Class 10

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण Textbook Exercise Questions, and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण

HBSE 10th Class Science अम्ल, क्षारक एवं लवण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
कोई विलयन लाल लिटमस को नीला कर देता है, इसका pH सम्भवतः क्या होगा ?
(a) 1
(b) 4
(c) 5
(d)10.
उत्तर-
(d) 10.

प्रश्न 2.
कोई विलयन अण्डे के पिसे हुए कवच से अभिक्रिया कर एक गैस उत्पन्न कर जो चूने के पानी को दूधिया कर देती है। इस विलय क्या होगा ?
(a) NaCl
(b) HCl
(c) LiCl
(d) KCl.
उत्तर-
(b) HCl.

प्रश्न 3.
NaOH का 10 mL विलयन HCI के 8 mL विलयन से पूर्णतः उदासीन हो जाता है। यदि हम NaOH के उसी विलयन का 20 mL लें तो इसे उदासीन करने के लिए HCI के उसी विलयन की कितनी मात्रा की आवश्यकता होगी ?
(a) 4 mL
(b) 8 mL
(c) 12 mL
(d) 16 mL.
उत्तर-
(d) 16 mL.

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प्रश्न 4.
अपच का उपचार करने के लिए निम्न में से किस औषधि का उपयोग होता है ?
(a) एण्टीबायोटिक (प्रतिजैविक)
(b) ऐनालजेसिक (पीड़ाहारी)
(c) ऐन्टैसिड
(d) एण्टीसेप्टिक (प्रतिरोधी)।
उत्तर-
(c) ऐन्टैसिड। 2015

प्रश्न 5.
निम्न अभिक्रिया के लिए पहले शब्द समीकरण लिखिए तथा उसके बाद सन्तुलित समीकरण लिखिए –
(a) तनु सल्फ्यूरिक अम्ल दानेदार जिंक के साथ अभिक्रिया करता है।
(b) तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल मैग्नीशियम पट्टी के साथ अभिक्रिया करता है।
(c) तनु सल्फ्यूरिक अम्ल ऐलुमिनियम चूर्ण के साथ अभिक्रिया करता है।
(d) तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल लौह के रेतन के साथ अभिक्रिया करता है।
उत्तर –
(a) जिंक + सल्फ्यूरिक अम्ल → जिंक सल्फेट + हाइड्रोजन गैस
Zn (s) + H2SO4 (aq) →ZnSO4+H2
(b) मैग्नीशियम + तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल → मैग्नीशियम क्लोराइड + हाइड्रोजन गैस
Mg (s) + 2HCl (aq) → MgCl2(aq) + H2
(c) ऐलुमिनियम + तनु सल्फ्यूरिक अम्ल → ऐलुमिनियम सल्फेट + हाइड्रोजन गैस
2AI (s) +3H2SO4 (aq) →Al2(SO4)3(aq) +3H2
(d) आयरन + तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल → आयरन क्लोराइड + हाइड्रोजन गैस
Fe (s) + 2HCl (aq) → FeCl2(aq) + H2

प्रश्न 6.
ऐल्कोहॉल एवं ग्लुकोज जैसे यौगिकों में भी हाइड्रोजन होती है लेकिन इनका वर्गीकरण अम्ल की तरह नहीं होता है। एक क्रियाकलाप द्वारा इसे सिद्ध कीजिए।
उत्तर-
ऐल्कोहॉल एवं ग्लूकोज जैसे यौगिकों में हाइड्रोजन होती है पर वे विलयन में आयनीकृत नहीं होते और H+ आयन उत्पन्न नहीं करते। यह निम्नलिखित क्रियाकलाप से प्रदर्शित होता है –
क्रियाकलाप

  • एक कॉर्क में दो कीलें लगाकर कॉर्क को 100 mL के एक बीकर में रख देते हैं।
  • दोनों कीलों को 6 वोल्ट की एक बैटरी से जोड़ देते हैं जो एक बल्ब तथा स्विच से भी सम्बद्ध हैं। यह समायोजन निम्न चित्र में दर्शाया गया है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 1

अब हम ऐल्कोहॉल तथा ग्लूकोज के विलयनों को बारी-बारी से बीकर में डालते हैं तथा विद्युत प्रवाह हेतु स्विच चालू करते हैं।

प्रेक्षण व परिणाम (Observation and Result) हम यह पाते हैं कि बल्ब नहीं जलता अत: ग्लूकोज तथा ऐल्कोहॉल विलयनों में विद्युत चालन नहीं होता परन्तु अम्लों में विद्युत चालन सम्भव है। अत: ग्लूकोज एवं ऐल्कोहॉल को अम्लों में वर्गीकृत नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 7.
आसवित जल विद्युत का चालक क्यों नहीं होता, जबकि वर्षा का जल होता है ?
उत्तर-
आसवित जल हाइड्रोजन आयन (H+) उत्पन्न नहीं करता है तथा यह उदासीन होता है। वर्षा जल अम्लीय होता है तथा हाइड्रोजन आयन (H+) उत्पन्न करता है। इस कारण से वर्षा जल विद्युत का चालन करता है।

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प्रश्न 8.
जल की अनुपस्थिति में अम्ल का व्यवहार अम्लीय क्यों नहीं होता है ?
उत्तर-
जल की अनुपस्थिति में अम्लों से हाइड्रोजन आयनों (H+) का विलगन नहीं हो सकता है चूँकि हाइड्रोजन आयन ही अम्लों के अम्लीय व्यवहार के लिए उत्तरदायी हैं। अतः इसकी अनुपस्थिति में अम्ल, अम्लीय व्यवहार प्रदर्शित नहीं कर सकते।

प्रश्न 9.
पाँच विलयनों A, B, C, D व E की जब सार्वत्रिक सूचक से जाँच की जाती है तो pH के मान क्रमशः 4,1, 11, 7 एवं 9 प्राप्त होते हैं। कौन-सा विलयन
(a) उदासीन है?
(b) प्रबल क्षारीय है?
(c) प्रबल अम्लीय है?
(d) दुर्बल अम्लीय है?
(e) दुर्बल क्षारीय है?
pH के मानों को हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता के आरोही क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
उत्तर –
(a) उदासीन – pH 7 वाला विलयन D
(b) प्रबल क्षारीय – pH 11 वाला विलयन C
(c) प्रबल अम्लीय – pH 1 वाला विलयन B
(d) दुर्बल अम्लीय – pH 4 वाला विलयन A
(e) दुर्बल क्षारीय – pH 9 वाला विलयन E :
हाइड्रोजन आयन सान्द्रता के बढ़ते क्रम में pH मान इस प्रकार व्यवस्थित होंगे
11<9<7<4<1
अर्थात् विलयन C < विलयन E < विलयन D < विलयन A< विलयन B

प्रश्न 10.
परखनली ‘A’ एवं ‘B’ में समान लम्बाई की मैग्नीशियम की पट्टी लीजिए। परखनली ‘A’ में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCI) तथा परखनली ‘B’ में ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH) डालिए। दोनों अम्लों की मात्रा तथा सान्द्रता समान है। किस परखनली में अधिक तेजी से बुदबुदाहट होगी तथा क्यों?
उत्तर-
HCl युक्त परखनली A में सनसनाहट अधिक तेज होगी क्योंकि HCl ऐसीटिक अम्ल की तुलना में अधिक प्रबल अम्ल है, अर्थात् HCl अम्ल में हाइड्रोजन आयन सान्द्रता अधिक होती है।

प्रश्न 11.
ताजे दूध के pH का मान 6 होता है। दही बन जाने पर इसके pH के मान में क्या परिवर्तन होगा? अपना उत्तर समझाइए।
उत्तर-
दूध के दही में परिवर्तित होने पर pH का मान 6 से कम हो जाएगा क्योंकि दूध की तुलना में दही अधिक अम्लीय होता है।

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प्रश्न 12.
एक ग्वाला ताजे दूध में थोड़ा बेकिंग सोडा मिलाता है।
(a) ताजे दूध के pH के मान को 6 से बदलकर थोड़ा क्षारीय क्यों बना देता है?
(b) इस दूध को दही बनने में अधिक समय क्यों लगता है?
उत्तर-
(a) दूध बेचने वाला ताजे दूध के pH को 6 से थोड़ा क्षारीय तक स्थानान्तरित कर देता है क्योंकि ऐसा करने से दूध अधिक समय तक खराब नहीं होगा।
(b) यह दूध दही बनने में अत्यधिक समय लेता है क्योंकि दूध को क्षारीय से अम्लीय होने में अधिक समय लगेगा जबकि यदि दूध का pH 6 ही होता तो यह अपेक्षाकृत कम समय में ही दही में परिवर्तित हो जाता।

प्रश्न 13.
प्लास्टर ऑफ पेरिस को आर्द्र-रोधी बर्तन में क्यों रखा जाना चाहिए? इसकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर-
प्लास्टर ऑफ पेरिस नमी (जल) के सम्पर्क में आने पर लेई जैसा पदार्थ बन जाता है तथा शीघ्रता से कठोर क्रिस्टलीय ठोस (जिप्सम) में परिवर्तित हो जाता है अतः प्लास्टर ऑफ पेरिस को आर्द्र-रोधी बर्तन में रखा जाना चाहिए।

प्रश्न 14.
उदासीनीकरण अभिक्रिया क्या है? दो उदाहरण दीजिए।”
उत्तर-
अम्ल एवं क्षार के मध्य अभिक्रिया होने पर लवण व जल प्राप्त होता है, इसे उदासीनीकरण अभिक्रिया कहते हैं।
क्षार + अम्ल → लवण + जल उदाहरण
2KOH (aq) + H2SO4 (aq) →K2SO4 (aq) +2H2O(l)
NaOH (aq) + HCl (aq) →NaCl (aq) +H2O(l)

प्रश्न 15.
धोने का सोडा एवं बेकिंग सोडा के दो-दो प्रमुख उपयोग बताइए।
उत्तर-
धोने के सोडे के उपयोग-
1. जल की स्थायी कठोरता दूर करने में,
2. काँच, कागज व साबुन के निर्माण में। .
खाने के सोडे के उपयोग-1, प्रतिअम्ल (antacid) औषधि के घटक के रूप में, 2. भोज्य तथा पेय पदार्थों में योगात्मक के रूप में।

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(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 20)

प्रश्न 1.
आपको तीन परखनलियाँ दी गयी हैं। इनमें से एक में आसवित जल एवं शेष दो में से एक में अम्लीय विलयन तथा दूसरे में क्षारीय विलयन है। यदि आपको केवल लाल लिटमस पत्र दिया जाता है तो आप प्रत्येक परखनली में पदार्थ की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर-
जिस परखनली में क्षारीय विलयन है वह लाल रंग के लिटमस पत्र को नीले रंग में परिवर्तित कर देता है। अब इस नीले लिटमस पत्र को बची हुई दोनों परखनलियों में डालते हैं। यदि नीला लिटमस पत्र पुनः लाल हो रहा है तो उस परखनली में अम्ल है तथा जिस परखनली में नीले लिटमस का रंग परिवर्तित नहीं हो रहा है वह आसवित जल है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 24) .

प्रश्न 1.
पीतल एवं ताँबे के बर्तनों में दही एवं खट्टे पदार्थ क्यों नहीं रखने चाहिए?
उत्तर-
दही एवं खट्टे पदार्थ अम्लीय होते हैं जोकि पीतल एवं ताँबे के बर्तनों के साथ अम्ल अभिक्रिया करके लवण बनाते हैं, जो विषैले होते हैं। इस कारण दही तथा अन्य खट्टे पदार्थों को पीतल तथा ताँबे के बर्तनों में नहीं रखना चाहिए।

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प्रश्न 2.
धातु के साथ अम्ल की अभिक्रिया होने पर सामान्यतः कौन- गैस निकलती है ? एक उदाहरण के द्वारा समझाइए। : गैस की उपस्थिति की जाँच आप कैसे करेंगे?
उत्तर-
जब एक अम्ल किसी धातु के साथ अभिक्रिया करता है तो सामान्यतः हाइड्रोजन गैस विमुक्त होती है। उदाहरण के लिए, जिंक पर सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया से जिंक सल्फेट तथा हाइड्रोजन गैस उत्पन्न होती है।
Zn (s) + H2SO4 (aq) →ZnSO4 + H2T.
हाइड्रोजन गैस की उपस्थिति की जाँच के लिए गैस के समीप एक जलती हुई मोमबत्ती ले जाने पर यदि गैस धमाके की आवाज के साथ जलती है तो यह हाइड्रोजन गैस है।

प्रश्न 3.
कोई धातु यौगिक ‘A’ तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के साथ अभिक्रिया करता है तो बुदबुदाहट उत्पन्न होती है। इससे उत्पन्न गैस एक जलती हुई मोमबत्ती को बुझा देती है। यदि उत्पन्न यौगिकों में एक कैल्सियम क्लोराइड है तो इस अभिक्रिया के लिए एक सन्तुलित रासायनिक समीकरण लिखिए।
उत्तर-
धातु यौगिक ‘A’ कैल्सियम कार्बोनेट होगा। उत्पन्न गैस कार्बन डाइऑक्साइड है।
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(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 27)

प्रश्न 1.
HCl, HNO3, आदि जलीय विलयन में अम्लीय अभिलक्षण क्यों प्रदर्शित करते हैं, जबकि ऐल्कोहॉल तथा ग्लूकोज जैसे यौगिकों के विलयनों में अम्लीयता के अभिलक्षण नहीं प्रदर्शित होते हैं ?
उत्तर-
HCl, HNO3, आदि जलीय विलयनों में अम्लीय गुण प्रदर्शित करते हैं क्योंकि ये विलयन में केवल हाइड्रोजन आयन (H+) उत्पन्न करते हैं। अम्लीय गुण के लिए हाइड्रोजन आयन ही कारण हैं। ऐल्कोहॉल तथा ग्लूकोज जलीय विलयनों में हाइड्रोजन आयन उत्पन्न नहीं करते, अतः इनके विलयन अम्लीय गुण प्रदर्शित नहीं करते।

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प्रश्न 2.
अम्ल का जलीय विलयन क्यों विद्युत का चालन करता है ?
उत्तर-
अम्ल के जलीय विलयन में हाइड्रोजन आयन (H+) उत्पन्न होते हैं जो कि विद्युत धारा के प्रवाह के लिए उत्तरदायी होते हैं।

प्रश्न 3.
शुष्क हाइड्रोक्लोरिक गैस शुष्क लिटमस पत्र के रंग को क्यों नहीं बदलती है ? –
उत्तर-
शुष्क HCl गैस H+ आयन उत्पन्न नहीं करती, क्योंकि HCl अणु से H+ आयनों का निष्कासन जल की अनुपस्थिति में नहीं हो पाता है। इस कारण से H+ आयनों की अनुपस्थिति अर्थात् अम्लीय गुण की अनुपस्थिति के कारण शुष्क लिटमस पत्र का रंग परिवर्तित नहीं होता है।

प्रश्न 4.
अम्ल को तनुकृत करते समय यह क्यों अनुशंसित करते हैं कि अम्ल को जल में मिलाना चाहिए, न कि जल को अम्ल में ?.
उत्तर-
अम्ल को तनुकृत करने के दौरान इसमें जल कभी भी नहीं मिलाना चाहिए क्योंकि अम्ल को जल में मिलाने पर उत्पन्न ऊष्मा बहुत अधिक होती है जिसके कारण मिश्रण पात्र से बाहर भी आ सकता है तथा समीप खड़े व्यक्ति को हानि पहुँच सकती है।

प्रश्न 5.
अम्ल के विलयन को तनुकृत करते समय हाइड्रोनियम आयन (H3O+) की सान्द्रता कैसे प्रभावित हो जाती है ?
उत्तर-
अम्ल को तनुकृत करने पर उसमें उपस्थित अनआयनित जल की मात्रा तो बढ़ती है परंतु H3O+ की मात्रा वही रहती है, परिणामस्वरूप H3O+ की सान्द्रता लगातार घटती जाती है।

प्रश्न 6.
जब सोडियम हाइड्रॉक्साइड विलयन में अधिक क्षारक मिलाते हैं तो हाइड्रॉक्साइड आयन (OH) की सान्द्रता कैसे प्रभावित होती है ?
उत्तर-
हाइड्रॉक्साइड आयनों (OH) की सान्द्रता बढ़ जाती है।

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(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं.31)

प्रश्न 1.
आपके पास दो विलयन ‘A’ तथा ‘B’ हैं। विलयन A के pH का मान 6 है एवं विलयन B के pH का मान 8 है। किस विलयन में हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता अधिक है ? इनमें से कौन अम्लीय है तथा कौन क्षारकीय?
उत्तर-
विलयनं ‘A’ में हाइड्रोजन आयन की सान्द्रता अधिक है।
विलयन ‘A’ (pH = 6) अम्लीय है। विलयन ‘B’ (pH = 8) क्षारीय है।

प्रश्न 2.
H+ (aq) आयन की सान्द्रता का विलयन की प्रकृति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर-
H+ (aq) आयनों की सान्द्रता जितनी अधिक होती है, अम्ल उतना ही प्रबल होता है।

प्रश्न 3.
क्या क्षारकीय विलयन में H+ (aq) आयन होते हैं? यदि हाँ, तो यह क्षारकीय क्यों होते हैं ?
उत्तर-
हाँ, क्षारकीय विलयनों में भी H+ (aq) आयन होते हैं फिर भी ये क्षारकीय होते हैं क्योंकि इनमें हाइड्रॉक्साइड आयनों (OH ) की सान्द्रता H+ (aq) आयनों से बहुत अधिक होती है।

प्रश्न 4.
कोई किसान खेत की मृदा की किस परिस्थिति में बिना बुझा हुआ चूना (कैल्सियम ऑक्साइड) बुझा हुआ चूना (कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड) या चॉक (कैल्सियम कार्बोनेट) का उपयोग करेगा?
उत्तर-
किसान अपने खेत की मिट्टी को बिना बुझा हुआ चूना (कैल्सियम ऑक्साइड) या बुझे हुए चूने (कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड) या चॉक (कैल्सियम कार्बोनेट) के साथ तब उपचारित करेगा जब मिट्टी में अम्लों की मात्रा आवश्यक मात्रा से अधिक होगी।

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(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 36)

प्रश्न 1.
CaOCl2 यौगिक का प्रचलित नाम क्या है ?
उत्तर-
ब्लीचिंग पॉउडर।

प्रश्न 2.
उस पदार्थ का नाम बताइए जो क्लोरीन से क्रिया करके विरंजक चूर्ण बनाता है।
उत्तर-
शुष्क बुझा हुआ चूना।

प्रश्न 3.
कठोर जल को मृदु करने के लिए किस सोडियम यौगिक का उपयोग किया जाता है ?
उत्तर-
धावन सोडा (सोडियम कार्बोनेट डेकाहाइड्रेट) NaCO3.10H2O.

प्रश्न 4.
सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट के विलयन को गर्म करने पर क्या होगा ? इस अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखिए।
उत्तर-
सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट के विलयन को गर्म करने पर कार्बन डाइऑक्साइड गैस प्राप्त होती है।
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प्रश्न 5.
प्लास्टर ऑफ पेरिस की जल के साथ अभिक्रिया के लिए समीकरण लिखिए।
उत्तर-
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HBSE 10th Class Scienceअम्ल, क्षारक एवं लवण InText Activity Questions and Answers

क्रियाकलाप 2.1.  (पा. पु. पृ. सं. 20)

प्रश्न 1.
प्रयोगशाला में हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (HCl), सल्फ्यूरिक अम्ल (H2SO4), नाइट्रिक अम्ल (HNO3), ऐसीटिक अम्ल (CH3COOH), सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH), कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड [Ca(OH)2], पोटैशियम हाइड्रोक्साइड [Mg(OH)2], एवं अमोनियम हाइड्रॉक्साइड (NH4OH) के नमूने एकत्र करके उनकी अम्लीय व क्षारीय स्थिति की पहचान कैसे करेंगे?
उत्तर-
अम्लीय व क्षारीय स्थिति की पहचान-
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अतः कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिनकी गंध अम्लीय या क्षारकीय माध्यम में बदल जाती है, इन्हें गंधीय सूचक कहते

क्रियाकलाप 2.2 (पा. पु. पृ. सं. 20)

प्रश्न 1.
इनमें से दो टुकड़े लीजिए एवं उनकी गंध की जाँच कीजिए।
उत्तर-
कपड़े के टुकड़ों से प्याज की गंध नहीं आ रही

प्रश्न 2. दोनों टुकड़ों को जल से धोकर उनकी गंध की पुनः जाँच कीजिए।
उत्तर-
(i) कपड़े के टुकड़े + तनु HCI का घोल → प्याज की गंध मौजूद है तथा इसका लाल रंग हल्का लाल हो गया।
(ii) कपड़े के टुकड़े + तनु NaOH का घोल → प्याज की गंध खत्म हो जाती है तथा इसका लाल रंग बदलकर हरा हो गया।

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प्रश्न 3.
कपड़े के दोनों टुकड़ों को धोकर इसमें से एक में तनु वैनिला एवं दूसरे में लौंग का तेल की कुछ बूंदें डालकर इनकी गंधों की जाँच करने पर क्या ज्ञात होता है?
उत्तर-
गंध की जाँच (i) तनु वैनिला + तनु NaOH → कोई गंध नहीं है। तनु वैनिला + तनु HCl → वैनिला की गंध मौजूद है।
(ii) लौंग का तेल + HCl → गंध में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।
लौंग का तेल + NaOH → गंध में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।

क्रियाकलाप 2.3 (पा. पु. पृ. सं. 21)

प्रश्न 1.
दानेदार जिंक के टुकड़ों की सतह पर आप क्या देखते हैं?
उत्तर-
दानेदार जिंक के टुकड़ों की सतह से हाइड्रोजन गैस के बुलबुले निकलते हुए दिखाई देते हैं।

प्रश्न 2.
साबुन के विलयन में बुलबुले क्यों बनते हैं?
उत्तर-
साबुन के विलयन में हाइड्रोजन गैस के प्रवाहित होने के कारण ही बुलबुले बनते हैं।

प्रश्न 3.
जलती हुई मोमबत्ती को गैस वाले बुलबुले के पास ले जाने पर आप क्या प्रेक्षण करते हैं?
उत्तर-
जलती हुई मोमबत्ती को गैस वाले बुलबुले के पास ले जाने पर यह फट-फट (Pop-sound) की ध्वनि के साथ जलने लगती है।

प्रश्न 4.
कुछ अन्य अम्ल, जैसे- HCI, HNO3, एवं CH3COOH के साथ यदि Zn की क्रिया करायें तो क्या होगा?
उत्तर-
HCl, HNO3, व CH3COOH के साथ भी Zn क्रिया करके H2 गैस उत्पन्न करती है।

क्रियाकलाप 2.4 (पा. पु. पृ. सं. 22)

प्रश्न 1.
क्या जिंक NaOH के घोल से अभिक्रिया करती है?
उत्तर-
हाँ, दानेदार जिंक में 2mL, NaOH मिलाकर गर्म करने पर क्रियाकलाप 2.3 की तरह H2 गैस उत्सर्जित होती है।

प्रश्न 2.
जिंक तथा NaOH के बीच होने वाली अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर-
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क्रियाकलाप 2. 5 (पा.पु. पृ.सं. 22)

प्रश्न 1.
चित्र के अनुसार प्रत्येक स्थिति में उत्पादित गैस को चूने के पानी (कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड का विलयन) से प्रवाहित कीजिए एवं अपने निरीक्षणों को अभिलिखित कीजिए। .
उत्तर-
चूने का पानी दूधिया हो जाता है। उपर्युक्त क्रियाकलाप में होने वाली अभिक्रियाओं को इस प्रकार लिखा जा सकता है
परखनली ‘A’-NaCO3 (s) + 2HCl (aq) → 2NaCl (aq) + H2O (l) + H2O (l) + CO2 (g)
परखनली ‘B’-NaHCO3 (s) + HCl (aq) → NaCl (aq) + H2O (l) + CO2 (g) उत्पादित कार्बन डाइऑक्साइड गैस को चूने के पानी में प्रवाहित करने पर,
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अत्यधिक मात्रा में कार्बन डाइ ऑक्साइड प्रवाहित करने पर निम्न अभिक्रिया होती है
CaCO3 (s)+ H2O(l) + CO2(g) → Ca(HCO3)2(aq) (जल में विलेयशील)|

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प्रश्न 2.
Na2CO3 व NaHCO3, में तनु HCl मिलाने पर क्या होता है?
उत्तर-
Na2CO3, व NaHCO3, में तनु HCI मिलाने पर CO2, गैस मुक्त होती है।

प्रश्न 3.
CaCO3 के विविध रूप कौन से हैं?
उत्तर-
CaCO3, के चूना पत्थर (Limestone), खड़िया (Chalk) एवं संगमरमर (marble) आदि विविध रूप हैं।

क्रियाकलाप 2.6 (पा. पु. पृ. सं. 23)

प्रश्न 1.
क्या अभिक्रिया मिश्रण के रंग में कोई परिवर्तन आया?
उत्तर-
अम्ल में फिनॉल्पथेलीन मिलाने पर कोई रंग नहीं आया जबकि क्षार में फिनॉल्पथेलीन मिलाने पर गुलाबी – रंग आता है।

प्रश्न 2.
अम्ल मिलाने पर क्षार में मिले फिनॉल्पथेलीन का रंग क्यों बदल गया?
उत्तर-
क्षार में अम्ल मिलाने पर क्षार का प्रभाव खत्म हो गया। यही कारण है कि फिनॉल्पथेलीन का रंग बदल गया।

प्रश्न 3.
उपरोक्त मिश्रण में दोबारा NaOH की बूंद मिलाने पर क्या फिनॉल्फ्थेलीन का रंग पुनः गुलाबी हो गया?
उत्तर-
हाँ, क्योंकि अब विलयन पुनः क्षारीय हो गया।

प्रश्न 4.
आपके विचार में ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि अम्ल द्वारा क्षार का प्रभाव व क्षार द्वारा अम्ल का प्रभाव समाप्त हो जाता है।

क्रियाकलाप 2.7 (पा. पु. पृ. सं. 23)

प्रश्न 1.
कॉपर ऑक्साइड का अभिक्रिया के दौरान क्या होता है?
उत्तर-
कॉपर ऑक्साइड का नीला रंग समाप्त होने लगेगा व विलयन का रंग नील-हरित होने लगेगा। ऐसा कॉपर (II) क्लोराइड के बनने के कारण होता है।

प्रश्न 2.
अभिक्रिया का सन्तुलित समीकरण लिखें।
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 8

क्रियाकलाप 2. 8 (पा. पु. पृ. सं. 24)

प्रश्न 1.
आपने क्या प्रेक्षण किया ?
उत्तर-
बीकर में अम्ल का विलयन लेने पर विद्युत का चालन होता है और बल्ब जलने लगता है।

प्रश्न 2.
ग्लूकोज व ऐल्कोहॉल के विलयन को लेने पर क्या विद्युत का चालन होता है?
उत्तर-
नहीं, ग्लूकोज एवं ऐल्कोहॉल का विलयन विद्युत का चालन नहीं करता है।

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प्रश्न 3.
अम्ल में विद्युत का चालन किस कारण से होता है?
उत्तर-
अम्ल में विद्युत का चालन धनायन H+ की उपस्थिति के कारण होता है।

प्रश्न 4.
बल्ब क्या प्रत्येक स्थिति में जलता है।
उत्तर-
बल्ब प्रत्येक स्थिति में नहीं जलता है।

क्रियाकलाप 2.9 (पा. पु. पृ. सं. 25)

प्रश्न 1.
NaCI व सान्द्र H2SO4 के मध्य क्रिया कराने पर क्या कोई गैस बाहर निकलती है?
उत्तर-
हाँ।

प्रश्न 2.
उत्सर्जित गैस को सूखे व नम नीले लिटमस पत्र से जाँचने पर क्या ज्ञात होता है?
उत्तर-
उत्सर्जित गैस नम नीले लिटमस पत्र को लाल कर देती है परन्तु सूखे नीले लिटमस पत्र पर कोई प्रभाव नहीं डालती है।

प्रश्न 3.
कौन अम्लीय गुण प्रदर्शित करता है?
(i) शुष्क HCl गैस या
(ii) HCl विलयन।
उत्तर-
HCl विलयन।

प्रश्न 4.
HCl विलयन अम्लीय गुण प्रदर्शित क्यों । करता है?
उत्तर-
क्योंकि विलयन में H+ आयन मुक्त हो जाते हैं इस कारण HCl विलयन अम्लीय गुण प्रदर्शित करता है।

क्रियाकलाप 2.10 (पा. पु. पृ. सं. 26)

प्रश्न 1.
जल व सल्फ्यूरिक अम्ल के मध्य क्रिया करने पर क्या तापमान में कोई परिवर्तन आता है?
उत्तर-
हाँ, जल व H2SO4 के मध्य क्रिया कराने पर तापमान बढ़ने लगता है।

प्रश्न 2.
अभिक्रिया ऊष्माशोषी है या ऊष्माक्षेपी?
उत्तर-
अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी होती है।

क्रियाकलाप 2.11 (पा. पु. पृ. सं. 28)

प्रश्न-
सारणी 2.2 में विलयन की pH की जाँच कीजिए। अपने प्रेक्षणों को सारणी में लिखिए।
उत्तर –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 9

क्रियाकलाप 2.12 (पा. पु. पृ. सं. 29).

प्रश्न 1.
अपने क्षेत्र में पौधों के उपयुक्त विकास के लिए आदर्श मिट्टी के pH के सम्बन्ध में आपने क्या उत्कर्ष निकाला?
उत्तर-
आदर्श मिट्टी के लिए आदर्श pH परास 7 से 7.6

क्रियाकलाप 2.13 (पा. पु. पृ. सं. 31)

प्रश्न 1.
नीचे दिए गए लवण के सूत्र लिखिए. पौटेशियम सल्फेट, सोडियम सल्फेट, कैल्सियम सल्फेट, मैग्नीशियम सल्फेट, कॉपर सल्फेट, सोडियम क्लोराइड, सोडियम नाइट्रेट, सोडियम कार्बोनेट एवं अमोनियम क्लोराइड।
उत्तर –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 10

प्रश्न 2.
उन अम्ल एवं क्षारक की पहचान कीजिए जिससे उपर्युक्त (क्रियाकलाप-2.13 के प्रश्न 1) लवण प्राप्त किए जा सकते हैं।
उत्तर –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 11

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण

प्रश्न 3.
समान धन या ऋण मूलक वाले लवणों को एक ही परिवार का कहा जाता है। जैसे-NaCl एवं Na2SO4 , सोडियम लवण के परिवार का है। इसी प्रकार NaCl एवं KCI क्लोराइड लवण के परिवार के हैं। इस क्रियाकलाप में दिए गए लवणों में आप कितने परिवारों की पहचान कर सकते हैं?
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 12

क्रियाकलाप 2.14 (पा. पु. पृ. सं. 32)

प्रश्न 1.
कौन से लवण अम्लीय, क्षारकीय एवं उदासीन हैं।
उत्तर-
अम्लीय लवण : ऐलुमिनियम क्लोराइड, जिंक सल्फेट, कॉपर सल्फेट।

क्षारकीय लवण : सोडियम ऐसीटेट, सोडियम कार्बोनेट, सोडियम हाइड्रोजन कार्बोनेट।
उदासीन लवण : सोडियम क्लोराइड, पोटैशियम नाइट्रेट।

प्रश्न 2.
अपने प्रेक्षणों को सारणी 2.4 में लिखिए।
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण 13

क्रियाकलाप 2.15 (पा. पु. पृ. सं. 35)

प्रश्न 1.
गर्म करने के बाद कॉपर सल्फेट का रंग क्या है?
उत्तर-
गर्म करने के बाद कॉपर सल्फेट का नीला रंग सफेद रंग में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 2.
क्वथन नली में क्या जल की बूंदें नजर आती हैं? ये कहाँ से आती हैं?
उत्तर-
क्वथन नली में जल की बूंदें नजर आती हैं। ये कॉपर सल्फेट के क्रिस्टल में उपस्थित जल को गर्म किये जाने पर वाष्प निकलने के कारण प्राप्त होती हैं अर्थात् ये कॉपर सल्फेट के क्रिस्टल में से आती हैं।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 2 अम्ल, क्षारक एवं लवण

प्रश्न 3.
गर्म करने के बाद प्राप्त कॉपर सल्फेट के नमूने में दोबारा जल की 2-3 बूंदें डालने पर क्या प्राप्त होता है ? क्या नीला रंग वापस आता है?
उत्तर-
कॉपर सल्फेट के नमूने में दोबारा जल की बूंदें डालने पर नीला रंग वापस आ जाता है क्योंकि CuSO4 दोबारा जल से क्रिया करके नीले रंग का CuSO4, 5 H2O बना लेता है।

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HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

Haryana State Board HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

HBSE 10th Class Science रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
नीचे दी गई अभिक्रिया के सम्बन्ध में कौन-सा कथन असत्य है
2 Pbo(s) +C(s) →2Pb (s)+CO2(g)
(a) सीसा अपचयित हो रहा है।
(b) कार्बन डाइऑक्साइड उपचयित हो रही है।
(c) कार्बन उपचयित हो रहा है।
(d) लैड ऑक्साइड अपचयित हो रहा है।
(i) (a) एवं (b)
(ii) (a) एवं (c)
(iii) (a), (b) एवं
(c) (iv) सभी।
उत्तर-
(i) (a) एवं (b).

कारण- उपरोक्त अभिक्रिया की विपरीत अभिक्रिया में अर्थात्
2Pb(s) + CO2(g) →2PbO(s) + C(s)
मे Pb का ऑक्सीकरण PbO में तथा CO2, का अपचयन C में हो रहा है।

प्रश्न 2.
Fe2O3+2Al → Al2O3, +2Fe
ऊपर दी गई अभिक्रिया निम्न में से किस प्रकार की है –
(a) संयोजन अभिक्रिया
(b) द्वि-विस्थापन अभिक्रिया
(c) वियोजन अभिक्रिया
(d) विस्थापन अभिक्रिया।
उत्तर-
(d) विस्थापन अभिक्रिया।

कारण- इस अभिक्रिया में एलुमीनियम (Al), Fe2O3, से Fe को विस्थापित करके AI2O3 बना रहा है अत: यह एक विस्थापन अभिक्रिया है।

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प्रश्न 3.
लौह-चूर्ण पर तनु हाइड्रोक्लोरिक अम्ल डालने से निम्न में से क्या होता है?
(a) हाइड्रोजन गैस तथा आयरन क्लोराइड बनता है
(b) क्लोरीन गैस एवं आयरन हाइड्रॉक्साइड बनता है
(c) कोई अभिक्रिया नहीं होती है
(d) आयरन लवण तथा जल बनता है।
उत्तर-
(a) हाइड्रोजन गैस तथा आयरन क्लोराइड बनता है। ये अभिक्रिया निम्न प्रकार है
Fe(s) + 2HCl(dil) → FeCl2 (aq) + H2 (g)

प्रश्न 4.
सन्तुलित रासायनिक समीकरण क्या है ? रासायनिक समीकरण को सन्तुलित करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर-
वह रासायनिक समीकरण जिसके दोनों पक्षों में प्रत्येक तत्व के परमाणुओं की संख्या बराबर होती है, सन्तुलित रासायनिक समीकरण (Balanced Chemical Equation) कहलाता है, जैसे
निम्नलिखित अभिक्रिया में अभिकारकों तथा उत्पादों में अलग-अलग सभी तत्वों के परमाणुओं की गणना करते हैं
Zn+H2SO4 →ZnSO4 + H2

तत्व के परमाणुओं की संख्याअभिकारकों मेंउत्पादों में
Zn11
H22
S11
O44

रासायनिक अभिक्रिया में पदार्थ न तो बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है। इस द्रव्यमान संरक्षण के नियम को सन्तुष्ट करने के लिए रासायनिक समीकरणों को सन्तुलित किया जाता है।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित कथनों को रासायनिक समीकरण के रूप में परिवर्तित कर उन्हें सन्तुलित कीजिए –
(a) नाइट्रोजन गैस हाइड्रोजन गैस से संयोग करके अमोनिया बनाती है।
(b) हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का वायु में दहन होने पर जल एवं सल्फर डाइऑक्साइड बनता है।
(c) ऐल्युमिनियम सल्फेट के साथ अभिक्रिया कर बेरियम क्लोराइड, ऐलुमिनियम क्लोराइड एवं बेरियम सल्फेट का अवक्षेप देता है।
(d) पोटैशियम धातु जल के साथ अभिक्रिया करके पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड एवं हाइड्रोजन गैस देती
उत्तर-
(a) प्रश्नानुसार, नाइट्रोजन + हाइड्रोजन → अमोनिया

चरण 1.
सर्वप्रथम इसका प्रतीकात्मक समीकरण लिखकर उसके चारों ओर बॉक्स खींचते हैं
H2 (g) + N2 (g) → NH3 (g)

चरण 2.
इस असन्तुलित समीकरण में उपस्थित विभिन्न तत्त्वों के परमाणुओं की संख्या की सूची बनाते हैं –

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
N21
H23

चरण 3.
इस चरण में हाइड्रोजन के परमाणुओं की संख्या अधिक होने के कारण इनका सर्वप्रथम सन्तुलन करते

 

हाइड्रोजन परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में2 (H2 में)3 (NH3 में)
सन्तुलन हेतु2×33×2

अ तः दिया गया समीकरण सन्तुलित होकर निम्नवत् होगा
3H2(g) + N2(g) → 2NH3 (g)

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चरण 4.
चरण 3 में प्राप्त समीकरण में हाइड्रोजन व नाइट्रोजन के परमाणुओं की संख्या दोनों ओर समान है, अतः दिया गया समीकरण पूर्ण रूप से सन्तुलित है।
3H2(g) + N2(g) → 2NH3(g)

(b) कथन के अनुसार रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
H2S (g) + O2 (g) → SO2(g) + H2O (l)

इसे सन्तुलित करने के लिए निम्नलिखित चरणों को अपनाते हैं-
चरण 1. सर्वप्रथम प्रत्येक सूत्र के चारों ओर बॉक्स बनाते हैं –
H2S (g) + O2 (g) → SO2 (g) + H2O (l)

चरण 2. इस समीकरण में उपस्थित विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की सूची बनाते हैं-

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
H22
S11
O23

चरण 3.
सर्वप्रथम हम ऑक्सीजन के परमाणुओं का सन्तुलन करते हैं –

ऑक्सीजन के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में2 (O2 में)3 (SO2 तथा H2O में)
सन्तुलन के लिए2×33×2

अत: इस गणना के उपरान्त समीकरण निम्नवत् होगा –
H2S (g) + 3O2 (g) → 2SO2 (g) +2H2O (l)

चरण 4.
चरण 3 में ऑक्सीजन परमाणुओं को सन्तुलित करने के कारण हाइड्रोजन के परमाणु असन्तुलित हो जाते हैं। अतः अब हाइड्रोजन के परमाणुओं को सन्तुलित करते हैं –

हाइड्रोजन के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में2 (H2S में)4(H2O में)
सन्तुलन के लिए2×24

पुनः आंशिक रूप से सन्तुलित समीकरण निम्नवत् त् होगा-.
2H2S (g) + 3O2 (g) →2SO2 (g) + 2H2O (l)

चरण 5. अब सल्फर के परमाणुओं की संख्या देखने पर ज्ञात होता है कि सल्फर के परमाणुओं की संख्या बाएँ व दाएँ पक्षों में बराबर है।
चरण 6. अतः अन्त में उपर्युक्त सन्तुलित समीकरण को – लिख देते हैं
2H2S (g) +3O2 (g) →2SO2 (g) + 2H2O(l)

(c) कथन के अनुसार असन्तुलित रासायनिक समीकरण निम्नवत् है –
BaCl2 (aq) +Al2(SO4)3 (aq) →AICl3 (aq) +BaSO4
इस समीकरण के सन्तुलन के लिए निम्नलिखित चरण अपनाए जाते हैं-

चरण 1.
सर्वप्रथम अभिक्रिया में प्रत्येक सूत्र को बॉक्स में लिख लेते हैं
BaCl2 (aq) + Al2 (SO4)3 (aq) →
AlCl3 (aq) + BaSO4]

चरण 2. विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की संख्या के लिए सारणी –

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
Ba11
Cl23
Al21
S31
O124

चरण 3.
इस चरण में हम ऑक्सीजन परमाणुओं को सन्तुलित करेंगे –

ऑक्सीजन के परमाणु ।अभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में12 [AI2(SO4)3, में]4 (BaSO4, में)
सन्तुलन के लिए123×4

उपर्युक्त गणना के उपरान्त आंशिक सन्तुलित समीकरण इस प्रकार होगा-
BaCl2 (aq) + Al2(SO4)3 (aq) → AlCl3 (aq) + 3BaSO4

चरण 4.
अब बेरियम के परमाणुओं की संख्या को सन्तुलन में लाते हैं –

बेरियम के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में1(BaCl2 में)3(BaSO4, में)
सन्तुलन के लिए3 ×13

पुनः आंशिक सन्तुलित समीकरण निम्नवत् होगा
3BaCl2 (aq) + Al2 (SO4)3 (aq) → AlCl3 (aq) + 3BaSO4

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चरण 5.
इस चरण में हम क्लोरीन परमाणुओं की संख्या को सन्तुलित करेंगे –

क्लोरीन के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में6 (3 BaCl2, में)3(AlCl3, में)
सन्तुलन के लिए63×2

पुनः आंशिक सन्तुलित समीकरण निम्नवत् होगा –
3BaCl2 (aq) + Al2 (SO4)3 (aq) → 2AlCl3 (aq) + 3BaSO4

चरण 6.
दोनों पक्षों में सल्फर व ऐल्युमिनियम की संख्या समान है। अन्ततः दोनों पक्षों में सभी परमाणुओं की संख्या गिनकर हमें ज्ञात होता है कि यह समीकरण पूर्ण रूप से सन्तुलित है। इसे निम्न प्रकार लिखा जा सकता है –
3BaCl2 (aq) + Al2(SO4)3 (aq) → 2AlCl3 (aq) +3BaSO4

(d) कथन के अनुसार रासायनिक समीकरण इस प्रकार है-
K(s) + H2O(l) →KOH(aq) + H2↑ (g)
इस समीकरण के सन्तुलन के लिये निम्नलिखित चरण अपनाये जाते हैं-

चरण 1. सर्वप्रथम अभिक्रिया में प्रत्येक सूत्र को बॉक्स में लिख लेते हैं
K(s) + H2O(l) → KOH(aq) + H2↑(g)

चरण 2.
विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की संख्या के लिये सारणी

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं  की संख्या
K11
H23
O11

चरण 3.
इस चरण में हम हाइड्रोजन परमाणुओं को सन्तुलित करेंगे –

हाइड्रोजन के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में2(H2O)3 (KOH) तथा H2
सन्तुलन के लिये2×33×2

अतः इस गणना के उपरान्त समीकरण निम्नवत् होगा –
K(s) + 3H2O → 2KOH(aq) + 2H2(g)

चरण 4.
चरण 3 में हाइड्रोजन परमाणु को सन्तुलित करने के कारण ऑक्सीजन परमाणु असन्तुलित हो जाते हैं। अतः अब ऑक्सीजन परमाणु को सन्तुलित करते हैं –

ऑक्सीजन के परमाणुअभिकारकों मेंउत्पादों में
प्रारम्भ में3(H2O)2(KOH)
सन्तुलन के लिये3×22×3

अतः इस गणना के उपरान्त आंशिक सन्तुलित समीकरण इस प्रकार होगा-.
K(s) + 6H2O(l) → 6KOH(aq) + 3H2(g)

चरण 5.
अब K को सन्तुलित करने पर –
6K(s) + 6HH2O(l)→ 6KOH(aq) + 3HH2(g) ↑

चरण 6.
समीकरण को सरल बनाने के लिये अभिकारक व उत्पाद में 3 से भाग देने पर
2K(s) + 2H2O(l) → 2KOH(aq) + H2(g)↑.
उपरोक्त अभिक्रिया पूर्णतः सन्तुलित है।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित रासायनिक समीकरणों को सन्तुलित कीजिए
(a) HNO3 +Ca(OH)2 →Ca(NO3)2 +H2O
(b) NaOH + H2SO4 →Na2SO4 +H2O
(c) NaCl+AgNO3 →AgCl+NaNO3
(d) BaCl + H2SO4 → BaSO4 + HCl
उत्तर-
(a)

चरण 1.
सर्वप्रथम प्रत्येक सूत्र के चारों ओर बॉक्स बनाते हैं –
HNO3 + Ca(OH)2 → Ca(NO3)2] + H2O

चरण 2.
समीकरण के तत्वों के परमाणुओं की सूची बनाते हैं –

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
H32
N12
O57
Ca11

चरण 3. नाइट्रोजन तत्व के परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिये HNO3 के पूर्व 2 लिखने पर
2HNO3 + Ca(OH)2 →Ca(NO3)2 + H2O

चरण 4. हाइड्रोजन के परमाणुओं को सन्तुलित करने के लिये HO अणुओं का गुणाः 2 से करने पर
2HNO3 + Ca(OH)2 →Ca(NO3)2 + 2H2O.

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चरण 5.
चूँकि अभिकारक एवं उत्पादों में ऑक्सीजन परमाणुओं की संख्या समान अर्थात् 8 है, अतः अभिक्रिया अब पूर्ण रूप से सन्तुलित है।
2HNO3 + Ca(OH)2 →Ca(NO3)2 + 2H2O

(b) सर्वप्रथम अभिक्रिया में प्रत्येक सूत्र को बॉक्स में लिख लेते हैं
NaOH+ H2SO4→Na2SO4 + H2O

चरण 1.
विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की संख्या के लिये सारणी –

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
Na12
O55
H32
S11

चरण 2.
उपरोक्त प्रेक्षण से ज्ञात हो रहा है कि अभिक्रिया में ऑक्सीजन तथा सल्फर परमाणुओं की संख्या अभिकारक , व उत्पाद में समान है।
अत: Na के परमाणुओं की संख्या समान करने के लिये NaOH में 2 का गुणा करने पर-
2NaOH + H2SO4 → Na2SO4+ H2O

चरण 3.
हाइड्रोजन परमाणुओं की संख्या को समान करने के लिये H,0 में 2 का गुणा करने पर
2NaOH + H2SO4 →Na2SO4+ 2H2O

चरण 4.
अब अं सीजन परमाणुओं की संख्या दोनों तरफ देखने पर ज्ञात होता है कि यह दाँयी तरफ व बाँयी तरफ समान है। अतः यह अभिक्रिया एक सन्तुलित अभिक्रिया है।
2NaOH + H2 → Na2SO4+ 2H2O

(c) कथन के अनुसार असन्तुलित रासायनिक समीकरण निम्न है
NaCl + AgNO3 →AgCl + NaNO3
यह समीकरण पहले से ही सन्तुलित है, इसे सन्तुलित करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

(d) कथन के अनुसार असन्तुलित रासायनिक समीकरण निम्न है –
BaCl2 (aq) + H2SO4 (aq) → BaSO4 (aq) + HCl(aq)

चरण 1.
सर्वप्रथम अभिक्रिया में प्रत्येक सूत्र को बॉक्स में लिख लेते हैं –
BaCl2 (aq) + H2SO4 (aq) → BaSO4 (aq) + HCl(aq)

चरण 2.
विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की संख्या के लिये सारणी-

तत्वअभिकारकों में परमाणुओं की संख्याउत्पादों में परमाणुओं की संख्या
Ba11
Cl21
H21
S11
O44

देखने पर विदित होता है कि अभिकारकों व उत्पादों में Ba, S व O की संख्या समान है।

चरण 3.
Cl परमाणुओं की संख्या समान करने के लिये HCI में 2 का गुणा करने पर
BaCl2 + H2SO4 →BaSO4 + 2HCl

चरण 4.
देखने पर ज्ञात होता है कि अभिकारकों व उत्पादों में परमाणुओं की संख्या समान है अतः यह अभिक्रिया सन्तुलित है।
BaCl2 + H2SO4→BaSO4 + 2HCl

प्रश्न 7.
निम्न अभिक्रियाओं के लिए सन्तुलित रासायनिक समीकरण लिखिए –
(a) कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड + कार्बन डाइऑक्साइड → कैल्सियम कार्बोनेट + जल
(b) जिंक + सिल्वर नाइट्रेट→ जिंक नाइट्रेट + सिल्वर
(c) ऐलुमिनियम + कॉपर क्लोराइड → ऐलुमिनियम क्लोराइड + कॉपर
(d) बेरियम क्लोराइड + पोटैशियम सल्फेट → बेरियम सल्फेट + पोटैशियम क्लोराइड
उत्तर –
(a) Ca(OH)2+CO2 →CaCO3 + H2O
(b) Zn + 2AgNO3 → Zn(NO3)2 + 2Ag
(c) 2Al+3 CuCl2 → 2AlCl3 +3Cu
(d) BaCl +K2SO4 → BaSO4+2KCl

प्रश्न 8.
निम्न अभिक्रियाओं के लिए सन्तुलित रासायनिक समीकरण लिखिए एवं प्रत्येक अभिक्रिया का प्रकार बताइए-
(a) पोटैशियम ब्रोमाइड (aq) + बेरियम आयोडाइड (aq) → पोटैशियम आयोडाइड (aq) + बेरियम ब्रोमाइड (s)
(b) जिंक कार्बोनेट (s) → जिंक ऑक्साइड (s) + कार्बन डाइऑक्साइड (g)
(c) हाइड्रोजन (g) + क्लोरीन (g) → हाइड्रोजन क्लोराइड (g)
(d) मैग्नीशियम (s) + हाइड्रोक्लोरिक अम्ल (aq) → मैग्नीशियम क्लोराइड (aq) + हाइड्रोजन (g)
उत्तर –
(a) 2KBr(aq) +BaI2 (aq) →2KI (aq) +BaBr2 (s) (द्विविस्थापन अभिक्रिया)
(b) ZnCO3 (s)→ZnO (s) + CO2 (g) (वियोजन अभिक्रिया)
(c) H2(g) + Cl2 (g) → 2HCl(g) (संयोजन अभिक्रिया)
(d) Mg (s) + 2HCl (aq) → MgCl2 (aq) + H2(g) (विस्थापन अभिक्रिया)

प्रश्न 9.
ऊष्माक्षेपी तथा ऊष्माशोषी अभिक्रियाओं का क्या अर्थ है ? उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया-वे अभिक्रियाएँ जिनमें ऊष्मा उत्पन्न होती है, ऊष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। उदाहरण के लिए-मेथेन गैस वायु की ऑक्सीजन में जलकर कार्बन डाइऑक्साइड और जल वाष्प बनाती है। इसमें ऊष्मा भी उत्पन्न होती है।
CH4(g) + 2O2(g) → CO2(g)+22O (g) +ऊष्मीय ऊर्जा
ऊष्माशोषी अभिक्रिया-वे अभिक्रियाएँ जिनमें ऊष्मा का अवशोषण होता है, ऊष्माशोषी अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
उदाहरण के लिए-हाइड्रोजन तथा आयोडीन के संयोग से हाइड्रोजन आयोडाइड का बनना ऊष्माशोषी अभिक्रिया है।
H2 +I2 → 2 HI – ऊष्मा

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प्रश्न 10.
श्वसन को ऊष्माक्षेपी अभिक्रिया क्यों कहते हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर-
श्वसन की प्रक्रिया में ऊर्जा निर्मुक्त होती है। श्वसन के दौरान, हमारे शरीर की कोशिकाओं में ग्लूकोज (भोजन के पाचन से प्राप्त) वायु की ऑक्सीजन से संयुक्त होकर कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल बनाने के साथ-साथ ऊर्जा को उत्सर्जित करता है।
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प्रश्न 11.
वियोजन अभिक्रिया को संयोजन अभिक्रियाओं के विपरीत क्यों कहा जाता है? इन अभिक्रियाओं के लिए समीकरण लिखिए।
उत्तर-
संयोजन अभिक्रिया में दो या दो से अधिक पदार्थ परस्पर संयोग करके एक नया पदार्थ बनाते हैं, जैसे
C(s)+O2 (g) → CO2(g)
तथा वियोजन अभिक्रिया में एक ही यौगिक विखण्डित होकर दो या दो से अधिक सरल पदार्थ बनाता है, जैसे कैल्सियम कार्बोनेट को गर्म करने पर वह वियोजित होकर कैल्सियम ऑक्साइड तथा कार्बन डाइऑक्साइड बनाता है।
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इस प्रकार वियोजन अभिक्रिया, संयोजन अभिक्रिया के विपरीत है।

प्रश्न 12.
उन वियोजन अभिक्रियाओं के एक-एक समीकरण लिखिए जिनमें ऊष्मा, प्रकाश एवं विद्युत के रूप में ऊर्जा प्रदान की जाती है।
उत्तर-
(i) ऊष्मा के रूप में-कैल्सियम कार्बोनेट को गर्म करने पर यह अपघटित होकर कैल्सियम ऑक्साइड व कार्बन डाइऑक्साइड देता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 3
(ii) प्रकाश के रूप में सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में सिल्वर क्लोराइड का सिल्वर तथा क्लोरीन में वियोजन हो जाता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 4
(iii) विद्युत के रूप में-जब अम्लीकृत जल का वैद्युत अपघटन किया जाता है, वह अपघटित होकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनाता है।
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प्रश्न 13.
विस्थापन एवं द्विविस्थापन अभिक्रियाओं में क्या अन्तर है ? इन अभिक्रियाओं के समीकरण लिखिए।
उत्तर-
(i) विस्थापन अभिक्रिया-ऐसी अभिक्रिया जिसमें किसी यौगिक के अणु के किसी एक परमाणु अथवा समूह (मूलक) के स्थान पर कोई दूसरा परमाणु अथवा समूह (मूलक) आ जाता है।
उदाहरण –
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(ii) द्विविस्थापन अभिक्रिया-वह अभिक्रिया जिसमें आयनों का परस्पर विस्थापन होता है, द्विविस्थापन अभिक्रिया कहलाती है।
उदाहरण –
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प्रश्न 14.
सिल्वर के शोधन में, सिल्वर नाइट्रेट के विलयन से सिल्वर प्राप्त करने के लिए कॉपर धातु द्वारा विस्थापन किया जाता है। इस प्रक्रिया के लिए अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 8

प्रश्न 15.
अवक्षेपण अभिक्रिया से आप क्या समझते हैं ? उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर-
अवक्षेपण अभिक्रिया-ऐसी अभिक्रियाएँ जिनमें उत्पाद अविलेय अवस्था में प्राप्त होकर विलयन में नीचे स्थिर हो जाता है, अवक्षेप कहलाता है, तथा यह क्रिया अवक्षेपण अभिक्रिया कहलाती है।
उदाहरण –
Na2SO4 (aq) + BaCl2 (aq) → BaSO4(↓) +2NaCl (aq)

प्रश्न 16.
ऑक्सीजन के योग या ह्रास के आधार पर निम्न पदों की व्याख्या कीजिए। प्रत्येक के लिए दो उदाहरण दीजिए
(a) उपचयन
(b) अपचयन।
उत्तर-
(a) उपचयन-वे अभिक्रियाएँ जिनमें ऑक्सीजन की वृद्धि (योग) होती है, उपचयन अभिक्रियाएँ कहलाती
उदाहरण –
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(b) अपचयन।
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प्रश्न 17.
एक भूरे रंग के चमकदार तत्व ‘X’ को वायु की उपस्थिति में गर्म करने पर वह काले रंग का हो जाता है। इस तत्व ‘X’ एवं उस काले रंग के यौगिक का नाम बताइए।
उत्तर-
तत्व ‘X’ कॉपर (Cu) है। काले रंग का यौगिक कॉपर (II) ऑक्साइड (CuO) है।

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प्रश्न 18.
लोहे की वस्तुओं को हम पेण्ट क्यों करते
उत्तर-
लोहे की वस्तुओं पर जंग उनकी खुली सतह पर ऑक्सीजन एवं नमी के कारण लगती है। लोहे की वस्तुओं की सतह पर पेण्ट लगने से सतह खुली नहीं रहती तथा ऑक्सीजन वस्तु की सतह के सम्पर्क में नहीं आ पाती और वस्तु पर जंग नहीं लगती।

प्रश्न 19.
तेल एवं वसायुक्त खाद्य पदार्थों को नाइट्रोजन से प्रभावित क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
तेल एवं वसायुक्त भोज्य पदार्थों के उपचयन से बचाव हेतु हम इनमें नाइट्रोजन प्रवाहित कर देते हैं। तेल तथा वसा का उपचयन होने पर ये विकृतगन्धी हो जाते हैं तथा इनकी गन्ध एवं स्वाद परिवर्तित हो जाता है। नाइट्रोजन प्रवाहित करने से इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है।

प्रश्न 20.
निम्न पदों का वर्णन कीजिए तथा प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दीजिए –
(a) संक्षारण,
(b) विकृतगन्धिता।
उत्तर-
(a) संक्षारण-जब किसी धातु की सतह वायु, जल अथवा अपने चारों ओर उपस्थित किसी अन्य पदार्थ द्वारा अभिक्रमित हो जाती है, अथवा इस पर जंग लग जाती है तब इसे संक्षारित वस्तु कहते हैं। यह प्रभाव संक्षारण कहलाता है। उदाहरण के लिए, लोहे पर जंग का लगना।

(b) विकृतगन्धिता-तेल व वसा के उपचयित हो जाने पर ये विकृतगन्धी हो जाते हैं तथा इनकी गन्ध व स्वाद में परिवर्तन हो जाता है। इनमें प्रतिऑक्सीकारक मिलाकर अथवा भोज्य पदार्थों को निर्वातित पात्रों में रखकर अथवा इनमें नाइट्रोजन प्रवाहित करके इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। उदाहरण-आलू की चिप्स की थैलियों में नाइट्रोजन प्रवाहित करके इन्हें उपचयित होने से बचाया जा सकता है।

HBSE 10th Class Science रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण InText Questions and Answers

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 6)

प्रश्न 1.
वायु में जलाने से पहले मैग्नीशियम रिबन को साफ क्यों किया जाता है ?
उत्तर-
मैग्नीशियम वायु में उपस्थित ऑक्सीजन से संयोग करके मैग्नीशियम ऑक्साइड बना लेता है। मैग्नीशियम ऑक्साइड व अन्य अशुद्धियों-धूल कण व नमी आदि को हटाकर शुद्ध मैग्नीशियम प्राप्त करने के लिए इसे वायु में जलाने से पहले साफ करना आवश्यक है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

प्रश्न 2.
निम्नलिखित रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए सन्तुलित समीकरण लिखिए
(i) हाइड्रोजन + क्लोरीन → हाइड्रोजन क्लोराइड
(ii) बेरियम क्लोराइड + ऐलुमिनियम सल्फेट बेरियम सल्फेट + ऐलुमिनियम क्लोराइड
(iii) सोडियम + जल → सोडियम हाइड्रॉक्साइड + हाइड्रोजन
उत्तर-
(i) H2+ Cl2 → 2HCl
(ii) 3BaCl2+Al2 (SO4)3 → 3BaSO4 +2AlCl 3
(iii) 2Na + 2H2O → 2NaOH + H2

प्रश्न 3.
निम्नलिखित अभिक्रियाओं के लिए उनकी अवस्था के संकेतों के साथ सन्तुलित रासायनिक समीकरण लिखिए-
(i) जल में बेरियम क्लोराइड तथा सोडियम सल्फेट के विलयन अभिक्रिया करके सोडियम क्लोराइड का विलयन तथा अघुलनशील बेरियम सल्फेट का अवक्षेप बनाते हैं।
(ii) सोडियम हाइड्रॉक्साइड का विलयन (जल में) हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के विलयन (जल में) से अभिक्रिया करके सोडियम क्लोराइड का विलयन तथा जल बनाते
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 21

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 11)

प्रश्न 1.
किसी पदार्थ ‘X’ के विलयन का उपयोग सफेदी करने के लिए होता है।
(i) पदार्थ ‘X’ का नाम तथा इसका सूत्र लिखिए।
(ii) ऊपर (i) में लिखे पदार्थ ‘X’ की जल के साथ अभिक्रिया लिखिए।
उत्तर-
(i) पदार्थ ‘X’ का नाम कैल्सियम ऑक्साइड (शुष्क चूना) है, तथा इसका रासायनिक सूत्र Cao है।
(ii) CaO की जल के साथ अभिक्रिया निम्नलिखित
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 22

प्रश्न 2.
क्रियाकलाप 1.7 में एक परखनली में एकत्रित गैस की मात्रा दूसरी से दोगुनी क्यों है? उस गैस का नाम बताइए।
उत्तर-
क्रियाकलाप 1.7 में जल के विद्युत्-अपघटन की अभिक्रिया निम्नलिखित प्रकार होती है
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 23
इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन गैस 2 : 1 की मात्रा में प्राप्त होती है। द्रव्यमान संरक्षण के नियमानुसार जब जल के दो अणु अपघटित होते हैं तब उत्पन्न हुई हाइड्रोजन की मात्रा ऑक्सीजन की मात्रा से दोगुनी होती है। अतः एक परखनली में हाइड्रोजन गैस की मात्रा दोगुनी है।

(पाठ्य-पुस्तक पृ. सं. 15)

प्रश्न 1.
जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो विलयन का रंग क्यों बदल जाता है ?
उत्तर-
जब लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में डुबोया जाता है तो लोहे की कील कॉपर सल्फेट के विलयन में से कॉपर को विस्थापित कर देती है तथा आयरन सल्फेट बनता है। अतः आयरन सल्फेट के विलयन के बनने के कारण विलयन का रंग बदल जाता है तथा लोहे की कील पर भूरे रंग की परत जम जाती है, एवं विलयन का रंग हल्का हरा हो जाता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 24

प्रश्न 2.
क्रियाकलाप 1.10 से भिन्न द्विविस्थापन अभिक्रिया का एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 25

प्रश्न 3.
निम्न अभिक्रियाओं में उपचयित तथा अपचयित पदार्थों की पहचान कीजिये
(i) 4Na (s) + O2 (g) →2Na2O(s)
(ii) CuO (s) + H2 (g) → Cu(s) + H2 O(l) [राज. 2015]
उत्तर-
(i) 4Na (s) + O2 (g) →2Na2O(s)
इस अभिक्रिया में सोडियम (Na) सोडियम ऑक्साइड (Na2O) में उपचयित या ऑक्सीकृत हो रहा है। इसका अर्थ यह है कि ऑक्सीजन का अपचयन हो रहा है।

(ii) CuO (s) + H2 (g) →Cu (s) + H2O(l)
इस अभिक्रिया में हाइड्रोजन गैस (H2) जल (H2O) में ऑक्सीकृत या उपचयित हो रही है जबकि कॉपर (ii) ऑक्साइड (CuO) का अपचयन कॉपर में हो रहा है|

HBSE 10th Class Science रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण InText Activity Questions and Answers

क्रियाकलाप 1.1. (पा. पु. पृ. सं. 1)

प्रश्न 1.
आपने क्या प्रेक्षण किया?
उत्तर-
हमने देखा कि मैग्नीशियम रिबन चमकदार श्वेत लौ के साथ जलकर श्वेत चूर्ण में परिवर्तित हो जाता है।

प्रश्न 2.
यह श्वेत चूर्ण किस यौगिक का है?
उत्तर-
यह श्वेत चूर्ण मैग्नीशियम ऑक्साइड का है। यह वायु में उपस्थित ऑक्सीजन तथा मैग्नीशियम के बीच होने वाली अभिक्रिया के कारण बनता है।

क्रियाकलाप 1.2 (पा. पु. पृ. सं. 2)

प्रश्न 1.
आपको कैसे ज्ञात हुआ कि रासायनिक परिवर्तन हुआ है?
उत्तर-
क्योंकि अभिक्रिया के दौरान अभिकारकों की अवस्था व रंग परिवर्तित हुआ है।

प्रश्न 2.
इस क्रियाकलाप का रासायनिक समीकरण लिखें।
उत्तर-
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 11

क्रियाकलाप 1.3 (पा. पु. पृ. सं. 2)

प्रश्न 1.
क्या जस्ते के दानों के आसपास कुछ होता दिखायी दे रहा है?
उत्तर-
हाँ, वहाँ से गैस के बुलबुले उत्पन्न होते दिखाई दे रहे हैं एवं जस्ते के दानों का आकार धीरे-धीरे घटता जा रहा है।

प्रश्न 2.
ये बुलबुले किस गैस के हैं?
उत्तर-
ये बुलबुले हाइड्रोजन गैस के हैं।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

प्रश्न 3.
शंक्वाकार फ्लास्क या परखनली को स्पर्श कीजिए। क्या इसके तापमान में कोई परिवर्तन हो रहा है?
उत्तर-
शंक्वाकार फ्लास्क गर्म हो रहा है। इसका तापमान बढ़ रहा है।

प्रश्न 4.
क्रियाकलापका रासायनिक समीकरण लिखें।
उत्तर-
शब्द समीकरणजस्ता + सल्फ्यूरिक अम्ल → जिंक सल्फेट + हाइड्रोजन रासायनिक समीकरण
Zn(s) + H2SO4 (aq) → ZnSO4(aq) + H2(g)

क्रियाकलाप 1.4 (पा. पु. पृ. सं. 7)

प्रश्न 1.
क्या बीकर के ताप में कोई परिवर्तन हुआ?
उत्तर-
हाँ, बीकर अत्यन्त गर्म हो गया।

प्रश्न 2.
अभिक्रिया का समीकरण लिखें।
उत्तर-
कैल्सियम ऑक्साइड जल के साथ तीव्रता से । अभिक्रिया करके बुझे हुए चूने (कैल्सियम हाइड्रॉक्साइड) का निर्माण करके अधिक मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न करता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 12

क्रियाकलाप 1.5 (पा. पु. पृ. सं. 8) .

प्रश्न 1.
गर्म करने के पश्चात् क्रिस्टल के रंग में क्या है परिवर्तन होता है?
उत्तर-
गर्म करने से पहले क्रिस्टल का रंग हरा था जो कि गर्म करने के पश्चात् भूरा हो गया ।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 13

प्रश्न 2.
यह किस प्रकार की वियोजन अभिक्रिया है?
उत्तर-
यह ऊष्मीय वियोजन अभिक्रिया है। ‘

क्रियाकलाप 1.7 (पा. पु. पृ. सं. 9)

प्रश्न 1.
लेड नाइट्रेट को गर्म करने पर क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर-
लेड नाइट्रेट को गर्म करने पर भूरे रंग का धुआँ उत्सर्जित होता है। यह भूरे रंग का धुआँ, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड गैस में बनने के कारण होता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 14

प्रश्न 2.
यह भूरे रंग का धुआँ किस पदार्थ का है?
उत्तर-
यह भूरे रंग का धुआँ नाइट्रोजन डाइऑक्साइड के (NO2) का है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

क्रियाकलाप 1. 8 (पा. पु. पृ. सं. 10)

प्रश्न 1.
एक जलती हुई मोमबत्ती को परखनलियों के मुख पर ले जाने से क्या होता है?
उत्तर-

  • जिस परखनली में ऑक्सीजन गैस भरी है, उसके मुख पर जलती हुई मोमबत्ती को ले जाने पर यह तेजी से जलने लगती है।
  • जिस परखनली में हाइड्रोजन गैस भरी है, उसके मुख पर जलती हुई मोमबत्ती ले जाने पर यह पॉप-आवाज (POP-SOUND) के साथ जलती है।

प्रश्न 2.
दोनों परखनलियों में कौन सी गैस उपस्थित है?
उत्तर-
एक परखनली में हाइड्रोजन गैस व दूसरी परखनली में ऑक्सीजन गैस भरी हुई है।

प्रश्न 3.
इस प्रकार के अपघटन को क्या कहते हैं?
उत्तर-
इस अपघटन को विद्युत-अपघटन कहते हैं|

प्रश्न 4.
क्या दोनों परखनलियों में एकत्रित गैस का आयतन समान है?
उत्तर-
नहीं, दोनों परखनलियों में एकत्रित गैस का आयतन समान नहीं है।

प्रश्न 5.
किस गैस का आयतन ज्यादा है?
उत्तर-
हाइड्रोजन गैस का आयतन ज्यादा है।

प्रश्न 6.
किस गैस का आयतन कम है?
उत्तर-
ऑक्सीजन गैस का आयतन कम है।

क्रियाकलाप 1.8 (पा. पु. पृ. सं. 10)

प्रश्न 1.
धूसर रंग किस धातु के कारण हो जाता है?
उत्तर-
धूसर रंग सिल्वर धातु के कारण हो जाता है।

प्रश्न 2.
थोड़ी देर पश्चात् सिल्वर क्लोराइड के रंग को देखिए क्या परिवर्तन हुआ?
उत्तर-
सूर्य के प्रकाश में श्वेत रंग का सिल्वर क्लोराइड धूसर रंग का हो जाता है। प्रकाश की उपस्थिति में सिल्वर क्लोराइड का सिल्वर तथा क्लोरीन में वियोजन के कारण से ऐसा होता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 15

प्रश्न 3.
यदि सिल्वर ब्रोमाइड को भी कुछ समय के लिये प्रकाश में रखें तो क्या यह भी इसी प्रकार अभिक्रिया करेगा?
उत्तर-
हाँ, यदि सिल्वर ब्रोमाइड को कुछ समय के लिए प्रकाश में रखें तो यह भी धूसर रंग में परिवर्तित हो जाता है जो कि सिल्वर ब्रोमाइड के सिल्वर तथा ब्रोमाइड में वियोजन के कारण होता है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 16

प्रश्न 4.
सिल्वर ब्रोमाइड के वियोजन की यह अभिक्रिया कहाँ प्रयुक्त होती है?
उत्तर-
सिल्वर ब्रोमाइड के वियोजन की इस अभिक्रिया का प्रयोग श्वेत-श्याम फोटोग्राफी में किया जाता है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

प्रश्न 5.
किस प्रकार की ऊर्जा के कारण यह वियोजन अभिक्रिया होती है?
उत्तर-
प्रकाशीय ऊर्जा के कारण यह वियोजन अभिक्रिया होती है।
यह भी करके देखिये –
एक परखनली में लगभग 2 ग्राम बेरियम हाइड्रॉक्साइड लीजिए अब इसमें लगभग 1 ग्राम अमोनियम क्लोराइड डालकर काँच की छड़ से मिलाइये। अपनी हथेली से परखनली के निचले सिरे को स्पर्श कीजिये। आप क्या अनुभव करते हैं? यह कौन सी अभिक्रिया है?
उत्तर-
बेरियम हाइड्रॉक्साइड एवं अमोनियम क्लोराइड को मिलाने में निम्न अभिक्रिया होती है –
Ba (OH)2(s) + 2NH4Cl(aq) → BaCl2(aq) + 2NH4OH(aq) परखनली को छूने पर हमें ठंड का अनुभव होता है अर्थात् परखनली ठंडी हो जाती है। यह एक द्विविस्थापन एवं ऊष्माशोषी अभिक्रिया है।

क्रियाकलाप 1.9 (पा. पु. पृ. सं. 11)

प्रश्न 1.
परखनली (A) में रखे कॉपर सल्फेट विलयन का रंग क्या है?
उत्तर-
परखनली (A) में रखे कॉपर सल्फेट विलयन का रंग नीला हो जाता है।

प्रश्न 2.
परखनली (B) में रखे कॉपर सल्फेट विलयन का रंग क्या है?
उत्तर-
परखनली (B) में रखे कॉपर सल्फेट विलयन का नीला रंग बहुत हल्का हो जाता है।

प्रश्न 3.
लोहे की कील का रंग भूरा क्यों हो गया?
उत्तर-
लोहे की कील का रंग कॉपर के अवक्षेपण के कारण भूरा हो जाता है।
CuSO4 +Fe → FeSO4 +Cu

प्रश्न 4.
कॉपर सल्फेट के विलयन का नीला रंग मलीन क्यों पड़ गया?
उत्तर-
कॉपर सल्फेट के विलयन का नीला रंग आयरन सल्फेट के बन जाने के कारण मलीन हो गया।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 17

प्रश्न 5.
यह अभिक्रिया किस प्रकार की अभिक्रिया
उत्तर-
यह अभिक्रिया विस्थापन अभिक्रिया है।

HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण

प्रश्न 6.
विस्थापन अभिक्रिया के कुछ अन्य उदाहरण क्या हैं?
उत्तर-
कुछ अन्य उदाहरण
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 18

क्रियाकलाप 1.10 (पा. पु. पृ. सं. 12)

प्रश्न 1.
सफेद अवक्षेप किस पदार्थ का है?
उत्तर-
सफेद अवक्षेप बेरियम सल्फेट (BaSO4) का है।

प्रश्न 2.
अभिक्रिया के लिये सन्तुलित रासायनिक समीकरण दीजिए।
उत्तर-
सन्तुलित रासायनिक समीकरण निम्न है –
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 19

प्रश्न 3.
क्या यह भी एक द्विविस्थापन अभिक्रिया
उत्तर-
हाँ, यह एक द्विविस्थापन अभिक्रिया है।

प्रश्न 4.
अभिक्रिया के दौरान बने सह-उत्पाद सोडियम क्लोराइड का क्या होता है?
उत्तर-
अभिक्रिया के दौरान बना सह-उत्पाद सोडियम क्लोराइड विलयन में ही रहता है।

प्रश्न 5.
द्विविस्थापन अभिक्रियाएँ किन्हें कहते हैं?
उत्तर-
वे अभिक्रियाएँ जिनमें अभिकारकों के आयनों का आदान-प्रदान होता है, द्विविस्थापन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।

क्रियाकलाप 1.11  (पा. पु. पृ. सं. 13)

प्रश्न 1.
कॉपर चूर्ण को गर्म करने पर आपने क्या देखा?
उत्तर-
कॉपर चूर्ण काला पड़ जाता है।

प्रश्न 2.
कॉपर चूर्ण काला क्यों पड़ जाता है?
उत्तर-
क्योंकि कॉपर चूर्ण की सतह पर कॉपर ऑक्साइड (II) की काली पर्त चढ़ जाती है।
HBSE 10th Class Science Solutions Chapter 1 रासायनिक अभिक्रियाएँ एवं समीकरण 20

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
सिली सिलाई मर्दाना शर्ट को खरीदते समय ध्यान रखने योग्य किन्हीं दो बातों के बारे में बताएं।
उत्तर :
1. व्यवसाय अनुसार शर्ट खरीदनी चाहिए।
2. शर्ट का रंग, डिजाइन और प्रिंट ऐसा होना चाहिए जो उसके शरीर पर अच्छा लगे।

प्रश्न 2.
कपड़ों पर लगे सूचना लेबल हमें क्या जानकारी देते हैं ?
उत्तर :
सूचना लेबल से निम्नलिखित जानकारी मिलती है –

  1. वस्त्र किस रेशे का बना है।
  2. वस्त्र किस तरह प्रयोग करना है।
  3. माप बड़ा अथवा बीच का अथवा छोटा है।
  4. निर्माता कम्पनी के नाम का पता चलता है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

प्रश्न 3.
वस्त्रों पर लगे देख-रेख लेबल से हमें क्या सूचना मिलती है ?
उत्तर :
इससे हमें पता चलता है कि कपड़ों को कैसे धोएं, गर्म या ठण्डे पानी में धोएं, प्रैस का तापमान कितना होना चाहिए, कपड़ों को धूप में सुखाएं या छांव में आदि।

प्रश्न 4.
कारण बताते हुए समझाएं कि छोटे बच्चों के लिए निम्न में से कौन से वस्त्र अधिक उचित हैं और क्यों (क) बने बनाए वस्त्र (ख) दर्जी से सिलवाए गए।
उत्तर :
बने बनाए वस्त्र बच्चों के लिए ठीक रहते हैं। बाज़ार में बच्चों के लिए –
भिन्न-भिन्न प्रकार के भिन्न-भिन्न रंगों के वस्त्र बड़ी मात्रा में उपलब्ध रहते हैं। बच्चों की वृद्धि भी तीव्रता से होती है इसलिए दर्जी से बार-बार जाने से समय तथा पैसा दोनों की बर्बादी होती है। बाजार से बने बनाए वस्त्रों को खरीदने से समय की बचत, पैसे की बचत हो जाती है तथा इन्तज़ार नहीं करना पड़ता। किसी भी तरह की मांग की पूर्ति हो जाती है।

प्रश्न 5.
दर्जी से वस्त्र सिलवाने के कोई दो लाभ व दो हानियां लिखें।
उत्तर :
लाभ (1) दर्जी से वस्त्र सिलवाने से कपड़ों की फिटिंग अच्छी होती है। (2) वस्त्रों पर डिज़ाइन अपनी पसंद का डलवाया जा सकता है। हानियां (1) कपड़ों को प्राप्त करने के लिए इन्तजार करना पड़ता है। (2) कई बार फिटिंग नहीं आती तो ठीक करवाना पड़ता है।

प्रश्न 6.
दर्जी से वस्त्र सिलवाने के दो लाभ बताएं।
उत्तर :
नोट-देखें प्रश्न 5.

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

प्रश्न 7.
गुणवत्ता से क्या भाव है ?
उत्तर :
किसी वस्त्र की प्रकार, प्रकृति उसकी बनावट की श्रेष्ठता की मात्रा को उसकी गुणवत्ता कह सकते हैं।

प्रश्न 8.
बाज़ारी वस्त्रों का चुनाव करने के लिए क्या ढंग अपनाएंगे ?
उत्तर :
निम्न बातों को ध्यान में रख कर चुनाव किया जाना चाहिए। वस्त्र में निम्न गुण हों –

  1. आकर्षक
  2. आरामदायक
  3. अच्छी कारीगरी
  4. बजट में
  5. अपने कार्य के अनुसार
  6. रंग का चयन आदि।

प्रश्न 9.
अच्छी कारीगरी के गुण बताएं।
उत्तर :
धागा, सीन का मिलान, कटाई, कॉलर तथा कफ, प्लेटें, बटन, काज, जि, लाईनिंग।

प्रश्न 10.
कारीगरी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
कारीगरी का अर्थ है तैयार वस्त्रों के नाप, कटाई, सिलाई, उलेड़ी, वन्धक, कालर, कफ और अलंकरण से है। इनका प्रयोग कैसे हो कि वस्त्र की कार्यशीलता, सुन्दरता, आकर्षकता और टिकाऊपन बना रहे।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

प्रश्न 11.
रेडीमेड कपड़े खरीदने का कोई एक (दो) लाभ लिखें।
उत्तर :
1. समय की बचत हो जाती है।
2. दर्जियों के पास आने-जाने की समस्या भी नहीं रहती।

प्रश्न 12.
दर्जी से कपड़े सिलवाते समय ध्यान रखने योग्य किसी एक बात का उल्लेख करें।
उत्तर :
दर्जी को चाहिए कि कपड़े की सिलाई मज़बूत धागे तथा कपड़े के रंग वाले धागे से ही करे।

प्रश्न 13.
दर्जी से सिलवाये गये वस्त्रों की कारीगरी की जाँच करने के लिए किसी एक बिन्दु का उल्लेख करें।
उत्तर :
सिलाई का वखिया छोटा होना चाहिए। कई बार दर्जी शीघ्र सिलाई और अधिक सिलाई करने के कारण वखिया मोटा कर देते हैं जो टिकाऊ नहीं होता।

प्रश्न 14.
दर्जी से कपड़े सिलवाने का कोई एक लाभ लिखें।
उत्तर :
कपड़ों की फिटिंग अच्छी रहती है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

प्रश्न 15.
बच्चों के लिए रेडीमेड कपड़े खरीदने का कोई एक लाभ लिखें।
उत्तर :
बाज़ार में बच्चों के लिए भिन्न-भिन्न रंगों तथा नमूनों वाले कपड़े उपलब्ध हैं तथा मनपसन्द वस्त्र चुनना आसान रहता है।

प्रश्न 16.
अपने लिए रेडीमेड सूट खरीदते समय उसकी कारीगरी का आंकलन करने का कोई एक बिन्दु लिखें।।
उत्तर :
वस्त्र सिलने के लिए प्रयोग किया गया धागा वस्त्र से मिलता हो तथा मज़बूत हो तथा धागे का रंग भी पक्का हो।

प्रश्न 17.
रंगीन रेडीमेड कपड़ों के लेबल पर क्या-क्या सूचना होनी चाहिए ?
उत्तर :
इस पर कपड़े को कैसे धोया जाए ठण्डे या गर्म पानी से, किस प्रकार का साबुन या डिटरजेंट प्रयोग करें, धूप में सुखाया जाए या छांव में, आदि जानकारी होनी चाहिए। कपडे पर कितनी गर्म प्रेस का प्रयोग करें। यह सब जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए।

प्रश्न 18.
तीन वर्षीय बालक के लिए रेडीमेड वस्त्रों का चुनाव करते समय ध्यान रखने योग्य दो बातें लिखिए।
उत्तर :
1. वस्त्र आसानी से पहनने तथा उतारने वाले हों माता की कम सहायता लेनी पड़े।
2. वस्त्रों पर अधिक नमूने नहीं होने चाहिए इससे वस्त्र भारी हो जाते हैं।

प्रश्न 19.
आजकल पुरुषों के लिए रेडीमेड कमीज़ क्यों बेहतर मानी जाती है, कोई दो कारण लिखें।
उत्तर :

  1. यह आरामदायक रहती है।
  2. सस्ती होती है।
  3. समय की बचत हो जाती है।
  4. दर्जियों के चक्करों से छुटकारा मिल जाता है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

प्रश्न 20.
दर्जी से छोटे बच्चों के कपड़े सिलवाते समय ध्यान रखने योग्य किन्हीं दो बातों का उल्लेख करें।
उत्तर :
1. बच्चों का शरीर जल्दी बढ़ता है इसलिए दर्जी से सिलवाए कपड़े में अधिक दाब रखना चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर वस्त्र खुला किया जा सके।
2. वस्त्र सरलता से पहने तथा उतारे जा सकें ऐसे होने चाहिए।

प्रश्न 21.
वस्त्रों पर ‘देखरेख लेबल’ क्या होता है ?
उत्तर :
देखरेख लेबल रेडीमेड वस्त्रों पर लगा रहता है। इस पर वस्त्र की देखरेख जैसे धुलाई, सुखाना, प्रैस करना आदि के बारे में जानकारी दी गई होती है।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न :
बने बनाए वस्त्र खरीदते समय उसकी कारीगरी का मूल्यांकन किस प्रकार करोगे?
अथवा
अपने लिए रेडीमेड सूट खरीदते समय उसकी कारीगरी की जांच कैसे करेंगे ? किन्हीं दो बिन्दुओं का उल्लेख करें।
उत्तर :
कारीगरी का अर्थ तैयार वस्त्रों के नाम, कटाई, सिलाई, उलेड़ी, बन्धक, कालर, कफ़ और अलंकरण से है। इनका कैसे प्रयोग किया जाए कि वस्त्र की कार्यशीलता, सुन्दरता, आकर्षकता और टिकाऊपन बना रहे। कारीगरी का मूल्यांकन करने के लिए निम्नलिखित तत्त्वों को देखना पड़ता है –

  1. नमूना-नमूनों का अर्थ है कि विभिन्न रेखाओं के प्रयोग से किसी आकृति को बनाना। ये सजावटी तथा रचनात्मक हो सकते हैं।
  2. कपड़े की कटाई-कपड़ा सिलने से पहले कपड़े की कटाई ठीक होनी चाहिए। कपड़े की कटाई ठीक होगी तो कपड़े की सिलाई भी अच्छी होगी।
  3. सिलाई-सिलाई का बखिया छोटा होना चाहिए। कई बार दर्जी शीघ्र सिलाई और अधिक सिलाई करने के कारण बखिया मोटा कर देते हैं जो टिकाऊ नहीं होता।
  4. उलेड़ी-जब वस्त्र तैयार हो जाता है तो कई स्थानों; जैसे घेरे पर, गले की रेखा पर उलेड़ी करनी पड़ती है यदि ऐसा न हो तो इन स्थानों से धागे निकलने लगते हैं जो अच्छे नहीं लगते।
  5. बन्धक-बन्धक की सहायता से हम किसी परिधान को उतार-पहन सकते हैं। इसके लिए हुक-आई, बटन, काज और जिप का प्रयोग किया जाता है। यदि यह ठीक हो तो वस्त्र की फाल अच्छी आती है वस्त्र पहना हुआ अच्छा लगता है।
  6. कालर, कफ़, जेब-कालर और कफ़ की फिटिंग ठीक होनी चाहिए इन पर झोल नहीं होनी चाहिए। जेब ठीक दिशा में लगी हो।
  7. पलीटस, डार्टस और चुन्नटें-इनसे कपड़े में लचीलापन आ जाता है।
  8. अलंकरण-कपड़े को आकर्षक बनाने के लिए लेस, पाईपिंग, झालर आदि लगाई जाती है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 11 बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
रेडीमेड वस्त्रों की ज़रूरत क्यों है ?
अथवा
रेडीमेड वस्त्र खरीदने के कोई दो लाभ लिखो ?
उत्तर :
1. समय को बचाना (Saves Time) – आजकल हर व्यक्ति अपने कार्य में व्यस्त रहता है जिससे उसके पास समय का अभाव है। उसके पास इतना समय नहीं होता कि वह कपड़ा खरीदे, डिज़ाइन का फैसला ले, दर्जी को माप दे। अगर फिटिंग नहीं आती तो ठीक करवाये। इन सब झंझटों से वह बच जाता है।

2. इन्तज़ार नहीं करना पड़ता (No Waiting) – तैयार वस्त्रों को पहनने के लिए इन्तज़ार नहीं करना पड़ता है। जैसे ही वस्त्र खरीदते हैं तुरन्त उसे पहन लेते हैं।

3. रचनात्मकता की ज़रूरत नहीं (Need for Creativity) – बाज़ारी वस्त्र किसी विशेषज्ञ के द्वारा तैयार किये जाते हैं। वही अपनी बुद्धिमत्ता से विभिन्न नमूनों वाले वस्त्र तैयार करता है। इससे पहनने वाले को डिजाइन के लिए सोचने की ज़रूरत नहीं होती है।

4. अलग-अलग आर्थिक स्तर के लोगों के लिए उपलब्धि (Availability of Readymade Garments for Different Income Groups) – तैयार वस्त्र हर आर्थिक स्तर वाले लोगों के लिए सिले होते हैं जिससे उनकी लोकप्रियता और भी बढ़ती जा रही है। हमारे समाज में तीन तरह के आर्थिक स्तर वाले लोग हैं।

उच्च आर्थिक स्तर वाले लोगों के लिए उत्तम गुणों वाले महंगे तैयार वस्त्र उपलब्ध होते हैं। ये वस्त्र काफ़ी दृढ़ और मज़बूत होते हैं। इनकी रंग और सिलाई पक्की होती है। तैयार वस्त्र मध्यम आर्थिक स्तर वाले लोगों के लिए भी होते हैं। यह छोटे शोरूम में उपलब्ध होते हैं। ये भी मज़बूत होते हैं और धुलाई के बाद खराब नहीं होते हैं। तैयार वस्त्र निम्न आर्थिक स्थिति वाले लोगों के लिए भी उपलब्ध होते हैं। हमारे देश के अधिकतर लोग गरीब हैं। इसलिए निम्न आय वर्ग के लिए तैयार वस्त्र काफ़ी संख्या में उपलब्ध हैं। ये कपड़े सस्ते होते हैं। इनका कपड़ा साधारण होता है। इनकी सिलाई, धागा, रंग पक्का नहीं होता है। यह धोने के बाद सिकुड़ भी जाते हैं।

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5. उचित लटकाव (Proper Drape) – तैयार वस्त्र जब हम खरीदते हैं तो हम उसी समय खरीदने से पहले डालकर उनका आकार, फिटिंग आदि का निरीक्षण कर लेते हैं जिससे यह वस्त्र हमारे शरीर की बनावट पर पूरे उतरते हैं और हमें जचते भी हैं।

6. कम दाम (Less Price) – बाज़ारी वस्त्र घर पर सिले वस्त्रों से कम मूल्य के पड़ते हैं क्योंकि वस्त्र को बाज़ारी रूप से तैयार करने के लिए कपड़ा काफ़ी मात्रा में थोक रेट में इकट्ठा खरीदा जाता है जिसके कारण यह सीधा फैक्टरी अथवा मिलों से भी खरीदा जाता है। कपड़े को जब इकट्ठा बड़े स्तर पर खरीदा जाता है तो उनको इकट्ठा ही काटा जाता है। इससे कपड़ा व्यर्थ नहीं जाता और यह कपड़ा किसी कटाई विशेषज्ञ के द्वारा ही काटा जाता है जिससे वह कपड़े का छोटे से छोटा टुकड़ा भी व्यर्थ नहीं फेंकते। कपड़ा काटने के बाद सिलाई के लिए सक्षम दर्जियों को दिया जाता है जो इतनी अधिक मात्रा में सिलाई कार्य मिलने के कारण सिलाई करने के दाम कम लेते हैं।

7. तुरन्त ज़रूरतों की पूर्ति करना (Fullfilling Immediate Requirements) – कई बार हमें किसी वस्त्र की बहुत जल्दी ज़रूरत होती है तो हम तैयार वस्त्र को उसी समय खरीद कर अपनी ज़रूरत को पूरा कर लेते हैं।

8. दर्जियों के चक्करों से छुटकारा (Protection from Harassment of Tailors) तैयार वस्त्र खरीदने के लिए उसे दर्जियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वह अपनी इच्छानुसार और फिटिंग अनुसार तैयार वस्त्र खरीद कर पहन लेता है।

9. अधिक विभिन्नता (More Variety) – तैयार वस्त्रों के नमूने विशेष डिज़ाइनर और फैशन विशेषज्ञ के द्वारा बनाये जाते हैं। वह अधिकतर प्रचलित फैशन के सम्पर्क में होते हैं जिससे वह वही नमूना और डिज़ाइन बनाते हैं जो उपभोक्ता को पहली बार देखने में भी पसन्द आ जाता है। वह विभिन्न नमूने तैयार करके बाज़ारी वस्त्रों में अधिक विभिन्नता पैदा करते हैं।

10. विस्तृत पसन्द (Wider Choice) – रेडीमेड वस्त्र विभिन्न रंग, डिजाइन और बनावट के होते हैं। इनको देखकर व्यक्ति की पसन्द भी अधिक हो जाती है। उसके सामने एक ही ज़रूरत को पूरा करने के लिए कई तरह के वस्त्र होते हैं और अपनी रुचि अनुसार इन वस्त्रों को वह खरीद सकता है।

11. किसी भी तरह की मांग की पूर्ति (Meeting of any Type of Demands) – उपभोक्ता की जैसी भी मांग होती है जैसा भी नमूना वह चाहते हैं, जैसा स्टाइल उपभोक्ता चाहते हैं, निर्माता उसी तरह के वस्त्र उपभोक्ता को देते हैं। जिससे उपभोक्ता अधिक सन्तुष्ट होते हैं।

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प्रश्न 2.
रेडीमेड कपड़ों के दो लाभ बताएं।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न।

प्रश्न 3.
बने बनाए वस्त्रों को खरीदते समय ध्यान रखने योग्य किन्हीं चार बातों का उल्लेख करो।
अथवा
रेडीमेड कपड़े खरीदते समय ध्यान रखने योग्य कोई दो बातें लिखें।
उत्तर :
बाज़ारी वस्त्रों को चुनते हुए ध्यान रखने योग्य बातें (Criteria for Selection of Readymade Garment) । आजकल तैयार वस्त्र अधिक पसन्द किए जाते हैं। इनकी मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। अधिकतर लोग पसन्द करते हैं कि वह सिले सिलाए कपड़ों की अपेक्षा बाज़ारी तैयार वस्त्र ही लें। हर उपभोक्ता वस्त्र पर धन खर्च करने से पहले यही चाहता है कि जिस वस्त्र को वह खरीदे वह उत्तम किस्म का और ठीक मूल्य का हो और उपभोक्ता की ज़रूरतों के अनुसार होना चाहिए। इसलिए उपभोक्ता को तैयार वस्त्रों को चुनते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

1. वस्त्र की गुणवत्ता (Quality of Garments) – वस्त्र को खरीदने से पहले हमें उसकी गुणवत्ता परख लेनी चाहिए। इसके लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए
(क) कपड़े का तन्तु कैसा है अगर यह तन्तु मिश्रित है, तो कपड़े की मजबूती अधिक होगी।
(ख) कपड़े की बुनाई घनी होनी चाहिए।
(ग) परिधान पर डिज़ाइनिंग के लिए जो भी वस्तु प्रयोग की गई हो वह मुख्य वस्त्र से मिलती होनी चाहिए।
(घ) कपड़ा ऐसा हो जो शरीर पर अच्छी तरह से ड्रेप होता है। अगर यह शरीर के अनुसार ड्रेप होते हैं तो यह देखने में काफ़ी सुन्दर लगते हैं। इससे शरीर की फिटिंग ठीक रहती है।
(ङ) कपड़ा ऐसा हो जिसको ड्राइकलीन की ज़रूरत न हो।
(च) कपड़े पर रगड़ने और धुलाई के साबुन का प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए।
(छ) कपड़े के रेशे सीधी दिशा में होने चाहिएं न कि टेढ़े। इनकी मोटाई एक समान होनी चाहिए।

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2. कारीगरी (Workmanship) – कारीगरी का अर्थ है तैयार वस्त्रों के नाप, कटाई, सिलाई, उलेड़ी, बन्धक, कालर, कफ़ और अलंकरण से है। इनका कैसे प्रयोग किया जाए कि वस्त्र की कार्यशीलता, सुन्दरता, आकर्षकता और टिकाऊपन बना रहे। वस्त्र की कारीगरी अच्छी है तो वस्त्र की कीमत होगी वह गुणात्मक रूप से भी अच्छा होगा। अगर कारीगरी अच्छी नहीं होगी तो ऐसे वस्त्र को पहनकर व्यक्ति को अच्छा नहीं लगेगा। कारीगरी के निम्नलिखित तत्त्व आते हैं –
(i) नमूना (Design) – नमूनों का अर्थ होता है कि विभिन्न रेखाओं के प्रयोग से किसी आकृति को बनाना। यह सजावटी और रचनात्मक हो सकते हैं। अपनी इच्छानुसार व्यक्ति किसी तरह के नमूने का अपनी पोशाक के लिए चयन कर सकता है। आजकल निर्माता उपभोक्ता की मांग पर आकर्षक नमूने वाले वस्त्र बना रहे हैं जिनको देखकर हमारा मन खरीदने के लिए लालायित हो जाता है। नमूना अगर अलग-अलग टुकड़े काट कर बना हआ है तो वह ट्रकडे ठीक लगे हए होने चाहिए, अगर नमूने के टुकड़े में धारियां अथवा चैक हैं तो उनकी लाइनें ठीक मिलनी चाहिए। अगर नमूना छपे हुए कपड़े का है तो छपे हुई नमूने की दिशा एक तरफ जाना चाहिए ऐसा नहीं कि एक रेखा ऊपर की ओर और दूसरी रेखा नीचे की ओर जा रही हो। अगर कपड़ा रोएंदार है तो वस्त्र के रोये एक ही दिशा में होने चाहिए।

(ii) कपड़े की कटाई (Cutting) – कपड़ा सिलने से पहले कपड़े की कटाई ठीक होनी चाहिए। कपड़े की कटाई ठीक होगी, तो कपड़े की सिलाई भी अच्छी होगी। वह वस्त्र व्यक्ति को पहना हुआ भी अच्छा लगेगा। अधिकतर निर्माता कपड़े की कटाई की तरफ विशेष ध्यान नहीं देते। कटाई के बाद सिलाई के दौरान उसमें सुधार नहीं किया जा सकता। उसमें दोष वैसे के वैसे ही रहेंगे। इसलिए कटाई की तरफ विशेष ध्यान देना चाहिए।

कपड़े की कटाई में निम्नलिखित बातों को देखना चाहिए –
(क) अधिकतर जो कपड़ा लम्बाई अथवा सीधे रुख की तरफ काटा गया है उस कपड़े का टिकाऊपन अधिक होता है जो चौड़ाई के रेशों पर काटा गया है। उसका टिकाऊपन कम होता है, हमें यह देखना चाहिए कि परिधान के सब टुकड़ों की लम्बाई कपड़े की लम्बाई वाले रेशों की तरफ और चौड़ाई कपड़े के चौड़ाई वाले रेशों की तरफ कटी हुई होनी चाहिए।

इससे कपड़ों को सिलने के बाद जब पहना जाता है तो अच्छा लगता है और किसी भी तरह का कोई खिंचाव उत्पन्न नहीं होता परन्तु जब कपड़े की लम्बाई को चौड़ाई वाले पर काटा जाता है तो इसमें कपड़े का टिकाऊपन कम होता है। कपडे में खिंचाव अधिक रहता है और कपड़ा थोड़े समय के बाद ही फटना शुरू हो जाता है। इसलिए इस बात का वस्त्र खरीदने से पहले अच्छी तरह परख लेना चाहिए। अगर ग्रेन की दिशा को देखने पर पता नहीं चल रहा तो आप कपड़े को पहनकर इसका परीक्षण कर सकते हैं।

(ख) गले की रेखा पर वास्तविक उरेब पट्टी (True Bias) लगी होनी चाहिए। इससे गले की फिटिंग सही आती है और उसमें ढीलापन नहीं आता।

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(ग) कपड़े को काटते हुए कई बार कपड़े की सिलवटें नहीं निकाली जाती उसको पूरी तरह समतल करके कपड़ा नहीं काटा जाता। इससे कई बार कपड़े का मुख्य ग्रेन सही नहीं होता और कपड़े में काण आ जाती है और ऐसे कपड़े को जब पहना जाता है तो वह अलग से लटकना शुरू हो जाता है।

(घ) कपड़े की लम्बाई और चौड़ाई वाले पैटर्न आपस में मिलते होने चाहिए।
(ङ) कपड़े में कोई छिद्र अथवा कट नहीं होना चाहिए इससे कपड़ा जल्दी ही फटना शुरू हो जाता है।

(iii) सिलाई (Seam) – बाज़ारी वस्त्रों की सिलाई का निरीक्षण ध्यानपूर्वक करना चाहिए –

(क) सिलाई दृढ़ होनी चाहिए। सिलाई का बखिया छोटा होना चाहिए कई बार दर्जी शीघ्र सिलाई और अधिक सिलाई करने के कारण बखिया मोटा कर देते हैं जो इतना टिकाऊ नहीं होता और थोड़े ही समय के बाद उधड़ने शुरू हो जाते हैं। ऐसे वस्त्रों की मरम्मत बहुत जल्दी करनी पड़ती है लम्बाई कपड़े की मोटाई के अनुसार होनी चाहिए परन्तु लम्बाई एक जैसी होनी चाहिए।
(ख) सिलाई यहां खत्म होती है वहां पर लटकते हुए धागे या तो बंधे हुए होने चाहिए या कटे हुए होने चाहिए।
(ग) कपड़ों की सिलाई में दबाव पर्याप्त होना चाहिए। अधिकतर रेडीमेड वस्त्रों में दबाव बहुत कम रखा जाता है।
(ङ) जिस स्थान पर कपड़े के दो टुकड़ों को जोड़ा जाता है वहां पर सिलाई अधिक मज़बूत होनी चाहिए।
(च) साधारण सिलाई के किनारों पर या तो कटाव होने चाहिए या इन्टरलोकिंग होनी चाहिए।
(छ) सिलाई सपाट होनी चाहिए विशेषकर बच्चों के लिए बच्चों की त्वचा कोमल होती है।
(ज) अगर कपड़े के नीचे लाइनिंग लगी है तो लाइनिंग की सिलाई देखना भी ज़रूरी है लाइनिंग का हर हिस्सा कपड़े से जुड़ा हुआ होना चाहिए।

(iv) उलेडी (Hem) – जब वस्त्र तैयार हो जाता है तो कई स्थानों पर उलेडी करनी पड़ती है जैसे घेरे पर, गले की रेखा पर और बाजू की मोहरी पर जिससे वस्त्र के निकले हुए धागों को अन्दर की तरफ मोड़कर सफाई से कस दिया जाता है। अगर उलेडी न की हो तो वस्त्र के धागे वहां से निकलते रहेंगे वस्त्र देखने में अच्छा नहीं लगेगा। इसलिए तुरपन बहुत जरूरी हो जाती है। तुरपन में हमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

(क) उलेड़ी अधिक मोटी नहीं होनी चाहिए इसके टांके पास-पास और समान दूरी के होने चाहिए।
(ख) उलेड़ी की चौड़ाई वस्त्र के नमूने के अनुसार होनी चाहिए।
(ग) उलेड़ी में धागा कहीं अटका हुआ नहीं होना चाहिए क्योंकि अगर कहीं धागा अटक जाता है तो तुरपन खींचकर सारी उधड़ सकती है।
(घ) उलेड़ी जिस स्थान पर खत्म होती है वहां से पक्की तरह बन्द हुई होनी चाहिए।
(ङ) उलेड़ी के धागे का रंग कपड़े के धागे के रंग के साथ मिलना चाहिए क्योंकि उलेड़ी के धागे का रंग सीधी तरफ भी दिखाई देता हैं। धागा अच्छी किस्म का होना चाहिए और उसका रंग अच्छा होना चाहिए कई बार धागे का रंग पक्का नहीं होता तो जिस स्थान पर तुरपन हुई होती है उस स्थान पर रंग उतरना शुरू हो जाता है जिससे कपड़ा देखने में भद्दा लगता है।
(च) उलेडी का कपड़ा इतना मुड़ा हुआ होना चाहिए कि अगर हम किसी स्थान पर लम्बाई बढ़ाने के इच्छुक हैं तो उलेड़ी को खोलकर कपड़े की लम्बाई बढ़ा सकें।

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(v) बन्धक (Fasteners) – बन्धक की सहायता से हम किसी परिधान को उतार सकते हैं। उसे पहन सकते हैं इसके लिए हुक-आई, बटन काज और जिप का प्रयोग किया जाता है। अगर ये ठीक से लगे हों तो वस्त्र की फाल अच्छी आती है, वस्त्र पहना हुआ अच्छा लगता है। वस्त्र की फिटिंग ठीक आती है अगर ये ठीक न लगे हों तो वस्त्र की दिखावट बिगड़ सकती है। इसलिए वस्त्र चुनते हुए इनका विशेष ध्यान रखना चाहिए इसके लिए निम्नलिखित बातों की तरफ ध्यान देना चाहिए –

(क) बटन और हुक की पट्टी वस्त्र के अनुसार लगी हुई होनी चाहिए। इसकी लम्बाई और चौड़ाई व्यक्ति की ज़रूरत अनुसार होनी चाहिए इसको लगाने के लिए अलग कपड़े की ज़रूरत होती है और कई बार कपड़ा बचाने के चक्कर में पट्टी बहुत छोटी लगाते हैं। इससे कपड़े की फिटिंग ठीक नहीं आती और वस्त्र पहनने में कठिनाई होती है। यह पट्टी इतने आकार की होनी चाहिए कि कपड़े को आसानी से पहना और उतारा जा सके। अगर यह पट्टी सीधे रूप में और सफ़ाई से लगी होगी, तो वस्त्र आकर्षक लगेगा इस पट्टी पर बटन अथवा हुक एक जैसी दूरी पर लगे होने चाहिए। इनका टांका पक्का होना चाहिए। बटन और हुक अच्छी किस्म की होनी चाहिए। कई बार घटिया किस्म के होने के कारण जल्दी टूट जाती है। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि बटन ऐसे तो नहीं लगे जिनको धोते समय अलग करना पड़े तो हमें ऐसा वस्त्र नहीं खरीदना चाहिए।

(ख) काज की पट्टी सीधी होनी चाहिए और ऐसे हो कि अधिक दिखाई न दें।
(ग) काज के टांके कसे हुए होने चाहिएं ढीले नहीं होने चाहिएं। काज को बनाने के बाद कोई भी धागा नज़र नहीं आना चाहिए काज का कटा भाग धागे से अच्छी तरह टका होना चाहिए।
(घ) हुक और आँख भी सफ़ाई से लगी होने चाहिए। जिप भी अच्छी किस्म की लगी होनी चहिए। इसको खोलकर और बन्द करके देख लेना चाहिए कि इसका कार्य ठीक है।

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(vi) कालर, कफ, जेब (Collar, Cuff & Pocket) यदि वस्त्र पर कालर कफ, पाकेट, इत्यादि लगे हों तो उनको भी ध्यान से देख लेना चाहिए इसमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

(क) कालर, कफ का कपड़ा वस्त्र के कपड़े से मिलना चाहिए इनकी दोनों साइड में एक जैसा कपड़ा इस्तेमाल होना चाहिए।
(ख) कालर और कफ की फिटिंग ठीक से होनी चाहिए इन पर झोल नहीं होना चाहिए।
(ग) कालर और कफ मुख्य डिज़ाइन के अनुसार ही बने हुए होने चाहिएं।
(घ) कालर की सिलाई के दबाव को पीछे की तरफ कटिंग कर देनी चाहिए ताकि कालर में झोल न पड़े।
(ङ) जेब बिल्कुल ठीक दिशा में लगी होनी चाहिए इसका कपड़ा मुख्य कपड़े जैसा होना चाहिए। इस पर डबल सिलाई होनी चाहिए जेब पर की गई उलेड़ी ऐसी हो जो सीधी तरफ से दिखाई न दे पाकेट का आकार वस्त्र के अनुसार होना चाहिए इतना आकार होना चाहिए कि उसमें हाथ डालते हुए अटके नहीं।
(च) कफ की सिलाई भी ठीक होनी चाहिए आसानी से उधड़ने वाली नहीं होनी चाहिए।

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(vii) पलीटस, डार्टस और चुन्नटें (Pleats, Darts & Gathers) – का मुख्य कार्य शरीर के झुकावों और मोड़ों के अनुसार कपड़े में फिटिंग को उत्पन्न करना। चुन्नटों के द्वारा कपड़े में लचीलापन पैदा किया जाता यह कपड़े को आकर्षक बना देती है। इससे कपड़े का आकार सुविधाजनक रहता है इसमें निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

(क) डार्ट और पलीट ऐसे हों जो शरीर की रूपरेखा के साथ मेल खाते हैं। ये कोणों पर कम चौड़ाई के होने चाहिए।
(ख) डार्ट और पलीटस बनाने के बाद समतल हुए होने चाहिए।
(ग) चुन्नटें एक जैसी होनी चाहिएं। इनके बीच में अगर कपड़ा अधिक लिया जाता है तो यह अच्छी लगती है इनका प्रभाव अच्छा आता है इनको बनाने के बाद अच्छी तरह से प्रेस करना चाहिए।
(घ) चुन्नटों के लिए प्रयोग किया गया धागा मज़बूत होना चाहिए और जब चुन्नटों को खींचा जाए तो टूटना नहीं चाहिए।

(viii) अलंकरण (Trimming) – कपड़े को आकर्षक और सुन्दर बनाने के लिए उन पर अलंकरण का प्रयोग किया जाता है। अलंकरण में लेस, पाइपिंग, झालर, फ्रिल और कढाई आता है अलंकरण के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

(क) अलंकरण की बनावट वस्त्र जैसी होनी चाहिए। अगर वस्त्र की बनावट चमकीली है तो अलंकरण की बनावट भी चमकीली होनी चाहिए।
(ख) अलंकरण का रंग अच्छी किस्म का और पक्का होना चाहिए।
(ग) जो परिधान धोए जाते हैं उन पर ऐसे अलंकरण नहीं लगाने चाहिए जिनको हम धो नहीं सकते।
(घ) बैल्ट अगर कपड़े के साथ लगी है तो अच्छी तरह लगी होनी चाहिए।

3. रंग (Colour) – वस्त्र का चुनाव करते हुए इनमें रंग का भी ध्यान रखना चाहिए। रंग पोशाक के चुनाव में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है रंग के द्वारा ही पहना हुआ वस्त्र अच्छा, सुन्दर आकर्षक और लुभावना लगता है। वस्त्रों में रंग का चुनाव करते हुए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

(क) परिधान में जितने भी टुकड़े प्रयोग किए गए हैं उनका रंग पक्का होना चाहिए। रंग उतरना नहीं चाहिए जो भी अलंकरण का प्रयोग किया गया हो उनका भी रंग पक्का होना चाहिए।
(ख) रंग मौसम के अनुसार हो, ठण्डे और हल्के रंग गर्म मौसम में पहनने चाहिएं।
(ग) वस्त्र का रंग पहनने वाले व्यक्ति के शरीर में अच्छा लगना चाहिए।
(घ) वस्त्र खरीदने से पहले हमें देख लेना चाहिए कि किन-किन रंगों का वस्त्र हम खरीदना चाहते हैं यह रंग एक-दूसरे से मिलते-जुलते होने चाहिएं। विशेषकर एक ही पोशाक के वस्त्रों के रंग।
(ङ) हमें अपनी, फब्बत देखनी चाहिए। जो रंग हमें जंचता हो जिसमें हम सुन्दर लगते हैं, हमें वही रंग चुनना चाहिए।
(छ) जैसे-जैसे व्यक्ति की उम्र बढ़ती है हल्के रंगों का प्रयोग अधिक करना चाहिए।
(ज) हमें सफेद रंग का प्रयोग गहरे रंगों के वस्त्रों के साथ करना चाहिए।
(झ) पोशाक के बड़े क्षेत्र में हल्का रंग अधिक होना चाहिएं और बाकी में हम गहरा रंग प्रयोग कर सकते हैं।

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4. लेबल (Label) – खरीदने से पहले उसका लेबल ध्यानपूर्वक देखना चाहिए और उसके ऊपर दी गई पूरी जानकारी का विश्लेषण करना चाहिए एक वस्त्र सम्बन्धी अच्छे लेबल पर प्रायः निम्नलिखित तरह की जानकारी होती है –

(क) वस्त्र किस रेशे का बना हुआ है अर्थात् इसमें कितने प्रतिशत सूत कितने प्रतिशत टैरीलिन कितने प्रतिशत पोलिएस्टर अर्थात् मिश्रित तन्तु के वस्त्र में विभिन्न रेशों का प्रतिशत बताया जाता है।
(ख) वस्त्र किस तरह का कार्य करेगा तुम्हारे लिए कैसे सहायक हैं।
(ग) वस्त्र का किस तरह प्रयोग करना है।
(घ) इसको कैसे धोना है, हाथ के साथ अथवा मशीन के साथ।
(ङ) क्या यह धोने के बाद सिकुड़ेगा या नहीं अर्थात् इसको preshrink किया गया है।
(च) इसका रंग पक्का है अथवा उतरने वाला है।
(छ) माप बड़ा छोटा अथवा बीच का है।
(ज) निर्माता अथवा वितरक का नाम होना चाहिए, अच्छे लेबल में सूचना स्पष्ट और सीधी होनी चाहिए। समझी जाने वाली भाषा में होनी चाहिए ताकि हर व्यक्ति इस पर दी गई जानकारी को पढ सके परन्तु अधिकतर निर्माता लेबल पर पर्याप्त निर्देश नहीं देते हैं जिसे उपभोक्ता को कोई लाभ नहीं मिलता और न ही उसका मार्ग दर्शन होता है।

5. फैशन (Fashion) – जो भी परिधान हम खरीद रहे हों प्रचलित फैशन का होना चाहिए। वस्त्रों में फैशन के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

(क) परिधान का स्टाइल हमारे विचारों के अनुसार होना चाहिए।
(ख) परिधान की सुन्दरता नमूना, लम्बाई और चौड़ाई हमारे शरीर पर अच्छी लगनी चाहिए।
(ग) हमें उसी फैशन को अपनाना चाहिए जो हमारे शरीर के लिए आरामदायक हो।
(घ) जो फैशन हमारे शरीर में कोई विकार उत्पन्न करे उस फैशन का हमें बिना सोचे समझे नकल नहीं करनी चाहिए।
(ङ) हमें अपने वस्त्रों के लिए फैशन का चुनाव खुद करना चाहिए। हमें विक्रेता की बातों में नहीं आना चाहिए।

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6. लटकाव और माप (Drape and Size) – बाज़ारी बस्त्र खरीदते समय लटकाव का भी ध्यान रखना चाहिए। ड्रेप हम वस्त्र को देखकर तह नहीं कर सकते हैं इसका अंदाजा तभी लग सकता है जब हम इसको पहनकर देखें हमें इसको पहनकर (Trial) लेना चाहिए और शीशे में देखना चाहिए कि वह हमारे शरीर पर कैसे जचता है और कैसे दिखाई देता है। सामान्य रूप में दुकानदार वस्त्र को इतना आकर्षक बना देते हैं कि उपभोक्ता उस वस्त्र का परीक्षण किए बिना ही उसे खरीद लेते हैं। वस्त्रों को जब खरीदने से पहले हम उनकी ड्रेप का निरीक्षण करते हैं उसके साथ ही हमें माप का भी ध्यान रखना चाहिए।

कई बार कमीज़-सलवार में कमीज़ तो सही बनाते हैं परन्तु सलवार का घेर छोटा बनाते हैं जिससे सल्वार का घेरा पहनने से फटना शुरू हो जाता है। इसी तरह पायजामा में भी अधिक दबाव नहीं दिया जाता है। अलग-अलग बाज़ारी तैयार वस्त्रों में अलग-अलग माप दिया जाता है जैसे पुरुषों की पैंट का माप कमर के माप से मापा जाता है, और उनकी शर्ट का माप छाती के माप से जैसे 44”, 42” 40” दिया जाता है महिलाओं के वस्त्र फ्री आकार में आते हैं जैसे XL Extra large, L (Large) M (Medium) S (Small) परन्तु बाज़ारी वस्त्र खरीदने से पहले पहनकर अवश्य देख लें कि उनका माप, आपके शरीर पर सही बैठता है कि नहीं अगर माप में कुछ अन्तर है तो उसमें सुधार करवाया जा सकता है।

7. आकर्षकता (Attractiveness) – वस्त्र चाहे कैसा भी हो यह सुन्दर और आकर्षक होना चाहिए जो पहनने वाले पर जंचना चाहिए क्योंकि सभी तरह के डिजाइन और रंग हर व्यक्ति के शरीर पर नहीं जचते। सुन्दरता निम्नलिखित तत्त्वों से बनती है –

(क) वस्त्र का प्रकार (Type of Cloth) – वस्त्र की बनावट वस्त्र की सुन्दरता को प्रभावित करती है। वस्त्र नरम अथवा सख्त बनावट का हो सकता है। वस्त्र की बुनाई ठीक होनी चाहिए। यह इतनी ढीली नहीं होनी चाहिए नहीं तो वस्त्र जल्दी फट जाएगा। वस्त्र पर परिसज्जा ठीक होनी चाहिए।

(ख) डिज़ाइन और स्टाइल (Design and Style) – वस्त्रों के कई डिजाइन और स्टाइल बनाए जाते हैं। परन्तु सभी को यह फबते नहीं हैं। भारी डिजाइन के वस्त्र, भारी व्यक्ति पर अच्छे नहीं लगते। कपडे पर समतल रेखाएं व्यक्ति को छोटा बना देती हैं और लम्बी रेखाएं लम्बा बना देती हैं। भारी साड़ी जिसका चौड़ा बार्डर है, लम्बी और पतली स्त्री पर अच्छी लगती है।

(ग) अनुरूपता (Harmony) – कपड़े की सुन्दरता में अनुरूपता का बहुत हाथ है। जैसे सिल्क सलवार सिलक की कमीज़ के साथ अच्छी लगती है। इस तरह रंग भी एक दूसरे के अनुरूप होने चाहिएं।

8. मूल्य (Cost) – परिधान हमें अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही खरीदना चाहिए। हमें पहले से ही पता होना चाहिए कि हमने किस रेंज में किस वस्त्र को खरीदना है तो इससे हमारा भी समय बचता है और दुकानदार का भी समय बचता है परन्तु इसे इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि अगर वस्त्र गुणात्मक रूप में अच्छा है और कीमत थोड़ी सी अधिक है तो हमें तभी खरीदना चाहिए।

9. सविधाजनक (Comfortability) – जो भी परिधान हम खरीदें वे आरामदायक होने चाहिएं। इसके पहनने से हमारी शारीरिक क्रियाशीलता में कमी नहीं आनी चाहिए। कई बार कपड़ा आड़ा कटा होता है जो कि पहनने पर फट जाता है इसलिए कपड़ों को पहन कर चल फिर कर देख लेना चाहिए अगर कहीं से दबाव कम हो तो उसको भी देख लेना चाहिए।

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प्रश्न 4.
कपड़ों की सुन्दरता को प्रभावित करने वाले कारक बताएं।
उत्तर :
कपड़ों की सुन्दरता को प्रभावित करने वाले कारक हैं – रंग, डिज़ाइन, अलं करण, वस्त्र का प्रकार, अनुरूपता आदि।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) निम्न का उत्तर एक-शब्द में दें

प्रश्न 1.
अच्छी कारीगरी का एक गुण बताएं।
उत्तर :
कटाई।

प्रश्न 2.
दर्जी से वस्त्र सिलवाने की एक हानि बताओ।
उत्तर :
समय नष्ट होता है।

प्रश्न 3.
रेडीमेड कपड़ा खरीदने का एक लाभ बताओ।
उत्तर :
समय की बचत।

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(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. रेडीमेड वस्त्र खरीदने से ……….. की बचत होती है।
2. ……….. का अर्थ है विभिन्न रेखाओं के प्रयोग से किसी आकृति को बनाना।
3. ……….. लेबल रेडीमेड कपड़ों पर लगा रहता है।
4. वस्त्र सिलने के लिए प्रयोग धागा ……….. से मिलता हो।
5. परिधान का स्टाईल तथा डिज़ाईन ……….. के अनुसार हो।
उत्तर :
1. समय
2. नमूने
3. देख-रेख
4. वस्त्र
5. आयु।

(ग) ठीक /गलत बताएं

1. बच्चों के वस्त्र सरलता से पहने तथा उतारे जा सकें।
2. दर्जी से वस्त्र सिलाने से फिटिंग अच्छी होती है।
3. सूचना लेबल पर वस्त्र के रेशे की सूचना भी होती है।
4. वस्त्र का रंग कोई भी हो चलेगा।
5. बड़ी आयु में गहरे रंग के वस्त्र पहनने चाहिए।
उत्तर :
1. (✓) 2. (✓) 3. (✓) 4. (✗) 5. (✗)

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
कारीगरी का अर्थ है –
(A) नाप
(B) कटाई
(C) सिलाई
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

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प्रश्न 2.
निम्न में ठीक है –
(A) दर्जी से वस्त्र सिलवाने से कपड़ों की फिटिंग अच्छी होती है
(B) वस्त्रों पर डिजाइन अपनी पंसद का डलवाया जा सकता है
(C) कपड़ों को प्राप्त करने का इन्तजार करना पड़ता है
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 3.
अच्छी कारीगरी है –
(A) धागा
(B) सीन का मिलान
(C) बटन
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

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प्रश्न 4.
कारीगरी का मूल्यांकन करने लिए …………. देखें।
(A) नमूना
(B) कपड़े की कटाई
(C) उलेड़ी
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 5.
निम्न में ठीक नहीं है –
(A) तैयार वस्त्र खरीदने पर भी समय नष्ट होता है
(B) दर्जी से वस्त्र सिलवाने पर समय नष्ट नहीं होता
(C) बड़ी आयु वाले व्यक्ति के लिए हल्के रंग के वस्त्र ठीक रहते हैं
(D) बच्चों के वस्त्र नर्म होने चाहिएं।
उत्तर :
दर्जी से वस्त्र सिलवाने पर समय नष्ट नहीं होता।

प्रश्न 6.
निम्न में ठीक है –
(A) बन्धक की सहायता से हम किसी परिधान को उतार सकते हैं
(B) उलेड़ी की चौड़ाई वस्त्र के नमूने के अनुसार हो।
(C) कालर पर सोल न हो
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 7.
निम्न में गलत है
(A) कपड़े की बुनाई घनी हो।
(B) दर्जी को कपड़े की सिलाई कच्चे धागे से करनी चाहिए।
(C) कपड़ा ऐसा खरीदे जिसे ड्राइक्लीन की आवश्यकता न हो
(D) सभी गलत है।
उत्तर :
दर्जी को कपड़े की सिलाई कच्चे धागे से करनी चाहिए।

प्रश्न 8.
कपड़ों पर लगे सूचना लेबल से हमें …………… जानकारी मिलती है।
(A) वस्त्र के रेशे की
(B) वस्त्र के प्रयोग की
(C) माप की
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

बाज़ारी वस्त्रों की गुणवत्ता परख HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य –

→ रेडीमेड वस्त्रों से समय बचता है।

→ रेडीमेड वस्त्रों से दर्जियों के चक्करों से छुटकारा मिलता है।

→ बाज़ारी वस्त्र खरीदते समय ध्यान दें कि इनकी सिलाई दृढ़ होनी चाहिए।

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→ वस्त्र का चुनाव करते समय रंग का भी ध्यान रखना चाहिए।

→ अधिक आयु वाले व्यक्ति के लिए हल्के रंग के परिधान लें।

→ खरीदने से पहले वस्त्रों पर लेबल को ध्यानपूर्वक देख लें।

→ प्रचलित फैशन का ही परिधान खरीदना चाहिए।

→ वस्त्र अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही खरीदें।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
वस्त्र धोने में प्रयोग किए जाने वाले सामान को कितने भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर :

  1. स्टोर करने के लिए सामान
  2. वस्त्र धोने के लिए सामान
  3. वस्त्र सुखाने के लिए सामान
  4. वस्त्र इस्तरी करने के लिए सामान।

प्रश्न 2.
वस्त्र संग्रह करने के लिए हमें क्या-क्या सामान चाहिए ?
उत्तर :
इसके लिए हमें अलमारी, लांडरी बैग अथवा गन्दे वस्त्र रखने के लिए टोकरी की ज़रूरत होती है। मर्तबान तथा प्लास्टिक के डिब्बे भी आवश्यक होते हैं।

प्रश्न 3.
वस्त्र धोने के लिए हम पानी कहां से प्राप्त करते हैं ?
उत्तर :
वस्त्र धोने के लिए वर्षा का पानी, दरिया का पानी, चश्मे का पानी तथा कु आदि स्रोतों से पानी प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
हल्के और भारी पानी में क्या अन्तर है ? भारी पानी को हल्का कैसे बनाया जा सकता है ?
उत्तर :

हल्का पानीभारी पानी
1. इसमें अशुद्धियां नहीं होती।1. इसमें अशुद्धियां होती हैं।
2. इसमें आसानी से साबुन की झाग बन जाती है।2. इसमें साबुन की झाग नहीं बनती।

भारी पानी को उबालकर तथा चूने के पानी से मिलाकर हल्का बनाया जा सकता है अथवा फिर कास्टिक सोडा अथवा सोडियम बाइकार्बोनेट से प्रक्रिया करके इसको हल्का बनाया जाता है।

प्रश्न 5.
वस्त्र धोने के लिए पानी के अतिरिक्त और क्या-क्या सामान चाहिए ?
उत्तर :
वस्त्र धोने के लिए पानी के अतिरिक्त साबुन, टब, बाल्टियां, चिल्मचियां, मग, रगड़ने वाला ब्रुश तथा फट्टा, पानी गर्म करने वाली देग, वस्त्र धोने वाली मशीन, सक्शन वाशर आदि सामान की ज़रूरत होती है।

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प्रश्न 6.
स्थाई और अस्थाई भारी पानी के दो अन्तर बताएं।
उत्तर :

स्थाई भारी पानीअस्थाई भारी पानी
1. इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के क्लोराइड तथा सल्फेट घुले होते हैं।1. इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण होते हैं।
2. कास्टिक सोडा अथवा सोडियम बाइकार्बोनेट से प्रक्रिया करके छानकर इसको हल्का बनाया जाता है।2. इसको उबालकर तथा चूने के पानी से मिलाकर हल्का बनाया जाता है।

प्रश्न 7.
वस्त्रों की धुलाई में पानी का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
1. पानी को विश्वव्यापी घोलक कहा जाता है। इसलिए वस्त्रों पर लगे दाग 1 मिट्टी आदि पानी में घुल जाते हैं तथा वस्त्र साफ़ हो जाते हैं।
2. पानी वस्त्र को गीला करके अन्दर तक चला जाता है तथा उसको साफ़ कर देता हैं।

प्रश्न 8.
ऊनी कपड़ों को ज्यादा समय क्यों नहीं भिगोना चाहिए ?
अथवा
ऊनी वस्त्रों को जल में अधिक देर तक क्यों नहीं भिगो कर रखना चाहिए?
उत्तर :
ऊन का तन्तु बहुत नर्म और मुलायम होता है। इसके ऊपर छोटी-छोटी तहें होती हैं जो कि पानी, गर्मी और क्षार से नर्म हो जाती हैं और एक दूसरे से उलझ जाती ‘सलिए इन्हें ज्यादा देर तक नहीं भिगोना चाहिए।

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प्रश्न 9.
गर्म कपड़े धोते समय गर्म तथा ठण्डा पानी क्यों नहीं डालना चाहिए ?
उत्तर :
क्योंकि इसके तन्तु आपस में जुड़ जाते हैं।

प्रश्न 10.
सूती कपड़े को धोने के लिए कुछ देर तक साबुन के पानी में भिगोकर रखने से क्या लाभ होता है ?
उत्तर :
वस्त्रों पर लगा हुआ घुलनशील मैल पानी में घुल जाता है तथा अन्य गन्दगी, धब्बे इन्हें आदि छूट जाते हैं।

प्रश्न 11.
वस्त्र धोने से पूर्व उसकी मरम्मत करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
वरन् उसके और अधिक फटने या उधड़ने का भय रहता है।

प्रश्न 12.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई कठिन क्यों होती है ?
उत्तर :
क्योंकि रेयॉन के वस्त्र पानी के सम्पर्क से निर्बल पड़ जाते हैं।

प्रश्न 13.
रेयॉन के वस्त्रों के लिए किस प्रकार की धुलाई अच्छी रहती है ?
उत्तर :
शुष्क धुलाई (ड्राइक्लीनिंग)।

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प्रश्न 14.
रेयॉन के वस्त्रों पर अम्ल तथा क्षार का क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
शक्तिशाली अम्ल तथा क्षार दोनों से ही रेयॉन के वस्त्रों को हानि होती है।

प्रश्न 15.
रेयॉन के वस्त्रों को धोते समय क्या बातें वर्जित हैं ?
उत्तर :
वस्त्रों को पानी में फुलाना, ताप, शक्तिशाली रसायनों तथा एल्कोहल का प्रयोग करना वर्जित है।

प्रश्न 16.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई के लिए कौन-सी विधि उपयुक्त होती है ?
उत्तर :
गँधने और निपीड़न की विधि।

प्रश्न 17.
रेयॉन के वस्त्रों को कहां सुखाना चाहिए ?
उत्तर :
छायादार स्थान पर तथा बिना लटकाए हुए चौरस स्थान पर।

प्रश्न 18.
रेयॉन के वस्त्रों पर इस्तरी किस प्रकार करनी चाहिए ?
उत्तर :
कम गर्म इस्तरी वस्त्र के उल्टी तरफ से करनी चाहिए। इस्तरी करते समय वस्त्र में हल्की सी नमी होनी चाहिए।

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प्रश्न 19.
ऊन का तन्तु कैसा होता है ?
उत्तर :
काफ़ी कोमल, मुलायम और प्राणिजन्य।

प्रश्न 20.
ऊन का तन्तु आपस में किन कारणों से जुड़ जाता है ?
उत्तर :
नमी, क्षार, दबाव तथा गर्मी के कारण।

प्रश्न 21.
ऊन के तन्तुओं की सतह कैसी होती है ?
उत्तर :
खुरदरी।

प्रश्न 22.
ऊन के रेशों की सतह खुरदरी क्यों होती है ?
उत्तर :
क्योंकि ऊन की सतह पर परस्पर व्यापी शल्क होते हैं।

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प्रश्न 23.
ऊनी कपड़ों को लटकाना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर :
ऊन बहुत पानी चूसती है और भारी हो जाती है, इसलिए अगर कपड़े लटकाकर सुखाया जाए तो वह नीचे लटक जाता है और आकार खराब हो जाता है।

प्रश्न 24.
ऊन के रेशों की सतह के शल्कों की प्रकृति कैसी होती है ?
उत्तर :
लसलसी, जिससे शल्क जब पानी के सम्पर्क में आते हैं तो फूलकर नर्म हो जाते हैं।

प्रश्न 25.
ऊन के रेशों के शत्रु क्या हैं ?
उत्तर :
नमी, ताप और क्षार।

प्रश्न 26.
ताप के अनिश्चित परिवर्तन से रेशों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
रेशों में जमाव व सिकुड़न हो जाती है।

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प्रश्न 27.
ऊन के वस्त्रों को किस प्रकार के साबुन से धोना चाहिए ?
उत्तर :
कोमल प्रकृति के शुद्ध क्षार रहित साबुन से।

प्रश्न 28.
धुलाई से कभी-कभी ऊन क्यों जुड़ जाती है ?
उत्तर :
ऊनी वस्त्र को धोते समय जब उसे पानी या साबुन के घोल में हिलाया-डुलाया जाता है तो ऊन के तन्तुओं के रेशे आपस में एक-दूसरे के ऊपर चढ़ जाते हैं जिसके फलस्वरूप ऊन जुड़ जाती है।

प्रश्न 29.
अधिक क्षार मिले पानी का ऊन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
ऊन सख्त हो जाती है तथा सूखने पर पीली पड़ जाती है।

प्रश्न 30.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई करने के लिए किस प्रकार के जल का प्रयोग करना चाहिए ?
उत्तर :
मृदु जल का।

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प्रश्न 31.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई में कौन-से घोल अधिक प्रचलित हैं ?
उत्तर :
पोटाशियम परमैंगनेट, सोडियम परऑक्साइड तथा हाइड्रोजन परऑक्साइड के हल्के घोल।

प्रश्न 32.
ऊनी कपड़ों को फुलाने की आवश्यकता क्यों नहीं होती ?
उत्तर :
क्योंकि पानी में डुबोने से रेशे निर्बल हो जाते हैं।

प्रश्न 33.
ऊनी वस्त्रों को धोते समय रगडना-कटना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर :
रगड़ने से रेशे नाश हो जाते हैं तथा आपस में फँसते हुए जम जाते हैं।

प्रश्न 34.
वस्त्रों को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ी-सी नील क्यों डाल देनी चाहिए ?
उत्तर :
जिससे कि ऊनी वस्त्रों में सफ़ेदी व चमक बनी रहे।

प्रश्न 35.
ऊनी कपड़ों को धूप में क्यों नहीं सुखाना चाहिए ?
उत्तर :
क्योंकि तेज़ धूप के प्रकाश के ताप से ऊन की रचना बिगड़ जाती है।

प्रश्न 36.
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए तापमान की दृष्टि से किस प्रकार के पानी का प्रयोग किया जाना चाहिए ?
उत्तर :
ऊनी कपड़ों की धुलाई के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करना चाहिए। धोते समय पानी का तापमान कपड़े को भिगोने से लेकर आखिरी बार खंगालने तक एक-सा होना चाहिए।

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प्रश्न 37.
धोने के बाद ऊनी कपड़ों को किस प्रकार सुखाना चाहिए ?
उत्तर :
धोने से पूर्व बनाए गए खाके पर कपड़ों को रखकर उसका आकार ठीक करके तथा छाया में उल्टा करके, समतल स्थान पर सुखाना चाहिए जहां चारों ओर से कपड़े पर हवा लग सके।

प्रश्न 38.
ऊनी कपड़ों पर कीड़ों का असर न हो इसलिए कपड़ों के साथ बक्से या अलमारी में क्या रखा जा सकता है ?
उत्तर :
नैफ्थलीन की गोलियां, पैराडाइक्लोरो बेंजीन का चूरा, तम्बाकू की पत्ती, कपूर, पिसी हुई लौंग, चन्दन का बुरादा, फिटकरी का चूरा या नीम की पत्तियां आदि।

प्रश्न 39.
रेयॉन के वस्त्रों को रगड़ना क्यों नहीं चाहिए ?
उत्तर :
रेयॉन के वस्त्र कमजोर और मुलायम होते हैं। इसलिए गीली अथवा सूखी अवस्था में रगड़ना या मरोड़ना नहीं चाहिए।

प्रश्न 40.
ऊनी वस्त्रों को अधिक देर तक नल में भिगोने से क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
ऊन के तन्तु कमजोर हो जाते हैं।

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प्रश्न 41.
दाग (धब्बे) कितनी किस्म के होते हैं तथा कौन-कौन से ?
उत्तर :
दाग कई प्रकार के होते हैं। दाग को ठीक ढंग से उतारने के लिए दाग की किस्म के बारे में जानकारी होना आवश्यक है। दाग को चार किस्मों में बांटा जा सकता है –

  1. वनस्पति दाग
  2. पाश्विक दाग
  3. चिकनाई के दाग
  4. रासायनिक दाग।

प्रश्न 42.
पाश्विक दाग से आप क्या समझते हैं ? उदाहरण सहित लिखो।
उत्तर :
ये दाग जानवरों या उनके उत्पादन; जैसे-अण्डे, मीट, दूध, खून या फिर पशुओं के मल-मूत्र से लगते हैं। ये दाग प्रोटीन प्रधान होते हैं तथा इनको ठण्डे पानी तथा साबुन से उतारा जा सकता है।

प्रश्न 43.
किसी एक वानस्पतिक धब्बे का नाम व उसे छुड़ाने की विधि लिखें।
अथवा
वानस्पतिक दाग से आप क्या समझते हैं ? उदाहरण दो।
उत्तर :
ये दाग वानस्पतिक चीज़ों से लगते हैं; जैसे-फूल, फलों का रस, सब्जी, घास, चाय, कॉफी आदि। इनको लवणयुक्त रासायनिक पदार्थों से उतारा जा सकता है।

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प्रश्न 44.
रासायनिक दाग कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
ये दाग रासायनिक पदार्थों से लगते हैं; जैसे कि स्याही, रंग, दवाइयां, नेल पालिश आदि। इनको रंगकाट या दूसरे रासायनिक पदार्थों से उतारा जा सकता है।

प्रश्न 45.
धब्बे कितने प्रकार के होते हैं ? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दें ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 41 से 44 का उत्तर।

प्रश्न 46.
दाग उतारते समय इस्तेमाल होने वाले काट पदार्थ कितने किस्म के होते हैं ? नाम बताओ।
उत्तर :
साधारणतया दो प्रकार के रंगकाट दाग उतारने के लिए प्रयोग किये जाते हैं –
1. ऑक्सीडाइजिंग रंगकाट (ब्लीच) जैसे प्राकृतिक हवा, धूप, हाइड्रोजन-परऑक्साइड, पोटोशियम, परमैंगनेट, सोडियम परबोरेट।
2. रिड्यूसिंग रंगकाट (ब्लीच) जैसे सोडियम बाइसल्फाइड, सोडियम हाइड्रोसल्फाइड।

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प्रश्न 47.
ऑक्सी कारक विरंजक (ब्लीच) से क्या अभिप्राय है ? दो उदाहरणे दें।
अथवा
ऑक्सी कारक विरंजक क्या होते हैं ?
अथवा
ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच क्या है ? इसके दो उदाहरण दें।
उत्तर :
ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच का प्रयोग जब धब्बे पर किया जाता है तो इनके बीच की ऑक्सीजन दाग के रंग से मिलकर उसको रंग रहित कर देती है जिससे दाग उतर जाता है। पोटाशियम परमैंगनेट, हाइड्रोजन परऑक्साइड इसकी दो किस्में हैं।

प्रश्न 48.
अपचायक ब्लीच से क्या अभिप्राय है ? दो उदाहरणे दो।
उत्तर :
इन ब्लीचों का प्रयोग जब दाग पर किया जाता है तो यह दाग से ऑक्सीजन दूर करके उनको रंग रहित कर देते हैं। यह सोडियम बाइसल्फाइड तथा सोडियम हाइड्रोसल्फाइड हैं। इनको ऊनी तथा रेशमी कपड़ों पर आसानी से प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 49.
कपड़ों को रंगकाट करने का प्राकृतिक तथा सबसे पुराना ढंग कौन-सा है ?
उत्तर :
खुली हवा तथा धूप कपड़ों को रंगकाट करने का सबसे पुराना तथा प्राकृतिक ढंग है। यह सबसे सस्ता तथा सरल भी है। दाग लगे सूती तथा सिल्क के कपड़े को धोकर धूप में सुखाया जाता है। हवा तथा धूप से दाग उड़ जाते हैं।

प्रश्न 50.
लाल दवाई क्या है तथा किस काम आती है ?
उत्तर :
लाल दवाई या पोटाशियम परमैंगनेट, बिना किसी खतरे के प्रयोग किया जाने वाला रंगकाट है। इससे दाग उतारते समय इसका अपना लाल भूरा रंग कपड़े पर रह जाता है जिसको सोडियम हाइड्रोसल्फाइड वाले पानी में डुबोकर साफ़ किया जाता है। लाल दवाई से पसीने, फफूंदी के दागों को दूर किया जा सकता है।

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प्रश्न 51.
पोटाशियम परमैंगनेट से दाग उतारते समय जो भूरा रंग रह जाता है उनको किस रसायन द्वारा उतारा जाता है ?
उत्तर :
इससे दाग उतारते समय रह गये लाल भूरे रंग को सोडियम हाइड्रोसल्फाइड तथा फिर हाइड्रोजन परऑक्साइड में डुबोकर साफ़ किया जाता है।

प्रश्न 52.
क्षारीय माध्यम वाले दो रसायनों के नाम लिखो जो कि कपड़ों से दाग उतारने के लिए प्रयोग किये जाते हैं ?
उत्तर :
क्षारीय माध्यम को बनाने के लिए कास्टिक सोडा, बोरैक्स तथा अमोनिया का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 53.
तेज़ाबी माध्यम वाले दो रसायनों के नाम लिखो जो कपड़ों के दाग उतारने के लिये प्रयोग किए जाते हैं।
उत्तर :
तेजाबी माध्यम वाले रसायन पदार्थ-(1) आगजैलिक एसिड तथा (2) एसिटिक एसिड हैं।

प्रश्न 54.
घी से किस प्रकार का दाग लगेगा ? इसे कैसे दूर किया जा सकता है ?
उत्तर :
इस किस्म के दागों को चिकनाई दाग कहा जाता है। इस प्रकार के दाग हल्के तेज़ाबी घोलों में भिगोकर दूर किये जाते हैं तथा बाद में कपड़े में रहे तेज़ाब को हल्के क्षारीय घोल से दूर किया जाता है। घी के दाग को पेट्रोल से भी उतारा जा सकता है।

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प्रश्न 55.
दाग उतारते समय कपड़े की पहचान करनी क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर :
दाग उतारते समय कपड़े की पहचान करनी इसलिए आवश्यक है कि दाग उतारने वाले रासायनिक पदार्थ प्रत्येक किस्म के कपड़ों पर नहीं प्रयोग किये जा सकते। यदि कोई रासायनिक पदार्थ कुछ कपड़ों के लिए ठीक हैं, तो वह दूसरी किस्म के रेशों के लिये हानिकारक भी हो सकता है। इसलिये दाग उतारते समय कपड़े की किस्म की जानकारी आवश्यक है।

प्रश्न 56.
दाग उतारते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
अथवा
कपड़ों पर लगे दाग धब्बे उतारते समय ध्यान रखने योग्य किन्हीं दो बातों का उल्लेख करें।
उत्तर :
दाग उतारते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. दाग की पहचान-यह सबसे पहला कदम है क्योंकि विभिन्न किस्म के दाग विभिन्न वस्तुओं से उतरते हैं।
  2. दाग लगने का समय-दाग कितना पुराना है, इस बात का पता होना चाहिए।
  3. कपड़े की पहचान- इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि जिस कपड़े पर दाग पड़ा हो वह किस किस्म के रेशे से बना हुआ है।
  4. कपड़े का रंग-दाग उतारते समय कपड़े के रंग का भी ध्यान रखना चाहिए क्योंकि रंगदार कपड़े पर लगे दाग को उतारते समय कपड़े के रंग भी खराब हो जाते हैं।

प्रश्न 57.
जैवले पानी किस किस्म का ब्लीच है तथा इसको किस प्रकार के कपड़ों के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए ?
उत्तर :
सोडियम हाइपोक्लोराइड को जैवले पानी कहा जाता है। यह एक शक्तिशाली रंगकाट है। इसको हल्का करके इस्तेमाल किया जाता है। ब्लीच करने की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए सिरका भी मिलाया जा सकता है। इस रंगकाट को ज्यादा देर तक कपड़ों के सम्पर्क में नहीं रखना चाहिए। जैवले पानी को सिल्क तथा ऊनी कपड़ों के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।

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प्रश्न 58.
हाइड्रोजन परऑक्साइड किस किस्म का ब्लीच है ? किस रसायन से इसकी क्रिया तीव्र की जा सकती है ?
उत्तर :
अधिकतर कपड़ों के लिये यह सुरक्षित तथा प्रभावशील ब्लीच है। आवश्यकता अनुसार इसको हल्का या गाढ़ा घोल बनाकर प्रयोग किया जा सकता है। इसकी क्रिया तेज़ करने तथा प्रभावशील बनाने के लिए इसमें अमोनिया या सोडियम परबोरेट थोड़ी मात्रा में मिलाया जा सकता है। सूती तथा लिनन के कपड़ों के लिये सीधा गाढ़ा घोल प्रयोग किया जा सकता है। अन्य कपड़ों के लिए 1 : 6 भाग पानी डालकर हल्का घोल बनाकर प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 59.
ऊनी तथा रेशमी कपड़ों के दाग ब्लीच करने के लिये ऑक्सीकारक ब्लीच ठीक रहते हैं या अपचायक ब्लीच ?
उत्तर :
ऊनी तथा सिल्क के कपड़ों के लिये रिड्यूसिंग ब्लीच का प्रयोग किया जाता है। सोडियम हाइड्रोसल्फाइड को तो सब किस्म के कपड़ों के लिए प्रयोग किया जा सकता है। पर सिल्क तथा ऊनी कपड़ों के लिये यह ज्यादा प्रभावशाली है। सोडियम बाइसल्फाइड की प्रक्रिया सल्फर ऑक्साइड गैस के कारण होती है। इसलिए रंगकाट करने के उपरान्त कपड़े को अच्छी तरह साफ़ पानी से धोना चाहिए अन्यथा हवा की नमी से सल्फ्यूरिक अम्ल बन जाएगा जो कपड़ों को खराब कर देता है।

प्रश्न 60.
ऊनी कपड़ों के दाग ब्लीच करने के लिए कौन-सा ब्लीच प्रयोग करना चाहिए तथा क्यों ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 59 का उत्तर।

प्रश्न 61.
सोडियम बाइसल्फाइड की रंगकाट करने की प्रक्रिया किस कारण होती है ? अच्छी प्रकार न खंगालने पर कपड़े को नुकसान क्यों पहुंचता है ?
उत्तर :
सोडियम बाइसल्फाइड की रंगकाट प्रक्रिया सल्फर डाइऑक्साइड से होती है। इसलिए रंगकाट करने के उपरान्त कपड़े को अच्छी तरह साफ़ पानी से खंगालना चाहिए अन्यथा हवा की नमी से सल्फ्यूरिक अम्ल बनकर कपड़ों को खराब कर सकता है। इस रंगकाट से बार-बार कपड़े धोने से पीले कपड़े भी सफेद हो जाते हैं।

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प्रश्न 62.
सूती कपड़े से चाय के दाग कैसे उतारोगे ?
उत्तर :
ताज़े दाग वाले सूती कपड़े पर कुछ ऊंचाई से उबलते पानी से चाय का ताज़ा दाग उतारा जा सकता है। परन्तु पुराने हुए दाग वाले कपड़े को सोडे या बौरेक्स मिले उबलते पानी में कुछ देर पड़े रहने के पश्चात् उस पर ग्लैसरीन लगाकर गुनगुने बोरैक्स या हल्के अमोनिया के घोल में कुछ देर रखें यदि फिर भी दाग रह जाए तो हाइड्रोजन परऑक्साइड से रंगकाट करें।

प्रश्न 63.
सूती कपड़े से खून का दाग कैसे उतारोगे ?
उत्तर :
सती कपडे से खन का ताज़ा दाग ठण्डे पानी से भिगो कर अमोनिया से धोकर उतारा जा सकता है। खून का सूखा दाग ठण्डे नमक वाले पानी में कुछ देर भिगो कर तथा फिर कपड़े को साबुन से धोकर उतारा जा सकता है।

प्रश्न 64.
नीली तथा काली स्याही का दाग कैसे उतारा जाता है ?
उत्तर :
विभिन्न किस्म की स्याहियों के दागों को विभिन्न चीजों से उतारा जाता है। नीली तथा काली स्याही में लोहे तथा रंगों का मिश्रण होता है। लोहे के दाग को काटने के लिए तेज़ाब तथा रंग उतारने के लिए रंगकाट की आवश्यकता पड़ती है। सबसे पहले पानी से पके हुए दाग को फीका करें। फिर लोहे के दाग को उतारने के लिए दही या नींबू में दाग वाले भाग को कुछ घण्टे पड़ा रहने दें। बाद में धोकर सूती कपड़े पर पोटाशियम परमैंगनेट का घोल लगाएं। सोडियम हाइड्रोसल्फाइड के घोल से भी स्याही के दाग हटाए जा सकते हैं।

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प्रश्न 65.
वस्त्र सुखाने के लिए क्या-क्या सामान चाहिए ? महानगरों और फ्लैटों में रहने वाले लोग वस्त्र कैसे सुखाते हैं ?
उत्तर :
वस्त्रों को सुखाने के लिए प्राकृतिक धूप तथा हवा की ज़रूरत होती है। परन्तु अन्य सामान जिसकी ज़रूरत होती है, वह है –

  1. रस्सी अथवा तार
  2. किल्प तथा हैंगर
  3. वस्त्र सुखाने वाला रैक
  4. वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट।

बड़े शहरों में फ्लैटों में रहने वाले लोग कपड़ों को सुखाने के लिए रैकों का प्रयोग करते हैं। ऑटोमैटिक वाशिंग मशीन की सहायता भी ली जा सकती है।

प्रश्न 66.
वस्त्र सुखाने के लिए क्या-क्या सामान चाहिए ? हमारे देश में वस्त्र सुखाने के लिए कौन-सा ढंग अपनाया जाता है ?
उत्तर :
वस्त्र धोने के लिए सामान-देखें प्रश्न 63 का उत्तर।

हमारे देश में साधारणतः घर खुले से होते हैं। छतों अथवा चौबारों पर जहां धूप आती हो रस्सियां अथवा तारों को ठीक ऊंचाई पर बांधकर इन पर वस्त्र सुखाने के लिए लटकाये जाते हैं। बड़े शहरों में जहां घर खुले नहीं होते तथा लोग फ्लैटों में रहते हैं, वस्त्रों को रैकों पर सुखाया जाता है। आजकल वाशिंग मशीनों का प्रयोग तो हर कहीं होने लगा है। इनके साथ भी वस्त्र सुखाये जा सकते हैं।

प्रश्न 67.
वस्त्रों को इस्त्री करना क्यों ज़रूरी है और कौन-कौन से सामान की आवश्यकता पड़ती है ?
उत्तर :
वस्त्र धोकर जब सुखाये जाते हैं, इनमें कई सिलवटें पड़ जाती हैं तथा वस्त्र की दिखावट बुरी सी हो जाती है। कपड़ों को प्रैस करके इनकी सिलवटें आदि तो निकल ही जाती हैं साथ ही वस्त्र में भी चमक आ जाती है तथा वस्त्र साफ़-सुथरा लगता है। वस्त्र प्रैस करने के लिए निम्नलिखित सामान की ज़रूरत पड़ती है बिजली अथवा कोयले से चलने वाली प्रैस, प्रेस करने के लिए फट्टा आदि।

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प्रश्न 68.
वस्त्र धोने के लिए कैसा पानी उपयुक्त नहीं और क्यों ?
उत्तर :
समुद्र के पानी का प्रयोग वस्त्र धोने के लिए नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें बहुत सारी अशुद्धियां मिली होती हैं।

प्रश्न 69.
धोबी को वस्त्र देने से क्या नुकसान हैं ?
उत्तर :

  1. धोबी कई बार वस्त्र साफ़ करने के लिए ऐसी विधियों का प्रयोग करता है जिससे वस्त्र जल्दी फट जाते हैं अथवा फिर कमजोर हो जाते हैं।
  2. कई बार वस्त्रों के रंग खराब हो जाते हैं।
  3. छूत की बीमारियां होने का भी डर रहता है।
  4. धोबी से वस्त्र धुलाना महंगा पड़ता है।

प्रश्न 70.
जल चक्र क्या है ?
उत्तर :
प्राकृतिक रूप में पानी कुओं, चश्मों, दरियाओं तथा समुद्रों में से मिलता है। धरती पर सूर्य की धूप से यह पानी भाप बनकर उड़ जाता है तथा वायुमण्डल में जलवाष्प के रूप में इकट्ठा होता रहता है तथा बादलों का रूप धारण कर लेता है। जब यह भारी हो जाते हैं तो वर्षा, ओलों तथा बर्फ के रूप में पानी दुबारा धरती पर आ जाता है। यह पानी शुरू से दरियाओं द्वारा होता हुआ समुद्र में मिल जाता है तथा यह चक्र इसी तरह चलता रहता है।

प्रश्न 71.
स्वादानुसार पानी का वर्गीकरण कैसे किया गया है ?
उत्तर :
स्वादानुसार पानी दो तरह का होता है –
1. मीठा अथवा हल्का पानी-इस पानी का स्वाद मीठा होता है।
2. खारा पानी-यह पानी स्वाद में नमकीन-सा होता है।

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प्रश्न 72.
पानी का वर्गीकरण अशुद्धियों के अनुसार किस प्रकार किया गया है ?
उत्तर :
अशुद्धियां के अनुसार पानी दो प्रकार का है –
1. हल्का पानी-इसमें अशुद्धियां नहीं होती तथा यह पीने में स्वादिष्ट होता है। इसमें साबुन की झाग भी शीघ्र बनती है।
2. भारी पानी-इसमें कैल्शियम तथा मैग्नीशियम के लवण घुले होते हैं। यह साबुन से मिलकर झाग नहीं बनाता। यह भी दो तरह का होता है अस्थाई भारी पानी तथा स्थाई भारी पानी।

प्रश्न 73.
वस्त्र धोने के लिए थापी अथवा डण्डे का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए ? वस्त्र धोने वाला फट्टा क्या होता है ?
उत्तर :
थापी का अधिक प्रयोग किया जाये तो कई बार वस्त्र फट जाते हैं, वस्त्र धोने वाला फट्टा स्टील अथवा लकड़ी का बना होता है। इस पर रखकर वस्त्रों को साबुन लगाकर रगड़ा जाता है। इस तरह वस्त्र से मैल उतर जाती है।

प्रश्न 74.
आप वस्त्र सुखाने के लिए लोहे के तार का प्रयोग करोगे अथवा नाइलॉन की रस्सी का ?
उत्तर :
वैसे तो दोनों का प्रयोग किया जा सकता है परन्तु लोहे की तार को जंग लग जाता है जिससे वस्त्र पर दाग पड़ जाते हैं। इसलिए नाइलॉन की रस्सी अधिक उपयुक्त रहेगी।

प्रश्न 75.
वस्त्रों की सफाई करने के लिए कौन-कौन से पदार्थों का प्रयोग किया जाता है ? नाम बताओ।
उत्तर :
वस्त्रों की सफाई करने के लिए निम्नलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है –
साबुन, रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ (जैसे-निरमा, रिन, लिसापोल आदि), कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरैक्स, एसिटिक एसिड, ऑग्जैलिक एसिड, ब्लीच, नील, रानीपॉल आदि।

प्रश्न 76.
साबुन बनाने के लिए ज़रूरी पदार्थ कौन-से हैं ?
उत्तर :
साबुन बनाने के लिए चर्बी तथा खार आवश्यक पदार्थ हैं। नारियल, महुए, सरसों, जैतून का तेल, सूअर की चर्बी आदि के चर्बी के रूप में प्रयोग किये जा सकते हैं। जबकि खार कास्टिक सोडा अथवा पोटाश से प्राप्त की जाती है।

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प्रश्न 77.
साबुन बनाने की कौन-कौन सी विधियां हैं ? किसी एक विधि का लाभ बताओ।
उत्तर :
साबुन बनाने की दो विधियां हैं –
1. गर्म तथा
2. ठण्डी विधि।

ठण्डी विधि के लाभ –

1. इसमें मेहनत अधिक नहीं लगती।
2. साबुन भी जल्दी बन जाता है।
3. यह एक सस्ती विधि है।

प्रश्न 78.
वस्त्रों में कड़ापन क्यों लाया जाता है ?
उत्तर :
1. वस्त्रों में ऐंठन लाने से यह मुलायम हो जाते हैं और इनमें चमक आ जाती है।
2. मैल भी वस्त्र के ऊपर ही रह जाती है जिस कारण कपड़े को धोना आसान हो जाता है।
3. वस्त्र में जान पड़ जाती है। देखने में मज़बूत लगता है।

प्रश्न 79.
वस्त्रों से दाग उतारने वाले पदार्थों को मुख्य रूप से कितने भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर :
इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है –
1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच – इससे ऑक्सीजन निकलकर धब्बे को रंग रहित कर देती है। हाइड्रोजन परऑक्साइड, सोडियम परबोरेट आदि ऐसे पदार्थ हैं।
2. रिड्यूसिंग एजेंट – यह पदार्थ धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर उसे रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट तथा सोडियम हाइड्रोसल्फेट ऐसे पदार्थ हैं।

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प्रश्न 80.
साबुन और साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ में क्या अन्तर है ?
उत्तर :

साबुनसाबुन रहित सफाईकारी पदार्थ
1. साबुन प्राकृतिक तेलों; जैसे-नारियल, जैतून, सरसों आदि से बनता है।1. साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ शोधक
2. साबुन का प्रयोग भारी पानी में नहीं किया जा सकता।2. इनका प्रयोग भारी पानी में भी किया जा सकता है।
3. साबुन को जब कपड़ों पर रगड़ा जाता है तो सफ़ेद-सी झाग बनती है।3. इनमें कई बार सफ़ेद झाग नहीं बनती।

प्रश्न 81.
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
वस्त्रों को सफ़ेद करने वाले पदार्थ हैं-नील तथा टीनोपॉल अथवा रानीपॉल। नील-नील दो प्रकार के होते हैं –
1. पानी में घुलनशील तथा
2. पानी में अघुलनशील नील।

इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील पहली प्रकार के नील हैं। ये पानी के नीचे बैठ जाते हैं। इन्हें अच्छी तरह से मलना पड़ता है।
एनीलिन दूसरी तरह के नील हैं। ये पानी में घुल जाते हैं।
टीनोपॉल – यह भी सफ़ेद वस्त्रों को और सफ़ेद तथा चमकदार करने के लिए प्रयोग किया जाता हैं।

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प्रश्न 82.
वस्त्रों को नील क्यों दिया जाता है?
अथवा
कपड़ों की धुलाई में सहायक सामग्री के रूप में नील की उपयोगिता लिखें।
उत्तर :
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों पर बार-बार धोने से पीलापन-सा आ जाता है। इसको दूर करने के लिए वस्त्रों को नील दिया जाता है तथा वस्त्र सी सफ़ेदी बनी रहती है।

प्रश्न 83.
नील देते समय धब्बे क्यों पड़ जाते हैं? यदि धब्बे पड़ जायें तो क्या करना चाहिए?
उत्तर :
अघुलनशील नील के कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं तथा इस तरह वस्त्रों को नील देने से वस्त्रों पर कई बार नील के धब्बे पड़ जाते हैं। जब नील के धब्बे पड़ जाएं तो वस्त्र को सिरके के घोल में खंगाल लेना चाहिए।

प्रश्न 84.
किस प्रकार के वस्त्रों को सफ़ेद करने की आवश्यकता पड़ती है ?
उत्तर :
सफ़ेद सूती तथा लिनन के वस्त्रों को बार-बार धोने पर इन पर पीलापन सा आ जाता है। इनका यह पीलापन दूर करने के लिए नील देना पड़ता है।

प्रश्न 85.
साबुन बनाने की गर्म विधि के बारे बताओ।
उत्तर :
तेल को गर्म करके धीरे-धीरे इसमें कास्टिक सोडा डाला जाता है। इस मिश्रण को गर्म किया जाता है। इस तरह चर्बी अम्ल तथा ग्लिसरीन में बदल जाती है। फिर उसमें नमक डाला जाता है, इससे साबुन ऊपर आ जाता है तथा ग्लिसरीन, अतिरिक्त खार तथा नमक नीचे चले जाते हैं। साबुन में सुगन्ध तथा रंग ठण्डा होने पर मिलाये जाते हैं तथा चक्कियां काट ली जाती हैं।

प्रश्न 86.
कपड़ों को नील कैसे दिया जाता है ?
उत्तर :
नील देते समय वस्त्र को धोकर साफ़ पानी से निकाल लेना चाहिए। नील को किसी पतले वस्त्र में पोटली बनाकर पानी में खंगालना चाहिए। वस्त्र को अच्छी तरह निचोड़कर तथा बिखेरकर नील वाले पानी में डालो तथा बाद में वस्त्र को धूप में सुखाओ।

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प्रश्न 87.
धोने से पूर्व वस्त्रों की मरम्मत करनी क्यों ज़रूरी है?
अथवा
कपड़े धोने से पहले उनकी मुरम्मत के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
कई बार वस्त्र सिलाइयों से अथवा उलेड़ियों से उधड़ जाते हैं अथवा किसी चीज़ में फँसकर फट जाते हैं। ऐसी हालत में वस्त्रों को धोने से पहले मरम्मत कर लेनी चाहिए नहीं तो और फटने अथवा उधड़ने का डर रहता है।

प्रश्न 88.
कौन-कौन सी बातों के आधार पर आप वस्त्रों को धोने से पहले छांटोगे?
उत्तर :
वस्त्रों की छंटाई उनके रंग, रेशों, आकार तथा गन्दगी के आधार पर की जाती है।

प्रश्न 89.
संश्लेषित कपड़ों पर इस्त्री करते समय किन-किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर :
1. इस्त्री उपयुक्त ताप पर गर्म करें।
2. इस्त्री करने का स्थान समतल तथा सीधा होना चाहिए।
3. वस्त्र के एक तरफ से शुरू होकर अन्त तक इस्त्री करनी चाहिए।

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प्रश्न 90.
सफेद कपड़ों का पीलापन दूर करने के उपाय व उसकी विधि लिखें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 84, 86 का उत्तर।

प्रश्न 91.
किसी एक वानस्पतिक धब्बे का नाम व उसे छुड़ाने की विधि लिखें।
उत्तर :
चाय का दाग वानस्पतिक दाग है। सूती कपड़े से ताजा दाग उतारने के लिए कुछ ऊंचाई से उबलता पानी दाग पर डालने से साफ हो जाता है। पुराने दाग के लिए सोडे या बोरैक्स या अमोनिया के हल्के घोल में कुछ देर रखा जाता है।

प्रश्न 92.
कपड़े धोने से पहले उनकी छंटाई करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
ऐसा करने से अधिक गन्दे, कम गन्दे, सफेद तथा रंगदार वस्त्रों को अलग करने से धुलाई सरलता से हो जाती है।

प्रश्न 93.
अपाच्य ब्लीच के दो उदाहरण दें।
उत्तर :
सोडियम बाईसल्फाईड, सोडियम हाइड्रोसल्फाईड।

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प्रश्न 94.
कपड़ों पर अकड़न लाने वाले पदार्थ बताएं।
उत्तर :
मैदा, अरारोट, आलू, चावलों का पानी, गेहूँ।।

प्रश्न 95.
भारी पानी को हल्का कैसे बनाया जा सकता है ?
उत्तर :
भारी पानी को उबालकर तथा चूने के पानी से मिलाकर हल्का बनाया जाता है।

प्रश्न 96.
ऑक्सीकारक ब्लीच के दो उदाहरण दें।
अथवा
कोई भी दो ऑक्सीकारक विरंजकों के नाम लिखें।
उत्तर :
पोटाशियम परमैंगनेट, हाइड्रोजन परऑक्साइड।

प्रश्न 97.
सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ बताएं।
उत्तर :
वस्त्र धोने वाला सोडा, सुहागा, अमोनिया, एसिटिक एसिड, ऑग्ज़ैलिक एसिड।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
ठण्डी विधि द्वारा कौन-कौन सी वस्तुओं से साबुन कैसे तैयार किया जा सकता है ? इसकी क्या हानियां हैं ?
अथवा
ठण्डी विधि द्वारा साबुन बनाने में कौन-कौन सी वस्तुएँ प्रयोग में आती हैं ?
उत्तर :
ठण्डी विधि द्वारा साबुन तैयार करने के लिए निम्नलिखित सामान लो –
कास्टिक सोडा अथवा पोटाश 250 ग्राम
महुआ अथवा नारियल तेल-1 लीटर
पानी-3/4 किलोग्राम
मैदा-250 ग्राम।
किसी मिट्टी के बर्तन में कास्टिक सोडा तथा पानी को मिलाकर 2 घण्टे तक रख दो। तेल तथा मैदे को अच्छी तरह घोल लो तथा फिर इसमें सोडे का घोल धीरे-धीरे डालो तथा हिलाते रहो। पैदा हुई गर्मी से साबुन तैयार हो जाएगा। इसको किसी सांचे में डालकर सुखा लो तथा चक्कियां काट लो।

हानियां – साबुन के अतिरिक्त खार तथा तेल और ग्लिसरॉल आदि साबुन में रह जाते हैं। अधिक खार वाले साबुन कपड़ों को हानि पहुंचाते हैं।

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प्रश्न 2.
साबुन किन-किन किस्मों में मिलता है ?
उत्तर :
साबुन निम्नलिखित किस्मों में मिलता है –
1. साबुन की चक्की-साबुन चक्की के रूप में प्रायः मिल जाता है। चक्की को गीले वस्त्र पर रगड़कर प्रयोग किया जाता है।
2. साबुन का पाऊडर-यह साबुन तथा सोडियम कार्बोनेट का बना होता है। इसको गर्म पानी में घोलकर कपड़े धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसमें सफ़ेद-सफ़ेद सूती वस्त्रों को अच्छी तरह साफ़ किया जाता है।
3. साबुन का चूरा-यह बन्द पैकेटों में मिलता है। इसको पानी में उबालकर सूती वस्त्र कुछ देर भिगो कर रखने के पश्चात् इसमें धोया जाता है। रोगियों के वस्त्रों को भी कीटाणु रहित करने के लिए साबुन के उबलते घोल का प्रयोग किया जाता है।
4. साबुन की लेस-एक हिस्सा साबुन का चूरा लेकर पाँच हिस्से पानी डालकर तब तक उबालो जब तक लेस-सी तैयार न हो जाये। इसको ठण्डा होने पर बोतलों में डालकर रख लो तथा जरूरत पड़ने पर पानी डालकर धोने के लिए इसे प्रयोग किया जा सकता है।

प्रश्न 3.
अच्छे साबुन की पहचान क्या है ?
उत्तर :

  1. साबुन हल्के पीले रंग का होना चाहिए। गहरे रंग के साबुन में मिलावट भी हो सकती है।
  2. साबुन हाथ लगाने पर थोड़ा कठोर होना चाहिए। अधिक नर्म साबुन में ज़रूरत से अधिक पानी हो सकता है जो केवल भार बढ़ाने के लिए ही होता है।
  3. हाथ लगाने पर अधिक कठोर तथा सूखा नहीं होना चाहिए। कुछ घटिया किस्म के साबुनों में भार बढ़ाने वाले पाऊडर डाले जाते हैं जो वस्त्र धोने में सहायक नहीं होते।
  4. अच्छा साबुन स्टोर करने पर, पहले की तरह रहता है, जबकि घटिया साबुनों पर स्टोर करने पर सफ़ेद पाऊडर-सा बन जाता है। इनमें आवश्यकता से अधिक खार होती है जोकि वस्त्र को खराब भी कर सकती है।
  5. अच्छा साबुन जुबान पर लगने से ठीक स्वाद देता है जबकि मिलावट वाला साबुन जुबान पर लगने पर तीखा तथा कड़वा स्वाद देता है।

प्रश्न 4.
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ कौन-से हैं?
उत्तर :
साबुन रहित प्राकृतिक, सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-रीठे तथा शिकाकाई। इनकी फलियों को सुखा कर स्टोर कर लिया जाता है।
रीठा – रीठों की बाहरी छील के रस में वस्त्र साफ़ करने की शक्ति होती है। रीठों की छील उतारकर पीस लो तथा 250 ग्राम छील को कुछ घण्टे के लिए एक लिटर पानी में भिगो कर रखो तथा फिर इन्हें उबालो तथा ठण्डा करके छानकर बोतलों में भरकर रखा जा सकता है। इसके प्रयोग से ऊनी, रेशमी वस्त्र ही नहीं अपितु सोने, चांदी के आभूषण भी साफ़ किये जा सकते हैं।

शिकाकाई – इसका भी रीठों की तरह घोल बना लिया जाता है। इससे कपड़े निखरते ही नहीं अपितु उनमें चमक भी आ जाती है। इससे सिर भी धोया जा सकता है।

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प्रश्न 5.
साबुन रहित रासायनिक सफ़ाईकारी पदार्थों से आप क्या समझते हो? इनके क्या लाभ हैं?
उत्तर :
साबुन प्राकृतिक तेल अथवा चर्बी से बनते हैं जबकि रासायनिक सफाईकारी शोधक रासायनिक पदार्थों से बनते हैं। यह चक्की, पाऊडर तथा तरल के रूप में उपलब्ध हो सकते हैं।
लाभ – (i) इनका प्रयोग हर तरह के सूती, रेशमी, ऊनी तथा बनावटी रेशों के लिए किया जा सकता है।
(ii) इनका प्रयोग गर्म, ठण्डे, हल्के अथवा भारी सभी प्रकार के पानी में किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
साबुन और अन्य साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थों के अतिरिक्त वस्त्रों की धुलाई के लिए कौन-से सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ प्रयोग किये जाते हैं ?
उत्तर :
सहायक सफाईकारी पदार्थ निम्नलिखित हैं –
(i) वस्त्र धोने वाला सोडा – इसको सफ़ेद सूती वस्त्रों को धोने के लिए प्रयोग किया जाता है। परन्तु रंगदार सूती वस्त्रों का रंग हल्का पड़ जाता है तथा रेशे कमजोर हो जाते हैं। यह रवेदार होता है तथा उबलते पानी में तुरन्त घुल जाता है। इससे सफ़ाई की प्रक्रिया में वृद्धि होती है। इसका प्रयोग भारी पानी को हल्का करने के लिए, चिकनाहट साफ़ करने तथा दाग़ उतारने के लिए किया जाता है।

(ii) बोरेक्स (सहागा) – इसका प्रयोग सफ़ेद सती वस्त्रों के पीलेपन को दर करने के लिए तथा चाय, कॉफी, फल, सब्जियों आदि के दाग उतारने के लिए किया जाता है। इसके हल्के घोल में मैले वस्त्र भिगोकर रखने पर उनकी मैल उगल आती है। इससे वस्त्रों में ऐंठन भी लाई जाती है।

(iii) अमोनिया – इसका प्रयोग रेशमी तथा ऊनी कपड़ों से चिकनाहट के दाग दूर करने के लिए किया जाता है।

(iv) एसिटिक एसिड – रेशमी वस्त्र को इसके घोल में खंगालने से इनमें चमक आ जाती है। इसका प्रयोग वस्त्रों के अतिरिक्त नील का प्रभाव कम करने के लिए भी किया जाता है। रेशमी, ऊनी वस्त्र की रंगाई के समय भी इसका प्रयोग किया जाता है।

(v) ऑग्ज़ैलिक एसिड – इसका प्रयोग छार की बनी चटाइयों, टोकरियों तथा टोपियों आदि को साफ़ करने के लिए किया जाता है। स्याही, जंग, दवाई आदि के दाग उतारने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।

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प्रश्न 7.
वस्त्रों से दागों का रंग काट करने के लिए क्या प्रयोग किया जाता है?
उत्तर :
कपड़ों से दागों का रंग काट करने के लिए ब्लीचों का प्रयोग होता है। यह दो प्रकार के होते हैं
(i) ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच – जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है, इसकी ऑक्सीजन धब्बे से क्रिया करके इसको रंग रहित कर देती है तथा दाग उतर जाता है। प्राकृतिक धूप, हवा तथा नमी, पोटाशियम परमैंगनेट, हाइड्रोजन पराक्साइड, सोडियम परबोरेट, हाइपोक्लोराइड आदि ऐसे रंग काट हैं।

(i) रिड्यूसिंग ब्लीच – जब इनका प्रयोग धब्बे पर किया जाता है तो यह धब्बे से ऑक्सीजन निकालकर इसको रंग रहित कर देते हैं। सोडियम बाइसल्फाइट, सोडियम हाइडोसल्फाइट ऐसे ही रंग काट हैं। ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों पर इनका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है। परन्तु तेज़ रंग काट से वस्त्र खराब भी हो जाते हैं।

प्रश्न 8.
नील की मुख्य कौन-कौन सी किस्में हैं ?
उत्तर :
नील मुख्यतः दो प्रकार का होता है –
(i) पानी में अघुलनशील नील – इण्डिगो, अल्ट्रामैरीन तथा प्रशियन नील ऐसे नील हैं। इसके कण पानी के नीचे बैठ जाते हैं, इसलिए वस्त्रों को धोने से पहले नील वाले पानी में अच्छी तरह हिलाना पड़ता है।
(ii) पानी में घुलनशील नील – इनको पानी में थोड़ी मात्रा में घोलना पड़ता है तथा इससे वस्त्र पर थोड़ा नीला रंग आ जाता है। इस तरह वस्त्र का पीलापन दूर हो जाता है। एनीलिन नील ऐसा ही नील है।

प्रश्न 9.
नील देते समय ध्यान में रखने योग्य बातें कौन-सी हैं?
उत्तर :

  1. नील सफ़ेद वस्त्रों को देना चाहिए रंगीन कपड़ों को नहीं।
  2. यदि नील पानी में अघुलनशील हो तो पानी को हिलाते रहना चाहिए नहीं तो वस्त्रों पर नील के धब्बे से पड़ जाएंगे।
  3. नील के धब्बे दूर करने के लिए वस्त्र को सिरके वाले पानी में खंगाल लेना चाहिए।
  4. नील दिए वस्त्रों को धूप में सुखाने पर उनमें और भी सफ़ेदी आ जाती है।

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प्रश्न 10.
वस्त्रों के कड़ापन लाने के लिए किन वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है? किन्हीं चार वस्तुओं के नाम लिखें।
उत्तर :
वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए अग्रलिखित पदार्थों का प्रयोग किया जाता है –

  1. मैदा अथवा अरारोट-इसको पानी में घोलकर गर्म किया जाता है।
  2. चावलों का पानी-चावलों को पानी में उबालने के पश्चात् बचे पानी का प्रयोग वस्त्र में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  3. आलू-आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  4. गंद-गंद को पीसकर गर्म पानी में घोल लिया जाता है तथा घोल को पतले वस्त्र में छान लिया जाता है। इसका प्रयोग रेशमी वस्त्रों, लेसों तथा वैल के वस्त्रों में ऐंठन लाने के लिए किया जाता है।
  5. बोरैक्स (सुहागा)-आधा लीटर पानी में दो बड़े चम्मच सुहागा घोल कर लेसों पर इसका प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
वस्त्र धोने से पूर्व आप क्या-क्या तैयारी करेंगे?
उत्तर :

  1. वस्त्रों की उधड़ी सिलाइयां लगा लेनी चाहिएं। यदि रफू, बटन, हुकों आदि की ज़रूरत हो तो लगा लो।
  2. वस्त्रों की जेबों आदि को देख लो, बैल्टें, बक्कल आदि उतार दो।
  3. वस्त्रों को रंग अनुसार, रेशे अनुसार, आकार अनुसार, गन्दगी अनुसार छांट कर अलग कर लो।
  4. यदि वस्त्रों पर कोई दाग धब्बे हैं तो पहले इन्हें दूर करो।

प्रश्न 12.
वस्त्रों को छांटने से आप क्या समझते हो?
अथवा
कपड़े धोते समय उनकी छंटाई कैसे की जाती है ?
उत्तर :
वस्त्रों को छांटने का अर्थ है कि वस्त्रों को उनके रंग, रेशे, आकार तथा गन्दगी के आधार पर अलग-अलग कर लेना क्योंकि सारे रेशे एक विधि से नहीं धोए जा सकते इसलिए सूती, ऊनी, रेशमी, नायलॉन, पालिएस्टर के अनुसार वस्त्र अलग कर लिये जाते हैं। सफ़ेद वस्त्र रंगदार वस्त्रों से पहले धोने चाहिएं क्योंकि रंगदार वस्त्रों से कई बार रंग निकलने लगता है। छोटे वस्त्र पहले धो लो तथा बड़े जैसे चादरें, खेस आदि को बाद में। कम गन्दे वस्त्र हमेशा पहले धोएं तथा अधिक गन्दे बाद में।

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प्रश्न 13.
सूती वस्त्रों की धुलाई कैसी की जाती है?
अथवा
सफेद सूती कपड़ों की धुलाई आप कैसे करोगे ?
उत्तर :

  1. पहले वस्त्र को कुछ समय के लिए भिगोकर रखा जाता है ताकि मैल उगल जाये। इस तरह साबुन, मेहनत तथा समय कम लगता है।
  2. कीटाणु रहित करने के लिए वस्त्रों को पानी में 10-15 मिनट के लिए उबाला जाता है।
  3. पहले से भीगे वस्त्रों को पानी से निकालकर निचोड़ा जाता है तथा साबुन अथवा अन्य किसी डिटर्जेंट आदि से वस्त्रों को रगड़कर, मलकर अथवा थापी से धोया जाता है। अधिक गन्दे हिस्से जैसे कालर, कफ आदि को ब्रश आदि से रगड़कर साफ़ किया जाता है।
  4. उबालने अथवा साबुन वाले पानी से धोने के पश्चात् कपड़ों को साफ़ पानी से 2-4 बार खंगाल कर सारा पानी निकाल देना चाहिए। फिर उन्हें अच्छी तरह निचोड़ लो।
  5. आवश्यकतानुसार नील अथवा मावा आदि देकर वस्त्र निचोड़कर झाड़कर सूखने के लिए डाल दो।

प्रश्न 14.
ऊनी वस्त्र धोते समय बहुत सावधानी प्रयोग करने की जरूरत क्यों पड़ती है?
उत्तर :
ऊनी रेशे पानी में डालने से कमजोर हो जाते हैं तथा लटक जाते हैं। गर्म पानी में डालने पर तथा रगड़कर धोने से यह रेशे जुड़ जाते हैं। सोडे वाले साबुन से धोने पर भी यह रेशे जुड़ जाते हैं। इसलिए ऊनी वस्त्र धोते समय काफ़ी सावधानी की ज़रूरत होती है। इनको धोते समय ध्यान रखो कि जितना भी पानी प्रयोग किया जाए, सारे का तापमान एक-सा होना चाहिए। कभी भी गर्म तथा सोडे वाले साबुन का प्रयोग न करो। धोने के लिए वस्त्र को हाथ से धीरे-धीरे दबाते रहना चाहिए तथा ऊनी वस्त्र को लटकाकर सुखाना नहीं चाहिए। वस्त्र को समतल स्थान पर सीधा रखकर सुखाना चाहिए।

प्रश्न 15.
अपने ऊनी स्वैटर की धुलाई आप कैसे करोगे?
अथवा
ऊनी वस्त्रों की धुलाई आप कैसे करोगे ?
उत्तर :
1. पहले स्वैटर से नर्म ब्रश से ऊपरी मिट्टी झाड़ी जाती है।
2. यदि स्वैटर ऐसा हो कि धोने के पश्चात् उसके बेढंगे हो जाने का डर हो तो धोने से पहले इसको खाका अखबार अथवा खाकी कागज़ पर उतार लेना चाहिए ताकि धोने के पश्चात् इसको फिर से पहले आकार में लाया जा सके।
3. पहले ऊनी वस्त्र को पानी में से डुबो कर निकाल लो तथा हाथों से दबाकर पानी निकाल दो। शिकाकाई, रीठे, जैनटिल अथवा लीसापोल को गुनगुने पानी में घोल कर झाग बना लो। फिर इस निचोड़े गए वस्त्र को इस साबुन वाले पानी में हाथों से धीरे-धीरे दबाकर रगड़े बगैर साफ़ करो।
4. वस्त्र को साफ़ पानी में धीरे-धीरे खंगालकर इसमें से साबुन अच्छी तरह निकाल दो तथा अतिरिक्त पानी तौलिए में दबाकर निकाल लो।
5. वस्त्र को बनाये हुए खाके पर रखकर इसके आकार में ले आयो तथा समतल स्थान जैसे-चारपाई पर वस्त्र बिछाकर इसके ऊपर सीधा डालकर छांव में सुखाओ।

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प्रश्न 16.
ऊनी स्वैटर को समतल स्थान पर क्यों व कैसे सुखाना चाहिए ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 15 का उत्तर।

प्रश्न 17.
भिगोने से सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों में से कौन-कौन से कमज़ोर हो जाते हैं और इनका धोने से क्या सम्बन्ध है?
उत्तर :
भिगोने से ऊनी तथा रेशमी वस्त्र कमजोर हो जाते हैं जबकि सुती वस्त्र मज़बत होते हैं। इनका धोने के साथ यह सम्बन्ध है कि ऊपर बताये कारण से सूती वस्त्रों को तो धोने से पहले कुछ समय के लिए भिगो कर रखा जाता है। परन्तु ऊनी तथा रेशमी वस्त्रों को भिगो कर नहीं रखा जाता।

प्रश्न 18.
भिगौने से कौन-से वस्त्र कमजोर पड़ जाते हैं ?
उत्तर :
ऊन के वस्त्र तथा सिल्क के वस्त्र।

प्रश्न 19.
ऐसी किस्म के वस्त्रों के बारे में बताओ जिन्हें उबाल कर धोया जा सकता है। ऐसे वस्त्र को धोते समय क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिएं?
उत्तर :
सूती वस्त्रों को उबालकर धोया जा सकता है। इन वस्त्रों को धोते समय निम्नलिखित सावधानियों की ज़रूरत है –

  1. सिलाइयों से उधड़े अथवा किसी अन्य कारण से फटे वस्त्र को धोने से पहले मरम्मत कर लो।
  2. सूती, लिनन, ऊनी, नायलॉन, पॉलिएस्टर, रेशमी वस्त्रों को अलग-अलग कर लो।
  3. सफ़ेद वस्त्रों को पहले धोएं तथा रंगदार को बाद में।
  4. अधिक मैले वस्त्रों को बाद में धोएं।
  5. रोगी के वस्त्रों को 10-15 मिनट के लिए पानी में उबालो तथा बाद में धोएं।
  6. छोटे तथा बड़े वस्त्रों को अलग-अलग करके धोएं।

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प्रश्न 20.
रेशमी वस्त्रों की धुलाई कैसे की जाती है ?
अथवा
रेश्मी कपड़ों को किस विधि से धोना चाहिए ?
अथवा
सिल्क का स्कार्फ धोने की विधि लिखें ?
उत्तर :
i. रीठे, शिकाकाई अथवा जैनटिल को गुनगुने पानी में घोलकर झाग बनाओ तथा इसमें वस्त्र को हाथों से धीरे-धीरे दबाकर धोएं तथा बाद में साफ़ से 3-4 बार खंगाल कर निकाल लो। वस्त्र को खंगालते समय एक चम्मच सिरका डाल लो। इससे वस्त्र में चमक आ जायेगी।
ii. धोने के पश्चात् रेशमी वस्त्र को गेहूँ का मावा दो ताकि इसकी प्राकृतिक ऐंठन कायम रखी जा सके।
iii. इन वस्त्रों को हमेशा छाया में सुखाएं। आधे सूखे वस्त्रों को इस्तरी करने के लिए उतार लो।

प्रश्न 21.
सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्रों को इस्त्री करने में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
सूती वस्त्रों की प्रेस-सूखे वस्त्रों पर पानी छिड़ककर इन्हें नम कर लिया जाता है तथा कुछ समय के लिए लपेट कर रख दिया जाता है ताकि वस्त्र एक जैसे नम हो जाएं। जब प्रैस अच्छी तरह गर्म हो जाये, तो वस्त्र के उल्टे तरफ पहले सिलाइयां, प्लीट, उलेड़ियों वाले फट्टे आदि प्रैस करो। वस्त्र की सीधी तरफ वस्त्र की लम्बाई की ओर प्रैस करो। कालर, कफ, बाजू आदि को पहले इस्तरी करो। प्रैस करने के पश्चात् वस्त्रों को तह लगा कर रख दें अथवा हैंगर पर टांग दें।

ऊनी वस्त्र की प्रैस-ऊनी वस्त्र पर प्रैस सीधी सम्पर्क में नहीं लाई जाती, इससे ऊनी रेशे जल जाते हैं। मलमल के एक सफ़ेद वस्त्र को गीला करके ऊनी वस्त्र पर बिछाओ तथा हल्की गर्म प्रैस से उसको प्रैस करो। एक स्थान पर प्रैस 3-4 सैकिण्ड से अधिक न रखो। प्रेस करने के पश्चात् वस्त्र की तह लगा दो ।।

रेशमी वस्त्रों की इस्तरी-वस्त्रों को नम तौलिए में लपेटकर नम कर दो। पानी का छींटा देने से दाग पड़ सकते हैं। हल्की गर्म इस्तरी से इस्तरी करो। इस्तरी करने के पश्चात् यदि वस्त्र नम हों तो इन्हें सुखा लो तथा सूखने के बाद ही सम्भालो।

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प्रश्न 22.
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
रेयॉन के वस्त्रों की धुलाई करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. रेयॉन के वस्त्रों को भिगोना, उबालना या ब्लीच नहीं करना चाहिए।
  2. साबुन मृदु प्रकृति का प्रयोग करना चाहिए।
  3. गुनगुना पानी ही प्रयोग में लाना चाहिए, अधिक गर्म नहीं।
  4. साबन का अधिक-से-अधिक झाग बनाना चाहिए जिससे साबुन पूरी तरह घुल जाए।
  5. गीली अवस्था में रेयॉन के कपड़े अपनी शक्ति 50% तक खो देते हैं, अत: वस्त्रों में से साबुन की झाग निकालने के लिए उन्हें सावधानीपूर्वक निचोड़ना चाहिए।
  6. साबुन की झाग निचोड़ने के बाद वस्त्र को दो बार गुनगुने पानी में से खंगालना चाहिए।
  7. वस्त्रों में से पानी को भी कोमलता से निचोड़कर निकालना चाहिए। वस्त्र को मरोड़कर नहीं निचोड़ना चाहिए।
  8. वस्त्र को किसी भारी तौलिए में रखकर, लपेटकर हल्के-हल्के दबाकर नमी को सुखाना चाहिए।
  9. वस्त्र को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
  10. वस्त्र को लटकाकर नहीं सुखाना चाहिए।
  11. वस्त्र को हल्की नमी की अवस्था में वस्त्र की उल्टी तरफ़ इस्तरी करना चाहिए।
  12. वस्त्रों को अलमारी में रखने अर्थात् तह करके रखने से पूर्व यह देख लेना चाहिए कि उनमें से नमी पूरी तरह से दूर हो चुकी है या नहीं।

प्रश्न 23.
ऊनी कपड़ों की धुलाई में प्रारम्भ से अन्त तक की विभिन्न क्रियाओं की सूची बनाइए।
उत्तर :

  1. वस्त्रों का छाँटना।
  2. वस्त्रों को झाड़ना या धूल-रहित करना।
  3. वस्त्रों में यदि कोई सुराख आदि हों तो उसकी मरम्मत करना।
  4. वस्त्र का खाका तैयार करना।
  5. दाग-धब्बे छुड़ाना।
  6. साबुन तथा पानी की तैयारी।
  7. धुलाई करना।
  8. वस्त्रों को सुखाना।
  9. वस्त्रों पर इस्तरी करना।

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प्रश्न 24.
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. ऊनी वस्त्रों को अधिक गर्म पानी से नहीं धोना चाहिए।
  2. ऊनी वस्त्रों को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
  3. अधिक क्षारीय घोलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. यदि रंग कच्चा हो और धुलाई में निकलता दिखाई दे तो धुलाई के अन्तिम जल में थोड़ी-सी नींबू की खटाई या सिरका मिला देना चाहिए।
  5. कच्चे रंग के कपड़ों को रीठे के घोल से घोलना चाहिए।

प्रश्न 25.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए किस प्रकार का साबुन प्रयोग करना चाहिए और क्यों?
उत्तर :
ऊनी वस्त्रों की धुलाई के लिए मृदु साबुन का प्रयोग करना चाहिए जिसमें सोडा बहुत कम हो या बिल्कुल न हो। साबुन द्रव रूप में अथवा चिप्स के रूप में हो जो पानी में एक जैसा घोल बना ले। क्षारयुक्त साबुन से ऊन के तन्तु कड़े हो जाते हैं तथा सफ़ेद ऊन में पीलापन आ जाता है। रंगीन वस्त्रों के लिए रीठे के घोल का प्रयोग किया जाना चाहिए क्योंकि इसके प्रयोग से कपड़े का रंग नहीं उतरता।

प्रश्न 26.
ऊन क्यों जुड़ जाती है?
उत्तर :
ऊन का तन्तु बहुत नर्म और मुलायम होता है। इसके ऊपर छोटी-छोटी तहें होती हैं जो कि पानी, गर्मी और क्षार से नर्म हो जाती हैं और एक-दूसरे से उलझ जाती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि कपडा जुड़ जाता है। इसलिए ऊन की धुलाई में विशेष ध्यान रखने की आवश्यकता होती है।

प्रश्न 27.
ऊनी कपड़ों को सिकुड़ने व जुड़ने से बचाने के लिए आवश्यक चार बातें लिखो।
उत्तर :

  1. कपड़ों को रगड़ना नहीं चाहिए।
  2. पानी बहुत गर्म नहीं होना चाहिए।
  3. कपड़ों की धुलाई में क्षारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. कपड़ों को गीली अवस्था में लटकाकर नहीं सुखाना चाहिए।

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प्रश्न 28.
अधिक मैले ऊनी वस्त्रों को कैसे साफ़ करोगे?
उत्तर :
ऊनी वस्त्रों को रीठे के घोल या इजी वाले पानी में थोड़ी देर के लिए भिगोएँ। उसे हाथों से धीरे-धीरे रगड़ें। अधिक मैले भाग को हाथ की हथेली पर रखकर थोड़ा और साबुन लगाकर दूसरे हाथ से धीरे-धीरे रगड़ें, यदि मैल साफ़ न हो तो उस भाग पर ब्रुश का प्रयोग करें। जब वस्त्र साफ़ हो जाएं तो फिर उसे समतल, छायादार स्थान पर सुखाएँ।

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चित्र-धीरे-धीरे मलने की विधि

प्रश्न 29.
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिये?
उत्तर :
ऊनी कपड़ों में रंग व चमक बनाए रखने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चहिए –

  1. ऊनी वस्त्र को अधिक गर्म पानी से नहीं धोना चाहिए।
  2. ऊनी वस्त्र को धूप में नहीं सुखाना चाहिए।
  3. अधिक क्षारीय घोलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. यदि रंग कच्चा हो और धुलाई में निकलता दिखाई दे तो धुलाई के अन्तिम जल में थोड़ी-सी नींबू की खटाई या सिरका मिला देना चाहिए।
  5. कच्चे रंग के कपड़ों को रीठे के घोल से धोना चाहिए।

प्रश्न 30.
ऊनी वस्त्रों को धोने से पूर्व उनका खाका क्यों तैयार किया जाता है ?
अथवा
ऊनी स्वैटर को धोने से पहले उसका खाका क्यों बनाया जाता है ?
उत्तर :
हाथ से बुने कपड़े सिकुड़ जाने या खींचे जाने के कारण खराब हो सकते हैं। इसलिए गीला करने से पहले खाकी कागज़ पर इनका खाका बना लिया जाता है ताकि धोने के बाद कपड़े को इसी कागज़ पर रख कर उसको ठीक करके सुखाया जा सके।

प्रश्न 31.
कपड़ों के परिष्करण (फिनिशिंग) से सम्बन्धित क्रियाएं कौन-सी हैं ?
उत्तर :

  1. कपड़ों को नम करना।
  2. कपड़ों पर इस्तरी करना।
  3. प्रेसिंग या प्रैस करना।
  4. स्टीमिंग या स्टीम करना।
  5. मेंगलिंग विधि या मेंगल करना।
  6. केलेन्डरिंग या केलेन्डर करना।

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प्रश्न 32.
कलफ लगाने से क्या लाभ होते हैं ?
अथवा
कलफ का प्रयोग वस्त्रों के लिए क्यों आवश्यक है ? किन वस्त्रों को कलफ किया जाता है?
अथवा
कपड़ों पर कलफ क्यों लगाया जाता है ? रेशमी कपड़ों पर किस चीज़ का कलफ लगाते हैं ?
अथवा
कल्फ का प्रयोग क्यों किया जाता है ? कपड़ों को कल्फ लगाने के लिए किन किन चीज़ों का प्रयोग किया जाता है?
उत्तर :
कपड़ों में कलफ से चमक और नवीनता आ जाती है।

  1. कपड़े में कलफ रहने से कपड़े में कड़ापन आ जाता है। वस्त्र कई दिनों तक पहना जा सकता है।
  2. मांड लगे कपड़ों पर धूल नहीं जमती है क्योंकि यह धागों के बीच के रिक्त स्थानों की पूर्ति करती है।
  3. कपड़ों पर सिलवटें नहीं पड़ती हैं, कपड़ों का आकार ठीक लगता है।
  4. कलफ लगे वस्त्र पहनने पर व्यक्ति स्मार्ट लगता है, उसके व्यक्तित्व में निखार आ जाता है। आमतौर पर सूती और रेशमी कपड़ों पर कलफ लगाई जाती है।

रेशमी कपड़ों पर गोंद की कलफ की जाती है।
कल्फ लगाने के लिए चीजें-देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 33.
धुलाई में नील का क्या महत्त्व है?
अथवा
कपड़ों पर नील क्यों लगाया जाता है ? नील लगाने की विधि लिखें।
उत्तर :
सूती वस्त्रों की सफेदी बढ़ाने के लिए नील लगाया जाता है। सफ़ेद वस्त्र पहनने अथवा धोने के पश्चात् पीले से पड़ जाते हैं क्योंकि उनकी सफेदी जाती रहती है। इस पीले रंग को दूर करने के लिए नील का प्रयोग किया जाता है। इससे वस्त्र में सफेदी व नवीनता पुनः आ जाती है।

वस्त्रों में नील देते समय विशेष ध्यान देना चाहिए। नील पानी में अच्छी तरह से घोल देना चाहिए। नील लगाने की उत्तम विधि यह है कि एक कपड़े के टुकड़े में नील रखकर पोटली बना लेनी चाहिए तथा पानी में डाल कर नील को घोल लेना चाहिए। जब पानी में नील एक सा घुल जाए तो गीले वस्त्र को उसमे डुबो देना चाहिए। नील लग जाने के बाद वस्त्र को धूप में सुखा देना चाहिए। इससे वस्त्र की सफेदी बढ़ जाती है।

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प्रश्न 34.
कपड़ों पर इस्तरी करने से क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
वस्त्रों की धुलाई करने के पश्चात् सभी कपड़ों पर प्रायः सिलवटें पड़ जाती हैं। कुछ वस्त्र ऐसे भी होते हैं जो मैले न होते हुए भी सिलवटों के कारण पहनने योग्य नहीं होते। इन वस्त्रों को मूलरूप व आकर्षण देने के लिए इन पर इस्तरी करने की आवश्यकता होती है। इस्तरी दो प्रकार की होती है-बिजली से चलने वाली तथा कोयले से चलने वाली।
इस्तरी करने से –

  1. वस्त्रों में चमक आ जाती है।
  2. वस्त्रों में सुन्दरता तथा निखार आ जाता है।
  3. सिलवटें समाप्त हो जाती हैं।

प्रश्न 35.
पानी के स्रोत के आधार पर पानी का वर्गीकरण कैसे करोगे ?
उत्तर :
पानी के स्रोत के आधार पर पानी का वर्गीकरण निम्नलिखित ढंग से किया जा सकता है –
1. वर्षा का पानी – यह पानी का सबसे शुद्ध रूप होता है। यह हल्का पानी होता है परन्तु हवा की अशुद्धियां इसमें घुली होती हैं। इसको वस्त्र धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
2. दरिया का पानी – पहाड़ों की बर्फ पिघल कर दरिया बनते हैं। जैसे-जैसे यह पानी मैदानी इलाकों में आता रहता है इसमें अशुद्धियों की मात्रा बढ़ती रहती है तथा पानी गंदा-सा हो जाता है। यह पानी पीने के लिए ठीक नहीं होता परन्तु इससे वस्त्र धोए जा सकते हैं।
3. चश्मे का पानी – धरती के नीचे इकट्ठा हुआ पानी किसी कमज़ोर स्थान से बाहर निकल आता है, इसको चश्मा कहते हैं। इस पानी में कई खनिज लवण घुले होते हैं इसको कई बार दवाई के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है। वस्त्र धोने के लिए यह पानी ठीक है।
4. धरती को खोदकर जो पानी बाहर निकलता है, वह पानी पीने के लिए ठीक होता है। इसको कुएं का पानी कहते हैं। इससे वस्त्र धोए जा सकते हैं।
5. समुद्र का पानी – इस पानी में काफ़ी अधिक अशुद्धियां होती हैं। यह पीने के लिए तथा वस्त्र धोने के लिए भी ठीक नहीं होता।

प्रश्न 36.
सूती सफेद कपड़े से निम्नलिखित दाग कैसे छुड़ायेंगे ?
(i) रक्त
(ii) पेंट।
उत्तर :
रक्त – 1. ताज़ा दाग के लिए ठण्डे पानी तथा साबुन से धोएं।
2. पुराने दाग को नमक वाले पानी में धोएं।

पेंट-ताज़ा दाग के सूखे अंश को खुरचकर निकालें तथा फिर मिथीलेटिड स्पिरिट या मिट्टी के तेल में डुबोकर धीरे-धीरे रगड़ें। पुराने दाग के लिए इसी विधि को दो-तीन बार दोहराएं।

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प्रश्न 37.
सूती कपड़ों पर कलफ लगाने की विधि लिखें।
उत्तर :
सूती कपड़े पर कलफ लगाकर कड़ापन लाया जाता है। इसके लिए 1 हिस्सा स्टार्च का तथा 2 हिस्सा ठण्डे पानी का लेकर इसमें सूती कपड़ा डाला जाता है। कलफ लगाते समय वस्त्र में साबुन नहीं होना चाहिए इसे अच्छी तरह धो लेना चाहिए।

प्रश्न 38.
सूती साड़ी पर कड़ापन लाने के लिए किस चीज़ का इस्तेमाल किया जाता है ? उसे लगाने की विधि लिखें।
उत्तर :
सूती साड़ी पर कड़ापन लाने के लिए मैदा या अरारोट, चावल का पानी, आलुयों से तैयार पानी का प्रयोग किया जाता है।
मैदा या अरारोट को पानी में घोलकर गर्म किया जाता है तथा इससे वस्त्र में कड़ापन लाया जाता है।
इसी प्रकार आलू काटकर पीस लिया जाता है तथा पानी में गर्म करके वस्त्रों में कड़ापन लाया जाता है।

प्रश्न 39.
पानी भारी किन कारणों से होता है?
उत्तर :
जल का भारीपन स्थाई तथा अस्थाई दो प्रकार का होता है। स्थाई भारीपन, पानी में मौजूद कैल्शियम सल्फेट, मैगनीशियम सल्फेट लवणों के कारण होता है। अस्थाई भारीपन, पानी में मौजूद कैल्शियम बाइकार्बोनेट तथा मैगनीशियम बाइकार्बोनेट लवणों के कारण होता है। अस्थाई भारीपन पानी को उबालने से दूर हो जाता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
धुलाई के लिए प्रयोग होने वाले सही सामान के चयन से समय और श्रम की बचत कैसे होती है?
उत्तर :
धुलाई के लिए प्रयोग होने वाला सामान इस तरह है –

  1. स्टोर करने के लिए सामान
  2. वस्त्र धोने के लिए सामान
  3. वस्त्र सुखाने के लिए सामान
  4. वस्त्र प्रेस करने के लिए सामान।

जब धोने वाले वस्त्र पहले ही इकट्ठे करके एक अलमारी अथवा टोकरी आदि में रखे जाएं जो कि धोने वाले स्थान के नज़दीक रखी हो, तो वस्त्र धोते समय सारे घर से विभिन्न कमरों से पहले वस्त्र इकट्ठे करने का समय बच जाता है। यह आदत गृहिणी को सारे घर के सदस्यों को डालनी चाहिए कि जो भी धोने वाला कपड़ा हो उसे इस काम के लिए बनाई अलमारी अथवा टोकरी में रखें। घर में साबुन, डिटर्जेंट, नील, ब्रुश आदि आवश्यक सामान पहले ही मौजूद होना चाहिए। इस तरह नहीं होना चाहिए कि उधर से वस्त्र धोने आरम्भ कर लिये जाएं तथा बाद में पता चले घर में तो साबुन अथवा कोई अन्य आवश्यक सामान नहीं है। इस तरह समय तथा मेहनत दोनों नष्ट होते हैं।

धोने के लिए पानी भी हल्का ही प्रयोग करना चाहिए क्योंकि भारी पानी में साबुन की झाग नहीं बनती तथा वस्त्र अच्छी तरह नहीं निखरते। इसलिए पानी को गर्म करके अथवा अन्य तरीके से पानी को हल्का बना लेना चाहिए।

वस्त्र सुखाने का भी ठीक प्रबन्ध होना चाहिए। रस्सियों आदि को अच्छी तरह बांधना चाहिए तथा कपड़ों पर क्लिप आदि लगा लेने चाहिए ताकि हवा चले तो वस्त्र उड़ न जाएं। यदि रैक हैं तो इन्हें पहले ही खोल लेना चाहिए। इस तरह विभिन्न आवश्यक सामान पहले ही इकट्ठा किया हो तो समय तथा मेहनत की बचत हो जाती है।

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प्रश्न 2.
वस्त्र धुलाई के सामान को किन-किन वर्गों में बांटा जा सकता है?
उत्तर :
स्टोर करने के लिए सामान –

  1. अलमारी-धोने वाले कमरे के नज़दीक अलमारी होनी चाहिए जिसमें साबुन, नील, मावा, रीठे, दाग उतारने वाला सामान आदि होना चाहिए।
  2. लांडरी बैग अथवा वस्त्र रखने के लिए टोकरी-इसमें घर के गंदे वस्त्र रखे जाते हैं।
  3. मर्तबान तथा प्लास्टिक के डिब्बे-रीठे, दाग उतारने का सामान, डिटर्जेंट आदि इनमें रखा जाता है।

वस्त्र धोने के लिए सामान –

(i) पानी – पानी एक विश्वव्यापी घोलक है। इसमें सभी तरह की मैल घुल जाती है तथा इस तरह इसका कपड़ों की धुलाई में महत्त्वपूर्ण स्थान है। पानी को विभिन्न स्रोतों से प्राप्त किया जा सकता है। वर्षा का पानी, दरिया का पानी, चश्मे का पानी, कुएँ के पानी का प्रयोग वस्त्र धोने के लिए किया जा सकता है।

(ii) साबुन – वस्त्र धोने के लिए कई सफ़ाईकारी पदार्थ, साबुन तथा डिटर्जेंट मिलते हैं। वस्त्र साफ़ करने में इनका बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है।

(iii) टब तथा बाल्टियां – इनमें वस्त्र भिगोकर रखे, धोये तथा खंगाले जाते हैं। यह लोहे, प्लास्टिक अथवा पीतल के होते हैं। इनमें नील देने, रंग देने तथा मावा देने का भी कार्य किया जाता है।

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चित्र- बालटी, मग और चम्मच आदि

(iv) चिल्मचियां तथा मग – इनमें नील, मावा आदि देने का कार्य किया जाता है। यह प्लास्टिक, तामचीनी तथा पीतल आदि के होतेहैं।

(v) लकड़ी का चम्मच तथा डण्डा-इससे नील अथवा मावा घोलने का कार्य किया जाता है। चादरें, खेस आदि को डण्डे अथवा थापी से पीट कर साफ़ किया जाता है।

(vi) हौदी-धुलाई वाले कमरे में पानी की टूटी के नीचे सीमेंट की हौदी बनी हुई होनी चाहिए। इससे काम आसान हो जाता है। हौदी के दोनों ओर सीमेंट अथवा लकड़ी के फट्टे लगे होने चाहिएं ताकि धोकर वस्त्र इन पर रखे जा सकें। इनकी ढलान हौदी की ओर होनी चाहिए।

(vii) रगड़ने वाला ब्रुश तथा फट्टा प्लास्टिक के ब्रुशों का प्रयोग वस्त्र के अधिक मैले हिस्से को रगड़कर मैल उतारने के लिए किया जाता है। फट्टा लकड़ी, स्टील अथवा जस्त का बना होता है। इस पर रखकर वस्त्र को रगड़कर मैल निकाली जाती है।

(viii) गर्म पानी-वस्त्र धोने के लिए या तो बिजली के बायलर में पानी गर्म किया जाता है या फिर आग के सेक से बर्तन में डालकर पानी गर्म किया जाता है।

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चित्र-रगड़ने वाला फट्टा

(ix) वस्त्र धोने वाली मशीन-इससे समय तथा शक्ति दोनों की बचत होती है। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार इसको खरीदा जा सकता है।
(x) सक्शन वाशर-भारी, ऊनी कम्बल, साड़ियां तथा अन्य वस्त्र इसके प्रयोग से आसानी से धोए जा सकते हैं।

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चित्र-सक्शन वाशर

वस्त्र सुखाने के लिए सामान-वस्त्रों को धोने के पश्चात् साधारणतः प्राकृतिक धूप तथा हवा में सुखाया जाता है। अन्य आवश्यक सामान इस तरह हैं –

(i) रस्सी अथवा तार – रस्सी को अथवा तार को खींचकर खूटियों तथा खम्बों में बांधा जाता है। रस्सी नायलॉन, सन अथवा सूत की हो सकती है। जंग रहित लोहे की तार भी हो सकती है।
(ii) क्लिप तथा हैंगर – वस्त्र तार पर लटका कर क्लिप लगा दी जाती है ताकि हवा चलने पर वस्त्र नीचे गिरकर खराब न हो जाएं। बढ़िया किस्म के वस्त्र हैंगर में डालकर सुखाए जा सकते हैं।
(iii) वस्त्र सुखाने वाले रैक – बरसातों में अथवा बड़े शहरों में जहां लोग फ्लैटों में रहते हैं वहां रैकों पर वस्त्र सुखाये जाते हैं। यह एल्यूमीनियम अथवा लकड़ी के हो सकते हैं। इन्हें फोल्ड करके सम्भाला भी जा सकता है।

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चित्र-वस्त्र सुखाने वाले रैक

(iv) वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट – विकसित देशों में प्रायः इसका प्रयोग होता है। खासकर जहां अधिक ठण्ड अथवा वर्षा होती है उन देशों में इसका प्रयोग साधारण है।
इनके अतिरिक्त ऑटोमैटिक वाशिंग मशीनों से भी वस्त्र सुखाए जा सकते हैं।

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चित्र-वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट

वस्त्र प्रेस करने वाला सामान (i) प्रेस-वस्त्र प्रेस करने के लिए बिजली अथवा कोयले वाली प्रैस का प्रयोग किया जाता है। प्रैस लोहे, पीतल तथा स्टील की मिलती है।

(ii) प्रेस करने वाला फट्टा-यह लकड़ी का होता है, फट्टे के स्थान पर बैंच अथवा मेज़ आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है। इस पर कम्बल बिछा कर ऊपर पुरानी चादर बिछा लेनी चाहिए।

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चित्र-वस्त्र प्रेस करने वाला फट्टा और बाजू बोर्ड

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प्रश्न 3.
सूती वस्त्रों की धुलाई किस प्रकार की जा सकती है?
अथवा
रंगीन सूती कपड़ों को किस प्रकार धोएंगे और उनको धोते समय किन-किन सावधानियों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर :
1. वस्त्र धोने से पूर्व यह ध्यानपूर्वक देख लेना चाहिए कि कहीं वस्त्र फटा तो नहीं है। यदि फटा है तो उसकी सिलाई कर देनी चाहिए।
2. यदि वस्त्रों में किसी प्रकार का धब्बा लगा हो तो धोने से पहले छुड़ा लेना चाहिए। इसके पश्चात् समस्त वस्त्रों को उनके आकार व प्रकार के अनुसार उनके समूहों में विभाजित कर लेना चाहिए।
3. रंगीन और सफ़ेद सूती वस्त्रों को अलग-अलग कर लेना चाहिए।
4. कपड़ों को पहले पानी में भिगो देना चाहिए। ऐसा करने से कपड़े की घुलनशील मैल पानी में घुल जाती है। वस्त्रों के अन्य गन्दगी धब्बे आदि गल जाते हैं।
5. धोने के लिए गर्म पानी का प्रयोग अच्छा रहता है। कपड़े धोने का साबुन, रगड़ने का तख्ता या ब्रुश तथा कलफ आदि सभी चीजें तैयार रखनी चाहिएँ।
6. वस्त्र के प्रकार के अनुसार धुलाई करनी चाहिए। मज़बूत वस्त्र; जैसे चादर, पतलून, सलवार आदि गर्म पानी में भिगोकर साबुन की टिक्की मिलानी चाहिए। रसोईघर के झाड़न आदि गर्म पानी में साबुन डालकर भिगो देने चाहिए, फिर हाथ से रगड़कर मलना चाहिए। कालर, कफ व कोर के नीचे के मैल को मुलायम ब्रश से रगड़कर धोना चाहिए।
7. रंगीन कपड़ों को हमेशा ठण्डे पानी में भिगोना व धोना चाहिए। यदि कपड़े बहुत अधिक गन्दे हों, तो उन्हें गुनगुने पानी में भिगोना चाहिए।
8. कोमल वस्त्रों को अधिक नहीं रगड़ना चाहिए, उन्हें थोड़ा-सा रगड़कर और निचोड़कर धोना चाहिए।
9. कपड़ों में से साबुन निकालने के लिए उसे स्वच्छ पानी में से बार-बार निकालना चाहिए। जब कपड़ों में से साबुन का पूरा झाग निकल जाए और कपड़ा साफ़ हो जाए, तो निचोड़ लेना चाहिए।
10. सफ़ेद कपड़ों पर कलफ लगाते समय कलफ के घोल में थोड़ी-सा नील डाल देना चाहिए ताकि कपड़ों में चमक आ जाए, फिर भली-भान्ति निचोड़कर कपड़े सुखाने चाहिए।
11. पानी निचोड़कर वस्त्रों को धूप में सुखाना चाहिए। यदि कोई रंगीन वस्त्र है तो उसे छाया में सुखाना चाहिए।
12. कपड़ों को हमेशा उल्टा करके सुखाना चाहिए।
13. सूखे वस्त्र को नम करके इस्तरी कर लेनी चाहिए।

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प्रश्न 4.
दाग धब्बे छुड़ाते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
जल का भारीपन स्थाई तथा अस्थाई दो प्रकार का होता है। स्थाई भारीपन, पानी में मौजूद कैल्शियम सल्फेट, मैगनीशियम सल्फेट लवणों के कारण होता है। अस्थाई भारीपन, पानी में मौजूद कैल्शियम बाइकार्बोनेट तथा मैगनीशियम बाइकार्बोनेट लवणों के कारण होता है। अस्थाई भारीपन पानी को उबालने से दूर हो जाता है।
उत्तर :
दाग-धब्बे किस प्रकार छुड़ाये जाते हैं, यह जानते हुए भी दाग-धब्बे छुड़ाते समय कुछ महत्त्वपूर्ण बातें जान लेनी चाहिएं जो निम्नलिखित हैं –
1. दाग-धब्बा तुरन्त छुड़ाया जाना चाहिए। इसके लिए धोबी पर निर्भर नहीं रहना चाहिए क्योंकि तब तक ये दाग-धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
2. दाग-धब्बे छुड़ाने में रासायनिक पदार्थों का कम मात्रा में प्रयोग करना चाहिए।
3. घोल को वस्त्र पर उतनी देर तक ही रखना चाहिए जितनी देर तक धब्बा फीका न पड़ जाए, अधिक देर तक रखने से वस्त्र कमज़ोर पड़ जाते हैं।
4. चिकनाई को दूर करने से पूर्व उस स्थान के नीचे किसी सोखने वाले पदार्थ की मोटी तह रखनी चाहिए। धब्बे को दूर करते समय रगड़ने के लिए साफ़ और नरम पुराने रुमाल का प्रयोग किया जा सकता है।
5. धब्बे उतारने का काम खुश्क हवा में करना चाहिए ताकि धब्बा उतारने के लिए प्रयोग किये जाने वाले रसायनों की वाष्प के दुष्प्रभाव से बचा जा सके।
6. दाग किस प्रकार का है, जब तक इसका ज्ञान न हो तब तक गर्म जल का उपयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि गर्म जल में कई तरह के धब्बे और अधिक पक्के हो जाते हैं।
7. रंगीन वस्त्रों पर ये धब्बे छुड़ाते समय कपड़े के कोने को जल में डुबोकर देखना चाहिए कि रंग कच्चा है अथवा पक्का।
8. धब्बा छुड़ाने की विधियों का ज्ञान अवश्य होना चाहिए क्योंकि विभिन्न वस्तुओं का प्रयोग अलग-अलग धब्बों को छुड़ाने हेतु किया जाता है।
9. ऊनी वस्त्रों पर से धब्बे छुड़ाते समय न तो गर्म जल का प्रयोग करना चाहिए और न ही क्लोरीन-युक्त रासायनिक पदार्थ का। (10) एल्कोहल, स्प्रिट, बैन्जीन, पेट्रोल आदि से दाग छुड़ाते समय आग से बचाव रखना चाहिए।

प्रश्न 5.
गर्म कपड़े धोने के समय कौन-कौन सी सावधानियाँ अपेक्षित हैं?
उत्तर :
गर्म कपड़े धोने के समय निम्नलिखित सावधानियाँ अपेक्षित हैं –

  1. ऊनी वस्त्रों को धोते समय रगडना तथा पीटना नहीं चाहिए।
  2. ऊनी वस्त्रों को धोने से पूर्व अधिक देर तक भिगोकर नहीं रखना चाहिए।
  3. ऊनी कपड़ों को कभी उबालना नहीं चाहिए।
  4. ऊनी वस्त्र धोने के लिए पानी बिल्कुल गुनगुना होना चाहिए। पानी का ताप सदैव एक-सा होना चाहिए।
  5. ऊनी वस्त्र धोने के लिए मृदु जल का ही प्रयोग करना चाहिए। अधिक क्षारयुक्त पानी से ऊन सख्त हो जाती है व सूखने पर पीली पड़ जाती है।
  6. ऊनी वस्त्र धोने के लिए साबुन क्षाररहित होना चाहिए। तीव्र क्षार का ऊन पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है।
  7. रंगीन ऊन के कपड़ों के लिए रीठों के घोल या डिटर्जेन्ट्स का प्रयोग करना चाहिए।
  8. सफ़ेद ऊनी कपड़ों को धोने के लिए घरेलू ब्लीचिंग घोलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यदि किसी ब्लीचिंग की आवश्यकता अनुभव की जाए तो हल्के हाइड्रोजन पर ऑक्साइड का प्रयोग करना चाहिए।
  9. वस्त्र को तब तक पानी में खंगालना चाहिए जब तक कि उसका साबुन या झाग पूर्णरूप से निकल न जाए।
  10. वस्त्र को पानी में आखिरी बार खंगालने से पहले पानी में थोड़ा-सा नील डाल देना चाहिए।
  11. ऊनी कपड़े को निचोड़ने के लिए उसे मोटे रोएंदार तौलिये में रखकर दोनों हाथों में चारों तरफ से दबाना चाहिए।
  12. काफ़ी मात्रा में अपने अन्दर पानी सोख लेने के कारण गीले ऊनी कपड़े भारी हो जाते हैं। उन्हें धोने के बाद तार पर टांग कर नहीं सुखाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से कपड़ा लम्बा तथा बेडौल हो जाता है।
  13. ऊनी कपड़े को उल्टा करके सेज या चारपाई पर छायदार स्थान पर सुखाना चाहिए।
  14. सुखाने पर कपड़े को उल्टा करके गीला कपड़ा रखकर इस्तरी करनी चाहिए।
  15. ऊनी कपड़ों को अधिक मैला होने से पहले ही धो लेना चाहिए।

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प्रश्न 6.
गर्म कपड़े धोने से पहले क्या तैयारी करोगे ?
उत्तर :
1.  गर्म कपड़ा कहीं फटा या उधड़ा हुआ हो तो ठीक कर लेना चाहिए ताकि धोने के समय छेद बड़ा न हो जाए।
2. गर्म कपड़े की बुनाई बड़ी खुली होती है जिससे उसमें मिट्टी फँस जाती है। इसलिए धोने से पहले कपड़ों को अच्छी तरह झाड़ना चाहिए।
3. धुलाई क्रिया को सफल बनाने के लिए गर्म वस्त्रों पर शोधक पदार्थों की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसके विषय में जानकारी होनी चाहिए।
4. गर्म वस्त्र में प्रयोग किए रेशों के अनुरूप, अनुकूल शोधक पदार्थों को ही चुनना – और प्रयोग करना चाहिए।
5. गर्म वस्त्रों पर दाग-धब्बे छुड़ाने वाले विभिन्न रसायनों तथा प्रतिकर्मकों आदि की क्या प्रतिक्रिया होती है, इसकी जानकारी रखनी चाहिए।
6. गर्म वस्त्रों की सफलतापूर्वक धुलाई के लिए उन्हें किस विधि से धोया जाए इसकी जानकारी आवश्यक है। वस्त्र की रचना के अनुसार ही विधि का प्रयोग करना चाहिए।

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चित्र-गर्म कपड़ा धोने की तैयारी

7. सभी प्रकार के वस्त्रों को एक साथ मिलाकर नहीं धोना चाहिए। वस्त्रों को किस्म, रचना, रंग आदि के अनुसार छांटकर अलग-अलग धोना चाहिए।
8. कम गन्दे वस्त्रों को अधिक गन्दे वस्त्रों के साथ नहीं धोना चाहिए।
9. वस्त्रों को धोने से पूर्व उनका निरीक्षण कर लेना चाहिए। यदि कहीं से सिलाई खुल गई हो या छेद आदि हो गया हो तो पहले उनकी मरम्मत करनी चाहिए।
10.  वस्त्र पर यदि कोई दाग या धब्बा लग गया है तो पहले उसे दूर करना चाहिए।
11. धोने से पूर्व वस्त्रों की जेबें देख लेनी चाहिएँ और यदि उनमें कुछ भी है तो उसे निकाल देना चाहिए।
12. धुलाई से पूर्व धुलाई में आवश्यक सहायक उपकरणों का पूर्व प्रबन्ध कर लेना चाहिए। इसमें समय की बचत होती है।
13. धुलाई में प्रयोग आने वाले रासायनिक प्रतिकर्मकों को बच्चों से दूर रखना चाहिए।
14. धुले वस्त्रों को सुखाने की उचित विधि का प्रयोग तथा उचित प्रबन्ध करना चाहिए।
15. धुलाई के लिए मृदु जल का प्रयोग करना चाहिए।
16. धोकर सुखाए वस्त्रों को तुरन्त प्रैस (इस्तरी) कर देना चाहिए।

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प्रश्न 7.
एक गर्म स्वेटर को कैसे धोओगे और प्रैस करोगे ?
उत्तर :
गर्म स्वेटर पर प्रायः बटन लगे रहते हैं। यदि कुछ ऐसे फैन्सी बटन हों जिनको धोने से खराब होने की सम्भावना हो तो उतार लेते हैं। यदि स्वेटर कहीं से फटा हो, तो सिल लेना चाहिए। अब स्वेटर का खाका तैयार करते हैं। इसके उपरान्त गुनगुने पानी में आवश्यकतानुसार लक्स का चूरा अथवा रीठे का घोल मिलाकर हल्की दबाव विधि से धो लेते हैं। तत्पश्चात् गुनगुने साफ़ पानी में तब तक धोते हैं जब तक सारा साबुन न निकल जाए। ऊनी वस्त्रों के लिए पानी का तापमान एक-सा रखते हैं तथा ऊनी वस्त्रों को पानी में बहुत देर तक नहीं भिगोना चाहिए वरन् इनके सिकुड़ने का भय हो सकता है। इसके बाद एक रोएंदार (टर्किश) तौलिए में रखकर उसको हल्के हाथों से दबाकर पानी निकाल लेते हैं। फिर खाके पर रखकर किसी समतल स्थान पर छाया में सुखा लेते हैं।

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चित्र-गर्म वस्त्र का खाका बनाना
प्रैस करना-सूखने के बाद वस्त्र को उल्टा करके उसके ऊपर गीला कपड़ा रखकर इस्तरी करनी चाहिए।

प्रश्न 8.
कपड़ों को सम्भालकर रखना क्यों ज़रूरी है? आप रेशमी कपड़ों को कैसे सम्भालोगे ?
उत्तर : कपड़ों को सम्भालकर रखना बहुत ज़रूरी है ताकि उनको टिड्डियों आदि से बचाया जा सके। गर्मियों के मौसम में गर्म कपड़ों को अच्छी तरह सम्भालकर रखना चाहिए ताकि गर्म कपड़ों वाला कीड़ा न खाए।

रेशमी कपड़ों को सम्भालना अथवा भण्डारण –

  1. रोज़ पहनने वाले कपड़ों को हैंगर में लटकाकर अलमारी में रखना चाहिए।
  2. सूरज की तेज़ रोशनी से रंग फीके पड़ जाते हैं, इसलिए इन्हें तेज़ रोशनी में नहीं रखना चाहिए।
  3. कपडों को मैली स्थिति में कई दिनों तक नहीं रखना चाहिए। हमेशा कपड़ों को साफ़ करके सम्भालना चाहिए।
  4. गर्मियों में जब रेशमी कपड़े न पहनने हों तो उन्हें किसी पुरानी चादर, सूती धोती, तौलिये या गुड्डी कागज़ में लपेटकर रखना चाहिए।
  5. सम्भालकर रखे जाने वाले कपड़ों में माया (माँड) लगाकर नहीं रखना चाहिए।

प्रश्न 9.
कपड़ों को सम्भाल कर रखना क्यों ज़रूरी है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 8 का उत्तर।

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प्रश्न 10.
सूती और ऊनी कपड़ों को सम्भालते समय कौन-कौन सी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है ?
अथवा
सूती कपड़ों की सम्भाल आप कैसे करेंगे ?
उत्तर :
सूती कपड़ों की सम्भाल करते समय ध्यान रखने योग्य बातें निम्नलिखित हैं –

  1. कपड़ों को हमेशा धोकर और अच्छी तरह सुखाकर रखना चाहिए।
  2. कपड़ों पर माया (कलफ) लगाकर अधिक दिन के लिए नहीं रखना चाहिए।
  3. प्रेस करने के बाद कपड़े को पूरी तरह समाप्त करके ही कपड़ों को सम्भालना चाहिए।
  4. नमीयुक्त कपड़ों में फफूंदी लग जाती है जिससे कपड़े कमज़ोर हो जाते हैं तथा उन पर दाग लग जाते हैं। अतः बरसात में कपड़ों की अलमारी या सन्दूक में कपड़े अच्छी तरह बन्द रहने चाहिए। धूप निकलने पर उन्हें धूप लगवाते रहना चाहिए।
  5. कपड़ों को नमी वाले स्थान में भूलकर भी नहीं रखना चाहिए।

ऊनी कपड़ों की सम्भाल –

  1. ऊनी कपड़ों की सम्भाल करने से पूर्व उन्हें ब्रुश से अच्छी तरह झाड़ लेना चाहिए।
  2. जो कपड़े गन्दे हों उन्हें धोकर या सूखी धुलाई (ड्राइक्लीनिंग) कराकर रखना चाहिए।
  3. ऊनी कपड़ों के बक्से, अलमारी आदि में धूप व हवा लगवाते रहना चाहिए।
  4. कपड़ों को नमी की हालत में या नमी के स्थान पर नहीं रखना चाहिए।
  5. जब बक्से में कपड़े बन्द किए जाएँ तो उनमें नैफ्थलीन की गोलियाँ, कपूर या नीम के सूखे पत्ते रखकर अच्छी प्रकार बन्द करना चाहिए।
  6. प्रत्येक कपड़े को अखबार के कागज़ में लपेटकर रखा जा सकता है, छपाई की स्याही के कारण कपड़ों को कीड़ा नहीं लगता।

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प्रश्न 11.
दाग उतारने के क्या नियम हैं तथा क्यों जरूरी हैं ?
उत्तर :
कपड़े पर लगा दाग एक चिह्न होता है जो कपड़े के रंग से अलग किस्म का होता है। इससे कपड़े की सुन्दरता खराब हो जाती है। कई तेजाबी दाग कपड़े में छेद भी कर देते हैं। इसलिये दाग को जल्दी से जल्दी उतारना चाहिए। दाग उतारने के नियम इस प्रकार हैं
1. दाग जब ताज़ा हो तो उस समय ही उतारने की कोशिश करनी चाहिए। पुराना होने से दाग पक जाता है तथा उतारते समय कपड़ा खराब होने का डर रहता है।
2. दाग लगे कपड़े को कभी भी प्रैस न करें। इससे दाग पक्का हो जाता है।
3. जब भी दाग को उतारना हो, साबुन तथा ठण्डे पानी या थोड़े से गुनगुने पानी से धो लें। गर्म पानी से कई दाग पक्के हो जाते हैं।
4. यदि कपड़ा कीमती हो तथा पानी से धोया न जा सकता हो परन्तु थोड़ा पानी सह सकता हो, तो दाग वाले स्थान पर कपड़े में रूई डालकर इस पैड पर दाग उतारने वाला पदार्थ लगा कर सिर्फ दाग वाले स्थान पर बार-बार पैड दबाना चाहिए।
5. तेल या चिकनाई वाली चीज़ को कपड़े पर जम जाने से रोकना चाहिए।
6. कई चीजें सूखने पर खरोंची जा सकती हैं। ऐसी चीजों को कपड़े पर सूखने के उपरान्त कम धार वाली छुरी से खरोंच लेना चाहिए।
7. दाग उतारने से पहले कपड़े की किस्म का पता करें। क्योंकि प्रत्येक रासायनिक पदार्थ प्रत्येक कपड़े पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
8. कपड़े की किस्म तथा दाग की किस्म जानने के बाद दाग उतारने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली चीज़/रासायनिक पदार्थ का पता करें।
9. जिस कपड़े से दाग उतारना हो, उस कपड़े के ऐसे भाग को जांच लेना चाहिए जो बाहर दिखाई न देता हो जैसे कपड़े की सिलाई नेफे के पास से या पट्टी के उल्टी तरफ या उसके साथ के कपड़े का टुकड़ा आदि।
10. यदि दाग को किसी कपड़े से उतारना हो, तो बाहर से गोल घुमाते हुए अन्दर को आएं। इस प्रकार करने से दाग उस भाग से बाहर नहीं फैलेगा।
11. चिकनाहट आदि का दाग उतारते समय स्याही चूस आदि बार-बार बदल कर रखना चाहिए।
12. दाग उतारने के लिए इस्तेमाल होने वाले रासायनिक पदार्थ का हल्का घोल इस्तेमाल करना चाहिए। हल्के घोल से कई बार धोने का उतना नुकसान नहीं होता जितना कि तेज़ घोल का एक बार प्रयोग करने से होता है। तेज काट पदार्थ प्रयोग करने से कपड़ा फट सकता है या रंगदार कपड़े का असली रंग खराब हो सकता है।
13. यदि दाग उतारने के लिए नमक का घोल इस्तेमाल किया गया है तो बाद में कपड़े पर क्षार का प्रभाव कम करने के लिए हमेशा तेज़ाब के हल्के घोल में धो लें। यदि पहले तेज़ाब का घोल प्रयोग किया गया हो तो बाद में कपड़े को क्षार के हल्के घोल में से निकालना चाहिए ताकि एक दूसरे के प्रभाव से उदासीन किया जा सके ।
14. दाग वाले कपड़े को दाग उतारने वाले घोल में केवल उतनी देर ही रखना चाहिए जब तक दाग न उतर जाए। यदि कपड़े को उस घोल में पड़ा रहने देंगे तो यह कपड़े के रेशों तक पहुंच कर उनको खराब कर सकता है या कमजोर बना सकता है।
15. दाग उतारने के पश्चात् कपड़े को दो-तीन बार साधारण पानी तथा साबुन से धोना चाहिए ताकि कपड़े में किसी किस्म का बाहरी पदार्थ न रह जाए।
16. रासायनिक पदार्थों को दाग उतारने के लिए खुली हवा में प्रयोग करें। दाग उतारने के लिये रासायनिक पदार्थ कभी भी आग के नज़दीक न लाएं क्योंकि रासायनिक पदार्थों को आग लगने का खतरा होता है।
17. यदि दाग की किस्म का पता लगे तो सबसे कम हानिकारक प्रतिकारक से निम्नलिखित ढंग प्रयोग करना चाहिए –
(i) दाग वाले कपड़े को ठण्डे पानी में भिगो दें।
(ii) गुनगुने पानी में भिगो दें, थोड़ी देर बाद साबुन से धो लें।
(iii) यदि कपड़ा सफ़ेद हो तो धूप में काफ़ी समय के लिए रख दें।
(iv) लवणयुक्त हल्के घोल का इस्तेमाल करें।
(v) तेज़ाब वाले हल्के घोल का इस्तेमाल करें।
(vi) यदि इससे भी दाग न उतरे तो ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच से यत्न करें।
(vii) यदि इनमें से किसी चीज़ से धब्बा फीका हो जाता है परन्तु उतरता नहीं तो बार बार उसी चीज़ का प्रयोग करें। पर घोल में तेज़ाब या क्षार की मात्रा ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

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प्रश्न 12.
दाग उतारने के लिये दाग की किस्म जानना क्यों ज़रूरी है ? और किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर :
दाग उतारने से पहले इसकी किस्म जानना आवश्यक है क्योंकि दाग की पहचान करने पर दाग को उतारने में आसानी रहती है। मुख्य तौर पर दाग चार किस्म के होते हैं –

  1. वनस्पति दाग (फूल, फल, सब्जियां)
  2. पाश्विक दाग (दूध, खून, अण्डा)
  3. चिकनाई के दाग (घी, मक्खन, पनीर)
  4. रासायनिक दाग (स्याही, रंग, दवाइयां)

इन चार किस्मों के दागों के स्रोत अलग-अलग हैं। इसलिये इनको उतारने के लिये भिन्न-भिन्न पदार्थों की आवश्यकता होती है जैसे वनस्पति दागों को लवणयुक्त पदार्थों, पाश्विक दागों को ठण्डे पानी तथा साबुन, चिकनाहट वाले दागों को गर्म पानी पर रंगकाट तथा रासायनिक पदार्थों को रंगकाट से उतारा जा सकता है। यदि दाग उतारने के लिए किसी ग़लत पदार्थ का प्रयोग कर लें तो दाग भी नहीं उतरता तथा कपड़ा भी खराब हो जाता है। इसलिये दाग उतारने के लिये दाग की किस्म को जानना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त दाग उतारते समय निम्नलिखित बातों का भी ध्यान रखना चाहिए

दाग उतारते समय ध्यान रखने योग्य बातें –

1. दाग की पहचान – दाग उतारने से पहले इसकी पहचान करनी आवश्यक है क्योंकि भिन्न-भिन्न किस्म के दाग भिन्न-भिन्न चीजों से उतरते हैं। इनकी पहचान इनके रंग, सुगन्धों तथा छूने से भी की जा सकती है। जैसे घास का रंग हरा, खून का लाल, चाय का खाकी होता है। पालिश तथा लिप्सटिक, रंग रोगन के दाग सूंघने पर पता लग सकते हैं। पाश्विक दाग से कपड़े अकड़ जाते हैं।

2. दाग लगने का समय – दाग की पहचान के बाद यह पता लगाना चाहिए कि दाग ताज़ा या पुराना है क्योंकि ताज़े दाग कई बार पानी तथा साबुन की साधारण धुलाई से निकल जाते हैं, जबकि पुराने दाग को उतारना काफ़ी मुश्किल होता है। दाग जितना ज्यादा पुराना होगा, उतारने में उतनी मुश्किल आती है। ताजे दाग की पहचान कपड़े को हाथ लगाने तथा सूंघने पर हो सकती है। ताजा दाग कई बार गीला होता है तथा उसमें ताज़गी की चमक होती है।

3. कपड़े की पहचान-जिस कपड़े पर दाग लगा हो वह किस किस्म के रेशों से बना हुआ है क्योंकि प्रत्येक किस्म के दाग उतारने वाले रासायनिक पदार्थ प्रत्येक किस्म के कपड़ों पर नहीं प्रयोग किये जा सकते। यदि कुछ रासायनिक पदार्थ कुछ किस्म के रेशों के लिये ठीक हैं तो वह दूसरी किस्म के कपड़ों के लिये हानिकारक भी सिद्ध हो सकते हैं। कपड़े निम्नलिखित किस्मों के रेशों से बने हो सकते हैं –

(क) वनस्पति से प्राप्त होने वाले रेशे-ये कपास, जूट तथा पटसन से प्राप्त होते हैं। इन बने कपड़ों से दाग उतारना काफ़ी आसान है। क्योंकि इनको पानी में धोने से कोई हानि नहीं होती। इनके ऊपर रासायनिक पदार्थों का कम बुरा प्रभाव होता है। तेज़ाब से यह रेशे जल जाते हैं।

(ख) जानवरों से प्राप्त होने वाले रेशे-ये जानवरों की ऊन तथा रेशम के कीड़ों से प्राप्त होते हैं। ये पानी में भिगोने पर कमजोर हो जाते हैं। इसलिए दाग उतारते समय इनको ज्यादा देर पानी में नहीं रखना चाहिए। इन पर रासायनिक पदार्थ ज्यादा बुरा प्रभाव डालते हैं। इसलिये इनसे दाग उतारते समय विशेष सावधानी प्रयोग करनी चाहिए। विशेषतया लवणयुक्त पदार्थ इनके लिये बहुत हानिकारक हैं। रगड़ कर दाग उतारने से यह कपड़े जल्दी फट जाते हैं।

(ग) कृत्रिम रेशे-ये रासायनिक पदार्थों से प्राप्त होते हैं; जैसे-कि टैरालीन, नाइलोन, एक्रीलिक आदि। इन पर पानी तथा रासायनिक पदार्थों का कम प्रभाव पड़ता है। इसलिये इनसे दाग उतारने आसान हैं। वैसे भी इन रेशों में दाग कम ही समाते हैं, जिसके कारण कई बार साधारण धुलाई से भी दाग उतर जाते हैं।

4. कपड़े का रंग-कपड़े की किस्म की पहचान करने के पश्चात् उसके रंग की ओर भी ध्यान देना चाहिए। सफ़ेद कपड़ों से दाग उतारने काफ़ी आसान हैं। परन्तु रंगदार कपड़ों से दाग उतारने थोड़े मुश्किल होते हैं। क्योंकि कुछ रासायनिक पदार्थ दाग उतारते समय कपड़े के असली रंग को भी खराब कर देते हैं, जिससे दाग वाला स्थान और भी भद्दा लगने लगता है। ऐसी किस्म के रंगदार कपड़ों से दाग उतारते समय ऐसी किस्म के रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करें जो कपड़े के रंग पर प्रभाव न डालें या फिर दाग को बिना उतारे ही रहने दें।

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प्रश्न 13.
दाग उतारते समय आप किन तीन बातों को ध्यान में रखोगे ?
उत्तर :
नोट-देखें उपरोक्त प्रश्न।

प्रश्न 14.
कपड़ों से दाग उतारने वाले ऑक्सीकारक ब्लीच कौन-कौन से हैं तथा इनसे किस किस्म के कपड़ों से तथा कैसे दाग उतारे जाते हैं ?
अथवा
आक्सीडाइजिंग ब्लीच क्या है ? इनके दो उदाहरण दें।
उत्तर :
साधारणतया दो प्रकार के ब्लीच (रंगकाट) कपड़े के दाग उतारने के लिए प्रयोग किये जाते हैं।

ब्लीच की किस्में –
1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच
2. रिड्यूसिंग ब्लीच।

1. ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच – इनका प्रयोग जब दाग पर किया जाता है तो इनमें ऑक्सीजन दाग के रंग से मिलकर उसको रंग रहित कर देती है जिससे दाग उतर जाता है। ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच की निम्नलिखित किस्में हैं –

(क) खुली हवा तथा धूप – यह कपड़ों को सफ़ेद करने का रंगकाट का सबसे पुराना, सस्ता तथा आसान ढंग है। जब सूती तथा लिनन के कपड़ों को घास पर फैला कर सुखाया जाता है तो सफ़ेद कपड़े और सफ़ेद होते हैं तथा यदि कोई दाग लगा हो तो वह भी उड़ जाता है।

(ख) जैवले पानी (सोडियम हाइपोक्लोराइड) – सोडियम हाइपोक्लोराइड को ही जैवले पानी कहा जाता है। यह एक शक्तिशाली रंगकाट है। इसको हल्का करके इस्तेमाल किया जा सकता है। ब्लीच करने की प्रक्रिया को तेज़ करने के लिए सिरका भी मिलाया जा सकता है। इस रंगकाट को कभी भी ज्यादा समय के लिये कपडे के सम्पर्क में नहीं रखना चाहिए। जितनी देर आवश्यक है उतनी देर के लिए ही इस्तेमाल करना चाहिए। कपड़ा इसमें सूखना नहीं चाहिए। अच्छी तरह खंगालने के बाद अमोनिया से खंगालना चाहिए परन्तु इसको

(i) सिल्क या ऊन के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।
(ii) रंगदार कपड़ों पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
(iii) कपड़े इसमें उबाले भी जा सकते हैं।

(ग) हाइड्रोजन परऑक्साइड – यह अधिकतर कपड़ों के लिए सुरक्षित तथा प्रभावशाली रसायन है। आवश्यकता अनुसार इसका हल्का या गाढ़ा घोल बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है। इसको ज्यादा प्रभावशाली बनाने के लिये इसमें अमोनिया या सोडियम परबोरेट थोड़ी मात्रा में मिलाया जा सकता है। सूती तथा लिनन के कपड़ों पर सीधा गाढ़े घोल का इस्तेमाल किया जा सकता है। शेष कपड़ों के लिये 1 : 6 भाग पानी डालकर घोल बनाकर इस्तेमाल किया जा सकता है।

(घ) सोडियम परबोरेट – यह बोरेक्स, कासटिक सोडा तथा हाइड्रोजन परऑक्साइड से बनाया जाता है। कपड़ों पर इस्तेमाल करने से पहले इसको एस्टिक अम्ल से उदासीन किया जा सकता है। यदि क्षार माध्यम बनाना हो तो अमोनिया मिलाया जा सकता है। हाइड्रोजन परऑक्साइड की तरह ही गर्म पानी से प्रयोग करने पर यह विशेष प्रभाव देता है।

(ङ) लाल दवाई या पोटाशियम परमैंगनेट – यह बिना किसी जोखिम के प्रयोग किया जाने वाला ब्लीच है, पसीना, फफूंदी के दागों को इससे साफ किया जाता है। इससे दाग उतारते समय इसका अपना भूरा रंग कपड़े पर किया जाता है। इसको सोडियम हाइड्रोसल्फाइड तथा फिर हाइड्रोजन परऑक्साइड में डुबोकर साफ किया जा सकता है।

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प्रश्न 15.
वस्त्रों की सुरक्षा हेतु या देखरेख में प्रयोग की जाने वाली सावधानियां कौन-कौन सी हैं?
उत्तर :
वस्त्र कितने भी कीमती, मज़बूत क्यों न हों किन्तु यदि उनकी ठीक से देखरेख नहीं की जायेगी तो वे अधिक दिनों तक नहीं चल सकेंगे। वस्त्रों की देखरेख के सम्बन्ध में अग्रलिखित बातों की ओर ध्यान देना चाहिए –

  1. वस्त्रों को अधिक दिनों तक गन्दे नहीं पड़े रहने देना चाहिए, उन्हें शीघ्र धो डालना चाहिए।
  2. गन्दे वस्त्रों को चूहे कुतर डालते हैं। उन्हें इधर-उधर नहीं रखना चाहिए। उन्हें एक डलिया (टोकरी) में डालकर रखना चाहिए।
  3. कपड़ों के फट जाने पर या उनमें छेद हो जाने पर उन्हें तुरन्त रफू करना चाहिये। रफू न करने से कपड़ा और अधिक फटने लगता है।
  4. कोट-पैन्ट आदि कपड़ों को टांग कर रखना चाहिए।
  5. वस्त्रों को सदैव तह करके अलमारी में रखना चाहिये।
  6. कलफ लगे कपड़ों को अधिक दिनों तक बिना प्रैस के नहीं रखना चाहिये।
  7. नये पुराने कपड़ों को पर्याप्त धूप लगवाने के बाद सन्दूक में रखना चाहिए जिससे उनकी सीलन दूर हो जाये।
  8. ऊनी वस्त्रों को रखते समय विशेष सावधानी का प्रयोग करना चाहिए। ऊनी वस्त्रों को धूप लगवाकर, पेट्रोल से साफ़ करके या ड्राइक्लीनिंग करवा कर फिनाइल की गोलियां रखकर सन्दूक में बन्द करके रखना चाहिए।
  9. रेशमी कपड़ों को भी अलमारी में टांगकर रखना चाहिये।
  10. वस्त्रों को रखने के बॉक्स में छेद नहीं होना चाहिये अन्यथा चूहे आदि घुसकर कपड़े काट सकते हैं।

प्रश्न 16.
वस्त्रों को धोने से पूर्व उनकी मरम्मत करना क्यों आवश्यक है?
उत्तर :
कपड़ों से धूल-मिट्टी तथा गन्दगी हटाने के लिए उनको धोना ज़रूरी है और वस्त्रों की धुलाई से पूर्व मरम्मत ज़रूरी है। यदि किसी कपड़े में खोंच लग गयी हो तो उसे मरम्मत किए बिना कदापि नहीं धोना चाहिए। यदि कपड़ा कहीं से उधड़ गया है या सीवन खुल गयी हो तो उसे धोने से पहले सिलाई कर देनी चाहिए वरना उसके और अधिक उधड़ने का भय रहता है। कपड़े में यदि छोटे-छोटे छेद हो गए हों तो उन्हें धोने से पहले रफू कर लेना चाहिए। यदि कपड़ा अधिक फटा हो या छेद अधिक बड़ा हो तो उसमें पैबन्द लगा लेना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो पैबन्द उसी रंग तथा डिजाइन के कपड़े का लगाना चाहिए। कपड़ों के बटन टूट गये हों तो उन्हें पहले ही टांक लेना चाहिए।

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प्रश्न 17.
वस्त्रों की धुलाई क्यों आवश्यक है ? अथवा धुलाई के क्या-क्या लाभ हैं?
अथवा
वस्त्रों की धुलाई के दो लाभ बताएं।
उत्तर :
1. व्यक्ति के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए कपड़ों का स्वच्छ सुन्दर होना अति आवश्यक है। धुलाई द्वारा कपड़ों में से अनेक प्रकार के कीटाणु दूर हो जाते हैं एवं स्वच्छ पहनने से व्यक्ति प्रसन्नचित रहता है।
2. कपड़ों द्वारा मनुष्य के व्यक्तित्व का परिचय मिलता है। धुले हुए स्वच्छ एवं इस्तरी किए हुए कपड़े व्यक्ति के गुणों को अभिव्यक्त करते हैं तथा गन्दे कपड़े व्यक्ति के व्यक्तित्व सम्बन्धी दोषों के प्रतीक हैं।
3. ओढ़ने-पहनने के कपड़ों में से पसीने आदि की दुर्गन्ध आने लगती है अत: दुर्गन्ध को कपड़ों की धुलाई द्वारा दूर किया जाता है।
4. कपड़ों की समय पर धुलाई न की जाए तो ऊनी, रेशमी तथा धातवीय तन्तुओं के वस्त्रों में अक्सर कीड़ा लग जाता है। गन्दगी से कपड़े की वास्तविक आयु भी शीघ्र समाप्त हो जाती है अतः कपड़ों की सुरक्षा हेतु उनकी धुलाई अथवा सफाई अति आवश्यक है।
5. बचत की दृष्टि से भी कपड़ों की धुलाई आवश्यक है। कपड़ों की धुलाई में खर्च किया हुआ पैसा अथवा गर्म कपड़ों की ड्राइक्लीनिंग में जो पैसा खर्च होता है, वह कपड़े की लम्बी अवधि तक चलने से वसूल हो जाता है। सही तरीके से कपड़ों को स्वच्छ रखा जाए तो वे काफ़ी लम्बे समय तक चलते हैं।
6. सौंदर्य की दृष्टि से भी कपड़ों का स्वच्छ होना आवश्यक है क्योंकि गन्दे कपड़े असुन्दर तथा स्वच्छ कपड़े सुन्दर माने जाते हैं।

प्रश्न 18.
धोबी से कपड़े धुलवाने की अपेक्षा घर पर कपड़े धोना अधिक उचित क्यों होता है?
अथवा
धोबी से कपड़े धुलवाने में क्या-क्या हानियां हैं?
उत्तर :
धोबी से कपड़े धुलवाने से निम्नलिखित हानियां हैं –

  1. धोबी से कपड़े धुलवाने में धन अधिक खर्च होता है।
  2. धोबी कपड़ों को बार-बार भट्टी लगाकर धोते हैं तथा पत्थर पर कूट-कूट कर साफ़ करते हैं, इससे कपड़ों का जीवन आधा रह जाता है।
  3. रंगीन कपड़ों का रंग फीका या खराब हो जाता है।
  4. धोबी के यहाँ रोगियों आदि के कपड़े भी धुलने के लिए आते हैं इसलिए अन्य कपड़ों को भी छूत के रोगाणु लगने का भय रहता है। ये रोगाणु स्वस्थ शरीर में रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
  5. धोबी से कपड़े धुलवाने से कई जोड़े कपड़ों की आवश्यकता होती है जो हर परिवार के लिए सम्भव नहीं है।
  6. धोबी प्रायः कपड़ों को समय पर नहीं देते अतः उन पर आश्रित नहीं रहा जा सकता है।

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प्रश्न 19.
विशेष अवसरों पर पहनने वाले तथा ऊनी कपड़ों की देखभाल किस प्रकार करनी चाहिए?
उत्तर :
विशेष अवसरों पर पहनने वाले तथा ऊनी कपड़ों की देखभाल-विशेष अवसरों पर पहनने के वस्त्र उच्च श्रेणी के व कोमल होते हैं। सर्दियों में ऊनी कपड़ों का प्रयोग करना पड़ता है। ये दोनों प्रकार के कपड़े कभी-कभी निकाले जाते हैं; जैसे-ऊनी कपड़ों को सर्दियों में ही निकाला जाता है तथा कुछ को विशेष अवसरों पर ही निकाला जाता है। अतः इनकी देखभाल की बहुत आवश्यकता रहती है। यदि इनकी देखभाल में लापरवाही बरती जाये तो इनमें कीड़ा लग जाता है या इनकी आकृति बिगड़ जाती है।

इनकी देखभाल हम निम्नलिखित प्रकार से कर सकते हैं –

1. इन वस्त्रों का संग्रह करने से पहले इनमें धूप व हवा लगा ली जाये लेकिन ज्यादा देर तक इन्हें धूप में न रखा जाये क्योंकि रेशमी वस्त्र ज्यादा देर तक धूप में रखने से खराब हो जाते हैं।
2.  वस्त्रों को रखने से पूर्व ब्रुश से झाड़ लिया जाये। ब्रुश से झाड़ने से पहले सारी जेबों को खाली करके उसे अच्छी तरह से हिलाओ या झटका मारो।
3. विशेष अवसरों पर पहनने वाले वस्त्र घर पर धोने से खराब हो जाते हैं अतः इनकी शुष्क धुलाई करवानी चाहिए।
4. कीमती सोने-चांदी से जड़े एवं बनारसी वस्त्र डस्ट प्रूफ बैग में रखने चाहिए। परन्तु इन वस्त्रों को जिसमें रखा जाए उसमें डी० डी० टी० का स्प्रे या अन्य किसी प्रकार का प्रतिकारक डाल देना चाहिए।
5. पहनने वाले ऊनी वस्त्रों को उतार कर हैंगर पर लटका देना चाहिए। यदि कोट आदि की बांह में पतला कागज़ लगा दिया जाए, तो उसकी बांह की आकृति ठीक बनी रहेगी। हैंगर पर वस्त्र को लटकाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि उसकी बाहें हैंगर पर ठीक प्रकार से जम गई हैं या नहीं।
6. वस्त्रों को नमी वाले स्थानों पर नहीं रखना चाहिए। नमी वाले स्थान पर रखने से कपड़ों में फफूंदी लग जाती है। वस्त्र को सूखे स्थान पर लटका कर तथा वस्त्र को ब्रश से झाड़ कर रखना चाहिए।
7. तम्बाकू, सूखी नीम की पत्तियां, देवदार वृक्ष की छाल, कपूर तथा फिनाइल की गोलियां ऊनी कपड़ों के साथ रखनी चाहिये। ये गोलियां तभी तक उपयोग होती हैं जब तक इनमें सुगन्ध बनी रहती है। वस्त्रों को कीटाणुओं से बचाने के लिए नेफ्थलीन की गोलियां अधिक प्रभावशाली होती हैं। पेराडाइक्लोरोबेन्जीन सर्वोत्तम प्रतिकारक है किन्तु यह महंगा है।
8. समस्त ऊनी वस्त्रों को पुराने अखबार के कागज़ में बाँधकर रखना चाहिये क्योंकि कीटाणुओं को अखबार की स्याही रुचिकर प्रतीत नहीं होती।
9. हाइड्रोसायनिक एसिड सेंक करने पर कीटाणु नष्ट हो जाते हैं किन्तु इसका प्रयोग केवल विशेषज्ञ कर सकते हैं अन्यथा यह हानिकारक सिद्ध हो सकती है।
10. कृमिनाशक पदार्थ का ऊन में मिश्रण करने से या तो जीवाणु नष्ट हो जाते हैं या ऊन उनके लिए अपाच्य हो जाती है।

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प्रश्न 20.
आप अपनी माता जी का ऊनी शाल का संग्रह कैसे करेंगे ?
अथवा
ऊनी कपड़ों का भण्डारण कैसे करोगे ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 19 का उत्तर।

प्रश्न 21.
वस्त्रों पर कलफ करते समय क्या सावधानियां प्रयोग में लानी चाहिए ?
उत्तर :
वस्त्रों पर कलफ करते समय निम्नलिखित सावधानियां प्रयोग करनी चाहिएं –

  1. जिन वस्त्रों को कलफ देना है, उनमें साबुन बिल्कुल नहीं होना चाहिए। कपड़ा बिल्कुल साफ़ पानी से निकला होना चाहिए।
  2. कलफ का गाढ़ापन कपड़े की बनावट पर निर्भर करता है। अगर कपड़ा पतला है तो गाढ़ा कलफ। अगर कपड़ा मोटा है तो पतला कलफ प्रयोग में लाना चाहिए।
  3. जो रंगीन कपड़े हैं उनके लिए ठंडी विधि के द्वारा कलफ प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि गर्म कलफ से रंग खराब हो जाएगा।
  4. अगर कपड़ों में चमक बढ़ाना चाहते हैं तो कलफ के घोल में थोड़ा तारपीन का तेल अथवा बोरेक्स डालना चाहिए।
  5. अगर कलफ का घोल गाढ़ा है और पतला करना है तो गर्म पानी मिलाना चाहिए। गर्म पानी मिलाने से घोल एक जैसा पतला हो जाएगा।
  6. कपड़े को कलफ लगाते समय कलफ वाले पानी में अच्छी तरह हिलाना चाहिए। इससे कपड़े के सब तरफ घोल लग जाएगा।
  7. जब कलफ लग जाता है, कपड़े का फालतू पानी निकाल कर अच्छी तरह झटक ले ताकि उसकी सिलवटें निकल जाएं, धूप में सुखाना चाहिए।
  8. वस्त्र जब सूख जाएं तो कपड़े को थोड़ा खींच लेना चाहिए ताकि उसके लम्बाई और चौड़ाई के धागे सीधे हो जाएं।
  9. जैसे ही कपड़े में थोड़ी नमी रहती है तो हमें इस्तरी कर लेनी चाहिए। थोड़ी नमी पर इस्तरी करने से उसमें चमक आ जाती है और कपड़ा थोड़ा कड़ा हो जाता है।
  10. अगर हमें कपड़ों को नील लगाना है तो उनके कलफ में ही नील डाल देना चाहिए।

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प्रश्न 22.
सिल्क की साड़ी धोने के लिए किस विधि का इस्तेमाल करोगे तथा क्यों ? रेशमी वस्त्रों को धोने के सामान्य नियम क्या हैं ?
उत्तर :
सिल्क की धुलाई दबाने तथा निचोड़ने की विधि द्वारा की जाती है। बहुत गन्दे भागों को हल्का सा रगड़ लें अगर बहुत गन्दी है तो साबुन के घोल में बोरेक्स या अमोनिया मिला लें। वस्त्र को दो या तीन बार हल्के गर्म पानी से निकाल लें। इसके लिए दबाने तथा निचोड़ने की विधि का इस्तेमाल इसलिए किया जाता है क्योंकि यह कोमल और सुन्दर होती है। अत्यधिक रगड़ से इसके तन्तु खराब हो जाते हैं। इसको अधिक रगड़ना नहीं चाहिए क्योंकि इसके तन्तु कमज़ोर पड़ जाते हैं। इन वस्त्रों में नाइट्रोजन काफ़ी मात्रा में होती है। इसलिए इन पर अम्ल और क्षार का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। इनकी धुलाई निम्नलिखित तरह से करनी चाहिए –

1. धोने से पहले तैयारी – कटे-फटे वस्त्र की मरम्मत कर लेनी चाहिए नहीं तो धोने की प्रक्रिया में थोड़ा सा फटा कपड़ा ओर फट जाएगा। वस्त्र पर लगे दाग धब्बों को भी हटा लेना चाहिए। हमें इसके लिए अम्लीय प्रकृति वाले प्रतिकिर्मक का हल्का घोल प्रयोग करना चाहिए।

2. धोना-इनको धोने के लिए डिटर्जेन्ट तथा हल्के गर्म पानी का प्रयोग करना चाहिए। परन्तु अन्तिम धुलाई ठण्डे पानी में होनी चाहिए। साबुन के घोल में हल्का बोरेक्स या अमोनिया डालते ही वस्त्र अधिक साफ़ हो जाते हैं। वस्त्र का जो भाग अधिक गन्दा है इस के लिए हमें हल्के साबुन का घोल प्रयोग करना चाहिए और थोड़ा रगड़ भी सकते हैं।

3. खंगालना – कपड़े का पानी बदल-बदल कर तब तक खंगालें जब तक सारा साबुन न निकल जाए। आखिर के पानी में कुछ बूंदें सिरके की डालनी चाहिएं। इससे चमक आ जाती है। सिरका अधिक पड़ जाने पर दोबारा साफ पानी में खंगाल लें क्योंकि अम्ल से रेशे कमजोर हो जाते हैं।

4. कलफ लगाना रेशमी वस्त्रों पर कडापन लाने के लिए गोंद के पानी का प्रयोग करना चाहिए। प्रायः वस्त्र को कलफ की आवश्यकता नहीं होती अगर गीले कपड़े पर लोहा कर दिया जाये।

5. सुखाना – छाया में सुखाना चाहिए क्योंकि धूप में सुखाने से सफ़ेद वस्त्र पीला पड़ जाता है रंगीन वस्त्रों का रंग उड़ जाता है।
6. परिसज्जा-इनको इस्तरी करते समय गीला करने की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि इन्हें सुखाते समय थोड़ी गीली अवस्था में ही हटा लिये जाते हैं। इस्तरी करते समय पानी के छींटे नहीं देने चाहिएं क्योंकि इससे दाग पड़ जाते हैं।

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प्रश्न 23.
सफेद सूती कपड़ों की धुलाई किस प्रकार करेंगे ?
उत्तर :
1. धुलाई से पहले तैयारी-धुलाई से पहले कटे-फटे वस्त्रों की मरम्मत करनी चाहिए तथा उधड़ा भाग सिल लें। दाग धब्बे निकाल लें।
2. छंटाई-रंग, मैल, गन्दगी, मोटाई के अनुसार छंटाई कर लेनी चाहिए।
3. भिगोना-कपड़ों को साबुन आदि के घोल में कुछ समय तक भिगोना चाहिए। इस प्रकार मैल उगल जाती है तथा धुलाई में अधिक समय नहीं लगता। अधिक मैले वस्त्र को अधिक समय तक भिगोएं। यदि भिगोने के लिए गर्म पानी का प्रयोग किया जाए तो वस्त्र और भी अच्छी प्रकार साफ होते हैं।
4. धुलाई-गर्म पानी तथा साबुन से धुलाई करनी चाहिए। अधिक गन्दे वस्त्रों को पानी में उबाला भी जा सकता है। मोटे वस्त्रों को ज़ोर से रगड़ें तथा पतले वस्त्रों को हल्का रगड़ें। कालर कफ को अच्छी तरह रगड़ें।
5. खंगालना-धुलने के बाद वस्त्रों को बार-बार साफ पानी में से खंगालें, तब तक खंगालें जब तक साबुन का सारा अंश निकल न जाए।
6. कलफ तथा नील-सफेद कपड़ों को नील देना चाहिए तथा व्यक्तिगत वस्त्रों को हल्की कलफ लगाएं।
7. सुखाना-धूप तथा खुले स्थान पर सुखाएं परन्तु अधिक देर तक धूप में रखने से पीलापन आ जाता है।

प्रश्न 24.
नायलॉन की साड़ी धोने की विधि का वर्णन करें।
उत्तर :
नायलॉन एक बनावटी तन्तु है तथा इसे निम्न विधि से धोया जाता है –

  1. धोने से पहले तैयारी-कटे-फटे वस्त्रों की मरम्मत करनी चाहिए तथा दाग-धब्बे निकाल लेने चाहिएं।
  2. धोना-अच्छे स्तर के डिटर्जेंट से इन्हें धोना चाहिए तथा हल्का धोना चाहिए। यदि अधिक मैला हो तो अधिक डिटर्जेंट डाल कर रगड़ कर मैल साफ करें।
  3. खंगालना-चार-पांच बार साफ पानी में खंगालें। खंगालने के बाद ऐंठन देकर निचोड़ना नहीं चाहिए इससे तन्तु विकृत हो जाते हैं। हाथ के हल्के दाब से निचोड़ें।
  4. सुखाना-वस्त्र को छायादार स्थान पर सुखाना चाहिए। धूप में वस्त्र खराब हो सकता है।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) एक शब्द में उत्तर दें –

प्रश्न 1.
एक पाश्विक दाग का उदाहरण दें।
उत्तर :
दूध का दाग।

प्रश्न 2.
अस्थाई भारी पानी को कैसे ठीक करेंगे ?
उत्तर :
उबाल कर।

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प्रश्न 3.
साबुन की झाग किस पानी में नहीं बनती ?
उत्तर :
भारी पानी में।

प्रश्न 4.
घास का दाग कैसा है ?
उत्तर :
वनस्पतिक दाग।

(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. स्थाई भारे पानी में कैल्शियम के ………. घुले होते हैं।
2. ऊन का तन्तु ………. तथा मुलायम होता है।
3. ………. पानी में साबुन की झाग आसानी से बनती है।
4. सोडियम बाइसल्फाइड ………. ब्लीच है।
5. ………. को जैवले पानी कहते हैं।
6. ऊनी वस्त्र को सुखाने के लिए ………. पर नहीं लटकाना चाहिए।
उत्तर :
1. क्लोराइड तथा सल्फेट
2. कोमल
3. हल्के
4. अपाच्य
5. सोडियम हाइपोक्लोराइड
6. तार।

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(ग) ठीक/गलत बताएं –

1. गोंद का प्रयोग कड़ापन लाने के लिए किया जाता है।
2. ऊन पर क्षारीय घोल का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
3. ऊनी वस्त्र गीले होने पर मजबूत हो जाते हैं।
4. एनीलिन नील पानी में घुलनशील नील है।
5. ऊनी वस्त्र पर रिड्यूसिंग ब्लीच का प्रयोग होता है।
6. कपड़े धोने से पहले उनकी छंटाई करनी चाहिए।
उत्तर :
1. (✓) 2. (✓) 3. (✗) 4. (✓) 5. (✓) 6. (✓)

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
निम्न में ठीक है –
(A) सूती वस्त्र को पानी का छींटा देकर धोएं
(B) सफेद वस्त्र पहले धोएं
(C) भारी पानी के साबुन की झाग नहीं बनती
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 2.
ऊन के लिए ठीक नहीं है –
(A) ऊनी वस्त्र को धोकर तार पर डालें
(B) ऊन सर्दी में प्रयोग होती है
(C) ऊन के तन्तु नर्म तथा मुलायम है
(D) अधिक क्षार से ऊन सख्त हो जाती है।
उत्तर :
ऊनी वस्त्र को धोकर तार पर डालें।

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प्रश्न 3.
ऊनी वस्त्रों की धुलाई में कौन-से धोल अधिक प्रचलित है –
(A) पोटाशियम परमैंगनेट
(B) सोडियम परऑक्साइड
(C) हाइड्रोजन परऑक्साइड
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 4.
तेज़ाबी माध्यम वाले रसायन हैं –
(A) अमोनिया
(B) एसटिक एसीड
(C) बारैक्स
(D) कासटिक सोडा।
उत्तर :
एसटिक एसीड।

प्रश्न 5.
ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच नहीं है –
(A) सोडियम बाइसल्फाइड
(B) धूप
(C) पोटाशियम परमैंगनेट
(D) सोडियम परबोरेट।
उत्तर :
सोडियम बाइसल्फाइड।

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प्रश्न 6.
जैवले पानी किसे कहते हैं –
(A) पोटाशियम परमैंगनेट
(B) सोडियम परबोरेट
(C) सोडियम हाइड्रोक्लोराइड
(D) सोडियम बाइसल्फाइड।
उत्तर :
सोडियम हाइड्रोक्लोराइड।

प्रश्न 7.
निम्न में ठीक है –
(A) जैवले पानी एक रंगकाट है
(B) फूल, घास का दाग वनस्पतिक दाग है
(C) दाग उतारते समय वस्त्र के रंग का भी ध्यान रखें
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 8.
निम्न में ठीक है –
(A) ऊनी तथा रेशमी कपड़ों के लिए रिड्यूसिंग ब्लीच का प्रयोग होता है।
(B) धूप भी रंगकाट का काम करती है
(C) धोबी को कपड़े देने से छूत की बीमारी हो सकती है
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 9.
पानी में घुलनशील नील है –
(A) इण्डीगो
(B) अल्ट्रामैरीन
(C) प्रशियन
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 10.
अच्छे साबुन का गुण नहीं है –
(A) साबुन हल्के पीले रंग का हो
(B) हाथ लगाने पर कठोर तथा सूखा होना चाहिए।
(C) अच्छे साबुन का स्वाद ठीक होता है।
(D) सभी।
उत्तर :
हाथ लगाने पर कठोर तथा सूखा होना चाहिए।

प्रश्न 11.
कपड़े में कड़ापन लाने के लिए प्रयोग करें –
(A) मैदा
(B) गोंद
(C) आलू
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

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प्रश्न 12.
निम्न में गलत है –
(A) एसीटिक एसीड के प्रयोग से रेशमी वस्त्रों में चमक आ जाती है
(B) अमोनिया का प्रयोग साबुन की जगह कर सकते हैं
(C) सोडियम बाइसल्फाइट रिड्यूसिंग ब्लीच है।
(D) सभी गलत।
उत्तर :
अमोनिया का प्रयोग साबुन की जगह कर सकते हैं।

प्रश्न 13.
कपड़ों के परिष्करण से सम्बन्धित क्रियाएं हैं –
(A) कपड़ों को इस्तरी करना
(B) स्टीम करना
(C) मेंगल करना
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 14.
धोबी से कपड़े धुलवाने से हानि है –
(A) खर्चीला काम
(B) कपड़े फट सकते हैं
(C) रंग हो सकते हैं
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 15.
छंटाई का ढंग है –
(A) रंग अनुसार
(B) गन्दगी अनुसार
(C) मोटाई अनुसार
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

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प्रश्न 16.
निम्न में ठीक है –
(A) कल्फ देने वाले वस्त्रों में साबुन रह जाए तो अच्छा है
(B) कल्फ का घोल पतला करने के लिए गर्म पानी डालें
(C) वस्त्रों को नमी वाले स्थान पर रखें
(D) कल्फ लगे कपड़ों को कई दिन तक प्रेस न करें।
उत्तर :
कल्फ का घोल पतला करने के लिए गर्म पानी डालें।

प्रश्न 17.
निम्न में गलत है
(A) कोट पेन्ट को टांग कर रखें
(B) धोबी से कपड़े धुलाना सस्ता है।
(C) रक्त का धब्बा पाश्विक दाग हैं।
(D) ताज़े दाग को उतारने की कोशिश करें।
उत्तर :
धोबी से कपड़े धुलाना सस्ता है।

वस्त्रों की देखभाल HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ घर में वस्त्र धोने के लिए कई तरह का सामान चाहिए।
→ वस्त्र धोने का सामान अपनी आर्थिक हालत अनुसार तथा आवश्यकतानुसार ही लो।
→ लाण्डरी बैग में धोने वाले वस्त्र इकट्ठे किये जाते हैं।
→ पानी एक विश्वव्यापी घोलक है, इसमें साधारणत: प्रत्येक प्रकार की मैल घुल जाती है।
→ पानी प्राप्त करने के लिए विभिन्न स्रोत हैं। वर्षा, दरिया, कुएं, चश्मे तथा समुद्र का पानी।
→ समुद्र का पानी वस्त्र धोने के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
→ पानी दो तरह का होता है-हल्का तथा भारी।
→ हल्के पानी में साबुन की झाग शीघ्र बनती है।
→ भारी पानी स्थाई तथा अस्थाई दो तरह का होता है। अस्थाई भारे पानी को उबाल कर हल्का किया जा सकता है।
→ साबुनों को सफ़ाईकारी कहा जाता है। यह चर्बी तथा खारों के मिश्रण से बनता है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल

→ टब, बाल्टियां, चिल्मचियां आदि का प्रयोग नील देने, मावा देने, वस्त्र भिगोने, खंगालने आदि के लिए किया जाता है।
→ फ्लैटों में रहने वाले लोग वस्त्र सुखाने के लिए रैकों का प्रयोग करते हैं।
→ विकसित देशों में वस्त्र सुखाने के लिए बिजली की कैबिनेट का प्रयोग किया जाता है।
→ वस्त्र को साफ़-सुथरी, चमकदार, सिलवट रहित दिखावट प्रदान करने के लिए इस्तरी किया जाता है।
→ ऊन का धागा जानवरों के बालों और पशम से बनता है।
→ ऊन के गीले कपड़ों को हैंगर में टांगकर नहीं सुखाना चाहिए।
→ ऊन का कपड़ा भिगोने से कमजोर हो जाता है। इसलिए इसको सीधा साबुन वाले पानी में धोना चाहिए।
→ ऊनी कपड़े को साबुन वाले पानी में डालकर हाथों से दबाकर धोना चाहिए।
→ प्रैस करने के बाद ऊनी वस्त्रों को हैंगर में डालकर थोड़ी देर हवा में लटकाना चाहिए ताकि कपड़ा अच्छी तरह सूख जाए।
→ ऊनी कपड़े में तह लगने के बाद प्रेस करने की ज़रूरत नहीं होती है।
→ गर्मियों के मौसम में गर्म कपड़ों को अच्छी तरह सम्भाल कर रखना चाहिए ताकि उनको गर्म कपड़ों वाला कीड़ा न खाए।
→ गन्दे कपड़ों को जो धोए जा सकते हों, धोना चाहिए और दूसरों को ड्राइक्लीन करवा लेना चाहिए।
→ जब ऊनी कपड़े बॉक्स में बन्द किए जाएं उनमें सूखी नीम, यूक्लिप्टस के पत्ते या नैफ्थलीन की गोलियां डालनी चाहिएं।।
→ सूती कपड़ों को धोना और सम्भालकर रखना सबसे आसान है।
→ फफूंदी कपड़े को कमजोर कर देती है और इसके दाग भी बड़ी मुश्किल से उतरते हैं।
→ रेशमी कपड़ों के सूरज की रोशनी में रंग खराब हो जाते हैं, इसलिए कपड़े तेज़ रोशनी में नहीं रखने चाहिए।
→ कपड़े पर किसी चीज़ से पड़े निशान को दाग कहा जाता है।
→ दाग की चार किस्में होती हैं-वनस्पति, पाश्विक, चिकनाई दाग तथा खनिज दाग।
→ इन चार किस्मों के दागों को उतारने के लिए भिन्न-भिन्न पदार्थ प्रयोग किए जाते हैं।
→ खुली धूप तथा हवा में कपड़ों से दाग उतारना सबसे पुराना ढंग है।
→ दो प्रकार के रंगकाट ऑक्सीडाइजिंग तथा ब्लीच तथा रिड्यूसिंग ब्लीच दाग उतारने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।
→ स्याही के दाग को रासायनिक दाग कहा जाता है।
→ दूध, अण्डा, खून के दाग को पाश्विक दाग कहा जाता है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल

→ दाग उतारने से पहले दाग की किस्म के बारे में जानना आवश्यक है।
→ हल्के रंगकाट ही दाग उतारने के लिए प्रयोग करने चाहिएं।
→ दाग वाले कपड़े के रेशे की पहचान भी दाग उतारने के लिए आवश्यक है।
→ साबुन चर्बी तथा खार का मिश्रण है।
→ साबुन दो विधियों से तैयार किया जा सकता है-ठण्डी विधि तथा गर्म विधि।
→ साबुन कई तरह के मिलते हैं-साबुन की चक्की, साबुन का चूरा, साबुन का पाऊडर, साबुन की लेस।
→ साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-रीठे, शिकाकाई, रासायनिक साबुन रहित सफ़ाईकारी पदार्थ।
→ सहायक सफ़ाईकारी पदार्थ हैं-कपड़े धोने वाला सोडा, अमोनिया, बोरैक्स, एसिटिक एसिड, ऑग्जैलिक एसिड।
→ रंग काट दो तरह के होते हैं-ऑक्सीडाइजिंग ब्लीच तथा रिड्यूसिंग ब्लीच।
→ नील, टीनोपाल आदि का प्रयोग कपड़ों को सफ़ेद रखने के लिए किया जाता
→ नील दो तरह के होते हैं-घुलनशील तथा अघुलनशील पदार्थ।
→ कपड़ों में ऐंठन अथवा अकड़न लाने वाले पदार्थ हैं-मैदा अथवा अरारोट, चावलों का पानी, आलू, गोंद, बोरैक्स।
→ वस्त्रों की अच्छी धुलाई से वस्त्र नये जैसे तथा स्वच्छ हो जाते हैं।
→ वस्त्र घर में अथवा लाण्डरी में धुलाए जा सकते हैं।
→ वस्त्र धोने से पहले इनकी मरम्मत, छटाई तथा दाग़ उतारने का काम कर लेना चाहिए।
→ वस्त्रों की छंटाई रेशों, रंग, आकार तथा गन्दगी के अनुसार करनी चाहिए।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 10 वस्त्रों की देखभाल

→ सूती वस्त्र पानी में भिगोने पर मजबूत हो जाते हैं जबकि ऊनी तथा रेशमी वस्त्र पानी में भिगो कर रखने पर कमजोर हो जाते हैं।
→ सूती वस्त्रों को कीटाणु रहित करने के लिए उबलते पानी में 10-15 मिनट के लिए रखना चाहिए।
→ सफेद वस्त्र पहले धोने चाहिएं।
→ सूती वस्त्रों को पानी का छींटा देकर प्रैस करो।
→ ऊनी, रेशमी वस्त्रों का रीठा, शिकाकाई, जैंटील आदि से धोना चाहिए।
→ ऊनी वस्त्रों को लटका कर नहीं सुखाना चाहिए।
→ ऊनी वस्त्रों को सीधा प्रैस के सम्पर्क में न लायें।
→ रेशमी सिल्क के वस्त्र को पानी छिडक कर नम न करो बल्कि किसी नम तौलिए में लपेटकर नम करो तथा प्रैस करो।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 आरोग्य भोजन सेवा एवं विभिन्न खाद्य पदार्थों का भण्डारण

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 आरोग्य भोजन सेवा एवं विभिन्न खाद्य पदार्थों का भण्डारण Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 9 आरोग्य भोजन सेवा एवं विभिन्न खाद्य पदार्थों का भण्डारण

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
आरोग्य भोजन सेवा की क्या परिभाषा है ?
उत्तर :
आरोग्य भोजन सेवा का अर्थ है भोजन का ऐसा रख-रखाव जिससे कि वह अति सूक्ष्म जीवों से मुक्त और सुरक्षित रह सके।

प्रश्न 2.
हम भोजन को आरोग्य कैसे रख सकते हैं ?
उत्तर :
भोजन को आरोग्य रखने के लिए हमें कुछ सामान्य नियमों का ध्यान रखना पड़ेगा। वह हैं –

  1. रसोई में स्वच्छता
  2. साफ़-सफ़ाई के साथ भोजन का रख-रखाव
  3. व्यक्तिगत आरोग्य धर्मिता।

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प्रश्न 3.
फ्रिज में रखकर भोजन को खराब होने से बचाना किस सिद्धान्त पर आधारित है ?
उत्तर :
भोजन में एन्जाइम की क्रिया और सूक्ष्म जीवों में वृद्धि तापमान के बढ़ने से बढ़ती है। कम तापमान पर इनकी वृद्धि कम होती है। इसलिए फ्रिज में भोजन को ठण्डा रखा जाता है। इससे भोजन सरक्षित रहता है।

प्रश्न 4.
बन्द डिब्बों और बोतलों में भोजन खराब होने से क्यों बचा रहता है ?
उत्तर :
हवा और नमी का अस्तित्व जीवाणुओं की वृद्धि का कारण बनता है। इसलिए भोजन को सुरक्षित रखने के लिए पहले भोजन को गर्म करके जीवाणु रहित कर लिया जाता है और फिर डिब्बे या बोतलों में बन्द करके हवा रहित बना लिया जाता है। इस तरह भोजन दीर्घकाल तक सुरक्षित रखा जा सकता है।

प्रश्न 5.
मीट और मछली पर जीवाणुओं के प्रभाव के बारे में लिखो।
उत्तर :
मीट तथा मछली पर जीवाणुओं का प्रभाव बहुत शीघ्र होता है क्योंकि मीट में नमी और प्रोटीन अधिक मात्रा में होता है। इसलिए जीवाणु शीघ्र आक्रमण करते हैं और संख्या में शीघ्रता से बढ़ते हैं।

प्रश्न 6.
डबलरोटी को फफूंदी लगने से उस पर कैसे परिवर्तन आ जाते हैं ?
उत्तर :
फफूंदी प्रत्येक प्रकार के भोजन पर पैदा हो जाती है। परन्तु नमी वाले भोजन पर 20-40 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में यह वृद्धि तेजी से होती है। फफूंदी लगने से डबलरोटी का स्वाद बदल जाता है। ऐसी डबलरोटी खाने से आदमी बीमार हो सकता है।

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प्रश्न 7.
भोजन को डिब्बों में बन्द करने से एन्जाइम अपनी क्रिया नहीं कर सकते। बताएं क्यों ?
उत्तर :
एन्जाइम को क्रियाशील होने के लिए हवा का होना बहुत ज़रूरी है। भोजन को डिब्बों और बोतलों में बन्द करते समय हवा रहित कर लिया जाता है ताकि एन्जाइम अपनी क्रिया न कर सकें।

प्रश्न 8.
कुछ बैक्टीरिया लाभदायक परिवर्तन लाते हैं, उदाहरण दो।
उत्तर :
बैक्टीरिया बहुत सूक्ष्म जीव होते हैं जो कम तेजाबी मात्रा वाले भोजनों में पाए जाते हैं। अनुकूल वातावरण में ये बहुत शीघ्रता से बढ़ते हैं और भोजन को खराब कर देते हैं। परन्तु कुछ बैक्टीरिया भोजन में लाभदायक परिवर्तन भी लाते हैं। जैसे दूध से दही और एल्कोहल से सिरका बनाने वाले बैक्टीरिया।

प्रश्न 9.
क्या धातएं भी भोजन को खराब कर सकती हैं ?
उत्तर :
कई धातुओं से मिलकर भी भोजन खराब हो जाता है जैसे तांबे और पीतल के बर्तनों में बनाया भोजन कुछ देर में ही खराब हो जाता है और खाने योग्य नहीं रहता। क्योंकि इन धातुओं से भोजन की रासायनिक क्रिया हो जाती है। इसलिए पीतल के बर्तनों को कलई करवाया जाता है।

प्रश्न 10.
भोजन की मिलावट से आप क्या समझते हो ?
उत्तर :
भोजन में कुछ ऐसी वस्तुओं की मिलावट करनी जो भोजन की कीमत से सस्ती हों या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हों, को भोजन की मिलावट कहा जाता है। जैसे देसी घी में वनस्पति घी मिला देना या अरहर की दाल में हानिकारक केसरी दाल को मिलाना।

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प्रश्न 11.
दालों में आम तौर पर किस वस्तु की मिलावट की जाती है ?
उत्तर :
अनाज की तरह दालों में भी कंकर, पत्थरी, मिट्टी, तिनके तथा अन्य कई बीज मिलाए जाते हैं। कई बार दालों की शक्ल अच्छी करने के लिए हानिकारक रंग भी मिलाए जाते हैं। चने और अरहर की दाल में केसरी दाल मिलाई जाती है तथा मांह और मूंगी की दालों में टैल्कम पाऊडर मिलाया जाता है।

प्रश्न 12.
चाय की पत्ती में मिलावट करने के लिए कौन-कौन से मिलावटी पदार्थ प्रयोग किए जाते हैं ?
उत्तर :
लोहे के बारीक टुकड़े चाय की पत्ती की तरह ही लगते हैं। जिस कारण चाय की इनसे मिलावट की जाती है। यह चाय पत्ती से भारी होने के कारण चाय पत्ती का भार बढ़ जाता है। कई बार प्रयोग की गई चाय पत्ती सुखा कर चाय पत्ती में मिलाई जाती है या वैसे ही पुरानी पत्ती बेची जाती है। मांह की दाल के छिलके भी पीस कर चाय पत्ती में मिलावट के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

प्रश्न 13.
भोजन पदार्थों में मिलावट क्यों की जाती है ?
उत्तर :
भोजन में मिलावट व्यापारियों की ओर से अधिक लाभ कमाने के लिए की जाती है। इसलिए व्यापारी घटिया और सस्ती वस्तुएं भोजन में मिला देते हैं। कई बार ये वस्तुएं स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हो जाती हैं।

प्रश्न 14.
सरसों के बीज में किस वस्तु की मिलावट की जाती है ?
उत्तर :
अर्गमोन के बीज तथा एरगट के बीज (Argemone seeds and ergot seeds) देखने में सरसों के बीजों की तरह लगते हैं इसलिए इनकी मिलावट सरसों के बीजों में आसानी से की जा सकती है।

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प्रश्न 15.
भोजन पदार्थों में मिलावट करने के क्या नुकसान हैं ? किन्हीं दो के बारे में लिखें।
उत्तर :
1. अधिक लाभ कमाने के लालच में कई व्यापारी और दुकानदार खाने वाली वस्तुओं में भी मिलावट कर देते हैं, जिससे वह वस्तुएं खाने वाले व्यक्ति के स्वास्थ्य का नुकसान होता है। जैसे अरहर की दाल में केसरी दाल मिलाने से खाने वाले को अधरंग हो जाता है।
2. खाने वाली वस्तुओं में वर्जित रंगों के प्रयोग से जिगर खराब हो जाता है और कैंसर भी हो सकता है।

प्रश्न 16.
बनावटी रंग कौन-कौन से भोजन पदार्थों में मिलाए जाते हैं और इनके क्या नुकसान हैं ?
उत्तर :
आइसक्रीम, मिठाइयां, बिस्कुट, शर्बत, सक्वैश आदि वस्तुओं में वर्जित और आवश्यकता से अधिक रंगों के प्रयोग से गुर्दे और जिगर खराब हो जाते हैं, कैंसर भी हो सकता है। गर्भवती औरत के भ्रूण में विकार पैदा हो सकते हैं।

प्रश्न 17.
क्या भोजन में मिलावटी पदार्थ का पता लगाया जा सकता है ?
उत्तर :
हाँ, भोजन में मिलावटी पदार्थ का पता चल सकता है। परन्तु इसके लिए जानकारी की आवश्यकता है। जैसे अनाज में एरगट के बीजों की जाँच करने के लिए अनाज को नमक वाले पानी में डालने से एरगट के बीज ऊपर तैर आते हैं। इस तरह दूध में मैदा या स्टार्च की मिलावट आयोडीन के कुछ तुपके मिलाने से पता चल सकती है। दूध का आयोडीन मिलाने के पश्चात् नीला या काला रंग स्टार्च का अस्तित्व दर्शाता है।

प्रश्न 18.
काली मिर्च में किस चीज़ की मिलावट की जा सकती है ? इसकी पहचान कैसे करोगे ?
उत्तर :
काली मिर्च में पपीते के बीज सुखा कर मिलाए जाते हैं। परन्तु पानी में डालने से पपीते के बीज पानी की स्तह पर तैरने लगते हैं।

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प्रश्न 19.
ड्रॉप्सी (Dropsy) नामक बीमारी कौन-से पदार्थ की मिलावट से होती है ?
उत्तर :
सरसों या दूसरे खाने वाले तेलों में यदि अधिक देर तक अर्गमोन की मिलावट वाला तेल प्रयोग किया जाए तो इस से ड्रॉप्सी नाम की बीमारी लग सकती है।

प्रश्न 20.
खराब होने वाले और न खराब होने वाले भोजन में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
खराब होने वाले भोजन वे पदार्थ होते हैं जिनको अधिक देर तक सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इन में दध और दध से बने पदार्थ, हरी सब्जियां, मीट, मछली आदि भोजन आते हैं। न खराब होने वाले भोजन वे भोजन हैं, जिनको प्राकृतिक रूप में दीर्घकाल के लिए खराब होने के बिना रखा जा सकता है, जैसे-गेहूँ, चावल, दालें, चीनी, घी आदि।

प्रश्न 21.
मक्खन को कहाँ और कैसे सम्भाला जा सकता है ?
उत्तर :
मक्खन बहुत जल्दी खराब होने वाली वस्तु है। ये सभी वस्तुओं से जल्दी पिघलता है और खराब होकर बदबू मारने लगता है। इस लिए इसको ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। इस को फ्रिज में रखना चाहिए। यदि फ्रिज न हो तो ठण्डे पानी में मक्खन वाला बर्तन रखें और दिन में तीन बार पानी बदलें।

प्रश्न 22.
भोजन की सम्भाल से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
भोजन की सम्भाल से अभिप्राय भोजन को दीर्घकाल के लिए हानिकारक जीवाणुओं और रासायनिक तत्त्वों के प्रभाव से खराब होने से बचाना है ताकि भोजन की सुगन्ध, रंग और पौष्टिकता में कोई अन्तर न पड़े।

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प्रश्न 23.
खराब भोजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
भोजन की नमी और रासायनिक तत्त्वों के परिवर्तन से भोजन की रचना, स्वाद और गुणों में अन्तर पड़ जाता है। ऐसे भोजन खाने योग्य नहीं रहते। यदि ऐसे भोजन को खा लिया जाए तो व्यक्ति बीमार हो सकता है।

प्रश्न 24.
पोषण तत्त्वों का संरक्षण करने के चार उपाय बताओ।
उत्तर :
देखें दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 1.

प्रश्न 25.
शीघ्र नष्ट होने वाले भोज्य पदार्थों के नाम बताएँ।
अथवा
कोई भी चार शीघ्र नष्ट होने वाले भोज्य पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर :
दूध, फल, हरी पत्तेदार सब्जियां।

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प्रश्न 26.
किन्हीं चार अर्धविकारीय खाद्य पदार्थों के नाम बताएं।
उत्तर :
मक्की का आटा, इमली, चावल का आटा, मक्खन।

प्रश्न 27.
फ्रिज में भोज्य पदार्थों को रखने से उन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 3।

प्रश्न 28.
कोई चार अविकारीय खाद्य पदार्थों के नाम बताएं।
उत्तर :
गेहूँ, दाल, मसाले, तेल।

प्रश्न 29.
डबलरोटी का भण्डारण आप कैसे करेंगे ?
उत्तर :
इसको डबलरोटी रखने वाले डिब्बे में ही रखना चाहिए जिसमें कि हवा न जा सके।

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प्रश्न 30.
अण्डों का भण्डारण आप कैसे करोगे ?
उत्तर :
ठण्डे स्थान पर रखकर जैसे फ्रिज में।

प्रश्न 31.
दीर्घकालीन सुरक्षित रहने वाले भोज्य पदार्थों के नाम लिखें।
उत्तर :
गेहूं, दालें, मसाले, तेल, भुनी मुंगफली आदि।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
घरों में प्रयोग किए जाने वाले भोजन पदार्थ कितनी प्रकार के होते हैं ?
अथवा
भोज्य पदार्थों को हम कैसे वर्गीकृत कर सकते हैं ?
उत्तर :
भोजन पदार्थ जल्दी खराब नहीं होते परन्तु नमी युक्त भोजन पदार्थ जैसे-फल, सब्जियां आदि कुछ समय के बाद खराब हो जाते हैं। भोजन पदार्थों की नमी के आधार पर भोजन पदार्थों को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जाता है –

  1. शीघ्र खराब होने वाले भोजन पदार्थ (Perishable Foods)-जैसे-दूध, मांस, फल, हरी पत्तेदार सब्जियां आदि।
  2. कुछ समय के लिए सुरक्षित रहने वाले भोजन (Semiperishable Foods) जैसे-आलू, प्याज, लहसुन, अरबी आदि।
  3. दीर्घकाल तक सुरक्षित रहने वाले भोजन (Non-Perishable Foods)-इन भोजन पदार्थों में नमी नाममात्र ही होती है। यह काफ़ी समय तक सुरक्षित रह सकते हैं जैसे अनाज, दालें, मूंगफली आदि।

प्रश्न 2.
भोजन को सम्भालने से क्या भाव है ?
उत्तर :
पौष्टिक तथा सन्तुलित भोजन को तैयार करने के लिए भोजन पदार्थों की देखभाल करनी बहुत ज़रूरी है। उचित ढंग के साथ सम्भाला भोजन अधिक समय तक चल सकता है। जब कभी किसी विशेष भोजन पदार्थ की कमी महसूस हो तो सम्भाले हुए भोजन पदार्थ को प्रयोग में लाया जा सकता है। भोजन की सम्भाल से अभिप्राय भोजन को दीर्घकाल तक हानिकारक जीवाणुओं तथा रासायनिक तत्त्वों के प्रभावाधीन खराब होने से बचाना है ताकि इसके रंग-रूप, सुगन्ध तथा पौष्टिक तत्त्वों में कोई अन्तर न आए।

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प्रश्न 3.
भोजन को सम्भालने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
1. भोजन की सम्भाल से भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है।
2. भोजन पर खर्च होने वाला समय तथा धन की बचत की जा सकती है जैसे मौसम में फल तथा सब्जियां सस्ते मिल जाते हैं। इसको आचार, चटनियां, जैम, मुरब्बे तथा शर्बत आदि बनाकर सम्भाला जाता है तथा दूसरे मौसम में जबकि भोजन पदार्थ नहीं मिलते तो प्रयोग में लाया जा सकता है।
3. मौसमी फल तथा सब्जियों की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। उनको सम्भालकर रखने से नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
4. भोजन पदार्थों को सम्भालकर रखने से सन्तुलित भोजन तैयार करना सरल हो जाता है। क्योंकि भोजन पदार्थों की सम्भाल करने से पौष्टिक तत्त्वों को भी सम्भाल कर रखा जाता है।
5. भिन्न-भिन्न ढंगों से सम्भालकर रखे भोजन को दीर्घकाल तक प्रयोग किया जा सकता है। जैसे फल तथा सब्जियों के आचार, चटनियां, जैम आदि बनाए जा सकते हैं। जैसे कई सब्जियों को सुखा कर भी लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। जैम-साग, मेथी, मटर आदि।

प्रश्न 4.
गर्मियों की ऋतु में भोजन जल्दी खराब हो जाता है, क्यों ?
उत्तर :
गर्मियों की ऋतु में भोजन जल्दी खराब होने का कारण सूक्ष्मजीव होते हैं। गर्मियों का तापमान सूक्ष्म जीवों के बढ़ने, फूलने और एंजाइमों की क्रिया के लिए ज्यादा अनुकूल होता है। इसलिए सूक्ष्म जीव भोजन में बढ़ते-फूलते हैं और उसको खराब कर देते हैं। गर्मियों में भोजन को इसी कारण ही ठण्डी जगहों जैसे फ्रिज और कोल्ड स्टोरों में रखा जाता है।

प्रश्न 5.
भोजन में मौजूद एंजाइम कैसे परिवर्तन लाते हैं ? उदाहरण दो।
उत्तर :
भोजन में कई तरह के एंजाइम होते हैं जोकि भोजन में कई तरह के परिवर्तन लाते हैं। पहले तो यह भोजन को पकाने का कार्य करते हैं जोकि हमारे हित में होता है परन्तु पकने के बाद यह भोजन को गलाने-सड़ाने के लिए भी ज़िम्मेदार हैं। इनकी क्रिया खास तापमान और हवा पर निर्भर करती है। हवा और तापमान दोनों को घटा कर एंजाइमों की प्रतिक्रिया को कंट्रोल किया जा सकता है। भोजन पदार्थों को हवा रहित डिब्बियों में बन्द कर एंजाइमों से भोजन को कुछ समय के लिए बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
किस प्रकार के सूक्ष्म जीवों के कारण भोजन खराब हो सकता है ? नाम बताओ।
उत्तर :
भोजन पदार्थ और सूक्ष्मजीव क्रिया करके इनको खराब कर देते हैं।
1. खमीर-गर्मियों में कई बार गुंथा आटा रात भर फ्रिज से बाहर रह जाए तो यह फूल जाता है इसको खमीर हो जाना कहते हैं। यह सूक्ष्म जीवों के कारण ऐसा होता है।
2. बैक्टीरिया-ये कम तेज़ाब वाले भोजन पदार्थों में होते हैं। अनुकूल वातावरण मिलने से ये जल्दी बढ़ते हैं। कुछ ही दिनों में एक बैक्टीरिया से लाखों करोड़ों बैक्टीरिया पैदा हो जाते हैं।
3. फंगस-फंगस हर तरह के भोजन से पैदा हो सकती है। परन्तु नमी वाले भोजन पदार्थों में जल्दी बढ़ती फूलती है। फंगस लगने से भोजन का स्वाद खराब हो जाता है, सड़ जाता है और खाने से हानि होती है।

प्रश्न 7.
मक्खियां भोजन को कैसे खराब करती हैं ? कीड़े, काकरोच और चूहे भोजन को कैसे खराब करते हैं और खराब होने से कैसे बचाया जा सकता है ?
उत्तर :
मक्खियां – मक्खियां गन्दी जगहों पर बैठती हैं। इनकी टांगों से बीमारी के जर्म चिपके होते हैं। जब ये भोजन पदार्थ पर बैठती हैं तो ये जर्म भोजन के ऊपर छोड़ देती हैं। ऐसा भोजन खाकर कई बार बीमारियां भी लग जाती हैं।

बचाव – मक्खियों से बचाव के लिए भोजन को जालीदार अल्मारियों या डोली में रखा जाता है। कीड़े, काकरोच आदि भी भोजन को खराब करते हैं। ज्यादा कीड़ियों वाला भोजन कड़वा हो जाता है। चूहे भी भोजन को कुतरते हैं और बीमारियों के जर्म छोड़ देते हैं।

बचाव – इनके बचाव के लिए डोली (जाली वाली) के पावे को पानी में रखो। चीजों को बन्द पैकटों, डिब्बों, टीनों आदि में रखो। जहां चींटियों का घर हो वहां कीट-नाशक दवाइयां डाल दो। चूहों से बचाव के लिए आटा, सूखी सेवियों और दालों आदि को बन्द टीनों में रखो। अनाज को ड्रमों में रखकर चूहों से और सुसरियों से बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 8.
सूखे पदार्थ जैसे कि अनाज को कैसे और कहां सम्भाल कर रखा जा सकता है ?
उत्तर :
अनाज को आमतौर पर बोरियों में रखा जाता है परन्तु इनको चूहे कुतर देते हैं। आजकल ऐसी बोरियां मिलती हैं जिनको चूहे खराब नहीं कर सकते। अनाज को टीन के बड़े-बड़े ड्रमों में भी रखा जा सकता है। बोरियों को तूड़ी में रखने से इसको सुसरी नहीं लगती। अनाज में नीम के सूखे पत्ते भी मिलाए जा सकते हैं। चावलों को बहुत समय रखना हो तो धान के रूप में रखा जा सकता है। इनमें हल्दी या कुछ नमक मिला कर भी सुरक्षित रखा जाता है। सूखी दालों आदि को बन्द पैकटों या हवा बन्द डिब्बों में रखा जाता है।

प्रश्न 9.
अर्गीमोन के बीज किस में मिलाए जाते हैं और इनका क्या नुकसान है ?
उत्तर :
सरसों या दूसरे खाने वाले तेल में इनकी मिलावट की जाती है।
अर्गीमोन की मिलावट वाले तेल के प्रयोग से जिगर का आकार बढ़ जाता है। आंखों की रोशनी कम हो जाती है। ज्यादा देर तक ऐसा तेल प्रयोग किया जाए तो आदमी अन्धा भी हो सकता है। दिल की बीमारी हो सकती है। ड्रॉप्सी नाम की बीमारी हो सकती है।

प्रश्न 10.
भोजन की मिलावटों से अपने आप को कैसे बचाओगे ?
उत्तर :
भोजन की मिलावटों से अपने आप को निम्नलिखित ढंगों से बचाया जा सकता है –

  1. भोजन भरोसेमन्द दुकानदारों से खरीदो।
  2. ऐग्मार्क, आई० एस० आई० या एफ० पी० ओ० मार्के वाली चीजें ही खरीदनी चाहिएं।
  3. तेल और पत्ती डिब्बा बन्द ही खरीदनी चाहिएं क्योंकि खुले पदार्थों में मिलावट हो सकती है।
  4. शंका होने की स्थिति में पदार्थ का नमूना मिलावट जांच करने वाली संस्थाओं को भेजना चाहिए।

प्रश्न 11.
‘आरोग्य धर्मी भोजन सेवा’ को परिभाषित करें।
उत्तर :
इसका अर्थ है सुरक्षित भोजन परोसना। इस लक्ष्य की प्राप्ति व्यक्तिगत स्वच्छता एवं क्षेत्र की सफाई बरकरार रखकर की जा सकती है।

प्रश्न 12.
खाद्य पदार्थों का वर्गीकरण कैसे कर सकते हैं ?
उत्तर :
हम खाद्य पदार्थों को तीन प्रकार से वर्गीकृत कर सकते हैं –

1. विकारीय खाद्य पदार्थ जो जल्दी खराब हो जाते हैं जैसे-दूध, हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ आदि।
2. अविकारीय खाद्य पदार्थ जो लम्बे समय तक खराब नहीं होते जैसे-गेहूँ, दाल, मसाले, तेल आदि।
3. अधर्विकारीय खाद्य पदार्थ जो अविकारीय खाद्य पदार्थों से जल्दी खराब हो जाते हैं परन्तु विकारीय खाद्य पदार्थों से बाद में खराब होते हैं जैसे-मैदा, सूजी, बेसन, मक्खन आदि।

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प्रश्न 13.
निम्नलिखित खाद्य पदार्थों को विकारीय, अर्धविकारीय एवं अविकारीय वर्गों में बांटिए –
बाजरा, साबूदाना, मक्के का आटा, शिमला मिर्च, बैंगन, छाछ, क्रीम, इमली, पालक, चावल का आटा, भूनी मूंगफली, पुदीना, दही।
उत्तर :
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प्रश्न 14.
खाद्य पदार्थों के भण्डारण का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
इसका अर्थ है खाद्य पदार्थों को सम्भाल कर रखना। उचित भण्डारण से खाद्य पदार्थों की रक्षा न केवल चूहों और कीड़ों से बल्कि नमी और कीटाणुओं से भी होती है।

प्रश्न 15.
कुछ अविकारीय खाद्य पदार्थों का उदाहरण देकर बताइए कि आप उनका भण्डारण कैसे करेंगे ?
उत्तर :
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प्रश्न 16.
अर्धविकारीय खाद्य पदार्थों का भण्डारण कैसे करेंगे ?
अथवा
अधर्विकारीय खाद्य पदार्थ कौन से हैं ? उनका भण्डारण कैसे करोगे ?
उत्तर :
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प्रश्न 17.
गेहूँ, दालों व मसालों का भण्डारण कैसे करोगे ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 15, 16 का उत्तर।

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प्रश्न 18.
चावल एवं दाल को बार-बार क्यों नहीं धोना चाहिए ?
उत्तर :
पानी में घुलनशील विटामिन तथा अन्य पोषक तत्त्वों का नाश होता है इसलिए चावल तथा दाल को बार-बार नहीं धोना चाहिए।

प्रश्न 19.
पोषक तत्त्वों का संरक्षण क्या होता है ?
उत्तर :
भोजन पकाते समय पोषक तत्त्वों को नष्ट न होने देना पोषक तत्त्वों का संरक्षण है जैसे तेज़ गर्मी पर विटामिन सी, ए आदि नष्ट हो जाते हैं इसलिए अत्यधिक समय तक गर्म नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार जब सब्जी आदि को छीलते हैं तो इसे बहुत ही पतला निकालना चाहिए क्योंकि इसमें कई पोषक तत्त्व होते हैं। इसी प्रकार दालों आदि को अधिक बार धोने से भी पोषक तत्त्व नष्ट होते हैं।

प्रश्न 20.
सब्जियों को काट कर धोने से क्या क्षति (हानि) होती है ?
उत्तर :
सब्जियों को काट कर धोने से इनमें मौजूद पानी में घुलनशील विटामिन तथा अन्य पोषक तत्त्व पानी के साथ निकल जाते हैं तथा सब्जी के पोषक गुणों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 21.
पोषक तत्त्वों के संरक्षण के कोई दो उपाय बताएं।
उत्तर :

  1. सब्जियों को काट कर नहीं धोना चाहिए।
  2. चावलों को उबालकर पानी को फेंकना नहीं चाहिए।
  3. सब्जियों आदि के छिलके बहुत पतले-पतले निकालने चाहिए।

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प्रश्न 22.
खाना बनाते समय मीठे सोडे का प्रयोग करने का क्या नुकसान है ?
उत्तर :
मीठा सोडा कई पोषक तत्त्वों को नष्ट कर देता है जैसे कई प्रकार के विटामिन इससे नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 23.
भोजन खराब होने के कारण बतायें।
उत्तर :
बैक्टीरिया, नमी, फंगस आदि के कारण भोजन खराब हो सकता है।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
भोजन को सुरक्षित कैसे रखा जा सकता है ?
उत्तर :
ताज़ा तथा साफ़-सुथरा भोजन तन्दरुस्ती के लिए आवश्यक है। भोजन को साफ़-सुथरा तथा खराब होने से बचाने के लिए भोजन की सुरक्षा के बारे में जानना आवश्यक है। भोजन की सुरक्षा के सिद्धान्त निम्नलिखित हैं –
भोजन की सुरक्षा के सिद्धान्त (Principles of Food Preservation) – उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट होता है कि भोजन पदार्थ कई कारणों द्वारा खराब हो जाते हैं जिनको खाने से स्वास्थ्य को हानि पहंचती है। भोजन को खराब होने से बचाने तथा उसमें पाए जाने वाले हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करना, भोजन के रंग-रूप तथा पौष्टिक तत्त्वों को सुरक्षित रखना ही भोजन की सम्भाल करना है। भोजन की सम्भाल के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित
(क) सूक्ष्म जीवाणुओं से बचाना
(ख) एन्ज़ाइम से बचाना
(ग) कीड़े-मकौड़ों से बचाना।

(क) सूक्ष्म जीवाणुओं से बचाना – सूक्ष्म जीवाणुओं से बचाना तथा उनके विकास को रोकना भोजन सुरक्षा का पहला सिद्धान्त है। आमतौर पर भोजन इन जीवाणुओं द्वारा ही खराब होते हैं। भोजन पदार्थ को निम्नलिखित ढंगों द्वारा सूक्ष्म जीवाणुओं से बचाया जा सकता है –

  • जीवाणुओं को दूर रखकर
  • जीवाणुओं को समाप्त करके
  • जीवाणुओं के विकास को रोककर।

1. जीवाणुओं को दूर रखकर – भोजन की सुरक्षा के सिद्धान्त का पालन करते हुए भोजन पदार्थों को जीवाणुओं से दूर रखने के लिए बढ़िया पैकिंग तथा भोजन भण्डार होने ज़रूरी हैं। पैकिंग के लिए गत्ते के डिब्बे से पोलीथिन, टिन तथा प्लास्टिक के हवा बन्द डिब्बे ठीक रहते हैं। जिन स्थानों पर भोजन अधिक मात्रा में सम्भाला गया हो वहां समय-समय पर कीटाणु नाशक दवाइयों का छिड़काव करना चाहिए ताकि जीवाणु पैदा ही न हो सकें।

2. जीवाणुओं को नष्ट करके – जीवाणुओं को पूरी तरह समाप्त करने के लिए निथारना या छानने की विधि का प्रयोग किया जाता है। इस तरीके से सारे जीवाणु भोजन में से अलग हो जाते हैं। यह तरीका आम तौर पर पानी, फलों का रस, जौ का पानी, शर्बत तथा शराब आदि के लिए प्रयोग किया जाता है। निथारना या छानने के लिए जिस फिल्टर का प्रयोग किया जाता है उसको भी पहले कीटाणु रहित किया जाता है।

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3. जीवाणुओं के विकास को रोकना – जीवाणुओं के विकास को रोकने के लिए कई तरीके अपनाए जाते हैं, जिनका वर्णन नीचे दिया गया है –
(i) तापमान को घटाकर या बढ़ाकर (Increasing or Decreasing Temperature) – जब भोजन पदार्थों को बहुत कम तापमान पर रखा जाए तो जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है। इसी कारण भोजन पदार्थों को कोल्ड स्टोरों में सम्भाला जाता है। तापमान को बढ़ाकर भोजन सुरक्षित किया जाता है। जैसे अधिक तापमान पर भोजन पकाने से जीवाणु नष्ट हो जाते हैं या फिर भोजन को निश्चित तापमान पर निश्चित समय के लिए गर्म करके (Sterilization) कीटाणुओं को नष्ट किया जाता है। दूसरा तरीका पाश्चुरीकरण (Pasteurization) है। इसमें भोजन को निश्चित तापमान तथा निश्चित समय के लिए गर्म करके फिर एकदम ठण्डा किया जाता है। इस विधि से भोजन को लम्बे समय तक रखा जा सकता है।

(ii) हवा को रोककर – इस विधि में भोजन को ऐसे तरीके के साथ बन्द किया जाता है कि उसमें हवा को रोककर ऑक्सीजन की कमी पैदा की जाती है। इस तरह ऑक्सीजन की कमी से जीवाणुओं का विकास रुक जाता है।

(ii) नमी घटाकर – जीवाणुओं के विकास के लिए नमी भी एक ज़रूरी तत्त्व है। इसलिए भोजन पदार्थों की सम्भाल के लिए उनमें पाई जाने वाली नमी को घटाना या सुखाना बहुत ज़रूरी है। नमी के सूखने से जीवाणुओं का विकास रुक जाता है। यह तरीका फसल, सब्जियों तथा दूध आदि के लिए प्रयोग किया जाता है।

(iv) रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करके – रासायनिक पदार्थों के प्रयोग से भोजन में पाए जाने वाले जीवाणु खत्म नहीं होते परन्तु भोजन में कुछ ऐसी परिस्थितियां आ जाती हैं जिनसे जीवाणुओं का विकास नहीं हो सकता। साधारणतः प्रयोग किए जाने वाले कुछ रासायनिक पदार्थ सिरका, सोडियम बैनजोएट (Sodium Benzoate) तथा पोटशियम मैटा बाइसल्फाइट (Potassium Meta Bisulphite) हैं।

प्रश्न 2.
भोजन को सूक्ष्म जीवाणुओं से कैसे बचाया जा सकता है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 3.
भोजन संरक्षण के लिए किन-किन रासायनिक पदार्थों का प्रयोग किया जा सकता है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

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प्रश्न 4.
जीवाणुओं के विकास को कैसे रोका जा सकता है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 5.
निम्नलिखित भोजन पदार्थों को आप कैसे सुरक्षित रख सकते हो –
(i) ताज़ी सब्जियां
(ii) दूध
(iii) मक्खन
(iv) अनाज
(v) अण्डे
(vi) मीट तथा मछली
(vii) फल
(viii) मिर्च मसाले
(ix) डबलरोटी
(x) दालें तथा तरी वाली सब्जियां।
उत्तर :
(i) सब्जियां – सब्जियां ताजी ही खरीदनी चाहिएं। पत्ता गोभी को 1-2 दिन में प्रयोग कर लेना चाहिए। घर के सबसे ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। इस प्रकार गाजरों, मूली तथा पत्ते वाली सब्जियों को सम्भालना ज़रूरी है। मटरों को निकालकर लम्बे समय के लिए रखना ठीक नहीं। सब्जियों को अच्छी तरह साफ़ करके फ्रिज में ही सम्भाला जा सकता है। आल, प्याज को तारों वाली टोकरी आदि में डालकर हवा में लटकाना ठीक रहेगा।

(ii) दूध-दूध को सुरक्षित रखने के लिए निथार कर उबाल लेना चाहिए। इससे टाइफाइड आदि के जीवाणु मर जाते हैं। उबालने के बाद किसी बर्तन में डालकर मलमल के कपड़े या जाली के साथ ढककर ठण्डे तथा हवा वाले स्थान पर या फ्रिज में रख लेना चाहिए। इसको मक्खियों से बचाकर रखना चाहिए।

(ii) मक्खन – मक्खन खट्टा हो जाता है, इसको यदि कुछ देर के लिए गर्म स्थान पर रखा जाए तो दुर्गन्ध आने लगती है। इसलिए इसको किसी चीनी या मिट्टी के बर्तन में डाल दो। अब इस बर्तन को किसी अन्य बड़े बर्तन जिसमें कि पानी हो में रखकर ऊपर मलमल के गीले कपड़े के साथ ढक देना चाहिए। मलमल धीरे-धीरे पानी चूसती जाएगी तथा इस पानी के उड़ने से ठण्डक रहेगी या मक्खन को फ्रिज में रखा जा सकता है।

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(iv) अनाज (सूखे पदार्थ) – हमारे देश में अनाज को आम तौर पर बोरियों में रखा जाता है परन्तु चूहे इसको रखने के साथ ही खराब कर देते हैं। परन्तु आजकल ऐसी बोरियां बनाई जा चुकी हैं जिनको चूहे खराब नहीं कर सकते। परन्तु यदि गेहूं, मक्की आदि को ऐसी बोरियों या टिन के बड़े-बड़े ढोलों में रखा जाए, तो इसको चूहों से बचाया जा सकता है। गेहूँ की बोरियां भूसे में रखने से भी उनको सुसरी नहीं लगती तथा ज्यादा समय ठीक रहती हैं। परन्तु अब अनाज को लोहे के ढोलों में डालकर तथा उसमें सल्फास की गोलियां डालकर दीर्घकाल के लिए सम्भाल कर रखा जा सकता है।

चावल को अधिक देर तक सुरक्षित रखने के लिए जीरी (धान) के रूप में रखना चाहिए नहीं तो थोड़ी-सी हल्दी या तेल लगाया जा सकता है। कई बार चावल में नमक या बोरैक्स मिलाकर इनको सुरक्षित रखा जाता है। इनको अन्धेरे वाले तथा नमी वाले स्थानों पर इकट्ठा रखना ठीक नहीं। चावल को तो मिट्टी के बर्तनों में भी नहीं रखना चाहिए क्योंकि यह नमी चूस सकते हैं।

सूखी दालों को जहाँ तक हो सके बन्द पैकटों में ही रखना चाहिए। इनको नमी वाले स्थानों पर नहीं रखना चाहिए या फिर हवा बन्द डिब्बों में। यदि ज्यादा मात्रा में हैं तो नीम के पत्ते डालकर या फिर पारे की गोलियां डालकर भी सम्भाला जा सकता है। आटा दुकान से देखकर खरीदना चाहिए कि पुराना होने के कारण इसमें सुसरी या कीड़े तो नहीं। आटा नमी वाली हवा में बिल्कुल नहीं रखना चाहिए।

(v) अण्डे-अण्डों को भी ठण्डे स्थानों पर ही रखना उचित रहता है। इनको फ्रिज के ऊपर के खाने में रखा जा सकता है।

(vi) पशु जन्य पदार्थ – इन पर जीवाणुओं का प्रभाव बहुत जल्दी होता है। इनको अच्छी तरह ढक कर सबसे ठण्डे स्थान पर रखना चाहिए। यदि फ्रिज की सुविधा हो तो इसमें भी सबसे ठण्डे खाने (Freezer) में रखना चाहिए। रखने से पहले गीले कपड़े के साथ साफ़ कर लेना चाहिए। पानी से धोना नहीं चाहिए। फ्रिज में रखते समय प्लास्टिक के बैग आदि में डालकर रखना ठीक रहता है। यदि फ्रिज की सुविधा न हो तो बाज़ार से लाकर तुरन्त पका लेना ठीक रहता है।

(vii) फल-फल हमेशा ताज़े खरीदने चाहिएं तथा ठण्डे स्थानों पर सम्भालने चाहिएं। यदि घर में फ्रिज हो तो यह उनमें रखे जा सकते हैं। परन्तु केले फ्रिज में बिल्कुल नहीं रखने चाहिएं क्योंकि उसमें इनका ऊपरी छिलका काला हो जाता है।

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(viii) मिर्च-मसाले – इनको ज्यादा मात्रा में खरीदना नहीं चाहिए क्योंकि ज्यादा देर पड़े रहने से इनकी सुगन्ध खत्म हो जाती है। इनको हमेशा ठण्डे, सूखे तथा अन्धेरे वाले स्थान पर रखना चाहिए यदि हो सके तो बन्द बर्तनों में रखना उचित होगा।

(ix) डबलरोटी – इसको डबलरोटी रखने वाले डिब्बे में ही रखना चाहिए जिसमें कि हवा न जा सके।

(r) दालें तथा तरी वाली सब्जियां – इनको खले बर्तन में डालकर आग पर रखकर कुछ देर के लिए उबालना चाहिए तथा 5-10 मिनट के लिए धीरे-धीरे कम आग पर पकने देना चाहिए। फिर आग से उतारकर ढक्कन से अच्छी तरह बन्द करने के बाद ठण्डे स्थान पर रख देना चाहिए। प्रयोग करने से पहले ढक्कन खोलना नहीं चाहिए। जब यह कमरे के तापमान पर पहुंच जाएं तो फ्रिज में भी रखा जा सकता है।

प्रश्न 6.
भोजन की मिलावट से आप क्या समझते हो ? यह क्यों की जाती है ? आम भोजन पदार्थों में की जाने वाली मिलावटें कौन-सी हैं? भोजन में मिलावट के क्या नुकसान हैं ?
उत्तर :
अधिक लाभ कमाने के लालच में कई घटिया व्यापारी और दकानदार खाने वाली वस्तुओं में मिलावट कर देते हैं। भोजन में सस्ती और हानिकारक वस्तुएं मिलाने को भोजन की मिलावट कहा जाता है, जैसे-देसी घी में वनस्पति घी, दूध में पानी, अरहर की दाल में केसरी दाल, दालों में कंकर, मिट्टी आदि। इस तरह जहां ग्राहक को घटिया वस्तुओं के लिए अधिक पैसे देने पड़ते हैं वहां कई बार मिलावटी भोजन स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होता है। मिलावट का अर्थ-तीन कारणों के कारण भोजन को मिलावटी कहा जाता है।

1. सस्ते और घटिया पदार्थ मिलाकर – सस्ते और घटिया पदार्थ मिलाने से भोजन के स्तर (Quality) को घटाया जा सकता है जैसे कि दूध में पानी मिलाना या देसी घी में वनस्पति घी और बासमती चावल में परमल चावल मिलाना आदि।

2. स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ मिला कर – कई बार भोजन में इस तरह के पदार्थ भी मिलाए जाते हैं जोकि सस्ते और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं जैसे कि चनों की दाल या अरहर की दाल में केसरी दाल मिलाना। कई बार अचानक भी स्वास्थ्य प्रतिरोधक पदार्थ भोजन में चले जाते हैं जैसे कि बरसात में बाहर पड़े गेहूँ को फफूंदी लग जाती है जोकि गेहूं में जहर पैदा करती है। यह चाहे अचानक ही हुई हो और किसी ने जान कर न भी की हो फिर भी भोजन की मिलावट ही कहलाती है।

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3. भोजन में से आवश्यक तत्त्वों को निकालकर – आवश्यक तत्त्वों को निकाल कर भी भोजन के स्तर (Quality) को कम किया जाता है। दूध में से क्रीम निकालकर दूध बेचना। इस प्रकार के दूध को भी मिलावटी कहा जाएगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि मिलावट उस को कहा जाता है जब कि भोजन में कोई सस्ता या घटिया पदार्थ मिलाया जाए तो उस में से कुछ निकाला जाए या उस में कोई स्वास्थ्य प्रतिरोधक (Harmful to Health) पदार्थ मिलाया जाए। मिलावट करने के लिए जो पदार्थ प्रयोग किया जाता है उसको मिलावटी पदार्थ (Adultrant) कहते हैं। यह प्रायः वास्तविक भोजन पदार्थ से सस्ता होता है और देखने में मूल पदार्थ की तरह ही दिखाई देता है ताकि मिलावटी पदार्थ को आसानी से पहचाना न जा सके।

प्रायः प्रयोग किए जाने वाले मिलावटी पदार्थ –
लगभग सभी ही खाद्य पदार्थों में मिलावट की जा सकती है। कुछ मिलावटी पदार्थों का विवरण निम्नलिखित दिया गया है –

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भोजन की साधारण मिलावटों के नुकसान

कई मिलावटी पदार्थों का स्वास्थ्य पर कोई नुकसान नहीं होता जैसे दूध में साफ पानी मिलाना और खोए में कारन स्टार्च या संघाड़े का आटा मिलाना परन्तु कई मिलावटी पदार्थ स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक भी हो सकते हैं। कई मिलावटों से मौत तक भी हो सकती है। कुछ मिलावटों के नुकसान निम्नलिखित हैं –

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प्रश्न 7.
हम रसोई में स्वच्छता कैसे रख सकते हैं ?
अथवा
रसोई घर में पालन किए जाने वाले स्वच्छता सम्बन्धी नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर :
रसोई की स्वच्छता का अर्थ है उस क्षेत्र की साफ-सफाई जहाँ भोजन तैयार किया जाता है। इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है यदि निम्न बातों का ध्यान रखा जाए –

  1. रसोई को साफ़ रखें और घर में पनपने वाले जन्तु जैसे-चूहे, मक्खियाँ, तिलचट्टे, मच्छर आदि से रसोई मुक्त रखें।
  2. रसोई में प्रकाश की समुचित व्यवस्था रखें, ताकि आप यह देख सकें कि रसोई में धूल या कीड़े-मकौड़े तो नहीं आ गए।
  3. जहाँ तक संभव हो रसोई का मुख सूर्य की तरफ रखें ताकि धूप रसोई में आए। धूप नमी को दूर करती है और कीटाणु व अन्य जीवाणुओं को मारती है।
  4. नाली व्यवस्था दुरुस्त रखें। नाली का मार्ग हमेशा खुला रहे और पानी जमा न हो।
  5. रसोई में एक ढका हुआ कूड़ेदान रखें। यह निश्चित कर लें कि वह रोज़ खाली कर दिया जाए।
  6. रसोई में प्रयुक्त कपड़े व धूल झाड़ने वाले को समय-समय पर साफ़ करें। उसके लिए गर्म पानी व उपयुक्त डिटर्जेन्ट इस्तेमाल करें।

प्रश्न 8.
रसोईघर की स्वच्छता सम्बन्धी किन्हीं तीन नियमों का उल्लेख करें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 7 का उत्तर।

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प्रश्न 9.
भोजन का रख-रखाव कैसे होना चाहिए जिससे कि वह आरोग्य रहे ?
उत्तर :
इसका अर्थ है कि भोजन बनाते समय स्वच्छता रखी जाए ताकि कोई जीवाणु और गन्दगी हमारे भोजन में प्रवेश न कर सके। यह उसी चरण से शुरू हो जाता है जब हम बाजार से भोजन खरीदते हैं। निम्न सुझावों के अनुसरण से भोजन आरोग्य रह सकता है।

  1. खाद्य पदार्थ का चयन पूर्ण परीक्षण करके ही करें । दूषित व खराब खाद्य पदार्थों को नकार दें।
  2. भोजन का भण्डारण सही तरीके से करें। पका हुआ भोजन फ्रिज में ही रखें। कच्चे भोजन को भी सही जगह और सही तरीके से रखें।
  3. रसोई का काम करने से पहले अच्छी तरह हाथ धोएँ।
  4. पके हुए भोजन को बिना ढके हुए कभी न छोड़ें क्योंकि धूल, गंदगी, कीटाणु एवं मच्छर भोजन को बर्बाद कर सकते हैं।
  5. यदि आप बीमार हैं अथवा सर्दी से पीड़ित हैं तो भोजन के सामने खाँसे या छींके नहीं। इससे भोजन संक्रमित हो सकता है और अन्य सदस्य बीमार हो सकते हैं।
  6. ताजे फलों व सब्जियों को भी अच्छी तरह धोकर खाएँ ताकि धूल व गन्दगी दूर हो जाए।
  7. पके हुए भोजन को साफ़ जगह एवं साफ़ बर्तनों में परोसें। बचे हुए भोजन को फ्रिज में रखें।
  8. छिलके आदि को कूड़ेदान में ही डालें।
  9. यदि फर्श पर कुछ गिरा है तो उसे एकदम साफ़ करें अन्यथा मक्खियाँ, तिलचट्टे उसकी ओर आकर्षित होंगे।
  10. प्रयोग के बाद सारे बर्तनों को साफ़ कर लें।

प्रश्न 10.
व्यक्तिगत स्वच्छता एवं आरोग्य धर्मिता से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
भोजन तैयार करते (पकाते) समय आप स्वच्छता सम्बन्धी जिन नियमों का पालन करेंगे, उनका ब्योरा दें।
अथवा
भोजन पकाते समय आप किन-किन चार बातों को ध्यान में रखोगे ?
उत्तर :
इसका अर्थ है सामान्य स्वास्थ्य और रसोई में काम करने के तरीके। यह इस प्रकार से हैं –

  1. भोजन बनाना आरम्भ करने से पहले अपने हाथों को अच्छी तरह से धोएँ। नाखूनों को सदा कटा हुआ व साफ़ रखें।
  2. बालों को रसोई में हमेशा बाँध कर रखें।
  3. भोजन बनाते समय उसे चखने की प्रवृत्ति से यथा संभव बचें। चखते समय उंगलियों को चाटना और उन्हीं उंगलियों को भोजन बनाने में प्रयोग करना एक बहुत बुरी आदत है।
  4. रसोई में गंदे पैर, गंदी चप्पल या गंदे कपड़ों के साथ न जाएँ। यदि आप ऐसा नहीं करते तो आप अनेक कीटाणु अपने साथ रसोई में ले जाते हैं। इससे आपका भोजन संक्रमित व बर्बाद हो सकता है।
  5. यदि आप बीमार हों तो उस समय भोजन बनाने से बचें। भोजन का रख-रखाव करने वाला व्यक्ति यदि बीमार हो तो वह पूरे परिवार में बीमारी फैला सकता है।

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प्रश्न 11.
विकारीय खाद्य पदार्थों का भण्डारण कैसे करेंगे ?
उत्तर :
विकारीय खाद्य पदार्थ –
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प्रश्न 12.
भोजन खराब होने के क्या कारण हैं ?
उत्तर :
भोजन में पाई जाने वाली नमी तथा रासायनिक तत्त्वों के बदलाव से ही भोजन की रचना, स्वाद तथा गुणों में अन्तर पड़ जाता है। यह भोजन पदार्थ देखने, सूंघने तथा स्वाद में भी ताज़े भोजन पदार्थों की अपेक्षा भिन्न होते हैं। ऐसे भोजन पदार्थ खाने योग्य नहीं रहते। यदि खराब भोजन पदार्थ खाया जाए तो यह कई बीमारियां पैदा करता है। भोजन में यह सारी तबदीलियां हानिकारक कीटाणुओं की वृद्धि के कारण होती हैं।

आमतौर पर भोजन दो कारणों से खराब होता है –

  • बाह्य कारण (Extenal Causes)
  • आन्तरिक कारण (Internal Causes

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1. बाह्य कारण (External Causes) – बाह्य कारण भोजन के वातावरण के साथ सम्बन्धित हैं जैसे-नमी, गर्मी, प्रकाश, हवा, जीवाणु तथा कीड़े-मकौड़े आदि।
नमी (Moisture) – नमी वाले भोजन पदार्थ जल्दी खराब हो जाते हैं क्योंकि बैक्टीरिया नमी वाले भोजन पदार्थ में अधिक होता है।
गर्मी (Heat) – कई जीवाणुओं को वृद्धि के लिए विशेष तापमान की आवश्यकता होती है। यदि वह तापमान मिल जाए तो इनकी वृद्धि बहुत जल्दी होती है तथा भोजन अल्पकाल में ही खराब हो जाता है। जैसे-दूध का फटना, आटे का फूलना आदि।
प्रकाश (Light) – घी या तेल वाले भोजन पदार्थ प्रकाश में पड़े रहें तो खराब हो जाते हैं क्योंकि उचित प्रकाश मिलने से जीवाणुओं की वृद्धि तेज़ हो जाती है तथा भोजन खाने योग्य नहीं रहता।
हवा (Air) – वायु में पाई जाने वाली नमी भी भोजन पदार्थों को खराब करती है। इसलिए भोजन पदार्थों को हवा रहित डिब्बों में रखना चाहिए।
जीवाणु (Micro Organisms) – जीवाणु बहुत बारीक होते हैं। इनको केवल माइक्रोस्कोप द्वारा ही देखा जा सकता है। यह भोजन की रचना, स्वाद तथा गुणों को प्रभावित करते हैं। भोजन को खराब करने वाले जीवाणु तीन प्रकार के होते हैं –

  • बैक्टीरिया (Bacteria)
  • फफूंदी (Mould)
  • खमीर (Yeat)

(i) बैक्टीरिया (Bacteria) – कुछ बैक्टीरिया नमी के कारण बढ़ने वाले, कुछ नमी तथा ताप के साथ बढ़ने वाले तथा कुछ अन्य केवल ताप के साथ बढ़ने वाले होते हैं। कुछ बैक्टीरिया हवा के बिना जीवित रह सकते हैं। इनको समाप्त करना काफ़ी कठिन होता है। भिन्न-भिन्न प्रकार के बैक्टीरिया को उचित परिस्थितियां मिलने से इनकी वृद्धि बहुत शीघ्र होती है। यह न केवल भोजन को खराब ही करते हैं, बल्कि कई बार ज़हरीला भी बना देते हैं।

(ii) फफूंदी (Mould) – फफूंदी भोजन को खराब करके ऐसी परिस्थिति पैदा करती है कि उसमें बैक्टीरिया की वृद्धि बहुत शीघ्र होती है। फफूंदी लगा भोजन सड़ना शुरू हो जाता है। उसमें से दर्गन्ध आने लगती है। बन्द डिब्बों में भोजन पर फफंदी नहीं लगती।

(iii) खमीर (Yeast) – खमीर की वृद्धि के लिए नमी तथा चीनी की ज़रूरत होती है। जिन भोजनों पर बैक्टीरिया की वृद्धि कम हो उन पर खमीर का प्रभाव बहुत जल्दी होता है। खमीर ज्यादातर फलों के रस, जैम, जैली आदि पर लगती है।

कीड़े-मकौड़े (Insects) – सुसरी, ढोरा, सुंडी तथा मक्खियां आदि भी भोजन को खराब करती हैं। यह भोजन पदार्थों को अन्दर से खाकर खोखला कर देते हैं, जिससे भोजन खाने योग्य नहीं रहता। कीड़े-मकौड़े भोजन पदार्थों पर फफूंदी, बैक्टीरिया तथा हानिकारक कीटाणु छोड़ जाते हैं, जिससे थोड़े समय में ही भोजन खराब होना शुरू हो जाता है।

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2. आन्तरिक कारण (Internal Causes) – भोजन में पाए जाने वाले एन्ज़ाइम्स (Enzymes) भी भोजन पदार्थों को खराब करते हैं। भोजन पदार्थों में एन्ज़ाइम्स 37 सेंटीग्रेड

तापमान पर क्रियाशील होते हैं। यह एन्ज़ाइम्स प्रोटीन से बने होते हैं। इसलिए अधिक तापमान से नष्ट हो जाते हैं। इनके द्वारा हुए परिवर्तन के कारण भोजन खाने योग्य नहीं रहता। चार प्रतिशत नमक के घोल में फल तथा सब्जियों को डालने से इनके अन्दर एन्जाइमों की क्रिया कम हो जाती है।

प्रश्न 13.
भोजन को खराब करने वाले आन्तरिक कारण बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 12 का उत्तर।

प्रश्न 14.
कौन-से ढंगों का प्रयोग करके भोजन को सुरक्षित रखा जा सकता है ?
अथवा
हम भोजन को किस प्रकार सुरक्षित रख सकते हैं ?
उत्तर :
भोजन की सुरक्षा के ढंग-कई भोजन पदार्थ शीघ्र ही खराब होने वाले होते हैं। यदि उनकी सम्भाल न की जाए तो नष्ट हो जाते हैं। जैसे-माँस, मछली, अण्डे, फल, सब्जियां, दूध तथा दूध से बने पदार्थ आदि। घर में प्रयोग किए जाने वाले भोजन पदार्थों की सम्भाल बहुत ज़रूरी है। इसके लिए निम्नलिखित घरेलु तरीके अपनाए जाते हैं –

  1. सुखाकर
  2. रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करके
  3. फ्रिज में रखकर
  4. डिब्बा-बन्द करके
  5. तेल तथा मसालों का प्रयोग करके।

1. सुखाकर – खाने वाली चीजों को सुखाकर रखने का तरीका बहुत पुराना है। यह तरीका उन इलाकों में अपनाया जाता है जहां धूप काफ़ी ज्यादा होती है तथा उस मौसम में वर्षा नहीं होती। तेज़ धूप तथा गर्मी के साथ भोजन पदार्थों का पानी सुखाकर जीवाणुओं की वृद्धि समाप्त हो जाती है। इस विधि के द्वारा सब्जियां जैसे साग, शलगम, मेथी, मटर, फल, पापड़, वड़ीयां, चिप्स तथा मछली आदि को सुखाया जाता है।

2. रासायनिक पदार्थों का प्रयोग करके – साधारणतः प्रयोग किए जाने वाले रासायनिक पदार्थ जैसे सिरका, सोडियम बैंजोएट तथा पोटाशियम मैटाबाइसल्फाइट का स्कवैश, जैम तथा चटनियां, आचार आदि की सुरक्षा के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

3. फ्रिज में रखकर – यदि ताप को ज्यादा कम कर दिया जाए तो जीवाणु क्रियाहीन हो जाते हैं। दूध, फल तथा सब्जियों को इस तरीके से सम्भाला जा सकता है।

4. डिब्बा बन्द करके-डिब्बा बन्दी भी भोजन सम्भालने का एक तरीका है। इस तरीके में बोतलों या डिब्बों को कीटाणु रहित (Sterlize) किया जाता है तथा फिर डिब्बों तथा बोतलों में भोजन डालकर हवा रहित (हवा निकालकर) सील बन्द किया जाता है। इस प्रकार भोजन को लम्बे समय तक रखा जाता है।

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5. तेल तथा मसालों का प्रयोग करके – भोजन पदार्थों को तेल, नमक तथा चीनी के प्रयोग द्वारा भी खराब होने से बचाया जाता है। यह चीजें जीवाणुओं को बढ़ने से रोकती हैं। इन पदार्थों का प्रयोग आचार, चटनियां तथा मुरब्बों में किया जाता है।

प्रश्न 15.
किन कारणों करके भोजन को सुरक्षित रखना जरूरी है ?
उत्तर :
भोजन की सम्भाल से अभिप्राय भोजन को लम्बे समय तक हानिकारक जीवाणुओं तथा रासायनिक तत्त्वों के प्रभावशाली खराब होने से बचाना है ताकि इसके रंग-रूप, सुगन्ध तथा पौष्टिक तत्त्वों में कोई अन्तर न आए।

भोजन को सुरक्षित रखने के लाभ –

1. भोजन को सुरक्षित रखने से भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है।
2. भोजन पर खर्च होने वाला समय तथा धन की बचत की जा सकती है जैसे मौसम में फल तथा सब्जियां सस्ते मिल जाते हैं। इसको आचार, चटनियां, जैम, मुरब्बे तथा शर्बत आदि बनाकर सम्भाला जाता है तथा दूसरे मौसम में जबकि भोजन पदार्थ नहीं मिलते तो प्रयोग में लाया जा सकता है।
3. मौसमी फल तथा सब्जियों की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। उनको सम्भालकर रखने से नष्ट होने से बचाया जा सकता है।
4. भोजन पदार्थों को सम्भालकर रखने से सन्तुलित भोजन तैयार करना सरल हो जाता है। क्योंकि भोजन पदार्थों की सम्भाल करने से पौष्टिक तत्त्वों को भी सम्भाल कर रखा जाता है।
5. भिन्न-भिन्न ढंगों से सम्भालकर रखे भोजन को लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। जैसे फल तथा सब्जियों के आचार, चटनियां, जैम आदि बनाए जा सकते हैं। कई सब्जियों को सुखाकर भी लम्बे समय तक प्रयोग किया जा सकता है। जैसे-साग, मेथी, मटर आदि।
6. सुरक्षित और सम्भाल कर रखा भोजन लड़ाई के समय सैनिकों को आसानी से भेजा जा सकता है।
7. सम्भाल कर रखा भोजन एक जगह से दूसरी जगह पर ले जाना आसान है। अमेरिका से बड़ी मात्रा में सूखा दूध दूसरी जगहों पर भेजा जाता है। सूखे भोजन का लाभ भी घट जाता है।
8. ऐसा भोजन बे-मौसम भी प्रयोग में लाया जा सकता है।
9. लम्बी यात्रा के समय भी सम्भाला और सुरक्षित भोजन काम आ सकता है।

भोजन की सम्भाल करने से पहले यह जानकारी होना ज़रूरी है कि भोजन क्यों तथा किन कारणों द्वारा खराब होते हैं तथा खराब भोजन क्या होता है।

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प्रश्न 16.
आहार संरक्षण की घरेलू विधियां बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 14 का उत्तर।

प्रश्न 17.
पोषक तत्त्वों के संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? यह किस प्रकार किया जा सकता है?
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) निम्न का उत्तर एक शब्द में दें।

प्रश्न 1.
अण्डों का भण्डारण कहां करेंगे ?
उत्तर : फ्रिज में।

प्रश्न 2.
क्या सभी बैक्टीरिया हानिकारक हैं ?
उत्तर :
नहीं।

प्रश्न 3.
अविकारीय भोजन पदार्थ की उदाहरण दें।
उत्तर :
गेहूँ।

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प्रश्न 4.
अर्ध विकारीय भोजन पदार्थ की उदाहरण दें।
उत्तर :
इमली।

प्रश्न 5.
सूजी कैसा भोजन पदार्थ है ?
उत्तर :
अर्ध विकारीय।

(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. दूध ……… खाद्य पदार्थ है।
2. गर्मी से ……… वाले भोजन पदार्थ जल्दी खराब होते हैं।
3. ……… भोज्य पदार्थ लम्बे समय तक खराब नहीं होते।
4. ……… में रखकर सब्जी, दूध को खराब होने से बचाया जाता है।
उत्तर :
1. विकारीय
2. नमी
3. विकारीय
4. फ्रिज़।

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(ग) ठीक/गलत बताएं –

1. मक्खियां तथा जीवाणु भोजन को खराब करते हैं।
2. मैदा अर्ध विकारीय भोजन पदार्थ है।
3. आरोग्य धर्मी भोजन सेवा का अर्थ है सुरक्षित भोजन परोसना।
4. मसालों को हवा बन्द टीन या बोतल में बन्द करें।
5. मीठा सोडा पके भोजन को कोई हानि नहीं पहुंचाता।
उत्तर :
1. (✓) 2. (✓) 3. (✓) 4. (✓) 5. (✗)

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
भोजन को आरोग्य कैसे रख सकते हैं ?
(A) रसोई में स्वच्छता
(B) साफ़-सफ़ाई के साथ भोजन का रख-रखाव
(C) व्यक्तिगत आरोग्यधर्मिता
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 2.
निम्न में गलत है –
(A) दूध अविकारीय खाद्य पदार्थ है
(B) मैदा अर्धविकारीय पदार्थ है
(C) गेहूं अविकारीय खाद्य पदार्थ है।
(D) कम तापमान पर सूक्ष्मजीवों की वृद्धि कम होती है।
उत्तर :
दूध अविकारीय खाद्य पदार्थ है।

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प्रश्न 3.
निम्न में ठाकले भोजन जल्दी खराती है।
(A) गर्मी में नमी वाले भोजन जल्दी खराब होते हैं।
(B) भोजन को खराब होने से बचाने से बचत होती है।
(C) फ्रिज में रखकर सब्जियों तथा दूध को खराब होने से बचाया जा सकता है।
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 4.
निम्न में विकारीय भोजन पदार्थ है –
(A) मक्की का आटा
(B) क्रीम
(C) इमली
(D) बाजरा।
उत्तर :
क्रीम।

प्रश्न 5.
निम्न में अर्द्धविकारीय भोजन पदार्थ नहीं है –
(A) मक्के का आटा
(B) पालक
(C) बाजरा
(D) चावल का आटा।
उत्तर :
पालक।

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प्रश्न 6.
निम्न में ठीक नहीं है –
(A) फंगस हर तरह के भोजन से पैदा हो सकती है
(B) बेसन अर्ध-विकारीय खाद्य पदार्थ है
(C) चूहे भोजन को कोई हानि नहीं पहुंचाते
(D) शिमला मिर्च विकारीय पदार्थ है।
उत्तर :
चूहे भोजन को कोई हानि नहीं पहुंचाते।

प्रश्न 7.
निम्न में अविकारीय पदार्थ नहीं है –
(A) बाजरा
(B) दही
(C) साबूदाना
(D) भूनी मूंगफली।
उत्तर :
दही।

प्रश्न 8.
भोजन को सुरक्षित रखने के लिए रसायन पदार्थ का प्रयोग नहीं कर सकते –
(A) सोडियम बैन्जोएट
(B) पोटाशियम मैटा बाइसल्फाइट
(C) सिरका
(D) सोडियम नाइट्रेट।
उत्तर :
सोडियम नाइट्रेट।

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प्रश्न 9.
निम्न में ठीक है –
(A) सब्जियों को काट कर नहीं धोना चाहिए
(B) चावलों को उबालकर पानी नहीं फेंकना चाहिए।
(C) सब्जियों आदि को छिलके पतले-पतले निकाले
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 10.
निम्न में गलत है –
(A) सब्जियों को पकाने के लिए मीठे सोडे का प्रयोग करना आवश्यक है।
(B) पानी में घुलनशील विटामिन सब्जी को काट कर धोने से नष्ट हो जाते हैं
(C) चावलों को उबालकर पानी को फेंकना नहीं चाहिए।
(D) तेल अविकारीय खाद्य पदार्थ है।
उत्तर :
सब्जियों को पकाने के लिए मीठे सोडे का प्रयोग करना आवश्यक है।

प्रश्न 11.
जीवाणुओं के विकास को रोकने का ढंग है –
(A) तापमान को घटाना
(B) हवा को रोककर
(C) नमी घटाकर
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 12.
मिलावट का अर्थ है –
(A) सस्ते और घटिया पदार्थ मिलाना
(B) स्वास्थ्य के लिए हानिकारक पदार्थ मिलाना
(C) भोजन में से आवश्यक तत्त्वों को निकालना
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

आरोग्य भोजन सेवा एवं विभिन्न खाद्य पदार्थों का भण्डारण HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ आरोग्य भोजन वह है जिसका रख-रखाव इस तरीके से किया जाता है कि वह अति सूक्ष्म जीवों से मुक्त व सुरक्षित रह सके।

→ यह इस बात पर निर्भर करता है कि गंदा-जल और गंदगी निकास व्यवस्था को आप कितना दुरुस्त रखते हैं और भोजन बनाते व परोसते समय व्यक्तिगत स्वच्छता का किस हद तक ध्यान रखते हैं।

→ भोजन की आरोग्य धर्मिता को सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित सामान्य नियमों का ध्यान रखना पड़ेगा –

  • रसोई में स्वच्छता
  • साफ-सफ़ाई के साथ भोजन का रख-रखाव
  • व्यक्तिगत आरोग्य धर्मिता।

→ विकारीय खाद्य पदार्थ वह हैं जो बहुत जल्दी खराब हो जाते हैं जैसे-दूध, हरी पत्तेदार सब्जियाँ आदि।

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→ अविकारीय खाद्य पदार्थ वह हैं जो लम्बे समय तक खराब नहीं होते जैसे गेहूँ, दाल, मसाले, तेल आदि।

→ अर्ध-विकारीय खाद्य पदार्थ वह हैं जो अविकारीय खाद्य पदार्थों से जल्दी खराब हो जाते हैं परन्तु विकारीय खाद्य पदार्थों से देर से खराब होते हैं।
जैसे – मैदा, सूजी, बेसन, मक्खन आदि।

→ भण्डारण का अर्थ है तुरन्त प्रयोग न होने वाले खाद्य पदार्थों को सम्भाल कर रखना।

→ यदि हम खाद्य पदार्थों को उचित तरीके से नहीं रखेंगे, तो उनके आस-पास चूहे, मक्खियां व कीड़े घूमेंगे। वे न केवल उनको खाएँगें अपितु उन्हें गन्दा भी कर देंगे जिससे कि वह हमारे खाने लायक नहीं रहेंगे।

→ उचित भण्डारण से खाद्य पदार्थों की रक्षा केवल चूहों और कीड़ों से नहीं बल्कि नमी और कीटाणुओं से भी होती है। इस प्रकार हम खाद्य पदार्थों को नष्ट होने से बचा लेते हैं। अविकारीय अधर्विकारीय एवं विकारीय खाद्य पदार्थों के भण्डारण के अलग-अलग तरीके हैं

  1. भोजन को खराब होने से बचाना ही भोजन की सम्भाल है।
  2. भोजन को खराब होने से बचाना चाहिए।
  3. नमी वाले भोजन पदार्थ जल्दी खराब होते हैं।
  4. फ्रिज में रखकर सब्जियों और दूध को खराब होने से बचाया जा सकता है।
  5. गर्मी में नमी वाले भोजन जल्दी खराब होते हैं।
  6. भोजन को खराब होने से बचाने से बचत होती है।
  7. मिलावटी भोजन खाने से स्वास्थ्य का नुकसान होता है।
  8. कुछ रसायनों के प्रयोग से भी भोजन सुरक्षित रखा जा सकता है।
  9. मक्खियाँ और जीवाणु भोजन को खराब करते हैं।
  10. बिना नमी वाले भोजन अधिक देर तक सुरक्षित रहते हैं।
  11. प्रत्येक कुशल गृहिणी को मिलावटी भोजन की जाँच करने की जानकारी होनी चाहिए।

ताज़ा और साफ़-सुथरा भोजन तन्दरुस्ती के लिए आवश्यक है। भोजन साफ़ सुथरा रखने के लिए और खराब होने से बचाने के लिए, भोजन की सम्भाल के बारे में प्रत्येक गृहिणी को जानकारी होनी आवश्यक है।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 भोजन सम्बन्धी योजना एवं आहार समूह

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 भोजन सम्बन्धी योजना एवं आहार समूह Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 भोजन सम्बन्धी योजना एवं आहार समूह

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
आई० सी० एम० आर० द्वारा निर्धारित किए गए पाँच आहार समूहों के नाम बताइए।
उत्तर :
आई० सी० एम० आर० (ICMR) ने निम्नलिखित पाँच आहार समूह निर्धारित किए हैं। यह हैं –

  1. अनाज
  2. दालें
  3. दूध, अण्डा व मांसाहार
  4. फल व सब्जियाँ
  5. वसा और शक्कर।

प्रश्न 2.
सन्तुलित भोजन से आप क्या समझते हो ? संतुलित भोजन क्यों जरूरी है ?
उत्तर :
सन्तुलित भोजन से भाव ऐसी मिली-जुली खुराक से है जिसमें भोजन के सभी आवश्यक तत्त्व जैसे, प्रोटीन, कार्बोज़, विटामिन, खनिज लवण आदि पूरी मात्रा में हों। भोजन न केवल माप-तोल में पूरा हो बल्कि गुणकारी भी हो ताकि मनुष्य की मानसिक वृद्धि भी हो सके तथा बीमारियों से लड़ने की क्षमता भी बनी रहे। सन्तुलित भोजन सभी व्यक्तियों के लिए एक-सा नहीं हो सकता। शारीरिक मेहनत करने वाले व्यक्तियों के लिए जो भोजन सन्तुलित होगा वह एक दफ्तर में काम करने वाले से भिन्न होगा।

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प्रश्न 3.
भोजन को किन-किन भोजन समूहों में बांटा जा सकता है और क्यों ?
उत्तर :
प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक तन्दुरुस्ती के लिए सन्तुलित भोजन का प्राप्त होना आवश्यक है जिसमें प्रोटीन, कार्बोज, विटामिन, खनिज लवण पूरी मात्रा में हो। परन्तु ये सभी वस्तुएँ एक तरह के भोजन से प्राप्त नहीं हो सकतीं। इसलिए भोजन को उनके खुराकी तत्त्वों के आधार पर निम्नलिखित समूहों में विभाजित किया जाता है –

  1. अनाज
  2. दालें
  3. सूखे मेवे
  4. सब्जियां
  5. फल
  6. दूध और दूध से बने पदार्थ तथा अन्य पशु जन्य साधनों के पदार्थ।
  7. मक्खन घी तेल
  8. शक्कर, गुड़
  9. मसाले, चटनी आदि।

प्रश्न 4.
क्या कैलोरियों की उचित मात्रा होने से भोजन सन्तुलित होता है ?
उत्तर :
खुराक व्यक्ति की आयु लिंग, काम करने की शारीरिक स्थिति पर निर्भर करती है। कठिन काम करने वाले व्यक्ति को साधारण काम करने वाले व्यक्ति से अधिक कैलोरियों की आवश्यकता होती है। परन्तु खराक में केवल कैलोरियों की उचित मात्रा से ही भोजन सन्तुलित नहीं बन जाता बल्कि इसके साथ-साथ पौष्टिक तत्त्वों की भी उचित मात्रा लेनी चाहिए। किसी एक पौष्टिक तत्त्व की कमी भी शरीर के लिए हानिकारक हो सकती है। इसलिए उचित कैलोरियों की मात्रा वाली खुराक को सन्तुलित नहीं कहा जा सकता।

प्रश्न 5.
दालों में कौन-से पौष्टिक तत्त्व होते हैं और अधिक मात्रा किसकी होती है ?
उत्तर :
दालें जैसे मूंग, मोठ, मांह, राजमांह, चने आदि में प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है। इनमें 20-25 प्रतिशत प्रोटीन होती है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘बी’ खनिज पदार्थ विशेष रूप में कैल्शियम की अच्छी मात्रा में होते हैं। सूखी दालों में विटामिन ‘सी’ नहीं होता परन्तु अंकुरित हुई दालें विटामिन ‘सी’ का अच्छा स्रोत हैं।

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प्रश्न 6.
कार्बोहाइड्रेट्स कौन-कौन से भोजन समूह में पाए जाते हैं ?
उत्तर :
कार्बोहाइड्रेट्स कार्बन, हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का मिश्रण है। ऑक्सीजन तथा हाइड्रोजन 2 : 1 के अनुपात में प्राप्त होती हैं। शरीर में 75 से 80 प्रतिशत ऊर्जा कार्बोहाड्रेट्स से ही पूरी होती है। यह ऊर्जा का एक सस्ता तथा मुख्य स्रोत है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 8 भोजन सम्बन्धी योजना एवं आहार समूह 1

चित्र-कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत

कार्बोहाइड्रेट्स के स्त्रोत – कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत निम्नलिखित हैं –

  1. अनाज।
  2. दालें।
  3. जड़ों वाली तथा भूमि के अन्दर पैदा होने वाली सब्जियां जैसे आलू, कचालू, अरबी, जिमीकन्द तथा शकरकन्दी आदि।
  4. शहद, चीनी तथा गुड़।
  5. जैम तथा जैली।
  6. सूखे मेवे जैसे बादाम, अखरोट, खजूर, किशमिश तथा मूंगफली आदि।

प्रश्न 7.
सब्जियों में कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्व होते हैं ?
उत्तर :
भोजन में सब्जियों का होना अति आवश्यक है क्योंकि इनसे विटामिन और खनिज पदार्थ मिलते हैं। भिन्न-भिन्न सब्जियों में भिन्न-भिन्न तत्त्व मिलते हैं। जड़ों वाली सब्जियां विटामिन ‘ए’ का अच्छा स्रोत है, हरी पत्तेदार सब्जियों में विटामिन ‘ए’, ‘बी’, ‘सी’ और लोहा काफ़ी मात्रा में होता है। फलीदार सब्जियां प्रोटीन का अच्छा स्रोत हैं।

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प्रश्न 8.
भोजन में मिर्च मसालों का प्रयोग क्यों किया जाता है ?
उत्तर :
भोजन का स्वाद और महक बढ़ाने के लिए इनमें कई तरह के मसाले जैसे जीरा, काली मिर्च, धनिया, लौंग, इलायची आदि प्रयोग किए जाते हैं। यह मसाले भोजन का स्वाद बढ़ाने के अतिरिक्त भोजन शीघ्र पचाने में भी सहायता करते हैं क्योंकि ये पाचक रसों को उत्तेजित करते हैं जिससे भोजन शीघ्र हज्म हो जाता है।

प्रश्न 9.
आहार नियोजन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
खाने का ढंग परिवार के अलग-अलग सदस्यों की आवश्यकता अनुसार बनाया जाता है जैसे बच्चे और रोगी के लिए थोड़ी-थोड़ी देर के पश्चात् भोजन तथा बुजुर्गों के लिए नर्म और हल्के भोजन का प्रबन्ध किया जाता है। परिवार के सदस्यों की ज़रूरत और निश्चित समय अनुसार अच्छे पोषण के लिए खाद्य पदार्थों का नियोजन करने को ही आहार नियोजन कहा जाता है।

प्रश्न 10.
आहार आयोजन के प्रमुख सिद्धान्त क्या हैं ?
अथवा
आहार आयोजन करते समय किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर :
आहार आयोजन करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  1. परिवार की रुचि
  2. ऋतु का ध्यान
  3. पारिवारिक आय
  4. व्यवसाय
  5. उपलब्ध वस्तुएं
  6. साप्ताहिक तालिका
  7. नवीनता
  8. मितव्ययता
  9. समय और शक्ति
  10. विविधता
  11. सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश
  12. अतिथियों की रुचि
  13. सरलता।

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प्रश्न 11.
परिवार के आहार का स्तर किन बातों पर निर्भर करता है ?
उत्तर :
परिवार के आहार का स्तर निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है –

  1. आहार के लिए उपलब्ध धन।
  2. गृहिणी के पास भोजन पकाने के लिए उपलब्ध समय एवं ऊर्जा।
  3. गृहिणी का खाद्य तथा पोषण सम्बन्धी ज्ञान।
  4. गृहिणी का आहार पकाने और परोसने में निपुण होना।

प्रश्न 12.
आहार की पौष्टिकता बढ़ाना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
सामान्य आहार में अनाज की मात्रा अधिक होती है। कार्बोज द्वारा व्यक्ति की कैलोरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो जाती है, परन्तु शरीर निर्माण करने वाले पौष्टिक तत्त्व जैसे प्रोटीन और स्वास्थ्य रक्षा करने वाले तत्त्व जैसे विटामिन और खनिज लवणों का अभाव है। इसलिए आहार की पौष्टिकता बढ़ाना आवश्यक है।

प्रश्न 13.
खाद्य पदार्थों का पौष्टिक मान बढ़ाने का महत्त्व लिखें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 12 का उत्तर।

प्रश्न 14.
आहार की पौष्टिकता कैसे बढ़ाई जा सकती है ?
उत्तर :

  1. आहार में मिश्रित अनाजों का प्रयोग करना चाहिए, जैसे-चावल या गेहूँ के साथ रागी या बाजरा।
  2. दालों के प्रयोग को बढ़ाना।
  3. हरी पत्तेदार सब्जियों का प्रयोग करना।
  4. सस्ते मौसमी खाद्य-पदार्थों का प्रयोग करना।

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प्रश्न 15.
दैनिक आहार व्यवस्था का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
परिवार के सदस्यों की दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं ज्ञात करके, दैनिक आहार की व्यवस्था की जाती है। भारत में प्राय: दिन चार बार आहार करने का प्रचलन है। इसलिए दिनभर की प्रस्तावित खाद्य-पदार्थों की मात्रा को चार भागों में बाँटा जाता है।

  1. प्रात:काल का नाश्ता (Breakfast)
  2. दोपहर का भोजन (Lunch)
  3. शाम की चाय (Evening Tea)
  4. रात्रि का भोजन (Dinner)।

प्रश्न 16.
सन्तुलित भोजन की योजना बनाते समय कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर :
परिवार के सदस्य का स्वास्थ्य उनके खाने वाले भोजन पर निर्भर करता है। एक समझदार गृहिणी को अपने परिवार के सदस्यों को सन्तुलित भोजन प्रदान करने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. परिवार के प्रत्येक सदस्य के रोज़ाना खुराकी तत्त्वों का ज्ञान होना चाहिए
  2. आवश्यक पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजन की जानकारी और चुनाव
  3. भोजन की योजनाबन्दी
  4. भोजन पकाने का सही ढंग, और
  5. भोजन परोसने के ढंग का ज्ञान होना चाहिए।

प्रश्न 17.
किन-किन कारणों से अनेक लोगों को सन्तुलित भोजन उपलब्ध नहीं होता ?
उत्तर :
दुनिया भर में 90% बीमारियों का कारण सन्तुलित भोजन का सेवन न करना है। विशेष रूप में तीसरी दुनिया के देशों में जनसंख्या के एक बड़े भाग को संतुलित भोजन नहीं मिलता। इसके कई कारण हैं जैसे –
1.ग़रीबी – ग़रीब लोग अपनी आय कम होने के कारण उपयुक्त मात्रा में आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों वाले भोजन नहीं खरीद सकते। सब्जियां, फल, दूध, आदि इन ग़रीब लोगों की खुराक का भाग नहीं बनते।

2. शिक्षा की कमी – यह आवश्यक नहीं कि केवल ग़रीब लोग ही सन्तुलित भोजन से वंचित रहते हैं। कई बार शिक्षा की कमी के कारण अच्छी आय वाले भी आवश्यक पौष्टिक भोजन नहीं लेते। आजकल कई अमीर लोग भी जंक फूड या फास्ट फूड का प्रयोग
अधिक करते हैं जो किसी तरह भी सन्तुलित भोजन नहीं होता।

3. बढ़िया भोजन न मिलना – कई बार लोगों को खाने पीने की वस्तुएं बढ़िया नहीं मिलतीं। आजकल सब्जियों में ज़हर की मात्रा काफ़ी अधिक होती है। शहर के लोगों को दूध भी बढ़िया किस्म का नहीं मिलता। इस तरह भी लोग सन्तुलित भोजन से वंचित रह जाते हैं।

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प्रश्न 18.
खाने का नियोजन किन-किन बातों पर आधारित है ?
अथवा
खाने के नियोजन को प्रभावित करने वाले कौन-कौन से कारक हैं ?
उत्तर :
ठीक खाने का नियोजन बनाना एक समझदार गृहिणी का काम है। यह नियोजन कई बातों पर आधारित होता है –
1. परिवार की आय-परिवार के भोजन का नियोजन परिवार की आय पर निर्भर करता है। उच्च आय वर्ग की गृहिणी महंगे भोजन पदार्थ बनाने के नियोजन तैयार कर सकती है परन्तु एक ग़रीब वर्ग की गृहिणी को परिवार की पौष्टिक आवश्यकताएं पूर्ण करने वाले परन्तु सस्ते भोजन का नियोजन बनाना पड़ता है।

2. परिवार का आकार और रचना-परिवार के सदस्यों की संख्या और उनकी आयु, स्वाद आदि भी भोजन के नियोजन को प्रभावित करते हैं जैसे जिस परिवार में बज़र्ग माता पिता हों, उस परिवार के भोजन का आयोजन एक ऐसा परिवार जिसमें जवान बच्चे और माता-पिता हों, से भिन्न होता है।

3. भोजन पकाने का समय और परोसने और पकाने का ढंग-ये भी खाने के नियोजन को प्रभावित करते हैं।

4. मौसम और घर की सुविधाएं भी गृहिणी के खाने नियोजन पर प्रभाव डालती हैं। उदाहरणस्वरूप यदि घर में फ्रिज हो तो एक बार बनाया भोजन दूसरे समय के लिए सम्भालकर रखा जा सकता है।

प्रश्न 19.
आहार आयोजन को परिवार का आकार व रचना किस प्रकार प्रभावित करते हैं, वर्णन करें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 18 का उत्तर।

प्रश्न 20.
भोजन में भिन्नता कैसे ला सकते हैं तथा क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
एक तरह का भोजन खाने से मन भर जाता है इसलिए खाने में रुचि बनाए रखने के लिए भिन्नता होनी आवश्यक है। यह भोजन में अनेक प्रकार से पैदा की जा सकती है –

  1. नाश्ते में प्रायः परांठे बनते हैं परन्तु रोज़ाना अलग किस्म का परांठा बनाकर भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है जैसे मूली का परांठा, मेथी वाला, गोभी वाला, मिस्सा परांठा आदि।
  2. सभी भोजन पदार्थ एक रंग के नहीं होने चाहिएं। प्रत्येक सब्जी, दाल या सलाद का रंग अलग-अलग होना चाहिए। इससे भोजन देखने को अच्छा लगता है और अधिक पौष्टिक भी होता है।
  3. भोजन पकाने की विधि से भी खाने में भिन्नता आ सकती है जैसे तवे की रोटी, तन्दूर की रोटी, पूरी आदि बनाकर भोजन में भिन्नता लाई जा सकती है।

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प्रश्न 21.
भोजन देखने में भी सुन्दर होना चाहिए। क्या आप इस तथ्य से सहमत हैं ? यदि हाँ तो क्यों ?
उत्तर :
जी हाँ; यह तथ्य बिल्कुल सही है कि भोजन देखने में अच्छा लगना चाहिए क्योंकि जो भोजन देखने में अच्छा न लगे उसको खाने को मन नहीं करता। यदि भोजन आँखों को न भाए तो मनुष्य उसका स्वाद भी नहीं देखना चाहता। भोजन को सुन्दर बनाने के लिए भोजन पकाने की विधि और उसको सजाने की जानकारी भी होनी चाहिए।

प्रश्न 22.
गर्भवती औरत के लिए एक दिन की आहार योजना बनाओ।
उत्तर :
एक गर्भवती औरत के लिए सन्तुलित भोजन की आवश्यकता होती है और यह भोजन दिन में पाँच बार खाना चाहिए। गर्भवती औरत के भोजन की एक दिन की योजना इस प्रकार होनी चाहिए –
सुबह-चाय, नींबू पानी, बिस्कुट या रस। नाश्ता-डबलरोटी, मक्खन, उबला हुआ अण्डा, परांठा, फलों का जूस। दिन के मध्य-दलिया, मौसमी फल। दोपहर का खाना-रोटी, चने, दही, सब्जी, सलाद। शाम के समय-केक या पौष्टिक लड़ड़ या कोई नमकीन और चाय। रात को-सब्जियों का सूप, रोटी, दाल, सब्जी, सलाद और खीर। सोने के समय-दूध।

प्रश्न 23.
गर्भवती औरत के लिए कैसा भोजन चाहिए और क्यों ?
अथवा
गर्भवती स्त्री को पौष्टिक तत्त्व अधिक मात्रा में क्यों लेना चाहिए ?
उत्तर :
माँ के पेट में ही बच्चे की सेहत और शारीरिक बनावट का फैसला हो जाता है। इसलिए गर्भवती माँ की खुराक सन्तुलित और अच्छी किस्म की होनी चाहिए। स्वस्थ माँ ही स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है। गर्भवती माँ की खुराकी आवश्यकता अपने लिए और बच्चे के लिए होती है। इसीलिए गर्भवती स्त्री को पौष्टिक तत्त्व को अधिक मात्रा में लेना चाहिए। गर्भवती औरत के लिए थोड़े-थोड़े समय के पश्चात् कम मात्रा में भोजन खाना ठीक रहता है। इसलिए गर्भवती औरत को दिन में तीन बार के स्थान पर पाँच बार भोजन खाना चाहिए। गर्भवती औरत के भोजन में दूध, फल, सब्जियां, मक्खन और दालें अवश्य शामिल होनी चाहिएं।

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प्रश्न 24.
दूध पिलाने वाली माँ के लिए कैसा भोजन चाहिए ? एक दिन की आहार योजना बनाओ।
उत्तर :
दूध पिलाने वाली माँ के एक दिन के भोजन का नियोजन- दूध पिलाने वाली माँ का आहार सन्तुलित होना चाहिए क्योंकि इसका प्रभाव बच्चे के स्वास्थ्य पर अच्छा पड़ेगा। दूध पिलाने वाली माँ का एक दिन का भोजन निम्नलिखित अनुसार होना चाहिए

  • सुबह – दूध या चाय।
  • नाशता – गोभी, आलू या मिस्सा परांठा, मक्खन, दही या दूध।
  • मध्य में – फलों का रस चीनी मिलाकर, फल या अंकुरित दाल।
  • दोपहर का भोजन – रोटी, हरी सब्जी, दाल या चने, राइता, सलाद, मौसमी फल।
  • शाम को – पंजीरी, केक, बिस्कुट, चाय या दूध।
  • रात को – दूध का गिलास।

बच्चे का स्वास्थ्य माँ के स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। यदि माँ की खुराक में पौष्टिक तत्त्व होंगे, तभी बच्चा तन्दुरुस्त होगा। दूध पिलाने वाली माँ की खराकी आवश्यकता गर्भवती औरत से अधिक होती है। दूध पिलाने वाली माँ को अन्य औरतों की अपेक्षा कैलोरियां, प्रोटीन, विटामिन और खनिज पदार्थों की आवश्यकता अधिक होती है। अच्छी प्रोटीन दूध की पैदावार में सहायक होती है। इसलिए दूध पिलाने वाली माँ की खुराक में प्रोटीन युक्त पदार्थ जैसे दूध, पनीर और दालें आदि काफ़ी मात्रा में होनी चाहिएं।

प्रश्न 25.
बुखार के समय भोजन की जरूरत बढ़ती है या कम हो जाती है ? बताओ और क्यों ?
उत्तर :
बुखार में पौष्टिक भोजन की आवश्यकता बढ़ जाती है क्योंकि बुखार से शरीर में कई परिवर्तन आते हैं जैसे कि शरीर की मैटाबोलिक दर बढ़ने से शरीर को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यह आवश्यकता साधारण से 50% बढ़ जाती है। बुखार में शरीर का तापमान बढ़ने से शरीर में तंतुओं की तोड़-फोड़ तेजी से होती है जिसके लिए अधिक प्रोटीन की ज़रूरत होती है। बुखार में शरीर के रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है। इसलिए अधिक विटामिनों की आवश्यकता होती है। बुखार से खनिज पदार्थ का निकास बढ़ जाता है। उनकी पूर्ति के लिए अधिक खुराक की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 26.
बुखार से आप क्या समझते हैं ? इसका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
शरीर एक मशीन की तरह काम करता है। मशीन की तरह ही शरीर में नुक्स पड़ सकता है जो प्रायः बुखार के रूप में प्रकट होता है। शरीर का तापमान तन्दुरुस्ती की स्थिति में 98.4 फार्नहीट होता है। यदि शरीर का तापमान इससे बढ़ जाए तो उसको बुखार कहा जाता है। बुखार से शरीर के तन्तुओं की तोड़-फोड़ बहुत तेजी से होती है, मैटाबोलिक दर बढ़ जाती है। शरीर में पौष्टिक तत्त्वों का शोषण कम होता है और सिर दर्द, कमर दर्द, बेचैनी प्रायः देखने में आते हैं।

प्रश्न 27.
बुखार में कैसा भोजन खाना चाहिए तथा क्यों ?
उत्तर :
बुखार में आहार आयोजन का विशेष ध्यान रखना चाहिए क्योंकि बुखार से शरीर में कई परिवर्तन आते हैं और कई खुराकी तत्त्वों की आवश्यकता बढ़ जाती है। बुखार के समय खुराक सम्बन्धी निम्नलिखित नुस्खे प्रयोग किए जाने चाहिएं

  1. ऊर्जा और प्रोटीन वाले भोजन पदार्थों का अधिक उपयोग।
  2. तरल और नर्म-गर्म भोजन का प्रयोग।
  3. दूध की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
  4. फलों का रस, सब्जियों की तरी, मीट की तरी, काले चने की तरी बीमार के लिए गुणकारी होती है।
  5. खिचड़ी, दलिया और अन्य हल्के भोजन देने चाहिएं।
  6. बीमार के खाने में मिर्च-मसाले कम होने चाहिएं।

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प्रश्न 28.
बुखार से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ? बुखार की अवस्था में पौष्टिक तत्वों की आवश्यकता बताएं।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न नं० 26, 27 में।

प्रश्न 29.
बुखार में भोजन के तत्त्वों की आवश्यकता पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
बुखार में खुराकी तत्त्वों की आवश्यकता शरीर में कई परिवर्तन आने के कारण बढ़ जाती है।

  1. ऊर्जा या शक्ति – बुखार में मैटाबोलिक दर बढ़ने से शरीर का तापमान बढ़ जाता है जिसके कारण 5% अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है इसलिए अधिक कैलोरियों वाली खुराक देनी चाहिए।
  2. प्रोटीन – शरीर में तापमान बढ़ने से तन्तुओं की तोड़-फोड़ तेजी से होती है इसलिए प्रोटीन अधिक मात्रा में लेनी चाहिए।
  3. कार्बोहाइड्रेट्स – बुखार से शरीर के कार्बोहाइड्रेट्स के भण्डार कम हो जाते हैं। इस कमी को पूरा करने के लिए अधिक मात्रा में कार्बोहाइड्रेट्स देने चाहिएं।
  4. विटामिन – बीमारी की हालत में शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है। इस स्थिति में बीमार मनुष्य को अधिक विटामिनों की आवश्यकता होती है।
  5. खनिज पदार्थ – सोडियम और पोटाशियम पसीने द्वारा अधिक निकल जाते हैं। इनकी पूर्ति के लिए दूध और जूस का अधिक प्रयोग करना चाहिए।
  6. पानी – बीमार आदमी को पानी उचित मात्रा में पीना चाहिए क्योंकि रोगी के शरीर में से पानी पसीने और पेशाब के द्वारा निकलता रहता है।

प्रश्न 30.
बढ़ते बच्चों के लिए कैसा भोजन चाहिए ?
उत्तर :
बढ़ रहे बच्चों के शरीर में बने सैलों और तन्तुओं का निर्माण होता है और इसके लिए प्रोटीन तथा कार्बोज़ आदि अधिक मात्रा में चाहिएं ताकि तन्तुओं का निर्माण और तोड़-फोड़ की पूर्ति हो सके। इसके अतिरिक्त बच्चों की दौड़ने, भागने और खेलने में कैलोरियां अधिक खर्च होती हैं। इसलिए इनकी पूर्ति करने के लिए बच्चों के भोजन में आवश्यक मात्रा में मक्खन, घी, तेल, चीनी, शक्कर, दूध, पनीर और सब्जियों का शामिल होना आवश्यक है।

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प्रश्न 31.
गर्भवती औरत के लिए अधिक कैलोरियों की आवश्यकता होती है या दूध पिलाने वाली माँ के लिए, और क्यों ?
उत्तर :
गर्भवती औरत या दूध पिलाने वाली माँ, दोनों का भोजन सन्तुलित होना चाहिए। परन्तु दूध पिलाने वाली माँ की खुराकी आवश्यकताएं गर्भवती औरत से अधिक होती हैं। दूध पिलाने वाली माँ को गर्भवती और अन्य औरतों की अपेक्षा कैलोरियां और अन्य पौष्टिक तत्त्व अधिक मात्रा में चाहिएं। बच्चे की पूर्ण खुराक के लिए माँ का दूध काफ़ी मात्रा में आवश्यक है। यह दूध तभी प्राप्त होगा यदि माँ की खुराक में दूध, सब्जियाँ, दालें, पनीर काफ़ी मात्रा में होंगे। पहले छः महीने माँ का दूध बच्चे के लिए मुख्य खुराक होता है। इसलिए दूध पिलाती माँ को अधिक कैलोरियों वाला पौष्टिक भोजन चाहिए।

प्रश्न 32.
पाँच आहार समूहों से प्राप्त होने वाले पोषक तत्त्व बताइए। प्रत्येक समूह के कुछ उदाहरण भी दें।
अथवा
ICMR द्वारा प्रस्तावित खाद्य वर्ग योजना में खाद्य पदार्थों को कितने वर्गों में बांटा गया है ? प्रत्येक वर्ग में सम्मिलित होने वाले दो-दो खाद्य पदार्थों के नाम लिखें।
अथवा
ICMR द्वारा प्रस्तावित पांच खाद्य वर्गों के नाम लिखें व प्रत्येक वर्ग के अन्तर्गत दो-दो भोज्य पदार्थ लिखें।
अथवा
ICMR द्वारा प्रस्तावित पांच खाद्य वर्गों के नाम लिखें और उनके प्राप्त पोषक तत्त्व भी बताएं।
अथवा
ICMR द्वारा प्रस्तावित ‘पांच खाद्य वर्ग योजना’ का विवरण दीजिए ?
अथवा
खाद्य पदार्थों को किन-किन वर्गों में बांटा जा सकता है ? उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर :
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प्रश्न 33.
पोषक तत्त्वों के आधार पर आहार समूह बनाने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
पोषक तत्त्वों के आधार पर आहार समूह बनाने के निम्नलिखित लाभ हैं
(i) किसी विशेष पोषक तत्त्व की आवश्यकता होने पर ज्ञात होता है कि किस आहार समूह की भोजन सामग्री लेनी है।
(ii) एक आहार समूह की भोज्य सामग्री एक-से पोषक तत्त्व लगभग एक-सी ही मात्रा में उपलब्ध कराती है। हम सफलता से एक भोज्य सामग्री के स्थान पर दूसरी भोज्य सामग्री उसी आहार समूह में से परिवर्तित कर सकते हैं। इसे आहार परिवर्तन कहते हैं।

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प्रश्न 34.
सन्तुलित आहार की परिभाषा दीजिए तथा इसकी विशेषताएँ बताएं।
उत्तर :
सन्तुलित आहार वह है जिसमें पोषक तत्त्व उतनी मात्रा तथा अनुपात में हो अर्थात् उचित मात्रा में रहते हैं जिनसे शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्त्व मिल सकें और साथ ही कुछ पोषक तत्त्वों का शरीर में भण्डारण भी हो सके जिससे कभी-कभी अल्पाहार के समय उनका उपयोग शरीर में हो सके। सन्तुलित आहार की विशिष्टताएँ – सन्तुलित आहार में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों ही खाद्य पदार्थों का समावेश रहता है। अत: निम्नलिखित ज़रूरतें सन्तुलित आहार द्वारा पूर्ण हो पाती हैं।

  1. किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत पोषण आवश्यकता की पूर्ति।
  2. सभी आहार समूहों में से खाद्य पदार्थों का समावेश।
  3. भोजन के विभिन्न प्रकारों का समावेश।
  4. मौसमी भोज्य पदार्थों का समावेश।
  5. कम खर्चीला।
  6. व्यक्तिगत रुचि और स्वाद के अनुकूल होना।

प्रश्न 35.
भोजन सम्बन्धी योजना क्या है ?
उत्तर :
इसका अर्थ है भोजन के लिए इस प्रकार से योजना बनाना कि परिवार का प्रत्येक सदस्य उपयुक्त पोषण स्तर प्राप्त कर सके। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें यह निर्धारित किया जाता है कि प्रतिदिन प्रत्येक भोजन में परिवार के सदस्य क्या खाएँगे।

प्रश्न 36.
भोजन सम्बन्धी योजना का क्या महत्त्व है ?
अथवा
आहार आयोजन का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
भोजन सम्बन्धी योजना निम्नलिखित बातों में सहायता प्रदान करती है –

  1. परिवार के सदस्यों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति।
  2. भोजन में मितव्ययिता का ध्यान रखना।
  3. विभिन्न सदस्यों की भोजन सम्बन्धी प्राथमिकताओं का ध्यान रखना।
  4. भोजन आकर्षक तरीके से परोसना।
  5. ऊर्जा, समय और ईंधन की बचत करना।
  6. बचे हुए भोजन का सही उपयोग।

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प्रश्न 37.
भोजन पकाते समय गृहिणी की व्यक्तिगत स्वच्छता सम्बन्धी किसी एक नियम का उल्लेख करें।
उत्तर :
भोजन पकाना शुरू करने से पूर्व गृहिणी को अपने हाथ अच्छी प्रकार से धोने चाहिए। बालों को हमेशा बांधकर रखना चाहिए।

प्रश्न 38.
खाना परोसते समय स्वच्छता सम्बन्धी किसी एक नियम का उल्लेख करें।
उत्तर :
खाना साफ-सुथरे बर्तनों में परोसना चाहिए तथा खाना खाने के लिए स्थान हवादार होना चाहिए।

प्रश्न 39.
दूध व दही का भण्डारण कैसे करेंगे ?
उत्तर :
दूध व दही का भण्डारण कम तापमान पर रेफ्रिजीरेटर में किया जाता है।

प्रश्न 40.
गेहूँ का भण्डारण कैसे करेंगे ?
उत्तर :
गेहूँ का भण्डारण बोरियों में, टीन के बने ड्रमों में किया जाता है। गेहूँ में नीम के पत्ते मिलाकर इसका भण्डारण किया जाता है।

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प्रश्न 41.
रसोई घर की स्वच्छता सम्बन्धी किसी एक नियम का उल्लेख करें।
उत्तर :
रसोईघर में खाने वाला सामान इधर-उधर बिखरा नहीं होना चाहिए, इससे चूहे, तिलचिट्टे, मक्खियां, छिपकलियां आदि रसोई में नहीं आ पाएंगे।

प्रश्न 42.
ताजे फलों व सब्जियों का भण्डारण किस प्रकार किया जाता है ?
उत्तर :
ताजे फलों व सब्जियों को ठण्डे स्थान जैसे फ्रिज में रखकर भण्डारण किया जाता है।

प्रश्न 43.
किस दशा में दिए जाने वाले आहार को उपचारार्थ कहा जाता है ?
उत्तर :
किसी रोगी को रोग की दशा में दिए जाने वाले भोजन को उपचारार्थ कहा जाता है।

प्रश्न 44.
आहार नियोजन कला है या विज्ञान ?
उत्तर :
आहार-नियोजन कला भी है तथा विज्ञान भी। विज्ञान इसलिए कि आहार नियोजन में पौष्टिक मूल्यों के अनुसार भोज्य पदार्थ तालिका में शामिल किए जाते हैं तथा पकाने में तथा परोसने में कला का प्रयोग होता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
आहार आयोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर :
आहार आयोजन का अर्थ है उपलब्ध भोज्य सामग्री के द्वारा परिवार के सदस्यों के लिए रुचिकर, स्वास्थ्यप्रद तथा पारिवारिक बजट के अनुकूल दैनिक आहार की अग्रिम रूप-रेखा तैयार करना। आहार आयोजन परिवार के हर सदस्य की आयु, लिंग, कार्य और उसकी पोषण सम्बन्धी आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही वैज्ञानिक ढंग से किया जा सकता है। आहार आयोजन के दो प्रमुख पहलू हैं – (i) आर्थिक तथा (ii) मनोवैज्ञानिक। एक धनी परिवार का आहार आयोजन गरीब परिवार के आहार आयोजन से सदैव भिन्न होगा। आहार आयोजन परिवार के सदस्यों को भोजन सम्बन्धी रुचियों एवं प्रवृत्तियों से भी बहुत अधिक प्रभावित होता है। आहार आयोजन का प्रमुख उद्देश्य परिवार के लिए पौष्टिक भोजन प्रदान करना है।

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प्रश्न 2.
आहार आयोजन से क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
आहार आयोजन से निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. परिवार के प्रत्येक सदस्य को शारीरिक आवश्यकताओं के अनुकूल पौष्टिक भोजन की प्राप्ति होती है।
  2. गृहिणी के समय की बचत होती है क्योंकि ठीक मौके पर यह नहीं सोचना पड़ता कि अमुक समय में क्या बनेगा। साथ ही उसके लिए सामान पहले से ही खरीद लिया जाता है।
  3. गृहिणी की शक्ति की बचत होती है। आहार आयोजन से कम समय में ही अधिक कार्य किया जा सकता है।
  4. परिवार के सदस्यों की रुचि को ध्यान में रखकर आहार आयोजन करने से प्रत्येक सदस्य को उसकी रुचि के अनुसार भोजन मिलता है।
  5. आहार आयोजन कर लेने से इकट्ठा सामान थोक के भाव से खरीदने से धन की बचत होती है।
  6. आहार आयोजन में सभी समय का आहार सन्तुलित, सुपाच्य होने के साथ-साथ स्वास्थ्यकर भी होता है।

प्रश्न 3.
प्रातःकाल के नाश्ते की कुछ व्यवस्थायें या मीन बताइये।
उत्तर :
नाश्ते की कुछ व्यवस्थायें निम्नलिखित हैं –

  1. गेहूँ, मक्का – बाजरा या गेहूँ-मक्का का दलिया, दूध या लस्सी के साथ; दो टोस्ट, मक्खन या मलाई के साथ, आलू का कटलेट या बेसन का पूड़ा, मौसमी फल – केला, अमरूद, पपीता, आम, सन्तरा या बेर आदि, चाय, कॉफी, लस्सी।
  2. गेहूँ, चने की या मिश्रित अनाज की रोटी, दही या रायते या आचार के साथ, मौसमी फल, लस्सी, शिकन्जवी, चाय या कॉफी।
  3. आलू, प्याज, मूली, गोभी, मेथी या बथुआ का परांठा दही के साथ; एक टोस्ट मक्खन, जैम या पनीर के टुकड़े के साथ; मौसमी फल, लस्सी, शिकन्जी, चाय या कॉफी।
  4. दो टोस्ट मक्खन या जैम के साथ, दो अण्डे उबले या तले हुए या बेसनी आमलेट, कार्न फ्लेक-दूध, मौसमी फल, चाय या कॉफी।
  5. डोसा-सांभर या इडली – सांभर, पोहे या ढोकले दाल व दही के साथ, बेसनी आमलेट या अण्डे का आमलेट, मौसमी फल, लस्सी, शिकन्जवी, चाय या कॉफी।

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प्रश्न 4.
दोपहर के भोजन की कुछ व्यवस्थायें बताइये।
उत्तर :
दोपहर के भोजन की कुछ व्यवस्थायें या मीनू निम्नलिखित हैं –

  1. मक्की की रोटी सरसों के साग के साथ या बाजरे की रोटी पत्ते सहित मूली की भुरजी व मूंग, मोठ की मिश्रित दाल के साथ या रोटी, पूड़ी या परांठों के साथ दाल, सब्जी, दही, चटनी व सलाद।
  2. चावल – दाल की खिचड़ी या बाजरा-दाल की खिचड़ी, बाजरा-लस्सी की राबड़ी हरी-सब्जी, दही, चटनी, अचार व सलाद।
  3. चावल, हरी-सब्जी, चटनी, टोस्ट-मक्खन, सलाद।
  4. चावल, दाल, कोई हरी-सब्जी, दही या रायता, चटनी व सलाद।
  5. रोटी, कोई हरी सब्जी, रायता, चटनी व सलाद।

नोट – दाल के स्थान पर कोफ्ते, सांभर, कढ़ी, आलू, बड़ियां, सोयाबीन बड़ियां, राजमांह, छोले, लोबिया आदि का प्रयोग करके भोजन में विविधता लाई जाती है।

प्रश्न 5.
संध्या का जलपान या शाम की चाय कब और कैसी होनी चाहिए ? शाम की चाय के कुछ मीनू भी बताइये।।
उत्तर :
कुछ लोग तो शाम को केवल चाय ही पीना पसन्द करते हैं, जबकि कुछ उसके साथ कुछ खाने को भी लेते हैं। चाय के साथ परोसे जाने वाले व्यंजन अवसर के अनुसार देने चाहिए। रोज़ तो घर में शाम को चाय के साथ अक्सर कुछ नमकीन और मीठा खा लिया जाता है, परन्तु ध्यान रखना चाहिए कि साथ में दिए जाने वाले व्यंजन हल्के, स्फूर्तिदायक और आसानी से परोसे जाने वाले हों। ऐसा करना इसलिए आवश्यक है कि रोज़ चाय पीने के लिए परिवार के सदस्य मेज आदि पर बैठना पसन्द नहीं करते अपितु जहाँ बैठे हों वहीं लेना पसन्द करते हैं। कुछ लोग जो दिनभर के काम के पश्चात् घर आते हैं, तो चाय के साथ कुछ भारी चीज़ जैसे लड्डू आदि खाना पसन्द करते हैं। परन्तु कुछ ऐसे भी लोग हैं जो रात्रि का भोजन जल्दी लेना चाहते हैं। अतः वे शाम को खाली चाय ही पीते हैं।

साधारण समय के लिए :

  1. पकौड़े, चाय।
  2. टमाटर के सैंडविच, चाय।
  3. मठरी, बेसन के लड्डू, चाय।
  4. मीठे बिस्कुट, साबूदाने के बड़े, चाय।
  5. जलेबी, आलू के चिप्स, चाय।

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प्रश्न 6.
रात्रि का भोजन कैसा होना चाहिए ?
उत्तर :
रात्रि के भोजन तथा दोपहर के भोजन में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। अत: रात के भोजन में भी वे सभी खाद्य-पदार्थ सम्मिलित किये जाते हैं जो दोपहर के भोजन में सम्मिलित किये जाते हैं लेकिन इतना होने पर भी रात के भोजन की व्यवस्था करते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। ये बातें निम्नलिखित हैं –

  1. इस भोजन की व्यवस्था सोने से कम-से-कम दो-तीन घंटे पूर्व होनी चाहिए।
  2. दिनभर काम करने के कारण टूटने-फूटने वाले कोषाणुओं की पूर्ति करने के लिए प्रोटीनयुक्त खाद्य-पदार्थों की संख्या अधिक होनी चाहिए।
  3. यह दोपहर के भोजन की तुलना में हल्का होना चाहिए अन्यथा पाचन क्रिया ठीक प्रकार से नहीं हो पाती है।

रात्रि के भोजन में निम्नलिखित खाद्य-पदार्थों को लिया जाना चाहिए –

  1. कोई भी दाल।
  2. हरी-सब्जी (यदि दोपहर के भोजन में न ली गई हो तो अवश्य ही प्रयोग करें)।
  3. दूध, दही।
  4. कोई मीठा व्यंजन, जैसे-कस्टर्ड, फ्रूट क्रीम, पुडिंग चावल या साबूदाने की खीर, आटा-सूजी या मूंग की दाल का अथवा बाजरे का हलवा, आइसक्रीम, कुल्फी आदि।
  5. भोजन से पूर्व सब्जियों या मांस का सूप।

प्रश्न 7.
रात्रि के भोजन के लिए कुछ मीनू बताइये।
उत्तर :

  1. पालक-पनीर कोफ्ता, गोभी की सब्जी, बूंदी का रायता, सलाद, पूरी, मूंगफली का पुलाव, गाजर का हलवा।
  2. कीमा-कोफ्ता, पालक-मूंगफली साग, आलू-गाजर-मटर की सब्जी, सलाद, पुलाव / तन्दूरी रोटी, फ्रूट-क्रीम (Fruit Cream)।
  3. टमाटर का सूप, धन-साग (Dhan-Sag), बेक्ड सब्जियां (Baked Vegetables), सलाद, पुलाव / नॉन, ट्राइफल पुडिंग (Trifle Pudding)।
  4. पालक सूप, आलू-मटर पनीर; गोभी मुसल्लम; गाजर का रायता; पुलाव / तन्दूरी रोटी; लैमन सूफले (Lemon Souffle)।
  5. केले और अमरूद का पेय; मीट करी / पनीर कोफ्ते; राजमांह; भरवां लौकी, सलाद; सादा पुलाव / पूरी, रबड़ी।

प्रश्न 8.
स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए सुबह का नाश्ता तैयार करते समय कौन कौन-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर :
स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए सुबह का नाश्ता तैयार करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –
1. सन्तुलित नाश्ता तैयार करना – स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए सदैव सन्तुलित नाश्ते की व्यवस्था करनी चाहिए जिससे उसकी पौष्टिक आवश्यकताएं पूरी हो सकें। इसके लिए चपाती या परांठा, उबली हुई सूखी दाल, सब्जी, दही एवं दूध की व्यवस्था करनी चाहिए। नाश्ते के मीनू में हमेशा बच्चों की रुचि के अनुकूल खाद्य-पदार्थों का समावेश करना चाहिए।

2. नाश्ते का आकर्षक होना – नाश्ते का रूप-रंग और उसकी रचना इतनी आकर्षक होनी चाहिए कि उसे देखते ही बच्चे का मन खाने के लिए लालायित हो उठे।

3. समय से नाश्ता तैयार करना – स्कूल जाने वाले बच्चे का नाश्ता तैयार करते समय माँ को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नाश्ता बच्चे के स्कूल जाने से इतनी देर पहले अवश्य तैयार हो जाए कि बच्चा आराम से नाश्ता कर सके।

4. नाश्ते का महत्त्व समझाना – प्रायः ऐसा होता है कि बच्चे स्कूल जाने से पहले नाश्ता लेना पसंद नहीं करते ऐसी स्थिति में बच्चे को डांटने-फटकारने के स्थान पर प्रेम से यह समझाना चाहिए कि उनके लिए नाश्ता लेना ज़रूरी है।

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प्रश्न 9.
स्कूल जाने वाले बच्चे के लिए टिफिन तैयार करते समय कौन-कौन-सी बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर :

  1. कैलोरी की मात्रा – टिफिन में पोषक तत्त्वों की दृष्टि में दैनिक आवश्यकता के 1/6 से 1/5 भाग की पूर्ति होनी चाहिए।
  2. सन्तुलित आहार – टिफिन तैयार करते समय सन्तुलित आहार सम्बन्धी सिद्धान्तों का ध्यान रखना चाहिए।
  3. हर रोज़ मीन बदलना – इससे भोजन के प्रति अरुचि पैदा नहीं होती।
  4. भोजन की मात्रा – बच्चे के टिफिन में भोजन की मात्रा न तो बहुत अधिक रखनी चाहिए और न बहुत कम।
  5. भोजन इस प्रकार का होना चाहिए कि टिफिन के उलटने से कोई पदार्थ, तरी आदि गिरकर कपड़े या किताबें खराब न हों।
  6. बच्चे को टिफिन के साथ एक नेपकिन देना चाहिए।
  7. बच्चे को पानी की बोतल भी ज़रूर देनी चाहिए।

प्रश्न 10.
जल्दी-जल्दी नाश्ता करने से क्या हानियाँ होती हैं ?
उत्तर :
जल्दी-जल्दी नाश्ता करने से निम्नलिखित हानियाँ होती हैं –
1. भोजन ठीक से चबाया नहीं जाता जिससे मुँह में स्टॉर्च शर्करा में रूपान्तरण नहीं हो पाता।

2. जल्दी-जल्दी में पूरा नाश्ता नहीं किया जाता जिससे भूख लगने के कारण बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता और वह थका-थका सा रहता है। इससे वह पढ़ाई में भी कमज़ोर होता है।

3. सन्तुलित और पूरा नाश्ता न करने और नाश्ते के लिए पैसा ले जाने के कारण बच्चे स्कूल के बाहर बैठे खोमचे वालों से दूषित भोज्य-पदार्थ खाते हैं जिसका असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। अतः स्पष्ट है कि स्कूल जाने वाले बच्चे को प्रातःकालीन नाश्ता आयोजित करते समय कुछ अधिक सावधानी रखनी चाहिए।

प्रश्न 11.
किशोरावस्था में पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएं क्यों बढ़ जाती हैं ?
उत्तर :
इस अवस्था में पर्याप्त शारीरिक परिवर्तन होते हैं –

  1. हड्डियां बढ़ती हैं,
  2. मांस-पेशियों की वृद्धि होती है
  3. कोमल तन्तुओं में वसा संग्रहीत होती है
  4. अस्थि पिजर दृढ़ हो जाता है
  5. शरीर में रोग-निरोधक क्षमता का विकास होता है
  6. नाड़ी मंडल में स्थिरता आती है
  7. लड़कों के कन्धे चौड़े होते हैं
  8. लड़कियों के नितम्ब बढ़ते हैं और मासिक धर्म प्रारम्भ हो जाता है।

इस प्रकार शारीरिक वृद्धि की गति बढ़ जाने के कारण इस अवस्था में भूख अधिक लगती है और पोषण सम्बन्धी आवश्यकताएं बढ़ जाती हैं।

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प्रश्न 12.
किशोरावस्था के लड़के-लड़कियां कुपोषण के शिकार क्यों होते हैं ?
उत्तर :
एक तरफ़ जब किशोरावस्था में पोषण आवश्यकताएं बढ़ती हैं दूसरी और वे प्रायः कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इसके अग्रलिखित कारण होते हैं –

  • पोषण विज्ञान सम्बन्धी अज्ञानता।
  • परम्परागत भोजन सम्बन्धी आदतें।
  • निर्धनता के कारण अपर्याप्त और असंतुलित भोजन।
  • मानसिक अस्थिरता और चिड़चिड़ापन।
  • कोई तीव्र संक्रमण एवं शारीरिक रोग जिसके कारण भूख कम लगती हो।
  • लड़कियों में स्थूलता का भय जिसके कारण वे बहुत-से खाद्य-पदार्थों जैसे दूध, आलू आदि से परहेज करती हैं।
  • दिनचर्या का नियमित न होना और भोजन करने का निश्चित समय न होना।
  • स्वतन्त्रता की भावना होने से अपने लिए भोजन स्वयं चुनना तथा अपनी शारीरिक आवश्यकताओं का ध्यान न रखना।

प्रश्न 13.
किशोरावस्था के लिए आहार आयोजन करते समय क्या सुझाव लाभकारी हो सकते हैं ?
अथवा
किशोरावस्था के लिए आहार आयोजन करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर :
किशोरावस्था के लिए आहार आयोजन करते समय निम्नलिखित सुझाव लाभकारी हो सकते हैं

  • भोजन की पौष्टिकता पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
  • भोजन में सभी वर्गों के खाद्य पदार्थ बदल-बदल कर सम्मिलित किए होने चाहिएँ।
  • दूध और दूध से बने पदार्थ भोजन में अवश्य सम्मिलित किए जाने चाहिएँ।
  • दूध का अभाव होने पर प्रोटीन की पूर्ति सोयाबीन एवं मूंगफली द्वारा करनी चाहिए।
  • हरी पत्तेदार सब्जियों तथा गहरी पीली सब्जियों को आहार में विशेष स्थान देना चाहिए।
  • भोजन में सलाद का होना आवश्यक है क्योंकि कच्ची सब्जियों द्वारा विटामिन सुलभ प्राप्त हो जाते हैं।
  • मौसम के फल जैसे अमरूद, केला, आम, पपीता को आहार में अवश्य सम्मिलित करना चाहिए।
  • भोजन तैयार करते समय तलने-भूनने की क्रियाओं का प्रयोग कम होना चाहिए।
  • मसालों का प्रयोग कम करना चाहिए।
  • भोजन का समय नियमित होना आवश्यक है।
  • शरीर का भार बढ़ रहा हो तो कैलोरी की मात्रा कम रखनी चाहिए।
  • कोष्ठबद्धता से बचने के लिए आहार में रेशेदार पदार्थों का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

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प्रश्न 14.
एक 15 वर्षीय किशोर लड़के की ICMR द्वारा प्रस्तावित दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं लिखें।
उत्तर :
एक 15 वर्षीय किशोर लड़के की ICMR द्वारा प्रस्तावित दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं इस प्रकार हैं –

  • किशोर का भार – लगभग 48 कि०ग्रा०
  • कैलोरी की मात्रा – 2450 कि० कैलोरी
  • प्रोटीन – 70 ग्राम
  • कैल्शियम – 600 मि.ग्रा०
  • लोहा – 41 मिग्रा०
  • विटामिन ए – 2400 मिग्रा०
  • थायामिन – 1.2 मि०ग्रा०
  • राइबोफ्लेबिन – 1.5 मिग्रा०

प्रश्न 15.
भोजन का पौष्टिक मान बढ़ाने का अभिप्राय लिखें।
उत्तर :
सामान्य आहार में अनाज की मात्रा अधिक होती है। कार्बोज़ द्वारा व्यक्ति की कैलोरी आवश्यकताओं की पूर्ति तो हो जाती है, परन्तु शरीर निर्माण करने वाले पौष्टिक तत्त्व जैसे प्रोटीन तथा स्वास्थ्य रक्षा करने वाले तत्त्व जैसे विटामिन व खनिज लवणों का अभाव होता है। जो भी खाद्य पदार्थ उपलब्ध होते हैं उनका पौष्टिक मान बढ़ाने से शरीर के लिए आवश्यक सभी पोषक तत्त्व उपलब्ध हो जाते हैं। अंकुरण द्वारा, मिश्रण द्वारा पौष्टिक मान बढ़ाया जाता है।

प्रश्न 16.
आटे का चोकर फेंकने से क्या नुकसान होते हैं ?
उत्तर :
आटे का चोकर फेंकने से प्रोटीन, थायमिन, निकोटिनिक एसिड, विटामिन B आदि का नुकसान होता है।

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प्रश्न 17.
एक गर्भवती स्त्री की ICMR द्वारा प्रस्तावित दैनिक पौशिक आवश्यकतायें लिखें।
उत्तर :
गर्भवती स्त्री के लिए प्रस्तावित दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं इस प्रकार हैं –

  • ऊर्जा – 2525 कि० कै (मध्यम कार्य)
  • प्रोटीन – 65 ग्राम
  • कैल्शियम – 1000 मिग्रा०
  • लोह – 38 मि०ग्रा०
  • रेटीनाल – 600 माइक्रो ग्रा०
  • थायमिन – 1.3 माइक्रो ग्रा०
  • विटामिन ‘सी’ – 40 मिग्रा०
  • विटामिन B12 – 1 माइक्रो ग्रा०
  • नायसिन – 16 मि.ग्रा०

प्रश्न 18.
दोपहर के भोजन का आयोजन करते समय गृहिणी को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ?
उत्तर :

  1. दोपहर का भोजन भारी होना चाहिए ताकि सन्तुष्टि मिले।
  2. इसमें सभी भोजन समूह से खाद्य पदार्थ होने चाहिए।
  3. कच्ची तथा पक्की सब्जियां होनी चाहिए।
  4. पूरे दिन की ज़रूरत का तीसरा भाग दोपहर के खाने से मिलना चाहिए।

प्रश्न 19.
एक वयस्क पुरुष की ICMR द्वारा प्रस्तावित दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं लिखें।
उत्तर :
वयस्क पुरुष जिसका शारीरिक भार 60 किलोग्राम है तथा मध्यम दर्जे का कार्य करता है, उसके लिए प्रस्तावित दैनिक पौष्टिक आवश्यकताएं हैं –

  • प्रोटीन – 60 ग्राम
  • कैल्शियम – 400 मिग्रा०
  • लोहा – 28 मि०ग्रा०
  • विटामिन ए – 2400 माइक्रो ग्राम
  • थायमिन – 1.4 मि०ग्रा०
  • राइबोफलेविन – 1.6 मि०ग्रा०
  • कैलोरी – 2875 किलो कैलोरी

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प्रश्न 20.
रात्रि के भोजन की व्यवस्था करते समय गृहिणी को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए ? (कोई दो)
उत्तर :
1. भोजन की व्यवस्था सोने से कम-से-कम दो तीन घण्टे पूर्व होनी चाहिए।
2. यह दोपहर के भोजन की तुलना में हल्का होना चाहिए।

प्रश्न 21.
भोजन सम्बन्धी अन्ध विश्वास एवं मान्यताओं का आहार आयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
हमारे देश में भोजन सम्बन्धी अन्ध विश्वास तथा भ्रम सदियों से चले आ रहे हैं। इनका आहार आयोजन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इनके कारण से जो भी कुछ भोजन हमें मिल पाता है उसका भी पूर्ण रूप से लाभ हम नहीं उठा पाते।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
(क) भोजन को समूहों में क्यों बांटा गया है ? सन्तुलित भोजन बनाने के समय इसके क्या लाभ हैं ?
(ख) संतुलित आहार आयोजन में आहार वर्ग किस प्रकार सहायक होते हैं ? उदाहरण सहित समझाएं।
उत्तर :
(क) अलग-अलग भोजनों में अलग-अलग पौष्टिक तत्त्व मौजूद होते हैं। इसलिए भोजन को उनके पौष्टिक तत्त्वों के अनुसार अलग-अलग भोजन समूहों में बांटा गया है। अण्डे और दूध को पूर्ण खुराक माना गया है। लेकिन प्रतिदिन एक भोजन नहीं खाया जा सकता। इससे मन ऊब जाता है। इसलिए भोजन समूहों में से ज़रूरत अनुसार कुछ-न-कुछ लेकर सन्तुलित भोजन प्राप्त किया जाता है। अलग-अलग भोजनों की पौष्टिक तत्त्वों के अनुसार बारम्बारता इस तरह है –

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सन्तुलित भोजन बनाते समय सारे भोजन समूहों में से आवश्यक पौष्टिक तत्त्वों वाले भोजन लिए जाएंगे ताकि भोजन स्वादिष्ट और खुशबूदार बनाया जा सके।
परिवार के लिए सन्तुलित भोजन बनाना (Planning Balanced Diet for the Family) सन्तुलित भोजन बनाने के लिए निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. मनुष्य की प्रतिदिन की पौष्टिक तत्वों की ज़रूरत का ज्ञान (Knowledge of Daily Nutritional Requirements)
  2. ज़रूरी पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजनों की जानकारी तथा चुनाव (Knowledge of Food Stuffs that can Provide Essential Nutrients)
  3. भोजन की योजनाबन्दी (Planning of Meals)
  4. भोजन पकाने का ढंग (Method of Cooking)
  5. भोजन परोसने का ढंग (Method of Serving Food)

1. मनुष्य की प्रतिदिन की पौष्टिक तत्त्वों की जरूरत का ज्ञान (Knowledge of Daily Nutritional Requirements) मनुष्य की भोजन की आवश्यकता उसकी आयु, लिंग, व्यवसाय तथा जलवायु के साथ-साथ शारीरिक हालत पर निर्भर करती है। जैसे भारा तथा शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्ति को हल्का तथा दिमागी कार्य करने वाले मनुष्य की अपेक्षा ज्यादा कैलोरी तथा ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार लड़कियों को लड़कों की अपेक्षा लोहे की ज्यादा ज़रूरत है। इसलिए सन्तुलित भोजन बनाने से पहले पारिवारिक व्यक्तियों की पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत का ज्ञान होना जरूरी है।

2. ज़रूरी पौष्टिक तत्त्व देने वाले भोजन की जानकारी (Knowledge of Food Stuffs that can Provide Essential Nutrients) – प्राकृतिक रूप में मिलने वाले भोजन को उनके पौष्टिक तत्त्वों के आधार पर पाँच भोजन समूहों में बांटा गया है, जोकि पीछे टेबल नं० 1 में दिए गए हैं। प्रत्येक समूह में से भोजन पदार्थ शामिल करने से सन्तुलित भोजन तैयार किया जा सकता है। भिन्न-भिन्न प्रकार की आयु, लिंग तथा शारीरिक अवस्था के अनुसार पौष्टिक तत्त्वों की ज़रूरत भी भिन्न-भिन्न होती है।

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3. भोजन की योजनाबन्दी (Planning of Meals) भोजन की ज़रूरत तथा चुनाव के बाद उसकी योजना बना ली जाए। कितने समय के अन्तराल के बाद भोजन खाया जाए जिसके पौष्टिक तत्त्वों की मात्रा पूरी हो सके। भोजन की योजनाबन्दी को निम्नलिखित बातें प्रभावित करती हैं –

  1. परिवार के सदस्यों की संख्या।
  2. परिवार के सदस्यों की आयु, व्यवसाय तथा शारीरिक अवस्था।
  3. परिवार के सदस्यों की भोजन के प्रति रुचि तथा जरूरत।
  4. परिवार के रीति-रिवाज।
  5. भोजन पर किया जाने वाला व्यय तथा भोजन पदार्थों की खुराक।

ऊपरलिखित बातों को ध्यान में रखते हुए पौष्टिक तत्त्वों की पूर्ति तथा भोजन की ज़रूरत के अनुसार सारे दिन में खाए जाने वाले भोजन को चार मुख्य भागों में बांटा गया है –

  1. सुबह का नाश्ता (Breakfast)
  2. दोपहर का भोजन (Lunch)
  3. शाम का चाय-पानी (Evening Tea)
  4. रात का भोजन (Dinner)

(i) सुबह का नाश्ता (Breakfast) – पूरे दिन की ज़रूरत का चौथा भाग सुबह के नाश्ते द्वारा प्राप्त होना चाहिए। अच्छा नाश्ता शारीरिक तथा मानसिक योग्यता को प्रभावित करता है। नाश्ते की योजना बनाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना आवश्यक है –
(क) शारीरिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए नाश्ता ठोस तथा कार्बोज़ युक्त होना चाहिए जबकि मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए हल्का तथा प्रोटीन युक्त नाश्ता अच्छा रहता है।

(ख) यदि नाश्ते तथा दोपहर के खाने में ज्यादा लम्बा समय हो तो नाश्ता भारी लेना चाहिए तथा यदि अन्तर कम या समय कम हो तो नाश्ता हल्का तथा जल्दी पचने वाला होना चाहिए।

(ग) नाश्ते में सभी भोजन तत्त्व शामिल होने चाहिएं जैसे भारी नाश्ते के लिए भरा हुआ परांठा, दूध, दही या लस्सी तथा कोई फल लिया जा सकता है। हल्के नाश्ते के लिए अंकुरित दाल, टोस्ट, दूध तथा फल आदि लिए जा सकते हैं।

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(ii) दोपहर का भोजन (Lunch) – पूरे दिन की ज़रूरत का तीसरा भाग दोपहर के भोजन द्वारा प्राप्त होना चाहिए। इसमें अनाज दालें, पनीर, मौसमी फल तथा हरी पत्तेदार सब्जियां होनी चाहिएं। भोजन में कुछ कच्ची तथा कुछ पक्की चीजें होनी चाहिएं। अधिकतर कार्य करने वाले लोग दोपहर का खाना साथ लेकर जाते हैं। इसलिए वह भोजन भी पौष्टिक होना चाहिए। उदाहरण के लिए दोपहर के भोजन में रोटी, राजमांह, कोई सब्जी, रायता तथा सलाद लिया जा सकता है तथा साथ ले जाने वाले भोजन में पुदीने की चटनी आदि तथा सैंडविच, गचक तथा कुछ फल सम्मिलित किया जा सकता है।

(iii) शाम की चाय (Evening Tea) – इस समय चाय के साथ कोई नमकीन या मीठी चीज़ जैसे बिस्कुट, केक, बर्फी, पकौड़े, समौसे आदि लिए जा सकते हैं।

(iv) रात का भोजन (Dinner) – इस भोजन में से भी पूरे दिन की ज़रूरत का तीसरा भाग प्राप्त होना चाहिए। रात तथा दोपहर के भोजन में कोई फर्क नहीं होता परन्तु फिर भी इसको बनाते समय कई बातों का ध्यान रखना चाहिए। जैसे –

(क) दोपहर के भोजन की अपेक्षा रात का भोजन हल्का होना चाहिए ताकि जल्दी पच सके।
(ख) सारा दिन काम – काज करते हुए शरीर के तन्तुओं की टूट-फूट होती रहती है। इसलिए इनकी मरम्मत के लिए प्रोटीन वाले भोजन पदार्थ होने चाहिएं।
(ग) रात का भोजन विशेष ध्यान देकर बनाना चाहिए क्योंकि इस समय परिवार के सारे सदस्य इकट्ठे होकर भोजन करते हैं।

4. भोजन पकाने का ढंग (Method of Cooking) – भोजन की योजनाबन्दी का तभी फ़ायदा है जब भोजन को ऐसे ढंग के साथ पकाया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा खुराकी तत्त्वों की सम्भाल हो सके। भोजन खरीदते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए

  1. सूखे भोजन पदार्थ जैसे अनाज, दालें अधिक मात्रा में खरीदनी चाहिएं परन्तु यह भी उतनी ही मात्रा में जिसकी आसानी से सम्भाल हो सके।
  2. फल तथा सब्जियां ताज़ी खरीदनी चाहिएं क्योंकि बासी फल तथा सब्जियों में विटामिन तथा खनिज लवण नष्ट हो जाते हैं।
  3. हमेशा साफ़ – सुथरी दुकानों से ही भोजन खरीदना चाहिए।

भोजन को पकाते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए –

  1. भोजन को अधिक समय तक भिगोकर नहीं रखना चाहिए क्योंकि बहुत सारे घुलनशील तत्त्व नष्ट हो जाते हैं।
  2. सब्जियों तथा फलों के ज्यादा छिलके नहीं उतारने चाहिएं क्योंकि छिलकों के नीचे विटामिन तथा खनिज लवण ज्यादा मात्रा में होते हैं।
  3. सब्जियों को बनाने से थोड़ी देर पहले ही काटना चाहिए नहीं तो हवा के सम्पर्क के साथ भी विटामिन नष्ट हो जाते हैं।
  4. सब्जियां तथा फल हमेशा बड़े-बड़े टुकड़ों में काटने चाहिएं क्योंकि इस तरह से फल तथा सब्जियों की कम सतह पानी तथा हवा के सम्पर्क में आती है।
  5. सब्जियों को उबालते समय पानी में डालकर कम-से-कम समय के लिए पकाया जाए ताकि उनकी शक्ल, स्वाद तथा पौष्टिक तत्त्व बने रहें।
  6. भोजन को पकाने के लिए मीठे सोडे का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे विटामिन ‘बी’ तथा ‘सी’ नष्ट हो जाते हैं।
  7. प्रोटीन युक्त पदार्थों को धीमी आग पर पकाना चाहिए नहीं तो प्रोटीन नष्ट हो जाएंगे।
  8. भोजन हिलाते तथा छानते समय अधिक समय नहीं लगाना चाहिए क्योंकि इससे भोजन के अन्दर हवा इकट्ठी होने के कारण विटामिन ‘सी’ नष्ट हो जाता है।
  9. खाना बनाने वाले बर्तन तथा रसोई साफ़-सुथरी होनी चाहिए।
  10. भोजन में अधिक मसालों का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  11. एक ही प्रकार के भोजन पदार्थों का प्रयोग बार-बार नहीं करना चाहिए।
  12. जो लोग शाकाहारी हों उनके भोजन में दूध, पनीर, दालें तथा सोयाबीन का प्रयोग अधिक होना चाहिए।
  13. जहां तक हो सके भोजन को प्रैशर कुक्कर में पकाना चाहिए क्योंकि इससे समय तथा शक्ति के साथ-साथ पौष्टिक तत्त्व भी बचाए जा सकते हैं।

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5. भोजन परोसने का ढंग (Method of Serving Food) –

  • खाना खाने वाला स्थान, साफ़-सुथरा तथा हवादार होना चाहिए।
  • खाना हमेशा ठीक तरह के बर्तनों में ही परोसना चाहिए जैसे तरी वाली सब्जियों के लिए गहरी प्लेट तथा सूखी सब्जियों के लिए चपटी प्लेट प्रयोग में लाई जा सकती है।
  • एक बार ही बहुत ज्यादा भोजन नहीं परोसना चाहिए बल्कि पहले थोड़ा तथा आवश्यकता पड़ने पर ओर लिया जा सकता है।
  • सलाद तथा फल भी भोजन के साथ अवश्य परोसने चाहिएं।
  • भोजन में रंग तथा भिन्नता होनी चाहिए। इसलिए धनिये के हरे पत्ते, नींबू तथा टमाटर आदि का प्रयोग किया जा सकता है।

यदि ऊपरलिखित बातों को ध्यान में रखकर भोजन तैयार किया जाए तो व्यक्ति अपनी आवश्यकतानुसार, प्रसन्न मन के साथ भोजन खाकर सन्तुलित भोजन का उद्देश्य पूरा कर सकता है। (ख) देखें (क) का उत्तर।

प्रश्न 2.
भोजन की पौष्टिकता बनाने के लिए भोजन पकाते समय कौन-सी बातों को ध्यान में रखना चाहिए ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 3.
आहार नियोजन से आप क्या समझते हैं ? इसको प्रभावित करने वाले कारक कौन-से हैं ?
उत्तर :
एक समझदार गृहिणी में यह गुण होना चाहिए कि आहार भोजन इस तरह बनाए कि परिवार के सभी सदस्यों को उनकी आवश्यकता अनुसार सन्तुलित और स्वादिष्ट खाना मिल सके। सारा दिन आवश्यकता अनुसार क्या-क्या खाना चाहिए यह आहार नियोजन से पता चलता है। इसलिए परिवार के सदस्यों की आवश्यकता और निश्चित समय अनुसार अच्छे पोषण के लिए खाद्य पदार्थों की योजनाबन्दी को आहार नियोजन कहा जाता है।

आहार नियोजन को प्रभावित करने वाले कारक –
1. आय – आहार नियोजन के समय आय को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए। अच्छे स्वास्थ्य के लिए अच्छा आहार अर्थात् सन्तुलित भोजन होना आवश्यक है। सन्तुलित भोजन के बारे में आप पहले ही पढ़ चुके हैं। यदि हम गैर-मौसमी वस्तु खरीदेंगे तो महंगी ही मिलेंगी। इस के विपरीत मौसमी सब्जी या फल पर खर्च कम होगा। यदि हम महंगे भोजन नहीं खरीद सकते तो हमारी कुछ आवश्यकताएं (पौष्टिक तत्त्वों सम्बन्धी) सस्ते भोजन से भी पूरी हो सकती हैं। जिस तरह सप्रेटा दूध अधिक प्रयोग किया जाए तो इसमें कोई नुकसान नहीं। जहां तक हो सके स्थानिक पैदा हुई सब्जियां और फल उपयोग करने में सस्ते से ही भोजन ताज़ा और विटामिन भरपूर होगा।

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2. मौसम – सर्दियों में अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है जबकि गर्मियों में ठण्डे और तरल पदार्थों की आवश्यकता अधिक होती है। इसके अनुसार ही खाने की योजना बनानी चाहिए। सर्दियों में जो ऊर्जा भरपूर पिन्नियां, मिठाइयां, समौसे और पकौड़े साथ देते हैं। प्रत्येक मौसम के अनुसार सूची बनाकर परिवार की पौष्टिक आवश्यकताओं को मुख्य रखना चाहिए। मौसमी फलों और सब्जियों को प्राथमिकता देनी चाहिए। बेमौसमी सब्जियां और फल महंगे भी मिलते हैं और ताज़े भी नहीं होते।

3. भोजन प्राप्ति – प्रत्येक स्थान पर प्रत्येक भोजन पदार्थ उपलब्ध नहीं होता। वह ही भोजन सूची में रखने चाहिएं जो आसानी से मिल सकें और निकट मिल सकें। दूर जाने से पैसा और समय नष्ट होगा। यदि घर में फ्रिज है तो बची हुई सब्जी प्रयोग की जा सकती है या यदि सूची में डबलरोटी है तो क्या वह उपलब्ध है आदि।

4. गृहिणी की रुचि और निपुणता – गृहिणी की खाना पकाने में रुचि और निपुणता होनी बहुत आवश्यक है इस तरह वह भिन्न-भिन्न प्रकार के खाने बनाकर भिन्नता लाकर अपने परिवार को खुश कर सकती है और अच्छे आयोजन से परिवार के सदस्यों की पौष्टिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।

5. परिवार का आकार और रचना – आहार नियोजन के समय परिवार के आकार और रचना को ध्यान में रखना पड़ेगा। परिवार के सदस्यों की आयु, कार्य, संख्या और शारीरिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर सूची बनानी पड़ेगी। जैसे पुरुषों को औरतों से अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है, बढ़ रहे बच्चे को अधिक प्रोटीन चाहिए। जैसे कि आप पीछे दिए अध्यायों में पढ़ चुके हैं कि गर्भवती बच्चे को दूध पिलाने वाली माँ की शारीरिक आवश्यकता अधिक होती है। कृषि करने वाले या सख्त मेहनत करने वाले आदमी को दफ्तर जाने वाले आदमी से अधिक खुराक की आवश्यकता होती है।

आहार नियोजन के समय भी इन बातों का ध्यान रखना चाहिए। इसके अतिरिक्त सूची बनाते समय भोजन सम्बन्धी आदतें, रीति-रिवाज और धार्मिक तथ्य भी ध्यान में रखने चाहिएं। जैसे परिवार का कोई सदस्य यदि शाकाहारी है तो खाने का आयोजन बनाते समय उसका ध्यान रखना चाहिए। यदि जीवन के रूप में ढंगों को ध्यान में रखकर खाने की योजना को बनाया जाएगा तभी भोजन का आनन्द लिया जा सकता है। ये सभी बातों को ध्यान में रखकर यदि सूची बनाई जाए तो शुरू में थोड़ी मुश्किल और अधिक समय लगेगा धीरे-धीरे आदत बन जाती है और कोई मुश्किल नहीं आती।

आहार नियोजन के लाभ –

  1. परिवार के लिए भोजन को सन्तुलित बनाया जा सकता है।
  2. सभी परिवार के सदस्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सकती है।
  3. समय, पैसा और शक्ति की बचत की जा सकती है।
  4. भोजन को स्वादिष्ट और आकर्षित बनाया जा सकता है।
  5. बचा हुआ भोजन सही ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है।
  6. खाना पकाते समय पौष्टिक तत्त्वों को बचाया जा सकता है।

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प्रश्न 4.
कोई तीन कारक बताएँ जो संतुलित भोजन की योजना बनाते समय ध्यान में रखने चाहिएँ।
उत्तर :
देखें प्रश्न 3 का उत्तर।

प्रश्न 5.
भारतीय मेडिकल खोज संस्था की ओर से भारतीयों के लिए की गई खराकी तत्त्वों की सिफ़ारिश के बारे में लिखें।
उत्तर :
भारतीय मेडिकल खोज संस्था (2000) की ओर से भारतीयों के लिए खुराकी तत्त्वों की रोजाना सिफ़ारिश

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प्रश्न 6.
वयस्क पुरुष और स्त्री के सन्तुलित भोजन का एक चार्ट बनाएं।
उत्तर :
वयस्क पुरुष और स्त्री का सन्तुलित भोजन

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प्रश्न 7.
आहार समूह के आधार पर परिवार के लिए सन्तुलित आहार की रचना करें।
उत्तर :
आहार समूह के आधार पर निम्नलिखित भोजनावली की रचना की जा सकती है, जो सन्तुलित है।

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पाँच समूह – भोजन

  1. अनाज – चपाती
  2. दालें – मूंग की दाल
  3. दूध तथा अन्य पशु जन्य पदार्थ – दही
  4. फल व सब्जियाँ – पालक गोभी व संतरा
  5. तेल, घी और चीनी – पकाने के लिए तेल का इस्तेमाल होगा।

एक और भोजनावली की भी रचना की जा सकती है –

आहार समूह – भोजन

  1. अनाज – चावल
  2. दालें – अरहर दाल
  3. दूध तथा अन्य पशु जन्य पदार्थ – रायता
  4. फूल व सब्जियां – मेथी, आड़, गाजर व अमरूद
  5. तेल, घी तथा चीनी – इन्हें पकाने में तेल का इस्तेमाल होगा।

प्रश्न 8.
परिवार के आहार आयोजन को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित घटकों का उल्लेख कीजिए।
1. लिंग
2. आयु
3. कार्य
4. आर्थिक स्थिति
5. सामाजिक घटक-कर्म, संस्कृति, जाति
6. भोजन संबंधी आदतें
7. भोजन का प्राप्त होना
8. भोजन सम्बन्धी अंधविश्वास एवं मान्यतायें।
उत्तर :
1. लिंग – परिवार के आहार आयोजन पर सदस्यों के लिंग का बहुत प्रभाव पड़ता है। समान आयु एवं व्यवसाय के पुरुषों और स्त्रियों की आहारीय आवश्यकतायें भिन्न-भिन्न होती हैं। एक शारीरिक श्रम करने वाली 30 वर्षीय स्त्री को प्रतिदिन 3000 कैलोरी की आवश्यकता होती है, जबकि उसी आयु के शारीरिक श्रम करने वाले पुरुष को प्रतिदिन 3900 कैलोरी की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार समान आयु के किशोर और किशोरियों की पौष्टिक आवश्यकताओं में भी काफी भिन्नता होती है। इस प्रकार लिंग की दृष्टि से भी आहार में भिन्नता होती है।

2. आयु – आहारीय आवश्यकतायें परिवार के विभिन्न सदस्यों की आयु पर निर्भर करती हैं। किसी भी परिवार में बच्चों की आहार आवश्यकतायें बड़े की आहार आवश्यकताओं से सदैव भिन्न होती हैं। बच्चों को बढ़ोतरी के लिए अधिक प्रोटीन, विटामिन और खनिज लवण युक्त आहार की आवश्यकता होती है, तो शारीरिक श्रम करने वाले वयस्क पुरुष या स्त्री को ऊर्जा प्राप्ति के लिए अधिक कैलोरी की आवश्यकता होती है। अतः ऐसे दो परिवार जिनमें सदस्यों की संख्या तो बराबर हो परन्तु उसकी आयु भिन्न-भिन्न हो तो अलग-अलग प्रकार के खाद्य-पदार्थों की आवश्यकता होगी।

3. कार्य – किसी व्यक्ति की आहारीय आवश्यकताएं उसके कार्य या व्यवसाय पर निर्भर करती हैं। अतः परिवार का आहार आयोजन उसके सदस्यों के व्यवसाय पर निर्भर करेगा। जिस परिवार में शारीरिक श्रम करने वाले सदस्य अधिक होंगे उस परिवार के आहार आयोजन में अधिक कैलोरी प्रदान करने वाले अथवा कार्बोज़ एवं वसायुक्त खाद्य पदार्थों का अधिक समावेश होगा। इसके विपरीत जिस परिवार में मानसिक कार्य करने वाले सदस्य अधिक होंगे उसके आहार आयोजन में प्रोटीन एवं खनिज लवण युक्त पदार्थों का समावेश अधिक होगा।

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4. आर्थिक स्थिति – आहार आयोजन पर घर की आर्थिक स्थिति का बहुत प्रभाव पड़ता है। गृहिणी को आहार आयोजन अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार करना होता है। इसीलिए गृहिणी आहार के लिए उपलब्ध धन के आधार पर ही खाद्य-पदार्थों का चयन करती है। यदि आहार के लिए धन की कोई कमी नहीं होती तो वह आहार आयोजन के लिए महंगे खाद्य-पदार्थों का चयन कर सकती है। इसके विपरीत यदि धन कम हो तो सस्ते खाद्य-पदार्थों का चयन करना पड़ता है।

5. सामाजिक घटक – धर्म, संस्कृति, जाति – भोजन सम्बन्धी आदतें, धर्म, जाति, सामाजिक स्थिति एवं संस्कृति से प्रभावित होती हैं। पंजाबी भोजन में तन्दूरी रोटी, दक्षिण भारतीय भोजन में इमली, मारवाड़ी भोजन में पापड़ अवश्य होना चाहिए। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के लोग दिन के खाने में चपातियों के साथ थोडा चावल खाते हैं जबकि दक्षिण भारतीय, बिहारी एवं बंगाली दिन में केवल भात खाते हैं और वह भी पेट भर के।

6. भोजन सम्बन्धी आदतें – आदत मनुष्य की द्वितीय प्रकृति है। कई ऐसे काम हैं जो हम आदतवश करते हैं। भोजन सम्बन्धी आदत भी इनमें से एक है। हम किसी व्यक्ति के पास सुस्वादु एवं अति पौष्टिक भोजन ले जा सकते हैं, परन्तु उसे खाने के लिए बाध्य नहीं कर सकते। उस भोजन को खाना उस व्यक्ति की आदत पर निर्भर करता है। कुछ व्यक्तियों को कुछ विशेष वस्तु के प्रति रुचि एवं कुछ विशेष के प्रति अरुचि रहती है। संसार में विभिन्न जाति एवं धर्म के लोग हैं। उनकी भोजन-सम्बन्धी आदतें भी भिन्न-भिन्न हैं।

हमारे देश में ही विभिन्न प्रान्त के लोग विभिन्न प्रकार के भोजन पसन्द करते हैं। दक्षिण भारत के लोग इमली, मिर्च, चावल अधिक पसन्द करते हैं तो मध्य प्रदेश और उत्तर भारत के लोग रोटी, परांठे, पूरियां आदि अधिक खाते हैं। भोजन के समय में भी विभिन्नता आदत के कारण होती है। कुछ लोग दिन में दो बार भोजन करते हैं तो कुछ लोग चार बार भोजन करते हैं। कुछ लोग दिनभर कुछ-न-कुछ खाते ही रहते हैं। कुछ लोग रात्रि में ही भरपेट भोजन करते हैं । यह सब आदत के ही कारण होता है। भोजन-सम्बन्धी आदत व्यक्तिगत होती है। भोजन-सम्बन्धी गलत आदतों से कुपोषण की समस्या उठ खड़ी होती है। इस प्रकार भोजन सम्बन्धी आदतों का आहार आयोजन पर बहुत प्रभाव पड़ता है।

7. भोजन का प्राप्त होना – आहार नियोजन करने में घर में उपलब्ध या आसानी से उपलब्ध वस्तुओं का बहुत प्रभाव पड़ता है। खाद्य-पदार्थों की उपलब्धि पर, मौसम व जलवायु का गहरा प्रभाव पड़ता है और विभिन्न मौसम में भिन्न-भिन्न खाद्य-पदार्थ पाये जाते हैं। अत: आहार आयोजन के समय ध्यान रखना चाहिए कि मौसम के अनुसार ही खाद्य-पदार्थों को अपने भोजन में सम्मिलित करें। ऐसे खाद्य-पदार्थ आसानी से मिल जाते हैं और सस्ते भी होते हैं।

यातायात के अच्छे साधन भी खाद्य-पदार्थों की उपलब्धि पर प्रभाव डालते हैं। अच्छे यातायात के साधन व खाद्य-पदार्थों को सुरक्षित रखने के अच्छे तरीकों से एक जगह पर पाये जाने वाले खाद्य-पदार्थों को आसानी से दूसरी जगह पर पहुँचाया जा सकता है। कुछ खाद्य-पदार्थों के उचित संग्रह व संरक्षण से उन्हें अधिक समय के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।

8. भोजन सम्बन्धी अन्ध – विश्वास एवं मान्यतायें-हमारे देश में भोजन सम्बन्धी अन्ध-विश्वास और भ्रम सदियों से चले आ रहे हैं। इनका आहार आयोजन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इनकी वजह से जो भी कुछ भोजन हमें मिल पाता है उसका भी हम पूरा फायदा नहीं उठा पाते। यदि वैज्ञानिक तौर पर देखा जाये तो हम यह कह सकते हैं कि ये बिल्कुल निराधार हैं क्योंकि हम देखते हैं कि इनके आधार पर एक वर्ग के लोग किसी भोज्य-पदार्थ को ग्रहण नहीं करते परन्तु दूसरे वर्ग के लोग उसी भोज्य-पदार्थ को बहुत लाभदायक समझते हैं। अतः आहार आयोजन के समय हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम इन भोजन भ्रमों को किस प्रकार से दूर करके पौष्टिक आहार दे सकें।

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प्रश्न 9.
आहार आयोजन को प्रभावित करने वाले किन्हीं पाँच कारकों के बारे में बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 3 का उत्तर।

प्रश्न 10.
आहार आयोजन करते समय गृहिणी को किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिये ?
उत्तर :
आहार आयोजन करते समय गृहिणी को निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिये –
→ प्रतिदिन की आहार – तालिका बनाते समय परे दिन को एक इकाई के रूप में लेना चाहिए-यानी सुबह का नाश्ता, दोपहर का खाना, शाम का नाश्ता एवं रात्रि के भोजन की आहार तालिका एक बार बनानी चाहिए। तालिका ऐसी हो जिससे दिनभर के भोजन से शरीर को अनिवार्य पोषक तत्त्व मिल सकें।

→ आर हा– तालिका बनाते समय मितव्ययिता को ध्यान में रखना चाहिए, परन्तु भोजन की पौष्टिकता को नहीं भूलना चाहिये। गृहिणी को यह ज्ञान होना चाहिये कि भोजन तत्त्वों की प्राप्ति के सस्ते साधन कौन-कौन से हैं ?

→ तालिका में पाँचों प्रमुख तत्त्वों (प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, खनिज लवण) का समावेश शारीरिक आवश्यकता के अनुसार होना चाहिये।
→ आहार – तालिका में सातों आधारभूत भोज्य पदार्थों का रहना अनिवार्य है।
→ आहार – तालिका में मुलायम खाद्य वस्तुओं के साथ कुछ प्राकृतिक रूप से कच्चे पदार्थों (अमरूद, खीरा, ककड़ी, टमाटर, गाजर, प्याज, मूली) आदि का रहना अनिवार्य है।
→ भोजन में क्षुधावर्द्धक पदार्थ (मट्ठा, जलजीरा, पोदीने का पानी, सूप, चाय, कॉफी) भी रहना अनिवार्य है।
→ एक समय के भोजन में ऐसे व्यंजन नहीं रखने चाहिये जिसमें एक ही भोजन तत्त्व की मात्रा अधिक हो, जैसे-दूध तथा दूध से बने पदार्थ।
→ प्रत्येक समय के भोजन में कुछ स्वाभाविक सुगन्ध और आकर्षण वाले पदार्थों का रहना ज़रूरी है।
→ पूरे दिन की आहार – तालिका में एक ही खाद्य वस्तु को एक ही रूप में एक बार से अधिक नहीं रखना चाहिए। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि एक ही भोज्य पदार्थ विभिन्न रूप से भोजन में सम्मिलित नहीं किया जाये, यथा–आलूभरी पूरी, आलू की भुजिया, आलू का चाप, आलू की सब्जी आदि।
→ बच्चों के स्कूल या दफ्तर के लिए दिया जाने वाला भोजन देखने में आकर्षक होना चाहिए, साथ ही लेकर जाने में सुविधाजनक होने के साथ-साथ पौष्टिकता से भरपूर होना भी आवश्यक है।
→ एक ही तरह के भोज्य-पदार्थों को प्रतिदिन की आहार-तालिका में नहीं रखना चाहिए। रात और दिन के भोजन में एक ही प्रकार का भोजन नहीं रहना चाहिए।
→ आहार – तालिका बनाते समय परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को कैलोरी सम्बन्धी आवश्यकताओं को ध्यान में रखना ज़रूरी है। कैलोरी की आवश्यकता एक ही भोज्य पदार्थ से पूरी न होकर विभिन्न भोज्य पदार्थों से होनी चाहिये।
→ आहार – तालिका जलवायु और मौसम के अनुकूल होनी चाहिये। गर्मी में ठण्डे पेय पदार्थ तथा मौसमी फल, सुपाच्य एवं हल्के भोज्य पदार्थों का आहार में समावेश होना चाहिये। जाड़े के मौसम में गरिष्ठ तले हुए भोज्य-पदार्थ, गर्म पेय आदि का उपयोग करना चाहिये।
→ आहार – तालिका बनाते समय परिवार के सदस्यों तथा अतिथियों की रुचि एवं आदतों को भी ध्यान में रखना अनिवार्य है।
→ आहार – तालिका में मौसमी चीज़ों का ही समावेश होना चाहिए।
→ एक बार के भोजन में अधिक किस्म के भोज्य पदार्थों को नहीं रखना चाहिए।
→ आहार – तालिका बनाते समय यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि तालिका में सम्मिलित किये गये खाद्य-पदार्थों को खाने योग्य बनाने में कितना समय लगेगा।
→ आहार – तालिका बनाते समय अपनी आर्थिक स्थिति पर भी ध्यान देना चाहिए।
→ भोजन सम्बन्धी आदतें, धर्म, जाति, सामाजिक स्थिति एवं सांस्कृतिक परिवेश से प्रभावित होती हैं। आहार आयोजन करते समय इन सभी का ध्यान रखना चाहिए।
→ कामकाजी स्त्रियों को सरल आहार तालिका बनानी चाहिए।

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प्रश्न 11.
सुबह के नाश्ते का आयोजन करते समय गृहिणी को किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिये ?
उत्तर :
दिन का पहला आहार नाश्ता या कलेवा कहलाता है। इसका आयोजन करते समय गृहिणी को निम्नलिखित बातों की ओर ध्यान देना चाहिए –
1. व्यवसाय – प्रातःकाल के नाश्ते का बहुत कुछ सम्बन्ध व्यवसाय से है। जिन लोगों को शारीरिक कार्य बहुत अधिक करना पड़ता है उनका नाश्ता पौष्टिक, ठोस तथा पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए जबकि मानसिक कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिए तरल, हल्के तथा थोड़े नाश्ते की आवश्यकता होती है।

2. नाश्ते तथा दोपहर के भोजन के समय में अन्तर – नाश्ता तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि नाश्ते तथा दोपहर के भोजन के समय में कितना अंतर होगा। यदि अंतर केवल दो अथवा तीन घण्टे का हो तो दूध, लस्सी, चाय तथा टोस्ट से ही काम चल सकता है, लेकिन यदि अन्तर चार पाँच घण्टों का हो तो फिर नाश्ता भारी होना चाहिए।

3. आदत – नाश्ते की मात्रा तथा उसके प्रकार का सम्बन्ध खाने वालों की आदत पर भी निर्भर करता है। इसका कारण यह है कि कुछ व्यक्ति बहुत हल्का नाश्ता लेना पसंद करते हैं तो कुछ लोगों की तृप्ति भारी नाश्ते के बिना होती ही नहीं है। इसी प्रकार से कुछ व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो नाश्ता लेना पसन्द ही नहीं करते। यही बात नाश्ते में ली जाने वाली वस्तुओं के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। विभिन्न प्रदेशों के निवासी विभिन्न प्रकार का नाश्ता लेना पसन्द करते हैं। उदाहरण के लिये पंजाब के लोग नाश्ते में लस्सी, दूध, परांठा लेना पसन्द करते हैं, उत्तर प्रदेश के लोग सत्तू, जलेबी, दूध, पूड़ी-कचौड़ी तो दक्षिण के लोग इडली, डोसा, कॉफी आदि।

4. सभी प्रकार के भोजन तत्त्वों का समावेश – नाश्ता तैयार करते समय इस बात का ध्यान रखना भी आवश्यक है कि उसमें सभी भोजन तत्त्वों यथा कार्बोज, प्रोटीन, वसा, लवण, रेशेदार पदार्थ, विटामिन युक्त पदार्थ तथा पेय पदार्थ तथा पेय पदार्थों का समावेश हो। दूध, चाय, कॉफी, कोको, लस्सी, शरबत, रस आदि पेय पदार्थ उत्तेजक होते हैं तथा रात की सुस्ती दूर करने में सहायता पहुँचाते हैं। फल या सब्जी रेशेदार होने के कारण पेट साफ करने तथा भूख बढ़ाने में योगदान देती हैं। मक्खन, पनीर, क्रीम आदि के द्वारा शरीर की वसा सम्बन्धी आवश्यकताएं पूरी होती हैं। परांठा, दलिया, रोटी, टोस्ट आदि के द्वारा शरीर को कार्बोज़ प्राप्त होता है तो दूध तथा दूध से बने पदार्थों के द्वारा प्रोटीन।

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प्रश्न 12.
दोपहर के आहार की योजना किस प्रकार करनी चाहिए ?
उत्तर :
दोपहर के आहार की योजना बहुत सावधानी से करनी चाहिए। इसका कारण यह कि आहार दिनभर कार्य करने की शक्ति व गर्मी प्रदान करता है । इस समय की आहार तालिका करते समय भी व्यवसाय, आयु, स्वास्थ्य, आदत आदि का ध्यान रखना चाहिए, किन्तु निम्नलिखित वर्गों में से कम-से-कम एक-एक खाद्य-पदार्थ अवश्य होना चाहिए –

  1. अनाज – गेहूँ, चावल, चना, जौ, बाजरा आदि।
  2. दाल – उड़द, अरहर, मूंग आदि।
  3. दही, पनीर।
  4. मौसमी फल – केला, सेब, संतरा, आम आदि।
  5. मौसमी सब्जी – मटर, गोभी, सीताफल, लौकी, भिण्डी, टिंडे, तोरई आदि।
  6. हरी पत्तेदार सब्जियां अथवा सलाद।
  7. वसायुक्त पदार्थ।

यह ध्यान देने वाली बात है कि दोपहर के आहार में अनाज पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए, जिससे दिनभर कार्य करने के लिए ऊर्जा व शक्ति भरपूर मात्रा में प्राप्त हो सके। दूसरी बात यह कि प्रतिदिन भोजन एक ही रीति से पकाने के स्थान पर भिन्न-भिन्न पद्धतियों से पकाना चाहिए। उदाहरण के लिए चावल कभी मीठे, कभी नमकीन तथा कभी सादा बनाये जा सकते हैं तो कभी आटे से रोटी, पूड़ी, कचौड़ी अथवा परांठे।

बड़े नगरों में कार्य करने का स्थान घर से इतनी दूर होता है कि प्रायः लोगों को दोपहर का भोजन अपने साथ ले जाना पड़ता है। ऐसी अवस्था में उसे ले जाने की सुविधा का अधिक ध्यान रखा जाता है तथा इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया जाता कि वह शरीर को पर्याप्त ऊर्जा एवं शक्ति देने वाला है अथवा नहीं। अतः प्रत्येक गृहिणी का यह कर्त्तव्य है कि वह इस बात का ध्यान रखे कि जो व्यक्ति दोपहर का भोजन साथ ले जाते हों, उनके आहार में शाक-भाजी, मूली, प्याज, हरी मिर्च आदि कुछ अधिक हों।

कच्चे फल, मूली आदि के द्वारा शरीर को सेलुलोज, लवण तथा विटामिन मिलने में सहायता पहुंचेगी। जो व्यक्ति भोजन साथ लेकर जाते हैं प्रायः उन्हें ठंडा भोजन ही करना पड़ता है। ठंडा भोजन खाने से पाचक रस ग्रन्थियां देर से उत्तेजित होती हैं। अतः ऐसे व्यक्तियों को भोजन के बाद चाय या कॉफी आदि गर्म पेय पदार्थ पीने चाहिए जिससे भोजन पचने में सहायता पहुँचे।

प्रश्न 13.
आहार नियोजन से आप क्या समझते हैं ? आहार नियोजन की उपयोगिता बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 3 का उत्तर।

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प्रश्न 14.
भोजन सम्बन्धी योजना का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 3 का उत्तर में आहार नियोजन के लाभ ।

प्रश्न 15.
आहार-समहों के निर्धारण का उद्देश्य क्या है ? अमेरिका की नेशनल रिसर्च कौंसिल तथा ICMR द्वारा निर्धारित आहार-समूहों का विवरण प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर :
शरीर को भिन्न-भिन्न प्रकार के पौष्टिक तत्त्वों जैसे प्रोटीन, कार्बोज, वसा, विटामिन, खनिज लवण आदि की आवश्यकता होती है। इन्हें विभिन्न भोज्य पदार्थों से प्राप्त किया जाता है, क्योंकि भोजन के सभी आवश्यक तत्त्व एक प्रकार के भोज्य पदार्थ में नहीं पाए जाते। गृहिणी के लिए यह विकट समस्या पैदा हो जाती है कि प्रत्येक बार कौन-से भोज्य पदार्थों का चुनाव करे ताकि सन्तुलित भोजन पकाया जा सके तथा सभी सदस्यों को उनकी रुचि तथा शारीरिक स्थिति के अनुसार पौष्टिक आहार उपलब्ध करवाया जा सके। इस समस्याओं से निपटने के लिए आहार समूहों का निर्धारण किया गया है।

आहार-समूह-अमेरिका की राष्ट्रीय अनुसंधान परिषद् ने सात आहार समूहों का निर्धारण किया है। इनका आधार यह माना गया है कि हमारे शरीर को मुख्यतः दस पोषक तत्त्वों की आवश्यकता है। यह पोषक तत्त्व हैं- प्रोटीन, कार्बोज, वसा, कैल्शियम, लोहा, विटामिन ए, थायमिन, राइबोफ्लेबिन, विटामिन सी तथा विटामिन डी।

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ICMR द्वारा किए गए आहार समूहों के वगीकरण
ICMR द्वारा आहार समूहों का एक व्यावहारिक वर्गीकरण किया गया है जिसमें पांच आहार समूह पाए गए हैं। ये समूह निम्नलिखित अनुसार हैं –

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एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) निम्न का उत्तर एक शब्द में दो –

प्रश्न 1.
आहार की पौष्टिकता बढ़ाने का एक ढंग बताओ।
उत्तर :
खाद्य पदार्थों का मिश्रण।

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प्रश्न 2.
आटे के चोकर में क्या होता है ?
उत्तर :
प्रोटीन।

प्रश्न 3.
दालों में कौन-सा पौष्टिक तत्त्व अधिक होता है ?
उत्तर :
प्रोटीन।

प्रश्न 4.
आहार नियोजन से गृहिणी का क्या बचता है ?
उत्तर :
समय।

(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. स्वस्थ व्यक्ति का शरीर का तापमान ……….. होता है।
2. दूध पिलाने वाली माँ के भोजन में ……….. की मात्रा अधिक हो।
3. दालों आदि में ……….. % प्रोटीन होती है।
4. कार्बोज़ द्वारा ……….. मिलती है।
5. रात्रि का भोजन दोपहर के भोजन की तुलना में ……….. होना चाहिए।
उत्तर :
1. 98.4F
2. प्रोटीन
3. 20-25
4. ऊर्जा
5. हल्का।

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(ग) ठीक/गलत बताएं –

1. भोजन सोने से कम-से-कम दो घण्टे पहले लें।
2. दालों में प्रोटीन होता है।
3. बच्चों को सन्तुलित आहार नहीं चाहिए।
4. बच्चों को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है।
5. आहार आयोजन से समय की बचत होती है।
उत्तर :
1. (✓) 2. (✓) 3. (✗) 4. (✓) 5. (✓)।

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
परिवार के आहार का स्तर निम्न बातों पर निर्भर है –
(A) आहार के लिए उपलब्ध धन ।
(B) गृहिणी के पास भोजन पकाने के लिए उपलब्ध समय एवं ऊर्जा
(C) गृहिणी का खाद्य तथा पोषण सम्बन्धी ज्ञान
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 2.
सब्जियों में ……… कम होता है।
(A) लोहा
(B) प्रोटीन
(C) विटामिन बी
(D) विटामिन सी।
उत्तर :
प्रोटीन।

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प्रश्न 3.
आहार आयोजन निम्न पर निर्भर है –
(A) परिवार की रुचि
(B) व्यवसाय
(C) समय तथा शक्ति
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 4.
सन्तुलित भोजन की योजना बनाते समय कौन-कौन सी बातों को ध्यान में रखोगे ?
(A) भोजन की योजनाबन्दी
(B) भोजन पकाने का सही ढंग
(C) परिवार के सदस्यों के रोज़ाना खुराकी तत्त्वों का ज्ञान
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 5.
निम्न में ठीक है –
(A) भोजन पकाने का समय तथा परोसने का ढंग खाने के नियोजन को प्रभावित करता है।
(B) गरीबी के कारण लोग सन्तुलित भोजन नहीं ले पाते।
(C) अशिक्षा के कारण भी लोग सन्तुलित भोजन नहीं करते।
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 6.
निम्न में गलत है –
(A) सभी अमीर लोग सन्तुलित भोजन ही लेते हैं।
(B) अशिक्षा के कारण लोग सन्तुलित भोजन नहीं लेते।
(C) परिवार का आकार भोजन नियोजन को प्रभावित करता है।
(D) सभी गलत।
उत्तर :
सभी अमीर लोग सन्तुलित भोजन ही लेते हैं।

प्रश्न 7.
बुखार में निम्न प्रकार का भोजन नहीं लेना चाहिए –
(A) तरल तथा नर्म गर्म भोजन का प्रयोग
(B) तला हुआ भारी भोजन
(C) खिचड़ी, दलिया आदि
(D) अधिक मात्रा में दूध।
उत्तर :
तला हुआ भारी भोजन।

प्रश्न 8.
रात्रि के भोजन में लेने चाहिए –
(A) दाल कोई भी
(B) हरी सब्जी
(C) सूप
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 9.
निम्न में सन्तुलित आहार की विशिष्टता नहीं है –
(A) व्यक्तिगत रुचि और स्वाद के अनुकूल
(B) अधिक महंगा
(C) सभी आहार समूहों में से खाद्य पदार्थों का समावेश
(D) व्यक्तिगत पोषण आवश्यकता।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 10.
निम्न में गलत है –
(A) वसा शरीर का तापमान बनाए रखने में सहायक है
(B) भोजन की योजना बनाने से समय नष्ट होता है
(C) कैलोरी की उचित मात्रा से ही सन्तुलित भोजन नहीं बनता
(D) अंकुरण से पौष्टिकता बढ़ती है।
उत्तर :
भोजन की योजना बनाने से समय नष्ट होता है।

प्रश्न 11.
निम्न में से आहार आयोजन के प्रमुख सिद्धान्त का हिस्सा है –
(A) परिवार की रुचि
(B) पारिवारिक आय
(C) साप्ताहिक तालिका
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 12.
किसी व्यक्ति के लिए पोषक तत्त्व कितनी मात्रा में चाहिए निम्न पर निर्भर है ?
(A) आयु
(B) वज़न
(C) लिंग
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 13.
निम्न में ठीक नहीं है –
(A) सन्तुलित भोजन से ही शरीर तन्दरुस्त रह सकता है
(B) सब्जियों में प्रोटीन होता है
(C) गर्भवती औरत को पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए
(D) बुखार की हालत में हल्का भोजन लेना चाहिए।
उत्तर :
सब्जियों में प्रोटीन होता है।

प्रश्न 14.
आई०सी० एम० आर० ने कितने आहार समूह निर्धारित किए हैं ?
(A) 3
(B) 2
(C) 4
(D) 5.
उत्तर :
5.

भोजन सम्बन्धी योजना एवं आहार समूह HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ भोजन सम्बन्धी योजना का अर्थ है भोजन के लिए इस प्रकार से योजना बनाना कि परिवार का प्रत्येक सदस्य उपयुक्त पोषण स्तर प्राप्त कर सके।

→ भोजन सम्बन्धी योजना वह प्रक्रिया है जिसमें वह निर्धारित किया जाता है कि प्रतिदिन प्रत्येक भोजन में क्या खाना चाहिए।

→ परिवारजनों की पोषण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा करना उनके स्वास्थ्य और उनकी कुशलता के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

→ भोजन सम्बन्धी योजना को हम ‘दैनिक भोजन निर्देशिका’ भी कह सकते हैं।

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→ भोजन योजना पर प्रभाव डालने वाले बहुत-से कारक हैं। भोजन का प्रकार और मात्रा को निर्धारित करते समय इनका ध्यान रखा जाता है।

→ यह कारक हजार यह कारक हैं-आयु, लिंग, गतिविधियाँ, आर्थिक स्थिति, मौसम, व्यवसाय, समय, ऊर्जा व कुशलता सम्बन्धी पहलू, परम्पराएं और प्रथाएं, व्यक्ति की पसंद व नापसंद, संतोष का स्तर आदि।

→ भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद् (ICMR) ने आहारों को वर्गीकृत करने का अधिक व्यावहारिक तरीका सुझाया है।

→ यह निम्नलिखित प्रकार से है –

  • अनाज
  • दालें
  • दूध तथा अन्य पशु जन्य पदार्थ
  • फल और सब्जियाँ
  • वसा और चीनी।

→ सन्तुलित भोजन से ही शरीर तन्दुरुस्त रह सकता है।

→ सन्तुलित भोजन में आवश्यक मात्रा में प्रोटीन, कार्बोज, विटामिन, चिकनाई, लवण और पानी होते हैं।

→ भोजन में केवल कैलोरियाँ होने से ही भोजन सन्तुलित नहीं बनता।

→ दालों, दूध तथा पशु जन्य पदार्थों आदि में प्रोटीन होती है।

→ अनाज दालें, गुड़, सूखे मेवे, मूंगफली, आलू, फल आदि कार्बोहाइड्रेट्स के स्रोत हैं।

→ सब्जियों में विटामिन और खनिज पदार्थ होते हैं।

→ खाना बनाने के लिए योजना बनाना एक अच्छी गृहिणी की निशानी है।

→ परिवार की आय और आकार आहार के नियोजन को प्रभावित करते हैं।

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→ गर्भवती औरत को पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए।

→ बुखार की हालत में पौष्टिक और हल्का भोजन खाना चाहिए।

→ अच्छे स्वास्थ्य के लिए सभी पोषक तत्त्वों की शरीर को आवश्यकता होती है।

→ किसी व्यक्ति के लिए पोषक तत्त्व कितनी मात्रा में चाहिए, यह अनेक तथ्यों पर निर्भर करता है जैसे आयु, लम्बाई, वज़न, लिंग, जलवायु, स्वास्थ्य, व्यवसाय एवं शारीरिक दशा।।

→ संतुलित आहार – यह एक ऐसा आहार है जो हमारे शरीर के लिए आवश्यक पोषक तत्त्व प्रदान कर हमें स्वस्थ रहने में सहायक होता है। मनुष्य के जीवन का आधार भोजन है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए भोजन का पौष्टिक होना आवश्यक है। जब मनुष्य अच्छा भोजन नहीं लेता तो वे बीमारियों का शिकार हो जाता है। मनुष्य अपने भोजन की आवश्यकता अनाज, सब्जियां, फल, दूध, दही तथा अन्य पशु जन्य पदार्थों आदि से पूरा करता है।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन-पौष्टिक तत्त्व, संवर्धन तथा संरक्षण

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन-पौष्टिक तत्त्व, संवर्धन तथा संरक्षण Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 7 भोजन-पौष्टिक तत्त्व, संवर्धन तथा संरक्षण

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
भोजन हमारे शरीर में कौन-कौन से काम आता है ? सूची बनाओ।
उत्तर :
भोजन प्राणियों को जीवित रखने के अतिरिक्त शरीर में निम्नलिखित कार्य करता है
1. शरीर को शक्ति देता है-मशीनों की तरह मानवीय शरीर को भी शक्ति की आवश्यकता होती है जोकि भोजन से प्राप्त होती है।
2. शरीर की वृद्धि-जन्म से लेकर जवानी तक मानवीय शरीर में लगातार वृद्धि होती है। इस वृद्धि के पीछे भोजन की शक्ति ही कार्य करती है।
3. टूटे तन्तुओं की मुरम्मत- भोजन शरीर के नष्ट हुए तन्तुओं के स्थान पर नए तन्तु बनाता है।

प्रश्न 2.
भोजन से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
वे सभी पदार्थ जो हम खाते हैं (दवाइयां और शराब को छोड़कर) जिनसे हमारा शरीर बनता और बढ़ता है, को भोजन कहा जाता है। भोजन से हमारे शरीर में गर्मी और ऊर्जा पैदा होती है। इससे शरीर अपनी क्रियाएं करने के योग्य हो जाता है और अपने टूटे हुए सैलों की मरम्मत भी कर सकता है।

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प्रश्न 3.
भोजन के कौन-से पौष्टिक तत्त्वों से हमें ऊर्जा मिलती है ?
उत्तर :
भोजन के कार्बोज, चिकनाई और प्रोटीन से शरीर को ऊर्जा मिलती है।

प्रश्न 4.
भोजन जीवन का मूल आधार माना जाता है। क्यों ?
उत्तर :
भोजन शरीर को ऊर्जा प्रदान करता है और शरीर की अन्दरूनी तोड़-फोड़ की मरम्मत करता है। ऊर्जा से शरीर अपनी आवश्यक क्रियाएं करने योग्य होता है और साथ साथ शरीर की मरम्मत भी होती रहती है। ये दोनों क्रियाएं शरीर को जीवित रखती हैं। इसलिए भोजन को जीवन का मूल आधार कहा जाता है।

प्रश्न 5.
शक्ति या ऊर्जा देने वाले भोज्य पदार्थों के नाम लिखें।
अथवा
ऐसे पौष्टिक तत्त्व के नाम बताएं जिनसे हमें ऊर्जा प्राप्त होती है। हर एक तत्त्व की प्राप्ति का एक उत्तम साधन भी बताएं।
उत्तर :
शक्ति निम्नलिखित भोजन पदार्थों से मिलती है, जैसे –
1. कार्बोज़ युक्त पदार्थ-गुड़, शक्कर, चीनी और जड़ों वाली सब्जियां।
2. चिकनाई युक्त पदार्थ- भोजन पदार्थ जैसे मक्खन, घी, तेल और तले हुए भोजन पदार्थ।
3. प्रोटीन युक्त पदार्थ-भोजन पदार्थ जैसे दूध, दही, मक्खन, अण्डे, मीट आदि।

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प्रश्न 6.
शरीर का निर्माण तथा टूटी-फूटी कोशिकाओं की मुरम्मत करने के लिए कौन-से पौष्टिक तत्त्वों की आवश्यकता होती है तथा कौन-से भोजन पदार्थो से प्राप्त किए जा सकते हैं ?
उत्तर :
भिन्न-भिन्न शारीरिक क्रियाएं करते समय शरीर के सैल टूटते, घिसते और नष्ट होते रहते हैं। इसलिए नये सैलों के निर्माण के लिए हमें प्रोटीन युक्त भोजन पदार्थ खाने चाहिएं जैसे अण्डा, दूध, मीट, मछली, अनाज। सोयाबीन प्रोटीन का एक मुख्य और सस्ता स्रोत है।

प्रश्न 7.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-से हैं ? उनके नाम लिखो।
उत्तर :
पौष्टिक तत्त्व भोजन का महत्त्वपूर्ण अंग है ये भिन्न-भिन्न रासायनिक तत्त्वों का मिश्रण होते हैं। इनकी शरीर को काफ़ी मात्रा में आवश्यकता होती है। एक सन्तुलित भोजन में निम्नलिखित पौष्टिक तत्त्व होते हैं-प्रोटीन, कार्बोज, चिकनाई, विटामिन, लवण और पानी।

प्रश्न 8.
प्रोटीन कौन-से तत्त्वों का मिश्रण है ?
उत्तर :
प्रोटीन पौष्टिक तत्त्वों में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसको मानवीय जीवन का आधार कहा जाता है। प्रोटीन कई प्रकार के अमीनो अम्लों के मिश्रण से बनता है। यह अमीनो अम्ल, कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कई सल्फर के संयोग से बनते हैं।

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प्रश्न 9.
कौन-सा तत्त्व केवल प्रोटीन में ही मिलता है ?
उत्तर :
नाइट्रोजन तत्त्व केवल प्रोटीन में ही मिलता है।

प्रश्न 10.
कार्बोहाइड्रेट के मुख्य स्त्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर :
यह हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और कार्बन का मिश्रण है। यह शरीर को गर्मी और शक्ति देने का सबसे सस्ता स्त्रोत है। कार्बोहाइड्रेट, गेहूँ, चावल, मक्की, जौ, फल, सूखे मेवे, गुड़, शक्कर, चीनी, शहद आदि से प्राप्त होता है।

प्रश्न 11.
विटामिन हमारे जीवन तत्त्व क्यों हैं ?
उत्तर :
विटामिन पौष्टिक तत्त्वों में एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व हैं। ये बढ़िया स्वास्थ्य, शारीरिक वृद्धि और बीमारियों का मुकाबला करने के लिए आवश्यक हैं। ये हमारे शरीर को थोड़ी मात्रा में चाहिए। परन्तु शरीर इनकी रचना नहीं कर सकता है। इसलिए इनको भोजन में शामिल करना आवश्यक है।

प्रश्न 12.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
घुलनशीलता के आधार पर विटामिनों को दो भागों में विभाजित किया जाता है-चर्बी में घुलनशील और पानी में घुलनशील विटामिन। पानी में घुलनशील विटामिनों का एक ग्रुप बी समूह होता है जो पानी में घुल जाता है। इसके अतिरिक्त विटामिन ‘सी’ तथा विटामिन ‘बी’ भी पानी में घुलनशील हैं।

प्रश्न 13.
पोषक तत्त्व क्या हैं ?
उत्तर :
पोषक तत्त्व भोजन में रहने वाले वह रासायनिक पदार्थ हैं जो शरीर को पोषण प्रदान करते हैं।

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प्रश्न 14.
पोषक तत्त्व कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
पोषक तत्त्व दो प्रकार के होते हैं –
1. सूक्ष्म पोषक तत्त्व।
2. वृहद पोषक तत्त्व।

प्रश्न 15.
सूक्ष्म एवं वृहद पोषक तत्त्वों में अन्तर उदाहरण सहित समझाएं।
उत्तर :
सूक्ष्म पोषक तत्त्व भोजन में अल्प मात्रा में रहते हैं, पर शरीर के लिए बहुत आवश्यक हैं। खनिज व विटामिन सूक्ष्म पोषक तत्त्व हैं। वृहद पोषक तत्त्व भोजन में बड़ी मात्रा में उपस्थित रहते हैं। यह तत्त्व शरीर के लिए बड़ी मात्रा में ही चाहिये होते हैं। कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन व वसा वृहद पोषक तत्त्व हैं।

प्रश्न 16.
प्राणिज प्रोटीन व वनस्पति प्रोटीन में क्या अन्तर है ?
अथवा
प्राणिज प्रोटीन और वनस्पतिक प्रोटीन के दो-दो उदाहरण दें।
उत्तर :
प्राणिज प्रोटीन-हमें दूध, मछली, मांस आदि से मिलते हैं। वनस्पति प्रोटीन हमें गेहूँ, सोयाबीन, मटर, दाल आदि से मिलते हैं।

प्रश्न 17.
वसा के दो स्रोत कौन-से हैं ?
उत्तर :
वसा के दो स्रोत हैं प्राणिज वसा- पशु जन्य पदार्थों आदि से मिलता है। वनस्पति वसा-मूंगफली, नारियल, सरसों आदि से मिलता है।

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प्रश्न 18.
आभाव जन्य रोग से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
यह एक ऐसी स्थिति है जो शरीर में तब उत्पन्न होती है जब कोई पोषक तत्त्व हमारे दैनिक आहार में शामिल नहीं होता है। यदि हम उस पोषक तत्त्व का सेवन दुबारा करना शुरू कर देते हैं तो यह दूर हो जाते हैं।

प्रश्न 19.
भोजन पकाने का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
भोजन पकाने के अनेक फायदे हैं, जैसे –

  1. पकाने से भोजन आसानी से पचता है।
  2. पकाने से खाद्य पदार्थों की दिखावट, प्रकृति, रंग, गन्ध और स्वाद में सुधार होता है।
  3. पकाने से आप खाद्य पदार्थों से अनेक प्रकार के व्यंजन बना सकते हैं।
  4. पकाने से खाद्य पदार्थ अधिक देर तक रखने में सहायता मिलती है।
  5. पकाने से भोजन सुरक्षित और रोगाणुरहित बन जाता है।

प्रश्न 20.
संवर्धन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
विशेष विधियों से खाद्य पदार्थों के पोषकों में सुधार लाने की प्रक्रिया संवर्धन (Enrichment) कहलाती है। इससे खाद्य पदार्थों के स्तर में सुधार आता है एवं उसकी पौष्टिकता बढ़ती है।

प्रश्न 21.
उस विटामिन का नाम लिखें जो प्रकाश और गर्मी से जल्दी नष्ट हो जाता है और उस विटामिन का एक मुख्य कार्य भी बताएं।
उत्तर :
राइबोफ्लेविन (विटामिन B2) गर्मी और रोशनी से शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। यह हमारी त्वचा तथा मांसपेशियों को स्वस्थ रखता है।

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प्रश्न 22.
कौन-कौन से खनिज पदार्थ हमारे शरीर के लिए आवश्यक हैं ? नाम बताओ।
उत्तर :
हमारे शरीर को दो प्रकार के खनिज पदार्थों की आवश्यकता होती है। एक मैक्रोमिनरल्ज़ जैसे कैल्शियम, फॉस्फोरस, सल्फर, सोडियम और क्लोरीन आदि। दूसरे माइक्रोमिनरल्ज़ हैं जैसे लोहा, आयोडीन, तांबा, जिंक, कोबाल्ट आदि।

प्रश्न 23.
निशास्ते में कौन-सा पौष्टिक तत्त्व होता है और यह तत्त्व और कौन से भोजन पदार्थों से प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर :
निशास्ते में कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं। यह अनाजों, जड़ों वाली सब्जियां और कंदमूल जैसे शकरकंदी और आलू में होता है।

प्रश्न 24.
कैल्शियम के कार्य बतायें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 22 लघु उत्तरीय प्रश्न का उत्तर।

प्रश्न 25.
पोषक तत्त्वों के संवर्धन की किसी एक विधि के बारे में लिखें तथा यह बताएं कि इस विधि से कौन-कौन से पौष्टिक तत्त्वों की वृद्धि होती है ?
उत्तर :
दालों या अनाज को अंकुरित करना। इससे इनमें विटामिन और खनिज काफी बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 26.
विटामिन ‘सी’ की कमी से बच्चों में कौन-सा रोग होता है ? उस रोग के मुख्य लक्षण लिखें।
उत्तर :
इसकी कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है।
1. जिससे मसूड़े सूज जाते हैं।
2. कोशिकाओं में से खून बहने लगता है।

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प्रश्न 27.
कार्बोज़ का संगठन क्या है ?
उत्तर :
कार्बोज़ एक कार्बनिक यौगिक है। यह कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन के रासायनिक संयोग से बना होता है। इसमें हाइड्रोजन तथा ऑक्सीजन का वही अनुपात होता है जो पानी में इन दोनों का होता है।

प्रश्न 28.
कार्बोज़ कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
कार्बोज़ तीन प्रकार के होते हैं।

  1. मोनोसेकेराइड – ग्लूकोज़, लेक्टोस
  2. डाइसेकेराइड – सुक्रोज, माल्टोज
  3. पॉलीसेकेराइड – स्टार्च, सैलुलोज़।

प्रश्न 29.
लोहे के उचित पोषण के लिए कौन-सा विटामिन आवश्यक है ?
उत्तर :
विटामिन सी लौह खनिज को फैरस अवस्था में बदल देता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
विटामिन ‘ए’ की कमी से शरीर को क्या हानि होती है ?
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ की कमी से शरीर पर हानिकारक प्रभाव होता है जो इस प्रकार है –
1. अन्धराता (Night Blindness) – विटामिन ‘ए’ की कमी से मनुष्य की अन्धेरे में देखने की शक्ति कम हो जाती है। रोशनी वाले स्थान या बाहर तेज़ धूप से अन्धेरे या अन्दर कमरे में आने पर कुछ समय के लिए देखने में रुकावट आती है। इसकी कमी से रंगों को ठीक तरह पहचानने में भी रुकावट होती है।

2. जीरोसिस (Xerosis) – विटामिन ‘ए’ की कमी से आंसू ग्रन्थियां सूख जाती हैं। आँखों के सफेद भाग पर धुंधलापन और कार्निया (Cornea) पर छोटे-छोटे दाने हो जाते हैं। इनमें सफेद चिपचिपा पदार्थ निकलता है और पलकें बन्द हो जाती हैं। अधिक समय तक विटामिन’ की कमी से मनुष्य अन्धा हो जाता है।

3. चमड़ी का खुरदरापन (Toad’s Skin)

4. प्रजनन क्रिया पर प्रभाव (Effect on Reproduction System)

5. गुर्दे में पत्थरी की सम्भावना (Chances of Stone Formation in Kidney)

6. वृद्धि में रुकावट (Effect on Growth)

7. दांतों और हड्डियों के विकार (Effects on Teeth and Bones) इसके अतिरिक्त गर्भ के समय और बच्चे को दूध देते समय विटामिन ‘ए’ की आवश्यकता अधिक होती है और ताजी सब्जियों में बासी सब्जियों से अधिक विटामिन ‘ए’ मिलता है। शरीर में इसका अधिक होना भी नुकसानदायक होता है।

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प्रश्न 2.
अन्धराता रोग किस पौष्टिक तत्त्व की कमी से होता है ? उसके लक्षण भी दें।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न नं० 1.

प्रश्न 3.
क्या विटामिन ‘के’ पानी में घुलनशील है ? इसका सबसे सस्ता स्त्रोत कौन-सा है ?
उत्तर :
नहीं, विटामिन ‘के’ पानी में घुलनशील नहीं बल्कि यह चर्बी में घुलनशील है। यह अधिकतर वनस्पति वर्ग में पाया जाता है। इस की कमी से बहते खून का बन्द होना कठिन हो जाता है, क्योंकि यह खून के जमने में सहायक है। यह हरी पत्तेदार सब्जियों में पाया जाता है। इसका सबसे सस्ता स्रोत फूलगोभी, बन्द गोभी और गण्ढ गोभी है।

प्रश्न 4.
आयोडीन नमक लेने का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
जिन स्थानों पर ज़मीन में आयोडीन की कमी हो वहां सभी व्यक्तियों को आयोडाइज्ड नमक (Iodised Salt) ही प्रयोग करना चाहिए। भारत में पोटाशियम आयोडेट से नमक को आयोडाइज्ड किया जाता है। जिन स्थानों पर जमीन में आयोडीन की कमी है वहां केवल यही नमक बेचा जा सकता है। वयस्कों में 100-150 माइक्रो ग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है। विशेष हालतों जैसे कि गर्भ अवस्था में इसकी आवश्यकता बढ़ जाती है। गिल्लड़ होने की स्थिति में आयोडीन की गोलियां दी जाती हैं।

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प्रश्न 5.
पानी की कमी से हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
पानी की कमी का प्रभाव (Effects of Deficiency of Water)-जिस मात्रा में पानी शरीर में से निकलता है उतनी मात्रा में द्रव्य पदार्थों या भोज्य पदार्थों द्वारा यदि पूरा न किया जाए तो हानिकारक प्रभाव होता है। इससे शरीर के पानी की मात्रा कम हो जाती है और शरीर के द्रव्य पदार्थों में परिवर्तन आ जाते हैं। शरीर की क्रियाओं की गति कम हो जाती है और फोक पदार्थों का विकास नहीं हो सकता। यदि पानी की बहुत कमी हो जाए तो मृत्यु भी हो सकती है।

प्रश्न 6.
बढ़ने वाले बच्चों के भोजन में प्रोटीन का होना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
बढ़ रहे बच्चों को प्रोटीन की अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि उनके शरीर में नए सैलों का निर्माण होता है और बच्चों के शरीर में सैलों की तोड़-फोड़ भी अधिक होती है। इसीलिए नए सैलों को बनाने और टूटे सैलों की मरम्मत के लिए बच्चों को प्रोटीन
की आवश्यकता अधिक होती है।

प्रश्न 7.
प्रोटीन के मुख्य कार्य क्या हैं तथा इसकी कमी का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
प्रोटीन के कार्य (Functions of Protein)-प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है, यह हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है

  1. शरीर की सुरक्षा और विकास का कार्य
  2. शरीर को ऊर्जा देने का कार्य
  3. रोगों से मुकाबला करने के लिए शक्ति को बढ़ाना
  4. खून बनाने में सहायक
  5. अम्ल और क्षार में सन्तुलन रखना
  6. हार्मोन्ज़ और एन्जाइमज़ (Enzymes) बनाने का कार्य
  7. मानसिक शक्ति प्रदान करना।

प्रोटीन की कमी से होने वाले नुकसान (Effect of Deficiency of Protein) (H.B. 2019) – प्रोटीन की कमी का प्रभाव बच्चों, गर्भवती औरतों और दूध पिलाने वाली माताओं पर अधिक पड़ता है। इसकी कमी से अग्रलिखित नुकसान होते हैं –

  1. शरीर की वृद्धि और विकास में रुकावट-प्रोटीन की कमी से शरीर की वृद्धि और बढ़ौत्तरी की रफ्तार कम हो जाती है। इससे शरीर कमजोर हो जाता है और बच्चों में शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
  2. खून की कमी – भोजन में प्रोटीन की कमी से खून की कमी के कारण अनीमिया (Anemia) हो जाता है।
  3. रोग प्रतिरोधक (Antibodies) पदार्थ की कमी-प्रोटीन शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्त्वों का निर्माण करता है। प्रोटीन की कमी से शरीर से बीमारियों में मुकाबला करने की शक्ति कम हो जाती है जिससे कई रोग लग जाते हैं।
  4. हड्डियां कमज़ोर होना-इसकी कमी हड्डियों को भी कमजोर करती है। इसलिए इनके जल्दी टूटने का डर रहता है।
  5. चमड़ी का खुश्क होना-शरीर में प्रोटीन की कमी से चमड़ी खुश्क हो जाती है और इससे शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
  6. बच्चे का कमज़ोर पैदा होना-गर्भवती और दूध पिलाने वाली औरतों में इसकी कमी होने से बच्चा कमजोर होता है और उसकी वृद्धि ठीक नहीं होती।
  7. प्रोटीन की कमी से बच्चे क्वाशियोरकॉर और मरास्मस (सूखा) रोगों का शिकार हो जाते हैं।

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प्रश्न 8.
प्रोटीन की कमी से बच्चे किस रोग का शिकार होते हैं ? उसके लक्षण भी बताएं।
उत्तर :
क्वाशियोरकॉर तथा सूखा रोग।

प्रश्न 9.
प्रोटीन के स्त्रोत कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
प्रोटीन की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources of Protein)
1. पशु जगत से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Sources) – जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ, पनीर, दही, खोया, मक्खन तथा अन्य पशु जन्य पदार्थ।
2. वनस्पति जगत से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Vegetable Sources) – जैसे दालें, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, बादाम, पिस्ता, नारियल, मटर और अनाज आदि।

प्रश्न 10.
कार्बोहाइड्रेट्स हमारे शरीर में क्या काम करते हैं ?
अथवा
कार्बोहाइड्रेट्स के हमारे शरीर में दो महत्त्वपूर्ण कार्य बताएं।
उत्तर :

  1. शक्ति प्रदान करना-कार्बोहाइड्रेट का मुख्य कार्य शारीरिक कार्यों के लिए गर्मी और शक्ति देना है। एक ग्राम कार्बोहाइडेट से 4 कैलोरी ऊर्जा मिलती है।
  2. शरीर को शक्ति प्रदान करने के लिए यह सबसे अच्छा स्रोत है। भोजन से प्राप्त होने वाली शक्ति का 50% से 60% भाग कार्बोहाइड्रेट द्वारा ही प्राप्त होता है।
  3. प्रोटीन एक महंगा स्रोत है और कार्बोहाइड्रेट प्रोटीन की बचत करते हैं ताकि प्रोटीन शरीर के निर्माण का कार्य कर सकें।
  4. यह चिकनाई की कमी को भी पूरा करते हैं और चिकनाई के पाचन में भी सहायक हैं।
  5. ग्लूकोज़ आवश्यक अमीनो एसिड के निर्माण में भी सहायक होता है।
  6. कार्बोहाइड्रेट्स भोजन को स्वादिष्ट बनाते हैं।
  7. सैलुलोज फोक का कार्य करता है जिससे शरीर में से मल निकालने के लिए सहायता मिलती है और कब्ज दूर होती है।
  8. कार्बोहाइड्रेट चिकनाई से मिल कर भूख की तृप्ति (Satiety) महसूस करते हैं। इससे काफ़ी देर भूख महसूस नहीं होती।

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प्रश्न 11.
भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की उचित मात्रा होना क्यों जरूरी है ?
उत्तर :
कार्बोहाइड्रेट्स का मुख्य कार्य शरीर को ऊर्जा प्रदान करना है। इसकी कमी के कारण शरीर में प्रोटीन और चर्बी इस कार्य के लिए प्रयोग की जाती है और शरीर कमजोर होना शुरू हो जाता है। भोजन में कार्बोहाइड्रेट्स की लगातार कमी होने से शारीरिक वृद्धि रुक जाती है और मरास्मस नाम का रोग हो जाता है। इसलिए कार्बोज़ का भोजन में उचित मात्रा में होना बहुत आवश्यक है।

प्रश्न 12.
कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर :
कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव (Effect of Deficiency of Carbohydrates) – कार्बोहाइड्रेट्स की कमी प्रायः कम ही देखने को मिलती है परन्तु यदि इसकी कमी हो जाए तो शरीर पर कई तरह से प्रभाव होता है।

1. बच्चों पर कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव (Effect of Deficiency of Carbohydrates on Children) – प्रायः पांच साल से कम आयु के बच्चों में इसकी कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। जहां बच्चों से दूध छुड़वाया जाता है, तो उनके भोजन में पूर्ण पौष्टिक तत्त्व शामिल नहीं किए जाते या अधिक समय के लिए बच्चों को माँ के दूध पर ही रखे जाने से भी शरीर में इसकी कमी हो जाती है। ऐसी स्थिति में शरीर कार्बोहाइड्रेट के स्थान पर ऊर्जा के लिए प्रोटीन का प्रयोग करता है और इससे प्रोटीन की कमी भी आ जाती है। इस अवस्था को मरास्मस या सूखा (Marasmus) कहा जाता है।

2. भार की कमी (Loss of Weight) – भोजन में जब कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो जाए तो शरीर कमजोर हो जाता है। इससे काम करने को दिल नहीं करता। भार कम होने लग पड़ता है और थकावट महसूस होती है।

3. किटोसिस (Ketosis) – कार्बोहाइड्रेट्स की कमी से शरीर में प्रोटीन-बॉडीज़ (Ketone Bodies) बढ़ जाती है। खून में अम्ल की मात्रा बढ़ जाती है। इससे मनुष्य को बेहोशी होने लगती है और मृत्य भी हो सकती है।

4. मांसपेशियों का ढीला पड़ना (Loosening of Muscles) – कार्बोहाइड्रेट्स की कमी का प्रभाव मांसपेशियों पर भी दिखाई देता है। चमड़ी ढीली पड़ने के कारण झुर्रियां पड़ जाती हैं और चेहरे की चमक भी कम हो जाती है। कार्बोहाइड्रेट्स की उचित मात्रा ही लेनी चाहिए। आवश्यकता से अधिक कार्बोज़ खाने से यह शरीर में जाकर चर्बी का रूप धारण करके कोशिका में इकट्ठा हो जाता है और मोटापे का रोग हो जाता है। इससे आदमी आलसी हो जाता है और खून का दौरा तेज़ होने का डर रहता है।

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प्रश्न 13.
चर्बी हमारे शरीर में क्या काम करती है ?
उत्तर :
चर्बी के कार्य (Functions of Fat) – चर्बी हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –

  1. ऊर्जा का साधन (Source of Energy)
  2. आवश्यक वसा अम्लों का साधन (Sources of Essential Fatty Acids)
  3. चर्बी में घुलनशील विटामिनों का स्रोत (Source of Fat Soluble Vitamins)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा (Protection of Sensitive Body Organs)
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाती है (Help in Making Food Tasty)
  6. सन्तुष्टि देती है (Give satisfaction)
  7. शरीर का तापमान बनाए रखती है (Helps in Regulating Body Temperature)
  8. चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए (For healthy skin)।

प्रश्न 14.
चर्बी की कमी तथा अधिक मात्रा का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
चर्बी की कमी से हानियां (Effects of Deficiency of Fats) – चर्बी की कमी से निम्नलिखित नुकसान होते हैं

  1. चर्बी की कमी से चिकनाई में घुलनशील विटामिन शरीर को नहीं मिलते और उनकी कमी से होने वाले रोग हो जाते हैं।
  2. आवश्यक वसा अम्लों (Fatty Acids) की कमी हो जाती है, जिसका असर आँखों और चमड़ी पर पड़ता है। इसलिए चमड़ी खुश्क हो जाती है। दाद और खुजली रोग होने का डर रहता है।
  3. चर्बी की कमी से शारीरिक ऊर्जा के लिए प्रोटीन का प्रयोग शुरू हो जाता है जिससे शारीरिक निर्माण का कार्य रुक जाता है।
  4. इसकी कमी से पाचन प्रणाली पर भी प्रभाव पड़ता है और कब्ज रहने लग जाती
  5. चर्बी की कमी से मनुष्य का शरीर हड्डियों का ढांचा बन जाता है।

एक बात ध्यान रखने योग्य यह है कि यदि चर्बी का अधिक प्रयोग किया जाए, तो मोटापा हो जाता है और हाजमा भी खराब हो जाता है। आज-कल की खोजों से यह सिद्ध हुआ है कि चिकनाई से प्राप्त की कोलेस्ट्रॉल स्वास्थ्य के लिए गम्भीर समस्या पैदा कर सकती है। जिससे खून का दबाव बढ़ जाता है और दिल का रोग होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसलिए हमें वनस्पति तेलों का प्रयोग अधिक करना चाहिए।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘ए’ का मुख्य काम क्या है तथा भोजन स्त्रोत बताएं।
अथवा
विटामिन ‘ए’ के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर :
विटामिन ‘ए’ के कार्य (Functions of Vitamin ‘A’) शरीर में विटामिन ‘ए’ निम्नलिखित कार्यों के लिए आवश्यक है

  1. शारीरिक विकास के लिए (For Physical growth)
  2. स्वस्थ आँखों के लिए (For healthy eyes)
  3. स्वस्थ चमड़ी के लिए (For Healthy Skin)
  4. प्रजनन क्रिया के लिए (For Reproduction)
  5. छूत के रोगों की रक्षा के लिए (For Protection against Contagious Diseases)
  6. स्वस्थ हड्डियों और दाँतों के लिए (For Healthy Bones and Teeth)

विटामिन ‘ए’ के स्त्रोत (Sources of Vitamin ‘A’) –

  1. पशु जन्य साधन दूध, मक्खन और देसी घी।
  2. हरे पत्ते वाली सब्जियां।
  3. पीले, संतरी और लाल फल और सब्जियां जैसे आम, पपीता, अनानास, बेर, गाजर और टमाटर में यह विटामिन कैरोटीन के रूप में पाया जाता है।

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प्रश्न 16.
विटामिन ‘डी’ के कार्य तथा कमी के बारे में बताएं।
उत्तर :
विटामिन ‘डी’ शरीर के लिए निम्नलिखित कार्य करता है –

  1. कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है। (Helps in Absorption of Calcium and Phosphorus)
  2. हड्डियों के विकास के लिए (For Development of Bones)
  3. शरीर के पूर्ण विकास के लिए (For Development of Body)।

विटामिन ‘डी’ की कमी के प्रभाव (Effects of the Deficiency of Vitamin ‘D’)

विटामिन ‘डी’ की कमी से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं –

  1. रिकेट्स रोग (Rickets)
  2. ओस्टोमलेशिया (Osteomalacia)
  3. ओस्टियोपोरोसिस (Osteoporosis)।

प्रश्न 17.
(क) विटामिन ‘ई’ का मुख्य कार्य क्या है ?
(ख) विटामिन ‘ई’ की कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
(क) विटामिन ‘ई’ के कार्य-शरीर में विटामिन ‘ई’ निम्नलिखित कार्य करता है –

  1. प्रजनन क्रिया में सहायता करता है।
  2. मांसपेशियों के विकास के लिए आवश्यक है।
  3. विटामिन ‘ए’ के बनने में सहायता करता है।

(ख) विटामिन ‘ई’ की कमी के शरीर पर प्रभाव –

  1. प्रजनन सम्बन्धी विकार (Effect on Reproduction System)
  2. गर्भपात (Miscarriage)
  3. भ्रूण की हत्या (Death of the Foetus)
  4. दिल का रोग (Disease of Heart) ।

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प्रश्न 18.
विटामिन ‘के’ का मुख्य काम क्या है तथा इसकी कमी का हमारे शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
विटामिन ‘के’ भी मनुष्य के पोषण के लिए भी बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह खून को जमाने में सहायता करता है। विटामिन ‘के’ के कार्य (Functions of Vitamin ‘K’) – इसका मुख्य कार्य खून को जमाने में सहायता करना है। विटामिन ‘के’ की कमी के प्रभाव-प्रायः विटामिन ‘के’ की कमी कम ही होती है क्योंकि यह विटामिन छोटी आंत में बनता है। सल्फा दवाइयों का अधिक प्रयोग करने से शरीर में इसका निर्माण रुक जाता है और यदि खून बहने लगे तो रुकता नहीं।

प्रश्न 19.
विटामिन ‘बी’ समूह में कौन-कौन से विटामिन आते हैं ? नाम बताएं।
उत्तर :
ग्यारह विटामिन ‘बी’ समूह को बनाते हैं परन्तु इनमें सात बहुत महत्त्वपूर्ण हैं-थायामिन, राइबोफ्लेविन, निकोटिनिक एसिड, पैंटोथिनिक एसिड, पिरिडाक्सिन, फौलिक एसिड, विटामिन ‘बी’ 12, कोलीन, इनोसीटोल और बायोटिन आते हैं। ये सभी विटामिन पानी में घुलनशील होते हैं।

प्रश्न 20.
निम्नलिखित के काम और स्त्रोत लिखें (1) थायामिन (2) राइबोफ्लेविन।
उत्तर :
1. थायामिन (B1) यह विटामिन पनीर, साबुत दालें, अनाज, अंकुरित दालों और चावलों की ऊपरी सतह पर काफ़ी मात्रा में होता है। यह विटामिन तन्त्रिका प्रणाली (Nervous System) के लिए शरीर की वृद्धि और विकास के लिए और रोगों से मुकाबला करने की शक्ति के लिए चाहिए। इस की कमी से मनुष्य को बेरी-बेरी रोग हो जाता है। यह रोग दो प्रकार का होता है। सूखी बेरी-बेरी और गीली बेरी-बेरी। सूखी बेरी-बेरी में भूख कम लगती है, कब्ज हो जाती है, टांगें, बाहें ठण्डी पड़ जाती हैं और जोड़ों में दर्द होने लग जाता है।

गीली बेरी-बेरी में टांगों और पेट में पानी भर जाता है। सांस लेने में कठिनाई होती है और दिल की धड़कन तेज़ हो जाती है और कई बार दिल की गति रुक जाने की सम्भावना होती है। अधिक सख्त कार्य करने वालों में, गर्भवती और बच्चे को दूध देने वाली माताओं को इस विटामिन की आवश्यकता अधिक होती है। चावल पालिश करने से थायामिन कम हो जाती है। साबुत दालों और अन-छने आटे का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इसमें थायामिन होती है। खाना अधिक देर तक पकाने और उसमें सोडे का प्रयोग करने से भी थायामिन नष्ट हो जाता है।

2. राइबोफ्लेविन (B2) – यह विटामिन पानी में घुलनशील है और प्रकाश से जल्दी नष्ट हो जाता है। भोजन को उबालने और भूनने के दौरान यह विटामिन काफ़ी मात्रा में नष्ट हो जाता है। यह विशेषकर पट्ठों और नसों में काम करता है। इसकी कमी से आँखों और चमड़ी पर बुरा प्रभाव पड़ता है। होठों के कोने फट जाते हैं, चमड़ी सूखी और खुश्क हो जाती है। यह विटामिन दूध या दूध से बने पदार्थ, मूंगफली, खमीर, दालों और हरे पत्ते वाली सब्जियों में होता है।

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प्रश्न 21.
(क) विटामिन ‘सी’ के कार्य, स्त्रोत तथा कमी का प्रभाव बताओ।
(ख) विटामिन ‘सी’ के कोई चार कार्य लिखें।
उत्तर :
यह पानी में घुलनशील है और इसको एस्कार्बिक एसिड भी कहा जाता है।
(क) 1. विटामिन ‘सी’ के कार्य
शरीर में विटामिन ‘सी’ निम्नलिखित कार्य करता है –

1. यह कोलेजन के निर्माण के लिए कार्य करता है। (It helps in the Formation and Maintenance of Collagen) कोलेजन एक प्रकार का सीमेंट जैसा पदार्थ है जो शरीर की कोशिकाओं को स्थिर रखता है। हड्डियों और दांतों के सख्त पदार्थ मैट्रिक और डैन्टाइन का निर्माण भी करता है। जख्मों के जल्दी भरने और टूटी हड्डियों को जोड़ने के लिए भी विटामिन ‘सी’ ही कार्य करता है।
2. फौलिक अम्ल के पाचन के लिए (For the Metabolism of Folic Acid)
3. कैल्शियम और लोहे के अवशोषण करने के लिए (For the Absorption of Calcium and Iron)
4. टाइरोसिन के ऑक्सीकरण के लिए (For the Oxidation of Tyrosine)
5. रोगों से लड़ने की शक्ति देता है (Give Resistance against Disease)।

2. विटामिन ‘सी’ के स्त्रोत –
1. सबसे अधिक विटामिन ‘सी’ आंवले में मिलता है। इसके अतिरिक्त खट्टे फल जैसे नींबू, संतरा, गलगल, चिकोतरा आदि।

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चित्र-विटामिन ‘सी’ के स्रोत –

2. हरे पत्ते वाली सब्जियां और टमाटर आदि।
3. अंकुरित दालें और अनाज।
4. माँ का दूध।

विटामिन ‘सी’ की कमी से होने वाले रोग –

  1. इसकी कमी से स्कर्वी नामक रोग हो जाता है जिससे मसूड़े सूज जाते हैं और कोशिकाओं में से खून बहने लग जाता है।
  2. दांतों में पाइयोरिया नामक रोग हो जाता है और दांत हिलने लग जाते हैं।
  3. जख्म जल्दी ठीक नहीं होते।
  4. खून कम और अशुद्ध हो जाता है।
  5. हड्डियां और शरीर कमजोर हो जाता है।
  6. थकावट महसूस होती है।

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(ख) – देखें भाग (क)।

प्रश्न 22.
कैल्शियम तथा फॉस्फोरस महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ हैं। कैसे ?
उत्तर :
1. कैल्शियम – यह बहुत महत्त्वपूर्ण खनिज लवण हैं। शरीर में पाए जाने वाले कुल लवणों का 75% भाग कैल्शियम और फॉस्फोरस में होता है। शरीर के कुल कैल्शियम का 99% भाग हड़ियों और दांतों में पाया जाता है।
कैल्शियम के कार्य (Functions of Calcium) – कैल्शियम के दो महत्त्वपूर्ण कार्य हैं
(i) हड्डियों और दांतों का निर्माण (Building Bones and Teeth) कैल्शियम और फॉस्फोरस दोनों मिल कर हड्डियों और दांतों का निर्माण करते हैं। इससे हड्डियों और दांतों का ढांचा मज़बूत होता है। दांतों के डैनटिन (Dentin) में 27 प्रतिशत कैल्शियम और एनैमल (Enamel) में 36 प्रतिशत कैल्शियम होता है।

(ii) शारीरिक क्रियाओं को चलाना (Regulating body Process) शरीर में होने वाली क्रियाओं के लिए कैल्शियम फॉस्फोरस के साथ मिलकर सहायता करता है। ये क्रियाएं इस प्रकार हैं –
(क) कैल्शियम खून को जमाने में सहायता करता है।
(ख) पेशियों के सिकुड़ने पर दिल की गति को बनाए रखने के लिए भी कैल्शियम आवश्यक है।
कैल्शियम की प्राप्ति के साधन-भोजन में कैल्शियम निम्नलिखित साधनों से प्राप्त होता है

  • दूध और दूध से बने पदार्थ ।
  • हरे पत्ते वाली सब्जियां जैसे पालक, सरसों, पुदीना, मूली और गाजर आदि।
  • छोटी मछलियां जो हड्डियों समेत खाई जाती हैं।

कैल्शियम की कमी के प्रभाव (Effects of Deficiency of Calcium)

  • बच्चों के दांत देरी से निकलते हैं या ठीक नहीं निकलते।
  • हड्डियां कमजोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।
  • बच्चों में रिकेट्स (Rickets) और बड़ों में औस्टोमलेशिया (Osteomalacia) रोग हो जाता है।

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2. फॉस्फोरस (Phosphorus) – कैल्शियम के साथ-साथ फॉस्फोरस का भी बहुत महत्त्व है। फॉस्फोरस लगभग शरीर के भार का 1 प्रतिशत भाग होता है। यह कैल्शियम में मिल कर हड्डियों और दांतों का निर्माण करता है। फॉस्फोरस के कार्य (Functions of Phosphorus) शरीर की रचना के लिए फॉस्फोरस बहुत कार्य करता है, जैसे –

  • हड्डियों और दांतों का निर्माण (Building Bones and Teeth)
  • कोशिकाओं की बनावट (Formation of Cells)
  • एन्ज़ाइम बनाना (Formation of Enzymes)

फॉस्फोरस की कमी के प्रभाव (Effects of Deficiency of Phosphorus) फॉस्फोरस की कमी बहुत कम होती है क्योंकि यह अनाज में काफ़ी मात्रा में पाया जाता है। परन्तु यदि कहीं इसकी कमी हो जाए, तो हड्डियां और दांत कमजोर हो जाते हैं। इसकी कमी से कोशिकाओं के बनने की प्रक्रिया में खराबी आ जाती है।

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प्रश्न 23.
(A) कैल्शियम की कमी से होने वाले रोगों का वर्णन करें।
(B) कैल्शियम के कार्य और साधन बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 22 का उत्तर।

प्रश्न 24.
लोहे की दैनिक आवश्यकता बहुत कम होने के बावजूद यह बहुत महत्त्वपूर्ण खनिज पदार्थ है। कैसे ?
अथवा
लोहे के दो मुख्य कार्य तथा दो मुख्य साधन बताएं।
उत्तर :
लोहा (Iron) शरीर में लोहा बहुत कम पाया जाता है। परन्तु शरीर की वृद्धि और शारीरिक क्रियाओं को ठीक ढंग से चलाने के लिए इसका बहुत योगदान है।

लोहे के कार्य (Functions of Iron) – लोहा हमारे शरीर मे निम्नलिखित कार्य करता है –

  • हीमोग्लोबिन का निर्माण।
  • मांसपेशियों का आवश्यक तत्त्व।
  • ऑक्सीकरण की क्रियाओं के लिए यह फेफड़ों के लिए ऑक्सीजन कोशिकाओं तक और कोशिकाओं से फेफड़ों तक पहुंचाता है।

लोहे की प्राप्ति के स्त्रोत (Sources of Iron) – लोहे की प्राप्ति के स्रोत निम्नलिखित हैं –

1. गुड, शक्कर और सूखे मेवे।
2. हरे पत्ते वाली सब्जियां तथा पशु जन्य साधन।

प्रश्न 25.
आयोडीन की कमी से क्या होता है तथा प्राप्ति के साधनों के बारे में बताओ।
उत्तर :
आयोडीन की कमी से –
1. घेघा रोग हो जाता है।
2. थाइराइड ग्रन्थियों में थायराक्सिन कम निकलता है जिससे बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास पूरा नहीं होता। बालिग व्यक्तियों में भी मानसिक विकास कम हो जाता है। शरीर सूज जाता है और ढीला पड़ जाता है।
3. अधिक कमी होने से मिक्सोडीमा हो जाता है। आँखें बाहर को आ जाती हैं।
4. बच्चों में क्रेटीनिज़्म (Cretinism) अर्थात् बच्चे बौने और भद्दे लगते हैं। चमड़ी मोटी और खुरदरी हो जाती है। जीभ बढ़ जाने से मुंह बन्द नहीं होता। आयोडीन की प्राप्ति के स्त्रोत-आयोडीन की आवश्यक मात्रा का 75% भाग ज़मीन पर पैदा हुई सब्जियों, दालों और अनाज से पूरी हो जाती है और शेष पानी से। परन्तु कई पहाड़ी स्थानों पर ज़मीन और पानी में आयोडीन नहीं होती, वहां आवश्यक आयोडाइज्ड नमक खाना चाहिए। अधिक नमी की स्थिति में इसकी गोलियां दी जाती हैं।

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प्रश्न 26.
पानी मनुष्य के शरीर के लिए कैसे महत्त्वपूर्ण है ?
उत्तर :
पानी (Water) – पानी हमारे भोजन का एक बड़ा भाग है। यद्यपि पानी को हम भोजन नहीं कह सकते क्योंकि न तो यह शक्ति देता है और न ही शरीर में होने वाली क्रियाओं का निर्माण करता है। परन्तु फिर भी हर कोशिका (Cell) में पौष्टिक तत्त्व पहुंचाने
का कार्य पानी ही करता है। शरीर के भार का लगभग 61% भाग पानी ही है।
पानी के कार्य (Functions of Water) (H.B. 2009)

पानी हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करता है –

  1. घोलक के रूप में (Water acts as a Solvent)
  2. पाचन क्रियाओं में सहायता (Helps in the Process of Digestion)
  3. फोक को बाहर निकालने में सहायता (Helps in the Removal of Waste Products)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा (Helps in the Protection of Sensitive Organs)
  5. तापमान को स्थिर रखने में सहायता करना (Helps in the Temperature Regulation)
  6. स्नेहक के रूप में कार्य करता है (Acts as a Lubricant)।

प्रश्न 27.
फोक का अपना महत्त्व कैसे है तथा प्राप्ति के क्या स्त्रोत हैं ?
अथवा
रुक्षांश (फोक) का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
फोक (Roughage) – फल और सब्जियों के रेशे और अनाजों के छिलके फोक बनाते हैं, यह स्टार्च के कणों को बाँध कर रखते हैं। ये पदार्थ आप नहीं पचते इनको चाहे जितना भी पचाया जाए फिर भी ये घुलते नहीं। फोक के कार्य (Functions of Roughage) – ये शरीर को कई पौष्टिक तत्त्व नहीं देते फिर भी इनका शरीर के लिए बहुत महत्त्व है।

  1. इनसे भोजन की मात्रा बढ़ जाती है।
  2. फोक से भोजन को पाचन प्रणाली को चलाने में सहायता मिलती है।
  3. आंतों और पट्ठों को क्रियाशील रखने में मदद करते हैं।
  4. पाचन के पश्चात् मल बाहर निकालने में सहायता करते हैं।
  5. कब्ज़ को दूर करते हैं।
  6. ये कुछ ऐसे जीवाणु के बनने में सहायता करते हैं जोकि पित एसिड को तोड़ते हैं।

फोक की प्राप्ति के स्रोत (Sources of Roughage) –

  1. हरी सब्जियाँ जैसे बन्द गोभी, गाजर के पत्ते, हरा धनिया, कढ़ी पत्ता, पुदीना आदि।
  2. फल जैसे-अंजीर, संतरा, टमाटर, अंगूर और अमरूद।
  3. सम्पूर्ण अनाज।

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प्रश्न 28.
लोहे की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है ? लोहे के हमारे शरीर में क्या कार्य हैं ?
उत्तर :
लोहे की कमी से अनीमिया हो जाता है। खून में हीमोग्लोबिन की कमी हो जाती है। इससे भूख कम लगना, सांस फूलना, दिल की धड़कन का बढ़ना, नाखून सफेद होना और शारीरिक कमजोरी हो जाती है।
यह रोग विटामिन बी कम्पलैक्स की कमी से भी हो जाता है। लोहे के कार्य –

  1. हीमोग्लोबिन का निर्माण।
  2. मांसपेशियों की आवश्यकता।
  3. ऑक्सीकरण की क्रियाओं के लिए ये फेफड़े के लिए ऑक्सीजन और कोशिकाओं से ऑक्सीजन फेफड़ों तक पहुंचाता है।

प्रश्न 29.
वृहद पोषक तत्त्वों द्वारा हमारे शरीर में किए गए कार्य एवं उनके स्रोतों का वर्णन करें।
उत्तर :
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प्रश्न 30.
पानी में कोई पोषक तत्त्व नहीं है। फिर भी यह हमारे लिए क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
पानी निम्नलिखित कारणों से आवश्यक है –

  1. यह शरीर की कोशिकाओं को अपना कार्य करने में सहायता करता है।
  2. यह भोजन पचाने में सहायता करता है और खाद्य के पोषक तत्त्वों को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाता है।
  3. यह हमारे शरीर के ताप को स्थिर रखता है। गर्मियों में पसीने द्वारा शरीर की गर्मी निकल जाती है।
  4. हमारे शरीर में उत्पन्न जलीय पदार्थों को मूत्र के रूप में निष्कासित करता है। हमें प्रतिदिन सात या आठ गिलास पानी पीना चाहिए।

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प्रश्न 31.
वसा के कोई चार कार्य लिखें।
उत्तर :

  1. ऊर्जा का स्रोत।
  2. चर्बी में घुलनशील विटामिनों का स्रोत ।
  3. शरीर का तापमान बनाए रखना।
  4. चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए।
  5. आवश्यक वसा अम्लों का स्रोत।

प्रश्न 32.
खाद्य पदार्थों का अंकुरण करने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :

  1. खाद्य पदार्थों को पचाने की क्षमता में वृद्धि होती है।
  2. दालें तथा चने नर्म हो जाते हैं तथा जल्दी पकते हैं।
  3. पौष्टिक मूल्य बढ़ता है।

प्रश्न 33.
कार्बोज के किन्हीं दो मुख्य कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर :
1. ऊर्जा प्रदान करना।
2. प्रोटीन को अपना सही काम करने में सहायता करता है। यदि कार्बोज़ की कमी हो तो शरीर प्रोटीन से ऊर्जा प्राप्त करने लगता है तथा प्रोटीन निर्माण कार्य नहीं कर पाता।

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प्रश्न 34.
विटामिन ‘सी’ की कमी से होने वाले रोग के लक्षण लिखें।
उत्तर :

  1. दाँत, मसूड़े तथा हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं।
  2. घाव जल्दी नहीं भरते।
  3. स्कर्वी रोग हो जाता है।

प्रश्न 35.
कैल्शियम की कमी के लक्षण बताएं।
उत्तर :

  1. बच्चों के दाँत देर से निकलते हैं।
  2. हड्डियां कमज़ोर होकर टेढ़ी हो जाती हैं।
  3. बच्चों में रिकेट्स तथा बड़ों में औस्टोमलेशिया रोग हो जाता है।

प्रश्न 36.
सोडियम की प्राप्ति, कार्य तथा महत्त्व के बारे में बताएं।
उत्तर :
सोडियम की प्राप्ति साधारण नमक जो हम प्रतिदिन, भोजन, दालों, सब्जियों में डालकर खाते हैं से हो जाती है।

कार्य तथा महत्त्व –

  1. सोडियम शरीर में क्षार तथा अम्ल का संतुलन बनाए रखता है। इससे शरीर में होने वाली विभिन्न रसायनिक क्रियाएं सुचारु ढंग से होती हैं।
  2. मांसपेशियों के संकुचन में सहायक है।
  3. शरीर में रसाकर्षण दबाव को ठीक रखने में सहायक है।
  4. शरीर में पानी की मात्रा के संतुलन में सहायक है।
  5. स्नायु द्वारा प्राप्त उत्तेजना को नियन्त्रित रखने में सहायक है।

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दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
भोजन के पौष्टिक तत्त्व कौन-कौन से हैं ? प्रोटीन के कार्य, कमी के परिणाम और स्त्रोत लिखो।
उत्तर :
पौष्टिक तत्त्व, वे रासायनिक तत्त्व हैं जो हमें भोजन से प्राप्त होते हैं और ये शारीरिक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा और शरीर के प्रत्येक कोश की बनावट और देखभाल के लिए आवश्यक योगदान देते हैं।
पौष्टिक तत्त्व निम्नलिखित हैं –

  1. प्रोटीन (Protein)
  2. कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates)
  3. चर्बी (Fat)
  4. विटामिन (Vitamin)
  5. खनिज पदार्थ (Mineral)
  6. पानी (Water)
  7. फोक (Roughage)

लाभ – पौष्टिक तत्त्वों में से प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। इसको मानवीय जीवन का आधार कहा जाता है जैसे मकान बनाने के लिए ईंटें, सीमेंट और मिट्टी की आवश्यकता होती है ठीक उसी तरह ही शरीर की रचना के लिए कोशों (Cells) की आवश्यकता होती है। इन कोशों के अन्दर प्रोटोप्लाज्म (Protoplasm) होता है जिस को जीवन का आधार माना जाता है। प्रोटोप्लाज्म प्रोटीन से ही बनता है।

प्रोटीन कई प्रकार के अमीनो अम्लों (Amino acids) के मिश्रण से बनता है। ये अमीनो अम्ल कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन और कई सल्फर के संयोग से बनते हैं। अमीनो अम्ल दो प्रकार के होते हैं –
(क) आवश्यक (Essential)
(ख) अनावश्यक (Non-essential)

(क) आवश्यक (Essential) ये शरीर के निर्माण के लिए आवश्यक अमीनो अम्ल हैं जिनको भोजन में से लेना आवश्यक हो जाता है। बच्चों के लिए 10 और बड़ों के लिए अमीनो अम्ल आवश्यक हैं। बच्चों में इन 8 अमीनो अम्लों के अतिरिक्त हिस्टीडीन (Histidin) और आरजनीन (Argnine) भी आवश्यक हैं। यह अमीनो अम्ल शारीरिक और मानसिक विकास करते हैं।

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(ख) अनावश्यक (Non-Essential) – ये अम्ल शरीर में ही पैदा हो जाते हैं इसलिए खुराक में से लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती परन्तु शरीर के लिए यह भी बहुत आवश्यक हैं।

प्रोटीन के वर्गीकरण का आधार – प्रोटीन का वर्गीकरण तीन बातों के आधार पर किया जाता है –

  1. साधन के आधार पर।
  2. गुणों के आधार पर।
  3. भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के आधार पर।

1. साधन के आधार पर (On the Basis of Source) –
(क) वनस्पति से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Vegetables Protein) – जैसे दालें, अनाज, मूंगफली, सोयाबीन, तिल और मटर आदि।
(ख) पशु-जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Protein) – जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ तथा अन्य पशु जन्य साधन ।

2. गुणों के आधार पर (On the Basis of Qualities) –
(क) पूर्ण प्रोटीन (Complete Protein) – यह दूध तथा अन्य पशु जन्य साधनों में पाई जाती है। इसको ‘ए’ श्रेणी की प्रोटीन कहा जाता है।
(ख) अपूर्ण प्रोटीन (Incomplete Protein) – यह अनाज, दालों और सूखे मेवों में होती है। इसको ‘बी’ श्रेणी का प्रोटीन कहा जाता है।
(ग) अर्द्ध-पूर्ण प्रोटीन (Partial Protein) – यह घटिया किस्म की प्रोटीन होती है। यह मक्की की जीन और जैलेटिन में पाई जाती है।

3. भौतिक और रासायनिक विशेषताओं के आधार पर (On the basis of Physical and Chemical Properties) –
(क) साधारण प्रोटीन (Simple Protein) – यह अण्डे के सफेद भाग (Albumin) में पाई जाती है।
(ख) मिश्रित प्रोटीन (Conjugated Protein) – इस तरह की प्रोटीन में प्रोटीन के साथ और प्रोटीन पदार्थ मिले होते हैं जैसे दूध की केसीनोजन (फॉस्फोरस + प्रोटीन) खन की हीमोग्लोबिन (लोहा + प्रोटीन)।
(ग) प्राप्त की गई प्रोटीन (Derivated Protein) – ये पैप्टोन, पैप्टाइड और अमीनो अम्लों जैसे पदार्थ हैं।

प्रोटीन के कार्य (Functions of Protein) – प्रोटीन एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जो हमारे शरीर में अग्रलिखित कार्य करती है

  1. शरीर की सुरक्षा और विकास का कार्य
  2. शरीर को ऊर्जा देने का कार्य
  3. रोगों से लड़ने के लिए शक्ति बढ़ाना
  4. खून बनाने में सहायक
  5. अम्ल और क्षार में सन्तुलन रखना
  6. हार्मोन्ज़ और एन्ज़ाइम्ज़ (Enzymes) बनाने का कार्य
  7. मानसिक शक्ति प्रदान करना।

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प्रोटीन की प्राप्ति के साधन (Sources of Protein) –

1. पशु जगत् से प्राप्त होने वाले प्रोटीन (Animal Sources) – जैसे दूध और दूध से बने पदार्थ, पनीर, दही, खोया, मक्खन तथा अन्य पशु जन्य साधन।
2. वनस्पति जगत् से प्राप्त होने वाले प्राप्त प्रोटीन (Vegetable Sources) – जैसे दालें, सोयाबीन, मूंगफली, तिल, बादाम, पिस्ता, नारियल, मटर और अनाज आदि।
प्रोटीन की कमी से होने वाले नुकसान (Effects of Deficiency of Protein) – प्रोटीन की कमी का प्रभाव बच्चों, गर्भवती औरतों और दूध पिलाने वाली माताओं पर अधिक पड़ता है। इसकी कमी से निम्नलिखित नुकसान होते हैं

  1. शरीर की वृद्धि और विकास में रुकावट – प्रोटीन की कमी से शरीर के विकास और वृद्धि की रफ्तार कम हो जाती है। इससे शरीर कमजोर हो जाता है और बच्चों में शारीरिक वृद्धि रुक जाती है।
  2. खून की कमी होना – भोजन में प्रोटीन की कमी से खून की कमी (Anaemia) हो जाती है।
  3. रोग प्रतिरोधक (Antibodies) पदार्थ की कमी – प्रोटीन शरीर में रोग प्रतिरोधक तत्त्वों का निर्माण करती है। प्रोटीन की कमी से शरीर में बीमारियों से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है जिससे कई रोग लग जाते हैं।
  4. हड्डियां कमज़ोर होना – इसकी कमी हड्डियों को भी कमज़ोर करती है इसलिए इनके जल्दी टूटने का डर रहता है।
  5. चमड़ी का खुश्क होना – शरीर में प्रोटीन की कमी से चमड़ी खुश्क हो जाती है और इससे शरीर पर झुर्रियां पड़ जाती हैं।
  6. बच्चे का कमज़ोर पैदा होना – गर्भवती और दूध पिलाने वाली औरतों में इसकी कमी होने से बच्चा कमजोर होता है और उसकी वृद्धि ठीक नहीं होती।
  7. प्रोटीन की कमी से बच्चे क्वाशियोरकॉर और मरास्मस (सूखा) रोगों के शिकार हो जाते हैं।

प्रश्न 2.
प्रोटीन के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 3.
वसा का वर्गीकरण, कार्य, स्रोत आदि के बारे में बताएं।
उत्तर :
वसा (Fat) – वसा भी मनुष्य की खुराक का एक महत्त्वपूर्ण भाग है। यह हाइड्रोजन, कार्बन और ऑक्सीजन का मिश्रण है। यह शरीर को शक्ति प्रदान करती है और पानी में अघुलनशील है। इसमें कार्बोज़ प्रोटीन से दुगुनी शक्ति होती है। एक ग्राम वसा से 9 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। हमारे शरीर को 15 से 20 प्रतिशत ऊर्जा वसा से मिलनी चाहिए। मनुष्य को रोज़ाना 20 से 30 ग्राम वसा की आवश्यकता होती है। वसा में घुलनशील विटामिन ‘ए’, ‘डी’ और ‘के’ हैं।
वसा का वर्गीकरण-वसा को उसके स्रोत के आधार पर दो वर्गों में विभाजित किया जाता है –
1. पशु जन्य साधन या वसा (Animal Sources) – जैसे घी, मक्खन तथा अन्य पशु जन्य साधनों की वसा आदि।
2. वनस्पति साधन (Vegetable Sources) – जैसे मूंगफली, सोयाबीन, सूरजमुखी, सरसों, तिल, नारियल, बिनोले आदि के तेल।
वसा के कार्य (Functions of Fat)

वसा हमारे शरीर में निम्नलिखित कार्य करती है –

  1. ऊर्जा का स्रोत (Source of Energy)
  2. आवश्यक वसा अम्लों का स्रोत (Source of Essential Fatty Acids)
  3. वसा में घुलनशील विटामिनों का स्रोत (Source of Fat Soluble Vitamins)
  4. कोमल अंगों की सुरक्षा – (Protection of Sensitive Body Organs)
  5. भोजन को स्वादिष्ट बनाती है – (Helps in Making Food Tasty)
  6. सन्तुष्टि देती है – (Gives Satisfaction)
  7. शरीर का तापमान बनाए रखती है (Helps in Regulating Body Temperature)
  8. चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए (For Healthy Skin)

वसा की प्राप्ति के स्रोत (Sources of Fat) – वसा निम्नलिखित भोजन पदार्थ में अधिक पाई जाती है –

  1. घी, मक्खन, क्रीम और तेल।
  2. वनस्पति तेल पदार्थ जैसे – सरसों, तिल, मूंगफली, नारियल, बिनौलों का तेल और वनस्पति घी।
  3. सूखे फल और मेवे जैसे – बादाम, अखरोट, सूखी गिरी और काजू तथा पशु जन्य पदार्थ।
  4. दूध और दूध से बने पदार्थ जैसे-दूध का पाऊडर और खोया आदि।

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प्रश्न 4.
सूक्ष्म पोषक तत्त्व द्वारा शरीर में किए गए कार्य व उनके स्रोत बताओ।
उत्तर :
सूक्ष्म पोषक तत्त्व हैं – लवण (Minerals) एवम् विटामिन।

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विटामिन – विटामिन कई प्रकार के होते हैं जैसे ए, बी, सी, डी आदि। इनमें से विटामिन ‘ए’ और ‘डी’ वसा में घुलते हैं। और विटामिन ‘बी’ और ‘सी’ पानी में घुलते है।

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प्रश्न 5. (क)
विटामिन ‘बी’ समूह के कार्य तथा स्त्रोत लिखें।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न।

प्रश्न 5.
(ख) विटामिन ‘ए’ के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न।

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प्रश्न 6.
विभिन्न पोषक तत्त्वों के अभाव से होने वाले रोगों के नाम लिखो एवम् उनके लक्षण भी बताओ।
उत्तर :
1. कार्बोहाइड्रेट्स (शर्करा)-यदि यह हमारे आहार में नहीं होता तो –

  • वज़न में कमी आती है।
  • ऊर्जा की कमी के कारण थकान अनुभव होती है।
  • शर्करा में कमी के कारण प्रोटीन ऊर्जा की आवश्यकता पूरा करता है।

अत: यह शरीर की अभिवृद्धि में मदद नहीं कर पाता। इस प्रकार शर्करा की कमी से प्रोटीन की भी कमी हो जाती है। इस रोग को प्रोटीन-एनर्जी-मालन्यूट्रीशन कहते हैं। यह रोग बच्चों में ज्यादा होता है। भारत में इसको मैरसमस कहते हैं।

मरासमस के लक्षण –

  • बच्चा हड़ियों का ढांचा बन जाता है। वह ठीक से नहीं बढ़ता।
  • शरीर में पानी इकट्ठा होने के कारण पेट फूल जाता है।
  • जिगर की कोशिकाएँ क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।
  • बच्चा पीला पड़ जाता है और चेहरे पर दाग पड़ जाते हैं।
  • बच्चा सदा भूखा-सा लगता है।

2. प्रोटीन-जब प्रोटीन हमारे आहार में उचित मात्रा में नहीं होता तो –

  • शरीर धीमी गति से बढ़ता है।
  • घाव को ठीक होने में बहुत समय लगता है।
  • हम मानसिक व शारीरिक रूप से थक जाते हैं।
  • हमारी मांसपेशियाँ दुर्बल हो जाती हैं।

3. वसा (फैट्स)-जब वसा उचित मात्रा में हमारे आहार में नहीं होता तो –

  • शरीर वसा में घुलनशील विटामिन को उचित रूप में प्रयोग नहीं कर पाता है।
  • वजन कम हो जाता है।
  • थकान व बेचैनी महसूस होती है।
  • शरीर को ऊर्जा देने के लिए प्रोटीन का प्रयोग होने लगता है।

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4. कैल्शियम-इसकी कमी से –

  • हड्डियाँ दुर्बल और विकृत हो जाती हैं।
  • अभिवृद्धि ठीक से नहीं होती।
  • माँसपेशियों की गति पर कोई नियन्त्रण नहीं रहता।

5. लोहा-इसकी कमी से –

  • शरीर द्वारा उचित मात्रा में रक्त नहीं बनता।
  • त्वचा पीली पड़ जाती है क्योंकि लाल रंग देने वाले लोहे की कमी हो जाती है।
  • रोग के कीटाणुओं से लड़ने की क्षमता नहीं रहती। इस रोग को हम ‘एनीमिया’ कहते हैं।

6. आयोडीन-इसकी कमी द्वारा –

  • गले में थायराइड ग्लैंड सूज जाता है।
  • बच्चे में अभिवृद्धि ठीक नहीं होती।
  • इस रोग को हम ‘गौयटर’ कहते हैं।

7. विटामिन ए-इसकी कमी के कारण –

(i) अन्धेरे में हमें साफ दिखाई नहीं देता।
(ii) आँखों में सूखापन आने लगता है। यदि कमी ज्यादा दिन रहे तो व्यक्ति अन्धा हो सकता है। इस रोग को ‘रतौंधी’ (Night blindness) कहते हैं।

8. विटामिन ‘बी’-इसकी कमी से –

  • व्यक्ति को भूख नहीं लगती और खाना पचाने में भी कठिनाई होती है।
  • व्यक्ति को थकान महसूस होती है और सिर दर्द रहता है।
  • होठों के किनारे पर त्वचा में दरारें पड़ जाती हैं।
  • आँखों में जलन होती है।
  • जीभ खुरदरी और लाल हो जाती है। इस रोग को ‘बेरी-बेरी’ (Beri-Beri) कहते हैं।

9. विटामिन ‘सी’- इसकी कमी के कारण –

  • दाँत मसूड़े व हड्डियाँ कमज़ोर हो जाती हैं।
  • मसूड़े सूज जाते हैं। अतः उनमें पस पड़ जाती है, खून निकलता है और दर्द होता
  • घाव जल्दी नहीं भरते। इस रोग को ‘स्कर्वी’ (Scurvy) कहते हैं।

10. विटामिन ‘डी’-इसकी कमी से –

  • दाँत स्वस्थ व मज़बूत नहीं रहते।
  • पेट बड़ा हो जाता है।
  • हड्डियाँ मज़बूत नहीं रहती। वह मुड़ जाती हैं अथवा विकृत हो जाती हैं। इस रोग को ‘रिकेट्स’ (Rickets) कहते हैं।

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प्रश्न 7.
पकाने से कौन-कौन से पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं ?
अथवा
पकाने से विभिन्न पौष्टिक तत्त्वों पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
उत्तर :
पकाने के दौरान निम्नलिखित पोषक तत्त्व नष्ट हो जाते हैं –
(i) विटामिन ‘ए’ – जब भी हम विटामिन ‘ए’ युक्त सब्जियों को तलते हैं जैसे पालक या मेथी की पूड़ी या पकौड़े बनाते हैं, तब विटामिन ‘ए’ नष्ट हो जाता है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि विटामिन ‘ए’ तलने पर तेल में सरलता से घुल जाता है चूंकि यह तेल में घुलनशील है।

(ii) विटामिन ‘बी’ – यह पानी में घुलनशील है। अत: जब हम चावल भिगोते हैं तो सारा ‘विटामिन बी’ पानी में चला जाता है। यदि हम वो पानी फैंक देते हैं तो विटामिन ‘बी’ भी साथ ही निकल जाता है। आप जितना चावल को रगड़ कर साफ करते हैं उतना ही ‘विटामिन बी’ पानी में बहा देते हैं। इसके अलावा कभी-कभी राजमा और चने जैसे खाद्य पदार्थों को नर्म बनाने के लिए मीठा सोडा प्रयोग किया जाता है। मीठा सोडा भी ‘विटामिन बी’ को नष्ट करता है।

(iii) विटामिन ‘सी’ – यह पकाने के दौरान सरलता से नष्ट हो जाता है। जब विटामिन-‘सी’ युक्त फल एवम् सब्जियों को काटा जाता हैं, तो यह नष्ट हो जाता है। यदि ‘विटामिन सी’ युक्त सब्जियों को ज्यादा पकाया जाता है अथवा उन सब्जियों का पानी फेंका जाता है, तो ‘विटामिन सी’ नष्ट हो जाता है। इसके अलावा ‘मीठा सोडा’ इस्तेमाल करने से भी ‘विटामिन सी’ नष्ट हो जाता है।

(iv) प्रोटीन – यदि प्रोटीन युक्त खाद्य पदार्थों को बहुत उच्च तापमान पर पकाया जाता है, तो ये चमड़े जैसे और कठोर हो जाते हैं। इन्हें पचाना भी कठिन हो जाता है। अतः सभी प्रकार के प्रोटीन शरीर को नहीं मिल पाते।

(v) वसा – जब वसा अर्थात् घी एवम् तेल को पकौड़े या पूड़ियाँ आदि तलने में अधिक समय तक बार-बार गर्म किया जाता है तो इसकी पौष्टिकता में कमी आ जाती है। तब यह खाद्य पदार्थ में विद्यमान ‘विटामिन ए’ को नष्ट कर देता है।

(vi) खनिज – सोडियम, पोटाशियम आदि खनिज पानी में घुल जाते हैं। खाद्य पदार्थ को काटने, धोने तथा उबालने के बाद बचे अतिरिक्त पानी को फेंकने से नष्ट हो जाते हैं।

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प्रश्न 8.
पोषक तत्त्वों के संरक्षण से आप क्या समझते हैं ? पोषक तत्त्वों का संरक्षण किस प्रकार किया जा सकता है?
उत्तर :
पकाने की प्रक्रिया के दौरान पोषकों का बचाव रखना संरक्षण कहलाता है। संरक्षण निम्नलिखित प्रकार से हो सकता है –

  1. सब्जियों को पहले धोएँ, फिर काटें इससे उनके खनिज व विटामिन नष्ट नहीं होते। खाद्य पदार्थ को आवश्यकता से अधिक न धोएं।
  2. सब्जियों का पतला-पतला छिलका ही उतारें क्योंकि छिलके के नीचे ही विटामिन पाए जाते हैं।
  3. सब्जियों के बड़े-बड़े टुकड़े काटिए और वह भी पकाने से बिल्कुल पहले। छोटे टुकड़े काटने का अर्थ है पोषक तत्त्वों की अधिक हानि।
  4. यदि सब्जियाँ पानी में पकानी हैं तो उन्हें केवल उबलते पानी में डालें।
  5. सब्जियों का बहुत पतला छिलका उतारें।
  6. पकाने के लिए उतना ही पानी प्रयोग करें जितना आवश्यक हो। अतिरिक्त पानी को फेंकने की बजाए कोई अन्य खाद्य पदार्थ बनाने में प्रयोग करें।
  7. मीठे सोडे का प्रयोग न करें। इसके बदले इमली या नींबू का रस विटामिनों को संरक्षित करने में सहायक है।
  8. चावल पकाने में उतना ही पानी प्रयोग करें जितना पकाने के दौरान सोख लिया जाए।
  9.  ऐसे बर्तन (कड़ाही/पतीले) में पकाइए जिसका ढक्कन अच्छी तरह फिट हो सके। यदि आप बिना ढक्कन वाले बर्तन में खाद्य पदार्थ पकाएंगे तो पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में नष्ट होंगे।
  10. खाद्य पदार्थ को आवश्यकता से अधिक मत पकाइए क्योंकि ऐसा करने से अनेक पोषक तत्त्व नष्ट हो जाएंगे।

प्रश्न 9.
पोषक तत्त्वों का संवर्धन किन विधियों द्वारा हो सकता है ? विस्तृत में समझाएँ।
अथवा
भोजन का पौष्टिक मान बढ़ाने की विधियों का महत्त्व लिखें।
उत्तर :
पोषक तत्त्वों का संवर्धन निम्नलिखित विधियों द्वारा होता है –
(i) मिश्रण
(ii) किण्वन
(iii) अंकुरण।

1. मिश्रण – यह पोषकों की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए विभिन्न खाद्य समूहों से सस्ते और सामान्य रूप से उपलब्ध खाद्य पदार्थों का मिश्रण करने की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए दाल चावल मिलाकर खाना चावल (अनाज) हमें ऊर्जा देते हैं और दाल प्रोटीन देती हैं।
इसके निम्नलिखित फायदे हैं –

  1. आप ऐसे आहार का सेवन कर सकते हैं जिसमें अच्छे स्तर के पोषक तत्त्व हों।
  2. आप सस्ते व सरलता से उपलब्ध होने वाले खाद्य पदार्थों का प्रयोग कर सकते हैं। इससे भोजन के पोषक तत्त्वों को पर्याप्त रूप से बढ़ावा मिलेगा।
  3. आप पूरे परिवार को संतुलित आहार दे सकते हैं।

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2. किण्वन-यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें खाद्य पदार्थों में कूछ सूक्ष्म जीवाणु प्रवेशित कराए जाते हैं। वह खाद्य पदार्थ में पहले से विद्यमान पौष्टिक तत्त्वों को सरल और अधिक उत्तम रूप में परिवर्तित कर देते हैं और अन्य तत्त्वों का निर्माण भी करते हैं। कुछ किण्वित खाद्य पदार्थों के उदाहरण हैं-दही, डबलरोटी, ढोकला, इडली आदि। इनके निम्नलिखित लाभ हैं –

  • सूक्ष्म जीवाणु जिनके कारण किण्वन होता है, प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट को छोटे-छोटे कणों में विभाजित करते हैं जोकि सरलता से पच जाते हैं।
  • किण्वन के दौरान मटर, फलियों जैसे अनाज और खाद्य पदार्थ, कैल्शियम, फॉस्फोरस और लौह जैसे खनिजों का स्तर अधिक अच्छा होता है। उस रूप में वह शरीर द्वारा सरलता से अवशोषित कर लिए जाते हैं।
  • किण्वित खाद्य पदार्थ स्पंजी और नरम हो जाते हैं तथा छोटे बड़े सभी इन्हें पसन्द करते हैं।

3. अंकुरण-यह ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दाल या अनाज को थोड़े-से पानी में भिगो कर रखने से उसमें छोटे-छोटे अंकुर निकल आते हैं।
उदाहरण-गेहूँ, बाजरा, राजमां, मटर आदि को अंकुरित किया जा सकता है। इसके निम्नलिखित लाभ हैं –

  • इससे खाद्य पदार्थों को पचाने की क्षमता बढ़ती है।
  • कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन छोटे-छोटे कणों में टूट जाते हैं जिन्हें पचाना आसानहोता है ।
  • अंकुरण से चने और दालें नरम हो जाती हैं। अतः उन्हें पकाने में कम समयलगता है और आप उन्हें सरलता से पचा सकते हैं।
  • बिना अतिरिक्त लागत के खाद्य पदार्थ का पौष्टिक मूल्य बढ़ जाता है।
  • खाद्य पदार्थों को अंकुरित करने से उनमें कुछ विटामिन और खनिज काफ़ी बढ़ जाते हैं। ‘विटामिन बी’ की मात्रा दुगुनी हो जाती है और विटामिन ‘सी’ लगभग सौ गुणा बढ़ जाता है।

प्रश्न 10.
आहार का पौष्टिक मूल्य बढ़ाने का एक ढंग बताओ।
उत्तर :
स्वयं उत्तर दें।

प्रश्न 11.
आहार की पौष्टिकता कैसे बढ़ाई जा सकती है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 9 का उत्तर।

प्रश्न 12.
जल में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ? मुख्य कार्य बताएं।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न नं० 4 में।

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प्रश्न 13.
पौष्टिक मान बढ़ाने की विधियां बताएं।
या हम खाद्य पदार्थों का मूल्य कैसे बढ़ा सकते हैं ?
उत्तर :
देखें प्रश्न नं० 8 का उत्तर।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) निम्न का उत्तर एक शब्द में दें –

प्रश्न 1.
गर्मी तथा प्रकाश में नष्ट होने वाला विटामिन बताएं।
उत्तर :
विटामिन B2.

प्रश्न 2.
आँखों से सम्बन्धित विटामिन का नाम बताओ।
उत्तर :
विटामिन A.

प्रश्न 3.
विटामिन सी की कमी से होने वाले रोग का नाम।
उत्तर :
स्कर्वी।

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प्रश्न 4.
पानी में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखें।
उत्तर :
विटामिन सी, विटामिन बी।

प्रश्न 5.
पूर्ण आहार किसे कहते हैं ?
उत्तर :
दूध को।

प्रश्न 6.
विटामिन A का स्त्रोत बताएं।
उत्तर :
दूध।

प्रश्न 7.
प्रोटीन प्राप्ति का वनस्पतिक स्त्रोत बताएं।
उत्तर :
दालें।

प्रश्न 8.
लोहे की कमी से कौन-सा रोग हो जाता है ? लोहे की प्राप्ति के दो मुख्य साधन बताएं।
उत्तर :
लोहे की कमी से अनीमिया रोग हो जाता है। लोहे के स्त्रोत-पालक, पुदीना, गुड़।

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प्रश्न 9.
पानी में घुलनशील विटामिन कौन-कौन से हैं ?
उत्तर :
विटामिन बी तथा सी।

प्रश्न 10.
प्रोटीन के दो मुख्य स्त्रोत लिखें।
उत्तर :
दूध तथा दूध से बने पदार्थ।

प्रश्न 11.
टूटे-फूटे तन्तुओं की मुरम्मत के लिए कौन-सा पौष्टिक तत्त्व आवश्यक
उत्तर :
प्रोटीन।

प्रश्न 12.
बेरी-बेरी रोग किस पौष्टिक तत्त्व की कमी से होता है ?
उत्तर :
विटामिन ‘बी’ की कमी से।

प्रश्न 13.
एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर का सामान्य तापमान कितना होता है?
उत्तर :
37° C अथवा 98.6° F।

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प्रश्न 14.
स्कर्वी रोग किस विटामिन की कमी से होता है ?
उत्तर :
विटामिन ‘सी’ की कमी से।

प्रश्न 15.
विटामिन ‘डी’ की कमी से कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर :
रिकेट्स।

प्रश्न 16.
वसा में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखें।
उत्तर :
विटामिन ‘ए’, विटामिन ‘डी’, विटामिन ‘के’ तथा विटामिन ‘ई’।

प्रश्न 17.
विटामिन ‘सी’ के कोई दो स्त्रोत लिखें।
उत्तर :
नींबू, संगतरा, हरी मिर्च, मौसम्मी आदि।

प्रश्न 18.
विटामिन ‘ए’ के मुख्य दो स्त्रोत लिखें।
उत्तर :
दूध, अण्डा, गाजर, पालक।

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प्रश्न 19.
कार्बोज़ के दो मुख्य स्रोत लिखें।
उत्तर :
गेहूँ, शहद।

प्रश्न 20.
विटामिन ‘सी’ की कमी से बच्चों में कौन-सा रोग होता है ?
उत्तर :
स्कर्वी।

प्रश्न 21.
दालों में कौन-सा पौष्टिक तत्त्व पाया जाता है ?
उत्तर :
प्रोटीन।

प्रश्न 22.
विटामिन ‘के’ के मुख्य कार्य क्या हैं ?
उत्तर :
इसका मुख्या कार्य खून को जमाने में सहायता करना है।

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प्रश्न 23.
बच्चों में कैल्सियम की कमी से होने वाले रोग का नाम लिखें व उस रोग का कोई एक लक्षण लिखें।
उत्तर :
रिकेट्स रोग हो जाता है, हड्डियां कमजोर हो जाती हैं।

प्रश्न 24.
कार्बोज़ के कोई दो मुख्य स्रोत बताएं।
उत्तर :
शक्कर, आलू, गेहूँ, शहद आदि।

प्रश्न 25.
आहारीय लोहे की प्राप्ति के कोई दो मुख्य साधन लिखिए।
उत्तर :
पालक, गुड़।

प्रश्न 26.
विटामिन ‘ए’ के कोई दो मुख्य स्रोत लिखें।
उत्तर :
गाजर, दूध।

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प्रश्न 27.
वसा में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखें।
उत्तर :
विटामिन A, विटामिन K.

प्रश्न 28.
जल में घुलनशील विटामिनों के नाम लिखें।
उत्तर :
विटामिन B, विटामिन C.

प्रश्न 29.
पोषक तत्त्वों के संवर्धन की विधियों के नाम लिखें। उत्तर–किण्वन, अंकुरण, मिश्रण।
(ख) रिक्त स्थान भरो –
1. प्रोटीन की कमी से ………… रोग हो जाता है।
2. वसा ………… का स्रोत है। ………..
3. संतरे में ……….. विटामिन होता है।
4. लोहे की कमी से ………… रोग हो जाता है।
5. विटामिन बी की कमी से ………… रोग हो जाता है।
6. दाँतों में पाइयोरिया ………. की कमी से होता है।
उत्तर :
1. क्वाशियोरकर
2. ऊर्जा
3. सी
4. अनीमिया
5. बेरो-बेरी
6. विटामिन सी।

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(ग) ठीक/गलत बताएं –
1. वसा, शक्कर से आधी ऊर्जा प्रदान करती है।
2. दाँतों के डैनटिन में 27% कैल्शियम होता है।
3. प्रजनन सम्बन्धी विकार विटामिन ई की कमी से हो सकते हैं।
4. वसा की कमी से आवश्यक वसा अम्लों की कमी हो जाती है।
उत्तर :
1. (✗) 2. (✓) 3. (✓) 4. (✓)।

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
निम्न में कार्बोज के स्त्रोत हैं –
(A) गेहूँ
(B) गुड़
(C) शहद
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 2.
विटामिन सी के स्त्रोत हैं –
(A) संतरा
(B) मालटा
(C) नींबू
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

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प्रश्न 3.
भोजन हमारे शरीर को …………….. देता है।
(A) शरीर को शक्ति देता है
(B) शरीर की वृद्धि
(C) टूटे तन्तुओं की मुरम्मत
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 4.
निम्न में प्राणिज प्रोटीन है –
(A) गेहूँ
(B) मटर
(C) दूध
(D) दाल।
उत्तर :
दूध।

प्रश्न 5.
लोहे का स्त्रोत है –
(A) पालक
(B) गुड़
(C) अण्डे का पीला भाग
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 6.
विटामिन ए की कमी से हानि है –
(A) चमड़ी का खुरदरापन
(B) प्रजनन क्रिया पर प्रभाव
(C) दांतों तथा हड्डियों के विकार
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 7.
राइबोफ्लेबिन है –
(A) विटामिन ए
(B) विटामिन B2
(C) विटामिन सी
(D) विटामिन डी।
उत्तर :
विटामिन B2

प्रश्न 8.
प्रोटीन के कार्य हैं –
(A) शरीर की सुरक्षा तथा विकास का कार्य
(B) मानसिक शक्ति प्रदान करना
(C) टूटे तन्तुओं की मुरम्मत
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 9.
वसा के कार्य हैं –
(A) ऊर्जा का साधन
(B) सन्तुष्टि देती है
(C) चमड़ी के स्वास्थ्य के लिए
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

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प्रश्न 10.
विटामिन डी की कमी का प्रभाव है –
(A) रिकेटस रोग
(B) ओस्टोमलेशिया
(C) ओस्टयोपोरोसिस
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 11.
विटामिन K के मुख्य कार्य है
(A) घाव से निकलते खून को जमाना
(B) आंखों की सुरक्षा
(C) तन्तुओं का निर्माण
(D) ऊर्जा प्रदान करना।
उत्तर :
घाव से निकलते खून को जमाना।

प्रश्न 12.
कैल्शियम की प्राप्ति के साधन हैं –
(A) दूध से बने पदार्थ
(B) पालक
(C) मूली
(D) सभी।
उत्तर :
सभी।

प्रश्न 13.
ए श्रेणी का प्रोटीन है –
(A) अनाज
(B) दूध
(C) मक्की की जीन
(D) सूखे मेवे।
उत्तर :
दूध।

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प्रश्न 14.
आयोडीन की कमी से होता है –
(A) थाइराइड गलैंड सूज जाता है
(B) बच्चों की अभिवृद्धि ठीक नहीं होती
(C) मिक्सोडीमा हो जाता है
(D) सभी ठीक।
उत्तर :
सभी ठीक।

प्रश्न 15.
निम्न में ठीक नहीं है –
(A) विटामिन डी की कमी से अन्धराता हो जाता है
(B) विटामिन E प्रजनन क्रिया में सहायक है
(C) लोहे का एक स्रोत पालक भी है
(D) आयोडीन की कमी से पेंघा रोग होता है।
उत्तर : विटामिन डी की कमी से अन्धराता हो जाता है।

प्रश्न 16.
विटामिन C की अधिक प्राप्ति होती है –
(A) मीठे पदार्थों से
(B) कड़वे पदार्थों से
(C) खट्टे पदार्थों से
(D) सभी ठीक है।
उत्तर :
खट्टे पदार्थों से।

भोजन-पौष्टिक तत्त्व, संवर्धन तथा संरक्षण HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ भोजन मानवीय जीवन का मूल आधार है।

→ भोजन शरीर को शक्ति प्रदान करता है।

→ भोजन शरीर की आन्तरिक मुरम्मत करता है।

→ सन्तुलित भोजन में शरीर के सभी आवश्यक पौष्टिक तत्त्व होते हैं।

→ प्रोटीन सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

→ विटामिन शरीर को बीमारियों से बचाते हैं।

→ विटामिन ए की कमी से अन्धराता हो सकता है।

→ प्रोटीन, कार्बोज, चिकनाई, विटामिन, लवण और पानी शरीर के लिए आवश्यक पौष्टिक तत्त्व हैं।

→ कार्बोहाइड्रेट्स, गेहूँ, चावल, मक्की, सूखे मेवे, गुड़, शक्कर, चीनी, शहद आदि से प्राप्त होते हैं।

→ विटामिन B2 गर्मी और प्रकाश से नष्ट हो जाते हैं।

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→ प्रोटीन की कमी से शारीरिक विकास रुक जाता है।

→ विटामिन ‘ए’ आँखों और चमड़ी के लिए लाभदायक होता है।

→ विटामिन ‘सी’ शरीर को बीमारियों से बचाता है और यह खट्टे फलों जैसे नींबू, संतरा, मालटा आदि में मिलता है।

→ विशेष विधियों द्वारा खाद्य पदार्थों के पोषकों में सुधार लाने की प्रक्रिया को संवर्धन कहते हैं।

→ भोज्य पदार्थों को अधिक तलने से विटामिन A नष्ट हो जाता है।

→ विटामिन B, C पानी में घुलनशील है।

→ पोषक तत्त्वों का संवर्धन करने के लिए मिश्रण, किण्वन तथा अंकुरण विधियों का प्रयोग होता है।

→ अंकुरण करने से विटामिन B तथा C की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1. (A)
वस्तुओं पर आई० एस० आई० (ISI) मार्क होने का क्या महत्त्व है ?
उत्तर :
आई० एस० आई० मार्क भारतीय मानक संस्थान (Indian Standard Institute) द्वारा किसी वस्तु की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण-पत्र है।

प्रश्न 1. (B)
खाद्य-पदार्थों के अतिरिक्त दस (चार) ऐसी वस्तुओं के नाम लिखिए जिन पर आई० एस० आई० मार्क लगा हो।
अथवा
उन चार वस्तुओं के नाम लिखो जिन पर आई० एस० आई० चिह्न लगाया जाता
उत्तर :
खाद्य-पदार्थों के अतिरिक्त दस वस्तुओं के नाम जिन पर आई० एस० आई० का मार्क होता है, निम्नलिखित हैं –

  1. गैस स्टोव
  2. गैस सिलेण्डर
  3. कुकिंग रेन्ज
  4. हेलमेट
  5. ब्लेड
  6. तराजू
  7. बाट
  8. विद्युत् प्रेस
  9. गीजर
  10. विद्युत् हीटर।

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प्रश्न 2.
कोई भी चार मानकीकरण चिह्न बताएं।
उत्तर :
I.S.I., एगमार्क, हालमार्क, F.P.O., वूलमार्क।

प्रश्न 3.
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम क्या है ?
उत्तर :
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम 1940 में बनाये गये। इस अधिनियम के अन्तर्गत देश में तैयार की गई अथवा आयात की गई औषधियों तथा मादक पदार्थों के गुणों की जाँच की जाती है। इस नियम में समय-समय पर आवश्यकतानुरूप संशोधन किया जाता है।

प्रश्न 4.
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम में क्या-क्या संशोधन किये गये ?
उत्तर :
सन् 1955, 1961, 1969 में इस अधिनियम में अनेक महत्त्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं तथा उपनियम बनाए गए हैं। इस अधिनियम के अनुसार यदि किसी औषधि अथवा मादक पदार्थ में प्रमाणित स्तर से नीचे के गुण पाए जाते हैं, तो उसे उसके निर्माता से उसके निर्माण का अधिकार छीन लेने के साथ-साथ उसके मालिक को एक वर्ष के कारावास का दण्ड भी दिया जाता है। इस अधिनियम में यह भी व्यवस्था है कि जो औषधियाँ एवं मादक पदार्थ बाजार में बिकने के लिए आएं उन पर लेबल लगा होना चाहिए और इस लेबल पर उपयुक्त सूचनाएं होनी चाहिए।

प्रश्न 5.
एगमार्क क्या है ?
उत्तर :
एगमार्क, भारत सरकार के बिक्री एवं निरीक्षण निदेशालय द्वारा खाद्य-पदार्थों की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण है।

प्रश्न 6.
I.S.I. मार्क क्या है ? इसकी स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
I.S.I. मार्क प्रयोग में लाये जाने वाले उपकरणों की उत्तमता का प्रमाण है। इसकी स्थापना 1947 में हुई।

प्रश्न 7.
पैकिंग के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :

  1. पैकिंग करने से वस्तुएं खराब नहीं होती।
  2. वस्तुएँ टूटने से बचती हैं।
  3. उसमें मिलावट नहीं होती।
  4. उनकी मात्रा कम नहीं होती।

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प्रश्न 8.
P.F.A. और F.P.O. का पूरा नाम बताएं।
उत्तर :
P.F.A. Prevention of Food Adulteration act. F.P.O. Food Product Order.

प्रश्न 9.
(A) एगमार्क का चिह्न किन पदार्थों पर लगाया जाता है ?
(B) चार वस्तुओं के नाम लिखें जिन पर एगमार्क चिह्न लगाया जाता है।
उत्तर :
एगमार्क का चिह्न निम्नलिखित पदार्थों पर लगाया जाता है-खाने के तेल, मक्खन, घी, अण्डों, मसालों आदि पर।

प्रश्न 10.
स्वेटर पर लगा वुलमार्क का लेबल हमें क्या सूचना देता है ?
उत्तर :
इससे पता चलता है कि स्वेटर की क्वालटी अच्छी है।

प्रश्न 11.
विज्ञापन उपभोक्ता की किस प्रकार मदद करते हैं ?
उत्तर :
विज्ञापन द्वारा उपभोक्ता को पदार्थ की सूचना, उपयोगिता का पता चलता है तथा उपभोक्ता की गलतफहमी दूर होती है।

प्रश्न 12.
उपभोक्ता शिक्षण का अर्थ समझाएं।
अथवा
उपभोक्ता शिक्षा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
उपभोक्ता शिक्षा का अर्थ है उपभोक्ता को अपने अधिकारों, हितों, अनहितों तथा सरकार द्वारा उसके हितों की रक्षा के लिए उठाए गए कदमों के बारे में शिक्षित करना है।

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प्रश्न 13.
ईको लेबल किन वस्तुओं पर लगाया जाता है ?
उत्तर :
जो वस्तुएं वातावरण के अनुकूल हैं उन पर यह लेबल लगाया जाता है।

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प्रश्न 14.
उपभोक्ता की किन्हीं दो समस्याओं का उदाहरण सहित उल्लेख करें।
उत्तर :
उपभोक्ता को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे विभिन्न वस्तुओं में मिलावट तथा दुकानदार द्वारा मानक बाटों के स्थान पर पत्थर आदि से बनाए बाटों का प्रयोग करना। खाद्य पदार्थों तथा और पदार्थों पर लेबल न लगे होना जैसे सरसों के तेल में आरगीमोन के तेल का मिला होना। जैसे गैस स्टोव पर आई० एस० आई० का चिहन न लगा होना।

प्रश्न 15.
समझदार उपभोक्ता के किन्हीं दो उत्तरदायित्वों का उल्लेख करें।
उत्तर :
देखें लघु उत्तरीय प्रश्न 2 का उत्तर।

प्रश्न 16.
स्तरता के चिहन क्या होते हैं ? किन्हीं दो चिहनों के नाम लिखें व बताएं कि ये किन उत्पादकों पर पाए जाते हैं ?
उत्तर :
स्तरता चिह्नों का प्रयोग वस्तुओं के उचित स्तर को बताने के लिए किया जाता है जैसे आई० एस० आई० तथा एगमार्क, एफ० पी० ओ० आदि।
1. एगमार्क कृषि से सम्बन्धित खाद्य पदार्थों के लिए।
2. आई० एस० आई० चिह्न कारखानों में बने पदार्थ उपकरणों के लिए।

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प्रश्न 17.
मिलावट से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
किस स्थिति में भोज्य पदार्थ को मिलावटी कहा जाता है ?
उत्तर :
मिलावट से अर्थ है कि किसी खाद्य पदार्थ में कुछ ऐसा मिला देना जो सस्ता हो तथा उसी पदार्थ जैसा दिखे जैसे असली घी में वनस्पति घी की मिलावट। कई बार खाद्य पदार्थ में से कुछ पदार्थ निकाल दिया जाता है यह भी एक प्रकार की मिलावट है जैसे दूध में से क्रीम निकालकर दूध को पूरे मूल्य पर बेचना। कई बार कुछ दुकानदार अधिक पैसे कमाने के लालच में सेहत के लिए हानिकारक पदार्थ भी मिला देते हैं जैसे सरसों में आरगीमोन के बीज।

प्रश्न 18.
उपभोक्ता की उपलब्ध कोई चार सहायक सामग्री बतायें।
उत्तर :
विज्ञापन, मानकीकरण चिह्न, पर्चे, लेबल, पैकिंग आदि।

प्रश्न 19.
उपभोक्ता किसे कहते हैं ?
उत्तर :
जो भी व्यक्ति बाज़ार से या कहीं से वस्तुओं अथवा सेवाओं को खरीदता है तथा इनके बदले पैसे देता है तथा उपभोग करता है वह उपभोक्ता कहलाता है।

प्रश्न 20.
मानकीकरण चिहन उपभोक्ता की किस प्रकार मदद करते हैं ?
उत्तर :
उपभोग की विभिन्न वस्तुओं पर मानकीकरण चिह्न लगे रहते हैं जैसे F.P.O., एगमार्क, आई० एस० आई०, पी० एफ० ए०, वूल मार्क आदि। ये चिन सरकार द्वारा विभिन्न निर्माताओं को उचित जांच परख के बाद ही दिए जाते हैं। कोई भी निर्माता इन चिह्नों का गलत प्रयोग नहीं कर सकता। इस प्रकार यदि वस्तु पर मानकीकरण चिह्न लगा है तो उपभोक्ता बिना किसी हिचकिचाहट के वस्तु को खरीद सकता है। एगमार्क कृषि सम्बन्धी पदार्थों पर लगाया जाता है। ISI का मार्क प्रोसेस तथा पैक किए खाद्य पदार्थ जैसे बिस्कुट, सेवियां, पाऊडर दूध, बेकिंग पाऊडर आदि तथा उपकरणों जैसे प्रेशर कुक्कर, बिजली की प्रेस, गीजर, केतली, गैस चूल्हा आदि पर लगता है। यदि मानकीकरण चिहन लगा हो तो उपभोक्ता के मन को तसल्ली रहती है कि उसके पैसे का ठीक प्रयोग हुआ है। उपभोक्ता को इतनी वस्तुओं में से गुणवत्ता के आधार पर चयन की सुविधा हो जाती है।

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प्रश्न 21.
ISI मार्क क्या है ? यह किन चीज़ों पर लगाया जाता है ?
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
दुकानदार किन विधियों से सामान कम तोलकर उपभोक्ताओं को ठगते हैं ?
अथवा
चार ऐसे तरीके बताएं जिनसे दुकानदार नापने व तौलने में गड़बड़ करते हैं ?
उत्तर :
सामान्यत: दुकानदार निम्नलिखित तरीकों से सामग्री कम तोलकर उपभोक्ताओं को ठगते हैं –
1. मिठाइयों को डिब्बे सहित, मांस को वेष्टित किए गए कागज़ के साथ तथा फलों एवं सब्जियों को पत्तों सहित तोलकर मुख्य वस्तु की कम मात्रा देते हैं। कुछ दुकानदार डिब्बे के एक ढक्कन को वज़न के साथ एक-दूसरे हिस्से में मिठाई आदि रखकर तोलते हैं और इस प्रकार से तोल के सही होने का भ्रम पैदा करते हैं जबकि वस्तुस्थिति यह होती है कि माल के साथ तोले जाने वाले डिब्बे का हिस्सा वज़न में भारी होता है तथा बाट के साथ रखा गया हिस्सा वज़न में कम होता है।

2. मानक बाटों के स्थान पर देशी बाटों या पत्थर आदि से बनाए गए घरेलू बाटों का प्रयोग करके।
3. घिसे हुए पुराने बाटों का प्रयोग करके।
4. तरल पदार्थों को लीटर के माप द्वारा मापने के स्थान पर तोल द्वारा बेचकर।
5. हाथ वाले तराजू का प्रयोग करते समय डंडी मारकर।
6. पैमाने वाले तराजू को दोषपूर्ण रखकर।
7. कुछ दुकानदार तराजू के जिस पलड़े में तोलने के लिए सामग्री रखी जाती है इसके नीचे चुम्बक रख देते हैं और इस प्रकार यह पलड़ा चुम्बक द्वारा नीचे की ओर खींच लिया जाता है। इस प्रकार उपभोक्ता को कम सामग्री प्राप्त होती है।

1. (क) दुकानदार नाप-तोल में गड़बड़ी कैसे करते हैं ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

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प्रश्न 2.
एक उपभोक्ता के रूप में आप अपने हक को सुरक्षित रखने के लिए किन-किन ज़िम्मेदारियों व कर्तव्यों को निभाने का प्रयास करेंगे ?
उत्तर :
एक उपभोक्ता के रूप में अपने हक को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित कर्तव्यों को निभाने का प्रयास करना चाहिए –
1. यदि यह भ्रम हो कि वस्तु में जान-बूझकर मिलावट की गई है, तो इस बात को नजरअन्दाज न कर उस मिलावट की रोकथाम की भरपूर कोशिश करनी चाहिए। इसकी जानकारी सम्बन्धित अधिकारियों को स्वयं जाकर, टेलीफोन द्वारा या पत्रों द्वारा देनी चाहिए।
2. उपभोक्ताओं को खाद्य-पदार्थ के निरीक्षकों की मिलावटी पदार्थों के नमूने लेने में सहायता करनी चाहिए तथा ऐसे प्रकरणों में गवाही देने के लिए तैयार रहना चाहिए।
3. उपभोक्ताओं को अपूर्ण लेबल वाली वस्तुएं नहीं खरीदनी चाहिएं तथा अन्य परिचित लोगों को भी इन वस्तुओं को खरीदने की मनाही करनी चाहिए।
4. नकली वस्तुओं की खरीद से बचने के लिए वस्तुएं विश्वसनीय दुकानों से ही खरीदनी चाहिए।
5. नकली वस्तुओं की बिक्री कम करने के लिए असली वस्तुओं के बारे में स्वयं जानकारी प्राप्त करने के साथ-साथ अपने परिचितों को भी इसकी जानकारी देनी चाहिए।
6. असत्य विज्ञापनों पर रोक लगवानी चाहिए। यदि विज्ञापन वस्तु विशेष से ताल मेल नहीं खाता तो इसकी सूचना सम्बन्धित विभाग को देनी चाहिए।
7. दोष-युक्त माप-तोल के साधनों के प्रयोग पर रोक लगानी चाहिए।

प्रश्न 2.
(A) उपभोक्ताओं के कोई तीन उत्तरदायित्व लिखें।
(B) उपभोक्ता के किसी एक मुख्य अधिकार के बारे में लिखिए।
(C) उपभोक्ता के चार कर्त्तव्य बताएं।
(D) उपभोक्ता के चार कर्तव्य लिखिए।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 3.
नाम-पत्र या लेबल क्या होते हैं ? एक अच्छे नाम-पत्र में कौन-कौन से गुण होने चाहिएं ?
अथवा
एक अच्छे लेबल में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
उत्तर :
किसी भी वस्तु को खरीदते समय उस वस्तु को तैयार करने में प्रयुक्त हुए पदार्थों की मात्रा, वस्तु का परिमाण एवं गिनती, तैयार पदार्थ की उत्तमता प्रयोग-विधि, गुणवत्ता मूल्य आदि को जानने का साधन उसकी पैकिंग पर चिपका हुआ नाम-पत्र या लेबल (Label) होता है। यही कारण है कि प्रत्येक उत्पादनकर्ता के लिए निर्मित पदार्थ की पैकिंग पर एक ऐसा लेबल चिपका होना जरूरी होता है जिससे उपभोक्ता को ये सारी सूचनाएं मिल सकें। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि निर्माता अथवा उत्पादक द्वारा किसी वस्तु पर चिपकाए गए लेबल में दी गई सारी सूचनाएं सही हों। यदि इस प्रकार का कोई बन्धन न हो तो बेईमान वस्तु निर्माता लेबल पर गलत सूचना देकर उपभोक्ता को गुमराह कर सकता है। भारतीय मानक संस्थान ने तैयार खाद्य-पदार्थों पर चिपकाए गए लेबलों में निम्नलिखित गुणों का होना ज़रूरी बताया है –

1. खाद्य-पदार्थों पर चिपकाया गया लेबल स्पष्ट होना चाहिए जिसे पढ़कर उपभोक्ता को वस्तु की गुणवत्ता आदि के बारे में कोई धोखा न हो।
2. दूसरे पदार्थों से मिलते-जुलते नामों, चित्रों, संकेतों आदि का नाम प्रयोग नहीं होना चाहिए अन्यथा उपभोक्ता को धोखा हो सकता है।
3. लेबल पर किसी ऐसे अधिनियम, नियम अथवा निर्देश का उल्लेख नहीं होना चाहिए जिसके फलस्वरूप लेबल पर दिए गए विवरणों एवं गुणवत्ता में बदलाव आ जाए।
4. चिपकाए गए लेबल पर अग्रलिखित सूचनाएं होनी चाहिए –

  • खाद्य-पदार्थ का नाम।
  • खाद्य-पदार्थ तैयार करने के लिए प्रयुक्त किए गए पदार्थों के नाम और उनकी मात्रा।
  • सामग्री की मात्रा।
  • उत्पादक, निर्माता का नाम एवं पता।
  • उस देश का नाम जहाँ पर वह पदार्थ तैयार किया गया है।
  • बैच नम्बर अथवा कोड नम्बर।
  • निर्माण की तिथि।
  • प्रयोग-अवधि अर्थात् सामग्री का उपयोग किस तिथि तक किया जा सकता है (Expiry date)।
  • भण्डार (Storage) के लिए निर्देश।
  • उपभोक्ता द्वारा दिए जाने वाला अधिकतम मूल्य (स्थानीय करों को छोड़कर)।

प्रश्न 4.
एगमार्क (Agmark) कौन-कौन सी वस्तुओं पर लगाया जाता है ? किसी वस्तु पर एगमार्क लगे होने से उपभोक्ता को क्या लाभ होता है ?
उत्तर :
एगमार्क मानक भारत सरकार के बिक्री एवं निरीक्षण निदेशालय द्वारा कृषि के माध्यम से उत्पादित खाद्य-पदार्थों की विभिन्न किस्मों के निमित्त निर्धारित किए गए हैं। अनाज, मसाले, तिलहन, तेल, मक्खन, घी, अण्डे आदि की विभिन्न किस्मों को कृषि उपज के श्रेणीकरण अधिनियम, 1937 (Grading and Marketing of Agricultural Products Act 1937) में परिभाषित किया गया है। विभिन्न खाद्य-पदार्थों के रंग-रूप, भार संरचना आदि के आधार पर उन्हें चार विभिन्न वर्गों क्रमश: 1-2-3-4 में वर्गीकृत किया गया है। यह वर्ग क्रमशः अतिउत्तम, उत्तम, अच्छा व सामान्य के सूचक हैं। एगमार्क सम्बन्धी मानक निर्धारित करते समय इस बात का भी उल्लेख किया गया है कि विभिन्न खाद्य-पदार्थों को वेष्टित (Wrapped) करते समय किस प्रकार के वेष्टन (Wrapper) का इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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किसी भी खाद्य-पदार्थ पर एगमार्क का होना उस वस्तु के उपभोक्ताओं के लिए बहुत लाभप्रद होता है। इससे उसे निम्नलिखित सूचनाएं सहज ही प्राप्त हो जाती हैं –

  1. खाद्य-पदार्थ लाइसेंस प्राप्त निर्माता द्वारा निर्मित है।
  2. खाद्य-पदार्थ तैयार करते समय स्वच्छता सम्बन्धी पूरी सावधानी रखी गई है।
  3. नाप-तोल सम्बन्धी विवरण प्रमाण पुष्ट है।
  4. खाद्य-पदार्थ का मानक मूल्य क्या है।
  5. खाद्य-पदार्थ किस्म की दृष्टि से वर्गीकृत श्रेणियों में से किस श्रेणी का है।

इस जानकारी के उपलब्ध होने से उपभोक्ता के लिए किसी वस्तु की सही किस्म का चुनाव करने में सरलता हो जाती है और उसके पैसे का सदुपयोग हो पाता है।

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प्रश्न 5.
आई० एस० आई० मार्क क्या है ? यह प्रमाण-पत्र कौन-कौन सी शर्ते पूरी होने पर दिया जाता है ?
उत्तर :
आई० एस० आई० (ISI) मार्क भारतीय मानक संस्थान (Indian Standard Institute) द्वारा किसी वस्तु की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण-पत्र है। भारतीय मानक संस्थान राष्ट्रीय स्तर का संगठन है। इसकी स्थापना सन् 1947 में हुई थी। इसका मुख्य कार्य विभिन्न खाद्य-पदार्थों यथा फल तथा सब्जियों से तैयार किए गए संरक्षित खाद्य-पदार्थों, संघनित दूध (Condensed Milk), पाश्विक खाद्य-पदार्थ, मसाले, शिशु-आहार (Baby food) आदि की किस्म को उत्तम बनाए रखना है। इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए यह संस्थान विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के परामर्श एवं सक्रिय सहयोग के विभिन्न खाद्य-पदार्थों के मानक तैयार करता रहता है।

ये मानक तैयार करते समय खाद्य-पदार्थों की संरचना, बाह्य रूप-रंग आदि विभिन्न बातों का ध्यान रखा जाता है। सन् 1952 में लागू किए गए तथा सन् 1961 में संशोधित किए आई० एस० आई० सर्टिफिकेशन मार्क अधिनियम (ISI) (Certification Mark Act) के अन्तर्गत इस संस्थान द्वारा विभिन्न खाद्य-पदार्थों के उत्पादकों को आई० एस० आई० मार्क के इस्तेमाल की सुविधा उपलब्ध है। लेकिन इसके इस्तेमाल के लिए खाद्य-पदार्थों के निर्माताओं की संस्थान से सम्पर्क स्थापित करके लाइसेंस (Licence) लेना पड़ता है। यह लाइसेंस निम्नलिखित शर्ते पूरी करने पर ही दिया जाता है

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1. खाद्य – पदार्थ भारतीय मानक संस्थान द्वारा निर्धारित मानकों (Standards) के अनुरूप हो।
2. खाद्य – पदार्थ के संरक्षण, डिब्बाबन्दी आदि की विभिन्न प्रक्रियाओं के दौरान संस्थान द्वारा प्रस्तावित प्रविधियों का प्रयोग हुआ हो।।
3. खाद्य – पदार्थों को भारतीय मानक संस्थान से उत्तमता का प्रमाण-पत्र हासिल करने के लिए भेजे जाने से पूर्व निर्माता द्वारा उन खाद्य-पदार्थों के स्तर निर्धारण की जाँच आई० एस० आई० के निरीक्षकों द्वारा प्रस्तावित विधि के अनुसार की गई हो।
4. खाद्य – पदार्थ तैयार करने की विधि, स्थान, तैयार सामग्री का निरीक्षण भी आई० एस० आई० के निरीक्षकों द्वारा किया जा सकता है।

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प्रश्न 6.
भार और माप अधिनियम सबसे पहले कब पास हुआ ? इसमें कब-कब संशोधन किए गए ?
उत्तर :
स्वतन्त्रता से पूर्व हमारे देश में नाप-तोल के लिए कहीं मन, सेर, छटांक का चलन था, कहीं कच्चा सेर तथा पक्का सेर चलता था, कहीं रत्ती, तोला काम में लाए जाते थे, कहीं कुड़ों और पायली चलते थे। सभी उपभोक्ताओं को विभिन्न क्षेत्रों में प्रयुक्त होने वाले बाटों की समुचित जानकारी नहीं होती थी। व्यापारी कम तोल कर उपभोक्ता का भरपूर फायदा उठाता था। यदि कोई उपभोक्ता पूछता था तो उसे कोई मनगढंत उत्तर देकर चुप करा दिया जाता था। बाजारों में सुधार लाने तथा उनका नियमन करने के लिए सरकार ने 28 मार्च, 1939 को स्टैंडर्ड ऑफ़ वेट एक्ट (Standard of Weight Act) पास किया।

लेकिन इस बीच द्वितीय विश्व महायुद्ध प्रारम्भ हो गया जिसके परिणामस्वरूप इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका। यह अधिनियम पहली जुलाई, 1942 से ही लागू हो पाया। इसके बाद टकसाल अधिकारी द्वारा प्रमाणित वज़न या बाट तैयार किए गए और पूरे देश में इन्हें वितरित किया गया। पहले दिल्ली, मुम्बई, कोलकाता, चेन्नई आदि बड़े-बड़े शहरों में इनका चलन हुआ। स्वतन्त्रता के बाद तोल एवं माप के साधनों के एकीकरण की दिशा में गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया।

अप्रैल सन् 1955 में भारतीय संसद् ने मानक नाप-तोल के लिए देश में मीट्रिक पद्धति तथा दशमलव प्रणाली अपनाए जाने का प्रस्ताव रखा। सन् 1956 में मानकमाप एवं तोल अधिनियम पास हुआ तथा पहली अक्तूबर, 1960 में यह पूरे देश में लागू हो गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत विक्रेता द्वारा मीट्रिक बाटों का प्रयोग न करना एक कानूनी अपराध है। समय-समय पर माप व तोल ब्यूरो (Weight and Measure Bureau) के निरीक्षक इस बात की जाँच करते हैं कि विक्रेता इस अधिनियम का पालन कर रहा है अथवा नहीं।

किसी पदार्थ को उसके वैष्टन (Wrapper) अथवा उनके डिब्बों (Containers) सहित तोलना भी एक कानूनी अपराध है। यदि कोई व्यापारी ऐसा करता है तो उपभोक्ता इसकी सूचना माप व तोल ब्यूरो (Weights and Measures Bureau) को दे सकता है।

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प्रश्न 7.
खाद्य कानून के क्या उद्देश्य हैं ?
उत्तर :
खाद्य कानून उपभोक्ताओं तक सुरक्षित तथा पौष्टिक खाद्य-पदार्थ पहुँचाने का कार्य करता है। इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं –

  1. मिलावटी खाद्य-पदार्थ के हानिकारक प्रभाव से उपभोक्ता की रक्षा करना।
  2. उचित व्यापार-आचरण को बढ़ावा देना तथा लागू करना।
  3. उपभोक्ता की रक्षा के लिए निम्नलिखित कानून पारित किए गए हैं
    • Prevention of Food Adulteration Act (P.F.A.)
    • Food Product Order (F.P.O.)
    • मांस उत्पाद नियन्त्रण आदेश।

प्रश्न 8.
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम का मूल उद्देश्य क्या है ? इस अधिनियम में क्या-क्या संशोधन किए गए ?
उत्तर :
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम 1940 में बनाया गया। इस अधिनियम के अन्तर्गत देश में तैयार की गई अथवा आयात की गई औषधियों तथा मादक पदार्थों के गुणों की जांच की जाती है। इस अधिनियम में समय-समय पर आवश्यकतानुरूप अनेक संशोधन किए जाते हैं। सन् 1955, 60, 61, 69 में इस अधिनियम में अनेक महत्त्वपूर्ण संशोधन किए गए हैं तथा उपनियम बनाए गए हैं। इस अधिनियम के अनुसार यदि किसी औषधि अथवा मादक पदार्थ में प्रमाणित स्तर से नीचे के गुण पाए जाते हैं तो उसके निर्माता से उसके निर्माण का अधिकार छीन लेने के साथ-साथ उसके मालिक को एक वर्ष के कारावास का दण्ड भी दिया जाता है। इस अधिनियम में यह भी व्यवस्था है कि जो औषधियाँ एवं मादक पदार्थ बाज़ार में बिकने के लिए आएं उन पर लेबल लगा होना चाहिए और इस लेबल पर निम्नलिखित सूचनाएँ होनी चाहिएं –

  1. निर्माता का नाम, पता तथा निर्माण के अधिकार।
  2. बैच नम्बर।
  3. निर्माण की तिथि और अवसान तिथि (Expiry date) अर्थात् उसे कब तक इस्तेमाल में लाया जा सकता है।
  4. औषधि-निर्माण के समय प्रयुक्त किए गए मिश्रणों के नाम ।
  5. उपभोग की विधि।

प्रश्न 9.
एक अच्छे लेबल में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
अथवा
लेबल पर दी जाने वाली अपेक्षित जानकारी की कोई चार बातें बताएं।
उत्तर :
एक अच्छे लेबल में निम्नलिखित गुण होने चाहिए –

  1. लेबल सही ढंग से खाद्य-पदार्थों पर चिपका हुआ होना चाहिए।
  2. पात्र ऐसा बनाया गया हो जो खाद्य-पदार्थ की मात्रा के बारे में धोखा नहीं दे या भ्रम नहीं उत्पन्न करे।
  3. लेबल पर लिखा हुआ विवरण आसानी से पढ़ा और समझा जा सके।
  4. लेबल पर खाद्य-पदार्थ में प्रयोग किए गए कृत्रिम रोगों अथवा रासायनिक परिरक्षकों का उल्लेख हो।
  5. वह खाद्य-पदार्थ जिसके स्तर की परिभाषा दी गई है, स्टॉक के अनुसार हो।

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प्रश्न 10.
उपभोक्ता सहायक सामग्री क्या होती है ? उपभोक्ताओं को उपलब्ध किन्हीं तीन प्रकार की सहायक सामग्री का उल्लेख करें।
उत्तर :
उपभोक्ता सहायक सामग्री उपभोक्ता को वस्तुओं के चयन में सहायता प्रदान करती हैं। विभिन्न उपभोक्ता सहायक सामग्री हैं-मानकीकरण चिह्न, लेबल, पैकिंग, विज्ञापन, पर्चे, पुस्तकें, उपभोक्ता फोरम आदि।

1. लेबल-लेबल द्वारा उपभोक्ताओं को वस्तु की गुणवत्ता, कीमत आदि का पता चलता है। लेबल पर निम्न जानकारी होती है –

  • वस्तु का नाम
  • वस्तु में प्रयुक्त सामग्री
  • बनने की तारीख
  • ट्रेड मार्क
  • मानकीकरण चिह्न
  • बैच लाईसेंस नम्बर
  • गारण्टी
  • प्रयोग तथा सम्भाल के दिशानिर्देश आदि।।

2. विज्ञापन – निर्माता द्वारा वस्तु को बेचने के लिए विभिन्न प्रकार के विज्ञापनों द्वारा उपभोक्ता को जानकारी दी जाती है। विज्ञापन, समाचार-पत्र, टी०वी०, रेडियो आदि पर सुन देख कर उपभोक्ता को वस्तु के बारे में जानकारी मिलती है तथा आवश्यकता होने पर उसे खरीदना आसान रहता है।

3. पर्चे – उपभोक्ता को वस्तु की जानकारी देने के लिए निर्माता पर्चे छपवाकर समाचार-पत्रों में डलवा देते हैं या अपने नौकरों द्वारा लोगों के घरों में फेंकवा दिए जाते हैं। इन पर वस्तु के बारे में पूर्ण जानकारी देने की कोशिश की जाती है। इस पर तकनीकी जानकारी या अन्य कोई भी आवश्यक जानकारी विस्तार से होती है।

प्रश्न 12.
उपभोक्ता को खरीददारी करते समय किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ? इनमें से किसी एक के बारे में लिखिए।
अथवा
उपभोक्ता को खरीददारी करते समय किन-किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है ? कोई चार कठिनाइयों को बताइए।
उत्तर :
उपभोक्ता की खरीददारी करते समय कई प्रकार की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है जैसे –

  1. मूल्यों में परिवर्तन
  2. वस्तुओं का न मिलना
  3. धोखाधड़ी
  4. मिलावट
  5. गलत विज्ञापन
  6. गलत लेबल
  7. अपूर्ण तथा गलत जानकारी
  8. घटिया वस्तुएं
  9. मानकीकरण चिहन का गलत प्रयोग आदि।

मूल्यों में परिवर्तन-कई दुकानदार वस्तु पर लिखे अधिकतम मूल्य से अधिक पैसे मांगते हैं, कई बार फ्री होम डिलवरी के नाम पर वस्तु का मूल्य बढ़ा दिया जाता है। कई छोटे दुकानदार अधिकतम मल्य से कुछ कम पैसे लेकर भी वस्तु बेच देते हैं इससे उपभोक्ता क्नफयूज़ हो जाता है कि एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न मूल्य क्यों है।

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प्रश्न 13.
कोई भी चार खाद्य पदार्थों के नाम इनमें पाई जाने वाली मिलावट के साथ लिखें।
उत्तर :

क्रमांकखाद्य पदार्थमिलावट
1.हल्दीलेड क्रोमेट
2.देसी घीवनस्पति घी
3.बादाम की गिरीखुमानी की गिरी
4.शहदचीनी
5.गेहूँ का आटावासी पीसी हुई रोटी

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
परिवार के लिए आवश्यक वस्तुओं का चुनाव करते समय गृहिणी को किस-किस प्रकार के निर्णय लेने पड़ते हैं ? उदाहरण सहित चर्चा कीजिए।
अथवा
विभिन्न वस्तुओं के चयन के समय क्या-क्या सावधानियां बरतनी चाहिए?
उत्तर :
अपने परिवार की आवश्यकताओं के अनुसार उचित प्रकार की विभिन्न वस्तुओं का चुनाव करने के लिए गृहिणी को कई निर्णय लेने पड़ते हैं जिनमें से मुख्य निम्नलिखित प्रकार हैं –
1. क्या खरीदें – उचित स्तर की वस्तुओं को खरीदने के लिए सबसे पहले यह निर्णय लेना पड़ता है कि क्या खरीदा जाए। उपभोक्ता को सर्वप्रथम यह देखना चाहिए कि, क्या खरीदी जाने वाली वस्तु की वास्तविक रूप से ज़रूरत है अथवा नहीं। अपने पारिवारिक बजट तथा पारिवारिक मापदण्ड, मूल्यों तथा लक्ष्यों के आधार पर गृहिणी तथा अन्य सदस्यों को भी यह देखना चाहिए कि आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए क्या खरीदना है।

2. कहाँ से खरीदें – “क्या खरीदा जाए” इस बात का निश्चय कर लेने के बाद उपभोक्ता को यह निश्चित करना पड़ता है कि वस्तुएँ कहाँ से खरीदी जाएँ। इसके लिए यह समाचार-पत्र, पत्रिकाएँ, रेडियो, टेलीविज़न आदि पर आने वाले विज्ञापनों से भी जानकारी प्राप्त कर सकता है। वस्तुओं की खरीददारी करने से पहले उसे विभिन्न बाजारों तथा दुकानों का ज्ञान होना आवश्यक है, क्योंकि प्रायः किसी एक विशेष प्रकार की अच्छी किस्म की वस्तु कम मूल्यों पर किसी विशेष बाज़ार में ही मिलती है, जैसे फर्नीचर की कोई भी वस्तु हमें लकड़ी या फर्नीचर के थोक-बाज़ार में ही बढ़िया व सस्ती मिल सकती है।

किस बाजार से खरीदनी है इस बात को निश्चित कर लेने के बाद उपभोक्ता को इस बात का निर्णय करना चाहिए कि किस दुकान से सामान खरीदा जाए। कई बार यह देखा गया है कि एक ही बाज़ार में विभिन्न दुकानों में एक ही प्रकार की वस्तु के लिए अलग-अलग दाम होते हैं। कई बार दुकानदार उपभोक्ताओं को कई एक अतिरिक्त सुविधाएँ या उपहार भी देते हैं। जैसे-खरीदी गई वस्तुओं को घर पर मुफ्त पहुंचाने की ज़िम्मेदारी या फिर दुकान से मुफ्त टेलीफोन करने की सुविधा या छोटे-मोटे उपहार आदि।

कई बार दुकानों को इस आकर्षक ढंग से सजाया जाता है ताकि उपभोक्ता खुद इसकी सजावट को देखकर दुकान की ओर खिंचा चला आए। परन्तु ऐसी दुकानों के भाव अन्य दुकानों के भाव से अधिक होंगे। क्योंकि इन सब सुविधाओं आदि का खर्चा निकालने के लिए वस्तुओं आदि का भाव बढ़ा दिया जाता है अथवा वस्तु का स्तर कुछ गिरा दिया जाता है। अत: वस्तुएँ खरीदने से पहले दो या तीन दुकानों से वस्तुएँ तथा उनके भाव देखकर ही निश्चय करना चाहिए।

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3. कब खरीदें – वस्तुओं को कब खरीदा जाए, यह निर्भर करता है उसकी प्रकृति पर। कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो केवल किसी मौसम में ही उपलब्ध होती हैं। उदाहरणार्थ विभिन्न प्रकार की सब्जियाँ तथा फल इत्यादि। ये वस्तुएँ मौसम में न केवल उपलब्ध ही होती हैं, अपितु सस्ती तथा उत्तम किस्म की भी होती हैं। इन वस्तुओं को मौसम में ही खरीदना चाहिए। इसके विपरीत कुछ अन्य वस्तुओं, जैसे कि पंखे, कूलर, रेफ्रीजरेटर, हीटर, गीजर इत्यादि की आवश्यकता विशेष मौसम में होने के कारण ये अपने मौसम में महँगी होती हैं। अतः जहाँ तक इस प्रकार की वस्तुओं को मौसम से पहले या मौसम के बाद अर्थात् ऑफ़ सीजन (Off Season) में ही खरीदना चाहिए जिससे उचित डिस्काउन्ट (Discount) मिल सके तथा वस्तु की कीमत कम देनी पड़े।

4. कितना खरीदें – गृहिणी को परिवार के सभी सदस्यों की आवश्यकताओं के आधार पर यह निश्चय कर लेना चाहिए कि वस्तु कितनी मात्रा में खरीदी जानी है। चूंकि प्रत्येक परिवार में साधन सीमित होते हैं अतः साधनों को ध्यान में रखकर ही वस्तु खरीदनी चाहिए, अन्यथा वस्तु उत्तम स्तर की नहीं खरीदी जा सकती तथा आवश्यकता की कोई एक-दो वस्तु अवश्य ही छूट जाती है। इसके अतिरिक्त अगर वस्तुएं इकट्ठी अधिक मात्रा में खरीदी जाती हैं तो सस्ती पड़ती हैं। ऐसा विशेषकर संयुक्त परिवार या ऐसे परिवार जिसमें सदस्यों की संख्या अधिक होते ही किया जाता है। इकट्ठी वस्तुएँ खरीदना बहुत लाभकारी रहता है, परन्तु ऐसा करते समय ध्यान रखें कि परिवार की आवश्यकता से अधिक मात्रा में वस्तुएँ न खरीदी जाएँ क्योंकि ऐसे में व्यर्थ ही धन की हानि होगी और वस्तु भी व्यर्थ जाएगी।

5. कितना व्यय करें – वस्तुओं की कीमत उसकी किस्मत, स्तर, मौसम तथा दुकान पर बहुत निर्भर करती है। उपभोक्ता को वस्तुओं की कीमत का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए। व्यय सदा बजट के अनुसार ही किया जाना चाहिए। यह उपभोक्ता की सामर्थ्य तथा आवश्यकता पर निर्भर करता है कि वह किस वस्तु के लिए कितना व्यय करना चाहता है। यह कुछ हद तक उसकी रहन-सहन के स्तर पर ही निर्भर करता है।

इस प्रकार उपभोक्ता, विशेषकर गृहिणी को खरीददारी करने से पहले इस बात का ज्ञान होना चाहिए कि उसे कौन-सी किस्म की वस्तुएँ कब और कहाँ से खरीदनी हैं। उसे उस दुकानदार से ही वस्तु खरीदनी चाहिए जिस पर उसे पूर्ण विश्वास हो तथा जो वस्तु की अच्छी किस्म की पूरी ज़िम्मेदारी ले। गृहिणी को चाहिए कि वह इस बात की ओर पूर्णतः सावधान रहे कि दुकानदार उसे किसी भी प्रकार का धोखा न दें। एक अच्छे उपभोक्ता को बाजार में बिकने वाली वस्तुओं का पूरी तरह से ज्ञान होना चाहिए।

अक्सर कई बार यह देखा गया है कि विक्रेता, उपभोक्ता को धोखा देने की कोशिश करते हैं, विशेषकर जब उपभोक्ता को सही ज्ञान न हो। उचित खरीद के लिए उपभोक्ता को विभिन्न वस्तुओं की किस्मों तथा उनके दामों के बारे में पूरी जानकारी होनी चाहिए। विक्रेता की धोखाधड़ी से बचने के लिए तथा विक्रेता को किसी भी प्रकार का गलत काम करने से रोकने में उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा योगदान है। जिसे हर उपभोक्ता को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हुए पूर्ण रूप से निभाना चाहिए।

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प्रश्न 2.
उत्पादनकर्ता या विक्रेता उपभोक्ताओं को किस प्रकार धोखा देने की कोशिश करते हैं ? उनसे बचने के लिए उपभोक्ताओं को क्या-क्या कदम उठाने चाहिएं ?
उत्तर :
प्राय: यह देखने में आता है कि अधिकतर उपभोक्ता बाजार से पूरी तरह वाकिफ नहीं होता। उसे विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की किस्म के अनुसार दाम का सही ज्ञान नहीं होता। उपभोक्ता की इस कमज़ोरी का फायदा दुकानदार या विक्रेता उठा लेते हैं और वे कई तरीकों से उपभोक्ता को धोखा देने की कोशिश करते हैं। अधिक मुनाफा कमाने के लिए विक्रेता अक्सर कई गलत चालों का सहारा लेते हैं। जैसे ही उनको पता चलता है कि उनकी किसी भी वस्तु की माँग बहुत अधिक बढ़ गई है और वस्तु बाज़ार में अधिक उपलब्ध नहीं है तो वह अपनी वस्तु का दाम बढ़ा देते हैं। ऐसा भी देखने में आता है कि विक्रेता अपनी वस्तुओं के महत्त्व को बढ़ाने के लिए उसकी कृत्रिम कमी भी उत्पन्न कर देते हैं और इस प्रकार विक्रेताओं को अधिक-से-अधिक लाभ कमाने का मौका मिल जाता है। इसके अतिरिक्त विक्रेता उपभोक्ता को धोखा देने के लिए कई नए-नए ढंग भी अपनाने लगे हैं जिनकी चर्चा नीचे की जा रही है।

1. वस्तुओं में मिलावट करके – बाज़ार में बेचे जाने वाले कई खाद्य पदार्थों में अक्सर मिलावट की जाती है। अक्सर यह मिलावट जान-बूझकर की जाती है। कई खाद्य-पदार्थों के रंग-रूप को बढ़ाने के लिए कई घटिया किस्म के कृत्रिम रंग मिला दिये जाते हैं जो कि मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध होते हैं। खाद्य-पदार्थों में मिलावट दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिसका मुख्य कारण है-वस्तुओं की कम उपलब्धि और दिन-प्रतिदिन होने वाली कीमतों में बढ़ोतरी ।

इस प्रकार की धोखाधड़ी को रोकने के लिए भारत सरकार ने 1954 में खाद्य-पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए एक कानून-पी० एफ० ए० (Prevention of Food Adulteration Act, PFA) बनाया जिसे 1955 में लागू किया गया। इस कानून के अन्तर्गत बाज़ार में बिकने वाले प्रायः सभी खाद्य-पदार्थों के लिए न्यूनतम मान्य मापदण्ड दिए गए हैं जिन्हें अपनाना आवश्यक है। यदि कोई खाद्य-पदार्थ इन मापदण्डों को पूरा नहीं कर पाता तो उसे मिलावटी खाद्य-पदार्थ कहा जाता है।

इस मिलावट को रोकने के लिए उपभोक्ता महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर सकते हैं। उन्हें चाहिए कि जैसे ही उन्हें मालूम हो कि किसी खाद्य-पदार्थ में मिलावट है तो तुरन्त इसकी सूचना सम्बन्धित अधिकारियों को दी जाए। इसके अतिरिक्त उपभोक्ता को चाहिए कि वे खुली वस्तुएँ नहीं खरीदें क्योंकि इनमें मिलावट की ज्यादा सम्भावना होती है। मान्यता प्राप्त खाद्य-पदार्थ ही खरीदने चाहिए जैसा कि आई० एस० आई० (ISI), एगमार्क (Agmark) या एफ० पी० ओ० (F. P. O.) मार्क वाले पदार्थ।

सामान्यतः उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं में खाद्य-पदार्थ ही अक्सर मिलावट के शिकार होते हैं। फिर भी कुछ दूसरी वस्तुएँ इससे वंचित नहीं रह पातीं, जैसे टेरीकाट या टैरीवूल कपड़े। यदि इन पर अच्छी ‘मिल’ का पूरी जानकारी देने वाला मार्क न हो, तो विक्रेता कपडे में टेरीलीन तथा ‘काटन’ या ‘वल’ की % मात्रा गलत बताकर उपभोक्ता को आसानी से धोखा दे सकता है। इसी प्रकार मकान बनाते समय प्रयोग में लाए जाने वाले सीमेंट में विक्रेता अक्सर रेत मिलाकर उपभोक्ता को धोखा देने की कोशिश करता है।

अतः प्रयोग में लाई जाने वाली सभी प्रकार की वस्तुओं में की जाने वाली मिलावटों से बचने के लिए उपभोक्ताओं को चाहिए कि वस्तुएँ सदा विश्वसनीय से ही खरीदें। साथ ही यह देख लें कि उन पर सही मार्का हो और जहाँ तक हो सके मान्यता प्राप्त वस्तुएँ जैसे आई० एस० आई० मार्क वाली ही खरीदें। आई० एस० आई० मार्क न केवल खाद्य-पदार्थों पर ही लगाए जाते हैं अपितु आजकल प्रयोग में लाई जाने वाली लगभग हर वस्तुओं पर लगाए जाते हैं।

आई० एस० आई० मार्क लगे होने पर, यह न केवल वस्तु की उत्तम किस्म को ही प्रदर्शित करता है परन्तु साथ ही उपभोक्ताओं को वस्तुओं के चयन में सहायता करता है और उन्हें इस बात की भी सन्तुष्टि देता है कि उन्होंने अपने पैसे का सही उपयोग किया है। आई० एस० आई० मार्क लगी वस्तुओं के कुछ उदाहरण हैं-बिजली के उपकरणों, जैसे – मिक्सी, फ्रिज, गीजर, पंखा, प्रैस, बल्ब, ट्यूब तथा बिजली की तारें आदि। इसी प्रकार रसोई घर के कुछ उपकरणों; जैसे-तेल, स्टोव, गैस का चूल्हा, कुकिंग-रेंज, गैस का सिलेण्डर, प्रेशर कुकर आदि पर आई० एस० आई० मार्क होता है जो इनकी उत्तम किस्म को तो दर्शाता ही है साथ ही इन्हें प्रयोग करते समय गृहिणी अपने आपको सुरक्षित भी महसूस करती है। इनके अतिरिक्त प्रयोग में लाई जाने वाली अन्य बहुत-सी वस्तुएँ, जैसे-रंग-रोगन, स्याही, गोंद, ब्लेड, हैलमेट इत्यादि पर भी आई० एस० आई० का मार्क होता है।

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2. अपर्याप्त लेबल-लेबल एक ऐसा साधन है जिसके द्वारा उपभोक्ता को उस पदार्थ के बारे में जानकारी दी जाती है। लेबल से हमें निम्नलिखित बातें पता चलती हैं – (i) पदार्थ क्या हैं, (ii) पदार्थ बनने की तारीख, (iii) पदार्थ का भार, (iv) उत्पादनकर्ता का पता तथा (v) पदार्थ का मूल्य। लेबल पर दी गई जानकारी के द्वारा उपभोक्ता अपनी आवश्यकतानुसार वस्तु को खरीद सकता है। परन्तु ऐसा भी देखा गया है कि व्यापारी अपूर्ण लेबल लगाकर उपभोक्ताओं को धोखा देने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार उपभोक्ताओं को भारतीय मानक संस्थान द्वारा निर्धारित अच्छे लेबल के गुणों का ज्ञान होना आवश्यक है जिसमें पूर्ण जानकारी वाला लेबल न होने पर किसी पदार्थ को झूठे मार्का वाला समझा जाएगा। उपभोक्ता को अपूर्ण लेबल बाली वस्तुओं को नहीं खरीदना चाहिए। उसको चाहिए कि वह मान्यता प्राप्त पदार्थ की खरीदे जो कि अच्छी किस्म के होते हैं।

3. त्रुटिपूर्ण माप और तोल के साधन – सन् 1956 ई० में मानक माप व तोल अधिनियम पास किया गया था। इस अधिनियम के अन्तर्गत मानक माप व तोल के साधनों की आवश्यकता और इनके बारे में पूर्ण जानकारी दी गई है। इसके साथ ही उनके डिज़ाइन और आधारित पदार्थ के बारे में आवश्यक निर्देश दिए गए हैं। कई बार ऐसा देखने में आता है कि विक्रेता अक्सर पदार्थों को तोलने के लिए मानक बाटों (Weights) का प्रयोग नहीं करते अपितु कोई ईंट-पत्थर आदि को बाटों के स्थान पर इस्तेमाल कर लेते हैं, जिसके फलस्वरूप वे आसानी से तोल में हेरा-फेरी कर लेते हैं। विक्रेता कई बार खाद्य-पदार्थों को उनके डिब्बे सहित तोल देते हैं तथा तराजू के पलड़ों को बराबर किए बिना ही पदार्थों को तोल कर उपभोक्ता को कम वस्तु दे देते हैं। कुछ विक्रेता मान्यता प्राप्त तराजू का प्रयोग न करके भी उपभोक्ताओं को छलने की कोशिश करते हैं। विशेषकर हाथ से पकड़कर तोलने वाले तराजू से तो वे तोल में हेरा-फेरी करते हैं।

इन दोषयुक्त तोल व माप के साधनों के प्रयोग को रोकने के लिए उपभोक्ताओं को निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए –

(i) उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे हाथ वाले तराजू के प्रयोग को बढ़ावा न दें।
(ii) वस्तुओं को तोलने से पहले तराजू की जाँच कर लेनी चाहिए। हाथ की तराजू में डण्डी देख लेना चाहिए। पैमाने वाले तराजू में भी यह देख लेना चाहिए कि उसकी सूई शून्य पर है या नहीं। इस प्रकार अगर तराजू में कोई त्रुटि हो तो उसे विक्रेता से सूचित करते हुए उस त्रुटि को दूर करवा लेना चाहिए।
(iii) बाटों तथा मापक का भली प्रकार निरीक्षण कर लेना चाहिए जिससे इस बात का पता लग जाता है कि प्रयोग में लाए जा रहे माप व तोल के साधन मानक अधिनियम के अनुसार हैं या नहीं।
(iv) डिब्बों या शीशियों में पैक किए गए पदार्थ खरीदने से पहले उनके लेबल पर दिए गए भार या मात्रा का भली-भाँति निरीक्षण कर लेना चाहिए।
(v) उपभोक्ता को गलियों में घूमने वाले या फेरी वालों से सामान खरीदते समय अत्यधिक सावधान रहना चाहिए क्योंकि उनके वाट अक्सर मानक अधिनियम के अनुसार नहीं होते।
(vi) किसी भी विक्रेता द्वारा यदि कम तोलने या मापने का भ्रम हो, तो शीघ्र ही माप व तोल कार्यालय को सूचित करना चाहिए।
अगर उपभोक्ता ऊपर दी गई इन बातों का ध्यान रखेंगे तो वह हर प्रकार की धोखा धड़ी को रोकने में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रदान कर सकते हैं। उन्हें ऐसा करने में अपने ऊपर किसी प्रकार का बोझ न समझकर इसे अपना कर्त्तव्य समझना चाहिए।

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4. असत्य विज्ञापनों द्वारा – आज के युग में एक ही प्रकार की वस्तु विभिन्न उत्पादकों द्वारा बनाई जाने लगी है और बाज़ार में कई नई-नई वस्तुएँ आने लगी हैं। अत: उत्पादनकर्ता अपने पदार्थों की बिक्री बढ़ाने के लिए कई प्रकार के विज्ञापनों का सहारा लेते हैं। इन विज्ञापनों का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं को उनके पदार्थों की सूचना देना, उन पदार्थों की विशेषताएँ बताना तथा उन पदार्थों की बिक्री बढ़ाना है।

इस प्रकार के विज्ञापन देने के लिए उत्पादनकर्ता या विक्रेता कई माध्यमों का प्रयोग करते हैं। जैसे-अखबार, पत्रिकाएँ, पोस्टर, रेडियो, टेलीविज़न, सिनेमा रील, सिनेमा स्लाइड्स आदि। विज्ञापनों पर उत्पादनकर्ता को काफ़ी खर्च करना पड़ता है। अतः इन विज्ञापनों पर किए गए खर्चों को निकालने के लिए उत्पादनकर्ता को अपनी वस्तुओं के दाम बढ़ाने पड़ते हैं। इस प्रकार यह कहना उचित नहीं होगा कि विज्ञापनों पर हुए खर्च का भार भी उपभोक्ताओं पर ही पड़ता है।

अक्सर देखा गया है कि विज्ञापनों में उत्पादनकर्ता अपनी वस्तुओं की विशेषताओं को काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर देते हैं जिससे अधिक उपभोक्ता उनकी वस्तुओं की ओर आकर्षित होकर उनका प्रयोग करना शुरू कर दें। इस प्रकार के असत्य विज्ञापन उपभोक्ताओं को पदार्थ के बारे में सही जानकारी न देकर उन्हें धोखे में रखते हैं और ऐसे में एक सामान्य उपभोक्ता के लिए पदार्थों की खरीद के बारे में निर्णय लेना काफ़ी कठिन हो जाता है। उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे वस्तुओं को खरीदते समय विज्ञापनों की सहायता तो अवश्य लें परन्तु केवल विज्ञापन के आधार पर ही वस्तुओं के खरीद का निर्णय कर लें। यदि उपभोक्ता केवल विज्ञापनों से आकर्षित होकर कोई भी ऐसी वस्तु खरीदता है जोकि उसके प्रयोग में न आ सके तो ऐसे में वह अपने धन को बेकार ही गँवाता है।

5. घटिया किस्म की वस्तुओं की बिक्री – विक्रेता कई बार बिना बताए ही उपभोक्ताओं को अच्छी वस्तुओं के स्थान पर घटिया किस्म की वस्तुएँ बेचकर उन्हें धोखा देने की कोशिश करते हैं। जैसे – मिलों द्वारा घोषित घटिया किस्म के कपड़े को अच्छी किस्म के कपड़े के स्थान पर बेचना, फर्नीचर की भीतरी सतहों पर घटिया किस्म की लकड़ी लगाना, लोहे की अलमारी या दूसरे फर्नीचर बनाने में घटिया किस्म की चादर का प्रयोग करके ऊपर से अच्छा रंग-रोगन आदि करके उन्हें महँगे दामों पर बेचना आदि। इस प्रकार की धोखाधड़ी से बचने के लिए उपभोक्ताओं को चाहिए कि वह सदा विश्वसनीय दुकानों से ही वस्तुएँ खरीदें।

6. नकली वस्तुओं की बिक्री – सौन्दर्य प्रसाधनों के असली पैकिंग में नकली चीजें भरकर बेचना तो इस प्रकार एक आम उदाहरण है जैसे-पाउडर, शैम्पू, क्रीम, लिपिस्टिक, सैंट इत्यादि। ऐसी नकली वस्तुओं की बिक्री को रोकने के लिए उपभोक्ताओं को चाहिए कि वे नकली वस्तुओं के उत्पादन को प्रोत्साहित न करें। अक्सर नकली और असली वस्तुओं के बीच जाँच करना भी काफ़ी कठिन हो जाता है। अत: उपभोक्ताओं को सदा विश्वसनीय दुकानों से ही वस्तुएँ खरीदनी चाहिए। इस प्रकार विक्रेताओं द्वारा की जाने वाली सब प्रकार की धोखाधड़ी को अगर उपभोक्ता चाहें तो रोकने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

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प्रश्न 2.
(A) विक्रेता उपभोक्ता को किस प्रकार धोखा देने की कोशिश करते –
(B) दोषयुक्त तोल व माप के साधनों के प्रयोग को रोकने के लिए उपभोक्ता को चाहिए कि वह किन चीज़ों के प्रयोग को बढ़ावा दें ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 2 का उत्तर।

प्रश्न 3.
उपभोक्ता को सूचना देने वाले नाम-पत्र या लेबल कितने प्रकार के होते हैं ? प्रत्येक प्रकार के बारे में महत्त्वपूर्ण बातें बताइए।
उत्तर :
उपभोक्ता को सूचना देने के लिए पदार्थों पर चिपकाए गए लेबल (Labels) को मोटे तौर पर चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। ये निम्नलिखित हैं
1. पदार्थों की विशेषताओं का परिचय देने वाले लेबल (Informative Labelling)-इस प्रकार के लेबल का उद्देश्य उपभोक्ताओं को यह सूचना देना है कि निर्मित पदार्थ को तैयार करने में कौन-कौन सी वस्तुएँ इस्तेमाल में लाई गई हैं। कच्चे पदार्थ (Raw Material), संरक्षणीय पदार्थ (Preservatives), रंग (Colours), पदार्थ के स्वाद को बढ़ाने वाले एसेंस (Essence), एकस्ट्रेक्ट (Extract), भण्डारण की विधि, प्रयोग विधि आदि सूचनाएँ देकर निर्माता अपनी ईमानदारी जतलाता हुआ उपभोक्ता का पूरा विश्वास अर्जित कर लेना चाहता है। वह जानता है कि यदि वह उपभोक्ता का विश्वास अर्जित कर लेगा तो उपभोक्ता उसके माल को हमेशा खरीदता रहेगा। वह दूसरों से भी उसके माल की तारीफ करेगा और वही माल खरीदने के लिए प्रेरित करेगा। ऐसा करने से उसके माल की बिक्री बढ़ेगी और बिक्री बढ़ने से साख बढ़ेगी एवं अधिक लाभ होगा।

2. ब्रांड की सूचना देने वाले लेबल (Brand Labelling) – प्रत्येक निर्माता एवं उत्पादक अपने पदार्थों को एक खास नाम से प्रचारित करता है। जैसे-ब्रुक ब्राण्ड चाय (Brook Bond Tea), डालडा घी, पोस्टमैन तेल, लिज्जत पापड़, विमल सूटिंग, हाकिंस प्रेशर कुकर, केलवीनेटर फ्रिज, ई० सी०, टेलीविज़न, फिलिप्स रेडियो, एवन साइकिल आदि। उत्पादक या निर्माता द्वारा अपने यहाँ उत्पादित या निर्मित होने वाले पदार्थों को कोई नाम दे देने से विज्ञापन में सुविधा रहती है। उपभोक्ता भी दुकानदार से उत्पादक, निर्माता द्वारा प्रचारित नाम की वस्तु माँग करके किसी वस्तु की गुणवत्ता सम्बन्धी अपनी पसन्द को व्यक्त करता है।

3. ट्रेड मार्क की सूचना देने वाले लेबल (Trade Mark Labelling) – वस्तु उत्पादक अथवा निर्माता अपने माल को दूसरे उत्पादकों अथवा कम्पनियों से पृथक् करने के लिए जहाँ एक ओर ब्राण्ड का सहारा लेता है वहीं दूसरी ओर वह ट्रेड-मार्क का भी आश्रय लेता है। ट्रेड-मार्क के रूप में किसी शब्द का इस्तेमाल भी किया जा सकता है और किसी चित्र, प्रतीक आदि का भी। उदाहरण के लिए दिल्ली क्लाथ मिल ने वानस्पतिक घी के लिए जहाँ ब्राण्ड के रूप में ‘रथ’ नाम का इस्तेमाल किया है वहाँ रथ का चित्र एक ट्रेड मार्क के रूप में प्रयुक्त हुआ है।

4. गुणवत्ता की श्रेणी की सूचना देने वाले लेबल (Grade Labelling) – इस वर्ग के अन्तर्गत वे लेबल आते हैं जिन पर यह सूचना छपी होती है कि वह पदार्थ गुणवत्ता की दृष्टि से किस स्तर का है। इसका उद्देश्य यह बताना होता है कि उपभोग की दृष्टि से किस पदार्थ की गुणवत्ता को सर्वोत्तम, उत्तम, अच्छा, सामान्य आदि कई वर्गों में बाँटा जा सकता है। हमारे देश में इस प्रकार के लेबल का कोई विशेष चलन नहीं है। केवल एगमार्क मानक ही खाद्य-पदार्थों को उनके रंग, रूप, भार, संरचना आदि के आधार पर पर चार वर्गों यथा अति उत्तम, अच्छा एवं सामान्य में बाँटकर 1,2,3,4 अंकों से स्थिति को सूचित करता है।

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प्रश्न 4.
एक अच्छे उपभोक्ता में कौन-कौन से गुण होने चाहिए ?
अथवा
विभिन्न वस्तुओं के चयन के समय क्या-क्या सावधानी बरतनी चाहिए ?
अथवा
एक अच्छे उपभोक्ता के कोई भी तीन गुण बताएँ।
उत्तर :
विभिन्न वस्तुओं के चयन के समय उपभोक्ता को निम्नलिखित सावधानियाँ बरतनी चाहिए –
1. विज्ञापनों के प्रभाव में न आना – आज का युग विज्ञापन का युग है। विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के निर्माता पत्र-पत्रिकाओं, दूरदर्शन (T.V.) रेडियो, पोस्टर आदि के माध्यम से अपनी वस्तु का भरपूर प्रचार करते हैं और अपनी वस्तु को सर्वश्रेष्ठ होने का दावा करते हैं। लेकिन बुद्धिमान उपभोक्ता को विज्ञापनों में दिए गए इस प्रकार के दावों से प्रभावित नहीं होना चाहिए। उसे अपनी सूझ-बूझ से काम लेना चाहिए और अच्छी कम्पनी की अच्छी वस्तु ही खरीदनी चाहिए।

2. खरीदी गई वस्त के लेबल को ध्यान से पढना बहत – से वस्त निर्माता किसी लोकप्रिय ब्रांड के नाम से मिलता-जुलता नाम रखकर ग्राहकों को गुमराह करने का प्रयत्न करते हैं। उदाहरण के लिए बॉम्बे डाइंग की चादरें कम्पनी से बनी बनाई आती हैं, जबकि बहुत-से दुकानदार उस पर बॉम्बे डाइंग के कपड़े से निर्मित (Made from Bombay Dyeing Cloth) की मोहर लगाकर बॉम्बे डाइंग के नाम से ही बेच देते हैं। विम, सर्फ, फिनायल, साबुन आदि बहुत-सी ऐसी घरेलू वस्तुएँ हैं जिनके लोकप्रिय ब्रांडों के नामों से मिलते-जुलते नाम रख देने से उपभोक्ता को धोखा हो जाता है। अतएव यह ज़रूरी है कि जो भी वस्तु खरीदी जाए उसके लेबल को ध्यान से पढ़ लिया जाये। जब दुकानदार को यह पता चल जाता है कि आप हर वस्तु देखभाल कर खरीदती हैं तब वह मिलते-जुलते नामों वाली वस्तुएं देकर ठगने का प्रयत्न नहीं करता।

3. जल्दबाजी में न खरीदना – जब दुकानदार को यह पता होता है कि आप जल्दी में हैं तो वह उसका अनुचित लाभ उठाने की कोशिश करने से नहीं चूकता। ऐसी स्थिति में वह उपभोक्ता को घटिया माल दे देता है। कभी-कभी तोल में हेरा-फेरी कर देता है या पैसों के हिसाब में गड़बड़ी कर देता है।

4. दिन में खरीदना – बहुत सी वस्तुएँ ऐसी होती हैं जिनके दोष रात को ठीक तरह से दिखाई नहीं देते। उदाहरण के लिए कपड़ों के रंग आदि की जाँच रात को ठीक तरह से नहीं हो पाती। अतएव ऐसी वस्तुएँ हमेशा दिन में ही खरीदनी चाहिए।

5. खरीदी जाने वाली वस्तुओं की सूची बनाना – खरीददारी के लिए बाजार में जाने से पहले उन सब वस्तुओं की सूची बना लेनी चाहिए जो आप खरीदना चाहती हैं। सूची बनाते समय यह भी लिख लेना चाहिए कि उसकी कितनी मात्रा चाहिए। इससे यह लाभ होता है कि कोई ज़रूरी चीज़ खरीदने से छूटती नहीं है तथा कोई भी वस्तु अधिक नहीं खरीदी जाती।

6. आई० एस० आई० अथवा एगमार्क वाली वस्तुएँ खरीदना – भारतीय मानक संस्थान (ISI) बहुत-से वस्तुओं के गुण, स्तर आदि की जाँच अपनी मोहर लगाती है। इसी प्रकार खाद्य सामग्रियों पर एगमार्ग की मोहर उनकी उत्तमता की प्रतीक होती है। अतएव जहाँ तक सम्भव हो सके वहाँ तक आई० एस० आई० अथवा एगमार्क की मोहर वाले खाद्य-पदार्थ खरीदने चाहिए।

7. दुकानदार से सामान तौलवाते समय सावधान रहना – बहुत-से दुकानदार तोल में हेरा-फेरी करके भी उपभोक्ताओं को ठगते हैं। इसके लिए वे विभिन्न प्रकार के तरीके काम में लाते हैं। घिसे हुए बाटों को प्रयोग, लिफाफे अथवा डिब्बे समेत वस्तुएँ तोलता आदि कुछ बहुप्रचलित विधियाँ हैं। अतएव प्रबुद्ध उपभोक्ता को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि दुकानदार कोई वस्तु तौलते समय इस प्रकार की कोई बेईमानी न करने पाए।

प्रत्येक नागरिक का यह महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य है कि वह दुकानदारों द्वारा की जाने वाली बेइमानी से उपभोक्ताओं की रक्षा करने में सरकार की सहायता करे। खाद्य-पदार्थ में मिलावट का पता लगाने पर खाद्य एवं स्वास्थ्य निरीक्षक को इसकी शिकायत करनी चाहिए। PFA 1954 ऐसा ही कानून है जिसके अन्तर्गत मिलावट करना अपराध माना गया है।

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प्रश्न 5.
PFA क्या है ? इसका संशोधन किन-किन वर्षों में किया गया ? अन्तिम संशोधन में कौन-कौन सी नई व्यवस्थाएँ जोड़ी गई हैं ?
उत्तर :
PFA का पूरा नाम है Prevention of Food Adulteration Act अर्थात् खाद्य अपमिश्रण (मिलावट) निवारण अधिनियम। भारत सरकार ने सन् 1954 में कोडेक्स ऐलिमेण्टेरियस कमीशन (Codex Alimentarius Commission) द्वारा विभिन्न खाद्य-पदार्थों के लिए निर्धारित गुण सम्बन्धी मानकों तथा नियमों को अपने देश की जलवायु एवं परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित करते हुए खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम (Prevention of Food Adulteration Act-PFA) बनाया। यह अधिनियम पहली जून, 1955 से जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर सारे देश में लागू किया गया। सन् 1968, 1973 तथा 1979 में इस अधिनियम में संशोधन किए गए।

इस अधिनियम के अन्तर्गत वैज्ञानिकों, रसायन-विश्लेषकों, चिकित्सकों, पोषण-विशेषज्ञों तथा व्यावसायिकों के प्रतिनिधियों की समिति ने बाजार में बिकने वाले सभी खाद्य-पदार्थों के गुण सम्बन्धी न्यूनतम मानक निर्धारित किए हैं। आहारीय मानकों की केन्द्रीय समिति (Central Committee for Food Standards-CCFS) द्वारा इन मानकों में समय-समय पर आवश्यकतानुसार सुधार लाया जाता है। बाजार में बिकने वाले सभी खाद्य-पदार्थों को इन मानकों के अनुरूप होना आवश्यक है। इस अधिनियम के अनुसार किसी एक ब्रांड के खाद्य-पदार्थों से मिलते-जुलते ब्रांड वाले खाद्य-पतार्थों को आयात करना, रखना एवं बेचना प्रतिबन्धित है।

कतिपय रंगों, रासायनिक संरक्षणीय पदार्थों, कृत्रिम मिठासयुक्त पदार्थों यथा सेकीन का प्रयोग प्रतिबन्धित है तथा जिन रंगों एवं संरक्षणीय पदार्थों के प्रयोग की अनुज्ञा प्राप्त है, वे भी केवल निर्धारित मात्रा के अनुसार ही इस्तेमाल किए जा सकते हैं। इसी प्रकार से केसरी दाल (Keshri Dal) तथा अपने आप मर जाने वाले पशुओं एवं पक्षियों के मांस की बिक्री भी प्रतिबन्धित है। यदि कोई विक्रेता निर्धारित मानकों एवं नियमों के अनुसार खाद्य-पदार्थ नहीं बेचता है तो उसे सजा दी जाती है। सन् 1979 में संशोधित हुए इस अधिनियम के अनुसार इस अधिनियम का पालन न करने वाले विक्रेता को 3 मास से 6 वर्ष तक का कारावास और ₹ 500 से ₹ 2000 तक जुर्माना किया जा सकता है।

किसी विक्रेता को कितना दण्ड दिया जाए यह उस विक्रेता द्वारा किए गए अपराध की गम्भीरता पर निर्भर करता है। यदि कोई विक्रेता ऐसा अपराध करता हुआ पकड़ा जाता है तो उसे पहले से भी कड़ी सजा दी जाती है। उसका लाइसेंस जब्त किया जा सकता है। उसके अपराध का विवरण देते हुए उसका नाम एवं पता स्थानीय अखबारों में मुद्रित कराया जा सकता है और इस कार्य पर हुआ व्यय विक्रेता को ही उठाना पड़ता है। यदि किसी विक्रेता द्वारा बेचे गए खाद्य-पदार्थ मानक स्तर एवं नियमों के अनुकूल न होने के कारण किसी उपभोक्ता का जीवन संकट में पड़ जाता है अथवा उसकी मृत्यु हो जाती है तो विक्रेता को आजीवन कारावास की सज़ा भी दी जा सकती है।

बाज़ार में बेचे जाने वाले खाद्य – पदार्थ के गुण निर्धारित मानक के अनुरूप हों इसकी व्यवस्था के लिए पी० एफ० ए० (PFA) के अतिरिक्त फूड प्रोडक्ट आर्डर (FPO) के माध्यम से एक अन्य व्यवस्था भी की गई है।

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प्रश्न 6.
खाद्य अपमिश्रण निवारण नियम क्या है ? यह कब बना ? इस नियम के अनुसार किन स्थितियों में भोज्य-पदार्थों को मिलावटी या अपमिश्रित कहा जाता है ?
अथवा
उपभोक्ता मिलावट निवारण नियम कब बना ? इस नियम के अनुसार भोज्य पदार्थों को किन स्थितियों में मिलावटी कहा जाता है ?
उत्तर :
उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की दशा के लिए भारत सरकार ने खाद्य मिलावट निवारण नियम (Prevention of Food Adulteration Act-PFA) 1954 ई० में बनाया।
इस अधिनियम के अन्तर्गत दण्ड का प्रावधान है। अधिनियम 1976 के संशोधन के अनुसार दोषी पाए जाने पर कम-से-कम 6 माह का सश्रम कारावास तथा एक हजार रुपए का जुर्माना है, यदि मिलावट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक न हो। मिलावट स्वास्थ्य के लिए हानिकारक प्रमाणित हो तो 6 वर्ष सश्रम कारावास के अलावा ₹ 2000 (दो हज़ार रुपए) तक जुर्माना हो सकता है। यदि किसी खाद्य-पदार्थ के उपयोग से किसी की मृत्यु हो जाने की सम्भावना हो या शरीर में ऐसी हानि हो जाए जिससे खतरनाक आघात लग जाए तो दण्ड आजन्म कारावास और कम-से-कम ₹ 5000 (पाँच हजार रुपए) का जुर्माना होगा।
इस नियम के अनुसार निम्नलिखित स्थितियों में भोज्य पदार्थों को मिलावटी कहा जाता है –

  1. जब भोज्य-पदार्थ अपने वास्तविक रंग-रूप वाले नहीं रहते हैं।
  2. जब भोज्य-पदार्थ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्त्वों से युक्त हों।
  3. जब भोज्य-पदार्थ से उसके कुछ भोज्य तत्त्व निकाल दिए जाते हों, जैसे-दूध में से क्रीम।
  4. जब भोज्य-पदार्थों में घटिया या कम दाम वाले पदार्थ मिला दिए जाते हों, जैसे-देसी घी में वनस्पति घी।
  5. जब भोज्य-पदार्थों में हानिकारक विषैले तत्त्व मिला दिए जाते हों, जैसे-पीसी हुई हल्दी में लेड क्रोमेट।
  6. जब भोज्य-पदार्थों को ऐसे धातु के बर्तन में रखा जाता है जिसके सम्पर्क से भोज्य-पदार्थ दूषित हो जाते हों।
  7. जब भोज्य-पदार्थ रोगी पशु या पक्षी द्वारा प्राप्त होते हैं।
  8. जब भोज्य-पदार्थों में न खाने योग्य रासायनिक पदार्थ या वर्जित रंग मिला दिए गए हों।
  9. जब भोज्य-पदार्थ दूषित स्थान पर दूषित हाथ से बनाए जाते हों, डिब्बे में बन्द किए जाते हों या बिक्री के लिए रखे जाते हों।
  10. जब भोज्य पदार्थो में संरक्षण के लिए निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा में रंग या संरक्षक पदार्थ मिलाए गए हों।
  11. जब भोज्य पदार्थों के गुणों एवं शुद्धता का गलत विवरण उनके डिब्बों पर दिया गया हो।

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प्रश्न 7.
F.P.O. (एफ० पी० ओ०) क्या है ? यह कब लागू हुआ ? इसके अन्तर्गत क्या व्यवस्था की गई ?
उत्तर :
फल व सब्जियों से तैयार किए गए खाद्य-पदार्थों तथा जैम, जैली, स्क्वैश, डिब्बाबन्द खाद्य-पदार्थ आदि की स्वच्छता, न्यूनतम मान्य मानक, खाद्य-पदार्थों के वेष्टन (Wrapper) तथा उन पर लगाये जाने वाले लेबल (Label) आदि के सम्बन्ध में आवश्यक निर्देश देने के लिए भारत सरकार ने सन् 1946 में फूड प्रोडक्ट आर्डर (Food Product Order) F.P.O की घोषणा की। सन् 1955 में अनिवार्य पदार्थों के अधिनियम की धारा तीन के अन्तर्गत इसमें संशोधन किया गया है। इस नियम के अनुसार बाज़ार में बिक्री के लिए फल व सब्जी से खाद्य-पदार्थ तैयार करने से पहले प्रत्येक निर्माता के लिए एफ० पी० ओ० (E.P.O.) लाइसेंस लेना ज़रूरी है। इसके साथ ही उसे खाद्य-पदार्थ तैयार करते समय इस कानून में दिए गए नियमों का पालन करना भी अनिवार्य है। यदि कोई निर्माता इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसके द्वारा तैयार किये गये माल को घटिया (Substandard) घोषित कर दिया जाता है। यदि वह दुबारा इन नियमों का उल्लंघन करता है तो उसे कानून में दिए गए प्रावधान के अनुसार दण्डित किया जाता है।

F.P.O. के अन्तर्गत –
(i) फल तथा सब्जियों से बने खाद्य-पदार्थों की किस्म के निम्न स्तर निर्धारित किए गए हैं।
(ii) कारखानों में काम करने के स्वच्छता तथा स्वास्थ्य के न्यूनतम स्तर निर्धारित किए गए हैं।
(iii) खाद्य-पदार्थों को पैक करने तथा उसके पात्रों पर लेबल लगाने के निर्देश दिए गए हैं। खाद्य-पदार्थ निर्माताओं (FPO) के लिए एफ० पी० ओ० (F.P.0.) सम्बन्धी नियमों का पालन करने के अतिरिक्त संग्रहण के लिए प्रयोग में लाये गये डिब्बों, बोतलों आदि पर चिपकाये गये लेबल (Label) पर एफ० पी० ओ० का निम्नलिखित सूचनाएँ देना आवश्यक होता है –

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  1. संरक्षित खाद्य-पदार्थ का नाम।
  2. खाद्य-पदार्थ तैयार करने के लिए प्रयुक्त सामग्री की सूची मात्रा सहित।
  3. प्रयुक्त किए गए रंगों, सुगंधियों तथा संरक्षकों के नाम।
  4. संरक्षित खाद्य-सामग्री की पैकिंग के समय मात्रा।
  5. संरक्षित खाद्य-पदार्थ का मूल्य।
  6. डिब्बा बन्दी की तिथि।
  7. वस्तु के इस्तेमाल की अवधि यदि कोई हो तो।
  8. मानक नियन्त्रण संस्थान का नाम जैसे F.P.O., I.S.I., Agmark आदि।
  9. बैच नम्बर अथवा कोड नम्बर।
  10. खाद्य-पदार्थ खराब होने की अंदेशित तिथि अथवा प्रयोग की विधि।
  11. खाद्य-पदार्थ को संगृहीत करने के लिए आवश्यक निर्देश।
  12. निर्माता का नाम एवं पता।
  13. उस प्रदेश का नाम जहाँ वह खाद्य-पदार्थ तैयार किया गया है।
  14. तैयार करने की विधि।

इस प्रकार स्पष्ट है कि एफ० पी० ओ० (F.P.O.) के अनुसार बाजार में बेचे जाने वाले विभिन्न खाद्य-पदार्थों में गुणों की न्यूनतम निर्धारित मात्रा का होना ज़रूरी है।

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प्रश्न 8.
उपभोक्ता के किन्हीं तीन मुख्य अधिकारों के बारे में लिखिए।
उत्तर :
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 के अन्तर्गत उपभोक्ता के अधिकार इस प्रकार हैं –
1. मूलभूत आवश्यकताएं – सभ्य जीवन के लिए आवश्यकताओं की पूर्ति जैसे रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, जल, चिकित्सा आदि उपभोक्ता का अधिकार हैं।
2. चयन अथवा चुनाव का अधिकार – उपभोक्ता का अधिकार है कि वह बेचने वाले से उचित गुणवत्ता तथा उचित कीमत वाली वस्तुओं का चयन करे।
3. सुनवाई – उपभोक्ता को अधिकार है कि वह वस्तुओं को निर्माताओं को अपने विचार प्रकट करे तथा निर्माता उनके विचारों को प्राप्त करें तथा उपभोक्ताओं की समस्याओं का समाधान करें।
4. जागरुक होना – उपभोक्ता का अधिकार है कि वह वस्तु की जानकारी मांग सकता है तथा निर्माता को उचित जानकारी प्रदान करनी पड़ेगी।
5. क्षतिपूर्ति – यदि वस्तु में किसी प्रकार से उचित नहीं है तो उपभोक्ता को उसका उचित परिशोधन या मुआवजा मिलना अधिकार क्षेत्र में आता है। उपभोक्ता उस वस्तु के निर्माता से मुआवज़ा लेने का अधिकारी है।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) एक शब्द में उत्तर दें –

प्रश्न 1.
फूड प्रोडक्ट आर्डर की घोषणा कब की गई ?
उत्तर :
1946 में।

प्रश्न 2.
हैलमेट पर कौन-सा मार्क लगेगा ?
उत्तर :
ISI.

प्रश्न 3.
P.F.A. कब लागू किया गया ?
उत्तर :
1954.

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान

प्रश्न 4.
ISI की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1947.

प्रश्न 5.
वातावरण के अनुसार अनुकूल वस्तुओं पर कौन-सा मार्क लगेगा ?
उत्तर :
ईको लेबल।

प्रश्न 6.
शुद्ध सोने के गहनों पर कौन-सा मार्क लगेगा?
उत्तर :
हॉल मार्क।

प्रश्न 7.
गैस स्टोव पर कौन-सा मार्क लगेगा ?
उत्तर :
ISI.

प्रश्न 8.
खाने के तेलों पर कौन-सा चिन्ह लगाया जाता है ?
उत्तर :
एगमार्क।

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प्रश्न 9.
स्वेटर पर कौन-सा मार्क लगेगा ?
उत्तर :
वूलमार्क।

प्रश्न 10.
औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम कब बनाया गया ?
उत्तर :
1940.

प्रश्न 11.
विद्युत् प्रेस पर कौन-सा मार्क लगा होता है ?
उत्तर :
ISI.

(ख) रिक्त स्थान भरो –
1. विद्युत् प्रेस पर ………… मार्क लगेगा।
2. FPO का पूरा नाम …………. है।
3. सप्रेटा दूध सस्ता बेचना ………… नहीं है।
4. कूलर व हीटर आदि मौसम के ………… खरीदने चाहिए।
5. भारतीय मानक संस्थान द्वारा ………… मार्क दिया गया है।
उत्तर :
1. ISI
2. Fruit Product Order
3. मिलावट
4. पहले या बाद
5. ISI.

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(ग) निम्न में गलत या ठीक बताएं –
1. जलेबी में रंग डालना मिलावट है।
2. एगमार्क कृषि सम्बन्धी पदार्थों के लिए है।
3. पैकिंग करने से वस्तुएं टूटती नहीं।
4. ISI मार्क कारखानों में बने पदार्थ उपकरण के लिए है।
5. FPO का मतलब Food Product Order.
6. PFA का मतलब Production of Food Adulteration Act.
7. एगमार्क प्रेस पर लगेगा।
उत्तर :
1. ठीक
2. ठीक
3. ठीक
4. ठीक
5. ठीक
6. ठीक
7. गलत।

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
निम्न में से ISI मार्क नहीं लगेगा ?
(A) बिजली की तारें
(B) बिजली के पंखे
(C) ब्लेड
(D) मसाले।
उत्तर :
मसाले।

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प्रश्न 2.
उपकरणों की उत्तमता के लिए लगने वाला मार्क है –
(A) ISI
(B) AGMARK
(C) FPO
(D) PFA.
उत्तर :
ISI.

प्रश्न 3.
FPO का पूरा नाम है –
(A) फ्रूट प्रोडक्ट आर्डर
(B) फ्रूट प्रोडक्ट आफिस
(C) फूड प्रोडक्ट आर्डर
(D) फूड प्रोडक्ट आफिस।
उत्तर :
फ्रूट प्रोडक्ट आर्डर।

प्रश्न 4.
एगमार्क लगाते हैं –
(A) सील बंद मसाले
(B) अनाज व दालें
(C) आटा
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर : उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 5.
एक जैम के पैक पर चिन्ह होता है –
(A) I.S.I.
(B) F.P.O.
(C) AGMARK
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर :
F.P.O.

प्रश्न 6.
एगमार्क लगाया जाता है –
(A) संसाधित भोजन पर
(B) अनाज और दालों पर
(C) पैक भोजन पर
(D) फल पदार्थों पर।
उत्तर :
अनाज और दालों पर।

प्रश्न 7.
एगमार्क ……… द्वारा दिया जाता है –
(A) भारतीय संसद् द्वारा
(B) भारत सरकार के बिक्री एवं निरीक्षण निदेशालय द्वारा
(C) भारतीय मानक ब्यूरो द्वारा
(D) भारतीय मानकीकरण संस्थान द्वारा।
उत्तर :
भारत सरकार के बिक्री एवं निरीक्षण निदेशालय द्वारा।

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प्रश्न 8.
मानक माप एवं तोल अधिनियम पूरे देश में कब लागू हुआ ?
(A) 1950
(B) 1960
(C) 1965
(D) 1970
उत्तर :
1960.

प्रश्न 9.
Standard of Weight Act कब लागू हुआ –
(A) 1 अगस्त, 1940
(B) 1 जुलाई, 1942
(C) 1 मार्च, 1944
(D) 1 नवम्बर, 1946.
उत्तर :
1 जुलाई, 1942.

प्रश्न 10.
कूलर और हीटर आदि कब खरीदने चाहिएं ?
(A) मौसम के पहले
(B) मौसम में
(C) मौसम के पहले या बाद
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
मौसम के पहले या बाद।

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प्रश्न 11.
किस स्थिति में भोज्य पदार्थ को मिलावटी कहा जाता है ?
(A) वास्तविक रंग-रूप वाले न हों
(B) हानिकारक तत्त्वों से युक्त हों
(C) घटिया या कम दाम वाले पदार्थ मिला दिए जाएं
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

प्रश्न 12.
दोषयुक्त तोल व माप के साधनों के प्रयोग को रोकने के लिए उपभोक्ता को चाहिए कि वह ……………. के प्रयोग को बढ़ावा दें।
(A) डिजिटल तोलने वाली मशीन
(B) हाथ वाले तराजू
(C) तराजू
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
डिजिटल तोलने वाली मशीन।

प्रश्न 13.
विद्युत् प्रेस पर कौन-सा मार्क लगा होता है-
(A) ISI
(B) FPO
(C) Agmark
(D) Woolmark.
उत्तर :
ISI.

प्रश्न 14.
ISI मार्क किस संस्था द्वारा दिया जाता है –
(A) भारतीय मानक संस्थान
(B) भारतीय माप संस्थान
(C) अंतर्राष्ट्रीय मानक संस्थान
(D) कोई भी नहीं।
उत्तर :
भारतीय मानक संस्थान।

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प्रश्न 15.
ISI मार्क किन चीज़ों पर लगाया जाता है –
(A) विद्युत् उपकरणों पर
(B) खाद्य पदार्थों पर
(C) कपड़ों पर
(D) अण्डों पर।
उत्तर :
विद्युत् उपकरणों पर।

प्रश्न 16.
वूलमार्क का लेबल हमें क्या सूचना देता है –
(A) क्वालिटी खराब है
(B) क्वालिटी नकली है
(C) क्वालिटी अच्छी है
(D) क्वालिटी सामान्य है।
उत्तर :
क्वालिटी अच्छी है।

प्रश्न 17.
P.F.A. का पूरा नाम बताएं –
(A) Prevention of Food Act
(B) Prevention of Food Adulteration Act
(C) Product Food Act
(D) Product of Food Adulteration Act.
उत्तर :
Prevention of Food Adulteration Act

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प्रश्न 18.
Agmark का चिन्ह किन पदार्थों पर लगाया जाता है ?
(A) खाने के तेलों पर
(B) सब्जियों पर
(C) दालों पर
(D) कपड़ों पर।
उत्तर :
खाने के तेलों पर।

प्रश्न 19.
ISI मार्क की स्थापना कब हुई ?
(A) 1940
(B) 1947
(C) 1942
(D) 1950.
उत्तर :
1947.

प्रश्न 20.
एगमार्क का चिह्न……… की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण है।
(A) खाद्य पदार्थों
(B) उपकरणों
(C) ऊन
(D) घी।
उत्तर :
घी।

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प्रश्न 21.
P.F.A. का पूरा नाम ……………… है।
(A) प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट
(B) प्रिवेंशन ऑफ फ्रूट अडल्टरेशन एक्ट
(C) प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेटड एक्ट
(D) प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेटड एक्ट।
उत्तर :
प्रिवेंशन ऑफ फूड अडल्टरेशन एक्ट।

प्रश्न 22.
खाने के तेलों पर कौन-सा चिन्ह लगाया जाता है ?
(A) एगमार्क
(B) एफ०पी०ओ०
(C) आई०एस०आई०
(D) वूल मार्क।
उत्तर :
एगमार्क।

प्रश्न 23.
बिजली की तारों पर कौन-सा चिह्न लगाया जाता है ?
(A) एगमार्क
(B) एफ० पी० ओ०
(C) आई०एस०आई०
(D) वूल मार्क।
उत्तर :
आई०एस०आई०।

उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ ISI मार्क भारतीय मानक संस्थान द्वारा किसी वस्तु की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण पत्र है।

→ I.S.I. प्रयोग में लाए जाने वाले उपकरणों की उत्तमता का प्रमाण है इसकी स्थापना 1947 में हुई।

→ एगमार्क, भारत सरकार के बिक्री एवं निरीक्षण निदेशालय द्वारा खाद्य-पदार्थों की उत्तमता के लिए दिया गया प्रमाण है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 6 उपभोक्ता अधिकारों का ज्ञान

→ एगमार्क का चिन्ह निम्नलिखित पदार्थों पर लगाया जाता है-खाने के तेल, घी, मक्खन, मसाले आदि।

→ दुकानदार कई तरह से उपभोक्ताओं को ठगते हैं – जैसे-घिसे बाट का प्रयोग करके, तराजू के पलड़े पर चुम्बक लगाकर आदि।।

→ उपभोक्ताओं के रूप में हमें अपने हक को सुरक्षित रखने के लिए कुछ कर्तव्यों को निभाने का प्रयास करना चाहिए। जैसे-दोष युक्त माप तोल के साधनों के प्रयोग पर रोक लगाएं, अपूर्ण लेबल वाली वस्तुएं न लें, नकली वस्तुओं की खरीद से बचें, यदि मिलावट वाली वस्तुओं का अनुमान हो तो सम्बन्धित अधिकारियों को सूचित करें।

→ 1940 में औषधि तथा मादक पदार्थ अधिनियम बनाया गया। इसके अनुसार यदि किसी औषधि अथवा मादक पदार्थ में प्रमाणित स्तर से नीचे के गुण पाए जाते हैं तो उसके निर्माता से उसके निर्माण का अधिकार छीन कर उसके मालिक को एक वर्ष के कारावास का दण्ड भी दिया जाता है।

→ परिवार के लिए आवश्यक वस्तुओं का चुनाव करते समय गृहिणी को कई निर्णय लेने पड़ते हैं; जैसे क्या खरीदें, कहां से खरीदें, कब खरीदें, कितना खरीदें आदि।

→ विक्रेता उपभोक्ताओं को धोखा देने की कोशिश करते हैं; जैसे – वस्तुओं में मिलावट करके, अपर्याप्त लेबल लगाकर त्रुटिपूर्ण माप और तोल द्वारा, असत्य विज्ञापनों द्वारा नकली वस्तुओं की बिक्री द्वारा।

→ उपभोक्ताओं को सूचना देने वाले लेबल चार प्रकार के होते हैं; जैसे – पदार्थों की विशेषताओं का परिचय देने वाले, ब्रांड की सूचना देने वाले, ट्रेड मार्क की सूचना वाले, गुणवत्ता की श्रेणी की सूचना वाले।

→ एक अच्छे उपभोक्ता के निम्नलिखित गुण होने चाहिएं –
विज्ञापनों के प्रभाव में न आना, जल्दबाजी में न खरीदना, खरीदी जाने वाली वस्तुओं की सूची बनाना, आई० एस० आई० अथवा एगमार्क वाली वस्तुएं खरीदना।

→ PFA – Prevention of Food Adulteration Act
CCFS – Central Committee for Food Standards
FPO – Food Product Order.

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
पारिवारिक आय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
सभी प्रकार की आय का आयोजन नियंत्रण व मूल्यांकन करना, जिससे परिवार के लिए अधिकतम सन्तुष्टि की प्राप्ति हो सके, उसे पारिवारिक आय कहते हैं।

प्रश्न 2.
मौद्रिक आय किसे कहते हैं ?
उत्तर :
आय के कई साधन हैं। वेतन से प्राप्त मुद्रा, व्यापार से प्राप्त मुद्रा, ज़मीन मकान के किराये से प्राप्त मुद्रा आदि। किसी भी साधन से प्राप्त मुद्रा, मौद्रिक आय कहलाती है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

प्रश्न 3.
आत्मिक आय से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त मौद्रिक तथा वास्तविक आय के व्यय से प्राप्त होने वाली सन्तुष्टि आत्मिक आय कहलाती है।

प्रश्न 4.
आवश्यक व्यय कौन-कौन से हैं ? आवश्यकताओं के वर्ग भी बताइये।
उत्तर :
भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा एवं चिकित्सा पर किये व्यय आवश्यक व्यय माने जाते हैं। आवश्यकताओं के वर्ग निम्नलिखित हैं –

  1. अनिवार्य आवश्यकताएं (जीवन रक्षक आवश्यकताएँ)
  2. निपुणता-रक्षक आवश्यकताएँ
  3. प्रतिष्ठा-रक्षक आवश्यकताएँ
  4. आराम संबंधी आवश्यकताएँ
  5. विलासिता संबंधी आवश्यकताएँ।

प्रश्न 5.
व्यय किसे कहते हैं ?
उत्तर :
अपने परिवार के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु तथा आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए विभिन्न साधनों से आय को किस प्रकार और कितना विभिन्न आवश्यकताओं पर खर्च किया जाता है, उसे व्यय कहते हैं।

प्रश्न 6.
परिवार की आय को कौन-कौन-से दो भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर :
परिवार की आय को दो भागों में विभाजित किया जाता है-प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष आय वह है जो पैसे के रूप में प्राप्त होती है जैसे वेतन, दुकान की कमाई। अप्रत्यक्ष आय जो किसी नौकरी करने वाले व्यक्ति को सुविधाओं के रूप में मिलती है जैसे मकान, मुफ्त दवाइयाँ, डॉक्टरी सहायता आदि।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

प्रश्न 7.
खर्च कितने प्रकार के हो सकते हैं ?
उत्तर :
परिवार को भिन्न – भिन्न जगहों से आय प्राप्त होती है उसको कहां और कितना प्रयोग किया जाता है को खर्च कहा जाता है। खर्च तीन प्रकार के होते हैं –
1. निर्धारित खर्च जैसे मकान का किराया, बच्चों की फीस।
2. अर्द्ध-निर्धारित खर्च-जो बढ़ता-घटता रहता है; जैसे कपड़े, भोजन और दवाइयों का खर्च।
3. गैर-निर्धारित खर्च-जिनको घटाया या बिल्कुल बन्द किया जा सकता है; जैसे मनोरंजन, हार-शृंगार आदि।

प्रश्न 8.
बजट से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
पारिवारिक आय के अनुसार घर के खर्च का पहले से भी अनुमान लगाने को बजट कहा जाता है या आय और खर्च का लेखा-जोखा बजट कहलाता है। बजट लिखित या मौखिक भी हो सकता है।

प्रश्न 9.
खर्च की आवश्यक और अनावश्यक मदें कौन-कौन सी हैं ?
उत्तर :
खर्च की आवश्यक और अनावश्यक मदें निम्नलिखित हैं –
(क) आवश्यक मदें-घर, भोजन और कपड़े।
(ख) कम आवश्यक मदें-घर को चलाने के लिए खर्चे बच्चों की पढाई, डॉक्टरी सहायता, मनोरंजन और अन्य फुटकर खर्च और बचत।
(ग) खर्च की अवश्यक मदें ये वे खर्चे हैं जिनसे आसानी से बचा जा सकता है। मनोरंजन का खर्च, हार-श्रृंगार का खर्च और धार्मिक खर्चे आदि।

प्रश्न 10.
बचत से आप क्या समझते हो ?
उत्तर :
घर की आय में से वह भाग जिसको प्रत्येक महीने आय में से बचा लिया जाता है उसको बचत कहते हैं। बचत प्रत्येक परिवार के लिए इसलिए आवश्यक है ताकि बीमारी, दुर्घटना, बुढ़ापे आदि के लिए पैसा इकट्ठा हो सके।

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प्रश्न 11.
बचत करने के किन्हीं चार ढंगों के बारे में बताएं।
उत्तर :
पुराने समय में गहने और सोने के रूप में ही बचत की जाती थी। परन्तु आजकल बचत करने के लिए नए ढंग हैं जो न केवल मनुष्य को बचत करने में सहायक होते हैं बल्कि वह बचत मनुष्य की आय का एक अन्य साधन भी बन जाती है; जैसे जीवन बीमा, निश्चित काल का जमा खाता, डाकघर बचत खाता और भविष्य निधि फण्ड योजना आदि।

प्रश्न 12.
व्यक्ति का व्यवसाय बजट पर कैसे प्रभाव डालता है ?
उत्तर :
कई व्यक्तियों को अपनी नौकरी या बिजनैस करके कई स्थानों पर जाना पड़ता है। इसलिए उनको कई ऐसी वस्तुओं पर खर्च करना पड़ता है जिनकी साधारण व्यक्ति को आवश्यकता नहीं होती जैसे सूटकेस, बढ़िया कपड़े और मोबाइल आदि। इन सभी बातों का प्रभाव बजट पर पड़ता है।

प्रश्न 13.
गृहिणी की योग्यता बजट पर कैसे प्रभाव डालती है ?
उत्तर :
समझदार गृहिणियां अपनी योग्यता और कुशलता से कम आय में परिवार की आवश्यकताएं पूर्ण करके बचत कर लेती हैं। जैसे घर कपड़े सिल कर,पुराने कपड़ों की मरम्मत करके, घर में आचार चटनियां बनाकर या घर में सब्जियां उगा कर पारिवारिक बजट को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 14.
बजट कितनी प्रकार का हो सकता है ?
उत्तर :
पारिवारिक बजट तीन प्रकार का होता है –

  1. बचत बजट (Surplus Budget) – इसमें आय अधिक और खर्च कम होता है।
  2. सन्तुलित बजट (Balanced Budget) – इसमें आय और खर्च बराबर होते हैं।
  3. घाटे का बजट (Deficit Budget) – इसमें आय कम और खर्च अधिक होता है।

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प्रश्न 15.
प्रतिदिन का हिसाब रखना बजट बनाने के लिए क्यों आवश्यक है ?
अथवा
प्रतिदिन का हिसाब-किताब रखना क्यों जरूरी है ?
उत्तर :
रोज़ाना खर्च का हिसाब रखने से गृहिणी को यह पता लगता है कि खर्च बजट के अनुसार हो रहा है। यदि किसी मद पर खर्च अधिक हो जाए तो किसी और से घटाकर उसको सन्तुलित किया जाता है।

प्रश्न 16.
बजट के प्रकार लिखिए, तथा बताइये कि सबसे अच्छा बजट कौन-सा माना जाता है ?
उत्तर :
पारिवारिक आय-व्यय के हिसाब से बजट तीन प्रकार के होते हैं –

  1. सन्तुलित बजट
  2. बचत का बजट
  3. घाटे का बजट।

बचत का बजट सर्वाधिक अच्छा बजट माना जाता है।

प्रश्न 17.
पारिवारिक बजट से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
पारिवारिक आय तथा व्यय में सन्तुलन लाने के लिए आय का सही उपयोग करना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिए गृहिणी को धन व्यय करने से पहले परिवार में विभिन्न साधनों या स्रोतों से होने वाली पूरी आय (आमदनी) तथा इस आय को विभिन्न मदों पर खर्च करने की पूरी योजना बना लेनी चाहिए। इस प्रकार परिवार में किसी निश्चित अवधि के लिए पर्व अनुमानित आय-व्यय के विस्तत विवरण को पारिवारिक बजट कहते हैं।

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प्रश्न 18.
बजट योजना किन तत्त्वों पर निर्भर करती है ?
उत्तर :
बजट योजना निम्न चार तत्त्वों पर निर्भर करती है –

  1. परिवार की आय।
  2. परिवार का लक्ष्य।
  3. परिवार की तात्कालिक आवश्यकताएँ।
  4. परिवार की भावी आवश्यकताएँ।

प्रश्न 19.
बजट-निर्माण के मुख्य चरण क्या हैं ?
उत्तर :
बजट-निर्माण के मुख्य चरण निम्नलिखित हैं –

  1. परिवार के सभी स्रोतों से प्राप्त मासिक आय को जोड़ना।
  2. परिवार की आवश्यकताओं की सूची उनकी प्राथमिकता के आधार पर बना लेना।
  3. पारिवारिक परिस्थितियों के अनुसार प्रत्येक आवश्यकता के लिए आय का प्रतिशत निर्धारित करना और अन्त में कुल खर्च का अनुमान लगाना।
  4. कुछ धन भविष्य के लिए अथवा आकस्मिक खर्च के लिए बचाया जाना।

प्रश्न 20.
बजट सम्बन्धी ऐन्जिल का सिद्धान्त क्या है ?
उत्तर :
ऐन्जिल के सिद्धान्त के अनुसार जैसे-जैसे आय बढ़ती है –

  1. भोजन पर व्यय का प्रतिशत घटता है तथा अन्य आरामदेह वस्तुओं पर व्यय का प्रतिशत बढ़ता है।
  2. मकान, वस्त्र, विद्युत् पर व्यय उतना ही रहता है, उसमें परिवर्तन नहीं होता।
  3. विलासिता, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन, सांस्कृतिक आवश्यकताओं पर व्यय का प्रतिशत बढ़ जाता है।

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प्रश्न 21.
निम्न व उच्च वर्ग के बजट में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
निम्न व उच्च वर्ग के बजट में निम्नलिखित अन्तर है –

  1. निम्न वर्ग में भोजन की मद में अधिक खर्च होता है जबकि उच्च वर्ग में भोजन की मद पर खर्च का प्रतिशत कम रहता है।
  2. उच्च वर्ग में शिक्षा तथा मनोरंजन पर प्रतिशत व्यय अधिक होता है जबकि निम्न वर्ग में इन मदों का प्रतिशत व्यय कम रहता है।
  3. उच्च परिवार में बचत का प्रतिशत अधिक होता है, जबकि निम्न परिवार में बचत नहीं के बराबर ही होती है।

प्रश्न 22.
गृहिणी को परिवार के आय-व्यय का सन्तुलन बनाए रखने के लिए किन-किन बातों पर ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर :
परिवार के आय-व्यय का सन्तुलन बनाए रखने के लिए अग्र बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  1. परिवार की आय के साधन।
  2. आय को प्रभावित करने वाले तत्त्व।
  3. परिवार के आवश्यक व्यय।
  4. व्यय को प्रभावित करने वाले तत्त्व।
  5. आय के साधनों का सम्भावित विकास।
  6. आय के साधनों को विकसित कर व्यय-योजना द्वारा रहन-सहन का स्तर उन्नत करना।
  7. बुद्धिमत्तापूर्ण व्यय, बचत के लाभ तथा ऋण से हानियाँ।
  8. आय-व्यय का सन्तुलित बजट।
  9. घरेलू हिसाब रखना।
  10. बचत के साधन अपनाना।
  11. बचत का सही उपयोग।
  12. आवश्यक कागज़-पत्रों की सम्भाल।

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प्रश्न 23.
बचत के प्रमुख लक्ष्य क्या हैं ?
अथवा
बचत करना क्यों आवश्यक है ?
अथवा
बचत के लाभ लिखें।
उत्तर :
बचत के प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित हैं –

  1. आय बन्द हो जाने पर एक साधन-नौकरी छूट जाने या व्यवसाय में घाटा हो जाने पर बचत की राशि ही काम आती है।
  2. चोरी हो जाने, आग लग जाने एवं महंगाई बढ़ने पर बचत का सदुपयोग किया जाता है।
  3. आकस्मिक दुर्घटना या बीमारी तथा बुढ़ापे में कार्य करने की असमर्थता के समय बचत ही काम आती है।
  4. मकान खरीदने, बनवाने या जमीन खरीदने के लिए बचत का प्रयोग किया जाता है।
  5. बच्चों की ऊँची शिक्षा में बचत का उपयोग किया जाता है।
  6. सामाजिक तथा धार्मिक कार्यों पर भी बचत का उपयोग होता है।
  7. राष्ट्र के विकास तथा रक्षा के साधनों पर बचत का उपयोग होता है।
  8. मुद्रा-स्फीति पर नियंत्रण के लिए बचत करना आवश्यक है।

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प्रश्न 23.
(A). बचत क्यों की जानी चाहिए ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 23 का उत्तर।

प्रश्न 24.
बचत किसे कहते हैं ? बचत तथा विनियोग के साधनों के नाम लिखिए।
उत्तर :
धन को किसी भी समय इकट्ठा जमा करने या फिर नियमित समय के अन्तर पर धीरे-धीरे एकत्रित करने को बचत कहा जाता है। बचत तथा विनियोग के प्रमुख साधन अग्रलिखित हैं –

  1. बैंक (Banks)
  2. डाकघर बचत खाता (Post Office Savings Account)
  3. जीवन बीमा (Life Insurance)
  4. भविष्य निधि योजना (Provident Fund)
  5. यूनिट्स (Units)
  6. राष्ट्रीय बचत सर्टिफिकेट (National Savings Certificate)
  7. लॉटरी, चिट व्यवस्था आदि (Lottery and Chit System)
  8. सहकारी संस्थाएँ (Co-operative Societies)
  9. कम्पनियों में पैसा लगाना (Investing in Companies)।

प्रश्न 24. (A)
बचत किसे कहते हैं ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 24 का उत्तर।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

प्रश्न 25.
बचत के विनियोजन में किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक तथा लाभकारी होता है ?
अथवा
बचत किए हुए धन को निवेश करते समय आप किन-किन बातों को ध्यान में रखेंगे।
उत्तर :
बचत के विनियोजन में निम्न दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक तथा लाभकारी होता है –
1. जिस संस्था में धन जमा करना है, वह विश्वसनीय हो।
2. विश्वसनीय संस्थाओं की ब्याज की दरें जानकर, जिस संस्था में ब्याज की दर अधिक हो, उसी में बचत का धन जमा करना चाहिए।

प्रश्न 26.
बचत के विनियोजन के लिए सरकारी तथा गैर-सरकारी संस्थाओं की सूची बनाइये।
उत्तर :
बैंक, डाकखाना, बीमा, प्रॉवीडेन्ट फण्ड, यूनिट ट्रस्ट, सहकारी समितियाँ, हिस्से (शेयर्स), चिट फण्ड कम्पनियाँ आदि।

प्रश्न 27.
बैंक में रुपया जमा करने के क्या लाभ हैं ?
उत्तर :
बैंक में रुपया जमा करने के निम्नलिखित लाभ हैं –

  1. बचत का धन सुरक्षित रहता है।
  2. आवश्यकता होने पर धन निकाला भी जा सकता है।
  3. बचत के धन पर ब्याज भी मिलता है।
  4. इस धन को देश के विकास के लिए विभिन्न उत्पादक कार्यों में लगाया जाता है।

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प्रश्न 28.
बचत खाता किसके नाम पर खोला जा सकता है ?
उत्तर :
बचत खाता निम्नलिखित नामों से खोला जा सकता है –

  1. किसी बालिग व्यक्ति के नाम पर।
  2. संरक्षता में किसी नाबालिग के नाम पर।
  3. दो या अधिक व्यक्तियों के नाम पर (संयुक्त खाता)। एक वर्ष से अधिक के नाबालिग बच्चे के नाम पर बचत खाते में धनराशि नकद, चैक या ड्राफ्ट के रूप में जमा कराई जा सकती है।

प्रश्न 29.
आवश्यकता पड़ने पर बैंक से धन किस प्रकार निकाला जा सकता है ? बचत खाते से धन निकालने के बैंक के क्या नियम होते हैं ?
उत्तर :
आवश्यकता पड़ने पर बैंक से चैक द्वारा या निकासी फार्म (Withdrawal form) की सहायता से धन निकाला जा सकता है। बैंक से धन निकालने के निम्न नियम होते हैं –

  1. जमाकर्ता अपने बचत खाते में 3 महीने में 30 बार धन निकाल सकता है।
  2. आवश्यकता पड़ने पर बैंक जमाकर्ता को 30 बार से अधिक बार धन निकालने की अनुमति दे सकता है।
  3. किसी भी समय यदि बचत खाते में पाँच सौ रुपये से कम होंगे तो जमाकर्ता से एक रुपया प्रति छः माह की दर से वसूल किया जाता है।
  4. जमाकर्ता द्वारा अपने बचत खाते से एक महीने में एक या अधिक बार निकाली गई कुल राशि 10,000 से अधिक नहीं होनी चाहिए।
  5. चैक बुक उन्हीं जमाकर्ता को दी जाती है जिनके बचत खाते में ₹ 500 या उससे अधिक रहते हैं।

प्रश्न 30.
पास बुक क्या होती है ?
उत्तर :
हर बचत खातेदार को एक पास बुक या पुस्तिका दी जाती है जिसमें बचत बैंक के नियम दिये होते हैं तथा खातेदार का नाम, पता तथा खाता नम्बर आदि विवरण होते हैं। बैंक से धन निकालते समय या जमा कराते समय पास बुक को साथ दिया जाता है जिससे राशि सम्बन्धी सभी आवश्यक विवरण बैंक द्वारा उसी समय दर्ज कर दिये जाते हैं।

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प्रश्न 31.
भविष्य निधि योजना से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर :
यह योजना नौकरी करने वाले सभी वर्ग के कर्मचारियों के लिए है। प्रत्येक कर्मचारी अपने वेतन में से अनिवार्य रूप से इस योजना में राशि विनियोजित करता है।

प्रश्न 32.
स्कूल बचत बैंक योजना क्या होती है ?
उत्तर :
स्कूल बचत बैंक योजना (संचायिका योजना) स्कूल के बच्चों का ऐसा बचत बैंक होता है जिसका नियमन वे स्वयं करते हैं। इससे बच्चों में नियमित बचत करने की आदत का विकास होता है, साथ ही उन्हें पैसे रखने का हिसाब भी आ जाता है। इस प्रकार स्कूली बच्चों द्वारा जमा की गई धनराशि का खाता विद्यालय के नाम से खोला जाता है।

प्रश्न 33.
यूनिट ट्रस्ट क्रय करके किस प्रकार बचत की जाती है ?
उत्तर :
भारतीय संसद् ने एक अधिनियम 1964 में लागू कर ‘यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया’ की स्थापना की थी। यूनिट एक प्रकार की अंशपूँजी होती है। इसकी कीमत ₹ 10 होती है परन्तु इसका क्रय-विक्रय मूल्य कम व अधिक होता रहता है। ट्रस्ट को उद्योगों से जो लाभ होता है उसका 90% यूनिट क्रय करने वालों में लाभांश के रूप में प्रतिवर्ष 30 जून को बाँट दिया जाता है। सन् 1983 में विधवाओं, अपंगों और 55 वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्तियों को लाभांश प्रतिमास देने की सुविधा हो गई है। इसमें कम से-कम ₹ 5,000 जमा करने पड़ते हैं। इसका लाभ बैंक या डाकघर से प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 34.
परिवार के लिए धन की बचत करने के कोई चार लाभ लिखें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 7 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न का उत्तर।

प्रश्न 35.
बचत का निवेश करने की किन्हीं छः संस्थाओं की सूची बनाएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 8, दीर्घ उत्तरीय प्रश्न का उत्तर।

प्रश्न 36.
व्यय योजना बनाने से परिवार को होने वाले कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर :
1. आकस्मिक खर्चों का अनुमान लगाना सरल हो जाता है।
2. व्यय योजना बनाने से बचत करने की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न 37.
बचत और विनियोग के दो साधन बताएं।
उत्तर :
बैंक, बीमा, शेयरस, यूनिट ट्रस्ट।

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प्रश्न 38.
आवश्यक व्यय तथा अनावश्यक व्यय कौन-कौन से हैं ? दो उदाहरण दें ?
उत्तर :
आवश्यक व्यय : बच्चों की फीस, घर का किराया। अनावश्यक व्यय : घूमने जाना, फिल्म देखने जाना।

प्रश्न 39.
अनावश्यक व्यय कौन-कौन से हैं?
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 40.
यूनिट ट्रस्ट ऑफ इण्डिया की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न।

लघ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
धन के प्रबन्ध के महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर :
धन एक भौतिक साधन है। प्रत्येक परिवार के लिए इसकी मात्रा भिन्न-भिन्न होते हुए भी परिवार के लिए इसकी मात्रा सीमित भी होती है और यह परिवार पर ही निर्भर करता है कि वह किस प्रकार से अपने इस सीमित धन से अधिक-से-अधिक आवश्यकताएँ पूरी कर सकें। धन का जीवन में एक महत्त्वपूर्ण साधन है। प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की विभिन्न सुख-सुविधाएँ जुटाने के लिए धन पर निर्भर रहना पड़ता है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य को जीवन में अनेक आवश्यकताओं का अनुभव होता है। मनुष्य की आवश्यकताएं तीन प्रकारों में बाँटी जा सकती हैं; जैसे कि-अति आवश्यक आवश्यकताएँ (Needs or Essential Requirements); आरामदायक आवश्यकताएँ (Comforts) तथा विलासितापूर्ण आवश्यकताएँ (Luxuries)।

इन सभी आवश्यकताओं को मनुष्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार पूर्ण करने का प्रयत्न करता है। परिवार की सम्पूर्ण व्यवस्था का संचालन धन पर ही निर्भर है। धन एक प्रकार का ऐसा सुविधाजनक साधन है जो कि मनुष्य को उन वस्तुओं को खरीदने में मदद करता है जिनके प्रयोग से उसकी आवश्यकताओं की सन्तुष्टि होती है। धन के उचित उपयोग के लिए धन के प्रबन्ध’ (Money Management) का सही ज्ञान होना अति आवश्यक है।

धन-प्रबन्ध के द्वारा ही पारिवारिक आय का योजनाबद्ध उपयोग सम्भव है। धन प्रबन्ध इस प्रकार करना चाहिए कि आय तथा व्यय में सन्तुलन हो तथा थोड़ी बहुत बचत की जा सके जो कि भविष्य में काम आ सके और परिवार की आकस्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने में भी सहायता दे सके। उचित धन प्रबन्ध परिवार के भविष्य को सुखमय तथा सुविधाजनक बनाने में सहायक होता है। इसके लिए आय के समस्त साधनों का पूरा ज्ञान होना अति आवश्यक है क्योंकि व्यय बहुत कुछ आय की राशि पर ही निर्भर करता है।

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प्रश्न 2.
पारिवारिक आय की क्या विशेषताएं हैं ?
उत्तर :
पारिवारिक आय की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं –

  1. पारिवारिक आय राष्ट्रीय की आय पर निर्भर करती है।
  2. आय का वितरण देशवासियों में समान रूप से नहीं होता। समाज में आय की विषमताओं के कारण निम्न वर्ग, मध्यम वर्ग एवं उच्च वर्ग समाज बन जाता है।
  3. जिस वर्ग का व्यक्ति होता है उसके अनुसार उसकी आय निर्धारित होती है। जैसे-कृषक वर्ग, व्यापारी वर्ग, शिक्षक वर्ग, डॉक्टर या अभियन्ता वर्ग आदि।
  4. व्यक्ति की कुशलता एवं उसके व्यक्तिगत गुणों पर उसकी आय निर्भर करती है।
  5. पारिवारिक आय परिवार में आय अर्जित करने वाले सदस्यों की संख्या पर निर्भर करती है।
  6. शिक्षित व्यक्तियों की आय अशिक्षित व्यक्तियों से अधिक होती है।
  7. परिवार में सदस्यों की संख्या कम रहने पर एक निश्चित आय अधिक लगती है परन्तु परिवार में सदस्यों की संख्या यदि बढ़ जाती है तब वही निश्चित आय कम लगती है।
  8. एक परिवार के लिए जितनी आय पर्याप्त होगी इसकी कोई सीमा निश्चित नहीं होती।

प्रश्न 3.
आय वर्ग कितने प्रकार के हैं ? विवेचना कीजिए।
उत्तर :
हर परिवार की अलग-अलग आय होती है, जिसके आधार पर वह अपनी भिन्न-भिन्न जरूरतों को पूर्ण करने में सफल होते हैं। किसी भी परिवार के जीवन-स्तर का अनुमान उसकी पारिवारिक आय से सरलता से लगाया जा सकता है। आय की मात्रा के आधार पर परिवारों को मुख्यत: तीन आय-वर्गों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. निम्न आय वर्ग (Low Income Group)
  2. मध्यम आय वर्ग (Middle Income Group)
  3. उच्च आय वर्ग (High Income Group)

सामान्यतः ये तीन आयु-वर्ग मान्य हैं, परन्तु इनमें कोई भी निश्चित विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती; जैसे कि निम्न और मध्यम वर्ग के बीच के वर्ग को निम्न-मध्यम आय वर्ग भी कहा जा सकता है और इससे उच्च और मध्यम वर्ग के बीच में उच्च-मध्यम आय-वर्ग आ सकता है। कितनी आय वाले परिवार को इनमें से किस वर्ग में रखा जाए यह भी पूरी तरह से निश्चित नहीं किया जाता है और यह समय-समय पर बदलता रहता है।

यही नहीं, विभिन्न अर्थशास्त्रियों के भी इसके बारे में भिन्न-भिन्न मत हैं। इसके साथ ही कोई परिवार कहाँ रहता है यानी रहने के स्थान पर, वस्तुओं की उपलब्धि तथा परिवार की उन्हें खरीदने की क्षमता (Purchasing Power) भी भिन्न-भिन्न होती है। उदाहरणार्थ बड़े शहरों में उसी धन की मात्रा से कम वस्तुएँ, सुख-सुविधाएँ तथा आवश्यकताओं को पूरा किया जा सकता है, जबकि गाँवों या छोटे शहरों में उतने ही धन से अधिक पारिवारिक आवश्यकताओं को सुविधापूर्वक पूरा किया जा सकता है।

फिर भी मान्य नियमों के आधार पर परिवार की आय को देखते हुए विभिन्न परिवारों को निम्न, मध्यम व उच्च आय वर्गों में बाँटने के लिए आगे दी गई विभाजन सीमा ली जा सकती है –
निम्न आय वर्ग – ₹ 800 मासिक तक।
मध्यम आय वर्ग – ₹ 800 से ₹ 2,000 मासिक तक।
उच्च आय वर्ग – ₹ 2,000 या ₹ 2,500 से ऊपर।

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प्रश्न 4.
व्यय कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
जो कुछ भी हम खर्च करते हैं उसको तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
निर्धारित व्यय – निर्धारित व्यय प्रतिमाह करने पड़ते हैं। ऐसे खर्च की राशि प्रायः निश्चित रहती है, जैसे-मकान का किराया, बिजली का खर्च, बीमे की किस्तें, आय कर, शिक्षा शुल्क आदि। ऐसे व्यय में किसी प्रकार की कटौती करना असम्भव रहता है।

अर्ध-निर्धारित – व्यय-कछ ऐसे व्यय होते हैं जिनको करना अनिवार्य होता है पर इनकी धनराशि में कमी या वृद्धि की जा सकती है। कमी या वृद्धि परिवार के सदस्यों की आमदनी व परिस्थिति पर निर्भर करती है। आमदनी बढ़ने पर खाने तथा वस्त्र पर अधिक व्यय किया जा सकता है, इसके विपरीत आमदनी कम हो जाने पर सादा भोजन या सादा वस्त्रों पर जीवित रहा जा सकता है।

अन्य व्यय – कुछ ऐसे व्यय होते हैं जो व्यक्ति विशेष की आमदनी पर निश्चित होते हैं। धन की कमी होने पर ऐसे व्यय बन्द किए जा सकते हैं तथा आमदनी बढ़ने पर उन्हें फिर किया जा सकता है। मनोरंजन व सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर आय के अनुसार ही खर्च होने लगता है तथा आय कम होने पर उन्हें बन्द किया जा सकता है।

आकस्मिक व्यय – ये व्यय ऐसे होते हैं जो अतिथियों के आगमन, बीमारी, दुर्घटना आदि के कारण उत्पन्न हो जाते हैं। इनकी पूर्ति करना भी आवश्यक होता है।

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प्रश्न 5.
व्यय को सीमित रखने के लिए गृहिणी को किन बातों का ध्यान देना चाहिए ?
उत्तर :
व्यय को सीमित रखने के लिए गृहिणी को अग्रलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिए –

  1. प्रत्येक गृहिणी को घर की आय का पूर्ण ज्ञान होना चाहिए ताकि वह ठीक बजट बना सके और खर्च भी उसी के अनुसार कर सके।
  2. प्रत्येक गृहिणी को घर में परिस्थितियों का ज्ञान होना चाहिए। परिवार में व्यक्तियों की संख्या, उनकी उम्र, उनकी आवश्यकताएँ, बच्चों की शिक्षा-श्रेणी आदि का ज्ञान गृहिणी को होना चाहिए।
  3. गृहिणी को पारिवारिक बजट बनाने का ज्ञान होना चाहिए।
  4. प्रतिदिन के व्यय का हिसाब रखा जाना चाहिए जिससे यह पता रहे कि किस मद में कितना खर्च हो चुका है और कितना भाग शेष बचा है। इससे अनावश्यक खर्चों को रोका जा सकता है।
  5. थोक क्रय करना चाहिए। इससे पूरे माह का सामान क्रय हो जाता है। सामान का मूल्य भी सस्ता रहता है और सामान ढोने आदि का खर्च भी बच जाता है।
  6. गृहिणी को बाजार भाव का ज्ञान भी होना चाहिए जिससे ठगे जाने की सम्भावना नहीं रहती।
  7. आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी ही करनी चाहिए।
  8. वस्तुओं को सदैव नकद खरीदना चाहिए। उधार खरीदने की आदत से व्यय असीमित हो जाता है।
  9. मितव्ययिता के साथ खर्च करने की आदत होनी चाहिए।

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प्रश्न 6.
व्यय को प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से होते हैं ?
उत्तर :
परिवार पर किए गए व्यय निम्नलिखित तत्त्वों से प्रभावित होते हैं –
1. परिवार का ढाँचा – हमारे देश में दो प्रकार की परिवार व्यवस्था है। संयुक्त परिवार व्यवस्था तथा एकाकी परिवार व्यवस्था। संयुक्त परिवार में कुछ मदों जैसे मकान का किराया, नौकर का पारिश्रमिक, भोजन, विद्युत् आदि के खर्च सम्मिलित रूप से एक जगह हो जाते हैं। ऐसे परिवार में सम्मिलित व्यय का बोझ परिवार के सभी सदस्यों पर पड़ता है। एकाकी परिवार में सभी खर्चे एक ही व्यक्ति की आय से ही करने पड़ते हैं। संयुक्त परिवार में एकाकी की तुलना में अधिक बचत की जा सकती है।

2. परिवार के सदस्यों की संख्या – एक व्यक्ति की आय और परिवार में सदस्यों की अधिक संख्या वाली स्थिति में बचत की सम्भावना नहीं के बराबर होती है।

3. बच्चों की संख्या – जिस परिवार में बच्चे अधिक होते हैं, उसमें खर्च अधिक होते हैं। इसलिए कहते हैं-‘कम बच्चे सुखी, परिवार’।

4. रहन-सहन का स्तर – जिस परिवार के रहन-सहन का स्तर ऊँचा होता है वैसे परिवार को अपने स्तर को बनाए रखने के लिए अधिक खर्च करना पड़ता है।

5. परिवार के सदस्यों के व्यवसाय – परिवार के सदस्यों के व्यवसाय भी खर्च को प्रभावित करते हैं। व्यवसाय को सुचारू रूप से चलाने के लिए भी व्यवसाय में धन खर्च करते रहना पड़ता है।

6. सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराएँ – प्रत्येक समाज तथा परिवार में ऐसी सामाजिक तथा धार्मिक परम्पराएँ होती हैं जिन्हें न चाहते हुए भी मानना पड़ता है और उन्हें निभाने में खर्च होता है। हमारे भारतीय समाज में आए दिन उत्सव होते हैं, जैसे-अन्नप्राशन, मुंडन, जनेऊ, विवाह, नामकरण, गृह-प्रवेश, मरणोपरान्त तेरहवीं आदि। इन उत्सवों को मनाने तथा सगे-सम्बन्धियों को भोज इत्यादि देने में बजट से अलग बहुत अधिक खर्च करना पड़ता है। आज ये सब खर्च व्यर्थ माने जाते हैं।

7. गृहिणी की योग्यता एवं कुशलता – बुद्धिमानी से खर्च करने पर परिवार को अधिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त होती हैं। यदि गृहिणी कुशल है और वह सोच-समझकर खर्च करती है तो वह परिवार को सुख व शान्ति दे सकती है।

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प्रश्न 7.
बचत के प्रमुख लक्षण क्या हैं ?
उत्तर :
बचत के प्रमुख लक्षण निम्न हैं –

  1. अन्य बन्द हो जाने पर, आय साधन-नौकरी छूट जाने या व्यवसाय में घाटा हो जाने पर बचत की राशि ही काम आती है।
  2. चोरी हो जाने, आग लग जाने एवं महँगाई बढ़ने पर बचत का सदुपयोग किया जाता है।
  3. आकस्मिक दुर्घटना या बीमारी तथा बुढ़ापे में कार्य की असमर्थता के समय बचत ही काम आती है।
  4. मकान खरीदने, बनवाने या जमीन खरीदने के लिए बचत का ही उपयोग किया जाता है।
  5. बच्चों की ऊँची शिक्षा में बचत का उपयोग किया जाता है।
  6. सामाजिक तथा धार्मिक कार्यों पर भी बचत का उपयोग होता है।
  7. राष्ट्र के विकास तथा रक्षा के साधनों पर बचत का उपयोग होता है।
  8. मुद्रा-स्फीति पर नियन्त्रण के लिए बचत करना आवश्यक है।

प्रश्न 8.
पारिवारिक बजट किस प्रकार बनाया जाता है?
उत्तर :
पारिवारिक बजट बनाने के लिए निम्न प्रकार तैयारी करते हैं
1. बजट बनाने से पूर्व निम्न सूचनाएँ एकत्रित की जाती हैं –

  • परिवार के सभी सदस्यों की संख्या (स्त्री, पुरुष, बच्चे, बूढ़े आदि)।
  • परिवार के सदस्यों की विभिन्न साधनों से होने वाली आय।
  • परिवार के बजट की अवधि-मासिक बजट बनाना है या वार्षिक।

2. सूचनाएँ एकत्रित करने के बाद खर्चों के बारे में अनुमान लगाया जाता है। यह देखना होता है कि किन-किन मदों पर खर्च होना है। उपभोग की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा तथा संख्या की सूची बनाई जाती है। वस्तुओं के मूल्य तथा उन पर व्यय किए गए कुल धन का पता लगाया जाता है।

3. पूरी सूची तैयार करने के बाद यह देखते हैं कि विभिन्न मदों पर आय का कितना प्रतिशत खर्च किया गया है। अन्त में आय में से व्यय निकालकर कुल बचत हुई या नहीं, यह देखते हैं। यदि व्यय अधिक है तो इसे किस प्रकार पूरा किया जा सकता है, यह देखते हैं। बजट बनाते समय आय का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए जिससे आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बाद कुछ धन भावी आवश्यकताओं के लिए भी बच जाए।

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प्रश्न 9.
गृहिणी मितव्ययिता कैसे कर सकती है?
उत्तर :
घर में मितव्ययिता के लिए कुछ सुझाव निम्नलिखित हैं –

  1. अति आवश्यक वस्तुओं को ही खरीदना चाहिए।
  2. खरीददारी सदैव नगद करनी चाहिए, उधार कभी नहीं लेना चाहिए।
  3. सामान सदैव विश्वास की व अच्छी दुकानों से ही खरीदना चाहिए।
  4. पौष्टिक गुणों वाले सस्ते खाद्य-पदार्थ ही प्रयोग में लाने चाहिएं।
  5. फसल के समय अधिक सामग्री (जैसे-गेहूँ, चावल) खरीदकर उसे विधिपूर्वक सुरक्षित रखना चाहिए। फल व सब्जियों का संरक्षण करना चाहिए।
  6. प्रतिकूल मौसम में सस्ता सामान (जैसे-गर्मी में ऊन) खरीदना चाहिए।
  7. जल, ईंधन तथा बिजली का सावधानी से प्रयोग करना चाहिए। बेकार में इन्हें बरबाद नहीं करना चाहिए।
  8. घर की वस्तुओं की नियमपूर्वक देखभाल, सफ़ाई तथा मरम्मत करते रहना चाहिए।
  9. बच्चों के लिए ट्यूटर रखने के बजाय उन्हें परिवार के सदस्यों द्वारा खुद पढ़ाया जाना चाहिए।
  10. घर के कामों में भी सदस्यों को हाथ बँटाना चाहिए और नौकर कम-से-कम रखने चाहिए।

प्रश्न 10.
भारत में पारिवारिक बजट बनाने में क्या कठिनाइयाँ सामने आती हैं ?
उत्तर :
भारत में पारिवारिक बजट बनाने में निम्न कठिनाइयाँ सामने आती हैं
1. गृहिणियों में शिक्षा का अभाव – भारत में अधिकांश गृहिणियाँ या तो अशिक्षित हैं या बहुत कम पढ़ी-लिखी हैं। इस कारण उन्हें बजट बनाने का ज्ञान नहीं है।
2. बजट बनाने का आलस्य – बहुत-सी गृहिणियाँ बजट बनाने को एक अतिरिक्त कार्य समझती हैं। इस प्रकार आलस्य बजट बनाने में एक कठिनाई है।
3. गृहिणियों में व्याप्त अन्धविश्वास – भारत की अधिकांश गृहिणियाँ अन्धविश्वासों तथा कुप्रथाओं को मान्यता देती हैं, इस कारण वे परिवार की आय और व्यय की बातों को खुलकर नहीं कह पाती हैं।
4. उचित सम्पर्क का अभाव – सरकारी कर्मचारियों और साधारण जनता का सीधा सम्पर्क न होने के कारण जनता बजट बनाने की ओर विशेष ध्यान नहीं देती है।

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प्रश्न 11.
परिवार के लिए खरीदी जाने वाली वस्तुओं को कितनी श्रेणियों में बाँटा जा सकता है?
अथवा
क्रय के कितने स्वरूप हैं?
उत्तर :
परिवार के लिए क्रय की जाने वाली वस्तुओं के चार स्वरूप हैं जो अग्रलिखित –
1. दैनिक क्रय – दैनिक क्रय में वे सभी वस्तुएँ आती हैं जिन्हें हम इकट्ठा खरीदकर नहीं रख सकते। उन्हें प्रतिदिन ही खरीदना चाहिए, जैसे-दूध, दही, पनीर, मक्खन, फल, सब्जी, अण्डे आदि। बहुधा ये वस्तुएं नियमित रूप से एक-दो बेचने वालों से ही खरीदी जाती हैं। इनमें से बहुत से बेचने वाले घर पर ही सामान दे जाते हैं। फल तथा ये सभी वस्तुएं मिश्रित दुकानों से खरीदनी चाहिए क्योंकि अनेक दुकानों से खरीदने पर वस्तुएँ अच्छी मिलती हैं।

2. मासिक उपयोग का सामान या आवधिक क्रय – पूरे माह के लिए सामान खरीद लिया जाता है। इसमें वे सभी वस्तुएँ खरीद ली जाती हैं जिनके खराब होने की सम्भावना नहीं रहती है और जिन्हें बार-बार खरीदे जाने से समय, धन, श्रम अधिक लगता है, जैसे अनाज, दालें, गुड़, साबुन आदि। कपड़े भी साल में दो-तीन बार इकट्ठे ही क्रय करके बनवा लिये जाते हैं। इस क्रय का बजट में स्थान होता है। इन वस्तुओं को भी निश्चित और हमेशा एक दुकान से नहीं खरीदना चाहिए।

3. आकस्मिक क्रय – इसके अन्तर्गत वे सभी वस्तएँ आती हैं जो कि आकस्मिक स्थिति में खरीदी जाती हैं, जैसे-अचानक बीमार पड़ने पर दवाइयाँ, इन्जेकशन, किसी के यहाँ से शादी का निमन्त्रण आने पर उपहार, भेंट आदि आकस्मिक रूप से खरीदी जाती हैं।

4. कदाचित् क्रय – इसके अन्तर्गत वे वस्तुएँ आती हैं जो कि कभी-कभी खरीदी जाती हैं। कई परिवार तो उन्हें जीवन में एक ही बार खरीद सकते हैं, जैसे-मकान, जमीन, मोटर-कार, फ्रिज, आभूषण। इनका खरीदा जाना बचत पर निर्भर करता है।

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प्रश्न 12.
डाकघर बचत बैंक में खाता खोलने की विधि बताइये।
उत्तर :
खाता खोलने के लिए अपनी सुविधानुसार निकटतम डाकघर में जाकर निर्धारित फार्म भरकर तथा धनराशि (जो जमा करनी हो या कम-से-कम पाँच रुपये) देकर खाता खुलवाया जा सकता है। डाकघर का अधिकारी उस व्यक्ति के नाम पास बुक बना देता है तथा जमा की गई राशी को पास बुक में चढ़ाकर मोहर लगा देता है। अब इस पास बुक की सहायता से कभी भी रुपये जमा कराये जा सकते हैं। एक व्यक्ति द्वारा खोले गये खाते में अधिक-से-अधिक ₹ 25,000 तथा दो व्यक्तियों के संयुक्त खाते में अधिक-से-अधिक ₹ 50,000 जमा हो सकते हैं। पास बुक खो जाने पर खातेदान प्रार्थना-पत्र निर्धारित शुल्क देकर नई पास-बुक बनवा सकता है।

प्रश्न 13.
भविष्य निधि (प्रॉवीडेन्ट फण्ड) क्या होती है? यह कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर :
भविष्य निधि नौकरी करने वाले की अनिवार्य बचत योजना होती है। इस योजना के अन्तर्गत प्रति माह वेतन से निश्चित धनराशि काटकर जमा कर ली जाती है। यह दो प्रकार की होती है –
1. अनिवार्य भविष्य निधि योजना (Compulsory Provident Fund) यह योजना गैर-सरकारी, अर्द्ध-सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, फैक्ट्रियों, फर्मों, कारखानों के कर्मचारियों पर लागू होती है। इसमें संस्था प्रत्येक कर्मचारी के वेतन से निश्चित हिसाब से पैसा काटकर भावी खाते में जमा कर देती है। कार्यरत रहने पर की गई जमा राशि का सेवा-निवृत्ति के बाद भुगतान कर दिया जाता है। यदि सेवक की। जाती है, तो उसके वारिसों को उक्त धनराशि दी जाती है। यदि उच्च शिक्षा, लम्बी बीमारी, आवास-गृह हेतु धन की आवश्यकता होती है तो उसे आंशिक भुगतान लेकर प्राप्त किया जा सकता है।

2. सामान्य भविष्य निधि योजना (General Provident Fund) यह योजना सरकारी कर्मचारियों पर लागू होती है। इसमें वेतन से निश्चित धन प्रति मास काटकर शासकीय कोष में जमा कर दिया जाता है। यदि कोई व्यक्ति अधिक राशि जमा करवाना चाहता है तो उसकी स्वेच्छा से अधिक काट लिया जाता है। शासकीय कर्मचारी की सेवा मुक्ति के बाद जमा राशि ब्याज सहित उसे वापस लौटा दी जाती है। यदि कर्मचारी की मृत्यु हो जाती है, तो उसके द्वारा उल्लेख किए गए वारिस को भुगतान कर दिया जाता है।

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प्रश्न 14.
परिवार की आय से आप क्या समझते हो? आय कितनी तरह की हो सकती है?
अथवा
पारिवारिक आय कितने प्रकार की होती है ? प्रत्येक का 2-2 पंक्तियों में वर्णन करें।
उत्तर :
परिवार की आय को दो भागों में विभाजित किया जाता है-प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष ।
प्रत्यक्ष आय – जो आय पैसे के रूप में घर आती है, उसको प्रत्यक्ष आय कहा जाता है। यह किसी दुकान से रोजाना की बचत, महीने का वेतन, छिमाही फसलों की कमाई या फैक्टरियों वालों का मुनाफ़ा आदि के रूप में हो सकती है। इसके अतिरिक्त अपने मकान का किराया, ज़मीन का वार्षिक ठेका (आय), बैंक का ब्याज आदि को भी प्रत्यक्ष आय कहा जाता है।

अप्रत्यक्ष आय – यह आय उन सुविधाओं के कारण होती है जो किसी भी नौकरी करने वाले को मिली हों और उनके न मिलने से घर वालों को आय में से खर्च करना पड़े जैसे कि सरकारी घर, मुफ्त दवाइयां या डॉक्टरी सहायता, बिना फ़ीस से बच्चों की पढ़ाई पर, सरकारी कार आदि।

प्रश्न 14. (A)
पारिवारिक आय कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 14 का उत्तर।

प्रश्न 15.
खर्च से आप क्या समझते हो? खर्च को कौन-कौन से भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर :
खर्च परिवार की आय और उसकी आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। कुछ खर्च ऐसे होते हैं जो परिवार को चाहे आय आधिक हो या कम करने ही पड़ते हैं पर कुछ खर्चे ऐसे होते हैं जिनको आय बढ़ने या घटने से बढ़ाये या घटाये जा सकते हैं जैसे मनोरंजन और हार-श्रृंगार का खर्चा । खर्च को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –
1. निश्चित खर्च-जैसे मकान का किराया, बिजली का बिल, स्कूल की फीस आदि वे खर्च हैं जो निश्चित होते हैं।
2. अर्द्ध-निश्चित खर्च-ये वे खर्च हैं जो आवश्यक होते हैं परन्तु इनमें परिवर्तन किया जा सकता है जैसे मकान का रख-रखाव, कपड़े और खाने पीने आदि का खर्च।
3. अतिरिक्त खर्च-ये वे खर्च हैं जो आय बढ़ने से बढ़ाए और घटने से घटाए या बन्द किए जा सकते हैं जैसे मनोरंजन और हार भंगार पर खर्च आदि।

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प्रश्न 15. (A)
निर्धारित व्यय व अर्धनिर्धारित व्यय में क्या अन्तर है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 15 का उत्तर।

प्रश्न 16.
घर के खर्चों को तुम कौन-कौन से मदों में बांटोगे?
उत्तर :
घर में कई प्रकार की वस्तुओं पर खर्च किया जाता है। घर के खर्च को मुख्य रूप में दो सूचियों में विभाजित किया जा सकता है
1. आवश्यक सूची-इस सूची में घर, भोजन, कपड़े, दवाई, बच्चों की पढ़ाई पर खर्चा आदि शामिल हैं। यह खर्चा प्रत्येक स्थिति में करना ही पड़ता है जिससे परिवार के आवश्यक खर्चे पूरे हो सकें।

2. कम आवश्यक सूची-इस सूची में मनोरंजन, हार-शृंगार, सैर-सपाटा, सामाजिक और धार्मिक समागमों के खर्चे शामिल होते हैं। ये खर्चे ऐसे होते हैं जिनको कुछ समय के लिए टाला भी जा सकता है और पैसा न होने की सूरत में ये खर्चे बन्द भी किए जा सकते हैं।

प्रश्न 17.
बचत क्यों और कैसे की जा सकती है?
उत्तर :
परिवार की आय में से खर्च के पश्चात् जो बचता है उसको बचत कहा जाता है। प्रत्येक मनुष्य को अपनी आय का कुछ प्रतिशत भाग अवश्य बचाना चाहिए। निम्नलिखित कारणों से बचत करनी आवश्यक होती है
1. अचानक बीमारी – कई बार घर का कोई सदस्य अचानक किसी गम्भीर बीमारी का शिकार हो सकता है और उसका इलाज कराने के लिए काफ़ी धन की आवश्यकता पड़ती है और ऐसी स्थिति में बचत काम आती है।

2. परिवार पालक की मृत्यु – कई बार किसी दुर्घटना या बीमारी कारण पारिवारिक मुखिया की अचानक मृत्यु हो सकती है जिससे परिवार की आय बन्द या कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में बचत काम आती है।

3. अचानक घाटा – व्यापार करने वाले लोगों को कई बार व्यापार में बहुत अधिक घाटा पड़ जाता है और उनके पास आय का साधन नहीं रहता। ऐसी स्थिति में बचत ही काम आती है।

4. भविष्य की आवश्यकताएं – प्रत्येक परिवार की अपनी भविष्य की आवश्यकताएं होती हैं जैसे बच्चों की उच्च शिक्षा, विवाह शादियों और मकान बनाने आदि के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। इन कामों के लिए बचाया हुआ धन प्रयोग किया जाता है।

5. सुरक्षित बुढ़ापे के लिए – बुढ़ापा एक कुदरती अवस्था है। इस अवस्था में मनुष्य कमाई करने के योग्य नहीं रहता, इसलिए इस समय उसको अपने खर्चे भोजन, कपड़े, आवास और दवाइयों के लिए धन की आवश्यकता होती है जोकि की गई बचत में से ही पूरी की जा सकती है।

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प्रश्न 18.
खर्च पर कौन-कौन से तत्त्व प्रभाव डालते हैं?
अथवा
व्यय को प्रभावित करने वाले तत्त्व लिखें।
उत्तर :
पारिवारिक आवश्यकताएं, मनोरंजन और अन्य सामाजिक और धार्मिक कार्यों पर प्रयोग की गई धन राशि को खर्च कहा जाता है। प्रत्येक परिवार के खर्चे भिन्न-भिन्न होते हैं। खर्च पर निम्नलिखित तत्त्व प्रभाव डालते हैं –
1. पारिवारिक सदस्यों की संख्या-यदि परिवार के सदस्यों की संख्या अधिक है तो खर्च भी अधिक होगा इसके अतिरिक्त सदस्यों की आयु और स्वास्थ्य से भी खर्च का सम्बन्ध है।

2. परिवार का सामाजिक स्तर-समाज में परिवार का क्या स्तर है इससे भी परिवार के खर्च पर प्रभाव पड़ता है। समाज में ऊँचा स्तर रखने वाले परिवारों को सामाजिक और धार्मिक कार्यों में अधिक योगदान देना पड़ता है।

3. व्यवसाय – व्यक्ति का व्यवसाय भी उनके खर्च को प्रभावित करता है जैसे राजनीतिज्ञ और व्यापार करने वाले लोगों को अपने व्यवसाय की सफलता के लिए क्लबों, मनोरंजन, महत्त्वपूर्ण लोगों की खातिरदारी पर खर्च करना पड़ता है।
इन तत्त्वों के अतिरिक्त व्यक्ति का स्वभाव, आदतें, दोस्ती का घेरा और मानसिक स्तर भी उसके खर्च को प्रभावित करते हैं।

प्रश्न 19.
प्रतिदिन का हिसाब लिखना क्यों ज़रूरी है और कैसे रखा जाता है?
अथवा
प्रतिदिन का हिसाब-किताब रखना क्यों ज़रूरी है?
उत्तर :
रोज़ाना हिसाब रखना सीमित आय वालों के लिए अति आवश्यक है, क्योंकि रोजाना हिसाब रखने से गृहिणी को यह पता चलता रहता है कि क्या खर्च बजट के अनुसार हो रहा है। यदि खर्चा बढ़ जाए तो गृहिणी को उसी दिन मालूम हो जाता है और दूसरे दिन वह जहां हो सके खर्चा कम कर के बजट को संतुलित कर सकती है। रोज़ाना हिसाब लिखने से गृहिणी परिवार के अन्य सदस्यों को साथ-साथ खर्चे के बारे में सावधान करती रहती है जिससे परिवार के दूसरे सदस्य भी फिजूलखर्ची नहीं करते।

हिसाब रखना-हर रोज़ का हिसाब रखने के लिए एक कापी या डायरी का प्रयोग किया जा सकता है। प्रतिदिन का हिसाब रखने के लिए हर रोज़ एक सफे (पेज) का प्रयोग करना चाहिए। पेज पर तारीख डाल कर चीज़ का ब्योरा अच्छी तरह देकर उसका रेट और कुल रकम लिखनी चाहिए। अगर किसी को सेवा फल के तौर पर कोई रकम दी जाए तो वह भी लिख लेनी चाहिए। महीने के अन्त में हर मद पर हुए खर्चे को अलग-अलग कर लेना चाहिए ताकि पता चल जाए कि किसी मद पर फजूल खर्च तो नहीं हुआ।

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प्रश्न 20.
खर्च की कौन-सी मदों से उच्च आय वालों का प्रतिशत खर्च कम आय वालों से अधिक होता है?
उत्तर :
खर्चे की मदें अमीर और ग़रीब दोनों की एक ही हैं परन्तु उच्च आय वर्ग, कम आय वालों से कई मदों पर अधिक खर्च करते हैं। जैसे भोजन, कपड़े, मनोरंजन और घर चलाना। भोजन में उच्च आय वर्ग महंगे भोजन पदार्थों का प्रयोग करते हैं और इसके साथ साथ उनका बाहर भोजन करने का खर्च अधिक होता है।

इस तरह कपड़ों और जूतों पर भी इस वर्ग का खर्च अधिक होता है। अमीर या उच्च आय वर्ग के लोग महंगे और संख्या में अधिक कपड़े बनाते हैं। इसके साथ ही जूते भी कपड़ों से मिलते या मेल खाते खरीदते हैं इसलिए इस तरह उनका कपड़ों के ऊपर कुल खर्चा अधिक हो जाता है। इसके अतिरिक्त उच्च आय वर्ग के लोग कम आय वालों से मनोरंजन पर अधिक खर्च करते हैं। वह सैर-सपाटे, फिल्मों, हार-शृंगार, सिगरेट, शराब आदि के खर्चे बढ़ा लेते हैं। इसके अतिरिक्त सामाजिक और धार्मिक कामों पर भी अधिक खर्च करते हैं। इसके साथ-साथ उनके नौकरों, पेट्रोल और टेलीफोनों के खर्चे भी बढ़ जाते हैं।

प्रश्न 21.
धन निवेश करने की किसी एक योजना के बारे में लिखें।
उत्तर :
देखें दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 8 का उत्तर।

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प्रश्न 22.
पारिवारिक व्यय का ब्योरा रखने के कोई दो लाभ बताएं।
उत्तर :
1. व्यय का ब्योरा रखने से मितव्ययिता आती है।
2. हिसाब रखने से बचत करने की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न 23.
कोई दो ऐसे तथ्य बतायें जो निवेश संस्था चुनने से पूर्व आप ध्यान में रखेंगे ?
उत्तर :
1. आयकर से छुटकारा-हमें वहां धन लगाना चाहिए जहां पर आयकर से छूट मिलती हो। विभिन्न बचत योजनाओं में आयकर छूट का प्रतिशत भिन्न-भिन्न होता है। अधिक प्रतिशत छूट वाला विकल्प उत्तम रहेगा।
2. आसान उपलब्धि-जैसे ही धन वापसी का समय आये तो धन वापसी आसान होनी चाहिए।

प्रश्न 24.
व्यय को प्रभावित करने वाले चार कारक बताएँ।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
पारिवारिक आय कितने प्रकार की होती है? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर :
आय का मुख्य साधन है-‘काम के बाद प्राप्त होने वाला धन’। लेकिन इसके अतिरिक्त परिवार को अन्य स्रोतों से भी धन प्राप्त हो सकता है।
पारिवारिक आय को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है –

  1. मौद्रिक आय (Money Income)
  2. वास्तविक आय (Real Income) प्रत्यक्ष आय
  3. आत्मिक आय (Psychic Income) अप्रत्यक्ष आय

मौद्रिक आय, ‘प्रत्यक्ष’ व ‘अप्रत्यक्ष’ दोनों तरह की वास्तविक आय तथा उनके उपभोग से प्राप्त मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि के योग को कुल आय (Total Income) कहते हैं।

1. मौद्रिक आय (Money Income) परिवार के सभी सदस्यों को किसी भी प्रकार से मुद्रा के रूप में प्राप्त हुई आय को मौद्रिक आय कहते हैं। इसके अन्तर्गत परिवार के सभी सदस्यों को सभी साधनों से प्राप्त वेतन, व्यापार, उद्योग-धन्धों से प्राप्त धन, मकान से प्राप्त किराया, बचत किए हुए धन से प्राप्त ब्याज या और किसी भी रूप में हुए लाभ आते हैं। इस प्रकार से प्राप्त धन परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी भी समय प्रयोग में लाया जा सकता है।

2. वास्तविक आय (Real Income) किसी भी समय पर मनुष्य की विभिन्न आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए उपलब्ध वस्तुएँ तथा सुख-सुविधाओं को वास्तविक आय कहा जा सकता है। यह आय समयानुसार परिवर्तनशील होती है। इसमें परिवार के किसी भी सदस्य को अपने कार्य-स्थल से धन के अतिरिक्त प्राप्त होने वाली वस्तुएँ तथा सुविधाएँ भी सम्मिलित होती हैं और इस प्रकार यह एक नियत समय के लिए निर्धारित होती है।

यह आय दो प्रकार की होती है –
(i) वास्तविक प्रत्यक्ष आय (Real Direct Income)
(ii) वास्तविक अप्रत्यक्ष आय (Real Indirect Income)

(i) वास्तविक प्रत्यक्ष आय – परिवार को वास्तविक प्रत्यक्ष रूप से होने वाली आय मुख्यतः वस्तुओं एवं सुविधाओं के रूप में ही प्राप्त होती है उदाहरणतः कई बार कार्य-स्थल से वेतन के अलावा कुछ ओर सुविधाएँ, जैसे कि रहने के लिए घर, कार, औषधि खर्चा, टेलीफोन का खर्चा, आने-जाने का खर्चा, यूनीफार्म (Uniform), नौकर आदि भी मिलते हैं और इस प्रकार यह परिवार के लिए प्रत्यक्ष आय का ही एक साधन है। इसी प्रकार गाँवों में किसानों की भूमि में खेती करने पर उनकी मेहनत के बदले उन्हें नगद पैसे के स्थान पर अधिकतर भूमि में हुई उपज में से एक हिस्सा दे दिया जाता है। यह भी परिवार के लिए प्रत्यक्ष आय ही है।

(ii) वास्तविक अप्रत्यक्ष आय-इस प्रकार की आय मुख्यतः परिवार के सदस्यों के ज्ञान व निपुणता के फलस्वरूप प्राप्त होती है उदाहरणार्थ परिवार को किसी सदस्य के बिजली व उपकरण ठीक करने के काम जानने से घर में बिजली या फिर कोई उपकरण बिगड़ जाने पर उसे ठीक करने के लिए बाहर से किसी व्यक्ति को बुलवाने पर होने वाले धन को बचाया जा सकता है। अन्य उदाहरणों में घर में बागबानी करके कुछ फल व सब्जियाँ आदि उगाकर तथा घर में ही कपड़े आदि सिलकर दर्जी को दी जाने वाली सिलाई से बचत की जा सकती है।

घर में इसी प्रकार से यदि गृहिणी अन्य कार्य, जैसे-घरेलू उपयोग के लिए फल-सब्जियों का संरक्षण करना, घर में कपड़े धोना आदि स्वयं करे तो वह परिवार के लिए एक प्रकार से अप्रत्यक्ष रूप से आय अर्जित कर रही है। इस प्रकार संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वास्तविक आय वह आय होती है जो परिवार को सुविधाओं के रूप में प्राप्त होती है और जिनके प्राप्त न होने पर परिवार को अपनी मौद्रिक आय में से खर्च करना पड़ता है।

3. आत्मिक आय (Psychic Income) विभिन्न स्रोतों से प्राप्त मौद्रिक तथा वास्तविक आय के व्यय से प्राप्त होने वाली सन्तुष्टि आत्मिक आय कहलाती है, हालांकि इस प्रकार की आय का कोई भी मापदण्ड नहीं है क्योंकि किसी भी आय के व्यय से किसी मनुष्य को कितनी सन्तुष्टि होती है, इसका माप लगाना अति कठिन है। यही नहीं, हर मनुष्य या परिवार को एक निश्चित मात्रा में किए गए व्यय से प्राप्त सन्तुष्टि भिन्न-भिन्न होती है परन्तु फिर भी आत्मिक आय में वृद्धि के लिए धन-प्रबन्ध का समुचित उपयोग बहुत ही आवश्यक है।

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प्रश्न 1. (A)
मौद्रिक आय से आप क्या समझते हैं ?
(B) मौद्रिक आय के चार उदाहरण दें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 1 का उत्तर।

प्रश्न 2.
पारिवारिक आय की सम्पूर्ति करने की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? आय की सम्पूर्ति करने के विभिन्न तरीकों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर :
परिवार चाहे किसी भी आय वर्ग का हो, उसे धन को समझदारी से प्रयोग करना चाहिए। हमारी दिन प्रतिदिन की अनगिनत आवश्यकताएँ होती हैं और उन आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए आय के साधन सीमित होते हैं। इस कारण केवल पारिवारिक आय तथा व्यय में सन्तुलन लाना बहुत कठिन हो जाता है, अपितु बचत की तो गुंजाइश ही नहीं रह जाती। इन सबके अतिरिक्त परिवार की आकस्मिक आवश्यकताओं को पूरा करना भी बहुत ही आवश्यक हो जाता है जिसके लिए पारिवारिक आय की सम्पूर्ति की आवश्यकता पड़ती है। पारिवारिक आय की सम्पूर्ति निम्नलिखित तरीकों द्वारा की जा सकती है –

1. गृह-उद्योगों द्वारा (Through Household Production) – गृहिणी घर में कुछ साधारण उद्योगों द्वारा धन में वृद्धि कर सकती है। उदाहरणार्थ अगर गृहिणी सिलाई कढ़ाई में निपुण हो तो उसे चाहिए कि वह घर के सभी कार्यों को सम्पन्न कर कुछ खाली समय अवश्य निकाल ले। इस समय का सदुपयोग वह कपड़ों की सिलाई करके और उन कपड़ों को बेचकर, कुछ धन बचाकर आय की सम्पूर्ति अवश्य कर सकती है। इसी प्रकार मौसम में फल तथा सब्जियों का संरक्षण करके बाज़ार में बेचना, पापड़-बड़ियाँ आदि बनाकर बेचना भी कुछ अन्य उदाहरण हैं। न केवल गृहिणी ही, वरन् घर का कोई भी सदस्य अपनी कुशलता, निपुणता तथा क्षमता का सही उपयोग करके पारिवारिक आय की सम्पूर्ति करने में सहायक हो सकता है।

2. पार्ट-टाइम नौकरी द्वारा (Through Part-Time Jobs) – गृहिणी या घर का कोई भी अन्य सदस्य कोई पार्ट-टाइम नौकरी कर ले तो परिवार की आय में वृद्धि की जा सकती है और आर्थिक स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। अत: गृहिणी को चाहिए कि गृह-संचालन में समय की उचित व्यवस्था करके कुछ समय बचाकर पार्ट-टाइम नौकरी करे जिससे कि परिवार का जीवन-स्तर ऊँचा उठाया जा सके।

3. परिवार की वास्तविक आय में बढ़ोत्तरी करना (Increase in the Real Income of the Family) परिवार की मौद्रिक आय के साथ-साथ वास्तविक आय में भी वृद्धि की जा सकती है। घर के आगे या पीछे पड़े खाली स्थान पर गृह-वाटिका बनाई जा सकती है, जिसमें विभिन्न प्रकार के फल तथा सब्जियाँ उगाई जा सकती हैं। इस प्रकार फल व सब्जियों पर व्यय होने वाले धन को बचाकर उसका उपयोग अन्य आवश्यक कार्यों के लिए किया जा सकता है।

उपरोक्त के अलावा पारिवारिक आय त में निम्नलिखित बातें भी सहायक होती हैं –

  1. समय का उचित विभाजन – गृह कार्यों का परिवार के सदस्यों में उचित विभाजन कर गृहिणी निर्धारित समय में गृह कार्य समाप्त कर बाहर भी कार्य कर सकती है या गृह उद्योग से आय को बढ़ा सकती है।
  2. श्रम एवं समय की बचत के साधनों का प्रयोग – इन साधनों द्वारा समय की बचत होती है जिसे अन्य गृह व्यवसाय में लगाकर धन उपार्जन किया जा सकता है।
  3. खाद्य – पदार्थों का संरक्षण एवं संग्रहीकरण-मौसम के अनुसार खाद्य-पदार्थों का संरक्षण तथा संग्रहीकरण कर व्यय में मितव्ययिता की जा सकती है जैसे – मौसम में अनाज सस्ते होते हैं, मौसमी फलों तथा सब्जियों को सॉस, चटनी, जैम, अचार, मुरब्बों आदि के रूप में संरक्षित करना।
  4. धन का मितव्यय-विवेकपूर्ण व्यय से बचत होती है।
  5. बचत किए हुए धन का उचित विनियोग-बचत के उचित विनियोग से धन में वृद्धि होती है। ब्याज के रूप में अतिरिक्त आय की वृद्धि होती है। अतः बचत का उचित विनियोग भी आवश्यक है। ब्याज से आय की कमी की पूर्ति होती है।

इस प्रकार उपरोक्त तरीकों से अर्जित सम्पूर्ण आय से परिवार की आवश्यकताओं को किसी सीमा तक पूरा किया जा सकता है, परन्तु साथ ही यह भी ज़रूरी है कि गृहिणी अपनी पारिवारिक आय का योजनापूर्वक उपयोग करे। अधिकतर गृहिणियाँ बिना योजना के ही धन का व्यय करती रहती है, जिसके कारण महीने के अन्त में कई महत्त्वपूर्ण कार्य अधूरे ही रह जाते हैं और परिवार के सभी लक्ष्यों की पूर्ति होना सम्भव नहीं हो पाता है। गृहिणी को चाहिए कि बचत का बजट बनाए जिससे पारिवारिक आय का कुछ अंश आकस्मिक आवश्यकताओं के लिए बचत के रूप में संग्रहित हो सके।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि पारिवारिक आय तथा व्यय में सन्तुलन लाने के लिए आय की सम्पूर्ति करना परिवार के लिए सहायक है। अत: किसी भी परिवार को सुखमय बनाने के लिए पारिवारिक आय का सही उपयोग तथा आवश्यकता पड़ने पर पारिवारिक आय को विभिन्न तरीकों से बढ़ाना भी अत्यन्त आवश्यक होता है।

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प्रश्न 2.A.
आय की सम्पूर्ति के तरीके बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 2 का उत्तर।

प्रश्न 3.
परिवार का हिसाब रखने के क्या लाभ होते हैं ?
अथवा
परिवार में आय-व्यय का विवरण रखना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
परिवार की अर्थ – व्यवस्था को ठीक बनाए रखने के लिए परिवार की आय तथा विभिन्न उद्देश्यों को ध्यान में रखकर बजट बना लेना ही पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि विभिन्न मदों पर खर्च किए जाने वाले पैसे का हिसाब-किताब रखना भी बहुत ज़रूरी होता है। घर में इतने प्रकार के खर्चे होते हैं, ‘सभी को याद रखना सम्भव नहीं होता और मानसिक बोझ लदा रहता है। बाजार का हिसाब-किताब रखने के लिए अलग से कापी होनी चाहिए। कापी के ऊपर के पृष्ठ पर ‘बाज़ार का हिसाब’ लिखना चाहिए। प्रत्येक वस्तु का मूल्य अलग-अलग लिखकर उससे प्रतिदिन के खर्च का जोड़ रात को लिख लिया जाए।

कई दिन का हिसाब यदि एक साथ लिखा जाता है तो इसमें भूलने का भय रहता है। हिसाब लिखते समय पृष्ठ के ऊपर तिथि एवं दिन अवश्य लिखना चाहिए। प्रत्येक कापी के पृष्ठ पर केवल एक दिन का हिसाब लिखने से देखने में आसानी होती है। हिसाब की कापी भी एक निर्धारित स्थान पर ही रखनी चाहिए। इससे कापी ढूँढ़ने में व्यर्थ में समय नष्ट नहीं होता और ढूँढने में कठिनाई भी नहीं होती। महीने के शुरू में ही गृह-स्वामिनी को खर्च का ब्योरा बना लेने से सुविधा रहती है तथा व्यर्थ की मदों पर फ़िजूल खर्च का भी भय नहीं रहता।

परिवार में आय-व्यय के विवरण रखने से निम्नलिखित लाभ होते हैं –

1. विभिन्न मदों के लिए निश्चित की गई धनराशि की उपयुक्तता का पता चलता है। यदि धनराशि कम पड़ जाती है तो इस बात का ध्यान रखा जा सकता है कि अगली बार बजट बनाते समय उस मद के लिए अधिक धनराशि नियत की जा सके। इसके विपरीत यदि निर्धारित धनराशि अधिक हो तो उससे सही करने में सहायता मिलती है।
2. कई पदार्थ, जैसे-अखबार, दूध आदि का मूल्य नकद नहीं चुकाया जाता है और महीने के अन्त में ही रकम का भुगतान किया जाता है। यदि नियमित रूप से दैनिक हिसाब लिखा हुआ हो तो भुगतान करने में परेशानी नहीं होती।
3. परिवार के विभिन्न सदस्यों की इच्छाओं-आकांक्षाओं का पता चल जाता है।
4. नई गृहस्थी की पारिवारिक आवश्यकताओं का ज्ञान हो जाता है।
5. आकस्मिक खर्चों का अनुमान लगाना सरल हो जाता है।
6. महीने के प्रारम्भिक दिनों में हाथ में अधिक पैसा होने से अधिक खर्चा हो जाता है। यदि दैनिक हिसाब लिखा हो तो आगामी दिनों में व्यय को सीमित करके सन्तुलित किया जा सकता है।
7. महीने भर बाजार से उधार सामान लेते रहने वाले परिवार में तो हिसाब-किताब लिखना और भी आवश्यक हो जाता है, जिससे दुकानदार किसी प्रकार की हेराफेरी न कर सके।
8. खर्चे का हिसाब-किताब रखने से मितव्ययिता आती है।
9. हिसाब रखने से गृहिणी को बचत करने की प्रेरणा मिलती है।
10. हिसाब रखने से नौकर की चोरी की आदत को बढ़ावा नहीं मिलता।

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प्रश्न 4.
घरेलू हिसाब-किताब की विभिन्न विधियाँ कौन-सी हैं ? संक्षेप में बताइए।
उत्तर :
परिवार में हिसाब-किताब की कुछ विधियाँ निम्नलिखित हैं –
1. पारिवारिक वित्त योजना – इसे बजट विधि भी कहते हैं। इस विधि के अन्तर्गत परिवार की सारी आय को एकत्रित करके बजट के अनुसार विभिन्न मदों में बाँट देते हैं। पूरा पैसा गहस्वामी या गृहिणी दोनों में से किसी के हाथ में होता है, या दोनों मिलकर खर्चा करते हैं।

2. आबंटन विधि – इस विधि में यह तय कर लिया जाता है कि आय का कितना भाग पारिवारिक खर्च के लिए है और वह गृहिणी को दे दिया जाता है। शेष अंश गृहस्वामी मकान के किराये तथा वैयक्तिक खर्चे के लिए अपने पास रख लेता है।

3. बराबर वेतन विधि – इस विधि में परिवार की आय में से परिवार के सभी प्रकार के खर्चों के लिए अपेक्षित धनराशि निकाल ली जाती है। शेष धन को पति-पत्नी वैयक्तिक खर्चे के लिए बराबर बाँट लेते हैं।

4. आय-व्यय की बराबर बाँट विधि-इस विधि के अन्तर्गत पूरी आय तथा खर्चों को दो बराबर-बराबर भागों में बाँट लिया जाता है। आय और व्यय का एक भाग पत्नी के तथा दूसरा भाग पति के हिस्से रहता है। जिन घरों में पति व पत्नी दोनों कमाते हैं, वहाँ इस पद्धति का प्रचलन अधिक है।

5. वितरण विधि – इस विधि में पूरी आय सामान्यतः गृहस्वामी के हाथ में रहती है और सभी उसी से अपनी आवश्यकतानुसार पैसा माँगते हैं।

6. अलग – अलग लिफाफों में पैसे रखना-खर्च के हिसाब-किताब की एक सरल विधि यह है कि बजट में जिस-जिस मद के लिए जितनी धनराशि निश्चित की गई है उसे अलग-अलग लिफाफों में डालकर लिफाफे पर मद का नाम लिख लिया जाता है। जिस समय जो खर्च करना होता है, उस समय उसी लिफाफे में से पैसे निकालकर खर्च कर लिया जाता है। इस विधि से महीने के अन्त में यह तो पता आसानी से चल जाता है कि किस मद में कितना खर्च हुआ है, परन्तु मद का पूरा हिसाब नहीं रखा जा सकता है।

7. अलग – अलग कार्ड बनाना-खर्चे का हिसाब-किताब रखने की यह अच्छी विधि है। इस विधि में विभिन्न प्रकार के खर्चों के लिए अलग-अलग कार्ड बना लिए जाते हैं, जैसे-दूध वाले के लिए कार्ड, धोबी के लिए अलग कार्ड, किराने वाले के लिए कार्ड आदि। इस विधि का दोष यह है कि कार्ड के खोने की सम्भावना रहती है और वर्ष भर में इतने कार्ड एकत्रित हो जाते हैं कि वार्षिक खर्च का आसानी से पता नहीं लगता।

8. खर्च की कापी बनाना – इस विधि में एक कापी, डायरी या रजिस्टर में प्रतिदिन विभिन्न मदों पर होने वाले खर्च को लिख लिया जाता है, जिससे प्रतिदिन का कुल व्यय निकल सकता है। दूध, अखबार, धोबी आदि के लिए महीने के शुरू में ही तारीख डालकर लेखा बना लिया जाता है तथा प्रतिदिन की मात्रा और मूल्यों को भर देते हैं। महीने के अन्त में इनका जोड़ निकाल लेते हैं।

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प्रश्न 5.
दूध का हिसाब रखना क्यों आवश्यक है ? इसके क्या नियम हैं ? दूध वाले के हिसाब-किताब का नमूना बनाइये।
उत्तर :
दूध का पैसा प्रतिदिन के हिसाब से भी चुकता किया जाता है, परन्तु इसमें असुविधा होती है। बड़े-बड़े शहरों में जहाँ सरकारी डेरियाँ होती हैं, वहां दूध की मात्रा प्रतिदिन के हिसाब से निर्धारित की जाती है। उपभोक्ता यदि इससे कम व अधिक लेना चाहता है तो नहीं ले सकता, अतः दूध का सीधा हिसाब होने से इसमें हिसाब रखने की आवश्यकता नहीं होती। भारतवर्ष में अधिकतर प्राइवेट डेरियों तथा दुकानों से दूध आता है। दूध ग्वालों द्वारा घरों में लाया जाता है जो कि अधिकतर अनपढ़ होते हैं। दूध का हिसाब रखना गृहिणी के लिए जरूरी हो जाता है। हिसाब न रखने से यह पता नहीं चल सकता कि किस दिन दूध कम या अधिक आया, किस दिन नहीं लिया गया तथा महीने में कुल दूध कितना लिया गया। इससे डेयरी वाला हिसाब में गड़बड़ी कर सकता है। दूध की मात्रा ज्यादा बतलाकर अधिक रुपये ले सकता है।

दूध का हिसाब रखने के नियम –

  1. दूध का हिसाब रखने के लिए अलग कापी हो।
  2. दूध का हिसाब प्रतिदिन लिख लेना चाहिए।
  3. हिसाब की कापी के प्रत्येक पृष्ठ का प्रयोग करें जिससे वह व्यर्थ में नष्ट न हो।
  4. इसके लिए हिसाब-किताब की तालिका अवश्य बनाई जाए।

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प्रश्न 6.
बचत की आवश्यकता क्यों होती है ?
उत्तर :
बचत की आवश्यकता निम्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होती है –
1. आपात्कालीन स्थितियों के लिए-भविष्य अनिश्चित होता है तथा परिवार के लिए कई ऐसी स्थितियाँ आ सकती हैं जिनका सामना करने के लिए अतिरिक्त धन की आवश्यकता पड़ती है
(i) बीमारी-परिवार का कोई भी सदस्य जब किसी गम्भीर रोग से ग्रस्त हो जाता है तो उसकी चिकित्सा के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी संकटकालीन स्थिति में परिवार द्वारा पहले से बचाया हुआ धन ही काम आता है।

(ii) किसी दुर्घटना के कारण असमर्थता-कई बार दुर्घटना से गृहस्वामी अपंग हो जाता है तथा काम करने योग्य नहीं रहता है। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए बचत किए गए धन की आवश्यकता होती है।

(iii) आय बन्द होना या कम होना-कई कारणों से, जैसे-नौकरी छूटना, व्यापार बन्द होना या व्यापार में घाटा होने से आय बन्द हो जाती है या कम हो जाती है लेकिन अन्य व्यय उतना ही रहता है। ऐसी स्थिति में बचत किया हुआ धन बहुत काम आता है और जब तक दूसरी नौकरी या व्यापार करते हैं तब तक इसी राशि से व्यय को सीमित करके काम चलाया जा सकता है।

(iv) गृहस्वामी का निधन हो जाने पर-मानव जीवन अस्थिर है। गृहस्वामी के निधन के बाद परिवार को आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति से बचत की गई राशि, जैसे-जीवन बीमा आदि परिवार को आर्थिक संरक्षण प्रदान करती है।

(v) अन्य आकस्मिक दुर्घटनाएँ-घर में आग लग जाने के कारण या चोरी हो जाने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है तथा इस क्षति को बचत किए गए धन द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।

2. सुरक्षित भविष्य के लिए नौकरी से अवकाश – प्राप्ति के बाद जो निवृत्त वेतन मिलता है वह परिवार की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु काफ़ी नहीं होता है, अतः आर्थिक रूप से सुरक्षित भविष्य के लिए बचत करना बहुत आवश्यक है।

3. पारिवारिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए – प्रत्येक परिवार के जीवन लक्ष्य होते हैं, जैसे-बच्चों के लिए उच्च शिक्षा आदि। सीमित आय द्वारा इन लक्ष्यों की पूर्ति करना असम्भव-सा है। यदि पहले ही जब बच्चे छोटे हों और परिवार पर आर्थिक दबाव अधिक न हो, आय का कुछ अंश बचाकर उचित रूप से जमा करते जाएँ तो बच्चों के बड़े होने तक उनकी शिक्षा के लिए काफ़ी धन हो जाता है।

4. पारिवारिक जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए – आज के भौतिक गुण में परिवार के जीवन स्तर की मापक कुछ भौतिक वस्तुएँ, जैसे-फ्रिज, रंगीन टी० वी०, कार आदि हैं। सीमित आय में इनको खरीदना तो कठिन है परन्तु बचत करके यदि धन इकट्ठा कर लिया जाए तो यह परिवार को उपलब्ध हो सकती हैं।

5. अन्य आकस्मिक खर्चों के लिए – परिवार के कई आकस्मिक खर्च, जैसे अतिथि आगमन, विवाह आदि के कारण होते हैं। ऐसी स्थिति में बचत की धनराशि ही काम आती है।

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प्रश्न 7.
परिवार द्वारा बचत कौन-कौन से माध्यम से की जाती है ? संक्षेप में वर्णन कीजिए।
अथवा
बचत किए हुए धन के विनियोग के विभिन्न साधनों के बारे में लिखिए।
उत्तर :
परिवार के द्वारा बचाई गई धनराशि बचत कहलाती है। इसे गृहिणी को ऐसे काम में लगाना चाहिए जिससे कुछ आय भी अर्जित हो तथा धन भी सुरक्षित रहे। बचत विनियोग के विभिन्न साधन हैं। सुरक्षा तथा आय की दृष्टि से प्रमुख साधन अग्रलिखित हैं –

  1. बैंक
  2. बीमा
  3. डाकखाना
  4. राष्ट्रीय बचत प्रमाण-पत्र
  5. यूनिट ट्रस्ट क्रय करके।

1. बैंक – पहले समय में लोग बैंक में रुपया जमा करवाने से घबराते थे। उन्हें इस बात का डर रहता था कि बैंक फेल हो जाए और रकम न दे तो उनकी रकम डूब जाएगी, परन्तु आजकल ऐसा नहीं होता। आज प्रायः अधिकांश बैंकों का राष्ट्रीयकरण हो गया है और राष्ट्रीयकृत बैंकों पर भी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इण्डिया का पूर्ण नियन्त्रण है। अत: बैंकों में जमा राशि की पूर्ण सुरक्षा रहती है।

बैंक एक ऐसी राष्ट्रीयकृत संस्था है जो मनुष्य की धन सम्बन्धी समस्याओं के निराकरण में सहयोग देती है। बैंक लोगों के धन को जमा करने का कार्य करती है। आवश्यकता पड़ने पर बैंक लोगों को अनेक कार्यों हेतु उधार रुपया देने की व्यवस्था करती है जिसके लिए ब्याज की दर बहुत कम होती है।

इसके अतिरिक्त बैंक में जमा रुपयों को समय-समय पर निकालने की सुविधा, औद्योगिक व्यवसायों के सम्पादन, कीमती वस्तुओं की सुरक्षा के लिए लॉकर्स की सुविधा, चैक, बिल, हुण्डी, ड्राफ्ट से भुगतान की सुविधा प्राप्त होती है।

2. जीवन बीमा – जीवन बीमा अनिवार्य रूप से बचत का उत्तम माध्यम है। यह व्यक्ति को सुरक्षा प्रदान करता है। जीवन बीमा एक ऐसा करार या बन्ध-पत्र होता है जिसमें भावी अनिश्चित विपत्तियों या विशेष घटना घटने पर बीमा धारक या उसके उत्तराधिकारी को एक पूर्व निश्चित धनराशि प्रदान की जाती है। इसके लिए उसे प्रति मास निश्चित किस्त देनी पड़ती है। बीमा निगम एक ऐसी संस्था है जो साधन एवं सुरक्षा प्रदान कर जोखिम को समाप्त करती है तथा अनिश्चित वातावरण को निश्चित वातावरण में परिवर्तित करती है।

3. डाकघर बचत बैंक – डाकघर बचत को सुरक्षित रखने तथा उसका पूर्ण लाभ उठाने में सहायक होता है। डाकघर में कम-से-कम राशि 2 रुपये तक जमा की जा सकती है। डाकघर, बैंक की भी भूमिका निभाते हैं। भारतीय सरकार ने डाकघर बचत बैंक की स्थापना इस दृष्टिकोण से की है कि लोग सरलतापूर्वक बचत कर सकें तथा उनमें बचत की आदत बन सके। इसमें दो व्यक्ति मिलकर रुपया जमा कर सकते हैं तथा नाबालिग बच्चों के नाम से भी माता-पिता खाता खोल सकते हैं।

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4. राष्ट्रीय बचत प्रमाण – पत्र-राष्ट्रीय बचत प्रमाण-पत्र की योजना 10 जून, 1966 से शुरू की गई है। ये बचत प्रमाण-पत्र ₹10, ₹ 100 तथा ₹ 1,000 की कीमत के डाकघर से खरीदे जा सकते हैं। अवधि की समाप्ति पर इस रकम पर ₹ 8 प्रति सैंकड़ा की दर से रुपया जमा करने वाले को वापस लौटा दिया जाता है। ये विभिन्न वर्षीय पत्र होते हैं।

5. यूनिट्स – भारतीय संसद् ने एक अधिनियम 1964 में लागू कर ‘यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया’ की स्थापना की थी। यूनिट एक प्रकार की अंशपूँजी होती है। इसकी कीमत ₹ 10 होती है। इसके द्वारा यूनिट क्रय करके बचत की जाती है। पोस्ट ऑफिस में आवेदन-पत्र देकर यूनिट्स को क्रय किया जा सकता है। यूनिट से मिलने वाले धन को विभिन्न उद्योगों में विनिमय किया जा सकता है। इसका लाभ बैंक या डाकघर से प्राप्त विभिन्न उद्योगों में विनिमय किया जा सकता है। इसका लाभ बैंक या डाकघर से प्राप्त किया जा सकता है।

6. अनिवार्य समय बचत खाता – इसमें एक निश्चित समयावधि के लिए खाते में धन जमा करवाया जाता है। इससे जमाकर्ता को प्रतिवर्ष निर्धारित ब्याज मिलता रहता है। निश्चित अवधि के पश्चात् ही जमाराशि वापस मिलती है। यह जमा खाता अकेले व्यक्ति द्वारा, संयुक्त रूप से, अल्पवयस्क और विक्षिप्त व्यक्ति के अभिभावक द्वारा खोला जा सकता है।

7. उपहार कूपन्स – यह कूपन ₹ 500, ₹ 1,000, ₹ 5,000 तथा ₹ 10,000 के मिलते हैं। कोई भी व्यक्ति उपहार के रूप में इन्हें किसी अल्पवयस्क या वयस्क व्यक्ति को दे सकता है।

8. दस-वर्षीय रक्षा जमा बाण्ड – यह रिज़र्व बैंक तथा स्टेट बैंक की कुछ शाखाओं और शासकीय कोषालय से खरीदे जा सकते हैं। एक वयस्क अधिक-से-अधिक ₹ 35,000 के और दो वयस्क संयुक्त रूप से ₹ 70,000 के बाण्ड खरीद सकते हैं। इनकी क्रय करने की तिथि से एक वर्ष तक भुगतान नहीं होता है तथा इसके पश्चात् नियमानुसार कटौती काटकर इच्छा से राशि वापिस ली जा सकती है।।

9. प्रीमियम इनामी बाण्ड – ये इनामी बाण्ड ₹ 5 से लेकर ₹ 100 तक के होते हैं। इनकी राशि का भुगतान पाँच वर्ष से पहले नहीं हो सकता है। इन पर इनाम की राशि भी प्राप्त होती है। ये रिज़र्व बैंक, स्टेट बैंक की शाखाओं, शासकीय कोषालयों तथा डाकखानों से प्राप्त किए जा सकते हैं।

10. लॉटरी चिट व्यवस्था – इसमें जान-पहचान वाले व्यक्ति मिलकर प्रतिमास निश्चित राशि देकर कुछ धन इकट्ठा करते हैं। इनमें से जिन व्यक्तियों को धन की आवश्यकता होती है वह चिट पर नाम लिखकर डालते हैं। चिट उठाने पर जिसका नाम आता है, उसे ही धन मिल जाता है, लेकिन आगामी सभी किस्तें जमा करवाते रहनी पड़ती है।

11. कम्पनियों में हिस्सा खरीदना – कई कम्पनियाँ अपने शेयर बेचती हैं। ये शेयर खरीदने पर प्रतिवर्ष धनराशि के हिसाब से लाभांश (Dividend) मिलता रहता है।

12. सहकारी संस्थाएँ – कुछ व्यक्ति मिलकर सहकारी संस्थाएं बनाकर व्यापार आदि करते हैं। जो लाभ होता है उसे आपस में लगाई गई धनराशि के हिसाब से बाँट लेते हैं। सहकारी संस्थाओं को पंजीकृत होने के पश्चात् सरकार की ओर से भी कई प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त होती हैं।

नोट – यहां दी गई सभी रुपयों की सीमा अथवा दर सरकार की तथा बैंक या डाकखाने द्वारा तय किए नियमों अनुसार कम या अधिक हो सकती है।

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प्रश्न 7.
(A) बचत किए हुए धन के निवेश के किसी एक साधन के बारे में लिखिए।
(B) बचत करना क्यों आवश्यक है ? बचत के विभिन्न तरीकों के बारे में बताइए।
उत्तर :
देखें प्रश्न 7 का उत्तर।

प्रश्न 8.
डाकघर में किन-किन तरीकों से बचत की जाती है ?
उत्तर :
1. डाकघर बचत बैंक (Postal Saving Bank Account) डाकघर में भी रुपया जमा करके बचत की जाती है। सरकार ने डाकघर में बचत बैंक का निर्माण इसलिए किया है कि लोग सरलतापूर्वक रुपया जमा कर सकें तथा उनमें बचत की प्रवृत्ति पैदा हो सके। देहाती क्षेत्रों में जहाँ बैंक की शाखाएँ नहीं हैं, परिवारों के लिए यह सुविधा बहत कल्याणकारी है। डाकघर बचत बैंक में कोई भी व्यक्ति स्वयं के नाम पर नाबालिग के नाम पर जिसका संरक्षक है, खाता खोल सकता है। इसमें दो व्यक्ति संयुक्त रूप से भी खाता खोल सकते हैं। यह खाता पाँच रुपए जमा करवा कर खोला जा सकता है।

डाकघर बचत बैंक में ब्याज की दर बदलती रहती है। डाकघर बचत बैंक में खाता खोलने को प्रोत्साहित करने के लिए कई इनामी योजनाएं भी निकाली गई हैं। इनमें प्रत्येक ऐसे व्यक्ति को इनाम के लिए रखा जा सकता है जिसकी कम-से-कम ₹ 200 की राशि डाकघर में जमा हो। एक व्यक्ति के नाम में अधिक-से-अधिक ₹ 25,000 तथा संयुक्त खाते में ₹ 50,000 जमा हो सकते हैं। जमा राशि केवल उसी डाकघर से निकाली जा सकती है, जहाँ पर खाता खोला गया है। ब्याज 31 मार्च के बाद वर्ष में एक बार जोड़ा जाता है। बैंक की तरह डाकघर भी खाता खोलने वाले को पास बुक देता है जिसमें प्रत्येक जमा तथा निकाली गई राशि का लेखा होता है। माता-पिता या अभिभावक स्वयं नाबालिग के नाम पर खाता खोल सकते हैं।

2. डाकघर सावधि संचयी योजना (Cumulative Scheme) बैंक की तरह इसमें भी सी० टी० डी० जमा खाते खोले जाते हैं। ये 5, 10, 15 वर्ष के लिए खोले जाते हैं। इसमें प्रतिमाह ₹ 5 से ₹ 100 तक की राशि जमा की जा सकती है।

  • इस योजना के अन्तर्गत कोई भी एक व्यक्ति या दो व्यक्ति मिलकर खाता खोल सकते हैं।
  • यह जमा खाता निश्चित अवधि के लिए खोला जाता है। इसमें ब्याज की दरें बदलती रहती हैं।
  • ब्याज का भुगतान प्रति वर्ष किया जाता है परन्तु ब्याज की गणना छमाही की जाती है।

3. डाकघर मियादी खाता (Postal Fixed Deposit) – यह खाता डाकघर में अकेले या संयुक्त रूप में खोला जा सकता है। यह 1, 2, 3, 5 या 10 वर्ष तक के लिए खोला जा सकता है। इसमें ₹ 50 से लेकर ₹ 25,000 तक जमा किए जा सकते हैं।

4. राष्ट्रीय बचत प्रमाण – पत्र (National Saving Certificates) ये प्रमाण-पत्र 10, 100, 1,000 की कीमत के डाकघर से खरीदे जा सकते हैं। ये रकम 10 वर्ष के बाद ₹ 8 प्रति सैंकड़ा की दर से ब्याज सहित जमा करने वाले को दे दी जाती है।

5. बारह-वर्षीय राष्ट्रीय रक्षा – पत्र-ये रक्षा-पत्र ₹ 5, 10, 15, 50, 100, 500, 1000, 5,000 तथा ₹ 25,000 की कीमतों के डाकघर से खरीदे जा सकते हैं। इसमें वार्षिक दर से ब्याज दिया जाता है। एक व्यक्ति 35,000 के तथा दो व्यक्ति एक साथ मिलकर 50,000 के 12 वर्षीय राष्ट्रीय रक्षा-पत्र खरीद सकते हैं।

उपरोक्त के अलावा डाकघर की सहायता से विविध प्रकार के बचत प्रमाण-पत्र तथा खातों द्वारा बचत की जा सकती है। पाँच वर्षीय राष्ट्रीय विकास पत्र, सामाजिक सुरक्षा पत्र, राष्ट्रीय बचत वार्षिक पत्र आदि इसी प्रकार के बचत पत्र हैं।

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प्रश्न 9.
जीवन बीमा क्या है ? इसके प्रमुख उद्देश्य व लाभ बताइए।
उत्तर :
जीवन बीमा बचत का सर्वोत्तम साधन है। जीवन बीमा निगम द्वारा दिया गया एक बन्ध-पत्र होता है जिसमें भावी अनिश्चित आपत्तियों या घटना घटित होने पर बीमाधारक को या उसके उत्तराधिकारी को एक पूर्व निश्चित धनराशि निगम द्वारा दी जाती है।

जीवन बीमा के उद्देश्य व लाभ जीवन बीमा के मुख्य उद्देश्य या लाभ निम्नलिखित हैं –
1. परिवार को आर्थिक संरक्षण प्रदान करना – बीमेदार के निधन पर उसके द्वारा नियुक्त परिवार के सदस्य को बीमा की राशि दी जाती है जिससे परिवार आर्थिक संकट का सामना कर सके।

2. वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा – वृद्धावस्था में बीमे द्वारा प्राप्त धनराशि आर्थिक संरक्षता प्रदान करती है।

3. विवाह, शिक्षा आदि के लिए आर्थिक सहायता – जीवन बीमा अपनी विशेष पॉलिसी के द्वारा परिवार के विभिन्न उद्देश्यों, विवाह, शिक्षा आदि के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करता है।

4. बचत की आदत डालना – जीवन बीमा बचत के लिए विवश करके परिवार के सदस्यों में नियमित बचत करने की आदत डालता है।

5. सम्पत्ति कर चुकाना – बीमेदार के निधन के बाद सम्पत्ति कर चुकाने के लिए सम्पत्ति को बेचने की आवश्यकता नहीं पड़ती है, जीवन बीमा सम्पत्ति कर के लिए धन की व्यवस्था करता है।

6. बीमेदार को व्यापार आदि के लिए ऋण देना-आर्थिक संकट में या व्यापार आदि के लिए बीमा निगम बीमेदार की पॉलिसी की जमानत लेकर ऋण भी देता है।

7. अन्य बचत योजनाओं की अपेक्षा अधिक लाभ पहुँचाना-जीवन बीमा अन्य बचत योजनाओं से अधिक लाभ पहुंचाती है –

  • बीमेदार की मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्राप्त होती है।
  • बीमे में जमा करवाई गई धनराशि पर आयकर की छूट होती है।
  • बीमेदार ने यदि किसी से ऋण लिया हो, तब भी उसके निधन के बाद बीमे की राशि उत्तराधिकारी को दी जाती है और इस प्रकार यह राशि लेनदारों से पूर्ण रूप से सुरक्षित होती है।
  • बीमेदार के व्यवस्था करने पर उसके निधन के बाद बीमे की धनराशि उत्तराधिकारी को किस्तों में दी जाती है और जिससे पूर्ण राशि का एक साथ अपव्यय न हो।

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प्रश्न 10.
धन का सदुपयोग करने के लिए एक परिवार को क्या-क्या करना चाहिए (कोई तीन उपाय)?
उत्तर :
धन का सदुपयोग करने के लिए परिवार को निम्न कार्य करने चाहिए –

  1. धन से सोना चांदी खरीद कर रख लेना चाहिए।
  2. बैंक में बचत खाता खोल लेना चाहिएं।
  3. निश्चित अवधि जमा योजना में पैसे लगाने चाहिए।
  4. वस्तुएँ आवश्यकतानुसार खरीदनी चाहिएं ना कि दिखावे के लिए।
  5. डाकखाने की विभिन्न बचत योजनाओं में पैसा लगाना चाहिए जैसे किसान विकास पत्र, राष्ट्रीय बचत योजना, डाक घर मासिक आय योजना।
  6. भविष्य निधि, बीमा पॉलिसी आदि में भी धन लगाया जा सकता है।
  7. वस्तुओं को ऑफ सीजन में खरीद कर भी पैसे की बचत की जा सकती है।

प्रश्न 11.
(A) बचत करना क्यों आवश्यक है ? बचत के किन्हीं चार साधनों के नाम बताएं।
(B) बचत किसे कहते हैं ? इसके साधनों के नाम लिखें।
(C) बचत करना क्यों आवश्यक है ? बचत करने के विभिन्न तरीकों के बारे में बताइए।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) निम्न का उत्तर एक शब्द में दें –

प्रश्न 1.
मकान का किराया कैसा खर्च है ?
उत्तर :
निर्धारित खर्च।

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प्रश्न 2.
पारिवारिक आय व्यय के हिसाब से बजट कितने प्रकार का है ?
उत्तर :
तीन प्रकार का।

प्रश्न 3.
यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया की स्थापना कब हुई ?
उत्तर :
1964.

प्रश्न 4.
आय को कितने भागों में बांटा जा सकता है ?
उत्तर :
तीन।

प्रश्न 5.
बजट योजना कितने तत्त्वों पर निर्भर है ?
उत्तर :
चार।

(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. अवकाश काल का उचित प्रयोग करके हम आत्मिक आय, पारिवारिक आय तथा
………… आय को बढ़ा सकते हैं।
2. ………….. का बजट उत्तम रहता है।
3. खर्चे का हिसाब-किताब रखने से …………. आती है।
4. आयु बढ़ने के साथ-साथ खर्चों में …………. होती है।
उत्तर :
1. मौद्रिक
2. बचत
3. मितव्ययता
4. वृद्धि।

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(ग) निम्न में ठीक तथा गलत बताएं –

1. विवेकपूर्ण व्यय से बचत होती है।
2. हमारे देश में दो प्रकार की परिवार व्यवस्था है।
3. शिक्षित व्यक्तियों की आय अशिक्षित व्यक्तियों से अधिक होती है।
4. आवश्यक वस्तुओं की खरीददारी ही करनी चाहिए।
उत्तर :
1. ठीक
2. ठीक
3. ठीक
4. ठीक।

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
खर्च कितने प्रकार के होते हैं –
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर :
तीन।

प्रश्न 2.
पारिवारिक बजट के प्रकार हैं –
(A) बचत बजट
(B) सन्तुलित बजट
(C) घाटे का बजट
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर :
उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 3.
यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इण्डिया की स्थापना कब की गई ?
(A) 1962
(B) 1964
(C) 1971
(D) 1980
उत्तर :
1964.

प्रश्न 4.
आय को मुख्यतः कितने भागों में बांट सकते हैं ?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर :
तीन।

प्रश्न 5.
आत्मिक आय से आप क्या समझते हैं –
(A) विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आय के व्यय से होने वाली सन्तुष्टि
(B) विभिन्न स्रोतों से प्राप्त धन
(C) प्राप्त सेवाएं और सुविधाएं
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
विभिन्न स्रोतों से प्राप्त आय के व्यय से होने वाली सन्तुष्टि।

प्रश्न 6.
परिवार की आय को कैसे बढ़ाया जा सकता है –
(A) अंशकालिक नौकरी करके
(B) परिवार की आय में बढ़ोत्तरी करके
(C) गृह उद्योगों की शुरुआत द्वारा
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

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प्रश्न 7.
अवकाश काल का उचित प्रयोग करके हम ……………. को बढ़ा सकते हैं।
(A) आत्मिक आय
(B) पारिवारिक आय
(C) मौद्रिक आय
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

प्रश्न 8.
सुरक्षित भविष्य के लिए क्या करना चाहिए –
(A) बचत करना
(B) खुलकर खर्च करना
(C) उधार लेना
(D) धन का दान देना।
उत्तर :
बचत करना।

प्रश्न 9.
आयु बढ़ने के साथ-साथ खर्चों में ……… होती है।
(A) वृद्धि
(B) कमी
(C) कोई फ़र्क नहीं पड़ता
(D) उपरिलिखित में से कोई नहीं।
उत्तर :
वृद्धि।

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प्रश्न 10.
किस प्रकार का बजट उत्तम रहता है –
(A) घाटे का बजट
(B) बचत का बजट
(C) सन्तुलित बजट
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
बचत का बजट।

प्रश्न 11.
संयुक्त परिवार में खर्च …………… होता है।
(A) कम
(B) अधिक
(C) सामान्य
(D) कोई भी नहीं।
उत्तर :
कम।

प्रश्न 12.
खर्च की आवश्यक मद कौन-सी है –
(A) घर
(B) भोजन
(C) कपड़े
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

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प्रश्न 13.
खर्च कितने प्रकार के होते हैं –
(A) निर्धारित खर्च
(B) अर्द्ध-निर्धारित खर्च
(C) गैर-निर्धारित खर्च
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

प्रश्न 14.
ऐन्जिल के सिद्धान्त के अनुसार जैसे-जैसे आय बढ़ती है, भोजन पर व्यय का प्रतिशत ……………. है।
(A) घटता
(B) बढ़ता
(C) उतना ही रहता है
(D) कोई भी नहीं।
उत्तर :
घटता।

प्रश्न 15.
निम्नलिखित में से कौन-सी प्राथमिक आवश्यकता नहीं है ?
(A) आवास
(B) भोजन
(C) कपड़ा
(D) शिक्षा।
उत्तर :
शिक्षा।

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प्रश्न 16.
बचत की आवश्यकता क्यों होती है ?
(A) सुरक्षित भविष्य के लिए
(B) आपात स्थिति का सामना करने के लिए
(C) परिवार के रहन-सहन का स्तर बढ़ाने के लिए
(D) उपर्युक्त सभी के लिए।
उत्तर :
उपर्युक्त सभी के लिए।

प्रश्न 17.
परिवार के द्वारा जिन साधनों और सुविधाओं का प्रयोग किया जाता है, वह उसकी कौन-सी आय कहलाती है ?
(A) आत्मिक आय
(B) वास्तविक आय
(C) मौद्रिक आय
(D) इनमें से कोई भी नहीं।
उत्तर :
आत्मिक आय

प्रश्न 18.
निम्नलिखित मदों में व्यय करने के लिए आप किसको सबसे अधिक प्राथमिकता देंगे ?
(A) विदेश यात्रा के लिए जाना
(B) सर्दियों के लिए पर्याप्त ऊनी कपड़ों की खरीददारी
(C) रेफ्रिजरेटर खरीदना
(D) नया सोफा सेट खरीदना।
उत्तर :
सर्दियों के लिए पर्याप्त ऊनी कपड़ों की खरीददारी।

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प्रश्न 19.
जीवन बीमा पॉलिसी कराना कहलाता है –
(A) निवेश
(B) व्यय करना
(C) बचत
(D) इनमें से कोई भी नहीं।
उत्तर :
बचत।

प्रश्न 20.
सुरक्षित भविष्य के लिए क्या करना चाहिए ?
(A) बचत करना
(B) खुलकर खर्च करना
(C) उधार लेना
(D) धन का दान देना।
उत्तर :
बचत करना।

प्रश्न 21.
निम्नलिखित मदों में से व्यय करने के लिए आप किसको सबसे अधिक प्राथमिकता देंगे ?
(A) छुट्टियाँ बिताने के लिए कहीं बाहर जाना
(B) बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन की खरीद
(C) मिक्सर ग्राइंडर की खरीद
(D) साधारण पर्दे बदलने के लिए नए फैन्सी पर्दो की खरीद।
उत्तर :
बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन की खरीद।

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प्रश्न 22.
निम्न में से कौन-सा कथन बचत से सम्बन्धित है ?
(A) आपकी माता द्वारा आपको दिए गए पैसे
(B) आपके पिता का वेतन
(C) आप प्रतिदिन दस रुपये एक डिब्बे में डालते हैं
(D) अण्डे बेचकर आपको धन मिलता है।
उत्तर :
आप प्रतिदिन दस रुपये एक डिब्बे में डालते हैं।

प्रश्न 24.
ऐंजिल के अनुसार, जैसे-जैसे आय बढ़ती है, मकान, वस्त्र, विद्युत् पर व्यय में ……………… ।
(A) परिवर्तन नहीं होता है
(B) परिवर्तन होता है
(C) लाभ होता है
(D) हानि होती है।
उत्तर :
परिवर्तन नहीं होता है।

प्रश्न 25.
संयुक्त परिवार में खर्च कम और आय …………. होती है।
(A) कम
(B) सामान्य
(C) अधिक
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
अधिक।

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प्रश्न 26.
कौन-सा बजट सबसे उत्तम रहता है ?
(A) घाटे का बजट
(B) बचत का बजट
(C) संतुलित बजट
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
बचत का बजट।

प्रश्न 27.
ऐंजिल के अनुसार, जैसे-जैसे आय बढ़ती है, भोजन पर व्यय का प्रतिशत
(A) घटता
(B) बढ़ता
(C) सामान्य
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
घटता।

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प्रश्न 28.
संयुक्त परिवार में खर्च आय अधिक होती है।
(A) ज्यादा
(B) कम
(C) सामान्य
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
कम।

प्रश्न 29.
परिवार की आय को कौन-कौन से दो भागों में बाँटा जा सकता है ?
(A) मौद्रिक आय व मानसिक रूप से प्राप्त आय
(B) प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष आय
(C) मौद्रिक आय व अप्रत्यक्ष आय
(D) अप्रत्यक्ष आय व मानसिक रूप से प्राप्त आय।
उत्तर :
मौद्रिक आय व मानसिक रूप से प्राप्त आय।

प्रश्न 30.
डाकखाने में कितने रुपयों से खाता खोला जा सकता है ?
(A) कम से कम ₹ 1000 से
(B) कम से कम ₹ 2000 से
(C) कम से कम ₹ 5000 से
(D) कम से कम ₹ 50 से।
उत्तर :
कम से कम ₹ 50 से।

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प्रश्न 31.
आमदनी में से ………… को बचत कहते हैं।
(A) खर्च की गई रकम
(B) उधार ली गई रकम
(C) बचाई गई रकम
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
बचाई गई रकम।

प्रश्न 32.
बजट योजना किस तत्त्व पर निर्भर करती है ?
(A) परिवार की आय
(B) परिवार का लक्ष्य
(C) परिवार की तत्कालीन आवश्यकताएँ
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
ऊपरलिखित सभी।

धन का प्रबन्ध HBSE 10th Class Home Science Notes

धन का प्रबन्ध –

→ परिवार की आय को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दो किस्मों में विभाजित किया जाता है।
→ घर की आवश्यकताओं के लिए प्रयोग की धन राशि को खर्च कहा जाता है।
→ खर्च निर्धारित और गैर-निर्धारित होता है।
→ पारिवारिक आमदन के अनुसार खर्च के अनुमान को बजट कहा जाता है।
→ आमदन में से बचाई गई रकम को बचत कहते हैं।
→ कुशल गृहिणी कम आमदन से भी बढ़िया घर चला सकती है।
→ बजट तीन किस्मों का होता है-बचत बजट, संतुलित बजट और घाटे का बजट।
→ बचत अवश्य करनी चाहिए। इसमें परिवार के सदस्यों की भलाई है।
→ संयुक्त परिवारों में खर्च कम और आय अधिक होती है।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 5 धन का प्रबन्ध

परिवार के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने वित्तीय साधनों का प्रयोग इस ढंग से करे कि अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त हो सके। प्रत्येक मनुष्य अपने ज्ञान, योग्यताओं का प्रयोग करके अपने जीवन का गुजारा करता है। एक विशेष समय में जैसे कि सप्ताह, महीना, साल में परिवार द्वारा कमाई गई आय को पारिवारिक आय कहा जाता है।

इस पारिवारिक आय को इस ढंग से खर्च करना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्य सन्तुष्ट, खुश और तन्दुरुस्त रहें। इसलिए एक समझदार गृहिणी को आय और खर्च में सन्तुलन रखने के लिए बजट बनाना चाहिए।

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HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

Haryana State Board HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

अति लघु उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
लक्ष्य क्या हैं ?
उत्तर :
लक्ष्य वे उद्देश्य हैं जिन्हें हम प्राप्त करना चाहते हैं जैसे एक विद्यार्थी का लक्ष्य होता है कि वह अच्छे अंक प्राप्त करे तथा शिक्षा पूर्ति के बाद अच्छा व्यापार या अच्छी नौकरी प्राप्त करे।

प्रश्न 2.
संसाधन किसे कहते हैं ?
उत्तर :
लक्ष्य प्राप्ति के लिए हम जिन चीजों तथा साधनों का प्रयोग करते हैं उन्हें संसाधन कहते हैं।

प्रश्न 3.
संसाधन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
ये दो प्रकार के होते हैं-मानवीय एवं मानवेतर।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

प्रश्न 4.
मानवीय व मानवेतर संसाधनों के कुछ उदाहरण दीजिए।
अथवा
निम्नलिखित साधनों का मानवीय व मानवेतर संसाधनों के अन्तर्गत सूचीकरण करें।समय, धन, ऊर्जा, भूमि, ज्ञान, भौतिक वस्तुएँ, कौशन व योग्यताएँ, सामुदायिक सुविधाएँ।
उत्तर :
HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन 1

प्रश्न 5.
मानवीय संसाधनों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
मानवीय संसाधन व्यक्ति विशेष का अंश होते हैं। इन संसाधनों का प्रयोग केवल वही व्यक्ति विशेष कर सकता है। जैसे-समय, ऊर्जा आदि।

प्रश्न 6.
मानवेतर संसाधन क्या हैं ?
उत्तर :
ये इस तरह के संसाधन हैं जिनका प्रयोग कोई भी व्यक्ति कर सकता है। जैसे-धन, भूमि आदि।

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प्रश्न 7.
संसाधनों की विशेषताएँ संक्षेप में समझाएँ।
उत्तर :
संसाधनों की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं –

  1. सभी संसाधन उपयोगी हैं क्योंकि इनके प्रयोग द्वारा ही मानव अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
  2. सभी संसाधन सीमित हैं अतः हमें इन्हें बर्बाद नहीं करना चाहिए। जैसे यदि आप धन या ऊर्जा को बर्बाद करते हैं तो आपको यह दुबारा अजित करने पड़ेंगे।
  3. सभी संसाधन एक-दूसरे से परस्पर जुडे हैं जैसे कि सब्जियाँ खरीदने के लिए न सिर्फ धन चाहिए बल्कि समय, ऊर्जा व कौशल भी चाहिए।

प्रश्न 8.
योजना बनाने के अतिरिक्त गहिणी को कौन-सी अन्य बातों का ज्ञान होना चाहिए जिससे समय तथा शक्ति बच सकती हो ?
अथवा
समय का प्रभावपूर्ण ढंग से प्रयोग करने के लिए आप गृहिणी को कोई दो सुझाव दें।
अथवा
समय का सदुपयोग करने के लिए एक गृहिणी को तीन सुझाव दें।
उत्तर :

  1. सभी चीज़ों को अपने स्थान पर रखो ताकि ज़रूरत पड़ने पर वस्तु को ढूंढ़ने में समय नष्ट न हो।
  2. काम करने के लिए सामान अच्छा तथा ठीक हालत में होना चाहिए।
  3. काम करने वाली जगह पर रोशनी का ठीक प्रबन्ध होना चाहिए।
  4. काम करने के सुधरे तरीकों का प्रयोग करना चाहिए।
  5. घर के सभी सदस्यों की मदद लेनी चाहिए। यदि फिर भी कार्य तथा आय के साधन ठीक हों तो कार्य बाहर से भी करवाया जा सकता है।
  6. काम करने वाली जगह की ऊंचाई अथवा वस्तुओं के हैण्डल ऐसे हों कि कन्धों पर अधिक भार न पड़े।

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प्रश्न 9.
मूल्यांकन से क्या अभिप्राय है ? बच्चों के लिए यह क्यों ज़रूरी है?
उत्तर :
कुछ देर किसी योजना के अनुसार कार्य करते रहने के पश्चात् देखा जाता है कि नियत लक्ष्य प्राप्त हो रहे हैं, अथवा नहीं। यदि लक्ष्य प्राप्त न हो रहे हों तो योजना में फेर-बदल किया जाता है तथा इस तरह अपनी योजना का मूल्यांकन किया जाता है ताकि नियत लक्ष्यों की पूर्ति हो सके।
बच्चों के विकास तथा वृद्धि में किसी प्रकार की कमी न आए इसलिए उनका मूल्यांकन करना आवश्यक है।

प्रश्न 10.
पारिवारिक साधनों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
पारिवारिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए परिवार में उपलब्ध साधनों का प्रयोग किया जाता है। इन साधनों को दो भागों में बांटा गया है –
(i) मानवीय साधन
(ii) भौतिक साधन।
दैनिक कार्यों में मौजूद साधनों का प्रयोग किया जाता है अथवा साधनों के प्रयोग से भी कार्य किया जाता है।

प्रश्न 11.
पारिवारिक साधनों का वर्गीकरण कैसे किया जा सकता है ?
उत्तर :
साधनों का वर्गीकरण दो भागों में किया जा सकता है –
1. मानवीय साधन
2. गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन।

(i) मानवीय साधन हैं – कुशलता, ज्ञान, शक्ति, दिलचस्पी, मनोवृत्ति तथा रुचियां आदि।
(ii) भौतिक साधन हैं – समय, धन, सामान, जायदाद, सुविधाएं आदि।

प्रश्न 12.
पारिवारिक साधनों की क्या विशेषताएं होती हैं ?
उत्तर :

  1. यह साधन सीमित होते हैं।
  2. साधन उपयोगी होते हैं तथा इनका प्रयोग कई रूपों में किया जा सकता है।
  3. साधनों का प्रभावशाली प्रयोग किसी भी व्यक्ति के जीवन स्तर को प्रभावित करता है।
  4. सभी साधनों का उचित प्रयोग परस्पर सम्बन्धित होता है तथा इस तरह उद्देश्यों की पूर्ति होती है।
  5. इन साधनों के उचित प्रयोग से हमारी इच्छाओं की पूर्ति होती है।

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प्रश्न 13.
मानवीय साधन कौन-से हैं और उनकी गृह-व्यवस्था में क्या महत्ता है ?
उत्तर :
ये वे साधन हैं जो मानव के अन्दर होते हैं। ये हैं – योग्यताएं, कुशलता, रुचियां, ज्ञान, शक्ति, समय, दिलचस्पी, मनोवृत्ति आदि।
इन साधनों का उचित प्रयोग करके गृह प्रबन्ध बढ़िया ढंग से किया जा सकता है। किसी कार्य को करने की योग्यता तथा कुशलता हो तो कार्य में रुचि तथा दिलचस्पी स्वयं पैदा हो जाती है। नए उपकरणों तथा मशीन आदि के बारे ज्ञान हो तो समय तथा शक्ति की बचत हो जाती है। घर के सदस्यों की शक्ति भी एक मानवीय साधन है।

प्रश्न 14.
भौतिक साधन कौन-से हैं और गृह-व्यवस्था के लिए कैसे लाभदायक हैं ?
अथवा
(A) भौतिक साधन क्या है? दो उदाहरण दें।
(B) कोई भी दो भौतिक साधन बताइये।
उत्तर :
गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन हैं-धन, समय, जायदाद, सुविधाएं आदि। इन सभी के उचित प्रयोग से गृह-व्यवस्था ठीक ढंग से की जा सकती है तथा परिवार के उद्देश्यों तथा ज़रूरतों की पूर्ति की जा सकती है।

प्रश्न 14. (A)
कोई भी दो भौतिक साधन बताइये।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्न।

प्रश्न 15.
समय तथा शक्ति की व्यवस्था से आप क्या समझते हो ?
उत्तर :
समय ऐसा साधन है जो कि सभी के लिए समान होता है। जब किसी कार्य को करने की शक्ति तथा समय का प्रयोग किया जाता है तो थकावट महसूस होती है। इसलिए समय तथा शक्ति दोनों साधनों को सही ढंग से प्रयोग करना चाहिए ताकि कार्य भी हो जाये तथा थकावट भी ज़रूरत से ज्यादा न हो तथा दोनों की बचत भी हो जाये।

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प्रश्न 16.
संसाधनों का प्रयोग समझदारी से करना चाहिए। इस कथन का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर :
इस कथन का अर्थ है कि सभी संसाधनों का प्रयोग समझदारी से करना चाहिए। संसाधन सीमित हैं यदि हम समझदारी से काम लेंगे तो हम संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर सकेंगे।

प्रश्न 17.
नीचे कुछ क्रियाएँ दी गई हैं। प्रत्येक क्रिया को करने के लिए आवश्यक संसाधन जो चाहिएं उनके नाम लिखें।
उत्तर :

  1. बाज़ार से सब्ज़ियाँ खरीदना – धन, कौशल, समय व ऊर्जा।
  2. कपड़े धोना – समय, ऊर्जा, कौशल।।
  3. भोजन पकाना – समय, ऊर्जा, कौशल व सब्जियाँ खरीदने के लिए धन।
  4. रेडियो सुनना – समय।
  5. गैस का चूल्हा चुनना – कौशल, ऊर्जा, समय, धन।
  6. चादर पर कढ़ाई करना – कौशल, समय, ऊर्जा ।

प्रश्न 18.
पार्क व डाक तार सेवा परिवार के किन संसाधनों के अन्तर्गत आते हैं ?
उत्तर :
भौतिक साधन।

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प्रश्न 19.
निम्नलिखित संसाधनों का मानवीय व मानवेतर संसाधनों के अन्तर्गत सूचीकरण करें –
(i) समय
(ii) कम्प्यू टर
(iii) पुस्तकें
(iv) ज्ञान।
उत्तर :
मानवीय संसाधन – ज्ञान।
मानवेतर संसाधन – समय, कम्प्यूटर, पुस्तकें।

प्रश्न 20.
एक गृहिणी की किन्हीं दो ऐसी निपुणताओं का उल्लेख करें, जो उसके परिवार के लिए संसाधन का कार्य कर सकती है। इन निपुणताओं की उपयोगिता बताएं।
उत्तर :
1. सिलाई-कढ़ाई
2. पाक कला।
गहिणी इन निपुणताओं का प्रयोग करके घर के माहौल को खुशगवार बना सकती है तथा इन्हीं निपुणताओं के प्रयोग से घर की आय में वृद्धि भी कर सकती है।

प्रश्न 21.
साधन कितनी प्रकार के हैं ? प्रत्येक का एक-एक उदाहरण दें।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 22.
कार्य सरलीकरण से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
कार्य सरलीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर :
आज के इस नवीन युग में जबकि अधिकतर गृहिणियां घर की कार्य विधियों के साथ-साथ बाहर भी काम पर जाती हैं, कार्य-सरलीकरण (Work Simplification) बहुत ही आवश्यक है। ‘निर्धारित समय और शक्ति की मात्रा के उपयोग से अधिक कार्य सम्पादित करना’ अर्थात् ‘कार्य की निश्चित मात्रा को कम करने की प्रक्रिया’ को ही कार्य सरलीकरण कहा जाता है। कार्य के सरलीकरण में समय और शक्ति दोनों के प्रबन्ध को मिला दिया जाता है।

प्रश्न 23.
ज्ञान प्राप्ति के कोई चार साधन बताइये ?
उत्तर :
पुस्तकें, रेडियो, समाचार-पत्र, अनुभव।

लघु उत्तदीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं ?
अथवा
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले छः तत्त्व बताएँ।
उत्तर :
पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व हैं –
परिवार का आकार तथा रचना, जीवन-स्तर, घर की स्थिति, परिवार के सदस्यों की शिक्षा, गृह निर्माता की कुशलता तथा योग्यता, ऋतु आर्थिक स्थिति आदि।

प्रश्न 2.
योजना बनाकर समय और शक्ति के व्यय को कैसे कम किया जा सकता है ?
उत्तर :
योजना बनाकर कार्य किया जाये तो समय तथा शक्ति के खर्च को कम किया जा सकता है। योजना बनाने से पहले सारे कार्यों की सूची बनाई जाती है। इस तरह यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा कार्य किस समय और कौन-से सदस्य द्वारा किया जाना है। योजना में अपने व्यक्तिगत कार्यों तथा मनोरंजन के लिए भी समय रखा जाता है। योजनाबद्ध ढंग से कार्य करने से रोज़ एक जैसी शक्ति का प्रयोग होता है। इस तरह अधिक थकावट भी नहीं होती। योजनाएं दैनिक कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों के लिए भी तैयार की जाती हैं। इस तरह समय तथा शक्ति के खर्च को घटाया जा सकता है।

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प्रश्न 3.
निर्णय लेने की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर :
निर्णय अथवा फैसला लेने की प्रक्रिया को गृह-सम्बन्ध का अभिन्न अंग माना गया है। निर्णय लेने की क्रिया से अभिप्राय है किसी समस्या के हल के लिए विभिन्न विकल्पों में से सही विकल्प का चुनाव करना। किसी भी तरह का निर्णय लेने के लिए अग्रलिखित चरणों में से गुजरना पड़ता है –

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प्रश्न 4.
निर्णय लेने से पूर्व सोच-विचार करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
जब परिवार में कोई समस्या आ जाये तो उसके हल के लिए सोच-विचार करके ही निर्णय लेना चाहिए। प्रत्येक समस्या के हल के लिए कई विकल्प होते हैं। विभिन्न विकल्पों की जानकारी प्राप्त करनी चाहिए तथा प्रत्येक विकल्प कई तत्त्वों का समूह होता है। इनमें से कई तत्त्व समस्या के हल के लिए सहायक होते हैं तथा कई नहीं, कई कम सहायक होते हैं तथा कई अधिक सहायक होते हैं।

इसलिए इन तत्त्वों की जानकारी प्राप्त करनी तथा कई स्थितियों में आपको किसी अन्य अनुभवी व्यक्ति की सलाह भी लेनी पड़ती है ताकि ठीक विकल्प का चुनाव हो सके जैसे मनोरंजन की समस्या के लिए कई विकल्प हैं जैसे सिनेमा जाना, कोई खेल खरीदना अथवा टेलीविज़न खरीदना। इन सभी विकल्पों के बारे जानकारी लेना तथा फिर एक उपयुक्त विकल्प जैसे कि टेलीविज़न का चुनाव किया जाता है क्योंकि एक लम्बे समय तक चलने वाला मनोरंजन का साधन है। इसके साथ परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए मनोरंजन के कार्यक्रम मिल सकते हैं। इसलिए इन सभी तत्त्वों को ध्यान में रखकर सभी विकल्पों के बारे में सोच समझकर ही निर्णय लेना चाहिए।

प्रश्न 5.
सही निर्णय गृह व्यवस्था में कैसे उपयोगी होता है ?
उत्तर :
सही निर्णय लिए जाएं तो समय, शक्ति, धन आदि की बचत हो सकती है। यदि घर की व्यवस्था सोच-समझकर तथा सही निर्णय न लेकर की जाए, तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है। घर के सदस्यों में मेल-मिलाप नहीं रहता। कोई भी कार्य समय पर नहीं होता तथा मानसिक तथा शारीरिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस तरह सभी निर्णय घर की व्यवस्था में बड़ा लाभदायक होता है।

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प्रश्न 6.
साधन क्या हैं ? ये कितने प्रकार के होते हैं ?
अथवा
साधन कितने प्रकार के होते हैं ? प्रत्येक के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर :
प्रबन्ध में विभिन्न साधनों का प्रयोग करके ही पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जाती है। व्यवस्था से सम्बन्धित निर्णय लेते समय यह भी ध्यान रखा जाता है कि विभिन्न पारिवारिक साधनों का प्रयोग किस प्रकार से किया जाए जिससे कि अधिक-से-अधिक लक्ष्यों की प्राप्ति की जा सके।

ये साधन दो प्रकार के होते हैं –
(i) मनुष्य गत या मानवीय साधन (Human Resources)
(ii) अमानवीय या बिना मनुष्य के या भौतिक साधन (Non Human or Material Resources)

मानवीय साधनों के अन्तर्गत समय, शक्ति तथा ऊर्जा, अभिरुचि, ज्ञान, निपुणता तथा परिस्थिति के अनुरूप अपने आप को ढालने की क्षमता आती है, जबकि भौतिक साधन हैं-धन-सम्पत्ति, मकान-कपड़ा आदि। सामुदायिक सुविधाएं जैसे-अस्पताल, स्कूल, पार्क आदि भी बिना मनुष्य के साधनों के ही उदाहरण हैं।

प्रश्न 7.
मानवीय साधन कार्य निपुणता एवं कुशलता द्वारा लक्ष्यों को कैसे प्राप्त किया जा सकता है ?
उत्तर :
घर को ठीक प्रकार से चलाने के लिए गृहिणी का विभिन्न कार्यों जैसे भोजन बनाना, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि में कुशल होना बहुत ही आवश्यक है। यदि गृहिणी वस्त्रों की सिलाई में निपुण है तो वह घर के सदस्यों के वस्त्र बाहर से न सिलवाकर, घर पर ही सिल सकती है जिससे एक प्रकार से अपने परिवार की आय की सम्पूर्ति कर सकती है। न केवल गृहिणी ही, वरन् घर के अन्य सदस्य भी अपनी कुशलता तथा निपुणता के बल से घर को उत्तम ढंग से व्यवस्थित करने में मदद कर सकते हैं। परिवार के सभी सदस्यों की अलग-अलग रुचि होती है। गृहिणी का यह कर्त्तव्य है कि वह घर को सुचारू रूप से चलाने के लिए सदस्यों की विभिन्न रुचियों की पुष्टि करने में मदद करे। इस प्रकार सदस्यों की रुचियों तथा कुशलता के आधार पर ही वह घर के विभिन्न कार्यों को उन पर सौंप सकती है।

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प्रश्न 8.
अमानवीय या भौतिक या पदार्थीय साधनों को परिभाषित करते हुए उन्हें उदाहरण सहित वर्णित कीजिए।
अथवा
पारिवारिक मानवेतर संसाधनों का वर्णन करो।
अथवा
अमानवीय साधनों के अन्तर्गत कौन-कौन से साधन सम्मिलित किए जा सकते हैं ?
उत्तर :
अमानवीय या भौतिक या पदार्थीय साधन वे होते हैं जोकि भौतिक रूप से व्यक्ति को प्राप्त होते हैं। ये साधन व्यक्ति द्वारा धारण, उपयोग तथा नियन्त्रित किए जाते हैं, उदाहरणार्थ-स्थिर सम्पत्ति, जैसे मकान, दुकान तथा ज़मीन आदि, तथा अस्थिर साधन वास्तव में हर प्रकार की भौतिक वस्तु जो कि परिवार को उपलब्ध हों-भौतिक या पदार्थीय साधन कहलाती है। ‘धन’ सबसे मुख्य भौतिक साधन है, क्योंकि इसी के द्वारा मनुष्य अन्य वस्तुओं को किसी भी आवश्यकतानुसार खरीद सकता है।

इसके साथ ही समाज द्वारा दी गई विभिन्न सुविधाएं, जैसे कि-अस्पताल, पार्क, खेल के मैदान, बाजार, समाज सदन तथा मन्दिर आदि, जिनका उपयोग परिवार के सभी सदस्य करते हैं-सभी भौतिक साधन हैं। वास्तव में मानवीय और भौतिक साधनों को पृथक् करना बहुत कठिन है। उपरोक्त सभी पारिवारिक साधनों में से कुछ साधन ऐसे हैं, जोकि मानवीय तथा भौतिक साधन दोनों कहलाते हैं।

उदाहरणार्थ-यदि एक गृहिणी सभी कार्य स्वयं अकेले नहीं कर सकती, तो वह हाथ बंटाने के लिए घरेलू नौकर को रख सकती है। इस स्थिति में वह अपने ‘धन’ को, ‘मनुष्य श्रम’ के बदले में परिवर्तित करती है। इसी प्रकार आज के वैज्ञानिक युग में हम देखते हैं, कि मानवीय शक्ति का स्थान विद्युत् तथा गैस द्वारा प्राप्त ऊर्जा ले रही है। इसी प्रकार समय भी मानवीय तथा भौतिक दोनों ही साधनों के अन्तर्गत आता है, क्योंकि यह सभी मनुष्यों के लिए स्थिर होता है। परन्तु इसका उपयोग किसी प्रकार किया जाए यह व्यक्ति पर निर्भर करता है।

प्रश्न 9.
‘समय-व्यवस्थापन’ से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
समय का व्यवस्थापन करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
समय एक बहुत महत्त्वपूर्ण साधन है। यही एक ऐसा साधन है जिसकी मात्रा प्रत्येक व्यक्ति के पास समान होती है, चाहे वह गरीब हो या अमीर, वह किसी भी जाति का हो, किसी भी लिंग का अथवा किसी भी आयु का। सभी के लिए एक दिन में होने वाले चौबीस घण्टे ही होते हैं जिनका उपयोग व्यक्ति किसी भी तरीके से कर सकता है। समय का उपयुक्त उपयोग बहुत ही आवश्यक है, क्योंकि बीता हुआ समय फिर वापिस नहीं मिल सकता।

समय का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है इसीलिए हम सबको यह प्रयत्न करना चाहिए कि समय का इस प्रकार प्रयोग किया जाये जिससे कि कम से कम समय में अधिक से अधिक कार्य हो सके तथा इसके साथ यह भी ज़रूरी है कि कार्य भली प्रकार से किया जाए। इस कम-से-कम समय में अधिक-से-अधिक व अच्छा कार्य करना ही “समय व्यवस्थापन” (Time Management) कहलाता है।

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प्रश्न 10.
गृहिणी के लिए ‘समय योजना’ करना क्यों आवश्यक है ?
उत्तर :
परिवार में आरम्भ से ही बच्चों को उनकी विभिन्न क्रियाओं को सीमित समय में ही पूरा करना सिखाया जाता है, उसी प्रकार माता-पिता भी विभिन्न कार्यविधियों, जैसे कि सुबह उठना, भोजन करना तथा बिस्तर पर जाने आदि के लिए एक निश्चित समय निर्धारित कर लेते हैं। इस प्रकार हर व्यक्ति समय का प्रयोग करने के लिए एक विशेष ‘समय अनुबन्ध’ (Time Pattern) की पुष्टि कर लेता है, चाहे वह कार्यसाधक हो या नहीं। परिवार में गृहिणी को सीमित समय में अनेक कार्य-विधियों को पूरा करना काफ़ी कठिन होता है क्योंकि उसे घर के विभिन्न उत्तरदायित्वों को निभाना पड़ता है। पारिवारिक जीवनचक्र के प्रथम सोपान में जबकि बच्चे बहुत छोटे होते हैं, यह कार्य और भी अधिक जटिल हो जाता है।

परिवार के विभिन्न लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए समय की ठीक व्यवस्था करना गृहिणी के लिए अत्यन्त आवश्यक है। उसे समय को विभिन्न कार्यों को करने, सोने आराम करने तथा मनोरंजन के लिए सही प्रकार से विभाजित करना चाहिए। परिवार की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुसार ही एक गृहिणी को कई कार्यों को सम्पन्न करने के लिए समय लगाना पड़ता है, जैसे घर की देख-रेख करना, खाना पकाना, बच्चों को खिलाना, शिक्षा तथा धन सम्बन्धी उत्तरदायित्वों को निभाना तथा अन्य कई सामाजिक तथा धार्मिक कार्य-विधियों में भाग लेना आदि।

गृहिणी को चाहिए कि वह अपने समय का आयोजन इस प्रकार करे कि वह उपलब्ध सीमित समय का अधिक-से-अधिक प्रयोग करके सभी कार्यों को सम्पन्न करने में सफल हो सके। इसके लिए गृहिणी को विभिन्न कार्यविधियों को करने के लिए “समय योजना” (Time Plan) बना लेनी चाहिए। एक अच्छी सोच विचार से बनाई गई योजना एक साधन का कार्य करती है जोकि समय तथा शक्ति की बचत करने में सहायक होती है।

प्रश्न 11.
(क) मानवीय साधन क्या हैं ? दो उदाहरण दें।
(ख) कोई दो मानवीय साधन बताइये।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

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प्रश्न 12.
शक्ति प्रबन्ध को परिभाषित करें।
उत्तर :
दैनिक कार्यों को ऐसी कुशलता, चतुराई और योजनाबद्ध तरीके से करना, जिससे कम से कम मात्रा में शक्ति के उपयोग से अधिक लाभप्रद कार्यों को सम्पन्न कर सके-‘शक्ति-प्रबन्ध’ कहलाता है। इस प्रकार शक्ति प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य है-किसी भी कार्य के लिए कम-से-कम शक्ति का व्यय करना जिससे कि गृहिणी काम को बिना थकान के ही कर सके।

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
पारिवारिक साधन मानवीय उद्देश्यों को प्राप्त करने में कैसे सहायक होते हैं ? इन्हें प्रभावित करने वाले तत्त्व कौन-से हैं ?
उत्तर :
परिवार के लिए उपलब्ध साधन, पारिवारिक लक्ष्यों अथवा उद्देश्यों की पूति करने में सहायक होते हैं। दैनिक कार्यों में मौजूद साधनों का प्रयोग किया जाता है अथवा साधनों के प्रयोग से भी कार्य किया जाता है। साधनों के सफल प्रयोग को कई तत्त्व प्रभावित करते हैं
1. परिवार का आकार तथा रचना – जिन परिवारों में छोटे बच्चे अथवा बुजुर्ग होते हैं वहां गृहिणी को अधिक कार्य करना पड़ता है। परन्तु बच्चे बड़े होकर गृहिणी की मदद करने लग जाते हैं, तथा कई बुजुर्ग भी घर के काम-काज में मदद कर देते हैं।
2. जीवन-स्तर – सादा जीवन व्यतीत करने वालों के लक्ष्य आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं।
3. घर की स्थिति – यदि घर, स्कूल तथा कॉलेज, मार्कीट आदि के निकट हो, तो आने-जाने का काफ़ी समय तथा शक्ति बच जाती है। यदि घर बड़ी सड़क के नज़दीक हो तो धूल-मिट्टी काफ़ी आती है तथा सफ़ाई पर काफ़ी समय नष्ट हो जाता है।
4. आर्थिक स्थिति – यदि अधिक आय हो तो घर में नौकर रखे जा सकते हैं तथा कई कार्य बाहर से भी करवाये जा सकते हैं। यदि आय कम हो तो गृहिणी को सभी कार्य स्वयं ही करने पड़ते हैं।
5. परिवार के सदस्यों की शिक्षा – पढ़े-लिखे लोग आधुनिक साधनों का प्रयोग करके अपनी शक्ति तथा समय की काफ़ी बचत कर लेते हैं, जैसे एक पढ़ी-लिखी गृहिणी वाशिंग मशीन तथा मिक्सी आदि का प्रयोग करेगी जबकि अनपढ लोग पुराने परम्परागत साधनों तथा रिवाजों पर ही निर्भर रहते हैं।
6. ऋतु बदलना – गांवों में बिजाई-कटाई के समय कार्य अधिक करना पड़ता है और समय कम। शहरों में ऋतु बदलने पर गर्म-ठण्डे कपड़ों आदि को निकालना तथा रखना आदि कार्य बढ़ जाते हैं।
7. गृह निर्माता की कुशलता तथा योग्यताएं – एक कुशल गृहिणी अपनी योग्यता से समय तथा शक्ति की बचत कर सकती है।

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प्रश्न 2.
समय और शक्ति पारिवारिक साधन कैसे हैं ? योजना बनाकर उनके व्यय को कैसे कम किया जा सकता है ?
अथवा
समय और शक्ति के व्यय को कैसे कम किया जा सकता है ?
उत्तर :
समय सभी के लिए ही बराबर होता है। एक दिन में 24 घण्टे होते हैं। परन्तु शक्ति सभी के पास एक जैसी नहीं होती तथा आयु के साथ-साथ इनमें अन्तर पड़ता रहता है। जब कोई कार्य किया जाता है तो समय तथा शक्ति दोनों खर्च होते हैं। योजना बनाकर कार्य किया जाये तो इन दोनों की बचत की जा सकती है। एक समझदार गृहिणी को समय तथा शक्ति के खर्च को घटाने के लिए योजना बनाने में कोई मुश्किल नहीं आती।

योजना को लिखकर बनाना चाहिए तथा योजना में लचीलापन होना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर इसको बदला जा सके। सभी कार्यों की सूची बनाने के पश्चात् योजना बनानी चाहिए। यह भी तय कर लेना चाहिए कि इनमें से कौन-से कार्य किस सदस्य ने तथा कब करने हैं। दैनिक कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों की भी योजना बना लेनी चाहिए।

अधिक भारी कार्य के पश्चात् हल्के कार्य को स्थान देना चाहिए ताकि अधिक थकावट न हो। योजना में अपने व्यक्तिगत तथा मनोरंजन के कार्यों के लिए भी समय रखना चाहिए। योजना इस तरह बनाएं कि प्रतिदिन ज़रूरी कार्यों तथा मनोरंजन के कार्यों में लगभग एक जैसी शक्ति व्यय हो। इस तरह योजनाबद्ध तरीके से कार्य करके शक्ति तथा समय दोनों की बचत हो जाती है।

प्रश्न 3.
रसोई में श्रम व समय की बचत के लिए क्या सामान्य उपाय हो सकते हैं ?
उत्तर :
रसोई में गहिणी को अपेक्षाकृत कम शारीरिक श्रम तथा समय लगे इसके लिए निम्नलिखित उपाय उपयोग में लाये जा सकते हैं –

  1. रसोईघर में या इसके समीप ही जल प्राप्ति के साधन हों, ताकि गृहिणी को पानी के लिए बार-बार रसोईघर के बाहर न जाना पड़े।
  2. प्रत्येक दिन मसाला पीसने में काफ़ी समय और श्रम लगता है। उस बचाव के लिए पिसे हुए मसालों का प्रयोग करना चाहिए।
  3. खाना पकाने में कई मामलों तथा नमक आदि का प्रयोग होता है। रसोई पकाते समय ये सभी चीजें यथासम्भव हाथ के निकट रखी हों, ताकि गृहिणी को बार-बार उठकर उन्हें लाने के लिए भण्डार-घर में न जाना पड़े।
  4. रसोईघर के बेकार पदार्थ, जैसे सब्जी के छिलके, डण्ठल आदि को रखने के लिए खास बर्तन निकट में रखा हो, ताकि उन्हें फेंकने के लिए गृहिणी को बार-बार बाहर न जाना पड़े।
  5. रसोई पकाने में यथासम्भव ऐसे साधनों का प्रयोग करना चाहिए जिनसे कम धुआं निकलता हो। ईंधनों में यथासम्भव उपलों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। साधारण आय के परिवारों के लिए कोयले का उपयोग करना अधिक उपयुक्त होता है।
  6. मैले कपड़ों को साफ करने के लिए गृहिणी को काफी श्रम करना पड़ता है। यदि साफ करने वाले कपड़ों को पहले ही सादे या सोडा मिले गर्म जल में भिगो दिया जाये तो कपड़े आसानी से साफ हो जाते हैं।
  7. गृहिणी को घर की सफाई करने में काफी समय लग जाता है। अतः ध्यान रखना चाहिए कि घर कम-से-कम गन्दा हो जिसके लिए जूतों को कमरे के भीतर नहीं लाना चाहिए तथा घर में प्रवेश करने के पहले पांवदान पर जूते या पैरों को साफ करने के बाद ही कमरे में प्रवेश करना चाहिए।

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प्रश्न 4.
अवकाश काल के लिए विभिन्न प्रकार की क्रियाएं क्या हो सकती हैं ?
उत्तर :
अवकाश-काल में विभिन्न प्रकार की कलात्मक-क्रियाएं क्रियात्मक-क्रिया तथा संग्रहात्मक क्रियाएं की जा सकती हैं। इन क्रियाओं के प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं –
1. कलात्मक क्रियाएं – दिन-प्रतिदिन के कार्यों को करने के पश्चात् अवकाश काल में विभिन्न प्रकार की कलात्मक क्रियाएं गृहिणी के जीवन की नीरसता को दूर कर उसे आनन्द का अनुभव कराती है। इन क्रियाओं से मनोरंजन के साथ-साथ थकान भी दूर हो जाती है। इन क्रियाओं के अन्तर्गत विभिन्न कलाएं, जैसे चित्रकला जिससे कि घर को सजाया जा सकता है, संगीत तथा नृत्यकला–जिससे मनोरंजन हो सकता है, तथा मूर्तिकला आदि आती हैं।

2. क्रियात्मक क्रियाएं – ये क्रियाएं परिवार के सभी सदस्यों के लिए आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से उपयोगी होती हैं उदाहरणार्थ एक गृहिणी, गृह प्रबन्ध सम्बन्धी क्रियाएं अपने अवकाश-काल में कर सकती हैं, जैसे मसाले तथा अनाज साफ करना, अचार-मुरब्बे बनाना, सिलाई-कढ़ाई आदि। इसके अतिरिक्त परिवार के अन्य सदस्य सामुदायिक तथा धार्मिक क्रियाओं, बागबानी, पशुपालन व भ्रमण आदि में अपना समय व्यय कर सकते हैं।

3. संग्रहात्मक क्रियाएं – गृहिणी अपनी रुचि के आधार पर अपने अवकाश-काल में विभिन्न वस्तुओं का संग्रह कर अपना मनोरंजन कर सकती है उदाहरणार्थ विभिन्न देशों के टिकटों का संग्रह, मुद्रा का संग्रह, फूल-पत्तियों तथा पक्षियों के पंखों को एकत्रित करना आदि इसी के अन्तर्गत आते हैं। न केवल गृहिणी वरन् परिवार में बच्चे तथा अन्य सदस्य भी अपनी रुचि के आधार पर इन वस्तुओं को एकत्रित करने का चयन कर सकते हैं।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि गृहिणी को अपनी समय-योजना बनाते समय अवकाश-काल के उपयुक्त उपयोग पर भी अवश्य ध्यान देना चाहिए। उसे अवकाश-काल की योजना बनाते समय यह देखना चाहिए कि उसमें ऐसी क्रियाएं हों जिससे कि उसका मनोरंजन हो तथा इसके साथ ही उसे नई कलाओं में रुचि क्षमता तथा निपुणता बढ़ाने का प्रोत्साहन मिले।

प्रश्न 5.
व्यर्थ में समय नष्ट न होने पाए, इसके लिए गृहिणी को आप क्या संकेत देंगी ?
उत्तर :
एक कुशल गृहिणी के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने घर के काम काज को इस तरह से संभाले कि व्यर्थ में समय नष्ट न होने पाये। समय के अपव्यय को रोकने के लिए निम्नलिखित संकेत प्रत्येक गृहिणी के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकते हैं –
1. समय के अपव्यय को रोकने के लिए सर्वोत्तम विधि यह है कि घर के कार्यों को एक सुनिश्चित योजना के माध्यम से पूरा किया जाये।

2. समय के बचाव के लिए यह आवश्यक है कि काम-काज में आने वाली वस्तुओं को चालू हालत में रखा जाये। यदि सब्जी काटने के लिए प्रयोग में लाये जाने वाले चाकू या छुरी की मूठ टूट गई तो सब्जी काटने में निश्चय ही देर लगेगी। इसी प्रकार यदि स्टोव के लिए प्रतिदिन बाजार से मिट्टी का तेल लाया जायेगा तो समय व्यर्थ में नष्ट होगा। इसी प्रकार से दिन-प्रतिदिन प्रयोग में आने वाली ऐसी बहुत-सी वस्तुएं हैं जिन्हें एक साथ क्रय न करने पर समय और श्रम का व्यर्थ में ही अपव्यय होता है।

3. समय के बचाव के लिए यह भी आवश्यक है कि जिस कार्य को करना हो. उसे करने की विधि भी ज्ञात हो। यदि ऐसा नहीं है तो काम करने में देर ही नहीं लगेगी अपितु वह ठीक प्रकार से सम्पन्न भी न हो पाएगा।

4. प्रत्येक काम मन लगा कर करने से भी समय की बचत होती है। मन लगाकर किया गया कार्य जहां एक ओर समय की बचत कराने में सहायक होता है वहीं दूसरी ओर वह ठीक समय पर पूरा भी हो जाता है।

5. समय की बचत के लिए उन यन्त्रों से भी सहायता लेनी चाहिए जिनके द्वारा कार्य शीघ्रता से सम्पन्न हो जाता है।

6. समय बचाने का सर्वोत्तम साधन तो यह है कि किसी भी कार्य को करते समय अपनी सूझबूझ का पूरा-पूरा लाभ उठाया जाए। उदाहरण के लिये, यदि किसी व्यक्ति को भोजन कराते या चाय पिलाते समय चार-पांच वस्तुएं परोसनी हों तो उन्हें एक-एक करके ले जाने के स्थान पर किसी ट्रे में रखकर एक साथ ले जाना चाहिए।

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प्रश्न 6.
एक गृहिणी को अपने अवकाश काल के सदुपयोग के बारे में आप क्या सलाह देंगे ?
उत्तर :
गृहिणी को प्रतिदिन कई प्रकार के गृह-कार्यों को सम्पन्न करना होता है जिसमें उसका अधिकांश समय लग जाता है। सबह के समय वह काफी व्यस्त होती है, क्योंकि उस समय उसे घर के अधिकांश कार्य करने होते हैं। अगर गृहिणी अपने कार्यों की योजना ठीक प्रकार से बनाये तो वह दोपहर में अवकाश का समय निकाल सकती है, जिसमें वह कुछ आराम कर सकती है तथा साथ ही अपने अवकाश काल में कुछ ऐसी क्रियाएं कर सकती हैं जिससे उसमें नवस्फूर्ति जागृत हो सके और वह पुनः अपने दैनिक कार्यों को सुचारु रूप से चला सके।

‘अवकाश-काल’ वह समय होता है जबकि गृहिणी घर के विभिन्न कार्यों में खाली होती है, तथा ‘अवकाश काल की क्रियाएं’ वे होती हैं जो कि सिर्फ उसके अपने लिए ही ज़रूरी होती हैं। एक गृहिणी अपने लिए कितना-अवकाश काल रखती है यह बहुत सी बातों पर निर्भर करता है उदाहरणार्थ-अगर वह परिवार के विभिन्न सदस्यों या नौकरों आदि से घर के कुछ कार्य करने में मदद ले लेती है तो उसके पास अधिक अवकाश-काल होता है जबकि इसके विपरीत कुछ गृहिणियां जो बाहर भी काम पर आती हैं, या कोई व्यवसाय चलाती हैं तो उन्हें ज्यादा अवकाश-काल नहीं मिल पाता। इसके साथ ही शहर व गांव के जीवन में काफ़ी अन्तर होने के कारण ग्रामीण व शहरी गृहिणियों के अवकाश काल में भी काफी अन्तर पाया जाता है।

अवकाश-काल चाहे कम हो या अधिक गृहिणी इसका उपयोग किसी प्रकार करे। प्रायः देखा जाता है कि अधिकांश गृहिणियां अवकाश-काल को सोने, आराम करने, बात-चीत करने में फिर उपन्यास आदि पढ़ने में ही व्यतीत करती हैं। आजकल की महँगाई के बढ़ते हुए इस युग में, विशेषकर उन गृहिणियों को चाहिए, जिनका कि कार्यक्षेत्र घर की चार-दीवारी तक ही सीमित रहता है कि वह अपने अवकाश काल को कुछ ऐसे उपयोगी कार्यों में लगाएं, जिससे कि वे अपनी पारिवारिक आय को बढ़ाने में भी मदद कर सकें।

गृहिणियां अपनी रुचि व कुशलता के अनुसार अपने अवकाश-काल में कढ़ाई-सिलाई, बागवानी, चित्रकारी, गुड़ियां बनाना आदि कार्य कर सकती हैं। ऐसा करने से वे न केवल अपने परिवार की आय ही बढ़ा सकती हैं, बल्कि जीवन की नीरसता को भी किसी हद तक कम कर सकती हैं। इस प्रकार परिस्थितियों के अनुसार, गृहिणी को चाहिए कि वह अपने अवकाश-काल को इस प्रकार आयोजित करे कि वह आराम के साथ-साथ इस समय को उपयोगी कार्यों में भी लगा सके।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

प्रश्न 7.
ज्ञान को मानवीय साधन के रूप में क्यों देखा जाता है ?
उत्तर :
वैसे तो जो भी व्यक्ति घर की व्यवस्था या प्रबन्ध को चलाए वही गृहप्रबन्धक कहलाता है, परन्तु इसका मुख्य उत्तरदायित्व गृहस्वामिनी अथवा गृहिणी पर ही होता है। घर को उचित ढंग से चलाने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि गृहिणी को घर के सभी कार्यों को सही रीति से करने तथा परिवार के साधनों का उचित उपयोग करने का पूरा ज्ञान हो। गृहिणी को निम्नलिखित कार्यों का ज्ञान तो आवश्यक ही होना चाहिए –

  1. घर को कैसे सजाया जाये।
  2. बच्चों की देख-रेख किस प्रकार की जाए।
  3. सन्तुलित भोजन किस प्रकार का होना चाहिए जिससे परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य ठीक रहे।
  4. खाना बनाने में इस प्रकार की दक्षता होनी चाहिए जिससे खाना बनाने में समय कम लगे और भोज्य पदार्थों की पौष्टिकता बनी रही। साथ ही खाना रुचिकर व स्वादिष्ट भी हो।
  5. खाना पकाने से पहले परिवार के सभी सदस्यों की रुचियों को ध्यान में रखकर योजना बना सके।
  6. बाजार से वस्तुएं खरीदने की कला का ज्ञान होना चाहिए।
  7. उसे ज्ञान होना चाहिए कि क्या खरीदना है, कहां से खरीदना है, कब खरीदना है और कितनी मात्रा में खरीदना है। इस सब के पीछे अर्थ यह है कि खरीददारी में धन का अपव्यय न होकर बचत हो।
  8. गृहिणी को बजट बनाने का ज्ञान भी होना चाहिए जिससे बचत भी हो सके।
  9. बचत किए गए पैसे का सही उपयोग भी अति आवश्यक है, इसके लिए गृहिणी को बैंक आदि में पैसे जमा करवाना तथा आवश्यकता के समय पैसे निकलवाने का ज्ञान भी होना चाहिए।

अत: ज्ञान ऐसा मानवीय साधन है जिसकी सहायता से इसके मानवीय तथा पदार्थाय या भौतिक साधनों में वृद्धि करके पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं।

प्रश्न 8.
सब प्रकार के साधनों की समान विशेषतायें क्या हैं ? वर्णन कीजिए।
अथवा
परिवारिक संसाधनों की विशेषताएं बताएं।
अथवा
साधनों में क्या समानताएँ पायी जाती हैं ?
उत्तर :
विभिन्न प्रकार के साधनों में निम्नलिखित विशेषतायें समान रूप से विद्यमान रहती हैं –
1. सभी साधन सीमित होते हैं सब प्रकार के साधनों की एक मुख्य विशेषता यह है कि ये सभी सीमित होते हैं। यदि उपलब्ध साधन सीमित न हों, तो उनकी व्यवस्था करने की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। वस्तुत: व्यवस्था की आवश्यकता तभी अनुभव होती है जब हमें सीमित साधनों में ही निर्धारित लक्ष्यों तक पहुंचना होता है।

जिस परिवार में जो साधन अधिक सीमित होगा, उस परिवार के लिए वही सबसे महत्त्वपूर्ण होगा जिस परिवार के पास पर्याप्त धन तो उपलब्ध हों परन्तु उसके सदस्यों के पास पर्याप्त समय न हो तो उस परिवार के लिए समय ही महत्त्वपूर्ण साधन होगा। इसके विपरीत ऐसा परिवार जिसके पास धन कम हो, उसके लिए समय की अपेक्षा धन ही महत्त्वपूर्ण साधन होगा। साधनों की सीमितता दो प्रकार की हो सकती है – (क) संख्यात्मक (Quantitative), (ख) गुणात्मक (Qualitative)।

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(क) संख्यात्मक (Quantitative) – वैसे तो सभी साधन सीमित होते हैं, किन्तु इनमें कुछ ऐसे होते हैं जिनकी सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं। उदाहरणार्थ समय एक ऐसा साधन है जिसे पूर्णतः सीमित कहा जा सकता है। संसार के प्रत्येक मनुष्य के लिये एक दिन में चौबीस घंटे होते हैं, न कम और न अधिक। यह बात दूसरी है कि अपनी आवश्यकताओं तथा उपलब्ध सुविधाओं के फलस्वरूप किसी व्यक्ति के पास एक मिनट बात करने के लिए भी समय न हो और किसी व्यक्ति के पास घंटों तक व्यर्थ की बातें करने के लिये समय निकल आये। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के पास धन भी सामान्यतः एक सीमित मात्रा में ही होता है।

(ख) गुणात्मक (Qualitative) – यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि विभिन्न कार्यों को करने के लिये संसार के सभी व्यक्तियों में एक जैसी कार्य-क्षमता एवं प्रतिभा नहीं होती। यह कार्यक्षमता उसकी आयु, लिंग, अवस्था व स्थितियों पर निर्भर करती है। कुछ लोगों में जन्मजात प्रतिभा भी होती है जिसके फलस्वरूप वे प्रत्येक कार्य को अत्यन्त कलात्मक ढंग से अति शीघ्र पूर्ण कर लेते हैं। कई व्यक्तियों में यह प्रतिभा जन्मजात तो नहीं होती किन्तु वे पर्याप्त परिश्रम करके विभिन्न कलाओं में निपुणता प्राप्त कर लेते हैं।

लेकिन जिन व्यक्तियों में कलात्मक अभिरुचि का सर्वथा अभाव होता है, वे चाहे कितना भी प्रशिक्षण क्यों न ले लें किन्तु उनके द्वारा किए गए कार्यों में कलात्मकता आने ही नहीं पाती। यही कारण है कि कुछ परिवार जहां बहुत मामूली फर्नीचर, पर्दे आदि को ऐसे कलात्मक ढंग से सजाते हैं कि वे प्रत्येक व्यक्ति को तुरन्त प्रभावित कर डालते हैं, वहां दूसरी ओर बहुत से लोग कलात्मक अभिरुचि न होने के कारण बहुमूल्य वस्तुओं को भी अत्यन्त फूहड़ ढंग से प्रयोग में लाते हैं।

2. सभी साधनों का परस्पर सम्बन्धित होना – गृह प्रबन्ध एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें सभी साधन चाहे वह भौतिक हों अथवा मानवीय का आपसी गहरा सम्बन्ध होता है। जब कोई गृहिणी अपनी ऊर्जा की उचित व्यवस्था करती है, तो उसके समय की स्वयं ही व्यवस्था हो जाती है। उदाहरणार्थ यदि कोई व्यक्ति कार खरीदना चाहता है, तो उसे या तो मौद्रिक आय में वृद्धि करनी होगी या परिवार की अन्य आवश्यकताओं पर होने वाले व्यय में कटौती करनी होगी।

यदि ऐसा न किया गया तो फिर कार खरीदने के लिए धन कहां से आयेगा ? यदि यह कहा जाये कि परिवार ने कार खरीदने के लिये पहले से ही पैसा एकत्रित कर लिया है तो ऐसा तभी हुआ होगा जब पहले इस कार्य के लिये पैसा इकट्ठा करने के लिये योजना बनाई गई होगी तथा परिवार के अन्य खर्चों में कटौती की गई होगी। मौद्रिक आय में वृद्धि के लिए कई बार गृहिणी या परिवार के अन्य सदस्य अपने मानवीय साधनों का प्रयोग करते हैं तथा मानवीय साधनों के प्रयोग से उन्हें भौतिक साधन प्राप्त होते हैं जिनका उपयोग वह अन्य भौतिक अथवा मानवीय साधनों को क्रय करने के लिए प्रयोग कर सकते हैं।

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3. सभी साधन उपयोगी होते हैं-सभी साधनों की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि वे हमारे जीवन के लिए उपयोगी होते हैं। वास्तव में वस्तु विशेष की उपयोगिता सिद्ध हो जाने के बाद ही उसकी गणना साधन के रूप में की जाती है। उदाहरणार्थ यदि बागवानी का ज्ञान साग सब्जी आदि उगाने में उपयोगी होता है, तो कलात्मक अभिरुचि विभिन्न कार्यों को कलात्मक ढंग से सम्पन्न करने में उपयोगी होती है। इसी प्रकार किसी गृहिणी की नाचने या गाने की कला की गणना तभी साधन के रूप में की जाएगी जब वह अपनी इस कला का उपयोग करेगी अन्यथा यह केवल कला मात्र ही है। इस कला का उपयोग बच्चों के लिए या फिर धन कमाने के लिए किया जा सकता है तथा यह साधन के रूप में प्रयोग की जा सकती है।

4. सभी साधनों की व्यवस्था करना – सभी साधनों की (चाहे वह भौतिक हो या मानवीय) व्यवस्था की जा सकती है। इनकी उचित व्यवस्था करके ही हम उत्तम गृह प्रबन्ध की कल्पना कर सकते हैं। इन साधनों के प्रयोग के लिए सर्वप्रथम उन्हें आयोजित करने की आवश्यकता होती है, जैसे कौन-सा साधन किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रयोग किया जाए। भौतिक आय की व्यवस्था करके ही हम ज्ञात कर सकते हैं कि कोई परिवार कितना भोजन पर, कितना कपड़ों पर तथा कितना अन्य आवश्यकताओं पर व्यय करे।

आयोजन के पश्चात् साधनों का प्रयोग करते समय नियन्त्रण रखना भी अति आवश्यक है जिससे साधनों का दुरुपयोग न हो। सभी साधनों का प्रयोग करने के पश्चात् हमें मूल्यांकन करना चाहिए जिससे हमें ज्ञान हो जाए कि साधनों के प्रयोग से हमारी आवश्यकता की पूर्ति हुई है या नहीं। जैसे धन की व्यवस्था करके जब हम आहार पर व्यय करते हैं और इस व्यय को नियन्त्रित भी रखते हैं तो अन्त में हमें देखना होगा कि मुद्रा के उपयोग से हमारी सन्तुलित आहार पाने की आवश्यकता पूर्ण हुई है अथवा नहीं ! यदि हमारी आवश्यकता पूर्ण नहीं हुई है, तो उसका क्या कारण है जिससे आगामी मास की व्यवस्था करते समय उन कारणों को दूर किया जा सके।

5. सभी साधनों के प्रयोग से लक्ष्य की प्राप्ति-सभी साधनों का प्रयोग, लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। यदि साधन लक्ष्यों की प्राप्ति न करे, तो वह अर्थहीन एवं निरर्थक हो जाते हैं। विभिन्न साधनों का व्यवस्थित उपयोग करके ही हम अपने लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकते हैं। यदि किसी भौतिक वस्तु या मानवीय गुणता के कारण लक्ष्य प्राप्ति न हो, तो हम उन्हें साधन की संज्ञा नहीं दे सकते हैं।

प्रश्न 8. (A)
सभी साधन सीमित होते हैं ? इस कथन का विश्लेषण करें।
उत्तर :
देखें प्रश्न 8 का उत्तर।

प्रश्न 8 (B)
संसाधनों की तीन विशेषताएं बताएं।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 8. (C)
साधनों की सीमितता कितने प्रकार की हो सकती है ? उदाहरण से समझाएँ।
उत्तर :
देखें उपरोक्त प्रश्नों में।

प्रश्न 9.
ज्ञान प्राप्ति किन-किन साधनों द्वारा हो सकती है ?
उत्तर :
कोई भी व्यक्ति निम्न साधनों द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है –

  1. शिक्षा (Education)
  2. अनुभव (Experience)
  3. किताबों, पत्रिकाओं, समाचार-पत्रों, टेलीविज़न आदि द्वारा (From Books, Magazines, Newspapers, T.V. etc.)

1. शिक्षा (Education) – परिवार के सदस्यों की उचित शिक्षा द्वारा (चाहे वह विद्यालय में दी जाए या घर पर दी जाए) मानवीय साधन ज्ञान का विकास किया जाता है। यह व्यक्ति की मानसिक क्षमता एवं बुद्धिमत्ता पर निर्भर करता है कि शिक्षा द्वारा वह कितना ज्ञान प्राप्त करेगा। एक बुद्धिमान् व्यक्ति शिक्षा के माध्यम से अपनी बुद्धि का विकास बहुत तीव्र गति से करता है। इसके विपरीत एक मानसिक रूप से कमजोर व्यक्ति सिखाने पर भी बहुत कम सीखता है। स्कूल में दी गई नियमानुसार शिक्षा तथा घर पर दी गई शिक्षा दोनों का ही महत्त्व एक-दूसरे से कम नहीं है।

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2. अनुभव (Experience) – परिवार का प्रत्येक सदस्य समय-समय पर अनुभवों को ग्रहण करता है तथा इन्हीं अनुभवों की सहायता से वह ज्ञान प्राप्त करता है। जैसे-जैसे आयु की वृद्धि होती है अनुभव बढ़ते रहने से ज्ञान भी बढ़ता रहता है। अनुभवों की कोई चरम सीमा नहीं होती है। अत: जीवन भर प्रत्येक व्यक्ति नाना प्रकार के अनुभवों द्वारा ज्ञान प्राप्त करता रहता है।

3. किताबों, पत्रिकाओं, समाचार – पत्रों, टेलीविज़न आदि द्वारा (From Books Magazines, Newspapers, T.V. etc.) – जिन परिवार के सदस्यों की पढ़ाई में रुचि होती है वह किसी-न-किसी प्रकार की किताब, पत्रिका, समाचार-पत्र आदि पढ़ते रहते हैं और अपने ज्ञान में वृद्धि करते रहते हैं। बच्चों में ज्ञान वृद्धि के लिए यह सामग्री देते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए कि सामग्री उचित हो और वह उनके द्वारा उत्तम ज्ञान को ग्रहण करे। कई बार अनुचित किताबों, पत्रिकाओं आदि का चयन करने के कारण बच्चों को अच्छी आदतों के स्थान पर बुरी आदतें घेर लेती हैं और वह अनुचित ज्ञान प्राप्त करते हैं। आज के युग में टेलीविज़न भी ज्ञान का एक बहुत उपयोगी माध्यम है। टेलीविज़न से बच्चों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई है।

प्रश्न 9 (A)
मानवीय संसाधन कौन-कौन से हैं ? किसी एक मानवीय संसाधन के बारे में लिखिए।
उत्तर :
मानवीय साधन हैं-कुशलता, ज्ञान, शक्ति, दिलचस्पी, रुचि आदि। देखें प्रश्न 9 का उत्तर (ज्ञान एक मानवीय साधन हैं)।

प्रश्न 10.
‘समय-योजना निर्माण के विभिन्न चरणों के बारे में विस्तारपूर्वक लिखिए।
उत्तर :
एक कार्यसाधक समय योजना के बनाने के लिए यह आवश्यक है कि एक गृहिणी अपने सभी परिवार के सदस्यों की सहायता से यह निर्णय कर ले कि कौन-कौन से कार्य प्रतिपादन करने आवश्यक हैं, कौन-कौन से साप्ताहिक कार्य हैं तथा कौन-से ऐसे कार्य हैं जोकि इतने आवश्यक नहीं हैं और आवश्यकता पड़ने पर जिन्हें छोड़ा जा सके। यद्यपि घर के सभी कार्यों को करने के लिए सामान्य रूप के समय स्थिर ही होता है, परन्तु योजना ऐसी होनी चाहिए कि आवश्यकतानुसार उनमें परिवर्तन लाया जा सके।

परिवार के सामूहिक कार्यों के अलावा कुछ अन्य व्यक्तिगत कार्य भी सदस्यों को पूर्ण करने होते हैं, अतः इनके लिए भी निश्चित समय होना चाहिए। इसीलिए समय-योजना बनाते समय इन कार्यों को भी ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि ये भी गृहिणी के समय के उपयोग पर प्रभाव डालती हैं। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि समय-योजना इस प्रकार की होनी चाहिए कि व्यक्तिगत रुचियों और सामूहिक परिवारिक कार्यों के लिए भी समय निकल सके।

समय-योजना निर्माण के चरण (Steps in making a Time Plan) समय योजना का निर्माण पारिवारिक आवश्यकताओं पर निर्भर करता है। सभी परिवारों की परिस्थितियां अलग-अलग होती हैं। इसलिए कभी भी किन्हीं दो परिवारों की समय योजना समान नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ एक परिवार, जिसमें कि छोटे बच्चे हों, उसकी समय-योजना निश्चित रूप से ही उस दूसरे परिवार से भिन्न होगी, जिसमें कि वयस्क सदस्य अधिक होंगे, परन्तु योजना बनाने में विभिन्न चरण सदैव समान रहे हैं। परिस्थितियां चाहे कैसे भी हों, समय-योजना सदा परिवार की आवश्यकताओं के अनुसार ही होनी चाहिए। योजना निर्माण के विभिन्न चरणों का विवरण निम्नलिखित है –

1. इसमें परिवार के विभिन्न दैनिक, साप्ताहिक, वार्षिक या मौसम के अनुसार नियत समय पर किए जाने वाले कार्यों की एक तालिका तैयार कर ली जाती है। उदाहरणार्थ दैनिक कार्यों के अन्तर्गत खाना पकाना, परोसना, बर्तन धोना, बिस्तर लगाना, आराम करना तथा बच्चों की देख-रेख इत्यादि आते हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ कार्य जैसे-इस्त्री करना, कपड़ों की मरम्मत करना, घर की भली प्रकार सफाई करना, कोई विशेष खाना पकाना तथा खरीददारी आदि करना, साप्ताहिक कार्यों के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार घर के रंग-रोगन करवाना एक वार्षिक, तथा सर्दी के मौसम में गर्म कपड़ों को निकालना व उसके पश्चात् उन्हें सम्भालकर रखना मौसम के अनुसार नियत समय पर किए जाने वाले कार्य के उदाहरण हैं।

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2. इसके अन्तर्गत परिवार में दैनिक कार्य, जोकि नियमित रूप से निश्चित समय पर किए जाते हैं, उनकी योजना बना ली जाती है। इन नियमित रूप से किए जाने वाले कार्यों का प्रारूप तैयार करने के बाद ही बाकी योजना बनाई जाती है। प्रतिदिन किए जाने वाले हर कार्य के लिए समय निर्धारित कर दिया जाता है। दैनिक कार्यों के आयोजन के बाद ही साप्ताहिक कार्यों के लिए खाली समय छोड़ दिया जाता है।

3. इस चरण में साप्ताहिक योजना पूरी कर ली जाती है। दैनिक योजना बनाते वक्त जो समय साप्ताहिक कार्यों के लिए छोड़ा जाता है, उसी समय में साप्ताहिक तथा कुछ विशिष्ट कार्यों को स्थान दिया जाता है। कार्यों के लिए समय निर्धारित करते समय गृहिणी को चाहिए कि वह ध्यान रखे कि परिवार की महत्त्वपूर्ण साप्ताहिक आवश्यकताओं को किस दिन व किस समय पूरा किया जा सकता है और साथ ही उसे यह भी देखना चाहिए कि परिवार के सदस्य उस समय उस कार्य को करने के लिए खाली हों।

4. इस अन्तिम चरण में परिवार में सामूहिक चर्चा करके यह निर्णय किया जाता है कि कौन-सा सदस्य क्या कार्य करेगा ? ऐसा करने के लिए परिवार के हर सदस्य के उत्तरदायित्व को स्पष्ट कर दिया जाता है।

समय – आयोजन के क्रियान्वय का नियन्त्रण (Control of Time Activities) समय-योजन के निर्माण के बाद इसको बहुत ध्यानपूर्वक क्रियान्वित करना चाहिए। योजना चाहे मौखिक हो या लिखित, एक अच्छी योजना सदा पथ-प्रदर्शक का काम करती है। एक सफल योजना वही है जोकि अवरोधों के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों में भी कार्य को भली प्रकार सम्पन्न होने में मदद करे।

उदाहरणार्थ अगर कोई आपात्कालीन स्थिति आ पड़े, जैसे कि घर में कोई बीमार हो जाए तो गृहिणी को चाहिए कि कुछ अनावश्यक कार्यों को स्थगित कर दे या फिर अपनी कार्य करने की गति में तीव्रता लाकर सभी कार्यविधियों को योजना के अनुसार ही पूरा करे। गृहिणी अपनी योजना पर नियंत्रण रखने में तभी सफल हो सकती है, अगर वह आपत्-स्थिति में भी न घबराए, अपितु मानसिक स्थिरता के बल पर उनका सामना करे।

समय-योजना का मूल्यांकन (Evaluating Time-Plans) समय-योजनाओं को क्रियान्वित करने के बाद, अन्त मे उसका मूल्यांकन किया जाता है। इससे यह पता लग जाता है कि हमारा कार्य योजना के अनुसार है या नहीं। दिन में सभी कार्य करने के बाद अन्त में गृहिणी को अवश्य ही समय-योजना का मूल्यांकन करना चाहिए जिससे कि वह जान सके कि क्या वह सभी कार्यों को सम्पन्न करने में सफल हुई है या नहीं।

सारे दिन या सप्ताह का कार्य समाप्त करके गृहिणी को योजना का विश्लेषण करते समय यह देखना चाहिए कि क्या योजना व्यवहार युक्त थी ? क्या पारिवारिक आवश्यकताएं इससे पूर्ण हुई हैं ? अगर नहीं, तो असफलता के क्या कारण थे ? इस प्रकार इन सब कारणों को जानकर गृहिणी फिर भविष्य में अधिक सफलता के साथ समय-योजना बना सकती है। एक योजना तभी सफल कहलाई जा सकती है अगर व्यक्तिगत या पारिवारिक लक्ष्यों की प्राप्ति संतोषजनक विधि से हो सके।

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प्रश्न 11.
शक्ति प्रबन्ध (Energy Management) के बारे में चर्चा कीजिए।
अथवा
अपनी ऊर्जा का आप बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग कैसे करेंगे ?
उत्तर :
समय के साथ-साथ शक्ति भी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण मानवीय साधन है। ‘समय’ तथा ‘शक्ति’ आपस में घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित हैं। एक का प्रबन्ध दूसरे पर बहुत प्रभाव डालता है, परन्तु ‘शक्ति प्रबन्ध’ समय के प्रबन्ध की अपेक्षा अधिक कठिन एवं जटिल कार्य है। शक्ति प्रबन्ध में लक्ष्यों का निश्चित होना आवश्यक है तथा इसके साथ ही लक्ष्य उसकी उपलब्ध शक्ति के अनुसार निर्धारित किए जा सकते हैं।

प्रत्येक घरेलू कार्य के लिए विभिन्न प्रकार की शक्ति खर्च होती है-जैसा कि अधिकतर कार्यों के लिए आंखों की शक्ति (Visual effort) खर्च होती है। कोई अन्य कार्य, जैसे सफाई करने, भोजन पकाने, बर्तन साफ करने, टेबल लगाने, कपड़े धोने आदि में ‘शारीरिक शक्ति’, (Manual Effort) खर्च होती है। इसके अतिरिक्त कुछ कार्य, जैसे कि चलने, दौड़ने व खड़े होने के लिए ‘पैरों की शक्ति’ (Pedal Effort), तथा अन्य कई कार्यों जैसे कि पढ़ना-लिखना आदि में ‘मानसिक-शक्ति’ (Mental Effort) खर्च होती है।

इस प्रकार स्पष्ट है कि विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग मात्रा में शक्ति खर्च होती है। यह कहा जा सकता है कि शक्ति का खर्च होना कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है। उदाहरणार्थ-कुछ हल्के कार्य, जैसा गाना सुनना, कढ़ाई करना, स्वेटर बुनना, कपड़ों की हाथ की सिलाई द्वारा मरम्मत करना, फर्नीचर झाड़ना आदि में कम शक्ति का व्यय होता है। कुछ अन्य कार्य, जैसे फर्नीचर पोंछने, इस्त्री करने, चित्रकारी आदि करने में हल्के कार्यों की अपेक्षा अधिक शक्ति खर्च होती है, जबकि तेज़ चलने, नाचने, कपड़े-धोने व सुखाने, आटा पीसने, कुएं से पानी खींचने जैसे भारी कामों में सबसे अधिक शक्ति खर्च करनी पड़ती है।

कार्य की प्रकृति के अलावा, शक्ति का व्यय इस बात पर भी निर्भर करता है कि गृहिणी अपने पारिवारिक जीवन-चक्र के किस सोपान से गुजर रही है। एकाकी परिवार के प्रारम्भिक सोपान में स्त्री को केवल पति-पत्नी, यानी कि दो व्यक्तियों की देखभाल पर ही शक्ति व्यय करनी होती है। दूसरे सोपान में बच्चों के पालन-पोषण का कार्य-भार, गृहिणी की शारीरिक एवं मानसिक शक्तियों पर दबाव डालते हैं।

तीसरे सोपान में, जब बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे होते हैं, गृहिणी अपनी कुछ शक्ति मनोरंजन के कार्यों में व्यय करती है। पारिवारिक जीवन-चक्र के अंतिम सोपान में तो वैसे ही आयु के अनुसार शक्ति क्षीण होने लगती है। इस प्रकार गृहिणी की कार्यक्षमता उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य तथा शारीरिक रचना पर भी निर्भर करती है और किन्हीं दो व्यक्तियों की कार्य क्षमता एक जैसी नहीं होती।

दैनिक कार्यों को ऐसी कुशलता, चतुराई और योजना बद्ध तरीके से करना, जिससे कम से-कम मात्रा में शक्ति के उपयोग से अधिक लाभप्रद कार्यों को सम्पन्न कर सके ‘शक्ति-प्रबन्ध’ कहलाता है। इस प्रकार शक्ति प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य है-किसी भी कार्य के लिए कम-से-कम शक्ति का व्यय करना जिससे कि गृहिणी काम को बिना थकान के ही कर सके। ‘थकान’ या ‘थकावट’-गृहिणी के कार्य करने की विधि से घनिष्ठ रूप से सम्बन्धित है। गृहिणी को चाहिए कि वह अपनी क्रियाओं को इस प्रकार से आयोजित करे जिससे कि वह कुछ समय तथा शक्ति बचत करके परिवार तथा समाज की कई अन्य गतिविधियों में भी भाग ले सके।

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प्रश्न 12.
‘थकान’ क्या है ? यह कितने प्रकार की होती है ? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जब कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक व मानसिक क्षमता से अधिक भारी कार्य करता है तो उसकी शारीरिक व मानसिक शक्ति कम हो जाती है, जिसके फलस्वरूप एक ऐसी स्थिति आ जाती है कि व्यक्ति बिल्कुल भी कार्य नहीं कर पाता, यही स्थिति ‘थकान’ (Fatique) कहलाती है। अत्यन्त सरल परिभाषा के रूप में यह कहा जा सकता है कि अपनी कार्य-क्षमता से अधिक शक्ति का व्यय करने से ‘थकान’ उत्पन्न हो जाती है। थकावट के कारण व्यक्ति कार्य में रुचि नहीं रख पाता।
यदि कोई व्यक्ति ऐसा कार्य करे जिसमें कि उसकी रुचि न हो और वह उसे करने में आनन्द का अनुभव न करे तो भी उसे थकान हो जाती है।
कार्य का ठीक प्रकार से आयोजन न करने से भी थकान की उत्पत्ति होती है। थकान के प्रकार (Type of Fatigue)-थकान दो प्रकार की होती है –
1. शारीरिक थकान (Physiological Fatigue)
2. मानसिक या मनोवैज्ञानिक थकान (Psychological Fatigue)

1. शारीरिक थकान लगातार कार्य करने से शारीरिक शक्ति का ह्रास हो जाता है, और एक स्थिति आती है जिसमें व्यक्ति और कार्य करने के योग्य नहीं रहता। कार्य करते समय शारीरिक मांसपेशियों में ‘ग्लूकोज’ के ऑक्सीकरण से ‘कार्बनडाइ-ऑक्साइड’, ‘जल’ तथा ‘लैक्टिक अम्ल’ उत्पन्न होते हैं। यह ऑक्सीकरण की क्रिया तभी पूर्ण होती है अगर शरीर को ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा मिलती रहे।

ग्लूकोज + ऑक्सीजन → कार्बन-डाइ-ऑक्साइड + जल + लैक्टिक अम्ल।
प्रत्येक कार्य के पश्चात् कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का शरीर से निष्कासन तथा लैक्टिक अम्ल का ऑक्सीकरण होना बहुत ही आवश्यक होता है। साधारण

स्थिति में तो कार्बन डाइ-ऑक्साइड (CO2) मांसपेशियों से रक्त द्वारा फेफड़ों में पहुंचाई जाती है तथा वहां से श्वास क्रिया द्वारा शरीर के बाहर निकाल दी जाती है और इसी प्रकार रक्त फेफड़ों से ऑक्सीजन को मांसपेशियों में पहुँचाता है जिससे कि लैक्टिक अम्ल का दोबारा से ऑक्सीकरण हो जाता है। अगर किन्हीं कारणों से ऑक्सीजन की कमी हो तो यह क्रिया लैक्टिक अम्ल स्थिति पर ही समाप्त हो जाती है और यह लैक्टिक अम्ल रुधिर में एकत्रित हो जाता है, जिससे थकान महसूस होती है। जब व्यक्ति निरंतर कार्य करता है तो ऑक्सीजन की कमी हो जाने से थकान उत्पन्न होती है। इसीलिए इस थकान को कम करने के लिए व्यक्ति को निरंतर कार्य न करते रहकर बीच-बीच में आराम भी करते रहना चाहिए ताकि शरीर को ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में मिलती रहे और उसे थकान भी महसूस न हो। गृहिणी को भी अपने कार्यों का विभाजन इस प्रकार करना चाहिए कि उसे किसी भी प्रकार का कार्य करते हुए थकान का अनुभव न हो।

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2. मानसिक थकान – जीवन में दैनिक कार्यों से उत्पन्न होने वाली थकान में अधिक मात्रा मानसिक थकान की ही होती है। मानसिक थकान से व्यक्ति की कार्यक्षमता कम हो जाती है तथा वह उस कार्य को करने में रुचि नहीं दिखाता। यह दो प्रकार की होती है।

  1. बोरियत से होने वाली थकान (Boredom Fatique)
  2. निराशा से होने वाली थकान (Frustration Fatique)।

1. बोरियत से होने वाली थकान – इस थकान में काम करने की वास्तविक क्षमता में तो कोई परिवर्तन नहीं आता, परन्तु कुछ ऐसे अन्य लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं जो बोरियत पैदा करते हैं, जैसे –

  1. मन का ऊब जाना
  2. बेचैनी का अनुभव होना
  3. मस्तिष्क में भारीपन
  4. काम में रुचि न दिखाना
  5. सोचने-समझने की शक्ति कम हो जाना।

उपरोक्त सभी लक्षणों के कई कारण हो सकते हैं, जैसे कार्य को लम्बी अवधि के लिए करना, काम करने का प्रबन्ध ठीक न होना, काम को उचित समय पर न करना, तथा कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों का होना।

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2. निराशा से होने वाली थकान-इस प्रकार की मनोवैज्ञानिक थकान सामान्यतः व्यक्तिगत कारणों से होती है। उदाहरणार्थ-कार्य करते समय व्यक्ति का सन्तुष्ट न होना कार्य में सफलता प्राप्त करने में कोई संदेह होना, काम पूरा करने में सफल न होना और परिवार के विभिन्न सदस्यों द्वारा सराहना का अभाव होना आदि।

थकान चाहे शारीरिक हो या मानसिक-इसको दूर करना बहुत ही आवश्यक होता है जिससे कि व्यक्ति की कार्यक्षमता पुनः बढ़ सके। थकान दूर रखने के सामान्य उपाय निम्नलिखित हैं –

  1. कार्य के अनुसार व्यक्ति की क्षमता के आधार पर कार्य के बीच में आराम काल का होना आवश्यक है।
  2. व्यक्ति को उत्साहित करना चाहिए। इसके लिए उसके काम की सराहना की जानी चाहिए।
  3. कार्य की प्रकृति में परिवर्तन होना चाहिए, जैसे कि, किसी भारी कार्य के बाद साधारण हल्का कार्य करना। ऐसा करने से व्यक्ति समय तथा शक्ति की बचत कर सकता है।
  4. समय और श्रम बचत के उपकरणों का उपयोग करना चाहिए, जिससे समय तथा श्रम की बचत हो सके और कार्य सरल हो जाए।

प्रश्न 13.
थकान कम करने के कौन-कौन से उपाय हैं ? संक्षेप में बताइये।
उत्तर :
थकान कम करने का सर्वोत्तम उपाय विश्राम है। कोई भी कार्य करते समय यदि बीच-बीच में थोड़ा सा विश्राम कर लिया जाये तो कार्य-क्षमता बढ़ जाती है और काम में भी मन लगता है। किस व्यक्ति के लिए कितने विश्राम की आवश्यकता है यह उस व्यक्ति की शारीरिक रचना तथा कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है। कुछ कार्य तो ऐसे होते हैं जिनमें अन्य कार्यों की अपेक्षा थकान कम होती है। इसी प्रकार कुछ लोगों की प्रकृति क्षमता ऐसी होती है कि वे थोड़े ही विश्राम से अपनी थकान दूर कर लेते हैं, जबकि अन्य व्यक्तियों को अधिक विश्राम की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कार्य के सरलीकरण तथा श्रम बचत के साधनों का उपयोग करने से भी थकान कम होती है। इसके अलावा थकान से बचने के लिए निम्नलिखित साधन व संकेत भी लाभकारी हो सकते हैं –

1. थकान से बचने के लिए कम – से-कम चलना फिरना चाहिए। चलना-फिरना कम करने के लिए घर में सभी आवश्यक तथा समय-समय पर उपयोग में आने वाली वस्तुएं इस प्रकार रखनी चाहिए कि वे समय पर आसानी से मिल सकें तथा उन्हें खोजने के लिए आवश्यक भाग दौड़ न करनी पड़े। ऐसा करने के लिए यह उपयुक्त होता है कि एक प्रकार का सामान एक ही स्थान पर रखा जाए। उदाहरणार्थ सिलाई का सब सामान सिलाई मशीन के साथ ही एक डिब्बे में रखना चाहिए, खाने-पीने का सब सामान किसी एक निश्चित स्थान पर रखना चाहिए, खाना बनाने का सभी सामान रसोई घर में एक ही स्थान पर पास-पास रखना चाहिए। ऐसा करने से न तो ढूंढ़ने में समय ही नष्ट होता है और न इधर-उधर व्यर्थ में भाग दौड़ करनी पड़ती है। भाग-दौड़ न करने पर अनावश्यक थकान बहुत कम होती है।

2. थकान से बचने के लिए यह भी आवश्यक है कि किसी भी कार्य को करते समय अनावश्यक क्रियाओं को हटा देना चाहिए। उदाहरणार्थ यदि किसी अतिथि के आने पर भोजन अथवा चाय परोसनी हो तो सामान लाने के लिए रसोईघर में बार-बार आने-जाने के स्थान पर एक ट्रे में सब वस्तुओं को रख कर ले जाया जा सकता है।

3. थकान से बचने के लिए यह भी आवश्यक है कि एक साथ प्रयोग में आने वाली वस्तुओं को एक स्थान पर रखा जाए, यथा-चाय के डिब्बे में चम्मच, चीनी का डिब्बा चाय के पास ही, सभी मसाले एक साथ ही मसालेदानी में, धुलाई का सभी सामान धुलाई कक्ष में एक अलमारी में रखना चाहिए।

4. थकान से बचने के लिए सही मुद्रा अपनाना भी जरूरी है। गलत मुद्रा में काम करने से थकान जल्दी होती है। उदाहरणार्थ बैठकर भोजन पकाने से अधिक थकान होती है जबकि खड़े होकर भोजन पकाने से थकान कम होती है।

5. थकान से बचाव के लिए ठीक यन्त्रों का उपयोग भी आवश्यक है। श्रम बचत के साधनों के उपयोग से भी थकान बहुत कम होती है।

6. थकान से बचने के लिए खड़े या बैठते समय इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए कि शरीर ऐसी स्थिति में रहे जिससे मांसपेशियों पर अधिक जोर न पड़े।

7. बहुत अधिक चिन्ता करने पर भी थकान हो जाती है। अतः प्रत्येक कार्य प्रसन्नचित्त रह कर करना चाहिए।

8. लगातार एक जैसा कार्य करने के कारण भी कभी-कभी थकान का अनुभव होने लगता है। अत: यह आवश्यक है कि गृहिणी अपने कार्यों का विभाजन इस प्रकार से करे कि कार्य करने से वह थकान का अनुभव न करे।

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प्रश्न 14.
कार्य सरलीकरण को परिभाषित कीजिए तथा मण्डल द्वारा दिये गए सिद्धान्तों का संक्षिप्त विवरण दीजिए।
उत्तर :
आज के इस नवीन युग में जबकि अधिकतर गृहिणियां घर की कार्य विधियों के साथ-साथ बाहर भी काम पर जाती हैं, कार्य-सरलीकरण (Work Simplification) बहुत ही आवश्यक है। ‘निर्धारित समय और शक्ति की मात्रा के उपयोग से अधिक कार्य सम्पादित करना’ अर्थात् ‘कार्य की निश्चित मात्रा को कम करने की प्रक्रिया’ को ही कार्य सरलीकरण कहा जाता है। कार्य के सरलीकरण में समय और शक्ति दोनों के प्रबन्ध को मिला दिया जाता है।

कार्य के सरलीकरण के विभिन्न तरीकों को एम० एच० मण्डल (M.H. Mandel) ने पांच वर्गों में विभाजित किया है।

1. हाथ और देह की गतियों में परिवर्तन – कार्य-सरलीकरण का सबसे आसान तरीका हाथ और देह की गतियां कम करना है। कार्य करते समय बैकार की गतियों को हटा देना चाहिए। ऐसा करने से समय तथा श्रम की बचत की जा सकती है। उदाहरणार्थ बर्तनों को रसोईघर में उसी क्रम से लगाना, जिस क्रम में उनका प्रयोग किया जाना हो, बर्तन धोने के बाद खुली हवा में रखकर सुखा लेना, जिससे उन्हें पोंछने की आवश्यकता न पड़े, खाना परोसते समय सभी पात्रों को ट्रे में रखकर ले जाना आदि।

इसी प्रकार रसोईघर में काम करते समय सभी उपकरण तथा खाना पकाते समय प्रयोग में लाया जाने वाला सामान, कार्य-स्थल के पास ही होना चाहिए, जैसे सब्जी बनाते समय मसालों का डिब्बा आदि। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि प्रबन्ध ऐसा होना चाहिए जिससे कि किसी भी काम को करने के लिए शारीरिक गतियां कम हों जिससे कार्य का भी सरलीकरण हो सके।

2. कार्य-स्थल एवं उपकरण में परिवर्तन – समय तथा श्रम की बचत तभी हो सकती है अगर संग्रह तथा कार्य-स्थल भी भली प्रकार से आयोजित किए जाएं, जैसे कि बर्तन धोने के स्थान का आयोजन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि साफ बर्तनों को बेसिन (Sink) के बाईं तरफ रखा जाए। इससे गृहिणी सरलता से कार्य कर सकती है तथा श्रम भी कम व्यय होता है। इसके साथ ही कार्य-स्थल की ठीक ऊंचाई होना भी बहुत आवश्यक है।

उपकरणों को इस तरह से क्रम में रखना चाहिए कि उनको उठाते समय कम समय व श्रम व्यय हो। हल्की वस्तुओं को अलमारी में ऊपर के खानों तथा भारी वस्तुओं को नीचे रखना चाहिए। जिससे उन्हें प्रयोग करते समय अधिक कठिनाई न हो। सही प्रकार के उपकरण प्रयोग में लाए जाएं तो इससे कार्य सीमित समय में पूर्ण हो जाता है। उदाहरणार्थ पतीले के स्थान पर प्रैशर-कुकर का प्रयोग करना, सब्जियां छीलने के लिए ‘पीलर’ (Peelers) का प्रयोग करना आदि। इसी प्रकार समय व श्रम बचत उपकरणों, जैसे मिक्सी, ग्राइंडर, कपड़े धोने की मशीन आदि के प्रयोग से भी गृहिणी समय व श्रम की बचत कर सकती है।

3. कार्य के क्रम में परिवर्तन – विभिन्न घरेलू क्रियाओं की योजना इस प्रकार से करनी चाहिए कि कार्य काफी सुगमता से हो सके। किसी भी कार्य को करने के लिए सबसे सरल तथा छोटा तरीका अपनाना चाहिए, जिससे समय व श्रम की बचत की जा सके। एक प्रकार का कार्य करते हुए अचानक ही दूसरा कार्य शुरू कर देने से कार्य करने की वह गति नहीं रहती तथा अधिक थकान होती है।

उदाहरणार्थ – सफाई करते समय अगर सर्वप्रथम एक कमरे में की सभी वस्तुओं को झाड़ा जाए, फिर उसके फर्श को झाड़ दी जाए तथा अन्त में उसी कमरे में पोंछा लगाया जाए, तथा फिर दूसरे कमरे में भी इन सभी क्रियाओं को इसी क्रम से दोहराया जाए तो कार्य इतनी सरलता से नहीं हो पाता। इसके विपरीत अगर सभी कमरों की सभी वस्तुओं को पहले झाड़-पोंछ की जाए फिर सब कमरों में झाड़ दी जाए तथा अन्त में पोंछा लगाया जाए, तो कम समय लगता है, क्योंकि ऐसा करने से काम की एक ही गति बनी रहती है जिससे कम थकान का अनुभव होता है। इस प्रकार कार्य को सरल बनाने के लिए कार्य करने की विधि में भी परिवर्तन लाना बहुत आवश्यक होता है।

4. कच्ची सामग्री के प्रयोग में परिवर्तन – वैज्ञानिक आविष्कारों के फलस्वरूप आजकल बाज़ार में अनेकों वस्तुएं उपलब्ध हैं जिनके प्रयोग से कार्य सरल बनाया जा सकता है। अपने परिवार के रहन-सहन के स्तर के आधार पर एक गृहिणी इन वस्तुओं का प्रयोग कर सकती है। पुराने समय में गृहिणी को स्वयं घर में आटा, दाल, बेसन व मसाले आदि पीसने में काफी समय लगता था, परन्तु आजकल बाजार में ये चीजें पीसी पिसाई ही मिलती हैं।

यह नहीं आजकल बाजार में कई व्यंजन बनाने के लिए कुछ हद तक तैयार सामग्री (Readymade Mixtures) भी उपलब्ध हैं-जिनके प्रयोग से समय व श्रम की बचत हो सकती है। उदाहरणार्थ-इडली, डोसा, गुलाबजामुन आदि बनाने के लिए बाजार में कई प्रकार के तैयार सूखे मिश्रण उपलब्ध हैं जिनके प्रयोग से गृहिणी समय की बचत कर कार्य को सरलता से करने में सफल होती है।

5. तैयार सामग्री में परिवर्तन – कच्ची सामग्री में परिवर्तन के साथ तैयार सामग्री की प्रकृति बदलकर भी समय व श्रम की बचत की जा सकती है। उदाहरण के लिए एक गृहिणी घर में अधिक मेहमान आ जाने पर चपाती के स्थान पर पूरी या चावल परोस सकती है जिन्हें बनाने में चपाती की अपेक्षा कम समय लगता है। यहां पर और भी कई उदाहरण दिए जा सकते हैं-अगर परिवार में ज्यादा छोटे बच्चे नहीं हों, तो गृहिणी के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह हर कमरे की प्रतिदिन सफाई करे। जो कमरे प्रतिदिन प्रयोग में लाये जाते हैं-उनको रोज़ साफ किया जा सकता है और बाकी कमरों को हफ्ते में दो या तीन बार।

सूती या अन्य कपड़े के बने टेबल मैट के स्थान पर प्लास्टिक या चटाई के मैट का प्रयोग करना, ताकि प्रयोग तथा सफाई आदि करने में आसानी रहे। हालांकि ‘मण्डल’ के कार्य सरलीकरण के ये पांच वर्ग काफी प्रचलित हैं, परन्तु “ग्रास वक्रैन्डल” ने इन ‘पांच वर्गों’ का संक्षिप्तीकरण करके उन्हें ‘तीन वर्गों में विभाजित किया है, जो इस प्रकार हैं –

  1. देह की गतिविधियों परिवर्तन (Changes in the activities of the body)
  2. घर के वातावरण में परिवर्तन जैसे कि कार्य स्थल एवं उपकरण में परिवर्तन
  3. उत्पादन में परिवर्तन-यानी ‘कच्ची’ तथा ‘तैयार’ सामग्री में परिवर्तन (Changes in the product)

इस प्रकार विभिन्न विधियों का उपयोग करके गृहिणी कार्य का सरलीकरण कर सकती है। इसके अतिरिक्त गृहिणी कार्य को अधिक रुचिकर बनाकर तथा उसमें निपुण होने से भी कार्य को सरल बना सकती है। कार्य करने के साथ-साथ पर्याप्त अवधि के आराम काल की योजना से भी गृहिणी थकान से बच जाती है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ‘कार्य-सरलीकरण’.-समय तथा श्रम की बचत के साथ-साथ अच्छा कार्य करने में भी सहायक है।

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प्रश्न 15.
कार्य-सरलीकरण क्या है ? रसोईघर के कार्यों का आप किस प्रकार सरलीकरण करेंगी ?
उत्तर :
कार्य-सरलीकरण क्या है ? देखें उपरोक्त प्रश्न के उत्तर का सम्बन्धित अंश।
रसोईघर में कार्य-सरलीकरण-पाकक्रिया से संबद्ध कार्यों के सम्पादन में गति, समय एवं पाक-प्रणाली का अध्ययन म्यूज, आर्मस्ट्रॉग, हेनरी, लिंडमैन, ग्रॉस आदि व्यक्तियों ने किया। इन लोगों ने तीन बुनियादी प्रकार के रसोईघरों की व्यवस्था तथा उपकरणों में परिवर्तन कर रसोईघर की व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन किया।

रसोईघर की स्थिति तथा रसोईघर में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों के आधार पर निष्कर्ष निकाले गये तथा निष्कर्ष के आधार पर निम्नलिखित सुझाव हैं –

  1. सब्जियां छीलते समय पीलर (Peelar) तथा काटते समय नोंक वाली छुरी या चाकू का व्यवहार करें।
  2. सब्जियों को मथने के लिए मैशी (Mashee) को प्रयुक्त करें।
  3. सब्जियों को धोने के लिए बड़े पात्र का प्रयोग करें तथा अधिक जल लें।
  4. काम शुरू करने के पूर्व सभी सामानों को गैस, स्टोव या चूल्हे के पास रख लें। इससे चलने की कम आवश्यकता होती है।
  5. हाथ से चलाने वाले तथा मिश्रण करने वाले उपकरणों के स्थान पर विद्युत् द्वारा चालित उपकरणों के प्रयोग से समय की बचत होती है।
  6. रसोईघर में पहियों वाली ट्रे का उपयोग करने के गृहिणी को चलने फिरने में सुविधा रहती है।
  7. रसोईघर तथा भंडार में वस्तुओं को संग्रह करने के लिए अधिक संख्या में अलग अलग खाने (Shelves) तथा अलमारियां बनानी चाहिए।
  8. अलमारियां तथा खाने (Shelves) पास-पास हों ताकि सामानों को निकालने एवं रखने में अधिक न चलना पड़े
  9. उपकरणों की कार्य-केन्द्र के आधार पर व्यवस्था करने से अधिक चलना नहीं पड़ता है और इस तरह समय एवं शक्ति की बचत होती है।
  10. काम करते समय दोनों हाथों का व्यवहार करना चाहिए।
  11. भोजन तालिका में परिवर्तन लाकर पाकक्रिया सहज बनाई जा सकती है।

रसोईघर की व्यवस्था उपयुक्त ढंग से रहने पर कम भाग-दौड़ करनी पड़ती है। अतः पाक-कक्ष में परिवर्तन लाकर कार्यों का सरलीकरण किया जा सकता है। इसके लिए कुछ सुझाव प्रस्तुत हैं –

  1. रसोईघर को आई-आकारगत (I-shaped), एल-आकारगत (L-shaped), यू आकारगत (U-shaped) अथवा समानान्तर दीवार वाले (Parallel wall) रसोईघर के रूप में व्यवस्थित करें।
  2. रसोईघर में सबसे अधिक चूल्हा और सिंक, सिंक और बर्तन रखने के स्थान और खाने की मेज के बीच चलना पड़ता है। अतः चूल्हे और सिंक के बीच की दूरी अधिक नहीं होनी चाहिए। सिंक और बर्तन रखने का स्थान पास-पास होना चाहिए।
  3. सब्जियों-फलों को काटने, चावल, दाल बीनने तथा आटा गूंथने के निमित कार्य क्षेत्र चूल्हे तथा सिंक के पास होना चाहिए।
  4. भण्डार व्यवस्था रसोईघर में ही होनी चाहिए।
  5. पाकक्रिया में प्रयुक्त होने वाली सामग्री को चूल्हे के पास रखें तथा बनाने वाले पात्रों एवं उपकरणों को भी पास ही रखें।
  6. पका हुआ भोजन खाने की मेज तक पहुंचाने में बड़ी ट्रे या ट्राली (Trolly) का व्यवहार करें।
  7. पाकक्रिया में प्रयुक्त होने वाले उपकरणों को अच्छी व्यवस्था में गैस स्टोव या चूल्हे के पास सजाकर रखें।
  8. बर्तन धोने का सिंक ऊंचाई पर रखें। गहरे सिंक में पानी निकलने का छिद्र ढक्कन से बन्द कर देने पर एक साथ अधिक बर्तन धोए जा सकते हैं।

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प्रश्न 16.
परिवार के मानवीय संसाधनों का वर्णन करें।
उत्तर :
मानवीय संसाधन इस प्रकार से हैं-ज्ञान, कौशल, योग्यता, ऊर्जा, अभिरुचि आदि।
1. ज्ञान – ज्ञान अथवा शिक्षा व्यक्ति के दिमाग में होता है जिसे आवश्यकता पड़ने पर प्रयोग किया जा सकता है। यह किसी व्यक्ति विशेष के पास मरते दम तक रहता है। ज्ञान के प्रयोग से धन भी कमाया जा सकता है जैसे अध्यापक, वकील, सी० ए० आदि अपने ज्ञान के बल पर धन अर्जित करते हैं।

2. ऊर्जा – ऊर्जा को शक्ति भी कहते हैं। यह प्रत्येक व्यक्ति के पास उसकी डील डौल शरीर तथा सोच पर निर्भर है। यह व्यक्ति विशेष का अंश होती है। जिनका मानसिक ऊर्जा का स्तर ऊँचा होता है वे कमज़ोर शरीर के रहते भी अधिक कार्य कर लेते हैं। यदि ऊर्जा का उपयोग योजनाबद्ध ढंग से किया जाए तो अधिक कार्य किया जा सकता है। एकदम से बहुत कार्य करने से ऊर्जा की क्षति होती है तथा थकावट हो जाती है।

3. योग्यता – किसी भी कार्य को कशलता से करने के सामर्थ्य को योग्यता कहते हैं। जैसे कुशल गृहिणी रोटी को पूरी तरह गोल बना लेती है। यह योग्यता अभ्यास द्वारा प्राप्त की जाती है। योग्यता भी मानवीय संसाधन है।

4. अभिरुचि – यह मनः स्थिति है जो हमें किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती है या रोकती है। कई बार कई कार्य करने से हमें आनन्द मिलता है तथा जोश पूर्ण होता है। इसी प्रकार कई बार कार्य करते हुए हम बोरियत महसूस करते हैं।

प्रश्न 17.
कार्य सरलीकरण के तीन सिद्धान्त बताएं।
उत्तर :
देखें प्रश्न 14 का उत्तर।

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प्रश्न 18.
शक्ति प्रबन्ध से आप क्या समझते हैं ? शक्ति प्रबन्ध का मुख्य उद्देश्य क्या है ?

उत्तर :
देखें प्रश्न 11 का उत्तर।

प्रश्न 19.
शारीरिक थकान क्या होती है ? यह कैसे दूर की जा सकती है ?
उत्तर :
देखें प्रश्न 12, 13 का उत्तर।

एक शब्द/एक वाक्य वाले प्रश्न –

(क) एक शब्द में उत्तर दें –

प्रश्न 1.
संसाधन कितने प्रकार के होते हैं ?
उत्तर :
दो।

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प्रश्न 2.
भूमि कैसा संसाधन है ?
उत्तर :
मानवेतर।

प्रश्न 3.
ज्ञान कैसा संसाधन है ?
उत्तर :
मानवीय।

प्रश्न 4.
कौन-सा संसाधन सभी के पास एक जैसा होता है ?
उत्तर :
समय।

प्रश्न 5.
कपड़े धोने के लिए ऊर्जा, कौशल के इलावा कौन-सा संसाधन चाहिए ?
उत्तर :
समय।

प्रश्न 6.
एक भौतिक साधन का उदाहरण दें।
उत्तर :
धन।

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प्रश्न 7.
निपुणता कैसा संसाधन है ?
उत्तर :
मानवीय।

प्रश्न 8.
थकान कितने प्रकार की होती है ?
उत्तर :
दो।

प्रश्न 9.
सभी के पास कितना समय है ?
उत्तर :
24 घण्टे प्रतिदिन।

प्रश्न 10.
अस्पताल, स्कूल कैसी सुविधा है ?
उत्तर :
सामुदायिक सुविधाएं।

(ख) रिक्त स्थान भरो –

1. ज्ञान ………… संसाधन है।
2. ………… भौतिक वस्तु है।
3. कार्य किसी ………….. की प्राप्ति के लिए किया जाता है।
4. कार्य सरलीकरण द्वारा हम ………… और ………….. की बचत कर सकते हैं।
5. अनुभव से …………… प्राप्त होता है।
उत्तर :
1. मानवीय
2. धन
3. उद्देश्य
4. समय, शक्ति
5. ज्ञान।

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(ग) निम्न में ठीक अथवा गलत बताएं –

1. थकान मानसिक तथा शारीरिक होती हैं।
2. रसोईघर के समीप ही पानी होना चाहिए।
3. आराम करके हम ऊर्जा का पुन: संचार करते हैं।
4. सभी संसाधन सीमित हैं।
उत्तर :
1. ठीक
2. ठीक
3. ठीक
4. ठीक

बहु-विकल्पीय प्रश्न –

प्रश्न 1.
संसाधन कितने प्रकार के होते हैं ?
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर :
दो।

प्रश्न 2.
हर व्यक्ति के जीवन में कोई-न-कोई ………. होता है
(A) संसाधन
(B) लक्ष्य
(C) ऊर्जा
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर :
लक्ष्य।

प्रश्न 3.
हमारे पास दिन में कितने घण्टे होते हैं ?
(A) 8
(B) 12
(C) 24
(D) 16.
उत्तर :
24.

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प्रश्न 4.
निम्न में मानवीय संसाधन है –
(A) समय
(B) कम्प्यू टर
(C) पुस्तकें
(D) ज्ञान।
उत्तर :
ज्ञान।

प्रश्न 5.
घर पर रेडियो सुनने के लिए निम्न संसाधन चाहिए
(A) समय
(B) धन
(C) भूमि
(D) कौशल।
उत्तर :
समय।

प्रश्न 6.
सामुदायिक सुविधाएं हैं –
(A) अस्पताल
(B) स्कूल
(C) पार्क
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर :
उपरोक्त सभी।

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प्रश्न 7.
थकान के प्रकार हैं –
(A) एक
(B) दो
(C) तीन
(D) चार।
उत्तर :
दो।

प्रश्न 8.
कार्य के सरलीकरण के विभिन्न तरीकों को एम० एच० मण्डल ने कितने वर्गों में बांटा है ?
(A) एक
(B) तीन
(C) पांच
(D) छः।
उत्तर :
पांच।

प्रश्न 9.
किस साधन के प्रयोग से हम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं ?
(A) ऊर्जा
(B) कौशल एवं योजना
(C) ज्ञान
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
ऊपरलिखित सभी।

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प्रश्न 10.
कार्य किसी ………… की पूर्ति के लिए किया जाता है –
(A) उद्देश्य
(B) मूल्य
(C) ऊर्जा
(D) समय।
उत्तर :
उद्देश्य।

प्रश्न 11.
संसाधन कितने प्रकार के होते हैं ?
(A) चार
(B) तीन
(C) दो
(D) पांच।
उत्तर :
दो।

प्रश्न 12.
कौन-सा मानवीय साधन का उदाहरण नहीं है ?
(A) ऊर्जा
(B) समय
(C) ज्ञान
(D) भौतिक वस्तुएँ।
उत्तर :
भौतिक वस्तुएँ।

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प्रश्न 13.
कार्य सरलीकरण के द्वारा हम ………. की बचत कर सकते हैं –
(A) समय
(B) शक्ति
(C) समय और शक्ति
(D) धन।
उत्तर :
समय और शक्ति।

प्रश्न 14.
आराम करके हम ………. का पुनः संचार कर सकते हैं –
(A) ऊर्जा
(B) समय
(C) बुद्धि
(D) धन।
उत्तर :
ऊर्जा।

प्रश्न 15.
एक ऐसे साधन का नाम बताओ जो हर एक व्यक्ति के पास समान मात्रा में उपलब्ध है –
(A) धन
(B) समय
(C) ऊर्जा
(D) ज्ञान।
उत्तर :
समय।

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प्रश्न 16.
किस साधन के प्रयोग से हम धन कमा सकते हैं ?
(A) ज्ञान
(B) कौशल एवं योग्यता
(C) ऊर्जा
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
ऊपरलिखित सभी।

प्रश्न 17.
समय और शक्ति के खर्च को कैसे कम किया जा सकता है।
(A) योजनाबद्ध ढंग से
(B) धीरे-धीरे काम करके
(C) आराम करके
(D) सो कर।
उत्तर :
योजनाबद्ध ढंग से।

प्रश्न 18.
ऐसा कौन-सा साधन है जिसका प्रयोग कोई अन्य व्यक्ति नहीं कर सकता ?
(A) ज्ञान
(B) धन
(C) जायदाद
(D) सार्वजनिक सुविधाएं।
उत्तर :
ज्ञान।

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प्रश्न 19.
कपड़े धोने में किस साधन का प्रयोग होता है ?
(A) समय
(B) ऊर्जा
(C) कौशल
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
ऊपरलिखित सभी।

प्रश्न 20.
पार्क व डाक-तार सेवा परिवार के किन संसाधनों के अन्तर्गत आते हैं ?
(A) भौतिक साधन
(B) मानवीय साधन
(C) मानवीय और भौतिक साधन
(D) कोई भी नहीं।
उत्तर :
भौतिक साधन।

प्रश्न 21.
ज्ञान प्राप्ति किन साधनों द्वारा की जा सकती है ?
(A) शिक्षा
(B) अनुभव
(C) किताबें और पत्रिकाएँ
(D) ऊपरलिखित सभी।
उत्तर :
ऊपरलिखित सभी।

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प्रश्न 22.
संसाधनों के दो प्रकार निम्न में से कौन-कौन-से हैं ?
(A) मानवीय व समय
(B) मानवीय व अमानवीय ।
(C) भौतिक व धन
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर :
मानवीय व अमानवीय।

प्रश्न 23.
कौन-सा मानवीय संसाधन का उदाहरण नहीं है ?
(A) समय
(B) ज्ञान
(C) ऊर्जा
(D) घरेलू उपाय।
उत्तर :
घरेलू उपाय।

प्रश्न 24.
निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही नहीं है ?
(A) सभी साधन उपयोगी होते हैं
(B) सभी साधनों के प्रयोग से लक्ष्यों की प्राप्ति होती है
(C) सभी साधन सीमित होते हैं
(D) संसाधन परस्पर सम्बन्धित नहीं होते।
उत्तर :
संसाधन परस्पर सम्बन्धित नहीं होते।

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में से कौन-सा मानवीय संसाधन का उदाहरण नहीं है ?
(A) समय
(B) ऊर्जा
(C) ज्ञान
(D) धन।
उत्तर :
धन।

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प्रश्न 26.
कपड़े धोने में किस संसाधन की आवश्यकता नहीं होती ?
(A) समय
(B) ऊर्जा
(C) कौशल
(D) सार्वजनिक सुविधाएँ।
उत्तर :
सार्वजनिक सुविधाएँ।

प्रश्न 27.
निम्नलिखित में से कौन-सा मानवीय संसाधन का उदाहरण है ?
(A) धन
(B) भूमि (जायदाद)
(C) सामुदायिक सुविधाएँ
(D) ज्ञान।
उत्तर :
ज्ञान।

प्रश्न 28.
मानवीय संसाधन व्यक्तियों की……..क्षमताएं तथा विशेषताएँ होती हैं।
(A) व्यक्तिगत
(B) सामूहिक
(C) मानसिक
(D) इनमें से कोई भी नहीं।
उत्तर :
व्यक्तिगत।

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प्रश्न 29.
………………….. भौतिक संसाधन नहीं है।
(A) ऊर्जा
(B) भूमि
(C) धन
(D) सामुदायिक वस्तुएं।
उत्तर :
ऊर्जा।

प्रश्न 30.
ज्ञान की प्राप्ति किन साधनों द्वारा की जा सकती है ?
(A) शिक्षा
(B) अनुभव
(C) किताब व पत्रिकाएं
(D) उपरिलिखित सभी।
उत्तर :
उपरिलिखित सभी।

परिवार के संसाधन HBSE 10th Class Home Science Notes

ध्यानार्थ तथ्य :

→ हर किसी के जीवन का कोई न कोई लक्ष्य (aim) होता है।

→ व्यक्ति अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने का निरन्तर प्रयास करता है।

→ अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कई चीजों की आवश्यकता होती है।

→ लक्ष्य प्राप्ति में प्रयुक्त सभी चीज़ों को संसाधन कहते हैं।

→ संसाधन दो प्रकार के होते हैं-मानवीय व मानवेतर।

→ मानवीय संसाधन व्यक्तियों की व्यक्तिगत क्षमताएँ तथा विशेषताएँ होती हैं। अर्थात् वह व्यक्ति विशेष का अपना अंश होते हैं तथा उनका प्रयोग केवल वही व्यक्ति कर सकता है।

→ मानवीय संसाधनों के उदाहरण हैं-ऊर्जा (Energy), समय (Time), ज्ञान (Knowledge) तथा कौशल व योग्यताएँ (Skills and abilities)।

→ मानवेतर संसाधन वे होते हैं जो हर किसी के प्रयोग के लिए उपलब्ध होते हैं जैसे-धन।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

→ मानवेतर संसाधनों के उदाहरण हैं –

  • भूमि (land)
  • धन (money)
  • भौतिक वस्तुएँ
  • सामुदायिक सुविधाएँ (Community Facilities)

→ ऊर्जा-हर काम को करने के लिए हमें ऊर्जा चाहिए। बिना ऊर्जा के कार्य करना असम्भव है।

→ जब हम कार्य करने के पश्चात् थक जाते हैं तो इसका अर्थ है कि हमारी ऊर्जा खत्म हो गई है।

→ आराम करके हम ऊर्जा का पुनः संचार करते हैं। ऊर्जा बचा कर नहीं रखी जा सकती है।

→ समय-हमारे पास दिन के केवल 24 घण्टे ही हैं। अतः समय का सदुपयोग करना आवश्यक है।

→ हम एक दिन में कितना काम करते हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम समय का सदुपयोग कितना करते हैं।

→ ऊर्जा की तरह समय को भी बचाकर नहीं रखा जा सकता।

→ ज्ञान-जीवन में अनेक चीजों का ज्ञान प्राप्त करना अति आवश्यक है।

→ ज्ञान द्वारा ही हम अपने सभी कामों को कर सकते हैं। यह एक ऐसा संसाधन है जिसे आप बांट तो सकते हैं परन्तु अपना लक्ष्य प्राप्त करने के लिए केवल आप ही इसका उपयोग कर सकते हैं।

→ कौशल व योग्यताएँ – यह भी व्यक्ति विशेष का अपना अंश है और व्यक्ति स्वयं ही उनका प्रयोग कर सकता है।

→ कोई व्यक्ति कौशल सीख सकता है और निरन्तर अभ्यास द्वारा उसे सुधार भी सकता है।

→ कोई भी कौशल सीखने के पश्चात् व्यक्ति ही उसका इस्तेमाल कर सकता है।

→ कौशल द्वारा हम धन की बचत कर सकते हैं।

→ धन-यह एक ऐसा संसाधन है जिसे हम तब इस्तेमाल करते हैं जब हमारा लक्ष्य है कुछ खरीदना। इसके अलावा हम इस संसाधन को दूसरे को भी प्रयोग करने के लिए दे सकते हैं।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

→ संसाधन के रूप में धन सीमित है। अतः असीमित आवश्यकताओं को सीमित धन से पूरा करना पड़ता है।

→ भूमि-भूमि का प्रयोग अनेक प्रकार से कर सकते हैं जैसे मकान बनाना, सब्जियाँ उगाना आदि। यदि आवश्यकता हो तो उसे बेचकर धन कमाया जा सकता है।

→ भौतिक वस्तुएँ-इसका अर्थ है वे चीजें जिनका हम दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं। जैसे-मेज, चारपाई आदि। इन चीज़ों के इस्तेमाल से हमारा काम आसान हो जाता है।

→ सामुदायिक सुविधाएँ-ये सुविधाएँ समुदाय या सरकार द्वारा दी जाती हैं। इन्हें सार्वजनिक प्रयोग में लाया जाता है। जैसे-~~पार्क, स्कूल, अस्पताल, खेल का मैदान आदि।

→ सभी संसाधन उपयोगी हैं-चूंकि सभी संसाधन हमें अपना लक्ष्य प्राप्त कराने में मदद करते हैं अत: यह सभी उपयोगी हैं। ये हमारी लक्ष्य प्राप्ति के सहायक हैं और हमें इन्हें बर्बाद नहीं करना चाहिए।

→ सभी संसाधन सीमित हैं-हमारी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए जो संसाधन उपलब्ध हैं वे सभी सीमित हैं। सीमित संसाधनों को असीमित आवश्यकताओं को पूरा करना पड़ता है अतः इनका प्रयोग बड़े ध्यान से करना चाहिए।

→ सभी संसाधनों का परस्पर अर्थात् आपस में सम्बन्ध होता है- इसका अर्थ है कि संसाधन एक-दूसरे से जुड़े हैं। जैसे यदि गृहिणी के पास धन, समय और ऊर्जा तो है खाना पकाने के लिए, पर कौशल नहीं है तो वह खाना नहीं पका सकती। अतः संसाधन इस तरह आपस में जुड़े हैं कि एक के बिना दूसरे का कोई आस्तित्व नहीं है।

→ जैसा कि हम जानते हैं कि संसाधन सीमित होते हैं अत: आपको यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि कोई संसाधन बेकार न जाए चाहे फिर व मानवीय है या मानवेतर। आप संसाधनों का तभी अधिक-से-अधिक प्रयोग कर सकते हैं जब आप उन्हें बर्बादी से बचाएंगे।

→ परिवार के उद्देश्यों तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपलब्ध साधनों की सहायता ली जाती है।

→ पारिवारिक साधनों को दो भागों में बांटा गया है –

  • मानवीय साधन
  • भौतिक साधन।

→ कार्य करने की कुशलता, ज्ञान, शक्ति, समय, दिलचस्पी, मनोवृत्ति तथा रुचियां आदि मानवीय साधन हैं।

→ धन, सामान, जायदाद, सुविधाएं आदि गैर-मानवीय अथवा भौतिक साधन हैं।

→ समय ऐसा साधन है जो सभी के लिए बराबर होता है।

→ समय को तीन भागों में बांटा जा सकता है-कार्य, विश्राम, नींद आदि।

→ विभिन्न व्यक्तियों में शक्ति भी अलग-अलग होती है तथा एक ही व्यक्ति में सारी उम्र एक जैसी शक्ति नहीं रहती।

HBSE 10th Class Home Science Solutions Chapter 4 परिवार के संसाधन

→ जब किसी कार्य को करने के लिए समय तथा शक्ति का प्रयोग किया जाता है तो थकावट अनुभव होती है।

→ परिवार का आकार तथा रचना, जीवन स्तर, घर की स्थिति, आर्थिक स्थिति, परिवार के सदस्यों की शिक्षा, गृह निर्माता की कुशलता तथा योग्यताएं, ऋतु बदलने से कार्य आदि पारिवारिक साधनों को प्रभावित करने वाले तत्त्व हैं।

→ योजनाबद्ध तरीके से कार्य करके समय तथा शक्ति के खर्च को कम किया जा सकता है।

→ रोज़ाना कार्यों के अतिरिक्त साप्ताहिक तथा वार्षिक कार्यों की भी योजना बनानी चाहिए।

→ यदि घर की आय के साधन ठीक हों तो घर के कार्य बाहर से करवाकर भी समय तथा शक्ति का बचाव किया जा सकता है।

→ जब किसी योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाता है तो कुछ देर पश्चात् पता लग जाता है कि नियत लक्ष्यों की पूर्ति हो रही है अथवा नहीं।

→ यदि उद्देश्यों की पूर्ति न हो रही हो तो अपनी योजना में परिवर्तन कर लेना चाहिए ताकि आगे के लिए उद्देश्यों की पूर्ति हो सके।

→ ठीक निर्णय लिए जाएं तो कार्य अच्छी तरह तथा आसानी से हो जाते हैं।

→ घर का प्रबन्धक अथवा गृहिणी सोच-समझकर निर्णय न करे तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है।

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