Class 12

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

HBSE 12th Class Hindi सिल्वर अतीत में दबे पाँव Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था, कैसे?
उत्तर:
सिंधु सभ्यता का नगर सुनियोजित था जिसमें पानी की समुचित व्यवस्था थी। मुख्य सड़कें चौड़ी थीं और अन्य छोटी थीं। इस सभ्यता के लोगों का मुख्य काम खेती करना था। इन्हें ताँबे और काँसे का पता था। यहाँ की खुदाई में मिले काँसे के बर्तन, चाक पर बने विशाल मिट्टी के बर्तन, उन पर की गई चित्रकारी, चौपड़ की गोटियाँ, कंघी, ताँबे का दर्पण, मनके के हार, सोने के आभूषण आदि यह सिद्ध करते हैं कि सिंधु सभ्यता साधन-संपन्न थी। ये लोग अपने यहाँ से निर्यात भी करते थे और बाहर से ऊन के वस्त्र आयात भी करते थे। यातायात के लिए वे बैलगाडियों का प्रयोग करते थे। उनके भंडार हमेशा अनाज से भरे रहते थे। गेहूँ, ज्वार, बाजरा, कपास आदि इनकी मुख्य फसलें थीं। उनके घरों में गृहस्थी की सभी आवश्यक सुविधाएँ थीं। वे साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखते थे।

उनकी कला-कृतियों से पता चलता है कि वे सुरुचि संपन्न लोग थे और उन्हें सौंदर्य-बोध का समुचित ज्ञान था। उनकी कला संस्कृति राज-पोषित व धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित थी। साधन-संपन्न होने के बावजूद इस सभ्यता में भव्यता का आडंबर नहीं था। न ही वहाँ कोई भव्य प्रसाद था और न ही मंदिर। यहाँ तक कि राजाओं और महंतों की समाधियाँ भी यहाँ नहीं थीं। यहाँ के मूर्तिशिल्प या औजार छोटे थे। मकान भी छोटे थे और उनके कमरे भी छोटे थे। राजा का मुकुट भी छोटा और नाव भी छोटी थी। किसी भी वस्तु से इस सभ्यता में आडंबर का एहसास नहीं होता। इसलिए यह कहना सर्वथा उचित है कि सिंधु सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था।

प्रश्न 2.
“सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।’ ऐसा क्यों कहा गया?
उत्तर:
उस काल के मनुष्यों की दैनिक प्रयोग की वस्तुओं को देखकर यह प्रतीत होता है कि सिंधु घाटी के लोग कला प्रिय थे। वास्तुकला में वे अत्यधिक प्रवीण थे। वहाँ पर धातु तथा मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं तथा चाक के बने बर्तन मिले हैं जिन पर चित्र बने हुए हैं। वनस्पति, पशु-पक्षी की छवियाँ, मुहरें, खिलौने, आभूषण, केश-विन्यास, ताँबे का बर्तन, कंघी तथा सुघड़ लिपि भी प्राप्त हुई है। ये सब उपलब्धियाँ इस सभ्यता के सौंदर्य-बोध को प्रमाणित करती हैं। यहाँ भव्य मंदिरों, स्मारकों आदि के कोई अवशेष नहीं मिले। ऐसा कोई चित्र या मूर्ति प्राप्त नहीं हुई जिससे पता चले कि ये लोग प्रभुत्व तथा आडंबर प्रिय हों। यहाँ से प्राप्त सौंदर्य-बोध जन-सामान्य से जुड़ा प्रतीत होता है। लगता है कि यहाँ की कला-संस्कृति को राजा तथा धर्म का कोई प्रश्रय नहीं मिला। इसलिए यह कहना समीचीन होगा कि सिंधु सभ्यता का सौंदर्य-बोध राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

प्रश्न 3.
पुरातत्त्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि “सिंधु सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।”
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के अजायबघर में जिन वस्तुओं तथा कलाकृतियों का प्रदर्शन किया गया है, उनमें औजार तो हैं परंतु हथियार नहीं हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मुअनजो-दड़ो हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक संपूर्ण सिंधु सभ्यता में किसी भी जगह हथियार के अवशेष नहीं मिले। इससे पता चलता है कि वहाँ कोई राजतंत्र नहीं था, बल्कि समाजतंत्र था। यदि इस सभ्यता में शक्ति का कोई केंद्र होता तो उसके चित्र अवश्य मिलते। इस सभ्यता के नरेश का मुकुट भी बहुत छोटा मिला है। राजमहल, मंदिर, समाधि के कोई चिह्न नहीं मिले हैं। इससे स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि इस सभ्यता में सत्ता का कोई केंद्र नहीं था। यह सभ्यता स्वतः अनुशासित थी, ताकत के बल पर नहीं। इसलिए पुरातत्त्ववेत्ताओं का यह विचार है कि शायद इस सभ्यता में कोई सैन्य सत्ता न हो। यहाँ के लोग अपनी सोच-समझ के अनुसार ही अनुशासित थे।

प्रश्न 4.
‘यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आपको कहीं नहीं ले जाती; वे आकाश की तरफ अधूरी रह जाती हैं। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं, उस के पार झाँक रहे हैं। इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि मुअनजो-दड़ो की सभ्यता पाँच हजार वर्ष पुरानी है। जबकि हमारे पास लिपिबद्ध इतिहास चौथी शताब्दी ई०पू० से ही उपलब्ध हो जाता है। इससे पता चलता है कि सिंधु सभ्यता वर्तमान इतिहास के काल से दुगुने काल की है। मुअनजो-दड़ो की खुदाई में मिली टूटी-फूटी सीढ़ियों पर पैर रखकर हम किसी छत पर नहीं पहुँच सकते परंतु जब हम इन सीढ़ियों पर पैर रखते हैं तो हमें गर्व होता है कि हमारी सभ्यता उस समय सुसंस्कृत तथा उन्नत सभ्यता थी जबकि शेष संसार में उन्नति का सूर्य अभी प्रकट भी नहीं हुआ था। अन्य शब्दों में, हम कह सकते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता संसार की शिरोमणि सभ्यता है। हम इतिहास के पार देखते हैं कि इस सभ्यता के विकास में एक लंबा समय लगा होगा। मुअनजो-दड़ो की वास्तुकला आज के सुनियोजित नगरों के लिए आदर्श नमूना है। यदि आज के महानगरों में चौड़ी सड़कें हों तो आज यातायात में कोई बाधा नहीं आएगी। उन लोगों की सोच कितनी उत्तम थी कि उनके घरों के दरवाजे मुख्य सड़कों की ओर नहीं खुलते थे, जबकि आज सब कुछ विपरीत है।

प्रश्न 5.
टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज़ होते हैं इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो तथा हड़प्पा के टूटे-फूटे खंडहरों को देखने से हमारे मन में यह भाव उत्पन्न होता है कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों की सभ्यता कितनी विकसित तथा साधन संपन्न थी। ये खंडहर हमें सिंधु घाटी सभ्यता तथा संस्कृति से परिचित कराते हैं। हमारे मन में यह विचार पैदा होता है कि हम लोग उन्हीं लोगों की संतान हैं जो यहाँ रहते थे। हम किसी-न-किसी प्रकार से इस सभ्यता से जुड़े हैं। ये हमारे ही पूर्वजों के घर थे। परंतु हमारा दुर्भाग्य है कि हम आज केवल दर्शक बनकर रह गए हैं। इन खंडहरों को देखकर हम ये कल्पना कर सकते हैं कि यहाँ हजारों साल पहले कितनी चहल-पहल रही होगी और लोगों के मन में कितनी खुश-शांति रही होगी। काश हम भी उनके पद-चिह्नों का अनुसरण कर पाते। ये खंडहर हमारे उस प्राचीन सभ्यता के प्रमाण हैं जिन्हें हम कभी नहीं भुला पाएँगे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

प्रश्न 6.
इस पाठ में एक ऐसे स्थान का वर्णन है, जिसे बहुत कम लोगों ने देखा होगा, परन्तु इससे आपके मन में उस नगर की एक तसवीर बनती है। किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थल, जिसको आपने नज़दीक से देखा हो, का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर:
इस पाठ में मुअनजो-दड़ो के अवशेषों का चित्रात्मक वर्णन किया गया है। भले ही हमने इस स्थान को न देखा हो पर पाठ को पढ़ने से वहाँ के मकानों, बौद्ध स्तूप, चौड़ी सड़कों, नालियों, चित्रकारी, कलाकारी आदि के चित्र हमारी आँखों के सामने झूल जाते हैं। सचमुच मुअनजो-दड़ो की सभ्यता संसार की सर्वाधिक विकसित सभ्यता कही जा सकती है।

कुछ महीने पहले हमारे विद्यालय के शिक्षकों ने दिल्ली के ऐतिहासिक स्थानों पर घूमने का कार्यक्रम बनाया था। मैंने भी इस कार्यक्रम में भाग लिया। इतिहास का विद्यार्थी होने के कारण मैं ऐतिहासिक स्थल देखने की अधिक रुचि रखत हम सबसे पहले लालकिला देखने गए। प्रस्तुत पाठ को पढ़ने के बाद मैं लालकिले के बारे में एक बार यह हमारे देश का एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान है। मुगल बादशाह शाहजहाँ ने इस किले का निर्माण करवाया था। इसकी भव्यता दूर से ही व्यक्ति को अपनी ओर आकर्षित करती है। यमुना नदी के किनारे पर बने इस किले में लाल पत्थरों का प्रयोग किया गया है।

इसके मुख्य द्वार की शोभा तो अत्यधिक आकर्षक है। इसी द्वार की छत पर हमारे प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर तिरंगा झंडा फहराते हैं। किले में अनेक महल बने हैं जिनमें संगमरमर का प्रयोग किया गया है। शाहजहाँ के काल में महलों की दीवारों पर सोने की नक्काशी की गई थी। दीवाने-आम तथा दीवाने-खास को देखकर दर्शकों की आँखें भौचक्की हो जाती हैं। परंतु लालकिले की सभ्यता भव्यता लिए हुए है और यह राजशक्ति का प्रमाण है। इसके मुकाबले में सिंधु घाटी सभ्यता राज-पोषित न होकर समाज-पोषित है। इसलिए मन में कभी-कभी ख्याल आता है कि शाहजहाँ ने तत्कालीन जनता का कितना शोषण किया होगा।

प्रश्न 7.
नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में? तर्क दें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो सिंधु नदी के समीप बसा था। नगर में लगभग सात सौ कएँ थे। प्रत्येक घर में स्नानागार व जल निकासी की बेजोड़ व्यवस्था थी। अतः लेखक द्वारा सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कहना उचित है। इस संदर्भ में निम्नलिखित प्रमाण दिए जा सकते हैं

  • आज भी संसार में बड़े-बड़े नगर तटों के पास बसे हैं। मुअनजो-दड़ो के पास ही सिंधु नदी थी।
  • पीने के पानी के लिए नगर में लगभग सात सौ कुओं की व्यवस्था थी। प्रत्येक घर में स्नानागार था।
  • जल निकासी की व्यवस्था इतनी अच्छी थी कि आज भी विकसित नगरों में ऐसी व्यवस्था उपलब्ध नहीं है। प्रत्येक नाली पक्की ईंटों से निर्मित थी और ईंटों से ढकी थी।
  • आज के नगरों तथा कस्बों में बदबू छोड़ती नालियाँ व गंदे नाले देखे जा सकते हैं।
  • यहाँ के मकान छोटे थे तथा कमरे भी छोटे-छोटे थे ताकि अधिकाधिक लोगों को आवासीय सुविधा प्राप्त हो सके। मुअनजो-दड़ो में जल की समुचित व्यवस्था को देखकर यह कहा जा सकता है कि सिंधु घाटी सभ्यता जल-संस्कृति का श्रेष्ठ उदाहरण है।

प्रश्न 8.
सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई है।
नजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है, क्या आपके मन में इससे कोई भिन्न धारणा या भाव भी पैदा होता है? इन संभावनाओं पर कक्षा में समूह-चर्चा करें।
उत्तर:
सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में पुरातत्त्ववेत्ताओं ने काफी कुछ लिखा है। यह निश्चित है कि इस सभ्यता के बारे में लिखित प्रमाण नहीं मिला। हमें केवल अवशेषों के आधार पर अवधारणा बनानी पड़ी है। लेखक ने मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की है वह काफी हद तक सही प्रतीक होती है क्योंकि हमें मुअनजो-दड़ो तथा हड़प्पा की खुदाई करने पर जो अवशेष मिले हैं उस आधार पर सिंधु घाटी का अनुमान लगाया गया है। भले ही कुछ लोग इन अनुमानों की सत्यता पर शंका व्यक्त करें, पर शंका व्यक्त करने का कोई तर्कसंगत प्रमाण नहीं मिलता। हमें तो केवल अवशेषों को ही प्रमाण मानना है। यहाँ से प्राप्त अवशेषों के काल का निर्धारण
रे पास कई वैज्ञानिक उपकरण हैं और पुरातत्त्ववेत्ताओं ने उनकी आवश्यक सहायता लेकर इस सभ्यता का काल निर्णय किया है। जहाँ तक आलोचकों का प्रश्न है वे अनेक तर्क देकर अपनी विभिन्न धारणाएँ व्यक्त कर सकते हैं।

HBSE 12th Class Hindi अतीत में दबे पाँव Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
मुअनजोदड़ो कहाँ बसा हुआ था? इसे विशेष प्रकार से क्यों बसाया गया था?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के विशेषज्ञों ने यह अनुमान लगाया है कि यह नगर अपने समय में सभ्यता का केंद्र रहा होगा। ऐसा माना जाता है कि यह क्षेत्र 200 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला था और इसकी जनसंख्या 85 हजार के लगभग रही होगी। पाँच हजार वर्ष पूर्व यह नगर महानगर की परिभाषा को स्पष्ट करता है। भले ही सिंधु घाटी एक मैदानी संस्कृति थी परंतु सिंधु नदी को सैलाब से बचाने के लिए उसे छोटे-छोटे टीलों पर बनाया गया था। विद्वानों का विचार था कि ये टीले प्राकृतिक नहीं थे बल्कि पक्की व कच्ची ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाकर उस पर बनाए गए थे। यह वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण था। भले ही यहाँ की इमारतें खंडहर बन चुकी हैं, नगर व गलियों के विस्तार से यह स्पष्ट हो जाता है कि नगर का नियोजन पूर्णतया सुनियोजित था। यह नगर सिंधु नदी से पाँच किलोमीटर की दूरी पर बना था। स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ और सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती तथा दक्षिण की ओर के खंडहरों में कामगारों की बस्ती है।

सामूहिक स्थान के लिए 40 फुट लंबा, 25 फुट चौड़ा, 7 फुट गहरा कुंड था जिसमें उत्तर तथा दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती थीं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने थे। कुंड के पानी की निकासी के लिए नालियाँ भी थीं। कुंड के दूसरी ओर विशाल कोठार था। कुंड उत्तर:पूर्व में एक लंबी इमारत थी जिसमें दालान तथा बरामदे बने थे। दक्षिण में 20 कमरों वाला एक विशाल मकान था। नगर की मुख्य सड़कों की चौड़ाई 33 फुट तक थी। परंतु गलियों की सड़कें 9 फुट से 12 फुट तक चौड़ी थीं। प्रत्येक घर में एक स्नानघर था और घरों के भीतर पानी की निकासी की व्यवस्था भी थी। बस्ती के भीतर छोटी सड़कें व गलियाँ थीं। इस नगर में कुओं का उचित प्रबंध था जोकि पक्की ईंटों से निर्मित थे। नगर में यदि छोटे घर थे, तो बड़े घर भी थे। पर सभी पंक्तिबद्ध थे। घर के कमरे छोटे थे ताकि आवास की समस्या का हल निकाला जा सके। संपूर्ण नगर की वास्तुशैली एक ही प्रकार की प्रतीत होती है। इसलिए यह नगर वास्तुकला की दृष्टि से सुनियोजित और सुव्यवस्थित रहा होगा।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

प्रश्न 2.
‘अतीत में दबे पाँव’ पाठ के आधार पर बौद्ध स्तूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के जो खंडहर प्राप्त हुए हैं उनमें सबसे ऊँचे चबूतरे पर एक बौद्ध स्तूप के अवशेष मिले हैं। इसका चबूतरा 25 फुट ऊँचा है। लेखक का कथन है कि इसका निर्माणकाल 26 सौ वर्ष पहले का है। चबूतरे पर भिक्षुओं के लिए अलग-अलग कमरे बने हुए हैं। यह बौद्ध स्तूप भारत का प्राचीनतम लैंडस्केप कहा जा सकता है। इसे देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह जाता है। पुरातत्त्वविदों के अनुसार, मुअनजो-दड़ो के स्तूप वाला भाग ‘गढ़’ है जिसके सामने एक बस्ती है जिसका संबंध शायद उच्च वर्ग से है। इसके पीछे पाँच किलोमीटर की दूरी पर सिंधु नदी है।

प्रश्न 3.
‘अतीत में दबे पाँव’ नामक पाठ के आधार पर महाकुंड का वर्णन करें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो में एक तालाब भी मिला है। इसे पुरातत्त्वविदों ने महाकुंड का नाम दिया है। इसकी लंबाई 40 फुट, चौड़ाई 25 फुट तथा गहराई 7 फुट है। उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ कुंड में उतरती हैं। उत्तर दिशा में दो पंक्तियों में 8 स्नानघर भी बने हुए हैं। इसके बारे में लेखक लिखता है-‘वह अनुष्ठानिक महाकंड भी है जो सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय वास्तुकौशल को स्थापित करने के लिए अकेला ही काफी माना जाता है। कुंड से पानी को बाहर निकालने के लिए नालियाँ बनी हुई हैं। ये सभी नालियाँ ईंटों से बनी हैं तथा ईंटों से ढकी हुई हैं। कुंड के तीन तरफ साधुओं के कक्ष हैं। इस कुंड की विशेष बात यह है कि इसमें पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का प्रयोग किया गया है। पार्श्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है। कुंड के पानी के प्रबंध के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। कुंड के पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ बनी हुई हैं।

प्रश्न 4.
सिन्धु घाटी की सभ्यता की फसलों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में पहले यह विचार था कि यहाँ के लोग अनाज पैदा नहीं करते थे, बल्कि आयात करते थे। परंतु हाल की खोज ने इस विचार को गलत सिद्ध कर दिया है। अब विद्वान यह मानते हैं कि सिंधु घाटी की सभ्यता खेतीहर और पशुपालक सभ्यता थी। आरंभ में लोहे का प्रयोग नहीं होता था परंतु पत्थर और ताँबे का खूब प्रयोग होता था। पत्थर तो सिंध में ही होता था और ताँबे की खानें राजस्थान में थीं। इनसे बनाए गए उपकरण खेती-बाड़ी के काम में लाए जाते थे। इतिहासकार इरफान हबीब ने यह सिद्ध किया है कि यहाँ पर कपास, गेहूँ, जौ, सरसों तथा चने की खेती होती थी। आरंभ में यहाँ की सभ्यता तट युग की सभ्यता थी लेकिन बाद में यह सूखे में बदल गई। विद्वानों का यह भी विचार है कि यहाँ के लोग ज्वार, बाजरा और भी पाप्त हए हैं।

रागी की भी खेती करते थे। यही नहीं, यहाँ खरबूजे, खजूर और अंगूर भी उगाए जाते थे। झाड़ियों से बेर इकट्ठे किए जाते थे। भले ही कपास के बीज नहीं मिले परंतु सूती कपड़ा मिला है। जिससे सिद्ध होता है कि ये लोग कपास की खेती भी करते थे। यहाँ से सूत का निर्यात किया जाता था।

प्रश्न 5.
निम्न वर्ग के मकानों के बारे में लेखक ने क्या लिखा है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता में समाज का निम्न वर्ग भी था क्योंकि यहाँ उच्च वर्ग की बस्ती के साथ-साथ कामगारों की बस्ती भी मिली है। इस बस्ती के घर टूटे-फूटे हैं जिससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि निम्न वर्ग के मकान अधिक मजबूत नहीं रहे होंगे। दूसरी बात यह भी है कि निम्न वर्ग के मकान मुख्य बस्ती से दूर बसे हुए थे। हल्के मकान होने के कारण ये पाँच हजार साल तक नहीं टिक पाए। यदि मुअनजो-दड़ो के दूसरे टीलों की खुदाई की जाए तो निम्न वर्ग के मकानों के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिल सकती है।

प्रश्न 6.
मुअनजो-दड़ो के अजायबघर में खुदाई के समय मिली कौन-कौन सी चीजें रखी हुई हैं?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो की खदाई में निकली हई पंजीकत वस्तओं की संख्या 50 हजार से भी अधिक है, लेकिन बहत कम वस्तएँ ही अजायबघर में प्रस्तुत की गई हैं। ये वस्तुएँ सिंधु घाटी की सभ्यता की झलक दिखाने के लिए पर्याप्त हैं। अजायबघर में काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मोहरें, आटे चाक पर बने हुए विशाल मिट्टी के बर्तन, उन पर की गई चित्रकारी, वाद्य, माप-तोल के पत्थर, चौपड़ की गोटियाँ, ताँबे के बर्तन, मिट्टी की बैलगाड़ी, दो पाटों वाली चक्की, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनके वाले हार और मिट्टी के कंगन आदि अनेक वस्तुएँ देखी जा सकती हैं। अजायबघर के अली नवाज़ के अनुसार यहाँ कुछ सोने के गहने भी थे जो बाद में चोरी हो गए। हैरानी की बात यह है कि यहाँ औजारों का तो प्रदर्शन किया गया है लेकिन कोई हथियार नहीं मिला। इसी प्रकार ताँबे और काँसे की बहुत-सी सुईयाँ हैं। नर्तकी और दाढ़ी वाले नरेश की मूर्तियाँ भी प्राप्त हैं। इसके अतिरिक्त हाथी दाँत और ताँबे के सुए भी प्रा प्राप्त हुए हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

प्रश्न 7.
मुअनजो-दड़ो के सामूहिक स्नानागार को धार्मिक स्थल माना जा सकता है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के सामूहिक स्नानागार को महाकुंड का नाम दिया गया है। यह कुंड करीब 40 फुट लंबा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा है। इसमें उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ नीचे उतरती हैं। महाकुंड की तीन दिशाओं में साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पंक्तियों में स्नानागार हैं जिसमें से किसी का दरवाजा भी दूसरे के सामने नहीं खुलता। कुंड में पक्की ईंटों का जमाव है। इस बात का विशेष ध्यान रखा गया है कि कुंड के पानी का रिसाव न हो पाए और बाहर का अशुद्ध पानी कुंड में न आए। इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों में ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का प्रयोग किया गया है। महाकुंड के लिए पानी का प्रबंध करने के लिए दोहरे घेरे वाला एक कुआँ बनाया गया है। कुंड के पानी को बाहर निकालने के लिए पक्की ईंटों की नाली बनाई गई है। महाकुंड की विशेषताओं से पता चलता है कि यह कुंड किसी धार्मिक अनुष्ठान से जुड़ा हुआ रहा होगा।

प्रश्न 8.
‘अतीत में दबे पाँव’ के कथ्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
ओम थानवी ने अतीत में दबे पाँव की रचना यात्रा वृत्तांत के रूप में की है परंतु यह रिपोर्ट से मिलता-जुलता लेख है। इसमें लेखक ने अतीत काल की सिंधु घाटी सभ्यता का रोचक और सजीव वर्णन किया है। यह सभ्यता दो महानगरों मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा में बसी हुई थी। इस लेख में मुअनजो-दड़ो शहर और वहाँ की सभ्यता व संस्कृति पर समुचित प्रकाश डाला गया है। लेखक ने यहाँ की बड़ी बस्ती का वर्णन करते हुए महाकुंड का भी परिचय दिया है। सिंधु घाटी सभ्यता में स्तूप, गढ़, स्नानागार, टूटे-फूटे घर, चौड़ी और कम चौड़ी सड़कें, बैलगाड़ियाँ, सूईयाँ, छोटी-छोटी नौकाएँ, मिट्टी के बर्तन, मूर्तियाँ और औजार प्राप्त हुए हैं। ये सब वस्तुएँ यहाँ की सभ्यता पर समुचित प्रकाश डालती हैं। मुअनजो-दड़ो से प्राप्त अवशेषों के आधार पर पाँच हजार वर्ष पहले की सिंधु घाटी सभ्यता की सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक गतिविधियों का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

प्रश्न 9.
सिंधु सभ्यता में नगर नियोजन से भी कहीं अधिक सौंदर्य-बोध देखा जा सकता है। ‘अतीत में दबे पाँव’ नामक पाठ के आधार पर विवेचन करें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो की खुदाई से यहाँ जो वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं वे उस समय के लोगों के सौंदर्य-बोध की परिचायक हैं। इन वस्तुओं में धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मिट्टी के बर्तन, उन पर की गई चित्रकारी, सुंदर मोहरें, उन पर बारीकी से की गई आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण आदि हिंदू सभ्यता के सौंदर्य-बोध का परिचय देती हैं। यहाँ की सुघड़ लिपि और आश्चर्यचकित करने वाली वास्तुकला तथा नगर नियोजन आदि भी सौंदर्य-बोध के परिचायक हैं। सिंधु सभ्यता में आवास की सुंदर व्यवस्था थी। अन्न का सही भंडारण किया जाता था और सबसे बढ़कर सुंदर कलाकृतियाँ भी बनाई जाती थीं। इन सब बातों से पता चलता है कि सिंधु सभ्यता में नगर नियोजन के साथ-साथ सौंदर्य-बोध के भी दर्शन होते हैं।

प्रश्न 10.
‘अतीत में दबे पाँव’ नामक पाठ के आधार पर सिंधु सभ्यता में प्राप्त वस्तुओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो की खदाई में प्राप्त वस्तओं का जो पंजीकरण किया गया. उनकी संख्या 50 हजार से भी अधिक है। इनमें से अधिकांश वस्तुएँ कराची, लाहौर, लंदन तथा दिल्ली में रखी हुई हैं। केवल कुछ वस्तुएँ ही यहाँ के अजायबघर में हैं जिनमें काला पड़ गया गेहूँ, चौपड़ की गोटियाँ, माप-तोल के पत्थर, ताँबे के बर्तन, दीपक, मिट्टी की बैलगाड़ी, कुछ खिलौने, कंघी, दो पाटों वाली चक्की, रंग-बिरंगे पत्थर के मनकों के हार तथा पत्थर के औजार गिनवाए जा सकते हैं। अजायबघर के चौकीदार के अनुसार यहाँ पर सोने के आभूषण भी थे जो कि चोरी हो चुके हैं। यही नहीं यहाँ काँसे के बर्तन, मोहरें, चाक पर बने विशाल मिट्टी के बर्तन, कुछ लिपिबद्ध चिह्न आदि वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं। यहाँ की उल्लेखनीय वस्तु दाढ़ी वाले नरेश की मूर्ति है जिसके शरीर पर एक सुंदर गुलकारी वाला दुशाला है। यही नहीं, हाथी दाँत और ताँबे की सुइयाँ भी मिली हैं। खुदाई में प्राप्त नर्तकी की मूर्ति एक अद्वितीय कला का नमूना है। इतिहासकारों का कहना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता संसार की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता कही जा सकती है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मुअनजो-दड़ो के नगर की दशा आज कैसी है?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो का प्राचीनतम नगर एक पुराने खंडहर में बदल चुका है। इस नगर के मकानों की छतें गायब हैं परंतु अंदर के कमरे, रसोई, अधूरी सीढ़ियाँ, चौड़ी सड़कें और गलियाँ ज्यों-की-त्यों हैं। वहाँ जाकर दर्शक यह अनुभव करता है कि मानो अभी यह नगर नींद में से जागकर उठ जाएगा और यहाँ रहने वाले लोग फिर से अपने काम में लग जाएँगे।

प्रश्न 2.
रईसों की बस्ती का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
‘अतीत में दबे पाँव पाठ में सिंधु घाटी की खुदाई से प्राप्त तथ्यों का वर्णन किया गया है। इस खुदाई से उस समय के घरों की बनावट से ही अनुमान लगाया गया है कि वहाँ गरीबों व रईसों की अलग-अलग बस्तियाँ थीं। रईसों की बस्ती यानी बड़े घर, चौडी सड़कें ज्यादा कुएँ हैं। इन घरों में स्नानघरों की भी सुन्दर व्यवस्था थी। यहाँ सड़क के दोनों ओर ढकी हुई नालियाँ भी मिली हैं जिससे वहाँ पानी की निकासी के प्रबन्धन का पता चलता है। वहाँ की बस्ती के भीतर छोटी सड़कें हैं और उनसे छोटी गलियाँ थीं। गलियों से ही घरों तक पहुँचा जाता है। यहाँ कुँओं का प्रबन्धन भी बहुत आकर्षक है।

प्रश्न 3.
‘देखना अपनी आँख का देखना है। बाकी सब आँख का झपकना है’ आशय स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक के इस कथन का अर्थ यह है कि किसी भी दृश्य अथवा वस्तु को आँखों से देखकर ही उसे जाना जा सकता है। मुअनजो-दड़ो नगर की भी यही स्थिति थी। उसे आँखों से देखकर ही मनुष्य पर सही और स्थायी प्रभाव पड़ सकता है। चित्रों, सही कल्पना साकार नहीं हो सकती।

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प्रश्न 4.
मुअनजो-दड़ो के नगर नियोजन का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
नगर नियोजन में मुअनजो-दड़ो की अपनी पहचान है भले ही इमारतें खंडहरों में बदल गई हों किन्तु शहर के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए सड़कों और गलियों के ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की सड़कें सीधी या आड़ी हैं। वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आजकल की सैक्टरनुमा कालोनियों में सीधा-आड़ा नियोजन बहुत देखने को मिलता है। अतः मुअनजो-दड़ो की नगर नियोजन उत्तम है।

प्रश्न 5.
पुरातत्त्ववेत्ताओं ने किस भवन को देखकर ‘कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स’ की कल्पना की है?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के महाकुंड के उत्तर:पूर्व में एक लंबी इमारत के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिसके बीचो-बीच एक खुला दालान है। उसके तीन तरफ बरामदे भी बने हुए हैं। संभवतः इनके साथ कुछ छोटे-छोटे कमरे भी रहे होंगे। कुछ पुरातत्त्ववेत्ताओं का यह भी कहना है कि इस इमारत में धार्मिक अनुष्ठान किए जाते होंगे क्योंकि इसके दक्षिण में एक अन्य इमारत के खंडहर प्राप्त हुए हैं। यहाँ बीस खंभों वाला एक विशाल हाल है। विद्वानों का यह विचार है कि यह राज्य सचिवालय, सभा भवन अथवा कोई सामुदायिक केंद्र रहा होगा। इस लंबी इमारत और साथ की खंडहर इमारत के आधार पर विद्वानों का कहना है कि यहाँ निश्चित से धर्म और विज्ञान पर विचार-विमर्श होता होगा। इसीलिए इसके लिए ‘कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स’ की कल्पना की गई है।

प्रश्न 6.
मुअनजो-दड़ो और चंडीगढ़ की नगर-योजना में कौन-सी समानता देखी जा सकती है?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो और चंडीगढ़ के नगर-निर्माण शिल्प में एक महत्त्वपूर्ण समानता है। दोनों नगरों की मुख्य सड़कों पर किसी भी मकान का दरवाजा नहीं खुलता। नगर के घरों में जाने के लिए पहले चौड़ी सड़क पर जाना पड़ता है। वहाँ से गली में प्रवेश करके घर में जाया जा सकता है। मुख्य सड़कों की ओर मकानों की पीठ है।

प्रश्न 7.
मुअनजो-दड़ो की सभ्यता सफाई और स्वच्छता के प्रति जागरूक थी। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो की सभ्यता सफाई और स्वच्छता के प्रति विशेष रूप से जागरूक थी। नगर में पानी की निकासी का विशेष प्रबंध था। प्रत्येक घर में स्नानघर था। घरों के अंदर का मैला पानी नाली के द्वारा बाहर की हौदी में गिरता था जो कि नालियों के जाल से जुड़ा हुआ था। सभी नालियाँ पत्थर से ढकी हुई थी जिससे मक्खी-मच्छर के बैठने की संभावना नहीं थी।

प्रश्न 8.
मुअनजो-दड़ो में रंगरेज का कारखाना भी था। सिद्ध करें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो में एक ऐसा भवन मिला है जिसकी जमीन में ईंटों के गोल गड्ढे बनाए गए हैं। पुरातत्त्ववेत्ताओं का विचार है कि इनमें वे बर्तन रखे जाते होंगे जो रंगाई के काम आते हैं। इस भवन में सोलह छोटे-छोटे मकान भी हैं। एक पंक्ति मुख्य सड़क पर है और दूसरी पंक्ति पीछे की सड़क पर है। ये सभी मकान एक मंजिले और छोटे हैं। प्रत्येक मकान में दो कमरे हैं और सभी घरों में स्नानघर भी हैं। ऐसा लगता है कि यहाँ पर रंगरेज रहते होंगे और रंगाई का काम भी करते होंगे।

प्रश्न 9.
‘जूझ’ पाठ में बचपन में लेखक के मन में पढ़ने के प्रति क्या विचार थे?
उत्तर:
बचपन में लेखक के मन में पढ़ने की प्रबल इच्छा थी। इसलिए वह सोचता था कि खेत में काम करने से उसके हाथ कुछ नहीं लगेगा, उसे किसी भी कीमत पर पढ़ना चाहिए।

प्रश्न 10.
मुअनजो-दड़ो को देखकर लेखक को राजस्थान के कुलधरा गाँव की याद क्यों आ गई?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के उजड़े हुए वीरान नगर को देखकर लेखक अचानक राजस्थान के कुलधरा गाँव को याद कर उठा। यह गाँव भी लंबे काल से वीरान पड़ा हुआ है। कहा जाता है कि लगभग 150 साल पहले यहाँ के राजा तथा गाँववासियों के बीच झगड़ा हो गया था। गाँव के लोग बड़े स्वाभिमानी थे। वे रातो-रात अपने घर छोड़कर कहीं ओर चले गए। तब से इस गाँव के घर खंडहर हो गए हैं। वे आज भी मानो अपने बाशिंदों के इंतजार में खड़े हुए हैं।

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प्रश्न 11.
‘कॉलेज ऑफ प्रीस्टस’ किसे कहा गया है? इसका निर्माण क्यों हुआ होगा?
उत्तर:
महाकुंड के उत्तर:पूर्व में एक बड़ी इमारत के अवशेष हैं। इसके बिल्कुल बीच में खुला और बड़ा दालान है। इसके तीनों तरफ बरामदे हैं। पुरातत्व जानकार के अनुसार धार्मिक अनुष्ठानों में ज्ञानशालाएँ साथ-साथ होती थीं, उस नजरिये से इसे ‘कॉलेज ऑफ प्रीस्टस’ माना जा सकता है। कॉलेज ऑफ प्रीस्टस’ उस कॉलेज को कहा गया है, जहाँ प्रीस्टस को धार्मिक शिक्षा दी जाती है। इसका निर्माण प्रीस्टस को शिक्षित करने हेतु किया गया होगा।

प्रश्न 12.
मुअनजो-दड़ो में जल की निकासी की व्यवस्था कैसे की गई थी?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो में जल की निकासी की अत्यन्त कुशल व्यवस्था थी। मुअनजो-दड़ो के समीप सिन्धु नदी बहती थी। निश्चय ही लोग उसका पानी अपने विभिन्न कार्यों में प्रयोग करते होंगे। इसके अतिरिक्त नगर में कुएँ, स्नानघर आदि थे। इनके पानी की निकासी के लिए उचित व्यवस्था थी। पानी की निकासी के लिए पक्की इंटों से बनी नालियों की व्यवस्था थी। ये नालियाँ ईंटों से ढकी हुई थीं। आज की जल-निकासी की व्यवस्था उसके मुकाबले में तुच्छ प्रतीत होती है।

प्रश्न 13.
मुअनजो-दड़ो से प्राप्त बैलगाड़ी और आज की बैलगाड़ी में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो में ठोस लकड़ी के पहियों वाली बैलगाड़ियाँ काम में लाई जाती थीं। संभव है उससे पहले कमानी या आरे वाले पहियों का प्रयोग भी किया जाता हो परंतु बाद में बैलगाड़ियों में काफी परिवर्तन हुआ। जीप के उतरे हुए पहिए लगाकर बैलगाड़ी चलाई जाने लगी। ऊँटगाड़ी में हवाई जहाज के उतरे पहिए लगाए जाने लगे। आज की बैलगाड़ियों में बैलों पर अधिक बोझ नहीं पड़ता।

प्रश्न 14.
मुअनजोदड़ो के अजायबघर में हथियारों के न होने से क्या संकेत मिलता है?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो के अजायबघर में अनेकानेक वस्तुएँ हैं, किन्तु हथियार एक भी नहीं है। इससे पता चलता है कि वहाँ कोई राजतंत्र नहीं था, अपितु समाजतंत्र था। यदि इस सभ्यता में शक्ति का कोई केन्द्र होता तो उसके चित्र अवश्य मिलते। इस सभ्यता के नरेश का मुकुट भी बहुत छोटा मिला है। यहाँ राजमहल, मन्दिर, समाधि आदि के कोई चिहन नहीं मिले। इससे स्पष्ट है कि इस सभ्यता में सत्ता का कोई केन्द्र नहीं था। यह सभ्यता स्वतः अनुशासित थी, ताकत के बल पर नहीं थी। यहाँ के लोग अपनी सोच-समझ के अनुसार ही अनुशासित थे।

प्रश्न 15.
मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा किस कारण से प्रसिद्ध हैं?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा सिंधु घाटी के स्मारक नगर कहे जा सकते हैं। इसे संसार की प्राचीनतम सभ्यताओं में गिना जाता है। खुदाई में मिले यहाँ के नगर प्राचीनतम नियोजित नगर हैं। इन नगरों का निर्माण आज के उन्नत नगरों के समान पूर्णतया व्यवस्थित है।

प्रश्न 16.
क्या मुअनजोदड़ो को सिंधु घाटी का महानगर कह सकते हैं?
उत्तर:
मुअनजो-दड़ो आज के सुनियोजित नगरों के समान है। यह नगर लगभग 200 हैक्टेयर में फैला हुआ है। यह अनुमान कि इसकी आबादी 85 हजार के लगभग रही होगी। इस नगर के मकान, गलियाँ, जल निकासी आदि का प्रबंध पूर्णतया व्यवस्थित है। अवश्य ही यह उस समय का महानगर रहा होगा।

अतीत में दबे पाँव Summary in Hindi

अतीत में दबे पाँव लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री ओम थानवी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
ओम थानवी का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-ओम थानवी का जन्म सन् 1957 में हुआ। इन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा बीकानेर में प्राप्त की और बाद में राजस्थान विश्वविद्यालय से व्यावसायिक प्रशासन में एम. कॉम. की। मूलतः ओम थानवी एक सफल पत्रकार कहे जा सकते हैं। 1980-89 तक वे ‘राजस्थान पत्रिका’ में कार्यरत रहे। बाद में इन्होंने ‘इतवारी पत्रिका’ का संपादन किया और इस साप्ताहिक पत्रिका को विशेष प्रतिष्ठा दिलाई। ओम थानवी के प्रयासस्वरूप ‘इतवारी पत्रिका’ ने सजग और बौद्धिक समाज में अपना विशेष स्थान बनाया।

ओम थानवी सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से जुड़े रहे हैं। यही नहीं, एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में भी इन्होंने सफलता प्राप्त की है। साहित्य, सिनेमा, कला, वास्तुकला, पुरातत्त्व और पर्यावरण में इनकी गहन रुचि रही है। 80 के दशक में ‘सेंटर फॉर साइंस एनवायरमेंट’ को फेलोशिप प्राप्त करने के बाद इन्होंने राजस्थान के पारंपरिक जल-स्रोतों पर खोज करके विस्तारपूर्वक लिखा। पत्रकारिता के लिए इन्हें अनेक पुरस्कार मिले। इनकी मुख्य उपलब्धि गणेशशंकर विद्यार्थी पुरस्कार है। 1999 में इन्होंने दैनिक जनसत्ता दिल्ली और कलकत्ता के संस्करणों के संपादन का कार्यभार संभाला। पिछले 17 वर्षों से वे इंडियन एक्सप्रेस समूह के हिंदी दैनिक जनसत्ता’ में संपादक के रूप में काम कर रहे हैं।

2. साहित्यिक विशेषताएँ मूलतः ओम थानवी एक पत्रकार के रूप में जाने जाते हैं। परंतु साहित्य और कला में भी इनकी विशेष रुचि रही है। इन्होंने विभिन्न विषयों पर लेखन कार्य किया है जो समय-समय पर समाचार-पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होता रहा है। उन्होंने प्रायः सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर सफल निबंध लिखें। इनके द्वारा लिखित संपादकीय बड़े ही रोचक और प्रभावशाली रहे।

3. भाषा-शैली-ओम थानवी की भाषा-शैली सहज, सरल और साहित्यिक है। भाषा के बारे में इनका दृष्टिकोण बड़ा उदार रहा है। यही कारण है कि इन्होंने अपनी भाषा में हिंदी के तत्सम, तद्भव शब्दों के अतिरिक्त अंग्रेज़ी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है। इनका वाक्य विन्यास भावानुकूल और प्रसंगानुकूल है। इन्होंने प्रायः वर्णनात्मक, विवेचनात्मक, विचारात्मक तथा व्यंग्यात्मक शैलियों का सफल प्रयोग किया है। आज भी वे अपनी लेखनी के द्वारा सामाजिक और सांस्कृतिक विषयों पर अपने विचार व्यक्त कर रहे हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

अतीत में दबे पाँव पाठ का सार

प्रश्न-
ओम थानवी द्वारा रचित ‘अतीत में दबे पाँव’ नामक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
अखंड भारत में बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में प्राचीन सभ्यता की खोज हेतु दो स्थानों पर खुदाई करवाई गई थी। आज ये दोनों स्थान पाकिस्तान में हैं। पहला स्थान पाकिस्तान के सिंध प्रांत मुअनजो-दड़ो के नाम से प्रसिद्ध है, दूसरा पंजाब प्रांत में हड़प्पा के नाम से जाना जाता है। पुरातत्त्व विभाग के विद्वानों ने इन दोनों स्थानों की खुदाई करके सिंधुकालीन सभ्यता की जानकारी प्राप्त की।
(1) मुअनजोदड़ो का संक्षिप्त परिचय-मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा विश्व के प्राचीनतम नियोजित नगर माने गए हैं। मुअनजो-दड़ो का अर्थ है-मुर्दो का टीला। मानव जाति ने छोटे-छोटे टीलों पर इस नगर का निर्माण किया था। किंतु इस नगर के नष्ट होने के बाद इसे मुअनजो-दड़ो नाम दिया गया। यह नगर सिंधु घाटी सभ्यता का सर्वश्रेष्ठ नगर माना जाता है। पुरातत्त्व विभाग ने जब इसकी खुदाई की, तब यहाँ असंख्य इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर चित्रित भांडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि प्राप्त हुए हैं। ये नगर अपने समय में सभ्यता का केंद्र था। विद्वानों का विचार यह है कि यह नगर शायद उस क्षेत्र की राजधानी थी। पूरा नगर दो सौ हैक्टेयर में फैला हुआ था। पाँच हजार वर्ष पूर्व यह एक बड़ा महानगर रहा होगा। इस नगर से सैकड़ों मील दूर हड़प्पा नगर था। परंतु रेललाइन बिछाने के कारण इसके अनेक प्रमाण नष्ट हो गए हैं।।

मुअनजो-दड़ो नगर मैदान में नहीं अपितु टीलों पर बसाया गया था। ये टीले प्राकृतिक न होकर मानव निर्मित थे। यहाँ कच्ची-पक्की ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाया गया था। ताकि सिंधु नदी के पानी से नगर को बचाया जा सके। भले ही यह नगर आज खंडहर बन चुका है। फिर भी इसके स्वरूप के बारे में आसानी से अनुमान लगा सकते हैं। इस नगर में गलियाँ, सड़कें, रसोई, खिड़की, चबूतरे, आँगन, सीढ़ियाँ आदि सुनियोजित ढंग से बनाई गई हैं। नगर की सभी सड़कें सीधी व आड़ी हैं। आधुनिक वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ की संज्ञा देते हैं। सिरे पर बौद्धस्तूप बना हुआ है और उसके पीछे ‘गढ़’ है। सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। उसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधु नदी बहती है। दक्षिण में कामगारों की बस्ती बनी हुई है। यही नहीं, नगर में महाकुंड नाम का तालाब भी है जो चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है।

इसकी गहराई लगभग सात फुट है। कुंड में उत्तर:दक्षिण से सीढ़ियाँ नीचे उतर रही हैं। इसके तीन ओर साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर दिशा में आठ स्नानघर हैं। इसमें किसी भी स्नानघर का दरवाजा किसी दूसरे के सामने नहीं खुलता। महाकुंड का तल तथा दीवारें चूने और पक्की ईंटों को मिलाकर बनाई गई हैं। कुंड में बाहर का गंदा पानी न आए, इसका विशेष ध्यान रखा गया है। कुंड में पानी भरने के लिए एक कुआँ भी है जो दोहरे घेरे वाला है। कुंड के पानी को निकालने के लिए पक्की ईंटों की नालियाँ बनाई गई हैं जो ऊपर से ढकी हुई हैं। पानी की निकासी की ऐसी सुंदर व्यवस्था पूर्व कालीन इतिहास में कहीं नहीं मिलती। कुंड के दूसरी ओर एक विशाल कोठार है जिसमें अनाज रखा जाता था। यही नहीं यहाँ नौ-नौ चौकियों की तीन-तीन हवादार कतारें हैं। इसके उत्तर में एक गली है जिससे संभवतः बैलगाड़ियों में भरकर अनाज लाया जाता होगा। एक ऐसा ही कोठार हड़प्पा में भी मिला है।

(2) बौद्ध स्तूप के अवशेष-मुअनजो-दड़ो सभ्यता के नष्ट होने के बाद एक जीर्ण-शीर्ण टीले के सबसे ऊँचे चबूतरे पर बहुत बड़ा बौद्ध स्तूप बना हुआ है जोकि पच्चीस फुट ऊँचे चबूतरे पर बना है। इसका निर्माणकाल छब्बीस सौ वर्ष पहले का है। चबूतरे पर भिक्षुओं के लिए कमरे बनाए गए हैं। राखालदास बनर्जी का कहना है कि ये अवशेष ईसवी पूर्वकाल के हैं। तत्पश्चात भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल ने खुदाई का कार्य आरंभ करवाया, जिसके फलस्वरूप भारतीय सभ्यता की गिनती मिस्र और मेसोपोटामिया (इराक) की प्राचीन सभ्यता के साथ की जाने लगी।

यह बौद्ध स्तूप भारत का प्राचीनतम लैंडस्केप कहा जा सकता हैं जिसे देखकर दर्शक भी रोमांचित हो उठते हैं। स्तूप का यह चबूतरा मुअनजो-दड़ो के एक विशेष भाग के सिरे पर स्थित है जिसे विद्वानों ने ‘गढ’ कहा है। तत्कालीन धार्मिक तथा राजनीतिक सत्ता के केंद्र चारदीवारी के अंदर ही होते थे। शहर ‘गढ़’ से कुछ दूरी पर स्थित हैं। मुअनजो-दड़ो में ऐसी इमारत है जो अपने स्वरूप को आज भी बनाए हुए है। मुअनजो-दड़ो की शेष इमारतें लगभग खंडहर हो चुकी हैं।

(3) सिंधु घाटी का परिचय-सिंधु घाटी में व्यापार और खेती दोनों काफी उन्नत स्थिति में थे। वस्तुतः उस समय के लोग खेती करते थे अथवा पशुओं को पालते थे। यहाँ कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने आदि की फसलें उगाई जाती थीं। कुछ विद्वानों का मत है कि यहाँ ज्वार, बाजरा और रागी की फसलें भी होती थीं। यही नहीं खजूर, अंगूर, खरबूजे भी यहाँ उगाए जाते थे। मुअनजो-दड़ो में जहाँ एक ओर सूत की कताई-बुनाई होती थी वहीं दूसरी ओर रंगाई भी होती थी। खुदाई में रंगाई का छोटा-सा कारखाना भी मिला है। इस सभ्यता के लोग सुमेर से ऊन का आयात करते थे और सूती कपड़े का निर्यात करते थे। इन्हें ताँबे का समुचित ज्ञान था। उस समय सिंध में काफी मात्रा में पत्थर थे, वहीं राजस्थान में ताँबे की खानें थीं। खुदाई से खेती-बाड़ी के उपकरण भी मिले हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 3 अतीत में दबे पाँव

महाकुंड के आस-पास उत्तरपूर्व में एक बहुत लंबी इमारत के अवशेष मिले हैं जिसमें दालान, बरामदे तथा छोटे-छोटे कमरे बने हुए हैं। दक्षिण में एक छोटी इमारत भी है जिसमें बीस कमरों वाला एक हाल भी था। यह शायद राज्य सचिवालय या सभा भवन या सामुदायिक केंद्र होगा। ‘गढ़’ की चारदीवारी के बाहर छोटे-छोटे टीले हैं। इन पर जो बस्ती बनी है उसे ‘नीचा नगर’ कहा गया है। पूर्व में ‘रईसों की बस्ती’ है जिसमें बड़े-बड़े घर, चौड़ी सड़कें और काफी मात्रा में कुएँ हैं। जिन पुरातत्त्ववेत्ताओं ने मुअनजो-दड़ो की खुदाई करवाई थी उनके नाम से यहाँ मुहल्ले बनाए गए है; जैसे ‘डीके’ हलका-दीक्षित काशीनाथ की खुदाई आदि।

‘डीके’ के नाम से दो हलके हैं। यह क्षेत्र दोनों बस्तियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हलका माना गया है क्योंकि यहाँ शहर की मुख्य सड़क है जोकि बहुत लंबी है। आज तो केवल आधा मील बची है। इस सड़क की चौड़ाई तैंतीस फीट है। भले ही सड़क के दोनों ओर मकान बने हैं जिनमें से किसी का भी दरवाजा बीच सड़क पर नहीं खुलता। घरों के दरवाजे अंदर की गलियों में खुलते हैं। मुख्य सड़क से गली में जाकर ही किसी घर में पहुँचा जा सकता है। प्रत्येक घर में स्नानघर है। खुली नालियाँ भीतर बस्ती में भी नहीं हैं। घर का पानी पहले हौदी में आता है फिर सड़क की नाली में। बस्ती के भीतर की गलियाँ नौ से बारह फीट चौड़ी हैं। बस्ती में कुओं का प्रबंध भी है। संपूर्ण नगर में लगभग सात सौ कुएँ हैं। मुअनजो-दड़ो को जल संस्कृति का नगर कहा गया है क्योंकि इसमें नदी, कुंड, तालाब, स्नानघर, कुएँ और पानी निकासी की व्यवस्था भी है।

बड़ी बस्ती में पुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर ‘डीके-जी’ का हलका है। यहाँ की दीवारें ऊँची और मोटी हैं। संभवतः यहाँ दो मंजिल वाले मकान रहे होंगे। कुछ दीवारों में छेद हैं। वे शायद शहतीरों के छेद होंगे। सभी घर भट्ठे की पक्की ईंटों के बने हैं जिनका अनुपात 1:2:4 है। इन घरों में पत्थर का उपयोग नहीं किया गया है। छोटे तथा बड़े घर एक ही पंक्ति में बनाए गए हैं। अधिकतर घर 30 जरबे 30 फुट के हैं। इनमें से कुछ दुगुने तथा कुछ तिगुने आकार के भी हैं। सभी घरों की वास्तुकला एक जैसी है। नगर में एक मुखिया का घर भी है जिसमें 20 कमरे तथा दो आँगन हैं। बड़े घरों में ऊपर की मंजिल होने के प्रमाण मिले हैं। घर चाहे छोटे हों या बड़े, पर कमरों का आकार बहुत छोटा है। इससे पता चलता है कि जनसंख्या काफी अधिक होगी। छोटे घरों में सीढ़ियाँ संकरी हैं तथा पायदान ऊँचे हैं। घरों की खिड़कियों तथा दरवाजों पर छज्जों के कोई सबूत नहीं मिले। ऐसा लगता है कि इस नगर में नहर नहीं थी। हो सकता है कि बारिश खूब होती हो, क्योंकि कुओं का तो कोई अभाव नहीं था।

(4) राजस्थान संबंधी सूचना-मुअनजो-दड़ो की गलियों और घरों को देखकर लेखक को राजस्थान के घरों की याद आ जाती है। क्योंकि यहाँ पर भी ज्वार, बाजरे की खेती होती थी। बेर भी होते थे। जैसलमेर का कुलधरा गाँव मुअनजो-दड़ो से मिलता-जुलता है। इस गाँव में लोगों का राजा से झगड़ा हो गया। इसलिए वे सभी गाँव खाली करके चले गए। पीले पत्थरों से बना यह सुंदर गाँव आज भी अपने बाशिंदों की राह देख रहा है। राजस्थान के अतिरिक्त पंजाब, हरियाणा, गुजरात में भी कुएँ, कुंड, गली-कूचे तथा कच्ची-पक्की ईंटों के कई घर वैसे ही मिलते हैं जैसे हज़ारों साल पहले थे। जॉन मार्शल ने मुअनजो-दड़ो पर तीन खंडों का एक विशद प्रबंध प्रकाशित करवाया है जिसमें सिंधु घाटी में सौ वर्ष पहले तथा खुदाई में मिली लोहे के पहियों वाली गाड़ी के चित्र दिखाए हैं। इससे पता चलता है कि इस सभ्यता की परंपरा निरंतर आगे चलती रहती है। गाड़ी में जो कमानी या आरे वाले पहिए लगे हैं, वे परिवर्ती हैं। अब तो किसान बैलगाड़ियों में जीप से उतरे पहिए भी लगाने लग गए हैं। ऊँटगाड़ी में तो हवाई जहाज से उतरे पहिए भी लगाए जाते हैं।

(5) मुअनजो-दड़ो का अजायबघर-मुअनजो-दड़ो भले ही आज खंडहर हैं परंतु यह सिंधु घाटी सभ्यता का अजायबघर कहा जा सकता है। यह किसी कस्बाई स्कूल के छोटे-से कमरे के समान है। परंतु यह अजायबघर छोटा-सा है और इसमें सामान भी कम है। मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली हुई वस्तुओं का पंजीकरण भी किया गया था। उनकी संख्या पचास हजार से अधिक है। इसकी मुख्य वस्तुएँ दिल्ली, कराची, लाहौर और लंदन में हैं। परंतु यहाँ जो चीजें दिखाई गई हैं वे विकसित सिंधु घाटी की सभ्यता को दिखाने में सक्षम हैं। इन वस्तुओं में काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, चाक पर बने मिट्टी के बर्तन, वाद्य, चौपड़ की गोटियाँ, दीपक, माप-तोल के पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी, अन्य खिलौने, दो पाटों वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थर के मनकों वाले हार तथा पत्थर के औजार हैं। इस अजायबघर में अली नवाज़ नाम का व्यक्ति तैनात किया गया है जो बताता है कि पहले यहाँ सोने के आभूषण भी थे जो कि चोरी हो गए। अजायबघर को देखकर हैरानी की बात यह लगती है कि यहाँ कोई हथियार नहीं मिला। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ की सभ्यता में शक्ति के बल पर अनुशासन कायम नहीं किया जाता था। यहाँ पर कोई सेना भी नहीं थी। यह सभ्यता सांस्कृतिक तथा सामाजिक व्यवस्था पर टिकी थी। इसलिए यह अन्य सभी सभ्यताओं से भिन्न प्रतीत होती है।

(6) मुअनजो-दड़ो-हड़प्पा सभ्यता-इस संस्कृति में न कोई सुंदर राजमहल है, न मंदिर और न ही राजाओं और महंतों की समाधियाँ हैं। मूर्तिशिल्प बड़े-छोटे आकार के हैं। राजा का मुकुट भी छोटे आकार का है। नावें भी छोटी हैं। लगता है कि उस काल में लोगों में लघता का विशेष महत्त्व था। मुअनजो-दडो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा नगर रहा होगा। दृष्टि से समृद्ध प्रतीत होता है कि इसमें न भव्यता थी और न ही आडंबर। यहाँ से प्राप्त हुई लिपि अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी। इसलिए यहाँ की सभ्यता का समुचित ज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता। सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में लेखक लिखता भी है-“सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज़्यादा था।

वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, ‘ मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति, पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध ज़ाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।”

प्रस्तुत अजायबघर में ताँबे और काँसे की बहुत सारी सुइयाँ मिली हैं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयां मिलीं जिनमें से एक तो दो इंच लंबी थी। हो सकता है कि यह सुई काशीदेकारी के काम आती हो। खुदाई में मुअनजो-दड़ो के नाम से प्रसिद्ध जो दाड़ी वाले ‘नरेश’ की मूर्ति प्राप्त हुई है, उसके शरीर पर आकर्षक गुलकारी वाला दुशाला भी है। खुदाई में हाथी दाँत तथा ताँबे के सुए भी मिले हैं। विद्वान मानते हैं कि इनसे शायद दरियों की बुनाई की जाती थी। मुअनजो-दड़ो में सिंधु के पानी का निकास होने लगा है जिसके कारण मुअनजो-दड़ो की खुदाई का काम रोकना पड़ा है। पानी का रिसाव होने के कारण क्षार और दलदल की समस्याएँ सामने आ गई हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि मुअनजो-दड़ो की सभ्यता के खंडहरों को किस प्रकार बचाया जाए।

कठिन शब्दों के अर्थ

अतीत के दबे पाँव = प्राचीन काल के अवशेष। मुअनजो-दड़ो = पाकिस्तान के सिंधु प्रांत में स्थित एक पुरातात्त्विक स्थान जिसका अर्थ है-मुर्दो का टीला। हड़प्पा = पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का पुरातात्त्विक स्थान। परवर्ती = बाद का। परिपक्व दौर = समृद्धि का समय। ताम्र = ताँबा। उत्कृष्ट = सर्वश्रेष्ठ। व्यापक = विस्तृत। तदात = सरका। भाडे = बर्तन। साक्ष्य = प्रमाण। आबाद = बसा हुआ। टीले = मिट्टी के छोटे-छोटे उठे हुए स्थान। खूबी = विशेषता। आदम = अत्यधिक प्राचीन। सहसा = अचानक। सहम = भय। महसूस = अनुभव करना। इलहाम = अनुभूति। निर्देश = आज्ञा। अभियान = तीव्रता से काम करना। पर्यटक = यात्री। सर्पिल = टेढ़ी-मेढ़ी। पगडंडी = संकीर्ण रास्ता। नागर = नगर की सभ्यता। लैंडस्केप = पृथ्वी का दृश्य। आलम = संसार। बबूल = कीकर जैसे वृक्ष। वक्त = समय। निहारना = देखना। जेहन = दिमाग। ज्ञानशाला = विद्यालय (स्कूल)। कोठार = भंडार। अनुष्ठानिक = पर्व से संबंधित। महाकुंड = विशालकुंड। वास्तुकौशल = भवन निर्माण की कुशलता। अंदाजा = अनुमान। नगर-नियोजन = नगर-निर्माण की विधि। अनूठी = अनुपम । मिसाल = उदाहरण। मतलब = आशय। भाँपना = अनुमान लगाना। कमोबेश = थोड़ी-बहुत। अराजकता = अशांति। प्रतिमान = मानक। कामगार = मज़दूर (श्रमिक)। साक्षर = पढ़े-लिखे। इत्तर = भिन्न (अलग)। संपन्न = धनवान (पूँजीपति)। विहार = बौद्धों का आश्रम । सायास = प्रयत्नपूर्वक। धरोहर = उत्तराधिकार में प्राप्त। अनुष्ठान = आयोजन।

पाँत = पंक्ति। पार्श्व = पास या अगल-बगल। समरूप = समान। धूसर = मटमैला रंग। निकासी = निकालना। बंदोबस्त = प्रबंध। परिक्रमा = चक्कर लगाना। जगजाहिर = जिसका सबको पता हो। निर्मूल = बिना शंका के। साबित = प्रमाणित। बहुतायत = अधिकता। आयात = विदेशों से मँगवाना। निर्यात = विदेशों को भेजना। अवशेष = चिह्न। सटी = नजदीक। भग्न = टूटी-फूटी। हलका = क्षेत्र। वास्तुकला = भवन का निर्माण करने की कला। चेतन = मस्तिष्क का वह भाग जिसके सहयोग से मानव काम करता है। अवचेतन = मस्तिष्क का वह भाग, जिसमें भाव सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। मैल = गंदगी। बाशिदें = वासी (रहने वाले)। सरोकार = प्रयोजन (मतलब)। बेहतर = अच्छा। . मुताबिक = अनुसार। तकरीबन = लगभग। कायदा = नियम। याजक-नरेश = यज्ञ करने वाला राजा। शिल्प = कलाकारी। संग्रहालय = अजायबघर। ध्वस्त = टूटी-फूटी। चौकोर = चार भुजाओं वाला। अचरज = आश्चर्य। साज-सज्जा = सजावट। संकरी = तंग। प्रावधान = व्यवस्था। जानी-मानी = प्रसिद्ध। रोज़ = दिन। अंतराल = मध्य। अजनबी = अनजान व्यक्ति। चहलकदमी = टहलना। अनधिकार = अधिकार के बिना। अपराध बोध = गलती की अनुभूति। विशद प्रबंध = विशाल ग्रंथ। इज़हार = प्रकट करना। अहम = मुख्य। मेज़बान = यजमान। पंजीकृत = सूचीबद्ध। मृद्-भांड = मिट्टी के बर्तन। आईना = दर्पण (शीशा)। प्रदर्शित = दिखाई गई। ताकत = शक्ति। राजप्रसाद = राजमहल। समृद्ध = संपन्न। आडंबर = दिखावा। उत्कीर्ण = खोदी हुई। वजह = कारण। केशविन्यास = बालों की साज-सज्जा। सुघड़ = सुंदर बनी हुई। नरेश = कशीदाकारी। साक्ष्य = प्रमाण। हासिल करना = प्राप्त करना। क्षार = नमक।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 2 जूझ

HBSE 12th Class Hindi जूझ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘जूझ’ शीर्षक के औचित्य पर विचार करते हुए यह स्पष्ट करें कि क्या यह शीर्षक कथानायक की किसी केंद्रीय चारित्रिक विशेषता को उजागर करता है?
उत्तर:
इस पाठ का शीर्षक ‘जूझ’ संपूर्ण कथानक का केंद्र-बिंदु है। ‘जूझ’ का अर्थ है-‘संघर्ष’ । कथानायक आनंद इस पाठ में हमें आदि से अंत तक संघर्ष करता दिखाई देता है। पाठशाला जाने के लिए आनंद को एक लंबे संघर्ष इस संघर्ष में उसकी माँ तथा दत्ता जी राव देसाई का सहयोग भी उल्लेखनीय है। पाठशाला में प्रवेश लेने के बाद अपने अस्तित्व के लिए आनंद को जूझना पड़ा। तब कहीं जाकर वह कक्षा का मॉनीटर बना। उसने कवि बनने के लिए भी निरंतर संघर्ष किया। वह कागज़ के छोटे टुकड़े अथवा पत्थर की शिला या भैंस की पीठ पर कविता लिखा करता था। उसके संघर्ष में मराठी अध्यापक न.वा.सौंदलगेकर ने साथ दिया। वस्तुतः कथानायक के दादा के अतिरिक्त अन्य सभी पात्रों ने उसका साथ दिया। अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि इस उपन्यास का शीर्षक ‘जूझ’ एकदम तर्कसंगत है।

उपन्यास का यह शीर्षक कथानायक की संघर्षमयी प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। जब दादा ने उसे पाठशाला जाने से रोक दिया तो वह चुपचाप नहीं बैठता। सर्वप्रथम वह अपनी माँ को अपने पक्ष में करता है और उसके बाद वह दत्ता जी राव देसाई का सहयोग प्राप्त करता है। यही नहीं, वह अपनी बात को दृढ़तापूर्वक रखते हुए दादा द्वारा लगाए गए आरोपों का डटकर उत्तर देता है और अन्ततः दादा को आश्वस्त करने के बाद पाठशाला में प्रवेश लेता है। पाठशाला की परिस्थितियाँ भी उसके सर्वथा विपरीत थीं, परंतु उसने हार नहीं मानी। अपने जुझारूपन के कारण वह कक्षा का मॉनीटर बन जाता है और स्वयं कविता भी लिखने लग जाता है। यह सब कुछ कथानायक की जूझ का ही परिणाम है।

प्रश्न 2.
स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?
उत्तर:
लेखक मराठी भाषा के अध्यापक न.वा.सौंदलगेकर से अत्यधिक प्रभावित हुआ। वे स्वयं कविता लिखते थे और कक्षा में कविता पढ़ाते समय कविता का सस्वर पाठ करते थे। उन्हें लय, छंद, यति-गति, आरोह-अवरोह आदि का समुचित ज्ञान था। जब वे कविता पाठ करते थे तो उनके मुख पर कविता के भाव झलकने लग जाते थे। जिसका कथानायक पर अनुकूल प्रभाव पड़ा। जब उसे पता चला कि अध्यापक ने अपने घर के दरवाजे पर लगी मालती नामक लता पर कविता लिख दी है, तब उसे अनुभव हुआ कि कवि भी अन्य मनुष्यों के समान ही हाड़-माँस, क्रोध, लोभ आदि प्रवृत्तियों का दास होता है। कथानायक ने वह मालती लता देखी थी और उस पर लिखी कविता को भी पढ़ा था। इसके बाद उसे यह महसूस हुआ कि वह अपने गाँव, खेत तथा आसपास के अनेक दृश्यों पर कविता लिख सकता है। शीघ्र ही वह तुकबंदी करने लगा और अध्यापक ने भी उसका उत्साह बढ़ाया। अध्यापक से छठी-सातवीं के विद्यार्थियों के सामने कविता पाठ करने का मौका मिला। यही नहीं, उसने विद्यालय के एक समारोह में कविता का गान भी किया। इससे उसके मन में यह आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ कि वह भी कवि बन सकता है।

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प्रश्न 3.
श्री सौंदलगेकर की अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।
उत्तर:
श्री सौंदलगेकर लेखक की कक्षा में मराठी पढ़ाते थे। वे बड़े सुचारु ढंग से कविता पढ़ाया करते थे। उनका गला बड़ा सुरीला था उन्हें छंद की यति, कविता की गति, आरोह-अवरोह का समुचित ज्ञान था। वे प्रायः कविता गाकर सुनाते थे और साथ-साथ अभिनय भी करते थे। उन्होंने कुछ अंग्रेज़ी कविताएँ भी कंठस्थ कर रखी थीं। मराठी के अनेक कवियों के साथ उनका निकट का संबंध था। अतः कविता पढ़ाते समय कवि यशवंत, बा.भ.बोरकर, भा.रा ताँबे, गिरीश, केशव कुमार, आदि के साथ हुई अपनी मुलाकातों के संस्मरण भी सुनाया करते थे। कभी-कभी स्वरचित कविता को कक्षा में भी सुनाते थे।

कविता सुनाते समय उनके चेहरे पर भावों के अनुकूल हाव-भाव देखे जा सकते थे। श्री सौंदलगेकर ने लेखक की तुकबंदी का अनेक बार संशोधन किया और बार-बार उसे प्रोत्साहित भी किया। वे लेखक को यह बताते थे कि कविता की भाषा कैसी होनी चाहिए, संस्कृत भाषा का प्रयोग कविता के लिए किस प्रकार होता है और छंद की जाति कैसे पहचानी जाती है। यही नहीं, उन्होंने लेखक को अलंकार ज्ञान से भी परिचित करवाया और शुद्ध लेखन पर भी बल दिया। वे कभी-कभी लेखक को पुस्तकें तथा कविता-संग्रह भी दे देते थे। इस प्रकार सौंदलगेकर कथानायक को कविता लिखने के लिए हमेशा प्रोत्साहित करते रहे और लेखक भी कविता लेखन में रुचि लेने लगा।

प्रश्न 4.
कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की अवधारणा में क्या बदलाव आया?
उत्तर:
कविता के प्रति लगाव से पहले कथानायक को ढोर चराते समय, खेत में पानी लगाते समय अथवा कोई दूसरा काम करते समय अकेलापन अत्यधिक खटकता था। यही नहीं, किसी के साथ बातचीत करना, गपशप करना, हँसी मज़ाक करना भी उसे अच्छा लगता था, परंतु अब अकेलापन उसे खटकता नहीं था। कविता लिखते समय वह अपने-आप से खेलता था। अब वह अकेला रहना पसंद करता था। इस अकेलेपन के कारण वह ऊँची आवाज़ में कविता का गान करता था। कभी-कभी वह कविता पाठ करते समय अभिनय करता था और थुई-थुई करके नाचता भी था। इस अकेलेपन के लगाव के कारण उसने अनेक बार नाचकर कविता का गान किया।

प्रश्न 5.
आपके खयाल से पढ़ाई-लिखाई के संबंध में लेखक और दत्ता जी राव का रवैया सही था या लेखक के पिता का? तर्क सहित उत्तर दें।
उत्तर:
हमारे विचार में पढ़ाई-लिखाई के संबंध में दत्ता जी राव का रवैया बिल्कुल सही था और लेखक के पिता का रवैया गलत था। लेखक का यह सोचना बिल्कुल सही है कि पढ़ लिखकर कोई नौकरी मिल जाएगी और चार पैसे हाथ में आने से विठोबा आण्णा के समान कोई व्यापार किया जा सकता है। उसका सोचना यह भी सही था कि जन्म भर खेत में काम करने से कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। इसी प्रकार दत्ता जी राव का रवैया बिल्कुल सही कहा जा सकता है। उसी ने लेखक के पिता को धमकाया तथा लेखक को पढ़ने के लिए पाठशाला भिजवाया। लेखक के पिता का यह कहना-“तेरे ऊपर पढ़ने का भूत सवार हुआ है। मुझे मालूम है, बालिस्टर नहीं होनेवाला है तू?” यह सर्वथा अनुचित है, परंतु आज के हालात को देखते हुए आज का पढ़ा-लिखा व्यक्ति वैज्ञानिक ढंग से खेती करके अच्छे पैसे कमा सकता है और समाज के निर्माण में समुचित योगदान दे सकता है।

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प्रश्न 6.
दत्ता जी राव से पिता पर दबाव डलवाने के लिए लेखक और उसकी माँ को एक झूठ का सहारा लेना पड़ा। यदि झूठ का सहारा न लेना पड़ता तो आगे का घटनाक्रम क्या होता? अनुमान लगाएँ।।
उत्तर:
कथानायक और उसकी माँ दत्ता जी राव के पास इसलिए गए थे कि वे लेखक के पिता पर दबाव डालकर लेखक को पाठशाला भिजवाया जा सके। उठते समय माँ ने दत्ता जी राव से कहा था-“हमने यहाँ आकर ये सभी बातें कहीं हैं, यह मत बता देना, नहीं तो हम दोनों की खैर नहीं है। माँ अकेली साग-भाजी देने आई थी। यह बता देंगे तो अच्छा होगा।” ऐसा ही झूठ लेखक की माँ ने अपने पति से बोला और उसे दत्ता जी राव के यहाँ मिलने के लिए भेजा।

यदि लेखक की माँ यह झूठ नहीं बोलती तो लेखक के दादा (पिता) बहुत नाराज़ हो जाते और माँ-बेटे की खूब पिटाई करते। दत्ता जी राव को इस बात का पता नहीं चलता कि लेखक का पिता स्वयं अय्याशी करने के लिए बेटे को खेत में झोंके हुए है। इसी प्रकार लेखक ने यह झूठ न बोला होता कि दादा (पिता) को बुलाने आया हूँ, उन्होंने अभी खाना नहीं खाया है। तब लेखक वहाँ जा नहीं पाता और दादा (पिता) लेखक पर झूठे आरोप लगाकर दत्ता जी राव को चुप करा देता। यदि माँ-बेटे यह तीन झूठ न बोलते तो इसका दुष्परिणाम यह होता कि लेखक जीवन-भर पढ़ाई न कर पाता और कोल्हू के बैल के समान खेती में पिसता रहता।

HBSE 12th Class Hindi जूझ Important Questions and Answers

बोधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
आनंद अर्थात् कथानायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।
अथवा
कथानायक की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
कथानायक में पाठशाला जाकर पढ़ने की बड़ी ललक थी। लेकिन वह अपने दादा के डर से यह नहीं कह पाता कि वह पढ़ने जाएगा। अतः अपनी पढ़ाई को लेकर वह अपनी माँ के सामने अपने मन की इच्छा को प्रकट करता है और माँ को यह सुझाव देता है कि उसे दत्ता जी राव सरकार की सहायता लेनी चाहिए। वस्तुतः यह बालक बड़ा ही दूरदर्शी और बुद्धिमान है। वह इस बात को अच्छी प्रकार जानता है कि उसके दादा न तो उसकी माँ की सुनेंगे और न लेखक की। लेकिन वह दत्ता जी राव के आदेश का पालन अवश्य करेंगे। इसलिए वह माँ को साथ लेकर दत्ता जी राव के सामने सारी सच्चाई खोल देता है।

इसके लिए वह माँ के सहयोग से झूठ का सहारा भी लेता है। गाँव का यह छोटा-सा लड़का इस तथ्य को भली प्रकार जानता है कि पढ़ाई-लिखाई करके कोई नौकरी प्राप्त की जा सकती है अथवा कोई व्यापार भी किया जा सकता है। इसके साथ-साथ यह बालक बड़ा ही परिश्रमी है। सवेरा होते ही वह खेत में जाता है और ग्यारह बजे तक खेत में काम करने के बाद पाठशाला जाता है। यही नहीं, पाठशाला से लौटकर वह ढोर भी चराता है। यद्यपि कक्षा में उसे अपने अस्तित्व के लिए जूझना पड़ता है, लेकिन वह खेती तथा पढ़ाई दोनों को बड़ी मेहनत एवं लगन के साथ करता है।

शीघ्र ही कक्षा के होशियार बच्चों में उसकी गिनती होने लग जाती है तथा मॉनीटर के समान वह दूसरे बच्चों के सवाल जाँचने लगता है। शीघ्र ही यह बालक अध्यापकों को प्रभावित करने लगता है तथा गणित के मास्टर उसे मॉनीटर का कार्य सौंप देते हैं। मराठी अध्यापक के संपर्क में आने के बाद कविता लेखन में उसकी रुचि उत्पन्न होती है। वह छठी-सातवीं के बालकों के सामने कविता गान करता है तथा पाठशाला के समारोह में भी भाग लेता है। मराठी अध्यापक के सहयोग से शुरू में वह तुकबंदी करता है, लेकिन बाद में वह अच्छी कविता लिखने लग जाता है।

प्रश्न 2.
‘जूझ’ कहानी के आधार पर दत्ता जी राव का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
दत्ता जी राव गाँव का एक सफल ज़मींदार है। गाँव वाले उनका बड़ा आदर करते हैं। एक समय लेखक के दादा उन्हीं के खेतों पर काम करते थे। वे बड़े ही नेकदिल तथा प्रभावशाली व्यक्ति हैं। दूसरों के दुख में वे सहायता करने वाले व्यक्ति हैं। बच्चों तथा स्त्रियों के प्रति उनका व्यवहार बड़ा ही कोमल और अनुकूल है। जो भी व्यक्ति उनके दरवाजे पर सहायता के लिए आता है वे उसकी सहायता करते हैं। कथानायक उनकी इस प्रवृत्ति से पूरी तरह परिचित है। इसलिए वह अपनी माँ के साथ उनकी सहायता लेने जाता है।

दत्ता जी राव साम, दाम, दंड, भेद आदि सभी तरीके अपनाकर काम निकालना जानते हैं। इसलिए लेखक तथा उसकी माँ के कहने पर दादा को अपने पास बुलाया। लेखक भी बहाने से वहाँ पहुँच गया। इस अवसर पर हुई बातचीत से दादा की सारी कलई खुल गई। राव जी ने उसे खूब फटकारा और खरी-खोटी सुनाई। उसे इस बात के लिए मजबूर कर दिया कि वह लेखक को पढ़ने के लिए पाठशाला अवश्य भेजे। वस्तुतः दत्ता जी राव एक कुशल कुम्हार की भाँति पहले तो उसे खूब ठोकते-पीटते हैं, बाद में अपनी उदारता एवं करुणा द्वारा उसे प्यार से अच्छी प्रकार से समझाते हैं। इसलिए वह लेखक के दादा को सही रास्ते पर ले आता है।

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प्रश्न 3.
लेखक के दादा की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
लेखक का दादा इस उपन्यास का खल पात्र है। वह एक आलसी, निकम्मा तथा ऐय्याश व्यक्ति है। उसकी पत्नी के अनुसार वह दिन भर एक वेश्या के घर पर पड़ा रहता है तथा एक आवारा साँड की तरह गाँव की गलियों में घूमता रहता है। अपने पुत्र के भावी जीवन के बारे में उसके मन में कोई चिंता नहीं है। उसने अपने छोटे-से लड़के को पाठशाला से हटाकर खेती में डाल दिया है। न उसे घर-परिवार की चिंता है और न अपनी पत्नी एवं बेटे की। वह हमेशा आवारागर्दी करता रहता है। बात-बात पर पत्नी को डाँटना एवं मारना उसके लिए एक सामान्य बात है। उसकी पत्नी उसे बरहेला सूअर कहती है।

यदि कोई घर का आदमी उसकी आवारागर्दी में बाधा उत्पन्न करता है तो वह उसे कुचल देता है। वस्तुतः दादा गाँव के आम शराबियों तथा मक्कारों के समान है। अपनी रक्षा के लिए वह बड़े-से-बड़ा झूठ बोल सकता है। यही नहीं, वह अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए अपने मेहनती तथा होनहार बालक पर आरोप लगाने से बाज नहीं आता। लेकिन दादा एक बुरा व्यक्ति होते हुए भी दत्ता जी राव का पूरा आदर-मान करता है और उसकी डाँट-फटकार को सुनकर सीधे रास्ते पर आ जाता है।

प्रश्न 4.
डेढ़ साल तक घर बैठे रहने के बाद भी कथानायक फिर से पाठशाला कैसे पहुँचता है?
उत्तर:
कथानायक जब पाँचवीं कक्षा में था, तब उसके दादा ने उसे पाठशाला से हटाकर खेती के काम में लगा दिया। परंतु कथानायक के मन में पढ़ाई के लिए बड़ी ललक थी। वह सोचता था कि मैं अब भी पाठशाला चला गया तो पाँचवीं कक्षा अवश्य पास कर लूँगा। परंतु वह दादा से अपने मन की बात नहीं कर सकता। इसीलिए उसने माँ की सहायता ली और दोनों माँ-बेटे दत्ता जी राव के पास गए। साथ ही दोनों ने दत्ता जी राव से यह भी कहा कि उनके यहाँ आने की बात दादा से न कहे। उधर माँ ने भी यह बहाना बनाया कि वह दत्ता जी के यहाँ साग-भाजी देने गई थी। इस प्रकार झूठ का सहारा लेकर कथानायक ने अपने दादा पर दत्ता जी राव का दबाव डलवाया। अन्ततः दादा इन शर्तों पर कथानायक को पाठशाला भेजने को तैयार हो गया कि वह सवेरे ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा, फिर पाठशाला जाएगा और पाठशाला से लौटकर उसे खेत में पशु भी चराने पड़ेंगे। इन सब संघर्षों से जूझने के बाद लेखक पाठशाला जा सका।

प्रश्न 5.
पाठशाला जाने पर लेखक को किन परेशानियों का सामना करना पड़ा?
उत्तर:
कक्षा में गली के केवल दो लड़के ही लेखक के परिचित थे, बाकी सभी अपरिचित थे। लेखक को कमजोर बच्चों के साथ बैठने के लिए मजबूर किया गया। उसके कपड़े पाठशाला के अनुकूल नहीं थे। लट्टे के थैले में पिछली कक्षा की कुछ किताबें और कापियाँ थीं। उसने सिर पर गमछा पहना था और लाल रंग की मटमैली धोती पहनी थी। शरारती लड़के उसका मज़ाक उड़ाने लगे। एक शरारती लड़के ने उसका गमछा छीन लिया और मास्टर जी की मेज पर रख दिया। छुट्टी के मध्यकाल में उसकी धोती की लाँग को भी खींचने का प्रयास किया गया। कक्षा के एक किनारे पर वह एक अपरिचित तथा उपेक्षित विद्यार्थी के समान बैठा था।

छुट्टी के बाद जब वह घर लौटा तो मन-ही-मन सोचा कि लड़के यहाँ मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, मेरा गमछा उतारते हैं, मेरी धोती खींचते हैं। इस तरह मैं कैसे निर्वाह कर पाऊँगा। इससे तो खेत का काम ही अच्छा है। परंतु अगले दिन वह पुनः उत्साहित होकर पाठशाला पहुँच गया। उसे आठ दिन तक एक नई टोपी तथा दो नई नाड़ी वाली मैलखाऊ रंग की चड्डियाँ मिलीं। वस्तुतः यही स्कूल की ड्रेस थी। अन्ततः मंत्री नामक कक्षा के अध्यापक के डर के कारण लेखक शरारती लड़कों के अत्याचार से बच पाया और वह मन लगाकर पढ़ाई करने लगा।

प्रश्न 6.
कथानायक की माँ की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
लेखक की माँ एक शोषित तथा प्रताड़ित नारी है। उसके पति ने उसे डरा-धमका कर कुंठित कर दिया है। पति की हिंसक प्रवृत्ति के समक्ष वह हार चुकी है। मन से तो वह अपने पुत्र का कल्याण चाहती है, लेकिन पति के डर के कारण कुछ कर नहीं पाती। वह भी चाहती है कि उसका बेटा पढ़ाई करे, लेकिन वह लाचार है। पुत्र द्वारा पढ़ाई करने का प्रस्ताव रखने पर वह कहती है-“अब तू ही बता, मैं क्या करूँ? पढ़ने-लिखने की बात की तो वह बरहेला सूअर की तरह गुर्राता है।”

अन्ततः लेखक द्वारा दत्ता जी राव के पास चलने के प्रस्ताव को वह स्वीकार कर लेती है। फिर भी उसे विश्वास नहीं है कि उसका पति आनंदा को पाठशाला जाने देगा। परंतु वहाँ जाकर उसकी हिम्मत बढ़ जाती है और वह सारी सच्चाई दत्ता जी राव को बता देती है। लेकिन वह दत्ता जी राव को यह भी कहती है कि वह उसके आने के बारे में उसके पति से कुछ न कहे।

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प्रश्न 7.
सिद्ध कीजिए कि आनंदा एक जुझारू बालक है।
उत्तर:
‘जूझ’ कथांश को पढ़ने से पता चलता है कि आनंदा अर्थात् लेखक एक सच्चा जुझारू है। उसमें निरंतर संघर्ष करने की प्रवृत्ति है। वह प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करता है। वह अपनी मेहनत के द्वारा असंभव काय वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करके माँ को दत्ता जी राव का सहयोग लेने के लिए कहता है और सफल भी होता है। पाठशाला में प्रवेश लेने के बाद उसे पुनः घोर निराशा तथा तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। लेकिन वह घबराता नहीं। शरारती बच्चों से बचता हुआ वह न केवल अध्यापक का प्रिय विद्यार्थी बन जाता है, बल्कि कवि भी बन जाता है। लेकिन यह सब करने के लिए वह पाठशाला की पढ़ाई तथा खेतों में निरंतर जूझता रहता है। अतः यह कहना गलत नहीं होगा कि आनंदा एक जुझारू बालक है।

प्रश्न 8.
सिद्ध कीजिए कि लेखक एक बुद्धिमान और प्रतिभा संपन्न बालक है।
उत्तर:
बचपन से ही लेखक में एक बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण देखे जा सकते हैं। अपनी पढ़ाई को जारी रखने के लिए वह अपनी माँ को समझाता है और उसे दत्ता जी राव के पास ले जाता है। यही नहीं, वह राव साहब को विश्वास दिलाकर अपने पिता को बाध्य कर लेता है। पाठशाला की प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वह अपनी बुद्धि के बल पर अध्यापकों का प्रिय छात्र बन जाता है और गणित तथा साहित्य में अग्रणी स्थान पा लेता है। उसे कक्षा का मॉनीटर भी बना दिया जाता है। मराठी-अध्यापक का सहयोग पाकर वह अच्छी कविता लिखने और गाने लगता है। लेकिन पढ़ाई के काम के साथ-साथ वह अपने पिता द्वारा रखी गई शर्तों के अनुसार खेत के कार्य को पूरी ईमानदारी से संपन्न करता है। अतः यह कहना अनुचित न होगा कि आनंदा एक प्रतिभाशाली तथा बुद्धिमान बालक है।

प्रश्न 9.
‘जूझ’ कहानी में पिता को मनाने के लिए माँ और दत्ता जी राव की सहायता से एक चाल चली गई है। क्या ऐसा कहना ठीक है? क्यों?
उत्तर:
‘जूझ’ कहानी में एक पिता अपने बेटे को पढ़ाने की बजाए खेती के काम में लगाता है और स्वयं दिन भर गाँव में आवारागर्दी करता है। यदि उसे बेटे को पढ़ाने के लिए कहा जाए तो वह बरहेला सूअर की तरह गुर्राता है। लेखक अपनी माँ के साथ मिलकर दत्ता जी राव की शरण में जाता है। तीनों ने मिलकर एक ऐसा उपाय निकाला, ताकि कथानायक की पढ़ाई आरंभ हो सके। यदि यह उपाय न अपनाया जाता तो लेखक आजीवन अनपढ़ ही रहता। अतः इस उपाय को चाल नहीं कह सकते, क्योंकि ‘चाल’ शब्द से षड्यंत्र की बू आती है। इसे युक्ति या उपाय कह सकते हैं।

प्रश्न 10.
किस घटना से पता चलता है कि लेखक की माँ उसके मन की पीड़ा समझ रही थी? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए।
उत्तर:
लेखक ने अपनी माँ से निवेदन किया कि वह आगे पढ़ाई करना चाहता है। पहले तो उसने अपनी लाचारी दिखाई, लेकिन जब लेखक ने माँ को दत्ता जी राव के पास चलने का सुझाव दिया तो वह लेखक की बात को मान गई। उसे लगा कि बेटे की पढ़ाई आरंभ कराने का यही सही रास्ता है। वह तत्काल पुत्र को साथ लेकर राव साहब के पास गई और उसने बड़ी हिम्मत जुटाकर सारी बात उनके सामने रखी। इस घटना से पता चलता है कि माँ अपने बेटे के मन की पीड़ा को समझती थी।

प्रश्न 11.
लेखक को पढ़ाने के लिए उसके पिता ने क्या शर्ते रखी?
उत्तर:
लेखक के पिता ने उसकी पढ़ाई के लिए अनेक शर्ते रखीं। उसने कहा कि पाठशाला जाने से पूर्व वह ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा, पानी लगाएगा और वहीं से पाठशाला जाएगा। सवेरे ही बस्ता लेकर पहले वह खेत में जाएगा। पाठशाला से छुट्टी होने के बाद वह घर पर बस्ता छोड़कर सीधा खेत में आएगा और घंटा भर ढोर चराएगा। जिस दिन खेत में काम अधिक होगा, वह पाठशाला नहीं जाएगा। आखिर लेखक ने दादा की सभी शर्ते मान लीं और पाठशाला जाना आरंभ कर दिया।

प्रश्न 12.
पाठशाला में पहले ही दिन लेखक के साथ कक्षा में क्या शरारतें हुईं? लेखक ने यह क्यों सोचा कि वह आगे से स्कूल नहीं जाएगा?
उत्तर:
पहले ही दिन कक्षा में लेखक को खूब तंग किया गया। चह्वाण नाम के लड़के ने लेखक का गमछा छीनकर अपने सिर पर लपेट लिया और फिर उसे अध्यापक की मेज पर रख दिया। बीच की छुट्टी में उसकी धोती की लाँग को भी खोलने का प्रयास किया। अन्य बच्चों ने उसकी खूब खिल्ली उड़ाई और मनमानी छेड़खानी की। उसकी हालत कौओं की चोंचों से घायल किसी खिलौने जैसी हो गई, जिससे लेखक का मन निराश हो गया। इसलिए उसने मन-ही-मन सोचा कि वह आगे से स्कूल नहीं जाएगा। इससे तो खेती का काम ही ठीक होगा।

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प्रश्न 13.
दत्ता जी राव की सहायता के बिना कहानी का ‘मैं पात्र वह सब नहीं पा सकता था जो उसे मिला। टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
यह कथन सर्वथा सही है कि दत्ता जी राव की सहायता के बिना कथानायक न तो आगे पढ़ सकता था और न ही कवि बन सकता था। लेखक और उसकी माँ के कहने पर दत्ता जी राव समझ गए कि ‘मैं’ पात्र में आगे पढ़ने की लगन है। अतः उसने ही उसके पिता (दादा) को डाँट फटकारकर लेखक को आगे पढ़ने के लिए तैयार किया। अतः लेखक के लिए दत्ता जी राव की सहायता का विशेष महत्त्व है।

प्रश्न 14.
दुबारा पाठशाला जाने पर लेखक का पहले दिन का अनुभव किस प्रकार का था?
उत्तर:
दुबारा पाठशाला जाने पर लेखक का पहले दिन का अनुभव कोई अच्छा नहीं था क्योंकि एक तो उसे कम उम्र के साथ बैठना पड़ा। दूसरा, वह इन बालकों को अपने से कम अक्ल का मानता था। कक्षा के सबसे शरारती लड़के चाण ने उसकी खिल्ली उड़ाई और उसका गमछा छीनकर मास्टर की मेज पर रख दिया। वह यह सोचकर डर गया कि कहीं उसका गमछा फट न जाए। बीच की छुट्टी में उसी शरारती लड़के ने उसकी धोती के लंगोट को भी खींचने का प्रयास किया। उसे कक्षा में बेंच के एक कोने पर अलग बैठना पड़ा। इस प्रकार लेखक का दुबारा पाठशाला जाने का पहला दिन कोई खास नहीं था।

प्रश्न 15.
पाँचवीं कक्षा में पास न होने के बाद लेखक को कैसा लगा? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
जो लड़के चौथी कक्षा पास करके पाँचवीं में आए थे, उनमें से गली के दो लड़कों को छोड़कर लेखक किसी को नहीं जानता था। जो लड़के कक्षा में उसके साथ थे, वे कम अक्ल तथा मंद बुद्धि के थे। अपनी पुरानी कक्षा का विद्यार्थी होकर भी वह अजनबी के रूप में कक्षा में बैठा था। पुराने सहपाठी उसे अच्छी तरह जानते थे, परंतु नए लड़के उसकी खिल्ली उड़ा रहे थे। कोई उसका गमछा छीन रहा था, कोई उसकी धोती की लाँग को खींचने की कोशिश कर रहा था, कोई उसके थैले का मज़ाक उड़ा रहा था। उसे पश्चाताप हो रहा था कि अवसर मिलने पर वह पाँचवीं कक्षा पास न कर सका और उसे फिर से पढ़ना पड़ रहा है।

प्रश्न 16.
लेखक का पाठशाला में विश्वास कैसे बढ़ा? ‘जूझ’ कहानी के आधार पर बताइए।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में लेखक के लिए दो घटनाओं का विशेष महत्त्व है। उसने कक्षा के मॉनीटर के समान गणित के सवाल निकालने आरंभ कर दिए। इससे मास्टर जी ने उसे भी अन्य लड़कों के सवाल जाँचने पर लगा दिया। इससे लेखक का आत्मविश्वास बढ़ने लगा। दूसरी घटना यह हुई कि वह भी मराठी अध्यापक के समान लय तथा गति के साथ कविता का गान करने लगा। इससे उसे प्रार्थना सभा में कविता गान करने का अवसर प्राप्त हुआ। उसका विश्वास अब इतना बढ़ गया कि वह स्वयं भी कविता लिखने लगा।

प्रश्न 17.
कथानायक को मास्टर की छड़ी की मार अच्छी क्यों लगती थी?
उत्तर:
लेखक कोई भी कीमत चुका कर पढ़ना चाहता था। इसीलिए वह अपने पिता की सभी शर्ते मान लेता है। वह जानता है कि खेती में उसका भविष्य अंधकारमय है। पढ़-लिख कर वह कोई नौकरी पा सकता है अथवा कोई व्यवसाय भी कर सकता है। इसीलिए वह अपनी पढ़ाई को पूरा करने के लिए पिता की सभी शर्ते मान लेता है। खेती के काम की अपेक्षा वह मास्टर की छड़ी की मार को सहन करना अच्छा समझता है। छड़ी की मार से कम-से-कम उसका भविष्य तो सुधर जाएगा। यही सोच कर वह छड़ी की मार को सहना श्रेयस्कर समझता है।

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प्रश्न 18.
कथानायक ने बचपन में किस प्रकार की कविताएँ लिखने का प्रयास किया?
उत्तर:
कथानायक को जब यह पता चला कि उसके मराठी के अध्यापक सौंदलगेकर ने अपने घर के दरवाज़े पर लगी मालती की लता पर कविता लिखी है, तो उसे लगा कि वह भी अपने आस-पास, अपने खेतों तथा अपने गाँव पर कविता बना सकता है। वह ढोर चराते समय फसलों पर या जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। इस कार्य के लिए वह अपने पास कागज़ का टुकड़ा तथा पैंसिल रखने लगा। कभी-कभी वह कंकड़ से पत्थर की शिला पर या लकड़ी से भैंस की पीठ पर कविता लिख लेता था। फिर उसे याद करके लिखकर अपने मास्टर को दिखाता था।

प्रश्न 19.
मराठी के अध्यापक से कविता पढ़कर कथानायक को क्या लाभ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
मराठी के अध्यापक से कविता पढ़ने के बाद कथानायक में कविता के प्रति अत्यधिक रुचि जागृत हुई। वह गति, लय, आरोह-अवरोह तथा अभिनय के साथ काव्य पाठ करने लगा। धीरे-धीरे वह इस काम में इतना पारंगत हो गया कि उसका काव्य पाठ अध्यापक से अधिक आकर्षक था। फलतः उसे कक्षा के सामने कविता गाने का अवसर मिला और स्कूल के समारोह में भाग लेने का मौका मिला। इससे कथानायक उत्साहित हो गया। वह अकेले में ऊँचे स्वर में कविता का गान करता था, नाचता था और अभिनय करता था। धीरे-धीरे उसे स्वयं कविता लिखने का शौक लग गया।

प्रश्न 20.
लेखक को अकेलेपन में आनंद क्यों आता था?
उत्तर:
जब लेखक अपने खेत में अकेला लय, गीत और ताल के साथ कविता का गान करता था और अभिनय करता था तो अकेलेपन में उसे अत्यधिक आनंद प्राप्त होता था। अकेलेपन में वह खुलकर गा सकता था, अभिनय कर सकता था और नाच भी सकता था। ऐसा करने में उसे बड़ा आनंद मिलता था।

प्रश्न 21.
‘जूझ’ कहानी के माध्यम से लेखक ने क्या सीख दी है?
अथवा
‘जूझ’ कहानी का उद्देश्य (प्रतिपाद्य) स्पष्ट करें।
उत्तर:
‘जूझ’ कहानी पाठकों को निरंतर संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। मानव-जीवन में चाहे परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों अथवा कितनी बाधाएँ और संकट क्यों न हों, उसे निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि धैर्य, हिम्मत तथा संघर्ष के साथ मुसीबतों का सामना करना चाहिए। इस कहानी का कथानायक पढ़ना चाहता है, लेकिन उसका पिता उसे पढ़ने नहीं देता। लेखक इस बाधा का हल निकालता है। वह अपनी माता का सहयोग लेकर दत्ता जी राव के पास जाता है और अन्ततः अपने पिता को राजी कर लेता है। इसके बाद भी बाधाएँ समाप्त नहीं होतीं। स्कूल के शरारती बच्चे उसे तंग करते हैं तथा उसकी खिल्ली उड़ाते हैं। परंतु वह धैर्यपूर्वक उनका भी सामना करता है। अन्त में वह अपने अध्यापकों का चहेता बन जाता है और कक्षा में मॉनीटर बन जाता है।

प्रश्न 22.
‘जूझ’ कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
इस कहानी का शीर्षक ‘जूझ’ पूर्णतया सार्थक है। यह शीर्षक कहानी की मूल भावना के सर्वथा अनुकूल है। कहानी का नायक आनंदा कहानी के आदि से अंत तक लगातार संघर्ष करता हुआ दिखाई देता है। अन्ततः वह सफलता प्राप्त करता है। लेखक ने कथानायक की जुझारू प्रवृत्ति का उद्घाटन करने के लिए यह कहानी लिखी है और उसका नामकरण ‘जूझ’ किया है। दूसरा यह शीर्षक संक्षिप्त, सटीक तथा सार्थक है। यह शीर्षक जिज्ञासावर्धक होने के कारण पाठकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। अतः यह शीर्षक सर्वथा तर्कसंगत एवं सार्थक है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
कथानायक पढ़ना क्यों चाहता था?
उत्तर:
कथानायक को लगा कि खेती में उसके लिए कोई भविष्य नहीं है। यदि वह सारा जीवन खेती-बाड़ी में लगा रहा तो उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाएगा। पढ़-लिखकर वह नौकरी कर सकता है या कारोबार कर सकता है। यही सोचकर वह खेती छोड़कर पढ़ना चाहता था।

प्रश्न 2.
लेखक का दादा कोल्हू जल्दी क्यों चलाता था?
उत्तर:
लेखक का दादा खेती के धंधे को अच्छी तरह समझता था। वह इस बात को अच्छी तरह समझता था कि यदि उसके द्वारा बनाया गया गुड़ जल्दी बाज़ार में आएगा तो उसे अच्छे पैसे मिल जाएँगे। इसलिए दादा जल्दी से कोल्हू चलाता था।

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प्रश्न 3.
लेखक का पिता (दादा) राव साहब का नाम सुनते ही उनसे मिलने के लिए क्यों गया?
उत्तर:
पूरे गाँव में दत्ता जी राव का अत्यधिक मान सम्मान था। दादा जी उनके बुलावे को कैसे ठुकरा सकता था, बल्कि वह तो यह जानकर प्रसन्न हो गया कि उन्होंने उसे अपने घर बुलाया है। अतः वह रोटी खाए बिना ही दत्ता जी राव से मिलने के लिए चल दिया।

प्रश्न 4.
कथानायक ने दत्ता जी राव को क्या विश्वास दिलाया?
उत्तर:
कथानायक ने अपनी पढ़ाई के बारे में दत्ता जी राव को विश्वास दिलाया। उसने कहा कि अभी जनवरी का महीना है और दो महीने में वह परीक्षा की पूरी तैयारी कर लेगा और परीक्षा में अवश्य पास हो जाएगा। इस तरह उसका एक साल बच जाएगा। उसने यह भी विश्वास दिलाया कि उसकी पढ़ाई का खेती के काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

प्रश्न 5.
लेखक ने दत्ता जी राव की उपस्थिति में अपने दादा से निडर होकर बातचीत क्यों की?
उत्तर:
लेखक पहले अपनी माँ के साथ दत्ता जी राव के पास गया था। तब माँ ने अपने पति की आवारागर्दी की सारी बात दत्ता जी राव को बता दी थी। उस समय दत्ता जी राव ने लेखक से कहा कि वह उसके दादा के आने के थोड़ी देर बाद ही वहाँ आ जाए और निडर होकर अपनी सारी बात कहे। इसलिए लेखक ने बड़ी निडरता के साथ अपने पढ़ने की बात को रखा।

प्रश्न 6.
लेखक के पिता ने दत्ता जी राव के समक्ष उसकी पढ़ाई बंद करने के क्या कारण बताए?
उत्तर:
लेखक के पिता ने दत्ता जी राव से झूठ बोलते हुए कहा कि लेखक (कथानायक) को गलत आदतें पड़ गई हैं। वह कंडे बेचता है, चारा बेचता है और सिनेमा देखने जाता है। यही नहीं, वह खेती और घर के काम की ओर उसकी पढ़ाई रोक दी गई है और उसे खेत के काम पर लगा दिया है।

प्रश्न 7.
मंत्री नामक मास्टर के व्यक्तित्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मंत्री नामक मास्टर गणित पढ़ाते थे। लड़कों के मन में उनकी दहशत बैठी हुई थी। वे छड़ी का उपयोग नहीं करते थे। हाथ से गरदन पकड़कर पीठ पर घूसा मारते थे। पढ़ने वाले लड़कों को शाबाशी भी मिलती थी। एकाध सवाल गलत हो जाते तो उसे वे समझा देते थे। किसी लड़के की कोई मूर्खता दिखाई दे तो उसे वहीं ठोंक देते। इसलिए सभी का पसीना छूटने लगता और सभी छात्र घर से पढ़ाई करके आने लगे।

प्रश्न 8.
पाठशाला जाते ही लेखक का मन खट्टा क्यों हो गया?
उत्तर:
पाठशाला जाते ही लेखक को पता चला कि वहाँ का सारा वातावरण बदल चुका है। उसके सभी साथी अगली कक्षा में चले गए थे। उसकी कक्षा के सभी बच्चे उससे कम उम्र के थे और कुछ मंद बुद्धि के थे। गली के दो लड़कों के सिवाय कोई भी कक्षा में उसका परिचित नहीं था। यह सब देखकर उसका मन खट्टा हो गया।

प्रश्न 9.
लेखक को पाँचवीं कक्षा में ही दाखिला क्यों लेना पड़ा?
उत्तर:
जब लेखक पाँचवीं कक्षा में पढ़ रहा था तो दादा ने उसका स्कूल जाना बंद कर दिया और उसे खेती के काम में लगा दिया। अतः पाँचवीं में पास न होने के कारण लेखक को फिर से उसी कक्षा में दाखिला लेना पड़ा।

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प्रश्न 10.
वसंत पाटील के व्यक्तित्व अथवा विद्यार्थी जीवन का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
वसंत पाटील लेखक का सहपाठी था। वह पतला-दुबला, किन्तु पढ़ने में होशियार था। उसका स्वभाव शांत था। उसके गणित के सभी सवाल ठीक निकलते थे। गणित के अध्यापक ने उसे कक्षा का मॉनीटर बना दिया था। लेखक भी उसे देखकर खूब मेहनत करने लगा था। लेखक पर वसंत पाटील का गहरा प्रभाव पड़ा था।

प्रश्न 11.
वसंत पाटिल की नकल करने से कथानायक को क्या लाभ प्राप्त हुआ?
उत्तर:
वसंत पाटील कक्षा में सबसे होशियार विद्यार्थी था। वह कक्षा का मॉनीटर भी था। उसकी नकल करने से कथानायक भी गणित के सवाल हल करने लगा। धीरे-धीरे वह भी कक्षा में वसंत पाटील के समान सम्मान प्राप्त करने लगा। यही नहीं, अध्यापक भी उसका उत्साह बढ़ाने लगे।

प्रश्न 12.
मास्टर सौंदलगेकर की साहित्यिक चेतना/काव्य-ज्ञान को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मास्टर सौंदलगेकर मराठी भाषा का अध्यापक था। वह बहुत तन्मय होकर कक्षा में बच्चों को पढ़ाता था। उस में साहित्य के प्रति गहन आस्था थी। उसे मराठी व अंग्रेज़ी की बहुत-सी कविताएँ कण्ठस्थ थीं। उसका गला बहुत सुरीला था। उसे छंद और लय का भी पूर्ण ज्ञान था। वह कविता के साथ ऐसे जुड़ता कि अभिनय करके भाव बोध करा देता। वह स्वयं भी बहुत सुन्दर कविता रचना करता था। वह कभी-कभी अपनी कविताएँ भी कक्षा में सुनाता था। लेखक ऐसे क्षणों में बहुत तन्मय हो जाता

प्रश्न 13.
गुड़ के विषय में दादा के व्यापारिक ज्ञान पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
दादा के अनुसार अगर कोल्हू जल्दी शुरू किया जाता तो ईख की अच्छी-खासी कीमत मिल जाती और उनकी यह सोच सही थी। क्योंकि जब चारों ओर कोल्हू चलने शुरू हो जाते तब बाज़ार में गुड़ की अधिकता हो जाती और भाव नीचे उतर आते। अच्छी कीमत वसूलने के लिए दादा गाँव भर से पहले अपना कोल्हू शुरू करवाते।

प्रश्न 14.
आनंदा के दादा की क्रूरता का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:’
जूझ’ कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि आनंदा के दादा (पिता) एक क्रूर व्यक्ति हैं। उसे अपने छोटे-से बालक के प्रति जरा भी सहानुभूति नहीं है। वह उसे पढ़ने के लिए स्कूल भेजने की अपेक्षा खेत मे काम करवाना चाहता है। वह उसकी पढ़ाई का विरोध करता है। वह दत्ता जी राव के कहने से आनंदा को स्कूल भेजने के लिए मान जाता है। उसके लिए भी कई कड़ी शर्ते रखता है। वह आप काम न करके बालक से खेत का काम करवाना चाहता है। यह उसकी क्रूरता का ही प्रमाण है।

प्रश्न 15.
लेखक को यह कब लगा मानो उसके पंख लग गए हों?
उत्तर:
मराठी, अध्यापक के कहने पर लेखक ने अपने द्वारा बनाई गई मनोरम लय को बच्चों के सामने गाया। यही नहीं, उसने स्कूल के समारोह में भी गीत को गाकर सुनाया, जिसे सभी ने पसंद किया। इससे लेखक का उत्साह बढ़ गया। इस प्रकार लेखक को लगा मानो उसके पंख लग गए हों।

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प्रश्न 16.
लेखक के कवियों के बारे में क्या विचार थे? अब वह उन्हें आदमी क्यों समझने लगा?
उत्तर:
पहले लेखक कवियों को किसी अन्य लोक के प्राणी समझता था। किंतु जब उसने देखा कि मराठी के मास्टर जी भी कविता लिखते हैं तब लेखक को समझ में आया कि ये कवि भी उसी के समान हाड़-माँस के आदमी होते हैं। अतः उसके मन का भ्रम दूर हो गया।

प्रश्न 17.
लेखक को मास्टर जी से किन विषयों पर कविताएँ लिखने की प्रेरणा मिली?
उत्तर:
मास्टर जी के घर के द्वार पर मालती की एक लता थी। उन्होंने उस पर एक अच्छी कविता लिखी थी। उसे सुनकर लेखक को भी प्रेरणा मिली। उसने अपने आस-पास के वातावरण, गाँव, खेत, फसल, फल-फूल और पशुओं आदि पर कविताएँ लिखनी आरंभ कर दी।

प्रश्न 18.
आनंदा के काव्य-प्रेम का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आनंदा एक होनहार छात्र था। वह अपने मराठी भाषा के अध्यापक सौंदलगेकर से बहुत प्रभावित था। वह मराठी भाषा में काव्य रचना करता था। आनन्दा ने अपने अध्यापक से प्रेरित होकर काव्य रचना आरम्भ की थी। वह कभी-कभी अपनी कविता को कक्षा में भी पढ़कर सुना देता था। उसे कविता के प्रति इतना प्रेम था कि वह भैंस को चराते समय भैंस की कमर पर भी कविता लिख देता था। कभी-कभी जमीन पर भी कविता लिखने का अभ्यास करता था। बाद में बड़ा होकर उसने अपने परिश्रम से अनेक कविताओं की रचना की थी। इससे उसके काव्य-प्रेम का बोध होता है।

जूझ Summary in Hindi

जूझ लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री आनंद यादव का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री आनंद यादव का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
श्री आनंद यादव का पूरा नाम आनंद रतन यादव है। इनका जन्म सन् 1935 में कागल कोल्हापुर में हुआ जो कि महाराष्ट्र में स्थित है। पाठकों में वे आनंद यादव के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन्होंने मराठी तथा संस्कृत साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधियाँ प्राप्त की और बाद में पी.एच.डी. भी की। बहुत समय तक आनंद यादव पुणे विश्वविद्यालय में मराठी विभाग में कार्यरत रहे। अब तक आनंद यादव की लगभग पच्चीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उपन्यास के अतिरिक्त इनके कविता-संग्रह तथा समालोचनात्मक निबंध भी प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी रचना ‘नटरंग’ का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा किया गया। सन 1990 में साहित्य अकादमी ने इनके द्वारा रचित उपन्यास ‘जूझ’ को पुरस्कार देकर सम्मानित किया। आनंद यादव की साहित्यिक रचनाएँ मराठी साहित्यकारों तथा पाठकों में काफी लोकप्रिय हैं।।

‘जूझ’ एक बहुचर्चित एवं बहुप्रशंसित आत्मकथात्मक उपन्यास है। इसमें एक किशोर के देखे और भोगे हुए गंवई जीवन के खुरदरे यथार्थ की विश्वसनीय गाथा का वर्णन है। इसके साथ-साथ लेखक ने अस्त-व्यस्त निम्न मध्यवर्गीय ग्रामीण समाज तथा संघर्ष करते हुए किसान-मजदूरों के जीवन की यथार्थ झांकी प्रस्तुत की है।

उपन्यास के इस अंश की भाषा सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा है, जिसमें तत्सम, तदभव तथा देशज शब्दों का सुंदर मिश्रण देखा जा सकता है। आत्मकथात्मक शैली के प्रयोग के कारण उपन्यास का यह अंश काफी रोचक एवं प्रभावशाली बन पड़ा है।

जूझ पाठ का सार

प्रश्न-
आनंद यादव द्वारा रचित ‘जूझ’ नामक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
जूझ’ मराठी के प्रसिद्ध कथाकार आनंद यादव के बहुचर्चित उपन्यास का एक अंश है। इसमें एक संघर्षशील किशोर के जीवन का यथार्थ वर्णन किया गया है। किशोर के पिता ने उसे कक्षा चार के बाद पाठशाला नहीं जाने दिया और खेती के काम में लगा लिया। किशोर को खेतों पर पानी लगाने और कोल्हू पर कार्य करना पड़ता है। दिनभर वह खेतों और घर के काम में जुटा रहता है। उसे पता है कि खेतों में कार्य करने से उसे कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। पढ़कर उसे नौकरी मिल सकती है। परंतु वह यह बात अपने दादा से कह नहीं पाता। यदि दादा को इस बात का पता लगेगा तो दादा उसकी बुरी तरह से पिटाई करेंगे। आखिर किशोर अपनी माँ के सहयोग से एक योजना बनाता है। कोल्हू का कार्य लगभग समाप्त हो चुका था। उसकी माँ कंडे थाप रही थी और किशोर बाल्टी में पानी भर-भर कर माँ को दे रहा था। उसने सोचा कि माँ से अकेले में बात करना उचित होगा। आखिर उसने हौंसला करके माँ से बात की। परंतु माँ ने कहा कि जब भी तेरी पढ़ाई की बात चलती है तो तुम्हारे दादा जंगली सूअर के सामान गुर्राने लगता है।

तब किशोर ने अपनी माँ से कहा कि वह दत्ता जी राव देसाई से इस बारे में बात करे। अन्ततः यह तय हुआ कि माँ-बेटा रात को उनसे बात करने जाएँगे। माँ चाहती थी कि उसका पुत्र सातवीं तक पढ़ाई तो अवश्य कर ले। इसलिए दोनों माँ-बेटा दत्ता जी राव के घर गए। दीवार के साथ बैठकर माँ ने दत्ता जी राव को घर की सभी बातें बता दी। उसने यह भी कहा कि उसका पति सारा दिन रखमाबाई के पास रहता है और खेत में खुद काम करने की बजाय उसके लड़के को इस काम पर लगा रखा है। इसलिए उसने उसके पुत्र की पढ़ाई बंद करवा दी है। दत्ता जी का रुख काफी अनुकूल था। यह देखकर किशोर ने कहा कि अब जनवरी का महीना चल रहा है, यदि उसे पाठशाला भेज दिया गया तो वह दो महीने में अच्छी तरह से पढ़कर पाँचवीं कक्षा पास कर लेगा। इस प्रकार उसका एक साल बच जाएगा। किशोर के पिता के काले कारनामे सुनकर राव जी क्रोधित हो उठे और कहा कि वह उसे आज ही ठीक कर देंगे।

राव ने किशोर से यह भी कहा कि जैसे ही तुम्हारे दादा घर पर आएँ तो उसे मेरे यहाँ भेज देना और घड़ी भर बाद तुम भी कोई बहाना करके यहाँ आ जाना। माँ-बेटा दोनों ने मिलकर यह भी निवेदन किया कि उनके यहाँ आने की बात दादा जी को पता न चले। इस पर दत्ता जी राव ने कहा कि तुमसे जो कुछ पूछूगा वह तुम बिना डर के बता देना। आखिर माँ-बेटे घर लौट गए। माँ ने दादा को राव साहब के यहाँ भेज दिया। साथ ही यह बहाना बनाया कि वह उनके यहाँ साग-भाजी देने गई थी। किशोर का दादा राव के बुलावे को अपना सम्मान समझकर तत्काल पहुँच गया। लगभग आधे घंटे बाद माँ ने बच्चे को यह कहकर भेजा कि दादा को खाने पर घर बुलाया है। दत्ता जी ने किशोर को देखकर कहा कि तू कौन-सी कक्षा में पढ़ता है। इस पर किशोर ने उत्तर दिया कि पहले वह पाँचवीं में पढ़ता था। अब पाठशाला नहीं जाता। क्योंकि दादा ने उसे स्कूल जाने से मना कर दिया है और खेतों में पानी देने के काम पर लगा दिया है। दादा ने रतनाप्पा राव को अपनी सारी बात बता दी।

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इस पर राव साहब ने दादा को फटकारते हुआ कहा “खुद खुले साँड की तरह घूमता है, लुगाई और बच्चों को खेती में जोतता है, अपनी मौज-मस्ती के लिए लड़के की बलि चढ़ा रहा है । इसके बाद दत्ता जी ने किशोर से कहा-“तू कल से पाठशाला जा, मास्टर को फीस दे दे, मन लगाकर पढ़, साल बचाना है। यदि यह तुझे पाठशाला न जाने दे, तो मेरे पास चले आना, मैं पढ़ाऊँगा तुझे।” इसके बाद दादा ने किशोर पर आरोप लगाते हुए कहा कि यह दिन भर जुआ खेलता है, कंडे बेचता है, चारा बेचता है, सिनेमा देखता है, खेती और घर का काम बिल्कुल भी नहीं करता है। परंतु यह सब आरोप झूठे थे। अन्ततः दत्ता जी ने दादा को संतुष्ट कर दिया और किशोर को अच्छी प्रकार समझाया। इस पर दादा ने यह स्वीकार कर लिया कि वह अपने बेटे को पाठशाला भेजेगा। परंतु दादा ने यह भी शर्त लगा दी कि वह सुबह ग्यारह बजे तक खेत में काम करेगा और सीधा खेत से ही पाठशाला जाएगा। यही नहीं, छुट्टी के बाद वह घंटा भर पशु चराएगा।

यदि खेत में अधिक काम हुआ तो वह कभी-कभी स्कूल से छुट्टी भी ले लेगा। किशोर ने यह सभी शर्ते मान लीं।। किशोर पाठशाला की पाँचवीं कक्षा में जाकर बैठ गया। कक्षा में दो लड़के उसकी गली के थे और बाकी सब अपरिचित थे। वे किशोर से कम उम्र के थे। वह बैंच के एक कोने पर जाकर बैठ गया। कक्षा के एक शरारती लड़के ने उसका मजाक उड़ाया। यही नहीं, उसका गमछा छीनकर मास्टर जी की मेज पर रख दिया। छुट्टी के समय उस शरारती लड़के ने किशोर की धोती की लाँग खोल दी। यह सब देखकर किशोर घबरा गया और उसका मन निराश हो गया। उसने अपनी माँ से कह कर बाज़ार से नई टोपी और चड्डी मंगवा ली, जिन्हें पहनकर वह स्कूल जाने लगा। इधर अध्यापक कक्षा के शरारती बच्चों को खूब मारते थे, इससे कक्षा का वातावरण कुछ सुधर गया। कक्षा का वसंत पाटील नाम का लड़का उम्र में छोटा था, परंतु पढ़ने में बहुत होशियार था। वह स्वभाव से शांत था और घर से पढ़कर आता था। इसलिए शिक्षक ने उसे कक्षा का मॉनीटर बना दिया। किशोर भी उसी के समान मन लगाकर पढ़ने लगा। धीरे-धीरे गणित उसकी समझ में आने लगा। अब वह भी वसंत पाटील के समान बच्चों के सवाल जांचने लगा। यही नहीं वसंत अब उसका दोस्त बन चुका था। अध्यापक खुश होकर उसे ‘आनंदा’ के नाम से पुकारते थे। अध्यापक के अपनेपन और वसंत की दोस्ती के कारण धीरे-धीरे उसका मन पढ़ाई में लगने लगा।

पाठशाला में न.वा.सौंदलगेकर नाम के मराठी के अध्यापक थे। उन्हें बहुत-सी मराठी और अंग्रेज़ी कविताएँ आती थीं। वे स्वर में कविताएँ गाते थे और छंदलय के साथ कविता का पाठ करते थे। कभी-कभी वे स्वयं भी अपनी कविता लिखते थे और कक्षा में सुनाते थे। धीरे-धीरे किशोर लेखक को उससे प्रेरणा मिलने लगी। जब भी वह खेत पर पानी लगाता या ढोर चराता, तब वह मास्टर के ही हाव-भाव, यति-गति और आरोह-अवरोह आदि के साथ कविता का गान करता था। यही नहीं, वह स्वयं भी कविताएँ लिखने लगा। अब उसे खेत का अकेलापन अच्छा लगता था। वह ऊँची आवाज़ में कविता का गान करता, अभिनय करता और कभी-कभी नांचने भी लगता। मास्टर जी को भी किशोर लेखक का कविता ज्ञान बहुत अच्छा लगा। उनके कहने पर ही किशोर लेखक ने छठी-सातवीं के बालकों के सामने कविता का गान किया। पाठशाला के एक समारोह में उसे कविता पाठ करने का अवसर मिला।

मास्टर सौंदलगेकर भी स्वयं कविता करते थे और उनके घर में भी कुछ कवियों के काव्य-संग्रह रखे हुए थे। वे अकसर लेखक को कवियों के संस्मरण भी सुनाते रहते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि किशोर लेखक को यह पता चल गया कि कवि भी हमारे समान एक मानव है। वह भी हमारे समान कविता कर सकता है। लेखक ने मास्टर जी के घर के दरवाजे पर लगी मालती की लता और उस पर लिखी कविता भी देखी थी।

उसे लगा कि वह भी अपने खेतों पर, गाँव पर, गाँव के लोगों पर कविताएँ लिख सकता है। इसलिए भैंस चराते समय वह पशुओं तथा जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगा। कभी-कभी वह अपनी लिखी हुई कविता मास्टर जी को दिखा देता था। इस काम के लिए वह अपने पास एक कागज़ और पैन रखने लगा। जब भी कागज़ और पैल न होती तो वह कंकर से पत्थर की शिला पर या छोटी लकड़ी से भैंस की पीठ पर कविता लिख देता था। कभी-कभी वह अपनी लिखी हुई कविता मास्टर जी को दिखाने के लिए उनके घर पहुँच जाता था। मास्टर जी भी उसे अच्छी कविता लिखने की प्रेरणा देने लगे और छंद, लय तथा अलंकारों का ज्ञान देने लगे। यही नहीं, वे किशोर युवक को पढ़ने के लिए पुस्तकें भी देने लगे। धीरे-धीरे मास्टर जी और किशोर लेखक में समीपता बढ़ती गई और उसकी मराठी भाषा में सुधार होने लगा। अब किशोर लेखक को शब्द के महत्त्व का पता लगा और वह अलंकार छंद, लय आदि को समझने लगा।

कठिन शब्दों के अर्थ

मन तड़पना = व्याकुल होना। हिम्मत = हौंसला। गड्ढे में धकेलना = पतन की ओर ले जाना। कोल्हू = एक ऐसी मशीन जिसके द्वारा गन्नों का रस निकाला जाता है। बहुतायत = अत्यधिक। मत = विचार। भाव नीचे उतरना = कीमत घटना। अपेक्षा तुलना। जन = मनुष्य। कडे = गोबर के उपले या गौसे। स्वर = वाणी। मन रखना = ध्यान देना। तड़पन = बेचैनी। जोत देना = लगा देना। छोरा = लड़का। निडर = निर्भीक। मालिक = स्वामी। बाड़ा = अहाता। जीमने = खाना खाने। राह देखना = प्रतीक्षा करना। जिरह = बहस । हजामत बनाना = डाँटना, फटकारना। श्रम = मेहनत। लागत = खर्च। लुगाई = स्त्री, पत्नी। काम में जोतना = खूब काम लेना। खुद = स्वयं । बर्ताव = व्यवहार। गलत-सलत = उल्टा-सीधा। ज़रा = तनिक। ना पास = फेल, अनुतीर्ण । वक्त = समय। ढोर = पशु। बालिस्टर = वकील। रोते-धोते = जैसे-तैसे। अपरिचित = अनजान। इंतज़ार = प्रतीक्षा। खिल्ली उड़ाना = मज़ाक उड़ाना। पोशाक = तन के कपड़े। मटमैली = गंदगी। गमछा = पतले कपड़े का तौलिया। काछ = धोती का लाँग।

चोंच मार-मार कर घायल करना = बार-बार पीड़ा पहुँचाना। निबाह = गुज़ारा। उमंग = उत्साह । मैलखाऊ = जिसमें मैल दिखाई न देता हो। दहशत = डर । ऊधम = कोलाहल मचाना। शाबाशी = प्रशंसा। ठोंक देना = पिटाई करना। पसीना छूटना = भयभीत होना। होशियार = चतुर। सवाल = प्रश्न। सही = ठीक। जाँच = परीक्षण। सम्मान = आदर। मुनासिब = उचित। व्यवस्थित = ठीक तरह से। एकाग्रता = ध्यानपूर्वक। मुलाकात = भेंट। दोस्ती जमना = मित्रता होना। कंठस्थ = जबानी याद होना। संस्मरण = पुरानी घटनाओं को याद करना। दम रोककर = तन्मय होकर। मान = आभास। यति-गति = कविता में रुकने तथा आगे बढ़ने के नियम। आरोह-अवरोह = स्वर का ऊँचा-नीचा होना। खटकना = महसूस होना। गपशप = इधर-उधर की बातें। समारोह = उत्सव। तुकबंदी = छंद में बंधी हुई कविता। महफिल = सभा। कविता का शास्त्र = कविता के नियम। ढर्रा = शैली। अपनापा = अपनापन, अपनत्व। सूक्ष्मता = बारीकी से।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

HBSE 12th Class Hindi सिल्वर बैंडिग Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?
उत्तर:
यशोधर बाबू और उनकी पत्नी दोनों ही आधुनिक सोच से दूर हैं, परंतु यशोधर बाबू की पत्नी अपने बच्चों का पक्ष लेते-लेते आधुनिक बन गई है। जब वह विवाह के बाद ससुराल में आई थी, तो उस समय यशोधर बाबू का परिवार संयुक्त परिवार था। घर में ताऊ जी एवं ताई जी की चलती थी। इसलिए उनकी पत्नी के मन में एक बहुत बड़ा दुख था। वह समझती थी कि उसे आचार-विचार के बंधनों में रखा जाता है। मानो वह जवान न होकर बूढ़ी औरत हो। जो नियम बुढ़िया ताई पर लागू होते थे, वे सभी उस पर भी लागू होते थे। इसलिए वह अपनी अतप्त इच्छाओं को पूरा करना चाहती है। इसलिए वह अपने पति से कहती है कि-“तुम्हारी ये बाबा आदम के जमाने की बातें, मेरे बच्चे नहीं मानते तो इसमें उनका कोई कसूर नहीं। मैं भी इन बातों को उसी हद तक मानूंगी जिस हद तक सुभीता हो। अब मेरे कहने से वह सब ढोंग-ढकोसला हो नहीं सकता-साफ बात।” ।

इसलिए यशोधर बाबू की पत्नी इस उम्र में भी बिना बाँह का ब्लाऊज पहनती है। होंठों पर लाली लगाती है और सिल्वर वैडिंग में खुलकर भाग लेती है। परंतु यशोधर बाबू एक परंपरावादी व्यक्ति हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को चाय पान के लिए तीस रुपये तो दे देते हैं परंतु वे आयोजन में भाग नहीं लेते। वे पूजा के लिए मंदिर जाते हैं। सुख-दुख में संयुक्त परिवार के लोगों से मिलना चाहते हैं। परंतु किसी अच्छे मकान में रहने के लिए नहीं जाते। यहाँ तक कि वे डी०डी०ए० का फ़्लैट लेने का भी प्रयास नहीं करते। जब उनके लड़के घर पर उनकी सिल्वर वैडिंग का आयोजन करते हैं, तो वे उससे भी बचने की कोशिश करते हैं। वे अपने आदर्श किशनदा के संस्कारों का ही अनुसरण करते हैं। परिणाम यह होता है कि वे परिस्थितियों के आगे झुक तो जाते हैं, परंतु उनका मन पुरानी परंपराओं से ही चिपका हुआ है। वे नए जमाने की सुविधाओं; जैसे गैस, फ्रिज आदि को अच्छा नहीं समझते। फिर भी वे सोचते हैं कि ये चीजें हैसियत बढाने वाली हैं। सच्चाई तो यह है कि वे समय के साथ ढल नहीं पाते और बार-बार किशनदा के संस्कारों को याद कर उठते हैं।

प्रश्न 2.
पाठ में ‘जो हुआ होगा’ वाक्य की आप कितनी अर्थ छवियाँ खोज सकते/सकती हैं?
उत्तर:
‘जो हुआ होगा’ वाक्य का पाठ में अनेक बार प्रयोग हुआ है। पहली बार इसका तब प्रयोग होता है, जब यशोधर बाबू ने किशनदा के किसी जाति भाई से उनकी मृत्यु का कारण पूछा था। उत्तर में उसने कहा था ‘जो हआ होगा’ अर्थात पता नहीं क्या हुआ और किस कारण से उनकी मृत्यु हुई। किशनदा ने विवाह नहीं किया था। इसलिए उनके बच्चे नहीं थे। इसलिए जाति भाई उनके प्रति उदासीन थे। उन्होंने यह आवश्यक नहीं समझा कि किशनदा की मृत्यु के कारणों का पता लगाया जाए। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि मानव के लिए विवाह संस्कार आवश्यक है। बाल-बच्चों से ही वृद्धावस्था में सुरक्षा हो सकती है। यदि किशनदा की संतान होती, तो उनके रिश्तेदार उनकी मृत्यु के कारणों की जानकारी रखते और उनके प्रति इतने उदासीन न होते।

किशनदा ने भी इस वाक्य का प्रयोग किया है। अपनों से मिली उपेक्षा के लिए, वे इस वाक्य का प्रयोग करते हैं। किशनदा भी जन इसी ‘जो हुआ होगा’ से मरते हैं, गृहस्थ हों, ब्रह्मचारी हों, अमीर हों, गरीब हों, मरते ‘जो हुआ होगा’ से ही हैं। हाँ-हाँ, शुरू में और आखिर में, सब अकेले ही होते हैं। अपना कोई नहीं ठहरा दुनिया में, बस अपना नियम अपना हुआ। यहाँ इस वाक्य का अर्थ अन्य संदर्भ में देखा जा सकता है अर्थात् किसी-न-किसी कारण से ही सबकी मृत्यु होती है। पाठ के आखिर में जब बच्चे यशोधर बाबू पर व्यंग्य करते हैं, तो उनको यह निश्चय हो गया कि किशनदा की मृत्यु ‘जो हुआ होगा’ से ही हुई होगी। भाव यह है कि बच्चे जब अपने माता-पिता की उपेक्षा करने लगते हैं, तो उनके प्राण जल्दी निकल जाते हैं।

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प्रश्न 3.
‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांश का प्रयोग यशोधर बाबू लगभग हर वाक्य के प्रारंभ में तकिया कलाम की तरह करते हैं। इस वाक्यांश का उनके व्यक्तित्व और कहानी के कथ्य से क्या संबंध बनता है?
उत्तर:
‘समहाउ इंप्रापर’ यशोधर बाबू का तकिया कलाम है। जिसका अर्थ यह है कि फिर भी यह अनुचित है। इस पाठ में एक दर्जन से अधिक बार इस वाक्यांश का प्रयोग हुआ है। इससे यशोधर बाबू का व्यक्तित्व झलकता है। वस्तुतः वे सिद्धांत प्रिय व्यक्ति हैं। जब उन्हें कोई बात अनुचित लगती है, तब उनके मुख से यह वाक्य निकल पड़ता है। उदाहरण के रूप में सर्वप्रथम ‘सिल्वर वैडिंग’ के लिए, वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को तीस रुपये चाय पान के लिए देते हैं, परंतु इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं। यही नहीं, वे अपने साधारण पुत्र को असाधारण वेतन मिलना भी ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं।

अन्यत्र उन्होंने अपनों से परायेपन का व्यवहार मिलने, डी०डी०ए० के फ्लैट के लिए पैसे न चुकाने, अपनी वृद्धा पत्नी द्वारा आधुनिका का स्वरूप धारण करने, बेटे द्वारा अपने पिता को वेतन न देने, संपन्नता में सगे-संबंधियों की उपेक्षा करने, बेटी द्वारा विवाह का निर्णय न लेने आदि को भी ‘समहाउ इंप्रापर’ कहा है। इसी प्रकार जब उसकी बेटी जींस तथा सैंडो ड्रैस पहनती है, घर में गैस, फ्रिज लाया जाता है। सिल्वर वैडिंग पर भव्य पार्टी दी जाती है। छोटा साला ओछापन दिखाता है और केक काटा जाता है, तब भी वे इसी वाक्यांश का प्रयोग करते हैं। वस्तुतः यशोधर बाबू किशनदा से प्रभावित होने के कारण सिद्धांतों पर चलने वाले व्यक्ति हैं। यही नहीं, वे भारतीय मूल्यों और मान्यताओं में विश्वास रखते हैं। लगभग ऐसे ही विचार आजकल के बुजुर्गों के हैं।

वाक्यांश कहानी के मूल कथ्य से जुड़ा हुआ है। लेखक यह दिखाना चाहता है कि आज पुरानी और नई पीढ़ी में एक खाई उत्पन्न हो चुकी है। प्रत्येक पुरानी पीढ़ी नवीन परिवर्तनों को अनुचित मानती है। इस नकारात्मक दृष्टिकोण के कारण ही उनके बच्चे तथा परिजन उनकी उपेक्षा करने लगते हैं, परंतु उनकी पत्नियाँ नए ज़माने के साथ स्वयं को अनुकूल बना लेती हैं। यही कारण है कि ‘समहाउ इंप्रापर’ एक प्रश्न चिह्न बनकर रह गया है। लेखक इस पाठ द्वारा यह कहना चाहता है कि यदि वृद्ध लोगों को अपने बच्चों के साथ सम्मानपूर्वक जीना है तो उन्हें नए परिवर्तनों को स्वीकार करना पड़ेगा, अन्यथा उनकी हालत यशोधर बाबू जैसी हो जाएगी।

प्रश्न 4.
यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। आपके जीवन को दिशा देने में किसका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और कैसे?
उत्तर:
यशोधर बाबू का जीवन किशनदा और उनके सिद्धांतों से प्रभावित रहा है। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के प्रति जो व्यवहार करते थे, वह किशनदा के ही समान था। भारतीय मूल्यों में आस्था, सादी जीवन-प्रणाली तथा धन-दौलत के प्रति अनासक्ति आदि प्रवृत्तियाँ किशनदा से ही प्रभावित हैं। हर आदमी जीवन में किसी-न-किसी से प्रेरणा अवश्य प्राप्त करता है। मेरे जीवन को प्रेरणा देने वाली मेरी अपनी माँ है। वे आज महाविद्यालय की एक सफल प्राध्यापिका हैं। उन्होंने प्रत्येक क की थी। इसके साथ-साथ वे बहुपठित एवं बहुश्रुत भी हैं। अपने विषय में प्रवीण होने के साथ-साथ उन्होंने अन्य विषयों का भी गहन अध्ययन किया है।

वे निरंतर मुझे पढ़ने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देती रहती हैं। परंतु मेरी माता जी का रहन-सहन बड़ा सादा और सरल है। वे बाहरी ताम-झाम में विश्वास नहीं करतीं। फलस्वरूप मैं आरंभ से ही पढ़ने-लिखने में ठीक हूँ। दसवीं की परीक्षा में मैंने नगर में सर्वाधिक अंक प्राप्त किए थे। यही नहीं, मैं विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यों में भी बढ़-चढ़कर भाग लेता हूँ और अपने गुरुजनों का हमेशा आदर करता हूँ। मैं उच्च शिक्षा प्राप्त करके किसी विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद प्राप्त करना चाहता हूँ। यदि ईश्वर की कृपा रही और मेरी माँ की मुझे नियमित प्रेरणा मिलती रही, तो मैं निश्चय से ही इस लक्ष्य को प्राप्त करूँगा।

प्रश्न 5.
वर्तमान समय में परिवार की संरचना, स्वरूप से जुड़े आपके अनुभव इस कहानी से कहाँ तक सामंजस्य बिठा पाते हैं?
उत्तर:
आधुनिक युग में संयुक्त परिवार प्रथा लगभग समाप्त हो चुकी है। भले ही यशोधर बाबू अपने ताऊ और ताई के साथ रहे हों। परंतु आज भौतिकवादी युग के कारण लोगों की आकांक्षाएँ बढ़ती जा रही हैं। प्रायः परिवार छोटे बनते जा रहे हैं। बेटा अपनी आय को स्वयं खर्चना चाहता है और अपनी पत्नी के साथ अलग रहना चाहता है। इधर पत्नी भी अपने पति की सलाह को नहीं मानती। बच्चे भी अपने कैरियर के बारे में माँ-बाप की सलाह को नहीं मानते हैं। इधर बेटियाँ भड़कीले वस्त्र पहनकर अपने मित्रों के साथ घूमना चाहती हैं। उनके पहनावे को देखकर माँ-बाप और बड़े बुजुर्गों को शर्म आती है। प्रत्येक लड़की अपने विवाह का निर्णय स्वयं लेना चाहती है। फलस्वरूप घर में गृहस्वामी की उपेक्षा की जाती है। इस प्रकार पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच एक दरार उत्पन्न हो गई है।

परंतु सामंजस्य के द्वारा हम इस समस्या का हल निकाल सकते हैं। पुराने लोगों को थोड़ा आधुनिक बनना पड़ेगा और नए लोगों को थोड़ा पुराना। हमारे मूल्य आज भी हमारी धरोहर हैं, उनमें बहुत-सी ऐसी बातें हैं जो हमारे समाज के लिए अत्यधिक उपयोगी हैं। घर की साग-सब्जी, दूध, राशन आदि लाने में घर के सभी लोगों को सहयोग करना होगा। यदि आज के बच्चे आधुनिक युग की सुख-सुविधाओं को पाना चाहते हैं तो उन्हें यशोधर बाबू जैसे पिता को अपमानित नहीं करना चाहिए। पत्नी का भी कर्त्तव्य बनता है कि वह अपने पति की सलाह को मानती हुई अपनी संतान की देखभाल करे, बल्कि वह एक माँ के रूप में अपने पति और बच्चों के बीच सेतु का काम कर सकती है। इसके साथ-साथ यशोधर बाबू के समान अधिक परंपरावादी बनना भी अच्छा नहीं है।

इधर घर की बेटियों और नारियों का यह कर्त्तव्य बनता है कि वे शालीनता का ध्यान रखते हुए वस्त्र धारण करें। अधिक मॉड बनने के दुष्परिणाम तो हम हर रोज़ देखते ही रहते हैं। इस कहानी में यशोधर बाबू ने तीस रुपये देकर, घर में गैस एवं फ्रिज के प्रति नरम रुख रखकर, केक काटकर तथा मेहमानों का स्वागत करके सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया है। घर के अन्य लोगों का भी कर्त्तव्य बनता है कि वे यशोधर बाबू जैसे गृहस्वामियों की भावनाओं को समझें। दोनों पक्षों में सामंजस्य स्थापित करने से ही आधुनिक युग को सफल बनाया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों? (क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य (ख) पीढ़ी का अंतराल (ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव
उत्तर:
इस कहानी में मानवीय मूल्यों को हाशिए पर धकेले जाते हुए ही दिखाया गया है। उदाहरण के रूप में यशोधर बाबू के बच्चे, भाईचारा एवं रिश्तेदारी का ध्यान नहीं रखते और न ही बुजुर्गों का उचित सम्मान करते हैं। इस कहानी में पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भी देखा जा सकता है। यशोधर बाबू के बच्चे तो आधुनिक बनना ही चाहते हैं, परंतु उनकी पत्नी भी आधुनिका बनी हुई है, और वह अपने पति को आधुनिक रंग-ढंग में देखना चाहती है।

परंतु यदि गहराई से इस कहानी का अध्ययन किया जाए तो यह बात स्पष्ट हो जाती है कि कहानी की मूल संवेदना पीढ़ी का अंतराल है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्र हैं। वे भारतीय संस्कृति को मानते हैं। पूजा-पाठ करते हैं। रामलीला देखने जाते हैं। रिश्तेदारी को निभाने का प्रयास करते हैं और सादा तथा सरल जीवन व्यतीत करना चाहते हैं, परंतु उनके बच्चे तथा पत्नी आधुनिक रंग-ढंग में ढल गए हैं। इस कहानी का कथानक इसी द्वंद्व पर टिका हुआ है। पीढ़ी-अंतराल के कारण जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, उसका शिकार यशोधर बाबू बनते हैं। वे अपने-आप में किशनदा से प्रभावित होने के कारण पुरानी व्यवस्था को अपनाते हैं।

यही नहीं, वह पुरानी परंपराओं को सही तथा नई परंपराओं को ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते हैं। इसीलिए सर्वत्र उपेक्षा होती है। घर के बच्चे उनकी वेशभूषा, चाल-ढाल, आचार-विचार आदि का विरोध करते हैं। उनका विचार है कि उनके पिता की सादगी वस्तुतः फटीचरी है। यही नहीं, उनके विचारानुसार रिश्तेदारी निभाना घाटे का सौदा है। धीरे-धीरे यशोधर बाबू उपेक्षित होते चले जाते हैं। बच्चे उनके लिए नया गाउन इसलिए लाते हैं कि ताकि वे फटा हुआ पुलओवर पहनकर समाज में उनकी बेइज्जती न कराएं। बच्चों को अपने मान-सम्मान की तो चिंता है, परंतु वे अपने पिता की मनःस्थिति को नहीं समझ पाते। अतः पीढ़ी अंतराल की समस्या ही इस कहानी की मुख्य समस्या है।

प्रश्न 7.
अपने घर और विद्यालय के आस-पास हो रहे उन बदलावों के बारे में लिखें जो सुविधाजनक और आधुनिक होते हुए भी बुजुर्गों को अच्छे नहीं लगते। अच्छा न लगने के क्या कारण होंगे?
उत्तर:
आज का युग वैज्ञानिक युग है। प्रतिदिन नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। प्रायः अधिकांश आविष्कार मानव को सुख-सुविधाएँ देने में अत्यधिक सहायक हैं। जहाँ तक हमारे देश का प्रश्न है, यहाँ पिछले कुछ दशकों में वैज्ञानिक प्रगति हुई है। आज प्रत्येक घर में बिजली के पंखे, ए०सी०, रसोई गैस के चूल्हे, टेलीफोन, इंटरनेट आदि अनेक ऐसी वस्तुएँ हैं जो लोगों के जीवन को सुविधाजनक बना रही हैं। लेकिन हमारे बड़े-बूढ़े अभी तक पुरानी बातों को याद कर उठते हैं।

वे प्रायः कहते रहते हैं कि चूल्हे की रोटी का कोई मुकाबला नहीं है। इसी प्रकार उनका कहना है कि फ्रिज के कारण हम बासी भोजन करते हैं, टी०वी० अश्लीलता फैला रहा है और मोबाइल का अधिक प्रयोग लड़के-लड़कियों को बिगाड़ रहा है। इसी प्रकार इंटरनेट के प्रयोग के कारण युवक-युवतियाँ अश्लील फिल्में देखते हैं और वे चरित्रहीन बन रहे हैं। यद्यपि सच्चाई है कि बुजुर्गों के विचार पुराने हो सकते हैं, परंतु आधुनिक सुविधाओं का अधिक प्रयोग हमारी जीवन-शैली को जटिल बनाता जा रहा है, परंतु सुविधाओं की ऐसी आँधी बुजुर्गों के रोकने पर रुकने वाली नहीं है।

प्रश्न 8.
यशोधर बाबू के बारे में आपकी क्या धारणा बनती है? दिए गए तीन कथनों में से आप जिसके समर्थन में हैं, अपने अनुभवों और सोच के आधार पर उसके लिए तर्क दीजिए
(क) यशोधर बाबू के विचार पूरी तरह से पुराने हैं और वे सहानुभूति के पात्र नहीं हैं।
(ख) यशोधर बाबू में एक तरह का द्वंद्व है जिसके कारण नया उन्हें कभी-कभी खींचता तो है पर पुराना छोड़ता नहीं। इसलिए उन्हें सहानुभूति के साथ देखने की ज़रूरत है।
(ग) यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व है और नयी पीढ़ी द्वारा उनके विचारों का अपनाना ही उचित है।
उत्तर:
ऊपर जो तीन कथन दिए गए हैं, उनमें से दूसरा कथन ही मुझे उचित लगता है। यशोधर बाबू एक द्वंद्व ग्रस्त व्यक्ति हैं। कभी नया उन्हें अपनी ओर खींचता है, परंतु पुराना उन्हें छोड़ नहीं पाता। वे स्वयं यह निर्णय नहीं कर पाते कि उन्हें नवीन मूल्यों को अपनाना चाहिए अथवा पुराने मूल्यों से चिपका रहना चाहिए। इसलिए हमें उनके बारे में सहानुभूतिपूर्वक सोचना चाहिए। मेरे दादा जी प्रायः नई वस्तुओं की आलोचना करते रहते हैं। एक बार हमने घर पर ए०सी० लगवाया। दादा जी ने इस सुविधा की न केवल आलोचना की, बल्कि इसका विरोध भी किया। यहाँ तक की उन्होंने मेरे पिता जी को डाँटते हुए कहा कि तुम आधुनिक चीज़ों पर पैसा खराब करते रहते हो, परंतु अगले दिन वे ए०सी० की ठंडी हवा में काफी देर तक सोते रहे। जब मैंने उन्हें चाय के लिए गाया तो वे मुझे कहने लगे–“बेटे ए०सी० पर खर्चा तो बहुत आ गया, परंतु इसकी ठंडी हवा बहुत सुख देती है। मैं तो गहरी नींद में सो गया था।”

इस प्रकार हम देखते हैं कि यशोधर बाबू का द्वंद्व स्वाभाविक है। वे पिछड़े हुए ग्रामीण क्षेत्र से महानगर में आए हैं। अभी तक उनके मन पर ग्रामीण अंचल का प्रभाव बना पड़ा है, परंतु उनके बच्चे दिल्ली महानगर में जन्मे एवं पले हैं। वे आधुनिक परिवेश से अत्यधिक प्रभावित हैं। वे अपने घर में सब प्रकार की आधुनिक सुविधाएँ चाहते हैं। ये नयापन यशोधर बाबू को भी यदा-कदा आकर्षित करता है। उदाहरण के रूप में गैस तथा फ्रिज के बारे में उनकी सोच अथवा भूषण से हाथ मिलाना, अतिथियों को अंग्रेज़ी में अपना परिचय देना आदि नएपन के सूचक हैं। ऐसी स्थिति में यशोधर बाबू के प्रति सहानुभूति का व्यवहार करना उचित होगा। यदि यशोधर बाबू के परिवार के लोग उन्हें पहले से ही सिल्वर वैडिंग की सूचना दे देते तो वे समय पर घर आते और अतिथियों का भरपूर स्वागत करते। इसके साथ-साथ हमें यह भी देखना चाहिए कि घर के बड़े बुजुर्गों के साथ सहानुभूति पूर्ण व्यवहार करना चाहिए। उनकी उपेक्षा कभी नहीं की जानी चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi सिल्वर बैंडिग Important Questions and Answers

बोधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर यशोधर बाबू की चार विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के प्रमुख पात्र हैं, परंतु वे एक परंपरावादी व्यक्ति होने के कारण आधुनिक परिवेश में मिसफिट दिखाई देते हैं। वे किशनदा के आदर्श व्यक्तित्व से कुछ प्रभावित हैं। वे पुराने संस्कारों को छोड़ नहीं पाते और नए परिवेश को ग्रहण करके उसकी आलोचना करते हैं। उनके व्यक्तित्व की चार प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(क) कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति-यशोधर बाब एक कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति हैं। वे प्रतिदिन समय पर कार्यालय जाते हैं और दिन-भर मेहनत से काम करते हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को ईमानदारी से काम करने की प्रेरणा देते हैं तथा प्रतिदिन का काम पूरा करके ही लौटते हैं।

(ख) एक संस्कारवान व्यक्ति-किशनदा से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू प्रतिदिन मंदिर जाकर प्रवचन सुनते हैं और सुबह-शाम घर पर पूजा करते हैं। यही नहीं, वे अपने घर पर ‘जन्यो-पुन्यू’ तथा रामलीला शिक्षा का काम भी समाज-सेवा के रूप में करते हैं। यही नहीं, वे यह भी चाहते हैं कि सगे-संबंधियों की सुख-दुख में सहायता करनी चाहिए। वे सरल वेशभूषा पहनते हैं और समय पर घूमने जाते हैं और सुबह जल्दी उठ जाते हैं।

(ग) सफल गहस्थी-उनको हम एक सफल गहस्थी कह सकते हैं। वे प्रतिदिन घर का राशन और साग-सब्जी खरीदकर लाते हैं तथा बच्चों का मन देखकर साइकिल छोड़कर पैदल जाते हैं। अनाथ होते हुए भी उन्होंने संयुक्त परिवार परंपरा को निभाया।

(घ) आधुनिकता के आलोचक-यशोधर बाबू आधुनिकता के नाम पर मनमानी करना, कम कपड़े पहनना, नए उपकरणों का प्रयोग करना यह सब पसंद नहीं करते हैं। विवाह की रजत जयंती मनाने को एक अनावश्यक खर्च मानते हैं। इसी प्रकार वे अपनी बेटी और पत्नी द्वारा आधुनिक कपड़ों को अपनाने का भी विरोध करते हैं। वस्तुतः किशनदा से अत्यधिक प्रभावित होने के बाद वे नवीन मूल्यों को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाते। फिर भी यशोधर बाबू ने पिता के कर्त्तव्य को अच्छी तरह निभाया। अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और उन्हें मानवीय मूल्यों तथा समाज संस्कृति से यथासंभव जोड़ने का प्रयास किया। लेकिन उनके बच्चे नए ज़माने से अत्यधिक प्रभावित हुए।

प्रश्न 2.
किशनदा के व्यक्तित्व पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
इस कहानी में किशनदा के चरित्र का वर्णन पृष्ठभूमि के रूप में किया गया है। इस कहानी के प्रत्येक संदर्भ में वे हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं। भले ही उनकी मृत्यु हो चुकी है, परंतु वे अपने मानस पुत्र यशोधर बाबू के रूप में अब भी जिंदा हैं। यशोधर बाबू के व्यक्तित्व पर उनका गहरा प्रभाव है। वे हर समय उनकी विशेषताएँ याद करते रहते हैं।

किशनदा एक सरल हृदय व्यक्ति हैं जो कुमाऊँ क्षेत्र से दिल्ली आकर सरकारी नौकरी करते हैं। उन्होंने कई पहाड़ी युवकों को अपने यहाँ शरण देकर उन्हें नौकरी प्राप्त करने में सहायता की। वे आजीवन कुँवारे रहे। यशोधर बाबू को उन्होंने न केवल नौकरी दिलवाने में सहायता की, बल्कि अनेक बार उन पर अपनी जेब से पैसे भी खर्च किए। किशनदा एक संस्कारवान तथा ग्रामीण संस्कृति से जुड़े व्यक्ति हैं।

यशोधर बाबू के व्यक्तित्व का निर्माण करने में उनका अत्यधिक सहयोग रहा। उन्होंने ही यशोधर बाबू को सुबह सैर पर जाने, सवेरे-शाम पूजा-पाठ करने, रामलीला वालों को एक कमरे की सुविधा देने तथा पहाड़ी क्षेत्रों की परंपराओं का निर्वाह करने की आदत डाल दी। यही कारण है कि यशोधर बाबू किशनदा की मृत्यु के बाद भी उनके द्वारा बताए गए संस्कारों का पालन करते रहे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

प्रश्न 3.
यशोधर बाबू की पत्नी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
यशोधर बाबू की पत्नी मुख्यतः पुराने संस्कारों वाली होते हुए भी किन कारणों से आधुनिका बन गई?
उत्तर:
यशोधर बाबू की पत्नी एक सामान्य भारतीय नारी है। वह पहले पुराने संस्कारों को मानती थी, परंतु बदलते वक्त के साथ-साथ उसने अपने-आपको भी बदल दिया। इसका कारण यह है कि वह समय की गति को अच्छी प्रकार से जानती है।

उसका विवाह एक अनचाहे संयुक्त परिवार में हुआ। घर के बड़ों की शर्म के कारण वह न तो मन चाहा ओढ़-पहन सकी और न ही खा सकी। वह स्वच्छंद होकर जीवन को जीना चाहती थी। परंतु संयुक्त परिवार में होने के कारण ऐसा नहीं कर पाई। इसलिए एक स्थल पर वह अपने पति को कहती भी है-“किशनदा तो थे ही जन्म के बूढ़े, तुम्हें क्या सुर लगा कि जो उनका बुढ़ापा खुद ओढ़ने लगे हो?” वह आधुनिक रंग-ढंग से जीना चाहती थी। इसलिए अधेड़ अवस्था में आते ही उसने होंठों पर लाली तथा बालों में खिज़ाब लगाना आरंभ कर दिया। उसने अपनी बेटी पर किसी तरह की रोक नहीं लगाई तथा उसे जींस तथा टॉप पहनने की खुली छूट दी।

यही नहीं, वह एक ऐसी नारी है जो आधुनिक सुविधाओं की दीवानी है। अपने पति के प्रति उसके मन में कोई सहानुभूति नहीं है। उसका मानना है कि उसका पति समय से पहले बूढ़ा हो गया है। इसलिए वह पूर्णतः आधुनिकता के रंग में रंगे बच्चों का साथ देने लगती है।

प्रश्न 4.
किशनदा का बुढ़ापा सुख से क्यों नहीं बीता? संक्षेप में उत्तर दीजिए।
उत्तर:
किशनदा ने आजीवन विवाह नहीं किया और वे सदैव समाज सेवा करते रहे। उनके साथियों ने दिल्ली की पॉश कॉलोनियों में ज़मीन लेकर अपने मकान बनवाए, लेकिन उन्होंने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। सेवानिवृत्त होने तक तो वे सरकारी क्वार्टर में रहे, बाद में कुछ समय के लिए किराए के क्वार्टर में भी रहे। अन्ततः वे अपने गाँव लौट गए। वहीं कुछ समय बाद उनका देहांत हो गया। यह किसी को नहीं पता कि उनकी मृत्यु कैसे हुई। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि गाँव में उनकी कोई सेवा गा। इस कहानी के आधार पर कहा जा सकता है कि किशनदा एकाकी और बेघर रहते हुए सबकी सेवा करते रहे। परंतु उन्होंने अपने भविष्य के बारे में कभी नहीं सोचा।

प्रश्न 5.
यशोधर बाबू का अपने बच्चों के प्रति कैसा व्यवहार था? ‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू लोकतंत्रीय मूल्यों पर विश्वास करते थे। उन्होंने अपने बच्चों पर कोई बात थोपने का प्रयास नहीं किया। उनका कहना था कि बच्चे उनके कहे को पत्थर की लकीर न माने। उन्होंने अपने बच्चों को अपनी इच्छानुसार काम करने की आज़ादी दी। उनका मानना था कि आज के बच्चों को अधिक ज्ञान है, लेकिन अनुभव का कोई विकल्प नहीं होता। उनकी केवल यही छोटी-सी इच्छा थी कि बच्चे कुछ भी करने से पहले उनसे पूछ लें, भले ही हम यशोधर बाबू को एक परंपरावादी पात्र कहें, लेकिन उन्होंने अपने बच्चों को हमेशा स्वतंत्र जीवन जीने दिया।

प्रश्न 6.
‘सिल्वर वैडिंग’ पार्टी में यशोधर बाबू का व्यवहार क्या आपको उचित लगा? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘सिल्वर वैडिंग’ पार्टी में यशोधर बाबू का व्यवहार बड़ा ही विचित्र था। उन्होंने इस पार्टी को इंप्रापर कहा। क्योंकि उनका मानना था कि यह सब अंग्रेज़ों के चोंचले हैं। यही नहीं, उन्होंने पत्नी तथा बेटी के कपड़ों पर भी प्रश्न चिह्न लगाया। उन्होंने यह सोचकर केक नहीं खाया कि इसमें अंडा होता है। हालांकि वे पहले मांसाहारी रह चुके थे। उन्होंने लड्ड भी इसलिए नहीं खाया, क्योंकि उन्होंने शाम की पूजा नहीं की। वे शाम की पूजा में अधिक देर तक इसलिए बैठे रहे, ताकि मेहमान वहाँ से चले जाएँ। यशोधर बाबू की अधिकांश हरकतें अनुचित ही लगती हैं। यदि वे परिवार के साथ थोड़ा-बहुत समझौता करके चलते तो शायद यह अधिक अच्छा होता।

प्रश्न 7.
यशोधर बाबू की कहानी को दिशा देने में किशनदा की भूमिका को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
यशोधर बाबू किशनदा के मानस-पुत्र हैं। आप इस कथन से कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
इस कहानी को पढ़ने से यह स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि यशोधर बाबू का जीवन किशनदा से अत्यधिक प्रभावित रहा है। वे दिल्ली में आकर किशनदा की छत्र-छाया में रहने लगे थे। इसलिए उनके आदर्शों का अनुकरण करते हुए वे ऑफिस के कर्मचारियों के साथ वैसा ही व्यवहार करते थे जैसा किशनदा करते थे। वे किशनदा के समान मंदिर जाते थे और घंटा भर बैठकर प्रवचन सुनते थे। किशनदा ने जीवन भर यदि मकान नहीं बनाया तो यशोधर बाबू ने भी डी०डी०ए० फ्लैट के पैसे जमा नहीं करवाए। उन्होंने किशनदा के इस वाक्य को हमेशा याद रखा कि मूर्ख घर बनाते हैं और बुद्धिमान उसमें रहते हैं। किशनदा के समान वे जन्यो-पुन्यूं, रामलीला आदि के धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते रहें। सही अर्थों में यशोधर बाबू किशनदा के सकते हैं। संध्या-पूजा करते समय उन्हें भगवान के स्थान पर किशनदा के ही दर्शन होते हैं। वस्तुतः यशोधर बाबू ने शुरू से ही किशनदा को अपना गुरु, माता-पिता और मार्गदर्शक माना तथा जीवन भर उनके आदर्शों का अनुकरण करते रहे।

प्रश्न 8.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के कथ्य पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
‘सिल्वर वैडिंग’ मनोहर श्याम जोशी की एक उल्लेखनीय लंबी कहानी है। इसका अपना भाषिक अंदाज है। लेखक यहाँ पर यह कहना चाहता है कि आधुनिकता की ओर अग्रसर होता हमारा समाज नवीन उपलब्धियों को समेट लेना चाहता है, परंतु हमारे मानवीय मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं।

यशोधर बाबू के जीवन में ‘जो हुआ होगा’ तथा ‘समहाउ इंप्रापर’ वाक्यांशों का अधिक महत्त्व है। पहले में तो यथा स्थिति वाद की सोच है, दूसरे में अनिर्णय की स्थिति। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि आधुनिकता के कारण जो बदलाव आ रहा है, उसे बड़े-बुजुर्ग लोग स्वीकार करने में द्वंद्व ग्रस्त दिखाई देते हैं। लगभग यही स्थिति यशोधर बाबू की है जो अ तरक्की से खुश होते हैं और इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ भी कहते हैं। लेखक यशोधर बाबू बुजुर्ग लोगों के द्वंद्व को रेखांकित करना चाहता है।

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प्रश्न 9.
‘यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन के पक्षधर हैं।’ सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
किशनदा के आदर्शों से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनके मन में आधुनिक साधनों और उपकरणों के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं है। ऑफिस जाते समय वे साइकिल का प्रयोग करते हैं और फटा हुआ पुलओवर पहनकर दूध लेने जाते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई दुविधा नहीं होती। वे दहेज़ में मिली घड़ी से ही काम चला लेते हैं और अपने सरकारी क्वार्टर को छोड़कर किसी आलीशान मकान में नहीं जाना चाहते। यही कारण है कि उन्होंने डी०डी०ए० फ़्लैट के लिए पैसे नहीं भरे। वे अपनी वर्तमान परिस्थिति से पूर्णतया संतुष्ट हैं। वे अपने बेटों के काम-काज में अधिक हस्तक्षेप नहीं करते।

प्रश्न 10.
यशोधर बाबू सामाजिक और पारिवारिक जीवन-शैली जीना चाहते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
विवाह के बाद यशोधर बाबू संयुक्त परिवार में रहते थे। दूसरा, किशनदा ने उनकी जीवन-शैली को अत्यधिक प्रभावित किया था। इसलिए वह न केवल अपने परिवार के लोगों से, बल्कि अन्य रिश्तेदारों से भी मिलना-जुलना चाहते हैं। वे हर माह अपनी बहन के पास कुछ पैसे भेजते रहते हैं। वे अपने बीमार जीजा का पता करने के लिए अहमदाबाद जाना चाहते हैं। उनकी यह भी इच्छा है कि उनके बच्चे सभी रिश्तेदारों का मान करें। रिश्तेदारों से जुड़ने में उन्हें विशेष प्रसन्नता प्राप्त होती है। परंतु उनकी पत्नी तथा बच्चे इसे एक मूर्खतापूर्ण कार्य कहते हैं। वे यह भी चाहते हैं कि उनकी पत्नी तथा बच्चे हर बात में उनकी सलाह लें और अपनी कमाई लाकर पिता के हाथों में रखें। इससे स्पष्ट होता है कि यशोधर बाबू की अपने परिवार के प्रति गहरी आसक्ति है।

प्रश्न 11.
यशोधर बाबू का व्यवहार आपको कैसा लगा? ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू भले ही नए ज़माने के व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन वे ज़माने की चाल को अवश्य पहचानते हैं। वे सरल और सादी जिंदगी जीना चाहते हैं। साथ ही अधेड़ आयु होने के कारण उनमें शिथिलता आ चुकी है, परंतु फिर भी वे मजबूर होकर नए परिवर्तन को अपना लेते हैं। ऐसा करने से उनके पुराने संस्कार ट जाते हैं। नई चीज को अपनाने में वे हमेशा सं परंतु वे उसका विरोध भी नहीं करते हैं। कारण यह है कि उनकी आयु अब ढल चुकी है। हमारे विचार में यशोधर बाबू जैसे व्यक्ति से थोड़े-बहुत परिवर्तन की ही आशा की जा सकती है।

प्रश्न 12.
यशोधर बाबू अपने ही घर में बेचारे तथा असहाय बन चुके हैं। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
इसमें दो मत नहीं हैं कि यशोधर बाबू अपने घर में ही बेचारे, मजबूर और असहाय-से लगते हैं। उनके बच्चे उनका कहना नहीं मानते। वे न तो अपने पिता का सम्मान करते हैं, न ही उनसे कोई सलाह लेते हैं और न ही उनसे अधिक बात करते हैं। घर के सभी लोग उन्हें उपेक्षा तथा तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं। मजबूर होकर वे साइकिल चलाना छोड़ देते हैं। फ्रिज और गैस को अपना लेते हैं। उपहार में मिले गाउन को पहन लेते हैं। अब उनमें बच्चों का विरोध करने की शक्ति नहीं रही। उनकी अपनी बेटी उनका अपमान करती है और उनकी पत्नी उन्हें छोड़कर बच्चों के साथ मिल जाती है। ऐसा लगता है कि वे अपने बच्चों से हार चुके हैं। यही कारण है कि उनके मन में ‘जो हुआ होगा’ वाक्यांश बार-बार उभरकर आता है।

प्रश्न 13.
एक सैक्शन आफिसर के रूप में यशोधर बाबू का दफ्तर में कैसा व्यवहार था?
उत्तर:
यशोधर बाबू एक सरकारी कार्यालय में सैक्शन आफिसर हैं वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर पूरा नियंत्रण रखते हैं। वे समय पर कार्यालय पहुँचते हैं और साढ़े पाँच बजे तक वहाँ कार्य करते हैं। मजबूर होकर अन्य कर्मचारियों को भी साढ़े पाँच बजे तक बैठना पड़ता है। अधीनस्थ कर्मचारियों से वे प्रायः सख्ती से निपटते हैं। परंतु आफिस से प्रस्थान करते समय वे एकाध चुटीली बात कहकर माहौल के तनाव को कम कर देते हैं। वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से थोड़ी-बहुत दूरी बनाए रखते हैं और उनके साथ अधिक घुलते-मिलते नहीं हैं। यही कारण है कि वे अपनी सिल्वर वैडिंग पार्टी के लिए तीस रुपये तो देते हैं, लेकिन उसमें शामिल नहीं होते। जब चड्डा उनके साथ बदतमीज़ी का व्यवहार करता है तो वे उसकी बात को मज़ाक में उड़ा देते हैं। इससे यह पता चलता है कि वे एक व्यवहार कुशल व्यक्ति हैं।

प्रश्न 14.
यशोधर बाबू अपनी भाषा में कार्यालयी मुहावरों का प्रयोग करते हैं? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की भाषा पर दफ़्तर की भाषा का अत्यधिक प्रभाव है। वे प्रायः बोलते समय सरकारी दफ्तरों में बोली जाने वाली अंग्रेजी भाषा के वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं। इस पाठ से दो-एक उदाहरण देखिए-
(i) आप लोग चाय पीजिए’ दैट’. तो ‘आई ड नाट माइंड’ लेकिन जो हमारे लोगों में ‘कस्टम’ नहीं है, उस पर ‘इनसिस्ट’ करना दैट’ मैं ‘समहाउ इंप्रॉपर फाइंड करता हूँ।

(ii) “मुझे तो वे ‘समहाउ इंप्रापर’ ही मालूम होते हैं। ‘एनीवे’ मैं तुम्हें ऐसा करने से रोक नहीं रहा। देयरफोर तुम लोगों को भी मेरे जीने के ढंग पर कोई एतराज नहीं होना चाहिए।”

प्रश्न 15.
‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में चड्डा का यशोधर बाबू के प्रति कैसा व्यवहार है और क्यों?
उत्तर:
चड्ढा यशोधर बाबू का अधीनस्थ कर्मचारी है। वह असिस्टेंट ग्रेड की परीक्षा पास करके नया-नया कर्मचारी नियुक्त हुआ है। उसमें अपनी योग्यता का घमंड है और वह हर बात में यशोधर बाबू को नीचा दिखाना चाहता है। वह यशोधर बाबू की पुरानी घड़ी को चूनेदानी अथवा बाबा आदम के ज़माने की घड़ी बताता है। वह यशोधर बाबू को डिजीटल घड़ी खरीदने के लिए कहता है। जब यशोधर बाबू अपना हाथ उससे मिलाने के लिए आगे बढ़ाते हैं तो वह उनका अपमान कर देता है। यही नहीं, यशोधर बाबू की सिल्वर वैडिंग की पार्टी के लिए उनसे तीस रुपये ले लेता है। इससे पता चलता है कि उसमें न तो गरिमा है, और न ही अपने से बड़ों की इज्जत करने की सभ्यता है। उसमें धृष्टता देखी जा सकती है।

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प्रश्न 16.
यशोधर बाबू के बच्चों का उज्ज्वल पक्ष कौन-सा है?
उत्तर:
यशोधर बाबू के बच्चे बड़े प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। वे अपनी प्रतिभा और मेहनत के बल पर आगे बढ़े हैं। बड़ा लड़का एक विज्ञापन कंपनी में पंद्रह सौ रुपये पर काम कर रहा है। दूसरा लड़का एलाइड सर्विसेज़ में चुना गया है। लेकिन वह और अच्छी नौकरी पाने के लिए दोबारा पढ़ रहा है। तीसरा लड़का स्कॉलरशिप लेकर पढ़ने के लिए अमरीका गया है। उनकी बेटी डॉक्टरी अमरीका जाना चाहती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी बच्चे उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। वे अपने घर में गैस, फ्रिज, सोफा, कालीन आदि सुविधाएँ जुटाना चाहते हैं।

प्रश्न 17.
यशोधर बाबू के बच्चों का पक्ष मलिन कौन-सा है?
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू के बच्चे बड़े ही प्रतिभाशाली और मेहनती हैं। लेकिन उनका व्यवहार अधिक अच्छा नहीं है। वे न तो पिता का मान करते हैं, न रिश्तेदारी का और न ही धर्म और समाज का। बल्कि वे बात-बात पर अपने पिता का अपमान करते हैं। वे पिता की सलाह लिए बिना ही उनकी सिल्वर वैडिंग की पार्टी का आयोजन कर देते हैं। साथ ही वे चाहते हैं कि उनके पिता हर बात में उनका सहयोग करें। भूषण अच्छी नौकरी पाकर भी घर में कुछ नहीं देता। वह हमेशा अपने घर में अपने पैसों की धौंस जमाता रहता है। वह पिता को अपमानित करते हुए कहता है कि वह घर में कोई नौकर रख लें, जिसका वेतन वह स्वयं देगा।

उपहार के रूप में एक गाउन देकर वह कहता है कि उनके पिता फटा हुआ गाउन पहनकर दूध लेने न जाएँ। इसी प्रकार उनकी लड़की स्वयं बेढंगे कपड़े पहनती है और पिता द्वारा टोकने पर उसे झिड़क देती है। यही नहीं, बच्चों के मन में अपने रिश्तेदारों और सगे-संबंधियों के प्रति भी कोई लगाव नहीं है। बुआ को पैसे भेजने के बारे में वे आनाकानी करते हैं और धर्म तथा समाज के कामों में भाग नहीं लेते। उनमें न तो अच्छे संस्कार हैं और न ही मानव मूल्य। उनके मन में केवल पद, प्रतिष्ठा और पैसे का ही मोह है।

प्रश्न 18.
यशोधर बाबू की पत्नी अपने पति से प्रतिकूल व्यवहार क्यों करती है?
उत्तर:
आरंभ में यशोधर बाबू की पत्नी को संयुक्त परिवार के बंधन में रहना पड़ा था। वह न तो जीवन के सुखों को भोग सकी और न ही जीवन का आनंद ले सकी। यशोधर बाबू ने अपनी बूढ़ी ताई के समान उसे भी अच्छा खाने-पहनने को नहीं दिया। वह अपने यौवन को खुलकर नहीं भोग पाई। इसलिए वह अपने पति के परंपरावादी विचारों का विरोध करती है। उसे इस बात का दुख है कि उसका पति बूढ़ों जैसी बातें करने लग गया है। एक स्थल पर वह उसे कहती भी है कि ‘तुम शुरू में तो ऐसे नहीं थे, शादी के बाद मैंने तुम्हें देख जो क्या नहीं रखा है! हफ्ते में दो-दो सिनेमा देखते थे। गज़ल गाते थे गज़ल! इस प्रकार हम देखते हैं कि यशोधर की पत्नी आधुनिक सुख-सुविधाओं को भोगना चाहती है और यशोधर पुराने मूल्यों से चिपका हुआ है। अतः वह अपने पति का विरोध करती है।

प्रश्न 19.
‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के यशोधर बाबू समय के साथ ढल सकने में असफल रहते हैं, ऐसा क्यों?
उत्तर:
यशोधर बाबू आजीवन किशनदा के आदर्शों का अनुसरण करते रहे। वे अपने परिवार को भी उन्हीं संस्कारों में ढालना चाहते थे, परंतु वे सच्चाई को भूल गए कि अब ज़माना बदल गया है। उनकी पत्नी तथा बच्चे नए ज़माने के अनुसार चलना चाहते यशोधर बाबू अपने पुराने संस्कारों तथा प्रौढावस्था के कारण नए जमाने का स्वागत नहीं करते। उन्हें लगता है कि आधनिक पहनावा पश्चिमी रंग-ढंग से प्रभावित है। इसलिए वे समय के साथ ढल सकने में असमर्थ रहते हैं।

प्रश्न 20.
‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है।
उत्तर:
यशोधर बाबू की पत्नी अपने यौवनकालीन जीवन से असंतुष्ट रही है। उसे संयुक्त परिवार के बंधनों में रहना पड़ा था। वह न तो मनमर्जी का खा सकी थी और न पहन सकी थी। उसका कोई शौक पूरा नहीं हुआ था। इसलिए जब उसके बच्चे नए ज़माने की ओर अग्रसर होते हैं तो वह भी उनके सुर में सुर मिलाना शुरू कर देती है। वह अपने सफेद बालों में खिज़ाब लगाती है। होंठों पर लाली लगाती है और ऊँची एड़ी के सैंडिल पहनती है। इस प्रकार वह समय के अनुसार ढल जाती है। यहाँ तक कि घर के सभी बच्चे भी उसका साथ देते हैं।

प्रश्न 21.
क्या पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी की मूल संवेदना कहा जा सकता है। तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
निश्चय से इस कहानी में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव को चित्रित किया गया है। लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि पश्चिमी सभ्यता का अंधा अनुकरण करने के कारण हम भारतवासी अपनी संस्कृति को त्याग चुके हैं। हमारे लिए रिश्तेदारी, परंपरा, भारतीय वेशभूषा तथा तीज-त्योहार का कोई मूल्य नहीं है। यही नहीं, मंदिर जाना या संध्या वंदना करना आदि भी हम पसंद नहीं करते। इसके स्थान पर हम सिल्वर वैडिंग पार्टी करना, केक काटना, जींस और टॉप पहनना आदि उचित मानते हैं, परंतु यशोधर बाबू अभी भी भारतीय संस्कृति का पक्ष लेते हैं और पाश्चात्य परंपरा का विरोध करते हैं। प्रस्तुत कहानी में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से उत्पन्न संघर्ष को दर्शाया गया है। अतः यह भी कहानी की मूल संवेदना हो सकती है।

प्रश्न 22.
क्या पीढ़ी के अंतराल को सिल्वर वैडिंग की मूल संवेदना कहा जा सकता है? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
वस्तुतः पीढ़ी का अंतराल ही इस कहानी की मूल संवेदना है। यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं और उनके बच्चे नई पीढ़ी का। यशोधर बाब परानी परंपराओं का निर्वाह करना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि होली, रामलीला, रिश्तेदारी आदि को निभाया जाए। वे सादा और सरल जीवन जीना चाहते हैं और बच्चों से यह चाहते हैं कि वे भी अपने बड़ों का सम्मान करें।

इसके विपरीत नई पीढ़ी भौतिकता को महत्त्व देती है। वह रिश्तेदारी की अपेक्षा आर्थिक विकास को श्रेयस्कर कर मानती है। उनके लिए पुराने संस्कार और परंपराएँ व्यर्थ हैं। यहाँ तक कि नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी को भी अपने रंग-ढंग में ढालना चाहती है। अतः सिल्वर वैडिंग में इन दो पीढ़ियों के संघर्ष का सजीव वर्णन किया गया है।

प्रश्न 23.
सिल्वर वैडिंग के कथानायक यशोधर बाबू एक आदर्श व्यक्तित्व हैं और नई पीढ़ी द्वारा उनके विचारों को अपनाना ही उचित है-इस कथन के पक्ष या विपक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
किसी भी दृष्टि से यशोधर बाबू का व्यक्तित्व आदर्श नहीं है। वे भले ही पुराने संस्कारों एवं परंपराओं से चिपके हुए तो उनकी पत्नी उनकी बात सुनती है और न ही उनके बच्चे। यहाँ तक कि वे अपने घर-परिवार, दफ्तर तथा समाज में अकेले पड़ जाते हैं। वे किशनदा के आदर्शों पर चलना चाहते हैं और नए युग के तौर-तरीकों को अपनाने में पूर्णतया असमर्थ रहते हैं। वस्तुतः उनका आचरण और व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली नहीं है कि वे अपने बच्चों में अपनी सोच को भर सकें। वे समय से पिछड़ चुके हैं और प्राचीन तथा नवीन में सामंजस्य नहीं बैठा सके। यदि वे ऐसा करने में सफल होते तो फिर यशोधर बाबू एक आदर्श कथानायक कहलाते।

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प्रश्न 24.
यशोधर बाबू की वाहन से सम्बद्ध विचारधारा को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू सदा ही दिखावे की दुनिया से दूर रहे और सहज जीवन जीने के पक्षधर रहे। वाहन के प्रति भी उनका यही दृष्टिकोण रहा है। यशोधर बाबू सवारी पर अधिक खर्च नहीं करते थे। जहाँ तक हो सकता था, वे पैदल चलना पसन्द करते थे। वे अपने क्वार्टर गोल मार्केट से सेक्रेट्रिएट तक पैदल ही आते-जाते थे। वे साग-सब्जी लेने भी पैदल ही जाते थे। आरम्भ में वे कार्यालय में साइकिल पर जाते थे, किन्तु अब उनके बच्चे युवा हो गए थे। उन्हें लगता था कि साइकिल तो चपरासी भी चलाते हैं। बच्चे चाहते थे कि उनके पिता जी अब स्कूटर ले लें। किन्तु उनका मानना था कि स्कूटर तो एक बेहूदा सवारी है और कार जब अफोर्ड नहीं कर सकते, तब उसकी बात सोचना ही क्यों?

प्रश्न 25.
यशोधर पंत के स्वभाव को रेखांकित कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू सहज, सरल तथा सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। उनके मन में आधुनिक साधनों और उपकरणों के प्रति कोई विशेष रुचि नहीं है। ऑफिस जाते समय वे साइकिल का प्रयोग करते हैं और फटा हुआ पुलओवर पहनकर दूध लेने जाते हैं। ऐसा करने से उन्हें कोई दुविधा नहीं होती। वे दहेज़ में मिली घड़ी से ही काम चला लेते हैं और अपने सरकारी क्वार्टर को छोड़कर किसी आलीशान मकान में नहीं जाना चाहते। यही कारण है कि उन्होंने डी०डी०ए० फ़्लैट के लिए पैसे नहीं भरे। वे अपनी वर्तमान परिस्थिति से पूर्णतया संतुष्ट हैं। वे अपने बेटों के कामकाज में अधिक हस्तक्षेप नहीं करते।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूषण बुआ को पैसे भेजने से मना क्यों करता है?
उत्तर:
यशोधर के अतिरिक्त घर के किसी सदस्य का अपने रिश्तेदारों से कोई लगाव नहीं है। विशेषकर भूषण यह समझता है कि बुआ उसके पिता की बहन है। इसलिए उसे पैसे भेजना उसका दायित्व नहीं है। वह इसे अनावश्यक संबंध मानता है।

प्रश्न 2.
यशोधर बाबू अपने घर देर से क्यों आते हैं?
उत्तर:
घर का कोई भी सदस्य यशोधर बाबू का आदर-मान नहीं करता, बल्कि सभी उनकी उपेक्षा एवं तिरस्कार करते हैं। छोटी-छोटी बातों पर उनका अपनी पत्नी से मतभेद हो जाता है। इसलिए जितना हो सकता है, वे घर से दूर ही रहते हैं।

प्रश्न 3.
यशोधर बाबू को अपने बड़े बेटे की बड़ी नौकरी पसंद क्यों नहीं थी?
उत्तर:
भले ही यशोधर सेक्शन आफिसर थे, लेकिन वे भी डेढ़ हज़ार के मासिक वेतन तक नहीं पहुँच पाए थे। उनके बेटे को छोटी आयु में ही इतना बड़ा वेतन मिल रहा था। वे सोचते थे कि इसमें कोई-न-कोई गड़बड़ अवश्य है। वे बेटे की नौकरी के रहस्य को नहीं समझ पाए। इसलिए उनको अपने बड़े बेटे की बड़ी नौकरी पसंद नहीं थी।

प्रश्न 4.
उपहार में मिले यशोधर के ड्रेसिंग गाउन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की सिल्वर वैडिंग के अवसर पर घर पर परिवार के सदस्यों ने एक पार्टी का आयोजन किया था। बच्चों ने उन्हें अनेक उपहार दिए थे। उनके एक बेटे ने उन्हें ड्रेसिंग गाउन उपहार में दिया था। यशोधर बाबू ने कभी गाउन का प्रयोग नहीं किया था, किन्तु उपहार में दिए गए गाउन को स्वीकार करना पड़ा। उन्होंने उसे अपने कमीज-पाजा पर पहन लिया था।

प्रश्न 5.
किशनदा की मृत्यु का कारण क्या रहा होगा?
उत्तर:
किशनदा रिटायर होकर दिल्ली छोड़कर अपने गाँव चले गए। वहाँ भी उन्हें उपेक्षा और तिरस्कार प्राप्त हुआ। वृद्धावस्था में उनकी देखभाल करने वाला कोई नहीं था। इस कारण शायद उनकी मृत्यु शीघ्र हो गई होगी।

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प्रश्न 6.
यशोधर ने किशनदा को अपने घर पर आश्रय क्यों नहीं दिया?
उत्तर:
यशोधर बाबू का क्वार्टर बहुत छोटा था। उसमें केवल दो कमरे थे, जिसमें तीन परिवार रहते थे। इसलिए यशोधर बाबू किशनदा को अपने घर आश्रय नहीं दे पाए।

प्रश्न 7.
यशोधर बाबू ने आजीवन अपना मकान क्यों नहीं बनाया?
उत्तर:
किशनदा से प्रभावित होने के कारण यशोधर बाबू भी मानते थे कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं और सयाने उनमें रहते हैं। वे आजीवन सरकारी क्वार्टर में रहे। फिर उन्हें यह भी उम्मीद थी कि जब उनका बेटा सरकारी नौकरी पर लग जाएगा तो उनके रिटायर होने के बाद यह क्वार्टर उन्हें फिर से मिल जाएगा। इस कारण यशोधर बाबू ने आजीवन अपना मकान नहीं बनाया।

प्रश्न 8.
यशोधर बाबू का प्रवचन में मन क्यों नहीं लगा?
उत्तर:
पहली बात तो यह है कि यशोधर अधिक धार्मिक तथा कर्मकांडी नहीं है। वे केवल किशनदा के कहने पर प्रवचन सुनने के लिए जाते हैं। दूसरा, घर से मिली उपेक्षा और तिरस्कार उनको चैन से जीने नहीं देती। धार्मिक प्रवचन सुनकर भी उनके मन की बेचैनी दूर नहीं होती। इसलिए यशोधर बाबू का प्रवचन में मन नहीं लगा।

प्रश्न 9.
यशोधर बाबू की सामाजिकता को उनकी पत्नी और बच्चे पसंद क्यों नहीं करते?
उत्तर:
यशोधर की पत्नी तथा बच्चे नहीं चाहते थे कि ‘जन्यो पुन्यूं की परंपरा का निर्वाह करने के लिए लोगों को घर पर बुलाया जाए और रामलीला की तैयारी के लिए घर का एक कमरा दिया जाए। इससे एक तो धन भी खर्च होता है तथा दूसरा समय भी नष्ट होता है। इन परंपराओं में बच्चों का कोई विश्वास नहीं था।

प्रश्न 10.
यशोधर बाबू को ऐसा क्यों लगा कि उनके क्वार्टर पर अब उनके बेटे का अधिकार हो गया है?
उत्तर:
यशोधर बाबू ने अनुभव किया कि उनका बेटा उनके क्वार्टर में मन माना परिवर्तन कर रहा है। वह घर के लिए पर्दे, कालीन, सोफा, डबल बेड और टी०वी० ले आया। फिर उसने यह भी निर्देश जारी कर दिया कि उसके टी०वी० को कोई हाथ न लगाए। इन बातों से यशोधर बाबू को यह महसूस हुआ कि उसके बेटे ने उसके ही क्वार्टर पर अधिकार जमा लिया है।

प्रश्न 11.
यशोधर बाबू गिरीश को बिगडैल क्यों कहते हैं?
उत्तर:
गिरीश यशोधर का साला है। वह महत्त्वाकांक्षी होने के साथ येन-केन-प्रकारेण उन्नति प्राप्त करने में विश्वास करता है। वह लड़कों को शार्ट-कट द्वारा तरक्की प्राप्त करने के उपाय बताता रहता है। यह सब यशोधर बाबू के सिद्धांतों के विरुद्ध है। अतः वे उसे बिगडैल कहते हैं।

प्रश्न 12.
यशोधर बाबू और उनकी पत्नी की ड्रेस के बारे में अलग-अलग राय क्यों है?
उत्तर:
यशोधर बाबू किशनदा से प्रभावित होने के कारण एक परंपरावादी व्यक्ति हैं। वे सरल और साधारण वेशभूषा पहनने में विश्वास करते हैं, लेकिन उनकी पत्नी नए ज़माने से प्रभावित होने के कारण बालों में खिज़ाब लगाती है, ऊँची एड़ी के सैंडल पहनती है और होंठों पर लाली लगाती है। वह अपनी बेटी को भी जींस, पतलून तथा बिना बाँह का ब्लाऊज पहनाती है।

प्रश्न 13.
किशनदा ने यशोधर बाबू की सहायता किस प्रकार से की?
उत्तर:
यशोधर. बाबू रेम्जे स्कूल अल्मोड़ा से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करके नौकरी की तलाश में दिल्ली आए थे। उस समय उनकी आयु नौकरी के लायक नहीं थी। ऐसी दशा में किशनदा ने उन्हें मैस का रसोइया बनाकर रख लिया। यही नहीं, किशनदा ने यशोधर बाबू को पचास रुपये उधार भी दिए ताकि वह अपने लिए कपड़े बनवा सके और गाँव पैसा भिजवा सके। बाद में किशनदा ने अपने ही ऑफिस में नौकरी दिलवाई और दफ्तरी जीवन में भी मार्ग-दर्शन किया।

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प्रश्न 14.
यशोधर बाबू ने अपनी सिल्वर वैडिंग पर केक क्यों नहीं खाया?
उत्तर:
भले ही यशोधर बाबू पहले यदा कदा माँस खा लेते थे। लेकिन इस समय वे पूर्णतया निरामिष भोजी थे। उन्होंने यह सोचकर केक नहीं खाया कि उसमें अंडा होता है। दूसरा वे विलायती परंपरा को भी नहीं निभाना चाहते थे।

प्रश्न 15.
घर बनाने के विषय में यशोधर बाबू के दृष्टिकोण का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू घर बनाने के विषय में ‘मूरख लोग मकान बनाते हैं और सयाने उनमें रहते हैं’ कहावत से सहमत है। उसका मत है कि जब तक सरकारी नौकरी में है तो सरकारी क्वार्टर। फिर बच्चों में से किसी की सरकारी नौकरी लग गई तो उसे सरकारी क्वार्टर मिल जाएगा। उसमें रह लेंगे। यशोधर बाबू ने कभी भी मकान बनाने के विषय में गम्भीरता से सोचा ही नहीं था।

प्रश्न 16.
किशनदा और यशोधर पंत की मित्रता की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
किशनदा और यशोधर पंत की मित्रता ही नहीं थी, अपितु दोनों में गहरा सम्बन्ध भी था। यशोधर पंत को किशनदा का मानस पुत्र कहें तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। किशनदा और यशोधर बाबू दोनों अच्छे मित्र थे। दोनों एक-दूसरे के काम आते थे अर्थात् एक-दूसरे का सहयोग करके अपनी अच्छी मित्रता का प्रमाण भी देते थे। किशनदा का यशोधर पंत के व्यक्तित्व निर्माण में अत्यधिक सहयोग रहा है। यशोधर पंत को किशनदा की मृत्यु के समाचार से बहुत शौक हुआ था। इन सब तथ्यों से पता चलता है कि दोनों में गहन मित्रता थी।

प्रश्न 17.
क्या यशोधर बाबू द्वारा बैठक में गमछा पहनकर आना उचित कहा जा सकता है?
उत्तर:
यशोधर बाबू का यह कार्य सर्वथा अनुचित कहा जाएगा। भारतीय अथवा विलायती दोनों परंपराओं की दृष्टि से इसे हम उचित नहीं कह सकते।

प्रश्न 18.
यशोधर बाब की बेटी की आधुनिकता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यशोधर बाबू की बेटी परम्परागत जीवन जीना पसन्द नहीं करती थी। वह हमेशा जींस और बगैर बाँह का टॉप पहने रहती है। वह अपने पिता की 25वीं वर्षगाँठ के समय इसी ड्रैस में मेहमानों को विदाई देती है। यशोधर बाबू भी उसे कई बार ऐसी ड्रैस न पहनने के लिए कह चुके थे। किन्तु उस पर उनकी बात का कोई असर नहीं हुआ। यशोधर बाबू की पत्नी बेटी का पक्ष लेती है वह स्वयं भी आधुनिक बनने व दिखने के पक्ष में है। किन्तु यशोधर बाबू को उनकी बात पसन्द नहीं थी।

सिल्वर बैंडिग Summary in Hindi

सिल्वर बैंडिग लेखक-परिचय

प्रश्न-
श्री मनोहर श्याम जोशी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री मनोहर श्याम जोशी का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में हुआ। वे हिंदी साहित्य में एक कथाकार, व्यंग्यकार, संपादक, पत्रकार तथा दूरदर्शन धारावाहिक लेखक के रूप में प्रसिद्ध हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने विज्ञान में स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने ‘दिनमान’ पत्रिका के सहायक संपादक के रूप में साहित्य जगत् में प्रवेश किया। बाद में वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिका का संपादन करने लगे। सन् 1984 में उन्होंने दूरदर्शन से प्रसारित होने वाले ‘हम लोग’ धारावाहिक का लेखन किया। आम लोगों में यह धारावाहिक अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। उनके द्वारा लिखित पटकथाओं पर ‘बुनियाद’, ‘हमराही’, ‘कक्का जी कहिन’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’ आदि लोकप्रिय धारावाहिक बने। सन् 2006 में इस साहित्यकार का निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ इनकी प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं

  • कहानी-संग्रह-‘कुरू कुरू स्वाहा’, ‘कसम’, ‘हरिया’, ‘हरक्यूलीज़ की हैरानी’, ‘हमजाद’, ‘क्याप’ आदि।
  • व्यंग्य-संग्रह ‘एक दुर्लभ व्यक्तित्व’, ‘कैसे किस्सागो’, ‘मंदिर घाट की पौड़ियाँ’, ‘ट-टा प्रोफेसर षष्ठी वल्लभ पंत’, ‘नेताजी कहिन’, ‘इस देश का यारो क्या कहना’ आदि।
  • साक्षात्कार-संग्रह ‘बातों बातों में’, ‘इक्कीसवीं सदी’।
  • संस्मरण-संग्रह-‘लखनऊ मेरा लखनऊ’, ‘पश्चिमी जर्मनी पर एक उड़ती नज़र’।
  • दूरदर्शन धारावाहिक ‘हम लोग’, ‘बुनियाद’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’। सन् 2005 में ‘क्याप’ के लिए उनको ‘साहित्य अकादमी’ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-मनोहर श्याम जोशी एक बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार थे। उन्होंने असंख्य कहानियाँ, संस्मरण, व्यंग्य लेख, साक्षात्कार तथा दूरदर्शन के लिए धारावाहिक लिखे। वे मूलतः आधुनिक युग बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने आज की पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा नैतिक समस्याओं पर अपने मौलिक विचार व्यक्त किए। ‘हम लोग’ तथा ‘बुनियाद’ जैसे धारावाहिकों में उन्होंने समाज की नब्ज़ को पकड़ने का सफल प्रयास किया है। उदाहरण के रूप में ‘सिल्वर वैडिंग’ कहानी में लेखक ने पुरानी पीढ़ी और नई पीढ़ी के बीच उत्पन्न खाई की ओर संकेत किया है जिसके फलस्वरूप आज संयुक्त परिवार टूटकर बिखर रहे हैं। अपने व्यंग्यात्मक लेखों में उन्होंने आज के राजनीतिज्ञों, तथाकथित साहित्यकारों एवं सामाजिक नेताओं पर करारे व्यंग्य किए हैं। उनकी कुछ कहानियाँ सामाजिक समस्याओं का उद्घाटन करती हैं और पाठकों को बहुत कुछ सोचने के लिए मजबूर कर देती हैं। उनकी अधिकांश रचनाएँ शिक्षा जगत् के लिए काफी उपयोगी हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Vitan Chapter 1 सिल्वर बैंडिग

4. भाषा-शैली-मनोहर श्याम जोशी ने प्रायः साहित्यिक हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है, जिसमें अंग्रेज़ी तथा उर्दू शब्दों का मिश्रण खुलकर देखा जा सकता है। कहीं-कहीं तो वे अंग्रेजी भाषा के पूरे वाक्य का ही प्रयोग कर देते हैं। वस्तुतः उनकी भाषा पात्रानुकूल तथा प्रसंगानुकूल कही जा सकती है। आवश्यकतानुसार वे पंजाबी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्दों का भी प्रयोग कर लेते हैं। ‘दिनमान’ तथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ पत्रिकाओं में उन्होंने पूर्णतया साहित्यिक हिंदी भाषा का ही प्रयोग किया है।

इसके साथ-साथ उनकी शैली साहित्यिक विधा के अनुसार बदल जाती है। व्यंग्य लेखों में उनका व्यंग्य बड़ा ही तीखा और चुभने वाला है। इस पाठ से उनकी भाषा-शैली का एक उदाहरण देखिए “अपनी सिल्वर वैडिंग की यह भव्य पार्टी भी यशोधर बाबू को समहाउ इंप्रापर ही लगी तथापि उन्हें इस बात से संतोष हुआ कि जिस अनाथ यशोधर बाबू के जन्मदिन पर कभी लह नहीं आए, जिसने अपना विवाह भी कोऑपरेटिव से दो-चार हज़ार कर्जा निकालकर किया बगैर किसी खास धूमधाम के, उसके विवाह की पच्चीसवीं वर्षगाँठ पर केक, चार तरह की मिठाई, चार तरह की नमकीन, फल, कोल्डड्रिंक्स, चाय सब कुछ मौजूद है।”

सिल्वर बैंडिग पाठ का सार

प्रश्न-
श्री मनोहर श्याम जोशी द्वारा रचित ‘सिल्वर वैडिंग’ पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
सिल्वर वैडिंग’ पाठ के रचयिता श्री मनोहर श्याम जोशी हैं। इसमें लेखक ने यशोधर पंत की 25वीं वर्षगाँठ का सजीव वर्णन किया है। यशोधर बाबू अपने विभाग के सेक्शन आफिसर के पद पर नियुक्त थे। वे अपने कार्यालय में एक निश्चित समय तक काम करते थे। दिनभर अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ उनका व्यवहार प्रायः रूखा था। लेकिन अपने गुरु कृष्णानंद (किशनदा) की परंपरा का अनुसरण करते हुए वे प्रायः सांयकाल को दफ्तर से जाते समय अपने कर्मचारियों के साथ हल्का-फुलका मज़ाक भी कर लेते थे। कभी-कभी वे अपने अधीनस्थ असिस्टेंट ग्रेड के लिपिक चड्डा की धृष्टता की भी अनदेखी कर देते थे।

एक बार यशोधर बाबू को अपने पूर्ववर्ती अधिकारी किशनदा की याद आ गई। वे उनके साथ बिताए हुए कुछ क्षणों की याद में डूब से गए। चड्ढा द्वारा पुनः बोलने पर उनके मुख से अचानक निकल पड़ा “नाव लैट मी सी, आई वॉज़ मैरिड ऑन सिक्स्थ फरवरी नाइंटिन फोर्टी सेवन।” आफिस के एक अन्य बाबू ने तत्काल हिसाब लगाकर कहा-“मैनी हैप्पी रिटर्नुस आफ द डे सर! आज तो आपका सिल्वर वैडिंग है। शादी को पूरा पच्चीस साल हो गया।” परंतु यशोधर बाबू सिल्वर वैडिंग को गोरे साहबों का चोंचला मानते थे। इधर चड्डा तथा मेनन ने चाय-मट्ठी तथा लड्डु की माँग प्रस्तुत की। यशोधर बाबू ने इसे ‘समहाउ इंप्रॉपर’ कहकर दस रुपये दे दिए। सारे सेक्शन के कहने पर भी वे इस दावत में शामिल नहीं हुए। हाँ, उन्होंने दस-दस के दो नोट और अवश्य दे दिए।

यशोधर बाबू ‘बॉय सर्विस से उन्नति प्राप्त करके सेक्शन ऑफिसर बने। किशनदा हमेशा उनके आदर्श बने रहे। वे उनके पूर्ववर्ती अधिकारी थे। इसलिए वे हमेशा उन्हीं का अनुकरण करते रहे और तरक्की करते हुए सेक्शन ऑफिसर बन गए। यशोधर बाबू किशनदा के समान सिद्धांतों के पक्के हैं। ऑफिस से छुट्टी मिलने के बाद हर रोज़ बिड़ला मंदिर जाते, प्रवचन सुनते और स्वयं ध्यान भी लगाते। वहाँ से निकलकर वे पहाड़गंज से साग-सब्जी खरीद कर लाते थे। इसी समय में वे लोगों से मिल-जुल लेते थे। वे पैदल घर से ऑफिस और ऑफिस से घर आते थे। यद्यपि ऑफिस से पाँच बजे छुट्टी मिल जाती थी, परंतु वे रात के आठ बजे ही घर पहुँचते थे। आज जब यशोधर बाबू बिड़ला मंदिर जा रहे थे, तो उन्होंने तीन बैडरूम वाले उस क्वार्टर को देखा, जिसमें किशनदा रहते थे। अब वह क्वार्टर नहीं रहा था। वहाँ पर एक छह मंजिला मकान खड़ा था। एक मंज़िल के क्वार्टर को तोड़कर छह मंजिला मकान बनाना यशोधर बाबू को अच्छा नहीं लगा।

भले ही उन्हें पद के अनुसार एंड्रयूज़गंज, लक्ष्मीबाई नगर, पंडारा रोड पर डी-2 टाइप का अच्छा क्वार्टर मिल रहा था। परंतु उन्होंने स्वीकार नहीं किया। जब उनका अपना क्वार्टर तोड़ा जाने लगा तब उन्होंने बचे क्वार्टरों में से एक क्वार्टर अपने नाम अलाट करवा लिया। इसका कारण यह था कि वे किशनदा की यादों को मन में लिए वहीं रहना चाहते थे। किशनदा को याद करते-करते वे मन-ही-मन सोचने लगे। अच्छा तो यह होता कि वह भी किशनदा के समान शादी न करता और जीवन भर समाज की सेवा करता।

फिर उन्हें याद आया कि किशनदा का बढ़ापा ठीक से व्य हुआ। जब सेवानिवृत्त होने के बाद किशनदा को क्वार्टर खाली करना पड़ा, तो किसी ने भी उन्हें आश्रय नहीं दिया। स्वयं यशोधर बाबू उन्हें अपने यहाँ रहने के लिए नहीं कह पाए। क्योंकि उस समय उनका विवाह हो गया था और उनके दो कमरों वाले क्वार्टर में तीन परिवार रह रहे थे। किशनदा कुछ साल राजेंद्र नगर में किराए का क्वार्टर लेकर रहे। किंतु मजबूर होकर वे अपने गाँव लौट गए और साल भर बाद स्वर्ग सिधार गए। यशोधर बाबू ने किशनदा से जो कुछ सीखा था, वह सब यशोधर बाबू को याद था।

यशोधर बाबू को याद आया कि हर रोज़ भ्रमण करने के बाद लौटते समय किशनदा अपने इस मानस पुत्र यशोधर बाबू के घर आते थे। किशनदा ने उन्हें जल्दी उठना सिखाया था। किशनदा ने ‘अरली टू बैड एंड अरली टू राइज मेक्स ए मैन हैल्दी एंड वाइज़!’ का मंत्र यशोधर बाबू को दिया था। इसलिए वे भी जल्दी उठने और सैर करने जाने लगे। आज भी यशोधर बाबू उस दृश्य को नहीं भूला पाते, जब किशनदा कुरते-पजामे में सैर को निकलते थे।

वे कुर्ते-पजामे के ऊपर ऊनी गाऊन पहनते थे, सिर पर गोल विलायती टोपी और पाँव में देसी खड़ाऊँ तथा छड़ी हाथ में लेकर चलते थे। यही कारण है कि जब तक किशनदा दिल्ली में रहे, तब तक यशोधर बाबू उनके शिष्य बने रहे। उन्होंने अपने बीवी-बच्चों की नाराज़गी की परवाह नहीं की। किशनदा से उन्होंने यह सीखा कि अपने घर पर होली गवाई जाए, जनेऊ बदलने के लिए कुमाऊँ वासियों को घर पर बुलाया जाए और रामलीला वालों को क्वार्टर का एक कमरा दिया जाए।

सिद्धांतों का पालन करने वाले यशोधर बाबू की पिछले कुछ वर्षों से अपनी पत्नी तथा बच्चों से छोटी-छोटी बात पर तकरार होती रहती थी। इसलिए शायद वे घर जल्दी लौटकर नहीं आते। उन्हें यह बिल्कुल पसंद नहीं था कि उनकी पत्नी आधुनिक नारी बने। यह उनके मूल संस्कारों के विरुद्ध था। जबकि यशोधर बाबू की पत्नी अपने बच्चों का साथ देते हुए ‘मॉड’ बन गई थी। यशोधर बाबू को इस बात का दुख है कि संयुक्त परिवार में रहते हुए उसकी पत्नी ने उसका साथ नहीं दिया। कारण यह था कि यशोधर बाबू परंपरावादी थे और उनके बच्चे आधुनिकवादी थे। पत्नी पुरानी परंपराओं को ढकोसला मानती थी और बच्चों का साथ देती थी। अपनी पत्नी के शृंगार को देखकर मज़ाक करते हुए कहते थे-शानयल बुढ़िया, चटाई का लहँगा, बूढ़ी मुँह मुँहासे, लोग करें तमासे’।

जब उनका बड़ा बेटा एक विज्ञापन संस्था में डेढ़ हज़ार रुपये मासिक का कर्मचारी बन गया, तो उन्हें ऐसा लगा कि उनके साधारण पत्र को असाधारण वेतन वाली नौकरी मिल गई है। उन्हें इस बात का भी दुख था कि उनका मंझला पुत्र ‘एलाइड सर्विसेज़’ में नहीं गया और बेटी विवाह के लिए तैयार न हुई, परंतु उन्हें अपने बच्चों की बातें उचित भी लगीं। उदाहरण के रूप में डी०डी०ए० के फ्लैट में पैसा न भरना, उन्होंने अपनी भूल ही मानी। उनके बच्चे बात-बात पर तर्क देते थे। उन्होंने यह भी सोचा कि पुश्तैनी घर में जाकर मरम्मत की जिम्मेवारी लेने से बेकार का झगड़ा लेना पड़ेगा। वे हमेशा किशनदा की बात को याद रखते थे कि मूर्ख लोग मकान बनाते हैं, सयाने उनमें रहते हैं। उनका सोचना था जब तक सरकारी नौकरी है, तब तक क्वार्टर है। बाद में गाँव का पुश्तैनी घर है। उनका यह विचार भी था कि उनके रिटायर होने से पहले उनके बेटे को सरकारी नौकरी मिल जाएगी और यह सरकारी क्वार्टर उन्हीं के पास रहेगा।

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आज प्रवचन सुनने में यशोधर बाबू का मन नहीं लगा। वे मन से न धार्मिक हैं, न कर्मकांडी। वे तो केवल अपने आदर्श किशनदा की परंपरा का पालन कर रहे थे। जैसे उनकी उम्र ढलने लगी तो वे किशनदा के समान मंदिर जाने लगे। गीता प्रेस गोरखपुर की पुस्तकें पढ़ने लगे और संध्या वंदना करने लगे, परंतु उनका मन कहीं टिकता नहीं था। कभी-कभी यह भी सोचते कि उन्हें आसक्ति को छोड़कर परलोक के बारे में सोचना चाहिए। अचानक प्रवचन में जनार्दन शब्द सुनकर उन्हें अपने जीजा जनार्दन जोशी की याद आ गई। उनकी तबीयत बहुत खराब थी और उनका हाल-चाल जानने के लिए उन्हें अहमदाबाद जाना होगा। परंतु उनके बीवी और बच्चे इसका विरोध करेंगे, जबकि यशोधर बाबू सुख अथवा दुख में सगे-संबंधियों के यहाँ जाना आवश्यक समझते थे। वस्तुतः यशोधर बाबू की पत्नी को उनका परंपरावादी होना बिल्कुल पसंद नहीं था।

उसका कहना था कि उसके पति ने स्वयं कुछ नहीं देखा। माँ के मरने के बाद यशोधर बाबू को अपनी विधवा बुआ के पास रहना पड़ा, जिसका लंबा-चौड़ा परिवार नहीं था। जब मैट्रिक करके दिल्ली पहुंचे तो किशनदा की छत्रछाया में रहने लगे। किशनदा के पास केवल गवई लोगों का ज्ञान था। जबकि यशोधर बाबू की पत्नी बगैर बाँह का ब्लाऊज पहनती थी, रसोई से बाहर दाल-भात खाती थी और ऊँची हील की सैंडल पहनती थी। यशोधर बाबू इसे ‘समहाउ इंप्रापर’ कहते थे। यशोधर बाबू चाहते थे कि समाज उन्हें एक आदरणीय बुजुर्ग समझे, बच्चे उनका आदर करें और उनसे सलाह लें। उनका यह भी विचार था कि बच्चे उनकी हर बात को पत्थर की लकीर न समझें, परंतु वे मनमानी तो न करें। वे चाहते थे कि बच्चे उनसे कहें कि बब्बा अब दूध लाना, सब्जी लाना, दालें लाना, राशन लाना, दवा लाना, कोयला लाना आदि सब काम छोड़ दें। उनकी यह इच्छा थी कि उनका बेटा वेतन लाकर उन्हीं को दे। लेकिन घर का कोई सदस्य उनकी इच्छाओं की ओर ध्यान नहीं देता था।

यशोधर बाबू टूटी-फूटी सड़कों से गुजरते हुए हाथ में सब्जी का झोला लटकाए जब घर पहुँचते हैं तो उनकी दशा द्वारका से लौटे सुदामा की तरह प्रतीत हो रही थी। घर के बाहर नेम प्लेट पर उनका अपना ही नाम वाई.डी. पंत लिखा है, परंतु उन्हें लगता ही नहीं कि यह घर उनका है। उनके क्वार्टर के बाहर एक कार, कुछ स्कूटर और मोटर-साइकिलें खड़ी थीं। लोग एक-दूसरे को विदा ले-दे रहे थे। उनके घर के बाहर गुब्बारे और कागज़ से बनी रंगीन झालरें और रंग-बिरंगी रोशनियों वाली लाइटें लगी हुई थीं। उनके बड़े बेटे भूषण को कार में बैठा व्यक्ति हाथ मिलाकर कह रहा था-“गिव माई वार्म रिगार्ड्स टू योर फादर।” यशोधर बाबू को यह सब देखकर कुछ भी समझ नहीं आ रहा था कि बाहर क्या हो रहा है? यशोधर बाबू ने देखा कि उसकी पत्नी एवं बेटी कुछ मेहमानों को विदा कर रही हैं।

लड़की ने जींस और बगैर बाँह का टॉप पहना हआ था और पत्नी ने बालों में खिजाब और होंठों पर लाली लगा रखी थी। यशोधर बाबू को यह सब ‘समहाउ इंप्रापर’ लगा। जब वे घर पहुँचे तो बड़े बेटे ने झिड़कते हुए कहा-“बब्बा, आप भी हद करते हैं। “सिल्वर वैडिंग के दिन साढ़े आठ बजे घर पहुंच रहे हैं। अभी तक मेरे बॉस आपकी राह देख रहे थे।” इस पर यशोधर बाबू ने कहा कि-“हम लोगों के यहाँ सिल्वर वैडिंग कब से होने लगी है।” तब यशोधर बाबू के भांजे चंद्रदत्त तिवारी ने कहा कि जब से आपका बेटा डेढ़ हज़ार रुपये महीना कमाने लगा है।

यशोधर बाबू को सिल्वर वैडिंग का आयोजन ठीक नहीं लगा, जिसमें केक, चार तरह की मिठाई, चार तरह की नमकीन, फल, कोल्डड्रिंक्स, चाय आदि सर्व की जा रही थी। उनको इस बात का दुख है कि आफिस जाते समय उन्हें किसी बात की सूचना नहीं दी गई थी। यही कारण है कि उनके पुत्र भूषण ने अपने मित्रों तथा सहयोगियों से अपने पिता का परिचय करवाया तो उन्होंने केवल बैंक्यू कहकर सबका जवाब दिया। आखिर बच्चों ने केक काटने का आग्रह किया। बेटी के आग्रह पर उन्होंने केक तो काटा पर साथ यह भी कहा “समहाउ आई डोंट लाइक आल दिस।” वे केक खाने को भी राजी नहीं हुए, क्योंकि उसमें अंडा होता है। उन्होंने अन्य सब लोगों को खाने के लिए कहा और खुद पूजा करने चले गए।

आज यशोधर बाबू ने संध्याकालीन पूजा में अधिक समय लगाया। वे चाहते थे कि अधिकांश मेहमान चले जाएँ, तो वे अपनी पूजा को समाप्त करेंगे। पूजा करते समय उन्हें किशनदा दिखाई दिए। यशोधर बाबू ने उनसे पूछा कि ‘जो हुआ होगा’ से आप कैसे मर गए। किशनदा ने उत्तर दिया-“भाऊ सभी जन इसी ‘जो हुआ होगा’ से मरते हैं।” शुरू और आखिर में सब अकेले ही होते हैं। वे चाहते थे कि काश किशनदा उनका आज भी मार्ग दर्शन करते। इसी बीच यशोधर बाबू की पत्नी ने आकर उन्हें डाँटा, तो वे आसन से खड़े हो गए।

सब रिश्तेदारों के जाने की बात मालूम होने पर यशोधर बाबू गमछा पहने ही बैठक में आ गए। यह देखकर उनकी बेटी क्रोधित हो उठी। तब यशोधर बाबू ने उसकी जींस पर व्यंग्य किया। अन्ततः यशोधर बाबू को प्रेजेंट खोलने के लिए कहा गया परंतु उन्होंने बच्चों से कहा कि तुम ही इसे खोलो और इसका इस्तेमाल करो। इस पर उनके बेटे भूषण ने प्रेजेंट को खोला और कहा कि यह ऊनी ड्रेसिंग गाउन है, मैं आपके लिए लाया हूँ। जब आप सवेरे दूध लेने जाएँ तो फटे हुए पुलोवर के स्थान पर इसे पहनकर जाएँ। उनकी बेटी कुर्ता-पजामा ले आई, तब यशोधर बाबू ने कुर्ता-पजामा पहन कर गाउन धारण कर लिया। परंतु यह निर्णय करना बड़ा कठिन है कि भूषण द्वारा कही गई दूध लाने की बात उन्हें चुभी या गाउन पहनकर उन्हें किशनदा बनना पसंद आया। परंतु इतना निश्चित था कि यशोधर बाबू की आँखें नम हो गईं।

कठिन शब्दों के अर्थ

सिल्वर वैडिंग = विवाह की रजत जयंती जो कि विवाह के पच्चीस वर्ष बाद मनाई जाती है। निगाह = दृष्टि। सुस्त = धीमी। मातहत = अधीन। जूनियर = अधीन काम करने वाला। शुष्क = रूखा। निराकरण = समाधान । छोकरा = लड़का। पतलून = पैंट। बदतमीज़ी = अभद्र व्यवहार। चूनेदानी = पान खानों वालों द्वारा चूना रखने का बर्तन । धृष्टता = अशिष्टता। करेक्ट = सही। बाबा आदम का ज़माना = पुराना समय। नहले पर दहला = जैसे को तैसा, जवाब देना। दाद = प्रशंसा। वक्ता = बोलने वाले। ठठाकर = ज़ोर से हँसते हुए। ठीक-ठिकाना = सही व्यवस्था। चोंचले = बनावटी व्यवहार। इनसिस्ट = आग्रह। चुग्गे भर = पेट भरने योग्य । जुगाड़ = अस्थायी व्यवस्था। नगण्य = महत्त्वहीन। सेक्रेट्रिएट = सचिवालय। नागवार = अनुचित।

निहायत = सर्वथा, एकदम। बेहूदा = अनुचित। अफोर्ड करना = सहन करना। इसरार = आग्रह। गप्प-गप्पाष्टक = बेकार की बातें। प्रवचन = धार्मिक व्याख्यान। रीत = प्रणाली। सिद्धांत के धनी = विचारों के पक्के। फिकरा = वाक्यांश। वजह = कारण । मदद = सहायता। पेंच = कारण। स्कॉलरशिप = छात्रवृत्ति। वर = विवाह के योग्य युवक। तरक्की = उन्नति। खुशहाली = संपन्नता। उपेक्षा = तिरस्कार का भाव। दिलासा देना = सांत्वना देना। तरफदारी करना = पक्ष लेना। मातृसुलभ = माताओं की स्वाभाविक मनोदशाएँ। मॉड = आधुनिक। गज़ब = आश्चर्यजनक। ताई = पिता के बड़े भाई की पत्नी। ढोंग-ढकोसला = आडंबरपूर्ण व्यवहार। अनदेखा करना = ध्यान न करना।

कुल = वंश। परंपरा = मान्यताएँ। निःश्वास = लंबी साँस । डेडीकेट = समर्पित। रिटायर = सेवानिवृत्त। विरासत = उत्तराधिकार। उपकृत = जिस पर उपकार किया गया है। प्रस्ताव = पेशकश। बिरादर = जाति भाई। किस्म = तरह। खुराफात = विघ्न डालने वाले काम। सर = सिर। दुनियादारी = सांसारिकता। पुश्तैनी = पैतृक। बिरादरी = जाति। बाध्य करना = मजबूर करना। कर्मकांडी = पूजा-पाठ करने वाला। राजपाट = राजसिंहासन। बाट = पगडंडी। जनार्दन = ईश्वर। तबीयत खराब होना = अस्वस्थ होना। एकतरफा लगाव = एक तरफ की आसक्ति। गम = दुख। गवाई = गाँव के। निभ = निर्वाह करना। बुजुर्गियत = वृद्धावस्था का बड़प्पन । बुढ़याकाल = वृद्धावस्था। एनीवे = किसी तरह। प्रवचन = भाषण। इरादा = निश्चय । लहजा = ढंग, तरीका। हाज़िरी = उपस्थिति।

भाऊ = बच्चा। अनुरोध = आग्रह। पट्टशिष्य = प्रिय शिष्य। निष्ठा = विश्वास, आस्था। जन्यो पुन्यूं = जनेऊ परिवर्तित करने वाली पूर्णिमा। कुमाउँनियों = कुमायूँ क्षेत्र के निवासियों। सख्त नापसंद = अत्यधिक अप्रिय लगना। बदतर = बुरी हालत। दुराग्रह = अनुचित हठ। बुजुर्ग = वृद्ध व्यक्ति। हरगिज़ = बिल्कुल। एक्सपीरिएंस = अनुभव। सबस्टीट्यूट = विकल्प। कुहराम = कोलाहल । नुक्ताचीनी = आलोचना। कारपेट = फर्श की दरी। कारोबार = धंधा। चौपट = नष्ट होना। कई मर्तबा = अनेक बार। इंप्रापर = अनुचित। तरफदारी करना = पक्ष लेना। खिजाब = सफेद बालों को काला करने वाला द्रव्य । एल.डी.सी. = लोअर डिवीजन क्लर्क। कदम = डग। माह = मासिक। नए दौर = नया युग। मिसाल = उदाहरण। भव्य = सुंदर। चचेरा भाई = चाचे का पुत्र। संपन्न = धनवान। हरचंद = बहुत अधिक। जताना = बताना, परिचित कराना। अनमनी = उदासी से भरा हुआ। आखिर = अंत। रवैया = व्यवहार। आमादा = तैयार। खिलाफ = विरुद्ध । लिमिट = सीमा। प्रेजेंट = तोहफा। इस्तेमाल = प्रयोग।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

HBSE 12th Class Hindi श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?
उत्तर:
लेखक जाति-प्रथा को श्रम विभाजन का एक रूप इसलिए नहीं मानता क्योंकि यह विभाजन स्वाभाविक नहीं है। पुनः यह मानव की रुचि पर भी आधारित नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें व्यक्ति की क्षमता और योग्यता की उपेक्षा की जाती है। यह माता-पिता के सामाजिक स्तर को ध्यान में रखकर ही बनाई जाती है। जन्म से पूर्व ही मनुष्य के लिए श्रम विभाजन करना पूर्णतया अनुचित है। जाति-प्रथा आदमी को आजीवन एक ही व्यवसाय से जोड़ देती है जोकि सर्वथा अनुचित है। जाति-प्रथा के कारण मनुष्य को उचित तथा अनुचित किसी भी व्यवसाय को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यहाँ तक कि यदि मनुष्य को भूखा मरना पड़ा तो भी वह अपना पेशा नहीं बदल सकता। यह स्थिति समाज के लिए बड़ी भयावह है।

प्रश्न 2.
जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोजगारी व भुखमरी का भी एक कारण कैसे बनती रही है? क्या यह स्थिति आज भी है?
उत्तर:
जाति-प्रथा किसी भी आदमी को अपनी रुचि के अनुसार पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती। उसे केवल पैतृक पेशा ही अपनाना पड़ता है। वह किसी अन्य पेशे को नहीं अपना सकता। भले ही वह उस पेशे में पारंगत क्यों न हो। आज उद्योग-धंधों की प्रक्रिया और तकनीक में लगातार विकास हो रहा है, जिससे कभी-कभी भयानक परिवर्तन उत्पन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पेशा बदलने को मजबूर होना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यदि मनुष्य को पेशा न बदलने दिया जाए तो वह बेरोज़गारी और भुखमरी का शिकार हो जाएगा।

आज भले ही समाज में भयंकर जाति-प्रथा है, लेकिन उसके बाद भी कोई ऐसी मजबूरी नहीं है कि वह अपने पैतृक व्यवसाय को छोड़कर नए पेशे को न अपना सके। आज जो लोग पैतृक व्यवसाय से जुड़े हैं वे अपनी इच्छा से जुड़े हुए हैं अथवा किसी अन्य व्यवसाय में योग्यता की कमी के कारण पैतृक व्यवसाय को अपनाए हुए हैं।

प्रश्न 3.
लेखक के मत से ‘दासता’ की व्यापक परिभाषा क्या है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कह सकते। दासता की एक अन्य स्थिति यह भी है जिसके अनुसार कुछ लोगों को अन्य लोगों द्वारा निर्धारित किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पाल होना पड़ता है। कानूनी पराधीनता न होने पर भी समाज में इस प्रकार की दासता देखी जा सकती है। उदाहरण के रूप में जाति-प्रथा के समान समाज में ऐसे लोगों का वर्ग भी संभव है जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध किसी पेशे को अपनाना पड़ सकता है। उदाहरण के रूप में सफाई करने वाले कर्मचारी इसी प्रकार के कहे जा सकते हैं।

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प्रश्न 4.
शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार की दृष्टि से मनुष्यों में असमानता संभावित रहने के बावजूद आंबेडकर ‘समता’ को एक व्यवहार्य सिद्धांत मानने का आग्रह क्यों करते हैं? इसके पीछे उनके क्या तर्क हैं?
उत्तर:
डॉ० आंबेडकर यह जानते हैं कि शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक परंपरा की दृष्टि से लोगों में असमानता हो सकती है, परंतु फिर भी वे क्षमता के व्यवहार्य सिद्धांत को अपनाने की सलाह देते हैं। इस संदर्भ में लेखक का यह तर्क है कि यदि हमारा समाज अपने सदस्यों का अधिकतम प्रयोग प्राप्त करना चाहता है, तो इसे समाज के सभी लोगों को आरंभ से ही समान अवसर और समान व्यवहार प्रदान करना होगा। विशेषकर हमारे राजनेताओं को सब लोगों के साथ एक-समान व्यवहार करना चाहिए। समाज में प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता का विकास करने का उचित अवसर मिलना चाहिए। लेखक का यह भी तर्क है कि जन्म लेना या सामाजिक परंपरा प्राप्त करना व्यक्ति के अपने वश में नहीं है। अतः इस आधार पर किसी के व्यवसाय का निर्णय करना उचित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
सही में आंबेडकर ने भावनात्मक समत्व की मानवीय दृष्टि के तहत जातिवाद का उन्मूलन चाहा है; जिसकी प्रतिष्ठा के लिए भौतिक स्थितियों और जीवन सुविधाओं का तर्क दिया है। क्या इससे आप सहमत हैं?
उत्तर:
इस बात को लेकर हम लेखक से पूरी तरह सहमत हैं। कारण यह है कछ लोग किसी उच्च वंश में उत्पन्न होने के फलस्वरूप उत्तम व्यवहार के अधिकारी बन जाते हैं। यदि हम गहराई से विचार करें तो पता चलेगा कि इसमें उनका कोई अपना योगदान नहीं है। सामाजिक परिवेश व्यक्ति को सम्मान प्रदान कर सकता है लेकिन उस व्यक्ति के सामर्थ्य का मूल्यांकन नहीं कर सकता है। मनुष्य के कार्यों तथा उसके प्रयत्नों के फलस्वरूप ही उसकी महानता का निर्णय होना चाहिए और आदमी के प्रयत्नों की सही जाँच तब हो सकती है जब सभी को समान अवसर प्राप्त हों। उदाहरण के रूप में गाँव के विद्यालयों तथा सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों का पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के साथ मुकाबला नहीं किया जा सकता। अतः समय की माँग यह है कि जातिवाद का उन्मूलन किया जाए और सभी को समान भौतिक स्थितियाँ और सुविधाएँ प्रदान की जाएँ। तब उनमें जो श्रेष्ठ व्यक्ति सिद्ध होता है, वही उत्तम व्यवहार का अधिकारी हो सकता है।

प्रश्न 6.
आदर्श समाज के तीन तत्त्वों में से एक ‘भ्रातृता’ को रखकर लेखक ने अपने आदर्श समाज में स्त्रियों को भी सम्मिलित किया है अथवा नहीं? आप इस ‘भ्रातता’ शब्द से कहाँ तक सहमत हैं? यदि नहीं तो आप क्या शब्द उचित समझेंगे/समझेंगी।
उत्तर:
आदर्श समाज के तीसरे तत्त्व (भ्रातृता) भाईचारे पर विचार करते समय लेखक ने अलग से स्त्रियों का उल्लेख नहीं किया, परंतु लेखक ने समाज की बात कही है और स्त्रियाँ समाज से अलग नहीं होतीं, बल्कि स्त्री और पुरुष दोनों के मिलने से समाज बनता है। अतः यह कहना कि आदर्श समाज में स्त्रियों को सम्मिलित किया गया है अथवा नहीं; यह सोचना ही व्यर्थ है। समाज में स्त्रियाँ स्वतः सम्मिलित हैं। भ्रातृता भले ही संस्कृतनिष्ठ शब्द है परंतु यह अधिक प्रचलित नहीं है। अतः यदि इसके स्थान पर भाईचारा शब्द का प्रयोग होता तो वह उचित होता।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
आंबेडकर ने जाति-प्रथा के भीतर पेशे के मामले में लचीलापन न होने की जो बात की है, उस संदर्भ में शेखर जोशी की कहानी ‘गलता लोहा’ पर पुनर्विचार कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से इस कहानी को स्वयं पढ़ें और विचार करें।

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प्रश्न 2.
‘कार्य कुशलता’ पर जाति-प्रथा का प्रभाव विषय पर समूह में चर्चा कीजिए। चर्चा के दौरान उभरने वाले बिंदुओं को लिपिबद्ध कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से इस कहानी को स्वयं पढ़ें और विचार करें।

इन्हें भी जानें

आंबेडकर की पुस्तक जातिभेद का उच्छेद और इस विषय में गांधी जी के साथ उनके संवाद की जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

हिंद स्वराज नामक पुस्तक में गांधी जी ने कैसे आदर्श समाज की कल्पना की है, उसे भी पढ़ें।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक की सहायता से स्वयं करें।

HBSE 12th Class Hindi श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पाठ में लेखक ने जाति-प्रथा की किन-किन बुराइयों का वर्णन किया है?
उत्तर:
जाति-प्रथा द्वारा किया गया श्रम विभाजन स्वाभाविक नहीं है क्योंकि यह श्रमिकों में भेद उत्पन्न करती है और उनमें ऊँच-नीच की भावना पैदा करती है। पुनः जाति-प्रथा पर आधारित श्रम विभाजन श्रमिकों की रुचि के अनुसार नहीं होता। जाति-प्रथा के फलस्वरूप श्रम विभाजन माँ के गर्भ में ही तय हो जाता है। जन्म लेने के बाद व्यक्ति की रुचि और क्षमता की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता। यही नहीं, जाति-प्रथा मनुष्य को हमेशा के लिए एक ही व्यवसाय से जोड़ देती है। यदि विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ तो भी व्यक्ति अपना व्यवसाय नहीं छोड़ सकता जिससे उसे भूखों मरना पड़ सकता है। जाति-प्रथा के कारण कुछ काम घृणित माने गए हैं, जो लोग मजबूरी में इन कार्यों को करते हैं उन्हें लोग हीन समझते हैं।

प्रश्न 2.
आदर्श समाज के बारे में लेखक ने क्या विचार व्यक्त किए हैं?
उत्तर:
लेखक जिस आदर्श समाज की बात करता है वह स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे पर आधारित होगा। लेखक का कहना है कि आदर्श समाज में जो परिवर्तन होगा उसका लाभ सभी को होगा किसी एक को नहीं। इस प्रकार के समाज में अनेक प्रकार के हितों में सभी लोगों की भागीदारी होगी। यही नहीं, सभी लोग समाज के कल्याण के लिए जागरूक रहेंगे। ऐसी स्थिति में सामाजिक जीवन में सबको निरंतर संपर्क के अनेक साधन और अवसर प्राप्त होंगे। समाज में भाईचारा इस प्रकार का होगा जैसे दूध और पानी का मिश्रण होता है। अतः आदर्श समाज समाज के सभी लोगों के लिए उपयोगी होगा।

प्रश्न 3.
लोकतंत्र से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक का विचार है कि लोगों में जो दूध-पानी के मिश्रण के समान भाईचारा विकसित होगा वही तो लोकतंत्र है। इसमें समाज के सभी लोगों में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना विकसित होगी। लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि लोकतंत्र सामूहिक जीवन-चर्या की एक नीति है। समाज के सम्मिलित अनुभवों का आदान-प्रदान ही लोकतंत्र है। इस प्रकार के लोकतंत्र की स्थापना होने से लोगों को अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव उत्पन्न होगा।

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प्रश्न 4.
लेखक के अनुसार मनुष्य की क्षमता किन बातों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि मनुष्यों की क्षमता शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार और मनुष्य के अपने प्रयत्नों पर निर्भर करती है। शारीरिक वंश-परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार जन्मजात होते हैं। ये दोनों मनुष्य के वश में नहीं हैं। अतः इनके आधार पर किसी का वर्ग और कार्य निश्चित नहीं किया जाना चाहिए और न ही जन्म के कारण किसी को श्रेष्ठ या निम्न मानना चाहिए। प्रत्येक मनुष्य के प्रयत्न उसके अपने वश में हैं। अतः सभी मनुष्यों को प्रयत्न करने के समान अवसर दिए जाने चाहिएँ। प्रयत्न करने पर जो मनुष्य उत्तम है, उसे उत्तम ही कहेंगे।

प्रश्न 5.
जाति-प्रथा भारतीय समाज में बेरोज़गारी और भुखमरी का एक कारण कैसे रही है? भीमराव आंबेडकर के विचारों के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जाति-प्रथा भारतीय समाज के लिए एक कलंक है। यह हमेशा बेरोज़गारी और भुखमरी का कारण बनती रही है। जब समाज किसी व्यक्ति को जाति के आधार पर एक विशेष पेशे से जोड़ देता है और यदि वह पेशा उस आद अथवा अपर्याप्त होता है तो उसके समक्ष भुखमरी की स्थिति उपस्थित हो जाती है। जाति-प्रथा उस व्यक्ति को अपना पेशा बदलने की अनुमति नहीं देती अथवा उसे पेशा बदलने की स्वतंत्रता नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में उसके सामने भूखों मरने के सिवाय और कोई चारा नहीं होता। भारतीय समाज हमेशा व्यक्ति को पैतृक पेशा अपनाने को मजबूर करता है। भले ही वह उसे पेशे में प्रवीण हो अथवा नहीं। पेशा बदलने की अनुमति न देना बेरोज़गारी का प्रमुख कारण बनता है। परंतु स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद इस स्थिति में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। जाति-प्रथा के बावजूद आज व्यक्ति को अपना पेशा चुनने अथवा बदलने का पूरा अधिकार है। सरकार द्वारा लागू की गई आरक्षण नीति से भी इस स्थिति में काफी परिवर्तन आया है।

प्रश्न 6.
‘जाति-प्रथा’ के आधार पर श्रम विभाजन को स्वाभाविक क्यों नहीं माना गया?
उत्तर:
जाति-प्रथा श्रम का जो विभाजन करती है वह मनुष्य की रुचियों तथा उसकी क्षमताओं पर आधारित नहीं होता, बल्कि यह विभाजन जन्म और जाति के आधार पर किया जाता है। जाति-प्रथा द्वारा किया गया श्रम विभाजन अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसमें व्यक्ति बंधनों में जकड़ लिया जाता है। सही श्रम विभाजन वही हो सकता है जिसमें मानव की रुचियों और क्षमताओं का ध्यान रखा जाए। रोज़गार के उचित अवसर सभी को प्राप्त होने चाहिएँ । दुःख की बात तो यह है कि जाति-प्रथा के आधार पर किया गया श्रम विभाजन ऊँच-नीच और छोटे-बड़े के भेदभाव को उत्पन्न करता है। यह विभाजन पूर्णतया अस्वाभाविक है।

प्रश्न 7.
जाति-प्रथा आर्थिक विकास के लिए किस प्रकार हानिकारक है?
उत्तर:
आर्थिक विकास के लिए यह जरूरी है कि लोगों को उनकी रुचि, क्षमता तथा योग्यता के अनुसार पेशा अपनाने और श्रम करने की स्वतंत्रता हो, बल्कि सभी को समान अवसर भी मिलने चाहिएँ। जाति-प्रथा सबको समान अवसर देने से रोकती है। वह व्यक्ति की अपनी रुचि, क्षमता और इच्छा की ओर कोई ध्यान नहीं देती। जो लोग जन्मजात पेशे को अपनाने के लिए मजबूर किए जाते हैं वे न चाहते हुए मजबूर होकर काम करते हैं। पेशे में न उनका दिल लगता है, न दिमाग। वे अपनी शक्तियों और क्षमताओं का समुचित प्रयोग नहीं कर पाते जिससे आर्थिक विकास अवरुद्ध हो जाता है।

प्रश्न 8.
आंबेडकर ने किसके लिए दासता शब्द का प्रयोग किया है और क्यों?
उत्तर:
आंबेडकर ने जाति-प्रथा के आधार पर पेशा अपनाने की परंपरा को ‘दासता’ की संज्ञा दी है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य इस परंपरा के कारण अपनी इच्छानुसार पेशा नहीं चुन सकता। उसे वही काम करना पड़ता है जो जन्म से उसके लिए निर्धारित कर दिया जाता है। उसकी अपनी इच्छा की परवाह नहीं की जाती। जाति-प्रथा के कारण समाज उसके लिए जो काम निर्धारित कर लेता है, आजीवन उसे वही काम करना पड़ता है। भले ही उसमें उसकी अपनी रुचि हो या न हो। ऐसा जीवन ‘दासता’ नहीं तो और क्या कहा जाएगा।

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प्रश्न 9.
जन्मजात धंधों में लगे हुए लोग कार्यकुशल क्यों नहीं बन पाते?
उत्तर:
जिन लोगों को जाति-प्रथा के कारण जन्मजात धंधों को अपनाना पड़ता है, उनमें कभी भी कार्य-कुशलता नहीं आ पाती। उस कार्य में उनकी रुचि नहीं होती लेकिन फिर भी उन्हें मजबूर होकर वह काम करना पड़ता है। यही नहीं, ऐसा व्यक्ति दुर्भावना से ग्रस्त हो जाता है। वह काम करने की बजाय टाल-मटोल की नीति को अपनाता है। जाति-प्रथा द्वारा निर्धारित काम में उसका दिल और दिमाग नहीं लगता, जिसके फलस्वरूप वह अपनी क्षमता की अपेक्षा बहुत कम काम करता है।

प्रश्न 10.
लेखक ने किस आधार पर असमान व्यवहार को उचित माना और क्यों?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि असमान प्रयत्न के आधार पर असमान व्यवहार उचित है। कहने का भाव यह है कि यदि कोई आदमी अपनी इच्छा से बहुत थोड़ा प्रयत्न करता है और ठीक से काम नहीं करता तो उसे कम सम्मान मिलना चाहिए। जो व्यक्ति अधिक प्रयत्न करता है उसे अधिक सम्मान मिलना चाहिए। इस प्रकार से व्यक्ति को प्रोत्साहित करना या दंडित करना सर्वथा उचित है। ऐसा करने से मनुष्य अपनी क्षमताओं का विकास कर सकेगा और अयोग्य लोगों को योग्य स्थानों पर काम करने को नहीं मिलेगा।

प्रश्न 11.
लेखक ने आदर्श समाज के बारे में क्या कहा है?
अथवा
आदर्श समाज की कल्पना का चित्रण कीजिए।
उत्तर:
लेखक आदर्श समाज की चर्चा करते हुए कहता है कि उसका आदर्श समाज स्वतंत्रता, समता और भ्रातृता पर आधारित होगा। यह किसी प्रकार से भी गलत नहीं है। भाईचारे में किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती। आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता अवश्य होनी चाहिए कि समाज में किया गया कोई भी परिवर्तन सर्वत्र व्याप्त हो जाए। ऐसे समाज में सार्वजनिक हितों में सबकी भागीदारी होनी चाहिए। सामाजिक जीवन में निरंतर संपर्क के अनेक साधन और अवसर सभी को प्राप्त होने चाहिएँ। लेखक इस तुलना दूध और पानी के मिश्रण से करता है। इसी को लोकतंत्र कहा जाता है। लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवन-चर्या की एक नीति है जिसमें सभी को अनुभवों का आदान-प्रदान करने का अवसर प्राप्त होता है।

प्रश्न 12.
लेखक ने समता को काल्पनिक वस्तु क्यों माना है? फिर भी वह समता क्यों चाहता है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार लोगों के बीच में समता प्राकृतिक नहीं है। उनका कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति जन्म से ही सामाजिक स्तर से अपने प्रयत्नों के कारण असमान होता है। सभी एक-समान नहीं हो सकते। अतः पूर्ण समता एक काल्पनिक वस्तु है। फिर भी लेखक का कहना है कि समाज के सभी लोगों को पढ़ने-लिखने और फलने-फूलने के बराबर अवसर मिलने चाहिएँ। किसी प्रकार का भेदभाव मानव के विकास में बाधा का काम करता है और उसकी कार्य-कुशलता को हानि पहुँचाता है। भले ही समाज विविध प्रकार का है और विशाल भी है, लेकिन फिर भी सभी मनुष्य समान होने चाहिएँ। तभी हमारा समाज वर्गहीन, जातिहीन और श्रेणीहीन होगा।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ के लेखक का नाम क्या है?
(A) डॉ० भीमराव आंबेडकर
(B) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(C) विष्णु खरे
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(A) डॉ० भीमराव आंबेडकर

2. डॉ० भीमराव आंबेडकर का जन्म कब हुआ?
(A) 14 अप्रैल, 1890 को
(B) 12 अप्रैल, 1891 को
(C) 14 अप्रैल, 1891 को
(D) 14 अप्रैल, 1881 को
उत्तर:
(C) 14 अप्रैल, 1891 को

3. भीमराव आंबेडकर का जन्म कहाँ पर हुआ?
(A) महू में
(B) मेद्या में
(C) बहू में
(D) भाण्डू में
उत्तर:
(A) महू में

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4. महू किस राज्य में स्थित है?
(A) उत्तरप्रदेश में
(B) राजस्थान में
(C) हरियाणा में
(D) मध्यप्रदेश में
उत्तर:
(D) मध्यप्रदेश में

5. डॉ० भीमराव का जन्म किस परिवार में हुआ?
(A) ब्राह्मण परिवार में
(B) क्षत्रिय परिवार में
(C) अस्पृश्य परिवार में
(D) वैश्य परिवार में
उत्तर:
(C) अस्पृश्य परिवार में

6. डॉ० भीमराव ने आरंभिक शिक्षा कहाँ प्राप्त की?
(A) पाकिस्तान में
(B) भारत में
(C) श्रीलंका में
(D) जापान में
उत्तर:
(B) भारत में

7. उच्चतर शिक्षा के लिए सर्वप्रथम वे कहाँ गए?
(A) न्यूयार्क में
(B) लंदन में
(C) पेरिस में
(D) हांगकांग में
उत्तर:
(A) न्यूयार्क

8. न्यूयॉर्क के बाद भीमराव ने कहाँ पर उच्च शिक्षा प्राप्त की?
(A) वाशिंगटन में
(B) दिल्ली में
(C) मुंबई में
(D) लंदन में
उत्तर:
(D) लंदन में

9. किन विश्वविद्यालयों ने डॉ. आंबेडकर को विधि, अर्थशास्त्र एवं राजनीति विज्ञान में डिग्रियाँ प्रदान की?
(A) पंजाब विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय ने
(B) कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इक्नॉमिक्स ने
(C) कोलकाता विश्वविद्यालय और मुंबई विश्वविद्यालय ने
(D) इलाहाबाद विश्वविद्यालय और मेरठ विश्वविद्यालय ने
उत्तर:
(B) कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ इक्नॉमिक्स ने

10. किस समाज से डॉ० आंबेडकर का मोह भंग हो गया?
(A) हिंदू समाज से
(B) ब्राह्मण समाज से
(C) जैन समाज से
(D) वैश्य समाज से
उत्तर:
(A) हिंदू समाज से

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11. डॉ० आंबेडकर कब बौद्ध धर्म के मतानुयायी बने?
(A) 12 अक्तूबर, 1952 को
(B) 14 अक्तूबर, 1956 को
(C) 12 अक्तूबर, 1955 को
(D) 16 अक्तूबर, 1957 को
उत्तर:
(B) 14 अक्तूबर, 1956 को

12. डॉ. आंबेडकर के साथ और कितने लोग बौद्ध धर्म के मतानुयायी बने?
(A) 2 लाख
(B) 3 लाख
(C) 5 लाख
(D) 7 लाख
उत्तर:
(C) 5 लाख

13. डॉ. आंबेडकर किस महान कवि से प्रभावित हुए थे?
(A) गुरुनानक देव से
(B) कबीरदास से
(C) रविदास से
(D) धर्मदास से
उत्तर:
(B) कबीरदास से

14. डॉ० भीमराव आंबेडकर का देहांत कब हुआ?
(A) 6 दिसंबर, 1956 को
(B) 5 दिसंबर, 1955 को
(C) 12 दिसंबर, 1956 को
(D) 6 दिसंबर, 1951 को
उत्तर:
(A) 6 दिसंबर, 1956 को

15. डॉ० भीमराव आंबेडकर ने किसके निर्माण में योगदान दिया?
(A) हिंदू समाज
(B) दलित समाज
(C) भारतीय संविधान
(D) भारतीय समाज
उत्तर:
(C) भारतीय संविधान

16. भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय ने बाबा साहेब आंबेडकर के संपूर्ण वाङ्मय को कितने खंडों में विभाजित किया है?
(A) 22
(B) 23
(C) 24
(D) 21
उत्तर:
(D) 21

17. बाबा भीमराव की रचना ‘जेनेसिस एंड डवेलपमेंट’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1927 में
(B) सन् 1928 में
(C) सन् 1917 में
(D) सन् 1930 में
उत्तर:
(C) सन् 1917 में

18. ‘द अनटचेबल्स, हू आर दे? का प्रकाशन किस वर्ष में हुआ?
(A) सन् 1945 में
(B) सन् 1946 में
(C) सन् 1947 में
(D) सन् 1948 में
उत्तर:
(D) सन् 1948 में

19. बाबा भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘बुद्धा एंड हिज़ धम्मा’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1957 में
(B) सन् 1958 में
(C) सन् 1959 में
(D) सन् 1960 में
उत्तर:
(A) सन् 1957 में

20. ‘हू आर द शूद्राज़’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1947 में
(B) सन् 1946 में
(C) सन् 1950 में
(D) सन् 1951 में
उत्तर:
(B) सन् 1946 में

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21. ‘थॉट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1950 में
(B) सन् 1951 में
(C) सन् 1955 में
(D) सन् 1960 में
उत्तर:
(C) सन् 1955 में

22. बाबा भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘द प्रॉबल्म ऑफ़ द रुपी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1919 में
(B) सन् 1920 में
(C) सन् 1922 में
(D) सन् 1923 में
उत्तर:
(D) सन् 1923 में

23. ‘द राइज़ एंड फॉल ऑफ द हिंदू वीमैन’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1965 में
(B) सन् 1960 में
(C) सन् 1921 में
(D) सन् 1930 में
उत्तर:
(A) सन् 1965 में

24. ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ कब प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1930 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1920 में
(D) सन् 1940 में
उत्तर:
(B) सन् 1936 में

25. डॉ. आंबेडकर द्वारा रचित ‘लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी’ किस वर्ष प्रकाशित हुई?
(A) सन् 1941 में
(B) सन् 1942 में
(C) सन् 1943 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(C) सन् 1943 में

26. सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान को लेखक ने क्या कहा है?
(A) स्वतंत्रता
(B) तानाशाही
(C) दासता
(D) लोकतंत्र
उत्तर:
(D) लोकतंत्र

27. जाति-प्रथा व्यक्ति को जीवन भर के लिए किससे बाँध देती है?
(A) एक ही व्यवसाय से
(B) अनेक व्यवसायों से
(C) व्यवसाय बदलने से
(D) व्यवसाय छोड़ने से
उत्तर:
(A) एक ही व्यवसाय से

28. लेखक ने भारतीय समाज में बेरोज़गारी और भुखमरी का क्या कारण बताया है?
(A) गरीबी
(B) पूँजीवाद
(C) जाति-प्रथा
(D) सांप्रदायिकता
उत्तर:
(C) जाति-प्रथा

29. आंबेडकर ने दूध और पानी के मिश्रण की तुलना किससे की है?
(A) स्वतंत्रता से
(B) समता से
(C) भाईचारे से
(D) सम्पन्नता से
उत्तर:
(C) भाईचारे से

30. लेखक ने काल्पनिक जगत की वस्तु किसे कहा है?
(A) राजनीति को
(B) सिद्धांत को
(C) समता को
(D) जातिवाद को
उत्तर:
(C) समता को

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31. लेखक के अनुसार हिन्दू धर्म की जाति-प्रथा व्यक्ति को कौन-सा पेशा चुनने की अनुमति देती है?
(A) पैतृक पेशा
(B) स्वतंत्र पेशा
(C) कर्मानुसार
(D) कार्य-कुशलता के अनुसार
उत्तर:
(A) पैतृक पेशा

32. कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर करना क्या कहलाता है?
(A) स्वतंत्रता
(B) आज्ञा पालन
(C) दासता
(D) गरीबी
उत्तर:
(C) दासता

33. कौन-सा धर्म व्यक्ति को जाति-प्रथा के अनुसार पैतृक-काम अपनाने को मजबूर करता है?
(A) हिन्दू
(B) मुस्लिम
(C) सिक्ख
(D) ईसाई
उत्तर:
(A) हिन्दू

34. स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित समाज को आंबेडकर ने कैसा समाज कहा है?
(A) अच्छा
(B) महत्त्वपूर्ण
(C) आदर्श
(D) स्वीकार्य
उत्तर:
(C) आदर्श

35. लेखक के अनुसार इस युग में किसके पोषकों की कमी नहीं है?
(A) श्रमवाद
(B) जातिवाद
(C) धर्मवाद
(D) राजनीति
उत्तर:
(B) जातिवाद

36. माता-पिता के आधार पर श्रम विभाजन करना किसकी देन है?
(A) धर्म की
(B) समाज की
(C) जाति-प्रथा की
(D) बेरोज़गारी की
उत्तर:
(C) जाति-प्रथा की

37. आदर्श समाज की विशेषता है
(A) विघटन
(B) अलगाव
(C) गतिशीलता
(D) विद्वेष
उत्तर:
(C) गतिशीलता

38. इस युग में ‘जातिवाद’ क्या है ?
(A) गुण
(B) विडम्बना
(C) श्रेष्ठ व्यवस्था
(D) ईश-विधान
उत्तर:
(B) विडम्बना

39. बाबा साहेब आंबेडकर ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?
(A) स्वतंत्र समाज की
(B) समान समाज की
(C) आदर्श समाज की
(D) गतिशील समाज की
उत्तर:
(C) आदर्श समाज की

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

40. लेखक ने भाईचारे के वास्तविक रूप को किसके मिश्रण की भाँति बताया है?
(A) आटा-नमक
(B) दूध-पानी
(C) दूध-घी
(D) घी-शक्कर
उत्तर:
(B) दूध-पानी

41. लेखक के अनुसार दासता का संबंध किससे नहीं है?
(A) समाज से
(B) कानून से
(C) शिक्षा से
(D) धन से
उत्तर:
(B) कानून से

42. किस क्रांति में ‘समता’ शब्द का नारा लगाया गया था?
(A) रूसी क्रांति में
(B) फ्रांसीसी क्रांति में
(C) जर्मन क्रांति में
(D) जापानी क्रांति में
उत्तर:
(B) फ्रांसीसी क्रांति में

43. बाबा साहेब के अनुसार किसके आधार पर समानता अनुचित है?
(A) वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के
(B) रोज़गार और धन के
(C) जाति और धर्म के
(D) धर्म और शिक्षा के
उत्तर:
(A) वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के

44. जाति-प्रथा के पोषक लोग किन जातियों से संबंधित हैं?
(A) छोटी जातियों से
(B) उच्च जातियों से
(C) राजनेताओं से
(D) धार्मिक नेताओं से
उत्तर:
(B) उच्च जातियों से

45. आर्थिक विकास के लिए जाति-प्रथा का परिणाम कैसा है?
(A) हानिकारक
(B) लाभकारी
(C) उपयोगी
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हानिकारक

46. श्रम के परंपरागत तरीकों में किस कारण से परिवर्तन हो रहा है?
(A) शिक्षा के कारण
(B) गरीबी के कारण
(C) बेरोज़गारी के कारण
(D) आधुनिक तकनीक के कारण
उत्तर:
(D) आधुनिक तकनीक के कारण

47. पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में किसका प्रमुख एवं प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है?
(A) मजदूरी का
(B) बेरोजगारी का
(C) असमानता का
(D) छुआछूत का
उत्तर:
(B) बेरोजगारी का

48. आधुनिक युग में विडम्बना की बात क्या है?
(A) साम्यवाद
(B) जातिवाद
(C) अद्वैतवाद
(D) प्रयोगवाद
उत्तर:
(B) जातिवाद

49. लेखक के अनुसार किस पहलू से जाति-प्रथा हानिकारक प्रथा है?
(A) राजनैतिक
(B) धार्मिक
(C) सामाजिक
(D) आर्थिक
उत्तर:
(D) आर्थिक

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50. जाति-प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक प्रेरणा-रुचि व आत्म-शक्ति को दबाकर उसे क्या बना देती है?
(A) निष्क्रिय
(B) सक्रिय
(C) कर्मशील
(D) गतिशील
उत्तर:
(A) निष्क्रिय

51. आधुनिक सभ्य समाज कार्य-कुशलता के लिए किसे आवश्यक मानता है?
(A) जाति-प्रथा
(B) शिक्षा
(C) श्रम-विभाजन
(D) प्रोत्साहन
उत्तर:
(C) श्रम-विभाजन

52. फ्रांसीसी क्रांति के नारे में कौन-सा शब्द विवाद का विषय रहा है?
(A) राजतंत्र
(B) समता
(C) स्वतंत्रता
(D) श्रम-विभाजन
उत्तर:
(B) समता

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] यह विडंबना की ही बात है, कि इस युग में भी ‘जातिवाद’ के पोषकों की कमी नहीं है। इसके पोषक कई आधारों पर इसका समर्थन करते हैं। समर्थन का एक आधार यह कहा जाता है, कि आधुनिक सभ्य समाज ‘कार्य-कुशलता’ के लिए श्रम विभाजन को आवश्यक मानता है और चूँकि जाति-प्रथा भी श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है इसलिए इसमें कोई बुराई नहीं है। इस तर्क के संबंध में पहली बात तो यही आपत्तिजनक है, कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का भी रूप लिए हुए है। श्रम विभाजन, निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंत किसी भी सभ्य समाज में श्रम विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती। भारत की जाति-प्रथा की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता [पृष्ठ-153]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक,भारतीय संविधान के निर्माता ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। इस गद्यांश में लेखक यह कहना चाहता है कि जाति-प्रथा को श्रम विभाजन से जोड़कर नहीं देखना चाहिए।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि हमारे लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आधुनिक युग में लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं। जातिवाद का समर्थन करने वाले इसके लिए अनेक आधारों को खोजने की कोशिश करते हैं। उनके द्वारा जातिवाद का समर्थन करने का एक आधार यह बताया जाता है कि आज हमारा समाज सभ्य हो चुका है और कार्य-कुशलता के लिए श्रम का विभाजन नितांत आवश्यक है। जहाँ तक जाति-प्रथा का प्रश्न है यह श्रम विभाजन का ही एक अन्य रूप है। अतः जाति-प्रथा में कोई बुराई नज़र नहीं आती। भाव यह है कि जाति-प्रथा का समर्थन करने वाले लोग जाति-प्रथा को श्रम विभाजन से जोड़ने का प्रयास करते हैं। परंतु लेखक ने उनके इस मत के बारे में अनेक विपत्तियाँ उठाई हैं।

उनका कहना है कि जाति-प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक-विभाजन का रूप ले चुकी है। जहाँ तक श्रम विभाजन का प्रश्न है यह सभ्य समाज के लिए नितांत आवश्यक है परंतु संसार के किसी भी सभ्य समाज में श्रम के विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों के भिन्न-भिन्न वर्गों में बनावटी विभाजन नहीं करती। हमारे लिए दुःख की बात है कि जाति-प्रथा को हम श्रम विभाजन का आधार मान चुके हैं। यह समाज के लिए घातक है। भारत में प्रचलित जाति-प्रथा की एक अन्य विशेषता यह है कि यह न केवल श्रमिकों का अस्वाभाविक रूप से विभाजन करती है, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक-दूसरे के मुकाबले में ऊँचा और नीचा घोषित कर देती है। परंतु ऊँच-नीच की यह प्रथा संसार के किसी भी समाज में प्रचलित नहीं है। केवल हमारे देश में ही श्रमिकों को विभिन्न वर्गों में बाँटकर ऊँच-नीच की खाई पैदा कर दी जाती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि हमारे देश में जाति-प्रथा को ही श्रम विभाजन का आधार माना गया है जो कि सर्वथा अनुचित है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक ने किस बात को विडंबना कहा है?
(ग) किस कारण से लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं?
(घ) श्रम विभाजन का क्या अर्थ है?
(ङ) क्या जाति-प्रथा एक बुराई है?
(च) भारत में ऐसी कौन-सी व्यवस्था है जो दूसरे देशों से अलग है?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम–‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’, लेखक का नाम-बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर ।

(ख) लेखक ने इस बात को विडंबना कहा है कि आज के वैज्ञानिक युग में हमारे देश में जातिवाद का समर्थन करने वालों की कमी नहीं है। वे लोग कार्य-कुशलता के लिए जाति-प्रथा को आवश्यक मानते हैं।

(ग) लोगों का विचार है कि कार्य-कुशलता के लिए जातिवाद आवश्यक है। उनका कहना है कि जातियाँ कर्म के आधार पर बनाई गई हैं और ये कर्म का विभाजन करती हैं। अतः श्रम विभाजन के लिए जाति-प्रथा आवश्यक है।

(घ) श्रम विभाजन का अर्थ है-मानव के लिए उपयोगी कामों का वर्गीकरण करना अर्थात प्रत्येक काम को कशलता से करने के लिए काम-धंधों का विभाजन करना । जैसे कोई खेती करता है, मजदूरी करता है, कोई फैक्ट्री चलाता है, कोई चिकित्सा करता है।

(ङ) निश्चय ही जाति-प्रथा एक बुराई है क्योंकि यह श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिकों का भी विभाजन करती है। जाति-प्रथा मानव को जन्म से ही किसी व्यवसाय से जोड़ देती है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि मानव अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पाता। यह इसलिए भी बुराई है क्योंकि इससे समाज में ऊँच-नीच का भेद-भाव उत्पन्न हो जाता है।

(च) जन्म के आधार पर काम-धंधा तय करना, केवल भारत में ही प्रचलित है। यह व्यवस्था ऊँच-नीच को जन्म देती है। भारत के अतिरिक्त यह पूरे संसार में कहीं भी प्रचलित नहीं है।

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[2] जाति-प्रथा पेशे का दोषपूर्ण पूर्वनिर्धारण ही नहीं करती बल्कि मनुष्य को जीवन-भर के लिए एक पेशे में बाँध भी देती है। भले ही पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त होने के कारण वह भूखों मर जाए। आधुनिक युग में यह स्थिति प्रायः आती है, क्योंकि उद्योग-धंधों की प्रक्रिया व एकनीक में निरंतर विकास और कभी-कभी अकस्मात परिवर्तन हो जाता है, जिसके कारण मनुष्य को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है और यदि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना पेशा बदलने की स्वतंत्रता न हो, तो इसके लिए भूखों मरने के अलावा क्या चारा रह जाता है? हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है, जो उसका पैतृक पेशा न हो, भले ही वह उसमें पारंगत हो। इस प्रकार पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति-प्रथा भारत में बेरोजगारी का एक प्रमुख व प्रत्यक्ष कारण बनी हुई है। [पृष्ठ-153-154]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि जाति-प्रथा मानव को जीवन भर के लिए एक ही पेशे से बाँध देती है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि जाति-प्रथा मनुष्य के पेशे का दोषपूर्ण निर्धारण पहले से ही निश्चित कर देती है और वह आजीवन उस पेशे से बँध जाता है। भले ही वह पेशा उसके लिए उचित न हो, पर्याप्त न हो। यह भी संभव है कि वह व्यक्ति उस पेशे के कारण भूखा मर जाए। आज के युग में यह स्थिति अकसर देखी जाती है। कारण यह है कि देश में उद्योग-धंधों और तकनीक का या तो लगातार विकास होता रहता है अथवा कभी उसमें अचानक बदलाव आ जाता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को मजबूर होकर अपना पेशा बदलना पड़ता है। इसके विपरीत हालातों में भी मनुष्य को अपना व्यवसाय बदलने की आज़ादी न हो तो उसके पास भूखा मरने की बजाय कोई अन्य रास्ता नहीं रह जाता। हिंदू धर्म में जाति-प्रथा का बोल-बाला है। किसी भी आदमी को ऐसा पेशा चुनने की आजादी नहीं दी जाती जो उसे पिता से प्राप्त न हुआ हो। भले ही वह उस पेशे में कितना भी प्रवीण क्यों न हो फिर भी वह उस पेशे को नहीं अपना सकता। जब जाति-प्रथा व्यक्ति को पेशा बदलने की आज्ञा नहीं देती तो भारत में बेरोजगारी तो बढ़ेगी ही। अतः जाति-प्रथा भारत में बढ़ती बेरोज़गारी का एक प्रमुख कारण है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने जाति-प्रथा की आलोचना इसलिए की है क्योंकि वह व्यक्ति को एक पेशे से बाँध देती है।
  2. जाति-प्रथा बेरोज़गारी फैलाने का एक प्रमुख कारण है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जाति-प्रथा में लेखक को क्या दोष दिखाई देता है?
(ख) मानव को अपना पेशा बदलने की आवश्यकता कब और क्यों पड़ती है?
(ग) पेशा बदलने की आज़ादी न मिलने के क्या परिणाम होते हैं?
(घ) कौन-सा धर्म मनुष्य को पैतृक पेशे के अतिरिक्त अन्य किसी पेशे को चुनने की आज़ादी नहीं देता?
(ङ) जाति-प्रथा बेरोजगारी का प्रमुख कारण कैसे है?
उत्तर:
(क) जाति-प्रथा में लेखक को अनेक दोष दिखाई देते हैं। पहली बात यह है कि जाति-प्रथा जन्म से मनुष्य के पेशे को निर्धारित कर देती है और वह जीवन-भर उस पेशे से बँध जाता है। यदि पेशा अनुपयुक्त या अपर्याप्त हो तो मनुष्य भूखा भी मर सकता है।

(ख) जब उद्योग-धंधों की प्रक्रिया या तकनीक में अचानक परिवर्तन आ जाए या उसका विकास अवरुद्ध हो जाए तो मनुष्य को अपना पेशा बदलना पड़ सकता है।

(ग) यदि मनुष्य को पेशा बदलने की आज़ादी न हो और उसके पेशे की माँग में कमी आ जाए तो उसे भूखा मरना पड़ सकता है।

(घ) हिंदू धर्म की जाति-प्रथा किसी मनुष्य को ऐसा पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती जो उसका पैतृक पेशा न हो। यह व्यवस्था सर्वथा अनुचित है।

(ङ) भारत में जाति-प्रथा मनुष्य को पेशा परिवर्तन की अनुमति नहीं देती। अतः यह जाति-प्रथा बेरोज़गारी को बढ़ावा देती है और यह बेरोज़गारी का प्रमुख कारण भी है।

[3] श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति-प्रथा गंभीर दोषों से युक्त है। जाति-प्रथा का श्रम विभाजन मनुष्य की स्वेच्छा पर निर्भर नहीं रहता। मनुष्य की व्यक्तिगत भावना तथा व्यक्तिगत रुचि का इसमें कोई स्थान अथवा महत्त्व नहीं रहता। ‘पूर्व लेख’ ही इसका आधार है। इस आधार पर हमें यह स्वीकार करना पड़ेगा कि आज के उद्योगों में गरीबी और उत्पीड़न इतनी बड़ी समस्या नहीं जितनी यह कि बहुत से लोग ‘निर्धारित’ कार्य को ‘अरुचि’ के साथ केवल विवशतावश करते हैं। ऐसी स्थिति स्वभावतः मनुष्य को दुर्भावना से ग्रस्त रहकर टालू काम करने के लिए प्रेरित करती है। ऐसी स्थिति में जहाँ काम करने वालों का न दिल लगता हो न दिमाग, कोई कुशलता कैसे प्राप्त की जा सकती है। [पृष्ठ-154]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से अवतरित है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा में अनेक दोष देखे जा सकते हैं क्योंकि जाति-प्रथा के द्वारा बनाया गया श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा व रुचि को नहीं देखता।

व्याख्या-लेखक पुनः कहता है कि जहाँ तक श्रम विभाजन का प्रश्न है, इसकी दृष्टि से भी जाति-प्रथा में अनेक गंभीर दोष देखे जा सकते हैं। जाति-प्रथा जो श्रम का विभाजन करती है, उसमें मनुष्य की इच्छा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। मनुष्य के अपने निजी विचार क्या हैं; उसकी अपनी रुचि किस काम में है? इसके बारे में जाति-प्रथा में किया गया श्रम विभाजन कुछ नहीं करता। भाव यह है कि मनुष्य की व्यक्तिगत भावनाओं और रुचियों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता, बल्कि जाति-प्रथा पूर्व जन्म य में लिखे हए को अधिक महत्त्व देती है। लेखक पनः कहता है कि आज हमारे देश में उद्योगों में गरीबी और शोषण इतनी गंभीर समस्या नहीं है जितनी कि अनेक लोगों को मजबूर होकर ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनमें उनकी रुचि नहीं है और ये काम समाज द्वारा निर्धारित किए जाते हैं।

इन हालातों में मनुष्य में बुरी भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। वह या तो टाल-मटोल करता है या बहुत कम काम,करता है। इन हालातों में काम करने वालों का न तो उस काम में दिल लगता है और न ही वे दिमाग लगाकर काम करते हैं। अतः वे अपने काम में प्रवीणता प्राप्त नहीं कर सकते। इसमें दो मत नहीं हो सकते कि जाति-प्रथा आर्थिक दृष्टि से समाज के लिए घातक है। कारण यह है कि जाति-प्रथा मनुष्य की स्वाभाविक बढ़ावा देने वाली रुचि और अंदर की शक्ति को दबा देती है और मानव अस्वाभाविक नियमों में बँध जाता है और वह बेकार हो जाता है। अतः जाति-प्रथा समाज के लिए सबसे बड़ी हानिकारक प्रथा है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा को दोषयुक्त घोषित किया है। क्योंकि जाति-प्रथा मनुष्य की व्यक्तिगत भावना और व्यक्तिगत रुचि को कोई महत्त्व नहीं देती।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक ने श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा को दोषपूर्ण क्यों माना है?
(ख) पूर्व लेख के आधार पर श्रम विभाजन का तात्पर्य क्या है?
(ग) लेखक के अनुसार श्रम के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या कौन-सी है?
(घ) कार्य निर्धारित होने के दुष्परिणाम क्या हैं?
(ङ) कार्य-कुशलता कैसे बढ़ायी जा सकती है?
(च) क्या आर्थिक दृष्टि से जाति-प्रथा हानिकारक है?
उत्तर:
(क) श्रम विभाजन की दृष्टि से जाति-प्रथा निश्चय से दोषपूर्ण है। पहली बात तो यह है कि मनुष्य की इच्छा और रुचि को न देखकर पूर्व लेख के आधार पर उसके पेशे को निर्धारित करती है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि मनुष्य इस काम में कोई रुचि नहीं लेता और काम को अनावश्यक बोझ समझता है।

(ख) पूर्व लेख के आधार पर श्रम विभाजन का अभिप्राय है कि जन्म के आधार पर मनुष्य के पेशे का निर्णय करना अर्थात् यह सोचना कि मनुष्य को पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर ही प्रतिफल मिलना चाहिए।

(ग) श्रम के क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोगों को अपनी इच्छा व रुचि के अनुसार काम नहीं दिया जाता। उन्हें मजबूर होकर वह काम करना पड़ता है जो वे नहीं करना चाहते। इससे काम की उत्पादक शक्ति घट जाती है।

(घ) कार्य निर्धारित होने का सबसे बुरा परिणाम यह होता है कि श्रमिक काम में रुचि नहीं लेता। वह काम को बोझ समझता है इसलिए काम के प्रति उसके मन में दुर्भावना उत्पन्न हो जाती है। वह टाल-मटोल की नीति को अपनाता है तथा दिल-दिमाग से उस काम को नहीं करता।

(ङ) कार्य-कुशलता को बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक मनुष्य को उसकी रुचि के अनुसार काम दिया जाए बल्कि उसे अपनी इच्छा से व्यवसाय ढूँढने का मौका दिया जाए।

(च) आर्थिक दृष्टि से जाति-प्रथा अत्यधिक हानिकारक है। इस प्रथा के फलस्वरूप लोगों को पैतृक काम-धंधा करना पड़ता है जिसमें उनकी रुचि नहीं होती। वे दिल और दिमाग से उस काम को नहीं करते, जिससे न तो कार्य में कुशलता आ सकती है और न ही उत्पादकता बढ़ सकती है।

[4] मेरा आदर्श-समाज स्वतंत्रता, समता, भ्रातृता पर आधारित होगा। क्या यह ठीक नहीं है, भ्रातृता अर्थात भाईचारे में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? किसी भी आदर्श-समाज में इतनी गतिशीलता होनी चाहिए जिससे कोई भी वांछित परिवर्तन समाज के एक छोर से दूसरे तक संचारित हो सके। ऐसे समाज के बहुविधि हितों में सबका भाग होना चाहिए तथा सबको उनकी रक्षा के प्रति सजग रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में अबाध संपर्क के अनेक साधन व अवसर उपलब्ध रहने चाहिए। तात्पर्य यह है कि दूध-पानी के मिश्रण की तरह भाईचारे का यही वास्तविक रूप है और इसी का दूसरा नाम लोकतंत्र है। क्योंकि लोकतंत्र केवल शासन की एक पद्धति ही नहीं है, लोकतंत्र मूलतः सामूहिक जीवनचर्या की एक रीति तथा समाज के सम्मिलित अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम है। इनमें यह आवश्यक है कि अपने साथियों के प्रति श्रद्धा व सम्मान का भाव हो। [पृष्ठ-154-155]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। इस लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता तथा बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। इस गद्यांश में लेखक ने आदर्श समाज की चर्चा की है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि मेरा आदर्श समाज ऐसा होगा जिसमें स्वतंत्रता, समानता और आपसी भाई-चारा होगा। लेखक का विचार है कि भाई-चारे में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह कुछ सीमा तक उचित भी है। आदर्श समाज में इतनी अधिक गतिशीलता होनी चाहिए ताकि उसमें आवश्यक परिवर्तन समाज के एक किनारे से दूसरे किनारे तक व्याप्त हो सके अर्थात् गतिशीलता से ही समाज में परिवर्तन आता है। इस प्रकार के आदर्श समाज के अनेक प्रकार के लाभों में सबको योगदान देना चाहिए। सभी को उन लाभों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। सामाजिक जीवन में बिना किसी बाधा के आपसी संबंध होने चाहिएँ।

इसके लिए सभी को साधन और अवसर प्राप्त होने चाहिएँ। भाव यह है कि भाईचारा दूध और पानी की तरह होना चाहिए। सच्चा भाईचारा ऐसा ही होता है। इसे हम लोकतंत्र भी कहते हैं। लेखक का कहना है कि लोकतंत्र शासन की एक व्यवस्था नहीं है, बल्कि लोकतंत्र सामाजिक जीवन जीने की एक पद्धति है और समाज के सभी अनुभवों के आदान-प्रदान का तरीका है। परंतु इसमें यह भी जरूरी है कि इसमें लोगों की अपने मित्रों के प्रति श्रद्धा और आदर की भावना भी उत्पन्न हो। नहीं तो भाईचारा सफल नहीं हो पाएगा और न ही लोकतंत्र।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने आदर्श समाज की व्याख्या करते हुए भाईचारे की भावना को विकसित करने पर बल दिया है।
  2. लेखक ने लोकतंत्र पर समुचित प्रकाश डाला है।
  3. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक ने किस समाज को आदर्श समाज माना है?
(ख) लेखक ने समाज में किस प्रकार के भाईचारे का समर्थन किया है?
(ग) लेखक ने लोकतंत्र की क्या परिभाषा बताई है?
(घ) समाज में किस प्रकार की गतिशीलता की बात की गई है?
(ङ) गतिशीलता, अबाध संपर्क तथा दूध-पानी के मिश्रण में कौन-सी समानता है?
उत्तर:
(क) लेखक ने उस समाज को आदर्श माना है जिसमें स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा हो। उसमें इस प्रकार की गतिशीलता होनी चाहिए कि सभी आवश्यक परिवर्तन संपूर्ण समाज में व्याप्त हो जाएँ।

(ख) लेखक समाज में इस प्रकार का भाईचारा चाहता है जिसमें लोगों के बीच बिना बाधा के संपर्क हो। उस भाईचारे में न तो कोई बंधन हो, न जड़ता और न ही रूढ़िवादिता, बल्कि गतिशीलता होनी चाहिए। जैसे दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं वैसे लोगों को मिलकर एक हो जाना चाहिए।

(ग) लेखक भाईचारे का दूसरा नाम लोकतंत्र को मानता है। उसका विचार है कि लोकतंत्र केवल शासन पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवन जीने का ढंग है। सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें लोग परस्पर अनुभवों का आदान-प्रदान करते हैं और दूसरे का उचित सम्मान करते हैं।

(घ) लेखक ने समाज में गतिशीलता का मत यह लिया है कि लोगों में परस्पर निर्बाध संपर्क हो, सहभागिता हो और सबकी रक्षा करने की जागरूकता हो। लोग दूध-पानी के समान मिले हुए हों और एक-दूसरे के प्रति श्रद्धा तथा सम्मान का भाव रखते हों।

(ङ) गतिशीलता, अबाध संपर्क तथा दूध-पानी के मिश्रण में सबसे बड़ी समानता यह है कि लोगों में उदारतापूर्वक मेल-मिलाप हो। जिस प्रकार दूध और पानी मिलकर एक हो जाते हैं उसी प्रकार लोग जाति-पाँति के बंधनों को त्यागकर गतिशील रहते हुए परस्पर संपर्क करें और एक-दूसरे का सम्मान करें।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

[5] जाति-प्रथा के पोषक, जीवन, शारीरिक-सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मनुष्य के सक्षम एवं प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए जल्दी तैयार नहीं होंगे, क्योंकि इस प्रकार की स्वतंत्रता का अर्थ होगा अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता किसी को नहीं है, तो उसका अर्थ उसे ‘दासता’ में जकड़कर रखना होगा, क्योंकि ‘दासता’ केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। ‘दासता’ में वह स्थिति भी सम्मिलित है जिससे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है। उदाहरणार्थ, जाति-प्रथा की तरह ऐसे वर्ग होना संभव है, जहाँ कुछ लोगों की अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं। [पृष्ठ-155]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से अवतरित है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता, बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक कहता है कि जाति-प्रथा के पोषक जीवन, शारीरिक सुरक्षा और संपत्ति के अधिकार को तो स्वीकार कर लेंगे, परंतु मानव की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करेंगे।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि जो लोग जाति-प्रथा का समर्थन करते हैं, वे जीवन की शारीरिक-सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लेंगे। इस प्रवृत्ति के प्रति उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी, लेकिन मानव के समर्थ तथा प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के लिए वे आसानी से तैयार नहीं होंगे अर्थात् जाति-प्रथा के पोषक यह कदापि नहीं मानेंगे कि प्रत्येक व्यक्ति को मानव समझकर उसे स्वतंत्रता का प्रभावशाली प्रयोग करने दिया जाए। कारण यह है कि इस प्रकार की स्वतंत्रता का मतलब यह है कि अपना व्यवसाय चुनने की आजादी किसी को नहीं है, बल्कि इसका मतलब है समाज के छोटे वर्ग को गुलामी में जकड़कर रखना।

लेखक का कथन है कि केवल कानूनी पराधीनता को दासता नहीं कहा जा सकता । दासता में वो स्थिति भी शामिल है जिसमें कुछ लोगों को अन्य लोगों के द्वारा निश्चित किए गए व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। भाव यह है कि समाज का उच्च वर्ग निम्न वर्ग के लिए व्यवहार को निर्धारित करने और कुछ कार्यों का पालन करने के लिए मजबूर करे तो यह भी दासता ही कही जाएगी। समाज में इस प्रकार की स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी समाज में उपलब्ध हो सकती है।।

उदाहरण के रूप में जाति-प्रथा के समाज में लोगों का ऐसा वर्ग भी हो सकता है जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे को अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने दासता अर्थात गुलामी की विभिन्न स्थितियों का गंभीर विवेचन किया है और जाति-प्रथा का खंडन – किया है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले क्या स्वीकार करते हैं और क्या अस्वीकार करते हैं?
(ख) दासता का क्या अर्थ है?
(ग) कानूनी पराधीनता न होने पर भी लोगों को इच्छा के विरुद्ध पेशे क्यों अपनाने पड़ते हैं?
(घ) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग किस स्वतंत्रता का विरोध करते हैं और क्यों?
उत्तर:
(क) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग शारीरिक सुरक्षा तथा संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को तो स्वीकार कर लेते हैं, परंतु मनुष्य के सक्षम और प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं करते।

(ख) कुछ लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए मजबूर करना ही दासता कहलाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि जाति-प्रथा के आधार पर जो कर्त्तव्य लोगों के निर्धारित किए जाते हैं वे दासता के ही लक्षण हैं।

(ग) जाति-प्रथा के कारण समाज में कुछ ऐसे वर्ग भी हैं जिन्हें अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशे अपनाने पड़ते हैं, परंतु यह कानूनी पराधीनता न होकर भी सामाजिक पराधीनता तो अवश्य है। उदाहरण के रूप में सफाई कर्मचारियों को सफाई का काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्हें कोई और काम नहीं दिया जाता।

(घ) जाति-प्रथा का पोषण करने वाले लोग मानव को पेशा (व्यवसाय) चुनने की स्वतंत्रता देने के विरुद्ध हैं। विशेषकर उच्च जाति के लोग इसका निरंतर विरोध करते रहते हैं। वे स्वयं तो ऊँचे कार्य करना चाहते हैं और समाज में श्रेष्ठ कहलाना चाहते हैं, परंतु छोटी जातियों को ऊपर उठने का अवसर प्रदान नहीं करते।

[6] ‘समता’ का औचित्य यहीं पर समाप्त नहीं होता। इसका और भी आधार उपलब्ध है। एक राजनीतिज्ञ पुरुष का बहुत बड़ी जनसंख्या से पाला पड़ता है। अपनी जनता से व्यवहार करते समय, राजनीतिज्ञ के पास न तो इतना समय होता है न प्रत्येक के विषय में इतनी जानकारी ही होती है, जिससे वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं तथा क्षमताओं के आधार पर वांछित व्यवहार अलग-अलग कर सके। वैसे भी आवश्यकताओं और क्षमताओं के आधार भिन्न व्यवहार कितना भी आवश्यक तथा औचित्यपूर्ण क्यों न हो, ‘मानवता’ के दृष्टिकोण से समाज दो वर्गों व श्रेणियों में नहीं बाँटा जा सकता। ऐसी स्थिति में, राजनीतिज्ञ को अपने व्यवहार में एक व्यवहार्य सिद्धांत की आवश्यकता रहती है और यह व्यवहार्य सिद्धांत यही होता है, कि सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार किया जाए। राजनीतिज्ञ यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सब लोग समान होते, बल्कि इसलिए कि वर्गीकरण एवं श्रेणीकरण संभव होता। [पृष्ठ-156]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ में से उद्धृत है। इसके लेखक भारतीय संविधान के निर्माता डॉ० भीमराव आंबेडकर हैं। प्रस्तुत लेख में लेखक ने जाति-प्रथा जैसे महत्त्वपूर्ण विषय को स्वतंत्रता, समता, बंधुता से जोड़कर देखने का प्रयास किया है। यहाँ लेखक ने समता के औचित्य पर समुचित प्रकाश डाला है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि समता का औचित्य बहुत व्यापक है। यह यहीं पर समाप्त नहीं हो जाता। इसके अन्य आधार भी देखे जा सकते हैं। एक राजनेता को असंख्य लोगों से मिलना पड़ता है। अपने हलके के लोगों से मिलते समय, व्यवहार करते समय.उसके पास इतना अधिक समय नहीं होता कि वह प्रत्येक व्यक्ति के विषय की जानकारी प्राप्त करे। न ही वह सबकी अलग-अलग आवश्यकताओं और क्षमताओं को जान सकता है और न ही सबके साथ अलग-अलग आवश्यक व्यवहार कर सकता है। यदि गहराई से देखा जाए तो लोगों की आवश्यकताओं और क्षमताओं को आधार बनाकर भिन्न-भिन्न व्यवहार करना उचित नहीं हो सकता क्योंकि ऐसा करने से हम मानवता की दृष्टि से समाज को दो वर्गों तथा श्रेणियों में विभक्त कर देंगे जोकि किसी भी प्रकार से सही नहीं कहा जा सकता।

ऐसी स्थिति में राजनेता को अपने व्यवहार में एक ऐसे सिद्धांत को अपनाना होता है जो सबके लिए उपयोगी और व्यवहार्य हो और वह सिद्धांत यही है कि एक क्षेत्र के सभी लोगों के साथ एक-सा व्यवहार किया जाए। राजनेता यह व्यवहार इसलिए नहीं करता कि सभी लोग समान होते हैं, बल्कि इसलिए करता है कि उसके लिए लोगों का वर्गीकरण तथा श्रेणीकरण संभव होता है। लेखक के कहने का भाव यह है कि राजनेता को अपने सभी मतदाताओं के साथ एक-सा व्यवहार करना चाहिए, उसे किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करना चाहिए।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने समता के औचित्य पर विशेष बल दिया है।
  2. लेखक ने सिद्धांत और व्यवहार को व्यवहार्य कहा है।
  3. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) समता के कौन-से औचित्य पर बल दिया गया है?
(ख) राजनीतिज्ञ को सबके साथ समान व्यवहार क्यों करना पड़ता है?
(ग) लेखक ने किस सिद्धांत और व्यवहार को व्यवहार्य कहा है?
(घ) राजनीतिज्ञ सब मनुष्यों के साथ एक समान व्यवहार क्यों नहीं कर पाता?
उत्तर:
(क) समता के औचित्य पर बल देने से लेखक का अभिप्राय यह है कि असंख्य लोगों की अलग-अलग आवश्यकताओं को जानकर उनके साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता। अतः मनुष्य को सबके साथ एक-समान व्यवहार करना चाहिए।

(ख) राजनीतिज्ञ को सबके साथ इसलिए समान व्यवहार करना पड़ता है क्योंकि उसका संपर्क असंख्य लोगों के साथ होता है। उसके लिए सबकी क्षमताओं और आवश्यकताओं को जान पाना संभव नहीं है। इसलिए उसे मजबूर होकर सबके साथ एक-जैसा व्यवहार करना पड़ता है।

(ग) सब मनुष्यों के साथ समान व्यवहार को ही लेखक ने व्यवहार्य कहा है क्योंकि इस सिद्धांत के द्वारा वह सबके साथ एक जैसा व्यवहार कर सकता है।

(घ) राजनीतिज्ञ सबके साथ एक-समान व्यवहार इसलिए नहीं कर पाता क्योंकि सभी लोग समान नहीं होते, बल्कि उनमें वर्गीकरण और श्रेणीकरण की संभावना बनी रहती है।

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज Summary in Hindi

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज लेखिका-परिचय

प्रश्न-
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-डॉ० भीमराव का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्यप्रदेश के महू ज़िले में हुआ। आरंभिक शिक्षा उन्होंने भारत में प्राप्त की। क्योंकि उनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार में हुआ था, इसलिए उन्हें आजीवन हिंदू धर्म की वर्ण-व्यवस्था तथा भारतीय समाज की जाति व्यवस्था के विरुद्ध लंबा संघर्ष करना पड़ा। बड़ौदा नरेश के प्रोत्साहन पर वे पहले उच्चतर शिक्षा के लिए न्यूयार्क गए। बाद में लंदन चले गए। उन्होंने वैदिक साहित्य को अनुवाद के माध्यम से पढ़ा और सामाजिक क्षेत्र में मौलिक कार्य किया। परिणामस्वरूप वे एक इतिहास-मीमांसक, विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, शिक्षाविद् तथा धर्म-दर्शन के व्याख्याता बनकर उभरे। कुछ समय तक उन्होंने अपने देश में वकालत की और अछूतों, स्त्रियों तथा मजदूरों को मानवीय अधिकार तथा सम्मान दिलाने के लिए लंबा संघर्ष किया। स्वयं दलित होने के कारण उन्हें सामाजिक समता पाने के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ा। भारत लौटकर उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र व राजनीति विज्ञान में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय और लंदन स्कूल ऑफ़ इक्नॉमिक्स से अनेक डिग्रियाँ भी प्राप्त की।

डॉ० आंबेडकर ने अपने चिंतन तथा रचनात्मकता के लिए बुद्ध एवं कबीर से प्रेरणा प्राप्त की। जातिवाद से संघर्ष करते हुए उनका हिंदू समाज से मोह-भंग हो गया। अतः 14 अक्तूबर, 1956 को अपने पाँच लाख अनुयायियों के साथ वे बौद्ध धर्म के मतानुयायी बन गए। वे भारतीय संविधान के निर्माता थे। यही कारण है कि उनको ‘भारत रत्न’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। 6 दिसंबर, 1956 को दिल्ली में इस महान समाजशास्त्री का देहांत हो गया।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 18 श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज

2. प्रमुख रचनाएँ-‘दें कास्ट्स इन इंडिया’, ‘देयर मेकेनिज्म’, ‘जेनेसिस एंड डेवलपमेंट’ (1917, प्रथम प्रकाशित कृति), ‘द अनटचेबल्स’, ‘हू आर दे?’ (1948), ‘हू आर द शूद्राज़’ (1946), ‘बुद्धा एंड हिज़ धम्मा’ (1957), ‘थाट्स ऑन लिंग्युस्टिक स्टेट्स’ (1955), ‘द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी’ (1923), ‘द एबोलुशन ऑफ़ प्रोविंशियल फायनांस इन ब्रिटिश इंडिया’ (पीएच.डी. की थीसिस, 1916), ‘द राइज़ एंड फॉल ऑफ़ द हिंदू वीमैन’ (1965), ‘एनीहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ (1936), ‘लेबर एंड पार्लियामेंट्री डैमोक्रेसी’ (1943), ‘बुद्धिज्म एंड कम्युनिज्म’ (1956), (पुस्तकें व भाषण) ‘मूक नायक’, ‘बहिष्कृत भारत’, ‘जनता’ (पत्रिका-संपादन), हिंदी में उनका संपूर्ण वाङ्मय भारत सरकार के कल्याण मंत्रालय से बाबा साहब आंबेडकर संपूर्ण वाङ्मय नाम से 21 खंडों में प्रकाशित हो चुका है।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-डॉ० भीमराव आंबेडकर लोकतंत्रीय शासन-व्यवस्था के प्रबल समर्थक थे। उन्होंने अपने साहित्य के द्वारा भारतीय समाज में व्याप्त जाति-प्रथा तथा छुआछूत का उन्मूलन करने का भरसक प्रयास किया। यही नहीं, उन्होंने जाति-प्रथा का विरोध करते हुए समाज में व्याप्त शोषण का भी विरोध किया। अछूतों के प्रति उनके मन में अत्यधिक सहानुभूति की भावना थी। वे आजीवन समाज के निचले तबके के लोगों के हक के लिए संघर्ष करते रहे।

महात्मा बुद्ध, संत कबीर और ज्योतिबा फुले ने उनकी विचारधारा को अत्यधिक प्रभावित किया। वस्तुतः वे इस प्रकार के लोकतंत्र की स्थापना करना चाहते थे जिसमें न तो जाति-पाँति का भेदभाव हो और न ही कोई छोटा-बड़ा हो, बल्कि सभी समान हों। यही कारण है कि उन्होंने अपनी रचनाओं में समकालीन समाज की विसंगतियों, विडंबनाओं, छुआछूत, जाति-प्रथा का यथार्थ वर्णन किया। प्रस्तुत निबंध ‘श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा’ उनकी निबंध-कला का श्रेष्ठ उदाहरण है जिसमें उन्होंने जाति-प्रथा जैसे विषय को स्वतंत्रता, समता और भाईचारे से जोड़कर देखने का प्रयास किया है।

4. भाषा-शैली-डॉ० आंबेडकर ने अंग्रेज़ी तथा हिंदी दोनों भाषाओं में उच्चकोटि के साहित्य का निर्माण किया है। जहाँ तक हिंदी भाषा का प्रश्न है उसमें उन्होंने तत्सम एवं तद्भव शब्दों के अतिरिक्त उर्दू, फारसी तथा अंग्रेज़ी के शब्दों का भी सुंदर मिश्रण किया है। उनकी भाषा सहज, सरल तथा बोधगम्य है। जहाँ कहीं वे गंभीर विषय का वर्णन करते हैं, वहाँ उनकी भाषा भी गंभीर बन जाती है। शब्द-चयन एवं वाक्य-विन्यास पूर्णतया भावानुकूल तथा प्रसंगानुकूल है। उन्होंने प्रायः विचारात्मक, वर्णनात्मक, चित्रात्मक तथा व्यंग्यात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। जहाँ कहीं वे सामाजिक विसंगतियों का खंडन करते हैं, वहाँ उनका व्यंग्य तीखा और चुभने वाला बन गया है।

श्रम-विभाजन और जाति-प्रथा, मेरी कल्पना का आदर्श समाज पाठ का सार

प्रश्न-
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर द्वारा रचित ‘श्रम विभाजन और जाति-प्रथा’ नामक पाठ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ जातिवाद के आधार पर की जाने वाली असमानता का वर्णन है। बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर अनेक तर्क देकर इस जातिवाद का विरोध करते हैं। आधुनिक युग में भी अनेक लोग जातिवाद का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि कार्य-कुशलता के आधार पर श्रम-विभाजन जरूरी है। परंतु दुःख इस बात का है कि जातिवाद श्रम-विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन भी करता है जो कि लेखक को स्वीकार्य नहीं है। किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाजन तो होना चाहिए, परंतु भारत में जाति-प्रथा का प्रचलन श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन करता है और वर्गभेद के कारण लोगों को ऊँच-नीच घोषित करता है। यदि हम जाति-प्रथा को श्रम-विभाजन का कारण मान लें तो भी यह मानव की रुचि पर आधारित नहीं है। एक विकसित और सक्षम समाज को व्यक्तियों को अपनी-अपनी रुचि के अनुसार व्यवसाय चुनने के योग्य बनाना चाहिए परंतु हमारे समाज में ऐसा नहीं हो रहा। लोग आज भी जाति-प्रथा में विश्वास रखते हैं और जाति के आधार पर मनुष्य को माता-पिता के सामाजिक स्तर पर पेशा अपनाने के लिए मजबूर करते हैं जो कि गलत है।

बसे बडा दोष यह है कि यह लोगों को एक पेशे से जोड देती है। इसके कारण यदि किसी उद्योग-धंधे में तकनीकी विकास के कारण परिवर्तन हो जाता है तो लोगों को भूखा मरना पड़ता है समाज में पेशा न बदलने के कारण बेरोज़गारी की समस्या उत्पन्न होती है। जाति-प्रथा के आधार पर जो श्रम-विभाजन किया जाता है, वह स्वेच्छा पर निर्भर नहीं होता। न ही इसमें व्यक्ति की रुचि को देखा जाता है, बल्कि माता-पिता के सामाजिक स्तर और पूर्व लेख को महत्त्व दिया जाता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि लोगों को मजबूर होकर वे काम करने पड़ते हैं जिनमें उनकी रुचि नहीं होती। ऐसे लोगों में टालू मानसिकता उत्पन्न हो जाती है। जो काम उनकी रुचि के अनुसार नहीं होता उसमें उनका दिल-दिमाग नहीं लगता। इसलिए हम कह सकते हैं कि जाति-प्रथा मनुष्य की प्रेरणा, रुचि को दबाती है और उन्हें निष्क्रिय बनाती है।

बाबा साहेब एक आदर्श समाज की कल्पना करते हैं। वे ऐसा समाज विकसित करना चाहते हैं जिसमें स्वतंत्रता, समता तथा भ्रातृभाव हो। भ्रातभाव में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। हमारा समाज गतिशील होना चाहिए ताकि वांछित परिवर्तन समाज में तत्काल व्याप्त हो जाएँ। इस प्रकार के समाज में सभी लोगों का सभी कार्यों में समभाग होना चाहिए। ऐसा होने पर सब सबके प्रति सजग होंगे और सबको सामाजिक साधन और अवसर प्राप्त होंगे। लेखक का कहना है कि भाईचारा दूध और पानी की तरह मिला होना चाहिए। इसी को वे लोकतंत्र का नाम देते हैं। उनका विचार है कि लोकतंत्र शासन की पद्धति नहीं है, बल्कि सामूहिक जीवनचर्या और अनुभवों के आदान-प्रदान का नाम ही लोकतंत्र है। इसमें अपने साथी मनुष्यों के प्रति सम्मान तथा श्रद्धा की भावना होनी चाहिए।

यह आदान-प्रदान जीवन और शारीरिक सुरक्षा का विरोध नहीं करता। हम संपत्ति अर्जित कर सकते हैं, आजीविका के लिए औजार बना सकते हैं तथा घर के लिए जरूरी सामान रख सकते हैं। इस अधिकार पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। दुःख इस बात का है कि मानव को सुखी बनाने के लिए प्रभावशाली प्रयोग की स्वतंत्रता देने के अधिकार के लिए सभी लोग तैयार नहीं होते। क्योंकि इसी के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता मिल जाती है। यदि यह स्वतंत्रता नहीं मिलती तो मनुष्य अभावों के कारण दास बन जाता है। दासता का संबंध कानून से नहीं है। यदि मनुष्य को दूसरों द्वारा निर्धारित व्यवहार तथा कर्तव्यों का पालन करना पड़े तो वह भी दासता कही जाएगी। जाति-प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह है कि मनुष्य को अपनी इच्छा के विरुद्ध पेशा अपनाना पड़ता है।

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फ्रांसीसी क्रांति में ‘समता’ शब्द का नारा लगाया गया था। परंतु यह शब्द काफी विवादास्पद रहा है। जो लोग समता की आलोचना करते हैं कि सभी मनुष्य एक-समान नहीं होते भले ही यह एक सच्चाई है, परंतु यह महत्त्वपूर्ण नहीं है। समता भले ही असंभव सिद्धांत है, लेकिन यह एक नियामक सिद्धांत भी है। मनुष्य की क्षमता शारीरिक वंश-परंपरा, सामाजिक उत्तराधिकार तथा मनुष्य के अपने प्रयत्नों पर निर्भर है। इन तीनों दृष्टियों से मनुष्य समान नहीं होते। यदि ऐसी स्थिति है तो भी समाज को ऐसे लोगों के साथ असमान व्यवहार नहीं करना चाहिए, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता विकसित करने के लिए नए प्रयास करने चाहिएँ।

बाबा साहेब का यह भी कहना है कि वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर असमानता अनुचित है। यदि यह असमानता की जाएगी तो उसमें केवल सुविधाभोगी लोगों को ही लाभ पहुँचेगा। ‘प्रयत्न’ मानव के अपने वश में हैं। परंतु वंश-परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा उसके हाथ में नहीं है। इसलिए वंश-परम्परा और सामाजिक उत्तराधिकार के नाम पर असमान व्यवहार करना सरासर गलत है। अन्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि समाज के सभी सदस्यों को अपनी-अपनी योग्यतानुसार अवसर प्राप्त होने चाहिएँ और समान अवसरों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। जहाँ तक राजनेताओं का प्रश्न है, उनका वास्ता अनेक लोगों से पड़ता है, परंत उनके पास इतना समय नहीं होता कि वे सबके बारे में जानकारी प्राप्त करें तथा आवश्यकताओं और क्षमताओं को जानें। राजनेताओं के लिए यह व्यवहार्य सिद्धांत उपयोगी है कि वे मानवता का पालन करते हुए समाज को दो वर्गों और श्रेणियों में विभाजित न करें। उन्हें सबके साथ समान व्यवहार करना चाहिए, परंतु व्यवहार में ऐसा हो नहीं पाता। राजनीतिज्ञों को सबके साथ एक-सा व्यवहार इसलिए करना चाहिए क्योंकि वर्गीकरण तथा श्रेणीकरण करने में न केवल उनकी व्यक्तिगत हानि है, बल्कि समाज की भी हानि है। भले ही समता एक काल्पनिक वस्तु है फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए समता का पालन करना चाहिए। यह व्यावहारिक भी है और उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है।

कठिन शब्दों के अर्थ

श्रम-विभाजन = मानवकृत कामों के लिए अलग-अलग श्रेणियाँ बनाना। विडंबना = दुर्भाग्य । पोषक = पुष्ट करने वाला। अस्वाभाविक = कृत्रिम (बनावटी)। श्रमिक = मज़दूर। समर्थन = सहमति। करार देना = घोषित करना। सक्षम = समर्थ । पेशा = धंधा। अनुपयुक्त = जो उचित नहीं है। प्रतिकूल = विपरीत। दूषित = दोषपूर्ण। प्रशिक्षण = शिक्षण देना। निर्विवाद = बिना किसी विवाद के। निजी = अपना। स्तर = श्रेणी (अवस्था)। निर्धारित करना = तय करना। निष्क्रिय = क्रियाहीन । प्रक्रिया = पद्धति। अकस्मात = अचानक। अनुमति = सहमति। पैतक = पिता से प्राप्त। प्रत्यक्ष = आँखों के समक्ष । स्वेच्छा = अपनी इच्छा से। पूर्वलेख = जन्म से पहले भाग में लिखा हुआ। उत्पीड़न = शोषण। दुर्भावना = बुरी भावना। प्रेरणा = रुचि (बढ़ावा देने वाली रुचि)। खेदजनक = दुखदायी। नीरस गाथा = उबाने वाली कथा या प्रसंग। भ्रातृता = भाईचारा। छोर = किनारा । गतिशीलता = आगे बढ़ने की प्रवृत्ति । बहुविध = अनेक प्रकार का। हित = स्वार्थ। सजग = सचेत। अबाध = बिना किसी बाधा के। पद्धति = तरीका। जीवनचर्या = जीवन जीने की पद्धति । गमनागमन = आना-जाना। स्वाधीनता = स्वतंत्रता। जीविकोपार्जन = जीवन के साधन जुटाना। समक्ष = सामने। पराधीनता = गुलामी। तथ्य = सच्चाई। नियामक सिद्धांत = दिशा देने वाला विचार। उत्तराधिकार = पूर्वजों से मिला अधिकार। ज्ञानार्जन = ज्ञान प्राप्त करना। निःसंदेह = बिना शक के। बाजी मार लेना = विजय प्राप्त करना। उत्तम = श्रेष्ठ । कुल = परिवार । ख्याति = प्रसिद्धि । पैतृक संपदा = पिता से प्राप्त संपत्ति। व्यावसायिक प्रतिष्ठा = व्यवसाय सम्बन्धी सम्मान। निष्पक्ष निर्णय = बिना पक्षपात के फैसला। तकाज़ा = आवश्यकता। व्यवहार्य = व्यावहारिक। वर्गीकरण = वर्गों में विभक्त करना। कसौटी = जाँच का आधार।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

HBSE 12th Class Hindi शिरीष के फूल Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत (संन्यासी) की तरह क्यों माना है?
उत्तर:
अवधूत सुख-दुख की परवाह न करते हुए हमेशा हर हाल में प्रसन्न रहता है। वह भीषण कठिनाइयों और कष्टों में भी जीवन की एकरूपता बनाए रखता है। शिरीष का वृक्ष भी उसी कालजयी अवधूत के समान है। आस-पास फैली हुई गर्मी, तप और लू में भी वह हमेशा पुष्पित और सरस रहता है। उसका पूरा शरीर फूलों से लदा हुआ बड़ा सुंदर लगता है। इसलिए लेखक ने शिरीष को अवधूत कहा है। शिरीष भी मानों अवधूत के समान मृत्यु और समय पर विजय प्राप्त करके लहलहाता रहता है। भयंकर गर्मी और लू भी उसे परास्त नहीं कर सकती। इसलिए लेखक ने उसे कालजयी कहा है।

प्रश्न 2.
हृदय की कोमलता को बचाने के लिए व्यवहार की कठोरता भी कभी-कभी ज़रूरी हो जाती है प्रस्तुत पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
हृदय की कोमलता को बचाने के लिए कभी-कभी व्यवहार में कठोरता लाना आवश्यक हो जाता है। इस संबंध में नारियल का उदाहरण हमारे सामने है जो बाहर से कठोर होता है, परंतु अंदर से कोमल होता है। शिरीष का फूल भी अपनी सरसता को बनाए रखने के लिए बाहर से कठोर हो जाता है। यद्यपि परवर्ती कवियों ने शिरीष को देखकर यही कहा कि इसका तो सब कुछ कोमल है। परंतु इसके फल बड़े मजबूत होते हैं। नए फूल आ जाने पर भी वे अपने स्थान को नहीं छोड़ते। अतः अंदर की कोमलता को बनाए रखने के लिए कठोर व्यवहार भी जरूरी है।

प्रश्न 3.
द्विवेदी जी ने शिरीष के माध्यम से कोलाहल व संघर्ष से भरी जीवन-स्थितियों में अविचल रह कर रहने की सीख दी है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
निश्चय से आज का जीवन अनेक कठिनाइयों से घिरा हुआ है। कदम-कदम पर कोलाहल और संघर्ष से भरी स्थितियाँ हैं, लेकिन द्विवेदी जी हमें इन स्थितियों में भी अविचलित रहकर जिजीविषु को बनाए रखने की शिक्षा देते हैं। शिरीष का वृक्ष भी भयंकर गर्मी और लू में अनासक्त योगी के समान अविचल खड़ा रहता है। अत्यंत कठिन और विषम परिस्थितियों में भी वह अपने जीने की शक्ति को बनाए रखता है। मानव-जीवन में भी संघर्ष और बाधाएँ हैं। मानव को भी शिरीष के वृक्ष के समान इन बाधाओं से हार नहीं माननी चाहिए। आज हमारे देश में चारों ओर भ्रष्टाचार, अत्याचार, मारकाट, लूटपाट और खून-खराबा फैला हुआ है। यह सब देखकर हमें निराश नहीं होना चाहिए, बल्कि इन विपरीत परिस्थितियों में भी हमें स्थिर और शांत रहकर जीवन के संघर्ष का सामना करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
हाय, वह अवधूत आज कहाँ है! ऐसा कहकर लेखक ने आत्मबल पर देह-बल के वर्चस्व की वर्तमान सभ्यता के संकट की ओर संकेत किया है। कैसे?
उत्तर:
अवधूत आत्मबल के प्रतीक हैं। वे शारीरिक विषय-वासनाओं को छोड़कर मन और आत्मा की साधना में लीन रहते हैं। लेखक ने कबीर, कालिदास, महात्मा गाँधी आदि को अवधूत कहा है। परंतु आज के बड़े-बड़े साधु-संन्यासी देह बल, धन बल और माया बल का संग्रह करने में लगे हुए हैं। अतः लेखक का यह कहना सर्वथा उचित है कि आज भारत में सच्चे आत्मबल वाले संन्यासी नहीं रहे। लेखक यह भी स्पष्ट करना चाहता है कि आत्मबल के स्थान पर देह बल को महत्त्व देने के कारण ही हमारे सामने सभ्यता का संकट उपस्थित हो चुका है। यही कारण है कि आज हमारे देश में सभी लोग सुविधाएँ जुटाने में लगे हुए हैं। गांधी जैसा अनासक्त योगी अब नहीं रहा। अतः देह बल को महत्त्व देने के कारण मानव जाति के लिए खतरा उत्पन्न हो गया है।

प्रश्न 5.
कवि (साहित्यकार) के लिए अनासक्त योगी की स्थिर प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय-एक साथ आवश्यक है। ऐसा विचार प्रस्तुत कर लेखक ने साहित्य-कर्म के लिए बहुत ऊँचा मानदंड निर्धारित किया है। विस्तारपूर्वक समझाएँ।
उत्तर:
कवि अथवा साहित्यकार समाज में सर्वोपरि स्थान रखता है। उससे ऊँचे आदर्शों की अपेक्षा की जाती है। एक सच्चा कवि अनासक्त योगी तथा स्थिर प्रज्ञ होने के कारण कठोर, शुष्क और नीतिज्ञ बन जाता है। परंतु कवि के पास विदग्ध प्रेमी का हृदय भी होता है। इसलिए वह नियमों और मानदंडों को महत्त्व नहीं देता। साहित्यकारों में दोनों विपरीत गुणों का होना आवश्यक है। यह स्थिति वज्र से भी कठोर और कुसुम से भी कोमल होने जैसी है। तुलसी, सूर, वाल्मीकि, कालिदास आदि महान् कवि इसी प्रकार के थे। उन्होंने जहाँ एक ओर मर्यादाओं का समुचित पालन किया वहाँ दूसरी ओर वे मधुरता के रस में भी डूबे रहे। जो साहित्यकार इन दोनों आदर्शों का निर्वाह कर सकता है, वही महान् साहित्यकार कहलाता है।

प्रश्न 6.
सर्वग्रासी काल की मार से बचते हुए वही दीर्घजीवी हो सकता है, जिसने अपने व्यवहार में जड़ता छोड़कर नित बदल रही स्थितियों में निरंतर अपनी गतिशीलता बनाए रखी है। पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।।
उत्तर:
काल सर्वग्राही और सर्वनाशी है। वह सबको अपना ग्रास बना लेता है। काल की मार से बचते हुए दीर्घजीवी वही व्यक्ति हो सकता है जो अपने व्यवहार में समय के अनुसार परिवर्तन लाता है। आज समय और समाज बदल चुका है। व्यक्ति को उसी के अनुसार बदलना चाहिए और गतिशील बनना चाहिए। शिरीष के वृक्ष का उदाहरण इसी तथ्य को प्रमाणित करता है। वह अग्नि, लू तथा तपन के साम्राज्य में भी स्वयं को परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेता है। यही कारण है कि वह लू और गर्मी में भी जीवन रस खोज लेता है और प्रसन्न होकर फलता-फूलता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने व्यवहार में जड़ता को त्यागकर स्थितियों ही दीर्घजीवी होकर जीवन का रस भोग सकता है। शिरीष के फूल और महात्मा गांधी दोनों ने कठोर परिस्थितियों के सामने गतिशीलता अपनाई और वे नष्ट नहीं हुए।

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प्रश्न 7.
आशय स्पष्ट कीजिए (क) दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर की आँख बचा पाएंगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कोड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे।।
(ख) जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है?…….मैं कहता हूँ कवि बनना है मेरे दोस्तो, तो फक्कड़ बनो।
(ग) फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है।
उत्तर:
(क) जीवन-शक्ति और काल रूपी अग्नि का सर्वत्र निरंतर संघर्ष चलता रहता है। यह संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता। काल का प्रभाव बहुत ही व्यापक है। जो लोग अज्ञानी हैं वे यह समझते हैं कि जहाँ पर वे देर तक बने रहेंगे तो वे काल रूपी देवता की नज़र से बच जाएंगे। परंतु उनकी यह सोच गलत है। क्योंकि जो व्यक्ति एक स्थान पर स्थिर खड़ा रहता है, काल उसे डस लेता है। यदि यमराज की मार से बचना है तो मनुष्य को हिलते-डुलते रहना चाहिए। स्थान बदलते रहना चाहिए। पीछे की ओर छिपने का प्रयास मत करो, बल्कि आगे मुँह करके बढ़ते रहो, गतिशील बनो। ऐसा करने से यमराज के कोड़े की मार से बचा जा सकता है। जो व्यक्ति स्थिर बना रहता है, वह निश्चय से मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। कहीं भी जमकर खड़ा होना मरने के समान है।

(ख) जो कवि अपने कवि-कर्म में लाभ-हानि, राग-द्वेष, सुख-दुख, यश-अपयश की परवाह न करके जीवन-यापन करता है, वही सच्चा कवि कहा जा सकता है। इसके विपरीत जो कवि अनासक्त नहीं रह सकता, मस्त-मौला नहीं बन सकता, बल्कि जो अपने कविता के परिणाम, लाभ-हानि के चक्कर में फँस जाता है, वह सच्चा कवि नहीं कहा जा सकता। लेखक का विचार है कि सच्चा कवि वही है जो मस्त मौला है। जिसे न तो सुख-दुःख की, न ही हानि-लाभ की और न ही यश-अपयश की चिंता है।

(ग) कोई फल या पेड़ स्वयं अपने आप में लक्ष्य नहीं है, बल्कि वह तो एक ऐसी अंगुली है जो किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए इशारा कर रही है। वह पेड़ या फल हमें यह बताने का प्रयास करता है कि उसे उत्पन्न करने वाली अथवा बनाने वाली कोई और शक्ति है। हमें उसे जानने का प्रयास करना चाहिए।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
शिरीष के पुष्प को शीतपुष्प भी कहा जाता है। ज्येष्ठ माह की प्रचंड गरमी में फूलने वाले फूल को शीतपुष्प संज्ञा किस आधार पर दी गई होगी?
उत्तर:
शिरीष एक ऐसा वृक्ष है जो ज्येष्ठ के महीने की प्रचंड गरमी में भी फलता-फूलता है। इसके फूल बड़े कोमल और सुंदर होते हैं। जेठ के महीने में सूर्य अग्नि की वर्षा करने वाली वृष राशि में प्रवेश करता है। फलस्वरूप पृथ्वी अग्नि के समान जलने लगती है। लू के थपेड़े और आँधी, झंझावात प्रकृति और मानव को कमजोर बना देते हैं, परंतु शिरीष के कोमल पुष्प इस भयंकर भी मुरझाते नहीं, बल्कि लहराते हैं। इसका कारण यह है कि वे इतने शीतल होते हैं कि गर्मी भी उन्हें छूकर शीतल हो जाती है। शायद इसी विशेषता के कारण शिरीष के वृक्ष को शीतपुष्प की संज्ञा दी गई है।

प्रश्न 2.
कोमल और कठोर दोनों भाव किस प्रकार गांधी जी के व्यक्तित्व की विशेषता बन गए?
उत्तर:
महात्मा गांधी एक महान महात्मा और सज्जन व्यक्ति थे। वे व्यवहार में भले ही पत्थर के समान कठोर लगते थे, परंतु उनका हृदय पुष्प के समान कोमल था। सामान्य लोगों की पीड़ा से वे द्रवीभूत हो जाते थे। ब्रिटिश साम्राज्य के अन्याय के विरुद्ध जब वे तन कर खड़े हो गए तब ऐसा लगा मानों यह वृद्ध व्यक्ति वज्र से निर्मित है। उन्होंने कठोर बनकर ही ब्रिटिश साम्राज्य के अन्याय और अत्याचार का विरोध किया। परंतु देश के लिए उनका हृदय पुष्प के समान कोमल बन जाता था। वे ग्रामीणों और गरीबों से अत्यधिक प्रेम करते थे।

प्रश्न 3.
आजकल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारतीय फूलों की बहुत माँग है। बहुत से किसान साग-सब्जी व अन्न उत्पादन छोड़ फूलों की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसी मुद्दे को विषय बनाते हुए वाद-विवाद प्रतियोगिता
का आयोजन करें।
उत्तर:
शिक्षक की सहायता से विद्यार्थी स्वयं करें।

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प्रश्न 4.
हज़ारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पाठ की तरह ही वनस्पतियों के संदर्भ में कई व्यक्तित्त्व व्यंजक ललित निबंध और भी लिखे हैं कुटज, आम फिर बौरा गए, अशोक के फूल, देवदारु आदि। शिक्षक की सहायता से इन्हें ढूंढ़िए और पढ़िए।
उत्तर:
शिक्षक की सहायता से पुस्तकालय से द्विवेदी जी के निबंध संग्रह लेकर इन निबंधों को पढ़ें।

प्रश्न 5.
द्विवेदी जी की वनस्पतियों में ऐसी रुचि का क्या कारण हो सकता है? आज साहित्यिक रचना-फलक पर प्रकृति की उपस्थिति न्यून से न्यून होती जा रही है। तब ऐसी रचनाओं का महत्त्व बढ़ गया है। प्रकृति के प्रति आपका दृष्टिकोण रुचिपूर्ण है या उपेक्षामय? इसका मूल्यांकन करें।
उत्तर:
द्विवेदी जी शांति निकेतन में हिंदी के अध्यापक थे। वहाँ पर अनेक प्रकार के वृक्ष, पेड़-पौधे लगे हुए थे। लेखक ने अपनी दिनचर्या के काल में पलाश, कचनार, अमलतास आदि के पेड़ों को फलते-फूलते देखा था। इसलिए वनस्पतियों में उनकी अत्यधिक रुचि रही है। . परंतु आज के साहित्यकारों के पास न तो समझ है और न ही दृष्टि है। वे थोड़े समय में बहुत कुछ पा लेना चाहते हैं।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
दस दिन फूले और फिर खंखड़-खंखड़ इस लोकोक्ति से मिलते जुलते कई वाक्यांश पाठ में हैं। उन्हें छाँट कर लिखें।
उत्तर:
भाषा के अर्थ और गौरव को बढ़ाने के लिए लेखक ने लोकोक्तियों और मुहावरों का प्रयोग किया है। प्रस्तुत पाठ में भी कुछ इसी के प्रयोग उपलब्ध होते हैं

  1. ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले।
  2. धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना।
  3. न ऊधो का लेना, न माधो का देना।
  4. वयमपि कवयः कवयः कवयस्ते कालिदासाद्या।

HBSE 12th Class Hindi शिरीष के फूल Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक शिरीष के पुष्य की ओर क्यों आकर्षित हुआ?
उत्तर:
जेठ का महीना था। भयंकर गर्मी पड़ रही थी। लेखक वृक्षों के नीचे बैठकर प्रकृति को निहार रहा था। लेखक के आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ शिरीष के असंख्य वृक्ष विद्यमान थे। लेखक सोचने लगा कि इस समय भयंकर गर्मी पड़ रही है। पृथ्वी आग का कुंड बनी हुई है और गर्म लू चल रही है। ऐसी स्थिति में भी शिरीष के वृक्षों पर फूल खिल रहे हैं। शिरीष के वृक्ष की यह विशेषता देखकर लेखक उसकी ओर आकर्षित हो गया और वह शिरीष के फूल के बारे में सोचने लगा।

प्रश्न 2.
पाठ के आधार पर आरग्वध और शिरीष के फूल की तुलना कीजिए।
उत्तर:
आरग्वध का दूसरा नाम अमलतास है। यह भी शिरीष के वृक्ष की तरह गर्मियों में फूलता है। परंतु आरग्वध पर केवल 15-20 दिनों तक ही फूल टिक पाते हैं। तत्पश्चात् वे झड़ जाते हैं और यह वृक्ष खंखड़ हो जाता है। लेकिन वसंत के आरंभ होते ही शिरीष के वृक्षों पर फूल आने शुरू हो जाते हैं और आषाढ़ के महीने तक इसके फूल खिले रहते हैं। कभी-कभी तो भादों में भी उसकी शाखाएँ फूलों से लदी रहती हैं। आरग्वध के फूल तो क्षण जीवी होते हैं, परंतु पलाश के फूल लंबे काल तक अपना अस्तित्व बनाए रहते हैं।

प्रश्न 3.
शिरीष के वृक्षों का क्या उपयोग है? पाठ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
शिरीष के वृक्ष आकार में बड़े तथा छायादार होते हैं। ये मंगलकारी तथा सजावटी वृक्ष माने गए हैं। परंतु इनके तने अधिक मजबूत नहीं होते और शाखाएँ तो और भी अधिक कमजोर होती हैं। इसलिए इन पर झूले नहीं डाले जा सकते। प्राचीनकाल में अमीर लोग अपने घर की चारदीवारी के पास शिरीष के वृक्ष लगाते थे। इन वृक्षों के फूल कोमल और मनोहारी होते हैं। इनमें से मोहक सुगंध उत्पन्न होती है। परंतु शिरीष के फल बहुत ही मजबूत होते हैं। जब तक नए फूल-पत्ते आकर उन्हें धक्का देकर नीचे नहीं गिरा देते तब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। आयुर्वेद की दृष्टि से यह वृक्ष बहुत ही उपयोगी माना गया है।

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प्रश्न 4.
शिरीष की महिमा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लेखक ने शिरीष वृक्ष की अनेक विशेषताओं का उल्लेख किया है, उसकी विशेषताएँ ही उसकी महिमा को दर्शाती हैं। वह आँधी, धूप, लू व गरमी की प्रचंडता में भी एक अवधूत की भाँति अविचल होकर कोमल फूलों को बिखेरता रहता है। शिरीष के फूल जितने कोमल और सुन्दर होते हैं, उसके फल उतने ही कठोर होते हैं। वे तब तक स्थान नहीं छोड़ते, जब तक नए फल आकर उन्हें धक्के मारकर गिरा न दें। शिरीष के वृक्ष की सुन्दरता की सभी साहित्यकारों ने प्रशंसा की है। यही उसकी महिमा का पक्का प्रमाण है।

प्रश्न 5.
शिरीष के फूलों की कोमलता को देखकर परवर्ती कवियों ने क्या समझा?
उत्तर:
शिरीष के फूलों की कोमलता को देखकर परवर्ती कवियों ने यह समझा कि उसका तो सब कुछ कोमल है। परंतु यह उनकी भूल है। शिरीष के फल बहुत मजबूत होते हैं। नए पत्ते निकल आने पर भी वे अपने स्थान को नहीं छोड़ते। जब तक नए पत्ते आकर उन्हें धक्का नहीं दे देते तब तक वे अपने स्थान पर बने रहते हैं। वसंत के आने पर संपूर्ण वनस्थली पुष्प और पत्तों के द्वारा कोमल ध्वनि उत्पन्न करती रहती है। लेकिन शिरीष के पुराने फल बुरी तरह से खड़खड़ाते हुए देखे जा सकते हैं। लेखक इनकी तुलना आज के नेताओं के साथ करता है। जो जमाने के रूप को न पहचान कर अपने स्थान को छोड़ना ही नहीं चाहते।

प्रश्न 6.
शिरीष के फूल पाठ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है? अथवा शिरीष के फूल पाठ का उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
यूँ तो इस पाठ के द्वारा लेखक ने अपनी प्रकृति-प्रेम की प्रवृत्ति को उजागर किया। परंतु उसका मुख्य उद्देश्य यह है कि भले ही आज कोलाहल और संघर्ष से परिपूर्ण जीवन बहुत ही कठिन बन चुका है। फिर भी हमें इन विषम परिस्थितियों में भी जिजीविषा को बनाए रखना चाहिए। शिरीष का वृक्ष ज्येष्ठ-आषाढ़ की भयंकर गर्मी और लू में भी अनासक्त योगी के समान अविचल बना रहता है। उसकी जीने की शक्ति बरकरार बनी रहती है। वह अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए निरंतर संघर्ष करता रहता है और किसी से हार नहीं मानता। हमें भी अपने सिद्धांतों पर टिके रहकर विपरीत परिस्थितियों का सामना करना चाहिए और कठोर परिस्थितियों के आगे झुकना नहीं चाहिए। इसके साथ-साथ लेखक ने राजनीतिक, साहित्य और समाज की पुरानी पीढ़ी के द्वंद्व की ओर भी संकेत किया है।

प्रश्न 7.
शिरीष के माध्यम से लेखक ने कोमल और कठोर भावों का सम्मिश्रण कैसे किया है?
उत्तर:
प्रस्तुत निबंध में लेखक ने कोमल और कठोर दोनों भावों का सुंदर मिश्रण किया है। लेखक ज्येष्ठ और आषाढ़ की भयंकर गर्मी और ल की चर्चा करता है। इन विपरीत परिस्थितियों में भी शिरीष का फूल फलता-फलता है। इसके फल बहुत ही कोमल होते हैं, परंतु इसके फल मजबूत होते हैं। ये नए पत्तों के आने पर भी अपने स्थान पर डटे रहते हैं। दूसरी ओर शिरीष के फूल भयंकर गर्मी में भी इतने कोमल होते हैं कि वे भौरों के पैरों के दबाव को सहन कर सकते हैं। पक्षियों के पैरों का दबाव पड़ते ही वे झड़ कर नीचे गिर जाते हैं। इस प्रकार लेखक ने शिरीष के माध्यम से कोमल और कठोर भावों का सुंदर मिश्रण किया है।

प्रश्न 8.
लेखक के कथन के अनुसार महाकाल देवता के कोड़ों की मार से कौन बच सकता है?
उत्तर:
लेखक का कथन है कि महाकाल देवता सपासप कोड़े चला रहा है। जीर्ण और दुर्बल उसके समक्ष झड़ जाते हैं। परंतु इन कौड़ों की मार से केवल वही बच पाते हैं जो ऊर्ध्वमुखी होते हैं। जो हमेशा ऊपर की ओर बढ़ते चले जाते हैं। जो स्थिर नहीं हैं बल्कि गतिशील हैं और हमेशा अपना स्थान बदलते रहते हैं। वे आगे की ओर मुँह करके हिलते-डुलते रहते हैं। तात्पर्य यह है कि सही रास्ते पर चलने वाले और निरंतर आगे बढ़ने वाले ही महाकाल की चोट से बच जाते हैं।

प्रश्न 9.
लेखक ने शिरीष और गांधी को एक समान क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक का कथन है कि गांधी जी और शिरीष को एक समान कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। शिरीष का फूल भयंकर गर्मी में भी मधुर फूल धारण किए रहता है। वह विपरीत परिस्थितियों से घबराता नहीं है। यही कारण है कि वह लंबे काल तक पुष्प धारण किए रहता है। इसी प्रकार गांधी जी ने भी असंख्य कठिनाइयों को झेला, परंतु सरसता को नहीं छोड़ा। उनके चारों ओर अग्निकांड और खून-खराबा चलता रहा परंतु वे हमेशा से ही अहिंसक और उदार बने रहे। गांधी और शिरीष दोनों ने ही विपरीत परिस्थितियों में अपने अस्तित्व को बनाए रखा। इसलिए लेखक ने इन दोनों को एक समान कहा है।

प्रश्न 10.
लेखक ने कर्णाट-राज की प्रिया विज्जिका देवी के बारे में क्या लिखा है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि कर्णाट-राज की प्रिया विज्जिका देवी ने बड़े गर्व से कहा था कि एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास। ब्रह्मा जी ने वेदों की रचना की, वाल्मीकि ने ‘रामायण’ की और व्यास ने ‘महाभारत’ की। इन तीनों के अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति कवि होने का दावा करता है तो मैं कर्णाट-राज की प्यारी रानी उनके सिर पर अपना बायाँ चरण रखती हूँ। भाव यह है कि कर्णाट-राज की प्रिया ने ब्रह्मा, वाल्मीकि और व्यास के अतिरिक्त किसी और को कवि नहीं माना।

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प्रश्न 11.
लेखक ने अवधूत और शिरीष की तुलना किस प्रकार की है?
उत्तर:
लेखक का कहना है कि शिरीष का फूल पक्का अवधूत है और वह लेखक के मन में तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती हैं। लेखक को इस बात की हैरानी है कि वह भयंकर गर्मी और चिलकती धूप में इतना सरस कैसे बना रह सकता है। हमारे देश पर भी मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया था। इन परिस्थितियों में स्थिर रहना बड़ा कठिन है, लेकिन शिरीष ने इन विषम परिस्थितियों को सहन किया। हमारे देश में भी एक बूढ़ा अर्थात् महात्मा गांधी विषम परिस्थितियों में स्थिर रह सका था। यदि शिरीष अवधूत है तो महात्मा गांधी भी अवधूत है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर शिरीष के समान इतना सरस और कोमल हो सका था।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1908 में
(B) सन् 1907 में
(C) सन् 1906 में
(D) सन् 1909 में
उत्तर:
(B) सन् 1907 में

2. द्विवेदी जी का जन्म किस गाँव में हुआ?
(A) छपरा
(B) कपरा
(C) खपरा
(D) तकरा
उत्तर:
(A) छपरा

3. द्विवेदी जी के पिता का नाम क्या था?
(A) अनमोल द्विवेदी
(B) रामलाल द्विवेदी
(C) करोड़ीमल द्विवेदी
(D) गिरधर द्विवेदी
उत्तर:
(A) अनमोल द्विवेदी

4. द्विवेदी जी ने किस वर्ष शास्त्राचार्य की परीक्षा उत्तीर्ण की?
(A) सन् 1931 में
(B) सन् 1932 में
(C) सन् 1930 में
(D) सन् 1929 में
उत्तर:
(C) सन् 1930 में

5. द्विवेदी जी किस ग्रंथ का नियमित रूप से पाठ किया करते थे?
(A) साकेत
(B) रामायण
(C) श्रीमद्भागवत गीता
(D) रामचरितमानस
उत्तर:
(D) रामचरितमानस

6. द्विवेदी जी की नियुक्ति शांति निकेतन में कब हुई?
(A) सन् 1932 में
(B) सन् 1931 में
(C) सन् 1930 में
(D) सन् 1934 में
उत्तर:
(C) सन् 1930 में

7. शांति निकेतन में द्विवेदी जी किस पद पर नियुक्त हुए?
(A) अंग्रेज़ी-अध्यापक
(B) हिंदी-अध्यापक
(C) संपादक
(D) सह-संपादक
उत्तर:
(B) हिंदी-अध्यापक

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8. शांति निकेतन में अध्यापन करने के बाद द्विवेदी जी किस विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए?
(A) मुंबई विश्व-विद्यालय
(B) कोलकाता विश्व-विद्यालय
(C) दिल्ली विश्वविद्यालय
(D) हिंदू विश्व-विद्यालय
उत्तर:
(D) हिंदू विश्वविद्यालय

9. पंजाब विश्व-विद्यालय में द्विवेदी जी किस पद पर नियुक्त हुए?
(A) वरिष्ठ प्रोफेसर
(B) मुख्य प्रोफेसर
(C) सहायक प्रोफेसर
(D) सलाहकार प्रोफेसर
उत्तर:
(A) वरिष्ठ प्रोफेसर

10. द्विवेदी जी किस पीठ पर आचार्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए?
(A) कबीर पीठ
(B) तुलसी पीठ
(C) टैगोर पीठ
(D) गांधी पीठ
उत्तर:
(C) टैगोर पीठ

11. भारत सरकार ने द्विवेदी जी को किस उपाधि से अलंकृत किया?
(A) पद्म भूषण
(B) पद्म श्री
(C) पद्म शोभा
(D) राष्ट्र भूषण
उत्तर:
(A) पद्म भूषण

12. द्विवेदी जी का देहांत किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1980 में
(B) सन् 1979 में
(C) सन् 1978 में
(D) सन् 1977 में
उत्तर:
(B) सन 1979 में

13. द्विवेदी जी की रचना ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी,
(B) उपन्यास
(C) आलोचना
(D) निबंध-संग्रह
उत्तर:
(B) उपन्यास

14. ‘अशोक के फूल’ किस विधा की रचना है?
(A) निबंध-संग्रह
(B) कहानी-संग्रह
(C) उपन्यास
(D) आलोचना
उत्तर:
(A) निबंध-संग्रह

15. ‘नाथ संप्रदाय’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) रेखाचित्र
(C) कहानी
(D) समीक्षा
उत्तर:
(D) समीक्षा

16. ‘विचार और वितर्क’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी-संग्रह
(B) निबंध-संग्रह
(C) नाटक
(D) एकांकी
उत्तर:
(B) निबंध-संग्रह

17. ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ के अतिरिक्त द्विवेदी जी ने कौन-सा उपन्यास लिखा है?
(A) सेवा सदन
(B) निर्मला
(C) चारुचंद्रलेख
(D) कंकाल
उत्तर:
(C) चारुचंद्रलेख

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18. ‘अशोक के फूल’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’ के अतिरिक्त द्विवेदी जी का और कौन-सा निबंध-संग्रह है?
(A) लता समूह
(B) देवलता
(C) कल्पलता
(D) उद्यानलता
उत्तर:
(C) कल्पलता

19. इनमें से कौन-सा समीक्षात्मक ग्रंथ द्विवेदी जी का नहीं है?
(A) सूर साहित्य
(B) हिंदी साहित्य की भूमिका
(C) मध्यकालीन धर्म साधना
(D) तुलसी साहित्य की विवेचना
उत्तर:
(D) तुलसी साहित्य की विवेचना

20. ‘शिरीष के फूल’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) डॉ० नगेन्द्र
(B) रामवृक्ष बेनीपुरी
(C) उदय शंकरभट्ट
(D) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
उत्तर:
(D) आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

21. आरग्वध किस पेड़ का नाम है?
(A) आम का
(B) नीम का
(C) अमलतास का
(D) शिरीष का
उत्तर:
(C) अमलतास का

22. अमलतास कितने दिनों के लिए फलता है?
(A) 15-20 दिन
(B) 1-2 महीने
(C) 2 सप्ताह
(D) 4 सप्ताह
उत्तर:
(A) 15-20 दिन

23. किस ऋतु के आने पर शिरीष लहक उठता है?
(A) शीत ऋतु
(B) शिरीष ऋतु
(C) वसंत ऋतु
(D) वर्षा ऋतु
उत्तर:
(C) वसंत ऋतु

24. किस महीने तक शिरीष के फूल मस्त बने रहते हैं?
(A) चैत्र।
(B) वैसाख
(C) ज्येष्ठ
(D) आषाढ़
उत्तर:
(D) आषाढ़

25. शिरीष की समानता का उपमान है
(A) बकुल
(B) अशोक
(C) अवधूत
(D) ईश
उत्तर:
(C) अवधूत

26. शिरीष को कैसा कहा गया है?
(A) कालजयी
(B) आतंकी
(C) सौदागर
(D) जड़मति
उत्तर:
(A) कालजयी

27. शिरीष की डालें कैसी होती हैं?
(A) कमजोर
(B) मजबूत
(C) मोटी
(D) पतली
उत्तर:
(A) कमजोर

28. द्विवेदी जी ने ‘शिरीष के फूल’ नामक पाठ में संस्कृत के किस महान कवि का उल्लेख किया है?
(A) बाणभट्ट
(B) भवभूति
(C) कालिदास
(D) भास
उत्तर:
(C) कालिदास

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29. शिरीष के फल किस प्रकार के होते हैं?
(A) कोमल
(B) कठोर
(C) कमजोर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कठोर

30. ‘धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!’ यह कथन किस कवि का है?
(A) कबीरदास
(B) सूरदास
(C) तुलसीदास
(D) बिहारी
उत्तर:
(C) तुलसीदास

31. ‘एक कवि ब्रह्मा थे, दूसरे वाल्मीकि और तीसरे व्यास’-यह गर्वपूर्वक किसने कहा था?
(A) कालिदास
(B) धन्या देवी
(C) सरस्वती
(D) विज्जिका देवी
उत्तर:
(D) विज्जिका देवी

32. शिरीष का वृक्ष कहाँ से अपना रस खींचता है?
(A) पानी से
(B) मिट्टी से
(C) वायुमंडल से
(D) खाद से
उत्तर:
(C) वायुमंडल से

33. लेखक ने किस भक्तिकालीन कवि की तुलना अवधूत के साथ की है?
(A) कबीर
(B) जायसी
(C) सूरदास
(D) तुलसीदास
उत्तर:
(A) कबीर

34. पुराने कवि किस पेड़ में दोलाओं को लगा देखना चाहते थे?
(A) बकुल
(B) अशोक
(C) अमलतास
(D) शिरीष
उत्तर:
(A) बकुल

35. आधुनिक हिन्दी काव्य में अनासक्त कवि हैं
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) सुमित्रानंदन पंत
(C) हरिवंश राय बच्चन
(D) मैथिलीशरण गुप्त
उत्तर:
(B) सुमित्रानंदन पंत

36. लेखक ने कबीर के अतिरिक्त और किस कवि को अनासक्त योगी कहा है?
(A) व्यास
(B) ब्रह्मा
(C) कालिदास
(D) वाल्मीकि
उत्तर:
(C) कालिदास

37. ‘शिरीष के फूल’ पाठ में महाकाल देवता द्वारा सपासप क्या चलाने की बात कही है?
(A) कोड़े
(B) डण्डे
(C) रथ
(D) भैंसा
उत्तर:
(A) कोड़े

38. बांग्ला के किस कवि को लेखक ने अनासक्त कवि कहा है?
(A) रवींद्रनाथ टैगोर
(B) शरतच्चंद्र
(C) मंगल कवि
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) रवींद्रनाथ टैगोर

39. ईक्षुदण्ड किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
(A) नीम के लिए
(B) गन्ने के लिए
(C) चावल के लिए
(D) बांस के लिए
उत्तर:
(B) गन्ने के लिए

40. अंत में लेखक ने शिरीष की तुलना किसके साथ की है?
(A) महात्मा गांधी
(B) जवाहर लाल नेहरू
(C) सरदार पटेल
(D) लाल बहादुर शास्त्री
उत्तर:
(A) महात्मा गांधी

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

41. ‘दिन दस फूला फूलि के खंखड़ भया पलास’ इस पंक्ति के लेखक कौन हैं?
(A) हजारी प्रसाद द्विवेदी
(B) वात्स्यायन
(C) कालिदास
(D) कबीरदास
उत्तर:
(D) कबीरदास

42. राजा दुष्यंत कैसे थे?
(A) अच्छे-भले प्रेमी
(B) हृदयहीन
(C) कमजोर
(D) संन्यासी
उत्तर:
(A) अच्छे-भले प्रेमी

43. शिरीष की बड़ी विशेषता क्या है?
(A) दिव्यता
(B) मस्ती
(C) भव्यता
(D) प्रगल्भता
उत्तर:
(B) मस्ती

44. ‘शिरीष के फूल’ निबंध में वर्णित कर्णाट-राज की प्रिया का क्या नाम है?
(A) मल्लिका
(B) विज्जिका देवी
(C) अलका
(D) नंदिनी देवी
उत्तर:
(B) विज्जिका देवी

45. द्विवेदी जी ने जगत के अतिपरिचित और अति प्रामाणिक सत्य किसे कहा है?
(A) प्राचीन और नवीन को
(B) सुख और दुख को
(C) अमृत और विष को
(D) जरा और मृत्यु को
उत्तर:
(D) जरा और मृत्यु को

46. लेखक ने कवि बनने के लिए क्या बनना आवश्यक माना है?
(A) विद्वान
(B) सुखी
(C) धनी
(D) फक्कड़
उत्तर:
(D) फक्कड़

47. पुराने फलों को अपने स्थान से हटते न देखकर लेखक को किसकी याद आती है?
(A) महात्मा गाँधी की
(B) नेताओं की
(C) कालिदास की
(D) बुजुर्गों की
उत्तर:
(B) नेताओं की

48. कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता के मंत्र का प्रचार कौन करता है?
(A) पलाश
(B) शिरीष
(C) गुलाब
(D) गुलमोहर
उत्तर:
(B) शिरीष

49. शिरीष के फूल को संस्कृत साहित्य में कैसा माना गया है?
(A) कठोर
(B) मजबूत
(C) सख्त
(D) कोमल
उत्तर:
(D) कोमल

50. द्विवेदी जी के अनुसार सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक कौन पहुँच सकते थे?
(A) कालिदास
(B) तुलसीदास
(C) वात्स्यायन
(D) कबीरदास
उत्तर:
(A) कालिदास

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

51. किस ग्रंथ में बताया गया है कि वाटिका के सघन छायादार वृक्षों की छाया में ही झूला (प्रेक्षा दोला) लगाया जाना चाहिए?
(A) ऋग्वेद
(B) मेघदूत
(C) सूरसागर
(D) काम-सूत्र
उत्तर:
(D) काम-सूत्र

शिरीष के फूल प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] जहाँ बैठ के यह लेख लिख रहा हूँ उसके आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ, शिरीष के अनेक पेड़ हैं। जेठ की जलती धूप में, जबकि धरित्री निर्धूम अग्निकुंड बनी हुई थी, शिरीष नीचे से ऊपर तक फूलों से लद गया था। कम फूल इस प्रकार की गरमी में फूल सकने की हिम्मत करते हैं। कर्णिकार और आरग्वध (अमलतास) की बात मैं भूल हा हैं। वे भी आस-पास बहत हैं। लेकिन शिरीष के साथ आरग्वध की तलना नहीं की जा सकती। वह पंद्रह-बीस दिन के लिए फूलता है, वसंत ऋतु के पलाश की भाँति । कबीरदास को इस तरह पंद्रह दिन के लिए लहक उठना पसंद नहीं था। यह भी क्या कि दस दिन फूले और फिर खंखड़-के-खंखड़-‘दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलासा!’ ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले। फूल है शिरीष। वसंत के आगमन के साथ लहक उठता है, आषाढ़ तक जो निश्चित रूप से मस्त बना रहता है। मन रम गया तो भरे भादों में भी निर्घात फूलता रहता है। जब उमस से प्राण उबलता रहता है और लू से हृदय सूखता रहता है, एकमात्र शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र प्रचार करता रहता है। यद्यपि कवियों की भाँति हर फूल-पत्ते को देखकर मुग्ध होने लायक हृदय विधाता ने नहीं दिया है, पर नितांत ढूँठ भी नहीं हूँ। शिरीष के पुष्प मेरे मानस में थोड़ा हिल्लोल ज़रूर पैदा करते हैं। [पृष्ठ-144]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तत निबंध में लेखक ने शिरीष के फल के सौं वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि शिरीष का फूल अपनी जीवन-शक्ति और संघर्षशीलता के लिए प्रसिद्ध है।

व्याख्या-लेखक शिरीष के फूल का वर्णन करता हुआ कहता है कि मैं जहाँ बैठ कर लिख रहा हूँ, उसके चारों ओर असंख्य शिरीष के फूल हैं। ये पेड़ लेखक के आगे भी हैं, पीछे भी हैं, दाएँ भी और बाएँ भी। जेठ का महीना है। धूप जल रही है और पृथ्वी बिना धुएँ के भाग का कुंड बन चुकी है। परंतु शिरीष के पेड़ पर इस धूप का कोई प्रभाव नहीं है। वह ऊपर से लेकर नीचे तक फूलों से लदा हुआ है। प्रकृति के क्षेत्र में शिरीष जैसे बहुत थोड़े-से पेड़ हैं जो इस भयंकर गर्मी में भी फूल धारण कर सकते हैं। अधिकांश पेड़ तो ग्रीष्म ऋतु में मुरझा ही जाते हैं। लेखक कर्णिकार और अमलतास के पेड़ों को भूल नहीं सकता क्योंकि उसके आस-पास दोनों प्रकार के पेड़ विद्यमान हैं। परंतु लेखक का कहना है कि हम शिरीष के पेड़ के साथ अमलतास की तुलना नहीं कर सकते। अमलतास केवल 15-20 दिन तक ही फूल धारण करता है। जैसे पलाश का पेड़ बसंत ऋतु में अल्पकाल के लिए ही फूलता है।

शायद यही कारण है कि कविवर कबीरदास को 15 दिन के लिए कर्णिकार का फूल धारण करना पसंद नहीं था। भला यह भी कोई बात है कि दस-पन्द्रह दिन तक फूल धारण करो और फिर दूंठ के दूंठ बने खड़े रहो। कबीरदास ने लिखा भी है-‘दिन दस फूला फूलिके खंखड़ भया पलास’ । लेखक का कहना है कि इस प्रकार की पूँछ वालों से बिना पूँछ वाले ही अच्छे हैं। शिरीष के फूल का अपना ही महत्त्व है। जैसे ही वसंत आता है वैसे ही यह पेड़ खिल उठता है और फिर आषाढ़ के महीने तक अपनी मस्ती में खिला रहता है।

अनेक बार यदि मन में आनंद आ गया तो वह भादों के महीने में भी बिना बाधा के फूला रहता है। जब गरमी के कारण व्यक्ति के प्राण उबलने लगते हैं और गर्म लू से हृदय सूखने लगता है तब यह अकेला शिरीष का पेड़ ही समय पर विजय पाने वाले संन्यासी के समान मानों इस मंत्र का प्रचार करता है कि जीवन अविजित है, उसे जीता नहीं जा सकता। अंत में लेखक कहता है कि अन्य कवियों के समान प्रत्येक फूल और पत्ते को देखकर आसक्त होने वाला दिल विधाता ने उसे नहीं दिया। लेकिन लेखक पूर्णतया भावनाहीन भी नहीं है। यही कारण है कि शिरीष के फूल लेखक के मन में थोड़ी बहुत हलचल जरूर पैदा कर देते हैं। लेखक ,ठ के समान नीरस न होकर सरस है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने विपरीत परिस्थितियों में भी शिरीष के फूलों के समान जिंदा रहने की क्षमता की ओर संकेत किया है।
  2. शिरीष के फूल के माध्यम से लेखक मानव को विपरीत परिस्थितियों में भी प्रसन्न रहने की प्रेरणा देता है।
  3. मुहावरों तथा सूक्तियों का उपयुक्त प्रयोग किया गया है।
  4. तत्सम प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है तथा शब्द-चयन उचित और भावानुकूल है।
  5. भावात्मक शैली के प्रयोग के कारण विषय-वर्णन अत्यंत रोचक बन पड़ा है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) लेखक शिरीष के फूल को क्यों पसंद करता है?
(ग) कबीरदास ने अमलतास जैसे वृक्ष को पसंद क्यों नहीं किया?
(घ) ऐसे दुमदारों से तो लँडूरे भले? इस पंक्ति का भावार्थ लिखिए।
(ङ) शिरीष किस ऋतु से लेकर किस ऋतु तक लहकता रहता है?
(च) लेखक ने शिरीष को कालजयी अवधूत क्यों कहा है?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम-‘शिरीष का फूल’, लेखक-हजारी प्रसाद द्विवेदी

(ख) लेखक को शिरीष के फूल इसलिए पसंद हैं क्योंकि उनमें जीवन-शक्ति और संघर्षशीलता होती है। जेठ की जलती हुई धूप में भी वह फूलों से लदा हुआ दिखाई देता है। विपरीत तथा कठोर परिस्थितियों में वह प्रकृति से जीवन रस खींचकर जीवन को अजेयता का संदेश देता है।

(ग) अमलतास एक ऐसा वृक्ष है जो केवल 15-20 दिनों के लिए ही खिलता है और तत्पश्चात् ठूठ हो जाता है। इसी कारण कबीरदास को अमलतास पसंद नहीं है। एक तो उसमें जीवन-शक्ति बहुत कम होती है, दूसरा उसके सौंदर्य की आयु भी अल्पकाल की होती है।

(घ) दुमदार उन पक्षियों को कहा गया है जिनकी पूँछ बहुत सुंदर होती है लेकिन ऐसे पक्षी अल्पकाल के लिए जीवित रहते हैं इसलिए कबीर को ये पक्षी पसंद नहीं हैं। उन्हें पूँछहीन पक्षी पसंद हैं जो विपरीत परिस्थितियों में भी जीवित रहते हैं और संघर्षों का सामना करते हैं।

(ङ) शिरीष का वृक्ष वसंत के आने पर फूलों से लद जाता है और आषाढ़ तक मस्त बना रहता है। कभी-कभी तो भादों की गर्मी तथा लू में भी वह फूलों से लहकता रहता है।

(च) कालजयी का अर्थ है-काल को जीतने वाला अर्थात् लंबे समय तक जिंदा रहने वाला संन्यासी। वस्तुतः ऐसे फक्कड़ साधु को कहते हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी साधना में लीन रहता है। शिरीष के फूल की तुलना कालजयी अवधूत से करना सार्थक है क्योंकि वह गर्मी, लू आदि की परवाह किए बिना फलों से लहकता रहता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

[2] फूलों की कोमलता देखकर परवर्ती कवियों ने समझा कि उसका सब-कुछ कोमल है! यह भूल है। इसके फल इतने मजबूत होते हैं कि नए फूलों के निकल आने पर भी स्थान नहीं छोड़ते। जब तक नए फल-पत्ते मिलकर, धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं। वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मुझे इनको देखकर उन नेताओं की बात याद आती है, जो किसी प्रकार ज़माने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नई पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं। [पृष्ठ-146]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से अवतरित है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक ने शिरीष के फूलों की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि शिरीष के फूल इतने अधिक सुंदर और कोमल होते हैं कि कालिदास के बाद के कवियों ने यह सोच लिया कि शिरीष के वृक्ष की प्रत्येक वस्तु कोमल होती है, परंतु यह उनकी भारी गलती है। कारण यह है कि शिरीष के फल बहुत मजबूत होते हैं। ये फल नए फूलों के आ जाने पर भी अपने स्थान पर जमे रहते हैं। जब तक नए फल और पत्ते उन्हें मिलकर धक्का देकर बाहर का रास्ता नहीं दिखाते, तब तक वे अपने स्थान पर जमे रहते हैं। यही कारण है कि वसंत के आने पर संपूर्ण वन-प्रदेश फूल और पत्तों से लद जाता है और उनमें मर्र-मर्र की ध्वनि उत्पन्न होती रहती है। लेकिन शिरीष के पुराने फल खड़खड़ाते हुए अपने स्थान पर जमे रहते हैं। शिरीष के फलों को देखकर लेखक उन नेताओं को याद करने लगता है जो किसी प्रकार से भी जमाने के रुख को पहचानना नहीं चाहते और अपने पद पर तब तक जमे रहते हैं जब तक युवा पीढ़ी के लोग उन्हें धक्के मारकर बाहर नहीं निकाल देते।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि शिरीष के फूल जितने सुंदर और कोमल होते हैं, उनके फल उतने ही बड़े और अड़ियल होते हैं वे अपने स्थान को आसानी से नहीं छोड़ते।।
  2. तत्सम प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  3. शिरीष के फूलों की तुलना नेताओं के साथ करना बड़ी सार्थक और सटीक बन पड़ी है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) किसे आधार मानकर लेखक ने कवियों को परवर्ती कहा है और क्यों?
(ख) शिरीष के फलों और फूलों के स्वभाव में क्या अंतर है?
(ग) शिरीष के फलों और आज के नेताओं में क्या समानता दिखाई पड़ती है?
(घ) वसंत का आगमन पुराने फलों को क्या संकेत देता है?
उत्तर:
(क) लेखक ने कालिदास को आधार मानकर बाद के कवियों को परवर्ती कहा है। वे भूल से शिरीष के वृक्ष को बहुत कोमल मानते हैं, जबकि शिरीष के फल बड़े ही कठोर और अडिग होते हैं।

(ख) शिरीष के फूल बड़े कोमल होते हैं, परंतु उसके फल बड़े कठोर और अपने स्थान पर जमे रहते हैं।

(ग) शिरीष के फलों तथा आज के नेताओं के स्वभाव में बहुत बड़ी समानता है। शिरीष के फल तब तक अपने स्थान पर जमे रहते हैं जब तक नए फूल और पत्ते उन्हें धक्का देकर नीचे नहीं गिराते। यही स्थिति आज के नेताओं की भी है जो कि इतने ढीठ हैं कि 80-85 आय तक भी राजनीति से संन्यास नहीं लेना चाहते। वे तभी अपने पद को छोड़ते उन्हें धक्का देकर बाहर का रास्ता दिखाते हैं।

(घ) वसंत के आगमन पर प्रकृति में एक नवीन परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन पुराने फलों को यह इशारा करता है कि उनका समय अब खत्म हो गया है, अतः उन्हें अपना स्थान छोड़ देना चाहिए ताकि नए फल लग सकें।

[3] मैं सोचता हूँ कि पराने की यह अधिकार-लिप्सा क्यों नहीं समय रहते सावधान हो जाती? जरा और मत्य, ये दोनों ही जगत के अतिपरिचित और अतिप्रामाणिक सत्य हैं। तुलसीदास ने अफसोस के साथ इनकी सच्चाई पर मुहर लगाई थी-‘धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!’ मैं शिरीष के फूलों को देखकर कहता हूँ कि क्यों नहीं फलते ही समझ लेते बाबा कि झड़ना निश्चित है! सुनता कौन है? महाकालदेवता सपासप कोड़े चला रहे हैं, जीर्ण और दुर्बल झड़ रहे हैं, जिनमें प्राणकण थोड़ा भी ऊर्ध्वमुखी है, वे टिक जाते हैं। दुरंत प्राणधारा और सर्वव्यापक कालाग्नि का संघर्ष निरंतर चल रहा है। मूर्ख समझते हैं कि जहाँ बने हैं, वहीं देर तक बने रहें तो कालदेवता की आँख बचा जाएँगे। भोले हैं वे। हिलते-डुलते रहो, स्थान बदलते रहो, आगे की ओर मुँह किए रहो तो कीड़े की मार से बच भी सकते हो। जमे कि मरे! [पृष्ठ-146]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से अवतरित है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक ने शिरीष के वृक्ष के पुराने एवं मजबूत फलों को देखकर अधिकार-लिप्सा की चर्चा की है।

व्याख्या-कवि का कथन है कि उसकी यह सोच है कि पुराने लोगों की अधिकार की इच्छा समाप्त क्यों नहीं होती। समय रहते हुए बिलकुल सावधान हो जाना चाहिए और अपने पद को त्याग देना चाहिए। बुढ़ापा और मौत संसार की ऐसी सच्चाई है जो पूर्णतया प्रामाणिक है तथा सभी को इसका पता भी है। लेकिन फिर भी लोग अधिकार की इच्छा को छोड़ना नहीं चाहते। गोस्वामी तुलसीदास ने बड़ी निराशा के साथ इस तथ्य का समर्थन किया है। उनका कहना है-“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!” अर्थात् पृथ्वी का यह प्रमाण है जो फलता है वह निश्चय से झड़ता है, जो जलता है वह नष्ट होता है। भाव यह है कि मृत्यु निश्चित है। इससे कोई बच नहीं सकता। लेखक शिरीष के फूलों को देखकर कहता है कि उन फूलों को फलते समय यह जान लेना चाहिए कि झड़ना तो निश्चित है। मानव को भी इस तथ्य को समझ लेना चाहिए। यमराज बड़ी तेजी के साथ अपने कोड़े चला रहा है।

जो पुराने और कमजोर हैं वे झड़ते जा रहे हैं। परंतु जिनकी चेतना अध्यात्म की ओर लगी हुई है, वे थोड़े समय तक जिंदा रहते हैं। इस संसार में प्राणधारा और सर्वत्र व्याप्त मृत्यु का संघर्ष निरंतर चलता रहता है। कोई भी मृत्यु से बच नहीं सकता। फिर भी अज्ञानी लोग यह समझते हैं कि जहाँ पर वे टिके हुए हैं, वहीं पर टिके रहने पर वे मृत्यु रूपी देवता से बच जाएँगे। ऐसे लोग मूर्ख हैं। जो व्यक्ति गतिशील है और अध्यात्म की ओर गतिमान है वह तो मृत्यु के कोड़े की मार से बच सकता है परंतु जो सांसारिक आसक्ति में डूबा हुआ है वह शीघ्र ही मृत्यु का शिकार बन जाएगा।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने अधिकार-लिप्सा की भर्त्सना करते हुए इस कटु सत्य का उद्घाटन किया है कि प्रत्येक प्राणी की मृत्यु निश्चित है।
  2. लेखक का यह भी कथन है कि जिसकी चेतना परमात्मा में लीन है, वही कुछ समय के लिए मृत्यु से बच सकता है।
  3. तत्सम प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन उचित तथा भावानुकूल है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक को पुराने की अधिकार-लिप्सा क्यों याद आ जाती है?
(ख) तुलसीदास ने जीवन के किस सत्य का उद्घाटन किया है?
(ग) ऊर्ध्वमुखी से लेखक का क्या अभिप्राय है?
(घ) काल देवता की आग से कैसे बचा जा सकता है?
उत्तर:
(क) लेखक शिरीष के वृक्ष के पुराने मजबूत फलों तथा बूढ़े राजनेताओं को देखकर ही अधिकार-लिप्सा को याद कर उठता है। भले ही पुराने फलों के झड़ने का समय आ गया है, परंतु फिर भी वे अपने स्थान को नहीं छोड़ते। इसी प्रकार वृद्ध राजनेता भी गद्दी पर जमे रहते हैं और युवा पीढ़ी को आगे नहीं आने देते। इसका कारण अधिकार-लिप्सा ही है।

(ख) तुलसीदास ने जीवन के इस सत्य का उद्घाटन किया है कि जो फलता है वह निश्चय से झड़ता भी है अर्थात् जन्म के साथ मृत्यु जुड़ी हुई है। वे कहते भी हैं-“धरा को प्रमान यही तुलसी जो फरा सो झरा, जो बरा सो बुताना!”

(ग) ऊर्ध्वमुखी से लेखक का अभिप्राय है कि जिन लोगों की चेतना हमेशा अध्यात्म की ओर रहती है वे कुछ समय तक अपने स्थान पर टिके रहते हैं। ऊर्ध्वमुखी का शाब्दिक अर्थ है-ऊपर की ओर टिके रहना अर्थात् अध्यात्म की ओर टिके रहना।

(घ) काल देवता की आग से बचने का अर्थ है मृत्यु से बचना। जो व्यक्ति स्थिर नहीं रहता, अध्यात्म की ओर गतिशील रहता है और स्थान बदलता रहता है, वह कुछ समय के लिए मृत्यु से बच सकता है।

[4] एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं, तब भी यह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं। एक वनस्पतिशास्त्री ने मुझे बताया है कि यह उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस खींचता है। ज़रूर खींचता होगा। नहीं तो भयंकर लू के समय इतने कोमल तंतुजाल और ऐसे सुकुमार केसर को कैसे उगा सकता था? अवधूतों के मुँह से ही संसार की सबसे सरस रचनाएँ निकली हैं। कबीर बहुत-कुछ इस शिरीष के समान ही थे, मस्त और बेपरवा, पर सरस और मादक। कालिदास भी ज़रूर अनासक्त योगी रहे होंगे। शिरीष के फूल फक्कड़ाना मस्ती से ही उपज सकते हैं और ‘मेघदूत’ का काव्य उसी प्रकार के अनासक्त अनाविल उन्मुक्त हृदय में उमड़ सकता है। जो कवि अनासक्त नहीं रह सका, जो फक्कड़ नहीं बन सका, जो किए-कराए का लेखा-जोखा मिलाने में उलझ गया, वह भी क्या कवि है? [पृष्ठ-146]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फल’ में से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा उसके स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक ने शिरीष की तुलना अवधूत के साथ की है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि कभी-कभी मुझे ऐसा लगता है कि शिरीष का वृक्ष एक विचित्र फक्कड़ संन्यासी है। चाहे जीवन में दुख हों अथवा सुख, वह कभी निराश नहीं होता और न ही हार मानता है। उसे न तो किसी से कुछ लेना है, न ही किसी को कुछ देना है। वह हमेशा अपनी मस्ती में लीन रहता है। जब संपूर्ण पृथ्वी और आकाश गर्मी के कारण जल रहे होते हैं तब यह श्रीमान पता नहीं कहाँ से जीवन के रस का संग्रह करता रहता है। जब यह मस्ती में होता है तो आठों पहर ही मस्त बना रहता है। उसे किसी की चिंता नहीं होती। एक वनस्पति शास्त्री ने लेखक को यह बताया कि शिरीष का वृक्ष ऐसे वृक्षों की श्रेणी में आता है जो अपना रस वायुमंडल की श्रेणी से प्राप्त करता है। लेखक सोचता है कि निश्चय से शिरीष ऐसा ही करता होगा।

अन्यथा इतनी गर्मी और लू के समय भी उसके फूलों में इतने कोमल तंतु जाल कैसे उत्पन्न हो जाते हैं और कैसे उसमें कोमल केसर उग आता है। लेखक का कहना है कि फक्कड़ कवियों ने ही संसार की सर्वश्रेष्ठ रसपूर्ण कविताओं की रचना की है। लेखक के अनुसार कबीरदास लगभग शिरीष के वृक्ष के समान ही था। वह भी अपने-आप में मस्त रहता था और संसार से बेपरवाह रहता था। उसमें सरसता और मस्ती थी। इसी प्रकार संस्कृत कवि कालिदास भी अवश्य आसक्तिहीन योगी था। जिस प्रकार शिरीष के फूल बड़ी मस्ती से पैदा होते हैं। उसी प्रकार मेघदूत जैसी काव्य रचना उसी कवि के हृदय से उत्पन्न हो सकती है जो अनासक्त और मुक्त हृदय हो। कवि का कहना है कि जो कवि आसक्तिहीन नहीं बन सका जिसमें फक्कड़पन नहीं है तथा जो अपने द्वारा किए गए काम का लेखा-जोखा करता रहता है, वह सच्चा कवि नहीं हो सकता है।

विशेष-

  1. यहाँ कवि ने उसी कवि को महान माना है जो फक्कड़, मस्त और अनासक्त योगी होता है।
  2. लेखक ने शिरीष के वृक्ष की तुलना अवधूत से की है जो सुख-दुख में एक साथ रहता है।
  3. तत्सम् प्रधान साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  4. शब्द-चयन सर्वथा उचित और भावानुकूल है।
  5. विचारात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) द्विवेदी जी ने शिरीष के वृक्ष की तुलना अवधूत के साथ क्यों की है?
(ख) वनस्पति शास्त्री ने लेखक को क्या बताया और लेखक की क्या प्रतिक्रिया थी?
(ग) लेखक ने किन कवियों को अवधूत कहा और क्यों?
(घ) लेखक सच्चा कवि किसे मानता है?
(ङ) कालिदास को अनासक्त योगी क्यों कहा गया है?
(च) शिरीष के फूलों को उगाने के लिए कौन-सा गुण होना चाहिए?
उत्तर:
(क) लेखक ने शिरीष को अवधूत इसलिए कहा है क्योंकि अवधूत अर्थात् अनासक्त संन्यासी सुख-दुःख की परवाह न करते हुए मस्ती में जीते हैं। उन पर विपरीत परिस्थितियों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे संघर्षशील और अजेय भी होते हैं। अवधूत के समान शिरीष के फूल भी तपती लू और जलते आसमान से जीवन रस खींचकर मस्ती में खिले रहते हैं। उनमें अदम्य जीवन-शक्ति होती है।

(ख) एक वनस्पति शास्त्री ने लेखक को यह बताया कि शिरीष उस श्रेणी का पेड़ है जो वायुमंडल से अपना रस प्राप्त करता है। लेखक वनस्पति शास्त्री के इस विचार से सहमत है। वह तर्क देता हुआ कहता है कि भयंकर लू के समय शिरीष के फूल के तंतुजाल तथा कोमल केसर अपने आप उग जाता है।

(ग) लेखक ने भक्तिकालीन कवि कबीरदास तथा संस्कृत कवि कालिदास को अवधूत कहा है। इन दोनों कवियों ने सरस रचनाएँ लिखी हैं। कबीर शिरीष के समान मस्त, बेपरवाह आसक्त तथा मादक था। कालिदास भी निश्चय से अनासक्त योगी था। वह भी शिरीष के समान था। उस अनासक्त योगी ने ‘मेघदूत’ काव्य की रचना की।

(घ) लेखक ने सच्चा कवि उसे कहा है जो लाभ-हानि के हिसाब-किताब में नहीं पड़ता। वह फक्कड़ होता है और अनासक्त भाव से काव्य-रचना करता है। वह किसी की परवाह नहीं करता और अपने आप में मस्त रहता है।

(ङ) कालिदास को अनासक्त योगी इसलिए कहा गया है क्योंकि उसने मेघदूत जैसी काव्य-रचना लिखी। जो व्यक्ति सुख-दुःख से प्रभावित नहीं होता और मस्ती में जीता है, वही इस प्रकार की काव्य-रचना लिख सकता है।

(च) शिरीष के फूल उगाने के लिए व्यक्ति को सुख-दुःख की परवाह नहीं करनी चाहिए। उसे आठों पहर मौज-मस्ती में रहना चाहिए और सुख-दुःख तथा विपरीत परिस्थितियों में मस्त रहना चाहिए। जिस प्रकार शिरीष के फूल तपती लू में भी वायुमंडल से रस खींच लेते हैं, उसी प्रकार ऐसे लोगों को भी अपने आसपास के लोगों से जीवन-शक्ति प्राप्त करनी चाहिए।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

[5] कालिदास वजन ठीक रख सकते थे, क्योंकि वे अनासक्त योगी की स्थिर-प्रज्ञता और विदग्ध प्रेमी का हृदय पा चुके थे। कवि होने से क्या होता है? मैं भी छंद बना लेता हूँ, तुक जोड़ लेता हूँ और कालिदास भी छंद बना लेते थे-तुक भी जोड़ ही सकते होंगे इसलिए हम दोनों एक श्रेणी के नहीं हो जाते। पुराने सहृदय ने किसी ऐसे ही दावेदार को फटकारते हुए कहा था-‘वयमपि कवयः कवयस्ते कालिदासाया!’ मैं तो मुग्ध और विस्मय-विमूढ़ होकर कालिदास के एक-एक श्लोक को देखकर हैरान हो जाता हूँ। अब इस शिरीष के फूल का ही एक उदाहरण लीजिए। शकुंतला बहुत सुंदर थी। सुंदर क्या होने से कोई हो जाता है? देखना चाहिए कि कितने सुंदर हृदय से वह सौंदर्य डुबकी लगाकर निकला है। शकुंतला कालिदास के हृदय से निकली थी। विधाता की ओर से कोई कार्पण्य नहीं था, कवि की ओर से भी नहीं। राजा दुष्यंत भी अच्छे-भले प्रेमी थे। उन्होंने शकुंतला का एक चित्र बनाया था, लेकिन रह-रहकर उनका मन खीझ उठता था। उहूँ कहीं-न-कहीं कुछ छूट गया है। बड़ी देर के बाद उन्हें समझ में आया कि शकुंतला के कानों में वे उस शिरीष पुष्प को देना भूल गए हैं, जिसके केसर गंडस्थल तक लटके हुए थे, और रह गया है शरच्चंद्र की किरणों के समान कोमल और शुभ्र मृणाल का हार। [पृष्ठ-147]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा उसके स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक ने संस्कृत के महान कवि कालिदास की साहित्यिक उपलब्धियों पर प्रकाश डाला है। लेखक उन्हें स्थिर-प्रज्ञता तथा अनासक्त योगी की संज्ञा देता है।

व्याख्या-कालिदास साहित्य-रचना करते समय शब्द की लय आदि का समुचित ध्यान रखते थे, क्योंकि वे सच्चे अनासक्त योगी थे। उन्हें हम स्थिर-प्रज्ञता तथा तपा हुआ प्रेमी भी कह सकते हैं अर्थात् उनके पास एक सच्चे प्रेमी का हृदय था। कवि बनने और कहलाने से कुछ नहीं होता। संसार में अनेक ऐसे कवि हैं जो तुकबंदी कर लेते हैं, परंतु हम उन्हें कालिदास नहीं कह सकते। लेखक भी छंद बना लेता है और तुकबंदी भी कर लेता है। कालिदास भी ऐसा करते होंगे। कालिदास छंद भी बनाते थे और तुक भी जोड़ लेते थे। परंतु इससे लेखक और कालिदास एक ही श्रेणी में नहीं रखे जा सकते। एक प्राचीन सहृदय व्यक्ति ने कवि होने का दावा करते हुए एक व्यक्ति को कहा था-“हम भी कवि हैं, हम भी कवि हैं, ऐसा कहने से हम कवि नहीं बन पाते। सच्चे कवि तो कालिदास आदि थे।” लेखक कालिदास के एक-एक श्लोक को देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है। वह उनके श्लोकों पर आसक्त होकर हैरान रह जाता है।

इस संदर्भ में शिरीष के फूलों का उदाहरण दिया जा सकता है। शकुंतला अद्वितीय सुंदरी थी। परंतु सुंदर होने से कोई बड़ा नहीं बन जाता। देखने की बात तो यह होती है कि कवि अपने सुंदर हृदय द्वारा उस सुंदरता में से डुबकी लगाकर बाहर निकला है या नहीं। अर्थात् उसने सौंदर्य को गंभीरता से अनुभव किया है या नहीं। शकुंतला कालिदास के हृदय से उत्पन्न हुई थी। भाव यह है कि कालिदास ने अपने हृदय की अनुभूतियों द्वारा शकुंतला के रूप-सौंदर्य का निर्माण किया था। विधाता ने उसे सौंदर्य देते समय कंजूसी नहीं बरती और कवि ने भी अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी। दूसरी ओर राजा दुष्यंत के पास भी एक प्रेमी-हृदय था और वे सज्जन व्यक्ति थे। राजा ने शकुंतला के एक चित्र का निर्माण किया। लेकिन बार-बार उनका मन अपने-आप से नाराज हो जाता था। उन्हें लगता था कि कहीं-न-कहीं कमी रह गई है। बहुत देर तक सोचने के बाद उनके मन में विचार आया कि वह शकुंतला के कानों में शिरीष का फूल लगाना भूल गए हैं। जिसका केसर उसके कपोलों तक लटका हुआ था। यही नहीं, शरदकालीन चंद्रमा की किरणों के समान कोमल और सुंदर कमलनाल का हार भी बनाना भूल गए हैं। अतः उन्होंने बाद में शकुंतला के चित्र के कानों में शिरीष का फूल बनाया और गले में कमलनाल का हार बनाया।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि कालिदास की सफलता का कारण उनकी स्थिर-प्रज्ञता और अनासक्ति थी।
  2. लेखक ने कालिदास की महानता के कारणों पर महत्त्व डालते हुए शिरीष के फूलों के महत्त्व का प्रतिपादन किया है।
  3. लाक्षणिकता के प्रयोग के कारण विषय रोचक व प्रभावशाली बन गया है।
  4. संस्कृतनिष्ठ हिंदी शब्दों का सफल प्रयोग है।
  5. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक ने कालिदास को सफल कवि क्यों माना है?
(ख) सामान्य कवि और कालिदास में क्या अंतर है?
(ग) शकुंतला कालिदास के हृदय से निकली थी-इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(घ) शकुंतला के सौंदर्य में किस-किस का हाथ रहा?
(ङ) चित्र बनाते समय राजा दुष्यंत को शकुंतला के चित्र में क्या कमी नजर आई?
उत्तर:
(क) लेखक ने कालिदास को सफल कवि इसलिए माना है क्योंकि उसमें स्थिर-प्रज्ञता और अनासक्ति थी। वे सुख-दुःख के प्रति बेपरवाह रहते थे और स्थिर मन से काव्य-रचना करते थे।

(ख) सामान्य कवि शब्दों का प्रयोग करते समय उनकी लय, तुक तथा छंद की ओर ज्यादा ध्यान देते हैं। यह तो कविता का बाह्य पक्ष है। इस पक्ष से वे विषय-वस्तु के मर्म को नहीं जान पाते और न ही विषय की गहराई में उतरकर लिख पाते हैं। जबकि कालिदास ने शकुंतला के सौंदर्य में डूबकर उसके सौंदर्य का वर्णन किया।

(ग) शकुंतला भले ही सुंदर थी, लेकिन ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ की नायिका शकुंतला की सुंदरता की सृष्टि कालिदास ने की थी। उसके सौंदर्य का वर्णन करने के लिए कवि शकुंतला के सौंदर्य में डूब गया और उसने सुंदरता के सभी पक्षों को देखते हुए काव्य-रचना की।

(घ) ईश्वरीय-कृपा, प्रेमी-हृदय दुष्यंत का असीम प्रेम तथा कवि कालिदास की सौंदर्य मुग्ध दृष्टि तीनों तत्त्वों ने समन्वित रूप में शकुंतला के सौंदर्य का निर्माण किया।

(ङ) जब राजा दुष्यंत शकुंतला के चित्र का निर्माण कर रहे थे तो उन्हें लगा कि यह चित्र पूर्ण नहीं है। उसका मन खीझ उठा। काफी देर सोचने के पश्चात् उन्हें ज्ञात हुआ कि उन्होंने शकुंतला के कानों में शिरीष के फूलों को नहीं लगाया है और न ही गले में कोमल तथा सुंदर कमलनाल का हार पहनाया है।

[6] कालिदास सौंदर्य के बाह्य आवरण को भेदकर उसके भीतर तक पहुँच सकते थे, दुख हो कि सुख, वे अपना भाव-रस उस अनासक्त कृपीवल की भाँति खींच लेते थे जो निर्दलित ईक्षुदंड से रस निकाल लेता है। कालिदास महान थे, क्योंकि वे अनासक्त रह सके थे। कुछ इसी श्रेणी की अनासक्ति आधुनिक हिंदी कवि सुमित्रानंदन पंत में है। कविवर रवींद्रनाथ में यह अनासक्ति थी। एक जगह उन्होंने लिखा-‘राजोद्यान का सिंहद्वार कितना ही अभ्रभेदी क्यों न हो, उसकी शिल्पकला कितनी ही सुंदर क्यों न हो, वह यह नहीं कहता कि हममें आकर ही सारा रास्ता समाप्त हो गया। असल गंतव्य स्थान उसे अतिक्रम करने के बाद ही है, यही बताना उसका कर्तव्य है।’ फूल हो या पेड़, वह अपने-आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए उठी हुई अँगुली है। वह इशारा है। [पृष्ठ-147]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा उसके स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। इस गद्यांश में लेखक ने कालिदास की सौंदर्य दृष्टि की सूक्ष्मता तथा पूर्णता का वर्णन किया है। यहाँ लेखक ने कालिदास के अतिरिक्त सुमित्रानंदन पंत तथा रवींद्रनाथ को भी अनासक्त कवि कहा है।

व्याख्या-कालिदास सुंदरता के सच्चे पारखी थे। वे सुंदरता के बाहरी परदे को पार करके उसकी गहराई में उतर जाते थे। चाहे सुख हो अथवा दुःख हो, वे अपने भाव-रस अनासक्त किसान के समान बाहर खींच कर ले आते थे। जिस प्रकार किसान भली-भाँति निचोड़े गन्ने से भी रस निकाल लेता है, उसी प्रकार कालिदास भी सौंदर्य में से भाव-रस निकाल लेते थे। कालिदास इसलिए महान् थे, क्योंकि वे अनासक्त व्यक्ति थे। उन्हें किसी से लगाव नहीं था। कवि सुमित्रानंदन पंत भी इसी श्रेणी के आसक्तिहीन कवि थे। कवि रवींद्रनाथ ठाकुर में भी अनासक्ति थी। इन दोनों कवियों ने सुख-दुःख की परवाह न करते हुए सुंदर काव्य-रचनाएँ लिखी हैं।

एक स्थल पर उन्होंने लिखा भी है राजा के उद्यान का मुख्यद्वार चाहे कितना भी ऊँचा हो, उसकी शिल्पकला सुंदरतम क्यों न हो, वह कभी नहीं कहता कि मेरे अंदर आकर सब रास्ते समाप्त हो गए हैं। भाव यह है कि सौंदर्य चाहे कितना महान् क्यों न हो, लेकिन वह अंतिम नहीं होता। असली पहुँचने का स्थान तो उसे पार करने के बाद ही मिलता है। यह संकेत करना उस मुख्य द्वार का कर्तव्य है। अंत में लेखक कहता है कि चाहे फूल हो चाहे वृक्ष, वे अपने आप में पूर्ण नहीं होते। वे किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए अपनी अँगुली से इशारा करते हैं अर्थात् वे हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और समझाते हुए कहते हैं कि उससे बढ़कर भी हो सकता है, उसकी खोज करो।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि कालिदास की सौंदर्य दृष्टि बड़ी गंभीर और अंतर्भेदनी थी।
  2. कवि ने सुमित्रानंदन पंत तथा रवींद्रनाथ ठाकुर को अनासक्त कवि कहा है।
  3. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी का प्रयोग हुआ है।
  4. विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग है।
  5. वाक्य-विन्यास सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कालिदास की सौंदर्य दृष्टि किस प्रकार की थी?
(ख) अनासक्ति का क्या अर्थ है?
(ग) कालिदास, सुमित्रानंदन पंत तथा रवींद्रनाथ में क्या समानताएँ थीं?
(घ) रवींद्रनाथ ने राजोद्यान के माध्यम से क्या संदेश दिया है?
उत्तर:
(क) कालिदास की सौंदर्य दृष्टि बड़ी सूक्ष्म एवं गहन थी। उन्होंने सुंदरता के बाहरी रूप को कभी नहीं देखा। वे सुंदरता के भीतर प्रवेश करना जानते थे। इसलिए उन्होंने बाहरी तथा भीतरी दोनों प्रकार के सौंदर्य का वर्णन किया है।

(ख) अनासक्ति का आशय है-व्यक्तिगत सुख-दुःख तथा लाभ-हानि से ऊपर उठना। सौंदर्य को भी इसी दृष्टि से देखना अनासक्त कहलाता है।

(ग) कालिदास, सुमित्रानंदन पंत तथा रवींद्रनाथ तीनों अनासक्त कवि थे। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-दुःख, लाभ-हानि एवं राग-द्वेष से ऊपर उठकर सौंदर्य के वास्तविक रूप को समझा और उसके मर्म को जाना। ये तीनों कवि वास्तविक सौंदर्य को देखने की क्षमता रखते थे।

(घ) राजोद्यान के बारे में रवींद्रनाथ ने कहा है कि सौंदर्य कितना परिपूर्ण या बहुमूल्य क्यों न हो, लेकिन वह अंतिम नहीं होता। बल्कि वह सौंदर्य किसी ओर सर्वोत्तम तथा ऊँचे सौंदर्य की ओर इशारा करता है तथा निरंतर आगे बढ़ने का संदेश देता है।

[7] शिरीष तरु सचमुच पक्के अवधूत की भाँति मेरे मन में ऐसी तरंगें जगा देता है जो ऊपर की ओर उठती रहती हैं। इस चिलकती धूप में इतना इतना सरस वह कैसे बना रहता है? क्या ये बाह्य परिवर्तन धूप, वर्षा, आँधी, लू-अपने आपमें सत्य नहीं हैं? हमारे देश के ऊपर से जो यह मार-काट, अग्निदाह, लूट-पाट, खून-खच्चर का बवंडर बह गया है, उसके भीतर भी क्या स्थिर रहा जा सकता है? शिरीष रह सका है। अपने देश का एक बूढ़ा रह सका था। क्यों मेरा मन पूछता है कि ऐसा क्यों संभव हुआ? क्योंकि शिरीष भी अवधूत है। शिरीष वायुमंडल में रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर है। गांधी भी वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल और इतना कठोर हो सका था। मैं जब-जब शिरीष की ओर देखता हूँ तब तब हूक उठती है-हाय, वह अवधूत आज कहाँ है! [पृष्ठ-147-148]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित निबंध ‘शिरीष के फूल’ में से लिया गया है। इसके लेखक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हैं। प्रस्तुत निबंध में लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती तथा उसके स्वरूप के वर्णन के साथ-साथ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। यहाँ लेखक शिरीष के फूल को याद करते हुए देश की वर्तमान स्थिति पर प्रकाश डालता है।

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व्याख्या लेखक का कथन है कि शिरीष का वृक्ष सचमुच एक पक्का अवधूत है। वह मेरे मन में भाव-तरंगें उत्पन्न करता है। ये भाव-तरंगें ऊपर को उठती हैं और मेरे मन में हलचल पैदा करती हैं। लेखक सोचता है कि शिरीष का वृक्ष इतनी तपती धूप में भी इतना सरस क्यों बना हुआ है? उसमें ऐसी क्षमता कहाँ से आई है। यह जो बाहरी परिवर्तन हो रहा है, उसमें धूप, वर्षा, आँधी, लू आदि क्या सच्चाई नहीं है। यह सच्चाई है। लेकिन शिरीष का वृक्ष इन विपरीत तथा कठोर परिस्थितियों में जीना जानता है। हमारे देश में भी काफी मार-काट हुई है, घरों को जलाया गया है, लोगों का कत्ल किया गया है। यह विनाशकारी आँधी हमारे देश में चली है।

क्या हम इन कठिन परिस्थितियों में जिंदा नहीं रह सकते। जब शिरीष कठिन परिस्थितियों में स्थिर रह सकता है तब हम भी रह सकते हैं। हमारे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भी इन कठोर परिस्थितियों में जीवित रहे थे। लेखक का मन उससे पूछता है कि ऐसा कैसे हो सका और क्यों हो सका। वे स्वयं उत्तर देते हुए कहते हैं कि शिरीष एक अनासक्त संन्यासी है। वह वायुमंडल से रस खींचकर कोमल भी बन सकता है और कठोर भी। महात्मा गांधी ने भी ऐसा ही किया था। उन्होंने भी वायुमंडल से रस प्राप्त करके कठोर जीवन यापन किया। लेखक जब-जब शिरीष की ओर देखता है तब-तब उसके मन में प्रश्न उठता है कि वह अनासक्त संन्यासी कहाँ चला गया? उस जैसे अवधूत अब कहीं दिखाई नहीं देते।।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने विचारात्मक शैली द्वारा शिरीष के वृक्ष के माध्यम से वर्तमान भारत की स्थिति पर समुचित प्रकाश डाला है।
  2. लेखक ने शिरीष के साथ महात्मा गांधी की तुलना की है।
  3. सहज एवं सरल साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  4. वाक्य-विन्यास सटीक एवं सार्थक है तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. विचारात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) शिरीष के वृक्ष के बारे में लेखक ने क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की है?
(ख) अग्निकांड और मार-काट में कौन-कौन स्थिर रह सके?
(ग) लेखक ने शिरीष को अवधूत क्यों कहा है?
(घ) एक बूढ़े से लेखक का क्या अभिप्राय है और उसकी तुलना शिरीष से क्यों की गई है?
(ङ) गांधी जी किस तरह कोमल व कठोर बने रह सके?
उत्तर:
(क) शिरीष का वृक्ष लेखक के मन में भाव-तरंगों को उठाता है। भाव यह है कि शिरीष के वृक्ष को देखकर लेखक के मन में उदात्त भाव उत्पन्न होने लगते हैं।

(ख) अग्निकांड और मार-काट के बीच शिरीष का वृक्ष स्थिर रह सका और महात्मा गांधी भी। शिरीष का वृक्ष तपती लू तथा धूप में जिंदा रह सका। इसी प्रकार महात्मा गांधी भारत-पाक विभाजन के समय हुई हिंसा के बावजूद स्थिर बने रहे।

(ग) लेखक ने शिरीष को अवधूत इसलिए कहा है क्योंकि वह ग्रीष्म ऋतु की तपन और लू के बावजूद वायुमंडल से रस खींचता है और फलता-फूलता है। इन विपरीत परिस्थितियों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

(घ) एक बूढ़े से लेखक का अभिप्राय महात्मा गांधी है, जिन्होंने भारत-पाक विभाजन के समय हिंसा का सामना किया और लोगों को शांत बने रहने की शिक्षा दी। गांधी जी ने भी शिरीष के समान कठिनाइयों में सरस रहना सीखा।

(ङ) गांधी जी ने अपनी आँखों से मार-काट को देखा। वे मार-काट करने वालों के आगे कठोर बनकर खड़े हो गए और इसी हिंसा के कारण उनके मन में करुणा की भावना उत्पन्न हुई और वे कोमल भी हो गए। इन विपरीत परिस्थितियों में भी गांधी जी कोमल व कठोर बने रहे।

शिरीष के फूल लेखक-परिचय

प्रश्न-
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के सुप्रसिद्ध निबंधकार थे। निबंधों की रचना द्वारा उन्होंने निबंध-साहित्य को समृद्ध किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जन्म उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के आरत दुबे का छपरा गाँव में सन् 1907 में हुआ था। उनके पिता अनमोल द्विवेदी बहुत अध्ययनशील तथा संत-स्वभाव के थे। द्विवेदी जी की प्रारंभिक शिक्षा अपने जिले के विद्यालयों में हुई। सन् 1930 में उन्होंने ‘शास्त्राचार्य’ की परीक्षा उत्तीर्ण की। लेखक ने बाल्यकाल में ही मैथिलीशरण गुप्त की ‘भरत-भारती’ तथा ‘जयद्रथ-वध’ जैसी कृतियों को कंठस्थ कर लिया था। उन्होंने ‘उपनिषद्’, ‘महाभारत’ तथा ‘दर्शन-ग्रंथों’ का अध्ययन किशोरावस्था में ही कर लिया था। द्विवेदी जी ‘रामचरितमानस’ का नियमित रूप से पाठ किया करते थे।

सन् 1930 में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी की नियुक्ति शांति-निकेतन में हिंदी अध्यापक के पद पर हुई। वहाँ पर उनको विश्वकवि रवींद्रनाथ ठाकुर, महामहोपाध्याय पं० विधु शेखर भट्टाचार्य, आचार्य क्षितिमोहन सेन, आचार्य नंदलाल बसु जैसे विश्व-विख्यात विभूतियों के संपर्क में आने का अवसर मिला। इस वातावरण ने लेखक के दृष्टिकोण को अत्यधिक व्यापक बना दिया।

अध्यापन के क्षेत्र में आचार्य द्विवेदी का बहुत योगदान रहा है। कलकत्ता में शांति निकेतन’ में अध्यापन के पश्चात् लगभग दस वर्ष तक उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तथा अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। तत्पश्चात् वे पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में भी हिंदी के वरिष्ठ प्रोफेसर तथा टैगोर-पीठ’ के आचार्य पद पर प्रतिष्ठित रहे। भारत सरकार ने इन्हें ‘पद्म-भूषण’ से अलंकृत किया। ये भारत सरकार की अनेक समितियों के निदेशक तथा सदस्य के रूप में हिंदी भाषा तथा साहित्य की सेवा करते हुए सन् 1979 में दिल्ली में स्वर्ग-सिधार गए।

2. प्रमुख रचनाएँ-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने विभिन्न विधाओं पर सफलतापूर्वक लेखनी चलाई है। उनकी प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं

  • समीक्षात्मक ग्रंथ-‘सूर साहित्य,’ ‘हिंदी साहित्य की भूमिका’, ‘मध्यकालीन धर्म साधना’, ‘सूर और उनका काव्य’, ‘नाथ-संप्रदाय’, ‘कबीर’, ‘मेघदूत’, ‘एक पुरानी कहानी’, ‘हिंदी साहित्य का आदिकाल’, ‘लालित्य मीमांसा’ आदि।
  • उपन्यास- बाणभट्ट की आत्मकथा’, ‘चारु चंद्र लेख’, ‘पुनर्नवा’ तथा ‘अनामदास का पोथा’।
  • निबंध-संग्रह ‘अशोक के फूल’, ‘विचार-प्रवाह’, ‘विचार और वितर्क’, ‘कल्पलता’, ‘कुटज’ तथा ‘भारत के कलात्मक विनोद’।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-हिंदी निबंध-साहित्य में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के पश्चात् आचार्य द्विवेदी जी सवश्रेष्ठ निबंधकार हैं। उन्होंने हिंदी साहित्य को जहाँ गवेषणात्मक, आलोचनात्मक और विचारात्मक निबंध प्रदान किए, वहाँ उन्होंने ललित निबंधों की रचना भी की है। वे हिंदी के प्रथम एवं श्रेष्ठ ललित निबंधकार हैं। यद्यपि उन्होंने पहली बार ललित निबंधों की रचना की, किंतु फिर भी उनका प्रयास अधूरा न होकर पूर्ण है। उनके निबंध साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) प्राचीन एवं नवीन का समन्वय आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध साहित्य में प्राचीन एवं नवीन विचारों का अपूर्व समन्वय है। उन्होंने अपने निबंधों में जहाँ एक ओर सनातन जीवन-दर्शन और साहित्य-सिद्धांतों को अपनाया है वहीं दूसरी ओर अपने युग के नवीन अनुभवों को लिया है। प्राचीन और नवीन विचारधाराओं के सामञ्जस्य से जो नए-नए निष्कर्ष निकलते हैं वे ही उनके साहित्य की अपूर्व देन कही जाती है। इस नए दृष्टिकोण से आज के साहित्यकारों व समाज को एक नई राह मिल सकती है अथवा जिसे अपने जीवन में धारण करके मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है।

(ii) विषयों की विविधता आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का जीवन-अनुभव बहुत गहन एवं विस्तृत है। उन्होंने जीवन के विविध पक्षों को समीप से देखा और परखा है। अपने विस्तृत जीवन-अनुभव के कारण ही उन्होंने अनेक विषयों को अपने निबंधों का आधार बनाया है। उनके निबंधों को विषय-विविधता के आधार पर निम्नलिखित कोटियों में रखा जा सकता है

  • सांस्कृतिक निबंध
  • ज्योतिष संबंधी
  • समीक्षात्मक
  • नैतिक
  • वृक्ष अथवा प्रकृति संबंधी।

(iii) मानवतावादी विचारधारा-द्विवेदी जी के निबंध साहित्य में मानवतावादी विचारधारा के सर्वत्र दर्शन होते हैं। इस विषय में द्विवेदी जी ने स्वयं लिखा है, “मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न कर सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर, संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।” आचार्य द्विवेदी का साहित्य संबंधी यह दृष्टिकोण उनके साहित्य में भी फलित हुआ है। इसीलिए उनके साहित्य में स्थान-स्थान पर मानवतावादी विचारों के दर्शन होते हैं।

(iv) भारतीय संस्कृति में विश्वास-आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी सदैव भारतीय संस्कृति के पक्षधर बने रहे। इसीलिए उनके निबंध साहित्य में भारतीय संस्कृति की महानता की तस्वीर देखी जा सकती है। भारतीय संस्कृति का जितना सूक्ष्मतापूर्ण अध्ययन व ज्ञान उनके निबंधों में व्यक्त हुआ है, वह अन्यत्र नहीं है। उन्होंने भारत की संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों में एकता या एकसूत्रता के दर्शन किए हैं। जीवन की एकरूपता की यही दृष्टि उनके साहित्य में साकार रूप धारण करके प्रकट हुई है। द्विवेदी जी सारे संसार के मनुष्यों में एक सामान्य मानव संस्कृति के दर्शन करते हैं। भारतीय संस्कृति के प्रति विश्वास एवं निष्ठा रखने का यह भी एक कारण है। ‘अशोक के फूल’, ‘भारतीय संस्कृति की देन’ आदि निबंधों में उनका यह विश्वास सशक्तता से व्यक्त हुआ है।

(v) भाव तत्त्व की प्रधानता आचार्य द्विवेदी के निबंध साहित्य की अन्य प्रमुख विशेषता है-भाव तत्त्व की प्रमुखता। भाव तत्त्व की प्रधानता के कारण ही भाषा धारा-प्रवाह रूप में आगे बढ़ती है। वे गंभीर-से-गंभीर विचार को भी भावात्मक शैली में लिखकर उसे अत्यंत सहज रूप में प्रस्तुत करने की कला में निपुण हैं। इसी कारण उनके निबंधों में कहीं विचारों की जटिलता या क्लिष्टता अनुभव नहीं होती। इस दृष्टि से ‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध की ये पंक्तियाँ देखिए

“एक-एक बार मुझे मालूम होता है कि यह शिरीष एक अद्भुत अवधूत है। दुःख हो या सुख, वह हार नहीं मानता। न ऊधो का लेना, न माधो का देना। जब धरती और आसमान जलते रहते हैं तब भी यह हज़रत न जाने कहाँ से अपना रस खींचते रहते हैं। मौज में आठों याम मस्त रहते हैं।”

(vi) संक्षिप्तता-संक्षिप्तता निबंध का प्रमुख तत्त्व है। द्विवेदी जी ने अपने निबंधों के आकार की योजना में इस तत्त्व का विशेष ध्यान रखा है। यही कारण है कि उनके निबंध आकार की दृष्टि से संक्षिप्त हैं। ये आकार में छोटे होते हुए भी भाव एवं विचार तत्त्व की दृष्टि से पूर्ण हैं। ये विषय-विवेचन की दृष्टि से सुसंबद्ध एवं कसावयुक्त हैं। शैली एवं शिल्प की दृष्टि से भी कहीं अधिक फैलाव नहीं है। विषय का विवेचन अत्यंत गंभीर एवं पूर्ण है। इसलिए निबंध कला का आदर्श बने हुए हैं।

(vii) देश-प्रेम की भावना आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध साहित्य में देश-प्रेम की भावना के सर्वत्र दर्शन होते हैं। वे देश-प्रेम को हर नागरिक का परम धर्म मानते हैं। जिस मिट्टी में हम पैदा हुए, हमारा शरीर जिसके अन्न, जल, वायु से पुष्ट हुआ, उसके प्रति लगाव या प्रेम-भाव रखना स्वाभाविक है। इसलिए उन्होंने अपने निबंध साहित्य में देश-प्रेम की भावना की बार-बार और अनेक प्रकार से अभिव्यक्ति की है। इस दृष्टि से उन्होंने अपने निबंधों में अपने देश की संस्कृति, प्रकृति, नदियों, पर्वतों, सागरों, जनता के सुख-दुःख का अत्यंत आत्मीयतापूर्ण वर्णन किया है। ‘मेरी जन्मभूमि’ निबंध इस दृष्टि से अत्यंत उत्तम निबंध है। इस निबंध में उन्होंने लिखा भी है, “यह बात अगर छिपाई भी तो भी कैसे छिप सकेगी कि मैं अपनी जन्मभूमि को प्यार करता हूँ।”

4. भाषा-शैली-आचार्य द्विवेदी जी के निबंधों में गंभीर पांडित्य और सरस हार्दिकता दोनों का साथ-साथ निर्वाह हुआ है। पांडित्य एवं लालित्य का ऐसा सामञ्जस्य मिलना दुर्लभ है। वे विषय को सरल-सहज भावों में इस प्रकार व्यक्त करते हैं कि पाठक विषय को हृदयगंम करता चलता है। द्विवेदी जी की तत्सम प्रधान साहित्यिक भाषा है। इसमें उन्होंने छोटे एवं बड़े दोनों प्रकार के वाक्यों का प्रयोग किया है। जहाँ लंबे वाक्यों का प्रयोग हुआ है, वहाँ विचार को समझने में अवश्य थोड़ी कठिनाई अनुभव होती है। उनकी भाषा में तत्सम शब्दावली के अतिरिक्त यथास्थान तद्भव, अंग्रेज़ी, उर्दू-फारसी व देशज शब्दों का भी भरपूर प्रयोग हुआ है। भाषा सुसंगठित, परिष्कृत, विषयानुकूल एवं प्रवाहमयी है। उनकी रचनाओं में भावात्मकता, लालित्य एवं माधुर्य का समावेश सर्वत्र दिखलाई पड़ता है। उन्होंने अपने निबंधों में विचारात्मक, व्यंग्यात्मक एवं भावात्मक शैलियों का सफल प्रयोग किया है।

शिरीष के फूल पाठ का सार

प्रश्न-
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित ‘शिरीष के फूल’ शीर्षक निबंध का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:’
शिरीष के फूल’ आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक ललित निबंध है। इसमें लेखक ने शिरीष के फूल के सौंदर्य, उसकी मस्ती और स्वरूप का वर्णन करते हुए कुछ सामाजिक विषयों पर भी प्रकाश डाला है। लेखक ने प्राचीन साहित्य में शिरीष के महत्त्व का विवेचन करते हुए उसकी तुलना एक अवधूत के साथ की है। इस निबंध में उन्होंने शिरीष के फूल के माध्यम से मानव की दृढ़ इच्छा-शक्ति का सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण किया है। लेखक का प्रकृति के प्रति अनन्य प्रेम है। वे जहाँ बैठकर निबंध लिख रहे थे वहाँ उनके आस-पास शिरीष के फूल खिले हुए थे। जब जेठ की दोपहरी की जलती हुई धूप में अन्य फूल व वनस्पति मुरझा गई थी उस समय शिरीष के पेड़ फूलों से लदे हुए झूम रहे थे। बहुत कम ऐसे वृक्ष होते हैं जो गर्मी के मौसम तक फूलों से लदे रहते हैं। कनेर और अमलतास के पेड़ भी गर्मी में ही फूलते हैं, किंतु केवल पंद्रह-बीस दिन के लिए ही। इसी प्रकार वसंत में पलाश के पेड़ भी खूब फूलते हैं, किन्तु कुछ समय पश्चात् वे फूल-रहित होकर ठूठ से दिखाई देने लगते हैं। लेखक का मत है कि ऐसे कुछ देर फूलने वाले वृक्षों से तो न फूलने वाले वृक्ष अच्छे हैं।

शिरीष का फूल अन्य वृक्षों से कुछ अलग प्रवृत्ति वाला है। वह वसंत के आते ही अन्य पेड़-पौधों के समान फूलों से लद जाता है और आषाढ़ के मास तक अर्थात् वर्षा काल तक निश्चित रूप से फूलों से लदा रहकर प्रकृति की शोभा बढ़ाता रहता है। कभी-कभी भादों मास तक भी इस पर फूल खिलते रहते हैं। भयंकर गर्मी में भी शिरीष कालजयी अवधूत की भाँति जीवन की अजेयता का मंत्र पढ़ता हुआ प्रतीत होता है।

शिरीष के फूल नए फूल आने तक अपना स्थान नहीं छोड़ते। यह पुराने की अधिकार-लिप्सा है। लेखक ने मनुष्य की इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए लिखा है, “जब तक नये फल-पत्ते मिलकर धकियाकर उन्हें बाहर नहीं कर देते तब तक वे डटे रहते हैं। वसंत के आगमन के समय जब सारी वनस्थली पुष्प-पत्र से मर्मरित होती रहती है, शिरीष के पुराने फल बुरी तरह खड़खड़ाते रहते हैं। मझे इनको देखकर उन नेताओं की याद आती है जो किसी प्रकार के जमाने का रुख नहीं पहचानते और जब तक नयी पौध के लोग उन्हें धक्का मारकर निकाल नहीं देते तब तक जमे रहते हैं।”

जब बुढ़ापा और मृत्यु सबके लिए निश्चित है तो शिरीष के फूलों को भी निश्चित रूप से झड़ना पड़ेगा, किंतु वे अड़े रहते हैं। न जाने वे ऐसा क्यों करते हैं। वे मूर्ख हैं, सोचते होंगे कि वे सदा ऐसे ही बने रहेंगे, कभी मरेंगे नहीं। इस संसार में भला कोई सदा बना रह सका है। काल देवता की आँख से कोई नहीं बच सकता। वृक्ष के पेड़ की यह खूबी है कि वह सुख-दुःख में सदा . समभाव बना रहता है। यदि वह वसंत में हँसता है तो ग्रीष्म ऋतु की तपन को सहता हुआ भी मुस्कुराता रहता है। लेखक को आश्चर्य होता है कि गर्मी के मौसम में वह कहाँ से रस प्राप्त करके जीवित रहता है। किसी वनस्पतिशास्त्री ने लेखक को बताया कि वह वायुमंडल से अपना रस प्राप्त कर लेता है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 17 शिरीष के फूल

आचार्य द्विवेदी जी का मत है कि संसार में अवधूतों के मुँह से ही संसार की सरल रचनाओं का जन्म हुआ। कबीर और कालिदास भी शिरीष की भाँति ही अवधूत प्रवृत्ति के रहे होंगे क्योंकि जो कवि अनासक्त नहीं रह सकता, वह फक्कड़ प्रवृत्ति का नहीं हो सकता। शिरीष का वृक्ष भी ऐसी फक्कड़ किस्म की मस्ती लेकर झूमता है। लेखक ने शिरीष के फूल के महत्त्व को दर्शाने के लिए प्राचीन प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा है, “राजा दुष्यंत भी अच्छे-भले प्रेमी थे। उन्होंने शकुंतला का एक चित्र बनाया था, लेकिन रह-रहकर उनका मन खीझ उठता था। उहूँ कहीं-न-कहीं कुछ छूट गया है। बड़ी देर बाद उन्हें समझ में आया कि शकुंतला के कानों में वे उस शिरीष पुष्प को देना भूल गये हैं जिसके केसर गंडस्थल तक लटके हुए थे और रह गया है शरच्चंद्र की किरणों के समान कोमल और शुभ्र मृणाल का हार।”

कालिदास की भाँति ही हिंदी के कवि सुमित्रानंदन पंत में भी अनासक्ति है। महान् कवि रवींद्रनाथ में भी यह अनासक्ति दिखलाई पड़ती है। लेखक की मान्यता है कि फूल हो या पेड़ वह अपने आप में समाप्त नहीं है। वह किसी अन्य वस्तु को दिखाने के लिए संकेत है। शिरीष का पेड़ सचमुच में लेखक के हृदय में अवधूत की भाँति तरंगें जगा देता है। वह विपरीत स्थितियों में भी स्थिर रह सकता है, यद्यपि ऐसा करना सबके लिए संभव नहीं होता। हमारे देश में महात्मा गांधी भी ऐसी ही विपरीत परिस्थितियों की देन थी। वे भी शिरीष की भाँति वायुमंडल से रस खींचकर इतना कोमल तथा कठोर हो सका। लेखक जब भी शिरीष के पेड़ को देखता है तो उसे गांधी जैसे अवधूत की स्मृति आ जाती है।

कठिन शब्दों के अर्थ

धरित्री = पृथ्वी। निर्धूम = धुएँ के बिना। कर्णिकार = कनेर। आरग्वध = अमलतास। पलास = ढाक। लहकना = खिलना। खंखड़ = ढूँठ। दुमदार = पूँछ वाले। लँडूरे = बिना पूँछ वाले। निर्घात = बिना बाधा के। लू = गर्म हवा। एकमात्र = इकलौता। कालजयी = समय को जीतने वाला। अवधूत = सांसारिक विषय-वासनाओं से ऊँचा उठा हुआ संन्यासी, वाममार्गी तांत्रिक। हिल्लोल = लहर। मंगलजनक = शुभदायक। अरिष्ट = रीठा का वृक्ष । पुन्नाग = सदाबहार वृक्ष । घनमसृण = घना चिकना। हरीतिमा = हरियाली। परिवेष्टित = ढका हुआ। कामसूत्र = वात्स्यायन का काम संबंधी ग्रंथ। दोला = झूला। तुंदिल = मोटे पेट वाला। परवर्ती = बाद के। मर्मरित = खड़खड़ाहट या सरसराहट की ध्वनि। सपासप = कोड़े पड़ने की आवाज। जीर्ण = पुराना। ऊर्ध्वमुखी = प्रगति की ओर। दुरंत = जिसका विनाश न हो सके। सर्वव्यापक = सर्वत्र व्याप्त। कालाग्नि = मृत्यु की आग। हज़रत = श्रीमान। अनासक्त = निर्लिप्त। अनाविल = स्वच्छ। उन्मुक्त = स्वच्छंद, द्वंद्वरहित। फक्कड़ = मस्तमौला। कर्णाट = प्राचीन काल का कर्नाटक राज्य । उपालंभ = उलाहना। स्थिर-प्रज्ञता = अविचल बुद्धि की अवस्था। विदग्ध = अच्छी प्रकार तपा हुआ। मुग्ध = आनंदित। विस्मय-विमूढ़ = आश्चर्यचकित। कार्पण्य = कंजूसी। गंडस्थल = कपोल, गाल। शरच्चंद्र = शरद ऋतु का चाँद। शुभ्र = श्वेत। मृणाल = कमलनाल। कृपीवल = किसान। निर्दलित = अच्छी तरह से निचोड़ा हुआ। ईक्षुदंड = गन्ना। अभ्रभेदी = गगनचुंबी। गंतव्य = लक्ष्य । खून-खच्चर = लड़ाई-झगड़ा। हूक = वेदना, पीड़ा।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 12th Class Hindi नमक Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
सफिया के भाई ने नमक की पुड़िया ले जाने से क्यों मना कर दिया?
उत्तर:
सफ़िया पाकिस्तान से सिख बीबी को भेंट के रूप में नमक की पुड़िया देने के लिए हिंदुस्तान में ले जाना चाहती थी। लेकिन सफ़िया का भाई स्वयं पुलिस अधिकारी था। उसने नमक की पुड़िया साथ ले जाने से अपनी बहन को मना कर दिया। वह इस बात को जानता था कि पाकिस्तान से हिंदुस्तान में नमक ले जाना गैर-कानूनी था। यदि सफ़िया नमक की पुड़िया ले जाती तो भारत-पाक सीमा पार करते समय कस्टम अधिकारी उसे पकड़ लेते। ऐसा होने पर सफिया और उसके परिवार का अपमान होता। यही कारण है कि सफ़िया के भाई ने उसे नमक की पुड़िया ले जाने से मना कर दिया।

‘प्रश्न 2.
नमक की पुड़िया ले जाने के संबंध में सफिया के मन में क्या द्वंद्व था?
उत्तर:
भाई द्वारा यह कहने पर कि पाकिस्तान से हिंदुस्तान में नमक ले जाना गैर-कानूनी है। सफ़िया के मन में द्वंद्व छिड़ गया, परंतु वह सिख बीबी को निराश नहीं करना चाहती थी। वह सोचने लगी कि किस तरह नमक को सीमा पार ले जाए परंतु यह काम आसान नहीं था। नमक के पकड़े जाने पर वह भी पकड़ी जा सकती थी। पहले तो उसने नमक की पुड़िया को कीनू की टोकरी में छिपाया। नमक ले जाने के अन्य तरीकों के बारे में भी वह सोचने लगी। परंतु अंत में इस द्वंद्व को समाप्त करते हुए उसने यह निर्णय लिया कि वह कस्टम अधिकारी को नमक दिखाकर ले जाएगी, चोरी से नहीं ले जाएगी।

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प्रश्न 3.
जब सफिया अमृतसर पुल पर चढ़ रही थी तो कस्टम ऑफिसर निचली सीढ़ी के पास सिर झुकाए चुपचाप क्यों खड़े थे?
उत्तर:
जब सफ़िया अमृतसर के पुल पर चढ़ रही थी तो कस्टम अधिकारी निचली सीढ़ी के पास सिर झुकाए खड़े थे। सिख बीबी का प्रसंग आने पर उस अफसर को अपने वतन ढाका की याद आने लगी। वह सफ़िया और सिख बीबी की भावनाओं के कारण संवेदनशील हो चुका था। उन्हें लगा कि भारत-पाकिस्तान की यह सीमा बनावटी है जबकि लोगों के दिल आपस में जुड़े हुए हैं। जो लाहौर में पैदा हुए थे वे लाहौर के लिए तरसते हैं, जो दिल्ली में पैदा हुए थे वे दिल्ली के लिए तरसते हैं तथा जो ढाका में पैदा हुआ था वह ढाका के लिए तरस रहा था। कस्टम अधिकारी मन-ही-मन सोच रहा था कि उसे उसके वतन से अलग क्यों कर दिया गया है।

प्रश्न 4.
लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा या मेरा वतन ढाका है जैसे उद्गार किस सामाजिक यथार्थ का संकेत करते हैं?
उत्तर:
पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी का यह कथन है कि लाहौर अभी तक सिख बीबी का वतन है, दिल्ली मेरा वतन है लेकिन सुनील दासगुप्त ने कहा मेरा वतन ढाका है। ये उद्गार इस सामाजिक यथार्थ का उद्घाटन करते हैं कि देशों की सीमाएँ लोगों के मनों को विभक्त नहीं कर सकतीं। मानव तो क्या पक्षी भी अपनी जन्मभूमि से प्रेम करते हैं। स्वदेश प्रेम कोई ऐसा पौधा नहीं है जिसे मनमर्जी से गमले में उगाया जा सके। जिस देश में जिस व्यक्ति का जन्म होता है वह उससे हमेशा प्रेम करता है। यदि मानचित्र पर लकीरें खींचकर भारत-पाक विभाजन कर दिया गया तो ये लकीरें लोगों को अलग-अलग नहीं कर सकती। प्रत्येक मनुष्य स्वाभाविक रूप से अपनी जन्मभूमि से प्रेम करता है। यही कारण है कि जिन लोगों का जन्म पाकिस्तान में हुआ है आज भी यदाकदा उसे याद कर उठते हैं। जिन पाकिस्तानियों का जन्म भारत में हुआ है वे भारत को याद करते रहते हैं। इसलिए भारत-पाक विभाजन कृत्रिम है। यह लोगों के दिलों को विभक्त नहीं कर सकता।

प्रश्न 5.
नमक ले जाने के बारे में सफिया के मन में उठे द्वंद्वों के आधार पर उसकी चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
नमक ले जाने के बारे में सफ़िया के मन में जो द्वंद्व उत्पन्न होता है उसके आधार पर सफिया के चरित्र की निम्नलिखित उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं
(1) सफ़िया एक साहित्यकार है इसलिए बातचीत करते समय वह किसी प्रकार का संकोच नहीं करती। वह एक स्पष्ट वक्ता है। भाई से बहस हो जाने पर भी वह किसी प्रकार का संकोच न करके नमक ले जाने के लिए अड़ जाती है। अंततः उसका भाई हारकर चुप हो जाता है।

(2) यही नहीं सफ़िया एक निडर स्त्री भी है। उसका भाई उसे समझाता है कि कस्टमवाले किसी की नहीं सुनते। पाकिस्तान से भारत में नमक ले जाना गैर-कानूनी है। यदि तुम्हारा भेद खुल गया तो तुम मुसीबत में फँस जाओगी। लेकिन वह भाई की बातों से डरती नहीं। कस्टम अधिकारियों के समक्ष निडर होकर कहती है ‘देखिए मेरे पास नमक है थोड़ा-सा’ मैं अपनी मुँह बोली माँ के लिए ले जा रही हूँ।

(3) सफ़िया में दृढ़-निश्चय है उसने बहुत पहले यह निश्चय कर लिया था कि वह सिख बीबी के लिए नमक ले जाएगी। अपना वचन निभाते हुए वह सरहद के पार नमक लेकर आई। भले ही यह काम गैर-कानूनी था।

(4) यही नहीं सफ़िया एक ईमानदार स्त्री है। उसके भाई ने कहा था कि जब वह नमक लेकर सरहद से गुजरेगी तो कस्टमवाले उसे पकड़ लेंगे। तब उसने अपनी ईमानदारी का परिचय देते हुए कहा था-“मैं क्या चोरी से ले जाऊँगी? छिपाके ले जाऊँगी? मैं तो दिखा के, जता के ले जाऊँगी।

(5) सफ़िया में मानवता के गुण भी हैं। वह सोचती है कि भले ही भारत पाकिस्तान दो देश बन गए हों, परंतु यहाँ एक जैसी जमीन है, एक जुबान है, एक-सी सूरतें और लिबास हैं। फिर ये दो देश कैसे बन गए हैं। अपने भाई को टोकती हुई कहती है कि तुम बार-बार कानून की बात करते हो क्या सब कानून हुकूमत के होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत, इंसानियत के नहीं होते? आखिर कस्टमवाले भी इंसान होते हैं कोई मशीन तो नहीं होते।

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प्रश्न 6.
मानचित्र पर एक लकीर खींच देने भर से ज़मीन और जनता बँट नहीं जाती है उचित तर्कों व उदाहरणों के जरिए इसकी पुष्टि करें।
उत्तर:
मानचित्र पर लकीर खींच देने से न तो ज़मीन बँट जाती है न ही जनता। यह कथन कुछ सीमा तक सत्य है। नमक कहानी के द्वारा हमें लेखिका यह संदेश देना चाहती है कि सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है। पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी दिल्ली को अपना वतन मानता है और हिंदुस्तानी कस्टम अधिकारी ढाका को अपना वतन मानता है। परंतु सच्चाई यह है कि जो लोग पाकिस्तान भारत और बांग्ला देश में रहते हैं, उनकी एक-सी जमीन है, एक जुबान है, एक-सी सूरतें और लिबास हैं।

हैरानी की बात यह है कि भारत-पाक विभाजन हुए लंबा समय बीत चुका है, लेकिन सिख बीबी आज भी लाहौर को अपना वतन कहती है। उसे अपने वतन से बड़ा लगाव है इसलिए वह लाहौर का नमक चाहती है। भारतीय कस्टम अधिकारी ढाका के नारियल के पानी को लाजवाब मानता है। पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों को अपना सलाम भेजता है। वह कहता भी है-“जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा। उन खातून को यह नमक देते वक्त मेरी तरफ से कहिएगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा, तो बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा।”

प्रश्न 7.
नमक कहानी में भारत व पाक की जनता के आरोपित भेदभावों के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है, कैसे?
उत्तर:
यह सत्य है कि सत्ता के भूखे कुछ लोगों ने भारत-पाक का विभाजन कर दिया। परंतु वे लोग इन दोनों देशों के नागरिकों के स्नेह और प्रेम का विभाजन नहीं कर सके। ये भेदभाव मात्र आरोपित है। सफिया के भाई के व्यवहार में भारत-पाक का भेदभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। इस आरोपित भेदभाव के बावजूद सिख बीबी और सफिया और पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी तथा सुनील दासगुप्त तथा सफ़िया के व्यवहार में जो स्नेह और प्रेम दिखाई देता है, उससे दोनों देशों की जनता के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है। यह स्वाद इस पूरी कहानी में विद्यमान है। भारत और पाकिस्तान के लोगों के दिल आज भी जुड़े हुए हैं। आज भी जन्मभूमि की याद उन्हें व्याकुल कर देती है। सिख बीबी हो या पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी या भारतीय कस्टम अधिकारी सभी के बीच मुहब्बत का नमकीन स्वाद घुला हुआ है।

क्यों कहा गया

प्रश्न 1.
क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं, कुछ मुहब्बत, मुरौवत, आदमियत और इंसानियत के नहीं होते?
उत्तर:
सभी कानून हमेशा हुकूमत के ही होते हैं। जो लोग सत्ता प्राप्त करते हैं वही कानून बनाते हैं और उन कानूनों को लागू करते हैं। जो लोग उन कानूनों का पालन नहीं करते उन्हें सत्ता द्वारा दण्डित किया जाता है। यह कानून हुकूमत की सुविधा के लिए बनाए जाते हैं और उसमें प्रेम, मुहब्बत इंसानियत, आदमियत की कोई कीमत नहीं होती। यही कारण है कि आज सत्ता द्वारा बनाए गए कानून हुकूमत के गुलाम बनकर रह गए हैं।

प्रश्न 2.
भावना के स्थान पर बुद्धि धीरे-धीरे उस पर हावी हो रही थी।
उत्तर:
भावना मानव के हृदय से संबंधित है और बुद्धि मस्तिष्क से। जब किसी मनुष्य में भावना उत्पन्न होती है तो उसकी बुद्धि काम करना बंद कर देती है। सफिया इन्हीं भावनाओं के आवेश के कारण ही नमक की पुड़िया को सरहद पार ले जाना चाहती है। क्योंकि वह भावनाओं से काम कर रही थी और उसकी बुद्धि ठीक से नहीं सोच रही थी। इन्हीं भावनाओं में आने के कारण उसने अपने भाई की बात भी नहीं मानी। परंतु गुस्सा उतरने पर कस्टम का ध्यान आते ही उसकी बुद्धि भावनाओं पर हावी हो रही थी और वह नमक की पुड़िया को भारत लाने के लिए अन्य उपाय सोचने लगी।

प्रश्न 3.
मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।
उत्तर:
अकसर देखने में आया है कि कानून को लागू करने वाले अधिकारी भावनाहीन होते हैं परंतु वे भी मानव ही होते हैं। अनेक बार उनकी भावनाएँ उनकी बुद्धि पर हावी हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में कस्टम के कठोर नियम भी टूट कर बिखर जाते हैं। यही कारण है कि कस्टम अधिकारी ने सफिया से यह कहा कि मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कानून हैरान रह जाता है। कस्टम के दोनों अधिकारियों ने गैर-कानूनी नमक को सीमा के पार जाने दिया। मानवीय भावनाओं के प्रवाह के कारण नमक मानो उनके हाथों से फिसलकर भारत चला गया।

प्रश्न 4.
हमारी ज़मीन हमारे पानी का मज़ा ही कुछ और है!
उत्तर:
यह कथन भारतीय कस्टम अधिकारी सुनील दासगुप्त का है जो ढाका को अपना वतन मानता है। यह अपने देश, अपनी जन्मभूमि की ज़मीन तथा उसके पानी की प्रशंसा करता है। इसका प्रमुख कारण यही है कि सभी प्राणियों को अपनी जन्मभूमि प्रिय लगती है। लंका छोड़ते समय राम ने भी अपने भाई लक्ष्मण से कहा था-
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

समझाइए तो ज़रा

प्रश्न 1.
फिर पलकों से कुछ सितारे टूटकर दूधिया आँचल में समा जाते हैं।
उत्तर:
सिख बीबी लाहौर का नाम सुनकर सफ़िया के पास आकर बैठ गई। उसे लाहौर याद आने लगा, क्योंकि उसका वतन लाहौर है। लाहौर की याद में वह भावुक हो उठी और उसकी आँखों से आँसू रूपी सितारे टूटकर उसके सफेद मलमल के दुपट्टे में समा गए।

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प्रश्न 2.
किसका वतन कहाँ है वह जो कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ।
उत्तर:
भारत लौटने पर सफ़िया अमृतसर स्टेशन के पुल पर चली जा रही थी। वह मन में सोचने लगी कि पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी का वतन देहली है। सुनील दासगुप्त का वतन ढाका है। सिख बीबी का वतन लाहौर है। राजनीतिक दृष्टि से इनके वतन पाकिस्तान और भारत हैं। उनके शरीर कहीं हैं और दिल कहीं हैं। अतः यह निर्णय करना कठिन है कि किसका वतन कहाँ है? सच्चाई तो यह है कि सत्ता के भूखे लोगों ने ये सरहदें बना दी हैं परंतु लोगों की भावनाएँ इन सरहदों को नहीं मानतीं।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
‘नमक’ कहानी में हिंदुस्तान-पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की भावनाओं, संवेदनाओं को उभारा गया है। वर्तमान संदर्भ में इन संवेदनाओं की स्थिति को तर्क सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में सिख बीबी, भारतीय कस्टम अधिकारी, पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी तथा सफ़िया के द्वारा दोनों देशों में रहने वाले लोगों की भावनाओं और संवेदनाओं को उभारा गया है परंतु भारत और पाकिस्तान में कुछ ऐसी समस्याएँ हैं जिनके कारण हमेशा तनाव बना रहता है। भारत-पाक के बीच तीन बार युद्ध हो चुका है, दोनों ओर से हजारों सैनिक वीरगति को प्राप्त हो चुके हैं, परंतु सियाचिन और कश्मीर विवाद आज तक नहीं सुलझ पाए। दोनों देशों के राजनेता भड़काऊ बयान देकर लोगों की भावनाओं से खेलते रहते हैं परंतु यदि भारत और पाकिस्तान के लोग सभ्य मन से चाहें तो दोनों देशों के संबंधों में सुधार हो सकता है। पाकिस्तान के लोगों को अपने राजनेताओं को शान्तिमय वातावरण बनाने के लिए मजबूर करना चाहिए। इसी प्रकार भारत के लोगों को भी अपनी सरकार पर दबाव डालना चाहिए। यदि दोनों देशों की समस्याओं का हल निकल आता है तो लोगों को व्यर्थ के तनाव, भय और आशंका से मक्ति मिल सकेगी। इसके साथ-साथ उग्रवाद भारत का हो या पाकिस्तान का उसकी नकेल कसनी भी जरूरी है।

प्रश्न 2.
सफिया की मनःस्थिति को कहानी में एक विशिष्ट संदर्भ में अलग तरह से स्पष्ट किया गया है। अगर आप सफिया की जगह होते/होती तो क्या आपकी मनःस्थिति भी वैसी ही होती? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
सफ़िया के मन में धर्म को लेकर किसी प्रकार की साम्प्रदायिकता नहीं थी। वह अपने पड़ोसी के घर कीर्तन में भाग लेती है और प्रसाद लेकर घर लौटती है। यही नहीं सिख बीबी को अपनी माँ की हमशक्ल देखकर उन्हें अपनी माँ के समान मान लेती है। वह उससे नमक लाने का वादा भी करती है और उसे अच्छी तरह निभाती है। अगर मैं उसकी जगह होती तो मैं उसे स्पष्ट कह देती कि वह मेरी माँ हैं और मैं उसकी बेटी। यही नहीं मैं भी लाहौर से सिख बीबी के लिए नमक लेकर आती। भले ही मैं वह उपाय न अपनाती जिसे सफिया ने अपनाया था। मैं समझती हूँ कि सफिया और मेरी मनःस्थिति में कोई विशेष अंतर न होता। कोई भी संवेदनशील व्यक्ति सफ़िया के समान ही आचरण करता।

प्रश्न 3.
भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए दोनों सरकारें प्रयासरत हैं। व्यक्तिगत तौर पर आप इसमें क्या योगदान दे सकते/सकती हैं?
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान के आपसी संबंधों को सुधारने के लिए व्यक्तिगत तौर पर अनेक प्रकार के उपाय अपनाए जा सकते हैं। सर्वप्रथम हमें अपने मन से पाकिस्तान के प्रति शत्रु भाव को त्यागना होगा। यदि कोई पाकिस्तानी नागरिक किसी प्रसंग में भारत आता है तो हमें उसे उचित स्नेह और सम्मान देना चाहिए ताकि वह भारत के प्रति मन में सकारात्मक धारणा लेकर जाए। पाकिस्तान से आने वाले कलाकारों का हमें व्यक्तिगत तौर पर स्वागत और सत्कार करना चाहिए। विशेषकर वहाँ से आने वाले खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाना चाहिए। यदि हमें पाकिस्तान जाने का मौका मिले तो हमें वहाँ के लोगों को प्रेम और भाईचारे का पैगाम देना चाहिए। इसी प्रकार इंटरनेट के प्रयोग द्वारा पाकिस्तान में अपने मित्र बनाएँ और उन्हें भारत-पाक मैत्री का संदेश दें। इसी प्रकार हम एक दूसरे के देश के बारे में राजनीतिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक जानकारियों का आदान-प्रदान कर सकते हैं। अंततः पिछली कड़वी बातों को भुलाकर हमें पाकिस्तानियों के प्रति भाईचारे का व्यवहार करना चाहिए। हम चाहें तो दोनों देशों के बीच गीत-संगीत के कार्यक्रमों का आयोजन भी कर सकते हैं।

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प्रश्न 4.
लेखिका ने विभाजन से उपजी विस्थापन की समस्या का चित्रण करते हुए सफिया व सिख बीबी के माध्यम से यह भी परोक्ष रूप से संकेत किया है कि इसमें भी विवाह की रीति के कारण स्त्री सबसे अधिक विस्थापित है। क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी से यह स्पष्ट नहीं होता कि सिख बीबी विवाह की रीति के कारण ही विस्थापित होकर भारत में आई है तथा न ही सफिया विवाह के बाद विस्थापित होकर भारत आई है। परंतु इतना निश्चित है कि विवाह के बाद स्त्री को विस्थापित होना पड़ता है। अपने देश में स्त्री विवाह के बाद ससुराल के नगर में जाकर बसती है। कभी-कभी उसे विदेश में भी जाकर रहना पड़ता है लेकिन इन दोनों प्रकार की विस्थापनाओं में बहुत बड़ा अंतर है। विवाह के बाद का विस्थापन इतना अधिक पीड़ादायक नहीं होता परंतु देश विभाजन के कारण विस्थापन प्रत्येक व्यक्ति को पीड़ा पहुँचाता है भले ही वह नारी हो अथवा पुरुष हो।

प्रश्न 5.
विभाजन के अनेक स्वरूपों में बँटी जनता को मिलाने की अनेक भूमियाँ हो सकती हैं-रक्त संबंध, विज्ञान, साहित्य व कला। इनमें से कौन सबसे ताकर पर है और क्यों?
उत्तर:
निश्चय से विभाजन के अनेक स्वरूपों में बँटी जनता को मिलाने की अनेक भूमियाँ हो सकती हैं। ये भूमियाँ रक्त संबंध, विज्ञान, साहित्य तथा कला से जुड़ी हो सकती हैं, परंतु इनमें सबसे ताकतवर रक्त संबंध है। साहित्य तथा कला भले ही एक दूसरे को जोड़ते हैं परंतु सभी लोग न तो साहित्य प्रेमी होते हैं, न ही कला प्रेमी। इस प्रकार विज्ञान के अनेक उपकरण दूरदर्शन, रेडियो, इंटरनेट आदि लोगों को एक-दूसरे के नजदीक ला सकते हैं। लेकिन बुरे इरादे वाले लोग इनका दुरुपयोग भी कर सकते हैं। साहित्य भी पड़ोसी देशों को आपस में जोड़ने का काम कर सकता है परंतु ये सभी साधन रक्त संबंध की बराबरी नहीं कर सकते। जिस व्यक्ति के अपने सगे-संबंधी पाकिस्तान में रहते हैं, वह मन से कभी भी पाकिस्तान का अहित नहीं सोच सकता। इसी प्रकार जिस पाकिस्तानी का भाई, बहन अथवा मामा दिल्ली तथा हैदराबाद में रहते हैं वह यह कभी नहीं चाहेगा कि इन नगरों का अहित हो।

आपकी राय

प्रश्न-
मान लीजिए आप अपने मित्र के पास विदेश जा रहे हैं/रही हैं। आप सौगात के तौर पर भारत की कौन-सी चीज ले जाना पसंद करेंगे/करेंगी और क्यों?
उत्तर:
हम भारत से निम्नलिखित वस्तुएँ सौगात के तौर पर अपने विदेशी मित्र के लिए ले जा सकते हैं-

  • ताज महल की प्रतिकृति
  • रुद्राक्ष की माला
  • कलाकृतियाँ
  • नटराज की मूर्ति
  • खादी के वस्त्र

भाषा की बात

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यान से पढ़िए
(क) हमारा वतन तो जी लाहौर ही है।
(ख) क्या सब कानून हुकूमत के ही होते हैं?
सामान्यतः ‘ही’ निपात का प्रयोग किसी बात पर बल देने के लिए किया जाता है। ऊपर दिए गए दोनों वाक्यों में ‘ही’ के प्रयोग से अर्थ में क्या परिवर्तन आया है? स्पष्ट कीजिए। ‘ही’ का प्रयोग करते हुए दोनों तरह के अर्थ वाले पाँच-पाँच वाक्य बनाइए।
उत्तर:
प्रथम (क) वाक्य में ‘ही’ के प्रयोग से यह परिवर्तन हुआ है कि हमारा वतन तो केवल लाहौर है और कोई नहीं। भले ही हम भारत में अपना व्यापार चला रहे हैं और अपना घर बनाकर रह रहे हैं परंतु वतन तो लाहौर को ही कहेंगे।

  • यह घर तो मेरा ही है।
  • मेरा जन्मस्थान लाहौर ही है।
  • हमारा भोजन तो दाल-चावल ही है।
  • उनका मकान लाल रंग का ही है।
  • यह पुस्तक गीता की ही है।

(ख) वाक्य में ‘ही’ के प्रयोग से यह पता चलता है कि सारे कानून हुकूमत के नहीं होते। उनसे परे भी कुछ नियम होते हैं जिन पर हुकूमत का कानून भी प्रभावी नहीं हो सकता।

  • क्या सब नियम सरकार के ही हैं।
  • क्या सब लड़के आपके कहे अनुसार ही चलेंगे।
  • क्या तुम मुझे अपने ही घर में भोजन नहीं खिलाओगे।
  • क्या क्रिकेट की टीम में सारे खिलाड़ी हरियाणवी ही होंगे।
  • क्या तुम यहाँ अंग्रेज़ी पढ़ने ही आते हो।

प्रश्न 2.
नीचे दिए गए शब्दों के हिंदी रूप लिखिए मुरौवत, आदमियत, अदीब, साडा, मायने, सरहद, अक्स, लबोलहजा, नफीस।
उत्तर:

  • मुरौवत = संकोच
  • आदमियत = मानवता
  • अदीब = साहित्यकार
  • साडा = हमारा
  • मायने = अर्थ
  • सरहद = सीमा
  • अक्स = बिम्ब, प्रतिछाया
  • लबोलहजा = बोलचाल का ढंग
  • नफीस = सुरुचिपूर्ण।

प्रश्न 3.
‘पंद्रह दिन यों गुज़रे कि पता ही नहीं चला’-वाक्य को ध्यान से पढ़िए और इसी प्रकार के (यों, कि, ही से युक्त पाँच वाक्य बनाइए।)
उत्तर:

  1. शिमला में दो महीने यों बीत गए कि पता ही नहीं चला।
  2. यों तो हम दिल्ली जाने ही वाले थे कि अचानक मामा जी परिवार सहित आ गए।
  3. आपने यों ही कह दिया कि पन्द्रह तारीख के लिए टिकट बुक करा दो।
  4. हम मेहमान का स्वागत यों करेंगे कि वे आजीवन याद ही करते रहेंगे।
  5. पिता जी ने यों ही कह दिया कि कल हम घूमने जाएँगे।

सजन के क्षण

प्रश्न-
‘नमक’ कहानी को लेखक ने अपने नज़रिये से अन्य पुरुष शैली में लिखा है। आप सफिया की नज़र से/उत्तम पुरुष शैली में इस कहानी को अपने शब्दों में कहें।
उत्तर:
छात्र स्वयं करें।

इन्हें भी जानें
1. महर्रम-इस्लाम धर्म के अनसार साल का पहला महीना, जिसकी दसवीं तारीख को इमाम हसैन शहीद हुए।

2. सैयद-मुसलमानों के चौथे खलीफा अली के वंशजों को सैयद कहा जाता है।

3. इकबाल-सारे जहाँ से अच्छा के गीतकार

4. नज़रुल इस्लाम-बांग्ला देश के क्रांतिकारी कवि

5. शमसुल इस्लाम-बांग्ला देश के प्रसिद्ध कवि

6. इस कहानी को पढ़ते हुए कई फिल्म, कई रचनाएँ, कई गाने आपके जेहन में आए होंगे। उनकी सूची बनाइए किन्हीं दो (फिल्म और रचना) की विशेषता को लिखिए। आपकी सुविधा के लिए कुछ नाम दिए जा रहे हैं।

  • फिल्में – रचनाएँ
  • 1947 अर्थ – तमस (उपन्यास – भीष्म साहनी)
  • मम्मो – टोबाटेक सिंह (कहानी – मंटो)
  • ट्रेन टु पाकिस्तान – जिंदगीनामा (उपन्यास – कृष्णा सोबती)
  • गदर – पिंजर (उपन्यास – अमृता प्रीतम)
  • खामोश पानी – झूठा सच (उपन्यास – यशपाल)
  • हिना – मलबे का मालिक (कहानी – मोहन राकेश)
  • वीर ज़ारा – पेशावर एक्सप्रेस (कहानी – कृश्न चंदर)

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7. सरहद और मज़हब के संदर्भ में इसे देखें-
तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा,
इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा।
मालिक ने हर इंसान को इंसान बनाया,
हमने उसे हिंदू या मुसलमान बनाया।
कुदरत ने तो बख्शी थी हमें एक ही धरती,
हमने कहीं भारत कहीं, ईरान बनाया ॥
जो तोड़ दे हर बंद वो तूफान बनेगा।
इंसान की औलाद है इंसान बनेगा।
-फिल्म : धूल का फूल, गीतकार : साहिर लुधियानवी

HBSE 12th Class Hindi नमक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
सफिया का लाहौर में कैसा सम्मान हुआ और उसके सामने क्या समस्या उपस्थित हुई?
उत्तर:
सफ़िया लाहौर में केवल पंद्रह दिन के लिए ही ठहरी। उसके ये पंद्रह दिन किस प्रकार गुजर गए उसे पता ही नहीं चला। जिमखाना की शामें, दोस्तों की मुहब्बत, भाइयों की खातिरदारियाँ उसे आनंद प्रदान कर रही थीं। दोस्तों और भाइयों का बस चलता तो विदेश में रहने वाली बहन के लिए वे कुछ भी कर देते। उसके दोस्त और रिश्तेदारों की यह हालत थी कि वे तरह-तरह के तोहफे ला रहे थे। उसके लिए यह समस्या उत्पन्न हो गई कि वह उन तोहफों को किस प्रकार पैक करे और किस प्रकार उन्हें भारत ले जाए। परंतु सफ़िया के लिए सबसे बड़ी समस्या बादामी कागज़ की पुड़िया थी जिसमें एक सेर के लगभग लाहौरी नमक था। जिसे वह अपनी मुँहबोली माँ सिख बीबी के लिए भारत ले जाना चाहती थी।

प्रश्न 2.
सफिया ने अपनी माँ किसे कहा है और क्यों?
उत्तर:
सफिया ने सिख बीबी को अपनी माँ कहा है क्योंकि उसने जब पहली बार सिख बीबी को कीर्तन में देखा तो वह हैरान रह गई। वह उसकी माँ से बिलकुल मिलती-जुलती थी। उनका भी भारी-भरकम जिस्म तथा छोटी-छोटी चमकदार आँखें थीं जिनमें नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगा रही थी। उसका चेहरा भी सफ़िया की माँ के समान खुली किताब जैसा था। उसने वैसा ही सफेद बारीक मलमल का दुपट्टा ओढ़ रखा था जैसा उसकी अम्मा मुहर्रम में ओढ़ा करती थी। सफ़िया ने मुहब्बत से उस सिख बीबी की ओर देखा।

प्रश्न 3.
सफिया ने नमक की पुड़िया कहाँ और किस प्रकार छिपाई? उस समय वह क्या सोच रही थी?
उत्तर:
सफ़िया ने टोकरी के कीनू कालीन पर उलट दिए तथा टोकरी को खाली करके नमक की पुड़िया उसकी तह में रख दी। उसने एक बार झाँक कर पुड़िया की ओर देखा उसे ऐसा अनुभव हुआ कि वह किसी प्रियजन को कब्र की गहराई में उतार रही है। कुछ देर तक उकई बैठकर वह नमक की पुड़िया को देखती रही। उसने उन कहानियों को भी याद किया जो उसने बचपन में अपनी अम्मा से सुनी थीं। कैसे एक शहजादे ने अपनी रान को चीरकर उसमें हीरा छुपा लिया था वह देवों, भूतों तथा राक्षसों के सामने से होता हुआ सीमाओं से पार गुजर गया था। वह सोचने लगी कि क्या इस जमाने में कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता वरना वह भी अपना दिल चीरकर उसमें नमक छिपाकर ले जाती।

प्रश्न 4.
सफिया और उसके भाई के विचारों में क्या अंतर था ? नमक पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर:
सफ़िया और उसके भाई के विचारों में बहुत अंतर था। साहित्यकार होने के कारण सफिया हृदय प्रधान नारी थी परंतु पुलिस अधिकारी होने के कारण उसका भाई बुद्धि प्रधान व्यक्ति था। सफिया मनुष्य को ही अधिक महत्त्व देती थी। परंतु उसका भाई सरकारी कानून और अपनी जिम्मेदारी को ही सब कुछ समझता था। इसी प्रकार सफ़िया कानून से बढ़कर मानवता पर विश्वास करती थी परंतु उसका भाई कस्टम अधिकारियों के कर्तव्यों पर विश्वास रखता था। सफिया का भाई जानता था कि पाकिस्तान से भारत में नमक ले जाना गैर-कानूनी है। इसलिए वह अपनी बहन को यह सलाह देता है कि वह लाहौरी नमक भारत में न ले जाए। अन्यथा कस्टम अधिकारियों के सामने उसका अपमान होगा। परंतु सफिया वादा निभाने को अधिक महत्त्व प्रदान करती थी और उसने अपने ढंग से वादा निभाया।

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प्रश्न 5.
सिख बीबी ने सफिया को अपने बारे में क्या बताया?
उत्तर:
कीर्तन के समय सफ़िया ने सिख बीबी से पूछा कि माता जी आपको यहाँ आए बहुत साल हो गए होंगे। तब उत्तर में सिख. बीबी ने कहा कि जब ‘हिंदुस्तान बना था तब हम यहाँ आ गए थे। यहाँ हमारी कोठी बन गई है। व्यापार भी है। और सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है पर हमें लाहौर बहुत याद आता है। हमारा वतन तो लाहौर ही है। जब सिख बीबी यह बता रही थी तो उसकी आँखों से आँसू निकलकर उसके दूधिया आँचल में समा गए और भी बातें हुईं पर सिख बीबी घूमकर उसी बात पर आ जाती थी कि ‘साडा लाहौर’ अर्थात् उसने कहा कि हमारा वतन तो लाहौर ही है।

प्रश्न 6.
इस कहानी में किन बातों को उभारा गया है?
अथवा
नमक कहानी का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी में लेखिका ने भारत तथा पाकिस्तान में रहने वाले लोगों की संवेदनाओं तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति की है। संवेदनाएँ हमेशा मानवीय रिश्ते से जुड़ी हुई होती हैं। राजनीति से इनका कोई संबंध नहीं होता। जिन लोगों का जन्म पाकिस्तान में हुआ था और विभाजन के बाद वे भारत में आ गए आज भी वे बार-बार अपनी जन्मभूमि को याद कर उठते हैं। यही स्थिति पाकिस्तान में रहने वाले उन लोगों की है जिनका जन्म भारत में हुआ था। पाकिस्तान से कई लोग इलाज के लिए भारत आते हैं। पाकिस्तान के लोग भारत की लड़कियों से विवाह करते हैं तथा भारत के लोग पाकिस्तान की लड़कियों से विवाह करते हैं। इन दोनों देशों के कलाकार और खिलाड़ी एक दूसरे के देश में जाते रहते हैं। ये बातें यह सिद्ध करती हैं कि दोनों देशों के लोगों की संवेदनाओं में बहुत बड़ी समानता है और संवेदनाओं की समानता ही उन्हें आपस में जोड़ती है।

प्रश्न 7.
सफिया ने रात के वातावरण का वर्णन किस प्रकार किया है?
उत्तर:
जब सफ़िया टोकरी की तह में नमक की पुड़िया रखकर उस पर कीनू सजा कर लेट गई उस समय रात के तकरीबन डेढ बजे थे। मार्च की सहानी हवा खिडकी की जाली से आ रही थी। बाहर चाँदनी साफ और ठण्डी थी। खिडकी के करीब चम्पा का एक घना वृक्ष लगा हुआ था। सामने की दीवार पर उस पेड़ की पत्तियों की प्रतिछाया पड़ रही थी। कभी किसी तरफ से किसी की दबी हुई खाँसी की आहट आ रही थी और दूर से किसी कुत्ते के भौंकने तथा रोने की आवाज सुनाई दे रही थी। चौंकीदार की सीटी बजती थी और फिर सन्नाटा छा जाता था। परंतु यह पाकिस्तान था।

प्रश्न 8.
सफिया ने भाई से क्या पूछा और उसने क्या उत्तर दिया?
उत्तर:
सफ़िया अपने भाई से नमक ले जाने के बारे में पूछती है। उसका भाई आश्चर्यचकित होकर कहता है कि ‘नमक’। पाकिस्तान से भारत नमक ले जाना तो गैर-कानूनी है परंतु आप नमक का क्या करेंगी ? आप लोगों के हिस्से में तो हमसे ज्यादा नमक आया है। सफिया ने झुंझलाते हुए कहा कि आया होगा हमारे हिस्से में नमक, मेरी माँ ने तो यही लाहौरी नमक मँगवाया है। सफ़िया का भाई कुछ समझ नहीं पा रहा था। वह सोचने लगा कि माँ तो बटवारे से पहले ही मर चुकी थीं। सफ़िया का भाई उसे कहता है कि देखो आपको कस्टम पार करके जाना है और अगर उन्हें नमक के बारे में पता चल गया तो आपका सामान मिट्टी में मिला देंगे।

प्रश्न 9.
सफिया के भाई ने अदीबों (साहित्यकारों) पर क्या व्यंग्य किया और सफिया ने क्या जवाब दिया?
उत्तर:
सफ़िया का भाई साहित्यकारों पर व्यंग्य करते हुए कहने लगा कि आप से कोई बहस नहीं कर सकता। आप अदीब ठहरी और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो जरूर ही घूमा हुआ होता है। वैसे मैं आपको बताए देता हूँ कि आप नमक ले नहीं जा पाएँगी और बदनामी मुफ्त में हम सबकी भी होगी। आखिर आप कस्टम वालों को कितना जानती हैं?

सफ़िया ने गुस्से में जवाब दिया, “कस्टमवालों को जानें या न जाने पर हम इंसानों को थोड़ा-सा जरूर जानते हैं और रही दिमाग की बात सो अगर सभी लोगों का दिमाग हम अदीबों की तरह घूमा हुआ होता तो यह दुनिया कुछ बेहतर ही जगह हो जाती, भैया।”

प्रश्न 10.
अमृतसर में सफिया को जो कस्टम ऑफिसर मिला वह कहाँ का रहने वाला था तथा उसने किताब दिखाकर क्या बताया?
उत्तर:
अमृतसर में सफिया को जो कस्टम अधिकारी मिला था वह ढाका का रहने वाला था। उसका नाम सुनील दास गुप्त था। सन् 1946 में उसके मित्र शमसुलइसलाम ने बड़े प्यार से उसे किताब भेंट की थी। सुनील दास गुप्त ने लेखिका को किताब दिखाकर यह बताया कि जब भारत-पाक विभाजन हुआ तब मैं भारत आ गया था, परंतु मेरा वतन ढाका है। मैं उस समय 12-13 साल का था परंतु नज़रुल और टैगोर को हम लोग बचपन में पढ़ा करते थे। जिस रात हम यहाँ आ रहे थे उसके ठीक एक साल पहले मेरे सबसे पुराने, सर्वाधिक प्रिय बचपन के मित्र ने मुझे यह किताब दी थी। उस दिन मेरी सालगिरह थी फिर हम कलकत्ता में रहे, पढ़े और फिर मुझे नौकरी भी मिल गई। परंतु हम अपने वतन आते-जाते रहते थे।

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प्रश्न 11.
राजनीतिक सीमा तथा राजनीतिज्ञों के कारण भले ही भारत और पाकिस्तान के लोग धार्मिक दुराग्रह के शिकार बने हुए हैं लेकिन फिर भी हिंदुस्तान-पाकिस्तान के दिल मिलने के लिए आतुर रहते हैं। प्रस्तुत पाठ के आधार पर इस कथन का विवेचन कीजिए।
अथवा
‘नमक’ पाठ के आधार पर वतन की स्मृति का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
आम लोगों के हृदयों में कोई दुश्मनी नहीं है। सामान्य जनता धर्म या क्षेत्र के आधार पर संघर्ष नहीं करना चाहती। बल्कि दोनों देशों के लोग अच्छे पड़ोसियों के समान रहना चाहते हैं। प्रस्तुत कहानी से पता चलता है कि सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ के नमक की सौगात चाहती है। पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी दिल्ली को अपना वतन मानता है। यही नहीं वह जामा मस्जिद की सीढ़ियों को अपना सलाम भेजता है। वह सिख बीबी को यह संदेशा भी भेजता है कि लाहौर अभी तक उसका वतन है और दिल्ली मेरा वतन है। बाकी सब धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। इसी प्रकार भारतीय कस्टम अधिकारी सुनील दास गुप्त ढाका को अपना वतन मानता है। वहाँ के नारियल को कोलकाता के नारियल से श्रेष्ठ मानता है। वह ढाका के बारे में कहता है कि हमारी जमीन और हमारे पानी का मजा ही कुछ ओर है। कहानी के इन प्रसंगों से पता चलता है कि भारतवासियों और पाकिस्तानियों के दिलों में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है।

प्रश्न 12.
इस कहानी के आधार पर सफिया के भाई का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
सफ़िया का भाई एक पाकिस्तानी पुलिस अधिकारी है। अतः उसके व्यवहार में अफसरों जैसा रोबदाब है। उसका स्वभाव भी बड़ा कठोर है। वह भारत पाकिस्तान के भेदभाव का समर्थक प्रतीत होता है। वह पारिवारिक संबंधों में भी भारत-पाक के भेदभाव को प्रमुखता देता है। वस्तुतः वह एक कट्टर तथा कठोर मुसलमान अफसर है। जब उसकी बहन सफ़िया भारत में लाहौरी नमक ले जाना चाहती है तो वह कहता है, “यह गैर-कानूनी है, नमक तो आपके हिस्से में बहुत ज्यादा है।” ऐसे लोगों के कारण ही भारत-पाक दूरियाँ बढ़ रही हैं। स्वभाव का कठोर होने के कारण वह संवेदनशून्य व्यक्ति है। वह सभी कस्टम अधिकारियों को अपने जैसा ही समझता है। इसलिए वह अपनी बहन को यह सलाह देता है कि वह लाहौरी नमक भारत न ले जाए यदि वह पकड़ी गई तो उसकी बड़ी बदनामी होगी।

प्रश्न 13.
सफिया ने किस प्रकार अपनी व्यवहार कुशलता द्वारा कस्टम अधिकारियों को प्रभावित कर लिया ?
उत्तर:
सफ़िया एक साहित्यकार होने के कारण एक व्यवहारकुशल नारी है। वह मानवीय रिश्तों के मर्म को अच्छी प्रकार समझती है। वह इस मनौवैज्ञानिक तथ्य से भली प्रकार परिचित है कि यदि किसी व्यक्ति के साथ भावनात्मक संबंध जोड़ लिए जाएँ या उसके समक्ष विनम्रतापूर्वक निवेदन किया जाए तो वह निश्चय से उसकी बात को मान जाएगा। उसने सर्वप्रथम पाकिस्तान के कस्टम अधिकारी से उसके वतन के बारे में पूछा और उससे व्यक्तिगत संबंध जोड़ लिया और फिर उसने दिल्ली को अपना वतन बताकर उससे गहरा संबंध जोड़ लिया। इस प्रकार वह मुहब्बत का तोहफा लाहौरी नमक पाकिस्तानी अधिकारी से साफ निकलवाकर ले गई। इसी प्रकार उसने भारतीय कस्टम अधिकारी सुनील दास गुप्त के मर्म को छुआ और वह सिख बीबी के लिए लाहौरी नमक ले जाने में कामयाब हो गई।

प्रश्न 14.
प्रस्तुत कहानी ‘नमक’ में भारत-पाक संबंधों में किस प्रकार एकता देखी जा सकती है?
उत्तर:
विभाजन से पहले भारत पाकिस्तान दोनों एक ही देश के दो भाग थे। विभाजन के बाद एक का नाम पाकिस्तान कहलाया और दूसरे का भारत। परंतु दोनों देशों के लोगों की भाषा, बोली, वेशभूषा आदि एक जैसी ही है। यही नहीं, दोनों देशों का खान-पान भी एक जैसा है। दोनों देशों में ऐसे अनेक नागरिक रहते हैं जिनकी जड़ें दूसरे देश में हैं। जो हिंदू पाकिस्तान से विस्थापित होकर भारत में आए वे पाकिस्तान को भी अपनी जन्मभूमि मानते हैं। यही स्थिति उन भारतीयों की है जो भारत से विस्थापित होकर पाकिस्तान चले गए। यदि दोनों देशों में सांप्रदायिकता को समाप्त कर दिया जाए तं सकते हैं लेकिन हमारे राजनीतिज्ञ अपने स्वार्थों को पूरा करने के लिए दोनों देशों की एकता को पनपने नहीं देते।

बहविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. रजिया सज्जाद जहीर का जन्म कब हुआ?
(A) 15 फरवरी, 1917 को
(B) 15 फरवरी, 1918 को
(C) 15 फरवरी, 1919 को
(D) 15 फरवरी, 1920 को
उत्तर:
(A) 15 फरवरी, 1917 को

2. रजिया सज्जाद जहीर का जन्म कहाँ हुआ?
(A) जयपुर
(B) अजमेर
(C) जोधपुर
(D) बीकानेर
उत्तर:
(B) अजमेर

3. रजिया सज्जाद जहीर ने किस विषय में एम.ए. की परीक्षा पास की ?
(A) हिंदी में
(B) अंग्रेजी में
(C) उर्दू में
(D) पंजाबी में
उत्तर:
(C) उर्दू में

4. सन् 1947 में रज़िया सज्जाद ज़हीर अजमेर छोड़कर कहाँ चली गई?
(A) आगरा
(B) मेरठ
(C) कानपुर
(D) लखनऊ
उत्तर:
(D) लखनऊ

5. रजिया सज्जाद जहीर ने किस व्यवसाय को अपनाया?
(A) व्यापार
(B) अध्यापन
(C) नौकरी
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(B) अध्यापन

6. रज़िया सज्जाद ज़हीर का देहांत कब हुआ?
(A) 18 दिसंबर, 1980 को
(B) 19 दिसंबर, 1978 को
(C) 18 दिसंबर, 1979 को
(D) 18 दिसंबर, 1982 को
उत्तर:
(C) 18 दिसंबर, 1979 को

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7. रज़िया सज्जाद ज़हीर को निम्नलिखित में से कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(A) प्रेमचंद पुरस्कार
(B) सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार
(C) कबीर पुरस्कार
(D) साहित्य अकादमी
उत्तर:
(B) सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार

8. उत्तरप्रदेश की किस अकादेमी ने रज़िया सज्जाद ज़हीर को पुरस्कार देकर सम्मानित किया?
(A) उर्दू अकादेमी
(B) हिंदी अकादेमी
(C) ललित कला अकादेमी
(D) चित्रकला अकादेमी
उत्तर:
(A) उर्दू अकादेमी

9. रज़िया सज्जाद ज़हीर को ‘सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार’ तथा ‘उर्दू अकादेमी पुरस्कार’ के अतिरिक्त और कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(A) अखिल भारतीय लेखिका संघ अवार्ड
(B) उत्तरप्रदेश लेखिका संघ अवार्ड
(C) दिल्ली लेखिका संघ अवार्ड
(D) उत्तर भारतीय लेखिका संघ अवार्ड
उत्तर:
(A) अखिल भारतीय लेखिका संघ अवार्ड

10. सन् 1965 में रज़िया सज्जाद जहीर की नियुक्ति कहाँ पर हुई?
(A) आकाशवाणी में
(B) साहित्य अकादेमी में
(C) उर्दू अकादेमी में
(D) सोवियत सूचना विभाग में
उत्तर:
(D) सोवियत सूचना विभाग में

11. रजिया सज्जाद जहीर के एकमात्र कहानी संग्रह का नाम क्या है?
(A) ज़र्द गुलाब
(B) पीला गुलाब
(C) नीला गुलाब
(D) काला गुलाब
उत्तर:
(A) ज़र्द गुलाब

12. रजिया सज्जाद जहीर मूलतः किस भाषा की लेखिका हैं?
(A) हिंदी
(B) उर्दू
(C) अरबी
(D) फारसी
उत्तर:
(B) उर्दू

13. ‘नमक’ कहानी की लेखिका का नाम क्या है?
(A) महादेवी वर्मा
(B) सुभद्राकुमारी चौहान
(C) रज़िया सज्जाद जहीर
(D) फणीश्वर नाथ रेणु
उत्तर:
(C) रज़िया सज्जाद जहीर

14. नमक कहानी का संबंध किससे है?
(A) हिंदुओं तथा मुसलमानों से
(B) भारतवासियों से
(C) पाकिस्तानियों से
(D) भारत-पाक विभाजन से
उत्तर:
(D) भारत-पाक विभाजन से

15. सफिया पाकिस्तान के किस नगर में गई थी?
(A) मुलतान में
(B) लाहौर में
(C) सयालकोट में
(D) इस्लामाबाद में
उत्तर:
(B) लाहौर में

16. सफिया लाहौर जाने से पहले किस कार्यक्रम में गई थी?
(A) कीर्तन में
(B) जगराते में
(C) मंदिर में
(D) मस्जिद में
उत्तर:
(A) कीर्तन में

17. सिख बीबी ने किसे अपना वतन कहा?
(A) अमृतसर को
(B) लाहौर को
(C) दिल्ली को
(D) मुलतान को
उत्तर:
(B) लाहौर को

18. कीर्तन कितने बजे समाप्त हुआ?
(A) 9 बजे
(B) 10 बजे
(C) 11 बजे
(D) 12 बजे
उत्तर:
(C) 11 बजे

19. सिख बीबी ने सफिया से क्या तोहफा लाने के लिए कहा?
(A) लाहौरी शाल
(B) लाहौरी नमक
(C) लाहौरी कीनू
(D) लाहौरी मेवा
उत्तर:
(B) लाहौरी नमक

20. सफ़िया लाहौर में किसके पास गई थी?
(A) माता-पिता के पास
(B) दोस्तों के पास
(C) पड़ोसियों के पास
(D) भाइयों के पास
उत्तर:
(D) भाइयों के पास

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

21. सफिया का भाई क्या था?
(A) पुलिस अफसर
(B) कस्टम अधिकारी
(C) व्यापारी
(D) सरकारी नौकर
उत्तर:
(A) पुलिस अफसर

22. सफिया ने बादामी कागज की पुड़िया में क्या बंद कर रखा था?
(A) सिंदूरी नमक
(B) सोडियम नमक
(C) सिंधी नमक
(D) लाहौरी नमक
उत्तर:
(D) लाहौरी नमक

23. कस्टमवालों के लिए क्या आवश्यक है?
(A) दिव्य ज्ञान
(B) ज्योतिष ज्ञान
(C) कर्त्तव्यपालन
(D) सहज समाधि
उत्तर:
(C) कर्त्तव्यपालन

24. ‘आखिर कस्टमवाले भी इंसान होते हैं, कोई मशीन तो नहीं होते’, यह कथन किसका है?
(A) ‘सफिया के भाई का
(B) सफ़िया का
(C) लेखिका का
(D) सुनील दास गुप्त का
उत्तर:
(B) सफ़िया का

25. आप अदीब ठहरी और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो ज़रूर ही घूमा हुआ होता है। यहाँ अदीब शब्द किसके लिए प्रयोग हुआ है?
(A) सिरफिरे व्यक्ति के लिए
(B) पागल के लिए
(C) साहित्यकार के लिए
(D) सरकारी अधिकारी के लिए
उत्तर:
(C) साहित्यकार के लिए

26. सफिया के कितने सगे भाई पाकिस्तान में थे?
(A) दो
(B) पाँच
(C) चार
(D) तीन
उत्तर:
(D) तीन

27. पहले सफिया ने नमक की पुड़िया को कहाँ रखा?
(A) अपने पर्स में
(B) फलों की टोकरी की तह में
(C) फलों के ऊपर
(D) सूटकेस में
उत्तर:
(B) फलों की टोकरी की तह में

28. सुनीलदास गुप्ता को सालगिरह पर उसके मित्र ने पुस्तक कब भेंट की?
(A) 1944
(B) 1942
(C) 1946
(D) 1940
उत्तर:
(C) 1946

29. कस्टम अधिकारी सुनीलदास गुप्ता को उसके बचपन के दोस्त ने किस अवसर पर पुस्तक भेंट की थी?
(A) सालगिरह
(B) नववर्ष
(C) दीपावली
(D) जन्मदिन
उत्तर:
(A) सालगिरह

30. संतरे और माल्टे को मिलाकर कौन-सा फल तैयार किया जाता है?
(A) नींबू
(B) मौसमी
(C) कीनू
(D) चकोतरा
उत्तर:
(C) कीनू

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

31. सफिया के दोस्त ने कीनू देते हुए क्या कहा था?
(A) यह हमारी दोस्ती का सबूत है
(B) यह हमारे प्रेम का सबूत है
(C) यह हिंदस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है
(D) यह रसीला और ठण्डा फल है
उत्तर:
(C) यह हिंदुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है।

32. किस रंग के कागज़ की पुड़िया में सेर भर सफेद लाहौरी नमक था?
(A) लाल
(B) सफेद
(C) बैंगनी
(D) बादामी
उत्तर:
(D) बादामी

33. “मुझे तो लाहौर का नमक चाहिए, मेरी माँ ने यही मँगवाया है।” वाक्य में सफिया ने अपनी माँ किसे कहा है?
(A) सिख बीबी
(B) सगी माँ
(C) मित्र की माँ
(D) पति की माँ
उत्तर:
(A) सिख बीबी

34. “मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।” यह कथन किसका है?
(A) पाकिस्तान कस्टम अधिकारी का
(B) सफ़िया का
(C) सफ़िया के भाई का
(D) सुनील दास गुप्त का
उत्तर:
(A) पाकिस्तान कस्टम अधिकारी का

35. ‘नमक’ कहानी में सबसे अच्छा डाभ कहाँ का बताया गया है?
(A) कलकत्ता का
(B) राँची का
(C) मथुरा का
(D) ढाका का
उत्तर:
(D) ढाका का

36. सफिया अपने को क्या कहती थी?
(A) मुगल
(B) पठान
(C) शेख
(D) सैयद
उत्तर:
(D) सैयद

37. सुनील दास किसे अपना वतन मानता है?
(A) भारत को
(B) पाकिस्तान को
(C) दिल्ली को
(D) ढाका को
उत्तर:
(D) ढाका को

38. सफ़िया कहाँ की रहने वाली है?
(A) कराची
(B) बंगाल
(C) जालन्धर
(D) लाहौर
उत्तर:
(D) लाहौर

39. सुनीलदास गुप्त अपने दोस्त के साथ बचपन में किन साहित्यकारों को पढ़ते थे?
(A) नजरुल और निराला
(B) नजरुल और शरतचंद्र
(C) टैगोर और शरतचंद्र
(D) नज़रुल और टैगोर
उत्तर:
(D) नज़रुल और टैगोर

40. अमृतसर में सफिया के सामान की जाँच करने वाले नौजवान कस्टम अधिकारी बातचीत और सूरत से कैसे लगते थे?
(A) गुजराती
(B) पंजाबी
(C) पाकिस्तानी
(D) बंगाली
उत्तर:
(D) बंगाली

41. ‘नमक’ पाठ के अनुसार क्या चीज़ हिंदुस्तान-पाकिस्तान की एकता का मेवा है?
(A) कीनू
(B) काजू
(C) बादाम
(D) पिस्ता
उत्तर:
(A) कीनू

42. सफिया की अम्मा सफेद बारीक मलमल का दुपट्टा कब ओढ़ा करती थी?
(A) मुहर्रम पर
(B) रमजान पर
(C) रक्षाबंधन पर
(D) ईद पर
उत्तर:
(A) मुहर्रम पर

43. “हमारा वतन तो जी लाहौर ही है” यह कथन किसका है?
(A) सिख बीबी
(B) सुनील दास गुप्त
(C) सफ़िया
(D) सफ़िया का भाई
उत्तर:
(A) सिख बीबी

44. सफिया अपने भाइयों से मिलने कहाँ जा रही थी?
(A) ढाका
(B) लाहौर
(C) कराची
(D) अमृतसर
उत्तर:
(B) लाहौर

नमक प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] उन सिख बीबी को देखकर सफिया हैरान रह गई थी, किस कदर वह उसकी माँ से मिलती थी। वही भारी भरकम जिस्म, छोटी-छोटी चमकदार आँखें, जिनमें नेकी, मुहब्बत और रहमदिली की रोशनी जगमगाया करती थी। चेहरा जैसे कोई खुली हुई किताब। वैसा ही सफेद बारीक मलमल का दुपट्टा जैसा उसकी अम्मा मुहर्रम में ओढ़ा करती थी। जब सफिया ने कई बार उनकी तरफ मुहब्बत से देखा तो उन्होंने भी उसके बारे में घर की बहू से पूछा। उन्हें बताया गया कि ये मुसलमान हैं। कल ही सुबह लाहौर जा रही हैं अपने भाइयों से मिलने, जिन्हें इन्होंने कई साल से नहीं देखा। लाहौर का नाम सुनकर वे उठकर सफिया के पास आ बैठी और उसे बताने लगी कि उनका लाहौर कितना प्यारा शहर है। वहाँ के लोग कैसे खूबसूरत होते हैं, उम्दा खाने और नफीस कपड़ों के शौकीन, सैर-सपाटे के रसिया, जिंदादिली की तसवीर। [पृष्ठ-130]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रजिया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ उनकी एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन समझती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक लाना गैरकानूनी है। सफ़िया जब कीर्तन में उन सिख बीबी को देखती है तो उनमें उसे अपनी माँ की झलक दिखती है। वह सिख बीबी सफिया से लाहौर और वहाँ के लोगों की अच्छाइयाँ बताती है। इसी संदर्भ में लेखिका कहती है

व्याख्या-उस सिख बीबी को देखकर सफिया हैरान हो गई कि किस प्रकार वह उसकी माँ से मिलती थी। उसका परिचय देते हुए सफ़िया कहती है कि उस सिख बीबी का शरीर भारी था, परंतु उसकी आँखें छोटी-छोटी तथा चमकदार थीं। उसकी आँखों से नेकी, प्रेम और दयालुता का प्रकाश जगमगाता था। उसका चेहरा क्या था, मानों कोई खुली हुई पुस्तक हो। उसके सिर पर श्वेत रंग का बहुत ही पतला मलमल का दुपट्टा था। इसी प्रकार का दुपट्टा उसकी माँ मुहर्रम के अवसर पर ओढ़ती थी। सफ़िया ने अनेक बार उसकी ओर प्यार से देखा। फलस्वरूप सिख बीबी ने लेखिका के बारे में घर की बहू से पूछ ही लिया।

तब उसकी बहू ने बताया कि ये महिला मुसलमान है। कल सवेरे यह अपने भाइयों से मिलने लाहौर जा रही है। इसने अपने भाइयों को कई सालों से नहीं देखा है। जब सिख बीबी ने लाहौर का नाम सुना तो वह लेखिका के पास आकर बैठ गई और कहने लगी कि उसका लाहौर बहुत प्यारा शहर है। लाहौर के निवासी बड़े सुंदर और अच्छा खाना खाने वाले होते हैं और यही नहीं सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनने के शौकीन होते हैं। उन्हें घूमने-फिरने से भी लगाव है। लाहौर और वहाँ के निवासी उत्साह और जोश की मूर्ति दिखाई देते हैं।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने सिख बीबी के माध्यम से लाहौर शहर की सुंदरता और वहाँ के लोगों की सुंदरता तथा उनकी जिंदादली का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा हिंदी-उर्दू मिश्रित भाषा का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. नेकी, मोहब्बत, रहमदिली, रोशनी, उम्दा, नफीस, शौकीन आदि उर्दू के शब्दों का सुंदर प्रयोग किया गया है।
  5. वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैलियों का प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखिका का नाम लिखिए।
(ख) सिख बीबी को देखकर सफिया हैरान क्यों रह गई?
(ग) घर की बहू ने सफिया के बारे में सिख बीबी को क्या बताया?
(घ) सिख बीबी ने लाहौर के बारे में सफिया से क्या कहा?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम-‘नमक’, लेखिका-रज़िया सज्जाद ज़हीर।।

(ख) सिख बीबी को देखकर सफ़िया इसलिए हैरान रह गई क्योंकि उसकी शक्ल उसकी माँ से मिलती थी। सफ़िया की माँ की तरह उसका शरीर भारी-भरकम, छोटी चमकदार आँखें, जिनसे दयालुता का प्रकाश विकीर्ण हो रहा था। सिख बीबी का मुख उसकी माँ जैसा था और उसने उसकी माँ की तरह मलमल का दुपट्टा ओढ़ रखा था, जो उसकी माँ मुहर्रम पर ओढ़ा करती थी।

(ग) घर की बहू ने सिख बीबी को सफिया के बारे में यह बताया कि वह एक मुसलमान है और उसके भाई लाहौर में रहते हैं। वह पिछले कई सालों से अपने भाइयों से नहीं मिली। इसलिए वह उनसे मिलने लाहौर जा रही है।

(घ) सिख बीबी ने सफ़िया को कहा कि लाहौर बहुत ही प्यारा शहर है। वहाँ के लोग न केवल सुंदर होते हैं, बल्कि सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनते हैं। वे घूमने-फिरने के भी शौकीन हैं। उनमें उत्साह व जोश भी बहुत है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

[2] “अरे बाबा, तो मैं कब कह रही हूँ कि वह ड्यूटी न करें। एक तोहफा है, वह भी चंद पैसों का, शौक से देख लें, कोई सोना-चाँदी नहीं, स्मगल की हुई चीज़ नहीं, ब्लैक मार्केट का माल नहीं।”
“अब आपसे कौन बहस करे। आप अदीब ठहरी और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो ज़रूर ही घूमा हुआ होता है। वैसे मैं आपको बताए देता हूँ कि आप ले नहीं जा पाएँगी और बदनामी मुफ्त में हम सबकी
भी होगी। आखिर आप कस्टमवालों को कितना जानती हैं?”
उसने गुस्से से जवाब दिया, “कस्टमवालों को जानें या न जानें, पर हम इंसानों को थोड़ा-सा जरूर जानते हैं।
और रही दिमाग की बात सो अगर सभी लोगों का दिमाग हम अदीबों की तरह घूमा हुआ होता तो यह दुनिया कुछ बेहतर ही जगह हो जाती, भैया।” [पृष्ठ-131]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद जहीर हैं। ‘नमक’ उनकी एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने अपने और अपने भाई के वार्तालाप को प्रस्तुत किया है।

व्याख्या-लेखिका अपने पुलिस अधिकारी भाई से कहती है कि मैं यह कब कहती हूँ कि कस्टमवाले अपने कर्तव्य का पालन न करें। मैं तो मात्र एक छोटी-सी भेंट लेकर जा रही हूँ, जो थोड़े पैसों में खरीदी जा सकती है और वे इसकी अच्छी प्रकार जाँच कर सकते हैं। यह थोड़ा-सा नमक है, न सोना है, न चाँदी है। यह स्मगल की गई कोई वस्तु नहीं है, और न ही कोई काला-बाज़ारी का माल है।

लेखिका की बातों का उत्तर देते हुए उसके भाई ने कहा कि अब आपसे कौन बहस कर सकता है, क्योंकि आप एक साहित्यकार हैं और साहित्यकारों का दिमाग थोड़ा सा घूमा हुआ होता ही है। लेकिन मैं आपको यह बता दूँ कि आप यह भेंट भारत नहीं ले जा सकेंगी। इससे हम सबको अपयश अवश्य ही मिलेगा। आप कस्टम अधिकारियों के बारे में कितना जानती हैं। वह प्रत्येक वस्तु की अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करते हैं। तब सफ़िया ने क्रोधित होकर अपने भाई से कहा कि कस्टम वालों को चाहे कोई न जाने परंतु मैं मनुष्यों को थोड़ा बहुत अच्छी तरह जानती हूँ। जहाँ तक बुद्धि का सवाल है तो हम जैसे साहित्यकारों के समान लोगों का भी दिमाग थोड़ा घूमा हुआ होता तो यह संसार बहुत उत्तम होता। लेकिन दुख इस बात का है कि लोगों के पास हम जैसा दिमाग नहीं है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने इंसानियत में अपना गहरा विश्वास व्यक्त किया है।
  2. लेखिका यह स्पष्ट करती है कि लोगों का दिमाग साहित्यकारों जैसा हो जाए तो संसार में सुख और शांति की स्थापना हो जाए।
  3. सहज, सरल, बोधगम्य भाषा का प्रयोग है जिसमें उर्दू तथा अंग्रेज़ी अक्षरों का मिश्रण हुआ है।
  4. ड्यूटी, स्मगल, ब्लैक मार्केट, कस्टम आदि अंग्रेज़ी के शब्द हैं तथा तोहफा शौक, चीज़, अदीब, दिमाग, मुफ्त, दुनिया, इंसान आदि उर्दू के शब्द हैं।
  5. वाक्य-विन्यास बड़ा ही सटीक बन पड़ा है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) सफिया क्या तर्क देकर पाकिस्तान से भारत में नमक ले जाना चाहती है?
(ख) सफिया का भाई अपनी बहन को अदीब कहकर साहित्यकारों पर क्या टिप्पणी करता है?
(ग) सिद्ध कीजिए कि सफ़िया मानवता पर विश्वास करती है?
(घ) सफिया के अनुसार किस स्थिति में दुनिया कुछ बेहतर हो सकती है?
(ङ) सफिया तथा उसके भाई में स्वभावगत अंतर क्या है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
(क) सफ़िया का तर्क यह है कि नमक केवल एक भेंट है जो थोड़े-से पैसों से खरीदी जा सकती है। यह भेंट न सोना है, न चाँदी है और न ही चोरी की वस्तु है। यह तो काला बाज़ार की वस्तु भी नहीं है।

(ख) सफिया का भाई अपनी बहन को साहित्यकार कहता है तथा यह भी कहता है कि सभी साहित्यकारों का दिमाग थोड़ा-सा हिला हुआ होता है। इस पागलपन में उसकी बहन नमक तो नहीं ले जा सकेगी, पर उसकी बदनामी अवश्य होगी।

(ग) सफ़िया का मानवता पर पूर्ण विश्वास है। वह सोचती है कि सीमा शुल्क अधिकारी भी इंसान होते हैं और वे इस बात को समझेंगे कि यह नमक केवल प्रेम की भेंट है, जिसे वह सिख बीबी के लिए लेकर जा रही है।

(घ) सफ़िया का विचार है कि सभी लोगों का दिमाग अगर साहित्यकारों जैसा हो, तथा उनकी सोच भी साहित्यकारों जैसी हो तो यह संसार आज और अच्छा होता।

(ङ) सफ़िया का भाई कानून को मानने वाला इंसान है। इसलिए वह कहता है कि कस्टम अधिकारी नमक को भारत नहीं ले जाने देंगे परंतु सफिया कानून के साथ-साथ प्रेम, मुहब्बत तथा मनुष्यता को भी महत्त्व देती है। इसलिए उसका विश्वास है कि कस्टम अधिकारी भेंट के रूप में ले जाए रहे नमक को नहीं रोकेंगे।

[3] अब तक सफिया का गुस्सा उतर चुका था। भावना के स्थान पर बुद्धि धीरे-धीरे उस पर हावी हो रही थी। नमक की पुड़िया ले तो जानी है, पर कैसे? अच्छा, अगर इसे हाथ में ले लें और कस्टमवालों के सामने सबसे पहले इसी को रख दें? लेकिन अगर कस्टमवालों ने न जाने दिया! तो मज़बूरी है, छोड़ देंगे। लेकिन फिर उस वायदे का क्या होगा जो हमने अपनी माँ से किया था? हम अपने को सैयद कहते हैं। फिर वायदा करके झुठलाने के क्या मायने? जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा। मगर कैसे? अच्छा, अगर इसे कीनुओं की टोकरी में सबसे नीचे रख लिया जाए तो इतने कीनुओं के ढेर में भला कौन इसे देखेगा? और अगर देख लिया? नहीं जी, फलों की टोकरियाँ तो आते वक्त भी किसी की नहीं देखी जा रही थीं। उधर से केले, इधर के कीनू सब ही ला रहे थे, ले जा रहे थे। यही ठीक है, फिर देखा जाएगा। [पृष्ठ-133]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ लेखिका की एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने सफ़िया की मनःस्थिति का परिचय दिया है। भावना के स्थान पर बुद्धि हावी हो चुकी थी। इसलिए वह यह सोचने पर मजबूर हो जाती है कि वह नमक को भारत कैसे ले जाए।

व्याख्या-धीरे-धीरे सफ़िया का क्रोध दूर होने लगा। भावनाओं का उबाल मंद पड़ चुका था। भावनाओं के स्थान पर बुद्धि उसे सोचने पर मजबूर कर रही थी। वह सोचने लगी कि उसे नमक तो ले जाना है, पर वह नमक को किस प्रकार ले जाए। यह एक विचारणीय प्रश्न है। वह सोचती है कि यदि वह नमक को अपने हाथ में ले ले और कस्टम अधिकारियों के समक्ष इसी को प्रस्तुत कर दे, तो इसका परिणाम क्या होगा। हो सकता है कि वह उसे नमक न ले जाने दें। ऐसी स्थिति में मजबूर होकर उसे नमक वहीं छोड़ना पड़ेगा। अगले क्षण वह सोचने लगी कि उसके वचन का क्या होगा, जो उसने अपनी माँ जैसी औरत को दिया था। सफ़िया सोचती है कि हम लोग सैयद माने जाते हैं और सैयद हमेशा वादा निभाते हैं। यदि मैंने अपना वचन न निभाया तो क्या होगा। मुझे अपने प्राण देकर भी यह वचन पूरा करना चाहिए। पर यह कैसे हो, यह सोचने की बात है।

अगले ही क्षण सफ़िया सोचने लगी कि मैं कीनुओं की टोकरी के नीचे इस नमक की पोटली को रख दूँ। ऊपर कीनुओं का ढेर होगा। इन कीनुओं के नीचे कोई नमक को नहीं देख पाएगा। यदि किसी ने देख लिया तो क्या होगा? पर सफिया सोचने लगी कि ऐसा नहीं होगा। आते समय फलों की टोकरियों की जाँच नहीं हो रही थी। उधर से लोग केले ला रहे थे, इधर से कीनू ले जा रहे थे। इसलिए यही अच्छा है कि मैं नमक को कीनुओं के नीचे ही रख दूँ। जो होगा देखा जाएगा।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने सफिया के अंतर्द्वद्व का सफल उद्घाटन किया है।
  2. वह अपना वचन निभाने के लिए जैसे-तैसे अपनी माँ जैसी सिख बीबी तक पहुँचाना चाहती है।
  3. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है, जिसमें उर्दू तथा अंग्रेज़ी के शब्दों का मिश्रण हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. आत्मचिन्तन प्रधान नई शैली का प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) भावना के स्थान पर बुद्धि हावी होने का क्या अर्थ है?
(ख) सफिया के मन में चल रहे अंतर्द्वद्ध का उद्घाटन कीजिए।
(ग) सैयदों के बारे में सफिया ने क्या दृष्टिकोण व्यक्त किया है?
(घ) अंत में सफिया ने क्या फैसला किया?
उत्तर:
(क) भाक्ना के आवेग में सफ़िया अपने पुलिस अधिकारी भाई से तर्क-वितर्क करने लगी थी। भावनाओं के कारण वह पाकिस्तान से सिख बीबी के लिए नमक ले जाना चाहती थी। परंतु जब उसके भाई ने उसके नमक ले जाने का समर्थन नहीं दिया तो वह बुद्धि द्वारा कोई उपाय खोजने लगी, ताकि वह नमक की पुड़िया ले जा सके।

(ख) सफ़िया के मन में यह द्वंद्व चल रहा था कि वह नमक हाथ में रखकर सीमा शुल्क अधिकारियों के समक्ष रख देगी। परंतु उसे विचार आया कि यदि अधिकारी न माने तो उसे नमक वहीं पर छोड़ना पड़ेगा, परंतु उसे फिर ध्यान आया कि जो वचन वह देकर आई थी, उस वचन का क्या होगा।

(ग) सफ़िया सैयद मुसलमान थी और सैयद लोग हमेशा अपने वादे को निभाते हैं तथा सच्चा सैयद वही होता है जो अपनी जान देकर भी अपना वादा पूरा करता है। सफ़िया भी यही करना चाहती थी।

(घ) अंत में सफ़िया ने यह फैसला लिया कि वह नमक की पुड़िया को कीनुओं की टोकरी की तह में रखकर ले जाएगी। जब वह भारत से आई थी तब उसने देखा कि अधिकारी फलों की जाँच नहीं कर रहे थे। भारत से लोग केले ला रहे थे, पाकिस्तान से लोग कीनू ले जा रहे थे।

[4] उसने कीनू कालीन पर उलट दिए। टोकरी खाली की और नमक की पुड़िया उठाकर टोकरी की तह में रख दी। एक बार झाँककर उसने पुड़िया को देखा और उसे ऐसा महसूस हुआ मानो उसने अपनी किसी प्यारे को कब्र की गहराई में उतार दिया हो! कुछ देर उकईं बैठी वह पुड़िया को तकती रही और उन कहानियों को याद करती रही जिन्हें वह अपने बचपन में अम्मा से सुना करती थी, जिनमें शहजादा अपनी रान चीरकर हीरा छिपा लेता था और देवों, खौफनाक भूतों तथा राक्षसों के सामने से होता हुआ सरहदों से गुज़र जाता था। इस ज़माने में ऐसी कोई तरकीब नहीं हो सकती थी वरना वह अपना दिल चीरकर उसमें यह नमक छिपा लेती। उसने एक आह भरी। [पृष्ठ-133]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रजिया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ लेखिका की एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने सफिया के द्वंद्व का उद्घाटन किया है। सफिया सोच नहीं पा रही थी कि वह किस प्रकार नमक को छिपाकर भारत ले जाए। अंत में उसने निर्णय किया कि वह
कीनुओं से भरी,टोकरी में नमक छिपाकर ले जाएगी।

व्याख्या-सफ़िया ने सारे कीनू कालीन पर पलट डाले और टोकरी को खाली कर दिया। अब उसने पुड़िया को उठाया तथा टोकरी की तह में रख दिया। उसने एक बार पुड़िया को देखा, तब उसे ऐसा अनुभव हुआ कि मानो अपने किसी प्रियजन को कब्र की गहराई में उतार दिया है। कुछ देर सफ़िया उकईं बैठी रही और पुड़िया को देखती रही। वह उन कहानियों को याद करने लगी, जिन्हें उसने अपनी माँ से सुना था कि एक राजकुमार ने अपनी जंघा को चीरकर उसमें एक हीरा छिपा लिया था। वह देवताओं, भयानक भूतों तथा राक्षसों के बीच होता हुआ सीमा पार चला गया था। वह सोचने लगी कि आधुनिक संसार में ऐसा कोई तरीका नहीं है जिसे अपनाकर नमक की पुड़िया को ले जाया जा सके। वह सोचती है कि काश वह अपना दिल चीरकर उसमें नमक की पुड़िया ले जाती पर वह एक निराशा की आह भरकर रह गई।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने सफ़िया की मनः स्थिति पर समुचित प्रकाश डाला है जो जैसे-तैसे नमक को भारत ले जाना चाहती है।
  2. सहज, सरल तथा बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है, जिसमें उर्दू मिश्रित शब्दों का प्रयोग हुआ है।
  3. शब्द-चयन सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) सफिया ने नमक को कहाँ छिपाया और क्यों?
(ख) कीनुओं के नीचे दबी नमक की पुड़िया सफिया को कैसे लगी?
(ग) सफिया बचपन में सुनी राजकुमारों की कहानियों को क्यों याद करने लगी?
(घ) सफिया द्वारा खौफनाक भूतों तथा राक्षसों के साथ देवों का प्रयोग करना क्या उचित है?
(ङ) सफ़िया ने राजकुमार के कारनामों को सुनकर आह क्यों भरी?
उत्तर:
(क) सफ़िया ने नमक की पुड़िया को कीनू की टोकरी की तह में छिपाया। वह सीमा शुल्क अधिकारियों की नज़र से नमक की पुड़िया को बचाना चाहती थी। उसके भाई ने बताया था कि कस्टम वाले उसे नमक नहीं ले जाने देंगे।

(ख) सफ़िया को लगा कि कीनू की टोकरी में नमक को दबाना मानो किसी प्रिय जन को कब्र की गहराई में उतारना है।

(ग) सफ़िया बचपन में सुनी राजकुमारों की कहानियों को इसलिए याद करने लगी क्योंकि वह किसी भी तरह इस भेंट को भारत ले जाना चाहती थी।

(घ) वस्तुतः सफिया को देवता शब्द का समुचित ज्ञान नहीं है। वह नहीं जानती कि देवी-देवता हिंदुओं के लिए पूजनीय होते हैं। अपनी ना-समझी के कारण खौफनाक भूतों तथा राक्षसों के साथ देवताओं का प्रयोग कर देती है जोकि अनुचित है।

(ङ) सफिया ने राजकुमार के कारनामों को सुनकर आह इसलिए भरी क्योंकि वह राजकुमारों जैसे कारनामे नहीं कर सकती थी। सफ़िया द्वारा आह भरना उसकी निराशा तथा मजबूरी का प्रतीक है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

[5] रात को तकरीबन डेढ़ बजे थे। मार्च की सुहानी हवा खिड़की की जाली से आ रही थी। बाहर चाँदनी साफ और ठंडी थी। खिड़की के करीब लगा चंपा का एक घना दरख्त सामने की दीवार पर पत्तियों के अक्स लहका रहा था। कभी किसी तरफ से किसी की दबी हुई खाँसी की आहट, दूर से किसी कुत्ते के भौंकने या रोने की आवाज, चौकीदार की सीटी और फिर सन्नाटा! यह पाकिस्तान था। यहाँ उसके तीन सगे भाई थे, बेशमार चाहनेवाले दोस्त थे, बाप की कब्र थी, नन्हे-नन्हे भतीजे-भतीजियाँ थीं जो उससे बड़ी मासूमियत से पूछते, ‘फूफीजान, आप हिंदुस्तान में क्यों रहती हैं, जहाँ हम लोग नहीं आ सकते।’ उन सबके और सफिया के बीच में एक सरहद थी और बहुत ही नोकदार लोहे की छड़ों का जंगला, जो कस्टम कहलाता था। [पृष्ठ-133-134]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ उनकी एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने प्रकृति का वर्णन करते हुए भारत-पाक विभाजन की स्थिति पर समुचित प्रकाश डाला है।

व्याख्या-रात के लगभग डेढ़ बज चुके थे। मार्च का महीना था और खिड़की की जाली में से बड़ी सुंदर और ठंडी-ठंडी हवा अंदर आ रही थी। बाहर चाँदनी स्वच्छ और ठंडी लग रही थी। खिड़की के पास चम्पा का सघन पेड़ था। सामने की दीवार पर उस पेड़ के पत्तों का प्रतिबिम्ब पड़ रहा था। चारों ओर मौन छाया था। फिर भी किसी तरफ से दबी हुई खाँसी की आवाज़ आ जाती थी। दूर से किसी कुत्ते का भौंकना या रोना सुनाई दे रहा था। बीच-बीच में चौकीदार की सीटी बजती रहती थी, फिर चारों ओर मौन का वातावरण छा जाता था। सफ़िया पुनः कहती है कि यह पाकिस्तान था जहाँ उसके तीन सगे भाई रहते थे। असंख्य प्रेम करने वाले मित्र और संबंधी थे। उसके पिता की कब्र भी यहीं थी। उसके छोटे-छोटे भतीजे और भतीजियाँ भी थीं। जो बड़े भोलेपन से पूछते थे कि आप हिंदुस्तान में क्यों रह रही हैं। जहाँ हम आ नहीं सकते अर्थात हमारा हिंदुस्तान में आना वर्जित है। सफ़िया और उनके मध्य एक सीमा बनी हुई थी जहाँ नोकदार छड़ों का जंगला बना था, जिसको सीमा शुल्क (कस्टम) विभाग कहा जाता है। यही सीमा भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग करती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने सफिया के माध्यम से मार्च महीने की रात्रि का बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया है।
  2. सफिया के भतीजे-भतीजियों के माध्यम से भारत-पाक सीमाओं पर करारा व्यंग्य किया गया है।
  3. सहज, सरल तथा सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें उर्दू शब्दों की बहुलता है। सुहानी, दरखत, चौकीदार, बेशुमार, कब्र, मासूमियत, फूफीजान, सरहद आदि उर्दू के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) मार्च के महीने की रात्रिकालीन प्रकृति का वर्णन किस प्रकार किया गया है?
(ख) रात का सन्नाटा किसके कारण भंग हो रहा था?
(ग) सफिया के कौन से सगे-संबंधी पाकिस्तान में रहते थे?
(घ) सफिया के भतीजे-भतीजियों ने उससे भोलेपन में क्या पूछा?
(ङ) सफिया ने कस्टम के बारे में क्या कहा है?
उत्तर:
(क) मार्च के महीने में रात्रिकालीन प्रकृति का वर्णन करते हुए लेखिका ने कहा है कि खिड़की की जाली से सुहानी हवा आ रही थी। बाहर स्वच्छ चाँदनी थी। खिड़की के बाहर चम्पा का एक सघन वृक्ष था, जिसके पत्तों का प्रतिबिम्ब सामने की दीवार पर पड़ रहा था।

(ख) कभी किसी तरफ से दबी खाँसी की आवाज़, दूर से कुत्ते का भौंकना एवं रोना और चौकीदार की सीटी की आवाज़ रात के सन्नाटे को भंग कर रही थी।

(ग) पाकिस्तान में सफिया के तीन सगे भाई थे। असंख्य प्रिय मित्र थे, उसके पिता की कब्र थी और छोटे-छोटे भतीजे-भतीजियाँ थीं।

(घ) भतीजे-भतीजियों ने भोलेपन से सफ़िया से पूछा कि फूफीजान आप हिंदुस्तान में क्यों रहती हैं, जहाँ हम लोग नहीं आ सकते।

(ङ) सफ़िया का कहना है कि उसके सगे-संबंधियों तथा उसके बीच एक सीमा बनी थी। जहाँ नोकदार लोहे की छड़ों का जंगला लगा था, इसी को कस्टम कहा जाता था।

[6] जब उसका सामान कस्टम पर जाँच के लिए बाहर निकाला जाने लगा तो उसे एक झिरझिरी-सी आई और एकदम से उसने फैसला किया कि मुहब्बत का यह तोहफा चोरी से नहीं जाएगा, नमक कस्टमवालों को दिखाएगी वह। उसने जल्दी से पुड़िया निकाली और हैंडबैग में रख ली, जिसमें उसका पैसों का पर्स और पासपोर्ट आदि थे। जब सामान कस्टम से होकर रेल की तरफ चला तो वह एक कस्टम अफसर की तरफ बढ़ी। ज्यादातर मेजें खाली हो चुकी थीं। एक-दो पर इक्का-दुक्का सामान रखा था। वहीं एक साहब खड़े थे लंबा कद, दुबला-पतला जिस्म, खिचड़ी बाल, आँखों पर ऐनक। वे कस्टम अफसर की वर्दी पहने तो थे मगर उन पर वह कुछ अँच नहीं रही थी। सफिया कुछ हिचकिचाकर बोली, “मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ।” [पृष्ठ-135]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ लेखिका की उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक लाना गैर-कानूनी है। यहाँ सफ़िया ने उस स्थिति का वर्णन किया, जब उसका सामान कस्टम पर जाँच के लिए बाहर निकाला जा रहा था।

व्याख्या-सफ़िया कहती है कि आखिर वह समय भी आ गया जब उसका सामान कस्टम पर जाँच के लिए बाहर निकाला जा रहा था। उस समय उसके शरीर में एक कम्पन-सा उत्पन्न हो गया। अचानक उसने निर्णय लिया कि प्रेम की इस भेंट को वह चोरी से नहीं ले जाएगी बल्कि वह कस्टम अधिकारियों को यह नमक दिखाकर ले जाएँगी। शीघ्रता से उसने नमक की पुड़िया को कीनुओं की टोकरी से निकाल लिया और हैंडबैग में रख लिया। हैंडबैग में सफिया के पैसों का बटुआ और पासपोर्ट भी था। उसका सामान कस्टम से भारत जाने वाली रेल पर चढ़ाया जाने लगा। तो वह एक सीमा शुल्क अधिकारी की ओर बढ़ने लगी। अधिकतर

मेजें अब खाली हो चुकी थीं। केवल एक-दो मेजों पर थोड़ा-बहुत सामान रखा था। वहीं एक सीमा शुल्क अधिकारी खड़ा था, जिसका कद लंबा था, परंतु शरीर दुबला-पतला था। उसके बाल आधे काले और आधे सफेद थे। उसने आँखों पर ऐनक पहन रखी थी। यद्यपि उसने शरीर पर सीमा शुल्क अधिकारी की वर्दी पहन रखी थी, परंतु वह वर्दी उसके शरीर के अनुकूल नहीं थी। सफ़िया ने थोड़ा सा साहस करके हिचकिचाते हुए कहा कि मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने सफ़िया की मनःस्थिति का प्रभावशाली वर्णन किया है, जो यह निर्णय लेती है कि वह इस प्रेम रूपी भेंट को चोरी से नहीं ले जाएगी बल्कि कस्टमवालों को दिखाकर ले जाएगी।
  2. सहज, सरल, सामान्य हिंदुस्तानी भाषा का प्रयोग है जिसमें उर्दू तथा अंग्रेज़ी शब्दों का मिश्रण किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जब सफिया का सामान कस्टम पर जाँच के लिए बाहर निकाला गया तो उसने क्या निर्णय लिया?
(ख) जब सफिया का सामान कस्टम से होकर रेल की तरफ जा रहा था तो सफिया ने क्या किया?
(ग) सफिया ने कस्टम अधिकारी का वर्णन किस प्रकार किया है?
(घ) सफिया कस्टम अधिकारी के आगे हिचकिचाकर क्यों बोली?
उत्तर:
(क) सफ़िया ने यह निर्णय लिया कि वह प्रेम की भेंट नमक को चोरी से बाहर नहीं ले जाएगी, बल्कि वह कस्टमवालों को नमक दिखाएगी। इसलिए उसने नमक की पुड़िया निकालकर अपने हैंडबैग में रख ली।

(ख) जब सफ़िया का सामान कस्टम से रेल की तरफ जा रहा था तो वह एक कस्टम अधिकारी की ओर बढ़ी।

(ग) सफ़िया ने लिखा है कि कस्टम अधिकारी का कद लंबा था, परंतु उसका शरीर दुबला-पतला था। सिर के बाल खिचड़ी थे और आँखों पर ऐनक लगा रखी थी। भले ही उसने कस्टम अधिकारी की वर्दी पहन रखी थी पर वह उस पर जच नहीं रही थी।

(घ) क्योंकि सफिया को यह डर था कि उसके पास नमक की पुड़िया है जिसे पाकिस्तान से भारत ले जाने की आज्ञा नहीं थी। इसलिए उसने हिचकिचाकर कस्टम अधिकारी से बात की।

[7] सफ़िया ने हैंडबैग मेज़ पर रख दिया और नमक की पुड़िया निकालकर उनके सामने रख दी और फिर आहिस्ता-आहिस्ता रुक-रुक कर उनको सब कुछ बता दिया। उन्होंने पुड़िया को धीरे से अपनी तरफ सरकाना शुरू किया। जब सफिया की बात खत्म हो गई तब उन्होंने पुड़िया को दोनों हाथों में उठाया, अच्छी तरह लपेटा और खुद सफिया के बैग में रख दिया। बैग सफिया को देते हुए बोले, “मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।” वह चलने लगी तो वे भी खड़े हो गए और कहने लगे, “जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा और उन खातून को यह नमक देते वक्त मेरी तरफ से कहिएगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा, तो बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा।” [पृष्ठ-135]

प्रसंग -प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर हैं। ‘नमक’ लेखिका की एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें लेखिका ने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक वर्णन किया है। विस्थापित होकर भारत में रहने वाली सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने सफ़िया और कस्टम अधिकारी के बीच की बात का वर्णन किया है, कि प्रेम का तोहफा कभी सीमाओं की परवाह नहीं करता।।

व्याख्या-सफ़िया ने हैंडबैग कस्टम अधिकारी की मेज़ पर रख दिया और उसमें से नमक की पुड़िया निकालकर अफसर के सामने रख दी। तत्पश्चात् उसने डरते-डरते सब-कुछ बता दिया। कस्टम अधिकारी ने पुड़िया को धीरे से अपनी तरफ सरकाना आरंभ कर दिया। जब सफ़िया सारी बात कह चुकी तब कस्टम अधिकारी ने नमक की पुड़िया को अपने हाथों में ले लिया और ठीक से कागज में लपेट लिया। उसने स्वयं नमक की पुड़िया सफिया के बैग में रख दी और कहा कि प्यार सीमा शुल्क से इस प्रकार गुज़र जाता है कि कानून को पता भी नहीं चलता और कानून आश्चर्यचकित हो जाता है।

जब सफ़िया वहाँ से चलने लगी तो सीमा शुल्क अधिकारी भी खड़ा हो गया और कहता है कि दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहना और जब उस सिख बीबी को नमक देने लगो तो मेरी तरफ से कहना कि लाहौर अभी भी उनका वतन है और दिल्ली मेरा वतन है। आज जो स्थिति बनी हुई है वह भी धीरे-धीरे ठीक हो जाएगी। एक बार पुनः पाकिस्तान और भारत के संबंध सुधर जाएँगे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने यह स्पष्ट किया है कि प्रेम-मुहब्बत की भेंट सीमाओं की परवाह नहीं करती।
  2. लेखिका ने कस्टम अधिकारी के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है, यदि भारत-पाकिस्तान के लोगों में स्नेह-प्रेम रहेगा तो भारत-पाक संबंधों में सुधार आएगा।
  3. सहज, सरल बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है। कई जगह उर्दू व अंग्रेज़ी शब्दों का मिश्रण है।
  4. वाक्य-विन्यास बड़ा ही सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) सफिया ने नमक की पुड़िया कस्टम अधिकारी के सामने क्यों रखी?
(ख) कस्टम अधिकारी किस देश का था और उसने नमक की पुड़िया सफिया को क्यों लौटा दी?
(ग) ‘मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कस्टम देखता रह जाता है’-इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
(घ) कस्टम अधिकारी ने सफिया को क्या संदेशा दिया?
(ङ) कस्टम अधिकारी किस आशा पर सब कुछ ठीक होने की बात कहता है?
उत्तर:
(क) सफ़िया प्रेम की भेंट नमक की पुड़िया को चोरी से भारत नहीं ले जाना चाहती थी, बल्कि वह कस्टम अधिकारी को दिखाकर ले जाना चाहती थी, इसलिए उसने वह पुड़िया कस्टम अधिकारी के सामने रख दी।

(ख) कस्टम अधिकारी पाकिस्तान का निवासी था, परंतु मूलतः वह दिल्ली का था। उसने नमक की पुड़िया सफिया को इसलिए लौटा दी, क्योंकि वह प्यार की भेंट थी। वह अधिकारी प्रेम-प्यार को फलते-फूलते देखना चाहता था।

(ग) कस्टम अधिकारी के कहने का भाव यह है कि प्रेम-प्यार की भेंट पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं चलती और न ही अधिकारी उसकी जाँच करते हैं बल्कि वे प्रेम की भेंट को प्रेमपूर्वक भिजवा देते हैं। यही कारण है कि कानून को इसका पता नहीं चलता।

(घ) कस्टम अधिकारी ने सफिया से कहा कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहना और सिख बीबी को नमक की पुड़िया देते समय कहना कि लाहौर अब भी उनका वतन है और मेरा वतन दिल्ली है। यदि इस प्रकार की मानसिकता भारत वासियों तथा पाकिस्तान में बनी रहेगी तो भारत-पाक संबंध एक दिन सुधर जाएंगे।

(ङ) कस्टम अधिकारी का विचार है कि चाहे भारतवासी हों या पाकिस्तानी हों, दोनों आपस में स्नेह और प्रेम से रहना चाहते हैं। जब लोगों की ऐसी भावना है तो निश्चय ही भारत-पाक सीमाएँ समाप्त हो जाएंगी।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

[8] प्लेटफार्म पर उसके बहुत से दोस्त, भाई रिश्तेदार थे, हसरत भरी नज़रों, बहते हुए आँसुओं, ठंडी साँसों और भिचे हुए होठों को बीच में से काटती हुई रेल सरहद की तरफ बढ़ी। अटारी में पाकिस्तानी पुलिस उतरी, हिंदुस्तानी पुलिस सवार हुई। कुछ समझ में नहीं आता था कि कहाँ से लाहौर खत्म हुआ और किस जगह से अमृतसर शुरू हो गया। एक ज़मीन थी, एक ज़बान थी, एक-सी सूरतें और लिबास, एक-सा लबोलहजा और अंदाज़ थे, गालियाँ भी एक ही-सी थीं, जिनसे दोनों बड़े प्यार से एक-दूसरे को नवाज़ रहे थे। बस मुश्किल सिर्फ इतनी थी कि भरी हुई बंदूकें दोनों के हाथों में थीं। [पृष्ठ-135-136]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्य भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘नमक’ में से लिया गया है। इसकी लेखिका रज़िया सज्जाद जहीर हैं। ‘नमक’ लेखिका की एक उल्लेखनीय कहानी है, जिसमें उन्होंने भारत-पाक विभाजन के बाद दोनों देशों के विस्थापित तथा पुनर्वासित लोगों की भावनाओं का मार्मिक चित्रण किया है। इसमें विस्थापित होकर भारत में आई सिख बीबी लाहौर को अपना वतन मानती है और वहाँ से नमक मँगवाना चाहती है, परंतु पाकिस्तान से नमक मँगवाना गैर-कानूनी है। यहाँ लेखिका ने रेलवे स्टेशन के उस प्लेटफार्म का वर्णन किया है जो पाकिस्तान की सीमा पर स्थित है।

व्याख्या-लेखिका कहती है कि सफ़िया के बहुत से दोस्त, भाई तथा सगे-संबंधी प्रेमपूर्वक दृष्टि से उसे देख रहे थे। कुछ लोग आँसू बहा रहे थे, कुछ ठंडी आँहें भरकर उसे विदाई दे रहे थे। कुछ लोग अपने होठों को भींचकर आँसुओं को रोकने का प्रयास कर रहे थे। रेलगाड़ी इन सब लोगों के बीच से गुजरकर भारत-पाक सीमा की तरफ बढ़ने लगी। अटारी स्टेशन आते ही पाकिस्तान पुलिस व उनके अधिकारी रेलगाड़ी से उतर गए और हिंदुस्तानी अधिकारी उस गाड़ी में चढ़ गए।

उस समय यह पता ही नहीं चल रहा था कि किस स्थान पर लाहौर खत्म हुआ और किस स्थान से अमृतसर शुरू हुआ। कहने का भाव यह है कि भारत-पाकिस्तान की ज़मीन वहाँ की प्रकृति और वातावरण सब कुछ एक जैसा था। लेखिका कहती भी है-एक ज़मीन थी और पाकिस्तानियों तथा भारतवासियों की एक ही जुबान थी। एक जैसी शक्लें थीं, एक ही जैसी वेशभूषा थी। यही नहीं उनकी बातचीत करने का ढंग एक जैसा था। हैरानी की बात तो यह है कि गालियाँ भी एक जैसी थीं जो दोनों एक-दूसरे को बड़े प्यार से निकाल रहे थे। कठिनाई केवल इस बात की थी कि दोनों तरफ के अधिकारियों के हाथों में बंदूकें थीं, जो लोगों में भय उत्पन्न करती थीं।

विशेष-

  1. यहाँ लेखिका ने भारत और पाकिस्तान की सीमा का बड़ा ही भावनापूर्ण दृश्य प्रस्तुत किया है।
  2. लेखिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारतवासियों और पाकिस्तानियों की शक्लें, वेशभूषा, बातचीत करने का ढंग भी एक जैसा है।
  3. सहज, सरल, बोधगम्य हिंदी भाषा का प्रयोग है। कहीं-कहीं पर उर्दू व अंग्रेजी शब्दों का मिश्रण भी मिलता है।
  4. वाक्य-विन्यास सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) सरहद की ओर बढ़ते समय प्लेटफार्म का दृश्य लिखिए। (ख) अटारी क्या है? वहाँ पर पुलिस में परिवर्तन क्यों हुआ? (ग) लाहौर और अमृतसर में अंतर क्यों प्रतीत नहीं हुआ? (घ) भारत और पाकिस्तान के निवासियों के बीच मुश्किल क्या है?
उत्तर:
(क) जब सफ़िया भारत-पाक सीमा की ओर बढ़ रही थी, तो वहाँ उसके अनेक मित्र और सगे-संबंधी थे। कोई उसे हसरत भरी नज़रों से देख रहा था, कोई रो रहा था और कोई आँखों के आँसुओं को रोकने के लिए अपने होंठ भींच रहा था। सम्पूर्ण वातावरण भावनापूर्ण था। सफ़िया की विदाई के कारण सभी के दिल भर आए थे।

(ख) अटारी एक स्टेशन का नाम है जहाँ से भारत की सीमा आरंभ होती है। यहाँ पर पाकिस्तानी पुलिस उतर जाती है और भारतीय पुलिस सवार हो जाती है। इसी प्रकार पाकिस्तान जाने वाली ट्रेन से भारतीय पुलिस उतर जाती है और पाकिस्तानी पुलिस सवार हो जाती है।

(ग) सफ़िया को लाहौर और अमृतसर में कोई अंतर प्रतीत नहीं हुआ। कारण यह था कि दोनों नगरों के लोगों की भाषा, ज़मीन, वेश-भूषा, बोलचाल, हावभाव तथा गालियाँ देने का ढंग लगभग एक जैसा था। दोनों में लोग एक-दूसरे से मिलकर बात-चीत कर रहे थे।

(घ) भारत और पाकिस्तान के निवासियों के बीच सबसे बड़ी मुश्किल है-दोनों देशों का विभाजन। जिसे लोग नहीं चाहते थे। राजनीतिक कारणों से अब दोनों अलग होकर एक-दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। दोनों ओर की सेनाएँ हमेशा बंदूकें ताने रहती हैं।

नमक Summary in Hindi

नमक लेखिका-परिचय

प्रश्न-
रज़िया सज्जाद ज़हीर का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
रज़िया सज्जाद ज़हीर का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचयरज़िया सज्जाद जहीर का जन्म 15 फरवरी, 1917 को राजस्थान के अजमेर नगर में हुआ। उन्होंने बी०ए० तक की शिक्षा घर पर रहते हुए प्राप्त की। विवाह के बाद उन्होंने उर्दू में एम०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। सन् 1947 में वे अजमेर छोड़कर लखनऊ चली आईं और वहाँ के करामत हुसैन गर्ल्स कॉलेज की प्राध्यापिका के रूप में पढ़ाने लगी। सन् 1965 में उनकी नियुक्ति सोवियत सूचना विभाग में हुई। 18 दिसम्बर, 1979 में उनका देहांत हो गया। रज़िया सज्जाद ज़हीर को सोवियत भूमि नेहरू पुरस्कार से नवाज़ा गया। बाद में उन्हें उर्दू अकादेमी ‘उत्तर प्रदेश’ से भी सम्मानित किया गया। यही नहीं, उन्हें अखिल भारतीय लेखिका संघ अवार्ड भी प्राप्त हुआ।

2. प्रमुख रचनाएँ-उनकी एकमात्र रचना का नाम है ‘ज़र्द गुलाब’। यह एक उर्दू कहानी-संग्रह है।

3. साहित्यिक विशेषताएँ मूलतः रज़िया सज्जाद ज़हीर उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका हैं। उन्हें महिला कहानीकार कहना ही उचित होगा, क्योंकि उन्होंने केवल कहानियाँ ही लिखी हैं। उनके पास एक प्राध्यापिका का कोमल हृदय है। अतः उनकी कहानियाँ जीवन के कोमलपक्ष का उद्घाटन करती हैं। कथावस्तु, पात्र चरित्र-चित्रण, देशकाल, संवाद, भाषा-शैली तथा उद्देश्य की दृष्टि से उनकी कहानियाँ सफल कही जा सकती हैं। संवेदनशीलता उनकी कहानियों की प्रमुख विशेषता है। उन्हें हम मानवतावादी लेखिका भी कह सकते हैं।

रज़िया सज्जाद ज़हीर की कहानियों में जहाँ एक ओर सामाजिक सद्भाव और धार्मिक सहिष्णुता है, वहाँ दूसरी ओर आधुनिक संदर्भो में बदलते हुए पारिवारिक मूल्यों का वर्णन भी है। उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ और मानवीय गुणों का सहज समन्वय अपनी कहानियों में मानवीय संवेदनाओं पर करारा व्यंग्य किया है। कहीं-कहीं वे मानवीय पीडाओं का सजीव चित्र प्रस्तुत करती हैं।

4. भाषा शैली-रज़िया सज्जाद ज़हीर ने मूलतः उर्दू भाषा में ही कहानियाँ लिखी हैं, परंतु उनकी उर्दू भाषा भी सहज, सरल और बोधगम्य है, जिसमें अरबी तथा फारसी शब्दों का खड़ी बोली हिंदी के साथ मिश्रण किया गया है। फिर भी उन्होंने अपनी भाषा में उर्दू शब्दावली का अधिक प्रयोग किया है। उनकी कुछ कहानियाँ देवनागरी लिपि में लिखी जा चुकी हैं और कुछ कहानियों का हिंदी में अनुवाद भी हुआ है। फिर भी उनकी भाषा सहज, सरल, तथा प्रवाहमयी कही जा सकती है। कहीं-कहीं उन्होंने मुहावरों तथा लोकोक्तियों का भी खुलकर प्रयोग किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 16 नमक

नमक पाठ का सार

प्रश्न-
रज़िया सज्जाद जहीर द्वारा रचित कहानी “नमक” का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत कहानी भारत-पाक विभाजन से उत्पन्न दुष्परिणामों की कहानी है। इस विभाजन के कारण दोनों देशों के लोग विस्थापित हुए तथा पुनर्वासित भी हुए। उनकी धार्मिक भावनाओं का यहाँ वर्णन किया गया है। पाकिस्तान से विस्थापित होने वाली एक सिख बीबी लाहौर को अब भी अपना वतन मानती है। भेंट के रूप में वह लाहौर का नमक पाना चाहती हैं। इसी प्रकार एक पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी देहली को अपना वतन कहता है, लेकिन भारतीय कस्टम अधिकारी सुनीलदास गुप्त ढाका को अपना वतन मानता हैं। अपने वतनों से विस्थापित होकर ये लोग अपने मूल जन्म स्थान को भुला नहीं पाते। रज़िया सज्जाद जहीर का कहना है कि एक ऐसा समय भी आएगा जब इन राजनीतिक सीमाओं का कोई महत्त्व नहीं रहेगा। लेखिका की आशा का पूरा होना भारत-पाकिस्तान तथा बांग्लादेश तीनों देशों के लिए कल्याणकारी है। एक बार सफिया अपने पड़ोसी सिख परिवार के घर कीर्तन में भाग लेने के लिए गई थी। वहाँ एक सिख बीबी को देखकर वह अपनी माँ को याद करने लगी, क्योंकि उनकी शक्ल-सूरत सफ़िया की माँ से मिलती थी।

सिख बीबी ने सफिया के बारे में कुछ जानकारी प्राप्त करनी चाही। तब घर की बहू ने बताया कि सफिया मुसलमान है और वह कल अपने भाई से मिलने लाहौर जा रही है। इस पर सिख बीबी ने कहा कि लाहौर तो उसका वतन है। आज भी उसे वहाँ के लोग, खाना-पीना, उनकी जिंदादिली याद है। यह कहते-कहते सिख बीबी की आँखों में आँसू आ गए। सफिया ने उसे सांत्वना दी और कहा कि क्या वह लाहौर से कोई सौगात मँगवाना चाहती है। तब सिख बीबी ने धीरे से लाहौरी नमक की इच्छा व्यक्त की। सफिया लाहौर में पन्द्रह दिनों तक रही। उसके रिशतेदारों ने उसकी खूब खातिरदारी की और उसे पता भी नहीं चला कि पन्द्रह दिन कैसे बीत गए हैं। चलते समय मित्रों और संबंधियों ने सफ़िया को अनेक उपहार दिए। उसने सिख बीबी के लिए एक सेर लाहौरी नमक लिया और सामान की पैकिंग करने लगी, परंतु पाकिस्तान से भारत में नमक ले जाना कानून के विरुद्ध था। अतः सफ़िया ने अपने भाई जो पुलिस अफसर था से सलाह की। भाई ने कहा कि नमक ले जाना कानून के विरुद्ध है। कस्टम वाले तुम्हारे सारे सामान की तालाशी लेंगे और नमक पकड़ा जाएगा, परंतु सफ़िया ने कहा कि वह उस सिख बीबी के लिए सौगात ले जाना चाहती है, जिसकी शक्ल उसकी माँ से मिलती-जुलती है। परंतु सफिया ने अपने भाई से कहा कि वह छिपा कर नहीं बल्कि दिखाकर नमक ले जाएगी। भाई ने पुनः कहा कि नमक ले जाना संभव नहीं है, इससे आपकी बदनामी अवश्य होगी। यह सुनकर सफ़िया रोने लगी।

रात होने पर सफिया सामान की पैकिंग करने लगी। सारा सामान सूटकेस तथा बिस्तरबंद में आ गया था। शेष बचे कीनुओं को उसने टोकरी में डाल दिया तथा उसके नीचे नमक की पुड़िया छुपा दी। लाहौर आते समय उसने देखा था कि भारत से आने वाले केले ला रहे थे और पाकिस्तान से जाने वाले कीनू ले जा रहे थे। कस्टमवाले इन फलों की जाँच नहीं कर रहे थे। यह सब काम करके सफ़िया सो गई। सपने में वह लाहौर के घर की सुंदरता, वहाँ के परिवेश, भाई तथा मित्रों को देखने लगी। उसे अपनी भतीजियों की भोली-भोली बातें याद आ रही थीं। सपने में उसने सिख बीबी के आँसू, इकबाल का मकबरा तथा लाहौर का किला भी देखा, परंतु अचानक उसकी आँख खुल गई, क्योंकि उसका हाथ कीनू की टोकरी पर लग गया था। उसे देते समय उसके मित्र ने कहा था कि यह पाकिस्तान और भारत की एकता का मेवा है। स्टेशन पर फर्स्ट क्लास के वेटिंग रूम में बैठी सफ़िया सोचने लगी कि मेरे आसपास कई लोग हैं, परंतु मुझे पता है कि कीनुओं की टोकरी में नीचे नमक की पुड़िया है। उसका सामान अब कस्टमवालों के पास जाँच के लिए जाने लगा। वह थोड़ी घबरा गई उसे थोड़ा-सा कम्पन हआ। तब उसने निर्णय लिया कि प्रेम की सौगात नमक को वह चोरी से नहीं ले जाएगी।

उसने नमक की पुड़िया निकालकर अपने हैंडबैग में रख ली। जब सामान जाँच के बाद रेल की ओर भेजा जाने लगा तो उसने एक कस्टम अधिकारी से इस बारे में चर्चा की। उसने अधिकारी से पूछ लिया था कि वह कहाँ का निवासी है। उसने कहा कि उसका वतन दिल्ली है। आखिर सफ़िया ने नमक की पुड़िया बैग से निकालकर अफसर की मेज पर रख दी और सारी बात बता दी। कस्टम अधिकरी ने स्वयं नमक की पुड़िया को सफ़िया के बैग में रख दिया और कहा “मुहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुज़र जाती है कि कानून हैरान रह जाता है।” अंत में उस अधिकारी ने कहा “जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा और उन खातून को यह नमक देते वक्त मेरी तरफ से कहिएगा कि लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा, तो बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा।” अंततः गाड़ी भारत की ओर चल पड़ी। अटारी स्टेशन पर पाकिस्तानी पुलिस नीचे उतर गई और हिंदुस्तानी पुलिस चढ़ गई। सफिया सोचने लगी कि कितनी विचित्र बात है कि “एक-सी जुबान, एक-सा लबोलहजा तथा एक-सा अंदाज फिर भी दोनों के हाथों में भरी हुई बंदूकें।” ।

अमृतसर पहुँचने पर भारतीय कस्टम अधिकारी फर्स्ट क्लास वालों की जाँच उनके डिब्बे के सामने ही करने लगे। सफ़िया की जाँच हो चुकी थी, परंतु सफिया ने अपना हैंडबैग खोलकर कहा कि मेरे पास थोड़ा लाहौरी नमक है तथा सिख बीबी की सारी कहानी सुना दी। अधिकारी ने सफिया की बात को ध्यान से सुना। फिर उसे एक तरफ आने के लिए कहा। उसने सफिया के सामान का ध्यान रखने के लिए एक कर्मचारी को आदेश दिया। वह सफ़िया को प्लेटफार्म के एक कमरे में ले गया। उसे आदर-पूर्वक बिठाया और चाय पिलाई। फिर एक पुस्तक उसे दिखाई, जिस पर लिखा था-“शमसुलइसलाम की तरफ से सुनील दास गुप्त को प्यार के साथ, ढाका 1946″। उसने यह भी बताया कि उसका वतन ढाका है। बचपन में वह अपने मित्र के साथ नज़रुल और टैगोर दोनों को पढ़ते थे। इस प्रकार सुनील दास ढाका की यादों में खो गया-“वैसे तो डाभ कलकत्ता में भी होता है जैसे नमक पर हमारे यहाँ के डाभ की क्या बात है! हमारी जमीन, हमारे पानी का मज़ा ही कुछ और है!” उसने पुड़िया सफ़िया के बैग में डाल दी और आगे-आगे चलने लगा। सफिया सोचने लगी-“किसका वतन कहाँ है वह जो कस्टम के इस तरफ है या उस तरफ!

कठिन शब्दों के अर्थ

कदर = प्रकार। ज़िस्म = शरीर। नेकी = भलाई। मुहब्बत = प्यार। रहमदिली = दयालुता। मुहर्रम = मुसलमानों का त्योहार। उम्दा = अच्छा। नफीस = सुरुचिपूर्ण। शौकीन = रसिया। जिन्दादिली = उत्साह और जोश। तस्वीर = मूर्ति। वतन = देश। साडा = हमारा । सलाम = नमस्कार । दुआ = प्रार्थना, शुभकामना। रुखसत = विदा। सौगात = भेंट। आहिस्ता = धीरे। जिमखाना = व्यायामशाला। खातिरदारी = मेहमान नवाजी। परदेसी = विदेशी। अज़ीज़ = प्रिय। सेर = एक किलो से थोड़ा कम। गैरकानूनी = कानून के विरुद्ध। बखरा = बंटवारा। ज़िक्र = चर्चा। अंदाज़ = तरीका। बाजी = बहन जी, दीदी। कस्टम = सीमा शुल्क। चिंदी-चिंदी बिखेरना = बुरी तरह से वस्तुओं को उलटना-पलटना। हुकूमत = सरकार। मुरौवत = मानवता। शायर = कवि। तोहफा = भेंट। चंद = थोड़ा। स्मगल = चोरी । ब्लैक मार्केट = काला बाज़ारी । बहस = वाद-विवाद । अदीब= साहित्यकार। बदनामी = अपयश। बेहतर = अच्छा। रवाना होना = विदा होना। व्यस्त = काम में लगा होना। पैकिंग = सामान बाँधना। सिमट = सहेज। नाजुक = कोमल । हावी होना = भारी पड़ना। मायने = मतलब। वक्त = समय। तह = नीचे की सतह । कब्र = मुर्दा दफनाने का स्थान। शहजादा = राजकुमार। रान = जाँघ । खौफनाक = भयानक। सरहद = सीमा। तरकीब = युक्ति। आश्वस्त = भरोसा होना। दोहर = चादर। दरख्त = वृक्ष। अक्स = प्रतिमूर्ति । लहकना = लहराना । आहट = हल्की-सी आवाज़। बेशुमार = अत्यधिक। मासूमियत = भोलापन। नारंगी = संतरिया रंग। दूब = घास। लबालब = ऊपर तक। वेटिंग रूम = प्रतीक्षा कक्ष। निगाह = नज़र। झिरझरी = सिहरन, कंपन। पासपोर्ट = विदेश जाने का पहचान-पत्र। खिचड़ी बाल = आधे सफेद आधे काले बाल। गौर = ध्यान। फरमाइए = कहिए। खातून = कुलीन नारी। रफ्ता-रफ्ता = धीरे-धीरे। हसरत = कामना। जुबान = भाषा। सूरत = शक्ल । लिबास = पहनावा । लबोलहजा = बोलचाल का तरीका। अंदाज = ढंग। नवाजना = सम्मानित करना। पैर तले की ज़मीन खिसकना = घबरा जाना। सफा = पृष्ठ। टाइटल = शीर्षक। डिवीजन = विभाजन। सालगिरह = वर्षगाँठ। डाभ = कच्चा नारिथल। फन = गर्व।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 15 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 15 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 15 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

HBSE 12th Class Hindi चार्ली चैप्लिन यानी हम सब Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
लेखक ने ऐसा क्यों कहा कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा?
उत्तर:
चार्ली चैप्लिन अपने समय के एक महान् कलाकार थे। उनकी फिल्में समाज और राष्ट्र के लिए अनेक संदेश देती हैं। छले 75 वर्षों से चार्ली के बारे में बहुत कुछ कहा गया है, परंतु अभी भी अगले पचास वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा। इसका पहला कारण तो यह है कि चार्ली के बारे में अभी कुछ ऐसी रीलें मिली हैं जिनके बारे में कोई कुछ नहीं जानता था। अतः रीलों को देखकर उनका मूल्यांकन किया जाएगा और उन पर काफी चर्चा होगी। इसके साथ-साथ चार्ली ने भारतीय जन-जीवन पर जो अपनी अमिट छाप छोड़ी है, अभी उसका मूल्यांकन होना बाकी है। निश्चय से चार्ली एक लोकप्रिय कलाकार थे। उनकी फिल्मों ने प्रत्येक समाज तथा राष्ट्र को अत्यधिक प्रभावित किया है। अतः आने वाले पचास वर्षों तक उनके बारे में काफी कुछ कहा जाएगा और उनके योगदान पर चर्चा होती रहेगी।

प्रश्न 2.
चैप्लिन ने न सिर्फ फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया, बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण-व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?
उत्तर:
फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाने का अर्थ है, उसे लोगों के लिए उपयोगी बनाना और फिल्मों के माध्यम से आम आदमी की अनुभूति को प्रकट करना। चार्ली से पहले की फिल्में एक विशेष वर्ग के लिए तैयार की जाती थीं। इन फिल्मों की कथावस्तु भी वर्ग विशेष से संबंधित होती थी, परंतु चार्ली ने निम्न वर्ग को अपनी फिल्मों में स्थान दिया और फिल्म-कला को जन-साधारण से जोड़ा। अतः यह कहना उचित होगा कि चार्ली ने फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया।

वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ने का अभिप्राय यह है कि फिल्में किसी विशेष वर्ग तथा जाति के लिए नहीं बनतीं। फिल्मों को सभी वर्गों के लोग देख सकते हैं। प्रायः चार्ली से पूर्व फिल्में कुछ विशेष वर्ग तथा जातियों के लिए तैयार की जाती थीं। उदाहरण के रूप में समाज के सुशिक्षित लोगों के लिए कला तैयार की जाती थी। इसी प्रकार कलाकार किसी विचारधारा का समर्थन करने के लिए फिल्में बनाते थे, परंतु चार्ली ने वर्ग-विशेष या वर्ण-व्यवस्था की जकड़न को भंग कर दिया और आम लोगों के लिए फिल्में बनाईं। यही नहीं, उन्होंने आम लोगों की समस्याओं को भी अपनी फिल्मों में प्रदर्शित किया। परिणाम यह हुआ कि उनकी फिल्में पूरे विश्व में लोकप्रिय बन गईं।

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प्रश्न 3.
लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गांधी और नेहरू ने भी उनका सान्निध्य क्यों चाहा?
उत्तर:
लेखक ने राजकूपर द्वारा बनाई गई ‘आवारा’ नामक फिल्म को चार्ली का भारतीयकरण कहा है। ‘आवारा’ फिल्म केवल ‘दी ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद नहीं है, बल्कि चार्ली का भारतीयकरण है। जब आलोचकों ने राजकपूर पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने चार्ली की नकल की है, तो उन्होंने इसकी परवाह नहीं की। राजकपूर की ‘श्री 420’ भी इसी प्रकार की फिल्म है। ‘आवारा’ और ‘श्री 420’ के बाद तो भारतीय फिल्मों में यह परंपरा चल पड़ी। यही कारण है कि दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, अभिताभ बच्चन तथा श्रीदेवी ने चार्ली का अनुकरण करते हुए स्वयं पर हँसने की परंपरा को बनाए रखा। गांधी जी भी कभी-कभी चार्ली के समान स्वयं पर हँसते थे। लेखक स्वीकार करता है कि महात्मा गांधी में चार्ली चैप्लिन का खासा पुट था। नेहरू और गांधी भी चार्ली के साथ रहना पसंद करते थे क्योंकि वे दोनों स्वयं पर हँसने की इस कला में निपुण थे।

प्रश्न 4.
लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों? क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं जहाँ कई रस साथ-साथ आए हो?
उत्तर:
लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में रस को श्रेयस्कर माना है, परंतु उनका कहना है कि कलाकृति में कुछ रसों को पाया-जाना अधिक श्रेयस्कर है। मानव-जीवन में हर्ष और विषाद दोनों की स्थितियाँ रहती हैं। करुण रस का हास्य रस में बदल जाना एक नवीन रस की माँग को उत्पन्न करता है, परंतु यह भारतीय कला में नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं जहाँ कई रस एक साथ आ जाते हैं। उदाहरण के रूप में उद्यान में नायक-नायिका प्रेम क्रीड़ाएँ कर रहे होते हैं। इस स्थिति में श्रृंगार रस है, परंतु यदि वहाँ पर अचानक साँप निकल आए तो शृंगार रस भय में परिवर्तित होकर भयानक रस को जन्म देता है। इसी प्रकार ‘रामचरितमानस’ में लक्ष्मण मूर्छा के प्रसंग में राम विलाप कर रहे होते हैं जिससे करुण रस का जन्म होता है, परंतु वहीं पर संजीवनी बूटी लेकर हनुमान का आना वीर रस को जन्म देता है। संस्कृत तथा हिंदी साहित्य में इस प्रकार के अनेक उदाहरण खोजे जा सकते हैं।

प्रश्न 5.
जीवन की जद्दोजहद ने चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे संपन्न बनाया?
उत्तर:
चार्ली को जीवन में निरंतर संघर्ष का सामना करना पड़ा। उसकी माँ एक परित्यकता नारी थी। यही नहीं, वह दूसरे दर्जे की स्टेज अभिनेत्री भी थी। घर में भयावह गरीबी थी। फिर उसकी माँ पागल भी हो गई। तत्कालीन पूँजीपति वर्ग एवं सामंतशाही वर्ग ने चार्ली को दुत्कारा और लताड़ा। नानी की ओर से वे खानाबदोशों से संबंधित थे, परंतु उसके पिता यहूदी वंशी थे। वे इन जटिल परिस्थितियों में संघर्ष करते रहे, परंतु उनका चरित्र घुमंतू बन गया। इस संघर्ष के कारण उन्हें जो जीवन-मूल्य मिले, वे उनके करोड़पति बन जाने पर भी ज्यों-के-त्यों बने रहे। इस लंबे संघर्ष ने उनके व्यक्तित्व में त्रासदी और हास्य को उत्पन्न करने वाले तत्त्वों का मिश्रण कर दिया। अतः चार्ली का व्यक्तित्व ऐसा बना जो स्वयं पर हँसता था। इसका एक कारण यह भी था कि चार्ली ने बड़े-बड़े अमीरों शासकों तथा सामंतों की सच्चाई को समीप से देखा था। उन्होंने अपनी फिल्मों में भी उनकी गरिमामयी दशा को दिखाया और फिर उन पर लात मारकर सबको हँसाया।

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प्रश्न 6.
चार्ली चैप्लिन की फिल्मों में निहित त्रासदी/करुणा/हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में क्यों नहीं आता?
उत्तर:
चार्ली चैप्लिन की फिल्मों में त्रासदी/करुणा/हास्य का अनोखा सामंजस्य देखा जा सकता है। इस प्रकार का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में नहीं आता। इसका कारण यह है कि भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र में कहीं पर भी करुण का हास्य में बदल जाना नहीं मिलता। ‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में हास्य के जो उदाहरण मिलते हैं वह हास्य दूसरों पर है अर्थात् पात्र दूसरे पात्रों पर हँसते हैं, अपने-आप पर नहीं। इसी प्रकार इनमें दिखाई गई करुणा दुष्टों से भी संबंधित है। संस्कृत नाटकों का विदूषक जो थोड़ी-बहुत बदतमीजी करते दिखाया गया है, उसमें भी करुण और हास्य का मिश्रण नहीं है।

प्रश्न 7.
चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर कब हँसता है?
उत्तर:
चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर तब हँसता है जब वह स्वयं को गर्वोन्मत्त, आत्मविश्वास से लबरेज़, सभ्यता, सफलता तथा संस्कृति की प्रतिमूर्ति, दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ रूप से दिखाता है। इस स्थिति में समझ लेना चाहिए कि अब कुछ ऐसा होने जा रहा है कि चार्ली की सभी गरिमा और गर्व सूई-चुभे गुब्बारे के समान फुस्स हो जाने वाली है। ऐसी स्थिति में वह स्वयं पर हँसता है।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
आपके विचार से मूक और सवाक् फिल्मों में से किसमें ज्यादा परिश्रम करने की आवश्यकता है और क्यों?
उत्तर:
हमारे विचार से मूक और सवाक् फिल्मों में से मूक फिल्मों में ज्यादा परिश्रम करने की आवश्यकता होती है। कारण यह है कि मूक फिल्मों में सभी भावों को शारीरिक चेष्टाओं द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है, जिसके लिए बहुत अधिक परिश्रम करना पड़ता है जबकि सवाक् फिल्मों में यह कार्य वाणी द्वारा आसानी से किया जाता है। कोई मंजा हुआ कलाकार ही मूक फिल्मों में सभी भावों को शारीरिक चेष्टाओं द्वारा व्यक्त कर सकता है। सवाक् फिल्मों में वाणी द्वारा स्नेह, करुणा, घृणा और क्रोध आदि भावों को आसानी से व्यक्त किया जा सकता है, परंतु यदि मूक फिल्मों में अभिनय की दक्षता नहीं होगी तो दर्शक भाव को समझ नहीं पाएंगे।

प्रश्न 2.
सामान्यतः व्यक्ति अपने ऊपर नहीं हँसते, दूसरों पर हँसते हैं? कक्षा में ऐसी घटनाओं का जिक्र कीजिए जब (क) आप अपने ऊपर हँसे हों; (ख) हास्य करुणा में या करुणा हास्य में बदल गई हो।।
उत्तर:
(क) एक बार मैं वर्षा में प्रसन्नचित होकर भागने लगा। अचानक मेरा पैर फिसला और मैं गिर गया। मैंने अपने चारों ओर देखा कि कहीं कोई मुझे देख तो नहीं रहा, परंतु सामने एक गधा खड़ा था। फलतः मैं अपनी बेवकूफी पर हँसने लगा।

(ख) एक बार रामकुमार जैसे अड़ियल लड़के को दंड देने के लिए मास्टर ने इतना पीटा कि उसका पेशाब ही निकल गया। कक्षा के सभी लड़के उसे देखकर हँसने लगे जिससे रामकुमार घबरा गया और वह बेहोश होकर गिर पड़ा। अब सभी लोग बड़े दुखी थे। उसे होश में लाने के लिए प्रयत्न करने लगे। मास्टर जी भी बड़े घबराए हुए दिखाई दे रहे थे। इस प्रकार हास्य की घटना करुणा में बदल गई।

प्रश्न 3.
चार्ली हमारी वास्तविकता है, जबकि सुपरमैन स्वप्न आप इन दोनों में खुद को कहाँ पाते हैं?
उत्तर:
चार्ली की फिल्मों में हमारे जीवन का यथार्थ रूप देखने को मिलता है। यही कारण है कि हम अपने को उसके रूप में देखने लगते हैं। अतः चार्ली हमारी ही वास्तविकता है, परंतु सुपरमैन मात्र कल्पना है। उसकी स्थिति सपने जैसी है। उसके कार्य इस प्रकार के होते हैं जिनके बारे में हम सपने में भी नहीं सोच सकते। सुपरमैन को हम स्वयं में कहीं नहीं देख सकते हैं। अतः मूलतः हम सभी चार्ली हैं। हम सुपरमैन नहीं बन सकते। इन दोनों में हम स्वयं को चार्ली के निकट पाते हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय सिनेमा और विज्ञापनों ने चार्ली की छवि का किन-किन रूपों में उपयोग किया है? कुछ फिल्में (जैसे आवारा, श्री 420, मेरा नाम जोकर, मिस्टर इंडिया और विज्ञापनों (जैसे चैरी ब्लॉसम) को गौर से देखिए और कक्षा में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
शिक्षक की सहायता से विद्यार्थी स्वयं करें। यह प्रश्न परीक्षोपयोगी नहीं है।

प्रश्न 5.
आजकल विवाह आदि उत्सव, समारोहों एवं रेस्तराँ में आज भी चार्ली चैप्लिन का रूप धरे किसी व्यक्ति से आप अवश्य टकराए होंगे। सोचकर बताइए कि बाज़ार ने चार्ली चैप्लिन का कैसा उपयोग किया है?
उत्तर:
आजकल विवाह आदि उत्सव, समारोहों एवं रेस्तराँ में मेहमानों का अभिनंदन करने अथवा हास्य की स्थिति उत्पन्न करने के लिए चार्ली चैप्लिन का प्रयोग किया जाता है। विशेषकर बच्चे उससे हँस-हँस कर बात करते हैं तथा खूब आनंद उठाते हैं। बाजार में चार्ली चैप्लिन का प्रयोग अधिकाधिक सामान बेचने के लिए किया जा सकता है। विशेषकर का रूप धारण करके ग्राहकों का अभिनंदन करें तथा उनसे हँसी-मजाक करें तो मॉल में उत्पादन की बिक्री बढ़ सकती है।

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भाषा की बात

प्रश्न 1.
तो चेहरा चार्ली चार्ली हो जाता है। वाक्य में चार्ली शब्द की पुनरुक्ति से किस प्रकार की अर्थ-छटा प्रकट होती है? इसी प्रकार के पुनरुक्त शब्दों का प्रयोग करते हुए कोई तीन वाक्य बनाइए। यह भी बताइए कि संज्ञा किन स्थितियों में विशेषण के रूप में प्रयुक्त होने लगती है?
उत्तर:
तो चेहरा चार्ली-चार्ली हो जाता है। इस वाक्य में चार्ली शब्द की पुनरुक्ति वास्तविकता के अर्थ को दर्शाती है अर्थात् चेहरे पर अपनी वास्तविकता का बोध होना अथवा सामान्य मनुष्य होने का भाव उजागर हो जाना।

तीन वाक्य-

  • तू डाल-डाल मैं पात-पात
  • पानी-पानी-जब मोहन की चोरी पकड़ी गई तो वह पानी-पानी हो गया।
  • गुलाब-गुलाब-प्रेमिका प्रेमी को एकटक देख रही थी, उसी समय उसके माता-पिता वहाँ आ गए। लज्जा के कारण उसका चेहरा गुलाब-गुलाब हो गया।

प्रश्न 2.
नीचे दिए वाक्यांशों में हुए भाषा के विशिष्ट प्रयोगों को पाठ के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।
(क) सीमाओं से खिलवाड़ करना
(ख) समाज से दुरदुराया जाना
(ग) सुदूर रूमानी संभावना
(घ) सारी गरिमा सुई-चुभे गुब्बारे जैसी फुस्स हो उठेगी।
(ङ) जिसमें रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं।
उत्तर:
(क) सीमाओं से खिलवाड़ करना का अर्थ है-सीमाओं का अतिक्रमण करना। चार्ली की फिल्मों ने पिछले 75 वर्षों में अपनी कला से सभी राष्ट्रों के लोगों को मुग्ध किया है। उनकी फिल्मों का प्रभाव समय, भूगोल और संस्कृतियों की सीमाओं को कर गया है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि चार्ली की फिल्मों का प्रभाव सर्वव्यापी और सार्वदेशक है।

(ख) चार्ली की पृष्ठभूमि निर्धनता पर आधारित थी। इसलिए वे समाज के पूँजीपति वर्ग तथा सामंती वर्ग से तिरस्कृत होते रहे।

(ग) चार्ली की नानी का संबंध खानाबदोशों से था। यही कारण है कि लेखक यह सुदूर रुमानी संभावना करता है कि चार्ली में कुछ-न-कुछ भारतीयता का अंश भी होगा। कारण यह है कि यूरोप के जिप्सी भारत से ही गए थे। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में स्वयं को श्रेष्ठतम दिखलाने का प्रयास करता है, परंतु अचानक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि उसकी सारी गरिमा और गर्व सुई-चुभे गुब्बारे के समान फुस्स हो जाती है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि चार्ली अपने श्रेष्ठ रूप को भी हास्य में परिवर्तित कर लेता है।

(ङ) चार्ली ने अपने महानतम क्षणों में अपमान, श्रेष्ठतम शूरवीर क्षणों में क्लैब्य, पलायन तथा लाचारी में विजय के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। यही कारण है कि उनका रोमांस प्रायः हास्य में परिवर्तित हो जाता है।

गौर करें

प्रश्न 1.
(क) दरअसल सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सिद्धांत या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है।
(ख) कला में बेहतर क्या है बुद्धि को प्रेरित करने वाली भावना या भावना को उकसाने वाली बुद्धि?
(ग) दरअसल मनुष्य स्वयं ईश्वर या नियति का विदूषक, क्लाउन, जोकर या साइड किक है।
(घ) सत्ता, शक्ति, बुद्धिमता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्ष में जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा चार्ली चार्ली हो जाता है।
(ङ) मॉडर्न टाइम्स द ग्रेट डिक्टेटर आदि फिल्में कक्षा में दिखाई जाएँ और फिल्मों में चार्ली की भूमिका पर चर्चा की जाए।
उत्तर:
(क) यह सच्चाई है कि कला के सिद्धांत बाद में बनाए जाते हैं। कला भावों का सहज उच्च छलन है। उसे सिद्धांतों में बाँधकर नहीं रखा जा सकता।

(ख) भावना को उकसाने वाली बुद्धि।

(ग) मनुष्य ईश्वर का विदूषक है।

(घ) सही है।

(ङ) आचार्य तथा शिक्षक की सहायता लेकर कक्षा में फिल्म दिखाना।

HBSE 12th Class Hindi चार्ली चैप्लिन यानी हम सब Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब पाठ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
विश्व सिनेमा के विकास में चार्ली चैप्लिन का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। वे एक महान अभिनेता थे। इस पाठ को पढ़कर हम उस महान अभिनेता के भीतर के मानव को जान जाते हैं। चार्ली निर्धन पृष्ठभूमि से संबंधित था, परंतु अपनी अभिनय कला के द्वारा उसने फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया तथा दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को भंग किया। वे साधारण होकर भी असाधारण थे। प्रस्तुत पाठ हास्य फिल्मों के महान् अभिनेता तथा निर्देशक चार्ली चैप्लिन के कला-धर्म की कुछ मूलभूत विशेषताओं को उजागर करता है। चार्ली की प्रमुख विशेषता करुणा तथा हास्य का सामंजस्य है। चार्ली की लोकप्रियता समय और स्थान की सीमाओं को लाँघकर सार्वदेशक और सार्वकालिक बन गई। चार्ली की लोकप्रियता से पता चलता है कि कला स्वतंत्र है। उन्हें सिद्धांतों में बाँधकर नहीं रखा जा सकता। लेखक ने पूरे पाठ में चार्ली चैप्लिन के जादू का सारगर्भित विवेचन किया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 15 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

प्रश्न 2.
चार्ली में कौन-सी विशेषताएँ हैं जिन्हें अन्य कॉमेडियन छू तक नहीं पाए?
उत्तर:
चार्ली की फिल्मों की प्रमुख विशेषता यह है कि उनमें भाषा का प्रयोग नहीं हुआ अथवा बहुत कम हुआ है। फलस्वरूप अभिनेता को अधिकाधिक मानवीय होना पड़ा। सवाक् फिल्मों में बड़े-बड़े कॉमेडियन हुए हैं, लेकिन उनको वह लोकप्रियता नहीं मिली जो चार्ली को मिली है। इसका प्रमुख कारण यह है कि चार्ली का प्रभाव सार्वभौमिक रहा है। चार्ली का चिर-युवा दिखाई देना अथवा बच्चों जैसा दिखाई देना एक उल्लेखनीय विशेषता हो सकती है, परंतु उनकी सर्वाधिक प्रमुख विशेषता यह है कि वे किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते। चार्ली के आस-पास जो वस्तुएँ, अड़गे, खलनायक, दुष्ट औरतें आदि होते हैं वे विदेश का निर्माण कर देते हैं। हम सभी चार्ली बन जाते हैं। चार्ली के सभी संगठनों में हमें यही लगता है कि यह मैं ही हो सकता हूँ अथवा हम यह कह सकते हैं कि उनकी फिल्मों को देखकर हम सब चार्ली बन जाते हैं।

प्रश्न 3.
चार्ली के बारे में लेखक की क्या धारणा है? ।
अथवा
लेखक ने चार्ली की किन विशेषताओं पर प्रकाश डाला है?
उत्तर:
सर्वप्रथम चार्ली ने पिछले 75 वर्षों से संसार को अपनी फिल्मों द्वारा मंत्र-मुग्ध किया है। उन्होंने पाँच पीढ़ियों तक लोगों को हँसाया जो अपने बुढ़ापे तक चार्ली को निश्चय से याद रखेंगी। यही नहीं, आगामी 50 वर्षों तक भी चार्ली पर बहुत कुछ कहा जाएगा और लिखा जाएगा। चार्ली ने भारतीय फिल्मी जगत को अत्यधिक प्रभावित किया है। विशेषकर राजकपूर ने चार्ली की फिल्म-कला से प्रभावित होकर ‘आवारा’, ‘श्री 420’ जैसी फिल्में बनाईं। चार्ली ने फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया और दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को भंग किया। करोड़पति बनने पर भी चार्ली अपनी भूमि से जुड़े रहे। उन्होंने अपने जीवन-मूल्यों में कोई परिवर्तन नहीं किया। यही नहीं, उन्होंने हास्य और करुण रस का अद्भुत सामंजस्य किया तथा लोगों को अपने ऊपर हँसना सिखाया।

प्रश्न 4.
चार्ली के जीवन को प्रभावित करने वाली दूसरी घटना कौन-सी है? इसके बारे में चार्ली ने आत्मकथा में क्या लिखा है?
उत्तर:
चार्ली के जीवन को प्रभावित करने वाली दूसरी घटना बहुत महत्त्वपूर्ण है। बचपन में चार्ली एक ऐसे घर में रहता था जो कसाईखाने के समीप था। वह प्रतिदिन सैकड़ों जानवरों को कसाईखाने में कटते हुए देखता था। एक दिन एक भेड़ किसी तरह कर भाग निकली। उसे पकड़ने वाले जो लोग पीछा कर रहे थे, वे रास्ते में फिसले और गिर पड़े। लोग यह दृश्य देखकर ठहाके लगाकर हँसने लगे। आखिरकार वह निर्दोष जानवर पकड़ लिया गया। तब बालक चार्ली को यह एहसास हुआ कि बेचारी उस भेड़ के साथ क्या हुआ होगा। वह रोता हुआ माँ के पास दौड़ कर आया और चिल्लाने लगा-‘उसे मार डालेंगे, उसे मार डालेंगे’। आगे चलकर चैप्लिन ने अपनी आत्मकथा में इस घटना का उल्लेख किया। “बसंत की वह बेलौस दोपहर और वह मजाकिया दौड़ कई दिनों तक मेरे साथ रही और मैं कई बार सोचता हूँ कि उस घटना ही ने तो कहीं मेरी भावी फिल्मों की भूमिका तय नहीं कर दी थी-त्रासदी और हास्योत्पादक तत्त्वों के सामंजस्य की।” ।

प्रश्न 5.
चार्ली चैप्लिन ने किस प्रकार भारतवासियों को प्रभावित किया?
उत्तर:
चार्ली चैप्लिन ने अपनी फिल्मों में हैरतअंगेज कारनामे किए, जिन्हें देखकर लाखों बच्चे हँसते हैं। आज भी बच्चे उनके कारनामों को देखते हैं। यह हँसी सदियों तक भारतवासियों को आनंद प्रदान करती रहेगी। यही नहीं, चार्ली ने भारतीय फिल्मों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विशेषकर राजकपूर ने चार्ली चैप्लिन का अनुकरण करते हुए ‘आवारा’ तथा ‘श्री 420’ जैसी लोकप्रिय फिल्में बनाईं। आगे चलकर हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध कलाकार दिलीप कुमार, देवानंद, अमिताभ बच्चन, श्रीदेवी आदि नायक-नायिकाओं ने भी चार्ली से प्रभावित होकर स्वयं को हँसी का पात्र बनाया। इन कलाकारों की चार्ली की नकल पर बनाई गई फिल्में दर्शकों में काफी लोकप्रिय हुईं। इस प्रकार चार्ली चैप्लिन ने न केवल भारतीयों को हँसाया, बल्कि उनका भरपूर मनोरंजन भी किया।

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प्रश्न 6.
चार्ली के मन पर करुणा और हास्य के संस्कार कैसे पड़े? ।
उत्तर:
बचपन में एक बार चार्ली बहुत अधिक बीमार पड़ गया। तब उसकी माँ ने उसे बाइबिल पढ़कर सुनाई। जब ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने का प्रसंग आया तो चार्ली अपनी माँ के साथ-साथ अत्यधिक द्रवित हो उठा और दोनों रोने लगे। इस प्रसंग से चार्ली ने करुणा को समीप से जाना। एक अन्य घटना भी है, जिसके कारण चार्ली के मन पर हास्य और करुणा के संस्कार पड़े। चार्ली के घर के पास एक कसाईखाना था। वहाँ हर रोज कटने के लिए जानवर लाए जाते थे। एक दिन एक भेड़ किसी प्रकार अपनी जान बचाकर भाग निकली। भेड़ को पकड़ने के लिए जो आदमी उसके पीछे दौड़ रहा था, वह रास्ते में अनेक बार फिसला और गिरा जिससे सब लोग उसे देखकर ठहाके लगाकर हँसने लगे। यह दृश्य देखकर चार्ली को भी हँसी आ गई, परंतु जब भेड़ पकड़ी गई तो चार्ली दुखी हो गया। वह यह सोचकर रोने लगा कि अब इस भेड़ को मार दिया जाएगा। इस प्रसंग के कारण भी उसके हृदय में करुणा के संस्कार उत्पन्न हुए।

प्रश्न 7.
राजकपूर ने किस बात से प्रेरित होकर फिल्मों में क्या प्रयोग किए?
उत्तर:
राजकपूर जानते थे कि चार्ली का सौंदर्यशास्त्र भारतीय है। वे इस सौंदर्यशास्त्र का प्रयोग भारतीय फिल्मों में करना चाहते थे, परंतु उन्हें इस बात की चिंता थी कि भारतीय लोग इसे स्वीकार करेंगे अथवा नहीं। फिर भी उन्होंने इसे प्रयोग करते हुए ‘आवारा’ फिल्म बनाई, जो कि चार्ली की ‘दि ट्रैम्प’ का भारतीयकरण था। राजकपूर ने इस बात की परवाह नहीं की कि वे चार्ली की नकल करके यह फिल्म बना रहे हैं और अभिनय कर रहे हैं। इसके बाद राजकपूर ने ‘श्री 420’ फिल्म बनाई। ये दोनों फिल्में काफी लोकप्रिय हुईं। इनमें नायकों पर हँसने तथा स्वयं नायकों की अपने ऊपर हँसने की नवीन परंपरा देखी जा सकती थी। 1953-57 के मध्य चार्ली अपनी गैर-ट्रैम्पनुमा अंतिम फिल्में बनाने लगे। तब तक भारतीय रंगमंच पर राजकपूर चैप्लिन का युवा अवतार बन चुके थे।

प्रश्न 8.
भारतीय जनता ने चार्ली के ‘फिनोमेनन’ को स्वीकार किया- उदाहरण देते हुए स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय जनता ने चार्ली के इस ‘फिनोमेनन’ को स्वीकार किया कि स्वयं पर हँसना और दूसरों को स्वयं पर हँसने का मौका देना भी हास्य रस को उत्पन्न करता है। भारतीयों ने इस नवीन परंपरा को ऐसे स्वीकार कर लिया जैसे बत्तख पानी को स्वीकार कर लेती है। उदाहरण के रूप में राजकपूर, दिलीप कुमार, देवानंद, शम्मी कपूर, जॉनीलीवर आदि कलाकारों ने चार्ली के इस फिनोमेनन को स्वीकार करते हुए अनेक फिल्मों में भूमिकाएं निभाईं। लेखक के अनुसार राजकपूर चार्ली का भारतीयकरण था। उनकी फिल्म ‘आवारा’ मात्र ‘दि ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद नहीं थी, बल्कि चार्ली का भारतीयकरण थी। राजकपूर ने इस आरोप की परवाह नहीं की कि वह चार्ली की नकल कर रहा है। महात्मा गांधी में भी चार्ली का खासा पुट था। एक समय था जब गांधी और नेहरू दोनों ने चार्ली की समीपता प्राप्त करनी चाही। इन दोनों राष्ट्र नेताओं को चार्ली इसलिए अच्छा लगता था क्योंकि वह उन्हें हँसाता था।

प्रश्न 9.
पाठ के आधार पर चार्ली का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
भले ही चार्ली दुनिया का महान हास्य अभिनेता और निर्देशक था, परंतु उसका बचपन गरीबी में बीता था। उसकी माँ एक परित्यक्ता और दूसरे दर्जे की स्टेज़ अभिनेत्री थी। शीघ्र ही वह पागलपन का शिकार हो गई। तब उसे जीवन में अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा। गरीबी के कारण उसे दो समय का भोजन भी नहीं मिल पाता था। साम्राज्यवादी पूँजीवाद और सामंतशाही से ग्रस्त समाज ने चार्ली को अपमानित किया और उसे कदम-कदम पर दुत्कारा, लेकिन फिर भी चार्ली ने जीवन में हार नहीं मानी और वह निरंतर संघर्ष करता रहा। चार्ली के जीवन की प्रमुख विशेषता यह थी कि वह चिर-युवा दिखाई देता था। उसकी एक अन्य विशेषता यह थी कि वह बच्चों जैसे दिखता था। उनके जीवन की प्रमुख विशेषता यह है कि उसने किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं माना और फिल्म-कला को लोकतांत्रिक बनाया। यही नहीं, चार्ली ने वर्ग-व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था को भी तोड़ डाला। चार्ली ने असंख्य फिल्में बनाईं और चमत्कारी अभिनय किया।

प्रश्न 10.
भारतीय हास्य परंपरा और चार्ली की हास्य परंपरा में क्या अंतर है?
उत्तर:
भारतीय हास्य परंपरा में हास्य केवल दूसरों पर ही अवलंबित होता है। भारतीय नाटकों में दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वालों की हँसी उड़ाई जाती है। विशेषकर संस्कृत नाटकों में जो राज्याधिकारी बदतमीजियाँ करते हैं, वे हास्य के विषय बन जाते हैं, परंतु भारतीय हास्य परंपरा में करुणा का मिश्रण न के बराबर है, परंतु चार्ली का हास्य भारतीय परंपरा से पूर्णतया भिन्न है। पहली बात तो यह है कि चार्ली के पात्र अपनी कमजोरियों और बेवकूफियों पर हँसते भी हैं और हँसाते भी हैं। दूसरी बात यह है कि वे करुणा का दृश्य दिखाते-दिखाते हास्य का स्थल उत्पन्न कर देते हैं अथवा हास्य का दृश्य उत्पन्न करके करुणा का दृश्य ले आते हैं। चार्ली हँसाते-हँसाते लोगों को रुला देते हैं। इसलिए चार्ली के हास्य में करुणा का मेल देखा जा सकता है।

प्रश्न 11.
भारतीय सौंदर्यशास्त्र चार्ली की रचनाओं से क्या शिक्षा ग्रहण कर सकता है?
उत्तर:
यह सर्वविदित है कि भारतीय सौंदर्यशास्त्र में हास्य रस और करुणा रस का मेल न के बराबर है, बल्कि इन दोनों में विरोध माना गया है। जहाँ हास्य है वहाँ करुणा नहीं है। जहाँ करुणा के दृश्य हैं, वहाँ हँसी नहीं उत्पन्न हो सकती, परंतु चार्ली ने अपनी फिल्मों में इन दोनों का अद्भुत मेल किया है। जो कि सौंदर्यशास्त्र की विशेष उपलब्धि कही जा सकती है। भारतीय सौंदर्यशास्त्र चार्ली की फिल्मों को देखकर कुछ नए प्रयोग कर सकता है। भारत के पौराणिक आख्यानों में ऐसे अनेक स्थल खोजे जा सकते हैं जहाँ हास्य के साथ करुणा भी विद्यमान है। भारतीय फिल्मों में इस नवीन प्रवृत्ति का समुचित विकास हुआ है और आगे चलकर यह प्रवृत्ति और अधिक विकसित होगी।

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प्रश्न 12.
भारतीय सौंदर्यशास्त्र ने चार्ली की कला को पानी में तैरती बत्तख की तरह स्वीकार कर लिया-व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय सौंदर्यशास्त्र चार्ली के सौंदर्यशास्त्र से सर्वथा भिन्न है। भारतीय नाटकों में करुणा और हास्य में विरोध देखा गया है, लेकिन चार्ली ने अपनी फिल्मों में बड़ी सफलता के साथ करुणा और हास्य का मिश्रण दिखाया है। यह सब होते हुए भी भारतीय सौंदर्यशास्त्र ने चार्ली की कला का सम्मान किया। विशेषकर हिंदी फिल्मों में राजकपूर, दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, देवानंद, अमिताभ बच्चन आदि फिल्मी कलाकारों ने चार्ली की कला का सम्मान करते हुए कुछ फिल्मों में अभिनय किया, जिसमें करुणा और हास्य का मेल देखा जा सकता है। सैद्धांतिक रूप में विरोधी होते हुए भी भारतीय सौंदर्यशास्त्र ने चार्ली के कला सिद्धांत को इस प्रकार स्वीकार किया जैसे बत्तख पानी में तैरती है परंतु भीगती नहीं है, बल्कि उस पानी से अलग रहती है।

प्रश्न 13.
चार्ली चैप्लिन की लोकप्रियता का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
चार्ली चैप्लिन एक महान कलाकार थे। उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उनकी स्वच्छन्द एवं सहज कला ही है। चार्ली चैप्लिन स्वयं का मज़ाक करके दूसरों को हँसाते हैं। चार्ली चैप्लिन ने फिल्मों को भी एक नई दिशा दी है। चार्ली चैप्लिन की लोकप्रियता का अन्य प्रमुख कारण है कि उन्होंने अपनी भाषाहीन फिल्मों को भी अधिक मानवीय, सजीव, क्रियात्मक और सम्प्रेषणीय बनाया। उन्होंने मानव का सर्वजन सुलभ स्वभाव दिखाया है।

प्रश्न 14.
अपने जीवन के अधिकांश हिस्से में हम चार्ली के टिली ही होते हैं। इस कथन की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
लेखक यह कहना चाहता है कि जब हम किसी बात पर अधिक प्रसन्न होते हैं तो अचानक कोई घटना हमारे रोमांस को पंक्चर कर देती है। हम जब स्वयं को महानतम् क्षणों में महसूस करते हैं तो कोई भी हमें चिढ़ा कर अथवा हमारा अपमान करके वहाँ से भाग जाता है। जब हम अपने-आपको बड़ा शूरवीर समझ रहे होते हैं तब हम कायरता और पलायन का शिकार हो जाते हैं। कभी-कभी ऐसी स्थिति भी आती है जब हम लाचार होते हैं फिर भी हम विजय पा लेते हैं। अतः हम सब चार्ली हैं, सुपरमैन नहीं हैं। अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि हम जीवन के अधिकांश भागों में चार्ली के टिली ही होते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ के लेखक का क्या नाम है?
(A) विष्णु खरे
(B) हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
(C) विष्णु प्रभाकर
(D) महादेवी वर्मा
उत्तर:
(A) विष्णु खरे

2. विष्णु खरे का जन्म कब हुआ?
(A) 4 जनवरी, 1941 को
(B) 9 फरवरी, 1940 को
(C) 10 फरवरी, 1942 को
(D) 5 फरवरी, 1940 को
उत्तर:
(B) 9 फरवरी, 1940 को

3. विष्णु खरे का जन्म कहाँ पर हुआ?
(A) राजस्थान के जयपुर में
(B) उत्तर प्रदेश के मेरठ में
(C) हरियाणा के रोहतक में
(D) मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में
उत्तर:
(D) मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में

4. विष्णु खरे ने किस विषय में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की?
(A) हिंदी
(B) अंग्रेज़ी
(C) फ्रैंच
(D) बांग्ला
उत्तर:
(B) अंग्रेज़ी

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5. विष्णु खरे ने किस कॉलेज से सन् 1963 में स्नातकोत्तर डिग्री प्राप्त की?
(A) क्रिश्चियन कॉलेज
(B) डी० ए० वी० कॉलेज
(C) हिंदू कॉलेज
(D) एस० डी० कॉलेज उ
त्तर:
(A) क्रिश्चियन कॉलेज

6. आरंभ में विष्णु खरे किस समाचार-पत्र में उप-संपादक रहे?
(A) दिनमान
(B) नवनीत
(C) दैनिक इंदौर
(D) नवभारत
उत्तर:
(C) दैनिक इंदौर

7. मध्य प्रदेश के अतिरिक्त विष्णु खरे ने और कहाँ पर प्राध्यापक के रूप में काम किया?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) राजस्थान
(C) हरियाणा
(D) दिल्ली
उत्तर:
(D) दिल्ली

8. केंद्रीय साहित्य अकादमी में विष्णु खरे ने किस पद पर काम किया?
(A) सचिव
(B) उप-सचिव
(C) अध्यक्ष
(D) सलाहकार
उत्तर:
(B) उप-सचिव

9. विष्णु खरे ने किस समाचार-पत्र में प्रभारी कार्यकारी संपादक के रूप में काम किया?
(A) दैनिक हिंदुस्तान
(B) नवभारत टाइम्स
(C) दैनिक जागरण
(D) दैनिक भास्कर
उत्तर:
(B) नवभारत टाइम्स

10. किस समाचार-पत्र में विष्णु खरे ने वरिष्ठ सहायक संपादक के रूप में काम किया?
(A) टाइम्स ऑफ इंडिया
(B) दि ट्रिब्यून
(C) हिंदुस्तान टाइम्स
(D) इंडियन एक्सप्रेस
उत्तर:
(A) टाइम्स ऑफ इंडिया

11. विष्णु खरे को सर्वप्रथम कौन-सा पुरस्कार मिला?
(A) कबीर सम्मान
(B) निराला सम्मान
(C) तुलसी सम्मान
(D) रघुवीर सहाय सम्मान
उत्तर:
(D) रघुवीर सहाय सम्मान

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12. दिल्ली से उन्हें कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(A) दिल्ली. पुरस्कार
(B) हिंदी साहित्य अकादमी
(C) जैनेंद्र पुरस्कार
(D) दिल्ली ललित कला अकादमी
उत्तर:
(B) हिंदी साहित्य अकादमी

13. ‘रघुवीर सहाय सम्मान’, तथा ‘हिंदी अकादमी सम्मान’ के अतिरिक्त विष्णु खरे अन्य कौन-से सम्मानों से पुरस्कृत हुए?
(A) शिखर सम्मान तथा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान
(B) कबीर सम्मान और तुलसी सम्मान
(C) पंत सम्मान
(D) प्रेमचंद सम्मान
उत्तर:
(A) शिखर सम्मान तथा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान

14. विष्णु खरे को फिनलैंड का कौन-सा पुरस्कार प्राप्त हुआ?
(A) फिनलैंड पुरस्कार
(B) फिनलैंड नेशनल अवार्ड
(C) फिनलैंड साहित्यिक पुरस्कार
(D) नाइट ऑफ दि ऑर्डर ऑफ दि व्हाइट रोज़
उत्तर:
(D) नाइट ऑफ दि ऑर्डर ऑफ दि व्हाइट रोज़

15. ‘एक गैर रूमानी समय में के रचयिता का क्या नाम है?
(A) जैनेंद्र कुमार
(B) हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
(C) विष्णु खरे
(D) विष्णु प्रभाकर
उत्तर:
(C) विष्णु खरे

16. ‘सिनेमा पढ़ने के तरीके’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) आलोचना
(C) नाटक
(D) कहानी
उत्तर:
(B) आलोचना

17. ‘खुद अपनी आँख से’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) विष्णु खरे
(B) विष्णु प्रभाकर
(C) हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
(D) फणीश्वर नाथरेणु
उत्तर:
(A) विष्णु खरे

18. ‘पिछला बाकी’ कविता-संग्रह के रचयिता का नाम लिखिए।
(A) जयशंकर प्रसाद
(B) सूर्यकांत निराला
(C) विष्णु खरे
(D) राम खरे
उत्तर:
(C) विष्णु खरे

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19. सत्ता, शक्ति, बुद्धिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों में जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा कैसा हो जाता है?
(A) आश्चर्यचकित
(B) कीटन-कीटन
(C) गौरवान्वित
(D) चार्ली-चार्ली
उत्तर:
(D) चार्ली-चार्ली

20. ‘सबकी आवाज पर्दे में’ के रचयिता का नाम क्या है?
(A) हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
(B) विष्णु खरे
(C) विष्णु प्रभाकर
(D) विष्णु करन
उत्तर:
(B) विष्णु खरे

21. किन दो समाचार पत्रों में विष्णु खरे के सिनेमा विषयक लेख प्रकाशित हुए हैं?
(A) ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘दि हिंदुस्तान’
(B) ‘दिनमान’ और ‘पंजाब केसरी’
(C) ‘नवनीत’ और ‘दैनिक भास्कर’ ।
(D) ‘दैनिक भास्कर’ और ‘दैनिक जागरण’
उत्तर:
(A) ‘नवभारत टाइम्स’ और ‘दि हिंदुस्तान’

22. ‘मेकिंग ए लिविंग’ चैप्लिन की कौन-सी फिल्म है?
(A) तीसरी
(B) पहली
(C) चौथी
(D) दूसरी
उत्तर:
(B) पहली

23. ‘मेकिंग ए लिविंग’ फिल्म को बने हुए कितने साल हो चुके हैं?
(A) 50 साल
(B) 60 साल
(C) 75 साल
(D) 80 साल
उत्तर:
(C) 75 साल

24. चार्ली ने अपनी फिल्मों में किन दो रसों का मिश्रण किया है?
(A) वीर रस और रौद्र
(B) शृंगार रस और वीर रस
(C) हास्य रस और वीभत्स रस
(D) करुणा रस और हास्य रस
उत्तर:
(D) करुणा रस और हास्य रस

25. लेखक के विचारानुसार आने वाले कितने वर्षों तक चार्ली के नाम का मूल्यांकन होता रहेगा?
(A) पचास वर्षों तक
(B) पच्चीस वर्षों तक
(C) साठ वर्षों तक
(D) चालीस वर्षों तक
उत्तर:
(A) पचास वर्षों तक

26. चार्ली चैप्लिन किस नेता से मिले?
(A) चाउनलाई
(B) महात्मा गाँधी
(C) ब्रेझनेव
(D) हिटलर
उत्तर:
(B) महात्मा गाँधी

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27. चार्ली की जो फिल्में हमें अलग प्रकार की भावनाओं का एहसास कराती हैं, उनमें से दो के नाम लिखिए।
(A) रेल ऑफ सिटी और छिविटेड
(B) मेट्रोपोलिस और द रोवंथ सील
(C) वीक एण्ड तथा सन्डे
(D) पोटिक्स और कोमेक्स
उत्तर:
(B) मेट्रोपोलिस और द रोवंथ सील

28. चार्ली की माँ किस प्रकार की नारी थी?
(A) परित्यक्ता
(B) विदूषी
(C) लोकप्रिय अभिनेत्री
(D) नौकरी पेशा
उत्तर:
(A) परित्यक्ता

29. चार्ली चैप्लिन का बड़ा गुण माना जाता है
(A) हास्य-प्रतिभा
(B) शृंगार-प्रतिभा
(C) ओज-प्रतिभा
(D) भक्ति-प्रतिभा
उत्तर:
(A) हास्य-प्रतिभा

30. चार्ली को एक ‘बाहरी’, ‘घुमंतू’ चरित्र किसने बना दिया था?
(A) जटिल परिस्थितियों ने
(B) अमीरी ने
(C) गरीबी ने
(D) उच्च जीवन-मूल्यों ने
उत्तर:
(A) जटिल परिस्थितियों ने

31. विष्णु खरे के अनुसार संस्कृत नाटकों में जो विदूषक है, वह किनसे बदतमीजियाँ करता है?
(A) मूखों से
(B) सेवकों से
(C) छोटे व्यक्तियों से
(D) राजव्यक्तियों से
उत्तर:
(D) राजव्यक्तियों से

32. आरंभ में चार्ली की किन लोगों ने भर्त्सना की?
(A) पूँजीपतियों ने
(B) राजनीतिज्ञों ने
(C) शिक्षकों ने
(D) गरीबों ने
उत्तर:
(A) पूँजीपतियों ने

33. किसकी तरफ से चार्ली खानाबदोशों से जुड़े हुए थे?
(A) दादी
(B) सास
(C) माँ
(D) नानी
उत्तर:
(D) नानी

34. चार्ली चैप्लिन की एक पहचान का नाम है :
(A) यहूदीवंशी
(B) नागवंशी
(C) अग्निवंशी
(D) भृगुवंशी
उत्तर:
(A) यहूदीवंशी

35. ‘यूरोप के जिप्सी किस देश से गए थे?
(A) चीन
(B) लंका
(C) भारत
(D) रूस
उत्तर:
(C) भारत

36. जब चार्ली बीमार थे तो उनकी माँ ने उन्हें किनका चरित्र पढ़कर सुनाया था?
(A) तुलसीदास
(B) हिटलर
(C) मदर टेरेसा
(D) ईसा मसीह
उत्तर:
(D) ईसा मसीह

37. किस प्रसंग को सुनकर चार्ली और उसकी माँ रोने लगे?
(A) भेड़ के भागने का प्रसंग
(B) ईसा के सूली चढ़ने का प्रसंग
(C) कसाईखाने का प्रसंग
(D) भेड़ के पकड़े जाने का प्रसंग
उत्तर:
(B) ईसा के सूली चढ़ने का प्रसंग

38. चार्ली की अधिकाँश फिल्में किसका इस्तेमाल नहीं करती?
(A) भाषा
(B) हास्य
(C) परम्परा
(D) संवाद
उत्तर:
(A) भाषा

 

39. भेड़ के पकड़े जाने पर चार्ली के हृदय में करुणा का भाव उत्पन्न क्यों हो गया?
(A) भेड़ के भाग जाने से
(B) भेड़ के मरने के डर से
(C) भेड़ के गिरने से
(D) भेड़ के बच जाने से
उत्तर:
(B) भेड़ के मरने के डर से

40. भारतीय सौंदर्यशास्त्र में हास्य का पात्र कौन होता है?
(A) मायक
(B) खलनायक
(C) विदूषक
(D) सहनायक
उत्तर:
(C) विदूषक

41. चार्ली से प्रभावित होकर राजकपूर ने कौन-सी दो फिल्में बनाईं?
(A) मेरा नाम जोंकर और संगम
(B) जिस देश में गंगा बहती है और अनाड़ी
(C) बरसात और तीसरी कसम
(D) आवारा और श्री 420
उत्तर:
(D) आवारा और श्री 420

42. किस भारतीय कलाकार ने चार्ली चैप्लिन की तरह अभिनय किया है?
(A) दिलीप कुमार
(B) मनोज कुमार
(C) राजकुमार
(D) अमिताभ बच्चन
उत्तर:
(A) दिलीप कुमार

43. देवानंद ने चार्ली का अनुकरण करते हुए किन फिल्मों में अभिनय किया?
(A) गाइड और हरे रामा हरे कृष्णा
(B) नौ दो ग्यारह और तीन देवियाँ
(C) ज्यूल थीफ और जुआरी
(D) गैम्बलर और जॉनी मेरा नाम
उत्तर:
(B) नौ दो ग्यारह और तीन देवियाँ

44. जटिल परिस्थितियों ने चार्ली को हमेशा कैसा चरित्र बना दिया?
(A) मध्यवर्गीय
(B) घुमंतू
(C) बुर्जुवा
(D) उच्चवर्गीय
उत्तर:
(B) घुमंतू

45. चार्ली चैप्लिन ने फिल्म कला को क्या बनाया?
(A) साम्राज्यवादी
(B) लोकतांत्रिक
(C) गणतांत्रिक
(D) निरंकुशवादी
उत्तर:
(B) लोकतांत्रिक

46. चार्ली किस भारतीय साहित्यकार के अधिक नज़दीक हैं?
(A) यशपाल
(B) जयशंकर प्रसाद
(C) प्रेमचन्द
(D) अमृतलाल नागर
उत्तर:
(C) प्रेमचन्द

47. चार्ली चैप्लिन की कला ने कितनी पीढ़ियों को मुग्ध किया है?
(A) तीन
(B) पाँच
(C) दो
(D) चार
उत्तर:
(B) पाँच

48. किस भारतीय अभिनेत्री ने चार्ली चैप्लिन की तरह अभिनय किया है?
(A) श्री देवी
(B) ऐश्वर्या राय
(C) राखी गुलजार
(D) निरूपा राय
उत्तर:
(A) श्री देवी

49. चार्ली चैप्लिन की फिल्मों का आधार क्या है?
(A) धर्म
(B) युद्ध
(C) प्रेम
(D) भावनाएँ
उत्तर:
(D) भावनाएँ

50. बालक चार्ली का मकान किसके पास था?
(A) सिनेमा घर के
(B) दवाखाने के
(C) कसाईखाने के
(D) मन्दिर के
उत्तर:
(C) कसाईखाने के

चार्ली चैप्लिन यानी हम सब प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] समय, भूगोल और संस्कृतियों की सीमाओं से खिलवाड़ करता हुआ चार्ली आज भारत के लाखों बच्चों को हँसा रहा है जो उसे अपने बुढ़ापे तक याद रखेंगे। पश्चिम में तो बार-बार चार्ली का पुनर्जीवन होता ही है, विकासशील दुनिया में जैसे-जैसे टेलीविज़न और वीडियो का प्रसार हो रहा है, एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग नए सिरे से चार्ली को घड़ी ‘सुधारते’ या जूते ‘खाने’ की कोशिश करते हुए देख रहा है। चैप्लिन की ऐसी कुछ फिल्में या इस्तेमाल न की गई रीलें भी मिली हैं जिनके बारे में कोई जानता न था। अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ कहा जाएगा। [पृष्ठ-120]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। इस पाठ में लेखक ने चार्ली के कला-कर्म की कुछ मूलभूत विशेषताओं पर प्रकाश डाला है। लेखक की दृष्टि से चार्ली की प्रमुख विशेषता करुणा और हास्य के तत्त्वों का सामंजस्य है। यहाँ लेखक चार्ली के योगदान पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि

व्याख्या-चार्ली ने समय, भूगोल तथा संसार की विभिन्न संस्कृतियों की सीमाओं के साथ खिलवाड़ किया अर्थात वह इन सीमाओं.को पार करके अपनी कला का प्रदर्शन करता रहा। आज भी वह भारतवर्ष के लाखों बच्चों को हँसाने में संलग्न है। भारत के ये बच्चे वृद्धावस्था तक चार्ली को याद करते रहेंगे। जहाँ तक पश्चिमी देशों का प्रश्न है, वहाँ तो चार्ली का बार-बार जन्म होता रहता है। आज की विकासशील दुनिया में टेलीविज़न तथा वीडियो का प्रसारण निरंतर बढ़ता जा रहा है। इसका परिणाम यह हुआ है कि पश्चिमी देशों के अधिकांश दर्शक एक नवीन दृष्टिकोण से चार्ली को घड़ी ठीक करते हुए अथवा जूते को खाने का प्रयास करते हुए देखने लगे हैं। हैरानी की बात तो यह है कि चार्ली चैप्लिन की कुछ ऐसी फिल्में अथवा रीलें मिली हैं जिनके बारे में लोग और जो लोगों को कभी नहीं दिखाई गई। आने वाले पचास वर्षों तक चाली चैप्लिन के बारे में बहुत कुछ लिखा और सुना जाएगा। कारण यह है कि वह अपने समय का एक महान कलाकार था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने चार्ली चैप्लिन की कला को याद करते हुए उसके योगदान पर समुचित प्रकाश डाला है।
  2. लेखक का यह भी कथन है कि चार्ली ने समय, भूगोल और संस्कृतियों की सीमाओं को पार करके भारत के लाखों बच्चों को हँसाया है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है जिसमें अंग्रेज़ी के शब्दों का सुंदर प्रयोग देखा जा सकता है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) भारत के प्रति चार्ली का क्या योगदान है?
(ग) पश्चिम में चार्ली के बार-बार पुनर्जीवित होने का क्या परिणाम हुआ है?
(घ) चार्ली चैप्लिन की कुछ फिल्में अथवा रीलें किस प्रकार की हैं?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम चार्ली चैप्लिन यानी हम सब, लेखक-विष्णु खरे।

(ख) चार्ली आज भी भारत के लाखों बच्चों को हँसा रहा है। ये बच्चे अपनी वृद्धावस्था तक चार्ली को याद रखेंगे।

(ग) पश्चिम में टेलीविजन तथा वीडियो के प्रसार के कारण एक बहुत बड़ा दर्शक वर्ग नए सिरे से चार्ली को घड़ी सुधारते या जूते खाने की कोशिश करते हुए देख रहा है।

(घ) चार्ली की कुछ फिल्में अथवा रीलें ऐसी प्राप्त हुई हैं जिनके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता था।

[2] उनकी फिल्में भावनाओं पर टिकी हुई हैं, बुद्धि पर नहीं। ‘मेट्रोपोलिस’, ‘दी कैबिनेट ऑफ डॉक्टर कैलिगारी’, ‘द रोवंथ सील’, ‘लास्ट इयर इन मारिएनबाड’, ‘द सैक्रिफाइस’ जैसी फिल्में दर्शक से एक उच्चतर अहसास की माँग करती हैं। चैप्लिन का चमत्कार यही है कि उनकी फिल्मों को पागलखाने के मरीजों, विकल मस्तिष्क लोगों से लेकर आइन्स्टाइन जैसे महान प्रतिभा वाले व्यक्ति तक कहीं एक स्तर पर और कहीं सूक्ष्मतम रास्वादन के साथ देख सकते हैं। चैप्लिन ने न सिर्फ फिल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया, बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। यह अकारण नहीं है कि जो भी व्यक्ति, समूह या तंत्र गैर-बराबरी नहीं मिटाना चाहता वह अन्य संस्थाओं के अलावा चैप्लिन की फिल्मों पर भी हमला करता है। चैप्लिन भीड़ का वह बच्चा है जो इशारे से बतला देता है कि राजा भी उतना ही नंगा है जितना मैं हूँ और भीड़ हँस देती है। कोई भी शासक या तंत्र जनता का अपने ऊपर हँसना पसंद नहीं करता। [पृष्ठ-121]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि चार्ली ने अपनी कला के द्वारा फिल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया तथा दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ डाला।

व्याख्या-लेखक चार्ली की कलागत विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए कहता है कि उनकी अधिकांश फिल्मों में भावनाओं की प्रधानता है, बुद्धि की नहीं। इस संदर्भ में हम ‘मेट्रोपोलिस’, ‘दी कैबिनेट ऑफ डॉक्टर कैलिगारी’, ‘द रोवंथ सील’, ‘लास्ट इयर इन मारिएनबाड’, ‘द सैक्रिफाइस’ ऐसी फिल्मों का उदाहरण दे सकते हैं, जिन्हें केवल उच्च स्तरीय दर्शक ही देखकर समझ सकते हैं, सामान्य दर्शक नहीं। चैप्लिन की फिल्मों का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि उनकी फिल्में जहाँ एक ओर पागलखाने के मरीजों और अस्त-व्यस्त मस्तिष्क वाले लोगों पर फिल्माई गई हैं, वहाँ दूसरी ओर आइन्स्टाइन जैसे महान प्रतिभाशाली व्यक्ति भी इन्हें एक ही स्तर पर सूक्ष्मतम रसास्वादन करते हुए देख सकते हैं और असीम आनंद प्राप्त कर सकते हैं। चैप्लिन का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने फिल्मकला को लोकतांत्रिक रूप प्रदान किया और साथ ही दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को भी तोड़ डाला।

भाव यह है कि उनकी फिल्मों को सभी प्रकार के लोग देखते हैं, परंतु यहाँ इसका उल्लेख करना आवश्यक होगा कि जो व्यक्ति अथवा लोगों का समूह समाज में व्याप्त असमानता को दूर नहीं करना चाहता वह जिस प्रकार असमानता को दूर करने वाली संस्थाओं का विरोध करता है उसी प्रकार चार्ली चैप्लिन की फिल्मों का भी विरोध करता है। इसका प्रमुख कारण यही है चार्ली ने अपनी फिल्मों द्वारा समाज में वर्ग और वर्ण भेद को हटाकर समानता की स्थापना की है। चैप्लिन सामान्य भीड़ का वह व्यक्ति है जो संकेत के द्वारा यह स्पष्ट कर देता है कि राजा और उसमें कोई अंतर नहीं है। इसलिए वह बड़े-बड़े शासकों को भी नंगा करता है और उनकी कमजोरियों से लोगों को अवगत कराता है। यह सब देखकर दर्शकों की भीड़ हँसने लगती है। कारण यह है कि कोई भी राजा अथवा शासनतंत्र यह नहीं चाहता कि वह अपने ऊपर हँसे अर्थात् अपना मजाक उड़ाए।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि चार्ली चैप्लिन की फिल्मों ने वर्ग और वर्ण व्यवस्था को तोड़कर फिल्मकला को लोकतांत्रिक बनाया।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का भी सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) चार्ली की फिल्में भावनाओं पर टिकी हुई हैं, बुद्धि पर नहीं। इसका क्या तात्पर्य है?
(ख) चार्ली चैप्लिन की फिल्मों के दर्शक कौन थे?
(ग) चार्ली ने फिल्मकला को लोकतांत्रिक कैसे बनाया?
(घ) कौन लोग चार्ली की फिल्म पर हमला बोलते हैं और क्यों?
(ङ) शासक चार्ली की फिल्मों को पसंद क्यों नहीं करते?
उत्तर:
(क) चार्ली ने अपनी फिल्मों में प्रायः मानवीय भावनओं का ही चित्रण किया है। उनके पात्र बुद्धि का सहारा नहीं लेते, केवल मन की भावनाओं के अनुसार व्यवहार करते हैं।

(ख) चार्ली चैप्लिन की फिल्मों को सभी लोग पसंद करते थे, चाहे पागलखाने के मरीज़ हों या सिर फिरे पागल या आइन्स्टाइन जैसे महान् वैज्ञानिक। सभी चैप्लिन की फिल्मों को अत्यधिक पसंद करते थे।

(ग) चार्ली ने समाज की वर्ग और वर्ण-व्यवस्था को तोड़कर फिल्मकला को लोकतांत्रिक बनाया। उनकी फिल्में किसी एक वर्ग के लिए नहीं थीं, बल्कि सभी लोगों के लिए थीं। सभी देशों के लोगों ने उनकी फिल्मों को पसंद किया।

(घ) जो लोग समाज में समानता को नहीं देखना चाहते और वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था का समर्थन करते हैं वही लोग चार्ली की फिल्मकला पर हमला बोलते हैं।

(ङ) चार्ली ने अपनी फिल्मों के द्वारा आम नागरिकों तथा उनके साथ-साथ बड़े-बड़े शासकों की कमजोरियों को नंगा किया। इसलिए शासक वर्ग उनकी फिल्मों को पसंद नहीं करता है, क्योंकि शासक यह नहीं चाहते थे कि इन लोगों को उनकी कमजोरियों का पता चले।

[3] एक परित्यक्ता, दूसरे दर्जे की स्टेज अभिनेत्री का बेटा होना, बाद में भयावह गरीबी और माँ के पागलपन से संघर्ष करना, साम्राज्य, औद्योगिक क्रांति, पूँजीवाद तथा सामंतशाही से मगरूर एक समाज द्वारा दुरदुराया जाना-इन सबसे चैप्लिन को वे जीवन-मूल्य मिले जो करोड़पति हो जाने के बावजूद अंत तक उनमें रहे। अपनी नानी की तरफ से चैप्लिन खानाबदोशों से जुड़े हुए थे और यह एक सुदूर रूमानी संभावना बनी हुई है कि शायद उस खानाबदोश औरत में भारतीयता रही हो क्योंकि यूरोप के जिप्सी भारत से ही गए थे और अपने पिता की तरफ से वे यहूदीवंशी थे। इन जटिल परिस्थितियों ने चार्ली को हमेशा एक ‘बाहरी’, ‘घुमंतू’ चरित्र बना दिया। वे कभी मध्यवर्गी, बुर्जुआ या उच्चवर्गी जीवन-मूल्य न अपना सके। यदि उन्होंने अपनी फिल्मों में अपनी प्रिय छवि ‘ट्रैम्प’ (बहू, खानाबदोश, आवारागद) की प्रस्तुत की है तो उसके कारण उनके अवचेतन तक पहुँचते हैं। [पृष्ठ-121]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक ने चार्ली के पारिवारिक जीवन का यथार्थ वर्णन किया है।

व्याख्या-चार्ली की माँ को उसके पति ने त्याग दिया था। दूसरा, वह दूसरे दर्जे की स्टेज़ की अभिनेत्री थी। आगे चलकर चार्ली और उसकी माँ को भयानक गरीबी का सामना करना पड़ा। उसकी माँ भी पागलपन से संघर्ष करती रही। यही नहीं, तत्कालीन साम्राज्य, औद्योगिक क्रांति, पूँजीवादी अर्थव्यवस्था तथा सामंतशाही से प्रभावित अभिमानी समाज ने चार्ली को दुत्कारा और उसका अपमान किया। इस लंबे संघर्ष तथा अपमान से चार्ली को ऐसे जीवन-मूल्य मिले जो उसके करोड़पति बन जाने के बाद भी उसमें अंत तक विद्यमान रहे। भाव यह है कि अपनी माँ का अपमान, गरीबी, पागलपन तथा तत्कालीन समाज द्वारा किए गए अपमान के कारण चैप्लिन को जीवन की जो सोच मिली उसे वह आखिर तक नहीं भूल पाया। भले ही आगे चलकर वह करोड़पति बन गया लेकिन वह विगत जीवन तथा उसके मूल्यों को भूल नहीं पाया।

चार्ली की नानी खानाबदोश परिवार की थी। लेखक सोचता है कि यह एक दूर की संभावना की जा सकती है कि चार्ली की नानी में कुछ भारतीयता रही हो, क्योंकि भारत से ही जिप्सी यूरोप में गए थे। यही कारण है कि चार्ली ने भी लगभग घुमंतुओं जैसा जीवन व्यतीत किया। चार्ली के पिता यहूदी थे। इससे पता चलता है कि चार्ली के जीवन की परिस्थितियाँ कितनी कठिन और विपरीत थीं, परंतु इन परिस्थितियों ने चार्ली को बाहरी तथा घुमंतू व्यक्ति बना दिया। वह हमेशा यहाँ से वहाँ भटकने वाला व्यक्ति बना रहा। उसने कभी भी मध्यम वर्गीय तथा उच्च वर्गीय जीवन-मूल्य नहीं अपनाए। उन्होंने अपनी फिल्मों में ‘ट्रैम्प’ की छवि प्रस्तुत की है। यह छवि कहती है कि वह एक बडु, खानाबदोश और आवारागर्द किस्म का चरित्र है। उसके इसी चरित्र के फलस्वरूप उसके अवचेतन को अच्छी प्रकार जान सकते हैं। लेखक के कहने का तात्पर्य यह है कि जटिल और विपरीत परिस्थितियों ने ही चार्ली को खानाबदोश और आवारागर्द व्यक्ति बना दिया था। अपनी फिल्मों में उसने अपनी इसी प्रिय छवि को प्रस्तुत किया है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने चार्ली की आरंभिक जीवन की जटिल परिस्थितियों तथा उसके पारिवारिक जीवन का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) चार्ली के माता-पिता का परिचय क्या है?
(ख) चार्ली का बचपन कैसे बीता?
(ग) बचपन में चार्ली को क्या भोगना पड़ा?
(घ) चार्ली चैप्लिन के जीवन में भारतीय संस्कारों की संभावना कैसे की जा सकती है?
(ङ) चार्ली आजीवन खानाबदोश क्यों बना रहा?
उत्तर:
(क) चार्ली की माँ दूसरे दर्जे की मंचीय अभिनेत्री थी, जिसे उसके पति ने तलाक दे दिया था। भयानक गरीबी के कारण वह लगभग पागल हो गई थी। चार्ली का पिता यहूदी वंश से संबंधित था।

(ख) बचपन में चार्ली को घोर कष्टों का सामना करना पड़ा। उसकी माँ एक परित्यक्ता नारी थी। अत्यधिक गरीबी के कारण वह पागल हो गई थी। चार्ली को इस संघर्ष का सामना करना पड़ा। यही नहीं, चार्ली को तत्कालीन पूँजीपतियों, सामंतों तथा राजकीय अधिकारियों की घोर उपेक्षा भी सहन करनी पड़ी।

(ग) बचपन में चार्ली को भयंकर गरीबी, माँ का पागलपन, प्रितहीन जीवन तथा पूँजीपतियों और सामंतों की उपेक्षा के कडुवे अनुभवों को भोगना पड़ा।

(घ) चार्ली की नानी खानाबदोश जाति से संबंधित थी। ये खानाबदोश भारत से यूरोप जाकर जिप्सी कहलाने लगे। इससे लेखक यह संभावना करता है कि चार्ली का अप्रत्यक्ष रूप से संबंध भारत से था।

(ङ) चार्ली के अवचेतन मन में उसकी नानी के खानाबदोशी संस्कार थे। उसे न तो माँ का प्यार मिला और न ही पिता का दुलार, बल्कि गरीबी के साथ-साथ उसे माँ का पागलपन भी झेलना पड़ा। यही नहीं, पूँजीपतियों और सामंतों में चार्ली को दुत्कारा और अपमानित किया जाता था। इसलिए वह न तो उच्च-वर्ग को अपना सका और न ही मध्य वर्ग को, बल्कि खानाबदोशों के समान जीवन बिताता रहा।

[4] चार्ली पर कई फिल्म समीक्षकों ने नहीं, फिल्म कला के उस्तादों और मानविकी के विद्वानों से सिर धुने हैं और उन्हें नेति-नेति कहते हुए भी यह मानना पड़ता है कि चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा है। दरअसल सिद्धांत कला को जन्म नहीं देते, कला स्वयं अपने सिद्धांत या तो लेकर आती है या बाद में उन्हें गढ़ना पड़ता है। जो करोड़ों लोग चार्ली को देखकर अपने पेट दुखा लेते हैं उन्हें मैल ओटिंगर या जेम्स एजी की बेहद सारगर्भित समीक्षाओं से क्या लेना-देना? वे चार्ली को समय और भूगोल से काट कर देखते हैं और जो देखते हैं उसकी ताकत अब तक ज्यों-की-त्यों बनी हुई है। यह कहना कि वे चार्ली में खुद को देखते हैं दूर की कौड़ी लाना है लेकिन बेशक जैसा चार्ली वे देखते हैं वह उन्हें जाना-पहचाना लगता है, जिस मुसीबत से वह अपने को हर दसवें सेकेंड में डाल देता है वह सुपरिचित लगती है। अपने को नहीं लेकिन वे अपने किसी परिचित या देखे हुए को चार्ली मानने लगते हैं। [पृष्ठ-121-122]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि चार्ली पर कुछ भी नया लिखना बड़ा कठिन होता जा रहा है क्योंकि फिल्म समीक्षकों ने उनकी फिल्मों पर प्रत्येक दृष्टिकोण से लिखा है।

व्याख्या-चार्ली पर असंख्य फिल्म आलोचकों ने बहुत कुछ लिखा है और प्रत्येक दृष्टिकोण से अपनी फिल्म-कला का मूल्याँकन किया है। यही नहीं, फिल्मकला के विद्वानों तथा मानव-विज्ञान के विद्वानों ने भी उनकी फिल्मों के बारे में काफी माथा-पच्ची की है। उन सबने अंततः यह स्वीकार कर लिया है कि चार्ली पर कुछ भी नया लिखना असंभव होता जा रहा है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सिद्धांतों से कला जन्म नहीं लेती, बल्कि कला अपने साथ सिद्धांत लेकर आती है अथवा कला से ही सिद्धांतों का निर्माण होता है। तात्पर्य यह है कि चार्ली ने सिद्धांतों के आधार पर फिल्मकला का निर्माण नहीं किया। उनकी कला में सिद्धांत स्वतः समाहित थे।

अतः आलोचना के बाद भी उन्होंने कला का अनुशीलन करके सिद्धांतों का निर्माण किया। जो लोग चार्ली को फिल्मों में देखकर हँस-हँस कर लोट-पोट हो जाते हैं तथा उनके पेट दुखने लगते हैं, ऐसे लोगों को मैल ओटिंगर या जेम्स एजी की अत्यधि क गंभीर आलोचनाओं से कुछ लेना-देना नहीं है। उन्होंने न इन समीक्षाओं को पढ़ा है और न ही पढ़ने का प्रयास किया है। आलोचक चार्ली को समय और भूगोल से अलग करके देखते हैं परंतु जो लोग चार्ली को देखते हैं और देखकर रसास्वादन प्राप्त करते हैं, उनकी शक्ति ज्यों-की-त्यों है, वह घटी नहीं है। यह कहना कि दर्शक चार्ली में स्वयं को देखते हैं। की सोच है परंतु यह निश्चित है कि दर्शक जिस प्रकार चार्ली को देखते हैं उन्हें लगता है कि वे चार्ली को अच्छी तरह से जानते और पहचानते हैं। भाव यह है कि चार्ली ने अपनी फिल्मकला के द्वारा स्वयं को सभी लोगों के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। दर्शकों को चार्ली की हरकतों में अपने आस-पास की जिंदगी दिखाई देती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि चार्ली चैप्लिन की कला पर पर्याप्त समीक्षा हो चुकी है। अतः उसके बारे में कुछ नया कहना अथवा लिखना बड़ा कठिन हो गया है।
  2. चार्ली के कारनामों को देखकर दर्शकों को लगता है कि वे अपने आस-पास की जिंदगी को देख रहे हैं।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हआ है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का संदर मिश्रण है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) चार्ली पर कुछ नया लिखना कठिन क्यों होता जा रहा है?
(ख) सिद्धांत कला को जन्म देते हैं या कला सिद्धांतों को जन्म देती है? स्पष्ट कीजिए।
(ग) चार्ली को देखकर करोड़ों लोगों के पेट क्यों दुखने लगते हैं?
(घ) कला को समय और भूगोल से काटकर देखने का क्या अर्थ है?
(ङ) चार्ली के कारनामों को देखकर लोग क्या अनुभव करते हैं?
उत्तर:
(क) कला समीक्षकों ने चार्ली चैप्लिन की कला पर इतना अधिक लिख दिया है कि अब उनके बारे में और अधिक को ने चाली की कला के प्रत्येक पहलू पर बहुत कुछ लिखा है। इसलिए उस पर कुछ नया लिखना कठिन होता जा रहा है।

(ख) सिद्धांतों से कला पैदा नहीं होती, बल्कि कला से सिद्धांत उत्पन्न होते हैं। सर्वश्रेष्ठ कला को देखकर ही कला समीक्षक सिद्धांत गढ़ लेते हैं। पहले से चले आ रहे कला संबंधी सिद्धांत श्रेष्ठ कला पर लागू नहीं होते, बल्कि श्रेष्ठ कला ही सिद्धांतों को जन्म देती है।

(ग) चार्ली का अभिनय तथा उसके कारनामे बड़े ही रोचक, चुटीले और हँसी उत्पन्न करने वाले होते हैं। उन्हें देखकर करोड़ों लोग हँस-हँसकर दोहरे हो जाते हैं जिससे उनके पेट दुखने लगते हैं। चार्ली की कला में हास्य रस का परिपाक देखा जा सकता है।

(घ) कला को समय और भूगोल से काटकर देखने का अभिप्राय है कि कलाकृति अथवा फिल्म किसी विशेष देश अथवा समय से जोड़कर नहीं देखी जा सकती। श्रेष्ठ कलाकृति अपने देश और उसकी सीमाओं को लांघकर सार्वजनिक अथवा सार्वभौमिक बन जाती है। उसका प्रभाव सभी देशों के सब दर्शकों पर अपनी छाप छोड़ जाता है।

(ङ) चार्ली के कारनामे देखकर लोग समझते हैं कि वह उनसे किसी-न-किसी रूप में परिचित है। चार्ली की हरकतों में उन्हें अपने आस-पास की जिंदगी दिखाई देती है।

[5] भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र को कई रसों का पता है, उनमें से कुछ रसों का किसी कलाकृति में साथ-साथ पाया जाना श्रेयस्कर भी माना गया है, जीवन में हर्ष और विषाद आते रहते हैं यह संसार की सारी सांस्कृतिक परंपराओं को मालूम है, लेकिन करुणा का हास्य में बदल जाना एक ऐसे रस-सिद्धांत की माँग करता है जो भारतीय परंपराओं में नहीं मिलता। ‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ में जो हास्य है वह ‘दूसरों’ पर है और अधिकांशतः वह परसंताप से प्रेरित है। जो करुणा है वह अकसर सद्व्यक्तियों के लिए और कभी-कभार दुष्टों के लिए है। संस्कृत नाटकों में जो विदूषक है वह राजव्यक्तियों से कुछ बदतमीजियाँ अवश्य करता है, किंतु करुणा और हास्य का सामंजस्य उसमें भी नहीं है। अपने ऊपर हँसने और दूसरों में भी वैसा ही माद्दा पैदा करने की शक्ति भारतीय विदूषक में कुछ कम ही नज़र आती है। [पृष्ठ-122-123]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब में से लिया गया है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि करुणा का हास्य रस में बदल जाना भारतीय परंपरा में नहीं मिलता।

व्याख्या भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र में अनेक रसों की चर्चा की गई है। उनमें से कुछ रसों का किसी कलाकृति में एक साथ होना एक विशेष उपलब्धि मानी जा सकती है। भाव यह है कि श्रेष्ठ कलाकार अपनी कलाकृति में अनेक रसों का परिपाक करता आया है। यह भी सत्य है कि जीवन में सुख-दुख एवं आशा तथा निराशा अकसर आते रहते हैं। संसार की सभी सांस्कृतिक परंपराएँ इस तथ्य से परिचित हैं परंतु करुणा का अचानक हास्य में परिवर्तित हो जाना एक ऐसे रस सिद्धांत का निर्माण करता है जो भारतीय साहित्यशास्त्र में प्राप्त नहीं होता। यह स्थिति किसी भी भारतीय रचना में दिखाई नहीं देती।

‘रामायण’ तथा ‘महाभारत’ में जो हास्य रस का परिपाक हुआ है, वह अन्य पात्रों से संबंधित है। प्रायः हास्य दूसरे की पीड़ा से उत्पन्न दिखाया गया है परंतु भारतीय परंपरा में करुणा आदर्श पात्रों से संबंधित है। कभी-कभार दुष्ट या खलनायक पात्र भी करुणा को उत्पन्न करते हुए दिखाए गए हैं। जहाँ तक संस्कृत के नाटकों का प्रश्न है तो उनमें विदूषक राजाओं अथवा राज्य अधिकारियों से कुछ बदतमीजियाँ करते दिखाया गया है, जिससे हास्य रस उत्पन्न होता है, परंतु उसके हास्य में करुणा का मिश्रण बिल्कुल नहीं होता। भारतीय विदूषक में अपने ऊपर हँसने तथा दूसरे में ऐसी स्थिति उत्पन्न करने की स्थिति कहीं पर दिखाई नहीं देती।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने भारतीय साहित्यशास्त्र तथा साहित्यिक रचनाओं में रस सिद्धांत की चर्चा की है।’
  2. लेखक स्वीकार करता है कि भारतीय विदूषक में करुणा और हास्य का सामंजस्य बिल्कुल नहीं है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र में रस की क्या स्थिति है?
(ख) करुणा का हास्य में बदल जाना किस प्रकार से रस सिद्धांत की माँग करता है? क्या यह भारतीय परंपरा में प्राप्त होता है?
(ग) संस्कृत नाटकों में विदूषक क्या करता है?
उत्तर:
(क) भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र में रसों की व्यापक चर्चा मिलती है। उनमें यह भी स्वीकार किया गया है कि श्रेष्ठ कलाकृति में अनेक रसों का पाया जाना श्रेयस्कर होता है।।

(ख) करुणा का हास्य रस में बदल जाना सर्वथा एक नवीन रस सिद्धांत की माँग करता है। यह भारतीय परंपराओं में प्राप्त नहीं होता।

(ग) संस्कृत नाटकों में विदूषक राजाओं अथवा राज्याधिकारियों से बदतमीजियाँ करके, हास्य रस उत्पन्न करता है। वह अपने ऊपर हँसकर दूसरों में वैसी स्थिति उत्पन्न करने की बहुत कम कोशिश करता है।

[6] चार्ली की अधिकांश फिल्में भाषा का इस्तेमाल नहीं करती इसलिए उन्हें ज्यादा-से-ज्यादा मानवीय होना पड़ा। सवाक् चित्रपट पर कई बड़े-बड़े कॉमेडियन हुए हैं, लेकिन वे चैप्लिन की सार्वभौमिकता तक क्यों नहीं पहुँच सकी पड़ताल अभी होने को है। चार्ली का चिर-यवा होना या बच्चों जैसा दिखना एक विशेषता तो है ही, सबसे बड़ी विशेषता शायद यह है कि वे किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते। यानी उनके आसपास जो भी चीजें, अड़ेंगे, खलनायक, दुष्ट औरतें आदि रहते हैं वे एक सतत ‘विदेश’ या ‘परदेश’ बन जाते हैं और चैप्लिन ‘हम’ बन जाते हैं। चार्ली के सारे संकटों में हमें यह भी लगता है कि यह ‘मैं’ भी हो सकता हूँ, लेकिन ‘मैं’ से ज्यादा चार्ली हमें ‘हम’ लगते हैं। यह संभव है कि कुछ अर्थों में ‘बस्टर कीटन’ चार्ली चैप्लिन से बड़ी हास्य-प्रतिभा हो लेकिन कीटन हास्य का काफ्का है जबकि चैप्लिन प्रेमचंद के ज्यादा नज़दीक हैं। [पृष्ठ-124]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश भाग हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से उद्धृत है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करता है कि चार्ली की कला सार्वभौमिक है। वे किसी भी संस्कृति को विदेशी नहीं लगते।

व्याख्या-चार्ली की अधिकतर फिल्मों में भाषा का प्रयोग नहीं किया गया अथवा उनकी फिल्मों में भाषा का बहुत कम प्रयोग किया गया है। यही कारण है कि उनकी फिल्में सर्वाधिक मानवीय हैं। यूँ तो बोलने वाली फिल्मों में बड़े-से-बड़े विदूषक हुए हैं। परंतु जौ सार्वभौमिकता चार्ली को प्राप्त हुई है, वह उनको प्राप्त नहीं हुई। इसका क्या कारण हो सकता है, इस बात की अभी जाँच-पड़ताल की जानी है। इस संबंध में शोध करने की आवश्यकता है। चार्ली की एक प्रमुख विशेषता यह है कि वे एक चिर-युवा अथवा बच्चों जैसे दिखाई देते हैं, परंतु उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे संसार की किसी भी संस्कृति के लिए विदेशी नहीं हैं अर्थात् प्रत्येक देश के दर्शक समझते हैं कि चार्ली उनकी अपनी संस्कृति से जुड़े हुए हैं।

कहने का भाव यह है कि फिल्म में चार्ली के आस-पास जो वस्तुएँ दिखाई जाती हैं अथवा बाधाएँ उत्पन्न की जाती हैं, जो खलनायक और बुरी औरतें दिखाई जाती हैं वे निरंतर विदेश का चित्र प्रस्तुत करते हैं। हम सभी स्वयं को चार्ली समझने लगते हैं। चार्ली पर हम जो भी मुसीबतें देखते हैं, उन्हें देखकर हमें यह महसूस होता है कि ऐसा मेरे साथ भी हो सकता है। यहाँ हमें ‘मैं’ की बात न करके ‘हम’ की बात करनी चाहिए अर्थात् हम सभी चार्ली बन जाते हैं। यह भी हो सकता है कि कुछ सीमा में ‘बस्टर कीटन’ में चार्ली से अधिक हास्य प्रतिभा हो सकती है, परंतु कीटन का हास्य काफ्का के समीप का हास्य है, परंतु चैप्लिन हमें प्रेमचंद के अधिक समीप दिखाई देता है। चार्ली का अभिनय प्रेमचंद के पाठों से मिलता-जुलता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि चार्ली हमें मानव की सहज एवं स्वाभाविक क्रियाएँ दिखाता है। इसलिए इनकी फिल्में भाषा-विहीन होती हैं।
  2. चार्ली की कला सार्वभौमिक है।
  3. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है, जिसमें अंग्रेजी के शब्दों का सुंदर मिश्रण है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) भाषा का प्रयोग न करने के फलस्वरूप चार्ली को क्या करना पड़ा?
(ख) चार्ली चैप्लिन की सार्वभौमिकता का क्या कारण है?
(ग) चार्ली की कला किसी भी संस्कृति को विदेशी क्यों नहीं लगती?
(घ) चार्ली के कारनामे ‘मैं’ न होकर ‘हम’ क्यों हैं?
(ङ) लेखक ने चार्ली को किस भारतीय साहित्यकार के समीप देखने का प्रयास किया है?
उत्तर:
(क) यह सत्य है कि चार्ली ने अपनी फिल्मों में भाषा का प्रयोग नहीं किया। अतः इसके लिए उनको सर्वाधिक मानवीय बनना पड़ा। तात्पर्य यह है कि चार्ली ने मानव की उन सहज तथा स्वाभाविक क्रियाओं को दर्शाया है जिन्हें दर्शक तत्काल समझ जाता है।

(ख) चार्ली की कला की सार्वभौमिकता होने का कारण यह है कि उनकी फिल्मों में मानव की सहज और स्वाभाविक क्रियाओं का मिश्रण किया गया है। भाषाविहीन होने के कारण उनकी फिल्मों में मानवीय क्रियाएँ अधिक हैं। यही नहीं, उनकी फिल्में प्रत्येक दर्शक को अपने आस-पास के जीवन का परिचय देती हैं।

(ग) चार्ली की फिल्मों के कलाकार दर्शकों को विदेशी पात्र जैसे नहीं लगते, बल्कि उन्हें अपने जैसे या अपने आस-पास के लोगों जैसे लगते हैं। भाव यह है कि चार्ली अपनी फिल्मों में मानवीय, सहज एवं स्वाभाविक क्रियाओं का वर्णन करता है, जिससे वह हमें आत्मीय लगता है।

(घ) चार्ली के कारनामे विविध प्रकार के हैं। वे किसी एक पात्र की कहानी नहीं लगते। उनके माध्यम से हमें अपने आस-पास के जीवन की झाँकी दिखाई देती है।

(ङ) लेखक ने चार्ली को मुंशी प्रेमचंद के अधिक समीप देखा है।

[7] एक होली का त्योहार छोड़ दें तो भारतीय परंपरा में व्यक्ति के अपने पर हँसने, स्वयं को जानते-बूझते हास्यास्पद बना डालने की परंपरा नहीं के बराबर है। गाँवों और लोक-संस्कृति में तब भी वह शायद हो, नागर-सभ्यता में तो वह थी नहीं। चैप्लिन का भारत में महत्त्व यह है कि वह ‘अंग्रेज़ों जैसे’ व्यक्तियों पर हँसने का अवसर देते हैं। चार्ली स्वयं पर सबसे ज्यादा तब हँसता है जब वह स्वयं को गर्वोन्मत्त, आत्म-विश्वास से लबरेज़, सफलता, सभ्यता, संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति, दूसरों से ज्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ, अपने ‘वज्रादपि कठोराणि’ अथवा ‘मूदुनि कुसुमादपि’ क्षण में दिखलाता है। तब यह समझिए कि कुछ ऐसा हुआ ही चाहता है कि यह सारी गरिमा सुई-चुभे गुब्बारे जैसी फुस्स हो उठेगी। [पृष्ठ-124]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि भारतीय परंपरा में होली का त्योहार ऐसा है जिसमें व्यक्ति अपने पर हँसता है और दूसरों को भी जान-बूझकर हँसाता है।

व्याख्या-भारत में होली का त्योहार ही एकमात्र ऐसी भारतीय परंपरा है जिसमें व्यक्ति अपने पर हँसता है तथा स्वयं को जानबूझकर हास्यास्पद बना डालता है। जिसके फलस्वरूप उसे देखकर अन्य लोग भी हँसते हैं। इस त्योहार को हम छोड़ दें तो भारतीय परंपरा में और कोई ऐसा त्योहार नहीं है जिसमें व्यक्ति स्वयं पर हँसता है और स्वयं को हास्यास्पद बनाता है। ग्रामीण क्षेत्रों तथा लोक संस्कृति में यह सब शायद होता हो, परंतु महानगरीय सभ्यता में यह न के बराबर है। चैप्लिन का भारत में विशेष महत्त्व है। कारण यह है कि वे हमें अंग्रेजों जैसे लोगों पर हँसने का मौका देते हैं।

चार्ली स्वयं पर सर्वाधिक उस समय हँसता है जब वह गर्व से उन्मत्त और आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है, स्वयं को सफल, सभ्यता, संस्कृति और वैभव की प्रतिमूर्ति मानता है या अपने-आप को दूसरों से अधिक ताकतवर और श्रेष्ठ समझता है या वह स्वयं को वज्र से अधिक कठोर और फूलों से अधि समझता है। वस्तुतः वह एक ऐसी स्थिति उत्पन्न कर लेना चाहता है जिससे उसका सारा गौरव और गर्व सुई-चुभे गुब्बारे के समान फुस्स होकर रह जाए। जिस प्रकार हम गुब्बारे को फुलाकर उसमें सूई-चुभो कर उसे फुस्स कर देते हैं, उसी प्रकार चार्ली स्वयं को ताकतवर और श्रेष्ठ दिखाने का प्रयास करता है, परंतु उसका सारा गर्व और अभिमान उस समय चूर-चूर हो जाता है जब उसके सामने विपरीत परिस्थितियाँ आ जाती हैं। यही स्थिति हास्य के साथ करुणा का मिश्रण करती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने भारत में होली के त्योहार और चार्ली के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) भारत में होली का त्योहार विशेष महत्त्व क्यों रखता है?
(ख) भारत में हँसी की किस परंपरा की कमी है?
(ग) भारत में अपने पर हँसने की परंपरा थोड़ी बहुत कहाँ पाई जाती है?
(घ) चार्ली स्वयं को कब हास्यास्पद बनाता है और क्यों?
(ङ) चार्ली गर्व और गरिमा के गुब्बारे को फुलाकर उसे फुस्स क्यों कर देता है?
उत्तर:
(क) भारत में होली के त्योहार का विशेष महत्त्व इसीलिए है क्योंकि इसमें भारतीय स्वयं पर हँसते हैं और जान-बूझकर अपने-आपको हास्यास्पद बना लेते हैं।।

(ख) भारत में उस हँसी का अभाव है जो अपने पर या अपने स्वभाव पर या अपनी कमियों के कारण उत्पन्न होती है। कहने का भाव यह है कि भारतीय स्वयं पर हँसना नहीं जानते।

(ग) भारत में स्वयं पर हँसने की परंपरा न के बराबर है। केवल होली के त्योहार पर भारतवासी स्वयं पर थोड़ा हँस लेते हैं अथवा गाँव के लोग लोक संस्कृति के बहाने से स्वयं पर हँस लेते हैं।

(घ) चार्ली स्वयं को हास्यास्पद उस अवसर पर बनाता है जब वह स्वयं को गर्वोन्मत, आत्म-विश्वास से लबरेज़ तथा सर्वाधिक शक्तिशाली समझने लगता है। इन क्षणों में हँसी उत्पन्न करके वह यह दिखाना चाहता है कि मनुष्य की गरिमा, शक्ति अथवा गर्व मात्र दिखावे के और कुछ नहीं हैं।

(ङ) चार्ली गुब्बारा फुलाकर इसलिए फुस्स कर देता है ताकि वह समाज के आडंबरों तथा व्यर्थ की गरिमा की पोल खोल सके। वह मनुष्य को यह समझाना चाहता है कि उसे व्यर्थ का गर्व नहीं करना चाहिए और न ही शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।

[8] अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम चार्ली के टिली ही होते हैं जिसके रोमांस हमेशा पंक्चर होते रहते हैं। हमारे महानतम क्षणों में कोई भी हमें चिढ़ाकर या लात मारकर भाग सकता है। अपने चरमतम शूरवीर क्षणों में हम क्लैब्य और पलायन के शिकार हो सकते हैं। कभी-कभार लाचार होते हुए जीत भी सकते हैं। मूलतः हम सब चार्ली हैं क्योंकि हम सुपरमैन नहीं हो सकते। सत्ता, शक्ति, बुद्धिमत्ता, प्रेम और पैसे के चरमोत्कर्षों में जब हम आईना देखते हैं तो चेहरा चार्ली-चार्ली हो जाता है। [पृष्ठ-124-125]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित निबंध ‘चार्ली चैप्लिन यानी हम सब’ में से अवतरित है। इसके लेखक विष्णु खरे हैं। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि हम जीवन के अधिकांश क्षणों में चार्ली के कारनामों के प्रतिरूप बन जाते हैं।

व्याख्या-यहाँ लेखक यह कहना चाहता है कि हमारे जीवन का अधिकांश हिस्सा चार्ली के कारनामों का प्रतिरूप है। जिस प्रकार चार्ली के कारनामें और रोमांस अंत में असफल हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य का रोमांस भी फुस्स हुए गुब्बारे जैसा हो जाता है। जब हमारा जीवन श्रेष्ठतम स्थिति पर पहुँच जाता है तो उस समय कोई व्यक्ति चिढ़ाकर या हमारा अपमान करके भाग जाता है। हमारे जीवन में अकसर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं। जब हम सफलता की ऊँचाई पर पहुँच जाते हैं अचानक असफल हो जाते हैं।

शूरवीरता के क्षणों में या हम हीरा बन जाते हैं या भगोड़े बन जाते हैं। अनेक बार ऐसी परिस्थितियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं जब हम मजबूर होते हुए भी विजयी हो जाते हैं। वस्तुतः अपने मूल रूप में हम सब चार्ली हैं। कोई भी सुपरमैन नहीं है। सत्ता प्राप्त करने, शक्तिशाली होने, बुद्धिमान कहलाने अथवा रोमांस और धन की चरम स्थिति में भी जब हम अपने यथार्थ को देखते हैं तब हम स्वयं को चार्ली के रूप में अपनाकर तुच्छ पाते हैं। भाव यह है कि मनुष्य अपने जीवन में चाहे जितनी भी अधिक उन्नति प्राप्त कर ले परंतु उसका मूल रूप तो चार्ली के समान ही है जो उत्कर्ष में भी उदास दिखाई देता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि मानव चाहे जितना अधिक विकास कर ले मूलतः वह चार्ली के समान कमजोर और तुच्छ प्राणी है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है, जिसमें अंग्रेज़ी शब्दों का मिश्रण है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) चार्ली के टिली होने का क्या अर्थ है?
(ख) चार्ली किस प्रकार का प्रतीक कहा जा सकता है?
(ग) चार्ली का चरित्र प्रायः किस प्रकार का है?
(घ) चेहरा चार्ली चार्ली हो जाता है? इसका अर्थ स्पष्ट करें।
(ङ) अपने चरित्रों के माध्यम से चार्ली क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
(क) चार्ली के टिली होने का अर्थ है-चार्ली के कारनामों और उसकी उपलब्धियों का प्रतिरूप बनाना। जिस प्रकार चार्ली के कारनामे और रोमांस अंत में असफल हो जाते हैं, उसी प्रकार सामान्य व्यक्ति की सफलता भी असफलता में बदल जाती है।

(ख) चार्ली एक ऐसे असफल व्यक्ति का प्रतीक है जो सफलता पाने के लिए खूब प्रयत्न करता है। कभी उसे सफलता मिलती है तो कभी नहीं मिलती। अंत में वह लालची और तुच्छ बनकर रह जाता है।

(ग) चार्ली का चरित्र प्रायः सफलता के शिखर पर पहुँचकर असफल हो जाता है। शूरवीर के रूप में स्थापित होने के बाद भी वह कायर और भगोड़ा बन जाता है। महानता प्राप्त करने के बाद भी वह तुच्छ बन जाता है और कभी-कभी लाचार होते हुए भी विजय प्राप्त कर लेता है।

(घ) चेहरा चार्ली हो जाने का अर्थ है कि हम सफलता की ऊँचाई पर पहुँचकर भी सामान्य, अदने और छोटे बन जाते हैं। हमारा सारा बड़प्पन, सारी शक्ति टॉय-टॉय फिस्स हो जाती है और हमारी कलई सबके सामने खुल जाती है।

(ङ) चार्ली अपने चरित्रों के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि हमारा बड़प्पन, हमारी शक्ति, हमारी गरिमा आदि मात्र दिखावा हैं। हमारा बाह्य रूप फूले हुए गुब्बारे के समान है जो सुई लगने से फुस्स होकर रह जाता है। हमारा मूल रूप अदना, सामान्य

चार्ली चैप्लिन यानी हम सबSummary in Hindi

चार्ली चैप्लिन यानी हम सब लेखिका-परिचय

प्रश्न-
विष्णु खरे का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। अथवा विष्णु खरे का साहित्यिक परिचय दीजिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-विष्णु खरे एक कवि, आलोचक, अनुवादक तथा पत्रकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में 9 फरवरी, 1940 को हुआ। युवावस्था में वे महाविद्यालय की पढ़ाई करने इंदौर आ गए। वहाँ से 1963 में क्रिश्चियन कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में उन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री ली। कुछ समय के लिए वे इंदौर से प्रकाशित ‘दैनिक इंदौर’ में उप-संपादक भी रहे, फिर बाद में उन्होंने मध्य प्रदेश तथा दिल्ली के महाविद्यालयों में प्राध्यापक के रूप में अध्यापन भी किया। विष्णु खरे ने दुनिया के महत्त्वपूर्ण कवियों की कविताओं के चयन और अनुवाद का विशिष्ट कार्य किया है जिसके जरिए अंतर्राष्ट्रीय परिदृश्य में प्रतिष्ठित विशिष्ट कवियों की रचनाओं का स्वर और मर्म भारतीय पाठक समूह तक सुलभ हुआ।

विष्णु खरे नई दिल्ली में केंद्रीय साहित्य अकादमी में उप-सचिव के रूप में काम करते रहे। इसी बीच वे ‘नवभारत टाइम्स’ से भी जुड़े। पहले वे ‘नवभारत टाइम्स’ में प्रभारी कार्यकारी संपादक के रूप में कार्य करते रहे, परंतु बाद में लखनऊ तथा जयपुर से प्रकाशित होने वाले संस्करणों के संपादक रहे। यही नहीं, वे ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में भी वरिष्ठ सहायक संपादक रहे। जवाहरलाल नेहरू स्मारक संग्रहालय तथा पुस्तकालय में भी वे दो वर्ष तक वरिष्ठ अध्यक्ष के रूप में काम करते रहे।

2. प्रमुख रचनाएँ ‘एक गैर रूमानी समय’, ‘खुद अपनी आँख’, ‘सबकी आवाज के पर्दे में’, ‘पिछला बाकी’ (कविता-संग्रह); ‘आलोचना की पहली किताब’ (आलोचना); ‘सिनेमा पढ़ने के तरीके’ (सिने आलोचना); ‘मरु प्रदेश और अन्य कविताएँ व (टी. एस. इलियट)’, ‘यह चाकू समय’ (ॲतिला योझेफ), ‘कालेवाला’ (फिनलैंड का राष्ट्रकाव्य) (अनुवाद)।

3. प्रमुख पुरस्कार-विष्णु खरे को हिंदी साहित्य की सेवा के कारण अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। सर्वप्रथम उन्हें रघुवीर सहाय सम्मान मिला। बाद में वे हिंदी अकादमी का सम्मान, शिखर सम्मान तथा मैथिलीशरण गुप्त सम्मान से भी सुशोभित हुए। उन्हें फिनलैंड का राष्ट्रीय सम्मान-‘नाइट ऑफ दि ऑर्डर ऑफ दि व्हाइट रोज़’ भी प्राप्त हुआ।

4. साहित्यिक विशेषताएँ यद्यपि विष्णु खरे एक समीक्षक तथा पत्रकार के रूप में अधिक प्रसिद्ध हुए हैं, लेकिन उन्होंने कवि के रूप में सफलता अर्जित की। गद्य-लेखन में वे आधुनिक युग के एक सफल साहित्यकार कहे जा सकते हैं। एक फिल्म समीक्षक के रूप में उन्हें विशेष ख्याति प्राप्त हुई। यही कारण है कि ‘दिनमान’, ‘नवभारत टाइम्स’, ‘दि पायोनियर’, ‘दि हिंदुस्तान’, ‘जनसत्ता’, ‘दैनिक भास्कर’, ‘हंस’, ‘कथादेश’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में उनके सिनेमा विषयक अनेक लेख प्रकाशित होते रहे हैं। वे उन विशेषज्ञों में से हैं जिन्होंने फिल्म को समाज, समय और विचारधारा के आलोक में देखा और इतिहास, संगीत, अभिनय, निर्देशन की बारीकियों के सिलसिले में उसका विश्लेषण किया। अपने लेखन द्वारा उन्होंने हिंदी के उस अभाव को पूरा करने में सफलता प्राप्त की है जिसके बारे में वे अपनी एक किताब की भूमिका में लिखते हैं-“यह ठीक है कि अब भारत में भी सिनेमा के महत्त्व और शास्त्रीयता को पहचान लिया गया है और उसके सिद्धांतकार भी उभर आए हैं लेकिन दुर्भाग्यवश जितना गंभीर काम हमारे सिनेमा पर यूरोप और अमेरिका में हो रहा है शायद उसका शतांश भी हमारे यहाँ नहीं है। हिंदी में सिनेमा के सिद्धांतों पर शायद ही कोई अच्छी मूल पुस्तक हो। हमारा लगभग पूरा समाज अभी भी सिनेमा जाने या देखने को एक हलके अपराध की तरह देखता है।” अपनी आलोचनाओं तथा लेखों में भी लेखक ने बेबाक अपने मौलिक विचार व्यक्त किए हैं।

चार्ली चैप्लिन यानी हम सब पाठ का सार

प्रश्न-
विष्णु खरे द्वारा रचित पाठ “चार्ली चैप्लिन यानी हम सब” का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ सुप्रसिद्ध हास्य फिल्मों के महान अभिनेता और निर्देशक चार्ली चैप्लिन से संबंधित है। प्रायः यह कहा जाता है कि करुणा और हास्य में विरोध होता है। करुणा में हँसी नहीं आती, परंतु चार्ली की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे करुणा में भी हास्य का मिश्रण कर देते थे। यह पाठ उनकी इसी कला का वर्णन करता है।

लेखक लिखता है कि चार्ली की जन्मशती मनाई गई। उनकी पहली फिल्म ‘मेकिंग ए लिविंग’ को बने हुए पचहत्तर साल पूरे हो चुके हैं। विकासशील राष्ट्रों के लोग टेलीविजन तथा वीडियो द्वारा उनकी फिल्मों को देखते हैं। उनकी फिल्मों की कुछ ऐस भी मिली हैं, जिनका कभी कोई प्रयोग नहीं किया गया था। अतः लेखक का यह विचार है कि आने वाले पचास वर्षों तक उनके काम का मूल्यांकन होता रहेगा। चार्ली की लगभग सभी फिल्में भावनाओं पर आधारित हैं न कि बुद्धि पर। दर्शकों की चार्ली की फिल्में भावनाओं को एक अलग प्रकार का अहसास कराती हैं। ‘मेट्रोपोलिस’, ‘दी कैबिनट ऑफ डॉक्टर कैलिगारी’, ‘द रोवंथ सील’, ‘लास्ट इयर इन मारिएनबाड’, ‘द सैक्रिफाइस’ आदि कुछ इसी प्रकार की फिल्में हैं। चार्ली की फिल्मों का जादू पागलखाने के मरीज़ों, विकल मस्तिष्क वाले लोगों तथा आइन्स्टाइन जैसे महान प्रतिभाशाली लोगों पर भी देखा जा सकता है। वस्तुतः चार्ली ने फिल्म कला के सिद्धांतों को तोड़ते हुए वर्ग-व्यवस्था और वर्ण-व्यवस्था को नष्ट किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि कमियाँ सभी के जीवन में होती हैं।

चार्ली की माँ एक परित्यकता नारी थी। वह एक सामान्य अभिनेत्री थी, परंतु बाद में वह पागल हो गई। घर में गरीबी होने के कारण आरंभ में चार्ली को अमीरों, सामंतों तथा उद्योगपतियों से अपमानित होना पड़ा। बाद में करोड़पति बन जाने पर भी चार्ली ने अपने जीवन-मूल्य में कोई बदलाव नहीं किया। उसकी नानी खानाबदोश थी और पिता एक यहूदी थे। इन विपरीत परिस्थितियों ने चार्ली को एक ‘बाहरी’ व ‘घुमंतू’ चरित्र का बना दिया। इसलिए चार्ली ने अपनी फिल्मों में बद्द, खानाबदोश तथा अवारागर्द की छवि प्रस्तुत की। वह कभी भी न तो मध्यवर्गी व्यक्ति के जीवन-मूल्य को अपना सका और न ही बुर्जुआ या उच्चवर्गी व्यक्ति के जीवन मूल्यों को। फिल्म समीक्षक आज भी यह समझते हैं कि चार्ली का आकलन करना कोई सहज कार्य नहीं है। क्योंकि उनकी कला सिद्धांतों पर टिकी हुई नहीं है, बल्कि उनकी कला सिद्धांतों का निर्माण करती है। जब चार्ली देश-काल की सीमाओं को पार कर जाता है तब वह सभी को अपने जैसा समझने लगता है। दर्शकों को लगता है, कि उसका किरदार उन जैसा ही है।

चार्ली ने बुद्धि की अपेक्षा भावनाओं को अधिक महत्त्व दिया। एक बार चार्ली बहुत बीमार पड़ गया। इस अवसर पर उसकी माँ ने बाइबिल से ईसा मसीह का जीवन पढ़कर सुनाया। ईसा के सूली चढ़ने के प्रसंग पर माँ-बेटा दोनों ही रोने लगे, परंतु इस प्रसंग से चार्ली ने स्नेह, करुणा तथा मानवता को समझा। एक अन्य घटना ने भी चार्ली पर प्रभाव डाला। उसके घर के पास ही एक कसाईखाना था, जिसमें वध के लिए सैकड़ों पशु हर रोज़ लाए जाते थे। एक बार वहाँ से एक भेड़ किसी प्रकार से अपनी जान बचाकर भाग निकली। मालिक उसके पीछे भागा, परंतु सड़क पर फिसलकर गिर पड़ा। दर्शक उसे देखकर हँसने लगे। अंततः वह भेड़ पकड़ी गई। चार्ली को पता था कि भेड़ के साथ क्या होगा। इससे उसके हृदय में करुणा का भाव उत्पन्न हो गया। यहीं से चार्ली ने “हास्य के बाद करुणा” इस मनोभाव को अपनी आने वाली फिल्मों का आधार बनाया।

भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र भी रस से संबंधित हैं, परंतु हमारे यहाँ करुणा, हास्य में नहीं बदलती। जीवन में जब भी हर्ष और विषाद के अवसर आते हैं तो हास्य और करुणा के भाव आते-जाते रहते हैं, परंतु दोनों में कोई समीपता नहीं होती। हास्य की स्थिति तब उत्पन्न होती है जब हम दूसरों को देखकर हँसते हैं, इसलिए हास्य आलंबन हम स्वयं न होकर दूसरा होता है। यद्यपि संस्कृत नाटकों में विदूषक अपने कारण दूसरों को हँसाता रहता है, परंतु करुणा और हास्य का मिलन वहाँ भी नहीं होता।

दर्शक को यह पता ही नहीं चल पाता कि चार्ली कब करुणा का रूप धारण कर लेगा, कब करुणा-हास्य का। भारतीय साहित्यशास्त्र ने भी चार्ली के इस प्रयोग को स्वीकार कर लिया है, जिससे कला की सार्वजनिकता सिद्ध हो जाती है। चार्ली के इसी सौंदर्यशास्त्र से प्रभावित होकर राजकपूर ने ‘आवारा’ फिल्म का निर्माण किया। यह न केवल चार्ली का भारतीयकरण था, बल्कि ‘दि ट्रैम्प’ का शब्दानुवाद भी था। इस फिल्म के बनने के बाद उस परंपरा ने जन्म लिया जिस पर नायक स्वयं पर हँसते हैं। इसके बाद तो दिलीप कुमार ने ‘बाबुल’, ‘शबनम’, ‘कोहिनूर’, ‘लीडर’ तथा ‘गोपी’ जैसी फिल्में भारतीय फिल्म जगत को दी। देवानंद ने ‘नौ दो ग्यारह’, ‘फंटूश’, ‘तीन देवियाँ’ फिल्मों में भाग लिया। इसी प्रकार शम्मी कपूर, अभिताभ बच्चन तथा श्रीदेवी जैसे कलाकार चार्ली चैप्लिन जैसी भूमिकाएँ करते देखे गए हैं। आज भी जब हमें कभी किसी नायक का फिल्मों में किसी झाड़ से पीटने का दृश्य देखने को मिलता है तो हम चार्ली को याद कर उठते हैं।

चार्ली की फिल्मों की अनेक विशेषताएँ हैं। पहली बात वे अपनी फिल्मों में भाषा का बहुत कम प्रयोग करते हैं। उनकी फिल्मों में मानवीय रूप अधिक उभरकर आता है। उनमें ऐसी सार्वभौमिकता है जिसके कारण उनकी फिल्मों को सभी देशों के लोग पसंद करते हैं। वे अपनी फिल्मों में चिर-युवा दिखाई देते हैं। किसी भी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए चार्ली विदेशी नहीं हैं। चार्ली में सब कुछ बनने की अद्भुत क्षमता है। चार्ली में सब लोग अपना-अपना रूप देखते हैं।

एक होली के पर्व की हम चर्चा न करें तो हमारे देश में स्वयं पर हँसने की परंपरा नहीं है और न ही कोई स्वयं को हास्यास्पद बनाता है। नगर के लोग तो अपने-आप पर हँसने की बात सोच भी नहीं सकते परंतु चार्ली सर्वाधिक स्वयं पर हँसता है। यही कारण है कि भारत में चार्ली का अत्यधिक महत्त्व है। वह बड़े-से-बड़े व्यक्ति पर हमें हँसने का मौका देता है। ऊँचे स्तर पर जाकर भी वह हास्य का पात्र बनने की क्षमता रखता है। उसका रोमांस अकसर असफल हो जाता है। महानतम क्षणों में भी वह अपमानित होने का अभिनय कर सकता है। शूरवीर क्षणों में वह कलैब्य और पलायन की स्थिति उत्पन्न कर देता है। उसके जो पात्र लाचार होते हैं वही अकसर विजय प्राप्त कर लेते हैं। इन विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत में चार्ली का विशेष महत्त्व है। लोग उसे खूब पसंद करते हैं।

कठिन शब्दों के अर्थ 

जन्मशती = जन्म की शताब्दी व जन्म का सौवाँ साल। मुग्ध = प्रसन्न। दुनिया = विश्व। इस्तेमाल = प्रयोग। अहसास = अनुभूति। विकल = बिगड़ा हुआ। रसास्वादन = आनंद लेना, रस लेना। परित्यक्ता = जिसे छोड़ दिया गया हो। मगरूर = अहंकारी। दुरदराया जाना = तिरस्कृत करना, दुत्कारा जाना। खानाबदोश = घुमक्कड़, घुमंतू। सुदूर = बहुत दूर। नेति-नेति = ना, ना। समीक्षा = कथन। सुपरिचित= जाना-पहचाना। बेहतर = अच्छा। उकसाना = प्रेरित करना। कसाईखाना = जहाँ जानवरों को काटा जाता है। ठहाका लगाना = जोर-जोर से हँसना। अहसास = अनुभव। त्रासदी = मार्मिक। सामंजस्य = तालमेल। श्रेयस्कर = सर्वश्रेष्ठ। विषाद = दुख। अधिकांशतः = अधिकतर। परसंताप = दूसरों का दुख। सद्व्यक्ति = अच्छा व्यक्ति। विदूषक = हँसी मजाक करने वाला। पारंपरिक = प्राचीन। स्वीकारोक्ति = स्वीकार करने वाली उक्ति। क्लाउन = प्रतिरूप। सान्निध्य = समीपता नितांत = आवश्यक। आरोप = दोष। परंपरा = रिवाज़। कॉमेडियन = हँसाने वाला। अंडगा = व्यवधान। सतत = लगातार। हास्य-प्रतिभा = हँसाने का गुण। हास्यास्पद = हँसी से भरी। अवसर = मौका। गर्वोन्मत्त = गर्व से भरा हुआ। लबरेज़ = लिपटा हुआ। समृद्धि = खुशहाली। गरिमा = महानता। सवाक् = बोलने वाली। क्षण = पल । लाचार = मजबूर। चार्ली-चार्ली = वास्तविकता का प्रकट होना।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

HBSE 12th Class Hindi पहलवान की ढोलक Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
कुश्ती के समय ढोल की आवाज़ और लुट्टन के दाँव-पेंच में क्या तालमेल था? पाठ में आए ध्वन्यात्मक शब्द और ढोल की आवाज़ आपके मन में कैसी ध्वनि पैदा करते हैं, उन्हें शब्द दीजिए।
उत्तर:
लुट्टन ढोल की आवाज़ से अत्यधिक प्रभावित था। वह ढोल की एक-एक थाप को सुनकर उत्साहित हो उठता था। ढोल की प्रत्येक थाप उसे कुश्ती का कोई-न-कोई दाँव-पेंच अवश्य बताती थी, जिससे प्रेरणा लेकर वह कुश्ती करता था। ढोल की ध्वनियाँ उसे इस प्रकार के अर्थ संकेतित करती थीं

  • चट्-धा, गिड-धा – आ-जा, भिड़ जा।
  • चटाक्-चट्-धा – उठाकर पटक दे।
  • ढाक्-ढिना – वाह पढे।
  • चट-गिड-धा – डरना मत
  • धाक-धिना, तिरकट-तिना – दाँव को काट, बाहर निकल जा
  • धिना-धिना, धिक-धिना – चित्त करो, पीठ के बल पटक दो।

ये शब्द हमारे मन में भी उत्साह भरते हैं और संघर्ष करने की प्रेरणा देते हैं।

प्रश्न 2.
कहानी के किस-किस मोड़ पर लट्टन के जीवन में क्या-क्या परिवर्तन आए?
उत्तर:

  1. सर्वप्रथम माता-पिता के निधन के बाद लुट्टन अनाथ हो गया और उसकी विधवा सास ने ही उसका पालन-पोषण किया।
  2. श्यामनगर दंगल में लुट्टन ने चाँद सिंह को हरा दिया और राज-दरबार में स्थायी पहलवान बन गया।
  3. पंद्रह साल बाद राजा साहब स्वर्ग सिधार गए और विलायत से लौटे राजकुमार ने उसे राज-दरबार से हटा दिया और वह अपने गाँव लौट आया।
  4. गाँव के लोगों ने कुछ दिन तक लुट्टन का भरण-पोषण किया, परंतु बाद में उसका अखाड़ा बंद हो गया।
  5. गाँव में अनावृष्टि के बाद मलेरिया और हैजा फैल गया और लुट्टन के दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई।
  6. पुत्रों की मृत्यु के चार-पाँच दिन बाद रात को लुट्टन की भी मृत्यु हो गई।

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प्रश्न 3.
लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं, यही ढोल है?
उत्तर:
लुट्टन न ने किसी गुरु से कुश्ती के दाँव-पेंच नहीं सीखे थे। उसे केवल ढोलक की उत्तेजक आवाज़ से ही प्रेरणा मिलती थी। ढोलक की थाप पड़ते ही उसकी नसें उत्तेजित हो उठती थीं। और उसका तन-बदन कुश्ती के लिए मचलने लगता था। श्यामनगर के मेले में उसने चाँद सिंह को ढोल की आवाज़ पर ही चित्त किया था। इसीलिए कुश्ती जीतने के बाद उसने सबसे पहले ढोल को प्रणाम किया। वह ढोल को ही अपना गुरु मानता था।

प्रश्न 4.
गाँव में महामारी फैलने और अपने बेटों के देहांत के बावजूद लट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा?
उत्तर:
लुट्टन पहलवान पर ढोल की आवाज़ का गहरा प्रभाव था। ढोल की आवाज़ उसके शरीर की नसों में उत्तेजना भर देती थी। अतः जिंदा रहने के लिए ढोल की आवाज़ उसके लिए जरूरी थी। यह आवाज़ गाँव के लोगों को भी उत्साह प्रदान करती थी। गाँव में महामारी के कारण लोगों में सन्नाटा छाया हुआ था। इसी ढोल की आवाज़ से लोगों को जिंदगी का अहसास होता था। लोग समझते थे कि जब लुट्टन का ढोल बज रहा है तो मौत से डरने की कोई बात नहीं है। अपने बेटों की मृत्यु के बावजूद भी वह मृत्यु के सन्नाटे को तोड़ने के लिए निरंतर ढोल बजाता रहा।

प्रश्न 5.
ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था?
उत्तर:
ढोलक की आवाज़ से रात का सन्नाटा और डर कम हो जाता था तथा मलेरिया और हैज़ा से अधमरे लोगों में एक नई चेतना उत्पन्न हो जाती थी। बच्चे हों अथवा बूढ़े या जवान, सभी की आँखों के सामने दंगल का दृश्य नाचने लगता था और वे उत्साह से भर जाते थे। लुट्टन का सोचना था कि ढोलक की आवाज़ गाँव के लोगों में भी उत्साह उत्पन्न करती है और गाँव के फैले हुए सन्नाटे में जीवन का अहसास होने लगता था। भले ही लोग रोग के कारण मर रहे थे, लेकिन जब तक वे जिंदा रहते थे तब तक मौत से नहीं डरते थे। ढोलक की आवाज़ उनकी मौत के दर्द को सहनीय बना देती थी और वे आराम से मरते थे।

प्रश्न 6.
महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था?
उत्तर:
महामारी फैलने के बाद परे गाँव की तस्वीर बदल गई थी। सूर्योदय होते ही पूरे गाँव में हलचल मच जाती थी। भले ही बीमार लोग रोते थे और हाहाकार मचाते थे फिर भी उनके चेहरों पर एक कांति होती थी। सवेरा होते ही गाँव के लोग अपने उन स्वजनों के पास जाते थे जो बीमार होने के कारण खाँसते और कराहते थे। वे जाकर उन्हें सांत्वना देते थे जिससे उनका जीवन उत्साहित हो उठता था।

परंतु सूर्यास्त होते ही सब लोग अपनी-अपनी झोंपड़ियों में चले जाते थे। किसी की आवाज़ तक नहीं आती थी। रात के घने अंधकार में एक चुप्पी-सी छा जाती थी। बीमार लोगों के बोलने की शक्ति नष्ट हो जाती थी। माताएँ अपने मरते हुए पुत्र को ‘बेटा’ भी नहीं कह पाती थी। रात के समय पूरे गाँव में कोई हलचल नहीं होती थी।

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प्रश्न 7.
कुश्ती या दंगल पहले लोगों या राजाओं का प्रिय शौक हुआ करता था। पहलवानों को राजा एवं लोगों के द्वारा विशेष सम्मान दिया जाता था
(क) ऐसी स्थिति अब क्यों नहीं है?
(ख) इसकी जगह अब किन खेलों ने ले ली है?
(ग) कुश्ती को फिर से प्रिय खेल बनाने के लिए क्या-क्या कार्य किए जा सकते हैं?
उत्तर:
पहले कुश्ती या दंगल करना एक आम बात थी। यह लोगों व राजाओं का प्रिय शौक था। राजा तथा अमीर लोग पहलवानों का बड़ा सम्मान करते थे। यहाँ तक कि गाँव की पंचायतें भी पहलवानों को आदर-मान देती थी। यह कुश्ती या दंगल उस समय मनोरंजन का श्रेष्ठ साधन था।
(क) अब पहलवानों को कोई सम्मान नहीं मिलता। केवल कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में ही दंगल आयोजित किए जाते हैं। अब राजा-महाराजाओं का जमाना भी नहीं है। उनका स्थान विधायकों, संसद-सदस्यों तथा मंत्रियों ने ले लिया है। उनके पास इन कामों के लिए कोई समय नहीं है। दूसरा, अब मनोरंजन के अन्य साधन प्रचलित हो गए हैं। कुश्ती का स्थान अब क्रिकेट, फुटबॉल आदि खेलों ने ले लिया है।

(ख) कुश्ती या दंगल की जगह अब क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, वॉलीबॉल, फुटबॉल, घुड़दौड़ आदि खेल प्रचलित हो गए हैं।

(ग) कुश्ती को फिर से लोकप्रिय बनाने के लिए अनेक उपाय अपनाए जा सकते हैं। गाँव की पंचायतें अखाड़े तैयार करके अनेक युवकों को इस ओर आकर्षित कर सकती हैं। दशहरा, होली, दीवाली आदि पर्यों पर कुश्ती आदि का आयोजन किया जा सकता है। सरकार की ओर से भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पहलवानों को पर्याप्त धन-राशि तथा सरकारी नौकरी मिलनी चाहिए। इसी प्रकार सेना, रेलवे, बैंक, एयर लाइंज आदि में भी पहलवानों को नौकरी देकर कुश्ती को बढ़ावा दिया जा सकता है। हाल ही में जिन पहलवानों ने मैडल जीते थे, उनको सरकार की ओर से अच्छी सरकारी नौकरियाँ दी गई हैं और अच्छी धन-राशि देकर सम्मानित किया गया है।

प्रश्न 8.
आशय स्पष्ट करें-
आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे।
उत्तर:
यहाँ लेखक अमावस्या की घनी काली रात में चमकते व टूटते हुए तारों की रोशनी पर प्रकाश डालता है। जब भी कोई तारा टूट कर जमीन पर गिरता तो ऐसा लगता था मानों वह महामारी से पीड़ित लोगों की दयनीय स्थिति पर सहानुभूति प्रकट करने के लिए आकाश से टूटकर पृथ्वी की ओर दौड़ा चला आ रहा है। लेकिन वह बेचारा कर भी क्या सकता था। दूरी होने के कारण उसकी ताकत और रोशनी नष्ट हो जाती थी। आकाश के दूसरे तारे उसकी असफलता को देखकर मानों हँसने लगते थे। भाव यह है कि आकाश से एक-आध तारा टूटकर गिरता था, किंतु अन्य तारे अपने स्थान पर खड़े-खड़े चमकते रहते थे।

प्रश्न 9.
पाठ में अनेक स्थलों पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है। पाठ में से ऐसे अंश चुनिए और उनका आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ में ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ पर प्रकृति का मानवीकरण किया गया है।
1. अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। आशय यह है कि रात को ओस पड़ रही थी। लेखक ने इसे लोगों की दयनीय स्थिति के साथ जोड़ दिया है। लेखक यहाँ यह कहना चाहता है कि जाड़े की अँधेरी रात में ओस के बिंदु रात के आँसुओं के समान दिखाई दे रहे थे। संपूर्ण वातावरण में दुख के कारण मौन छाया हुआ था। यहाँ लेखक ने अँधेरी रात का मानवीकरण किया है जो कि गाँव के दुख से दुखी होकर रो रही है।

2. रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती…..
आशय यह है कि महामारी ने रात को भी भयानक बना दिया था और वह भयानक रूप धारण करके गुजरती जा रही थी। यहाँ पुनः रात्रि का मानवीकरण किया गया है।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
पाठ में मलेरिया और हैजे से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति को चित्रित किया गया है। आप ऐसी किसी अन्य आपद स्थिति की कल्पना करें और लिखें कि आप ऐसी स्थिति का सामना कैसे करेंगे/करेंगी?
उत्तर:
प्रस्तुत पाठ में मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव की दयनीय स्थिति का वर्णन किया गया है। डेंगू बुखार के कारण लगभग ऐसी स्थिति पूरे देश में उत्पन्न हो गई थी। अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान के डॉक्टर भी इसकी चपेट में आ गए थे। यह बीमारी एक विशेष प्रकार के मच्छर के काटने से होती है। यदि हमारे गाँव में इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी तो मैं निम्नलिखित उपाय करूँगा

  • मैं गाँव में स्वच्छता अभियान चलाऊँगा और लोगों को समझाऊँगा कि वे कहीं पर पानी इकट्ठा न होने दें।
  • लोगों को डेंगू से बचने के उपाय बताऊँगा।
  • पंचायत से मिलकर गाँव में रक्तदान शिविर लगवाने का प्रयास करूँगा।
  • डेंगू का शिकार बने लोगों की सूचना सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों को दूंगा।

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प्रश्न 2.
ढोलक की थाप मृत गाँव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी-कला से जीवन के संबंध को ध्यान में रखते हुए चर्चा कीजिए।
उत्तर:
कला और जीवन का गहरा संबंध है। कला के अनेक भेद हैं। काव्य और संगीत श्रेष्ठ कलाएँ मानी गई हैं। कविताएँ निराश योद्धाओं में भी प्राण भर देती हैं। वीरगाथा काल का सारा साहित्य इसी प्रकार का है। चंदबरदाई अपनी कविता द्वारा राजा पृथ्वीराज चौहान और उसकी सेना को उत्साहित करते रहते थे। इसी प्रकार बिहारी ने अपने एक दोहे द्वारा राजा जयसिंह को अपनी नवोढ़ा पत्नी को छोड़कर अपने राजकाज को संभालने के योग्य बनाया। कवि के एक पत्र की दो पंक्तियों ने महाराणा प्रताप के इस निश्चय को दृढ़ कर दिया कि वह सम्राट अकबर के सामने नहीं झुकेगा। आज भी आल्हा काव्य को सुनकर लोगों में जोश भर जाता है। यही नहीं, लोक गीतों को सुनकर लोगों के पैर अपने-आप थिरकने लगते हैं।

प्रश्न 3.
चर्चा करें कलाओं का अस्तित्व व्यवस्था का मोहताज नहीं है।
उत्तर:
केवल सरकारी सहायता से ही कलाओं का विकास नहीं होता। शेष कलाकार किसी का आश्रय पाकर कलाकृतियाँ नहीं बनाते। ग्रामीण अंचल के ऐसे अनेक कलाकार हैं, जो स्वयं अपनी कला के लिए प्रसिद्ध हैं। उन्हें किसी का आश्रय नहीं लेना पड़ता। लोकतंत्र में यह आवश्यक है कि जनता के सहयोग से ही कलाओं का विकास करें। फिर भी समाज द्वारा कलाकारों को उचित सम्मान दिया जाना चाहिए।

भाषा की बात

प्रश्न 1.
हर विषय, क्षेत्र, परिवेश आदि के कुछ विशिष्ट शब्द होते हैं। पाठ में कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का बहुतायत प्रयोग हुआ है। उन शब्दों की सूची बनाइए। साथ ही नीचे दिए गए क्षेत्रों में इस्तेमाल होने वाले कोई पाँच-पाँच शब्द बताइए-
→ चिकित्सा
→ क्रिकेट
→ न्यायालय
→ या अपनी पसंद का कोई क्षेत्र
उत्तर:
कुश्ती से जुड़ी शब्दावली
अखाड़ा, दंगल, ताल ठोकना, दाँव काटना, चित्त करना, पढे।

चिकित्सा-डॉक्टर, मैडीसन, अस्पताल, वार्ड ब्वाय, ओ०पी०डी०, नर्सिंग होम, ओव्टी०, मलेरिया औषधि आदि।
क्रिकेट-बॉलिंग, बैटिंग, एल०बी०डब्ल्यू, विकेट, फालो-ऑन, टॉस जीतना, नो बॉल, क्लीन बोल्ड आदि।
न्यायालय-एडवोकेट, जज, कचहरी, सम्मन, आरोप-पत्र, आरोपी कैदी आदि।
संगीत-लय, ताल, वाद्य यंत्र, हारमोनियम, तबला, साज, गायन आदि।

प्रश्न 2.
पाठ में अनेक अंश ऐसे हैं जो भाषा के विशिष्ट प्रयोगों की बानगी प्रस्तुत करते हैं। भाषा का विशिष्ट प्रयोग न केवल भाषाई सर्जनात्मकता को बढ़ावा देता है बल्कि कथ्य को भी प्रभावी बनाता है। यदि उन शब्दों, वाक्यांशों के स्थान पर किन्हीं अन्य का प्रयोग किया जाए तो संभवतः वह अर्थगत चमत्कार और भाषिक सौंदर्य उद्घाटित न हो सके। कुछ प्रयोग इस प्रकार हैं।
→ फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा।
→ राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए।
→ पहलवान की स्त्री भी दो पहलवानों को पैदा करके स्वर्ग सिधार गई थी।
इन विशिष्ट भाषा-प्रयोगों का प्रयोग करते हुए एक अनुच्छेद लिखिए।
उत्तर:
राजा साहब से अनुमति लेकर लुट्टन पहलवान अखाड़े में उतरा। पहले तो चाँद सिंह ने अनेक दाँव लगाए, परंतु ढोलक की आवाज़ सुनते ही लुट्टन उस पर बाज़ की तरह टूट पड़ा। देखते-ही-देखते उसने अपना दाँव लगाया। परंतु वह चाँद सिंह को चित्त नहीं कर पाया। ढोल अभी भी बज रहा था। लुट्टन पहलवान के उत्साह ने जोश मारा और उसने अगले ही दाँव में चाँद सिंह को चित्त कर दिया। चारों ओर लुट्टन की जय-जयकार होने लगी। इधर राजा साहब की स्नेह-दृष्टि लुट्टन पर पड़ी। अतः शीघ्र ही उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लग गए। अब लुट्टन का जीवन सुख से कट रहा था। परंतु अचानक उसकी पत्नी दो पहलवान पुत्रों को जन्म देकर स्वर्ग सिधार गई।

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प्रश्न 3.
जैसे क्रिकेट की कमेंट्री की जाती है वैसे ही इसमें कुश्ती की कमेंट्री की गई है? आपको दोनों में क्या समानता और अंतर दिखाई पड़ता है?
उत्तर:
क्रिकेट एक लोकप्रिय खेल है। हमारे देश में लगभग सारा वर्ष ही क्रिकेट के मैच होते रहते हैं। इसकी कमेंट्री के लिए दो-तीन व्यक्तियों को नियुक्त किया जाता है जो मैच की कमेंट्री लगातार करते रहते हैं। इस कमेंट्री का प्रसारण रेडियो तथा दूरदर्शन द्वारा किया जाता है।

प्रस्तुत पाठ में कुश्ती की भी कमेंट्री की गई है। दोनों में समानता यह है कि दर्शक अपनी-अपनी टीम के खिलाड़ियों के उत्साह वर्धन के लिए तालियाँ बजाते हैं और खूब चीखते-चिल्लाते हैं। प्रायः दर्शक दो भागों में बँट जाते हैं। परंतु दोनों की कमेंट्री में काफी अंतर दिखाई देता है। कुश्ती में कोई निश्चित कामेंटेटर नहीं होता और न ही कमेंट्री करने की कोई उचित व्यवस्था होती है। कुश्ती की कमेंट्री के प्रसारण की भी कोई उचित व्यवस्था नहीं होती। इसलिए यह खेल अधिक लोकप्रिय नहीं हो पाया।

HBSE 12th Class Hindi पहलवान की ढोलक Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
पहलवान की ढोलक के आधार पर लट्टन का चरित्र-चित्रण कीजिए।
उत्तर:
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी में लुट्टन ही प्रमुख पात्र है, बल्कि वह कथानक का केंद्र-बिंदु है। उसी के चरित्र के चारों ओर कथानक घूमता रहता है। अन्य शब्दों में हम उसे कहानी का नायक भी कह सकते हैं। नौ वर्ष की आयु में लुट्टन अनाथ हो गया था। शादी होने के कारण उसकी सास ने उसका लालन-पालन किया। गाँव में वह गाएँ चराया करता था और उनका धारोष्ण दध पीता था। किशोरावस्था से ही व्यायाम करने लगा जिससे उसकी भजाएँ तथा सीना चौड़ा हो गया। अपने क्षेत्र में वह एक अच्छा पहलवान समझा जाता था। वह बहुत ही साहसी और वीर पुरुष था। एक पहलवान के रूप में उसने पंजाब के प्रसिद्ध पहलवान चाँद सिंह को हराया तथा राज-पहलवान का स्थान अर्जित किया। यही नहीं, उसने काले खाँ को भी चित्त करके लोगों के भ्रम को दूर कर दिया।

आरंभ से ही लुट्टन एक भाग्यहीन व्यक्ति था। बचपन में ही उसके माता-पिता चल बसे, बाद में उसके दोनों बेटे महामारी का शिकार बन गए। यही नहीं, राजा श्यामानंद के स्वर्गवास होने पर उसकी दुर्दशा हो गई। परंतु लुट्टन ने गाँव में रहते हुए प्रत्येक परिस्थिति का सामना किया। उसने महामारी की विभीषिका का डटकर सामना किया और सारी रात ढोल बजाकर लोगों को महामारी से लड़ने के लिए उत्साहित किया। वह एक संवेदनशील व्यक्ति था, जो सुख-दुख में गाँव वालों का साथ देता रहा।

प्रश्न 2.
महामारी से पीड़ित गाँव की दुर्दशा कैसी थी? संक्षेप में लिखिए।
उत्तर:
गाँव में महामारी ने भयानक रूप धारण कर लिया था। मलेरिया और हैजे के कारण प्रतिदिन दो-चार मौतें हो जाती थीं। सूर्योदय के बाद दिन के समय लोग काँखते-कूँखते और कराहते रहते थे। खाँसी से उनका बुरा हाल था। रात के समय उनमें बोलने की शक्ति भी नहीं होती थी। कभी-कभी “हरे राम” “हे भगवान” की आवाज़ आ जाती थी। कमज़ोर बच्चे माँ-माँ कहकर पुकारते थे। परंतु रात के समय भयानक चुप्पी छा जाती थी। ऐसा लगता था कि मानो अँधेरी रात आँसू बहा रही है। दूसरी ओर, सियार, उल्लू मिलकर रोते थे जिससे रात और अधिक भयानक हो जाती थी।

प्रश्न 3.
रात के भयानक सन्नाटे में पहलवान की ढोलक का क्या प्रभाव पड़ता था?
उत्तर:
शाम होते ही लुट्टन पहलवान अपनी ढोलक बजाना शुरू कर देता था। ढोलक की आवाज़ में एक आशा का स्वर था। मानो वह रात भर महामारी की भयंकरता को ललकारता रहता था। ढोलक की आवाज़ मृत्यु से जूझने वाले लोगों के लिए संजीवनी शक्ति का काम करती थी।

प्रश्न 4.
लट्टन अपना परिचय किस प्रकार देता था?
उत्तर:
लुट्टन ने अपने क्षेत्र में अनेक पहलवानों को धूल चटा दी थी। इसलिए वह अपने-आपको होल इंडिया (भारत) का प्रसिद्ध पहलवान कहता था। वस्तुतः उसमें उत्साह की भावना अधिक थी। वह अपने जिले को ही पूरा देश समझता था। उसके कहने का भाव था कि वह एक प्रसिद्ध पहलवान है, जिसने अनेक पहलवानों को हराया है।

प्रश्न 5.
लुटन सिंह ने चाँदसिंह को किस प्रकार हराया?
उत्तर:
लुट्टन सिंह और चाँदसिंह के बीच हुई कुश्ती अत्यन्त महत्त्वपूर्ण थी। यदि लुट्टन सिंह यह कुश्ती हार जाता तो उसका जीवन मिट्टी में मिल जाता और चाँद सिंह को राजदरबार में सम्मानित किया जाता। लुट्टन सिंह ने ढोलक की थाप की आवाज के अनुकूल दाँव पेंच लगाए। कुछ मिनटों के संघर्ष के बाद लुट्टन सिंह ने चाँद सिंह को गर्दन से पकड़ा और उठाकर चित्त कर दिया। जो लोग चाँद सिंह की जय-जयकार कर रहे थे, उनकी बोलती बन्द हो गई और अब जब लोग लुट्टन सिंह की जय-जयकार करने लगे तो राजा ने भी लुट्टन सिंह को कहा कि उसने मिट्टी की लाज रख ली।

प्रश्न 6.
श्यामनगर के दंगल ने किस प्रकार लुट्टन को कुश्ती लड़ने के लिए प्रेरित किया?
उत्तर:
श्यामनगर के राजा श्यामानंद कुश्ती के बड़े शौकीन थे। राजा साहब ने ही वहाँ दंगल का आयोजन किया था। लुट्टन केवल दंगल देखने के लिए ही गया था। लेकिन “शेर के बच्चे” की उपाधि प्राप्त पंजाब के पहलवान चाँद सिंह ने सबको चुनौती दे डाली, परंतु कोई भी पहलवान उससे कुश्ती करने के लिए तैयार नहीं हुआ। इस प्रकार चाँद सिंह गर्जना करता हुआ किलकारियाँ मारने लगा। ढोलक की आवाज़ सुनकर लुट्टन की नस-नस में उत्साह भर गया और उसने चाँद सिंह को चुनौती दे डाली।

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प्रश्न 7.
लुट्टन द्वारा चाँद सिंह को चुनौती देने से चारों ओर खलबली क्यों मच गई?
उत्तर:
जब लुट्टन ने चाँद सिंह को चुनौती दी और अखाड़े में आया तो चाँद सिंह उसे देखकर मुस्कुराया। वह बाज की तरह लुट्टन पर टूट पड़ा। चारों ओर दर्शकों में खलबली मच गई। लोग लुट्टन की ताकत से अपरिचित थे। अनेक लोग यह सोच रहे थे कि यह नया पहलवान चाँद सिंह के हाथों मारा जाएगा। कुछ लोग तो कह रहे थे कि यह पागल है, अभी मारा जाएगा। इसलिए दंगल के चारों ओर खलबली मच गई।

प्रश्न 8.
राजा साहब ने लुट्टन को कुश्ती लड़ने से क्यों रोका?
उत्तर:
राजा साहब लुट्टन की शक्ति को नहीं जानते थे। उन्होंने उसे पहली बार देखा था। दूसरा राजा साहब चाँद सिंह को नते थे। उन्हें लगा कि यह व्यक्ति अपनी ना-समझी और अनजाने में चाँद सिंह के हाथों मारा जाएगा। इसलिए राजा साहब ने उस पर दया करते हुए उसे कुश्ती लड़ने से रोका।

प्रश्न 9.
लुट्टन और चाँद सिंह में से लोग किसका समर्थन कर रहे थे और क्यों?
उत्तर:
लुट्टन और चाँद सिंह की कुश्ती में अधिकांश लोग और कर्मचारी चाँद सिंह का समर्थन कर रहे थे। वे चाँद सिंह की शक्ति से परिचित थे। लेकिन लुट्टन को कोई नहीं जानता था। चाँद सिंह पंजाब का पहलवान था और उसे “शेर के बच्चे” की उपाधि मिल चुकी थी। लोगों का विश्वास था कि चाँद सिंह लुट्टन को धराशायी कर देगा।

प्रश्न 10.
कुश्ती में लुट्टन को किसका समर्थन मिल रहा था?
उत्तर:
दंगल में जुड़े सभी लोग चाँद सिंह का ही समर्थन कर रहे थे। केवल ढोल की आवाज़ ही लुट्टन को कुश्ती लड़ने की प्रेरणा दे रही थी और उसका उत्साह बढ़ा रही थी। वह ढोल की आवाज़ के मतलब समझ रहा था। मानों कह रहा था दाव काटो बाहर हो जा। उठा पटक दे! चित करो, वाह बहादुर आदि। इस प्रकार ढोल उसकी हिम्मत को बढ़ा रहा था।

प्रश्न 11.
चाँद सिंह को हराने के बाद राजा साहब ने लुट्टन के साथ कैसा व्यवहार किया?
उत्तर:
राज कर्मचारियों के विरोध के बावजूद राजा साहब ने लुट्टन को लुट्टन सिंह नाम दिया और उसे अपने दरबार में राज पहलवान नियुक्त कर दिया। साथ ही उसे राज पहलवान की सुविधाएँ भी प्रदान की।

प्रश्न 12.
राज पंडित तथा क्षत्रिय मैनेजर ने लट्टन सिंह को राज पहलवान बनाने का विरोध क्यों किया?
उत्तर:
राज पंडित और मैनेजर दोनों ही जातिवाद में विश्वास रखते थे। वे चाँद सिंह का इसलिए समर्थन कर रहे थे कि वह क्षत्रिय था। जब लुट्टन को लुट्टन सिंह नाम दिया गया तो राज पंडितों ने मुँह बिचकाकर कहा “हुजूर! जाति का ……. सिंह……।” क्षत्रिय मैनेजर ने भी लुट्टन सिंह की जाति को आधार बनाकर यह कहा कि यह तो सरासर अन्याय है। इसलिए राजा साहब को कहना पड़ा कि उसने क्षत्रिय का काम किया है। इसलिए उसे राज पहलवान बनाया गया है।

प्रश्न 13.
लुट्टन सिंह के जीवन की त्रासदी का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सर्वप्रथम माता-पिता के निधन के बाद लुट्टन अनाथ हो गया और उसकी विधवा सास ने ही उसका पालन-पोषण किया। श्यामनगर दंगल में लुट्टन ने चाँद सिंह को हरा दिया और राज-दरबार में स्थायी पहलवान बन गया। पंद्रह साल बाद राजा साहब स्वर्ग सिधार गए और विलायत से लौटे राजकुमार ने उसे राज-दरबार से हटा दिया और वह अपने गाँव लौट आया। गाँव के लोगों ने कुछ दिन तक लुट्टन का भरण-पोषण किया, परंतु बाद में उसका अखाड़ा बंद हो गया। गाँव में अनावृष्टि के बाद मलेरिया और हैजा फैल गया और लुट्टन के दोनों पुत्रों की मृत्यु हो गई। पुत्रों की मृत्यु के चार-पाँच दिन बाद रात को लुट्टन की भी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 14.
मेले में जाकर लुट्टन का व्यवहार कैसा होता था?
उत्तर:
मेले में जाते ही लुट्टन सिंह बच्चों के समान हरकतें करने लगता था। वह लंबा चोगा पहनकर हाथी की मस्त चाल चलता था। मज़ाक-मज़ाक में वह दो सेर रसगुल्ले खा जाता था और आठ-दस पान एक साथ मुँह में रखकर चबाता था। वह अपनी आँखों पर रंगीन चश्मा धारण करता था और हाथ में खिलौने लेकर मुँह से पीतल की सीटी बजाता था।

प्रश्न 15.
एक पिता के रूप में लुट्टन का व्यवहार कैसा था?
उत्तर:
लुट्टन सिंह एक सुयोग्य पिता कहा जा सकता है। उसने अपने दोनों बेटों का बड़ी सावधानी से पालन-पोषण किया। पत्नी की मृत्यु के बाद बेटों का दायित्व उसी के कंधों पर था। उसने अपने बेटों को पहलवानी के गुर सिखाए। महामारी का शिकार बनने के बाद भी वह अपने बेटों का उत्साह बढ़ाता रहा। जब उसके बेटों की मृत्यु हो गई तो उसने बड़े सम्मान के साथ उनके शवों को नदी में विसर्जित किया।।

प्रश्न 16.
लुट्टन सिंह को राज-दरबार क्यों छोड़ना पड़ा?
उत्तर:
राजा साहब का स्वर्गवास होने पर उनका बेटा विलायत से पढ़कर लौटा था। वह कुश्ती को एक बेकार शौक समझता था। क्योंकि उसे घुड़दौड़ का शौक था। क्षत्रिय मैनेजर और राज पुरोहित भी नए राजा की हाँ-में-हाँ मिला रहे थे। इसलिए नए राजा ने लुट्टन की आजीविका की चिंता न करते हुए उसे राज-दरबार से निकाल दिया।

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प्रश्न 17.
लुट्टन सिंह ढोल को अपना गुरु क्यों मानता था?
उत्तर:
लुट्टन सिंह ने अपने क्षेत्र के पहलवानों के साथ कुश्ती करते हुए कुश्ती के सारे दाँव-पेंच सीखे थे। लेकिन ढोल की थाप ही उसके उत्साह को बढ़ाती थी और उसे कुश्ती जीतने की प्रेरणा देती थी। वह ढोल का बड़ा आदर करता था। ढोल की थाप का अनुसरण करते हुए ही उसने “शेर के बच्चे” चाँद सिंह को धूल चटाई और नामी पहलवान काले खाँ को हराया। चाँद सिंह को हराने के बाद सबसे पहले वह ढोल के पास आया और उसे प्रणाम किया और हमेशा के लिए उसे अपना गुरु मान लिया।

प्रश्न 18.
‘मनुष्य का मन शरीर से अधिक महत्त्वपूर्ण है। दंगल में लुट्टन ने इस उक्ति को कैसे सिद्ध कर दिखाया?
उत्तर:
लुट्टन ने जवानी के जोश में नामी पहलवान चाँद सिंह उर्फ “शेर के बच्चे” को दंगल में ललकार दिया। सभी लोग, राजा तथा पहलवान यही सोचते थे कि लुट्टन सिंह चाँद सिंह के सामने टिक नहीं पाएगा। आज तक किसी ने भी उसे श्यामनगर के दंगल में भाग लेते हुए नहीं देखा था। राजा साहब तथा अन्य लोगों ने उसे बहुत समझाया कि वह चाँद सिंह का मुकाबला न करे। परंतु लुट्टन ने अपने मन की आवाज़ को सुना और यह सिद्ध कर दिखाया कि मनुष्य का मन उसके शरीर से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है।

प्रश्न 19.
‘पहलवान की ढोलक’ कहानी का उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
‘पहलवान की ढोलक’ सोद्देश्य रचना है। इस कहानी में लेखक ने मानवीय मूल्यों का वर्णन किया है। कहानी का नायक लुट्टन पहलवान है। वह व्यक्ति दुःखों व मुसीबतों की चिंता किए बिना दूसरों के कल्याण व भलाई की बात सोचता है। गांव में मलेरिया फैल जाने पर उसने अपनी ढोलक की आवाज से गांव के लोगों के दिलों में ऐसा साहस भर दिया कि उन्होंने मलेरिया और हैजा जैसी बीमारियों का मुकाबला किया। ढोलक की थाप से लोग जाड़े भरी रात भी काट लेते थे। उसने चाँद सिंह जैसे पहलवान को हराकर लोगों के दिल जीत लिए थे किन्तु मन में जरा भी अहंकार नहीं था। लुट्टन ने यह भी बताया कि जहाँ व्यक्ति का आदर मान न हो वहाँ एक क्षण भी नहीं ठहरना चाहिए। दुःख व संकट की घड़ी में भी मानव को साहस रखना चाहिए। इस प्रकार सार रूप में कहा जा सकता है कि प्रस्तुत कहानी में मानवीय मूल्यों को उजागर करना ही लेखक का मूल उद्देश्य है।

प्रश्न 20.
राजदरबार से निकाले जाने के बाद लट्टन पहलवान और उसके बेटों की आजीविका कैसे चलती थी?
उत्तर:
राजा साहब का अचानक स्वर्गवास हो गया और नए राजकुमार ने विलायत से लौटकर राज-काज अपने हाथ में ले लिया। राजकुमार ने प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने की दृष्टि से तीनों पहलवानों की छुट्टी कर दी। अतः तीनों बाप-बेटे ढोल कंधे पर रखकर अपने गाँव लौट आए। गाँव वाले किसानों ने इनके लिए एक झोंपड़ी डाल दी, जहाँ ये गाँव के नौजवानों व ग्वालों को कुश्ती सिखाने लगे। खाने-पीने के खर्च की ज़िम्मेदारी गाँव वालों ने ली थी। किंतु गाँव वालों की व्यवस्था भी ज़्यादा दिन न चल सकी। अतः अब लुट्टन के पास सिखाने के लिए अपने दोनों पुत्र ही थे।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘पहलवान की ढोलक’ रचना के लेखक का नाम क्या है?
(A) महादेवी वर्मा
(B) फणीश्वर नाथ रेणु
(C) धर्मवीर भारती
(D) विष्णु खरे
उत्तर:
(B) फणीश्वर नाथ रेणु

2. ‘पहलवान की ढोलक’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी
(B) निबंध
(C) रेखाचित्र
(D) संस्मरण
उत्तर:
(A) कहानी

3. फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1923 में
(B) सन् 1922 में
(C) सन् 1921 में
(D) सन् 1920 में
उत्तर:
(C) सन् 1921 में

4. फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म किस राज्य में हुआ?
(A) मध्य प्रदेश
(B) उत्तर प्रदेश
(C) उत्तराखण्ड
(D) बिहार
उत्तर:
(D) बिहार

5. फणीश्वर नाथ रेणु का जन्म बिहार के किस जनपद में हुआ?
(A) पटना
(B) अररिया
(C) सहरसा
(D) मुज़फ्फरगढ़
उत्तर:
(B) अररिया

6. फणीश्वर नाथ रेणु किस प्रकार के कथाकार हैं?
(A) महानगरीय
(B) ऐतिहासिक
(C) आंचलिक
(D) पौराणिक
उत्तर:
(C) आँचलिक

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7. रेणु के जन्म स्थान का नाम क्या है?
(A) रामपुर
(B) विराटपुर
(C) मेरीगंज
(D) औराही हिंगना
उत्तर:
(D) औराही हिंगना

8. रेणु ने किस वर्ष स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया?
(A) 1942
(B) 1943
(C) 1946
(D) 1933
उत्तर:
(A) 1942

9. रेणु का निधन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1987 में
(B) सन् 1977 में
(C) सन् 1976 में
(D) सन् 1978 में
उत्तर:
(B) सन् 1977 में

10. रेणु किस विचारधारा के साहित्यकार थे?
(A) प्रगतिवादी
(B) प्रयोगवादी
(C) छायावादी
(D) स्वच्छन्दतावादी
उत्तर:
(A) प्रगतिवादी

11. किस उपन्यास के प्रकाशन से रेणु को रातों-रात ख्याति प्राप्त हो गई?
(A) परती परिकथा
(B) मैला आँचल
(C) दीर्घतपा
(D) जुलूस
उत्तर:
(B) मैला आँचल

12. ‘मैला आँचल’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1956 में
(B) सन् 1955 में
(C) सन् 1954 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(C) सन् 1954 में

13. रेणु के उपन्यास ‘परती परिकथा’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1954 में
(B) सन् 1956 में
(C) सन् 1957 में
(D) सन् 1955 में
उत्तर:
(C) सन् 1957 में

14. रेणु के उपन्यास ‘दीर्घतपा’ का प्रकाशन वर्ष क्या है?
(A) सन् 1963 में
(B) सन् 1962 में
(C) सन् 1961 में
(D) सन् 1960 में
उत्तर:
(A) सन् 1963 में

15. ‘कितने चौराहे’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी-संग्रह
(B) निबंध-संग्रह
(C) उपन्यास
(D) नाटक
उत्तर:
(C) उपन्यास

16. ‘कितने चौराहे’ का प्रकाशन वर्ष क्या है?
(A) सन् 1965
(B) सन् 1966
(C) सन् 1964
(D) सन् 1967
उत्तर:
(B) सन् 1966

17. ‘ठुमरी’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी-संग्रह
(B) निबंध-संग्रह
(C) उपन्यास
(D) संस्मरण
उत्तर:
(A) कहानी-संग्रह

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18. ‘ठुमरी’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1954 में
(B) सन् 1965 में
(C) सन् 1952 में
(D) सन् 1957 में
उत्तर:
(D) सन् 1957 में

19. रेणु जी का कौन-सा उपन्यास उनके मरणोपरांत प्रकाशित हुआ?
(A) जुलूस
(B) कितने चौराहे
(C) पलटू बाबूरोड
(D) दीर्घतपा
उत्तर:
(C) पलटू बाबूरोड

20. ‘ऋण जल धन जल’ किस विधा की रचना है?
(A) संस्मरण
(B) कहानी-संग्रह
(C) रिपोर्ताज़
(D) निबंध-संग्रह
उत्तर:
(A) संस्मरण

21. इनमें से कौन-सी रचना संस्मरण विधा की है?
(A) नेपाली क्रांति कथा
(B) अग्निखोर
(C) पटना की बाढ़
(D) वन तुलसी की गंध
उत्तर:
(D) वन तुलसी की गंध

22. रेणु की किस कहानी पर लोकप्रिय फिल्म बनी?
(A) ठुमरी
(B) पहलवान की ढोलक
(C) तीसरी कसम
(D) अग्निखोर
उत्तर:
(C) तीसरी कसम

23. ‘नेपाली क्रांति कथा’ और ‘पटना की बाढ़’ किस विधा की रचनाएँ हैं?
(A) रिपोर्ताज़
(B) संस्मरण
(C) कहानी-संग्रह
(D) उपन्यास
उत्तर:
(A) रिपोर्ताज़

24. ‘पहलवान की ढोलक’ मुख्य रूप से किसका वर्णन करती है?
(A) लुट्टन पहलवान की गरीबी का
(B) लुट्टन पहलवान की जिजीविषा और हिम्मत का
(C) लुट्टन की त्रासदी का ।
(D) लुट्टन की निराशा का
उत्तर:
(B) लुट्टन पहलवान की जिजीविषा और हिम्मत का

25. लट्टन कितनी आयु में अनाथ हो गया था?
(A) 7 वर्ष की आयु में
(B) 8 वर्ष की आयु में
(C) 10 वर्ष की आयु में
(D) 9 वर्ष की आयु में
उत्तर:
(D) 9 वर्ष की आयु में

26. किस पहलवान को शेर का बच्चा कहा गया?
(A) सूरज सिंह
(B) तारा सिंह
(C) धारा सिंह
(D) चाँद सिंह
उत्तर:
(D) चाँद सिंह

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27. गाँव में कौन-से रोग फैले हुए थे?
(A) डेंगू
(B) मलेरिया और हैज़ा
(C) तपेदिक
(D) मधुमेह
उत्तर:
(B) मलेरिया और हैज़ा

28. ढोलक की आवाज़ गाँव में क्या करती थी?
(A) संजीवनी शक्ति का काम
(B) भय
(C) निराशा
(D) घबराहट
उत्तर:
(A) संजीवनी शक्ति का काम

29. ‘शेर के बच्चे के गुरु का नाम था-
(A) दारा सिंह
(B) अजमेर सिंह
(C) समर सिंह
(D) बादल सिंह
उत्तर:
(D) बादल सिंह

30. लुट्टन पहलवान के कितने पुत्र थे?
(A) तीन
(B) चार
(C) दो
(D) एक
उत्तर:
(C) दो

31. लट्टन ने चाँद सिंह को कहाँ के दंगल में हराया था?
(A) राम नगर के
(B) प्रेम नगर के
(C) श्याम नगर के
(D) कृष्णा नगर के
उत्तर:
(C) श्याम नगर के

32. पंजाबी जमायत किसके पक्ष में थी?
(A) काले खाँ के
(B) चाँदसिंह के
(C) लुट्टन के
(D) छोटे सिंह के
उत्तर:
(B) चाँदसिंह के

33. पहलवान क्या बजाता था?
(A) वीणा
(B) तबला
(C) मृदंग
(D) ढोलक
उत्तर:
(D) ढोलक

34. लुट्टन पहलवान अपने दोनों हाथों को दोनों ओर कितनी डिग्री की दूरी पर फैलाकर चलने लगा था?
(A) 30 डिग्री
(B) 60 डिग्री
(C) 45 डिग्री
(D) 75 डिग्री
उत्तर:
(C) 45 डिग्री

35. लुट्टन को किसका आश्रय प्राप्त हो गया?
(A) ज़मींदार का
(B) ग्राम पंचायत का
(C) राजा साहब का
(D) सरकार का
उत्तर:
(C) राजा साहब का

36. दंगल का स्थान किसने ले लिया था?
(A) क्रिकेट ने
(B) फुटबाल ने
(C) घोड़ों की रेस ने
(D) भाला फेंक ने
उत्तर:
(C) घोड़ों की रेस ने

37. लुट्टन के दोनों पुत्रों की मृत्यु किससे हुई?
(A) करंट लगने से
(B) साँप के काटने से
(C) सड़क दुर्घटना से
(D) मलेरिया-हैजे से
उत्तर:
(D) मलेरिया-हैजे से

38. रात्रि की भीषणता को कौन ललकारती थी?
(A) चाँदनी
(B) बिजली
(C) पहलवान की ढोलक
(D) भावुकता
उत्तर:
(C) पहलवान की ढोलक

39. लट्टन पहलवान कितने वर्ष तक अजेय रहा?
(A) दस वर्ष
(B) पंद्रह वर्ष
(C) अठारह वर्ष
(D) बीस वर्ष
उत्तर:
(B) पंद्रह वर्ष

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40. लुट्टन सिंह ने दूसरे किस नामी पहलवान को पटककर हरा दिया था?
(A) अफजल खाँ को
(B) काला खाँ को
(C) कल्लू खाँ को
(D) अब्दुल खाँ को
उत्तर:
(B) काला खाँ को

पहलवान की ढोलक प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] जाड़े का दिन। अमावस्या की रात-ठंडी और काली। मलेरिया और हैज़े से पीड़ित गाँव भयात शिशु की तरह थर-थर काँप रहा था। पुरानी और उजड़ी बाँस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य! अँधेरा और निस्तब्धता!

अँधेरी रात चुपचाप आँसू बहा रही थी। निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे। पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं। आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हँस पड़ते थे। [पृष्ठ-108]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी साहित्य के महान आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। इसमें लेखक ने अपनी आंचलिक रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोक संस्कृति तथा लोकजीवन का लोकभाषा के माध्यम से प्रभावशाली वर्णन किया है। प्रस्तुत कहानी में गाँव, अंचल तथा संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। यहाँ लेखक मलेरिया तथा हैजे से पीड़ित गाँव की एक अमावस्या की रात का वर्णन करते हुए कहता है कि-

व्याख्या-भयंकर सर्दी का दिन था। अमावस्या की घनी काली रात थी। ठंड इस काली रात को और अधिक काली बना रही थी। पूरा गाँव मलेरिया तथा हैजे से ग्रस्त था। संपूर्ण गाँव भय से व्यथित बच्चे के समान थर-थर काँप रहा था। गाँव का प्रत्येक व्यक्ति सर्दी का शिकार बना हआ था। पुरानी तथा उजड़ी हुई बाँस तथा घास-फूस से बनी झोंपड़ियों में अँधेरा छाया हुआ था, साथ ही मौन का राज्य भी उनमें मिला हुआ था। चारों ओर अंधकार तथा चुप्पी थी। कहीं किसी प्रकार की हलचल सुनाई नहीं देती थी।

लेखक रात का मानवीकरण करते हुए कहता है कि ऐसा लगता था कि मानों अँधेरी काली रात चुपचाप रो रही है और अपनी चुप्पी को छिपाने का प्रयास कर रही है। ऊपर आकाश में टिमटिमाते हुए तारे अपनी रोशनी फैलाने का प्रयास कर रहे थे। ज़मीन पर कहीं रोशनी का नाम तक दिखाई नहीं दे रहा था। दुखी लोगों के प्रति सहानुभूति प्रकट करने के लिए यदि कोई संवेदनशील तारा ज़मीन की ओर जाने का प्रयास भी करता था तो उसका प्रकाश और ताकत रास्ते में ही समाप्त हो जाती थी, जिससे आकाश में अन्य तारे उसकी असफल संवेदनशीलता पर मानों खिलखिलाकर हँसने लगते थे। भाव यह है कि उस घने के एक तारा टूट कर पृथ्वी की ओर गिरने का प्रयास कर रहा था। शेष तारे ज्यों-के-त्यों आकाश में जगमगा रहे थे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने शीतकालीन अमावस्या की रात की सर्दी, मलेरिया तथा हैजे से पीड़ित गाँव के लोगों की व्यथा का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सजीव वर्णन हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) गाँव में अंधकार और सन्नाटे का साम्राज्य क्यों फैला हुआ था?
(ग) गाँव के लोग किन बीमारियों से पीड़ित थे?
(घ) अँधेरी रात को आँसू बहाते क्यों दिखाया गया है?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम ‘पहलवान की ढोलक’, लेखक-फणीश्वर नाथ रेणु।

(ख) अमावस्या की ठंडी और काली रात के कारण गाँव में अंधकार और सन्नाटा फैला हुआ था।

(ग) गाँव के लोग मलेरिया तथा हैजे से पीड़ित थे।

(घ) गाँव में मलेरिया तथा हैजा फैला हुआ था तथा महामारी के कारण हर रोज लोग मर रहे थे। चारों ओर मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। इसलिए लेखक ने कहा है कि ऐसा लगता था कि मानों अँधेरी रात भी आँसू बहा रही थी।

[2] सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज़ कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी। गाँव की झोंपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज़, ‘हरे राम! हे भगवान!’ की टेर अवश्य सुनाई पड़ती थी। बच्चे भी कभी-कभी निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ पुकारकर रो पड़ते थे। पर इससे रात्रि की निस्तब्धता में | बाधा नहीं पड़ती थी। कुत्तों में परिस्थिति को ताड़ने की एक विशेष बुद्धि होती है। वे दिन-भर राख के घरों पर गठरी की तरह सिकुड़कर, मन मारकर पड़े रहते थे। संध्या या गंभीर रात्रि को सब मिलकर रोते थे। [पृष्ठ-108]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से अवतरित है। इसके लेखक हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। इसमें लेखक ने अपनी आँचलिक रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोक संस्कृति तथा लोकजीवन का लोकभाषा के माध्यम से प्रभावशाली वर्णन किया है। प्रस्तुत कहानी में गाँव, अंचल तथा संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। यहाँ लेखक मलेरिया तथा हैज़े से ग्रस्त गाँव की अमावस्या की काली रात का वर्णन करते हुए कहता है कि-

व्याख्या-गाँव में अंधकार और चुप्पी का साम्राज्य फैला हुआ था। बीच-बीच में झोंपड़ियों से कभी-कभी बीमार लोगों की आवाज़ निकल आती थी। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए लेखक कहता है कि सियारों की चीख-पुकार तथा उल्लू की भयानक आवाजें उस मौन को भंग कर देती थीं। गाँव की झोंपड़ियों में बीमार लोग पीड़ा से कराहने लगते थे और कभी-कभी हैज़े के कारण उल्टी कर देते थे। बीच-बीच में हरे-राम, हे भगवान की आवाजें सुनने को मिल जाती थीं। भाव यह है कि गाँव के असंख्य लोग हैज़े और मलेरिया से ग्रस्त थे। कभी-कभी कमज़ोर बच्चे अपने कमज़ोर गलों से ‘माँ-माँ’ कहकर रोने लगते थे। इस प्रकार रात की चुप्पी पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता था, लेकिन कुत्तों में परिस्थितियों को पहचानने की विशेष योग्यता होती है क्योंकि वे जान चुके थे कि गाँव में अनावृष्टि और महामारी फैली हुई है इसलिए उन्हें खाने को कुछ नहीं मिलेगा। वे कूड़े के ढेर पर गठरी के रूप में सिकुड़ कर पड़ संध्या अथवा गहरी रात होते ही सब मिलकर रोने लगते थे अर्थात् वे भूख से व्याकुल होकर भौंकते और चिल्लाते थे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने मलेरिया तथा हैज़े से ग्रस्त लोगों की दयनीय स्थिति का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन किया है तथा कुत्तों की प्रकृति पर भी समुचित प्रकाश डाला है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) रात की निस्तब्धता को कौन भंग करते थे और क्यों?
(ख) सियारों और पेचक की आवाजें डरावनी क्यों थीं?
(ग) झोंपड़ियों से किसकी आवाजें सुनाई दे रही थीं और क्यों?
(घ) कुत्तों में क्या विशेषता होती है और वे गहरी रात में क्यों रोते थे?
उत्तर:
(क) सियारों की चीख-पुकार, उल्लुओं की डरावनी आवाजें, रोगियों की कराहने की आवाजें और कुत्तों का मिलकर रोना, ये सभी रात की निस्तब्धता को भंग करते थे। ऐसा लगता था कि ये सभी महामारी से दुखी होकर विलाप कर रहे थे।

(ख) सियारों और उल्लुओं की आवाजें इसलिए डरावनी लग रही थीं, क्योंकि गाँव में महामारी फैली हुई थी। प्रतिदिन दो-तीन लोग मर रहे थे। ऐसे में सियार और उल्लू भी चीख-पुकार कर रो रहे थे, मानों वे एक-दूसरे को मौत का समाचार दे रहे हों।

(ग) झोंपड़ियों से बीमार तथा कमज़ोर रोगियों के कराहने तथा रोने और उल्टियाँ करने की आवाजें भी आ रही थीं। कभी-कभी ये रोगी हे राम, हे भगवान कहकर ईश्वर को पुकार उठते थे और छोटे बच्चे माँ-माँ कहकर रोने लगते थे।

(घ) कुत्ते आसपास के वातावरण में चल रहे खुशी और गमी को पहचानने की अद्भुत क्षमता रखते हैं। महामारी के कारण उन्होंने जान लिया था कि लोग महामारी के कारण प्रतिदिन मर रहे हैं। किसी के घर में चूल्हा नहीं जलता, इसलिए कुत्तों को भी खाने को कुछ नहीं मिलता वे कूड़े के ढेर पर दुबककर बैठे रहते थे और रात को मिलकर एक-साथ रोते थे।

[3] लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल-पोस कर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूध पीता और कसरत किया करता था। गाँव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे; लट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी। नियमित कसरत ने किशोरावस्था में ही उसके सीने और बाँहों को सुडौल तथा मांसल बना दिया था। जवानी में कदम रखते ही वह गाँव में सबसे अच्छा पहलवान समझा जाने लगा। लोग उससे डरने लगे और वह दोनों हाथों को दोनों ओर 45 डिग्री की दूरी पर फैलाकर, पहलवानों की भाँति चलने लगा। वह कुश्ती भी लड़ता था। [पृष्ठ-110]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। इसमें लेखक ने अपनी आंचलिक रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोक संस्कृति तथा लोकजीवन का लोकभाषा के माध्यम से प्रभावशाली वर्णन किया है। प्रस्तुत कहानी में गाँव, अंचल तथा संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। यहाँ लेखक ने लुट्टन पहलवान की बाल्यावस्था का यथार्थ वर्णन किया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि लुट्टन नौ साल का हुआ, तब उसके माता-पिता चल बसे और वह अनाथ हो गया। परंतु यह एक अच्छी बात थी कि उसका विवाह हो चुका था, नहीं तो वह भी मृत्यु का शिकार बन जाता। उसकी सास विधवा थी। उसी ने उसका लालन-पालन किया। बचपन में वह गाय चराने जाया करता था। गाय तथा भैंसों के थनों से निकला ताजा दूध पीता था तथा खूब व्यायाम करता था। अकसर गाँव के लोग उसकी सास को अनेक कष्ट देकर उसे परेशान करते थे। इसीलिए लुट्टन ने यह फैसला कि वह व्यायाम करके पहलवान बनेगा और लोगों से बदला लेगा। वह हर रोज नियमानुसार व्यायाम करता था, इसलिए किशोरावस्था में ही उसकी छाती चौड़ी हो गई थी और भुजाएँ खूब पुष्ट और सुदृढ़ बन गई थीं। जैसे ही लुट्टन ने यौवन में कदम रखा तो लोगों ने समझ लिया कि यह गाँव का सबसे अच्छा पहलवान है। अब गाँव के लोग उससे डरने लग गए थे। वह अपने हाथों को दोनों तरफ 45 डिग्री के फासले पर फैलाकर चलता था, जिससे उसकी चाल पहलवानों जैसी थी। कभी-कभी वह अन्य पहलवानों से से कुश्ती भी लड़ लेता था। भाव यह है कि जवानी में कदम रखते ही लुट्टन एक अच्छा पहलवान बन चुका था और लोगों पर उसका प्रभाव छा गया था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने लुट्टन के आरंभिक जीवन का यथार्थ वर्णन किया है और यह बताने का प्रयास किया है कि वह गाँव में एक अच्छा पहलवान समझा जाता था।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है जिसमें, उम्र, कसरत, वरना, कुश्ती, तकलीफ आदि उर्दू शब्दों का सफल वर्णन हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) विधवा सास ने लुट्टन पहलवान का लालन-पालन क्यों किया?
(ख) किस आयु में लुट्टन अनाथ हो गया था?
(ग) लुट्टन ने पहलवानी क्यों शुरू की?
(घ) कौन-सा काम करके लुट्टन बचपन में बड़ा हुआ?
(ङ) लोग लुट्टन से क्यों डरने लगे थे?
(च) “वरना वह भी माँ-बाप का अनुसरण करता” इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) विधवा सास ने लुट्टन पहलवान का लालन-पालन इसलिए किया क्योंकि नौ वर्ष की आयु में ही उसके माता-पिता चल बसे थे। तब तक उसकी शादी हो चुकी थी। अतः उसकी सास ने ही उसका लालन-पालन किया।

(ख) नौ वर्ष की आयु में लुट्टन के माता-पिता चल बसे और वह अनाथ हो गया था।

(ग) गाँव के लोग लुट्टन की सास को तरह-तरह के कष्ट देते थे अतः लुट्टन के मन में आया कि वह उन लोगों से बदला ले जिन्होंने उसकी सास को तंग किया था। इसीलिए उसने अपना शरीर मज़बूत बनाने के लिए पहलवानी शुरू कर दी।

(घ) लुट्टन बचपन में गाएँ चराकर और कसरत करके बड़ा हुआ। (ङ) लुट्टन अब एक नामी पहलवान बन चुका था। उसका शरीर हृष्ट-पुष्ट था। इसलिए लोग उससे डरने लगे थे।

(च) इस पंक्ति का भाव यह है कि सौभाग्य से लुट्टन का विवाह हो चुका था। अगर उसका विवाह न हुआ होता तो उसकी देखभाल करने वाला कोई न होता। नौ वर्ष की आयु में उसके माता-पिता चल बसे तो उसकी सास ने ही उसका लालन-पालन किया। अन्यथा अपने माता-पिता की भाँति वह भी मृत्यु को प्राप्त हो जाता।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

[4] एक बार वह ‘दंगल’ देखने श्यामनगर मेला गया। पहलवानों की कुश्ती और दाँव-पेंच देखकर उससे नहीं रहा गया। जवानी की मस्ती और ढोल की ललकारती हुई आवाज़ ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी। उसने बिना कुछ सोचे-समझे दंगल में ‘शेर के बच्चे को चुनौती दे दी। ‘शेर के बच्चे का असल नाम था चाँद सिंह। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ, पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था। सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपक पड़ती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को पछाड़कर उसने ‘शेर के बच्चे की टायटिल प्राप्त कर ली थी। इसलिए वह दंगल के मैदान में लँगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान, उससे लड़ने की कल्पना से भी घबराते थे। अपनी टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए ही चाँद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था। [पृष्ठ-110]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। यहाँ लेखक ने श्यामनगर के दंगल का वर्णन किया है, जिसमें पंजाब के पहलवान चाँद सिंह (शेर के बच्चे) ने सभी पहलवानों को कुश्ती के लिए ललकारा था। लेखक कहता है कि

व्याख्या-एक बार लुट्टन श्यामनगर के मेले में आयोजित दंगल को देखने गया। पहलवानों की कुश्ती और दाँव-पेंच देखकर उसमें भी कुश्ती लड़ने की इच्छा उत्पन्न हुई। यौवनकाल की मस्ती और ढोल की ललकारती हुई आवाज़ ने उसके अंदर प्रबल जोश भर दिया। वस्तुतः ढोल की आवाज़ सुनकर लुट्टन की नसों में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती थी। पहलवानी का माहौल देखकर लुट्टन अपने आपको रोक नहीं पाया और उसने ‘शेर के बच्चे’ (चाँद सिंह) को कुश्ती के लिए ललकार दिया। शेर के बच्चे का मूल नाम चाँद सिंह था। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ पहली बार श्यामनगर के मेले में आया था। वह बड़ा ही हृष्ट-पुष्ट और सुंदर नौजवान था। उसके शरीर के प्रत्येक अंग से सौंदर्य टपकता था। तीन दिनों में ही उसने पंजाबी तथा पठान पहलवानों के समूह को तथा अपनी आयु के सभी पहलवानों को हरा दिया जिसके फलस्वरूप उसे ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि प्राप्त हुई। फलस्वरूप वह दंगल के मैदान में लँगोट कसकर चलता रहता था। वह एक विचित्र प्रकार की किलकारी भरता था और उछल-उछल कर चलता था। स्थानीय युवक पहलवान उससे कुश्ती करने में घबराते थे। कोई भी उसका मुकाबला करने को तैयार नहीं था। अपनी पदवी को सच्चा सिद्ध करने के लिए चाँद सिंह दहाड़कर अन्य पहलवानों को भयभीत करने का प्रयास करता था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने पंजाब से आए हुए पहलवान चाँद सिंह के हृष्ट-पुष्ट शरीर तथा उसकी पहलवानी का बड़ा ही सुंदर व सजीव वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लुट्टन किस कारण कुश्ती करने के लिए प्रेरित हुआ?
(ख) बिजली उत्पन्न करने का क्या आशय है?
(ग) ‘शेर का बच्चा’ किसे कहा गया है और क्यों?
(घ) ‘शेर का बच्चा’ किस प्रकार दंगल में चुनौती देता हुआ घूम रहा था?
उत्तर:
(क) पहलवानों की कुश्ती तथा उसके दाँव-पेंच देखकर लुट्टन अपने-आप पर नियंत्रण नहीं रख सका। फिर जवानी की मस्ती तथा ढोल की ललकारती हुई आवाज़ ने लुट्टन को कुश्ती करने के लिए प्रेरित किया।

(ख) बिजली उत्पन्न करने का आशय है कि प्रबल जोश उत्पन्न करना। ढोल की आवाज़ सुनने से लुट्टन की नसों में उत्तेजना उत्पन्न हो जाती थी और उसके तन-बदन में एक बिजली-सी कौंधने लगती थी।

(ग) ‘शेर का बच्चा’ पंजाब के पहलवान चाँद सिंह को कहा गया है। उसने श्यामनगर के मेले में तीन दिनों में ही पंजाबी तथा पठानों के गिरोह तथा अपनी उम्र के सभी पहलवानों को कुश्ती में हराकर यह पदवी प्राप्त की थी।

(घ) ‘शेर का बच्चा’ अर्थात चाँद सिंह दंगल के मैदान में लँगोट कसकर सभी पहलवानों को खली चनौती दिया फिरता था। वह अपने-आपको शेर का बच्चा सिद्ध करने के लिए विचित्र प्रकार की किलकारी मारा करता था। वह छोटी-छोटी छलाँगें लगाकर उछलता-कूदता हुआ बीच-बीच में दहाड़ उठता था।

[5] भीड़ अधीर हो रही थी। बाजे बंद हो गए थे। पंजाबी पहलवानों की जमायत क्रोध से पागल होकर लट्टन पर गालियों की बौछार कर रही थी। दर्शकों की मंडली उत्तेजित हो रही थी। कोई-कोई लट्टन के पक्ष से चिल्ला उठता था-“उसे लड़ने दिया जाए!” अकेला चाँद सिंह मैदान में खड़ा व्यर्थ मुसकुराने की चेष्टा कर रहा था। पहली पकड़ में ही अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का अंदाज़ा उसे मिल गया था। विवश होकर राजा साहब ने आज्ञा दे दी-“लड़ने दो!” [पृष्ठ-111]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आंचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। इसमें लेखक ने अपनी आँचलिक रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोक संस्कृति तथा लोकजीवन का लोकभाषा के माध्यम से प्रभावशाली वर्णन किया है। प्रस्तुत कहानी में गाँव, अंचल तथा संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। यहाँ लेखक ने उस स्थिति का वर्णन किया है जब लुट्टन राजा साहब से कुश्ती लड़ने की आज्ञा माँग रहा था।

व्याख्या-लेखक कहता है कि लोगों की भीड़ बेचैन होती जा रही थी। यहाँ तक कि बाजे बजने भी बंद हो गए थे। लुट्टन बार-बार हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाता हआ राजा साहब से कश्ती लड़ने की आज्ञा माँग रहा था। दूसरी ओर, पंज समूह क्रोध के कारण पागल हो रहा था। वे सभी लुट्टन पहलवान को गालियाँ दे रहे थे। कुछ लोग लुट्टन का पक्ष लेकर चिल्लाते हुए कह रहे थे कि उसे लड़ने की आज्ञा दी जानी चाहिए। उधर अकेला चाँद सिंह मैदान में खड़ा हुआ बेकार में हँसने की कोशिश कर रहा था। पहली पकड़ में उसे अंदाजा हो गया था कि उसका विरोधी ताकतवर है। उसे हराना आसान नहीं है। आखिर राजा साहब ने लुट्टन को अपनी स्वीकृति दे दी और कहा कि उसे लड़ने दिया जाए।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने दंगल का बड़ा ही सजीव वर्णन किया है, साथ ही लुट्टन की ताकत का भी हल्का-सा संकेत दिया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सार्थक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) भीड़ अधीर क्यों हो रही थी?
(ख) पंजाबी पहलवानों की जमायत लुट्टन को गालियाँ क्यों दे रही थी?
(ग) चाँद सिंह मैदान में खड़ा होकर व्यर्थ मुसकुराने की चेष्टा क्यों कर रहा था?
(घ) आखिर राजा साहब ने क्या किया?
उत्तर:
(क) भीड़ इसलिए अधीर हो रही थी क्योंकि वह चाँद सिंह और लुट्टन की कुश्ती को देखना चाहती थी। कुछ लोग लुट्टन का पक्ष लेते हुए कह रहे थे कि उसे कुश्ती लड़ने की आज्ञा मिलनी चाहिए।

(ख) पंजाबी पहलवानों की जमायत लुट्टन को इसलिए गालियाँ दे रही थी क्योंकि वे यह नहीं चाहते थे कि लुट्टन चाँद सिंह के साथ कुश्ती करे।

(ग) चाँद सिंह मैदान में खड़ा इसलिए व्यर्थ मुसकुराने की चेष्टा कर रहा था क्योंकि उसने पहली पकड़ में यह जान लिया था कि उसका विरोधी लुट्टन ताकतवर है और उसे हराना आसान नहीं है।

(घ) अंत में मजबूर होकर राजा साहब ने लुट्टन को चाँद सिंह से कुश्ती लड़ने की आज्ञा दे दी।

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[6] लुट्टन की आँखें बाहर निकल रही थीं। उसकी छाती फटने-फटने को हो रही थी। राजमत, बहुमत चाँद के पक्ष में था। सभी चाँद को शाबाशी दे रहे थे। लट्टन के पक्ष में सिर्फ ढोल की आवाज़ थी, जिसकी ताल पर वह अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था अपनी हिम्मत को बढ़ा रहा था। अचानक ढोल की एक पतली आवाज़ सुनाई पड़ी-
‘धाक-धिना, तिरकट-तिना, धाक-धिना, तिरकट-तिना…..!!’
लुट्टन को स्पष्ट सुनाई पड़ा, ढोल कह रहा था-“दाँव काटो, बाहर हो जा दाँव काटो, बाहर हो जा!!” [पृष्ठ-111]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। इसमें लेखक ने अपनी आँचलिक रचनाओं के माध्यम से ग्रामीण लोक संस्कृति तथा लोकजीवन का लोकभाषा के माध्यम से प्रभावशाली वर्णन किया है। यहाँ लेखक ने लुट्टन और चाँद सिंह की कुश्ती का वर्णन किया है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि चाँद सिंह ने लुट्टन को कसकर दबा लिया था जिस कारण लुट्टन थोड़ा कमज़ोर पड़ गया था। घबराहट के कारण उसकी आँखें बाहर निकलती नज़र आ रही थीं। उसकी छाती पर भी दबाव बढ़ता जा रहा था। राजा साहब के अधिकारी चाँद सिंह का समर्थन कर रहे थे। सभी उसे शाबाशी दे रहे थे। लुट्टन का समर्थन करने वाला कोई नहीं था। केवल ढोल की आवाज़ की ताल पर लुट्टन अपनी ताकत और दाँव-पेंच को जाँच रहा था और अपना हौसला बढ़ा रहा था। भाव यह है कि ढोल की आवाज़ उसके लिए प्रेरणा का काम कर रही थी। अचानक उसे ढोल की बारीक-सी आवाज़ सुनाई पड़ी, मानों ढोल लुट्टन से कह रहा था कि चाँद सिंह के दाँव को काटो और बाहर निकल जाओ। लुट्टन ने ऐसा ही किया। .

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने हारते हुए लुट्टन की स्थिति पर प्रकाश डाला है और साथ ही यह बताया है कि कैसे ढोल की आवाज़ ने लुट्टन की हार को जीत में बदल दिया।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग है, जिसमें कुश्ती से जुड़ी शब्दावली का अत्यधिक प्रयोग किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लुट्टन की आँखें बाहर क्यों निकल रही थीं?
(ख) राजमत और बहुमत चाँद का पक्ष क्यों ले रहा था?
(ग) लुट्टन के पक्ष में कौन था?
(घ) ढोल की आवाज़ लुट्टन से क्या कह रही थी?
उत्तर:
(क) लुट्टन की आँखें इसलिए बाहर निकल रही थी क्योंकि चाँद सिंह ने लुट्टन को कसकर दबा लिया था और उसे पहले दाँव में ही चित्त करने की कोशिश कर रहा था।

(ख) राजमत और बहुमत चाँद सिंह के पक्ष में इसलिए था क्योंकि एक तो वह ‘शेर के बच्चे’ की पदवी प्राप्त कर चुका था और दूसरा वह क्षत्रिय पंजाब का नामी पहलवान था। इसलिए सब लोग चाँद सिंह को ही शाबाशी दे रहे थे।

(ग) लुट्टन के पक्ष में केवल ढोल की आवाज़ थी। उसी आवाज़ पर लुट्टन अपनी शक्ति और दाँव-पेंच की परीक्षा ले रहा था।

(घ) ढोल की आवाज़ लुट्टन को स्पष्ट कह रही थी कि चाँद सिंह के दाँव को काटकर बाहर निकल जाओ।

[7] पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें पोंछ रही थी। लुट्टन को राजा साहब ने पुरस्कृत ही नहीं किया, अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। तब से लुट्टन राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे। राज-पंडितों ने मुँह बिचकाया-“हुजूर! जाति का…… सिंह…!”, मैनेजर साहब क्षत्रिय थे। ‘क्लीन-शेव्ड’ चेहरे को संकुचित करते हुए, अपनी शक्ति लगाकर नाक के बाल उखाड़ रहे थे। चुटकी से अत्याचारी बाल को रगड़ते हुए बोले-“हाँ सरकार, यह अन्याय है!” [पृष्ठ-112]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। प्रस्तुत कहानी में गाँव, अंचल तथा संस्कृति का सजीव चित्रण किया गया है। जब लुट्टन पहलवान ने पंजाबी पहलवान चाँद सिंह को दंगल में चित्त कर दिया था तब राजा साहब ने उसे अपने दरबार में राज-पहलवान बना दिया था।

व्याख्या-लेखक कहता है कि लुट्टन पहलवान ने पंजाबी पहलवान चाँद सिंह पर विजय प्राप्त कर ली। फलस्वरूप चाँद सिंह की आँखों में हार के आँस आ गए। उसके पंजाबी पहलवान साथी भी बहुत दुखी थे। वे सब मिलकर चाँद सिंह को सांत्वना दे रहे थे। दूसरी ओर, राजा साहब ने लट्टन को न केवल इनाम दिया, बल्कि उसे हमेशा के लिए अपने दरबार में राज-पहलवान बन चुका था। राजा साहब उसे लुट्टन सिंह के नाम से बुलाने लगे, परंतु राज पुरोहित उससे खुश नहीं हुए। उन्होंने मुँह बिचकाते हुए राजा से कहा कि महाराज! यह तो छोटी जाति का व्यक्ति है। इसे सिंह कहना कहाँ तक उचित है। राजा साहब का मैनेजर एक क्षत्रिय था। उससे भी यह सहन नहीं हुआ कि एक छोटी जाति वाला व्यक्ति राज-पहलवान बने। उसने दाढ़ी-मूंछ मुँडवा रखी थी तथा उसका चेहरा बड़ा सिकुड़ा हुआ था। वह बार-बार अपनी नाक के बाल उखाड़ता जा रहा था। अपनी नाक के एक बाल को रगड़ते हुए उसने महाराज से कहा कि हाँ सरकार, यह तो सरासर न्याय विरोधी कार्य है। मैनेजर साहब के कहने का यह अभिप्राय था कि एक छोटी जाति के व्यक्ति को राज-पहलवान नहीं बनाया जाना चाहिए। यह पदवी तो किसी क्षत्रिय पहलवान को ही मिलनी चाहिए।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि उस समय भारतीय समाज में ऊँच-नीच का बहुत भेद-भाव था। इसलिए राज पुरोहित तथा क्षत्रिय मैनेजर लुट्टन पहलवान के राज-पहलवान बनने का विरोध कर रहे थे।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक, सटीक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पंजाबी पहलवानों की जमायत चाँद सिंह की आँखें क्यों पोंछ रही थी?
(ख) राजा साहब ने लुट्टन के लिए क्या किया ?
(ग) राजा साहब ने किस लिए लुट्टन पहलवान को अपने दरबार में रख लिया था?
(घ) लुट्टन सिंह का विरोध किसने ओर क्यों किया?
(ङ) प्राचीन काल में जातिप्रथा की बुराई कहाँ तक व्याप्त थी?
उत्तर:
(क) पंजाब से आए पहलवान को अभी-अभी ‘शेर के बच्चे’ की उपाधि प्राप्त हुई थी, परंतु लुट्टन पहलवान ने सबके सामने उसको धूल चटा दी थी। इसलिए वह दुखी था और उसकी आँखों में आँसू आ गए थे। पंजाबी पहलवान के साथ उसके सभी साथी भी दुखी थे। वे सभी मिलकर चाँद सिंह को सांत्वना दे रहे थे।

(ख) राजा साहब ने लुट्टन को हमेशा के लिए अपने दरबार में रख लिया और उसे इनाम दिया, चूँकि वह राज-पहलवान बन चुका था, इसलिए राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे थे।

(ग) राजा साहब ने लुट्टन पहलवान को अपने दरबार में इसलिए रख लिया क्योंकि उसने ‘शेर के बच्चे’ चाँद सिंह को दंगल में हराया था। उसने सर्वश्रेष्ठ पहलवान बनकर अपनी मिट्टी की लाज को बचाया था। दूसरा, राजा साहब पहलवानों के प्रशंसक भी थे।

(घ) राजपुरोहित तथा क्षत्रिय मैनेजर दोनों ने लुट्टन के राज पहलवान बनने का विरोध किया। पहले तो राज पंडित ने मुँह बिचकाते हुए इस बात का विरोध किया कि छोटी जाति के लुट्टन को लुट्टन सिंह कहकर दरबार में रखना ठीक नहीं है। इसी प्रकार क्षत्रिय मैनेजर चाहता था कि किसी क्षत्रिय को राज पहलवान नियुक्त किया जाना चाहिए।

(ङ) प्राचीन काल में भारतीय समाज में जाति-पाति और ऊँच-नीच का काफी भेदभाव व्याप्त था। राजाओं के यहाँ बड़े-बड़े अधिकारी ऊँची जाति के होते थे और वे छोटी जाति के लोगों से घृणा करते थे। बल्कि वे छोटी जाति के प्रतिभा संपन्न लोगों को उभरने नहीं देते थे और उन्हें दबाकर रखते थे।

[8] राजा साहब ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा-“उसने क्षत्रिय का काम किया है।” उसी दिन से लट्टन सिंह पहलवान की कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई। पौष्टिक भोजन और व्यायाम तथा राजा साहब की स्नेह-दृष्टि ने उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लगा दिए। कुछ वर्षों में ही उसने एक-एक कर सभी नामी पहलवानों को मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखा दिया। काला खाँ के संबंध में यह बात मशहूर थी कि वह ज्यों ही लँगोट लगाकर ‘आ-ली’ कहकर अपने प्रतिद्वंद्वी पर टूटता है, प्रतिद्वंद्वी पहलवान को लकवा मार जाता है लुट्टन ने उसको भी पटककर लोगों का भ्रम दूर कर दिया। [पृष्ठ-112]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। लेखक ने अपने उपन्यासों, कहानियों तथा संस्मरणों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रस्तुत कहानी में लेखक ने आंचलिक जीवन तथा लोक संस्कृति का सजीव वर्णन किया है। यहाँ लेखक ने उस स्थिति का वर्णन किया है जब राजा साहब के क्षत्रिय मैनेजर तथा राज-पुरोहित द्वारा लुट्टन पहलवान को राज पहलवान बनाने का विरोध किया था। राजा साहब ने उनको दो टूक उत्तर दिया।

व्याख्या-राजा साहब क्षत्रिय मैनेजर तथा राजपुरोहित द्वारा उठाई गई आपत्ति के फलस्वरूप मुस्कुराकर बोले कि लुट्टन ने चाँद सिंह पहलवान को धूल चटाकर एक क्षत्रिय का ही काम किया है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि वह क्षत्रिय नहीं है। उस दिन के बाद लुट्टन सिंह पहलवान का यश चारों ओर फैलने लगा। दूर-दूर तक के लोग जान गए कि लुट्टन राज-दरबार का पहलवान बन गया है। अब उसे खाने के लिए पौष्टिक भोजन मिलता था। वह खूब कसरत भी करता रहता था। इस पर राजा साहब की कृपा-दृष्टि भी उस पर बनी हुई थी। इससे उसका यश और भी बढ़ गया। कुछ ही वर्षों में लुट्टन सिंह ने आस-पास के सभी मशहूर पहलवानों को पराजित कर दिया था, जिससे उसका नाम काफी प्रसिद्ध हो गया। भाव यह है कि लुट्टन सिंह ने आस-पास के सभी पहलवानों को कुश्ती में पछाड़ दिया था।

उस समय काले खाँ नाम का एक प्रसिद्ध पहलवान था। उसके बारे में मशहूर था कि जब वह लँगोट बाँधकर ‘आ-ली’ कहता हुआ अपने विरोधी पर हमला करता है तो उसके विरोधी को लकवा मार जाता है अर्थात् उसके द्वारा हमला करते ही विरोधी पहलवान धराशायी हो जाता है। लुट्टन ने उसे भी दंगल में पटकनी दे दी जिससे लोगों के मन में काले खाँ को लेकर जो गलतफहमी थी, वह दूर हो गई। भाव यह है कि लुट्टन ने दूर-दूर के सुप्रसिद्ध पहलवानों को हराकर अपनी धाक जमा ली थी।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने लुट्टन की पहलवानी तथा उसके यश का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) राजा साहब ने मुसकुराते हुए यह क्यों कहा कि लुट्टन ने क्षत्रिय का काम किया है?
(ख) लुट्टन पहलवान की कीर्ति दूर-दूर तक कैसे फैल गई?
(ग) काला खाँ कौन था? लुट्टन ने उसे किस प्रकार हराया?
(घ) मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखाने का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
(क) राजा साहब ने मुसकुराते हुए यह इसलिए कहा कि लुट्टन ने क्षत्रिय का काम किया है क्योंकि नामी पहलवान चाँद सिंह को हराना कोई आसान काम नहीं था। लुट्टन ने स्थानीय निवासियों की लाज को बचाया। जो काम पहले क्षत्रिय करते थे, वही काम छोटी जाति वाले ने किया। इसलिए राजा साहब को कहना पड़ा कि लुट्टन ने क्षत्रिय का काम किया है।

(ख) लुट्टन ने पंजाब के प्रसिद्ध पहलवान चाँद सिंह को धूल चटाई जिससे लोगों में उसका नाम प्रसिद्ध हो गया। दूसरा, लुट्टन सिंह ने राजा श्यामानंद के दरबार में राज पहलवान का पद पा लिया। इसलिए उसकी कीर्ति दूर-दूर तक फैल गई।

(ग) काला खाँ एक नामी पहलवान था। उसे कोई भी हरा नहीं पाया था। उसके बारे में यह बात प्रसिद्ध थी कि जैसे ही वह लँगोट बाँधकर ‘आ-ली’ कहता है तो उसके विरोधी को लकवा मार जाता है। लट्टन सिंह ने उसे हराकर सब लोगों के भ्रम को दूर कर दिया।

(घ) ‘मिट्टी सुंघाकर आसमान दिखाना’ का आशय है कि अपने विरोधी पहलवान को धरती पर पीठ के बल पटक देना, ताकि उसकी पीठ ज़मीन से लग जाए। कुश्ती की शब्दावली में इसे चित्त करना (हरा देना) कहते हैं।

[9] किंतु उसकी शिक्षा-दीक्षा, सब किए-कराए पर एक दिन पानी फिर गया। वृद्ध राजा स्वर्ग सिधार गए। नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य को अपने हाथ में ले लिया। राजा साहब के समय शिथिलता आ गई थी, राजकुमार के आते ही दूर हो गई। बहुत से परिवर्तन हुए। उन्हीं परिवर्तनों की चपेटाघात में पड़ा पहलवान भी। दंगल का स्थान घोड़े की रेस ने लिया। [पृष्ठ-114]

प्रसंग प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से अवतरित है। इसके लेखक हिंदी के सप्रसिद्ध आँचलिक कथाकार तथा निबंधकार ‘फणीश्वर नाथ रेण’ हैं। लेखक ने अनेक संस्मरणों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रस्तुत कहानी में लेखक ने आंचलिक जन-जीवन तथा लोक संस्कृति का सजीव वर्णन किया है तथा पहलवानी को एक कला के रूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ लेखक ने लट्टन सिंह के जीवन में आए परिवर्तन की ओर संकेत करते हुए लिखा है-

व्याख्या-लुट्टन सिंह ने पहलवानी के क्षेत्र में जो शिक्षण-परीक्षण प्राप्त किया था और राज दरबार में अपना स्थान बनाया था, वह सबं समाप्त हो गया था। यहाँ तक कि अपने बच्चों को भावी पहलवान बनाने के सपने भी चूर-चूर हो गए, क्योंकि वृद्ध राजा श्यामनंद का देहांत हो गया था। नया राजकुमार विलायत से शिक्षा प्राप्त करके लौटा था। उसने आते ही राज्य व्यवस्था संभाल ली। राजा साहब के समय में राज्य व्यवस्था कुछ ढीली पड़ गई थी, परंतु राजकुमार ने आते ही सब कुछ ठीक कर दिया। उसने अनेक परिवर्तन किए। उन परिवर्तनों का एक धक्का लुट्टन पहलवान को भी लगा। अब राजकुमार ने कुश्ती दंगल में रुचि लेनी बंद कर दी और वह घोड़े की रेस में रुचि लेने लगा। भाव यह है कि राजदरबार से लुट्टन सिंह और उसके दोनों बेटों को निकाल दिया गया, क्योंकि राजकुमार पश्चिमी सभ्यता में पला नौजवान था और वह पहलवानों का खर्चा उठाना नहीं चाहता था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि वृद्ध राजा की मृत्यु के बाद नए राजकुमार ने लुट्टन सिंह पहलवान का राज्याश्रय छीन लिया था।
  2. सहज, सरल साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व सटीक है तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लुट्टन सिंह पहलवान के किए कराए पर पानी क्यों फिर गया?
(ख) वृद्ध राजा के स्वर्ग सिधार जाने पर नए राजकुमार ने विलायत से आते ही क्या किया?
(ग) राज्य परिवर्तन से किस प्रकार के लाभ-हानि होते हैं?
(घ) राज दरबार में बने रहने के लिए आपके अनुसार कौन-सी आवश्यकता होनी जरूरी है?
उत्तर:
(क) लुट्टन ने अपने क्षेत्र के सभी पहलवानों को हराने के बाद राज दरबार में अपना स्थान बनाया था। वह पंद्रह साल तक राजदरबार में रहा। वह चाहता था कि आगे चलकर उसके दोनों बेटे भावी पहलवान बनें। उसने उन दोनों को पहलवानी का प्रशिक्षण भी दिया। परंतु वृद्ध राजा के देहांत के बाद उसके सारे सपने टूट गए। नए राजा ने पहलवानी के खर्चों को व्यर्थ सिद्ध किया और लुट्टन सिंह और उसके दोनों लड़कों को राजदरबार से निकाल दिया।

(ख) नए राजकुमार ने विलायत से आते ही राज्य व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। राजा साहब के समय राज्य व्यवस्था में काफी शिथिलता आ चुकी थी। राजकुमार ने इस शिथिलता को दूर किया और बहुत से परिवर्तन किए। उन्हीं परिवर्तनों में से एक धक्का पहलवान को भी लगा।

(ग) राज्य परिवर्तन होने से किसी को लाभ होता है किसी को हानि। उदाहरण के रूप में जब राजकुमार राजा बना तो लुट्टन सिंह पहलवान को हानि हुई क्योंकि उसे राजदरबार से निकाल दिया गया। दूसरी ओर घुड़दौड़ से संबंधित कर्मचारियों को आश्रय मिल गया और उन्हें दरबार से धन मिलने लगा।

(घ) प्रस्तुत कहानी को पढ़ने से पता चलता है कि राज दरबार में रहने के लिए राजाश्रय के साथ-साथ राजा के विश्वस्त मैनेजरों के साथ-साथ उसके सलाहकारों की कृपा दृष्टि भी बनी रहनी चाहिए, अन्यथा दरबार में राजाश्रित व्यक्ति का वही हाल होगा, जो लुट्टन सिंह का हुआ।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

[10] अकस्मात गाँव पर यह वज्रपात हुआ। पहले अनावृष्टि, फिर अन्न की कमी, तब मलेरिया और हैजे ने मिलकर गाँव को भूनना शुरू कर दिया। गाँव प्रायः सूना हो चला था। घर के घर खाली पड़ गए थे। रोज़ दो-तीन लाशें उठने लगी। लोगों में खलबली मची हुई थी। दिन में तो कलरव, हाहाकार तथा हृदय-विदारक रुदन के बावजूद भी लोगों के चेहरे पर कुछ प्रभा दृष्टिगोचर होती थी, शायद सूर्य के प्रकाश में सूर्योदय होते ही लोग काँखते-कूँखते कराहते अपने-अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसियों और आत्मीयों को ढाढ़स देते थे “अरे क्या करोगी रोकर, दुलहिन! जो गया सो तो चला गया, वह तुम्हारा नहीं था; वह जो है उसको तो देखो।” [पृष्ठ-114]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध आँचलिक कहानीकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। लेखक ने अपने असंख्य उपन्यासों, कहानियों एवं संस्मरणों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रस्तुत कहानी में लेखक आँचलिक जन-जीवन तथा लोक-संस्कृति का सजीव वर्णन करता है, तथा पहलवानी को एक कला के रूप में प्रस्तुत करता है। यहाँ लेखक ने गाँव में अनावृष्टि, मलेरिया तथा हैजे के प्रकोप का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन किया है

व्याख्या-लेखक कहता है कि अचानक गाँव पर बिजली गिर पड़ी। पहले तो वर्षा न होने के कारण सूखा पड़ा जिससे अन्न की भारी कमी हो गई और लोग भूख से मरने लगे। इसके बाद मलेरिया तथा हैजे के कारण गाँव के लोग मृत्य को प्राप्त धीरे-धीरे सारा गाँव सूना होता जा रहा था। अनेक घर तो खाली हो गए थे। प्रतिदिन गाँव से दो-तीन शव निकाले जाते थे जिससे लोगों में काफी घबराहट फैली हुई थी। कहने का भाव यह है कि हर रोज दो-चार मनुष्यों के मरने से गाँव के लोगों में खलबली मच गई थी। दिन में शोर-शराबा, हाय-हाय तथा हृदय को फाड़ने वाले विलाप की आवाजें आती थीं। फिर भी लोगों के चेहरों पर थोड़ा बहुत तेज दिखाई देता था। कारण यह है कि सूर्य के उदय होते ही उसकी रोशनी में लोग खाँसते और कराहते हुए अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसी तथा रिश्तेदारों को सांत्वना देते थे। वे रोती हुई स्त्री से कहते थे कि हे बहू! अब रोने से क्या लाभ है, जो इस संसार से चला गया, वह अब लौटकर आने वाला नहीं है। यूँ समझ लो कि वह तुम्हारा था ही नहीं। जो इस समय तुम्हारे पास जिंदा है, उसकी देखभाल करो। कहने का भाव यह है कि अनावृष्टि, मलेरिया तथा हैज़े के कारण पूरे गाँव में मृत्यु का तांडव नाच चल रहा था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने लुट्टन सिंह पहलवान के गाँव में फैली अनावृष्टि, मलेरिया तथा हैज़े के कारण उत्पन्न विनाश का हृदय-विदारक वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) किन कारणों से गाँव में वज्रपात हुआ?
(ख) गाँव प्रायः सूना क्यों होता जा रहा था?
(ग) दिन में लोगों के चेहरे पर कुछ प्रभा क्यों दृष्टिगोचर होती थी?
(घ) लोग अपने पड़ोसियों तथा आत्मीयों को क्या कहकर ढांढस देते थे?
उत्तर:
(क) गाँव में पहले तो अनावृष्टि हुई जिससे अनाज की कमी हो गई, तत्पश्चात् मलेरिया तथा हैजे के प्रकोप ने गाँव को नष्ट करना आरंभ कर दिया।

(ख) मलेरिया तथा हैजे की महामारी की चपेट में आने के कारण लोग मृत्यु का ग्रास बन रहे थे। प्रतिदिन गाँव से दो-तीन लाशें उठने लगी थीं, इसीलिए गाँव सूना होता जा रहा था। कुछ मकान तो खाली पड़े हुए थे।

(ग) दिन के समय लोग काँखते-कूँखते-कराहते हुए अपने घरों से बाहर निकलकर अपने पड़ोसियों और सगे-संबंधियों को सांत्वना देते थे। इससे उनके चेहरे पर प्रभा रहती थी।

(घ) लोग अपने पड़ोसियों तथा रिश्तेदारों को ढांढस बंधाते हुए कहते थे कि-अरी बहू! अब रोने का क्या लाभ है? जो इस संसार से चला गया, वह अब लौटकर आने वाला नहीं है। यूँ समझ लो कि वह तुम्हारा था ही नहीं। जो इस समय तुम्हारे पास जिंदा है, उसकी देखभाल करो।

[11] रात्रि की विभीषिका को सिर्फ पहलवान की ढोलक ही ललकारकर चुनौती देती रहती थी। पहलवान संध्या से सुबह तक, चाहे जिस ख्याल से ढोलक बजाता हो, किंतु गाँव के अर्द्धमृत, औषधि उपचार-पथ्य-विहीन प्राणियों में वह संजीवनी शक्ति ही भरती थी। बूढ़े-बच्चे-जवानों की शक्तिहीन आँखों के आगे दंगल का दृश्य नाचने लगता था। स्पंदन-शक्ति-शून्य स्नायुओं में भी बिजली दौड़ जाती थी। अवश्य ही ढोलक की आवाज़ में न तो बुखार हटाने का कोई गुण था और न महामारी की सर्वनाश शक्ति को रोकने की शक्ति ही, पर इसमें संदेह नहीं कि मरते हुए प्राणियों को आँख मूंदते समय कोई तकलीफ नहीं होती थी, मृत्यु से वे डरते नहीं थे। [पृष्ठ-115]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके कहानीकार आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। लेखक ने असंख्य उपन्यासों, कहानियों, संस्मरणों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रस्तुत कहानी में लेखक ने आंचलिक जन-जीवन तथा लोक-संस्कृति का सजीव वर्णन किया है तथा पहलवानी को एक कला के रूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि रात की भयानकता में पहलवान की ढोलक की आवाज़ आधे मरे हुए तथा दवाई-इलाज से रहित लोगों को संजीवनी शक्ति प्रदान करती थी। इसी स्थिति का वर्णन करते हुए लेखक कहता
है

व्याख्या-मलेरिया और हैजे के कारण गाँव में निरंतर लोगों की मृत्यु हो रही थी। चारों ओर विनाश फैला हुआ था। दिन की अपेक्षा रात अधिक भयानक होती थी, परंतु पहलवान की ढोलक की आवाज़ इस भयानकता का सामना करती थी। लुट्टन पहलवान शाम से लेकर सवेरे तक, चाहे किसी भी विचार से ढोलक बजाता था, परंतु गाँव के मृतःप्राय तथा औषधि और इलाज रहित लोगों के लिए यह संजीवनी का काम करती थी अर्थात् ढोलक की आवाज़ बीमार तथा लाचार प्राणियों को थोड़ी-बहुत शक्ति देती थी। गाँव के बूढ़े-बच्चों एवं जवानों में निराशा छाई हुई थी, परंतु ढोलक की आवाज़ सुनकर उनकी आँखों के सामने दंगल का नज़ारा नाच उठता था। लोगों के शरीर की नाड़ियों में जो धड़कन और ताकत समाप्त हो चुकी थी ढोलक की आवाज़ सुनते ही मानों उनके शरीर में बिजली दौड़ जाती हो। इतना निश्चित है कि ढोलक की आवाज़ में ऐसा कोई गुण नहीं है जो मलेरिया के बुखार को दूर कर सके और न ही कोई ऐसी ताकत है जो महामारी से उत्पन्न विनाश की ताकत को रोक सकती थी। परंतु यह भी निधि कि ढोलक की आवाज़ सुनकर मरने वाले लोगों को कष्ट नहीं होता था और न ही वे मौत से डरते थे। भाव यह है कि ढोलक की आवाज़ सुनकर गाँव के अधमरे और मृतःप्राय लोग मृत्यु का आलिंगन कर लेते थे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने रात की भयानकता का यथार्थ वर्णन किया है जिसके कारण लोग महामारी का शिकार बन रहे थे, परंतु ढोलक की आवाज़ उनके लिए संजीवनी शक्ति के समान थी।
  2. सहज, सरल, तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सटीक तथा भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) रात की विभीषिका से लेखक का क्या अभिप्राय है?
(ख) रात की विभीषिका में कौन लोगों को सहारा देता था?
(ग) पहलवान की ढोलक की आवाज़ का लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता था?
(घ) ढोलक की आवाज़ किन लोगों में संजीवनी का काम करती थी?
उत्तर:
(क) रात की विभीषिका से लेखक का अभिप्राय महामारी से उत्पन्न विनाश से है। प्रतिदिन न जाने कितने लोग बीमारी के शिकार बन जाते थे। महामारी की चपेट में आ जाते थे। घर-के-घर खाली होते जा रहे थे। हर रोज़ घरों से दो-चार शव निकाले जाते थे।

(ख) रात की भयानकता के कारण लोगों में मौत का डर समाया रहता था, परंतु पहलवान की ढोलक की आवाज़ गाँव के सभी लोगों को सहारा देती थी। चाहे बीमार लोगों को कोई औषधि न मिलती हो, परंतु उन्हें उत्साह अवश्य मिलता था।

(ग) पहलवान की ढोलक की आवाज़ सुनकर लोगों के निराश तथा मरे हुए मनों में भी उत्साह की लहरें उत्पन्न हो जाती थीं। उनकी आँखों के सामने दंगल का नजारा नाचने लगता था और वे मरते समय मृत्यु से डरते नहीं थे।

(घ) ढोलक की आवाज़ गाँव के अधमरे, औषधि, उपचार तथा पथ्यहीन प्राणियों में संजीवनी का काम करती थी।

[12] उस दिन पहलवान ने राजा श्यामानंद की दी हुई रेशमी जाँघिया पहन ली। सारे शरीर में मिट्टी मलकर थोड़ी कसरत की, फिर दोनों पुत्रों को कंधों पर लादकर नदी में बहा आया। लोगों ने सुना तो दंग रह गए। कितनों की हिम्मत टूट गई। किंत, रात में फिर पहलवान की ढोलक की आवाज़, प्रतिदिन की भाँति सुनाई पड़ी। लोगों की हिम्मत दुगुनी बढ़ गई। संतप्त पिता-माताओं ने कहा-“दोनों पहलवान बेटे मर गए, पर पहलवान की हिम्मत तो देखो, डेढ़ हाथ का कलेजा है!” चार-पाँच दिनों के बाद। एक रात को ढोलक की आवाज़ नहीं सुनाई पड़ी। ढोलक नहीं बोली। पहलवान के कुछ दिलेर, किंतु रुग्ण शिष्यों ने प्रातःकाल जाकर देखा-पहलवान की लाश ‘चित’ पड़ी है। [पृष्ठ-115]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘पहलवान की ढोलक’ से उद्धृत है। इसके कहानीकार आँचलिक कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु हैं। लेखक ने असंख्य उपन्यासों, कहानियों, संस्मरणों द्वारा हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है। प्रस्तुत कहानी में लेखक ने आँचलिक जन-जीवन तथा लोक-संस्कृति का सजीव वर्णन किया है तथा पहलवानी को एक कला के रूप में प्रस्तुत किया है। यहाँ लेखक ने लुट्टन सिंह पहलवान के आखिरी क्षणों का संवेदनशील वर्णन किया है

व्याख्या-लुट्टन सिंह पहलवान के दोनों बेटे भी महामारी का शिकार बन गए, परंतु पहलवान के चेहरे पर कोई दुख का भाव नहीं था। उस दिन उसने राजा श्यामानंद द्वारा दिया गया रेशमी जाँघिया पहना और सारे शरीर पर मिट्टी मली। तत्पश्चात् उसने खूब व्यायाम किया और दोनों बेटों की लाशों को अपने कँधों पर लादकर पास की नदी में प्रवाहित कर दिया। जब लोगों ने इस समाचार को सुना तो सभी हैरान रह गए। कुछ लोगों की तो हिम्मत टूट गई। उनका सोचना था कि दोनों बेटों के मरने के बाद पहलवान निराश हो गया होगा, परंतु ऐसा नहीं हुआ। हर रोज़ की तरह रात के समय पहलवान की ढोलक की आवाज़ सुनाई दे रही थी। इससे निराश लोगों की हिम्मत दोगुनी बढ़ गई। दुखी पिता और माताओं ने यह कहा कि भले ही लुट्टन पहलवान के दोनों बेटे मर गए हैं, परंतु उसमें बड़ी हिम्मत और हौंसला है। उसका दिल बड़ा मज़बूत है। ऐसा दिल आम लोगों के पास नहीं होता।

लेकिन चार-पाँच दिन बीतने के बाद एक रात ऐसी आई कि ढोलक की आवाज़ बंद हो गई। ढोलक की आवाज़ सुनाई नहीं दी। सुबह पहलवान के कुछ उत्साही और बीमार शिष्यों ने जाकर देखा तो पहलवान की लाश ज़मीन पर चित्त पड़ी है अर्थात् उसकी लाश पीठ के बल पड़ी है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने लुट्टन पहलवान तथा उसके दोनों बेटों की मृत्यु का संवेदनशील वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक तथा संवादात्मक शैलियों का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लुट्टन पहलवान ने अपने दोनों बेटों के शवों को किस प्रकार दफनाया?
(ख) लोग पहलवान की किस बात पर हैरान थे?
(ग) किस घटना से लोगों की हिम्मत टूट गई?
(घ) पहलवान की ढोलक बजनी क्यों बंद हो गई?
(ङ) पहलवान की मौत का कैसे पता चला?
(च) मौत के बारे में पहलवान की क्या इच्छा थी और क्यों?
उत्तर:
(क) लुट्टन पहलवान ने राजा श्यामानंद का दिया हुआ रेशमी जाँघिया पहना। फिर शरीर पर मिट्टी रगड़कर खूब व्यायाम किया और अपने दोनों बेटों के शवों को कंधों पर लादकर नदी में प्रवाहित कर आया।

(ख) लोग पहलवान की हिम्मत के कारण हैरान थे। पिता होते हुए भी वह अपने बेटों की मौत पर नहीं रोया। मरते दम तक वह ढोल बजाता रहा। यही नहीं, अपने बेटों को बीमारी से लड़ने के लिए उत्साहित करता रहा। उनकी मृत्यु होने पर वह उन दोनों की लाशों को अपने कंधों पर लादकर नदी में प्रवाहित कर आया।

(ग) लोगों ने देखा कि उन सबका उत्साह बढ़ाने वाले पहलवान के दोनों बेटे मर गए हैं और वह उनकी लाशों को अपने कंधों पर लादकर नदी में प्रवाहित कर आया था। इस घटना से लोगों की हिम्मत टूट गई थी। वे यह समझने लगे कि अब तो पहलवान बहुत ही निराश हो गया है। अतः वह अब ढोल नहीं बजाएगा।

(घ) पहलवान ने अपने आखिरी दम तक ढोलक को बजाना जारी रखा। उसकी मृत्यु होने के बाद ही ढोलक बजनी बंद हो गई। (ङ) जब ढोलक का बजना बंद हो गया तो लोगों ने समझ लिया कि अब पहलवान भी संसार से विदा हो चुका है।

(च) मौत के बारे में पहलवान की यह इच्छा थी कि उसके शव को चिता पर चित्त न लिटाया जाए क्योंकि वह जीवन में कभी भी किसी से चित्त नहीं हुआ था। इसलिए उसने अपने शिष्यों को कह रखा था कि उसके शव को चिता पर पेट के बल लिटाया जाए और मुखाग्नि देते समय ढोलक बजाई जाए।

पहलवान की ढोलक Summary in Hindi

पहलवान की ढोलक लेखक-परिचय

प्रश्न-फणीश्वर नाथ रेणु का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री फणीश्वर नाथ रेणु हिंदी साहित्य में एक आंचलिक कथाकारक के रूप में प्रसिद्ध हैं। उनका जन्म 4 मार्च, 1921 को बिहार के पूर्णिया (अब अररिया) जनपद के औराही हिंगना नामक गाँव में हुआ। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गाँव में ही प्राप्त की। बाद में रेणु जी ने फर्बिसगंज, विराटनगर, नेपाल तथा हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी से शिक्षा प्राप्त की। राजनीति में उनकी सक्रिय भागीदारी थी और वे आजीवन दमन तथा शोषण के विरुद्ध संघर्ष करते रहे। सन् 1942 में रेणु ने स्वाधीनता संग्राम में भाग लिया और तीन वर्ष तक नज़रबंद रहे। जेल से छूटने के बाद उन्होंने ‘किसान आंदोलन’ का नेतृत्व किया। यही नहीं, उन्होंने नेपाल की राणाशाही के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष भी किया, लेकिन 1953 में साहित्य-सृजन में जुट गए। राजनीतिक आंदोलन से उनका गहरा जुड़ाव रहा। पुलिस तथा प्रशासन का दमन सहते हुए वे साहित्य-सृजन में जुटे रहे। सत्ता के दमन चक्र का विरोध करते हुए उन्होंने राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मश्री’ की उपाधि का भी त्याग कर दिया। 11 अप्रैल, 1977 को इस महान् आँचलिक रचनाकार का निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-रेणु जी मूलतः कथाकार हैं, लेकिन उन्होंने कुछ संस्मरण तथा रिपोर्ताज भी लिखे हैं।

  • उपन्यास ‘मैला आँचल’ (1954), ‘परती परिकथा’ (1957), ‘दीर्घतपा’ (1963), ‘जुलूस’ (1965), ‘कितने चौराहे’ (1966), ‘पलटू बाबूरोड’ ‘मरणोपरांत’ (1979)।
  • कहानी-संग्रह ‘ठुमरी’ (1957) ‘अग्निखोर’, ‘आदिम रात्रि की महक’, ‘एक श्रावणी दोपहरी की धूप’, ‘तीसरी कसम’।
  • संस्मरण-‘ऋण जल धन जल’, ‘वन तुलसी की गंध’, ‘श्रुत-अश्रुत पूर्व’।।
  • रिपोर्ताज-‘नेपाली क्रांति कथा’, ‘पटना की बाढ़’।

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3. साहित्यिक विशेषताएँ-फणीश्वर नाथ रेणु को अपने पहले उपन्यास ‘मैला आँचल’ से विशेष ख्याति मिली। इसकी कथा भूमि उत्तरी-बिहार के पूर्णिया अँचल की है। इसके बाद लेखक ने प्रायः आँचलिक उपन्यासों तथा कहानियों उन्होंने बिहार के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक चेतना का बड़ी बारीकी से चित्रण किया है। उनका साहित्य आँचलिक प्रदेश की लोक संस्कृति तथा लोक विश्वासों और लोगों के जीवन-क्रम पर पड़ने वाले प्रभावों को बड़ी आत्मीयता से उकेरता है। वस्तुतः मैला आँचल के प्रकाशन के शीघ्र बाद उन्हें रातों-रात एक महान साहित्यकार की उपाधि प्राप्त हो गई। जहाँ अन्य साहित्यकार स्वतंत्रता प्राप्ति को आधार बनाकर साहित्य की रचना करने लगे, वहाँ रेणु ने अपनी रचनाओं के द्वारा अँचल की समस्याओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। ‘पहलवान की ढोलक’ रेणु जी की एक प्रतिनिधि कहानी है, जिसमें लेखक ने ग्रामीण अंचल की संस्कृति को बड़ी सजीवता के साथ अंकित किया है। उनके संपूर्ण कथा साहित्य में कथावस्तु, पात्रों का चरित्र-चित्रण, देशकाल, कथोपकथन, भाषा-शैली तथा उद्देश्य की दृष्टि से सर्वत्र आँचलिकता का ही आभास होता है। वे सच्चे अर्थों में आंचलिक कथाकार कहे जा सकते हैं।

4. भाषा-शैली-रेणु जी ने अपनी रचनाओं में प्रायः आँचलिक भाषा का ही प्रयोग किया है। भले ही उनकी रचनाओं की भाषा हिंदी है, परंतु उसमें यत्र-तत्र आँचलिक शब्दों का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। लेखक ने अपनी प्रत्येक रचना में सहज एवं सरल, हिंदी भाषा का प्रयोग करते समय तत्सम, तद्भव तथा आँचलिक शब्दों का सुंदर मिश्रण किया है। कहीं-कहीं वे अंग्रेज़ी शब्दों का देशीकरण भी कर लेते हैं और कहीं-कहीं मैनेजर, क्लीन-शेव्ड, होरीबुल, टैरिबुल आदि अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करने से भी नहीं चूकते। उनकी रचनाएँ विशिष्ट भाषा प्रयोग के लिए प्रसिद्ध हैं।

एक उदाहरण देखिए-“लुट्टन पहलवान ने चाँद सिंह को ध्यान से देखा फिर बाज़ की तरह उस पर टूट पड़ा। देखते-ही-देखते पासा पलटा और चाँद सिंह चाहकर भी जीत न सका। राजा साहब की स्नेह दृष्टि लुट्टन पर पड़ी, बस फिर क्या था, उसकी प्रसिद्धि में चार चाँद लग गए। जीवन सुख से कटने लगा। पर दो पहलवान पुत्रों को जन्म देकर उसकी स्त्री चल बसी।”

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि फणीश्वर नाथ रेणु की साहित्यिक रचनाएँ कथ्य तथा शिल्प दोनों दृष्टियों से उच्च कोटि की आँचलिक रचनाएँ हैं। उन्होंने बिहार के जन-जीवन का जो यथार्थपरक वर्णन किया है, वह बेमिसाल बन पड़ा है। वे प्रायः वर्णनात्मक, विवेचनात्मक, मनोविश्लेषणात्मक, प्रतीकात्मक तथा संवादात्मक शैलियों का सफल प्रयोग करते हैं।

पहलवान की ढोलक पाठ का सार

प्रश्न-
फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा रचित ‘पहलवान की ढोलक’ नामक कहानी का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
फणीश्वर नाथ रेणु एक आंचलिक कथाकार हैं। उन्होंने ग्रामीण जन-जीवन से संबंधित अनेक कहानियाँ लिखी हैं। ‘पहलवान की ढोलक’ उनकी एक महत्त्वपूर्ण कहानी है जिसमें उन्होंने लुट्टन नामक पहलवान की जीने की इच्छा और उसकी हिम्मत का यथार्थ वर्णन किया है।
1. गाँव में मलेरिया और हैजे का प्रकोप-गाँवों में हैजा और मलेरिया बुरी तरह से फैल चुका था। रात का घना काला अंधकार और भयानक सन्नाटा छाया हुआ था। भले ही यह अमावस्या की काली रात थी, लेकिन आकाश में तारे चमक रहे थे। पास ही जंगल से गीदड़ों और उल्लुओं की डरावनी आवाजें सुनाई दे रही थीं। उनकी आवाज़ों से रात का सन्नाटा भंग हो रहा था। गाँव की झोंपड़ियों में लेटे हुए मरीज ‘हरे राम’! हे भगवान। कह कर ईश्वर की सहायता माँग रहे थे, बच्चे अपने निर्बल कंठों से ‘माँ-माँ’ कहते हुए रो रहे थे। भयंकर सर्दी में कुत्ते राख की ढेरियों पर अपने शरीर सिकोड़कर लेटे हुए थे। जब कुत्ते सर्दी के मारे रोने लगते थे तो उस वातावरण में भयानकता व्याप्त हो जाती थी। रात्रि का यह वातावरण बड़ा भयावह लग रहा था। लेकिन लुट्टन पहलवान की ढोलक निरंतर बज रही थी। चाहे दिन हो या रात हो, उसकी ढोलक निरंतर बजती रहती थी-‘चट्-धा, गिड़-धा…. चट्-धा, गिड़-धा!’ अर्थात् ‘आ जा भिड़ जा, आ जा, भिड़ जा!’… बीच-बीच में ‘चटाक्-चट्-धा!’ यानी उठाकर पटक दे! उठाकर पटक दे!’ इस प्रकार लुट्टन पहलवान के ढोलक की थाप गाँव के लोगों में संजीवनी भर देती थी। इसी ढोलक की आवाज़ के सहारे लोग रात के जाड़े को काट लेते थे। पूरे जिले में लुट्टन पहलवान काफी प्रसिद्ध था।

2. बाल्यावस्था में लुट्टन का विवाह लुट्टन की शादी बचपन में ही हो गई थी। नौ वर्ष का होते-होते उसके माता-पिता का देहांत हो गया। सास ने ही उसका पालन-पोषण किया। वह अकसर गाय चराने जाता था, ताजा दूध पीता था और खूब व्यायाम करता था, परंतु गाँव के लोग उसकी सास को तकलीफ पहुँचाते रहते थे। इसी कारण वह पहलवान बन गया और कुश्ती लड़ने लगा। धीरे-धीरे वह आसपास के गाँवों में नामी पहलवान बन गया था, परंतु उसकी कश्ती ढोल की आवाज के साथ जुड़ी हुई थी।

3. श्यामनगर के दंगल का आयोजन एक बार श्यामनगर में दंगल का आयोजन हुआ। लुट्टन भी दंगल देखने गया। इस दंगल में चाँद सिंह नामक पहलवान अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ आया था। उसने लगभग सभी पहलवानों को हरा दिया, जिससे उसे “शेर के बच्चे” की उपाधि मिली। किसी पहलवान में यह हिम्मत नहीं थी कि वह उसका सामना करता। श्यामनगर के राजा चाँद सिंह को अपने दरबार मे रखने की सोच ही रहे थे कि इसी बीच लुट्टन ने चाँद सिंह को चुनौती दे डाली। लुट्टन ने अखाड़े में अपने लंगोट लगाकर किलकारी भरी। लोगों ने उसे पागल समझा। कुश्ती शुरू होते ही चाँद सिंह लुट्टन पहलवान पर बाज की तरह टूट पड़ा। यह देखकर राजा साहब ने कुश्ती रुकवा दी और लुट्टन को समझाया कि वह चाँद सिंह से कुश्ती न लड़े। लेकिन लुट्टन ने राजा साहब से कुश्ती लड़ने की आज्ञा माँगी। इधर राजा साहब के मैनेजर और सिपाहियों ने भी उसे बहुत समझाया, लेकिन लुट्टन ने कहा कि यदि राजा साहब उसे लड़ने की अनुमति नहीं देंगे तो वह पत्थर पर अपना सिर मार-मार मर जाएगा। भीड़ काफी बेचैन हो रही थी। पंजाबी पहलवान लुट्टन को गालियाँ दे रहे थे और चाँद सिंह मुस्कुरा रहा था, परंतु कुछ लोग चाहते थे कि लुट्टन को कुश्ती लड़ने का मौका मिलना चाहिए। आखिर मजबूर होकर राजा साहब ने लुट्टन को कुश्ती लड़ने की आज्ञा दे दी।

4. लट्टन और चाँद सिंह की कुश्ती-ज़ोर-ज़ोर से बाजे बजने लगे। लुट्टन का अपना ढोल भी बज रहा था। अचानक चाँद सिंह ने लुट्टन पर हमला किया और उसे कसकर दबा लिया। उसने लुट्टन की गर्दन पर कोहनी डालकर उसे चित्त करने की कोशिश की। दर्शक चाँद सिंह को उत्साहित कर रहे थे। उसका गुरु बादल सिंह भी चाँद सिंह को गुर बता रहा था। ऐसा लग रहा था कि लुट्टन की आँखें बाहर निकल आएँगी। उसकी छाती फटने को हो रही थी। सभी यह सोच रहे थे कि लुट्टन हार जाएगा। केवल ढोल की आवाज़ की ताल ही एक ऐसी शक्ति थी जो लुट्टन को हिम्मत दे रही थी।

5. लुट्टन की विजय-ढोल ने “धाक धिना”, “तिरकट तिना” की आवाज़ दोहराई। लुट्टन ने इसका अर्थ यह लगाया कि चाँद सिंह के दाँव को काटकर बाहर निकल जा। सचमुच लुट्टन बाहर निकल गया और उसने चाँद सिंह की गर्दन पर कब्जा कर लिया। ढोल ने अगली आवाज़ निकाली “चटाक् चट् धा” अर्थात् उठाकर पटक दे और लुट्टन ने चाँद सिंह को उठाकर धरती पर दे मारा। अब ढोलक ने “धिना-धिना धिक धिना” की आवाज़ निकाली। जिसका यह अर्थ था कि लुट्टन ने चाँद सिंह को चारों खाने चित्त लक ने “धा-गिड-गिड” वाह बहादर की ध्वनि निकाली। लट्टन जीत गया था। लोग माँ दुर्गा, महावीर तथा राजा श्यामानंद की जय-जयकार करने लग गए। लुट्टन ने श्रद्धापूर्वक ढोल को प्रणाम किया और फिर राजा साहब को गोद में उठा लिया। राजा साहब ने लुट्टन को शाबाशी दी और उसे हमेशा के लिए अपने दरबार में रख लिया।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 14 पहलवान की ढोलक

6. राज-दरबार में लुट्टन का काल-पंजाबी पहलवान चाँद सिंह के आँसू पोंछने लगे। बाद में राज-पंडित तथा क्षत्रिय मैनेजर ने नियुक्ति का विरोध भी किया। उनका कहना था कि राज-दरबार में केवल क्षत्रिय पहलवान की ही नियुक्ति होनी चाहिए, परंतु राजा साहब ने उनका समर्थन नहीं किया। शीघ्र ही राज्य की ओर से लुट्टन के लिए सारी व्यवस्था कर दी गई। कुछ दिनों में लुट्टन ने आसपास के सभी पहलवानों को पराजित कर दिया। यहाँ तक कि काले खाँ पहलवान भी लुट्टन से हार गया। राज-दरबार का आसरा मिलने के बाद लुट्टन घुटने तक लंबा चोगा पहने अस्त-व्यस्त पगड़ी पहने हुए मेलों में हाथी की चाल चलते हुए घूमता था। हलवाई के कहने पर वह दो सेर, रसगुल्ले खा जाता था। यहाँ तक कि आठ दस पान एक-ही बार मुँह में रखकर चबा जाता था, परंतु उसके शौक बच्चों जैसे थे। वह आँखों पर रंगीन चश्मा लगाता था। हाथ में खिलौने नचाता था और मुँह से पीतल की सीटी बजाता था।

7. लुट्टन का प्रभाव-लुट्टन हर समय हँसता रहता था। दंगल में कोई भी उससे कुश्ती करने की हिम्मत नहीं करता था। यदि कोई उससे कुश्ती करना भी चाहता तो राजा साहब उसे अनुमति नहीं देते थे। इस प्रकार राजदरबार में रहते हुए लुट्टन ने पंद्रह वर्ष व्यतीत कर दिए। लुट्टन की सास और पत्नी दोनों मर चुके थे। उसके दो बेटे थे। वे दोनों अच्छे पहलवान थे। लोग कहते थे कि ये दोनों लड़के बाप से भी अच्छे पहलवान निकलेंगे। शीघ्र ही दोनों को राजदरबार के भावी पहलवान घोषित कर दिया गया। तीनों का भरण-पोषण राजदरबार की तरफ से हो रहा था। लुट्टन अपने लड़कों से कहा करता था कि मेरा गुरु कोई मनुष्य न होकर, ढोल है। मैं इसे ही प्रणाम करके अखाड़े में उतरता हूँ। तुम दोनों भी इसी को प्रणाम करके अखाड़े में उतरना। शीघ्र ही उसने अपने बेटों को पहलवानी के सारे गुर सिखा दिए।

8. राजा साहब की मृत्यु और लुट्टन का बेटों सहित गाँव लौटना अचानक राजा साहब का स्वर्गवास हो गया। नया राजकुमार विलायत से पढ़कर लौटा था। शीघ्र ही उसने राजकाज को सँभाल लिया। उसने राज प्रशासन को सुव्यवस्थित करने के लिए अनेक प्रयत्न किए जिससे लुट्टन और उसके बेटों की छुट्टी कर दी गई। लुट्टन अपने बेटों को साथ लेकर और ढोल कंधे पर रखकर गाँव लौट आया। गाँव के लोगों ने उनके लिए एक झोंपड़ी बना दी। जहाँ लुट्टन गाँव के नौजवानों और ग्वालों को कुश्ती की शिक्षा देने लगा। खाने-पीने का खर्च भी गाँव वाले उठा रहे थे, परंतु यह व्यवस्था अधिक दिन तक नहीं चल पाई। गाँव के सभी नौजवानों ने अखाड़े में आना बंद कर दिया। अब लुट्टन केवल अपने दोनों लड़कों को ही कुश्ती के गुर सिखा रहा था।

9. लुट्टन के जीवन तथा परिवार का अंत-अचानक गाँव पर भयानक संकट आ गया। पहले तो गाँव में सूखा पड़ गया, जिससे गाँव में अनाज की भारी कमी हो गई। शीघ्र ही मलेरिया और हैजे का प्रकोप फैल गया। गाँव में एक के बाद एक घर उजड़ने लगे। प्रतिदिन दो-तीन मौतें हो जाती थीं। लोग रोते हुए एक-दूसरे को सांत्वना देते थे। दिन छिपते ही लोग अपने घरों में छिप जाते थे। चारों ओर मातम छाया रहता था। केवल पहलवान की ढोलक बजती रहती थी। गाँव के बीमार कमजोर तथा अधमरे लोगों के लिए ढोलक की आवाज़ संजीवनी शक्ति का काम कर रही थी।

एक दिन तो पहलवान पर भी वज्रपात हो गया। उसके दोनों बेटे भी मृत्यु का ग्रास बन गए। लुट्टन ने लंबी साँस लेते हुए यह कहा कि “दोनों बहादुर गिर पड़े।” उस दिन लुट्टन ने राजा साहब द्वारा दिया रेशमी जांघिया पहना और शरीर पर मिट्टी मलकर खूब कसरत की। फिर वह दोनों बेटों को कंधे पर लादकर नदी में प्रवाहित कर आया। यह घटना देखकर गाँव वालों के भी हौंसले पस्त हो गए। चार-पाँच दिन बाद एक रात को ढोलक की आवाज बंद हो गई। लोग समझ गए कि कोई अनहोनी हो गई है। सुबह होने पर शिष्यों ने झोंपड़ी में जाकर देखा कि लुट्टन पहलवान की लाश चित्त पड़ी थी। शिष्यों ने गाँव वालों को बताया कि उनके गुरु लुट्टन ने यह इच्छा प्रकट की थी कि उसके शव को चिता पर पेट के बल लिटाया जाए क्योंकि वह जिंदगी में कभी चित नहीं हुआ और चिता को आग लगाने के बाद ढोल बजाया जाए। गाँव वालों ने ऐसा ही किया।

कठिन शब्दों के अर्थ

अमावस्या = चाँद रहित अंधेरी रात। मलेरिया = एक रोग जो मच्छरों के काटने से फैलता है। हैजा = प्रदूषित पानी से फैलने वाला रोग। भयार्त्त = भय से व्याकुल। शिशु = छोटा बच्चा। सन्नाटा = चुप्पी। निस्तब्धता = चुप्पी, मौन। चेष्टा = कोशिश। भावुक = कोमल मन वाला व्यक्ति। ज्योति = प्रकाश। शेष होना = समाप्त होना। क्रंदन = चीख-पुकार। पेचक = उल्लू । कै करना = उल्टी करना। मन मारना = थक कर हार जाना। टेर = पुकार । निर्बल = कमज़ोर। कंठ = गला। ताड़ना = भाँपना। घूरा = गंदगी का ढेर। संध्या = सांझ। भीषणता = भयंकरता। ताल ठोकना = चुनौती देना, ललकारना। मृत = मरा हुआ। संजीवनी = प्राण देने वाली बूटी। होल इंडिया = संपूर्ण भारत । अनाथ = बेसहारा। अनुसरण करना = पीछे-पीछे चलना। धारोष्ण = गाय-भैंस के थनों से निकलने वाला ताजा दूध । नियमित = हर रोज। सुडौल = मज़बूत। दाँव-पेंच = कुश्ती लड़ने की युक्तियाँ। बिजली उत्पन्न करना = तेज़ी उत्पन्न करना। चुनौती = ललकारना। अंग-प्रत्यंग = प्रत्येक अंग। पट्टा = पहलवान। टायटिल = पदवी। किलकारी = खुशी की आवाज़। दुलकी लगाना = उछलकर छलांग लगाना। किंचित = शायद। स्पर्धा = मुकाबला। पैंतरा = कुश्ती का दांव-पेंच। गोश्त = माँस । अधीर = व्याकुल । जमायत = सभा। उत्तेजित = भड़कना। प्रतिद्वंद्वी = मुकाबला करने वाला। विवश = मजबूर। हलुआ होना = पूरी तरह से कुचला जाना। चित्त करना = पीठ लगाना, हराना। आश्चर्य = हैरानी। जनमत = लोगों का साथ।

चारों खाने चित्त करना = पूरी तरह से हरा देना। सन-जाना = भर जाना। आपत्ति करना = अस्वीकार। गद्गद् होना = प्रसन्न होना। पुरस्कृत करना = इनाम देना। मुँह बिचकाना = घृणा करना। संकुचित = सिकुड़ा हुआ। कीर्ति = यश। पौष्टिक = पुष्ट करने वाला। चार चाँद लगाना = शान बढ़ाना। आसमान दिखाना = हरा देना, चित्त करना। टूट पड़ना = आक्रमण करना। लकवा मारना = पंगु हो जाना। भ्रम दूर करना = संदेह को दूर करना। दर्शनीय = देखने योग्य । अस्त-व्यस्त = बिखरा हुआ। मतवाला = मस्त। चुहल = शरारत। उदरस्थ = पेट में डालना। हुलिया = रूप-सज्जा। अबरख = रंगीन चमकीला कागज़। वृद्धि = बढ़ोतरी। देह = शरीर । अजेय = जो जीता न जा सके। अनायास = अचानक। भरण-पोषण = पालन-पोषण। प्रताप = शक्ति। पानी फिरना = समाप्त होना। विलायत = विदेश। शिथिलता = ढिलाई । चपेटाघाट = लपेट में लेकर प्रहार करना। टैरिबल = भयानक। हौरिबल = अत्यधिक भयंकर। छोर = किनारा । चरवाहा = पशु चराने वाला। अकस्मात = अचानक। वज्रपात होना = वज्र का प्रहार होना, बहुत दुख होना। अनावृष्टि = सूखा पड़ना। कलरव = शोर। हाहाकार = रोना-पीटना। हृदय-विदारक रुदन = दिल को दहलाने वाला रोना। प्रभा = प्रकाश। काँखते-कूँखते = सूखी खाँसी करते हुए। आत्मीय = अपने प्रिय। ढाढ़स देना = तसल्ली देना। विभीषिका = भयानक स्थिति। अर्द्धमृत = आधे मरे हुए। औषधि = दवाई। पथ्य-विहीन = औषधि रहित। संजीवनी शक्ति = जीवन देने वाली ताकत। स्पंदन-शक्ति-शून्य = धड़कन रहित। स्नायु = नसें। आँख मूंदना = मरना। क्रूर काल = कठोर मृत्यु। असह्य वेदना = ऐसी पीड़ा जो सहन न की जा सके। दंग रहना = हैरान होना। हिम्मत टूटना = निराश होना। संतप्त = दुखी। डेढ़ हाथ का कलेजा = बहुत बड़ा कलेजा। रुग्ण = बीमार।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे

HBSE 12th Class Hindi काले मेघा पानी दे Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
लोगों ने लड़कों की टोली को मेढक-मंडली नाम किस आधार पर दिया? यह टोली अपने आपको इंदर सेना कहकर क्यों बुलाती थी?
उत्तर:
गाँव के लोग लड़कों को नंग-धडंग और कीचड़ में लथपथ देखकर बुरा मानते थे। उनका कहना था कि यह पिछड़ापन ढोंग और अंधविश्वास है। ऐसा करने से वर्षा नहीं होती। इसलिए वे उन्हें गालियाँ देते थे और उनसे घृणा करते थे। लोग इस इंदर सेना को मेढक-मंडली कहते थे।

परंतु गाँव के किशोरों की टोली इंद्र देवता से वर्षा की गुहार लगाती थी। बच्चों का कहना था कि भगवान इंद्र वर्षा करने के लिए लोगों से पानी का अर्घ्य माँग रहे हैं। वे तो उनका दूत बनकर लोगों को जल का दान करने की प्रेरणा दे रहे हैं। ऐसा करने से इंद्र देवता वर्षा का दान करेंगे और खूब वर्षा होगी।

प्रश्न 2.
जीजी ने इंदर सेना पर पानी फेंके जाने को किस तरह सही ठहराया?
उत्तर:
जीजी का कहना था कि देवता से कुछ पाने के लिए हमें कुछ दान और त्याग करना पड़ता है। किसान भी तीस-चालीस मन अनाज पाने के लिए पहले पाँच-छः सेर गेहूँ की बुवाई करता है। तब कहीं उसका खेत हरा-भरा होकर लहराता है। इंदर सेना लोगों को यह प्रेरणा देती है कि वे इंद्र देवता को अर्घ्य चढ़ाएँ। यदि लोग भगवान इंद्र को पानी का दान करेंगे तो वे भी झमाझम वर्षा करेंगे। अतः इंदर सेना एक प्रकार से वर्षा की बुवाई कर रही है। हमें इस परंपरा का पालन करना चाहिए।

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प्रश्न 3.
पानी दे, गुड़धानी दे मेघों से पानी के साथ-साथ गुड़धानी की माँग क्यों की जा रही है?
उत्तर:
गुड़धानी का अर्थ है-गुड़ और धान अर्थात् गुड़ और अनाज मिलाकर बनाए गए लड्डु। इंदर सेना के किशोर इंद्र देवता से पानी के साथ गुड़धानी भी माँग रहे हैं। बच्चों को पीने के लिए पानी और खाने के लिए गुड़धानी चाहिए। यह सब बादलों पर निर्भर करता है। यदि बादल बरसेंगे तो खेतों में गन्ना और अनाज खूब पैदा होंगे। इस प्रकार इंद्र देवता ही हमें गुड़धानी देने वाला देवता है। इसलिए बच्चे पानी के साथ-साथ गुड़धानी की माँग करते हैं।

प्रश्न 4.
गगरी फूटी बैल पियासा इंदर सेना के इस खेलगीत में बैलों के प्यासा रहने की बात क्यों मुखरित हुई है?
उत्तर:
बैल भारतीय कृषि व्यवस्था की रीढ़ की हड्डी कहे जाते हैं। वे हमारे खेतों को जोतते हैं और अन्न पैदा करते हैं। किसान उन्हीं पर निर्भर हैं। यदि वे प्यासे रहेंगे तो हमारी फसलें नष्ट हो सकती हैं। सांकेतिक रूप में लेखक यही कहना चाहता है कि वर्षा न होने से हमारे खेत सूख रहे हैं और खेती के आधार कहे जाने वाले बैल प्यास से मर रहे हैं। वर्षा होने से हमारे खेत भी बच जाएँगे और बैल भी भूखे-प्यासे नहीं रहेंगे।

प्रश्न 5.
इंदर सेना सबसे पहले गंगा मैया की जय क्यों बोलती है? नदियों का भारतीय सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
इंदर सेना सबसे पहले गंगा मैया की जय इसलिए बोलती है क्योंकि गंगा भारत की पवित्र नदी है। यह भारत के अधिकांश भाग को जल और अन्न प्रदान करती है। लोग इसकी मां के समान पूजा करते हैं। भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक तथा धार्मिक परिवेश में इसका विशेष महत्त्व है। यमुना, गोदावरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र आदि नदियाँ भी हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश से जुड़ी हुई हैं। प्राचीनकाल से भारत के बड़े-बड़े नगर इन्हीं नदियों के किनारे बसे हुए थे। इन्हीं नदियों के कारण हमारे समाज और सामाजिकता का विकास हुआ। अब भी लोग नदियों को प्रणाम करते हैं और अनेक पर्यों पर नदियों में स्नान करते हैं। हमारे अनेक पावन नगर; जैसे हरिद्वार, ऋषिकेश, काशी आदि गंगा नदी के किनारे बसे हुए हैं। जब भी हम अपनी संस्कृति का गान करते हैं तब गंगा, यमुना, कावेरी, कृष्णा, ब्रह्मपुत्र आदि नदियों के नाम अवश्य लेते हैं।

प्रश्न 6.
रिश्तों में हमारी भावना-शक्ति का बँट जाना विश्वासों के जंगल में सत्य की राह खोजती हमारी बुद्धि की शक्ति को कमजोर करती है। पाठ में जीजी के प्रति लेखक की भावना के संदर्भ में इस कथन के औचित्य की समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
भावना की शक्ति मानव के लिए अत्यधिक उपयोगी है। इससे मनुष्य को स्नेह की जो खुराक मिलती है, वह जीवन के लिए अत्यधिक उपयोगी है जो बच्चा भावनात्मक रूप से सुरक्षित रहता है, वह हमेशा प्रसन्न रहता है और विकास की ओर अग्रसर होता है। यही नहीं, इससे मानव का बौद्धिक और शारीरिक विकास भी होता है। बौद्धिक विकास के कारण ही लेखक कुमार-सुधार सभा का उपमंत्री बना। लेकिन इस स्थिति में पहुँचकर अनुचित तथा उचित के विवेक का सहारा लेता है, लेकिन जीजी ने तर्कनिष्ठ लेखक को यह अहसास कराने का प्रयास किया कि तर्क और परिणाम ही सब कुछ नहीं होता। भावनात्मक सत्य का अपना महत्त्व होता है। भावनाएँ सूक्ष्म होती हैं और उनके परिणाम भी सूक्ष्म होते हैं। जीजी की आस्था और भावुकता ने लेखक को एक नए तथ्य की जानकारी दी। लेखक के सारे तर्क हार गए और उसे यह अनुभव हुआ कि भावनाओं और तर्कों में समन्वय आवश्यक है। यह तभी होगा जब मनुष्य तर्क शक्ति के साथ-साथ भावनाओं का भी ध्यान रखेगा।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
क्या इंदर सेना आज के युवा वर्ग का प्रेरणास्रोत हो सकती है? क्या आपके स्मृति-कोश में ऐसा कोई अनुभव है जब युवाओं ने संगठित होकर समाजोपयोगी रचनात्मक कार्य किया हो, उल्लेख करें।
उत्तर:
इंदर सेना आज के युवा वर्ग के लिए प्रेरणा-स्रोत का काम कर सकती है। इंदर सेना के प्रयास को हमें अंधविश्वास नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह रचनात्मक कार्य के लिए किया गया सामूहिक प्रयास है। सामूहिक प्रयास ही जन-शक्ति का प्रतीक है। इसी के कारण हमारे देश में बड़े-बड़े आंदोलन चले। जो युवक बादलों को वर्षा करने के लिए मजबूर कर सकते हैं, वे समाज की असंख्य समस्याओं का भी समाधान कर सकते हैं। यदि युवा शक्ति को किसी रचनात्मक आंदोलन से जोड़ दिया जाए तो देश की तस्वीर बदल सकती है। सन् 1975 में कांग्रेस ने देश में आपातकालीन की घोषणा की थी तब जयप्रकाश ने युवकों को संगठित करके जन आंदोलन चलाया था। इसी प्रकार महात्मा गाँधी ने भी युवकों का सहयोग लेकर सत्य का आंदोलन चलाया तत्पश्चात् हमारा देश आज़ाद हुआ।

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प्रश्न 2.
तकनीकी विकास के दौर में भी भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर निर्भर है। कृषि-समाज में चैत्र, वैशाख सभी माह बहुत महत्त्वपूर्ण हैं पर आषाढ़ का चढ़ना उनमें उल्लास क्यों भर देता है?
उत्तर:
इस तथ्य से सभी परिचित हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है। आषाढ़ से पहले जेठ मास में भयंकर गर्मी पड़ती है। पशु-पक्षी मानव आदि सभी प्राणी गर्मी के कारण व्याकुल हो उठते हैं। आषाढ़ मास लगते ही पहली बरसात होती है। लोग इस बरसात की बेचैनी से प्रतीक्षा करते हैं। आषाढ़ की वर्षा लोगों को राहत दिलाती है, लेकिन किसानों के लिए यह वर्षा एक वरदान समझी जाती है। वे अपने हल और बैल लेकर खेतों की ओर चल देते हैं। वे फसल उत्पन्न करने की तैयारी करते हैं। सावनी फसल हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है और कृषक समाज में उत्साह भर देती है।

प्रश्न 3.
पाठ के संदर्भ में इसी पुस्तक में दी गई निराला की कविता बादल-राग पर विचार कीजिए और बताइए कि आपके जीवन में बादलों की क्या भूमिका है?
उत्तर:
“बादल राग” निराला जी की एक उल्लेखनीय कविता है। इसमें कवि ने बादल को क्रांति का रूप माना है। कवि बादल का आह्वान करते हुए कहता है कि वह वर्षा करे और गरीब किसानों को शोषण से मुक्त करे। यही नहीं, इस कविता के द्वारा कवि पुरानी जड़ परंपराओं को त्यागकर नव-निर्माण की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

मेरे जीवन में बादलों की विशेष भूमिका रही है, क्योंकि मैं ग्रामीण जन-जीवन से जुड़ा हुआ हूँ। वर्षा हमारे जीवन को आनन्द प्रदान करती है और नीरस जीवन में रस भर देती है। मन करता है कि मैं नगर को छोड़कर फिर से खेतों में चला जाऊँ और हरे-भरे खेत देखकर आनन्द प्राप्त करूँ।

प्रश्न 4.
त्याग तो वह होता…. उसी का फल मिलता है। अपने जीवन के किसी प्रसंग से इस सूक्ति की सार्थकता समझाइए।
उत्तर:
यह सूक्ति हमारे जीवन से संबंधित है। हम विद्या प्राप्त करने के लिए खूब मेहनत करते हैं। अपनी नींद, भूख, इच्छा को त्याग कर खूब पढ़ते हैं। अन्ततः हम अपने इस त्याग का फल प्राप्त करते हैं। मेरे अपने जीवन का एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग है। मैंने थोड़े-थोड़े पैसे जोड़कर एक कंबल खरीदा था। प्रातः की सैर करते समय मैं उस कम्बल को ओढ़ लेता था। एक दिन मैं पार्क में सैर कर रहा था। वहाँ एक गरीब आदमी ठंड से सिकुड़ कर लेटा हुआ था। उसके तन पर पूरे कपड़े भी नहीं थे। अचानक मैंने अपना कम्बल उतारकर उस गरीब व्यक्ति पर डाल दिया। उसने मेरी ओर हैरानी से देखा। मुझे लगा कि वह मुझे आशीर्वाद दे रहा है। घर लौटने पर पिता जी द्वारा पूछने पर मैंने सारी बात उन्हें बता दी। मेरे पिता जी बड़े प्रसन्न हुए और उसी दिन मेरे लिए एक नया गर्म शाल ले आए।

प्रश्न 5.
पानी का संकट वर्तमान स्थिति में भी बहुत गहराया हुआ है। इसी तरह के पर्यावरण से संबद्ध अन्य संकटों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
पानी के संकट के साथ-साथ बिजली का संकट भी बढ़ता जा रहा है। खनिज तेलों और पेट्रोलियम पदार्थों की कमी हमारी अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से जंगल घटते जा रहे हैं और जनसंख्या वृद्धि से गाँव और नगरों का विस्तार होता जा रहा है। इससे ऑक्सीजन की मात्रा घट गई है। उद्योगों की जहरीली गैसों के कारण वायुमंडल की ओजोन परत में जगह-जगह छेद हो गए हैं। यही नहीं कारखाने और फैक्टरियाँ भी गंदे पानी से नदियों को प्रदूषित कर रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा सारे विश्व में मँडरा रहा है।

प्रश्न 6.
आपकी दादी-नानी किस तरह के विश्वासों की बात करती हैं? ऐसी स्थिति में उनके प्रति आपका रवैया क्या होता है? लिखिए।
उत्तर:
मेरी दादी-नानी दोनों का विश्वास है कि गंगा में स्नान करने से मोक्ष मिल जाता है। इसी प्रकार वे पूजा की राख और जली हुई बत्तियों को नदी में बहाने की आज्ञा देती रहती हैं। यही नहीं, वे पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक जलाकर वहाँ खाद्य पदार्थ भी रख आती हैं। मैंने उन्हें समझाने का बहुत प्रयास किया कि ऐसा करने से नदी का जल प्रदूषित हो जाता है और पीपल के आस-पास गंदगी फैलती है, परंतु वे मेरी सलाह को नकार देती हैं। लेकिन ईश्वर में उनके विश्वास का मैं भी समर्थन करता हूँ। विद्यालय जाने से पहले भगवान का थोड़ा भजन कर लेता हूँ।

चर्चा करें

प्रश्न 1.
बादलों से संबंधित अपने-अपने क्षेत्र में प्रचलित गीतों का संकलन करें तथा कक्षा में चर्चा करें।
उत्तर:
अपने विद्यालय के पुस्तकालय से लोक-गीतों की पुस्तक को पढ़ें अथवा अपनी माँ, दादी, नानी या बुआ से पूछकर लोक गीतों का संग्रह कीजिए और कक्षा में अपने सहपाठियों के साथ इन गीतों पर चर्चा कीजिए।

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प्रश्न 2.
पिछले 15-20 सालों में पर्यावरण से छेड़-छाड़ के कारण भी प्रकृति-चक्र में बदलाव आया है, जिसका परिणाम मौसम का असंतुलन है। वर्तमान बाड़मेर (राजस्थान) में आई बाढ़, मुंबई की बाढ़ तथा महाराष्ट्र का भूकंप या फिर सुनामी भी इसी का नतीजा है। इस प्रकार की घटनाओं से जुड़ी सूचनाओं, चित्रों का संकलन कीजिए और एक प्रदर्शनी का आयोजन कीजिए, जिसमें बाज़ार दर्शन पाठ में बनाए गए विज्ञापनों को भी शामिल कर सकते हैं। और हाँ ऐसी स्थितियों से बचाव के उपाय पर पर्यावरण विशेषज्ञों की राय को प्रदर्शनी में मुख्य स्थान देना न भूलें।
उत्तर:
शिक्षक की सहायता से विद्यार्थी स्वयं करें।

विज्ञापन की दुनिया

प्रश्न 1.
‘पानी बचाओ’ से जुड़े विज्ञापनों को एकत्र कीजिए। इस संकट के प्रति चेतावनी बरतने के लिए आप किस प्रकार का विज्ञापन बनाना चाहेंगे?
उत्तर:
शिक्षक की सहायता से विद्यार्थी चित्र की रचना करें।
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HBSE 12th Class Hindi काले मेघा पानी दे Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
“काले मेघा पानी दे” नामक निबंध का उद्देश्य अथवा प्रतिपाद्य अपने शब्दों में लिखिए।
अथवा
“काले मेघा पानी दे” पाठ के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
मानव-जीवन में तर्क और आस्था का अपना-अपना महत्त्व है। तर्क हमेशा वैज्ञानिक तथ्य को स्वीकार करता है, परंतु आस्था हमारी भावनाओं से जुड़ी होती है। तर्क विनाशकारी होता है। जिसे वह सत्य नहीं समझता, उसे वह नष्ट करना चाहता है। दूसरी ओर आस्था और विश्वास हमारे जीवन को सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है और हम आशावादी होकर कर्म करते हैं। इस निबंध में एक संदेश यह भी दिया गया है कि हमें जीवन में पाने से पहले कुछ खोना भी पड़ता है। जो लोग दान और त्याग में विश्वास नहीं करते, वे भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं। ऐसे लोग ही सामाजिक और आर्थिक विषमता को अंजाम देते हैं व समाज में अव्यवस्था फैलाते हैं।

प्रश्न 2.
वर्षा न होने पर हमारी कृषि किस प्रकार प्रभावित होती है?
उत्तर:
वर्षा न होने पर खेतों की मिट्टी सूख जाती है और उसमें पपड़ियाँ जम जाती हैं। बाद में धरती में दरारें पड़ जाती हैं। पशु-पक्षी व मानव सभी व्याकुल हो जाते हैं। किसान के बैल भी प्यास के मारे मरने लगते हैं। वर्षा न होने पर कृषि पर संकट के बादल छा जाते हैं और देश की अर्थव्यवस्था गड़बड़ा जाती है।

प्रश्न 3.
वर्षा न होने पर गाँव के लोग क्या-क्या उपाय करते हैं?
उत्तर:
वर्षा न होने पर गाँव के लोग ईश्वर की भक्ति करते हैं। स्थान-स्थान पर पूजा-पाठ व कथा-कीर्तन होता है। कुछ लोग मीठे चावल बनाकर लोगों को खिलाते हैं। जब इन उपायों से भी वर्षा नहीं होती तो गाँव की युवा मंडली गाँव वालों से जल दान कराती है। उनका विश्वास है कि ऐसा करने से इंद्र देवता प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे।

प्रश्न 4.
गाँव की इंद्र सभा के कार्यकलाप का वर्णन करें।
उत्तर:
जब सभी उपाय अपनाने पर भी वर्षा नहीं होती तब गाँव की युवा मंडली घर-घर जाकर पानी का दान मांगती है। इस मंडली में 12 से 18 वर्ष तक के नंग-धडंग युवा होते हैं जिन्होंने केवल एक लंगोटी धारण की होती है। ये युवा गंगा मैया की जय-जयकार करते हुए गाँव की गलियों में जाते हैं और दुमंजिले गाँव के मकानों पर खड़ी स्त्रियाँ पानी के घड़े व बाल्टियाँ उड़ेल देती हैं। युवा उस पानी से स्नान करते हैं, और मिट्टी व कीचड़ में लोट-पोट हो जाते हैं। इस अवसर पर वे इस लोकगीत का गान करते हैं-
काले मेघा पानी दे
गगरी फूटी बैल पियासा
पानी दे, गुड़धानी दे
काले मेघा पानी दे।

प्रश्न 5.
मेंढक-मंडली का शब्दचित्र प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर:
मेंढक मंडली’ का एक और नाम भी है-इंदर सेना। इस मंडली में दस-बारह वर्ष से सोलह वर्ष तक की आयु के बच्चे होते हैं। जो लोग उनके नग्नरूप शरीर, उनकी उछल-कूद, उनके शोर-शराबे और उनके कारण होने वाली कीचड़ काँदों से चिढ़ते थे, वे उन्हें मेंढक-मंडली कहते थे। उनकी अगवानी गलियों में होती थी। उनमें से अधिकतर एक जांगिए या लंगोटी में होते थे। वे एक स्थान पर एकत्रित होकर पहला जयकारा लगाते थे-“बोल गंगा मैया की जय” । जयकारा सुनते ही लोग सावधान हो जाते थे। स्त्रियाँ घरों की छतों व खिड़कियों से झाँकने लगती थीं। वह विचित्र नंग-धडंग टोली उछलती-कूदती समवेत पुकार लगाती थी। यह टोली इन्द्र देवता को खुश करने के लिए ऐसा करती थी।

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प्रश्न 6.
ऋषि मुनियों के बारे में लेखक के क्या विचार हैं? दोनों के दृष्टिकोण को स्पष्ट करें।
उत्तर:
जीजी का विचार है, कि सब ऋषि मुनि यह कह गए हैं कि पहले तुम खुद त्याग करो तब देवता तुम्हें चार गुणा और आठ गुणा लौटाएँगे, परंतु लेखक ऋषि मुनियों के वचनों को आर्य समाज के संदर्भ में देखता है। वह स्वयं आर्यसमाजी है। उसे इस बात का दुख है कि अंधविश्वासों के साथ ऋषि मुनियों का नाम जोड़ा गया है। वह अपनी जीजी से कहता है “ऋषि मुनियों को काहे बदनाम करती हो जीजी, क्या उन्होंने कहा था कि जब मानव पानी की बूंद ६ को तरसे तब पानी कीचड़ में बहाओ।”

प्रश्न 7.
आपकी दृष्टि में जीजी की आस्था उचित है या लेखक का तर्क?
उत्तर:
इस निबंध को पढ़ने से जीजी की आस्था हमें अधिक प्रभावित करती है। कारण यह है कि जीजी की व्याख्या पूर्णतः तर्क संगत है और वह हमारी परंपराओं पर आधारित है। भले ही वह अनपढ़ है, लेकिन वह दान और त्याग के महत्त्व को भली प्रकार जानती है। यह एक कटु सत्य है कि जब तक हम त्याग और दान नहीं करेंगे तब तक समाज के लोग किस प्रकार जीवन-यापन कर सकेंगे। त्याग और दान भी समाजवाद की स्थापना करने का एक छोटा-सा प्रयास है।

प्रश्न 8.
पानी की बुआई से क्या तात्पर्य है? ‘काले मेघा पानी दे’ के आधार पर स्पष्ट करें।
उत्तर:
किसान भरपूर फसल पाने के लिए अपने खेतों में बीज की बुआई करता है। अधिक फसल पाने के लिए उसे कुछ बीजों का त्याग भी करना पड़ता है। इसी प्रकार बादलों से बरसात पाने के लिए गाँव के लोग अपने द्वारा संचित जल में से कुछ जल दान को जल की बआई कहते हैं। भले ही वैज्ञानिक दृष्टि से यह सत्य नहीं है, पर बनी हुई है। अनेक बार ऐसा करने से वर्षा हुई भी है।

प्रश्न 9.
‘काले मेघा पानी दे’ पाठ के आधार पर त्याग और दान की महिमा का वर्णन करें।
उत्तर:
‘काले मेघा पानी दे’ पाठ में लेखक ने त्याग और दान की महिमा पर प्रकाश डाला है। लेखक के अनुसार त्यागपूर्वक किया गया दान ही सच्चा दान है। यदि किसी व्यक्ति के पास लाखों-करोड़ों रुपये हैं और उसमें से वह सौ-पचास रुपये दान कर देता है तो इसे हम त्यागपूर्वक दान नहीं कह सकते। यदि आपको किसी वस्तु की अत्यधिक आवश्यकता है और आप उसी वस्तु का दान करते हैं तो वही त्यागपूर्वक दान कहा जाएगा। वस्तुतः स्वयं दुख उठाकर किया गया दान ही सच्चा दान कहा जाता है।

प्रश्न 10.
‘काले मेघा पानी दे’ संस्मरण में भ्रष्टाचार पर किस प्रकार से व्यंग्य किया गया है?
उत्तर:
यद्यपि ‘काले मेघा पानी दे’ संस्मरण में पानी माँगने व कीचड़ में नहाने की प्रथा व सूखे में पीने के पानी को बरबाद करना आदि पर भी व्यंग्य किया गया है। किन्तु लेखक ने समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार पर भी अत्यन्त तीक्ष्ण व्यंग्य किया है। लेखक कहता है कि आज हम हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी मांगें तो रखते हैं, किंतु देश के लिए त्याग का कहीं नामो-निशान नहीं है। हम सबका अपना स्वार्थ आज एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम चटखारे लेकर एक-दूसरे के भ्रष्टाचार की बातें करते हैं। क्या कभी हमने अपने भीतर भी झांककर देखा है कि कहीं हम भी उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे हैं? आज समाज में विकास तो है किन्तु गरीब, गरीब ही रह गए हैं। यह सब भ्रष्टाचार के कारण ही है। लेखक ने इस पाठ के माध्यम से भ्रष्टाचार पर करारा व्यंग्य किया है।

प्रश्न 11.
धर्मवीर भारती की जीजी के संस्कारों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
लेखक की जीजी एक वृद्धा थी। वह आस्थाशील नारी थी। इसलिए वह समाज की परम्पराओं के मर्म को समझती थी। उसका परम्पराओं में पूर्ण विश्वास था। लेखक के प्रति भी उसकी ममता थी। वह पूजा अनुष्ठानों का फल भी लेखक को देना चाहती थी। उसने लेखक के जीवन में भी शुभ संस्कारों को उत्पन्न करने का प्रयास किया है।

प्रश्न 12.
जीजी लेखक से पूजा अनुष्ठान के कार्य क्यों करवाती थी?
उत्तर:
जीजी को लेखक से अपने पुत्रों से भी अधिक स्नेह था। इसलिए वह लेखक से ही पूजा अनुष्ठान के कार्य करवाती थी। इन कार्यों का पुण्य लेखक को प्राप्त हो। वह लेखक का कल्याण चाहती थी।

प्रश्न 13.
‘काले मेघा पानी दे पाठ के आधार पर जीजी के चरित्र पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
जीजी वृद्धा की नारी थी। वह लेखक से अत्यधिक प्रेम करती थी। एक आस्थाशील नारी होने के कारण वह समाज की परंपराओं के मर्म को भली प्रकार से जानती थी। इन परंपराओं में उसका पूर्ण विश्वास था। लेखक के प्रति उसकी ममता थी। वह पूजा-अनुष्ठान के कार्यों का फल भी लेखक को देना चाहती थी। उसने भरसक प्रयास किया कि वह लेखक में शुभ संस्कारों को उत्पन्न कर सके।

प्रश्न 14.
‘काले मेघा पानी दे’ पाठ के आधार पर लेखक के चरित्र का संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
लेखक एक सुशिक्षित और जागरूक युवक था। उसमें आर्य समाज के संस्कार थे। वह अंधविश्वासों का कट्टर विरोधी मार सभा का मंत्री था और उसमें नेतत्व शक्ति भी थी। वह प्रत्येक बात के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से सोचता था। इसलिए उसने इंदर सेना द्वारा बड़ी कठिनाई से संचित किए हुए पानी के दान में माँगने को अनुचित ठहराया और इस परंपरा का विरोध किया, परंतु अन्ततः वह जीजी के स्नेह और आस्था के आगे झुक गया। इस प्रकार उसने तर्क और आस्था में समन्वय स्थापित कर लिया।

प्रश्न 15.
इंदर सेना जेठ के अंतिम तथा आषाढ़ के प्रथम सप्ताह में ही पानी माँगने क्यों आती थी?
उत्तर:
जेठ के अंतिम तथा आषाढ़ के प्रथम सप्ताह में गर्मी अपनी चरम सीमा पर होती है। गर्म लू से पृथ्वी तप जाती है। आषाढ़ मास में ही वर्षा का आगमन होता है, लेकिन कभी-कभी इस मास में वर्षा नहीं होती। इसके फलस्वरूप जीव-जंतु पानी के बिना मरने लगते हैं। ज़मीन सूखकर पत्थर बन जाती है, और जगह-जगह से फट जाती है। इंदर सेना इंद्र देवता से ही वर्षा की याचना के लिए लोगों से पानी का दान माँगती है।

प्रश्न 16.
‘काले मेघा पानी दे’ संस्मरण की क्या विशेषता है?
उत्तर:
प्रस्तुत संस्मरण में लेखक ने लोक प्रचलित आस्था तथा विज्ञान के तर्क के संघर्ष का वर्णन किया है। विज्ञान हमेशा सत्य को महत्त्व देता है और यह तर्क आश्रित है। परंतु लोक प्रचलित विश्वास आस्था से जुड़ा हुआ है। इसमें कौन सही और गलत है, यह निर्णय कर पाना कठिन है। विज्ञान तो ग्लोबल वार्मिंग को अनावृष्टि का कारण मानता है, लेकिन लोक परंपरा इस तर्क को स्वीकार नहीं करती। वे लोक परंपराओं का अंधानुकरण करके जीवन-यापन कर रहे हैं।

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प्रश्न 17.
दिनों-दिन गहराते पानी के संकट से निपटने के लिए क्या आज का युवा वर्ग ‘काले मेघा पानी दे’ की इंद्र सेना की तर्ज़ पर कोई सामूहिक कार्य प्रारंभ कर सकता है? अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
पानी का गहराता संकट हमारे देश के लिए एक भयंकर समस्या बन चुका है। इस संकट को टालने के लिए ग्रामीण व शहरी युवक-युवतियाँ अत्यधिक सहयोग दे सकते हैं। युवा वर्ग देश के गाँवों में तालाब खुदवा सकता है, जहाँ पानी का भंडारण किया जा सकता है। इस पानी से जहाँ एक ओर खेतों की सिंचाई की जा सकती है, वहाँ दूसरी ओर भूमिगत जल के स्तर में भी सुधार लाया जा सकता है। युवक प्रत्येक घर में जाकर पानी को व्यर्थ बरबाद न करने का संदेश भी लोगों को दे सकते हैं।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘काले मेघा पानी दे’ पाठ के लेखक का नाम है
(A) जैनेंद्र कुमार
(B) महादेवी वर्मा
(C) रघुवीर सहाय
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(D) धर्मवीर भारती

2. धर्मवीर भारती का जन्म कब हुआ?
(A) 2 दिसंबर, 1926
(B) 11 दिसंबर, 1936
(C) 2 जनवरी, 1927
(D) 3 मार्च, 1928
उत्तर:
(A) 2 दिसंबर, 1926

3. धर्मवीर भारती के पिता का क्या नाम था?
(A) राम जी लाल
(B) चरंजीवी लाल
(C) मोहन लाल
(D) कृष्ण लाल
उत्तर:
(B) चरंजीवी लाल

4. धर्मवीर भारती की माता का क्या नाम था?
(A) सीता देवी
(B) राधा देवी
(C) चंदी देवी
(D) चंडी देवी
उत्तर:
(C) चंदी देवी

5. धर्मवीर भारती ने इंटर की परीक्षा कब उत्तीर्ण की?
(A) सन् 1940 में
(B) सन् 1939 में
(C) सन् 1941 में
(D) सन् 1942 में
उत्तर:
(D) सन् 1942 में

6. धर्मवीर भारती ने किस पाठशाला से इंटर की परीक्षा पास की?
(A) ब्राह्मण पाठशाला
(B) कायस्थ पाठशाला
(C) सनातन धर्म पाठशाला
(D) डी०ए०वी० पाठशाला
उत्तर:
(B) कायस्थ पाठशाला

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7. धर्मवीर भारती ने किस विश्वविद्यालय से बी०ए० की परीक्षा पास की?
(A) प्रयाग विश्वविद्यालय
(B) लखनऊ विश्वविद्यालय
(C) आगरा विश्वविद्यालय
(D) मेरठ विश्वविद्यालय
उत्तर:
(A) प्रयाग विश्वविद्यालय

8. सर्वाधिक अंक प्राप्त करने पर धर्मवीर भारती को कौन-सा पदक मिला?
(A) चिंतामणि पदक
(B) चिंतामणि घोष मंडल पदक
(C) प्रेमचंद पदक
(D) जयशंकर प्रसाद पदक
उत्तर:
(B) चिंतामणि घोष मंडल पदक

9. धर्मवीर भारती ने हिंदी में किस वर्ष एम०ए० की परीक्षा पास की?
(A) सन् 1946 में
(B) सन् 1948 में
(C) सन् 1947 में
(D) सन् 1949 में
उत्तर:
(C) सन् 1947 में

10. धर्मवीर भारती ने किस वर्ष पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त की?
(A) सन् 1950 में
(B) सन् 1951 में
(C) सन् 1952 में
(D) सन् 1954 में
उत्तर:
(D) सन् 1954 में

11. धर्मवीर भारती ने किस विषय में पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त की?
(A) सिद्ध साहित्य
(B) जैन साहित्य
(C) नाथ साहित्य
(D) संत साहित्य
उत्तर:
(A) सिद्ध साहित्य

12. धर्मवीर भारती किस पत्रिका के संपादक बने?
(A) नवजीवन
(B) धर्मयुग
(C) साप्ताहिक हिंदुस्तान
(D) दिनमान
उत्तर:
(B) धर्मयुग

13. धर्मवीर भारती ने इंग्लैंड की यात्रा कब की?
(A) सन् 1958 में
(B) सन् 1960 में
(C) सन् 1961 में
(D) सन् 1962 में
उत्तर:
(C) सन् 1961 में

14. धर्मवीर भारती ने इंडोनेशिया तथा थाईलैंड की यात्रा कब की?
(A) सन् 1962 में
(B) सन् 1963 में
(C) सन् 1964 में
(D) सन् 1966 में
उत्तर:
(D) सन् 1966 में

15. धर्मवीर भारती की ‘दूसरा सप्तक’ की कविताएँ कब प्रकाशित हुईं?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1952 में
(C) सन् 1943 में
(D) सन् 1950 में
उत्तर:
(A) सन् 1951 में

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16. ‘ठंडा लोहा’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1952 में
(C) सन् 1953 में
(D) सन् 1949 में
उत्तर:
(B) सन् 1952 में

17. ‘कनुप्रिया’ के रचयिता हैं
(A) रघुवीर सहाय
(B) फणीश्वरनाथ रेणु
(C) धर्मवीर भारती
(D) जैनेंद्र कुमार
उत्तर:
(C) धर्मवीर भारती

18. ‘गुनाहों का देवता’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी
(B) काव्य
(C) एकांकी
(D) उपन्यास
उत्तर:
(D) उपन्यास

19. ‘गुनाहों का देवता’ का रचयिता कौन हैं?
(A) अज्ञेय
(B) धर्मवीर भारती
(C) रघुवीर सहाय
(D) नरेश मेहता
उत्तर:
(B) धर्मवीर भारती

20. ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) कहानी
(C) निबंध
(D) रेखाचित्र
उत्तर:
(A) उपन्यास

21. ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ किसकी रचना है?
(A) ,महादेवी वर्मा
(B) फणीश्वर नाथ रेणु
(C) हज़ारी प्रसाद द्विवेदी
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(D) धर्मवीर भारती

22. ‘ठेले पर हिमालय’ किस विधा की रचना है?
(A) निबंध
(B) कहानी
(C) रेखाचित्र
(D) संस्मरण
उत्तर:
(A) निबंध

23. ‘कहनी-अनकहनी’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) मुक्तिबोध
(B) जैनेंद्र कुमार
(C) धर्मवीर भारती
(D) फणीश्वर नाथ रेणु
उत्तर:
(C) धर्मवीर भारती

24. ‘मानव मूल्य और साहित्य, किस विधा की रचना है?
(A) एकांकी
(B) उपन्यास
(C) निबंध
(D) नाटक
उत्तर:
(C) निबंध

25. धर्मवीर भारती का निधन कब हुआ?
(A) सन् 1995 को
(B) सन् 1994 को
(C) सन् 1997 को
(D) सन् 1998 को
उत्तर:
(C) सन् 1997 को

26. ‘नदी प्यासी थी’ किस विधा की रचना है?
(A) काव्य
(B) एकांकी
(C) निबंध
(D) कहानी
उत्तर:
(B) एकांकी

27. धर्मवीर भारती को किस राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया?
(A) पदम् विभूषण
(B) पद्मश्री
(C) पदम् रत्न
(D) खेल रत्न
उत्तर:
(B) पद्मश्री

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28. ‘पदम्श्री’ के अतिरिक्त धर्मवीर भारती को कौन-सा पुरस्कार मिला?
(A) व्यास सम्मान
(B) प्रेमचंद सम्मान
(C) ज्ञानपीठ पुरस्कार
(D) कबीर सम्मान
उत्तर:
(A) व्यास सम्मान

29. ‘अंधा युग’ के रचयिता का क्या नाम है?
(A) महादेवी वर्मा
(B) धर्मवीर भारती
(C) फणीश्वर नाथ रेणु
(D) कुँवर नारायण
उत्तर:
(B) धर्मवीर भारती

30. ‘अंधा युग’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) कहानी
(C) एकांकी
(D) गीति नाट्य
उत्तर:
(D) गीति नाट्य

31. धर्मवीर भारती की किस रचना पर हिंदी में फिल्म बनी?
(A) सूरज का सातवाँ घोड़ा
(B) गुनाहों का देवता
(C) अंधायुग
(D) पश्यंती
उत्तर:
(A) सूरज का सातवाँ घोड़ा

32. ‘आषाढ़’ से सम्बद्ध ऋतु है:
(A) बसंत
(B) वर्षा
(C) शीत
(D) ग्रीष्म
उत्तर:
(B) वर्षा

33. ‘काले मेघा पानी दे’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी
(B) संस्मरण
(C) रेखाचित्र
(D) निबंध
उत्तर:
(B) संस्मरण

34. ‘इंदर सेना’ को लेखक ने क्या नाम दिया है?
(A) वानर सेना
(B) राम सेना
(C) मेढक-मंडली
(D) कछुआ मंडली
उत्तर:
(C) मेढक-मंडली

35. इंदर सेना द्वारा जल का दान माँगने को लेखक क्या कहता है?
(A) अंधविश्वास
(B) लोक विश्वास
(C) धार्मिक विश्वास
(D) लोक परंपरा
उत्तर:
(A) अंधविश्वास

36. वर्षा का देवता कौन माना गया है?
(A) इन्द्र
(B) वरुण
(C) सूर्य
(D) पवन
उत्तर:
(A) इन्द्र

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37. लोगों ने लड़कों की टोली को मेढक-मंडली नाम क्यों दिया?
(A) नंग-धडंग शरीर के साथ कीचड़-कांदों में लोटने के कारण
(B) अनावृष्टि में जल माँगने के कारण
(C) शोर-शराबे द्वारा गाँव की शांति भंग करने के कारण
(D) तालाब में मेंढकों के समान उछलने के कारण
उत्तर:
(A) नंग-धडंग शरीर के साथ कीचड़-कांदों में लोटने के कारण

38. किशोर अपने-आप को इंदर सेना क्यों कहते हैं?
(A) वर्षा के लिए इंद्र को प्रसन्न करने के लिए
(B) लोगों से जल माँगने के लिए
(C) इंद्र देवता से प्यार करने के लिए
(D) इंद्र के समान आचरण करने के लिए
उत्तर:
(A) वर्षा के लिए इंद्र को प्रसन्न करने के लिए

39. ‘गुड़धानी’ से क्या अभिप्राय है?
(A) अनाज
(B) पानी
(C) गुड़ और चने से बना लड्ड
(D) धन-संपत्ति
उत्तर:
(C) गुड़ और चने से बना लड्डू

40. लंगोटधारी युवक किसकी जय बोलते हैं?
(A) इंद्र देवता की
(B) गंगा मैया की
(C) भगवान की
(D) बादलों की
उत्तर:
(B) गंगा मैया की

41. जीजी की दृष्टि में किसके बिना दान नहीं होता?
(A) समृद्धि
(B) इच्छा
(C) आस्था
(D) त्याग
उत्तर:
(D) त्याग

42. बच्चों की टोली ‘पानी दे मैया’ कहकर किस सेना के आने की बात कहती है?
(A) वानर सेना
(B) बान सेना
(C) इंद्र सेना
(D) राम सेना
उत्तर:
(C) इंद्र सेना

43. जीजी लेखक के हाथों पूजा-अनुष्ठान क्यों कराती थी?
(A) अपने कल्याण के लिए
(B) लेखक के कल्याण के लिए
(C) समाज-कल्याण के लिए
(D) परिवार के कल्याण के लिए
उत्तर:
(B) लेखक के कल्याण के लिए

44. जन्माष्टमी पर बचपन में लेखक आठ दिनों तक झाँकी सजाकर क्या बाँटता था?
(A) पंजीरी
(B) लड्डू
(C) बतासे
(D) फल
उत्तर:
(A) पंजीरी

45. किन लोगों ने त्याग और दान की महिमा का गुणगान किया है?
(A) ऋषि-मुनियों ने
(B) देवताओं ने
(C) राजनीतिज्ञों ने
(D) शिक्षकों ने
उत्तर:
(A) ऋषि-मुनियों ने

46. हर छठ पर लेखक छोटी रंगीन कुल्हियों में क्या भरता था?
(A) भूजा
(B) मिठाई
(C) बूंदी
(D) पंजीरी
उत्तर:
(A) भूजा

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47. ‘काले मेघा पानी दे’ पाठ में किस लोक प्रचलित द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया गया है?
(A) आस्था और अनास्था
(B) विश्वास और विज्ञान
(C) पाप और पुण्य
(D) आधुनिकता और पौराणिकता
उत्तर:
(B) विश्वास और विज्ञान

48. अंधविश्वास से क्या होता है?
(A) नुकसान
(B) लाभ
(C) प्रकाश
(D) ईश दर्शन
उत्तर:
(A) नुकसान

49. प्रस्तुत पाठ में ‘बोल गंगा मैया की जय’ का पहला नारा कौन लगाता था?
(A) मेढक मंडली
(B) ऋषि समूह
(C) गंगा स्नान करने वाले
(D) हरिद्वार जाने वाले
उत्तर:
(C) मेढक मंडली

50. प्रस्तुत पाठ में लेखक को कुमार-सुधार सभा का कौन-सा पद दिया गया?
(A) मंत्री
(B) महामंत्री
(C) उपमंत्री
(D) सहमंत्री
उत्तर:
(C) उपमंत्री

51. जीजी के लड़के ने पुलिस की लाठी किस आंदोलन में खाई थी?
(A) राष्ट्रीय आंदोलन
(B) भूदान आंदोलन
(C) विदेशी वस्त्र आंदोलन
(D) नमक आंदोलन
उत्तर:
(A) राष्ट्रीय आंदोलन

काले मेघा पानी दे प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] उछलते-कूदते, एक-दूसरे को धकियाते ये लोग गली में किसी दुमहले मकान के सामने रुक जाते, “पानी दे मैया, इंदर सेना आई है।” और जिन घरों में आखीर जेठ या शुरू आषाढ़ के उन सूखे दिनों में पानी की कमी भी होती थी, जिन घरों के कुएँ भी सूखे होते थे, उन घरों से भी सहेज कर रखे हुए पानी में से बाल्टी या घड़े भर-भर कर इन बच्चों को सर से पैर तक तर कर दिया जाता था। ये भीगे बदन मिट्टी में लोट लगाते थे, पानी फेंकने से पैदा हुए कीचड़ में लथपथ हो जाते थे। हाथ, पाँव, बदन, मुँह, पेट सब पर गंदा कीचड़ मल कर फिर हाँक लगाते “बोल गंगा मैया की जय” और फिर मंडली बाँध कर उछलते-कूदते अगले घर की ओर चल पड़ते बादलों को टेरते, “काले मेघा पानी दे।” [पृष्ठ-100]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। लेखक अपने गाँव के एक प्रसंग का वर्णन करता है। गाँव में अनावृष्टि के कारण किशोर युवकों की इंदर सेना उछलती-कूदती हुई गलियों में सिर्फ एक लंगोटी पहने लोगों से दान में पानी माँगती थी। इसी प्रसंग की चर्चा करते हुए लेखक कहता है

व्याख्या-गाँव के कुछ नंग-धडंग किशोर एक लंगोटी बाँधे हुए गाँव की गलियों में लोगों से पानी की याचना करते थे। ये युवक उछलते-कूदते हुए एक-दूसरे को धक्का देते हुए आगे बढ़ते थे। ये किसी दुमंजिले मकान के सामने रुककर गुहार लगाते थे- हे माँ! तुम्हारे द्वार पर इंदर सेना आई है, इसे पानी दो मैया। प्रायः सभी घरों में जेठ माह के अंत में अथवा आषाढ़ के आरंभ में अनावृष्टि के कारण सूखा पड़ा रहता था और घरों में पानी की बड़ी कमी होती थी। जिन लोगों के घरों में प्रायः कुएँ थे, वे भी सूख जाते थे। सभी घर-परिवार पानी सँभाल कर रखते थे, क्योंकि पानी की बहुत कमी होती थी। तो भी लोग बचाकर रखे पानी से एक बाल्टी या घड़ा भरकर इंदर सेना पर उड़ेल देते थे जिससे वे सिर से पैर तक भीग जाते थे। भीगे शरीर से ये लोग मिट्टी में लोट जाते थे। पानी फैंकने से जो कीचड़ बन जाता था। उससे यह सेना लथपथ हो जाती थी। सभी के हाथों-पैरों, शरीर, मुख, पेट आदि पर गंदा कीचड़ लग जाता था, परंतु किसी को इसकी परवाह नहीं होती थी। सभी युवक जोर से नारा लगाते ‘बोल गंगा मैया की जय’ । तत्पश्चात् वे पुनः मंडली बनाकर उछलते-कूदते हुए अगले घर की तरफ चल देते थे। इसके साथ-साथ वे बादलों से पुनः पुकार लगाकर पानी माँगते और कहते-काले मेघा पानी दे। इस प्रकार यह इंदर सेना पूरे गाँव की गलियों में चक्कर लगाती हुई घूमती थी।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने अनावृष्टि के अवसर पर लड़कों द्वारा गठित इंदर सेना का यथार्थ वर्णन किया है, जो लोगों से दान में पानी माँगती थी।
  2. सहज, सरल तथा जन-भाषा का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली के साथ-साथ संबोधनात्मक शैली का भी सफल प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) किन दिनों पानी की कमी हो जाती थी?
(ग) उछलते-कूदते किशोर दुमहले मकान के सामने रुककर क्या कहते थे?
(घ) पानी की कमी के बावजूद इन बच्चों पर पानी क्यों डाला जाता था?
(ङ) इंदर सेना के किशोर बादलों को क्या टेर लगाते थे?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम काले मेघा पानी दे
लेखक का नाम-धर्मवीर भारती

(ख) जेठ महीने के अंतिम काल अथवा आषाढ़ महीने के आरंभ के दिनों में पानी की कमी हो जाती थी और घरों के कुएँ भी सूख जाते थे।

(ग) उछलते-कूदते हुए किशोर दुमहले मकान के सामने रुककर कहते थे-“पानी दे मैया, इंदर सेना आई है”।

(घ) लोगों का विश्वास था यदि इंदर सेना के किशोरों पर पानी उड़ेला जाएगा तो इंद्र देवता प्रसन्न होकर वर्षा करेंगे।

(ङ) इंदर सेना के किशोर बादलों को टेर लगाते थे-काले मेघा पानी दे।

[2] वे सचमुच ऐसे दिन होते जब गली-मुहल्ला, गाँव-शहर हर जगह लोग गरमी में भुन-भुन कर त्राहिमाम कर रहे, होते, जेठ के दसतपा बीत कर आषाढ़ का पहला पखवारा भी बीत चुका होता पर क्षितिज पर कहीं बादल की रेख भी नहीं दीखती होती, कुएँ सूखने लगते, नलों में एक तो बहुत कम पानी आता और आता भी तो आधी रात को भी मानो खौलता हुआ पानी हो। शहरों की तुलना में गाँव में और भी हालत खराब होती थी। जहाँ जुताई होनी चाहिए वहाँ खेतों की मिट्टी सूख कर पत्थर हो जाती, फिर उसमें पपड़ी पड़ कर ज़मीन फटने लगती, लू ऐसी कि चलते-चलते आदमी आधे रास्ते में लू खा कर गिर पड़े। ढोर-ढंगर प्यास के मारे मरने लगते लेकिन बारिश का कहीं नाम निशान नहीं, ऐसे में पूजा-पाठ कथा-विधान सब करके लोग जब हार जाते तब अंतिम उपाय के रूप में निकलती यह इंदर सेना। वर्षा के बादलों के स्वामी, हैं इंद्र और इंद्र की सेना टोली बाँध कर कीचड़ में लथपथ निकलती, पुकारते हुए मेघों को, पानी माँगते हुए प्यासे गलों और सूखे खेतों के लिए। [पृष्ठ-100-101]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। लेखक अपने गाँव के उस प्रसंग का वर्णन करता है, जब गाँव में अनावृष्टि के कारण किशोर युवकों की इंदर सेना उछलती-कूदती हुई गलियों में सिर्फ एक लंगोटी पहने लोगों से दान में पानी माँगती थी। यहाँ लेखक भीषण गर्मी से उत्पन्न स्थिति का वर्णन करते हुए कहता है

व्याख्या-सच्चाई तो यह है कि ग्रीष्म ऋतु के वे दिन इस प्रकार के होते थे जब नगर-मोहल्ले, गाँव-नगर सभी स्थानों पर भयंकर गर्मी पड़ती थी तथा गर्मी में भुनते हुए लोग भगवान से यही प्रार्थना करते थे कि हमारी रक्षा करो। जेठ के महीने के दस दिनों का ताप व्यतीत हो चुका था और आषाढ़ का पहला पक्ष गुजर गया था, परंतु आकाश में कहीं पर भी बादलों का नामो-निशान नहीं था। प्रायः इस मौसम में कुएँ भी सूख जाते थे और नलकों में भी बहुत थोड़ा पानी आता था। आता भी था तो आधी रात को तथा उबलता हुआ। नगरों के मुकाबले गाँव में हालत और भी खराब हो जाती थी। भाव यह है कि पानी का अभाव नगरों में कम होता था, परंतु गाँव में बहुत अधिक होता था। जिन दिनों खेतों में जुताई की जाती थी, वहाँ मिट्टी सूखकर पत्थर बन जाती थी।

स्थान-स्थान पर पपड़ियाँ पड़ने से मिट्टी फट जाती थी। झुलसा देने वाली लू चलती थी जिसके फलस्वरूप रास्ते पर चलने वाला व्यक्ति आधे रास्ते चलने के बाद लू लगने से गिर पड़ता था। पानी की इतनी भारी कमी हो जाती थी कि प्यास के कारण पशु तक मरने लग जाते थे, परंतु दूर-दूर तक कहीं भी बरसात का नामो-निशान तक नहीं मिलता था। लोग ईश्वर की पूजा तथा कथाओं का वर्णन करके भी थक जाते थे और वर्षा बिल्कुल नहीं होती थी। आखिरी उपाय के रूप में यह इंदर सेना गाँव में निकल पड़ती थी। इंद्र को बादलों का स्वामी माना गया है। युवकों की यह टोली उसी की सेना मान ली जाती थी। इंदर सेना के किशोर कीचड़ से लथपथ होकर मेघों को पुकार लगाते थे और प्यासे लोगों तथा सूखे खेतों के लिए इंद्र देवता से पानी की याचना करते थे। कहने का भाव यह है कि अनावृष्टि के समय इंदर सेना के गठन का आयोजन अंतिम उपाय के रूप में अपनाया जाता था।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने ग्रीष्म ऋतु की भयंकर गर्मी का यथार्थ वर्णन किया है।
  2. लेखक यह भी बताता है कि लोग बारिश के लिए पूजा-पाठ तथा कथा-विधान करते थे, परंतु अंतिम उपाय के रूप में इंदर सेना निकलती थी।
  3. सहज, सरल, तथा जनभाषा का सफल प्रयोग है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. वर्णनात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) इस गद्यांश में किस ऋतु का वर्णन किया गया है?
(ख) लोग किस कारण से परेशान हो जाते थे?
(ग) गाँव में गर्मियों का क्या प्रभाव होता था?
(घ) गाँव के लोग वर्षा के लिए कौन-कौन से उपाय करते थे?
(ङ) ‘इंदर सेना’ किसे कहा गया है और वह क्या करती थी?
उत्तर:
(क) इस गद्यांश में ग्रीष्म ऋतु का वर्णन किया गया है।

(ख) आषाढ़ के महीने में लोग गर्मी तथा अनावृष्टि के कारण अत्यधिक परेशान हो जाते थे। कुएँ सूख जाते थे और नलों में पानी भी नहीं आता था। यदि आता भी था तो रात को उबलता हुआ पानी आता था। गर्मी के कारण पशु-पक्षी तथा लोग बेहाल हो जाते थे।

(ग) गाँव की हालत शहरों से भी बदतर होती थी। जुताई के खेतों की मिट्टी सूखकर पत्थर बन जाती थी। धीरे-धीरे उसमें पपड़ी पड़ने लगती थी और ज़मीन फट जाती थी। गर्म लू के कारण आदमी बेहोश होकर गिर पड़ता था और प्यास से पशु मरने लगते थे।

(घ) गाँव के लोग वर्षा के लिए इंदर भगवान से प्रार्थना करते थे। कहीं पूजा-पाठ होता था, तो कहीं कथा-विधान, जब ये सभी उपाय असफल हो जाते थे, तब कीचड़ तथा पानी से लथपथ होकर किशोरों की इंदर सेना गलियों में निकल पड़ती थी और इंद्र देवता से बरसात की गुहार लगाती थी।

(ङ) ‘इंदर सेना’ गाँव के उन युवकों को कहा गया है जो एक लंगोटी पहने नंग-धडंग भगवान इंद्र से वर्षा माँगने के लिए घूमते थे। गाँव के लोग मकानों के छज्जों से उन पर एक-आध घड़ा पानी डाल देते थे और वे उछलते-कूदते हुए बादलों को पुकार कर कहते थे काले मेघा पानी दे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे

[3] पानी की आशा पर जैसे सारा जीवन आकर टिक गया हो। बस एक बात मेरे समझ में नहीं आती थी कि जब चारों ओर पानी की इतनी कमी है तो लोग घर में इतनी कठिनाई से इकट्ठा करके रखा हुआ पानी बाल्टी भर-भर कर इन पर क्यों फेंकते हैं। कैसी निर्मम बरबादी है पानी की। देश की कितनी क्षति होती है इस तरह के अंधविश्वासों से। कौन कहता है इन्हें इंद्र की सेना? अगर इंद्र महाराज से ये पानी दिलवा सकते हैं तो खुद अपने लिए पानी क्यों नहीं माँग लेते? क्यों मुहल्ले भर का पानी नष्ट करवाते घूमते हैं, नहीं यह सब पाखंड है। अंधविश्वास है। ऐसे ही अंधविश्वासों के कारण हम अंग्रेज़ों से पिछड़ गए और गुलाम बन गए। [पृष्ठ-101-102]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उधृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। लेखक अपने गाँव के उस प्रसंग का वर्णन करता है जब गाँव में अनावृष्टि के कारण किशोर युवकों की इंदर सेना उछलती-कूदती हुई गलियों में सिर्फ एक लंगोटी पहने लोगों से दान में पानी माँगती थी। यहाँ लेखक इंदर सेना के गठन तथा गाँववालों द्वारा उन पर पानी फैंकने की परंपरा को अंधविश्वास घोषित करता है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि ऐसा लगता था कि मानों पानी की आशा पर ही सबका जीवन आकर टिक गया हो, परंतु लेखक अपनी जिज्ञासा को प्रकट करते हुए कहता है कि यह बात उसकी समझ में नहीं आ रही थी कि सब तरफ पानी की इतनी भारी कमी है, फिर भी लोग बड़ी कठिनाई से इकट्ठे किए गए पानी को इंदर सेना के किशोरों पर बाल्टी भर-भर कर डाल देते थे। यह तो निश्चय से पानी की बरबादी है। ऐसा करना सर्वथा अनुचित है। यह एक प्रकार का अंधविश्वास है जिसमें पूरे देश की हानि होती है। पता नहीं लोग इसे इंदर सेना क्यों कहते हैं। यदि लोग इंद्र देवता से पानी दिलवा सकते हैं तो उन्हें स्वयं उससे पानी माँग लेना चाहिए। लोगों के कठिनाई से इकट्ठे किए गए पानी को बरबाद नहीं करना चाहिए। ये लोग मुहल्ले भर का पानी बरबाद करते हुए गलियों में घूमते हैं और शोर-शराबा करते हैं, यह न केवल पाखंड है, अंधविश्वास भी है। इसी अंधविश्वास के कारण हमारा देश पिछड़ गया है। हम भारतवासी इन्हीं अंधविश्वासों के कारण अन्य देशों से पिछड़ गए और अंग्रेज़ शासकों के गुलाम बन गए। अतः इस प्रकार के अंधविश्वासों को छोड़कर हमें पानी के लिए और कोई उपाय अपनाने चाहिएँ।

विशेष-

  1. इसमें लेखक ने इंदर सेना के उपाय को अंधविश्वास का नाम दिया है।
  2. सहज, सरल तथा जनभाषा का सफल प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) कौन-सी बात लेखक को समझ नहीं आती थी?
(ख) लेखक के अनुसार पानी की निर्मम बरबादी क्या है?
(ग) इंदर-सेना के विरोध में लेखक ने क्या तर्क दिया था?
(घ) लेखक की दृष्टि में पाखंड तथा अंधविश्वास क्या है?
(ङ) लेखक ने भारत की.गुलामी तथा अवनति का मूल कारण किसे माना है?
उत्तर:
(क) लेखक को यह बात समझ नहीं आती थी कि जब लोगों के घरों में पानी की इतनी कमी है तथा वे प्यास और अनावृष्टि के कारण व्याकुल हो रहे हैं, तब वे इंद्र सेना पर पानी का घड़ा उड़ेलकर उसे बरबाद क्यों कर रहे हैं।

(ख) लेखक के अनुसार नंग-धडंग किशोरों पर पानी डालना पानी की बरबादी है। जब पानी की इतनी कमी है तब लोगों को बूंद-बूंद पानी भी बचाना चाहिए।

(ग) इंदर-सेना के विरोध में लेखक यह तर्क देता है कि जब इंदर-सेना के युवक इंद्र भगवान से पानी दिलवा सकते हैं तो ये अपने लिए उनसे पानी क्यों नहीं माँग लेते। सेना लोगों का पानी क्यों बरबाद करती है?

(घ) लेखक की दृष्टि में इंद्र देवता को प्रसन्न करने के लिए इंद्र सेना के किशोरों पर घड़ा भर-भर पानी डालना गाँव वालों की नासमझी है। निश्चय से यह लोगों का अंधविश्वास है, ऐसा करने से वर्षा नहीं होती।

(ङ) लेखक ने पाखंडों तथा अंधविश्वासों को भारत की गुलामी तथा अवनति का मूल कारण माना है।

[4] मगर मुश्किल यह थी कि मुझे अपने बचपन में जिससे सबसे ज्यादा प्यार मिला वे थीं जीजी। यूँ मेरी रिश्ते में कोई नहीं थीं। उम्र में मेरी माँ से भी बड़ी थीं, पर अपने लड़के-बहू सबको छोड़ कर उनके प्राण मुझी में बसते थे। और वे थीं उन तमाम रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों, पूजा-अनुष्ठानों की खान जिन्हें कुमार-सुधार सभा का यह उपमंत्री अंधविश्वास कहता था, और उन्हें जड़ से उखाड़ फेंकना चाहता था। पर मुश्किल यह थी कि उनका कोई पूजा-विधान, कोई त्योहार अनुष्ठान मेरे बिना पूरा नहीं होता था। [पृष्ठ-102]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। यहाँ लेखक जीजी के साथ अपने प्रगाढ़ संबंधों पर प्रकाश डालता है। लेखक अपनी जीजी का बड़ा आदर मान करता है। वह कहता है कि-

व्याख्या कठिनाई यह थी कि लेखक को बाल्यावस्था से ही सर्वाधिक प्यार अपनी जीजी से ही मिला था। उसके साथ लेखक का कोई गहरा रिश्ता नहीं था। वह लेखक की माँ से भी बड़ी थी, परंतु वह अपने लड़के तथा पुत्रवधू की अपेक्षा लेखक से अत्यधिक प्यार करती थी। वे समाज के सभी रीति-रिवाजों, तीज-त्योहारों, पूजा-पाठ तथा कर्मकाण्डों में पूरा विश्वास रखती थीं, परंतु लेखक आर्य समाज द्वारा स्थापित कुमार-सुधार सभा का उपमंत्री था और वह इंद्र सेना के इस कार्य को अंधविश्वास मानता था और वह चाहता था कि वह उसे जड़ से उखाड़ दे, लेकिन सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि लेखक के बिना जीजी का कोई भी पूजा-विधान, त्योहार-कार्य पूरा नहीं होता था। कहने का भाव यह है कि जीजी अपने प्रत्येक पूजा-विधान में लेखक का सहयोग लेती थी।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि जीजी के प्रति उसके मन में बड़ी आदर-भावना थी।
  2. सहज, सरल तथा जनभाषा का सफल प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सार्थक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विश्लेषणात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) लेखक के लिए मुश्किल की बात क्या थी?
(ख) लेखक किन्हें अंधविश्वास कहता था?
(ग) जीजी किन कार्यों में लेखक का सहयोग लेती थी?
उत्तर:
(क) लेखक के लिए मुश्किल बात यह थी कि बाल्यावस्था से ही उसे सर्वाधिक प्यार उसकी जीजी से प्राप्त हुआ था। वह रीति-रिवाज़ों तथा पूजा-अनुष्ठानों में पूरा विश्वास रखती थीं।

(ख) लेखक सभी रीति-रिवाज़ों, तीज-त्योहारों तथा पूजा-अनुष्ठानों को अंधविश्वास कहता था।

(ग) जीजी सभी प्रकार के पूजा-विधान, त्योहारों-अनुष्ठानों आदि में लेखक का पूरा सहयोग लेती थीं।

[5] लेकिन इस बार मैंने साफ इनकार कर दिया। नहीं फेंकना है मुझे बाल्टी भर-भर कर पानी इस गंदी मेढक-मंडली पर। जब जीजी बाल्टी भर कर पानी ले गईं उनके बूढ़े पाँव डगमगा रहे थे, हाथ काँप रहे थे, तब भी मैं अलग मुँह फुलाए खड़ा रहा। शाम को उन्होंने लड्डू-मठरी खाने को दिए तो मैंने उन्हें हाथ से अलग खिसका दिया। मुँह फेरकर ‘बैठ गया, जीजी से बोला भी नहीं। पहले वे भी तमतमाई, लेकिन ज्यादा देर तक उनसे गुस्सा नहीं रहा गया। पास आ कर मेरा सर अपनी गोद में लेकर बोली, “देख भइया रूठ मत। मेरी बात सुन। यह सब अंधविश्वास नहीं है। हम इन्हें पानी नहीं देंगे तो इंद्र भगवान हमें पानी कैसे देंगे?” मैं कुछ नहीं बोला। फिर जीजी बोलीं। “तू इसे पानी की बरबादी समझता है पर यह बरबादी नहीं है। यह पानी का अर्घ्य चढ़ाते हैं, जो चीज़ मनुष्य पाना चाहता है उसे पहले देगा नहीं तो पाएगा कैसे? इसीलिए ऋषि-मुनियों ने दान को सबसे ऊँचा स्थान दिया है।” [पृष्ठ-102]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। इस बार लेखक ने जीजी को साफ मना कर दिया कि वह इस गंदी मेढक-मंडली पर पानी नहीं डालेगा।

व्याख्या-लेखक कहता है कि जीजी ने उसे बहुत समझाया कि वह इंदर सेना पर पानी डाले. परंत लेखक ने स्पष्ट कह दिया कि वह इन गंदे युवकों की मंडली पर बाल्टी भर-भर कर पानी नहीं डालेगा। परंतु जीजी बाल्टी भरकर पानी ले आई। उस समय उसके बूढ़े पाँव डगमगा रहे थे और हाथ काँप रहे थे, परंतु लेखक ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया। वह जीजी से नाराज़ होकर एक तरफ खड़ा रहा। शाम को जीजी ने लेखक को खाने के लिए लड्ड और मठरी दी, परंतु लेखक ने अपने हाथ से खाने के सामान को दूर कर दिया और वह जीजी की ओर से मुँह फेर कर बैठ गया। यहाँ तक कि वह जीजी से बोला भी नहीं। लेखक की यह हरकत देखकर जीजी को पहले गुस्सा आया, परंतु यह गुस्सा क्षण भर का था।

जल्दी ही जीजी का गुस्सा दूर हो गया। उसने लेखक के सिर को अपनी गोद में लेते हुए कहा- देखो मैया, मुझसे इस तरह नाराज़ मत हो और मेरी बात को जरा ध्यान से सुनो। इंदर सेना पर पानी की बाल्टी भर कर डालना कोई अंधविश्वास नहीं है। यदि हम इंद्र भगवान को पानी दान नहीं करेंगे तो बदले में वे हमें पानी नहीं देंगे। यह सुनकर भी लेखक ने कोई उत्तर नहीं दिया। जीजी फिर कहने लगी कि जिसे तू पानी की बरबादी समझ रहा है, वह कोई बरबादी नहीं है। वह तो इंद्र देवता को जल चढ़ाना और पूजा करना है। मनुष्य अपने जीवन में जो वस्तु पाना चाहता है उसके बदले उसे पहले कुछ देना पड़ता है। यदि वह कुछ देगा नहीं तो पाएगा कैसे। यही कारण है कि हमारे देश में ऋषियों ने दान को जीवन में सर्वोत्तम स्थान दिया है। भाव यह है कि यदि हम कुछ दान करेंगे तो बदले में कुछ प्राप्त कर पाएँगे। अतः इंद्र देवता को जल चढ़ाना किसी भी दृष्टि से जल की बरबादी नहीं है। इंद्र देवता ही तो बाद में हमें वर्षा के रूप में बहुत-सा पानी देते हैं।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने दान के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि जीवन में त्याग से ही सख की प्राप्ति होती है।
  2. सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सटीक व भावानुकूल है।
  4. संवादात्मक शैली का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) लेखक ने किस बात से साफ इंकार कर दिया?
(ख) जब जीजी बाल्टी भरकर पानी ले आई तो उनके शरीर की हालत कैसी थी?
(ग) लेखक ने लड्ड-मठरी को अलग से क्यों खिसका दिया?
(घ) जीजी ने क्या तर्क देकर सिद्ध किया कि इंद्र देवता को पानी देना पानी की बरबादी नहीं है?
उत्तर:
(क) लेखक ने इस बात से साफ इंकार कर दिया कि वह मेढक-मंडली पर बाल्टी भर-भर कर पानी नहीं डालेगा। क्योंकि वह इसे पानी की बरबादी मानता है।

(ख) जब जीजी बाल्टी भर कर पानी लाई तब उनके बूढ़े पैर डगमगा रहे थे और उनके हाथ काँप रहे थे।

(ग) लेखक जीजी से नाराज़ था। उसने स्पष्ट कह दिया था कि वह गंदी मेंढक-मंडली पर पानी नहीं फैंकेगा। इसलिए जब जीजी ने उसे खाने के लिए लड्ड, मठरी दिए तो लेखक ने उन्हें दूर खिसका दिया।

(घ) जीजी ने यह तर्क दिया कि यह पानी हम इंद्र देवता को अर्घ्य के रूप में चढ़ाते हैं। मनुष्य अपने जीवन में जो कुछ पाना चाहता है तो बदले में उसे पहले कुछ देना पड़ता है अन्यथा उसे कुछ नहीं मिलता, इसी को दान कहते हैं। ऋषि-मुनियों ने भी दान को जीवन में सर्वोत्तम स्थान दिया है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे

[6] “देख बिना त्याग के दान नहीं होता। अगर तेरे पास लाखों-करोड़ों रुपये हैं और उसमें से तू दो-चार रुपये किसी को दे दे तो यह क्या त्याग हुआ। त्याग तो वह होता है कि जो चीज़ तेरे पास भी कम है, जिसकी तुझको भी ज़रूरत है तो अपनी ज़रूरत पीछे रख कर दूसरे के कल्याण के लिए उसे दे तो त्याग तो वह होता – है, दान तो वह होता है, उसी का फल मिलता है।” [पृष्ठ-103]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। यह कथन जीजी का है। वे लेखक को त्याग के महत्त्व के बारे में बताती हुई कहती है कि-

व्याख्या-त्याग के बिना दान नहीं हो सकता। यदि तुम्हारे पास लाखों-करोड़ों रुपयों की धन-राशि है और तुमने उसमें से दो-चार रुपये दान में दे भी दिए तो यह त्याग नहीं कहलाता। त्याग उस वस्तु का होता है जो पहले ही तुम्हारे पास कम मात्रा में है और तुम्हें उसकी नितांत आवश्यकता भी है। परंतु यदि तुम अपनी आवश्यकता की परवाह न करते हुए दूसरे व्यक्ति के भले के लिए उसे त्याग देते हो तो वही सच्चा दान कहलाता है। इस प्रकार के दान का ही हमें फल मिलता है। कहने का भाव यह है कि सच्चा दान उसी वस्तु का होता है, जो तुम्हारे पास बहुत कम है और तुम्हें भी उसकी ज़रूरत होती है लेकिन तुम अपनी ज़रूरत की चिंता न करते हुए दूसरे व्यक्ति के कल्याणार्थ उसे दे देते हो तो वही सच्चा दान कहा जाएगा।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने जीजी के माध्यम से त्याग व दान के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।
  2. सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. संवादात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) यह कथन किसने किसको कहा है? और क्यों कहा है?
(ख) लाखों-करोड़ों रुपये में से दो-चार रुपये का दान करने का क्या महत्त्व है?
(ग) सच्चा त्याग किसे कहा गया है?
(घ) किस प्रकार के दान का फल मिलता है?
उत्तर:
(क) यह कथन जीजी ने लेखक से कहा है। इस कथन द्वारा वह उसे सच्चे त्याग और दान से अवगत कराना चाहती है।

(ख) लाखों-करोड़ों रुपयों में से दो-चार रुपयों का किया गया दान कोई महत्त्व नहीं रखता। यह तो मात्र दान देने का ढकोसला है।

(ग) सच्चा त्याग वह होता है कि यदि किसी वस्तु की हमारे पास कमी हो और उसकी हमें ज़रूरत भी हो और परंतु फिर भी हम अपनी ज़रूरत को पीछे रखकर दूसरों के कल्याणार्थ उसे दान में दे देते हैं, वही सच्चा त्याग कहलाता है।

(घ) त्याग और कल्याण की भावना से किए गए दान का फल अवश्य मिलता है।

[7] फिर जीजी बोली, “देख तू तो अभी से पढ़-लिख गया है। मैंने तो गाँव के मदरसे का भी मुँह नहीं देखा। पर एक बात देखी है कि अगर तीस-चालीस मन गेहूँ उगाना है तो किसान पाँच-छह सेर अच्छा गेहूँ अपने पास से लेकर ज़मीन में क्यारियाँ बना कर फेंक देता है। उसे बुवाई कहते हैं। यह जो सूखे हम अपने घर का पानी इन पर फेंकते हैं वह भी बुवाई है। यह पानी गली में बोएँगे तो सारे शहर, कस्बा, गाँव पर पानीवाले बादलों की फसल आ जाएगी। हम बीज बनाकर पानी देते हैं, फिर काले मेघा से पानी माँगते हैं। सब ऋषि-मुनि कह गए हैं कि पहले खुद दो तब देवता तुम्हें चौगुना-अठगुना करके लौटाएँगे भइया, यह तो हर आदमी का आचरण है, जिससे सबका आचरण बनता है। यथा राजा तथा प्रजा सिर्फ यही सच नहीं है। सच यह भी है कि यथा प्रजा तथा राजा। यही तो गाँधी जी महाराज कहते हैं।” [पृष्ठ-103]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। यहाँ जीजी दान का महत्त्व समझाने के लिए एक और उदाहरण देती है। वह लेखक से कहती है कि

व्याख्या-तुम तो पढ़-लिखकर विद्वान बन गए हो, परंतु जहाँ तक मेरा प्रश्न है, मैं गाँव के स्कूल में आज तक नहीं गई। मुझे तो यह भी पता नहीं कि स्कूल कैसा होता है। लेकिन मैं एक बात जानती हूँ कि यदि किसान को अपने खेत में तीस-चालीस मन अनाज उगाना हो तो पहले वह अपने खेत में क्यारियाँ बनाकर पाँच-सेर गेहूँ उसमें बीज के रूप में डालता है। इसी को हम बुआई कहते हैं। इस समय यहाँ सूखा पड़ा हुआ है। हम जो अपने घर का पानी इंद्र सेना पर डालते हैं, वह एक प्रकार से बुआई है। हम अपनी गली में पानी बोएँगे जिससे सारे नगर-कस्बे, शहर में बादल वर्षा करेंगे। यह वर्षा ही हमारी फसल है।

हम बीज के रूप में पानी का दान करते हैं, बाद में काले बादल से पानी माँगते हैं। हमारे देश के ऋषि-मुनि भी यही कह गए हैं कि पहले तुम स्वयं दान करो, देवता तुम्हें चार गुणा और आठ गुणा करके वह दान वापिस करेंगे। यह आचरण प्रत्येक व्यक्ति का है। अन्य शब्दों में यह सबका आचरण बन जाता है। केवल यह सत्य नहीं है यथा राजा तथा प्रजा, बल्कि यह भी सत्य है कि यथा प्रजा तथा राजा। गाँधी जी ने भी इस बात का समर्थन किया था। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि लोग जैसा आचरण करते हैं, राजा को वैसा आचरण करना पड़ता है। हमारे देवता भी तो राजा हैं। जब लोग उनकी पूजा-अर्चना करेंगे, कुछ दान देंगे तो बदले में हमें भी बहुत

विशेष-

  1. यहाँ जीजी ने किसान के उदाहरण द्वारा दान की महिमा का प्रतिपादन किया है।
  2. जीजी ने तर्कसंगत भाषा में अपने विचारों को व्यक्त किया है।
  3. सहज, सरल भाषा का प्रयोग हुआ है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. संवादात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) जीजी ने लोगों द्वारा पानी दान करने की परंपरा को उचित क्यों ठहराया है?
(ख) जीजी द्वारा पानी दान करने की समानता किससे की गई है?
(ग) ‘यथा राजा तथा प्रजा’ और ‘यथा प्रजा तथा राजा’ में क्या अंतर है?
(घ) गाँधी जी ने प्रजा और राजा के आचरण में किसे अधिक महत्त्वपूर्ण माना है?
(ङ) ऋषि-मुनि क्या कह गए हैं?
उत्तर:
(क) जीजी ने यह तर्क दिया है कि बादलों को पानी दान करने से बादलों से वर्षा का जल प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए वे इंदर सेना के लिए पानी दान करने की परंपरा को उचित ठहराती हैं।

(ख) जीजी द्वारा पानी दान करने की समानता किसानों से की गई है। जिस प्रकार किसान खेत में तीस-चालीस मन गेहूँ उगाने के लिए पाँच-छः सेर अच्छा गेहूँ बुआई के रूप में डालते हैं। किसान की यह बुआई ही एक प्रकार का दान है। इसी प्रकार काले मेघा से वर्षा पाने के लिए पानी की कुछ बाल्टियाँ दान करना मानों पानी की बुआई है।

(ग) ‘यथा राजा तथा प्रजा’ का अर्थ है-राजा जैसा आचरण करता है, प्रजा भी उसे देखकर वैसा ही आचरण करती है। ‘यथा प्रजा तथा राजा’ का अर्थ है जिस देश की प्रजा जैसा आचरण करती है। वहाँ का राजा भी वैसा ही आचरण करता है। अन्य शब्दों में जनता का आचरण राजा को अवश्य प्रभावित करता है।

(घ) गाँधी जी ने प्रजा के आचरण को अधिक महत्त्वपूर्ण माना है। उनका कहना था कि प्रजा के आचरण को देखकर राजा को अपना आचरण बदलना पड़ता है। गाँधी जी ने सत्याग्रह आंदोलन द्वारा इस उक्ति को चरितार्थ कर दिखाया था।

(ङ) ऋषि-मुनियों का कहना है कि मनुष्य को पहले स्वयं त्यागपूर्वक दान करना चाहिए तभी देवता उसे अनेक गुणा देते हैं।

[8] इन बातों को आज पचास से ज़्यादा बरस होने को आए पर ज्यों की त्यों मन पर दर्ज हैं। कभी-कभी कैसे-कैसे संदर्भो में ये बातें मन को कचोट जाती हैं, हम आज देश के लिए करते क्या हैं? माँगें हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी हैं पर त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं है। अपना स्वार्थ आज एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम चटखारे लेकर इसके या उसके भ्रष्टाचार की बातें करते हैं पर क्या कभी हमने जाँचा है कि अपने स्तर पर अपने दायरे में हम उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे है? काले मेघा दल के दल उमड़ते हैं, पानी झमाझम बरसता है, पर गगरी फूटी की फूटी रह जाती है, बैल पियासे के पियासे रह जाते हैं? आखिर कब बदलेगी यह स्थिति? [पृष्ठ-103]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ से उद्धृत है। इसके लेखक डॉ० धर्मवीर भारती हैं। यह लेखक का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। यहाँ लेखक ने जीजी के द्वारा दिए गए संदेश को स्वीकार करते हुए देश की वर्तमान दशा पर प्रकाश डाला है।

व्याख्या लेखक कहता है कि इन बातों को गुजरे हुए पचास वर्ष हो चुके हैं। लेकिन जीजी की बातें आज भी मन पर अंकित हैं। ऐसे अनेक संदर्भ आते हैं जब ये बातें मन पर चोट पहुँचाती हैं। हम देश की वर्तमान हालत देखकर व्याकुल हो उठते हैं। लेखक कहता है कि हमने अपने देश के लिए कुछ भी नहीं किया। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम देश के सामने अनेक माँगें प्रस्तुत करते हैं, परंतु हमारे अंदर त्याग तनिक भी नहीं है। हम सब स्वार्थी बन गए हैं और स्वार्थ पूरा करना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम लोगों में व्याप्त भ्रष्टाचार की खूब चर्चा करते हैं। उनकी निंदा करके हमें बहुत आनंद आता है।

लेकिन हमने यह नहीं सोचा कि निजी स्तर पर हम अपने क्षेत्र में उसी भ्रष्टाचार का हिस्सा तो नहीं बन गए हैं। भाव यह है कि हम स्वयं तो भ्रष्टाचार से लिप्त हैं। भ्रष्ट उपाय अपनाकर हम अपना काम निकालते हैं। काले मेघा के समूह आज भी उमड़-घुमड़कर आते हैं। खूब पानी बरसता है। पर गगरी फूटी-की-फूटी रह जाती है और हमारे बैल प्यासे मरने लगते हैं। भाव यह है कि हमारे देश में धन और संसाधनों की कोई कमी नहीं है, फिर भी लोग अभावग्रस्त और गरीब हैं। भ्रष्टाचार के कारण ये संसाधन आम लोगों तक नहीं पहुंच पाते। लेखक अंत में सोचता है कि इस स्थिति में कब परिवर्तन होगा और हमारे देश में कब समाजवाद का उदय होगा?

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने देश में व्याप्त भ्रष्टाचार और उससे उत्पन्न स्थिति पर समुचित प्रकाश डाला है।
  2. सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सटीक व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विवेचनात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 13 काले मेघा पानी दे

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) कौन-सी बात लेखक के मन में ज्यों-की-त्यों दर्ज है?
(ख) कौन-सी बात लेखक के मन को कचोट रही है?
(ग) भ्रष्टाचार के बारे में लोगों का आचरण कैसा है?
(घ) पानी बरसने पर भी गगरी क्यों फूटी रहती है? बैल क्यों प्यासे रह जाते हैं?-इन पंक्तियों में निहित अर्थ क्या है?
उत्तर:
(क) बचपन में जीजी ने लेखक को बताया था कि देवता से आशीर्वाद पाने के लिए हमें पहले स्वयं कुछ दान करना पड़ता है। इसीलिए तो बादलों से वर्षा पाने के लिए पानी का दान किया जाता है। इस बात ने लेखक के मन को अत्यधिक प्रभावित किया था। इसलिए यह बात आज भी लेखक के मन में अंकित है।

(ख) लेखक के मन को यह बात कचोटती है कि आज लोग सरकार के सामने बड़ी-बड़ी माँगें रखते हैं और अपने स्वार्थों को पूरा करने में संलग्न हैं किंतु न तो कोई देश के लिए त्याग करना चाहता है और न ही अपने कर्तव्य का पालन करना चाहता है।

(ग) भ्रष्टाचार को लेकर लोग चटखारे लेकर बातें करते हैं और भ्रष्ट लोगों की निंदा भी करते हैं किंतु वे स्वयं इस भ्रष्टाचार के अंग बन चुके हैं। आज हर आदमी किसी-न-किसी प्रकार से भ्रष्टाचार की दलदल में फंसा हुआ है।

(घ) इस कथन का आशय है कि हमारे देश में धन और संसाधनों की कोई कमी नहीं है, परंतु भ्रष्टाचार के कारण ये संसाधन लोगों तक नहीं पहुंच पाते जिसके फलस्वरूप लोग गरीब व अभावग्रस्त हैं।

काले मेघा पानी दे Summary in Hindi

काले मेघा पानी दे लेखिका-परिचय

प्रश्न-
धर्मवीर भारती का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
धर्मवीर भारती का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय धर्मवीर भारती का जन्म 2 दिसंबर, 1926 को इलाहाबाद के अतरसुईया मोहल्ले में हुआ। उनके पिता का नाम चरंजीवी लाल तथा माता का नाम चंदी देवी था। बचपन में ही उनके पिता का असामयिक निधन हो गया। फलस्वरूप बालक धर्मवीर को अनेक कष्ट झेलने पड़े। सन् 1942 में उन्होंने कायस्थ पाठशाला के इंटर कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया, जिसके कारण उनकी पढ़ाई एक वर्ष के लिए रुक गई। सन् 1945 में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से बी०ए० की परीक्षा उत्तीर्ण की। सर्वाधिक अंक प्राप्त करने के कारण इन्हें ‘चिंतामणिघोष मंडल’ पदक मिला। सन 1947 में उन्होंने हिंदी में एम०ए० की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1954 में उन्होंने ‘सिद्ध साहित्य’ पर पी०एच०डी० की उपाधि प्राप्त की और प्रयाग विश्वविद्यालय में ही प्राध्यापक नियुक्त हुए, परंतु शीघ्र ही वे “धर्मयुग” के संपादक उन्होंने “कॉमन वेल्थ रिलेशंस कमेटी” के निमंत्रण पर इंग्लैंड की यात्रा की। उन्हें पश्चिमी जर्मनी जाने का भी मौका मिला। सन् 1966 में भारतीय दूतावास के अतिथि बनकर इंडोनेशिया व थाईलैंड की यात्रा की। आगे चलकर उन्होंने भारत-पाक युद्ध के काल में बंगला देश की गुप्त यात्रा की और ‘धर्मयुग’ में युद्ध के रोमांच का वर्णन किया। साहित्यिक सेवाओं के कारण सन् 1972 में भारत सरकार ने उन्हें “पद्मश्री” से सम्मानित किया। 5 सितबर, 1997 को उनका निधन हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-धर्मवीर भारती की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-
काव्य रचनाएँ-‘दूसरा सप्तक की कविताएँ (1951), ‘ठंडा लोहा’ (1952) ‘सात-गीत वर्ष’, ‘कनुप्रिया’ (1959)।
उपन्यास-‘गुनाहों का देवता’, ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’।
गीति नाट्य-अंधा युग’।
कहानी-संग्रह-‘मुर्दो का गाँव’, ‘चाँद और टूटे हुए लोग’, ‘बंद गली का आखिरी मकान’।
निबंध-संग्रह-‘ठेले पर हिमालय’, ‘कहनी-अनकहनी’, ‘पश्यंती’, ‘मानव मूल्य और साहित्य’।
आलोचना-‘प्रगतिवाद’, ‘एक समीक्षा’।
एकांकी-संग्रह ‘नदी प्यासी थी’।

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3. साहित्यिक विशेषताएँ-धर्मवीर भारती स्वतंत्रता के बाद के साहित्यकारों में विशेष स्थान रखते हैं। उन्होंने हर उम्र और हर वर्ग के पाठकों के लिए अलग-अलग रचनाएँ लिखी हैं। उनके साहित्य में व्यक्ति स्वातंत्र्य, मानवीय संकट तथा रोमानी चेतना आदि प्रवृत्तियाँ देखी जा सकती हैं, परंतु वे सामाजिकता और उत्तरदायित्व को अधिक महत्त्व देते हैं। इनके आरंभिक काव्य में हमें रोमानी भाव-बोध देखने को मिलता है। “गुनाहों का देवता” इनका सर्वाधिक लोकप्रिय उपन्यास है। इसमें एक सरस और भावप्रवण प्रेम कथा है। ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ भी भारती जी का एक लोकप्रिय उपन्यास है, जिस पर एक हिंदी फिल्म भी बन चुकी है। ‘अंधा युग’ में कवि ने आज़ादी के बाद गिरते हुए जीवन मूल्यों, अनास्था, मोहभंग, विश्वयुद्धों से उत्पन्न भय आदि का वर्णन किया है।

‘काले मेघा पानी दे’ भारती जी का एक प्रसिद्ध संस्मरण है जिसमें उन्होंने लोक प्रचलित विश्वास तथा विज्ञान के द्वंद्व का चित्रण किया है। प्रस्तुत संस्मरण किशोर जीवन से संबंधित है। इसमें दिखाया गया है कि किस प्रकार गाँवों के बच्चों की इंदर सेना अनावृष्टि को दूर करने के लिए द्वार-द्वार पर पानी माँगती चलती है।

4. भाषा-शैली-भारती जी आरंभ से ही सरल भाषा के पक्षपाती रहे हैं। उन्होंने प्रायः जन-सामान्य की बोल-चाल की भाषा का ही प्रयोग किया है जिसमें तत्सम, देशज तथा विदेशी शब्दावली का उपयुक्त प्रयोग किया है। अपनी रचनाओं में वे उर्दू, फारसी तथा अंग्रेज़ी शब्दों के साथ-साथ तद्भव शब्दों का भी खुलकर मिश्रण करते हैं। विशेषकर, निबंधों में उनकी भाषा पूर्णतया साहित्यिक हिंदी भाषा कही जा सकती है। ‘काले मेघा पानी दे’ वस्तुतः भारती जी का एक उल्लेखनीय संस्मरण है जिसमें सहजता के साथ-साथ आत्मीयता भी है। बड़ी-से-बड़ी बात को वे वार्तालाप शैली में कहते हैं और पाठकों के हृदय को छू लेते हैं। अपने निबन्ध तथा रिपोर्ताज में उन्होंने सामान्य हिंदी भाषा का प्रयोग किया है। एक उदाहरण देखिए-

“मैं असल में था तो इन्हीं मेढक-मंडली वालों की उमर का, पर कुछ तो बचपन के आर्यसमाजी संस्कार थे और एक कुमार-सुधार सभा कायम हुई थी उसका उपमंत्री बना दिया गया था-सो समाज-सुधार का जोश कुछ ज्यादा ही था। अंधविश्वासों के खिलाफ तो तरकस में तीर रखकर घूमता रहता था।”

काले मेघा पानी दे पाठ का सार

प्रश्न-
धर्मवीर भारती द्वारा रचित संस्मरण ‘काले मेघा पानी दे’ का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
‘काले मेघा पानी दे’ धर्मवीर भारती का एक प्रसिद्ध संस्मरण है, जिसे निबंध भी कहा जा सकता है। इसमें लोक-प्रचलित विश्वास तथा विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया गया है। विज्ञान तर्क के सहारे चलता है और लोक-जीवन विश्वास के सहारे। दोनों के अलग-अलग दृष्टिकोण हैं। लेखक ने इन दोनों पक्षों को प्रस्तुत किया है और यह निर्णय पाठकों पर छोड़ दिया है कि वे किसे ग्रहण करना चाहते हैं और किसे छोड़ना चाहते हैं।
1. अनावृष्टि और इंदर सेना का गठन-जब वर्षा की प्रतीक्षा करते-करते न केवल धरती, बल्कि लोगों के मन भी सूख जाते थे। तब इस अवसर पर गाँव के नंग-धडंग लड़के लंगोटीधारी युवकों की टोली का गठन करते हैं। ये किशोर ‘गंगा मैया की जय’ बोलते हुए गलियों में निकल पड़ते थे। वे प्रत्येक घर के बाहर जाकर आवाज़ लगाते थे “पानी दे मैया, इंदर सेना आई है”। घर की औरतें दुमंजिले के बारजे पर चढ़ जाती थी और वहाँ से उन पर घड़े का पानी उड़ेल देती थीं। वे बच्चे उस पानी से भीग कर नहाते थे और गीली मिट्टी में लोटते हुए कहते थे
“काले मेघा पानी दे
गगरी फूटी बैल पियासा
पानी दे, गुड़धानी दे
काले मेघा पानी दे।”
इस काल में सभी लोग गर्मी के मारे जल रहे होते थे। कुएँ तक सूख जाते थे और खेतों की मिट्टी सूखकर पत्थर बन जाती थी। पशु-पक्षी भी प्यास के मारे तड़पने लगते थे। परंतु आकाश में कहीं कोई बादल नज़र नहीं आता था। हार कर लोग पूजा-पाठ और कथा विधान भी बंद कर देते थे। इस अवसर पर इंदर सेना कीचड़ से लथपथ होकर काले बादलों को पुकारते हुए गलियों में हुड़दंग मचाती हुई निकलती थी।

2. लेखक द्वारा विरोध-लेखक भी इन किशोरों की आयु का ही था। वह बचपन से ही आर्यसमाज से प्रभावित था। वह कुमार-सुधार सभा का उपमंत्री भी था। इसलिए वह इसे अंधविश्वास मानता था और किशोरों की इस इंदर सेना को मेढक-मंडली का नाम देता था। उसका यह तर्क था कि जब पहले ही पानी की इतनी भारी कमी है तो फिर लोग कठिनाई से लाए हुए पानी को व्यर्थ में क्यों बरबाद कर रहे हैं। अगर यह किशोर सेना इंदर की है तो ये लोग सीधे-सीधे इंद्र देवता से गुहार क्यों नहीं लगाते। लेखक का विचार है कि इस प्रकार के अंधविश्वासों के कारण ही हमारा देश पिछड़ गया और गुलाम हो गया।

3. जीजी के प्रति लेखक का विश्वास-लेखक के मन में अपनी जीजी के प्रति बहुत विश्वास था। वह इंद्र सेना और अन्य विश्वासों को बहुत मानती थी। वह प्रत्येक प्रकार की पूजा और अनुष्ठान लेखक के हाथों करवाती थी, ताकि उसका फल लेखक को प्राप्त हो। जीजी चाहती थी कि लेखक भी इंदर सेना पर पानी फैंके, परंतु लेखक ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। जीजी काफी वृद्ध हो चुकी थी, फिर भी उसने कांपते हाथों से बच्चों पर पानी की बाल्टी फेंकी। लेखक न तो जीजी से बोला और न ही उसके हाथों से लड्डू-मठरी खाई।

4. जीजी और लेखक के बीच विवाद-जीजी का कहना था कि यदि हम इंद्र भगवान को पानी नहीं देंगे, तो वह हमें कैसे पानी देंगे। परंतु लेखक का कहना था कि यह एक कोरा अंधविश्वास है। इसके विपरीत जीजी ने तर्क देते हुए कहा कि यह पानी की बरबादी नहीं है, बल्कि इंद्र देवता को चढ़ाया गया अर्घ्य है। यदि मानव अपने हाथों से कुछ दान करेगा तो ही वह कुछ पाएगा। हमारे यहाँ ऋषि-मुनियों ने भी त्याग और दान की महिमा का गान किया है। त्याग वह नहीं है जो करोड़ों रुपयों में से कुछ रुपये दान किए जाएँ, परंतु जो चीज़ तुम्हारे पास कम है उसमें से दान या त्याग करना महत्त्वपूर्ण है।

यदि वह दान लोक-कल्याण के लिए किया जाएगा, उसका फल अवश्य मिलेगा। लेखक इस तर्क से हार गया। फिर भी वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। तब जीजी ने एक और तर्क दिया कि किसान तीस-चालीस मन गेहूँ पैदा करने के लिए पाँच-छः सेर गेहूँ अपनी ओर से बोता है। इसी प्रकार सूखे में पानी फैंकना, पानी बोने के समान है। जब हम इस पानी को बोएँगे तो आकाश में बादलों की फसलें लहराने लगेंगी। पहले हम चार गना वापिस लौटाएँगे। यह कहना सच नहीं है कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’ किंत हमें यह कहना चाहिए कि “यथा प्रजा तथा राजा” गांधी जी ने भी इसी दृष्टिकोण का समर्थन किया था।

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5. लेखक का निष्कर्ष यह घटना लगभग पचास वर्ष पहले की है, लेकिन इसका प्रभाव लेखक के मन पर अब भी है। वह मन-ही-मन सोचता है कि हम देश के लिए क्या कर रहे हैं। हम सरकार के सामने बड़ी-बड़ी मांगें रखते हैं, लेकिन हमारे अंदर त्याग की कोई भावना नहीं है। भले ही हम लोग भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, परंतु हम सभी भ्रष्टाचार से लिप्त हैं। यदि हम स्वयं को सुधार लें तो देश और समाज स्वयं सुधर जाएगा, परंतु इस दृष्टिकोण से कोई नहीं सोचता। काले मेघ अब भी पानी बरसाते हैं, लेकिन गगरी फूटी-की-फूटी रह जाती है। बैल प्यासे रह जाते हैं। पता नहीं यह हालत कब सुधरेगी?

कठिन शब्दों के अर्थ

मेघा = बादल। इंदर सेना = इंद्र के सिपाही। मेढक-मंडली = कीचड़ से लिपटे हुए मेढकों जैसे किशोर। नग्नस्वरूप = बिल्कुल नंगे। काँदो = कीचड़। अगवानी = स्वागत। सावधान = सचेत, जागरूक। छज्जा = मुंडेर। बारजा = मुंडेर के साथ वाला स्थान। समवेत = इकट्ठा, सामूहिक। गगरी = घड़ा। गुड़धानी = गुड़ और चने से बना एक प्रकार का लड्डू। धकियाना = धक्का देना। दुमहले = दो मंजिलों वाला। सहेज = सँभालना। तर करना = भिगोना। बदन = शरीर। हाँक = जोर की आवाज़। टेरते = पुकारते। त्राहिमाम = मुझे बचाओ। दसतपा = तपते हुए दस दिन। पखवारा = पंद्रह दिन का समय, पाक्षिक। क्षितिज = वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं। खौलता हुआ = बहुत गर्म । जुताई = खेतों में हल चलाना। ढोर-ढंगर = पशु। कथा-विधान = धार्मिक कथाएँ कहना। निर्मम = कठोर। क्षति = हानि। पाखंड = ढोंग। संस्कार = आदतें। तरकस में तीर रखना = विनाश करने के लिए तैयार रहना। प्राण बसना = प्रिय होना। तमाम = सभी। पूजा-अनुष्ठान = पूजा का काम। खान = भंडार। जड़ से उखाड़ना = पूरी तरह नष्ट करना। सतिया = स्वास्तिक का चिह्न। पंजीरी = गेहूँ के आटे और गुड़ से बनी हुई मिठाई। छठ = एक पर्व का नाम। कुलही = मिट्टी का छोटा बर्तन। अरवा चावल = ऐसा चावल जो धान को बिना उबाले निकाला गया हो। मुँह फुलाना = नाराज़ होना। तमतमाना = क्रोधित होना। अर्घ्य = जल चढ़ाना। ढकोसला = दिखावा। किला पस्त होना = हारना। मदरसा = स्कूल । बुवाई = बीज होना। दर्ज होना = लिखना। कचोटना = बुरा लगना। चटखारे लेना = रस लेना, मजा लेना। दायरा = सीमा। अंग बनना = हिस्सा बनना। झमाझम = भरपूर।

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HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

Haryana State Board HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

HBSE 12th Class Hindi बाज़ार दर्शन Textbook Questions and Answers

पाठ के साथ

प्रश्न 1.
बाज़ार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?
उत्तर:
बाज़ार का जादू चढ़ने पर मनुष्य बाज़ार की आकर्षक वस्तुओं को खरीदने लगता है और अकसर अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेता है, परंतु जब बाज़ार का जादू उतर जाता है तो उसे पता चलता है कि जो वस्तुएँ उसने अपनी सुख-सुविधाओं के लिए खरीदी थीं, वे तो उसके आराम में बाधा उत्पन्न कर रही हैं।

प्रश्न 2.
बाज़ार में भगत जी के व्यक्तित्व का कौन-सा सशक्त पहलू उभरकर आता है? क्या आपकी नज़र में उनका आचरण समाज में शांति-स्थापित करने में मददगार हो सकता है?
उत्तर:
भगत जी चौक बाज़ार में चारों ओर सब कुछ देखते हुए चलते हैं, लेकिन वे बाज़ार के आकर्षण की ओर आकृष्ट नहीं होते। वे न तो बाजार को देखकर भौंचक्के हो जाते हैं और न ही बाजार की बनावटी चमक-दमक हुई अनेक प्रकार की वस्तुओं के प्रति न तो उन्हें लगाव होता है और न ही अलगाव, बल्कि वे तटस्थ भाव तथा संतुष्ट मन से सब कुछ देखते हुए चलते हैं। उन्हें तो केवल जीरा और काला नमक ही खरीदना होता है। इसलिए वे फैंसी स्टोरों पर न रुककर सीधे पंसारी की दुकान पर चले जाते हैं। उनके जीवन का यह पहलू सशक्त उभरकर हमारे सामने आता है।

निश्चय से भगत जी का यह आचरण समाज में शांति स्थापित करने में मददगार हो सकता है। अनावश्यक वस्तुओं का घर में संग्रह करने से घर-परिवार में अशांति ही बढ़ती है। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार ही वस्तुओं की खरीद करता है तो इससे बाज़ार में महंगाई भी नहीं बढ़ेगी और लोगों में संतोष की भावना उत्पन्न होगी जिससे समाज में शांति की व्यवस्था उत्पन्न होगी।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

प्रश्न 3.
‘बाज़ारूपन’ से क्या तात्पर्य है? किस प्रकार के व्यक्ति बाजार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाज़ार की सार्थकता किसमें है?
उत्तर:
‘बाज़ारूपन’ का अर्थ है-ओछापन। इसमें दिखावा अधिक होता है और आवश्यकता बहुत कम होती है। इसमें गंभीरता नहीं होती केवल ऊपरी सोच होती है। जिन लोगों में बाजारूपन होता है, वे बाजार को निरर्थक बना देते हैं, उसके महत्त्व को घटा देते हैं।

परंतु जो लोग आवश्यकता के अनुसार बाज़ार से वस्तुएँ खरीदते हैं, वे ही बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं। ऐसे लोगों के कारण ही बाज़ार में केवल वही वस्तुएँ बेची जाती हैं जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। ऐसी स्थिति में बाज़ार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन बनता है। भगत जी जैसे लोग जानते हैं कि उन्हें बाज़ार से क्या खरीदना है। अतः ऐसे लोग ही बाज़ार को सार्थक बनाते हैं।

प्रश्न 4.
बाज़ार किसी का लिंग, जाति, धर्म या क्षेत्र नहीं देखता; वह देखता है सिर्फ उसकी क्रय शक्ति को। इस रूप में वह एक प्रकार से सामाजिक समता की भी रचना कर रहा है। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं?
उत्तर:
यह कहना सही है कि बाज़ार किसी भी व्यक्ति का लिंग, जाति, धर्म अथवा क्षेत्र नहीं देखता। चाहे सवर्ण हो या अवर्ण, सूचित-अनुसूचित जातियों के लोग आदि सभी उसके लिए एक समान हैं। बाज़ार यह नहीं पूछता कि आप किस जाति अथवा धर्म से संबंधित हैं, वह तो केवल ग्राहक को महत्त्व देता है। ग्राहक के पास पैसे होने चाहिए, वह उसका स्वागत करता है। इस दृष्टि से बाज़ार निश्चय से सामाजिक समता की रचना करता है, क्योंकि बाज़ार के समक्ष चाहे ब्राह्मण हो या निम्न जाति का व्यक्ति हो, मुसलमान हो या ईसाई हो, सभी बराबर हैं। वे ग्राहक के सिवाय कुछ नहीं हैं। इस दृष्टिकोण से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। दुकानदार के पास सभी प्रकार के लोग बैठे हुए देखे जा सकते हैं। वह किसी से यह नहीं पूछता कि वह किस जाति अथवा. धर्म को मानने वाला है, परंतु मुझे एक बात खलती है, आज बढ़ती हुई आर्थिक विषमता के कारण केवल अमीर व्यक्ति ही बाज़ार में खरीददारी कर सकता है। महंगाई के कारण गरीब व्यक्ति बाज़ार जाने का साहस भी नहीं करता। फिर भी यह सत्य है कि बाज़ार सामाजिक समता की स्थापना करता है।

प्रश्न 5.
आप अपने तथा समाज से कुछ ऐसे प्रसंग का उल्लेख करें (क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ। (ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई।
उत्तर:
सचमुच पैसे में बड़ी शक्ति है। पैसे का हमारे जीवन में अत्यधिक महत्त्व है। जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब हम पैसे के अभाव को महसूस करते हैं। लेकिन यह भी सही है कि जीवन में पैसा ही सब कुछ नहीं है।
(क) जब पैसा शक्ति के परिचायक के रूप में प्रतीत हुआ-भले ही हमारे देश में कहने को तो लोकतंत्र है, लेकिन गरीब व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता। आज के माहौल में विधानसभा का चुनाव लड़ने के लिए कम-से-कम दो करोड़ रुपये तो चाहिए ही। आम आदमी इतने पैसे कहाँ से जुटा सकता है। अतः हमारे चुनाव भी पैसे की शक्ति के परिचायक बन चुके हैं। अमीर तथा दबंग लोग ही चुनाव लड़ते हैं और जीतकर पैसे बनाते हैं। चाहे कोई एम०एल०ए० हो या संसद सदस्य सभी करोड़पति हैं। इसी से पैसे की शक्ति का पता चल जाता है।

(ख) जब पैसे की शक्ति काम नहीं आई-पैसे में पर्याप्त शक्ति होती है, लेकिन जीवन में अनेक अवसर ऐसे भी आते हैं जब पैसे की शक्ति काम नहीं आती। सेठ जी के पुत्र को कैंसर हो गया। सेठ जी ने उसके उपचार पर लाखों रुपये खर्च कर दिए। यहाँ तक कि वह उसे ईलाज के लिए अमेरिका भी ले गया, लेकिन उसका बेटा बच नहीं सका। सेठ जी के पैसे की शक्ति भी काम नहीं आई।

पाठ के आसपास

प्रश्न 1.
बाज़ार दर्शन पाठ में बाजार जाने या न जाने के संदर्भ में मन की कई स्थितियों का जिक्र आया है आप इन स्थितियों से जुड़े अपने अनुभवों का वर्णन कीजिए।
(क) मन खाली हो
(ख) मन खाली न हो
(ग) मन बंद हो
(घ) मन में नकार हो
उत्तर:
(क) मन खाली हो-एक बार मैं बिना किसी उद्देश्य से एक मॉल में प्रवेश कर गया। मेरी जेब में पैसे भी काफी थे। यहाँ-वहाँ भटकते हुए मैं यह निर्णय नहीं कर पाया कि मैं घर के लिए कौन-सी वस्तु खरीदकर ले जाऊँ। आखिर मैंने बड़ा-सा एक रंग-बिरंगा खिलौना खरीद लिया। घर पहुँचते ही पता चला कि वह खिलौना चीन का बना हुआ था। एक घंटे बाद ही वह खिलौना खराब हो गया। अतः अब वह हमारे स्टोर की शोभा बढ़ा रहा है। यह सब मन खाली होने का परिणाम है।

(ख) मन खाली न हो-सर्दी आरंभ हो चुकी थी। मेरी माँ ने कहा कि बेटा एक गर्म जर्सी खरीद लो। दो-चार दिन बाद मैं अपने पिता जी के साथ बाज़ार चला गया। हमने बाज़ार में अनेक वस्तुएँ देखीं, लेकिन कुछ नहीं खरीदा। मैंने तो सोच लिया कि मुझे केवल एक गर्म जर्सी ही खरीदनी है। अन्ततः हम लायलपुर जनरल स्टोर पर गए। मैंने वहाँ से मनपसंद जर्सी खरीद ली और मैं पिता जी के साथ घर लौट आया।

(ग) मन बंद हो-एक दिन सायंकाल मैं अपने मित्रों के साथ बाज़ार गया। लेकिन मेरा मन बड़ा ही उदास था। दुकानदारों की आवाजें मुझे व्यर्थ लग रही थीं। मुझे बाज़ार की रौनक से भी अपकर्षण हो गया। कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था। मित्रों ने यहाँ-वहाँ से कछ सामान लिया लेकिन मैं खाली हाथ ही घर लौट आया।

(घ) मन में नकार हो मैं कुछ दिनों से दूरदर्शन पर जंकफूड के बारे में बहुत कुछ सुन रहा था। धीरे-धीरे मेरे मन में जंक फूड के प्रति घृणा-सी उत्पन्न हो गई। मैं अपने मित्रों के साथ एक अच्छे होटल में गया। वहाँ पर पीज़ा, बरगर, डोसा, चने-भटूरे आदि बहुत कुछ था। लेकिन मेरे मन में नकार की स्थिति बनी हुई थी। मेरा मन तो सादी दाल-रोटी खाने को कर रहा था। अतः मैं मित्रों के साथ वहाँ से भूखा ही लौटा और घर में अपनी माँ के हाथों से बनी सब्जी-रोटी ही खाई।

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प्रश्न 2.
बाज़ार दर्शन पाठ में किस प्रकार के ग्राहकों की बात हुई है? आप स्वयं को किस श्रेणी का ग्राहक मानते/मानती हैं?
उत्तर:
बाज़ार दर्शन पाठ में दो प्रकार के ग्राहकों की बात की गई है। प्रथम श्रेणी में वे ग्राहक आते हैं, जिनके मन खाली हैं तथा जिनके पास खरीदने की शक्ति ‘पर्चेजिंग पावर’ भी है। ऐसे लोग बाजार की चकाचौंध के शिव से अनावश्यक सामान खरीदकर अपने मन की शांति भंग करते हैं। द्वितीय श्रेणी में वे ग्राहक आते हैं जिनका मन खाली नहीं होता अर्थात जो मन में यह निर्णय करके बाज़ार जाते हैं कि वे बाज़ार से अमुक आवश्यक वस्तु खरीदकर लाएँगे। ऐसे ग्राहक भगत जी के समान होते हैं। मैं द्वितीय श्रेणी की ग्राहक हूँ। मैं हमेशा मन में यह निर्णय करके बाज़ार जाती हूँ कि मुझे बाज़ार से क्या खरीद कर लाना है।

प्रश्न 3.
आप बाज़ार की भिन्न-भिन्न प्रकार की संस्कृति से अवश्य परिचित होंगे। मॉल की संस्कृति और सामान्य बाज़ार और हाट की संस्कृति में आप क्या अंतर पाते हैं? पर्चेजिंग पावर आपको किस तरह के बाज़ार में नज़र आती है?
उत्तर:
आज के महानगरों में विभिन्न प्रकार के बाज़ार हैं-साप्ताहिक बाज़ार सप्ताह में एक बार लगता है। इसी प्रकार थोक बाज़ार, कपड़ा बाज़ार और करियाना बाज़ार भी हैं। फर्नीचर बाज़ार से केवल फर्नीचर मिलता है और पुस्तक बाज़ार से पुस्तकें। ये सभी हमारे जीवन से जुड़े हुए हैं। लेकिन मॉल आम लोगों के लिए नहीं है। उनमें केवल वही लोग जा सकते हैं जिनके पास काला धन होता है। गरीब लोगों के लिए वहाँ पर कोई स्थान नहीं है। सामान्य बाज़ार तथा हाट में अमीर-गरीब सभी लोग जाते हैं, क्योंकि इन बाजारों में आवश्यक वस्तुएँ उचित मूल्य पर मिल जाती हैं। पर्चेजिंग पावर मॉल में ही देखी जा सकती है जहाँ लोग अपना स्टेट्स दिखाते हैं। अनाप-शनाप खाते हैं और अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं। पूंजीपतियों के पास ही क्रय शक्ति होती है।

प्रश्न 4.
लेखक ने पाठ में संकेत किया है कि कभी-कभी बाज़ार में आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
लेखक के अनुसार ‘पर्चेजिंग पावर’ दिखाने वाले पूँजीपति लोग ही बाज़ार के ‘बाज़ारूपन’ को बढ़ाते हैं। इन लोगों के कारण बाज़ार में छल-कपट तथा शोषण को बढ़ावा मिलता है। दुकानदार अकसर ग्राहक का शोषण करता हुआ नज़र आता है। लेकिन कभी-कभी हमारी आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है। हाल ही में आटा, चावल, चीनी, दालों तथा सब्जियों के दाम आकाश को छूने लग गए हैं। ये सभी वस्तुएँ हमारी नित्य-प्रतिदिन की आवश्यकता की वस्तुएँ हैं। लेकिन दुकानदार तथा बिचौलिए खुले आम हमारा शोषण कर रहे हैं। यदि घर में गैस का सिलिंडर नहीं है तो हम इसे अधिक दाम देकर खरीद लेते हैं और शोषण का शिकार बनते हैं। मैं लेखक के इस विचार से सहमत हूँ कि प्रायः आवश्यकता ही शोषण का रूप धारण कर लेती है।

प्रश्न 5.
स्त्री माया न जोड़े यहाँ माया शब्द किस ओर संकेत कर रहा है? स्त्रियों द्वारा माया जोड़ना प्रकृति प्रदत्त नहीं, बल्कि परिस्थितिवश है। वे कौन-सी परिस्थितियाँ होंगी जो स्त्री को माया जोड़ने के लिए विवश कर देती हैं?
उत्तर:
माया जोड़ने का अर्थ है-घर के लिए आवश्यक वस्तुओं का संग्रह करना और चार पैसे जोड़ना। स्त्री ही घर-गृहस्थी है। उसे ही घर-भर की सुविधाओं का ध्यान रखना होता है। वह प्रायः घर के लिए वही वस्तुएँ खरीदती है जो नितांत आवश्यक होती हैं।

अनेक बार कुछ स्त्रियाँ देखा-देखी अनावश्यक वस्तुएँ भी खरीद लेती हैं। वे पुरुषों की नज़रों में सुंदर दिखने के लिए अपना बनाव-श्रृंगार भी करती हैं और इसके लिए आकर्षक वस्त्र तथा आभूषण भी खरीदती हैं। पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की यह मज़बूरी बन गई है कि वह माया को जोड़े अन्यथा उसका अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।

आपसदारी

प्रश्न 1.
ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं के बराबर हो जाता है भगत जी की इस संतुष्ट निस्पृहता की कबीर की इस सूक्ति से तुलना कीजिए-
चाह गई चिंता गई मनुआँ बेपरवाह
जाके कछु न चाहिए सोइ सहंसाह। कबीर
उत्तर:
भगत जी बाज़ार से उतना ही सामान खरीदते हैं, जितनी उनको आवश्यकता होती है। ज़रूरत-भर जीरा-नमक लेने के बाद उनके लिए सारा बाज़ार और चौक न के बराबर हो जाता है। लगभग यही भाव कबीर के दोहे में व्यक्त हुआ है। जब मनुष्य की इच्छा पूरी हो जाती है तो उसका मन बेपरवाह हो जाता है। उस समय वह एक बादशाह के समान होता है। भगत जी की संतुष्ट निस्पृहता कबीर की इस सूक्ति से सर्वथा मेल खाती है। कबीर ने तो यह लिखा है, लेकिन भगत जी ने इस दोहे की भावना को अपने जीवन में ही उतार लिया है।

प्रश्न 2.
विजयदान देथा की कहानी ‘दुविधा’ (जिस पर ‘पहेली’ फिल्म बनी है) के अंश को पढ़ कर आप देखेंगे/देखेंगी कि भगत जी की संतुष्ट जीवन-दृष्टि की तरह ही गड़रिए की जीवन-दृष्टि है, इससे आपके भीतर क्या भाव जगते हैं?
गड़रिया बगैर कहे ही उस के दिल की बात समझ गया, पर अँगूठी कबूल नहीं की। काली दाढ़ी के बीच पीले दाँतों की हँसी हँसते हुए बोला ‘मैं कोई राजा नहीं हूँ जो न्याय की कीमत वसूल करूँ। मैंने तो अटका काम निकाल दिया। और यह अंगूठी मेरे किस काम की! न यह अँगुलियों में आती है, न तड़े में। मेरी भेड़ें भी मेरी तरह गँवार हैं। घास तो खाती हैं, पर सोना सूंघती तक नहीं। बेकार की वस्तुएँ तुम अमीरों को ही शोभा देती हैं।’-विजयदान देथा
उत्तर:
निश्चय से भगत जी की संतुष्ट जीवन-दृष्टि गड़रिए की जीवन-दृष्टि से मेल खाती है। मानव जितना भौतिक सुखों के पीछे भागता है, उतना ही वह अपने लिए असंतोष तथा अशांति का जाल बुनता जाता है। इस जाल में फंसे हुए मानव की स्थिति मृग की तृष्णा के समान है। सुख तो मिलता नहीं, अलबत्ता वह धन-संग्रह के कारण अपने जीवन को नरक अवश्य बना लेता है। उसकी असंतोष की आग कभी नहीं बुझती। इस संदर्भ में कविवर कबीरदास ने कहा भी है
माया मुई न मन मुआ मरि मरि गया सरीर।
आसा तृष्णा ना मिटी कहि गया दास कबीर।

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प्रश्न 3.
बाज़ार पर आधारित लेख नकली सामान पर नकेल ज़रूरी का अंश पढ़िए और नीचे दिए गए बिंदुओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए।
(क) नकली सामान के खिलाफ जागरूकता के लिए आप क्या कर सकते हैं?
(ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का क्या नैतिक दायित्व है?
(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे छिपी मानसिकता को उजागर कीजिए।
नकली सामान पर नकेल ज़रूरी
अपना क्रेता वर्ग बढ़ाने की होड़ में एफएमसीजी यानी तेजी से बिकने वाले उपभोक्ता उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ गाँव के बाजारों में नकली सामान भी उतार रही हैं। कई उत्पाद ऐसे होते हैं जिन पर न तो निर्माण तिथि होती है और न ही उस तारीख का ज़िक्र होता है जिससे पता चले कि अमुक सामान के इस्तेमाल की अवधि समाप्त हो चुकी है। आउटडेटेड या पुराना पड़ चुका सामान भी गाँव-देहात के बाजारों मे खप रहा है। ऐसा उपभोक्ता मामलों के जानकारों का मानना है। नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन के सदस्य की मानें तो जागरूकता अभियान में तेजी लाए बगैर इस गोरखधंधे पर लगाम कसना नामुमकिन है।

उपभोक्ता मामलों की जानकार पुष्पा गिरिमा जी का कहना है, ‘इसमें दो राय नहीं कि गाँव-देहात के बाजारों में नकली रीय उपभोक्ताओं को अपने शिकंजे में कसकर बहराष्ट्रीय कंपनियाँ, खासकर ज्यादा उत्पाद बेचने वाली कंपनियाँ, गाँव का रुख कर चुकी हैं। वे गाँववालों के अज्ञान और उनके बीच जागरूकता के अभाव का पूरा फायदा उठा रही हैं। उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए कानून ज़रूर हैं लेकिन कितने लोग इनका सहारा लेते हैं यह बताने की ज़रूरत नहीं। गुणवत्ता के मामले में जब शहरी उपभोक्ता ही उतने सचेत नहीं हो पाए हैं तो गाँव वालों से कितनी उम्मीद की जा सकती है।

इस बारे में नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्रस रिड्रेसल कमीशन के सदस्य जस्टिस एस.एन. कपूर का कहना है, ‘टीवी ने दूर-दराज़ के गाँवों तक में बहुराष्ट्रीय कंपनियों को पहुंचा दिया है। बड़ी-बड़ी कंपनियाँ विज्ञापन पर तो बेतहाशा पैसा खर्च करती हैं लेकिन उपभोक्ताओं में जागरूकता को लेकर वे चवन्नी खर्च करने को तैयार नहीं हैं। नकली सामान के खिलाफ जागरूकता पैदा करने में स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी मिलकर ठोस काम कर सकते हैं। ऐसा कि कोई प्रशासक भी न कर पाए।’

बेशक, इस कड़वे सच को स्वीकार कर लेना चाहिए कि गुणवत्ता के प्रति जागरूकता के लिहाज़ से शहरी समाज भी कोई ज़्यादा सचेत नहीं है। यह खुली हुई बात है कि किसी बड़े ब्रांड का लोकल संस्करण शहर या महानगर का मध्य या निम्नमध्य वर्गीय उपभोक्ता भी खुशी-खुशी खरीदता है। यहाँ जागरूकता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि वह ऐसा सोच-समझकर और अपनी जेब की हैसियत को जानकर ही कर रहा है। फिर गाँववाला उपभोक्ता ऐसा क्योंकर न करे। पर फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि यदि समाज में कोई गलत काम हो रहा है तो उसे रोकने के जतन न किए जाएँ। यानी नकली सामान के इस गोरखधंधे पर विराम लगाने के लिए जो कदम या अभियान शुरू करने की ज़रूरत है वह तत्काल हो।
-हिंदुस्तान 6 अगस्त 2006, साभार
उत्तर:
(क) नकली सामान के खिलाफ जागरूकता उत्पन्न करना नितांत आवश्यक है। यह कार्य स्कूल तथा कॉलेज के विद्यार्थियों द्वारा मिलकर किया जा सकता है। इसी प्रकार समाचार पत्र, दूरदर्शन, रेडियो आदि संचार माध्यम भी नकली सामान के विरुद्ध अभियान चला सकते हैं। इसके लिए नुक्कड़ नाटक भी खेले जा सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि लोगों को नकली सामान के विरुद्ध सावधान किया जाए।

(ख) उपभोक्ताओं के हित को मद्देनज़र रखते हुए सामान बनाने वाली कंपनियों का यह दायित्व है कि ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए सही वस्तुओं का उत्पादन करें। अन्यथा उनका व्यवसाय अधिक दिन तक नहीं चल पाएगा।

(ग) ब्रांडेड वस्तु को खरीदने के पीछे लोगों की यह मानसिकता है कि ब्रांडेड वस्तुएँ बनाने वाली कंपनियाँ ग्राहक के संतोष को ध्यान में रखती हैं, परंतु जो कंपनियाँ नकली सामान बनाती हैं, सरकार को भी उन पर नकेल करनी चाहिए।
टिप्पणी-इन सभी बिंदुओं पर विद्यार्थी अपनी कक्षा में अपने-अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं, परंतु यह विचार-विमर्श शिक्षक की देख-रेख में होने चाहिए।
उपभोक्ता क्लब में भी इस गद्यांश का वाचन किया जा सकता है।

प्रश्न 4.
प्रेमचंद की कहानी ईदगाह के हामिद और उसके दोस्तों का बाजार से क्या संबंध बनता है? विचार करें।
उत्तर:
ईदगाह कहानी में हामिद के सभी मित्र बाज़ार में चाट पकौड़ी और मिठाइयाँ खाते हैं। इसी प्रकार वे मिट्टी के खिलौने भी खरीदते हैं। इन बच्चों को घर से काफी पैसे ईदी के रूप में मिले थे। परंतु हामिद को तो बहुत कम पैसे मिले थे। हामिद के मुँह में भी पानी भर आया। लेकिन उसने मन में प्रतिज्ञा की थी कि वह अपनी दादी अमीना के लिए एक चिमटा खरीदकर ले जाएगा। हामिद के मित्र “बाज़ार दर्शन” के कपटी ग्राहकों के समान हैं। वे बाज़ार से अनावश्यक सामान खरीदते हैं और बाद में पछताते हैं, परंतु हामिद भगत जी के समान सब मित्रों के साथ घुलमिल कर रहता है, परंतु केवल आवश्यक वस्तु ही खरीदता है।

विज्ञापन की दुनिया

प्रश्न 1.
आपने समाचारपत्रों, टी.वी. आदि पर अनेक प्रकार के विज्ञापन देखे होंगे जिनमें ग्राहकों को हर तरीके से लुभाने का प्रयास किया जाता है। नीचे लिखे बिंदुओं के संदर्भ में किसी एक विज्ञापन की समीक्षा कीजिए और यह भी लिखिए कि आपको विज्ञापन की किस बात ने सामान खरीदने के लिए प्रेरित किया।
1. विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय-वस्तु
2. विज्ञापन में आए पात्र व उनका औचित्य
3. विज्ञापन की भाषा
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उत्तर:
भारतीय जीवन बीमा निगम’ का उपरोक्त विज्ञापन सामान्य व्यक्ति को भी बीमा कराने की प्रेरणा देता है। इस विज्ञापन ने मुझे भी निम्नलिखित बिंदुओं में से प्रभावित किया है
(1) विज्ञापन में सम्मिलित चित्र और विषय वस्तु-विज्ञापन में दिखाया गया परिवार (पति-पत्नी तथा उनका बेटा-बेटी) बीमा कराने के बाद सुरक्षित एवं प्रसन्न दिखाई देता है। अतः यह विज्ञापन विषय-वस्तु तथा चित्र के सर्वथा अनुकूल एवं प्रभावशाली है।

(2) एक स्वस्थ एवं जागरूक परिवार हमेशा अपने भविष्य के प्रति चिंतित होता है। उपर्यक्त चित्र में परिवार के मुखिया ने अपनी पत्नी तथा बच्चों के भविष्य को सुरक्षित बनाने के लिए ‘जीवन निश्चय’ बीमा करवाया है। यह एक एकल प्रीमियम प्लान है जोकि 5, 7, तथा 10 वर्ष की अवधि के बाद गांरटीयुक्त परिपक्वता लाभ दिलाता है।

(3) विज्ञापन की भाषा-प्रस्तुत विज्ञापन की भाषा ‘गांरटी हमारी, हर खुशी तुम्हारी’ मुझे अत्यधिक पसंद है जिसे सुनकर कोई भी समझदार व्यक्ति अपने परिवार के लिए यह बीमा अवश्य लेना चाहेगा। स्लोगन सुनकर या पढ़कर ही ग्राहक इसकी ओर आकर्षित हो जाता है।

प्रश्न 2.
अपने सामान की बिक्री को बढ़ाने के लिए आज किन-किन तरीकों का प्रयोग किया जा रहा है? उदाहरण सहित उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए। आप स्वयं किस तकनीक या तौर-तरीके का प्रयोग करना चाहेंगे जिससे बिक्री भी अच्छी हो और उपभोक्ता गुमराह भी न हो।
उत्तर:
आज के वैज्ञानिक युग में सामान की बिक्री बढ़ाने के लिए विज्ञापन का सहारा लेना ज़रूरी है। मैं अपने उत्पाद को ग्राहकों तक पहुँचाने के लिए निम्नलिखित उपाय करूँगा

  1. दूरदर्शन के लोकप्रिय सीरियल पर विज्ञापन दूंगा।
  2. किसी लोकप्रिय समाचार पत्र में अपने उत्पाद का विज्ञापन दूंगा। इसके लिए मैं अखबार में छपे हुए पर्चे भी डलवा सकता हूँ।
  3. मोबाइल पर एस०एम०एस० द्वारा भी विज्ञापन दे सकता हूँ।
  4. रेडियो पर भी उत्पाद का प्रचार-प्रसार किया जा सकता है।
  5. एजेंटों को घर-घर भेज कर भी उत्पाद का प्रचार किया जा सकता है।

मैं उपर्युक्त साधनों में से समाचार पत्र व दूरदर्शन पर विज्ञापन देना अधिक पसंद करूँगा। मैं उपभोक्ता की सुविधा को ध्यान में रखते हुए उत्पादित वस्तुओं की गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखुंगा, ताकि लोगों तक अच्छी वस्तुएँ पहुँच सकें।

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भाषा की बात

प्रश्न 1.
विभिन्न परिस्थितियों में भाषा का प्रयोग भी अपना रूप बदलता रहता है कभी औपचारिक रूप में आती है तो कभी अनौपचारिक रूप में। पाठ में से दोनों प्रकार के तीन-तीन उदाहरण छाँटकर लिखिए।
उत्तर:
(क) भाषा का औपचारिक रूप-

  • कोई अपने को न जाने तो बाज़ार का यह चौक उसे कामना से विकल बना छोडे………. असंतोष तृष्णा से घायल कर मनुष्य को सदा के लिए यह बेकार बना डाल सकता है।
  • उनका आशय था कि पत्नी की महिमा है, उस महिमा का मैं कायल हूँ।
  • एक और मित्र की बात है यह दोपहर के पहले गए और बाज़ार से शाम को वापिस आए।

(ख) भाषा का अनौपचारिक रूप-

  • यह देखिए, सब उड़ गया। अब जो रेल टिकट के लिए भी बचा हो।
  • बाज़ार है कि शैतान का जाल है? ऐसा सज़ा-सज़ा कर माल रखते हैं कि बेहया ही हो जो न फँसे।
  • बाज़ार को देखते क्या रहे?

लाए तो कुछ नहीं। हाँ पर यह समझ न आता था कि न लूँ तो क्या?

प्रश्न 2.
पाठ में अनेक वाक्य ऐसे हैं, जहाँ लेखक अपनी बात कहता है कुछ वाक्य ऐसे हैं जहाँ वह पाठक-वर्ग को संबोधित करता है। सीधे तौर पर पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्यों को छाँटिए और सोचिए कि ऐसे संबोधन पाठक से रचना पढ़वा लेने में मददगार होते हैं?
उत्तर:
पाठक को संबोधित करने वाले पाँच वाक्य:

  1. लेकिन ठहरिए। इस सिलसिले में एक और महत्त्व का तत्त्व है जिसे नहीं भूलना चाहिए।
  2. यहाँ एक अंतर चीन्ह लेना बहुत ज़रूरी है। मन खाली नहीं रहना चाहिए।
  3. क्या जाने उसे भोले आदमी को अक्षर-ज्ञान तक भी है या नहीं। और बड़ी बातें तो उसे मालूम क्या होंगी और हम न जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें जानते हैं।
  4. पर उस जादू की जकड़ से बचने का सीधा-सा उपाय है।
  5. कहीं आप भूल न कर बैठना।

इस प्रकार के वाक्य निश्चय से पाठक को सोचने के लिए मजबूर कर देते हैं। अतः इन वाक्यों की निबंध में विशेष उपयोगिता मानी गई है।

प्रश्न 3.
नीचे दिए गए वाक्यों को पढ़िए।
(क) पैसा पावर है।
(ख) पैसे की उस पर्चेजिंग पावर के प्रयोग में ही पावर का रस है।
(ग) मित्र ने सामने मनीबैग फैला दिया।
(घ) पेशगी ऑर्डर कोई नहीं लेते।
ऊपर दिए गए इन वाक्यों की संरचना तो हिंदी भाषा की है लेकिन वाक्यों में एकाध शब्द अंग्रेजी भाषा के आए हैं। इस तरह के प्रयोग को कोड मिक्सिंग कहते हैं। एक भाषा के शब्दों के साथ दूसरी भाषा के शब्दों का मेलजोल। अब तक आपने जो पाठ पढ़े उसमें से ऐसे कोई पाँच उदाहरण चुनकर लिखिए। यह भी बताइए कि आगत शब्दों की जगह उनके हिंदी पर्यायों का ही प्रयोग किया जाए तो संप्रेषणीयता पर क्या प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
कोड मिक्सिंग हिंदी भाषा में प्रायः होता रहता है। आधुनिक हिंदी भाषा देशज तथा विदेशज शब्दों को स्वीकार करती हुई आगे बढ़ रही है। पुस्तक के पठित पाठों के आधार पर निम्नलिखित उदाहरण उल्लेखनीय हैं

  1. दाल से एक मोटी रोटी खाकर मैं ठाठ से यूनिवर्सिटी पहुँची। (भक्तिन)
  2. पैसा पावर है। पर उस के सबूत में आस-पास माल-ढाल न जमा हो तो क्या वह खाक पावर है। पैसे को देखने के लिए बैंक हिसाब देखिए……..।
  3. वहाँ के लोग कैसे खूबसूरत होते हैं, उम्दा खाने और नफीस कपड़ों के शौकीन, सैर-सपाटे के रसिया, जिंदादिली की तस्वीर।
  4. बाज़ार है कि शैतान का जाल है।
  5. अपने जीवन के अधिकांश हिस्सों में हम चार्ली केटिली ही होते हैं।

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प्रश्न 4.
नीचे दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश पर ध्यान देते हुए उन्हें पढ़िए
(क) निर्बल ही धन की ओर झुकता है।
(ख) लोग संयमी भी होते हैं।
(ग) सभी कुछ तो लेने को जी होता था।
ऊपर दिए गए वाक्यों के रेखांकित अंश ‘ही’, ‘भी’, ‘तो’ निपात हैं जो अर्थ पर बल देने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं। वाक्य में इनके होने-न-होने और स्थान क्रम बदल देने से वाक्य के अर्थ पर प्रभाव पड़ता है, जैसे
मुझे भी किताब चाहिए। (मुझे महत्त्वपूर्ण है।)
मुझे किताब भी चाहिए। (किताब महत्त्वपूर्ण है।)
आप निपात (ही, भी, तो) का प्रयोग करते हुए तीन-तीन वाक्य बनाइए। साथ ही ऐसे दो वाक्यों का भी निर्माण कीजिए जिसमें ये तीनों निपात एक साथ आते हों।
उत्तर:
(क) ही
मित्र! केवल आप ही मेरी सहायता कर सकते हैं।
मैं ही तो तुम्हारे घर में था।
पिता जी ने आज ही दिल्ली जाना था।

(ख) भी
मैं भी तुम्हारे साथ सैर पर चलूँगा।
राधा ने भी स्कूल में प्रवेश ले लिया है।
तुम भी काम की तरफ ध्यान दो।

(ग) तो
यदि तुम मेरी सहायता नहीं करोगे तो मैं तुम्हारे साथ नहीं चलूँगा।
यूँ ही शोर मत करो। मेरी बात तो सुनो।
मैं यहीं तो खड़ा था।

(ग) ही, तो, भी
(1) यदि यह बात है तो तुम भी राधा के ही साथ चले जाओ।
(2) तुम भी तो हमेशा गालियाँ ही बकते रहते हो।

चर्चा करें

1. पर्चेजिंग पावर से क्या अभिप्राय है?
बाज़ार की चकाचौंध से दूर पर्चेजिंग पावर का सकारात्मक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है? आपकी मदद के लिए संकेत दिया जा रहा है-
(क) सामाजिक विकास के कार्यों में।
(ख) ग्रामीण आर्थिक व्यवस्था को सुदृढ़ करने में…….।
उत्तर:
विद्यार्थी शिक्षक के सहयोग से कक्षा में अपने सहपाठियों के साथ चर्चा करें तथा प्रत्येक विद्यार्थी को अपने विचार प्रकट करने का अवसर दिया जाए।

HBSE 12th Class Hindi बाज़ार दर्शन Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
प्रस्तुत पाठ में कितने प्रकार के ग्राहकों का उल्लेख किया गया है?
उत्तर:
इस पाठ में पहला ग्राहक लेखक का मित्र है, जो बाज़ार में मामूली सामान लेने गया था, परंतु बाज़ार से बहुत-से बंडल खरीदकर ले आया। लेखक का दूसरा मित्र दोपहर में बाज़ार गया, लेकिन सायंकाल को खाली हाथ घर लौट आया। उसके मन में बाज़ार से बहुत कुछ खरीदने की इच्छा थी, परंतु बाज़ार से खाली हाथ लौट आया।

तीसरा ग्राहक लेखक के पड़ोसी भगत जी हैं जो आँख खोलकर बाज़ार देखते हैं, पर फैंसी स्टोरों पर नहीं रुकते। वे केवल पंसारी की एक छोटी-सी दुकान पर रुकते हैं। जहाँ से काला नमक तथा जीरा खरीदकर वापिस लौट आते हैं। तीसरा ग्राहक अर्थात् भगत जी केवल आवश्यक वस्तुएँ ही खरीदते हैं।

प्रश्न 2.
‘बाज़ार दर्शन’ नामकरण की सार्थकता का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
प्रस्तुत निबंध में बाज़ार के बारे में समुचित प्रकाश डाला गया है। लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि कौन-सा ग्राहक किस दृष्टि से बाज़ार का प्रयोग करता है। लेखक ने इस निबंध में बाज़ार की उपयोगिता पर समुचित प्रकाश डाला है। जो लोग बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर अपनी पर्चेज़िग पावर का प्रदर्शन करते हैं, वे बाज़ार को निरर्थक सिद्ध करते हैं, परंतु कुछ ऐसे ग्राहक हैं जो बाज़ार से आवश्यकतानुसार सामान खरीदते हैं और संतुष्ट रहते हैं। इस प्रकार के लोग बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं। यहाँ लेखक ने बाज़ार के सभी पहलुओं पर प्रकाश डाला है, साथ ही दुकानदार तथा ग्राहक की मानसिकता का उद्घाटन किया है। अतः ‘बाज़ार-दर्शन’ नामकरण पूर्णतः सार्थक है।

प्रश्न 3.
‘मन खाली नहीं रहना चाहिए’, खाली मन होने से लेखक का क्या मन्तव्य है?
उत्तर:
‘मन खाली नहीं रहना चाहिए’ से अभिप्राय है कि जब हम बाज़ार में जाएँ तो मन में आवश्यक वस्तुएँ खरीदने के बारे में सोचकर ही जाएँ, बिना उद्देश्य के न जाएँ। जब कोई व्यक्ति निरुद्देश्य बाज़ार जाता है तो वह अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर लाता है। इससे बाज़ार में एक व्यंग्य-शक्ति उत्पन्न होती है। ऐसा करने से न तो बाजार को लाभ पहुँचता है, न ही ग्राहक को, बल्कि केवल प्रदर्शन की वृत्ति को ही बढ़ावा मिलता है।

प्रश्न 4.
‘बाज़ार का जादू सब पर नहीं चलता’। भगत जी के संदर्भ में इस कथन का विवेचन करें।
उत्तर:
बाज़ार में एक जादू होता है जो प्रायः ग्राहकों को अपनी ओर खींचता है, किंतु कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जिनका मन भगत जी की तरह संतुष्ट होता है। बाज़ार का आकर्षण उनके मन को प्रभावित नहीं कर पाता। लेखक के पड़ोसी भगत जी दिन में केवल छः आने ही कमाते थे। वे इस धन-राशि से अधिक नहीं कमाना चाहते थे। उनके द्वारा बनाया गया चूरन बाज़ार में धड़ाधड़ बिक जाता था। जब उनकी छः आने की कमाई पूरी हो जाती तो बचे चूरन को वह बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे। वे चाहते तो थोक में चूरन बनाकर बेच सकते थे। परंतु उनके मन में धनवान होने की कोई इच्छा नहीं थी। उनके सामने फैंसी स्टोर इस प्रकार दिखाई देते थे जैसे उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे केवल बाजार से अपनी आवश्यकता का सामान खरीदने के लिए जाते थे और बाजार की आकर्षक वस्तुओं की ओर नहीं ललचाते थे। इसलिए कह सकते हैं कि बाज़ार का जादू सब पर नहीं चलता।

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प्रश्न 5.
लेखक के पड़ोस में कौन रहता है तथा उनके बारे में क्या बताया गया है?
उत्तर:
लेखक के पड़ोस में एक भगत जी रहते हैं जो चूरन बेचने का काम करते हैं। वे न जाने कितने वर्षों से चूरन बेच रहे हैं लेकिन उन्होंने छः आने से अधिक कभी नहीं कमाया। वे चौक बाज़ार में काफी लोकप्रिय हैं। जब उन्हें छः आने की कमाई हो जाती है तो वे बच्चों में मुफ्त चूरन बाँट देते हैं, परंतु भगत जी ने बाज़ार के गुर को नहीं पकड़ा अन्यथा वे मालामाल हो जाते। वे अपना चूरन न तो चौक में बेचते हैं न पेशगी ऑर्डर लेते हैं। लोगों की उनके प्रति बड़ी सद्भावना है। वे हमेशा स्वस्थ प्रसन्न तथा संतुष्ट रहते हैं। सच्चाई तो यह है कि चूरन वाले भगत जी पर बाज़ार का जादू नहीं चल सका।

प्रश्न 6.
लेखक ने भगत जी से मुलाकात होने पर उनसे क्या प्रतिक्रिया व्यक्त की है?
उत्तर:
एक बार लेखक को बाज़ार चौक में भगत जी दिखाई दिए। लेखक को देखते ही उन्होंने जय-जयराम किया और लेखक ने भी उनको जय-जयराम किया। उस समय भगत जी की आँखें बंद नहीं थीं। बाज़ार में और भी बहुत-से लोग और बालक मिले। वे सभी भगत जी द्वारा पहचाने जाने के इच्छुक थे। भगत जी ने हँसकर सभी को पहचाना, सबका अभिवादन किया और सबका अभिवादन लिया। वे बाज़ार की सज-धज को देखते हुए चल रहे थे। परंतु भगत जी के मन में उनके प्रति अप्रीति नहीं थी विद्रोह भी नहीं था, बल्कि प्रसन्नता थी। वे खुली आँख, संतुष्ट और मग्न से बाज़ार चौक में चल रहे थे।

प्रश्न 7.
चौक बाज़ार में चलते हुए भगत जी कहाँ पर जाकर रुके और उन्होंने क्या किया?
उत्तर:
चौक बाज़ार में चलते हुए भगत जी एक पंसारी की दुकान पर रुके। बाज़ार में हठपूर्वक विमुखता उनमें नहीं थी। अतः उन्होंने पंसारी की दुकान से आवश्यकतानुसार काला नमक व जीरा लिया और वापिस लौट पड़े। इसके बाद तो सारा चौक उनके लिए नहीं के बराबर हो गया। क्योंकि वे जानते थे कि उन्हें जो कुछ चाहिए था वह उन्हें मिल गया है।

प्रश्न 8.
बाजार के जादू चढ़ने-उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
बाज़ार का जादू मनुष्य के सिर पर चढ़कर बोलता है। बाज़ार कहता है-मुझे लूटो, और लूटो। इस पर बाज़ार मनुष्य को विकल बना देता है और वह अपना विवेक खो बैठता है। बाज़ार का जादू उतरने पर मनुष्य को लगता है कि उसका बजट बिगड़ गया है। वह फिजूल की चीजें खरीद लाया है। यही नहीं, उसके सुख-चैन में भी खलल पड़ गया है।

प्रश्न 9.
लेखक ने किस बाज़ार को मानवता के लिए विडंबना कहा है और क्यों?
उत्तर:
लेखक ने उस बाज़ार को मानवता के लिए विडंबना कहा है, जिसमें ग्राहकों की आवश्यकता-पूर्ति के लिए क्रय-विक्रय नहीं होता, बल्कि अमीर लोगों की क्रय-शक्ति को देखते हुए अनावश्यक वस्तुएँ बेची जाती हैं। पूँजीपति अपनी क्रय-शक्ति का प्रदर्शन इस बाज़ार में करते हैं जिससे बाज़ार में छल-कपट तथा शोषण को बढ़ावा मिलता है। यही नहीं, सामाजिक सद्भाव भी नष्ट होता है। इस प्रकार के बाज़ार में ग्राहक और बेचक दोनों ही एक-दूसरे को धोखा देने का प्रयास करते हैं। अतः इस प्रकार का बाज़ार समाज के लिए हानिकारक है। यदि हम इसे मानवता के लिए विडंबना कहते हैं तो अनुचित नहीं होगा।

प्रश्न 10.
इस पाठ में बाज़ार को ‘जादू’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
प्रायः जादू दर्शक को मोहित कर लेता है। उसे देखकर हम ठगे से रह जाते हैं और अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं। इसी प्रकार बाजार में भी बड़ी आकर्षक और सुंदर वस्तुएँ सजाकर रखी जाती हैं। ये वस्तुएँ हमारे मन में आकर्षण पैदा करती हैं। हम बाज़ार के रूप जाल में फँस जाते हैं और अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। इसीलिए बाज़ार को ‘जादू’ कहा गया है।

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प्रश्न 11.
भगत जी की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
भगत जी लेखक के पड़ोस में रहते थे। वे निर्लोभी तथा संतोषी व्यक्ति थे। वे न तो अधिक धन कमाना चाहते थे और न ही धन का संग्रह करना चाहते थे। वे चूरन बनाकर बाज़ार में बेचते थे। जब वे छः आने की कमाई कर लेते थे, तो बचा हुआ चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते थे।

भगत जी पर बाज़ार के आकर्षण का कोई प्रभाव नहीं था। वे बाज़ार को आवश्यकता की पूर्ति का साधन मानते थे। इसीलिए वे पंसारी की दुकान से काला नमक और जीरा खरीदकर घर लौट जाते थे। भगत जी बाज़ार में सब कुछ देखते हुए चलते थे, लोगों का अभिवादन लेते थे और करते भी थे। वे हमेशा बाज़ार तथा व्यापारियों और ग्राहकों का कल्याण मंगल चाहते थे।

प्रश्न 12.
‘बाजार दर्शन’ पाठ के आधार पर बताइए कि पैसे की पावर का रस किन दो रूपों में प्राप्त होता है?
उत्तर:
पैसे की पावर का रस निम्नलिखित दो रूपों में प्राप्त होता है-

  1. अपना बैंक बैलेंस देखकर।
  2. अपना बंगला, कोठी, कार तथा घर का कीमती सामान देखकर।

प्रश्न 13.
भगत जी बाज़ार को सार्थक तथा समाज को शांत कैसे कर रहे हैं? ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर:
भगत जी निश्चित समय पर पेटी उठाकर चूरन बेचने के लिए बाज़ार में निकल पड़ते हैं। छः आने की कमाई होते ही वे चूरन बेचना बंद कर देते हैं और बचा हुआ चूरन बच्चों में मुफ्त बाँट देते हैं। वे पंसारी से आवश्यकतानुसार नमक और जीरा खरीद कर लाते हैं तथा सबको जय-जयराम कहकर सबका स्वागत करते हैं। वे बाज़ार की चमक-दमक से आकर्षित नहीं होते, बल्कि बड़े संतुष्ट और मग्न होकर बाजार में चलते हैं। इस प्रकार वे बाजार को सार्थक करते हैं और समाज को शांत रहने का उपदेश देते हैं।

प्रश्न 14.
कैपिटलिस्टिक अर्थशास्त्र को लेखक ने मायावी तथा अनीतिपूर्ण क्यों कहा है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार कैपिटलिस्टिक अर्थशास्त्र धन को अधिक-से-अधिक बढ़ाने पर बल देता है। इसलिए यह मायावी तथा छली है। बाज़ार का मूल दर्शन आवश्यकताओं की पूर्ति करना है, लेकिन इस लक्ष्य को छोड़कर व्यापारी अधिकाधिक धन कमाने की कोशिश करते हैं। वे ग्राहक को आवश्यकता की उचित वस्तु सही मूल्य पर न देकर उससे अधिक दाम लेते हैं। इससे व्यापार में कपट बढ़ता है और ग्राहक की हानि होती है। यही नहीं, इससे शोषण को भी बल मिलता है जो कि अनीतिपूर्ण है। ऐसे पूँजीवादी बाज़ार से मानवीय प्रेम, भाईचारा तथा सौहार्द समाप्त हो जाता है। इसके साथ-साथ पूँजीवादी अर्थशास्त्र के कारण बाज़ार में फैंसी वस्तुओं को बेचने पर अधिक बल देता है जिससे लोग बिना आवश्यकता के उसके रूप-जाल में फँस जाते हैं। यह निश्चय से बाज़ार का मायावीपन है।

प्रश्न 15.
लेखक के दोनों मित्रों के स्वभाव में कौन-सी समानता है और कौन-सी असमानता है?
उत्तर:
समानता-लेखक के दोनों मित्र खाली मन से बाज़ार गए। पहला मित्र मन में थोड़ा-सा सामान लेने का लक्ष्य रखकर बाज़ार गया, लेकिन उसका मन कुछ भी खरीदने के लिए खाली था। दूसरा मित्र बिना उद्देश्य के बाज़ार में घूमने गया और उसके रूप-जाल में फँस गया। दोनों में से एक ने कुछ खरीदा और दूसरा केवल मन में सोचता ही रह गया।

असमानता-पहले मित्र के पास पैसा अधिक है। वह पैसा खर्च करना जानता है। परंतु दूसरा मित्र दुविधाग्रस्त है लेकिन शीघ्र निर्णय नहीं ले पाता।

प्रश्न 16.
लेखक के अनुसार परमात्मा और मनुष्य में क्या अंतर है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
लेखक के अनुसार परमात्मा स्वयं में पूर्ण है। उसमें कोई भी इच्छा शेष नहीं है। वह शून्य है, परंतु मनुष्य अपूर्ण है। प्रत्येक मानव में कोई-न-कोई इच्छा बनी रहती है। उसकी सभी इच्छाएँ कभी पूर्ण नहीं होतीं। इसका कारण स्वयं मनुष्य है। परंतु यदि मानव इच्छाओं से मुक्त हो जाए तो वह भी परमात्मा की तरह संपूर्ण हो सकता है।

प्रश्न 17.
भगत जी का चूरन हाथों-हाथ कैसे बिक जाता है?
उत्तर:
भगत जी शुद्ध चूरन बनाते थे और सब लोग उनका चूरन खरीदने के लिए उत्सुक रहते थे। लोग उन्हें सद्भावना देते थे और उनसे सद्भावना लेते थे। इसलिए भगत जी स्वयं लोगों में लोकप्रिय थे और उनका चूरन भी लोगों में प्रसिद्ध था।

प्रश्न 18.
प्रथम मित्र ने फालतू वस्तुएँ खरीदने के लिए किसे जिम्मेवार ठहराया, परंतु सच्चाई क्या है? स्पष्ट करें।
उत्तर:
प्रथम मित्र ने फालतू वस्तुएँ खरीदने के लिए अपनी पत्नी की इच्छा तथा बाज़ार के जादू भरे आकर्षण को दोषी माना है। परंतु असली दोषी तो पैसे की गर्मी तथा मन का खाली होना है। इन दोनों स्थितियों में बाजार का जादू भरा आकर्षण ग्राहक को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

प्रश्न 19.
खाली मन और बंद मन में क्या अंतर है?
उत्तर:
लेखक के अनुसार खाली मन का अर्थ है मन में कोई इच्छा धारण करके न चलना। परंतु बंद मन का अर्थ है-मन में किसी प्रकार की इच्छा को उत्पन्न न होने देना और मन को बलपूर्वक दबाकर रखना।

प्रश्न 20.
“चाँदनी चौक का आमंत्रण उन पर व्यर्थ होकर बिखर जाता है”-इसका आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
यह गंद्य पंक्ति भगत जी के लिए कही गई है। भगत जी निस्पृही मनोवृत्ति वाले व्यक्ति हैं। वे अपने मन में सांसारिक आकर्षणों को संजोकर नहीं रखते। यही कारण है कि चाँदनी चौक का आकर्षण उनके मन को प्रभावित नहीं कर पाता। बाज़ार के जादू तथा आकर्षण के मध्य रहते हुए वे उसके मोहजाल से बच जाते हैं। वे एक संतुष्ट व्यक्ति हैं। इसलिए चाँदनी चौक का आकर्षण उनको प्रभावित नहीं कर पाता।

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प्रश्न 21.
पैसे की व्यंग्य-शक्ति किस प्रकार साधारण व्यक्ति को चूर-चूर कर देती है और किस व्यक्ति के सामने चूर-चूर हो जाती है?
उत्तर:
पैसे में बहुत व्यंग्य-शक्ति होती है। पैसे वाले व्यक्ति का बंगला, कोठी एवं कार को देखकर साधारण जन के हृदय में लालसा, ईर्ष्या तथा तृष्णा उत्पन्न होने लगती है। पैसे की कमी के कारण वह व्याकुल हो जाता है। वह सोचता है कि उसका जन्म किसी अमीर परिवार में क्यों नहीं हुआ।

परंतु भगत जी जैसे व्यक्ति में न अमीरों को देखकर ईर्ष्या होती है, न तृष्णा होती है। पैसे की व्यंग्य-शक्ति उन्हें छू भी नहीं हैं कहता है कि तुम मुझे ले लो, परंतु वे पैसे की परवाह नहीं करते, इसलिए भगत जी जैसे निस्पृह व्यक्ति के सामने पैसे की व्यंग्य-शक्ति चूर-चूर हो जाती है।

बहुविकल्पीय प्रश्नोत्तर

1. ‘बाज़ार दर्शन’ के रचयिता हैं
(A) महादेवी वर्मा
(B) फणीश्वर नाथ ‘रेणु’
(C) धर्मवीर भारती
(D) जैनेंद्र कुमार
उत्तर:
(D) जैनेंद्र कुमार

2. जैनेंद्र का जन्म किस प्रदेश में हुआ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) मध्य प्रदेश
(C) बिहार
(D) झारखंड
उत्तर:
(A) उत्तर प्रदेश

3. जैनेंद्र का जन्म उत्तर प्रदेश के किस नगर में हुआ?
(A) आगरा
(B) अलीगढ़
(C) मेरठ
(D) कानपुर
उत्तर:
(B) अलीगढ़

4. जैनेंद्र का जन्म कब हुआ?
(A) सन् 1907 में
(B) सन् 1908 में
(C) सन् 1905 में
(D) सन् 1906 में
उत्तर:
(C) सन् 1905 में

5. जैनेंद्र का जन्म अलीगढ़ के किस कस्बे में हुआ?
(A) कौड़ियागंज
(B) गौड़ियागंज
(C) लखीमपुर
(D) रामपुरा
उत्तर:
(A) कौड़ियागंज

6. जैनेंद्र कुमार ने उपन्यासों तथा कहानियों के अतिरिक्त किस विधा में सफल रचनाएँ लिखीं?
(A) एकांकी
(B) नाटक
(C) निबंध
(D) रेखाचित्र
उत्तर:
(C) निबंध

7. भारत सरकार ने जैनेंद्र कुमार को किस उपाधि से सुशोभित किया?
(A) पद्मश्री
(B) पद्मभूषण
(C) पद्मसेवा
(D) वीरचक्र
उत्तर:
(B) पद्मभूषण

8. जैनेंद्र कुमार को पद्मभूषण के अतिरिक्त कौन-कौन से दो प्रमुख पुरस्कार प्राप्त हुए?
(A) शिखर सम्मान और भारत-भारती सम्मान
(B) प्रेमचंद सम्मान और उत्तर प्रदेश सम्मान
(C) साहित्य अकादमी पुरस्कार और भारत-भारती पुरस्कार
(D) ज्ञान पुरस्कार और गीता पुरस्कार
उत्तर:
(C) साहित्य अकादमी पुरस्कार और भारत-भारती पुरस्कार

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9. जैनेंद्र कुमार के प्रथम उपन्यास ‘परख’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1930 में
(B) सन् 1931 में
(C) सन् 1932 में
(D) सन् 1929 में
उत्तर:
(D) सन् 1929 में

10. जैनेंद्र कुमार का निधन किस वर्ष में हुआ?
(A) सन् 1990 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1988 में
(D) सन् 1992 में
उत्तर:
(A) सन् 1990 में

11. ‘कल्याणी’ उपन्यास का प्रकाशन कब हआ?
(A) सन् 1939 में
(B) सन् 1932 में
(C) सन् 1928 में
(D) सन् 1931 में
उत्तर:
(A) सन् 1939 में

12. ‘त्यागपत्र’ उपन्यास का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1936 में
(B) सन् 1938 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1941 में
उत्तर:
(C) सन् 1937 में

13. जैनेंद्र की रचना ‘मुक्तिबोध’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी
(B) नाटक
(C) उपन्यास
(D) एकांकी
उत्तर:
(C) उपन्यास

14. जैनेंद्र के उपन्यास ‘सुनीता’ का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1938 में
(B) सन् 1932 में
(C) सन् 1937 में
(D) सन् 1935 में
उत्तर:
(D) सन् 1935 में

15. ‘अनाम स्वामी’ किस विधा की रचना है?’
(A) निबंध
(B) नाटक
(C) उपन्यास
(D) कहानी
उत्तर:
(C) उपन्यास

16. ‘वातायन’ किस विधा की रचना है?
(A) कहानी-संग्रह
(B) उपन्यास
(C) निबंध-संग्रह
(D) एकांकी-संग्रह
उत्तर:
(A) कहानी-संग्रह

17. ‘नीलम देश की राजकन्या’ कहानी-संग्रह का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1931 में
(B) सन् 1933 में
(C) सन् 1935 में
(D) सन् 1936 में
उत्तर:
(B) सन् 1933 में

18. ‘प्रस्तुत प्रश्न निबंध संग्रह का प्रकाशन कब हुआ?
(A) सन् 1932 में
(B) सन् 1936 में
(C) सन् 1933 में
(D) सन् 1934 में
उत्तर:
(B) सन् 1936 में

19. ‘पूर्वोदय’ निबंध-संग्रह का प्रकाशन किस वर्ष हुआ?
(A) सन् 1951 में
(B) सन् 1950 में
(C) सन् 1952 में
(D) सन् 1953 में
उत्तर:
(A) सन् 1951 में

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20. ‘विचार वल्लरी’ निबंध-संग्रह का प्रकाशन वर्ष कौन-सा है?
(A) सन् 1950
(B) सन् 1951
(C) सन् 1952
(D) सन् 1954
उत्तर:
(C) सन् 1952

21. ‘मंथन’ के रचयिता कौन हैं?
(A) धर्मवीर भारती
(B) महादेवी वर्मा
(C) फणीश्वर नाथ ‘रेणु’
(D) जैनेंद्र कुमार
उत्तर:
(D) जैनेंद्र कुमार

22. ‘मंथन’ किस विधा की रचना है?
(A) उपन्यास
(B) निबंध
(C) कहानी
(D) रेखाचित्र
उत्तर:
(B) निबंध

23. ‘मंथन’ का प्रकाशन किस वर्ष में हुआ?
(A) सन् 1953 में
(B) सन् 1952 में
(C) सन् 1954 में
(D) सन् 1955 में
उत्तर:
(A) सन् 1953 में

24. ‘जड़ की बात’ का प्रकाशन वर्ष है?
(A) 1936
(B) 1937
(C) 1945
(D) 1946
उत्तर:
(C) 1945

25. ‘साहित्य का श्रेय और प्रेय’ के रचयिता हैं-
(A) महादेवी वर्मा
(B) कुंवर नारायण
(C) जैनेंद्र कुमार
(D) धर्मवीर भारती
उत्तर:
(C) जैनेंद्र कुमार

26. साहित्य का श्रेय और प्रेय की रचना कब हुई?
(A) 1952 में
(B) 1953 में
(C) 1951 में
(D) 1954 में
उत्तर:
(B) 1953 में

27. ‘सोच-विचार’ के रचयिता हैं-
(A) जैनेंद्र कुमार
(B) धर्मवीर भारती
(C) रघुवीर सहाय
(D) शमशेर बहादुर सिंह
उत्तर:
(A) जैनेंद्र कुमार

28. संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की कौन-सी विशेषता प्रभावित होती है?
(A) निर्बलता
(B) सबलता
(C) संपन्नता
(D) धनाढ्यता
उत्तर:
(A) निर्बलता

29. बाजार चौक में भगतजी क्या बेचते थे?
(A) मिठाई
(B) चूरन
(C) सब्जी
(D) फल
उत्तर:
(B) चूरन

30. लेखक ने चूरन वाले को ‘अकिंचित्कर’ कहा है, जिसका अर्थ है-
(A) ठग
(B) अर्थहीन
(C) व्यापारी
(D) भिखारी
उत्तर:
(B) अर्थहीन

31. चूरन बेचने वाले महानुभाव को लोग किस नाम से पुकारते थे?
(A) फेरीवाला
(B) चूरन वाला
(C) मनि राम
(D) भगत जी
उत्तर:
(D) भगत जी

32. ‘बाज़ार दर्शन’ का प्रतिपाद्य है
(A) बाज़ार के उपयोग का विवेचन
(B) बाज़ार से लाभ
(C) बाज़ार न जाने की सलाह
(D) बाज़ार जाने की सलाह
उत्तर:
(A) बाज़ार के उपयोग का विवेचन

33. लेखक का मित्र किसके साथ बाज़ार गया था?
(A) अपने पिता के साथ
(B) मित्र के साथ
(C) पत्नी के साथ
(D) अकेला
उत्तर:
(C) पत्नी के साथ

34. क्या फालतू सामान खरीदने के लिए पत्नी को दोष देना उचित है?
(A) हाँ
(B) नहीं
(C) कह नहीं सकता
(D) बाज़ार का दोष है
उत्तर:
(B) नहीं

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35. लेखक के अनुसार पैसा क्या है?
(A) पावर है
(B) हाथ की मैल है
(C) माया का रूप है
(D) पैसा व्यर्थ है
उत्तर:
(A) पावर है

36. जैनेन्द्र जी ने केवल बाजार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र को क्या बताया है?
(A) नीतिशास्त्र
(B) सुनीतिशास्त्र
(C) अनीतिशास्त्र
(D) अधोनीतिशास्त्र
उत्तर:
(C) अनीतिशास्त्र

37. हमें किस स्थिति में बाज़ार जाना चाहिए?
(A) जब मन खाली हो
(B) जब मन खाली न हो
(C) जब मन बंद हो
(D) जब मन में नकार हो
उत्तर:
(B) जब मन खाली न हो

38. बाज़ार किसे देखता है?
(A) लिंग को
(B) जाति को
(C) धर्म को
(D) क्रय-शक्ति को
उत्तर:
(D) क्रय-शक्ति को

39. ‘बाज़ारूपन’ से क्या अभिप्राय है?
(A) बाज़ार से सामान खरीदना
(B) बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदना
(C) बाज़ार से आवश्यक वस्तुएँ खरीदना
(D) बाज़ार को सजाकर आकर्षक बनाना
उत्तर:
(B) बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदना

40. बाजार में जादू को कौन-सी इन्द्रिय पकड़ती है?
(A) आँख
(B) नाक
(C) हाथ
(D) मुँह
उत्तर:
(A) आँख

41. ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ के आधार पर धन की ओर कौन झुकता है?
(A) निर्धन
(B) विवश
(C) निर्बल
(D) असहाय
उत्तर:
(C) निर्बल

42. फिजूल सामान को फिजूल समझने वाले लोगों को क्या कहा गया है?
(A) स्वाभिमानी
(B) खर्चीला
(C) मूर्ख
(D) संयमी
उत्तर:
(D) संयमी

43. जैनेन्द्र कुमार के मित्र ने बाजार को किसका जाल कहा है?
(A) शैतान का जाल
(B) जी का जंजाल
(C) आलवाल
(D) प्रणतपाल
उत्तर:
(A) शैतान का जाल

बाज़ार दर्शन प्रमुख गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

[1] उनका आशय था कि यह पत्नी की महिमा है। उस महिमा का मैं कायल हूँ। आदिकाल से इस विषय में पति से पत्नी की ही प्रमुखता प्रमाणित है। और यह व्यक्तित्व का प्रश्न नहीं, स्त्रीत्व का प्रश्न है। स्त्री माया न जोड़े, तो क्या मैं जोई? फिर भी सच सच है और वह यह कि इस बात में पत्नी की ओट ली जाती है। मूल में एक और तत्त्व की महिमा सविशेष है। वह तत्त्व है मनीबैग, अर्थात पैसे की गरमी या एनर्जी। [पृष्ठ-86]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है।

व्याख्या-लेखक का मित्र अपनी पत्नी के साथ बाजार से बहुत-सा सामान लेकर लौटा था। इस पर लेखक ने उससे कहा कि यह सब क्या है। इस पर मित्र ने उत्तर दिया कि उसकी पत्नी जो साथ थी, इसलिए उसे बहुत-सा सामान लाना पड़ा। लेखक का कहना है कि मित्र के कहने का भाव था कि यह पत्नी की महत्ता का परिणाम है। कोई भी व्यक्ति पत्नी के कहने को टाल नहीं सकता। लेखक भी पत्नी के महत्त्व को स्वीकार करने वाला है। प्राचीनकाल से ही इस विषय को लेकर पति की अपेक्षा पत्नी को अधिक महत्त्व दिया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि घर का सामान खरीदने में पत्नी की बात ही सुनी जाती है।

इसमें किसी के महत्त्व का प्रश्न नहीं है, बल्कि नारी का प्रश्न है। घर-गृहस्थी में प्रायः पत्नी की ही चलती है। लेखक कहता है कि स्त्री यदि धन-संपत्ति नहीं जोड़ेगी तो लेखक अर्थात् पुरुष तो नहीं जोड़ सकता। यह एक कड़वी सच्चाई है। हर आदमी इस बात में पत्नी का ही सहारा लेता है। परंतु बाज़ार से सामान खरीदने के लिए एक अन्य तत्त्व का भी विशेष महत्त्व है और वह है-धन से भरा हुआ थैला। अन्य शब्दों में हम इसे पैसे की गरमी भी कह सकते हैं। भाव यह है कि जिसके पास पैसे की गरमी होगी, वह निश्चय से सामान खरीदने में अपनी पत्नी का सहयोग करेगा।

विशेष-

  1. इसमें लेखक ने पत्नी की महिमा का प्रतिपादन किया है। बाज़ार से सामान खरीदने में भी पत्नी की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है।
  2. इसके साथ-साथ लेखक ने धन के महत्त्व पर भी प्रकाश डाला है, क्योंकि धन के कारण ही मनुष्य की क्रय-शक्ति बढ़ती है।
  3. यहाँ लेखक ने सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है जिसमें तत्सम शब्दों के अतिरिक्त उर्द (कायल) एवं अंग्रेजी (मनीबैग, एनर्जी) शब्दों का संदर मिश्रण किया है।
  4. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  5. विश्लेषणात्मक शैली का प्रयोग हुआ है।

गद्यांश ,पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) पाठ तथा लेखक का नाम लिखिए।
(ख) बाज़ार से सामान खरीदने पर पुरुष पत्नी के नाम का ही सहारा क्यों लेते हैं?
(ग) लेखक के अनुसार बाज़ार से अनचाही वस्तुएँ खरीदने का क्या कारण है?
(घ) आदिकाल से पति-पत्नी में से किसे अधिक महत्त्व दिया जाता है?
उत्तर:
(क) पाठ का नाम बाज़ार दर्शन, लेखक-जैनेंद्र कुमार

(ख) बाज़ार से सामान खरीदने पर पुरुष हमेशा सारा दोष पत्नियों के सिर मढ़ देते हैं और साथ में यह तर्क देते हैं कि स्त्री माया का रूप है। अतः उसका स्वभाव ही माया जोड़ना है।

(ग) बाज़ार से अनचाही वस्तुएँ खरीदने का मुख्य कारण मनीबैग है अर्थात जिसके पास धन की शक्ति होती है वही व्यक्ति बाज़ार से चाही-अनचाही वस्तुएँ खरीदकर लाता है।

(घ) आदिकाल से सामान खरीदने के बारे में पति की अपेक्षा पत्नी को ही अधिक महत्त्व दिया जाता है। चाहे पुरुष बाज़ार से अनचाहा सामान खरीदकर लाए, परंतु वह सारा दोष पत्नी को ही देता है।

[2] पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो तो क्या वह खाक पावर है! पैसे को देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए, पर माल-असबाब मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं। पैसे की उस ‘पर्चेजिंग पावर’ के प्रयोग में ही पावर का रस है। लेकिन नहीं। लोग संयमी भी होते हैं। वे फिजूल सामान को फिजूल समझते हैं। वे पैसा बहाते नहीं हैं और बुद्धिमान होते हैं। बुद्धि और संयमपूर्वक वह पैसे को जोड़ते जाते हैं, जोड़ते जाते हैं। वह पैसे की पावर को इतना निश्चय समझते हैं कि उसके प्रयोग की परीक्षा उन्हें दरकार नहीं है। बस खुद पैसे के जुड़ा होने पर उनका मन गर्व से भरा फूला रहता है। [पृष्ठ-86]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक सद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाजार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक पैसे की शक्ति पर प्रकाश डालता हुआ कहता है कि

व्याख्या-पैसा निश्चय से ही एक शक्ति है, परंतु वह शक्ति तभी दिखाई दे सकती है जब उसके परिणामस्वरूप घर में काफी सारा सामान एकत्रित किया गया हो! क्योंकि सामान के बिना पैसे की शक्ति का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि किसी के पास पैसा है अथवा नहीं, यह उसके बैंक के हिसाब-किताब से जाना जा सकता है जो कि लोगों के लिए संभव नहीं है। यदि किसी के पास बहुत बड़ा मकान, आलीशान कोठी और घर में तरह-तरह का सामान होगा, कार होगी, तो बिना देखे ही उसका पैसा दिखाई देगा। लेखक कहता है कि यदि कोई पैसे की क्रय-शक्ति का प्रयोग करता है तो पैसे के प्रयोग में पैसे की शक्ति का आनंद लिया जा सकता है।

परंतु कुछ लोग ऐसे नहीं होते। वे संयम और नियम से काम लेते हैं। बेकार सामान को वे बेकार समझकर नहीं खरीदते। उसे खरीदना वे फिजूलखर्ची मानते हैं। वे पैसे को व्यर्थ में नष्ट नहीं करते। इसीलिए ऐसे लोग समझदार कहे जाते हैं। वे अपनी बुद्धि का प्रयोग करके और किफायत करते हुए धन का संग्रह करते हैं और इस प्रकार धन को जोड़ते हुए चले जाते हैं। उन्हें पैसे की शक्ति पर पूरा भरोसा होता है। परंतु वे पैसे के प्रयोग की कभी भी जाँच नहीं करते। केवल धन का संग्रह होने के कारण ही उनके मन में अभिमान भरा रहता है। वे गर्व के कारण फूले नहीं समाते। ऐसे लोग केवल धन का संग्रह करते हैं, उसे खर्च नहीं करते।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि पैसे की सार्थकता उसकी क्रय-शक्ति में निवास करती है। एक धनवान व्यक्ति के धनी होने का पता हमें उसके घर, मकान तथा उसके कीमती सामान को देखकर चलता है, न बैंक में रखे पैसे को देखकर।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है, जिसमें तत्सम, तद्भव, उर्दू (खाक, माल, असबाब, फिजूल) तथा अंग्रेज़ी (पर्चेजिंग पावर, बैंक) शब्दों का सुंदर मिश्रण हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विश्लेषणात्मक तथा विवेचनात्मक शैलियों का सफल प्रयोग हुआ है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) पैसे को पावर कहने का क्या आशय है?
(ख) लोग पैसे की पावर का प्रयोग किस प्रकार करते हैं?
(ग) यहाँ ”संयमी’ किन लोगों को कहा गया है?
(घ) किन लोगों का मन गर्व से फूला हुआ रहता है?
उत्तर:
(क) पैसे को पावर कहने का आशय यह है कि धन ही मनुष्य की शक्ति का प्रतीक है। धन के द्वारा वह अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त कर सकता है और स्वयं को औरों से अधिक ताकतवर सिद्ध कर सकता है। धन से ही मनुष्य की क्रय-शक्ति बढ़ जाती है।

(ख) लोग पैसे की पावर का प्रयोग घर का सामान, बंगला, कोठी, कार आदि खरीदकर करते हैं। वे अन्य लोगों को अपनी क्रय-शक्ति दिखाकर अपने शक्तिशाली होने का प्रमाण देते हैं।

(ग) यहाँ ‘संयमी’ शब्द का प्रयोग उन लोगों के लिए किया गया है जो पैसे को खर्च नहीं करते। वस्तुतः इस शब्द में करारा व्यंग्य छिपा हुआ है। कंजूस लोग धन का संग्रह करके स्वयं को बुद्धिमान सिद्ध करते हैं। अतः यहाँ लेखक ने कंजूस अमीरों पर करारा व्यंग्य किया है।

(घ) अमीर लोगों का मन इकट्ठे किए गए धन के कारण गर्व से फूला हुआ रहता है। वे धन को खर्च करना नहीं जानते।

[3] मैंने मन में कहा, ठीक। बाज़ार आमंत्रित करता है कि आओ मुझे लूटो और लूटो। सब भूल जाओ, मुझे देखो। मेरा रूप और किसके लिए है? मैं तुम्हारे लिए हूँ। नहीं कुछ चाहते हो, तो भी देखने में क्या हरज़ है। अजी आओ भी। इस आमंत्रण में यह खूबी है कि आग्रह नहीं है आग्रह तिरस्कार जगाता है। लेकिन ऊँचे बाज़ार का आमंत्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है। चाह मतलब अभाव। चौक बाज़ार में खड़े होकर आदमी को लगने लगता है कि उसके अपने पास काफी नहीं है और चाहिए, और चाहिए। मेरे यहाँ कितना परिमित है और यहाँ कितना अतुलित है ओह! [पृष्ठ-87]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक ने बाज़ार की प्रवृत्ति पर समुचित प्रकाश डाला है।

व्याख्या-इससे पूर्व लेखक का मित्र कहता है कि बाज़ार तो शैतान का जाल है, जिसमें सजा-सजाकर सामान रखा जाता है। इसलिए भोले-भाले लोग उसके जाल में फंस जाते हैं। इस पर लेखक मन-ही-मन सोचता है कि यह तो सर्वथा उचित है। बाजार मनुष्य को अपने प्रति आकर्षित करता है। मानों वह कहता है कि यहाँ आओ। मुझे आकर लूट लो। अन्य सब बातों को भूल जाओ और मेरी तरफ देखो, मैं जो यहाँ सजधज कर तैयार खड़ा हूँ किसी और के लिए नहीं अपितु तुम्हारे लिए खड़ा हूँ। यदि तुम कुछ भी खरीदना नहीं चाहते तो न खरीदो, परंतु मुझे देखने में क्या बुराई है। मेरे पास आओ और मुझे अच्छी तरह से देखो।

बाजार द्वारा दिया गया यह आमंत्रण विशेष प्रकार का है। यह आमंत्रण ऐसा है जिसमें कोई खुशामद नहीं है, क्योंकि खुशामद के कारण मनुष्य में अपमान की भावना उत्पन्न होती है। जो जितना बड़ा होता है, उसका आमंत्रण भी मौन रूप से होता है जिससे ग्राहक में सामान खरीदने की इच्छा पैदा होती है। इच्छा से अभिप्राय मनुष्य में किसी-न-किसी चीज की कमी है। जब मनुष्य बाज़ार में खड़ा हो जाता है तो उसे यह लगने लगता है कि उसके पास पर्याप्त मात्रा में सामान नहीं है। उसे और अधिक सामान खरीदना चाहिए। यह चाहत वस्तुएं खरीदने के लिए मजबूर करती है। वह सोचता है कि उसके पास सीमित साधन हैं जबकि बाज़ार में असंख्य और अनेक वस्तुएँ पड़ी हैं। इसलिए उसे अधिकाधिक वस्तुएँ खरीदनी चाहिएँ।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने बाज़ार की महिमा पर समुचित प्रकाश डाला है जो कि ग्राहक को स्वतः अपनी ओर आकर्षित कर लेती है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है, जिसमें तत्सम, तद्भव, उर्दू (हर्ज, खूबी) आदि शब्दों का सुंदर मिश्रण हुआ है।
  3. छोटे-छोटे वाक्यों के कारण भाव स्वतः स्पष्ट होने लगता है।
  4. आत्मकथात्मक शैली द्वारा लेखक ने बाज़ार के आकर्षण पर समुचित प्रकाश डाला है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बाज़ार में माल देखने के लिए आमंत्रण क्यों दिया जाता है?
(ख) कौन-सा आमंत्रण ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करता है और क्यों?
(ग) बाज़ार का चौक लोगों में किस प्रकार की भावना उत्पन्न करता है?
(घ) ग्राहक यह क्यों सोचने लगता है कि उसके पास कितना परिमित है और कितना अतुलित है?
उत्तर:
(क) बाज़ार में माल देखने के लिए आमंत्रण इसलिए दिया जाता है ताकि देखने वाले के मन में वस्तुएँ खरीदने की लालसा जागृत हो और वह बिना आवश्यकता के भी सामान खरीदने लग जाए।

(ख) बाज़ार का मौन-मूक आमंत्रण ही ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। बाज़ार किसी को आवाज़ देकर अपने पास नहीं बुलाता। वस्तुतः बाज़ार की आकर्षक वस्तुएँ ही ग्राहक को यह सोचने को मजबूर कर देती हैं कि वह भी बाज़ार से कुछ-न-कुछ खरीद कर अवश्य ले जाए।

(ग) बाज़ार का चौक लोगों में वस्तुएँ खरीदने की कामना को जागृत करता है। लोग उन वस्तुओं को भी खरीद लेते हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता नहीं होती।

(घ) बाज़ार में वस्तुओं के भंडार को देखकर ग्राहक को लगता है कि उसके घर में बहुत कम वस्तुएँ हैं जबकि यहाँ तो असीमित और अपार सामान सजा है। अतः उसे भी यहाँ से और वस्तुएँ खरीद लेनी चाहिए।

[4] बाज़ार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है तो बाज़ार की अनेकानेक चीजों का निमंत्रण उस तक पहुँच जाएगा। कहीं हुई उस वक्त जेब भरी तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है! मालूम होता है यह भी लूँ, वह भी लूँ। सभी सामान ज़रूरी और आराम को बढ़ाने वाला मालूम होता है। पर यह सब जादू का असर है। जादू की सवारी उतरी कि पता चलता है कि फैंसी चीज़ों की बहुतायत आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती है। थोड़ी देर को स्वाभिमान को ज़रूर सेंक मिल जाता है पर इससे अभिमान की गिल्टी की और खुराक ही मिलती है। जकड़ रेशमी डोरी की हो तो रेशम के स्पर्श के मुलायम के कारण क्या वह कम जकड़ होगी? [पृष्ठ-88]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक ने स्पष्ट किया है कि बाज़ार में एक ऐसा जादू होता है जो ग्राहक को तत्काल मोहित कर लेता है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि बाजार की सजधज में एक ऐसा जादू है जो देखने वाले की आँखों के माध्यम से अपना प्रभाव छोड़ जाता है। वस्तुतः उसका जादू नई-नई वस्तुओं के सुंदर रूप पर निर्भर करता है। जिस प्रकार चुंबक का जादू केवल लोहे पर ही चलता है, ईंट व पत्थर पर नहीं, उसी प्रकार बाज़ार के जादू की एक सीमा होती है। यदि किसी व्यक्ति के पास बहुत सारा पैसा हो, परंतु उनका मन पूर्णतः खाली हो तो ऐसे लोगों पर बाज़ार के जादू का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार अगर किसी के पास पैसे नहीं हैं और उसके मन में वस्तुएँ खरीदने की इच्छाएँ हों तो उस पर भी बाज़ार का आकर्षण कारगर सिद्ध होता है। यदि किसी व्यक्ति के पास धन का अभाव है परंतु उसके मन में इच्छा है तो बाज़ार की सजी असंख्य वस्तुओं का आकर्षण उसे अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।

भाव यह है कि व्यक्ति कहीं से भी उधार लेकर वस्तुएँ खरीदने में नहीं हिचकिचाएगा, परंतु यदि दुर्भाग्य से किसी ग्राहक के पास काफी सारे पैसे हों, तब उसका मन किसी की बात को नहीं सुनता। तब उस व्यक्ति का मन यह अनुभव करता है जो कुछ बाज़ार में है, मैं सब कुछ खरीद लूँ। मुझे बाज़ार की सभी वस्तुओं की इच्छा है। वह सोचता है कि बाज़ार की ये सब वस्तुएँ मेरे लिए आरामदायक सिद्ध होंगी, बाज़ार के जादू के प्रभाव के कारण मनुष्य ऐसे सोचने लगता है, जैसे ही बाज़ार का जादू अर्थात् आकर्षण उसके मन से उतर जाता है वैसे ही उसे यह महसूस होता है कि ये सब वस्तुएँ तो उसके लिए बेकार हैं। इन वस्तुओं की अधिकता उसे आराम देने में सहायक सिद्ध नहीं होगी, बल्कि उसके जीवन में बाधा उत्पन्न करेंगी। तब व्यक्ति में बाज़ार के आकर्षण के प्रति अपकर्षण उत्पन्न हो जाता है और वह सोचने लगता है कि मैंने ये वस्तुएँ व्यर्थ में ही खरीद ली हैं। मुझे तो उनकी आवश्यकता ही नहीं थी।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया है कि बाज़ार का जादू भले ही आकर्षक होता है, परंतु उसका आकर्षण क्षणिक होता है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है जिसमें हिंदी के तत्सम, तद्भव तथा उर्दू (बाज़ार, जादू, राह, असर, वक्त, जरूरी, सवारी, खलल) आदि शब्दों का सुंदर मिश्रण हुआ है।
  3. छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग भावाभिव्यक्ति में सफल रहा है।
  4. विवेचनात्मक शैली के प्रयोग से निबंध की भाषा में निखार आ गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) बाज़ार का जादू ‘रूप का जादू’ कैसे है?
(ख) ‘जेब भरी हो, और मन खाली हो’ का भावार्थ स्पष्ट कीजिए।
(ग) बाज़ार का जादू किस प्रकार के व्यक्तियों को प्रभावित करता है?
(घ) बाज़ार के जादू का असर खत्म होने पर क्या अनुभव होने लगता है?
उत्तर:
(क) बाज़ार में अनेक प्रकार की वस्तुओं को सजा-सजा कर प्रस्तुत किया जाता है। ग्राहक नई-नई वस्तुओं के सुंदर रूप को देखकर धोखा खा जाता है और उनके मन में वस्तुओं को खरीदने की इच्छा उत्पन्न होने लगती है।

(ख) जब व्यक्ति के मन में बाज़ार से कुछ भी खरीदने की इच्छा नहीं होती, तब उसके मन को खाली कहा जाता है, परंतु यदि उसके पास बहुत सारे पैसे होते हैं तो लोग अपने धन की शक्ति को दिखाने के लिए वस्तुओं का क्रय करते हैं। अतः जेब भरी होने का अर्थ है-बहुत सारा धन होना और मन खाली का अर्थ है कि कोई निश्चित सामान खरीदने की इच्छा न होना।

(ग) बाज़ार का जादू केवल उन व्यक्तियों को प्रभावित करता है जिनके पास पैसे की भरमार होती है, लेकिन मन में कोई वस्तु खरीदने की लालसा नहीं होती, परंतु बाज़ार की सजी-धजी वस्तुएँ ऐसे लोगों को अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने के लिए मजबूर कर देती हैं।

(घ) जब बाज़ार के आकर्षण का प्रभाव समाप्त हो जाता है तब ग्राहक यह अनुभव करने लगता है कि जो लुभावनी वस्तुएँ उसने आराम के लिए खरीदी थीं, वे तो उसके किसी काम की नहीं हैं। वे आराम देने की बजाए उसके जीवन में बाधा उत्पन्न कर रही हैं और उसके मन की शांति को भंग कर रही हैं।

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[5] पर उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ तो खाली मन न हो मन खाली हो, तब बाज़ार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो, लू का लूपन व्यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्य में भरा हो तो बाज़ार भी फैला-का-फैला ही रह जाएगा। तब वह घाव बिलकुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाज़ार तुमसे कृतार्थ होगा, क्योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्चा लाभ उसे दोगे। बाज़ार की असली कृतार्थता है। आवश्यकता के समय काम आना। [पृष्ठ-88]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक बाज़ार के जादू से बचने का एक श्रेष्ठ उपाय बताता है कि जब भी हम बाज़ार जाएँ, उस समय हमारा मन खाली नहीं होना चाहिए।

ख्या-जब भी बाजार जाना हो तो हमारे मन में किसी प्रकार का भटकाव एवं भ्रम नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें एक निश्चित वस्तु का लक्ष्य रखकर ही बाज़ार जाना चाहिए। बाज़ार के जादू से बचने का सीधा-सरल उपाय यही है। यदि तुम्हारे मन में कोई वस्तु खरीदने का लक्ष्य न हो तो बाज़ार मत जाओ। लेखक एक उदाहरण देता हुआ कहता है कि लू से बचने का एक ही उपाय है कि पानी पीकर ही लू में बाहर जाना चाहिए। यदि शरीर में पानी होगा तो लू शरीर को किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं कर पाएगी। अतः यदि हमारे मन में किसी वस्तु को खरीदने का लक्ष्य है तो बाज़ार की व्यापकता और आकर्षण हमारे लिए किसी काम का नहीं रहेगा, वह हमें कोई पीड़ा नहीं दे सकेगा, बल्कि हम आनन्दपूर्वक बाज़ार का दर्शन कर सकेंगे। दूसरी ओर बाज़ार भी तुम्हारे प्रति कृतज्ञता का भाव रखेगा, क्योंकि तुमने उसे थोड़ा-बहुत सही लाभ पहुंचाया है। बाज़ार का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह आवश्यकता पड़ने पर हमारे काम आता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने बाज़ार के प्रभाव से बचने का एक सरल उपाय यह बताया है कि हमें मन में कोई निश्चित वस्तु खरीदने का लक्ष्य रखकर ही बाज़ार में जाना चाहिए, तभी हम बाज़ार के जादू से बच सकेंगे।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. विवेचनात्मक शैली के प्रयोग के कारण भाव पूरी तरह स्पष्ट हुए हैं।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बाज़ार के जादू की जकड़ से बचने का सीधा उपाय क्या है?
(ख) लू में जाते समय हम पानी पीकर क्यों जाते हैं?
(ग) बाज़ार की सार्थकता किसमें है?
(घ) मन में लक्ष्य रखने का तात्पर्य क्या है?
(ङ) बाज़ार हमें किस स्थिति में आनंद प्रदान करता है?
उत्तर:
(क) बाज़ार के जादू से बचने का सीधा एवं सरल उपाय यह है कि हमें खाली मन के साथ बाज़ार नहीं जाना चाहिए, बल्कि किसी वस्तु को खरीदने का लक्ष्य रखकर ही बाज़ार जाना चाहिए।

(ख) हम लू में पानी पीकर इसलिए घर से बाहर जाते हैं ताकि हमारे शरीर में पानी हो। यदि हमारे शरीर में पानी होगा तो लू हमें किसी प्रकार की हानि नहीं पहुँचा सकेगी।

(ग) बाज़ार की सार्थकता ग्राहकों की आवश्यकताएँ पूरी करने में है। जब ग्राहकों को अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ बाजार से मिल जाती हैं तो बाज़ार अपनी सार्थकता को सिद्ध कर देता है।

(घ) मन में लक्ष्य भरने का तात्पर्य यह है कि उपभोक्ता बाज़ार जाते समय किसी निश्चित वस्तु को खरीदने का लक्ष्य बनाकर ही बाज़ार में जाए। यदि वह बिना लक्ष्य के बाज़ार जाएगा तो वह निश्चित रूप से बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर ले आएगा, जो बाद में उसकी अशांति का कारण बनेंगी।

(ङ) जब उपभोक्ता बाज़ार से व्यर्थ की वस्तुएँ खरीदने की बजाय केवल अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ खरीदता है तो बाज़ार उसे आनंद प्रदान करने लगता है इससे बाज़ार भी कृतार्थ हो जाता है।

[6] यहाँ एक अंतर चीन्ह लेना बहुत ज़रूरी है। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि वह मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जाएगा, वह शून्य हो जाएगा। शून्य होने का अधिकार बस परमात्मा का है जो सनातन भाव से संपूर्ण है। शेष सब अपूर्ण है। इससे मन बंद नहीं रह सकता। सब इच्छाओं का निरोध कर लोगे, यह झूठ है और अगर ‘इच्छानिरोधस्तपः’ का ऐसा ही नकारात्मक अर्थ हो तो वह तप झूठ है। वैसे तप की राह रेगिस्तान को जाती होगी, मोक्ष की राह वह नहीं है। [पृष्ठ-88-89]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक ने मन के खाली होने तथा बंद होने के अंतर को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि हमें इस अंतर को भली प्रकार से पहचान लेना चाहिए कि हमारा मन खाली है अथवा भरा हुआ है। मन को खाली रखने का मतलब यह नहीं है कि हम अपने मन को पूर्णतः बंद कर दें अर्थात् हम मन में सोचना ही बंद कर दें। यदि हमारा मन चिंतनहीन हो जाएगा तो वह निश्चय से शून्य हो जाएगा। इसका अर्थ है मन का मर जाना और उसकी इच्छाएँ समाप्त हो जाना। इस स्थिति पर अधिकार प्राप्त करने का अधिकार केवल ईश्वर को है, जो कि अपने अन्दर सनातन भाव को लिए है। ईश्वर के अतिरिक्त संपूर्ण सृष्टि अधूरी है, पूर्ण नहीं है, क्योंकि संपूर्णता केवल परमात्मा के पास है। इसलिए हमारा मन इच्छाओं से रहित नहीं हो सकता। यह कहना सरासर झूठ है कि कोई व्यक्ति सभी इच्छाओं को त्याग सकता है और यह कहना भी गलत है कि इच्छाओं का निरोध ही तपस्या है। यदि कोई इस प्रकार के नकारात्मक अर्थ को स्वीकार करके उसे तपस्या का नाम देता है, वह भी सरासर झूठ है। लेखक के अनुसार तपस्या का मार्ग रेगिस्तान के समान व्यर्थ और बेकार है। वह मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग नहीं है। आनंद पूर्ण साधना यही है कि मानव संसार में रहते हुए उसके बंधनों से बचने का प्रयास करे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने यह कहने का प्रयास किया है कि मन को मारने की कोई आवश्यकता नहीं है। मन में इच्छाएँ तो होनी ही चाहिएँ।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है जिसमें ‘इच्छानिरोधस्तपः’ संस्कृत की सूक्ति का सफल प्रयोग किया गया है।
  3. वाक्य-विन्यास भावाभिव्यक्ति में पूरी तरह सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) मन के खाली होने तथा बंद होने में क्या अंतर है?
(ख) लेखक ने ईश्वर और मानव की प्रकृति में क्या अंतर बताया है?
(ग) लेखक ने किस प्रवृत्ति को नकारात्मक कहा है?
(घ) लेखक ने तप के रास्ते को रेगिस्तान का गंतव्य क्यों कहा है? इसके पीछे कौन-सा व्यंग्य छिपा है?
उत्तर:
(क) मन के खाली होने का अर्थ है- मन में कोई निश्चित लक्ष्य अथवा कोई विशेष इच्छा न होना। दूसरी ओर मन के बंद होने का आशय है कि मन की सभी इच्छाओं का समाप्त हो जाना अर्थात् मर जाना। ये दोनों स्थितियाँ एक-दूसरे के विपरीत हैं।

(ख) ईश्वर और मानव की प्रकृति में मुख्य अंतर यह है कि ईश्वर अपने आप में संपूर्ण है। उसकी कोई भी इच्छा शेष नहीं है, परंतु मानव हमेशा अपूर्ण होता है। उसमें हमेशा इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं तथा नष्ट होती रहती हैं।

(ग) लेखक के अनुसार मानव द्वारा अपनी सब इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेना ही नकारात्मक प्रवृत्ति है। जो लोग मन को मारने की प्रवृत्ति को तपस्या का नाम देते हैं, वे सर्वथा झूठ का आश्रय लेते हैं। कोई भी मनुष्य अपने मन की सब इच्छाओं पर काबू नहीं पा सकता।

(घ) तप का रास्ता एक सारहीन और व्यर्थ का रास्ता है। जो लोग यह समझते हैं कि इच्छाओं को मारकर ही तप किया जा सकता है, वे झूठ बोलते हैं। वस्तुतः संसार में रहकर उसके बंधनों से बचने का प्रयास करना ही मोक्ष है। जो कि आनंदपूर्वक साधना कही जा सकती है। रेगिस्तान की राह द्वारा लेखक यह व्यंग्य करता है कि सभी इच्छाओं को समाप्त करना संभव नहीं है। यह तो रेगिस्तान के मार्ग की तरह शुष्क तथा बेकार का परिश्रम है।

  1. [7] ठाठ देकर मन को बंद कर रखना जड़ता है। लोभ का यह जीतना नहीं है कि जहाँ लोभ होता है, यानी मन में, वहाँ नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आँख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे तो क्या हुआ? ऐसे क्या लोभ मिट जाएगा? और कौन कहता है कि आँख फूटने पर रूप दीखना बंद हो जाएगा? क्या आँख बंद करके ही हम सपने नहीं लेते हैं? और वे सपने क्या चैन-भंग नहीं करते हैं? इससे मन को बंद कर डालने की कोशिश तो अच्छी नहीं। वह अकारथ है यह तो हठवाला योग है। शायद हठ-ही-हठ है, योग नहीं है। इससे मन कृश भले हो जाए और पीला और अशक्त जैसे विद्वान का ज्ञान। वह मुक्त ऐसे नहीं होता। इससे वह व्यापक की जगह संकीर्ण और विराट की जगह क्षुद्र होता है। इसलिए उसका रोम-रोम मूंदकर बंद तो मन को करना नहीं चाहिए। वह मन पूर्ण कब है? हम में पूर्णता होती तो परमात्मा से अभिन्न हम महाशून्य ही न होते? अपूर्ण हैं, इसी से हम हैं। सच्चा ज्ञान सदा इसी अपूर्णता के बोध को हम में गहरा करता है। सच्चा कर्म सदा इस अपूर्णता की स्वीकृति के साथ होता है। [पृष्ठ-89]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके नेर हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंन उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक स्पष्ट करता है कि मन की सभी इच्छाओं एवं उमंगों को मार डालना निर्जीवता है। इस संदर्भ में लेखक कहता है कि

व्याख्या-सुख-सुविधाएँ प्रदान करके मन को शांत रखना निर्जीवता ही कही जाएगी। ऐसा करके हम लोभ पर विजय प्राप्त नहीं करते। यदि हमारे मन में लोभ है तो हमारा दृष्टिकोण नकारात्मक हो जाएगा। जिस मन में लोभ पैदा होता है यदि हम उसे पूरी तरह बंद कर दें तो निश्चय से यह मनुष्य की हार कही जाएगी। यदि कोई व्यक्ति अपनी आँखों को ही नष्ट कर देगा और सोचेगा कि वह लोभ को प्रेरणा देने वाली वस्तु को देखने से बच जाएगा तो उसकी यह सोच व्यर्थ कही जाएगी। इससे तो उसकी अपनी हानि होगी। इस प्रकार से लोभ-लालच को मिटाया नहीं जा सकता। यह कहना सर्वथा अनुचित है कि आँखें नष्ट करने से सुंदर रूप दिखाई देना बंद हो जाएगा। इस तथ्य से सभी लोग परिचित हैं कि हम सभी आँखें बंद करके ही सपने लेते हैं। उनमें अनेक सपने ऐसे होते हैं जो हमारी सुख-शांति को भंग करते हैं और हमें आराम से नहीं बैठने देते। इसलिए मन को बंद करने की ऐसी कोशिश करना व्यर्थ ही कहा जाएगा। यह एक बेकार का कार्य है। इसे हम योग नहीं कह सकते, केवल हठ ही कह सकते हैं।

इससे हमारा मन उसी प्रकार शक्तिहीन तथा कमजोर होता है जैसे किसी विद्वान का ज्ञान शक्तिहीन या कमज़ोर होना। इससे मुक्ति नहीं मिलती। मन को बंद करने से मनुष्य की व्यापकता तथा विराटता समाप्त हो जाती है तथा क्षुद्रता एवं संकीर्णता उत्पन्न होती है। इसलिए लेखक का विचार है कि हमें मन की इच्छाओं को मारना नहीं चाहिए। इससे हमारा मन कभी भी पूर्ण नहीं बन सकता। यदि हमारे अन्दर पूर्णता होती तो हम परमात्मा से कभी अलग न होते। यह अपूर्णता ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा आधार है। इसी के कारण हमारा अस्तित्व बना हुआ है। सच्चा ज्ञान वही है जो हमारी इस अपूर्णता के ज्ञान को और अधिक गहरा बनाता है। जब हम अपनी इस अपूर्णता को स्वीकार कर लेते हैं तो हम सच्चा कर्म करने में सक्षम होते हैं। अतः यह सोचना ही व्यर्थ है कि हम अपने मन को मारकर ईश्वर के समान पूर्ण हो जाएँगे।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने इस बात पर बल दिया है कि मनुष्य को अपने मन की इच्छाओं को समाप्त नहीं करना चाहिए। इसीलिए लेखक कहता है कि सच्चा ज्ञान अपूर्णता के बोध में है।
  2. सहज, सरल तथा साहित्यिक हिंदी भाषा का सफल प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित और भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. गंभीर विवेचनात्मक शैली का सफल प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लेखक मन को बंद रखने के विरुद्ध क्यों है?
(ख) किस स्थिति में लोभ की जीत और आदमी की हार होती है?
(ग) आँख फोड़ डालने के पीछे क्या व्यंग्य छिपा है?
(घ) आँख फोड़ डालने पर भी मनुष्य बेचैन तथा व्याकुल क्यों रहता है?
(ङ) लेखक ने किसे हठ योग कहा है?
(च) लेखक के अनुसार सच्चा ज्ञान क्या है?
उत्तर:
(क) लेखक का विचार है कि मन को बंद रखना अर्थात् मन की सभी इच्छाओं को समाप्त कर देना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इच्छाओं को मार डालने से हमारा मन ही जड़ हो जाएगा और उर गतिशीलता नष्ट हो जाएगी।

(ख) जब मनुष्य अपने उस मन को पूरी तरह बंद कर देता है जिसमें लोभ उत्पन्न होता है तो उस स्थिति में लोभ की विजय होती है और आदमी की हार होती है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि मनुष्य ने लोभ से डर कर अपने मन के द्वार बंद कर दिए हैं। उसमें लोभ से संघर्ष करने की शक्ति नहीं रही।

(ग) ‘आँख फोड़ डालने’ का व्यंग्य यह है कि संसार की गतिविधियों को अनदेखा करना और उसकी ओर से मन को हटा लेना और मन में यह निर्णय ले लेना कि वह संसार के आकर्षणों की ओर ध्यान नहीं देगा।

(घ) जब मनुष्य संसार की सारी गतिविधियों को अनदेखा करने लगता है तब भी उसके मन में अनेक प्रकार के सपने बनते-बिगड़ते रहते हैं। अतः मनुष्य अपने उन सपनों के बारे में सोचता हुआ हमेशा बेचैन ही रहता है और उसके मन को शांति नहीं मिलती।

(ङ) संसार की सभी इच्छाओं, स्वादों और आनंदों का निषेध करना ही हठ योग कहलाता है। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि जब मनुष्य अपने मन में यह हठ कर लेता है कि वह संसार की गतिविधियों की ओर ध्यान नहीं देगा और अपनी इच्छाओं को मार लेगा, तभी वह हठ योग की ओर अग्रसर होने लगता है।

(च) लेखक के अनुसार सच्चा ज्ञान वही है जो हमें हमारी अपूर्णता का बोध कराता है। इस प्रकार के ज्ञान से हम पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रेरित होते हैं और कर्म करने लगते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

[8] क्या जाने उस भोले आदमी को अक्षर-ज्ञान तक भी है या नहीं। और बड़ी बातें तो उसे मालूम क्या होंगी। और हम-आप न जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें जानते हैं। इससे यह तो हो सकता है कि वह चूरन वाला भगत हम लोगों के सामने एकदम नाचीज़ आदमी हो। लेकिन आप पाठकों की विद्वान श्रेणी का सदस्य होकर भी , मैं यह स्वीकार नहीं करना चाहता हूँ कि उस अपदार्थ प्राणी को वह प्राप्त है जो हम में से बहुत कम को शायद प्राप्त है। उस पर बाजार का जादू वार नहीं कर पाता। माल बिछा रहता है, और उसका मन अडिग र पैसा उससे आगे होकर भीख तक माँगता है कि मुझे लो। लेकिन उसके मन में पैसे पर दया नहीं समाती। वह निर्मम व्यक्ति पैसे को अपने आहत गर्व में बिलखता ही छोड़ देता है। ऐसे आदमी के आगे क्या पैसे की व्यंग्य-शक्ति कुछ भी चलती होगी? [पृष्ठ-90]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक चूरन बेचने वाले भगत जी की बात कर रहा है जो बिना आवश्यकता के बाज़ार में देखता तक नहीं।

व्याख्या-लेखक कहता है कि शायद उस भोले भगत जी को अक्षर-ज्ञान है या नहीं अर्थात् वह अनपढ़ व्यक्ति लगता है। इसलिए वह बड़ी-बड़ी बातें नहीं करना चाहता है और न ही उसे बड़ी-बड़ी बातों का पता है। अन्य लोग तो बड़ी-बड़ी बातें जानते भी हैं और करते भी हैं। इससे लोग यह निष्कर्ष भी निकाल सकते हैं कि भगत जी उनके सामने मामूली व्यक्ति हैं जिसका कोई महत्त्व नहीं है। भले ही लेखक पाठकों की पढ़ी-लिखी श्रेणी का ही व्यक्ति है, परंतु वह इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं करता। भगत जी जैसे मामूली व्यक्ति को जो कुछ प्राप्त है, वह शायद हम में से बहुत कम लोगों को प्राप्त है। सत्य तो यह है कि भगत जी पर बाज़ार का जादू चल ही नहीं सकता। उसके सामने बाज़ार का माल फैला रहता है, परंतु उसका मन कभी चंचल नहीं होता। वह स्थिर रहता है।

पैसा उसके सामने भीख माँगता हुआ कहता है कि मुझे स्वीकार कर लो, परंतु भगत जी पैसे की माँग को ठुकरा देते हैं। उन्हें पैसे पर दया नहीं आती। जिससे पैसे का गर्व टूटकर बिखर जाता है। पैसे के संबंध में भगत जी एक कठोर हृदय वाले व्यक्ति हैं। ऐसा लगता है कि मानों पैसा उसके आगे रोने लगता है और भगत जी के स्वाभिमान के आगे नतमस्तक हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति पर पैसे की व्यंग्य-शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता पैसे की व्यंग्य-शक्ति उसके आगे कुंठित हो जाती है और अपने आपको कोसने लगती है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक यह स्पष्ट करता है कि यदि व्यक्ति के मन में संयम, विवेक और संतोष वृत्ति है तो सांसारिक आकर्षण उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। ऐसा व्यक्ति मायावी आकर्षणों की परवाह किए बिना आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित एवं भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. यहाँ विवेचनात्मक तथा विश्लेषणात्मक शैलियों का प्रयोग किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) यहाँ लेखक ने किस भोले आदमी की बात की है और किस बात में उसका भोलापन दिखाई देता है?
(ख) लेखक ने चूरन वाले भगत जी को अपदार्थ क्यों कहा है?
(ग) भगत जी के पास ऐसा क्या है जो बड़े-बड़े विद्वानों के पास नहीं है?
(घ) भगत जी पर बाज़ार के जादू का प्रभाव क्यों नहीं होता? (ङ) पैसे की व्यंग्य-शक्ति से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) यहाँ चूरन वाले भगत जी को भोला आदमी कहा गया है। दुनिया की नज़रों में वे बहुत सीधे और भोले व्यक्ति हैं। संसार के अन्य लोग तो अवसर मिलने पर बाज़ार की सभी वस्तुएँ खरीद लेना चाहते हैं, परंतु भगत जी आवश्यकता के बिना कुछ नहीं खरीदते। इसलिए उन्हें भोला व्यक्ति कहा गया है।

(ख) अपदार्थ का अर्थ है-बेचारा या अंकिचन संसार की नज़रों में भगत जी न अमीर हैं और न ही शिक्षित हैं, इसलिए लोग उन्हें अपदार्थ कहते हैं।

(ग) भगत जी एक संतोषी, विवेकशील तथा संयमी व्यक्ति हैं। ये गुण संसार के बड़े-बड़े विद्वानों में भी नहीं मिलते। संसार के अधिकांश लोग लोभी, लालची होते हैं।

(घ) भगत जी सीधा-सादा जीवन व्यतीत करते हैं। उनके मन में आकर्षक वस्तुएँ खरीदने की तृष्णा नहीं है। इसलिए बाज़ार का जादू उनको प्रभावित नहीं कर पाता। वे अपनी आवश्यकतानुसार जीरा व काला नमक लेकर घर लौट आते हैं।

(ङ) पैसे,की व्यंग्य-शक्ति का अभिप्राय है कि पैसे की शक्ति लोगों को लुभाती है, उन्हें लोभी बनाती है तथा तृष्णा से व्याकुल कर देती है, परंतु भगत जी पर पैसे की व्यंग्य-शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे तो बाज़ार की अनावश्यक वस्तुओं को देखते तक नहीं। फलस्वरूप पैसे की व्यंग्य-शक्ति विफल हो जाती है।

[9] पैसे की व्यंग्य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है। मैं पैदल चल रहा हूँ कि पास ही धूल उड़ाती निकल गई मोटर। वह क्या निकली मेरे कलेजे को कौंधती एक कठिन व्यंग्य की लीक ही आर-से-पार हो गई। जैसे किसी ने आँखों में उँगली देकर दिखा दिया हो कि देखो, उसका नाम है मोटर, और तुम उससे वंचित हो! यह मुझे अपनी ऐसी विडंबना मालूम होती है कि बस पूछिए नहीं। मैं सोचने को हो आता हूँ कि हाय, ये ही माँ-बाप रह गए थे जिनके यहाँ मैं जन्म लेने को था! क्यों न मैं मोटरवालों के यहाँ हुआ! उस व्यंग्य में इतनी शक्ति है कि ज़रा में मुझे अपने सगों के प्रति कृतघ्न कर सकती है।। [पृष्ठ-90]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक ने पैसे की व्यंग्य-शक्ति के प्रभाव को स्पष्ट करने का प्रयास किया है।

व्याख्या-पैसे की व्यंग्य-शक्ति बडी विचित्र और कठोर है, लेखक उस शक्ति का वर्णन करता हआ कहता है कि एक व्यक्ति बाज़ार में पैदल जा रहा था। उसके पास से धूल उड़ाती एक मोटरकार निकल जाती है। उस मोटरकार के निकलते ही पैदल चलने वाले व्यक्ति के कलेजे को पार करती हुई एक कठोर व्यंग्य की लकीर निकल जाती है। उस व्यक्ति के हृदय में एक जलन-सी होने लगती है मानों कोई उसकी आँखों में उँगली डालकर यह दिखाने का प्रयास करता है कि तुम्हारे सामने से मोटरकार गुजर गई है। यह मोटरकार तुम्हारे पास नहीं है। इससे पैदल चलने वाले व्यक्ति को अपनी मजबूरी का पता चल जाता है और वह अपनी हालत के बारे में सोचने के लिए मजबूर हो जाता है। वह सोचने लगता है कि उसके पास इस प्रकार की मोटरकार क्यों नहीं है। बड़े दुख मैंने ऐसे माँ-बाप के यहाँ जन्म लिया जिनके पास मोटरकार नहीं है। मैं मोटरकारों वालों के यहाँ क्यों नहीं जन्मा? उस व्यंग्य में इतनी तीव्र शक्ति होती है कि मैं अपने सगे-संबंधियों से भी घृणा करने लगता हूँ और मेरे अन्दर अकृतज्ञता का भाव उत्पन्न हो जाता है।

विशेष-

  1. यहाँ पर लेखक यह बताना चाहता है कि पैसे की व्यंग्य-शक्ति मनुष्य में ईर्ष्या और द्वेष की भावना उत्पन्न करती है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावानुकूल है।
  4. आत्मसंबोधनात्मक शैली के कारण भावाभिव्यक्ति पूर्णतः स्पष्ट हो गई है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) लेखक ने पैसे की व्यंग्य-शक्ति को दारुण क्यों कहा है?
(ख) पास ही धूल उड़ाती निकल गई मोटरकार का पैदल चलने वाले पर क्या प्रभाव पड़ा?
(ग) पैदल चलने वाला व्यक्ति क्या सोचने के लिए मजबूर हो जाता है?
(घ) पैदल चलने वाला व्यक्ति किन कारणों से सगे-संबंधियों के प्रति कृतघ्न हो जाता है?
उत्तर:
(क) पैसे की शक्ति को लेखक ने दारुण इसलिए कहा है क्योंकि वह आम आदमी में ईर्ष्या, जलन तथा तृष्णा को उत्पन्न करती है। अपने से अमीर व्यक्ति के समान वह भी सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना चाहता है।

(ख) पास ही धूल उड़ाती निकली मोटरकार ने पैसे की व्यंग्य-शक्ति का प्रभाव दिखा दिया। पैदल चलने वाले व्यक्ति को यह तत्काल ही महसूस हो गया कि उसके पास मोटरकार नहीं है, इससे उसे अपनी हीनता महसूस होने लगी।

(ग) पैदल चलने वाला व्यक्ति यह सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि वह ऐसे माँ-बाप के यहाँ क्यों जन्मा, जिनके पास मोटरकार नहीं है। काश! मैं मोटरकार वाले माँ-बाप के यहाँ जन्म लेता।

(घ) पैदल चलने वाला व्यक्ति पैसे की व्यंग्य-शक्ति के कारण ही अपने सगे-संबंधियों के प्रति कृतघ्न हो जाता है। वह यहाँ तक सोचने लगता है कि उसका जन्म भी किसी अमीर परिवार में होता।

[10] उस बल को नाम जो दो; पर वह निश्चय उस तल की वस्तु नहीं है जहाँ पर संसारी वैभव फलता-फूलता है। वह कुछ अपर जाति का तत्त्व है। लोग स्पिरिचुअल कहते हैं; आत्मिक, धार्मिक, नैतिक कहते हैं। मुझे योग्यता नहीं कि मैं उन शब्दों में अंतर देखू और प्रतिपादन करूँ। मुझे शब्द से सरोकार नहीं। मैं विद्वान नहीं कि शब्दों पर अटकूँ। लेकिन इतना तो है कि जहाँ तृष्णा है, बटोर रखने की स्पृहा है, वहाँ उस बल का बीज नहीं है। बल्कि यदि उसी बल को सच्चा बल मानकर बात की जाए तो कहना होगा कि संचय की तृष्णा और वैभव की चाह में व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है। निर्बल ही धन की ओर झुकता है। वह अबलता है। वह मनुष्य पर धन की और चेतन पर जड़ की विजय है। [पृष्ठ-90-91]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाजार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। इससे पूर्व लेखक यह स्पष्ट कर चुका है कि लोक वैभव की व्यंग्य-शक्ति उस सामान्य चूरन वाले व्यक्ति के सामने चूर-चूर हो गई थी। उसमें ऐसा कौन-सा बल था जो इस तीखे व्यंग्य के सामने अजेय बना रहा। इस संदर्भ में लेखक कहता है कि

व्याख्या-उस बल को कोई भी नाम दिया जा सकता है। वह निश्चय से कोई ऐसी गहरी वस्तु नहीं है जिस पर खड़ा होकर संसार का धन-वैभव बढ़ता है। वह बल धन-संपत्ति को नहीं बढ़ाता और न ही वह उससे संबंधित है। वह तो एक अलग प्रकार का तत्त्व है जिसे लोग आध्यात्मिक शक्ति कहते हैं। उसे धार्मिक, नैतिक अथवा आत्मिक शक्ति भी कहा जा सकता है। लेखक स्वीकार करता है कि उसके पास ऐसी सोच-समझ नहीं है जिसके द्वारा वह गहराई में जाए और उस शक्ति की व्याख्या करे। लेखक यह भी स्वीकार करता है शब्दों में अंतर से उसका कोई संबंध नहीं है।

वह यह भी स्वीकार करता है कि वह ऐसा विद्वान नहीं है जो यहाँ-वहाँ भटकता फिरे। लेकिन फिर भी वह अपनी समझ से प्रकाश डालता हुआ कहता है कि जिन लोगों में धन प्राप्त करने की इच्छा है, धन का संग्रह करने की चाह है, ऐसे लोगों के पास वह बल नहीं है, परंतु उस बल को यदि सच्चा बल मान लिया जाए तो धन-संग्रह की इच्छा और धन-वैभव की चाह मनुष्य को कमज़ोर ही बनाती है और कमज़ोर व्यक्ति ही धन की ओर भागता है जिसे लेखक बलहीनता कहता है। अन्य शब्दों में लेखक कहता है ऐसी स्थिति में मनुष्य पर धन की विजय होती है अर्थात् वह धन का गुलाम हो जाता है। यह चेतन पर जड़ की विजय है। मनुष्य तो चेतनशील है, परंतु धन-वैभव जड़ है। फिर भी वह चेतनशील मनुष्य पर विजय प्राप्त कर लेता है।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने उस बल की चर्चा की है जो धन-वैभव के तीखे व्यंग्य के आगे अजेय बना रहता है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावानुकूल है।
  4. आत्मविश्लेषणात्मक शैली द्वारा आध्यात्मिक शक्ति की विवेचना की गई है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) लोग किस बल को ‘स्पिरिचुअल’ कहते हैं। लेखक ने इस बल को और कौन-से नाम दिए हैं?
(ख) लेखक के अनुसार कौन व्यक्ति सबल है और कौन निर्बल है?
(ग) व्यक्ति की निर्बलता किस बात से प्रमाणित होती है?
(घ) मनुष्य पर धन की और चेतन पर जड़ की विजय से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
(क) सांसारिक वैभव के सामने न झुकने वाला बल ही स्पिरिचुअल है। लेखक ने इसे आत्मिक, धार्मिक और नैतिक बल कहा है।

(ख) जिस व्यक्ति में न तो संचय की तृष्णा है और न ही वैभव की चाह है, वह सबल है, परंतु जिसमें ये दोनों चीजें हैं वह निर्बल है। निर्बल व्यक्ति ही धन की ओर झुकता है, सबल नहीं।

(ग) व्यक्ति की निर्बलता इस बात से प्रमाणित होती है कि उसमें धन-संपत्ति का संचय करने की तृष्णा और वैभव की चाह होती है।

(घ) मनुष्य में जब धन का संग्रह करने की तष्णा पैदा होती है तो यह मनुष्य पर धन की विजय है। मनुष्य एक चेतनशील प्राणी है और धन जड़ और निर्जीव है। इसलिए यह जड़ पर चेतन की विजय कहलाती है।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

[11] एक बार चूरन वाले भगत जी बाज़ार चौक में दीख गए। मुझे देखते ही उन्होंने जय-जयराम किया। मैंने भी जयराम कहा। उनकी आँखें बंद नहीं थीं और न उस समय वह बाज़ार को किसी भाँति कोस रहे मालूम होते थे। राह में बहुत लोग, बहुत बालक मिले जो भगत जी द्वारा पहचाने जाने के इच्छुक थे। भगत जी ने सबको ही हँसकर पहचाना। सबका अभिवादन लिया और सबको अभिवादन किया। इससे तनिक भी यह नहीं कहा जा सकेगा कि चौक-बाज़ार में होकर उनकी आँखें किसी से भी कम खुली थीं। लेकिन भौंचक्के हो रहने की लाचारी उन्हें नहीं थी। व्यवहार में पसोपेश उन्हें नहीं था और खोए से खड़े नहीं वह रह जाते थे। भाँति-भाँति के बढ़िया माल से चौक भरा पड़ा है। उस सबके प्रति अप्रीति इस भगत के मन में नहीं है। जैसे उस समूचे माल के प्रति भी उनके मन में आशीर्वाद हो सकता है। विद्रोह नहीं, प्रसन्नता ही भीतर है, क्योंकि कोई रिक्त भीतर नहीं है। देखता हूँ कि खुली आँख, तुष्ट और मग्न, वह चौक-बाज़ार में से चलते चले जाते हैं। राह में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं। कहीं भगत नहीं रुकते। रुकते हैं तो एक छोटी पंसारी की दुकान पर रुकते हैं। वहाँ दो-चार अपने काम की चीज़ ली और चले आते हैं। बाजार से हठ पूर्वक विमुखता उनमें नहीं है। [पृष्ठ-91]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यहाँ लेखक उस घटना का हवाला देता है जब उन्हें बाज़ार चौक में भगत जी दिखाई दिए थे। उस समय भी भगत जी संतुष्ट और प्रसन्न थे।

व्याख्या-लेखक कहता है कि एक बार उन्हें चूरन वाले भगत जी बाज़ार चौक में मिल गए। लेखक को देखते ही भगत जी ने उनसे जय-जयराम किया। लेखक ने भी उत्तर में उनका अभिवादन किया। उस समय भी उनकी आँखें पूरी तरह से खुली थीं। ऐसा लगता था कि वे किसी भी प्रकार बाज़ार की निंदा या आलोचना नहीं कर रहे थे। भाव यह था कि उनको बाज़ार से किसी प्रकार की आसक्ति नहीं थी। बाज़ार में बहुत-से लोग व बालक थे। वे चाहते थे कि भगत जी उन्हें पहचानें। भगत जी ने हँसते हुए सभी को पहचाना। सभी से अभिवादन लिया और सभी को अभिवादन किया। इससे पता चलता है कि भगत जी बहुत मिलनसार व्यक्ति थे। साथ ही यह भी सिद्ध होता है कि भगत जी चौक बाज़ार में चलते समय बाज़ार और वहाँ के लोगों की तरफ ध्यान न दे रहे हों। वे सब लोगों को देख रहे थे और बाज़ार की वस्तुओं को भी देख रहे थे, परंतु उनमें हैरान होने की मजबूरी नहीं थी। न ही उनके व्यवहार में किसी प्रकार का असमंजस था।

वे बाज़ार को हैरान होकर देखकर खड़े भी नहीं होते थे। बाज़ार चौक बढ़िया-से-बढ़िया वस्तुओं से भरा हुआ था। उन वस्तुओं में एक विचित्र आकर्षण भी था। परंतु भगत के मन में इन वस्तुओं के प्रति घृणा की भावना भी नहीं थी। ऐसा लगता था मानों वे बाज़ार के माल को मन-ही-मन आशीर्वाद दे रहे हों। उनके मन में विद्रोह की भावना नहीं थी, बल्कि प्रसन्नता की भावना थी। कारण यह है कि किसी का भी मन किसी समय खाली नहीं होता। कोई-न-कोई विचार मन में चलता रहता है। भगत जी का मन इस समय प्रसन्न था। लेखक ने देखा कि भगत जी खुली आँखों से संतुष्ट तथा निमग्न होकर चौक बाज़ार के बीचों-बीच चले जा रहे हैं। मार्ग में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर भी हैं, परंतु भगत जी कहीं भी नहीं रुकते। वे निरंतर बाज़ार को देखते हुए आगे बढ़ते चले जाते हैं और अंत में पंसारी की एक छोटी-सी दुकान पर जाकर रुक जाते हैं। वहाँ से वे दो चार आने का सामान खरीद लेते हैं और लौट आते हैं। बाज़ार के प्रति उनके मन में कोई विद्रोह का भाव या विमुखता भी नहीं थी। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि बाज़ार के प्रति भगत जी का न तो कोई लगाव था, न अलगाव था। वे केवल अपनी आवश्यकता की वस्तु खरीदने के लिए बाज़ार में जाते हैं।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने भगत जी के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि हमें केवल बाज़ार से आवश्यकता-पूर्ति का सामान ही खरीदना चाहिए, अनावश्यक सामान नहीं खरीदना चाहिए।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास बड़ा ही सटीक व भावानुकूल है।
  4. वर्णनात्मक शैली द्वारा भगत जी की चारित्रिक विशेषताओं का उद्घाटन किया गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) “भगत जी की आँखें बंद नहीं थीं” इससे क्या अभिप्राय है?
(ख) बाज़ार में भगत जी प्रसन्न और संतुष्ट क्यों दिखाई देते हैं?
(ग) रास्ते में लोग और बालक भगत जी द्वारा पहचाने जाने के इच्छुक क्यों थे?
(घ) भगत जी फैंसी माल को देखकर भी भौंचक्के क्यों नहीं होते? (ङ) भगत जी बाज़ार किसलिए जाते थे?
उत्तर:
(क) इस पंक्ति का अभिप्राय है कि भगत जी खुली आँखों से बाज़ार को देखते हुए चल रहे थे। उन्होंने बाज़ार की वस्तुओं के लोभ से बचने के लिए अपनी आँखें बंद नहीं की। इससे यह स्पष्ट होता है कि बाजार के प्रति उनके मन में न तिरस्कार की भावना थी, न निषेध की भावना थी।

(ख) भगत जी बाज़ार में प्रसन्न व संतुष्ट इसलिए दिखाई देते हैं क्योंकि उन्हें बाज़ार से अपनी आवश्यकतानुसार काला नमक व जीरा मिल जाता है। इसके अतिरिक्त बाज़ार की वस्तुओं के प्रति उनके मन में न तिरस्कार है और न ही उन्हें खरीदने की इच्छा है। बाज़ार का आकर्षण उनके मन में विकार उत्पन्न नहीं करता। इसलिए वह सहज भाव से प्रसन्न व संतुष्ट दिखाई देते हैं।

(ग) भगत जी रास्ते में चलते हुए सबसे जय-जयराम करते थे। वे सबसे हँसकर मिलते थे और उनका अभिवादन भी करते थे। कारण यह था कि वे बड़े मिलनसार व्यक्ति थे। इसलिए रास्ते के लोग चाहते थे कि भगत जी पहचान कर उनका अभिवादन करें।

(घ) बाज़ार की फैंसी वस्तुओं को देखकर वही लोग भौंचक्के होते हैं जिनके मन में उन वस्तुओं को खरीदने की इच्छा होती है। ऐसे लोग तृष्णा के कारण ही आकर्षक वस्तुओं को देखकर भौंचक्के होते हैं। भगत जी के मन में फैंसी माल के प्रति कोई तृष्णा नहीं थी और न ही उन्हें इसकी आवश्यकता थी। इसलिए वे फैंसी माल को देखकर भौंचक्के नहीं हुए।

(ङ) भगत जी बाज़ार में काला नमक व जीरा खरीदने के लिए जाते थे। इनसे वे चूरन बनाकर बाज़ार में बेचते थे।

[12] लेकिन अगर उन्हें जीरा और काला नमक चाहिए तो सारे चौक-बाज़ार की सत्ता उनके लिए तभी तक है, तभी तक उपयोगी है, जब तक वहाँ जीरा मिलता है। ज़रूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया कि फिर सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं बराबर हो जाता है। वह जानते हैं कि जो उन्हें चाहिए वह है जीरा नमक। बस इस निश्चित प्रतीति के बल पर शेष सब चाँदनी चौक का आमंत्रण उन पर व्यर्थ होकर बिखरा रहता है। चौक की चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है क्योंकि भगत जी को जीरा चाहिए वह तो कोने वाली पंसारी की दुकान से मिल जाता है और वहाँ से सहज भाव में ले लिया गया है। इसके आगे आस-पास अगर चाँदनी बिछी रहती है तो बड़ी खुशी से बिछी रहे, भगत जी से बेचारी का कल्याण ही चाहते हैं। [पृष्ठ-91]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक ने यह बताने का प्रयास किया है कि भगत जी के लिए बड़े-बड़े फैंसी स्टोरों का कोई महत्त्व नहीं है। उनके लिए केवल छोटी-सी पंसारी की दुकान का महत्त्व है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि भगत जी के रास्ते में बड़े-बड़े फैंसी स्टोर हैं, पर भगत जी कहीं पर नहीं रुकते। भगत जी के सामने वे फैंसी स्टोर ज्यों-के-त्यों पड़े रह जाते हैं। क्योंकि भगत जी तो एक छोटी-सी पंसारी की दुकान पर जाकर रुकते हैं। जहाँ से वे दो-चार आने का सामान लेकर लौट पड़ते हैं। इस स्थिति में भगत जी के मन में न तो बाज़ार के लिए हठ है और न ही विमुखता। उन्हें तो केवल जीरा और काला नमक चाहिए था जिसे उन्होंने खरीद लिया। भगत जी के लिए चौक बाज़ार का अस्तित्व तब तक है जब तक उन्हें बाज़ार से जीरा व काला नमक उपलब्ध होता है। जब उन्होंने अपनी आवश्यकतानुसार जीरा खरीद लिया तो सारा चौक उनके लिए कोई महत्त्व नहीं रखता।

उनके लिए तो केवल जीरे और नमक का महत्त्व है, जो उन्हें बाज़ार से मिल गया। भगत जी के इसी निश्चित विश्वास के कारण शेष संपूर्ण चाँदनी चौक का निमंत्रण उनके लिए बेकार है। भगत जी उसकी ओर कोई ध्यान नहीं देते। चौक का आकर्षण दोनों दिशाओं में मानों भूख से व्याकुल होकर देखता रह जाता है। भगत जी को केवल जीरा ही चाहिए था जिसे उन्होंने केवल पंसारी की दुकान से बड़े सहज भाव से खरीद लिया। चाँदनी चौक के आकर्षण से न भगत जी को कोई लगाव है, न अलगाव है। चाँदनी चौक का संपूर्ण सौंदर्य उनके लिए फैला रहता है। भगत जी उस बाज़ार का भला ही चाहते हैं, परंतु उसके आकर्षण के प्रति आसक्त नहीं होते और अपनी ज़रूरत की वस्तुएँ खरीदकर लौट जाते हैं।

विशेष-

  1. इसमें लेखक ने चाँदनी चौक के आकर्षण के प्रति भगत जी के तटस्थ भाव का सजीव वर्णन किया है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास बड़ा ही सटीक व भावानुकूल है।
  4. वर्णनात्मक शैली द्वारा भगत जी पर समूचा प्रकाश डाला गया है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) भगत जी बड़े-बड़े फैंसी स्टोरों के पास क्यों नहीं रुकते?
(ख) भगत जी एक छोटी पंसारी की दुकान पर क्यों रुकते हैं?
(ग) सारा चौक भगत जी के लिए नहीं के बराबर कब और क्यों हो जाता है?
(घ) चौक की चाँदनी भगत जी के लिए कोई महत्त्व क्यों नहीं रखती?
उत्तर:
(क) भगत जी बड़े-बड़े फैंसी स्टोरों के पास इसलिए नहीं रुकते क्योंकि उनके लिए फैंसी स्टोर का आकर्षक सामान अनावश्यक है। वे फैंसी स्टोर के आकर्षणों के शिकार नहीं होते और आगे बढ़ते चले जाते हैं।

(ख) भगत जी बाज़ार में बेचने के लिए चूरन तैयार करते हैं। अतः उन्हें अपनी आवश्यकता का सामान अर्थात् काला नमक व जीरा इसी छोटी-सी पंसारी की दुकान पर मिल जाता है। इसलिए वह पंसारी की दुकान पर रुक जाते हैं।

(ग) जब भगत जी बाज़ार से अपनी ज़रूरत के अनुसार जीरा और नमक खरीद लेते हैं तो सारा चौक तथा बाज़ार उनके लिए नहीं के बराबर हो जाता है, क्योंकि उन्हें जो कुछ चाहिए था, वह उसे लेकर लौट आते हैं।

(घ) भगत जी केवल अपनी ज़रूरत का सामान खरीदने ही चाँदनी चौक बाज़ार में जाते हैं। चाँदनी चौक का आकर्षण भगत जी को व्यामोहित नहीं कर पाता। इसलिए सारा चौक भगत जी के लिए कोई महत्त्व नहीं रखता।

[13] यहाँ मुझे ज्ञात होता है कि बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति-शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाज़ार को देते हैं। न तो वे बाज़ार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाज़ार को सच्चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाज़ार का बाज़ारूपन बढ़ाते हैं। जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। कपट की बढ़ती का अर्थ परस्पर में सद्भाव की घटी। [पृष्ठ-91]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2′ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाजार दर्शन’ लेखक का एक महत्त उपभोक्तावाद तथा बाजारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। प्रस्तुत गद्यांश में लेखक ने बाज़ार की सार्थकता पर समुचित प्रकाश डाला है।

व्याख्या-लेखक का कथन है कि वही व्यक्ति बाज़ार को सार्थक बना सकता है जिसे पता है कि उसे बाज़ार से क्या खरीदना है, परंतु जो लोग यह नहीं जानते कि उन्हें क्या खरीदना है, उनका मन खाली होता है। वे अपनी क्रय-शक्ति के अभिमान में बाज़ार को केवल अपनी विनाशक शक्ति प्रदान करते हैं। लेखक इसे शैतानी-शक्ति अथवा व्यंग्य की शक्ति कहता है। कहने का भाव यह है कि इस प्रकार के लोग अपनी पर्चेजिंग पावर का अभिमान प्रकट करते हुए बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीद लेते हैं। उनकी यह शक्ति एक शैतानी शक्ति है जो कि समाज तथा बाज़ार का ही विनाश करती है। इस प्रकार के लोग न तो स्वयं बाज़ार से कोई लाभ उठा सकते हैं और न ही बाज़ार को सच्चा लाभ पहुंचा सकते हैं। इस प्रकार के लोगों के कारण बाज़ार के बाजारूपन को बढ़ावा मिलता है। यही नहीं, इससे छल-कपट की भी वृद्धि होती है और कपट बढ़ने का अर्थ यह है कि लोगों में सद्भाव घट जाता है अर्थात् अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने वाले लोग बाज़ार में छल-कपट को बढ़ावा देते हैं तथा आपसी सद्भावना को नष्ट करते हैं।

विशेष-

  1. यहाँ लेखक ने बाज़ार की सार्थकता को स्पष्ट करते हुए बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने वाले लोगों पर करारा व्यंग्य किया है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा उचित व भावाभिव्यक्ति में सहायक है।
  4. वर्णनात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर
प्रश्न-
(क) बाज़ार की सार्थकता से क्या अभिप्राय है?
(ख) किस प्रकार के लोग बाजारूपन को बढ़ावा देते हैं और कैसे?
(ग) धन की शक्ति बाज़ार को किस प्रकार प्रभावित करती है?
(घ) किन कारणों से बाज़ार में सद्भाव घटता है तथा कपट बढ़ता है?
उत्तर:
(क) लेखक के अनुसार वही बाज़ार सार्थक है जो ग्राहकों को आवश्यक सामान उपलब्ध कराता है। जो बाज़ार अनावश्यक तथा आकर्षक वस्तुओं का प्रदर्शन करता है, वह लोगों की इच्छाओं को भड़काकर अपनी निरर्थकता व्यक्त करता है।

(ख) जो लोग धन की ताकत के बल पर अनावश्यक वस्तुओं को बाजार से खरीदते हैं वे लोग ही बाजारूपन तथा छल-कपट को बढ़ावा देते हैं। इस प्रकार के लोग मानों “ह दिखाना चाहते हैं कि उनमें कितना कुछ खरीदने की ताकत है। इससे लोगों में अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने की होड़ लग जाती है। फलस्वरूप वस्तुएँ आवश्यकता के लिए नहीं, बल्कि झूठी शान के लिए खरीदी जाती हैं जिससे छल-कपट तथा शोषण को बढ़ावा मिलता है।

(ग) धन की शक्ति बाज़ार में शैतानी-शक्ति को बढ़ावा देती है। अमीर लोग बाज़ार से अनावश्यक फैंसी वस्तुएँ खरीद कर अपनी शान का ढोल पीटते हैं। दूसरी ओर दुकानदार अर्थात् विक्रेता कपट का सहारा लेते हुए उसका शोषण करता है जिससे ग्राहक और दुकानदार में सद्भाव नष्ट हो जाता है। दुकानदार और ग्राहक एक-दूसरे को धोखा देने में लगे रहते हैं।

(घ) जब बाजार ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करने का साधन बनता है तब लोगों में सदभावना बढ़ती है, परंतु जब ग्राहक अपनी शान का डंका बजाने के लिए अनावश्यक वस्तुएँ खरीदने लगता है तो बाज़ार भी छल-कपट का सहारा लेने लगता है जिससे दुकानदार और ग्राहक में सद्भाव नहीं रहता। दोनों एक-दूसरे को धोखा देने की ताक में लगे रहते हैं।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

[14] इस सद्भाव के हास पर आदमी आपस में भाई-भाई और सुहृद और पड़ोसी फिर रह ही नहीं जाते हैं और आपस में कोरे गाहक और बेचक की तरह व्यवहार करते हैं। मानो दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक ही हानि में दूसरे का अपना लाभ दीखता है और यह बाज़ार का, बल्कि इतिहास का; सत्य माना जाता है ऐसे बाजार को बीच में लेकर लोगों में आवश्यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता; बल्कि शोषण होने लगता है तब कपट सफल होता है, निष्कपट शिकार होता है। ऐसे बाज़ार मानवता के लिए विडंबना हैं और जो ऐसे बाज़ार का पोषण करता है, जो उसका शास्त्र बना हुआ है; वह अर्थशास्त्र सरासर औंधा है वह मायावी शास्त्र है वह अर्थशास्त्र अनीति-शास्त्र है। [पृष्ठ-91-92]

प्रसंग-प्रस्तुत गद्यांश हिंदी की पाठ्यपुस्तक ‘आरोह भाग 2’ में संकलित पाठ ‘बाज़ार दर्शन’ से उद्धृत है। इसके लेखक हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार तथा निबंधकार जैनेंद्र कुमार हैं। ‘बाज़ार दर्शन’ लेखक का एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें उन्होंने उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा की है। यह निबंध बाज़ार के आकर्षण तथा क्रय-विक्रय की शक्ति पर समुचित प्रकाश डालता है। यहाँ लेखक यह स्पष्ट करता है कि किस प्रकार दुकानदार तथा ग्राहक के बीच सदभाव का पतन होने लगता है।

व्याख्या-लेखक कहता है कि जब दुकानदार तथा ग्राहक के बीच सद्भाव नष्ट हो जाता है तो वे दोनों न तो आपस में भाई-भाई होते हैं, न मित्र होते हैं और न ही पड़ोसी होते हैं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के साथ ग्राहक और बेचक जैसा व्यवहार करने लगते हैं। दुकानदार सौदेदारी करता है और ग्राहक भी मूल्य घटाने का काम करता है। ऐसा लगता है कि मानों दोनों एक-दूसरे को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। यदि एक को हानि होती है तो दूसरे को लाभ पहुँचता है। जो कि बाज़ार का नियम नहीं है, बल्कि इतिहास का नियम है। यह कटु सत्य है कि इस प्रकार के बाज़ार में लोगों के बीच आवश्यकताओं का लेन-देन नहीं होता, केवल छल-कपट होता है। सच्चाई तो यह है कि दुकानदार शोषक बनकर ग्राहकों का शोषण करने लगता है जिससे छल-कपट को सफलता मिलती है तथा भोले-भाले लोग उसका शिकार बनते हैं। इस प्रकार का बाज़ार संपूर्ण मानव जाति के लिए सबसे बड़ा धोखा है। जो लोग इस प्रकार के बाज़ार को बढ़ावा देते हैं और उनके द्वारा जो शास्त्र बनाया गया है वह अर्थशास्त्र बिल्कुल उल्टा है। वह धोखे का शास्त्र है। इस प्रकार का अर्थशास्त्र अनीति पर टिका है जो कि ग्राहक का कदापि कल्याण नहीं कर सकता।

विशेष-

  1. इसमें लेखक ने छल तथा कपट को बढ़ावा देने वाले बाज़ार की भर्त्सना की है।
  2. सहज, सरल एवं साहित्यिक हिंदी भाषा का प्रयोग हुआ है।
  3. वाक्य-विन्यास सर्वथा सार्थक व सटीक है।
  4. विवेचनात्मक शैली का प्रयोग है।

गद्यांश पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्नोत्तर-
प्रश्न-
(क) लेखक किस सद्भाव के ह्रास की बात करता है?
(ख) लेखक ने किस अर्थशास्त्र को अनीति शास्त्र कहा है?
(ग) बाज़ार में शोषण क्यों होने लगता है?
(घ) लेखक ने किस प्रकार के बाज़ार को मानवता का शत्रु कहा है?
उत्तर:
(क) यहाँ लेखक ने दुकानदार तथा ग्राहक के बीच होने वाले सद्भाव की चर्चा की है। जब ग्राहक अपनी झूठी शान दिखाने के लिए अपनी पर्चेजिंग पावर के द्वारा बाज़ार से अनावश्यक वस्तुएँ खरीदता है तब बाज़ार में कपट को बढ़ावा मिलता है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि ग्राहक और दुकानदार के बीच सद्भाव समाप्त हो जाता है।

(ख) लेखक ने उस अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र कहा है जो कि बाज़ार में बाजारूपन तथा छल-कपट को बढ़ावा देता है। इस प्रकार का बाज़ार अनीति पर आधारित होता है और वह ग्राहकों से धोखाधड़ी करने लगता है।

(ग) जब बाजार में बाजारूपन बढ़ जाता है और छल-कपट बढ़ने लगता है तो दुकानदार और ग्राहक दोनों ही एक-दूसरे का शोषण करने लगते हैं। दुकानदार ग्राहक को ठगना चाहता है और ग्राहक दुकानदार को।

(घ) लेखक का कहना है कि जो बाज़ार छल-कपट तथा शोषण पर आधारित होता है वह मानवता का शत्रु है। इस प्रकार के बाज़ार में सीधे-सादे ग्राहक हमेशा ठगे जाते हैं। कपटी लोग निष्कपटों को अपना शिकार बनाते रहते हैं।

बाज़ार दर्शन Summary in Hindi

बाज़ार दर्शन लेखिका-परिचय

प्रश्न-
श्री जैनेंद्र कुमार का संक्षिप्त जीवन-परिचय देते हुए उनकी साहित्यिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
अथवा
श्री जैनेंद्र कुमार का साहित्यिक परिचय अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
1. जीवन-परिचय-श्री जैनेंद्र कुमार सुप्रसिद्ध कथाकार थे, किंतु उन्होंने उच्चकोटि का निबंध-साहित्य लिखा। उनका जन्म सन् 1905 को अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक गाँव में हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा हस्तिनापुर जिला मेरठ में हुई। उन्होंने 1919 ई० में पंजाब विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। तत्पश्चात् उन्होंने काशी विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश लिया, किंतु गांधी जी के आह्वान पर पढ़ाई छोड़कर वे असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए। गांधी जी जीवन-दर्शन का प्रभाव उनकी रचनाओं में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। जैनेंद्र जी ने कथा-साहित्य के साथ-साथ उच्चकोटि के निबंधों की रचना भी की है। सन् 1970 में उनकी महान् साहित्यिक सेवाओं के कारण भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया। दिल्ली विश्वविद्यालय ने भी सन् 1973 में इन्हें डी० लिट् की मानद उपाधि से विभूषित किया। जैनेंद्र कुमार को ‘साहित्य अकादमी’ तथा ‘भारत-भारती’ पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। सन् 1990 में उनका देहांत हो गया।

2. प्रमुख रचनाएँ-श्री जैनेंद्र कुमार की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं-

  • उपन्यास-परख’ (1929), ‘सुनीता’ (1935), ‘कल्याणी’ (1939), ‘त्यागपत्र’ (1937), ‘विवर्त’ (1953), ‘सुखदा’ (1953), ‘व्यतीत’ (1953), ‘जयवर्द्धन’ (1953), ‘मुक्तिबोध’।
  • कहानी-संग्रह-‘फाँसी’ (1929), ‘वातायन’, (1930), ‘नीलम देश की राजकन्या’ (1933), ‘एक रात’ (1934), ‘दो चिड़िया’ (1935), ‘पाजेब’ (1942), ‘जयसंधि’ (1929)।
  • निबंध-संग्रह-‘प्रस्तुत प्रश्न’ (1936), ‘जड़ की बात’ (1945), ‘पूर्वोदय’ (1951), ‘साहित्य का श्रेय और प्रेय’ (1953), ‘मंथन’ (1953), ‘सोच-विचार’ (1953), ‘काम, प्रेम और परिवार’ (1953), ‘ये और वे’ (1954), ‘साहित्य चयन’ (1951), ‘विचार वल्लरी’ (1952)।

3. साहित्यिक विशेषताएँ-जैनेंद्र कुमार ने प्रायः विचार-प्रधान निबंध ही लिखे हैं। उनके निबंधों में लेखक एक गंभीर चिंतक के रूप में हमारे सामने आता है। ये विषय साहित्य, समाज, राजनीति, संस्कृति, धर्म तथा दर्शन से संबंधित हैं। भले ही हिंदी साहित्य में वे एक मनोवैज्ञानिक उपन्यासकार तथा कहानीकार के रूप में प्रसिद्ध हैं, परंतु निबंध-लेखक के रूप में उन्हें विशेष प्रसिद्धि प्राप्त हुई है। वस्तुतः उनके निबंधों में वैचारिक गहनता के गुण देखे जा सकते हैं। एक गंभीर चिंतक होने के कारण वे अपने प्रत्येक निबंध के विषय में सभी पहलुओं पर समुचित प्रकाश डालते हैं।

इसके लिए हम उनके निबंध बाज़ार दर्शन को ले सकते हैं जिसमें उपभोक्तावाद तथा बाज़ारवाद पर व्यापक चर्चा देखी जा सकती है। भले ही यह निबंध कुछ दशक पहले लिखा गया हो, परंतु आज भी इसकी उपयोगिता असंदिग्ध है। इसमें लेखक यह स्पष्ट करता है कि यदि हम अपनी आवश्यकताओं को ठीक-ठीक समझकर बाज़ार का उपयोग करेंगे तो निश्चय ही हम उससे लाभ उठा सकेंगे, परंतु यदि हम खाली मन के साथ बाज़ार में जाएँगे तो उसकी चमक-दमक में फँसकर अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर लाएँगे जो आगे चलकर हमारी शांति को भंग करेंगी।

वे अपने प्रत्येक निबंध में अपने दार्शनिक अंदाज में अपनी बात को समझाने का प्रयास करते हैं। परंतु फिर भी कहीं-कहीं उनके विचार अस्पष्ट और दुरूह बन जाते हैं जिसके फलस्वरूप साधारण पाठक का साधारणीकरण नहीं हो पाता।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

4. भाषा-शैली-यद्यपि कथा-साहित्य में जैनेंद्र कुमार ने सहज, सरल तथा स्वाभाविक हिंदी भाषा का प्रयोग किया है, परंतु निबंधों में उनकी भाषा दुरूह एवं अस्पष्ट बन जाती है। फिर भी वे संबोधनात्मक तथा वार्तालाप शैलियों का प्रयोग करते समय अपनी बात को सहजता तथा सरलता से करने में सफल हुए हैं। यद्यपि वे भाषा में प्रयुक्त वाक्यों के संबंध में व्याकरण के नियमों का पालन नहीं करते, फिर भी उनके द्वारा प्रयक्त वाक्यों की अशद्धि कहीं नहीं खटकती। उनकी भाषा में रोचकता आदि से अंत तक बनी रहती है। वे अपनी भाषा में प्रचलित शब्दों का ही प्रयोग करते हैं। यत्र-तत्र वे अंग्रेज़ी, उर्दू तथा देशज शब्दों का मिश्रण कर लेते हैं।

श्री तारा शंकर के शब्दों में-“जैनेंद्र की सबसे बड़ी विशेषता इनकी रचना का चमत्कार, कहने का ढंग या शैली है। उनकी भाषा के वाक्य प्रायः छोटे-छोटे, चलते, परंतु साथ ही मानों फूल बिखेरते चलते हैं। वे पारे की तरह ढुलमुल करते रहते हैं। जैनेंद्र को न तो उर्दू से घृणा है, न अंग्रेज़ी से परहेज है और न ही संस्कृत से दुराव है। इसलिए उनकी भाषा सहज, सरल तथा प्रवाहमयी है।” एक उदाहरण देखिए-“यहाँ मुझे ज्ञात होता है कि बाज़ार को सार्थकता भी वही मनुष्य देता है जो जानता है कि वह क्या चाहता है। और जो नहीं जानते कि वे क्या चाहते हैं, अपनी ‘पर्चेजिंग पावर’ के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाज़ार को देते हैं। न तो वे बाज़ार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाज़ार को सच्चा लाभ दे सकते हैं।”

बाज़ार दर्शन पाठ का सार

प्रश्न-
जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित ‘बाज़ार दर्शन’ नामक निबंध का सार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
प्रस्तत निबंध हिंदी के सप्रसिद्ध निबंधकार, कथाकार जैनेंद्र कमार का एक उल्लेखनीय निबंध है। इसमें लेखक ने बाज़ार के उपयोग तथा दुरुपयोग का सूक्ष्म विवेचन किया है। लेखक यह स्पष्ट करना चाहता है कि बाज़ार हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करता है। हम बाज़ार से केवल वही वस्तुएँ खरीदें जिनकी हमें आवश्यकता है।
1. पैसे की गरमी का प्रभाव लेखक का एक मित्र अपनी पत्नी के साथ बाज़ार में गया। वहाँ से लौटते समय वह अपने साथ बहुत-से बंडल लेकर लौटा। लेखक द्वारा पूछने पर उसने उत्तर दिया कि श्रीमती जो उसके साथ गई थी। इसलिए काफी कुछ अनावश्यक वस्तुएँ खरीदकर लाया है। लेखक का विचार है कि पत्नी को दोष देना ठीक नहीं है। फालतू वस्तुओं को खरीदने के पीछे ग्राहक की पैसे की गरमी है। वस्तुतः पैसा एक पावर है जिसका प्रदर्शन करने के लिए लोग बंगला, कोठी तथा फालतू का सामान खरीद लेते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग पैसे की पावर को समझकर उसे जोड़ने में ही लगे रहते हैं और मन-ही-मन बड़े प्रसन्न होते हैं। मित्र ने लेखक को बताया कि यह सब सामान खरीदने पर उसका सारा मनीबैग खाली हो गया है।

2. बाज़ार का प्रभावशाली आकर्षण-फालतू सामान खरीदने का सबसे बड़ा कारण बाज़ार का आकर्षण है। मित्र ने लेखक को बताया कि बाज़ार एक शैतान का जाल है। दुकानदार अपनी दुकानों पर सामान को इस प्रकार सजाकर रखते हैं कि ग्राहक फँस ही जाता है। वस्तुतः बाजार अपने रूप-जाल द्वारा ही ग्राहकों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। ब आग्रह नहीं होता। वह ग्राहकों को लूटने के लिए प्रेरणा देता है। यही कारण है कि लोग बाज़ार के आकर्षक जाल का शिकार बन जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति खाली मन से बाज़ार जाता है तो वह निश्चय से लुट कर ही आता है।

लेखक का एक अन्य मित्र दोपहर के समय बाज़ार गया, परंतु वह शाम को खाली हाथ लौट आया। जब लेखक ने पूछा तो उसने बताया कि बाज़ार में सब कुछ खरीदने की इच्छा हो रही थी। परंतु वह एक भी वस्तु खरीदकर नहीं लाया। पूछने पर उसने बताया कि यदि मैं एक वस्तु खरीद लेता तो उसे अन्य सब वस्तुएँ छोड़नी पड़ती। इसलिए मैं खाली हाथ लौट आया। लेखक का विचार है कि यदि हम किसी वस्तु को खरीदने का विचार बनाकर बाज़ार जाते हैं तो फिर हमारी ऐसी हालत कभी नहीं हो सकती।

3. बाज़ार के जादू का प्रभाव-बाज़ार में रूप का जादू होता है। जब ग्राहक का मन खाली होता है, तब वह उस पर अपना असर दिखाता है। खाली मन बाज़ार की सभी वस्तुओं की ओर आकर्षित होता है और यह कहता है कि सभी वस्तुएँ खरीद ली जाएँ। परंतु जब बाज़ार का जादू उतर जाता है तब ग्राहक को पता चलता है कि उसने जो कुछ खरीदा है, वह उसे आराम पहुँचाने की बजाय बेचैनी पहुंचा रहा है। इससे मनुष्य में अभिमान बढ़ता है, परंतु उसकी शांति भंग हो जाती है। बाज़ार के जादू का प्रभाव रोकने का एक ही उपाय है कि हम खाली मन से बाज़ार न जाएँ बल्कि यह निर्णय करके जाएँ कि हमने अमुक वस्तु खरीदनी है। ऐसा करने से बाज़ार ग्राहक से कृतार्थ हो जाएगा। आवश्यकता के समय काम आना बाज़ार की वास्तविक कृतार्थता है।

4. खाली मन और बंद मन की समस्या-यदि ग्राहक का मन बंद है तो इसका अभिप्राय है कि मन शून्य हो गया है। मनुष्य का मन कभी बंद नहीं होता है। शून्य होने का अधिकार केवल ईश्वर का है। कोई भी मनुष्य परमात्मा के समान पूर्ण नहीं है, सभी अपूर्ण हैं। इसलिए मानव-मन में इच्छाएँ उत्पन्न होती रहती हैं। इच्छाओं का विरोध करना व्यर्थ है। यह तो एक प्रकार से ठाट लगाकर मन को बंद करना है। ऐसा करके हम लोभ को नहीं जीतते, बल्कि लोभ हमें जीत लेता है।

जो लोग मन को बलपूर्वक बंद करते हैं। वे हठयोगी कहे जा सकते हैं। इससे हमारा मन संकीर्ण तथा क्षुद्र हो जाता है। प्रत्येक मानव अपूर्ण है, हमें इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए। सच्चा कर्म हमें अपूर्णता का बोध कराता है। अतः हमें मन को बलपूर्वक रोकना नहीं चाहिए अपितु बात को सुनना चाहिए। क्योंकि मन की सोच उद्देश्यपूर्ण होती है, परंतु इसका तात्पर्य यह नहीं है कि हम मन को मनमानी करने की छूट दें, क्योंकि वह अखिल का एक अंग है। अतः हमें समाज का एक अंग बनकर रहना होता है।

5. भगत जी का उदाहरण लेखक के पड़ोस में चूरन बेचने वाले एक भगत जी रहते हैं। उनका यह नियम है कि वह प्रतिदिन छः आने से अधिक नहीं कमाएँगे। इसलिए वह अपना चूरन न थोक व्यापारी को बेचते हैं न ही ऑर्डर पर बनाते हैं। जब वे बाज़ार जाते हैं तो वह बाज़ार की सभी वस्तुओं को तटस्थ होकर देखते हैं। उनका मन बाज़ार के आकर्षण के कारण मोहित नहीं होता। वे सीधे पंसारी की दुकान पर जाते हैं जहाँ से वे काला नमक तथा जीरा खरीद लेते हैं और अपने घर लौट आते हैं।

भगत जी द्वारा बनाया गया चूरन हाथों-हाथ बिक जाता है। अनेक लोग भगत के प्रति सद्भावना प्रकट करते हुए उनका चूरन खरीद लेते हैं। जैसे ही भगत जी को छः आने की कमाई हो जाती है तो वे बचा हुआ चूरन बच्चों में बाँट देते हैं। वे हमेशा स्वस्थ रहते हैं। लेखक का कहना है कि भगत जी पर बाज़ार का जादू नहीं चलता। भले ही भगत जी अनपढ़ हैं और बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते परंतु उस पर बाज़ार के जादू का कोई प्रभाव नहीं पड़ सकता। पैसा मानों उनसे भीख माँगता है कि मुझे ले लो परंतु भगत जी का मन बहुत कठोर है और उन्हें पैसे पर दया नहीं आती। वह छः आने से अधिक नहीं कमाना चाहते।।

6. पैसे की व्यंग्य शक्ति का प्रभाव पैसों में भी एक दारुण व्यंग्य शक्ति है। जब हमारे पास से मोटर गुज़रती है तो पैसा हम पर एक गहरा व्यंग्य कर जाता है तब मनुष्य अपने आप से कहता है कि उसके पास मोटरकार क्यों नहीं है? वह कहता है कि उसने मोटरकार वाले माता-पिता के घर जन्म क्यों नहीं लिया? पैसे की यह व्यंग्य-शक्ति अपने सगे-संबंधियों के प्रति कृतघ्न बना देती है, परंतु चूरन बेचने वाले भगत जी पर इस व्यंग्य-शक्ति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसके सामने व्यंग्य-शक्ति पानी-पानी हो जाती है। भगत जी में ऐसी कौन-सी शक्ति है जो पैसे के व्यंग्य के समक्ष अजेय बनी रहती है। हम उसे कुछ भी नाम दे सकते हैं, परंतु यह भी एक सच्चाई है कि जिस मन में तृष्णा होती है, उसमें शक्ति नहीं होती। जिस मनुष्य में संचय की तृष्णा और वैभव की चाह है, वह मनुष्य निश्चय से निर्बल है। इसी निर्बलता के कारण वह धन-वैभव का संग्रह करता है।

7. बाज़ार के बारे में भगत जी का दृष्टिकोण एक दिन भगत जी की लेखक के साथ मुलाकात हुई। दोनों में राम-राम हुई। लेखक यह देखकर दंग रह गया कि भगत जी सबके साथ हँसते हुए बातें कर रहे हैं। वे खुली आँखों से बाज़ार में आते-जाते हैं। वे बाज़ार की सभी वस्तुओं को देखते हैं। बाज़ार के सामान के प्रति उनके मन में आदर की भावना है। मानों वे सबको दे रहे हैं क्योंकि उनका मन भरा हआ है। वे खली आँख तथा संतष्ट मन से सभी फैंसी स्टोरों को छोडकर पंसारी की दकान से काला नमक और जीरा खरीदते हैं। ये चीज़े खरीदने पर बाज़ार उनके लिए शून्य बन जाता है, मानों उनके लिए बाज़ार का अस्तित्व नहीं है। चाहे चाँदनी चौक का आकर्षण उन्हें बुलाता रहे या चाँदनी बिछी रहे, परंतु वे सभी का कल्याण, मंगल चाहते हुए घर लौट आते हैं। उनके लिए बाज़ार का मूल्य तब तक है, जब तक वह काला नमक और जीरा नहीं खरीद लेते।

8. बाज़ार की सार्थकता-लेखक के अनुसार बाज़ार की सार्थकता वहाँ से कुछ खरीदने पर है। जो लोग केवल अपनी क्रय-शक्ति के बल पर बाज़ार में जाते हैं, वे बाज़ार से कोई लाभ प्राप्त नहीं कर सकते और न ही बाज़ार उन्हें कोई लाभ पहुंचा सकता है। ऐसे लोगों के कारण ही बाज़ारूपन तथा छल-कपट बढ़ रहा है। यही नहीं, मनुष्यों में भ्रातृत्व का भाव भी नष्ट हो रहा है। इस मनोवृत्ति के कारण बाज़ार में केवल ग्राहक और विक्रेता रह जाते हैं। लगता है कि दोनों एक-दूसरे को धोखा देने का प्रयास कर रहे हैं। इस प्रकार का बाज़ार लोगों का शोषण करता है और छल-कपट को बढ़ावा देता है। अतः ऐसा बाज़ार मानव के लिए हानिकारक है। जो अर्थशास्त्र इस प्रकार के बाज़ार का पोषण करता है, वह अनीति पर टिका है। उसे एक प्रकार का मायाजाल ही कहेंगे। इसलिए बाज़ार की सार्थकता इसमें है कि वह ग्राहकों की आवश्यकताओं को पूरा करे और बेकार की वस्तुएँ न बेचे।

HBSE 12th Class Hindi Solutions Aroh Chapter 12 बाज़ार दर्शन

कठिन शब्दों के अर्थ

आशय = प्रयोजन, मतलब। महिमा = महत्त्व, महत्ता। प्रमाणित = प्रमाण से सिद्ध । माया = धन-संपत्ति। मनीबैग = धन का थैला, पैसे की गरमी। पावर = शक्ति। माल-टाल = सामान। पजे ग पावर = खरीदने की शक्ति। फिजूल = व्यर्थ। असबाब = सामान। करतब = कला। दरकार = आवश्यकता, ज़रूरत। बेहया = बेशर्म, निर्लज्ज। हरज़ = हानि। आग्रह = खुशामद करना। तिरस्कार = अपमान। मूक = मौन। काफी = पर्याप्त। परिमित = सीमित। अतुलित = जिसकी तुलना न हो सके। कामना = इच्छा। विकल = व्याकुल । तृष्णा = लालसा। ईर्ष्या = जलन। त्रास = दुख, पीड़ा। बहुतायत = अधिकता। सेंक = तपन, गर्मी। खुराक = भोजन। कृतार्थ = अनुगृहीत। शून्य = खाली। सनातन = शाश्वत। निरोध = रोकना। राह = रास्ता, मार्ग।

अकारथ = व्यर्थ। व्यापक = विशाल, विस्तृत। संकीर्ण = संकरा। विराट = विशाल । क्षुद्र = तुच्छ, हीन। अप्रयोजनीय = बिना किसी मतलब के। खुशहाल = संपन्न। पेशगी = अग्रिम राशि। बँधे वक्त = निश्चित समय पर। मान्य = सम्माननीय। नाचीज़ = महत्त्वहीन, तुच्छ। अपदार्थ = महत्त्वहीन, जिसका अस्तित्व न हो। दारुण = भयंकर। निर्मम = कठोर। कुंठित = बेकार, व्यर्थ। लीक = रेखा। वंचित = रहित। कृतघ्न = अहसान को न मानने वाला। लोकवैभव = सांसारिक धन-संपत्ति। अपर = दूसरा। स्पिरिचुअल = आध्यात्मिक। प्रतिपादन = वर्णन। सरोकार = मतलब। स्पृहा = इच्छा। अकिंचित्कर = अर्थहीन। संचय = संग्रह। निर्बल = कमज़ोर। अबलता = निर्बलता, कमजोरी। कोसना = गाली देना। अभिवादन = नमस्कार। पसोपेश = असमंजस। अप्रीति = शत्रुता। ज्ञात = मालूम। विनाशक = नष्ट करने वाला, नाशकारी। सद्भाव = स्नेह तथा सहानुभूति की भावना। बेचक = बेचने वाला या व्यापारी। पोषण = पालन।

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