HBSE 7th Class Hindi Vyakaran संधि

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Sandhi संधि Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Vyakaran संधि

संधि शब्द का अर्थ है जोड़ या मिलन। जब दो शब्द एक दूसरे से मिलते हैं और मिलने के कारण उनमें ध्वनि अथवा ध्वनियों का परिवर्तन होता है, तो उन शब्दों में संधि होना माना जाता है। जैसे
राम + अवतार = रामावतार सधि तीन प्रकार की होती है :
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि : स्वर से परे स्वर आने पर शब्दों के मेल में उनमें जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं, जैसे-
हिम + आलय = हिमालय
मुनि + ईश्वर = मुनीश्वर

स्वर संधियां पांच प्रकार की होती हैं :
1. दीर्घ संधि
2. गुण संधि
3. वृद्धि संधि
4. यण संधि
5. अयादि संधि

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(क) दीर्घ संधि : अ-आ से परे अ-आ होने पर दोनों मिलकर आ, इ-ई से परे इ-ई होने पर दोनों मिलकर ई, उ, ऊ होने पर दोनों मिलकर ऊ हो जाता है। इस संधि का परिणाम दीर्घ स्वर होता है, अत: इसे दीर्घ संधि कहते हैं। जैसे –
अ + आ = आ
भाव + अर्थ = भावार्थ
चरण + अमृत = चरणामृत
परम + अर्थ = परमार्थ
देह + अंत = देहात

अ + आ + आ
हिम + आलय = हिमालय
सचिव + आलय = सचिवालय
छात्र + वास = छात्रावास
धर्म + आत्मा = धर्मात्मा

आ + अ = आ
शिक्षा + अर्थी = शिक्षार्थी
रेखा + अंश = रेखांश
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
यथा + अर्थ = यथार्थ

आ + आ = आ
विद्या + आलय = विद्यालय
महा + आशय = महाशय
मुनि + ईश = मुनीश
गिरि + ईश = गिरीश
कपि + ईश = कपीश
हरि + ईश = हरीश
नदी + ईश = नदीश
रजनी + ईश = रजनीश

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran संधि

उ+ उ = ऊ
बहु + उद्देशीय = बहुद्देशीय
सु + उक्ति = सूक्ति
भानु + उदय = भानूदय
लघु + उत्तर = लघूत्तर
वधू + उत्सव = वधूत्सव

(ख) गुण संधि : अ अथवा आ के बाद इ अथवा ई हो तो दोनों मिलकर ए, अ अथवा आ के बाद 3 अथवा ऊ हो तो दोनों मिलकर ओ तथा अ अथवा आ के बाद ऋ हो तो दोनों मिलकर अर हो जाते हैं। जैसे – अ, आ + ई, ई = ए
स्व + इच्छा = स्वेच्छा
दिन + ईश = दिनेश
नर + इंद्र = नरेंद्र
रम + ईश्वर = परमेश्वर
महा + इंद्र – महेंद्र
महा + ईश = महेश
यथा + इष्ट – यथेष्ट
लंका + ईश = लंकेश

अ, आ + उ, ऊ = ओ
बहु + उद्देशीय – बहुद्देशीय
सु + उक्ति = सूक्ति
चंद्र + उदय = चंद्रोदय
वीर + उचित = वीरोचित
महा + उत्सव = महोत्सव
पूर्व + उक्त = पूर्वोक्त

अ, आ + ऋ = अर्
ब्रह्म + ऋषि – ब्रह्मर्षि
महा + ऋषि = महर्षि
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि
राजा + ऋषि = राजर्षि

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(ग) वृद्धि संधि : अ अथवा आ के बाद ए अथवा ऐ हो तो दोनों मिलकर ऐ तथा अ अथवा आ के बाद ओ अथवा औ हो तो दोनों को मिलाकर औ हो जाता है।

अ, आ + ए, ऐ = ऐ
एक + एक = एकैक
लोक + एषणा = लोकेषणा
सदा + एव = सदैव
तथा + एव = तथैव

अ, आ + ओ, औ = औ
अधर + गोष्ठ = अधरोष्ठ
परम + औषध = परमौषध
महा + औषध = महौषध

(घ) यण संधि : इ अथवा ई के बाद हु और ई को छोड़कर यदि कोई अन्य स्वर हो तो इ अथवा ई के स्थान पर ‘यु’, उ अथवा ऊ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उनके स्थान पर ‘व्’ और ऋ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उसके स्थान पर ‘र’ हो जाता है। ‘इ’ के स्थान पर ‘य’ यदि + अपि = यद्यपि
प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर
इति + आदि = इत्यादि
प्रति + एक = प्रत्येक

‘उ’ के स्थान पर ‘व’
सु + अल्प = स्वल्प
सु + आगत = स्वागत
अनु + एषण = अन्वेषण

‘ऋ’ के स्थान पर ‘र’
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

(ङ) अयादि संधि : ए, ऐ, ओ, औ के बाद यदि कोई भी स्वर हो तो ‘ए’ का ‘अय’, ‘ऐ’ का ‘आय’, ‘ओ’ का ‘अव्’ और का ‘आव’ हो जाता है।
ने + अन = नयन
पो + अन = पवन
गै + अक = गायक
पौ + अक = पावक

टिप्पणी : हिन्दी में ये शब्द रूढ़ या तत्सम माने जाएंगे। संस्कृत के समान इनमें संधि नहीं मानी जाएगी। आजकल इन शब्दों को हिंदी में संधियुक्त नहीं माना जाता।

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2. व्यंजन संधि : व्यंजन से परे व्यंजन या स्वर आने पर जो संधि होती है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं। व्यंजन संधि के प्रमुख नियम ये हैं-
(क) वर्ग का तृतीय वर्ण : वर्गों के प्रथम वर्ण से परे वर्गों का तृतीय-चतुर्थ वर्ण, कोई स्वर अधवा य, र, ल, व, ह आदि वर्णों में से कोई वर्ण हो तो पहले वर्ण को अपने वर्ग का तृतीय-वर्ण हो जाता है:
दिक् + अंबर = दिगंबर
भगवत् + गौता = भगवद्गीता
घट् + दर्शन = षड्दर्शन
कृत् + अंत = कृदंत
वाक् + ईश = वागीश
सत् + धर्म = सद्धर्म

(ख) वर्ग का पंचम वर्ण : वर्ग के प्रथम या तृतीय वर्ण से परे पाँचवा वर्ण हो, तो उसके स्थान पर उसी का पाँचवा वर्ण हो जाता है –
वाक् + मय = वाङ्मय
चित् + मय = चिन्मय
षट् + मास = षण्मास
षड् + मुख = षण्मुख
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
सत् + मार्ग = सन्मार्ग

(ग) त् के बाद ज या झ हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ज’ हो जाता है:
सत् + जन = सज्जन
उत् + ज्वल = उज्ज्वल
जगत् + जननी = जगज्जननी
विपत् + जाल = विपज्जाल

(घ) त् के बाद ड या ढ हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ज’ हो जाता है :
उत् + डयन = उड्डयन
वृहत् + टीका = वृहट्टीका

(ङ) त् के बाद ल हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ल’ हो जाता है:
उत् + लास = उल्लास
उत् + लेख = उल्लेख
तत् + लीन – तल्लीन

(च) त् के बाद यदि श हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘च’ और ‘श’ के स्थान पर ‘छ’ हो जाता है।
सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
उत् + श्वास = उच्छवास
उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
तत् + शिव = तच्छिव

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(छ) यदि ‘त्’ के बाद च/छ हो तो ‘त्’ का ‘च’ हो जाता है
उत् + चारण = उच्चारण
सत् + चरित्र = सच्चरित्र

(ज) त् के बाद ह हो तो ‘त्’ का ‘द्’ और ‘ह’ का ‘ध’ हो जाता है:
तत् + हित = तद्धित
उत् + हार = उद्धार

(झ) ‘म्’ के बाद यदि कोई स्पर्श व्यंजन हो तो ‘म्’ के स्थान पर उसी वर्ग का अंतिम वर्ण हो जाता है:
सम् + कल्प = सइकल्प (संकल्प)
सम् + तोष = सन्तोष (संतोष)
सम् + चय = संचय (संचय)
सम् + भाषण = सम्भाषण (संभाषण)

टिप्पणी : हिन्दी में अब संकल्प, संतोष आदि का प्रयोग ही अधिक हो रहा है। इन्हीं को मानक प्रयोग स्वीकार किया गया है।

(अ) म् के बाद य, र, ल, व, स, श, ह हो तो म् का अनुस्वार हो जाता है:
सम् + योग = संयोग
सम् + वाद = संवाद
सम् + रक्षक = संरक्षक
सम् + शय = संशय
सम् + लग्न = संलग्न
सम् + हार = संहार

अपवाद : यदि सम् के बाद ‘राट्’ हो तो म् का म् ही रहता है। सम् + राट् = सम्राट

(ट) ‘छ’ से पूर्व स्वर हो तो ‘छ’ से पूर्व ‘च’ आ जाता
परि + छेद = परिच्छेद
आ + छादन् = आच्छादन

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(ठ) हुस्व स्वर इ, उ के बाद यदि ‘र’ हो और ‘र’ के बाद फिर ‘र’ हो तो ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाता है। ‘र’ का लोप हो जाता है।
निर + रस = नीरस
निर + रोग = नीरोग

(ङ) न् का ण होना : यदि ऋ, र, ष के बाद ‘न’ व्यंजन – आता है तो ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है। जैसे-
राम + अयन = रामायण
परि + नाम = परिणाम

3. विसर्ग संधि : विसर्ग से परे स्वर या व्यंजन आने पर जो संधि होती है उसे विसर्ग संधि कहते हैं। विसर्ग संधि के प्रमुख नियम ये हैं-
(क) विसर्ग के पहले ‘अ’ हो और बाद में कोई घोष व्यंजन (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवां वर्ण, य, र, ल, व, ह) हो तो, विसर्ग का ‘ओ’ हो जाता है :
मनः + बल = मनोबल
मनः + रंजन- मनोरंजन
तमः + गुण = तमोगुण
तपः + वन = तपोवन
रज: + गुण = रजोगुण
मनः + हर = मनोहर
अधः + गति = अधोगति
पयः + धर = पयोधर

(ख) विसर्ग के बाद यदि च, छ हो तो विसर्ग का ‘श’ हो जाता है:
निः + चिंत = निश्चित
निः + छल = निश्छल
दु: + चरित्र = दुश्चरित्र

(ग) विसर्ग के बाद यदि ट्, ठ् हो तो विसर्ग का ष हो जाता है :
धनुः + टंकार = धनुष्टंकार

(घ) विसर्ग के बाद यदि त, थ हो तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है :
दु: + तर = दुस्तर
नमः + ते = नमस्ते

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(ङ) विसर्ग के पहले कोई स्वर हो या बाद में कोई घोष ध्वनि (स्वर, वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवां वर्ण) एवं य, र, ल, व, ह हो तो विसर्ग का ‘र’ होता है :
निः + जन = निर्जन
निः + यात = निर्यात
निः + बल = निर्बल
निः + लिप्त = निर्लिप्त
निः + विकार = निर्विकार
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
दुः + गुण = दुर्गुण
निः + लोभ = निर्लोभ

(च) विसर्ग से परे श, ष, स हो तो विसर्ग के विकल्प से परे वाला वर्ण हो जाता है।
निः + संदेह = निस्संदेह
दु: + शासन = दुश्शासन

(छ) यदि विसर्ग से पूर्व ‘इ’ अथवा ‘उ’ हो बाद बाद में क, ख, प, फ हो तो विसर्ग श, ष, स् का ‘ए’ हो जाता
निः + कलंक = निष्कलंक
दुः + कर = दुष्कर
निः + पाप = निष्पाप
निः + फल = निष्फल

(ज) विसर्ग से परे क, ख, प, फ हो तो विसर्ग ज्यों का त्यों बना रहता है:

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