Author name: Prasanna

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

HBSE 11th Class Geography जैव-विविधता एवं संरक्षण Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. जैव-विविधता का संरक्षण निम्न में किसके लिए महत्त्वपूर्ण है?
(A) जंतु
(B) पौधे
(C) पौधे और प्राणी
(D) सभी जीवधारी
उत्तर:
(D) सभी जीवधारी

2. निम्नलिखित में से असुरक्षित प्रजातियाँ कौन सी हैं?
(A) जो दूसरों को असुरक्षा दें
(B) बाघ व शेर
(C) जिनकी संख्या अत्यधिक हों अधिक हों
(D) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है
उत्तर:
(D) जिन प्रजातियों के लुप्त होने का खतरा है

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

3. नेशनल पार्क (National parks) और पशुविहार (Sanctuaries) निम्न में से किस उद्देश्य के लिए बनाए गए है?
(A) मनोरंजन
(B) पालतू जीवों के लिए
(C) शिकार के लिए
(D) संरक्षण के लिए
उत्तर:
(D) संरक्षण के लिए

4. जैव-विविधता समृद्ध क्षेत्र हैं-
(A) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र
(B) शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र
(C) ध्रुवीय क्षेत्र
(D) महासागरीय क्षेत्र
उत्तर:
(A) उष्णकटिबंधीय क्षेत्र

5. निम्न में से किस देश में पृथ्वी सम्मेलन (Earth summit) हुआ था?
(A) यू०के० (U.K.)
(B) ब्राजील
(C) मैक्सिको
(D) चीन
उत्तर:
(B) ब्राजील

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जैव-विविधता क्या है?
उत्तर:
जैव-विविधता (Bio-diversity)-किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की संख्या और उनकी विविधता को जैव-विविधता कहा जाता है। यह विकास के लाखों वर्षों के इतिहास का परिणाम है।

प्रश्न 2.
जैव-विविधता के विभिन्न स्तर क्या हैं?
उत्तर:
जैव-विविधता को निम्नलिखित तीन स्तरों पर समझा जाता है-

  • आनुवांशिक जैव-विविधता
  • प्रजातीय जैव-विविधता
  • पारितन्त्रीय जैव-विविधता।

प्रश्न 3.
हॉट स्पॉट (Hot Spot) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हॉट स्पॉट (Hot Spot)-जिन क्षेत्रों में जैव-विविधता अति समृद्ध एवं संवेदनशील हो और मानवीय गतिविधियों के कारण खतरे में हो ऐसे क्षेत्रों को जैव-विविधता के हॉट स्पॉट कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 16 जैव-विविधता एवं संरक्षण

प्रश्न 4.
मानव जाति के लिए जन्तुओं के महत्त्व का वर्णन संक्षेप में कीजिए।
उत्तर:
मानव अपनी मूलभूत आवश्यताएँ; जैसे रोटी, कपड़ा और मकान तथा विकसित सुखी जीवन की अन्य सुविधाएँ भिन्न-भिन्न तरीकों से जैविक विविधता से ही प्राप्त करता है। जीवों की अनेक प्रजातियाँ हमें बहुत-से पदार्थ प्रदान करती हैं जिससे हमारी भौतिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि होती है, जो कल्याणकारी जीवन के लिए अति आवश्यक है।

प्रश्न 5.
विदेशज प्रजातियों (Exotic Species) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विदेशज प्रजातियाँ (Exotic Species)-वे प्रजातियाँ जो स्थानीय आवास की मूल जैव प्रजाति नहीं हैं लेकिन उस तन्त्र में स्थापित की गई हैं, उन्हें विदेशज प्रजातियाँ कहते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
प्रकृति को बनाए रखने में जैव-विविधता की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
जैव-विविधता ने मानव संस्कृति के विकास में बहुत योगदान दिया है, इसी प्रकार, मानव समुदायों ने भी आनुवंशिक, प्रजातीय व पारिस्थितिक स्तरों पर प्राकृतिक विविधता को बनाए रखने में बड़ा योगदान दिया है।

दूसरे शब्दों में जिस पारितंत्र में जितनी प्रकार की प्रजातियाँ होंगी, वह पारितंत्र उतना ही अधिक स्थायी होगा।
1. जैव-विविधता की आर्थिक भूमिका-

  • सभी मनुष्यों के लिए दैनिक जीवन में जैव-विविधता एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है, जैव-विविधता का एक महत्त्वपूर्ण भाग ‘फसलों की विविधता’ है, जिसे कृषि जैव विविधता कहा जाता है।
  • जैव-विविधता को संसाधनों के उन भंडारों के रूप में भी समझा जा सकता है, जिनकी उपयोगिता भोज्य-पदार्थ, औषधियाँ और सौंदर्य प्रसाधन आदि बनाने में है।

2. जैव-विविधता की पारिस्थितिकीय भूमिका-

  • जीव व प्रजातियाँ ऊर्जा ग्रहण कर उसका संग्रहण करती हैं। प्रत्येक जीव अपनी जरूरत पूरी करने के साथ-साथ दूसरे जीवों के पनपने में भी सहायक होता है।
  • प्रजातियाँ जलवायु को नियंत्रित करने में सहायक होती है। ये पारितंत्री क्रियाएँ मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण क्रियाएँ हैं।
  • पारितंत्र में जितनी अधिक विविधता होगी, प्रजातियों के प्रतिकूल स्थितियों में भी रहने की संभावना और उनकी उत्पादकता भी उतनी ही अधिक होगी।

3. जैव-विविधता की वैज्ञानिक भूमिका-

  • जैव-विविधता इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि प्रत्येक प्रजाति हमें यह संकेत देती है, कि जीवन का आरंभ कैसे हुआ और भविष्य में कैसे विकसित होगा।
  • पारितंत्र में हम भी एक प्रजाति हैं, तथा मानव प्रजाति की क्या भूमिका है, इसे हम जैव-विविधता से समझ सकते हैं।
  • यह समझना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि हमारे साथ सभी प्रजातियों को जीवित रहने का अधिकार हैं। अतः कई प्रजातियों को स्वेच्छा से विलुप्त करना नैतिक रूप से गलत है।

प्रश्न 2.
जैव-विविधता के हास के लिए उत्तरदायी प्रमुख कारकों का वर्णन करें। इसे रोकने के उपाय भी बताएँ।
उत्तर:
जैव-विविधता के ह्रास के लिए उत्तरदायी कारक निम्नलिखित हैं
1. जनसंख्या में वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के कारण लोगों को रहने के लिए एवं कृषि के लिए अधिक भूमि की आवश्यकता होती है जिसकी पूर्ति वनों को काटकर की जाती है। इस प्रकार विभिन्न प्रजातियों के आवास स्थल नष्ट हो जाते हैं और बहुत-सी प्रजातियाँ लुप्त हो जाती हैं। इसलिए बढ़ती जनसंख्या जैव-विविधता के लिए बड़ा खतरा है।

2. वन्य जीवों का अवैध शिकार वन्य प्राणियों से बहुमूल्य पदार्थ प्राप्त करने के लिए उनका अवैध शिकार किया जाता है जिससे बहुत-सी प्रजातियाँ विलुप्त होने के कगार पर हैं जो जैव-विविधता के लिए एक खतरा हैं।

3. प्रदूषण-पर्यावरण प्रदूषण, विशेषकर जलीय पारितन्त्र को खराब कर देता है, इससे जलीय जीवों के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया है।

4. विदेशज प्रजातियों का आगमन किसी भी क्षेत्र में विदेशी प्रजातियों के आगमन से स्थानीय प्रजातियों के आवास एवं भोजन आदि के लिए उनके साथ संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष में स्थानीय कमजोर प्रजातियाँ नष्ट हो जाती हैं।

जैव-विविधता हास को रोकने के उपाय-जैव-विविधता ह्रास को रोकने के लिए निम्नलिखित उपाय हैं-

  • संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए प्रयास किए जाने चाहिएँ।।
  • प्रजातियों को लुप्त होने से बचाने के लिए उचित योजनाएँ व प्रबन्धन किया जाना चाहिए।
  • वन्य जीवों के आवास के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय पार्क बनाए जाने चाहिएँ।
  • वनस्पति एवं प्राणी प्रजातियों की किस्मों को संरक्षित करना चाहिए।

जैव-विविधता एवं संरक्षण HBSE 11th Class Geography Notes

→ जैव-विविधता (Biodiversity)-पृथ्वी अथवा किसी निश्चित भौगोलिक क्षेत्रों के पौधों, प्राणियों व सूक्ष्म जीवों की विविधता को जैव-विविधता कहते हैं।

→ टैक्सोनोमी (Taxonomy)-जीवों के वर्गीकरण के विज्ञान को टैक्सोनोमी कहते हैं।

→ तप्त स्थल (Hot Spots)-संसार के जिन क्षेत्रों में प्रजातीय विविधता पाई जाती है, उन्हें विविधता के ‘तप्त स्थल’ कहा जाता है।

→ आनुवंशिकी (Genetics)-आनुवंशिक लक्षणों के पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण की विधियों और कारणों के अध्ययन को आनुवंशिकी कहते हैं।

→ आनुवंशिकता (Heredity)-जीवधारियों की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में विभिन्न लक्षणों के प्रेक्षण या संचरण को आनुवंशिकता कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

HBSE 11th Class Geography पृथ्वी पर जीवन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन जैवमंडल में सम्मिलित हैं।
(A) केवल पौधे
(B) केवल प्राणी
(C) सभी जैव व अजैव जीव
(D) सभी जीवित जीव
उत्तर:
(C) सभी जैव व अजैव जीव

2. उष्णकटिबंधीय घास के मैदान निम्न में से किस नाम से जाने जाते हैं?
(A) प्रेयरी
(B) स्टैपी
(C) सवाना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सवाना

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

3. चट्टानों में पाए जाने वाले लोहांश के साथ ऑक्सीजन मिलकर निम्नलिखित में से क्या बनाती है?
(A) आयरन सल्फेट
(B) आयरन कार्बोनेट
(C) आयरन ऑक्साइड
(D) आयरन नाइट्राइट
उत्तर:
(C) आयरन ऑक्साइड

4. प्रकाश-संश्लेषण प्रक्रिया के दौरान, प्रकाश की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड जल के साथ मिलकर क्या बनाती है?
(A) प्रोटीन
(B) कार्बोहाइड्रेट्स
(C) एमिनोएसिड
(D) विटामिन
उत्तर:
(B) कार्बोहाइड्रेट्स

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पारिस्थितिकी से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पारिस्थितिकी का सीधा सम्बन्ध जैविक तथा अजैविक तत्त्वों के पारस्परिक सम्बन्धों से है। जैव समूहों तथा जीवों और वातावरण के बीच जो सम्बन्ध होते हैं, उनका अध्ययन पारिस्थितिकी कहलाता है अर्थात् वातावरण तथा जीवों के मध्य पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को ही पारिस्थितिकी कहते हैं।

प्रश्न 2.
पारितत्र (Ecological system) क्या है? संसार के प्रमुख पारितंत्र प्रकारों को बताएं।
उत्तर:
पारितन्त्र का अर्थ-पारितन्त्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के एकीकरण का परिणाम है। दूसरे शब्दों में, जीव तथा उसके पर्यावरण के बीच की स्वतन्त्र इकाई को पारितन्त्र (Ecosystem) कहा जाता है।
पारितन्त्र के प्रकार-पारितन्त्र दो प्रकार के होते हैं-

  • जलीय पारितन्त्र (Terrestrial Ecosystem)
  • स्थलीय पारितन्त्र (Aquatic Ecosystem)

संसार के कुछ प्रमुख पारितंत्र निम्नलिखित हैं- वन, घास-क्षेत्र, मरुस्थल, झील, नदी, समुद्र इत्यादि।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
खाद्य श्रृंखला क्या है? चराई खाद्य शृंखला का एक उदाहरण देते हुए इसके अनेक स्तर बताएं।
उत्तर:
खाद्य श्रृंखला का अर्थ-भोजन अथवा ऊर्जा के एक पोषण तल से अन्य पोषण तलों तक पहुँचने की प्रक्रिया को खाद्य श्रृंखला (Food Chain) कहा जाता है।

एक पारितन्त्र में अनेक खाद्य शृंखलाएँ बनती हैं जिनमें चराई खाद्य शृंखला भी एक प्रमुख श्रृंखला है। यह शृंखला हरे पौधों (उत्पादक) से आरम्भ होकर माँसाहारी तक जाती है। इस श्रृंखला के विभिन्न स्तर निम्नलिखित हैं
घास → हरा टिड्डा → मेंढ़क → साँप → बाज

प्रश्न 4.
खाद्य जाल (Food web) से आप क्या समझते हैं? उदाहरण सहित बताएं।
उत्तर:
खाद्य जाल का अर्थ-पारितन्त्र में खाद्य शृंखलाएँ स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में नहीं चलती हैं। ये आपस में अन्य खाद्य श्रृंखलाओं से अलग स्तर पर जुड़ी रहती हैं और एक जाल-सा बनाती हैं, जिसे खाद्य जाल (Food Web) कहा जाता है।

उदाहरण-किसी चरागाह पारितन्त्र में हिरण, खरगोश, चरने वाले पशु-चूहे और सुनसुनिया आदि घास को अपना भोजन बनाते हैं। चूहों को साँप या शिकारी पक्षी खा सकते हैं तथा शिकारी पक्षी साँपों को भी खा सकते हैं। इसका अर्थ यह है कि उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प मौजूद हैं जिस कारण पारितन्त्र में सन्तुलन बना रहता है।

प्रश्न 5.
बायोम (Biome) क्या है?
उत्तर:
बायोम-विशेष परिस्थितियों में पादप व जन्तुओं के अन्तर्सम्बन्धों के कुल योग को बायोम (Biome) कहते हैं। यह पौधों और प्राणियों का एक समुदाय है जो बड़े भौगोलिक क्षेत्र में पाया जाता है। संसार के प्रमुख बायोम हैं

  • वन बायोम
  • मरुस्थलीय बायोम
  • घास-भूमि बायोम
  • जलीय बायोम
  • उच्च प्रदेशीय बायोम।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
संसार के विभिन्न वन बायोम (Forest Biomes) की महत्त्वपूर्ण विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
वन बायोम को निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन 1
1. उष्ण कटिबन्धीय वन-ये दो प्रकार के होते हैं-

  • भूमध्य रेखीय वन
  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन।

भूमध्य रेखीय वन-

  • भूमध्य रेखीय वन भूमध्य रेखा से उत्तर व दक्षिण अक्षांश के बीच स्थित होते हैं।
  • इन वनों में तापमान 20° से 25°C के बीच रहता है।
  • इन क्षेत्रों की मिट्टी अम्लीय होती है जिसमें पोषक तत्त्वों की कमी होती है।
  • इन वनों में असंख्य वृक्षों के झुण्ड लम्बे व घने वृक्ष मिलते हैं।

उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन-

  • उष्ण कटिबन्धीय पर्णपाती वन 10° से 25° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के बीच पाए जाते हैं।
  • इन वनों का तापमान 25° से 30°C के बीच रहता है।
  • इन वनों में वार्षिक औसत वर्षा 1000 मि०मी० होती है।
  • इन वनों में कम घने तथा मध्यम ऊँचाई के वृक्ष मिलते हैं।
  • इन वनों में कीट, पतंगे, चमगादड़, पक्षी व स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।

2. शीतोष्ण कटिबन्धीय वन-

  • इन वनों का तापमान 20° से 30° के बीच पाया जाता है।
  • इन वनों में वर्षा समान रूप से वितरित होती है तथा 750-1500 मि०मी० के बीच होती है।
  • इन वनों में पौधों की प्रजातियों में कम विविधता पाई जाती है। यहाँ ओक, बीच आदि वृक्ष पाए जाते हैं।
  • प्राणियों में गिलहरी, खरगोश, पक्षी तथा काले भालू आदि जन्तु पाए जाते हैं।

3. बोरियल वन-

  • इन वनों में छोटी आई ऋतु व मध्यम रूप से गर्म ग्रीष्म ऋतु तथा लम्बी शीत ऋतु पाई जाती है।
  • इन वनों में वर्षा मुख्यतः हिमपात के रूप में होती है जो 400-1000 मि०मी० होती है।
  • वनस्पति में पाइन, स्यूस आदि कोणधारी वृक्ष मिलते हैं।
  • प्राणियों में कठफोड़ा, चील, भालू, हिरण, खरगोश, भेड़िया व चमगादड़ आदि प्रमुख हैं।

प्रश्न 2.
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) क्या है? वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण (Fixation) कैसे होता है? वर्णन करें।
उत्तर:
जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle) पृथ्वी पर जीवन विविध प्रकार से जीवित जीवों के रूप में पाया जाता है। ये जीवधारी विविध प्रकार के पारिस्थितिक अन्तर्सम्बन्धों में जीवित हैं। जीवधारी बहुलता व विविधता में ही जीवित रह सकते हैं। जीवित रहने की प्रक्रिया में विविध प्रवाह; जैसे ऊर्जा, जल व पोषक तत्त्वों की उपस्थिति सम्मिलित है। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि पिछले 100 वर्षों में वायुमण्डल व जलमण्डल की संरचना में रासायनिक घटकों का सन्तुलन लगभग एक समान रहा है। रासायनिक तत्त्वों का यह सन्तुलन पौधों व प्राणी ऊत्तकों से होने वाले चक्रीय प्रवाह के द्वारा बना रहता है। जैवमण्डल में जीवधारी व पर्यावरण के बीच में रासायनिक तत्त्वों के चक्रीय प्रवाह को जैव भू-रासायनिक चक्र कहा जाता है।

वायुमंडल में नाइट्रोजन का यौगिकीकरण-(Fixation)वायुमण्डल की स्वतन्त्र नाइट्रोजन को जीव-जन्तु प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण करने में असमर्थ हैं परन्तु कुछ फलीदार पौधों की जड़ों में उपस्थित जीवाणु तथा नीली-हरी शैवाल (Blue green Algae) वायुमण्डल की नाइट्रोजन को सीधे ही ग्रहण कर सकते हैं और उसे नाइट्रोजन के यौगिकों में बदल देते हैं। इस प्रक्रिया को नाइट्रोजन यौगिकीकरण कहते हैं। शाकाहारी जन्तुओं द्वारा इन पौधों के खाने पर इसका कुछ भाग उनमें चला जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 15 पृथ्वी पर जीवन

प्रश्न 3.
पारिस्थितिक संतुलन (Ecological balance) क्या है? इसके असंतुलन को रोकने के महत्त्वपूर्ण उपायों की चर्चा करें।
उत्तर:
पारिस्थितिक सन्तुलन का अर्थ-किसी पारितन्त्र या आवास में जीवों के समुदाय में परस्पर गतिक साम्यता की अवस्था ही पारिस्थितिक सन्तुलन है। यह तभी सम्भव है जब जीवधारियों की विविधता अपेक्षाकृत स्थायी रहे। अतः पारितन्त्र में हर प्रजाति की संख्या में एक स्थायी सन्तुलन को भी पारिस्थितिक सन्तुलन (Ecological Balance) कहा जाता है।

पारिस्थितिक असन्तुलन को रोकने के उपाय-

  • जीव-जन्तुओं के आवास स्थानों को नष्ट नहीं करना चाहिए।
  • वन्य जीवों के शिकार पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।
  • पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
  • वृक्षारोपण किया जाना चाहिए।
  • पर्यावरणीय कारकों का सही एवं उचित प्रयोग करना चाहिए।
  • जनसंख्या दबाव से भी पारिस्थितिकी बहुत प्रभावित हुई है अतः जनसंख्या वृद्धि पर रोक लगानी चाहिए।
  • मानव के अधिक हस्तक्षेप से असंतुलन बढ़ता है, जिससे बाढ़ और कई जलवायु संबंधी परिवर्तन देखने को मिलते है। अतः मानव का पर्यावरण से छेड़छाड़ कम करना भी एक उपाय हो सकता है।

पृथ्वी पर जीवन HBSE 11th Class Geography Notes

→ जैवमण्डल (Biosphere)-जैवमण्डल पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी पौधों, जन्तुओं, प्राणियों और इनके चारों ओर के पर्यावरण के पारस्परिक अन्तर्संबंध से बनता है।

→ पारिस्थितिकी (Ecology)-भौतिक पर्यावरण और जीवों के बीच घटित होने वाली पारस्परिक क्रियाओं के अध्ययन को पारिस्थितिकी कहते हैं।

→ पारितंत्र (Ecosystem)-पारितंत्र पर्यावरण के सभी जैव तथा अजैव घटकों के समाकलन का परिणाम है।

→ स्वपोषित (Autotroph)- ऐसे पौधे जो प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं अकार्बनिक पदार्थों से तैयार करते हैं, स्वपोषित कहलाते हैं।

→ खाद्य शृंखला (Food Chain)-पारिस्थितिक तंत्र में ऊर्जा का प्रवाह क्रमबद्ध स्तरों की एक श्रृंखला होती है, जिसे खाद्य श्रृंखला कहते हैं।

→ जैव भू-रासायनिक चक्र (Biogeochemical Cycle)-पारितंत्र में अजैव तत्त्वों का जैव तत्त्वों में बदलना तथा पुनः जैव तत्त्वों का अजैव तत्त्वों में बदल जाना, जैव भू-रासायनिक चक्र कहलाता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 11th Class Geography महासागरीय जल संचलन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. महासागरीय जल की ऊपर एवं नीचे की गति किससे संबंधित है?
(A) ज्वार
(B) तरंग
(C) धाराएँ
(D) ऊपर में से कोई नहीं
उत्तर:
(A) ज्वार

2. वृहत ज्वार आने का क्या कारण है?
(A) सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल
(B) सूर्य और चंद्रमा द्वारा एक दूसरे की विपरीत दिशा से पृथ्वी पर गुरुत्वाकर्षण बल
(C) तटरेखा का दंतुरित होना
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं
उत्तर:
(A) सूर्य और चंद्रमा का पृथ्वी पर एक ही दिशा में गुरुत्वाकर्षण बल

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 14 महासागरीय जल संचलन

3. पृथ्वी तथा चंद्रमा की न्यूनतम दूरी कब होती है?
(A) अपसौर
(B) उपसौर
(C) उपभू
(D) अपभू
उत्तर:
(C) उपभू

4. पृथ्वी उपसौर की स्थिति कब होती है?
(A) अक्तूबर
(B) जुलाई
(C) सितंबर
(D) जनवरी
उत्तर:
(D) जनवरी

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
तरंगें क्या हैं?
उत्तर:
तरंगे महासागरीय जल की दोलायमान गति है जिसमें जल स्थिर रहता है और अपने स्थान पर ही ऊपर-नीचे और आगे-पीछे होता रहता है। तरंग एक ऊर्जा है। वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती है।

प्रश्न 2.
महासागरीय तरंगें ऊर्जा कहाँ से प्राप्त करती हैं?
उत्तर:
वायु जल को ऊर्जा प्रदान करती है, जिससे तरंगें उत्पन्न होती हैं। वायु के कारण तरंगें महासागर में गति करती हैं, तथा ऊर्जा तटरेखा पर निर्मुक्त होती है। तरंगें वायु से ऊर्जा को अवशोषित करती हैं। अधिकतर तरंगें वायु के जल के विपरीत दिशा में गतिमान होने से उत्पन्न होती हैं।

प्रश्न 3.
ज्वार-भाटा क्या है?
उत्तर:
समुद्रों का जल-स्तर कभी भी स्थित नहीं रह पाता अपितु नियमित रूप से दिन (24 घण्टे की अवधि का सौर्यिक दिवस) में दो बार एकान्तर क्रम से ऊपर चढ़ता और नीचे उतरता रहता है। तटीय किनारों पर समुद्री जल के ऊपर चढ़ने को ज्वार तथा नीचे उतरने को भाटा कहते हैं।

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प्रश्न 4.
ज्वार-भाटा उत्पन्न होने के क्या कारण हैं?
उत्तर:

  1. चंद्रमा, सूर्य और पृथ्वी के पारस्परिक गुरुत्वाकर्षण के कारण ज्वार-भाटाओं की उत्पत्ति होती है।
  2. दूसरा कारक-अपकेंद्रीय बल है, जोकि गुरुत्वाकर्षण को संतुलित करता है।
  3. गुरुत्वाकर्षण बल तथा अपकेंद्रीय बल दोनों मिलकर पृथ्वी पर महत्त्वपूर्ण ज्वार-भाटाओं को उत्पन्न करते हैं।

प्रश्न 5.
ज्वार-भाटा नौसंचालन से कैसे संबंधित है?
उत्तर:
पृथ्वी, चंद्रमा व सूर्य की स्थिति ज्वार की उत्पत्ति का कारण है और इनकी स्थिति के सही ज्ञान से ज्वारों का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह नौसंचालकों व मछुआरों को उनके कार्य-संबंधी योजनाओं में मदद करता है। नौसंचालन में ज्वारीय प्रवाह का अत्यधिक महत्व है। ज्वार के समय तट के निकट जल की गहराई अधिक हो जाती है जिससे बड़े-बड़े जहाज भी बन्दरगाहों के निकट पहुँच सकते हैं तथा भाटे के समय चले जाते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जल धाराएँ तापमान को कैसे प्रभावित करती हैं? उत्तर पश्चिम यूरोप के तटीय क्षेत्रों के तापमान को ये किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
जल धाराएँ किसी प्रदेश के तापमान और जलवायु को प्रभावित करती हैं। गर्म महासागरीय धाराएँ ठण्डे क्षेत्रों में तापमान को बढ़ा देती हैं जबकि ठण्डी धाराएँ गर्म महासागरीय क्षेत्रों में तापमान को घटा देती हैं। गल्फ स्ट्रीम एक गर्म महासागरीय धारा है जो उत्तर:पश्चिम यूरोप के तट के पास से बहती है तथा इस क्षेत्र के तापमान को बढ़ा देती है। जल वाले क्षेत्रों से कम तापमान वाले क्षेत्रों की ओर तथा इसके विपरीत कम तापमान वाले क्षेत्रों से अधिक तापमान वाले क्षेत्रों की ओर बहती हैं। जब ये धाराएँ एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बहती हैं, तो यह उन क्षेत्रों के तापमान को प्रभावित करती हैं। किसी भी जलराशि के तापमान का प्रभाव उसके ऊपर की वायु पर पड़ता है। इसी कारण विषुवतीय क्षेत्रों से उच्च अक्षांशों वाले ठंडे क्षेत्रों की ओर बहने वाली जलधाराएँ उन क्षेत्रों की वायु के तापमान को बढ़ा देती हैं।

तापमान को प्रभावित करना-

  • गर्म उत्तरी अटलांटिक अपवाह जो उत्तर की ओर यूरोप के पश्चिम तट की ओर बहती है।
  • यह ब्रिटेन और नार्वे के तट पर शीत ऋतु में भी बर्फ नहीं जमने देती।
  • जलधाराओं का जलवायु पर प्रभाव और अधिक स्पष्ट हो जाता है, जब आप समान अक्षांशों पर स्थित ब्रिटिश द्वीप समूह की शीत ऋतु की तुलना कनाड़ा के उत्तरी-पूर्वी तट की शीत ऋतु से करते हैं।
  • कनाडा का उत्तरी-पूर्वी तट लेब्राडोर की ठंडी धारा के प्रभाव में आ जाता है। इसलिए यह शीत ऋतु में बर्फ से ढका रहता है।

प्रश्न 2.
जल धाराएँ कैसे उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
जल धाराओं को उत्पन्न करने के निम्नलिखित कारक हैं-
1. ऋतु परिवर्तन-उत्तरी हिंद महासागर में समुद्री धाराओं की दिशा ऋतु परिवर्तन के साथ बदल जाती है। हिंद महासागर में भूमध्य-रेखीय विपरीत धारा केवल शीत ऋतु में ही होती है और भूमध्यरेखीय धारा केवल ग्रीष्म ऋतु में बहती है।

2. भूघूर्णन-पृथ्वी का अपने कक्ष में घूर्णन के कारण कोरिऑलिस बल उत्पन्न होता है। इसी बल के कारण बहता हुआ जल मुड़कर दीर्घ वृत्ताकार मार्ग का अनुसरण करता है, जिसे गायर्स कहते है। “फेरेल” के नियम के अनुसार, उत्तरी गोलार्द्ध में धाराएँ अपनी दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में बाईं ओर मुड़ जाती हैं। इससे नई धाराएँ बनती हैं।

3. लवणता में अंतर-अधिक लवणता वाला जल भारी होता है, जो नीचे बैठ जाता है। उसके स्थान पर कम लवणता व घनत्व वाला जल आ जाता है जो धारा के रूप में बह जाता है।

4. वाष्पीकरण-जिन स्थानों पर वाष्पीकरण अधिक होता है, वहाँ पर जल का तल नीचे हो जाता है फिर वहाँ अन्य क्षेत्रों का जल जमा हो जाता है। इसी प्रकार एक धारा उत्पन्न होती है।

5. तटरेखा की आकृति-उत्तरी हिंद महासागर में पैदा होने वाली धाराएँ भारतीय प्रायद्वीप की तट रेखा का अनुसरण करती हैं।

महासागरीय जल संचलन HBSE 11th Class Geography Notes

→ तरंग शृंग (Crest of the Wave)-तरंग का ऊपर उठा हुआ भाग तरंग शृंग कहलाता है।

→ स्वेल (Swell) महासागर पर तूफान केन्द्र के बाहर की तरफ दूरी पर एक-समान ऊँचाई और आवर्तकाल के साथ समुद्री तरंगें नियमित रूप से चल रही होती हैं, जिन्हें स्वेल कहा जाता है।

→ महासागरीय धारा (Ocean Currents) महासागरों के एक भाग से दूसरे भाग की ओर निश्चित दिशा में बहुत दूरी तक जल के निरन्तर प्रवाह को महासागरीय धारा कहते हैं।

→ प्रलयकारी तरंगें (Catastrophic Waves)-इन तरंगों की उत्पत्ति ज्वालामुखी, भूकम्प या महासागरों में हुए भूस्खलन के कारण होती है। इन्हें सुनामी भी कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

HBSE 11th Class Geography महासागरीय जल Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. उस तत्त्व की पहचान करें जो जलीय चक्र का भाग नहीं है।
(A) वाष्पीकरण
(B) वर्षण
(C) जलयोजन
(D) संघनन
उत्तर:
(C) जलयोजन

2. महाद्वीपीय ढाल की औसत गहराई निम्नलिखित के बीच होती है।
(A) 2-20 मी०
(B) 20-200 मी०
(C) 200-3,000 मी०
(D) 2,000-20,000 मी०
उत्तर:
(C) 200-3,000 मी०

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

3. निम्नलिखित में से कौन-सी लघु आकृति महासागरों में नहीं पाई जाती है?
(A) समुद्री टीला
(B) महासागरीय गंभीर
(C) प्रवाल द्वीप
(D) निमग्न द्वीप
उत्तर:
(B) महासागरीय गंभीर

4. लवणता को प्रति समुद्री मक (ग्राम) की मात्रा से व्यक्त किया जाता है-
(A) 10 ग्राम
(B) 100 ग्राम
(C) 1,000 ग्राम
(D) 10,000 ग्राम
उत्तर:
(C) 1,000 ग्राम

5. निम्न में से कौन-सा सबसे छोटा महासागर है?
(A) हिंद महासागर
(B) अटलांटिक महासागर
(C) आर्कटिक महासागर
(D) प्रशांत महासागर
उत्तर:
(C) आर्कटिक महासागर

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
हम पृथ्वी को नीला ग्रह क्यों कहते हैं?
उत्तर:
जल पृथ्वी पर रहने वाले सभी प्रकार के जीवों के लिए आवश्यक घटक है। पृथ्वी के जीव सौभाग्यशाली हैं कि यह एक जलीय ग्रह है। पृथ्वी ही सौरमण्डल का एकमात्र ऐसा ग्रह है जिसकी सतह पर 71% जल पाया जाता है। जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को नीला ग्रह या जलीय ग्रह कहा जाता है।

प्रश्न 2.
महाद्वीपीय सीमांत क्या होता है?
उत्तर:
महाद्वीपीय सीमांत प्रत्येक महादेश का विस्तृत किनारा होता है जोकि अपेक्षाकृत छिछले समुद्रों तथा खाड़ियों से घिरा भाग होता है। यह महासागर का सबसे छिछला भाग होता है, जिसकी औसत प्रवणता 1 डिग्री या उससे भी कम होती है। इस सीमा का किनारा बहुत ही खड़े ढाल वाला होता है।

प्रश्न 3.
विभिन्न महासागरों के सबसे गहरे गर्तों की सूची बनाइये।
उत्तर:
वर्तमान समय में लगभग 57 गर्मों की खोज हो चुकी है जो निम्नलिखित अनुसार हैं-
32 प्रशांत महासागर
19 अटलांटिक महासागर
6 हिंद महासागर

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

प्रश्न 4.
ताप-प्रवणता क्या है?
उत्तर:
यह सीमा समुद्री सतह से लगभग 100 से 400 मीटर नीचे प्रारंभ होती है, एवं कई सौ मीटर नीचे तक जाती है। वह सीमा क्षेत्र जहाँ तापमान में तीव्र गिरावट आती है, उसे ताप-प्रवणता (थर्मोक्लाइन) कहा जाता है।

प्रश्न 5.
समुद्र में नीचे जाने पर आप ताप की किन परतों का सामना करेंगे? गहराई के साथ तापमान में भिन्नता क्यों आती है?
उत्तर:
समुद्र में नीचे जाने पर हमें तीन परतों से गुजरना पड़ता है
1. पहली परत-

  • यह महासागरीय जल की सबसे उपरी परत होती है
  • यह परत 500 मीटर तक मोटी होती है
  • इसका तापमान 20° सेंटीग्रेड से -25° सेंटीग्रेड के बीच होता है।

2. दूसरी परत-

  • इसे तापप्रवणता परत कहा जाता है
  • यह पहली परत के नीचे स्थित होती है
  • ताप प्रवणता की मोटाई -500 से 1000 मीटर तक होती है।

3. तीसरी परत-

  • यह परत बहुत ठंडी होती है
  • यह परत गम्भीर महासागरीय तली तक विस्तृत होती है
  • आर्कटिक एवं अंटार्कटिक वृत्तों में सतही जल का तापमान 0° से० के निकट होता है और इसलिए गहराई के साथ तापमान में बहुत कम परिवर्तन आता है।

प्रश्न 6.
समुद्री जल की लवणता क्या है?
उत्तर:
सागरीय जल की मात्रा और उसमें घुले हुए लवणों की मात्रा के बीच पाए जाने वाले अनुपात को समुद्री जल की लवणता कहा जाता है। लवणता को प्रति हजार भागों में व्यक्त किया जाता है अर्थात् प्रति 1,000 ग्राम समुद्री जल में कितने ग्राम लवण की मात्रा है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलीय चक्र के विभिन्न तत्व किस प्रकार अंतर-संबंधित हैं?
उत्तर:
जल एक चक्रीय संसाधन है जिसका प्रयोग एवं पुनः प्रयोग किया जा सकता है। जब समुद्री जल वाष्प बनकर बादल का रूप धारण करता है और वो ही बादल जब वायुमंडलीय अवरोधों से टकराता है तो वर्षा करता है वर्षा का जल प्रवाहित होकर नदी, नालों से होते हुए सागरों में मिल जाता है। फिर सूर्यताप से सागरों के जल वाष्प बन जाते है। इस प्रक्रिया को जल चक्र कहा जाता है। इसी प्रकार जलीय चक्र में एक तत्व दूसरे तत्व से अंतर-संबंधित है।

जलीय चक्र पृथ्वी के जलमंडल में विभिन्न रूपों जैसे-गैस, तरल व ठोस में जल का परिसंचलन है। इसका संबंध महासागरों, वायुमंडल, भूपृष्ठ, स्तल एवं जीवों के बीच सतत् आदान-प्रदान से भी है। पर्यावरण में जल तीनों मण्डलों में तीनों अवस्थाओं (ठोस, तरल तथा गैस) में पाया जाता है। वर्षा होने तथा हिम पिघलने से जल का अधिकतर भाग ढाल के अनुरूप बहकर नदियों के द्वारा समुद्र में चला जाता है। इस जल का कुछ भाग महासागरों, झीलों तथा नदियों से जलवाष्प (Water Vapour) बनकर वायुमण्डल में लौट जाता है व कुछ भाग वनस्पति द्वारा अवशोषित होकर वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration) द्वारा वायुमण्डल में जा मिलता है।

वर्षा और हिम के पिघले जल का शेष भाग रिसकर या टपक-टपककर भूमिगत हो जाता है। वायुमण्डल में उपस्थित जलवाष्प संघनित (Condense) होकर बादलों का रूप धारण करते हैं। बादलों से वर्षा होती है और वर्षा का जल नदियों के रास्ते फिर से पहुँच जाता है। झरनों के माध्यम से भूमिगत जल भी कहीं-न-कहीं धरातल पर निकलकर नदियों से होता हुआ समुद्रों में जा पहुँचता है। “अतः महासागरों, वायुमण्डल तथा स्थलमण्डल में परस्पर होने वाला जल का समस्त आदान-प्रदान जलीय-चक्र कहलाता है।” इस जलीय चक्र में जल कभी रुकता नहीं और अपनी अवस्था (State) तथा स्थान बदलता रहता है।

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प्रश्न 2.
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारकों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
महासागरों के तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-
स्थलमण्डल और वायुमण्डल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारकों की अपेक्षा जलमण्डल के तापमान को प्रभावित करने वाले कारक अधिक जटिल (Complex) होते हैं। महासागरों पर तापमान वितरण को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक निम्नलिखित हैं

1. अक्षाश (Latitude)-भूमध्य रेखा पर सूर्य की किरणें लम्बवत् और ध्रुवों की ओर तिरछी पड़ती हैं। फलस्वरूप भूमध्यरेखीय क्षेत्र में महासागरीय जल का औसत वार्षिक तापमान अधिक रहता है और ध्रुवों की ओर जाने पर समुद्री जल का तापमान घटता जाता है। उदाहरणतः भूमध्य रेखा पर महासागरीय जल का औसत वार्षिक तापमान 26°C, 20° अक्षांश पर 23°C, 40° अक्षांश पर -14°C तथा 60° अक्षांश पर 1°C रह जाता है। 0°C की समताप रेखा ध्रुवीय क्षेत्रों के चारों ओर टेढ़ा-मेढ़ा वृत्त बनाती है और सर्दियों के मौसम में थोड़ा-सा भूमध्य रेखा की ओर खिसक आती है।

2. प्रचलित पवनें (Prevailing Winds)-स्थल से जल की ओर बहने वाली प्रचलित पवनें समुद्री जल को तट से परे बहा ले जाती हैं। हटे हुए गर्म जल का स्थान लेने के लिए नीचे से समुद्र का ठण्डा पानी ऊपर आता रहता है। परिणामस्वरूप वहाँ सागरीय का तापमान कम हो जाता है। उदाहरणतः उष्ण कटिबन्ध से पूर्व से आने वाली सन्मार्गी पवनों (Trade Winds) के प्रभाव से महासागरों के पूर्वी तटों पर समुद्री जल का तापमान कम और पश्चिमी तटों पर समुद्री जल का तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसके विपरीत शीतोष्ण कटिबन्ध में पछुवा पवनों (Westerlies) के प्रभाव से महाद्वीपों के पश्चिमी तटों पर समुद्री जल का तापमान कम और पूर्वी तटों पर समुद्री जल का तापमान अपेक्षाकृत अधिक होता है।

3. महासागरीय धाराएँ (Ocean Currents)-महासागरीय जल के तापमान को वहाँ चलने वाली गर्म अथवा ठण्डी जल धाराएँ भी प्रभावित करती हैं। उदाहरणतः मैक्सिको की खाड़ी से चलने वाली गल्फ स्ट्रीम (Gulf Stream) नामक गर्म जल धारा उत्तरी अमेरिका के पूर्वी तट के पास तथा उत्तरी-पश्चिमी यूरोप के पास समुद्री जल के तापमान को बढ़ा देती है। इसी कारण नार्वे के तट पर 60° उत्तरी अक्षांश पर भी समुद्री जल जम नहीं पाता। इसके विपरीत लैब्रेडोर की ठण्डी जलधारा के कारण शीत ऋतु में उत्तरी अमेरिका के उत्तरी-पूर्वी तट पर 50° उत्तर अक्षांश पर ही तापमान हिमांक तक पहुँच जाता है।

4. समीपवर्ती स्थलखण्डों का प्रभाव (Effect ofAdjacent Land Masses) खुले महासागरों के तापमान सारा साल लगभग एक-जैसे रहते हैं, परन्तु पूर्णतः अथवा आंशिक रूप से स्थल खण्डों से घिरे हुए समुद्रों का तापमान ग्रीष्म ऋतु में अधिक व शीत ऋतु में कम हो जाता है। ऐसे समुद्रों पर निकटवर्ती स्थल खण्डों का प्रभाव पड़ता है जो जल की अपेक्षा शीघ्र गर्म और शीघ्र ठण्डे हो जाते हैं। उदाहरणतः भूमध्य रेखा पर ग्रीष्म ऋतु में खुले महासागरीय जल का तापमान 26°C होता है जबकि लाल सागर (Red Sea) का तापमान उन्हीं दिनों 30°C तक पहुँचा होता है।

5. लवणता (Salinity)-प्रायः अधिक लवणता वाला महासागरीय जल अधिक ऊष्मा ग्रहण कर लेता है जिससे उसका तापमान भी बढ़ जाता है। इसके विपरीत समुद्र का कम खारा जल कम ऊष्मा ग्रहण करने के कारण अपेक्षाकृत ठण्डा रहता है।

6. प्लावी हिमखण्ड तथा प्लावी हिमशैल (Ice floes and Icebergs)-ध्रुवीय क्षेत्रों से टूटकर आने वाले बहुत अधिक प्लावी हिमखण्ड (Ice floes) और प्लावी हिमशैल (Icebergs) जिन महासागरों में मिलते हैं, वहाँ के जल का तापमान अपेक्षाकृत कम हो जाता है। उत्तरी ध्रुव के पास ग्रीनलैंड से टूटकर आने वाले हिमखण्ड और हिमशैल पर्याप्त दूरी तक अन्धमहासागर के जल का तापमान नीचे कर देते हैं। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव के पास अंटार्कटिका से टूटकर आने वाले हिमखण्ड व हिमशैल निकटवर्ती दक्षिणी महासागर (Southern Ocean) के जल का तापमान कम कर देते हैं।

7. वर्षा का प्रभाव (Effect of Rain)-जिन समुद्री भागों में वर्षा अधिक होती है, वहाँ सतह (सागर की सतह) का तापक्रम अपेक्षाकृत कम तथा नीचे के जल का तापमान अधिक होता है। भूमध्य रेखीय महासागरों में अधिक वर्षा के कारण ऊपरी सतह का तापक्रम कम तथा नीचे गहराई में तापक्रम अधिक होता है अर्थात् तापक्रम की विलोमता देखने को मिलती है।

महासागरीय जल HBSE 11th Class Geography Notes

→ महाद्वीपीय मग्नतट (Continental Shelf) महाद्वीपीय मग्नतट महासागर का एक ऐसा निमज्जित प्लेटफॉर्म होता है जिस पर महाद्वीपीय उच्चावच स्थित है।

→ जलमग्न केनियन (Submarine Canyons) महासागरीय नितल पर तीव्र ढालों वाली गहरी व संकरी ‘V’ आकार की घाटियों या गॉর্जो को जलमग्न केनियन कहते हैं। जलमग्न कटक (Submarine Ridges) महासागरों की तली पर स्थित सैंकड़ों कि०मी० चौड़ी तथा हज़ारों कि०मी० लम्बी पर्वत श्रेणियों को जलमग्न कटक कहते हैं।

→ गाईऑट (Guyot)-सपाट शीर्ष वाले समुद्री पर्वतों को गाईऑट कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 13 महासागरीय जल

→ महाद्वीपीय सीमान्त (Continental Margin) यह महाद्वीपों की पर्पटी की अंतः समुद्री सीमा है। इसमें महाद्वीपीय मग्नतट, ढाल और उत्थान शामिल हैं।

→ ग्रांड बैंक्स (Grand Banks)-कनाडा के न्यूफाउंडलैंड द्वीप के दक्षिण-पूर्व में विश्व के सर्वश्रेष्ठ मत्स्य-ग्रहण क्षेत्रों में से एक।

→ अयन वृत्त (Tropics)-कर्क रेखा (23.5° उ०) व मकर रेखा (23.5° द०) को अयन वृत्त कहा जाता है, क्योंकि यहाँ सूर्य का प्रखर प्रकाश पड़ता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

HBSE 11th Class Geography विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. कोपेन के A प्रकार की जलवायु के लिए निम्न में से कौन-सी दशा अर्हक हैं?
(A) सभी महीनों में उच्च वर्षा
(B) सबसे ठंडे महीने का औसत मासिक तापमान हिमांक बिंदु से अधिक
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक
(D) सभी महीनों का औसत तापमान 10° सेल्सियस के नीचे
उत्तर:
(C) सभी महीनों का औसत मासिक तापमान 18° सेल्सियस से अधिक

2. जलवायु के वर्गीकरण से संबंधित कोपेन की पद्धति को व्यक्त किया जा सकता है
(A) अनुप्रयुक्त
(B) व्यवस्थित
(C) जननिक
(D) आनुभविक
उत्तर:
(D) आनुभविक

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3. भारतीय प्रायद्वीप के अधिकतर भागों को कोपेन की पद्धति के अनुसार वर्गीकृत किया जायेगा-
(A) “Af”
(B) “BSh”
(C) “Cfb”
(D) “Am”
उत्तर:
(D) “Am”

4. निम्नलिखित में से कौन सा साल विश्व का सबसे गर्म साल माना गया है?
(A) 1990
(B) 1998
(C) 1885
(D) 1950
उत्तर:
(B) 1998

5. नीचे लिखे गए चार जलवायु समूहों में से कौन आर्द्र दशाओं को प्रदर्शित करता हैं?
(A) A-B-C-E
(B) A-C-D-E
(C) B-C-D-E
(D) A-C-D-F
उत्तर:
(D) A-C-D-F

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
जलवायु के वर्गीकरण के लिए कोपेन के द्वारा किन दो जलवायविक चरों का प्रयोग किया गया है?
उत्तर:
कोपेन ने जलवायु के वर्गीकरण के लिए निम्नलिखित जलवायविक चरों का प्रयोग किया है-

  • तापमान
  • वर्षण
  • तापमान और वर्षण का वनस्पति के वितरण से सम्बन्ध।

प्रश्न 2.
वर्गीकरण की जननिक प्रणाली आनुभविक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?
उत्तर:
जननिक प्रणाली में जलवायु को उनके कारणों के आधार पर संगठित करने का प्रयास किया जाता है, जबकि आनुभविक प्रणाली में जलवायु तापमान और वर्षण से सम्बन्धित आंकड़ों पर आधारित है।

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प्रश्न 3.
किस प्रकार की जलवायुओं में तापांतर बहुत कम होता है?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु में तापांतर बहुत कम होता है। यह जलवायु विषुवत् रेखा के निकट पाई जाती है। इन प्रदेशों में तापमान सामान्य रूप से ऊँचा और वार्षिक तापांतर नगण्य होता है। किसी भी दिन अधिकतम तापमान लगभग 30° से० और न्यूनतम तापमान लगभग 20° से होता है। लेकिन वार्षिक ताप में अंतर बहुत कम है।

प्रश्न 4.
सौर कलंकों में वृद्धि होने पर किस प्रकार की जलवायविक दशाएँ प्रचलित होंगी?
उत्तर:
सौर कलंक सूर्य पर काले धब्बे होते हैं, जो एक चक्रीय ढंग से घटते-बढ़ते रहते हैं। मौसम वैज्ञानियों के अनुसार सौर कलंकों की संख्या के बढ़ने से मौसम ठंडा और आर्द्र हो जाता है तथा तूफानों की संख्या बढ़ जाती है। सौर कलंकों के कम होने से उष्ण एवं शुष्क दशाएँ उत्पन्न होती हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना करें।
उत्तर:
A एवं B प्रकार की जलवायुओं की जलवायविक दशाओं की तुलना निम्नलिखित प्रकार से है-

‘A’ प्रकार की जलवायु‘B’ प्रकार की जलवायु.
(1) ये उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु वाले प्रदेश हैं।(1) ये शुष्क जलवायु वाले प्रदेश हैं।
(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा अधिक होती है।(2) इस प्रकार की जलवायु में वर्षा बहुत कम होती है।
(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर कम होता है।(3) इस प्रकार की जलवायु में वार्षिक तापान्तर अधिक होता है।
(4) यह जलवायु 0° अक्षांश के आसपास के क्षेत्रों तथा कर्क रेखा और मकर रेखा के मध्य पाई जाती है।(4) यह जलवायु 15° से 60° उत्तर व दक्षिण अक्षांशों के मध्य विस्तृत है तथा 15° से 30° के निम्न अंक्षाशों में यह उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब क्षेत्र में पाई जाती है।
(5) इस प्रकार की जलवायु में जैव-विविधता वाले उष्ण कटिबंधीय सदाहरित वन पाए जाते हैं।(5) इस प्रकार की जलवायु में कंटीले बन पाए जाते हैं।

प्रश्न 2.
C तथा A प्रकार के जलवायु में आप किस प्रकार की वनस्पति पाएँगे?
उत्तर:
‘A’ उष्ण कटिबंधीय जलवायु को तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन 1
(1) AF-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु विषुवत् वृत्त के निकट पाई जाती है। इस जलवायु में सघन वितान तथा व्यापक जैव विविधता वाले सदाबहार वन पाए जाते हैं।

(2) Am-उष्ण कटिबंधीय मानसून जलवायु भारतीय उपमहाद्वीप दक्षिण अमेरिका के उत्तर:पूर्वी तथा उत्तरी आस्ट्रेलिया में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन पाए जाते हैं जिसमें पेड़ अपनी पत्तियाँ वर्ष में एक बार गिरा देता है।

(3) Aw-उष्ण कटिबंधीय आर्द्र एवं शुष्क जलवायु AF प्रकार के जलवायु प्रदेशों के उत्तर एवं दक्षिण में पाई जाती है। इस जलवायु में पर्णपाती वन और पेड़ों से ढकी घासभूमियाँ पाई जाती हैं।
‘B’ कोष्ण शीतोष्ण जलवायु को चार प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है-
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन 2

  • Cwa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु में पतझड़ वन पाए जाते हैं।
  • Cs-भूमध्य-सागरीय प्रदेशों में फलों के वृक्ष पाए जाते हैं।
  • Cfa-आर्द्र उपोष्ण कटिबंधीय (Cfa) में पर्णपाती वन पाए जाते हैं। इस क्षेत्र के कुछ क्षेत्रों में घासभूमियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 3.
ग्रीनहाऊस गैसों से आप क्या समझते हैं? ग्रीन हाऊस गैसों की एक सूची तैयार करें।
उत्तर:
ग्रीनहाऊस गैसें ऐसी गैसें जो धरती पर एक आवरण बनाकर कम्बल की भाँति काम करती हैं और धरती की ऊष्मा को बाहर जाने से रोकती हैं, ग्रीनहाऊस गैसें कहलाती हैं। ये पृथ्वी के तापमान को बढ़ाने में सहायक हैं।

ग्रीनहाऊस गैसें वर्तमान में प्रमुख ग्रीनहाऊस गैसें कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2), क्लोरो-फ्लोरोकार्बन्स (CFCs), मीथेन (CH4), नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) और ओज़ोन (O3) हैं। नाइट्रिक ऑक्साइड (NO) और कार्बन मोनोक्साइड (CO) कुछ ऐसी अन्य गैसें हैं जो ग्रीनहाऊस गैसों से आसानी से प्रतिक्रिया करती हैं और वायुमण्डल में उनके सान्द्रण को प्रभावित करती हैं।

1. कार्बन-डाइऑक्साइड (CO2) वायुमण्डल में उपस्थित ग्रीनहाऊस गैसों में सबसे अधिक सान्द्रण CO2 का है। वैसे तो कार्बन-चक्र हजारों वर्षों की अवधि में वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा सन्तुलित बनाए रखता है, लेकिन लघु-अवधि में यह सन्तुलन कई बार बिगड़ जाता है। विगत कुछ वर्षों में कोयला, पेट्रोल, डीजल तथा प्राकृतिक गैस; जैसे जीवश्मी ईंधनों के जलने से प्रतिवर्ष 6 अरब टन कार्बन-डाइऑक्साइड वायुमण्डल में मिल रही है। वन तथा महासागर CO2 के कुण्ड माने जाते हैं। वन अपनी वृद्धि के लिए CO2 का उपयोग करते हैं। अतः भूमि उपयोग में परिवर्तनों के कारण की गई जंगलों की कटाई भी CO2 की मात्रा बढ़ाती है।

CO2 लगभग 0.5 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ रही है। सन् 1750 के बाद वायुमण्डल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 30 प्रतिशत बढ़ी है, जिसने ग्रीनहाऊस प्रभाव में 65 प्रतिशत का योगदान दिया है। एक अन्य अनुमान के अनुसार 21वीं शताब्दी के मध्य तक वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रांति से पूर्व की तुलना में दोगुनी हो जाएगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि कार्बन-डाइऑक्साइड की मात्रा दोगुनी हो जाए तो वायुमण्डल का तापमान 3° सेल्सियस बढ़ सकता है। 21वीं सदी के अन्त तक वायुमण्डल का तापमान 1.4° से 5.8° सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

2. क्लोरो फ्लोरो कार्बन (CFCs)-यह गैस मनुष्य का अनुसंधान है, प्रकृति में यह नहीं मिलती। यह वास्तव में संश्लेषित (Synthetic) यौगिकों का समूह है जिसका प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 20 हजार गुना ताप प्रग्रहित करता है। ये यौगिक वातानुकूलन व प्रशीतन की मशीनों, आग बुझाने के उपकरणों में तथा छिड़काव यन्त्रों में प्रणोदक (Propelent) के रूप में प्रयोग होते हैं। वर्तमान में इसकी मात्रा 4 प्रतिशत की दर से वायुमण्डल में बढ़ रही है। CFCs वायुमण्डल की ऊपरी सतह पर समताप मण्डल में क्लोरीन को मुक्त करती है जो ओज़ोन को तोड़ती है। ओज़ोन परत पैराबैंगनी किरणों (Ultraviolet rays) से पृथ्वी की रक्षा करती है। समताप मण्डल में ओज़ोन के सान्द्रण का ह्रास ओज़ोन छिद्र कहलाता है। यह छिद्र हानिकारक पराबैंगनी किरणों को क्षोभमण्डल से गुजरने देता है। ओज़ोन का सबसे अधिक हास अंटार्कटिका के ऊपर हुआ है।

3. नाइट्रस ऑक्साइड-इसका महत्त्वपूर्ण स्रोत उष्ण कटिबन्धीय मिट्टी है, जहाँ पर जीवाणु नाइट्रोजन के प्राकृतिक यौगिकों से क्रिया करके नाइट्रस ऑक्साइड पैदा करते हैं। कृषि में नाइट्रोजन उर्वरकों के प्रयोग, पेड़-पौधों को जलाने, नाइट्रोजन वाले ईंधन को जलाने तथा नाइलोन उद्योग द्वारा छोड़े जाने के कारण वायुमण्डल में इसकी मात्रा में वृद्धि हुई है। इस समय वायुमण्डल में इसकी मात्रा 0.31 भाग प्रति दस लाख भाग (PPM) है। नाइट्रस ऑक्साइड का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 250 गुना अधिक ताप प्रग्रहित (Trap) करता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 12 विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन

4. मीथेन गैस-तापमान बढ़ाने में मीथेन गैस का प्रत्येक अणु कार्बन-डाइऑक्साइड की तुलना में 25 गुना अधिक प्रभावी है। मीथेन अपघटकों (Decomposers) की देन है। इसके अधिकांश स्रोत जैविक हैं। मीथेन गैस धान के खेतों, नम भूमि तथा दलदल से निकलती है, इसलिए इसे मार्श गैस (Marsh Gas) भी कहते हैं। यह सागरों, ताज़े जल, खनन कार्य, गैस ड्रिलिंग तथा जैविक पदार्थों के सड़ने से उत्पन्न होती है। पशु और लकड़ी खाने वाले कीड़े; जैसे दीमक को मीथेन छोड़ने का जिम्मेदार पाया गया है।

5. जलवाष्प-अन्य ग्रीनहाऊस गैसों के कारण तापमान बढ़ने से जल की वाष्पन दर भी बढ़ जाती है। वायुमण्डल में जमा हुए ज्यादा जलवाष्प तापमान को और ज्यादा बढ़ाते हैं, क्योंकि जलवाष्प स्वयं एक प्राकृतिक ग्रीनहाऊस गैस है।

6. ओज़ोन-यद्यपि निचले वायुमण्डल में यह गैस कम पाई जाती है पर फिर भी इसका जमाव गर्मी बढ़ाने का काम करता है। ग्रीनहाऊस गैसों के प्रभाव को नियन्त्रित करने वाले कारक-

  • गैस के सान्द्रण में वृद्धि के परिणाम।
  • वायुमण्डल में इसके जीवनकाल अर्थात् ग्रीनहाऊस गैसों के अणु जितने लंबे समय तक बने रहते हैं, इनके द्वारा लाए गए परिवर्तनों से वायुमण्डलीय तंत्र को उबरने में उतना अधिक समय लगता है।
  • इसके द्वारा अवशोषित विकिरण की तरंग लंबाई।

विश्व की जलवायु एवं जलवायु परिवर्तन HBSE 11th Class Geography Notes

→ समताप रेखाएँ (Isotherms)-ये काल्पनिक रेखाएँ समुद्र तल के अनुसार समान ताप वाले स्थानों को मिलाती हैं।

→ जलवायु प्रदेश (Climatic Region)-पृथ्वी के धरातल पर पाए जाने वाले ऐसे भू-भाग, चाहे वे पास-पास हों या दूर-दूर। जहाँ लगभग एक समान जलवायु पाई जाती है, जलवायु प्रदेश कहलाते हैं।

→ ध्रुवीय ज्योति (Aurora) आयनमण्डल में विद्युत चुम्बकीय घटना का एक प्रकाशमय प्रभाव, जो उच्च अक्षांशों में लाल, हरे तथा सफेद चापों के रूप में दिखाई देता है। रात को आकाश में भू-पृष्ठ से 100 कि०मी० की ऊँचाई पर ध्रुवीय ज्योति किरणों तथा चादरों की तरह दिखाई पड़ती है। दक्षिणी गोलार्द्ध में यह ज्योति दक्षिणी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Australis) तथा उत्तरी गोलार्द्ध में उत्तरी ध्रुवीय ज्योति (Aurora Borealis) कहलाती है।

→ स्टैपी (Steppe) महाद्वीपों के आन्तरिक भागों में स्थित शीतोष्ण कटिबन्धीय घास के मैदानों को विभिन्न महाद्वीपों में अलग-अलग नामों से जानते हैं; जैसे-यूरेशिया में स्टैपी, उत्तरी अमेरिका में प्रेयरी, दक्षिणी अमेरिका में पंपास, अफ्रीका में वेल्ड्स तथा ऑस्ट्रेलिया में डाउन्स आदि।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

HBSE 11th Class Geography भूगोल एक विषय के रूप में Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. मानव के लिए वायुमंडल का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) जलवाष्प
(B) धूलकण
(C) नाइट्रोजन
(D) ऑक्सीजन
उत्तर:
(D) ऑक्सीजन

2. निम्नलिखित में से वह प्रक्रिया कौन-सी है जिसके द्वारा जल, द्रव से गैस में बदल जाता है-
(A) संघनन
(B) वाष्पीकरण
(C) वाष्पोत्सर्जन
(D) अवक्षेपण
उत्तर:
(B) वाष्पीकरण

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 11 वायुमंडल में जल

3. निम्नलिखित में से कौन-सा वायु की उस दशा को दर्शाता है जिसमें नमी उसकी पूरी क्षमता के अनुरूप होती है-
(A) सापेक्ष आर्द्रता
(B) निरपेक्ष आर्द्रता
(C) विशिष्ट आर्द्रता
(D) संतृप्त हवा
उत्तर:
(D) संतृप्त हवा

4. निम्नलिखित प्रकार के बादलों में से आकाश में सबसे ऊँचा बादल कौन सा है?
(A) पक्षाभ
(B) वर्षा मेघ
(C) स्तरी
(D) कपासी
उत्तर:
(A) पक्षाभ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वर्षण के तीन प्रकारों के नाम लिखें।
उत्तर:

  1. हिमपात-जब तापमान 0° सेंटीग्रेड से कम होता है, तब वर्षण हिमतूलों के रूप में होता है, जिसे हिमपात कहते हैं।
  2. सहिम वृष्टि-सहिम वृष्टि वर्षा की जमी हुई बूंदें हैं या पिघली हुई बर्फ के पानी की जमी हुई बूंदें हैं।
  3. ओला पत्थर कभी-कभी वर्षा की बूंदें बादल से मुक्त होने के बाद बर्फ के छोटे गोलाकार ठोस टुकड़ों में परिवर्तित होकर पृथ्वी पर पहुँचती हैं, जिसे ओला पत्थर (वृष्टि) कहते हैं।

प्रश्न 2.
सापेक्ष आर्द्रता की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
किसी निश्चित तापमान पर वायु के किसी आयतन में उपस्थित जलवाष्प की मात्रा तथा उसी तापमान पर उसी वायु को संतृप्त करने के लिए आवश्यक जलवाष्प की मात्रा के अनुपात को सापेक्ष (आपेक्षिक) आर्द्रता (Relative Humidity) कहते हैं।

प्रश्न 3.
ऊँचाई के साथ जलवाष्प की मात्रा तेजी से क्यों घटती है?
उत्तर:
वायुमंडल में जलवाष्प की मात्रा वाष्पीकरण तथा संघनन से क्रमशः घटती-बढ़ती रहती है। हवा द्वारा जलवाष्प ग्रहण करने की क्षमता पूरी तरह से तापमान पर निर्भर होती है। ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटता जाता है, इसलिए ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ तापमान घटने पर जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

प्रश्न 4.
बादल कैसे बनते हैं? बादलों का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
बादल पानी की छोटी बँदों या बर्फ के छोटे रवों की संहति होता है जो कि पर्याप्त ऊँचाई पर स्वतंत्र हवा में जलवाष्प के संघनन के कारण बनते हैं।

बादलों को चार रूपों में वर्गीकृत किया जाता है।

  • पक्षाभ मेघ (बादल)
  • कपासी मेघ
  • स्तरी मेघ
  • वर्षा मेघ

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षणों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विश्व के वर्षण वितरण के प्रमुख लक्षण-

  • भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर वर्षा की मात्रा कम होती जाती है।
  • उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में व्यापारिक पवनों के चलने के कारण महाद्वीपों के पूर्वी भागों में वर्षा अधिक तथा पश्चिमी भागों में वर्षा कम होती है।
  • शीतोष्ण कटिबन्ध में पछ्वा पवनों के कारण महाद्वीपों के पश्चिमी भागों में वर्षा अधिक तथा पूर्वी भागों में वर्षा कम होती है।
  • महाद्वीपों के तटीय भागों की अपेक्षा आन्तरिक भागों में वर्षा कम होती है।
  • जहाँ समुद्र तटों के सहारे पर्वत श्रेणियाँ फैली होती हैं वहाँ पवनाभिमुखी ढालों तथा तटीय मैदानों में खूब वर्षा होती है, परन्तु पवनविमुखी ढालों पर वर्षा कम होती है।

विश्व में वर्षा के वितरण का निम्नलिखित ढाँचा प्रस्तुत होता है-
1. भूमध्य रेखीय प्रदेश यह संसार में सबसे अधिक वर्षा उपलब्ध क्षेत्र है। वर्षा की क्रिया संवहनिक है। वर्षा वर्ष भर नियमित रूप से होती रहती है। वर्षा का औसत लगभग 80 सें०मी० होता है। इस पेटी में अमेजन बेसिन (दक्षिण अमेरिका), कांगो बेसिन (अफ्रीका), मलाया तथा पूर्वी द्वीप मुख्य हैं।

2. उष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार अक्षांश तक है। इनमें सम्मिलित मुख्य देश भारत, दक्षिणी चीन, उत्तरी ऑस्ट्रेलिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, पूर्वी ब्राजील और पूर्वी अफ्रीका इत्यादि हैं। मध्यमान वार्षिक वर्षा 50 से 200 सें०मी० तक है। वर्षा व्यापारिक व मानसून हवाओं के द्वारा होती है।

3. शीतोष्ण कटिबन्धीय प्रदेश-इन प्रदेशों का विस्तार 65° अक्षांश तक है। इनमें पश्चिमी यूरोप, पश्चिमी कनाडा, चिली व न्यूज़ीलैण्ड इत्यादि देश सम्मिलित हैं। यहाँ वर्षा पछुवा पवनों के प्रभाव से पश्चिमी किनारों पर होती है। औसत वार्षिक वर्षा 50 से 100 सें०मी० तक होती है।

4. शीत कटिबन्धीय प्रदेश इस पेटी में ऊँच अक्षांशों वाले प्रदेश सम्मिलित हैं। यह प्रदेश अधिक ठण्डे होने के कारण हिमाच्छादित रहते हैं। इसमें टुण्ड्रा और उत्तरी साइबेरिया सम्मिलित हैं। वार्षिक औसत वर्षा 25 सें०मी० से भी कम है।

औसत वार्षिक वर्षा के आधार पर विश्व के विभिन्न भागों को निम्नलिखित पाँच वर्गों में बांटा जाता है-

  • 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले प्रदेश ये भूमध्य रेखीय प्रदेश, शीतोष्ण कटिबन्ध के पश्चिमी तट पर पर्वतों के पवनाभिमुख ढाल तथा मानसूनी प्रदेशों के तटीय मैदान हैं।
  • 100 से 200 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-इस वर्ग में 200 सें०मी० से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के निकटवर्ती भाग तथा उष्ण शीतोष्ण कटिबन्ध के तटीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 50 से 100 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश-ये उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों के भीतरी भागों में तथा शीतोष्ण क्षेत्रों के आन्तरिक भागों में स्थित हैं।
  • 20 से 50 सें०मी० वर्षा वाले प्रदेश इस वर्ग में पर्वत श्रेणियों के वृष्टि छाया प्रदेश, महाद्वीपों के अत्यधिक आन्तरिक भाग तथा उच्च अक्षांशीय प्रदेश सम्मिलित हैं।
  • 20 सें०मी० से कम वर्षा वाले प्रदेश-यह उष्ण एवं शीत मरुस्थलीय प्रदेश हैं।

प्रश्न 2.
संघनन के कौन-कौन से प्रकार हैं? ओस एवं तुषार के बनने की प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संघनन के निम्नलिखित चार प्रकार हैं-

  • ओस
  • तुषार या पाला
  • कुहासा एवं कोहरा
  • बादल या मेघ।

1. ओस (Dew)-दिन के समय पृथ्वी सूर्य से गर्मी प्राप्त करती है और रात्रि के समय विकिरण द्वारा छोड़ देती है। रात को विकिरण द्वारा गर्मी निकल जाने से जब कभी धरातल का तापमान ओसांक से कम हो जाता है तो वायु में उपस्थित जलवाष्प पौधों की पत्तियों तथा अन्य तनों पर छोटी-छोटी बूंदों के रूप में जमा हो जाते हैं, इसे ओस कहते हैं।

2. तुषार या पाला (Frost) यदि ओसांक 0° सेल्सियस अर्थात् हिमांक से नीचे हो तो वायु में उपस्थित जलवाष्प बिना द्रवावस्था में आए सीधे हिमकणों के रूप में परिवर्तित होकर धरातल पर जम जाते हैं। इन हिमकणों के विस्तार को पाला (Frost) कहते हैं।

3. कुहासा एवं कोहरा (Mist and Fog)-जब धरातल से कई मीटर की ऊँचाई तक वायु की परत का तापमान ओसांक से नीचे गिर जाए अर्थात् वायु की आपेक्षित आर्द्रता 100 प्रतिशत से अधिक हो जाए तो जलवाष्प जलकणों में परिवर्तित होकर वायुमण्डल के धूल-कणों पर एकत्रित हो जाते हैं और वायु में ही लटके रहते हैं। इससे धुन्धला-सा दिखाई देने लगता है और दृश्यता (Visibility) कम हो जाती है। इसे ही कुहासा या धुन्ध कहते हैं। जब दृश्यता एक किलोमीटर से भी कम हो जाती है तो इसे कोहरा (Fog) कहते हैं। 200 मीटर से कम दूरी तक ही वस्तुएँ दिखाई देने की स्थिति को सघन कोहरा (Thick Fog) कहते हैं।

4. बादल या मेघ (Clouds)-वायुमण्डल में ऊँचाई पर जलकणों या हिमकणों के जमाव एवं संघनन को बादल कहते हैं। मेघों का निर्माण वायु के ऊपर उठने वाली वायु के ठण्डा होने से होता है। मेघ कोहरे का बड़ा रूप है जो वायुमण्डल में वायु के रुद्धोष्म प्रक्रिया द्वारा उसका तापमान ओसांक बिन्दु से नीचे आने से बनते हैं। बादलों की आकृति उनकी निर्माण प्रक्रिया पर आधारित है, लेकिन उनकी ऊँचाई, आकृति, रंग, घनत्व तथा प्रकाश के परावर्तन के आधार पर बादलों को निम्नलिखित चार रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है

ओस के बनने की प्रक्रिया-जाड़े की रातों में जब आकाश स्वच्छ होता है तो तीव्र भौमिक विकिरण से धरातल ठण्डा हो जाता है। ठण्डे धरातल पर ठहरी वायुमण्डल की आर्द्र निचली परतें भी ठण्डी होने लगती हैं। धीरे-धीरे यह वायु ओसांक तक ठण्डी हो जाती है। इससे वायु में विद्यमान जलवाष्प संघनित हो जाता है और नन्हीं-नन्हीं बूंदों के रूप में घास व पौधों की पत्तियों पर जमा हो जाता है। वाष्प से बनी जल की इन बूंदों को ओस कहते हैं।

तुषार के बनने की प्रक्रिया-पाला (तुषार) प्रायः तब बनाता है जब वायु का तापमान तीव्रता से हिमांक से नीचे गिर जाता है। पाला पड़ने के लिए भी उन्हीं परिस्थितियों की आवश्यकता होती है जिनकी ओस के लिए होती है, परन्तु पाला पड़ने के लिए ओसांक का हिमांक से नीचे होना आवश्यक है।

वायुमंडल में जल HBSE 11th Class Geography Notes

→ जलवाष्प (Water Vapours)-जलवाष्प वायुमण्डल की एक रंगहीन, गंधहीन और स्वादहीन गैस है।

→ निरपेक्ष आर्द्रता (Absolute Humidity)-वायु के प्रति इकाई आयतन में विद्यमान जलवाष्प के वास्तविक भार को वायु की निरपेक्ष आर्द्रता कहते हैं।

→ विशिष्ट आर्द्रता (Specific Humidity)–वायु के प्रति इकाई भार में जलवाष्प के भार को विशिष्ट आर्द्रता कहते हैं।

→ वाष्पीकरण (Evaporation)-जल की तरलावस्था अथवा ठोसावस्था का गैसीय अवस्था में परिवर्तन होने की प्रक्रिया को वाष्पीकरण कहते हैं।

→ संघनन या द्रवण (Condensation)-जल की गैसीय अवस्था का तरलावस्था या ठोसावस्था में बदलने की प्रक्रिया को संघनन या द्रवण कहते हैं।

→ वृष्टि (Precipitation)-वायु में उपस्थित जलवाष्पों का संघनन द्वारा द्रवावस्था या ठोसावस्था में बदलकर पृथ्वी पर गिरने की घटना को वृष्टि कहते हैं।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

HBSE 11th Class Geography वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. यदि धरातल पर वायुदाब 1,000 मिलीबार है तो धरातल से 1 कि०मी० की ऊँचाई पर वायुदाब कितना होगा?
(A) 700 मिलीबार
(B) 900 मिलीबार
(C) 1,100 मिलीबार
(D) 1,300 मिलीबार
उत्तर:
(B) 900 मिलीबार

2. अंतर उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र प्रायः कहाँ होता है?
(A) विषुवत् वृत्त के निकट
(B) कर्क रेखा के निकट
(C) मकर रेखा के निकट
(D) आर्कटिक वृत्त के निकट
उत्तर:
(A) विषुवत् वृत्त के निकट

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

3. उत्तरी गोलार्ध में निम्नवायुदाब के चारों तरफ पवनों की दिशा क्या होगी?
(A) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के अनुरूप
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत
(C) समदाब रेखाओं के समकोण पर
(D) समदाब रेखाओं के समानांतर
उत्तर:
(B) घड़ी की सुइयों के चलने की दिशा के विपरीत

4. वायुराशियों के निर्माण के उद्गम क्षेत्र निम्नलिखित में से कौन-सा है-
(A) विषुवतीय वन
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग
(C) हिमालय पर्वत
(D) दक्कन पठार
उत्तर:
(B) साइबेरिया का मैदानी भाग

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुदाब मापने की इकाई क्या है? मौसम मानचित्र बनाते समय किसी स्थान के वायुदाब को समुद्र तल तक क्यों घटाया जाता है?
उत्तर:
वायदाब मापने की इकाई ‘मिलीबार’ है जिसे किलो पास्कल (hpa) लिखा जाता है। वायुदाब के क्षैतिज वितरण का अध्ययन समान अंतराल पर खींची समदाब रेखाओं द्वारा किया जाता है। समदाब रेखाएँ वे रेखाएँ है जो समुद्रतल से एक समान वायुदाब वाले स्थानों को मिलती है। दाब पर ऊँचाई के प्रभाव को दूर करने और तुलनात्मक बनाने के लिए, वायुदाब मापने के बाद इसे समुद्रतल के स्तर पर घटाया जाता है।

प्रश्न 2.
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की तरफ हो अर्थात् उपोष्ण उच्च दाब से विषुवत वृत्त की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्णकटिबंध में पवनें उत्तरी पूर्वी क्यों होती हैं?
उत्तर:
जब दाब प्रवणता बल उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर हो तो उत्तरी गोलार्द्ध में उष्ण कटिबंध में पवनें उत्तर-पूर्वी होती हैं क्योंकि पवनों की दिशा कॉरिआलिस बल से प्रभावित होती है।

प्रश्न 3.
भूविक्षेपी पवनें क्या हैं?
उत्तर:
जब समदाब रेखाएँ सीधी हों तथा घर्षण का प्रभाव न हो तो दाब प्रणवता बल कॉरिआलिस बल से सन्तुलित हो जाता है, जिसके परिणामस्वरूप पवनें समदाब रेखाओं के समानान्तर बहती हैं, जिन्हें ‘भू-विक्षेपी पवनें’ कहा जाता है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

प्रश्न 4.
समुद्र व स्थल समीर का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थलीय समीर-रात्रि को जब सूर्य का प्रभाव नहीं होता तो स्थल और समुद्र दोनों ही ठण्डे होने लगते हैं। परन्तु स्थल, समुद्र की अपेक्षा अधिक ठण्डा हो जाता है। इस प्रकार स्थल पर जल की अपेक्षा तापमान कम तथा वायुभार अधिक होता है। इसलिए रात्रि के समय स्थल से समुद्र की ओर ठण्डी वायु चलती है जिसे स्थलीय समीर (Land Breeze) कहते हैं।

समुद्री समीर-दिन के समय सूर्य से ऊष्मा प्राप्त करके स्थल तथा जल दोनों ही गरम होना शुरू कर देते हैं, परन्तु स्थल, जल की अपेक्षा शीघ्र एवं अधिक गरम हो जाता है। फलस्वरूप स्थलीय भाग का तापमान अधिक तथा जलीय भाग का तापमान कम होता है। अतः समुद्र पर स्थल की अपेक्षा वायु का भार अधिक है। इससे ठण्डी हवा समुद्र से स्थल की ओर चलना आरम्भ कर देती है जिसे जलीय या समुद्री समीर (Sea Breeze) कहते हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पवनों की दिशा व वेग को प्रभावित करने वाले कारण बताएँ।
उत्तर:
पवन की उत्पत्ति, दिशा और वेग को नियन्त्रित करने वाले कारक (Factors Affecting the Velocity, Direction and Origin of Wind)
1. दाब प्रवणता बल (Pressure Gradient Force)-दो बिन्दुओं के बीच वायुदाब में परिवर्तन की दर को दाब प्रवणता कहा जाता है। अतः दो स्थानों के बीच दाब प्रवणता जितनी अधिक होगी, वायु की गति उतनी ही तीव्र होगी। दाब प्रवणता से प्रेरित होकर ही वायु उच्च वायुदाब क्षेत्र से निम्न वायुदाब क्षेत्र की ओर बहती है।

2. विक्षेपण बल (Deflection Force)-शुरू में तो पवनें दाब प्रवणता के अनुसार बहती हैं। लेकिन जैसे ही बहने लगती हैं उनकी दिशा पृथ्वी के घूर्णन तथा उसके साथ सापेक्ष वायुमंडल के घूर्णन के प्रभाव से विक्षेपित होने लगती हैं। इसे कॉरिआलिस प्रभाव (Coriolis Effect) कहते हैं जिसके प्रभावाधीन उत्तरी गोलार्द्ध में पवनें अपने दाहिनी ओर तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में अपने बाईं ओर मुड़ जाती हैं। कॉरिआलिस प्रभाव भूमध्य रेखा पर शून्य होता है और ध्रुवों की ओर उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है।

3. भू-घर्षण (Land Friction)-महाद्वीपों पर पाई जाने वाली धरातलीय विषमताओं; जैसे पर्वत, पठार और मैदान के कारण पवनों के मार्ग में अवरोध और घर्षण पैदा हो जाते हैं जिससे पवनों की गति और दिशा दोनों प्रभावित होते हैं। महासागरों पर किसी प्रकार का अवरोध न होने के कारण वहाँ पवनें तेज़ी से बहती हैं और उनकी दिशा भी स्पष्ट होती है।

4. अपकेन्द्री बल (Centrifugal Force)-इस बल के प्रभावाधीन किसी भी वक्राकार पथ पर चलती हुई पवनें, धाराएँ या कोई भी गतिमान वस्तु वक्र के केन्द्र से बाहर की ओर छूटने या जाने की प्रवृत्ति रखती है। पवन मार्ग के वक्र के छोटा होने तथा पवन की गति बढ़ने पर अपकेन्द्री बल भी बढ़ने लगता है अर्थात् पवनें और अधिक तेजी से वक्र मार्ग से बाहर की ओर जाने का प्रयास करती हैं।

प्रश्न 2.
पृथ्वी पर वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण का वर्णन करते हुए चित्र बनाएँ। 30° उत्तरी व दक्षिण अक्षांशों पर उपोष्ण कटिबंधीय उच्च वायुदाब के संभव कारण बताएँ।
उत्तर:
वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण-वायुमंडलीय पवनों के प्रवाह प्रारूप को ही वायुमंडलीय सामान्य परिसंचरण कहा जाता है। यह वायुमंडलीय परिसंचरण महासागरीय जल को गतिमान करता है जो पृथ्वी की जलवायु को प्रभावित करता है। भूमंडलीय पवनों का प्रारूप मुख्यतः निम्नलिखित बातों पर निर्भर करता है

  • वायुमंडलीय तापन में अक्षांशीय भिन्नता
  • वायुदाब पट्टियों की उपस्थिति
  • वायुदाब पट्टियों का सौर किरणों के साथ विस्थापन
  • महासागरों व महाद्वीपों का वितरण
  • पृथ्वी का घूर्णन।

उच्च सूर्यातप व निम्न वायुदाब के कारण भू-मंडलीय वायु संवहन धाराओं के रूप में ऊपर उठती है। उष्ण कटिबंधों से आने वाली पवनें इस निम्न-दाब क्षेत्र में अभिसरण करती हैं। यह वाय क्षोभमंडल के ऊपर 14 कि०मी० की ऊँचाई तक ऊपर चढ़ती है। फिर ध्रुवों की तरफ प्रवाहित होती है। इसके परिणामस्वरूप 30° उत्तर व 30° दक्षिण अक्षांश पर वायु एकत्रित हो जाती है। इस एकत्रित वायु का अवतलन होता है जिसके कारण उपोष्ण कटिबंधीय उच्च-दाब क्षेत्र बनता है।

वायुमंडल का सामान्य परिसंचरण महासागरों को भी प्रभावित करता है। वायुमंडल में वृहत पैमाने पर चलने वाली पवनें धीमी तथा अधिक गति की महासागरीय धाराओं को प्रवाहित करती हैं।

प्रश्न 3.
उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की उत्पत्ति केवल समुद्रों पर ही क्यों होती है? उष्ण कटिबंधीय चक्रवात के किस भाग में मूसलाधार वर्षा होती है और उच्च वेग की पवनें चलती हैं और क्यों?
उत्तर:
उष्ण कटिबंधीय चक्रवात आक्रामक तूफान हैं जिनकी उत्पत्ति उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों के महासागरों पर होती है। क्योंकि इनका जन्म प्रायः अधिक गर्मी पड़ने से ही होता है और ये तटीय क्षेत्रों की तरफ गतिमान होते हैं। ये चक्रवात आक्रामक पवनों के कारण विस्तृत विनाश, अत्यधिक वर्षा और तूफान लाते हैं।

हिन्द महासागर में ‘चक्रवात’ अटलांटिक महासागर में ‘हरीकेन’, पश्चिम प्रशांत और दक्षिण चीन सागर में ‘टाइफन’ तथा पश्चिमी आस्ट्रेलिया में ‘विली-विलीज’ के नाम से जाने जाते हैं। इनकी उत्पत्ति व विकास के लिए अनुकूल स्थितियाँ हैं।

  • बृहत् समुद्री सतह; जहाँ तापमान 27° से० अधिक हो
  • कोरिऑलिस बल
  • ऊर्ध्वाधर पवनों की गति में अंतर कम होना
  • कमजोर निम्न दाब क्षेत्र या निम्न स्तर का चक्रवातीय परिसंचरण का होना
  • समुद्री तल तंत्र पर ऊपरी अपसरण।

वे चक्रवात जो प्रायः 20° उत्तरी अक्षांश से गुजरते हैं, उनकी दिशा अनिश्चित होती है और ये अधिक विध्वंसक होते हैं। एक विकसित उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की विशेषता इसके केंद्र के चारों तरफ प्रबल सर्पिल पवनों का परिसंचरण है, जिसे इसकी आँख कहा जाता है। इस परिसंचरण प्रणाली का व्यास 150 से 250 कि०मी० होता है। इसके केंद्र में वायु शान्त होती है। अक्षु के चारों तरफ अक्षुभिति होती है जहाँ वायु का प्रबल व वृत्ताकार रूप से आरोहण होता है, यह आरोहण क्षोभसीमा की ऊँचाई तक पहुँचता है। इसी क्षेत्र में पवनों का वेग अधिकतम होता है, जो 250 कि०मी० प्रति घंटा तक होता है। इन चक्रवातों से मूसलाधार वर्षा होती है।

वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ HBSE 11th Class Geography Notes

→ वायुदाब (Air Pressure)-किसी स्थान पर ऊपर स्थित वायु के सम्पूर्ण स्तंभ का भार वायुदाब कहलाता है।

→ पछुवा पवनें (Westerlies) उपोष्ण उच्च-दाब कटिबंधों से उपध्रुवीय निम्न-दाब कटिबंधों की तरफ वर्ष-भर चलने वाली पवनें पछुवा पवनें कहलाती हैं।

→ ध्रुवीय पवनें (Polar Winds)-ध्रुवीय उच्च वायुदाब क्षेत्रों से उपध्रुवीय निम्न वायुदाब कटिबंधों की ओर वर्ष भर चलने वाली पवनों को ध्रुवीय पवनें कहते हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 10 वायुमंडलीय परिसंचरण तथा मौसम प्रणालियाँ

→ मिस्ट्रल (Mistral)-शीत ऋतु में आल्प्स पर्वत से भूमध्य-सागर की तरफ फ्रांस और स्पेन के तटों पर बहने वाली तेज, शुष्क व ठण्डी पवन को मिस्ट्रल कहते हैं।

→ चक्रवात (Cyclones) चक्रवात वायु की वह राशि है जिसके मध्य में न्यून वायुदाब होता है तथा बाहर की तरफ वायुदाब बढ़ता जाता है।

→ वाताग्र जनन (Frontogenesis)-वातारों के बनने की प्रक्रिया को वाताग्र जनन कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 9 सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान

HBSE 11th Class Geography सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्न में से किस अक्षांश पर 21 जून की दोपहर सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं?
(A) विषुवत् वृत्त पर
(B) 23.5° उ०
(C) 66.5° द०
(D) 66.5° उ०
उत्तर:
(B) 23.5° उ०

2. निम्न में से किन शहरों में दिन ज्यादा लंबा होता है?
(A) तिरुवनंतपुरम
(B) हैदराबाद
(C) चंडीगढ़
(D) नागपुर
उत्तर:
(A) तिरुवनंतपुरम

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3. निम्नलिखित में से किस प्रक्रिया द्वारा वायुमंडल मुख्यतः गर्म होता है?
(A) लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर विकिरण से
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से
(C) परावर्तित सौर विकिरण से
(D) प्रकीर्णित सौर विकिरण से
उत्तर:
(B) लंबी तरंगदैर्ध्य वाले स्थलीय विकिरण से

4. निम्न पदों को उसके उचित विवरण के साथ मिलाएँ।

1. सूर्यातप(अ) सबसे कोष्ण और सबसे शीत महीनों के मध्य तापमान का अंतर
2. एल्बिडो(ब) समान तापमान वाले स्थानों को जोड़ने वाली रेखा
3. समताप रेखा(स) आनेवाला सौर विकिरण
4. वार्षिक तापांतर(द) किसी वस्तु के द्वारा परावर्तित दृश्य प्रकाश का प्रतिशत

उत्तर:
1. (स)
2. (द)
3. (ब)
4. (अ)

5. पृथ्वी के विषुवत् वृत्तीय क्षेत्रों की अपेक्षा उत्तरी गोलार्ध के उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों का तापमान अधिकतम होता है, इसका मुख्य कारण है-
(A) विषवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में कम बादल होते हैं।
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।
(C) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में ‘ग्रीन हाऊस प्रभाव’ विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा ज्यादा होता है।
(D) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्र विषुवतीय क्षेत्रों की अपेक्षा महासागरीय क्षेत्र के ज्यादा करीब है।
उत्तर:
(B) उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्मी के दिनों की लंबाई विषुवतीय क्षेत्रों से ज्यादा होती है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण किस प्रकार जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है?
उत्तर:
तापमान जलवायु और मौसम का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। तापमान का वायुमण्डल के दाब से सीधा सम्बन्ध है। यदि तापमान कम होगा तो वायुदाब अधिक होगा और यदि तापमान अधिक होगा तो वायुदाब कम होगा। वायुदाब किसी स्थान के मौसम और जलवायु को प्रभावित करता है। अतः पृथ्वी पर तापमान का असमान वितरण जलवायु और मौसम को प्रभावित करता है।

प्रश्न 2.
वे कौन से कारक हैं, जो पृथ्वी पर तापमान के वितरण को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
तापमान के वितरण को प्रभावित करने वाले कारक निम्नलिखित हैं-

  1. स्थल व जल-जलीय भागों की अपेक्षा स्थलीय भागों में सूर्य का ताप अधिक देखने को मिलता है।
  2. ऊँचाई-165 मी० की ऊँचाई पर 1° सेंटीग्रेड तापमान घटता है। इसलिए पर्वतीय भागों में मैदानी भागों से कम तापमान मिलता है।
  3. अक्षांश-अप्रैल से जून तक उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्यातप अधिक रहता है तथा सितंबर से मार्च में विषुवत् रेखा पर सूर्यातप क्रम होता है।

प्रश्न 3.
भारत में मई में तापमान सर्वाधिक होता है, लेकिन उत्तर अयनांत के बाद तापमान अधिकतम नहीं होता। क्यों?
उत्तर:
भारत में मई में दिन की लम्बाई अधिक होने से सूर्यातप अधिक प्राप्त होता है लेकिन उत्तर अयनान्त के बाद सूर्य की किरणें तिरछी होना आरम्भ करती है जिससे तापमान अधिकतम नहीं हो पाता।

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प्रश्न 4.
साइबेरिया के मैदान में वार्षिक तापांतर सर्वाधिक होता है। क्यों?
उत्तर:
साइबेरिया उत्तरी गोलार्द्ध के स्थलीय भाग का अत्यधिक ठण्डा प्रदेश है। सर्दियों में वहाँ सबसे ठण्डे महीने का तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है जबकि गर्मियों में कोष्ण महासागरीय धाराएँ बहती हैं, इससे सबसे गर्म महीने का औसत तापमान काफी बढ़ जाता है। इसलिए साइबेरिया में वार्षिक तापान्तर सर्वाधिक होता है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
अक्षांश और पृथ्वी के अक्ष का झुकाव किस प्रकार पृथ्वी की सतह पर प्राप्त होने वाली विकिरण की मात्रा को प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
सूर्य की किरणें 0° अक्षांश या विषुवत् रेखा पर सालों भर लंबवत् पड़ती हैं। 0° अक्षांश से 2372° उत्तरी और 23% दक्षिणी अक्षांशों के बीच सूर्य ऊपर-नीचे होता रहता है। 21 मार्च से 21 जून तक सूर्य उत्तरायन होता है, कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् होती हैं तथा उस वक्त ग्रीष्म ऋतु होती है तथा मकर रेखा पर शीत ऋतु होती है। 23 सितंबर से 22 दिसंबर तक सूर्य दक्षिणायन होता है तथा मकर पर सूर्य की किरणें लंबवत् पड़ती हैं तथा उस वक्त कर्क रेखा पर शीत ऋतु होती है।

कर्क रेखा के उत्तर में तथा मकर रेखा के दक्षिण में जैसे-जैसे हम बढ़ते हैं, वहाँ का तापमान घटता जाता है। इसी कारण 66° उत्तरी अक्षांश तथा 66° दक्षिण अक्षांश के ऊपरी भाग में शीत कटिबंध पाया जाता है जहाँ वर्ष-भर निम्न ता है तथा बर्फ जमी रहती है। इसका मख्य कारण है कि यहाँ सर्य की किरणें तिरछी पडती हैं जो विकिरण की मात्रा को प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 2.
उन प्रक्रियाओं की व्याख्या करें जिनके द्वारा पृथ्वी तथा इसका वायुमंडल ऊष्मा संतुलन बनाए रखते हैं।
उत्तर:
पृथ्वी पर सूर्यातप का असमान वितरण है। सूर्य पृथ्वी को गर्म करता है और पृथ्वी वायुमंडल को गर्म करती है। परिणामस्वरूप पृथ्वी न तो अधिक समय के लिए गर्म होती है और न ही अधिक ठंडी। अतः हम यह पाते हैं कि पृथ्वी के अलग-अलग भागों में प्राप्त ताप की मात्रा समान नहीं होती।

इसी भिन्नता के कारण वायुमंडल के दाब में भिन्नता होती है एवं इसी कारण पवनों के द्वारा ताप का स्थानांतरण एक स्थान से दूसरे स्थान पर होता है। उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में अधिक गर्मी पड़ने के कारण वहाँ की वायु गर्म होकर ऊपर उठ जाती है और उस स्थान को भरने के लिए उपोष्ण कटिबंध से हवाएँ उष्ण कटिबंध की ओर चलती हैं, जिससे उष्ण कटिबंध के तापमान में ज्यादा वृद्धि नहीं हो पाती।

इसी तरह से उपोष्ण कटिबंध क्षेत्र में शीतोष्ण कटिबंध से हवाएँ चलकर इन क्षेत्रों के तापमान में संतुलन बनाती हैं। इसी तरह वायुमंडल एक क्षेत्र के तापमान को ज्यादा बढ़ने नहीं देता तथा शीत कटिबंधीय और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में गर्म महासागरीय धाराएँ चलती हैं। ये धाराएँ इन क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती हैं। उष्ण कटिबंध क्षेत्रों में ठंडी धाराएँ चलती हैं और उन क्षेत्रों के तापमान को कम कर देती हैं। इसी तरह पृथ्वी की महासागरीय धाराएँ और वायुमंडल संतुलन में बने रहते हैं।

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प्रश्न 3.
जनवरी में पृथ्वी के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्द्ध के बीच तापमान के विश्वव्यापी वितरण की तुलना करें।
उत्तर:
उत्तरी गोलार्द्ध में स्थल की अधिकता है और तापमान स्थलीय भागों में कम रहता है। इसलिए समताप रेखाएँ जैसे ही स्थलों से महासागरों में पहुँचती हैं तो भूमध्य रेखा की ओर मुड़ जाती हैं क्योंकि सागरीय भागों में तापमान अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अतः उत्तरी गोलार्द्ध में ताप प्रवणता अधिक रहती है (समताप रेखाओं के बीच की दूरी कम रहती है) दक्षिणी गोलार्द्ध में समताप रेखाएँ महासागरीय प्रभाव के कारण दूर-दूर रहती हैं और महाद्वीपों से गुजरते समय दक्षिणी ध्रुव की ओर मुड़ जाती हैं। समताप रेखाएँ उत्तरी गोलार्द्ध की तुलना में अधिक नियमित होती हैं।

जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में सर्दी और दक्षिणी गोलार्द्ध ग्रीष्म ऋतु होती है जिसका मुख्य कारण सूर्य का दक्षिणायन में होता है। जिस कारण सूर्य की किरणें दक्षिणी गोलार्द्ध में लंबवत् पड़ती है। जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती हैं।

विषुवत रेखा के समीपवर्ती क्षेत्रों में तापमान 27° सेंटीग्रेड तथा कर्क रेखा पर 15° सेंटीग्रेड और शीतोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में तापमान 10° सेंटीग्रेड होता है। उदाहरण के लिए साइबेरिया के वोयान्सक में -32 सेंटीग्रेड, दक्षिणी गोलार्द्ध में आस्ट्रेलिया, न्यूज़ीलैंड, दक्षिण अफ्रीकी देशों और दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के अर्जेन्टाइना में जनवरी में तापमान औसतन 30° सेंटीग्रेड होता है।

दक्षिणी भाग जैसे चिली और अर्जेन्टाइना में तापमान 15 से 20° सेंटीग्रेड होता है। इस तरह से जनवरी में उत्तरी गोलार्द्ध में कम तापमान और दक्षिणी गोलार्द्ध में अधिक तापमान देखने को मिलता है।

सौर विकिरण, ऊष्मा संतुलन एवं तापमान HBSE 11th Class Geography Notes

→ सौर विकिरण (Solar Radiation)-सूर्य ऊष्मा को अंतरिक्ष में चारों तरफ निरन्तर प्रसारित करता रहता है। सूर्य द्वारा ऊष्मा की प्रसारण क्रिया को सौर विकिरण कहा जाता है।

→ कैलोरी (Calorie)-समुद्रतल पर उपस्थित वायुदाब की दशा में एक ग्राम जल का तापमान 1° सेल्सियस बढ़ाने के लिए आवश्यक ऊर्जा को कैलोरी कहा जाता है।

→ एल्बिडो (Albedo)-किसी पदार्थ की परिवर्तनशीलता या परावर्तन गुणांक। इसे दशमलव या प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।

→ संचालन (Conduction) आण्विक सक्रियता के द्वारा पदार्थ के माध्यम से ऊष्मा का संचार संचालन कहलाता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

HBSE 11th Class Geography वायुमंडल का संघटन तथा संरचना Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस वायुमंडल में सबसे अधिक मात्रा में मौजूद है?
(A) ऑक्सीजन
(B) आर्गन
(C) नाइट्रोजन
(D) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(C) नाइट्रोजन

2. वह वायुमंडलीय परत जो मानव जीवन के लिए महत्त्वपूर्ण है-
(A) समतापमंडल
(B) क्षोभमंडल
(C) मध्यमंडल
(D) आयनमंडल
उत्तर:
(B) क्षोभमंडल

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

3. समुद्री नमक, पराग, राख, धुएँ की कालिमा, महीन मिट्टी किससे संबंधित हैं?
(A) गैस
(B) जलवाष्प
(C) धूलकण
(D) उल्कापात
उत्तर:
(C) धूलकण

4. निम्नलिखित में से कितनी ऊँचाई पर ऑक्सीजन की मात्रा नगण्य हो जाती है?
(A) 90 कि०मी०
(B) 100 कि०मी०
(C) 120 कि०मी०
(D) 150 कि०मी०
उत्तर:
(C) 120 कि०मी०

5. निम्नलिखित में से कौन-सी गैस सौर विकिरण के लिए पारदर्शी है तथा पार्थिव विकिरण के लिए अपारदर्शी?
(A) ऑक्सीजन
(B) नाइट्रोजन
(C) हीलियम
(D) कार्बन डाइऑक्साइड
उत्तर:
(D) कार्बन डाइऑक्साइड

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमंडल से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पृथ्वी के चारों तरफ कई सौ किलोमीटर की मोटाई में व्याप्त वायु के आवरण को वायुमंडल कहा जाता है। वायुमंडल पृथ्वी की गुरुत्व शक्ति के कारण ही इसके साथ टिका हुआ है। मोंकहाउस के शब्दों में, “वायुमंडल गैस की एक पतली परत है जो गुरुत्वाकर्षण के कारण पृथ्वी के साथ सटी हुई है।” क्रिचफील्ड के अनुसार, “वायुमंडल गैसों का गहरा आवरण है जो पृथ्वी को पूर्णतः घेरे हुए है।”

प्रश्न 2.
मौसम एवं जलवायु के तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
वे तत्त्व जिनसे किसी विशिष्ट प्रकार के मौसम या जलवायु की रचना होती है, उन्हें मौसम अथवा जलवायु के तत्त्व कहा जाता है। तापमान, वायुदाब, आर्द्रता, वर्षा, वायु की दिशा एवं गति तथा जलवायु परिवर्तन आदि जलवायु के मुख्य तत्त्व हैं।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

प्रश्न 3.
वायुमंडल की संरचना के बारे में लिखें।
उत्तर:
वायुमंडल अलग-अलग घनत्व तथा तापमान वाली विभिन्न परतों का बना होता है। पृथ्वी की सतह के पास घनत्व अधिक होता है, जबकि ऊँचाई बढ़ने के साथ-साथ यह घटता जाता है। वायुमंडल को पाँच संस्तरों में बाँटा गया है-

  • क्षोभमंडल
  • समतापमंडल
  • मध्यमंडल
  • आयनमंडल
  • बाह्य वायुमंडल या बहिर्मंडल।

प्रश्न 4.
वायुमंडल के सभी संस्तरों में क्षोभमंडल सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण क्यों हैं?
उत्तर:
क्षोभमंडल वायुमंडल का सबसे नीचे का संस्तर है इसकी ऊँचाई लगभग 13 कि०मी० है। इस संस्तर में धूलकण तथा जलवाष्प मौजूद होते हैं। मौसम में परिवर्तन इसी संस्तर में होता है। इस संस्तर में प्रत्येक 165 मी० की ऊँचाई पर तापमान 1°C घटता जाता है। जैविक क्रिया के लिए यह सबसे महत्त्वपूर्ण संस्तर है।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
वायुमंडल के संघटन की व्याख्या करें।
उत्तर:
वायुमंडल का संघटन वायुमंडल के संघटन का अर्थ है कि वायुमंडल किन-किन पदार्थों से मिलकर बना हुआ है। वायुमंडल अनेक गैसों का यांत्रिक मिश्रण है। गैसों के अतिरिक्त वायुमंडल में जलवाष्प और कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं।
1. गैसें (Gases)-आयतन के अनुसार शुद्ध शुष्क वायु में लगभग 78 प्रतिशत नाइट्रोजन तथा लगभग 21 प्रतिशत ऑक्सीजन पाई जाती है। इस प्रकार नाइट्रोजन व ऑक्सीजन वायुमंडल की दो प्रमुख गैसें हैं जो समूचे वायुमंडल के आयतन का 99 प्रतिशत भाग घेरे हुए हैं। शेष 1 प्रतिशत में अन्य अनेक गैसें आती हैं।

वायु में विभिन्न गैसों की प्रतिशत मात्रा (आयतन)
नाइट्रोजन78 %
ऑक्सीजन21 %
आर्गन0.93 %
कार्बन-डाइऑक्साइड0.03 %
अन्य0.04 %

कुछ महत्त्वपूर्ण गैसों की उपयोगिता
(1) ऑक्सीजन मनुष्य और जानवर साँस के रूप में ऑक्सीजन को ही ग्रहण करते हैं। ऑक्सीजन दहन (Combustion) के लिए आवश्यक है। इसके बिना आग नहीं जलाई जा सकती। ऑक्सीजन की उत्पत्ति प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से होती है व इसका ह्रास वनों के विनाश से होता है। शैलों के रासायनिक अपक्षय में सहयोग देकर ऑक्सीजन अनेक भू-आकारों की उत्पत्ति का कारण बनती है।

(2) नाइट्रोजन नाइट्रोजन वायु में उपस्थित ऑक्सीजन के प्रभाव को कम करती है। यदि वायुमंडल में नाइट्रोजन न होती तो वस्तुएँ इतनी तेजी से जलतीं कि उस पर नियन्त्रण करना कठिन होता। इतना ही नहीं, नाइट्रोजन के अभाव में मनुष्य व जीव-जन्तुओं के शरीर के ऊतक भी जलकर नष्ट हो जाते। मिट्टी में नाइट्रोजन की उपस्थिति प्रोटीनों का निर्माण करती है जो पौधों और वनस्पति का भोजन बनते हैं।

(3) कार्बन-डाइऑक्साइड-पौधे जीवित रहने के लिए कार्बन-डाइऑक्साइड पर निर्भर करते हैं। हरे पौधे वायुमंडल की कार्बन-डाइऑक्साइड से मिलकर स्टार्च व शर्कराओं का निर्माण करते हैं। यह गैस प्रवेशी सौर विकिरण को तो पृथ्वी तल तक आने देती है किन्तु पृथ्वी से विकिरित होने वाली लम्बी तरंगों को बाहर जाने से रोकती है। इससे पृथ्वी के निकट वायुमंडल का निचला भाग गर्म रहता है। इस प्रकार कार्बन-डाइऑक्साइड ‘काँच घर’ का प्रभाव उत्पन्न करती है।

(4) ओषोण या ओज़ोन यह गैस ऑक्सीजन का ही एक विशिष्ट रूप है जो वायुमंडल में अधिक ऊँचाइयों पर ही न्यून मात्रा में मिलती है। ओजोन गैस सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों (Ultra-Violet Rays) के कुछ अंश को अवशोषित कर लेती है जिससे स्थलमण्डल एक उपयुक्त सीमा से अधिक गर्म नहीं हो पाता। ओज़ोन मुख्यतः धरातल से 10 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक स्थित है।

2. जलवाष्प (Water Vapour)-वाष्प वायुमंडल की सबसे अधिक परिवर्तनशील और असमान वितरण वाली गैस है। वायुमंडल में वाष्प के मुख्य स्रोत जलमण्डल से वाष्पीकरण तथा पेड़-पौधों व मिट्टी से वाष्पोत्सर्जन है। अति ठण्डे तथा अति शुष्क क्षेत्रों में यह हवा के आयतन के एक प्रतिशत से भी कम होती है जबकि भूमध्य रेखा के पास उष्ण और आर्द्र क्षेत्रों में आयतन के हिसाब से यह 4 प्रतिशत तक हो सकती है। वायु में उपस्थित कुल जलवाष्प का लगभग आधा भाग 2,000 मीटर की ऊँचाई से नीचे व्याप्त है। भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर जाने पर वायु में जलवाष्प की मात्रा कम होती जाती है। इसी प्रकार ऊँचाई के साथ भी जलवाष्प की मात्रा घटती जाती है।

3. ठोस कण व आकस्मिक रचक (Solid Particles and Accidental Component)-गैस तथा वाष्प के अतिरिक्त वायु में कुछ सूक्ष्म ठोस कण भी पाए जाते हैं जिनमें धूलकण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होते हैं। ये कण सौर विकिरण का कुछ अंश अवशोषित कर लेते हैं साथ ही सूर्य की किरणों का परावर्तन और प्रकीर्णन भी करते हैं। इसी के परिणामस्वरूप हमें आकाश नीला दिखाई पड़ता है। किरणों के प्रकीर्णन के कारण ही सूर्योदय और सूर्यास्त के समय आकाश में लाल और नारंगी रंग की छटाएँ बनती हैं। इन्हीं धूल कणों के कारण ही धुंध व धूम कोहरा बनता है।

वायुमंडल में कुछ आकस्मिक रचक और अपद्रव्य भी शामिल होते हैं। इनमें धुएँ की कालिख, ज्वालामुखी राख, उल्कापात के कण, समुद्री झाग के बुलबुलों के टूटने से मुक्त हुए ठोस लवण, जीवाणु, बीजाणु तथा पशुशालाओं के पास की वायु में अमोनिया . के अंश इत्यादि पदार्थ आते हैं।

प्रश्न 2.
वायुमंडल की संरचना का चित्र खींचे और व्याख्या करें।
उत्तर:
HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना 1
पृथ्वी के चारों तरफ पाया जाने वाला वायु का सारा आवरण केवल एक परत नहीं है बल्कि इसमें हवा की अनेक संकेन्द्रीय परतें हैं जो घनत्व और तापमान की दृष्टि से एक-दूसरे से भिन्न हैं। भूमण्डल से परे हटने के क्रम में वायुमंडल की निम्नलिखित परते हैं-
1. क्षोभमण्डल (Troposphere)-भू-तल के सम्पर्क में यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है। ध्रुवों पर इस परत की ऊँचाई 8 किलोमीटर और भूमध्य रेखा पर 18 किलोमीटर है। भूमध्य रेखा पर क्षोभमण्डल की अधिक ऊँचाई का कारण यह है कि वहाँ पर चलने वाली तेज़ संवहन धाराएँ ऊष्मा को धरातल से अधिक ऊँचाई पर ले जाती हैं।

यही कारण है कि जाड़े की अपेक्षा गर्मी में क्षोभमण्डल की ऊँचाई बढ़ जाती है। संवहन धाराओं की अधिक सक्रियता के कारण इस परत को प्रायः संवहन क्षेत्र भी कहते हैं। इस मण्डल में प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1° सेल्सियस तापमान गिर जाता है। ऊँचाई बढ़ने पर तापमान गिरने की इस दर को सामान्य ह्रास दर कहा जाता है। मानव व अन्य धरातलीय जीवों के लिए यह परत सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। ऋतु व मौसम सम्बन्धी लगभग सभी घटनाएँ; जैसे बादल, वर्षा, भूकम्प आदि जो मानव-जीवन को प्रभावित करती हैं, इसी परत में घटित होती हैं। क्षोभमण्डल में ही भारी गैसों, जलवाष्प, धूलकणों, अशुद्धियों व आकस्मिक रचकों की अधिकतम मात्रा पाई जाती है।

क्षोभमण्डल की ऊपरी सीमा को क्षोभ सीमा (Tropopause) कहते हैं। यह क्षोभमण्डल व समतापमण्डल को अलग करती है। लगभग 11/2 से 2 किलोमीटर मोटी इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान गिरना बन्द हो जाता है। इस भाग में हवाएँ व संवहनी धाराएँ भी चलना बन्द हो जाती हैं।

2. समतापमण्डल (Stratosphere)-क्षोभ सीमा से परे यह एक संवहन-रहित परत है जिसमें आँधी, बादलों की गरज, तड़ित-झंझा, धूलकण और जलवाष्प इत्यादि नहीं पाए जाते। इसमें केवल क्षीण क्षैतिज हवाएँ चलती हैं। यह परत 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इसकी मोटाई भूमध्य रेखा की अपेक्षा ध्रुवों पर अधिक होती है। कभी-कभी यह परत भूमध्य रेखा पर लुप्तप्राय हो जाती है। इस परत के निचले भागों में अर्थात् 20 किलोमीटर की ऊँचाई तक तापमान एक-जैसा रहता है।

इससे ऊपर 50 किलोमीटर की ऊँचाई तक तापमान धीरे-धीरे बढ़ता है। इसका कारण यह है कि 20 से 50 किलोमीटर की ऊँचाई में वायुमंडल में ओज़ोन गैस पाई जाती है जो सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी को ऊर्जा के तीव्र तथा हानिकारक तत्त्वों से बचाती है। समतापमण्डल की ऊपरी सीमा समताप सीमा (Stratopause) कहलाती है जिसमें ओज़ोन की मात्रा अधिक होती है।

3. मध्यमण्डल (Mesosphere)-समतापमण्डल के ऊपर स्थित वायुमंडल की यह तीसरी परत मध्यमण्डल कहलाती है। इसका विस्तार 80 किलोमीटर की ऊँचाई तक होता है। इस परत में ऊँचाई के साथ तापमान घटने लगता है और 80 किलोमीटर की ऊँचाई पर तापमान -100° सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है। मध्यमण्डल की ऊपरी सीमा मध्य सीमा (Mesopause) कहलाती है।

4. आयनमण्डल (Ionosphere)-मध्यमण्डल सीमा से परे स्थित यह परत 80 से 400 किलोमीटर की ऊँचाई तक विस्तृत है। इस परत में विद्यमान गैस के कण विद्युत् आवेशित होते हैं। इन विद्युत् आवेशित कणों को आयन कहा जाता है। ये आयन विस्मयकारी विद्युतीय और चुम्बकीय घटनाओं का कारण बनते हैं। इसी परत में ब्रह्माण्ड किरणों का परिलक्षण होता है। आयनमण्डल पृथ्वी की ओर से भेजी गई रेडियो-तरंगों को परावर्तित करके पुनः पृथ्वी पर भेज देता है। इसी मण्डल से उत्तरी ध्रुवीय प्रकाश तथा दक्षिणी ध्रुवीय प्रकाश के दर्शन होते हैं।

5. बाह्यमण्डल (Exosphere) वायुमंडल की यह सबसे ऊपरी परत है। इसे बहिर्मंडल भी कहा जाता है। इसकी वायु अत्यन्त विरल है जो धीरे-धीरे अंतरिक्ष में विलीन हो जाती है। यह सबसे ऊँचा संस्तरन है तथा इसके बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है।

वायुमंडल का संघटन तथा संरचना HBSE 11th Class Geography Notes

→ ब्रह्मांड किरणें (Cosmic Rays)-बाह्य अंतरिक्ष से पृथ्वी पर पहुंचने वाला रहस्यमयी विकिरण।

→ इंद्रधनुष (Rainbow)-बहुरंजित प्रकाश की एक चाप, जो वर्षा की बूंदों द्वारा सूर्य की किरणों के आंतरिक अपवर्तन तथा परावर्तन द्वारा निर्मित होती है।

→ प्रभामंडल (Halo)-सूर्य अथवा चंद्रमा के चारों ओर एक प्रकाश-वलय जो उस समय बनता है जब आकाश में पक्षाभ-स्तरी मेघ की एक महीन परत छायी रहती है। जब सौर प्रभामंडल बन जाता है, तब वह सूर्य की चमक के कारण दिखाई नहीं देता, परंतु गहरे रंग के शीशे से आसानी से देखा जा सकता है।

→ धूम कोहरा (Smog)-अत्यधिक धुएं से भरा कोहरा, जो सामान्य रूप से औद्यौगिक तथा घने बसे नगरीय क्षेत्रों में पाया जाता है। अंग्रेज़ी भाषा के इस शब्द की रचना दो शब्दों स्मोक व फॉग को मिलाकर की गई है।

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 8 वायुमंडल का संघटन तथा संरचना

→ प्रकीर्णन (Scattering)-लघु तरंगी सौर विकिरण का वायुमंडल के धूलकण व जलवाष्पों से टकराकर टूटना।

→ इंटरनेट (Internet) एक ऐसी विद्युतीय व्यवस्था जिसमें सूचना के महामार्ग (Information Superhighway) पर बैठे लाखों, करोड़ों लोगों द्वारा आपस में जुड़े हुए कंप्यूटरों द्वारा सूचनाओं का आदान-प्रदान होता है।

→ वायुमंडल (Atmosphere)-पृथ्वी के चारों तरफ कई सौ कि०मी० की मोटाई में व्याप्त वायु के आवरण को वायुमंडल कहा जाता है।

→ क्षोभमंडल (Troposphere)-भूतल के सम्पर्क में यह वायुमंडल की सबसे निचली परत है जिसका घनत्व सर्वाधिक है।

→ वायु दीप्ति (Air Glow)-आयनमंडल में वायु में एक अजीब चमक होती है जिसे वायु दीप्ति कहा जाता है।

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HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

HBSE 11th Class Geography भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. स्थलरूप विकास की किस अवस्था में अधोमुख कटाव प्रमुख होता है?
(A) तरुणावस्था
(B) प्रथम प्रौढ़ावस्था
(C) अंतिम प्रौढ़ावस्था
(D) वृद्धावस्था
उत्तर:
(A) तरुणावस्था

2. एक गहरी घाटी जिसकी विशेषता सीढ़ीनुमा खड़े ढाल होते हैं; किस नाम से जानी जाती है-
(A) U आकार की घाटी
(B) अंधी घाटी
(C) गॉर्ज
(D) कैनियन
उत्तर:
(D) कैनियन

HBSE 11th Class Geography Solutions Chapter 7 भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास

3. निम्न में से किन प्रदेशों में रासायनिक अपक्षय प्रक्रिया यांत्रिक अपक्षय प्रक्रिया की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होती है-
(A) आर्द्र प्रदेश
(B) शुष्क प्रदेश
(C) चूना-पत्थर प्रदेश
(D) हिमनद प्रदेश
उत्तर:
(A) आर्द्र प्रदेश

4. निम्न में से कौन-सा वक्तव्य लेपीज (Lapies) शब्द को परिभाषित करता है-
(A) छोटे से मध्यम आकार के उथले गर्त
(B) ऐसे स्थलरूप जिनके ऊपरी मुख वृत्ताकार व नीचे से कीप के आकार के होते हैं
(C) ऐसे स्थलरूप जो धरातल से जल के टपकने से बनते हैं
(D) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों
उत्तर:
(D) अनियमित धरातल जिनके तीखे कटक व खाँच हों

5. गहरे, लंबे व विस्तृत गर्त या बेसिन जिनके शीर्ष दीवार खड़े ढाल वाले व किनारे खड़े व अवतल होते हैं, उन्हें क्या कहते हैं?
(A) सर्क
(B) पाश्विक हिमोढ़
(C) घाटी हिमनद
(D) एस्कर
उत्तर:
(A) सर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 30 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
चट्टानों में अधःकर्तित विसर्प और मैदानी भागों में जलोढ़ के सामान्य विसर्प क्या बताते हैं?
उत्तर:
नदी विकास की प्रारंभिक अवस्था में प्रारंभिक मंद ढाल पर विसर्प लूप विकसित होते हैं और ये लूप चट्टानों में गहराई तक होते हैं जो प्रायः नदी अपरदन या भूतल के लगातार उत्थान के कारण बनते हैं। बाढ़ व डेल्टाई मैदानों पर लूप जैसे प्रारूप विकसित होते हैं, जिन्हें विसर्प कहते हैं। नदी विसर्प के निर्मित होने का एक कारण तटों पर जलोढ़ का अनियमित व असंगठित जमाव है। बड़ी नदियों के विसर्प में उत्तल किनारों पर सक्रिय निक्षेपण होते हैं।

प्रश्न 2.
घाटी रंध्र अथवा युवाला का विकास कैसे होता है?
उत्तर:
धरातलीय प्रवाहित जल घोल रंध्रों व विलयन रंध्रों से गुजरता हुआ अन्तभौमि नदी के रूप में विलीन हो जाता है और फिर कुछ दूरी के पश्चात् किसी कंदरा से भूमिगत नदी के रूप में फिर निकल आता है। जब घोलरंध्र व डोलाइन इन कंदराओं की छत से गिरने से या पदार्थों के स्खलन द्वारा आपस में मिल जाते हैं, तो लंबी, तंग तथा विस्तृत खाइयाँ बनती हैं जिन्हें घाटी रंध्र या युवाला कहते हैं।

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प्रश्न 3.
चूनायुक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौम जल प्रवाह अधिक पाया जाता है, क्यों?
उत्तर:
भौम जल का कार्य सभी चट्टानों में नहीं देखा जा सकता। ऐसी चट्टानें जैसे चूना-पत्थर या डोलोमाइट, जिनमें कैल्शियम कार्बोनेट की प्रधानता होती है, वहाँ पर इसकी अधिक मात्रा देखने को मिलती है। इसलिए चूना युक्त चट्टानी प्रदेशों में धरातलीय जल प्रवाह की अपेक्षा भौम जल प्रवाह अधिक पाया जाता है।

प्रश्न 4.
हिमनद घाटियों में कई रैखिक निक्षेपण स्थलरूप मिलते हैं। इनकी अवस्थिति व नाम बताएँ।
उत्तर:
हिमनद घाटियों के रैखिक निक्षेपण स्थलरूप निम्नलिखित हैं-
1. हिमोढ़-हिमोढ़, हिमनद टिल या गोलाश्मी मृत्तिका के जमाव की लंबी कटके हैं। अंतस्थ, हिमोढ़ हिमनद के अंतिम भाग में मलबे के निक्षेप से बनी लंबी कटकें हैं।

2. एस्कर-हिमनद के पिघलने से जल हिमतल के ऊपर से प्रवाहित होता है अथवा इसके किनारों से रिसता है या बर्फ के छिद्रों के नीचे से प्रवाहित होता है। यह जलधारा अपने साथ बड़े गोलाश्म, चट्टानों के टुकड़े और छोटा चट्टानी मलबा बहाकर लाती है जो हिमनद के नीचे इस बर्फ की घाटी में जमा हो जाते हैं फिर ये पिघलकर वक्राकार कटक के रूप में मिलते है, जिन्हें एस्कर कहते हैं।

3. हिमानी धौत मैदान-हिमानी जलोढ़ निक्षेपों से हिमानी धौत मैदान निर्मित होते हैं।

4. ड्रमलिन-ड्रमलिन का निर्माण हिमनद दरारों में भारी चट्टानी मलबे के भरने व उसके बर्फ के नीचे रहने से होता है।

प्रश्न 5.
मरुस्थली क्षेत्रों में पवन कैसे अपना कार्य करती है? क्या मरुस्थलों में यही एक कारक अपरदित स्थलरूपों का निर्माण करता है?
उत्तर:
मरुस्थली धरातल शीघ्र गर्म और ठंडे हो जाते है। ठंड और गर्मी से चट्टानों में दरारें पड़ जाती हैं जो खंडित होकर पवनों द्वारा अपरदित होती रहती हैं। पवनें रेत के कण उड़ाकर अपने आस-पास की चट्टानों का कटाव करती हैं, जिससे कई स्थलाकृतियों का निर्माण होता है। मरुस्थलों में अपक्षय केवल पवन द्वारा ही नहीं, अपितु वर्षा व वृष्टि से भी प्रभावित होता है। मरुस्थलों में नदियाँ चौड़ी, अनियमित तथा वर्षा के बाद अल्प समय तक ही प्रवाहित होती हैं।

निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लगभग 150 शब्दों में दीजिए

प्रश्न 1.
आई व शुष्क जलवायु प्रदेशों में प्रवाहित जल ही सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है। विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
आर्द्र प्रदेशों में अत्यधिक वर्षा होती है। प्रवाहित जल सबसे महत्त्वपूर्ण भू-आकृतिक कारक है, जो धरातल के निम्नीकरण के लिए उत्तरदायी है। प्रवाहित जल के दो तत्त्व हैं-

  • धरातल पर परत के रूप में फैला हुआ प्रवाह।
  • रैखिक प्रवाह, जो घाटियों में नदियों, सरिताओं के रूप में बहता है।

प्रवाहित जल द्वारा निर्मित अधिकतर अपरदित स्थलरूप ढ़ाल प्रवणता के अनुरूप बहती हुई नदियों की आक्रामक युवावस्था से संबंधित हैं। तेज ढाल लगातार अपरदन के कारण मंद ढाल में परिवर्तित हो जाते हैं, जिससे निक्षेपण आरंभ होता है। तेज ढाल से बहती हुई सरिताएँ भी कुछ निक्षेपित भू-आकृतियाँ बनाती हैं, लेकिन ये नदियों के मध्यम तथा धीमे ढाल पर बने आकारों की अपेक्षा बहुत कम होते हैं। प्रवाहित जल का ढाल जितना मंद होगा उतना ही अधिक निक्षेपण होगा।

जब लगातार अपरदन के कारण नदी तल समतल हो जाए, तो अधोमुखी कटाव कम हो जाता है और तटों का पार्श्व अपरदन बढ़ जाता है और इसके फलस्वरूप पहाड़ियाँ और घाटियाँ समतल मैदानों में परिवर्तित हो जाती हैं। शुष्क क्षेत्रों में अधिकतर स्थलाकृतियों का निर्माण बृहत् क्षरण और प्रवाहित जल की चादर बाढ़ से होता है। मरुस्थलीय चट्टानें अत्यधिक वनस्पति-विहीन होने के कारण तथा दैनिक तापांतर के कारण यांत्रिक एवं रासायनिक अपक्षय से अधिक प्रवाहित होती हैं। मरुस्थलीय भागों में • भू-आकृतियों का निर्माण सिर्फ पवनों से नहीं बल्कि प्रवाहित जल से भी होता है।

प्रश्न 2.
चूना चट्टाने आई व शुष्क जलवायु में भिन्न व्यवहार करती हैं क्यों? चूना प्रदेशों में प्रमुख व मुख्य भू-आकृतिक प्रक्रिया कौन सी हैं और इसके क्या परिणाम हैं?
उत्तर:
चूना-पत्थर एक घुलनशील पदार्थ है, इसलिए चूना-पत्थर आर्द्र जलवायु में कई स्थलाकृतियों का निर्माण करता है जबकि शुष्क प्रदेशों में इसका कार्य आर्द्र प्रदेशों की अपेक्षा कम होता है। चूना पत्थर एक घुलनशील पदार्थ होने के कारण चट्टान पर इसके रासायनिक अपक्षय का प्रभाव सर्वाधिक होता है, लेकिन शुष्क जलवायु वाले प्रदेशों में यह अपक्षय के लिए अवरोधक होता है। लाइमस्टोन की रचना में समानता होती है तथा परिवर्तन के कारण चट्टान में फैलाव तथा संकुचन नहीं होता जिस कारण चट्टान का बड़े-बड़े टुकड़ों में विघटन अधिक मात्रा में नहीं हो पाता। डोलोमाइट चट्टानों के क्षेत्र में भौमजल द्वारा घुलन क्रिया और उसकी निक्षेपण प्रक्रिया से बने ऐसे स्थलरूपों को कार्ट स्थलाकृति का नाम दिया गया है।

अपरदनात्मक तथा निक्षेपणात्मक दोनों प्रकार के स्थलरूप कार्ट स्थलाकृतियों की विशेषताएँ हैं। अपरदित स्थलरूप घोलरंध्र, कुंड, लेपीज और चूना पत्थर चबूतरे हैं। चूनायुक्त चट्टानों के अधिकतर भाग गर्तों व खाइयों के हवाले हो जाते हैं और पूरे क्षेत्र में अत्यधिक अनियमित, पतले व नुकीले कटक आदि रह जाते हैं, जिन्हें लेपीज कहते है। कभी-कभी लेपिज के विस्तृत क्षेत्र समतल चुनायुक्त चूबतरों में परिवर्तित हो जाते हैं।

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प्रश्न 3.
हिमनद ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों को निम्न पहाड़ियों व मैदानों में कैसे परिवर्तित करते हैं या किस प्रक्रिया से यह कार्य सम्पन्न होता है बताएँ?
उत्तर:
महाद्वीपीय हिमनद या गिरिपद हिमनद वे हिमनद हैं, जो वृहत् समतल क्षेत्र पर हिम परत के रूप में फैले हों तथा पर्वतीय या घाटी हिमनद वे हिमनद हैं, जो पर्वतीय ढालों में बहते हैं। प्रवाहित जल के विपरीत हिमनद प्रवाह बहुत धीमा होता है। हिमनद प्रतिदिन कुछ सेंटीमीटर या इससे कम से लेकर कुछ मीटर तक प्रवाहित हो सकते हैं। हिमनद मुख्यतः गुरुत्व बल के कारण गतिमान होते हैं। हिमनदों से प्रबल अपरदन होता है जिसका कारण इसके अपने भार से उत्पन्न घर्षण है। हिमनद द्वारा कर्षित चट्टानी पदार्थ, इसके तल में ही इसके साथ घसीटे जाते हैं या घाटी के किनारों पर अपघर्षण व घर्षण द्वारा अत्यधिक अपरदन करते हैं। हिमनद अपक्षय-रहित चट्टानों का भी प्रभावशाली अपरदन करते हैं जिससे ऊँचे पर्वत छोटी पहाड़ियों व मैदानों में परिवर्तित हो जाते हैं।

हिमनद के लगातार संचलित होने से हिमनद मलबा हटता है, विभाजक नीचे हो जाता है और ढाल इतने निम्न हो जाते हैं कि हिमनद की संचलन शक्ति समाप्त हो जाती है तथा निम्न पहाड़ियों व अन्य निक्षेपित स्थलरूपों वाला एक हिमानी धौत रह जाता है।

भू-आकृतियाँ तथा उनका विकास HBSE 11th Class Geography Notes

→ लोएस (Loess)-पवन द्वारा उड़ाकर जमा किए गए धूल के पीले या स्लेटी रंग के निक्षेप।

→ भू-आकृति (Land Forms)-छोटे-से मध्यम आकार के भूखण्ड को भू-आकृति कहा जाता है।

→ हिमनदी/हिमानी (Glacier) कर्णहिम (Neve) के पुनर्पटन (Recrystallisation) से बनी हिम की विशाल संहतराशि जो धरातल पर गुरुत्वाकर्षण के प्रभावाधीन बहती है, हिमनदी या हिमानी कहलाती है।

→ जल-प्रपात (Water Falls)-चट्टानी कगार के ऊपरी भाग से नदी का सीधे नीचे गिरना जल-प्रपात कहलाता है।

→ नदी तंत्र (River System) मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों को मिलाकर बना एक तंत्र।

→ भूगु (Cliff)-एकदम खड़े समुद्री तट को भृगु कहा जाता है।

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