशासन और सत्ता के केंद्र भी बन चुके थे। इनमें नए भवन नई स्थापत्य-कला के साथ स्थापित किए गए। बहुत-से नए संस्थानों का विकास हुआ। इस प्रकार ये शहर आजीविका की तलाश में आने वाले लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए।

→ सन् 1900 से लेकर 1940 तक भारत की कुल जनसंख्या के मात्र 13 प्रतिशत लोग ही शहरों में रहते थे। औपनिवेशिक काल में शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा ही रहा। यदि पूर्व-ब्रिटिशकाल से तुलना की जाए तो शहरों में आजीविका कमाने वाले लोगों की संख्या बढ़ने की बजाय कम हुई। अंग्रेज़ों के राजनीतिक नियंत्रण के फलस्वरूप और आर्थिक नीतियों के चलते कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे नए शहरों का उदय तो हुआ, लेकिन ये ऐसे शहर नहीं बन पाए जिससे भारत की समूची अर्थव्यवस्था में शहरीकरण को लाभ मिले। वस्तुतः अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों व गतिविधियों के कारण उन शहरों
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 Img 2
का भी पतन हो गया जो अपने किसी विशिष्ट उत्पादों के लिए प्रसिद्ध थे। उदाहरण के लिए ढाका, मुर्शिदाबाद, सोनारगांव इत्यादि वस्त्र उत्पादक केंद्र बर्बाद होते गए।

रेलवे नेटवर्क के इस विस्तार से भारत में बहुत-से शहरों की कायापलट हुई। खाद्यान्न तथा कपास व जूट इत्यादि रेलवे स्टेशन आयातित वस्तुओं के वितरण तथा कच्चे माल के संग्रह केंद्र बन गए। इसके परिणामस्वरूप नदियों के किनारे बसे तथा पुराने मार्गों पर पड़ने वाले उन शहरों का महत्त्व कम होता गया जो पहले कच्चे माल के संग्रह केंद्र थे। रेलवे विस्तार के साथ रेलवे कॉलोनियाँ बसाई गईं। लोको (रलवे वर्कशॉप) स्थापित हुए। इन गतिविधियों से भी कई नए रेलवे शहर; जैसे कि बरेली, जमालपुर, वाल्टेयर आदि अस्तित्व में आए।

→ औपनिवेशिक शहर अपने नाम और स्थान से ही नए (New) नहीं थे, अपितु अपने स्वरूप से भी नए थे। ये अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिम्बित कर रहे थे। ये आधुनिक औद्योगिक शहर नहीं बन पाए बल्कि औपनिवेशिक शहरों के तौर पर ही विकसित हुए। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते उपयोगी बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ। अंग्रेज़ों ने अपनी ‘व्यापारिक बस्तियों’ व ‘कारखानों’ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे।

→ सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेज़ों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरु से ही परिलक्षित हुआ। इन शहरों में आधुनिक औद्योगिक विकास के अंकुर तो फूटने लगे, लेकिन यह विकास बहुत ही धीमा और सीमित रहा। इसका कारण पक्षपातपूर्ण संरक्षणवादी नीतियाँ थीं। इन नीतियों ने औद्योगिक विकास को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दिया। फैक्ट्री उत्पादन शहरी अर्थव्यवस्था का आधार नहीं बन सका। वास्तव में कलकत्ता, बम्बई व मद्रास जैसे विशाल शहर मैनचेस्टर या लंकाशायर ब्रिटिश औद्योगिक शहरों की तरह औद्योगिक नगर नहीं बन सके। ये औद्योगिक नगरों की अपेक्षा सेवा-क्षेत्र अधिक थे।

→ औपनिवेशिक वाणिज्यिक संस्कृति प्रतिबिम्बित हुई। राजनीतिक सत्ता और संरक्षण ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापारियों के हाथों में आने से नई शहरी संस्कृति उत्पन्न हुई। नए संस्थानों का उदय हुआ। नदी अथवा समुद्र के किनारे गोदियों (Docks) व घाटों का विकास होने लगा। व्यापार से जुड़ी अन्य संस्थाओं का उदय हुआ जैसे कि जहाज़रानी उद्योग के लिए बीमा एजेंसियाँ बनीं तथा यातायात डिपो व बैंकिंग संस्थानों की स्थापना हुई।

→ कंपनी के प्रमुख प्रशासकीय कार्यालयों की स्थापना अपने आप में ब्रिटिश प्रशासन में नौकरशाही के बढ़ते हुए प्रभाव का सूचक था। औपनिवेशिक शहरों में शासक वर्ग तथा संपन्न यूरोपियन व्यापारी वर्ग के निजी महलनुमा मकान बने। उनके लिए पृथक क्लब, रेसकोर्स तथा रंगमंच इत्यादि भी स्थापित किए गए। ये जहाँ विदेशी अभिजात वर्ग की रुचियों को अभिव्यक्त कर रहे थे वहीं इनसे भेदभाव और प्रभुत्व भी स्पष्ट दिखाई दे रहा था।

→ एक नया भारतीय संभ्रांत वर्ग भी इन शहरों में उत्पन्न हो चुका था। यह वर्ग अपनी हैसियत को ऊँचा दिखाने के लिए पाश्चात्य जीवन-शैली का अनुसरण करने लगा। दूसरी ओर, इन शहरों में काफी बड़ी संख्या में कामगार एवं गरीब लोग रहते थे। यह खानसामा, पालकीवाहक, गाड़ीवान तथा चौकीदारों के रूप में संभ्रांत भारतीय एवं यूरोपीय लोगों को अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवाते थे। इसके अतिरिक्त ये औद्योगिक मजदूरों के रूप में या फिर पोर्टर, निर्माण एवं गोदी मजदूरों के तौर पर कार्य करते थे। इन लोगों की स्थिति अच्छी नहीं थी। ये लोग शहर के विभिन्न भागों में घास-फूस की कच्ची झोंपड़ियों में रहते थे।

→ लम्बे समय तक उन्होंने सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई जैसे मुद्दों की ओर अंग्रेजों ने कभी ध्यान नहीं दिया। उन्होंने गोरी बस्तियों को ही साफ और सुंदर बनाने पर बल दिया था। लेकिन महामारियों के मंडराते खतरों से उनके इस दृष्टिकोण में बदलाव आने लगा। हैजा, प्लेग, चेचक जैसी महामारियों में लाखों लोग मर रहे थे। इससे प्रशासकों को यह खतरा सताने लगा कि ये बीमारियाँ उनके क्षेत्रों में भी फैल सकती हैं। इसलिए उनके लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा सफाई के लिए कुछ कदम उठाने जरूरी हो गए।

→ पर्वतीय शहर भी नए औपनिवेशिक विशेष शहरों के तौर पर विकसित हुए। शुरू में ये सैनिक छावनियाँ बनीं, फिर अधिकारियों के आवास-स्थल और अन्ततः पर्वतीय पर्यटन स्थलों के तौर पर विकसित हुए। इन शहरों में शिमला, माउंट आबू, दार्जीलिंग व नैनीताल इत्यादि थे।

धीरे-धीरे ये पर्वतीय शहर एक तरह से सेनिटोरियम (Sanitoriums) बन गए अर्थात् ऐसे स्थान बन गए जहाँ सैनिकों को आराम व चिकित्सा के लिए भेजा जाने लगा। पहाड़ी शहरों की जलवायु स्वास्थ्यवर्द्धक थी। पहाड़ों की मृदु और ठण्डी जलवायु अंग्रेज़ व यूरोपीय अधिकारियों को लुभाती थी। यही कारण था कि गर्मियों के दिनों में अंग्रेज़ अपनी राजधानी शिमला बनाते थे। इन्होंने अपने निजी और सार्वजनिक भवन यूरोपीय शैली में बनवाए। इन घरों में रहते हुए उन्हें यूरोप में अपनी निवास बस्तियों की अनुभूति होती थी। पर्वतीय शहरों पर अंग्रेज़ी-शिक्षण संस्थान तथा एंग्लिकन चर्च स्थापित किए गए। स्पष्ट है कि पर्वतीय शहरों में गोरे लोगों को पश्चिमी सांस्कृतिक जीवन जीने का अवसर मिला।

→ धीरे-धीरे इन पर्वतीय शहरों को रेलवे नेटवर्क से जोड़ दिया गया और महाराजा, नवाब, व्यापारी तथा अन्य मध्यवर्गीय लोग भी इन पर्वतीय शहरों पर पर्यटन के लिए जाने लगे। इन संभ्रांत लोगों को ऐसे स्थलों पर काफी संतोष की अनुभूति होती थी। पर्वतीय स्थल केवल पर्यटन की दृष्टि से ही अंग्रेज़ों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं थे, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़े महत्त्वपूर्ण थे।

→ नए शहरों का सामाजिक जीवन पहले के शहरों से अलग था। ये मध्य वर्ग के केन्द्र थे। इस वर्ग में शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउंटेंट्स इत्यादि थे। इन नए शहरों में मिलने-जुलने के नए स्थल; जैसे कि सार्वजनिक पार्क, टाउन हॉल, रंगशाला और 20वीं सदी में सिनेमा हॉल इत्यादि बन चुके थे। ये स्थल मध्यवर्गीय लोगों के जीवन का हिस्सा बनने लगे। यह मध्य वर्ग अपनी नई पहचान और नई भूमिकाओं के साथ अस्तित्व में आया। नए शहरों में औरतों के लिए नए अवसर उत्पन्न हुए। फलतः सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

→ परंतु सार्वजनिक स्थानों पर कामकाज करने वाली महिलाओं को सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता था। स्पष्ट है कि सामाजिक बदलाव सहज रूप से नहीं हो रहे थे। रूढ़िवादी विचारों के लोग पुरानी परम्पराओं और व्यवस्था को बनाए रखने का पुरजोर समर्थन कर रहे थे। दूसरी ओर, कामगार लोगों के लिए शहरी जीवन एक संघर्ष था। फिर भी इन लोगों ने अपनी ‘एक अलग जीवंत शहरी संस्कृति’ रच ली थी। वे धार्मिक त्योहारों, मेलों, स्वांगों तथा तमाशों इत्यादि में भाग लेते थे। ऐसे अवसरों पर वे अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों पर प्रायः कटाक्ष और व्यंग्य करते हुए उनका मज़ाक उड़ाते थे।

→ विकसित होते मद्रास शहर में अंग्रेज़ों और भारतीयों के बीच पृथक्करण (Segregation) स्पष्ट दिखाई देता है। यह पृथक्करण शहर की बनावट और दोनों समुदायों की हैसियत (Position) में साफ-साफ झलकता है। फोर्ट सेंट जॉर्ज में अधिकतर यूरोपीय लोग रहते थे। इसीलिए यह क्षेत्र व्हाइट किले के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। भारतीयों को इस क्षेत्र में रहने की अनुमति नहीं थी। व्हाइट टाउन प्रशासकीय और न्यायिक व्यवस्था का केन्द्र भी था। व्हाइट टाउन से बिल्कुल अलग ब्लैक टाउन बसाया गया। कलकत्ता-नगर नियोजन में ‘विकास’ सम्बन्धी विचारधारा झलक रही थी और साथ ही इसका अर्थ राज्य द्वारा लोगों के जीवन और शहरी क्षेत्र पर अपनी सत्ता को स्थापित करना था। इसमें फोर्ट विलियम का नया किला तथा सुरक्षा के लिए मैदान रखा गया। उल्लेखनीय है कि कलकत्ता कस्बे का विकास तीन गाँवों-(सुतानाती, कोलकाता व गोविन्दपुर) को मिलाकर हुआ था।

→ कलकत्ता की नगर योजना में लॉर्ड वेलेज़्ली ने उल्लेखनीय योगदान दिया। कलकत्ता अब ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी था। इस सन्दर्भ में, 1803 ई० का वेलेज़्ली का प्रशासकीय आदेश महत्त्वपूर्ण है। वेलेज़्ली के इस सरकारी आदेश के बाद ‘जन स्वास्थ्य’ नगर नियोजन में प्रमुख विचार बन गया। शहरों में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा और भविष्य की नगर-नियोजन की परियोजनाओं में ‘जन स्वास्थ्य’ का विशेष ध्यान रखा गया।

→ ब्रिटिश साम्राज्य के विस्तार के साथ ही अंग्रेज़ों का झुकाव इस ओर बढ़ता गया कि कलकत्ता, बम्बई और मद्रास को शानदार शाही राजधानियों के रूप में बनाया जाए। इन शहरों की भव्यता से ही साम्राज्यवादी ताकत सत्ता झलकती थी। नगर नियोजन में उन सभी खूबियों को प्रतिबिंबित होना था जिसका प्रतिनिधित्व होने का दावा अंग्रेज़ करते थे। ये मुख्य खूबियाँ थीं- तर्क-संगत क्रम व्यवस्था, (Rational Ordrain), सटीक क्रियान्वयन (Meticulous Execution) और पश्चिमी सौन्दर्यात्मक आदर्श (Western Aesthetic Ideas)। वस्तुतः साफ-सफाई नियोजन और सुन्दरता, औपनिवेशिक शहर के आवश्यक तत्त्व बन गए।

→ कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे बड़े शहरों में न्यूक्लासिकल तथा नव-गॉथिक शैलियों में अंग्रेज़ों ने भवन बनवाए। ये पाश्चात्य स्थापत्य शैलियाँ थीं। फिर बहुत-से धनी भारतीयों ने इन पश्चिमी शैलियों को भारतीय शैलियों में मिलाकर मिश्रित स्थापत्य शैली का विकास किया। इसे इण्डोसारासेनिक शैली कहा गया है। उल्लेखनीय है कि इन स्थापत्य शैलियों के माध्यम से भी राजनीतिक और सांस्कृतिक टकरावों को समझा जा सकता है।

काल-रेखा

1500-1700 ई०पणजी में पुर्तगाली (1510); मछलीपट्टनम में डच (1605); मद्रास (1639), बंबई (1661) और कलकत्ता (1690) में अंग्रेज़ तथा पांडिचेरी (1673) में फ्रांसीसी ठिकानों की स्थापना।
1600-1623 ई०ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कंपनी के सूरत, भड़ीच, अहमदाबाद, आगरा और मछलीपट्टनम में ‘कारखाने’ (कार्यालय व गोदाम) थे।
1622 ई०बंबई उस समय एक छोटा-सा द्वीप था। यह अनेक वर्षों तक पुर्तगालियों के अधिकार में रहा। 1622 ई० में ब्रिटेन के सम्राट चार्ल्स द्वितीय को पुर्तगाली राजकुमारी से विवाह के समय दहेज में दिया गया था।
1668 ई०बंबई (मुंबई) की किलाबंदी की गई।
1698 ई०अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता (आधुनिक) की नींव रखी गई।
1772-1785 ईवारेन हेस्टिंग्स का शासनकाल।
1757 ई०प्लासी के युद्ध में अंग्रेज़ों की विजय।
1773 ई०कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना।
1798-1805 ई०लॉर्ड वेलेज़्ली का भारत में गवर्नर-जनरल के रूप में कार्यकाल।
1803 ई०कलकत्ता नगर सुधार पर वेलेज़्ली का मिनट्स लिखना।
1817 ई०कलकत्ता नगर नियोजन के लिए लॉटरी कमेटी का गठन।
1818 ई०दक्कन पर अंग्रेज़ों की विजय व बम्बई को नए प्रांत की राजधानी।
1853 ई०पहली रेलवे लाइन, बम्बई से ठाणे।
1857 ई०बम्बई, कलकत्ता व मद्रास में विश्वविद्यालयों की स्थापना।
1870 का दशकनगर-पालिकाओं में निर्वाचित भारतीयों को शामिल करना।
1881 ई०मद्रास हॉर्बर के निर्माण का काम पूरा होना।
1896 ई०बम्बई के वाटसंस होटल में पहली बार फिल्म दिखाना।
1896 ई०प्लेग महामारी का फैलना।
1911 ईoकलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को राजधानी बनाया जाना।
1911 ई०‘गेट वे ऑफ़ इण्डिया’ बनाया गया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

HBSE 12th Class History औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों ने नेतृत्व सँभालने के लिए पुराने शासकों से क्या आग्रह किया ?
उत्तर:
बहुत सारे स्थानों पर विद्रोही सिपाहियों (सैनिकों) ने नेतृत्व संभालने के लिए पुराने अपदस्थ शासकों से आग्रह किया कि वे विद्रोह को नेतृत्व प्रदान करें। क्योंकि वे जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता। यह बात सही है कि सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुंचे। वहाँ उन्होंने बहादुर शाह को अपना नेता बनाया। वह वृद्ध था। बादशाह तो नाममात्र का ही था। स्वाभाविक तौर पर वह विद्रोह की खबर से बेचैन और भयभीत हुआ। यद्यपि अंग्रेजों की नीतियों से वह त्रस्त तो था ही फिर भी विद्रोह के लिए तैयार वह तभी हुआ जब कुछ सैनिक शाही शिष्टाचार की अवहेलना करते हुए दरबार तक आ चुके थे। सिपाहियों से घिरे बादशाह के पास उनकी बात मानने के लिए और कोई चारा नहीं था। अन्य स्थानों पर भी पहले सिपाहियों ने विद्रोह किया और फिर नवाबों और राजाओं को नेतृत्व करने के लिए विवश किया।

प्रश्न 2.
उन साक्ष्यों के बारे में चर्चा कीजिए जिनसे पता चलता है कि विद्रोही योजनाबद्ध और समन्वित ढंग से काम कर रहे थे?
उत्तर:
इस बात के कुछ प्रमाण मिलते हैं कि सिपाही विद्रोह को योजनाबद्ध एवं समन्वित तरीके से आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे। विभिन्न छावनियों में विद्रोही सिपाहियों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान था। ‘चर्बी वाले कारतूसों’ की बात सभी छावनियों में पहुँच गई थी। बहरमपुर से शुरू होकर बैरकपुर और फिर अंबाला और मेरठ में विद्रोह की चिंगारियाँ भड़कीं। इसका अर्थ है कि सूचनाएँ एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच रही थीं। सिपाही बगावत के मनसूबे गढ़ रहे थे। इसका एक और उदाहरण यह है कि जब मई की शुरुआत में सातवीं अवध इर्रेग्युलर कैवेलरी (7th Awadh Irregular Cavalry) ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा : “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के आदेश की प्रतीक्षा है।”

सिपाहियों की बैठकों के भी कुछ सुराग मिलते हैं। हालांकि बैठक में वे कैसी योजनाएँ बनाते थे, उसके प्रमाण नहीं हैं। फिर भी कुछ अंदाजें लगाए जाते हैं कि इन सिपाहियों का दुःख-दर्द एक-जैसा था। अधिकांश उच्च-जाति के थे और उनकी जीवन-शैली भी मिलती-जुलती थी। स्वाभाविक है कि वे अपने भविष्य के बारे में ही निर्णय लेते होंगे। चार्ल्स बॉल (Charles Ball) उन शुरुआती इतिहासकारों में से है जिसने 1857 की घटना पर लिखा है। इसने भी उन सैन्य पंचायतों का उल्लेख किया है जो कानपुर सिपाही लाइन में रात को होती थी। जिनमें मिलिट्री पुलिस के कप्तान ‘कैप्टेन हियर्से’ की हत्या के लिए 41वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सैनिकों ने उन भारतीय सिपाहियों पर दबाव डाला, जो उस कप्तान की सुरक्षा के लिए तैनात थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 3.
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की किस हद तक भूमिका थी? [2017 (Set-A, D)]
उत्तर:
1857 के घटनाक्रम के निर्धारण में धार्मिक विश्वासों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। विभिन्न तरीकों से सैनिकों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई थीं। सामान्य लोग भी अंग्रेज़ी सरकार को संदेह की दृष्टि से देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि सरकार अंग्रेज़ी शिक्षा और पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार-प्रसार करके भारत में ईसाइयत को बढ़ावा दे रही है। उनका संदेह गलत भी नहीं था क्योंकि अधिकारी वर्ग ईसाई पादरियों को धर्म प्रचार की छूट और प्रोत्साहन दे रहे थे। सैनिकों और स्कूलों में धर्म परिवर्तन के लिए प्रलोभन भी दिया जा रहा था। 1850 में बने उत्तराधिकार कानून से यह संदेह विश्वास में बदल गया। इसमें धर्म बदलने वाले को पैतृक सम्पत्ति प्राप्ति का अधिकार दिया गया था।

सैनिकों को विदेशों में जाकर लड़ने के लिए भी विवश किया जाता था, जिसे वे गलत मानते थे। इसमें वे अपना धर्म भ्रष्ट मानते थे। अन्ततः इन सभी परिस्थितियों के अन्तर्गत ‘चर्बी वाले कारतूस’ तथा कुछ अन्य अफवाहों, जैसे कि ‘आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट इत्यादि के चलते इस विद्रोह का घटनाक्रम निर्धारित हुआ। अफवाहें तभी विश्वासों में बदल रही थीं क्योंकि उनमें संदेह की अनुगूंज थी।

प्रश्न 4.
विद्रोहियों के बीच एकता स्थापित करने के लिए क्या तरीके अपनाए गए?
उत्तर:
विद्रोहियों की सोच में सभी भारतीय सामाजिक समुदायों में एकता आवश्यक थी। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में निम्नलिखित बातों पर जोर दिया गया-

  1. जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया।
  2. अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का बखान भी किया गया।
  3. लाभ की दृष्टि से इस युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक-समान बताया।
  4. बादशाह बहादुर शाह की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई।
  5. विद्रोह के लिए समर्थन जुटाने के लिए तीन भाषाओं हिंदी, उर्दू और फारसी में अपीलें जारी की गईं।

प्रश्न 5.
अंग्रेज़ों ने विद्रोह को कुचलने के लिए क्या कदम उठाए?
उत्तर:
विद्रोह को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों ने निम्नलिखित कदम उठाए
(1) गवर्नर जनरल लॉर्ड केनिंग ने कम्पनी सरकार के समस्त ब्रिटिश साधनों को संगठित करके विद्रोह को कुचलने के लिए एक समुचित योजना बनाई।

(2) मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए।

(3) एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी।

(4) सबसे पहले दिल्ली पर पुनः अधिकार की रणनीति अपनाई गई। केनिंग जानता था कि दिल्ली के पतन से विद्रोहियों की कमर टूट जाएगी। साथ ही देशी शासकों और ज़मींदारों का समर्थन पाने के लिए उन्हें लालच दिया गया।

(5) हिंदू-मुसलमानों में सांप्रदायिक तनाव भड़काकर विद्रोह को कमजोर करने का प्रयास किया गया। लेकिन इसमें उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
अवध में विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? किसान, ताल्लुकदार और ज़मींदार उसमें क्यों शामिल हुए?
उत्तर:
अवध में विद्रोह अपेक्षाकृत सबसे व्यापक था। इस प्रांत में आठ डिविजन थे उन सभी में विद्रोह हुआ। यहाँ किसान व दस्तकार से लेकर ताल्लुकदार और नवाबी परिवार के सदस्यों सहित सभी लोगों ने इसमें भाग लिया। हरेक गांव से लोग विद्रोह में शामिल हुए। यहाँ विदेशी शासन के विरुद्ध यह विद्रोह लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर चुका था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है; वो सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वो प्यार करते थे। वस्तुतः इसमें विभिन्न प्रकार की पीड़ाओं (A chain of grievances) ने किसानों, सिपाहियों, ताल्लुकदारों और खजकुमारों को परस्पर जोड़ दिया था। संक्षेप में, विद्रोह की व्यापकता के निम्नलिखित कारण थे

1. अवध का विलय-अवध का विलय 1856 में विद्रोह फूटने से लगभग एक वर्ष पहले हुआ था। इसे ‘कुशासन’ का आरोप लगाते हुए ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया था। लेकिन अवधवासियों ने इसे न्यायसंगत नहीं माना। बल्कि वे इसे डलहौज़ी का विश्वासघात मान रहे थे। 1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल (cherry) एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” डलहौज़ी एक उग्र साम्राज्यवादी था। वस्तुतः उसकी दिलचस्पी अवध की उपजाऊ जमीन को हड़पने में भी थी। अतः कुशासन तो एक बहाना था। अवधवासी यह जानते थे कि अपदस्थ नवाब वाजिद अली शाह बहुत लोकप्रिय था। लोगों की नवाब व उसके परिवार से गहरी सहानुभूति थी। जब उसे कलकत्ता से निष्कासित किया गया तो बहुत-से लोग उनके पीछे विलाप करते हुए गए।

2. ताल्लुकदारों का अपमान-ताल्लुकदारों ने विद्रोह में बढ़-चढ़कर भाग लिया। उनकी सत्ता व सम्मान को अंग्रेजी राज से जबरदस्त क्षति हुई थी। ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार। वे छोटे महलनुमा घरों में रहते थे। अपनी-अपनी जागीर में सत्ता व जमीन पर उनका नियंत्रण था। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

3. भूमि छीनने की नीति-आर्थिक दृष्टि से अवध के ताल्लुकदारों की हैसियत व सत्ता को क्षति भूमि छीनने की नीति से पहुँची। 1856 ई० में अधिग्रहण के तुरंत बाद एक मुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement of 1856) नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जो इस मान्यता पर आधारित थी कि ताल्लुकदार जमीन के वास्तविक मालिक नहीं हैं। उन्होंने जमीन पर कब्जा धोखाधड़ी व शक्ति के बल पर किया हुआ है। इस मान्यता के आधार पर ज़मीनों की जाँच की गई। ताल्लुकदारों की जमीनें उनसे लेकर किसानों को दी जाने लगीं। पहले अवध के 67% गाँव ताल्लुकदारों के पास थे और इस ब्रिटिश नीति से यह संख्या घटकर मात्र 38% रह गई।

4. किसानों में असंतोष-विद्रोह में बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इससे अंग्रेज़ अधिकारी काफी परेशान हुए थे, क्योंकि किसानों ने अंग्रेज़ों का साथ देने की बजाय अपने पूर्व मालिकों (ताल्लुकदारों) का साथ दिया। जबकि अंग्रेजों ने उन्हें ज़मीनें भी दी थीं। इसके कई कारण थे जैसे कि अंग्रेजी राज से एक संपूर्ण ग्रामीण समाज व्यवस्था भंग हो गई थी। यदि कभी ज़मींदार किसानों से बेगार या धन वसूलता था तो बुरे वक्त में वह उनकी सहायता भी करता था। ताल्लुकदारों की छवि दयालु अभिभावकों की थी। तीज-त्योहारों पर भी उन्हें कर्जा अथवा मदद मिल जाती थी, फसल खराब होने पर भी उनकी दया दृष्टि किसानों पर रहती थी। लेकिन अंग्रेज़ी राज की नई भू-राजस्व व्यवस्था में कोई लचीलापन नहीं था, न ही उसके निर्धारण में और न ही वसूली में। मुसीबत के समय यह नई सरकार कृषकों से कोई सहानुभूति की भावना नहीं रखती थी। संक्षेप में कहा जा सकता है कि अवध में विद्रोह विभिन्न सामाजिक समूहों का एक सामूहिक कृत्य था। किसान, ज़मींदार व ताल्लुकदारों ने इसमें बड़े स्तर पर सिपाहियों का साथ दिया क्योंकि अंग्रेजों के खिलाफ इन सबका दुःख-दर्द एक हो गया था।

प्रश्न 7.
विद्रोही क्या चाहते थे? विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में कितना फर्क था?
उत्तर:
विद्रोही नेताओं की घोषणाओं, सिपाहियों की कुछ अर्जियों तथा नेताओं के कुछ पत्रों से हमें विद्रोहियों की सोच के बारे में कुछ जानकारी मिलती है, जो इस प्रकार है

(1) वे अंग्रेज़ी सत्ता को उत्पीड़क, निरंकुश और षड्यंत्रकारी मान रहे थे। इसलिए उन्होंने ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक समूहों को एकजुट होने का आह्वान किया। वे इस राज से सम्बन्धित प्रत्येक चीज को खारिज कर रहे थे।

(2) विद्रोहियों की घोषणाओं से ऐसा लगता है कि वे भारत के सभी सामाजिक समूहों में एकता चाहते थे। विशेष तौर पर उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम एकता पर जोर दिया। लाभ की दृष्टि से युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक-समान बताया। बहादुरशाह जफ़र की घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई के साथ संघर्ष में भाग लेने की अपील की गई।

(3) वे वैकल्पिक सत्ता के रूप में अंग्रेज़ों का राज समाप्त करके 18वीं सदी से पहले की मुगलकालीन व्यवस्था की ओर ही वापिस लौटना चाहते थे।

विभिन्न सामाजिक समूहों की दृष्टि में अंतर-उपरोक्त बातों से यह अर्थ नहीं निकालना चाहिए कि सभी विद्रोहियों की सोच बिल्कुल एक जैसी थी। वास्तव में अलग-अलग सामाजिक समूहों की दृष्टि में अंतर था, उदाहरण के लिए

(1) सैनिक चाहते थे कि उन्हें पर्याप्त वेतन, पदोन्नति तथा अन्य सुविधाएं यूरोपीय सिपाहियों की तरह ही प्राप्त हों। वे अपने आत्म-सम्मान व भावनाओं की भी रक्षा चाहते थे। वे अंग्रेजों की विदेशी सत्ता को खत्म करके अपने पुराने शासकों की सत्ता की पुनः स्थापना चाहते थे।

(2) अपदस्थ शासक विद्रोह के नेता थे। परन्तु इनमें से अधिकांश अपनी रजवाड़ा शाही को ही पुनः स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे। इसलिए उन्होंने पुराने ढर्रे पर ही दरबार लगाए और दरबारी नियुक्तियाँ कीं।

(3) ताल्लुकदार अथवा ज़मींदार अपनी जमींदारियों और सामाजिक हैसियत के लिए संघर्ष में कूदे थे। वे अपनी जमीनों को पुनः प्राप्त करना चाहते थे जो अंग्रेज़ों ने उनसे छीनकर किसानों को दे दी थीं।

(4) किसान अंग्रेज़ों की भू-राजस्व व्यवस्था से परेशान था। इसमें कोई लचीलापन नहीं था। राजस्व का निर्धारण बहुत ऊँची दर पर किया जाता था और उसकी वसूली ‘डण्डे’ के साथ की जाती थी। फसल खराब होने पर भी सरकार की ओर से कोई दयाभाव नहीं था। इसी कारण वह साहकारी के चंगल में फँसता था। यही कारण था कि अंग्रेजी राज के साथ-साथ वह अन्य उत्पीडकों को भी खत्म करना चाहता था। उदाहरण के लिए उन्होंने कई स्थानों पर सूदखोरों के बहीखाते जला दिए और उनके घरों में तोड़-फोड़ की।

उपरोक्त समूहों के अतिरिक्त दस्तकार भी अंग्रेज़ों की नीतियों से बर्बाद हुए। वे भी विद्रोहियों के साथ आ गए थे। बहुत-से रूढ़िवादी विचारों के लोग सामाजिक व धार्मिक कारणों से भी अंग्रेज़ी व्यवस्था को खत्म करना चाहते थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 8.
1857 के विद्रोह के बारे में चित्रों से क्या पता चलता है? इतिहासकार इन चित्रों का किस तरह विश्लेषण करते हैं?
उत्तर:
चित्र भी इतिहास लिखने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। 1857 के विद्रोह से सम्बन्धित कुछ चित्र, पेंसिल से बने रेखाचित्र, उत्कीर्ण चित्र (Etchings), पोस्टर, कार्टून इत्यादि उपलब्ध हैं। कुछ चित्रों और कार्टूनों के बाजार-प्रिंट भी मिलते हैं। किसी घटना की छवि बनाने में ऐसे चित्रों की विशेष भूमिका होती है। चित्र विचारों और भावनाओं के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी व्यक्त करते हैं। 1857 के चित्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि जो चित्र इंग्लैण्ड में बने उन्होंने ब्रिटिश जनता में अलग छवि बनाई। इनसे वहाँ के लोग उत्तेजित हुए और उन्होंने विद्रोहियों को निर्दयतापूर्वक कुचल डालने की मांग की। दूसरी ओर भारत में छपने वाले चित्रों, संबंधित फिल्मों तथा कला व साहित्य के अन्य रूपों में उन्हीं विद्रोहियों की अलग छवि को जन्म दिया। इस छवि ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को पोषित किया। इंग्लैण्ड और भारत में चित्रों से बनने वाली छवियों को हम निम्नलिखित कुछ उदाहरणों से समझ सकते हैं

A. अंग्रेज़ों द्वारा बनाए गए चित्र-इन चित्रों को देखकर विविध भावनाएँ और प्रतिक्रियाएँ पैदा होती हैं।

(1) टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 में बनाए गए चित्र ‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ में अंग्रेज़ नायकों (कैम्पबेल, औट्रम व हैवलॉक) की छवि उभरती है। इन नायकों ने लखनऊ में विद्रोहियों को खदेड़कर अंग्रेज़ों को सुरक्षित बचा लिया था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 Img 3

(2) बहुत-से समकालीन चित्रों ने ब्रिटिश नागरिकों में प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा मिला। उदाहरण के लिए जोसेफ़ नोएल पेटन का चित्र ‘इन मेमोरियम’ (स्मृति में) को देखने से दर्शक के मन में बेचैनी और क्रोध की भावना सहज रूप से उभरती है। दूसरी ओर ‘मिस व्हीलर’ का तमंचा वाले चित्र से ‘सम्मान की रक्षा का संघर्ष’ नज़र आता है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 Img 4
(3) दमन और प्रतिशोध की भावना को बढ़ावा देने वाले बहुत-से चित्र मिलते हैं। 1857 के पन्च नामक पत्र में ‘जस्टिस’ नामक चित्र में एक गौरी महिला को बदले की भावना से तड़पते हुए दिखाया गया है। विद्रोहियों को तोप से उड़ाते हुए बहुत-से चित्र बनाए गए हैं। इन चित्रों को देखकर ब्रिटेन के आम नागरिक प्रतिशोध को उचित ठहराने लगे। केनिंग की ‘दयाभाव’ का मजाक उड़ाने लगे। ‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ ऐसा ही एक कार्टून है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 Img 5
B. भारतीयों द्वारा बनाए गए चित्र-यदि हम भारत में 1857 में जुड़ी फिल्मों और चित्रों को देखते हैं तो हमारे मन में अलग प्रतिक्रिया होती है। रानी लक्ष्मीबाई का नाम लेते ही मन में वीरता, अन्याय और विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष की साकार प्रतिमा की छवि बनती है। ऐसी छवि बनाने में गीतों, कविताओं, फिल्मों एवं चित्रों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। लक्ष्मीबाई के चित्र प्रायः घोड़े पर सवार हाथ में तलवार लिए वीरांगना के बनाए गए।

प्रश्न 9.
एक चित्र और एक लिखित पाठ को चुनकर किन्हीं दो स्रोतों की पड़ताल कीजिए और इस बारे में चर्चा कीजिए कि उनसे विजेताओं और पराजितों के दृष्टिकोण के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
हम पाठ्यपुस्तक में दिए गए चित्रों में से चित्र को लेते हैं। इस चित्र में विजेताओं का दृष्टिकोण झलकता है। इसमें विद्रोहियों को दानवों तथा अंग्रेज़ औरत को वीरांगना के रूप में दर्शाया गया है। चित्र का शीर्षक ‘मिस व्हीलर’ है। उसे कानपुर में हाथ में तमंचा लिए हुए अपनी इज्जत की रक्षा करती हुई दृढ़तापूर्वक खड़ी दिखाया गया है। अकेली औरत पर किस तरह से विद्रोही तलवारों और बंदूकों से आक्रमण कर रहे हैं; जैसे वे मानव नहीं दानव हों। चित्र में धरती पर बाइबल पड़ी है जो इस संघर्ष को ‘ईसाइयत की रक्षा के संघर्ष के रूप में व्यक्त करती है। यह चित्र उस हत्याकांड पर आधारित है जब विद्रोहियों ने नाना साहिब के न चाहते हुए भी अंग्रेज़ औरतों और बच्चों को मौत के घाट उतार दिया था, लेकिन यह हत्याकांड तब हुआ जब विद्रोहियों ने बनारस में अंग्रेजों द्वारा किए गए हत्याकाण्डों का समाचार सुना। वे अपने प्रतिशोध को रोक नहीं पाए।

(अन्तिम भेंट में हनवंत सिंह ने उस अंग्रेज़ अफसर से कहा था, “साहिब, आपके मुल्क के लोग हमारे देश में आए और उन्होंने हमारे राजाओं को खदेड़ दिया। आप अधिकारियों को भेजकर जिले-जिले में जागीरों के स्वामित्व की जाँच करवाते हैं। एक ही झटके में आपने मेरे पूर्वजों की जमीन मुझसे छीन ली। मैं चुप रहा। फिर अचानक आपका बुरा समय प्रारंभ हो गया। यहाँ के लोग आपके विरुद्ध उठ खड़े हुए। तब आप मेरे पास आए, जिसे आपने बरबाद कर दिया था। मैंने आपकी जान बचाई है। किंतु, अब मैं अपने सिपाहियों को लेकर लखनऊ जा रहा हूँ ताकि आपको देश से खदेड़ सऊँ।” पाठयपस्तक में स्रोत नं0 4)

स्पष्ट है कि विजेताओं के दृष्टिकोण से बने चित्र में पराजितों के दृष्टिकोण के लिए कोई स्थान नहीं था।

अब हम Box में दिए गए स्रोत को लेंगे। यह एक लिखित रिपोर्ट का भाग है। इसमें ताल्लुकदारों यानी पराजितों के दृष्टिकोण का पता चलता है। विवरण में काला कांकर के राजा हनवंत सिंह की उस अंग्रेज़ अधिकारी से बातचीत के अंश हैं जो 1857 में जान बचाने के लिए हनवंत सिंह के पास शरण लेता है। हनवंत सिंह उसकी जान बचाता है और साथ ही अंग्रेजों को देश से निकालने के लिए लखनऊ जाकर लड़ने का निश्चय भी दोहराता है। इस विवरण को पढ़कर हमारे मन में विद्रोहियों की छवि वह नहीं उभरती जो

‘मिस व्हीलर’ नामक चित्र में उभरती है। यहाँ ताल्लुकदार हनवंत सिंह एक विद्रोही नेता है जो एक ओर शरण में आए एक अंग्रेज़ की जान बचाता है तो दूसरी ओर अपने सिपाहियों को लेकर युद्ध क्षेत्र में उतरता है। यहाँ विद्रोही बर्बर, नृशंस और दानव नहीं हैं। वे एक ‘वीर इंसान’ हैं।

परियोजना कार्य

प्रश्न 10.
1857 के विद्रोही नेताओं में से किसी एक की जीवनी पढ़ें। देखिए कि उसे लिखने के लिए जीवनीकार ने किन स्रोतों का उपयोग किया है? क्या उनमें सरकारी रिपोर्टों, अखबारी खबरों, क्षेत्रीय भाषाओं की कहानियों, चित्रों और किसी अन्य चीज़ का इस्तेमाल किया गया है? क्या सभी स्रोत एक ही बात कहते हैं या उनके बीच फर्क दिखाई देते हैं? अपने निष्कर्षों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी पुस्तकालय से या इंटरनेट पर विद्रोही नेताओं जैसे कि बहादुरशाह जफर, महारानी लक्ष्मीबाई, तांत्या तोपे, कुंवर सिंह, राव तुलाराम इत्यादि प्रमुख नेताओं की जीवनी पढ़ें। पढ़ते समय विद्यार्थी यह विवरण तैयार करें कि लेखक ने किन स्रोतों के आधार पर पुस्तक लिखी है। सरकारी रिपोर्टों का उपयोग कितना है, देशी भाषा, स्थानीय कोई भी भाषा या अंग्रेज़ी समाचार-पत्र, पत्रिकाओं से कितने और कैसे तथ्य लिए गए हैं। पेंटिंग, मूर्ति, कार्टून, गीत, रागनी इत्यादि का कितना प्रयोग है। लेखक किस दृष्टि से लिख रहा है। वह कितना निष्पक्ष है। इसमें यह भी नोट करें कि इन सम्बन्धित साक्ष्यों में आपस में कितना अंतर है। सारी सूचनाओं के आधार पर अपने प्राध्यापक के निर्देशन में एक रिपोर्ट तैयार करें।

प्रश्न 11.
1857 पर बनी कोई फिल्म देखिए और लिखिए कि उसमें विद्रोह को किस तरह दर्शाया गया है। उसमें अंग्रेज़ों, विद्रोहियों और अंग्रेज़ों के भारतीय वफादारों को किस तरह दिखाया गया है? फिल्म किसानों, नगरवासियों, आदिवासियों, जमीदारों और ताल्लकदारों के बारे में क्या कहती है? फिल्म किस तरह की प्रतिक्रिया को जन्म देना चाहती है?
उत्तर:
1857 के विद्रोह पर कई फिल्में बनी हैं। परन्तु उनमें सर्वाधिक चर्चित ‘मंगल पांडे’ है जिसमें आमिर खान ने छाप छोड़ने वाली भूमिका निभाई है। इस फिल्म को देखा जा सकता है। इसमें भारतीय सिपाहियों की दिनचर्या, असंतोष, धर्म के प्रति उनमें संवेदनशीलता, जातीय सम्बन्धों की झलक, भारत के विभिन्न समूहों (किसान, आदिवासी, जमींदार, ताल्लुकदार) आदि की स्थिति इत्यादि को फिल्माया गया है। फिल्म देखकर मन पर क्या प्रतिक्रिया होती है। इस पर विचार करें। उदाहरण के लिए फिल्म में जिस प्रकार ‘चर्बी वाले कारतूस’ बनाते दिखाया गया है, इस पर विचार करें कि क्या यह ‘ऐतिहासिक सत्य है या कल्पनात्मक अभिव्यक्ति। यदि यह कल्पनात्मक अभिव्यक्ति है तो दर्शक पर क्या प्रभाव डालती है। फिर हम जान पाएँगे कि छवियाँ कैसे निर्मित होती हैं।

औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य HBSE 12th Class History Notes

→ फिरंगी-फिरंगी फारसी भाषा का शब्द है जो सम्भवतः फ्रैंक (जिससे फ्रांस नाम पड़ा है) से निकला है। हिंदी और उर्दू में पश्चिमी लोगों का मजाक उड़ाने के लिए कभी-कभी इसका प्रयोग अपमानजनक दृष्टि से भी किया जाता था।

→ रेजीडेंट-ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासनकाल में गवर्नर जनरल के प्रतिनिधि को रेजीडेंट कहा जाता था। उसे ऐसे राज्यों में नियुक्त किया जाता था जो अंग्रेजों के प्रत्यक्ष शासन में नहीं था, लेकिन आश्रित राज्य होता था।

→ सहरी-रोजे (रमजान महीने के व्रत) के दिनों में सूरज निकलने से पहले का भोजन।

→ गवर्नर-जनरल-भारत में ब्रिटिश सरकार का मुख्य प्रशासक’ गवर्नर-जनरल कहलाता था।

→ वायसराय-1858 के बाद गवर्नर-जनरल को भारतीय रियासतों के लिए वायसराय कहा जाने लगा। वायसराय का अर्थ था ‘प्रतिनिधि’ यानी इंग्लैण्ड के ‘ताज’ का प्रतिनिधि।

→ बादशाह-मुगल शासक बादशाह कहलाते थे। इसका मौलिक शब्द है ‘पादशाह’ जिसका अर्थ है-‘शाहों का शाह’ पादशाह चगती तुर्की का शब्द है। फारसी में यह बादशाह बन गया।

→ बैरक-सैनिकों का सैनिक छावनी में निवास स्थान।

→ छावनी सेना का स्टेशन जिसमें बड़ी संख्या में सैनिक टुकड़ियाँ रहती थीं।

→ इस अध्याय में हम 1857 के जन-विद्रोह का अध्ययन करेंगे। सबसे अधिक गहन विद्रोह अवध क्षेत्र में हुआ। इसलिए इस क्षेत्र में हुए विद्रोह की गहन छान-बीन करेंगे। साथ ही इसके सामान्य कारणों को भी पढ़ेंगे। विद्रोही क्या सोचते थे और कैसे वे अपनी योजनाएँ बनाते थे; उनके नेता कैसे थे इत्यादि पहलुओं पर भी चर्चा करेंगे। दमन और फिर अंततः इस विद्रोह की छवियाँ (चित्रों, रेखाचित्रों व कार्टून इत्यादि के माध्यम से) कैसे निर्मित हुई, इस पर भी विचार करेंगे।

→ 10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में विद्रोह शुरू हुआ। सिपाहियों ने ‘चर्बी वाले कारतूसों’ का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। 85 भारतीय सिपाहियों को 8 से लेकर 10 वर्ष तक की कठोर सज़ा दी गई। उसी दिन दोपहर तक अन्य सैनिकों ने भी बगावत का झंडा बुलंद कर दिया। शीघ्र ही यह समाचार मेरठ शहर और आस-पास के देहात में भी फैल गया और कुछ लोग भी सिपाहियों से आ मिले।

→ 11 मई को सूर्योदय से पूर्व ही मेरठ के लगभग दो हजार जाँबाज़ सिपाही दिल्ली में प्रवेश कर चुके थे। उन्होंने कर्नल रिप्ले सहित कई अंग्रेज़ों की हत्या कर दी। फिर सिपाही लालकिले पहुँचे। उन्होंने बहादुर शाह जफ़र से नेतृत्व के लिए अनुरोध किया। वह कहने मात्र के लिए ही बादशाह था। वास्तव में वह एक बूढ़ा, शक्तिहीन, अंग्रेजों का पेंशनर था। उसने संकोच और अनिच्छा के साथ सिपाहियों के आग्रह को स्वीकार कर लिया। उसने स्वयं को विद्रोह का नेता घोषित कर दिया। इससे सिपाहियों के विद्रोह को राजनीतिक वैधता मिल गई।

→ सैनिकों के विद्रोह को देखकर जनसामान्य भी कुछ भयरहित हो गए। लोग अंग्रेज़ी शासन के प्रति नफरत से भरे हुए थे। वे लाठी, दरांती, तलवार, भाला तथा देशी बंदूकों जैसे अपने परंपरागत हथियारों के साथ विद्रोह में कूद पड़े। इनमें किसान, कारीगर, दुकानदार व नौकरी पेशा तथा धर्माचार्य इत्यादि सभी लोग शामिल थे। आम लोगों के आक्रोश की अभिव्यक्ति स्थानीय शासकों के खिलाफ भी हुई। बरेली, कानपुर व लखनऊ जैसे बड़े शहरों में अमीरों व साहूकारों पर भी हमले हुए। लोगों ने इन्हें उत्पीड़क और अंग्रेज़ों का पिठू माना। इसके अतिरिक्त विद्रोह-क्षेत्रों में किसानों ने भू-राजस्व देने से मना कर दिया था। सिपाहियों का यह विद्रोह एक व्यापक ‘जन-विद्रोह’ बन गया। एक अनुमान के अनुसार, इसके दौरान अवध में डेढ़ लाख और बिहार में एक लाख नागरिक शहीद हुए थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 Img 1
यह एक व्यापक विद्रोह था। जून के पहले सप्ताह तक बरेली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, बनारस जैसे बड़े-बड़े नगर स्वतंत्र हो चुके थे। यह गाँवों और कस्बों में फैल चुका था। हरियाणा व मध्य भारत में भी यह जबरदस्त विद्रोह था।

→ विभिन्न छावनियों के बीच विद्रोही सिपाहियों में भी तालमेल के कुछ सुराग मिलते हैं। इनके बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान था। ‘चर्बी वाले कारतूसों’ की बात सभी छावनियों में पहुंच गई थी। ‘धर्म की रक्षा’ को लेकर चिंता और आक्रोश भी सभी जगह था। सिपाही बगावत के मनसूबे गढ़ रहे थे। इसका एक और उदाहरण यह है कि जब मई की शुरूआत में सातवीं अवध इरेग्युलर कैवेलरी (7th Awadh Irregular Cavalry) ने नए कारतूसों का प्रयोग करने से मना कर दिया तो उन्होंने 48वीं नेटिव इन्फेंट्री को लिखा : “हमने अपने धर्म की रक्षा के लिए यह फैसला लिया है और 48वीं नेटिव इन्फेंट्री के हुक्म का इंतजार कर

→ सिपाहियों की बैठकों के भी कुछ सुराग मिलते हैं। हालांकि बैठकों में वो कैसी योजनाएँ बनाते थे, उसके प्रमाण नहीं हैं। फिर भी कुछ अंदाजे लगाए जाते हैं कि इन सिपाहियों का दुःख-दर्द एक-जैसा था। अधिकांश उच्च-जाति से थे और उनकी जीवन-शैली भी मिलती-जुलती थी। स्वाभाविक है कि वे अपने भविष्य के बारे में ही निर्णय लेते होंगे। इनके नेता मुख्यतः अपदस्थ शासक और ज़मींदार थे। विभिन्न स्थानों पर इसके स्थानीय नेता भी उभर आए थे। इनमें से कुछ तो किसान नेता थे।

→ यह विद्रोह कुछ अफवाहों और भविष्यवाणियों से भड़का था। लेकिन अफवाहें तभी फैलती हैं जब उनमें लोगों के मन में गहरे बैठे भय और संदेह की अनुगूंज सुनाई देती है। इन अफ़वाहों में लोग विश्वास इसलिए कर रहे थे क्योंकि इनके पीछे बहुत-से ठोस कारण थे। ये कारण सैनिक, आर्थिक, राजनीतिक और धार्मिक थे। लोग अंग्रेज़ों की नई व्यवस्था को भारतीय दमनकारी, परायी और हृदयहीन मान रहे थे। उनकी परंपरागत दुनिया उजड़ रही थी जिससे वे परेशान हुए। अतः इन बहुत-से कारणों के समायोजन से लोग विद्रोही बने।

→ अवध प्रांत में आठ डिविजन थे, उन सभी में विद्रोह हुआ। यहाँ किसान व दस्तकार से लेकर ताल्लुकदार और नवाबी परिवार के सदस्यों सहित सभी वर्गों के लोगों ने वीरतापूर्वक संघर्ष किया। हरेक गाँव से लोग विद्रोह में शामिल हुए। ताल्लुकदारों ने उन सभी गाँवों पर पुनः अपना अधिकार कर लिया जो अवध विलय से पहले उनके पास थे। किसान अपने परंपरागत मालिकों (ताल्लुकदारों) के साथ मिलकर लड़ाई में शामिल हुए। अवध की राजधानी लखनऊ विद्रोह का केंद्र-बिंदु बनी। फिरंगी राज के चिहनों को मिटा दिया गया। टेलीग्राफ लाइनों को तहस-नहस कर दिया गया। यहाँ घटनाओं का क्रम कुछ इस तरह चला। 4 जून, 1857 को विद्रोह प्रारंभ हुआ। विद्रोहियों ने ब्रिटिश रैजीडेंसी को घेर लिया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

1 जुलाई को अवध का चीफ कमीश्नर हैनरी लारेंस (Henery Lawrence) लड़ता हुआ मारा गया। 1858 के शुरू में विद्रोहियों की संख्या लखनऊ शहर में लगभग 2 लाख की थी। यहाँ संघर्ष सबसे लंबा चला। अन्य स्थानों की अपेक्षा विदेशी शासन के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध (Popular Resistance) अवध में अधिक था। अवध के विलय से एक भावनात्मक उथल-पुथल शुरू हो गई। एक अन्य अखबार ने लिखा : “देह (शरीर) से जान जा चुकी थी। शहर की काया बेजान थी….। कोई सड़क, कोई बाज़ार और कोई घर ऐसा न था जहाँ से जान-ए आलम से बिछुड़ने पर विलाप का शोर न गूंज रहा हो।” लोगों के दुःख और असंतोष की अभिव्यक्ति लोकगीतों में भी हुई।

→ संक्षेप में कहा जा सकता है कि अवध में भारी विद्रोह देहात व शहरी लोगों, सिपाहियों तथा ताल्लुकदारों का एक सामूहिक कृत्य (Collective Act) था। बहुत-से सैनिक कारणों से तो सैनिक ग्रस्त थे ही वे अपने परिवार व गाँव के दुःख-दर्द से भी आहत थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 Img 2

→ विद्रोहियों की घोषणाओं में ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक समूहों को एकजुट होने का आह्वान किया गया। ब्रिटिश राज को एक विदेशी शासन के रूप में सर्वाधिक उत्पीड़क व शोषणकारी माना गया। इसलिए इससे संबंधित प्रत्येक चीज़ को पूर्ण तौर पर खारिज किया जा रहा था। अंग्रेजी सत्ता को उत्पीड़क एवं निरंकुश के साथ

→ साथ ही, धर्म, सम्मान व रोजगार के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। इस लड़ाई को एक ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ घोषित किया। विद्रोह के दौरान विद्रोहियों ने सूदखोरों के बही-खाते भी जला दिये थे और उनके घरों में तोड़-फोड़ व आगजनी की थी। शहरी संभ्रांत लोगों को जान बूझकर अपमानित भी किया। वे उन्हें अंग्रेज़ों के वफादार और उत्पीड़क मानते थे।

→ विद्रोही भारत के सभी सामाजिक समुदायों में एकता चाहते थे। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया। अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का उल्लेख भी किया गया। लाभ की दृष्टि से इस युद्ध को दोनों समुदायों के लिए एक समान बताया।

→ ध्यान रहे विद्रोह के चलते ब्रिटिश अधिकारियों ने हिंदू और मुसलमानों में धर्म के आधार पर फूट डलवाने का भरसक प्रयास किए थे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। उदाहरण के लिए बरेली में विद्रोह के नेता खानबहादुर के विरुद्ध हिंदू प्रजा को भड़काने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स औट्रम (James Outram) द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया था। अंततः हारकर उसे 50,000 रुपये वापस ख़जाने में जमा करवाने पड़े जो इस उद्देश्य के लिए निकाले गए थे।

→ विद्रोह का दमन करने के लिए मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए। एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया के अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी। साथ ही सबसे पहले दिल्ली पर पुनः अधिकार की रणनीति अपनाई गई। केनिंग जानता जन-विद्रोह और राज (1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान) था कि दिल्ली के पतन से विद्रोहियों की कमर टूट जाएगी। हिंदू-मुसलमानों में सांप्रदायिक तनाव भड़काकर विद्रोह को कमजोर करने का प्रयास भी किया गया। लेकिन इसमें उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी।

→ इस अध्याय के अंतिम भाग में उन छवियों को समझने का प्रयास किया गया है जो अंग्रेज़ों व भारतीयों में निर्मित हुईं। इन छवियों में शामिल हैं-विद्रोह से संबंधित अनेक चित्र, पेंसिल निर्मित रेखाचित्र, उत्कीर्ण चित्र (Etchings), पोस्टर, के उपलब्ध बाजार-प्रिंट इत्यादि। साथ में हम जान पाएंगे कि इतिहासकार ऐसे स्रोतों का कैसे उपयोग करते हैं।

समय-रेखा

1.1801 ई०वेलेजली द्वारा अवध में सहायक संधि लागू की गई
2.13 फरवरी, 1856अवध का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय
3.10 मई, 1857मेरठ में सैनिकों द्वारा विद्रोह
4.11 मई, 1857विद्रोही सेना का मेरठ से दिल्ली पहुँचना
5.12 मई , 1857बहादुर शाह ज़फर द्वारा विद्रोहियों का नेतृत्व स्वीकार करना
6.30 मई, 1857लखनऊ में विद्रोह
7.4 जून, 1857अवध में सेना में विद्रोह
8.10 जून, 1857सतारा में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्रिदोह
9.30 जून, 1857चिनहाट के युद्ध में अंग्रेज़ों की हार
10.जुलाई, 1858युद्ध में शाह मल की मृत्यु
11.20 सितंबर, 1857ब्रिटिश सेना का विजयी होकर दिल्ली में प्रवेश
12.25 सितंबर, 1857ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियाँ हैवलॉक व ऑट्रम के नेतृत्व में लखनऊ पहुँचीं रानी लक्ष्मीबाई वीरगति को प्राप्त हुई
13.17 जून, 1858वेलेजली द्वारा अवध में सहायक संधि लागू की गई

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 11 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

HBSE 12th Class History उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
ग्रामीण बंगाल के बहुत-से इलाकों में जोतदार एक ताकतवर हस्ती क्यों था?
उत्तर:
जोतदार बंगाल के गाँवों में संपन्न किसानों के समूह थे। गाँव के मुखिया भी इन्हीं में से होते थे। संक्षेप में इन जोतदारों की ताकत में वृद्धि होने के निम्नलिखित मुख्य कारण थे

1. ज़मीनों के वास्तविक मालिक-जोतदार गाँव में ज़मीनों के वास्तविक मालिक थे। कईयों के पास तो हजारों एकड़ भूमि थी। वे बटाइदारों से खेती करवाते थे। जो फसल का आधा भाग अपने पास और आधा जोतदार को दे देते थे। इससे जोतदारों की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि होती चली गई।

2. व्यापारी तथा साहूकार-जोतदार केवल भू-स्वामी ही नहीं थे। उनका स्थानीय व्यापार व साहूकारी पर भी नियंत्रण था। वे एक व्यापारी, साहूकार तथा भूमिपति के रूप में अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग थे।

3. भू-राजस्व भुगतान में जान-बूझकर देरी-जोतदार जान-बूझकर गाँव में ऐसा माहौल तैयार करवाते थे कि ज़मींदार के अधिकारी (अमला) गाँव से लगान न एकत्रित कर पाए। यह विलंब ज़मींदार के लिए कुड़की लेकर आता था। इससे जोतदार को लाभ मिलता था।

4. ज़मीन की खरीद-ज़मींदार की ज्यों ही ज़मीन की नीलामी होती थी, उसे प्रायः जोतदार ही खरीदता था। इससे उनकी शक्ति में और वृद्धि होती जाती थी और ज़मींदारों की शक्ति का दुर्बल होना स्वाभाविक था।

प्रश्न 2.
जमींदार लोग अपनी ज़मींदारियों पर किस प्रकार नियंत्रण बनाए रखते थे? उत्तर:ज़मींदारों ने अपनी सत्ता और ज़मींदारी बचाने के लिए निम्नलिखित तिकड़मबाजी लगाई

1. बेनामी खरीददारी-ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी को बचाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी का अपनाया। इसमें प्रायः ज़मींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे। फिर वे देय राशि सरकार को नहीं देते थे। सरकार को पुनः उस ज़मीन को नीलाम करना पड़ता था और इस बार भी ज़मींदार के दूसरे एजेंट वैसा ही करते और सरकार को फिर राशि जमा नहीं करवाते। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती जब तक सरकार और बोली लगाने वाले दोनों हार न जाते। बोली लगाने वाले नीलामी के समय आना ही छोड़ जाते थे। अन्ततः सरकार को वह ज़मींदारी पुराने ज़मींदार को देनी पड़ती थी।

2. ज़मीन का कब्जा न देना-यदि बाहर के शहरी धनी लोग अधिक बोली देकर ज़मीन खरीदने में सफल हो जाते थे तो ऐसे लोगों को कई बार ज़मींदार के लठैत (लठियाल) ज़मीन में प्रवेश ही नहीं करने देते थे। कई बार ज़मींदार अपनी रैयत को नए ज़मींदार के विरुद्ध भडका देते थे। या फिर रैयत की पुराने जमींदार के साथ लगाव व सहानुभूति होती थी। इस कारण से वह नए जमींदार को ज़मीन में घुसने ही नहीं देती थी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 3.
पहाड़िया लोगों ने बाहरी लोगों के आगमन पर कैसी प्रतिक्रिया दर्शाई?
उत्तर:
बाहरी लोगों का आगमन पहाड़िया लोगों के लिए जीवन का संकट बन गया था। उनके पहाड़ व जंगलों पर कब्जा करके खेत बनाए जा रहे थे। पहाड़िया लोगों में इसकी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक था। पहाड़ियों के आक्रमणों में तेजी आती गई। अनाज व पशुओं की लूट के साथ इन्होंने अंग्रेजों की कोठियों, ज़मींदारों की कचहरियों तथा महाजनों के घर-बारों पर अपने मुखियाओं के नेतृत्व में संगठित हमले किए और लूटपाट की।

दूसरी ओर ब्रिटिश अधिकारियों ने दमन की क्रूर नीति अपनाई। उन्हें बेरहमी से मारा गया परंतु पहाड़िया लोग दुर्गम पहाड़ी गों में जाकर बाहरी लोगों (ज़मींदारों व जोतदारों) पर हमला करते रहे। ऐसे क्षेत्रों में अंग्रेज़ों के सैन्य बलों के लिए भी इनसे निपटना आसान नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश अधिकारियों ने शांति संधि के प्रयास शुरू किए। जिसमें उन्हें वार्षिक भत्ते की पेशकश की गई। बदले में उनसे यह आश्वासन चाहा कि वे शांति व्यवस्था बनाए रखेंगे। उल्लेखनीय है कि अधिकतर मुखियाओं ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। जिन कुछ मुखियाओं ने इस प्रस्ताव को स्वीकार किया था, उन्हें पहाड़िया लोगों ने पसंद नहीं किया।

प्रश्न 4.
संथालों ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह क्यों किया?
अथवा
संथालों के विद्रोह के क्या कारण थे?
उत्तर:
संथालों के विद्रोह के निम्नलिखित कारण थे
(1) उनकी ज़मीनें धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलकर ज़मींदारों और साहूकारों के हाथों में जाने लगीं। साहूकार और ज़मींदार उनकी ज़मीनों के मालिक बनने लगे। महेशपुर और पाकुड़ के पड़ोसी राजाओं ने संथालों के गाँवों को आगे छोटे ज़मींदारों व साहूकारों को पट्टे पर दे दिया। वे मनमाना लगान वसूल करने लगे।

(2) इससे शोषण व उत्पीड़न का चक्र शुरू हुआ। लगान अदा न कर पाने की स्थिति में संथाल किसान साहूकारों से ऋण लेने के लिए विवश हुए। साहूकार ने 50 से 500 प्रतिशत तक सूद वसूल किया।

(3) किसान की दरिद्रता बढ़ने लगी। वे ज़मींदारों के अर्ध-दास व श्रमिक बनने लगे।

(4) सरकारी अधिकारी, पुलिस, थानेदार सभी महाजनों का पक्ष लेते थे। वे स्वयं भी संथालों से बेगार लेते थे। यहाँ तक कि संथाल कृषकों की स्त्रियों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं थी। अतः दीकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध संथालों का विद्रोह फूट पड़ा।

प्रश्न 5.
दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति क्रुद्ध क्यों थे?
उत्तर:
1870 ई० के आसपास दक्कन के रैयत ऋणदाताओं के प्रति अत्यधिक क्रुद्ध थे। विद्रोह के दौरान उन्होंने उनके बही-खाते और कई जगह तो घरों को भी जला डाला था। वास्तव में अमेरिकी गृह युद्ध के बाद उनके लिए ऋण का स्रोत सूख गया था। उन्हें ऋण मिलना बंद हो गया था।

जब साहूकारों ने उधार देने से मना किया तो किसानों को बहुत गुस्सा आया। क्योंकि परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में न तो अधिक ब्याज लिया जाता था और न ही मुसीबत के समय उधार से मनाही की जाती थी। किसान विशेषतः इस बात पर अधिक नाराज़ थे कि साहूकार वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनके हालात पर रहम नहीं खा रहा है। सन् 1874 में साहूकारों ने भू-राजस्व चुकाने के लिए किसानों को उधार देने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। वे सरकार के इस कानून को नहीं मान रहे थे कि चल-सम्पत्ति की नीलामी से यदि उधार की राशि पूरी न हो तभी साहूकार जमीन की नीलामी करवाएँ। अब उधार न मिलने से मामला और भी जटिल हो गया। किसान विद्रोही हो उठे।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
इस्तमरारी बंदोबस्त के बाद बहुत-सी ज़मींदारियाँ क्यों नीलाम कर दी गईं?
उत्तर:
इस्तमरारी बंदोबस्त यानी ज़मींदारी प्रथा के कारण बहुत-से ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ नीलाम कर दी गई थीं क्योंकि वे समय पर सरकार को देय राशि का भुगतान नहीं कर पाते थे। इस प्रणाली के अंतर्गत राजस्व की दर बहुत ऊँची निर्धारित की गई थी। जिस दशक में यह बंदोबस्त लागू किया गया था, उसी दशक में मंदी का दौर चल रहा था। इसलिए रैयत (किसान) अपने लगान को चुकाने की स्थिति में ही नहीं था। दूसरी ओर, कंपनी सरकार ने ज़मींदारों की सैनिक व प्रशासनिक शक्तियों को कम कर दिया था। उनके सैनिक दस्ते भंग कर दिए थे। पुलिस और न्याय के अधिकार भी छीन लिए थे। अब वे किसानों से डंडे के बल पर लगान वसूल नहीं कर सकते थे। वे लगान न देने वाले किसानों के खिलाफ न्यायालय में तो जा सकते थे परंतु न्यायालयों में न्याय की प्रक्रिया काफी लंबी थी। उदाहरण के लिए बर्दवान जिले में ही 1798 में 30,000 से अधिक मुकद्दमें बाकीदारों के विरुद्ध लम्बित थे।

सरकार का राजस्व वसूली का रवैया बहुत ही कठोर था। इसके लिए सूर्यास्त विधि (Sunset Law) का अनुसरण किया गया था अर्थात् निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न करने वाले ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ नीलाम कर दी जाती थीं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि संपन्न ग्रामीण वर्ग (जोतदार और धनी किसान) भी ज़मींदार की नीलामी से खुश होता था। वह सामान्य किसानों (रैयत) को ज़मींदार के विरुद्ध लगान न देने के लिए प्रोत्साहित भी करता था। कई बार तो फसल न होने पर और कई बार तो जान-बूझकर भी वह ज़मींदार को लगान नहीं देता था। उसे यह पता था कि ज़मींदार सैनिक कार्रवाई नहीं कर सकता और न्यायालय में मुकद्दमों का आसानी से निर्णय नहीं हो सकता। अतः यही वे परिस्थितियाँ थीं जिनमें इस्तमरारी प्रथा के चलते बहुत-सी ज़मींदारियाँ 18वीं सदी के अंतिम दशक में नीलाम कर दी गई थीं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 7.
पहाड़िया लोगों की आजीविका संथालों की आजीविका से किस रूप में भिन्न थी?
उत्तर:
पहाड़िया और संथाल दो जनजातियाँ थीं। लेकिन दोनों की आजीविका के साधनों में अंतर था। संथाल पहाड़ियों की. अपेक्षा अग्रणी बाशिंदे थे।
दोनों जनजातियों की आजीविका के साधनों में अंतर को निम्नलिखित तरीके से स्पष्ट किया जा सकता है

पहाड़िया लोगों की आजीविकासंथालों की आजीविका
1. पहाड़िया लोगों की खेती कुदाल (Hoe) पर आधारित थी। ये राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहते थे। वे हल को हाथ लगाना पाप समझते थे।1. संथाल हल (Plough) की खेती यानी स्थायी कृषि सीख रहे थे। ये गंजुरिया पहाड़ियों की तलहटी में रहने वाले लोग थे।
2. पहाड़िया लोग झूम की खेती करते थे। वे झाड़ियों को काटकर व घास-फूँस को जलाकर एक छोटा-सा ज़मीन का टुकड़ा निकाल लेते थे। यह छोटा-सा खेत पर्याप्त उपजाऊ होता था। घास व झाड़ियों के जलने से बनी राख उसे और भी उपजाऊ बना देती थी। ये लोग साधारण कृषि औजार-कुदाल से ज़मीन को थोड़ा खुरचकर खेती करते थे। कुछ वर्षों तक उसमें खाने के लिए विभिन्न तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगाते और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे खाली (परती) छोड़ देते, ताकि यह पुनः उर्वर हो जाए।2. यह अपेक्षाकृत स्थायी प्रवृत्ति के थे। ये परिश्रमी थे और इन्हें खेती की समझ थी। इसलिए जमींदार लोग इन्हें नई भूमि निकालने तथा खेती करने के लिए मजदूरी पर रखते थे।
3. कृषि के अतिरिक्त शिकार व जंगल के उत्पाद पहाड़िया लोगों की आजीविका के साधन थे। वे काठ कोयला बनाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ एकत्र करते थे। खाने के लिए महुआ नामक पौधे के फूल एकत्र करते थे। जंगल से रेशम के कीड़े के कोया (Silkcocoons) एवं राल (Resin) एकत्रित करके बेचते थे।3. संथाल जंगल तोड़कर अपनी जमीनें निकालकर खेती करने लगे। वे पहाड़िया लोगों के क्षेत्रों में घुसे आ रहे थे। वे नए निकाले खेतों में तम्बाकू सरसों, कपास तथा चावल की खेती करते थे।
4. पहाड़िया लोग जंगलों को बर्बाद करके उस क्षेत्र में हल नहीं चलाना चाहते थे। वे बाजार के लिए खेती नहीं चाहते थे।4. ये जंगलों को तोड़कर खेती कसने में परहेज नहीं करते थे।

प्रश्न 8.

अमेरिकी गृहयुद्ध ने भारत में रैयत समुदाय के जीवन को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर:
अमेरिका में गृहयुद्ध सन् 1861 से 1865 के बीच हुआ। इस गृहयुद्ध के दौरान भारत की रैयत को खूब लाभ मिला। कपास की कीमतों में अचानक उछाल आया क्योंकि इंग्लैंड के उद्योगों को अमेरिका से कपास मिलना बंद हो गया था। भारतीय कपास की माँग बढ़ने के कारण कपास उत्पादक रैयत को ऋण की भी समस्या नहीं रही। कपास सौदागरों ने बंबई दक्कन के जिलों में कपास उत्पादन का आँकलन किया। किसानों को अधिक कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। कपास निर्यातकों ने शहरी साहकारों को पेशगी राशियाँ दी ताकि वे ये राशियाँ ग्रामीण ऋणदाताओं को उपलब्ध करवा सकें और वे आगे किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें उधार दे सकें।

निर्यातक, साहूकार, व्यापारी तथा किसान सभी अपने-अपने मुनाफे के लिए कपास की पैदावार बढ़ाने के लिए प्रयत्न करने लगे। ऋण की समस्या अब किसानों के लिए नहीं थी। साहूकार भी अपनी उधार राशि की वापसी के लिए आश्वस्त था।

दक्कन के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। किसानों को लंबी अवधि के ऋण प्राप्त हुए। कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ भूमि पर सौ रुपए तक की पेशगी राशि किसानों को दी गई। चार साल के अंदर ही कपास पैदा करने वाली ज़मीन दो गुणी हो गई। 1862 ई० तक स्थिति यह थी कि इंग्लैंड में आयात होने वाले कुल कपास आयात का 90% भाग भारत से जा रहा था। बंबई में दक्कन में कपास उत्पादक क्षेत्रों में इससे समृद्धि आई। यद्यपि इस समृद्धि का लाभ मुख्य तौर पर धनी किसानों को ही हुआ। गरीब किसान इस तेजी के दौर में भी साहूकार के कर्ज से निकल नहीं पाए। परंतु ज्यों ही गृहयुद्ध समाप्त हुआ। पुनः अमेरिका से कपास ब्रिटेन में आयात होने लगी। भारतीय रैयत का माल बिकना कम हो गया। साथ में उनका ऋण स्रोत भी सूख गया। इससे उनमें
आक्रोश बढ़ा।

प्रश्न 9.
किसानों का इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के बारे में क्या समस्याएँ आती हैं?
उत्तर:
इतिहासकारों को किसानों संबंधी इतिहास लिखने में सरकारी स्रोतों के उपयोग के दौरान कई तरह की समस्याएँ आती हैं; जैसे कि ये स्रोत निष्पक्ष नहीं होते। राजस्व अभिलेख, विभिन्न दंगा आयोग की रिपोर्ट, सरकार द्वारा नियुक्त सर्वेक्षणकर्ताओं की रिपोर्ट, प्रशासनिक पत्राचार, अधिकारियों के निजी कागज-पत्र तथा उनकी डायरी वृत्तांत इत्यादि सभी दस्तावेज सरकारी स्रोत कहे
जाते हैं।

इन सरकारी स्रोतों के आधार पर किसानों संबंधी इतिहास लिखने में सबसे बड़ी समस्या होती है उन स्रोतों के ‘उद्देश्य एवं दृष्टिकोण’ की खोज-बीन करना। क्योंकि वे किसी-न-किसी रूप में सरकारी दृष्टिकोण एवं अभिप्राय के पक्षधर होते हैं। वे निष्पक्ष नहीं होते। उदाहरण के लिए ‘दक्कन दंगा आयोग’ नियुक्ति का उद्देश्य यह पता लगाना था कि सरकारी राजस्व की माँग का विद्रोह के साथ क्या संबंध था अर्थात् क्या किसान राजस्व की ऊँची दर के कारण विद्रोही हुए थे या फिर इसके अन्य कारण थे। जाँच-पड़ताल के बाद रिपोर्ट में आयोग ने स्पष्ट किया कि सरकारी माँग किसानों के आक्रोश का कारण बिल्कुल नहीं थी।

इसके लिए साहूकार तथा उनके हथकंडे ही उत्तरदायी थे। परन्तु साहूकार की शरण में किसान क्यों जाने के लिए विवश हुआ, यहाँ आयोग निष्पक्ष नहीं रहा। राजस्व की ऊँची दर और उसे वसूलने के तरीके, विशेषतः मंदी व प्राकृतिक आपदाएँ (अकालों आदि) ही किसान को साहूकार के चंगुल में फंसाती थीं। आयोग ने इन सब बातों को उत्तरदायी नहीं माना। अतः स्पष्ट है कि आयोग सरकार का पक्ष ले रहा था। औपनिवेशिक सरकार अपने दोष को स्वीकार करने को तैयार नहीं थी। ध्यान रहे सरकारी रिपोर्ट इतिहास-लेखन में बहुमूल्य स्रोत तो होते हैं, लेकिन उन्हें सदैव सावधानीपूर्वक पढ़ना चाहिए। साथ ही समाचार-पत्रों, गैर सरकारी वृत्तांतों, वैधिक अभिलेखों तथा यथासंभव मौखिक स्रोतों के साक्ष्यों से मिलान करना चाहिए।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
उपमहाद्वीप के बाह्यरेखा मानचित्र (खाके) में इस अध्याय में वर्णित क्षेत्रों को अंकित कीजिए। यह भी पता लगाइए कि क्या ऐसे भी कोई इलाके थे जहाँ इस्तमरारी बंदोबस्त और रैयतवाड़ी व्यवस्था लागू थी। ऐसे इलाकों को मानचित्र में भी अंकित कीजिए।
उत्तर:
उपमहाद्वीप में कई ऐसे क्षेत्र थे जहाँ दोनों प्रणालियाँ लागू की गई थीं जैसे कि बंगाल (बिहार, उड़ीसा सहित), मद्रास . प्रेजीडेंसी, सूरत, बंबई प्रेजीडेंसी, मद्रास के कुछ इलाके, उत्तर पूर्वी भारत में पड़ने वाले पहाड़िया और संथाल लोगों के स्थान।

इस्तमरारी बंदोबस्त मुख्यतः बंगाल बिहार व उड़ीसा क्षेत्र में लागू किया गया था। यह ब्रिटिश भारत के लगभग 19% भाग पर लागू थी।

रैयतवाड़ी प्रणाली को सन् 1820 तक मद्रास, बंबई के कुछ भागों, बर्मा तथा बरार, आसाम व कुर्ग के कुछ क्षेत्रों में लागू किया गया। इसमें कुल मिलाकर ब्रिटिश भारत की कुल भूमि के 51 प्रतिशत हिस्से को शामिल किया गया।

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
फ्रांसिस बुकानन ने पूर्वी भारत के अनेक जिलों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की थीं। उनमें से एक रिपोर्ट पढ़िए और इस अध्याय में चर्चित विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए उस रिपोर्ट में ग्रामीण समाज के बारे में उपलब्ध जानकारी को संकलित कीजिए। यह भी बताइए कि इतिहासकार लोग ऐसी रिपोर्टों का किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं।
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक के दिशा निर्देश में परियोजना रिपोर्ट तैयार करें।

प्रश्न 12.
आप जिस क्षेत्र में रहते हैं, वहाँ के ग्रामीण समदाय के वद्धजनों से चर्चा कीजिए और उन खेतों में जाइए जिन्हें वे अब जोतते हैं। यह पता लगाइए कि वे क्या पैदा करते हैं, वे अपनी रोजी-रोटी कैसे कमाते हैं, उनके माता-पिता क्या करते थे, उनके बेटे-बेटियाँ अब क्या करती हैं और पिछले 75 सालों में उनके जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं। अपने निष्कर्षों के आधार पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी इसके लिए गाँव के सरपंच, नंबरदार तथा वृद्धजनों से सूचना प्राप्त करें। यथासंभव गाँव संबंधी रिकॉर्ड को देखें।
साक्षात्कारों और विभिन्न रिकॉर्डस के आधार पर अपने अध्यापक के निर्देशन में ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ बनाएँ।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन HBSE 12th Class History Notes

→ उपनिवेशवाद-यह वह विचारधारा है जिसके अंतर्गत किसी देश, राष्ट्र या संप्रदाय को अन्य राष्ट्र या समुदाय के लोगों द्वारा अधीन बनाकर विभिन्न क्षेत्रों (आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक) को प्रभावित करने के लिए प्रेरित करती है।

→ साम्राज्यवाद-जब कोई एक राष्ट्र किसी अन्य राष्ट्र या उसके किसी भू-क्षेत्र पर राजनीतिक अधिकार स्थापित करके अपने हितों की पूर्ति करता है, तो उसे साम्राज्यवाद कहते हैं। उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद का परस्पर गहरा संबंध होता है।

→ औपनिवेशिक व्यवस्था-ऐसी व्यवस्था जिसका विकास उपनिवेशवाद की विचारधारा के तहत हुआ हो। उदाहरण के लिए भारत में अंग्रेजों की व्यवस्था औपनिवेशिक थी। अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए उन्होंने भारत में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवर्तन किए।

→ अभिलेखागार-उस स्थान को कहा जाता है जहाँ पुराने दस्तावेज, सरकारी रिपोर्ट, फाइलें, वैधिक निर्णय, अभियोग, याचिकाएँ, डायरियाँ, समाचार पत्र-पत्रिकाएँ इत्यादि सुरक्षित रखे जाते हैं जिन्हें शोधकर्ता उपयोग करते हैं और अपने निष्कर्षों के साथ इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।

→ ताल्लकेदार-यह शब्द ज़मींदारों के लिए प्रयोग में आता है। लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ है वह व्यक्ति जिसके साथ ताल्लुक (संबंध) हो। आगे चलकर ताल्लुक का अर्थ क्षेत्रीय इकाई हो गया था।

→ राजा-बंगाल में 18वीं सदी में ‘राजा’ शब्द का प्रयोग प्रायः शक्तिशाली ज़मींदारों के लिए किया जाता था। इनके पास अपने न्यायिक और सैनिक अधिकार होते थे। ये नवाब को अपना ज़मींदारी-राजस्व देते थे। वैसे काफी सीमा तक ये स्वायत्त थे।

→ ज़मींदार-बंगाल के ‘राजाओं’ तथा ‘ताल्लुकेदारों को इस्तमरारी बंदोबस्त (Permanent Settlement) के तहत ‘जमींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया। उन्हें सरकार को निर्धारित राजस्व निश्चित समय पर देना होता था। इस परिभाषा के अनुसार वे गाँव में भू-स्वामी नहीं थे, बल्कि भू-राजस्व समाहर्ता यानी संग्राहक मात्र थे।

→ जोतदार-उत्तरी बंगाल में जोतदार धनी किसानों को कहा जाता था। कुछ जोतदार तो हजारों एकड़ के मालिक थे। वे अपनी खेती बटाईदारों (बरगादारों या अधियारों) से करवाते थे।

→ रैयत-अंग्रेज़ों के विवरणों में रैयत’ शब्द का प्रयोग किसानों के लिए किया जाता था। गाँव का प्रत्येक छोटा या बड़ा रैयत ज़मींदार को लगान अदा करता था।

→ शिकमी रैयत-रैयत (किसान) कुछ ज़मीन तो स्वयं जोतते थे और कुछ आगे बटाईदारों को जोतने के लिए दे देते थे। ये बटाईदार किसान शिकमी रैयत कहलाते थे। ये रैयत को फसल का हिस्सा (लगान) देते थे।

→ अमला-ज़मींदार का वह अधिकारी जो गाँव में रैयत से लगान एकत्र करने आता था।

→ जमा-गाँव की भूमि का कुल लगान।

→ लठियाल-लाठीवाला। बंगाल में ज़मींदार के लठैतों को लठियाल कहा जाता था।

→ बेनामी-इसका शाब्दिक अर्थ है ‘गुमनाम’, किसी फर्जी व्यक्ति के नाम से किए जाने वाले सौदे। इसमें असली फायदा उठाने वाले व्यक्ति का नाम सामने नहीं आता।

→ हवलदार या गाँटीदार या मंडल-उत्तरी बंगाल में जोतदार गाँवों में मुखिया (मुकद्दम) बनकर उभरे, लेकिन अन्य भागों में ऐसे धनी प्रभावशाली मुखियाओं को हवलदार या गाँटीदार (Gantidars) या मंडल कहा जाता था।

→ महालदारी-भूमि बंदोबस्त, जिसमें महाल अथवा गाँव को इकाई मानकर राजस्व की माँग निर्धारित की गई। यह मुख्यतः उत्तर भारत में लागू किया गया।

→ साहूकार-यह ऐसा व्यक्ति होता था जो पैसा ब्याज पर उधार देता था और साथ ही व्यापार भी करता था।

→ किरायाजीवी-यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग में लाया गया जो अपनी सम्पत्ति की आय पर जीवनयापन करते हैं।

→ योमॅन कंपनी के शासनकाल के रिकॉर्ड में छोटे किसान को ‘योमॅन’ कहा गया।

→ ताम्रपट्टोत्कीर्णन या एक्वाटिंट-ऐसी तस्वीर होती है जो ताम्रपट्टी में अम्ल (Acid) की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके बनाई जाती है।

→ इस अध्याय का संबंध औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था के उन प्रभावों से है, जो भारत के गाँवों पर पड़े। उल्लेखनीय है कि ब्रिटिश राज के कारण देहाती समाज की परंपरागत व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। कुछ लोग धनवान और कुछ गरीब हो गए। बहुत-से लोगों के हाथों से गुजर-बसर के साधन तक छिन गए। राजस्व की ऊँची दर निर्धारित करने से किसानों के जीवन पर काफी बुरा असर हुआ। वे साहूकारी के जाल में फँसते गए। अन्यायपूर्ण सरकारी कानूनों के प्रति किसानों की प्रतिक्रिया विद्रोहों के रूप में हुई। इस अध्याय में बंगाल तथा बंबई दक्कन के देहात में हुए परिवर्तनों को ही अध्ययन का आधार बनाया गया है।

→ सन् 1793 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भू-राजस्व की एक नई प्रणाली अपनाई, जिसे ‘ज़मींदारी प्रथा’, ‘स्थायी बंदोबस्त’ अथवा ‘इस्तमरारी-प्रथा’ कहा गया। यह प्रणाली बंगाल, बिहार, उड़ीसा तथा बनारस व उत्तरी कर्नाटक में लागू की गई थी। इस व्यवस्था से सरकार की आय निश्चित हो गई और प्रशासन व व्यापार दोनों को नियमित करने में लाभ हुआ। परन्तु यह बंगाल की अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं कर सकी। कालांतर में यह प्रणाली कंपनी के लिए भी आर्थिक तौर पर घाटे की सिद्ध हुई। साथ ही इसमें रैयत को ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई। शीघ्र ही कंपनी अधिकारियों को इसमें एक आर्थिक बुराई और भी नज़र आने लगी। इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था।

→ प्रारंभ में स्थाई बंदोबस्त ज़मींदारों के लिए काफी हानिप्रद सिद्ध हुआ। बहुत-से ज़मींदार सरकार को निर्धारित भूमि-कर का भुगतान समय पर नहीं कर सके। परिणामस्वरूप उन्हें उनकी ज़मींदारी से वंचित कर दिया गया। समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि बर्दवान के राजा (शक्तिशाली ज़मींदार) की ज़मींदारी के अनेक महाल (भू-संपदाएँ) सार्वजनिक तौर पर नीलाम किए गए थे। ध्यान रहे ये ज़मींदार अपनी ज़मींदारियों को बचाने के लिए तरह-तरह की तिकड़मबाजी भी लगाते थे। इस व्यवस्था के चलते गाँवों के संपन्न किसान समूहों एवं जोतदारों को शक्तिशाली होने का अवसर मिला।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

→ बंगाल में जिस अवधि के परिवर्तनों पर हम विचार कर रहे हैं उसका एक प्रमुख समकालीन स्रोत 1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई एक रिपोर्ट है। यह पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई। इसमें 1002 पृष्ठ थे जिनमें से 800 से अधिक पृष्ठों में परिशिष्ट लगाए गए थे। इन परिशिष्टों में भू-राजस्व से संबंधित आंकड़ों की तालिकाएँ, अधिकारियों की बंगाल व मद्रास में राजस्व व न्यायिक प्रशासन पर लिखी गई टिप्पणियाँ, जिला कलेक्टरों की अपने अधीन भू-राजस्व व्यवस्था पर रिपोर्ट तथा ज़मींदारों एवं रैयतों के आवेदन पत्रों को सम्मिलित किया गया था। ये साक्ष्य इतिहास लेखन के लिए बहुमूल्य हैं। लेकिन यह कोई निष्पक्ष रिपोर्ट नहीं कही जा सकती। इसका अध्ययन सावधानीपूर्वक किया जाना चाहिए। जो प्रवर समिति के सदस्य इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले थे उनका प्रमुख उद्देश्य कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करना था। राजस्व प्रशासन की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।

→ इस अध्याय के एक भाग में ‘पहाड़िया’ और ‘संथालों’ के जीवन पर पड़े प्रभावों को बहुत ही गम्भीरता से वर्णित किया गया है। राजमहल की पहाड़ियों के इर्द-गिर्द रहने वाले पहाड़िया लोगों की खेती तो अभी कुदाल (Hoe) पर आधारित ही थी। जबकि गंजुरिया पहाड़ियों की तलहटी में रहने वाले संथाल हल (Plough) की खेती यानी स्थायी कृषि सीख रहे थे। अंग्रेजों ने अपने हितों के लिए पहाड़िया और संथालों के जीवन में हस्तक्षेप करके उनके परंपरागत जीवन को बदला दिया था। फिर पहाड़िया और संथालों की प्रतिक्रिया काफी तीखी हुई।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 Img 1

→ सन् 1855-56 में तो संथालों का आक्रोश एक ज़बरदस्त सशस्त्र विद्रोह के रूप में फूट पड़ा। जून को भगनीडीट गाँव में लगभग 400 आदिवासी गाँवों से करीब 6,000 आदिवासी प्रतिनिधियों की सभा हुई जिसमें एक स्वर से खले विद्रोह का आह्वान किया गया। विद्रोह के नेता सीदो, कान्ह, चाँद और भैरव थे। ये चारो भाई थे। सीदो (सिधू मांझी) ने स्वयं को देवीपुरुष बताया और संथालों के भगवान् ‘ठाकुर’ का अवतार घोषित किया। संथालों को विश्वास था कि भगवान् उनके साथ हैं। ये नेता हाथी, घोड़े और पालकी पर चलते थे।

गाँव-गाँव में ढोल, नगाड़ों के साथ जुलूस निकालकर विद्रोह का आह्वान किया गया। एक अनुमान के अनुसार लगभग 60,000 सशस्त्र संथाल संगठित हो गए थे। इन्होंने महाजनों, ज़मींदारों के घरों को जला दिया, जमकर लूटपाट की तथा उन बही-खातों को भी बर्बाद कर दिया जिनके कारण वे गुलाम हो गए थे। चूंकि अंग्रेज़ सरकार महाजनों और ज़मींदारों का पक्ष ले रही थी। अतः संथालों ने सरकारी कार्यालयों, पुलिस कर्मचारियों पर हमले किए। थानों में आग लगा दी। भागलपुर और राजमहल के बीच रेल, डाक और तार सेवा को तहस-नहस कर दिया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 Img 2
→ विद्रोहियों को कुचलने के लिए सेना ने कत्लेआम मचा दिया। गाँव-के-गाँव जलाकर राख कर दिए। निःसंदेह संथालों ने वीरतापूर्वक अंग्रेज़ी सेना का मुकाबला किया, परन्तु सीधे तीर-धनुष और छापामार युद्ध के सहारे तोपों और गोलियों के सामने अधिक समय तक नहीं टिक सके। लगभग 15,000 संथाल मारे गए। 1855 ई० में सीदो को पकड़कर मार डाला गया। 1856 ई० में कान्हू को भी पकड़ लिया गया।

→ 1875 का दक्कन विद्रोह-यह विद्रोह 12 मई, 1875 को महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरू हुआ। दो महीनों के अंदर यह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। 100 कि०मी० पूर्व से पश्चिम तथा 65 कि०मी० उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। उन्होंने साहूकारों से उनके ऋण-पत्र (debt bonds) और बही-खाते (Account books) छीन लिए और उन्हें जला दिया। जिन साहूकारों ने बही-खाते और ऋण-पत्र देने का विरोध किया, उन्हें मारा-पीटा गया। उनके घरों को भी जला दिया गया। इसके अलावा अनाज की दुकानें लूट ली गईं।

→ यह विद्रोह मात्र अनाज के लिए दंगा’ (Grain Riots) नहीं था। किसानों का निशाना साफ तौर पर ‘कानूनी दस्तावेज’ (Legal Documents) थे। इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी भी घबराए। उन्होंने इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई। किसानों के इन विद्रोहों का संबंध देहाती अर्थव्यवस्था में उन परिवर्तनों से है जो ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों से आए। विशेषतः इन नीतियों के चलते साहकास और कृषकों के मध्य परंपसुगत संबंध समाप्त हो गए।

→ ऋण-प्राप्ति और उसकी वापसी दोनों ही दक्कन के किसानों के लिए एक जटिल प्रक्रिया थी। परंपरागत साहूकारी कारोबार में कानूनी दस्तावेजों का इतना झंझट नहीं था। जुबान अथवा वायदा ही पर्याप्त था। क्योंकि किसी सौदे के लिए परस्पर सामाजिक दबाव रहता था। ब्रिटिश अधिकारी वर्ग बिना विधिसम्मत अनुबंधों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। जुबानी लेन-देन कानून के दायरे में कोई महत्त्व नहीं रखता था जबकि परंपरागत प्रणाली में गाँव की पंचायत महत्त्व देती थी।

→ कर्ज में डूबे किसान को जब और उधार की जरूरत पड़ती तो केवल एक ही तरीके से यह संभव हो पाता कि वह ज़मीन, गाड़ी, हल-बैल ऋण दाता को दे दे। फिर भी जीवन के लिए तो उसे कुछ-न-कुछ साधन चाहिए थे। अतः वह इन साधनों को साहूकार से किराए पर लेता था जो वास्तव में उसके अपने ही होते थे।

क्रम संख्याकालघटना का विवरण
1 .1757अंग्रेज़ों व सिराजुद्दौला के मध्य प्लासी की लड़ाई हुई।
2 .1764बक्सर की लड़ाई।
3 .1765इलाहाबाद की संधि हुई।
4 .1772वारेन हेस्टिग्स बंगाल का गवर्नर बनकर आया जिसे 1773 में गवर्नर जनरल बनाया गया।
5 .1773कंपनी की सैनिक व राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण रखने के लिए रेग्यूलेटिंग एक्ट पास किया गया।
6 .1784रेग्यूलेटिंग एक्ट की कमियों को दूर करने के लिए ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ पास किया गया।
7 .1793स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी अथवा ज़मींदारी) लॉर्ड कार्नवालिस ने लागू किया।
8 .1780 का दशकसंथाल बंगाल में आए और ज़मींदारों के खेतों में काम करने लगे।
9 .1800 का दशकसंथाल जनजाति के लोग राजमहल की पहाड़ियों में आकर बसने लगे।
10 .1813‘पाँचवीं रिपोर्ट’ ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई।
11 .1818पहला भू-राजस्व बंदोबस्त, बंबई दक्कन में।
12 .1820 के दशककृषि उत्पादों के मूल्यों में गिरावट का प्रारंभ।
13 .1832-34
14 .1855-56बंबई दक्कन में भयंकर अकाल। आधी जनसंख्या समाप्त हो गई। संथालों का विद्रोह।
15 .1855संथाल नेता सीदो की हत्या की गई।
16 .1861-65अमेरिका गह यद्ध।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

HBSE 12th Class History राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
मुगल दरबार में पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुग़लकालीन भारत में मुद्रण कला का विकास नहीं हुआ था। इसलिए सभी इतिवृत्तों की रचना पांडुलिपियों (हस्तलिखित ग्रंथ) के रूप में हुई। पांडुलिपियों की रचना का मुख्य केन्द्र ‘शाही किताबखाना’ कहलाता था। फारसी भाषा में किताबखाना का आम अर्थ पुस्तकालय से लिया जाता है। मुगलकाल में किताबखाना पुस्तकालय से भिन्न था। किताबखाना सही अर्थों में लिपिघर था जहाँ बादशाह के आदेशानुसार लेखक व उनके सहयोगी सुबह से शाम तक पांडुलिपियों की रचना में व्यस्त रहते थे। इसी स्थान पर लिखी गई पांडुलिपियों को संग्रह करके रखा भी जाता था। किताबखाना काफी बड़ा तथा सुनियोजित स्थल था। वहाँ मात्र लेखक ही नहीं होते थे, बल्कि विविध प्रकार के कार्य करने वाले व्यक्ति होते थे।

ये सभी किताबखाना के नेतृत्व में कार्य करते थे। पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया में सबसे पहले कागज व उसके पन्ने बनाने वाले कारीगर कार्य करते थे। इसी तरह स्याही बनाने वालों का वर्ग था। कागज व स्याही के तैयार होने पर लेखक लिखता था। फिर उन पृष्ठों पर चित्रकार लेखक की सलाह के अनुरूप चित्र बनाता था। लेखन व चित्र कार्य होने के बाद जिल्दसाज जिल्द चढ़ाता था। इस तरह पांडुलिपि एक. पूरी प्रक्रिया के तहत तैयार होती थी।

प्रश्न 2.
मुगल दरबार से जुड़े दैनिक-कर्म और विशेष उत्सवों के दिनों ने किस तरह से बादशाह की सत्ता के भाव को प्रतिपादित किया होगा?
उत्तर:
मुग़ल शासकों ने भारत में सत्ता स्थापित करने के बाद मध्य-एशिया, ईरान व प्राचीन भारतीय शासन-व्यवस्था को अपनाकर इस तरह की परम्पराएँ अपनाईं जिससे राज्य मजबूत हुआ। इसके साथ ही शासक की सत्ता भी जनता के मन में बैठी। इसके लिए दरबार के अग्रलिखित प्रतीकों को लिया गया है

1. राज सिंहासन-सम्राट का केंद्र बिंदु राज सिंहासन था जिसने संप्रभु के कार्यों को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया था। इसे ऐसे आधार के रूप में स्वीकार किया जाता था जिस पर पृथ्वी टिकी हुई है।

2. अधिकारियों के बैठने के स्थान प्रत्येक अधिकारी (दरबारी) की हैसियत का पता उसके बैठने के स्थान से लगता था। जो दरबारी जितना सम्राट के निकट बैठता था उसे उतना ही सम्राट् के निकट समझा जाता था।

3. सम्मान प्रकट करने का तरीका-शासक को किये गये अभिवादन के तरीके से भी अभिवादनकर्ता की हैसियत का पता चलता था।

4. दिन की शुरुआत-बादशाह अपने दिन की शुरुआत सूर्योदय के समय कुछ धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था।

5. सार्वजनिक सभा (दीवान-ए-आम)-बादशाह अपनी सरकार के प्राथमिक कार्यों को पूरा करने के लिए दीवान-ए-आम में आता था। वहाँ राज्य के अधिकारी अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करते थे।

6. खास उत्सवों के अवसर-अनके धार्मिक त्योहार; जैसे होली, ईद, शब-ए-बारात आदि त्योहारों का आयोजन खूब ठाट-बाट से किया जाता था।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 3.
मुग़ल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में शाही परिवार की महिलाएँ मुख्य रूप से हरम में रहती थीं। हरम की सारी व्यवस्था का संचालन वे स्वयं करती थीं। हरम में सभी महिलाओं की स्थिति एक जैसी नहीं थी। इसके अतिरिक्त कई बार शाही परिवार की महिलाएँ भी राजनीति में सक्रिय रहती थीं। उदाहरण के लिए नूरजहाँ के राजनीति में आने के बाद हरम की स्थिति व पहचान दोनों बदल गईं। 1611 ई० से 1626 ई० तक जहाँगीर के शासन काल में नूरजहाँ ने प्रत्येक गतिविधि में हिस्सा लिया। वह झरोखे पर बैठती थी तथा सिक्कों पर उसका नाम आता था। ‘नूरजहाँ गुट’ सही अर्थों में जहाँगीर के शासन में सारे फैसले करता था। जहाँगीर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि मैंने बादशाहत नूरजहाँ को दे दी है, मुझे कुछ प्याले शराब तथा आधा सेर माँस के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए। शाहजहाँ के शासन काल में उसकी पुत्री जहाँआरा तथा रोशनआरा लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक फैसलों में शामिल होती थीं। वे उच्च पदों पर आसीन मनसबदारों की भाँति वार्षिक वेतन लेती थीं।

आर्थिक तौर पर सम्पन्न होने पर हरम की प्रमख महिलाओं ने इमारतों व बागों का निर्माण कार्य कराया। नरजहाँ ने आगरा में एतमादुद्दौला (अपने पिता) के मकबरे का निर्माण करवाया। शालीमार व निशात बागों को बनवाने में भी उसकी मुख्य भूमिका थी। इसी प्रकार दिल्ली में शाहजहाँनाबाद की कई कलात्मक योजनाओं में जहाँआरा की भूमिका थी। उसने शाहजहाँनाबाद में आँगन, बाग व चाँदनी चौक की रूप रेखा तैयार की। शाही परिवार की महिलाएँ प्रायः शिक्षित भी होती थीं। इसलिए साहित्य लेखन में भी अपनी भूमिका अदा करती थीं। गुलबदन बेगम ने हुमायूँनामा नामक पुस्तक लिखी। अतः स्पष्ट है कि शाही परिवार की महिलाएँ हरम व राजनीतिक मामलों में सक्रिय रहती थीं।

प्रश्न 4.
वे कौन-से मुद्दे थे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान किया?
उत्तर:
मुग़ल जिस तरह आन्तरिक व्यवस्था पर ध्यान देते थे उसी तरह उनकी विदेश नीति भी काफी परिपक्व थी। शासक जिस तरह की उपाधियों या पदवियों को धारण करते थे उनका असर पड़ोसी राज्यों पर अवश्य होता था। जहाँगीर (विश्व पर कब्जा करने वाला), शाहजहाँ (विजय का शासक) तथा आलमगीर (विजय का स्वामी) द्वारा धारण की गई उपाधियाँ खास थीं। मुग़ल अविजित क्षेत्रों पर भी राजनीतिक नियंत्रण बनाने के लिए कदम उठाते रहते थे तथा एक बार विजित करने के उपरांत उस पर हमेशा के लिए अधिकार के लिए कार्य करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि मुगल अपने साम्राज्य की सीमा विस्तार के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे, उनकी इस नीति के आधार पर ही उनके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों का निर्धारण होता था।

इन रिश्तों में कूटनीतिक चाल व संघर्ष साथ-साथ चलता था। इस कड़ी में पड़ोसी राज्यों के साथ क्षेत्रीय हितों के तनाव व राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चलती रहती थी। इसके साथ-साथ दूतों का आदान-प्रदान भी होता रहता था। उनकी विभिन्न देशों तथा धर्मों के प्रति नीति ने उनके प्रभाव को स्थापित किया। इनके निम्नलिखित मुख्य पक्ष थे

1. ईरानियों एवं तूरानियों से संबंध-मुग़ल बादशाहों के ईरान व मध्य एशिया के पड़ोसी देशों से राजनीतिक रिश्ते हिंदूकुश पर्वतों द्वारा निर्धारित सीमा पर निर्भर करते थे।

2. कंधार का किला-नगर-यह किला मुगलों तथा सफावियों के बीच झगड़े का मुख्य कारण था। आरंभ में यह किला नगर हुमायूँ के अधिकार में था। सन् 1595 में अकबर ने इस पर दोबारा कब्जा कर लिया। जहाँगीर ने शाह अब्बास के दरबार में कंधार को मुग़ल अधिकार स्वीकारने को कहा परंतु सफलता नहीं मिली। क्योंकि शाह ने 1621 ई० में इस पर कब्जा कर लिया। शाहजहाँ ने 1638 ई० में इसे फिर जीत लिया। 1649 ई० में सफावी शासकों ने इस पर फिर अधिकार कर लिया। अतः यह मुगलों व ईरान के बीच झगड़े की जड़ रहा।

3. ऑटोमन साम्राज्य : तीर्थयात्रा और व्यापार-ऑटोमन राज्य के साथ अपने संबंधों में मुगल बादशाह धर्म और व्यापार को मिलाने की कोशिश करते थे। वे बिक्री से अर्जित आय को धर्मस्थलों व फकीरों में दान में बाँट देते थे। औरंगजेब को अरब भेजे जाने वाले धन के दुरुपयोग का पता चला तो उसने भारत में उसके वितरण का समर्थन किया।

4. ईसाई धर्म-मुग़ल दरबार के यूरोपीय विवरणों में जेसुइट वृत्तांत सबसे पुराना है। पन्द्रहवीं शताब्दी के अंत में भारत तक सीधे समुद्र की खोज का अनुसरण करते हुए पुर्तगाली व्यापारियों ने तटीय नगरों में व्यापारिक केंद्रों का जाल स्थापित किया। इस प्रकार ईसाई धर्म भारत में आया। इन बातों से स्पष्ट है कि मुगल अपनी स्थिति के प्रति सचेत थे। इसलिए बाह्य शक्तियों पर अपना दबाव बनाने के लिए कार्य करते रहते थे।

प्रश्न 5.
मुग़ल प्रांतीय प्रशासन के मुख्य अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। केंद्र किस तरह से प्रांतों पर नियंत्रण रखता था ?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य काफी विस्तृत था। एक जगह से उसकी व्यवस्था संचालित नहीं हो सकती थी। मुगलों ने इसे आगे विभिन्न इकाइयों में विभाजित किया था। इन्हें प्रांत या सूबा कहा जाता था। इन इकाइयों में भी केन्द्रीय व्यवस्था की तरह हर स्तर (छोटे-बड़े) के अधिकारी व नौकरशाह होते थे। उनके संबंध शाही दरबार से निरंतर रहते थे।

प्रांतों का आकार एक-जैसा नहीं था लेकिन इनके नाम भौगोलिकता के अनुरूप थे। सूबे का मुखिया सबेदार होता था जिसकी नियुक्ति शासक द्वारा की जाती थी। वह उसी के प्रति जिम्मेदार होता था। सूबेदार की सहायता के लिए दीवान, बख्शी तथा सद्र के नाम से सहायक वजीर (मंत्री) होते थे। वे सूबेदार के सहयोगी अवश्य थे लेकिन इनकी नियुक्ति भी प्रत्यक्षतः शासक द्वारा की जाती थी। इस तरह सूबेदार स्वतंत्र होते हुए भी नियंत्रण में था। अकबर के काल में सूबों की संख्या 15, जहाँगीर के काल में 17, शाहजहाँ के काल में 22 तथा औरंगजेब के काल में 21 थी।

जैसे संपूर्ण राज्य सूबों में विभाजित था, उसी तरह सूबे सरकारों में विभाजित थे। सरकार में सबसे बड़ा अधिकारी फौजदार था। किसी सूबे में सरकारों की संख्या कितनी होगी यह निश्चित नहीं था। सरकार को आगे परगनों में विभाजित किया गया था। परगना का स्तर वर्तमान जिले का रहा होगा। परगना स्तर पर कानूनगो, चौधरी व काजी नामक अधिकारी थे। कानूनगो, राजस्व का रिकॉर्ड रखने वाला अधिकारी था जबकि चौधरी का मुख्य कार्य राजस्व संग्रह करना था। ये दोनों अधिकारी वंशानुगत थे। प्रशासन में सबसे छोटी इकाई गाँव थी। इसकी व्यवस्था ग्राम पंचायत देखती थी। मुग़लों का प्रांतीय शासन केंद्र से अलग-थलग नहीं था बल्कि तंत्र का एक हिस्सा था। विभिन्न प्रांतों व उसकी इकाइयों के अधिकारियों का तबादला प्रति वर्ष या दो वर्ष में किया जाता था। मगलों के प्रशासन की पकड गाँव तक थी। मगल अपने अधिकारियों को स देते थे। इस तरह प्रान्त के अनियन्त्रित होने की गुंजाइश नहीं थी।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
उदाहरण सहित मुग़ल इतिहासों के विशिष्ट अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए।
अथवा
इतिवृत्त की मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
इतिवृत्त (क्रॉनिकल्स) मुगलकालीन इतिहास की जानकारी का बहुत महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। सभी मुग़ल शासकों ने इतिवृत्तों के लेखन की ओर विशेष ध्यान दिया। इतिवृत्त के विभिन्न आयामों व पक्षों का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है-

1. रचना के उद्देश्य-मुगलकाल में रचे गए इतिवृत्त बहुत सोची-समझी नीति का उद्देश्य थे। विभिन्न इतिहासकारों व विद्वानों ने इस बारे में अपने-अपने मतों की अभिव्यक्ति की है जिनमें से ये पक्ष उभरकर सामने आते हैं

  • इतिवृत्तों के माध्यम से मुगल शासक अपनी प्रजा के सामने एक प्रबुद्ध राज्य की छवि बनाना चाहते थे।
  • इतिवृत्तों के वृत्तांत के माध्यम से शासक उन लोगों को संदेश देना चाहते थे जिन्होंने राज्य का विरोध किया था तथा भविष्य में भी कर सकते थे। उन्हें यह बताना चाहते थे कि यह राज्य बहुत शक्तिशाली है तथा उनका विद्रोह कभी सफल नहीं होगा।
  • इतिवृत्तों के माध्यम से शासक अपने राज्य के विवरणों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहते थे।

2. इतिवृत्तों की विषय-वस्तु-मुग़ल शासकों ने इतिवृत्त लेखन का कार्य दरबारियों को दिया। अधिकतर इतिवृत्त शासक की देख-रेख में लिखे जाते थे या उसे पढ़कर सुनाए जाते थे। कुछ शासकों ने आत्मकथा लेखन का कार्य स्वयं किया। इस माध्यम से ये शासक स्वयं को प्रबुद्ध वर्ग में स्थापित करना चाहते थे, साथ ही अन्य लेखकों का मार्गदर्शन भी करना चाहते थे। इन सभी पक्षों से यह स्पष्ट होता है कि इन इतिवृत्तों के केन्द्र में स्वयं शासक व उसका परिवार रहता था। इस कारण इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासक, शाही परिवार, दरबार, अभिजात वर्ग, युद्ध व प्रशासनिक संस्थाएँ रहीं। इन इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासकों के नाम अथवा उनके द्वारा धारण उपाधियों की पुष्टि भी करना था।

3. भाषा-मुग़ल दरबारी इतिहास फारसी भाषा में लिखे गये थे। क्योंकि मुगलों की मातृभाषा तुर्की थी। इनके पहले शासक बाबर ने कविताएँ और संस्मरण तुर्की में लिखे थे।

4. अनुवाद-बाबर के संस्मरणों का बाबरनामा के नाम से तुर्की से फारसी भाषा में अनुवाद किया गया था। महाभारत और रामायण का अनुवाद भी फारसी भाषा में हुआ।

5. शिल्पकारों का योगदान-पांडुलिपियों की रचना में विविध प्रकार के कार्य करने वाले लोग शामिल होते थे; जैसे चित्रकार, जिल्दसाज तथा आवरणों को अलंकृत करने वाले लोग।

6. मुगल काल के प्रमुख इतिवृत्त-मुगलकाल के प्रमुख इतिवृत्त यह है

बाबरनामा या तुक-ए-बाबरी लेखक बाबर, हुमायूँनामा लेखिका हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम, अकबरनामा-लेखक अबुल फज्ल, तुक-ए-जहाँगीरी लेखक जहाँगीर, शाहजहाँनामा लेखक मामुरी, बादशाहनामा (शाहजहाँ पर आधारित) लेखक अब्दुल हमीद लाहौरी, आलमगीरनामा लेखक मुहम्मद काजिम । इन इतिवृत्तों के नामों से स्पष्ट होता है कि ये इतिवृत्त शासक-विशेष के साथ जुड़े हैं तथा या तो स्वयं का वृत्तांत हैं या दरबारी द्वारा अपने संरक्षण का विवरण है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 7.
इस अध्याय में दी गई दृश्य सामग्री किस हद तक अबल फज्ल द्वारा किए गए ‘तसवीर’ के वर्णन से मेल खाती है?
उत्तर:
अकबर के दरबारी लेखक अबुल फज़्ल ने चित्रकारी को ‘जादुई कला’ कहा है। वह कहता है कि चित्रकारी निर्जीव को सजीव की भाँति प्रस्तुत करने की क्षमता रखती है। इसलिए वह तसवीर के वर्णन में चित्रकारों की प्रशंसा करता है। अबुल फज्ल ने अपने वृत्तांत में अकबर के विचारों को उद्धत किया है कि बादशाह कहते हैं, “कई लोग ऐसे हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं पर मैं ऐसे व्यक्तियों को नापसंद करता हूँ। मुझे लगता है कि कलाकार के पास खुदा को समझने का बेजोड़ तरीका है। चूंकि कहीं-न-कहीं उसे यह महसूस होता है कि खुदा की रचना को वह जीवन नहीं दे सकता।”

इस्लाम सामान्य रूप से प्राकृतिक चित्रों की चित्रकारी का समर्थन नहीं करता। ऐसी धारणा है कि चित्रकारी एक सृजन है जबकि सृजन का अधिकार केवल खुदा के पास है। इसलिए कुरान और हदीस में मानव रूपों के चित्रण पर प्रतिबंध का वर्णन है। उसी वर्णन के अनुरूप उलेमा (धर्मशास्त्री) चित्रकारी को गैर-इस्लामी घोषित करते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि कलाकार अपने इस कार्य से खुदा की रचना करने की शक्ति को अपने हाथ में लेने का प्रयास करता है। हमें मुगलकाल में शासकों तथा कट्टरपंथी धर्मशास्त्रियों के बीच निरंतर तनाव दिखाई देता है। उलेमा शासक की गतिविधियों को धर्म-विरोधी बताते हैं जबकि शासक इसे मानव भावों की अभिव्यक्ति तथा खुदा को समझने का मार्ग बताते हैं।

अबुल फज़्ल के वर्णन के आधार पर शासकों ने धर्म की कट्टरता को महत्त्व न देते हुए चित्रकला को महत्त्व दिया। इससे चित्रकला की व्याख्या ही बदल गई। जैसा कि स्पष्ट किया गया है कि इस्लाम प्राकृतिक चीजों व रूपों के चित्रण की आज्ञा नहीं देता, इसके बाद भी मुगलकाल में चित्रकारी खूब फली-फूली। समय के साथ इस्लाम में विश्वास करने वाले विद्वानों व धर्मशास्त्रियों ने चित्रकारी के बारे में नई व्याख्याएँ की, जिसके कारण मोटे तौर पर धारणा में बदलाव आया। मात्र कुछ रूढ़िवादी चिन्तक ऐसे थे जो बाद तक भी विरोध करते रहे।

नए व्याख्याकारों ने राज्य की राजनीतिक आवश्यकता के अनुरूप इसे उचित बताया। इस व्याख्या के अनुसार स्पष्ट किया गया कि इससे शासक व जनता के बीच की दूरी में कमी आती है तथा राजा व प्रजा एक-दूसरे के भाव समझ पाते हैं। शासक केवल किसी एक धर्म विशेष का नहीं है। ईरान के मुस्लिम शासकों (सफावी) ने भी चित्रकारी को संरक्षण दिया। इसके लिए कार्यशालाएँ आयोजित कीं। इन सबका प्रभाव भी मुगल शासकों पर पड़ा। अतः चित्रकारी संबंधी नई व्याख्या प्रस्तुत की जिसमें चित्रकारी को धर्म विरोधी घोषित न कर, सांस्कृतिक विकास का पहलू घोषित किया।

नई व्याख्याओं के चलते हुए मुगल दरबार चित्रकारों के लिए संरक्षण क्षेत्र बन गया। कुछ कलाकार; जैसे मीर सैय्यद अली, अब्दुस समद व विहजाद ईरान से भारत आए। अकबर के समय केसू, जसवन्त, बसावन जैसे हिन्दू कलाकार भी दरबार में पहुंचे। अकबर सप्ताह में एक दिन चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन करवाता था। उसी परंपरा को जहाँगीर ने आगे बढ़ाया। उसका काल चित्रकला की दृष्टि से स्वर्ण काल माना जाता था।

मुगल शासकों ने पांडुलिपि चित्रण की ओर विशेष ध्यान दिया। अकबर के काल में चित्रित होने वाली मुख्य पांडुलिपियों में बाबरनामा, हुमायूँनामा, अकबरनामा, हम्जनामा, रज्मनामा (महाभारत का अनुवाद), तारीख-ए-अल्फी व तैमूरनामा थीं। बाद के शासकों ने अपने इतिवृत्तों विशेषकर तुक-ए-जहाँगीरी व शाहजहाँनामा को चित्रित करवाया। इसके साथ ही उन्होंने पहले लिखे गए इतिवृत्तों की और पांडुलिपियों को तैयार करवाकर उन्हें चित्रित करवाया। ये पांडुलिपियाँ सैकड़ों की संख्या में किताबखाना में रखी गई थीं। मुग़ल शासकों द्वारा जिस तरह से पांडुलिपियों को चित्रित करवाया गया, उसकी नकल यूरोप के शासकों ने भी की। इस काल में चित्रित पुस्तकों को उपहार में देना एक प्रकार की परंपरा बन गई थी।

प्रश्न 8.
मुगल.अभिजात वर्ग के विशिष्ट अभिलक्षण क्या थे? बादशाह के साथ उनके संबंध किस तरह बने?
उत्तर:
मुगलकाल के नौकरशाहों यानी अधिकारियों के समूह को अभिजात वर्ग का नाम दिया गया है। इस समूह में विभिन्न क्षेत्रों व धार्मिक समूहों के लोग थे। मुगल शासक इस बात का ध्यान रखते थे कि कोई भी दल इतना बड़ा न हो कि वह संगठित होकर राज्य के लिए चुनौती बन जाए। यह नौकरशाहों का समूह उस गुलदस्ते जैसा था जिसमें अलग-अलग रंग तथा अलग-अलग किस्म के फूल हैं, लेकिन वे एक मुट्ठी में बंधकर शोभा प्रदान करने की स्थिति में हों। ये चाहे किसी धर्म या क्षेत्र से हों, इनकी खास बात यह थी कि ये शासक के प्रति वफादार थे।

अकबर के शासन काल के प्रारंभिक दौर में इस अभिजात वर्ग में तुरानी (मध्य-एशिया) तथा ईरानी मुख्य थे। 1560 ई० के। बाद अभिजात वर्ग में बदलाव आया। इसमें दो वर्ग और जुड़े। ये राजपूत तथा भारतीय मुसलमान थे। राजपूत परिवारों से सर्वप्रथम आमेर (अंबर) का राजा भारमल (बिहारीमल) था जिसने वैवाहिक राजनीतिक संबंधों द्वारा अकबर के अभिजात वर्ग में प्रवेश किया।

जहाँगीर के काल में अभिजात वर्ग की मौलिक संरचना वही बनी रही, परंतु अधिक ऊँचे पदों पर ईरानी पहुँचने में सफल रहे। इसका मुख्य कारण नूरजहाँ थी क्योंकि वह स्वयं ईरान से आई थी। उसके पिता ग्यास बेग, भाई आसफ खाँ इत्यादि बहुत ऊँचे पदों तक पहुँचे। उनके साथ संबंधों का फायदा उठाकर अन्य ईरानी भी आगे बढ़ गए। शाहजहाँ के काल में अभिजात वर्ग सन्तुलित था। उसमें भारतीय व विदेशी सभी शामिल थे। औरंगजेब के समय भी स्थिति लगभग इसी तरह की रही। सामान्यतः यह कहा जाता है कि उसने यह पद केवल सुन्नीओं के लिए रखे थे। परंतु आंकड़े बताते हैं कि उसके दरबार में राजपूत व मराठे काफी अच्छी संख्या में थे। सिंहासन ग्रहण करने के समय तथा मृत्यु तक संख्या में कमी नहीं आई बल्कि आंकड़े वृद्धि दर्ज कराते थे।

मुग़ल साम्राज्य सैन्य प्रधान राज्य था। इसलिए अभिजात वर्ग की सेना संबंधित गतिविधियों को बहुत महत्त्व दिया जाता था। अभिजात वर्ग के सदस्य सैन्य अभियानों का नेतृत्व भी करते थे साथ ही केन्द्र व प्रान्त स्तर पर अधिकारी के रूप में कार्य भी करते थे। वे अपनी टुकड़ी के सैनिक प्रमुख होते थे। उन्हें अपने सैनिकों व घुड़सवारों को भर्ती करना होता था। इन सैनिक व घुड़सवारों के लिए हथियार, रसद व प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी मनसबदार की होती थी। उसके घोड़ों की पीठ के दोनों ओर मुगलों का शाही निशान बना होता था। उसके मुखिया तथा घोड़े का नम्बर भी दर्ज होता था। शासक विभिन्न अवसरों पर नियमित रूप से इन अधिकारियों की सेना का निरीक्षण करता था। समय के साथ बदलाव के चलते हुए शासक व अभिजात वर्ग के बीच रिश्ते मुरीद व मुर्शीद जैसे बन गए थे। कुछ के साथ रिश्ते बहुत अधिक अपनेपन के भी थे।

मुगल दरबार में नौकरी पाना बेहद कठिन कार्य था। दूसरी ओर अभिजात व सामान्य वर्ग के लोग शाही सेवा को शक्ति, धन व उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का एक साधन मानते थे। नौकरी में आने वाले व्यक्ति से आवेदन लिया जाता था, फिर मीरबख्शी की जाँच-पड़ताल के बाद उसे दरबार में प्रस्तुत होना होता था। मीरबख्शी के साथ-साथ दीवान-ए-आला (वित्तमंत्री) तथा सद्र-उस-सद्धर (जन कल्याण, न्याय व अनुदान का मंत्री) भी उस व्यक्ति को कागज तैयार करवाकर अपने-अपने कार्यालयों की मोहर लगाते थे। फिर वे शाही मोहर के लिए मीरबख्शी के द्वारा ले जाए जाते थे। ये तीनों मंत्री दरबार में दाएँ खड़े होते थे, बाईं ओर नियुक्ति व पदोन्नति पाने वाला व्यक्ति खड़ा होता था। शासक उससे कुछ औपचारिक बात करके उसे दरबार के प्रति वफादार रहने की बात कहता था तथा संकेत करता था कि वह किस स्थान पर खड़ा हो। इस तरह उस व्यक्ति की नियुक्ति तथा पदोन्नति मानी जाती थी।

शासक द्वारा नौकरशाहों पर नियंत्रण के लिए कुछ नियम बनाए गए थे। उनके अनुसार शासक सामान्य रूप से इनके प्रति कठोर व्यवहार रखता था। नियमित निरीक्षण में इन्हें किसी तरह की छूट नहीं थी। थोड़ा-सा भी शक होने या अनुशासन की उल्लंघना करने पर इन्हें दण्ड दिया जाता था। इनकी कभी भी कहीं भी बदली की जा सकती थी। कोई भी अधिकारी किसी भी कार्य को करने की मनाही नहीं कर सकता था। इन सबके अतिरिक्त यह कि इनका पद पैतृक नहीं होता था अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को नए सिरे से जीवन की शुरुआत करनी होती थी। किसी भी अभिजात वर्ग के व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति, उसकी सन्तान को नहीं दी जाती थी बल्कि यह स्वतः ही बादशाह या दरबार की सम्पत्ति बन जाती थी।

प्रश्न 9.
राजत्व के मुगल आदर्श का निर्माण करने वाले तत्त्वों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
मुग़लों ने भारत पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया। उन्होंने अपने शासन में कुछ सिद्धान्तों को महत्त्व दिया। ये सिद्धांत भारत की परंपरागत शासन-व्यवस्था से भी जुड़े तथा दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों से भी। इनके राजत्व के सिद्धांत में मध्य-एशियाई तत्त्व भी थे तो ईरान का प्रभाव भी साफ दिखाई देता है। इनके राजत्व के आदर्शों को विभिन्न इतिवृत्तों में विशेष जगह मिली है। कई स्थानों पर तो इतिवृत्त मुगल राजत्व सिद्धांत की स्पष्ट व्याख्या भी करते हैं। मुग़ल इतिवृत्तों में मुग़ल राज्य को आदर्श राज्य वर्णित किया है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ प्रस्तुत की हैं

1. मुगल राज्य : एक दैवीय राज्य-मुगलकाल के सभी इतिवृत्त इस बात की जानकारी देते हैं कि मुगल शासक राजत्व के दैवीय सिद्धान्त में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उन्हें शासन करने की शक्ति स्वयं ईश्वर ने प्रदान की है। ईश्वर की इस तरह की कृपा सभी व्यक्तियों पर नहीं होती, बल्कि व्यक्ति-विशेष पर ही होती है।
मुगल शासकों के दैवीय राजत्व के सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व अबुल फज़्ल ने दिया। वह इसे फर-ए-इज़ादी (ईश्वर से प्राप्त) बताता है। वह इस विचार के लिए प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1191 में मृत्यु) से प्रभावित था। उसने इस तरह के विचार ईरान के शासकों के लिए प्रस्तुत किए थे।

2. सुलह-ए-कुल : एकीकरण का एक स्रोत-मुग़ल इतिवृत्त साम्राज्य को हिन्दुओं, जैनों, ज़रतुश्तियों और मुसलमानों जैसे अनेक भिन्न-भिन्न नृजातीय और धार्मिक समुदायों को समाविष्ट किए हुए साम्राज्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सभी तरह की शांति और स्थायित्व के स्रोत रूप में बादशाह सभी धार्मिक और नृजातीय समूहों से ऊपर होता था, इनके बीच मध्यस्थता करता था तथा यह सुनिश्चित करता था कि न्याय और शांति बनी रहे। अबुल फज्ल सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन की आधारशिला बताता है। सुलह-ए-कुल में यूँ तो सभी धर्मों और मतों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता थी किंतु उसकी एक शर्त थी कि वे राज्य-सत्ता को क्षति नहीं पहुँचाएँगे अथवा आपस में नहीं लड़ेंगे।

मुगल शासक विशेषकर अकबर ने धर्म व राजनीति दोनों के संबंधों को समझने का प्रयास किया। उसने इनकी सीमा व महत्त्व को समझा। इस समझ के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूरी तरह धर्म का त्याग संभव नहीं है लेकिन धर्म की कट्टरता को त्यागकर अवश्य चला जाए। उसने धर्म को राजनीति से भी थोड़ा दूर करने का प्रयास किया। इस कड़ी में उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर, यह सन्देश दिया कि गैर-इस्लामी प्रजा से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। उसने युद्ध में पराजित सैनिकों को दास बनाने पर रोक लगाई तथा जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन को गैर-कानूनी घोषित किया। अकबर ने अपने साम्राज्य में गौ-वध को देशद्रोह घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी।

3. सामाजिक अनुबंध पर आधारित न्यायपूर्ण प्रभुसत्ता-मुग़ल शासकों ने न्याय को विशेष महत्त्व दिया। वे यह मानते थे कि न्याय व्यवस्था ही उनसे सही अर्थों में प्रजा के साथ संबंधों की व्याख्या है। अबुल फज्ल ने अकबर के प्रभुसत्ता के सिद्धांत को स्पष्ट किया है। उसके अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के चार तत्त्वों-जीवन (जन), धन (माल), सम्मान और विश्वास (दीन) की रक्षा करता है। इसके बदले में जनता से आशा करता है कि वह राजाज्ञा का पालन करे तथा अपनी आमदनी (संसाधनों) में से कुछ हिस्सा राज्य को दे। अबुल फज़्ल स्पष्ट करता है कि इस तरह का चिन्तन किसी न्यायपूर्ण संप्रभु का ही हो सकता है जिसे दैवीय मार्गदर्शन प्राप्त हो।

मुग़ल शासकों ने सामाजिक अनुबंध पर आधारित न्याय को अपनाया तथा जनता में प्रचारित भी किया। इसके लिए विभिन्न प्रकार के प्रतीकों को प्रयोग में लाया गया। इसमें सर्वाधिक कार्य चित्रकारों के माध्यम से करवाया गया। मुगल शासकों ने दरबार तथा सिंहासन के आस-पास विभिन्न स्थानों पर जो चित्रकारी करवाई उसमें वो शेर तथा बकरी या शेर तथा गाय साथ-साथ बैठे दिखाई देते हैं। उनकी चित्रकारी जनता को यह सन्देश देने का साधन था कि इस राज्य में सबल या दुर्बल दोनों परस्पर मिलकर रह सकते हैं। इनमें भी कुछ चित्रों में शासक को शेर पर सवार दिखाया गया है जो इस बात का संदेश है कि उसके साम्राज्य में उनसे शक्तिशाली कोई नहीं था।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
विश्व मानचित्र के एक रेखाचित्र पर उन क्षेत्रों को अंकित कीजिए जिनसे मुगलों के राजनीतिक व सांस्कृतिक संबंध थे।
उत्तर:
इसके लिए विद्यार्थी विश्व के मानचित्र में वर्तमान अफगानिस्तान, ईरान, अरब क्षेत्र के देश, तुर्की, उजबेगिस्तान व मध्य एशिया के देशों को दिखाएँ।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

परियोजना कार्य

प्रश्न 11.
किसी मुग़ल इतिवृत्त के विषय में और जानकारी ढूंढिए। इसके लेखक, भाषा, शैली और विषयवस्तु का वर्णन करते हुए एक वृत्तांत तैयार कीजिए। आपके द्वारा चयनित इतिहास की व्याख्या में प्रयुक्त कम-से-कम दो चित्रों का, बादशाह की शक्ति को इंगित करने वाले संकेतों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल के इतिवृत्त या वृत्तांत में से किसी एक का चयन करते हुए हम अकबरनामा को चुन सकते हैं तथा यह जानकारी ले सकते हैं।

  • वृत्तांत (इतिवृत्त का नाम)-अकबरनामा
  • लेखक – अबुल फल
  • शैली – दरबारी लेखन
  • भाषा – फारसी
  • विषय-वस्तु – अकबर के काल की घटनाओं का विवरण

इस बारे में विस्तृत जानकारी आप जे०बी०डी० पुस्तक में मुख्य इतिवृत्त के रूप में वर्णित अकबरनामा के संदर्भ में जानकारी से ले सकते हैं।

मौलिक रूप में इस पुस्तक में 150 से अधिक चित्र दिए गए हैं। इन चित्रों को पुस्तक की मूल प्रति, इंटरनेट तथा राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में रखी चित्रकारियों में देख सकते हैं। इन चित्रों में दरबार से संबंधित किन्हीं भी दो चित्रों को देख सकते हैं, इन चित्रों में आप पाएँगे कि शासक के बैठने की जगह अन्यों से ऊँची है तथा अन्य दरबारी भी एक निश्चित क्रम में बैठे हैं। इस तरह शासक के बैठने के स्थान पर आप प्रायः शेर तथा बकरी या शेर तथा गाय के चित्र पाएंगे। इसका अर्थ स्पष्ट है कि शासक शक्तिशाली-से-शक्तिशाली व सामान्य-से-सामान्य दोनों का रक्षक है। शासक अपनी परंपरा व बादशाह की शक्ति को इन संकेतों से प्रदर्शित कर रहा है।

प्रश्न 12.
राज्यपद के आदर्शों, दरबारी रिवाजों और शाही सेवा में भर्ती की विधियों पर ध्यान केंद्रित करते हुए व समानताओं और विभिन्नताओं पर प्रकाश डालते हुए मुगल दरबार और प्रशासन की वर्तमान भारतीय शासन व्यवस्था से तुलना कर एक वृत्तांत तैयार कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में नौकरशाही शासन-व्यवस्था का केंद्र थी, परंतु इस नौकरशाही की शक्ति का स्रोत मुगल शासक थे। इसलिए वे नौकरशाहों को नियुक्त करते समय दरबारी प्रतिष्ठा, व्यक्ति की सामाजिक, धार्मिक हैसियत का ध्यान रखते थे। शासक के विचार तथा कार्य-प्रणाली पर कोई प्रश्न नहीं उठा सकता था। शासक का अपने बड़े-से-बड़े तथा छोटे-से-छोटे अधिकारी के प्रति व्यवहार प्रायः कठोर होता था। इस काल में कार्य की विशेषज्ञता को महत्त्व नहीं दिया जाता था बल्कि सेवा में आया हुआ व्यक्ति सैनिक, असैनिक, दरबार संबंधी व राजस्व संबंधी सभी कार्य करने के लिए बाध्य होता था। उदाहरण के लिए अकबरनामा का लेखक अबुल फज्ल दरबारी लेखक था परंतु उसने 15 से अधिक सैन्य अभियानों में सेना का नेतृत्व किया। वह शासक का सलाहकार भी था। शासक ने उसे कई बार सेना निरीक्षण का कार्य भी दिया।

इसकी तुलना जब हम भारतीय शासन-व्यवस्था से करते हैं तो स्पष्ट होता है कि यह व्यवस्था एक संविधान के तहत चलती है जिसको राष्ट्र द्वारा 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। इस संविधान व सरकार में शक्ति का स्रोत जनता है। वह हर तरह के परिवर्तन की शक्ति रखती है। शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए विशाल नौकरशाही, केंद्र तथा राज्य स्तर पर है। इनको एक निश्चित प्रक्रिया द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस बारे में यह ध्यान भी रखा जाता है कि व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ हो। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि मुगलकालीन शासन-व्यवस्था आज की शासन-व्यवस्था से काफी भिन्न थी।

राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार HBSE 12th Class History Notes

→ तैमूरी वंशज तैमूर के वंश से संबंध रखने वाले मुग़ल स्वयं को तैमूरी वंशज कहते थे।

→ बहु या यायावर-वह समुदाय जो एक स्थान पर न बसा हो बल्कि विभिन्न स्थानों पर घूमते हुए जीवन जीता हो।

→ पादशाह या बादशाह-शाहों का शाह अर्थात् शासकों का शासक बाबर द्वारा यह उपाधि काबुल व कंधार जीतने के बाद ली गई थी।

→ न्याय की जंजीर-जहाँगीर द्वारा स्वयं को न्यायप्रिय घोषित करने के लिए आगरा के किले में सोने की जंजीर लगवाई जिसे कोई भी फरियादी खींच सकता था।

→ इतिवृत्त-मुगल शासकों के दरबार में दरबारियों द्वारा लिखे गए वृत्तांत।

→ चगताई तुर्की-बाबर की आत्मकथा की भाषा। मूलतः यह तुर्की थी लेकिन इस पर बाबर के कबीले के बोली चगताई का प्रभाव था।

→ हिंदवी-मुगलकाल में उत्तर-भारत में जन साधारण द्वारा बोली जाने वाली भाषा।

→ रज्मनामा मुगलकाल में महाभारत नामक पुस्तक का अनुवाद करके उसे रज्मनामा का नाम दिया गया।

→ शाही किताबखाना-मुग़ल शासकों के महल में स्थित वह जगह जहाँ पर पुस्तकें लिखी जाती थीं।

→ नस्तलिक-मुगलकाल में कागज पर कलम से लिखने की एक शैली।

→ फर-ए-इज़ादी ईश्वर से प्राप्त राज्य, अबुल फज्ल ने मुगलों के राज्य को फर-ए-इज़ादी का नाम दिया।

→ सुलह-ए-कुल-अकबर की सबके साथ मिलकर चलने की नीति सुलह-ए-कुल कहलाई। शाब्दिक अर्थ के रूप में इसे ‘पूर्ण शांति’ कहा जाता है।

→ जियारत-किसी सूफी फकीर की दरगाह पर श्रद्धापूर्वक प्रार्थना के लिए जाना।

→ दीन-पनाह मुग़ल शासक हुमायूँ द्वारा दिल्ली में बनाया गया भवन।

→ बुलंद दरवाजा-अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी में बनाई गई दरवाजा रूपी इमारत।

→ शाहजहाँबाद-मुग़ल शासक शाहजहाँ द्वारा दिल्ली में ही बसाया गया एक नया शहर जिसमें लाल किला, जामा मस्जिद व चाँदनी चौक शामिल थे।

→ जमींबोसी-अपने से बड़े के प्रति झुककर जमीन चूमकर अभिवादन की प्रा।।

→ चार तसलीम-चार बार झुककर अभिवादन करना।

→ झरोखा-मुग़ल शासकों की सूर्योदय के समय जनता को महल की विशेष जगह से दर्शन देने की प्रथा।

→ नौरोज-ईरानी परंपरा के अनुसार नववर्ष का उत्सव, इसे मुग़ल दरबार में उत्सव के रूप में मनाया जाता था।

→ हिजरी कैलेंडर-इस्लामी परम्परा के अनुरूप समय गणना बताने वाला कैलेंडर।

→ तख्त-ए-मुरस्सा-शाहजहाँ द्वारा बनाया गया हीरे-जवाहरातों से जड़ा सिंहासन । इसे सामान्यतः मयूर सिंहासन कहा जाता था।

→ नकीब-दरबार में किसी भी विशेष व्यक्ति या शासक के आने की घोषणा करने वाला व्यक्ति।

→ नजराना मगल शासक, शहजादे का राज परिवार के किसी सदस्य को भेंटस्वरूप दिया जाने वाला उपहार।

→ पादशाह बेगम-मुगल बादशाह की वह पत्नी जो शाही आवास की देख-रेख करती थी।

→ हरम-शाब्दिक अर्थ पवित्र यह वह स्थान था जहाँ मगल शासकों का परिवार रहता था।

मनसबदार-मुगलों की सेवा में सैनिक या असैनिक सेवा करने वाला उच्च पद का व्यक्ति।

→ सूबा मुगलकाल में प्रांत के लिए प्रयुक्त शब्द।

→ जेसुइट-ईसाई धर्म प्रचारकों के लिए प्रयोग किया जाने वाला शब्द।

→ दीन-ए-इलाही-सभी धर्मों के बारे में सुनने के बाद अकबर द्वारा 1582 ई० में स्थापित नया मत।

15वीं तथा 16वीं शताब्दी में विश्व भर में अनेक युग प्रवर्तक घटनाएं घटीं। नए-नए राजवंशों की स्थापना हुई, यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance) तथा धर्म सुधार (Reformation) आंदोलन चले। उसी प्रकार भारत में भी दिल्ली सल्तनत का पतन हुआ तथा उसके खण्डहरों पर मुगल साम्राज्य का उदय हुआ। यह परिवर्तन भारतीय इतिहास में एक ऐसा परिवर्तन था जिसने न केवल देश के इतिहास की धारा को ही नया मोड़ दिया, अपितु एक नए क्षितिज एवं नव-प्रभात का भी सूत्रपात किया। यह एक महान् राजनीतिक परिवर्तन था। इस परिवर्तन का सूत्रधार तैमूर का वंशज बाबर था।।

→ मुगल वंश के संस्थापक बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 को मध्य-एशिया के फरगाना (वर्तमान में उजबेगिस्तान) में हुआ। 1494 ई० में बाबर अपने पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद फरगाना का शासक बना। उसने 1504 ई० में काबुल तथा 1507 ई० में कन्धार को जीता। 1519 से 1526 ई० तक उसने भारत पर पाँच आक्रमण किए तथा वह सभी में सफल रहा। 1526 ई० में उसने पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अन्तिम सुल्तान इब्राहिम लोधी को हराकर मुगल वंश की नींव रखी। उसने अपने राज्य को सुदृढ़ आधार दिया। 1530 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। .. बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ शासक बना। शेरशाह ने उसे 1540 ई० में बेलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में पराजित कर दिया तथा उसे भारत से निर्वासित होना पड़ा। उसने 1555 ई० में शेरशाह के कमजोर उत्तराधिकारियों को हराकर एक बार फिर दिल्ली व आगरा पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1556 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

→ हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र अकबर शासक बना। अकबर ने अपनी प्रारंभिक सफलताएँ अपने शिक्षक व संरक्षक बैहराम खाँ के नेतृत्व में पाईं। तत्पश्चात् उसने प्रत्येक क्षेत्र में साम्राज्य का विस्तार किया। उसने आन्तरिक दृष्टि से अपने राज्य का विस्तार कर इसे विशाल, सुदृढ़ तथा समृद्ध बनाया। उसने राजपूतों व स्थानीय प्रमुखों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर हटाकर गैर-इस्लामी जनता को यह एहसास करवाने का प्रयास किया कि वह उनका भी शासक है। इस तरह अकबर अपने राजनीतिक, प्रशासनिक व उदारवादी व्यवहार के कारण मुग़ल शासकों में महानतम स्थान प्राप्त करने में सफल रहा। 1605 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

→ अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से शासक बना। उसने अकबर की नीतियों को आगे बढ़ाया। उसने अपने जीवन का अधिकतर समय लाहौर में बिताया। 1611 ई० में उसने मेहरूनिसा (बाद में नूरजहाँ) से शादी की। नूरजहाँ शासन में इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने शासन व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। 1627 ई० में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई।

→ जहाँगीर के बाद उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। खुर्रम ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण किया। अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद उसने ताजमहल का निर्माण प्रारंभ करवाया। दक्षिण के बारे में उसने बीजापुर, गोलकुण्डा व अहमदनगर के सन्दर्भ में सन्तुलित नीति अपनाई। उसके शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध था जो 1657-58 ई० में लड़ा गया। इसमें उसके तीन पुत्र दारा शिकोह, मुराद व शुजा मारे गए तथा औरंगज़ेब सफल रहा। उसने 1658 ई० में शाहजहाँ को गद्दी से हटाकर जेल में डाल दिया।

→ 1658 ई० में अपने भाइयों को हराकर व पिता को बन्दी बनाकर औरंगज़ेब सत्ता प्राप्त करने में सफल रहा। वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी को पसन्द करता था, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संकीर्ण था। प्रशासनिक व्यवस्था में उसने कोई बदलाव नहीं किया। उसके काल में मुगल साम्राज्य की आर्थिक स्थिति खराब हो गई, जिससे सैन्य तंत्र भी कमजोर हुआ। इस तरह 1707 ई० में उसकी मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य चारों ओर से संकटों से घिरा हुआ था।

→ 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के बाद मुगल वंश में एक के बाद एक कमजोर शासक आए। इन शासकों के काल में शासन, दरबार व अभिजात वर्ग पर शासकों की पकड़ कमजोर हुई, जिसके कारण सत्ता का केन्द्र दिल्ली, आगरा व लाहौर न होकर विभिन्न क्षेत्रीय नगर हो गए। इन क्षेत्रीय नगरों में क्षेत्रीय सत्ता की स्थापना हुई। 1739 ई० में ईरान के शासक नादिरशाह ने मुग़ल शासक मुहम्मद शाह को बुरी तरह से पराजित कर दिल्ली में लूटमार की। इससे मुगल साम्राज्य का वैभव, सम्मान व पहचान मिट्टी में मिल गई।

→ 1857 ई० केजन-विद्रोह में एक बार फिर जन-विद्रोहियों ने मुग़ल राज्य व वंश के नाम का प्रयोग किया तथा अन्तिम मुगल शासक . बहादुरशाह जफर को इसका नेतृत्व दे दिया। अन्ततः वह हार गया तथा उसके पुत्रों व परिवार के अधिकतर सदस्यों का कत्ल कर दिया । गया। उसे बन्दी बनाकर रंगून भेज दिया गया, जहाँ 1862 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। इसके बाद मुगल वंश समाप्त हो गया। मुग़ल शासकों ने शासन के लिए जिस तरह की व्यवस्था अपनाई, उसके द्वारा वे विशाल विजातीय जनता तथा बहु-सांस्कृतिक जीवन के बीच तालमेल बना सके। शासन-व्यवस्था की इस कड़ी में इस वंश के शासकों ने अपने वंश के इतिहास-लेखन की ओर विशेष ध्यान दिया। यह इतिहास-लेखन दरबारी संरक्षण में दरबारियों एवं विद्वानों के द्वारा लिखा गया। इन दरबारी लेखकों द्वारा जहाँ शासक की इच्छा व भावना का ध्यान रखा गया, वहीं उन्होंने इस महाद्वीप से संबंधित विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ भी उपलब्ध कराई हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

→ आधुनिक इतिहासकारों विशेषतः अंग्रेज़ी में लिखने वालों ने मुगलों की इस लेखन शैली को ‘क्रॉनिकल्स’ का नाम दिया है, जिसको अनुवादित रूप में इतिवृत्त या इतिहास कहा जा सकता है। ये इतिवृत्त (वृत्तांत) मुगलकाल की घटनाओं का कालानुक्रमिक विवरण प्रस्तुत करते हैं। इन इतिवृत्तों की सामग्री दरबारी लेखकों द्वारा कड़ी मेहनत से एकत्रित की गई। फिर इन्होंने इसे व्यवस्थित ढंग से वर्गीकृत किया। मुगलकालीन इतिहास-लेखन के लिए यह इतिवृत्त सबसे प्रमुख स्रोत है, क्योंकि इनमें तथ्यात्मक जानकारी प्रचुर मात्रा में है।

→ इन इतिवृत्तों में मुगल शासकों की विजयों, राजधानियों, दरबार, केंद्रीय व प्रांतीय शासन व विदेश नीति पर प्रकाश डाला गया है। इसके साथ-साथ मुगल शासकों की धार्मिक नीति तथा प्रजा के साथ व्यवहार का विस्तृत वर्णन भी है। निःसंदेह ये इतिवृत्त या वृत्तांत मुगलकालीन इतिहास के लेखन का महत्त्वपूर्ण आधार हैं।

काल-रेखा

कालघटना का विवरण
1483 ईoबाबर का फरगाना में जन्म
1494 ई०बाबर का फरगाना का शासक बनना
1497 ईoबाबर के हाथ से राज्य का निकलना व निर्वासन जीवन की शुरुआत
1504 ई०बाबर की काबुल विजय, सिकंदर लोधी द्वारा आगरा की स्थापना
1526 ईoपानीपत की पहली लड़ाई व बाबर की जीत
1530 ईoबाबर की मृत्यु तथा बाबरनामा की पाण्डुलिपि को संगृहीत करना।
1540 ई०हुमायूँ की शेरशाह के हाथों हार व भारत से बाहर जाना
1555 ईoहुमायूँ की पुनः भारत विजय
1556 ई०हुमायूँ की मृत्यु, पानीपत की दूसरी लड़ाई व अकबर का शासक बनना
1562 झoअकबर द्वारा किसी राजपूत परिवार से वैवाहिक संबंधों की शुरुआत
1563 ई०अकबर द्वारा तीर्थ यात्रा कर की समाप्ति
1564 ई०अकबर द्वारा जजिया कर को हटाना
1570-85 ई०अकबर द्वारा फतेहपुर सीकरी में भवन निर्माण व उसे राजधानी बनाना
1587 ई०गुलबदन बेगम द्वारा हुमायूँनामा के लेखन की शुरुआत
1589 ई०बाबरनामा का तुर्की से फारसी में अनुवाद
1589-1602 ईoअबुल फण्ल द्वारा अकबरनामा का लेखन
1596-98 ई०अबुल फण्ल्ल द्वारा आइन-ए-अकबरी का लेखन
1605 ई०अकबर की मृत्यु व सलीम का जहाँगीर के नाम से शासक बनना
1611 ई०जहाँगीर की नूरजहाँ से शादी
1605-22 ई०जहाँगीर द्वारा आत्मकथा तुज़्क-ए-जहाँगीरी (जहाँगीरनामा) का लेखन
1627 ई०जहाँगीर की मृत्यु
1631 ई०मुमताज महल की मृत्यु
1639-47 ई०अब्दुल हमीद लाहौरी द्वारा बादशाहनामा के दो खण्डों का लेखन
1657-58 ई०शाहजहाँ के काल में उत्तराधिकार का युद्ध
1658 ई०औरंगज़ेब का शासक बनना
1668 ई०मुहम्मद काजिम द्वारा औरंगज़ेब के काल के पहले 10 वर्षों का इतिवृत्त आलमगीरनामा के नाम से संकलन
1669 ई०औरंगज़ेब के काल में जाटों का विद्रोह
1679 ई०औरंगज़ेब द्वारा जजिया कर फिर से लगाना औरंगज़ेब की मृत्यु
1707 ई०से संकलन

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

HBSE 12th Class History  किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
कृषि इतिहास लिखने के लिए आईन-ए-अकबरी को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन-सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी मुगलकालीन कृषि इतिहास लेखन का एक अति महत्त्वपूर्ण स्रोत है। यह अकबर के काल की कृषि व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालती है। इससे हमें मुगलकाल की फसलों, सिंचाई तकनीक, कृषकों तथा ज़मींदारों के आपसी संबंधों की जानकारी मिलती है। इतना होते हुए भी इस पुस्तक की कुछ सीमा रूपी समस्याएँ हैं। इसका वर्णन इस प्रकार है

(i) आइन-ए-अकबरी पूरी तरह से दरबारी संरक्षण में लिखी गई है। लेखक कहीं भी अकबर के विरुद्ध कोई शब्द प्रयोग नहीं कर पाया। उसने विभिन्न विद्रोहों के कारणों व दमन को भी एक पक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ii) आइन-ए-अकबरी में विभिन्न स्थानों पर जोड़ में गलतियाँ पाई गई हैं। यहाँ यह माना जाता है कि गलतियाँ अबल-फज्ल के सहयोगियों की गलती से हुई होंगी या फिर नकल उतारने वालों की गलती से।

(iii) आइन में आंकड़े राज्य के सन्दर्भ में तो सहायक हैं, जिसमें दर इत्यादि का वर्णन सही है। परन्तु मजदूरों की मजदूरी, जन-सामान्य की कर सम्बन्धी समस्या का वर्णन इसमें नहीं है। इसी तरह कई क्षेत्रों के सन्दर्भ में कीमतें भी विरोधाभासपूर्ण बताई गई हैं।

(iv) अबुल-फज़ल ने आइन का लेखन आगरा में किया; इसलिए आगरा व इसके आस-पास का वर्णन बहुत अधिक विस्तार के साथ किया गया है। इस बारे में उसकी सूचनाएँ पूरी तरह सही भी हैं। अन्य स्थानों के आंकड़ों एवं सूचनाओं में कमियाँ भी हैं तथा ये सीमित भी हैं।

इतिहासकार इन सीमा रूपी समस्याओं का निपटारा, अन्य स्रोतों का प्रयोग तुलना रूप में या जानकारी प्राप्त करके करता है। आंकड़ों से संबंधित जानकारी अबुल फज़्ल के ही वर्णन के अन्य स्थानों में मिल जाती है। जोड़ इत्यादि की गलतियों का निदान पुनः जोड़ करके इतिहासकार इसे स्रोत के रूप में प्रयोग कर लेता है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 2.
सोलहवीं-सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार, कपास, बाजरा, तिलहन, ग्वार इत्यादि थीं। सामान्यतः कृषक खाद्यान्नों का ही उत्पादन करते थे। ये फसलें भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उगाई जाती थीं। चावल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता था जहाँ 40 इंच या इससे अधिक वार्षिक वर्षा होती थी। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ, ज्वार, बाजरा इत्यादि बोए जाते थे, जबकि गेहूँ लगभग भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बोई जाती थी। फसलों के उत्पादन में सर्वाधिक महत्त्व मानसून पवनों का था। जहाँ वे अधिक सक्रिय होती थीं वहाँ गेहूँ व चावल का फसल चक्र रहता था। कम सक्रिय क्षेत्रों में कम वर्षा या कम पानी वाली फसलें उत्पादित होती थीं। इस काल में गन्ना, कपास व नील इत्यादि फसलें भी उगाई जाती थीं। इन फसलों को जिन्स-ए-कामिल कहा जाता था। मुगलकाल में रेशम, तम्बाकू, मक्का, जई, पटसन इत्यादि भी उत्पादित होने लगा था।

इन सभी तरह के फसलों के उत्पादन के बाद भी यह कहा जा सकता है कि इस समय कृषि उत्पादन महज गुजारे के लिए था। ऐसा इसलिए क्योंकि खाद्यान्न फसलों के अतिरिक्त फसलें सीमित क्षेत्र में उत्पादित होती थीं। कृषक समाज फसलें उत्पादित करते समय परिवार के भरण-पोषण का ध्यान भी रखता था। सरकार के पास राजस्व के रूप में फसल ही आती थी। नकदी मुद्रा नहीं के बराबर ही थी। सरकार तथा ग्रामीण समुदाय के पास अनाज के भंडार न होना भी इस बात की पुष्टि करता है कि अतिरिक्त अनाज का अभाव था। इस कारण और अकाल इत्यादि के समय भूख से मरने के उदाहरण से भी इस बात की पुष्टि होती है कि कृषक जितना उत्पादन करता था उतना साथ-साथ उपभोग भी हो जाता था।

प्रश्न 3.
कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।
उत्तर:
मुगलकालीन समाज में महिलाएं पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। कार्य विभाजन की कड़ी में सामाजिक तौर पर यह माना जाता था कि पुरुष बाहर के कार्य करेंगे तथा महिलाएँ चारदीवारी के अन्दर। यहाँ विभिन्न स्रोतों में महिलाएँ कृषि उत्पादन व विशेष कार्य अवसरों पर साथ-साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं। अतः स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन में महिला की भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 1

प्रश्न 4.
विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में एशिया व यूरोप दोनों में हो रहे मौद्रिक परिवर्तनों से भारत को काफी लाभ हो रहा था। जल व स्थल मार्ग के व्यापार से भारत की चीजें पहले से अधिक दुनिया में फैली तथा नई-नई वस्तुओं का व्यापार भी प्रारंभ हुआ। इस व्यापार की खास बात यह थी कि भारत से विदेशों को जाने वाली मदों में उपयोग की चीजें थीं तथा बदले में भारत में चाँदी आ रही थी। भारत में चाँदी की प्राकृतिक दृष्टि से कोई खान नहीं थी। उसके बाद भी विश्व की चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत में एकत्रित हो रहा था। चाँदी के साथ-साथ व्यापार विनिमय से भारत में सोना भी आ रहा था।

भारत में विश्व भर से सोना-चाँदी आने के कारण मुग़ल साम्राज्य समृद्ध हुआ। इसके चलते हुए अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध-चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। बाह्य व्यापार में मुद्रा के प्रचलन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर भी पड़ा। इसमें भी अब वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आने लगी। शहरों में बाजार बड़े आकार के होने लगे। गाँवों से बिकने के लिए फसलें शहर आने लगीं। मुद्रा के प्रचलन में राज्य का राजस्व जिन्स के साथ नकद भी आने लगा। मुद्रा के कारण ही मज़दूरों को मज़दूरी के रूप में नकद पैसा दिया जाने लगा।

प्रश्न 5.
उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुगल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू-राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।
उत्तर:
मुगलकाल में राज्य की आय का मुख्य स्रोत भू-राजस्व था। राज्य की आर्थिक स्थिति तथा कोष इस बात पर निर्भर करता था कि भू-राजस्व कितना तथा कैसे एकत्रित किया जा रहा है। आइन-ए-अकबरी में टोडरमल की नीति को स्पष्ट किया गया है कि अकबर ने अपने राजकोष को समृद्ध बनाने के लिए इस तरह की नीति अपनाई। उसने अपने राजकोष की स्थिति को देखकर सारे साम्राज्य की भूमि को नपवाया। इस नपाई के बाद प्रत्येक क्षेत्र को इस आधार पर बांटा की उससे भू-राजस्व एक करोड़ रुपया बनता हो। इस तरह सारा साम्राज्य 182 परगनों में विभाजित किया गया। नपाई के बाद जमीन का बंटवारा भी उसके उपजाऊपन के आधार पर किया गया। इस बंटवारे का उद्देश्य भी राजस्व की वास्तविकता का ज्ञान करना था।

मुगलकाल में राज्य की आर्थिक स्थिति भी उसी समय तक अच्छी रही जब तक भू-राजस्व ठीक एकत्रित किया गया। उदाहरण के लिए औरंगजेब के काल में हम सर्वाधिक कृषक विद्रोह देखते हैं क्योंकि उसने कठोरता के साथ अधिक भू-राजस्व वसूलने का प्रयास किया। यह प्रयास असफल रहा। अतः स्पष्ट है कि मुगलकाल में राजकोषीय व्यवस्था का आधार भू-राजस्व व्यवस्था थी। * निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में पंचायत, गाँव का मुखिया, कृषक व गैर-कृषक समुदाय के लोग थे। इस समुदाय के इन घटकों की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में गहरा तालमेल था अर्थात् जो वर्ग साधन सम्पन्न था, उसी का सामाजिक स्तर भी ऊँचा था। वह अपने स्तर को बनाए रखने के लिए हमेशा प्रयासरत रहता था। गाँव में रहने वाला हर व्यक्ति सामाजिक ताने-बाने का एक हिस्सा था। मुगलकाल में जाति व गाँव एक-दूसरे के पूरक भी थे। अर्थात् जाति गाँव को बांधती थी तथा गाँव जाति व्यवस्था को बनाकर रखने में मदद करता था। एक गाँव में कृषक, दस्तकार तथा सेवा करने वाली जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति अपना पुश्तैनी कार्य करती थी।

आर्थिक व सामाजिक स्तर पर इन जातियों में समानता की स्थिति नहीं थी। निम्न जातियों में मुख्य रूप से वो जातियाँ थीं जिनके पास भूमि की मिल्कियत नहीं थी। ये लोग गाँव में वे कार्य करते थे जिन्हें निम्न या हीन समझा जाता था; जैसे मृत पशुओं को उठाना, चमड़े के कार्य या सफाई कार्य इत्यादि। इन जातियों के लोग खेतों में मजदूरी भी करते थे। उस काल में खेती योग्य जमीन की कमी नहीं थी। फिर भी निम्न जातियों के लिए कुछ कार्य ही निर्धारित थे क्योंकि अन्य कार्य को करने की जिम्मेदारी अन्य उच्च वर्गों की मानी जाती थी। इस तरह यह कहा जा सकता है कि निम्न जातियों के लोग निर्धनता का जीवन जीने के लिए मजबूर थे।

जैसा कि स्पष्ट है कि गाँव में जाति, गरीबी व सामाजिक हैसियत के बीच प्रत्यक्ष संबंध था। निम्न वर्ग के लोगों की स्थिति अधिक गरीबी वाली थी। समाज में कुछ लोग ऐसे भी थे जिनकी स्थिति बीच वाली थी। इस बीच वाले समुदाय में कुछ वर्गों की आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथ सामाजिक हैसियत में भी कुछ बदलाव आया। उदाहरण के तौर पर कहा जा सकता है कि इस काल में पशुपालन व बागबानी का काफी विकास हुआ। इसके कारण इन कार्यों को करने वाली अहीर, गुज्जर व माली जैसी जातियों की आर्थिक स्थिति सुधरी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 7.
सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगलवासियों की जिंदगी किस तरह बदल गई?
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी में कृषि व्यवस्था पर आधारित समाज के अतिरिक्त भी भारत का ग्रामीण समाज था। यह समाज बड़े जंगल क्षेत्र, झाड़ियों (खरबंदी) का क्षेत्र, पहाड़ी कबीलाई क्षेत्र इत्यादि था। यह समाज मुख्य रूप से झारखंड, उड़ीसा व बंगाल का कुछ क्षेत्र, मध्य भारत, हिमालय का तराई क्षेत्र तथा दक्षिण के पठार व तटीय क्षेत्रों में फैला था। जंगल के लोगों का जीवन कृषि व्यवस्था से भिन्न था।

इस काल में भारत का विशाल भू-क्षेत्र जंगलों से सटा था तथा यहाँ के लोग आदिवासी थे जो कबीलों की जिन्दगी जीते थे। वे जंगलों में प्राकृतिक जीवन-शैली के अनुरूप रह रहे थे। जंगलों के उत्पादों, शिकार व स्थानांतरित कृषि के सहारे वे लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनके कार्य मौसम (जलवायु) के अनुकूल होते थे। मुगलकाल में जंगल की व्यवस्था व जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आया। विभिन्न तरह के व्यापारियों, सरकारी अधिकारियों एवं स्वयं शासक भी विभिन्न अवसरों पर जंगलों में जाया करते थे। इस तरह अब जंगल का जीवन पहले की तरह स्वतंत्र व शान्त नहीं रहा, बल्कि समाज के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा। इन परिवर्तनों के लिए बहुत-से कारण जिम्मेदार थे। इनमें से मुख्य का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

(i) हाथियों की प्राप्ति-मुगलकाल की सेना में हाथियों का बहुत महत्त्व था। ये हाथी जंगलों में मिलते थे। राज्य इन्हें प्राप्त करने के लिए जंगली क्षेत्र पर नियंत्रण रखता था। मुगलकाल में राज्य जंगलवासियों से यह उम्मीद करता था कि वे भेंट अर्थात् पेशकश के रूप में हाथी दें।

(ii) शिकार यात्राएँ-मुग़ल शासक अपना सारा समय दरबार व महल में नहीं गुजारते थे, बल्कि वे अपने अधिकारियों व मनसबदारों के साथ शिकार के लिए भी जाया करते थे। यह शिकार मात्र मनोरंजन या भोजन विशेष के लिए नहीं होता था बल्कि इससे कुछ अधिक इसके सरोकार थे। शासक इस माध्यम से अपने पूरे साम्राज्य की वास्तविकता को जानना चाहता था। वह वहाँ लोगों की शिकायतें सुनता था तथा न्याय भी करता हेत शिविर था। शासक की इस तरह की गतिविधियों ने राज्य व जंगलवासियों की बीच की दूरियों में कमी की।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 2

(iii) वाणिज्यिक कृषि-वाणिज्यिक खेती व व्यापार के कारण भी जंगलवासियों का जीवन प्रभावित हुआ। जंगल में उत्पादित होने वाले पदार्थों विशेषकर शहद, मोम व लाख भारत से काफी मात्रा में निर्यात होता था। इन पदार्थों की पूर्ति जंगल से होती थी। भारतीय लाख की यूरोप में माँग बढ़ती जा रही थी। इसको जंगलवासी बड़ी कुशलता से तैयार करते थे। इस तरह धीरे-धीरे जंगलवासियों का एक वर्ग इन चीजों को उपलब्ध कराने वाला हो गया। इस समय जंगल में मुख्य व्यापार वस्तुओं के माध्यम से होता था, परन्तु धीरे-धीरे धातु मुद्रा भी वहाँ घुसपैठ कर रही थी।

(iv) व्यापारिक गतिविधियाँ-कुछ छोटे कबीले दो बस्तियों के बीच रहते थे। इन्होंने इन बस्तियों को जोड़ने के लिए व्यापारिक कार्य करने शुरू कर दिए। इस काल में कुछ कबीले गाँव व शहर के बीच व्यापार की कड़ी का काम कर रहे थे। इनके ऊपर गाँव व शहर दोनों की जीवन-शैली का प्रभाव पड़ रहा था।

(v) मुखियाओं का ज़मींदारों के रूप में उदय-जंगल की सामाजिक संरचना में कबीलों के कुछ सरदार या मुखिया जंगल के सरदार या ज़मींदार बन गए। उन्हें अपने जंगल की रक्षा के लिए सेना की आवश्यकता महसूस होने लगी। दूसरी ओर, शासक व अधिकारियों के सम्पर्क में रहने के कारण वह उस तरह की जीवन-शैली अपनाने लगा। कुछ कबीलों के मुखिया तो सरकारी क्षेत्र में आ गए। उन्होंने अपने करीबी लोगों एवं कबीलों के अन्य लोगों को भी सरकारी सेवा में लेने की स्थितियाँ बना दीं। इस तरह स्पष्ट है कि इस सामाजिक बदलाव ने जंगलवासियों व कबीलों की जिन्दगी को पूरी तरह से बदल दिया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 3

प्रश्न 8.
मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदार महत्त्वपूर्ण था क्योंकि वह बहुत बड़े भू-क्षेत्र का मालिक था। यह सारा भू-क्षेत्र उसके निजी प्रयोग के लिए था। अपने इस अधिकार के कारण वह गाँव व क्षेत्र में सामाजिक तौर पर भी ऊँची पहचान रखता था। इस ऊँची पहचान का कारण उसकी जाति भी थी। इस तरह वह व्यक्ति सामाजिक व आर्थिक दृष्टि से बहुत ऊँची पहचान रखता था।

उसकी यह स्थिति पैतृक थी तथा राज्य उसकी इस स्थिति में सामान्य तौर पर बदलाव नहीं कर सकता था। इसलिए राज्य उससे विभिन्न प्रकार की सेवाएँ (खिदमत) लेता था जिनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण राजस्व की वसूली थी। राज्य की सेवाओं के बदले उसकी राजनीतिक हैसियत भी ऊँची होती थी। इन स्थितियों के चलते हुए उसके लिए कार्य करने वाले कृषक, दिहाड़ीदार मजदूर, खेतिहर वर्ग तथा गाँवों के अन्य लोग लगभग उसकें पराधीन होते थे। इसलिए उसे स्थानीय स्तर पर कोई चुनौती नहीं मिलती थी।
मुगलकाल में ज़मींदार की तीन श्रेणियाँ थीं। इनका वर्णन इस प्रकार है

(i) प्रारंभिक ज़मींदार ये ज़मींदार वो ज़मींदार होते थे जो अपनी ज़मीन का राजस्व स्वयं कोष में जमा कराते थे। एक गाँव में प्रायः ऐसे ज़मींदार 4 या 5 ही हुआ करते थे।

(ii) मध्यस्थ ज़मींदार ये ज़मींदार वो थे जो अपने आस-पास के क्षेत्रों के ज़मींदारों से कर वसूल करते थे तथा उसमें से कमीशन के रूप में एक हिस्सा अपने पास रखकर कोष में जमा कराते थे। ऐसे ज़मींदार या तो एक गाँव में एक या फिर दो या तीन गाँवों का एक होता था।

(ii) स्वायत्त मुखिया ये ज़मींदार बहुत बड़े क्षेत्र के मालिक होते थे। कई बार इनके पास 200 या इससे अधिक गाँव भी होते थे। इनकी पहचान स्थानीय राजा की तरह होती थी। सरकारी तन्त्र भी उनके प्रभाव में होता था। इनके क्षेत्र में कर एकत्रित करने में सरकार के अधिकारी भी सहयोग देते थे। ये बहुत साधन सम्पन्न होते थे।

जमींदारों के अधिकार व कर्त्तव्य (Rights and Duties of Zamindars) अधिकार व कर्तव्यों की दृष्टि से इनको सामाजिक तौर पर कोई चुनौती नहीं थी। ज़मींदार वर्ग के बारे में बताया गया कि इससे ऊपर व अधीन वर्ग दोनों को इसकी जरूरत थी। ऐसे में अपनी ज़मीन की खरीद, बेच, हस्तांतरण, गिरवी रखने का अधिकार इनके पास था। विभिन्न तरह के प्रशासनिक पदों पर इन्हें नियुक्त किया जाता था। अपने क्षेत्र में विशेष पोशाक, घोड़ा, वाद्य यन्त्र बजवाने का अधिकार इनके पास था। भू-राजस्व से इन्हें एक निश्चित मात्रा में कमीशन मिलता था।

ज़मींदारों के कर्त्तव्यों के बारे में कहा जा सकता है कि अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी इनकी थी। इनके क्षेत्र से शासक व शाही परिवार का कोई सदस्य गुजरता था तो उन्हें वहाँ उपस्थित होना पड़ता था। राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य था। कुछ ज़मींदार अपनी पहचान बनाने के लिए सामाजिक पंचायतों में भाग लेते थे तथा विभिन्न तरह के झगड़ों को निपटाने के फैसले किया करते थे। कुछ ज़मींदार अपने क्षेत्र में धर्मशालाएँ बनवाना व कुएँ खुदवाना भी जरूरी समझते थे।

प्रश्न 9.
पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में एक महत्त्वपूर्ण पहलू पंचायत व्यवस्था थी। गाँव की सारी व्यवस्था, आपसी संबंध तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन पंचायत द्वारा ही किया जाता था। ग्राम पंचायत प्राचीनकाल में ही शक्तिशाली संस्था के रूप में कार्य कर रही थी। विभिन्न प्रकार के राजनीतिक परिवर्तनों का इस पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। विभिन्न शक्तिशाली शासकों ने भी इसकी कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप नहीं किया। मुग़ल शासकों ने भी इस बारे में पहले से प्रचलित नीति का पालन किया।

(i) पंचायत का गठन-ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थी इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था। हाँ, इतना अवश्य है कि पंचायत में लिए गए फैसले को मानना सभी के लिए जरूरी था।

(ii) पंचायत का मुखिया-गाँव की पंचायत मुखिया के नेतृत्व में कार्य करती थी। इसे मुख्य रूप से मुकद्दम या मंडल कहते थे। मुकद्दम या मंडल का चुनाव पंचायत द्वारा किया जाता था। इसके लिए गाँव के पंचायती बुजुर्ग बैठकर किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमत हो जाते थे। प्रायः गाँव के सबसे बड़े कृषक या प्रभावशाली व्यक्ति को मुखिया माना जाता था। मुखिया का चुनाव होने के बाद पंचायत उसका नाम स्थानीय ज़मींदार के पास भेजती थी। ज़मींदार प्रायः उस नाम को स्वीकार कर लेता था। इस तरह मुखिया के चयन की औपचारिकता पूरी होती थी। मुखिया के कार्यों में पटवारी मदद करता था। गाँव की आमदनी, खर्च व अन्य विकास कार्यों के करवाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। गाँव की जातीय व्यवस्था तथा सामाजिक बंधनों को लागू करने में वह अधिक समय लगाता था।

(iii) पंचायत के कार्य ग्राम पंचायत व मुखिया को गाँव के विकास तथा व्यवस्था की देख-रेख में कार्य करने होते थे। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(a) गाँव की आय व खर्च का नियंत्रण पंचायत करती थी। गाँव का अपना एक खजाना होता था जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का हिस्सा होता था। इस खजाने से पंचायत गाँव में विकास कार्य कराती थी।

(b) गाँव में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर बाढ़ व अकाल की स्थिति में भी पंचायत विशेष कदम उठाती थी। इसके लिए वह अपने कोष का प्रयोग तो करती ही थी साथ में सरकार से तकावी (विशेष आर्थिक सहायता) के लिए भी कार्य करती थी।

(c) गाँव के सामुदायिक कार्य जिन्हें कोई एक व्यक्ति या कृषक नहीं कर सकता था तो वह कार्य पंचायत द्वारा किए जाते थे। इनमें छोटे-छोटे बाँध बनाना, नहरों व तालाबों की खुदाई करवाना, गाँव के चारों ओर मिट्टी की बाड़ बनवाना तथा सुरक्षा के लिए कार्य करना इत्यादि प्रमुख थे।

(d) गाँव की सामाजिक संरचना विशेषकर जाति व्यवस्था के बंधनों को लागू करवाना भी पंचायत का मुख्य काम था। पंचायत किसी व्यक्ति को जाति की हदों को पार करने की आज्ञा नहीं देती थी। पंचायत शादी के मामले व व्यवसाय के मामले में इन बंधनों को कठोरता से लागू करती थी।

(e) गाँव में न्याय करना पंचायत का अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। गाँव में हर प्रकार के झगड़े व सम्पत्ति-विवाद का समाधान पंचायत करती थी। पंचायत दोषी व्यक्ति को कठोर दण्ड दे सकती थी, जिसमें व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक कर दिया जाता था।

इस तरह स्पष्ट है कि पंचायत व गाँव का मुखिया गाँव नियमन परंपरावादी ढंग से करते थे। ग्रामीण ताना-बाना व जातीय परंपरा को बनाए रखना इनका मुख्य ध्येय होता था।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
विश्व के बहिरेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ।
उत्तर:
मुग़लों का आर्थिक संपर्क, जल व थल मार्ग से कई देशों से था। इन देशों को विश्व के मानचित्र में प्रदर्शित किया जा सकता है मध्य एशिया के देश, पश्चिमी एशिया के देश, दक्षिणी एशिया के देश, अरब क्षेत्र के देश, फ्रांस, ब्रिटेन और पुर्तगाल।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 4

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन-सी फसलें उगाई जाती हैं, कौन-से जानवर पाले जाते हैं, कौन-से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं-सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी इसके लिए सर्वप्रथम अपने गाँव या पड़ोस के गाँव का चयन करें। इसके लिए वह एक प्रश्नावली तैयार करें। जैसे

  • आपके गाँव में कौन-कौन सी फसलें होती हैं।
  • गाँव के लोग किन-किन पशुओं को पालते हैं।
  • गाँव में किस-किस दस्तकारी से संबंधित लोग रहते हैं।
  • क्या गाँव में महिलाओं को भूमि के मालिक होने का अधिकार है।
  • आपकी पंचायत क्या-क्या कार्य करती है।
  • आपकी पंचायत का चुनाव कैसे होता है।

इन प्रश्नों की जानकारी के बाद विद्यार्थी अध्याय को ध्यान से पढ़कर तुलना करें कि फसलों व जानवरों में कोई बदलाव आया है। इसमें विशेष अंतर पंचायत व्यवस्थाएँ यह हैं कि मुगल काल में पंचायतें प्रभावी वर्ग की स्थायी पैतृक पदों वाली तथा जातीय आधार पर होती थी जबकि आज की पंचायतों को चुनाव में गाँव का प्रत्येक स्त्री पुरुष बिना किसी जाति धर्म, क्षेत्र, भाषा के भेदभाव के बिना हिस्सा ले सकता है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 12.
आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?
उत्तर:
पाठ्यपुस्तक में वर्णित आइन को पढ़िए। इसके लिए आप इंटरनेट से भी मदद ले सकते हैं या फिर किसी विश्वविद्यालय या महाविद्यालय के पुस्तकालय से आइन पुस्तक के रूप में ले सकते हैं। इस पुस्तक के किसी एक अध्याय को पढ़कर अपने विचार निश्चित कर सकते हैं। इसके लिए J.B.D. की पाठ्यपुस्तक आपके लिए मददगार होगी क्योंकि इस पुस्तक में अध्याय के प्रारंभ में भी स्रोतों का अध्ययन किया गया है। इसमें आइन-ए-अकबरी के विभिन्न भागों व अध्यायों का वर्णन है। आइन-ए-अकबरी की स्रोतों के रूप में सीमाएँ तथा महत्त्व को भी स्पष्ट रूप से इंगित किया गया है। इन्हीं पक्षों का प्रयोग आप विस्तृत विश्लेषण के लिए अपने चयनित किए गए अध्याय पर भी कर सकते हैं।

किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य HBSE 12th Class History Notes

→ आइन-ए-अकबरी-अकबर के शासनकाल में उसके दरबारी अबुल फज्ल द्वारा लिखी गई पुस्तक।

→ रैयत-इसका शाब्दिक अर्थ प्रजा है। मुगलकाल में यह शब्द कृषकों के लिए प्रयोग किया गया है। इस शब्द का बहुवचन ‘रिआया’ है।

→ खुद-काश्त-वह किसान जो ज़मीन का मालिक भी था तथा स्वयं उसको जोतता भी था।

→ पाहि-काश्त-यह वह किसान था जिसके पास अपनी जमीन नहीं होती थी। वह पड़ोस के गाँव या अपने ही गाँव में पड़ोसी की ज़मीन पर खेती करता था।

→ खालिसा-मुगलकाल की वह ज़मीन जिससे एकत्रित भू-राजस्व सीधे सरकारी कोष में जाता था।

→ जागीर-ज़मीन का वह हिस्सा जिसका राजस्व किसी अधिकारी को उसकी सरकारी सेवा अर्थात् वेतन के बदले दिया जाता था।

→ जिन्स-ए-कामिल-मुगलकाल में उत्पादित होने वाली वे फसलें जो खाद्यान्न नहीं होती थीं। राज्य को इन फसलों से अधिक कर प्राप्त होता था।

→ रबी-वह फसल जो अक्तूबर-नवंबर में बोई जाती तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी।

→ खरीफ वह फसल जो मई, जून व जुलाई में रोपित की जाती तथा अक्तूबर व नवंबर में काटी जाती थी।

→ पुश्तैनी-वह कार्य या संपत्ति जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता हो।

→ मल्लाहजादा-मल्लाह वह व्यक्ति होता है जो नौका चलाता है। उसका पुत्र मल्लाहजादा कहलाता था।

→ खेतिहर-वह व्यक्ति जो स्वयं ज़मीन का मालिक नहीं होता बल्कि कृषक के साथ मिलकर मज़दूर इत्यादि के रूप में कार्य करता था।

→ मीरास-किसी व्यक्ति को उसकी सेवा के बदले भूमि दी जाती थी। उसे मीरास या वतन कहा जाता था।

→ जंगली-वे लोग जिनका निवास स्थान जंगल में था।

→ कारवाँ–सामूहिक रूप में पशुओं व गाड़ियों के साथ व्यापार करने वाले लोग।

→ ज़मींदार-मुगलकाल का वह व्यक्ति जो ज़मीन का मालिक होता था। उसे अपनी ज़मीन बेचने, खरीदने व हस्तांतरण का अधिकार होता था।

→ स्वायत्त मुखिया-मुगलकाल में एक ऐसा ज़मींदार जो बहुत बड़े क्षेत्र का स्वामी होता था। जनता उन्हें उस क्षेत्र में शासक ही समझती थी।

→ जरीब-ज़मीन को नापने के लिए प्रयोग की जाने वाली लोहे की जंजीर जरीब कहलाती थी।

→ शिजरा-किसी गाँव, शहर या क्षेत्र का कपड़े पर बनाया गया नक्शा शिजरा कहलाता था। इसमें निवास क्षेत्र व कृषि क्षेत्र का उल्लेख होता था।

→ पोलज-मुगलकाल की वह कृषि भूमि जो सबसे अधिक उपजाऊ थी।

→ जमा-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष के लिए निर्धारित लगान दर जमा कहलाती थी। ”

→ हासिल-मुगलकाल में किसी क्षेत्र विशेष से जितना कर एकत्रित होता था वह हासिल कहलाता था।

→ टकसाल वह स्थान जहाँ पर किसी राज्य अथवा देश की मुद्रा छपती थी या आज भी छपती है।

→ मुकद्दम-मुगलकाल में गाँव के मुखिया को कहा जाता था।

→ एक ‘छोटा गणराज्य’-भारतीय गाँव के लिए अंग्रेज लेखकों द्वारा प्रयोग किया गया शब्द।

→ पायक-असम क्षेत्र में पैदल सैनिकों को पायक कहा जाता था।

→ सफावी-ईरान के शासकों को सफावी कहा जाता था।

मुगलकाल में कुल जनसंख्या के लगभग 85% से अधिक लोग गाँवों में रहते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था का केन्द्र कृषि थी। छोटे-से-छोटे कृषक तथा खेतिहर मजदूर से लेकर बड़े-से-बड़े व्यक्ति का सम्बन्ध कृषि से था। समाज के सभी वर्ग कृषि उत्पादन में अपना-अपना हिस्सा अपने-अपने ढंग से लेते थे। इस उत्पादन के बँटवारे में समाज के विभिन्न वर्गों में सहयोग, टकराव व प्रतिस्पर्धा साथ-साथ चलती थी। इन्हीं रिश्तों व परिस्थितियों के बीच ग्रामीण समाज की संरचना बनती थी। मुगल साम्राज्य की आय का मुख्य साधन भू-राजस्व था। वह विभिन्न तरीकों से विभिन्न व्यक्तियों के माध्यम से इसे एकत्रित करता था। इस राजस्व के एकत्रित करने में यह आवश्यक था कि ग्रामीण समाज पर नियंत्रण रखा जाए। मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व को एकत्रित करने के लिए जिन्स के साथ-साथ मुद्रा की नीति को भी अपनाया। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी या वाणिज्यिक फसलें भी उगाई जाती थीं। इस प्रक्रिया के चलते हुए व्यापार, मुद्रा व बाजार का सम्बन्ध गाँवों से हो गया। इस कारण गाँव भी अब अलग-अलग न रह कर शहर से जुड़ गए।

→ मुगलकाल का आर्थिक इतिहास जानने का एक प्रमुख साधन आइन-ए-अकबरी है। इस स्रोत से हमें यह पता चलता है कि राज्य का कृषि, कृषक व ज़मींदारों के बारे में दृष्टिकोण कैसा था? इसके अतिरिक्त कुछ और स्रोत भी हैं जो आर्थिक पक्ष की जानकारी देते हैं। इन स्रोतों का प्रयोग कर 16वीं व 17वीं शताब्दी के आर्थिक इतिहास का पुनर्निर्माण किया जा सकता है।

→ जैसा कि स्पष्ट है मुगलकाल में भी भारत कृषि प्रधान देश था। उस समय लोग आज की तुलना में कृषि पर अधिक निर्भर थे। ये लोग वर्ष भर खेती के कार्यों में लगे रहते थे। ज़मीन की जुताई, बिजाई व कटाई के अनुरूप इनकी दिनचर्या जुड़ी थी। इस समय कृषि पर आधारित उद्योग लगभग प्रत्येक गाँव में थे जिसमें लोग कृषि के मुख्य काम के अतिरिक्त समय गुजारते थे। भौगोलिक दृष्टि से भारत में कृषक व कृषि व्यवस्था की प्रणाली एक-जैसी नहीं थी। मैदानी क्षेत्रों में बड़े-बड़े खेत थे तथा उनमें उत्पादन बड़े स्तर पर होता था। पहाड़ी क्षेत्रों में छोटे-छोटे खेत व उत्पादन भी सीमित थे। इस तरह पठारी व मरुस्थल क्षेत्र की स्थिति भी अन्य से भिन्न थी। भारत के बहुत बड़े हिस्से पर जंगल भी थे। वहाँ रहने वाले लोगों की जीवन-शैली पूरी तरह से भिन्न थी। इस तरह से पूरे भारत के बारे में कृषक व कृषि के सन्दर्भ में एक जैसे निष्कर्ष निकालना सम्भव नहीं है।

→ मुगलकाल में कृषक के लिए मोटे तौर पर रैयत या मुज़रियान शब्द का प्रयोग मिलता है। कई स्थानों पर हमें कृषक के लिए किसान व आसामी शब्द भी मिलते हैं। 17वीं शताब्दी के स्रोतों में खुद-काश्त व पाहि-काश्त इत्यादि शब्दों का प्रयोग कृषकों के लिए मिलता है। यह शब्द उनकी प्रकृति में अन्तर को स्पष्ट करता है। कहीं-कहीं यह विभिन्न क्षेत्रों के भाषायी अन्तर के कारण है।

→ मुगलकाल में फसल चक्र खरीफ व रबी के नाम से जाना जाता था। यह फसल चक्र भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में था। उपजाऊ क्षेत्रों में दोनों फसलें होती थीं। जबकि कम उपजाऊ क्षेत्रों में एक फसल मौसम के अनुरूप ली जाती थी। रबी (बसन्त) की फसल अक्तूबर-नवम्बर में रोपित होती थी तथा मार्च-अप्रैल में काटी जाती थी जबकि खरीफ (पतझड़) की फसल की बिजाई मई, जून व जुलाई में होती थी तथा कटाई सितम्बर, अक्तूबर व नवम्बर में होती थी। इस फसल चक्र का आधार मानसून पवनें थीं। भारत में जिन क्षेत्रों में वर्षा पर्याप्त मात्रा में होती थी या सिंचाई के साधन उपलब्ध थे, वहाँ तीन फसलें भी ली जाती थीं। तीसरी फसल मोटे तौर पर पशुओं के लिए चारा इत्यादि होता था। दूसरी ओर गन्ना व नील इस तरह की फसलें भी थीं जो वर्ष में एक बार ही हो पाती थीं।

→ कृषि सम्बन्धी इन पक्षों की एक विशेष बात यह थी कि मुगलकाल में जोत क्षेत्र काफी बड़ा था। कृषि क्षेत्र को बढ़ाने के लिए राज्य तथा कृषकों द्वारा लगातार कार्य किए गए। जोत क्षेत्र के बढ़ने तथा नई फसलों के आगमन का परिणाम यह रहा कि अकाल व भुखमरी की स्थिति पहले से कम हुई। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव जनसंख्या पर पड़ा। 1600 से 1700 तक भारत की जनसंख्या में लगभग 5 करोड़ की वृद्धि हुई तथा आगामी 100 वर्षों में यह और अधिक बढ़ी। स्रोतों के अनुमान के अनुसार 16वीं व 17वीं शताब्दी में भारत की जनसंख्या में लगभग 33% की वृद्धि हुई। इस जनसंख्या वृद्धि से कृषि उत्पादन भी बढ़ा क्योंकि कृषि पर काम करने वाले लोग भी बढ़े।

→ गाँव में व्यवस्था का संचालन पंचायतें करती थीं। गाँव में प्रायः कई जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति की अपनी एक पंचायत होती थी। ये जातीय पंचायत गाँव की परिधि के बाहर भी महत्त्व रखती थी। इनका अस्तित्व क्षेत्रीय आधार पर भी होता था। ये बहुत शक्तिशाली होती थीं। ये पंचायतें अपनी जाति (बिरादरी) के झगड़ों का निपटारा करती थीं। जातीय परंपरा व बन्धनों के दृष्टिकोण से ये ग्रामीण पंचायतों की तुलना में अधिक कठोर थीं। दीवानी झगड़ों का निपटारा, शादियों के जातिगत मानदण्ड, कर्मकाण्डीय गतिविधियों का आयोजन तथा अपने व्यवसाय को मजबूत करना इनके काम थे। व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को ये पंचायतें जाति से बाहर कर देती थीं। सामाजिक अस्तित्व की दृष्टि से यह दण्ड बेहद कठोर होता था क्योंकि इसके द्वारा व्यक्ति अपने परिवार, व्यवसाय व वैवाहिक संबंधों इत्यादि से भी कट जाता था।

→ ग्राम पंचायतों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग का प्रभुत्व था। वह वर्ग अपनी मनमर्जी के फैसले पंचायत के माध्यम से लागू करवाता था। सामान्य तौर पर निम्न वर्ग के लोग पंचायत की इस तरह की कार्रवाई को झेल लेते थे। परन्तु स्रोतों में विशेषकर महाराष्ट्र व राजस्थान से प्राप्त दस्तावेजों में इस तरह के प्रमाण मिले हैं कि निम्न वर्ग ने विरोध किया हो। इन दस्तावेज़ों में ऊँची जातियों व सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली या बेगार की शिकायत है, जिसके अनुसार निम्न वर्ग के लोग स्पष्ट करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है तथा उन्हें उनसे न्याय की उम्मीद भी नहीं है।

→ भारतीय ग्राम प्राचीनकाल से छोटे गणराज्य के रूप में कार्य कर रहे थे। मुगलकाल में इस व्यवस्था में थोड़ा-बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की। शासक की ओर से नकदी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इस काल में विदेशी व्यापार में भी वृद्धि हुई। विदेशों को निर्यात होने वाली चीजें गाँव में बनती थीं। इस व्यापार से नकद धन मिलता था। इस तरह धीरे-धीरे मजदूरी का भुगतान भी नकद किया जाने लगा। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें भी उगाई जाने लगी, जिससे कृषक को पर्याप्त मात्रा में लाभ होता था। रेशम तथा नील मुगलकाल में अत्यधिक लाभ देने वाली फसलें मानी जाती थीं। इस तरह ग्रामीण समाज में वस्तु विनिमय के साथ मुद्रा का प्रयोग भी होने लगा। इससे ग्रामीण ताना-बाना व व्यवस्था प्रभावित होने लगी।

→ जंगलवासियों के जीवन में भी मुगलकाल में कई तरह के परिवर्तन आए। विभिन्न कारणों के होते हुए जंगलवासियों की दूरियाँ गाँव व नगरों से कम हुई, वहीं राज्य के साथ भी संबंधों में बदलाव आया। 16वीं सदी के एक बंगाली कवि मुकंदराम चक्रवर्ती ने ‘चंडीमंगल’ नामक कविता लिखी। इस कविता के नायक कालकेतु ने जंगल खाली करवाकर नए साम्राज्य की स्थापना की। उसने अपनी कविता में उस प्रक्रिया को वर्णित किया है जो जंगल में साम्राज्य का विस्तार करने के लिए अपनाई गई तथा जिसने जंगल के जीवन व व्यवस्था को बदल दिया।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

→ मुगलकाल में कृषि संबंधों का अध्ययन करते हुए अभी तक हमने कृषक, गैर-कृषक व ग्रामीण समुदायों के कुछ पक्षों का वर्णन किया है। इन संबंधों में एक और बहुत महत्त्वपूर्ण पक्ष का अध्ययन जरूरी है। यह पक्ष ज़मींदार के नाम से जाना जाता था। यह कृषि व्यवस्था का केन्द्र था, क्योंकि वह भूमि का मालिक था। उसे ज़मीन के बारे में सारे अधिकार प्राप्त थे अर्थात् वह अपनी ज़मीन को बेच सकता था या किसी को हस्तांतरित कर सकता था। वह अपनी भूमि से कर एकत्रित करके राज्य को देता था। इस तरह यह वर्ग अपने से ऊपर तथा नीचे वाले दोनों वर्गों पर प्रभाव रखता था। ज़मींदार के सन्दर्भ में एक खास बात यह भी है कि वह खेती की कमाई खाता था, लेकिन स्वयं खेती नहीं करता था। बल्कि वह अपने अधीन कृषकों व मजदूरों से कृषि करवाता था।

→ निष्कर्ष के तौर पर हम कह सकते हैं कि 16वीं व 17वीं सदी सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण है। इस काल में ग्रामीण व्यवस्था व कृषि व्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। ये बदलाव आपस में जुड़े थे। ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था प्रमुख थी। उसी आधार पर सामाजिक ताना-बाना बना था। कृषक समुदाय इस व्यवस्था में शीर्ष पर था। उसकी जाति भी उच्च थी। निम्न जातियों के लोग भूमि के मालिक नहीं थे। वे या तो गैर-कृषक कार्य करते थे या फिर खेतिहर मजदूर थे।

काल-रेखा

कालघटना का विवरण
1483 ई०बाबर का मध्य एशिया के फरगाना में जन्म
1504 ई०बाबर की काबुल-विजय
1526 ई०बाबर की पानीपत की पहली लड़ाई में जीत, दिल्ली सल्तनत का अन्त व मुग़ल वंश की स्थापना
1530 ई०हुमायूँ का गद्दी पर बैठना
1540 ई०हुमायूँ की शेरशाह सूरी द्वारा पराजय व हुमायूँ का (1540-55) भारत से निर्वासन
1540-45 ई०शेरशाह सूरी का शासन काल
1545-55 ई०शेरशाह सूरी के उत्तराधिकारियों का काल
1555-56 ई०हुमायूँ द्वारा फिर से सत्ता पर अधिकार करना
1556 ई०पानीपत की दूसरी लड़ाई व अकबर के शासन काल का प्रारंभ
1556-1605 ई०अकबर का शासन काल
1605-1627 ई०जहाँगीर का शासन काल
1628-1658 ई०शाहजहाँ का शासन काल
1658-1707 ई०औरंगज़ेब का शासन काल
1707-1857 ई०औरंगज़ेब के बाद 11 मुग़ल शासकों का काल या उत्तर मुग़लकाल
1739 ई०नादिरशाह का दिल्ली पर आक्रमण व लूटमार
1757 ई०प्लासी की लड़ाई में बंगाल पर अंग्रेजों का कब्ना
1761 ई०पानीपत की तीसरी लड़ाई व मराठों की अब्दाली के हाथों हार
1765 ई०बंगाल, बिहार व उड़ीसा में अंग्रेजों को दीवानी अधिकार की प्राप्ति
1857 ई०1857 का जन विद्रोह, अन्तिम मुग़ल बादशाह को बन्दी बनाकर बर्मा की राजधानी रंगून भेजना।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Read More »

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

HBSE 12th Class History एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
पिछली दो शताब्दियों में हम्पी के भवनावशेषों के अध्ययन में कौन-सी पद्धतियों का प्रयोग किया गया है? आपके अनुसार यह पद्धतियाँ विरुपाक्ष मन्दिर के पुरोहितों द्वारा प्रदान की गई जानकारी का किस प्रकार पूरक रहीं?
उत्तर:
विजयनगर की जानकारी का मुख्य स्रोत हम्पी से प्राप्त पुरातात्विक सामग्री है। यह पुरातात्विक सामग्री एक खुदाई या खनन प्रक्रिया के बाद ही प्रयोग हो सकी है। संक्षेप में हम इस प्रक्रिया को इस तरह समझ सकते हैं।

1. खनन मानचित्र-सर्वप्रथम पूरे क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया। फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। उसके बाद फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

2. खनन कार्य-पूरे क्षेत्र को इस तरह विभाजित करके खनन कार्य प्रारंभ किया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्र को अलग-अलग विशेषज्ञ की देखरेख में बांटा गया तथा फिर गहन खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संरचनाएँ बाहर आने लगीं, लेकिन इन्होंने आकार तब लिया जब आपस में इन टुकड़ों को जोड़ दिया गया। फिर यहाँ से देवस्थल, मंडप, विशाल गोपुरम्, शाही स्थल, धार्मिक केंद्र, सड़क, बरामदे, बाजार इत्यादि के अवशेष सामने आए। जॉन एम. फ्रिट्ज (John M. Fritz), जॉर्ज मिशेल (George Michell) तथा एम.एस. नागराज राव (M.S. Nagraja Rao) वे व्यक्ति थे जो प्रारंभ से अंत तक खुदाई के कार्य से जुड़े रहे। पुरातात्विक सामग्री से प्राप्त इस भव्य नगर के बारे में सर्वप्रथम जानकारी कॉलिन मैकेन्जी ने दी। उसे इस बारे में ज्ञान विरुपाक्ष मन्दिर के पुजारियों से हुआ था। वे पुजारी बताते थे कि इस क्षेत्र में कभी भव्य साम्राज्य था इस तरह यह सत्य है कि दो शताब्दियों के खनन ने पुजारियों द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि की है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 2.
विजयनगर की जल-आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
उत्तर:
विजयनगर की जल-आवश्यकताओं की पूर्ति जल प्रबंधन की एक निश्चित योजना के अनुरूप थी। शासकों ने इस ओर विशेष ध्यान दिया। विजयनगर प्राकृतिक दृष्टि से पहाड़ियों के बीच था। इसके उत्तर:पूर्व में तुंगभद्रा नदी बहती थी। पहाड़ियों की जल धाराओं से यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बना है। वहीं पर शासकों ने बाँधों का निर्माण किया। इन बाँधों से पानी लेकर बड़े-बड़े कुण्डों में एकत्रित किया जाता था। इन कुण्डों से कृषि में सिंचाई की जरूरत को पूरा किया जाता था। इसके साथ ही शासकों द्वारा नहर के माध्यम से इस जलाशय का पानी शहर के मुख्य हिस्से ‘राजकीय केंद्र’ तक पहुँचाया जाता था। अवशेषों के आधार पर कहा जा सकता है कि तुंगभद्रा नदी पर बाँध बनाकर कर हिरिया नहर का निर्माण करवाया गया।

प्रश्न 3.
शहर के किलेबंद क्षेत्र में कृषि क्षेत्र को रखने के आपके विचार में क्या फायदे और नुकसान थे?
उत्तर:
खेतों को किलेबंदी क्षेत्र में लाने के फायदे व नुकसान देखने से पहले जरूरी है कि प्रश्न उठाया जाए कि इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसका जवाब ढूँढने के लिए हमें मध्यकालीन युद्ध पद्धति को समझना होगा। इस काल में युद्ध मुख्य रूप से घेरा बंदियों से जीते जाते थे। यह घेराबंदी महीनों तक चलती थी तथा शत्रु खाद्यान्न व जल का संकट पैदा किया करता था जिससे बचने के लिए शासक किलों के अंदर बड़े-बड़े अन्नागारों का निर्माण करवाया करते थे। विजयनगर व बहमनी में संघर्ष महीनों नहीं वर्षों चला करते थे। इसलिए विजयनगर के शासकों ने न केवल अन्नागारों बल्कि पूरे कृषि क्षेत्र को ही किलेबंद कर दिया। यह व्यवस्था महँगी जरूर थी, लेकिन इसके परिणाम सुखद थे।

प्रश्न 4.
आपके विचार में महानवमी डिब्बा से संबद्ध अनुष्ठानों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
विजयनगर शहर में सबसे आकर्षक एवं ऊँचा स्थान ‘महानवमी डिब्बा’ था। यह 11000 वर्ग फीट वाले विशाल मंच पर 40 फीट की ऊँचाई वाला मंच था। इस विशाल मंच पर लकड़ी की संरचना बनी होने के प्रमाण मिलते हैं।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 1
इतिहासकार व पुरातत्वविद ‘महानवमी’ का अर्थ महान ‘नौवें दिवस’ से लेते हैं। यह कब आता था, इस बारे में साक्ष्य कोई जानकारी नहीं देते। इसलिए इसे अनुमानतः दशहरा, दुर्गा पूजा तथा नवरात्रों इत्यादि त्यौहारों से जोड़ा गया है। इनके आयोजन की कोई तिथि निर्धारित नहीं की जा सकती। लेकिन इस बात का अनुमान लगाया जाता है कि शासक इस दिन को अपनी शक्ति प्रदर्शन, पहचान व संपन्नता इत्यादि के रूप में देखते थे। इस दिन विभिन्न तरह के अनुष्ठान किए जाते थे। अनुष्ठान के अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों के नायक एवं अधीनस्थ राजा विजयनगर के राय व अतिथियों को भेंट देते थे। इस माध्यम से वे अपनी स्वामीभक्ति का प्रदर्शन भी करते थे। शासक इस कार्यक्रम के अंतिम दिन शाही सेना तथा नायकों की सेना का निरीक्षण भी करता था। अतः स्पष्ट है कि महानवमी डिब्बा अनुष्ठानों का केन्द्र बिन्दु था। ये अनुष्ठान शासक की शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक होते थे।

प्रश्न 5.
दिया गया चित्र विरुपाक्ष मन्दिर के एक अन्य स्तंभ का रेखाचित्र है। क्या आप कोई पुष्प-विषयक रूपांकन देखते हैं? किन जानवरों को दिखाया गया है? आपके विचार में उन्हें क्यों चित्रित किया गया है? मानव आकृतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दिखाया गया स्तम्भ रेखाचित्र काफी महत्त्वपूर्ण है। इस स्तंभ पर उत्कीर्ण की गई चीजें कई पक्षों को स्पष्ट करती हैं। इस स्तम्भ रेखाचित्र को कलाकारी के अनुरूप 8 भागों में बांटा जा सकता है। इसके प्रत्येक भाग में वनस्पति, मनुष्य या किसी-न-किसी जीव-जन्तु को दिखाया गया है। इसमें विभिन्न चार तरह के फूल दिखाए गए हैं। जबकि पशुओं व बड़े जंतुओं में हाथी, घोड़ा, शेर व मगरमच्छ अधिक स्पष्ट उभरकर सामने आते हैं। इन पशुओं में शेर राज्य की शक्ति का प्रतीक है जबकि हाथी व घोड़ा थल सेना में इनके महत्त्व को इंगित करता है। मगरमच्छ इनकी समुद्री सीमा के सुदृढ़ पक्ष को बताता है। चित्र में वर्णित नाचता हुआ मोर साम्राज्य की समृद्धि को अभिव्यक्त करता है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 2
चित्र में दिखाई गई मानव आकृतियों में तीन किसी-न-किसी देवता को अभिव्यक्त करती हैं जबकि एक में एक व्यक्ति शिवलिंग के सम्मुख विशेष नृत्य करता हुआ दिखाया गया है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि यह स्तम्भ चित्र विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि, सुरक्षा व सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन की सजीव प्रस्तुति है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
“शाही केंद्र” शब्द शहर के जिस भाग के लिए प्रयोग किए गए हैं, क्या वे उस भाग का सही वर्णन करते हैं।
उत्तर:
पुरातत्वविदों को विजयनगर की खुदाई के दौरान विभिन्न प्रकार के अवशेष मिले। शहर के केन्द्र में कुछ भवन बड़े भव्य तथा अन्य स्थानों की तुलना में अधिक सुरक्षात्मक ढंग से बनाए गए थे। इनकी बनावट को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसी स्थल से विजयनगर साम्राज्य का प्रशासन चलता था इसलिए पुरातत्वविदों ने इसे शाही या राजकीय केंद्र कहा है। इस क्षेत्र में शासक का आवास, 60 से अधिक मन्दिर तथा बड़े-बड़े सभा स्थल हैं। शहर के इसी हिस्से में ‘महानवमी डिब्बा’ जैसा भव्य चबूतरा है जहाँ शासक अपनी भव्यता, शक्ति का प्रदर्शन करते थे। हर तरह के शाही उत्सवों का आयोजन स्थल भी यही स्वीकारा जाता है। विभिन्न मंडपों के आंगन भी यहाँ हैं। शासक द्वारा सलाहकारों की सभा का आयोजन जिस कमल महल में होता है वह भी इसी क्षेत्र में है।

शाही केंद्र में हजार राम मंदिर जैसा दर्शनीय भव्य स्थल है जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यह मंदिर केवल शाही परिवार के सदस्यों के लिए था। यह क्षेत्र राज्य के बीच में था। विजयनगर शहर सात दुर्गों की दीवारों के अन्दर था तो केवल यही क्षेत्र सातवें दुर्ग में था। इस केंद्र के बाहर राज्य की सबसे अधिक शक्तिशाली मानी जाने वाली सेना (अर्थात् हाथी सेना) का अस्तबल भी यहीं था। इस तरह के विभिन्न पक्षों को देखने के उपरांत तथा भवनों के अवशेषों के मूल्यांकन से स्पष्ट है कि यह शाही केंद्र था। इस बारे में जो वर्णन जिस तरह दिया गया है वह सही अर्थों में इसकी पुष्टि करता है।

प्रश्न 7.
कमल महल और हाथियों के अस्तबल जैसे भवनों का स्थापत्य हमें उनके बनवाने वाले शासकों के विषय में क्या बताता है?
उत्तर:
विजयनगर शहर के अवशेषों का नामकरण पुरातत्वविदों व इतिहासकारों ने उनकी बनावट, स्थिति व प्रयोग के आधार पर दिया है। विजयनगर शहर के शाही केंद्र में स्थित दो भवन अधिक चर्चा का मुद्दा है। जिनमें पहला है कमल महल तथा दूसरा है हाथियों का अस्तबल। इन दोनों भवनों का स्थापत्य अलग-अलग तरह का है। ऐसे में इनके बनाने के बारे में शासकों का दृष्टिकोण भी एक नहीं कहा जा सकता। इन दोनों को अलग-अलग करके ठीक समझा जा सकता है

(क) कमल महल-यह शाही केंद्र की सबसे सुन्दर इमारत है। किसी लिखित साक्ष्य । में इसके प्रयोग की जानकारी नहीं मिलती। यह भवन विभिन्न मंडपों के बीच बना है। इसके स्तम्भों पर चारों ओर नक्काशी की गई है। इसकी मेहराबों को चाहे किसी भी कोने से देखें तो यह कमल जैसी दिखती हैं। इसलिए अंग्रेज यात्रियों, पुरातत्वविदों ने इसे कमल (लोटस) महल का नाम दे दिया। इसकी स्थिति के विभिन्न पक्षों को देखकर पता चलता है कि शासक इसके माध्यम से अपनी समृद्धि तथा राज्य के वास्तुविदों के कौशल को दुनिया के सामने रखना चाहता थी ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि शासक यहाँ अपने सलाहकारों से भेंट किया करता था। विभिन्न राजदूतों का स्वागतकक्ष भी यही था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 3
(ख) हाथियों का अस्तबल हाथियों का अस्तबल भी शाही केंद्र में है तथा कमल महल के पास है। शाही केंद्र क्षेत्र में यह सबसे बड़ी इमारत है। हाथियों के अस्तबल के आकार को देखने से इस बात का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि विजयनगर के शासकों की सेना में हाथी काफी थे एवं उनका महत्त्व भी काफी अधिक था। इसके निर्माण के पीछे शासकों का उद्देश्य अपनी हाथी सेना को सुरक्षा देना था। इसके साथ इस भवन की निर्माण शैली का अन्य कोई उदाहरण नहीं मिलता। शाही निवास के अति नजदीक होने के कारण यह भी कहा जा सकता है कि शासक हाथियों की सेना से शाही महल की सुरक्षा भी करवाता था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 4
सारांश में यह कहा जा सकता है कि शासकों के इसे बनवाने के उद्देश्य को लिखित साक्ष्यों के अभाव में शत-प्रतिशत नहीं बताया जा सकता। लेकिन निर्माण शैली भवनों की स्थिति के आधार पर निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 8.
स्थापत्य की कौन-कौन सी परंपराओं ने विजयनगर के वास्तुविदों को प्रेरित किया? उन्होंने इन परंपराओं में किस प्रकार बदलाव किए?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य दक्षिण भारत के जिस क्षेत्र में स्थापित हुआ। वह स्थापत्य कला की दृष्टि से काफी समृद्ध था। इस क्षेत्र में पल्लव, चालुक्य, होयसल व चोलों का शासन रहा। इन सभी वंशों के शासकों ने पिछली कई शताब्दियों से विभिन्न तरह के भवनों का निर्माण करवाया। इन भवनों में सबसे अधिक मात्रा में मन्दिर थे। विजयनगर के वास्तुविदों को इन्हीं भवनों विशेषकर मन्दिरों को देखकर भवन बनाने की प्रेरणा मिली। इसके अतिरिक्त विजयनगर के शासकों के अरब क्षेत्र के साथ लगातार संबंध रहे। वहाँ से वस्तुओं का आदान-प्रदान निरंतर होता रहा। विजयनगर के वास्तुविदों को अरब क्षेत्र विशेषकर ईरान के भवन देखने का मौका मिला। उत्तर भारत के भवनों तथा उड़ीसा के गजपति शासकों के भवनों ने भी उन्हें मार्गदर्शन दिया।

विजयनगर के वास्तुविदों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत से सीख लेकर भारत के अन्य स्थानों के भवनों जैसे भवन बनाने प्रारंभ किए। उन्होंने अरब क्षेत्र की भवन निर्माण शैली का भी प्रचूर भाषा में प्रयोग किया। उनका यह प्रयोग शाही भवनों, महलों, शहरी क्षेत्र की इमारतों के साथ-साथ बाजारों इत्यादि में भी दिखाई देता है। विजयनगर में वास्तुविदों ने इस मिश्रित वास्तुकला का प्रयोग जल प्रबंधन में किया। इसमें मैदानी व पर्वतीय दोनों शैलियाँ प्रयोग की। राज्य को सुरक्षा देने की सोचते हुए इन्होंने दुर्गों की सात पंक्तियाँ बनाईं। दुर्गों की दीवारें, दरवाज़े व गुंबद तुर्की प्रभाव

आनुष्ठानिक दृष्टि से इस काल के दो भवन महत्त्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। पहला है निजामुद्दीन औलिया की खानकाह जो बाद में दरगाह बनी और दूसरी है दिल्ली की जामा मस्ज़िद जो मक्का के बाद इस्लाम जगत की सबसे बड़ी मस्ज़िद है। ये सभी भवन सामान्य आवास व्यवस्था से दूर तथा सुरक्षा की दृष्टि से विशेष चारदीवारी से घिरे थे।

संकेत 2-इन भवनों के स्थापत्य के लिए प्राध्यापक के निर्देशन में भ्रमण करें। साथ में ‘इंटरनेट’ पर उपलब्ध जानकारी का लाभ उठाएँ।

प्रश्न 11.
अपने आस-पास के किसी धार्मिक भवन को देखिए। रेखाचित्र के माध्यम से छत, स्तंभों, मेहराबों, यदि हों तो, गलियारों, रास्तों, सभागारों, प्रवेशद्वारों, जलआपूर्ति आदि का वर्णन कीजिए। इन सभी की तुलना विरुपाक्ष मन्दिर के अभिलक्षणों से कीजिए। वर्णन कीजिए कि भवन का हर भाग किस प्रयोग में लाया जाता था। इसके इतिहास के विषय में पता कीजिए।
उत्तर:
संकेत 1-हरियाणा के क्षेत्र में हम कई महत्त्वपूर्ण धार्मिक भवनों को देखते हैं, जिनमें ऐतिहासिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र में छटी पातशाही का गुरुद्वारा, पानीपत में बू अली कलंदर की दरगाह, नारनौल में इब्राहिम सूर द्वारा बनाई गई मस्ज़िद तथा हिसार की लाट की मस्ज़िद प्रमुख हैं। कलायत के दो प्राचीन मंदिर भी उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आधुनिक काल में बनी बहुत-सी इमारतें हर शहर में देखी जा सकती हैं।
यह सभी भवन स्थापत्य की दृष्टि से जहाँ महत्त्वपूर्ण हैं, अपने युग की जीवन-शैली को भी कुछ हद तक स्पष्ट करते हैं। जैसे कि हम विरुपाक्ष के मंदिर में पाते हैं। इसकी मुख्य विशेषताएँ हैं

  • इसमें दो प्रवेश द्वार हैं। पूर्वी द्वार विशाल गोपुरम् है।
  • गोपुरम् से तीन प्रवेश द्वारों से गुजरकर हम बरामदे से होकर देवालय तक पहुँचते हैं जहाँ विरुपाक्ष की मूर्ति स्थापित है।
  • गोपुरम् से देवालय तक चार मंडप बने हैं।
  • मंदिर के उत्तर में कमलपुरम् जलाशय है।

संकेत 2-इस मंदिर की विशेषताओं तथा ऊपर बताई गई हरियाणा की इमारतों की विशेषताओं की तुलना करें। कुछ स्थानों का स्वयं भ्रमण करें। स्थापत्य की विशेषताओं को नोट करें। उसके ऐतिहासिक पक्ष की जानकारी लें।

एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर HBSE 12th Class History Notes

→ शास्त्ररूढ़ शास्त्रों से संबंधित

→ विजयनगर-विजय का शहर

→ राय-विजयनगर के शासकों की उपाधि

→ तेलुगु-आन्ध्र प्रदेश क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा

→ कुदिरई चेट्टी-घोड़ों के व्यापारी

→ संगम वंश-विजयनगर का पहला राजवंश

→ सर्वेयर-सर्वेक्षण करने वाला

→ कन्नड़ कर्नाटक क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा

→ गजपति-उड़ीसा के शासकों की उपाधि

→ रायचूर दोआब-तुंगभद्रा व कृष्णा नदियों के बीच का क्षेत्र

→ गोपुरम्-मन्दिर का प्रवेश द्वार

→ नायक-सैनिक टुकड़ी के प्रमुख (क्षेत्र-विशेष में)

→ अमर-नायक-प्रशासन तथा सैनिक प्रमुख

→ इंडो-इस्लामिक-हिंद-इस्लामी

→ महानवमी-महान् नौवां दिन

→ पम्पादेवी-कर्नाटक क्षेत्र में स्थानीय देवी

→ देवस्थल-मन्दिर में देवता की मूर्ति स्थापित करने वाला स्थान

→ हिन्दू सूरतराणा-हिन्दू सुलतान

→ विरुपाक्ष-विजयनगर क्षेत्र का सबसे प्रमुख देवता

→ बिसनगर-विजयनगर के लिए डोमिंगो पेस द्वारा प्रयुक्त शब्द

→ हम्पी-विजयनगर का वर्तमान नाम

→ महानवमी डिब्बा-विजयनगर शहर में मंच पर बनाया गया एक भवन

→ विट्ठल महाराष्ट्र क्षेत्र में विष्णु के रूप में पूजा जाने वाला देवता

दक्षिण क्षेत्र में चोल व चालुक्यों के पतन के बाद देवगिरी, वारंगल द्वारसमुद्र तथा मदुरई जैसे राज्यों का उत्थान हुआ। इन राज्यों पर दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों (विशेषकर अलाऊद्दीन खलजी) द्वारा अधिकार कर लिया गया। दिल्ली से दूर होने के कारण दिल्ली के सुल्तान इस क्षेत्र को सुगमता से नियंत्रित नहीं कर पाए। मुहम्मद तुगलक ने दूरी की बाधा को पार करते हुए वर्तमान महाराष्ट्र के देवगिरी नामक स्थान का नाम दौलताबाद बदलकर इसे अपनी राजधानी बनाया। परन्तु उसे वापिस दिल्ली पर ही केंद्रित करना पड़ा तथा दक्षिण अव्यवस्था के दौर में उलझ गया। यहाँ दो राज्यों का उत्थान हुआ, जिन्हें विजयनगर व बहमनी के नाम से जाना जाता है।

→ 1336 ई० में हरिहर व बुक्का राय दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई वह साम्राज्य को सही दिशा दे पाया। उसके पश्चात् हरिहर द्वितीय (1377-1405) तथा देवराय प्रथम (1406-22) शासक बने। इन्होंने बहमनी से संघर्ष जारी रखा। साथ ही आर्थिक विकास, कृषि व व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। उनके बाद देवराय द्वितीय (1422-46) शासक बना। उसने इस साम्राज्य की सीमा का खूब विस्तार किया। फारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने उसकी खुले मन से प्रशंसा की है। इसके बाद इस साम्राज्य में कई कमजोर शासक आए जिनको बहमनी के शासकों ने पराजित कर इनकी सीमा को छोटा कर दिया। विजयनगर अपने चरमोत्कर्ष पर कृष्णदेव राय (1509-29) के शासन काल में पहुँचा।

→ बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया। यह युद्ध तालीकोटा (वास्तव में राक्षसी-तांगड़ी क्षेत्र) में हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की। जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया। विजयनगर शहर ही साम्राज्य की राजधानी था। इसकी संरचना व स्थापत्य कला को देखने से यह ज्ञात होता है कि यह महत्त्वपूर्ण शहर था। यह शहर वे सारी विशेषताएँ रखता था जो किसी भी शक्तिशाली राज्य की राजधानी की जरूरत होती थी।

→  इस शहर के मन्दिर, भवन तथा अन्य अवशेष व्यापक रूप में मिलते हैं। नायक व अमर-नायकों के अभिलेख तथा यात्रियों का वृत्तांत शहर के बारे में विस्तृत प्रकाश डालता है। 15वीं शताब्दी के यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफानासी निकितिन (Afanaci Niktian) मुख्य हैं। 16वीं शताब्दी के यात्रियों में दुआर्ते बरबोसा (Duarate Barbosa), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) के नाम आते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

→ विजयनगर साम्राज्य के रायों ने जहाँ जल प्रबंधन उच्चकोटि का किया, वहीं सुरक्षा व्यवस्था तथा सड़कों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया। नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी। जिसके बारे में हमें जानकारी फारस के दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक से मिलती है। वह सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है।

→ विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। पुरातत्वविदों ने इसे शाही केंद्र तथा राजकीय केंद्र इत्यादि नाम भी दिए हैं। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

→ विजयनगर की जानकारी के स्रोत हमें विभिन्न रूपों में मिलते हैं। इनमें पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत शामिल हैं। इनमें से अध्ययनकर्ताओं ने फोटोग्राफ, मानचित्र, उपलब्ध भवनों की खड़ी संरचनाएँ व मूर्तियों की ओर विशेष ध्यान दिया है। मैकेन्जी द्वारा प्रारंभ के सर्वेक्षण के पश्चात् जो रिपोर्ट दी गई, उसको अभिलेखों के वर्णन तथा यात्रियों के वृत्तांत के साथ जोड़ा गया। इस क्षेत्र के अध्ययन का कार्य भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण तथा कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग द्वारा बड़े स्तर पर निरंतर ही किया गया। इस कड़ी में मिली सफलता ने सन् 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित करवा दिया। 1980 के दशक में खनन कार्य और अधिक गहन, व्यापक, योजनाबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप विजयनगर के अवशेष सामने आए।

समय रेखा
क्रम संख्याकालघटना का विवरण
1.1206 ई०दिल्ली सल्तनत की स्थापना
2.1290 ई०खलजी वंश की स्थापना
3.1320 ईoतुगलक वंश की स्थापना
4.1325 ईoमुहम्मद तुगलक का सत्ता पर आना
5.1336 ई०विजयनगर साम्राज्य की स्थापना
6.1347 ई०बहमनी साम्राज्य की स्थापना
7.1435 ई०उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना
8.1486 ई०विजयनगर में सुलुव वंश की सत्ता
9.1490 ईoगुजरात, बीजापुर व बरार में स्वतंत्र राज्यों का उदय
10.1509-29 ई०विजयनगर में कृष्णदेव राय का शासन
11.1518 ई०बहमनी राज्य का अन्त, गोलकुण्डा का उत्थान
12.1526 ईभारत में मुगल वंश की स्थापना
13.1565 ई०तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की हार व पतन का प्रांरभ
14.1707 ई०औरंगजेब की मृत्यु व मुगलों का पतन
15.1800 ई०कॉलिन मैकेन्जी की विजयनगर यात्रा
16.1815 ई०कॉलिन मैकेन्जी भारत में प्रथम सर्वेयर बना
17.1821 ई०कॉलिन मैकेन्जी की मृत्यु
18.1836 ई०पुरातत्वविदों द्वारा हम्पी के अभिलेखों का संकलन प्रारंभ
19.1856 ईअलेक्जैंडर ग्रनिलो द्वारा हम्पी के चित्र लेना
20.1876 ई०जे०एफ० फ्लीट द्वारा अभिलेखों का प्रलेखन प्रारंभ
21.1902 ईसर जॉन मार्शल द्वारा संरक्षण कार्य की शुरुआत
22.1986 ई०यूनेस्को द्वारा हम्पी को विश्व विरासत में शामिल करते हुए पुरातत्व स्थल घोषित

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Read More »