Author name: Prasanna

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 11 जब सिनेमा ने बोलना सीखा

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 11 जब सिनेमा ने बोलना सीखा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 11 जब सिनेमा ने बोलना सीखा

HBSE 8th Class Hindi जब सिनेमा ने बोलना सीखा Textbook Questions and Answers

पाठ से

प्रश्न 1.
जब पहली बोलती फिल्म प्रदर्शित हुई तो उसके पोस्टरों पर कौन-से वाक्य छापे गए? उस फिल्म में कितने चेहरे थे? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
जब पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ प्रदर्शित हुई तब उसके पोस्टरों में निम्नलिखित वाक्य छापे गए

  • ये सभी सजीव हैं, साँस ले रहे हैं, शत-प्रतिशत बोल रहे हैं।
  • अठहत्तर मुर्दा इंसान जिंदा हो गए।
  • उनको बोलते, बातें करते देखो।
  • हाँ, पोस्टर पड़कर बताया जा सकता है कि फिल्म में 78 चेहरे थे।

प्रश्न 2.
पहला बोलता सिनेमा बनाने के लिए फिल्मकार अवेशिर एम. ईरानी को प्रेरणा कहाँ से मिली? उन्होंने ‘आलमआरा’ फिल्म के लिए आधार कहाँ से लिया?विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
पहला बोलता सिनेमा बनाने के लिए फिल्मकार अदेशिर एम. ईरानी को प्रेरणा 1929 में देखी एक हॉलीवुड की बोलती फिल्म ‘शो बेट’ से मिली। इस फिल्म को देखने के बाद उन्होंने भी बोलती फिल्म बनाने का निश्चय किया। उन्होंने अपनी पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ के लिए पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक को आधार बनाया। इसके आधार पर ही फिल्म की पटकथा तैयार की गई। नाटक के कई गाने ज्यों के त्यों ले लिए गए।

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प्रश्न 3.
विट्रल का चयन ‘आलमआरा’ के नायक के रूप में हुआ लेकिन हटाया क्यों गया? विट्ठल ने पुनः नायक होने के लिए क्या किया?विचार प्रकट कीजिए।
उत्तर:
‘आलमआरा’ फिल्म के लिए नायक के रूप में विट्ठल का चयन हुआ था। वे उस दौर के सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाले स्टार थे। पर विट्ठल को उर्दू बोलने में मुश्किलें आती थीं। उनकी इस कमी के कारण उन्हें नायक से हटाकर मेहबूब को नायक बना दिया। इससे विट्ठल नाराज हो गए। उन्होंने अपना हक पाने के लिए मुकदमा कर दिया। उनका मुकदमा उस दौर के मशहूर वकील मोहम्मद अली जिन्ना ने लडा। इस मुकदमे में विट्ठल जीत गए और भारत की पहली सवाक् फिल्म के नायक बन गए।

प्रश्न 4.
पहली सवाक् फिल्म के निर्माता-निदेशक अर्देशिर को जब सम्मानित किया गया, तब सम्मानकर्ताओं ने उनके लिए क्या कहा था?अर्देशिर ने क्या कहा और इस प्रसंग में लेखक ने क्या टिप्पणी की है?लिखिए
उत्तर:
पहली सवाकू फिल्म ‘आलमआरा’ के निर्माता-निर्देशक अर्देशिर को 1956 में फिल्म प्रदर्शन के पच्चीस वर्ष पूरे होने पर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर सम्मानकर्ताओं ने उन्हें ‘भारतीय सवाक फिल्मों का पिता’ कहा। इस पर अर्देशिर ने विनम्रतावश कहा-“मुझे इतना बड़ा खिताब देने की जरूरत नहीं है। मैंने तो देश के लिए अपने हिस्से का जरूरी योगदान दिया है।”
इस प्रसंग पर लेखक की टिप्पणी यह थी कि निर्माता-निर्देशक बहुत अधिक विनम्र थे।

पाठ से आगे

1. मूक सिनेमा में संवाद नहीं होते, उसमें दैहिक अभिनय की प्रधानता होती है। पर, जब सिनेमा बोलने लगी अनेक परिवर्तन हुए। उन परिवर्तनों को अभिनेता, दर्शक और कुछ तकनीकी दृष्टि से पाठ का आधार लेकर खोजें। साथ ही अपनी कल्पना का भी सहयोग लें।
उत्तर:
मूक सिनेमा में केवल अंगों का संचालन होता है. मुँह से कुछ नहीं बोला जाता अतः संवाद नहीं होते।
अभिनेताओं में यह परिवर्तन आया कि उनका पढ़ा-लिखा होना जरूरी हो गया, क्योंकि अब उन्हें संवाद भी बोलने पड़ते थे।
दर्शकों पर भी अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का खूब असर पड़ने लगा। औरतें अभिनेत्रियों की केश-सज्जा और वेशभूषा की नकल करने लगी।

तकनीकी दृष्टि से भी फिल्मों में काफी सुधार आए। अब गीत-संगीत का महत्त्व बढ़ चला। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ गया। फिल्में ज्यादा आकर्षक बनने लगीं।

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2. डब फिल्में किसे कहते हैं? कभी-कभी डब फिल्मों में अभिनेता के मुँह खोलने और आवाज में अंतर आ जाता है। इसका कारण क्या हो सकता है?
उत्तर:
डब फिल्में उन फिल्मों को कहते हैं जिनमें अभिनय तो कोई करता है, पर उसके संवाद दूसरे के द्वारा बाद में बुलवा कर डब किए जाते हैं। ऐसा दो स्थितियों में किया जाता है

  • किसी दूसरी भाषा की फिल्म को अन्य भाषा में डब करके प्रदर्शित करने के लिए।
  • किसी अभिनेता को दूसरे अभिनेता की आवाज देने के लिए।

यह काम फिल्म बनने के बाद किया जाता है।

  • जब एक कलाकार दुसरे कलाकार को बोलते देखकर उसे अपनी आवाज में दोहराता है तब मूल अभिनेता के मुख खोलने तथा डब करने वाली आवाज में कई बार थोड़ा अंतर रह जाता है। दो भिन्न भाषाओं में यह स्थिति अधिक उपस्थित हो जाती है।

अनुमान और कल्पना

1. किसी मूक सिनेमा में बिना आवाज के ठहाकेदार हँसी कैसी दिखेगी? अभिनय करके अनुभव कीजिए।
उत्तर:
मूक सिनेमा में बिना आवाज़ के ठहाकेदार हँसी केवल मुँह के खुलने से ही प्रकट होगी। खिलखिलाहट को आवाज तो सुनाई नहीं देगी।
विद्यार्थी ठहाकेदार हँसी, का अभिनय करके इस स्थिति का अनुभव करें।

2. मूक फिल्म देखने का एक उपाय यह है कि आप टेलीविजन की आवाज़ बंद करके फिल्म देखें। उसकी कहानी को समझने का प्रयास करें और अनुमान लगाएँ कि फिल्म में संवाद और दृश्य की हिस्सेदारी कितनी है?
उत्तर:
विद्यार्थी टेलीविजन पर फिल्म देखते समय आवाज (Volume) को बंद कर दें। तभी पर्दे पर फिल्म का केवल मूक अभिनय दिखाई देगा। आपका पूरा ध्यान फिल्म की कहानी और अभिनय पर केंद्रित रहना चाहिए।
इससे आप फिल्म में संवाद और दृश्य की हिस्सेदारी को भली प्रकार समझ सकेंगे।

भाषा की बात

1. ‘सवाक्’ शब्द वाक के पहले ‘स’ लगाने से बना है। ‘स’ उपसर्ग से कई शब्द बनते हैं। निम्नलिखित शब्दों के साथ ‘स’ का उपसर्ग की भाँति प्रयोग करके शब्द बनाएँ और शब्दार्थ में होनेवाले परिवर्तन को बताएँ। : हित, परिवार, विनय, चित्र, बल, सम्मान।
उत्तर :
स + हित – सहित (हित सहित, साथ)
स + परिवार – सपरिवार (परिवार सहित)
स + विनय – सविनय (विनयपूर्वक)
स + चित्र – सचित्र (चित्र सहित)
स + सम्मान = सम्मान (सम्मान संहित)

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2. उपसर्ग और प्रत्यय दोनों ही शब्दांश होते हैं। वाक्य में इनका अकेला प्रयोग नहीं होता। दोनों में अंतर केवल इतना होता है कि उपसर्ग किसी भी शब्द में पहले लगता है और प्रत्यय बाद में। हिन्दी के सामान्य उपसर्ग इस प्रकार हैं – अ / अन, नि, दु, क / कु, स / सु. अध, बिन औं आदि।
पाठ में आए उपसर्ग और प्रत्यय युक्त शब्दों के कुछ, उदाहरण नीचे दिए जा रहे हैं-

मूल शब्दउपसर्गप्रत्ययशब्द
वाक्सवाक्
लोचनासुसुलोचना
फिल्मकारफिल्मकार
कामयाबकामयाबी

इस प्रकार के 15-15 उदाहरण खोजकर लिखिए और अपने सहपाठियों को दिखाइए।

अन्य उपसर्ग

उपसर्गअर्थउपसर्ग के योग से बने शब्द
अतिबहुत अधिकअत्यंत, अत्युत्तम, अत्याचार।
अधिअधिक, श्रेष्ठअधिकार, अधिमास, अध्यक्ष, अधिशुल्क, अधिभार, अधिकार।
अनुपीछे, समान, प्रत्येकअमुज, अनुकरण, अनुचर, अनुशासन, अनुभव, अनुकूल, अनुरोध, अनुवाद।
अपबुरो, नीचे, विरुद्धअपयश, अपकार, अपमान, अपशब्द, अपव्यय, अपकर्ष।
अभिसामने, पासअभिमुख, अभिमान, अभ्यास, अभियान, अभिभाषण, अभ्यागत।
अवबुरा, हीन, नीचेअवगुण, अवनत, अवसान, अवसर, अवनति, अवकाश, अवमूल्यन, अवज्ञा।
तक, ऊपर, पूर्णआजन्म, आजीवन, आरक्षण, आगमन, आकर्षण, आदान।
उत्ऊपर, श्रेष्ठउत्थान, उत्कर्ष, उच्चारण, उन्नति, उत्सर्ग, उत्तम।
उपसमीप, गौण, नीचेउपवन, उपकार, उपदेश, उपस्थित, उपग्रह, उपमंत्री, उपवाक्य, उपनाम, उपप्रधान।
दुस्/दुर्कठिन, बुरादुस्साहस, दुस्साध्य, दुस्वर, दुर्दिन, दुर्घटना, दुर्दशा, दुर्गुण, दुराचार, दुर्लभ।
निस्/निरनिषेधनिश्चल, निष्काम, निस्संदेह. निर्जन, निरपराध, निर्दोष।
निरहितनिपूता, निडर, निकम्मा. निवास, नियुक्ति, निषेधा
पराउल्टा, पीछेपराजय, पराभव, पराक्रम, परामर्श, पराधीन।
परिचारों ओरपरिचय, परिणाम, परिवर्तन, परिक्रमा, परिधि, पर्यटन।
प्रअधिकप्रबल, प्रसिद्धि प्रयत्न, प्रगति, प्रचार, प्रस्थान, प्राचार्य, प्रभाव, प्राध्यापक।
प्रतिविरुद्धप्रतिकूल, प्रतिध्वनि, प्रत्यक्ष, प्रतिष्ठा, प्रतिनिधि, प्रतिकार, प्रतिदिन, प्रतिवर्ष।
विविशेष, उल्टावियोग, विदेश, विनय, विजय, विनाश, विज्ञान, विपक्ष, विमुख।
सम् (सं)अच्छा, सामनेसम्मान, सम्मेलन, संशोधन, संपूर्ण, संयम, संगम, संकल्प, संतोष, सम्मुख, सम्मति।

प्रत्ययों के उदाहरण:

आक – तैराक
दार – देनदार, होनहार
नी – ओड़नी, सूंपनी
आई – पढ़ाई, लिखाई
इया – डिब्बा > डिबिया, खाट > खटिया, दुख > दुखिया, बेटी > बिटिया।
ई – घंटा > घंटी, पहाड़ > पहाड़ी, रस्सा > रस्सी।
डा/री – मुख > मुखड़ा, कोठा > कोठरी।
पन/पा – लड़का > लड़कपन, बच्चा > बचपन, बूढा > बुढ़ापा।
ई – चोर > चोरी, खेत > खेती, दोस्त > दोस्ती, दुश्मन > दुश्मनी।
ता/त्व – मनुष्य > मनुष्यत्व, मानव मानवता।
एरा – साँप > सपेरा, चित्र > चितेरा।
आर – सोना > सुनार, लोहा > लुहार।
वाला – इक्का > इक्केवाला, ताँगा > ताँगेवाला।
वान – गाड़ी > गाड़ीदान, कोच > कोचवान।
कार – कला > कलाकार, फन > फनकार।
क – लिपि > लिपिक, लेख> लेखक।
गर – जादू > आदूगर, सौदा > सौदागर।
दारा – जर्मी > जमींदार, दुकान > दुकानदार।
हारा – लकड़ी > लकड़हारा।
पन/पा – काला > कालापन, मोटा > मोटापा।
ता/त्व – लघु > लधुता/लघुत्व, अपना > अपनत्व।
गरीब > गरीबी, खुश > खुशी, बुद्धिमान > बुद्धिमानी।
आस – मीठा > मिठास, खट्टा > खटास।
आई – अच्छा > अच्छाई, बुरा > बुराई।
ई – गुलाब > गुलाबी, ऊन > ऊनी।
ईला – रस > रसीला, जहर > जहरीला, बर्फ > बर्फीला।
ईन – नमक > नमकीन, रंग > रंगीन, शौक > शौकीन।
आ – भूख > भूखा, प्यास > प्यासा।

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HBSE 8th Class Hindi जब सिनेमा ने बोलना सीखा Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
भारतीय सिनेमा का जनक किसे माना जाता है?
उत्तर:
भारतीय सिनेमा का जनक दादा साहब फाल्के को माना जाता है। सवाक् सिनेमा के जनक थे-अर्देशिर ईरानी।

प्रश्न 2.
‘आलमआरा’ कब और कहाँ पहली बार प्रदर्शित की गई? इस फिल्म का क्या हाल रहा?
उत्तर:
‘आलमआरा’ फिल्म 14 मार्च, 1931 को मुंबई के ‘मजेस्टिक’ सिनेमा में प्रदर्शित हुई। फिल्म 8 सप्ताह तक ‘हाउसफुल’ चली और भीड़ इतनी उमड़ती थी कि पुलिस के लिए नियंत्रण । करना मुश्किल हो जाया करता था। समीक्षकों ने इसे ‘भड़कीली फैंटेसी’ फिल्म करार दिया था, मगर दर्शकों के लिए यह फिल्म एक अनोखा अनुभव थी। यह फिल्म 10 हजार फुट लंबी थी और इसे चार महीनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया गया था।

प्रश्न 3.
‘आलमआरा’ फिल्म में कौन-कौन-से कलाकारों ने काम किया?
उत्तर:
‘आलमआरा’ फिल्म की नायिका जुबैदा थी और नायक थे-विट्ठल। इनके अलावा सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर और जगदीश सेठी आदि अभिनेता भी मौजूद थे। आगे चलकर वे फिल्मोद्योग के प्रमुख अभिनेता बने।

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केवल पढ़ने के लिए

कंप्यूटर गाएगा गीत हिंदी फिल्मों में गीतों का आगमन आलम आरा (1931) से हुआ और तब से वे अब तक लोकप्रिय सिनेमा का अनिवार्य अंग बने हुए हैं। प्रारंभ से अभिनेताओं को अपने गीत खुद गाने पड़ते थे जो उसी समय रिकॉर्ड किए जाते थे। बाद में जब यह महसूस किया गया कि हर अभिनेता या अभिनेत्री अच्छा गायक भी हो यह जरूरी नहीं तो पार्श्व गायन की प्रथा शुरू हुई और उससे गायन और भी परिष्कृत हुआ। इस बीच रिकॉर्डिंग की तकनीक में भी बहुत सुधार हुआ और उससे भी गायन की शैली में परिवर्तन हुआ। सिनेमा जैसे लोकप्रिय माध्यम में गीत के बोलों का महत्त्व ज्यादा होता है क्योंकि उन्हीं के माध्यम से किसी धुन का भावनात्मक प्रभाव पैदा होता है।

फिल्म संगीत का उद्गम इस सदी के प्रारंभिक वर्षों में शास्त्रीय संगीत के अलावा, कव्वाली, भजन, कीर्तन तथा लोक-संगीत के वातावरण में हुआ। लोक-नाट्य तथा पेशेवर टूरिंग थिएटर कंपनियों का प्रभाव भी शुरू के फिल्मी गीतों पर था। कि उन दिनों माइक्रोफोन तथा लाउडस्पीकर जैसी चीजें नहीं थी, खुली हुई ऊँची स्पष्ट आवाज में गाना सबसे बड़ा और अनिवार्य गुण होता था। गायक को दूर-दूर तक बैठी भीड़ तक अपनी आवाज पहुँचानी होती थी। प्रारंभिक फिल्मों पर थिएटर का असर था, प्रारंभिक बोलती फिल्मों के लिए गायक भी थियेटर से आए। यह थिएटर परंपरागत रूप से पुरुषों का था, जिसमें महिला पात्रों की भूमिकाएँ भी पुरुष ही करते थे। लेकिन सिनेमा कि कहीं अधिक यथार्थवादी माध्यम है, उसमें यह चीज नहीं चल सकती थी। अत: जो गायिकाएँ फिल्मों के लिए आई वे स्वाभाविक ही भिन्न क्षेत्र की थीं। ये उस पेशेवर गायिकाओं के वर्ग से आई जो महफिलों में और शादियों या सालगिरहों पर मुजरे पेश करती थीं।

इस शैली को फिल्म संगीत का पहला चरण कहा जा सकता है। ये गायिकाएँ जरा नाक में बैठी आवाज में गाती थीं। गीतों के बोल भी वे जरा बनावटी ढंग से चबा कर, अदा करती थीं। जल्दी ही गायिकाओं ने सुकून देनेवाली शैली में गाना शुरू कर दिया। नई शैली का उदाहरण काननबाला का गाया ‘जबाब बना गीत,’ ‘दुनिया ये दुनिया तूफानमेल’ था।

फिल्मी गायन के इस दूसरे दौर में ऐसी बहुत प्रतिभाएं सामने आईं, जिन्होंने अपनी आवाज को माइक्रोफोन के अनुकूल स्वाभाविक पिच (सुर) पर ढालने में सफलता पाई। शमशाद बेगम, सुरैया, नूरजहाँ तथा कुंदनलाल सहगल इनमें शामिल थे।

सहगल के साथ ही फिल्मी गायन का दूसरा दौर समाप्त हुआ। माइक्रोफोन के उपयुक्त नई आवाजें आई। मोहम्मद रफी, मुकेश, हेमंत कुमार, मन्नाडे, किशोर कुमार, तलत महमूद सभी मूलतः गायक थे। लता मंगेशकर के साथ गायिकाओं के क्षेत्र में नए युग की शुरुआत हुई। उनके कंठ की ताजगी और आकर्षण ने गायकी के प्रतिमानों को ही बदल दिया। इनके अतिरिक्त आशा भोसले, गीता दत्त, सुमन कल्याणपुर आदि गायिकाओं ने अपनी खास शैली विकसित की।

भविष्य में क्या होगा? क्या हमारे लोकप्रिय सिनेमा पर गीत अब भी पहले की तरह हावी बने रहेंगे? क्या नित नए उपकरणों के आने के बाद आवाज के सुरीलेपन की जरूरत उतनी नहीं रह जाएगी? और किसे पता किसी दिन कंप्यूटर ऐसी आवाज बना कर रख दे जो किसी भी मानवीय आवाज़ से ज्यादा मुकम्मल हो!

जब सिनेमा ने बोलना सीखा गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

1. पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनानेवाले फिल्मकार थे अर्देशिर एम.ईरानी। अर्देशिर ने 1929 में हॉलीवुड की एक बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखी और उनके मन में बोलती फिल्म बनाने की इच्छा जगी। पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक को आधार बनाकर उन्होंने अपनी फिल्म की पटकथा बनाई। इस नाटक के कई गाने ज्यों के त्यों फिल्म में ले लिए गए। एक इंटरव्यू में अर्देशिर ने उस वक्त कहा था-‘हमारे पास कोई संवाद लेखक नहीं था, गीतकार नहीं था, संगीतकार नहीं था।

‘इन सबकी शुरुआत होनी थी। अर्देशिर ने फिल्म में गानों के लिए स्वयं की धुनें चुनीं। फिल्म के संगीत में महज तीन वाद्य-तबला; हारमोनियम और वायलिन का इस्तेमाल किया गया। आलम आरा में संगीतकार या गीतकार में स्वतंत्र रूप से किसी का नाम नहीं डाला गया। इस फिल्म में पहला पार्श्वगायक बने डब्लू, एम. खाना पहला गाना था-‘दे दे खुदा के नाम पर प्यारे, अगर देने की ताकत है।’
प्रश्न:
1. पहली बोलती फिल्म कौन-सी थी और उसे किसने बनाया
2. उनके मन में बोलती फिल्म बनाने की इच्छा क्यों जागी?
3. इस फिल्म में गीत-संगीत की क्या दशा थी?
4. इस फिल्म में किन-किन वाद्यों का प्रयोग किया गया?
5. पहले पार्श्वगायक कौन बने तथा उनका पहला गाना कौन-सा था?
उत्तर :
1. पहली बोलती फिल्म थी-‘आलम आरा।’ इस फिल्म को फिल्मकार अर्देशिर एम. ईरानी ने बनाया था।
2. अर्देशिर ने 1929 में हॉलीवुड की एक बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखी थी। उसको देखकर ही उनके मन में अपनी बोलती फिल्म बनाने की इच्छा जागी।।
3. इस फिल्म के लिए उनके पास कोई गीतकार या संगीतकार नहीं थे।
4. फिल्म में केवल तीन वाद्य तबला, हारमोनियम और वायलिन का इस्तेमाल किया गया था।
5. डब्लू. एम. खान पहले पार्श्वगायक बने। उनका पहला गाना था-दे दे खुदा के मा- पर प्यारे, अगर देने की ताकत है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 11 जब सिनेमा ने बोलना सीखा

2. जब पहली बार सिनेमा ने बोलना सीख लिया, सिनेमा में काम करने के लिए पढ़े-लिखे अभिनेता-अभिनेत्रियों की जरूरत भी शुरू हुई, क्योंकि अब संवाद भी बोलने थे, सिर्फ अभिनय से काम नहीं चलनेवाला था। मूक फिल्मों के दौर में तो पहलवान जैसे शरीरवाले, स्टंट करनेवाले और उछल-कूद करनेवाले अभिनेताओं से काम चल जाया करता था।

अब उन्हें संवाद बोलना था और गायन की प्रतिभा की कद्र भी होने लगी थी। इसलिए ‘आलम आरा’ के बाद आरंभिक ‘सवाक्’ दौर की फिल्मों में कई ‘गायक-अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नजर आने लगे। हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ा। सिनेमा में देह और तकनीक की भाषा की जगह जन प्रचलित बोलचाल की भाषाओं का दाखिला हुआ। सिनेमा ज्यादा देसी हुआ। एक तरह की नई आजादी थी। जिससे आगे चलकर हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब फिल्मों में बेहतर होकर उभरने लगा।
प्रश्न:
1. बोलती फिल्मों के लिए किस प्रकार के कलाकारों की आवश्यकता हुई?
2. मूक फिल्मों में कैसे कलाकारों से काम चल जाया करता था?
3. फिल्मों से भाषाओं पर क्या प्रभाव पड़ा?
4. सवाक् फिल्मों में कैसे अभिनेता पर्दे पर नजर आने लगे?
5. फिल्मों में क्या बात उभरने लगी?
उत्तर :
1. बोलती फिल्मों के लिए पढ़े-लिखे कलाकारों की आवश्यकता हुई क्योंकि अब उन्हें संवाद बोलने थे।
2. मूक फिल्मों में पहलवान जैसे शरीर वाले, स्टंट करने वाले और उछल-कूद करने वाले अभिनेताओं से काम चल जाता था।
3. सवाक् फिल्मों से हिंदी-उर्दू भाषाओं का महत्त्व बढ़ गया। अब जन प्रचलित भाषाओं का दाखिला हुआ।
4. सवाक् फिल्मों में गायक अभिनेता बड़े पर्दे पर नजर आने लगे। – 5. फिल्मों में हमारे दैनिक और सार्वजनिक जीवन का प्रतिबिंब बेहतर होकर नसर आने लगा।

जब सिनेमा ने बोलना सीखा Summary in Hindi

जब सिनेमा ने बोलना सीखा पाठ का सार

यह सिनेमा के बारे में है। 14 मार्च, 1931 की तारीख ऐतिहासिक थी क्योंकि इस दिन भारत की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ प्रदर्शित हुई थी। इससे पहले मूक फिल्में बनती थीं। पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ को बनाने वाले फिल्मकार थे-अर्दशिर एम. ईरानी। उन्होंने 1929 में हॉलीवड की एक बोलती फिल्म ‘शो बोट’ देखी थी। तभी से उनके मन में भी बोलती फिल्म बनाने की इच्छा जागी।

उन्होंने पारसी रंगमंच के एक लोकप्रिय नाटक को आधार बनाकर पटकथा लिखी। उनके पास कोई संवाद लेखक, गीतकार और संगीतकार नहीं था। अत: नाटक के कई गाने ज्यों के त्यों फिल्म में ले लिए गए। गानों की धुनें उन्होंने स्वयं चुनीं। संगीत में केवल तीन वाद्य-तबला, हारमोनियम और वायलिन का प्रयोग किया गया।

फिल्म के पहले पार्श्वगायक बने-डब्ल्यू. एम. खान। पहला गाना था-‘दे-दे खुदा के नाम पर प्यारे, अगर देने की ताकत है।’ फिल्म की शूटिंग रात में करनी पड़ती थी। अतः कृत्रिम प्रकाश व्यवस्था करनी पड़ी। आर्देशिर की कंपनी ने भारतीय सिनेमा के लिए 150 मूक और लगभग 100 बोलती फिल्में बनाई।

‘आलम आरा’ फिल्म ‘अरेबियन नाइट्स’ जैसी फैंटेसी थी। इसमें गीत, संगीत तथा नृत्य के अनोखे संयोजन थे। फिल्म की नायिका जुबैदा थी और नायक थे-विट्ठल। वे उस दौर के सर्वाधिक पारिश्रमिक पाने वाले स्टार थे। विट्ठल को उर्दू बोलने में मुश्किल आ रही थी अत: उनकी जगह मेहबूब को नायक बनाया गया। इस पर विट्ठल ने मुकदमा कर दिया। उनका मुकदमा मोहम्मद अली जिन्ना ने लड़ा। उनके कारण विटुल मुकदमा जीत गए और पहली बोलती फिल्म के नायक बने। मराठी और हिंदी फिल्मों में वे लंबे समय तक नायक और स्टंटमैन के रूप में सक्रिय रहे। आलम आरा में सोहराब मोदी, पृथ्वीराज कपूर, याकूब और जगदीश सेठी जैसे अभिनेता भी थे।

यह फिल्म 14 मार्च, 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में प्रदर्शित हुई। यह फिल्म आठ सप्ताह तक हाउसफुल चली। यह फिल्म 10 हजार फुट लंबी थी भौर इसे चार महीनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया गया था। अन्य सामाजिक विषयों पर भी सवाक फिल्में बननी शुरू हुई। ऐसी ही एक फिल्म थी-‘खुदा की शान’।

इसका एक पात्र महात्मा गाँधी जैसा था अतः ब्रिटिश सरकार को चुभा। बोलती फिल्मों में संवाद बोलने के लिए पढ़े-लिखे कलाकारों की आवश्यकता हुई। उस दौर की फिल्मों में कई ‘गायक अभिनेता’ बड़े पर्दे पर नजर आने लगे। अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की लोकप्रियता का असर दर्शकों पर खूब पड़ रहा था। ‘माधुरी’ फिल्म की नायिका सुलोचना का हेयर स्टाइल उस दौर की औरतों में खूब लोकप्रिय हुआ। ‘आलमआरा’ को भारत के अलावा श्रीलंका, बर्मा तथा पश्चिमी एशिया द्वारा भी पसंद किया गया।

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जब सिनेमा ने बोलना सीखा शब्दार्थ

सजीव – जानदार (living, alive), शिखर – सबसे ऊंचे स्थान (peak), मूक – गूंगा (dumb), सवाक – बोलती हुई (talking). लोकप्रिय – प्रसिद्ध (populary, महज- केवल (only), पार्श्वगायक – पीछे से गाने वाले (playback singer), साउंड – आवाज (sound). कृत्रिम – बनावटी (artificial), व्यवस्था – इंतजाम (arrangement), प्रकाश – रोशनी (light). सर्वाधिक – सबसे अधिक (most), पारिश्रमिक – मेहनताना (remuneration), चर्चित – जिसकी चर्चा हो (popular), स्तंभ- खंभा, प्रमुख आधार (pillar), विनम्र – कोम.न, दयालु (humble), खिताब – सम्मान (honour), केश सज्जा – बालों की सजावट (hair dressing).

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 10 कामचोर

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 10 कामचोर Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 8th Class Hindi कामचोर Textbook Questions and Answers

कहानी से

प्रश्न 1.
कहानी में मोटे-मोटे किस काम के हैं? किन के बारे में और क्यों कहा गया?
उत्तर:
कहानी में मोटे-मोटे घर के बच्चों के बारे में कहा गया। ऐसा इसलिए कहा गया क्योंकि वे कामचोर थे। यहाँ तक कि हिलकर पानी तक नहीं पीते थे। वे निठल्ले थे।

प्रश्न 2.
बच्चों के ऊधम मचाने के कारण घर की क्या दुर्दशा हुई?
उत्तर:
बच्चों ने काम करने के नाम पर जो ऊधम मचाया तससे सारे घर की दुर्दशा हो गई

  • मटके-सुराहियाँ इधर-उधर लुढ़क गए।
  • सारा घर धूल से अट गया।
  • धूल पर पानी छिड़कने से कीचड़ हो गई।
  • घर के सारे बर्तन अस्त-व्यस्त हो गए।
  • घर में मुर्गियों, भेड़ों को खूब धमा चौकड़ी मचने लगी।
  • मैंस ने भी घर का हुलिया बिगाड़ दिया।

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प्रश्न 3.
‘या तो बच्चा-राज कायम कर लो या मुझे ही रख लो।’ अम्मा ने कब कहा और इसका परिणाम क्या हुआ?
उत्तर:
बच्चों की हरकतों से घर में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ था। घर का सारा सामान अस्त-व्यस्त तथा टूट-फूट गया था। बच्चों के पिता ने उन्हें काम करने का फरमान जारी किया था। अम्मा ने इस स्थिति को देखकर चुनौती भरे स्वर में कहा-‘या तो बच्चा-राज कायम कर लो या मुझे ही रख लो। नहीं तो मैं चली मायके।’

इसका परिणाम यह निकला कि सब बच्चों को कतार में खड़ा करके हिदायत दे दी गई-“अगर किसी बच्चे ने घर की किसी चीज को हाथ लगाया तो बस, रात का खाना बंद हो जाएगा।” और बच्चे काम करने से बच गए।

प्रश्न 4.
‘कामचोर’ कहानी क्या संदेश देती है?
उत्तर:
‘कामचोर’ कहानी हमें यह संदेश देती है कि कोई भी काम करने के लिए समझदारी की आवश्यकता होती है। बिना सोचे-समझे किया गया काम मुसीबत खड़ी कर देता है।

प्रश्न 5.
क्या बच्चों ने उचित निर्णय लिया कि अब चाहे कुछ भी हो जाए, हिलकर पानी भी नहीं पिएंगे?
उत्तर:
नहीं, बच्चों ने यह उचित निर्णय नहीं लिया। उन्हें काम तो करना चाहिए. पर समझदारी के साथ। स्वयं हिलकर पानी भी न पीने का निश्चय उन्हें और भी कामचोर बना देगा।

कहानी से आगे

प्रश्न 1.
घर के सामान्य काम हों या अपना निजी काम, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी क्षमता के अनुरूप उन्हें करना | आवश्यक क्यों है?
उत्तर:
यह सही है कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक काम अपनी क्षमता के अनुरूप करना चाहिए, तभी उस काम में पूरी सफलता मिलती है। काम चाहे घर का सामान्य काम हो अथवा हमारा निजी काम, सफलता तभी मिलेगी जब हम अपनी क्षमता के अनुरूप करेंगे। क्षमता से बाहर जाकर काम करना सफल नहीं हो पाता।

प्रश्न 2.
भरा-पूरा परिवार कैसे सुखद बन सकता है और कैसे दुखद? ‘कामचोर’ कहानी के आधार पर निर्णय कीजिए।
उत्तर:
‘कामचोर’ कहानी में बताया गया है कि जब हम अपनी क्षमता को ध्यान में न रखकर काम करते हैं तब भरा-पूरा परिवार दुखी हो जाता है क्योंकि काम लाभदायक न होकर हानिकारक हो जाता है। जब सब मिल-जुलकर अपनी क्षमतानुसार काम करते हैं तब भरा-पूरा परिवार सुखद बन जाता है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 10 कामचोर

प्रश्न 3.
बड़े होते बच्चे किस प्रकार माता-पिता के सहयोगी हो सकते हैं और किस प्रकार भार? ‘कामचोर’ कहानी के आधार पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
यह सही है कि बड़े होते बच्चे माता-पिता के सहयोगी हो सकते हैं। वे उनके काम-काज में हाथ बँटा सकते हैं। पर वे सहयोगी तभी तक हो सकते हैं जब वे अपनी क्षमता और बुद्धि के अनुसार काम करें। यदि वे अपनी क्षमता को ध्यान में रखे बिना काम करेंगे तो वे माता-पिता के लिए भार बन जाएंगे। इस स्थिति में वे काम को सुधारने की बजाय बिगाड़कर रख देंगे।

प्रश्न 4.
‘कामचोर’ कहानी एकल परिवार की कहानी है या संयुक्त परिवार की? उन दोनों तरह के परिवारों में क्या-क्या अंतर होते हैं।
उत्तर:
यह कहानी संयुक्त परिवार की है। एकल परिवार में व्यक्ति अपना, अपनी पत्नी और अपने बच्चों का ही ध्यान रखता है। संयुक्त परिवार में घर से सभी सदस्य दादा-दादी, चाचा-चाची, ताऊ-ताई, तथा उनके बच्चे एक साथ मिलकर रहते हैं। इसमें सभी को घर के काम करने पड़ते हैं।

अनुमान और कल्पना

1. घरेलू नौकरों को हटाने की बात किन-किन परिस्थितियों में उठ सकती है? विचार कीजिए।
उत्तर:
घरेलू नौकरों को हटाने की बात निम्नलिखित परिस्थितियों में उठ सकती है

  • जब नौकर कामचोर हों।
  • जब घरेलू नौकर आवश्यकता से अधिक हों।
  • जब घर की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हो जाए।
  • जब नौकर ढंग से काम न करते हों।
  • जब वे मालिक की आज्ञा का पालन न करते हों।

2. कहानी में एक समृद्ध परिवार के ऊधमी बच्चों का चित्रण है। आपके अनुमान से उनकी आदत क्यों बिगड़ी होगी? उन्हें ठीक ढंग से रहने के लिए आप क्या-क्या सुझाव देना चाहेंगे?
उत्तर:
हमारे अनुमान से इनकी आदत इसलिए बिगड़ी होगी

  • उनके हर काम को घरेलू नौकर कर देते होंगे।
  • उनके माता-पिता उनके प्रति लापरवाह होंगे।
  • उन्हें उचित शिक्षा नहीं मिली होगी।
  • इन्हें ठीक ढंग से रहने के लिए हम ये सुझाव देना चाहेंगे
  • पहले इन बच्चों से छोटे-छोटे काम करवाए जाएं, जिन्हें वे आसानी से कर लें।
  • उन्हें तरीके से काम करना सिखाया जाए।
  • उचित शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

3. किसी सफल व्यक्ति की जीवनी से उसके विद्यार्थी जीवन की दिनचर्या के बारे में पढ़ें और सुव्यवस्थित कार्यशैली पर एक लेख लिखें।
→ यह कार्य विद्यार्थी स्वयं करें। वे महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़ सकते हैं।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 10 कामचोर

भाषा की बात

“धुली-येधुली बालटी लेकर आठ हाथ चार थनों पर पिल पड़े।” धुली शब्द से पहले ‘बे’ लगाकर ‘बेधुली’ बना है। जिसका अर्थ हुआ ‘बिना धुली’। ‘के’ एक उपसर्ग है। ‘बे’ उपसर्ग से बनने वाले कुछ और शब्द हैं-
बेतुका, बेईमान, बेघर, बेचैन, बेहोश आदि। आप भी नीचे लिखे उपसर्गों से बनने वाले शब्द खोजिए-
1. प्रा – ………………………..
2. आ – ………………………..
3. भर – ………………………..
4. बद – ………………………..
उत्तर:
1. प्र – प्रभाव, प्रयोग
2. आ – आजन्म, आमरण
3. भर – भरपेट, भरसक
4. बद – बदनाम, बदशक्ल

HBSE 8th Class Hindi कामचोर Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
झाडू देने पर क्या समस्या सामने आई?
उत्तर:
क्योंकि झाड़ एक थी और लेने वाले उम्मीदवार बहुत, इसलिए झण-भर में झाड़ के पुर्जे उड़ गए। जितनी सीके जिसके हाथ पड़ीं, वह उनसे ही उलटे-सीधे हाथ मारने लगा। अम्मा ने सिर पीट लिया। भई, ये बुजुर्ग काम करने दें तो इन्सान काम करे। जब जरा-जरा सी बात पर लगे तो बस, हो चुका काम!

प्रश्न 2.
मुर्गियों ने क्या तूफ़ान मचाया?
उत्तर:
मुर्गियाँ ऊट-पटौंग इधर-उधर कूदने लगी थीं। दो मुर्गियाँ खीर के प्यालों से, जिन पर आया चांदी के वर्क लगा रही थी. दौडती-फडफडाती हुई निकल गई। सारी खीर दीदी के कामदानी के दुपट्टे और ताजे धुले सिर पर लगी हुई है। एक बड़ा-सा मुर्गा अम्मा के खुले हुए पानदान में कूद पड़ा और कत्थे-चूने में लुथड़े हुए पंजे लेकर नानी अम्मा की सफेद दूध जैसी चादर पर छापे मारता हुआ निकल गया।

एक मुर्गी दाल की पतीली में छपाक मारकर भागी और सीधी जाकर मोरी में इस तेजी से फिसली कि सारी कीचड़ मौसीजी के मुंह पर पड़ी जो बैठी हुई हाथ-मुँह धो रही थीं। इधर सारी मुर्गियाँ बेनकेल का ऊँट बनी चारों तरफ़ दौड़ रही थीं। एक भी मुर्गी दड़बे में जाने को राजी न थी।

प्रश्न 3.
बच्चों की हरकतों से घर की क्या हालत हो गई?
उत्तर:
बच्चों की हरकतों से घर में तूफ़ान उठ खड़ा हुआ। ऐसा लगता था, जैसे सारे घर में मुर्गियाँ, भेड़ें. टूटे हुए तसले, बालटियाँ, लोटे, कटोरे और बच्चे थे। बच्चे बाहर किए गए। मुर्गियाँ बाग में हंकाई गई। मातम-सा मनाती तरकारी वाली के आँसू पौंछे गए और अम्मा आगरा जाने के लिए सामान बाँधने लगी।

कामचोर गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

1. इतने में भेड़ें सूप को भूलकर तरकारीवाली की टोकरी पर टूट पड़ी। वह दालाम में बैठी मटर की फलियाँ तोल-तोल कर रसोइए को दे रही थी। वह अपनी तरकारी का बचाव करने के लिए सीना तान कर उठ गई। आपने कभी भेड़ों को मारा होगा, तो अच्छी तरह देखा होगा कि बस, ऐसा लगता है, जैसे सई के तकिए को कूट रहे हों। भेड़ को चोट ही नहीं लगती। बिलकुल यह समझकर कि आप उससे मजाक कर रहे हैं। वह आप ही पर चढ़ बैठेगी। जरा-सी देर में भेड़ों ने तरकारी छिलकों समेत अपने पेट की कड़ाही में झोंक दी।
प्रश्न:
1. सूप में क्या था?
2. सूप भूलकर भेड़ें किस पर, क्यों टूट पड़ीं?
3. तरकारीवाली ने बचाव का क्या उपाय किया?
4. भेड़ को चोट क्यों नहीं लगती?
5. भेड़ों ने तरकारी के साथ क्या किया?
उत्तर:
1. सूप में दाने थे। भेड़ें दिनभर की भूखीं थीं अत: वे सभी सूप पर झपट पड़ी थीं।
2. जब मेड़ों ने तरकारियों की भरी टोकरी देखी तो वे सूप को मूलकर उस पर टूट पड़ी।
3. तरकारीवाली अपनी सरकारी का बचाव करने के लिए सीना तान कर उठ खड़ी हो गई। उसने भेड़ों का पीटा भी, पर व्यर्थ रहा।
4. भेड़ के शरीर पर ऊन की मोटी परत होती है अत: उन्हें इंडे की चोट नहीं लगती। उन्हें पीटते समय लगता है कि हम रुई के तकिए को कूट रहे हैं।
5. भेड़ों ने सारी तरकारी छिलकों सहित अपने पेट में उतार ली अर्थात् उन्हें खा गई।

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2. तय हुआ कि मैंस की अगाड़ी-पिछाड़ी बांध दी जाए और फिर काबू में लाकर दूध दुह लिया जाए। बस, झूले की रस्सी उतारकर मैंस के पैर बांध दिए गए। पिछले वो पैर चाचा जी की चारपाई के पायों से बाँध, अगले दो पैरों को बाँधने की कोशिश जारी थी कि मैंस चौकन्नी हो गई। छूटकर जो भागी तो पहले चाचा जी समझे कि शायद कोई | सपना देख रहे हैं। फिर जब चारपाई पानी के दम से टकराई
और पानी छलककर गिरा तो समझे कि आंधी-तूफान में फंसे हैं। साथ में भूचाल भी आया हुआ है। फिर जल्दी ही | उन्हें असली बात का पता चल गया और पलंग की दोनों पटियाँ पको, बच्चों को छोड़ देनेवालों को बुरा-भला सुनाने लगे।
प्रश्न:
1. किसने, क्या तय किया?
2. इसके लिए क्या प्रयास किया गया?
3. चाचाजी ने क्या समझा?
4. बाद में उन्हें क्या बात पता चली?
5. उन्होंने किसे चुरा-भला कहा?
उत्तर:
1. बच्चों ने यह किया कि मैंस की अगाड़ी और पिछाड़ी बाँध दी जाए और इस प्रकार उसे काबू में लाकर दूध दुह लिया जाए।
2. इस योजना को पूरा करने के लिए झूले की रस्सी से मैंस के पैर बांध दिए गए। पिछले दो पैरों को चाचाजी की चारपाई से पायों से बांधकर अगले पैरों को बाँधने की कोशिश की गई. पर मैंस चौकन्नी होकर भाग ली।
3. जब चाचाजी की चारपाई आगे भागी तो उन्होंने समझा कि कोई सपना देख रहे हैं।
4. जब उनकी चारपाई पानी के इम से टकराई और पानी छलककर उन पर गिरा तो उन्होंने समझा कि वे किसी आँधी-तूफान में फंस गए हैं साथ में भूचाल भी आया हुआ है।
5. चाचाजी बच्चों को खुला छोड़ देने वालों को बुरा-भला सुनाने लगे।

कामचोर Summary in Hindi

कामचोर पाठ का सार

घर में काफी बहस के बाद यह तय हुआ कि नौकरों की छुट्टी कर दी जाए। घर के बच्चे इतने मोटे हैं और कोई काम खुद नहीं करते। ये तो हिलकर पानी तक नहीं पीते। ये कामचोर हो गए हैं। बच्चों को कहा गया कि तुम सिवाय कधम मचाने के कुछ महीं करते। बच्चों में हिल-हिलकर पानी पीने के प्रयास में मटकों, सुराहियों को इधर-उधर लुढ़का दिया। उन्हें फरमान हुआ-ओ काम नहीं करेगा, उसे रात का खाना हरगिज़ नहीं मिलेगा। बच्चों ने अपने लिए काम पूछा तो बताया गया-दरी को साफ करो, आँगन का कूड़ा हटाओ, पेड़ों में पानी दो।

बच्चे काम पर जुट गए। फर्शी दरी को चारों कोनों से पकड़कर झटकना शुरू कर दिया। सारा घर धूल से अट गया। खाँसते-खाँसते सब बेदम हो गए। जब झाड़ लगाने का फैसला हुआ तब झाड़ तो एक थी अतः झगड़े में झाड़ के पुर्जे उड़ गए। कहा गया कि पहले थोड़ा पानी छिड़कना चाहिए था। जब पानी छिड़का गया तो सारी धूल कीचड़ बन गई। अब निश्चय किया गया कि पेड़ों को पानी दिया जाए अतः सभी बच्चे कोई-न-कोई बरतन लेकर नल पर टूट पड़े। वहाँ खूब धक्का-मुक्की हुई। बच्चे कीचड़ से लथपथ हो गए।

अब बच्चे समझ गए कि सफाई और पेड़ों को पानी देने का काम उनके वश की बात नहीं है। उन्होंने सोचा कम-से-कम मुर्गियाँ ही बंद कर दें। अत: वे शाम से ही बाँस, छड़ी लेकर मुर्गियों को हाँकने लगे-‘चल दड़बे, दड़बे’ मुर्गियाँ इधर-उधर कूदने लगीं। दो मुर्गिर्चा खीर के प्यालों से दौड़ती-फड़फड़ाती निकल गई। बाद में पता चला कि प्याले खाली हैं और सारी खीर दीदी के कामदानी के दुपट्टे और ताजे धुले सिर पर लगी है। एक बड़ा-सा मुर्गा अम्मा के खुले पानदान में कूद पड़ा और कत्थे-चूने में पंजे सानकर नानी अम्मा की सफेद चादर पर छापा मारकर चला गया। एक मुर्गी दाल की पतीली में छपाक मारकर भागी और मोरी की कीचड़ को मौसीजी के मुंह पर फेंक गई। कोई भी मुर्गी दड़बे में जाने को तैयार न थी।

किसी को सूझी कि जो भेड़ें आई हुई हैं उन्हें दाना खिला दिया जाए। दिनभर की भूखी भेड़ें दाने सूप पर झपट पड़ी। वे तख्तों पर चढ़ गई। तश्त पर बानी दीदी का दुपट्टा फैला हुआ था। भेड़ों ने सब गड़बड़ कर दिया। हज्जन माँ एक पलंग पर दुपट्टे से मुंह ढंक कर सो रही थी। उन पर भेड़ें जा दौड़ी तो दुपट्टे में उलझी चिल्लाने लगीं ‘मारो-मारो’। इसके बाद भे. तरकारी वाली की टोकरी पर टूट पड़ीं। तरकारीवाली ने अपना बचाव करने के लिए भेड़ों को मारा, पर भला उन्हें चोट कहाँ लगने वाली थी। ऐसा लगता था कि रुई के तकिए कूटे जा रहे हों। भेड़ों ने सारी तरकारी अपने पैरों में उतार दी।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 10 कामचोर

अब मैंस का दूध निकालने का काम पूरा करने का सोचा गया। भैस बाल्टी को लात मारकर दूर जा खड़ी हुई। अब भैस के अगले-पिछले पैरों को बाँधने की बात सोची गई। झूले की रस्सी से बांधकर चाचा की चारपाई से पायों बाँध दिए गए। अगले पैर बाँधते समय मैंस चौकन्नी हो गई और छूटकर भागी तो चाचा की चारपाई पानी के इम से जा टकराई। फिर बछड़ा खोला गया। उसे देखकर मैंस ने अपने खुरों को ब्रेक लगा दिए। बछड़ा अपने काम में जुट गया।

दूध इधर-उधर बिखर गया। सारे घर में कोहराम-सा मच गया था। अब अम्मा ने चुनौती दे डाली-“या तो बच्चा राज कायम कर लो या मुझे ही रख लो। नहीं तो मैं चली मायके।” अब अम्मा ने अपना फैसला पलटकर कहा- “अगर किसी बच्चे ने घर की किसी चीज को हाथ लगाया तो बस, रात का खाना बंद हो जाएगा।” अब बच्चों ने भी निश्चय कर लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, वे हिलकर पानी भी नहीं पिएँगे।

कामचोर शब्चार्थ

वबैल = दबने वाले, कमजोर Weak), हरगिज कदापि (Seldom), फरमान राजाज्ञा (Order), तनख्याह = वेतन (Salary), हवाला = उद्धरण (Reference), धुऔधधार = ताबड़तोड़, लगातार (Continuous), कुमुक = फौजी टुकड़ी (Force), धींगामुस्ती जबर्दस्ती, धक्का-मुक्की (Forcefully), लश्टम-पश्टम जैसे-तैसे जल्दी में (In hurry), बेनकेल काबू से बाहर (Out of control).

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

HBSE 8th Class Hindi कबीर की साखियाँ Textbook Questions and Answers

पाठ से

प्रश्न 1.
‘तलवार का महत्त्व होता है प्यान का नहीं’-उक्त उदाहरण से कबीर क्या कहना चाहता है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘तलवार का महत्त्व होता है. म्यान का नहीं’ से वीर यह कहना चाहते हैं कि असली चीज़ की काकी आनी चाहिए। दिखावटी वस्तु का कोई महत्त्व नहीं होता। ईशार का भी वास्तविक ज्ञान जरूरी है। डोंग-आडंबर तो म्यान के समान निरर्थक हैं।। असली ब्रह्म को पहचानो और उसी को स्वीकारो।

प्रश्न 2.
पाठ की तीसरी साखी-जिसकी एक पंक्ति हैं ‘मनवा तो चहुँ विसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहि के द्वारा कबीर क्या कहना चाहते हैं।
उत्तर:
इस साखी के द्वारा कबीर कंवल माता फरकर स्वर की उपासना करने को ढोंग बताते हैं। माला फेरने और मुंह से राम-राम का जाप करना व्यर्थ है। ईश्वर उपासन के लिए मन की एकाग्रता आवश्यक है। इसके बिना ईश्वर-स्मरण नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 3.
कबीर घास की निंदा करने से मना करते हैं। कबीर के दोहे में ‘घास’ का विशेष अर्थ क्या है और कबीर के उक्त दोहे का संदेश क्या है?
उत्तर:
कबीर अपने दोहे में उस घास तक की निंदा करने से मना करते हैं जो हमारे पैरों के तले होती है। कबीर के दोहे में ‘पास’ का विशेष अर्थ है। यहाँ पास दबे-कुचले व्यक्तियों की प्रतीक है। इन लोगों की तुच्छ मानकर निंदा की जाती है, जबकि ऐसा करना सर्वथा अनुचित है। कबीर के दोहे का संदेश यही है कि किसी की निंदा मत करो, विशेषकर छोटे लोगों की।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

प्रश्न 4.
मनुष्य के व्यवहार में ही दूसरों को विरोधी बना लेने वाले दोष होते हैं। किस साखी से यह भावार्थ व्यक्त होता है?
उत्तर:
निम्नलिखित साखी में यह भाव व्यक्त होता है
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन सीतल होय।
यह आपा तूं डाल दे, दया करै सब कोय।।

पाठ से आगे

1. “या आपा को डारि दे, दया करै सब कोया” ऐसी बानी बोलिए मनका आपा खोय।
इन दो पंक्तियों में ‘आपा’ को छोड़ देने या खो देने की बात की गई है। ‘आपा’ किस अर्थ में प्रयुक्त हुआ है? क्या ‘आपा’ स्वार्थ के निकट का अर्थ देता है या घमंड का?
उत्तर :
‘आपा’ अहंकार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
‘आपा’ घमंड का अर्थ देता है।

2. आपके विचार में ‘आपा’ और ‘आत्मविश्वास’ में तथा ‘आपा’ और ‘उत्साह’ में क्या कोई अंतर हो सकता है? स्पष्ट करें।
उत्तर :
आपा और आत्मविश्वास।
आपा में अतिविश्वास होता है जो अहंकार का रूप ले लेता है। आत्मविश्वास एक गुण है। यह अपने पर भरोसा होता है।
आपा और उत्साह : ‘आपा’ में अहं का भाव है तथा उत्साह में किसी काम को करने का जोश होता है।

3. सभी मनुष्य एक ही प्रकार से देखते-सुनते हैं पर एकसमान विचार नहीं रसते। सभी अपनी-अपनी मनोवृत्तियों के अनुसार कार्य करते हैं। पाठ में आई कबीर की किस साखी से उपर्युक्त पंक्तियों के भाव मिलते हैं एकसमान होने के लिए आवश्यक क्या है? लिखिए ।
उत्तर :
साखी
माला तो कर में फिरै, जीभि फिरै मुख माँहि। मनवा तो चहुँ दिसि फिरै, यह तो सुमिरन नाहिं।

समान भावार्थ के दोहों की तुलना करें।
1. माला फेरत युग गया, गया न मन का फेर।।
जो तोको काँटा बोये ताहि बोओ तू फूल।
वाको शूल का सूल है ताको फूल का फूल।।

2 जात पात पूछै नाहिं कोई
हरि को भजै सो हरि को होई।

  • माला फेरत… में कबीर ने माला फेरने को व्यर्थ बताया है। इसकी तुलना ‘माला तो कर में…नाहिं’ दोहे से की जा सकती है।
  • ‘जो तोंको…फूल’ वाले दोहे में परोपकार की शिक्षा दी गई है। इसकी तुलना ‘आवतगारी…एक’ से की जा सकती है।
  • ‘जात-पात…होई’ में कबीर जाति-पाति का विरोध करते हैं। इसकी तुलना पहले दोहे ‘जाति न पूछौ…म्यान’ से की जा सकती है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

4. कबीर के दोहों को साखी क्यों कहा जाता है, ज्ञात कीजिए।
उत्तर :
कबीर के दोहों को साखी इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें श्रोता को गवाह बनाकर साक्षात् ज्ञान दिया गया है।

भाषा की बात

बोलचाल की क्षेत्रीय विशेषताओं के कारण शब्दों के उच्चारण में परिवर्तन होता है। जैसे-वाणी शब्द बानी बन जाती है, मन से मनवा, मनुवा आदि हो जाता है। उच्चारण के परिवर्तन से वर्तनी भी बदल जाती है। नीचे कुछ शब्द दिए जा रहे हैं उनका वह रूप लिखिए जिससे आपका परिचय हो।
ग्यान, जीभि, पाऊँ, तलि, आँखि, बैरी।
→ ग्यान – ज्ञान
जीभि – जीभ
पाऊँ – पाँव
तलि – तले
आँखि – आँख
बैरी – वैरी (शत्रु)

कबीर की साखियाँ साखियों (दोहे) की सप्रसंग व्याख्या

1. जाति न पूछौ साधु की, जो पूछो तो ज्ञाना
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।

प्रसंग:
प्रस्तुत साखी ज्ञानमार्गी कवि कबीरदास द्वारा रचित है। इस दोहे में कबीरदास द्वारा ज्ञान को महत्त्व दिए जाने का उल्लेख हुआ है। वे जाति-पाति का विरोध भी करते हैं।

व्याख्या:
कबीरदास कहते हैं साधु की सच्ची पहचान करने के लिए उसकी जाति न पूछकर उसका ज्ञान पूछना चाहिए। साधु का ज्ञान ही उसकी असली पहचान है। कबीरदास उदाहरण देकर अपनी बात स्पष्ट करते हैं कि मूल्य तो तलवार का होता है, म्यान का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता। हमें वास्तविक वस्तु की पहचान करनी चाहिए। ज्ञान से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है।

विशेष:

  1. कबीर का डोंग-आनंबर विरोध उभर कर आया है।
  2. सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग किया गया है।

2 आवत गारी एक है, उलटत होड़ अमोका
कह ‘कबीर’ नहिं उलटिए, वही एक की एका।

प्रसंग : प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचिा हैं।

व्याख्या:
कबीरदास कहते हैं कि जब गाली आती है तब वह एक ही होती है। उसके उलट देने पर वह कई रूप ले लेती है। जवाब देने पर गालियों का सिलसिला चल निकलता है। कबीरदास का कहना है कि माली का उलटकर उत्तर नहीं देना चाहिए। ऐसा करने पर वह एक की एक ही रह जाती है।

विशेष:

  1. नीति संबंधी बात कही गई है।
  2. ‘कह कबीर’ में अनुप्रास अलंकार है।
  3. सधुक्कड़ी भाषा अपनाई गई है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

3. माला तो कर में फिर, जीभि फिरै मुख माहि।
मनवा तो चहूँ विसि फिर, यह तो सुमिरन नाहिं।

प्रसंग:
प्रस्तुत साखी कबीरदास द्वारा रचित है। कबीर माला फेरने को निरा डोंग बताते हुए इसे निरर्थक बताते हैं।

व्याख्या:
कबीरदास यथार्थ स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं-प्राय: यह होता है कि लोगों के हाथ में तो माला घूमती रहती है और मुख में जीभ भी घूमती रहती है अर्थात् हाथ से माला फेरकर और मुंह से राम नाम का मौन उच्चारण करके हम ईश्वर-स्मरण का ढोंग करते हैं। इसका कारण यह है कि उस समय भी हमारा मन चारों दिशाओं में घूमता रहता है. अर्थात् हम एकाग्रचित नहीं होते, अत: इसे प्रभु-स्मरण नहीं कहा जा सकता।

विशेष:

  1. कबीर ने माला फेरने को व्यर्थ का ढोंग बताया
  2. मुख माहि’ में अनुप्रास अलंकार का प्रयोग है।

4. ‘कबीर’ घास न नीदिए, जो पाऊँ तलि होइ।
उड़ि पड़े जब ऑखि मैं, खरी बुहेली होइ॥

प्रसंग: प्रस्तुत साखी ज्ञानमार्गी कवि कबीरदास प रचित है।

व्याख्या:
कबीरदास किसी भी तुच्छ व्यक्ति या वस्तु की निंदा करने की मनाही करते हैं। उनका तो यहाँ तक कहना है कि अपने पैरों के नीचे की घास तक की भी निंदा नहीं करनी चाहिए। इस व्यर्थ प्रतीत होने वाली घास का तिनका तक हमें परेशान करने को काफी है। जब यह तिनका उड़कर हमारी आँख में गिर जाता है तब आँख बहुत दुखने लगती है।

विशेष:

  1. कबीर तुच्छ व्यक्ति को भी महत्त्व देना चाहते
  2. सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग है।

4. जग में बैरी कोइ नहिं, जो मन सीतल होय।
या आपा को डारि दे, दया करै सब कोय।।

प्रसंग: प्रस्तुत साखी निर्गुणधारा के प्रतिनिधि कवि कबीरदास द्वारा रचित है।

व्याख्या:
कबीर कहते हैं कि यदि हमारा मन शीतल अर्थात् शांत है तो हमें इस संसार में अपना कोई भी शत्रु प्रतीत नहीं होगा। | हमें आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने अहंकार को त्याग दें। हमें सभी के प्रति दया की भावना प्रदर्शित करनी चाहिए।

विशेष:

  1. नीति संबंधी बात कही गई है।
  2. ‘आपा’ अहंकार के लिए प्रयुक्त है।
  3. सधुक्कड़ी भाषा का प्रयोग है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 9 कबीर की साखियाँ

कबीर की साखियाँ कवि-परिचय

जीवन-परिचय-कबीरदास ज्ञानमागी शाखा के प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि माने जाते हैं। कबीर का जन्म 1390 में काशी में हुआ। कहा जाता है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था और वह लोक-लाज के डर से इन्हें लहरतारा नामक तालाब के निकट छोड़ आई थी। वहाँ से ले जाकर नीमा और नीरू जलाहा दंपत्ति ने इसका पालन-पोषण किया। इस प्रकार हिंदू-मुसलमान दोनों के संस्कार इनके जीवन में विद्यमान हैं। कबीर अनपढ़ थे। उन्होंने स्वयं कहा है

मसि कागद छुऔ नहि, कलम गहि नहिं हाथ। इनके परिवार के बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। कहा जाता है कि इनकी पत्नी का नाम लोई था जिससे कमाल और कमाली दो संतानें थीं। रामानंद इनके गुरु थे। कबीर की मृत्यु 1495 ई० में मगहर में हुई।

रचनाएँ-कबीर की रचनाओं के संकलन ‘बीजक’ के तीन अंग हैं-सबद, साखी और रमैनी। साहित्यिक विशेषताएँ-कबीर के काव्य का विषय कुरीतियों, सामाजिक एवं धार्मिक बुराइयों का खंडन करता था। उन्होंने समाज में फैले हुए ढोंग, आडंबरों, जाति-पाति के भेदभाव पर कड़े प्रहार किए हैं। उन्होंने कहा है जाति-पाँति पूछे न कोई, हरि को भजे सो हरि को होड़ी। कबीर ने ईश्वर प्राप्ति के लिए गुरु की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने गुरु को गोविंद से भी बड़ा बताया है। कबीर ने अपने काव्य में रहस्यवादी भावना का समावेश किया है।

भाषा-शैली-कबीर की भाषा-शैली ने सामान्य जन को प्रभावित किया है। उनकी भाषाः पंचमेल खिचड़ी है जिसे साहित्यकार सधुक्कड़ी के नाम से पुकारते हैं। इस भाषा में पूर्वी हिंदी, ब्रज, अवधी, राजस्थानी, पंजाबी आदि भाषाओं का मिश्रण है।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

HBSE 8th Class Hindi यह सबसे कठिन समय नहीं Textbook Questions and Answers

पाठ से

प्रश्न 1.
“यह कठिन समय नहीं है” यह बताने के लिए कविता में कौन-कौन से तर्क प्रस्तुत किए गए है? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
‘यह कठिन समय नहीं है’ बताने के लिए कविता में निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किए गए हैं

  • चिड़िया की चोंच में अभी भी तिनका दबा है।
  • चिड़िया की उड़ान में कोई बाधा नहीं है।
  • स्टेशन पर रेलगाड़ियों का आवागमन जारी है।
  • लोग एक-दूसरे की प्रतीक्षा करते हैं।
  • लोगों को दूसरों की कुशलता की चिंता रहती है।
  • बूढी नानी अभी बच्चों को कहानियाँ सुनाती है।

प्रश्न 2.
चिड़िया चोंच में तिनका दबाकर उड़ने की तैयारी में क्यों है ? वह तिनकों का क्या करती होगी ? लिखिए।
उत्तर :
चिड़िया चोंच में तिनका दबाकर उड़ने की तैयारी में इसलिए है ताकि वह उस तिनके को अपने घोंसले तक ले जा सके। वह उस तिनके से अपने घोंसले को मजबूत करती होगी।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

प्रश्न 3.
कविता में कई बार ‘अभी भी’ का प्रयोग करके बातें रखी गई हैं। ‘अभी भी’ का प्रयोग करते हुए तीन वाक्य बनाइए और देखिए उनमें लगातार, निरंतर, बिना रुके चलने वाले किसी कार्य का भाव निकल रहा है या नहीं ?
उत्तर :
‘अभी भी’ के प्रयोग वाले वाक्य :
1. अभी भी वर्षा हो रही है।
2. मैं अभी भी पुस्तकें पढ़ता हूँ।
3. पुलिस अभी भी लोगों के चालान करती है।

  • इन तीनों वाक्यों में लगातार, बिना रुके चलने वाले कार्य का भाव निकल रहा है।

प्रश्न 4.
“नहीं” और “अभी भी” को एक साथ प्रयोग करके तीन वाक्य लिखिए और देखिए ‘नहीं’ ‘अभी भी’ के पीछे कौन-कौन से भाव छिपे हो सकते
उत्तर :
1. नहीं, अभी भी मैं तुम्हें हरा सकता हूँ।
2. नहीं, अभी भी आतंक का वातावरण बना हुआ है।
3. नहीं, अभी भी तुम सच नहीं बोल रहे हो।

  • ‘नहीं’ के पीछे किसी बात को नकारने के तथा ‘अभी भी’ के पीछे निरंतरता के भाव छिपे हुए हैं।

कविता से आगे

प्रश्न 1.
घर के बड़े-बूढों द्वारा बच्चों को सुनाई जाने वाली किसी ऐसी कथा की जानकारी प्राप्त कीजिए जिसके आखिरी हिस्से में कठिन परिस्थितियों से जीतने का संदेश हो।
उत्तर :
विद्यार्थी ऐसी कथा की जानकारी प्राप्त करें।

प्रश्न 2.
आप जब भी घर से स्कूल जाते हैं कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा होता है। सूरज डूबने का समय भी आपको खेल के मैदान से घर लौट चलने की सूचना देता है कि घर में कोई आपकी प्रतीक्षा कर रहा है-प्रवीक्षा करने वाले व्यक्ति के विषय में आप क्या सोचते हैं ? अपने विचार लिखिए।
उत्तर :
सूरज डूबने के समय घर पर हमारी माँ हमारी प्रतीक्षा कर रही होती है। समय पर न लौटने पर वह परेशान हो जाती है। वह हमारी शुभचिंतिका होती है। उसका प्यार दिखावटी नहीं होता। माँ की इच्छा होती है कि उसकी संतान दिन छिपने से पहले घर सकुशल लौट आए।

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अनुमान और कल्पना

अंतरिक्ष के पार की दुनिया से क्या सचमुच कोई बस आती है जिससे खतरों के बाद भी बचे हुए लोगों की खबर मिलती है ? आपकी राय में यह झूठ है या सच ? यदि झूठ है तो कविता में ऐसा क्यों लिखा गया ? अनुमान लगाइए यदि सच लगता है तो किसी अंतरिक्ष संबंधी विज्ञान कथा के आधार पर कल्पना कीजिए वह बस कैसी होगी, वे बचे हुए लोग खतरों से क्यों घिर गए होंगे? इस संदर्भ को लेकर कोई कथा बना सकें तो बनाइए।
उत्तर :
हम जानते हैं कि यह सब झूठ है। यह सब कल्पना पर आधारित है। कविता में ऐसा इसलिए लिखा गया है ताकि कुछ फैंटेसी बनी रहे। कई काल्पनिक बातें हमें आनंद देती हैं। वैसी ही बात अंतरिक्ष के पार की दुनिया के बारे में है।

केवल पढ़ने के लिए

पहाड़ से ऊँचा आदमी तीन सौ साठ फीट लंबा और तीस फीट चौड़ा पहाड़ काटने के लिए कितना वक्त लग सकता है? निश्चित ही टेक्नोलॉजी के इस युग में इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करेगा कि आप पहाड का सीना चीरने के लिए किस मशीन का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन अगर यह पूछा जाए कि इसी काम को एक ही शख्स को अंजाम देना हो तो कितना ‘वक्त लगेगा?

शायद यह चकरा देनेवाला सवाल होगा लेकिन बिहार के गया जिले के गेलौर गाँव में एक मजदूर परिवार में जन्मे एक शख्स ने इसका जवाब अपने बाजुओं और अपनी मेहनत से दिया। पहाड़ को हिला देनेवाले उन दशरथ मांझी ने राजधानी दिल्ली में 2007 में अंतिम सांस ली। उनका जन्म 1934 में हुआ था।

वर्ष 1966 की किसी अलसुबह जब छेनी-हथौड़ा लेकर दशरथ माँझी अपने गांव के पास स्थित पहाड़ के पास पहुंचे तो बहुत कम लोगों को इस बात का पता था कि इस शख्स ने अपने दिल में क्या ठान लिया है। मजदूरी और कभी-कभार इधर-उधर काम करने वाले राहगीरों के लिए ही नहीं, गाँव के लोगों के लिए भी वह एक हँसी के पात्र बन गए थे।

जीवन संगिनी फागुनी देवी का समय पर इलाज न करा पाने से उसे खो चुके दशरथ मांझी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा। धुन के पक्के दशरथ की अथक मेहनत बाईस साल बाद तब रंग लाई, जब उस पहाड़ से एक रास्ता दूसरे गाँव तक निकल आया।

आखिर ऐसी क्या बात हुई कि दशरथ को पहाड़ चीरने की धुन सवार हुई। दरअसल पहाड़ को जब तक चीरा नहीं गया था, तब तक दशरथ के गाँव से सबसे नजदीकी वजीरगंज अस्पताल 90 किलोमीटर पड़ता था। दशरथ की पत्नी की तबीयत खराब होने पर उसे वहाँ ले जाने के दौरान ही उसने दम तोड़ दिया था। उन्हें लगा कि पहाड़ से कोई रास्ता होता तो मैं अपनी पत्नी को वक्त पर अस्पताल ले जाता और उसका इलाज करा पाता। सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की एक कविता है: ‘दुख तुम्हें क्या तोड़ेगा तुम-दुख को तोड़ दो। बस अपनी आँखें औरों के सपनों से जोड़ दो।’

जिंदगी का तीसवाँ वसंत पार कर चुके दशरथ मांझी ने शायद शेष गाँव के निवासियों के मन में दबी इस छोटी-सी । हसरत को अपनी जिंदगी का मिशन बना डाला और अपनी पत्नी की असामयिक मौत से उपजे प्रचंड दुख को एक नयी संकल्प शक्ति में तब्दील कर दिया। पाँच-छह साल तक दशरथ अकेले ही मेहनत करते रहे। धीरे-धीरे और लोग भी जुड़ा चले गए। वहाँ एक दानपात्र भी रखा गया था, जिसमें लोग चंदा डाल देते थे। कई लोग अपने घर से अनाज भी देते थे।

आज की तारीख में आप कह सकते हैं कि गेलौर से वजीरगंज जाने की अस्सी किलोमीटर की दूरी को 13 किलोमीटर ला देने वाला यह रास्ता एक श्रमिक के प्यार की निशानी है। एक अंग्रेज पत्रकार ने लिखा : ‘पूअरमैंस ताजमहल’।

कुछ साल पहले एक पत्रकार उनसे मिलने गया, तब एक फक्कड़ कबीरपंथी की तरह यायावरी कर रहे दशरथ मांझी ने उन्हें अपनी एक प्रिय कहानी सुनाई थी जो उस चिड़िया के बारे में थी जिसका घोंसला समुद्र बहाकर ले गया था। कहानी उस चिड़िया की प्रचंड जिजीविषा और संकल्प को बयां कर रही थी, जिसके तहत समुद्र द्वारा घोंसला न लौटाने पर चिड़िया ने अकेले ही समंदर का सुखा देने को संकल्प लिया। शुरुआत में उसे पागल करार देने वाली बाकी चिड़ियाँ भी उसके साथ जुड़ गई और फिर विष्णु का वाहन गरुड़ भी इन कोशिशों का हिस्सा बन गया।

फिर बीच-बचाव करने के लिए खुद विष्णु को आना पड़ा जिन्होंने समुद्र को धमकाया कि अगर उसने चिड़िया का घोंसला नहीं लौटाया तो पलभर में उसे सुखा दिया जाएगा। तब पत्रकार ने जब उनसे पूछा कि कहानी की चिड़िया क्या आप ही हैं। इसके जवाब में आँखों में शरारत भरी मुस्कान लिए दशरथ मांझी ने बात टाल दी थी।

पिछले कुछ सालों से दशरथ माँझी कबीरपंथी साधु बन गए थे और यायावर बने हुए थे, लेकिन कबीर का उनका स्वीकार महज ऊपरी नहीं था। उनके विचारों में भी कबीर जैसी प्रखरता थी। गरीब और मेहनतकशों का ईश्वर पूजा में उलझे रहना और तमाम अंधश्रद्धाओं को शिकार होना उन्हें कचोटता था। वे कहते थे कि जिंदगी भर फाकाकशी करते रहे आदमी की मौत के बाद मृत्युभोज में क्यों अच्छे-अच्छे पकवान खिलाए जाते हैं. इसके लिए लोग कर्जा क्यों लेते हैं?

दशरथ मांझी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन क्या वे हमें उन मिथकीय पात्रों की याद दिलाते प्रतीत नहीं होते, जैसे पात्र हमें पुराणों में मिलते हैं, फिर वह चाहे प्रोमेथियस हो या भगीरथ। ऐसी शख्यिसतें, जो मनुष्य की उद्दाम जिजीविषा को प्रतिबिंबित कर रही होती हैं और अपनी कोशिशों से प्रकृति की दानव शक्तियों और इंसानियत के दुश्मनों से लड़ रही होती हैं।

अपने जीवन का फलसफा बयान करते हुए उन्होंने एक पत्रकार को शायद इसलिए बताया था कि पहाड़ मुझे उतना ऊँचा कभी नहीं लगा, जितना लोग बताते हैं। मनुष्य से ज्यादा ऊंचा कोई नहीं होता।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

यह सबसे कठिन समय नहीं काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं !
अभी भी दबा है चिड़िया की
चोंच में तिनका
और वह उड़ने की तैयारी में है !
अभी भी झरती हुई पत्ती
थामने को बैठा है हाथ एक
अभी भी भीड़ है स्टेशन पर
अभी भी एक रेलगाड़ी जाती है गंतव्य तक,
जहाँ कोई कर रहा होगा प्रतीक्षा

प्रसंग :
प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत भाग-3’ में संकलित कविता ‘यह सबसे कठिन समय नहीं’ से अवतरित है। इसकी रचयिता जया जादवानी हैं।

व्याख्या :
कवयित्री आशावादी है। वह वर्तमान समय को कोसती नहीं है। उसके अनुसार आज का समय सबसे कठिन समय नहीं है। कठिन समय वह होता है जब पशु-पक्षियों तक को आश्रय का अभाव हो जाता है। अभी तक चिड़ियों की चोंच में तिनका मौजूद है अर्थात् उसे भोजन और आश्रय मिल रहा है। चिड़िया स्वच्छंदता पूर्वक विचरण करने को भी तत्पर है। हाथ पेड़-पौधों से झरती पत्तियों को थामने को तैयार रहता है। स्टेशन पर होने वाली भीड़ में कोई कमी नहीं है। वहाँ रेलगाड़ियों का आना-जाना निरंतर होता रहता है। रेलगाड़ी को जहाँ तक जाना होता है, वह वहाँ तक जाती है और उसकी प्रतीक्षा करने वाले लोग भी मौजूद हैं।

ये सभी बातें इस बात का सबूत हैं कि जीवन अपनी रफ्तार से चल रहा है। इसे सबसे कठिन समय तो नहीं कहा जा सकता।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

2. अभी भी कहता है कोई किसी को
जल्दी आ जाओ कि अब
सूरज डूबने का वक्त हो गया
अभी कहा जाता है
उस कथा का आखिरी हिस्सा
जो बूढ़ी नानी सुना रही सदियों से
दुनिया के तमाम बच्चों को
अभी आती है एक बस
अंतरिक्ष के पार की दुनिया से
लाएगी बचे हुए लोगों की खबर!
नहीं, यह सबसे कठिन समय नहीं।

प्रसंग :
प्रस्तुत काव्यांश जया जादवानी की कविता ‘यह सबसे कठिन समय नहीं है’ से अवतरित है। कवयित्री आशावादी है।

व्याख्या :
कवयित्री का कहना है कि आज के समय को सबसे कठिन समय नहीं कहा जा सकता। अभी भी लोगों के दिलों में एक-दूसरे के लिए प्रेम और चिंता की भावना विद्यमान है। अभी भी हमारे शुभचिंतक चाहते हैं कि हम सूरज छिपने से पहले घर पहुंच जाएँ। रात को देर होने पर उन्हें बेचैनी होती है।

बूढ़ी नानी अभी भी बच्चों को अपनी सदियों पुरानी कहानी सुनाकर खुश कर देती है। बच्चों को अंतरिक्ष पार से आने वाली परी की प्रतीक्षा रहती है। वे उस पार के बच्चों के बारे में जानना चाहते हैं। जब तक लोगों का आपस में इतना प्यार और लगाव बना हुआ है तब तक भला इस दौर को कठिन समय कैसे कहा जा सकता है। हमें आशा का दामन नहीं छोड़ना चाहिए।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 8 यह सबसे कठिन समय नहीं

यह सबसे कठिन समय नहीं Summary in Hindi

यह सबसे कठिन समय नहींकविता का सार

प्रस्तुत कविता जया जादवानी द्वारा रचित है। कवयित्री का कहना है कि अभी निराशा की कोई बात नहीं है। आज का समय सबसे कठिन समय नहीं है। अभी भी आशा के कई चिह्न शेष हैं। अभी भी चिड़िया की चोंच में तिनका है अर्थात् उसे आश्रय प्राप्त है और वह उड़ने को भी तैयार है। पेड़ से झरती पत्ती को थामने वाला कोई मौजूद है। रेलवे स्टेशनों पर चहल-पहल अभी भी बरकरार है। रेलगाड़ी अपने निश्चित स्थल तक जाती है।

अभी तक लोग अपने आगंतुकों की प्रतीक्षा करते हैं। लोग अपनों की चिंता करने वाले अभी भी मौजूद हैं। सूरज छिपने से पहले अपनों को लोग घर के अंदर देखना चाहते हैं। अभी भी बूढ़ी नानी छोटे बच्चों को कहानी-किस्से सुनाती हैं। अभी भी बच्चों को अंतरिक्ष पार की दुनिया लुभाती है। इन सबका होना यह सिद्ध करता है कि आज भी सबसे कठिन समय नहीं आया है। जीवन की आशा अभी भी मौजूद है।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए

HBSE 8th Class Hindi क्या निराश हुआ जाए Textbook Questions and Answers

आपके विचार से

प्रश्न 1.
लेखक ने स्वीकार किया है कि लोगों ने उन्हें भी धोखा दिया है, फिर भी वह निराश नहीं है। आपके विचार से इस बात का क्या कारण हो सकता है?
उत्तर:
लेखक इस तथ्य को स्वीकार करता है कि लोगों ने कई अवसरों पर उसे भी धोखा दिया है, पर वह इसी को सभी पर लागू नहीं करना चाहता। स्थिति चिंताजनक अवश्य है, पर निराश होकर बैठ जाने वाली नहीं है। जैसी स्थिति है, उसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया जाता है। लेखक आशावादी है, वह कुछ बुरे लोगों के आधार पर भविष्य को अंधकारमय नहीं देखता। अभी भी उसका विश्वास जीवन के महान मूल्यों में बना हुआ है। यही कारण है कि वह निराश नहीं है।

प्रश्न 2.
समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और टेलीविजन पर आपने ऐसी अनेक घटनाएं देखी-सुनी होंगी जिनमें लोगों ने बिना किसी लालच के दूसरों की सहायता की हो या ईमानदारी से काम किया हो। ऐसे समाचार तथा लेख एकत्रित करें और कम से कम दो घटनाओं पर अपनी टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
विद्यार्थी इस प्रकार के समाचार तथा लेख एकत्रित

दो घटनाएँ:
1. पिछले दिनों एक रेलगाड़ी दूसरी खड़ी रेलगाड़ी से बल्लभगढ़ (हरियाणा) के निकट जा टकराई थी। इस टक्कर में शुरू के चार डिब्बे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए थे। यद्यपि रात का समय था फिर भी दुर्घटना की खबर निकटवर्ती क्षेत्र में तेजी से फैल गई। ग्रामीण लोग अपने-अपने वाहन लेकर घटनास्थल पर आ गए।

सरकारी सहायता तो काफी विलंब से पहुंची, पर ग्रामीणों ने घायलों को निकाल-निकाल कर निकटवर्ती अस्पतालों तक पहुंचाया। उनके इस काम में उनका कोई लालच न था बल्कि उन्होंने मानवीय दृष्टिकोण से यह काम किया था। उनकी तत्परता से कई लोगों की जान बच सकी।

2. दूसरी घटना दिल्ली के महरौली रोड पर घटी। एक मोटर साइकिल सवार को एक कार ने जबर्दस्त टक्कर मारी और भाग गई। बाइक पर पति-पत्नी सवार थे। वे बेहोश, लहू-लुहान अवस्था में दूर जा गिरे थे। तभी एक जीप आकर रुकी। उसमें से दो-तीन व्यक्ति उतरे और घायलों को जीप में लिटाकर सफदरजंग अस्पताल तक ले गए। उन लोगों ने भी यह काम इंसानियत के वशीभूत होकर किया था। उन्हें किसी प्रकार का लालच न था।

प्रश्न 3.
लेखक ने अपने जीवन की दो घटनाओं में रेलवे टिकट बाबू और बस कंडक्टर की अच्छाई और ईमानदारी की बात बताई है। आप भी अपने या अपने किसी परिचित के साथ हुई किसी घटना के बारे में बताइए जिसमें किसी ने बिना किसी स्वार्थ के भलाई, ईमानदारी और अच्छाई के कार्य किए हों।
उत्तर:
लेखक ने अपने जीवन की दो घटनाओं में रेलवे के टिकट बाबू और बस कंडक्टर की अच्छाई और ईमानदारी की बात बताई है। हमारे जीवन में भी ऐसी घटनाएं घटित होती रहती हैं। पिछले सप्ताह की ही बात है। मैं डी.टी.सी. की बस में सफर कर रहा था कि एक व्यक्ति एक महिला के हाथ से पर्स छीन कर बस से उतर कर भाग निकला। वह महिला सहायता की गुहार लगाती रही, पर लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया।

तभी बस के कंडक्टर ने बस रुकवाई और उत्तर कर उस ठग के पीछे भागने लगा। काफी दूर जाने के बाद कंडक्टर ने उस ठग को पकड़ लिया। तब तक बस भी उस तक पहुंच चुकी थी। उसने उसे धक्का देकर बस में चढ़ाया और बस को पास के थाने में ले गया। वहाँ उसे पुलिस के हवाले किया तथा पर्स उस महिला को दिलवा दिया। सभी सवारियों ने उसके साहस एवं ईमानदारी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उसने अपने कर्तव्य का पालन बिना किसी लालच के किया था।

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पर्दाफाश

प्रश्न 1.
दोषों का पर्दाफाश करना कब बुरा रूप ले सकता है?
उत्तर:
दोषों का पर्दाफाश करना तब बुरा रूप ले लेता है जब हम इसमें रस लेने लगते हैं। दूसरे के दोषों का उल्लेख चटखारे लेकर नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 2.
आजकल के बहुत से समाचार पत्र या समाचार चैनल ‘दोषों का पर्दाफ़ाश’ कर रहे हैं। इस प्रकार समाचारों और कार्यक्रमों की सार्थकता पर तर्क सहित विचार लिखिए।
उत्तर:
आजकल बहुत से समाचार पत्र या समाचार चैनल दोषों का पर्दाफाश कर रहे हैं। हमारे विचार से उनके इस काम का असली कारण अपनी TRP को बढ़ाना है। वे ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुँचने के लिए कई बार पर्दाफाश के नाम पर बात का बतंगड़ बना डालते हैं। जैसे दिल्ली में एक शिक्षिका के बारे में किया गया।

कारण बताइए

निम्नलिखित के संभावित परिणाम क्या-क्या हो सकते हैं ? आपस में चर्चा कीजिए-
उत्तर:
जैसे:”ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है।” परिणाम-भ्रष्टाचार बढ़ेगा।

1. “सच्चाई केवल भीरू और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है।” ……………………
उत्तर:
परिणाम = झूठ का बोलबाला बढ़ेगा, वे ही फले-फूलेंगे। ……………………

2. “झूठ और फरेब का रोजगार करनेवाले फल-फूल रहे हैं।” ……………………
उत्तर:
परिणाम = ईमानदारी की प्रवृत्ति घटती चली जाएगी। ……………………

3. “हर आवमी दोषी अधिक दिख रहा है, गुणी कम।”? ……………………
उत्तर:
दोष ज्यादा दिखता है जैसे कालिमा ज्यादा फैलती है। गुणों की चर्चा हम कम करते हैं।

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दो लेखक और बस यात्रा

आपने इस लेख में एक बस की यात्रा के बारे में पड़ा। इससे पहले भी आप एक बस यात्रा के बारे में पड़ चुके हैं। यदि दोनों बस-यात्राओं के लेखक आपस में मिलते, तो एक-दूसरे को कौन-कौन सी बातें बताते ? अपनी कल्पना से उनकी बातचीत लिखिए।
उत्तर:
पहली बस-यात्रा का लेखक: अरे भाई, हमारी बस तो पहले से ही खटारा लग रही थी। तुम्हारी बस को क्या हो गया?

दूसरी बस-यात्रा का लेखक: हमारी बस भी रुक-रुक कर चल रही थी। अब सुनसान जगह पर आकर बिल्कुल ही रुक

पहली बस-यात्रा का लेखक: हमारी बस का ड्राइवर बड़ा होशियार है। उसने इंजन तक पेट्रोल पहुंचाने का अनोखा उपाय खोज निकाला।

दूसरी बस-यात्रा का लेखक: हमारी बस का कंडक्टर बहुत होशियार है। वह बस अड्डे जाकर नई बस ले आया। साथ ही बच्चों के लिए एक लाटे में दूध भी ले आया।

सार्थक शीर्षक

1. लेखक ने लेख का शीर्षक ‘क्या निराश हुआ जाए’ क्यों रखा होगा ? क्या आप इससे भी बेहतर शीर्षक सुझा सकते हैं?
उत्तर:
यह शीर्षक इसलिए रखा गया होगा क्योंकि लेखक लोगों के मन से निराशा की भावना को निकालना चाहता है।
अन्य शीर्षक-आशावादी दृष्टिकोण।

2. यदि ‘क्या निराश हुआ जाए’ के बाद कोई विराम चिह्न लगाने के लिए कहा जाए तो आप दिए गए चिह्नों में से कौन-सा चिह्न लगाएंगे ? अपने चुनाव का कारण भी बताइए। -, । .! ? . । = ।…. ।
उत्तर:
क्या निराश हुआ जाए ?
यहाँ प्रश्नवाचक चिह्न उपयुक्त है क्योंकि कवि ने प्रश्नात्मक लहजे में शीर्षक का नाम रखा है। इसका अप्रत्यक्ष अर्थ निकलता है-निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

3. “आदर्शों की बातें करना तो बहुत आसान है पर उन पर चलना बहुत कठिन है।” क्या आप इस बात से सहमत । हैं? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
हाँ, यह बात सही है कि आदर्शों की बात करना तो आसान है। पर उन पर चलना बहुत कठिन है। आदशों पर चलना कष्टों और बाधाओं को आमंत्रण देना है। हम फिर भी यही कहेंगे कि आदर्शों पर चलकर ही हम अपने व्यक्तित्व को एक नया रूप दे पाएंगे। आदशों से हटकर जीना तो समझौतावादी हो जाएगा। कुछ अच्छा पाने के लिए कष्ट झेलने ही पड़ते हैं।

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सपनों का भारत

“हमारे महान मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।”
1. आपके विचार से हमारे महान विद्वानों ने किस तरह के भारत के सपने देखे थे? लिखिए।
2. आपके सपनों का भारत कैसा होना चाहिए है? लिखिए।
उत्तर:
1. हमारे विचार से हमारे महान विद्वानों ने एक ऐसे भारत के सपने देखे थे जिसमें ईमानदारी, मेहनत, सच्चाई आदि मानवीय आदर्शों की प्रतिष्ठा होगी। यहाँ ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय नहीं समझा जाएगा। लोगों की जीवन के महान मूल्यों में आस्था बनी रहेगी।

2. हमारे सपनों का भारत ऐसा है जिसमें श्रम, ईमानदारी एवं कर्तव्यनिष्ठा को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता हो। मेरे भारत में हेरा-फेरी करने वालों की कोई जगह नहीं होगी। मेरे सपनों के भारत में कृषि, उद्योग, वाणिज्य, शिक्षा, स्वास्थ्य की उन्नत अवस्थाएं होंगी। सभी को सुख-सुविधाएँ पाने का अधिकार होगा।

भाषा की बात

1. दो शब्दों के मिलने से समास बनता है। समास का एक प्रकार है- द्वंद्व समास। इसमें दोनों शब्द प्रधान होते हैं। जब दोनों भाग प्रधान होंगे तो एक-दूसरे में द्वंद्व (स्पर्धा, होड़) की संभावना होती है। कोई किसी से पीछे रहना नहीं चाहता, जैसे-चरम और परम = चरम-परम, भीरू और बेबस = भीरू-बेबस। दिन और रात = दिन रात।

‘और’ के साथ आए शब्दों के जोड़े को ‘और’ हटाकर (-) योजक चिह्न भी लगाया जाता है। कभी-कभी एक साथ भी लिखा जाता है। द्वंद्व समास के बारह उदाहरण ढूँढकर लिखिए।
उत्तर:
द्वंद्व समास के उदाहरण:
1. भाई-बहन
2. दाल-रोटी
3. माँ-बाप
4. भीम-अर्जुन
5. सच्चा -झूठा
6. पाप-पुण्य
7. पी-शक्कर
8. पति-पत्नी
9. दाल-चावल
10. सुख-दुःख
11. नर-नारी
12 ऊंच-नीच

2. पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाओं के उदाहरण खोजकर लिखिए।
उत्तर:

  1. व्यक्तिवाचक संज्ञा: रवीन्द्रनाथ ठाकुर, तिलक, महात्मा गाँधी, भारतवर्ष।
  2. जातिवाचक संज्ञा: समाचारपत्र, समुद्र, कानून, बीमार, मनुष्य, ड्राइवर, कंडक्टर, नौजवानों, यात्री बस।
  3. भाववाचक संज्ञा: उगी, डकैती, तस्करी, चोरी, ईमानदारी, स्वास्थ्य, विनम्रता।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए

HBSE 8th Class Hindi क्या निराश हुआ जाए Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
लेखक के अनुसार आज के समाज में कौन-कौन सी बुराइयाँ दिखाई देती हैं ?
उत्तर:
लेखक के अनुसार आज के समाज में निम्नलिखित बुराइयाँ दिखाई देती हैं:

  • ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार की बुराइयाँ।
  • लोग एक-दूसरे के दोष ढूँढते हैं और उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाते हैं।
  • सभी को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है।

प्रश्न 2.
क्या कारण है कि आज हर आदमी में दोष अधिक दिखाई दे रहे हैं और गुण कम?
उत्तर:
आजकल कुछ माहौल ऐसा बन गया है कि ईमानदारी से जीविका चलाने वाले पिस रहे हैं और झूठ-फरेब का सहारा लेने वाले फल-फूल रहे हैं। जो आदमी कुछ करता है उसमें दोष खोजे जाते हैं जबकि कुछ न करने वाला सुखी रहता है। आजकल काम करने वाला हर आदमी दोषी दिखाई देता है। उसके गुणों को भुला दिया जाता है।

प्रश्न 3.
लेखक दोषों का पर्दाफाश करते समय किस बात से बचने के लिए कहता है ?
उत्तर:
लेखक दूसरे के दोषों का पर्दाफाश करते समय उसमें रस लेने की प्रवृत्ति से बचने के लिए कहता है। उसे दोष को सामान्य ढंग से ही कहना चाहिए, चटखारे लेकर नहीं।

प्रश्न 4.
कुछ यात्री बस-ड्राइवर को मारने के लिए क्यों उतारू थे ?
उत्तर:
कुछ यात्री बस-ड्राइवर को मारने को इसलिए उतारू थे, क्योंकि उनके विचार से ड्राइवर ने जान-बूझकर बस खराब कहकर रोक दी थी। जब कंडक्टर चुपचाप चला गया तो उन्होंने समझा कि ड्राइवर ने उसे डाकुओं को बुलाने के लिए भेजा है।

प्रश्न 5.
टिकट-चेकर के चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा लेखक को चकित क्यों कर गई ?
उत्तर:
एक बार टिकट लेते समय लेखक ने भूल से बाबू को दस रुपए की जगह सौ का नोट दे दिया। टिकट लेकर वह निश्चिंत होकर रेल के डिब्बे में जा बैठा। बहुत देर बाद टिकट बाबू उसे ढूँढता हुआ आया। उसने लेखक को नब्बे रुपये लौटा दिए और कहा, ‘अच्छा हुआ आप मिल गए।’ उस समय उस बाबू के मुख पर विचित्र संतोष का भाव था। लेखक को इस ईमानदारी पर आश्चर्य हुआ।

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प्रश्न 6.
जीवन के महान् मूल्यों के बारे में हमारी आस्था क्यों हिलने लगी है ?
उत्तर:
आज ऐसा वातावरण बन गया है कि ईमानदारी और मेहनत से काम करने वाले भोले लोग पिस रहे हैं और झूठ-फरेब से जीविका चलाने वाले चालाक लोग मौज-मजे उड़ा रहे हैं। सच्चाई सिर्फ बेबस और डरपोक लोगों का काम समझा जाता है। यही कारण है कि जीवन के महान् मूल्यों पर हमारी आस्था डगमगाने लगी है।

प्रश्न 7.
हमारे महापुरुषों के सपने के भारत का क्या स्वरूप था ?
उत्तर:
हमारे महापुरुषों के सपने के भारत का स्वरूप ऐसा था जिसमें धर्म को कानून से बड़ा माना गया था। उसके मूल्य थे-सेवा, ईमानदारी, सच्चाई, आध्यात्मिकता। इस स्वरूप में मनुष्य मात्र से प्रेम था, महिलाओं का सम्मान होता था तथा झूठ और चोरी को गलत समझा जाता था।

प्रश्न 8.
भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध आक्रोश करना किस बात को प्रमाणित करता है ?
उत्तर:
भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध आक्रोश प्रकट करना इस बात को प्रमाणित करता है कि हम ऐसी चीज को गलत समझते हैं और समाज में उन तत्त्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं, जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं।

प्रश्न 9.
जो आज ऊपर-ऊपर दिखाई दे रहा है वह कहाँ तक मनुष्य निर्मित नीतियों की त्रुटियों की देन है?
उत्तर:
आज समाज में जो कुछ ऊपर-ऊपर से खराब दिखाई दे रहा है वह मनुष्य द्वारा बनाई गई गलत नीतियों का ही दुष्परिणाम है। मनुष्य की बनाई नौतियाँ कई बार समय-सीमा पर खरी नहीं उतरती अतः उन्हें बदलने की आवश्यकता उपस्थित हो जाती है। कभी-कभी ये परीक्षित आदर्शों से टकराते हैं अत: निराश होने की आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 10.
“वर्तमान परिस्थितियों में हताश हो जाना ठीक नहीं है।” इस कथन की पुष्टि में लेखक ने क्या उदाहरण दिए हैं ?
उत्तर:
पहला उदाहरण: एक बार लेखक टिकट लेते समय दस रुपए की जगह सौ रुपए का नोट दे बैठा। जब वह रेल के डिब्बे में बैठ गया तो बहुत देर बाद क्लर्क ढूँढता-ढूँढता वहाँ आया। उसने लेखक को नब्बे रुपए देते हुए कहा-‘अच्छा हुआ आप मिल गए।’

दूसरा उदाहरण: एक बार लेखक परिवार सहित बस में , कहीं जा रहा था। रात का समय था और रास्ता बहुत खराब था। अचानक एक सुनसान स्थान पर बस खराब हो गई। बस के कंडक्टर ने बस की छत से साइकिल उतारी और कहीं चला गया। यात्री बहुत घबराए। उन्होंने सोचा कि डाकुओं को बुलाने गया है।

सभी यात्रियों ने ड्राइवर को बस से नीचे उतार कर पौटने का निश्चय किया। उनका कहना था कि ड्राइवर ने जान-बूझकर बस रोकी है। वह डाकुओं से मिला हुआ है। लेखक ने ड्राइवर को पीटने से तो बचा लिया, पर मन-ही-मन वह भी डरा हुआ था। उसके बच्चे भूखे और प्यासे चिल्ला रहे थे। तभी सामने से एक खाली बस आई जिसमें उनकी बस का कंडक्टर भी था। कंडक्टर ने आते ही कहा: आप लोगों के लिए दूसरी बस ले आया हूँ। पहली बस तो चलने लायक नहीं थी। इस पर सभी ने कंडक्टर को धन्यवाद दिया और ड्राइवर से क्षमा मांगी। ऐसे अनेक उदाहरण जीवन में मिल जाते हैं, इसलिए निराश होने का कारण नहीं।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 7 क्या निराश हुआ जाए

प्रश्न 11.
रवींद्रनाथ ठाकुर ने भगवान से क्या प्रार्थना की और क्यों ?
उत्तर:
रवींद्रनाथ ठाकुर ने भगवान से यह प्रार्थना की कि “संसार में केवल नुकसान ही उठाना पड़े, धोखा ही खाना पड़े तो ऐसे अवसरों पर भी हे प्रभो! मुझे ऐसी शक्ति दो कि मैं तुम्हारे ऊपर संदेह न करूं।” उन्होंने ऐसी प्रार्थना इसलिए की क्योंकि वे धोखा तो खा सकते थे, पर किसी को धोखा देना नहीं चाहते थे।

प्रश्न 12.
‘महान भारत को पाने की संभावना बनी हुई है और बनी रहेगी।’ लेखक के इस कथन से हमें क्या संदेश मिलता है?
तर:
लेखक के इस कथन से हमें यह संदेश मिलता है कि भारतवर्ष महान था, अब भी महान है। हमें आशावादी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। वर्तमान परिस्थितियों में भी निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

प्रश्न 13.
निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए:
(क) सामाजिक कायदे-कानून कभी-कभी बुग-युग से परीक्षित आवशों से टकराते हैं।
उत्तर:
मनुष्य-बुद्धि ने परिस्थितियों का सामना करने के लिए कुछ कायदे-कानून बनाए हैं। ये कायदे-कानून सबके लिए बनाए जाते हैं, पर सबके लिए एक ही प्रकार के नियम सुखकर नहीं होते। ये कायदे-कानून कभी-कभी युगों से चले आ रहे जींचे-परखे आदशों से मेल न खाने से टकराते हैं। ऐसा होता आया

(ख) व्यक्ति-चित्त सब समय आवर्शों द्वारा चालित नहीं होता।
उत्तर:
व्यक्ति का चित्त हर समय आदर्शों के अनुसार ही नही चलता। मनुष्य के मन में लोभ, मोह जैसे विकार भी होते हैं, वे उस पर कई बार हावी हो जाते हैं। उस स्थिति में आदर्श पीछे रह जाते हैं।

(ग) धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता है, कानून को बिया जा सकता है।
उत्तर:
भारतवर्ष कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा था, पर अब इस स्थिति में अंतर आ गया है। अब एसा माना जान लगा है कि धर्म तो पवित्र है अत: उसे धोखा नहीं दिया जा सकता। धर्मभीरु लोग भी कानून को धोखा दे देते हैं।

(घ) महान् भारतवर्ष को पाने की संभावना बनी हुई है, बनी रहेगी।
उत्तर:
इसका आशय यह है कि भारतवर्ष की महानता को फिर से स्थापित करना कठिन नहीं है। उसे महान बनाया जा सकता है। हमें वर्तमान परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए। वर्तमान कमियाँ क्षणिक हैं, इन पर काबू पाया जा सकता है।

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प्रश्न 14.
‘बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई में उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है।’ क्यों ?
उत्तर:
सामान्यतः लोग दूसरों की बुराई करने में रस लेते हैं। इसमें उन्हें एक खास प्रकार का मजा आता है। यह एक बुरी प्रवृत्ति है। हम दूसरों की अच्छी बातों को उतनी रुचि के साथ प्रकट नहीं करते, जबकि हमें ऐसा करना चाहिए। अच्छी बातों को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।

प्रश्न 15.
‘क्या निराश हुआ जाए’ पाठ के शीर्षक से आप कहाँ तक सहमत हैं ?
उत्तर:
इस पाठ के शीर्षक से हम पूरी तरह सहमत हैं। इसका कारण यह है कि लेखक वर्तमान निराशाजनक परिस्थितियों से लोगों को उबारना चाहता है। वह प्रश्न करके अपनी चिंता अभिव्यक्त करता है। इस शीर्षक का तात्पर्य है- निराश होने की आवश्यकता नहीं है। यह शीर्षक पूरी तरह उचित है।

प्रश्न 16.
किस प्रकार के आचरण को निकृष्ट (घटिया) कहा गया है?
उत्तर:
जो लोग गरीबों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं के लिए मिले धन को बीच में ही हड़प लेते हैं.ऐसे नेताओं और अधिकारियों के जीवन को लेखक ने निकृष्ट (नीचतापूर्ण) कहा है।

प्रश्न 17.
‘उनके चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा थी। मैं चकित रह गया।’ उपर्युक्त पंक्तियों में संकेतित घटना का संक्षेप में वर्णन करो।
उत्तर:
एक बार टिकट लेते समय लेखक ने भूल से बाबू को दस रुपये की जगह सौ का नोट दे दिया। टिकट लेकर वह निश्चिंत होकर रेल के डिब्बे में जा बैठा। बहुत देर बाद टिकट बाबू उसे ढूंढता हुआ आया। उसने लेखक को नब्बे रुपये लौटा दिए और कहा, ‘अच्छा हुआ आप मिल गए’। उस समय उस बाबू के मुख पर विचित्र संतोष का गौरव था। लेखक को इस ईमानदारी पर आश्चर्य हुआ।

प्रश्न 18.
समाज में पाई जाने वाली अच्छाइयों में से एक अच्छाई नीचे दी गई है। ऐसी ही तीन अच्छाइयाँ और बताइए समाज महिलाओं का सम्मान करता है।
उत्तर:
अन्य अच्छाइयाँ:
(क) दूसरों की सेवा करने को प्रशंसनीय गुण माना जाता है।
(ख) ईमानदारी की सर्वत्र प्रशंसा की जाती है।
(ग) आध्यात्मिकता को गुण माना जाता है।

प्रश्न 19.
जीवन के मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था क्यों हिलने लगी है ? सही उत्तर छाँटिए:
(क) मानवीय मूल्य के अर्थ बदल गए हैं।
(ख) गाँधी और तिलक का भारत अतीत में डूब गया है।
(ग) श्रमजीवी पिस रहे हैं और फरेब का रोजगार करने वाले फल-फूल रहे हैं।
(घ) आज मानवीय मूल्यों का कोई महत्त्व नहीं रह गया है।
उत्तर:
(ग) श्रमजीवी पिस रहे हैं और फरेब का रोजगार करने वाले फल-फूल रहे हैं।

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क्या निराश हुआ जाए गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता है। समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार भरे रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित है। इसमें लेखक ने यह समझाने का प्रयास किया है कि हमें जीवन में निराश नहीं होना चाहिए। जीवन के प्रति आशावान बने रहना चाहिए।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि समाचार-पत्रों में विभिन्न प्रकार की बुराइयों के समाचार पढ़कर मन में निराशा आ जाना स्वाभाविक है। चोरी-डकैती, ठगी, तस्करी और भ्रष्टाचार आदि के समाचारों से अखबार भरे रहते हैं। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाता है, बदले में दूसरा व्यक्ति भी वैसा ही करता है।

इस स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि कोई भी आदमी ईमानदार नहीं रह गया है। सभी बेईमान प्रतीत होते हैं। अब हर आदमी, संदेह के घेरे में है। किसी के प्रति आदर-सम्मान रह ही नहीं गया है।

2. यह सही है कि इन दिनों कुछ ऐसा माहौल बना है कि ईमानदारी से मेहनत करके जीविका चलाने वाले निरीह और भोले-भाले श्रमजीवी पिस रहे हैं और झूठ तथा फरेब का रोजगार करने वाले फल-फूल रहे हैं। ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय समझा जाने लगा है, सच्चाई केवल भीरू और बेबस लोगों के हिस्से पड़ी है। ऐसी स्थिति में जीवन के महान मूल्यों के बारे में लोगों की आस्था ही हिलने लगी है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्य-पुस्तक वसंत भाग-3 में संकलित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित हैं। इसके रचयिता हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।

व्याख्या:
लेखक का कहना है कि भारत का वर्तमान माहौल कुछ निराशाजनक दिखाई देता है। इस माहौल में ईमानदार और मेहनती लोगों को अधिक परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। मेहनतकश वर्ग पिस रहा है। इन्हें रोजी-रोटी कमाने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। झूठे एवं धोखेबाज फलते-फूलते नजर आ रहे हैं।

वर्तमान समय में ईमानदारों को मूर्ख समझा जाने लगा है। जो लोग डरपोक और बेबस हैं वे ही सच्चाई के रास्ते पर चल रहे हैं। ऐसा वातावरण लोगों को जीवन मूल्यों से डिगाने में सहायक हो रहा है। अब उन मूल्यों से लोगों का विश्वास ही खत्म होता जा रहा है। यह स्थिति सुखद नहीं है।

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3. भारतवर्ष ने कभी भी भौतिक वस्तुओं के संग्रह को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया है। उसकी दृष्टि से मनुष्य के भीतर जो महान् आंतरिक गुण स्थिर भाव से बैठा हुआ है, वही चरम और परम है। लोभ-मोह, काम-क्रोध आदि विचार मनुष्य में स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहते हैं, पर उन्हें प्रधान शक्ति मान लेना और अपने मन तथा बुद्धि को उन्हीं के इशारों पर छोड़ देना बहुत बुरा आचरण है।

प्रसंग:
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक वसंत भाग-3 में संकलित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित हैं। इसके रचयिता हैं-हजारी प्रसाद द्विवेदी। इसमें लेखक ने यह समझाने की कोशिश की है कि हमें वर्तमान परिस्थितियों में निराश नहीं होना चाहिए।

व्याख्या:
लेखक बताता है कि भारतवर्ष में सुख-सुविधाओं की वस्तुओं को जमा करने को कभी महत्त्वपूर्ण नहीं माना गया। यहाँ आध्यात्मिक ज्ञान को पाने का प्रयास किया गया है। मनुष्य के अंदर जो आत्मा के रूप में परम सत्ता विराजमान है उसी को पाने का लक्ष्य रखा गया है तथा उसी को महान माना गया है।

यह सत्य है कि व्यक्ति के अंदर काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार (बुराइयाँ) विद्यमान रहते हैं. पर उन्हें मुख्य ताकत नहीं मान लेना चाहिए। यदि हम अपने मन और बुद्धि को उन्हीं के इशारों पर चलाने लगेंगे तो यह बहुत घटिया बात होगी। हमें तो इन विकारों पर अपना नियंत्रण रखना है। इन्हें अपने ऊपर हावी नहीं होने देना है।

4. दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उघाटित करके उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात है, अच्छाई को उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत भाग-3’ में संकलित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित है। लेखक वर्तमान स्थिति की समीक्षा करते हुए कहता है:

व्याख्या:
दोषों अर्थात् बुराइयों को उजागर करने में कोई गल्लत बात नहीं है, पर ऐसा करते समय हमें उसमें रस नहीं लेना चाहिए। किसी के गलत व्यवहार को सबके सामने बताते समय उसे सामान्य ढंग से ही कहना चाहिए उसे चटखारे लेकर नहीं सुनाना चाहिए। केवल दोषों को उद्घाटित करना ही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। यदि किसी की बुराई में तुम रस लेते हो तो उसकी अच्छी बात को भी उतना ही रस लेकर प्रकट करो। यदि तुम ऐसा नहीं करते तो यह एक बुरी प्रवृत्ति है। दूसरों की अच्छाई को भी प्रकट करना चाहिए।

5. कैसे कहूँ कि मनुष्यता एकदम समाप्त हो गई। कैसे कहूँ कि लोगों में दया-माया रह ही नहीं गई। जीवन में न जाने कितनी ऐसी घटनायें हुई हैं जिन्हें मैं भूल नहीं सकता।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत भाग-3’ में संकलित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित है। लेखक वर्तमान स्थिति की समीक्षा करते हुए हमसे निराश न होने के लिए कहता है:

व्याख्या:
लेखक के पास ऐसे पर्याप्त उदाहरण मौजूद हैं जो उसे जीवन के प्रति आस्थावान बनाते हैं। लेखक का मत है कि अभी ऐसी स्थिति नहीं आई है। कि हम मान बैठे कि मनुष्यता बिल्कुल ही समाप्त हो गई है। ऐसा भी कोई कारण दृष्टिगोचर नहीं होता कि हम यह मान बैठे कि लोगों में दया-माया शेष नहीं रह गई है। लेखक के मन-मस्तिष्क पर अनेक ऐसी घटनाएं उपस्थित हैं। जिन्हें वह कभी नहीं भुला सकता अर्थात् उन घटनाओं से वह इतना अधिक अभिभूत है कि उसे विश्वास होता है कि अभी तक समाज में अच्छे लोगों की कमी नही है।

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6. ठगा भी गया हूँ, धोखा भी खाया है, परंतु बहुत कम स्थलों पर विश्वासघात नाम की चीज मिलती है। केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है तो जीवन कष्टकर हो जाएगा, परंतु ऐसी घटनाएँ भी बहुत कम नहीं हैं जब लोगों ने अकारण सहायता की है, निराश मन को डाँढस दिया है और हिम्मत बंधाई है।

प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी द्वारा रचित निबंध ‘क्या निराश हुआ जाए’ से अवतरित है। इसमें लेखक ने वर्तमान परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए आशावादी दृष्टिकोण अपनाने का परामर्श दिया है।

व्याख्या:
लेखक बताता है कि उन्हें स्वयं भी अनेक बार दूसरों ने ठगा है। वे कई बार धोखा भी खा गए हैं। इसके बावजूद विश्वासघात जैसी बात बहुत कम मौकों पर देखने को मिली है। हमें केवल उन्हीं बातों को याद नहीं रखना जिनमें हमने धोखा खाया है। यदि ऐसा किया गया तो हमारा जीवन मुसीबतों से भर जाएगा। हमें अच्छी बातों को ही स्मरण रखना चाहिए। जीवन में ऐसे अवसर भी काफी आते हैं जब दूसरे लोग बिना किसी स्वार्थ के हमारी सहायता करते हैं और मुसीयत की घड़ी में हमारी हिम्मत बंधाते हैं।

भाव यह है कि हमें बुरी बातों को भुलाकर अच्छी बातों को याद रखना चाहिए। इसी से हमारा जीवन सुखमय बन सकेगा।

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क्या निराश हुआ जाए Summary in Hindi

क्या निराश हुआ जाए पाठ का सार

हर रोज हम समाचार-पत्रों में ठगी, डकैती, चोरी, तस्करी, भ्रष्टाचार आदि के समाचार पढ़ते हैं। लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी नहीं रहा। परंतु लेखक का मत है कि निराश होने की आवश्यकता नहीं। भारत महान था और रहेगा।

एक बड़े आदमी ने लेखक से कहा कि देश में फैली बुराइयों का सबसे बड़ा कारण यह है कि यहाँ जो खून-पसीना एक करके काम करता है, वह भूखों मरता है, धोखे से काम करने, और कुछ काम न करने वाले मौज उड़ाते हैं।

हमारे बनाए कानूनों में भी कुछ भूलें हैं। एक ओर शताब्दियों से चली आई भावनाएँ और मर्यादाएँ हैं, दूसरी ओर गरीबों की भलाई के लिए बनाए गए नये-नये कानून हैं। पुरानी मर्यादाओं और नए कानूनों में जब विरोध और टकराव होता है, तो स्थिति बिगड़ती है।

संसारी सुखों और बाहरी दिखावे को बहुत अधिक महत्त्व देने से भी भ्रष्टाचार बहुत बढ़ा है। भारत में धन को इतना महत्त्व कभी नहीं दिया गया और रिश्वत, लोभ, मोह आदि को कभी अच्छा नहीं माना गया।

यहाँ करोड़ों पिछड़े हुए और कंगाल लोगों की दशा सुधारने के लिए जो प्रयत्न कृषि, दस्तकारी और उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे हैं, उनसे वास्तविक उद्देश्य पूर्ण नहीं हो रहा। सारा लाभ बीच के अधिकारी (अफसर) और चालाक धूर्त हड़प लेते हैं। . जितने कानून बनते हैं, उतने उनके छिद्र ढूँढकर, उनसे बचने के उपाय सोच लिए जाते हैं। कुछ लोग लोभ-मोह को ही सब कुछ मानने लगे हैं। पुराने अच्छे आदर्शों और संस्कारों को रूढ़िवादी और घिसा-पिटा मानकर उनकी खूब निंदा की गई। इससे भ्रष्टाचार बढ़ गया।

उपाय: लेखक का मत है कि केवल कानून बनाने और उसके भय से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं हो सकता। भारत की परंपरा के अनुसार कानून से धर्म को अधिक मान दिया जाना चाहिए। लोग कानून से उतना नहीं डरते, जितना धर्म से डरते हैं। ईमानदारी, दया, सहानुभूति, सत्य, सेवा और भक्ति को अधिक महत्त्व दिया जाए। समाचार पत्रों में जो भ्रष्टाचार के समाचार छपते हैं, उनसे पता चलता है कि लोग तस्करी, रिश्वत, लूटमार आदि से दुःखी और परेशान हैं।

लेखक का कहना है कि बुरे कामों व अनुचित तरीकों का भंडाफोड़ करना अच्छी बात है, पर लोग इन बुरी बातों को पढ़ने में स्वाद (मजा) लेते हैं और यह बहुत बुरी बात है। देश में सैकड़ों अच्छी बातें, ईमानदारी और सच्चाई की घटनाएं होती हैं। पर उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता। एक बार लेखक टिकट खरीदते हुए भूल से दस रुपये की जगह सौ का नोट दे आया। बहुत देर बाद टिकट क्लर्क ने ढूंढते हुए आकर उसके नब्बे रुपये लौटाए। एक बार वह परिवार सहित बस द्वारा कहीं जा रहा था। रात थी, जंगल था, डाकुओं का डर था। बस रुकी । कंडक्टर उसकी छत से साइकिल उतारकर कहीं चला गया। लोगों ने समझा, वह डाकुओं को बुलाने गया है।

लोग ड्राइवर को पीटने को उतारू हो गए। लेखक ने ड्राइवर को बचाया। बहुत देर बाद सामने से खाली बस आई। उसी में लेखक वाली बस का कंडक्टर भी था। कंडक्टर ने कहा-यह बस चलने लायक नहीं थी। वह शहर से दूसरी बस लाया है। लेखक ने जीवन में कई बार धोखा खाया, परंतु इसके विपरीत उसे ईमानदार, साहसी और सहारा देने वाले लोग अधिक मिले। इसलिए निराश नहीं होना चाहिए।

क्या निराश हुआ जाए शब्दार्थ

आरोप = दोष (allegation), गुण = विशेषता (quality), अतीत = पुराना बीता हुआ (past), गह्वर = गुफा, गहराई (cave, deep), आदर्श = अनुकरणीय (Ideal), मनीषियों = चिंतन करने वाले (thinker), माहौल = वातावरण (atmosphere), जीविका = गुजारा (livelihood), श्रमजीवी = मेहनत पर जीने वाले (labourer), मूर्खता = बेवकूफी (foolishness), पर्याय = उसी जैसा (synonym), भीरू = डरपोक (coward), आस्था = विश्वास (belief), त्रुटि = भूल (error), विधि = नियम (rule), निषेध = रोक (prohibited), परीक्षित = जाँचे हुए (tested), हताश = निराश (distress), संग्रह में जोड़ना (collection), आंतरिक = भीतरी (internal), विद्यमान = मौजूद (present), प्रधान शक्ति = मुख्य ताकत (main power), निकृष्ट = घटिया (below standard), आचरण , बर्ताव (behaviour), संयम = काबू से (control), प्रयत्न = कोशिश (effort), दरिद्र = गरीब (poor), अवस्था = हालत (condition), लक्ष्य = ध्येय (aim), विस्तृत = अधिक फैले हुए (wide), विकार = बुराई (bad element), मजाक = हँसी (mockery), उपयोगी = लाभदायक (useful), पर्याप्त = काफी (sufficient), प्रमाण = सबूत (evidence), नष्ट = समाप्त (destroy), पीड़ा = दु:ख (pain), आक्रोश = गुस्सा (anger), पर्दाफाश = कलई खोलना (exposed), उजागर = स्पष्ट (clear), चकित = हैरान (surprise), लुप्त = गायब (disappear),अवांछित = जो चाही न जाएँ (unwanted), निर्जन = जहाँ कोई आदमी न हो (lonely), भयभीत = डरा हुआ (terrorised), व्याकुल = बेचैन (restlessness), विश्वासघात = धोखा (treachery), अकारण = बिना वजह (without reason), ज्योति = रोशनी की लौ (light), संभावना = उम्मीद (possibility), निरीह = असहाय, बेचारा (helpless), मूल्य = जीवन मूल्य आदर्श (values of life), विधि-निषेध = करने न करने के नियम, आलोड़ित = उथल-पुथल, हिलोरें करता हुआ (waving), विकार = बुराई, दोष (demerit), दकियानूसी = पुराने विचारों का (orthodox), प्रतिष्ठा = सम्मान (regard), दोषोद्घाटन = बुराइयाँ उजागर करना, अवांछित = अनचाही (unwanted), कातरमुद्रा = डरा हुआ रूप (frightened), वंचना = धूर्तता, जवाब दे देना = खराब हो जाना, हिसाब बनाना = योजना बनाना (toplan), चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना = डर जाना, घबरा जाना (purplexed).

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये

HBSE 8th Class Hindi भगवान के डाकिये Textbook Questions and Answers

कविता से

प्रश्न 1.
कवि ने पक्षी और बावल को भगवान के डाकिए क्यों बताया है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
कवि ने पक्षी और बादल को भगवान के डाकिए इसलिए बताया है क्योंकि वे भगवान के संदेश को हम तक लाते हैं।

प्रश्न 2.
पक्षी और बादल द्वारा लाई गई चिट्ठियों को कौन-कौन पढ़ पाते हैं ? सोचकर लिखिए।
उत्तर :
पक्षी और बादल द्वारा लाई गई चिट्ठियों को पेड़-पौधे, पानी और पहाड पढ़ पाते हैं।

प्रश्न 3.
किन पंक्तियों का भाव है:
(क) पक्षी और बादल प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश एक देश से दूसरे देश को भेजते हैं।
उत्तर :
पक्षी और बादल एक-दूसरे देश में जा-जाकर वहाँ प्रेम. सदभाव और एकता की भावना का प्रसार करते हैं।

(ख) प्रकृति देश-देश में भेदभाव नहीं करती। एक देश से उठा बादल दूसरे वेश में बरस जाता है।
उत्तर :
प्रकृति किसी भी देश से पक्षपात नहीं करती। एक देश में जब भाप उठकर बादल का रूप ले लेती है तब वह दूसरे देश में जाकर वर्षा रूप में बरस जाती है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये

प्रश्न 4.
पक्षी और बादल की चिट्ठियों में पेड़-पौधे, पानी और पहाड़ क्या पढ़ पाते हैं ?
उत्तर :
पक्षी और बादल की चिट्ठियों में पेड़-पौधे, पानी और पहाड़ भगवान के भेजे संदेश को पढ़ पाते हैं।

प्रश्न 5.
‘एक देश की धरती दूसरे देश को सुगंध भेजती है’-कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर :
इस कथन का आशय है कि एक देश अपने प्रेम-प्यार के संदेश को पक्षियों के पंखों के माध्यम से दूसरे देश को भेजता है।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
पक्षियों और बादल की चिट्ठियों के आवान-प्रदान को आप किस दृष्टि से देख सकते हैं?
उत्तर :
पक्षियों और बादल की चिट्ठियों के आदान-प्रदान को हम प्रेम-प्यार और आपसी सद्भाव की दृष्टि से देख सकते हैं।

प्रश्न 2.
आज विश्व में कहीं भी संवाद भेजने और पाने का एक बड़ा साधन इंटरनेट है। पक्षी और बावल की चिड्डियों की तुलना इंटरनेट से करते हुए दस पंक्तियाँ लिखिए।
उत्तर :
आज विश्व में कहीं भी संवाद भेजने और पाने का एक बड़ा साधन है-इंटरनेट।
पक्षी और बादल की चिट्ठियाँ हमें भली प्रकार समझ नहीं आती, पर पेड़. पौधे, पानी, पहाड़ उन्हें भली प्रकार समझ पाते हैं।
इंटरनेट सूचनाओं का एक विस्तृत जाल है। इसमें बहुत कुछ समाया हुआ है। इंटरनेट के माध्यम से संसार की किसी भी सूचना को तुरंत प्राप्त किया जा सकता है। इसे सभी समझ सकते हैं।

प्रश्न 3.
हमारे जीवन में डाकिए की भूमिका पर दस बाक्य लिखिए।
उत्तर :
हमारे जीवन में डाकिए की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। आज भी डाकिया दूर-दराज बसे गाँवों तक हमारे पत्र एवं मनीआर्डर पहुंचाता है।

  • डाकिया ग्रामीण जन-जीवन का एक सम्मानित सदस्य माना जाता है।
  • डाकिया कम वेतन पाकर भी अपना काम अत्यंत परिश्रम एवं लगन के साथ संपन्न करता है।
  • डाकिया का महत्त्व अभी भी बना हुआ है, भले ही अब कंप्यूटर और ई-मेल का जमाना आ गया है।
  • डाकिया से हमारा व्यक्तिगत सम्पर्क होता है। (अन्य वाक्य विद्यार्थी स्वयं लिखें।)

अनुमान और कल्पना

डाकिया, इंटरनेट के वल्ड वाइड वेब (डब्ल्यू डब्ल्यू, डब्ल्यू. www) तथा पक्षी और बादल-इन तीनों संवाववाहकों के विषय में अपनी कल्पना से एक लेख तैयार कीजिए। “चिट्ठियों की अनूठी दुनिया ” पाठ का सहयोग ले सकते हैं।
उत्तर :
इस प्रकार का लेख विद्यार्थी अपनी कल्पना से स्वयं तैयार करें। इसके लिए पिछला पाठ भी पढ़ें।

  • इंटरनेट में विश्व भर की जानकारी भर दी गई है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये

भगवान के डाकिये काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. पक्षी और बादल,
ये भगवान के डाकिए हैं,
जो एक महादेश से
दूसरे महादेश को जाते हैं।
हम तो समझ नहीं पाते हैं
मगर उनकी लाई चिट्ठियों पेड़,
पौधे, पानी और पहाड़ बाँचते हैं।

शब्दार्थ : महावेश – विशाल देश, महाद्वीप (continents), बाँचते हैं – पढ़ते हैं (Reads)।

प्रसंग :
प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत भाग-3’ में संकलित कविता ‘भगवान के डाकिए’ से अवतरित हैं। इसके रचयिता राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। कवि पक्षी और बाटानों को भगवान के डाकिए बताता है।

व्याख्या :
कवि का कहना है कि पक्षी और बादल भगवान के संदेश को हम तक पहुंचाने वाले डाकिए हैं। ये किसी देश की सीमा से बँधकर नहीं रहते। ये तो एक बड़े देश (महाद्वीप) से दूसरे महादेश (महाद्वीप) तक चले जाते हैं। हम सामान्यजन तो उनकी लाई चिट्ठियों को नहीं समझ पाते हैं, पर उन्हें पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ भली प्रकार पढ़ लेते हैं। प्रकृति के ये विविध उपादान पक्षी और बादल से प्रभावित होते हैं। इन्हें उनकी भाषा समझ आ जाती है।

विशेष :

  1. प्रकृति को संदेशवाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
  2. पेड़, पौधे, पानी, पहाड़ में ‘च’ वर्ण की आवृत्ति के कारण अनुप्रास अलंकार है।

2. हम तो केवल यह आँकते हैं
कि एक देश की धरती
दूसरे देश को सुगंध भेजती है।
और वह सौरभ हवा में तैरते हुए
पक्षियों की पाँखों पर तिरता है।
और एक देश का भाप
दूसरे देश में पानी
बनकर गिरता है।

शब्दार्थ : आँकते हैं – अनुमान करते हैं (to guess), सौरभ – सुगंध, खुशबू (fragrant), पाँख – पंख (feathers), दूसरे देश को सुगंध भेजती है = प्रेम-प्यार का संदेश भेजती है (message of love)|

प्रसंग :
प्रस्तुत काव्यांश रामधारी सिंह दिनकर की कविता ‘भगवान के डाकिए’ से अवतरित है। इस कविता में कवि ने पक्षी और बादल को भगवान के डाकिए बताया है।

व्याख्या :
कवि कहता है कि हम पक्षी और बादल के संदेश को भले ही न पढ़ पाते हों, पर इतना अनुमान अवश्य लगा लेते हैं कि एक देश की धरती दूसरे देश के लोगों को प्रेम-प्यार का संदेश भेजती रहती है। पक्षी और बादल प्रेम, सद्भाव और एकता का संदेश एक देश से दूसरे देश को भेजते रहते हैं। ऐसा लगता है कि हवा में उड़ते हुए पक्षियों के पंखों पर प्रेम-प्यार की सुगंध तैरकर दूसरे देश तक पहुँच जाती है। प्रकृति भी किसी देश के साथ भेदभाव नहीं करती। वह भौगोलिक बंधनों को भी स्वीकार नहीं करती। यही कारण है कि एक देश में उठा बादल दूसरे देश में जाकर बरस जाता है। वर्षा देश-सीमा का बंधन नहीं मानती।।

विशेष :

  1. कवि प्रकृति के निष्पक्ष रूप का वर्णन करता
  2. ‘पक्षियों की पाँखों पर’ में अनुप्रास अलंकार की छटा

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 6 भगवान के डाकिये

भगवान के डाकिये Summary in Hindi

भगवान के डाकिये कवि-परिचय

जीवन-परिचय :
श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जन्म सन् 1908 ई. में बिहार राज्य के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक ग्राम के एक साधारण किसान परिवार में हुआ। स्थानीय पाठशाला में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत पटना कॉलेज से सन् 1932 ई. में बी. ए. (इतिहास में प्रतिष्ठा, Hons, in History) की परीक्षा उत्तीर्ण की। कुछ दिन अध्यापन कार्य किया। सन् 1947 से 1950 ई. तक उन्होंने जन-संपर्क विभाग में निदेशक के पद पर कार्य किया।

3फिर कुछ समय तक लंगर सिंह कॉलेज में हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे। सन् 1952 में आपको राज्य सभा का सदस्य मनोनीत किया गया। सन् 1964 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए परन्तु सन् 1965 में त्यागपत्र देने पर आपको केंद्रीय सरकार का हिंदी सलाहकार नियुक्त किया गया। भारत सरकार ने दिनकर जी को उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए ‘पद्मभूषण’ उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें ‘संस्कृति के चार अध्याय’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार तथा ‘उर्वशी’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। 19 मई सन् 1974 ई. को दिनकर जी का देहांत हो गया।

रचनाएँ :
दिनकर जी की प्रमुख गद्य रचनाएँ हैं-संस्कृति के चार अध्याय, रेती के फूल, मिट्टी की ओर, अर्द्ध नारीश्वर, शुद्ध कविता की खोज, उजली आग, साहित्यमुखी काव्य की भूमिका, लोकदेव नेहरू, देश विदेश आदि।

काव्य-रचनाएँ : रेणुका, हुंकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, सामधेनी, उर्वशी, रसवंती, परशुराम की प्रतीक्षा, हारे को हरिनाम।

साहित्यिक विशेषताएँ :
यद्यपि दिनकर जी की ख्याति का आधार काव्य है तथापि गद्य पर भी उन्हें समान अधिकार प्राप्त था। वे आशावादी कवि थे। उनके काव्य में राष्ट्रीयता एवं भारतीय संस्कृति के स्वर मुखरित हुए हैं। उनकी प्रारंभिक कविताएँ छायावादी हैं। बाद में उन्होंने मनुष्य को समाज में अग्रसर होने की प्रेरणा देने वाले साहित्य की रचना की। दिनकर जी ने साहित्य, समाज, संस्कृति, राजनीति तथा अन्य समसामयिक विषयों पर मर्मस्पर्शी तथा विचारोत्तेजक लेख लिखे। उन निबंधों में राष्ट्रीयता की स्पष्ट झलक है। वे गाँधी विचारधारा तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से भी अभिप्रेरित हैं।

भगवान के डाकिये कविता का सार

कवि पक्षी और बादल को भगवान के डाकिए बताता है। जिस प्रकार डाकिए संदेश लाने का काम करते हैं उसी प्रकार पक्षी और बादल भगवान का संदेश हम तक लाते हैं। उनकं लाए संदेश को हम भले ही न समझ पाएँ पर पेड़, पौधे, पानी और पहाड़ उसे भली प्रकार पढ़-समझ लेते हैं। हम तो उल इतना भर आँकते हैं कि एक देश की धरती दूसरे देश को खुशबू भेजती है। पक्षियों के पंखों पर संगध तैरती है। एक देश का भाप दूसरे देश में पानी बनकर गिरता है। प्रकृति के लिए सीमाओं का बंधन नहीं होता।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

HBSE 8th Class Hindi चिट्ठियों की अनूठी दुनिया Textbook Questions and Answers

पाठ से

प्रश्न 1.
पत्र जैसा संतोष फोन या एस एम एस का संदेश क्यों नहीं दे सकता?
उत्तर:
पत्र में हम अपने हृदय के भावों को स्पष्ट रूप में अभिव्यक्त कर सकते हैं जबकि फोन या एस एम एस में बात संक्षेप में ही कही जाती है। पत्र लिखकर ही पूरी संतुष्टि मिलती है। पत्र में आत्मीयता की भावना समाई रहती है जबकि फोन या एस एम एस केवल कामकाजी बात करते हैं। पत्रों को सहेजकर रखा जा सकता है जबकि फोन या एस एम एस को नहीं।

प्रश्न 2.
पत्र को खत, कागद, उत्तरम, जाबू, लेख, काडिद, पाती, चिट्ठी इत्यादि कहा जाता है। इन शब्दों से संबंधित भाषाओं के नाम बताइए।
उत्तर:

शब्दसंबंधित भाषा
खतउर्दू
कागदकन्नड़
उत्तरम, जाबू, लेखतेलुगु
काडिदतमिल
पाती, चिट्ठी हिंदो पत्रसंस्कृत

प्रश्न 3.
पत्र-लेखन की कला के विकास के लिए क्या-क्या प्रयास हुए? लिखिए।
उत्तर:
पत्र-लेखन की कला के विकास के लिए निम्नलिखित प्रयास हुए:

  • पत्र-संस्कृति विकसित करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों
  • में पत्र-लेखन का विषय शामिल किया गया।
  • विश्व डाक संघ की ओर से 16 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों के लिए पत्र-लेखन प्रतियोगिताओं का सिलसिला 1972 ई. से शुरू किया गया।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

प्रश्न 4.
पत्र धरोहर हो सकते हैं, लेकिन एस एम एस क्यों नहीं? तर्क सहित अपना विचार लिखिए।
उत्तर:
पत्र प्रेरणा देते हैं अतः लोग उन्हें धरोहर की तरह सहेजकर रखते हैं। पत्र चूँकि लिखित रूप में होते हैं अत: सहेजकर रखे जा सकते हैं। पर एस एम एस को सहेजकर नहीं रखा जाता। इनमें केवल कामकाज की बात होती है। इसे लोग जल्दी ही भूल जाते हैं। भला आप कितने संदेशों को सहेजकर रख सकते हैं। तमाम महान हस्तियों की यादगार तो इनके लिखे पत्रों में होती है अत: उनके लिखे पत्र धरोहर हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
क्या चिद्वियों की जगह कभी फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल ले सकते हैं?
उत्तर:
फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल कभी भी चिट्ठियों की जगह नहीं ले सकते। ये सब संचार के आधुनिक साधन अवश्य हैं। इनसे व्यावसायिक कामकाज तो चलाया जा सकता है, पर इनमें पत्रों के गुण नहीं आ सकते। पत्र से आत्मीयता का जो बोध होता है वह इनमें नहीं आ सकता। लोग पत्रों को संभालकर रखते हैं. पर फैक्स, ई-मेल या टेलीफोन और मोबाइल के संदेश अपनी सूचना देकर अर्थहीन हो जाते हैं। पत्रों के संकलन साहित्य का रूप भी ले लेते हैं।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
किसी को बिना टिकट सादे लिफाफे पर सही पता लिखकर पत्र बैरंग भेजने पर कौन-सी कठिनाई आ सकती है? पता कीजिए।
उत्तर:
सही पता लिखने पर पत्र अपने ठिकाने पर तो पहुँच जाएगा पर संबंधित व्यक्ति को तभी मिलेगा जब वह डाक टिकट तथा जुर्माने का भुगतान करेगा। अतः लिफाफे पर उणि डाक टिकट अवश्य लगानी चाहिए।

प्रश्न 2.
पिन कोड भी संख्याओं में लिखा गया एक पता है, कैसे?
उत्तर:
पिन कोड से उस क्षेत्र का पता चल जाता है जहाँ पत्र भेजा गया है।
पहले अंकों में शहर का संकेत है, फिर उस क्षेत्र, नगर या कॉलोनी का पता होता है। जैसे 110059 पिन कोड है।
1100 दिल्ली का संकेत है।
59 पश्चिमी दिल्ली के जनकपुरी- क्षेत्र का कोड है।
पिन कोड संख्याओं में लिखा पता भले ही हो, पर यह पूरा पता नहीं है। इससे किसी निश्चित मकान या व्यक्ति तक नहीं पहुँचाया जा सकता। पिन कोड से पत्र की छंटाई में सुविधा अवश्य
होती है। इससे पत्र जल्दी पहुँचता है।

प्रश्न 3.
ऐसा क्यों होता था कि महात्मा गाँधी को दुनिया भर से पत्र ‘महात्मा गाँधी-इंडिया’ पता लिखकर आते थे?
उत्तर:
ऐसा इसलिए होता था क्योंकि उन दिनों महात्मा गाँधी सर्वाधिक लोकप्रिय एवं चर्चित व्यक्ति थे। वे कहाँ होंगे,
इसका पता सभी को रहता था। अतः पत्र कहीं से आया हो, उन तक पहुंच जाता था। यह उनकी लोकप्रियता का पर्याय था।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

अनुमान और कल्पना

1. रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की कविता ‘भगवान के डाकिए’ आपकी पाठ्यपुस्तक में है। उसके आधार पर पक्षी और बादल को डाकिए की भाँति मानकर अपनी कल्पना से लेख लिखिए।
उत्तर:
पक्षी और बादल डाकिए का काम करते हैं। डाकिया वह होता है जो किसी का संदेश किसी तक पहुंचाए। पक्षी और बादल भी प्रकृति का संदेश दूसरों तक पहुँचाते हैं। इनके लाए पत्र भले ही आम आदमी की समझ में न आते हों पर उनके संदेश जिनके लिए होते हैं, वे उन्हें शीघ्र समझ लेते हैं। पक्षी और बादल प्रकृति के संदेश वाहक हैं।

2. संस्कृत साहित्य के महाकवि कालिदास ने बादल को संवादवाहक बनाकर ‘मेघदूत’ नाम का काव्य लिखा है। ‘मेघदूत’ के विषय में जानकारी प्राप्त कीजिए।
उत्तर:
संस्कृत के महान कवि कलिदास ने बादल को संवादवाहक बनाकर ‘मेघदूत’ नामक काव्य रचा था।
उस काव्य में बताया गया है कि धनपति कुबेर ने यक्ष को निर्वासन को दंड दिया था। तब यक्ष ने अपनी प्रिया के पास बादल को संदेश वाहक बनाकर अपना संदेश भिजवाया था।

3. पक्षी को संदेशवाहक बनाकर अनेक कविताएँ एवं गीत लिखे गए हैं। एक गीत है-जा-जा रे कागा विदेशवा, मेरे पिया से कहियो संदेशवा। इस तरह के तीन गीतों का संग्रह कीजिए। प्रशिक्षित पक्षी के गले में पत्र बांधकर निर्धारित स्थान तक पत्र भेजने का उल्लेख मिलता है। मान लीजिए आपको एक पक्षी को संदेश वाहक बनाकर का भेजना हो तो आप वह पत्र किसे भेजना चाहेंगे और उसमें क्या लिखना चाहेंगे?
उत्तर:
पक्षियों को और विशेषकर कबूत को अपना संदेशवाहक । बनाकर भेजने की परंपरा प्राचीन काल में रही है। पत्र को उसके गले में बाँध दिया जाता था और वह निर्धारित स्थान तक पत्र पहुँचा देता था।

4. केवल पढ़ने के लिए दी गई रामदरश मिश्र की कविता ‘चिट्ठियाँ’ को ध्यानपूर्वक पढ़िए और विचार कीजिए क्या यह कविता केवल लेटर बॉक्स में पड़ी निर्धारित पते पर जाने के लिए तैयार चिट्ठियों के बारे में है? या रेल के डब्बे बैठी सवारी भी उन्हीं चिट्ठियों की तरह हैं जिनके पास उनके गंतव्य तक की टिकट है पत्र के पते की तरह? और क्या विद्यालय भी एक लेटर बाक्स की भाँति नहीं है जहाँ से उत्तीर्ण होकर विद्यार्थी अनेक क्षेत्रों में चले जाते हैं? अपनी कल्पना को पंख लगाइए और मुक्त मन से इस विषय में विचार-विमर्श कीजिए।
उत्तर:
रामदरथ मिश्र की कविता
चिट्ठियाँ
लेटरबक्स में पड़ी चिट्ठियाँ
अनंत सुख-दुख वाली अनंत चिट्ठियाँ
लेकिन कोई किसी से नहीं बोलती
सभी अकेले-अकेले
अपनी मंजिल पर पहुंचने का इंतजार करती हैं।
कैसा है यह एक साथ होना
दूसरे के साथ हँसना न रोना
क्या हम भी
लेटरबक्स की चिट्ठियाँ हो गए हैं।
(विद्यार्थी अपने मन के विचार लिखें।)

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भाषा की बात

1. किसी प्रयोजन विशेष से संबंधित शब्दों के साथ पत्र शब्द जोड़ने से कुछ शब्द बनते हैं जैसे-प्रशस्ति पत्र, समाचार पत्र। – आप ना पत्र के योग से बनने वाले दस शब्द लिखिए
उत्तर:
व्यापारिक पत्र – चेतावनी पत्र
साहित्यिक पत्र – प्रेरक पत्र
स्मरण पत्र – प्रेम पत्र
घरेलू पत्र – सरकारी पत्र
शोक पत्र – शिकायती पत्र

2. ‘व्यापारिक’ शब्द व्यापार शब्द के साथ ‘इक’ प्रत्यय के. योग से बना है। इक प्रत्यय के योग से बनने वाले शब्दों को अपनी पाठ्यपुस्तक से खोजकर लिखिए।
उत्तर:
पारिवारिक, सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, राजनीतिक।

3. दो स्वरों के मेल से होने वाले परिवर्तन को स्वर संधि कहते हैं; जैसे-रवीन्द्र – रवि + इन्द्र। इस संधि में इ+ ई हुई है। इसे दीर्घ संधि कहते हैं। दीर्घ स्वर संधि के और उदाहरण खोजकर लिखिए। मुख्य रूप से स्वर संधियाँ चार प्रकार की मानी गई हैं-दीर्घ, गुण, वृद्धि और यण।
हस्व या दीर्घ अ, इ, उ के बाद हस्व या दीर्घ अ, इ, उ, आ आए तो ये आपस में मिलकर क्रमशः दीर्घ आ, ई, ऊ हो जाते हैं, इसी कारण इस संधि को दीर्ध संधि कहते हैं। जैसे-संग्रह + आलय – संग्रहालय, महा + आत्मा – महात्मा।
इस प्रकार के कम-से-कम दस उदाहरण खोजकर लिखिए और अपनी शिक्षिका/शिक्षक को दिखाइए।
उत्तर:
उदाहरण:
1. दीर्घ संधि:
ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ, से परे क्रमशः ह्रस्व या दीर्घ अ, इ, उ आ जाएँ तो दोनों मिलकर क्रमशः आ, ई, ऊ हो जाते हैं
(क) अ + अ = आ
परम + अणु – परमाणु
वेद + अत – वेदांत।
मत + अनुसार = मतानुसार
धर्म + अर्थ – धर्मार्थ।

अ + आ = आ
हिम + आलय = हिमालय
रत्न + आकर = रत्नाकर।
धन + आदेश = धनादेश
परम +. आत्मा = परमात्मा।

आ + अ = आ
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
दीक्षा + अंत = दीक्षांत।
परीक्षा + अर्थी = परीक्षार्थी
रेखा + अंकित – रेखांकित।

आ + आ + आ
विद्या + आलय = विद्यालय
कारा + आवास = कारावास।
मदिरा + आलय = मदिरालय
दया + आनंद = दयानन्द।

(ख) इ + इ = ई
रवि + इन्द्र – रवीन्द्र
अभि + इष्ट = अभीष्ट।
कपि + इन्द्र = कपींद्र
अति + इव = अतीव।

इ + ई = ई
गिरि + ईश = गिरीश
कपि + ईश्वर = कपीश्वर।
हरि + ईश = हरीश
फणि + ईश्वर = फणीश्वर।

ई + इ = ई
मही + इन्द्र = महीन्द्र
नदी + इन्द्र = नदीन्द्र।

ई + ई = ई
मही + ईश = महीश
रजनी + ईश – रजनीश।

(ग) उ + उ = ऊ
लघु + उत्तर = लघूत्तर
गुरु + उपदेश = गुरूपदेश।
सु + उक्ति = सूक्ति
अनु + उदित = अनूदित।

उ + ऊ = ऊ
लघु + ऊर्मि = लघुर्मि
सिन्धु + ऊर्मि = सिन्धूमि।

ऊ + उ = ऊ
वधू + उत्सव = वधूत्सव।

ऊ + ऊ = ऊ
वधू + ऊर्मि = वधूर्मि।

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2. गुण संधि: ‘अ’ और ‘आ’ से परे यदि हस्व या दीर्घ ‘इ’. ‘उ’ या ‘ऋ’ आएँ तो वे क्रमशः ‘ए’, ‘ओ’ और ‘अर्’ हो जाते हैं-
(क) अ + इ = ए
नर + इंद्र – नरेंद्र।
भारत + इंदु – भारतेंदु।

अ + ई = ए
गण + ईश = गणेश।
परम + ईश्वर = परमेश्वर।

आ + इ = ए
महा + इंद्र – महेंद्र।
यथा + इष्ट = यथेष्ट।

आ + ई = ए
रमा + ईश = रमेश।
राका + ईश = राकेश।

(ख) अ + उ = ओ
सूर्य + उदय = सूर्योदय।
पर + उपकार – परोपकार।

अ + ऊ = ओ
नव + ऊढ़ा = नवोढ़ा।

आ + उ = ओ
महा + उत्सव = महोत्सव।

आ + ऊ = ओ
महा + मा = महोमि।

(ग) अ + ऋ = अर्
देव + ऋषि = देवर्षि।
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि।

आ + ऋ = अर्
महा + ऋषि = महर्षि।

3. वृद्धि संधि: ‘अ’ या ‘आ’ से परे ‘ए’ या ‘ऐ’ हों तो दोनों को मिलाकर ‘ऐ’ तथा ‘औ’ या ‘औ’ हों तो उन्हें मिलाकर ‘औ’ हो जाता है।
अ + ए = ऐ → एक + एक = एकैक।
आ + ए = ऐ → सदा + एव = सदैव।
अ + ऐ = ऐ → मत + ऐक्य = मतैक्य।
आ + ऐ = ऐ → महा + ऐश्वर – महैश्वर्य।
अ + ओ = औ → जल + ओध = जलौध।
आ + ओ = औ → महा + औध = महौधा
अ + औ = औ → वन + औषध = वनौषध।
आ + औ = औ → महा + औषध = महौषधा

4. यण संधि: ह्रस्व या दीर्घ ‘इ’, ‘उ’, ‘ऋ’ से परे भिन्न जाति का कोई स्वर आ जाए तो इ-ई को ‘य’, उ-3 को ‘व’ और ‘ऋ’ को ‘र’ हो जाता है।
इ + अ = य
अति + अधिक = अत्यधिक।
अति + अंत – अत्यंत।

इ + आ = या
इति + आदि = इत्यादि।
अति + आचार – अत्याचार।

इ + उ = यु
प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर।
उपरि + उक्त = उपर्युक्त।

उ + अ = व → मनु + अंतर = मन्वन्तर।
उ + आ = वा → सु + आगत = स्वागत।
उ + ए = वे → अनु + एषण – अन्वेषण।
ऊ + आ = वा → वधू + आगमन = वध्वागमन।
ऋ + अ = र → पितृ + अनुमति = पित्रनुमति।
ऋ + आ = रा → पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

HBSE 8th Class Hindi चिट्ठियों की अनूठी दुनिया Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
पत्रों की दुनिया कैसी है? साहित्य एवं मानव-सभ्यता के विकास में पत्रों’ की क्या। भूमिका है?
उत्तर:
पत्रों की दुनिया भी अजीबो-गरीब है और उसकी उपयोगिता हमेशा से बनी रही है। पत्र जो काम कर सकते हैं, वह संचार का आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश कहाँ दे सकता है। पत्र एक नया सिलसिला शुरू करते हैं और राजनीति, साहित्य तथा कला के क्षेत्रों में तमाम विवाद और नयी घटनाओं की जड़ भी पत्र ही – होते हैं। दुनिया का तमाम साहित्य पत्रों पर केंद्रित है और मानव सभ्यता के विकास में इन पत्रों ने अनूठी भूमिका निभाई है।

प्रश्न 2.
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1953 में क्या कहा था? पाठ के आधार पर बताइए।
उत्तर:
पंडित जवाहर लाल नेहरू ने सन् 1953 में सही ही कहा था कि-‘हजारों सालों तक संचार का साधन केवल हरकारे (रनर्स) या फिर तेज घोड़े रहे हैं। उसके बाद पहिए आए। पर रेलवे और तार से भारी बदलाव आया। तार ने रेलों से भी तेज गति से संवाद पहुँचाने का सिलसिला शुरू किया। अब टेलीफोन, वायरलस और आगे रेडार-दुनिया बदल रहा है।’

प्रश्न 3.
महात्मा गाँधी के पास पत्र कैसे पहुँचते थे? वे उन पत्रों का जवाब कैसे देते थे? लोग उनके लिखे पत्रों का क्या करते थे?
उत्तर:
महात्मा गाँधी के पास दुनिया भर से तमाम पत्र केवल महात्मा गाँधी-इंडिया लिखे आते थे और वे जहाँ भी रहते थे, वहाँ तक पहुँच जाते थे। आजादी के आंदोलन के कई अन्य दिग्गज हस्तियों के साथ भी ऐसा ही था। गाँधीजी के पास देश दुनिया से बड़ी संख्या में पत्र पहुँचते थे, पर पत्रों का जवाब देने के मामले में उनका कोई जोड़ नहीं था।

कहा जाता है कि जैसे ही उन्हें पत्र मिलता था, उसी समय वे उसका जवाब भी लिख देते थे। अपने हाथों से ही ज्यादातर पत्रों का जवाब देते थे। पत्र भेजने वाले लोग उन पत्रों को किसी प्रशस्तिपत्र से कम नहीं मानते हैं और कई लोगों ने तो पत्रों को फ्रेम करा कर रख लिया है। यह है पत्रों का जादू। यही नहीं, पत्रों के आधार पर ही कई भाषाओं में जाने कितनी किताबें लिखी जा चुकी हैं।

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

1. पिछली शताब्दी में पत्र लेखन ने एक कला का रूप ले लिया। डाक व्यवस्था के सुधार के साथ पत्रों को सही दिशा देने के लिए विशेष प्रयास किए गए। पत्र संस्कृति विकसित करने के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों में पत्र लेखन का विषय भी शामिल किया गया। भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों में ये प्रयास चले और विश्व डाक संघ ने अपनी ओर से काफी प्रयास किए।

विश्व डाक संघ की ओर से 16 वर्ष से कम आयु वर्ग बच्चों के लिए पत्र लेखन प्रतियोगिताएँ आयोजित करने का सिलसिला सन् 1972 से शुरू किया गया। यह सही है कि खास तौर पर बड़े शहरों और महानगरों में संचार साधनों के तेज विकास तथा अन्य कारणों से पत्रों की आवाजाही प्रभावित हुई है, पर देहाती दुनिया आज भी चिड़ियों से ही चल रही है। फैक्स, ईमेल, टेलीफोन तथा मोबाइल ने चिनियाँ की तेजी को रोका है, पर व्यापारिक डाक की संख्या लगातार बढ़ रही है।
प्रश्न:
1. पत्र लिखने ने पिछली शताब्दी में क्या रूप ले लिया है?
2. पत्र-संस्कृति के विकास के लिए क्या प्रयास किया गया?
3. विश्व डाक संघ ने क्या प्रयास किया?
4. समाचार भेजने के लिए क्या-क्या साधन प्रयोग किए जा रहे हैं?
उत्तर:
1. पिछली शताब्दी में पत्र लिखने ने एक कला का रूप ले लिया है।
2. पत्र-संस्कृति के विकास के लिए स्कूली पाठ्यक्रमों में पत्र लेखन को एक विषय के रूप में शामिल किया गया है।
3. विश्व डाक संघ द्वारा 16 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों के लिए पत्र-लेखन प्रतियोगिताओं का आयोजन 1972 से शुरू किया गया है।
4. समाचार भेजने के लिए फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल आदि माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

2. पत्र व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आजादी के बाद ही हुआ है। तमाम सरकारी विभागों की तुलना में सबसे ज्यादा गुडविल डाक विभाग की ही है। इसकी एक खास वजह यह भी है कि यह लोगों को जोड़ने का काम करता है। घर-घर तक इसकी पहुँच है।

संचार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी चिट्ठी-पत्री की हैसियत बरकरार है। शहरी इलाकों में आलीशान हवेलियाँ हों या फिर झोपड़पट्टियों में रह रहे लोग, दुर्गम जंगलों से घिरे गाँव हों या फिर बर्फबारी के बीच जी रहे पहाड़ों के लोग, समुद्र तट पर रह रहे मछुआरे हों या फिर रेगिस्तान की ढाँढियों में रह रहे लोग, आज भी खतों का ही सबसे बेसब्री से इंतजार होता है। एक दो नहीं, करोंड़ों लोग खतों और अन्य सेवाओं के लिए रोज भारतीय डाकघरों के दरवाजों तक पहुँचते हैं और इसकी बहु आयामी भूमिका नजर आ रही है। दूर देहात में लाखों गरीब घरों में चूल्हे मनीआर्डर अर्थव्यवस्था से ही जलते हैं। गाँवों या गरीब बस्तियों में चिट्ठी या मनीआर्डर लेकर पहुंचने वाला डांकिया देवदूत के रूप में देखा जाता है।
प्रश्न:
1. भारत में पत्र-यवहार की परंपरा कैसी है?
2. सबसे ज्यादा गुडविल किस सरकारी विभाग की है? इसका कारण क्या है?
3. कौन खतों का बेसब्री से इंतजार करते हैं?
4. गाँवों में डाकिया को किस रूप से देखा जाता है और क्यों? और क्यों?
उत्तर:
1. भारत में पत्र-व्यवहार की परंपरा बहुत पुरानी है। हाँ, इसका विकास आजादी के बाद ज्यादा हुआ है।
2. सारे सरकारी विभागों में डाक विभाग की गुडविल सबसे ज्यादा है। इसका कारण यह है कि यह पत्रों द्वारा लोगों को जोड़ने का काम करता है।
3. देश के सभी भागों में लोग खतों का बेसब्री से इंतजार. करते हैं, भले ही वह आलीशान हवेलियों में रहते हों अथवा पहाड़ों पर रहते हों या समुद्र तट के मछुआरे हों अथवा रेगिस्तानी या बर्फीले क्षेत्रों में रहने वाले लोग हों।
4. गाँवों में डाकिया को देवदूत के रूप में देखा जाता है क्योंकि उसके द्वारा लाए मनीआर्डर के रुपयों से ही उनके घरों के चूल्हे जलते हैं।

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया Summary in Hindi

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया पाठ का सार

पत्रों की दुनिया बड़ी ही अनोखी है। पत्र जो काम कर सकते हैं वह काम संचार का कोई भी साधन नहीं कर सकता। पत्र लिखने . और पढ़ने से बड़ा संतोष मिलता है। अनेक घटनाओं और विवादों की जड़ में पत्र ही होते हैं। मानव-सभ्यता के विकास में पत्रों ने अनूठी भूमिका निभाई है। पत्रों को विविध भाषाओं में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है, जैसे उर्दू में खत, संस्कृत में पत्र, कन्नड में कागद, तेलगु मे उत्तरम, तमिल मे कब्दि कहा जाता है। पत्र लिखना भी एक कला है। दुनिया में रोजाना करोड़ों पत्र इधर से उधर जाते हैं।

पिछली शताब्दी में पत्र लिखने ने एक कला का रूप ले लिया। पत्र-लेखन को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया। विश्व डाकसंघ की ओर से 16 वर्ष से कम आयु वर्ग के बच्चों के लिए पत्र-लेखन प्रतियोगिताओं के आयोजन का सिलसिला 1972 में शुरू हुआ। आजकल फैक्स, ई-मेल, टेलीफोन तथा मोबाइल के प्रयोग ने चिट्ठियों की तेजी को भले ही रोका है, पर व्यापारिक डाक लगातार बढ़ रही है। अब भी लोग पत्रों का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

आज देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अपने पुरखों की चिट्ठियों को सहेज और सँजोकर रख रहे हैं। बड़े-बड़े लेखक, पत्रकार, उद्यमी, कवि, प्रशासक, संन्यासी या किसान की पत्र रचनाएँ अनुसंधान का विषय हैं। पंडित नेहरू ने अपनी पुत्री इंदिरा गाँधी को भी पत्र लिखे थे। हम पत्रों को तो सहेजकर रख लेते हैं, पर एस एम एस संदेशों को जल्दी ही भूल जाते हैं। महात्मा गाँधी द्वारा लिखे गए पत्र बहुत बड़ी धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं। दुनिया के संग्रहालयों में जानी-मानी हस्तियों के पत्रों के अनूठे संकलन हैं। ये पत्र देश, काल और समाज को जानने-समझने का असली पैमाना हैं।

महात्मा गाँधी के पास दुनिया भर से पत्र आते थे। पते के रूप में उन पर केवल महात्मा गाँधी-इंडिया लिखा होता था और वे जहाँ भी होते वहीं पहुँच जाते थे। गाँधीजी के पास दुनिया भर से बड़ी संख्या में पत्र पहुँचते थे। वे उनका जवाब भी भिजवाते थे। वे अपने हाथों से ही अधिकांश पत्रों का जवाब लिखते थे। लिखते-लिखते जब उनका दाहिना हाथ दर्द करने लगता था तब वे बाएँ हाथ से लिखने में जुट जाते थे। पत्र पाने वाले लोग गाँधीजी के पत्रों को प्रशस्तिपत्र से कम नहीं मानते थे। कई लोगों ने तो उन पत्रों को फ्रेम करा लिया था। यह उनके पत्रों को जादू ही तो था। पत्र किसी दस्तावेज से कम नहीं होते। पत्रों से संबंधित कई पुस्तकें मिल जाती हैं। पत्रों के संकलन का काम डाक मंगलमूर्ति ने किया है। पत्रों में प्रेमचंद, नेहरू जी, गाँधी जी तथा रवीन्द्रनाथ टैगोर के पत्र बहत प्रेरक हैं। महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर के मध्य 1915 से 1941 तक जो पत्राचार हुआ. उनसे नए-नए तथ्यों तथा उनकी मनोदशा का लेखा-जोखा मिलता है।

पत्र-व्यवहार की परंपरा भारत में बहुत पुरानी है। पर इसका असली विकास आजादी के बाद ही हुआ। डाक विभाग की पहुंच घर-घर तक है। आज भी लोग खतों का बेसब्री से इंतजार करते हैं। दूर देहात में लाखों गरीब घरों में चूल्हे मनीआर्डर की अर्थव्यवस्था से ही जलते हैं। गाँवों में आज भी डाकिया देवदूत के रूप में देखा जाता है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 5 चिट्ठियों की अनूठी दुनिया

चिट्ठियों की अनूठी दुनिया शब्दार्थ

उपयोगिता = लाभदायी (use), आधुनिकतम = नवीनतम (modern), केंद्रित = टिके होना (centred), तलाशना = ढूंढना (10 search), अहमियत = महत्त्व (importance), प्रयास – कोशिश (Efforts), विकसित = फली-फूली (Developed), व्यापारिक = व्यापार संबंधी (related to bursiness), बेसनी = सन के बिना (restless), मिसाल = उदाहरण (example), पुरखे = पूर्वज (ancestors), संकलन = संग्रह (collection), दिग्गज – बड़ी (Big. great), हस्ती = व्यक्तित्व (personalities), प्रशस्तिपत्र = गुणगान गाने वाला पत्र (letter of praive), दस्तावेज = जरूरी कागज (documents), तथ्यों = सच्चाइयों (facts), मनोदशा = मन की दशा (position of mind), गुडविल = नेकनामी (goodwill), हैसियत = दशा (status), बहुआयामी = अनेक रूपों वाला (malti dimensional), देवदूत = फरिश्ता (angel).

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 4 दीवानों की हस्ती

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 4 दीवानों की हस्ती Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 4 दीवानों की हस्ती

HBSE 8th Class Hindi दीवानों की हस्ती Textbook Questions and Answers

कविता से

प्रश्न 1.
कवि ने अपने आने को ‘उल्लास’ और जाने को ‘आँसू बनकर बह जाना’ क्यों कहा है?
उत्तर:
कवि अपने आने को उल्लास इसलिए कहता है क्योंकि किसी भी नए स्थान पर बड़े उत्साह के साथ जाता है। वहाँ जाकर उसे प्रसन्नता होती है। पर जब वह उस स्थान को छोड़कर आगे जाता है तब उसे दु:ख होता है। विदाई के क्षणों में उसकी आँखों से आँसू बह निकलते हैं।

प्रश्न 2.
भिखमंगों की दुनिया में बेरोक प्यार लुटाने वाला कवि ऐसा क्यों कहता है कि वह अपने हृदय पर असफलता का एक निशान भार की तरह लेकर जा रहा है? क्या वह निराश है या प्रसन्न है?
उत्तर:
कवि इस दुनिया को भिखमंगों की दुनिया बताता है। यह दुनिया केवल लेना जानती है, देना नहीं। कवि दुनिया के लोगों को अपना समझकर उन पर अपना प्यार लुटाता है, पर उसे बदले में वैसा प्यार नहीं मिलता। अतः वह अपने हृदय पर असफलता का भार लेकर जा रहा है। कवि निराश है।

प्रश्न 3.
कविता में ऐसी कौन-सी बात है जो आपको सबसे अच्छी लगी?
उत्तर:
कविता में हमें कवि का जीवन के प्रति दृष्टिकोण अच्छा लगा। ऐसा दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति ही सुखी रह सकता है।

कविता से आगे

प्रश्न 1.
जीवन में मस्ती होनी चाहिए, लेकिन कब मस्ती हानिकारक भी हो सकती है? सहपाठियों के बीच चर्चा कीजिए।
उत्तर:
‘जीवन में मस्ती’ विषय पर विद्यार्थी अपने सहपाठियों के मध्य चर्चा करें। दोनों पक्षों पर विचार करें।

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अनुमान और कल्पना

1. एक पंक्ति में कवि ने यह कहकर अपने अस्तित्व को नकारा है कि “हम दीवानों की क्या हस्ती है आज यहाँ, कल वहाँ चले।” दूसरी पंक्ति में उसने यह कहकर अपने अस्तित्व को महत्त्व दिया है कि “मस्ती का आलम साथ चला, हम धूल उड़ाते जहाँ चले।” यह फाकामस्ती का उदाहरण है। अभाव में भी खुश रहना फाकामस्ती कही जाती है। कविता में इस प्रकार की अन्य पंक्तियाँ भी हैं, उन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और अनुमान लगाइए कि कविता में परस्पर विरोधी बातें क्यों की गई हैं?
→ अन्य विरोधी बातों वाली काव्य-पंक्तियाँ
आए बनकर उल्लास अभी,
आँसू बनकर बह चले अभी।
(उल्लास भी आँसू भी)
हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले।
हम एक निसानी-सी उर पर
ले असफलता का भार चले।
(प्यार लुटाना-असफलता का भार)

भाषा की बात

संतुष्टि के लिए कवि ने ‘छककर’, “जी भरकर’ और ‘खुलकर’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इसी भाव को व्यक्त करने वाले कुछ और शब्द सोचकर लिखिए, जैसे-हँसकर, गाकर।

  • पढ़कर – खिलकर
  • सुनकर – तृप्त होकर

HBSE 8th Class Hindi दीवानों की हस्ती Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
इस कविता में प्रयुक्त ‘दीवाना’ शब्द के निम्नलिखित अर्थों में सर्वोपयुक्तं अर्थ को चुनिए:
(क) पागल
(ख) लगनशील
(ग) आवारा
(घ) मनमौजी।
उत्तर:
मनमौजी।

प्रश्न 2.
कवि ने इस कविता में दीवानों की क्या विशेषताएँ बताईं?
उत्तर:
कवि ने इस कविता में बताया है कि दीवाने मनमौजी स्वभाव के होते हैं। वे एक जगह टिककर नहीं बैठते। वे लोगों के सुख-दुख के साथी होते हैं। विशेषकर गरीबों के लिए अपना प्यार लुटाते हैं। दीवाने मान-अपमान, भलाई-बुराई, अपने-पराए की भावना से ऊपर उठे होते हैं। वे किसी दूसरे के बनाए बंधन में बंधकर रहना नहीं जानते। वे किसी को बद्दुआ नहीं देते। सब को समान दृष्टि से देखते हैं।

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प्रश्न 3.
इस कविता में जीवन के प्रति कौन-सा दृष्टिकोण झलकता है?
उत्तर:
इस कविता में जीवन को पूरी मस्ती के साथ जीने का दृष्टिकोण झलकता है। हमें स्वच्छंद जीवन जीना चाहिए। किसी के बंधन में बंधकर जीना ठीक नहीं है। गरीबों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। किसी के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए।

प्रश्न 4.
निम्नलिखित भाव कविता की किन पंक्तियों में व्यक्त हुए हैं?
1. हम बंधनों में रहकर भी आजाद रहने लगे।
2. हमने संसार को कुछ दिया और संसार से कुछ लिया भी।
3. हम मन में असफलता के बोझ को वहन करते चले।
उत्तर:
कविता की निम्नलिखित पंक्तियों में ये भाव व्यक्त हुए हैं:
1. हम स्वयं बंधे थे, और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले
2. जग से उसका कुछ लिए चले, – जग को अपना कुछ दिए चले।
3. ले एक निशानी सी उर पर, ले असफलता का भार चले।

प्रश्न 5.
इस कविता से आपको क्या प्रेरणा मिलती
उत्तर:
इस कविता में हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें मनमौजी प्रवृत्ति का होना चाहिए। हमें बंधनों में बंधकर नहीं रहना चाहिए। स्वच्छंद जीवन जीना हमारा लक्ष्य होना चाहिए। लोगों के दीवानों की हस्ती [वसंत-भाग-3] सुख-दुःख में साझीदार होने की प्रेरणा भी हमें इस कविता से मिलती है।

प्रश्न 6.
सारी कविता पढ़कर कवि की किस मनःस्थिति का बोध होता है?
(क) वैराग्य की
(ख) संतोष की
(ग) जीवन से भागने की
(घ) सुख-दुख में समान भाव से मस्त रहने की।
उत्तर:
सारी कविता पढ़कर कवि की “सुख-दुःख में समान भाव से मस्त रहने की” पुनः स्थिति का बोध होता है।

प्रश्न 7.
दीवाने टिककर क्यों नहीं बैठते?
उत्तर:
दीवानों का जीवन स्वच्छंद होता है। वे जहाँ-तहाँ घूमते रहते हैं। एक जगह टिकने में वे बंधनों का अनुभव करते हैं। किसी के बंधन स्वीकार नहीं कर सकते। वे कभी यहाँ तो कभी वहाँ जा पहुँचते हैं।

प्रश्न 8.
इस कविता का प्रतिपाद्य लिखो।
उत्तर:
‘दीवानों की हस्ती’ शीर्षक कविता का प्रतिसाद्य है कि हमें सुख-दुःख में समान भाव, से मस्त बने रहना चाहिए। मनमौजी जीवन आनंद से परिपूर्ण होता , सी में जीवन का सच्चा रूप झलकता है। हमें सभी प्रकार के भदों से ऊपर उठकर जीवन बिताना चाहिए। सामाजिकता का बोध भी हमारे अंदर बमा रहना चाहिए। त्याग और परोपकार की भावना अपनानी चाहिए। आजादी और गतिशीलता जीवन में आवश्यक है। संसार की स्वार्थ भावना से हमें कभी दुःखी नहीं होना चाहिए। सभी को अपना प्यार बाँटना चाहिए। बंधनों में बंधकर नहीं रहना चाहिए।

दीवानों की हस्ती Summary in Hindi

दीवानों की हस्तीपाठ का सार

जीवन-परिचय : भगवतीचरण वर्मा का जन्म 30 अगस्त 1903 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के शफीपुर ग्राम में हुआ था। पाँच वर्ष की उम्र में ही पिता का देहान्त हो जाने के कारण छोटी उम्र में ही इनके कंधे पर परिवार का भार आ गया। जीवन संघर्ष में जूझते हुए इन्होंने बी.एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की और कानपुर में वकालत करने लगे। लेकिन वकालत में इनका दिल न लगा

और ये अधिकांश समय साहित्य-सृजन को देने लगे। आठवीं कक्षा में पढ़ते समय इनकी पहली कविता ‘प्रताप’ में छपी थी। वकालत करते समय तक ये कवि के रूप में विख्यात हो गए थे। कविता से प्रारंभ करके इन्होंने कहानी, उपन्यास, निबन्ध, नाटक आदि बहुत कुछ लिखा।

जीविका के लिए उन्होंने रेडियो स्टेशनों में नौकरी की, सिनेमा के लिए कहानियाँ और संवाद लिखे, पत्रों का संपादन एवं प्रकाशन किया। काफी समय तक ये संसद सदस्य भी रहे। इनका देहान्त 1980 में दिल्ली में हुआ।

रचनाएँ : भगवती जी के कहानी संग्रह इस प्रकार हैं : ‘दो बाँके’, ‘इन्स्टालमेंट’, ‘राख और चिनगारी’। ‘मोर्चा बन्दी’ नाम से चित्रलेखा, सामर्थ्य और सीमा, रेखा, सबहि बचावत राम गुसाईं, प्रश्न और मरीचिका, पतन, भूले बिसरे चित्र। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर बनी फिल्म बड़ी प्रसिद्ध हुई थी। इन्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार भी मिल चुका है।

आपने कविताएँ, रेडियो रूपक तथा नाटक भी लिखे हैं। इनकी जिन काव्य-कृतियों ने ख्याति पाई है, इनमें प्रमुख हैं-‘मधुकण’, ‘मानव’, ‘प्रेम संगीत’।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 4 दीवानों की हस्ती

विशेषताएँ : वर्मा जी छायावादोत्तर काल के कवि हैं, अतः उनके काव्य पर छायावादी संस्कारों की स्पष्ट छाया है। परंतु वर्मा जी की विशिष्टता इस बात में है कि इन्होंने छायावाद के कल्पना अतिरेक और वायवीय सूक्ष्मता के विरुद्ध ऐसी कविताएँ दीं, जिनका संबंध पृथ्वी के ठोस जीवन से है और जो मर्म को छूती हैं, मात्र चमत्कृत नहीं करतीं। इन कविताओं में कोमलता है, कामना की मोहिनी है, सौन्दर्य की लालसा है। परन्तु इन अलबेले भावों को इस प्रकार व्यक्त किया गया है कि वे तत्काल चेतना को मुग्ध कर देते हैं।

आधुनिक कवि होने के कारण वर्मा जी समाजवादी विचारधारा से अछूते नहीं रहे, परंतु उनमें कम्युनिस्ट कट्टरता और भावावेश नहीं है, उनमें भी मानव और समाज के दलित वर्गों के प्रति सहानुभूति उपलब्ध होती है और इस भाव को. इन्होंने अपनी कई मार्मिक कविताओं में व्यक्त किया है। परंतु यह मनोदृष्टि उतनी समाजवाद की आभारी नहीं, जितनी गाँधीवाद की। उनकी कविताएँ ‘ भैसा गाड़ी’, ‘ट्राम’, ‘राजा साहिब का वायुयान’ अपने परिवेश पर यथार्थ-निष्ठ दृष्टि डालती हैं व वह मनोमुद्रा कई बार बेधक व्यंग्य से भरी कविताओं को भी जन्म देती है।

दीवानों की हस्ती कविता का सार

“दीवानों की हस्ती’ शीर्षक कविता में भगवतीचरण वर्मा ने बताया है कि दीवाने कभी किसी बंधन को स्वीकार नहीं करते। वे एक जगह टिककर नहीं रहते। वे कभी यहाँ तो कभी दूसरी जगह पहुंच जाते हैं। संसार के लोगों के मध्य सुख-दुख को बाँटते चलते हैं। गरीबों के मध्य अपना प्यार लुटाते चलते हैं। उनका जीवन मान-अपमान की भावना से परे होता है। वे तो हँस-हंस कर आगे बढ़ते चले जाते हैं। उन्हें अच्छे मतों की परवाह भी नहीं होती। सब लोग उनके अपने होते हैं। दीवाने अपने बनाए बंधनों में बंधे होते हैं, जिन्हें वे जब चाहे तोड़ देते हैं। उनका जीवन पूरी तरह अपना होता है।

दीवानों की हस्ती काव्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. हम दीवानों की क्या हस्ती,
हैं आज यहाँ कल वहाँ चले,
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उड़ाते जहाँ चले।
आए बनकर उल्लास अभी,
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए, अरे,
तुम कैसे आए, कहाँ चले?

शब्दार्थ : दीवानों = मस्त रहने वाला (Carefree), मस्ती का आलम = मस्ती से भरा संसार (World with joy), उल्लास = खुशी (Joy), आँसू बनकर बह गए – दुःख के आँसू बहने लगे।

प्रसंग : प्रस्तुत पद्यांश भगवंतीचरण वर्मा द्वारा रचित कविता ‘दीवानों की हस्ती’ से उद्धत है। मनमौजी स्वभाव वाले, निश्चित रहने वाले व्यक्ति जहाँ भी जाते हैं, मस्तियाँ उनके साथ रहती हैं। इसी बात का वर्णन करते हुए कवि कहता है:

व्याख्या : हम मन-मौजी मनुष्यों की कोई हस्ती नहीं है। कोई खास विशेषता या योग्यता भी नहीं है। बस, अपनी मस्ती ही हमारा सब-कुछ है। जब मौज आयी, कहीं भी चल दिए। आज अगर यहाँ हैं, तो कल किसी दूसरे स्थान पर जा सकते हैं। हमारी विशेषता केवल इतनी ही है कि हम अपने पाँवों से धूल उड़ाते हुए जहाँ कहीं भी चले जाते हैं, मस्ती का एक संसार, अपने मनमौजीपन का एक निश्चिंत वातावरण हमारे साथ रहा करता है।

हम मस्तों के जीवन में अभी-अभी आनंद और खुशी का भाव है। अगले क्षण वही आनंद आँसू बनकर बहता हुआ भी दिखाई देता है, अर्थात् पल में आनन्द-में मुस्कराना, पल में किसी दुःख से रो देना, इस प्रकार कोई भी भाव स्थिर नही रह पाता। लोग पूछते रह जाते हैं कि तुम लोग कहाँ से आ रहे हो, किधर जा रहे हो, पर हमारे पास इसका कोई उत्तर नहीं होता।

भाव यह है कि निश्चिंत रहना, अपने मन की मौज के अनुसार कार्य करना ही सच्चे मस्तों का जीवन है, उनकी हस्ती का परिचय है।

काव्य-सौंदर्य:

  • धूल उड़ाता चलना’ एक मुहावरा है, जिसका अर्थ होता है धूम मचाते हुए जाना।
  • कवि के अनुसार जन्म-मृत्यु, आने-जाने, सुख-दुःख का अपना एक क्रम है।
  • मनमौजी लोगों की प्रकृति का सुदर परिचय मिलता है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 4 दीवानों की हस्ती

2. किस ओर चले ? मत यह पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।
दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोए।
छककर सुख-दुख के घूटों को,
हम एक भाव से पिए चले।

शब्दार्थ : जग = संसार (World), छककर = तृप्त होकर (Satisfied)

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ भगवतीचरण वर्मा की कविता ‘दीवानों की हस्ती’ से अवतरित हैं। इनमें कवि बताता है कि मनमौजी और निश्चिंत रहने वालों का जीवन के प्रति अलग दृष्टिकोण रहता है। वे हर दशा का भोग जी भरकर करते हैं। इन भावों को स्पष्ट करते हुए कवि कहता है:

व्याख्या : हम लोग किस ओर जा रहे हैं, यह पता नहीं। बस इतना जानते हैं कि हमें चलते रहना है, हँसते-रोते चलतें जाने का नाम ही जीवन है, अतः हमेशा चलते रहते हैं। सारे संसार से ताने सुनते हैं। बदले में संसार को अपनी मस्ती का दान देते हैं। इस प्रकार हर हाल में चलना, यही हमारे जीवन का क्रम है। मन की मौज में आकर हम लोग दुनियावालों से दो बातें कह लेते हैं। बदले में उनकी बातें चुपचाप सुन भी लेते हैं। बात अच्छी लगी तो जी-भर हँस भी लेते हैं। बात बुरी लगी तो संसार के बुरे व्यवहार पर रो लेते हैं। इस प्रकार जीवन में चाहे सुख आए, चाहे दुःख आए, दोनों के घुट हम खूब जी भरकर एक ही भाव से पी लेते हैं। इसी में हमारी मस्ती है। भाव यह है कि सुख-दुःख, आशा-निराशा में एक सा रह पाना सरल काम नहीं है। कोई मनमौजी स्वभाव वाला व्यक्ति ही ऐसा कर सकता है। सुख-दुख को समान रूप से स्वीकार करते हैं।

विशेष:

  • दीवानों की सामाजिकता की भावना अभिव्यक्त
  • जीवन में सुख और दुख दोनों का महत्त्व स्वीकारा गया है।
  • सरल एवं प्रवाहपूर्ण भाषा का प्रयोग किया गया है।

3. हम भिखमंगों की दुनिया में,
स्वच्छंद लुटाकर प्यार चले,
हम एक निशानी-सी उर पर,
ले असफलता का भार चले।

शब्दार्थ : भिखमंगों = भिखारियों (Beggars), स्वच्छंद = मुक्त (Free), उर = हृदय (Heart), असफलता = हार (Defeat), मान = आदर (Respect), अपमान = बेइज्जती (Insult)।

प्रसंग : ‘दीवानों की हस्ती’ शीर्षक कविता की इन पंक्तियों में बताया गया है कि मनमौजी स्वभाव वालों की दुनिया अलग होती है। हार या जीत, प्रत्येक दशा में मनमौजी लोग प्रसन्न रहते हैं, इस भाव को प्रकट करते हुए कवि कह रहा है।

व्याख्या : यह दुनिया भिखारियों जैसी है। वह केवल लेना ही जानती है, देना नहीं। अतः हम इसको समझकर भी अपना प्यार सबके लिए स्वतंत्रतापूर्वक लुटाते हैं। बदले में कुछ भी न चाहकर अपने रास्ते पर चल देते हैं। हाँ, हम अपने जैसा मस्तमौला दुनिया को नहीं बना पाए, इस असफलता का भार हमारे मन पर अवश्य रह जाता है। फिर भी अपनी हार की चिंता न करके हम अपने रास्ते पर निश्चिंत बढ़ जाते हैं।  कवि का भाव यह है कि हर हाल में प्रसन्न रहना और अपने दिमाग पर बोझ न पड़ने देना चाहिए। यही मस्ती का वास्तविक जीवन है।

काव्य-सौन्दर्य : दुनिया स्वार्थी है। स्वार्थ ही ईर्ष्या-द्वेष तथा विषाद का कारण है। दीवाने स्वार्थ से ऊपर उठ चुके हैं। उनके अनुकरण करने पर जीवन प्रेममय बन जाएगा। मान-अपमान की विशेष चिंता नहीं करनी चाहिए। ‘एक निशानी-सी उर पर’ में उपमा अलंकार है। ‘प्राणों की बाजी हार चले’ मुहावरे का भी सुंदर प्रयोग हुआ है।

4. अब अपना और पराया क्या ?
आबाद रहें रुकने वाले।
हम स्वयं बँधे थे, और स्वयं
हम अपने बंधन तोड़ चले।

शब्दार्थ : नतमस्तक = सिर झुकाना (To blow head), अभिशाप = बुराई (Bad), वरदान = आशीर्वाद (Blessing), दृगों = आँखों (Eyes)।

प्रसंग : मस्त लोग अपने को दुःख देने वालों को भी शाप .. नहीं देते, इन भावों को प्रकट करते हुए कवि कह रहा है :

व्याख्या : दुनिया ने हमारे साथ भला व्यवहार किया या बुरा व्यवहार किया, हम लोग उनको याद नहीं रखते। सभी को समान मानकर एक ही भाव से भुला देते हैं। इस प्रकार अपना मस्ती-भरा जीवन बिताने के बाद, अब यहाँ. से (इस दुनिया से) जाने के समय हमारे लिए अपने-पराए का कोई भेद-भाव नहीं रह गया। हमारी तो यही शुभकामना है- हमारे … पीछे यहाँ रहने वाले हमेशा आबाद रहें, प्रसन्न रहें। हमने संसार के बंधनों में अपने-आपको खुद ही बाँधा था। आज खुद ही उन बंधनों को तोड़कर जा रहे हैं।

भाव यह है कि हम मनमौजी जीवों के लिए किसी बात का कोई बंधन नहीं। हम चाहते हैं कि दुनिया हमारी तरह ही मस्ती से जीवन काट ले।

विशेष:

  • दीवाने ‘भला-बुरा’ और ‘अपना-पराया’ के भेद-भाव से ऊपर उठ जाते हैं। संसार में . राग-विराग, ईर्ष्या-द्वेष की भावना सदा से रही है। इसे मिटाया नहीं जा सकता।
  • सरल एवं प्रवाहमयी भाषा-शैली का अनुसरण किया गया है।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

HBSE 8th Class Hindi बस की यात्रा Textbook Questions and Answers

कारण बताएँ

प्रश्न 1.
“मैंने उस कंपनी के हिस्सेदार की तरफ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा।”
लेखक के मन में हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा क्यों जग गई ?
उत्तर:
लेखक के मन में बस कंपनी के हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा इसलिए जाग गई कि वह इतनी खटारा बस को चलाने का साहस जुटा रहा था। कंपनी का हिस्सेदार अपनी पुरानी बस की खूब तारीफ कर रहा था। ऐसे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भाव ही उमड़ता है।

प्रश्न 2.
“लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफर नहीं करते।”
लोगों ने यह सलाह क्यों दी?
उत्तर:
लोगों ने लेखक को यह सलाह इसलिए दी क्योंकि इस बस का कोई भरोसा नहीं है कि यह कब और कहाँ रुक जाए, शाम बीतते ही रात हो जाती है और रात रास्ते में कहाँ बितानी पड़ जाए। कुछ पता नहीं रहता। उनके अनुसार यह बस डाकिन की तरह है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

प्रश्न 3.
“ऐसा जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं।”
लेखक को ऐसा क्यों लगा ?
उत्तर:
जब बस का इंजन स्टार्ट हुआ तब सारी बस झनझनाने लगी। लेखक को ऐसा प्रतीत हुआ कि पूरी बस ही इंजन है। मानो वह बस के भीतर न बैठकर इंजन के भीतर बैठा हुआ हो।

प्रश्न 4.
“गजब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है।”
लेखक को यह सुनकर हैरानी क्यों हुई ?
उत्तर:
लेखक ने बस की बुरी हालत देखकर बस-कंपनी के हिस्सेदार से पूछा था कि क्या यह बस चलती भी है। तब उसने उत्तर दिया था कि हाँ, यह बस भली प्रकार चलती है और अपने आप चलती है। यह सुनकर लेखक को हैरानी हुई कि इतनी जर्जर बस बिना धक्का दिए अपने आप चलती है।

प्रश्न 5.
“मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था।”
लेखक पेड़ों को दुश्मन क्यों समझ रहा था?
उत्तर:
लेखक को पेड़ों से डर इसलिए लग रहा था कि कहीं उसकी बस किसी पेड़ से टकरा न जाए। एक पेड़ के निकल जाने पर वह दसरे पेड़ का इंतजार करता कि बस कहीं इस पेड़ से न टकरा जाए। उसे हर पेड़ अपना दुश्मन लग रहा था।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ किसके नेतृत्व में, किस उद्देश्य से तथा कब हुआ था? इतिहास की उपलब्धत पुस्तकों के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1930 में अंग्रेजी सरकार से असहयोग करने तथा स्वराज पारित के लिए किया गया था।

प्रश्न 2.
सविनय अवज्ञा का उपयोग व्यंग्यकार ने किस रूप में किया है? लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में सरकारी आदेशों का पालन न करने के लिए किया गया था। इसमें अंग्रेजी सरकार के साथ सहयोग न करने की भावना थी। 12 मार्च 1930 को इसी कड़ी में दांडी मार्च किया गया। नमक कानून 1930 में तोड़ा गया। लेखक ने इसका उपयोग इस संदर्भ में किया है कि आंदोलन के दौरान जिस प्रकार अंग्रेजों के दमन पूर्वक कार्यों से भारतीय जनता झकी नहीं विनम्रपूर्वक अपने संघर्ष में बढ़ी रही उसी प्रकार यह बस भी अपने खटारा और टूटी-फूटी होने के बावजूद चल ही रही है या कहें कि चलाई जा रही है। बस का ढाँचा जवाब दे रहा था, किंतु वह चल ही रही थी।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

प्रश्न 3.
आप अपनी किसी यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभवों को याद करते हुए एक लेख लिखिए।
उत्तर:
कुछ समय पूर्व की बात है चाचा जी के बुलावे पर मैं और मेरा मित्र रोहित ऊधमपुर जाने के लिए तैयार हुए। तैयारी अचानक बन गई अतः आरक्षण की व्यवस्था नहीं हो पाई। सामान्य डिब्बे से ही सफर करना पड़ा। यह विचार बना कि गाड़ी से पठानकोट तक चला जाए। उसके बाद सांबा तक बस द्वारा व वहाँ से उधमपुर। अधिक सामान की आवश्यकता नहीं थी अतः एक बैग लेकर दिल्ली जंक्शन के प्लेटफार्म नं. 11 की ओर रुख किया। T.V. स्क्रीन से पता चला कि गाड़ी प्लेटफार्म पर पहुँचने वाली है। हमने टिकट लिए। खुले पैसे की कमी से 6 रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। हम पुल से नीचे उतरकर जनरल डिब्बे की ओर चल पड़े। बोतल का पानी रास्ते में ही समाप्त हो चुका था।

अतः यह तय हुआ कि रोहित पानी ले आए। ठंडे पानी की मशीन पर लगर खाने जैसी भीड़ हो रही थी। जैसे तैसे पानी भरकर डिब्बे में सवार हो गए। यह देखकर हम खुश थे कि अधिक भीड़ नहीं थी। लेकिन हमारी यह खुशी पश्चिम बंगाल के मार्क्सवादी शासन (कुशासन) की तरह स्थायी नहीं थी। पता चला कि हाथों में झंडे, डंडे तथा जेब पर बिल्ले लगाए किसान यूनियन के लोग इसी डिब्बे पर नजरे गड़ाए लपके आ रहे थे। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने थोड़ी ही देर में डिब्बे को रैली स्थल में बदल दिया। हालत यह थी कि अब हम चाहकर बाहर भी नहीं जा सकते थे। शाहरूख खान के ‘छैयाँ-छैयाँ’ वाले गाने के स्मरण ने मन को कुछ-कुछ राहत दी।

मन बहलाना

अनुमान कीजिए यदि बस जीवित प्राणी होती, वह बोल सकती तो वह अपनी बुरी हालत और भारी बोझ के कष्ट को किन शब्दों में व्यक्त करती? लिखिए।
मैं एक बहुत पुरानी और बूढी बस हूँ। मेरी हालत जर्जर हो चुकी है। अब मैं लंबी यात्रा करने लायक नहीं रह गई हूँ। मैं तो थोड़ा-बहुत टहल ही सकती हूँ। मुझ पर सवारियों का बोझ मत लादो। मैं तुम्हारा बोझ सहन नहीं कर सकती। मैं इस बोझ से दबकर दम तोड़ दूंगी। अब तो मैं एक वृद्धा की तरह हूँ। तुम्हें तो मेरा सम्मान करना चाहिए। तुम मेरे कष्टों को बढ़ाओ मत। अब मुझे चलने में तकलीफ होती है। अब मैं आराम करना चाहती हूँ। मुझे चैन से रहने दो।

भाषा की बात

1. बस, वश, बस तीन शब्द हैं-इनमें बस सवारी के अर्थ में, वश अधीनता के अर्थ में और बस पर्याप्त (काफी) के अर्थ में प्रयुक्त होता है जैसे- बस से चलना होगा। मेरे वश में नहीं है। अब बस करो।
उपर्युक्त वाक्य के समान तीनों शब्दों से युक्त आप भी दो-दो वाक्य बनाइए।
बस : 1. यह बस बहुत सुविधाजनक है।
2. मेरठ से बस का सफर दो घंटे का है।

वश : 1. इस स्थिति पर मेरा वश नहीं है।
2. यह काम सरकार के वश में ही है।

बस : 1. तुम्हें बस झगड़ना ही आता है।
2. बस मैं नहीं जा सकता।

2. “हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है।” ने, की, से आदि शब्द वाक्य के दो शब्दों के बीच संबंध स्थापित कर रहे हैं। ऐसे शब्दों को कारक कहते हैं। इसी तरह जब दो वाक्यों को एक साथ जोड़ना होता है ‘कि’ का प्रयोग होता है।

कहानी में से दोनों प्रकार के चार वाक्यों को चुनिए।
→ बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।

  • हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।
  • मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है
  • झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।

3. “हम फौरन खिड़की से दूर सरक गए। चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी।” ‘सरकना’ और ‘रेंगना’ जैसी क्रिया दो प्रकार की गति बताती है। ऐसी कुछ और क्रियाएँ एकत्र कीजिए जो गति के लिए प्रयुक्त होती हैं, जैसे-घूमना इत्यादि। उन्हें वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

  • पकड़ना – हमने गाड़ी पकड़नी चाही।
  • धड़कना – दिल तेजी से धड़क रहा था।

4. “काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था।”
इस वाक्य में ‘बच’ शब्द को दो तरह से प्रयोग किया गया है। एक ‘शेष’ के अर्थ में और दूसरा सुरक्षा के अर्थ में।
नीचे दिए गए शब्दों को वाक्यों में प्रयोग करके देखो। ध्यान रहे, एक ही शब्द वाक्य में दो बार आना चाहिए, और शब्दों के अर्थ में कुछ बदलाव होना चाहिए।
(क) जल
(ख) फल
(ग) हार।
जल : नदियों का जल पवित्र होता है।
वह आग से जल गया।

फल : फल खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
अच्छे काम का अच्छा फल मिलता है।

हार : गले का हार सुंदर है।
हम मैच हार गए।

5. भाषा की दृष्टि से देखें तो हमारी बोलचाल में प्रचलित अंग्रेजी शब्द फर्स्ट क्लास में दो शब्द हैं-फर्स्ट और क्लास। क्लास का विशेषण है फर्स्ट। चूँकि फर्स्ट संख्या है, फर्स्ट क्लास संख्यावाचक विशेषण का उदाहरण है। महान आदमी में किसी आदमी की विशेषता है महान। यह गुणवाचक विशेषण है। संख्यावाचक विशेषण और गुणवाचक विशेषण के उदाहरण खोजकर लिखिए।
चतुर व्यक्ति, सुंदर स्त्री, सच्चा आदमी। – गुणवाचक विशेषण
तीसरा आदमी, चार अमरूद। संख्यावाचक विशेषण

बस की यात्रा Summary in Hindi

बस की यात्रा पाठ का सार

लेखक और उसके मित्रों ने तय किया कि वे शाम चार बजे की बस से पन्ना जाएँगे। वहाँ से इसी कंपनी की बस सतना के लिए एक घंटे बाद मिलती है जो जबलपुर की ट्रेन मिला (पकड़ा) देती है। दो लोगों को सुबह काम पर हाजिर होना था अतः यह रास्ता अपनाना ठीक समझा गया। यद्यपि समझदार लोगों ने शाम की बस से सफर करने को मना किया था, पर वे माने नहीं। बस बहुत बूढी अर्थात् पुरानी थी। उन लोगों को लगा कि यह बस तो पूजा के योग्य है क्योंकि इसकी दशा वृद्धा स्त्री के समान थी। बस कंपनी के हिस्सेदार ने बताया कि यह बस भली प्रकार चलती है। डॉक्टर मित्र ने कहा कि यह बस अनुभवी है और हमें बेटों की तरह गोद में लेकर चलेगी। लेखक को विदा करने आए लोगों ने ऐसा भाव प्रकट किया कि मानो वे उन्हें अंतिम विदा दे रहे हों।

खैर बस का इंजन स्टार्ट हो गया। बस के अधिकांश शीशे टूटे हुए थे। उन लोगों को लगा कि इंजन उनकी सीट के नीचे है। वैसे बस के सभी हिस्से एक-दूसरे से असहयोग कर रहे थे। एकाएक बस रुक गई। पता चला पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। बस का ड्राइवर बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे नली से इंजन में पहुँचाने लगा। लेखक को अब बस के किसी हिस्से का भरोसा नहीं था। उसे डर लगने लगा कि बस किसी पेड़ से टकरा जाएगी। बस फिर रुक गई। उसका इंजन खोलकर ठीक किया गया तो वह बहुत धीमी रफ्तार से चलने लगी। बस पुलिया पर पहुंची ही थी उसका एक टायर फट गया। वह तो बस की स्पीड कम थी अन्यथा वह नाले में जा गिरती। लेखक बस को श्रद्धाभाव से देखने लगा। काफी देर में एक पुराना घिसा हुआ टायर लगाया गया तब वह कहीं चली। लेखक ने समय पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। अब तो हँसी-मजाक चालू हो गया।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

बस की यात्रा शब्दार्थ

तय = निश्चित (Fix), वयोवृद्ध = आयु से बूढ़े (Old person), वृद्धावस्था = वृद्ध अवस्था = बुढ़ापा (Old age), विश्वसनीय = विश्वास (भरोसा) करने लायक (Faithful), अंतिम = आखिरी (Last), निमित्त = बहाना (Cause), स्टार्ट = चालू (Start),रंक = गरीब (Poor), असहयोग = अ+असहयोग = सहयोग न करना (Non co-operation), सविनय = स+विनय = विनयपूर्वक (Respectfully), अवज्ञा = आज्ञा न मानना (Not obey order), ब्रेक फेल = ब्रेकों का काम न करना (Brake fail), दृश्य = नजारा (Scene), इत्तफाक = संयोग (By chance), अंत्येष्टि = अंतिम संस्कार (Last ceremony), उत्सर्ग = बलिदान (Sacrifice), बेताबी = बेचैनी (Restlessness).।

बस की यात्रा गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए इससे सफर नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत. भाग-3’ में संकलित पाठ ‘बस की यात्रा’ से अवतरित है। यह पाठ हास्य-व्यंग्य में रचा गया है। इसके लेखक हैं प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई।।

व्याख्या : इस गद्यांश में लेखक ने बस की जीर्ण-शीर्ण दशा पर व्यंग्य किया है। बस बहुत पुरानी थी। इस बस को देखकर वृद्ध स्त्री का दृश्य सामने आ रहा था। इस बस को देखकर लेखक के पान में श्रद्धा भावना उत्पन्न हुई। यह बस बहुत बूढ़ी अर्थात् पुरानी (कबाड़) थी। इसकी हालत देखकर लगता था कि यह सदियों का अनुभव अपने अंदर समेटे हुए है। जिस प्रकार कोई नूढी स्त्री अनुभवी होती है, वही दशा इस बस की थी। लेखक व्यंग्य करते हुए कहता है कि लोग इसमें सफर करने से इसलिए कतराते थे कि बुढ़ापे में चलते समय इसे कष्ट होगा। वृद्ध व्यक्ति तो पूजा करने के योग्य होता है अतः इस पुरानी बस की भी पूजा ही की जानी चाहिए। भला इस पर सवारी कैसे की जा सकती है।

यहाँ व्यंग्य यह है कि बस की हालत इतनी जर्जर थी कि वह सामान्य ढंग से चल ही नहीं सकती थी। उसकी हालत खस्ता थी।

2. बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुजर रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता सीट बॉडी को छोड़कर आगे निकल गई है। कभी लगता कि सीट को छोड़कर बॉडी आगे भागी जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए। यह समझ में नही आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है।

प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘बस की यात्रा’ से लिया गया है। लेखक पुरानी बस में यात्रा के अनुभव को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करता है।

व्याख्या : लेखक और उसके मित्र पुरानी खटारा बस में सवार हो गए। बस का चलना कठिन लग रहा था, पर वह बस चल ही पड़ी। लेखक को लगा कि यह बस उस समय जरूर जवान रही होगी जब महात्मा गाँधी का असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। (व्यंग्य यह है कि बस की खस्ता हालत को देखकर लेखक ने इसे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बताया अर्थात् बस बहुत पुरानी थी) मानो इसे इस प्रकार की पूरी ट्रेनिंग मिल चुकी थी। बस भलीभाँति जानती थी। कि किस प्रकार असहयोग किया जाता है। बस का हर कल-पुर्जा एक दूसरे से असहयोग कर रहा था अर्थात् उनमें कोई तालमेल न था। बस की सीटें बस की बॉडी से अलग हो रही थीं। कभी सीट बस की बॉडी से आगे निकल जाती थी तो कभी बॉडी सीट को पीछे छोड़कर आगे चली जाती थी। यह आँख-मिचौली का खेल 8-10 मील तक चलता रहा। फिर सारे अंतर मिट गए। लेखक की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह सीट पर बैठा है अथवा सीट उसके ऊपर चढ़ी है।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

HBSE 8th Class Hindi लाख की चूड़ियाँ Textbook Questions and Answers

कहानी से

प्रश्न 1.
बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था? ..
उत्तर:
बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव बड़े चाव के साथ जाता था। उसके चाव का कारण यह था कि वहाँ उसे ढेर सारी लाख की रंग-बिरंगी गोलियाँ मिलती थीं। ये गोलियाँ उसका मन मोह लेती थीं। बदलू लेखक के मामा के गाँव का था अतः उसे उसको ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था, पर वह ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ कहता था। इसका कारण यह था कि गाँव के सभी बच्चे उसे ‘बदलू काका’ ही कहा करते थे। लेखक भी उनकी देखा-देखी उसे ‘बदलू काका’ ही कहता था।

प्रश्न 2.
वस्तु विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित पद्धति क्या है?
उत्तर:
‘वस्तु विनिमय’ में एक वस्तु को दूसरी वस्तु देकर लिया जाता था। वस्तु के लिए पैसे नहीं लिए जाते थे। वस्तु के बदले वस्तु ली-दी जाती थी। लोग अनाज देकर चूड़ियाँ ले लेते थे।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

प्रश्न 3.
“मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं।’-पंक्ति में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
इस पंक्ति में लेखक ने इस व्यथा की ओर संकेत किया है कि मशीनों के आगमन के साथ कारीगरों के हाथों से काम-धंधा छिन गया। मानो उनके हाथ ही कट गए हों। मशीनों ने लोगों को बेरोजगार बना दिया। .

प्रश्न 4.
बदलू के मन में ऐसी कौन-सी व्यथा थी, जो लेखक से छिपी न रह सकी?
उत्तर:
बदलू के मन में इस बात की व्यथा की मशीनी युग के प्रभावस्वरूप उस जैसे अनेक कारीगरों को बेरोजगारी और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। अब लोग कारीगरी की कद्र न करके दिखावटी चमक पर अधिक ध्यान देते हैं। ।

प्रश्न 5.
मशीनी युग से बदलू के जीवन में क्या बदलाव आया?
उत्तर:
मशीनी युग से बदलू के जीवन में यह बदलाव आया कि वह बेरोजगार हो गया। काम न करने से उसका शरीर भी ढल गया, उसके हाथों-माथे पर नसें उभर आईं। अब वह बीमार रहने लगा।

कहानी से आगे

प्रश्न 1.
आपने मेले-बाजार आदि में हाथ से बनी चीजों को बिकते देखा होगा। आपके मन में किसी चीज को बनाने की कला को सीखने की इच्छा हुई हो और आपने कोई कारीगरी सीखने का प्रयास किया हो तो उसके विषय में लिखिए।
उत्तर:
मैंने मेले-बाजार में तरह-तरह की रंग-बिरंगी काँच के छोटे-छोटे बीकरों में रखी मोमबत्तियाँ बिकती देखीं। मेरे मन में भी यह इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं भी इनको बनाने की कला सीखू। मैंने हस्तशिल्प कार्यशाला में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया। अब मैं स्वयं इस प्रकार की कलात्मक मोमबत्तियाँ आसानी से बना लेता हूँ। मैं इनकी बिक्री करके कुछ धन भी कमा लेता हूँ।

प्रश्न 2.
लाख की वस्तुओं का निर्माण भारत के किन-किन राज्यों में होता है? लाख से चूड़ियों के अतिरिक्त क्या-क्या चीजें बनती हैं? ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
लाख की वस्तुओं का निर्माण राजस्थान में सबसे अधिक होता है। यह काम गुजरात में भी होता है क्योंकि यह राज्य राजस्थान से सटा हुआ है। – लाख से चूड़ियाँ बनती हैं। – लाख से खिलौने बनते हैं।

अनुमान और कल्पना

प्रश्न 1.
घर में मेहमान आने पर आप उसका अतिथि-सत्कार कैसे करेंगे?
उत्तर:
घर में मेहमान आने पर हम उन्हें आदर सहित बिठाएँगे।

  • उनके आने पर प्रसन्नता प्रकट करेंगे।
  • उन्हें पीने के लिए चाय, कॉफी, लस्सी या शर्बत देंगे।
  • बाद में उन्हें खाना खिलाएँगे।
  • उनके साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करेंगे।

प्रश्न 2.
आपको अपनी छुट्टियों में किसके घर जाना सबसे अच्छा लगता है? वहाँ की दिनचर्या लिखिए। अलग कैसे होती है?
उत्तर:
हमें छुट्टियों में अपने नाना-नानी के घर जाना सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि वे हमें बहुत प्यार करते हैं। वहाँ की दिनचर्या बहुत ही मस्ती भरी होती है। वहाँ हमें स्कूल जाने की चिंता नहीं होती। अतः हम वहाँ देर तक सोते हैं और धूप निकल आने पर उठते हैं। वहाँ हम आस-पास के बच्चों के साथ घूमने जाते हैं। घर पर हमें नाश्ता भी बड़ा मजेदार मिलता है। नाश्ता करके हम खेलने निकल जाते हैं। दोपहर का खाना काफी देर से होता है। घर के आँगन में खेलते-कूदते और मस्ती करते हैं। इस प्रकार दिन भर मौज-मस्ती चलती रहती है।

प्रश्न 3.
मशीनी युग में अनेक परिवर्तन आए दिन होते रहते हैं। आप अपने आस-पास से इस प्रकार के किसी परिवर्तन का उदाहरण चुनिए और उसके बारे में लिखिए।
उत्तर:
मशीनी युग में अनेक परिवर्तन आए दिन होते रहते हैं। हमारे आस-पास भी इस प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं। पहले हमारे घर के पास कई स्त्रियाँ दाल पीसने का काम करती थीं। वे बड़ी-बड़ी सिलों पर पत्थर के बट्टों से दाल पीसकर कुछ रुपए कमा लेती थीं। प्रायः हलवाई उनसे दाल पिसवाते थे। अब दाल पीसने की मशीनें आ गई हैं। अब वही काम मशीन थोड़ी ही देर में कर देती है। इससे उनका काम छिन गया है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

प्रश्न 4.
बाजार में बिकने वाले सामानों की डिज़ाइनों में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। आप इन परिवर्तनों को किस प्रकार देखते हैं। आपस में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
बाजार में अनेक प्रकार के सामान बिकते हैं। इनमें खाने-पीने के सामानों के अतिरिक्त पहनने-ओढ़ने के कपड़े भी होते हैं। मनोरंजन के भी बहुत सामान बाजार में मिलते हैं। इन सामानों में डिजाइनों में हमेशा परिवर्तन आता रहता है, विशेषकर कपड़ों के डिजाइनों में।

प्रश्न 5.
हमारे खान-पान, रहन-सहन और कपड़ों में भी बदलाव आ रहा है। इस बदलाव के पक्ष-विपक्ष में बातचीत कीजिए और बातचीत के आधार पर लेख तैयार कीजिए।
उत्तर:
आज के युग में हमारे खान-पान, रहन-सहन तथा कपड़ों में अनेक प्रकार के बदलाव आ रहे हैं। इस बदलाव के पक्षविपक्ष में बड़े लोगों से बातचीत करने पर यह कहा जा सकता है: बदलाव प्रकृति का नियम है। हर युग में बदलाव आता रहा है और आता रहेगा। इस बदलाव को कोई रोक नहीं सकता। यद्यपि बड़े लोग इसे देर से स्वीकार करते हैं, पर युवा पीढ़ी इसे तुरंत अपना लेती है। बड़े लोग इसे फैशन का नाम दे देते हैं तथा प्रारंभ में इसका विरोध करते हैं, पर कुछ समय बीत जाने के उपरांत वे भी इसे स्वीकार कर लेते हैं।

भाषा की बात

1. ‘बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूड़ियों से’ और बदलू स्वयं कहता है।-“जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है लाख में कहाँ संभव है?” ये पंक्तियाँ बदलू की दो प्रकार की मनोदशाओं को सामने लाती हैं। दूसरी पंक्ति में उसके मन की पीड़ा है। इसमें व्यंग्य भी है। हारे हुए मन.से, या दुखी मन से अथवा व्यंग्य में बोले गए वाक्यों के अर्थ सामान्य नहीं होते। कुछ व्यंग्य वाक्यों को ध्यानपूर्वक समझकर एकत्र कीजिए और उनके भीतरी अर्थ की व्याख्या करके लिखिए।

‘वहाँ की औरतें अपने मरद का हाथ पकड़कर सड़कों पर घूमती भी हैं और फिर उनकी कलाइयाँ नाजुक होती हैं। लाख की चूड़ियाँ पहनें तो मोच न आ जाए।’
→ इस कथन में शहरी स्त्रियों पर व्यंग्य किया गया है। शहर की औरतों को बेशर्म बताया गया है क्योंकि वे सड़कों पर अपने मर्द (पति) का हाथ पकड़कर घूमती हैं।

→ दूसरा व्यंग्य उनकी कलाई की नाजुकता पर किया गया है कि वे लाख की चूड़ियों का बोझ झेल ही नहीं सकती।

→ ‘आजकल सब काम मशीन से होता है। जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?

→ बदलू मशीनी युग पर व्यंग्य करता है। मशीनों ने लोगों को बेरोजगार बना दिया। लोग सुंदरता के पीछे भागते हैं, मजबूती की परवाह किसे है।

2. बदलू कहानी में दृष्टि से पात्र है और भाषा की बात (व्याकरण) की दृष्टि से संज्ञा है। किसी भी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, विचार अथवा भाव को संज्ञा कहते हैं। संज्ञा को तीन भेदों में बांटा गया है –
(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा जैसे-शहर, गाँव, पतली-मोटी, गोल, चिकना इत्यादि

(ख) जातिवाचक संज्ञा जैसे–चरित्र, स्वभाव, वजन, आकार आदि द्वारा जानी जाने वाली संज्ञा।

(ग) भाववाचक संज्ञा, जैसे–सुंदरता, नाजुक, प्रसन्नता इत्यादि जिसमें कोई व्यक्ति नहीं है और न आकार, वचन परंतु उसका अनुभव होता है। पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाएँ चुनकर लिखिए।

  • व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ – रज्जो, बदलू
  • जातिवाचक संज्ञाएँ – चूड़ियाँ, स्त्रियाँ, काँच, सड़क, काका, मशीन, चारपाई, गोली।
  • भाववाचक संज्ञाएँ – पढ़ाई, सुंदरता, व्यथा
  • गाँव की बोली के शब्द : मरद (मर्द), लला (लाल), बखत (वक्त), मचिया (खाट), पियाज (प्याज), तमाखू (तंबाकू) आदि।

3. गाँव की बोली में कई शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं। कहानी में बदलू बक्त (समय) को बखत, उम्र (वय/आयु) को उमर कहता है। इस तरह के अन्य शब्दों को खोजिए जिनके रूप में परिवर्तन हुआ हो, अर्थ में नहीं।
विद्यार्थी स्वयं करों

HBSE 8th Class Hindi लाख की चूड़ियाँ Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
बदलू कौन था? उसका व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था और वास्तव में वह बहुत ही सुंदर चूड़ियाँ बनाता था। उसकी बनाई हुई चूड़ियों की खपत भी बहुत. थी। उस गाँव में तो सभी स्त्रियाँ उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ पहनती ही थीं आस-पास के गाँवों के लोग भी उससे चूड़ियाँ ले जाते थे परंतु वह कभी भी चूड़ियों को पैसों से बेचता न था। उसका अभी तक वस्तु-विनिमय का तरीका था और लोग अनाज के बदले उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। कभी भी उसे किसी से झगड़ते नहीं देखा गया।

प्रश्न 2.
जब कई वर्ष बाद लेखक बदलू से मिलने गया तब उसने क्या शिकायत की?
उत्तर:
बदलू ने लेखक को बताया कि उसका काम तो कई साल से बंद है। उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ कोई पूछे तब तो। गाँव-गाँव में काँच का प्रचार हो गया है। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, मशीन युग है न यह, लला! आजकल सब काम मशीन से होता है। खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और फिर जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

प्रश्न 3.
बदलू लेखक को मलाई क्यों नहीं खिला पाया?
उत्तर:
पहले बदलू के पास एक गाय थी। वह उसके दूध की मलाई लेखक को खिलाया करता था। अब वह गाय बिक चुकी थी क्योंकि बदलू के पास उसको खिलाने को कुछ नहीं था अतः अब मलाई होती ही न थी।

लाख की चूड़ियाँ गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

1. वैसे तो मेरे मामा के गाँव का होने के कारण मुझे बदलू को ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था परंतु मैं उसे ‘बदलू मामा’ न कहकर बदलू काका कहा करता था जैसा कि गाँव के सभी बच्चे उसे कहा करते थे। बदलू का मकान कुछ ऊँचे पर बना था। मकान के सामने बड़ा-सा सहन था जिसमें एक पुराना नीम का वृक्ष लगा था। उसी के नीचे बैठकर बदलू अपना काम किया करता था। बगल में भट्ठी दहकती रहती जिसमें वह लाख पिघलाया करता।

सामने एक लकड़ी की चौखट पड़ी रहती जिस पर लाख के मुलायम होने पर वह उसे सलाख के समान पतला करके चूड़ी का आकार देता। पास में चार-छह विभिन्न आकार की बेलननुमा मुंगेरियाँ रखो रहतीं जो आगे से कुछ पतली और पीछे से मोटी होतीं। लाख की चूड़ी का आकार देकर वह उन्हें मुंगेरियों पर चढ़ाकर गोल और चिकना बनाता और तब एक-एक कर पूरे हाथ की चूड़ियाँ बना चुकने के पश्चात वह उन पर रंग करता।
प्रश्न:
1. लेखक को बदलू को किस संबोधन से पुकारना चाहिए था पर वह किस संबोधन से पुकारता था और क्यों?
2. बदलू का मकान कैसा था?
3. बदलू अपना काम कहाँ करता था?
4. वह अपना काम कैसे करता था?
5. वह किससे चूड़ी बनाता था तथा कैसे?
उत्तर:
1. लेखक को बदलू को ‘मामा’ से संबोधित करना चाहिए था क्योंकि वह उसके मामा के गाँव से था, पर वह उसे ‘बदलू काका’ कहकर संबोधित करता था क्योंकि गाँव के सभी बच्चे उसे ‘बदलू काका’ ही कहते थे।
2. बदलू का मकान कुछ ऊँचाई पर बना था। उसके मकान के सामने बड़ा सा आँगन था और उसमें नीम का पेड़ लगा हुआ था।
3. बदलू नीम के पेड़ के नीचे बैठकर अपना काम करता था।
4. वह दहकती भट्ठी पर लाख पिघलाता रहता था। वह लाख को मुलायम करके चूड़ी का आकार देता। इसके लिए वह विभिन्न आकार की मुंगरियों पर चढ़ाकर गोल करता था?
5. वह लाख से चूड़ी बनाता था। इसके बाद वह चूड़ियों पर रंग करता था।

2. मैं बहुधा हर गर्मी की छुट्टी में अपने मामा के यहाँ चला जाता और एक-आध महीने वहाँ रहकर स्कूल खुलने के समय तक वापस आ जाता। परंतु दो-तीन बार ही मैं अपने मामा के यहाँ गया होऊँगा। जब मेरे पिता की एक दूर के शहर में बदली हो गई और एक लंबी अवधि तक मैं अपने मामा के गाँव न जा सका। तब लगभग आठ-दस वर्षों के बाद जब मैं वहाँ गया तो इतना बड़ा हो चुका था कि लाख की गोलियों में मेरी रूचि नहीं रह गई थी। अत: गाँव में होते हुए भी कई दिनों तक मुझे बदलू का ध्यान न आया।

इस बीच मैंने देखा कि गाँव में लगभग सभी स्त्रियाँ काँच की चूड़ियाँ पहने हैं। विरले ही हाथों में मैंने लाख की चूड़ियाँ देखीं। तब एक दिन सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया। बात यह हुई कि बरसात में मेरे मामा की छोटी लड़की आँगन में फिसलकर गिर पड़ी और उसके हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई और उससे खून बहने लगा। मेरे मामा उस समय घर पर न थे। मुझे ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी। तभी सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि उससे मिल आऊँ। अतः शाम को मैं घूमते-घूमते उसके घर चला गया। बदलू वहीं चबूतरे पर नीम के नीचे एक खाट पर लेटा था।
प्रश्न:
1. लेखक काफी समय तक मामा के गाँव क्यों नहीं जा सका?
2. वहाँ जाकर लेखक ने स्त्रियों में क्या परिवर्तन देखा?
3. लेखक को बदलू की याद कैसे आई?
4. लेखक को बदलू कहाँ मिला?
उत्तर:
1. लेखक के पिता की बदली किसी दूर के शहर में हो गई थी। इसी कारण वह 8-10 वर्षों तक मामा के गाँव नहीं जा सका।
2. लंबे समय के बाद जब लेखक मामा के गाँव गया तो उसने देखा कि अब वहाँ की अधिकांश स्त्रियाँ लाख की चूड़ियों के स्थान पर काँच की चूड़ियाँ पहने हुए हैं। किसी-किसी स्त्री ने ही लाख की चूड़ी पहन रखी थी।
3. लेखक की मामा की छोटी लड़की के हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई थी और खून बहने लगा था। उस समय उसके मामा घर पर नहीं थे और लेखक को ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी थी। तभी उसे बदलू की याद हो आई।
4. जब लेखक बदलू से मिलने उसके घर गया तब वह उसे | चबूतरे पर नीम के पेड़ के नीचे एक खाट पर लेटा हुआ मिला।

लाख की चूड़ियाँ Summary in Hindi

लाख की चूड़ियाँ पाठ का सार

लेखक को सारे गाँव में बदलू सबसे अच्छा लगता था क्योंकि वह उसे लाख की सुंदर-सुंदर गोलियाँ बनाकर देता था। लेखक उसे ‘बदलू काका’ कहा करता था। बदलू काका नीम के पेड़ के नीचे बैठकर दहकती भट्ठी पर लाख पिघला कर उसे चूड़ी का आकार देता था। वह बेलननुमा मुँगेरियों पर लाख को चढ़ाकर उसे चूड़ियों का आकार देता था और बाद में उन पर रंग करता था। वह बीच-बीच में हुक्का पीता रहता था। वह बचपन में लेखक को ‘लला’ कहता था और एक मचिया पर बिठाता था। वहीं लेखक उसे चूड़ियाँ बनाते देखता रहता था। बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था। गाँव की सभी स्त्रियाँ उसी की बनाई चूड़ियाँ पहनती थीं। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। विवाह के अवसर पर उसकी चूड़ियों का मूल्य बढ़ जाता था। वह काँच की चूड़ियों से चिढ़ता था।

वह लेखक से बचपन में उसकी पढ़ाई के बारे में पूछता रहता था। कभी-कभी बदलू उसकी अच्छी खातिर भी करता था। बदलू उसके लिए लाख की एक-दो गोलियाँ बना देता था। बदलू लेखक के मामा के गाँव में रहता था। लेखक के पिता की बदली दूर के शहर में हो गई थी। अतः वह लंबे समय तक मामा के गाँव न जा सका। जब वह गाँव गया तो उसने गाँव की लगभग सभी स्त्रियों को काँच की चूड़ियाँ पहने देखा। एक शाम को वह बदलू से मिला तो सहसा उसने लेखक को पहचाना नहीं। फिर लेखक ने अपना नाम जनार्दन बताकर गोलियों की बात याद दिलाई, लेकिन वह फिर भी चुप रहा। बदलू ने उसे बताया कि अब उसका लाख की चूड़ियाँ बनाने का काम कई साल से बंद है क्योंकि अब उसकी बनाई चूड़ियों की पूछ नहीं होती। सभी को काँच की सुंदर चूड़ियाँ चाहिए। अब तक बदलू का शरीर भी ढल चुका था। उसे बुरी तरह खाँसी आ रही थी। उसके मन में व्यथा छिपी थी, जिसे लेखक ने भाँप लिया।

लेखक ने विषय बदलने के लिए पूछा-काका, अब की आम की फसल कैसी है? उसने जवाब दिया-अच्छी है और यह कहकर उसके लिए अपनी बेटी से कहकर आम मँगवाए। फिर लेखक ने गाय के बारे में पूछा तो वह बोला-गाय को दो साल पहले बेच दिया, कहाँ से खिलाता उसे? तभी उसकी बेटी रज्जो एक डलिया में ढेर से आम ले आई। बेटी ने चार-पाँच सिंदूरी आम छाँटकर उसे दे दिए। लेखक ने देखा कि रज्जो की गोरी-गोरी कलाइयों पर लाख की चूड़ियाँ फब रही थीं। बदलू बोला-यही आखिरी जोड़ा बनाया था, जमींदार साहब की बेटी के लिए। वे दस आने दे रहे थे, बदलू ने वह जोड़ा नहीं दिया और कह दिया-शहर से ले आओ। लेखक को यह सुनकर प्रसन्नता हुई कि बदलू ने हारकर भी हार नहीं मानी। उसका व्यक्तित्व टूटने वाला नहीं था।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

लाख की चूड़ियाँ शब्दार्थ

विभिन्न = तरह-तरह की (Different), पैतृक = पिता का (Paternal), विनिमय = बदल-बदल (Exchange), नाजुक = कोमल (Tender), विरले = कोई-कोई (not common), स्मृति पटल = मस्तिष्क में याद (Memory), अतीत = पुराना समय (old period), व्यथा = मन की तकलीफ (Agony)।

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