Author name: Prasanna

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

HBSE 12th Class History भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?
उत्तर:
इतिहासकारों की दृष्टि में भारत के विभिन्न समुदायों में विचारों व विश्वासों का आदान-प्रदान होता था। धार्मिक विश्वासों के बारे में वे मानते हैं कि कम-से-कम दो प्रक्रियाएँ चल रही थीं। एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। यह परंपरा मूल रूप से उच्च वर्गीय परंपरा थी जो वैदिक ग्रंथों में फली-फूली। ये ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में भी रचे गए। वैदिक परंपरा का यह सरल साहित्य सामान्य लोगों के लिए था। दूसरी परंपरा शूद्र, स्त्रियों व अन्य सामाजिक वर्गों के बीच स्थानीय स्तर पर विकसित हुई विश्वास प्रणालियों पर आधारित थी। अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की ऐसी प्रणालियाँ काफी लंबे समय में विकसित हुईं। इन दोनों अर्थात् ब्राह्मणीय व स्थानीय परंपराओं के संपर्क में आने से एक-दूसरे में मेल-मिलाप हुआ। इसी मेल-मिलाप को (ख) इतिहासकार समाज की गंगा-जमुनी संस्कृति या संप्रदायों के समन्वय के रूप में देखते हैं। इसमें ब्राह्मणीय ग्रंथों में
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शूद्र व अन्य सामाजिक वर्गों के आचरणों व आस्थाओं को स्वीकृति मिली। दूसरी ओर सामान्य लोगों ने कुछ सीमा तक ब्राह्मणीय परंपरा को स्थानीय विश्वास परंपरा में शामिल कर लिया। इसका एक बेहतरीन उदाहरण उड़ीसा में पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ स्थानीय देवता जगन्नाथ अर्थात् संपूर्ण विश्व का स्वामी था। बारहवीं सदी तक आते-आते उन्होंने अपने इस देवता को विष्णु के रूप में स्वीकार कर लिया।

प्रश्न 2.
किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
उत्तर:
इस्लाम का लोक प्रचलन जहाँ भाषा व साहित्य में देखने को मिलता है, वहीं स्थापत्य कला (विशेषकर मस्जिद) के निर्माण में भी स्पष्ट दिखाई देता है। मस्जिद के लिए अनिवार्य है कि उसका प्रार्थना स्थल का दरवाजा मक्का की ओर खुले तथा मस्जिद में मेहराब तथा मिनबार (व्यासपीठ) हो। इन समानताओं को ध्यान में रखते हुए भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ मस्जिदें बनीं जिनमें मौलिकताएँ तो वही हैं लेकिन छत की स्थिति, निर्माण का सामान, सज्जा के तरीके व स्तंभों के बनाने की विधि अलग थी। इनको जन-सामान्य ने अपनी भौगोलिक व परंपरा के अनुरूप बनाया। कश्मीर में श्रीनगर स्थित झेलम नदी के किनारे बनी चरार-ए-शरीफ को देखिए जो पहाड़ी क्षेत्र की भवन निर्माण परंपराओं को प्रदर्शित करती है। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लामिक स्थापत्य स्थानीय लोक प्रचलन का एक हिस्सा बन गया, अर्थात् इनमें मस्जिद के सार्वभौमिक गुण भी थे तथा स्थानीय परिपाटी को भी अपनाया गया था।
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प्रश्न 3.
बे शरिया और बा शरिया सूफी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सूफी फकीरों ने सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या कर नवीन मतों की नींव रखी। जैसे उन्होंने खानकाह का जीवन त्यागकर रहस्यवादी, फकीर की जिंदगी को निर्धनता व ब्रह्मचर्य के साथ जिया। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग व हैदरी इत्यादि नामों से जाना गया। इन सूफी मतों में जो शरिया में विश्वास करते थे उन्हें बा-शरिया कहते थे तथा जो शरिया की अवहेलना करते थे उन्हें बे-शरिया कहा जाता था। इनमें एकरूपता इस बात की थी कि ये दोनों सूफी आंदोलन से थे। इनकी जीवन-शैली सरल थी। ये इस्लामिक परंपराओं की व्याख्या सरल ढंग से करते थे। इनमें अंतर इनके विश्वास को लेकर था। बा-शरिया के फकीर धर्म को राजनीति से जुड़ा मानते थे तथा वे शासन को शरियत के अनुसार चलाने के पक्षधर थे, जबकि बे-शरिया धर्म की व्याख्या देश, काल, परिस्थिति के अनुसार करने में विश्वास करते थे।

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प्रश्न 4.
चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार व वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर:
अलवार, नयनार व वीरशैव दक्षिण भारत में उत्पन्न विचारधाराएँ थीं। इनमें अलवार व नयनार तमिलनाडु में तथा वीरशैव कर्नाटक में थे। इन्होंने जाति प्रथा के बंधनों को अपने ढंग से नकारा। अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया। उन्होंने सभी मनुष्यों को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। इनके साहित्य में वैदिक ब्राह्मणों की तुलना में विष्णु भक्तों को प्राथमिकता दी गई है। ये भक्त चाहे किसी भी जाति अथवा वर्ण से थे। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे। अलवार समाज ने इन संतों व उनकी रचनाओं को पूरा सम्मान दिया तथा उन्हें वेदों जितना प्रतिष्ठित बताया।

अलवार संतों का एक मुख्य काव्य ‘नलयिरादिव्यप्रबंधम्’ को तमिल वेद के रूप में मान्यता दी गई। लिंगायत समुदाय के लोगों ने भी जाति व्यवस्था का विरोध किया। इन्होंने ब्राह्मणीय धर्मशास्त्रों की मान्यताओं को नहीं स्वीकारा। उन्होंने वयस्क विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की। इस समुदाय में अधिकतर वे लोग शामिल हुए जिनको ब्राह्मणवादी व्यवस्था में विशेष महत्त्व नहीं मिला। इनका विश्वास था कि जाति व्यवस्था वर्ग विशेष के हितों की पूर्ति करती है।

प्रश्न 5.
कबीर तथा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ ?
उत्तर:
कबीर तथा गुरु नानक मध्यकालीन संत परंपरा में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनके उपदेशों ने समाज को नई दिशा दी। कबीर-कबीर के जन्म, प्रारंभिक जीवन और वंश आदि के विषय में विद्वानों में मतैक्य नहीं है। अधिकांश विद्वानों के अनुसार उनका जन्म बनारस में हिन्दू परिवार में हुआ, परन्तु उनका पालन-पोषण नीरू नामक जुलाहे के घर में हुआ। वे ईश्वर की एकता, समानता में विश्वास रखते थे। उन्होंने अच्छे कर्मों, चरित्र की उच्चता व मन की पवित्रता पर बल दिया। जाति-पांति व वर्ग में वे विश्वास नहीं करते थे। उन्हें हिन्दू-मुसलमान एकता में दृढ़ विश्वास था। हजारों हिन्दू, मुस्लिम उनके शिष्य थे। वे मूर्ति-पूजा, व्यर्थ के रीति-रिवाज़ों व आडंबरों के घोर विरोधी थे। मूर्ति-पूजा का खंडन करते हुए
उन्होंने बहुत सुंदर दोहा लिखा

“जे पाहन पूजै हरि मिलें, तो मैं पूनँ पहार।
वा ते यह चाकी भली, पीस खाए संसार।”

कबीर को रामानन्द का शिष्य माना जाता है। भक्ति आंदोलन के सुधारकों में कबीर को बड़ा ऊँचा और महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वे ईश्वर की एकता में विश्वास करते थे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए उन्होंने भरसक प्रयास किए। उन्होंने जात-पात, छुआछूत, व्यर्थ के रीति-रिवाज़, मूर्ति पूजा, धार्मिक यात्राओं, अंधविश्वासों और बाह्य आडम्बरों का खंडन किया। उन्होंने मन की शुद्धता और अच्छे कर्म करने पर अधिक बल दिया।

श्री गुरु नानक देव जी-श्री गुरु नानक देव जी सिख धर्म के प्रणेता थे। उनका जन्म 1469 ई० में रावी नदी के तट पर स्थित तलवंडी (वर्तमान ननकाना साहिब) नामक गाँव में हुआ था। उनका झुकाव शुरू से ही अध्यात्मवाद की ओर था। उन्होंने सारे भारत में, दक्षिण में श्रीलंका से पश्चिम में मक्का और मदीना तक का भ्रमण किया था।

उनकी प्रमुख शिक्षा थी कि ईश्वर एक है। वह सर्वशक्तिमान है। ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने निष्काम भक्ति, शुभ कर्म, शुभ जीवन, नाम के स्मरण और आत्मसमर्पण पर अधिक बल दिया। मार्गदर्शन के लिए उन्होंने गुरु की अनिवार्यता को स्वीकार किया है। वे जाति-पाति, ऊँच-नीच, धर्म व वर्ग के भेदभाव के विरुद्ध थे। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रबल समर्थक थे। वे गृहस्थ जीवन को सर्वश्रेष्ठ मानते थे और उसके त्याग के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने गृहस्थ जीवन में ही ईश्वर की प्राप्ति को संभव बताया। धर्मनिरपेक्षता के प्रचार के लिए उन्होंने लंगर की प्रथा प्रारंभ की, उन्हें गरीबों से अत्यधिक सहानुभूति थी, धर्म के नाम पर आपसी संघर्ष व्यर्थ है। इन्होंने एक साधारण व्यक्ति का जीवन जीते हुए लोक भाषा में अपनी बात कही। इनके तर्क करने का ढंग तथा उपदेश जनता में लोकप्रिय हुए जिस कारण बहुत बड़ी संख्या में लोग इनका अनुसरण करने लगे।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
सूफी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सूफी मत के धार्मिक विश्वास सरल थे। ये सरल आदर्श ही इनके आचरण का आधार बने। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है नौवीं सदी में जब सूफी मत का आंदोलन के रूप में आविर्भाव हुआ, तो इसके लिए कुछ नियमों तथा सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया। सूफी साधकों ने परमात्मा, आत्मा तथा सृष्टि आदि की विवेचना की। संक्षेप में, सूफी मत के सिद्धान्तों को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है

(1) परमात्मा के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा एक है। उनका मानना था कि वह अद्वितीय पदार्थ जो

(2) आत्मा को सूफी साधक ईश्वर का अंग मानते हैं। यह सत्य प्रकाश का अभिन्न अंग है, परन्तु मनुष्य के शरीर से उसका अस्तित्व खो जाता है।

(3) जगत के संबंध में सूफी साधकों का विचार है कि परमात्मा से सूर्य, चन्द्र, बुध, शुक्र, मंगल, बृहस्पति, शनि, नक्षत्रगण आदि उत्पन्न हुए। परमात्मा की कृपा से ही अग्नि, हवा, जल, पृथ्वी का निर्माण हुआ। सूफी साधक जगत को माया से पूर्ण नहीं देखते थे।

(4) मनुष्य के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि मनुष्य परमात्मा के सभी गुणों को अभिव्यक्त करता है।

(5) सूफी साधकों ने पूर्ण मानव को अपना गुरु (मुर्शीद) माना। बिना आध्यात्मिक गुरु के वह कभी, कुछ नहीं प्राप्त कर सकता है।

(6) प्रेम को प्रायः सभी धर्मों में परमात्मा को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधक माना है। सूफियों ने भी इसी प्रेम के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने की आशा की।

(7) परमात्मा के साक्षात्कार के लिए, मिलन या एकाकार होने के लिए अपनी यात्रा में सूफियों को दस अवस्थाओं में से गुजरना पड़ता है। सूफी मत के अनुसार ये दस अवस्थाएँ इस प्रकार थीं

  • तैबा (प्रायश्चित)
  • बरा (संयम)
  • जुहद (धर्मपरायणता)
  • फगर (निर्धनता)
  • सब्र (धैर्य)
  • शुक्र (कृतज्ञता)
  • खौफ (भय)
  • रज़ा (आशा)
  • तवक्कुल (संतुष्टि)
  • रिजा (देवी इच्छा के समक्ष आत्म-समर्पण)

इन सिद्धान्तों पर चलते हुए सूफी संत व उनके अनुयायी कष्टमय जीवन जीना पसन्द करते थे। उनके लिए सुख, साधन इतना अर्थ नहीं रखते थे जितना कि जिंदगी के सरलतम व ऊँचे आदर्शों के अनुरूप जीना। ये प्रायः समझौतावादी चिंतन नहीं अपनाते थे।

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प्रश्न 7.
क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
उत्तर:
अलवार, नयनार व सूफी संत जन-साधारण के बीच काफी लोकप्रिय होते थे। शासक की तुलना में समाज पर उनकी पकड़ काफी अच्छी होती थी। शासकों की हमेशा यह इच्छा रहती थी कि वे इन संत-फकीरों का विश्वास जीत लें। इससे जनता के साथ जुड़ने में आसानी रहेगी तथा उन्हें जन समर्थन मिलने की उम्मीद रहेगी। तमिलनाडु क्षेत्र में शासकों ने अलवार-नयनार संतों को हर प्रकार का सहयोग दिया। इन शासकों ने उन्हें अनुदान दिए तथा मन्दिरों का निर्माण करवाया।

चोल शासकों ने चिदम्बरम, तंजावुर तथा गंगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। इन मन्दिरों में शिव की कांस्य प्रतिमाओं को बड़े स्तर पर स्थापित किया। अलवार व नयनार संत वेल्लाल कृषकों व सामान्य जनता में ही सम्मानित नहीं थे, बल्कि शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। सुन्दर मन्दिरों का निर्माण व उनमें मूर्तियों (कांस्य, लकड़ी, पत्थर व अन्य धातुओं) की स्थापना के अतिरिक्त शासक वर्ग ने संत कवियों के गीतों व विचारों को भी महत्त्व दिया। उन्होंने इन संत-कवियों की प्रतिमाएँ भी देवताओं के साथ लगवाईं। इन संतों के उपदेशों व भजनों का संग्रह करवाकर शासकों ने एक तमिल ग्रन्थ ‘तवरम’ का संकलन भी किया।

इसी तरह से सूफी संतों को भी शासकों ने विभिन्न तरह के अनुदान दिए। अजमेर में मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह तो शासक व शाही परिवार के सदस्यों की पहली पसन्द बन गई थी। मुहम्मद तुगलक सल्तनत काल का पहला सुल्तान था जिसने इस दरगाह की यात्रा की। मुहम्मद तुगलक स्वयं निजामुद्दीन औलिया की खानकाह पर भी निरन्तर जाया करता था। मुगल काल में अकबर ने अपने जीवन में अजमेर की 14 बार यात्रा की। उसने इस दरगाह को विभिन्न चीजें दीं। इसके बाद जहाँगीर, शाहजहाँ व शाहजहाँ की
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पुत्री जहाँआरा द्वारा भी इस स्थान पर जाने के प्रमाण मिलते हैं। अकबर ने फतेहपुर सीकरी में सलीम चिश्ती से न केवल भेंट की, बल्कि उससे प्रभावित होकर अपनी राजधानी भी आगरा से बदलकर फतेहपुर सीकरी कर दी। बाद में उसने सलीम चिश्ती की दरगाह का निर्माण भी फतेहपुर सीकरी के अन्य भवनों के बीच करवाया।
अतः स्पष्ट है कि शासक इन संत फकीरों के माध्यम से समाज से जुड़ना चाहते थे। इसी उद्देश्य से वे संतों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे और समाज पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता था।

प्रश्न 8.
उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
उत्तर:
सूफी फकीरों व भक्ति संतों की लोकप्रियता का मुख्य कारण यह था कि उन्होंने स्थानीय भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी। चिश्ती सिलसिले के शेख व अनुयायी तो मुख्य रूप से हिंदवी में बात करते थे। बाबा फरीद, कबीर व श्री गुरु नानक की काव्य रचनाएँ स्थानीय भाषा में थीं। इनमें से अधिकतर श्री गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। कुछ और सूफियों ने ईश्वर के प्रति आस्था व मानवीय प्रेम को कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। इनकी भाषा भी सामान्य व्यक्ति की थी। मलिक मोहम्मद जायसी की ‘पद्मावत’ चित्तौड़ के राजा रतनसेन व पद्मिनी के बीच प्रेम-प्रसंग पर आधारित है। इसने समाज को सूफी विचारधारा से जोड़ने में मदद की। जायसी के अनुसार, प्रेम आत्मा का परमात्मा तक पहुँचने का मार्ग है। चिश्तियों की तरह अन्य सूफियों ने भी विभिन्न तरह का काव्य वाचन किया। इस काव्य को खानकाहों व दरगाहों पर विभिन्न अवसरों पर गाया जाता था।

सूफी कविता की एक विधा 17वीं व 18वीं शताब्दी में कर्नाटक में बीजापुर क्षेत्र में विकसित हुई। इसे दक्खनी (उर्दू का एक रूप) कहा गया। इसमें महिलाओं के दैनिक जीवन व कार्य प्रणाली की छोटी-छोटी कविताएँ चिश्ती संतों द्वारा रची गईं। इनमें विभिन्न पारिवारिक परंपराओं पर कविताएँ लोरीनामा, शादीनामा तथा चरखानामा इत्यादि थीं। ये कविताएँ कार्य करते समय महिलाएँ गाया करती थीं। भक्ति सन्तों के उपदेश आज भी गीतों इत्यादि में इसलिए सुरक्षित हैं क्योंकि वे सामान्य व्यक्ति की भाषा में थे। इसी सरल भाषा के माध्यम से आम व्यक्ति धर्म व अध्यात्म जैसी जटिल बातों को समझ पाते थे। इसी तरह सामाजिक रूढ़ियों व अन्ध-विश्वासों को कमजोर करने में सफलता तभी मिल सकती थी जब भाषा को समझा जा सके। इस तरह सूफी फकीरों व भक्ति संतों ने अपने विचार सामान्य व्यक्ति की भाषा में अभिव्यक्त किए।

प्रश्न 9.
इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
यह भक्ति व सूफी परंपराओं से संबंधित है। ये परंपराएँ राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से जुड़ी हुई नहीं हैं। मुख्यतयाः इनका आकार सामाजिक व धार्मिक है। विषय की प्रकृति में भिन्नता के कारण इनके स्रोतों में भी अंतर है। इस अध्याय में प्रयुक्त मुख्य पाँच स्रोतों व उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचार इस प्रकार हैं

1. लोकधारा-भक्ति व सूफी संतों की जानकारी के लिए अध्याय में मूर्ति कला, स्थापत्य कला एवं धर्म गुरुओं के संदेशों का प्रयोग किया गया है। इसी तरह उनके अनुयायियों द्वारा रचित गीत, काव्य रचनाएं, जीवनी इत्यादि भी प्रयोग में लाई गई हैं। सामाजिक-धार्मिक दृष्टि से इन्हें इस तरह प्रस्तुत किया गया है कि जन-मानस उनमें विश्वास कर सके तथा जीवन के आदर्शों की प्रेरणा ले सके।

2. ‘कश्फ-उल-महजुब’-यह अली बिन उस्मान हुजविरी (मृत्यु 1071) द्वारा सूफी विचार व आचरण पर लिखित प्रारंभिक मुख्य पुस्तक है। इस पुस्तक में यह ज्ञान मिलता है कि बाह्य परंपराओं ने भारत के सूफी चिन्तन को कैसे प्रभावित किया या इससे स्थानीय समाज व धर्म कैसे प्रभावित हुआ।

3. मुलफुज़ात (सूफी संतों की बातचीत)-यह फारसी के कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी द्वारा संकलित है। इस कवि द्वारा शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत को आधार बनाकर ‘फवाइद-अल-फुआद’ ग्रन्थ लिखा गया। इनका उद्देश्य शेखों के उपदेशों एवं कथनों को संकलित करना होता था ताकि नई पीढ़ी उनका अनुकरण कर सके।

4. मक्तुबात-यह लिखे हुए पत्रों का संकलन होता है जिन्हें या तो स्वयं शेख ने लिखा था या उसके किसी करीबी अनुयायी ने। इन पत्रों में धार्मिक सत्य, अनुभव, अनुयायियों के लिए आदर्श जीवन-शैली व शेख की आकांक्षाओं का पता चलता है। शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के लिखे पत्र ‘मक्तुबात-ए-इमाम रब्बानी’ में संकलित हैं जिसमें अकबर की उदारवादी तथा असांप्रदायिक विचारधारा का ज्ञान मिलता है।

5. ‘तज़किरा’-इसमें सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण होता है। भारत में पहला सूफी तज़किरा मीर खुर्द किरमानी का सियार-उल-औलिया है जो चिश्ती संतों के बारे में है। भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण तज़किरा ‘अख्यार-उल-अखयार’ है। तज़किरा में सिलसिले की प्रमुखता स्थापित करने का प्रयास किया जाता था। इसके साथ ही आध्यात्मिक वंशावली की महिमा को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा जाता था। इस तरह तज़किरा में कल्पनीय, अद्भुत व अविश्वसनीय बातें भी होती हैं। परंतु इतिहासकार का दायित्व है कि वह इन पक्षों के होते हुए भी इसमें से जानकारी ग्रहण करें। प्रस्तुत अध्याय में धार्मिक परंपरा के इतिहास लेखन के बारे में मौखिक व लिखित दोनों तरह की परंपराओं को समझने का प्रयास किया गया है। इनमें अभी कुछ ही साक्ष्य सुरक्षित हो पाए हैं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।
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परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11.
इस अध्याय में वर्णित 3 धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें। इसके लिए दीर्घउत्तरीय प्रश्न 7 एवं 8 में संत कबीर एवं गुरु नानक देव जी का अध्ययन करें।

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प्रश्न 12.
इस अध्याय में वर्णित सूफी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या ये यात्राएँ अभी भी की जाती हैं? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन सी हैं?
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं करें।

भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ HBSE 12th Class History Notes

→ शास्त्ररूढ़ शास्त्रों से संबंधित

→ जगन्नाथ-संपूर्ण विश्व का स्वामी

→ अलवार-तमिलनाडु में विष्णु के भक्त

→ अंडाल-तमिलनाडु की एक अलवार स्त्री भक्त

→ वीरशैव-शिव के वीर

→ आनुष्ठानिक-धार्मिक अनुष्ठान संबंधी

→ पतंजलि की कृति-पतंजलि की रचना

→ वैष्णव-विष्णु को इष्टदेव मानने वाले

→ नयनार-तमिलनाडु में शिव के भक्त

→ तवरम-तमिल भाषा में नयनारों के भजनों का एक ग्रन्थ

→ लिंगायत-लिंग धारण करने वाले शिव भक्त

→ जिम्मी-इस्लामिक राज्य में (गैर इस्लामी) संरक्षित श्रेणी के लोग

→ मुकद्दस-पवित्र

→ तामीर-निर्माण

→ मातृकुलीयता-माता के कुल से अपना संबंध जोड़ना

→ मिनबार-व्यासपीठ

→ जजिया-इस्लामिक राज्य में जिम्मियों से लिया जाने वाला कर

→ तामील-आज्ञा का पालन

→ मातृ-गृहता-माता का अपनी संतान के साथ मायके में रहना व पति का भी उसी परिवार में रहना

→ मेहराब-प्रार्थना का स्थल

→ इन्सान-ए-कामिल-मर्यादा पुरुषोत्तम

→ मुरीद-भक्त या अनुयायी

→ दरगाह-शेख का समाधि-स्थल

→ लंगर-सामुदायिक रसोई

→ काकी-रोटी (अन्न) बाँटने वाला

→ जियारत प्रार्थना

→ उलटबाँसी-विपरीत अर्थ वाली उक्तियाँ

→ कबीर-महान

→ सगुण-ईश्वर को किसी रूप या आकार में मानना

→ खालसा पंथ-पवित्रों की सेना

→ मक्तुबात-लिखे हुए पत्रों का संकलन

→ मुर्शीद-पीर या शेख

→ खानकाह-शेख का निवास

→ उर्स-पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन

→ फुतूह-बिना मांगा दान

→ मुरक्का-ए-दिल्ली-दिल्ली का एलबम

→ सल्तान-उल-मशेख शेखों में सुल्तान

→ नाम-सिमरन-ईश्वर का सच्चा जाप

→ निर्गुण-ईश्वर को किसी आकार या रूप में न स्वीकारना

→ संगत-सामुदायिक उपासना (उपासक)

→ मुलफुजात-सूफी संतों की बातचीत

→ तजकिरा-सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण

→ 8वीं से 18वीं सदी का काल भारत के इतिहास में धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण रहा है, क्योंकि इस काल में धार्मिक विश्वास व श्रद्धा में विभिन्न तरह के परिवर्तन हो रहे थे। ये परिवर्तन आन्तरिक व बाह्य दोनों कारणों से हो रहे थे। इनके कारण केवल धर्म व धार्मिक परंपराएँ ही नहीं बदल रही थीं, बल्कि सामाजिक ताना-बाना भी प्रभावित हो रहा था। इस तरह के सामाजिक-धार्मिक परिवर्तनों के कारण राजनीतिक व्यवस्था, स्थिति व शासन करने की शैली में भी बदलाव आ रहा था। इन सभी परिवर्तनों की जड़ में भक्ति व सूफी परंपराएँ थीं। यहीं भक्ति व सूफी परंपराएँ इस अध्याय की विषय-वस्तु हैं।

→ वैदिक धर्म में जीवन के चार उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष बताए गए हैं। इन उद्देश्यों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मोक्ष को माना जाता है। मोक्ष को प्राप्त करने के लिए तीन मार्ग ज्ञान, कर्म व भक्ति बताए गए हैं। इन मार्गों में जनसामान्य में सर्वाधिक लोकप्रिय भक्ति मार्ग रहा। मध्यकाल में तो इसे भक्ति आंदोलन के नाम से जाना गया है, परंतु ध्यान योग्य पहलू यह है कि मध्यकाल तो इस परंपरा का शिखर काल था। इसकी जड़ें प्राचीन काल में ही प्रकट होने लगी थीं। जब उपासक अपने इष्टदेव की आराधना मंदिरों में तल्लीनता से करते हुए प्रेम-भाव को व्यक्त करते थे। ये उपासक विभिन्न तरह की रचनाओं को गाते एवं श्रद्धा व्यक्त करते थे। इस तरह के भाव वैष्णव व शैव दोनों संप्रदायों के लोग अभिव्यक्त करते थे।

→ भक्ति शब्द की उत्पत्ति ‘भज्’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ सेवा से लिया जाता है। भक्ति व्यापक अर्थ में मनुष्य द्वारा ईश्वर या इष्टदेव के प्रति पूर्ण समर्पण होता है जिसके अनुरूप व्यक्ति स्वयं को अपने श्रद्धेय में समा लेता है। इसमें सामाजिक रूढ़ियाँ, ताना-बाना, मर्यादाएँ तथा बंधनों की भूमिका नहीं होती, बल्कि सरलता, समन्वय की भावना तथा पवित्र जीवन पर बल दिया जाता है। भक्ति संत कवियों ने समाज की रूढ़ियों व नकारात्मक चीजों का विरोध कर, उसके प्रत्येक वर्ग को अपने साथ जोड़ा, जिनके चलते हुए समाज का एक बड़ा वर्ग इनका अनुयायी व समर्थक बन गया। सभी भक्त कवियों ने मोटे तौर पर एक ईश्वर में विश्वास, ईश्वर के प्रति निष्ठा व प्रेम तथा गुरु के महत्त्व पर बल दिया। साथ ही मानव मात्र की समानता, जीवन की पवित्रता, सरल धर्म तथा समन्वय की भावना के लिए कहा। इन संत कवियों में सगुण व निर्गुण के आधार पर अंतर था। सगुण के कुछ संत कवि भगवान राम के रूप में लीन थे, जबकि कुछ को कृष्ण का रूप पसन्द था। इन्हीं आधारों पर इन्हें राममार्गी तथा कृष्णमार्गी कहा जाता था।

→ भक्ति परंपरा की शुरुआत वर्तमान तमिलनाडु क्षेत्र में छठी शताब्दी में मानी जाती है। प्रारंभ में इस परंपरा का नेतृत्व विष्णु भक्त अलवारों तथा शिव भक्त नयनारों ने किया। ये अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। ये अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया। इस तरह ये स्थल तीर्थ स्थलों के रूप में उभरे। संत-कवियों के भजनों को मन्दिरों में अनुष्ठान के समय गाया जाने लगा तथा इन संतों की प्रतिमा भी इष्टदेव के साथ स्थापित कर दी गई। इस तरह इन संतों की भी पूजा प्रारंभ हो गई।
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→ बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक क्षेत्र में एक नए आंदोलन की शुरुआत हुई जिसको बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण संत ने नेतृत्व दिया। बासवन्ना चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे व जैन धर्म में विश्वास करते थे। उनकी विचारधारा को कर्नाटक क्षेत्र में बहुत लोकप्रियता मिली। उसके अनुयायी शिव के उपासक वीरशैव कहलाए। उनमें से लिंग धारण करने वाले लिंगायत बने। इस समुदाय के लोग शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं तथा पुरुष अपने बाएं कंधे पर, चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग को धारण करते हैं। इन लिंगधारी पुरुषों को लोग बहुत सम्मान देते हैं तथा श्रद्धा व्यक्त करते हैं। कन्नड़ भाषा में इन्हें जंगम या यायावर भिक्षु कहा जाता है।

→ अरब क्षेत्र में इस्लाम का उदय विश्व के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। 7वीं शताब्दी में इसके उदय के पश्चात् यह धर्म पश्चिमी एशिया में तेजी से फैला और कालांतर में यह भारत में भी पहुँचा। तत्पश्चात् यहाँ बाहर से आई धार्मिक व वैचारिक पद्धति के साथ आदान-प्रदान की प्रक्रिया शुरू हुई। फलतः एक नया सामाजिक ताना-बाना उभरा।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

→ इस्लाम के भारत में आगमन के पश्चात् जो परिवर्तन हुए वे मात्र शासक वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के जन-सामान्य के विभिन्न वर्गों; जैसे कृषक, शिल्पी, सैनिक, व्यापारी इत्यादि से भी जुड़े थे। समाज के बहुत-से लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी जीवन-शैली व परंपराओं का पूरी तरह परित्याग नहीं किया, लेकिन इस्लाम की आधार स्तम्भ पाँच बातें अवश्य स्वीकार कर लीं।

→ सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। हाँ यह स्पष्ट है कि सूफीवाद का अंग्रेज़ी समानार्थक शब्द ‘सूफीज्म’ है। सूफीज्म शब्द हमें प्रकाशित रूप में 19वीं सदी में मिलता है। इस्लामिक साहित्य में इसके लिए तसब्बुफ शब्द मिलता है। कुछ विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कुछ अन्य विद्वान सूफी को सोफिया (यानि वे शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं। इस तरह इस शब्द की उत्पत्ति के बारे में एक मत तो नहीं हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि इस्लाम में 10वीं सदी के बाद अध्यात्म, वैराग्य व रहस्यवाद में विश्वास करने वाली सूचियों की संख्या काफी थी तथा ये काफी लोकप्रिय हुए। इस तरह 11वीं शताब्दी तक सूफीवाद एक विकसित आंदोलन बन गया।

→ भारतीय उपमहाद्वीप में कई सिलसिलों की स्थापना हुई। इनमें सर्वाधिक सफलता चिश्ती सिलसिले को मिली, क्योंकि जन-मानस इसके साथ अधिक जुड़ पाया। चिश्ती सिलसिले की स्थापना ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती ने की। परंतु भारत में इसकी स्थापना का श्रेय मुईनुद्दीन चिश्ती को जाता है। मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म 1141 ई० में ईरान में हुआ। इस सिलसिले के अन्य संतों में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, हमीदुद्दीन नागौरी, निजामुद्दीन औलिया व शेख सलीम चिश्ती इत्यादि हैं। इनकी कार्य प्रणाली, जीवन-शैली व ज्ञान ने भारत के जन-सामान्य को आकर्षित किया।

समय-रेखा

काल (लगभग)व्यक्ति व क्षेत्र की जानकारी
1. छठी व सातवीं शताब्दी 500-700 ईoतमिलनाडु में अलवार व नयनारों के नेतृत्व में भक्ति आन्दोलन का उदय।
2. आठवीं व नौवीं शताब्दी 700-900 ई०तमिलनाडु में सुन्दर मूर्ति, नम्मलवर, मणिक्वचक्कार व अंडाल का समय, शंकराचार्य (788-820) का काल
3. दसर्वं व ग्यारहवीं शताब्दी 900-1100 ई०उत्तर भारत में राजपूतों का उत्थान, पंजाब में अल हुजविरी, दाता गंज बख्श तथा तमिलनाडु में रामानुजाचार्य का काल।
4. बारहवीं शताब्दी 1100-1200 ई०कर्नाटक में बासवन्ना (1106-68) तथा उत्तर भारत में मोहम्मद गोरी के आक्रमण 1192 ई० में मुइनुद्दीन चिश्ती का भारत आगमन।
5. तेरहवीं शताब्दी 1200-1300 ई०खाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का अजमेर में स्थापित होना, दिल्ली में बख्तियार काकी, महाराष्ट्र में ज्ञानदेव, पंजाब में बहाऊद्दीन जकारिया व फरीदुद्दीन गंज-ए-शंकर; दिल्ली सल्तनत की स्थापना।
6. चौदहवीं शताब्द्री 1300-1400 ई०दिल्ली में निजामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो व जियाऊद्दीन बर्नी, सिन्ध में शाहबाज कलन्दर, कश्मीर में लाल देद, उत्तर प्रदेश में रामानंद।
7. पंद्रहवीं शताब्द्री 1400-1500 ई०उत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास व सूरदास; पंजाब में गुरुनानक; महाराष्ट्र में तुकाराम व नामदेव; असम में शंकरदेव; गुजरात में बल्लभाचार्य व ग्वालियर में अब्दुल्ला सत्तारी।
8. सोलहवीं शताब्दी 1500-1600 ई०राजस्थान में मीराबाई; पंजाब में गुरु अंगददेव व गुरु अर्जुन देव, उत्तर प्रदेश में मलिक मोहम्मद जायसी, तुलसीदास। भारत में मुगल वंश की स्थापना, बंगाल में श्री चैतन्य।
9. सत्रहवीं शताब्दी 1600-1700 ई०हरियाणा क्षेत्र में शेख अहमद सरहिन्दी; पंजाब व दिल्ली में गुरु तेग बहादुर, उत्तर भारत में गुरु गोबिन्द सिंह व पंजाब में मियाँ मीर।
10. अठारहवीं शताब्दी 1700-1800 ई०बंगाल में संन्यासी व चुआरो का उत्थान, भारत में अंग्रेजी शासन का प्रारंभ, राजा राम मोहन राय का जन्म (1774)।

 

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

HBSE 12th Class History यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
किताब-उल-हिन्द पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
‘किताब-उल-हिन्द’, अल-बिरूनी द्वारा रचित सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसे ‘तहकीक-ए-हिन्द’ के नाम से भी जाना जाता है। मौलिक तौर पर यह ग्रंथ अरबी भाषा में लिखा गया है तथा बाद में यह विश्व की कई प्रमुख भाषाओं में अनुवादित हुआ। इसमें कुल 80 अध्याय हैं जिनमें भारत के धर्म, दर्शन, समाज, परंपराओं, चिकित्सा, ज्योतिष इत्यादि विषयों को विस्तृत ढंग से लिखा गया है। भाषा की दृष्टि से लेखक ने इसे सरल व स्पष्ट बनाने का प्रयास किया है।

अल-बिरूनी ने इस रचना के लेखन में विशेष शैली का प्रयोग किया है। वह प्रत्येक अध्याय को एक प्रश्न से प्रारंभ करता है, फिर उसका उत्तर संस्कृतवादी परंपराओं के अनुरूप विस्तृत वर्णन के साथ करता है। फिर उसका अन्य संस्कृतियों के साथ तुलनात्मक अध्ययन करता है। वह इस कार्य में पाली, प्राकृत इत्यादि भाषाओं के अनुवाद का प्रयोग करता है। वह विभिन्न दन्त कथाओं से लेकर विभिन्न वैज्ञानिक विषयों खगोल-विज्ञान व चिकित्सा विज्ञान इत्यादि विषयों की रचनाएँ है। वह प्रत्येक पक्ष का वर्णन आलोचनात्मक ढंग से करता है।

प्रश्न 2.
इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए।
उत्तर:
इब्न बतूता और बर्नियर दोनों ही विदेशी यात्री हैं। इन दोनों ने ही भारत के बारे में अपना वृत्तांत विस्तार से लिखा है। तुलनात्मक दृष्टि से इनके वृत्तांत में कुछ समानता है तो कुछ अंतर भी है।

इब्न बतूता अफ्रीका में मोरक्को देश का रहने वाला था। वह धर्मशास्त्री था। उसने साहित्यिक व शास्त्रीय यात्राओं के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से 1325 ई० में यात्रा प्रारंभ की। मध्य-एशिया में उसने भारत के शासक मुहम्मद-बिन-तुगलक की प्रशंसा सुनी। इससे उसके मन में शासक से मिलने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। वह 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा।

मुहम्मद-बिन-तुगलक व इब्न बतूता दोनों एक-दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। शासक ने उसे दिल्ली का काज़ी नियुक्त किया तथा बाद में दूत बनाकर चीन भी भेजा। चीन जाने के बाद वह 1349 ई० में स्वदेश चला गया। मोरक्को के शासक के निर्देश पर इन जुजाई ने उससे अनुभव लेकर ‘रिला’ नामक ग्रंथ की रचना की।

दूसरी ओर बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था। वह व्यवसाय से चिकित्सक था। वह शाहजहाँ के शासन काल के अंतिम दिनों 1656 ई० में भारत आया तथा 1668 में स्वदेश चला गया। उसने ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक पुस्तक लिखी। . दोनों में समानता यह है कि दोनों ने अपने-अपने समय के शासकों के दरबार, सामंतों व अन्य उच्च वर्ग के लोगों के जीवन की जानकारी दी। दोनों ने समाज की परंपराओं विशेषकर विवाह प्रणाली, सती प्रथा तथा त्योहारों इत्यादि का वर्णन किया है। दोनों का वृत्तांत अन्य लोगों के लिए प्रेरणा बना है।

दोनों में अंतर मुख्य रूप से उद्देश्य को लेकर है। बतूता अधिक-से-अधिक जानकारी लेकर जिज्ञासा को शांत करना चाहता है जबकि बर्नियर पूर्व (भारत) तथा पश्चिम (यूरोप) की तुलना करते हुए, भारत को निम्न बताना चाहता है। वह यूरोप में पूंजीवाद के उत्थान की स्थितियों के अनुरूप लिखता है। इब्न बतूता ने स्वयं कुछ नहीं लिखा जबकि बर्नियर ने रचना स्वयं लिखी है।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 3.
बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
बर्नियर ने मुगल काल के नगरों का वर्णन किया है। उसके अनुसार भारत की जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग मनपात यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। मुगलकालीन नगरों को बर्नियर शिविर नगर’ कहता था अर्थात् ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर करते थे। ये ‘शिविर नगर’ तभी बनते थे जब राजकीय दरबार का आगमन होता था। राजकीय कारवाँ के निकल जाने के बाद इन शिविर नगरों का आविर्भाव समाप्त हो जाता था। यह सामाजिक और आर्थिक रूप से राजकीय प्रश्रय पर निर्भर करते थे।

बर्नियर के अनुसार उस काल में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे। ये नगर उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि श्रेणियों में विभाजित थे। वास्तव में इनका अस्तित्व समृद्ध व्यापारिक समुदायों तथा व्यावसायिक वर्गों के अस्तित्व का परिचायक था। . इस काल में नगरों की एक विशेषता और भी उभरकर सामने आई। घ्यापारी वर्ग मजबूत सामुदायिक एवं बंधुत्व के संबंधों से जुड़े हुए थे।

वे व्यावसायिक और जातिगत संस्थाओं के माध्यम से संगठित थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा. जाता था और उनके मुखिया को सेठ। अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों के सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय के मुखिया या सेठ द्वारा होता था। शहर के अन्य समुदायों के व्यावसायिक वर्ग में चिकित्सक (हकीम-वैद्य), अध्यापक (मुल्ला-पंडित), अधिवक्ता (वकील) चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि सम्मलित थे। ये राजकीय आश्रय अथवा अन्य के संरक्षण में रहते थे।

प्रश्न 4.
इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के बारे में कई साक्ष्य दिए गए हैं। उसके अनुसार भारत में दास बाजार में उसी तरह बिकते हैं जैसी कि अन्य दैनिक प्रयोग की वस्तुएँ। लोग इन दास-दासियों को घरेलू कार्यों तथा उपहार इत्यादि के लिए खरीदते हैं। वह जब स्वयं सिन्ध पहुँचा तो उसने सुल्तान मुहम्मद-बिन-तुगलक को भेंट देने के लिए दास खरीदे। उसने मुल्तान पहुँचकर, वहाँ के गवर्नर को किशमिश व बादाम के साथ एक दास और कुछ घोड़े भेंट किए। सुल्तान मुहम्मद तुगलक ने नसीरुद्दीन नामक एक धर्मोपदेशक को उसके ज्ञान व प्रवचन से प्रभावित होकर एक लाख टके तथा दो सौ दास दिए।

इब्न बतूता के अनुसार, पुरुष दास का प्रयोग घरेलू कार्यों; जैसे बाग-बगीचों की देखभाल, पशुओं की देखरेख, महिलाओं व पुरुषों को पालकी या डोली में एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाने के लिए होता था। दासियाँ शाही महल, अमीरों के आवास पर घरेलू कार्य करने व संगीत गायन के लिए खरीदी जाती थीं। वह बताता है कि शासक की बहन की शादी में इन दासियों ने बहुत उच्चकोटि के कार्यक्रम प्रस्तुत किए थे। सुल्तान अपने अमीरों व दरबारियों पर नियंत्रण रखने के लिए भी दासियों का प्रयोग करता था।

प्रश्न 5.
सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
उत्तर:
बर्नियर ने अपने वृत्तांत में सती प्रथा के बारे में काफी विस्तार से लिखा है। उसने 12 वर्ष की आयु की एक लड़की के सती होने का मार्मिक वर्णन किया है। उसने सती होने या करने की विधि भी लिखी है। बर्नियर अपने वर्णन में सती के विभिन्न पक्षों का उल्लेख करते हुए जिस तरह लिखता है उससे स्पष्ट होता है कि कई तत्वों ने उसका ध्यान इस दिशा में खींचा। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

  • सती प्रथा यूरोप की प्रथाओं से अलग थी। किसी जीवित व्यक्ति को जलाने की प्रथा उसे अमानवीय लगी।
  • उसे भारत में अल्पवयस्क शादी आश्चर्यजनक लगी और अल्पावस्था में विधवा को सती करना और अधिक आश्चर्यजनक लगा।
  • उसे सती होने जा रही बच्ची की मनोदशा पर तरस आ रहा था।
  • उसे परिवार की बूढ़ी महिला व ब्राह्मणों का व्यवहार अजीब लगा। क्योंकि वे किसी जीवित व्यक्ति को जलाने को महसूस नहीं कर रहे थे, बल्कि प्रथा का पालन करने में व्यस्त थे।
  • विधवा के हाथ-पाँव बाँधना तथा फिर ढोल-नगाड़ों की आवाज में मरने वाले प्राणी की आवाज को दबाने से अधिक आश्चर्यजनक पहलू और क्या हो सकता था।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250 से 300 शब्दों में)

प्रश्न 6.
जाति व्यवस्था के संबंध में अल-बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
उत्तर:
अल-बिरूनी की भारतीय समाज के बारे में समझ उसी वैदिक ज्ञान पर आधारित थी जिसमें वर्गों की उत्पत्ति बताई गई है। इस समझ के अनुसार ब्राह्मण का इस समाज में सर्वोच्च स्थान था। उनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के सिर से हुई, उसके बाद क्षत्रियों का स्थान था जिनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के कंधों व हाथों से हुई। क्षत्रियों के बाद वैश्यों का स्थान था। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा की जंघाओं से हुई है। इस कड़ी में चौथा स्थान शूद्रों का है। इनकी उत्पत्ति ब्रह्मा के चरणों से हुई है। वह यह भी लिखता है कि तीसरे व चौथे वर्ण में कोई अधिक अंतर नहीं है।

अल-बिरूनी इस विभाजन को ब्राह्मण वर्ग द्वारा संचालित बताता है, परन्तु वह अपवित्रता की धारणा को स्वीकार नहीं कर पाता। वह लिखता है कि हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है वह पूर्णतया स्थायी नहीं होती बल्कि वह अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास करती है तथा अन्ततः सफल भी होती है। वह अपने मत के पक्ष में उदाहरण देकर स्पष्ट करता है कि हवा कितनी भी प्रदूषित क्यों न हो, सूर्य उसे स्वच्छ कर देता है। इसी तरह समुद्र के पानी में नमक की उपस्थिति भी उसे गंदा होने से बचाती है। उसके अनुसार यदि प्रकृति में अशुद्ध को शुद्ध करने का गुण नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन सम्भव नहीं होता।

इसी तरह जाति-व्यवस्था में अपवित्रता की व्याख्या प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। अल-बिरूनी भारतीय समाज की जाति प्रथा की तुलना फारस से करता है। वह यह भी स्पष्ट करता है कि भारत में वर्गों की उत्पत्ति का संबंध ब्रह्मा से माना जाता है लेकिन फारस में विभाजन का आधार कार्य है। वहाँ पहले वर्ग में शासक व घुड़सवार (अर्थात सैनिक), दूसरे वर्ग में भिक्षु, तीसरे में चिकित्सक, शिक्षक, पुरोहित थे, जबकि चौथे में कृषक व शिल्पकार थे। इन सभी में व्यवसायों में बदलाव से समाज में इनकी पहचान भी बदल जाती थी।

अल-बिरूनी बताता है कि भारतीय समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य व शूद्र के अतिरिक्त भी एक वर्ग था जिससे व्यवस्था से बाहर माना जाता था। उसे लोग अंत्यज कहते थे। यह वर्ग सामाजिक दृष्टि से व्यवस्था से बाहर अवश्य था, लेकिन आर्थिक तौर पर कृषि इत्यादि में अपनी सेवा निरंतर देता रहता था।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

प्रश्न 7.
क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन-शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
उत्तर:
इन बतूता ने भारत के विभिन्न शहरों में अपना काफी समय बिताया। उसने जो कुछ वहाँ देखा, उसका वर्णन कर दिया। उसने अपना वर्णन इतनी कुशलता से किया है कि पाठक को यह एहसास होता है जैसे वह उस स्थान पर हो। उसके वृत्तांत से तत्कालीन शहर की बसावट तथा जीवन-शैली की विस्तार से जानकारी मिल जाती है। इस बात की पुष्टि उसके द्वारा दिल्ली व दौलताबाद के वृत्तांत से हो जाती है। उदाहरण के लिए इस वृत्तांत को लिया जा सकता है। . दिल्ली-बतूता के अनुसार “देहली बड़े क्षेत्र में फैला घनी आबादी वाला शहर है………. शहर के चारों ओर बनी प्राचीर अतुलनीय है, दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है; और इसके भीतर रात्रि के पहरेदार तथा द्वारपालों के कक्ष हैं। प्राचीर के अन्दर खाद्य सामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र तथा घेरेबंदी में काम आने वाली मशीनों के संग्रह के लिए भंडार गृह बने हुए थे……….. प्राचीर के भीतरी भाग में घुड़सवार तथा पैदल सैनिक शहर की ओर से दूसरे छोर तक आते-जाते हैं।

प्राचीर में खिड़कियाँ बनी हुई हैं जो शहर की ओर खुलती हैं और इन्हीं खिड़कियों के माध्यम से प्रकाश अंदर आता है। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से बना है जबकि ऊपरी भाग ईंटों से। इस शहर में कुल 28 द्वार हैं जिन्हें दरवाजा कहा जाता है। इनमें सबसे विशाल बदायूँ दरवाजा है। मांडवी दरवाजे के अन्दर अनाज मण्डी है, गुल दरवाजे के बगल में फलों का एक बगीचा है…….देहली शहर में एक बेहतरीन कब्रगाह है जिसमें : बनी कब्रों के ऊपर गुंबद बनाई गई है और जिन कब्रों पर गुंबद नहीं हैं उनमें निश्चित रूप से मेहराब है। कब्रगाह में कंदाकार, चमेली

तथा जंगली गुलाब जैसे फूल उगाए जाते हैं और ये फूल सभी मौसमों में खिले रहते हैं।” दौलताबाद-दौलताबाद के बारे में बतूता बताता है कि यह दिल्ली से किसी तरह कम नहीं था और आकार में उसे चुनौती देता था। यहाँ पुरुष व महिला गायकों के लिए एक बाजार था जिसे ताराबंबाद कहते थे। यह सबसे बड़े एवं सुन्दर बाजारों में से एक था। यहाँ बहुत सी दुकानें थीं। दुकानों को कालीन से सजाया जाता था। बाजार के मध्य में एक विशाल गुंबद खड़ा था जिसमें कालीन बिछाए गए थे। प्रत्येक गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते थे।

गायिकाएँ एक के बाद एक झुण्डों में उनके समक्ष आकर सूर्यास्त का गीत गाती और नाचती थीं। इन बतूता के दोनों शहरों के वृत्तांत को जानने के बाद शहरी जन-जीवन की विस्तृत झांकी आँखों के सामने आती है जिससे स्पष्ट होता है कि शहर की बनावट कैसी थी। उसकी सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए थे। वहाँ बाजार में क्या मिलता था। शहरों में सांस्कृतिक गतिविधियाँ किस तरह चलती थीं। अतः स्पष्ट है कि इन बतूता का वृत्तांत समकालीन शहरी केंद्रों की जानकारी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 8.
चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित .. करने में सक्षम करता है?
उत्तर:
बर्नियर ने अपने वृत्तांत में भारतीय ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ लिखा है। वह इस बारे में स्पष्ट करता है कि भारत में ग्रामीण समाज पिछड़ा हुआ है। उसके अनुसार “हिंदुस्तान के साम्राज्य के विशाल ग्रामीण अंचलों में अधिकतर रेतीली या बंजर हैं। यहाँ की खेती अच्छी नहीं है और इन इलाकों में आबादी भी कम है। यहाँ तक कि कृषि योग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा श्रमिकों के अभाव में कृषि विहीन रह जाता है, गरीब लोग अपने लोभी स्वामियों की माँगों को पूरा करने में प्रायः असमर्थ रहते हैं। वे अत्यंत निरंकुशता से हताश हो गाँव छोड़कर चले जाते हैं।” बर्नियर का यह वृत्तांत एक पक्षीय है। इस बात को समझने के लिए इतिहासकार को उसके लेखन का उद्देश्य समझना होगा। जिसमें यह स्पष्ट है कि वह यूरोप में निजी स्वामित्व जारी रखना चाहता है। वह भारत के कृषक व ग्रामीण समाज की दुर्दशा के लिए भूमि स्वामित्व को जिम्मेदार ठहराता है। यह भारत में स्वामित्व निजी के स्थान पर शासकीय मानता है।

इतिहासकार उसके वृत्तांत को पढ़कर सामान्य रूप से यह निष्कर्ष निकाल सकता है कि भारतीय ग्राम पिछड़े हुए थे। ऐसा कार्ल मार्क्स व मॉन्टेस्क्यू ने भी कहा है। इसके लिए जरूरी है कि इतिहासकार अन्य तुलनात्मक स्रोतों का अध्ययन करें। वह बर्नियर की स्थिति तथा लेखन के उद्देश्य को भी समझे। इतिहासकार ग्रामीण समाज के अन्य पक्षों विशेषकर लोगों की जीवन शैली के बारे में भी जानने का प्रयास करे। इन बिंदुओं पर ध्यान रखकर 17वीं शताब्दी के गाँवों के बारे में इतिहासकार समझ बना सकता है।

इसी कदम पर आगे बढ़ते हुए इतिहासकार समकालीन ग्रामीण समाज को भी समझ सकता है। वह बर्नियर की तरह के स्रोतों का जब मूल्यांकन कर लेगा तथा अन्य स्रोतों का अध्ययन उसकी विषय-वस्तु में होगा तो निश्चित तौर पर समकालीन समाज को अच्छी तरह समझ सकता है। अतः बर्नियर का वृत्तांत इतिहास को समकालीन ग्रामीण समाज समझने का मार्ग तो देता है लेकिन उसके दोषों के प्रति भी उसे सचेत होना होगा।

यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ HBSE 12th Class History Notes

→ शास्त्ररूढ़-शास्त्रों से संबंधित

→ शरिया (शरियत)-इस्लामी कानून

→ कारवाँ-बड़ी सामूहिक यात्रा

→ श्रुतलेख-सुनकर लिखना

→ इतालवी-इटली का निवासी

→ ऑटोमन साम्राज्य-तुर्की का साम्राज्य

→ अमीर (मध्यकाल में) सामंत

→ डच हॉलैण्ड के निवासी

→ पुनः मुद्रित दोबारा प्रकाशन

→ हस्तलिपियाँ हाथ से लिखे गए ग्रन्थ

→ अवरोध-समस्या

→ पतंजलि की कृति–पतंजलि की रचना

→ अंत्यज-सामाजिक वर्ण व्यवस्था से बाहर के लोग

→ काज़ी-न्याय करने वाला इस्लाम धर्म का विशेषज्ञ

→ ताराबबाद-गायकों का बाजार

→ उलुक-अश्व वाली डाक सेवा

→ दावा-पैदल डाक सेवा

→ कालीकट-वर्तमान कोजीकोड (केरल)

→ द्वि-विपरीतता दोनों को एक-दूसरे के विपरीत

→ बेहतर-भूमि धारकों का वर्ग

→ बलाहार-भूमिहीन कृषक

→ टका-सल्तनत काल की मुद्रा

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 5 यात्रियों के नज़रिए : समाज के बारे में उनकी समझ

→ भारत में प्राचीन काल से विदेशी यात्री आते रहे हैं। ये यात्री व्यापार, रोजगार, तीर्थ यात्रा या धर्म प्रचार इत्यादि उद्देश्यों से आए। इन यात्रियों में से कुछ ने अपने वृत्तांत पुस्तक, व्यक्तिगत डायरी व संस्मरण के रूप में लिखे हैं। उनके यही लिखित साक्ष्य हमें भारतीय इतिहास के विभिन्न पक्षों को समझने का आधार देते हैं।

→ प्रस्तुत अध्याय में भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले उन यात्रियों का वर्णन है जिन्होंने मध्यकालीन समाज के बारे में विस्तृत वर्णन दिया है। इस बारे में भी सभी यात्रियों का वर्णन सम्भव नहीं है अतः केवल तीन यात्रियों पर अपना ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। ये यात्री ग्यारहवीं शताब्दी में मध्य-एशिया वर्तमान उज्बेकिस्तान से आने वाले अल-बिरूनी, चौदहवीं शताब्दी में मोरक्को (अफ्रीका) से आने वाले इब्न बतूता तथा सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर हैं। इन यात्रियों ने जिस तरह सामाजिक स्थिति का वर्णन किया है उससे कालक्रम के अनुरूप लगभग पूरे मध्यकाल की समझ बनती है। अरब लेखकों में सबसे महत्त्वपूर्ण व विस्तृत जानकारी देने वाला व्यक्ति अल-बिरूनी है जो महमूद क देने वाला व्यक्ति अल-बिरूनी है जो महमूद के साथ भारत आया, जिसने तत्कालीन भारत की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डाला।

→ अल-बिरूनी का वास्तविक नाम अबू रेहान था। उसका जन्म मध्य-एशिया में स्थित आधुनिक उज्बेकिस्तान के ख्वारिज्म (वर्तमान नाम खीवा) नामक स्थान पर 973 ई० में हुआ। ख्वारिज्म इस समय शिक्षा का अति महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। अल-बिरूनी को इसी स्थान पर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला। उसने यहाँ पर सीरियाई, हिब्रू, फारसी, अरबी व संस्कृत भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया। इसलिए वह इन भाषाओं में लिखित मौलिक ग्रन्थों को पढ़ पाया। वह यूनानी भाषा को नहीं समझता था लेकिन इस भाषा के सभी प्रमुख ग्रन्थ अनुवादित हो चुके थे। इसी कारण वह प्लेटो व अरस्तु के दर्शन व ज्ञान को अनुवादित रूप में पढ़ पाया। इस तरह वह अपने जीवन के प्रारंभिक दौर में ही विभिन्न भाषाओं के साहित्य से परिचित हो गया।

→1017 ई० में महमूद ने ख्वारिज्म पर आक्रमण किया तथा जीत हासिल की। विजय के बाद उसने यहाँ पर कुछ लोगों को बंदी बनाया। इनमें कुछ विद्वान तथा कवि भी थे। अल-बिरूनी भी इन्हीं बंदी लोगों में एक था तथा वह इसी अवस्था में गजनी लाया गया। गजनी में रहते हुए महमूद उसकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। फलतः न केवल महमूद ने उसे मुक्त किया वरन् उसे दरबार में सम्मानजनक पद भी दिया। बाद में अल-बिरूनी उसका राजकवि भी बना। गजनी प्रवास के दौरान उसने खगोल-विज्ञान, गणित व चिकित्सा से संबंधित पुस्तकें पढ़ीं। वह महमूद के साथ भारत में कई बार आया तथा उसने इस क्षेत्र में ब्राह्मणों, पुरोहितों व विद्वानों के साथ काफी समय बिताया। उनके साथ रहने के कारण वह संस्कृत भाषा में और प्रवीण हो गया। अब वह न केवल इसे समझ सकता था बल्कि अनुवाद करने में भी सक्षम हो गया। उसने सहारा रेगिस्तान से लेकर वोल्गा नदी तक की यात्रा के आधार पर लगभग 20 पुस्तकों की रचना की। इन रचनाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण ‘किताब-उल-हिन्द’ है जिसे ‘अल बरूनीज इण्डिया’ के नाम से जाना जाता है। गजनी में ही 1048 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

→ इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का यात्री था। उसने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण 1325 से 1354 ई० तक किया। अफ्रीका, एशिया व यूरोप के कुछ हिस्से की यात्रा करने के कारण इसे, एक प्रारंभिक विश्व यात्री की संज्ञा दी जाती है। इब्न बतूता का जन्म अफ्रीका महाद्वीप के मोरक्को नामक देश के तैंजियर नामक स्थान पर 24 फरवरी, 1304 ई० को हुआ। बतूता का परिवार इस क्षेत्र में सबसे सम्मानित, शिक्षित व इस्लामी कानूनों का विशेषज्ञ माना जाता था। बतूता कम आयु में ही उच्चकोटि का धर्मशास्त्री बन गया।

→ इन बतूता साहित्यिक व शास्त्रीय ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं था। उसके मन में यात्राओं के माध्यम से प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त करने की लालसा उत्पन्न हुई। इसी की पूर्ति हेतु वह 22 वर्ष की आयु में घर से निकला तथा विश्व के विभिन्न स्थानों तथा दूर-दराज क्षेत्रों की यात्रा की। 1325-1332 ई० तक उसने मक्का व मदीना की यात्रा की तथा इसके बाद सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के देशों की यात्रा की। उसने अपनी यात्राएँ जल एवं थल दोनों मार्गों से की। इन देशों की यात्रा के उपरांत वह मध्य-एशिया के रास्ते से भारत की ओर बढ़ा तथा 1333 ई० में सिन्ध पहुँचने में सफल रहा। बतूता 1334 ई० में दिल्ली पहुँचा तथा सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक से भेंट की। ये दोनों एक दूसरे की विद्वता से प्रभावित हुए। सुल्तान ने बतूता को दिल्ली का काजी (न्यायाधीश) नियुक्त कर उसे शाही सेवा में ले लिया। उसने 8 वर्षों तक इस पद पर कार्य किया। इसी दौरान सुल्तान के साथ उसका मतभेद हो गया जिसके कारण उसे पद से हटाकर जेल में डाल दिया गया।

→ परन्तु यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रही तथा सुल्तान ने एक बार फिर उस पर विश्वास कर शाही सेवा में ले लिया। इस बार उसे चीन में सुल्तान की ओर से दूत बन कर जाने का आदेश दिया। इस समय चीन में मंगोलों का राज्य था। इस तरह 1342 ई० में इन बतूता ने नई नियुक्ति स्वीकार कर चीन की ओर प्रस्थान किया। . वह सुमात्रा होते हुए चीनी बन्दरगाह जायतुन (वर्तमान नाम क्वानझू) उतरा। उसने यहाँ से चीन के विभिन्न स्थानों की यात्रा की तथा मंगोल शासक को बीजिंग में महम्मद तगलक का पत्र सौंपा। शासक ने उसे दूत के रूप में स्वीकार किया, लेकिन बतता स्वयं वहाँ लम्बे समय तक नहीं रुक सका।

→ 1347 ई० में वहाँ से वापिस अपने देश मोरक्को के लिए चल दिया। वह 8 नवम्बर, 1349 ई० को अपने पैतृक स्थान तेंजियर मोरक्को के शासक ने उससे अपने अनुभव तथा विभिन्न स्थानों की जानकारी देने के लिए कहा। उसने अपनी स्मृति के आधार पर यह सारी जानकारी शासक को उपलब्ध कराई जिसे संकलित कर रिला या रला या सफरनामा नामक पुस्तक के रूप में सुरक्षित किया गया। इब्न बतूता की अपने पैतृक स्थान तैंजियर में 1377 ई० में मृत्यु हो गई।

→ बर्नियर एक राजनीतिज्ञ, दार्शनिक तथा इतिहासकार था। उसने बारह वर्ष (1656-68) का समय भारत में लगाया। वह शाहजहाँ के बड़े बेटे दारा शिकोह का चिकित्सक था। बर्नियर का जन्म फ्रांस के अजों नामक प्रान्त के जुं नामक स्थान पर 1620 ई० में हुआ। उसका परिवार कृषि का कार्य करता था। उसने कृषि के साथ-साथ पढ़ाई की तथा पेशे से चिकित्सक बन गया। इसी व्यवसाय को करते हुए उसने फिलिस्तीन, सीरिया व मिस्र की यात्रा की। वह 1656 ई० में सूरत पहुँचा तथा इसी वर्ष दारा शिकोह ने उसे अपना चिकित्सक बना दिया। उसने शाहजहाँ के शासनकाल में उत्तराधिकार के युद्ध की कुछ घटनाएँ देखी जिसका उसने विस्तार से वर्णन किया है। दारा की मृत्यु के बाद उसे आर्मीनियाई अमीर (सामन्त) डानिश मंडखान ने संरक्षण दिया। उसने भारत में सूरत, आगरा, लाहौर, कश्मीर, कासिम बाजार, मसुलीपट्टम व गोलकुण्डा इत्यादि स्थानों का भ्रमण किया। वह 1668 ई० में भारत से फ्रांस लौट गया। 1688 ई० में उसके पैतृक स्थान पर ही उसकी मृत्यु हो गई।

→ फ्रांस्वा बर्नियर ने मुगल काल में भारत की यात्रा की। उसने जो कुछ देखा व समझा उसे ‘ट्रैवल्स इन द मुगल एम्पायर’ नामक रचना में लिखता गया। उसकी यह रचना फ्रांस में 1670-71 में प्रकाशित हुई तथा इसे फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित किया गया। प्रारंभिक पाँच वर्षों 1670-75 के बीच यह रचना अंग्रेजी, डच, जर्मन तथा इतालवी में अनुवादित हो गई तथा आठ बार फ्रांसीसी में इसका पुनर्मुद्रण हुआ। इन तीनों ही यात्रियों ने भारत के बारे में वृत्तांत दिया है। यह वृत्तांत काफी सूचनाप्रद तथा रोचक है।

क्रम संख्याकालयात्रीदेश/क्षेत्र
1.711-12मोहम्मद-बिन-कासिमअरब क्षेत्र
2.973-1048अल-बिरूनीउज्बेकिस्तान
3.1254-1323मार्को पोलोइटली
4.1304-1377इब्न बतूतामोरक्को (अफ्रीका)
5.1413-82अंब्दुर-रज़्ज़ाकसमरकन्द
6.1498वास्कोडिगामापुर्तगाल
7.1518दूरते बारबोसापुर्तगाल
8.1580-84फादर मान्सरेतस्पेन
9.1582-91राल्फ फिचइंग्लैड
10.1615-19सर टॉमस रोइंग्लैंड
111617-20एडवर्ड टेरीइंग्लैंड
121626-31महमूदवली बलखीबल्ख
131620-27फ्रेन्को पेलसर्टइंग्लैंड
141600-1667पीटर मुंडीइंग्लैंड
151605-1689तैवर्नियरफ्रांस
161620-1688फ्रांस्वा बर्नियरफ्रांस
171653-1708मनूकीइटली

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

HBSE 12th Class History विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
निःसंदेह नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचार उपनिषदों के दार्शनिकों से भिन्न थे। उपनिषदों में आत्मिक ज्ञान पर बल दिया गया था, जिसका अर्थ था आत्मा और परमात्मा के संबंधों को जानना। परमात्मा ब्रह्म है, जिससे संपूर्ण जगत पैदा हुआ है। जीवात्मा अमर है और ब्रह्म का ही अंश है। जीवात्मा ब्रह्म में लीन होकर मुक्ति प्राप्त करती है। इसके लिए सद्कर्मों और आत्मिक ज्ञान की जरूरत है। उपनिषदों के इस ज्ञान से नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचार भिन्न थे जो निम्नलिखित तर्कों से स्पष्ट हैं

  • नियतिवादियों का मानना था कि प्राणी नियति यानी भाग्य के अधीन है। मनुष्य उसी के अनुरूप सुख-दुख भोगता है। सद्कर्मों अथवा आत्मज्ञान से नियति नहीं बदलती।
  • भौतिकवादियों का मानना था कि मानव का शरीर पृथ्वी, जल, अग्नि तथा वायु से बना है। आत्मा और परमात्मा कोरी कल्पना है। मृत्यु के पश्चात् शरीर में कुछ शेष नहीं बचता। अतः भौतिकवादियों के विचार भी आत्मा-परमात्मा या अन्य विचार भी उपनिषदों के दार्शनिकों से बिल्कुल भिन्न थे।

प्रश्न 2.
जैन धर्म की महत्त्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
जैन धर्म की मुख्य शिक्षाएँ इस प्रकार हैं
1. अहिंसा-जैन धर्म की शिक्षाओं का केंद्र-बिंदु अहिंसा का सिद्धांत है। जैन दर्शन के अनुसार संपूर्ण विश्व प्राणवान है अर्थात् पेड़-पौधे, मनुष्य, पशु-पक्षियों सहित पत्थर और पहाड़ों में भी जीवन है। अतः किसी भी प्राणी या निर्जीव वस्तु को क्षति न पहुँचाई जाए। यही अहिंसा है। इसे मन, वचन और कर्म तीनों रूपों में पालन करने पर जोर दिया गया।

2. तीन आदर्श वाक्य-जैन शिक्षाओं में तीन आदर्श वाक्य हैं सत्य विश्वास, सत्य ज्ञान तथा सत्य चरित्र। इन तीनों वाक्यों को त्रिरत्न कहा गया है।

3. पाँच महाव्रत-जैन शिक्षाओं में मनुष्य को पापों से बचाने के लिए पाँच महाव्रतों के पालन पर जोर दिया गया है। ये ब्रत हैं। अहिंसा का पालन, चोरी न करना, झूठ न बोलना, धन संग्रह न करना तथा ब्रह्मचर्य का पालन करना।

4. कठोर तपस्या-जैन धर्म में मोक्ष प्राप्ति के लिए और पिछले जन्मों के बरे कर्मों के फल को समाप्त करने के लिए कठोर तपस्या पर बल दिया गया है।

प्रश्न 3.
साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
भोपाल की दो शासिकाओं शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने साँची के स्तूप को बनाए रखने में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने इसके संरक्षण के लिए धन भी दिया और इसके पुरावशेषों को भी संरक्षित किया। 1818 में इस स्तूप की खोज के बाद बहुत-से यूरोपियों का इसके पुरावशेषों के प्रति विशेष आकर्षण था। फ्रांसीसी और अंग्रेज़ अलंकृत पत्थरों को ले जाकर अपने-अपने देश के संग्रहालयों में प्रदर्शित करना चाहते थे। फ्रांसीसी विशेषतया पूर्वी तोरणद्वार, जो सबसे अच्छी स्थिति में था, को पेरिस ले जाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने शाहजहाँ बेगम से इजाजत माँगी। ऐसा प्रयत्न अंग्रेज़ों ने भी किया। बेगम ने सूझ-बूझ से काम लिया। वह इस मूल कृति को भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही संरक्षित रखना चाहती थी। सौभाग्यवश कुछ पुरातत्ववेत्ताओं ने भी इसका समर्थन कर दिया। इससे यह स्तूप अपनी जगह सुरक्षित रह पाया। भोपाल की बेगमों ने स्तूप के रख-रखाव के लिए धन भी उपलब्ध करवाया। सुल्तानजहाँ बेगम ने स्तूप स्थल के पास एक संग्रहालय एवं अतिथिशाला भी बनवाई।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

प्रश्न 4.
निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और उत्तर दीजिए
महाराज हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता-पिता के साथ
मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?
(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं?
(ङ) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर:
(क) धनवती ने तत्कालीन कुषाण शासक हुविष्क के शासनकाल के तैंतीसवें वर्ष के गर्म मौसम के प्रथम महीने के आठवें दिन का उल्लेख करके अपने अभिलेख की तिथि को निश्चित किया।

(ख) उन्होंने बौद्ध धर्म में अपनी आस्था प्रकट करने और स्वयं को सच्ची भिक्खुनी सिद्ध करने के लिए मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति की स्थापना की।

(ग) वह अभिलेख में अपनी मौसी (माता की बहन) बुद्धमिता तथा उसके गुरु बल और अपने माता-पिता का नाम लेती है।

(घ) धनवती त्रिपिटक (सुत्तपिटक, विनयपिटक तथा अभिधम्म पिटक) बौद्ध ग्रंथों को जानती थी।

(ङ) उन्होंने यह पाठ बल की शिष्या बुद्धमिता से सीखे थे। प्रश्न 5. आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर:
बौद्ध धर्म की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करने के लिए महात्मा बुद्ध ने बौद्ध संघ की स्थापना की। बौद्ध संघ महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित एक धार्मिक व्यवस्था भी थी। अतः इसमें स्त्री-पुरुष निम्नलिखित कारणों से शामिल हुए

(1) बौद्ध संघ की व्यवस्था समानता पर आधारित थी। इसमें किसी वर्ण, जाति या वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता था। संघ का संगठन गणतंत्रात्मक प्रणाली पर आधारित था।

(2) शुरू में संघ में स्त्रियों को शामिल नहीं किया गया था परंतु बाद में स्त्रियों को भी संघ की सदस्या बनाया गया। वे भी बौद्ध धर्म की ज्ञाता बनीं।

(3) बौद्ध धर्म के शिक्षक-शिक्षिकाएँ बनने के लिए स्त्री-पुरुष संघ के सदस्य बनते थे। वे बौद्ध धर्म ग्रंथों का गहन अध्ययन करते थे ताकि वे संघ की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार कर सकें।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है ?
उत्तर:
साहित्यिक ग्रंथों के व्यापक अध्ययन से प्राचीन मूर्तिकला के अर्थ को समझा जा सकता है। यह बात साँची स्तूप की मूर्तिकला के संदर्भ में भी लागू होती है। इसलिए इतिहासकार साँची की मूर्ति गाथाओं को समझने के लिए बौद्ध साहित्यिक परंपरा के ग्रंथों का गहन अध्ययन करते हैं। बहुत बार तो साहित्यिक गाथाएँ ही पत्थर में मूर्तिकार द्वारा उभारी गई होती हैं। साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य काफी हद तक सहायक है; जैसे कि नीचे दिए गए उदाहरणों से स्पष्ट होता है

1. वेसान्तर जातक की कथा साँची के उत्तरी तोरणद्वार के एक हिस्से में एक मूर्तिकला अंश को देखने से लगता है कि उसमें एक ग्रामीण दृश्य चित्रित किया गया है। परंतु यह दृश्य वेसान्तर जातक की कथा से है, जिसमें एक राजकुमार अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंपकर अपनी पत्नी और बच्चों के साथ वनों में रहने के लिए जा रहा है।
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अतः स्पष्ट है कि जिस व्यक्ति को जातक कथाओं का ज्ञान नहीं होगा वह मूर्तिकला के इस अंश को नहीं जान पाएगा।

2. प्रतीकों की व्याख्या-मूर्तिकला में प्रतीकों को समझना और भी कठिन होता है। इन्हें तो बौद्ध परंपरा के ग्रंथों को पढ़े बिना समझा ही नहीं जा सकता। साँची में कुछ एक प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बौद्ध वृक्ष के नीचे ज्ञान-प्राप्ति वाली घटना को प्रतीकों के रूप में दर्शाने का प्रयत्न किया है। बहुत-से प्रतीकों में वृक्ष दिखाया गया है, लेकिन कलाकार का तात्पर्य संभवतया इनमें एक पेड़ दिखाना नहीं रहा, बल्कि पेड़ बुद्ध के जीवन की एक निर्णायक घटना का प्रतीक था।

इसी तरह साँची की एक और मूर्ति में एक वृक्ष के चारों ओर बौद्ध भक्तों को दिखाया गया है। परंतु बीच में जिसकी वे पूजा कर रहे हैं वहाँ महात्मा बुद्ध का मानव रूप में चित्र नहीं है, बल्कि एक खाली स्थान दिखाया गया है यही रिक्त स्थान बुद्ध की ध्यान की दशा का प्रतीक बन गया।

अतः स्पष्ट है कि मूर्तिकला में प्रतीकों अथवा चिह्नों को समझने के लिए बौद्ध ग्रंथों का अध्ययन होना चाहिए। यहाँ यह भी ध्यान रहे कि केवल बौद्ध ग्रंथों के अध्ययन से ही साँची की सभी मूर्तियों को नहीं समझा जा सकता। इसके लिए तत्कालीन अन्य धार्मिक परंपराओं और स्थानीय परंपराओं का ज्ञान होना भी जरूरी है, क्योंकि इसमें लोक परंपराओं का समावेश भी हुआ है। उत्कीर्णित सर्प, बहुत-से जानवरों की मूर्तियाँ तथा शालभंजिका की मूर्तियाँ इत्यादि इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 7.
चित्र I और II में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नज़र आता है? वास्तुकला, पेड़-पौधे और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम-धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन-से ग्रामीण और कौन-से शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर:
साँची के स्तूप में मूर्तिकला के उल्लेखनीय नमूने देखने को मिलते हैं। इनमें जातक कथाओं को उकेरा गया है, साथ ही बौद्ध परंपरा के प्रतीकों को भी उभारा गया है, यहाँ तक कि अन्य स्थानीय परंपराओं को शामिल किया गया है।
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चित्र I और II में भी बौद्ध परंपरा से जुड़ी धारणाओं को उकेरा गया है।
चित्र को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें अनेक पेड़-पौधे और जानवरों को दिखाया गया है। दृश्य ग्रामीण परिवेश का लगता है। लेकिन बौद्ध धर्म की दया, प्रेम और अहिंसा की धारणाएँ इसमें स्पष्ट झलकती हैं। चित्र के ऊपरी भाग में जानवर निश्चिंत भाव से सुरक्षित दिखाई दे रहे हैं, जबकि निचले भाग में कई जानवरों के कटे हुए सिर और धनुष-बाण लिए हुए मनुष्यों के चित्र हैं, जो बलि प्रथा और शिकारी-जीवन, हिंसा को प्रकट करते हैं।

चित्र-II बिल्कुल अलग परिदृश्य को व्यक्त कर रहा है। संभवतः यह कोई बौद्ध संघ का भवन है जिसमें बौद्ध भिक्षु ध्यान और प्रवचन जैसे कार्यों में व्यस्त हैं। चित्र में उकेरा गया भव्य सभाकक्ष और उसके स्तंभों में भी बौद्ध धर्म के प्रतीक दिखाई दे रहे हैं। स्तंभों के ऊपर हाथी और दूसरे जानवर बने हैं। ध्यान रहे इनसे जुड़े साहित्य का यदि हम अध्ययन करें तो संभवतः इन चित्रों का और भी गहन अर्थ निकालने में सक्षम हो पाएँगे।

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प्रश्न 8.
वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
लगभग 600 ईसा पूर्व से 600 ई० के मध्य वैष्णववाद और शैववाद का विकास हुआ। इसे हिंदू धर्म या पौराणिक हिंदू धर्म भी कहा जाता है। इन दोनों नवीन विचारधाराओं की अभिव्यक्ति मूर्तिकला और वास्तुकला के माध्यम से भी हुई। इस संदर्भ में मूर्तिकला और वास्तुकला के विकास का परिचय निम्नलिखित है

1. मूर्तिकला–बौद्ध धर्म की महायान शाखा की भाँति पौराणिक हिंदू धर्म में भी मूर्ति-पूजा का प्रचलन शुरू हुआ। भगवान् विष्णु व उनके अवतारों को मूर्तियों के रूप में दिखाया गया। अन्य देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ बनाई गईं। प्रायः भगवान् शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में प्रस्तुत किया गया। लेकिन कई बार उन्हें मानव रूप में भी दिखाया गया। विष्णु की प्रसिद्ध प्रति देवगढ़ दशावतार मंदिर में मिली है। इसमें उन्हें शेषनाग की शय्या पर लेटे हुए दिखाया गया है। वे कुण्डल, मुकुट व माला आदि पहने हैं। इसके एक ओर शिव तथा दूसरी ओर इन्द्र की प्रतिमाएँ हैं। नाभि से निकले कमल पर ब्रह्मा विराजमान हैं। लक्ष्मी विष्णु के चरण दबा रही हैं। वराह पृथ्वी को प्रलय से बचाने के लिए दाँतों पर उठाए हुए हैं। पृथ्वी को भी नारी रूप में दिखाया गया है। गुप्तकालीन शिव मंदिरों में एक-मुखी और चतुर्मुखी शिवलिंग मिले हैं।

2. वास्तुकला- वैष्णववाद और शैववाद के अंतर्गत मंदिर वास्तुकला का विकास हुआ। संक्षेप में, शुरुआती मंदिरों के स्थापत्य (वास्तुकला) की कुछ विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(i) मंदिरों का प्रारंभ गर्भ-गृह (देव मूर्ति का स्थान) के साथ हुआ। ये चौकोर कमरे थे। इनमें एक दरवाजा होता था, जिससे उपासक पूजा के लिए भीतर जाते थे। गर्भ-गृह के द्वार अलंकृत थे।

(ii) धीरे-धीरे गर्भ-गृह के ऊपर एक ऊँचा ढांचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था।
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(iii) शुरुआती मंदिर ईंटों से बनाए गए साधारण भवन हैं, लेकिन गुप्तकाल तक आते-आते स्मारकीय शैली का विचार उत्पन्न हो चुका था, जो आगामी शताब्दियों में भव्य पाषाण मंदिरों के रूप में अभिव्यक्त हुआ। इनमें ऊँची दीवारें, तोरण, तोरणद्वार और विशाल सभास्थल बनाए गए, यहाँ तक कि जल आपूर्ति का प्रबंध भी ‘किया गया।

(iv) पूरी एक चट्टान को तराशकर मूर्तियों से अलंकृत पूजा-स्थल बनाने की शैली भी विकसित हुई। उदयगिरि का विष्णु मंदिर इसी शैली से बनाया गया। इस संदर्भ में महाबलीपुरम् (महामल्लपुरम्) के मंदिर भी विशेष उल्लेखनीय हैं।

प्रश्न 9.
स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
स्तूप बौद्ध धर्म के अनुयायियों के पूजनीय स्थल हैं। यह क्यों और कैसे बनाए गए, इसका वर्णन निम्नलिखित प्रकार से है

1. स्तूप क्यों बनाए गए?-स्तूप का शाब्दिक अर्थ टीला है। ऐसे टीले, जिनमें महात्मा बुद्ध के अवशेषों (जैसे उनकी अस्थियाँ, दाँत, नाखून इत्यादि) या उनके द्वारा प्रयोग हुए सामान को गाड़ दिया गया था, बौद्ध स्तूप कहलाए। ये बौद्धों के लिए पवित्र स्थल थे।

यह संभव है कि स्तूप बनाने की परंपरा बौद्धों से पहले रही हो, फिर भी यह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। इसका कारण वे पवित्र अवशेष थे जो स्तूपों में संजोकर रखे गए थे। इन्हीं के कारण वे पूजनीय स्थल बन गए। महात्मा बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य आनंद ने बार-बार आग्रह करके बुद्ध से उनके अवशेषों को संजोकर रखने की अनुमति ले ली थी। बाद में सम्राट अशोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से करके उन पर मुख्य शहर में स्तूप बनाने का आदेश दिया। दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक सारनाथ, साँची, भरहुत, बौद्ध गया इत्यादि स्थानों पर बड़े-बड़े स्तूप बनाए जा चुके थे। अशोक व कई अन्य शासकों के अतिरिक्त धनी व्यापारियों, शिल्पकारों, श्रेणियों व बौद्ध भिक्षुओं व भिक्षुणियों ने भी स्तूप बनाने के लिए धन दिया।

2. स्तूप कैसे बनाए गए?-प्रारंभिक स्तूप साधारण थे, लेकिन समय बीतने के साथ-साथ इनकी संरचना जटिल होती गई। इनकी शुरुआत कटोरेनुमा मिट्टी के टीले से हुई। बाद में इस टीले को अंड (Anda) के नाम से पुकारा जाने लगा। अंड के ऊपर बने छज्जे जैसा ढांचा ईश्वर निवास का प्रतीक था। इसे हर्मिका कहा गया। इसी में बौद्ध अथवा अन्य बोधिसत्वों के अवशेष रखे जाते थे। हर्मिका के बीच में एक लकड़ी का मस्तूल लगा होता था। इस पर एक छतरी बनी होती थी। अंड (टीले) के चारों ओर एक वेदिका होती थी। यह पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से पृथक् रखने का प्रतीक थी।

परियोजना कार्य (कोई एक)

(क) इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस-पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ, तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती-जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 4 विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास

(ख) इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तस्वीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तस्वीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर:
परियोजना (क) के लिए संकेत :

  • पौराणिक हिंदू धर्म (वैष्णववाद, शैववाद) की परंपरा वर्तमान में हिंदू धर्म के नाम से सर्वाधिक प्रचलन में है-इसमें मूर्ति पूजा है। इन मूर्तियों की तुलना आप अध्याय में वर्णित मूर्तियों से कर सकते हैं। मंदिरों की वास्तुकला की तुलना कर सकते हैं।
  • जैन मंदिर भी प्रायः मिल जाते हैं। इनकी मूर्तियों और वास्तुकला की तुलना की जा सकती है।
  • कुरुक्षेत्र में प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष भी हैं।

परियोजना (ख) के लिए संकेत :
इसके लिए विद्यार्थी स्तूप, साँची व अमरावती से प्राप्त मूर्तियों के चित्रों तथा वैष्णववाद व शैववाद से जुड़े विभिन्न देवी-देवताओं के चित्र ले सकते हैं। जैन धर्म से संबंधित चित्रों का उपयोग भी कर सकते हैं। इस संदर्भ में इंटरनेट से भी चित्र ‘डाऊनलोड’ करके उपयोग में लाए जा सकते हैं।

विचारक, विश्वास और इमारतें : सांस्कृतिक विकास HBSE 12th Class History Notes

→ श्रमण-शिक्षक और विचारक जो स्थान-स्थान पर घूमकर अपनी विचारधाराओं से लोगों को अवगत करवाते थे तथा तर्क-वितर्क करते थे।

→ कुटागारशालाएँ–’नुकीली छत वाली झोंपड़ी’, जहाँ घुमक्कड़ श्रमण आकर ठहरते थे और विभिन्न विषयों पर वाद-विवाद करते थे।

→ स्तूप-ढेर या टीला जहाँ महात्मा बुद्ध या अन्य किसी पवित्र भिक्षु के अवशेष (दाँत, अस्थियाँ, नाखून) आदि रखे जाते थे।

→ संतचरित्र-किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी जिसमें उस संत की उपलब्धियों का गुणगान होता है।

→ चैत्य ऐसे टीले जहाँ शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष सुरक्षित रख दिए जाते थे।

→ थेरवाद-महायान परंपरा के लोग दूसरी बौद्ध परंपरा के लोगों को हीनयान के अनुयायी कहते थे, लेकिन ये लोग (हीनयान के अनुयायी) अपने आपको थेरवादी कहते थे। इसका मतलब है वे लोग जो पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (जिन्हें थेर कहते थे) के बनाए रास्ते पर चलने वाले हैं।

→ तीर्थंकर-जैन परंपरा के अनुसार ऐसे महापुरुष जो लोगों को संसार रूपी सागर से पार उतार सकें।

→ निर्ग्रन्थ-बिना ग्रन्थि के अर्थात् बंधन मुक्त। जैन परंपरा में जैन मुनि और संन्यासी को निर्ग्रन्थ कहा गया।

→ वैष्णव-विष्णु की उपासना करने वाले।

→ शैव-शिव के उपासक।

→ महाभिनिष्क्रिमण-महात्मा बुद्ध द्वारा गृह त्याग की घटना को बौद्ध मत में महाभिनिष्क्रिमण कहा गया।

→ महापरिनिर्वाण-महात्मा बुद्ध के देहावसान को बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण कहा गया।

→ उपसंपदा-बौद्ध संघ में प्रवेश करना।

→ बोधिसत्त बौद्ध धर्म के अनुयायी जो अपने सत्त कर्मों से पुण्य कमाते थे।

समकालीन बौद्ध ग्रंथों से पता चलता है कि छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में 60 से भी अधिक नए संप्रदाय उभरकर आए। इन संप्रदायों के संन्यासी घूम-घूमकर अपने विचारों का जन-समुदाय में प्रचार करते थे और साथ ही विरोधी मत वालों के साथ वाद-विवाद भी करते थे। उनके विचार मौखिक व लिखित परंपराओं में संगृहीत हुए। कलाकारों ने उन्हें अपनी कला-कृतियों में अभिव्यक्ति दी। इन संन्यासी मनीषियों में महावीर और महात्मा बुद्ध सबसे विख्यात हुए।

→ जैन और बौद्ध धर्मों का उदय उत्तर वैदिक काल (लगभग 1000 ई०पू० से 600 ई० तक) के दौरान विकसित हुई परिस्थितियों से हुआ। इस अवधि में आर्थिक स्तर पर कृषि की नई व्यवस्था विकसित हुई, सामाजिक विषमता में वृद्धि हुई। साथ ही धर्म में कई तरह की बुराइयाँ व दिखावा बढ़ चुका था। इस दौरान नए राजनीतिक परिवर्तन भी हुए। विशेषतः राजतन्त्र प्रणाली का विस्तार हुआ। सामूहिक तौर पर यही वह पृष्ठभूमि है, जिसने पूर्वोत्तर भारत में नए धार्मिक संप्रदायों को जन्म दिया।

→ उत्तर वैदिक काल के अंतिम दौर में बलि व यज्ञादि कर्मकांडों के खिलाफ जबरदस्त प्रतिक्रिया शुरू हुई। विशेष तौर पर धर्म व दर्शन पर नए प्रश्न उठ रहे थे। उपनिषदों में नए सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया। इन सिद्धांतों में कर्म, पुनर्जन्म और मोक्ष थे। लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना तथा पुनर्जन्म के बारे में जानने के लिए उत्सुक थे। परंतु उपनिषदों का गूढ़ ज्ञान सामान्य जनता की समझ से बाहर था। इस वैदिक परंपरा को नकारने वाले दार्शनिक सत्य के स्वरूप पर बहस कर रहे थे। सत्य, अहिंसा, तपस्या, पुनर्जन्म, कर्मफल तथा आत्मा-परमात्मा इत्यादि विषयों पर वाद-विवाद और चर्चाएँ कर रहे थे। वे अपनी-अपनी व्याख्याएँ प्रस्तुत कर रहे थे। इनमें से यदि कोई अपने प्रतिद्वन्द्वी को अपना ज्ञान समझाने में सफल हो जाता था तो वह प्रतिद्वन्द्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था। इनमें से कई मनीषियों ने ब्राह्मणवादी समझ से अपनी अलग समझ प्रस्तुत की।

→ ‘जैन’ शब्द संस्कृत के ‘जिन्’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘विजेता’ अर्थात् वह व्यक्ति जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया हो। जैन परंपरा के अनुसार महावीर स्वामी से पहले 23 तीर्थंकर (आचाय) हो चुके थे और महावीर स्वामी 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे। तीर्थंकर का शाब्दिक अर्थ है ऐसा महापुरुष जो लोगों (स्त्री व पुरुष दोनों) को संसार रूपी सागर से पार उतार सके।
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→ जैन विचारधारा को व्यापक बनाने का श्रेय महात्मा महावीर स्वामी का है। इसलिए उन्हें इस धर्म का वास्तविक संस्थापक .. भी कहा जाता है। उनका मूल नाम वर्धमान था एवं जन्म वैशाली के पास कुड़ीग्राम में 540 ई० पू० में हुआ। उनके पिता सिद्धार्थ जातृक क्षत्रियगण के मुखिया थे तथा माता त्रिशला लिच्छवी शासक चेटक की बहन थी। महावीर स्वामी की पत्नी का नाम यशोधा तथा पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था। 30 वर्ष की आयु में इन्होंने अपने बड़े भाई नंदीवर्धन से आज्ञा लेकर घर त्याग दिया। 12/2 वर्ष की कठोर तपस्या के बाद उन्हें केवल्य अथवा परम ज्ञान की प्राप्ति हुई। तब वह केवलीन या केवली कहलाए। अपनी इंद्रियों पर विजय पा लेने के कारण उन्हें ‘जिन’ अथवा जैन कहा गया। वे महावीर (अतुल पराक्रमी) भी कहलाए। .

→ बौद्ध धर्म का प्रभाव जैन धर्म से भी अधिक व्यापक रहा। इस धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। महात्मा बुद्ध के पिता शुद्धोधन शाक्यगण के मुखिया और कपिलवस्तु के शासक थे। उनकी माता माया कोलियागण से थीं। नेपाल की तराई के लुम्बिनी वन में बुद्ध का जन्म हुआ। इनके बचपन का नाम सिद्धार्थ था। माता का निधन हो जाने पर सिद्धार्थ का पालन-पोषण सौतेली माँ गौतमी ने किया, इसी कारण ये गौतम कहलाए।

→ बौद्ध दर्शन में संसार की समस्त वस्तुएँ परिवर्तनशील हैं। ये प्रवाह के रूप में स्थायी दिखती हैं; जैसे किनारे से देखने वाले को बहता हुआ पानी ठहरा हुआ दिखता है। उनके अनुसार किसी वस्तु या जीव में कोई आत्मा नहीं है। सब कुछ हर क्षण बदल रहा है। कुछ भी स्थायी एवं शाश्वत् नहीं है।

→ महात्मा बुद्ध का निष्कर्ष था कि मनुष्य अष्ट मार्ग का अनुसरण करके पुरोहितों के फेर से व मिथ्या आडम्बरों से बच जाएगा तथा अपना लक्ष्य (मुक्ति) भी प्राप्त करेगा। उन्होंने निर्वाण के लिए व्यक्ति केंद्रित प्रयास पर बल दिया जिसमें गुरु की आवश्यकता नहीं थी। अपने शिष्यों के लिए उनका अंतिम संदेश आत्मज्ञान का था : “तुम सब अपने लिए स्वयं ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें स्वयं ही अपनी मुक्ति का रास्ता खोजना है।”

→ बुद्ध के मतानुसार जन्म व मृत्यु का चक्र आत्मा से नहीं, बल्कि अहंकार (अहम्) के कारण चलता है अर्थात् पुनर्जन्म आत्मा का नहीं, बल्कि अहंकार का होता है। यदि इस पर विजय पा ली जाए तो मनुष्य को मुक्ति (निर्वाण) मिल जाएगी। बौद्ध चिंतन में आत्मा व परमात्मा जैसे विषय अप्रासंगिक हैं।

→ बौद्ध संघ की कार्य-प्रणाली गणों की परंपरा पर आधारित थी। इस प्रणाली में जनवाद अधिक था। संघ के सदस्य परस्पर बातचीत से सहमति की ओर बढ़ते थे। सभी सदस्यों के अधिकार समान थे। यदि किसी विषय पर सहमति न बन पाती तो मतदान करके बहुमत से निर्णय लिया जाता जो सभी को स्वीकार्य होता। अपराधी अथवा नियमों की उल्लंघना करने वाले भिक्षु को जो दण्ड मिलता, वह उसे अनिवार्य तौर पर भोगना पड़ता था। कालान्तर में भिक्षुओं में तीखे मतभेद पैदा हो गए, जिनके समाधान के लिए बौद्धों की चार महासभाएँ हुईं।

→ बहुत-से लोग प्राचीन मूर्तियों को पाने के लिए लालायित रहते हैं, क्योंकि वे खूबसूरत और अनुपम होती हैं। परंतु कला इतिहासकार के लिए वे ज्ञान का स्रोत होती हैं। वे उनका गहन अध्ययन करके इतिहास की कुछ लुप्त कड़ियों को जोड़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन यह तभी संभव हो पाता है जब इतिहासकार को अन्य स्रोतों (साहित्य) का भी व्यापक ज्ञान हो। उदाहरण के लिए, बौद्ध स्तूपों पर उत्कीर्ण की हुई मूर्तियों का ऐतिहासिक अर्थ वही कर सकता है जिसने बौद्ध ग्रंथों का भी गहरा अध्ययन कर रखा हो। क्योंकि बहुत बार साहित्यिक गाथाएँ ही पत्थर में मूर्तिकार द्वारा उभारी गई होती हैं।
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→ अमरावती के स्तूप से प्राप्त एक मूर्ति को देखें जिसमें एक दूसरी जातक कथा को प्रदर्शित किया गया है। यह बुद्ध द्वारा अपनी विनम्रता (करुणा) से एक मतवाले हाथी (गजराज) को वश में किए जाने की है। दृश्य कुछ यूँ है महात्मा बुद्ध की ओर एक मतवाला हाथी आगे बढ़ रहा है; स्त्री-पुरुष सब भयभीत हैं, पुरुषों के हाथ खड़े हैं और औरतें भय से उनके साथ चिपकी हुई हैं। तभी बुद्ध विनम्रता की मुद्रा में हाथी की ओर बढ़ते हैं और हाथी नतमस्तक हो जाता है। इस घटना को लोग अपने घरों के झरोखों से भी देख रहे हैं।

→ कालान्तर में बौद्ध धर्म दो शाखाओं में विभाजित हो गया। ये शाखाएँ थीं-महायान और हीनयान। इनका शाब्दिक अर्थ है क्रमशः ‘बड़ा जहाज’ और ‘छोटा जहाज’। अर्थात् जो अनुयायी बहुमत में थे, उन्होंने अपनी श्रेष्ठता को सिद्ध करने के लिए स्वयं को महायान कहा और अल्पसंख्यकों को हीनयान के नाम से पुकारा। लेकिन पुरातन परंपरा के अनुयायियों ने स्वयं को थेरवादी माना जिसका अर्थ था कि वे पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (जिन्हें थेर कहा जाता था) के अनुयायी हैं।
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पौराणिक हिंदू धर्म में भी बौद्ध धर्म की महायान शाखा की भाँति मुक्तिदाता की कल्पना उभरकर आई। विशेषतया हिंदू धर्म में ‘मुक्तिदाता’ वाली परिकल्पना में वैष्णव और शैव परंपराएँ शामिल हैं। हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में विष्णु को परमेश्वर माना
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गया है, जबकि शैव परंपरा में शिव परमेश्वर है अर्थात् दोनों में एक विशेष देवता की आराधना को महत्त्व दिया गया। उल्लेखनीय है कि इस पूजा पद्धति में उपासना और परम देवता के बीच का संबंध समर्पण और प्रेम का स्वीकारा गया। इसलिए यह भक्ति कहलाया।
काल-रेखा

कालघटना का विवरण
प्राचीन इमारतों व मूर्तियों की खोज व संरक्षण

(आधुनिक काल)

1796 ईअमरावती स्तूप के अवशेष मिले
1814 ई०इण्डियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना
1818 ई०साँची के स्तूप की खोज
1834 ई०रामराजा द्वारा रचित एसेज़ ऑन द आकिटैक्वर ऑफ़ द हिंदूज का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप का सर्वेक्षण किया।
1835-42 ई०जेम्स फर्गुसन ने भारत के महत्त्वपूर्ण प्राचीन महत्त्व के स्थलों का सर्वेक्षण किया।
1851 ईमद्रास में गवर्नमेंट म्यूज़ियम की स्थापना हुई।
1854 ई०गुंदूर के कमिश्नर एलियट ने अमरावती के स्तूप स्थल की यात्रा की; अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स नामक पुस्तक लिखी। यह साँची पर सबसे प्रारंभिक रचनाओं में से एक है।
1876 ई०एच०डी० बारस्टो ने शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा ताज-उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया।
1878 ई०राजेन्द्र लाल मित्र द्वारा लिखित बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि का प्रकाशन हुआ।
1880 ई०प्राचीन भवनों का संग्रहाध्यक्ष एच०एच०कोल को बनाया गया।
1888 ई०ट्रेजरर-ट्रोव एक्ट पास हुआ जिसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज को अपने अधिकार में ले सकती थी।
1914 ई०जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की रचना ‘द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची  का प्रकाशन हुआ।
1923 ई०जॉन मार्शल द्वारा तैयार कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन।
1955 ई०भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली की स्थापना।
1989 ई०साँची को एक ‘वर्ल्ड हेरिटेज़ साइट’ घोषित किया गया।

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

HBSE 12th Class History बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्त्वपूर्ण रही होगी?
उत्तर:
पितृवंशिकता वह पारिवारिक परंपरा है जिसमें वंश परंपरा पिता से पुत्र फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि की ओर चलती है। इसमें परिवार की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र ही होते हैं। राजाओं के संदर्भ में सिंहासन के उत्तराधिकारी पुत्र ही थे।

ब्राह्मण ग्रंथों से पता चलता है कि प्राचीन भारत में पितृवंशिकता का ‘आदर्श’ स्थापित हो चुका था। ऋग्वेद में भी इन्द्र जैसे वीर पुत्र की कामना की गई है। विशिष्ट उच्च परिवारों में पितृवंशिकता और भी अधिक महत्त्वपूर्ण थी क्योंकि उनमें भूमि और सत्ता के स्वामित्व का प्रश्न महत्त्वपूर्ण होता था। महाभारत का युद्ध सत्ता और साधनों के प्रश्न को लेकर ही हुआ था। इस युद्ध में पांडव और कौरव दोनों चचेरे परिवार थे। जीत पांडवों की हुई तो ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर को शासक घोषित किया गया। इससे पितृवंशिकता का आदर्श और भी सुदृढ़ हुआ। पितृवंशिकता के अपवाद यदा-कदा ही मिलते हैं। जैसे कि पुत्र के न होने पर भाई या फिर चचेरा भाई राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लेता था। कुछ विशेष परिस्थितियों में औरतें भी सत्ता की उत्तराधिकारी बनीं।

प्रश्न 2.
क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वर्ण व्यवस्था के अनुसार समाज की रक्षा का दायित्व और शासक बनने का अधिकार क्षत्रियों के पास था। परंतु हम देखते हैं कि आरंभिक राज्यों में सभी शासक क्षत्रिय वंश से नहीं थे। बहुत-से गैर-क्षत्रिय शासक वंशों का भी पता चलता है। उदाहरण के लिए ह्यूनसांग के समय उज्जैन व महेश्वरपुर के शासक ब्राह्मण थे। चन्द्रगुप्त मौर्य को भी ब्राह्मण ग्रंथों (पुराणों) में शूद्र बताया गया जबकि बौद्ध ग्रंथ उसे क्षत्रिय मानते हैं। मौर्यों के बाद शुंग व कण्व ब्राह्मण शासक बने। गुप्तवंश के शासक तथा हर्षवर्धन भी संभवतः वैश्य थे। इनके अतिरिक्त प्राचीन काल में बाहर से आने वाले बहुत-से आक्रमणकारी शासक (शक, कुषाण इत्यादि) भी क्षत्रिय, नहीं थे। दक्कन भारत के सातवाहन शासक भी स्वयं को ब्राह्मण मानते थे। अतः स्पष्ट है कि भारत में आरम्भिक राज्यों में सभी शासक संभवतः क्षत्रिय नहीं थे।

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प्रश्न 3.
द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए तथा उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
महाभारत के आदिपर्व में द्रोण व हिडिम्बा की तथा जातक ग्रंथ में बोधिसत्त्व मातंग की कथा मिलती है। तीनों कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना बड़ी रुचिकर है। भारतीय संदर्भ में धर्म की व्याख्या वर्ण-कर्त्तव्य पालन के संदर्भ में की गई है। ब्राह्मण ग्रंथों में वर्ण-धर्म के पालन पर अत्यधिक बल दिया गया है। उसे ‘उचित’ सामाजिक कर्त्तव्य बताया गया है।

द्रोण की कथा में एकलव्य निषाद जाति से था जिसे वर्ण-धर्म के अनुसार धनुर्विद्या सीखने का अधिकार नहीं था। इसलिए ने उसे शिक्षा देने से इंकार कर दिया था। फिर भी एकलव्य ने यह विद्या अपनी लगन से प्राप्त की। गुरु द्रोण ने गुरु दक्षिणा में दायें हाथ का अंगूठा लिया। स्पष्ट है कि इस कथा के माध्यम से निषादों को धर्म का संदेश दिया जा रहा था। दूसरी कथा हिडिम्बा-भीम की है जिसमें भीम ने वर्ण-धर्म का पालन करते हए वनवासी लड़की (हिडिम्बा) के विवाह प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया था। लेकिन इसमें भी प्रचलित परंपरा से हटने का आभास मिलता है जब युधिष्ठिर ने अपने छोटे भाई भीम (उच्च कुल) को निम्न कुल से संबंधित हिडिम्बा के साथ विवाह की अनुमति दे दी थी। – तीसरी कथा मातंग की है जिसका जन्म चाण्डाल के घर में हुआ था।

जिसे देखकर मांगलिक नामक व्यापारी की बेटी (दिथ्थ) चिल्लाने लगी कि उसने ‘अशुभ’ देख लिया है। मातंग को मारा पीटा गया परंतु उसने हार मानने की बजाय विरोध स्वरूप ‘मरण व्रत’ धारण कर लिया। वस्तुतः यह कथा ब्राह्माणिक धर्म परंपरा के विरोध का उदाहरण है। यह विरोध मातंग के इन शब्दों में स्पष्ट झलकता है, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं, वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो दोषमुक्त हैं, वे भेंट के योग्य हैं।” अतः तीनों कथाओं में वर्ण-धर्म के पालन करने पर बल दिया गया है, परंतु ाथ ही इस धर्म के विरुद्ध विरोध का स्वर स्पष्ट झलकता है।

प्रश्न 4.
किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था।
उत्तर:
ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त’ पर आधारित सामाजिक विषमताओं की व्याख्या मिलती है। इस व्याख्या में वर्ण व जाति को ईश्वरीय बताया गया है। इसमें सामाजिक भेदभाव निहित था। बौद्ध ग्रंथों में इसके विपरीत सामाजिक विषमताओं (भेदभावों) को ईश्वर की देन या पुनर्जन्म का परिणाम नहीं माना गया है। उनके अनुसार ये भेदभाव सदैव से नहीं थे। प्रारम्भ में मानव सहित सभी जीव शान्ति की अवस्था में रहते थे। इनमें कोई मेरा-तेरा नहीं था, न कोई अमीर व न कोई गरीब था। संग्रह की प्रवृत्ति भी नहीं थी। यह व्यवस्था पतन की ओर तब बढ़ने लगी जब मानव में लालसा, मक्कारी और संचय जैसी भावनाएँ पैदा हुईं। ऐसी स्थिति में सामाजिक भेदभावों का उदय हुआ।

सामाजिक भेदभावों को दूर करने के लिए बौद्ध ग्रंथों में एक सामाजिक अनुबंध की व्याख्या मिलती है, जिसके अनुसार सब लोगों ने मिलकर राजपद स्थापित किया। ऐसे व्यक्ति (राजा) को यह अधिकार दिया कि वह अपराधी को सजा दे। इस प्रकार बौद्ध व्याख्या में राजपद ईश्वरीय नहीं माना गया, जैसा कि ब्राह्मण ग्रंथ मानते हैं, बल्कि इसे एक सामाजिक समझौता (अनुबंध) माना गया।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं :
संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ….. मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ….. (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ, … मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं…. सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं…. मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”….. मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा….. सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा….

इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए-उम्र, लिंग, भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार भी हैं? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?
उत्तर:
इस अवतरण में ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर आयु, लिंग-भेद और बंधुत्व के अतिरिक्त समाज में स्थिति, ज्ञान के आधार पर संबोधन करते हैं। संबोधन की इस सूची में वर्ण व्यवस्था द्वारा स्थापित मानदंडों का विशेष ध्यान रखा गया है। उदाहरण के लिए सबसे पहले ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित का अभिवादन किया गया है। गुरु द्रोण व कृपाचार्य को चरण स्पर्श कहा गया है फिर कुरु वंश के प्रमुख भीष्म पितामह और फिर धृतराष्ट्र के प्रति सम्मान व्यक्त किया गया है। दुर्योधन और अन्य कुरु योद्धाओं को शुभकामनाएँ दी गई हैं। तत्पश्चात् महामति विदुर (दासीपुत्र) का आदरपूर्वक अभिवादन किया गया है। इसके बाद महिलाओं को सूची में शामिल किया गया है जो पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को दर्शाता है। इसके बाद गणिकाओं और सबसे अंत में वर्ण व्यवस्था में सबसे निचले स्तर पर स्थित दास-दासियों को शामिल किया गया है। इनके साथ विकलांग व असहायों को रखा गया है। स्पष्ट है कि सामाजिक स्थिति के अनुरूप बनाए गए मानदंडों के कारण ही इस सूची में विभिन्न लोगों को स्थान दिया गया है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

प्रश्न 6.
भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि : चूँकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है………….. बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीजें इसमें निहित हैं …. (वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।” चर्चा कीजिए।
उत्तर:
महाभारत एक विस्तृत महाकाव्य है। इसकी मूल कथा कौरवों और पांडवों के बीच सत्ता और साधनों को लेकर लड़े गए युद्ध से संबंधित है। चूंकि यह एक गतिशील ग्रंथ रहा है इसलिए इसमें इस मूल कथा के साथ-साथ अन्य कथाएँ, मिथक और घटनाक्रम जुड़ते गए। इसमें बहुत-से उपदेश भी हैं। विद्वानों का विचार है कि लगभग 1000 वर्षों (500 ई→पू→ से 500 ई→) में यह ग्रंथ संपूर्ण हुआ है। शुरू में इसमें मात्र 8800 श्लोक थे और जयस यानी विजय संबंधी ग्रंथ कहलाता था। कालांतर में यह लगभग 24000 श्लोकों के साथ भारत नाम से जाना गया। अन्ततः यह महाभारत कहलाया। अब इसमें लगभग एक लाख श्लोक हैं।

चूँकि महाभारत दीर्घ अवधि में रचा और लिखा गया है, इसलिए इसमें भारतीय समाज के अनेक पक्ष शामिल होते गए। आर्यों के उत्तर भारत में विस्तार के बाद मध्य और दक्षिणी भारत में उनका फैलाव हुआ तो उनके इस ग्रंथ में भी अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक व धार्मिक पक्ष जुड़ते गए। यह ग्रंथ मात्र आर्यों का नहीं रह गया। आर्य लोगों का भारत में बसने वाले अन्य जन-जातियों और कबीलों से समायोजन हुआ, तो इन लोगों के सामाजिक जीवन के विभिन्न पक्ष भी इसमें जुड़ते गए। इस प्रकार मौरिस विन्टरविट्ज़ का यह निष्कर्ष उचित है कि ‘महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है।

उनका यह वाक्य और भी सारगर्भित है कि यह ग्रंथ ‘भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।’ इसका अर्थ है कि इस ग्रंथ में मात्र सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पक्षों का ही वर्णन नहीं है बल्कि नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और गहन दार्शनिक विवेचन भी है। उदाहरण के लिए इस ग्रंथ का महत्त्वपूर्ण भाग श्रीमद्भगवद् गीता को लें जो संपूर्ण भारतीय दर्शन का निचोड़ है। इसमें मोक्ष प्राप्ति के तीनों मार्गों-ज्ञान, कर्म और भक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है।

भारतीय समाज की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता वर्ण व जाति व्यवस्था रही है। इस व्यवस्था के नैतिक और सामाजिक आदर्शों को महाभारत ग्रंथ ने विभिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है। यहाँ तक कि उपदेशों के माध्यम से भी उन्हें व्यक्त किया है। उदाहरण के लिए एकलव्यगाथा, जिसमें वर्ण-धर्म की पालना का उपदेश दिया गया है। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि महाभारत में भारतीयों के सामाजिक जीवन का सार मिलता है। इसलिए यह संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है।

प्रश्न 7.
क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
महाभारत के रचनाकार के विषय में भी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। जनश्रुतियों के अनुसार.महर्षि व्यास ने इस ग्रंथ को श्रीगणेश जी से लिखवाया था। परंतु आधुनिक विद्वानों का विचार है कि इसकी रचना किसी एक लेखक द्वारा नहीं हुई। वर्तमान में इस ग्रंथ में एक लाख श्लोक हैं लेकिन शुरू में इसमें मात्र 8800 श्लोक ही थे। दीर्घकाल में रचे गए इन श्लोकों का रचयिता कोई एक लेखक नहीं हो सकता। इतिहासकार मानते हैं कि इसकी मूल गाथा के रचयिता भाट सारथी थे, जिन्हें सूत कहा जाता था। यह ‘सूत’ क्षत्रिय योद्धाओं के साथ रणक्षेत्र में जाते थे और उनकी विजयगाथाएँ रचते थे। विजयों का बखान करने वाली यह कथा परंपरा मौखिक रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में चलती रही। इतिहासकारों का अनुमान है कि पाँचवीं शताब्दी ई→पू→ से इस कथा परंपरा को ब्राह्मण लेखकों ने अपनाकर इसे और विस्तार दिया। साथ ही इसे लिखित रूप भी दिया। यही वह समय था जब उत्तर भारत में क्षेत्रीय राज्यों और राजतंत्रों का उदय हो रहा था। कुरु और पांचाल, जो महाभारत कथा के केंद्र बिंदु हैं, भी छोटे सरदारी राज्यों से बड़े राजतंत्रों के रूप में उभर रहे थे। संभवतः इन्हीं नई परिस्थितियों में महाभारत की कथा में कुछ नए अंश शामिल हुए। यह भी संभव है कि नए राजा अपने इतिहास को नियमित रूप से लिखवाना चाहते हों।

जैसे-जैसे आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ बदलती गईं, महाभारत की मूल गाथा में उनके अनुरूप नए अंश .. जुड़ते गए। महाभारत ज्ञान का एक अपूर्व खजाना बनता गया। धर्म, दर्शन और उपदेश इत्यादि अंश मूल कथा के साथ जुड़कर महाभारत एक विशाल ग्रंथ बनता गया। इस ग्रंथ की रचना का एक और महत्त्वपूर्ण चरण लगभग 200 ई→पू→ से 200 ईसवी के बीच शुरू हुआ। यह वही चरण था जिसमें आराध्य देव के रूप में विष्णु की महत्ता बढ़ रही थी। श्रीकृष्ण, जो इस महाकाव्य के महानायकों में से एक थे, को भगवान श्री विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार किया गया। इस प्रकार लगभग 1000 वर्ष से भी अधिक अवधि में यह ग्रंथ अपना वृहत् रूप धारण कर पाया। इससे यह भी स्पष्ट है कि इसकी रचना करने में एक से अधिक विद्वानों का योगदान है।

प्रश्न 8.
आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्त्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
आरंभिक भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों में भेदभाव (विषमताएँ) था। ब्राह्मण ग्रंथों से यह स्पष्ट है कि समाज में पितृवंशिकता का ‘आदर्श’ स्थापित हो चुका था। इसमें वंश परंपरा पिता से पुत्र फिर पौत्र और प्रपौत्र आदि की ओर चलती थी। प्रारंभिक वैदिक साहित्य में औरत के प्रति सम्मान तो झलकता है, फिर भी पुरुषों को समाज में अधिक महत्त्व प्राप्त था। ऋग्वेद में पुत्र-कामना को प्राथमिकता दी गई। विशेषतः इंद्र जैसे वीर पुत्र की कामना की गई। उदाहरण के लिए ऋग्वेद के एक मंत्र में कहा गया है कि ‘मैं इसे (बेटी) यहाँ से यानी पिता के घर से मुक्त करता हूँ किंतु वहाँ (पति के घर) से नहीं। मैंने इसे वहाँ मजबूती से स्थापित किया है जिससे इंद्र के अनुग्रह से इसके उत्तम पुत्र हों और पति के प्रेम का सौभाग्य इसे प्राप्त हो।

शासक वर्गों में सिंहासन के उत्तराधिकारी भी पुत्र थे। उपनिषदों में पिता के आध्यात्मिक पुण्य का उत्तराधिकारी पुत्र को बताया गया अर्थात् पुत्र की उत्पत्ति किसी परिवार के लिए धर्म के अनुसार भी आवश्यक हो गई। फलतः सामान्य लोग भी इसी परंपरा से जुड़ते गए। पितृवंशिक परंपरा समाज की एक आदर्श पंरपरा बन गई। महाभारत के युद्ध में भी पांडवों के विजयी होने के उपरांत युधिष्ठिर को शासक घोषित किया गया। इससे पितृवंशिकता का आदर्श और भी सुदृढ़ हुआ। वस्तुतः इस आदर्श के अपवाद यदा-कदा ही मिलते हैं। कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही कुछ महिलाएँ सत्ता की उत्तराधिकारी बनी हैं। जैसे कि प्रभावती गुप्त का शासिका बनने का उदाहरण मिलता है।

विवाह प्रणाली में भी स्त्री-पुरुष के संबंधों में भेदभाव स्पष्ट झलकता है। गोत्र-बहिर्विवाह प्रणाली में पिता अपनी पुत्री का विवाह एक ‘योग्य’ युवक से कन्यादान संस्कार को संपन्न करता हुआ करता था। ‘कन्यादान’ का अर्थ कहीं-न-कहीं चेतन या अचेतन रूप में स्त्री को वस्तुसम मान लेना रहा है। प्रायः छोटी उम्र में ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता था। विशेषतः ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों (ब्राह्मण, क्षत्रिय इत्यादि) में स्त्री की स्थिति पुरुष की तुलना में और भी खराब थी। उच्च या शासक परिवारों में बहु-पत्नी विवाह का प्रचलन था।

अधिकांश धर्मशास्त्र पति व पिता की संपत्ति में औरत की हिस्सेदारी को स्वीकार नहीं करते हैं। पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र थे। स्वाभाविक तौर पर इससे समाज में स्त्री की स्थिति पुरुष की तुलना में गौण हो गई। परिवार में औरत का अधिकार केवल उसे उपहार से प्राप्त धन (स्त्रीधन) पर ही था। अन्य किसी तरीके से अर्जित धन पर औरत का स्वामित्व नहीं था। कुलीन परिवारों में भी, जहाँ साधनों की कमी नहीं थी, औरत की स्थिति गौण ही रही, बल्कि पुरुष नियंत्रण ऐसे परिवारों में और भी अधिक होता था। सातवाहन (दक्कन में) शासकों की सूची से आभास मिलता है कि उनमें पिता की अपेक्षा माताएँ अधिक महत्त्वपूर्ण थीं क्योंकि शासकों को मातृनाम से (जैसे गौतमी-पुत्त सिरी-सातकणि) जाना गया। परंतु हमें यहाँ इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि सातवाहन शासकों में भी राजसिंहासन की उत्तराधिकारी महिलाएँ नहीं बल्कि पुरुष ही बनें।

प्रश्न 9.
उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।
उत्तर:
बंधुत्व और विवाह संबंधी नियम ब्राह्मण ग्रंथों में मिलते हैं। इन ग्रंथों के लेखकों का यह विश्वास था कि इन नियमों के निर्धारण में उनका दृष्टिकोण सार्वभौमिक (सर्वत्र अनुसरण होने वाला) था। इन नियमों का पालन सभी स्थानों पर सभी के द्वारा होना चाहिए परंतु व्यवहार में ऐसा नहीं था। व्यवहार में तो जब इन नियमों की उल्लंघना होने लगी थी तभी तो ब्राह्मण विधि ग्रंथों (जैसे कि मनुस्मृति, नारदस्मृति या अन्य ग्रंथ) की जरूरत महसूस हुई और उनकी रचना की गई। इन ग्रंथों में बंधुत्व व विवाह संबंधी नियमों की उल्लंघना करने वालों के लिए दंड का विधान बताया गया था।

भारत एक उपमहाद्वीप है। इसके विशाल भू-भाग में अनेक क्षेत्रीय विभिन्नताएँ विद्यमान थीं। सामाजिक संबंधों में अनेक जटिलताएँ थीं। संचार के साधन अविकसित थे। एक स्थान से दूसरे स्थान पर आना-जाना आसान नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में ब्राह्मणीय नियम सार्वभौमिक नहीं बन सकते थे। ब्राह्मणीय नियमों के अनुसार चचेरे, मौसेरे व ममेरे आदि भाई-बहनों में रक्त संबंध होने के कारण विवाह वर्जित था। परंतु यह नियम दक्षिण भारत के अनेक समुदायों में प्रचलित नहीं था। उत्तर भारत में भी सर्वत्र रूप से इनका अनुसरण नहीं होता था। आश्वलायन गृहसूत्र में विवाह के आठ प्रकारों के बारे में पता चलता है। स्पष्ट है कि विवाह के नियम एक जैसे नहीं थे। इन विवाहों में से पहले चार विवाहों (ब्रह्म, देव, आर्ष व प्रजापत्य) को ही उत्तम माना गया। उन्हें धर्मानुकूल और आदर्श बताया गया। जबकि असुर, गांधर्व, राक्षस और पैशाच विवाहों को अच्छा नहीं माना गया, परंतु ये प्रचलन में तो थे। यह इस बात का प्रमाण है कि ब्राह्मणीय नियमों से बाहर विवाह प्रथाएँ अस्तित्व में थीं।

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10.
मानचित्र को देखकर कुरु-पांचाल क्षेत्र के पास स्थित महाजनपदों और नगरों की सूची बनाइए।
HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 Img 1
उत्तर:
संकेत

  • महाजनपदों के नाम–गांधार, कंबोज, कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ती, चेदी वत्स, अश्मक, मगध, अंग, लिच्छवी, शाक्य, पांचाल, मल्ल, कोशांबी।
  • नगरों के नाम हस्तिनापुर, मथुरा, विराट, उज्जैन, अयोध्या, कपिलवस्तु, पावा, वैशाली, कुशीनगर, सारनाथ, वाराणसी, पाटलिपुत्र, श्रावस्ती।

परियोजना कार्य

प्रश्न 11.
अन्य भाषाओं में महाभारत की पुनर्व्याख्या के बारे में जानिए। इस अध्याय में वर्णित महाभारत के किन्हीं दो प्रसंगों का इन भिन्न भाषा वाले ग्रंथों में किस तरह निरूपण हुआ है उनकी चर्चा कीजिए। जो भी समानता और विभिन्नता आप इन वृत्तांत में देखते हैं। उन्हें स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
स्वयं अध्ययन करके निष्कर्ष निकालें।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

प्रश्न 12.
कल्पना कीजिए कि आप एक लेखक हैं और एकलव्य की कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखिए।
उत्तर:
विद्यार्थी स्वयं सामाजिक स्थितियों का गहन अध्ययन करते हुए एकलव्य कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखें।

बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज HBSE 12th Class History Notes

→ बहिर्विवाह किसी समूह से बाहर विवाह; जैसे कि गोत्र-बहिर्विवाह, ग्राम-बहिर्विवाह या फिर सपिंड-बहिर्विवाह।

→ अंतर्विवाह-अपने ही वर्ण, जाति, जनजाति में विवाह करना। धर्मशास्त्रों में अपने वर्ण अथवा जाति में ही विवाह पर बल दिया गया है।

→ सपिंड-बहिर्विवाह-स्मृतियों में एक ही पूर्वज को पिंडदान करने वाले तथा एक ही माता-पिता से उत्पन्न संतानों में विवाह निषेध बताया गया है। उन्हें ऐसे समूह से बाहर विवाह पर जोर दिया गया, जिन्हें सपिंड-बहिर्विवाह कहा गया।

अनुलोम विवाह-ऐसा अंतर्जातीय विवाह, जिसमें पुरुष उच्च वर्ण अथवा जाति का होता था, जबकि स्त्री निम्न वर्ण या जाति की होती थी।

→ प्रतिलोम विवाह ऐसा अंतर्जातीय विवाह जिसमें स्त्री उच्च वर्ण या जाति से होती थी जबकि पुरुष निम्न वर्ण या जाति से होता था।

→ पितृसत्तात्मक-ऐसे परिवार जिनमें वंश-परंपरा पिता से पुत्र फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि की ओर चलती हो।

→ मातृसत्तात्मक-ऐसे परिवार जिनमें वंश-परंपरा माँ से जुड़ी हो। इसमें लड़की का महत्त्व अधिक होता है।

→ बांधव समूह भाई-बंधुओं का एक बड़ा समूह जिसे समाज विज्ञान की भाषा में जाति समूह (Kinfolk) कहा गया है।

→ बहु-पत्नी प्रथा-एक पुरुष द्वारा एक से अधिक पत्नियाँ रखने की प्रथा।

→ धर्मशास्त्र-इनमें धर्मसूत्र, स्मृतियाँ और उन पर लिखी गई टीकाएं शामिल हैं। ये मुख्यतः प्राचीन भारत के सामाजिक कानूनों के ग्रंथ हैं।

→ वर्ण–’वर्ण’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के ‘वरी’ धातु से मानी जाती है, जिसका अर्थ है वरण (चयन) करना। कुछ विद्वान वर्ण का अर्थ ‘रंग’ मानते हैं।

→ समालोचनात्मक कार्य संस्कृत साहित्य के संदर्भ में समालोचनात्मक कार्य मूलकथा को खोजने का प्रयास होता है।

→ बहुपति प्रथा-एक स्त्री के एक से अधिक पति होना।

→ गोत्र-ऐसा समूह जो स्वयं को एक ही पूर्वज की संतान होने का दावा करता है।

→ श्रेणी-गिल्ड अथवा संगठन को श्रेणी कहा गया है। प्राचीन भारत में प्रायः शिल्पकार और व्यापारियों की श्रेणियाँ होती थीं।

→ स्त्रीधन-एक स्त्री को विवाह के समय पिता, पति, भाई इत्यादि से प्राप्त होने वाले उपहार अथवा भेंट। इन पर स्त्री का निजी अधिकार माना जाता था।

→ महाकाव्य-ऐसा विशाल काव्य-ग्रंथ जो किसी देश अथवा संप्रदाय के जीवन के अनेक पहलुओं पर प्रकाश डालता हो।

प्रस्तुत अध्याय में लगभग एक हजार वर्षों (लगभग 600 ई→ पू→ से 600 ईसवी) के दौरान भारत में हुए सामाजिक परिवर्तनों और सामाजिक संस्थाओं पर प्रकाश डाला गया है। हम जानते हैं कि वैदिक युग में पशुचारी कबीलाई समाज धीरे-धीरे रूपांतरित होता हुआ कृषक समाज में बदला। खेती के विकास के साथ-साथ दस्तकारियों की संख्या भी बढ़ती गई। समय बीतने के साथ अपने-अपने व्यवसाय में दक्ष कारीगरों के विभिन्न सामाजिक समूह उभरकर सामने आए। पुश्तैनी व्यवसाय करते-करते ये समूह कारीगर जातियों में बदलते गए। लेकिन यह सामाजिक विकास समानता पर आधारित नहीं था। इसमें संपत्ति का वितरण असमान होने के कारण आर्थिक एवं सामाजिक विषमताओं में वृद्धि होने लगी।

→ हम यहाँ बंधुत्व (परिवार) व विवाह नियमों का अध्ययन करते हुए इन आर्थिक व सामाजिक विभेदों का अध्ययन भी करेंगे। साथ ही यह भी समझने का प्रयास करेंगे कि सामाजिक इतिहास लेखन में इतिहासकार साहित्यिक परंपराओं; जैसे कि महाभारत या रामायण का उपयोग कैसे करते हैं?

→ भारत में पितृवंशिक व्यवस्था का आदर्श ऋग्वैदिक काल से ही चला आ रहा था। शासक वर्ग ही नहीं, धनी वर्ग के लोग और ब्राह्मण भी संभवतः ऐसा ही दृष्टिकोण रखते थे। इस आदर्श को लेकर यदा-कदा अपवाद भी मिलते हैं। पुत्र के न होने पर कई बार तो एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी हो जाता था तो कभी बंधु-बांधव (kinsmen) राजगद्दी पर अपना अधिकार कर लेते थे। कई बार कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में स्त्रियाँ भी सत्ता की उत्तराधिकारी बनीं।

→ विवाह संस्था का स्वरूप धार्मिक संस्कारों और नियमों से निर्धारित हुआ। इसका मूल उद्देश्य विवाह संबंधों में स्थायित्व कायम करना और पितृवंश को आगे बढ़ाना था। साथ ही भारत में जातीय व्यवस्था (Caste System) को स्थायित्व प्रदान करने में भी इसकी मुख्य भूमिका रही। यहाँ हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि पितृवंशिक व्यवस्था के अंतर्गत पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र का विशेष महत्त्व था, जबकि पुत्रियों को भिन्न दृष्टि से देखा गया। उन्हें पिता की संपत्ति में अधिकार नहीं मिला। साथ ही रक्त संबंधों से बाहर के परिवारों में उनका विवाह जरूरी माना गया। जबकि अंतर्विवाह प्रणाली (Endogamy) के अंतर्गत वर्ण अथवा जाति के अंदर ही विवाह को उत्तम माना गया। अतः वर्ण व जाति से बाहर विवाह वर्जित होता गया।

→ भारत में ‘जाति’ एक अनोखी व्यवस्था रही है। इस व्यवस्था में प्रत्येक जाति का समाज में ऊपर से नीचे तक स्थान निर्धारित था। अतः सामाजिक विषमता इसके इस स्वरूप में ही थी। ‘जाति’ का शाब्दिक अर्थ ‘जन्म’ है अर्थात् जाति एक ऐसा सामाजिक समूह है, जिसकी सदस्यता जन्मजात थी। एक जाति के सदस्यों का एक पुश्तैनी (वंशागत) व्यवसाय था और उस जाति के सदस्य अपनी ही जाति में विवाह करते थे। अन्य जातियों के साथ संबंधों में उच्च-निम्न तथा पवित्र-अपवित्रता के भावों का अहम स्थान रहा। जाति संबंधी आचार-संहिता धर्मशास्त्रों में स्पष्ट हुई, जिसे व्यवहार में बनाए रखने के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जाते रहे।

→ फिर भी वर्ण अथवा जाति-व्यवस्था पूर्णतः एक जड़-व्यवस्था नहीं रही है। इसमें आवश्यकतानुसार गतिशीलता रही है। उदाहरण के लिए, शुरू में वैश्य (विश के साधारण सदस्य) पशुचारक और किसान थे और शूद्र सेवक थे। धीरे-धीरे उन्नति करके वैश्य व्यापारी व जमींदार हो गए और शद्र कृषक बन गए, परंतु इस पर भी उन्हें वर्ण-व्यवस्था में द्विज का दर्जा नहीं मिला। विचाराधीन काल के अंत तक आते-आते उन्हें रामायण, महाभारत और पुराण जैसे ग्रंथों को सुनने का अधिकार मिला। उनकी स्थिति में कुछ सुधार आया।

→ वर्ण-व्यवस्था वाले समाज में सबसे निचले स्तर पर जो लोग थे, उन्हें चांडाल कहा जाता था। प्रायः धर्म-ग्रंथों में इनका वर्णन बहुत ही अपमानजनक है। उन्हें चोर, झूठे, झगड़ालू, लोभी, क्रोधी व अपवित्र बताया गया है। सामान्यतः इनका काम मृत-पशुओं को उठाना, उनकी खाल उतारना और उससे कई तरह का सामान बनाना, शवों का अंतिम संस्कार करना तथा सड़कों-गलियों की सफाई करना आदि था। इन कामों को दूषित और अपवित्र माना जाता था। यद्यपि ये सभी काम ‘सभ्य’ समाज के लिए निहायत ज़रूरी थे। धर्म-कर्म करने वाले ब्राह्मण स्वयं को सबसे पवित्र मानते थे। उनका कहना तक उच्च वर्ण के लोगों को अपवित्र कर देता है। उन्हें ‘अस्पृश्य’ अथवा ‘अछूत’ बताया गया। वस्तुतः इस दृष्टिकोण ने सामाजिक विषमता को अमानवीय-स्तर तक पहुँचा दिया। फाहियान के विवरण से पता चलता है कि चाण्डाल शहर और गाँवों से बाहर अलग बस्तियों में रहते थे। ये लोग माँस का व्यवसाय करते थे। जब कभी वे नगर या गाँव में आते तो उन्हें अपने आने की सूचना किसी वस्तु से आवाज़ करके देनी पड़ती थी, ताकि स्वयं को पुनीत कहने वाले लोग उनके साये से बच सकें।

→ विचाराधीन काल में दास, भूमिहीन कृषि मज़दूर, शिकारी, मछुआरे, पशुपालक, किसान, ग्राम मुखिया, कारीगर-दस्तकार, व्यापारी तथा अधिकारी और राजा सभी भारत उप-महाद्वीप के विभिन्न भागों में समाज के अंग थे। इन सभी सामाजिक समुदायों एवं वर्गों का किसी-न-किसी रूप में आर्थिक क्रिया-कलापों में योगदान था, परंतु इनकी सामाजिक स्थिति एक समान नहीं थी। वस्तुतः समाज में उनका स्थान आर्थिक साधनों पर उनके नियंत्रण पर निर्भर करता था, जिनके पास भी ये साधन जितने अधिक थे उनकी समाज में स्थिति उतनी ही ऊँची थी। अधिकांश धर्मशास्त्र पति व पिता की संपत्ति में औरत की हिस्सेदारी को स्वीकार नहीं करते थे। स्वाभाविक तौर पर इससे समाज में स्त्री की स्थिति पुरुष की तुलना में गौण रही।

→ बौद्ध व्याख्या में सामाजिक विषमताओं को ईश्वर की देन या पूर्वजन्म का परिणाम नहीं बताया गया है, बल्कि इसके लिए लालसा को दोषी ठहराया। अतः बौद्ध व्याख्याकारों ने सामाजिक अंतर्विरोधों को दूर करने के लिए एक सामाजिक समझौते की व्याख्या दी। इसके अनुसार सामाजिक विषमता सदैव से नहीं थी। शुरू में न तो मानव पूर्ण रूप में विकसित था और न ही वनस्पति जगत। तब सभी जीव शांति की अवस्था में निवास करते थे। कोई तेरा-मेरा नहीं था। संचय की कोई प्रवृत्ति नहीं थी। यह व्यवस्था पतन की ओर तब बढ़ने लगी, जब मानव में लालसा, कपट, प्रतिहिंसा, मक्कारी और संचय जैसी भावनाएँ बलवती होने लगीं। स्पष्ट है कि इन भावनाओं से सामाजिक विषमताओं ने जन्म लिया। तब सब लोगों ने मिलकर विचार करके राजपद को मान्यता दी।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 3 बंधुत्व, जाति तथा वर्ग : आरंभिक समाज

भारत की मूलकथा कौरवों व पांडवों के बीच लड़े गए संहारक युद्ध की है। ये दोनों चचेरे परिवार थे। इनमें यह युद्ध राजगद्दी व भू-क्षेत्र को लेकर हुआ। इस मुख्य कथा के अतिरिक्त महाभारत में कई तरह के मिथक, कथाएँ, वर्णन और उपदेश भी हैं। ग्रंथ तात्कालिक सामाजिक समुदायों के सामाजिक व्यवहार को भी दर्शाता है। शुरू में महाभारत की गाथा मौखिक तौर पर एक पीढ़ी से अलग पीढ़ी में चलती रही। कालांतर में इसे ब्राह्मण विद्वानों ने लिखित रूप दिया। फिर यह हस्तलिखित परंपरा में संप्रेषित होती रही।

→ इतिहासकार इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए साहित्यिक स्रोतों का उपयोग बड़ी सावधानी और विवेकपूर्ण तरीके से करते हैं। वे इस बात का ध्यान करते हैं कि अमुक ग्रंथ का लेखक कौन है, उसका सामाजिक दृष्टिकोण क्या है, क्योंकि लेखक भी अपने पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकता है। वे ग्रंथ की भाषा पर भी विचार करते हैं। उदाहरण के लिए क्या वे ग्रंथ संस्कृत में हैं या फिर पालि, प्राकृत या तमिल जैसी भाषाओं में हैं। उल्लेखनीय है कि संस्कृत ब्राह्मण विद्वानों की भाषा थी तो जनसामान्य की भाषा पालि व प्राकृत थी। इसलिए भाषा से संकेत मिलता है कि अमुक ग्रंथ किसी वर्ग विशेष में प्रचलित था अथवा सामान्य लोगों में। संस्कृत भी जटिल है या सरल, पद्य है या गद्य, यह पहलू भी विचारणीय होता है। इतिहासकार किसी ग्रंथ का अध्ययन करते समय उसके संभावित संकलन या रचना काल तथा उसके रचना क्षेत्र पर भी ध्यान देते हैं।

III. काल-रेखा

कालघटना का विवरण
लगभग 500 ई० पू०पाणिनि की (संस्कृत व्याकरण) अष्टाध्यायी की रचना
लगभग 500 से 200 ई० पू०धर्मसूत्रों का संस्कृत भाषा में रचनाकाल
लगभग 500 से 100 ई० पू०आरंभिक बौद्ध-ग्रंथों (त्रिपिटक सहित) का पालि भाषा में रचनाकाल
लगभग 500 ई० पू० से 400 ई०रामायण और महाभारत का संस्कृत भाषा का रचनाकाल
लगभग 200 ई० पू० से 200 ई०मनुस्मृति का रचनाकाल
405 से 411 ई०फाहियान भारत में रहा
630 से 643 ई०ह्यूनसांग भारत में रहा
1919 से 1966 ई०महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण परियोजना का काल
1973 ई०जे०ए०बी० वैन बियुटेनेन द्वारा महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण

के अंग्रेज़ी अनुवाद की शुरुआत

1978 ई०जे०ए०बी० वैन बियुटेनेन की मृत्यु

 

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

HBSE 12th Class History राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्पकला के उत्पादन के प्रमाणों की चर्चा कीजिए। हड़प्पा के नगरों के प्रमाण से ये प्रमाण कितने भिन्न हैं?
उत्तर:
आरंभिक ऐतिहासिक नगरों का उदय छठी सदी ई→पू→ में हुआ। इनके शिल्प उत्पाद निम्नलिखित प्रकार से थे

(1) इस काल में मिट्टी के उत्तम श्रेणी के कटोरे व थालियाँ बनाई जाती थीं। इन बर्तनों पर चिकनी कलई चढ़ी होती थी। इन्हें उत्तरी काले पॉलिश मृदभांड (N.B.P.W.) के नाम से जाना जाता है।

(2) नगरों में लोहे के उपकरण, सोने, चाँदी के गहने, लोहे के हथियार, बर्तन (कांस्य व ताँबे के), हाथी दाँत का सामान, शीशे, शुद्ध व पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ भी बनाई जाती थीं।।

(3) भूमि अनुदान पत्रों से जानकारी मिलती है कि नगरों में वस्त्र बनाने का कार्य, बढ़ई का कार्य, आभूषण बनाने का कार्य, मृदभांड बनाने का कार्य, लोहे के औजार बनाने का कार्य होता था। हड़प्पा के नगरों से तुलना-हड़प्पा के शिल्प उत्पादों तथा आरंभिक ऐतिहासिक नगरों के शिल्प उत्पादों में काफी भिन्नता पाई जाती है। हड़प्पा सभ्यता के शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातु-कर्म, मुहर बनाना तथा बाट बनाना सम्मिलित थे। परंतु हड़प्पा के लोग लोहे के उपकरण नहीं बनाते थे। उनके उपकरण पत्थर, कांस्य व ताँबे के थे। दूसरी ओर, प्रारंभिक नगरों के लोग बड़ी मात्रा में लोहे के औजार, उपकरण और वस्तुएँ बनाते थे।

प्रश्न 2.
महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
छठी सदी ई→पू→ के बौद्ध और जैन ग्रंथों में हमें 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। बौद्ध ग्रंथ अंगुतर निकाय में हमें इन राज्यों के नामों का उल्लेख मिलता है।
विशिष्ट अभिलक्षण-इन महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण निम्नलिखित प्रकार से हैं

(1) अधिकांश जनपदों में राजतंत्रात्मक प्रणाली थी जिसमें राजा सर्वोच्च व वंशानुगत था, लेकिन निरंकश नहीं था। मन्त्रिपरिषद – अयोग्य राजा को पद से हटा दिया करती थी।

(2) कुछ महाजनपदों में गणतंत्रीय व्यवस्था थी। इन्हें गण या संघ कहते थे। गणराज्यों का मुखिया ‘गणमुख्य’ कहलाता था। जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन करते थे। ये ‘राजन’ (राजा) कहलाते थे। वह अपनी परिषद् के सहयोग से राज्य करता था। वस्तुतः इन गण राज्यों में कुछ लोगों के समूह (Oligarchies) का शासन होता था।

(3) प्रत्येक महाजनपद की अपनी राजधानी थी जिसकी किलेबंदी की जाती थी।

(4) इस काल में रचित धर्मशास्त्रों में शासक तथा लोगों के लिए नियमों का निर्धारण किया गया है। इन शास्त्रों में राजा को यह सलाह दी गई कि वह कृषकों, व्यापारियों और दस्तकारों से कर प्राप्त करे। पड़ोसी राज्य पर हमला कर धन लूटना या प्राप्त करना वैध (Legitimate) उपाय बताया गया।
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(5) धीरे-धीरे इनमें से कई राज्यों ने स्थायी सेना और नौकरशाही तंत्र का गठन कर लिया था परंतु कुछ राज्य अभी भी अस्थायी सेना पर निर्भर थे।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 3.
सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण इतिहासकार कैसे करते हैं?
उत्तर:
सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने में इतिहासकारों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है क्योंकि सामान्य लोगों ने अपने विचारों और अनुभवों के संबंध में शायद ही कोई वृत्तांत छोड़ा हो। फिर भी इतिहासकार सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करते हैं क्योंकि इतिहास निर्माण में इन लोगों के द्वारा ही अहम् भूमिका निभाई गई। इस कार्य को पूरा करने के लिए इतिहास विभिन्न प्रकार के स्रोतों का सहारा लेते हैं।

(1) विभिन्न स्थानों पर खुदाई से अनाज के दाने तथा जानवरों की हड्डियाँ मिलती हैं जिससे यह पता चलता है कि वे किन फसलों से परिचित थे तथा किन पशुओं का पालन करते थे।

(2) भवनों और मृदभांडों से उनके घरेलू जीवन का पता चलता है।

(3) अभिलेखों से शिल्प उत्पादों का पता चलता है।

(4) भूमि अनुदान पत्रों से भी ग्रामीण जीवन की झांकी का पता चलता है। इनमें ग्राम के उत्पादन तथा ग्राम के वर्गों की जानकारी मिलती है।

(5) कुछ साहित्य भी सामान्य लोगों के जीवन पर प्रकाश डालते हैं। उदाहरण के लिए जातक कथाओं और पंचतंत्र की कहानियों से इस प्रकार के संदर्भ निकाले जाते हैं।

(6) विभिन्न ग्रन्थों में नगरों में रहने वाले सर्वसाधारण लोगों का पता चलता है। इन लोगों में धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहार, छोटे व्यापारी आदि होते थे।

प्रश्न 4.
पांड्य सरदार (स्रोत 3) को दी जाने वाली वस्तुओं की तुलना दंगुन गाँव (स्रोत 8) की वस्तुओं से कीजिए। आपको क्या समानताएँ और असमानताएँ दिखाई देती हैं?
उत्तर:
पांड्य सरदार को भेंट की गई वस्तुओं की जानकारी हमें शिल्पादिकारम् में दिए वर्णन से प्राप्त होती है तथा दंगुन गाँव वह गाँव है जिसे प्रभावती गुप्त ने एक भिक्षु को भूमि अनुदान में दिया था। इस अनुदान पत्र से हमें गाँव में पैदा होने वाली वस्तुओं की जानकारी मिलती है। पांडय सरदार को प्राप्त वस्तओं व दंगन गाँव की वस्तओं की सची निम्नलिरि

(1) पहाड़ी लोग वञ्जि के राजा के लिए हाथी दाँत, शहद, चंदन, सिंदूर के गोले, काजल, हल्दी, इलायची, काली मिर्च, कंद का आटा वगैरह भेंट लाए। उन्होंने राजा को बड़े नारियल, आम, दवाई में काम आने वाली हरी पत्तियों की मालाएँ, तरह-तरह के फल, प्याज़, गन्ना, फूल, सुपारी के गुच्छे, पके केलों के गुच्छे, जानवरों व पक्षियों के बच्चे आदि का अर्पण किया।

(2) दंगुन गाँव की वस्तुओं में घास, जानवरों की खाल, कोयला, मदिरा, नमक, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल, दूध आदि सम्मिलित थे।

समानताएँ-दोनों सूचियों की वस्तुओं में बहुत कम समानता है। दोनों सूचियों में मात्र फूल का नाम पाया गया है। ऐसा लगता है कि पांड्य राजा भी उपहार मिलने के बाद जानवरों की खाल का प्रयोग करते थे।

असमानताएँ-इन दोनों सूचियों में अधिकतर असमानताएँ ही दिखाई देती हैं। वस्तुएँ प्राप्त करने के तरीकों में भी बहुत । असमानताएँ दिखती हैं। एक ओर जहाँ पांड्य सरदार को लोग खुशी से नाच गाकर वस्तुएँ भेंट कर रहे हैं तो दूसरी ओर दंगुन गाँव के लोगों को दान प्राप्तकर्ता को ये वस्तुएँ देनी ही पड़ती थीं। अनुदान पत्र से स्पष्ट है कि ऐसा करने के लिए वे बाध्य थे।

प्रश्न 5.
अभिलेखशास्त्रियों की कुछ समस्याओं की सूची बनाइए।
उत्तर:
अभिलेखों के अध्ययनकर्ता तथा विश्लेषणकर्ता को अभिलेखशास्त्री कहते हैं। अपने कार्य के संपादन में अभिलेखशास्त्रियों ‘को निम्नलिखित समस्याओं का सामना करना पड़ता है

(1) अभिलेखशास्त्रियों को कभी-कभी तकनीकी सीमा का सामना करना पड़ता है। अक्षरों को हल्के ढंग से उत्कीर्ण किया जाता है जिन्हें पढ़ पाना कठिन होता है। कभी-कभी अभिलेखों के कुछ भाग नष्ट हो जाते हैं। इससे अक्षर लोप हो जाते हैं जिस कारण शब्दों/वाक्यों का अर्थ समझ पाना कठिन हो जाता है।

(2) कई अभिलेख विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं, इससे भी हम वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाते।

(3) एक सीमा यह भी रहती है कि अभिलेखों में उनके उत्कीर्ण करवाने वाले के विचारों को बढ़ा-चढ़ाकर व्यक्त किया जाता है। अतः तत्कालीन सामान्य विचारों से इनका संबंध नहीं होता। फलतः कई बार ये जन-सामान्य के विचारों और कार्यकलापों पर प्रकाश नहीं डाल पाते। अतः स्पष्ट है कि सभी अभिलेख राजनीतिक और आर्थिक इतिहास की जानकारी प्रदान नहीं कर पाते।

(4) अनेक अभिलेखों का अस्तित्व नष्ट हो गया है या अभी प्राप्त नहीं हुए हैं। अतः अब तक जो अभिलेख प्राप्त हुए हैं वे कुल अभिलेखों का एक अंश हैं।

(5) अभिलेखशास्त्रियों को अनेक सूचनाएँ अभिलेखों पर नहीं मिल पातीं। विशेष तौर पर जनसामान्य से जुड़ी गतिविधियों पर अभिलेखों में बहुत कम या नहीं के बराबर लिखा गया है।

(6) अभिलेखों में सदा उन्हीं के विचारों को व्यक्त किया जाता है जो उन्हें उत्कीर्ण करवाते हैं। ऐसे में अभिलेखशास्त्री को अत्यंत सावधानी तथा आलोचनात्मक अध्ययन से इनकी सूचनाओं को परखना जरूरी होता है।

प्रश्न 6.
मौर्य प्रशासन के प्रमुख अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। अशोक के अभिलेखों में इसमें से कौन-कौन से तत्त्वों के प्रमाण मिलते हैं?
उत्तर:
मौर्य साम्राज्य भारत में प्रथम ऐतिहासिक साम्राज्य था। मगध महाजनपद ने अन्य जनपदों पर अधिकार स्थापित कर साम्राज्य का निर्माण किया। साम्राज्य की अवधारणा चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य में फलीभूत हुई। बिंदुसार तथा सम्राट अशोक इस साम्राज्य के अन्य प्रमुख शासक रहे। मौर्य साम्राज्य के अभिलक्षणों की जानकारी हमें उस काल के ग्रंथों तथा अशोक के अभिलेखों से मिलती है। मौर्य साम्राज्य के प्रमुख अभिलक्षण निम्नलिखित प्रकार हैं

1. राजा-मौर्य राज्य भारत में प्रथम सर्वाधिक विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य था। साम्राज्य में समस्त शक्ति का स्रोत सम्राट था। वास्तव में राजा और राज्य का भेद कम रह गया था। अर्थशास्त्र में लिखा है कि ‘राजा ही राज्य’ है। वह सर्वाधिकार संपन्न (Supreme Authority) था। वह सर्वोच्च सेनापति व सर्वोच्च न्यायाधीश था।

2. मंत्रि परिषद्-चाणक्य ने कहा है, “रथ केवल एक पहिए से नहीं चलता इसलिए राजा को मंत्रियों की नियुक्ति करनी चाहिए और उनकी सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए। मंत्रिपरिषद् के सदस्यों को अमात्य क थे-प्रधानमंत्री, पुरोहित और सेनापति। समाहर्ता (वित्त मंत्री) और संधिधाता (कोषाध्यक्ष) अन्य महत्त्वपूर्ण मंत्री थे।”

3. प्रांतीय प्रशासन विस्तृत साम्राज्य को पाँच प्रांतों (राजनीतिक केंद्रों) में बाँटा हुआ था।

  • उत्तरापथ-इसमें कम्बोज, गांधार, कश्मीर, अफगानिस्तान तथा पंजाब आदि के क्षेत्र शामिल थे। इसकी राजधानी . तक्षशिला थी।
  • पश्चिमी प्रांत-इसमें काठियावाड़-गुजरात से लेकर राजपूताना-मालवा आदि के सभी प्रदेश शामिल थे। इसकी राजधानी उज्जयिनी थी।
  • दक्षिणपथ इसमें विंध्याचल से लेकर दक्षिण में मैसूर (कर्नाटक) तक सारा प्रदेश शामिल था। इसकी राजधानी सुवर्णगिरी थी।
  • कलिंग-इसमें दक्षिण-पूर्व का उड़ीसा का क्षेत्र शामिल था, जिसमें दक्षिण की ओर जाने के महत्त्वपूर्ण स्थल व समुद्री मार्ग थे। इसकी राजधानी तोशाली थी।
  • प्राशी (पूर्वी प्रदेश) इसमें मगध तथा समस्त उत्तरी भारत का प्रदेश था। इसकी राजधानी पाटलिपुत्र थी। यह प्रदेश पूर्ण रूप से सम्राट के नियन्त्रण में ही था।
    प्रांतों का शासन-प्रबन्ध राजा का प्रतिनिधि (वायसराय) करता था, जिसे कुमार या आर्यपुत्र कहते थे।

4. नगर का प्रबन्ध-मैगस्थनीज़ के अनुसार नगर का प्रशासन 30 सदस्यों की एक परिषद् करती थी, जो 6 उपसमितियों में विभाजित थी।

  • पहली समिति-यह शिल्प उद्योगों का निरीक्षण करती थी। शिल्पकारों के अधिकारों की रक्षा भी करती थी।
  • दूसरी समिति-यह विदेशी अतिथियों का सत्कार, उनके आवास का प्रबंध तथा उनकी गतिविधियों पर नजर रखने का कार्य करती थी। उनकी चिकित्सा का प्रबंध भी करती थी।
  • तीसरी समिति-यह जनगणना तथा कर निर्धारण के लिए, जन्म-मृत्यु का ब्यौरा रखती थी।
  • चौथी समिति-यह व्यापार की देखभाल करती थी। इसका मुख्य काम तौल के बट्टों तथा माप के पैमानों का निरीक्षण तथा सार्वजनिक बिक्री का आयोजन यानी बाजार लगवाना था।
  • पाँची समिति-यह कारखानों और घरों में बनाई गई वस्तुओं के विक्रय का निरीक्षण करती थी। विशेषतः यह ध्यान रखती थी कि व्यापारी नई और पुरानी वस्तुओं को मिलाकर न बेचें। ऐसा करने पर दण्ड की व्यवस्था थी।
  • छठी समिति-इसका कार्य बिक्री कर वसूलना था। जो वस्तु जिस कीमत पर बेची जाती थी, उसका दसवां भाग बिक्री कर के रूप में दुकानदार से वसला जाता था। यह कर न देने पर मृत्यु दण्ड की व्यवस्था थी।

5. असमान शासन व्यवस्था-मौर्य साम्राज्य अति विशाल साम्राज्य था। साम्राज्य में शामिल क्षेत्र बड़े विविध और भिन्न-भिन्न . प्रकार के थे। इसमें अफगानिस्तान का पहाड़ी क्षेत्र शामिल था, वहीं उड़ीसा जैसा तटवर्ती क्षेत्र भी था। स्पष्ट है कि इतने बड़े तथा विविधताओं से भरपूर साम्राज्य का प्रशासन एक-समान नहीं होगा। साम्राज्य के सभी भागों पर नियंत्रण भी समान नहीं था। मगध प्रांत व पाटलिपुत्र में अधिक नियंत्रण होगा तथा प्रांतीय राजधानियों में भी सख्त नियंत्रण होगा। परंतु अन्य भागों में नियंत्रण उतना कठोर नहीं था।

6. आवागमन की सुव्यवस्था साम्राज्य के संचालन के लिए भू-तल और नदी मार्गों से आवागमन होता था। इनकी सुव्यवस्था की जाती थी। राजधानी से प्रांतों तक पहुँचने में भी समय लगता था। अतः मार्ग में ठहरने व खान-पान की व्यवस्था की जाती थी। अशोक ने मार्गों पर सराएँ बनवाईं, कुएँ खुदवाए तथा पेड़ लगवाए।

7. धम्म महामात्र-अशोक के अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि अशोक ने धम्म नीति से अपने साम्राज्य में शांति-व्यवस्था तथा एकता बनाने का प्रयास किया। उसने लोगों में सार्वभौमिक धर्म के नियमों का प्रचार-प्रसार किया। अशोक के अनुसार, धर्म के प्रसार का लक्ष्य, लोगों के इहलोक तथा परलोक को सुधारना था। इसके लिए उसने राज्य की ओर से विशेष अधिकारी नियुक्त किए जो ‘धम्म महामात्र’ के नाम से जाने जाते थे। इन्हें व्यापक अधिकार दिए गए थे। उन्हें समाज के सभी वर्गों के कल्याण और सुख के लिए कार्य करना था।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 2 राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ

प्रश्न 7.
यह बीसवीं शताब्दी के एक सुविख्यात अभिलेखशास्त्री, डी.सी. सरकार का वक्तव्य है : भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में नहीं है : चर्चा कीजिए।
उत्तर:
सुप्रसिद्ध अभिलेखशास्त्री डी→सी→ सरकार ने मत व्यक्त किया है कि अभिलेखों से भारतीयों के जीवन, संस्कृति और . सभी गतिविधियों से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी प्राप्त होती है। अभिलेखों से मिलने वाली जानकारी का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. शासकों के नाम-अभिलेखों से हमें राजाओं के नाम का पता चलता है। साथ ही हम उनकी उपाधियों के बारे में भी जान पाते हैं। उदाहरण के लिए अशोक का नाम अभिलेखों में आया है तथा उसकी दो उपाधियों (देवनाम् प्रिय तथा पियदस्स) का भी उल्लेख मिलता है। समुद्रगुप्त, खारवेल, रुद्रदामा आदि के नाम भी अभिलेखों में आए हैं।

2. राज्य-विस्तार-उत्कीर्ण अभिलेखों की स्थापना वहीं पर की जाती थी जहाँ पर उस राजा का राज्य विस्तार होता था। उदाहरण के लिए मौर्य साम्राज्य का विस्तार जानने के लिए हमारे पास सबसे प्रमुख स्रोत अशोक के अभिलेख हैं।

3. राजा का चरित्र-ये अभिलेख शासकों के चरित्र का चित्रण करने में भी सहायक हैं। उदाहरण के लिए अशोक जनता के . बारे में क्या सोचता था। अनेक विषयों पर उसने स्वयं के विचार व्यक्त किए हैं। इसी प्रकार समुद्रगुप्त के चरित्र-चित्रण के लिए प्रयाग प्रशस्ति उपयोगी है। यद्यपि इनमें राजा के चरित्र को बढ़ा-चढ़ाकर लिखा गया है।

4. काल-निर्धारण-अभिलेख की लिपि की शैली तथा भाषा के आधार पर शासकों के काल का भी निर्धारण कर लिया जाता है।

5. भाषा व धर्म के बारे में जानकारी-अभिलेखों की भाषा से हमें उस काल के भाषा के विकास का पता चलता है। इसी प्रकार अभिलेखों पर धर्म संबंधी जानकारी भी प्राप्त होती है। उदाहरण के लिए, अशोक के धम्म की जानकारी के स्रोत उसके अभिलेख हैं। भूमि अनुदान पत्रों से भी धर्म व संस्कृति के बारे में जानकारी मिलती है।

6. कला-अभिलेख कला के भी नमूने हैं। विशेषतौर पर मौर्यकाल के अभिलेख विशाल पाषाण खंडों को पालिश कर चमकाया गया तथा उन पर पशुओं की मूर्तियाँ रखवाई गईं। ये मौर्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं।

7. सामाजिक वर्गों की जानकारी-अभिलेखों से हमें तत्कालीन वर्गों के बारे में भी जानकारी मिलती है। हमें पता चलता है कि शासक एवं राज्याधिकारियों के अलावा नगरों में व्यापारी व शिल्पकार (बुनकर, सुनार, धोबी, लौहकार, बढ़ई) आदि भी रहते थे।

8. भू-राजस्व व प्रशासन-अभिलेखों से हमें भू-राजस्व प्रणाली तथा प्रशासन के विविध पक्षों की जानकारी भी प्राप्त होती है। विशेषतौर पर भूदान पत्रों से हमें राजस्व की जानकारी मिलती है। साथ ही जब भूमि अनुदान राज्याधिकारियों को दिया जाने लगा तो धीरे-धीरे स्थानीय सामंतों की शक्ति में वृद्धि हुई। इस प्रकार भूमि अनुदान पत्र राजा की घटती शक्ति जानकारी भी देते हैं। उक्त सभी बातों के साथ हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन अभिलेखों का सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहिए। अभिलेखों की सीमाएँ भी होती हैं। विशेषतौर पर जनसामान्य से संबंधित जानकारी इन अभिलेखों में कम पाई जाती है। तथापि अभिलेखों से समाज के विविध पक्षों से काफी जानकारी मिलती है।

प्रश्न 8.
उत्तर:मौर्य काल में विकसित राजत्व के विचारों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
उत्तर:मौर्य काल में राजत्व का एक नया विचार जोर पकड़ने लगा। यह नया विचार या सिद्धांत दिव्य राजत्व का सिद्धांत था। इस सिद्धांत के तहत राजा अपने आपको ईश्वर से जोड़ने लगे। स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है कि श देवता या देवताओं से उत्पन्न बताया। इस माध्यम से वे प्रजा में अपना रुतबा बहुत ऊँचा कर लेना चाहते थे। प्रजा के दिलो-दिमागों में अपना नेतृत्व (Hegemony) स्थापित करना चाहते थे। उल्लेखनीय है कि धर्म या धार्मिक रीतियों का प्रयोग कर, स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि या दैवीय उत्पत्ति बताकर प्रजा में राजा के प्रति आस्था पैदा करना शासकों की प्राचीन काल से ही रणनीति रही थी। उत्तरवैदिक काल में शासक अपनी शक्ति को बढ़ाने के लिए यज्ञों का सहारा लेते थे। यह यज्ञ बहुत-से ब्राह्मणों द्वारा लंबे समय तक करवाए जाते थे। इन यज्ञों में राजसूय यज्ञ (राज्यारोहण पर), वाजपेय (शक्तिप्रदपेय) तथा अश्वमेध यज्ञ प्रमुख थे जिसके माध्यम से राजाओं को दैवीय शक्तियाँ प्राप्त होती थीं।

मौर्य शासक अशोक ने भी दैवीय सिद्धांत का सहारा लिया। वह अपने आपको ‘देवानाम् प्रियदर्शी’ (देवों का प्यारा) की उपाधि से विभूषित करता है। मौर्योतर काल में कुषाण शासकों ने भी बड़ी-बड़ी उपाधियों को धारण किया तथा दिव्य राजत्व को अपनाया। कुषाणों ने मध्य एशिया से मध्य भारत तक के विशाल भू-क्षेत्र पर लगभग प्रथम सदी ई→पू→ से प्रथम ई→ सदी तक शासन किया। उनके द्वारा प्रचलित दैवत्व की परिकल्पना उनके सिक्कों और मूर्तियों से बेहतर रूप में अभिव्यक्त होती है।

मथुरा (उत्तरप्रदेश) के समीप माट (Mat) के एक देवस्थान से स्थापित की गई कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

इसी प्रकार की मूर्तियाँ अफगानिस्तान में एक देवस्थान से प्राप्त हुई हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि देवस्थानों में विशाल मूर्तियों की स्थापना का विशेष उद्देश्य रहा होगा। वस्तुतः वे अपने आपको ‘देवतुल्य’ प्रस्तुत करना चाहते होंगे। उल्लेखनीय है कि कुषाण शासकों ने भारतीय धर्मों (शैव, बौद्ध, वैष्णव आदि) को अपनाया तथा इन धर्म के प्रतीकों को अपने सिक्कों पर भी खुदवाया। विम ने अपने सिक्कों पर शिव की आकृति, नंदी और त्रिशूल आदि का प्रयोग किया। कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ (Son of God) की उपाधि धारण की। ऐसा करने की प्रेरणा कुषाणों को चीनी शासकों से मिली होगी जो स्वयं को ‘स्वर्गपुत्र’ (Sons of Heaven) मानते थे।

प्रश्न 9.
वर्णित काल में कृषि के तौर-तरीकों में किस हद तक परिवर्तन हुए?
उत्तर:
600 ई→पू→ से 600 ई→ के लंबे कालखंड में भारत में अनेक परिवर्तन आए। इन परिवर्तनों का प्रमुख आधार कृषि प्रणाली का विकसित होना था। इस काल में शासक अधिक मात्रा में कर वसूल करना चाहते हैं। करों की बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए किसान उपज बढ़ाने के उपाय ढूँढने लगे। शासकों ने भी इसमें योगदान दिया। उन्होंने सिंचाई कार्यों को बढ़ावा दिया। फलतः कृषि के तौर-तरीकों में निम्नलिखित बदलाव आए

1. सिंचाई कार्य मौर्य शासकों ने खेती-बाड़ी को बढ़ाने की ओर विशेष ध्यान दिया। राज्य किसानों के लिए सिंचाई व्यवस्था/जल वितरण का कार्य करता था। मैगस्थनीज़ ने ‘इंडिका’ में लिखा है कि मिस्र की तरह मौर्य राज्य में भी सरकारी अधिकारी जमीन की पैमाइश करते थे। नहरों का निरीक्षण करते थे जिनसे होकर पानी छोटी नहरों में पहुँचता था। जूनागढ़ अभिलेख से पता चलता है कि चंद्रगुप्त मौर्य के एक गवर्नर पुष्यगुप्त ने सौराष्ट्र (गुजरात) में गिरनार के पास सुदर्शन झील पर एक बाँध बनवाया था जो सिंचाई के काम आता था। … पाँचवीं सदी में स्कंदगुप्त ने भी इसी झील का जीर्णोद्धार करवाया था। कुँओं व तालाबों से सिंचाई कर कृषि उपज बढ़ाई जाती थी। नहरों का निर्माण शासक या संपन्न लोग ही करवा पाते थे। परंतु कुओं तालाबों के निर्माण में समुदाय तथा व्यक्तिगत प्रयास भी प्रमुख भूमिका निभाते थे।

2. हल से खेती-कृषि उपज बढ़ाने का एक उपाय हल का प्रचलन था। अधिक बरसात वाले क्षेत्रों में हल के लोहे के फाल का प्रयोग प्रचलन में आया। इसकी मदद से मिट्टी को गहराई तक जोता जाने लगा। उल्लेखनीय है कि गंगा व कावेरी की घाटियों के उपजाऊ क्षेत्र में छठी सदी ई→ पू→ से लोहे वाले फाल सहित हल का प्रयोग होने लगा था। प्राचीन पालि ग्रंथों में कृषि के लिए लोहे के औजारों का उल्लेख है। अष्टाध्यायी में भी आयोविकर कुशि (लोहे की फाल) का उल्लेख है। उत्तरी भारत में इस संबंध में कुछ पुरातात्विक साक्ष्य भी मिलते हैं। इसका परिणाम कृषि क्षेत्र में वृद्धि, कृषक बस्तियों का प्रसार और उत्पादन का बढ़ना है, जिसका लाभ राज्य को भी मिला।

3. धान रोपण की विधि की शुरुआत-कृषि क्षेत्र में पैदावार बढ़ाने में एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपाय धान रोपण की शुरुआत है। भारत में धान रोपण की शुरुआत 500 ई→पू→ में स्वीकार की जाती है। धान लगाने की प्रक्रिया के लिए रोपण और रोपेति जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। सालि का तात्पर्य उखाड़कर लगाए जाने वाली जाड़े की फसलों से है। पालि ग्रंथों में इस प्रक्रिया को बीजानि पतितापेति के नाम से जाना जाता है। ज्ञातधर्म कोष में प्राकृत वाक्यांश उक्खाय निहाए का अर्थ है “उखाड़ना और । प्रतिरोपित करना” प्रतिरोपण की इस प्रणाली से पैदावार बढ़ी। इससे गाँवों में परिवर्तन आया।

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प्रश्न 10.
मानचित्र 1 और 2 की तुलना कीजिए और उन महाजनपदों की सूची बनाइए जो मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे। क्या इस क्षेत्र में अशोक के कोई अभिलेख मिले हैं?
उत्तर:
(1) अशोक के साम्राज्य में शामिल महाजनपदों के नाम-(i) अंग, (ii) मगध, (iii) काशी, (iv) कौशल, (v) वज्जि, (vi) मल्ल, (vii) चेदी (चेटी), (viii) वत्स, (ix) कुरू, (x) पांचाल, (xi) मत्स्य, (xii) शूरसेन, (xiii) अश्मक, (xiv) (rv) गांधार, (xvi) कम्बोज।

(2) अशोक के साम्राज्य में महाजनपदीय क्षेत्रों में मिले अभिलेख-लौरिया अराराज, लौरिया नंदगढ़, रामपुरवा, सहसराम, बैरार, भाबू, टोपरा, शाहबाजगढ़ी, मानसेहरा, सारनाथ, कौशाम्बी तथा कई अन्य अभिलेख मिले हैं।
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प्रश्न 11.
एक महीने के अखबार एकत्रित कीजिए। सरकारी अधिकारियों द्वारा सार्वजनिक कार्यों के बारे में दिए गए वक्तव्यों को काटकर एकत्रित कीजिए। समीक्षा कीजिए कि इन परियोजनाओं के लिए आवश्यक संसाधनों के बारे में खबरों में क्या लिखा है। संसाधनों को किस प्रकार से एकत्र किया जाता है और परियोजनाओं का उद्देश्य क्या है। इन वक्तव्यों को कौन जारी करता है और उन्हें क्यों और कैसे प्रसारित किया जाता है? इस अध्याय में चर्चित अभिलेखों के साक्ष्यों से इनकी तुलना कीजिए। आप इनमें क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?
उत्तर:
विद्यार्थी अपने अध्यापक के दिशा-निर्देश में परियोजना रिपोर्ट तैयार करें।

प्रश्न 12.
आज प्रचलित पाँच विभिन्न नोटों और सिक्कों को इकट्ठा कीजिए। इनके दोनों ओर आप जो देखते हैं उनका वर्णन कीजिए। इन पर बने चित्रों, लिपियों और भाषाओं, माप, आकार या अन्य समानताओं और असमानताओं के बारे में एक रिपोर्ट तैयार कीजिए। इस अध्याय में दर्शित सिक्कों में प्रयुक्त सामग्रियों, तकनीकों, प्रतीकों, उनके महत्त्व और सिक्कों के संभावित कार्य की चर्चा करते हुए इनकी तुलना कीजिए।
उत्तर:
संकेत-(1) आधुनिक प्रचलित 10 रुपए, 50 रुपए, 100 रुपया, 500 रुपए तथा 1000 रुपए के नोटों पर देखकर विवरण लिखें। जैसे कि भारत सरकार, रिजर्व बैंक, गवर्नर, चित्र (राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, नोट नम्बर, रिजर्व बैंक की मोहर, राष्ट्रीय चिह्न, गवर्नर क्या वचन देता है, इत्यादि। इन सारे तथ्यों के आधार पर स्वतन्त्र भारत के नोटों की विशेषताओं पर विचार करें।

(2) 1 रुपया, 2 रुपए तथा 5 रुपए के सिक्कों पर अंकित चिह्नों की तुलना उन सिक्कों से करें जो प्राचीनकालीन सिक्के अध्याय में दिखाए गए हैं।

राजा, किसान और नगर : आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ HBSE 12th Class History Notes

→ मुद्राशास्त्र-सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। प्राचीनकाल में धातु के बने सिक्के होते थे। इन सिक्कों पर पाए जाने वाले चित्रों, लिपि तथा सिक्कों की धातु का विश्लेषण किया जाता है। जिन संदर्भो में ये सिक्के पाए जाते हैं, उनका अध्ययन भी मुद्राशास्त्र में किया जाता है।

→ अभिलेख-अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु, मिट्टी के बर्तन इत्यादि जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।

→ अभिलेखशास्त्र-अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेखशास्त्र कहते हैं।

→ पंचमार्क सिक्के-चाँदी और ताँबे के आयताकार या वृत्ताकार टुकड़े बनाकर उन पर ठप्पा मारकर विभिन्न चिह्न (जैसे सूर्य, वृक्ष, मानव आदि) खोदे जाते थे। इन्हें पंचमार्क या आहत सिक्के कहते हैं।

→ धान की रोपाई धान की रोपाई उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पानी काफी मात्रा में न की रोपाई उन क्षेत्रों में की जाती है जहाँ पानी काफी मात्रा में पाया जाता है। पहले बीज अंकुरित किए जाते हैं तथा पानी से भरे खेत में पौधों की रोपाई की जाती है। इस प्रक्रिया से उपज में वृद्धि होती है।

→ गहपति-गहपति घर का मुखिया होता था। घर में रहने वाली महिलाओं, बच्चों और दासों पर उसका नियंत्रण होता था। घर से जुड़ी भूमि, पशुओं और अन्य सभी वस्तुओं का वह स्वामी होता था। कभी-कभी गहपति शब्द शहरों में रहने वाले संभ्रांत व्यक्तियों और व्यापारियों के लिए भी होता था।

→ संगम साहित्य-प्रारंभिक तमिल साहित्य को संगम साहित्य कहते हैं। दक्षिण भारत में पाण्ड्य राजाओं की राजधानी मदुरा में तमिल कवियों के सम्मेलन हुए। इन सम्मेलनों को संगम के नाम से जाना जाता है। ये तीन सम्मेलन (संगम) लगभग 300 ई→ पूर्व से 300 ई→ के बीच बुलाए गए। इन संगमों के फलस्वरूपं वृहद् संगम साहित्य की रचना हुई।

→ जातक-महात्मा बुद्ध के पूर्व जन्मों की कथाओं को जातक कहते हैं। प्रत्येक कथा एक प्रकार की लोककथा है। इसमें 549 लोककथाएँ हैं। ये पाली भाषाएँ हैं।

→ अग्रहार-अग्रहार से अभिप्राय उस भूमि से है जो अनुदान पत्रों के माध्यम से ब्राह्मणों को दी जाती थी। इस भूमि में ब्राह्मणों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा गया था।

→ तमिलकम् प्राचीन काल में भारत के सुदूर दक्षिणी क्षेत्रों को तमिलकम् नाम से जाना जाता था। इसमें तमिलनाडु तथा आंध्र व केरल के कुछ प्रदेश शामिल थे।

→ जनपद-वह भूखंड या क्षेत्र जहाँ पर कोई जन (कबीला, लोग या कुल) अपना पाँव रखता था या बस जाता था, जनपद कहलाता था। इस शब्द का प्रयोग प्राकृत और संस्कृत दोनों भाषाओं में मिलता है।

→ महाजनपद-एक बड़ा और शक्तिशाली राज्य जैसे मगध।

→ अल्पतन्त्रीय राज्य (ओली गाकी) यह एक ऐसा राज्य होता है जिसमें सत्ता कुछ गिने चुने लोगों के हाथों में होती है। उदाहरण के लिए रोम में गणतन्त्र या अल्पतन्त्र की स्थापना हुई थी।

→ दानात्मक अभिलेख (अनुदान पत्र)-धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों, भिक्षुओं आदि को दिया गया दान तथा दान के प्रमाण के रूप में प्रदान किए ताम्रपत्र को ‘अनुदान पत्र’ कहते हैं।

→ पेरिप्लस व एरीशियन-यह यूनानी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है समुद्री यात्रा। एरीथ्रियन यूनानी भाषा में लाल सागर को कहते हैं।

→ प्रतिवेदक मौर्य विशेष तौर पर अशोक के काल में रिपोर्टर (सूचना देने वाले) को प्रतिवेदक कहा जाता था। अभिलेखशास्त्री इसे संवाददाता बताते हैं।

→ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद डेढ़ हजार वर्षों का लंबा काल अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण था। इस काल में भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में अनेक विकास (Developments) हुए। सिंधु और उसकी सहायक नदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की। उत्तर भारत, दक्कन के पठार और कर्नाटक के क्षेत्रों में कृषक बस्तियों की शुरुआत हुई।

→ इसके साथ ही दक्कन और दक्षिण भारत में चरवाहा समुदाय के प्रमाण मिलते हैं। ईसा पूर्व की प्रथम सहस्राब्दी के दौरान मध्य और दक्षिण भारत में महापाषाणीय संस्कृति अस्तित्व में आई। वस्तुतः यह शवों के अंतिम संस्कार का नया तरीका था, जिसमें दफनाने के लिए बड़े-बड़े पाषाणों का प्रयोग किया जाता था। कई स्थानों पर इन शवाधानों में शवों के साथ लोहे के बने उपकरण और हथियारों को भी दफनाया गया था। इसका अर्थ था कि इन क्षेत्रों में लोहे का प्रयोग हो रहा था जो भौतिक संस्कृति के विकास में महत्त्वपूर्ण कदम था।

→ छठी शताब्दी ई→पू→ से अनेक प्रवाहों (Trends) के भी प्रमाण मिलते हैं। सम्भवतः इनमें सबसे ज्यादा मुखर आरंभिक राज्यों, साम्राज्यों और रजवाड़ों (kingdoms) का विकास है। इन राजनीतिक प्रक्रियाओं की पृष्ठभूमि में भी अनेक परिवर्तन कार्य कर रहे थे। कृषि क्षेत्र का विस्तार और उत्पादन बढ़ाने के अनेक तरीके अपनाए जा रहे थे, अर्थात् भारत में कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था की स्थापना हो रही थी और किसानों का महत्त्व बढ़ता जा रहा था। इसके साथ-साथ व्यापार और वाणिज्य का भी उदय और विकास हो रहा था। मुद्रा का प्रचलन बढ़ रहा था। फलतः उपमहाद्वीप पर नए नगरों का उत्कर्ष हुआ। वस्तुतः 600 ई→पू→ से 600 ई→ का काल ‘राजा, किसान और नगरों के उदय और उनके अन्तर्संबंधों का काल था।

→ अभिलेख मोहरों, प्रस्तर स्तंभों, स्तूपों, चट्टानों और ताम्रपत्रों (भूमि अनुदानपत्र) इत्यादि पर मिलते हैं। ये ईंटों या मूर्तियों पर भी मिलते हैं। अभिलेख का महत्त्व इसलिए भी है कि इन पर इनके निर्माताओं की उपलब्धियों, क्रियाकलापों और विचारों को उत्कीर्ण किया जाता है। अभिलेख स्थायी प्रमाण होते हैं तथा इनमें फेर-बदल नहीं किया जा सकता।

→ अशोक के अभिलेख ब्राह्मी लिपि में हैं। यह लिपि बाएँ से दाएँ लिखी जाती थी। यह आधुनिक भारतीय लिपियों की उद्गम लिपि भी है। ब्राह्मी लिपि को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेवा में एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1838 में पढ़ने (Decipher) में सफलता पाई।

→ भूमि अनुदान पत्र अभिलेखों में ही सम्मिलित किए जाते हैं। इन दान पत्रों में राजाओं, राज्याधिकारियों, रानियों, शिल्पियों, व्यापारियों इत्यादि द्वारा दिए गए धर्मार्थ धन, मवेशी, भूमि आदि का उल्लेख मिलता है। राजाओं और सामंतों द्वारा दिए गए भूमि अनुदान पत्र का विशेष महत्त्व है क्योंकि इनमें प्राचीन भारत की व्यवस्था और प्रशासन से संबंधित जानकारी मिलती है।

→ पुरातात्विक सामग्री में सिक्कों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। शासकों की राज्य सीमा, राज्यकाल, आर्थिक स्थिति तथा धार्मिक विश्वासों के संबंध में सिक्के महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। इनसे सांस्कृतिक और सामाजिक महत्त्व की जानकारी भी प्राप्त होती है। मुद्रा प्रणाली का आरंभ मानव की आर्थिक प्रगति का प्रतीक है। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र (Numismatics) कहा जाता है।

→ सबसे पहले छठी शती ई→पू→ में चाँदी और ताँबे के आयताकार या वृत्ताकार टुकड़े बनाए गए। इन टुकड़ों पर ठप्पा मारकर अनेक प्रकार के चिह्न जैसे कि सूर्य, वृक्ष, मानव, खरगोश, बिच्छु, साँप आदि खोदे हुए थे। इन्हें पंचमार्क या आहत सिक्के कहते हैं।

→ प्रत्येक महाजनपद की अपनी राजधानी (Capital) थी जिसकी किलेबंदी की जाती थी। राज्य को किलेबंद शहर, सेना और नौकरशाही के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती थी। इस काल में रचित इन धर्मशास्त्रों में शासक तथा लोगों के लिए नियमों का निर्धारण किया गया है। इन शास्त्रों में राजा को यह सलाह दी गई कि वह कृषकों, व्यापारियों और दस्तकारों से कर तथा अधिकार (Tribute) प्राप्त करे।

→ प्रारंभ में मगध की राजधानी राजगृह (राजगीर का प्राकृत नाम) थी जिसका अभिप्राय था राजा का घर (House of King)। राजगृह पहाड़ियों के बीच स्थित एक किलेबंद था। बाद में 4 शताब्दी ई→पू→ में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) मगध की राजधानी बना। पाटलिपुत्र का गंगा नदी के संपर्क मार्गों पर नियंत्रण था। उल्लेखनीय है कि छठी शताब्दी ई→पू→ से चौथी शताब्दी ई→पू→ के मध्य में 16 महाजनपदों में से मगध महाजनपद सबसे शक्तिशाली होकर उभरा।

→ अन्ततः मगध महाजनपद विस्तार करते हुए भारत में प्रथम साम्राज्य का रूप धारण कर गया। यह प्रथम साम्राज्य मौर्य साम्राज्य था जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई→पू→ में की। चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य का विस्तार उत्तर:पश्चिम में . अफगानिस्तान तथा बलूचिस्तान तक फैला हुआ था। भारतीय इतिहास का महान शासक अशोक चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र (Grandson) था जिसने कलिंग (वर्तमान ओडिशा) को जीता।

→ अशोक ने प्रजा में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा करने का प्रयास किया। सामूहिक रूप से उसकी इसी नीति को धम्म कहा गया है।

→ मौर्य राज्य भारत में प्रथम सर्वाधिक विस्तृत और शक्तिशाली साम्राज्य था। साम्राज्य में समस्त शक्ति का स्रोत सम्राट था। वास्तव में राजा और राज्य का भेद कम रह गया था। अर्थशास्त्र में लिखा है कि ‘राजा ही राज्य’ है। वह सर्वाधिकार संपन्न (Supreme Authority) था। वह सर्वोच्च सेनापति व सर्वोच्च न्यायाधीश था। सभी पदों पर वही नियुक्ति करता था।

→ अशोक के अनुसार, धर्म के प्रसार का लक्ष्य, लोगों के इहलोक तथा परलोक को सुधारना था। इसके लिए उसने राज्य की ओर से विशेष अधिकारी नियुक्त किए जो ‘धम्म महामात्र’ के नाम से जाने जाते थे।

→ मौर्य शासकों के पास एक शक्तिशाली सेना थी, जिसकी सहायता से राज्य का क्षेत्रीय विस्तार किया गया, साथ ही उस पर नियन्त्रण बनाए रखने में भी उसकी विशेष भूमिका रही। प्लिनी (Pliny) के अनुसार उनके पास 9,000 हाथी, 30,000 अश्वारोही और 6,00,000 पैदल सैनिक थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में रथ भी उनकी सेना में थे।

→ इतिहासकारों को यह जानकर भी सुखानुभूति हुई कि अशोक के अभिलेखों के संदेश दूसरे शासकों के आदेशों के बिल्कुल भिन्न थे। ये अभिलेख उन्हें बताते थे कि अशोक बहुत ही शक्तिर्शाली तथा मेहनती सम्राट था जो विनम्रता से (बिना बड़ी-बड़ी उपाधियों को धारण किए) जनता को पुत्रवत मानकर उनके नैतिक उत्थान में लगा रहा। इस प्रकार इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इन इतिहासकारों ने अशोक को प्रेरणादायक व्यक्तित्व स्वीकारा तथा मौर्य साम्राज्य को अत्यधिक महत्त्व दिया।

→ सुदूर दक्षिण में इस काल में तीन राज्यों का उदय हुआ। यह क्षेत्र तमिलकम् (इसमें आधुनिक तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश व केरल के भाग शामिल थे) कहलाता था। तीन राज्यों के नाम हैं-चोल, चेर और पाण्ड्य । दक्षिण के ये राज्य संपन्न थे तथा लंबे समय तक अस्तित्व में रहे।

→ संगम साहित्य बहुत ही विपुल -कुछ विद्वान इसे महासंग्रह कहते हैं। इस काव्य को भ्रमणशील भाट और विद्वान कवि दोनों ने लिखा। यह साहित्य चोल, चेर, पाण्ड्य शासकों तथा अनेक छोटे-मोटे राजाओं या नायकों की जानकारी देता है।

→ प्रारम्भिक चोल शासकों में कारिकाल सबसे प्रसिद्ध है। कारिकाल का अर्थ ‘जले हुए पैर वाला व्यक्ति’ होता है।

→ पाण्ड्य शासकों में सबसे महान नेडुजेलियन था। इसकी उपाधि से ज्ञात होता है कि इसने किसी आर्य (उत्तर भारत) सेना को पराजित किया। वह तलैयालंगानम् के युद्ध को जीतने के कारण बहुत प्रसिद्ध हुआ।

→ स्रोतों से जानकारी प्राप्त होती है कि शासकों ने अपने आपको देवता या देवताओं से उत्पन्न बताया। इस माध्यम से वे प्रजा में अपना रुतबा बहुत ऊँचा कर लेना चाहते थे। प्रजा के दिलो-दिमागों में अपना नेतृत्व (Hegemony) स्थापित करना चाहते थे। उल्लेखनीय है कि धर्म या धार्मिक रीतियों का प्रयोग कर, स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि या दैवीय उत्पत्ति बताकर प्रजा में राजा के प्रति आस्था पैदा करना शासकों की प्राचीन काल से ही रणनीति रही थी।
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→ कुषाण शासकों ने भारतीय धर्मों (शैव, बौद्ध, वैष्णव आदि) को अपनाया तथा इन धर्मों के प्रतीकों को अपने सिक्कों पर भी खुदवाया। विम ने अपने सिक्कों पर शिव की आकृति, नंदी और त्रिशूल आदि का प्रयोग किया। कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ (Son of God) की उपाधि धारण की।

→ कृषि व्यवस्था के उदय के आरंभ से ही उपज बढ़ाने के अनेक उपाय किए जाते रहे थे। फलतः नई फसलों को उगाना, मिट्टी को उपजाऊ बनाना, खेती में हल तथा धातु का प्रयोग इत्यादि तरीके प्रचलन में आए। फसल की सिंचाई कर उपज बढ़ाना भी प्रमुख तरीका था।

→ कृषि क्षेत्र में पैदावार बढ़ाने में एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपाय धान रोपण की शुरुआत है। भारत में धान रोपण की शुरुआत 500 ई→पू→ में स्वीकार की जाती है। धान लगाने की प्रक्रिया के लिए रोपण और रोपेति जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है।

→ गुप्तकाल में अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि सम्राटों ने धार्मिक कार्यों या परोपकार के लिए अनेक गाँव अनुदान में दिए। सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री प्रभावती गुप्त द्वारा दिए अनुदानपत्र का विवरण भी हमें प्राप्त होता है। प्रभावती ने अभिलेख में ग्राम कुटुंबिनों (गृहस्थ और कृषक), ब्राह्मणों और दंगुन गांव के अन्य निवासियों को स्पष्ट आदेश दिया।

→ भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग छठी शताब्दी ई→पू→ में विभिन्न क्षेत्रों में कई नगरों का उदय हुआ। ये नगर हड़प्पा सभ्यता के काफी समय बाद हड़प्पा क्षेत्रों से उत्तर:पूर्व में मुख्यतः गंगा-यमुना की घाटी में पैदा हुए। इनमें से अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थीं। इस काल के प्रमुख नगर तक्षशिला अस्सपुर, वैशाली, कुशीनगर, उज्जयिनी, कपिलवस्तु, मिथिला, शाकल, साकेत, चम्पा, पाटलिपुत्र आदि थे।

→ नगरों में शिल्पकारों एवं व्यापारियों की श्रेणियों या संघों का भी उल्लेख मिलता है। प्रत्येक श्रेणी का एक अध्यक्ष होता था। इन श्रेणियों में विभिन्न व्यवसायों से जुड़े कारीगर सम्मिलित होते थे। प्रमुख शिल्पकार श्रेणियाँ थीं-धातुकार (लुहार, स्वर्णकार, ताँबा, कांसा व पीतल का काम करने वाले), बढ़ई, राजगीर, जुलाहे, कुम्हार, रंगसाज, बुनकर, कसाई, मछुआरे इत्यादि। ये श्रेणियाँ अपने सदस्यों के हितों की रक्षा करती थीं।

→ तमिल व संस्कृत साहित्य तथा विदेशी वृत्तांतों से जानकारी मिलती है कि भारत में अनेक प्रकार का सामान एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाता था। इन वस्तुओं में प्रमुख थीं-नमक, अनाज, वस्त्र, लोहे का सामान, कीमती पत्थर, लकड़ी, औषधीय पौधे इत्यादि। भारत का विदेशी व्यापार रोमन साम्राज्य तक फैला हुआ था।

क्रम संख्याकालघटना का विकरण
1.लगभग 600 ई०पू०उत्तर प्रदेश और पश्चिम बिहार में लोहे का बड़े पैमाने पर प्रयोग
2.लगभभग 600 ई०पू०धान रोपण विधि, गंगा द्रोणी में नगरीकरण और महाजनपदों का उदय, आहत सिक्कों का प्रयोग
3.लगभग 500 ई०पू० से 400 ई० पू०मगध शासकों द्वारा सत्ता का सुदृढ़ीकरण करना
4.लगभग 327-325 ई०पू०सिकंदर का भारत पर आक्रमण
5.लगभग 321 ई०पू०चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण
6.268-231 ई०पू०अशोक का शासन काल
7.लगभग 200 ई०पू०मध्य एशिया से घनिष्ठ व्यापार संपर्क प्रारंभ
8.लगभग 100 ई०पू० से 200 ई०पू०उत्तर-पश्चिम में शक शासक, रोम से व्यापार
लगभग 78 ई०पू०कनिष्क का राज्यारोहण; शक संवत् आरंभ
10.लगभग 320 ई०पू०गुप्त शासन का आरंभ
11.लगभग $335-375$ ई० पू०समुद्रगुप्त का शासनकाल
12.लगभग $375-415$ ई० पू०चंद्रगुप्त II, दक्षिण में वाकाटक
13.लगभग $500-600$ ई० पू०चालुक्य (कर्नाटक में) व पल्लव (तमिलनाडु में)
14.लगभग $606-647$ ई० पू०हर्षवर्धन कन्नौज में शासक, ह्यनसांग का भारत आना।
15.1784 ईoबंगाल एशियाटिक सोसायटी का गठन
16.1838 ई०जेम्स प्रिंसेप अशोक के अभिलेख पढ़ने में सफल हुआ
17.1877 ईoअलेक्जैंडर कनिंघम द्वारा अशोक के अभिलेखों के अंक अंश का प्रकाशन
18.1886 ई०एपिग्राफिआ कर्नाटिका (Ephigraphia Carnatica) का प्रथम अंक प्रकाशित
19.1888 ई०एपिग्राफिआ इंडिका (Ephigraphia Indica) का प्रथम अंक प्रकाशित
20.1965-66 ई०डी. सी. सरकार द्वारा ‘इंडियन एपिग्राफी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी (Indian Ephigraphy and Indian Ephigraphical Glossary) का प्रकाशन

 

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HBSE 12th Class History Solutions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

Haryana State Board HBSE 12th Class History Solutions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Solutions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

HBSE 12th Class History ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता Textbook Questions and Answers

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1.
हड़प्पा सभ्यता के शहरों में लोगों को उपलब्ध भोजन सामग्री की सूची बनाइए। इन वस्तुओं को उपलब्ध कराने वाले समूहों की पहचान कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न स्थलों की खुदाई से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि इस सभ्यता के लोगों की भोजन सामग्री में निम्नलिखित वस्तुएँ या चीजें सम्मिलित थीं

  • अनाज-गेहूँ, जौ, मटर, ज्वार, बाजरा, तिल, सरसों, राई, चावल आदि।
  • पेड़-पौधों के उत्पाद-खजूर, तरबूज आदि।
  • माँस-पालतू पशुओं एवं जंगली जानवरों का।
  • दूध-पशुओं से।

भोजन सामग्री में शामिल इन वस्तुओं/चीजों को निम्नलिखित समूहों द्वारा उपलब्ध करवाया जाता था

  • किसान-शहरी आबादी को गाँवों के लोग अनाज उपलब्ध करवाते थे।
  • व्यापारी-व्यापारी समूह गाँवों से अनाज को शहरों तक पहुँचाते थे जहाँ अन्नागारों में इसे रखा जाता था।
  • पशुचारी समूह कृषक समुदायों के साथ-साथ पशुचारी समूह भी थे जो माँस और दूध उपलब्ध कराते थे।
  • आखेटक व मछुवारे–हड़प्पा क्षेत्र में आखेटक समूह भी थे जो जंगली पशु, शहद, जड़ी-बूटियाँ उपलब्ध कराते थे। मछुवारे भी भोजन की जरूरत पूरी करते थे।

प्रश्न 2.
पुरातत्वविद् हड़प्पाई समाज में सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता किस प्रकार लगाते हैं? वे कौन-सी भिन्नताओं पर ध्यान देते हैं?
उत्तर:
पुरातत्वविद् हड़प्पा सभ्यता के समाज में विद्यमान सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं का पता लगाने के लिए एक निश्चित विधि अपनाते हैं। वे शवाधानों का परीक्षण करते हैं। दूसरा खुदाई में प्राप्त हुए विलासिता संबंधी सामग्री का विश्लेषण करते हैं। इन आधारों का संक्षिप्त विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. शवाधान-हड़प्पा में मृतकों के अन्तिम संस्कार का सबसे ज्यादा प्रचलित तरीका दफनाना ही था। शव सामान्य रूप से उत्तर-दक्षिण दिशा में रखकर दफनाते थे। कब्रों में कई प्रकार के आभूषण तथा अन्य वस्तुएं भी प्राप्त हुई हैं। जैसे कुछ कब्रों में ताँबे के दर्पण, सीप और सुरमे की सलाइयाँ पाई गई हैं। कुछ शवाधानों में बहुमूल्य आभूषण और अन्य सामान मिले हैं। कुछ कब्रों में बहुत ही सामान्य सामान मिला है।

शवाधानों की बनावट से भी विभेद प्रकट होता है। कुछ कळे सामान्य बनी हैं तो कुछ कब्रों में ईंटों की चिनाई की गई है। ऐसा लगता है कि चिनाई वाली कब्रे उच्चाधिकारी वर्ग अथवा अमीर लोगों की हैं। सारांश में हम कह सकते हैं कि शवाधानों से प्राप्त सामग्री से हमें हड़प्पा के समाज की सन्तोषजनक जानकारी अवश्य प्राप्त हो जाती है।

2. विलासिता-हड़प्पा सभ्यता के नगरों से प्राप्त कलातथ्यों (Artefacts) से भी सामाजिक विभेदन का अनुमान लगाया जाता है। इन कलातथ्यों को मोटे तौर पर दो भागों में बाँटा जाता है पहले ऐसे अवशेष थे जो दैनिक उपयोग (Utility) के थे तथा दूसरे । विलासिता (Luxury) से जुड़े थे। दैनिक उपयोग की वस्तुएं हड़प्पा सभ्यता के सभी स्थलों से प्राप्त हुई हैं। दूसरा विलासिता की वस्तुओं में महँगी तथा दुर्लभ वस्तुएँ शामिल थीं। इनका निर्माण बाहर से प्राप्त सामग्री/पदार्थों से या जटिल तरीकों द्वारा किया जाता था। उदाहरण के लिए फयॉन्स (घिसी रेत या सिलिका/बालू रेत में रंग और गोंद मिलाकर पकाकर बनाए बर्तन) के छोटे बर्तन इस श्रेणी में रखे जा सकते हैं।

ये फयॉन्स से बने छोटे-छोटे पात्र संभवतः सुगन्धित द्रवों को रखने के लिए प्रयोग में लाए जाते थे। हड़प्पा के कुछ पुरास्थलों से सोने के आभूषणों की निधियाँ (पात्रों में जमीन में दबाई हुई) भी मिली हैं। उल्लेखनीय है कि जहाँ दैनिक उपयोग का सामान हड़प्पा की सभी बस्तियों में मिला है, वहीं विलासिता का सामान मुख्यतः मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े नगरों में ही मिला है जो संभवतः राजधानियाँ भी थीं। पुरातत्वविद् सामाजिक, आर्थिक स्थिति, खानपान, मकानों, विलासिता आदि भिन्नताओं पर ध्यान देते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 3.
क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं कि हड़प्पा सभ्यता के शहरों की जल निकास प्रणाली, नगर-योजना की ओर संकेत करती है? अपने उत्तर के कारण बताइए।
उत्तर:
इस तथ्य से सहमति के पर्याप्त प्रमाण हैं कि हड़प्पा सभ्यता के नगरों की जल निकासी प्रणाली नगर-योजना की ओर संकेत करती है। सारे नगर में नालियों का निर्माण नियोजित और सावधानीपूर्वक किया जाता था।

  • वास्तव में ऐसा लगता है कि नालियों तथा गलियों की संरचना पहले की गई थी तथा बाद में इनके साथ घरों का निर्माण किया जाता था। प्रत्येक घर के गंदे पानी की निकासी एक पाईप (पक्की मिट्टी के) से होती थी जो सड़क और गली की नाली से जुड़ी होती थी।
  • शहरों के नक्शों से जान पड़ता है कि सड़कों और गलियों को लगभग एक ग्रिड प्रणाली से बनाया गया था और वे एक-दूसरे को समकोण काटती थीं।
  • जल निकासी की प्रणाली बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह कई छोटी बस्तियों में भी दिखाई पड़ती है। उदाहरण के लिए लोथल में आवासों के बनाने के लिए. जहाँ कच्ची ईंटों का इस्तेमाल हुआ है वहीं नालियाँ पक्की ईंटों से बनाई गई थीं। नालियों के विषय में मैके नामक पुरातत्वविद् (अर्ली इण्डस सिविलाईजेशन) ने लिखा है, “निश्चित रूप से यह अब तक खोजी गई सर्वथा संपूर्ण प्राचीन प्रणाली है।”

प्रश्न 4.
हड़प्पा सभ्यता में मनके बनाने के लिए प्रयुक्त पदार्थों की सूची बनाइए। कोई भी एक प्रकार का मनका बनाने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(A) पदार्थ-हड़प्पा सभ्यता के लोग गोमेद, फिरोजा, लाल पत्थर, स्फटिक (Crystal), क्वार्ट्ज़ (Quartz), सेलखड़ी (Steatite) जैसे बहुमूल्य एवं अर्द्ध-कीमती पत्थरों के अति सुन्दर मनके बनाते थे। मनके व उनकी मालाएं बनाने में ताँबा, कांस्य और सोना जैसी धातुओं का भी प्रयोग किया जाता था। शंख, फयॉन्स (faience), टेराकोटा या पक्की मिट्टी से भी मनके बनाए जाते थे। इन्हें अनेक आकारों चक्राकार, गोलाकार, बेलनाकार और खंडित इत्यादि में बनाया जाता था। कुछ मनके अलग-अलग पत्थरों को जोड़कर बनाए जाते थे। पत्थर के ऊपर सोने के टोप वाले सुन्दर मनके भी पाए गए हैं।
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(B) प्रक्रिया मनके भिन्न-भिन्न प्रक्रिया से बनाए जाते थे। वस्तुतः यह प्रक्रिया पदार्थ (Material) के अनुसार होती थी। जिस प्रकार सेलखड़ी जैसे मुलायम पत्थर के मनके सरलता से बन जाते थे और ये सबसे ज्यादा संख्या में पाए गए हैं। सेलखड़ी के चूर्ण से लेप तैयार कर उसे सांचे में डालकर अनेक आकारों के मनके तैयार किए जाते थे। सेलखड़ी के सूक्ष्म मनके बनाने की कला तकनीक अभी भी पुरातत्ववेत्ताओं के लिए पहेली बनी हुई है।

कठोर पत्थरों के मनके बनाने की प्रक्रिया कठिन थी। उदाहरण के लिए पुरातत्वविदों का विचार है कि लाल इन्द्रगोपमणि (Carnelian) एक जटिल प्रक्रिया द्वारा बनाई जाती थी। इसे पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पकाकर प्राप्त किया जाता था। कठोर पत्थरों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ा जाता था। आरी से काटकर आयताकार छड़ में बदला जाता था, फिर उसके बेलनाकार टुकड़े करके पॉलिश से चमकाया जाता था। अन्त में चर्ट बरमे या कांसे के नलिकाकार बरमे से उनमें छेद किया जाता था। मनकों में छेद करने के ऐसे उपकरण चन्हदडो, लोथल, धौलावीरा जैसे स्थलों से प्राप्त हुए हैं।

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प्रश्न 5.
नीचे दिए गए चित्र को देखिए और उसका वर्णन कीजिए। शव किस प्रकार रखा गया है? उसके समीप कौन-सी वस्तुएँ रखी गई हैं? क्या शरीर पर कोई पुरावस्तुएँ हैं? क्या इनसे कंकाल के लिंग का पता चलता है?
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उत्तर:
चित्र देखकर शव के संबंध में निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले जाते हैं

  • शव एक गर्त में रखा हुआ है। यह उत्तर-दक्षिण दिशा में रखा हुआ है।
  • शव के समीप सिर की तरफ मृदभाण्ड रखे हैं, इनमें मटका, जार आदि शामिल हैं।
  • शव पर पुरावस्तुएँ हैं विशेषतः कंगन आदि आभूषण हैं। ऐसा लगता है कि ये वस्तुएँ मृतक द्वारा अपने जीवन काल में प्रयोग की गई थीं और हड़प्पाई लोगों का विश्वास था कि वह अगले जीवन में भी उनका प्रयोग करेगा।
  • शव को देखकर उसके लिंग (sex) के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। ऐसा लगता है कि यह किसी महिला का शव है।

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)

प्रश्न 6.
मोहनजोदड़ो की कुछ विशिष्टताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर-योजना प्रणाली थी। इसका संबंध विकसित हड़प्पा अवस्था (2600-1900 ई.पू.) से था। नगरों में सड़कें और गलियाँ एक योजना के अनुसार बनाई गई थीं। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाते थे। अन्य सड़कें और गलियाँ मुख्य मार्ग को समकोण पर काटती थीं जिससे नगर वर्गाकार या आयताकार खण्डों में विभाजित हो जाते थे। मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगन तथा अन्य छोटे नगरों में नगर-योजना प्रणाली में काफी समानताएँ देखने को मिलती हैं। मोहनजोदड़ो नगर में व्यापक खुदाई हुई है, इससे इस नगर की विशिष्टताओं की जानकारी मिलती है। इन विशिष्टताओं से हम अन्य नगरों की विशिष्टताओं को भी समझ सकते हैं।

मोहनजोदड़ो की कुछ विशिष्टताएँ-मोहनजोदड़ो को हड़प्पा सभ्यता का सबसे बड़ा शहरी केंद्र माना जाता है। इस सभ्यता की नगर-योजना, गृह निर्माण, मुद्रा, मोहरों आदि की अधिकांश जानकारी मोहनजोदड़ो से प्राप्त हुई है।

1. नगर दुर्ग–यह नगर दो भागों में बँटा था। एक भाग में ईंटों से बनाए ऊँचे चबतरे पर स्थित बस्ती है। इसके चारों ओर ईंटों से बना परकोटा (किला) था, जिसे ‘नगर दुर्ग’ (Citadel) कहा जाता है। ‘नगर दुर्ग’ का क्षेत्रफल निचले नगर से कम था। इसमें पकाई ईंटों से बने अनेक बड़े भवन पाए गए हैं। दुर्ग क्षेत्र में शासक वर्ग के लोग रहते थे। निचले नगर के चारों ओर भी दीवार थी। इस क्षेत्र में भी कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया था। ये चबूतरे भवनों की आधारशिला (Foundation) का काम करते थे। दुर्ग क्षेत्र के निर्माण तथा निचले क्षेत्र में चबूतरों के निर्माण के लिए विशाल संख्या में श्रमिकों को लगाया गया होगा।

2. प्लेटफार्म-इस नगर की यह भी विशेषता रही होगी कि पहले प्लेटफार्म या चबूतरों का निर्माण किया जाता होगा तथा बाद में इस तय सीमित क्षेत्र में निर्माण कार्य किया जाता होगा। इसका अभिप्राय यह हुआ कि पहले योजना बनाई जाती होगी तथा बाद में उसे योजनानुसार लागू किया जाता था। नगर की पूर्व योजना (Pre-planning) का पता ईंटों से भी लगता है। यह ईंटें पकाई हुई (पक्की) तथा धूप में सुखाई हुई होती थीं। इनका मानक (1:2:4) आकार था। इसी मानक आकार की ईंटें हड़प्पा सभ्यता के अन्य नगरों में भी प्रयोग हुई हैं।

3. गृह स्थापत्य-मोहनजोदड़ो से उपलब्ध आवासीय भवनों के नमूनों से सभ्यता के गृह स्थापत्य का अनुमान लगाया जाता है। घरों की बनावट में समानता पाई गई है। ज्यादातर घरों में आंगन (Courtyard) होता था और इसके चारों तरफ कमरे बने होते थे। ऐसा लगता है कि आंगन परिवार की गतिविधियों का केंद्र था। उदाहरण के लिए गर्म और शुष्क मौसम में आंगन में खाना पकाने व कातने जैसे कार्य किए जाते थे। ऐसा भी प्रतीत होता है कि घरों के निर्माण में एकान्तता (Privacy) का ध्यान रखा जाता था। भूमि स्तर (Ground level) पर दीवार में कोई भी खिड़की नहीं होती थी। इसी प्रकार मुख्य प्रवेश द्वार से घर के अन्दर या आंगन में नहीं झांका/देखा जा सकता था। बड़े घरों में कई-कई कमरे, रसोईघर, शौचालय एवं स्नानघर होते थे। कई मकान तो दो मंजिले थे तथा ऊपर पहुंचने के लिए सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं। मोहनजोदड़ो में प्रायः सभी घरों में कुएँ होते थे। विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि मोहनजोदड़ो नगर में लगभग सात सौ कुएँ थे।

4. दुर्ग क्षेत्र में भवन-हमने जाना कि मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और कालीबंगन जैसे नगर दो भागों में बँटे हुए थे। एक भाग कच्ची ईंटों से बने ऊँचे चबूतरे पर बना होता था तथा इसके चारों ओर मोटी दीवार होती थी। इसे दुर्ग कहा जाता है। मोहनजोदड़ो दुर्ग क्षेत्र में सार्वजनिक महत्त्व अनेक भवनों के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं

(i) विशाल स्नानागार-यह मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल है। यह ईंटों के स्थापत्य का सुन्दर नमूना है। आयताकार में बना यह स्नानागार 11.88 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.45 मीटर गहरा है। इसके उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ बनी हैं। ये सीढ़ियाँ स्नानागार के तल तक जाती हैं। यह स्नानागार पक्की ईंटों से बना है। इसे बनाने में चूने तथा तारकोल का प्रयोग किया गया था। इसके साथ ही कुआँ था जिससे इसे पानी से भरा जाता था। साफ करने के लिए इसकी पश्चिमी दीवार में तल पर नालियाँ बनी थीं। स्नानागार के तीन ओर मंडप एवं कक्ष बने हुए थे। विद्वानों का मानना है कि इस स्नानागार और भवन का प्रयोग धार्मिक समारोहों के लिए किया जाता था।
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(ii) विशाल भवन-विशाल स्नानागार के समीप ही एक विशाल इमारत के अवशेष हैं। यह भवन 69 x 23.5 मीटर आकार का है। इसके बारे में अनुमान है कि यह किसी उच्चाधिकारी (पुरोहित) का निवास स्थान रहा होगा। इसमें 33 वर्ग फुट का खुला आंगन है और इसमें तीन बरांडे खुलते हैं।

(iii) अन्नागार-मोहनजोदड़ो में स्नानागार के साथ (पश्चिम में) एक विशाल अन्नागार भी मिला है। इस अन्नागार में ईंटों से निर्मित 27 खण्ड (Blocks) हैं। इन खंडों में प्रकाश के लिए आड़े-तिरछे रोशनदान बने हुए हैं। हड़प्पा में भी इसी प्रकार का अन्नागार मिला है। इस भवन का आकार 50 x 40 मीटर है। इस भवन के बीच में सात मीटर चौड़ा गलियारा था। इसमें अनाज, कपास तथा व्यापारिक वस्तुओं का भण्डारण किया जाता था।

5. सड़कें और गलियाँ-जैसा हमने बताया कि सड़कें और गलियाँ सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मोहनजोदड़ो में निचले नगर में मुख्य सड़क 10.5 मीटर चौड़ी थी, इसे ‘प्रथम सड़क’ कहा गया है। अन्य सड़कें 3.6 से 4 मीटर तक चौड़ी थीं। गलियाँ एवं गलियारे 1.2 मीटर (4 फुट) या उससे अधिक चौड़े थे। घरों के बनाने से पहले ही सड़कों व गलियों के लिए स्थान छोड़ दिया जाता था। उल्लेखनीय है कि मोहनजोदड़ो के अपने लम्बे जीवनकाल में इन सड़कों पर अतिक्रमण (encroachments) या निर्माण कार्य दिखाई नहीं देता।

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6. नालियों की व्यवस्था-मोहनजोदड़ो नगर में नालियों का निर्माण भी बहुत सावधानीपूर्वक किया गया था। ऐसा लगता है कि नालियों तथा गलियों की संरचना पहले की गई थी तथा बाद में इनके साथ घरों का निर्माण किया गया था। प्रत्येक घर के गन्दे पानी (Waste Water) की निकासी एक पाईप (Terracotta Pipe) से होती थी जो सड़क गली की नाली से जुड़ा होता था। जल निकासी की प्रणाली बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि यह कई छोटी बस्तियों में भी दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 7.
हड़प्पा सभ्यता में शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की सूची बनाइए तथा चर्चा कीजिए कि ये किस प्रकार प्राप्त किए जाते होंगे?
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता अपने हस्तशिल्प उत्पादों के लिए विख्यात थी। हड़प्पा के लोगों ने इन शिल्प उत्पादों में महारत हासिल कर ली थी। मनके बनाना (bead-making), सीपी उद्योग (Shell Cutting Industry), धातु-कर्म (सोना-चांदी के आभूषण, ताँबा, कांस्य के बर्तन, खिलौने उपकरण आदि), तौल निर्माण, प्रस्तर उद्योग, मिट्टी के बर्तन बनाना (Pottery), ईंटें बनाना (Brick Laying), मुद्रा निर्माण (Seal-making) आदि हड़प्पा के लोगों के प्रमुख शिल्प उत्पाद थे। कई बस्तियाँ तो इन उत्पादों के लिए ही प्रसिद्ध थीं। उदाहरण के लिए चन्हुदड़ो बस्ती में मुख्यतः शिल्प उत्पादों का ही कार्य होता था। .

(A) सूची-इन उत्पादों के लिए कच्चे माल की आवश्यकता थी। कच्चे माल की सूची निम्नलिखित प्रकार की है-चिकनी मिट्टी, पत्थर, तांबा, जस्ता, कांसा, सोना, शंख, कार्नीलियन (सुन्दर लाल रंग), स्फटिक, क्वार्टज़, सेलखड़ी, लाजवर्द मणि (नीले रंग के अफगानी पत्थर), कीमती लकड़ी, कपास, ऊन, सुइयाँ, फयॉन्स, जैस्पर, चक्कियाँ आदि।

(B) माल प्राप्त करने के तरीके कच्चे माल की सूची में से कई चीजें स्थानीय तौर पर मिल जाती थीं परंतु अधिकतर; जैसे पत्थर, धातु, लकड़ी इत्यादि बाहर से मंगवाई जाती थीं। पकाई मिट्टी से बनी बैलगाड़ियों के खिलौने इस बात का संकेत हैं कि बैलगाड़ियों का प्रयोग सामान का आयात करने के लिए होता था। सिन्धु व सहायक नदियों का भी मार्गों के रूप में प्रयोग होता था। समुद्र तटीय मार्गों का इस्तेमाल भी माल लाने के लिए किया जाता था।
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1. अंतर्खेत्रीय संपर्कों से माल की प्राप्ति-हड़प्पावासी भारतीय उपमहाद्वीप व आसपास के क्षेत्रों से माल उत्पादन के लिए वस्तुएँ (कच्चा माल) प्राप्त करते थे।

1. बस्तियों की स्थापना-सिन्ध, बलूचिस्तान के समुद्रतट, गुजरात, राजस्थान तथा अफगानिस्तान तक के क्षेत्र से कच्चा माल प्राप्त करने के लिए उन्होंने बस्तियों का निर्माण किया हुआ था। इन क्षेत्रों में प्रमुख बस्तियां थीं-नागेश्वर (गुजरात), बालाकोट, शोर्तुघई (अफगानिस्तान), लोथल आदि। नागेश्वर और बालाकोट से शंख प्राप्त करते थे। शोर्तुघई (अफगानिस्तान) से कीमती लाजवर्द मणि (नीलम) आयात करते थे। लोथल के संपर्कों से भड़ौच (गुजरात) में पाई जाने वाली इन्द्रगोपमणि (Carnelian) मँगवाई जाती थी। इसी प्रकार उत्तर गुजरात व दक्षिण राजस्थान क्षेत्र से सेलखड़ी का आयात करते थे।

स्थान/बस्तीआयातित कच्चा माल
नागेश्वरशंख
बालाकोटशंख
शोर्तुघईनीलम (लाजवर्द मणि)
लोथलइन्द्रगोपमणि
दक्षिण राजस्थान व उत्तर गुजरातसेलखड़ी
खेतड़ीतांबा
दक्षिण भारतसोना

2. अभियानों से माल प्राप्ति हड़प्पा सभ्यता के लोग उपमहाद्वीप के दूर-दराज क्षेत्रों तक अभियानों (Expeditions) का आयोजन कर कच्चा माल प्राप्त करने का तरीका भी अपनाते थे। इन अभियानों से वे स्थानीय क्षेत्रों के लोगों से संपर्क स्थापित करते थे। इन स्थानीय लोगों से वे वस्तु विनिमय से कच्चा माल प्राप्त करते थे। ऐसे अभियान भेजकर राजस्थान के खेतड़ी क्षेत्र से तांबा तथा दक्षिण भारत में कर्नाटक क्षेत्र से सोना प्राप्त करते थे। उल्लेखनीय है कि इन क्षेत्रों से हड़प्पाई पुरा वस्तुओं तथा कला तथ्यों के साक्ष्य मिले हैं। पुरातत्ववेत्ताओं ने खेतड़ी क्षेत्र से मिलने वाले साक्ष्यों को गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति का नाम दिया है जिसके विशिष्ट मृदभांड हड़प्पा के मृदभांडों से भिन्न हैं।

2. दूरवर्ती क्षेत्रों से संपर्क-हड़प्पा सभ्यता के नगरों व्यापारियों का पश्चिम एशिया की सभ्यताओं के साथ संपर्क था। उल्लेखनीय है कि मेसोपोटामिया हड़प्पा सभ्यता के मुख्य क्षेत्र से बहुत दूर स्थित था फिर भी इस बात के साक्ष्य मिल रहे हैं कि इन दोनों सभ्यताओं के बीच व्यापारिक संबंध था।

1. तटीय बस्तियाँ–यह व्यापारिक संबंध समुद्रतटीय क्षेत्रों के समीप से (समुद्री मार्गों से) यात्रा करके स्थापित हुए थे। मकरान (बलूचिस्तान) तट पर सोटकाकोह बस्ती तथा सुत्कागेंडोर किलाबन्द बस्ती इन यात्राओं के लिए आवश्यक राशन-पानी प्रदान करती होगी।

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2. मगान-ओमान की खाड़ी पर स्थित रसाल जनैज (Rasal-Junayz) भी व्यापार के लिए महत्त्वपूर्ण बन्दरगाह थी। सुमेर के लोग ओमान को मगान (Magan) के नाम से जानते थे। मगान में हड़प्पा सभ्यता से जुड़ी वस्तुएँ; जैसे मिट्टी का मर्तबान, बर्तन, इन्द्रगोप के मनके, हाथी-दांत व धातु के कला तथ्य मिले हैं। हाल ही में पुरातात्विक खोजों से संकेत प्राप्त होते हैं कि हड़प्पा के लोग संभवतः ओमान (अरब प्रायद्वीप के दक्षिण-पश्चिम छोर पर स्थित) से ताँबा मँगवाते थे। हड़प्पाई कला तथ्यों (Artefacts) और ओमानी ताँबे दोनों में निकिल (Nickel) के अंशों का मिलना दोनों के सांझा उद्भव (Origin) की ओर संकेत करता है।

3. दिलमुन–फारस की खाड़ी में भी हड़प्पाई जहाज पहुँचते थे। दिलमुन (Dilmun) तथा पास के तटों पर जहाज जाते थे। दिलमुन से हड़प्पा के कलातथ्य तथा लोथल से दिलमुन की मोहरें प्राप्त हुई हैं।

4. मेसोपोटामिया-वस्तुतः दिलमुन (बहरीन के द्वीपों से बना) मेसोपोटामिया का प्रवेश द्वार था। मेसोपोटामिया के लोग सिंधु बेसिन (Indus Basin) को मेलुहा (Meluhha) के नाम से जानते थे (कुछ विद्वानों के मतानुसार मेलुहा सिंधु क्षेत्र का बिगड़ा हुआ नाम है)। मेसोपोटामिया के लेखों (Texts) में मेलुहा से व्यापारिक संपर्क का उल्लेख है। पुरातात्विक साक्ष्यों से ज्ञात हुआ है कि मेसोपोटामिया में हड़प्पा की मुद्राएँ, तौल, मनके, चौसर के नमूने (dice), मिट्टी की छोटी मूर्तियाँ मिली हैं। इसका अभिप्राय है कि हड़प्पाई लोग मेसोपोटोमिया से व्यापार संपर्क रखते थे तथा संभवतः वे यहाँ से चाँदी एवं बढ़िया किस्म की लकड़ी प्राप्त करते थे।

प्रश्न 8.
चर्चा कीजिए कि पुरातत्वविद् किस प्रकार अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं।
उत्तर:
पुरातत्वविदों को खुदाई के दौरान अनेक प्रकार के शिल्प तथ्य प्राप्त होते हैं। वे इन शिल्प तथ्यों को अन्य वैज्ञानिकों की मदद से अन्वेषण व विश्लेषण करके व्याख्या करते हैं। इस कार्य में वे वर्तमान में प्रचलित प्रक्रियाओं, विश्वासों आदि का भी सहारा लेते हैं। हड़प्पा सभ्यता के संबंध में पुरातत्वविदों के अग्रलिखित निष्कर्षों से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि वे किस प्रकार अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं

1. जीवन-निर्वाह का आधार कृषि-पुरावशेषों तथा पुरावनस्पतिज्ञों की मदद से पुरातत्वविद् हड़प्पा सभ्यता की जीविका निर्वाह प्रणाली के संबंध में निष्कर्ष निकलते हैं। उनके अनुसार नगरों में अन्नागारों का पायां जाना इस बात का प्रमाण है कि इस सभ्यता के लोगों के जीवन-निर्वाह या भरण पोषण का मुख्य आधार कृषि व्यवस्था थी। सिंधु नदी के जलोढ़ मैदानों में यहाँ के किसान अनेक फसलें उगाते थे। पुरा-वनस्पतिज्ञों (Archaeo-botanists) के अध्ययनों से इस क्षेत्र में उगाई जाने वाली अनेक फसलों की जानकारी मिली है।

सभ्यता के विभिन्न स्थलों से गेहूँ, जौ, दाल, सफेद चना, तिल, राई और मटर जैसे अनाज के दाने मिले हैं। गेहूँ की दो किस्में पैदा की जाती थीं। हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगन से गेहूँ और जौ प्राप्त हुए हैं। गुजरात में ज्वार और रागी का उत्पादन होता था। सौराष्ट्र में बालाकोट में बाजरा व ज्वार के प्रमाण मिले हैं। 1800 ई.पू. में लोथल में चावल उगाने के प्रमाण मिले हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोग सम्भवतः दुनिया में पहले थे जो कपास का उत्पादन करते । इसके साक्ष्य मेहरगढ़, मोहनजोदड़ो आदि स्थानों से मिले हैं। .

2. पशुपालन व शिकार-इसी प्रकार सभ्यता से प्राप्त शिल्प तथ्यों तथा पुरा-प्राणिविज्ञानियों (Archaeo-zoologists) के अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि हड़प्पन भेड़, बकरी, बैल, भैंस, सुअर आदि जानवरों का पालन करने लगे थे। कूबड़ वाला सांड उन्हें विशेष प्रिय था। गधे और ऊँट का पालन बोझा ढोने के लिए करते थे। ऊँटों की हड्डियाँ बड़ी मात्रा में पाई गई हैं। इसके अतिरिक्त भालू, हिरण, घड़ियाल जैसे पशुओं की हड्डियाँ भी मिली हैं। मछली व मुर्गे की हड्डियाँ भी प्राप्त हुई हैं। वे हाथी, गैंडा जैसे पशुओं से भी परिचित थे।

3. सामाजिक-आर्थिक भिन्नताओं की पहचान-पुरातत्वविद् विभिन्न प्रकार की सामग्री से विभिन्न तरीकों से यह जानने की। कोशिश करते हैं कि अध्ययन किए जाने वाले समाज में सामाजिक-आर्थिक विभेदन मौजद था या नहीं। उदाहरण के लिए हड के समाज में सामाजिक-आर्थिक स्थिति में भेद को जानने के लिए कई विधियाँ अपनाई गई हैं। शवाधानों से प्राप्त सामग्री के आधार पर इस भेद का पता लगाया जाता है। आप संभवतः मिस्र के विशाल पिरामिडों (जिनमें से कुछ हड़प्पा के समकालीन थे) से परिचित हैं। इनमें से कई राजकीय शवाधान थे जहाँ बड़ी मात्रा में धन-संपत्ति दफनाई गई थी। इसी प्रकार पुरातत्वविद् दैनिक प्रयोग तथा विलासिता से संबंधी सामग्री की पहचान कर सामाजिक-आर्थिक भिन्नता का पता लगाते थे।

4. शिल्प उत्पादन केंद्रों की पहचान-हड़प्पा के शिल्प उत्पादन केंद्रों की पहचान के लिए भी विशेष विधि अपनाई जाती है। पुरातत्वविद् किसी उत्पादन केंद्र को पहचानने में कुछ चीजों का प्रमाण के रूप में सहारा लेते हैं। पत्थर के टुकड़ों, पूरे शंखों, सीपी के ट्रकडों, तांबा, अयस्क जैसे कच्चे माल, अपूर्ण वस्तुओं, छोड़े गए माल और कडा-कर्कट आदि चीजों से उत्पादन केंद्रों की पहचान की जाती है। कारीगर वस्तुओं को बनाने के लिए पत्थर को काटते समय या शंख-सीपी को काटते हुए अनुपयोगी सामग्री छोड़ देते थे। कार्यस्थलों (Work Shops) से प्राप्त ऐसी सामग्री के ढेर होने पर अनुमान लगाया जाता है कि वह स्थल उत्पादन केंद्र रहा होगा।

5. परोक्ष तथ्यों के आधार पर व्याख्या कभी-कभार पुरातत्वविद् परोक्ष तथ्यों का सहारा लेकर वर्गीकरण करते हैं। उदाहरण के लिए कुछ हड़प्पा स्थलों पर कपड़ों के अंश मिले हैं। तथापि कपड़ा होने के प्रमाण के लिए दूसरे स्रोत जैसे मूर्तियों का सहारा लिया जाता है। किसी भी शिल्प तथ्य को समझने के लिए पुरातत्ववेत्ता को उसके.संदर्भ की रूपरेखा विकसित करनी पड़ती है। उदाहरण के लिए हड़प्पा की मोहरों को तब तक नहीं समझा जा सका जब तक उन्हें सही संदर्भ में नहीं रख पाए। वस्तुतः इन मोहरों को उनके सांस्कृतिक अनुक्रम (Cultural Sequence) एवं मेसोपोटामिया में हुई खोजों की तुलना के आधार पर ही इन्हें सही अर्थों में समझा जा सका।

निष्कर्ष व्यापक तथ्यों के अभाव, विस्तृत खुदाई न होने, लिपि न पढ़े जाने के कारण हड़प्पा सभ्यता के संबंध में पुरातत्वविदों के कई निष्कर्ष संदिग्ध बने हुए हैं। जैसे विशाल स्नानागार का संबंध आनुष्ठानिक क्रिया से था या नहीं। नारी मृण्मूर्तियों का क्या उपयोग था। साक्षरता कितनी थी। फिर भी पुरातत्वविद् उपलब्ध साक्ष्यों से इतिहास का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करते हैं।

HBSE 12th Class History Solutions Chapter 1 ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता

प्रश्न 9.
हड़प्पाई समाज में शासकों द्वारा किए जाने वाले संभावित कार्यों की चर्चा कीजिए।
उत्तर:
हड़प्पा सभ्यता के समय में राजनीतिक सत्ता का क्या स्वरूप था तथा वे क्या-क्या कार्य करते थे। इस संबंध में पुरातत्वविदों तथा इतिहासकारों में एक मत नहीं है। विशेषतौर पर हड़प्पा लिपि के नहीं पढ़ पाने के कारण यह पक्ष अभी तक अस्पष्ट है। फिर भी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि वहाँ पर शासक वर्ग अवश्य था। चाहे वह कुलीनतंत्र हो या धर्मतंत्र। ऐसा निष्कर्ष इसलिए भी निकाला जाता है कि इतने बड़े पैमाने पर नगर तथा उसमें उत्तम व्यवस्था के लिए शासक वर्ग होना जरूरी है।

इसी प्रकार अन्नागारों, विशाल भवनों, औजारों, हथियारों, मोहरों में समरूपता से लगता है कि शासक अवश्य होंगे। व्यापार को नियंत्रण करने के लिए भी कोई प्रशासन की व्यवस्था रही होगी। हड़प्पा सभ्यता के सभी साक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि हड़प्पाई समाज में शासक थे तथा उनके द्वारा किए जाने वाले संभावित कार्यों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से दिया जा सकता है

1. शासकों के द्वारा जटिल फैसले लिए जाते होंगे तथा उन्हें लागू करवाने जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य भी किए जाते होंगे। हड़प्पा स्थलों पर प्राप्त पुरावशेषों में असाधारण एकरूपता इस बात का सूचक है कि इस बारे में नियम रहे होंगे। मृदभाण्ड, मोहरें, बाट तथा ईंटों में यह असाधारण एकरूपता शासकों के आदेशों पर ही रही होगी।

2. बस्तियों की स्थापना व नियोजन का निर्णय लेना, बड़ी संख्या में ईंटों को बनवाना, शहरों में विशाल दुर्ग/दीवारें, सार्वजनिक भवन, दुर्ग क्षेत्र के लिए चबूतरे का निर्माण कार्य, लाखों की संख्या में विभिन्न कार्यों के लिए मजदूरों की व्यवस्था करना ; जैसे कार्य शासकों के द्वारा ही करवाए जाते रहे होंगे। नगरों की सारी व्यवस्था की देखभाल शासक वर्ग द्वारा की जाती थी।

3. कुछ पुरातत्वविदों का कहना है कि मेसोपोटामिया के समान हड़प्पा में भी पुरोहित शासक रहे होंगे। पाषाण की एक मूर्ति की पहचान ‘पुरोहित राजा’ के रूप में की जाती है जो एक प्रासाद महल में रहता था। लोग उसे पत्थर की मूर्तियों में आकार देकर सम्मान करते थे। यह संभावना भी व्यक्त की जाती है कि यह पुरोहित राजा धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन करते थे। यह भी कहा जाता है कि विशाल स्नानागार एक आनुष्ठानिक क्रिया के आयोजन के लिए बनवाया गया होगा। यद्यपि हड़प्पा सभ्यता की आनुष्ठानिक प्रथाओं को अभी तक ठीक प्रकार से नहीं समझा जा सका है।

4. कुछ विद्वानों का मत है कि हड़प्पाई समाज में एक राजा नहीं था बल्कि कई शासक थे जैसे मोहनजोदड़ो हड़प्पा आदि के अपने अलग-अलग शासक होते थे। वे अपने-अपने क्षेत्र में व्यवस्था को देखते थे।

5. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि हड़प्पा राज्य कांस्य युग का था तथा यह लोह युग के राज्य से भिन्न था। न इसकी स्थायी सेना थी और न स्थायी नौकरशाही। भू-राजस्व भी वसूल नहीं किया जाता था। शासक वर्ग में विभिन्न समुदायों के प्रमुख लोग शामिल थे जो आपस में मिलकर इसे चलाते थे। इन लोगों का तकनीकी, शिल्पों तथा व्यापार पर अधिकार था। ये शिल्पकारों से उत्पादन करवाते थे। दूर-दूर तक व्यापार करते थे। किसानों से अनाज शहरों तक आता था तथा इसे अन्नागारों में रखा जाता था।

6. हड़प्पा सभ्यता के काल में उभरे क्षेत्रीय, अन्तक्षेत्रीय तथा बाह्य व्यापार को सुचारू रूप से चलाने का कार्य भी शासक के हाथों में ही होगा। शासक बहुमूल्य धातुओं व मणिकों के व्यापार पर नियंत्रण रखते होंगे। इस व्यापार से उन्हें धन प्राप्त होता था। बड़े पैमाने पर शिल्प उत्पादों, माप-तोल प्रणाली, कलाओं का संचालन भी शासक करते होंगे।

स्पष्ट है कि नगर नियोजन, भवन निर्माण, दुर्ग निर्माण, निकास प्रणाली, गलियों का निर्माण, मानव संसाधन को कार्य पर लगाना, शिल्प उत्पाद, खाद्यान्न प्राप्ति, व्यापारिक कार्य, धार्मिक अनुष्ठान जैसे महत्त्वपूर्ण कार्यों का संपादन हड़प्पाई शासकों द्वारा किया जाता होगा।

ईंटें, मनके तथा अस्थियाँ : हड़प्पा सभ्यता HBSE 12th Class History Notes

→ पुरातात्विक साक्ष्य-पुरानी ऐतिहासिक वस्तुओं को पुरातात्विक साक्ष्य कहते हैं। इनमें भौतिक अवशेष; जैसे मकान, घर, इमारतें आदि तथा मृदभांड, मोहरें, औजार, सिक्के आदि सम्मिलित हैं।

→ सेलखड़ी-एक प्रकार का पत्थर जिसका प्रयोग हड़प्पा सभ्यता में मोहरें बनाने के लिए होता था।

→ कांस्य युग-इस युग का अर्थ है जब ताँबा व टिन को मिलाकर कांसा बनाया जाता था तथा इस धातु के बर्तन, औजार, उपकरण, हथियार आदि बनाए जाते थे।

→ शिल्प तथ्य-मनुष्य की कारीगरी का नमूना । पुरातत्वविद् इससे इतिहास का पुनर्निर्माण करते हैं।

→ मोहर-पत्थर या लाख अथवा अन्य किसी वस्तु का टुकड़ा। इस पर कोई आकृति बनी होती थी। इसे प्रमाणीकरण के लिए प्रयोग में लाया जाता था।

→ रेडियो कार्बन डेटिंग इसे सी-14 (कार्बन-14) भी कहते हैं। यह निर्जीव कार्बनिक पदार्थ में रेडियोधर्मी आइसोटोप को मापने की विधि है। सी-14 का आधा जीवन 5568 वर्ष तथा पूर्ण कार्बन जीवन 111,36 वर्ष होता है। मृत वस्तु में कार्बन घटता रहता है।

→ खानाबदोशी-पशुचारी और चारे की तलाश में घूमने वाले समुदायों से जुड़ी जीवन-शैली। ये एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते हैं।

→ कछारी मैदान-नदी किनारे के आस-पास वह क्षेत्र जिस पर बाढ़ के कारण नदी की गाद जमा होती है।

→ उत्खनन-प्राचीन स्थल की खुदाई करना।

→ अन्नागार-अनाज रखने के लिए भंडार गृह।

→ चित्रलिपि-जिस लिपि में चित्रों को प्रतीक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है।

→ टेराकोटा-मूर्तियाँ बनाने के लिए चिकनी मिट्टी तथा रेत का मिश्रण कर आग में पकाना। यह भूरे लाल रंग का बन जाता है।

→ मनका-पत्थर का छोटा टुकड़ा जिसके बीच में धागा पिरोने के लिए छेद होता था।

→ मेसोपोटामिया-इराक का प्राचीन नाम।

→ अग्निवेदियां कालीबंगन में पाए गए ईंटों से बने गड्ढे। इनमें जानवरों की हड्डियाँ तथा राख मिली है।

→ पारिस्थितिकी पौधों का पशुओं या मनुष्यों या संस्थाओं का पर्यावरण के संबंध में अध्ययन।

→ विवर्तनिक विक्षोभ-वह प्रक्रिया जिससे पृथ्वी के धरातल के बहुत बड़े क्षेत्र ऊपर उठ जाते हैं।

→ शमन-वे महिलाएँ या पुरुष जो जादुई तथा इलाज करने की शक्ति होने के साथ ही दूसरी दुनिया से संपर्क बनाने की सामर्थ्य का दावा करते हैं।

→ बी.सी. (B.C.)-बिफोर क्राइस्ट (Before Christ) ईसा पूर्व (ई.पू.)।

→ ए.डी. (A.D.)-ऐनो डॉमिनी (Anno-Domini) लैटिन भाषा में अभिप्राय है इन द इयर आफ लॉर्ड (In the Year of Lord) अर्थात् ईसा के जन्म के वर्ष से।

→ सी.ई. (CE.)-कॉमन एरा (Common Era) आजकल ए.डी. के बजाए सी.ई. का प्रयोग किया जाने लगा है।

→ बी.सी.ई. (BCE)-बिफोर कॉमन एरा (Before Common Era) आजकल बी.सी. (ई.पू.) के स्थान पर बी.सी.ई. का प्रयोग किया जाता है।

→ सी. (Circa)-सिरका (Circa) लैटिन भाषा का शब्द है। इसका प्रयोग अनुमानतः के अर्थ में किया जाता है।

→ बी.पी. (B.P.)-बी.पी. (Before Present) अर्थात् वर्तमान से पहले।

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में हुई खुदाई तथा नवीन नगरीय सभ्यता की घोषणा ने भारतीय इतिहास की हमारी धारणा को बदल दिया। इससे पूर्व ऋग्वेद व अन्य वैदिक साहित्य के आधार पर लगभग 15वीं सदी ई.पू. से वैदिक समाज से भारतीय इतिहास का प्रारंभ माना जाता था। शहरों के विषय में यह विचार था कि भारत में इनका उद्भव 6वीं सदी ई.पू. में गंगा-यमुना की द्रोणी से हुआ। हड़प्पा सभ्यता की खोज ने इस धारणा को पूर्णतः बदल दिया। ऐसा इसलिए हुआ कि अब जिन नगरों व सभ्यता का पता चला वह लगभग 2500 ई.पू. के थे। इनका विशाल क्षेत्र सिंधु व सहायक नदियों तथा उससे बाहर तक फैला हुआ था। पुरातत्वविदों की दृष्टि से इस नगरीय सभ्यता के विशिष्ट पहचान बिंदु थे-ईंटें (पक्की व कच्ची), कीमती व अर्द्धकीमती पत्थर के मनके, मानव व पशुओं की अस्थियाँ, मोहरें आदि। उल्लेखनीय है कि नई बस्तियों की खोजों, खुदाइयों तथा अनुसंधानों ने इस सभ्यता के संबंध में हमारे ज्ञान में वृद्धि की है।

आज भी नए-नए स्थलों की खोज हो रही है और हो सकता है कि भविष्य में और भी नए-नए कला तथ्यों (Artefacts) के प्रकाश में आने पर हड़प्पावासियों के बारे में हमारे विचारों में बदलाव आए। प्रस्तुत अध्याय में इन प्रथम नगरों की कहानी के विविध पक्षों पर प्रकाश डाला गया है। हम इन शहरी केंद्रों की आर्थिक और सामाजिक संस्थाओं को समझने का प्रयास करेंगे। अध्याय में हम यह जान पाएँगे कि पुरातत्वविद् प्राप्त शिल्प तथ्यों का विश्लेषण किस प्रकार करते हैं। साथ ही हम यह भी जानेंगे कि नई सामग्री (Material) तथा तथ्य (Data) मिलने पर किस प्रकार इतिहास की स्थापित अवधारणाओं (exisiting notions) में परिवर्तन आता है।

→ हड़प्पा की खोज के बाद अब तक इस सभ्यता से जुड़ी लगभग 2800 बस्तियों की खोज की जा चुकी है। इन बस्तियों की विशेषताएँ हडप्पा से मिलती हैं। विद्वानों (सरजॉन मार्शल) ने इस सभ्यता को “सिंध घाटी की सभ्यता” का नाम दिया क्योंकि शुरू में बहुत-सी बस्तियाँ सिंधु घाटी और उसकी सहायक नदियों के मैदानों में पाई गई थीं।

→ वर्तमान में पुरातत्ववेत्ता इसे “हड़प्पा की सभ्यता” कहना पसंद करते हैं। यह नामकरण इसलिए उचित है कि इस संस्कृति से संबंधित सर्वप्रथम खुदाई हड़प्पा में हुई थी। अन्य स्थानों की खुदाई से भी सभ्यता के वही लक्षण प्राप्त हुए जो हड़प्पा से प्राप्त हुए थे।

→ यद्यपि परिपक्व हड़प्पा सभ्यता का केंद्र स्थल सिन्ध और पंजाब में (मुख्यतः सिंधु घाटी में) दिखाई पड़ता है, तथापि यह सभ्यता बलूचिस्तान, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जम्मू, उत्तरी राजस्थान, गुजरात तथा उत्तरी महाराष्ट्र तक फैली हुई थी अर्थात् इसका फैलाव उत्तर में जम्मू से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी के मुहाने तक और पश्चिम में बलूचिस्तान से लेकर उत्तर-पूर्व में मेरठ तक का था। यह सारा क्षेत्र त्रिभुज के आधार का था। इसका पूरा क्षेत्रफल लगभग 1,299,600 वर्ग किलोमीटर आंका जाता है। हड़प्पा सभ्यता का विस्तार इसकी समकालीन मिस्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताओं से काफी बड़ा था।

→ पूर्ण विकसित सभ्यता का समय लगभग 2600 ई.पू. से 1900 ई.पू. माना जाता है। इस सभ्यता के पूर्ण विकसित रूप से पहले तथा बाद में भी इसका काल माना जाता है। विकसित स्वरूप को अलग दर्शाने के लिए इन्हें आरंभिक हड़प्पा (Early Harappan) तथा उत्तर हड़प्पा (Late Harappan) नाम दिया जाता है।

→ प्राक हड़प्पा काल में सिंधु क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न कृषक समुदायों में सांस्कृतिक परम्पराओं में समानता लगती है। इन छोटी-छोटी परंपराओं के मेल से एक बड़ी परंपरा प्रकट हुई। परंतु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि ये समुदाय कृषक व पशुचारी थे। कुछ शिल्पों में पारंगत थे। इनकी बस्तियाँ सामान्यतः छोटी थीं तथा कोई भी बड़ी इमारतें नहीं थीं। कुछ प्राक हड़प्पा बस्तियों का परित्याग भी हुआ तथा कुछ स्थलों पर जलाये जाने के भी प्रमाण मिले हैं। तथापि यह स्पष्ट लगता है कि हड़प्पा सभ्यता का आविर्भाव लोक संस्कृति के आधार पर हुआ।

→ नगरों में अन्नागारों का पाया जाना इस बात का प्रमाण है कि इस सभ्यता के लोगों के जीवन-निर्वाह या भरण पोषण का मुख्य आधार कृषि व्यवस्था थी।

→ उपलब्ध साक्ष्यों से कृषि तकनीक से संबंधित कुछ निष्कर्ष निकाले गए हैं। उदाहरण के लिए बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के हल का नमूना मिला है। बहावलपुर से भी ऐसा नमूना मिला है। कालीबंगन (राजस्थान) में प्रारंभिक हड़प्पा काल के खेत को जोतने के प्रमाण मिले हैं। शोर्तुघई (उत्तरी अफगानिस्तान) से भी जुते हुए खेत (Plough and field) प्राप्त हुए हैं। पक्की मिट्टी से बनाए वृषभ (बैल) के खिलौनों के साक्ष्य तथा मोहरों पर पशुओं के चित्रों से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे बैलों का खेतों की जुताई के लिए प्रयोग करते थे।

→ संभवतः लकड़ी के हत्थों में लगाए गए पत्थर के फलकों (Stone blades) का प्रयोग फसलों को काटने के लिए किया जाता था। धातु के औजार (तांबे की हँसिया) भी मिले हैं परंतु महंगी होने की वजह से इसका प्रयोग.क्रम होता होगा।

→ सभ्यता से प्राप्त शिल्प तथ्यों तथा पुरा-प्राणिविज्ञानियों (Archaeo-zoologists) के अध्ययनों से ज्ञात हुआ है कि हड़प्पन भेड़, बकरी, बैल, भैंस, सुअर आदि जानवरों का पालन करने लगे थे। कूबड़ वाला सांड उन्हें विशेष प्रिय था।

→ हड़प्पा सभ्यता की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी। इसका संबंध विकसित हड़प्पा अवस्था (2600-1900 ई.पू.) से था। नगरों में सड़कें और गलियाँ एक योजना के अनुसार बनाई गई थीं। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाते थे। अन्य सड़कें और गलियाँ मुख्य मार्ग को समकोण पर काटती थीं जिससे नगर वर्गाकार या आयताकार खण्डों में विभाजित हो जाते थे।

→ सड़कें और गलियाँ सीधी होती थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। मोहनजोदड़ो में निचले नगर में मुख्य सड़क 10.5 मीटर चौड़ी थी, इसे ‘प्रथम सड़क’ कहा गया है।

→ अन्य सड़कें 3.6 से 4 मीटर तक चौड़ी थीं। जिस प्रकार मोहनजोदड़ो में गृहों का निर्माण नियोजित तथा सावधानीपूर्वक किया गया था, उसी प्रकार सारे नगर में नालियों का निर्माण भी बहुत सावधानीपूर्वक किया गया था।

→ मोहनजोदड़ो का सबसे महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक स्थल विशाल स्नानागार है। यह ईंटों के स्थापत्य का सुन्दर नमूना है। आयताकार में बना यह स्नानागार 11.88 मीटर लम्बा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.45 मीटर गहरा है। इसके उत्तर और दक्षिण में सीढ़ियाँ बनी हैं। ये सीढ़ियाँ स्नानागार के तल तक जाती हैं। यह स्नानागार पक्की ईंटों से बना है।

→ पुरातत्ववेत्ता किसी सभ्यता में विद्यमान सामाजिक-आर्थिक भेदभाव को जानने के लिए कई प्रकार के अवशेषों का प्रमाण के तौर पर प्रयोग करते हैं। कब्रों में पाई जाने वाली सामग्री इसमें प्रमुख होती है जिनसे इस प्रकार के भेदभाव का पता चलता है।

→ हड़प्पा के लोगों ने शिल्प उत्पादों में महारत हासिल कर ली थी। मनके बनाना, सीपी उद्योग, धातु-कर्म (सोना-चांदी के आभूषण, ताँबा, कांस्य के बर्तन, खिलौने उपकरण आदि), तौल निर्माण, प्रस्तर उद्योग, मिट्टी के बर्तन बनाना, ईंटें बनाना, मुद्रा निर्माण आदि हड़प्पा के लोगों के प्रमुख शिल्प उत्पाद थे। कई बस्तियाँ तो इन उत्पादों के लिए ही प्रसिद्ध थीं।

→ हड़प्पा सभ्यता के लोग गोमेद, फिरोजा, लाल पत्थर, स्फटिक (Crystal), क्वार्ट्ज़ (Quartz), सेलखड़ी (Steatite) जैसे . बहुमूल्य एवं अर्द्ध-कीमती पत्थरों के अति सुन्दर मनके बनाते थे। मनके व उनकी मालाएं बनाने में ताँबा, कांस्य और सोना जैसी धातुओं का भी प्रयोग किया जाता था। शंख, फयॉन्स (faience), टेराकोटा या पक्की मिट्टी से भी मनके बनाए जाते थे।

→ हल्की चमकदार सतह वाली सफेद रंग की आकर्षक मोहरें (Seals) हड़प्पा सभ्यता के लोगों का उच्चकोटि का योगदान कही जा सकती हैं। सेलखड़ी की वर्गाकार व आयताकार मुद्राएँ सभी सभ्यता स्थलों पर मिली हैं।

→पुरातत्वविद् किसी उत्पादन केंद्र को पहचानने में कुछ चीजों का प्रमाण के रूप में सहारा लेते हैं। पत्थर के टुकड़ों, पूरे शंखों, सीपी के टुकड़ों, तांबा, अयस्क जैसे कच्चे माल, अपूर्ण वस्तुओं, छोड़े गए माल और कूड़ा-कर्कट आदि चीजों से उत्पादन केंद्रों की पहचान की जाती है। कारीगर वस्तुओं को बनाने के लिए पत्थर को काटते समय या शंख-सीपी को काटते हुए अनुपयोगी सामग्री छोड़ देते थे।

→ हड़प्पा सभ्यता के लोग अपने उत्पादों के लिए विविध प्रकार का कच्चा माल प्रयोग में लाते थे। शिल्प उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल में शामिल वस्तुएँ थीं-चिकनी मिट्टी, पत्थर, तांबा, जस्ता, कांसा, सोना, शंख, कार्नीलियन (सुन्दर लाल रंग), स्फटिक, क्वार्टज, सेलखड़ी, लाजवर्द मणि (नीले रंग के अफगानी पत्थर), कीमती लकड़ी, कपास, ऊन इत्यादि। इनमें से कई चीजें स्थानीय तौर पर मिल जाती थीं परंतु अधिकतर; जैसे पत्थर, धातु, लकड़ी इत्यादि बाहर से मंगवाई जाती थीं।

→ हड़प्पा सभ्यता के नगरों/व्यापारियों का पश्चिम एशिया की सभ्यताओं के साथ संपर्क था। उल्लेखनीय है कि मेसोपोटामिया हड़प्पा सभ्यता के मुख्य क्षेत्र से बहुत दूर स्थित था फिर भी इस बात के साक्ष्य मिल रहे हैं कि इन दोनों सभ्यताओं के बीच व्यापारिक संबंध था। हड़प्पा की मोहरों पर चित्रों के माध्यम से लिखावट है। मुद्राओं के अतिरिक्त ताम्र उपकरणों व पट्टिकाओं, मिट्टी की लघु पट्टिकाओं, कुल्हाड़ियों, मृदभांडों आभूषणों, अस्थि छड़ों और एक प्राचीन सूचनापट्ट पर भी हड़प्पा लिपि के कई नमूने प्राप्त हुए हैं। उल्लेखनीय है कि यह लिपि अभी तक पढ़ी न जा सकने के कारण रहस्य बनी हुई है।

→ हड़प्पा सभ्यता की एक अन्य विशेषता माप और तौल व्यवस्था में समरूपता का पाया जाना था। दूर-दूर तक फैली . बस्तियों में एक ही प्रकार के बाट-बट्टे पाए गए हैं। हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने तौल की इस प्रणाली से आपसी व्यापार और विनिमय को नियन्त्रित किया होगा।

→ मोहनजोदड़ो से प्राप्त विशाल भवन को ‘राजप्रासाद’ का नाम दिया जाता है। यद्यपि विशाल इमारत में अन्य कोई अद्भुत अवशेष नहीं मिले हैं। इसी प्रकार मोहनजोदड़ो से प्राप्त पत्थर की प्रतिमा प्राप्त हुई है। इसे ‘पुरोहित-राजा’ का नाम दिया जाता रहा है। व्हीलर महोदय ने तो इस आधार पर हड़प्पा की शासन प्रणाली को ‘धर्मतन्त्र’ नाम दिया है।

→ हड़प्पा सभ्यता के पतन के बारे में अनेक व्याख्याएँ दी जाती हैं। जलवायु परिवर्तन, नदियों में बाढ़ व भूकम्प या नदियों का सूख जाना या मार्ग बदलना इसके कारण बताए जाते हैं। इसी प्रकार कुछ विद्वानों ने बर्बर आक्रमणों को सभ्यता के अवसान का कारण बताया है। हाल ही में सभ्यता-क्षेत्र में पर्यावरणीय-असन्तुलन (Environmental Imbalances) से जोड़कर परिवर्तनों की व्याख्या प्रस्तुत की है।

→ मार्शल ने भारतीय पुरातत्व को महत्त्वपूर्ण दिशा प्रदान की। भारत में वह पहला पुरातत्वविद् था। वह यूनान तथा क्रीट के अनुभव भी अपने साथ लेकर आया था। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि वह न केवल कनिंघम की तरह ही अद्भुत खोज करना चाहता था बल्कि वह दैनिक जीवन की पद्धतियों को भी जानना चाहता था। मार्शल ने पुरा स्थल की स्तर विन्यास (Stratigraphy) पर ध्यान न देकर सारे टीले को समान आकार की क्षैतिज इकाइयों में उत्खनन करवाया।

→ 1980 के दशक के बाद हड़प्पा-पुरातत्व में अन्तर्राष्ट्रीय रुचि लगातार बढ़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप तथा बाहर के पुरातत्वविद् .. सांझे रूप से हड़प्पा व मोहनजोदड़ो में कार्यरत हैं। ये लोग आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का प्रयोग करके मिट्टी, पत्थर, धातु, पादप (Plant)तथा पशुओं के अवशेषों को प्राप्त करने के लिए सतहों के अन्वेषण एवं प्राप्त तथ्यों के प्रत्येक सूक्ष्म हिस्से के विश्लेषण में लगे हैं।

→ एक मोहर पर एक पुरुष देवता को योगी की मुद्रा में दिखाया गया है। इसके दाईं ओर हाथी तथा बाघ एवं बाईं ओर गैंडा तथा भैंसा हैं। पुरुष देवता के सिर पर दो सींग हैं। पुरातत्वविदों ने इस देवता को ‘आद्य शिव’ की संज्ञा दी है।

→ एक मोहर में एक शृंगी पशु उत्कीर्णित है। यह घोड़े जैसा पशु है, जिसके सिर के बीच में एक सींग निकला हुआ है। यह कल्पित तथा संश्लिष्ट लगता है। ऐसा बाद में हिन्दू धर्म के अन्य देवता (नरसिंह देवता) के बारे में कहा जा सकता है।
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काल-रेखा

हड़प्पाई पुरातत्व के विकास के प्रमुख चरण
19 वीं सदी 1875हड़प्पा की मोहर पर कनिंघम की रिपोर्ट
20 वीं सदी 1921दयाराम साहनी द्वारा हड़प्पा की खोज एवं माधो स्वरूप वत्स द्वारा हड़प्पा में खुदाई का आरंभ राखालदास बनर्जी द्वारा मोहनजोदड़ो की खोज
1922सर जॉन मार्शल द्वारा नवीन सभ्यता की घोषणा
1924मोहनजोदड़ो में उत्खननों का प्रारंभ
1925क्रीलर महोदय द्वारा हड़प्पा में खुदाई
1946एस. आर. राव द्वारा लोथल में खुदाई का आरंभ
1955बी.बी. लाल तथा बी. के थापर द्वारा कालीबंगन में उत्खननों का आरंभ
1960एम.आर. मुगल द्वारा बहावलपुर में उत्खनन व अन्वेषण शुरू
1974जर्मन-इतालवी संयुक्त दल द्वारा मोहनजोदड़ो में सतह-अन्वेषणों का कार्य शुरू
1980अमेरिकी दल द्वारा हड़प्पा में उत्खनन शुरू
1986धौलावीरा में आर. एस. बिष्ट द्वारा खुदाई कार्य आरंभ
1990हड़प्पाई पुरातत्व के विकास के प्रमुख चरण

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HBSE 10th Class Home Science Solutions in English Medium

  • Chapter 1 Principles of Growth and Development
  • Chapter 2 Role of Books, Music, Rhymes, Games, Radio etc.
  • Chapter 3 Play
  • Chapter 4 Resources Available in Family
  • Chapter 5 Money Management
  • Chapter 6 Consumer Education
  • Chapter 7 Nutrients
  • Chapter 8 Meal Planning
  • Chapter 9 Food Hygiene and Methods of Storage of Food
  • Chapter 10 Care of Clothes
  • Chapter 11 Quality Check of Apparel

HBSE 10th Class Home Science Question Paper Design

Class: 10th
Subject: Home Science
Paper: Annual or Supplementary
Marks: 60
Time: 3 Hrs

1. Weightage to Objectives:

ObjectiveKUATotal
Percentage of Marks404218100
Marks24251160

2. Weightage to Form of Questions:

Forms of QuestionsESAVSAOTotal
No. of Questions3591229
Marks Allotted1515181260
Estimated Time60404436180

3. Weightage to Content:

Units/Sub-UnitsMarks
1. Principles of Growth and Development8
2. Role of Books, Music, Rhymes, Games, Radio etc.2
3. Play5
4. Resources Available in Family5
5. Money Management4
6. Consumer Education4
7. Nutrients7
8. Meal Planning6
9. Food Hygiene and Methods of Storage of Food8
10. Care of Clothes8
11. Quality Check of Apparel3
Total60

4. Scheme of Sections:

5. Scheme of Options: Internal Choice of 1 Essay Type Question

6. Difficulty Level:
Difficult: 10% Marks
Average: 50% Marks
Easy: 40% Marks

Abbreviations: K (Knowledge), U (Understanding), A (Application), E (Essay Type), SA (Short Answer Type), VSA (Very Short Answer Type), O (Objective Type)

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HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. प्रदूषकों के परिवहित एवं विसरित होने के माध्यम के आधार पर प्रदूषण को निम्नलिखित प्रकार में वर्गीकृत किया जाता है-
(A) वायु प्रदूषण
(B) जल प्रदूषण
(C) भूमि प्रदूषण
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. भारत में जल का कितने प्रतिशत (%) भाग प्रदूषित हो चुका है?
(A) लगभग 20%
(B) लगभग 40%
(C) लगभग 70%
(D) लगभग 90%
उत्तर:
(C) लगभग 70%

3. गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रतिदिन कितने लीटर मल-जल डाला जाता है?
(A) 4 अरब लीटर
(B) 6 अरब लीटर
(C) 8 अरब लीटर
(D) 10 अरब लीटर
उत्तर:
(B) 6 अरब लीटर

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

4. किस नगर में वाहनों से कार्बन मोनोक्साइड अधिक पैदा होती है?
(A) शिमला में
(B) दिल्ली में
(C) कुल्लू में
(D) अमृतसर में
उत्तर:
(B) दिल्ली में

5. निम्नलिखित में से मानव-जनित प्रदूषक का उदाहरण है-
(A) बैक्टीरिया
(B) ज्वालामुखी राख
(C) खनन
(D) उल्कापात
उत्तर:
(C) खनन

6. निम्नलिखित में से नैसर्गिक प्रदूषक का उदाहरण है
(A) ज्वालामुखी राख
(B) खनन
(C) परमाणु विस्फोट
(D) रासायनिक प्रक्रियाएँ
उत्तर:
(A) ज्वालामुखी राख

7. अम्लीय वर्षा जल का pH मान होता है
(A) 5 से 2.5
(B) 5 से 7.5 के बीच
(C) 7.5 से अधिक
(D) 7.5 से कम
उत्तर:
(A) 5 से 2.5

8. विश्व जैव-विविधता दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है? ।
(A) 22 अप्रैल
(B) 25 जून
(C) 22 मई
(D) 1 दिसम्बर
उत्तर:
(C) 22 मई

9. ओजोन परत के क्षरण के लिए सर्वाधिक उत्तरदायी गैस है-
(A) कार्बन-डाइऑक्साइड
(B) ऑक्सीजन
(C) क्लोरो-फ्लोरो कार्बन
(D) सल्फर-डाइऑक्साइड
उत्तर:
(C) क्लोरो-फ्लोरो कार्बन

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

10. डेसीबल इकाई है-
(A) वायुताप की
(B) वायुदाब की
(C) शोर के स्तर की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) शोर के स्तर की

11. हमारे वायुमंडल में कितने प्रतिशत कार्बन-डाइऑक्साइड गैस विद्यमान है?
(A) 21 प्रतिशत
(B) 78 प्रतिशत
(C) 0.01 प्रतिशत
(D) 0.03 प्रतिशत
उत्तर:
(D) 0.03 प्रतिशत

12. वायु प्रदूषण के प्रमुख स्रोत हैं-
(A) उद्योग व कारखाने
(B) खनन
(C) जीवाश्म ईंधन का दहन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

13. किस प्रकार के प्रदूषण के कारण श्वसन व तंत्रिका प्रणाली संबंधी अनेक बीमारियाँ होती हैं?
(A) भू-प्रदूषण
(B) शोर-प्रदूषण
(C) वायु-प्रदूषण
(D) जल-प्रदूषण
उत्तर:
(C) वायु-प्रदूषण

14. कोहरा मानव स्वास्थ्य के लिए ……………… सिद्ध होता है
(A) लाभकारी
(B) अत्यंत घातक
(C) हानिकारक एवं लाभकारी दोनों
(D) न हानिकारक, न लाभकारी
उत्तर:
(B) अत्यंत घातक

15. ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा देने वाले स्रोत हैं
(A) सायरन
(B) लाउडस्पीकर
(C) तीव्र चालित मोटर-वाहन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. भारत के कई बड़े शहरों एवं महानगरों में कौन-सा प्रदूषण अधिक खतरनाक हैं?
(A) जल प्रदूषण
(B) भू-प्रदूषण
(C) ध्वनि प्रदूषण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) ध्वनि प्रदूषण

17. धूम्र कुहरा संबंधित होता है-
(A) जल प्रदूषण से
(B) भू प्रदूषण से
(C) वायु प्रदूषण से
(D) शोर प्रदूषण से
उत्तर:
(C) वायु प्रदूषण से

18. वायु प्रदूषण से वायुमंडल में किस गैस की मात्रा बढ़ती है?
(A) ऑक्सीजन की
(B) नाइट्रोजन की
(C) कार्बन-डाइऑक्साइड की
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) कार्बन-डाइऑक्साइड की

19. कृषि/खेती में रासायनिक पदार्थों को डालने से किस प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है?
(A) भू-प्रदूषण को
(B) शोर-प्रदूषण को
(C) वायु प्रदूषण को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) भू-प्रदूषण को

20. किस नगर में वाहनों से कार्बन मोनोक्साइड अधिक पैदा होती है?
(A) शिमला में
(B) दिल्ली में
(C) कुल्लू में
(D) अमृतसर में
उत्तर:
(B) दिल्ली में

21. निम्नलिखित में से मानव-जनित प्रदूषक का उदाहरण है-
(A) बैक्टीरिया
(B) ज्वालामुखी राख
(C) खनन
(D) उल्कापात
उत्तर:
(C) खनन

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

22. निम्नलिखित में से नैसर्गिक प्रदूषक का उदाहरण है-
(A) ज्वालामुखी राख
(B) खनन
(C) परमाणु विस्फोट
(D) रासायनिक प्रक्रियाएँ
उत्तर:
(A) ज्वालामुखी राख

B. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दें

प्रश्न 1.
ओजोन परत को पतला करने वाली गैस कौन-सी है?
उत्तर:
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन।

प्रश्न 2.
शोर का स्तर मापने की इकाई क्या है?
अथवा
ध्वनि की उच्चता मापने की इकाई का क्या नाम है?
उत्तर:
डेसीबल।

प्रश्न 3.
अम्लीय वर्षा किस प्रदूषण से होती है?
उत्तर:
वायु प्रदूषण से।

प्रश्न 4.
मदा लवणता का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
नहरी सिंचाई का अत्यधिक उपयोग।

प्रश्न 5.
पर्यावरण दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
5 जून को।

प्रश्न 6.
ओज़ोन गैस के कारण कौन-सी झिल्ली नष्ट हो जाती है?
उत्तर:
श्लेष्मिक झिल्ली।

प्रश्न 7.
वायुमंडल में ऑक्सीजन कितने प्रतिशत होती है?
उत्तर:
लगभग 21 प्रतिशत।

प्रश्न 8.
वायुमंडल में नाइट्रोजन की मात्रा कितने प्रतिशत होती है?
उत्तर:
लगभग 78 प्रतिशत।

प्रश्न 9.
वायु में सबसे अधिक प्रतिशत में कौन-सी गैस होती है?
उत्तर:
नाइट्रोजन।

प्रश्न 10.
हम श्वसन क्रिया में कौन-सी गैस छोड़ते हैं?
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड।

प्रश्न 11.
पृथ्वी का सुरक्षा कवच किसे कहा जाता है?
उत्तर:
ओजोन परत को।

प्रश्न 12.
विश्व की किसी एक प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संस्था का नाम बताएँ।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)।

प्रश्न 13.
विश्व ओजोन दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
16 दिसम्बर को।

प्रश्न 14.
भोपाल गैस त्रासदी दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
2 दिसम्बर को।

प्रश्न 15.
वायु प्रदूषण के स्रोतों को कितने भागों में बाँटा जाता है?
उत्तर:
दो भागों में।

प्रश्न 16.
हमारे चारों ओर जो प्राकृतिक, भौतिक व सामाजिक आवरण है, क्या कहलाता है?
उत्तर:
पर्यावरण।

प्रश्न 17.
कौन-सी गैस अम्लीय वर्षा का प्रमुख कारण है?
उत्तर:
सल्फर डाइऑक्साइड।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

प्रश्न 18.
रेफ्रिजरेटर एवं एयर कंडीशनर्स के प्रयोग से वायुमण्डल में किस गैस की मात्रा बढ़ती है?
उत्तर:
क्लोरो-फ्लोरो कार्बन की।

प्रश्न 19.
भूमि के गुणों का हास होना क्या कहलाता है?
उत्तर:
भू-निम्नीकरण।

प्रश्न 20.
वायु प्रदूषण के दो स्रोतों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. कोयला, पेट्रोल व डीजल का जलना
  2. घरेलू कूड़ा-कर्कट।

प्रश्न 21.
विश्व पर्यावरण संरक्षण दिवस प्रतिवर्ष कब मनाया जाता है?
उत्तर:
26 नवम्बर को।

प्रश्न 22.
एक प्रमुख ग्रीनहाउस गैस का नाम लिखें।
उत्तर:
कार्बन-डाइऑक्साइड (CO)।

प्रश्न 23.
हमारे आसपास का वातावरण कैसा होना चाहिए?
उत्तर:
हमारे आसपास का वातावरण स्वच्छ व शांतिमय होना चाहिए।

प्रश्न 24.
वायु-प्रदूषण का कोई एक प्राकृतिक स्रोत बताएँ।
उत्तर:
ज्वालामुखी।

प्रश्न 25.
ध्वनि प्रदूषण का कोई एक प्राकृतिक स्रोत बताएँ।
उत्तर:
आसमान में बिजली का कड़कना।

प्रश्न 26.
झबआ जिला किस राज्य में स्थित है?
उत्तर:
मध्य प्रदेश।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वायु का संघटन लिखिए।
अथवा
हमारे वायुमंडल में कौन-कौन-सी मुख्य गैसें उपस्थित हैं?
उत्तर:
भौतिक दृष्टि से वायु विभिन्न गैसों का सम्मिश्रण है। वायु के संघटन में निम्नलिखित प्रमुख गैसें होती हैं-

गैसेंआयतन (% में)गैसेंआयतन (% में)
नाइट्रोजन78.03नियोन0.0018
ऑक्सीजन20.99हीलियम0.0005
ऑर्गन0.93क्रिप्टॉन0.0001
कार्बन-डाइऑक्साइड0.03जेनॉन0.000005
हाइड्रोजन0.01ओजोन0.0000001

प्रश्न 2.
पर्यावरण कितने प्रकार के होते हैं? नाम बताएँ।
उत्तर:
पर्यावरण मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं-

  1. प्राकृतिक या भौतिक पर्यावरण इसमें हमारे चारों ओर की वस्तुएँ; जैसे भूमि, नदियाँ, पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मौसम, जलवायु आदि शामिल होते हैं।
  2. सामाजिक पर्यावरण-इसमें घर, गलियाँ, स्कूल, रीति-रिवाज, परंपराएँ, कानून, व्यापारिक प्रतिष्ठान आदि शामिल होते हैं।

प्रश्न 3.
वायु-प्रदूषण (Air Pollution) क्या है?
उत्तर:
जब वायु में निश्चित मात्रा में अधिक विषैली और हानिकारक गैसें तथा धूलकण मिल जाते हैं, तो उसे वायु-प्रदूषण (Air Pollution) कहते हैं।

प्रश्न 4.
ध्वनि-प्रदूषण क्या है?
उत्तर:
जब ध्वनि अवांछनीय हो या कानों और मस्तिष्क में हलचल करे, तो उसे ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं। यह एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है जो मानव के जीवन पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

प्रश्न 5.
जल-प्रदूषण कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
जल-प्रदूषण मुख्यतः पाँच प्रकार का होता है-

  1. पृथ्वी तल पर जल-प्रदूषण
  2. पृथ्वी के अन्दर जल-प्रदूषण
  3. नदी जल-प्रदूषण
  4. झीलों, झरनों व तालाबों का जल-प्रदूषण
  5. समुद्रीय जल-प्रदूषण।

प्रश्न 6.
मृदा-प्रदूषण के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
मृदा-प्रदूषण के दो कारण निम्नलिखित हैं-

  1. भूमि में रासायनिक पदार्थों; जैसे जस्ता, कीटनाशक, रासायनिक खाद को डालने से मृदा प्रदूषित हो जाती है।
  2. उद्योगों के कूड़े-कर्कट में बहुत-से हानिकारक रासायनिक तत्त्व होते हैं, जो वायु के द्वारा मिट्टी में पहुँचकर उसे प्रदूषित कर देते हैं।

प्रश्न 7.
भू-निम्नीकरण के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. अति-पशुचारण
  2. अत्यधिक खनन क्रिया
  3. अत्यधिक सिंचाई क्रिया।

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प्रश्न 8.
ध्वनि प्रदूषण से क्या-क्या हानियाँ होती हैं?
उत्तर:

  1. मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
  2. चिड़चिड़ापन, बहरापन, तनाव व सिर दर्द के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
  3. श्रवण क्षमता स्थायी रूप से समाप्त हो जाती है।

प्रश्न 9.
जल-प्रदूषण के स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:

  1. औद्योगिक अपशिष्ट
  2. घरेलू वाहित जल
  3. कृषि अपशिष्ट
  4. तापीय दूषित जल
  5. रेडियोधर्मी अपशिष्ट
  6. खनिज तेल का रिसाव
  7. वायुमण्डलीय कण आदि।।

प्रश्न 10.
पर्यावरण संरक्षण से संबंधित भारत की किन्हीं तीन संस्थाओं (संस्थानों) के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून-1986
  2. राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान (NEERI), नागपुर 1958
  3. वन शोध संस्थान, देहरादून-1906।

प्रश्न 11.
ग्रीन हाउस प्रभाव से आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
ग्रीन हाउस प्रभाव एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी के वातावरण में उपस्थित कार्बन-डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन .. ऑक्साइड तथा मीथेन जैसी ग्रीन हाउस गैसें पृथ्वी के तापमान को बढ़ाती हैं।

प्रश्न 12.
अम्लीय वर्षा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
औद्योगिक इकाइयों की विभिन्न उत्पादन क्रियाओं से निकली गैसों; जैसे कार्बन-डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड आदि का जलवाष्प के साथ मिलकर वर्षा के रूप में गिरना अम्लीय वर्षा कहलाती है।

प्रश्न 13.
धूम्र कुहरा क्या है?
उत्तर:
नगरीय एवं औद्योगिक क्षेत्रों में वायुमण्डल की निचली परत में भारी मात्रा में विद्यमान प्रदूषित गैसें और प्रदूषक तत्त्व जब सामान्य रूप से पड़ने वाले कोहरे से मिल जाते हैं तो धूम्र कुहरा पैदा हो जाता है जोकि मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत घातक सिद्ध होता है।

प्रश्न 14.
वायु-प्रदूषण के अप्राकृतिक स्रोत कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:

  1. जीवाश्म ईंधन का दहन
  2. खनन
  3. औद्योगिक प्रक्रम
  4. परिवहन या यातायात के साधन
  5. धूम्रपान
  6. रेडियोधर्मिता आदि।

प्रश्न 15.
ग्रीन हाउस प्रभाव को कम करने के उपाय बताएँ।
उत्तर:

  1. जीवाश्म ईंधन का कम उपयोग करना
  2. अधिक से अधिक पौधे रोपण करना
  3. क्लोरो-फ्लोरो कार्बन के प्रयोग को प्रतिबंधित करना
  4. पर्यावरण संतुलन बनाए रखने हेतु सहयोग करना या पर्यावरण के प्रति जागरूक रहना।

प्रश्न 16.
भौतिक वातावरण (Physical Environment) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भौतिक वातावरण को प्राकृतिक वातावरण भी कहते हैं, क्योंकि इसमें हमारे चारों ओर उपस्थित घटकों या वस्तुओं को शामिल किया जाता है। जैसे-हवा, पानी, भूमि, पेड़-पौधे, मौसम, जलवायु, आकाश, अशु-पक्षी, जीव-जन्तु आदि।

प्रश्न 17.
प्रदूषक (Pollutants) किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब पर्यावरणीय तत्त्वों; जैसे पानी, हवा, भूमि आदि में कुछ अवांछनीय पदार्थ मिल जाते हैं तो इन अवांछनीय पदार्थों से पर्यावरणीय तत्त्व प्रदूषित हो जाते हैं। इन पर्यावरणीय तत्त्वों को दूषित करने वाले अवांछनीय पदार्थों को प्रदूषक कहा जाता है। उदाहरण के लिए, कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ, घरेलू कूड़ा-कर्कट और वाहनों से निकलने वाला धुआँ आदि।

प्रश्न 18.
जल प्रदूषण क्या है?
उत्तर:
सारे जीव-जंतुओं के जीवित रहने के लिए जल का लगातार मिलते रहना बहुत आवश्यक है। जल में घुलनशील व अघुलनशील अशुद्धियों या पदार्थों के मिल जाने से जल का दूषित होना जल-प्रदूषण कहलाता है।

प्रश्न 19.
प्रदूषण की कोई दो परिभाषाएँ लिखें।
उत्तर:
1. ई०पी० ओडम के अनुसार, “प्रदूषण से अभिप्राय हमारे जल, हवा और जमीन में भौतिक, रासायनिक और जीव-विज्ञान में आने वाले परिवर्तन हैं जो कि जीवन और आवश्यक नस्लों पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।”

2. टी० जी० मैक्लालिन के अनुसार, “मनुष्य ने व्यर्थ पदार्थ और अतिरिक्त ऊर्जा का जो सिलसिला वातावरण में । आरम्भ किया है, वह प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य और वातावरण को हानि पहुँचाने वाला है।”

प्रश्न 20.
पर्यावरण प्रदूषण को कितने वर्गों में बाँटा गया है?
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण मुख्यतः दो वर्गों में बाँटा गया है-

  1. प्रत्यक्ष पर्यावरण प्रदूषण-यह वह प्रदूषण है जिसका प्रभाव पेड़-पौधों, प्राणी और जीव-जन्तुओं (जैवमंडल) पर प्रत्यक्ष रूप से पड़ता है।
  2. अप्रत्यक्ष पर्यावरण प्रदूषण-यह वह प्रदूषण है जिसका प्रभाव जैवमंडल पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है।

प्रश्न 21.
मृदा-प्रदूषण क्या है?
उत्तर:
मनुष्य के हस्तक्षेप एवं दुरुपयोग द्वारा जब मृदा में ऐसे भौतिक, जैविक एवं रासायनिक परिवर्तन हो जाएँ जिनसे उसकी वास्तविक गुणवत्ता एवं उत्पादकता का ह्रास हो जाए, तो उसे भूमि या मृदा-प्रदूषण कहते हैं।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के साधनों या उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के साधन या उपाय निम्नलिखित हैं-

  1. फैक्ट्रियों की चिमनियाँ काफी ऊँची होनी चाहिएँ ताकि धुआँ और कई अन्य गैसें वातावरण को प्रदूषित न कर सकें।
  2. कारों, बसों, ट्रकों आदि से निकलने वाले धुएँ को रोकने के लिए इनमें नए यन्त्र लगाकर वातावरण को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है।
  3. गंदगी के ढेरों को इकट्ठे नहीं होने देना चाहिए, क्योंकि इनमें से निकलती हुई बदबू वातावरण को प्रदूषित करती है।
  4. औद्योगिक स्थान आबादी से दूर होने चाहिएँ ताकि लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ने से रोका जा सके।
  5. घनी जनसंख्या में सफाई का ध्यान रखना चाहिए ताकि वातावरण को दूषित होने से बचाया जा सके।
  6. पेड़-पौधे अधिक-से-अधिक लगाए जाने चाहिएँ।
  7. मनुष्य और जीव-जंतुओं के मृतक शरीरों को जलाने का ठीक प्रबंध करना चाहिए।

प्रश्न 2.
अम्लीय वर्षा के क्या कारण हैं?
उत्तर:
कोयला तथा खनिज तेल जैसे जीवाश्म ईंधनों के जलने से उत्पन्न धुएँ में 3 से 4 प्रतिशत तक गंधक की मात्रा होती है। चिमनियों से धुएँ के रूप में जब यह गंधक वायुमंडल में मिलती है तो सल्फ्यूरिक एसिड बनकर वायु को प्रदूषित करती है। ये ईंधन पूरी तरह से नहीं जलते उनसे कार्बन मोनोऑक्साइड निकलती है जो जल को प्रदूषित करती है। कारखानों से निकलकर सल्फ्यूरिक एवं नाइट्रोजन ऑक्साइड वायु में उपस्थित जलवाष्प से मिलकर क्रमशः सल्फ्यूरिक एवं नाइट्रिक एसिड में बदल जाते हैं। फिर यही एसिड अम्ल वर्षा (Acid Rain) के रूप में पुनः धरातल पर पहुँच जाते हैं।

प्रश्न 3.
गरीबी का भूख से क्या रिश्ता है? वर्णन करें।
उत्तर:
गरीबी-यह वह मजबूरी है जिसमें व्यक्ति अपने या अपने परिवार के लिए दो वक्त का खाना नहीं जुटा पाता। योजना आयोग राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर गरीबी के विस्तार का आकलन करता रहा है। गरीबी का स्वरूप गाँव या शहर में एक जैसा होता है। गरीबी एक अभिशाप है जिसमें जीवन जीना भी एक अभिशाप जैसा होता है। यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसके दलदल में फँसने पर बाहर निकलने के लिए व्यक्ति हाथ-पैर मारता रहता है।

भूख-स्वस्थ रहने के लिए दो वक्त की रोटी न मिल पाना भूख कहलाती है। गरीबी और भूख एक सिक्के के दो पहलू हैं, क्योंकि गरीबी के अनुपात और भूखे लोगों के प्रतिशत में विशेष अंतर नहीं होता, क्योंकि जिस आय से गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है वह न्यूनतम जरूरतें पूरी करती हो। ऐसा आवश्यक था परन्तु अब खाद्यान्न के प्रति व्यक्ति की बढ़ती हुई उपलब्धता से भी गरीबी और भूख के कम होने का पता चलता है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

प्रश्न 4.
ध्वनि प्रदूषण को रोकने के कोई चार उपाय बताएँ।
उत्तर:
ध्वनि प्रदूषण को रोकने के कोई चार उपाय निम्नलिखित हैं-

  1. रिहायशी बस्तियों की तरफ मोटरों, कारों और ट्रकों का यातायात बन्द कर देना चाहिए।
  2. जहाँ शोर-प्रदूष। हो वहाँ रिहायशी बस्तियाँ नहीं बनने देनी चाहिएँ। बस्तियों में और सड़कों के साथ-साथ नीम और अशोक वृक्ष लगाने चाहिएँ।
  3. ध्वनि-प्रदूषण को कम करने के लिए कानून बनाना चाहिए ताकि इस तरह से प्रदूषण पैदा करने वाले को कानून के दायरे में सजा दी जा सके।
  4. बड़े-बड़े उद्योग, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे आवासीय क्षेत्रों से संतुलित दूरी पर होने चाहिएँ।

प्रश्न 5.
मृदा अपरदन के प्रमुख कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
मृदा अपरदन के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. वर्षा ऋतु में नदियों में बाढ़ आने से उनका जल-स्तर बढ़ जाता है तथा नदियों का जल, कृषि और पशुचारण के क्षेत्र में प्रवेश कर मिट्टी का अपरदन करता है।
  2. ढालू भूमि में पानी का बहाव तीव्र होने के कारण मिट्टी की ऊपरी सतह बह जाती है।
  3. वनस्पति-विहीन क्षेत्रों में हवा के कारण मिट्टी का उत्तरी आवरण बह जाता है या हवा द्वारा उड़ा लिया जाता है।
  4. अधिक पशुचारण के कारण पशुओं द्वारा वनस्पति या घास की जड़ें कमजोर होकर उन्हें हानि पहुँचाती हैं, जिससे मिट्टी खोखली होकर बह जाती है।
  5. एक खेत में बार-बार एक ही फसल बोने से मिट्टी के आवश्यक खनिज तत्त्व नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी असन्तुलित हो जाती है।
  6. स्थानान्तरी कृषि में जंगलों को साफ करके कृषि करने से भी मिट्टी के कटाव को बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 6.
ध्वनि प्रदूषण के प्राकृतिक व मानवीय स्रोत बताएँ।
अथवा
ध्वनि प्रदूषण के अप्राकृतिक स्रोत कौन-कौन से हैं?
अथवा
शोर प्रदूषण के कौन-कौन से स्रोत हैं?
उत्तर:
ध्वनि प्रदूषण के स्रोत दो प्रकार के हैं-

  1. प्राकृतिक स्त्रोत-ध्वनि के प्राकृतिक स्रोतों से अभिप्राय ज्वालामुखी फटना, बिजली कड़कना, बादलों का गरजना, आंधी-तूफान, लहरों की आवाज, तेज गति की पवनें इत्यादि शामिल हैं।
  2. मानवीय स्रोत-औद्योगिक मशीनें, स्वचालित वाहन, डाइनामाइट विस्फोट, युद्धाभ्यास, पुलिस द्वारा चलाई गोलियाँ, लाउडस्पीकर्स, रेडियो, बैंड-बाजे, आतिशबाजी, भवन निर्माण इत्यादि मानवीय स्रोत को दर्शाता है।

प्रश्न 7.
अम्लीय वर्षा के क्या दुष्प्रभाव हैं?
उत्तर:
अम्तीय वर्षा के दुष्प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  1. मिट्टी में अम्लीयता बढ़ जाती है।
  2. मिट्टी के खनिज व पोषक तत्त्व समाप्त हो जाते हैं।
  3. मिट्टी की उत्पादकता कम हो जाती है।
  4. पेय जल भण्डार दूषित हो जाते हैं।
  5. आँखों में जलन, श्वसन एवं त्वचा संबंधी अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
  6. इसका वनों पर भी बुरा असर पड़ता है।

प्रश्न 8.
जल-प्रदूषण के प्रमुख दुष्प्रभाव या दुष्परिणाम बताएँ।
अथवा
जल-प्रदूषण से क्या-क्या हानि हो सकती है?
उत्तर:
जल-प्रदूषण के दुष्प्रभाव या दुष्परिणाम निम्नलिखित हैं-

  1. दूषित जल पीने से हमें पीलिया, हैजा, मियादी बुखार आदि अनेक बीमारियाँ हो जाती हैं।
  2. दूषित जल में जल-जीवों के लिए खुराक की कमी होने के कारण इनकी संख्या में कमी आ जाती है।
  3. वनस्पति एवं कृषि पर भी जल-प्रदूषण का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। दूषित जल पेड़-पौधों की जड़ों को नष्ट कर देता है और उनका विकास रुक जाता है।
  4. जल-प्रदूषण से जैव-विविधता का संकट व पारिस्थितिकीय असंतुलन उत्पन्न होता है। इससे विभिन्न जीवों की भोज्य श्रृंखला प्रभावित होती है।

प्रश्न 9.
हमारा वातावरण किन-किन कारणों से प्रदूषित हो रहा है?
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं-

  1. आवश्यकता से अधिक प्राकृतिक संसाधनों का दोहन।
  2. बढ़ती जनसंख्या।
  3. शहरीकरण एवं औद्योगीकरण।
  4. रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाइयों का अधिक मात्रा में प्रयोग।
  5. वनों की निरंतर कटाई।
  6. बढ़ती प्राकृतिक आपदाएँ।
  7. पर्यावरण संतुलन के प्रति लोगों में जागरुकता का अभाव आदि।

प्रश्न 10.
वायु-प्रदूषण के प्रमुख कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
वायु को अशुद्ध करने वाले कारण लिखें।
उत्तर:
वायु-प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  1. तंबाकू का उपयोग विभिन्न प्रकार से धूम्रपान करने के लिए किया जाता है। धूम्रपान से वायुमंडल में धुआँ लगातार फैलता रहता है जो वायु को प्रदूषित करता है।
  2. कारखानों एवं वाहनों द्वारा छोड़े गए धुएँ के कारण वायु प्रदूषित होती है।
  3. कीटनाशक तथा उर्वरक पदार्थ वायु में मिल जाते हैं और लटकते कणों के रूप में वहीं मौजूद रहते हैं। ये भी वायु को प्रदूषित करते हैं।
  4. खुले में घरेलू कूड़ा फेंकने से भी वायु प्रदूषित होती है।
  5. ‘लकड़ी, ईंधन, कूड़ा, पटाखे और अन्य पदार्थों को जलाने से वायु-प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है।
  6. तेलशोधक, धातुशोधक तथा रासायनिक उद्योगों आदि से निकलने वाली जहरीली गैसें वायु को दूषित करती हैं।

प्रश्न 11.
प्रदूषित जल की रोकथाम के किन्हीं चार उपायों का वर्णन कीजिए। अथवा जल को प्रदूषित होने से कैसे रोका जा सकता है?
उत्तर:
प्रदूषित जल की रोकथाम के उपाय निम्नलिखित हैं-
(i) प्रकृति प्रदूषित जल को धूप, हवा और गर्म मौसम द्वारा साफ करती है। घरेलू और औद्योगिक जल एक तालाब में इकट्ठा कर लिया जाता है। इसमें काई और बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, जो जहरीले पदार्थों को खा जाते हैं। यह जल प्रयोग करने के योग्य हो जाता है। इस जल को बिना किसी खतरे के कृषि में प्रयोग किया जा सकता है। जल में रहने वाली मछलियाँ भी जल को शुद्ध करने में सहायता करती हैं।

(ii) रासायनिक पदार्थ; जैसे फिटकरी, चूना और पोटैशियम परमैंगनेट, क्लोरीन आदि का प्रयोग करके जल को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है। फिटकरी अशुद्ध जल को नीचे बिठा देती है। चूना जल के भारीपन को दूर करता है। पोटैशियम परमैंगनेट, क्लोरीन जल के सूक्ष्म जीवाणुओं को समाप्त कर देती हैं।

(iii) कीटनाशक दवाइयों और खादों को समय के अनुसार प्रयोग में लाकर और कम-से-कम मात्रा में प्रयोग करके जल को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है।

(iv) जल को प्रदूषित होने से रोकने के लिए सख्त कानून का होना बहुत जरूरी है। इसके साथ-साथ सामाजिक और औद्योगिक इकाइयाँ बहते हुए जल में व्यर्थ पदार्थ न फेंकें, जिससे जल को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है।

प्रश्न 12.
पर्यावरण के बचाव (संरक्षण) हेतु हमारी क्या भूमिका होनी चाहिए?
अथवा
पर्यावरण संरक्षण के मुख्य उपाय बताएँ।
अथवा
वातावरण को प्रदूषित होने से बचाने के उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
पर्यावरण का बचाव करना किसी एक व्यक्ति का दायित्व न होकर संपूर्ण मानव जाति का दायित्व है। इसके बचाव या संरक्षण हेतु हमें निम्नलिखित उपाय करने चाहिएँ-

  1. हमें घरेलू कूड़े-कर्कट को कूड़ेदान या उचित स्थान पर ही डालना चाहिए।
  2. हमें पॉलिथीन के लिफाफों का उपयोग कम-से-कम करना चाहिए।
  3. जंगलों और वन्य-जीवों के संरक्षण हेतु हमें वृक्षों को नहीं काटना चाहिए।
  4. हमें पानी को व्यर्थ में बहने नहीं देना चाहिए।
  5. वातावरण से मेल रखने वाले उत्पादों को ही उपयोग में लाना चाहिए।
  6. अधिक-से-अधिक वृक्षारोपण कर पर्यावरण के संरक्षण हेतु योगदान देना चाहिए।
  7. जीव-जन्तुओं के मृतक शरीरों को दबाने के लिए उचित स्थान का प्रबंध करना चाहिए।
  8. फैक्ट्रियों की चिमनियाँ काफी ऊँची होनी चाहिएँ, ताकि धुआँ और अन्य विषैली गैसें वातावरण को प्रदूषित न कर सकें।
  9. पर्यावरण के संरक्षण हेतु लोगों को जागरूक करना चाहिए।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जल-प्रदूषण (Water Pollution) की विस्तृत व्याख्या कीजिए।
अथवा
भारत में जल-प्रदूषण पर एक टिप्पणी लिखिए।
अथवा
जल-प्रदूषण क्या है? इसके कारण तथा रोकथाम के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जल-प्रदूषण (Water Pollution)-सारे जीव-जंतुओं के जीवित रहने के लिए जल का साफ-सुथरा और लगातार मिलते रहना बहुत आवश्यक है। जल में घुलनशील व अघुलनशील अशुद्धियों या चीजों के मिल जाने से जल का दूषित होना जल-प्रदूषण कहलाता है।

जल-प्रदूषण के कारण (Causes of Water Pollution)-जल-प्रदूषण के कारण निम्नलिखित हैं-
(i) मल प्रवाह और घर के कूड़ा-कर्कट से लगभग 75% जल प्रदूषित होता है। बहते हुए जल की अपेक्षा खड़ा जल जल्दी प्रदूषित होता है। इसमें से बदबू आनी शुरू हो जाती है।

(ii) उद्योगों के फालतू रासायनिक पदार्थों को बहते हुए जल में बहा दिया जाता है ताकि इनसे छुटकारा पाया जा सके। ये रासायनिक पदार्थ जल को जहरीला बनाते हैं और जल में रह रहे जानवरों के लिए खतरा पैदा करते हैं।

(iii) कीटनाशक दवाइयाँ तेज रसायन पदार्थ होती हैं, जो कीड़े मारने के लिए प्रयोग में लाई जाती हैं। साधारणतया किसानों द्वारा इनका प्रयोग आवश्यकता से अधिक किया जाता है। खेतों का जल जिसमें कीटनाशक दवाइयाँ मिली होती हैं, बहकर झीलों, तालाबों, नहरों और नदियों में चला जाता है और उनके जल को प्रदूषित कर देता है।

(iv) मैल निवारक से अभिप्राय उस चीज से है, जो सफाई का कार्य करती है, जिसमें साधारण साबुन भी आ जाता है। मैल निवारक में फॉस्फोरस होने के कारण जल प्रदूषित होता है।

(v) आज के युग में खेती की पैदावार को बढ़ाने के लिए किसानों द्वारा प्रायः रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाता है। इन खादों में नाइट्रेट और फॉस्फोरस की मात्रा अधिक होती है। खेतों में सिंचाई और वर्षा के कारण ये खादें बहकर। नदियों और तालाबों में मिल जाती हैं और उनके जल को दूषित कर देती हैं।

प्रदूषित जल की रोकथाम के उपाय (Control Measures of Water Pollution)-जल को दूषित होने से रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-
(i) प्रकृति प्रदूषित जल को धूप, हवा और गर्म मौसम द्वारा साफ करती है। कर का जल और औद्योगिक जल एक तालाब में इकट्ठा कर लिया जाता है। इसमें काई और बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं, जो जहरीले पदार्थों को खा जाते हैं। यह जल प्रयोग करने के योग्य हो जाता है। इस जल को बिना किसी खतरे के कृषि में प्रयोग किया जा सकता है। जल में रहने वाली मछलियाँ भी जल को शुद्ध करने में सहायता करती हैं।

(ii) रसायन पदार्थ; जैसे फिटकरी, चूना और पोटैशियम परमैंगनेट, क्लोरीन आदि का प्रयोग करके जल को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है। फिटकरी अशुद्ध जल को नीचे बिठा देती है। चूना जल के भारीपन को दूर करता है। – पोटैशियम रोगों के रोगाणओं को नष्ट करती है। क्लोरीन द्वारा भी जल को साफ किया जा सकता है।

(iii) कीटनाशक दवाइयों और खादों को समय के अनुसार प्रयोग में लाकर और कम-से-कम मात्रा में प्रयोग करके जल को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है।

(iv) जल को प्रदूषित होने से रोकने के लिए सख्त कानून का होना जरूरी है। इसके साथ-साथ नगरपालिकाएँ और औद्योगिक इकाइयाँ बहते हुए जल में कम-से-कम व्यर्थ पदार्थ फेंकें, जिससे जल को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 12 भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में चयनित कुछ मुद्दे एवं समस्याएँ

प्रश्न 2.
ध्वनि या शोर प्रदूषण (Noise Pollution) पर विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) क्या है? इसके प्रभावों तथा रोकथाम के उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
शोर प्रदूषण के कारण, प्रभाव और उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ध्वनि या शोर प्रदूषण (Noise Pollution)-शोर शब्द लेटिन भाषा में से लिया गया है जिसको “Nausea” कहते हैं जिसका अर्थ पेट की परेशानी के कारण उल्टी का आना है। परन्तु आजकल न चाहने वाली आवाज, जिसका कोई मूल्य न हो और असीमित आवाज जैसे नामों के साथ इसकी व्याख्या की जाती है। शोर चाहे थोड़ा हो या ज्यादा, यह मनुष्य के संवेग और व्यवहार पर प्रभाव डालता है। जब ध्वनि अवांछनीय हो या कानों और मस्तिष्क में हलचल करे, तो उसे ध्वनि-प्रदूषण कहते हैं। यह एक ऐसा अवांछनीय परिवर्तन है, जो मानव के जीवन पर हानिकारक प्रभाव डालता है।

ध्वनि-प्रदूषण के कारण (Causes of Noise Pollution)-ध्वनि-प्रदूषण के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-

  • कारखानों में मशीनें बहुत अधिक ध्वनि पैदा करती हैं जिससे शोर-प्रदूषण फैलता है।
  • यातायात वाहनों (मोटरगाड़ियों, रेलों, जहाजों) के द्वारा शोर प्रदूषण होता है।
  • शादियों, पर्यों में उपयोग किए जाने वाले लाउडस्पीकर एवं पटाखे आदि शोर प्रदूषण के कारण हैं।

ध्वनि-प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Noise Pollution)-ध्वनि-प्रदूषण के प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं
1. सुनने की शक्ति पर प्रभाव-ध्वनि-प्रदूषण के कारण मनुष्य की सुनने की शक्ति कम हो जाती है। विशेषतौर पर बुनाई वाले कर्मियों पर इसका सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ता है।

2. स्वास्थ्य पर प्रभाव-ध्वनि-प्रदूषण के कारण केवल सुनने पर ही प्रभाव नहीं पड़ता, बल्कि कई प्रकार की मानसिक बीमारियाँ . भी लग जाती हैं; जैसे कि परेशानी, तनाव, नींद का न आना, मानसिक थकावट, दिमाग आदि पर प्रभाव पड़ता है।

ध्वनि-प्रदूषण की रोकथाम के उपाय (Control Measures of Noise Pollution)-आज के युग में ध्वनि-प्रदूषण एक समस्या बन गई है। इसकी आम रोकथाम तभी हो सकती है यदि साधारण लोगों को इससे होने वाले शारीरिक और मानसिक नुकसान की जानकारी दी जाए। ध्वनि-प्रदूषण को निम्नलिखित तरीकों से रोका जा सकता है

  • रिहायशी बस्तियों की तरफ मोटरों, कारों और ट्रकों का यातायात बन्द कर देना चाहिए।
  • जहाँ शोर-प्रदूषण हो वहाँ रिहायशी बस्तियाँ नहीं बनने देनी चाहिएँ। बस्तियों में और सड़कों के साथ-साथ नीम और
  • ध्वनि प्रदूषण को कम करने के लिए कानून बनाना चाहिए ताकि इस तरह से प्रदूषण पैदा करने वाले को कानून के दायरे में सजा दी जा सके।
  • बड़े-बड़े उद्योग, रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डे आवासीय क्षेत्रों से संतुलित दूरी पर होने चाहिएँ।
  • समाचार-पत्रों, रेडियो, टी.वी. आदि के माध्यम से लोगों को ध्वनि-प्रदूषण के दुष्परिणामों से अवगत करवाना चाहिए।

प्रश्न 3.
वायु-प्रदूषण (Air Pollution) पर विस्तृत नोट लिखें। अथवा वायु-प्रदूषण (Air Pollution) क्या है? वायु-प्रदूषण के कारणों एवं रोकथाम के उपायों का उल्लेख कीजिए।
अथवा
वायु-प्रदूषण के कारणों एवं प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
वायु-प्रदूषण (Air Pollution)-जब वायु में निश्चित मात्रा में अधिक विषैली और हानिकारक गैसें तथा धूलकण मिल जाते हैं, तो उसे वायु-प्रदूषण कहते हैं।

वाय-प्रदूषण के कारण (Causes of Air Pollution) वायु निम्नलिखित कारणों से प्रदूषित होती है-

  • तेज हवाओं से ऊपर उठी धूल, गलियों और सड़कों को साफ करने से उठे धूलकण हवा में लटकते रहते हैं।
  • कारखानों एवं मोटरगाड़ियों द्वारा छोड़े गए धुएँ के कारण वायु प्रदूषित होती है।
  • कीटनाशक तथा उर्वरक पदार्थ वायु में मिल जाते हैं और लटकते कणों के रूप में वहीं मौजूद रहते हैं। ये भी वायु को प्रदूषित करते हैं।
  • खुले में घरेलू कूड़ा फेंकने से वायु प्रदूषित होती है।
  • लकड़ी, ईंधन, कूड़ा, पटाखे और अन्य चीज़ों को जलाने से वायु-प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है।

वायु-प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Air Pollution)-वायु-प्रदूषण के प्रभाव निम्नलिखित हैं
1. स्वास्थ्य पर प्रभाव-वायु के बिना मनुष्य का जीवित रहना असंभव है। वायु द्वारा ऑक्सीजन हमारे शरीर में पहुँचती है और शरीर की क्रियाएँ जारी रहती हैं, इसलिए शुद्ध वायु स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी है। परन्तु जब कई प्रकार की गैसें और धूल-कण वायु में मिलते हैं तो वायु प्रदूषित हो जाती है, जो मनुष्य के लिए हानिकारक होती है। इसका मनुष्य के सभी तंत्रों पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण मनुष्य का स्वास्थ्य खराब हो जाता है।

2. भीषण रोग-प्रदूषित वायु के कारण मनुष्य दमा और फेफड़ों के कैंसर जैसी बीमारियों का शिकार हो जाता है। भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकला हुआ रासायनिक पदार्थ कई प्रकार की अन्य बीमारियाँ पैदा करता है; जैसे कार्बन मोनोऑक्साइड मनुष्य के दिल को प्रभावित करती है। सल्फर डाइऑक्साइड साँस लेने में कठिनाई पैदा करती है। नाइट्रिक एसिड और सल्फर एसिड साँस की बीमारियाँ पैदा करते हैं।

3. पौधों पर प्रभाव प्रदूषित वायु फसलों तथा पौधों पर भी बहुत प्रभाव करती है। ओज़ोन (Ozone) विशेषतौर पर पत्तों वाली सब्जियों, चारे की फसलों और जंगली पौधों के लिए हानिकारक है।

4. जलवायु पर प्रभाव-शहरों में फैक्ट्रियाँ ज्यादा होने के कारण ठोस कण बादलों की आकृति बनाए रखते हैं, जिसके कारण धुंध और कोहरा उन स्थानों से ज्यादा पड़ता है जहाँ फैक्ट्रियाँ कम होती हैं। कणों के कारण तापमान और वायु के बहाव में परिवर्तन आता रहता है।

वायु-प्रदूषण की रोकथाम के उपाय (Control Measures of Air Pollution) वायु-प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं-

  • शहर या गाँव के आस-पास प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारखानों को लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
  • प्रदूषण को कम करने के लिए कारखानों की चिमनियाँ ऊँची होनी चाहिएँ, क्योंकि ये अधिक प्रदूषण फैलाती हैं।
  • कारखानों और मोटरगाड़ियों द्वारा छोड़े जाने वाले धुएँ को नियंत्रित करना चाहिए।
  • कीटनाशक एवं उर्वरकों से वायु प्रदूषित होती है। इसलिए इनका उपयोग कम-से-कम करना चाहिए।
  • घरेलू कूड़े-कर्कट को खुले में न फेंककर किसी गड्ढे आदि में फेंकना चाहिए।

प्रश्न 4.
मृदा अपरदन (Soil Erosion) पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
मृदा अपरदन (Soil Erosion) क्या है? इसको नियंत्रित करने के उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
मृदा अपरदन (Soil Erosion)-मृदा के कटाव के कारण उसमें निहित आवश्यक उपजाऊ तत्त्व जो ऊपरी परत में विद्यमान होते हैं, वे समाप्त हो जाते हैं। उसकी उर्वरा शक्ति कम हो जाती है, जिससे वह फसलों तथा वनस्पति के उगाने योग्य नहीं। रहती। आर्द्र जलवायु वाले प्रदेशों (जहाँ वर्षा अधिक होती है) में अपक्षालन की प्रक्रिया से मिट्टी के आवश्यक तत्त्व घुलकर निचली परतों में चले जाते हैं, जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है। मरुस्थलीय तथा अर्द्ध-मरुस्थलीय प्रदेशों में मृदा की ऊपरी परत हवा द्वारा एक स्थान से उड़ाकर दूसरे स्थान पर ले जाई जाती है, जिससे भूमि कटाव होता है और मिट्टी की पैदावार करने की क्षमता का ह्रास होता है।

मृदा अपरदन को रोकने के उपाय (Measures to Prevent Soil Erosion) मृदा के संरक्षण एवं प्रबन्धन में मृदा संसाधनों के दीर्घकालीन उपयोग हेतु मृदा के कटाव को नियन्त्रित करना, उसकी उर्वरता को बनाए रखना तथा उसमें सुधार कर उर्वरता में वृद्धि करना सम्मिलित हैं। मृदा के संरक्षण या मृदा अपरदन को रोकने के लिए निम्नलिखित विधियाँ अपनानी चाहिएँ-
1. सम्मोच रेखीय जुताई (Contour Ploughing)-इसमें पहाड़ी ढालों के अनुरूप जुताई की जाती है। ढलानों को कई भागों में बाँटा जाता है, जिससे मिट्टी के कटाव की दर कम हो सके। इस प्रकार की जुताई में कतारों में फसलों को बोकर वर्षा के जल का अवशोषण अधिकतम किया जाता है।

2. फसलों का हेर-फेर (Shifting of Cultivation)-किसी भी खेत या क्षेत्र में एक ही फसल को दो साल से अधिक नहीं बोना चाहिए, क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति कम हो जाती है तथा आवश्यक खनिज तत्त्व समाप्त हो जाते हैं। यदि किसी खेत में दो साल तक गेहूँ की फसल बोई जाती है तो उसके बाद चना या सरसो बोनी चाहिए।

3. नियन्त्रित पशुचारण (Controlling Animal Grazing)-पशुचारण पर प्रतिबन्ध या नियन्त्रण लगाना चाहिए। कुछ चुने हुए स्थानों या क्षेत्रों में पशुचारण होना चाहिए, जिससे मिट्टी का कटाव सीमित रहे।

4. वृक्षारोपण (Tree Plantation)-जिन क्षेत्रों में मिट्टी के कटाव की समस्या है, वहाँ अधिक-से-अधिक वृक्ष लगाने चाहिए। वृक्षों की कटाई पर रोक लगानी चाहिए। जिन क्षेत्रों में मरुस्थल है, वहाँ लम्बी-लम्बी कतारों में वृक्षारोपण करना चाहिए।

5. मेंडबन्दी (Plugging)-जो क्षेत्र प्रतिवर्ष बाढ़ग्रस्त हो जाते हैं, वहाँ अवनालिका अपरदन द्वारा बड़े-बड़े गड्ढे बन जाते हैं। इसलिए खेतों के चारों ओर मेंडबन्दी कर देनी चाहिए तथा अवनालिका अपरदन वाले क्षेत्रों में लम्बी-लम्बी दीवारें बना देनी चाहिए।

इनके अतिरिक्त मृदा अपरदन को रोकने के उद्देश्य से सिंचाई के साधनों का विकास किया जाना चाहिए। वर्षा ऋतु में अतिरिक्त जल के संचयन की व्यवस्था जिसको शुष्क ऋतु में प्रयोग में लाया जा सके, की जानी चाहिए। पहाड़ी क्षेत्रों में मेंड्युक्त खेतों से भी मृदा अपरदन को नियन्त्रित किया जा सकता है।

प्रश्न 5.
भू-निम्नीकरण पर एक नोट लिखिए।
अथवा
भू-निम्नीकरण से आपका क्या तात्पर्य है? इसके कारणों और इसको नियंत्रित करने के उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भू-निम्नीकरण-भू-निम्नीकरण से तात्पर्य स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर भूमि की उत्पादकता में कमी है। मृदा अपरदन, लवणता एवं भू-क्षरता के कारण भू-निम्नीकरण होता है।

भू-निम्नीकरण के कारण-भू-निम्नीकरण मुख्यतः दो कारणों से संभव होता है-
1. प्राकृतिक कारण वैसे तो सभी निम्न कोटी भूमि क्षेत्र व्यर्थ नहीं होता, लेकिन भूमि पर होने वाली अनियंत्रित प्रक्रियाएँ इसको व्यर्थ भूमि क्षेत्र में बदल देती है। इन प्रक्रियाओं के आधार पर इनको वर्गीकृत किया जा सकता है प्राकृतिक खड्डे, मरुस्थलीय व रेतीली भूमि, तटीय भूमि, बंजर व चट्टानी भूमि, तीव्र ढाल वाली भूमि एवं हिमानी क्षेत्र आदि।

2. मानवीय या अप्राकृतिक कारण-मानवजनित प्रक्रियाओं ने भूमि की उत्पादकता एवं उर्वरता को बहुत अधिक प्रभावित किया है। जैसे मृदा (भूमि) का कुप्रबंधन, भूमि का अविरल उपयोग, भूमि अपरदन को प्रोत्साहन देने वाली क्रियाएँ, जलाक्रांतता, सारीयता में वृद्धि आदि। इन क्रियाओं से भू-निम्नीकरण को बहत अधिक बढ़ावा मिला है। खनन और अति सिंचाई भी इसका कारण है।

भू-निम्नीकरण को नियंत्रित करने के उपाय भू-निम्नीकरण को नियंत्रित करने के उपाय निम्नलिखित हैं-

  • जो भूमि मानवीय क्रियाओं के कारण बंजर या व्यर्थ हुई है उसको कृषि योग्य बनाने के लिए नई प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना चाहिए।
  • रेतीली, मरुस्थलीय व तटीय भूमि को उर्वरकों, कम्पोस्ट एवं सिंचाई की सुविधाओं के माध्यम से उपयोगी एवं कृषि योग्य बनाया जा सकता है।
  • जनाकांत भूमि व दलदली भूमि को कुशल प्रबंधन के द्वारा उपजाऊ बनाया जा सकता है।
  • भू-निम्नीकरण की समस्या को सरकारी एवं गैर-सरकारी संगठनों की सहायता से सुलझाया जा सकता है।

प्रश्न 6.
मृदा-प्रदूषण (Soil Pollution) पर विस्तारपूर्वक नोट लिखें।
अथवा
मृदा-प्रदूषण किसे कहते हैं? इसके मुख्य कारण क्या हैं? इसे नियंत्रित करने के उपाय बताइए।
अथवा
मृदा-प्रदूषण किसे कहते हैं? कौन-कौन से प्राकृतिक व भौतिक कारक मृदा को प्रदूषित करते हैं? इसे नियन्त्रित करने के उपाय समझाइए।
अथवा
भूमि-प्रदूषण से क्या अभिप्राय है? भूमि-प्रदूषण के प्रभावों व रोकथाम के उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूमि/मृदा-प्रदूषण का अर्थ (Meaning of Land or Soil Pollution)-मनुष्य के हस्तक्षेप एवं दुरुपयोग द्वारा जब मृदा में ऐसे भौतिक, जैविक एवं रासायनिक परिवर्तन हो जाएँ जिनसे उसकी वास्तविक गुणवत्ता एवं उत्पादकता का ह्रास हो, तो उसे भूमि या मृदा-प्रदूषण कहते हैं।

मृदा-प्रदूषण के कारण (Causes of Soil Pollution)-मृदा-प्रदूषण के निम्नलिखित कारण हैं-

  • भूमि में रासायनिक पदार्थों; जैसे जस्ता, कीटनाशक, दवाइयाँ, रासायनिक खाद आदि अधिक मात्रा में डालने से मृदा-प्रदूषण होता है।
  • उद्योगों से निकलने वाले कूड़े-कर्कट में बहुत से हानिकारक रासायनिक तत्त्व होते हैं जो वायु व पानी के माध्यम से मिट्टी में पहुँचकर उसे प्रदूषित कर देते हैं।
  • बढ़ती जनसंख्या की प्राथमिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वनों की कटाई लगातार बढ़ती जा रही है जिसका दुष्परिणाम यह है
  • कि भूक्षरण की समस्याएँ निरंतर बढ़ रही हैं।
  • भूमि का जल-स्तर कम होने से भूमि प्रदूषित होती है।
  • दूषित जल को जब सिंचाई के काम में उपयोग किया जाता है तो इससे भूमि की गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
  • घरेलू कूड़ा-कर्कट भूमि को निरंतर प्रदूषित कर रहा है, क्योंकि घरेलू कूड़े में काँच, प्लास्टिक व पॉलिथीन आदि पदार्थ भूमि के लिए हानिकारक होते हैं।
  • अम्लीय वर्षा के कारण भी मृदा का अपक्षय होता है।
  • कृषि में रासायनिक पदार्थों व खनन गतिविधियों से भी भूमि प्रदूषण को बढ़ावा मिलता है।

मृदा-प्रदूषण के प्रभाव (Effects of Soil Pollution)-मृदा-प्रदूषण के प्रभाव निम्नलिखित हैं-

  • दूषित भूमि के बैक्टीरिया मानव शरीर में पहुँचकर अनेक बीमारियाँ; जैसे पेचिश, हैजा, टायफाइड आदि फैलाते हैं।
  • भूमि में कीटनाशक दवाइयों के प्रयोग से फसलों या अनाजों में भी अनेक विषैले तत्त्व पैदा हो जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं।
  • मृदा-प्रदूषण से भूमि की गुणवत्ता एवं उपजाऊ शक्ति लगातार कम होती जाती है।
  • मृदा-प्रदूषण से भूक्षरण की समस्याएँ निरंतर बढ़ती जाती हैं।

मृदा-प्रदूषण की रोकथाम/नियंत्रण के उपाय (Measures of Prevention/Control of Soil Pollution)-मृदा प्रदूषण की रोकथाम के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाने चाहिएँ-

  • मृदा-प्रदूषण को रोकने के लिए वायु-प्रदूषण एवं जल-प्रदूषण को रोकना चाहिए।
  • भूमि में रासायनिक पदार्थों (उर्वरकों व कीटनाशकों) का कम-से-कम उपयोग करना चाहिए। इनके स्थान पर जैव नियंत्रण विधि अपनानी चाहिए।
  • ठोस पदार्थों; जैसे टिन, ताँबा, लोहा, काँच आदि को मृदा में नहीं दबाना चाहिए।
  • ठोस पदार्थों को गलाकर या चक्रीकरण द्वारा नवीन उपयोगी वस्तुएँ बनानी चाहिएँ।
  • खेती वाली भूमि में गोबर से बनी खाद का प्रयोग करना चाहिए।
  • वनों (जंगलों) के संरक्षण हेतु सख्त कानून बनाए जाने चाहिएँ, ताकि वनों की अवैध कटाई पर रोक लगाई जा सके।
  • वृक्षारोपण को अधिक-से-अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

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HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

Haryana State Board HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

A. नीचे दिए गए चार विकल्पों में से सही उत्तर को चुनिए

1. वर्ष 2010-2011 में निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था?
(A) जापान
(B) यूरोप
(C) संयुक्त राज्य अमेरिका
(D) यू०ए०ई०
उत्तर:
(D) यू०ए०ई०

2. आयात और निर्यात का अंतर कहलाता है
(A) व्यापार
(B) व्यापार-संतुलन
(C) आयात
(D) निर्यात
उत्तर:
(B) व्यापार-संतुलन

3. जब आयात निर्यात से कम हो तो व्यापार संतुलन होता है-
(A) पक्ष में
(B) विपक्ष में
(C) शून्य में
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(A) पक्ष में

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

4. जब आयात निर्यात से अधिक हो तो व्यापार संतुलन होता है-
(A) पक्ष में
(B) विपक्ष में
(C) शून्य में
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) विपक्ष में

5. निम्नलिखित में से किस वस्तु का भारत आयात करता है?
(A) ईंधन
(B) मशीनें
(C) उर्वरक
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

6. निम्नलिखित में से भारत निर्यात करता है-
(A) चाय
(B) पेट्रोलियम
(C) मशीनें
(D) उर्वरक
उत्तर:
(A) चाय

7. भारत में सबसे ज्यादा मूल्य का आयात किस मद में होता है?
(A) पेट्रोलियम
(B) मशीनें
(C) उर्वरक
(D) रत्न
उत्तर:
(A) पेट्रोलियम

8. तूतीकोरिन पत्तन भारत के किस राज्य में स्थित है?
(A) तमिलनाडु
(B) पश्चिमी बंगाल
(C) उड़ीसा
(D) आंध्र प्रदेश
उत्तर:
(A) तमिलनाडु

9. जवाहरलाल नेहरू पत्तन का निर्माण किस पत्तन के भार को कम करने के लिए किया गया है?
(A) कोच्चि
(B) मार्मागाओ
(C) मुंबई
(D) कांडला
उत्तर:
(C) मुंबई

10. निम्नलिखित में से भारत के प्रमुख पत्तन/बंदरगाह कितने हैं?
(A) 10
(B) 11
(C) 12
(D) 8
उत्तर:
(C) 12

11. भारत की नवीन बंदरगाह है
(A) न्हावाशेवा
(B) चेन्नई
(C) हल्दिया
(D) विशाखापत्तनम
उत्तर:
(A) न्हावाशेवा

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

12. भारत के कुल अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का कितना प्रतिशत भाग समुद्री मार्ग द्वारा होता है?
(A) लगभग 70%
(B) लगभग 75%
(C) लगभग 80%
(D) लगभग 90%
उत्तर:
(D) लगभग 90%

13. निम्नलिखित में से कौन-सा पत्तन पूर्वी तट पर स्थित नहीं है?
(A) कोलकाता
(B) पारादीप
(C) मार्मागाओ
(D) विशाखापट्टनम
उत्तर:
(C) मार्मागाओ

14. निम्नलिखित में से कौन-सा पत्तन पश्चिमी तट पर स्थित नहीं है?
(A) मुंबई
(B) कोच्चि
(C) न्हावाशेवा
(D) पारादीप
उत्तर:
(D) पारादीप

15. किस बंदरगाह को भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है?
(A) कोलकाता को
(B) चेन्नई को
(C) कोच्चि को
(D) मुंबई को
उत्तर:
(D) मुंबई को

16. भारत का कृत्रिम बंदरगाह है-
(A) मुंबई
(B) चेन्नई
(C) कोलकाता
(D) कोच्चि
उत्तर:
(B) चेन्नई

17. जुआरी नदमुख के मुँहाने पर अवस्थित बंदरगाह है-
(A) मुंबई
(B) हल्दिया
(C) मार्मागाओ
(D) पारादीप
उत्तर:
(C) मार्मागाओ

18. किस पत्तन का पोताश्रय सबसे गहरा है?
(A) मुंबई
(B) हल्दिया
(C) मार्मागाओ
(D) पारादीप
उत्तर:
(D) पारादीप

19. भारत का विशालतम कंटेनर पत्तन है-
(A) मुंबई पत्तन
(B) कोच्चि पत्तन
(C) जवाहरलाल नेहरू पत्तन
(D) एन्नौर पत्तन
उत्तर:
(C) जवाहरलाल नेहरू पत्तन

B. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर एक शब्द में दीजिए

प्रश्न 1.
भारत में सबसे ज्यादा मूल्य का आयात किस मद में होता है?
उत्तर:
पेट्रोलियम एवं संबद्ध उत्पादों का।

प्रश्न 2.
विदेशी व्यापार में भारत का सबसे बडा भागीदार कौन है?
उत्तर:
यू०ए०ई० और संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 3.
देश की सबसे ज्यादा मध्यम और छोटी पत्तनें भारत के किस तटीय राज्य में हैं?
उत्तर:
महाराष्ट्र।

प्रश्न 4.
भारत की सबसे गहरी और स्थल रुद्ध पत्तन कौन-सी है?
उत्तर:
विशाखापट्टनम।

प्रश्न 5.
भारत के उस राज्य का नाम लिखिए जहाँ दो प्रमुख समुद्री पत्तन हैं?
उत्तर:
तमिलनाडु (चेन्नई, तूतीकोरिन)।

प्रश्न 6.
भारत की सबसे नवीन बंदरगाह कौन-सी है?
उत्तर:
न्हावाशेवा।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 7.
भारत के कोई दो अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तनों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन (नई दिल्ली)।
  2. दमदम अंतर्राष्ट्रीय विमान पत्तन (कोलकात्ता)।

प्रश्न 8.
भारत की तट रेखा पर अच्छे पोताश्रय की कमी क्यों है?
उत्तर:
तट रेखा सामान्यतः सीधी और सपाट होने के कारण।

प्रश्न 9.
भारत के पूर्वी तट पर स्थित दो पत्तनों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  1. पारादीप पत्तन
  2. विशाखापट्टनम पत्तन।

प्रश्न 10.
कौन-सा बंदरगाह ‘भारतीय सामुद्रिक व्यापार का पूर्वी द्वार’ कहलाता है?
उत्तर:
कोलकाता-हल्दिया।

प्रश्न 11.
सन् 2003-2004 में कौन-सा देश भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार था?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 12.
भारत में विमान पत्तनों का प्रबंध कौन करता है?
उत्तर:
भारतीय विमान पत्तन प्राधिकरण।

प्रश्न 13.
पारादीप बंदरगाह किस राज्य में है?
उत्तर:
ओडिशा में।

प्रश्न 14.
वर्तमान में कांडला पत्तन का क्या नाम रखा गया है?
उत्तर:
दीनदयाल पत्तन।

प्रश्न 15.
किसे अरब सागर की रानी (क्वीन ऑफ अरेबियन सी) के लोकप्रिय नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
बेंवानद कायाल को।

प्रश्न 16.
परंपरागत वस्तुओं के व्यापार में गिरावट का मुख्य कारण क्या है?
उत्तर:
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा।

प्रश्न 17.
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के प्रवेश द्वार के रूप में किसे जाना जाता है?
उत्तर:
समुद्री पत्तनों को।

प्रश्न 18.
देश का सबसे पुराना या प्राचीन बंदरगाह/पत्तन कौन-सा है?
उत्तर:
चेन्नई पत्तन।

प्रश्न 19.
भारत का निगमीकृत बंदरगाह पत्तन कौन-सा है?
उत्तर:
एन्नौर पत्तन (तमिलनाडु)।

प्रश्न 20.
देश का सबसे गहरा, प्राकृतिक एवं स्थलरुद्ध पत्तन कौन-सा है?
उत्तर:
विशाखापट्टनम पत्तन (आंध्र प्रदेश)।

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार क्या है?
उत्तर:
विभिन्न देशों के बीच वस्तुओं व सेवाओं के आयात-निर्यात को अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार कहते है।

प्रश्न 2.
भारत से निर्यात की जाने वाली चार प्रमुख वस्तुओं के नाम लिखो।
उत्तर:

  1. चाय
  2. रत्न और आभूषण
  3. सूती धागे और वस्त्र
  4. औषधियाँ और दवाइयाँ
  5. चमड़ा और चमड़े का सामान
  6. लोहा और इस्पात।

प्रश्न 3.
आयात (Import) क्या है?
उत्तर:
किसी देश से किसी वस्तु को अपने देश में लाने की क्रिया को आयात कहा जाता है। उदाहरण के लिए, भारत विदेशों से पेट्रोलियम संबंधित उत्पाद, मशीनें अथवा पूंजीगत माल और रसायन व उर्वरक आदि उत्पादों को मंगवाता है। ये ही आयात है।

प्रश्न 4.
निर्यात (Export) क्या है?
उत्तर:
किसी वस्तु को दूसरे देश में भेजने की क्रिया को निर्यात कहा जाता है। उदाहरण के लिए, भारत विदेशों को चाय, रत्न, आभूषण, सूती धागे व वस्त्र और चमड़ा और उससे संबंधित सामान आदि को भेजता है। ये ही निर्यात है।

प्रश्न 5.
व्यापार संतुलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
आयात और निर्यात का अंतर व्यापार संतुलन (Balance of Trade) कहलाता है।

प्रश्न 6.
विदेशी व्यापार क्या है? अथवा विदेशी व्यापार को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
जब वस्तुओं व सेवाओं का क्रय-विक्रय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है, उसे विदेशी व्यापार कहते हैं, जैसे भारत चाय, रत्न, आभूषण, सिले-सिलाए वस्त्रों का निर्यात करता है और उर्वरक, कच्चा तेल और मशीनें दूसरे देशों से आयात करता है।

रॉबर्टसन के अनुसार, “विदेशी व्यापार वृद्धि का इंजन है।” यह किसी देश के प्राकृतिक साधनों के उपयोग और अतिरेक उत्पादन के निर्यात में सहायता करता है अर्थात् यह किसी देश की अर्थव्यवस्था में निर्णायक भूमिका निभाता है।

प्रश्न 7.
शुद्ध कच्चे माल से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
ऐसी अर्ध-निर्मित वस्तुएँ जिन्हें उद्योगों में कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इसके पश्चात् उससे शुद्ध उपभोग योग्य वस्तुएँ जैसे चप्पल, थैलियाँ आदि बनाई जाती हैं।

प्रश्न 8.
भुगतान संतुलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भुगतान संतुलन एक नियत समय में किसी देश द्वारा शेष विश्व से हुए लेन-देन का सुव्यवस्थित विवरण है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 9.
हल्दिया पत्तन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हल्दिया पत्तन कोलकाता से 105 कि०मी० अंदर अनुप्रवाह पर स्थित है। इस पत्तन का निर्माण कोलकाता पत्तन की संकुलता को घटाने के लिए किया गया।

प्रश्न 10.
तूतीकोरिन पत्तन की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  1. यह एक प्राकृतिक पोताश्रय है तथा इसकी पृष्ठभूमि भी अत्यंत समृद्ध है।
  2. यह विभिन्न प्रकार के नौभार का निपटान करता है।

प्रश्न 11.
न्यू-मंगलौर पत्तन कहाँ स्थित है? यह किन वस्तुओं का निपटान करता है?
उत्तर:
न्यू-मंगलौर पत्तन कर्नाटक में स्थित है। यह पत्तन कुद्रेमुख खानों से निकले लौह-अयस्क का निर्यात करता है। यह पत्तन उर्वरकों, पेट्रोलियम उत्पादों, खाद्य तेलों, चाय-कॉफी, सूत, ग्रेनाइट पत्थर आदि वस्तुओं का निपटान करता है।

प्रश्न 12.
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पत्तनों के नाम लिखें।
अथवा
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित दो पत्तनों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. कांडला पत्तन
  2. मुंबई पत्तन
  3. मार्मागाओ पत्तन
  4. न्यू मंगलौर पत्तन
  5. कोच्चि पत्तन आदि।

प्रश्न 13.
भारत के किन्हीं छः अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. सुभाषचंद्र बोस हवाई अड्डा (दमदम)-कोलकाता।
  2. कोच्चि अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा-कोच्चि।
  3. इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा-नई दिल्ली।
  4. जवाहरलाल नेहरू हवाई अड्डा (सांताक्रुज)-मुंबई।
  5. मीनाम्बक्कम अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा-चेन्नई।
  6. राजा सांसी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अडड़ा-अमृतसर।

प्रश्न 14.
भारत के किन्हीं छः व्यापारिक साझेदार देशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. संयुक्त अरब अमीरात
  2. अमेरिका
  3. जापान
  4. ब्रिटेन
  5. जर्मनी
  6. सिंगापुर आदि।

प्रश्न 15.
घरेलू व्यापार तथा विदेशी व्यापार में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
घरेलू व्यापार-जब वस्तुओं और सेवाओं का क्रय-विक्रय देश के एक भाग में किया जाता है, उसे घरेलू व्यापार कहते हैं; जैसे सोनीपत की साइकिल तथा असम की चाय सारे देश में बिकती हैं।

विदेशी व्यापार-जब वस्तुओं व सेवाओं का क्रय-विक्रय अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होता है, उसे विदेशी व्यापार कहते हैं; जैसे भारत चाय, रत्न, आभूषण, सिले-सिलाए वस्त्रों का निर्यात करता है और उर्वरक, कच्चा तेल और मशीनें दूसरे देशों से आयात करता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के बदलते विदेशी व्यापार के संघटन दिशा पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
भारत का विदेशी व्यापार विश्व के लगभग सभी देशों के साथ होता है, परंतु फिर भी कुछ देश ऐसे हैं, जिनका इस संबंध में महत्त्व अपेक्षतया अधिक है। स्वतंत्रता-प्राप्ति से पहले हमारा विदेशी व्यापार ब्रिटेन से अधिक होता था, क्योंकि हम अंग्रेजों के अधीन थे, परंतु अब स्थिति बदल गई है। अब हमारा अधिक व्यापार संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ होता है। इसके बाद जापान, ब्रिटेन तथा रूस का नंबर है। पिछले कई वर्षों से संयुक्त राज्य अमेरिका हमारे आयात व्यापार का स्रोत है। जर्मनी,भी हमारे आयात व्यापार का स्रोत है। जापान पिछले कुछ वर्षों से हमारे आयात का स्रोत बना हुआ है। भारत के निर्यात व्यापार में भी स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद बहुत परिवर्तन आए हैं। हमारे निर्यात व्यापार की दिशा रूस, पूर्वी यूरोप तथा दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों की ओर बढ़ रही है।

प्रश्न 2.
मुंबई को भारत का प्रवेश-द्वार कहा जाता है, क्यों?
अथवा
मुंबई भारत का सबसे महत्त्वपूर्ण पत्तन क्यों हैं? अथवा मुंबई पत्तन का भारतीय अर्थव्यवस्था में क्या योगदान है?
उत्तर:
यह सत्य है कि मुंबई को भारत का प्रवेश-द्वार कहा जाता है। यह एक प्राकृतिक पत्तन है तथा यहाँ पानी गहरा है। यह विश्व की प्राकृतिक पत्तनों में से एक है। यहाँ हर प्रकार के जलयान सुरक्षित रूप से लंगर डाल सकते हैं। इस पत्तन से विश्व के विभिन्न देशों को माल भेजा जाता है तथा विभिन्न देशों से भारत के लिए यहाँ माल आकर उतरता है। भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का 1/4 भाग इसी पत्तन द्वारा होता है। यहाँ भारी मशीनों तथा औद्योगिक माल उतारने-चढ़ाने के लिए आधुनिक सुविधाएँ उपलब्ध हैं। पालघाट तथा भोरघाट दरों में से रेलों द्वारा मुंबई को भारत के दूसरे नगरों से जोड़ा गया है। इस तरह देश के विभिन्न भागों से इस पत्तन से विदेशों को आसानी से माल निर्यात किया जाता है। इन सब कारणों से मुंबई को भारत का प्रवेश-द्वारा कहा जाता है।

प्रश्न 3.
भारत के चार प्रमुख समुद्री पत्तनों के नाम बताइए।
उत्तर:
भारत के चार प्रमुख समुद्री पत्तन निम्नलिखित हैं-

  1. मुंबई-यह पत्तन भारत के प्रमुख पत्तनों में सबसे बड़ा है। भारत का एक-चौथाई से भी अधिक विदेशी व्यापार इसी पत्तन से होता है।
  2. चेन्नई-यह पूर्वी तट पर स्थित सबसे पुराने पत्तनों में से एक है। इसका पोताश्रय भी प्राकृतिक है। यहाँ से सामान्य वस्तुओं का आयात-निर्यात होता है।
  3. कांडला-यह एक ज्वारीय पत्तन है। इस पत्तन से खनिज तेल, पेट्रोलियम, उत्पाद, उर्वरक, खाद्यान्न, नमक, कपास, चीनी आदि का व्यापार होता है।
  4. कोच्चि-यह भारत का चौथा प्रमुख पत्तन है। इसका पोताश्रय प्राकृतिक है। यहाँ से पेट्रोलियम उत्पाद, उर्वरक तथा कुछ सामान्य वस्तुओं का निर्यात किया जाता है।

प्रश्न 4.
भारत के विदेशी या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में असंतुलन के कारण लिखें।
उत्तर:
भारत के निर्यात में पिछड़ने के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. भारतीय वस्तुओं की उत्पादन लागत अधिक है। हम समय, श्रम, कच्चे-माल का पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पाते।
  2. भारतीय वस्तुओं की गुणवत्ता का स्तर निम्न है।
  3. भारत के परम्परागत निर्यातों की विदेशों में कम माँग है।
  4. भारतीय रुपए का बार-बार अवमूल्यन एक हथियार के रूप में प्रयोग हो रहा है।
  5. यदि कोई देश विकसित राष्ट्रों से आयात करता है तो उसे कम आयात शुल्क देना होता है। यदि वही देश, वही माल किसी
  6. विकासशील देश से ले तो उसे अधिक आयात शुल्क देना पड़ता है।

प्रश्न 5.
1960-61 से 2000-2001 के बीच भारत में किन वस्तुओं के आयात में परिवर्तन हुए?
उत्तर:
1960-61 से 2000-2001 के बीच भारत में निम्नलिखित वस्तुओं के आयात में परिवर्तन हुए-
(1) कृषि उत्पादों/वस्तुओं के आयात में गिरावट आई। 1960-61 में लगभग 187 करोड़ रुपयों के खाद्य अनाज आयात किए गए जो 2000-2001 में 50 करोड़ रुपयों से भी कम हो गए।

(2) 1970-71 में 504 करोड़ रुपयों की पूंजीगत वस्तुएँ आयात की गई। 2000-2001 में पूंजी वस्तुओं के आयात में पर्याप्त वृद्धि हुई है।

(3) उर्वरकों पर आयात व्यय सन् 1960-61 में 60 करोड़ से भी कम था जो 2000-2001 में बढ़कर 15000 करोड़ रुपयों से अधिक हो गया।

(4) पेट्रोलियम के आयात व्यय पर पर्याप्त वृद्धि हुई। इस वृद्धि के दो कारण हैं-

  • पेट्रोलियम की कीमतों में वृद्धि
  • औद्योगिक व यातायात क्षेत्र के विस्तार के लिए पेट्रोलियम पदार्थों की अधिक माँग।

प्रश्न 6.
1960-61 से 2000-2001 के बीच भारत में किन वस्तुओं के निर्यात में परिवर्तन हुए?
उत्तर:
भारत में वर्ष 1960-61 में कल निर्यात 642 करोड़ रुपए था। वर्ष 1990-91 में 32553 करोड रुपए हो गया। वर्ष 2000-2001 में यह 203571 करोड़ रुपए तक बढ़ गया। अतः 1960-61 से 2000-2001 के बीच भारत में निम्नलिखित वस्तुओं के निर्यात में परिवर्तन हुए

  1. कुल निर्यातों में कृषि उत्पादों की प्रतिश्ता में गिरावट आई।
  2. परम्परागत वस्तुओं; पटसन, चाय, अनाज व खनिज पदार्थ के भाग में गिरावट आई।
  3. कुल निर्यातों में निर्मित वस्तुओं के भाग में पर्याप्त वृद्धि हुई।
  4. कुल निर्यातों में रत्नों और रेडीमेड कपड़ों के भाग में पर्याप्त वृद्धि हुई।

प्रश्न 7.
कांडला पत्तन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
कांडला पत्तन खाड़ी कच्छ पर स्थित है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  1. यह प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  2. इसकी पृष्ठभूमि में उत्तर-पश्चिमी भारत के उपजाऊ मैदान सम्मिलित हैं।
  3. यह स्वेज़ नहर के समुद्री मार्ग के निकट है।
  4. यहाँ से सूती कपड़ा, सीमेंट, मशीनें तथा दवाइयाँ आयात होती हैं तथा सीमेंट, अभ्रक, तिलहन तथा नमक निर्यात होता है।

प्रश्न 8.
मुम्बई पत्तन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
मुम्बई पत्तन पश्चिमी तट (कोंकण तट) के मध्यवर्ती भाग में एक द्वीप पर स्थित है, जिसे एक पुल द्वारा भारतीय मुख्य स्थल से जोड़ा गया है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. यह देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  2. इसकी पृष्ठभूमि में काली मिट्टी के कपास क्षेत्र तथा विकसित औद्योगिक क्षेत्र सम्मिलित हैं।
  3. यहाँ उत्तम गोदामों की व्यवस्था है।
  4. यहाँ ट्रांबे में भाभा अणु शक्ति केंद्र, ऐलीफेंटा की गुफाएँ तथा मैरीन ड्राइव दर्शनीय स्थल हैं।
  5. यहाँ से मशीनें, पेट्रोलियम, कोयला, कागज़ तथा फिल्में आयात की जाती हैं तथा सूती कपड़ा, तिलहन, मैंगनीज, चमड़ा तथा तंबाकू निर्यात किए जाते हैं।

प्रश्न 9.
विशाखापट्टनम पत्तन की विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
विशाखापट्टनम पत्तन पूर्वी तट पर आंध्र प्रदेश में स्थित है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  1. यह प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  2. यह डॉल्फिन नोज़ नामक कठोर चट्टानों से घिरी हुई है।
  3. इसकी पृष्ठभूमि में लोहा, कोयला तथा मैंगनीज़ के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हैं।
  4. यहाँ जलयान निर्माण का सबसे बड़ा कारखाना स्थित है।
  5. यहाँ कोयला, तेल तथा ईंधन उपलब्ध हैं।
  6. यहाँ से चावल, खाद्यान, पेट्रोलियम तथा मशीनें आयात की जाती हैं तथा लोहा, मैंगनीज़, तिलहन, चमड़ा, लाख तथा तंबाकू निर्यात किया जाता है।

दीर्घ-उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के विदेशी व्यापार की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत के विदेशी व्यापार की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
1. प्रतिकूल व्यापार-संतुलन-स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद भारत को अपने उद्योगों के विकास के लिए भारी मात्रा में मशीनों का आयात करना पड़ा। कृषि के विकास के लिए कृषि-यंत्र, उर्वरक तथा खनिज तेल का भी आयात करना पड़ा, परंतु निर्यात उस गति से नहीं बढ़ पाया। इस प्रकार हमारे व्यापार का संतुलन प्रतिकूल हो गया।

2. निर्यात में विविधता हमारे देश में प्राचीन समय में चाय, चमड़ा तथा चमड़े का सामान, पटसन तथा सूती वस्त्र का निर्यात होता था, परंतु अब हम विभिन्न प्रकार की निर्मित वस्तुओं का निर्यात करते हैं।

3. विश्वव्यापी व्यापार-आज़ादी प्राप्त होने से पहले हमारा व्यापार मुख्यतः ब्रिटेन के साथ होता था लेकिन आज विश्व के लगभग सभी देशों के साथ हमारे व्यापारिक संबंध हैं।

4. आयात में परिवर्तन पहले हम मुख्यतः खाद्यान्न तथा निर्मित वस्तुओं का आयात करते थे, परंतु आज सबसे अधिक आयात खनिज तेल का किया जाता है। अन्य महत्त्वपूर्ण आयात की वस्तुएँ लोहा-इस्पात, उर्वरक, कागज़, खाने के तेल आदि हैं।

5. समुद्री मार्ग द्वारा व्यापार–भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों द्वारा होता है। स्थलीय व्यापार केवल हमारे पड़ोसी देशों तक ही सीमित है। हमारे पड़ोसी देश निर्धन तथा पिछड़े हुए हैं, अतः हमारा अधिकतर विदेशी दूर स्थित देशों से समुद्री मार्ग द्वारा किया जाता है। हमारा स्थलीय व्यापार लाभदायक नहीं है।

6. कुछ चुनी हुई बंदरगाहों द्वारा ही व्यापार–बेशक भारत की तट-रेखा 7,516.6 कि०मी० लंबी है, परंतु यह अधिक कटी-फटी नहीं है तथा प्राकृतिक बंदरगाहों का यहाँ अभाव है। भारत में कुछ चुनी हुई बंदरगाहों से ही व्यापार होता है; जैसे मुंबई, कांडला, कोच्चि, चेन्नई, कोलकाता आदि। इसलिए माल-लादने तथा उतारने की इन बंदरगाहों पर गहनता पाई जाती है। अतः अधिक भीड़-भाड़ के कारण, यहाँ कठिनाई पेश आती है।

HBSE 12th Class Geography Important Questions Chapter 11 अंतर्राष्ट्रीय व्यापार

प्रश्न 2.
भारत के विदेशी व्यापार की दिशा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी देश के विदेशी व्यापार की दिशा का अभिप्राय यह होता है कि वह देश किन देशों को निर्यात करता है और किन देशों से आयात करता है अर्थात् उसके व्यापारिक संबंध किन देशों के साथ हैं। भारत का विदेशी व्यापार निम्नलिखित देशों के साथ होता है
1. एंग्लो अमेरिका-एंग्लो अमेरिका में संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। भारत इसको रत्न, आभूषण, सूती-वस्त्र, हस्त-शिल्प आदि उत्पाद निर्यात और इलेक्ट्रॉनिक सामान, मशीनें, उर्वरक, रसायन आदि उत्पादों का आयात करता है।

2. पश्चिमी यूरोप यह भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक प्रदेश है। 2005-06 की अवधि में कुल आयात में 21.17% तथा कुल निर्यात में 24.06% की भागीदारी थी। पश्चिमी यूरोप में लगभग 28 देश आते हैं जिन्हें सामूहिक रूप से यूरोपियन यूनियन (EU) कहा जाता है। भारत रत्न, आभूषण, सिले-सिलाए वस्त्र, चमड़ा, चमड़े का सामान, मशीनें, दवाइयाँ, हस्तशिल्प, प्लास्टिक उत्पाद, कालीन आदि उत्पादन निर्यात करता है और बहुमूल्य और अल्पमूल्य रत्न, चाँदी, मशीनें, उपकरण व औषधीय उत्पाद आदि का आयात करता है।

3. स्वतंत्र राज्यों के परिसंघ एवं बाल्टिक देश-स्वतंत्र राज्यों का परिसंघ सोवियत संघ के विघटन के बाद ही अस्तित्व में आया। सन् 1990-1991 में भारत का पूर्व सोवियत संघ के साथ कुल व्यापार 78.03 अरब रुपए का हुआ था जबकि इस प्रदेश के देशों के साथ भारत का कुल व्यापार 80.61 अरब रुपयों का हुआ था। अकेले रूस के साथ निर्यात में 1.20% और आयात में 2.03% भागीदारी थी।

4. पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका-भारत के पश्चिमी एशिया के 12 और उत्तरी अफ्रीका के 7 देशों से संबंध हैं। यद्यपि इन देशों के साथ भारत का व्यापार तेजी से बढ़ा है, लेकिन व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में नहीं रहा है। भारत से इन देशों को मुख्यतः दवाइयाँ, रत्न, आभूषण निर्यात किए जाते हैं।

5. दक्षिण-पूर्वी तथा पूर्वी एशिया दक्षिणी-पूर्वी एशियाई राष्ट्र संघ तथा पूर्वी एशियाई देशों के साथ भारत के व्यापारिक समझौते हैं। भारत इन्हें रत्न, आभूषण, सूती वस्त्र, सिले-सिलाए वस्त्र, दवाइयाँ, माँस उत्पाद, सामुद्रिक उत्पाद निर्यात करता है और इन देशों से कोकिंग, मशीनें, बिजली की मशीनें, लकड़ी के उत्पाद, अलौह धातुएँ आदि आयात करता है।

6. अफ्रीका-इस महाद्वीप में भारत का व्यापार मुख्य रूप से दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, मॉरीशस, आइवरी कोस्ट, कीनिया, घाना, इथोपिया, बैनिन, सेनेगल के साथ है।

प्रश्न 3.
भारत के प्रमुख पत्तनों या बंदरगाहों का वर्णन करें।
अथवा
भारत के प्रमुख बंदरगाहों/पत्तनों की विशेषताओं का वर्णन करें। अथवा भारत के पूर्वी तट पर स्थित पत्तनों का वर्णन करें। अथवा भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पत्तनों का वर्णन करें।
उत्तर:
जल परिवहन यातायात का एक सस्ता साधन है। भारी सामान ढोने के लिए यह एक उपयुक्त साधन है। सागरीय पत्तन सागर के किनारे जलयानों के ठहरने के स्थान होते हैं। कटा-फटा तट, जल की अधिक गहराई, संपन्न पृष्ठभूमि तथा उत्तम जलवायु एक आदर्श पत्तन की उपयुक्त. परिस्थितियाँ हैं। भारत में लक्षद्वीप, अंडमान तथा निकोबार की तटीय रेखा सहित तट की लंबाई 7516.6 कि०मी० है।

भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पत्तन/बंदरगाह भारत के पश्चिमी तट पर स्थित प्रमुख पत्तन/बंदरगाह निम्नलिखित हैं-
1. कांडला-यह पत्तन गुजरात के खाड़ी कच्छ पर स्थित है। वर्तमान में भारत सरकार ने इस पत्तन का नाम बदलकर ‘दीन दयाल पत्तन’ कर दिया है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • यह प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  • इसकी पृष्ठभूमि में उत्तर-पश्चिमी भारत के उपजाऊ मैदान सम्मिलित हैं।
  • यहाँ सागर की गहराई लगभग दस मीटर है।
  • यहाँ बड़े-बड़े जहाज़ों के ठहरने की प्राप्त व्यवस्था है।
  • यह स्वेज़ नहर के समुद्री मार्ग के निकट है।
  • यहाँ से सूती कपड़ा, सीमेंट, मशीनें तथा दवाइयाँ आयात होती हैं तथा सीमेंट, अभ्रक, तिलहन तथा नमक निर्यात होता है।

2. मुंबई-यह पत्तन महाराष्ट्र के पश्चिमी तट (कोंकण तट) के मध्यवर्ती भाग में एक द्वीप पर स्थित है, जिसे एक पुल द्वारा भारतीय मुख्य स्थल से जोड़ा गया है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • यह देश की सबसे बड़ी प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  • यह स्वेज़ नहर के समुद्री मार्ग के निकट है।
  • इसकी पृष्ठभूमि में काली मिट्टी के कपास क्षेत्र तथा विकसित औद्योगिक क्षेत्र सम्मिलित हैं।
  • यहाँ बड़े-बड़े जहाज़ आकर ठहर सकते हैं।
  • यहाँ उत्तम गोदामों की व्यवस्था है।
  • यहाँ ट्रांबे में भाभा अणु शक्ति केंद्र, ऐलीफेंटा की गुफाएँ तथा मैरीन ड्राइव दर्शनीय स्थल हैं।
  • यह भारतीय जल सेना का प्रमुख केंद्र है।
  • यहाँ से मशीनें, पेट्रोलियम, कोयला, कागज़ तथा फिल्में आयात की जाती हैं तथा सूती कपड़ा, तिलहन, मैंगनीज, चमड़ा तथा तंबाकू निर्यात किए जाते हैं।

3. मार्मागाओ-यह गोवा में स्थित है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

  • यह प्राकृतिक पत्तन है।
  • इसकी पृष्ठभूमि में पश्चिमी महाराष्ट्र तथा पश्चिमी कर्नाटक सम्मिलित हैं।
  • यहाँ पचास जलयानों के खड़े होने की व्यवस्था है।
  • यहाँ से खाद्यान्न, रासायनिक खादें, खनिज तेल तथा मशीनें आयात की जाती हैं तथा नारियल, मैंगनीज, खनिज लोहा तथा मूंगफली निर्यात की जाती है।

4. कोच्चि-यह केरल राज्य में स्थित है। इसकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-

  • यह एक प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  • यह लैगून झील के किनारे स्थित है।
  • यह पूर्वी एशिया तथा ऑस्ट्रेलिया जलमार्गों पर स्थित है।
  • यह अपनी पृष्ठभूमि से जलमार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है।
  • यहाँ भारत का दूसरा जलयान निर्माण केंद्र स्थित है।
  • यहाँ से चावल, पेट्रोलियम, रसायन, मशीनें आदि आयात की जाती हैं तथा कहवा, गर्म मसाले, इलायची, रबड़, काजू, चाय तथा सूती कपड़ा निर्यात किया जाता है।

भारत के पूर्वी तट पर स्थित पत्तन/बंदरगाह-भारत के पूर्वी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाह/पर्तन निम्नलिखित हैं-
1. चेन्नई-यह पत्तन कोरोमंडल तट पर तमिलनाडु में स्थित है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • यह कृत्रिम पत्तन है।
  • दो मोटी जल-तोड़ दीवारें बनाकर इसे सुरक्षित बनाया गया है।
  • इसकी पृष्ठभूमि में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक का उपजाऊ क्षेत्र तथा औद्योगिक प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • यहाँ कोयले का अभाव है।
  • यहाँ से चावल, पेट्रोलियम, मशीनें, लौह-इस्पात तथा कोयला आयात किए जाते हैं तथा कहवा, चाय, गर्म मसाले, तिलहन, रबड़ तथा चमड़ा निर्यात किए जाते हैं।

2. विशाखापट्टनम-यह पत्तन पूर्वी तट पर आंध्र प्रदेश में स्थित है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • यह प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  • यह डॉल्फिन नोज़ नामक कठोर चट्टानों से घिरी हुई है।
  • इसकी पृष्ठभूमि में लोहा, कोयला तथा मैंगनीज़ के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हैं।
  • यहाँ जलयान निर्माण का सबसे बड़ा कारखाना स्थित है।
  • यहाँ कोयला, तेल तथा ईंधन उपलब्ध हैं।
  • यहाँ से चावल, खाद्यान, पेट्रोलियम तथा मशीनें आयात की जाती हैं तथा लोहा, मैंगनीज़, तिलहन, चमड़ा, लाख तथा तंबाकू निर्यात किया जाता है।

3. पारादीप-यह पत्तन पूर्वी तट पर ओडिशा राज्य में स्थित है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-

  • यह नई तथा आधुनिक पत्तन है।
  • यह प्राकृतिक तथा सुरक्षित पत्तन है।
  • यहाँ जल की गहराई अधिक है, इसलिए बड़े-बड़े जलयान यहाँ आकर ठहरने में समर्थ हैं।
  • इसकी पृष्ठभूमि में ओडिशा के खनिज क्षेत्र सम्मिलित हैं।
  • यहाँ से मशीनें, चावल, तेल आदि आयात किया जाता है तथा लोहा, मैंगनीज़, अभ्रक आदि खनिज पदार्थ निर्यात किए जाते हैं।

4. कोलकाता-यह पत्तन पश्चिम बंगाल के गंगा के डेल्टा प्रदेश में हुगली नदी के किनारे बंगाल की खाड़ी से 128 किलोमीटर अंदर की ओर स्थित है। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं

  • यह एक कृत्रिम पत्तन है।
  • यहाँ जल की गहराई कम है।
  • नदियों की तलछट हटाने के लिए काफी धन खर्च होता है।
  • ज्वार-भाटा के समय यहाँ जहाज़ आ-जा सकते हैं।
  • यहाँ से पेट्रोलियम, रबड़, चावल, मशीनें तथा मोटरें आयात की जाती हैं तथा पटसन, चाय, खनिज लोहा, कोयला, चीनी तथा अभ्रक निर्यात किया जाता है।।

इस पत्तन ने विशाखापट्टनम, पारादीप और उसकी अनुषंगी पत्तन हल्दिया जैसी अन्य पत्तनों की ओर निर्यात के दिकपरिवर्तन के कारण अपनी सार्थकता काफ़ी हद तक खो दी है। कोलकाता पत्तन हुगली नदी द्वारा लाई गई गाद की समस्या से भी जूझता रहा . है जो कि उसे समुद्र से जुड़ने का मार्ग प्रदान करती है।

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