Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० जवाहर लाल नेहरू के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे। वे इस पद पर 1947 से 1964 तक रहे। मई, 1964 में पं० नेहरू की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय देश की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां ठीक नहीं थीं। राजनीतिक तौर पर 1962 में चीन से हार, भारत में पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक स्तर पर भारत में बढ़ती हुई ग़रीबी एवं पड़ने वाला भयंकर अकाल। इन परिस्थितियों में पं० नेहरू का जाना भारत के लिए एक त्रासदी से कम नहीं था।

पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे। कुछ विदेशी विद्वानों का यह मत था कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारत में लोकतन्त्र समाप्त हो जाएगा तथा पाकिस्तान की तरह सैनिक तानाशाही स्थापित हो जाएगी क्योंकि भारत में पं० नेहरू के पश्चात् ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो पं० नेहरू की तरह प्रजातन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में पूरी तरह विश्वास रखता हो तथा उसे चला सकता हो।

परन्तु विदेशी विद्वानों की ऐसी भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं, बल्कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारतीय लोकतन्त्र और अधिक मज़बूत होकर विश्व परिदृश्य पर उभरा। पं० नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पहले श्री लाल बहादुर शास्त्री तथा बाद में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सफलतापूर्वक कार्य किया।

1. श्री लाल बहादर शास्त्री-पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु 27 मई, 1964 को हुई और प्रधानमन्त्री का पद रिक्त हो गया, परन्तु प्रधानमन्त्री पद के लिए कांग्रेस में कोई बड़ा घमासान या संघर्ष नहीं हुआ। कांग्रेस के मुख्य नेताओं में प्रधानमन्त्री पद के लिए एकमतता न होने के कारण श्री लाल बहादुर शास्त्री को एक मध्यमार्गी उम्मीदवार के रूप में भारत का प्रधानमन्त्री बनाया गया। इस एक घटना से भारत सहित पूरे विश्व में यह सन्देश पहुंचा कि कांग्रेस पार्टी एक राजनीतिक दल के रूप में परिपक्व हो गई है तथा भारत पं० नेहरू के पश्चात् भी लोकतन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में गहरा विश्वास रखता है।

शास्त्री जी नेहरूवादी समाजवादी थे, वे उदारवादी, सरल भाषी परन्तु दृढ़ संकल्पी थे। उन्होंने 9 जून, 1964 को प्रधानमन्त्री के पद का कार्यभार सम्भाला। पं० नेहरू के मन्त्रिमण्डल में वे एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार के रूप में जाने जाते थे। पं० नेहरू के आग्रह पर शास्त्री जी ने असम में भाषायी दंगों एवं श्रीनगर में हज़रत बल दरगाह से चोरी हुए एक पवित्र समृति चिह्न से उत्पन्न हुई समस्याओं को कुशलतापूर्वक सुलझाया। शास्त्री जी ने जब देश की बागडोर सम्भाली, उस समय भारत विकट समस्याओं में घिरा हुआ था।

भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी अनुभव हो रही थी। अतः शास्त्री जी ने कृषि पर विशेष ध्यान दिया। इसलिए उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। शास्त्री जी की सरल एवं उदार छवि के कारण पाकिस्तान ने अपनी सैनिक शक्ति से भारत को डराने का प्रयास किया तथा 1965 में जम्मू कश्मीर पर भयंकर आक्रमण भी कर दिया।

परन्तु शास्त्री जी की सूझ-बूझ एवं कुशल नेतृत्व से भारत ने न केवल पाकिस्तान का साहसपूर्वक सामना ही किया, बल्कि युद्ध में विजयी होकर उभरे। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हुआ और ताशकन्द में ही जनवरी, 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। शास्त्री जी लगभग 20 महीने ही देश के प्रधानमन्त्री रहे थे, परन्तु इस छोटी सी अवधि में भी उन्होंने देशवासियों पर गम्भीर छाप छोड़ी।

2. श्रीमती इन्दिरा गांधी-शास्त्री जी की असामयिक मृत्यु के पश्चात् देश एवं कांग्रेस के सामने पुनः यह प्रश्न पैदा हो गया कि देश का प्रधानमन्त्री कौन बने। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं की यह राय थी कि पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए क्योंकि पं० नेहरू की बेटी होने के कारण उन्हें देश एवं विदेश में ख्याति एवं सम्मान प्राप्त है। परन्तु कांग्रेस में मोरारजी देसाई इस पक्ष में नहीं थे कि श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए, बल्कि वह स्वयं देश का प्रधानमन्त्री बनना चाहते थे।

अत: उन्होंने मत विभाजन का सुझाव दिया। अतः 19 जनवरी, 1966 को कांग्रेस में नेतृत्व के लिए पहली बार मतदान हुआ। यह देश एवं कांग्रेस के लिए एक ऐतिहासिक दिन था, क्योंकि पं० नेहरू के जीवनकाल में इस प्रकार के मत-विभाजन के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता था। इस मत विभाजन में श्रीमती इन्दिरा गांधी के पक्ष में 355 एवं विपक्ष में 169 वोट पड़े। मत विभाजन से स्पष्ट पता चलता है कि अधिकांश कांग्रेसी पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को ही देश का प्रधानमन्त्री बनाना चाहते थे।

कुछ विद्वानों का यह मत है कि अधिकांश कांग्रेसियों ने श्रीमती गांधी को इसलिए प्रधानमन्त्री बनाया, क्योंकि वे केन्द्र में अपने लिए एक अहानिकारक व्यक्ति को प्रधानमन्त्री के रूप में देखना चाहते थे। इस दृष्टिकोण में श्रीमती गांधी, मोरारजी देसाई के मुकाबले कांग्रेसी नेताओं के लिए कम हानिकारक थीं। 1967 में होने वाले लोकसभा के चुनावों में भी जीतकर श्रीमती गांधी देश की प्रधानमन्त्री बनी रहीं। अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में श्रीमती गांधी ने ऐसे कई कार्य किए जिससे कांग्रेस प्रणाली- चुनौ देश प्रगति कर सके।

उन्होंने कृषि कार्यों को बढ़ावा दिया। ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया तथा देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। श्रीमती गांधी को 1971 में असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जब पूर्वी पाकिस्तान के कारण भारत एवं पाकिस्तान के मध्य भयंकर युद्ध शुरू हो गया। परन्तु 1971 का युद्ध भारत एवं श्रीमती गांधी के लिए एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ तथा इस युद्ध के जीतने पर विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि पं० नेहरू के बाद भी उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने देश को कुशल नेतृत्व प्रदान किया तथा देश को विकास के पथ पर ले गए।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 2.
1967 के गैर-कांग्रेसवाद एवं चुनावी बदलाव का वर्णन करें।
उत्तर:
1967 के चौथे आम चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चुनावों में पहली बार कांग्रेस को ऐसा अनुभव हुआ कि जनता पर से उसकी पकड़ ढीली हो रही है। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। केन्द्र में जहां कांग्रेस मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई, वहीं 8 राज्य विधानसभाओं (बिहार, केरल, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर-प्रदेश तथा पश्चिम का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप कांग्रेस 8 में से 7 राज्यों में सरकार बनाने में असफल रही।

उत्तर प्रदेश में उसने जोड़-तोड़ करके सरकार बनाई, परन्तु वह अधिक समय तक नहीं चल पाई। केन्द्र में कांग्रेस पार्टी को मुश्किल से ही बहुमत प्राप्त हो पाया था। 1967 के चौथे आम चुनावों में लोकसभा की 520 सीटों के लिए मतदान हुआ, जिसमें विभिन्न दलों की स्थिति इस प्रकार रही
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चौथी लोकसभा की दलीय स्थिति से यह स्पष्ट पता चलता है कि जिस कांग्रेस पार्टी ने पहले तीन आम चुनावों में जिन विरोधी दलों को बुरी तरह से हराया, वे दल चौथे लोक सभा चुनाव में बहुत अधिक सीटों पर चुनाव जीत गए। इसी तरह राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति 1967 के आम चुनाव में ठीक नहीं थी। 16 राज्यों की जिन विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए उनमें से 8 राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 1967 में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनावों वाले राज्यों में से कुछ राज्य विधानसभाओं में दलीय स्थिति अग्र प्रकार
से रही
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उपरोक्त दलीय स्थिति (मध्य प्रदेश को छोड़कर) को देखकर यह कहा जा सकता है कि 1967 के चुनाव बहुत बड़े उल्ट फेर वाले रहे। इस चुनाव में केन्द्र में कांग्रेस जहां अपनी सरकार बनाने में सफल रही, वहीं 7 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। इससे पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर गैर-कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 3.
1969 में कांग्रेस में विभाजन के क्या कारण थे ?
उत्तर:
1969 का वर्ष कांग्रेस पार्टी के आन्तरिक राजनीति के लिए ऐतिहासिक वर्ष रहा। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा भूमि सुधार लागू करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना तथा राष्ट्रपति के पद के लिए कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार (नीलम संजीवा रेड्डी) के विरुद्ध अपना उम्मीदवार (वी० वी० गिरी) खड़ा करना, जैसी कुछ ऐसी घटनाएं थीं, जिन्हें निजलिंगप्पा तथा सिंडीकेट ने पसन्द नहीं किया। इसीलिए कांग्रेस में धीरे-धीरे आन्तरिक कलह बढ़ती रही, जो आगे चलकर विभाजन के रूप में सामने आई। 1969 में कांग्रेस में विभाजन के मुख्य कारण इस प्रकार थे

1. दक्षिण-पंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह (Tussle over drift to Right or Left):
1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्य विधानसभाओं में हार का सामना करना पड़ा। अतः कांग्रेस में यह मंथन होने लगा, कि किस तरह कांग्रेस को राज्यों में मज़बूत किया जाए। कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह विचार था कि राज्यों में कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि कुछ अन्य कांग्रेसियों का यह मत पा कि कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा की अपेक्षा वामपंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चलना चाहिए। इस प्रकार की कलह 1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक मुख्य कारण बनी।।

2. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद (Difference over the candidate of the post of President):
कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर भी मतभेद था। श्रीमती इन्दिरा गांधी जहां ज़ाकिर हसैन को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहती थी, वहीं कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

3. युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह (Tussle between Yuva Turks and Syndicate):
1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन का एक कारण युवा तुर्क (चन्द्रशेखर, चरणजीत यादव, मोहन धारीया, कृष्ण कान्त एवं आर० के० सिन्हा) तथा सिंडीकेट (कामराज, एस० के० पाटिल, अतुल्य घोष एवं निजलिंगप्पा) के बीच होने वाली कलह थी। जहां युवा तुर्क बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं राजाओं के प्रिवी पों को समाप्त करने के पक्ष में था, वहीं सिंडीकेट इसका विरोध कर रहा था।

4. 1969 का राष्ट्रपति चुनाव (Election of President 1969):
कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य महा पूर्ण कारण 1969 में हुआ राष्ट्रपति का चुनाव था। मई, 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् देश का राष्ट्रपति कौन बनेगा, एक विषय पर कांग्रेस में मतभेद थे। 1971 में होने वाले लोकसभा चुनावों के विषय में कांग्रेस एवं दलों का यह अनुमान था कि 1971 के चुनावों में यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो उस स्थिति में राष्ट्रपति की भमिका महत्त्वपर्ण हो जायेगी. क्योंकि तब राष्ट्रपति अपने विवेक के आधार पर किस बनाने के लिए आमन्त्रित करेगा।

अत: प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी पसन्द का राष्ट्रपति चाहते थे। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में जगजीवन राम का नाम राष्ट्रपति पद के लिए उठाया, परन्तु सिंडीकेट ने इसका विरोध किया तथा उन्होंने नीलम संजीवा रेड्डी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनुमोदित किया, जिसे स्वीकार कर लिया। परन्तु श्रीमती गांधी इससे सन्तुष्ट नहीं हुईं तथा उन्होंने अपनी ही पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवार के विरुद्ध अपना उम्मीदवार (वी० वी० गिरी) खड़ा कर दिया तथा वी० वी० गिरी चुनाव जीत भी गए। इस घटना से कांग्रेस के आन्तरिक मतभेद बढ़ गए।

5. मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना (Taking away Finance Department from Morarji Desai):
1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य कारण प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना था। मोरारजी देसाई ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए मन्त्रिमण्डल से त्याग-पत्र दे दिया। सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री की इस कार्यवाही का विरोध किया। मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेने के बाद मन्त्रिमण्डल ने सर्वसम्मति से बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रस्ताव को पास कर दिया

6. सिंडीकेट पर दक्षिणपंथियों के साथ गुप्त समझौते का आरोप (Alleged secret deal of the Syndicate with Rightist Parties):
कांग्रेस ने जब राष्ट्रपति पद के लिए नीलम संजीवा रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया, तो कार्यवाहक राष्ट्रपति वी० वी० गिरी ने भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। सिंडीकेट को यह लगा कि वी० वी० गिरी ने श्रीमती इन्दिरा गांधी के कहने पर घोषणा की है, जबकि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ऐसे किसी भी घटनाक्रम से अपने आप को अलग बताया। परन्तु सिंडीकेट को यह आभास हो गया कि राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार (नीलम संजीवा रेडी) के लिए राह आसान नहीं है।

अतः निजलिंगप्पा ने इस विषय में जनसंघ तथा स्वतन्त्र पार्टी से बातचीत करनी शुरू की तथा उनसे अनुरोध किया, कि यदि आप नीलम संजीवा रेड्डी के लिए पहली प्राथमिकता नहीं डाल सकते, तो दूसरी प्राथमिकता (Preference) अवश्य डालें। इस पर जगजीवन तथा फखरुद्दीन अली अहमद ने निजलिंगप्पा से यह पूछा कि उन्होंने किस आधार पर उन दलों से बातचीत की। इन दोनों नेताओं ने सिंडीकेट पर दक्षिणपंथियों के साथ गुप्त समझौता करने का आरोप लगाया। इससे कांग्रेस का आन्तरिक वातावरण और खराब हो गया।

7. श्रीमती इन्दिरा गांधी पर साम्यवादियों का साथ देने का आरोप (Alleged Truce of Indira with Communists):
जिस प्रकार जगजीवन राम तथा फखरुद्दीन अली अहमद ने सिंडीकेट पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने दक्षिणपंथियों से गुप्त समझौता कर रखा है, वहीं सिंडीकेट ने श्रीमती इन्दिरा गांधी पर यह आरोप लगाया कि वह कांग्रेस में वामपंथ को बढ़ावा दे रही है। इस विषय पर सिंडीकेट एवं श्रीमती इन्दिरा गांधी के समर्थकों के बीच विवाद गहराता जा रहा था।

8. सिंडीकेट द्वारा श्रीमती इन्दिरा गांधी को पद से हटाने का प्रयास (Syndicate tried for removal of Indira from the Post of EM.):
1969 में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के राष्ट्रपति चुनावों में हार जाने के बाद सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को पद से हटाने का प्रयास किया। परन्तु इसके विरोध में 60 से अधिक कांग्रेसी सदस्यों ने निजलिंगप्पा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात की। 23 अगस्त, 1969 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में अधिकांश सदस्यों ने श्रीमती गांधी के पक्ष में विश्वास व्यक्त किया। उपरोक्त घटनाओं के कारण कांग्रेस की आन्तरिक कलह इतनी बढ़ गई कि नवम्बर, 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया।

प्रश्न 4.
1971 में पांचवें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर एक नोट लिखें।
अथवा
1970 के दशक के प्रारम्भ में इन्दिरा गांधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा चुनाव कई पक्षों से ऐतिहासिक थे। श्रीमती गांधी को जहां व्यक्तिगत स्तर पर लोगों का विश्वास जीतना था, वहीं पर अपनी नीतियों के प्रति लोगों की राय भी जाननी थी। 1971 के लोकसभा चुनावों के परिणामों की जब घोषणा की गई, तो श्रीमती गांधी को लोगों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। श्रीमती गांधी को लोकसभा की 518 सीटों में से 352 सीटें प्राप्त हुईं। 1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति इस प्रकार है
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1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति से साफ पता चलता है कि लोगों ने श्रीमती गांधी को जीताकर उन्हें एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्वीकार कर लिया था। वास्तव में 1971 की कांग्रेस विजय, श्रीमती गांधी की ही विजय मानी जाती है। क्योंकि श्रीमती गांधी ने चुनाव प्रचार में एक तरह से स्वयं को भी एक मुद्दा बना रखा था।

जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विपक्षियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि लोगों ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द किया तथा श्रीमती गांधी को पूर्ण बहुमत प्रदान किया। 1971 के पांचवें लोकसभा चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गांधी एवं कांग्रेस (आर०) की जीत के निम्नलिखित कारण थे

1. श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व (Chrismatic Leadership of Mrs. Gandhi):
1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा कारण श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को कुशलता से पुनर्जीवित किया तथा देश के विकास के लिए कई नीतियां बनाईं। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तथा महाराजाओं के प्रिवी पर्सी को बन्द कर दिया। 1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं से सम्पर्क साधा तथा मतदाताओं को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों से अवगत कराया।

2. समाजवादी नीतियां (Socialistic Policies):
1971 के चुनावों में कांग्रेस की जीत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण श्रीमती गांधी द्वारा अपनाई गई समाजवादी नीतियां थीं। उन्होंने प्रत्येक चुनाव रैली में समाजवाद के विषय में बढ़-चढ़ कर बातें की। जब किसी ने उनसे जानना चाहा कि वे समाजवाद पर इतना अधिक जोर क्यों दे रही हैं, तो श्रीमती गांधी का उत्तर था कि लोग यही सुनना पसन्द करते हैं। अतः श्रीमती गांधी ने अपने समाजवादी भाषणों तथा नीतियों से 1971 का चुनाव जीता था।

3. ग़रीबी हटाओ का नारा (Slogan of Garibi Hatao):
1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारण उनके द्वारा दिया गया, ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा था। इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जिसे मतदाताओं ने पसन्द नहीं किया और भारी संख्या में लोगों ने कांग्रेस को वोट डालें। ग़रीबी हटाने के लिए श्रीमती गांधी ने चुनाव घोषणा पत्र में नीतियों एवं कार्यक्रमों का वर्णन किया।

4. कांग्रेस दल पर श्रीमती गांधी की पकड़ (Hold of Mrs. Gandhi on Congress Party):
1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि श्रीमती गांधी की अपने दल पर पूरी पकड़ एवं प्रभाव था। 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पश्चात् श्रीमती गांधी पूरी तरह पार्टी पर छा गईं। कांग्रेस पार्टी में कोई भी नेता उनकी आज्ञा की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

5. श्रीमती गांधी के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण (Polarisation of vote in favour of Mrs. Gandhi):
1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि इन चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण श्रीमती गांधी एवं उनकी पार्टी के पक्ष में हुआ। समाज के सभी वर्गों ने श्रीमती गांधी के पक्ष में वोट डाले। यही कारण था, कि श्रीमती गांधी 1971 के चुनावों में प्रथम तीन चुनावों का इतिहास दोहरा सकीं। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि 1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने मतदाताओं की इच्छाओं को भांप लिया था तथा उसी के अनुसार अपनी नीतियां एवं कार्यक्रम बनाए, जिसके कारण श्रीमती गांधी को इतनी बड़ी चुनावी सफलता मिली।

प्रश्न 5.
‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा चुनाव कई पक्षों से ऐतिहासिक माने जाते हैं। इन चुनावों में भारी बहुमत से जीतकर श्रीमती गांधी जहां कांग्रेस की निर्विवाद नेता बन गई हैं, वहीं उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नये नारे को जन्म दिया, जिसे ‘ग़रीबी हटाओ’ कहा जाता है। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार श्रीमती गांधी की चुनावी विजय में इस नारे की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। परन्तु मतदाताओं ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द करते हुए श्रीमती गांधी को भारी बहुमत से विजय दिलाई। श्रीमती गांधी के इस नारे ने जहां मतदाताओं को प्रभावित किया वहां पुनर्गठन के दौर से गुजर रही कांग्रेस में नये रक्त का संचार भी किया। श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे के अन्तर्गत ग़रीबों के निरन्तर विकास की बात कही।

‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा। इससे मतदाताओं को यह आभास हुआ कि कांग्रेस पार्टी वास्तव में ही ग़रीबों की ग़रीबी दूर करना चाहती है, अतः उन्होंने बाकी सभी दलों को हराते हुए श्रीमती गांधी एवं उनके दल को विजयी बनाया।

परन्तु 1971 के चुनावों के पश्चात् भारत एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ ऐसी घटनाएं घटीं कि श्रीमती गांधी के लिए अब ‘ग़रीबी हटाओ’ के अन्तर्गत शुरू किये गए कार्यक्रमों के लिए आबंटित धन में कमी करना आवश्यक हो गया। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, बढ़ती हुई महंगाई एवं मुद्रा स्फीति की दर तथा 1973 में विश्व स्तर पर पैदा हुए तेल संकट ने श्रीमती गांधी के ‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम को गहरा आघात पहुंचाया। 1974-1975 में श्रीमती गांधी ने ग़रीबी उन्मूलन के लिए जो धन आबंटित किया था, उनमें एक तिहाई की कटौती कर दी गई। परन्तु इसके साथ ही श्रीमती गांधी ने कुछ अन्य प्रयास भी किए। श्रीमती गांधी ने 1975 में ग़रीबी हटाने के लि शुरुआत की, जिसके द्वारा गरीबी को (विशेषकर ग्रामीण ग़रीबी को) दूर करने का प्रयास किया गया। परन्तु ये उपाय पर्याप्त नहीं थे।

जब श्रीमती गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा कमजोर पड़ने लगा, तब जनता ने जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में श्रीमती गांधी के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया तथा श्रीमती गांधी की राजनीतिक विफलताओं एवं कमजोरियों को लोगों के सामने लाना शुरू कर दिया। दूसरे शब्दों में जय प्रकाश नारायण ने श्रीमती गांधी के लिए राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया।

इसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया। परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलने लगीं कि अन्ततः श्रीमती गांधी को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। केवल पांच साल के अन्दर ही श्रीमती गांधी की ‘गरीबी हटाओ’ की राजनीति असफल हो गई तथा 1977 के चुनावों में लोगों ने श्रीमती गांधी को ऐतिहासिक पराजय का सामना करवाया तथा सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी।

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प्रश्न 6.
1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के सन्दर्भ में सिंडीकेट’ से क्या अभिप्राय है ? सिंडीकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर:
1960 के दशक में कांग्रेस पार्टी में एक समूह बहुत अधिक शक्तिशाली था, जिसे सिंडीकेट कहा जाता है। सिंडीकेट में अनुभवी कांग्रेसी नेता शामिल थे, जिनमें कामराज, एस० के० पाटिल, अतुल्य घोष एवं निजलिंगप्पा शामिल थे। सिंडीकेट ने कांग्रेस की नीतियों एवं कार्यक्रमों एवं निर्णयों को सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग से प्रभावित किया।

मई, 1964 में पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात् किसे देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए, यह बहुत बड़ा प्रश्न था। इस समस्या को हल करने में सिंडीकेट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिंडीकेट ने श्री लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमन्त्री बनवाने में कांग्रेस में सहमति बनाई। जनवरी, 1966 में श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारत की प्रधानमन्त्री बनाने में सिंडीकेट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं तथा मुख्यमन्त्रियों ने श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारत की प्रधानमन्त्री बनना स्वीकार कर लिया, परन्तु मोरारजी देसाई स्वयं प्रधानमन्त्री बनाना चाहते थे।

अत: उन्होंने नेतृत्व के लिए प्रतियोगिता करने का निर्णय किया। सिंडीकेट ने इस बात को सुनिश्चित किया कि मत विभाजन के समय श्रीमती इन्दिरा गांधी की जीत निश्चित हो। अतः सिंडीकेट की सहायता से ही श्रीमती इन्दिरा गांधी कांग्रेस संसदीय दल की नेता चुनी गईं। इस प्रकार श्री जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनवाने में तथा अलग-अलग राज्यों में मुख्यमन्त्री एवं राज्यपालों के सम्बन्ध में निर्णय लेने में भी इस संगठन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० जवाहर लाल नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकार पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं०. जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे। वे इस पद पर 1947 से 1964 तक रहे। मई, 1964 में पं० नेहरू की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय देश की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां ठीक नहीं थीं। राजनीतिक तौर पर 1962 में चीन से हार, भारत में पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक स्तर पर भारत में बढ़ती हुई ग़रीबी एवं पड़ने वाला भयंकर अकाल, इन परिस्थितियों में पं० नेहरू का जाना भारत के लिए एक त्रासदी से कम नहीं था। पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे।

कुछ विदेशी विद्वानों का यह मत था कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो पं० नेहरू की तरह प्रजातन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में पूरी तरह विश्वास रखता हो तथा उसे चला सकता हो। परन्तु विदेशी विद्वानों की ऐसी भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं, बल्कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारतीय लोकतन्त्र और अधिक मज़बूत होकर विश्व परिदृश्य पर उभरा। पं० नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पहले श्री लाल बहादुर शास्त्री तथा बाद में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सफलतापूर्वक कार्य किया।

प्रश्न 2.
श्री लाल बहादुर शास्त्री के विषय में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
पं० नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् कांग्रेस के मुख्य नेताओं में प्रधानमन्त्री पद के लिए एकमतता न होने के कारण श्री लाल बहादुर शास्त्री को एक मध्यमार्गी उम्मीदवार के रूप में भारत का प्रधानमन्त्री बनाया गया। इस एक घटना से श्व में यह सन्देश पहंचा कि कांग्रेस पार्टी एक राजनीतिक दल के रूप में परिपक्व हो गयी है तथा भारत पं० नेहरू के पश्चात् भी लोकतन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में गहरा विश्वास रखता है। शास्त्री जी नेहरूवादी समाजवादी थे, वे उदारवादी, सरलभाषी परन्तु दृढ़ संकल्पी थे। उन्होंने 9 जून, 1964 को प्रधानमन्त्री के पद का कार्यभार सम्भाला। पं० नेहरू के मन्त्रिमण्डल में वे एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार के रूप में जाने जाते थे।

पं० नेहरू के आग्रह पर शास्त्री जी ने असम में भाषायी दंगों एवं श्रीनगर में हजरत बल दरगाह से चोरी हुए एक पवित्र स्मृति चिह्न से उत्पन्न हुई समस्याओं को कु पूर्वक सुलझाया। शास्त्री जी ने जब देश की बागडोर सम्भाली, उस समय भारत विकट समस्याओं से घिरा हुआ था। भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी अनुभव हो रही थी।

अतः शास्त्री जी ने कृषि पर विशेष ध्यान दिया। इसीलिए उन्होंने जय जवान जय किसान का नारा दिया। शास्त्री जी ने अपनी सूझ-बूझ से न केवल 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण का सामना ही किया, बल्कि युद्ध में पाकिस्तान को हराया। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द में समझौता हुआ और ताशकन्द में ही जनवरी, 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। शास्त्री जी लगभग 20 महीने ही देश के प्रधानमन्त्री थे, परन्तु इस छोटी-सी अवधि में भी उन्होंने देशवासियों पर गम्भीर छाप छोड़ी।

प्रश्न 3.
श्री लाल बहादुर शास्त्री के उत्तराधिकारी के रूप में श्रीमती इन्दिरा गांधी पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के पश्चात् देश एवं कांग्रेस के सामने पुन: यह प्रश्न पैदा हो गया कि देश का प्रधानमन्त्री कौन बने। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं की यह राय थी कि पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए। परन्तु मोरारजी देसाई भी प्रधानमन्त्री बनने के इच्छुक थे, इसलिए उन्होंने मत विभाजन का सुझाव दिया।

मत विभाजन में श्रीमती गांधी के पक्ष में 355 एवं विपक्ष में 169 वोट पड़े। कुछ विद्वानों का यह मत था कि अधिकांश कांग्रेसियों ने श्रीमती गांधी को इसलिए प्रधानमन्त्री बनाया क्योंकि वे केन्द्र में अपने लिए एक अहानिकारक व्यक्ति को प्रधानमन्त्री के रूप में देखना चाहते थे। इस दृष्टिकोण से श्रीमती गांधी, मोरारजी देसाई के मुकाबले कांग्रेसी नेताओं के लिए कम हानिकारक थीं।

1967 में होने वाले लोकसभा के चुनावों में भी जीतकर श्रीमती गांधी देश की प्रधानमन्त्री बनी रहीं। अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में श्रीमती गांधी ने ऐसे कई कार्य किये जिससे देश प्रगति कर सके। उन्होंने कृषि कार्यों को बढ़ावा दिया। ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया तथा देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। श्रीमती गांधी को 1971 में असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जब पूर्वी पाकिस्तान के कारण भारत एवं पाकिस्तान के मध्य भयंकर युद्ध शुरू हो गया। परन्तु 1971 का युद्ध भारत एवं श्रीमती गांधी के लिए एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ तथा इस युद्ध के जीतने पर विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

प्रश्न 4.
1967 के गैर-कांग्रेसवाद एवं चुनावी बदलाव का वर्णन करें।
अथवा
1967 में हुए चौथे आम चुनाव पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1967 के चौथे आम चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चुनावों में पहली बार कांग्रेस को यह अनुभव हुआ कि जनता पर से उसकी पकड़ ढीली हो रही है। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। केन्द्र में जहां कांग्रेस मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई. वहीं 8 राज्य विधानसभाओं (बिहार, केरल, मद्रास, उडीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल) में हार का सामना करना पड़ा।

लोकसभा की कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को केवल 283 सीटें ही मिल पाईं। अत: जिस कांग्रेस पार्टी ने पहले तीन आम चुनावों में जिन विरोधी दलों को बुरी तरह से हराया, वे दल चौथे लोकसभा चुनाव में बहुत अधिक सीटों पर चुनाव जीत गए। इसी तरह राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति 1967 के आम चुनावों में 1967 के आम चुनाव बहुत बड़े उलट-फेर वाले रहे। इससे पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर गैर कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 5.
कांग्रेस में फूट के मुख्य कारण क्या थे ?
उत्तर:
1. दक्षिण पंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह-1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्य विधानसभाओं में हार का सामना करना पड़ा। अत: कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह विचार था कि राज्यों में कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि कुछ अन्य कांग्रेसियों का यह मत था कि कांग्रेस को वामपंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चलना चाहिए।

2. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद-कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर मतभेद था। श्रीमती इन्दिरा गांधी जहां जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहती थीं, वहीं कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

3. युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह-1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन का एक कारण युवा तुर्क तथा सिंडीकेट के बीच होने वाली कलह थी। जहां युवा तुर्क बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं राजाओं के प्रिवी पों को समाप्त करने के पक्ष में था, वहीं सिंडीकेट इसका विरोध कर रहा था।

4. मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना-1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य कारण प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना था। मोरारजी देसाई ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए मन्त्रिमण्डल से त्याग-पत्र दे दिया। सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री की इस कार्यवाही का विरोध किया।

प्रश्न 6.
1971 में पांचवें लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की जीत के क्या कारण थे ?
अथवा
1970 के दशक में इन्दिरा गांधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हई थी?
उत्तर:
1. श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व-1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा कारण श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को कुशलता से पुनर्जीवित किया। श्रीमती गांधी ने व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं से सम्पर्क साधा तथा मतदाताओं को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों से अवगत कराया।

2. समाजवादी नीतियां-1971 के चुनावों में कांग्रेस की जीत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण श्रीमती गांधी द्वारा अपनाई गई समाजवादी नीतियां थीं। उन्होंने प्रत्येक चुनाव रैली में समाजवाद के विषय में बढ़-चढ़ कर बातें की। जब किसी ने उनसे जानना चाहा कि वे समाजवाद पर इतना अधिक ज़ोर क्यों दे रही है, तो श्रीमती गांधी का उत्तर था, कि
लोग यही सुनना पसन्द करते हैं।

3. ग़रीबी हटाओ का नारा-1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारण उनके द्वारा दिया गया, ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा था। इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जिसे मतदाताओं ने पसन्द नहीं किया।

4. कांग्रेस दल पर श्रीमती गांधी की पकड़-1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि श्रीमती गांधी की अपने दल पर पूरी पकड़ एवं प्रभाव था। 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पश्चात् श्रीमती गांधी पूरी तरह पार्टी पर छा गई। कांग्रेस पार्टी में कोई भी नेता उनकी आज्ञा की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

प्रश्न 7.
‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति का वर्णन करें।
अथवा
‘ग़रीबी हटाओ’ का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार श्रीमती गांधी की चुनावी विजय में इस नारे की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। श्रीमती गांधी ने जहां ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। परन्तु मतदाताओं ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द कांग्रेस प्रणाली-चुनौतियां और पुनर्स्थापना । करते हुए श्रीमती गांधी को भारी बहुमत से विजय दिलाई। ‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक-से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा।

परन्तु 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं विश्व स्तर पर पैदा हुए तेल संकट के कारण श्रीमती गांधी ने ग़रीबी हटाओ कार्यक्रमों के लिए आबंटित धन में कमी करनी शुरू कर दी। जब श्रीमती गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा कमजोर पड़ने लगा, तब जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोगों ने श्रीमती गांधी के विरुद्ध आन्दोलन करके राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट पैदा कर दिया।

इसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया। परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलने लगी कि अन्ततः श्रीमती गांधी को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। केवल पांच साल के अन्दर ही श्रीमती गांधी की ‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति असफल हो गई तथा 1977 के चुनावों में लोगों ने श्रीमती गांधी को ऐतिहासिक पराजय का सामना करवाया तथा सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी।

प्रश्न 8.
क्या 1969 में कांग्रेस विभाजन को रोका जा सकता था ? यदि विभाजन नहीं होता तो यह किस प्रकार 1970 की राजनीति को प्रभावित करता।
उत्तर:
1969 की तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उस समय कांग्रेस के विभाजन को रोका नहीं जा सकता था, क्योंकि कांग्रेस के दोनों गुटों में तनाव एवं अविश्वास बहुत बढ़ चुका था। परन्तु यदि कांग्रेस का विभाजन न होता, तो कांग्रेस 1970 की राजनीति को और अधिक ढंग से प्रभावित कर सकती थी। उदाहरण के लिए कांग्रेस 1971 के चुनावों में और अधिक प्रभावशाली जीत दर्ज कर सकती थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी सम्भवत: इतनी शक्तिशाली एवं सर्वमान्य नेता बन जाती है कि उन्हें आपात्काल लगाने की आवश्यकता न पड़ती तथा जनता पार्टी का इस प्रकार उदय न होता।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित किस सन्दर्भ में हैं
(क) जय जवान, जय किसान
(ख) गरीबी हटाओ
(ग) इन्दिरा हटाओ
(घ) ग्रैंड एलाइंस ?
उत्तर:
(क)जय जवान, जय किसान-जय जवान, जय किसान का नारा भारत के प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1960 के दशक में दिया, क्योंकि उस समय भारत को युद्धों का सामना भी करना पड़ रहा था तथा साथ ही भारत में खाद्यान्न संकट भी पैदा हुआ था।

(ख) गरीबी हटाओ-गरीबी हटाओ का नारा श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सन् 1971 में दिया ताकि भारत में गरीबी को कम किया जा सके।

(ग) इन्दिरा हटाओ-इन्दिरा हटाओ का नारा सन् 1971 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के विरोधी दलों एवं सिंडीकेट ने दिया था, ताकि श्रीमती गांधी को चुनावों में हराकर उनकी शक्ति को कम किया जा सके।

(घ) ग्रैंड एलाइंस-1971 के चुनावों से पहले श्रीमती इन्दिरा गांधी को हराने के लिए विरोधी दलों ने गठबन्धन किया जिसे ग्रैंड एलाइंस कहा गया।

प्रश्न 10.
1960 के दशक को ‘खतरनाक’ दशक क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
1960 के दशक को ‘खतरनाक’ दशक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस दशक में भारत को कई पक्षों से समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीतिक स्तर पर पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु तथा 1966 में उनके उत्तराधिकारी श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु भारत के लिए अपूर्णनीय क्षति थी। इसके साथ-साथ इस दशक में भारत को दो युद्धों का सामना करना पड़ा।

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तथा 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया। इसी दशक में भारत में भारी खाद्यान्न संकट पैदा हुआ। इसी दशक में भारत में गरीबी, असमानता, साम्प्रदायिकता तथा क्षेत्रीय विवाद भी अनसुलझे थे। इसके अतिरिक्त 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया। इसीलिए 1960 के दशक को खतरनाक दशक कहा जाता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 11.
‘कांग्रेस प्रणाली’ के पुनर्स्थापन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति से साफ पता चलता है कि लोगों ने लोगों ने श्रीमती गांधी को जीत दिला कर उन्हें एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्वीकार कर लिया था। वास्तव में 1971 की कांग्रेस विजय, श्रीमती लोगों ने लोगों ने श्रीमती गांधी को राजनीतिक विज्ञान । गांधी की ही विजय मानी जाती है।

क्योंकि श्रीमंती गांधी ने चुनाव प्रचार में एक तरह से स्वयं को भी एक मुद्दा बना रखा था। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विपक्षियों ने ‘इंदिरा हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि लोगों ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसंद किया गया तथा श्रीमती गांधी को पूर्ण बहुमत प्रदान किया।

1972 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए जिनमें वे अधिकतर राज्यों में श्रीमती इन्दिरा गांधी की पार्टी ने ही चुनाव जीता। इन दो लगातार जीतों ने कांग्रेस के पुनर्स्थापन में सहायता की। परन्तु कांग्रेस के 1971 से पहले के प्रभुत्व एवं बाद के प्रभुत्व में अन्तर था, जिनका वर्णन इस प्रकार है

(1) श्रीमती गांधी की कांग्रेस पार्टी नये अंदाज में बनी थी तथा इन्दिरा गांधी ने जो कुछ भी किया वह पुरानी कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम नहीं था।

(2) इन्दिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी को उसी प्रकार की लोकप्रियता प्राप्त थी जो लोकप्रियता पुरानी कांग्रेस को अपने शुरुआती दौर में प्राप्त थी। परन्तु नहीं कांग्रेस पुरानी कांग्रेस से कई मायनों में अलग थी। नई कांग्रेस अपने नेता की लोकप्रियता पर निर्भर थी। इस पार्टी का ढांचागत संगठन भी कमज़ोर था। इस पार्टी में कई गुट नहीं थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित अवश्य किया, परन्तु उसकी प्रकृति को बदलकर।

(3) पुरानी कांग्रेस प्रत्येक तनाव एवं संघर्ष को सहन कर लेती थी, परन्तु नई कांग्रेस में इसका अभाव था।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० नेहरू का उत्तराधिकारी कौन बना ?
उत्तर:
पं० नेहरू के उत्तराधिकारी श्री लाल बहादुर शास्त्री बनें। श्री लाल बहादुर शास्त्री एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार थे। शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। शास्त्री जी ने अपनी सूझ-बूझ से न केवल 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण का सामना किया, बल्कि युद्ध में पाकिस्तान को हराया। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हआ और ताशकंद में ही 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की उत्तराधिकारी श्रीमती इन्दिरा गांधी बनी। मोरार जी देसाई के आग्रह पर प्रधानमन्त्री पद के लिए कराये गए मत विभाजन में अधिकांश कांग्रेसी नेताओं ने श्रीमती गांधी के पक्ष में मत दिया। प्रधानमन्त्री बनने के बाद श्रीमती गांधी ने कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दिया, ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया, देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। 1971 में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराया, जिसके कारण बांग्लादेश नाम का एक नया देश अस्तित्व में आया।

प्रश्न 3.
लाल बहादुर शास्त्री के काल में भारत को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उनमें से किन्हीं दो के नाम लिखें।
अथवा
कोई दो चुनौतियाँ बताइये जिनका सामना लाल बहादुर शास्त्री के काल में भारत को करना पड़ा ?
उत्तर:

  • भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी हो गई थी।
  • भारत को सन् 1965 में पाकिस्तान से युद्ध लड़ना पड़ा।

प्रश्न 4.
भारत में चौथे आम चुनाव कब हुए और उसमें क्या परिणाम निकले ?
अथवा
चौथे आम चुनाव कब हुए थे ?
उत्तर:
भारत में चौथे आम चुनाव 1967 में हुए। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया, जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। लोकसभा की कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को केवल 283 सीटें ही मिल पाईं। इसके साथ-साथ कांग्रेस को 8 राज्य विधानसभाओं में भी हार का सामना करना पड़ा। इससे पहली बार भारत में गैर कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 5.
सन् 1969 में कांग्रेस पार्टी में हुए विभाजन का मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
(1) 1967 के चुनावों में मिली हार के बाद कुछ कांग्रेसी दक्षिणपंथी दलों के साथ जबकि कुछ कांग्रेसी वामपंथी दलों के साथ समझौते का समर्थन कर रहे थे, जिसमें कांग्रेस में मतभेद बढ़ा।

(2) कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनावों को लेकर मतभेद था। श्रीमती गांधी डॉ. जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनना चाहती थीं, वही कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

प्रश्न 6.
दल विरोधी अधिनियम कब पास करवाया गया?
उत्तर:
दल विरोधी अधिनियम सन् 1985 एवं 2003 में पास किये गए।

प्रश्न 7.
गरीबी हटाओ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
गरीबी हटाओ का नारा 1971 के पांचवें लोक सभा चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने दिया। श्रीमती गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के अन्तर्गत ग़रीबों के निरन्तर विकास की बात कही। ‘गरीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक-से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा। इससे मतदाताओं को यह आभास हुआ कि कांग्रेस पार्टी वास्तव में ही गरीबों की गरीबी दूर करना चाहती है, अत: उन्होंने बाकी सभी दलों को हराते हुए श्रीमती गांधी एवं उनके दल को विजयी बनाया।

प्रश्न 8.
1969 में कांग्रेस विभाजन के पश्चात् बने दो राजनीतिक दलों के नाम बताएं।
उत्तर:
1969 में कांग्रेस विभाजन के पश्चात् जो दो दल सामने आए, उनके नाम कांग्रेस (आर) (Congress (R) Requisitioned) तथा कांग्रेस (ओ) (Congress (O)-organisation) थे। कांग्रेस (आर) का नेतृत्व श्रीमती गांधी कर रही थीं, वहीं कांग्रेस (ओ) का नेतृत्व सिंडीकेट कर रहा था।

प्रश्न 9.
सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी ने किसे अपना उम्मीदवार बनाया था?
उत्तर:
सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी ने श्री० वी० वी० गिरी को अपना उम्मीदवार बनाया था।

प्रश्न 10.
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से किस पर निर्भर थी ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से श्रीमती इन्दिरा गांधी पर निर्भर थी।

प्रश्न 11.
श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् भारत का प्रधानमंत्री कौन बना ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् भारत का प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी बनी।

प्रश्न 12.
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा कब और कहां से मशहूर हुआ ?
उत्तर:
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा सन् 1967 से हरियाणा से मशहूर हुआ।

प्रश्न 13.
किन्हीं चार राज्यों के नाम लिखिए जहां, 1967 के चुनावों के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं ?
उत्तर:

  • बिहार
  • पंजाब
  • उड़ीसा
  • राजस्थान।

प्रश्न 14.
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से किस-किस पर निर्भर थी ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी इन्दिरा गांधी पर मुख्य रूप से निर्भर थी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 15.
प्रिवी पर्सेस की समाप्ति पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय देशी रियासतों के भारत में विलय के समय सरकार ने राज परिवारों को यह आश्वासन दिया था कि रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी सम्पदा रखने का अधिकार होगा। इसके साथ ही सरकार की तरफ से उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिए जाएंगे। ये दोनों चीजें इस बात को आधार मानकर निश्चित की जाएंगी कि जिस राज्य का विलय भारत में किया जाना है, उसका विस्तार, राजस्व और क्षमता कितनी है। इस व्यवस्था को ही ‘प्रिवी पर्स’ कहा गया।

प्रश्न 16.
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमन्त्री कौन बना ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी बनीं।

प्रश्न 17.
उन दो नेताओं के नाम लिखें, जिन्होंने निम्नलिखित नारे दिए ?
(1) ‘जय जवान जय किसान’ तथा
(2) ‘गरीबी हटाओ’।
उत्तर:
जय जवान जय किसान का नारा श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने तथा ग़रीबी हटाओ का नारा श्रीमती इन्दिरा गांधी जी ने दिया था।

प्रश्न 18.
पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद कौन भारत के प्रधानमन्त्री बने ?
उत्तर:
पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमन्त्री बने।

प्रश्न 19.
‘ग्रैंड-एलायंस’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1967 के चुनावों में मिली असफलता एवं 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस में हुए विभाजन के कारण श्रीमती गांधी पूरी क्षमता से अपनी सरकार नहीं चला पा रही थी। अतः 1971 में उन्होंने मध्यावधि चुनाव करवाने की घोषणा की। इस चुनाव में सभी विपक्षी दलों ने मिलकर एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसे ‘ग्रैंड एलायंस’ कहा जाता है।

इस ग्रैंड एलायंस में भारतीय जनसंघ, स्वतन्त्र पार्टी, भारतीय क्रान्ति दल तथा एस० एम० पी० जैसे विरोधी दल शामिल थे। इन दलों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जबकि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया। चुनावों में मतदाताओं ने श्रीमती गांधी को भारी जनसमर्थन प्रदान किया तथा ‘ग्रैंड एलायंस’ को चुनावों में निराशा हाथ लगी।

प्रश्न 20.
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा किस तरह की राजनीति से सम्बन्धित है?
उत्तर:
आया राम, गया राम’ का मुहावरा दल-बदल की राजनीति से सम्बन्धित है। इस तरह की परिस्थितियों ने भारत में राजनीतिक अस्थिरता पैदा की है।

प्रश्न 21.
सन् 1971 का चुनाव, कांग्रेस पार्टी ने किस चुनाव निशान पर लड़ा था?
उत्तर:
सन् 1971 का चुनाव, कांग्रेस पार्टी ने गाय-बछड़ा, चुनाव निशान पर लड़ा था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. पं० जवाहर लाल नेहरू का उत्तराधिकारी बना?
(A) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(B) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(C) डॉ० राधा कृष्ण
(D) श्रीमती इन्दिरा गांधी।
उत्तर:
(B) श्री लाल बहादुर शास्त्री।

2. 1967 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को कितनी सीटें मिली थी ?
(A) 283
(B) 330
(C) 350
(D) 400
उत्तर:
(A) 283

3. 1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को सीटें मिली थी ?
(A) 300
(B) 325
(C) 352
(D) 390
उत्तर:
(C) 352

4. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद भारत का प्रधानमन्त्री कौन बना ?
(A) चौ० चरण सिंह
(B) मोरार जी देसाई
(C) इन्दिरा गांधी
(D) जगजीवन राम।
उत्तर:
(C) इन्दिरा गांधी।

5. कांग्रेस का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1968
(B) 1969
(C) 1970
(D) 1971
उत्तर:
(B) 1969

6. युवा तुर्क में कौन शामिल था ?
(A) चन्द्रशेखर
(B) मोहनधारिया
(C) कृष्ण कांत
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

7. सिंडीकेट में कौन शामिल था ?
(A) कामराज
(B) निजलिंगप्पा
(C) एस० के० पाटिल
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

8. 1969 के राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार था
(A) नीलम संजीवा रेड्डी
(B) वी० वी० गिरी
(C) मोरार जी देसाई
(D) श्रीमती इन्दिरा गांधी।
उत्तर:
(A) नीलम संजीवा रेड्डी।

9. 1969 के राष्ट्रपति चुनावों में श्रीमती गांधी ने किस उम्मीदवार का समर्थन किया ?
(A) जगजीवन राम
(B) नीलम संजीवा रेड्डी
(C) वी० वी० गिरी
(D) मोरार जी देसाई।
उत्तर:
(C) वी० वी० गिरी।

10. पांचवीं लोकसभा चुनाव में किस दल को जीत प्राप्त हुई ?
(A) कांग्रेस
(B) स्वतन्त्र दल
(C) जनसंघ
(D) जनता पार्टी।
उत्तर:
(A) कांग्रेस।

11. 1971 के पांचवीं लोकसभा चुनाव में ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा किसने दिया ?
(A) कामराज
(B) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(C) श्री० अटल बिहारी बाजपेयी
(D) मोरार जी देसाई।
उत्तर:
(B) श्रीमती इन्दिरा गांधी।

12. कांग्रेस में प्रथम बार फूट पड़ी
(A) 1968 में
(B) 1969 में
(C) 1967 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1969 में।

13. 1969 में कांग्रेस विभाजन का मुख्य कारण था ?
(A) कांग्रेस में दक्षिणपंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह
(B) राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद
(C) युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

14. 1971 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की विजय का कारण था-
(A) श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व
(B) कांग्रेस की समाजवादी नीतियां
(C) ग़रीबी हटाओ का नारा
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

15. “जय जवान जय किसान” का नारा किसने दिया था ?
(A) इन्दिरा गांधी
(B) चौ० चरण सिंह
(C) लाल बहादुर शास्त्री
(D) महात्मा गांधी।
उत्तर:
(C) लाल बहादुर शास्त्री।

16. चौथी लोकसभा के चुनाव निम्नलिखित वर्ष में हुए
(A) 1971 में
(B) 1969 में
(C) 1967 में
(D) 1966 में।
उत्तर:
(C) 1967 में।

17. कांग्रेस पार्टी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा कौन-से लोक सभा चुनाव में प्रमुख था?
(A) 1971
(B) 1977
(C) 1980
(D) 1984
उत्तर:
(B) 1971

18. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई
(A) 1965 में
(B) 1967 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में।

19. ‘गरीबी हटाओ’ का नारा निम्नलिखित राजनीतिक दल में से किसने दिया था?
(A) कम्युनिस्ट पार्टी
(B) कांग्रेस पार्टी
(C) जनसंघ पार्टी
(D) बहुजन समाज पार्टी।
उत्तर:
(B) कांग्रेस पार्टी।

20. 1967 के चौथे लोकसभा चुनाव में जनसंघ को सीटें मिलीं
(A) 35
(B) 42
(C) 55
(D) 47
उत्तर:
(A) 35

21. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस का पहली बार विभाजन किस वर्ष हुआ ?
(A) 1967 में
(B) 1969 में
(C) 1970 में
(D) 1965 में।
उत्तर:
(B) 1969 में।

22. ‘पांचवां आम-चुनाव’ कब हुआ ?
(A) 1967 में
(B) 1969 में
(C) 1971 में
(D) 1972 में।
उत्तर:
(C) 1971 में

23. वर्ष 1971 में भारत में कौन-सा आम चनाव हआ था ?
(A) चौथा
(B) पांचवां
(C) छठा
(D) सातवां।
उत्तर:
(B) पांचवां।

24. प्रीवी पर्स की समाप्ति कब की गई ?
(A) 1971 में
(B) 1972 में
(C) 1973 में
(D) 1974 में।
उत्तर:
(A) 1971 में।

25. श्रीमती इन्दिरा गांधी की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 30 अक्तूबर, 1982
(B) 31 अक्तूबर, 1984
(C) 31 अक्तूबर, 1985
(D) 31 अक्तूबर, 1986
उत्तर:
(B) 31 अक्तूबर, 1984

26. 1967 के चुनावों को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम किसने दिया था ?
(A) राम मनोहर लोहिया
(B) मोरार जी देसाई
(C) जगजीवन राम
(D) चन्द्रशेखर।
उत्तर:
(A) राम मनोहर लोहिया।

27. राम मनोहर लोहिया की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 1935
(B) 1952
(C) 1962
(D) 1967
उत्तर:
(D) 1967

28. ‘आया राम गया राम’ की कहावत किस राज्य से सम्बन्धित है ?
(A) बिहार
(B) हरियाणा
(C) उत्तर-प्रदेश
(D) हिमाचल प्रदेश।
उत्तर:
(B) हरियाणा।

29. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हुई
(A) मई 1964 में
(B) मई 1967 में
(C) मई 1962 में
(D) मई 1965 में।
उत्तर:
(A) मई 1964 में।

30. पांचवें आम चुनाव के बाद भारत के प्रधानमन्त्री बने
(A) इन्दिरा गांधी
(B) राजीव गांधी
(C) अटल बिहारी वाजपेयी
(D) चन्द्रशेखर।
उत्तर:
(A) इन्दिरा गांधी।

31. ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा निम्नलिखित किस से सम्बन्धित है
(A) मिश्रित सरकार
(B) जातिवाद
(C) दल बदल
(D) साम्प्रदायिकता।
उत्तर:
(C) दल बदल।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने ………….. का नारा प्रमुख नारा दिया है।
उत्तर:
ग़रीबी हटाओ

(2) ‘गरीबी हटाओ’ का नारा ………….. राजनैतिक दल ने दिया था।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी

(3) ‘आया राम गया राम’ का मुहावरा ……….. प्रकार की राजनीति से सम्बन्धित है।
उत्तर:
दल-बदल

(4) पांचवें आम चुनाव के बाद …………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी

(5) सन् 1969 में ……………….. राष्ट्रीय दल में विभाजन हुआ।
उत्तर:
कांग्रेस

(6) दल-बदल विरोधी अधिनियम वर्ष ……….. में पास हुआ।
उत्तर:
1985 एवं 2003

(7) पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद ………………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
लाल बहादुर शास्त्री

(8) सन् 1971 का चुनाव कांग्रेस पार्टी ने …………. चुनाव निशान पर लड़ा था।
उत्तर:
गाय-बछड़ा

(9) 1967 में श्री मोरार जी देसाई को…………बना दिया गया ?
उत्तर:
उप-प्रधानमंत्री

(10) श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ………… का नारा दिया था।
उत्तर:
जय जवान, जय किसान

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

(11) ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति सन् ………….. में की गई।
उत्तर:
1971

(12) ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा ………… नेता ने दिया था।
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी

(13) ‘आया राम गया राम’ का मुहावरा ……….. राज्य में मशहूर हुआ।
उत्तर:
हरियाणा

(14) सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ………….. को अपना उम्मीदवार बनाया था।
उत्तर:
श्री०वी०वी० गिरी

(15) पांचवां आम चुनाव सन् ………… में हुआ।
उत्तर:
1971

(16) नेहरू जी की मृत्यु के बाद …………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री

(17) सोवियत संघ के ………… नगर में श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई।
उत्तर:
ताशकंद

(18) 1960 के दशक को ……………….. दशक कहा जाता है।
उत्तर:
खतरनाक

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
चौथे आम चुनाव के बाद केन्द्र में किस दल की सरकार बनी ?
उत्तर:
चौथे आम चुनाव के बाद केन्द्र में कांग्रेस दल की सरकार बनी।

प्रश्न 2.
“जय जवान, जय किसान” का नारा किसने दिया ?
उत्तर:
“जय जवान, जय किसान” का नारा श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया।

प्रश्न 3.
प्रिवी पर्स की समाप्ति कब की गई ?
उत्तर:
सन् 1971 में।

प्रश्न 4.
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमंत्री कौन बना था ?
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी।

प्रश्न 5.
किस वर्ष में इन्दिरा गांधी को अनुशासनहीनता के लिए कांग्रेस पार्टी से निष्कासित किया गया था ?
उत्तर:
सन् 1969 में।

प्रश्न 6.
श्रीमती इंदिरा गांधी ने कौन-सा नारा दिया?
उत्तर:
‘गरीबी हटाओ।

प्रश्न 7.
‘आया राम-गया राम’ का मुहावरा किससे सम्बन्धित है ?
उत्तर:
दल-बदल (हरियाणा) से।

प्रश्न 8.
‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा किस नेता ने दिया ?
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी।

प्रश्न 9.
पं० नेहरू जी की मत्य के बाद भारत के प्रधानमन्त्री कौन बने ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का क्या अर्थ है ? भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
नेहरू जी की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
भारत की विदेश नीति’ के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ- प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है। विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। रुथना स्वामी के अनुसार, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहारों का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

भारतीय विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त-भारतीय विदेश नीति के निर्माता भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू माने जाते हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् उन्होंने भारतीय विदेश नीति में जिन तत्त्वों का समावेश किया, वे आज भी विद्यमान हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1: गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment):
भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है। भारत एक गुट-निरपेक्ष देश है और इसकी विदेश नीति भी गुट-निरपेक्षता पर आधारित है। पं० नेहरू ने कहा था-“जहां तक सम्भव हो, हम इन शक्ति-गुटों से अलग रहना चाहते हैं, जिनके कारण पहले भी महायुद्ध हुए हैं और भविष्य में हैं।” गुट-निरपेक्षता का अर्थ है-अपनी स्वतन्त्र नीति । जनता सरकार ने मार्च, 1977 में सत्ता में आने पर गुट-निरपेक्षता की नीति पर बल दिया। श्रीमती इन्दिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी की सरकार ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। आजकल संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार भी गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण कर रही है।

2. साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशवादियों का विरोध (Opposition of Imperialists and Colonialists):
भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा है, जिस कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है।

3. जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध (Opposite to the Policy of Caste, Colour and Discrimination):
भारत की विदेश नीति का एक अन्य मूल सिद्धान्त यह है कि भारत ने जाति, रंग, भेदभाव की भारत के विदेश सम्बन्ध नीति के विरुद्ध सदैव आवाज़ उठाई है। भारत शुरू से ही जाति-पाति के बन्धन को समाप्त करने के पक्ष में रहा है और उसने अपनी विदेश नीति द्वारा समय-समय पर ऐसे प्रयत्न किए हैं जिनसे इस नीति को विश्व में समाप्त कर सके।

4. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध (Friendly Relations with other Countries):
भारत की विदेश नीति की एक अन्य विशेषता यह है कि भारत विश्व के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। भारत ने न केवल मित्रतापूर्ण सम्बन्ध एशिया के देशों से ही बढाए हैं, बल्कि उसने विश्व के अन्य देशों से भी सम्बन्ध बनाए हैं।

5. एशिया-अफ्रीकी देशों का संगठन (Unity of Afro-Asian Countries):
भारत ने पारस्परिक आर्थिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिए एशिया और अफ्रीका के देशों को संगठित करने का प्रयास किया है। भारत का विचार है कि देश संगठित होकर उपनिवेशवाद का अच्छी तरह से विरोध कर सकेंगे तथा अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों की स्वतन्त्रता के लिए वातावरण उत्पन्न कर सकेंगे। भारत ने इन देशों को गुट-निरपेक्षता का रास्ता दिखाया तथा अनेक देशों ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया और इस प्रकार गुट-निरपेक्ष देशों का एक गुट बन गया। 24 मई, 1994 को दक्षिण अफ्रीका गुट-निरपेक्ष देशों के आन्दोलन का 110वां सदस्य बन गया।

6. संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को महत्त्व देना (Importance to Principles of United Nations):
भारत की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को भी महत्त्व दिया गया और भारत द्वारा सदा ही प्रयास किया गया है कि वह विश्व-शान्ति स्थापित करने के लिए युद्धों को रोके। भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों का पालन किया है और किसी देश पर हमला नहीं किया है। भारत शान्ति का पुजारी है।

7. राष्ट्रमण्डल की सदस्यता (Membership of Commonwealth of Nations):
भारत की विदेश नीति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रमण्डल की सदस्यता है। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता ने भारत को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली भूमिका अदा करने योग्य बनाया है।

8. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत तटस्थ नहीं है (India is not Neutral in International Politics):
यद्यपि भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार गुट-निरपेक्षता है, परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बिल्कुल भाग नहीं लेता। भारत किसी गुट में शामिल न होने के कारण ठीक को ठीक और ग़लत को ग़लत कहने वाली नीति अपनाता है। पं० नेहरू के शब्द आज भी सजीव हैं “जहां स्वतन्त्रता के लिए खतरा उपस्थित हो, न्याय की धमकी दी जाती हो अथवा जहां आक्रमण होता हो, वहां न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न ही तटस्थ रहेंगे।”

9. पंचशील (Panchsheel):
भारत की विदेश नीति का एक और महत्त्वपूर्ण भाग है-पंचशील, जो भारत की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को एक महत्त्वपूर्ण देन है। यह सिद्धान्त 1954 में बड़ा लोकप्रिय हुआ जब भारत और चीन के बीच तिब्बत के प्रश्न पर सन्धि हुई। राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने के लिए पांच सिद्धान्तों की रचना की गई, जिन्हें पंचशील के नाम से पुकारा जाता है। भारत द्वारा जब भी कोई निर्णय अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर लिया जाता है तो वह इन पांच सिद्धान्तों को सामने रखकर लिया जाता है। भारत ने सदैव प्रयास किया है कि इन पांच सिद्धान्तों को अन्य देश भी स्वीकार करें।

10. क्षेत्रीय सहयोग (Regional Co-operation) :
यद्यपि भारत में एक महाशक्ति बनाने के सारे लक्षण पाए जाते हैं, परन्तु भारत ने कभी भी महाशक्ति बनने का प्रयत्न नहीं किया। भारत का सदा ही क्षेत्रीय सहयोग में विश्वास रहा है। भारत ने क्षेत्रीय सहयोग की भावना को विकसित करने के लिए 1985 में क्षेत्रीय सहयोग के लिए ‘दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ’ (South Asian Association of Regional Co-operation) की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे संक्षेप में, ‘सार्क’ (SAARC) कहा जाता है। इस संघ में भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, बांग्ला देश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान तथा मालद्वीप भी शामिल हैं।

11. नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वातावरण की सुरक्षा का प्रश्न (New International Economic order and question of the protection of Environment):
पिछले कुछ वर्षों से नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना और वातावरण की सुरक्षा का प्रश्न भारत की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया है। भारत विश्व में से अन्याय पर आधारित अर्थव्यवस्था समाप्त करके न्यायपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना करना चाहता है, ताकि विकासशील देश विकसित देशों के वित्तीय संगठनों से आर्थिक मदद प्राप्त कर सकें। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने वाले ऐसे प्रयत्नों का भारत ने सदैव समर्थन किया है, जिससे पर्यावरण की सुरक्षा की जा सके।

अन्त में हम कह सकते हैं कि, भारत की विदेश नीति प्रो० हीरेन मुखर्जी (Prof. Hiren Mukherjee) के शब्दों में यह है कि, “उपनिवेशवाद का विरोध ……… सारी नस्लों को पूरी समानता ………… गुट-निरपेक्षता ………. एशिया तथा अफ्रीका को संसार की राजनीति में नए उभर रहे तत्त्वों के रूप में मान्यता …………. अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को समाप्त करना और विवादों को हिंसा तथा युद्ध के बिना हल करना भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धान्त हैं।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 2.
‘विदेश नीति’ का अर्थ स्पष्ट करें। भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्त्व बताइये।
अथवा
भारत की ‘विदेश नीति’ के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्त्व-सन् 1947 से पूर्व भारत की कोई अपनी विदेश नीति नहीं थी। ब्रिटेन की जो विदेश नीति होती थी वही भारत सरकार की विदेश नीति थी। यदि जर्मनी ब्रिटेन का शत्रु होता, तो भारत सरकार भी उसे अपना शत्रु मानती थी। 1947 में स्वतन्त्र होने के पश्चात् भारत को स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्माण करना था। स्वतन्त्र भारत के संविधान में उन नीति निर्देशक सिद्धान्तों का वर्णन कर दिया गया है जिनका अनुसरण इस देश को करना है। स्वतन्त्र भारत ने जिस विदेश नीति का अनुसरण किया है वह भी राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। इस नीति को निर्धारित करने में अनेक तत्त्वों ने सहयोग दिया है। ये तत्त्व निम्नलिखित हैं

1.संवैधानिक आधार (Constitutional Basis):
भारत के संविधान में राजनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए इस विषय में भी निर्देश दिए गए हैं। अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को निम्नलिखित कार्य करने के लिए कहा गया है

(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
(ख) दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, समझौतों तथा कानूनों के लिए सम्मान उत्पन्न करना।
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाना। राजनीति के इन निर्देशक सिद्धान्तों ने भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. भौगोलिक तत्त्व (Geographical Factors):
भारत में विदेश नीति को निर्धारित करने में भौगोलिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत का समुद्र तट बहुत विशाल है। भारत की सुरक्षा के लिए नौ-सेना का शक्तिशाली होना अति आवश्यक है और इसलिए भारत अपनी नौ-सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए लगा हुआ है। भारत की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बर्मा (म्यनमार) के साथ लगती हैं। कश्मीर राज्य के कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं, जिनकी सीमा अफ़गानिस्तान और रूस के साथ लगती है यद्यपि इस समय वे पाकिस्तान के कब्जे में हैं। इन देशों को लगती अपनी सीमाओं को ध्यान में रखकर ही भारत ने अपनी विदेश नीति का निर्धारण किया है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background):
लगभग 200 वर्ष के दीर्घकाल तक भारत को अंग्रेजों की दासता में रहना पड़ा, फलस्वरूप भारत अन्य राष्ट्रों की तुलना में ग्रेट ब्रिटेन के सम्पर्क में अधिक रहा और इसी कारण इंग्लैण्ड की सभ्यता व संस्कृति का भारत पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। चिरकाल तक साम्राज्यवाद के कारण शोषित व परतन्त्र रहने के कारण भारत की विदेश नीति पर प्रभाव पड़ा है और अब इसकी विदेश नीति का मुख्य सिद्धान्त साम्राज्यवाद तथा औपनिवेशवाद का विरोध करना है अ एशिया व अफ्रीका में होने वाले स्वाधीनता संघर्षों का समर्थन करता रहा है।

4. आर्थिक तत्त्व (Economic Factors) :
भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। भारत में उस समय अनाज की भारी कमी थी और वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। भारत अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए अमेरिका और ब्रिटेन पर निर्भर करता था। भारत का विदेशी व्यापार मुख्यत: ब्रिटेन व अमेरिका के साथ था। जिन मशीनरियों व खाद्य सामग्रियों को विदेशों से मंगवाना होता है वह भी उसे इन देशों से ही मुख्यतः प्राप्त करनी होती हैं और इनके साथ ही अमेरिका व ब्रिटेन की पर्याप्त पूंजी भारत के अनेक कल-कारखानों में लगी हुई है।

ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक था कि भारत की विदेश नीति पश्चिमी पूंजीवादी राज्यों के प्रति सद्भावनापूर्ण रही। 1950 के पश्चात् भारत और सोवियत संघ धीरे-धीरे एक-दूसरे के नज़दीक आने लगे और भारत सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों से तकनीकी तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करने लगा। दोनों गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए भारत ने गट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। वास्तव में भारत की विदेश नीति और उसके आर्थिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

5. राष्ट्रीय हित (National Interest):
विदेश नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4 दिसम्बर, 1947 को संविधान सभा में पण्डित नेहरू ने कहा था कि आप कोई भी नीति अपनाएं, विदेश नीति का निर्धारण करने की कला राष्ट्रीय हित के सम्पादन में ही निहित है। पं. नेहरू ने गट-निरपेक्षता और विश्व-शान्ति की स्थापना को भारत की विदेश नीति का आधार इसलिए बनाया ताकि भारत गुटों से अलग रहकर अपना आर्थिक तथा औद्योगिक विकास कर सके। यदि भारत गुटों की नीति में फंस जाता तो दोनों गुटों से आर्थिक सहायता न पा सकता। अत: भारत के हित को देखते हुए ही गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाया गया है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रमण्डल (Commonwealth of Nations) का सदस्य रहना स्वीकार किया।

6. विचारधारा का प्रभाव (Impact of Ideology):
विदेश नीति का निर्माण करने में उस देश की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय कांग्रेस ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में तरह-तरह के आदर्श संसार के सामने प्रस्तुत किए थे। कांग्रेस ने सदैव विश्व-शान्ति और शान्तिपूर्ण सह-जीवन का समर्थन तथा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का घोर विरोध किया। सत्तारूढ़ होने पर कांग्रेस को अपनी विदेश नीति का निर्माण इन्हीं आदर्शों पर करना था। कांग्रेस महात्मा गांधी के आदर्शों तथा सिद्धान्तों से भी काफी प्रभावित थी।

अत: भारत की विदेश नीति गांधीवाद से काफी प्रभावित थी, इसलिए भारत की विदेश नीति में विश्व-शान्ति पर बहुत जोर दिया जाता है। समाजवादी देशों के प्रति भारत की सहानुभूति बहुत कुछ मार्क्सवादी प्रभाव का परिणाम मानी जाती है। पश्चिम के उदारवाद का भी भारत की विदेश नीति पर काफ़ी प्रभाव है। हमारी विदेश नीति के निर्माता पं० नेहरू पश्चिमी लोकतन्त्रीय परम्पराओं से बहुत प्रभावित थे। वे पश्चिमी लोकतन्त्र तथा साम्यवाद दोनों की अच्छाइयों को पसन्द करते थे और उनकी बुराइयों से दूर रहना चाहते थे। अत: गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया गया।

7. अन्तर्राष्ट्रीय तत्त्व (International Factors):
भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय सोवियत गुट और अमरीकी गुट में शीत-युद्ध चल रहा था। संसार के प्रायः सभी देश उस समय दो गुटों में विभाजित थे। पं० जवाहरलाल नेहरू ने किसी एक गुट में शामिल होने के स्थान पर दोनों गुटों से अलग रहना देश के हित में समझा।

अतः भारत ने गुट-निरपेक्ष नीति का अनुसरण किया। पिछले कुछ वर्षों से अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन हुआ है। अमेरिका और चीन के सम्बन्धों में सुधार हुआ है लेकिन अमेरिका और पाकिस्तान बहुत नज़दीक हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति के कारण भारत और सोवियत संघ और समीप आए। 1991 में सोवियत संघ के विघटन होने के बाद विश्व में अमेरिका ही एकमात्र सुपर पॉवर रह गया है। इसीलिए भारत भी अमेरिका के साथ अपने आर्थिक, सामाजिक सम्बन्धों को मज़बूत बनाने पर बल दे रहा है।

8. सैनिक तत्त्व (Military Factors):
सैनिक तत्त्व ने भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सैनिक दृष्टि से बहुत निर्बल था। इसलिए भारत ने दोनों गुटों से सैनिक सहायता प्राप्त करने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका ने खुलेआम पाकिस्तान का साथ दिया और भारत पर दबाव डालने के लिए अपना सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा तो भारत को सोवियत संघ से 20 वर्षीय सन्धि करनी पड़ी। आजकल अमेरिका पाकिस्तान को आधुनिकतम हथियार दे रहा है, जिसका भारत ने अमेरिका से विरोध किया है, पर अमेरिका अपनी नीति पर अटल है। अतः भारत को भी अपनी रक्षा के लिए रूस तथा अन्य देशों से आधुनिकतम हथियार खरीदने पड़ रहे हैं।

9. राष्ट्रीय संघर्ष (National Struggle):
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन ने विदेश नीति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण

  • राष्ट्रीय आन्दोलन ने भारत में महाशक्तियों के संघर्ष का मोहरा बनने से बचने का संकल्प उत्पन्न किया।
  • अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्र में गुट-निरपेक्ष रहते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की भावना जागृत हुई।
  • प्रत्येक तरह के उपनिवेशवाद, जातिवाद व रंग-भेद का विरोध करने का साहस हुआ।
  • स्वाधीनता संघर्ष के लिए सहानुभूति उत्पन्न हुई।

10. वैयक्तिक तत्त्व (Personal Factors):
भारतीय विदेश नीति पर इस राष्ट्र के महान् नेताओं के वैयक्तिक तत्त्वों का भी प्रभाव पड़ा। पण्डित नेहरू के विचारों से हमारी विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई। पण्डित नेहरू उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे। वह मैत्री, सहयोग व सह-अस्तित्व के पोषक थे।

साथ ही अन्याय का विरोध करने के लिए शक्ति प्रयोग के समर्थक थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचारों द्वारा हमारी विदेश नीति के ढांचे को ढाला। पण्डित नेहरू के अतिरिक्त डॉ० राधाकृष्णन, कृष्णा मेनन, पाणिक्कर जैसे महान् नेताओं के विचारों ने भी हमारी विदेश नीति को प्रभावित किया। स्वर्गीय शास्त्री जी व भूतपूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के काल में हमने अपनी विदेश नीति के मूल तत्त्वों को कायम रखते हुए इसमें व्यावहारिक तत्त्वों का भी प्रयोग किया।

प्रश्न 3.
भारत-चीन के मध्य विवाद के उन मुख्य विषयों का वर्णन करें जो 1962 के युद्ध का कारण बने।
अथवा
भारत और चीन के बीच मतभेदों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत एवं चीन एशिया के दो महत्त्वपूर्ण देश हैं। भारत और चीन के मध्य पहले गहरी मित्रता थी, परन्तु धीरे-धीरे दोनों देशों में मतभेद बढ़ते रहे, जिनके कारण अन्ततः 1962 में दोनों देशों के बीच एक युद्ध भी हुआ। इस युद्ध के निम्नलिखित कारण माने जा सकते हैं

1. तिब्बत समस्या (Tibet Problem)-भारत-चीन के बीच हुए युद्ध का एक कारण तिब्बत की समस्या थी। सन् 1914 में इन दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण करने के लिए शिमला में एक सम्मेलन हुआ था जिसमें आर्थर हेनरी मैकमोहन ने भाग लिया था। शिमला-सन्धि में यह निर्णय हुआ था कि

  • तिब्बत पर चीन का आधिपत्य रहेगा परन्तु बाह्य तिब्बत को अपने कार्य में पूरी आज़ादी रहेगी।
  • चीन तिब्बत के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • चीन कभी भी तिब्बत को अपने राज्य का प्रान्त घोषित नहीं करेगा।

बाह्य तिब्बत और भारत के बीच की ऊंची पर्वत श्रेणियों को सीमा मान कर एक नक्शे में लाल पैंसिल से निशान लगा दिए तथा इस सीमा रेखा को मैकमोहन लाइन का नाम दिया गया। सीमा-विवाद के समय चीन ने भी इसी रेखा का समर्थन किया। कश्मीर की उत्तरी सीमा को स्पष्ट करते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने 1899 में चीन को लिखा था कि भारत के विदेश सम्बन्ध इसकी पूर्वी सीमा 80 अक्षांश पूर्वी देशान्तर है। इससे स्पष्ट है कि अक्साई चीन भारतीय सीमा के अन्तर्गत है और वह सीमा ऐतिहासिक है।

स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद भारत को तिब्बत में निम्नलिखित बहिदेशीय (Extra-territorial) अधिकार मिले :

  • तिब्बत और ब्रिटिश भारतीय व्यापारियों के झगड़ों में बचाव पक्ष पर देश की विधि लागू होती थी और उसी देश का न्यायाधीश सुनवाई के समय अध्यक्षता करता था।
  • यदि तिब्बत में ब्रिटिश-राज्य के लोगों के बीच विवाद होते थे तो उनका निर्णय ब्रिटिश अधिकारी ही करते थे।
  • ब्रिटिश एजेंटों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ फ़ौज रखने का अधिकार था।
  • गेट टुंग के यान टुंग से व्यॉणट्सी तक टेलीफोन और टेलीग्राफ संस्थाओं पर भी ब्रिटिश अधिकारियों का अधिकार था।
  • तिब्बत में भारत सरकार के ग्यारह विश्राम-गृह थे।

चीन ने तिब्बत की सत्ता तथा भारत के अधिकारों का सम्मान न करते हुए 7 अक्तूबर, 1950 को तिब्बत में अपने सैनिक भेज दिए। जब भारत ने इस ओर चीन का ध्यान आकर्षित करवाया तो उसने कठोर शब्दों में अपेक्षा की। नये नक्शों में चीन ने भारत की लगभग 50 हज़ार वर्गमील सीमा चीन प्रदेश के अन्तर्गत दिखाई। श्री नेहरू द्वारा इसका विरोध करने पर चीनी प्रधानमन्त्री ने कहा कि ये नक्शे राष्ट्रवादी सरकार के पुराने नक्शों की नकल हैं और समय मिलने पर इसे ठीक कर लिया जाएगा।

चीनियों ने आक्साईचिन के पठार में सड़क बना ली। लद्दाख में कई सैनिक चौकियां स्थापित कर ली। सन् 1958 में लद्दाख के खरनाम किले पर भी कब्जा कर लिया गया। 31 मार्च, 1957 में दलाईलामा ने चीनियों के दमन से भयभीत होकर भारत में राजनीतिक शरण ली। चीन ने इसका विरोध किया। श्री चाऊ-एन-लाई ने भारत को लिखा कि “मैकमोहन रेखा चीन के तिब्बत क्षेत्र के विरुद्ध अंग्रेजों की आक्रमणकारी नीति का परिणाम था। कानूनी तौर पर इसे वैध नहीं माना जा सकता।”

सन् 1959 को भारत पर आरोप लगाया कि वह तिब्बत में सशस्त्र विद्रोहियों को संरक्षण दे रहा है। चीन ने भारत के लगभग 90,000 किलोमीटर प्रदेश पर दावा करते हुए कहा कि भारतीय सेनाएं इस प्रदेश में घुसकर चीन की अखण्डता को चुनौती दे रही हैं। __ 1960 में भारत और चीन के प्रधानमन्त्रियों ने दिल्ली में एक संयुक्त-विज्ञप्ति में यह माना कि दोनों देशों में कुछ मतभेद हैं। यह तनाव और भी बढ़ा जब 1962 में गलवान घाटी की भारतीय पुलिस चौकी को चीनियों ने घेर लिया।

2. मानचित्र से सम्बन्धित समस्या (Problem Regarding Maps):
भारत एवं चीन के मध्य 1962 में युद्ध का एक कारण दोनों देशों के बीच मानचित्र के रेखांकित भू-भाग था। चीन ने 1954 में प्रकाशित अपने मानचित्र में कुछ ऐसे भाग प्रदर्शित किये थे जो वास्तव में भारतीय भू-भागों में थे। जब इस मुद्दे को चीन के साथ उठाया गया, तो उसने कहा कि यह पुराना मानचित्र है, नये मानचित्र में इस गलती को सुधार लिया जायेगा, परन्तु 1955 में चीन ने बराहोती पर कब्जा किया, तत्पश्चात् शिपकी दर्रा के द्वारा भारतीय भू-क्षेत्र की अवमानना की।

3. सीमा विवाद (Boundary Dispute):
भारत-चीन के बीच विवाद का एक कारण सीमा विवाद था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ता गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 4.
1962 में भारत-चीन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन करें। युद्ध से सम्बन्धित कोलम्बो समझौते का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत एवं चीन के मध्य 1962 में हुए युद्ध की परिस्थितियां बहुत पहले बननी शुरू हो गई थीं। अन्ततः चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत की उत्तरी सीमा पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हमले के कारण भारतीय फ़ौजें जब तक सम्भली तब तक चीन ने सैनिक चौकियों पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत के कहने पर तेजी से सैन्य सामग्री भेजी। चीन ने अचानक 21 नवम्बर, 1962 को एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा कर दी। इसके साथ ही द्वि-सूत्रीय योजना की घोषणा भी की

(1) चीनी सेनाएं 7 नवम्बर, 1962 की वास्तविक नियन्त्रण रेखा (Actual Line of Control) से 20 किलोमीटर अपनी ओर हट जाएंगी और सेना 1 दिसम्बर से हटना शुरू करेंगी।

(2) चीनी सेना के हटने से खाली क्षेत्र पर चीन सरकार अपनी असैनिक चौकियां स्थापित करेगी। इन चौकियों की स्थिति का पता भारत सरकार को उसके दूतावास द्वारा दिया जाएगा। चीन ने भारत सरकार को इन शर्तों को मानने के लिए कहा। इसके साथ ही भारत को 7 नवम्बर, 1959 को अपनी सेनाओं को अपने ही क्षेत्र में 20 किलोमीटर हटने के लिए कहा।

विपरीत स्थितियों के कारण भारत ने चीन की एक-पक्षीय युद्ध-विराम घोषणा को मान लिया परन्तु द्वि-सूत्रीय योजना को नहीं माना और घोषित किया कि जब तक चीन 8 सितम्बर, 1962 की स्थिति तक नहीं लौट जाता तब तक कोई वार्ता नहीं होगी। चीन के इस आक्रमण के बाद हिन्दी चीनी भाई-भाई का युग समाप्त हुआ और भारत और चीन एक-दूसरे के शत्रु गए। उन्हीं दिनों भारत की संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा यह संकल्प किया कि “भारत जब तक चीन द्वारा बलात् अधिकृत किए गए अपने क्षेत्र को खाली न करा लेगा तब तक चैन नहीं लेगा।”

चीन के इस आक्रमण के कारण भारत गुट-निरपेक्ष नीति की कड़ी आलोचना हुई परन्तु पं० नेहरू ने इस नीति पर गहरा विश्वास प्रकट किया। भारत की विदेश नीति में अब यथार्थवाद की ओर झुकाव शुरू हुआ। पं० नेहरू ने यह घोषणा कि-“अतीत में हम निर्धनता और निरक्षरता की मानवीय समस्याओं में इतने उलझे रहे कि हमने प्रतिरक्षा की आवश्यकताओं के प्रति तुलनात्मक दृष्टि से बहुत कम ध्यान दिया। यह स्पष्ट है कि अब हम इस ओर अधिक ध्यान देंगे। हम अपनी सेनाओं को सुदृढ़ बनायेंगे तथा जहां तक सम्भव होगा सेना के लिए आवश्यक शस्त्र सामग्री अपने ही देश में तैयार करेंगे।”

कोलम्बो प्रस्ताव और चीन का दुराग्रह-श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार) कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मिस्र और घाना ने दिसम्बर 1962 में भारत-चीन वार्ता के लिए कोलम्बो सम्मेलन का आयोजन किया। श्रीमती भण्डारनायके स्वयं प्रस्ताव लेकर नई दिल्ली और पीकिंग गईं। इसके बाद 19 जनवरी, 1963 को यह प्रस्ताव प्रकाशित किए गए जिनकी मुख्य बातें निम्नलिखित थीं

  • युद्ध-विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा ले।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • विवाद का अन्तिम हल होने तक चीन द्वारा खाली किया गया क्षेत्र असैनिक क्षेत्र हो जिसकी निगरानी दोनों पक्षों द्वारा नियुक्त गैर-सैनिक चौकियां करें।
  • पूर्वी नेफा क्षेत्र दोनों सरकारों द्वारा मान्य वास्तविक नियन्त्रण रेखा युद्ध-विराम रेखा का रूप ले। शेष क्षेत्रों के बारे में दोनों देश भावी वार्ताओं में निर्णय करें।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शान्तिपूर्ण ढंग से किया जाए।

कोलम्बो प्रस्ताव का उद्देश्य दोनों देशों में गतिरोध की स्थिति को खत्म करना था। चीन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने का विश्वास दिलाया और भारत ने कुछ स्पष्टीकरण मांगे। पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सेना मैकमोहन लाइन तक जा सकेगी और चीनी सेना भी अपने पूर्व तक जा सकेगी लेकिन विवादपूर्ण क्षेत्रों से उसे दूर रहना होगा। इस स्पष्टीकरण के बाद भारत ने अपनी सहमति दे दी परन्तु चीन ने कुछ शर्ते जोड़ दी जिससे यह प्रस्ताव महत्त्वहीन हो गया। इससे चीन का रुख स्पष्ट हो गया कि वह भारत के साथ अपने विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना नहीं चाहता था।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 5.
भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध से पहले की घटनाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ परन्तु साथ ही भारत का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। अतः पाकिस्तान भारत का पड़ोसी देश है जिस कारण भारत-पाक समस्याओं का विशेष महत्त्व है। कावदश सम्बन्ध पाकिस्तान को भारत की अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की नीति बिल्कुल पसन्द नहीं थी। पाकिस्तान अन्य देशों से सहायता प्राप्त करने तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपना महत्त्व बढ़ाने के लिए पश्चिमी गुट में सम्मिलित हो गया और CENTO तथा SEATO आदि क्षेत्रीय तथा सैनिक संगठनों का सदस्य बन गया। परन्तु भारत ने उन गुटों की नीति की अपेक्षा गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

विस्थापित सम्पत्ति, देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति, नहरी पानी, सीमा निर्धारण, वित्तीय और व्यापारिक समायोजन, जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर और कच्छ के विवादों के लिए भारत और पाकिस्तान में युद्ध होते रहे हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी रही है। कश्मीर के विवाद को छोड़कर अन्य सभी विवादों एवं समस्याओं का हल लगभग हो चुका है। 1948 में कश्मीर को लेकर दोनों देशों में युद्ध हुआ फिर इसी समस्या को लेकर 1965 में युद्ध हुआ और 1971 में बंगला देश के मामले पर युद्ध हुआ। जब तक कश्मीर की समस्या का पूर्णरूप से हल नहीं होता तब तक दोनों देशों में स्थायी रूप से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं हो सकते।

भारत और पाकिस्तान में निम्नलिखित विवादों के कारण अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे हैं :

1. जूनागढ़ और हैदराबाद का भारत में मिलाया जाना:
भारतीय क्षेत्र की रियासत जूनागढ़ के नवाब ने जब अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाना चाहा तो जनता ने विद्रोह कर दिया। नवाब स्वयं पाकिस्तान भाग गया और रियासत के दीवान तथा वहां की पुलिस की प्रार्थना पर 9 नवम्बर, 1947 को भारत सरकार ने रियासत का शासन अपने हाथों में ले लिया। फरवरी, 1948 में जनमत संग्रह में भारत के पक्ष में 1 लाख 90 हजार से भी अधिक मत आए जबकि पाकिस्तान के पक्ष में केवल 91 मत पड़े।

हैदराबाद की रियासत भी पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में थी। 1947 में निज़ाम ने भारत के साथ एक ‘यथा-पूर्व-स्थिति’ में समझौता किया। लेकिन हैदराबाद के प्रशासन में प्रभावशाली मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन ‘मजलिस-ए-ईहादउल’ के रजाकारों ने रियासत में भयानक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी। तब जनता और निज़ाम की रक्षा के लिए पुलिस की और रजाकारों ने आत्म-समर्पण कर दिया। हैदराबाद सरकार ने समस्या को सुरक्षा परिषद में रखा और इसका अन्तिम हल तब हुआ जब दिसम्बर, 1948 में भारत ने सुरक्षा परिषद् से स्पष्ट कह दिया कि वह अब इस प्रश्न के वाद-विवाद में कोई भाग नहीं लेगी।

2. ऋण अदा करने का प्रश्न:
स्वतन्त्र भारत ने पुरानी सरकार के कर्ज का भार सम्भाला। इसके अनुसार उसे 5 वर्ष में पाकिस्तान से 300 करोड़ रुपया लेना था लेकिन पाकिस्तान ने कर्जे को चुकाने का नाम तक नहीं लिया जबकि भारत ने पाकिस्तान को दिये जाने वाले ₹ 5 करोड़ का कर्ज चुका दिया।

3. विस्थापित सम्पत्ति तथा अल्पसंख्यकों की रक्षा का प्रश्न:
1947 से 1957 तक लगभग 90 लाख मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए और इतने ही गैर मुस्लिम पाकिस्तान से भारत आए। दोनों ही क्षेत्रों के लोग अपने पीछे विशाल मात्रा में चल और अचल सम्पत्ति छोड़ गए। यह अनुमान लगाया जाता है कि मुसलमानों ने भारत में ₹300 करोड़ की और भारतीयों ने पाकिस्तान में ₹ 3 हजार करोड़ की सम्पत्ति छोड़ी थी।

पाकिस्तान समस्या के सभी सुझावों को ठुकराता गया। अल्पसंख्यकों की रक्षा की समस्या भी दोनों के सामने थी। 1950 में साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने और अल्पसंख्यकों में रक्षा की भावना उत्पन्न करने के लिए दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों के बीच ‘नेहरू-लियाकत’ समझौता हुआ जिसका पाकिस्तान ने कभी पालन नहीं किया और दुःखी शरणार्थी भारत में आते रहे।

4. नहरी पानी विवाद:
भारत और पाकिस्तान के बीच एक और समस्या नदियों के हिस्से के सम्बन्ध में थी। पंजाब के विभाजन के कारण पानी के प्रश्न पर कठिन स्थिति पैदा हो गई। सतलुज, व्यास और रावी नदियों के हैडवर्क्स भारत में रह गए लेकिन नदियों की दृष्टि से 25 में से केवल 20 नहरें भारत में आईं और एक नहर दोनों देशों में आई।

दोनों देशों की सहमति से यह विवाद मध्यस्थता के लिए विश्व बैंक को सौंप दिया गया। इसके प्रयत्नों से 19 सितम्बर, 1960 को भारत और पाक में सिन्ध बेसिन के पाने के बंटवारे में ‘नहरी समझौता’ (Indo-Pak Canal Water Treaty) हुआ। इस समझौते के अनुसार यह निश्चय किया गया कि 10 वर्ष की अवधि के बाद, जो पाकिस्तान की प्रार्थना पर 3 वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकेगी, तीनों पूर्वी नदियों का पानी भारत के अधिकार में रहेगा जबकि तीनों पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के अधिकार में; केवल इनका सीमित पानी उत्तर की ओर के जम्मू और कश्मीर

प्रान्त में प्रयोग किया जाएगा। यह तय हुआ कि 10 वर्ष तक भारत पूर्वी नदियों से पाकिस्तान की प्रत्येक वर्ष घटती हुई मात्रा में पानी देगा और नई नहरों के निर्माण के लिए पाकिस्तान को आवश्यक मात्रा में धन भी देगा। यदि पाकिस्तान भारत से पानी देने वाली अवधि में 3 वर्ष की वृद्धि के लिए प्रार्थना करेगा तो प्रार्थना स्वीकृत होने पर उसी अनुपात में भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली राशि में कटौती कर दी जाएगी। 12 जनवरी, 1961 को इस सन्धि की शर्ते लागू कर दी गईं। यह सन्धि पाकिस्तान के लिए विशेष लाभदायक थी।

5. कश्मीर विवाद (Kashmir Controversy):
स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत था। इसका क्षेत्रफल 1,34,00 वर्ग कि० मी० और जनसंख्या 40 लाख थी। इनमें से लगभग 77% मुसलमान, 20% हिन्दू तथा 3% सिक्ख, बौद्ध आदि थे। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबायली लोगों (Tribesmen) को प्रेरणा और सहायता देकर 20 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। 24 अक्तूबर, 1947 को श्रीनगर को बिजली प्रदान करने वाले मदुरा बिजली घर पर अधिकार कर लिया गया। इस पर महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता मांगी और कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की।

27 अक्तूबर, 1947 को भारत सरकार ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान से कबायलियों को मार्ग न देने के लिए कहा परन्तु पाकिस्तान उन्हें पूरी सहायता देता रहा। इस पर लार्ड माऊंटबेटन के परामर्श पर भारत सरकार ने 1 जनवरी, 1948 की संयुक्त राष्ट्र चार्टर की 34वीं और 35वीं धारा के अनुसार सुरक्षा परिषद् से पाकिस्तान के विरुद्ध शिकायत की और अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को आक्रमणकारियों की सहायता बन्द करने को कहे।

कश्मीर और संयुक्त राष्ट्र–सुरक्षा परिषद् कश्मीर विवाद का कोई समाधान ढूंढ़ने में असफल रही है। इसका मुख्य कारण यह था कि सुरक्षा परिषद् का उद्देश्य एक न्यायपूर्ण निर्णय करना नहीं रहा है। अपितु दोनों पक्षों में किसी भी मूल्य पर समझौता कराना रहा है। सुरक्षा परिषद् के सामने भारत की शिकायत के बाद दो मुख्य प्रश्न थे

(1) क्या पाकिस्तान ने आक्रमण किया है ?
(2) क्या कश्मीर का भारत में अधिमिलन (Accession) वैधानिक है? इन दोनों प्रश्नों के तथ्य स्पष्ट थे, परन्तु सुरक्षा परिषद् ने इनका उत्तर देने के अतिरिक्त आक्रमण के शिकार भारत और आक्रमणकारी पाकिस्तान को समान स्थिति देकर समझौता करवाने का प्रयत्न किया। 21 अप्रैल, 1948 को सुरक्षा-परिषद् ने भारत और पाकिस्तान के विवाद के समाधान के लिए 5 सदस्यों के संयुक्त राष्ट्र आयोग (U.N.C.I.P.) की नियक्ति की। को कश्मीर में युद्ध-विराम हो गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कश्मीर विवाद के समाधान के लिए आधार रूप में निम्नलिखित सिद्धान्तों को सामने रखा

  • पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेनाएं हटा ले और कबायलियों को भी वहां से हटाने का प्रयत्न करे।
  • सेनाओं द्वारा खाली किए गए प्रदेशों का शासन-प्रबन्ध आयोग के निरीक्षण में स्थानीय अधिकारी करेंगे।
  • पाकिस्तानी सेनाओं के हट जाने के पश्चात् भारत भी अपनी सेना के अधिकांश भाग को हटा लेगा।
  • अन्त में एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष जनमत संग्रह के द्वारा यह निर्णय किया जाएगा कि कश्मीर भारत में शामिल होगा या पाकिस्तान में।

सुरक्षा परिषद् ने श्री चैस्टर निमिट्ज को जनमत संग्रह का प्रशासक नियुक्त किया, परन्तु दोनों देशों में कोई समझौता न हो सकने के कारण श्री चैस्टर ने त्याग-पत्र दे दिया। फरवरी, 1950 में सुरक्षा-परिषद् ने सर ओवन डिक्सन (Sir Owen Dixon) को तथा उनकी कोशिशों के सफल हो जाने पर 1951 में डॉ० फ्रैंक ग्राहम (Dr. Frank Graham) को समझौता करवाने के लिए नियुक्त किया। 27 मार्च, 1953 को डॉ० ग्राहम ने अपनी अन्तिम रिपोर्ट में इस समस्या को दोनों देशों में सीधी वार्ता के द्वारा सुलझाने पर जोर दिया। इस सुझाव के अनुसार 1953 में दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों में सीधी वार्ता और 1953-54 में सीधा पत्र-व्यवहार हुआ, परन्तु इसका कोई फल नहीं निकला।

1954 में अमेरिका पाकिस्तान को सैनिक सहायता देने को तैयार हो गया। पाकिस्तान का उद्देश्य इस सहायता से अपनी सैनिक स्थिति दृढ़ करना था। इससे बाध्य होकर भारत को भी अपनी नीति बदलनी पड़ी। पं० नेहरू ने घोषणा की- “जनमत संग्रह करने का प्रश्न स्पष्ट रूप से इस शर्त के साथ सम्बद्ध था कि पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेनाएं भारत के विदेश सम्बन्ध हटा लेगा। पिछले 9 वर्षों में पाकिस्तान यह शर्त पूरी करने में असमर्थ रहा है। पाकिस्तान को मिलने वाली सैनिक सहायता और उसकी सैनिक समझौतों की सदस्यता ने कश्मीर में जनमत संग्रह करने के प्रस्ताव के मूल आधार को ही नष्ट कर दिया है।”

26 जनवरी, 1957 को जनता द्वारा निर्वाचित विधान सभा ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने का निश्चय किया। पाकिस्तान ने फिर से कश्मीर के प्रश्न को सुरक्षा परिषद् में उठाया। पहले गुन्नार यारिंग (Gunnar Yarring) और फिर डॉ० फ्रैंक ग्राहम को दोनों पक्षों में समझौता करने के लिए भेजा गया परन्तु कोई सफलता नहीं मिली। बाद में दिल्ली, कराची, रावलपिंडी और ढाका में दोनों देशों के विदेश मन्त्रियों के बीच वार्ता हुई। परन्तु पाक विदेश मन्त्री श्री भुट्टो के तनावपूर्ण रुख के कारण ये वार्ताएं 1963 में असफल हो गईं।

प्रश्न 6.
भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए 1965 की युद्ध एवं ताशकंद समझौते का वर्णन करें।
उत्तर:
पाकिस्तान का व्यवहार सदैव भारत विरोधी रहा है। सन् 1965 में भारत को दो बार पाकिस्तानी आक्रमण का शिकार होना पड़ा। पहली बार अप्रैल में कच्छ के रण में और दूसरी बार सितम्बर में कश्मीर में। कच्छ के रण में कुछ सफलताओं के बाद पाकिस्तानी सेनाओं को पीछे हट जाना पड़ा। 30 जून, 1965 को युद्ध-विराम समझौता हो गया और भारत ने अपनी शान्तिप्रियता का परिचय देते हुए कच्छ-सम्बन्धी मतभेदों को एक अन्तर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के निर्णय के लिए रखने की बात मान ली।

परन्तु पाकिस्तान ने भारत के इस रूख को दुर्बलता समझा और 1965 में युद्ध-विराम रेखा का उल्लंघन करके बड़ी संख्या में घुसपैठिये कश्मीर में भेज दिये। परन्तु भारतीय सेनाओं ने उन्हें पीछे धकेल दिया और हाजीपीर और टिथवाल के पाक-अधिकृत इलाकों को मुक्त करवा लिया। सितम्बर, 1965 को पाकिस्तानी सेनाओं ने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके छम्ब प्रदेश पर आक्रमण कर दिया।

इससे विवश होकर भारत को भी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी पाकिस्तान के क्षेत्र में युद्ध को ले जाना पड़ा। पाकिस्तानी सेनाओं के पास आधुनिकतम शस्त्रों के होते हुए भी भारतीय सेनाओं ने उन्हें बुरी तरह हरा दिया। अन्त में सुरक्षा परिषद् के 20 सितम्बर के प्रस्ताव का पालन करते हुए दोनों पक्षों ने 22-23 सितम्बर को सुबह 3.30 बजे युद्ध बन्द कर दिया। इस समय तक भारतीय सेनाएं लाहौर के दरवाजों तक पहुंच चुकी थीं।

युद्ध-विराम के बाद भी दोनों देशों में सामान्य सम्बन्धों की समस्या बनी रही। 10 जनवरी, 1966 को सोवियत संघ के प्रधानमन्त्री श्री कोसीगिन के प्रयत्नों से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हो गया जिसके द्वारा भारत के प्रधानमन्त्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात पर सहमत हो गये कि दोनों देशों के सभी सशस्त्र व्यक्ति 25 फरवरी, 1966 के पूर्व उस स्थान पर वापस बुला लिये जाएंगे जहां वे 5 अगस्त, 1965 के पूर्व थे तथा दोनों पक्ष युद्ध-विराम रेखा पर युद्ध विराम की शर्तों का पालन करेंगे। इस समझौते के द्वारा भारत ने खोया अधिक और पाया कम। यह समझौता पाकिस्तान के लिए अधिक लाभप्रद था तथा आचार्य कृपलानी का यह मत, “श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दबाव में आकर हस्ताक्षर किये थे,’ एक बड़ी सीमा तक उचित लगता है।

इससे एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पूरी हुई-भारत और पाकिस्तान में युद्ध स्थिति की औपचारिक समाप्ति। परन्तु पाकिस्तान ने शीघ्र ही भारत विरोधी प्रचार करना शुरू कर दिया। ताशकंद समझौते (Tashkent Agreement)-भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध को रुकवाने में सोवियत संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके प्रयासों से भारत एवं पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ, जिसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं

  • दोनों पक्षों का यह प्रयास रहेगा कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बने।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि दोनों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जाये, जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पहले थी।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध प्रचार नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों के उच्चायुक्त एक-दूसरे के देश में वापिस आयेंगे।

प्रश्न 7.
सन् 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के मुख्य कारण बताइए। इसके क्या परिणाम हुए ?
उत्तर:
भारत एवं पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध का मुख्य कारण पूर्वी पाकिस्तान में होने वाली घटनाएं और उनका भारत पर पड़ने वाला प्रभाव था। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगला देश) में जनता ने याहियां खां की तानाशाही के विरुद्ध स्वतन्त्रता का आन्दोलन आरम्भ किया। याहिया खां ने आन्दोलन को कुचलने के लिए सैनिक शक्ति का प्रयोग किया।

भारत ने बंगला देश मुक्ति संघर्ष में उसका साथ दिया। लगभग एक करोड़ शरणार्थियों को भारत में आना पड़ा। इससे भारत की आर्थिक व्यवस्था पर बड़ा बोझ पड़ा। भारत ने विश्व के देशों से अपील की कि जब तक बंगला देश की समस्या का संकट हल नहीं हो जाता तब तक पाकिस्तान को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न दी जाए।

सोवियत संघ और अनेक अन्य देशों ने भारत के साथ सहानुभूति प्रकट की। परन्तु चीन और अमेरिका जैसी महान् शक्तियां बंगला देश के प्रश्न को पाकिस्तान का घरेलू मामला बताकर उसे आर्थिक तथा सैनिक सहायता देती रहीं। पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का निश्चय किया और पाकिस्तान के आक्रमण का डटकर मुकाबला किया। 5 दिसम्बर को सुरक्षा परिषद् की बैठक में पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाया कि वह पूर्वी पाकिस्तान में क्रान्तिकारियों को सहायता दे रहा है।

अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया, परन्तु सोवियत संघ ने भारत का पक्ष लिया और वीटो का प्रयोग किया। 6 दिसम्बर को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय संसद् में बंगला देश गणराज्य के उदय की सूचना दी। 16 दिसम्बर, 1971 को ढाका में जनरल नियाजी ने आत्म-समर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए और लगभग 1 लाख पाक सैनिकों ने आत्म-समर्पण किया।

17 दिसम्बर को रात्रि के 8 बजे ‘एक-पक्षीय युद्ध विराम’ की घोषणा करते हुए श्रीमती गांधी ने याहिया खां को युद्धबन्दी प्रस्ताव मान लेने की अपील की। याहिया खां ने तुरन्त इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस युद्ध की विजय से भारत का सम्मान बढ़ा और अमेरिका की गहरी कूटनीतिक पराजय हुई। पाकिस्तान के विभाजन से पाकिस्तान का हौसला ध्वस्त हो गया।

शिमला सम्मेलन-श्रीमती गांधी ने पाकिस्तान की हार का कोई अनुभव लाभ न उठाते हुए दोनों देशों की समस्याओं पर विचार करने के लिए जून 1972 में शिमला में एक शिखर सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में पाक के तत्कालीन शासक प्रधानमन्त्री भुट्टो ने और भारत की उस समय की प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने भाग लिया। 3 जुलाई को दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस समझौते की महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं

(1) दोनों राष्ट्र अपने पारस्परिक झगड़ों को द्विपक्षीय बातचीत और मान्य शांतिपूर्ण ढंगों से हल करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं।

(2) दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता और सार्वभौम समानता का सम्मान करेंगे।

(3) दोनों राष्ट्र एक-दूसरे क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी का प्रयोग नहीं करेंगे।

(4) दोनों देशों द्वारा परस्पर विरोधी प्रचार नहीं किया जाएगा।

(5) समझौते में तय पाया गया कि दोनों देश परस्पर सामान्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयत्न करेंगे। संचार व्यवस्था, डाक व्यवस्था, जल, थल, हवाई यात्रा को पुनः चालू करने के लिए वार्ताएं की जाएंगी। आर्थिक तथा व्यापारिक सहयोग के सम्बन्ध में भी शीघ्र वार्ता की जाएगी।

(6) स्थायी शान्ति हेतु भी अनेक प्रयत्न किए जाने का समझौते में उल्लेख था। इसके लिए दोनों देशों को अपनी सेनाओं को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर वापस बुलाना था।

प्रश्न 8.
भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 के बाद के सम्बन्धों का वर्णन करें।
अथवा
भारत के पाकिस्तान के साथ संबंधों पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
1971 के युद्ध के पश्चात् भारत-पाक के सम्बन्ध काफ़ी खराब हो गए। मार्च, 1977 में जनता सरकार की स्थापना के पश्चात् भारत-पाक सम्बन्धों में सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनवरी, 1980 में प्रधानमन्त्री बनने पर भारत-पाक सम्बन्ध को सुधारने पर बल दिया, परन्तु सोवियत सेना के अफ़गानिस्तान में होने से स्थिति काफ़ी खराब हो गई। जनवरी-फरवरी, 1982 में पाकिस्तान के विदेश मन्त्री आगाशाह भारत आए और उन्होंने युद्ध-वर्जन सन्धि का प्रस्ताव पेश किया जिस पर श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारत पाक में सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त आयोग की स्थापना का सुझाव दिया।

सहयोग के प्रयास-1985 में भारत और पाकिस्तान के कई मन्त्रियों और अधिकारियों की एक-दूसरे के देशों में यात्राएं हुईं। व्यापार, कृषि, विज्ञान, तकनीकी और संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कुछ समझौते भी हुए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की पाकिस्तान यात्रा-29 दिसम्बर, 1988 को प्रधानमन्त्री राजीव गांधी दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान गए और उनकी पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बेनजीर भुट्टो से भारत-पाक सम्बन्धों पर भी बातचीत हुई। 31 दिसम्बर, 1988 को भारत और पाकिस्तान ने आपसी सम्बन्ध सद्भावनापूर्ण बनाने के उद्देश्य से शिमला समझौते के करीब 16 वर्ष बाद तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें एक-दूसरे के परमाणु संयन्त्रों पर आक्रमण नहीं करने सम्बन्धी समझौता काफ़ी महत्त्वपूर्ण है।

दिसम्बर, 1989 में वी० पी० सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। इस सरकार के अल्पकालीन कार्यकाल में भारत-पाक सम्बन्धों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। नरसिम्हा राव की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध– राष्ट्रमण्डल शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए भारत और पाक के प्रधानमन्त्री ने 17 अक्तूबर, 1991 को हरारे में बातचीत की। 1 जनवरी, 1992 को भारत और पाकिस्तान द्वारा यह समझौता लागू कर दिया गया, जिससे एक-दूसरे के आण्विक ठिकानों और सुविधाओं पर हमला न करने की व्यवस्था की गई थी।

पाक परमाणु कार्यक्रम-पाक परमाणु कार्यक्रम में भारत काफ़ी समय से चिन्तित है। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिन्तित होकर भारत ने भी मई, 1998 में पांच परमाणु परीक्षण किए जिसके मुकाबले में पाकिस्तान ने छ: परमाणु परीक्षण किए। बस सेवा के लिए भारत-पाक समझौता-17 फरवरी, 1999 को भारत और पाकिस्तान ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा प्रारम्भ करने के लिए एक समझौता किया।

20 जनवरी, 1999 को भारत-पाक सम्बन्धों में एक नया अध्याय उस समय खुला जब भारतीय प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं बस से लाहौर तक गए। ऐतिहासिक लाहौर घोषणा के अन्तर्गत भारत व पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादों को गम्भीरता से हल करने पर सहमत हुए और दोनों ने एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का विश्वास व्यक्त किया।

कारगिल मुद्दा–पाकिस्तान ने लाहौर घोषणा को रौंदते हुए भारत के कारगिल व द्रास क्षेत्र में व्यापक घुसपैठ करवाई। अनंत धैर्य के पश्चात् 26 मई, 1999 को भारत ने पाकिस्तान के इस विश्वासघात का करारा जवाब दिया। 12 अक्तूबर, 1999 को पाकिस्तान में सेना ने शासन पर अपना कब्जा कर लिया। लेकिन पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने भी भारत के साथ सम्बन्धों में मधुरता का कोई संकेत नहीं दिया। आगरा शिखर वार्ता-पाकिस्तान के शासक परवेज़ मुशर्रफ भारत के आमन्त्रण पर जुलाई, 2001 में भारत आए।

भारत में दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता हुई, जिसमें कश्मीर समस्या का समाधान, प्रायोजित आतंकवाद, एटमी लड़ाई खतरा, सियाचिन से सेना की वापसी, व्यापार की सम्भावनाएं, युद्धबन्दियों की रिहाई एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान मुख्य मुद्दे थे, परन्तु मुशर्रफ के अड़ियल रवैये के कारण यह वार्ता विफल रही।

भारतीय संसद पर हमला-13 दिसम्बर, 2001 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद् पर हमला किया जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत खराब हो गये तथा दोनों देशों ने सीमा पर फ़ौजें तैनात कर दीं, परन्तु विश्व समुदाय के हस्तक्षेप एवं पाकिस्तान द्वारा लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए मोहम्मद पर पाबन्दी लगाए जाने से दोनों देशों में तनाव कुछ कम हुआ।

प्रधानमन्त्री वाजपेयी की इस्लामाबाद यात्रा-जनवरी, 2004 में भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी चार दिन के लिए ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (सार्क) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद गए। अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री से मुलाकात की। इस शिखर सम्मेलन से दोनों देशों के बीच तनाव में कमी आई और दोनों ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति व्यक्त की।

मुम्बई पर आतंकवादी हमला-26 नवम्बर, 2008 को पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों ने मुम्बई के होटलों पर कब्जा करके कई व्यक्तियों को मार दिया। भारत ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की मांग की, जिसे पाकिस्तान ने नहीं माना, इससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री जुलाई 2009 में मिस्र में 15वें गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दौरान मिले तथा दोनों नेताओं ने परस्पर द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। इस बैठक के दौरान दोनों देशों ने विवादित मुद्दों को परस्पर बातचीत द्वारा हल करने की बात को दोहराया था।

25 फरवरी, 2010 को भारत एवं पाकिस्तान के विदेश सचिवों की नई दिल्ली में बातचीत हुई। इस बातचीत के दौरान भारत ने पाकिस्तान को वांछित आतंकवादियों को भारत को सौंपने को कहा। अप्रैल 2010 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री सार्क सम्मेलन के दौरान भूटान में मिले। इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। नवम्बर 2011 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मालद्वीप में 17वें सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान मिले। इस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सम्बन्धों पर बातचीत की।

दिसम्बर 2012 में पाकिस्तान के आन्तरिक मंत्री श्री रहमान मलिक भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने वीजा नियमों को और सरल बनाया। सितम्बर, 2013 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने द्विपक्षीय मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने सभी विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। मई 2014 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीप मुद्दों पर बातचीत की।

जुलाई 2015 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूस के शहर उफा में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने आतंकवाद एवं द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। 25 दिसम्बर, 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंच कर दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार लाने का प्रयास किया। नवम्बर 2018 में भारत-पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर को बनाने की घोषणा की। करतारपुर साहब सिक्खों का पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के 18 साल बिताए थे।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध न तो सामान्य थे और न ही सामान्य हैं। समय के साथ-साथ दोनों देशों में कटुता बढ़ती जा रही है। यह खेद का विषय है कि दोनों देशों में इस कड़वाहट को दोनों देशों के पढ़े-लिखे नागरिक भी दूर करने में असफल रहे। वास्तव में दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तब तक स्थापित नहीं हो सकते जब तक कि दोनों देशों के बीच अनेक विवादास्पद मुद्दों को हल नहीं किया जाता।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 9.
भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाने के मुख्य कारण बताएं।
उत्तर:
भारत में प्रारम्भिक वर्षों में परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के प्रति दृष्टिकोण आदर्शवादी एवं उदारवादी ही रहा। भारत ने शीत युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष आन्दोलन के विकास पर अधिक बल दिया तथा निशस्त्रीकरण का समर्थन करता रहा। परन्तु 1962 में चीन से युद्ध में हार, 1964 में चीन द्वारा परमाणु विस्फोट तथा 1965 एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ दो युद्धों ने भारत की परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के निर्माण पर बहुत अधिक प्रभाव डाला।

1970 के दशक में भारतीय नेतृत्व ने पहली बार अनुभव किया कि भारत को भी परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनना है। 1970 के दशक से लेकर वर्तमान समय तक भारत ने परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त की हैं। भारत ने सर्वप्रथम 1974 में एक तथा 1998 में पांच परमाणु परीक्षण करके विश्व को दिखला दिया कि भारत भी एक परमाणु सम्पन्न राष्ट्र है। भारत द्वारा परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार को बनान एवं रखने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना (To Become Self Dependent Nation):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं वे सभी आत्मनिर्भर राष्ट्र माने जाते हैं।

2. न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना (To Achieve the Position of Minimum Deterrent):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है। भारत ने सदैव यह कहा है कि भारत कभी भी पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा। भारत के पास परमाणु हथियार होने पर कोई भी देश भारत पर हमला करने से पहले सोचेगा।

3. शक्तिशाली राष्ट्र बनना (To Become Strong Nation):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जितने देश भी परमाणु सम्पन्न हैं, वे सभी के सभी शक्तिशाली राष्ट्र माने जाते हैं। इसके साथ परमाणु हथियारों की धारणा से भारत में केन्द्रीय शक्ति और अधिक मज़बूत एवं शक्तिशाली होती है जोकि बहुत आवश्यक है, क्योंकि जब कभी भी भारत में केन्द्रीय सरकार कमज़ोर हुई है, भारत को नुकसान उठाना पड़ा है।

4. प्रतिष्ठा प्राप्त करना (To achieve Prestige):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है। क्योंकि विश्व के सभी परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों को आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

5. भारत द्वारा लड़े गए युद्ध (War fought by India):
भारत ने समय-समय पर 1962, 1965, 1971 एवं 1999 में युद्धों का सामना किया। युद्धों में होने वाली अधिक हानि से बचने के लिए भारत परमाणु हथियार प्राप्त करना चाहता है।

6. दो पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार होना (Two Neighbours have a Nuclear Drum):
भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और इन दोनों देशों के साथ भारत युद्ध भी लड़ चुका है। अतः भारत को अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने का हक है।

7. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की विभेदपूर्ण नीति (Policy of Nuclear Nation):
परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि (N.P.T.) तथा 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि (C.T.B.T.) को इस प्रकार लागू करना चाहा, कि उनके अतिरिक्त कोई अन्य देश परमाणु हथियार न बना सके। भारत ने इन दोनों सन्धियों को विभेदपूर्ण मानते हुए इन पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखा।

प्रश्न 10.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ बताइए। गुट-निरपेक्षता आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य तथा सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
गुट-निरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
गुट निरपेक्ष आन्दोलन का अर्थ-गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी शक्तिशाली राष्ट्र का पिछलग्गू न बनकर अपना स्वतन्त्र मार्ग अपनाना। गुटों से अलग रहने की नीति का तात्पर्य अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में ‘वटस्थता’ कदापि नहीं है। कई पाश्चात्य लेखकों ने गुट-निरपेक्षता के लिए तटस्थता अथवा तटस्थतावाद शब्द का प्रयोग किया है उनमें मौर्गेन्थो, पीस्टर लायन, हेमिल्टन, फिश आर्मस्ट्रांग तथा कर्नल लेवि आदि ने इस नीति के लिए तटस्थता शब्द का प्रयोग कर भ्रम पैदा कर दिया है। वास्तव में दोनों नीतियां शान्ति व युद्ध के समय संघर्ष में नहीं उलझतीं, परन्तु तटस्थता निष्क्रियता व उदासनीता की नीति है, जबकि गुट-निरपेक्षता सक्रियता की नीति है।

तटस्थ देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों या घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्णतया निष्पक्ष रहते हैं और वे किसी अन्तर्राष्ट्रीय घटना या विषय के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त नहीं करते हैं। गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के प्रति निष्पक्ष या उदासीन नहीं होते, अपितु वे इन विषयों में पूर्ण रुचि लेते हैं और प्रत्येक के गुणों को सम्मुख रखते हुए उसके सम्बन्ध में निर्णय करने हेतु स्वतन्त्र होते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी अभिनीत करते हैं। अत: गुट-निरपेक्षता की नीति का अभिप्राय निष्पक्षता या उदासीनता की नीति नहीं है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के उद्देश्य-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं

1. शान्ति-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्व में शान्ति व्यवस्था और न्याय की स्थापना के लिए प्रयासरत है।

2. सजनात्मकता-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन शीत युद्ध के दौरान उत्पन्न हुई विश्व को नष्ट करने की प्रवृत्ति को समाप्त करके विश्व को सृजनात्मक प्रवृत्ति की ओर मोड़ना चाहता है।

3. आर्थिक न्याय-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विश्व में विद्यमान आर्थिक विषमता को दूर करके सभी देशों और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक न्याय को उपलब्ध करवाने का समर्थक है।

4. निःशस्त्रीकरण-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सभी तरह के अस्त्रों-शस्त्रों को नष्ट करके विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से समाधान करना है ताकि आतंक व भय के माहौल से मुक्ति प्राप्त हो सके।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के सिद्धान्त-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रमुख सिद्धान्त सैनिक सम्बन्धों का विरोध करना एवं उनसे दूर रहना है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्व को वैचारिक आधार पर बांटने का विरोध करना है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन मित्रता एवं समानता में विश्वास रखता है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र जैसे विश्व संस्थाओं का समर्थन करता है।

प्रश्न 11.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का क्या अर्थ है ? भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के मुख्य कारण लिखें।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 10 देखें। भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत के गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण हैं

1. आर्थिक पुनर्निर्माण–स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश का आर्थिक पुनर्निर्माण था। अतः भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था ताकि सभी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

2. स्वतन्त्र नीति-निर्धारण के लिए- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतन्त्र नीति का निर्धारण कर सके। भारत को स्वतन्त्रता हज़ारों देश प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। किसी एक गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढाने के लिए भारत की प्रतिष्ठा बढाने के लिए गट-निरपेक्षता की नीति का निर्माण किया गया। यदि भारत स्वतन्त्र विदेश नीति का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से अपना निर्णय देता तो दोनों गुट उसके विचारों का आदर करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी होगी और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

4. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता-भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 12.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जन्मदाता है।

(2) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 7वां शिखर सम्मेलन 1983 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में हुआ।

(3) राजीव गांधी की अध्यक्षता में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग, उत्तर-दक्षिण वार्तालाप, नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र संघ की सक्रिय भूमिका आदि विषयों पर जोर दिया।

(4) भारत की पहल पर ‘अफ्रीका कोष’ कायम किया गया।

(5) भारत ने अफ्रीका कोष को, रु० 50 करोड़ की राशि दी।

(6) भारत को 1986 एवं 1989 में अफ्रीका कोष का अध्यक्ष चुना गया। ऋण, पूंजी-निवेश तथा अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जैसे कई आर्थिक प्रस्तावों का मूल प्रारूप भारत ने बनाया।

(7) 1989 के बेलग्रेड सम्मेलन में भारत ने पृथ्वी संरक्षण कोष कायम करने का सुझाव दिया और सदस्य राष्टों ने इसका भारी समर्थन किया।

(8) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दसवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, वातावरण सुरक्षा, आतंकवाद जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। भारत का यह रुख जकार्ता घोषणा में शामिल किया गया कि आतंकवाद प्रादेशिक अखण्डता एवं राष्ट्रों की सुरक्षा को एक भयानक चुनौती है।

(9) भारत ने ही गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का ध्यान विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण की तरफ खींचा।

(10) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के महत्त्व एवं सदस्य राष्ट्रों की इसमें निष्ठा बनाए रखने के लिए भारत ने द्विपक्षीय मामले सम्मेलन में न खींचने की बात कही जिसे सदस्य राष्ट्रों ने स्वीकार किया।

(11) 1997 में दिल्ली में गुट-निरपेक्ष देशों के विदेश मन्त्रियों का शिखर सम्मेलन हुआ।

(12) बारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, विश्व शान्ति एवं आतंकवाद से निपटने के लिए एक विश्वव्यापी सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव पेश किया, जिसका सदस्य राष्ट्रों ने समर्थन किया।

(13) तेरहवें शिखर सम्मेलन में सक्रिय भूमिका अभिनीत करते हुए भारत ने आतंकवाद एवं इसके समर्थकों की कड़ी आलोचना कर विश्व शान्ति पर बल दिया।

(14) भारत ने क्यूबा में हए 14वें एवं मिस्त्र में हए 15वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हए आतंकवाद को समाप्त करने का आह्वान किया।

(15) भारत ने ईरान में 16वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए सीरिया समस्या एवं ईरान परमाणु विवाद को बातचीत द्वारा हल करने पर जोर दिया।

(16) भारत ने वेनेजुएला (2016) में हए 17वें एवं अजरबैजान में (2019) हए 18वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए विकास के लिए वैश्विक शांति स्थापित करने एवं आतंकवाद को समाप्त करने पर जोर दिया।

प्रश्न 13.
‘गुट-निरपेक्षता’ का क्या अर्थ है ? भारतीय गुट-निरपेक्षता की विशेषताएं बताइये ।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 10 देखें।

1. भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है- भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है क्योंकि भारत ने स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय राज्य नीति से दूर नहीं रखा है, अपितु भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका अभिनीत करता है।

2. सैन्य समझौतों का विरोध-भारत सैन्य समझौतों का विरोध करता है। अतः भारत सेन्टो (CENTO), नाटो (NATO), सीटो (SEATO), वारसा सन्धि (WARSA-PACT) आदि में सम्मिलित नहीं हुआ है।

3. शक्ति राजनीति से दूर रहना-भारत शक्ति राजनीति का विरोध करता है और प्रत्येक राष्ट्र के शक्तिशाली बनने के अधिकार को स्वीकार करता है।

4. शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति-भारत का पंचशील के सिद्धान्तों पर पूर्ण विश्वास है। शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति पंचशील के दो प्रमुख सिद्धान्त हैं। भारत शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का समर्थन करता है।

5. स्वतन्त्र विदेश नीति-भारत अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर कार्यान्वयन करता है। भारत अपनी विदेश नीति का निर्माण किसी भी अन्य देश के प्रभावाधीन नहीं करता, अपितु स्वेच्छा से स्वतन्त्र रूप में करता है। भारत दोनों शक्ति गुटों में से किसी भी गुट का सदस्य नहीं है।

6. निर्गुट देशों के मध्य गुटबन्दी नहीं है-कुछ आलोचकों का मत है कि निर्गुटता की नीति गुट-निरपेक्ष देशों की गुटबन्दी है। किन्तु आलोचकों का यह विचार उचित नहीं है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ गुट-निरपेक्ष देशों का तृतीय गुट स्थापित करना नहीं है।

7. गुट-निरपेक्षता शान्ति की नीति है-भारत एक निर्गुट देश है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य विश्व शान्ति स्थापित करना है। भारत शीत युद्ध एवं सैन्य समझौतों का विरोध करता है क्योंकि वह इन्हें विश्व-शान्ति हेतु भयावह समझता है।

प्रश्न 14.
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ? भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
अथवा
भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। भारतीय विदेश नीति के लक्ष्य एवं उद्देश्य-भारतीय विदेश नीति के लक्ष्य एवं उद्देश्यों का वर्णन इस प्रकार है

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, समझौतों तथा कानूनों के लिए सम्मान उत्पन्न करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का अर्थ बताइये। कोई एक परिभाषा भी दीजिए।
अथवा
विदेश नीति से आपका क्या अभिप्राय है? एक परिभाषा देकर स्पष्ट करें।
उत्तर:
विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का एक समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। विभिन्न राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के व्यवहार में क विदश सम्बन्ध परिवर्तन लाने के लिए और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अपने व्यवहार के अनुसार बनाने के लिए विदेश नीति का प्रयोग करता है।

डॉ० महेन्द्र कुमार के शब्दों में , “विदेश नीति कार्यों की सोची समझी क्रिया दिशा है जिससे राष्ट्रीय हित की विचारधारा के अनुसार विदेशी सम्बन्धों में उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।” रुथना स्वामी के शब्दों में, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहार का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति के किन्हीं चार मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
अथवा
भारत की विदेश नीति के कोई चार मुख्य सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
1. गुट-निरपेक्षता- भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी गुट में शामिल न होना और स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करना। भारत सरकार ने सदा ही गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया है।

2. विश्व शान्ति और सुरक्षा की नीति-भारत की विदेश नीति का आधारभूत सिद्धान्त विश्व शान्ति और सुरक्षा बनाए रखना है। भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने के पक्ष में है। भारत ने सदैव विश्व शान्ति की स्थापना की और सुरक्षा की नीति अपनाई है।

3. साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशों का विरोध-भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य का शिकार रहा है जिसके कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है। भारत साम्राज्यवाद को विश्व शान्ति का शत्रु मानता है क्योंकि साम्राज्यवाद युद्ध को जन्म देता है।

4. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध-भारतीय विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता यह है कि भारत विश्व के सभी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति के कोई चार निर्धारक तत्व लिखिए।
उत्तर:
1. संवैधानिक आधार-भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए, बताया गया है। अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहिए तथा दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाने चाहिए।

2. राष्ट्रीय हित-विदेशी नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपने हितों की रक्षा के लिए अपनाई है।

3. आर्थिक तत्व-भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतन्त्रता के समय भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए भारत ने गट-निरपेक्षता की नीति अपनाई ताकि दोनों गुटों के देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

4. विचारधारा का प्रभाव-विदेश नीति का निर्माण करने में उस देश की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है।

प्रश्न 4.
भारत की परमाणु नीति की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत परमाणु शक्ति का प्रयोग विनाशकारी उद्देश्यों के लिए करने के विरुद्ध है। 1974 में भारत ने एक परमाणु धमाका किया था, परन्तु इसके साथ भारत ने यह घोषणा की थी कि भारत का परमाणु धमाका सैनिक लक्ष्यों के लिए नहीं, बल्कि शान्तिमयी उद्देश्यों के लिए है। भारत ने परमाणु अप्रसार सन्धि (Nuclear Non-Proliferation Treaty) के ऊपर हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि भारत इस सन्धि को गैर-परमाणु शक्तियों के लिए पक्षपात वाली सन्धि मानता है।

यद्यपि भारत ने परमाणु बम न बनाने की घोषणा की थी, फिर भी अपने पड़ोसी देशों द्वारा एकत्र की जाने वाली परमाणु सामग्री से चिंतित होकर तथा अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने 11 मई तथा 13 मई, 1998 को पांच परमाणु विस्फोट किए। यह परमाणु विस्फोट भारत ने अपनी सुरक्षा की दृष्टि से किए हैं। इन विस्फोटों के बाद भारत ने और परमाणु विस्फोट न करने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही साथ परमाणु अस्त्रों को पूर्णतः समाप्त करने के पक्ष में है। इसके लिए वह एक आम सहमति वाली सन्धि के निर्माण के पक्ष में है।

प्रश्न 5.
1962 के भारत-चीन युद्ध के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:
1. तिब्बत की समस्या-1962 की भारत-चीन युद्ध की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या थी। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर सुलझाना चाहता था।

2. मानचित्र से सम्बन्धित समस्या-भारत एवं चीन के मध्य 1962 में युद्ध का एक कारण दोनों देशों के बीच मानचित्र में रेखांकित भू-भाग था। चीन ने 1954 में प्रकाशित अपने मानचित्र में कुछ ऐसे भाग प्रदर्शित किये जो वास्तव में भारतीय भू-भाग में थे, अत: भारत ने इस पर चीन के साथ अपना विरोध दर्ज कराया।

3. सीमा विवाद- भारत चीन के बीच युद्ध का एक कारण सीमा विवाद भी था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तुचीन ने नहीं। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 6.
भारत-चीन सीमा विवाद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत और चीन एशिया के दो बड़े और पड़ोसी देश हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव रहा है। इसी विवाद के चलते 1962 में दोनों देशों के बीच एक युद्ध भी हो चुका है। दोनों देशों के बीच तिब्बत एक संवेदनशील विषय है। तिब्बत भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित है। पहले यह एक स्वतन्त्र राज्य हुआ करता था। 18वीं शताब्दी में तिब्बत को चीन का एक भाग मान लिया गया। 1950 में चीन ने तिब्बत में व्यापक पैमाने पर घुसपैठ की जिसका भारत ने विरोध किया। 1959 में तिब्बत की राजधानी में अचानक सैनिक गतिविधियां बढ़ गयीं।

तिब्बत के वैधानिक शासक दलाई लामा को बाहर निकाल दिया गया। चीन भारत की तिब्बत के प्रति इस सहानुभूति को पसन्द नहीं करता और भारत के दलाई लामा की शरण को शत्रु जैसी कार्यवाही मानता है। सितम्बर, 1959 में चीनी सरकार ने भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के 1,28,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में औपचारिक रूप से अपना दावा प्रस्तुत किया। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और इसकी 6400 वर्ग किलोमीटर सीमा पर कब्जा कर लिया। आज भी भारत की लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर सीमा चीन के कब्जे में है। चीन इस पर अपना दावा करता है जबकि यह भारत की सीमा है। आज भी दोनों देशों में सीमा विवाद बना हुआ है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 7.
1962 में भारत-चीन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत-चीन के मध्य 1962 में हुए युद्ध की परिस्थितियां बहुत पहले बननी शुरू हो गई थीं। अन्तत: चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत की उत्तरी सीमा पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हमले के कारण भारतीय फ़ौजें जब तक सम्भलीं, तब तक चीन ने सैनिक चौंकियों पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत के कहने पर तेजी से सैन्य सामग्री भेजी। चीन ने अचानक 21 नवम्बर, 1962 के एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा कर दी तथा दो सूत्रीय योजना की घोषणा की।

प्रथम, चीनी सेनाएं, 7 नवम्बर, 1959 की वास्तविक नियन्त्रण रेखा से 20 किलोमीटर अपनी ओर हट जायेंगी। द्वितीय, चीनी सेना के हटने से खाली क्षेत्र पर चीन सरकार अपनी असैनिक चौंकियां स्थापित करेगी। विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत ने चीन की एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा को मान लिया, परन्तु द्विपक्षीय योजना को नहीं माना और यह घोषणा की, कि जब तक चीन 8 सितम्बर, 1962 की स्थिति तक नहीं लौट जाता तब तक कोई वार्ता नहीं होगी।

प्रश्न 8.
कोलम्बो प्रस्ताव के मुख्य प्रावधान लिखें।
उत्तर:
श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार), कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मिस्र और घाना ने दिसम्बर, 1962 में भारत-चीन वार्ता लम्बो सम्मेलन आयोजित किया। श्रीमती भण्डारनायके स्वयं प्रस्ताव लेकर दिल्ली और पीकिंग गई। इसके बाद 19 जनवरी, 1963 को यह प्रस्ताव प्रकाशित किये गए, जिनकी मुख्य बातें निम्नलिखित थीं

  • युद्ध-विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण दल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में सैनिक चौंकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा ले।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • विवाद को अन्तिम हल होने तक चीन द्वारा खाली किया गया क्षेत्र असैनिक क्षेत्र हो, जिसकी निगरानी दोनों पक्षों द्वारा नियुक्त गैर सैनिक चौंकियां करें।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शान्तिपूर्ण ढंग से किया जाए।

प्रश्न 9. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:
1. जूनागढ़ एवं हैदराबाद का भारत में मिलाया जाना-जूनागढ एवं हैदराबाद की रियासतें भारत में मिला लिये जाने से पाकिस्तान को गहरा धक्का लगा तथा वह भारत को सदैव नीचा दिखाने की कार्यवाहियां करने लगा।

2. ऋण अदा करने का प्रश्न-स्वतन्त्र भारत ने पुरानी सरकार के कर्जे का भार सम्भाला। इसके अनुसार इसे 5 वर्ष में पाकिस्तान से 300 करोड़ रुपये लेने थे, लेकिन पाकिस्तान ने कर्जे को चुकाने का नाम तक नहीं लिया।

3. विस्थापित सम्पत्ति तथा अल्प संख्यकों की रक्षा का प्रश्न-1947 से 1957 तक लगभग 90 लाख मुसलमान भारत से पाकिस्तान गये तथा इतने ही गैर मुस्लिम पाकिस्तान से भारत आए। पाकिस्तान ने इन विस्थापितों की सम्पत्ति तथा अल्पसंख्यकों की रक्षा से सम्बन्धित सभी सुझावों को नकार दिया।

4. कश्मीर समस्या-1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा कारण कश्मीर समस्या थी। अक्तूबर, 1947 में कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर रियासत को भारत में मिलाने की घोषणा कर दी थी, परन्तु पाकिस्तान ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।

प्रश्न 10.
ताशकंद समझौते के मुख्य प्रावधान लिखें।
उत्तर:
ताशकंद समझौता 1966 में सोवियत संघ में भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ। इस समझौते के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं

  • दोनों पक्षों का यह प्रयास रहेगा, कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बनें।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे, कि दोनों देशों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जायें, जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पहले थीं।।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध प्रचार नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों के उच्चायुक्त एक-दूसरे के देश में वापिस आयेंगे।

प्रश्न 11.
पंचशील पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
पंचशील के सिद्धान्त भारत और चीन के प्रधानमंत्री, पण्डित जवाहर लाल व चाऊ-एन-लाई ने बनाए। पंचशील का साधारण अर्थ पांच सिद्धान्त हैं। अप्रैल, 1954 में भारत तथा चीन के मध्य एक व्यापारिक समझौता हुआ था। इस व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धान्त दिए गए जिनको सामूहिक रूप से पंचशील कहा जाता है। इन पांच सिद्धान्तों को भारत तथा चीन ने परस्पर सम्बन्धों को नियमित करने के विषय में स्वीकार किया था। ये सिद्धान्त हैं-

  • परस्पर क्षेत्रीय अखण्डता तथा प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
  • परस्पर आक्रमण न करना।
  • परस्पर आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप न करना।
  • समानता तथा परस्पर लाभ।
  • शान्तिमय सह-अस्तित्व।

प्रश्न 12.
भारत द्वारा परमाणु नीति एवं कार्यक्रम अपनाने के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:
1. आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना-भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर एक आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं वे सभी आत्म-निर्भर राष्ट्र हैं।

2. न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना-भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है।

3. दो पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार होना-भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं।

4. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की विभेदपूर्ण नीति- परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) तथा 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (C.T.B.T.) के विभेदपूर्ण ढंग से लागू किया, जिसके कारण भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।

प्रश्न 13.
भारतीय परमाणु नीति के कोई दो पक्ष बताएं।
उत्तर:
भारतीय परमाणु नीति के दो पक्ष निम्नलिखित हैं

1. आत्म रक्षा-भारतीय परमाणु नीति का प्रथम पक्ष आत्म रक्षा है। भारत ने आत्म रक्षा के लिए परमाणु हथियारों का निर्माण किया है, ताकि कोई अन्य देश भारत पर परमाणु हमला न कर सके।

2. प्रथम प्रयोग की मनाही-भारत की परमाणु नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि भारत ने परमाणु हथियारों का युद्ध में पहले प्रयोग न करने की घोषणा कर रखी है।

प्रश्न 14.
भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने वाले किन्हीं चार बाहरी कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन-भारतीय विदेश नीति अन्तर्राष्ट्रीय जैसे यू० एन० ओ०, आई० एम० एफ० तथा वर्ल्ड बैंक प्रभावित करते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय जनमत- भारतीय विदेश नीति को अन्तर्राष्ट्रीय जनमत प्रभावित करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय कानून-भारतीय विदेश नीति को अन्तर्राष्ट्रीय कानून प्रभावित करते हैं।
  • विश्व समस्याएं-भारतीय विदेश नीति को मानवीय अधिकारों तथा आतंकवाद की समस्याएं भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 15.
‘गुट-निरपेक्ष आन्दोलन’ के कोई चार उद्देश्य बताइये।
अथवा
गुट निरपेक्षता के कोई चार उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों को शक्ति गुटों से अलग रखना था।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाना था।
  • सदस्य देशों में सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद को समाप्त करना इसका एक मुख्य उद्देश्य रखा गया।

प्रश्न 16.
भारतीय गुट-निरपेक्षता की कोई चार विशेषताएँ बताइये ।
अथवा
भारत की गुट निरपेक्षता की नीति के मुख्य तत्त्व लिखिए।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आंदोलन की नीति किसी गुट में शामिल होने के विरुद्ध है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने पर बल देती है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति साम्राज्यवाद के विरुद्ध है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति रंग भेदभाव की नीति के विरुद्ध है।

प्रश्न 17.
भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाने के कोई चार कारण लिखिए।
अथवा
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है? भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के कोई तीन कारण लिखिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ- इसके लिए अति लघु उत्तरीय प्रश्नों में प्रश्न नं0 4 देखें। भारत द्वारा गुट निरपेक्ष नीति अपनाने के कारण

1. आर्थिक पुनर्निर्माण-स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश का आर्थिक पुनर्निर्माण था। अत: भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था ताकि सभी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

2. स्वतन्त्र नीति-निर्धारण के लिए भारत ने गुट-निपरेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतन्त्र नीति का निर्धारण कर सके। भारत को स्वतन्त्रता हज़ारों देश प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। किसी एक गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति का निर्माण किया गया। यदि भारत स्वतन्त्र विदेश नीति का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से अपना निर्णय देता तो दोनों गुट उसके विचारों का आदर करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी होगी और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

4. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है। विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। रुथना स्वामी के अनुसार, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहारों का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति की कोई दो मुख्य विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:

  • भारतीय विदेश नीति का मुख्य आधारभूत सिद्धान्त गुट-निरपेक्षता है।
  • भारतीय विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त राष्ट्रहित की रक्षा करना है।

प्रश्न 3.
भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने वाले दो तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
1. संवैधानिक आधार-भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए इस विषय में भी निर्देश दिए गए हैं। अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने, दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध रखने तथा अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाने सम्बन्धी निर्देश दिए गए हैं।

2. राष्ट्र हित-विदेश नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने अपने राष्ट्र हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रमण्डल का सदस्य रहना स्वीकार किया। भारत ने राष्ट्र हितों को सामने रखते हुए ही ऐसे कार्य किए हैं जिन्हें उचित कहना कठिन है।

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ स्पस्ट करें।
उत्तर:
भारत एक गुट-निरपेक्ष देश है। भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार गुट-निरपेक्षता है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है-अपनी स्वतन्त्र नीति। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है कि किसी गुट में शामिल न होकर स्वतन्त्र रहना। गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण देश प्रत्येक समस्या पर उसके गुण-दोष पर विचार कर अपनी राय कायम करता है। गुट-निरपेक्षता की नीति शान्तिवाद की नीति है।

भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के अनुसार, “गुट-निरपेक्षता में न तो तटस्थता है और न ही समस्याओं के प्रति उदासीनता। उसमें सिद्धान्तों के आधार पर सक्रिय और स्वतन्त्र रूप से निर्णय करने की भावना निहित है। अपनी इसी आन्तरिक शक्ति के सहारे वह सभी देशों के बीच विश्वास तथा सहयोग को अधिक-से-अधिक बढ़ाने पर बल दे रहा है, ताकि विश्व को युद्ध और आर्थिक विनाश से बचाया जा सके।”

प्रश्न 5.
पंचशील क्या है ?
उत्तर:
पंचशील के सिद्धान्त भारत और चीन के प्रधानमन्त्री, पण्डित जवाहर लाल व चाऊ-एन-लाई ने बनाए। पंचशील का साधारण अर्थ पांच सिद्धान्त हैं। अप्रैल, 1954 में भारत तथा चीन के मध्य एक व्यापारिक समझौता हुआ था। इस व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धान्त दिए गए जिनको सामूहिक रूप से पंचशील कहा जाता है। इन पांच सिद्धान्तों को भारत तथा चीन ने परस्पर सम्बन्धों को नियमित करने के विषय में स्वीकार किया था। ये सिद्धान्त हैं-

  • परस्पर क्षेत्रीय अखण्डता तथा प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
  • परस्पर आक्रमण न करना
  • परस्पर आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप न करना
  • समानता तथा परस्पर लाभ
  • शान्तिमय सह-अस्तित्व।

प्रश्न 6.
भारत-चीन में हुए 1962 के युद्ध के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
1. तिब्बत की समस्या-1962 के भारत-चीन युद्ध की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या थी। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर सुलझाना चाहता था।

2. सीमा विवाद- भारत-चीन के बीच युद्ध का एक कारण सीमा विवाद भी था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं किया। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 7.
कोलम्बो प्रस्ताव के कोई चार प्रावधान लिखें।
उत्तर:

  • युद्ध विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा लें।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए।

प्रश्न 8.
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ कब और कौन-सा समझौता किया था?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ सन् 1966 में ताशकन्द समझौता किया था।

प्रश्न 9.
ताशकंद समझौते के कोई दो प्रावधान लिखें।
उत्तर:

  • दोनों पक्षों (भारत-पाकिस्तान) का यह प्रयास रहेगा कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बनें।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि दोनों देशों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जाएं जहां से 5 अगस्त, 1965 से पहले थीं।

प्रश्न 10.
‘शिमला समझौता’ कब और किसके मध्य सम्पन्न हुआ ?
उत्तर:
1972 को भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ, जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

  • दोनों देश आपसी मतभेदों का शान्तिपूर्ण ढंग से हल करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे की सीमा पर आक्रमण नहीं करेंगे।

प्रश्न 11.
भारत और चीन के मध्य दो मुख्य विवाद कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:

  • भारत और चीन में महत्त्वपूर्ण विवाद सीमा का विवाद है। चीन ने भारत की भूमि पर कब्ज़ा कर रखा है।
  • चीन का तिब्बत पर कब्जा और भारत का दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना।

प्रश्न 12.
भारत-पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में तनाव के मुख्य कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान में कभी भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रहे। इन दोनों में तनाव के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) भारत-पाक सम्बन्धों में तनाव का महत्त्वपूर्ण कारण कश्मीर का मामला है। पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाया है जिसे भारत नापसन्द करता है।

(2) भारत और पाकिस्तान में तनावपूर्ण सम्बन्धों का एक कारण यह है कि पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर के आतंकवादियों की सभी तरह की सहायता कर रहा है।

प्रश्न 13.
भारत द्वारा परमाणु शस्त्र बनाने के दो मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर:

  • भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है।
  • भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक हैं क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और इन दोनों देशों से भारत युद्ध भी लड़ चुका है।

प्रश्न 14.
भारत की परमाणु नीति के विकास के दो पड़ाव लिखें।
उत्तर:

  • भारत ने 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की।
  • भारत ने 1974 एवं 1998 में परमाणु परीक्षण किए। इन परीक्षणों द्वारा भारत ने परमाणु कार्यक्रम को आगे जारी रखने के लिए आवश्यक तथ्य एवं आंकड़े प्राप्त किए।

प्रश्न 15.
पोखरण में भारत ने परमाणु परीक्षण कब किए ?
उत्तर:
भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण सन् 1974 एवं सन् 1998 में किये।

प्रश्न 16.
नेहरू की विदेश नीति के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • दूसरे देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना।
  • गुटों की राजनीति से अलग रहना।

प्रश्न 17.
विदेशी नीति से सम्बन्धित किन्हीं दो नीति निर्देशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।

प्रश्न 18.
तिब्बत का पठार भारत और चीन में तनाव का एक बड़ा मसला कैसे बना ?
उत्तर:
भारत और चीन के बीच तनाव का एक कारण तिब्बत की समस्या है। 29 अप्रैल, 1954 को भारत ने कुछ शर्तों के साथ तिब्बत पर चीन के आधिपत्य को स्वीकार किया। दोनों देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों में विश्वास व्यक्त किया। मार्च, 1957 में दलाईलामा ने चीनियों के दमन से भयभीत होकर भारत में राजनीतिक शरण ले ली, जिसका चीन ने विरोध किया, तभी से तिब्बत भारत एवं चीन के बीच एक बड़ा मसला बना हुआ है।

प्रश्न 19.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के ऐसे दो उदाहरण दीजिए जिनमें भारत ने स्वतन्त्र रवैया अपनाया है ?
उत्तर:

  • निःशस्त्रीकरण-भारत ने नि:शस्त्रीकरण के मुद्दे पर स्वतन्त्र रवैया अपनाया है तथा किसी के दबाव में नहीं आया।
  • आतंकवाद-भारत ने आतंकवाद जैसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे पर स्वतन्त्र रवैया अपनाया है।

प्रश्न 20.
अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं के ऐसे कोई दो उदाहरण दीजिए, जिनमें भारत ने स्वतन्त्र रवैया अपनाया ?
उत्तर:
1. स्वेज नहर की समस्या-26 जुलाई, 1956 को मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर ब्रिटेन, फ्रांस एवं इज़रायल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया, भारत ने इस आक्रमण की निन्दा करते हुए कहा कि विवाद को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाए।

2. सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप-भारत ने 1979 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में किए गए सैनिक हस्तक्षेप की निन्दा की।

प्रश्न 21.
मैक्मोहन रेखा से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मैक्मोहन रेखा उत्तर-पूर्व में भारत-चीन सीमा का विभाजन करती है। सन् 1914 में शिमला में हुए ब्रिटिश भारत, चीन और तिब्बत के प्रतिनिधियों के एक सम्मेलन में यह सीमा रेखा निर्धारित करके औपचारिक रूप से सीमा विभाजन किया गया था। इस सीमा रेखा का नाम तत्कालीन भारत मन्त्री आर्थर हेनरी मैक्मोहन के नाम से रखा गया था। भारत ने इस सीमा रेखा को सदैव वैध माना है। यह एक प्राकृतिक सीमा है। क्योंकि यह उत्तर में तिब्बत के पठार और दक्षिण में भारत की पर्वत श्रेणियों से निकलती है। चीन ने इस सीमा रेखा का कभी आदर नहीं किया।

प्रश्न 22.
भारत चीन सीमा विवाद क्या है ?
उत्तर:
भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव रहा है। सितम्बर, 1959 में चीनी सरकार ने भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के 1,28,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में औपचारिक रूप से अपना दावा प्रस्तुत किया। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और इसकी 6400 वर्ग किलोमीटर सीमा पर कब्जा कर लिया। आज भी भारत की लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर सीमा चीन के कब्जे में है। चीन इस पर अपना दावा करता है जबकि यह भारत की सीमा है। आज भी दोनों देशों में सीमा विवाद बना हुआ है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्न में से कौन-सा पं० नेहरू द्वारा अपनाई गई विदेश नीति का एक तत्त्व है
(A) गुट-निरपेक्षता
(B) साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध
(C) पंचशील।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. निम्न में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने वाला तत्त्व है-
(A) संवैधानिक आधार
(B) भौगोलिक तत्त्व
(C) राष्ट्रीय हित
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. भारत-चीन युद्ध कब हुआ ?
(A) 1962
(B) 1965
(C) 1971
(D) 1974
उत्तर:
(A) 1962

4. कोलम्बो प्रस्ताव का प्रावधान था
(A) युद्ध विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है
(B) चीन द्वारा पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटाना
(C) भारत द्वारा अपनी वर्तमान स्थिति को कायम रखना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

5. मैक्मोहन रेखा का निर्धारण किया गया
(A) 1914 में
(B) 1920 में
(C) 1925 में
(D) 1935 में।
उत्तर:
(A) 1914 में।

6. निम्न में से किसने पंचशील के सिद्धान्तों का निर्धारण किया ?
(A) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(C) पं० नेहरू।

7. पंचशील के कितने सिद्धान्त हैं ?
(A) चार
(B) पाँच
(C) सात
(D) आठ।
उत्तर:
(B) पाँच।

8. 1965 में किन दो देशों के बीच युद्ध हुआ ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-चीन
(C) भारत-श्रीलंका
(D) पाकिस्तान-नेपाल।
उत्तर:
(A) भारत-पाकिस्तान।

9. ताशकन्द समझौता किन दो देशों के बीच हुआ ?
(A) भारत-चीन
(B) भारत-पाकिस्तान
(C) भारत-नेपाल
(D) भारत-श्रीलंका।
उत्तर:
(B) भारत-पाकिस्तान।

10. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में किस नए देश का जन्म हुआ ?
(A) नेपाल
(B) भूटान
(C) बंगलादेश
(D) मालद्वीप।
उत्तर:
(C) बंगलादेश।

11. शिमला समझौता किन दो देशों के बीच हुआ ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-चीन
(C) भारत-नेपाल
(D) भारत-श्रीलंका।
उत्तर:
(A) भारत-पाकिस्तान।

12. पं० नेहरू कब से कब तक भारत के प्रधानमन्त्री रहे ?
(A) 1947-1950
(B) 1947-1955
(C) 1947-1962
(D) 1947-1964
उत्तर:
(D) 1947-1964

13. किसके सुझाव पर कश्मीर का विभाजन किया गया था ?
(A) माउण्टबेटन
(B) एम० सी० नाटन
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(A) माउण्टबेटन।

14. भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाने का कारण है
(A) आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना
(B) शक्तिशाली राष्ट्र बनना
(C) पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

15. भारत ने प्रथम परमाणु विस्फोट किस वर्ष किया ?
(A) 1974
(B) 1988
(C) 2000
(D) 2001
उत्तर:
(A) 1974

16. भारत ने द्वितीय परमाणु विस्फोट कब किया ?
(A) 1974
(B) 1985
(C) 1998
(D) 2000
उत्तर:
(C) 1998

17. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का आन्तरिक निर्धारक तत्त्व है ?
(A) संवैधानिक आधार
(B) भौगोलिक तत्त्व
(C) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

18. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का बाहरी निर्धारक तत्त्व है ?
(A) राष्ट्रीय हित
(B) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन
(C) आर्थिक तत्त्व
(D) संवैधानिक आधार।
उत्तर:
(B) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन।

19. निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय विदेश नीति की विशेषता है ?
(A) गुट-निरपेक्षता
(B) साम्राज्यवादियों का विरोध
(C) उपनिवेशवादियों का विरोध
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

20. पंचशील के सिद्धान्तों का प्रतिपादन कब किया गया ?
(A) 1954
(B) 1956
(C) 1958
(D) 1960
उत्तर:
(A) 1954

21. निम्नलिखित में से कौन-सा पंचशील का सिद्धान्त है ?
(A) राष्ट्रों को एक-दूसरे की प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए
(B) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करेगा
(C) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

22. भारत में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने परमाणु परीक्षण किया
(A) सन् 1998 में
(B) सन् 1996 में
(C) सन् 1999 में
(D) सन् 1997 में।
उत्तर:
(D) सन् 1998 में।

23. भारत-पाक के मध्य शिमला समझौता कब हुआ?
(A) वर्ष 1962 में
(B) वर्ष 1972 में
(C) वर्ष 1974 में
(D) वर्ष 1976 में।
उत्तर:
(B) वर्ष 1972 में।

24. कारगिल संघर्ष के दौरान भारतीय सेना ने कौन-सा ऑपरेशन चलाया था?
(A) ऑपरेशन विजय
(B) ऑपरेशन सुरक्षा
(C) ऑपरेशन शान्ति
(D) इनमें कोई नहीं।
उत्तर:
(A) ऑपरेशन विजय।

25. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जनक किसको माना जाता है ?
(A) सुकर्णो को
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू को
(C) नेल्सन मंडेला को
(D) सभी को।
उत्तर:
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू को।

26. पाकिस्तान की स्थापना किस वर्ष में हुई ?
(A) 1947 में
(B) 1950 में
(C) 1945 में
(D) 1949 में।
उत्तर:
(A) 1947 में।

27. भारत की विदेश नीति का मुख्य निर्माता किसे माना जाता है ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू
(B) इंदिरा गांधी
(C) महात्मा गांधी
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू।

28. पहला गुट-निरपेक्ष सम्मेलन हुआ
(A) काहिरा में
(B) बेलग्रेड में
(C) कोलम्बो में
(D) नई दिल्ली में।
उत्तर:
(B) बेलग्रेड में।

29. ‘पंचशील समझौता’ किन देशों के मध्य हुआ ?
(A) भारत-श्रीलंका
(B) भारत-नेपाल
(C) भारत-पाकिस्तान
(D) भारत-तीन।
उत्तर:
(D) भारत-चीन।

30. निम्न में से एक भारत का पड़ोसी देश नहीं है ?
(A) चीन
(B) अमेरिका
(C) नेपाल
(D) पाकिस्तान।
उत्तर:
(B) अमेरिका।

31. भारत का पड़ोसी देश नहीं है
(A) पाकिस्तान
(B) नेपाल
(C) अमेरिका
(D) चीन।
उत्तर:
(C) अमेरिका।

32. भारत का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1947
(B) 1948
(C) 1949
(D) 1950
उत्तर:
(A) 1947

33. भारत के विभाजन से कौन-सा नया देश अस्तित्व में आया ?
(A) रूस
(B) जर्मनी
(C) पाकिस्तान
(D) जापान।
उत्तर:
(C) पाकिस्तान।

34. पाकिस्तान ने भारत पर पहली बार कब आक्रमण किया ?
(A) वर्ष 1965 में
(B) वर्ष 1971 में
(C) वर्ष 1984 में
(D) वर्ष 1950 में।
उत्तर:
(A) वर्ष 1965 में।

35. वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच कौन-सा समझौता हुआ ?
(A) ताशकन्द समझौता
(B) पंचशील समझौता
(C) शिमला समझौता
(D) कारगिल समझौता।
उत्तर:
(C) शिमला समझौता।

36. प्रधानमन्त्री राजीव गांधी कब चीन की ऐतिहासिक यात्रा पर गए ?
(A) 1985
(B) 1986
(C) 1987
(D) 1988
उत्तर:
(D) 1988

37. बांडुंग में एफ्रो-एशियाई दोनों देशों का सम्मेलन कब हुआ ?
(A) सन् 1952 में
(B) सन् 1955 में
(C) सन् 1956 में
(D) सन् 1972 में।
उत्तर:
(B) सन् 1955 में।

38. क्या वर्तमान समय में नेपाल में लोकतन्त्र पाया जाता है ?
(A) हां
(B) नहीं
(C) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) हां।

39. गुट निरपेक्षता से तात्पर्य है
(A) तटस्थता
(B) तटस्थीकरण
(C) अलगाववाद
(D) किसी भी शक्ति गुट में शामिल न होना।
उत्तर:
(D) किसी भी शक्ति गुट में शामिल न होना।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) चीन ………… दल के शासन वाला देश है।
उत्तर:
साम्यवादी

(2) शिमला समझौता वर्ष ……….. में हुआ।
उत्तर:
1972

(3) 1962 में ……….. और …….. देशों के बीच युद्ध हुआ।
उत्तर:
चीन, भारत

(4) ………. भारत का पड़ोसी देश है।
उत्तर:
पाकिस्तान

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

(5) आजकल गुट निरपेक्ष देशों की संख्या ………… है।
उत्तर:
120

(6) 1962 में ……………… ने भारत पर आक्रमण किया।
उत्तर:
चीन

(7) पंचशील समझौते पर ………….. और ……………. दो देशों ने हस्ताक्षर किए।
उत्तर:
भारत, चीन,

(8) भारत द्वारा अपना प्रथम परमाणु परीक्षण सन् ……………. में किया गया था।
उत्तर:
1974

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
विदेश नीति क्या होती है ?
उत्तर:
प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति का संवैधानिक आधार लिखें।
उत्तर:
अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाने सम्बन्धी निर्देश दिए गए हैं।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति का कोई एक उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
क्षेत्रीय अखण्डता की रक्षा करना।

प्रश्न 4.
भारत की विदेश नीति का मख्य निर्माता किसे माना जाता है ?
उत्तर:
पं. जवाहर लाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का निर्माता माना जाता है।

प्रश्न 5.
लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के साथ कौन-सा समझौता किया?
उत्तर:
ताशकन्द समझौता।

प्रश्न 6.
‘ताशकन्द समझौता’ किन देशों के मध्य हुआ ?
उत्तर:
भारत-पाकिस्तान के बीच।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
नियोजन से आप क्या समझते हैं ? नियोजन के लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
आधुनिक राज्य पुलिस राज्य न होकर कल्याणकारी राज्य है। आधुनिक राज्य अपने नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक आदि की उन्नति में व्याप्त है। राज्य अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए नियोजन पद्धति को प्रयोग में ला रहे हैं। आज नियोजन की आवश्यकता को व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया है।

आर्थिक नियोजन की विधि को सबसे पहले रूस ने 1928 में लागू किया। इन योजनाओं के फलस्वरूप कुछ वर्षों में ही रूस संसार की महान् शक्तियों में गिना जाने लगा। आर्थिक नियोजन की सफलता को देखकर संसार के सभी देशों विशेषकर अल्पविकसित देशों ने योजनाओं के मार्ग को अपनाया है।

फिफ्नर और प्रिस्थस (Pfiffner and Presthus) ने ठीक ही कहा है, “सभी संगठनों को यदि वे अपने उद्देश्यों की सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो योजना का निर्माण करना All organisations must plan if they are to achieve their end.”) लीविस (Lewis) ने कहा है, “आज मुख्य बात यह नहीं कि नियोजन हो अथवा नहीं अपितु यह है कि नियोजन का रूप क्या होना चाहिए।

नियोजन का अर्थ एवं परिभाषाएं (Meaning and Definitions of Planning):
नियोजन निर्माण आम व्यक्ति तथा सामूहिक प्रयत्न का एक स्वाभाविक अंग है। फिफ्नर और प्रिस्थस के अनुसार, “नियोजन एक ऐसी विवेकपूर्ण प्रक्रिया है जो सारे मानव-व्यवहार में पाई जाती है।” साधारण शब्दों में नियोजन का अर्थ कम से कम व्यय द्वारा उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए पूर्व निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करना है। उर्विक (Urwick) के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, साधारण रूप से कार्य करने की एक पूर्व निश्चित मानसिक प्रक्रिया है । कार्य करने से पूर्व विचार तथा अनुमानों की अपेक्षा तथ्यों के प्रकाश में कार्य करना है, यह अनुमान लगाने वाली प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया है।”

डिमॉक (Dimock) के शब्दों में, “योजना परिवर्तन के स्थान पर तर्क सम्मत इच्छा का प्रयोग करना है। कार्य करने से पूर्व निर्णय लेना है न कि कार्य आरम्भ करने के बाद सुधारना।” सेक्लर हडसन (Secklar Hudson) के अनुसार, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिए आधार की खोज ही नियोजन है।” (The process of devising a basis for future course of action.) भारतीय विचारक डॉ० अमरेश के अनुसार, “संक्षेप में नियोजन उन भावी कार्यक्रमों के चयन एवं विकास की विधि है जिसके द्वारा एक घोषित लक्ष्य की सहज प्राप्ति होती है।”

जॉन डी० मिलट (John D. Millett) के शब्दों में, “प्रशासकीय प्रयत्न के उद्देश्यों को निश्चित करने तथा उनको प्राप्त करने के लिए उपयुक्त साधनों की व्यवस्था करना ही नियोजन है।” प्रो० के० टी० शाह (K.T. Shah) के अनुसार, “नियोजन एक लोकतन्त्रीय व्यवस्था में उपभोग, उत्पादन, अनुसन्धान, व्यापार तथा वित्त का तकनीकी समायोजन है। यह उन उद्देश्यों के अनुरूप होते हैं जिनका निर्धारण राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्थाओं द्वारा होता है।”

डॉ० एम० पी० शर्मा (Dr. M.P. Sharma) के अनुसार, “नियोजन विस्तृत अर्थों में व्यवस्थित क्रिया का स्वरूप है। नियोजन में इस प्रकार समस्त मानवीय क्रियाएं आ जाती हैं भले ही वह व्यक्तिगत हों अथवा सामूहिक।” अमरेश महेश्वरी के अनुसार विभिन्न कार्यक्रमों तथा साधनों के संगठन, संघनन तथा विलीनीकरण की क्रिया को नियोजन कहते हैं। परिभाषाओं से स्पष्ट है कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को उचित साधनों द्वारा प्राप्त करना ही नियोजन है। व्यापक रूप से नियोजन के अन्तर्गत निम्नलिखित चार क्रम शामिल हैं

  • लक्ष्य का निर्धारण।
  • लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नीति का निर्धारण।
  • निश्चित नीति के अनुसार प्रक्रियाओं तथा साधनों का निर्धारण।
  • नियोजन के परिणामों का समुचित रूप से वर्गीकरण तथा विश्लेषण करना।

अच्छे नियोजन के लक्षण (Characteristics of a Good Plan):
एक अच्छी योजना में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं

1. स्पष्ट उद्देश्य-नियोजन के उद्देश्य की स्पष्ट तथा व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए। नियोजन के लक्ष्य का संक्षिप्त तथा निश्चित होना ज़रूरी है। यदि नियोजन के लक्ष्य स्पष्ट न हों तो अधिकारियों को सफलता नहीं मिलती।

2. साधनों की व्यवस्था- उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधनों तथा उपायों की व्यवस्था होनी चाहिए।

3. लचीलापन-नियोजन में आवश्यकतानुसार लचीलापन होना चाहिए। नियोजन भविष्य से सम्बन्धित होता है और भविष्य में परिस्थितियां बदल सकती हैं। बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार जिसमें आसानी से परिवर्तन लाया जा सके वही सही नियोजन है।

4. समन्वय-नियोजन के विभिन्न अंगों में सन्तुलन होना चाहिए। विभिन्न नियोजनों के बीच समन्वय स्थापित किया जाना ज़रूरी है। विभिन्न नियोजनों के अनुरूप ही मुख्य नियोजन का होना आवश्यक है।

5. व्यावहारिकता-नियोजन में व्यावहारिकता का होना अति आवश्यक है।

6. सिद्धान्त-नियोजन में कार्यों का स्पष्ट विश्लेषण तथा सफलता को मापने के लिए कुछ सिद्धान्तों का प्रतिपादन होना चाहिए।

7. स्पष्ट विषय-वस्तु-किसी भी नियोजन की विषय-वस्तु स्पष्ट होनी चाहिए।

8. पद-सोपान-नियोजन में उसके पद-सोपान का रहना ज़रूरी है।

9. निरन्तरता-नियोजन की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उसमें निरन्तरता हो। निरन्तरता न होने पर नियोजन पर किया गया खर्च, समय और श्रम बेकार हो जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में आर्थिक नियोजन के मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
आर्थिक नियोजन 20वीं शताब्दी की देन है। संसार की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं ने दसरे महायद्ध के पश्चात् आर्थिक विकास तथा स्थिरता के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आर्थिक नियोजन की विधि को अपनाया है। भारत ने भी स्वतन्त्रता के पश्चात् आर्थिक नियोजन को अपनाया है। भारत में आर्थिक नियोजन के मुख्य उद्देश्य अग्रलिखित हैं

1. राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि-भारत में आर्थिक नियोजन का प्रथम उद्देश्य देश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग आदि का विकास करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है। जनसंख्या की वृद्धि की दर में कमी करके प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करना भी आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य है।

2. आर्थिक असमानता में कमी-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना है। आर्थिक असमानता क्रान्ति एवं संघर्ष को जन्म देती है। अत: नियोजन का ये उद्देश्य होता है कि सभी वर्गों का विकास किया जाए।

3. क्षेत्रीय असमानताओं में कमी-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य देश में क्षेत्रीय असमानताओं में कमी करना होता है। इसके लिए देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

4. पूर्ण रोज़गार-आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य रोजगार के अवसर बढ़ाना है ताकि प्रत्येक व्यक्ति को रोज़गार दिया जा सके।

5. उपलब्ध साधनों का पूर्ण उपयोग-आर्थिक नियोजन का एक मुख्य उद्देश्य देश के प्राकृतिक साधनों का पूर्ण उपयोग करना होता है। आर्थिक नियोजन द्वारा वन, जल, भूमि, खनिज पदार्थ आदि प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग करके देश का आर्थिक विकास करने की कोशिश की जाती है।

6. आर्थिक विकास- भारत में आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास की बाधाओं को दूर करके देश का आर्थिक विकास करना है।

7. जीवन स्तर में वृद्धि-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा करना है और इसके लिए उत्पादन के समस्त क्षेत्रों में वृद्धि की जाती है।

8. उद्योगों का विकास-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य मूल तथा भारी उद्योगों का विकास करना तथा इस प्रकार देश का तेजी से औद्योगिकीकरण करना है।

9. आत्म निर्भरता-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य देश को अधिक से अधिक आत्म-निर्भर बनाना है ताकि देश दूसरे देशों पर कम-से-कम निर्भर रहे।

10. सामाजिक उद्देश्य-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य मनुष्य का सम्पूर्ण विकास करना होता है। अत: नियोजन का उद्देश्य सामाजिक कल्याण में वृद्धि करना भी है। आर्थिक नियोजन का एक मुख्य उद्देश्य समाज के निर्धन तथा शोषित वर्ग को सुरक्षा प्रदान करना है।

निष्कर्ष (Conclusion):
संक्षेप में भारत में आर्थिक नियोजन का मूल उद्देश्य लोकतन्त्रीय तथा कल्याणकारी कार्य विधियों द्वारा देश का तीव्र गति से आर्थिक विकास करना है। योजना आयोग के शब्दों में, “भारत में योजनाकरण का केन्द्रीय उद्देश्य लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाना तथा उन्हें समृद्ध जीवन व्यतीत करने के लिए अधिकाधिक सुविधाओं की व्यवस्था करना है।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 3.
योजना आयोग की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
योजना आयोग के प्रमुख कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
रचना (Composition):
योजना आयोग की रचना समय-समय पर बदलती रहती थी। आरम्भ में इसके कुल छः सदस्य थे और इनमें योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे। प्रधानमन्त्री योजना आयोग का अध्यक्ष होता था और इसके अतिरिक्त आयोग का उपाध्यक्ष भी होता था।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष का कैबिनेट मन्त्री का स्तर होता था और सदस्यों का स्तर मन्त्री का होता था। योजना आयोग का एक स्थायी सचिव भी होता था जो मन्त्रिमण्डल का सचिव भी होता था। पूर्णकालिक सदस्यों के अतिरिक्त वित्त मन्त्री, गृहमन्त्री आदि भी योजना आयोग के अल्पकाल के सदस्य होते थे। योजना आयोग मुख्य रूप से तीन विभागों द्वारा कार्य करते थे-

  • कार्यक्रम सलाहकार समिति,
  • सामान्य सचिवालय तथा
  • तकनीकी विभाग।

कार्य (Functions):
योजना आयोग जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री थे, भारत में एक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली परामर्शदात्री अभिकरण के रूप में प्रकट हुए हैं। इसके कार्य इस प्रकार थे

(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों तो उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।

(2) देश के साधनों के अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

(3) नियोजन में स्वीकृति कार्यक्रम तथा परियोजनाओं के बारे में प्राथमिकताएं निश्चित करना।

(4) योजना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को इंगित करना तथा राष्ट्र की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना के लिए स्वस्थ वातावरण उत्पन्न करना।

(5) योजना के लिए विभिन्न यन्त्रों का जुटाना जो उसकी विभिन्न सेवाओं पर काम आ सके।

(6) समय-समय पर योजना की प्रगति का मूल्यांकन करना और नीति तथा उपायों में आवश्यकतालमेल करना।

(7) वर्तमान आर्थिक व्यवस्था, प्रचलित नीतियों, उपायों तथा विकास-कार्यक्रमों के विचार-विमर्श के लिए इसके कर्त्तव्य के पालन को आसान बनाने के लिए आवश्यक सिफ़ारिशें करना अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकारों द्वारा सुझावों हेतु भेजी जांच की सिफारिश करना।

(8) राष्ट्र के विकास में लोगों का सहयोग प्राप्त करना।

(9) देश के औद्योगिक विकास के लिए नियोजन करना।

(10) केन्द्र और राज्य सरकारों की विकास योजनाओं का निर्माण करना। (नोट-एक जनवरी 2015 को केन्द्र सरकार ने योजना आयोग को समाप्त करके इसके स्थान पर ‘नीति आयोग’ की स्थापना की थी।)

प्रश्न 4.
नीति आयोग पर एक संक्षिप्त लिखें।
उत्तर:
भारत में स्थापित योजना आयोग की प्रासंगिकता 1990 के दशक में कम होने लगी। लाइसैंस राज समाप्त होने के बाद यह बिना किसी प्रभावी अधिकार के सलाहकार संस्था के तौर पर काम करता रहा। योजना आयोग की रचना, कार्यप्रणाली तथा इसकी प्रासंगिकता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे थे। योजना आयोग के अनुसार 28 रु० की आय वाला व्यक्ति ग़रीबी रेखा से ऊपर है, जबकि आयोग ने अपने दो शौचालयों पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिये थे।

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का कहना था, कि “हम दिल्ली सिर्फ इसलिए आते हैं, ताकि आयोग हमें बता सके कि हम अपना धन कैसे खर्च करें।” पूर्व केन्द्रीय मन्त्री कमल नाथ योजना आयोग को ‘आमचेयर एडवाइजर तथा नौकरशाहों का पार्किंग लॉट’ कहकर व्यंग्य कर चुके हैं। स्वतन्त्र मूल्यांकन कार्यालय (आई०ई०ओ०) ने आयोग को आई०ए०एस० अधिकारियों का अड्डा बताया है।

यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने योजना आयोग को ‘जोकरों का समूह’ कहा था। इन सभी कारणों से योजना आयोग जैसी पुरानी संस्था को समाप्त करके एक नई संस्था बनाने का विचार काफी समय से उठ रहा था। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने 1998 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था, कि “विकास की बदलती आवश्यकताओं के लिए योजना आयोग का फिर गठन होगा।”

भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमन्त्री थे, तब वे कई बार योजना आयोग की अप्रासंगिकता की बात उठा कर एक नयी संस्था की वकालत कर चुके थे। इसलिए जब वे मई, 2014, में देश के प्रधानमंत्री बने, तभी से उन्होंने योजना आयोग के स्थान पर एक नई संस्था या आयोग को बनाने पर जोर दिया।

7 दिसम्बर, 2014 को नई दिल्ली में मुख्यमन्त्रियों की बैठक में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग के स्थान पर नई व्यवस्था बनाने को समय की ज़रूरत बताया तथा उन्होंने कहा, कि अब योजना की प्रक्रिया ‘ऊपर से नीचे’ की बजाय ‘नीचे से ऊपर’ करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो न केवल सृजनात्मक रूप से चिंतन कर सके, बल्कि संघात्मक ढांचे को मजबूत बनाने के साथ ही राज्यों में नई ऊर्जा का संचार भी कर सके। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखकर एक जनवरी, 2015 को योजना आयोग को समाप्त करके नीति आयोग (NITI AAYOG-NATIONAL INSTITUTION FOR TRANSFORMING INDIA) क स्थापना की गई।

नीति आयोग की रचना (Composition of NITI Aayog)-नीति आयोग की रचना निम्नलिखित ढंग से की गई है

  • अध्यक्ष-प्रधानमन्त्री
  • उपाध्यक्ष-इसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री करेंगे।
  • सी०ई०ओ०-सी०ई०ओ० केन्द्र के सचिव स्तर का अधिकारी होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री निश्चित कार्यकाल के लिए करेंगे।
  • गवर्निंग काऊंसिल-इसमें सभी मुख्यमंत्री तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
  • पूर्णकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम पांच सदस्य होंगे।
  • अंशकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम दो पदेन सदस्य होंगे।
  • पदेन सदस्य- इसमें अधिकतम चार केन्द्रीय मन्त्री होंगे।
  • विशेष आमंत्रित सदस्य-इसमें विशेषज्ञ होंगे, जिन्हें प्रधानमन्त्री मनोनीत करेंगे।

5 जनवरी, 2015 को प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरविन्द पनगड़िया को नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया, जिन्होंने 14 जनवरी, 2015 को अपना कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री ने 11 जनवरी, 2015 को सिन्धुश्री खुल्लर को आयोग का पहला सी०ई०ओ०, (C.E.O. Chief Executive Officer) मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। 31 दिसम्बर, 2015 को सिन्धुश्री खुल्लर की सेवानिवृत्ति के पश्चात् श्री अमिताभ कांत को नीति आयोग का सी० ई० ओ० नियुक्त किया गया। 5 अगस्त, 2017 को श्री राजीव कुमार को श्री अरविन्द पनगड़िया के स्थान पर नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया।

विभाग (Department):
नीति आयोग में कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए तीन विभागों की भी व्यवस्था की गई है

  • पहला अन्तर्राज्जीय परिषद् की तरह कार्य करेगा।
  • दूसरा विभाग लम्बे समय की योजना बनाने तथा उसकी निगरानी करने का काम करेगा।
  • तीसरा विभाग डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर तथा यू०आई०डी०ए०आई० (UIDAI) को मिलाकर बनाया जायेगा।

उद्देश्य (Objectives):
नीति आयोग के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • सशक्त राज्य से सशक्त राष्ट्र-इस सूत्र से सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) को बढ़ाना।
  • रणनीतिक तथा दीर्घावधि के लिए नीति तथा कार्यक्रम का ढांचा बनाना।
  • ग्रामीण स्तर पर योजनाएं बनाने के तन्त्र को विकसित करना।
  • आर्थिक प्रगति से वंचित रहे वर्गों पर विशेष ध्यान देना।
  • राष्टीय सरक्षा के हितों व आर्थिक नीति में तालमेल बिठाना।

नीति आयोग का गठन भी योजना आयोग की तरह मन्त्रिमण्डल के प्रस्ताव से हआ है परन्त दोनों में महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है, कि नीति आयोग की गतिविधियों में मुख्यमन्त्री एवं निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। इस प्रकार प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्थापित नीति आयोग ‘टीम इण्डिया तथा सहकारी संघवाद’ के विचार को साकार करेगा, जबकि पं० नेहरू के समय के योजना आयोग की प्रकृति केन्द्रीयकृत थी, इसलिए योजना आयोग को सुपर केबिनेट भी कहा जाने लगा था।

नीति आयोग की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करेंगे। इसकी गवर्निंग काऊंसिल में सभी राज्यों के मुख्यमन्त्री तथा केन्द्र शासित प्रदेशों के उप-राज्यपाल सदस्य के रूप में शामिल होंगे। नीति आयोग प्रधानमन्त्री तथा सभी मुख्यमन्त्रियों के लिए विकास का राष्ट्रीय एजेण्डा तैयार करने के लिए एक ‘थिंक टैंक’ की तरह काम करेगा। नीति आयोग जन केन्द्रित, सक्रिय तथा सहभागी विकास एजेण्डा के सिद्धान्त पर आधारित है। इससे सहकारी संघवाद की भावना बढ़ेगी। नीति आयोग की मुख्य भूमिका या कार्य राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के अलग-अलग नीतिगत विषयों पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों को जरूरी रणनीतिक व तकनीकी परामर्श देना है।

नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी, 2015 को हुई, जिसमें प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी, वित्त मन्त्री श्री अरुण जेटली तथा आयोग के उपाध्यक्ष श्री अरविंद पनगडिया शामिल थे। इनके अतिरिक्त बैठक में विजय केलकर, नितिन देसाई, अशोक गुलाटी, सुबीर गोकर्ण, बिमल जालान, पार्थसारथी सोम, जी०एन० वाजपेयी, राजीव कुमार, राजीव लाल, मुकेश बुरानी, आर० वैद्यनाथन तथा बालाकृष्णन जैसे अर्थशास्त्रियों ने भी भाग लिया। इस बैठक में अर्थव्यवस्था की विकास दर फिर तेज़ करने, रोज़गार के अवसर बढ़ाने तथा ढांचागत संरचना सहित महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

नीति आयोग की दूसरी महत्त्वपूर्ण बैठक 8 फरवरी, 2015 को हुई, इसमें नीति आयोग के सभी सदस्यों ने भाग लिया। इस बैठक में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने निम्नलिखित बातों पर बल दिया

(1) प्रधानमन्त्री ने आर्थिक सुधारों की धीमी गति, विकास की धीमी गति, मेक इन इण्डिया को मिलते कम समर्थन तथा मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियों में कमी को देखते हुए राज्यों से सक्रिय सहयोग की अपील की।

(2) प्रधानमन्त्री ने राज्यों को आपसी मतभेद भुलाकर विकास दर को तेज़ करने, निवेश बढ़ाने तथा रोजगार पैदा करने की अपील की।

(3) उन्होंने मुख्यमन्त्रियों से अपने-अपने राज्यों में एक नोडल अफसर नियुक्त करने की अपील की ताकि, राज्य लम्बित मुद्दों को हल तथा परियोजनाओं को जल्दी पूरा करने के लिए अवश्यक कदम उठा सकें।

(4) उन्होंने विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा ग़रीबी को बताया तथा इसे दूर करने को सबसे बड़ी चुनौती बताया।

(5) उनके अनुसार नीति आयोग सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद का एक नया मॉडल बनायेगा।

(6) नीति आयोग की इस बैठक में प्रधानमन्त्री ने तीन उप-समितियां बनाने की घोषणा की, जोकि केन्द्र की 66 योजनाओं को ठीक से संगठित करने, कौशल विकास तथा स्वच्छ भारत योजना को निरन्तर चलाए रखने के लिए सुझाव देंगी।

(7) उन्होंने कहा, कि केन्द्र सभी के लिए एक ही नीति के सिद्धान्त से हटकर, नीतियों तथा राज्यों की ज़रूरत के उचित समन्वय पर बल देगा।

(8) उन्होंने मुख्यमन्त्रियों को परियोजनाओं को धीमी करने के कारणों पर खुद ध्यान देने की अपील की। (9) उन्होंने ग़रीबी समाप्त करने के लिए राज्यों से टास्क फोर्स गठित करने की अपील की।

(10) उन्होंने मख्यमन्त्रियों तथा उपराज्यपालों से फ्लैगशिप योजनाओं, ढांचागत योजनाओं, स्वच्छता मिशन, मेक इन इण्डिया अभियान, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, स्मार्ट सिटी, डिजिटल इण्डिया, स्किल इण्डिया, प्रधानमन्त्री सिंचाई योजना तथा 2022 तक सभी के लिए घर उपलब्ध कराने जैसी केन्द्र की योजनाओं की सफलता के लिए सुझाव मांगे।

स्पष्ट है कि योजना आयोग को समाप्त करके बनाये गये नीति आयोग पर देश के विकास के लिए कारगार नीतियां एवं योजनाएं बनाने का दबाव रहेगा। यह सही है कि योजना आयोग द्वारा पूरे देश के लिए लगभग एक जैसी नीति बनाना सही तरीका नहीं था क्योंकि भारत में कुछ राज्य कृषि प्रधान हैं, तो कुछ राज्यों में उद्योगों की अधिकता है। किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय अधिक है, तो किसी की कम। इसलिए पूरे देश के लिए एक ही तरह की नीति व्यावहारिक सिद्ध नहीं हो रही थी। इसलिए नीति बनाते हुए विभिन्नताओं का सही विचार आवश्यक है। यदि नीति आयोग में ऐसा होना सम्भव हो तो उचित रहेगा।

प्रश्न 5.
खाद्य संकट से आपका क्या अभिप्राय है? खाद्य संकट के प्रमुख परिणामों का वर्णन करें।
उत्तर:
खाद्य संकट से अभिप्राय खाने पीने की वस्तुओं का कम होना है। 1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति राजनीतिक बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल था। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित किया। भारत में आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी।

खाद्य संकट के प्रमुख परिणाम

  • खाद्य संकट के कारण भारत में बड़े पैमाने पर कुपोषण फैला।
  • बिहार के कई भागों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का आहार 2200 कैलोरी से घटकर 1200 कैलोरी रह गया।
  • 1967 में बिहार में मृत्यु दर पिछले साल की तुलना में 34% बढ़ गई।
  • खाद्य संकट के कारण देश में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने लगीं।
  • खाद्यान्न संकट ने देश की राजनीतिक परिस्थितियों को भी प्रभावित किया।
  • देश को चावल एवं गेहूं का आयात करना पड़ा। जिससे भारत की विदेशी पूंजी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • नियोजन के प्रति नागरिकों का विश्वास हिलने लगा।
  • योजना बनाने वालों को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा ताकि खाद्य संकट को टाला जा सके।

प्रश्न 6.
हरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रभावों का वर्णन करो।
अथवा
हरित क्रांति क्या है ? हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति, राजनीतिक बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया।

भारत के आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी जिसने भारतीय नेतृत्व को चिन्ता में डाल दिया कि किस प्रकार इन स्थितियों से बाहर निकला जाए। अतः भारतीय नीति निर्धारकों ने कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि करने का निर्णय किया, ताकि भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो जाए। यहीं से भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत मानी जाती है। हरित क्रान्ति का मुख्य उद्देश्य देश में पैदावार को बढ़ाकर भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाना था। हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएं या तत्त्व निम्न प्रकार से हैं

1. कृषि का निरन्तर विस्तार (Continued Expansion of Agriculture Sector):
हरित क्रान्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य या तत्त्व भारत में कृषि क्षेत्र का निरन्तर विस्तार एवं विकास करना था। यद्यपि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही भारत में कृषि क्षेत्र का विस्तार जारी था परन्तु 1960 के मध्य में इस ओर अधिक ध्यान दिया गया और यह कार्य हरित क्रान्ति के अन्तर्गत किया गया।

2. दोहरी फसल का उद्देश्य (Aim of Double Cropping):
हरित क्रान्ति का एक अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व या उद्देश्य यह था कि साल में दो मौसमी फ़सलें बोई जाएं। साधारण रूप से भारत में प्रतिवर्ष एक मौसमी फसल ही काटी जाती थी, इसका प्रमुख कारण यह था कि प्रतिवर्ष भारत में एक ही मौसमी वर्षा होती थी। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अब प्रतिवर्ष दो मौसमी वर्षा करके दो मौसमी फ़सलें काटने का निर्णय लिया गया।

एक फ़सल प्राकृतिक वर्षा के आधार पर होनी तथा दूसरी कृत्रिम वर्षा के आधार होगी। कृत्रिम वर्षा के लिए सिंचाई सुविधाओं एवं यन्त्रों की ओर विशेष ध्यान दिया गया। प्राकृतिक वर्षा के समय जो पानी व्यर्थ चला जाता है उसे अब एक जगह एकत्र किया जाने लगा तथा नी का प्रयोग उस मौसमी फ़सल के लिए किया जाने लगा जब प्राकृतिक वर्षा नहीं होती थी। इस तरह भारत में अब एक वर्ष में दो मौसमी फ़सलें होने लगीं तथा खाद्यान्न पदार्थों की अधिकाधिक पैदावार होने लगी।

3. अच्छे बीजों का प्रयोग (Use of Good Qualities Seeds):
हरित क्रान्ति का एक तत्त्व या उद्देश्य अच्छे बीजों का प्रयोग करना था ताकि फ़सल ज्यादा हो। इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (Indian Council for Agriculture Research) का 1965 एवं 1973 में पुनर्गठन किया गया। भारत में चावल, गेहूं, मक्का तथा बाजरा की विशेष किस्में तैयार की गईं।

4. भारत में कृषि का मशीनीकरण भी किया गया। इसके अन्तर्गत किसानों को कृषि यन्त्र खरीदने के लिए कृषि ऋण प्रदान किया गया।

5. हरित क्रांति के अन्तर्गत कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था का प्रबन्ध एवं विस्तार किया गया। 6. हरित क्रांति के अन्तर्गत खेतों में कीटानाशक दवाओं एवं रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाने लगा। तीसरी पंचवर्षीय योजना में हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए विशेष जोर दिया गया। तीसरी पंचवर्षीय योजना में अच्छी किस्म के बीजों पर ध्यान दिया गया। सिंचाई साधनों का विस्तार किया गया। किसानों को कृषि के विषय में और अधिक शिक्षित किया गया।

हरित क्रान्ति की सफलताएं (Achievements of Green Revolution):
भारत में हरित क्रान्ति के कुछ अच्छे परिणाम सामने आए जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि (Record Increasement in Production) हरित क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूँ का आयात करता था, वह अब गेहूँ को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि (Increasement in Crop Field)-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

3. औद्योगिक विकास को बढ़ावा (Promotion of Industrial Development) हरित क्रान्ति के कारण भारत में न केवल कृषि क्षेत्र को ही फायदा हुआ बल्कि इसने औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा दिया। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अच्छे बीजों, अधिक पानी, खाद तथा कृत्रिम यन्त्रों की आवश्यकता थी, जिसके लिए उद्योग लगाए गए। इससे लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ है।

4. बांधों का निर्माण (Making of Bandh)हरित क्रान्ति के लिए वर्षा के पानी को संचित करने की आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए कई जगहों पर बांधों का निर्माण किया गया जिससे कई लोगों को रोजगार मिला।

5. जल विद्युत् शक्ति को बढ़ावा (Promotion Water Energy)-बांधों द्वारा संचित किए गए पानी का जल विद्युत् शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया गया।

6. विदेशों में भारतीय किसानों की मांग (Demand of Indian Farmers in Foreign)-भारत की हरित क्रान्ति से कई देश इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय किसानों को अपने देश में बसाने के लिए प्रोत्साहित किया। कनाडा जैसे देश ने भारत सरकार से किसानों की मांग की। जिसके कारण पंजाब एवं हरियाणा से कई किसान कनाडा में जाकर बस गए।

7. विदेशी कों की वापसी-हरित क्रान्ति के समय या उससे पहले भारत ने विदेशी संस्थाओं से जो भी कर्जे लिए थे, उन्हें वापिस कर दिया गया।

8. राजनीतिक स्थिति में बढ़ोत्तरी (Increasement of Political Status)-भारत में हरित क्रान्ति का एक सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अच्छी छवि बन गई। हरित क्रान्ति के परिणाम भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो गया, जिससे भारत को अमेरिका पर खाद्यान्न के लिए निर्भर नहीं रहना पडा और इसका प्रभाव 1971 की पाकिस्तान के साथ लडाई में देखा गया।

9. बुनियादी ढांचे में विकास (Development of Infrastructure) हरित क्रान्ति की एक सफलता यह रही कि इसके परिणामस्वरूप भारत में बुनियादी ढांचे में उत्साहजनक विकास देखने को मिला। हरित क्रान्ति द्वारा पैदा हुई समस्याएं (Problems Emerged by Green Revolution) हरित क्रान्ति से भारत में जहां विकास के नये द्वार खुले, वहीं इससे सम्बन्धित कई समस्याएं भी पैदा हुईं

  • हरित क्रान्ति के कारण भारत में चाहे खाद्यान्न संकट समाप्त हो गया, परन्तु वह थोड़े समय के लिए ही था। आज भी भारत में खाद्यान्न संकट पैदा हो जाता है।
  • भारत में 1980 के दशक में वर्षा न होने से हरित क्रान्ति से कुछ विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो पाया।
  • हरित क्रान्ति के बावजूद 1998 में भारत को प्याज आयात करना पड़ा।
  • भारत को 2004 में चीनी आयात करनी पड़ी।
  • हरित क्रान्ति की सफलता पूरे भारत में न होकर केवल उत्तरी राज्यों में ही दिखाई पड़ती है।
  • कालाहाण्डी जैसे क्षेत्रों में लोग आज भी भूख के कारण मर रहे हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 7.
हरित क्रान्ति तथा इसके राजनीतिक कुप्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
हरित क्रान्ति किसे कहते हैं ? इसके राजनैतिक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हरित क्रान्ति का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 6 देखें। हरित क्रान्ति के राजनीतिक प्रभाव-हरित क्रान्ति के निम्नलिखित राजनीतिक प्रभाव पड़े

  • हरित क्रान्ति के कारण पंचवर्षीय योजना को कुछ समय के लिए रोक दिया गया।
  • हरित क्रान्ति के समय भारत में राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा।
  • हरित क्रान्ति के दौरान होने वाले चुनावों के परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में गठबन्धन सरकारों का निर्माण हुआ।
  • हरित क्रान्ति के दौरान दल-बदल को बढ़ावा मिला।
  • हरित क्रांन्ति के दौरान प्रशासनिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 8.
विकास का अर्थ बताइये। विकास के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विकास का अर्थ (Meaning of Development)-विकास एक व्यापक एवं सार्वभौमिक धारणा है, जिसको विभिन्न सन्दर्भो में विभिन्न अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है। वर्तमान भौतिकवादी युग में व्यक्ति व समाज के विकास की अवधारणा का अर्थ प्रायः आर्थिक विकास से ही लिया जाता है। विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर ये कहा जा सकता है कि विकास एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है जिसमें ढांचों में, दृष्टिकोणों और संस्थाओं में परिवर्तन, आर्थिक सम्पदा में वृद्धि, असमानताओं में कमी और निर्धनता का उन्मूलन शामिल है। परम्परागत समाज से आधुनिक विकसित समाज में परिवर्तन करने की प्रक्रिया को विकास कहते हैं।

1. एल्फ्रेड डायमेन्ट (Alfred Diamant) के अनुसार, “राजनीतिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक राजनीतिक व्यवस्था के नए प्रकार के लक्ष्यों को निरन्तर सफल रूप में प्राप्त करने की क्षमता बनी रहती है।”

2. चुतर्वेदी (Chaturvedi) के अनुसार, “विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है। विकास का उद्देश्य है-एक प्राचीन एवं पिछड़ी हुई व्यवस्था को आधुनिक व्यवस्था में बदलना।”

3. लूसियन पाई (Lucian Pye) के अनुसार, “राजनीतिक विकास संस्कृति का वितरण और जीवन के प्रतिमानों के नए भागों के अनुकूल बनाना, उन्हें उनके साथ मिलाना या उनके साथ सामंजस्य बिठाना है।”

विकास के उद्देश्य (Objectives of Development)-विकास के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं

1. न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति-विकास का प्रथम महत्त्वपूर्ण लक्ष्य गरीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। चिकित्सा सुविधाएं, स्वास्थ्य, पेयजल, कपड़ा, मकान, भोजन आदि आवश्यक पदार्थों की सुविधाएं आम जनता को दी जाएंगी।

2. गरीबी व बेरोज़गारी को दूर करना-पिछड़े तथा विकासशील देशों का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य आर्थिक पुनर्निर्माण करके गरीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना है। विकसित देश भी बेरोज़गारी की समस्या को हल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

3. प्राकृतिक साधनों का विकास-विकासशील देशों का लक्ष्य प्राकृतिक साधनों का शोषण करके देश का आर्थिक विकास करना है।

4.विकास की ऊंची दर-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए आर्थिक विकास की ऊंची दर को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की जाए।

5. आत्म-निर्भरता-अल्पविकसित तथा विकासशील देशों का लक्ष्य अपने देश को आत्म-निर्भर बनाना है।

6. समाज कल्याण के कार्य-विकासशील देश लोगों के आर्थिक तथा समाज कल्याण के कार्यों को निम्न स्तर के लोगों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखते हैं। गरीब वर्गों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सरकार को भारी निवेश का रास्ता अपनाना पड़ेगा। विश्व के अनेक देशों में बेकारी भत्ता (Unemployment Allowance) दिया जाता है। विश्व के अनेक विकसित देशों में बेरोजगारों को बेकारी भत्ता, नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा, वृद्धों को पेंशन इत्यादि अनेक सुविधाएं दी गई हैं और विकासशील देश इन सुविधाओं को देने का प्रयास कर रहे हैं।

7. लोकतन्त्रीय पद्धति से विकास-लोकतन्त्र पद्धति के द्वारा ही विकास कार्य किए जाने चाहिए। लोकतन्त्र विकास का विरोधी नहीं है। यह ठीक है कि अधिनायकवादी देशों में विकास की गति तीव्र होती है और अधिनायक विकास की जो दिशा तय करता है उसी दिशा में विकास होता है।

परन्तु अधिनायकवादी देशों ने जनसहयोग के अभाव में विकास में जनता की न तो रुचि होती है और न ही विकास के लाभ आम जनता तक पहुंचते हैं। उदाहरण के तौर पर साम्यवादी देशों में विकास के प्रतिमानों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता था जबकि वास्तविकता बिल्कुल उसके विपरीत थी। अत: विकास जनसहयोग से ही होना चाहिए ताकि विकास या लाभ आम जनता में समानता के आधार पर वितरित किया जा सके।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
प्रथम पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) प्रथम योजना का सर्वप्रथम उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध तथा देश के विभाजन के फलस्वरूप देश में जो आर्थिक अव्यवस्था तथा असन्तुलन पैदा हो चुका था उसको ठीक करना था।

(2) प्रथम योजना का दूसरा उद्देश्य देश में सर्वांगीण सन्तुलित विकास का प्रारम्भ करना था ताकि राष्ट्रीय आय निरन्तर बढ़ती जाए और लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊंचा उठ सके। यह आर्थिक विकास, प्रचलित सामाजिक-आर्थिक ढांचे में सुधार लाकर किया जाना था।

(3) योजना का तीसरा मुख्य उद्देश्य उत्पादन-क्षमता में वृद्धि तथा आर्थिक विषमता को यथासम्भव कम करना था।

(4) प्रथम योजना का एक उद्देश्य मुद्रा-स्फीति के दबाव को कम करना भी था।

प्रश्न 2.
दूसरी पंचवर्षीय योजना के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय आय में पर्याप्त वृद्धि की जाए ताकि लोगों के रहन-सहन के स्तर में सुधार हो सके।
  • देश का औद्योगिक विकास तीव्र गति से किया जाए और इसके लिए आधारभूत तथा भारी उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया जाए।
  • रोज़गार के अवसरों में अधिक-से-अधिक विस्तार किया जाए।
  • धन तथा आय के बंटवारे में असमानता को कम किया जाए तथा आर्थिक सत्ता को विकेन्द्रित किया जाए।

प्रश्न 3.
तीसरी पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) राष्ट्रीय आय में वार्षिक वृद्धि दर 5 प्रतिशत से अधिक किया जाए तथा विनियोग इस प्रकार हो कि यह विकास दर आगामी पंचवर्षीय योजनाओं में उपलब्ध हो सके।

(2) खाद्यान्नों में आत्म-निर्भरता प्राप्त की जाए तथा कृषि उत्पादन में इतना विकास किया जाए जिससे उद्योगों तथा निर्यात की आवश्यकताएं पूरी हो सकें।

(3) आधारभूत उद्योगों जैसे इस्पात, कैमिकल उद्योग, ईंधन तथा विद्युत् उद्योगों का विस्तार किया जाए तथा मशीन निर्माण की क्षमता को इस प्रकार बढ़ाया जाए कि आगामी दस वर्षों में इस क्षेत्र में लगभग आत्म-निर्भर हो जाएं तथा औद्योगिक विकास के लिए भविष्य में मशीनरी की आवश्यकताएं देश में पूरी हो सकें।

(4) देश की मानव शक्ति का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाए तथा रोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि की जाए।

प्रश्न 4.
विकास का समाजवादी मॉडल क्या है?
अथवा
विकास के समाजवादी मॉडल का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
(1) विकास का समाजवादी मॉडल उत्पादन तथा वितरण के साधनों को समस्त समाज की सम्पत्ति मानता है। अतः समाजवादी उत्पादन तथा वितरण के साधनों पर राज्य का नियन्त्रण स्थापित करना चाहते हैं।

(2) विकास का समाजवादी मॉडल व्यक्ति की अपेक्षा समाज के विकास को अधिक महत्त्व देता है।

(3) विकास का समाजवादी मॉडल नियोजित अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है। नियोजित अर्थव्यवस्था के द्वारा ही देश का विकास किया जा सकता है।

(4) विकास का समाजवादी मॉडल आर्थिक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतियोगिता समाप्त करके सहयोग की भावना पैदा करने के पक्ष में है।

प्रश्न 5.
विकास के पूंजीवादी मॉडल से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
विकास का पूंजीवादी मॉडल क्या है ?
उत्तर:

  • विकास का पूंजीवादी मॉडल खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ार मूलक अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल अर्थव्यवस्था में सरकार के गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप को उचित नहीं मानता।
  • विकास का पंजीवादी मॉडल लाइसेंस/परमिशन को समाप्त करने के पक्ष में है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल भौतिक विकास में विश्वास रखता है।

प्रश्न 6.
पांचवीं पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
1. निर्धनता को दूर करना-पांचवीं योजना का मुख्य उद्देश्य निर्धनता को दूर करना था। निर्धनता दूर करने का अभिप्राय यह है कि देशवासियों की कम-से-कम इतनी आय अवश्य होनी चाहिए कि वे अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

2. आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति- पांचवीं योजना का एक मुख्य उद्देश्य देशवासियों की आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था करना था।

3. रोज़गार की अधिकाधिक व्यवस्था–उत्पादन बढ़ाने वाले रोजगार का विस्तार करना ताकि अधिक लोगों को रोज़गार दिया जा सके।

4. आर्थिक स्वावलम्बन-पांचवीं योजना का एक मुख्य लक्ष्य आर्थिक आत्म-निर्भरता की प्राप्ति है। विदेशी सहायता को 1978-79 तक बिल्कुल शून्य करना इस योजना का लक्ष्य था।

प्रश्न 7.
छठी पंचवर्षीय योजना के मुख्य चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय आय की विकास दर का लक्ष्य 5.2 % निर्धारित किया गया। प्रति व्यक्ति आय की विकास दर का लक्ष्य 3.3 % रखा गया।
  • कृषि की विकास दर का लक्ष्य 4 प्रतिशत, उद्योगों का 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष तथा निर्यात का 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष निर्धारित किया गया था।
  • बचत की दर 24.5 प्रतिशत तथा निवेश की दर 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष निर्धारित की गई थी।
  • जनसंख्या की वृद्धि दर को 2.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष से कम करके 1.86 प्रतिशत प्रतिवर्ष करने का लक्ष्य रखा गया।

प्रश्न 8.
सातवीं पंचवर्षीय योजना के चार मुख्य उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • योजना का विकेन्द्रीकरण होगा और विकास के काम में सब लोगों का सहयोग लिया जाएगा।
  • ग़रीबी और बेरोजगारी कम की जाएगी। रोजगार के अवसरों में 4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य रखा गया।
  • क्षेत्रीय असमानता कम की जाएगी।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण की सुविधाएं अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुंचाई जाएंगी।

प्रश्न 9.
आठवीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • देश में पर्याप्त रोजगार अवसर पैदा करना।
  • जनसंख्या की वृद्धि दर को कम करना।
  • प्राथमिक शिक्षा को सर्वव्यापक बनाना।
  • कृषि क्षेत्र में विविधता को बढ़ावा देना।

प्रश्न 10.
नौवीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • बचत दर को बढ़ाकर 28.6% करना।
  • विकास दर को सात प्रतिशत प्रतिवर्ष करना।
  • कीमतों को स्थिर रखना।
  • जनसंख्या वृद्धि दर को कम करना।

प्रश्न 11.
10वीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • प्रति व्यक्ति आय को दुगुनी करना।
  • विकास दर को 8% प्रतिवर्ष करना।
  • निर्धनता को बढ़ावा देना।
  • कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 12.
नियोजन का अर्थ बताओ।
उत्तर:
वर्तमान समय में नियोजन का विशेष महत्त्व है। नियोजन से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी करना है। कुछ विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विधि निर्धारित करना ही नियोजन कहलाता है। हडसन ने नियोजन की परिभाषा देते हुए कहा है, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिए आधार की खोज नियोजन है।” मिलेट के अनुसार, “प्रशासकीय कार्य के उद्देश्यों को निर्धारित करना तथा उनकी प्राप्ति के साधनों पर विचार करने को नियोजन कहते हैं।” हैरिस के शब्दों में, “आय तथा कीमत के सन्दर्भ की गति में साधनों के बंटवारे को प्रायः नियोजन कहते हैं।”

प्रश्न 13.
भारत में नियोजन के कोई चार मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
1. राष्ट्रीय आय में वृद्धि-भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है।

2. क्षेत्रीय असन्तुलन में कमी-विभिन्न योजनाओं का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य क्षेत्रीय असन्तुलन को कम करना रहात अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सके। इस दिशा में भारत सरकार ने योजना अवधि में पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु विशेष कार्यक्रम लागू किए हैं।

3. आर्थिक असमानता में कमी-नियोजन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना है। रोज़गार-नियोजन का मुख्य उद्देश्य रोज़गार के अवसर बढ़ाना है।

प्रश्न 14.
भारत में आर्थिक नियोजन को अपनाने के कोई चार कारण लिखिये।
अथवा
भारत में योजना पद्धति को क्यों अपनाया गया ?
उत्तर:
नियोजन की आवश्यकता मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से अनुभव की जाती है

  • नियोजन के द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करके समाज की उन्नति की जा सकती है।
  • आर्थिक न्याय तथा सामाजिक समता पर आधारित अच्छे समाज के निर्माण को सम्भव बनाने के लिए नियोजन ‘अति आवश्यक है।
  • नियोजन से श्रमिकों तथा निर्धनों की शोषण से सुरक्षा की जा सकती है।
  • नियोजन से राष्ट्र की पूंजी थोड़े-से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं होती।

प्रश्न 15.
अच्छे नियोजन की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
अच्छे नियोजन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  • नियोजन के उद्देश्य की स्पष्ट तथा व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए।
  • उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधनों तथा उपायों की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • नियोजन में आवश्यकतानुसार लचीलापन होना चाहिए।
  • नियोजन के विभिन्न अंगों में सन्तुलन होना चाहिए।

प्रश्न 16.
योजना आयोग के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
योजना आयोग के मख्य कार्य निम्नलिखित थे

(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और जो साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।

(2) देश के साधनों का अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

(3) नियोजन में स्वीकृत कार्यक्रम तथा परियोजनाओं के बारे में प्राथमिकताएं निश्चित करना।

(4) योजना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को इंगित करना तथा राष्ट्र की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना के लिए स्वस्थ वातावरण उत्पन्न करना।

प्रश्न 17.
योजना आयोग की कार्यप्रणाली की आलोचना क्यों की जाती थी ?
उत्तर:
भारत में स्थापित योजना आयोग की प्रासंगिकता 1990 के दशक में कम होने लगी। लाइसैंस राज समाप्त होने के बाद यह बिना किसी प्रभावी अधिकार के सलाहकार संस्था के तौर पर काम करता रहा। योजना आयोग की रचना, कार्यप्रणाली तथा इसकी प्रासंगिकता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे थे। योजना आयोग के अनुसार 28 रु० की आय वाला व्यक्ति ग़रीबी रेखा से ऊपर है, जबकि आयोग ने अपने दो शौचालयों पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिये थे।

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का कहना था, कि “हम दिल्ली सिर्फ इसलिए आते हैं, ताकि आयोग हमें बता सके कि हम अपना धन कैसे खर्च करें।” पूर्व केन्द्रीय मन्त्री कमल नाथ योजना आयोग को ‘आमचेयर एडवाइजर तथा नौकरशाहों का पार्किंग लॉट’ कहकर व्यंग्य कर चुके हैं।

स्वतन्त्र मूल्यांकन कार्यालय (आई०ई०ओ०) ने आयोग को आई०ए०एस० अधिकारियों का अड्डा बताया है। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने योजना आयोग को ‘जोकरों का समूह’ कहा था। इन सभी कारणों से योजना आयोग जैसी पुरानी संस्था को समाप्त करके एक नई संस्था बनाने का विचार काफी समय से उठ रहा था।

प्रश्न 18.
नीति आयोग की स्थापना कब की गई ? इसकी रचना का वर्णन करें।
उत्तर:
एक जनवरी, 2015 को योजना आयोग को समाप्त करके नीति आयोग (NITI AAYOG NATIONAL INSTITUTION FOR TRANSFORMING INDIA) की स्थापना की गई।

नीति आयोग की रचना (Composition of NITI Aayog)-नीति आयोग की रचना निम्नलिखित ढंग से की गई है

  • अध्यक्ष–प्रधानमन्त्री
  • उपाध्यक्ष- इसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री करेंगे।
  • सी०ई०ओ०-सी०ई०ओ० केन्द्र के सचिव स्तर का अधिकारी होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री निश्चित कार्यकाल के लिए करेंगे।
  • गवर्निंग काऊंसिल- इसमें सभी मुख्यमंत्री तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
  • पूर्णकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम पांच सदस्य होंगे।
  • अंशकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम दो पदेन सदस्य होंगे।
  • पदेन सदस्य-इसमें अधिकतम चार केन्द्रीय मन्त्री होंगे।
  • विशेष आमंत्रित सदस्य-इसमें विशेषज्ञ होंगे, जिन्हें प्रधानमन्त्री मनोनीत करेंगे।

प्रश्न 19.
नीति आयोग में कितने विभागों की व्यवस्था की गई है ?
उत्तर:
नीति आयोग में कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए तीन विभागों की भी व्यवस्था की गई है

  • पहला अन्तर्राज्जीय परिषद् की तरह कार्य करेगा।
  • दूसरा विभाग लम्बे समय की योजना बनाने तथा उसकी निगरानी करने का काम करेगा।
  • तीसरा विभाग डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर तथा यू०आई०डी०ए०आई० (UIDAI) को मिलाकर बनाया जायेगा।

प्रश्न 20.
नीति आयोग के उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
नीति आयोग के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • सशक्त राज्य से सशक्त राष्ट्र-इस सूत्र से सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) को बढ़ाना।
  • रणनीतिक तथा दीर्घावधि के लिए नीति तथा कार्यक्रम का ढांचा बनाना।
  • ग्रामीण स्तर पर योजनाएं बनाने के तन्त्र को विकसित करना।
  • आर्थिक प्रगति से वंचित रहे वर्गों पर विशेष ध्यान देना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों व आर्थिक नीति में तालमेल बिठाना।

प्रश्न 21.
विकास के किन्हीं तीन उद्देश्यों का वर्णन करें।
अथवा
विकास के किन्हीं चार उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विकास के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  • विकास का प्रथम महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ग़रीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना हैं।
  • आर्थिक पुनर्निर्माण करके ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना है।
  • विकास का लक्ष्य प्राकृतिक साधनों का विकास करना है।
  • विकास की ऊँची दर प्राप्त करना।

प्रश्न 22.
भारत में योजना पद्धति को क्यों अपनाया गया ?
उत्तर:
भारत में योजना पद्धति को निम्नलिखित कारणों से अपनाया गया

  • नियोजन के द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करके समाज की उन्नति की जा सकती है।
  • आर्थिक न्याय तथा सामाजिक समता पर आधारित अच्छे समाज के निर्माण को सम्भव बनाने के लिए नियोजन अति आवश्यक है।
  • आर्थिक नियोजन से श्रमिकों तथा निर्धनों की शोषण से सुरक्षा की जा सकती है।
  • आर्थिक नियोजन से राष्ट्र की पूंजी थोड़े से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं होती।

प्रश्न 23.
राष्ट्रीय विकास परिषद् के मुख्य कार्य लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रीय विकास परिषद् के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

  • समय-समय पर राष्ट्रीय योजना के कार्य की समीक्षा करना।
  • राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली सामाजिक व आर्थिक नीति के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना।
  • राष्ट्रीय योजना के अन्तर्गत निश्चित लक्ष्यों और उद्देश्यों की सफलता के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना।

इसके अन्तर्गत जनता से सक्रिय सहयोग प्राप्त करना. प्रशासकीय सेवाओं की कार्यकशलता में सधार करना। पिछडे प्रदेशों तथा वर्गों का पूर्ण विकास करना तथा सभी नागरिकों द्वारा समान मात्रा में बलिदान के माध्यम से राष्ट्रीय विकास के लिए साधनों का निर्माण करने के उपायों की सिफ़ारिश करना भी सम्मिलित है।

प्रश्न 24.
सार्वजनिक क्षेत्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र से अभिप्राय उन व्यवसायों तथा आर्थिक क्रिया-कलापों से है जिनके साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है और जिनका प्रबन्ध व नियन्त्रण सरकार के हाथों में ही होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में आर्थिक क्रियाओं का संचालन मुख्य रूप से सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।

सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत राज्य द्वारा सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की जाती है। वे सभी उद्योग-धन्धे तथा व्यावसायिक गतिविधियां जिन पर सरकार का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र कहलाता है। प्रो० ए० एच० हैन्सन के अनुसार, “सरकार के स्वामित्व और संचालन के अन्तर्गत आने वाले औद्योगिक, कृषि एवं वित्तीय संस्थानों से है।”

राय चौधरी एवं चक्रवर्ती के अनुसार, “लोक उद्यम या आधुनिक उपक्रम व्यवसाय का वह स्वरूप है जो सरकार द्वारा नियन्त्रित और संचालित होता है तथा सरकार उसकी या तो स्वयं एकमात्र स्वामी होती है अथवा उसके अधिकांश हिस्से सरकार के पास होते हैं।” इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में लोक उद्यमों का वर्णन इस प्रकार मिलता है, “लोक उद्योग का आशय ऐसे उपक्रम से है जिस पर केन्द्रीय, प्रान्तीय अथवा स्थानीय सरकार का स्वामित्व होता है। ये उद्योग अथवा उपक्रम मूल्य के बदले वस्तुओं एवं सेवाओं की पूर्ति करते हैं तथा सामान्यतया स्वावलम्बी आधार पर चलाए जाते हैं।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 25.
सार्वजनिक क्षेत्र की विशेषताएं लिखें।
उत्तर:

  • सार्वजनिक क्षेत्र एक व्यापक धारणा है जिसमें सरकार की समस्त आर्थिक तथा व्यावसायिक गतिविधियां शामिल की जाती हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत स्थापित किए जाने वाले विभिन्न उद्यमों, निगमों तथा अन्य संस्थाओं पर सरकार का स्वामित्व, प्रबन्ध तथा संचालन होता है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय नियन्त्रण होता है और सार्वजनिक क्षेत्र में एकाधिकार की प्रवृत्ति पाई जाती है।

प्रश्न 26.
हरित क्रान्ति की मुख्य चार विशेषताएं बताइये।
उत्तर:
1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि-हरित-क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूँ का आयात करता था, वह अब गेहूँ को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

3. औद्योगिक विकास को बढ़ावा-हरित क्रान्ति के कारण भारत में न केवल कृषि क्षेत्र को ही फायदा हुआ बल्कि इसने औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा दिया। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अच्छे बीजों, अधिक पानी, खाद तथा कृत्रिम यन्त्रों की आवश्यकता थी, जिसके लिए उद्योग लगाए गए। इससे लोगों को रोज़गार भी प्राप्त हुआ।

4. बांधों का निर्माण-हरित क्रान्ति के लिए वर्षा के पानी को संचित करने की आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए कई जगहों पर बाँधों का निर्माण किया गया जिससे कई लोगों को रोजगार मिला।

प्रश्न 27.
‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था उस व्यवस्था को कहते हैं, जहां पर पूंजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था का मिश्रित रूप पाया जाता है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में वैयक्तिक क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों की व्यवस्था की जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र वाले उद्योगों का प्रबन्ध राजकीय निगम और व्यक्तिगत क्षेत्र के उद्योगों का प्रबन्ध व्यक्तिगत रूप से उद्योगपतियों द्वारा किया जाता है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था पाई जाती है।

प्रश्न 28.
हरित क्रान्ति की आवश्यकता पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति तथा राजनीति बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल था। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया।

भारत में आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी, जिसने भारतीय नेतृत्व को चिन्ता में डाल दिया कि किस प्रकार इन स्थितियों से बाहर निकला जाए। अतः भारतीय नीति निर्धारकों ने कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि करने का निर्णय किया ताकि भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बन जाए। यहीं से भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत मानी जाती है। हरित क्रान्ति का मुख्य उद्देश्य देश में पैदावार को बढ़ाकर भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाना था।

प्रश्न 29.
आर्थिक विकास के भारतीय मॉडल की मुख्य विशेषताएं क्या हैं ?
उत्तर:

  • भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है।
  • भारत के आर्थिक विकास में नियोजन को महत्त्व प्रदान किया गया है।
  • भारत में आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण किया जाता है।
  • भारत में कृषि के साथ-साथ औद्योगिकीकरण पर भी बल दिया गया है।

प्रश्न 30.
‘नियोजित विकास’ की कोई चार उपलब्धियां लिखें।
अथवा
भारत में नियोजन की कोई चार उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • नियोजन विकास से देश का संतुलित विकास सम्भव हो पाया है।
  • नियोजित विकास से श्रमिकों एवं कमजोर वर्गों का शोषण कम हुआ है।
  • नियोजित विकास से भारत खाद्यान्न क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो पाया है।
  • इससे राष्ट्र की पूंजी थोड़े-से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं हो पाई है।

प्रश्न 31.
भारत में ‘खाद्य संकट’ के क्या परिणाम हुए थे ?
उत्तर:

  • खाद्य संकट से भारत में बड़े स्तर पर कुपोषण फैला।
  • बिहार के कई भागों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का आहार 2200 कैलोरी से घटकर 1200 कैलोरी रह गया।
  • 1967 में बिहार में मृत्यु दर पिछले साल की तुलना में 34% बढ़ गई।
  • खाद्य संकट के कारण देश में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ गईं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
विकास एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है जिसमें ढांचों में, दृष्टिकोणों और संस्थाओं में परिवर्तन, आर्थिक सम्पदा में वृद्धि, असमानताओं में कमी और निर्धनता का उन्मूलन शामिल है। परम्परागत समाज से आधुनिक विकसित समाज में परिवर्तन करने की प्रक्रिया को विकास कहते हैं।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था किस प्रकार की थी ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही पिछड़ी अवस्था में थी। भारत की कृषि व्यवस्था खराब अवस्था में थी। स्वतन्त्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था थी। अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का इतनी बुरी तरह से शोषण किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह खराब हो गई। परिणामस्वरूप स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन, अर्द्ध सामन्ती तथा असन्तुलित अर्थव्यवस्था बन कर रह गई।

प्रश्न 3.
‘हरित क्रान्ति’ का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है, जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। जे० जी० हारर के अनुसार, “हरित क्रान्ति शब्द 1968 में होने वाले उन आश्चर्यजनक परिवर्तनों के लिए प्रयोग में लाया जाता है, जो भारत के खाद्यान्न उत्पादन में हुआ था तथा अब भी जारी है।” हरित क्रान्ति से न केवल आर्थिक एवं सामाजिक बल्कि राजनीतिक ढांचा भी प्रभावित हुआ।

प्रश्न 4.
भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उत्तर:
भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय असन्तुलन को कम करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है, ताकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया जा सके।

प्रश्न 5.
भारत में हरित क्रान्ति को अपनाने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • हरित क्रान्ति अपनाने का प्रथम कारण खाद्य संकट को दूर करना था।
  • हरित क्रान्ति अपनाने का दूसरा कारण कृषि के लिए आधुनिक यन्त्रों एवं साधनों का प्रयोग करना था।

प्रश्न 6.
भारतीय विकास की योजना में सर्वोच्च प्राथमिकता किसे दी जाती है ?
उत्तर:
भारतीय विकास की योजना में सर्वोच्च प्राथमिकता कृषि विकास को दी जाती है।

प्रश्न 7.
हरित क्रान्ति की कोई दो असफलताएं या सीमाएं लिखें।
उत्तर:
(1) हरित क्रान्ति के कारण भारत में चाहे खाद्यान्न संकट समाप्त हो गया, परन्तु वह थोड़े समय के लिए ही था। आज भी भारत में खाद्यान्न संकट पैदा हो जाता है।
(2) हरित क्रान्ति की सफलता पूरे भारत में न होकर केवल उत्तरी राज्यों में ही दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 8.
हरित क्रान्ति की कोई दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि-हरित क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूं का आयात करता था, वह अब गेहूं को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 9.
सन् 2015 में, योजना आयोग की जगह कौन-सा आयोग बनाया गया ? उसके उपाध्यक्ष का नाम लिखिए।
उत्तर:
सन् 2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनाया गया तथा इसके पहले उपाध्यक्ष का नाम श्री अरविंद पनगड़िया था। वर्तमान समय में नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री राजीव कुमार हैं।

प्रश्न 10.
विकास के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर:
विकास का मुख्य उद्देश्य ग़रीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना है, तथा प्राकृतिक संसाधनों का विकास करके देश को आत्मनिर्भर बनाता है।

प्रश्न 11.
मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के प्रायः दो रूप माने जाते हैं। एक रूप पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तथा दूसरे को समाजवादी अर्थव्यवस्था कहा जाता है। जहां अर्थव्यवस्था के इन दोनों रूपों का अस्तित्व हो उस अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 12.
योजना आयोग के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:
(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और जो साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।
(2) देश के साधनों का अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

प्रश्न 13.
कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए क्या प्रयत्न किए गए ?
उत्तर:

  • कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए सिंचाई साधनों का विस्तार किया गया।
  • कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग पर बल दिया गया।

प्रश्न 14.
नियोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
नियोजन से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी करना है। हडसन के अनुसार, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिये आधार की खोज नियोजन है।”

प्रश्न 15.
भारत में पहली पंचवर्षीय योजना कब लागू हुई ? अब तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं ?
उत्तर:
भारत में पहली पंचवर्षीय योजना सन् 1951 में लागू हुई। अब तक 12 पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अप्रैल 2012 से मार्च 2017 तक था।

प्रश्न 16.
निजी क्षेत्र में क्या-क्या शामिल है ?
उत्तर:
निजी क्षेत्र में खेती-बाड़ी, व्यापार एवं उद्योग शामिल हैं।

प्रश्न 17.
भारत में योजना आयोग का गठन करने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:
भारत में योजना आयोग का गठन करने का मुख्य उद्देश्य नियोजित विकास करना था।

प्रश्न 18.
भारत में खाद्य संकट के क्या परिणाम हुए थे ?
उत्तर:

  • सरकार को गेहूं का आयात करना पड़ा।
  • सरकार को अमेरिका जैसे देशों से विदेशी मदद भी स्वीकार करनी पड़ी।

प्रश्न 19.
विकास का पूंजीवादी मॉडल क्या है ?
उत्तर:

  • विकास का पूंजीवादी मॉडल खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ार मूलक अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल अर्थव्यवस्था में सरकार के गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप को उचित नहीं मानता।

प्रश्न 20.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास के लिए किस प्रकार की अर्थव्यवस्था का चुनाव किया गया था?
उत्तर:
आज़ादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद कायम था। विकास के सम्बन्ध में मुख्य मुद्दा यह था कि विकास के लिए कौन-सा मॉडल अपनाया जाए ? विकास का पूंजीवादी मॉडल या विकास का साम्यवादी मॉडल। पूंजीवादी मॉडल के समर्थक देश के औद्योगीकरण पर अधिक बल दे रहे थे, जबकि साम्यवादी मॉडल के समर्थक कृषि के विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र की ग़रीबी को दूर करना आवश्यक समझते थे। इन परिस्थितियों में सरकार दुविधा में पड़ गई, कि विकास का कौन-सा मॉडल अपनाया जाए। परन्तु आपसी बातचीत तथा सहमति के बीच का रास्ता अपनाते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया।

प्रश्न 21.
निजी क्षेत्र क्या हैं ?
उत्तर:
निजी क्षेत्र उसे कहा जाता है, जिसे सरकार द्वारा न चलाकर व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा अपने लाभ के लिए चलाया जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना किस वर्ष लागू की गई ?
(A) 1951
(B) 1960
(C) 1957
(D) 1962
उत्तर:
(A) 1951

2. अब तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएं लागू की जा चुकी हैं ?
(A) 7
(B) 8
(C) 11
(D) 12
उत्तर:
(D) 12

3. 11वीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल क्या था ?
(A) 1992-1997
(B) 1997-2002
(C) 2002-2007
(D) 2007-2012
उत्तर:
(D) 2007-2012

4. योजनाबद्ध विकास की प्रेरणा भारत को मिली
(A) सोवियत रूस से
(B) अमेरिका से
(C) ब्रिटेन से
(D) पाकिस्तान से।
उत्तर:
(A) सोवियत रूस से।

5. ‘बाम्बे योजना’ कब प्रकाशित की गई ?
(A) वर्ष 1942 में
(B) वर्ष 1944 में
(C) वर्ष 1945 में
(D) वर्ष 1950 में।
उत्तर:
(B) वर्ष 1944 में।

6. भारत में किस वर्ष घोर अकाल पड़ा था ?
(A) वर्ष 1965-67 में
(B) वर्ष 1967-69 में
(C) वर्ष 1967-71 में
(D) वर्ष 1967-73 में।
उत्तर:
(A) वर्ष 1965-67 में।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

7. उच्च उत्पादकता के लिए फसल क्षेत्र मांग करता है :
(A) अधिक पानी की
(B) अधिक उर्वरक की
(C) अधिक कीटनाशकों की
(D) उपर्युक्त सभी की।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी की।

8. “नियोजन विस्तृत अर्थों में व्यवस्थित क्रिया का स्वरूप है, नियोजन में इस प्रकार समस्त मानवीय क्रियाएं आ जाती हैं, भले ही वह व्यक्तिगत हों अथवा सामूहिक।” यह किसका कथन है ?
(A) प्रो० के० टी० शर्मा
(B) डॉ० एम० पी० शर्मा
(C) उर्विक
(D) बैंथम।
उत्तर:
(B) डॉ० एम० पी० शर्मा।

9. योजना आयोग का अध्यक्ष कौन होता था ?
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमन्त्री
(C) वित्त मन्त्री
(D) योजना मन्त्री।
उत्तर:
(B) प्रधानमन्त्री।

10. भारत में योजना आयोग की कब नियुक्ति की गई थी ?
(A) 1952
(B) 1950
(C) 1956
(D) 1960
उत्तर:
(B) 1950

11. योजना आयोग किस तरह की संस्था थी ?
(A) असंवैधानिक
(B) गैर-संवैधानिक
(C) संवैधानिक
(D) अति-संवैधानिक।
उत्तर:
(D) अति-संवैधानिक।

12. निम्नलिखित में से कौन नियोजन की उपलब्धि है ?
(A) राष्ट्रीय आय में वृद्धि
(B) सामाजिक विकास
(C) उत्पादन में आत्मनिर्भरता
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी।

13. “समाजवाद हमारी समस्याओं का एकमात्र समाधान है।” ये शब्द किसने कहे थे ?
(A) महात्मा गांधी ने
(B) सरदार पटेल ने
(C) जवाहर लाल नेहरू ने
(D) डॉ० लॉस्की ने।
उत्तर:
(C) जवाहर लाल नेहरू ने।

14. 1992 तक भारत में किस प्रकार की अर्थव्यवस्था थी ?
(A) साम्यवादी अर्थव्यवस्था
(B) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था
(C) समाजवादी अर्थव्यवस्था
(D) मिश्रित अर्थव्यवस्था।
उत्तर:
(D) मिश्रित अर्थव्यवस्था।

15. सोवियत रूस ने विकास का कौन-सा मॉडल अपनाया था ?
(A) समाजवादी मॉडल
(B) पूंजीवादी मॉडल
(C) मिश्रित मॉडल
(D) कल्याणकारी मॉडल।
उत्तर:
(A) समाजवादी मॉडल।

16. एक जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर किस नये आयोग की स्थापना हुई. ?
(A) नीति आयोग
(B) पानी आयोग
(C) केन्द्र आयोग
(D) राज्य आयोग।
उत्तर:
(A) नीति आयोग।

17. भारत की विकास योजना का उद्देश्य है
(A) आर्थिक विकास
(B) आत्मनिर्भरता
(C) सामाजिक विकास
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

18. ‘जनता-योजना’ के जनक थे
(A) मोंटेक सिंह
(B) मनमोहन सिंह
(C) मोरारजी देसाई
(D) एम० एन० राय।
उत्तर:
(D) एम० एन० राय।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष विकास के दो ही मॉडल थे, पहला उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल तथा दूसरा . ………… मॉडल था।
उत्तर:
समाजवादी

(2) योजना आयोग की स्थापना मार्च, …………. में की गई।
उत्तर:
1950

(3) योजना आयोग का अध्यक्ष ………… होता है।
उत्तर:
प्रधानमन्त्री

(4) 1944 में उद्योगपतियों ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे …………. के नाम से जाना जाता है।
उत्तर:
बाम्बे प्लान

(5) ……….. में प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी हुआ।
उत्तर:
1951

(6) दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। ………….. के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों के एक समूह ने यह योजना तैयार की थी।
उत्तर:
पी०सी० महालनोबिस

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
हरित क्रान्ति किस दशक में हुई ?
उत्तर:
हरित क्रान्ति 1960 के दशक में हुई।

प्रश्न 2.
भारत में योजना आयोग की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में की गई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 3.
भारत में कैसी अर्थव्यवस्था लागू की गई ?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की दलीय प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दलीय प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं
1. भारत में बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली है।

2. एक दल के प्रभुत्व युग का अन्त-भारत में लम्बे समय तक विशेषकर 1977 तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, परन्तु वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व समाप्त हो चुका है और उसकी जगह अन्य दलों ने ले ली है।

3. सैद्धान्तिक आधारों का अभाव-राजनीतिक दलों का सैद्धान्तिक आधारों पर संगठित होना अनिवार्य है, परन्तु हमारे देश में ऐसे दलों का अभाव है जो ठोस राजनीतिक तथा आर्थिक सिद्धान्तों पर संगठित हों।

4. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों की महत्ता निरन्तर बढ़ती जा रही है।

5. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-भारतीय दलीय प्रणाली की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें क्षेत्रीय दलों की महत्ता लगातार बढ़ती जा रही है।

6. व्यक्तित्व का प्रभाव-लगभग प्रत्येक भारतीय राजनीतिक दल में किसी विशेष प्रतिनिधित्व की अति महानता है। कांग्रेस में सर्वप्रथम पण्डित जवाहर लाल नेहरू, फिर श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा बाद में श्री राजीव गांधी दल का केन्द्र बिन्दु बने हुए थे तथा वर्तमान में श्रीमती सोनिया गांधी एवं श्री राहुल गांधी दल का केन्द्र बिन्दु हैं। भारतीय जनता पार्टी में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवाणी का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में यह पार्टी श्री नरेन्द्र मोदी एवं श्री अमित शाह के नेतृत्व में चल रही है। भारतीय राजनीतिक दलों में सिद्धान्तों की अपेक्षा व्यक्तित्व की अधिक महत्ता है।

7. दलों में गुटबन्दी-कोई भी ऐसा भारतीय राजनीतिक दल नहीं है, जो गुटबन्दी का शिकार न हो। दलों में यह गुटबन्दी विभिन्न राजनीतिक के व्यक्तित्व की महानता का कारण है।

8. घोषित सिद्धान्तों का बलिदान-भारतीय राजनीतिक दल अपने सिद्धान्तों को कोई अधिक महत्ता नहीं देते। राजनीतिक लाभ के लिए ये दल अपने घोषित सिद्धान्तों का शीघ्र ही बलिदान कर देते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में विरोधी दल की क्या भमिका है? इसका संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में विरोधी दल निम्नलिखित भूमिका निभाता है

1. आलोचना-भारत में विरोधी दल का मुख्य कार्य सरकार की नीतियों की आलोचना करना है। विरोधी दल संसद् के अन्दर और संसद के बाहर सरकार की आलोचना करते हैं। विरोधी दल यह आलोचना मन्त्रिमण्डल सदस्यों से विभिन्न प्रश्न पूछ कर, वाद-विवाद तथा अविश्वास प्रस्ताव पेश करके करते हैं।

2. वैकल्पिक सरकार- भारत में संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण विरोधी दल वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए तैयार रहता है। यद्यपि विरोधी दल को सरकार बनाने के ऐसे अवसर बहुत ही कम मिलते हैं।

3. शासन नीति को प्रभावित करना-विरोधी दल सरकार की आलोचना करके सरकार की नीतियों को प्रभावित करता है। कई बार सत्तारूढ़ दल विरोधी दल के सुझावों को ध्यान में रखकर अपनी नीति में परिवर्तन
करते हैं।

4. लोकतन्त्र की रक्षा-विरोधी दल सरकार के तानाशाह बनने से होकर लोकतन्त्र की रक्षा करता है।

5. उत्तरदायी आलोचना-विरोधी दल केवल सरकार की आलोचना करने के लिए आलोचना नहीं करते बल्कि सरकार को विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव भी देते हैं। आवश्यकता पड़ने पर विरोधी दल सरकार को पूर्ण सहयोग देता है।

6. अस्थिर मतदाता को अपील करना-विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को आम चुनाव में हराने का प्रयत्न करता है। इसके लिए विरोधी दल सत्तारूढ़ दल की आलोचना करके मतदाताओं के सामने यह प्रमाणित करने का प्रयत्न करता है कि यदि उसे अवसर दिया जाए तो वह देश का शासन सत्तारूढ़ दल की अपेक्षा अच्छा चला सकता है। विरोधी दल अस्थायी मतदाताओं को अपने पक्ष में करके चुनाव जीतने का प्रयत्न करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 3.
भारत में एक दल की प्रधानता के कारण लिखें।
उत्तर:
प्रारम्भिक वर्षों में भारत में एक दल की प्रधानता के निम्नलिखित कारण थे

1. कांग्रेस में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था (Congress as Respresentative of all Shades of Opinion):
कांग्रेस पार्टी की प्रधानता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था, कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। वास्तव में कांग्रेस स्वयं में एक ‘महान् गठबन्धन’ (Grand Alliance) था। कांग्रेस पार्टी उग्रवादी, उदारवादी, दक्षिण पंथी, साम्यवादी तथा मध्यमार्गी नेताओं का एक महान् मंच था, जिसके कारण लोग इसी पार्टी को मत दिया करते थे।

2. विरोधी दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे (Opposition Parties as Disgruntled children of the Congress Party):
स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक वर्षों में जितने भी विरोधी राजनीतिक दल थे, उनमें से अधिकांश राजनीतिक दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे। समाजवादी पार्टी, प्रजा समाजवादी पार्टी, संयुक्त समाजवादी पार्टी, 29 जनसंघ, राम राज्य परिषद् तथा हिन्दू महासभा जैसी पार्टियों के सम्बन्ध कभी-न-कभी कांग्रेस से ही रहे हैं। अत: लोगों ने उस समय कांग्रेस से अलग हुए दलों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस को ही वोट देना उचित समझा।

3. 1967 के पश्चात् भी केन्द्र में कांग्रेस की प्रधानता (Dominance of Congress at the Centre level even after 1967 Elections):
यद्यपि 1967 के चुनावों के पश्चात् राज्यों में से कांग्रेस की प्रधानता समाप्त हो गई, परन्तु केन्द्र में अभी भी कांग्रेस की शक्तिशाली सरकार थी, जो राज्यों की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका रखती थी।

4. राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में समानता (Similarity of Programmes of all Parties):
कांग्रेस एवं उसकी विरोधी पार्टियों के कार्यक्रमों एवं नीतियों में कोई बहुत अधिक अन्तर नहीं था, बल्कि उनमें समानताएं अधिक थीं। जिसके कारण मतदाताओं ने अन्य पार्टियों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देना उचित समझा।

5. गठबन्धन सरकारों की असफलता (Failure of Coalition govt.):
कांग्रेस की प्रधानता का एक कारण राज्यों में गठबन्धन सरकारों की असफलता थी। 1967 के आम चुनावों के पश्चात् आधे राज्यों में गैर-कांग्रेसी गठबन्धन सरकारें बनीं, परन्तु गैर-कांग्रेसी नेता अपने निजी स्वार्थों के लिए आपस में ही उलझते रहे, जिस कारण गठबन्धन सरकारें सफल न हो सकी तथा लोगों का गैर-कांग्रेसी सरकारों से मोहभंग हो गया।

6. राजनीतिक दल-बदल (Political Defection):
1967 के आम चुनावों के पश्चात् जो राजनीतिक दल-बदल हुए, उससे परोक्ष रूप में आगे चलकर कांग्रेस पार्टी ही अधिक शक्तिशाली हुई।

प्रश्न 4.
भारत में ‘एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली’ किसी दूसरे देश की एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है ? एक दल के प्रभुत्व का अर्थ क्या यह है कि भारत में वास्तविक प्रजातन्त्र नहीं है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
भारत में एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली किसी दूसरे देश की इसी तरह की प्रणाली से सर्वथा भिन्न है। क्योंकि भारत में उस दल में भी प्रजातान्त्रिक तत्त्व पाये जाते हैं तथा भारत में एक दल के प्रभुत्व के होते हुए भी वास्तविक तौर पर प्रजातन्त्र पाया जाता है, जिसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

  • भारत में निर्धारित तौर पर चुनाव होते रहे हैं।
  • भारत में सभी दलों को चुनावों में भाग लेने का अधिकार है।
  • भारत के सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त है।
  • भारत में विरोधी दल पाया जाता है।
  • विरोधी दलों एवं लोगों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त है।
  • चुनावों के पश्चात् उसी दल की सरकार बनती है, जिसे बहुमत प्राप्त हो।
  • भारतीय नागरिकों को संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं।
  • मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 5.
भारत में 1952 के आम चुनाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए किस प्रकार मील का पत्थर साबित हुए ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में 1952 के प्रथम आम चुनाव दुनिया के लोकतन्त्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए, क्योंकि यह चुनाव कई पक्षों से अनूठा तथा इसको सफलतापूर्वक करवाने में कई बाधाएं थीं। स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची का होना आवश्यक था तथा चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन भी आवश्यक था। भारतीय चुनाव आयोग ने इन कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। 1952 में लगभग 17 करोड़ मतदाताओं ने 3200 विधायक और लोकसभा के 489 सांसदों का चुनाव करना था। इस प्रकार का कार्य हिमालय पर चढ़ाई करने जैसा था।

भारतीय मतदाताओं में केवल 15 प्रतिशत मतदाता ही साक्षर थे। अतः चुनाव आयोग को विशेष मतदान पद्धति के बारे में सोचना पड़ा। भारत में चुनाव करवाने केवल इसलिए ही मुश्किल नहीं थे, बल्कि अधिकांश भारतीय मतदाता अनपढ़ ग़रीब एवं प्रजातान्त्रिक प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ थे, जबकि जिन देशों में लोकतान्त्रिक चुनाव सफलतापूर्वक होते थे, वे अधिकांश विकसित देश थे और उन विकसित देशों में भी महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नहीं था।

जबकि भारत में 1952 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को अपनाया गया था। अतः भारत में स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाना बहुत मुश्किल कार्य था। एक भारतीय सम्पादक ने “इस चुनाव को इतिहास का सबसे बड़ा जुआ कहा था। आर्गनाइजर पत्रिका के अनुसार, “पं. जवाहर लाल नेहरू अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे कि सार्वभौम मताधिकार का सिद्धान्त असफल रहा है।”

1952 में हुए प्रथम चुनाव की सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरे होने में लगभग छ: महीने लगे। अधिकांश सीटों पर मुकाबला भी हुआ तथा हराने वाले उम्मीदवारों ने भी माना, कि चुनाव निष्पक्ष हुए। विदेशी आलोचकों ने भी चुनावों की निष्पक्षता को स्वीकार किया। चुनावों के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा कि “सर्वत्र यह बात स्वीकृत की जा रही है, कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतन्त्र के सबसे बड़े प्रयोग को सफलतापूर्वक पूरा किया।” इसीलिए कहा जाता है. कि 1952 के चुनाव दुनिया के लोकतन्त्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय दलीय व्यवस्था की कोई चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
1. भारत में बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली है।

2. एक दल के प्रभुत्व युग का अन्त-भारत में लम्बे समय तक विशेषकर 1977 तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, परन्तु वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व समाप्त हो चुका है और उसकी जगह अन्य दलों ने ले ली है।

3. सैद्धान्तिक आधारों का अभाव-राजनीतिक दलों का सैद्धान्तिक आधारों पर संगठित होना अनिवार्य है, परन्तु हमारे देश में ऐसे दलों का अभाव है जो ठोस राजनीतिक तथा आर्थिक सिद्धान्तों पर संगठित हों।

4. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों की महत्ता निरन्तर बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 2.
एक प्रजातन्त्रीय राज्य के लिए राजनीतिक दल क्यों अनिवार्य हैं ?
उत्तर:
आधुनिक युग राष्ट्रीय राज्यों का युग है। आधुनिक समय के ऐसे राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र असम्भव है क्योंकि इन राज्यों की जनसंख्या तथा आकार अत्यधिक है। आधुनिक समय में अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र अथवा प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही सम्भव है। राजनीतिक दलों के बिना इस प्रकार के लोकतन्त्र की सम्भावना नहीं हो सकती। संयुक्त कार्यक्रम के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए, सरकार का निर्माण करने के लिए और विपक्षी दल की भूमिका अभिनं करने के लिए राजनीतिक दलों की आवश्यकता है। इसी कारण कहा जा सकता है “राजनीतिक दल नहेंद्र नहीं।” (No political parties, no democracy.)

प्रश्न 3.
लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार चुनाव में भाग लेना।
  • शासक दल अथवा विपक्षी दल के रूप में भूमिका निभाना।
  • लोगों को राजनीतिक रूप में जागृत करना।
  • सरकार तथा लोगों में एक योजक का काम करना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 4.
91वें संशोधन द्वारा दल-बदल को रोकने के लिए क्या उपाय किए गए हैं ?
उत्तर:
दल-बदल को रोकने के लिए 52वें संशोधन द्वारा बनाया गया कानून पूरी तरह दल-बदल रोकने में सफल नहीं रहा। इसी कारण दल-बदल कानून को और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए दिसम्बर, 2003 में संविधान में 91वां संशोधन किया गया।

इस कानून (संवैधानिक संशोधन) द्वारा यह व्यवस्था की गई, कि दल-बदल करने वाला कोई सांसद या विधायक सदन की सदस्यता खोने के साथ-साथ अगली बार चुनाव जीतने तक अथवा सदन के शेष कार्यकाल तक (जो भी पहले हो), मन्त्री पद या लाभ का कोई अन्य पद प्राप्त नहीं कर सकेगा। इस कानून के अन्तर्गत सांसदों या विधायकों के दल-बदल करने के लिए एक तिहाई सदस्य संख्या की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 5.
कांग्रेस पार्टी को ‘छतरी संगठन’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की स्थापना सन् 1885 में की गई। कांग्रेस पार्टी की स्थापना के समय भारत में राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी थीं, कि समाज का प्रत्येक वर्ग भारत को स्वतन्त्र देखना चाहता था। इसीलिए जब 1885 में कांग्रेस पार्टी की स्थापना की गई, तब समाज का प्रत्येक वर्ग अपने छोटे-मोटे मतभेद भुलाकर कांग्रेस के मंच पर आ गया। कांग्रेस में सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों तथा समुदायों के लोग शामिल थे। इसीलिए पामर (Palmer) ने कांग्रेस पार्टी को एक ‘छाता संगठन’ कहा है। आगे चलकर डॉ० अम्बेदकर ने कांग्रेस पार्टी की तुलना एक सराय से की थी जिसके द्वार समाज के सभी वर्गों के लिए खुले हुए थे।

प्रश्न 6.
भारत में एक दल के प्रभुत्व के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर:
1. सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व-कांग्रेस पार्टी की प्रधानता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था।

2. विरोधी दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे-स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक वर्षों में जितने भी विरोधी दल थे उनमें से अधिकांश दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे। अत: लोगों ने अलग हुए गुटों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देना उचित समझा।

3. राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में समानता-कांग्रेस एवं उसकी विरोधी पार्टियों के कार्यक्रमों में काफ़ी समानता पाई जाती थी। इसलिए भी मतदाता अन्य दलों की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देते थे।

4. गठबन्धन सरकारों की असफलता-कांग्रेस की प्रधानता का एक कारण राज्यों में गठबन्धन सरकारों की असफलता थी। जिसके कारण लोगों का गैर-कांग्रेसी सरकारों से मोह भंग हो गया।

प्रश्न 7.
कांग्रेस पार्टी की राज्य स्तर पर असमान प्रधानता की व्याख्या करें।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की राज्य स्तर पर असमान प्रधानता का अर्थ यह है, कि केन्द्र की तरह राज्यों में कांग्रेस पार्टी . सदैव प्रधान नहीं रही। 1977 तक कांग्रेस पार्टी की केन्द्र स्तर पर प्रधानता बनी रही। परन्तु इसी दौरान राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की पूरी प्रधानता नहीं रही। क्योंकि कुछ राज्यों में क्षेत्रीय या अन्य दलों का उदय हो चुका था।

जैसे, भारतीय साम्यवादी दल, मार्क्सवादी दल, अकाली दल, द्रविड़ कड़गम, क्रान्तिकारी समाजवादी पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक तथा नेशनल कान्फ्रेंस। इन दलों ने समय-समय पर अपने-अपने राज्यों में सरकार बनाकर राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की प्रधानता को चुनौती थी। इसीलिए कहा जाता है, कि राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की असमान प्रधानता थी।

प्रश्न 8.
कांग्रेस के गठबन्धनवादी स्वरूप की व्याख्या करें।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी यद्यपि 1977 तक केन्द्र में शासन करती रही। परन्तु राज्यों में कांग्रेस की पूरी प्रधानता नहीं रही तथा समय-समय पर क्षेत्रीय तथा अन्य दलों ने कांग्रेस पार्टी को चुनावों में पराजित भी किया। इसी कारण कांग्रेस पार्टी ने कई राज्यों में अन्य दलों से समझौता करके अपनी सरकारें बनवाने का प्रयास किया।

1954 में कांग्रेस पार्टी ने कोचीन में पी० एस० पी० की अल्पमत सरकार भी बनवाई। 1957 में उड़ीसा में कांग्रेस पार्टी ने दूसरे आम चुनावों में एक स्थानीय दल गणतन्त्र परिषद् से गठबन्धन किया। 1970 के अन्त में केन्द्र में भी कांग्रेस ने अपनी सरकार को चलाने के लिए साम्यवादी दलों का सहारा लिया। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है, कि यद्यपि कांग्रेस की प्रधानता रही है, परन्तु समय-समय पर उसे गठबन्धन राजनीति को स्वीकार करना पड़ा है।

प्रश्न 9.
भारत में एक पार्टी का प्रभत्व विश्व के और देशों में एक पार्टी के प्रभत्व से किस प्रकार भिन्न था ?
उत्तर:
भारत में एक पार्टी का प्रभुत्व विश्व के और देशों में एक पार्टी के प्रभुत्व से सर्वथा भिन्न था। उदाहरण के लिए भारत और मैक्सिको में दोनों देशों में एक खास समय में एक ही दल का प्रभुत्व था। परन्तु दोनों देशों में एक दल के प्रभुत्व के स्वरूप में मौलिक अन्तर था, जहां भारत में लोकतान्त्रिक आधार पर एक दल का प्रभुत्व कायम था, वहीं मैक्सिको में एक दल की तानाशाही पाई जाती थी तथा लोगों को अपने विचार रखने का अधिकार नहीं था।

इसी प्रकार सोवियत संघ एवं चीन में भी एक पार्टी का प्रभुत्व पाया जाता था, परन्तु इन देशों में भी राजनीतिक दल प्रजातान्त्रिक आधारों पर संगठित नहीं हुए थे, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रजातान्त्रिक आधार पर संगठित हुई थी।

प्रश्न 10.
स्वतन्त्रता के शुरू के वर्षों में विपक्षी दलों को यद्यपि कहने भर का प्रतिनिधित्व मिल पाया, फिर भी इन दलों ने हमारी शासन-व्यवस्था के लोकतान्त्रिक चरित्र को बनाये रखने में किस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाई ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के शुरू के वर्षों में विपक्षी दलों को यद्यपि कहने भर का प्रतिनिधित्व मिल पाया फिर भी इन दलों ने हमारी शासन-व्यवस्था को लोकतान्त्रिक चरित्र को बनाये रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के शुरुआती वर्षों में सी०पी०आई०, जनसंघ, स्वतन्त्र पार्टी तथा सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियां भारत में विपक्षी दल की भूमिका निभाती थीं।

इन दलों ने समयानुसार एवं आवश्यकतानुसार सत्ताधारी कांग्रेस दल की अनुचित नीतियों एवं कार्यक्रमों की आलोचना की। ये आलोचनाएं सैद्धान्तिक तौर पर सही होती थीं। इन विपक्षी दलों ने अपनी सक्रिय गतिविधियों से कांग्रेस दल पर अंकुश बनाये रखा तथा लोगों को राजनीतिक स्तर पर एक विकल्प प्रदान करते रहे।

प्रश्न 11.
प्रथम तीन चुनावों में मुख्य विपक्षी दल कौन-से थे ?
उत्तर:
प्रथम तीन आम चुनावों में मुख्य विपक्षी दलों में सी० पी० आई०, एस० पी०, प्रजा समाजवादी पार्टी, जनसंघ तथा स्वतंत्र पार्टी शामिल हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 12.
‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सन् 1924 में हुई। इस पार्टी को 1952 के लोकसभा चुनावों में 16 सीटें, 1957 के चुनावों में 27 सीटें एवं 1962 के चुनावों में 29 सीटें प्राप्त हुईं। इस पार्टी ने 1957 में केरल में विश्व की पहली लोकतांत्रिक साम्यवादी सरकार का निर्माण किया। 1959 में चीन के साथ सम्बन्ध के बारे में भारतीय साम्यवादी दल में दो गुट बन गए और 1962 में चीन के आक्रमण ने इस मतभेद को और अधिक बढ़ा दिया।

एक गुट ने चीन के आक्रमण को आक्रमण कहा और इसका मुकाबला करने के लिए भारत सरकार के देने का वचन दिया, परन्तु दूसरे गुट ने जो चीन के प्रभाव में था, इसे सीमा सम्बन्धी विवाद कह कर पुकारा, परिणामस्वरूप 1964 में वामपंथी सदस्य जिनकी संख्या लगभग एक तिहाई थी, भारतीय साम्यवादी दल से अलग हो गए और मार्क्सवादी दल की स्थापना की।

प्रश्न 13.
‘भारतीय जनसंघ’ पार्टी पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारतीय जनसंघ पार्टी की स्थापना सन् 1951 में हुई थी। इसके संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। जनसंघ अपनी विचारधारा, सिद्धांत एवं कार्यक्रम के आधार पर अन्य दलों से भिन्न था। यह दल एक देश, एक संस्कृति एवं राष्ट्र पर जोर देता था। जनसंघ का कहना था, कि भारत एवं पाकिस्तान को मिलाकर ‘अखण्ड भारत’ बनाया जाए।

यह दल अंग्रेज़ी को हटाकर हिन्दी को राजभाषा बनाने के पक्ष में था। इस दल ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को ‘विशेष सुविधाएं देने का विरोध किया। सन् 1952 के चुनावों में इस दल को 3 सीटें मिली, 1957 के चुनावों में इस दल को 4 सीटें मिलीं। इस दल के मुख्य नेताओं में श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्री दीनदयाल उपाध्याय एवं श्री बलराम मधोक शामिल थे।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का समूह है जो सार्वजनिक मामलों पर एक-से विचार रखते हों और संगठित होकर अपने मताधिकार द्वारा सरकार पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहते हों ताकि अपने सिद्धान्तों को लागू कर सकें। गिलक्राइस्ट के शब्दानुसार, “राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का संगठित समूह है जिनके राजनीतिक विचार एक से हों और एक राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करके सरकार पर नियन्त्रण रखने का प्रयत्न करते हों।”

प्रश्न 2.
भारत में कांग्रेस पार्टी की स्थापना कब हुई ? इसके मुख्य संस्थापक का नाम लिखिए।
उत्तर:
कांग्रेस की स्थापना सन् 1885 में हुई तथा इसके संस्थापक का नाम ए० ओ० ह्यूम था।

प्रश्न 3.
भारत में साम्यवादी दल की स्थापना कब हुई? इसका विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
भारत में साम्यवादी दल की स्थापना सन् 1924 में हुई और इसका विभाजन सन् 1964 में हुआ।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता के बाद भारत द्वारा किस शासन प्रणाली को चुना गया था ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के बाद भारत द्वारा संसदीय शासन प्रणाली को चुना गया था।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में चुनाव कराने की जिम्मेवारी किसे सौंपी गई है ?
अथवा
भारत में चुनाव कराने की जिम्मेवारी किसे सौंपी गई है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में चुनाव कराने की जिम्मेवारी चुनाव आयोग को सौंपी गई है।

प्रश्न 6.
भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी का 1964 में विभाजन हआ। इसका क्या कारण था ?
उत्तर:
भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना 1924 में की गई थी। 1959 में चीन के साथ सम्बन्ध के बारे में भारतीय साम्यवादी दल में दो गुट बन गए और 1962 के चीन के आक्रमण ने इस मतभेद को और अधिक बढ़ा दिया। एक गुट ने चीन के आक्रमण को आक्रमण कहा और इसका मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पूरी सहायता देने का वचन दिया, परन्तु दूसरे गुट ने जो चीन के प्रभाव में था, इसे सीमा सम्बन्धी विवाद कह कर पुकारा। परिणामस्वरूप 1964 में वामपंथी सदस्य जिनकी संख्या लगभग एक तिहाई थी, भारतीय साम्यवादी दल से अलग हो गए और मार्क्सवादी दल की स्थापना की।

प्रश्न 7.
भारतीय जनसंघ की स्थापना कब हुई ? इसके संस्थापक कौन थे ?
उत्तर:
भारतीय जनसंघ की स्थापना सन् 1951 में हुई। इसके संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

प्रश्न 8.
किस विद्वान् ने कांग्रेस पार्टी को एक सराय कहा और क्यों ?
उत्तर:
डॉ० भीम राव अम्बेदकर ने कांग्रेस पार्टी को सराय कहा था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के द्वार समाज के सभी वर्गों के लिए खुले हुए थे। डॉ० अम्बेदकर के अनुसार कांग्रेस पार्टी के द्वार मित्रों, दुश्मनों, चालाक व्यक्तियों, मूों तथा यहां तक कि सम्प्रदायवादियों के लिए भी खुले हुए थे।

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प्रश्न 9.
भारतीय जनसंघ ने किस विचारधारा पर जोर दिया था ?
उत्तर:

  • भारतीय जनसंघ ने एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र के विचार पर जोर दिया।
  • जनसंघ का विचार था कि भारतीय संस्कृति और परम्परा के आधार पर भारत आधुनिक प्रगतिशील और ताकतर बन सकता है।

प्रश्न 10.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मौलाना अबुल कलाम का पूरा नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद था। इनका जन्म 1888 में हुआ तथा निधन 1958 में हुआ। अबुल कलाम इस्लाम के प्रसिद्ध विद्वान् थे। वे प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, कांग्रेसी नेता तथा हिन्दू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। उन्होंने भारत विभाजन का विरोध किया। वे संविधान सभा के सदस्य थे, तथा स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षा मन्त्री थे।

प्रश्न 11.
भारत की दलीय व्यवस्था के कोई दो लक्षण दीजिए।
उत्तर:

  • भारत में बहुदलीय व्यवस्था पाई जाती है।
  • भारत में राजनीतिक दलों का चुनाव आयोग के पास पंजीकरण होता है।

प्रश्न 12.
डॉ० भीम राव अम्बेदकर पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
डॉ० भीम राव अम्बेदकर का जन्म महाराष्ट्र में 1891 में हुआ। डॉ० अम्बेदकर कानून के विशेषज्ञ एवं संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। डॉ० अम्बेदकर जाति विरोधी आन्दोलन के नेता तथा पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के संघर्ष के प्रेरणा स्रोत माने जाते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् नेहरू मन्त्रिमण्डल में मन्त्री बने, परन्तु 1951 में हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर असहमति जताते हुए पद से इस्तीफा दिया। 1956 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 13.
राजकुमारी अमृतकौर के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
राजकुमारी अमृतकौर गांधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी थीं, उनका जन्म 1889 में कपूरथला के राजपरिवार में हुआ। उन्होंने अपनी माता के अनुसार ईसाई धर्म अपनाया। वह संविधान सभी की सदस्य भी रहीं तथा नेहरू मन्त्रिमण्डल में स्वास्थ्य मन्त्री का कार्यभार सम्भाला। सन् 1964 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 14.
सी० राजगोपालाचारी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।।
उत्तर:
सी० राजगोपालाचारी का जन्म 1878 में हुआ। सी० राजगोपालाचारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। वे संविधान सभा के सदस्य थे, वे भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल बने। वे केन्द्र सरकार में मन्त्री तथा मद्रास के मुख्यमन्त्री भी रहे। उन्होंने 1959 में स्वतन्त्र पार्टी की स्थापना की। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1972 में उनका देहान्त हो गया।

प्रश्न 15.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में हुआ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी संविधान सभा के सदस्य थे। वे हिन्द महासभा के महत्त्वपूर्ण नेता तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने 1950 में पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को लेकर मतभेद होने पर नेहरू मन्त्रिमण्डल से इस्तीफा दिया। वे कश्मीर को स्वायत्तता देने के विरुद्ध थे। कश्मीर नीति पर जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा 1953 में हिरासत में ही उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 16.
चुनाव से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
चुनाव एक ऐसी विधि है, जिसके द्वारा मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। चुनाव प्रत्यक्ष भी हो सकते हैं, और अप्रत्यक्ष भी हो सकते हैं।

प्रश्न 17.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आय राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी, परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है।

प्रश्न 18.
साम्यवादी दल, सन् 1964 में हुए विभाजन के बाद किन दो राजनीतिक दलों में बंटा था ?
उत्तर:
साम्यवादी दल, सन् 1964 में हुए विभाजन के भारतीय साम्यवादी दल तथा भारतीय साम्यवादी (मार्क्सवादी) दल में बंटा हुआ था।

प्रश्न 19.
गठबन्धन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
गठबन्धन सरकार का साधारण अर्थ है, कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। चुनावों से पूर्व या चुनावों के बाद कई दल मिलकर अपना साझा कार्यक्रम तैयार करते हैं। उसके आधार पर वे मिलकर चुनाव लड़ते . हैं अथवा अपनी सरकार बनाते हैं। भारत में सबसे पहले केन्द्र में 1977 में गठबन्धन सरकार बनी।

प्रश्न 20.
‘एक दलीय प्रभत्व’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था उसे कहते हैं, जहां बहुदलीय पद्धति के अन्तर्गत किसी एक दल की प्रधानता होती है। एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था में यद्यपि अन्य भी कई दल होते हैं, परंतु उनका राजनीतिक महत्व अधिक नहीं होता, क्योंकि लोगों का उन्हें अधिक समर्थन प्राप्त नहीं होता। ऐसी व्यवस्था में मतदाता केवल एक ही दल को अधिक महत्त्व देते हैं। भारत एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था का एक प्रत्यक्ष उदाहरण रहा है।

प्रश्न 21.
‘एक दल की प्रधानता का युग’ कौन-से काल को कहा जाता है ?
उत्तर:
एक दल की प्रधानता का युग सन् 1952 से 1962 तक के काल को कहा जाता है, क्योंकि इन तीनों चुनावों में केन्द्र एवं राज्य स्तर पर कांग्रेस का ही प्रभुत्व था।

प्रश्न 22.
भारत में एक दल की प्रधानता का युग कब समाप्त हुआ ?
उत्तर:
भारत में एक दल की प्रधानता का युग सन् 1967 में हुए चौथे आम चुनाव के बाद समाप्त हुआ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. दूसरा आम चुनाव कब हुआ?
(A) 1950 में
(B) 1952 में
(C) 1957 में
(D) 1962 में।
उत्तर:
(C) 1957 में।

2. निम्नलिखित में से किसने कांग्रेस को छाता संगठन (Umbrella organisation) की संज्ञा दी ?
(A) महात्मा गांधी ने
(B) जवाहर लाल नेहरू ने
(C) पामर ने
(D) बाल गंगाधर तिलक ने।
उत्तर:
(C) पामर ने।

3. किसने कांग्रेस की तुलना सराय से की है ?
(A) गोपाल कृष्ण गोखले
(B) लाला लाजपत राय
(C) डॉ० अम्बेदकर
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(C) डॉ० अम्बेदकर।

4. निम्न में से एक दल को ‘छाता संगठन’ के नाम से सम्बोधित किया गया।
(A) सोशलिस्ट पार्टी
(B) कांग्रेस दल
(C) भारतीय जनसंघ
(D) हिन्दू महासभा।
उत्तर:
(B) कांग्रेस दल।

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5. भारत में चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है
(A) राष्ट्रपति को
(B) संसद् को
(C) मुख्य न्यायाधीश को
(D) चुनाव आयोग को।
उत्तर:
(D) चुनाव आयोग को।

6. निम्नलिखित में से किस नेता ने कांग्रेस को जन-आन्दोलन का रूप दिया ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू ने
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने
(C) विनोबा भावे
(D) महात्मा गांधी ने।
उत्तर:
(D) महात्मा गांधी ने।

7. भारत के प्रथम मुख्य चुनाव उपयुक्त कौन थे ?
(A) टी० एन० शेषन
(B) सुकुमार सेन
(C) एम० एस० गिल
(D) हुकुम सिंह।
उत्तर:
(B) सुकुमार सेन।

8. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई ?
(A) 1885 में
(B) 1886 में
(C) 1905 में
(D) 1895 में।
उत्तर:
(A) 1885 में।

9. भारत में एक दल की प्रधानता का युग किस नेता से जुड़ा है ?
(A) सरदार पटेल
(B) पं० नेहरू
(C) महात्मा गांधी
(D) लाल बहादुर शास्त्री
उत्तर:
(B) पं० नेहरू।

10. प्रथम तीन आम चुनावों में किस राजनीतिक दल का प्रभुत्व बना रहा ?
(A) कम्युनिस्ट पार्टी का
(B) समाजवादी पार्टी का
(C) कांग्रेस पार्टी का
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(C) कांग्रेस पार्टी का।

11. स्वतन्त्र भारत में एक दल की प्रधानता का युग निम्नलिखित वर्ष से आरम्भ होता है
(A) 1952 में
(B) 1957 में
(C) 1950 में
(D) 1951 में।
उत्तर:
(A) 1952 में।

12. प्रथम आम चुनावों में कांग्रेस को लोकसभा में कितने स्थान प्राप्त हुए थे?
(A) 361
(B) 401
(C) 364
(D) 370
उत्तर:
(C) 364

13. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन कब हुआ ?
(A) 1962 में
(B) 1964 में
(C) 1975 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1964 में।

14. 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ निम्न के लिए भी चुनाव कराए गए थे
(A) भारत के राष्ट्रपति का चुनाव
(B) राज्य विधानसभा का चुनाव
(C) राज्य सभा का चुनाव
(D) प्रधानमन्त्री का चुनाव।
उत्तर:
(B) राज्य विधानसभा का चुनाव।

15. भारतीय जनसंघ के संस्थापक कौन थे ?
(A) सी० राजगोपालाचारी
(B) डॉ० श्यामा प्रसाद
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(B) डॉ० श्यामा प्रसाद।

16. राष्ट्रीय मंच पर किस नेता के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई ?
(A) महात्मा गांधी
(B) गोपाल कृष्ण गोखले
(C) डॉ० अम्बेदकर
(D) पं० नेहरूं।
उत्तर:
(A) महात्मा गांधी।

17. भारतीय जनता पार्टी की जड़ें किस पार्टी में पाई जाती हैं ?
(A) साम्यवादी पार्टी
(B) स्वतन्त्र पार्टी
(C) भारतीय जनसंघ
(D) कांग्रेस पाटी।
उत्तर:
(C) भारतीय जनसंघ।

18. सन् 1957 के चुनावों के बाद निम्नलिखित किस राज्य में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ ?
(A) राजस्थान में
(B) मद्रास में
(C) आन्ध्र प्रदेश में
(D) केरल में।
उत्तर:
(D) केरल में।

19. भारतीय जनसंघ की स्थापना निम्नलिखित वर्ष में हुई :
(A) 1950 में
(B) 1951 में
(C) 1952 में
(D) 1949 में।
उत्तर:
(B) 1951 में।

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20. स्वतन्त्र भारत में पहला आम चुनाव कब हुआ ?
(A) 1952 में
(B) 1957 में
(C) 1948 में
(D) 1950 में।
उत्तर:
(A) 1952 में।

21. सन् 1952 से 1966 तक भारत के राजनीतिक मंच पर
(A) एक दल की प्रधानता रही
(B) दो-दलीय प्रधानता रही
(C) तीन दलीय प्रधानता रही
(D) बहु-दलीय प्रधानता रही।
उत्तर:
(A) एक दल की प्रधानता रही।

22. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना निम्नलिखित किस वर्ष में हुई-
(A) 1950 में
(B) 1924 में
(C) 1964 में
(D) 1934 में।
उत्तर:
(B) 1924 में।

23. ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना किस वर्ष हुई ?
(A) 1950 में
(B) 1951 में
(C) 1957 में
(D) 1960 में।
उत्तर:
(B) 1951 में।

24. प्रथम आम चुनाव में लोकसभा में 16 स्थान प्राप्त करके कौन-सा दल कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर रहा ?
(A) जनसंघ
(B) समाजवार्दी पार्टी
(C) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
(D) हिन्दू महासभा।
उत्तर:
(C) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी।

25. 1957 में केरल विधानसभा में किस दल की सरकार बनी ?
(A) साम्यवादी दल
(B) कांग्रेस पार्टी
(C) स्वतन्त्र पार्टी
(D) जनसंघ
उत्तर:
(A) साम्यवादी दल।

26. भारत में तीसरा आम चुनाव सम्पन्न हुआ
(A) 1961 में
(B) 1962 में
(C) 1960 में
(D) 1963 में।
उत्तर:
(B) 1962 में।

27. भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी में विभाजन कब हुआ ?
(A) 1962 में
(B) 1964 में
(C) 1957 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1964 में।

28. विश्व में सबसे पहले कहां पर निर्वाचित ढंग से साम्यवादी दल की सरकार बनी ?
(A) केरल
(B) मास्को
(C) हवाना
(D) गुजरात।
उत्तर:
(A) केरल।

29. भारत में वयस्क मताधिकार की आयु निश्चित की गई है
(A) 20 वर्ष
(B) 21 वर्ष
(C) 18 वर्ष
(D) 19 वर्ष।
उत्तर:
(C) 18 वर्ष।

30. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस स्थान पर हुई ?
(A) दिल्ली में
(B) बम्बई में
(C) लखनऊ में
(D) कलकत्ता में।
उत्तर:
(B) बम्बई में।

31. 1984 में कांग्रेस ने लोकसभा का चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा?
(A) इंदिरा गांधी
(B) मोरार जी देसाई
(C) राजीव गांधी
(D) देवराज अर्स।
उत्तर:
(C) राजीव गांधी।

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32. भारत के प्रथम चुनाव आयुक्त थे :
(A) बलराम जाखड़
(B) हुकुम सिंह
(C) सुकुमार सेन
(D) शिवराज पाटिल।
उत्तर:
(C) सुकुमार सेन।

33. मुख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय निम्नलिखित को जाता है
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) राजेन्द्र प्रसाद
(C) गोपाल कृष्ण गोखले
(D) ए० ओ० ह्यम।
उत्तर:
(D) ए० ओ० ह्यूम।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) साम्यवादी पार्टी की स्थापना वर्ष ………… में हुई।
उत्तर:
1924

(2) भारत में एक दल की प्रधानता का युग ……….. भारतीय नेता से जुड़ा हुआ है।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू

(3) केन्द्र स्तर पर कांग्रेस पार्टी की प्रधानता वर्ष …………… में समाप्त हो गई।
उत्तर:
1977

(4) पामर ने कांग्रेस को एक …………. संगठन कहा।
उत्तर:
छाता

(5) एस० ए० डांगे …………… पार्टी के नेता थे।
उत्तर:
साम्यवादी

(6) भारत के चुनाव आयोग का गठन ………… में हुआ।
उत्तर:
1950

(7) स्वतंत्र भारत में पहला आम चुनाव सन् …………….. में हुआ।
उत्तर:
1952

(8) सन् 1957 के चुनावों के पश्चात् पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन ……….. राज्य में हुआ।
उत्तर:
केरल

(9) भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष ……………… थे।
उत्तर:
श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में किस प्रकार की दलीय प्रणाली पाई जाती है ?
उत्तर:
भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है।

प्रश्न 2.
मख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय किस व्यक्ति को जाता है ?
उत्तर:
मुख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय ए० ओ० ह्यूम को जाता है।

प्रश्न 3.
भारत में एक दल की प्रधानता किस दल से सम्बन्धित रही है ?
उत्तर:
भारत में एक दल की प्रधानता कांग्रेस दल से सम्बन्धित रही है।

प्रश्न 4.
किस युग में कांग्रेस पार्टी ने मध्यवर्गीय व्यापारियों, पाश्चात्य शिक्षित व्यापारियों, वकीलों एवं भू-स्वामियों को एक मंच प्रदान किया ?
उत्तर:
उदारवादी युग में।

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प्रश्न 5.
कांग्रेस दल किस सन् में राष्ट्रीय चरित्र वाले एक जनसभा के रूप में अस्तित्व में आया ?
उत्तर:
कांग्रेस दल 1905 से 1918 तक के काल में राष्ट्रीय चरित्र वाले एक जनसभा के रूप में अस्तित्व में आया।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय मंच पर किस नेता के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई ?
उत्तर:
राष्ट्रीय मंच पर महात्मा गांधी के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई।

प्रश्न 7.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन सन् 1964 में हुआ।

प्रश्न 8.
प्रथम आम चुनावों के समय कितने राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दल विद्यमान थे ?
उत्तर:
प्रथम आम चुनावों में 14 राष्ट्रीय स्तर एवं 52 राज्य स्तर के दल विद्यमान थे।

प्रश्न 9.
कांग्रेस पार्टी की स्थापना किस वर्ष हुई ?
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की स्थापना सन् 1885 में हुई।

प्रश्न 10.
भारत में मतदाता दिवस कब मनाया जाता है ?
उत्तर:
भारत में मतदाता दिवस 25 जनवरी को मनाया जाता है।

प्रश्न 11.
भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी किसे सौंपी गई है ?
उत्तर:
चुनाव आयोग को।

प्रश्न 12.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर:
ए० ओ० ह्यम।

प्रश्न 13.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
सन् 1964 में।

प्रश्न 14.
भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर:
भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

प्रश्न 15.
श्री एस० ए० डांगे किस दल के प्रमुख नेता थे ?
उत्तर:
भारतीय साम्यवादी दल।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

निबन्धात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण की समस्या सभी राष्ट्रों के सामने आती है। यह समस्या विशेषकर उन देशों की है जिन्होंने द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् स्वतन्त्रता प्राप्त की। आज भी यह समस्या तीसरे विश्व (Third World) के देशों के लिए बनी हुई है।

राष्ट्र-निर्माण का अर्थ (Meaning of Nation-Building):
राष्ट्र निर्माण के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हैं। एक इतिहासकार राष्ट्रों के विकास (Growth of Nations) की शब्दावली का प्रयोग करता है जबकि एक राजनीतिज्ञ राष्ट्र निर्माण (Nation-Building) की भाषा बोलता है। समाजशास्त्री राष्ट्र विकास (Nation Development) जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां ।

कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। यह सामाजिक प्रक्रिया कई प्रकार की संस्थाओं में पाई जाती है। इसके कई स्वरूप होते हैं जिनके द्वारा राष्ट्र निर्माण का कार्य होता है। डेविड ए० विलसन (David A. Wilson) के शब्दों में, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनैतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।’

लुसियन पाई (Pye) के मतानुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफ़ादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

गिलक्राइस्ट (Gilchrist) ने राष्ट्र की परिभाषा इस प्रकार दी है, “राष्ट्र राज्य तथा राष्ट्रीयता का योग है।”

ब्लंट्शली (Bluntschli) के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण मनुष्यों के ऐसे समूह को कहते हैं जो विशेषतया भाषा और रीति-रिवाज द्वारा एक समान सभ्यता में बंधे हुए हों, जिससे उनमें एकता और समस्त विदेशियों से भिन्नता की भावना पैदा होती है।”

नाविको (Navicow) कहता है कि, “राष्ट्र एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक एकता है और सामाजिक विकास का उच्चतम उत्पादन है।” कुछ विद्वान् राष्ट्र निर्माण को राजनीतिक विकास समझते हैं। परन्तु वास्तव में राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास नहीं है। राजनीतिक विकास का अर्थ समाज का सामूहिक राजनीतिक परिवर्तन होता है। (Total Political Formation of Society.) राजनीतिक परिवर्तन के भिन्न-भिन्न पक्ष होते हैं।

आल्मण्ड और पॉवेल (Almond and Powell) के अनुसार, “राजनीतिक विकास अर्थात् राजनीतिक परिवर्तन में चार मुख्य समस्याएं होती हैं।” वे हैं-राज्य निर्माण, राष्ट्र निर्माण, राजनीतिक भागेदारी, कल्याण और विभाजन। (State building, Political Participation, Welfare and Distribution.) इसका अर्थ यह है कि राष्ट्र निर्माण न तो राज्य निर्माण है और न ही इसको राजनीतिक विकास कहा जा सकता है क्योंकि आल्मण्ड के मतानुसार राज्य निर्माण का अर्थ है एक राज्य में नये ढांचों की रचना और सरकार के चले हुए ढांचों का पुनर्गठन और उसकी अधिक क्रिया। इससे अभिप्राय यह है कि राज्य निर्माण का अर्थ है आधुनिक राजनीतिक ढांचों के सभी रूपों की रचना।

इसके विपरीत राष्ट्र निर्माण एक ढांचे सम्बन्धी समस्या नहीं है, राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों और नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

साधारण शब्दों में इसका अर्थ यह है कि परम्परावादी संकुचित वफ़ादारों को समाप्त होना चाहिए जैसे कि परिवार, जाति, धर्म, आदि के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर सम्पूर्ण प्रणाली तथा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी होनी चाहिए। इससे अभिप्राय यह है कि एक देश में राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) हो जहां एक व्यक्ति सीमित वफ़ादारियों की तुलना में राज्य के प्रति वफादारियों को अधिक महत्त्व दें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की परिभाषा दीजिए और राष्ट्र निर्माण के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख करें।
अथवा
राष्ट्र निर्माण का अर्थ स्पष्ट करें। राष्ट्र निर्माण के मुख्य तत्वों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। राष्ट्र निर्माण के तत्त्व-इसके लिए पाठ्य-पुस्तक का प्रश्न नं० १ देखें।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 3.
“राष्ट्र निर्माण” के मार्ग में बाधक तत्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाले बाधक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत को विदेशी गुलामी से स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 को प्राप्त हुई थी। इस दीर्घ समय में भारत राष्ट्र निर्माण के आदर्श को प्राप्त नहीं कर सका है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में कुछ ऐसी समस्याएं विद्यमान हैं जो राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधाएं सिद्ध हुई हैं। ऐसी कुछ समस्याएं अथवा बाधाएं इस प्रकार हैं

1. साम्प्रदायिकता (Communalism):
भारत बहुधर्मी देश है। अंग्रेजों ने भारत के इस बहुधर्मी स्वरूप को अपने राजनीतिक हितों के लिए प्रयोग किया था। उन्होंने भारतीयों में ‘फूट डालो तथा राज्य करो’ की नीति (Policy of divide and rule) को ग्रहण किया था। अंग्रेजों ने विशेष रूप से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में पारस्परिक वैर विरोध बढ़ाने के लिए विशेष प्रयत्न किये थे।

उनके ऐसे प्रयत्नों के कारण ही 1947 में साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन हुआ था। इस विभाजन के साथ ही भारत में साम्प्रदायिकता समाप्त न हुई, बल्कि अनेक कारणों ने साम्प्रदायिकता को और भी अधिक उत्तेजित किया तथा अन्त में यह समस्या राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण संकट अथवा बाधा बन गई।

2. जातिवाद (Casteism):
साम्प्रदायिकता की तरह जातिवाद भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। जातिवाद के तथ्य ने लोगों को तुच्छ विचारों वाले मनुष्य बना दिया है। अनेक लोग राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जाति हितों को प्राथमिकता देते हैं। उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बड़ी बाधा है।

3. भाषावाद (Linguism):
जिस तरह भारत एक बह-धर्मी देश है उसी तरह भारत एक बह-भाषाई देश भी है। भारतीय संविधान ने हिन्दी सहित भारत की 22 भाषाओं को मान्यता दी है। परन्तु भारत में बोलने वाली भाषाएं कई सैंकड़ों में हैं। भारतीय लोग अपनी भाषा के साथ बहुत अनुराग रखते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सभी लोगों को अपनी मातृ-भाषा से प्रेम होता है। परन्तु भारत में भाषा को एक राजनीतिक तथ्य बना दिया गया है। भाषावाद तथा साम्प्रदायिकता का गम्भीर संगम कर दिया है तथा यह संगम राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा बना हुआ है।

4. क्षेत्रवाद (Regionalism):
भारत एक विशाल देश है जिसके कई क्षेत्र (Regions) हैं। कई क्षेत्रों को भाषा के आधार पर राज्यों के रूप में संगठित किया गया है। लोगों की क्षेत्रवाद की भावना इतनी अधिक बलवान् है कि राष्ट्रीय सरकार इन विवादों को सम्बन्धित लोगों की प्रसन्नतानुसार हल नहीं कर सकी है। क्षेत्रवाद की इस बलवान भावना के कारण ही भारत के कई भागों में पृथक्कवाद का स्वर भी उठा है। इस तरह क्षेत्रवाद अथवा प्रदेशवाद राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा बन गया है।

5. साम्प्रदायिक राजनीतिक दल (Communal Political Parties):
भारत के कुछ राजनीतिक दल साम्प्रदायिक आधारों पर संगठित किए गए हैं। कुछ ऐसे दल भी हैं जिसका संगठन जाति अथवा भाषा के आधार पर किया गया है। ऐसे राजनीतिक दल दोनों की धार्मिक, जातीय अथवा भाषाई भावनाओं को अपने राजनीतिक हितों के लिए उत्तेजित करते हैं। इस तरह की नीतियों वाले राजनीतिक दल भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में रुकावट सिद्ध होते हैं।

6. राजनीतिक अवसरवादिता (Political Opportunism):
भारत में लगभग सभी राजनीतिक दलों में राजनीतिक अवसरवादिता पाई जाती है। राजनीतिक व्यक्ति यह देखते हैं कि उसके दल को राजनीतिक लाभ किस तरह हो सकता है। राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए विरोधी विचारों वाले राजनीतिक दल चुनाव गठबन्धन कर लेते हैं। इसका परिणाम यह निकला है कि अधिकतर नेताओं तथा उनके समर्थकों में अपने स्वार्थी हितों के अतिरिक्त राष्ट्र अथवा समाज के हितों के विषय में सोचने अथवा कुछ करने की कोई रुचि नहीं रही है। ऐसी रुचि का अभाव भी राष्ट्र निर्माण के आदर्श के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है।

7. ग़रीबी तथा निरक्षरता (Poverty and Illiteracy):
भारत में ग़रीबी तथा निरक्षरता व्यापक स्तर पर पाई जाती है। ऐसे लोगों को राष्ट्र निर्माण के अर्थों का ज्ञान शायद तब तक न हो सके जब तक ग़रीबी तथा निरक्षरता से उनकी मुक्ति नहीं हो जाती है।

8. आन्दोलनों तथा हिंसा की राजनीति (Politics of Agitation and Violence):
भारतीय राजनीति वास्तव में आन्दोलनों की राजनीति बन गई है। छोटी-छोटी बातों के लिए भी हड़तालों, धरनों, रैलियों इत्यादि का सहारा लिया जाता है। हिंसक घटनाएं लोगों में एक-दूसरे के प्रति घृणा उत्पन्न करती हैं। इस तरह आन्दोलनों तथा हिंसा की राजनीति भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा सिद्ध हो रही है।

9. अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना (Sence of Insecurity in Minorities):
भारत में अनेक ही धार्मिक, भाषाई तथा सांस्कृतिक अल्पसंख्यक है। संविधान ने इन अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति तथा भाषा की सुरक्षा का अधिकार दिया हुआ है परन्तु इसके बावजूद भारत में रहते अल्पसंख्यकों को असुरक्षा की भावना अनुभव होती है। इस तरह अल्पसंख्यकों तथा बहुसंख्यकों में अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है तथा भावना राष्ट्र निर्माण के लिए बाधा सिद्ध होगी।

10. अपर्याप्त संसाधन (Inadequate Resources):
भारत में धन एवं पर्याप्त संसाधनों की कमी है, जिसके कारण राष्ट्र निर्माण के कार्यों में बाधा पहुंचती है।

प्रश्न 4.
राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए। 2014, 18)
उत्तर:
भारतीय राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली रुकावटों को निम्नलिखित उपायों द्वारा दूर किया जा सकता है

1. शिक्षा प्रणाली में सुधार (Reforms in Educational System):
प्रचलित भारतीय शैक्षिक प्रणाली में क्रान्तिकारी सुधार किए जाने अनिवार्य हैं। शिक्षा को वास्तविक जीवन से सम्बन्धित करने की अति आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त शैक्षिक प्रणाली में ऐसे सुधार करने चाहिए जिनके फलस्वरूप शिक्षा रोज़गार प्रधान (Employment Oriented) हो तथा विद्यार्थियों में हथकरघों का गुण विकसित करे।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना ही नहीं होना चाहिए बल्कि विद्यार्थियों में देश-भक्ति तथा राष्ट्रवाद की भावना तथा राष्ट्रीय चरित्र का विकास होना चाहिए। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्षता का गुण विकसित कर सके तथा उनके दृष्टिकोण को विशाल कर सके।

2. ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना (Removal of Poverty and Unemployment):
जब तक बेरोज़गारी को समाप्त नहीं किया जाता तब तक ग़रीबी की भी समाप्ति नहीं हो सकती। ये दोनों आर्थिक बुराइयां परस्पर सम्बन्धित हैं तथा दोनों की समाप्ति के बिना राष्ट्र निर्माण का कार्य सफल नहीं हो सकता।

3. सन्तुलित आर्थिक विकास (Balanced Economic Development):
भारत के विभिन्न भागों अथवा क्षेत्रों का सन्तुलित विकास होना अनिवार्य है। यदि कुछ क्षेत्र अधिक विकसित हों तथा कुछ अधिक पिछड़े होंगे तो उनमें ईर्ष्या अथवा पारस्परिक विरोध की भावना उत्पन्न हो सकती है। इस पारस्परिक विरोध के अतिरिक्त पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों में ऐसा असन्तोष फैलता है कि वह धीरे-धीरे राष्ट्रीय मुख्य धारा से दूर होते जाते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए देश के सभी क्षेत्रों का सन्तुलित विकास होना चाहिए।

4. भाषा की समस्या का समाधान (Solution of Language Problem):
भारत में भाषा की समस्या भी गम्भीर रूप की है। भाषा की समस्या का समाधान करने के लिए तीन भाषाई फार्मूला तैयार किया गया था। इस फार्मूले ने भाषा सम्बन्धी समस्या की गम्भीरता को कुछ कम तो अवश्य किया है परन्तु समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई। भाषा सम्बन्धी समस्या को हल किए बिना राष्ट्र निर्माण के आदर्श की प्राप्ति असम्भव है।

5. भारतीय भाषाओं की एक साझी लिपि (Common Script for all Indian Languages):
राष्ट्र निर्माण के कार्य की सफलता के लिए सभी भारतीय भाषाओं की एक सांझी लिपि का विकास करना अनिवार्य है। यूरोप के कई देशों में कई भाषाएं बोली जाती हैं तथा रोमन लिपि को सभी भाषाओं की एक सांझी लिपि के रूप में ग्रहण किया जाता है।

आचार्य विनोबा भावे तथा श्री राज नारायण ने देवनागरी लिपि को सभी भारतीय भाषाओं की सांझी लिपि के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया था। यदि कोई सांझी लिपि ग्रहण कर ली जाए तो विभिन्न भाषाएं बोलने वाले भारतीयों में वह लिपि साझी कड़ी का काम कर सकती है।

6. स्वस्थ राजनीतिक वातावरण (Healthy Political Atmosphere):
यदि देश के राजनीतिक वातावरण में आवश्यक सुधार न किए गए तो राष्ट निर्माण का आदर्श मात्र कल्पना बन कर ही रह जाएगा। इसलिए यह अनिवार्य है कि राजनीतिक बुराइयों को दूर करके राजनीतिक वातावरण स्वस्थ बनाया जाए।

7. स्वच्छ प्रशासन (Clean Administration):
राजनीतिक भ्रष्टाचार ने प्रशासन को भी भ्रष्ट बना दिया है। आज प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार की भरमार है। धन के बल से प्रशासकीय अधिकारियों से गैर-कानूनी कार्य भी करवाए जाते हैं। यह भी सत्य है कि रिश्वत दिए बिना उचित कार्य कम ही होते हैं। प्रशासन में बेइमानी, रिश्वतखोरी को समाप्त करने की आवश्यकता है। ऐसी बुराइयों को समाप्त करने से ही स्वच्छ प्रशासन सम्भव हो सकता है।

8. साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों तथा संगठनों पर प्रतिबन्ध (Ban on Communal Parties and Organisations):
राष्ट्र निर्माण की प्राप्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि ऐसे राजनीतिक दलों तथा संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए जो लोगों में साम्प्रदायिकता की घृणा उत्पन्न करते हैं।

9. दल प्रणाली में सुधार (Reforms in Party System):
हमारे देश में बहुदलीय प्रणाली है। ठोस सिद्धान्तों पर आधारित राजनीतिक दलों का अभाव है। दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का भी अभाव है। गुटबन्दी अथवा आन्तरिक धड़ेबन्दी लगभग प्रत्येक भारतीय राजनीतिक दल की विशेषता बन चुकी है। इतने अधिक राजनीतिक दल राष्ट्रीय एकता के लिए स्वयं ही संकट बन जाते हैं। राष्ट्र निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि दल प्रणाली में ऐसे सुधार किए जाएं।

10. भावनात्मक एकीकरण (Emotional Integration):
राष्ट्र निर्माण के लिए भारतीयों में भावनात्मक एकीकरण का होना है। भावनात्मक एकीकरण एक प्रकार की भावना है जिसका स्थान लोगों के मन तथा दिमागों में हैं। भावनात्मक एकीकरण की प्राप्ति सत्ताधारी कानूनों द्वारा नहीं हो सकती। यह तो एक आन्तरिक भावना है जो स्वयं ही विकसित हो सकती है तथा लोगों को जागृत करने से उनके मन में उत्पन्न की जा सकती है। भारतीय राष्ट्र निर्माण के आदर्श की प्राप्ति के लिए भारतीयों में पारस्परिक भावनात्मक साझेदारी विकसित की जानी अनिवार्य है।

प्रश्न 5.
विभाजन की विरासतों का वर्णन करें।
अथवा
1947 में भारत विभाजन से उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटेन के अधीन रहा। एक लम्बे स्वतन्त्रता संग्राम के कारण भारत को 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। परन्तु भारत की स्वतन्त्रता के साथ-साथ भारत का दुःखद विभाजन हो गया तथा पाकिस्तान नाम का एक नया स्वतन्त्र राज्य अस्तित्व में आया। भारत विभाजन के समय हमें बहुत-सी समस्याएं विरासत के रूप में मिलीं। जैसे रिफ्यूजियों के पुनर्वास की समस्या, कश्मीर समस्या, राज्यों के गठन एवं पुनर्गठन की समस्या तथा भाषा से सम्बन्धित राजनीतिक विवाद। इन समस्याओं से निपटने के लिए पं० नेहरू एवं सहयोगियों ने क्या दृष्टिकोण अपनाया, उनका वर्णन इस प्रकार है

1. शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या (Problem of resettlement of Refugee):
भारत के विभाजन के फलस्वरूप जो पहली समस्या हमें विरासत के रूप में मिली, वह थी शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या। जब भारत का विभाजन होना निश्चित हो गया, तो बड़ी संख्या में जो लोग पाकिस्तान को छोड़कर भारत आए, उन्हें ही वास्तव में शरणार्थी कहा जाता है। पाकिस्तान छोड़कर भारत आने वाले लोगों की संख्या लाखों में थी।

अतः सरकार के सामने इन लोगों के पुनर्वास की मुश्किल समस्या सामने थी। भारत सरकार को न केवल इन शरणार्थी लोगों को भारत में रहने के लिए घरों की ही व्यवस्था करनी थी, बल्कि उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार पर यह समझाना भी था, कि जिस प्रकार वे पाकिस्तान में सुरक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे, वैसा ही सुरक्षित जीवन उन्हें अब भारत में भी प्रदान किया जायेगा।

परन्तु विभाजन के समय दोनों ओर से जिस प्रकार कत्लेआम किया जा रहा था, वैसी स्थिति में लोगों को किसी भी प्रकार का ढाढस या विश्वास दिलाना मुश्किल था, क्योंकि इस विभाजन के कारण लाखों लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा था यही कारण था, कि विभाजन के समय भारत आने वाले लोग, जिन्हें हम शरणार्थी कहते हैं, काफ़ी डरे हुए थे,

इसके साथ ही इन लोगों को अपनी ज़मीन जायदाद की चिन्ता भी सता रही थी कि बार्डर के दूसरी ओर (हिन्दुस्तान) जाकर हमें हमारी सम्पत्ति एवं जायदाद के मुआवजे के रूप में कुछ प्राप्त भी होगा, या नहीं। शरणार्थियों की इस प्रकार की समस्याओं ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० नेहरू एवं उनके सहयोगियों के सामने मुश्किलें खड़ी कर रखी थीं तथा पं० नेहरू एवं उनके सहयोगियों के लिए इस प्रकार की समस्या से निपटना एक चुनौती थी।

समस्या का समाधान (Settlement of the Problems) यद्यपि शरणार्थियों की समस्या भारत के विभाजन की सबसे बड़ी समस्या थी, परन्तु भारत सरकार को इस समस्या को निपटाना ही था, अन्यथा भारत में अराजकता की स्थिति पैदा होने का खतरा था, तथा जो लोग अपना सब कुछ छोड़कर भारत आए उन्हें यह लगे कि उन्होंने भारत आकर कोई गल्ती नहीं की।

इस समस्या को हल करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० नेहरू ने दूरदर्शिता का परिचय दिया तथा लोगों के पुनर्वास को बड़े ही संयम ढंग से व्यावहारिक रूप प्रदान किया। पं० नेहरू ने शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए सर्वप्रथम एक पुनर्वास मन्त्रालय (Resettlement Ministry) का निर्माण किया, जिसको शरणार्थी लोगों के पुनर्वास की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

शरणार्थियों को अस्थाई तौर पर ठहराने के लिए जगह-जगह कैम्प लगाए। जैसे-जैसे इन लोगों के रहने की पूर्णकालिक व्यवस्था होने लगी, वैसे-वैसे उन्हें इन कैम्पों से निकालकर उन स्थानों पर भेजा जाने लगा। पं० नेहरू ने शरणार्थियों को मुआवजे के रूप में यथा-योग्य जमीन जायदाद प्रदान की। उन्हें सभी प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक अधिकार प्रदान किये गए। 1955 में नागरिकता कानून बना कर इन शरणार्थियों को भारत का नागरिक बनाया गया। इस प्रकार पं० नेहरू ने अपने सकारात्मक दृष्टिकोण से एक बड़ी ही जटिल समस्या का समाधान किया।

2. कश्मीर की समस्या (The Kashmir Problem)-कश्मीर की समस्या भारत एवं पाकिस्तान के बीच एक प्रमुख समस्या बनी हुई है। भारत के विभाजन स्वरूप कश्मीर समस्या पैदा हुई। स्वतन्त्रता से पहले कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय यह निर्णय लिया गया कि इस बात का फैसला स्वयं कश्मीर करेगा कि वह भारत में शामिल होना चाहता है या पाकिस्तान में या स्वतन्त्र राज्य बनना चाहेगा। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर को एक स्वतन्त्र राज्य ही बनाये रखने का निर्णय लिया। परन्तु पाकिस्तान सदैव ही कश्मीर को अपने राज्य में शामिल करने के लिए उत्सुक रहा। अतः उसने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया।

15 अक्तूबर, 1947 को लगभग 5000 आक्रमणकारियों ने कश्मीर के अन्दर ओवन के किले (Fort Owen) की घेराबन्दी शुरू कर दी। 22 अक्तूबर, तक इस घुसपैठ ने एक पूर्ण आक्रमण का रूप धारण कर लिया। यह बात सर्वविदित थी, कि आक्रमणकारियों में अधिकांशतः पाकिस्तानी सैनिक थे। इस आक्रमण से कश्मीर के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया। इससे भारत का चिन्तित होना भी स्वाभाविक था, क्योंकि इस प्रकार की घटना का भारत में अवश्य प्रभाव पड़ता। अत: कश्मीर समस्या का समाधान पं० नेहरू एवं सरदार पटेल के लिए एक मुश्किल चुनौती थी।

समस्या के समाधान का प्रयास (Efforts to resolve the Problem)-कश्मीर के राजा हरि सिंह को जब यह लगने लगा, कि कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा हो जायेगा, तो उसने भारत से सहायता मांगी। भारत ने सहायता का आश्वासन देते हुए कश्मीर को भारत में शामिल होने की बात कही, जिसे राजा हरि सिंह ने मान लिया। इस पर पं० नेहरू एवं सरदार पटेल ने भारतीय सेना को कश्मीर में भेजा, इसके साथ भारत ने पाकिस्तान से यह आग्रह किया कि, वह कश्मीर में अपनी सैनिक गतिविधियां बन्द करें।

परन्तु पाकिस्तान ने इससे इन्कार कर दिया। जब भारत सरकार एवं माऊंटबेटन को यह लगने लगा, कि कश्मीर की समस्या को इस ढंग से नहीं सुलझाया जा सकता तो, पं० नेहरू इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र के सामने ले गए, ताकि इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके। परन्तु कश्मीर की समस्या काफ़ी सालों तक बनी रही। अन्तत: 5-6 अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया तथा यह स्पष्ट किया, कि अब केवल पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे वाले (पी० ओ० के०-POK) पर ही बातचीत होगी।

3. राज्यों का गठन एवं पुनर्गठन की समस्या-इसके लिए प्रश्न नं० 6 देखें। प्रश्न 6. भारत में राज्यों के पुनर्गठन पर एक विस्तृत लेख लिखें।
उत्तर:
भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप विरासत के रूप में जो दूसरी बड़ी समस्या मिली, वह थी, देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले भारत दो भागों में बंटा हआ था-ब्रिटिश भारत (British India) एवं देशी राज्य (Native States) । ब्रिटिश भारत का शासन तत्कालीन भारत सरकार के अधीन था, जबकि देशी राज्यों का शासन देशी राजाओं के हाथों में था। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के मार्ग में देशी रियासतें सदैव बाधा बनी रहीं। इन देशी रियासतों ने संवैधानिक गतिरोधों को बढ़ावा दिया। जब कभी भी भारत की संवैधानिक समस्या को हल करने का प्रयास किया जाता, तो इन देशी रियासतों के भविष्य की समस्या पैदा हो जाती थी।

स्वतन्त्र भारत के निर्माण के भावी ढांचे में देशी रियासतों के लिए व्यवस्था करना संविधान निर्माताओं के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहा। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले भारत में देशी रियासतों की संख्या लगभग 565 थी, इसके अन्तर्गत भारत की जनसंख्या का 20% भाग तथा भारत के क्षेत्रफल का लगभग 45% भाग आता था, अतः इतनी बड़ी जनसंख्या एवं क्षेत्रफल को भारत से अलग नहीं किया जा सकता था और उस स्थिति में तो बिल्कुल नहीं, जब अधिकांश देशी रियासतें भारत के आन्तरिक हिस्सों में विद्यमान थीं।

इन देशी रियासतों में जनसंख्या, क्षेत्र एवं आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर पर्याप्त अन्तर पाए जाते थे, जहां एक ओर कश्मीर, हैदराबाद तथा मैसूर जैसे ऐसे देशी राज्य थे जोकि कई यूरोपीय राज्यों से भी बड़े थे, तो वहीं दूसरी ओर काठियावाड़ तथा पश्चिमी भारत के देशी राज्य नक्शों में सूई की नोक से अधिक बड़े नहीं थे। ये देशी राज्य भारत में विलय को तैयार नहीं थे, जोकि भारत की कानून व्यवस्था के लिए काफ़ी हानिकारक स्थिति थी। वी० पी० मेनन का कहना है, कि, “निराशावादी भविष्यवक्ताओं ने यह भविष्यवाणी की, कि भारतीय स्वतन्त्रता की नौका देशी रियासतों की चट्टानों से टकरा कर चूर-चूर हो जायेगी।” इस प्रकार देशी रियासतों की भारत में विलय की समस्या भारत सरकार के सामने खड़ी थी।

समस्या का समाधान (Resettlement of the Problems) यद्यपि देशी रियासतों की भारत में विलय की समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी, परन्तु पं० नेहरू एवं तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल ने इस समस्या को बड़े ही सुनियोजित ढंग से सुलझाया। देशी रियासतों की समस्या के हल के लिए पं० नेहरू ने 27 जून, 1947 को एक विभाग की स्थापना की, जिसे राज्य विभाग (State’s Department) कहा जाता है। पं० नेहरू ने सरदार पटेल को इस विभाग का मन्त्री एवं वी० पी० मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया।

देशी रियासतों का भारत में विलय तीन चरणों के अन्तर्गत किया गया। प्रथम एकीकरण, द्वितीय-अधिमिलन, तृतीय-प्रजातन्त्रीकरण। एकीकरण (Integration) के अन्तर्गत वे देशी रियासतें आती हैं, जिन्होंने सरदार पटेल के परामर्श पर स्वयं ही भारत में विलय होना स्वीकार कर लिया था। अधिकांश देशी रियासतें इसी आधार पर भारत में शामिल हो गईं।

जबकि अधिमिलन (Accession) के अन्तर्गत जूनागढ़ एवं हैदराबाद जैसी रिय ो शामिल किया गया, क्योंकि इन्होंने स्वेच्छा से भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था, परन्तु सरदार पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल एवं सूझ-बूझ से इन दोनों रियासतों को भारत में विलय होने के लिए मजबूर कर दिया।

तीसरा चरण इन संस्थाओं के प्रजातन्त्रीकरण (Democratisation) से सम्बन्धित है। देशी रियासतों को प्रजातान्त्रिक ढांचे में ढालना भारत सरकार के लिए प्रमुख समस्या थी। इस समस्या के लिए प्रान्तों में प्रजातान्त्रिक एवं प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना की गई। इन प्रान्तों में भी संसदीय शासन प्रणाली लागू की गई तथा निर्वाचित विधानसभाओं की व्यवस्था की गई। इस प्रकार पं० नेहरू एवं सरदार पटेल की सूझ-बूझ से देशी रियासतों की समस्या का समाधान हो पाया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 7.
‘भाषा’ पर राजनीतिक विवाद की समस्या का वर्णन करें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान निर्माताओं के सामने एक प्रमुख समस्या सरकारी भाषा को लेकर थी। भारत के बहुत बड़े भाग में हिन्दी भाषा बोली जाती है लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। भाषायी विविधता को देखते हुए भी संविधान निर्माता इस बात पर सहमत थे कि भारत के लिए एक सामान्य भाषा का होना आवश्यक है।

संविधान सभा के बहुत-से सदस्य हिन्दी को सरकारी भाषा बनाने के पक्ष में थे जबकि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से आए सदस्यों ने इसका विरोध किया। इनका मानना था कि यदि हिन्दी को सरकारी भाषा घोषित कर दिया गया तो प्रतियोगी सरकारी नौकरियों में हिन्दी बोलने वाले व्यक्तियों का प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा और ग़ैर-हिन्दी भाषी क्षेत्र पिछड़ जाएंगे।

परन्तु हिन्दी भाषा के समर्थकों का विचार था कि, क्योंकि भारत के लगभग 40 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलने वाले हैं, अतः हिन्दी स्वाभाविक रूप से सरकारी भाषा होनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि यदि अंग्रेज़ी को सरकारी भाषा घोषित किया गया तो इससे सरकार और लोगों में दूरियां बढ़ जाएंगी क्योंकि विदेशी भाषा होने के कारण लोग इससे भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाएंगे।

अन्ततः संविधान सभा में यह निर्णय लिया गया कि हिन्दी भारत की सरकारी भाषा होगी। (अनुच्छेद 343) लेकिन अंग्रेजी भाषा अगले 15 वर्षों तक संघीय सरकार के अधिकारिक कार्यों के लिए जारी रहेगी। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 345 में यह भी व्यवस्था की गई कि राज्य विधानमण्डल के कानून द्वारा कोई राज्य अधिकारिक रूप से किसी अन्य भाषा को सरकारी कार्यों के लिए प्रयोग कर सकता है।

यद्यपि अंग्रेजी भाषा संविधान लागू होने के 15 वर्षों तक सरकारी भाषा के रूप में जारी रहनी थी, परन्तु 1955 में श्री जी० बी० खेर (G.B. Kher) की अध्यक्षता में गठित सरकारी भाषा आयोग ने अंग्रेजी भाषा के स्थान पर हिन्दी भाषा का प्रयोग करने पर बल दिया। भाषा आयोग ने और भी कई महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें कीं। लेकिन भाषा आयोग की सिफारिशों पर गैर-हिन्दी क्षेत्रों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसके विरोध में देश के कई स्थानों पर व्यापक प्रदर्शन हुए।

सरकारी भाषा विधेयक, 1963 (Official Language Bill, 1963):
अप्रैल, 1963 में संसद् में औपचारिक रूप से सरकारी भाषा विधेयक प्रस्तुत किया गया। साथ ही प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू को यह भी आश्वासन देना पड़ा कि हिन्दी भाषा को गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों पर थोपा नहीं जाएगा। हिन्दी का सरकारी भाषा बनना और भाषायी विवाद (Hindi to be an official Language and Lingual Conflicts)-26 जनवरी, 1965 को हिन्दी सरकारी भाषा बन गई।

लेकिन जब इसको लागू करने का प्रश्न आया तो भारत के अधिकांश प्रदेशों में भारी प्रदर्शन एवं दंगे हुए। विशेषतया मद्रास, बंगाल और केरल में हिन्दी विरोधी जबकि उत्तरी राज्यों-राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में हिन्दी के समर्थन में प्रदर्शन हुए।

भाषायी विवाद के दिनों में सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में दिल्ली में हुए राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में यह सुझाव दिया गया था कि सैकेण्डरी शिक्षा के लिए त्रि-भाषा फार्मूला प्रयोग में लाया जाए। यह कहा गया कि हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी और अंग्रेजी के साथ-साथ एक और आधुनिक भाषा अपनाई जाएगी और गैर-हिन्दी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी भाषा को पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जाए।

धीरे-धीरे हिन्दी अंग्रेजी भाषा का स्थान ले लेगी। लेकिन त्रि-भाषीय फार्मूला एक मज़ाक बन कर रह गया। 1965 में हिन्दी विरोधी दंगों को शान्त करने के लिए प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने यह आश्वासन दिया, कि हिन्दी को सरकारी स्तर पर लाने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है, कि अंग्रेजी को भारत से बाहर निकाला जा रहा है, गैर-हिन्दी भाषी राज्य तब तक अंग्रेजी का प्रयोग करते रहेंगे, जब तक वे हिन्दी प्रयोग के लिए तैयार नहीं हो जाते।

प्रश्न 8.
स्वतंत्र भारत के सामने मुख्य चुनौतियां क्या थीं ?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी निम्नलिखित चुनौतियां थीं

1. राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती-स्वतत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय एकीकरण की थी। स्वतंत्रता के समय लगभग 565 देशी रियासतों को भारत में शामिल करने की बड़ी चुनौती थी। इन सभी रियासतों की बोली, भाषा, खान-पान, रहन-सहन तथा पहरावा सब कुछ भिन्न-भिन्न था। अधिक अनेकता वाला देश कभी भी एकजुट नहीं रह सकता। इसीलिए देश के नेताओं के सामने देश के भविष्य को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े थे। जिसका हल किया जाना आवश्यक था।

2. विकास की चुनौती-स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी एक अन्य बड़ी चुनौती विकास की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता थी, क्योंकि अंग्रेज़ भारत को बहुत बुरी दशा में छोड़कर गए थे। अतः सभी प्रकार के क्षेत्र में विकास की आवश्यकता थी। साथ ही साथ भारतीय नेताओं को इस बात की भी व्यवस्था करनी थी कि विकास ऐसा हो, जिससे सभी वर्गों का कल्याण हो।

3. लोकतन्त्र की स्थापना की चुनौती-स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में नेताओं के समक्ष लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की भी चुनौती थी। ताकि समाज के सभी वर्गों को भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिल सके। इसके लिए भारत में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई। लोगों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 9.
भारत विभाजन के अच्छे व बरे परिणामों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत का विभाजन सन् 1947 में हुआ। इस विभाजन के अच्छे एवं बुरे परिणामों का वर्णन इस प्रकार है

(क) भारत विभाजन के अच्छे परिणाम

  • भारत विभाजन से लोगों को आजादी अपेक्षाकृत जल्दी मिल गई।
  • विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् कानून व्यवस्था को लागू करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् प्रशासन को उचित एवं कुशलतापूर्वक चलाया जाने लगा।

(ख) भारत विभाजन के बुरे परिणाम

  • सन् 1947 में बड़े पैमाने पर एक जगह की आबादी को दूसरी जगह जाना पड़ा।
  • धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदायों के लोगों को बेरहमी से कत्ल किया।
  • भारत विभाजन से महिलाओं को अमानवीय यातनाएं झेलनी पड़ी।
  • भारत विभाजन से देश की एकता एवं अखण्डता को गहरा धक्का लगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों और नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

साधारण शब्दों में, इसका अर्थ यह है कि परम्परावादी संकुचित वफ़ादारियों को समाप्त होना चाहिए जैसे कि परिवार, जाति, धर्म आदि के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर सम्पूर्ण प्रणाली तथा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी होनी चाहिए। इससे अभिप्राय यह है कि एक देश में राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) हो जहां एक व्यक्ति सीमित वफ़ादारियों की तुलना में राज्य के प्रति वफ़ादारियों को अधिक महत्त्व दें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की परिभाषा दें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण की निम्नलिखित परिभाषाएं हैं

(1) डेविड ए० विल्सन के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।”

(2) ब्लंटशली के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण मनुष्यों के ऐसे समूह को कहते हैं, जो विशेषतया भाग और रीति-रिवाज द्वारा एक समान सभ्यता में बंधे हुए हैं, जिससे उनमें एकता और समस्त विदेशियों से भिन्नता की भावना उत्पन्न हो।”

(3) लूसियन पाई के मतानुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफ़ादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

(4) प्रेडियर फोडरे के अनुसार, “नस्ल की साझ और भाषा, आदतें, रीति-रिवाज और धर्म की समानता ऐसे तत्त्व हैं, जो राष्ट्र का निर्माण करते हैं।”

प्रश्न 3.
राष्ट्र निर्माण के विषय में लूसियन पाई के विचारों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण के विषय में लूसियन पाई के विचारों को तीन भागों में बांटा जा सकता है

1. सामूहिक जन-सम्बन्धी-राजनीतिक विकास को जब जन-सम्बन्धी स्तर से देखते हैं तो इसका अर्थ यह हो जाता है कि लोगों के आदर्श में क्या मुख्य परिवर्तन आया है। वे सरकार और उच्च स्तरीय अधिकारियों इत्यादि के निर्णयों का पालन कैसे करते हैं ? और राजनीतिक निर्णयों में किस तरह और किस हद तक भागीदार है। इसको गण का सिद्धान्त (Principal of Quality) कहा जा सकता है।

2. सरकार के स्तर सम्बन्धी राजनीतिक विकास के साथ प्रजातन्त्र प्रणाली में अधिक शक्ति (सामर्थ्य) उत्पन्न हो जाती है। इसका अर्थ है कि जन सम्बन्धी मामलों के प्रतिबन्ध की सामर्थ्य तथा जन साधारण की मांगों के साथ चलने की सामर्थ्य । एक अविकसित राजनीतिक प्रणाली में इस प्रकार का सामर्थ्य बहुत कम होता है।

3. नीति के संगठन सम्बन्धी-राजनीतिक प्रणाली के संगठन के विषय में यह कहा जा सकता है कि एक विकसित हो रही राजनीतिक प्रणाली में संगठन सम्बन्धी भिन्नता अधिक होती है और भागीदारी संस्थाओं का समूहीकरण भी 15 अधिक होता है। इससे यह पता चलता है कि पाई (Pye) की राजनीतिक विकास की धारणा आल्मण्ड (Almond) के राजनीतिक विकास की धारणा से भिन्न है क्योंकि वह सामर्थ्य का एक नया तत्त्व प्रस्तुत करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 4.
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है

1. औद्योगीकरण. औद्योगीकरण राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करता है। जैसे ही एक देश औद्योगिक उन्नति करता लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वे अपनी परानी आदतों और परम्पराओं को त्याग देते हैं।

2. ध्यम का प्रसार एक राष्ट्र में जन-माध्यम के साधनों का विकास और प्रसार भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देता है। जन-माध्यम के साधनों में समाचार-पत्र, प्रसारण, डाक एवं तार प्रबन्ध, सड़कें, रेलें, वायु सेवाएं, चलचित्र, टेलीविज़न आदि शामिल हैं। इन साधनों द्वारा नागरिकों में अधिक जानकारी तथा चेतनता उत्पन्न होती है।

3. धर्म-निरपेक्ष संस्कृति का प्रसार-धर्म-निरपेक्ष संस्कृति भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देती है क्योंकि कट्टर धर्म कई बार नागरिकों में फूट और घृणा पैदा करता है। इसके विपरीत यदि एक देश में लोग धर्म-निरपेक्ष संस्कृति को अपना लें तो उनका दृष्टिकोण विशाल हो जाता है।

4. राजनीतिक भागीदारी-राजनीतिक भागीदारी भी राष्ट्र-निर्माण में अपनी भूमिका निभाती है। इसका अर्थ यह है कि लोगों को राष्ट्र की राजनीतिक क्रियाओं में भाग लेना चाहिए। यदि वे राजनीतिक क्रियाओं, जनता के कामों और निर्णयों में भाग लेते रहें तो राष्ट्र निर्माण में वृद्धि होती है। राजनीतिक भागीदारी के साथ अवसरों की समानता भी उत्पन्न होती है। इससे जाति-पाति के प्रभावों को भी पराजित किया जाता है।

प्रश्न 5.
राष्ट्र निर्माण के किन्हीं चार बाधक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के चार बाधक तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • जातिवाद राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है।
  • भाषावाद ने राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधाएं पैदा की हैं।
  • क्षेत्रवाद ने राष्ट्र निर्माण की भावना को हानि पहुंचाई है।
  • भारत में कुछ सांप्रदायिक दल पाए जाते हैं, जो राष्ट्र निर्माण के मार्ग में रुकावट सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय संघ में हैदराबाद को शामिल करने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के समय भारत में लगभग 565 देशी रियासतें थीं। ब्रिटिश सरकार ने इन रियासतों को यह निर्णय करने की छूट दे दी थी, कि वे भारत में शामिल हों, या पाकिस्तान में या स्वतन्त्र राज्य के रूप में अपने आपको बनाये रखें। तत्कालीन परिस्थितियों में हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय किया। परन्तु हैदराबाद का निजाम परोक्ष रूप से पाकिस्तान समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित था। इसका क्षेत्रफल 132000 वर्ग किलोमीटर था।

इसकी जनसंख्या लगभग एक करोड़ चालीस लाख थी। इस जनसंख्या में से लगभग 85% जनसंख्या हिन्दू थी। भारत के गृहमन्त्री सरदार पटेल को यह अन्देशा था कि आने वाले समय में हैदराबाद पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए खतरा पैदा कर सकता है। हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान से हथियार खरीद कर हिन्दुओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिये।

सरदार पटेल ने लॉर्ड माऊण्टबेटन की मदद से निजाम को यह समझाने का पूरा प्रयास किया कि हैदराबाद को भारत में मिलाने में ही हित है। परन्तु निजाम ने सभी प्रयासों को नकार दिया। तत्पश्चात् सरदार पटेल ने हैदराबाद के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का आदेश दिया। 13 सितम्बर, 1947 से 18 सितम्बर, 1947 तक दोनों पक्षों में युद्ध हुआ परन्तु हैदराबाद के लड़ाकुओं को भारतीय सेना के सामने हथियार डालने ही पड़े। हैदराबाद को भारत में मिला लेने की अनेक मुसलमान नेताओं ने तारीफ की।

प्रश्न 7.
भारतीय संघ में जूनागढ़ को शामिल करने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
जूनागढ़ गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक राज्य था। इसमें बाबरियावाड़, मानावदार तथा मंगरोल नामक जागीरें शामिल थीं। जूनागढ़ की लगभग 80% जनसंख्या हिन्दू थी। जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान के साथ शामिल होने का निर्णय किया। सितम्बर, 1947 में जब पाकिस्तान ने जनागढ के शामिल होने की स्वीकृति का अनुमोदन किया तो भारत सरकार को गहरा धक्का लगा।

क्योंकि भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर जूनागढ़ भारत में ही शामिल हो सकता था, परन्तु जूनागढ़ के शासक के न मानने पर सरदार पटेल ने, जूनागढ़ के शासकों के विरुद्ध बल प्रयोग का आदेश दिया। जूनागढ़ में भारतीय सैनिकों का सामना करने की क्षमता नहीं थी। अत: पहले अरजी हुकूमत (अरजी अर्थात् लोगों द्वारा प्रार्थना तथा हुकूमत अर्थात् शासन) को आमन्त्रित किया गया तत्पश्चात् भारतीय सरकार को 1 दिसम्बर, 1947 में करवाये गए जनमत संग्रह में जूनागढ़ के लगभग 99% लोगों ने भारत में शामिल होने की बात कही।

प्रश्न 8.
पाण्डिचेरी तथा गोवा के भारत में शामिल होने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् पाण्डिचेरी फ्रांस तथा गोवा पुर्तगाल के अधीन थे। फ्रांस पाण्डिचेरी को भारत में शामिल करने के पक्ष में नहीं था। परिणामस्वरूप भारतीय सैनिकों ने कार्यवाही करके पाण्डिचेरी को भारतीय संघ में शामिल कर लिया। इसी तरह पुर्तगाल भी गोवा पर से अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता था। अतः पुर्तगाल ने भारत द्वारा पेश किये गए सभी प्रस्तावों का विरोध किया।

परिणामस्वरूप 18 दिसम्बर, 1961 को भारतीय सेना ने गोवा, दमन व दीयू को पुर्तगाल से मुक्त कराके भारत में शामिल कर लिया। भारतीय प्रधानमन्त्री ने इसे मात्र पुलिस कार्यवाही की संज्ञा दी। लगभग 3000 पुर्तगाली सैनिक युद्धबन्दी बना लिए गए, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया। 1987 में गोवा भारत का 25वां राज्य बन गया।

प्रश्न 9.
कश्मीर समस्या पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ और पाकिस्तान की भी स्थापना हुई। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर 22 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता मांगी और कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की।

भारत में कश्मीर का विधिवत् विलय हो गया, परन्तु पाकिस्तान का आक्रमण जारी रहा और पाकिस्तान ने कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और अब भी उस क्षेत्र पर जिसे ‘आजाद कश्मीर’ कहा जाता है, पाकिस्तान का कब्जा है। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। भारत सरकार ने कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया और 1 जनवरी, 1949 को कश्मीर का युद्ध विराम हो गया।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर की समस्या को हल करने का प्रयास किया पर यह समस्या काफ़ी सालों तक बनी रही। अन्ततः 5-6-अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया तथा यह स्पष्ट किया, कि अब केवल पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे वाले (पी० ओ० के०-POK) पर ही बातचीत होगी।

प्रश्न 10.
‘भाषावाद’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत एक बहु-भाषी देश है। यहां पर सैंकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। संविधान के द्वारा देवनागरी लिपि की हिन्दी भाषा को केन्द्र सरकार की सरकारी भाषा निश्चित किया है। इसके अतिरिक्त संविधान द्वारा हिन्दी सहित 22 भाषाओं को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। भारतीय लोगों को अपनी मातृ-भाषा के प्रति बहुत ज्यादा लगन और श्रद्धा है। इसीलिए भारत में भाषावाद का विकास हुआ है। भारतीय संघ के राज्यों का संगठन भी भाषा के आधार पर किया गया है।

इस तथ्य ने भी भारत में भाषावाद के विकास को प्रोत्साहित किया है। भाषावाद भारतीय लोकतन्त्र की कार्यशीलता पर बुरे प्रभाव डाल रहा है। कई राजनीतिक दलों का निर्माण भाषा के आधार पर किया गया है।

कई राज्यों के लोग भाषा के आधार पर पृथक् राज्यों के निर्माण की मांग कर रहे हैं। लोगों की भाषा के प्रति निष्ठा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना के विकास के मार्ग में रुकावट बन रही है। भाषावाद कई लोगों के मत व्यवहार को प्रभावित करता है। दक्षिण भारत के लोगों की विरोधता के कारण हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा सरकारी रूप से नहीं दिया जा सका है। यह पूर्णतया राष्ट्रीय विकास के रास्ते में रुकावट बन रहा है।

प्रश्न 11.
भारत विभाजन के अच्छे परिणाम बताइये।
उत्तर:

  • भारत विभाजन से लोगों को आजादी अपेक्षाकृत जल्दी मिल गई।
  • विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् कानून व्यवस्था को लागू करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् प्रशासन को उचित ढंग से चलाया जाने लगा।

प्रश्न 12.
भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
भाषा ने भारतीय राजनीति को निम्नलिखित ढंगों से प्रभावित किया है
1. राष्ट्रीय एकता को खतरा-राष्ट्रीय एकता के लिए एक सामान्य भाषा का होना अति आवश्यक है। संविधान निर्माताओं ने यही बात सोचकर हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित किया था। परन्तु भाषा के विवाद ने राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को करारी चोट पहुंचायी है। दक्षिण के राज्य और उत्तर के राज्यों में मुख्य विवाद का कारण भाषा ही है।

2. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन–राज्य पुनर्गठन कानून 1956 के आधार पर भारत को 14 राज्यों तथा 6 संघीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया। परन्तु राज्यों के 1956 के पुनर्गठन से समस्या समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसके बाद भी अनेक राज्यों का पुनर्गठन किया गया और आज भारत में 28 राज्य और 8 संघीय क्षेत्र हैं। आज भी अनेक क्षेत्रों के भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग उठाई जाती है।

3. क्षेत्रवाद की भावना का विकास-भाषा के आधार पर ही लोगों में क्षेत्रवाद की भावना का विकास हुआ है और विभिन्न भाषा बोलने वाले पृथक् राज्य की मांग करते हैं जिससे भारत की एकता खतरे में पड़ सकती है।

4. सीमा विवाद-भाषा के कारण अनेक राज्यों में सीमा विवाद उत्पन्न हुए हैं और आज भी अनेक राज्यों के बीच यह विवाद चल रहे हैं। उदाहरणस्वरूप पंजाब और हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक तथा केरल इत्यादि में सीमा विवाद विद्यमान है।

प्रश्न 13.
राष्ट्र निर्माण के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के कोई चार उपाय लिखिए।
उत्तर:

  • राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए शिक्षा प्रणाली में सुधार करना आवश्यक है। शिक्षा को वास्तविक जीवन से सम्बन्धित करने की आवश्यकता है।
  • बेरोज़गारी एवं ग़रीबी को दूर करना आवश्यक है।
  • राष्ट्र निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए देश में संतुलित आर्थिक विकास होना चाहिए।
  • राष्ट्र निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए लोगों को स्वच्छ एवं पारदर्शी प्रशासन दिया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 14.
विभाजन से उत्पन्न किन्हीं चार समस्याओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत विभाजन से उत्पन्न कोई चार समस्याएं लिखें।
उत्तर:

  • विभाजन से उत्पन्न पहली जो समस्या थी, वह थी शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या।
  • भारत के विभाजन की दूसरी समस्या कश्मीर की समस्या है। भारत के विभाजन स्वरूप ही कश्मीर की समस्या पैदा हई है।
  • भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप जो एक अन्य समस्या पैदा हुई, वह थी देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना।
  • भारत के विभाजन के कारण राज्यों के पुनर्गठन की समस्या भी पैदा हुई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 15.
स्वतन्त्रता के बाद, पिछले छः दशकों में राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित सीखे पाठों में से किन्हीं चार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय एकता के लिए धर्म-निरपेक्षता का होना आवश्यक है, ताकि सभी लोगों को धर्म की स्वतन्त्रता प्राप्त हो।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए साम्प्रदायिक सद्भावना का होना भी आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए लोगों का शिक्षित होना आवश्यक है, ताकि उन्हें अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों का ज्ञान हो।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए राजनीतिक दलों का स्वस्थ आधारों पर संगठित होना आवश्यक है, राजनीतिक दल धर्म या जाति के आधार पर संगठित न होकर राजनीतिक और आर्थिक आधार पर संगठित होने चाहिएं।

प्रश्न 16.
मणिपुर और जूनागढ़ के रजवाड़े भारतीय संघ का अंग कैसे बने ?
उत्तर:
मणिपुर- मणिपुर की विधानसभा में भारत के विलय के प्रश्न पर सहमति नहीं थी। मणिपुर कांग्रेस चाहती थी कि इस रियासत को भारत में मिला दिया जाए, जबकि अन्य पार्टियां इसके विरुद्ध थीं। परन्तु भारत सरकार ने मणिपुर पर भारत में विलय के लिए दबाव डाला, जिसमें उसे सफलता भी मिली। मणिपुर के महाराजा बोधचन्द्र सिंह ने भारत में विलय से सम्बन्धित दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किये। जूनागढ़- इसके लिए प्रश्न नं0 7 देखें।

प्रश्न 17.
राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी नेहरू जी के दृष्टिकोण की व्याख्या करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी नेहरू जी के दृष्टिकोण का वर्णन इस प्रकार है

  • संसदीय शासन प्रणाली-राष्ट्र निर्माण के लिए नेहरू जी संसदीय शासन प्रणाली को लागू करना चाहते थे।
  • धर्म-निरपेक्ष राज्य-नेहरू जी राष्ट्र निर्माण के लिए धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना चाहते थे।
  • न्याय एवं स्वतन्त्रता-नेहरू जी ने राष्ट्र निर्माण के लिए न्याय एवं स्वतन्त्रता का समर्थन किया।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था-पं० नेहरू राष्ट्र के निर्माण के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाए जाने के पक्ष थे।

प्रश्न 18.
स्वतन्त्र भारत के सामने उपस्थित किन्हीं चार मुख्य चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्र भारत के सामने राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी निम्नलिखित चुनौतियां थीं

1. राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय एकीकरण की थी।

2. विकास की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी एक अन्य बड़ी चुनौती विकास की थी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता थी, क्योंकि अंग्रेज़ भारत को बहुत बुरी दशा में छोड़कर गए थे।

3. लोकतन्त्र की स्थापना की चनौती-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत में नेताओं के समक्ष लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की भी चुनौती थी ताकि समाज के सभी वर्गों को भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिल सके।

4. धार्मिक कट्टरता की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय धार्मिक कट्टरता भी एक चुनौती थी।

प्रश्न 19.
भारत विभाजन के चार प्रमुख कारण बताइये।
उत्तर:
1. अंग्रेजों की कुटिल नीति – भारत विभाजन का प्रमुख कारण अंग्रेजों की कुटिल नीतियां थीं, क्योंकि अंग्रेज़ जाते-जाते भारत को कमज़ोर करना चाहते थे।

2. जिन्ना की हठधर्मिता – भारत विभाजन का एक अन्य कारण जिन्ना की हठधर्मिता थी।

3. भारतीय नेताओं की शांति की इच्छा – भारत का विभाजन इसलिए भी हुआ, क्योंकि भारतीय नेताओं को यह आशा थी, कि विभाजन के बाद शायद भारत में शांति स्थापित हो जाए।

4. साम्प्रदायिक दंगे – भारत विभाजन का एक अन्य कारण उस दौरान हुए भीषण साम्प्रदायिक दंगे हैं।

प्रश्न 20.
राष्ट्र के किन्हीं चार तत्वों का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के किन्हीं चार तत्वों का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्र को जन्म देने वाले चार तत्व बताइये।।
उत्तर:
1.सामान्य मातृभूमि-प्रत्येक मनुष्य को अपनी मातृभूमि अर्थात् अपने जन्म-स्थान से प्यार होना स्वाभाविक ही है। एक ही स्थान या प्रदेश पर जन्म लेने वाले व्यक्ति मातृभूमि से प्यार करते हैं और इस प्यार के कारण वे आपस में एक भावना के अन्दर बन्ध जाते हैं।

2. वंश की समानता-कुछ लेखकों ने राष्ट्रीयता के लिए वंश पर जोर दिया है। वंश अथवा जाति की समानता से अभिप्राय व्यक्तियों के उस समूह से है जो एक ही पूर्वजों से सम्बन्धित हैं और वे रूप, आकार, रंग, कद आदि की कुछ शारीरिक समानताएं रखते हैं।

3. सामान्य भाषा-सामान्य भाषा राष्ट्रवाद का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। भाषा के द्वारा ही एक मनुष्य अपने विचारों को प्रकट कर सकता है।

4. सामान्य धर्म-सामान्य धर्म से भी एकता उत्पन्न होती है। धर्म के नाम पर लोग इकट्ठे हो जाते हैं और धर्म के नाम पर अपना जीवन भी बलिदान दे देते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण का अर्थ बताइए।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों एवं नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की कोई दो परिभाषाएं लिखें।
अथवा
राष्ट्र की कोई एक परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
1. डेविड ए० विल्सन के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं, जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।”

2. लुसियन पाई के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

प्रश्न 3.
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है

1. औद्योगीकरण – औद्योगीकरण राष्ट निर्माण को प्रभावित करता है। जैसे ही एक देश औद्योगिक उन्नति करता है वैसे ही वहां के लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वे अपनी पुरानी आदतों और परम्पराओं को त्याग देते हैं।

2. जन-माध्यम का प्रसार – एक राष्ट्र में जन-माध्यम के साधनों का विकास और प्रसार भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देता है। जन-माध्यम के साधनों में समाचार-पत्र, प्रसारण, डाक एवं तार प्रबन्ध, सड़कें, रेलें, वायु सेवाएं, चलचित्र, टेलीविज़न आदि शामिल हैं। इन साधनों द्वारा नागरिकों में अधिक जानकारी तथा चेतनता उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
3 जून, 1947 को ब्रिटिश गवर्नर जनरल माऊण्टबेटन ने क्या घोषणा की ?
उत्तर:
3 जून, 1947 का दिन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस दिन ब्रिटिश गवर्नर जनरल माऊण्टबेटन ने यह घोषणा की, कि ब्रिटिश सरकार जून, 1948 की अपेक्षा अगस्त, 1947 में सत्ता भारतीयों को सौंप देगी।

प्रश्न 5.
हैदराबाद को भारत में किस प्रकार शामिल किया गया ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति एवं भारत के विभाजन के पश्चात् हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय किया। परन्तु परोक्ष रूप से निजाम पाकिस्तान समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित था तथा इसकी 85% जनसंख्या हिन्दू थी। हैदराबाद कभी भी भारतीय सुरक्षा को खतरा पैदा कर सकता था। अतः सरदार पटेल के काफ़ी मनाने के बाद भी निज़ाम जब नहीं माना तो भारत ने सैनिक कार्यवाही करके हैदराबाद को भारत में मिला लिया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 6.
जूनागढ़ को भारत में किस प्रकार शामिल किया गया ?
उत्तर:
जूनागढ़ गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक राज्य था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जूनागढ़ ने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय किया। परन्तु भारत की सुरक्षा की दृष्टि से यह उचित नहीं था। अन्ततः भारत द्वारा बल प्रयोग करने के बाद पहले अरजी हुकूमत को आमन्त्रित किया गया, तत्पश्चात् शासन सम्भालने के लिए भारत को आमन्त्रित किया गया।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत द्वारा किन दो चुनौतियों का सामना किया जा रहा था ?
उत्तर:

  • शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत द्वारा शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या का सामना किया जा रहा था।
  • राज्यों के पुनर्गठन की समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय विरासत के रूप जो दूसरी बड़ी समस्या मिली, वह थी देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना।

प्रश्न 8.
उन वास्तविक राज्यों के नाम बताएं, जिनमें से निम्नलिखित राज्य बने
1. मेघालय
2. गुजरात।
उत्तर:

  1. मेघालय- मेघालय, असम राज्य से अलग होकर राज्य बना है।
  2. गुजरात-गुजरात, बम्बई प्रेजीडेंसी से अलग होकर राज्य बना है।

प्रश्न 9.
राज्यों का पुनर्गठन क्या है ? यह कब किया गया ?
उत्तर:
राज्यों के पुनर्गठन का अर्थ है कि राज्यों का भाषा के आधार पर पुनः गठन करना। भारत में राज्यों का पुनर्गठन 1956 में किया गया।

प्रश्न 10.
मुहम्मद अली जिन्नाह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मुहम्मद अली जिन्नाह का जन्म कराची में 1876 में हुआ। जिन्नाह ने द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त दिया, तथा पाकिस्तान की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 11.
महात्मा गांधी ने 14 अगस्त, 1947 को कहा, “कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन भी होगा और गमी का भी।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
महात्मा गांधी के अनुसार 15 अगस्त, 1947 को खुशी का दिन इसलिए होगा, क्योंकि इस दिन भारत आजाद होगा जबकि गमी का दिन इसलिए होगा, क्योंकि इस दिन भारत का विभाजन होगा।

प्रश्न 12.
भारत के विभाजन के दो मुख्य कारण बताएँ।
उत्तर:

  • भारत के विभाजन का प्रमुख कारण अंग्रेजों की कुटिल नीतियां थीं, जो जाते-जाते भारत को कमज़ोर करना चाहते थे।
  • भारत विभाजन के लिए जिन्नाह की हठधर्मिता भी ज़िम्मेदार थी।

प्रश्न 13.
किस अधिनियम के अन्तर्गत भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई ?
उत्तर:
भारत को भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 के अन्तर्गत स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।

प्रश्न 14.
देश विभाजन के समय कश्मीर का राजा कौन था ?
उत्तर:
देश विभाजन के समय कश्मीर का राजा हरि सिंह था।

प्रश्न 15.
वर्तमान में कितनी भाषाओं को संविधान के द्वारा मान्यता दी गई है ?
उत्तर:
वर्तमान में 22 भाषाओं को संविधान द्वारा मान्यता दी गई है।

प्रश्न 16.
देश के विभाजन के समय भारत के गवर्नर जनरल कौन थे ?
उत्तर:
देश के विभाजन के समय भारत के गर्वनर जनरल लार्ड माऊण्टबेटन थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. गुजरात राज्य का निर्माण हुआ
(A) वर्ष 1959 में
(B) वर्ष 1958 में
(C) वर्ष 1960 में
(D) वर्ष 1957 में।
उत्तर:
(C) वर्ष 1960 में।

2. द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त का प्रतिपादन किया
(A) कांग्रेस ने
(B) मुस्लिम लीग ने
(C) हिन्दू महासभा ने
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) मुस्लिम लीग ने।

3. विभाजन से पहले भारत की जनसंख्या थी
(A) लगभग 36 करोड़
(B) लगभग 40 करोड़
(C) लगभग 50 करोड़
(D) लगभग 38 करोड़।
उत्तर:
(A) लगभग 36 करोड़।

4. भारत में राष्ट्र निर्माण में निम्न बाधा है
(A) अनपढ़ता
(B) बेरोजगारी
(C) जातिवाद
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

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5. हरियाणा राज्य का गठन हुआ
(A) वर्ष 1966 में
(B) वर्ष 1967 में
(C) वर्ष 1968 में
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) वर्ष 1966 में।

6. सीमा आयोग के अध्यक्ष कौन थे ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) सरदार पटेल
(C) लिरिल रेडक्लिफ
(D) जॉन साइमन।
उत्तर:
(D) लिरिल रेडक्लिफ।

7. भारत के विभाजन से उत्पन्न समस्याएं हैं
(A) भौगोलिक दूरी की समस्या
(B) गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की समस्या
(C) शरणार्थियों की समस्या
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी।

8. निम्नलिखित में से किसे पुलिस कार्य द्वारा पुर्तगालियों से मुक्त करवाया गया था ?
(A) पांडिचेरी
(B) कारगिल
(C) गोवा
(D) कश्मीर।
उत्तर:
(C) गोवा।

9. निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व राष्ट्र निर्माण में बाधा डालता है ?
(A) भौगोलिक एकता
(B) शिक्षा का प्रसार
(C) राजनीतिक भागीदारी
(D) साम्प्रदायिकता।
उत्तर:
(D) साम्प्रदायिकता।

10. निम्नलिखित में से भारत के प्रथम गहमन्त्री कौन थे ?
(A) महात्मा गांधी
(B) डॉ० अम्बेदकर
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(D) सरदार पटेल।

11. राज्य पुनर्गठन अधिनियम को कब लागू किया गया था ?
(A) 10 जून, 1956 को
(B) 15 अगस्त, 1947 को
(C) 20 जनवरी, 1948 को
(D) 1 नवम्बर, 1956 को।
उत्तर:
(D) 1 नवम्बर, 1956 को।

12. हैदराबाद के शासक को कहा जाता था
(A) नवाब
(B) राजा
(C) निजाम
(D) महाराजा।
उत्तर:
(C) निजाम।

13. राज्य बनने से पहले हरियाणा किस राज्य का अंग था ?
(A) मुम्बई
(B) पंजाब
(C) राजस्थान
(D) गुजरात।
उत्तर:
(B) पंजाब।

14. भारतीय संविधान को लागू किया गया
(A) 26 जनवरी, 1948 को
(B) 26 जनवरी, 1950 को
(C) 15 अगस्त, 1947 को
(D) 28 जनवरी, 1949 को।
उत्तर:
(B) 26 जनवरी, 1950 को।

15. भारत में कितनी भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है ?
(A) 22 भाषाओं को
(B) 24 भाषाओं को
(C) 18 भाषाओं को
(D) 25 भाषाओं को।
उत्तर:
(A) 22 भाषाओं को।

16. भारत के पहले प्रधानमंत्री थे
(A) डॉ. मनमोहन सिंह
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू
(C) श्रीमती इंदिरा गांधी
(D) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद।
उत्तर:
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू।

17. विभाजन के समय भारत में कुल देशी रियासतों की संख्या थी :
(A) 560
(B) 562
(C) 565
(D) 665.
उत्तर:
(C) 565.

18. अलग आन्ध्र प्रदेश राज्य का उदय किस वर्ष में हुआ ?
(A) 1957 में
(B) 1956 में
(C) 1952 में
(D) 1959 में।
उत्तर:
(C) 1952 में।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

(1) स्वतन्त्रता के बाद सबसे बड़ी चुनौती ……….. की थी।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण

(2) स्वतन्त्रता के समय भारतीय रियासतों की संख्या ………… थी।
उत्तर:
565

(3) हैदराबाद की रियासत के शासक को ……….. कहते थे।
उत्तर:
निजाम

(4) ………… में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ।
उत्तर:
1956

(5) असम से अलग करके 1972 में …………. राज्य बनाया गया।
उत्तर:
मेघालय

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(6) भारत 15 अगस्त, ………… को स्वतन्त्र हुआ।
उत्तर:
1947

(7) 15 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से ………… ने ऐतिहासिक भाषण दिया।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू

(8) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष कई ……….. थीं।
उत्तर:
चुनौतियाँ

(9) 26 जनवरी, 1950 को भारतीय ………… लागू किया गया।
उत्तर:
संविधान।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण के लिए किन तत्वों का होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण के लिए भाषायी एकता, सामान्य संस्कृति तथा भौगोलिक एकता जैसे महत्वपूर्ण तत्त्वों का होना अनिवार्य है।

प्रश्न 2.
भारत में राष्ट्र निर्माण में कौन-से तत्त्व बाधा डालते हैं ?
उत्तर:
भारत में राष्ट्र निर्माण में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा जातिवाद इत्यादि जैसे तत्त्व बाधा डालते हैं।

प्रश्न 3.
हजोग, चकमा, सन्थाल तथा अन्य अनेक गैर-बंगाली समूह जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान छोड़ दिया था, वे बसने के लिए कहां गए ?
उत्तर:
भारत।

प्रश्न 4.
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री कौन थे ?
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू थे।

प्रश्न 5.
भारत के प्रथम गृहमन्त्री कौन थे ?
उत्तर:
भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण के राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
वैश्वीकरण के राजनीतिक एवं आर्थिक आयामों का वर्णन कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के राजनीतिक तथा सांस्कतिक आयामों का वर्णन करें।
अथवा
वैश्वीकरण के आर्थिक पहलू का वर्णन करें।
उत्तर:
वर्तमान समय में संचार क्रान्ति (Communication Revolution) ने समस्त संसार की दूरियां कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी कारण सम्पूर्ण विश्व एक ‘विश्व गांव’ (Global Village) में बदल गया है। विश्व में संचार क्रान्ति की प्रभावशाली भूमिका के कारण एक नई विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे वैश्वीकरण (Globalisation) कहा जाता है। वैश्वीकरण के आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक पक्षों का वर्णन इस प्रकार है

1. आर्थिक पक्ष (Economic Manifestations):
वैश्वीकरण का आर्थिक पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि आर्थिक आधार पर ही वैश्वीकरण की धारणा ने अधिक ज़ोर पकड़ा है। आर्थिक वैश्वीकरण के अन्तर्गत ही अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन तथा विश्व बैंक प्रायः इस प्रकार की नीतियां बनाते हैं, जो विश्व के अधिकांश देशों को प्रभावित करती हैं। वैश्वीकरण के कारण विश्व के अधिकांश देशों में आर्थिक प्रवाह बढ़ा है। इसके अन्तर्गत वस्तुओं, पूंजी तथा जनता का एक देश से दूसरे देश में जाना सरल हुआ है।

विश्व के अधिकांश देशों ने आयात से प्रतिबन्ध हटाकर अपने बाजारों को विश्व के लिए खोल दिया है। वैश्वीकरण के चलते बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपना अधिकांश निवेश विकासशील देशों में कर रही हैं। यद्यपि वैश्वीकरण के समर्थकों के अनुसार वैश्वीकरण के कारण अधिकांश लोगों को लाभ होगा तथा उनका जीवन स्तर सुधरेगा। परन्तु वैश्वीकरण के आलोचक इससे सहमत नहीं हैं, उनके अनुसार विकसित देशों ने अपने वीज़ा नियमों को सरल बनाने की अपेक्षा अधिक कठोर बनाना शुरू कर दिया है। इसके अतिरिक्त वैश्वीकरण का लाभ एक छोटे से भाग में रहने वाले लोगों को मिला है, सभी लोगों को नहीं।

2. सांस्कृतिक पक्ष (Cultural Manifestations):
वैश्वीकरण का सांस्कृतिक पक्ष भी लोगों के सामने आया है। हम विश्व के किसी भी भाग में रहें, वैश्वीकरण के प्रभावों से मुक्त नहीं हो सकते। वर्तमान समय में लोग क्या खाते हैं, क्या देखते हैं, क्या पहनते, क्या सोचते हैं, इन सभी पर वैश्वीकरण का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। वैश्वीकरण से विश्व में सांस्कृतिक समरूपता का उदय होना शुरू हुआ है, परंतु यह कोई विश्व संस्कृति नहीं है बल्कि यूरोपीय देशों एवं अमेरिका द्वारा अपनी संस्कृति को विश्व में फैलाने का परिणाम है।

लोगों द्वारा पिज्जा एवं बर्गर खाना तथा नीली जीन्स पहनना अमेरिकी संस्कृति का प्रभाव ही है। विश्व के विकसित देश अपनी आर्थिक ताकत के बल पर विकासशील एवं पिछड़े देशों पर अपनी संस्कृति लादने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे कि एक देश विशेष की संस्कृति के पतन होने का डर पैदा हो गया है। परन्तु वैश्वीकरण के समर्थकों का कहना है कि संस्कृति के पतन की आशंका नहीं है, बल्कि इससे एक मिश्रित संस्कृति का उदय होता है, जैसे कि आज भारत तथा कुछ हद तक अमेरिका के युवा नीली जीन्स पर खादी का कुर्ता पहनना पसन्द करते हैं।

3. राजनीतिक पक्ष (Political Manifestations):
वैश्वीकरण का प्रभाव आर्थिक एवं सांस्कृतिक पक्षों से ही नहीं बल्कि राजनीतिक पक्ष से भी देखा जाना चाहिए। राजनीतिक पक्ष पर वैश्वीकरण के प्रभावों का वर्णन तीन आधारों पर किया जा सकता है। प्रथम यह कि वैश्वीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों के हस्तक्षेप से राज्य कमजोर हुए हैं। राज्यों के कार्य करने की क्षमता एवं क्षेत्र में कमी आई है।

वर्तमान समय में कल्याणकारी राज्य की धारणा धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही है क्योंकि राज्य कई कल्याणकारी कार्यों से अपना हाथ खींच रहा है। वर्तमान समय में पुन: न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा का विकास हो रहा है अर्थात् राज्य केवल कुछ महत्त्वपूर्ण कार्यों तक ही अपने आपको सीमित रख रहा है।

दूसरा यह है कि कुछ विद्वानों के अनुसार वैश्वीकरण के प्रभाव के बावजूद भी राज्यों की शक्तियां कम नहीं हुई हैं। राज्य आज की विश्व राजनीति में प्रमुख स्थान रखता है। राज्य जिन कार्यों से अपने आपको अलग कर रहा है वह अपनी इच्छा से कर रहा है किसी के दबाव में नहीं। तीसरे यह कहा जा रहा है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हुए हैं। आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी की मदद से राज्य अपने नागरिकों को लाभदायक एवं सही सूचनाएं प्रदान करने में सफल हुए हैं। तकनीक एवं सूचना के प्रभाव से राज्यों को अपने कर्मचारियों की मुश्किलों को जानकर उन्हें दूर करने का अवसर मिला है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 2.
भारत में तथा विश्वस्तर पर वैश्वीकरण के प्रतिरोध पर एक निबंध लिखें।
अथवा
भारत तथा विश्व स्तर पर वैश्वीकरण के प्रतिरोध पर एक विस्तृत नोट लिखें।
अथवा
‘विश्व स्तर पर वैश्वीकरण के प्रतिरोध’ पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
भारत वैश्वीकरण के अखाड़े के रूप में (India as an arena of Globalisation):
1991 में नई आर्थिक नीति अपनाकर भारत वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया से जुड़ गया। 30 दिसम्बर, 1994 को भारत ने एक अन्तर्राष्ट्रीय समझौतावादी दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए। 1 जनवरी,1995 को विश्व व्यापार संगठन की स्थापना हुई और भारत इस पर हस्ताक्षर करके इसका सदस्य बन गया। समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भारत ने अनेक नियमों और औपचारिकताओं को समाप्त करना शुरू कर दिया जो वर्षों से आर्थिक विकास में बाधा बनी हुई है।

इन सुधारों के परिणामस्वरूप विश्व के अनेक विकसित देशों एवं बहु राष्ट्रीय कम्पनियों को भारत एक बहुत बड़ी मण्डी के रूप में नज़र आने लगा क्योंकि भारत की जनसंख्या बहुत अधिक है, तथा यहां पर सस्ता श्रम उपलब्ध है। परिणामस्वरूप विश्व के अनेक विकसित देशों तथा बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों में भारत में निवेश करने की होड़-सी लग गई। एनरॉन, कोका कोला, पेप्सी, पास्को, सोनी, पैनासोनिक, इत्यादि इसके कुछ उदाहरण हैं। चीन जैसे देश ने भी भारत में अपने उत्पाद पिछले कुछ वर्षों से बड़ी तेज़ी से उतारे हैं। सभी देश एवं कम्पनियां भारतीय लोगों को आकर्षित करने में लगी हुई हैं।

भारत में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष (Struggle against Globalisation in India):
वैश्वीकरण के दौर में भारत द्वारा उदारीकरण एवं निजीकरण की प्रक्रिया को अपनाने से जहां कुछ लाभ हुआ है, वहीं कुछ हानि भी हुई है। उदाहरण के लिए वैश्वीकरण का लाभ कुछ थोड़े से लोगों को हुआ है। देश के सभी लोगों विशेषकर ग़रीबों तथा किसानों को इसका लाभ नहीं पहुंचा, इसी कारण समय-समय पर कुछ किसानों द्वारा आत्म-हत्या की खबरें आती रहती हैं।

इसलिए भारत में कुछ संगठनों एवं राजनीतिक दलों ने वैश्वीकरण की धारणा का विरोध किया है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव ने वैश्वीकरण का विरोध करते हुए कहा कि, “भारत पर वैश्वीकरण का बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा है। कृषि, उद्योग एवं दस्तकारी की कीमत पर घरेलू बाजारों को विदेशी कम्पनियों के दोहन के लिए खोल दिया गया है।” भारत में कुछ स्वयंसेवी संगठनों तथा पर्यावरणवादियों द्वारा वैश्वीकरण का विरोध किया जा रहा है। क्योंकि वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण देश का पर्यावरण खराब हो रहा है, जो कि लोगों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाल रहा है।

विश्व स्तर पर वैश्वीकरण का प्रतिरोध (Resistance of Globalisation on world level):
भारत की तरह विश्व स्तर पर भी वैश्वीकरण का विरोध हुआ है। उदाहरण के लिए 1999 में सियाटल, 2001 में कत्तर तथा सन् 2001 में ब्राजील में वैश्वीकरण के विरुद्ध व्यापक रूप में विरोध प्रदर्शन हुए। वामपथियों का कहना है कि वैश्वीकरण पूंजीवाद की ही एक विशेष व्यवस्था है। दक्षिण पंथियों ने भी वैश्वीकरण के कारण राज्यों के कमजोर होने पर इसकी आलोचना की है।

प्रश्न 3.
वैश्वीकरण की परिभाषा दीजिये। इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिये।
अथवा
“वैश्वीकरण” को परिभाषित करें। इसकी मुख्य विशेषताओं का उल्लेख करें।
अथवा
वैश्वीकरण क्या है ? इसकी मुख्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में संचार क्रान्ति (Communication Revolution):
ने समस्त संसार की दूरियां कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी कारण सम्पूर्ण विश्व एक ‘विश्व गांव’ (Global Village) में बदल गया है। विश्व में संचार क्रान्ति की प्रभावशाली भूमिका के कारण एक नई विचारधारा का जन्म हुआ, जिसे वैश्वीकरण (Globalization) कहा जाता है। वैश्वीकरण और लोक प्रशासन का परस्पर गहरा सम्बन्ध है, क्योंकि दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं।

वैश्वीकरण का अर्थ एवं परिभाषा-वैश्वीकरण, विश्वव्यापीकरण या भूमण्डलीकरण (Globalization) एक रोमांचक शब्द है जो अर्थव्यवस्था के बाजारीकरण से सम्बन्धित है। यह शब्द व्यापार के अवसरों की जीवन्तता एवं उसके विस्तार का द्योतक है। वैश्वीकरण की अवधारणा को विचारकों ने निम्न प्रकार से परिभाषित किया है

1. एन्थनी गिडेन्स (Anthony Giddens):
के अनुसार वैश्वीकरण की अवधारणा को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है

  • वैश्वीकरण से अभिप्राय विश्वव्यापी सम्बन्धों के प्रबलीकरण से है।
  • वैश्वीकरण एक ऐसी अवधारणा है जो दूरस्थ प्रदेशों को इस प्रकार जोड़ देती है कि स्थानीय घटनाक्रम का प्रभाव मीलों दूर स्थित प्रदेशों की व्यवस्थाओं एवं घटनाओं पर पड़ता है।

2. राबर्टसन (Robertson):
के मतानुसार, “वैश्वीकरण विश्व एकीकरण की चेतना के प्रबलीकरण से सम्बन्धित अवधारणा है।”

3. गाय ब्रायंबंटी के शब्दों में, “वैश्वीकरण की प्रक्रिया केवल विश्व व्यापार की खुली व्यवस्था, संचार के आधुनिकतम तरीकों के विकास, वित्तीय बाज़ार के अन्तर्राष्ट्रीयकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते महत्त्व, जनसंख्या देशान्तरगमन तथा विशेषतः लोगों, वस्तुओं, पूंजी आंकड़ों तथा विचारों के गतिशील से ही सम्बन्धित नहीं है बल्कि संक्रामक रोगों तथा प्रदूषण का प्रसार भी इसमें शामिल है।” साधारण शब्दों में वैश्वीकरण से अभिप्राय है कि किसी वस्तु, सेवा, पूंजी एवं बौद्धिक संपदा का एक देश से दूसरे देशों के साथ अप्रतिबन्धित आदान-प्रदान। वैश्वीकरण तभी सम्भव हो सकता है जब इस प्रकार के आदान-प्रदान में किसी देश द्वारा कोई अवरोध उत्पन्न न किया जाए। वैश्वीकरण के अंग-विद्वानों के मतानुसार वैश्वीकरण के चार प्रमुख अंग हैं

  • व्यापार अवरोधकों (Trade Barriers) को कम करना ताकि विभिन्न देशों में वस्तुओं का निर्बाध रूप से आदान-प्रदान हो सके।
  • ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिससे विभिन्न देशों में तकनीक (Technology) का बेरोक-टोक प्रवाह हो सके।
  • ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे विभिन्न देशों में पूंजी (Capital) का प्रवाह स्वतन्त्र रूप से हो सके।
  • ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे श्रम (Labour) का निर्बाध रूप से प्रवाह हो सके।

विशेष रूप से विकसित देशों के समर्थक विचारक वैश्वीकरण का अर्थ निर्बाध व्यापार-प्रवाह, निर्बाध पूंजी-प्रवाह और निर्बाध तकनीक प्रवाह तक सीमित कर देते हैं। परन्तु विकासशील देशों के समर्थक विचारकों का मानना है कि यदि समूचे विश्व को सार्वभौम ग्राम (Global Village) में परिभाषित करना है तो श्रम के निर्बाध-प्रवाह की उपेक्षा नहीं की जा सकती। पिछड़े और विकासशील देशों में श्रम की अधिकता है। अत: इनमें श्रम गतिशीलता को मान्यता देना आवश्यक है।

वैश्वीकरण की विशेषताएं-वैश्वीकरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  • वैश्वीकरण के कारण यातायात एवं संचार के साधनों का विकास हुआ है, जिससे भूगौलिक दूरियां समाप्त हो गई हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण श्रम बाज़ार भी विश्वव्यापी हो गया है, क्योंकि अब बहुत अधिक मात्रा में लोग रोज़गार के लिए दूसरे देश में जाते हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण इलैक्ट्रोनिक मीडिया का न्यायक प्रचार एवं प्रसार हुआ है, जिससे एक वैश्विक संस्कृति की स्थापना हुई है।
  • वैश्वीकरण के कारण शिक्षा का भी वैश्विक स्वरूप उभर कर सामने आया है। वैश्वीकरण के अनेक विकासशील देशों के शिक्षा कार्यक्रम भी विश्व स्तरीय हो गए हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण वर्तमान समय में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर रोज़गार प्रदान कर रही हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण पेशेवरों (Professionals) की आवाजाही बहुत अधिक हो गई है।
  • श्रम बाजार के कारण लोगों को रोजगार के लिए दूसरे देशों में भेजने के लिए जगह-जगह पर ब्रोकर एवं एजेन्ट सक्रिय हो गए हैं।
  • वैश्वीकरण से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर धन का आदान-प्रदान या हस्तान्तर आसान हो गया है।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के पक्ष और विपक्ष में चार-चार तर्क दीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के सकारात्मक पक्ष का वर्णन कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के नकारात्मक पक्ष का वर्णन करें।
अथवा
वैश्वीकरण के पक्ष में तर्क दीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण के पक्ष व विपक्ष में कोई चार-चार तर्क दीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ-इसके लिए लिए प्रश्न नं0 3 देखें। पक्ष में तर्क-(सकारात्मक पक्ष)

(1) वैश्वीकरण तेजी से बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में नितान्त अनिवार्य प्रक्रिया है। यह विद्यमान तथा लगातार बढ़ रही अन्तर्राष्ट्रीय अन्तर्निर्भरता का स्वाभाविक विकास है।

(2) वैश्वीकरण के कारण पूंजी की गतिशीलता बढ़ी है और इसका चलन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। इससे विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है।

(3) यद्यपि वैश्वीकरण की प्रक्रिया में कुछ दोष हैं, लेकिन इससे यह प्रक्रिया व्यर्थ नहीं हो जाती। वास्तव में वैश्वीकरण की प्रक्रिया अभी प्रारम्भिक दौर में है। जब एक बार यह प्रक्रिया पूर्ण होकर सच्चे अर्थों में विश्वव्यापी (Global) बन जाएगी तो यह समूचे विश्व के निरन्तर विकास का साधन बनेगी।

(4) विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation) को वैश्वीकरण के एक उपकरण के रूप में समझना चाहिए। यदि इस संगठन द्वारा विश्व व्यापार को निष्पक्ष रूप से नियमित किया जाए तो वैश्वीकरण की प्रक्रिया अत्यन्त लाभदायक हो सकती है।

(5) पिछड़े देशों में तकनीक एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया द्वारा इन देशों को उन्नत तकनीक का लाभ मिल सकता है।

(6) वैश्वीकरण ने विश्वव्यापी सूचना क्रान्ति को जन्म दिया है। इससे समाज का प्रत्येक वर्ग जुड़ने लगा है। इससे सामाजिक गतिशीलता को बढ़ावा मिला है।

(7) बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के फैलाव से रोजगार की सम्भावनाएं बढ़ गई हैं। साथ ही रोज़गार की गतिशीलता में भारी वृद्धि हुई है।

(8) वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने उदारवादी विचारों के प्रसार द्वारा शासन व्यवस्थाओं पर गहन प्रभाव डाला है। चीन जैसा कट्टर साम्यवादी देश भी उदारवाद की प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है।

विपक्ष में तर्क (नकारात्मक पक्ष)-वैश्वीकरण के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जाते हैं

(1) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का समर्थन विकसित देश विशेषतया अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जापान, जर्मनी आदि कर रहे हैं। आलोचकों के अनुसार विकसित देशों को अपना तैयार माल बेचने के लिए बड़े-बड़े बाजारों की आवश्यकता है। ये बाज़ार वैश्वीकरण की प्रक्रिया द्वारा प्राप्त हो सकते हैं।

(2) आलोचकों के अनुसार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।

(3) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहुंच पाया है। इससे आर्थिक असमानता को बढ़ावा मिला है। विशेषतया तीसरी दुनिया में गरीब देशों में बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है।

(4) आलोचकों का मत है कि वैश्वीकरण स्वाभाविक रूप से स्वीकृत नहीं बल्कि एक थोपी हुई प्रक्रिया है।

(5) यह अलोकतान्त्रिक प्रक्रिया है जो लोकतान्त्रिक पर्दे में चलाई जाती है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ समाज का उच्च सुविधा सम्पन्न वर्ग उठा रहा है।

(6) सरकार द्वारा निरन्तर सब्सिडी एवं अन्य सहायता राशि में कटौती की जा रही है। इसकी प्रत्यक्ष मार निर्धन वर्ग पर पड़ रही है।

(7) वैश्वीकरण ने एक सांस्कृतिक संकट खड़ा कर दिया है। वैश्वीकरण में बड़ी तेज़ी से उपभोक्तावाद को बढ़ावा दिया जा रहा है।

(8) आलोचकों का विचार है कि वैश्वीकरण का शिक्षा व्यवस्था पर भी गम्भीर प्रभाव पड़ा है।

वैश्वीकरण के कारण अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व स्थापित हो गया है जिससे अन्य भाषाओं पर प्रभाव पड़ा है। शिक्षा का तीव्र गति से वाणिज्यीकरण (Commercialization) हो रहा है और बाज़ारोन्मुखी शिक्षा पर बल दिया जा रहा है। शिक्षा व्यवस्था में मूल्यों एवं नैतिकता के स्तर में गिरावट आई है। निष्कर्ष-वैश्वीकरण के पक्ष और विपक्ष में दिए गए तर्कों के आधार पर हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि वैश्वीकरण को समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह तो एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।

समस्या यह है कि वैश्वीकरण के नाम पर कुछ सम्पन्न देशों ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। विकसित देश अपनी अत्याधुनिक तकनीक, पूंजी व व्यापारिक स्थिति के कारण वैश्वीकरण की प्रक्रिया को दोषपूर्ण बना रहे हैं। अभी तीसरी दुनिया के देशों में वैश्वीकरण की प्रक्रिया ठीक से लागू नहीं हुई है। अतः अभी से इसका मूल्यांकन करना उचित भी नहीं है। आज आवश्यकता इस बात की है कि वैश्वीकरण के नाम पर की जाने वाली संकीर्ण राजनीति को रोका जाए और किसी प्रमुख संस्था द्वारा इस प्रक्रिया को निष्पक्ष एवं बिना किसी दबाव के निर्बाध रूप से संचालित किया जाए।

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण या भू-मण्डलीयकरण का अर्थ बताएं। भारत द्वारा भू-मण्डलीयकरण या वैश्वीकरण की नीति को अपनाने के मुख्य लाभ बताएं।
उत्तर:
वैश्वीकरण या भू-मण्डलीयकरण का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं0 3 देखें। भारत द्वारा भू-मण्डलीयकरण या वैश्वीकरण की नीति को अपनाने के लाभ भारत द्वारा भूमण्डलीयकरण या वैश्वीकरण की नीति को अपनाने के निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए हैं

  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत की आर्थिक विकास दर में वृद्धि हुई है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत में बुनियादी एवं ढांचागत सुविधाओं का विकास हुआ है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत को आधुनिकतम तकनीक एवं प्रौद्योगिकी प्राप्त हुई है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत में विदेशी आर्थिक निवेश बढ़ा है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 6.
वैश्वीकरण की अवधारणा के उदय के विभिन्न कारणों का वर्णन कीजिए।
अथवा
“वैश्वीकरण”के उदय के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण के उद्भव के निम्नलिखित कारण हैं

  • विश्व में बदलते हुए परिवेश में राष्ट्रों में परस्पर अन्तर्निभरता बढ़ी है, जिसके कारण वैश्वीकरण का विकास हुआ।
  • विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक पर बढ़ती हुई निर्भरता को कम करने के लिए वैश्वीकरण का उद्भव हुआ।
  • विश्व में वर्तमान समय में हो रहे निरन्तर विकास के एक साधन की आवश्यकता थी, जिसे वैश्वीकरण ने पूरा किया है।
  • विकासशील एवं पिछड़े देशों को उन्नत किस्म के बीज और औजार देने के लिए भी वैश्वीकरण का उद्भव हुआ है।
  • विश्व व्यापी सूचना क्रान्ति ने भी वैश्वीकरण के उदय में सहयोग दिया है।
  • वैश्वीकरण के उदय का एक अन्य कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का फैलाव है।
  • विश्व में लगातार उदारवादी एवं प्रजातान्त्रिक विचारों के फैलाव ने भी वैश्वीकरण को बढ़ावा दिया है।

प्रश्न 7.
भू-मण्डलीयकरण या वैश्वीकरण के प्रति भारतीय दृष्टिकोण क्या है ?
अथवा
वैश्वीकरण के प्रति भारत के दृष्टिकोण को स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारत एक विकासशील देश है। अन्य विकासशील देशों की तरह भारत में भी वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अपनाए हुए अधिक समय नहीं हुआ। 30 दिसम्बर, 1994 को विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बनकर भारत ने आर्थिक उदारीकरण में प्रवेश किया और इसके बाद इस प्रक्रिया को जारी रखा। लेकिन वैश्वीकरण के प्रभावों को इतनी अल्पावधि में स्पष्ट करना अत्यन्त कठिन है।

इसका कारण यह है कि भारत सहित सभी देशों में आर्थिक सुधारों के कार्यक्रम एक समान लागू नहीं किए गए हैं। सभी देशों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं और आर्थिक सुधारों की उपलब्धियों पर सर्वत्र सहमति नहीं है। भारतीय सन्दर्भ में वैश्वीकरण के प्रभाव के सम्बन्ध में तीन विचारधाराएं देखी जा सकती हैं।

प्रथम कुछ कट्टरपंथियों का मत है कि वैश्वीकरण के कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत में न केवल आर्थिक क्षेत्र में प्रभुत्व स्थापित कर रही हैं, बल्कि यहां के सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक ताने-बाने में भी दखल दे रही हैं। अतः इन कम्पनियों के चंगुल में फंस कर भारत पुनः गुलाम न बन जाए, इसलिए वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत को दूर रहना चाहिए।

दूसरा, सुधारवादी विद्वानों के अनुसार भारत में फैली व्यापक गरीबी, निरक्षरता और सामाजिक पिछड़ेपन को तब तक दूर नहीं किया जा सकता जब तक भारत भी स्वयं को विश्व अर्थव्यवस्था से नहीं जोड़ता। यदि भारत स्वयं को वैश्वीकरण की प्रक्रिया से नहीं जोड़ता तो उसकी आर्थिक-समाज की कल्पना कभी पूरी नहीं होगी।

इसके अलावा तेजी से बदलती विश्व व्यवस्था में शामिल होने के अलावा भारत के पास कोई विकल्प नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय तकनीक, सहयोग व प्रतिस्पर्धा का लाभ उठाने के लिए भारत को वैश्वीकरण की धारा में प्रवाहित होना होगा। तीसरा विचार जो सार्थक एवं प्रासंगिक है, यह है कि भारत को वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अंगीकार करते हुए घरेलू बाज़ार, सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था व राजनीतिक वातावरण के साथ-साथ अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण आदि को ध्यान में रखना चाहिए। भारत को वैश्वीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि उसकी एक-तिहाई आबादी अभी निर्धनता रेखा से नीचे जीवनयापन कर रही है।

आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय भी भारत का लक्ष्य होना चाहिए। इस बात को भी सुनिश्चित करना होगा कि कहीं विकसित देश भारत को एक विशाल मंडी के रूप में इस्तेमाल न करें। यहां के लघु और कुटीर उद्योग को बढ़ाना भी सरकार का लक्ष्य होना चाहिए। भारत ने 1980 के प्रारम्भिक दौर में ही तकनीकी विकास के लिए वैश्वीकरण की प्रक्रिया के प्रति अपना सकारात्मक दृष्टिकोण स्पष्ट कर दिया था।

दिवंगत प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी देश के वैधानिक एवं तकनीकी विकास को सुनिश्चित करने के लिए विदेशी तकनीक के पक्षधर थे। जैसे-जैसे विश्व व्यवस्था में बदलाव आता गया भारत ने भी स्वयं को उदारीकरण और वैश्वीकरण के साथ जोड़ लिया। 1991 में भारत ने नई आर्थिक नीति अपनाई जो इस बात का प्रमाण है कि भारत वैश्वीकरण की प्रक्रिया से अलग नहीं हो सकता। नई आर्थिक नीति भारत के उदारीकरण और वैश्वीकरण के प्रति दृष्टिकोण को स्पष्ट करती है। नई आर्थिक नीति मुख्यतया निम्न विषयों पर बल देती है

1. उद्योग नीति में सुधार (Trade Policy Reforms):
1991 से नई औद्योगिक नीति के अन्तर्गत भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक दक्ष एवं गतिशील तथा प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए कुछ उद्योगों को छोड़कर लगभग सभी उद्योगों को लाइसेंस मुक्त कर दिया गया है।

2. विदेशी निवेश (Foreign Investment):
भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के अवसरों का पता लगाने के प्रयास तेज़ करने पर बल दिया गया है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश की बिना रोक-टोक और अफसरशाही के नियन्त्रणों के बिना अनुमति दी जाएगी। अनिवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश करने को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

3. द्योगिकी समझौते (Foreign Technology Agreements):
भारत सरकार ने औद्योगिक विकास और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से विदेशों से प्रौद्योगिकी समझौते करने पर विशेष बल दिया है। सरकार ने विदेशी तकनीशियनों की सेवाओं को भाड़े पर लेने की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया है।

4. सार्वजनिक क्षेत्र (Public Sector):
सार्वजनिक क्षेत्र ने भारत के आर्थिक विकास विशेषतया आधारभूत एवं ढांचागत उद्योगों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। नई औद्योगिक नीति में यह कहा गया है कि अब समय आ गया है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बारे में नया दृष्टिकोण अपनाए। इन उद्योगों को अधिक विकासोन्मुखी बनाने तथा तकनीकी रूप से गतिशील बनाने के उपाय किए जाने चाहिएं। नई नीति में इन क्षेत्रों की इजारेदारी को मात्र 8 क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया है। नई नीति के अन्तर्गत अब वे क्षेत्र भी जो सार्वजनिक क्षेत्र के लिए सुरक्षित थे, निजी क्षेत्र के लिए खोल दिए गए हैं।

5. एकाधिकार तथा प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम (Monopolistic and Restrictions Trade Practices Act-MRTP):
नई औद्योगिक नीति के अन्तर्गत एकाधिकार तथा प्रतिबन्धात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम लागू कर दिया गया है। इसके अन्तर्गत बड़ी कम्पनियों और औद्योगिक घरानों पर से अधिकतम पूंजी की सीमा समाप्त कर दी गई है। अब औद्योगिक घरानों व कम्पनियों को नए उपक्रम लगाने, किसी उद्योग की उत्पादन क्षमता बढ़ाने, कम्पनियों के विलय आदि के बारे में सरकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।

6. विनिमय दर (Exchange Rate):
1992-93 से भारतीय रुपए को विदेशी मुद्रा में पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया है।

7. वित्तीय सुधार (Financial Reforms):
निजी क्षेत्र के बैंकों और विदेशी संयुक्त उपक्रमों को भी वित्तीय मामलों में अपना कार्य बढ़ाने की स्वीकृति प्रदान की गई है।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
अथवा
वैश्वीकरण की परिभाषा दीजिए तथा इसके मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
वैश्वीकरण का क्या अर्थ है ? इसके मुख्य उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
वैश्वीकरण का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं0 3 देखें। वैश्वीकरण का उद्देश्य

  • वैश्विक स्तर पर पूंजी का स्वतंत्र प्रवाह करना।
  • वैश्विक स्तर पर श्रम का स्वतंत्र प्रवाह करना।
  • वैश्विक स्तर पर तकनीक एवं प्रौद्योगिकी का स्वतंत्र प्रवाह करना।
  • वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देना।
  • विश्व को एक गांव के रूप में परिवर्तित करना।
  • संचार साधनों का विकास करके वैश्विक दूरी को कम करना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
20वीं शताब्दी के अन्तिम दशक में संचार क्रान्ति ने समूचे विश्व की दूरियाँ कम कर दी और समस्त संसार को ‘सार्वभौमिक ग्राम’ (Global Village) में परिवर्तित कर दिया। इस युग में एक नई विचारधारा का सूत्रपात हुआ जिसे वैश्वीकरण (Globalisation) कहा जाता है। यद्यपि भारत इस विचारधारा से अनभिज्ञ नहीं है क्योंकि हमारी संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को मान्यता प्रदान करती है, लेकिन आधुनिक युग में वैश्वीकरण का विशेष महत्त्व है।

वैश्वीकरण से अभिप्राय है कि किसी वस्तु, सेवा, पूंजी एवं बौद्धिक संपदा का एक देश से दूसरे के साथ अप्रतिबन्धित आदान-प्रदान । वैश्वीकरण तभी सम्भव हो सकता है, जब इस प्रकार के आदान-प्रदान में किसी देश द्वारा कोई अवरोध उत्पन्न न किया जाए।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण को परिभाषित करें।
उत्तर:
1. एन्थनी गिडेन्स (Anthony Giddens) के अनुसार, “वैश्वीकरण की अवधारणा को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है

  • वैश्वीकरण से अभिप्राय विश्वव्यापी सम्बन्धों के प्रबलीकरण से है।
  •  वैश्वीकरण एक ऐसी अवधारणा है जो दूरस्थ प्रदेशों को इस प्रकार जोड़ देती है कि स्थानीय घटनाक्रम का प्रभाव मीलों दूर स्थित प्रदेशों की व्यवस्थाओं एवं घटनाओं पर पड़ता है।

2. राबर्टसन (Robertson) के मतानुसार, “वैश्वीकरण विश्व एकीकरण की चेतना के प्रबलीकरण से सम्बन्धित अवधारणा है।”

3. गाय ब्रायंबंटी के शब्दों में, “वैश्वीकरण की प्रक्रिया केवल विश्व व्यापार की खुली व्यवस्था, संचार के आधुनिकतम तरीकों के विकास, वित्तीय बाज़ार के अन्तर्राष्ट्रीयकरण बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते महत्त्व, जनसंख्या देशान्तरगमन तथा विशेषत: लोगों, वस्तुओं, पूंजी आंकड़ों तथा विचारों के गतिशीलन से ही सम्बन्धित नहीं है बल्कि संक्रामक रोगों तथा प्रदूषण का प्रसार भी इसमें शामिल है।”

प्रश्न 3.
वैश्वीकरण की कोई चार प्रमुख विशेषताएं लिखें।
उत्तर:
वैश्वीकरण की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

  • वैश्वीकरण के कारण यातायात एवं संचार के साधनों का विकास हुआ है, जिससे भूगौलिक दूरियां समाप्त हो गई हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण श्रम बाज़ार भी विश्वव्यापी हो गया है, क्योंकि अब बहुत अधिक मात्रा में लोग रोज़गार के लिए दूसरे देश में जाते हैं।
  • वैश्वीकरण के कारण इलेक्ट्रोनिक मीडिया का न्यायिक प्रचार एवं प्रसार हुआ है, जिससे एक वैश्विक संस्कृति की स्थापना हुई है।
  • वैश्वीकरण के कारण शिक्षा का भी वैश्विक स्वरूप उभर कर सामने आया है। वैश्वीकरण के अनेक विकासशील देशों के शिक्षा कार्यक्रम भी विश्व स्तरीय हो गए हैं।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के पक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
वैश्वीकरण के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

(1) वैश्वीकरण तेजी से बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में नितान्त अनिवार्य प्रक्रिया है। यह विद्यमान तथा लगातार बढ़ रही अन्तर्राष्ट्रीय अन्तर्निर्भरता का स्वाभाविक विकास है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया से जुड़ने के अलावा आज विकासशील राष्ट्रों के पास विकास का कोई अन्य विकल्प नहीं है।

(2) वैश्वीकरण के कारण पूंजी की गतिशीलता बढ़ी है और इसका चलन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। इससे विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है।

(3) वैश्वीकरण की प्रक्रिया के द्वारा लगातार स्थायी रूप से चलने वाला विकास (Sustainable Development) प्राप्त किया जा सकता है।

(4) पिछड़े देशों में तकनीक एवं प्रौद्योगिकी की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है लेकिन वैश्वीकरण की प्रक्रिया द्वारा इन देशों को उन्नत तकनीक का लाभ मिल सकता है।

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण के विपक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
वैश्वीकरण के विपक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

(1) आलोचकों के अनुसार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां व्यापार एवं व्यवसाय के नाम पर छोटे एवं पिछड़े देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने लगी हैं।

(2) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहुंच पाया है। इससे आर्थिक समानता को बढ़ावा मिला है। विशेषतया तीसरी दुनिया में गरीब देशों में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।

(3) आलोचकों का मत है कि वैश्वीकरण स्वाभाविक रूप से स्वीकृत नहीं बल्कि एक थोपी हुई प्रक्रिया है। वस्तुतः वैश्वीकरण व्यापारोन्मुखी प्रक्रिया है, जो व्यापारिक उद्देश्यों के लिए कार्य करती है। इनमें जन-कल्याण जैसे उद्देश्य गौण होकर रह गए हैं।

(4) यह अलोकतान्त्रिक प्रक्रिया है जो लोकतान्त्रिक पर्दे में चलाई जाती है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ समाज का उच्च सुविधा सम्पन्न वर्ग नहीं उठा रहा है। इसने गैर-योजनाबद्ध प्रभावों द्वारा, श्रम-वेतनों को सीमित रख कर और कल्याणकारी राज्य की भूमिका सीमित करके लोकतन्त्र को कमजोर बना दिया है।

प्रश्न 6.
वैश्वीकरण के प्रति भारत की प्रतिक्रिया स्वरूप उठाए गए किन्हीं चार कदमों का वर्णन करें।
उत्तर:

1. उद्योग नीति में सुधार-1991 से नई औद्योगिक नीति के अन्तर्गत भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक दक्ष एवं गतिशील तथा प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए कुछ उद्योगों को छोड़कर सभी उद्योगों को लाइसेंस मुक्त कर दिया गया है।

2. विदेशी निवेश-भारत में विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के अवसरों का पता लगाने के प्रयास तेज़ करने पर बल दिया गया है। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों में 51 प्रतिशत तक विदेशी पूंजी निवेश की बिना रोक-टोक और अफसरशाही के नियन्त्रणों के बिना अनुमति दी जाएगी। अनिवासी भारतीयों द्वारा भारत में निवेश करने को प्रोत्साहन दिया जाएगा।

3. विदेशी प्रौद्योगिकी समझौते-भारत सरकार ने औद्योगिक विकास और प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से विदेशों से प्रौद्योगिकी समझौते करने पर विशेष बल दिया है। सरकार ने विदेशी तकनीशियनों को सेवाओं को भाड़े पर लेने की प्रक्रिया को प्रारम्भ कर दिया है।

4. विनिमय दर-1992-93 से भारतीय रुपये को विदेशी मुद्रा में पूर्ण परिवर्तनीय बना दिया गया है।

प्रश्न 7.
वैश्वीकरण के परिणामों की प्रकृति की बहस पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण में परिणामों की प्रकृति पर बहस का आधार यह है कि वैश्वीकरण की धारणा को अपनाने से एक देश की अर्थव्यवस्था को लाभ पहुंचा है या हानि। दूसरे विश्व के अधिकांश लोगों को इससे लाभ पहुंचा है, या नहीं। वैश्वीकरण के आलोचकों का यह मानना है कि व्यापक संदर्भ में वैश्वीकरण के लाभ कम हैं, जबकि दोष अधिक हैं।

वैश्वीकरण के कारण कल्याणकारी राज्य की धारणा कमजोर पड़ रही है जिससे अधिकांश लोगों को हानि हो रही है। वृद्धों तथा ग़रीबों को इससे सर्वाधिक हानि हुई है। वैश्वीकरण के कारण प्रवासन की प्रक्रिया में भी तेजी आई है, जिससे प्रवासियों के मानवाधिकारों एवं सम्बन्धित देश की सुरक्षा पर भी बहस होनी शुरू हो गई है।

वैश्वीकरण की धारणा के अन्तर्गत अपनाई गई मुक्त व्यापार व्यवस्था से केवल अमीरों को ही लाभ पहुंचा है, ग़रीबों को नहीं। आलोचक वैश्वीकरण को अमेरिकीकरण भी कहते हैं, क्योंकि वैश्वीकरण को सबसे अधिक बढ़ावा अमेरिका से ही मिला है तथा इसके चलते सर्वाधिक लाभ भी अमेरिका को ही हुआ। आलोचकों के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठन अमेरिकी दिशा-निर्देशों के अनुसार चलकर उसे लाभ पहुंचाते हैं, जबकि इसके नकारात्मक प्रभाव अधिकांश विकासशील देशों को भुगतने पड़ते हैं। अत: वैश्वीकरण के परिणामों की प्रकृति अधिकांशतः नकारात्मक ही रही है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण विरोधी आन्दोलन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
वैश्वीकरण आशानुरूप सफलता प्राप्त नहीं कर पा रहा है। कई उदाहरणों से यह बात बार-बार स्पष्ट हो रही है, कि वैश्वीकरण से केवल अमीर लोगों या देशों को लाभ पहुंच रहा है, विशेषकर अमेरिका को। अधिकांश विकासशील देशों को वैश्वीकरण से हानि ही हुई है। इसी कारण वैश्वीकरण के विरोध में आन्दोलन होने भी शुरू हो गए हैं।

जो लोग वैश्वीकरण का विरोध कर रहे हैं, उन्हें प्रायः एन्टी ग्लोबलाइजेशन कहा जाता है। परन्तु अधिकांश वैश्वीकरण विरोधी स्वयं ही यह शब्द स्वीकार नहीं करते बल्कि इसके स्थान पर ग्लोबल जस्टिस ‘द मूवमैंट ऑफ़ मूवमेन्टस’ तथा ‘द अल्टर ग्लोबलाइज़ेशन शब्द प्रयोग करना उचित समझते हैं।

वैश्वीकरण के विरोध में वस्तुत: 20वीं शताब्दी के अन्त में आन्दोलनों की शुरुआत हुई तथा धीरे-धीरे यह आन्दोलन अधिक तेज़ हो गए। 1999 में ‘सियाटल’ में हुए विश्व व्यापार संगठन के मन्त्री स्तरीय सम्मेलन में वैश्वीकरण के विरोध में तीव्र आन्दोलन हुए। आन्दोलनकारी वैश्वीकरण के प्रभावों को लोगों के लिए तथा पर्यावरण के लिए हानिकारक मानकर इसके विरुद्ध आन्दोलन चलाते हैं।

प्रश्न 9.
वैश्वीकरण के राजनीतिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
राजनीतिक पक्ष पर वैश्वीकरण के प्रभावों का वर्णन तीन आधारों पर किया जा सकता है प्रथम यह है कि वैश्वीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हस्तक्षेप से राज्य कमजोर हुए हैं। वर्तमान समय में कल्याणकारी राज्य की धारणा धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रही है। वर्तमान समय में पुन: न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य की धारणा का विकास हो रहा है। दूसरा यह है कि कुछ विद्वानों के अनुसार वैश्वीकरण के प्रभाव के बावजूद भी राज्यों की शक्तियां कम नहीं हुई हैं। राज्य जिन कार्यों से अपने आपको अलग कर रहा है, वह अपनी इच्छा से कर रहा है, किसी के दबाव में नहीं।

तीसरे यह कहा जा रहा है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हुए हैं। आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी की मदद से राज्य अपने नागरिकों को लाभदायक एवं सही सूचनाएं प्रदान करने में सफल हुए हैं। तकनीक एवं सूचना के प्रभाव से राज्यों को अपनी कमजोरियों को जानकर उन्हें दूर करने का अवसर मिला है।

प्रश्न 10.
वैश्वीकरण के आर्थिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण का आर्थिक पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि आर्थिक आधार पर ही वैश्वीकरण की धारणा ने अधिक जोर पकड़ा है। आर्थिक वैश्वीकरण के अन्तर्गत ही अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व व्यापार संगठन तथा विश्व बैंक प्रायः इस प्रकार की नीतियां बनाते हैं जो विश्व के अधिकांश देशों को प्रभावित करती हैं। वैश्वीकरण के कारण विश्व के अधिकांश देशों में आर्थिक प्रवाह बढ़ा है।

इसके अन्तर्गत वस्तुओं, पूंजी तथा जनता का एक देश से दूसरे देश में जाना सरल हुआ है। विश्व के अधिकांश देशों ने आयात से प्रतिबन्ध हटाकर अपने बाजारों को विश्व के लिए खोल दिया है। वैश्वीकरण के चलते बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपना अधिकांश निवेश विकासशील देशों में कर रही हैं।

यद्यपि वैश्वीकरण के समर्थकों के अनुसार वैश्वीकरण के कारण अधिकांश लोगों को लाभ होगा तथा उनका जीवन स्तर सुधरेगा, परन्तु वैश्वीकरण के आलोचक इससे सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार वैश्वीकरण का लाभ एक छोटे से भाग में रहने वाले लोगों को मिला है सभी लोगों को नहीं।

प्रश्न 11.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण का सांस्कृतिक पक्ष भी लोगों के सामने आया है। हम विश्व के किसी भी भाग में रहें, वैश्वीकरण के प्रभावों से मुक्त नहीं हो सकते । वर्तमान समय में लोग क्या खाते हैं, क्या देखते हैं, क्या पहनते हैं, क्या सोचते हैं, इन सभी पर वैश्वीकरण का प्रभाव साफ़ देखा जा सकता है। वैश्वीकरण से विश्व में सांस्कृतिक समरूपता का उदय होना शुरू हुआ है, परन्तु यह कोई विश्व संस्कृति नहीं है बल्कि यूरोपीय देशों एव अमेरिका द्वारा अपनी संस्कृति को विश्व में फैलाने का परिणाम है।

लोगों द्वारा पिज्जा एवं बर्गर खाना तथा नीली जीन्स पहनना अमेरिका की. संस्कृति का ही प्रभाव है। विश्व के विकसित देश अपनी आर्थिक ताकत के बल पर विकासशील एवं पिछड़े देशों पर अपनी संस्कृति लादने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे कि एक देश विशेष की संस्कृति के पतन होने का डर पैदा हो गया है। परन्तु वैश्वीकरण के समर्थकों का कहना है कि संस्कृति के पतन की आशंका नहीं है बल्कि इससे एक मिश्रित संस्कृति का उदय होता है जैसे कि आज भारत तथा कुछ हद तक अमेरिका के युवा नीली जीन्स पर खादी का कुर्ता पहनना पसन्द करते हैं। ..

प्रश्न 12.
वैश्वीकरण की कोई दो आलोचनाएं लिखें।
उत्तर:
वैश्वीकरण की दो आलोचनाएं निम्नलिखित हैं

(1) आलोचकों के अनुसार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां व्यापार एवं व्यवसाय के नाम पर छोटे एवं पिछड़े देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने लगी हैं।

(2) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहुंच पाया है। इससे आर्थिक समानता को बढ़ावा मिला है। विशेषतया तीसरी दुनिया में गरीब देशों में बेरोज़गारी बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 13.
वैश्वीकरण के कोई चार नकारात्मक वास्तविक उदाहरण बताएं।
उत्तर:

  • फसल के खराब होने पर कुछ किसानों ने आत्महत्या कर ली।
  • छात्राओं द्वारा पश्चिमी वेशभषा वाले वस्त्र पहनने के कारण कछ संगठनों ने उन्हें धमकी दी।
  • बालीवुड (भारत) के कई निर्माताओं ने हालीवुड (अमेरिका) की फ़िल्मों की नकल की है।
  • भारत में दुकानदारों को यह भय है कि यदि बड़ी कम्पनियों ने अपने उत्पाद यहां बेचने शुरू कर दिये तो उनकी दुकानदारी समाप्त हो जायेगी.!

प्रश्न 14.
एक कल्याणकारी राज्य में कौन-कौन सी विशेषताएं होनी चाहिए, किन्हीं चार का वर्णन करें।
उत्तर:

  • एक कल्याणकारी राज्य को लोगों के कल्याण के लिए सभी प्रकार के कार्य करने चाहिए।
  • एक कल्याणकारी राज्य को अपने नागरिकों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।
  • एक कल्याणकारी राज्य को अपने नागरिकों के कार्यों में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
  • एक कल्याणकारी राज्य को अपने नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं मानसिक विकास में सहयोग देना चाहिए।

प्रश्न 15.
वैश्वीकरण के कोई चार महत्त्वपूर्ण अंग लिखें।
उत्तर:
विद्वानों के मतानुसार वैश्वीकरण के चार प्रमुख अंग हैं

  • व्यापार अवरोधकों (Trade Barriers) को कम करना ताकि विभिन्न देशों में वस्तुओं का निर्बाध रूप से आदान-प्रदान हो सके।
  • ऐसी परिस्थितियां पैदा करना जिससे विभिन्न देशों में तकनीक (Technology) का बेरोक-टोक प्रवाह हो सके।
  • ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे विभिन्न देशों में पूंजी (Capital) का प्रवाह स्वतन्त्र रूप से हो सके।
  • ऐसा वातावरण तैयार करना जिससे श्रम (Labour) का निर्बाध रूप से प्रवाह हो सके।

प्रश्न 16.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत को प्राप्त होने वाले कोई चार लाभ लिखें।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत की आर्थिक विकास दर में वृद्धि हुई है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत में बुनियादी एवं ढांचागत सुविधाओं का विकास हुआ है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत को आधुनिकतम तकनीक एवं प्रौद्योगिकी प्राप्त हुई है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत में विदेशी आर्थिक निवेश बढ़ा है।

प्रश्न 17.
वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत को होने वाली कोई चार हानियां बताएं।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया से भारत के अपने उद्योगों एवं छोटे व्यापारियों को हानि हुई है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत में निर्धनता एवं बेरोज़गारी बढ़ी है।
  • छात्र-वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण भारत ने कई क्षेत्रों में दी जाने वाली सब्सिडी समाप्त कर दी है।
  • वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने सरकार के राजनीतिक एवं आर्थिक निर्णयों को प्रभावित किया है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वैश्वीकरण क्या है ?
उत्तर:
वैश्वीकरण (Globalisation) से अभिप्राय है किसी वस्तु, सेवा, पूंजी एवं बौद्धिक सम्पदा का एक देश से दूसरे देशों के साथ निर्बाध रूप से आदान-प्रदान । वैश्वीकरण के अन्तर्गत अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का संचालन निर्बाध रूप से होता है जो एक सर्वसहमत अन्तर्राष्ट्रीय संस्था द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करता है।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण की दो परिभाषाएं लिखें।
उत्तर:
1. रोबर्टसन के अनुसार, “वैश्वीकरण विश्व एकीकरण की चेतना के प्रबलीकरण से सम्बन्धित अवधारणा है।”

2. गाय ब्रायंबंटी के अनुसार, “वैश्वीकरण की प्रक्रिया केवल विश्व व्यापार की खुली व्यवस्था, संचार के आधुनिकतम तरीकों के विकास, वित्तीय बाज़ार के अन्तर्राष्ट्रीयकरण, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बढ़ते महत्त्व, जनसंख्या देशान्तरगमन तथा विशेषतः लोगों, वस्तुओं, पूंजी, आंकड़ों तथा विचारों के गतिशीलन से ही सम्बन्धित नहीं है, बल्कि संक्रामक रोगों तथा प्रदूषण का प्रसार भी इसमें शामिल है।”

प्रश्न 3.
वैश्वीकरण के किन्हीं दो अंगों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • व्यापार अवरोध को कम करना ताकि विभिन्न देशों में वस्तुओं का निर्बाध रूप से आदान-प्रदान हो सके।
  • ऐसी परिस्थितियां पैदा करना, जिससे विभिन्न देशों में तकनीक का बेरोक-टोक प्रवाह हो सके।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के पक्ष में कोई दो तर्क दें।
उत्तर:
(1) वैश्वीकरण तेजी से बदलते हुए अन्तर्राष्ट्रीय परिवेश में नितान्त अनिवार्य प्रक्रिया है। यह विद्यमान तथा लगातार बढ़ रही अन्तर्राष्ट्रीय अन्तर्निर्भरता का स्वाभाविक विकास है। वैश्वीकरण की प्रक्रिया से जुड़ने के अलावा आज विकासशील राष्ट्रों के पास विकास का कोई अन्य विकल्प नहीं है।

(2) वैश्वीकरण के कारण पूंजी की गतिशीलता बढ़ी है और इसका चलन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर हुआ है। इससे विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं पर निर्भरता कम हुई है।

प्रश्न 5.
वैश्वीकरण के विपक्ष में कोई दो तर्क दो।
उत्तर:
(1) आलोचकों के अनुसार बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की एकाधिकारवादी प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां व्यापार एवं व्यवसाय के नाम पर छोटे एवं पिछड़े देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं में हस्तक्षेप करने लगी हैं।

(2) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ अधिकांश जनता तक नहीं पहँच पाया है। इससे आर्थिक असमानता को बढ़ावा मिला है। विशेषतया तीसरी दुनिया में ग़रीब देशों में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 6.
वैश्वीकरण के राजनीतिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
राजनीतिक पक्ष पर वैश्वीकरण के प्रभावों का वर्णन तीन आधारों पर किया जा सकता है। प्रथम यह है कि वैश्वीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों के हस्तक्षेप से राज्य कमज़ोर हुए हैं। दूसरा यह है कि कुछ विद्वानों के अनुसार वैश्वीकरण के प्रभाव के बावजूद भी राज्यों की शक्तियां कम नहीं हुई हैं। राज्य अपनी इच्छानुसार कार्य को करने या न करने का निर्णय लेते हैं। तीसरे यह कि आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी की मदद से राज्य अपने नागरिकों को लाभदायक एवं सही सूचनाएं प्रदान करने में सफल हुए हैं।

प्रश्न 7.
वैश्वीकरण के आर्थिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण का आर्थिक पक्ष बहुत महत्त्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि आर्थिक आधार पर ही वैश्वीकरण की धारणा ने अधिक जोर पकड़ा है। वैश्वीकरण के कारण विश्व के अधिकांश देशों में आर्थिक प्रयह बढ़ा है। इसके अन्तर्गत वस्तुओं, पूंजी तथा जनता का एक देश से दूसरे देश में जाना सरल हुआ। यद्यपि वैश्वीकरण के समर्थकों के अनुसार वैश्वीकरण के कारण अधिकांश लोगों को लाभ होगा तथा उनका जीवन स्तर सुधरेगा, परन्तु आलोचकों के अनुसार वैश्वीकरण का लाभ एक छोटे से भाग में रहने वाले लोगों को मिला है, सभी को नहीं।

प्रश्न 8.
वैश्वीकरण के सांस्कृतिक पक्ष की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण का सांस्कृतिक पक्ष भी लोगों के सामने आया है। वर्तमान समय में लोग क्या खाते हैं, क्या पीते हैं, क्या देखते हैं, क्या पहनते हैं तथा क्या सोचते हैं ? इन सभी पर वैश्वीकरण का साफ़ प्रभाव देखा जा सकता है। वैश्वीकरण के आलोचकों के अनुसार वैश्वीकरण के कारण एक देश विशेष की संस्कृति के पतन का खतरा हो गया है, परन्तु समर्थकों के अनुसार इससे मिश्रित संस्कृति का उदय होता है, उदाहरण के लिए भारत एवं कुछ हद तक अमेरिका के युवा नीली जीन्स पर खादी का कुर्ता पहनना पसन्द करते हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 9.
भारत की वैश्वीकरण के अखाड़े के रूप में व्याख्या करें।
उत्तर:
1991 में नई आर्थिक नीति अपनाकर भारत, वैश्वीकरण एवं उदारीकरण की प्रक्रिया से जुड़ गया। आर्थिक प्रभावों के परिणामस्वरूप विश्व के अनेक विकसित देशों एवं बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों को भारत एक बड़ी.मण्डी के रूप में नजर आने लगा। अत: अनेक विकसित देशों तथा बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों में भारत में निवेश करने की होड़-सी लग गई। एनरॉन, कोका कोला, पेप्सी, सोनी तथा पैनासोनिक इत्यादि इसके उदाहरण हैं। चीन जैसे देश ने भी भारत में अपने उत्पाद पिछले कुछ वर्षों से बड़ी तेज़ी से उतारे हैं। अतः सभी देश एवं कम्पनियां भारतीय लोगों को आकर्षित करने में लगी हुई हैं।

प्रश्न 10.
भारत में वैश्वीकरण के विरुद्ध संघर्ष पर नोट लिखें।
उत्तर:
वैश्वीकरण के आलोचकों के अनुसार वैश्वीकरण का लाभ कुछ थोड़े-से लोगों को हुआ, देश के सभी लोगों विशेषकर ग़रीबों तथा किसानों को इसका लाभ नहीं पहुंचा, इसी कारण समय-समय पर कुछ किसानों द्वारा आत्महत्या की ख़बरें आती रहती हैं। इसलिए भारत में कुछ संगठनों एवं राजनीतिक दलों ने वैश्वीकरण की धारणा का विरोध किया है। भारत में विरोध करने वालों में वामपन्थी दल, पर्यावरणवादी एवं कुछ स्वयंसेवी संगठन शामिल हैं।

प्रश्न 11.
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण का अर्थ लिखें।
उत्तर:
सांस्कृतिक विभिन्नीकरण का अर्थ यह है कि वैश्वीकरण के कारण प्रत्येक संस्कृति कहीं ज्यादा अलग और विशिष्ट होती जा रही है।

प्रश्न 12.
वैश्वीकरण के कोई दो आर्थिक प्रभाव लिखिए।
उत्तर:

  • विकास शील देशों की आर्थिक व्यवस्था विकसित देशों पर निर्भर हो गई है।
  • वैश्वीकरण के कारण विश्व के अधिकांश देशों में आर्थिक प्रवाह बढ़ा है।

प्रश्न 13.
वैश्वीकरण एक बहु आयामी धारणा है। व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण को एक बहु आयामी धारणा कहा जा सकता हैं क्योंकि यह कई पक्षों से सम्बन्धित है, जैसे पक्ष, आर्थिक पक्ष एवं सांस्कृतिक पक्ष । वैश्वीकरण केवल एक आर्थिक कारण नहीं है। यह कुछ समाजों को शेष की अपेक्षा और समाज के एक भाग को शेष हिस्सों की अपेक्षा अधिक प्रभावित करता है।

प्रश्न 14.
वैश्वीकरण की लहर के कारण राज्यों पर क्या प्रभाव पड़ा है ?
उत्तर:
वैश्वीकरण की लहर के कारण राज्य कमज़ोर हुए हैं, या शक्तिशाली इसके पक्ष में दो तर्क दिये जाते हैं। वैश्वीकरण प्रथम यह है कि वैश्वीकरण के कारण अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों के हस्तक्षेप से राज्य कमज़ोर हए हैं। दूसरा मत यह है कि वैश्वीकरण के कारण राज्य पहले की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली हए हैं। क्योंकि इसके कारण राज्यों को आधुनिक तकनीक एवं प्रौद्योगिकी प्राप्त हुई है।

प्रश्न 15.
भारत में नई आर्थिक नीति कब और क्यों लागू की गई ?
उत्तर:
भारत में नई आर्थिक नीति जुलाई, 1991 में लागू की गई, ताकि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में एक प्रतिस्पर्धात्मक राष्ट्र के रूप में विकसित किया जा सके।

प्रश्न 16.
राज्यों पर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • बहराष्ट्रीय कम्पनियों ने राज्यों में अधिक-से-अधिक निवेश करके राज्यों की आर्थिक शक्ति को कम किया है।
  • बहराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपनी आर्थिक शक्ति के कारण राज्यों के राजनीतिक निर्णयों को भी प्रभावित किया है।

प्रश्न 17.
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ में कौन-कौन वैश्वीकरण का विरोध करते हैं ?
उत्तर:
‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ के अन्तर्गत मानवाधिकार कार्यकर्ता, पर्यावरणवादी, मजदूर, युवा और महिला कार्यकर्ता एकजुट होकर वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 18.
वैश्वीकरण के कारण व्यापारिक गतिविधियों पर पड़ने वाले कोई दो प्रभाव लिखो।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण के कारण विभिन्न देशों ने मुक्त बाज़ार व्यवस्था को अपनाया है।
  • वैश्वीकरण के कारण राज्यों की संरक्षणवादी नीति समाप्त हो गई है तथा विश्व व्यापार को बढ़ावा मिल रहा है।

प्रश्न 19.
विश्व के मैक्डोनॉल्डीकरण से आप क्या समझते हैं ? व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व के मैक्डोनॉल्डीकरण का अर्थ यह है कि विश्व पर कुछ शक्तिशाली विशेषकर अमेरिका का सांस्कृतिक प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। विश्व में बर्गर तथा नीली जीन्स की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। मैक्डोनॉल्डीकरण के अन्तर्गत विश्व वैसा ही बनता जा रहा है, जैसा अमेरिकी सांस्कृतिक जीवन शैली बनाना चाहती है।

प्रश्न 20.
वैश्वीकरण को पुन:पनिवेशीकरण क्यों कहा जाता है ? व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्वीकरण की प्रक्रिया के कारण विकासशील एवं कमज़ोर राज्यों पर विकसित एवं धनी राज्यों का राजनीतिक एवं आर्थिक प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियां विकासशील देशों में विकसित देशों के लाभ कार्य कर रही हैं तथा विकासशील देशों को आर्थिक तौर पर अपने अधीन करती जा रही हैं। इसीलिए वैश्वीकरण को पुनर्डपनिवेशीकरण भी कहा जाता है।

प्रश्न 21.
आर्थिक वैश्वीकरण के कोई दो दोष लिखें।
उत्तर:

  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण विकासशील देशों की आर्थिक व्यवस्था विकसित देशों पर निर्भर हो गई है।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण विश्व में निर्धनता एवं बेरोज़गारी बढ़ी है।

प्रश्न 22.
भारत में संरक्षणवाद के कोई दो नकारात्मक परिणाम लिखें।।
उत्तर:

  • भारत में संरक्षणवाद की नीति के कारण आर्थिक विकास की दर बहुत कम रही है।
  • संरक्षणवादी नीति के कारण भारत में सामाजिक एवं आर्थिक बुनियादी विकास नहीं हो पाया।

प्रश्न 23.
भारत में वैश्वीकरण के कोई दो दोष लिखें।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण के कारण भारत में बेरोज़गारी बढ़ी है।
  • वैश्वीकरण के कारण भारतीय वस्तुओं की मांग कम हुई है।

प्रश्न 24.
वैश्वीकरण के कितने पक्ष हैं ?
उत्तर:
वैश्वीकरण के मुख्यतः तीन पक्ष हैं-

  • आर्थिक पक्ष
  • राजनीतिक पक्ष
  • सांस्कृतिक पक्ष।

प्रश्न 25.
“वर्ल्ड सोशल-फोरम” विश्व व्यापी सामाजिक मंच क्या है?
अथवा
वर्ल्ड सोशल फोरम क्या है ?
उत्तर:
वर्ल्ड सोशल फोरम नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करने वाला मंच है। इसकी पहली बैठक 2001 में ब्राजील में हुई थी। वर्ल्ड सोशल फोरम के अंतर्गत एकत्र होकर मानवाधिकार कार्यकर्ता, मज़दूर, युवक, महिलाएं तथा पर्यावरणवादी नव-उदारवादी वैश्वीकरण का विरोध करते हैं।

प्रश्न 26.
“सांस्कृतिक समरूपता” का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
लोगों के खाने-पीने एवं पहरावे में समानता को सांस्कृतिक समरूपता कहते हैं। वैश्वीकरण के युग में किसी सांस्कृतिक समरूपता का उदय नहीं हुआ है, बल्कि पश्चिमी संस्कृति को शेष विश्व पर थोपा जा रहा है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. वर्तमान समय में निम्नलिखित विचारधारा विश्व में पाई जाती है
(A) नाजीवादी
(B) फ़ासीवादी
(C) वैश्वीकरण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(C) वैश्वीकरण।

2. वर्तमान में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का स्थान किस अवधारणा ने ले लिया है ?
(A) अहस्तक्षेपी राज्य
(B) पूंजीवादी राज्य
(C) समाजवादी राज्य
(D) सर्वाधिकारवादी राज्य।
उत्तर:
(B) पूंजीवादी राज्य।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

3. भारत में वैश्वीकरण का आरम्भ कब से माना जाता है
(A) 1995
(B) 1991
(C) 1989
(D) 1987.
उत्तर:
(B)1991.

4. वैश्वीकरण के प्रभाव हैं
(A) राजनीतिक
(B) आर्थिक
(C) सांस्कृतिक
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

5. 1999 में विश्व व्यापार संगठन की मन्त्री स्तरीय बैठक कहां हुई ?
(A) नई दिल्ली
(B) टोकियो
(C) सियाटल
(D) लन्दन।
उत्तर:
(C) सियाटल।

6. भारत में वैश्वीकरण का समय-समय पर किसने विरोध किया है ?
(A) वामपन्थियों ने
(B) स्वयंसेवी संगठनों ने
(C) पर्यावरणवादियों ने
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

7. यह किसका कथन है-“वैश्वीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें सामाजिक सम्बन्ध अपेक्षाकृत दूरी रहित एवं सीमा रहित बन जाते हैं।”
(A) मारगेन्थो
(B) डेविड मूर
(C) वैपलिस एवं स्मिथ
(D) पं० नेहरू।
उत्तर:
(C) वैपलिस एवं स्मिथ।

8. वैश्वीकरण का कारण है
(A) शीत युद्ध का अन्त
(B) सोवियत संघ का पतन
(C) सूचना क्रांति
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

9. वैश्वीकरण के पक्ष में कौन-सा तर्क दिया जा सकता है ?
(A) वैश्वीकरण के द्वारा राष्ट्र एक-दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं
(B) वैश्वीकरण राष्ट्रों को अधिक-से-अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित करता है
(C) वैश्वीकरण संघर्ष एवं युद्ध की सम्भावनाओं को कम करता है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

10. वैश्वीकरण के विपक्ष में कौन-सा तर्क दिया जा सकता है ?
(A) वैश्वीकरण के कारण बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है
(B) वैश्वीकरण की प्रक्रिया का लाभ साधारण जनता तक नहीं पहुँच सकता है
(C) वैश्वीकरण एक स्वीकृत नहीं, बल्कि थोपी गई प्रक्रिया है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

11. भारत द्वारा वैश्वीकरण को अपनाया गया
(A) वर्ष 1992 में
(B) वर्ष 1993 में
(C) वर्ष 1991 में
(D) वर्ष 1994 में।
उत्तर:
(C) वर्ष 1991 में।

12. वैश्वीकरण का उद्देश्य है
(A) पूंजी का स्वतंत्र प्रवाह
(B) श्रम का स्वतंत्र प्रवाह
(C) तकनीक का स्वतंत्र प्रवाह
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

13. वैश्वीकरण (भू-मण्डलीकरण) के अन्तर्गत भारत सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीति को नाम दिया गया है
(A) समाजवाद
(B) उदारवाद
(C) नया समाजवाद
(D) नई आर्थिक नीति।
उत्तर:
(D) नई आर्थिक नीति।

14. वैश्वीकरण के युग में कौन-सा संगठन विश्व के देशों के लिए व्यापक नियमावली बनाता है ?
(A) विश्व व्यापार संगठन
(B) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(C) सामाजिक एवं आर्थिक परिषद्
(D) विश्व बैंक
उत्तर:
(A) विश्व व्यापार संगठन।

15. W.S.F. का क्या अर्थ लिया जाता है
(A) World Social Forum
(B) World Sports Forum
(C) World State Fund
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) World Social Forum.

16. W.S.F. की पहली बैठक कहां हुई थी ?
(A) भारत
(B) जापान
(C) ब्राज़ील
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(C) ब्राज़ील।

17. ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की पहली बैठक कब हुई थी ?
(A) 2001 में
(B) 2005 में
(C) 2007 में
(D) 2009 में।
उत्तर:
(A) 2001 में।

18. वैश्वीकरण कैसी धारणा है ?
(A) बहुआयामी
(B) एक आयामी
(C) द्वि-आयामी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) बहुआयामी।

19. भारत में नई आर्थिक नीति शुरू हुई ?
(A) सन् 1985 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1980 में
(D) सन् 1992 में।
उत्तर:
(B) सन् 1991 में।

रिक्त स्थान भरें

(1) वैश्वीकरण एक ………. अवधारणा है, जिसके राजनीतिक, आर्थिक व सांस्कृतिक आयाम हैं।
उत्तर:
बहुआयामी

(2) कल्याणकारी राज्य की अवधारणा का स्थान अब …………… राज्य ने ले लिया है।
उत्तर:
न्यूनतम हस्तक्षेपकारी

(3) वर्ल्ड सोशल फोरम की पहली बैठक 2001 में ………………… में हुई। (देश का नाम लिखिए)
उत्तर:
ब्राजील

(4) वैश्वीकरण का सम्बन्ध ……………… पारस्परिक जुड़ाव से है।
उत्तर:
विश्वव्यापी

(5) वैश्वीकरण के कारण सम्पूर्ण विश्व एक …………….. में बदल गया है।
उत्तर:
विश्व गांव

(6) विश्व व्यापार संगठन की स्थापना सन् ……………. में हुई।
उत्तर:
1995

(7) सन् 2007 में ‘वर्ल्ड सोशल फोरम’ की सातवीं बैठक ………………. में हुई।
उत्तर:
नैरोबी (कीनिया)

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वर्ल्ड सोशल फोरम की 2001 में पहली बैठक किस देश में हुई ?
उत्तर:
ब्राजील में।

प्रश्न 2.
वैश्वीकरण की शुरुआत किस वर्ष से मानी जाती है ?
उत्तर:
सन् 1991 से।

प्रश्न 3.
भारत ने किस वर्ष “नई आर्थिक नीति” को अपनाया ?
उत्तर:
सन् 1991 में।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 वैश्वीकरण

प्रश्न 4.
आधुनिक समय में कौन-सी विचारधारा विश्व में पाई जाती है ?
उत्तर:
वर्तमान समय में विश्व में उदारवादी और वैश्वीकरण विचारधारा का बोल-बाला है।

प्रश्न 5.
WSF का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
विश्व सामाजिक फोरम (World Social Forum)।

प्रश्न 6.
कल्याणकारी राज्य की धारणा का स्थान किस अवधारणा ने ले लिया है ?
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य की धारणा का स्थान न्यूनतम हस्तक्षेपकारी राज्य ने ले लिया है।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
पर्यावरण प्रदूषण के लिए उत्तरदायी तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण के लिए अनेक कारण उत्तरदायी हैं, जिसमें से महत्त्वपूर्ण निम्नलिखित हैं

1. पश्चिमी विचारधारा (Western Thinking):
पर्यावरण के प्रदूषण की वर्तमान स्थिति के लिए पश्चिमी चिन्तन काफ़ी सीमा तक उत्तरदायी है। पश्चिमी विश्व के भौतिक विकास के मूल में, वहां की भौतिक जीवन दृष्टि है। पश्चिम का ईसाई समाज ईसाई धर्म की इस मान्यता के अनुसार जीवन व्यतीत करता है कि ईश्वर ने मानव को पृथ्वी पर, जो कुछ भी है, उसका उपभोग करने के लिए भेजा है।

रीडर्स डायजेस्ट के लेख में अर्नातड टायन्बी ने स्पष्ट किया है कि आज जो पर्यावरण की समस्या हमारे सामने आ खड़ी हुई है उसका मूल कारण है ईसाइयत की यह अवधारणा, जो कहती है कि भगवान् ने मनुष्य को इस सृष्टि में अपने सुख के लिए उपभोग करने का अधिकार दिया है। ‘Eat drink and be Marry’ इस विचारधारा ने प्रकृति के शोषण को प्रोत्साहित किया है और ईसाइयत की इसी विचारधारा ने पर्यावरण के प्रदूषण को विकसित किया।

2. जनसंख्या में वृद्धि (Increase in Population) :
विश्व की जनसंख्या में पिछले 50 वर्षों में बड़ी तीव्र गति से वृद्धि हुई है। जनसंख्या अधिक होने के कारण मानव की आवश्यक वस्तुओं-रोटी, कपड़ा और मकान की भी पूर्ति नहीं हो रही है। विश्व की अधिकांश जनसंख्या की मल आवश्यकता रोटी, कपडा, मकान ही है और इन वस्तुओं की पूर्ति लकड़ी, लोहा, भूमि, कच्चा-माल, खाद्य पदार्थ, जल इत्यादि के भण्डारों से हो सकती है अर्थात् प्रकृति का शोषण आवश्यक हो जाता है। अत: विशाल जनसंख्या प्रकृति पर बोझ है और पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है।

3. वनों की कटाई व भू-क्षरण (Deforestation and Soil Erosion):
मानव जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने में और पर्यावरण के सन्तुलन बनाए रखने में वनों की भूमिका प्राचीन काल से ही बड़ी महत्त्वपूर्ण रही है। हिमालय और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में वनों की निरन्तर कटाई के फलस्वरूप भूमि की कठोरता कम होती जा रही है और भू-क्षरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है।

भूमि के भू-क्षरण के कारण बाढ़ों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है और ईंधन की लकड़ी व अन्य पशुओं का निरन्तर ह्रास हो रहा है। अनेक वन्य प्रजातियां आज लुप्त हो चुकी हैं। वनवासियों का अधिकतर जीवन वनों पर निर्भर करता है, किन्तु वनों के कटने से, उनके जीवन-यापन में अनेक कठिनाइयां आ रही हैं और इन कठिनाइयों के फलस्वरूप आज वनस्पतियों में भी पर्याप्त असन्तोष फैल रहा है।

वन, वातावरण की स्वच्छता के लिए अनिवार्य तत्त्व है। केवल प्रकृति में वन ही दूषित वायु (Carbon dioxide) के भक्षक हैं और बदले में वे स्वच्छ ऑक्सीजन प्रदान करते हैं जोकि जीवन के लिए अनिवार्य तत्त्व है। आज के युग में जब जनसंख्या व उद्योगों के विस्तार के कारण स्वच्छ हवा का अभाव होता जा रहा है, निरन्तर वनों की कमी से वायु के चक्र में भी बाधा पड़ती है और इस तरह वनों के अभाव से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा के बढ़ने से पर्यावरण का प्रदूषित होना स्वाभाविक होता जा रहा है।

4. जल प्रदूषण (Water Pollution):
जिस प्रकार वन सम्पदा सीमित है उसी तरह प्रकृति ने जल पूर्ति को भी सीमित बनाया है। पानी न केवल मानव के लिए ही, अपितु पशु-पक्षी, कीट-पतंगे, पेड़-पौधों आदि के लिए भी आवश्यक है। हवा के पश्चात् जीवन के लिए दूसरा अनिवार्य तत्त्व-पानी है। जल की मात्रा सीमित है जबकि जल की पूर्ति, मांग अथवा मात्रा असीमित है। जल की सीमित मात्रा के साथ-साथ मानव ने नदियों व समुद्र के पानी को भिन्न भिन्न ढंगों से प्रदूषित करना शुरू कर दिया है। कारखानों से निकलने वाले विषैले रसायनों, कीटनाशक पदार्थों तथा पेट्रोलियम उत्पादन से नगरों के गन्दे नालों के पानी से नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है।

5. वायु प्रदूषण (Air Pollution):
जल प्रदूषण से भी अधिक खतरनाक वायु प्रदूषण है। वर्तमान सभ्यता ने जिस गति से शहरों का आयोजनाबद्ध विकास किया है और जितना अधिक जनसंख्या को घना बनाया है उसी अनुपात में इन नगरों में लोगों को श्वास लेने के लिए स्वच्छ वायु का मिलना कठिन हो गया है। भारत में दिल्ली, मुम्बई, चेन्नई, कोलकाता, लुधियाना इत्यादि बड़े नगरों में वायु प्रदूषित व विषैली बन गई है।

बड़े-बड़े नगरों में वायु प्रदूषण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेवार हैं-कल कारखाने, खनन परियोजनाएं (Mining Projects), ताप-बिजली परियोजनाएं (Thermal Power Projects), परमाणु बिजली परियोजनाएं (Nuclear Power Projects), परिवहन के साधन (Mode of Transport) इत्यादि। बड़े-बड़े कारखानों की चिमनियों से निकलते काले धुएं, नगरों के वायुमण्डल को प्रदूषित कर रहे हैं।

6. औद्योगीकरण (Industrialisation):
पर्यावरण को प्रदूषित करने का एक महत्त्वपूर्ण कारण औद्योगीकरण है। औद्योगिक क्रान्ति के पश्चात् उद्योगों का बड़ी तेजी से विकास हुआ है। विश्व के विकसित देशों तथा विकासशील देशों में बड़े-बड़े उद्योग, कारखाने तथा मिलें स्थापित की गई हैं। कारखानों व मिलों को चलाने के लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है।

जिस स्थान पर बड़े-बड़े कारखाने केन्द्रित होंगे वहां पर उतनी ही अधिक ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी। ऊर्जा की आवश्यकता की पूर्ति के लिए कोयला तथा तेल को जलाना पड़ता है अथवा बिजली व परमाणु शक्ति का उपभोग करना पड़ता है जिनसे विषैली गैसें पैदा होती हैं, जो वायु व जल को प्रदूषित व विषाक्त कर देती हैं।

7. ध्वनि प्रदूषण (Noise Pollution) :
विभिन्न प्रकार की ध्वनियों व शोर ने नगरों के पर्यावरण को प्रदूषित करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। बड़े-बड़े नगरों में चारों तरफ शोर ही शोर है। सुबह चार बजे से लेकर रात के बारह बजे तक बड़े-बड़े नगरों का पर्यावरण विभिन्न प्रकार के शोरों से प्रदूषित होता रहता है। बसों, ट्रकों, गाड़ियों, दुपहिया आदि वाहनों का शोर, लाऊडस्पीकरों का शोर, जनरेटर का शोर और जुलूस व शोभा यात्राओं तथा जलसों का शोर आदि कानों के पर्दो तथा स्नायुतन्त्र (Nervous System) को बुरी तरह प्रभावित करते हैं।

8. अन्य कारण (Other Reasons)-उपर्युक्त कारकों के अतिरिक्त पर्यावरण को प्रदूषित करने के अनेक और भी कारण हैं। कूड़ा-कर्कट जलाने से कूड़े-कर्कट के ढेरों से पर्यावरण प्रदूषित होता है। कृषि अन्य कूड़ा-कर्कट का जलाया जाना (Burning of Agricultural wastes) पर्यावरण को प्रदूषित करता है। धूल अथवा मिट्टी का उड़ना (अन्धेरी) पर्यावरण को प्रदूषित करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 2.
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए विभिन्न उपायों का वर्णन करें।
अथवा
पर्यावरण की सुरक्षा के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
पर्यावरण की सुरक्षा के विभिन्न उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर-वर्तमान समय में विश्व की एक बहुत बड़ी चिन्ता पर्यावरण की है। मानवता को बचाने के लिए पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना अति आवश्यक है। 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने रियो-द-जनेरो (Rio-Do-Janeiro) में पर्यावरण पर विचार-विनिमय के लिए एक सम्मेलन बुलाया, जिसमें एजेंडा-21 (Agenda-21) के नाम से एक कार्यक्रम तैयार किया गया, जिस पर सभी देशों ने सहमति प्रकट की। प्रकृति और पर्यावरण के संरक्षण के मुख्य उपाय निम्नलिखित हैं

1. समग्र चिन्तन की आवश्यकता (Need for Holistic Thinking):
पश्चिमी जगत् के भौतिक चिन्तन में इस बात पर बल दिया गया है कि इस पृथ्वी पर व प्रकृति पर जो कुछ भी है, वह मानव के उपभोग के लिए है। अतः आवश्यकता मानव की सोच को बदलने की है। इसके लिए भारत का समग्र चिन्तन (Holistic or Integrated thinking of India) एक महत्त्वपूर्ण उपाय है। भारतीय चिन्तन मानव को पेड़ों, वनों, नदियों, पशु-पक्षियों आदि की रक्षा पर भी बल देता है।

2. जनसंख्या नियन्त्रण (Population Control):
विश्व की जनसंख्या बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है और वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉसपेक्ट्स रिपोर्ट के अनुसार विश्व की जनसंख्या 7.2 अरब से बढ़कर वर्ष 2050 तक 9.6 अरब हो जायेगी। पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना अत्यावश्यक है। बिना जनसंख्या की वृद्धि को रोके मानव को स्वच्छ पर्यावरण नहीं मिल पाएगा। इसीलिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना, जहां एक ओर देश की अपनी समस्या है वहां दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र भी विश्व जनसंख्या को रोकने के लिए प्रयत्नशील है।

3. वन संरक्षण (Forest Conservation):
पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए तथा देश के सन्तुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि वनों की रक्षा की जाए। वनों की अन्धाधुन्ध कटाई को रोकना अत्यावश्यक है। वनों की रक्षा के लिए यह भी आवश्यक है कि जो व्यक्ति अनाधिकृत ढंग से पेड़ों को काटे तो उसके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की जानी चाहिए। भारत में वानिकी अनुसन्धान का मुख्य दायित्व भारतीय वानिकी अनुसन्धान शिक्षा परिषद् (Indian Council of Forestry Research and Education) का है।

4. वन्य-जीवन का संरक्षण (Conserving the Wild Life):
वन संरक्षण के साथ-साथ वन्य जीवन का संरक्षण करना आवश्यक है। भारत में शेर, चीते, हाथियों, घड़ियालों, गैंडे, भालू इत्यादि जीवों की प्रजातियों के नष्ट होने का गम्भीर खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति के सन्तुलन को बनाए रखने के लिए तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए वन्य जीवन (Wild life) को सुरक्षित रखना अत्यावश्यक हो गया है। इसीलिए भारत सरकार ने शिकार और पशु पक्षियों को मारने तथा उनके अवैध व्यापार पर प्रतिबन्ध लगा दिया है।

5. उचित तकनीक का प्रयोग (Adoption of Proper Technology):
आधुनिक भौतिकवादी युग में मनुष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बड़े-बड़े कारखाने उतने ही आवश्यक हैं जितना कि पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाना। इसलिए कारखानों को चलाने के लिए ऐसे ईंधन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए जिससे जहरीली गैसें व धुआं निकलकर वायुमण्डल को प्रदूषित करें।

उपभोक्ता वस्तुओं के उत्पादन के लिए लघु तथा कुटीर उद्योगों का प्रयोग किया जाना चाहिए। गांव के लोगों की आवश्यकताओं की पूर्ति ग्राम कुटीर उद्योगों के द्वारा की जानी चाहिए। कारखानों में प्रदूषण निरोधक उपकरणों को लगाना अनिवार्य किया जाना चाहिए।

6. जनता को पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा देना (To educate the People about environment):
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए यह अत्यावश्यक है कि आम जनता को पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा दी जाए। यह शिक्षा दूरदर्शन, रेडियो, समाचार-पत्रों द्वारा तथा जुलूसों, जलसों व प्रदर्शनियों द्वारा दी जानी चाहिए। विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में पर्यावरण सम्बन्धी शिक्षा को अवश्य शामिल किया जाना चाहिए।

1978 में ‘राष्ट्रीय प्राकृतिक इतिहास संग्रहालय’ की देख-रेख में भारत के अनेक स्थानों पर प्रदर्शनियां आयोजित की गईं ताकि आम जनता को पर्यावरण के संरक्षण का महत्त्व बतलाया जा सके। 1982 में भारत में पर्यावरण सूचना प्रणाली स्थापित की गई। पर्यावरण सूचना प्रणाली सांसदों और अन्य पर्यावरण प्रेमियों को पर्यावरण के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सूचना प्रदान कर रही है।

7. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग (International Co-operation):
पर्यावरण प्रदूषण एक देश की समस्या न होकर सारे विश्व की समस्या है। अतः इस समस्या का समाधान भी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थानों द्वारा ही किया जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र तथा इसकी एजेंसियां पर्यावरण की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

8. आवश्यकताएं कम करना (To minimise the wants):
पर्यावरण के संरक्षण के लिए सर्वोत्तम उपाय अपनी आवश्यकताओं को कम करना है।

9. विविध उपाय (Miscellaneous Measures) :
उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त निम्नलिखित उपायों द्वारा पर्यावरण को प्रदूषित होने से रोका जा सकता है

  • ध्वनि प्रदूषण को रोकने के लिए लाऊड-स्पीकरों के इस्तेमाल पर प्रतिबन्ध लगाया जाना चाहिए। प्रशासन की स्वीकृति के बिना लाऊड-स्पीकरों के प्रयोग पर मनाही होनी चाहिए।
  • कूड़ा-कर्कट के ढेर शहर के समीप इकट्ठे नहीं किए जाने चाहिए और न ही जलाए जाने चाहिए।
  • जल प्रदूषण को रोकने के लिए गन्दे नालों व कारखानों का पानी नदियों में नहीं डाला जाना चाहिए।
  • बसों, ट्रकों, गाड़ियों व दुपहिया से निकलने वाले धुएं को रोकने के लिए कार्यवाही की जानी चाहिए। दिल्ली सरकार ने ‘नियन्त्रित प्रदूषण प्रमाण-पत्र’ न रखने वाले वाहनों पर जुर्माने की रकम पहली बार ₹1000 तक और उसके .. बाद हर बार ₹ 2000 तक जुर्माना 21 जुलाई, 1997 से लागू कर दिया है।

प्रश्न 3.
पर्यावरण संरक्षण के लिये अन्तर्राष्टीय स्तर पर किए गये विभिन्न प्रयासों का वर्णन कीजिये।
अथवा
पर्यावरण संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किये गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किए गए प्रयास-पर्यावरण संरक्षण के लिए समय समय पर विश्व स्तर पर सम्मेलन होते रहे हैं तथा नियमों एवं उपनियमों का निर्माण किया गया है, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. स्टॉकहोम सम्मेलन (Stockholm Conference) पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण सम्मेलन जून, 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित किया गया। इसका आयोजन संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में किया गया था। इस सम्मेलन की महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें थीं

  • मानवीय पर्यावरण पर घोषणा,
  • मानवीय पर्यावरण पर कार्य योजना,
  • संस्थागत एवं वित्तीय व्यवस्था पर प्रस्ताव,
  • विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रस्ताव,
  • परमाणु शस्त्र परीक्षणों पर प्रस्ताव,
  • दूसरे पर्यावरण सम्मेलन किये जाने के प्रस्ताव तथा
  • राष्ट्रीय स्तर पर कार्य किये जाने के सम्बन्ध में सरकारों को सिफारिशें किये जाने का निर्णय।

2. पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित विश्व समझौतों की पुष्टि (Ratification of Global Convention Regarding Environment Protection)-1975 में अधिकांश राज्यों ने पर्यावरण से सम्बन्धित विश्व स्तरीय समझौतों को अपनी स्वीकृति प्रदान करके पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन को और अधिक प्रभावी बना दिया। इनमें समझौतों में शामिल थे- .

  • तेल-प्रदूषण की हानि के लिए असैनिक दायित्व पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय-1969।
  • तेल प्रदूषण के उपघातों के विषयों में खुले समुद्र में हस्तक्षेप से सम्बन्धित अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय–1969।
  • अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमि तथा विशेषकर पानी में रहने वाले पक्षियों के रहने के स्थान पर अभिसमय 1971।
  • कूड़ा-कर्कट तथा अन्य सामान के ढेर लगाने से सामुद्रिक प्रदूषण को बचाने के लिए अभिसमय-1972।
  • विश्व सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक विरासत के संरक्षण से सम्बन्धित अभिसमय-1972।
  • संकटापन्न या जोखिम में पड़े एवं जंगली पेड़-पौधों के अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार का अभिसमय-1973।
  • जलपोतों तथा हवाई जहाज़ों द्वारा ढेर लगाने से सामुद्रिक प्रदूषण को बचाने के लिए अभिसमय-1973।

3. नैरोबी घोषणा (Nairobi Declaration):
स्टॉकहोम सम्मेलन की 10वीं वर्षगाँठ का सम्मेलन 1982 में नैरोबी में किया गया। इस सम्मेलन में विलुप्त वन्य जीवों के व्यापार से सम्बन्धित प्रावधान अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक सम्पदा तथा खुले समुद्र में प्रदूषण इत्यादि से सम्बन्धित प्रावधानों को स्वीकार किया गया।

4. पृथ्वी सम्मेलन (Earth Summit):
स्टॉकहोम सम्मेलन के पश्चात् पर्यावरण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मेलन सन् 1992 में ब्राजील की राजधानी रियो डी जनेरियो में हुआ। इस सम्मेलन में 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का आयोजन भी संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में हुआ।

इस सम्मेलन का मुख्य विषय पर्यावरण एवं सन्तुलित विकास था। पृथ्वी सम्मेलन में की गई घोषणा को एंजेण्डा-21 के नाम से जाना जाता है। इस सम्मेलन में स्टॉकहोम के उपबन्धों को स्वीकार करते हुए उन्हें लागू करने पर जोर दिया गया। पृथ्वी सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित कुल 27 सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया।

5. विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक (Global Climate Change Meet):
1997 में नई दिल्ली में विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक हुई। इस बैठक में निर्धनता, पर्यावरण तथा संसाधन प्रबन्ध के समाधान के सम्बन्ध में विकसित तथा विकासशील देशों में व्यापार की सम्भावनाओं पर विचार किया गया। इस बैठक में ग्रीन गृह गैसों (Green House Gases) को वातावरण में न छोड़ने की सम्भावनाओं पर चर्चा हुई।

6. क्योटो प्रोटोकोल (Kyoto Protocol):
1997 में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक दूसरी बैठक क्योटो (जापान) में हुई। इसमें लगभग 150 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक के अन्त में क्योटो घोषणा की गई जिसके अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई कि सूचीबद्ध औद्योगिक देश वर्ष 2008 से 2012 तक 1990 के स्तर से नीचे 5.2% तक अपने सामूहिक उत्सर्जन में कमी कर देंगे। पर्यावरण संरक्षण के लिए स्वच्छ विकास संयंत्रों (Clean Development Machanism) लागू करने की बात की गई।

7. ब्यूनिस-ऐरिस बैठक (Buenus-Aires Convention):
1998 में अर्जेन्टाइना के शहर ब्यूनिस-ऐरिस में क्योटो प्रोटोकोल की समीक्षा के लिए एक बैठक की गई। भारत जैसे देशों की यह दलील थी कि विलासिता और आवश्यकता में अन्तर किया जाना चाहिए।

अर्थात् विलासिता के कारण गैसों का रिसाव न हो और आवश्यकता के कारण इसे छोड़ने से रोका न जाए। बाली सम्मेलन-2007-दिसम्बर, 2007 में इण्डोनेशिया के शहर बाली में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक महत्त्वपूर्ण सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में पर्यावरण को बचाने के लिए क्योटो प्रोटोकोल को लागू करने तथा अन्य साधनों पर विचार किया गया। .

कोपनहेगन सम्मेलन-2009-दिसम्बर, 2009 में डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक विश्व सम्मेलन हुआ था। इस सम्मेलन में लगभग 190 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। इस सम्मेलन में पर्यावरण को बचाने के लिए कई उपायों पर चर्चा की गई। कानकून सम्मेलन 2010-दिसम्बर, 2010 में कानकून (मैक्सिको) में पर्यावरण सरंक्षण पर हुए विश्व सम्मेलन में 193 देश एक मसौदे पर सहमत हुए, जिसके अन्तर्गत 100 अरब डालर के ग्रीन क्लाइमेट फंड बनाने पर सहमित बनी, तथा 2011 तक विवादित मसलों को हल करने का संकल्प लिया गया।

डरबन सम्मेलन-दिसम्बर, 2011 में डरबन (दक्षिण अफ्रीका) में पर्यावरण संरक्षण पर हुए विश्व सम्मेलन में 194 देशों ने भाग लिया। वार्ता में वर्ष 2015 के एक समझौते की रूप रेखा स्वीकार कर ली गई, जिसके अन्तर्गत भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के लिए पहली बार कानूनी तौर पर देश बाध्य होंगे। रियो + 20 सम्मेलन-20-22 जून, 2012 को ब्राजील के शहर रियो डी जनेरियो में जीवन्त विकास (Sustainable Development) पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन को रियो +20 के नाम से जाना जाता है, क्योंकि इस सम्मेलन के ठीक बीस साल पहले 1992 में इसी शहर में पृथ्वी सम्मेलन हुआ था।

इस सम्मेलन में लगभग 40000 पर्यावरणविद, 10000 सरकारी अधिकारी तथा 190 देशों से राजनीतिज्ञ शामिल हुए। इस सम्मेलन की दो केन्द्रीय विषय वस्तु है, प्रथम जीवन्त विकास और ग़रीबी निवारण के सम्बन्ध में हरित व्यवस्था तथा द्वितीय जीवन्त विकास के लिए संस्थाओं के ढांचे का निर्माण करना। सम्मेलन में जीवन्त विकास के प्रति राजनीतिक प्रतिबद्धता, ग़रीबी निवारण, जीवन्त विकास के लिए महत्त्वपूर्ण संस्थाओं तथा लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कार्यवाही के फ्रेमवर्क की चर्चा की गई।

लीमा सम्मेलन-दिसम्बर, 2014 में संयुक्त राष्ट्र का जलवायु सम्मेलन लीमा (पेरन) में हुआ। सम्मेलन में उपस्थित लगभग 190 देश उस वैश्विक समझौते के मसौदे पर राजी हो गए, जिस पर 2015 में होने वाले पेरिस सम्मेलन में मुहर लगनी है। लीमा में बनी सहमति के अन्तर्गत 31 मार्च, 2015 तक सभी देश ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती की अपनी-अपनी योजनाएं पेश करेंगे। इस घरेलू नीतियों के आधार पर पेरिस सम्मेलन में पेश कि वैश्विक समझौते की रूपरेखा तय की जायेगी। पेरिस में होने वाला समझौता सन् 2020 से प्रभावी होगा।

पेरिस सम्मेलन-नवम्बर-दिसम्बर 2015 में पेरिस में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन हुआ, जिसमें लगभग 196 देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में यह सहमति बनी कि ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखा जायेगा। इसके लिए विकसित देश प्रतिवर्ष विकासशील देशों को 100 अरब डॉलर की मदद देंगे। यह व्यवस्था सन् 2020 से आरम्भ होगी।

काटोविस सम्मेलन-दिसम्बर, 2018 में पोलैण्ड के शहर काटोविस में संयुक्त राष्ट्र के 24वें जलवायु सम्मेलन में 197 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में पेरिस जलवायु समझौते के लक्ष्य को हासिल करने के लिए नियम कायदों को अंतिम रूप दिया गया।

उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि समय-समय पर पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सम्मेलन होते रहे हैं परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि इन सम्मेलनों में लिए गये निर्णयों को उचित ढंग से लागू किया जाए।

प्रश्न 4.
भारत में पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी किन्हीं छः उपायों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी कोई छ: उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत सदैव ही पर्यावरण संरक्षण का पक्षधर रहा है। परन्तु भारत ने पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित विकसित देशों के दृष्टिकोण का समर्थन नहीं किया है। इसी कारण यद्यपि भारत ने क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर किए परन्तु फिर भी इसे (भारत) औद्योगीकरण के दौर में ग्रीन गृह गैसों के उत्सर्जन के विषय में छूट दी गई है।

2005 में हुई G-8 के देशों की शिखर बैठक में भारत ने सभी का ध्यान इस ओर खींचा कि विकासशील देशों की प्रति व्यक्ति ग्रीन गृह गैस की उत्सर्जन दर विकसित देशों के मुकाबले में नाममात्र है। अतः भारत का मानना है कि ग्रीन गृह गैस की उत्सर्जन दर में कमी करने की अधिक जिम्मेदारी विकसित देशों की ही है। भारत विश्व मंचों पर पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित अधिकांश ऐतिहा उत्तरदायित्व का तर्क रखता है। भारत ने सदैव पर्यावरण से सम्बन्धित वैश्विक प्रयासों का समर्थन किया है।

  • भारत ने 2001 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम पास किया। इसमें ऊर्जा के ज्यादा अच्छे ढंग से उपयोग की पहल की गई है।
  • 2003 के बिजली अधिनियम में पुनर्नवा (Renewable) ऊर्जा के प्रयोग पर जोर दिया गया है।
  • भारत में प्राकृतिक गैस के आयात और स्वच्छ कोयले के प्रयोग का रुझान बढ़ा है।
  • भारत इस प्रयास में है कि 2012 तक अपने बायोडीज़ल के राष्ट्रीय मिशन को पूरा कर ले।
  • भारत ने 1992 में ब्राज़ील में हुए पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित पृथ्वी सम्मेलन की समीक्षा के लिए 1997 में एक बैठक आयोजित की।
  • भारत का यह दृष्टिकोण है कि विकासशील देशों को वित्तीय मदद तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी तकनीक विकसित देश दें ताकि विकासशील देश पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित अपनी ज़रूरतों को पूरा कर सकें।
  • भारत दक्षिण एशिया में सार्क की मदद से सभी देशों से पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित कदम उठाने का आग्रह करता रहा है।
  • भारत ने सदैव यह प्रयास किया है कि पर्यावरण संरक्षण पर सार्क देश एक राय रखें। इससे स्पष्ट है कि भारत ने सदैव पर्यावरण संरक्षण के लिए उचित एवं कठोर कदम उठाए जिनका पालन अन्य देशों द्वारा भी किया
  • भारत सरकार द्वारा इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 5.
प्राकृतिक पर्यावरण का अर्थ स्पष्ट करें। प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषण को कैसे रोका जा सकता है ?
उत्तर:
प्राकृतिक पर्यावरण का अर्थ है-कोई वस्तु जो हमें घेरे हुए है। इस अर्थ में पर्यावरण में वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं जो यद्यपि हमसे पृथक् हैं, तथापि हमारे जीवन या हमारी गतिविधि को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित करती हैं। पर्यावरण एक जटिल घटना वस्तु है, जिसके कई रूप होते हैं जैसे- भौतिक पर्यावरण प्राणीशास्त्रीय पर्यावरण, सामाजिक पर्यावरण एवं अपार सामाजिक पर्यावरण। पर्यावरण में सब परिस्थितियां शामिल हैं जो प्रकृति ने मानव को ही प्रदान की हैं।

मैकाइवर (Maciver) के शब्दों में, “पृथ्वी का धरातल, उसकी सम्पूर्ण प्राकृतिक दशाएं और प्राकृतिक साधन भूमि, जल, पहाड़, मैदान, खनिज पदार्थ, पेड़-पौधे, पशु, पक्षी, जलवायु, पृथ्वी पर लीला करने वाली तथा मानव जीवन को प्रभावित करने वाली विद्युत् तथा विकीर्णन शक्तियां सम्मिलित हैं।”

पर्यावरण में सम्मिलित सम्पूर्ण ग्रहों, जैसे सूर्य, तारे, वर्षा, समुद्र, ऋतुएं ज्वारभाटे एवं सामुद्रिक धाराएं आदि हैं जो मनुष्य की परिवर्तन शक्ति से बाहर हैं और दूसरी ओर नियन्त्रित भौगोलिक पर्यावरण है, .जैसे—धरती, नदियां, अन्य जल स्रोत, नहरें, वन आदि। इस नियन्त्रित पर्यावरण में कुछ सीमा तक परिवर्तन हो सकता है। प्राकृतिक पर्यावरण प्रदूषण को रोकने के उपाय- इसके लिए प्रश्न नं० 2 देखें।

प्रश्न 6. पर्यावरण से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके प्रदूषण के मुख्य आम प्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
पर्यावरण से आपका क्या अभिप्राय है ? पर्यावरण प्रदूषण के मुख्य प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पर्यावरण का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं0 5 देखें। प्रदूषण के प्रभाव-प्रदूषण के निम्नलिखित प्रभाव पड़ते हैं

  • प्रदूषण के प्रभाव से प्राकृतिक सन्तुलन खराब हुआ है।
  • प्रदूषण के प्रभाव से जीव-जन्तुओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • प्रदूषण के प्रभाव से ऋतु चक्र प्रभावित हुआ है।
  • पर्यावरण प्रदूषण से उत्पादन की गुणात्मक क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • पर्यावरण प्रदूषण से मानवीय जीवन और कठिन हो गया है।
  • प्रदूषण से पेड़-पौधों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।
  • संसार में नई-नई एवं गम्भीर बीमारियों की उत्पत्ति हुई है, जो मानव जीवन को हानि पहुंचा रही हैं।
  • प्रदूषण से खेतों की उपजाऊ शक्ति कम हुई है।

प्रश्न 7.
विकास और पर्यावरण में क्या सम्बन्ध है ? विकास कार्यों के पर्यावरण पर बुरे प्रभावों की चर्चा करें।
अथवा
विकास कार्यों के पर्यावरण पर बुरे प्रभावों की चर्चा करें।
उत्तर:
विकास और पर्यावरण में गहरा सम्बन्ध है। विकास एवं पर्यावरण दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। विकास की निरन्तर चलने वाली धारणा ने पर्यावरण को बहुत अधिक प्रभावित किया है। इसीलिए पर्यावरण विद्वानों ने अक्षय विकास की धारणा का समर्थन किया है। अक्षय विकास वह क्षय न होने वाला विकास है, जिसका एक पीढ़ी के द्वारा उपभोग हो लेने पर दूसरी पीढ़ी के लिए विकास और सम्भोग की पूर्ण परिस्थितियां बनी रहें। विकास कार्यों के कारण पर्यावरण पर निम्नलिखित बुरे प्रभाव पड़े हैं

  • विकास कार्यों के लिए वृक्षों को काटा जा रहा है, जिससे वातावरण में शुद्ध वायु की कमी हो रही है।
  • विकास कार्यों के लिए अधिक-से-अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, जिसके कारण मनुष्यों के रहने योग्य तथा कृषि योग्य उपजाऊ जमीन कम हो रही है।
  • विकास कार्यों के लिए पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे जल स्तर लगातार कम होता जा रहा है।
  • विकास कार्यों के पश्चात् छोड़े गए जहरीले कूड़ा-कबाड़ पर्यावरण को हानि पहुंचाते हैं।
  • विकास कार्यों के लिए जंगलों में लगातार कमी आ रही है।
  • विकास कार्यों से विश्व तापन (Global warming) लगातार बढ़ रहा है।
  • विकास कार्यों के कारण आदिवासियों को लगातार उनके मूल अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

प्रश्न 8.
‘मूलवासी’ से क्या अभिप्राय है ? मूलवासियों के अधिकार कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
‘मूलवासी’ का अर्थ-मूलवासी से हमारा अभिप्राय किसी क्षेत्र विशेष में रहने वाली वहाँ की मूल जाति या वंश के लोगों से है जो कि अनादिकाल से सम्बन्धित क्षेत्र में रहते आ रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा इसे परिभाषित करते हुए बताया गया है कि, “मूलवासी ऐसे लोगों के वंशज हैं जो किसी विद्यमान देश में बहुत दिनों से रहते चले आ रहे थे फिर किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के अन्य हिस्सों से आए और इन लोगों को अपने अधीन कर लिया।” यह मूलवासी सैंकड़ों वर्ष बीत जाने के बावजूद भी, उस देश जिसमें वह अब रह रहे हैं, कि संस्थाओं के अनुरूप आचरण करने से अधिक अपनी परंपरा, सांस्कृतिक रीति-रिवाज तथा अपने विशेष सामाजिक, आर्थिक ढर्रे पर जीवनयापन करना पसन्द करते हैं, मूलवासी कहलाते हैं।

मूलवासियों को जनजातीय, आदिवासी आदि नामों से भी पुकारा जाता है। विश्व में इनकी जनसंख्या लगभग 30 करोड़ है। यह विश्व के लगभग प्रत्येक देश में किसी-न-किसी नाम से विद्यमान हैं। फिलीपिन्स में कोरडिलेरा क्षेत्र में, चिल्ली में मापुशे नामक समुदाय, अमेरिका में रैड इण्डियन नामक समुदाय, पनामा नहर के पूर्व में कुना नामक समुदाय, भारत में भील-सन्थाल सहित अनेकों जनजातियाँ, ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड में पालिनेशिया, मैलनेशिया और माइक्रोनेशिया वंश के मूलवासी रहते हैं। मूलवासियों के अधिकार

  • विश्व में मूलवासियों को बराबरी का दर्जा प्राप्त हो।
  • मूलवासियों को अपनी स्वतन्त्र पहचान रखने वाले समुदाय के रूप में जाना जाए।
  • मूलवासियों के आर्थिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन न किया जाए।
  • देश के विकास से होने वाला लाभ मूलवासियों को भी मिलना चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पर्यावरण का अर्थ है-कोई वस्तु जो हमें घेरे हुए है। इस अर्थ में पर्यावरण में वे सभी वस्तुएं सम्मिलित हैं जो यद्यपि हमसे पृथक् हैं, तथापि हमारे जीवन या हमारी गतिविधि को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित करती हैं। पर्यावरण एक जटिल घटना वस्तु है, जिसके कई रूप होते हैं जैसे- भौतिक पर्यावरण, प्राणीशास्त्रीय पर्यावरण, सामाजिक पर्यावरण एवं अपार सामाजिक पर्यावरण।

पर्यावरण में सब परिस्थितियां शामिल हैं जो प्रकृति ने मानव को ही प्रदान की हैं। मैकाइवर (Maclver) के शब्दों में, “पृथ्वी का धरातल, उसकी सम्पूर्ण प्राकृतिक दशाएं और प्राकृतिक साधन भूमि, जल, पहाड़, मैदान, खनिज पदार्थ, पेड़ पौधे, पशु, पक्षी, जलवायु, पृथ्वी पर लीला करने वाली तथा मानव जीवन को प्रभावित करने वाली विद्युत् तथा विकीर्णन शक्तियाँ सम्मिलित हैं।”

पर्यावरण में सम्मिलित सम्पूर्ण ग्रहों, जैसे सूर्य, तारे, वर्षा, समुद्र, ऋतुएं, ज्वारभाटे एवं सामुद्रिक धाराएं आदि हैं जो मनुष्य की परिवर्तन शक्ति से बाहर हैं और दूसरी ओर नियन्त्रित भौगोलिक पर्यावरण है, जैसे-धरती, नदियां, अन्य जल स्रोत, नहरें, वन आदि हैं। इस नियन्त्रित पर्यावरण में कुछ सीमा तक परिवर्तन हो सकता है।

प्रश्न 2.
पर्यावरण प्रदूषण के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
1. पश्चिमी विचारधारा–पर्यावरण के प्रदूषण की वर्तमान स्थिति के लिए पश्चिमी चिन्तन काफ़ी सीमा तक उत्तरदायी है। पश्चिमी विश्व के भौतिक विकास के मूल में, वहां की भौतिक जीवन दृष्टि है। पश्चिम का ईसाई समाज धर्म की इस मान्यता के अनुसार जीवन व्यतीत करता है कि, ईश्वर ने मानव को पृथ्वी पर, जो कुछ भी है, उसका उपभोग करने के लिए भेजा है।

2. जनसंख्या में वृद्धि-जनसंख्या अधिक होने के कारण मानव की आवश्यक वस्तुओं-रोटी, कपड़ा और मकान की पूर्ति नहीं हो रही है, और इन वस्तुओं की पूर्ति लकड़ी, लोहा, भूमि, कच्चा माल, खाद्य पदार्थ, जल इत्यादि के भण्डारों से हो सकती है अर्थात् प्रकृति का शोषण आवश्यक हो जाता है।

3. वनों की कटाई एवं भू-क्षरण-वनों की निरन्तर कटाई के फलस्वरूप भूमि की कठोरता कम होती जा रही है और भू-क्षरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। निरन्तर वनों की कमी से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा में बढ़ने से पर्यावरण का प्रदूषित होना स्वाभाविक है।

4. जल-प्रदूषण—जिस प्रकार वन सम्पदा सीमित है, उसी तरह प्रकृति ने जल पूर्ति को भी सीमित बनाया है। इस कारण मानव ने नदियों व समुद्र के पानी को भिन्न-भिन्न ढंगों से प्रदूषित करना शुरू कर दिया। कारखानों से निकलने वाले विषैले रसायनों तथा नगरों के गन्दे पानी से नदियों का जल प्रदूषित हो रहा है।

प्रश्न 3.
‘पर्यावरण संरक्षण’ के किन्हीं चार उपायों का वर्णन कीजिये।
अथवा
पर्यावरण की सुरक्षा के किन्हीं चार उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. समग्र चिन्तन की आवश्यकता-पश्चिमी जगत् के भौतिक चिन्तन में इस बात पर बल दिया जाता है कि इस पृथ्वी पर व प्रकृति पर जो कुछ भी है, वह मानव के उपभोग के लिए है। अतः आवश्यकता मानव की सोच को बदलने की है। इसके लिए भारत का समग्र चिन्तन (Holistic or Integrated thinking of India) एक महत्त्वपूर्ण उपाय है।

2. जनसंख्या नियन्त्रण विश्व की जनसंख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है और आज की 7.2 अरब की जनसंख्या 2050 में 9.6 अरब हो जाएगी। पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना आवश्यक है।

3. वन संरक्षण-पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए तथा देश के सन्तुलित विकास के लिए यह आवश्यक है कि वनों की रक्षा की जाए। वनों की अंधाधुंध कटाई को रोकना अत्यावश्यक है।

4. वन्य-जीवन का संरक्षण-वन संरक्षण के साथ-साथ वन्य जीवन का संरक्षण करना अत्यावश्यक है। भारत में शेर, चीते, हाथियों, घड़ियालों, गैंडों, भालू इत्यादि जीवों की प्रजातियों के नष्ट होने का गम्भीर खतरा पैदा हो गया है। प्रकृति के सन्तुलन को बनाए रखने के लिए तथा पर्यावरण की रक्षा के लिए वन्य जीवन (Wild life) को सुरक्षित रखना अत्यावश्यक हो गया है।

प्रश्न 4.
पोषणकारी अथवा अक्षय विकास की धारणा का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
पोषणकारी विकास अथवा अखण्ड विकास की अवधारणा का अर्थ है-निरन्तर चलने वाला विकास अर्थात् ऐसा विकास जिसमें न कोई. खण्ड हो और न ही विकास का क्षय है। पर्यावरणवाद के समर्थकों ने दो मुख्य विचारधाराओं पर बल दिया है

  • मनुष्य और प्रकृति के टूटे हुए सम्बन्धों को दोबारा जोड़ना।
  • मनुष्य के सामाजिक और राजनीतिक जीवन को नये परिवर्तित रूप में ढालना।

इन दोनों विचारधाराओं के अनुसार आधुनिक औद्योगिक समाज में मनुष्य ने अपने विकास व ज़रूरतों के लिए प्रकृति का लगातार दोहन किया है। इस लगातार दोहन के फलस्वरूप मनुष्य का धीरे-धीरे प्रकृति से सम्बन्ध टूटना शुरू हो गया है और पर्यावरण सम्बन्धी अनेक समस्याएँ जटिल रूप धारण कर रही हैं। इस विचारधारा के अनुसार मनुष्य और प्रकृति के इस टूटे हुए सम्बन्ध को पर्यावरण के प्रति शालीनता का रुख अपनाकर फिर से जोड़ना होगा और प्रकृति की इस धरोहर को अपने तक सीमित न रखकर आने वाली पीढ़ियों के उपभोग के लिए सुरक्षित रखना होगा।

पर्यावरण वेत्ताओं ने अक्षय विकास की अवधारणा को इस प्रकार परिभाषित किया है-“एक ऐसा विकास जो अब तक हुए विकास को तथा उस विरासत को भी सुरक्षित रखें जिस पर उसकी नींव रखी गयी है।” साधारण शब्दों में, “अक्षय विकास वह क्षय न होने वाला विकास है जिसका एक पीढ़ी के द्वारा उपभोग हो लेने पर दूसरी पीढ़ी के लिए विकास और सम्भोग की पूर्ण परिस्थितियाँ बनी रहें।”

प्रश्न 5.
मूलवासियों के कौन-कौन से अधिकार हैं ?
उत्तर:
मूलवासियों (भारत में इन्हें अनुसूचित जनजाति या आदिवासी कहा जाता है।) के अधिकार निम्नलिखित हैं

  • विश्व में मूलवासियों को बराबरी का दर्जा प्राप्त हो।
  • मूलवासियों को अपनी स्वतन्त्र पहचान रखने वाले समुदाय के रूप में जाना जाए।
  • मूलवासियों के आर्थिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन न किया जाए।
  • देश के विकास से होने वाला लाभ मूलवासियों को भी मिलना चाहिए।

प्रश्न 6.
विश्व की ‘साझी विरासत’ का क्या अर्थ है ? इसकी सुरक्षा के दो उपाय बताएं।
अथवा
“विश्व की साझी सम्पदा” पर एक नोट लिखिए।
उत्तर:
1. विश्व की साझी विरासत से अभिप्राय उस सम्पदा से है, जिस पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है। जैसे साझी नदी, साझा कुआं, साझा मैदान तथा साझा चरागाह इत्यादि। इसी तरह कुछ क्षेत्र एक देश के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, जैसे पृथ्वी का वायुमण्डल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह तथा बाहरी अन्तरिक्ष इत्यादि। इसका प्रबन्धन अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किया जाता है। इनकी रक्षा के दो उपाय अग्रलिखित हैं सीमित प्रयोग-विश्व की साझी विरासतों का सीमित प्रयोग करना चाहिए।

2. जागरुकता पैदा करना-विश्व की साझी विरासतों के प्रति लोगों में जागरुकता पैदा करनी चाहिए।

प्रश्न 7.
विश्व राजनीति में पर्यावरण की चिंता के कोई चार कारण लिखिये।
उत्तर:
पर्यावरण निम्नीकरण (क्षरण) के सम्बन्ध में चार चिन्ताओं का वर्णन इस प्रकार है

  • बढ़ता वायु प्रदूषण-पर्यावरण के क्षरण से विश्व में निरन्तर वायु प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है।
  • कृषि योग्य भूमि में कमी-पर्यावरण क्षरण से कृषि योग्य भूमि लगातार कम हो रही है।
  • चरागाहों की समाप्ति-पर्यावरण क्षरण से विश्व में चारागाह समाप्त हो रहे हैं।
  • जलाशयों में कमी-पर्यावरण क्षरण से जलाशयों की जलराशि बड़ी तेजी से कम हुई है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 8.
पर्यावरण से सम्बन्धित स्टॉकहोम सम्मेलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण सम्मेलन जून, 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में आयोजित किया गया। इसका आयोजन संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में किया गया था। इस सम्मेलन की महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें थीं

  • मानवीय पर्यावरण पर घोषणा,
  • मानवीय पर्यावरण पर कार्ययोजना,
  • संस्थागत एवं वित्तीय व्यवस्था पर प्रस्ताव,
  • विश्व पर्यावरण दिवस पर प्रस्ताव,
  • परमाणु शस्त्र परीक्षणों पर प्रस्ताव,
  • दूसरे पर्यावरण सम्मेलन ।
  • किये जाने के प्रस्ताव तथा
  • राष्ट्रीय स्तर पर कार्य किये जाने के सम्बन्ध में सरकारों को सिफ़ारिशें किये जाने का निर्णय।

प्रश्न 9.
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित किन्हीं चार विश्व समझौतों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • तेल-प्रदूषण की हानि के लिए असैनिक दायित्व पर अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय-1969।
  • तेल प्रदूषण के उपघातों के विषयों में खुले समुद्र में हस्तक्षेप से सम्बन्धित अन्तर्राष्ट्रीय अभिसमय-19691
  • अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की नम भूमि तथा विशेषकर पानी में रहने वाले पक्षियों के रहने के स्थान पर अभिसमय 19711
  • कूड़ा-कर्कट तथा अन्य सामान के ढेर लगाने से सामुद्रिक प्रदूषण को बचाने के लिए अभिसमय-1972 ।

प्रश्न 10.
पृथ्वी सम्मेलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
स्टॉकहोम सम्मेलन के पश्चात् पर्यावरण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मेलन सन् 1992 में ब्राजील की राजधानी रियो डी जनेरियो में हुआ। इस सम्मेलन में 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन का आयोजन भी संयुक्त राष्ट्र के तत्त्वाधान में हुआ। इस सम्मेलन का मुख्य विषय पर्यावरण एवं सन्तुलित विकास था।

पृथ्वी सम्मेलन में की गई घोषणा को एजेण्डा-21 के नाम से जाना जाता है। इस सम्मेलन में स्टॉकहोम के उपबन्धों को स्वीकार करते हुए उन्हें लागू करने पर जोर दिया गया। पृथ्वी सम्मेलन में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित कुल 27 सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया।

प्रश्न 11.
क्योटो प्रोटोकोल के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1997 में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक दूसरी बैठक क्योटो (जापान) में हुई। इसमें लगभग 150 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। बैठक के अन्त में क्योटो घोषणा की गई जिसके अन्तर्गत यह सूचीबद्ध औद्योगिक देश वर्ष 2008 से 2012 तक 1990 के स्तर के नीचे 5.2% तक अपने सामूहिक उत्सर्जन में कमी कर देंगे। पर्यावरण संरक्षण के लिए स्वच्छ विकास संयन्त्रों (Clean Development Machanism) लागू करने की बात की गई।

प्रश्न 12.
वनों से हमें प्राप्त होने वाले कोई चार लाभ लिखें।
उत्तर:
वनों में हमें निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं

  • वनों से हमें कीमती लकड़ियां मिलती हैं, जो कई प्रकार के प्रयोग में आती हैं।
  • वनों में पाए जाने वाले जैव विविधता के भण्डार सुरक्षित रहते हैं।
  • वन जलवायु एवं पर्यावरण को सन्तुलित करते हैं।
  • वन जल-चक्र को सन्तलित करते समय वर्षा करवाते हैं।

प्रश्न 13.
वनों से सम्बन्धित हमारी चिन्ताएं क्या हैं ?
उत्तर:
वनों से सम्बन्धित निम्नलिखित चिन्ताएं हैं

  • वनों को लोग बड़ी तेज़ी से काट रहे हैं।
  • वनों की कटाई के कारण जैव विविधता के भण्डार समाप्त हो रहे हैं।
  • वनों की कटाई के कारण जलवायु सन्तुलन चक्र अस्थिर हो गया है।
  • वनों के अन्धाधुन्ध कटने से बाढ़ की सम्भावनाएं बढ़ गई हैं।

प्रश्न 14.
सन् 1987 में प्रकाशित ‘ऑवर कॉमन फ्यूचर रिपोर्ट’ में शामिल की गई कोई चार बातें लिखें।
उत्तर:
सन् 1987 में प्रकाशित रिपोर्ट में निम्नलिखित बातें शामिल थीं

  • आर्थिक विकास तथा पर्यावरण प्रबन्धन के परस्पर सम्बन्धों को हल करने के लिए दक्षिणी देश अधिक गम्भीर थे।
  • आर्थिक विकास की वर्तमान विधियां स्थायी नहीं रहेंगी।
  • औद्योगिक विकास की मांग दक्षिणी देशों में अधिक है।
  • विकसित एवं विकासशील देशों में पर्यावरण के सम्बन्ध में अलग-अलग विचार थे।

प्रश्न 15.
अंटार्कटिका महाद्वीप के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
अंटार्कटिका महाद्वीप एक करोड़ चालीस लाख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह मुख्यत: एक बर्फीला क्षेत्र है। इस पर किसी एक देश या संगठन का अधिकार नहीं है। यद्यपि कोई भी देश या संगठन शान्तिपर्ण कार्यों के लिए यहां पर अनसन्धान कर सकता है। अंटार्कटिका महाद्वीप विश्व की जलवाय एवं पर्यावरण को सन्तलित करता है।

अंटार्कटिक महाद्वीप की आन्तरिक बर्फीली परत ग्रीन हाऊस गैसों के जमाव का महत्त्वपूर्ण सूचना-स्रोत है। इसके साथ-साथ इससे लाखों-हज़ारों वर्षों के पहले के वायुमण्डलीय तापमान का पता लगाया जा सकता है। इस महाद्वीप को किसी भी देश के राजनीतिक एवं सैनिक हस्तक्षेप से अलग रखने के लिए कुछ नियम बनाए गए हैं, जिनका पालन करना सभी देशों के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 16.
प्राकृतिक संसाधनों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
प्राकृतिक संसाधनों से हमारा अभिप्राय ऐसे संसाधनों से है जो कि हमें प्रकृति से ठोस, द्रव्य और गैस के रूप में प्राप्त होते हैं। प्राकृतिक संसाधनों को पृथ्वी पर मानवीय जीवन का आधार माना जाता है। मानवीय सभ्यता के विकास में इन प्राकृतिक संसाधनों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रारम्भिक काल में यह संसाधन प्रचुर मात्रा में है, परन्तु जैसे-जैसे जनसंख्या में वृद्धि होती चली गई वैसे-वैसे ही प्राकृतिक संसाधनों का तेज़ी से दोहन आरम्भ हो गया था। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते हैं कि मानवीय विकास प्राकृतिक संसाधनों के विनाश से हुआ है क्योंकि मानव ने स्वयं ही आत्मनिर्भर जैव मंडल के तन्त्र को प्राकृतिक संसाधन के तन्त्र में परिवर्तित कर दिया है।

प्रश्न 17.
‘भारत के पावन वन-प्रान्तर’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
भारत में प्रचलित कछ धार्मिक कारणों के कारण वनों के कुछ भागों को काटा नहीं जाता। ऐसे स्थानों पर किसी देवता या पुण्यात्मा का निवास माना जाता है। भारत में इस प्रकार के स्थानों को ‘पावन वन-प्रान्तर’ कहा जाता है। भारत में ‘पावन वन-प्रान्तर’ को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है, जैसे राजस्थान में इसे वानी, झारखण्ड में जहेरा स्थान एवं सरना, मेघालय में लिंगदोह, उत्तराखण्ड में थान या देवभूमि, महाराष्ट्र में देव रहतिस तथा केरल में काव कहा जाता है।

पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित साहित्य में भी अब पावन वन-प्रान्तर अर्थात् देव स्थान को स्वीकार किया जाता है। कुछ अनुसन्धानकर्ताओं के अनुसार देव स्थानों की मान्यता के कारण जैव विविधता और पारिस्थितिक तन्त्र को न केवल सुरक्षित रखा जा सकता है, बल्कि सांस्कृतिक विभिन्नता को बनाए रखने में मदद मिलती है।

प्रश्न 18.
विकास कार्यों के पर्यावरण पर पड़ने वाले किन्हीं चार बुरे प्रभावों को लिखें।
अथवा
पर्यावरण पर विकास कार्यों के चार बुरे प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • विकास कार्यों के लिए वृक्षों को काटा जा रहा है, जिसने वातावरण में शुद्ध वायु की कमी हो रही है।
  • विकास कार्यों के लिए अधिक-से-अधिक भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है, जिसके कारण मनुष्यों के रहने योग्य तथा कृषि योग्य उपजाऊ जमीन कम हो रही है।
  • विकास कार्यों के लिए पानी का अत्यधिक दोहन हो रहा है, जिससे जल स्तर लगातार कम होता जा रहा है।
  • विकास कार्यों के पश्चात् छोड़े गए जहरीले कूडा-कबाड़ पर्यावरण को हानि पहुंचाते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पर्यावरण प्रदूषण के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  • पर्यावरण के प्रदूषण की वर्तमान स्थिति के लिए पश्चिमी देश जिम्मेवार हैं। क्योंकि इन्होंने प्राकृतिक संसाधनों का अन्धाधुन्ध दोहन किया है।
  • वनों की निरन्तर कटाई के फलस्वरूप भमि की कठोरता कम हो रही है और भ-क्षरण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गई है। निरन्तर वनों की कमी से कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा के बढ़ने से पर्यावरण का प्रदूषित होना स्वाभाविक है।

प्रश्न 2.
पर्यावरण संरक्षण के कोई दो उपाय बताएं।
उत्तर:

  • पर्यावरण संरक्षण के लिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना आवश्यक है।
  • पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाने के लिए तथा देश के सन्तुलित विकास के लिए आवश्यक है, कि वनों की रक्षा की जाए।

प्रश्न 3.
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित स्टॉकहोम सम्मेलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे पहला और महत्त्वपूर्ण सम्मेलन जून 1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में हुआ। इसका आयोजन संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में किया गया था। इस सम्मेलन में सात महत्त्वपूर्ण प्रस्तावों को पारित किया गया, जिसके आधार पर पर्यावरण को प्रदूषित होने से बचाया जा सकता है।

प्रश्न 4.
पृथ्वी सम्मेलन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
स्टॉकहोम सम्मेलन के पश्चात् पर्यावरण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण सम्मेलन जून 1992 में ब्राजील की राजधानी रियो-डी-जनेरियो में हुआ। इस सम्मेलन को पृथ्वी सम्मेलन भी कहा जाता है। इस सम्मेलन का आयोजन भी संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में किया गया था। इस सम्मेलन में 170 देश, हज़ारों स्वयंसेवी संगठन तथा अनेक बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों ने हिस्सा लिया। इस सम्मेलन में स्टॉकहोम के उपबन्धों को स्वीकार करते हुए, उन्हें लागू करने पर जोर दिया गया।

प्रश्न 5.
क्योटो प्रोटोकोल के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1997 में पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित एक बैठक क्योटो (जापान) में हुई। इसमें लगभग 150 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। क्योटो घोषणा में कहा गया, कि सूचीबद्ध औद्योगिक देश वर्ष 2008 से 2012 तक 1990 के स्तर से नीचे 5.2% तक अपने सामूहिक उत्सर्जन में कमी करेंगे।

प्रश्न 6.
विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1997 में नई दिल्ली में विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक हुई। इस बैठक में निर्धनता, पर्यावरण तथा संसाधन प्रबन्ध के समाधान के सम्बन्ध में विकसित तथा विकासशील देशों में व्यापार की सम्भावनाओं पर विचार किया गया। इस बैठक में ग्रीन गृह गैसों को वातावरण में न छोड़ने की सम्भावनाओं पर चर्चा हुई।

प्रश्न 7.
पर्यावरण संरक्षण में भारत की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत सदैव ही पर्यावरण संरक्षण का पक्षधर रहा है। भारत ने प्रायः सभी पर्यावरण सम्मेलनों में शों के पर्यावरण से सम्बन्धित अधिकारों की आवाज़ उठाई है। भारत ने पर्यावरण प्रदूषित होने का जिम्मेदार विकसित देशों को माना है। भारत ने पर्यावरण संरक्षण के लिए अन्तर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर कई प्रयास किए हैं। भारत ने जहां क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर किये हैं, वहीं घरेलू मोर्चे पर कई कानून बनाए हैं।

प्रश्न 8.
विश्व में खाद्यान्न उत्पादन की कमी के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • विश्व में खाद्यान्न उत्पादन की कमी का एक कारण कृषि योग्य भूमि का न बढ़ना है। इसके कृषि योग्य भूमि की उपजाऊ निरन्तर कम हो रही है।
  • विश्व में खाद्यान्न उत्पादन की कमी का एक कारण चारागाहों का समाप्त होना तथा जल प्रदूषण का बढ़ना है।

प्रश्न 9.
विश्व में साफ पानी का भण्डार कितना है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की विश्व विकास रिपोर्ट 2006 के अनुसार विश्व में साफ पानी का भण्डार बहुत कम है। पीने योग्य साफ पानी के अभाव में प्रत्येक वर्ष लगभग 30 लाख से अधिक बच्चे मारे जाते हैं। विश्व की लगभग एक अरब बीस करोड़ जनता को साफ पानी उपलब्ध नहीं है।

प्रश्न 10.
ओजोन परत में छेद होने की घटना की व्याख्या करें।
उत्तर:
पृथ्वी के ऊपरी वायुमण्डल में ओजोन गैस की मात्रा निरन्तर कम हो रही है। इस प्रकार की घटना को ओजोन परत में छेद होना भी कहते हैं। इससे न केवल पारिस्थितिक तन्त्र पर ही नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 11.
लोगों को अकाल के समय मुख्यतः किन दो समस्याओं का सामना करना पड़ता है ?
उत्तर:

  • अकाल के समय लोगों को खाद्य पदार्थों की कमी का सामना करना पड़ता है।
  • अकाल के समय लोगों को पीने के लिए पानी नहीं मिलता, क्योंकि सभी कुएं एवं तालाब सूख जाते हैं।

प्रश्न 12.
वैश्विक सम्पदा की रक्षा के लिए किए गए कोई दो समझौते लिखें।
उत्तर:

  • 1959 में की गई अंटार्कटिक सन्धि।
  • 1987 में किया गया मांट्रियाल न्यायाचार या प्रोटोकोल।

प्रश्न 13.
अंटार्कटिक महाद्वीप के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
अटार्कटिक महाद्वीप एक करोड़ चालीस वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह मुख्यत: बर्फीला क्षेत्र है। इस पर किसी देश या संगठन का अधिकार नहीं है। यद्यपि कोई भी देश शान्तिपूर्ण कार्यों के लिए यहां पर अनुसन्धान कर सकता है। अंटार्कटिक महाद्वीप विश्व की जलवायु एवं पर्यावरण को सन्तुलित करता है।

प्रश्न 14.
पर्यावरण की समस्याओं के अध्ययन के लिए किये गए कोई दो उपाय लिखें।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम जैसे कई अन्य अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में पर्यावरण से सम्बन्धित सेमिनार एवं सम्मेलन करवाए हैं।
  • राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण के अध्ययन को बढ़ावा दिया गया है।

प्रश्न 15.
पर्यावरण शरणार्थी से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
पर्यावरण के खराब होने से एवं खाद्यान्न की उत्पादकता कम होने से लोगों द्वारा उस स्थान से हटकर कहीं और शरण लेना पर्यावरण शरणार्थी कहलाता है। 1970 के दशक में भयंकर अनावृष्टि से अफ्रीकी देशों के नागरिकों को इस प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 16.
“विश्व तापन” किसे कहते हैं ?
अथवा
वैश्विक ताप वृद्धि किसे कहते हैं ?
अथवा
भूमण्डलीय ऊष्मीकरण (Global Warming) क्या है ?
पर्यावरण पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन क संसाधन
उत्तर:
विश्व तापन से अभिप्राय विश्व के तापमान का लगातार बढ़ना है। पिछले कई वर्षों से विकास की अच्छी दौड़ ने पर्यावरण को बहुत हानि पहुंचाई है, जिसके कारण जंगलों में कमी आई है, तथा ग्लेशियरों से लगातार बर्फ पिघल रही है। इसी कारण विश्व का तापमान लगातार बढ़ रहा है।

प्रश्न 17.
वैश्विक तापन के कोई दो परिणाम बताएं।
उत्तर:
(1) वैश्विक तापन से ग्लेशियरों का तापमान बढ़ने से बर्फ पिघलनी शुरू हो गई है, जिससे समुद्र तटीय कुछ देशों के जलमग्न होने का खतरा पैदा हो गया है।
(2) वैश्विक तापन से वातावरण का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे कई प्रकार की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याएं पैदा हो गई हैं।

प्रश्न 18.
जून-2005 में हुई जी-8 की बैठक में भारत ने किन दो बातों की ओर विश्व समुदाय का ध्यान आकर्षित किया ?
उत्तर:

  • भारत का यह कहना था, कि विकसित देश विकासशील देशों की अपेक्षा ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन अधिक कर रहे हैं।
  • भारत के अनुसार ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में कमी करने की ज़िम्मेदारी भी विकसित देशों की अधिक है।

प्रश्न 19.
भारत में ग्रीन हाउस गैसों की उत्सर्जन मात्रा की स्थिति लिखें।
उत्तर:
भारत में ग्रीन हाऊस गैसों की उत्सर्जन मात्रा किसी भी विकसित देश के मुकाबले बहुत कम है। भारत में सन् 2000 तक ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन प्रति व्यक्ति 0.9 टन था। एक अनुमान के अनुसार सन् 2030 तक यह मात्रा बढ़कर 1.6 टन प्रतिव्यक्ति हो जायेगी।

प्रश्न 20.
निर्जन वन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
निर्जन वन से अभिप्राय ऐसे वनों से है, जिसमें मनुष्य एवं जानवर नहीं पाए जाते हैं। उत्तरी गोलार्द्ध के कई देशों में निर्जन वन पाए जाते हैं। इन देशों में वन को निर्जन प्रान्त के रूप में देखा जाता है जहां पर लोग नहीं रहते। इस प्रकार का दृष्टिकोण मनुष्य को प्रकृति का अंग नहीं मानता।

प्रश्न 21.
विकसित देशों ने संसाधनों के दोहन के लिए कौन-कौन से कदम उठाए ?
उत्तर:

  • विकसित देशों ने संसाधनों वाले क्षेत्रों में अपनी सेना को रक्षा के लिए तैनात किया।
  • विकसित देशों ने संसाधनों वाले देशों में ऐसी संस्थाएं स्थापित करवाईं जो उनके अनुसार कार्य करें।

प्रश्न 22.
नैरोबी घोषणा (1982) के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
स्टॉकहोम सम्मेलन की 10वीं वर्षगांठ का सम्मेलन 1982 में नैरोबी में किया गया। इस सम्मेलन में विलुप्त वन्य जीवों के व्यापार से सम्बन्धित प्रावधान अन्तर्राष्ट्रीय प्राकृतिक सम्पदा तथा खुले समुद्र में प्रदूषण इत्यादि से सम्बन्धित प्रावधानों को स्वीकार किया गया।

प्रश्न 23.
विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1997 में नई दिल्ली में विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक हुई। इस बैठक में निर्धनता, पर्यावरण तथा संसाधन प्रबन्ध के समाधान के सम्बन्ध में विकसित तथा विकासशील देशों में व्यापार की सम्भावनाओं पर विचार किया गया। इस बैठक में ग्रीन गृह गैसों (Green House Gases) को वातावरण में न छोड़ने की सम्भावनाओं पर चर्चा हुई।

प्रश्न 24.
सन् 1998 में हुई ब्यूनिस-ऐरिस बैठक की व्याख्या करें।
उत्तर:
ब्यूनिस-ऐरिस बैठक (Buenus-Aires Convention)-1998 में अर्जेन्टाइना के शहर ब्यूनिस-ऐरिस में क्योटो प्रोटोकोल की समीक्षा के लिए एक बैठक की गई। भारत जैसे देशों की यह दलील थी कि विलासिता और आवश्यकता में अन्तर किया जाना चाहिए अर्थात् विलासिता के कारण गैसों का रिसाव न हो और आवश्यकता के कारण इसे छोड़ने से रोका न जाए।

प्रश्न 25.
वैश्विक तापवृद्धि और जलवायु परिवर्तन के लिए किन्हें उत्तरदायी माना जाता है ?
उत्तर:
वैश्विक तापवद्धि और जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशों को उत्तरदायी माना जाता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

प्रश्न 26.
भारत द्वारा ‘फ्रेमवर्क कन्वेन्शन ऑन क्लाइमेट चेंज’ की प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए उठाई गई दो मांगें लिखें।
उत्तर:

  • भारत ने यह मांग की, कि विकसित देशों को आसान दरों पर विकासशील देशों को वित्तीय सहायता देनी चाहिए।
  • भारत ने यह भी मांग की विकसित देश पर्यावरण के सन्दर्भ में अच्छी एवं उन्नत तकनीक विकासशील देशों को प्रदान करें।

प्रश्न 27.
वैश्विक साझा सम्पदा किसे कहते हैं ? किन्हीं दो उदाहरणों को सूचीबद्ध कीजिए।
उत्तर:
विश्व का साझी विरासत से अभिप्राय उस सम्पदा से है, जिस पर किसी एक का नहीं बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता है। जैसे साझी नदी, साझा कुआं, साझा मैदान तथा साझा चरागाह इत्यादि। इसी तरह कुछ क्षेत्र एक देश के क्षेत्राधिकार से बाहर होते हैं, जैसे पृथ्वी का वायुमण्डल, अंटार्कटिका, समुद्री सतह तथा बाहरी अन्तरिक्ष इत्यादि । इसका प्रबन्धन अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय द्वारा साझे तौर पर किया जाता है।

प्रश्न 28.
मूलवासी किन्हें कहा जाता है ? वे किन संस्थाओं के अनुरूप आचरण करते हैं ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार उन्हें मूलवासी कहा जाता है, जो किसी मौजूदा देश में बहुत समय से रहते चले आ रहे हैं, तत्पश्चात् किसी दूसरी संस्कृति या जातीय मूल के लोग विश्व के अन्य भागों से उस देश विशेष में आए तथा इन लोगों को अपने अधीन कर लिया। मूलवासी अधिकांशतः अपनी परम्परा, सांस्कृतिक रीति-रिवाज तथा विशेष सामाजिक आर्थिक नियमों के अनुसार ही आचरण करते हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. पर्यावरण संरक्षण को अधिक प्रोत्साहन मिलने का आधार है
(A) निरन्तर बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण
(B) निरन्तर कृषि भूमि में होती कमी के कारण
(C) वायुमण्डल में ओजोन गैस की मात्रा में लगातार कमी होने के कारण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. किस वर्ष स्टॉकहोम सम्मेलन हुआ ?
(A) 1992 में
(B) 1972 में
(C) 1998 में
(D) 1982 में।
उत्तर:
(B) 1972.

3. सन् 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ का पृथ्वी सम्मेलन कहाँ हुआ था ?
(A) नई दिल्ली
(B) जोहानसवर्ग
(C) बीजिंग
(D) रियो-डी-जनेरियो।
उत्तर:
(D) रियो-डी-जनेरियो।

4. क्योटो-प्रोटोकाल पर किस वर्ष सहमति बनी ?
(A) 1997 में
(B) 1995 में
(C) 1993 में
(D) 1990 में।
उत्तर:
(A) 1997 में।

5. सन् 1992 में संयुक्त राष्ट्र संघ का पृथ्वी सम्मेलन कहां हुआ ?
(A) नई दिल्ली में
(B) जोहान्सबर्ग में
(C) बीजिंग में
(D) रियो डी जनेरियो में।
उत्तर:
(D) रियो डी जनेरियो में।

6. रियो डी जनेरियो (1992) सम्मेलन को किस नाम से पुकारा जाता है ?
(A) पृथ्वी सम्मेलन
(B) जल सम्मेलन
(C) मजदूर सम्मेलन
(D) आर्थिक सम्मेलन।
उत्तर:
(A) पृथ्वी सम्मेलन।

7. पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित उत्तरी गोलार्द्ध एवं दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों में
(A) मतभेद नहीं पाए जाते
(B) मतभेद पाए जाते हैं ।
(C) उपरोक्त दोनों
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(B) मतभेद पाए जाते हैं।

8. विकास कार्यों के बुरे प्रभाव हैं
(A) कृषि भूमि में कमी
(B) भूमि की उत्पादकता में कमी
(C) वायु प्रदूषण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

9. विश्व का कितना प्रतिशत निर्जन क्षेत्र अंटार्कटिका महाद्वीप के अन्तर्गत आता है ?
(A) 40 प्रतिशत
(B) 10 प्रतिशत
(C) 26 प्रतिशत
(D) 35 प्रतिशत।
उत्तर:
(C) 26 प्रतिशत।

10. पर्यावरण किन कारणों से प्रदूषित होता है ?
(A) जनसंख्या में वृद्धि के कारण
(B) वनों की कटाई व भू-क्षरण
(C) औद्योगीकरण के कारण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

11. पर्यावरण को प्रदूषित होने से कैसे बचाया जा सकता है ?
(A) जनसंख्या को नियन्त्रित करके
(B) वनों का संरक्षण करके
(C) आवश्यकताएं कम करके
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

12. निम्न में से कौन-सा सम्मेलन पर्यावरण से सम्बन्धित है ?
(A) स्टॉकहोम सम्मेलन
(B) पृथ्वी सम्मेलन
(C) विश्व जलवायु परिवर्तन बैठक
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

13. भारत ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम कब पास किया ?
(A) 2005 में
(B) 2002 में
(C) 2003 में
(D) 2001 में।
उत्तर:
(D) 2001 में।

14. भारत ने ‘क्योटो प्रोटोकॉल’ पर कब हस्ताक्षर किए ?
(A) अगस्त, 1991 में
(B) अगस्त, 2000 में
(C) अगस्त, 2001 में
(D) अगस्त, 2002 में।
उत्तर:
(D) अगस्त, 2002 में।

15. पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार के बारे में सही है
(A) जल प्रदूषण
(B) वायु प्रदूषण
(C) ध्वनि प्रदूषण
(D) उपर्युक्त कभी।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी।

16. रियो सम्मेलन ( पृथ्वी सम्मेलन) में कितने देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था ?
(A) 150
(B) 160
(C) 170
(D) 180.
उत्तर:
(C) 170.

17. भारत ने क्योटो प्रोटोकॉल पर कब हस्ताक्षर किए ?
(A) वर्ष 2003 में
(B) वर्ष 2001 में
(C) वर्ष 1999 में
(D) वर्ष 2002 में।
उत्तर:
(C) वर्ष 2002 में।

18. विश्व में मूलवासियों की लगभग जनसंख्या है
(A) 35 करोड़
(B) 30 करोड़
(C) 40 करोड़
(D) 25 करोड़।
उत्तर:
(B) 30 करोड़।

19. क्लब ऑफ रोम ने ‘लिमिट्स टू ग्रोथ’ (Limits to Growth) नामक पुस्तक कब प्रकाशित की ?
(A) 1962 में
(B) 1971 में
(C) 1972 में।
(D) 1982 में।
उत्तर:
(C) 1972 में।

20. वैश्विक सम्पदा की सुरक्षा के लिए किया गया समझौता
(A) अटार्कटिका समझौता-1959
(B) मांट्रियाल न्यायाचार-1981
(C) अटार्कटिका पर्यावरणीय न्यायाचार 1991
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

21. पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित बॉली सम्मेलन कब हुआ था ?
(A) दिसम्बर, 2007
(B) दिसम्बर, 2008
(C) दिसम्बर, 2005
(D) दिसम्बर, 2002.
उत्तर:
(A) दिसम्बर, 2007.

22. सन् 2009 में ‘पृथ्वी सम्मेलन’ किस देश में हुआ था?
(A) भारत में
(B) चीन में
(C) नेपाल में
(D) कोपनहेगन में।
उत्तर:
(D) कोपनहेगन में।

23. कोपेन हेगन सम्मेलन में कितने देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था ?
(A) 180
(B) 185
(C) 190
(D) 192.
उत्तर:
(D) 192.

24. अक्तूबर 2009 में किस देश ने अपनी देश की कैबिनेट बैठक समुद्र के नीचे की थी ?
(A) मालद्वीप
(B) नेपाल
(C) भूटान
(D) बंग्लादेश।
उत्तर:
(A) मालद्वीप।

25. किस देश ने दिसम्बर, 2009 में अपने देश की कैबिनेट बैठक एवरेस्ट पर की थी ?
(A) मालद्वीप
(B) नेपाल
(C) भूटान
(D) बंग्लादेश।
उत्तर:
(B) नेपाल।

26. विकसित देशों की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की कितनी % है ?
(A) 15%
(B) 20%
(C) 22%
(D) 28%.
उत्तर:
(C) 22%.

27. विकसित देश विश्व के कितने % संसाधनों का प्रयोग करते हैं ?
(A) 50%
(B) 22%
(C) 88%
(D) 70%.
उत्तर:
(C) 88%.

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधन

28. विकसित देश विश्व की कितनी % ऊर्जा का प्रयोग करते हैं ?
(A) 73%
(B) 65%
(C) 60%
(D) 50%.
उत्तर:
(A) 73%.

29. भारत में ‘मूलवासी’ के लिए किस शब्द का प्रयोग किया जाता है ?
(A) अगड़ा वर्ग
(B) पिछड़ा वर्ग
(C) आदिवासी
(D) स्वर्ण वर्ग।
उत्तर:
(C) आदिवासी।

30. पर्यावरण संरक्षण के लिए भारत में किस प्रकार के वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है?
(A) इलेक्ट्रिक वाहनों को
(B) पेट्रोल के वाहनों को
(C) डीज़ल के वाहनों को
(D) मिट्टी के तेल के वाहनों को।
उत्तर:
(A) इलेक्ट्रिक वाहनों को।

रिक्त स्थान भरें

(1) 1972 में …………… में पर्यावरण से सम्बन्धित पहला सम्मेलन हुआ।
उत्तर:
स्टॉकहोम

(2) पर्यावरण से सम्बन्धित रियो सम्मेलन, जोकि 1992 में हुआ, को ………….. सम्मेलन भी कहा जाता है।
उत्तर:
पृथ्वी

(3) …………….. प्रोटोकोल सम्मेलन 1997 में जापान में हुआ।
उत्तर:
क्योटो

(4) भारत ने क्योटो प्रोटोकोल पर ……………… में हस्ताक्षर किये।
उत्तर:
अगस्त, 2002

(5) पर्यावरण संरक्षण के लिए दिसम्बर, 2007 में …………… में सम्मेलन हुआ।
उत्तर:
बाली

(6) पर्यावरण संरक्षण का भारत ने सदैव …………….. किया है।
उत्तर:
समर्थन।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
स्टॉकहोम (स्वीडन) सम्मेलन कब हुआ ?
उत्तर:
स्टॉकहोम (स्वीडन) सम्मेलन सन् 1972 में हुआ।

प्रश्न 2.
पृथ्वी सम्मेलन कब और कहां पर हुआ ?
उत्तर:
पृथ्वी सम्मेलन 1992 में रियो डी जनेरियो (ब्राज़ील) में हुआ।

प्रश्न 3.
पर्यावरण प्रदूषण का कोई एक कारण बताएं।
उत्तर:
पर्यावरण प्रदूषण का महत्त्वपूर्ण कारण जनसंख्या वृद्धि है।

प्रश्न 4.
पर्यावरण संरक्षण का कोई एक उपाय लिखें।
उत्तर:
पर्यावरण संरक्षण के लिए जनसंख्या को नियन्त्रित करना आवश्यक है।

प्रश्न 5.
क्योटो प्रोटोकोल (Kyoto Protocol) सम्मेलन कब और किस देश में हुआ ?
उत्तर:
क्योटो प्रोटोकोल सम्मेलन 1997 में जापान में हुआ।

प्रश्न 6.
भारत ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम कब पास किया ?
उत्तर:
भारत ने 2001 में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम पास किया।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सुरक्षा की परम्परागत चिन्ताओं एवं निःशस्त्रीकरण की राजनीति का वर्णन करें।
उत्तर:
विश्व स्तर पर अधिकांश देशों को अपनी-अपनी सुरक्षा की चिन्ता लगी रहती है, जिसके लिए वे हथियारों का निर्माण करते हैं, परन्तु स्वयं ही हथियारों को समाप्त करने अर्थात् निःशस्त्रीकरण पर भी जोर देते हैं।

1. सुरक्षा की परम्परागत चिन्ताएं (Traditional Concerns of Security):
सुरक्षा की परम्परागत धारणा में सबसे बडी चिन्ता सैनिक खतरे से सम्बन्धित होती है। इस प्रकार के खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है। शत्रु देश दूसरे देश को सैनिक हमले की धमकी देकर उसकी प्रभुसत्ता, अखण्डता तथा स्वतन्त्रता के लिए खतरा उत्पन्न करता है। इस प्रकार के सैनिक हमले में न केवल सैनिक ही मारे जाते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में सामान्य नागरिक भी हताहत होते हैं, तथा करोड़ों रुपये की सम्पत्ति नष्ट हो जाती है।

सैन्य हमले के साथ-साथ आतंकवाद भी सुरक्षा की एक महत्त्वपूर्ण चिन्ता बनी हुई है। वर्तमान समय में आतंकवाद पूरे विश्व के लिए खतरा बना हुआ है। 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। भारत भी एक लम्बे समय से आतंकवाद का शिकार रहा है। इस प्रकार की परिस्थितियों ने वर्तमान समय में मौजूद चुनौतियों को अधिक गम्भीर कर दिया है।

2. नि:शस्त्रीकरण की राजनीति (Politics of Disarmament):
वर्तमान समय में अधिकांश देशों के पास हथियारों के बड़े-बड़े ज़खीरे हैं, जोकि सम्पूर्ण मानव सभ्यता के लिए बहुत बड़े खतरे हैं। इसीलिए समय-समय पर इन हथियारों को समाप्त करने के या नियन्त्रित करने की बात की जाती रही है। निःशस्त्रीकरण उस स्थिति में तो और भी आवश्यक हो गया है, जब कई देशों के पास नरसंहार के हथियार (Weapons of Most destruction) हैं जिनमें परमाणु, जैविक और रासायनिक हथियार शामिल हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने नि:शस्त्रीकरण के लिए 1952 में निःशस्त्रीकरण आयोग की स्थापना की। 1963 में आंशिक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि की गई। 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि की गई। 1990 के दशक में व्यापक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि की गई। इसके अतिरिक्त भी निशस्त्रीकरण एवं शस्त्र नियन्त्रण के लिए कई सन्धियां की गईं।

यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि वास्तविक निःशस्त्रीकरण की अपेक्षा इस पर राजनीति अधिक की गई है क्योंकि जो भी शक्तिशाली या परमाणु सम्पन्न (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन) देश हैं। किसी भी स्थिति में अपने सैनिक या हथियारों के प्रभुत्व को बनाये रखना चाहते हैं। अतः निःशस्त्रीकरण की दिशा में कोई भी सार्थक प्रयास पूरा नहीं हो पाता।

प्रश्न 2.
वैश्विक ग़रीबी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा जैसे गैर-परम्परागत या मानवीय सुरक्षा से सम्बन्धित मुद्दे की व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व में विद्यमान कई मुद्दों में से वैश्विक ग़रीबी, स्वास्थ्य तथा शिक्षा सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। क्योंकि ये तीनों मुद्दे सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप से मानवाधिकारों से जुड़े हुए हैं। इन सभी मुद्दों का वर्णन इस प्रकार है

1. वैश्विक ग़रीबी (Global Poverty):
विश्व में आज सबसे बड़ी समस्याओं में से एक वैश्विक ग़रीबी है। यद्यपि गरीबी सम्पूर्ण विश्व में पाई जाती है। परन्तु विकासशील तथा नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों में यह अधिक खतरनाक रूप में विद्यमान है। अधिकांश विकासशील देशों में लोगों को खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं हैं, जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न देशों में रोजगार के अवसर सीमित हैं, जिसके कारण सभी लोगों को रोजगार नहीं मिल पाता।

अतः वे लोग ग़रीबी की अवस्था में जीवन बिताने के लिए विवश रहते हैं। वर्तमान समय में लगभग 1.2 बिलियन जनसंख्या को प्रतिदिन केवल एक डॉलर पर ही गुजारा करना पड़ता है। इस आंकड़े से विश्व में ग़रीबी की भयंकर स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ग़रीबी के कारण विकासशील देशों के लोगों को कुपोषण, भुखमरी तथा महामारी इत्यादि से समय-समय पर जूझना पड़ता है। ग़रीबी के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना पाई जाती है, तथा वे गलत कार्यों की ओर आकर्षित होने लगते हैं।

2. स्वास्थ्य (Health):
विश्व के अधिकांश देशों को आज स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। विश्व स्तर पर बढ़ती आर्थिक सम्पन्नता तथा वैज्ञानिक उन्नति के बावजूद भी विश्व के अधिकांश लोग स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से पीड़ित हैं। उदाहरण के लिए पिछले कुछ वर्षों से 20 मिलियन लोगों की मृत्यु ऐसी बीमारियों से हुई, जिनका इलाज सम्भव था।

इससे स्पष्ट है कि आर्थिक सम्पन्नता एवं चिकित्सा तथा वैज्ञानिक उन्नति का सभी लोगों को फायदा नहीं मिल रहा। इनका फायदा केवल विकसित देशों के कुछ थोड़े से लोगों को पहुंच रहा है। जबकि आज भी विकासशील देशों के लोग चेचक, हैजा, प्लेग तथा एड्स जैसी बीमारियों से मर रहे हैं, परन्तु उनका इलाज नहीं हो पा रहा है। विकासशील देशों के बच्चे असमय मृत्यु एवं कुपोषण के शिकार हो जाते हैं। इन्हें स्वच्छ पानी, उचित चिकित्सा सहायता तथा साफ वातावरण नहीं मिल पाता जिसका नकारात्मक प्रभाव इनके स्वास्थ्य पर पड़ता है।

3. शिक्षा (Education):
वर्तमान समय में विश्व के सभी लोगों को शिक्षा देना भी एक गम्भीर समस्या बनी हुई है। वास्तव में ग़रीबी, शिक्षा एवं स्वास्थ्य आपस में जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए ग़रीब व्यक्ति न तो शिक्षित हो पाता है, और न ही बीमारी के समय अपना इलाज ही करवा पाता है। इसी तरह एक अशिक्षित व्यक्ति न तो उचित रोज़गार कर पाता है, और न ही अपने स्वास्थ्य की देखभाल कर पाता है। विश्व के अधिकांश देशों, विशेषकर विकासशील देशों में बहुत अधिक निरक्षरता पाई जाती है। अशिक्षित व्यक्ति चालाक लोगों की बातों में आकर गलत कार्य करने लगते हैं।

इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के एक महत्त्वपूर्ण अभिकरण यूनेस्को (UNESCO-United Nations Educational, Scientific and Cultural Organisation) ने विश्व स्तर पर शिक्षा के प्रसार की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली है। यूनेस्को के संविधान की प्रस्तावना का प्रथम वाक्य है कि, “चूंकि युद्ध मनुष्य के दिमाग में पैदा होता है, इसलिए शान्ति को सुरक्षित रखने की आधारशिला भी मानव दिमाग में बनाई जानी चाहिए।” अर्थात् लोगों को शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक आधार पर जागरूक एवं शिक्षित बनाया जाये, ताकि वे गलत कार्यों की ओर अग्रसर न हों।

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प्रश्न 3.
मानवाधिकार एवं प्रवासन से सम्बन्धित मुद्दों की व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व में मानवाधिकार एवं प्रवासन से सम्बन्धित समस्याएं बहुत अधिक हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. मानवाधिकार का मुद्दा (Issue of Human Rights):
मानव अधिकारों की समस्या विश्व की प्रमुख समस्याओं में से एक है। मानव अधिकार वे अधिकार हैं जोकि सभी मनुष्यों को प्राप्त होने चाहिएं। ये अधिकार मानव जीवन के विकास के लिए आवश्यक हैं।

संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 10 दिसम्बर, 1948 को मानव अधिकार की घोषणा की परन्तु घोषणा के इतने वर्ष के बाद भी संसार के अनेक देशों में लोगों को मानव अधिकार प्राप्त नहीं हैं। कछ देशों में नागरिकों को नागरिक और राजनीतिक अधिकारों से वंचित रखा गया है जबकि कछ देशों में नागरिकों को आर्थिक और सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं।

जाति, धर्म, रंग, लिंग आदि के आधार पर आज भी नागरिकों के साथ भेदभाव किया जाता है और इन्हीं आधारों पर नागरिकों को अधिकारों से वंचित रखा जाता है। दक्षिण अफ्रीका में काले लोगों को काफ़ी लम्बे संघर्ष के बाद राजनीतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं। आज भी संसार के अनेक देशों में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं हैं। अत: मानव अधिकार एक गम्भीर समस्या बनी हुई है।

2. प्रवासन का मुद्दा (Issue of Migration):
आज के वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के युग में विश्व ने एक छोटे से गांव का रूप धारण कर लिया है। संचार एवं यातायात के साधनों के विकास के कारण एक देश से दूसरे देश में जाना अब और अधिक आसान हो गया है। परन्तु इससे अब प्रवासन तथा इससे सम्बन्धित अधिकारों की समस्याएं पैदा हो गईं। वर्तमान समय में विकासशील देशों के लोग बड़ी संख्या में अमेरिका, यूरोप तथा ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में जाकर बसने का प्रयास करते हैं। अतः अधिकांश विकसित देश लगातार अपने प्रवासन कानूनों को जटिल बनाते जा रहे हैं ताकि प्रवासियों की संख्या को कम किया जा सके।

पिछले वर्षों से अपने मातृ देश को छोड़कर दूसरे देश में जाकर बसने का प्रचलन बड़ा है। जनसंख्या संसाधन ब्यूरो के अनुसार वर्तमान समय में विश्व आबादी का लगभग 2.5% भाग प्रवासी के तौर पर रहा है। जिस देश में प्रवासियों की संख्या अधिक होती है, वहां पर सुरक्षा एवं सांस्कृतिक खतरों की सम्भावना बढ़ जाती है।

इसी कारण अधिकांश देश प्रवासियों की संख्या में कमी करने का प्रयास कर रहे हैं।संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त ने प्रवासन से सम्बन्धित कई प्रश्नों का हल जानने का प्रयास किया कि बहुत बड़े स्तर पर प्रवासन के क्या कारण एवं परिणाम हो सकते हैं। प्रवासन के समय प्रवासियों को किस प्रकार के संकटों एवं मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ता है। इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढ़ने के पश्चात् यह उच्चायुक्त इन समस्याओं को हल करने के लिए प्रयासरत है।

प्रश्न 4.
निःशस्त्रीकरण से आप क्या समझते हो ? आधुनिक युग में इसकी क्या आवश्यकता है ?
उत्तर:
निःशस्त्रीकरण आज अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति की ज्वलंत समस्या है जो कि निरन्तर विचार-विमर्श के बावजूद भी गम्भीर बनी हुई है। शस्त्रों की दौड़, खासतौर पर आण्विक शस्त्रों की दौड़ इतनी तेजी से बढ़ रही है कि इसके कारण ‘पागलपन’ (Madness) की स्थिति पैदा हो गई है। इसीलिए आज विश्व समुदाय निःशस्त्रीकरण के ऊपर ज़ोर दे रहा है और यही समय की मांग है। निःशस्त्रीकरण का अर्थ (Meaning of Disarmament)-साधारण शब्दों में नि:शस्त्रीकरण से हमारा अभिप्राय: “शारीरिक हिंसा के प्रयोग के समस्त भौतिक तथा मानवीय साधनों के उन्मूलन से है।”

यह एक ऐसा कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य हथियारों के अस्तित्व और उनकी प्रकृति से उत्पन्न कुछ खास खतरों को कम करना है। इससे हथियारों की सीमा निश्चित करने या उन पर नियन्त्रण करने या उन्हें कम करने का विचार प्रकट होता है। निःशस्त्रीकरण का लक्ष्य आवश्यक रूप से निरस्त्र कर देना नहीं है। इसका लक्ष्य तो यह है कि जो भी हथियार इस समय उपस्थित हैं, उनके प्रभाव को घटा दिया जाए। मॉर्गेन्थो (Morgenthau) के शब्दों में, “निःश्स्त्रीकरण कुछ या सब शस्त्रों में कटौती या उनको समाप्त करना है ताकि शस्त्रीकरण की दौड़ का अन्त हो।”

वी० वी० डायक (V.V. Dyke) के मतानुसार, “सैनिक शक्ति से सम्बन्धित किसी भी तरह के नियन्त्रण अथवा प्रतिबन्ध लगाने के कार्य को निःशस्त्रीकरण कहा जाता है।” वेस्ले डब्ल्यू ० पोस्वार (Wesley W. Posvar) ने अपने एक लेख ‘The New Meaning of Arms Control’ में लिखा है कि, “निःशस्त्रीकरण से हमारा अभिप्राय: सेनाओं और शस्त्रों को घटा देने या समाप्त कर देने से है जबकि शस्त्र-नियन्त्रण में वे सभी उपाय शामिल हैं जिनका उद्देश्य युद्ध के सम्भावित और विनाशकारी परिणामों को रोकना है। इसमें सेनाओं तथा शस्त्रों के घटाने या न घटाने को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता है।”

निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता (Necessity of Disarmament):
निम्न कारणों से निःशस्त्रीकरण को आवश्यक माना जाता है 1. विश्व शान्ति व सुरक्षा के लिए-नि:शस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व-शान्ति व सुरक्षा की स्थापना सम्भव है।

2. निःशस्त्रीकरण आर्थिक विकास में सहायक-विश्व के अधिकांश विकसित व अविकसित राष्ट्र अपने धन को आर्थिक क्षेत्र में न लगाकर उसका प्रयोग सैनिक क्षेत्र में करते हैं जो उनकी आर्थिक स्थिति के लिए हानिकारक है। यदि विकासशील देश निःशस्त्रीकरण की प्रक्रिया को अपनाते हुए नि:शस्त्रीकरण के रास्ते पर चलें तो इसके कारण इन देशों का बहुत आर्थिक विकास हो सकता है क्योंकि ये देश जितना धन अपनी रक्षा पर खर्च करते हैं वही धन ये अपने आर्थिक विकास पर खर्च करें तो शीघ्र ही यह आर्थिक शक्ति बन सकते हैं।

3. निःशस्त्रीकरण अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करता है- निःशस्त्रीकरण के द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी आती है क्योंकि शस्त्रों की होड़ के कारण प्रत्येक राष्ट्र अधिक-से-अधिक हथियार एकत्रित करने की सोचता है। हैडली बुल के अनुसार शस्त्रों की होड़ स्वयं तनाव की सूचक है। अतः अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को कम करने व आपसी सहयोग की वृद्धि के लिए आवश्यक है कि निःशस्त्रीकरण पर बल दिया जाए।

4. निःशस्त्रीकरण उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का अन्त करने में सहायक है-जब एक देश के पास बड़ी मात्रा में हथियार जमा होने लगते हैं तो वह इनका प्रयोग अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने में करने लगता है। इसके कारण ही उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद की बुराइयां पैदा हो जाती हैं क्योंकि साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद शक्ति बढ़ाने के ही दूसरे रूप हैं। यदि राष्ट्र निःशस्त्रीकरण पर बल देंगे तो शक्तिशाली राष्ट्र कभी भी अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने की नहीं सोचेंगे जिसके कारण उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद का अन्त होगा तथा राष्ट्रों के मध्य आपसी सहयोग व शान्ति का वातावरण बनेगा।

5. लोक-कल्याण को बढ़ावा-सभी राष्ट्र चाहे वह विकसित हों या विकासशील शस्त्रों पर धन व्यय करते हैं। यदि विकासशील देश निःशस्त्रीकरण की नीति पर चलें तो वह प्रतिवर्ष अपने करोड़ों डालर बचा कर उन्हें लोक कल्याण के कार्यों पर खर्च कर सकते हैं।

6. विदेशी हस्तक्षेप को रोकता है-जब बड़े राष्ट्र शस्त्रों का भारी मात्रा में निर्माण कर लेते हैं तो इन्हें दूसरे देशों व अविकसित देशों में बेचते हैं। कुछ अविकसित देश इन देशों से नवीन तकनीक के सैन्य उपकरणों का आयात करते हैं। इसके कारण वह उन विकासशील देशों के आन्तरिक मामलों में दखल-अंदाजी करते हैं। अत: विकासशील देशों में महाशक्तियों के बढ़ते हुए हस्तक्षेप को रोकने के लिए यह आवश्यक है कि यह देश मिलकर निःशस्त्रीकरण पर बल दें।

7. सैनिकीकरण को रोकता है-प्रायः देखा जाता है कि शस्त्रों की होड़ सैनिकीकरण को जन्म देती है। आज प्रत्येक राष्ट्र अपनी सुरक्षा के लिए लाखों की सेना एकत्रित करता है। अत: बढ़ते हुए सैनिकीकरण को रोकने के लिए नि:शस्त्रीकरण बहत आवश्यक है।

8. सैनिक गठबन्धनों को रोकता है-नि:शस्त्रीकरण सैनिक गठबन्धनों को रोकता है। द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद शस्त्रीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई। इसके दौरान कई सैनिक गठबन्धन हुए जिनमें नाटो, सीटो, सेंटो, एंजुस गठबन्धन अमेरिका के द्वारा किए गए। परन्तु जैसे ही 1985 के बाद गोर्बोच्योव-रीगन के मध्य वार्ता आरम्भ हुई तो इसमें नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई और धीरे-धीरे नाटो को छोड़कर सभी सैनिक गठबन्धन समाप्त हो गए हैं। अत: स्पष्ट है कि नि:शस्त्रीकरण सैनिक गठबन्धनों को रोकता है।

9. परमाणु युद्ध से बचाव के लिए आवश्यक-द्वितीय विश्व-युद्ध के दौरान 7 अगस्त, 1945 को अमेरिका ने नागासाकी पर और 9 अगस्त, 1945 को हिरोशिमा पर परमाणु बम गिराए। इसके कारण भयंकर नरसंहार हुआ। इसके पश्चात् 1949 में सोवियत संघ ने, 1954 में ब्रिटेन ने, 1959 में फ्रांस ने तथा 1963 में चीन ने परमाणु बम का आविष्कार किया।

इन देशों ने मिलकर ‘परमाणु क्लब’ बना लिया और परमाणु क्षमता पर अपना एकाधिकार जमाए रखा। इसका मुख्य कारण था कि परमाणु शक्ति का प्रसार न हो। परन्तु धीरे-धीरे भारत, इज़राइल, ब्राजील, दक्षिणी अफ्रीका, ईराक, पाकिस्तान, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया आदि देशों ने भी परमाणु क्षमता प्राप्त कर ली जिसके कारण परमाणु युद्ध होने के आसार बढ़ गए।

इसके कारण परमाणु क्लब के सदस्य राष्ट्रों को चिन्ता हुई और उन्होंने परमाणु युद्ध को रोकने के लिए नि:शस्त्रीकरण पर बल दिया। इस दिशा में व्यापक परमाणु प्रसार निषेध सन्धि (C.T.B.T.) उल्लेखनीय है। 1985 में गोर्बोच्योव-रीगन के मध्य शान्ति वार्ता आरम्भ हुई और इसके कारण नि:शस्त्रीकरण की प्रक्रिया आरम्भ हुई और परमाणु युद्ध का भय टल गया।

प्रश्न 5.
निःशस्त्रीकरण के मार्ग में आने वाली मुख्य बाधाओं का वर्णन करो।
उत्तर:
नैतिक रूप से विश्व को विनाश से बचाने का दायित्व मानव जाति पर ही है। इस दायित्व की पूर्ति तभी हो सकती है यदि विश्व के विभिन्न देश निःशस्त्रीकरण को व्यावहारिकता प्रदान करें। यद्यपि विभिन्न राज्यों ने व्यक्तिगत रूप से नि:शस्त्रीकरण की ओर बढ़ने का प्रयास किया है और संयुक्त राष्ट्र द्वारा भी विभिन्न प्रयास किए गए हैं, लेकिन फिर भी नि:शस्त्रीकरण के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सका है। इसके विपरीत विनाश के नए-नए शस्त्रों का आविष्कार किया जा रहा है और निःशस्त्रीकरण के प्रयासों को विफल किया जा रहा है। नि:शस्त्रीकरण के मार्ग में आने वाली प्रमुख बाधाएं इस प्रकार हैं

1. आपसी अविश्वास की समस्या (The problem of mutual distrust):
निःशस्त्रीकरण का लक्ष्य तभी प्राप्त किया जा सकता है जब विश्व के विभिन्न राष्ट्रों में आपसी विश्वास की भावना सुदृढ़ हो। लेकिन दुर्भाग्य से विश्व व्यवस्था में एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर विश्वास नहीं करता। राष्ट्रों के मध्य इसी अविश्वास की भावना के कारण अब तक निःशस्त्रीकरण की दिशा में जितने भी प्रयास किए गए हैं, उनमें डर व अविश्वास साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

2. राष्ट्रीय हित (National Interest):
प्रत्येक राष्ट्र अपने हित को सर्वोपरि महत्त्व देता है। राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के बाद ही वह अपनी सीमाओं से बाहर निकलकर किसी आदर्श की बात करता है। उदाहरणार्थ भारत और पाकिस्तान ने व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं, क्योंकि दोनों देश पहले अपने हितों को पूरा करना चाहते हैं।

3. विभिन्न राजनीतिक समस्याएं (Various Political Problems):
निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में अनेक राजनीतिक समस्याएं बाधा बनती हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि राजनीतिक समस्याओं के कारण राष्ट्रों के मध्य तनाव पैदा होते हैं जिससे कई बार युद्ध की नौबत आ जाती है। इसलिए हथियारों का होना अत्यावश्यक है। राजनीतिक समस्याओं के कारण राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण प्रदूषित हो जाता है। इनके कारण नि:शस्त्रीकरण के प्रयास असफल हो जाते हैं।

4. राष्ट्रीय सुरक्षा (National Security):
विश्व का प्रत्येक राज्य प्रत्येक दृष्टिकोण से सुरक्षित होना चाहता है। इसके कारण वह सेना व पुलिस बल को अत्याधुनिक बनाने में बिल्कुल भी पीछे नहीं रहना चाहता। कोई भी राष्ट्र अपनी सुरक्षा व्यवस्था को दूसरे के भरोसे नहीं रहने देना चाहता। अतः राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति बढ़ती आशंका शस्त्रीकरण को बढ़ावा देती है।

5. शक्ति के अनुपात की समस्या (Problem of the Ratio of Power):
नि:शस्त्रीकरण के मार्ग में एक कठिनाई शक्ति के अनुपात पर है। निःशस्त्रीकरण में विभिन्न राष्ट्रों द्वारा आनुपातिक रूप से अपने-अपने शस्त्रास्त्रों को कम किया जाता है। परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि शस्त्रों में कटौती के लिए किस अनुपात को स्वीकार किया जाए। निःशस्त्रीकरण के उपरान्त यह नहीं होना चाहिए शक्तिशाली देश तो कमजोर बन जाए और कमज़ोर देश शक्तिशाली बन जाए। इसके अतिरिक्त हथियारों को कम करने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। अलग-अलग राष्ट्र हथियारों को कम करने के लिए अलग-अलग मापदण्ड अपनाते हैं, जो कि उचित नहीं है।

6. वर्चस्व की भावना (Instinct of Hegemony) :
अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में प्रत्येक शक्तिशाली राष्ट्र यह चाहता पर उसका वर्चस्व बरकरार रहे। इसलिए वे अपने आपको सैनिक दृष्टि से अत्यधिक मजबूत बनाने का प्रयास करते हैं। इसके लिए शस्त्रों का संग्रह अर्थात् शस्त्रीकरण और नए शस्त्रों की खोजों को बढ़ावा मिलता है। कई राष्ट्र तो हथियारों के व्यापार को खुले तौर पर प्रोत्साहन देते हैं। वर्चस्व की यह भावना नि:शस्त्रीकरण के सभी प्रयासों पर कुठाराघात करती है।

7. प्राथमिकता निर्धारण में कठिनाई (Problem in the determination of the priority):
नि:शस्त्रीकरण की एक प्रमुख समस्या यह है कि राजनीतिक प्रश्नों को पहले सुलझाया जाए या निःशस्त्रीकरण के प्रयास किए जाएं। ये दोनों प्रश्न एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। ये दोनों ही प्रश्न आपसी अविश्वास, तनाव, भय और संघर्ष को बढ़ावा देते हैं। परन्तु वास्तविक प्रश्न यह है कि इन दोनों में से किसे प्राथमिकता दी जाए।

8. आर्थिक कारण (Economic Causes):
आर्थिक तत्त्व भी नि:शस्त्रीकरण के प्रयासों में बाधक बनता है। अमेरिका, फ्रांस, स्वीडन, इंग्लैण्ड इत्यादि अनेक देशों की बड़ी-बड़ी कम्पनियां हथियार बनाने का काम करती हैं। इन कम्पनियों का निरन्तर यह प्रयास रहता है कि उनको अधिक-से-अधिक हथियार बेचने के अवसर प्राप्त हों। इनका तर्क है कि नि:शस्त्रीकरण किया जाता है तो शस्त्र उद्योग बन्द हो जाने से लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे। कई शक्तिशाली देशों की अर्थव्यवस्थाएं तो काफी हद तक शस्त्र उद्योगों पर टिकी हुई हैं। अतः यदि शस्त्र नियन्त्रण के प्रयास किए जाते हैं तो उनको भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ेगा।

9. निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में ईमानदारी का अभाव (Lack of Honesty in the efforts of Disarma ment):
विभिन्न राज्यों द्वारा निःशस्त्रीकरण की दिशा में अब तक जितने भी प्रयास किए गए हैं, उनमें ईमानदारी व निष्ठा का साफ़ तौर पर अभाव देखा जा सकता है। प्रत्येक राष्ट्र आदर्शों की बात करके दूसरे राष्ट्र को धोखा देने के प्रयास में लगा रहता है। वास्तव में कोई भी राष्ट्र किसी अन्य राष्ट्र की सैन्य-शक्ति का सही आंकलन नहीं कर सकता। राष्ट्रों द्वारा शस्त्र कटौती के लिए प्रस्तुत समझौते में आंकड़े कुछ और होते हैं, जबकि वास्तविकता कुछ और होती है।

10. निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार उपरोक्त विवरण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि नि:शस्त्रीकरण की समस्या एक गम्भीर अन्तर्राष्ट्रीय समस्या है और इसके मार्ग में अनेक समस्याएं हैं। अब समय आ गया है कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय निःशस्त्रीकरण की दिशा में ईमानदारी, आपसी विश्वास और सहयोग का परिचय दें तथा मानव जाति के अस्तित्व को चिरकाल तक सुरक्षित रहने दें। यह एक सकारात्मक पक्ष है कि आज विश्व जनमत निःशस्त्रीकरण के पक्ष में है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निःशस्त्रीकरण की आवश्यकता के कोई चार कारण लिखिये।
अथवा
निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ? किन्हीं चार कारणों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • विश्व शांति व सुरक्षा के लिए-नि:शस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व-शांति व सुरक्षा की स्थापना संभव है।
  • आर्थिक विकास में सहायक-नि:शस्त्रीकरण के द्वारा विकासशील देश अपना आर्थिक विकास कर सकते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी-नि:शस्त्रीकरण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पाये जाने वाले तनावों में कमी करता है।
  • सैनिक गठबन्धनों में कमी-निःशस्त्रीकरण से सैनिक गठबन्धनों में कमी आती है।

प्रश्न 2.
निःशस्त्रीकरण के मार्ग में आने वाली किन्हीं चार बाधाओं का उल्लेख कीजिये।
अथवा
निःशस्त्रीकरण के मार्ग में आने वाली किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • विभिन्न राजनीतिक समस्याएं-नि:शस्त्रीकरण के प्रयासों में अनेक राजनीतिक समस्याएं बाधा बनती हैं।
  • वर्चस्व की भावना-प्रत्येक राष्ट्र की वर्चस्व की भावना नि:शस्त्रीकरण के मार्ग में बाधा पैदा करती है।
  • शक्ति के अनुपात की समस्या-निःशस्त्रीकरण में एक बाधा शक्ति के अनुपात की समस्या है।
  • ईमानदारी का अभाव-निःशस्त्रीकरण के अब तक जितने भी प्रयास किये गए हैं, उनमें ईमानदारी का अभाव साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

प्रश्न 3.
सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
सुरक्षा की परंपरागत धारणा में सबसे बड़ी चिंता सैनिक खतरे से सम्बन्धित होती है। इस प्रकार के खतरे का स्रोत कोई दूसरा देश होता है। शत्रु देश दूसरे देश को सैनिक हमले की धमकी देकर उसकी प्रभुसत्ता, अखंडता तथा स्वतंत्रता के लिए खतरा उत्पन्न करता है। इस प्रकार के सैनिक हमले में न केवल सैनिक ही मारे जाते हैं, बल्कि बड़ी संख्या में सामान्य नागरिक भी हताहत होते हैं, तथा करोड़ों रुपये की संपत्ति नष्ट हो जाती है।

सैन्य हमले के साथ साथ आतंकवाद भी सुरक्षा की एक महत्त्वपूर्ण चिंता बनी हुई है। वर्तमान समय में आतंकवाद पूरे विश्व के लिए खतरा बना हुआ है। 11 सितंबर, 2001 को अमेरिका पर हुए आंतकवादी हमले ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया। भारत भी एक लंबे समय से आतंकवाद का शिकार रहा है। इस प्रकार की परिस्थितियों ने वर्तमान समय में मौजूद चुनौतियों को अधिक गंभीर कर दिया है।।

प्रश्न 4.
शक्ति सन्तुलन क्या है ? व्याख्या करें।
अथवा
‘शक्ति सन्तुलन’ पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
शक्ति सन्तुलन का अर्थ है कि किसी भी देश को इतना सबल नहीं बनने दिया जाए कि वह दूसरों की सुरक्षा के लिए खतरा बन जाए। शक्ति सन्तुलन के अन्तर्गत विभिन्न राष्ट्र अपने आपसी शक्ति सम्बन्धों को बिना शक्ति के हस्तक्षेप के स्वतन्त्रतापूर्वक संचालित करते हैं। इस प्रकार यह एक विकेन्द्रित व्यवस्था है, जिसमें शक्ति,तथा नीतियां निर्माणक इकाइयों के हाथों में ही रखी जाती हैं।

1. सिडनी बी० फे० के अनुसार, “शक्ति सन्तुलन सभी राष्ट्रों में इस प्रकार की व्यवस्था है, कि उनमें से किसी भी सदस्य को इतना सबल बनने से रोका जाए, कि वह अपनी इच्छा को दूसरों पर न लाद सके।”
2. मॉर्गन्थो के अनुसार, “शक्ति सन्तुलन अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में सामान्य सामाजिक सिद्धान्त की अभिव्यक्ति है।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

प्रश्न 5.
बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा के चार घटक कौन-कौन से हैं ?
अथवा
परम्परागत सुरक्षा के किन्हीं चार तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा के चार घटक निम्नलिखित हैं

  • निःशस्त्रीकरण-बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निःशस्त्रीकरण है।
  • शस्त्र नियन्त्रण-शस्त्र नियन्त्रण द्वारा भी बाहरी खतरों को कम किया जा सकता है।
  • सन्धियां-बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटक सन्धियां हैं, क्योंकि सन्धि द्वारा दो या दो से अधिक देशों में मित्रता हो सकती है।
  • विश्वास बहाली-दो या दो से अधिक देशों द्वारा परस्पर विश्वास बहाली के प्रयासों द्वारा भी बाहरी खतरों को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 6.
आन्तरिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाले कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:

  • आन्तरिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व आतंकवाद है।
  • आन्तरिक सुरक्षा को प्रभावित करने वाला दूसरा महत्त्वपूर्ण कारक अलगाववाद है।
  • साम्प्रदायिकता आन्तरिक सुरक्षा के मार्ग में एक बड़ी बाधा मानी जाती है।
  • जातिवादी हिंसा ने भी आन्तरिक सुरक्षा को बहुत अधिक प्रभावित किया है।

प्रश्न 7.
परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) 1968 के किन्हीं चार प्रावधानों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • NPT के नियमों के अनुसार परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र, परमाणु शक्ति विहीन राष्ट्रों को परमाणु बम बनाने की जानकारी नहीं देंगे।
  • परमाणु शक्ति सम्पन्न राज्य परमाणु अस्त्र प्राप्त करने पर परमाणु शक्ति विहीन राज्यों की मदद नहीं करेंगे।
  • परमाणु शक्तिविहीन राष्ट्र परमाणु बम बनाने का अधिकार त्याग देंगे।
  • परमाणु अस्त्रों के परीक्षण और विस्फोटों पर रोक लगाने की अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था स्थापित की जानी चाहिए।

प्रश्न 8.
आतंकवाद किसे कहते हैं ?
उत्तर:
आतंक को अंग्रेजी में ‘टैरर’ (Terror) कहते हैं, जोकि लैटिन भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ आतंक की गतिविधियों से लिया जाता है। सामान्य रूप से जब एक समूह का संगठन अपनी मांगों को मनवाने के लिए, बम विस्फोट, जहाज़ों का अपचालन तथा अनावश्यक रूप से जान-माल की हानि करता है, तो उसे आतंकवाद की घटना कहा जा सकता है। श्वार्जनबर्गर के अनुसार, “एक आतंकवादी घटना को उसके तात्कालिक लक्ष्य के सन्दर्भ में सर्वश्रेष्ठ तरीके से परिभाषित किया जा सकता है। यह लक्ष्य है, डर पैदा करने के लिए शक्ति का प्रयोग करना और अपने लक्ष्यों को पूरा करना।”

प्रश्न 9.
आतंकवाद की वद्धि के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
1. असमान विकास-सम्पूर्ण विश्व का समान विकास नहीं हुआ है। अधिकांश विकसित देश, विकासशील देशों का शोषण करके अपना विकास कर रहे हैं, जिसके कारण विकासशील देशों के कुछ वर्गों में ऐसी भावनाएं पैदा होती हैं, कि वे आतंकवादी घटनाओं की ओर अग्रसर हो जाते हैं।

2. कट्टरवादिता में वृद्धि-विश्व स्तर पर आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं का एक अन्य कारण विभिन्न धर्मों में बढ़ती कट्टरवादिता है जिसके कारण एक धर्म के लोग, अपने धर्म को बचाने के लिए प्रायः हिंसक गतिविधियां करते हैं।

प्रश्न 10.
आतंकवाद को किस तरह रोका जा सकता है ? कोई चार उपाय बताएं।
उत्तर:

  • विश्व का एक समान विकास करना चाहिए, ताकि कोई भी देश या उस देश के लोग अपने आप को उपेक्षित अनुभव न करें।
  • देशों को ऐसे प्रयास करने चाहिए कि लोगों में नस्ल, धर्म, जाति एवं भाषा के आधार पर कट्टरवादिता न बढ़े।
  • विश्व स्तर पर ग़रीबी एवं निरक्षरता को कम करने का प्रयास करना चाहिए।
  • आतंकवादी गतिविधियों को रोकने के लिए विभिन्न देशों को कानून बनाने चाहिएं।

प्रश्न 11.
विश्व की सुरक्षा की दृष्टि से किन्हीं चार खतरों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विश्व की सुरक्षा की दृष्टि से चार खतरे निम्नलिखित हैं

  • अकाल, महामारी एवं प्राकृतिक आपदा
  • अभाव तथा भय
  • वैश्विक तापवृद्धि तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद
  • एड्स तथा बर्ड फ्लू।

प्रश्न 12.
वैश्विक ग़रीबी पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
विश्व में आज सबसे बड़ी समस्याओं में से एक वैश्विक ग़रीबी है। यद्यपि ग़रीबी सम्पूर्ण विश्व में पाई जाती है। परन्तु विकासशील तथा नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों में यह अधिक खतरनाक रूप में विद्यमान है। अधिकांश विकासशील देशों में लोगों को खाद्य पदार्थ प्राप्त नहीं हैं, जिसके कारण उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। विभिन्न देशों में रोजगार के अवसर सीमित हैं, जिसके कारण सभी लोगों को रोज़गार नहीं मिल पाता।

अत: वे लोग ग़रीबी की अवस्था में जीवन बिताने के लिए विवश रहते हैं। वर्तमान समय में लगभग 1.2 बिलियन जनसंख्या को प्रतिदिन केवल एक डॉलर पर ही गुजारा करना पड़ता है। इस आंकड़े से विश्व में गरीबी की भयंकर स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ग़रीबी के कारण विकासशील देशों के लोगों को कुपोषण, भुखमरी तथा महामारी इत्यादि से समय-समय पर जूझना पड़ता है। ग़रीबी के कारण लोगों में असुरक्षा की भावना पाई जाती है, तथा वे गलत कार्यों की ओर आकर्षित होने लगते हैं।

प्रश्न 13.
मानवाधिकारों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
लॉस्की के अनुसार, अधिकार सामाजिक जीवन की वे परिस्थितियां हैं जिनके बिना कोई मनुष्य अपना पूर्ण विकास नहीं कर सकता। निःसन्देह यह मानवाधिकारों की अत्यन्त व्यापक व्याख्या है। लेकिन कुछ विद्वानों का मानना है कि प्रत्येक व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताएं पूरी होनी चाहिएं। उसे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, शैक्षणिक, इत्यादि क्षेत्र में अपने स्वाभाविक विकास के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिएं। ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को नस्ल, जाति, धर्म, वंश, रंग, लिंग, भाषा इत्यादि के भेदभाव के बिना मिलने चाहिएं।

प्रश्न 14.
मानवाधिकार की चार प्रमुख श्रेणियों का वर्णन करें।
उत्तर:
1. राजनीतिक अधिकार-राजनीतिक अधिकारों में वोट का अधिकार, चुनाव लड़ने का अधिकार तथा सरकार की आलोचना करने इत्यादि का अधिकार शामिल है।

2. नागरिक अधिकार-नागरिक अधिकारों में कानून के समक्ष समानता का अधिकार, बिना भेदभाव के समान अधिकारों का अधिकार, जीवन का अधिकार तथा स्वतन्त्रता इत्यादि का अधिकार शामिल है।

3. सामाजिक आर्थिक अधिकार-इन अधिकारों में शिक्षा का अधिकार, विवाह करने एवं परिवार बनाने का अधिकार, काम का अधिकार तथा विश्राम का अधिकार इत्यादि शामिल है।

4. मानवाधिकारों की चौथी श्रेणी में जातीय व धार्मिक समूहों एवं पराधीन राष्ट्रों के अधिकार शामिल हैं।

प्रश्न 15.
भारत मानव अधिकारों का प्रबल समर्थक क्यों हैं ? कोई तीन कारण बताकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत निम्नलिखित कारणों से मानव अधिकारों का समर्थन करता है

  • आधुनिक राज्य मानव अधिकारों के बिना न तो विकास कर सकते हैं और न ही शान्ति व्यवस्था कायम कर सकते हैं।
  • मानवीय विकास एवं प्रगति के लिए मानव अधिकार आवश्यक है।
  • भारतीय विदेश नीति विश्व शान्ति एवं मानवता के उत्थान पर आधारित है, इसलिए भी भारत मानव अधिकारों का समर्थन करता है।

प्रश्न 16.
‘प्रवासन’ क्या है? प्रवासन के कोई तीन कारण लिखें।
उत्तर:
प्रवासन का अर्थ है-प्रवासन से हमारा अभिप्राय एक देश के अधिकाधिक लोगों के बेहतर जीवन, विशेष तौर पर आर्थिक अवसरों की तलाश में विकसित देशों या अन्य देशों की ओर पलायन है। परन्तु इससे प्रवासन तथा इससे सम्बन्धित अधिकारों की समस्याएं पैदा हो गई हैं। अधिकांश विकसित देश लगातार अपने प्रवासन कानूनों को जटिल बना रहे हैं ताकि प्रवासियों की संख्या को कम किया जा सके। इसके साथ-साथ प्रवासन के समय प्रवासियों को कई प्रकार के संकटों एवं मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ता है।

प्रवासन के कारण-

  • प्रवासन का प्रथम कारण रोज़गार की तलाश है।
  • जनसंख्या की वृद्धि के कारण भी प्रवासन होता है।
  • सुरक्षा मुद्दे के कारण भी प्रवासन होता है।

प्रश्न 17.
मानव सुरक्षा (Human Security) से सम्बन्धित किन्हीं चार खतरों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
1. आतंकवाद-आतंकवाद मानव सुरक्षा के खतरों का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है। वर्तमान समय में संपूर्ण विश्व की सुरक्षा आतंकवाद के कारण खतरे में है।

2. वैश्विक तापवृद्धि-वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) मानव सुरक्षा के खतरे का एक अन्य नया स्रोत है। वैश्विक तापवृद्धि के कारण विश्व का पर्यावरण लगातार खराब हो रहा है जिससे कई प्रकार की नई समस्याएँ पैदा हो रही हैं।

3. नई महामारियाँ-मानव सुरक्षा के नये खतरों के स्रोत में कुछ नई महामारियों को भी शामिल किया जा सकता है। उदाहरण के लिए बर्ड फ्लू तथा स्वाइन फ्लू ने पिछले वर्षों से विश्व-भर में आतंक मचा रखा है।

4. जनसंहार-मानव सुरक्षा के खतरों में जनसंहार को भी शामिल किया जाता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निःशस्त्रीकरण किसे कहते हैं ?
उत्तर:
नि:शस्त्रीकरण का अर्थ शारीरिक हिंसा के प्रयोग के समस्त भौतिक तथा मानवीय साधनों के उन्मूलन से है। सैनिक शक्ति से सम्बन्धित किसी भी तरह के नियन्त्रण अथवा प्रतिबन्ध लगाने के कार्य को निःशस्त्रीकरण कहा जाता है। निःशस्त्रीकरण से हथियारों की सीमा निश्चित करने या उन पर नियन्त्रण करने या उन्हें कम करने का विचार प्रकट होता है। नि:शस्त्रीकरण का अर्थ है जो भी हथियार इस समय हैं उनके प्रभाव को कम कर दिया जाए।

प्रश्न 2.
निःशस्त्रीकरण क्यों आवश्यक है ?
उत्तर:
निःशस्त्रीकरण का अर्थ है अस्त्रों-शस्त्रों का अभाव या अस्त्रों-शस्त्रों को नष्ट करना। वर्तमान में विश्व परमाणु अस्त्रों के भण्डार पर बैठा है। इसलिए निःशस्त्रीकरण आवश्यक है।

(1) शीत युद्ध के दौरान दोनों पक्षों ने अत्याधुनिक अस्त्रों-शस्त्रों का निर्माण किया है। यदि निःशस्त्रीकरण के द्वारा इन हथियारों को नष्ट न किया गया तो इसका प्रयोग मानव जाति के अस्तित्व के लिए भयावह सिद्ध होगा।

(2) विश्व के अधिकांश देश शस्त्रीकरण पर प्रतिवर्ष अरबों डालर खर्च कर देते हैं यदि यही धन विश्व में पाई जाने वाली ग़रीबी, पौष्टिक भोजन और बीमारी पर खर्च हो तो मानव जाति को इन भयानक रोगों से मुक्ति दिलाई जा सकती है।

प्रश्न 3.
निःशस्त्रीकरण के मार्ग में आने वाली तीन कठिनाइयां लिखें।
उत्तर:

  • महाशक्तियों में अस्त्र-शस्त्रों के आधुनिकीकरण के प्रति मोह का होना।
  • एक-दूसरे के प्रति अविश्वास की भावना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता।

प्रश्न 4.
वैश्वीकरण के भारत पर पड़ने वाले कोई दो प्रभाव बताओ।
उत्तर:

  • वैश्वीकरण के कारण भारत में विदेशी पूंजी निवेश बढ़ा है। इससे रोजगार के नए-नए अवसर पैदा हुए हैं।
  • वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप मुद्रा स्फीति की दर कम हुई है।

प्रश्न 5.
सुरक्षा से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
साधारण शब्दों में सुरक्षा का अर्थ खतरे या संकट से स्वतन्त्रता से लिया जाता है। परन्तु प्राचीन काल से अब तक तथा विश्व के अलग-अलग देशों में सुरक्षा का अलग-अलग अर्थ लिया जाता है।

प्रश्न 6.
सुरक्षा की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पामर व परकिन्स के अनुसार, “सुरक्षा का स्पष्ट अर्थ है, शान्ति के खतरे से निपटने के लिए उपाय करना।”

प्रश्न 7.
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का वर्णन करें।
उत्तर:
सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का सम्बन्ध मुख्य रूप से बाहरी खतरों से है। इस धारणा में एक-दूसरे को दूसरे देश के सैन्य खतरे की चिन्ता सताती रहती है। अर्थात् सुरक्षा की पारम्परिक धारणा में खतरे का स्रोत विदेशी देश होता है।

प्रश्न 8.
युद्ध की स्थिति में किसी देश के पास कितने विकल्प होते हैं ?
उत्तर:
युद्ध की स्थिति में किसी देश के पास मुख्यतः तीन विकल्प होते हैं

  • आत्मसमर्पण करना,
  • आक्रमणकारी देश की शर्ते मानना,
  • आक्रमणकारी देश को युद्ध में हराना।

प्रश्न 9.
शक्ति सन्तुलन के कोई दो महत्त्व बताएं।
उत्तर:

  • शक्ति सन्तुलन युद्ध की सम्भावना को कम करता है।
  • शक्ति सन्तुलन कमज़ोर राष्ट्रों को सुरक्षा प्रदान करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

प्रश्न 10.
गठबन्धन से आप क्या अर्थ लेते हैं ?
अथवा
गठबन्धन क्यों बनाए जाते हैं ?
उत्तर:
गठबन्धन पारम्परिक सुरक्षा की एक महत्त्वपूर्ण धारणा है। एक गठबन्धन में कई देश सम्मिलित होते हैं। गठबन्धनों को लिखित नियमों एवं उपनियमों द्वारा एक औपचारिक रूप दिया जाता है। प्रत्येक देश गठबन्धन प्रायः अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए करता है।

प्रश्न 11.
राष्ट्रीय हितों के बदलने पर निष्ठाएं भी बदल जाती हैं। उदाहरण देकर व्याख्या करें।
उत्तर:
राष्ट्रीय हितों के बदलने पर प्रायः निष्ठाएं भी बदल जाती हैं। उदाहरण के लिए 1980 के दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका ने सोवियत संघ के विरुद्ध तालिबान का समर्थन किया, परन्तु 9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने तालिबान और अलकायदा के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया।

प्रश्न 12.
नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों के सामने सुरक्षा की क्या समस्याएं आईं थीं ?
उत्तर:

  • नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों के सामने सबसे बड़ी समस्या इन देशों के भीतर उठने वाले अलगाववादी आन्दोलन थे।
  • नवस्वतन्त्रता प्राप्त देशों को अलगाववादी आन्दोलन के साथ-साथ पड़ोसी देशों के साथ पाए जाने वाले तनावपूर्ण सम्बन्धों का भी सामना करना पड़ रहा था।

प्रश्न 13.
किन दो प्रकार के खतरनाक हथियारों के निर्माण पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है ?
उत्तर:

  • जैविक हथियारों के निर्माण को रोकने के लिए 1972 में जैविक हथियार सन्धि (Biological Weapons Convention) की गई।
  • रासायनिक हथियारों के निर्माण को रोकने के लिए 1992 में रासायनिक हथियार सन्धि (Chemical Weapon Conventions) की गई।

प्रश्न 14.
एंटी बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र सन्धि (ABM) किन दो देशों के बीच हुई ?
उत्तर:
एंटी बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्र सन्धि शीत युद्ध के दौरान (1972) संयुक्त राज्य अमेरिका एवं सोवियत संघ के बीच हुई थी। इस सन्धि के द्वारा दोनों देशों ने बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्रों को रक्षा कवच के रूप में प्रयोग करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। अतः इस सन्धि ने बैलेस्टिक प्रक्षेपास्त्रों के व्यापक उत्पादन पर रोक लगा दी।

प्रश्न 15.
सुरक्षा की गैर-परंपरागत अवधारणा क्या है ?
उत्तर:
सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा के विषय में यह कहा जाता है, कि केवल राज्यों को ही सुरक्षा की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि सम्पूर्ण मानवता को सुरक्षा की आवश्यकता होती है। अतः सुरक्षा की अपारम्परिक धारणा में सम्पूर्ण मानवता को हानि पहुंचाने वाले खतरों को शामिल किया है।

प्रश्न 16.
नागरिक सुरक्षा एवं राज्य सुरक्षा में कोई दो सम्बन्ध बताएं।
उत्तर:

  • नागरिक सुरक्षा एवं राज्य सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक हैं।
  • राज्य सुरक्षा पर नागरिक सुरक्षा को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

प्रश्न 17.
विश्व सुरक्षा की धारणा की उत्पत्ति के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • विश्व को निरन्तर वैश्विक तापन, आतंकवाद, महामारियां तथा गृहयुद्ध की समस्याओं ने विश्व सुरक्षा की धारणा पैदा की है।
  • इन समस्याओं का सामना कोई एक देश अकेले नहीं कर सकता, अतः सभी देशों ने मिलकर विश्व सुरक्षा का दायित्व लिया है।

प्रश्न 18.
‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ से आप क्या लेते हैं ?
उत्तर:
‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ उन्हें कहा जाता है, जो अपने मूल निवास से तो विस्थापित हो चुके हों परन्तु, उन्होंने उसी देश में किसी अन्य भाग पर शरणार्थी के रूप में रहना शुरू कर दिया है। कश्मीरी पण्डित ‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन माने जाते हैं।’

प्रश्न 19.
मैड काऊ (Mad Cow) की घटना के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1990 के दशक में इंग्लैण्ड में जानवरों में फैलने वाली बीमारी को मैड काऊ (Mad Cow) कहा जाता है। इस महामारी के कारण इंग्लैण्ड को बहुत अधिक आर्थिक हानि उठानी पड़ी।

प्रश्न 20.
क्योटो प्रोटोकोल की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैश्विक तापन की समस्या से निपटने के लिए 1997 में भारत सहित कई देशों ने क्योटो प्रोटोकोल पर हस्ताक्षर किये थे। क्योटो प्रोटोकोल के अनुसार ग्रीन हाऊस गैस के उत्सर्जन को कम करने के लिए दिशा-निर्देश जारी किये गए थे।

प्रश्न 21.
स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
विश्व के अधिकांश देशों को आज स्वास्थ्य से सम्बन्धित समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पिछले कुछ वर्षों में लगभग 20 मिलियन लोगों की मृत्यु ऐसी बीमारियों से हुई, जिनका इलाज सम्भव था, इससे स्पष्ट है कि आर्थिक सम्पन्नता, चिकित्सा एवं वैज्ञानिक उन्नति का सभी लोगों को फायदा नहीं मिल रहा। आज भी विकासशील देशों के लोग चेचक, हैजा, प्लेग तथा एड्स जैसी बीमारियों से पीड़ित हैं।

प्रश्न 22.
विश्व स्तर पर शिक्षा की समस्या पर नोट लिखें।
उत्तर:
वर्तमान समय में विश्व के सभी लोगों को शिक्षा देना भी एक गम्भीर समस्या बनी हुई है। विश्व के अधिकांश देशों विशेषकर विकासशील देशों में बहुत अधिक निरक्षरता पाई जाती है। अशिक्षित व्यक्ति चालाक लोगों की बातों में आकर गलत कार्य करने लगते हैं। इसीलिए संयुक्त राष्ट्र संघ के एक महत्त्वपूर्ण अभिकरण यूनेस्को ने विश्व स्तर पर शिक्षा की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

प्रश्न 23.
‘प्रवासन’ (माइग्रेशन) का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
प्रवासन से हमारा अभिप्राय एक देश के अधिकाधिक लोगों के बेहतर जीवन, विशेष तौर पर आर्थिक अवसरों की तलाश में विकसित देशों या अन्य देशों की ओर पलायन है। परन्तु इससे प्रवासन तथा इससे सम्बन्धित अधिकारों की समस्याएं पैदा हो गई हैं। अधिकांश विकसित देश लगातार अपने प्रवासन कानूनों को जटिल बना रहे हैं ताकि प्रवासियों की संख्या को कम किया जा सके। इसके साथ-साथ प्रवासन के समय प्रवासियों को कई प्रकार के संकटों एवं मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ता है।

प्रश्न 24.
‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जो लोग अपना घर-बार छोड़कर राष्ट्रीय सीमा के अन्दर ही कहीं और रहते हों, उन्हें ‘आन्तरिक रूप से विस्थापित जन’ कहते हैं ।

प्रश्न 25.
मानव सुरक्षा का (Human Security) किसे कहते हैं ?
उत्तर:
मानव सुरक्षा का अर्थ है कि एक व्यक्ति की हर प्रकार से रक्षा की जाए, अर्थात् व्यक्ति की गरीबी, भूख, बेरोज़गारी तथा आतंक से रक्षा की जाए।

प्रश्न 26.
युद्ध से आप क्या अर्थ लेते हैं ? इसके क्या परिणाम होते हैं ?
उत्तर:
दो या दो से अधिक देशों के बीच विनाशकारी अस्त्रों-शस्त्रों से होने वाले झगड़े को युद्ध की संज्ञा दी जाती है। युद्ध के परिणामस्वरूप अत्यधिक विनाश एवं जान माल की क्षति होती है। युद्ध के कारण कई लोग विकलांगता के शिकार हो जाते हैं तथा महिलाएं विधवा हो जाती हैं। अधिकांश लोगों को कई प्रकार की बीमारियां जकड़ लेती हैं। युद्ध के परिणामस्वरूप शहर के शहर तथा गांव के गांव नष्ट हो जाते हैं।

प्रश्न 27.
संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की घोषणा कब की ? किन्हीं दो मानवाधिकारों के नाम लिखो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की घोषणा 10 दिसम्बर, 1948 को की। दो महत्त्वपूर्ण मानवाधिकारों के नाम इस प्रकार हैं

  • जीवन की सुरक्षा तथा स्वतन्त्रता का अधिकार।
  • विवाह करने एवं पारिवारिक जीवन का अधिकार।

प्रश्न 28.
गठबन्धन मुख्य रूप से किस पर आधारित होता है ?
उत्तर:
गठबन्धन प्रायः राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं तथा राष्ट्रीय हितों के बदलने पर गठबन्धन भी बदल जाते हैं।

प्रश्न 29.
परम्परागत सुरक्षा के किन्हीं चार तत्त्वों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
परम्परागत सुरक्षा के चार तत्त्वों का उल्लेख इस प्रकार है

  • निःशस्त्रीकरण-बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक निःशस्त्रीकरण है।
  • शस्त्र नियन्त्रण-शस्त्र नियन्त्रण द्वारा भी बाहरी खतरों को कम किया जा सकता है।
  • सन्धियां-बाहरी खतरों से सम्बन्धित परम्परागत सुरक्षा की धारणा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटक नि:शस्त्रीकरण।
  • विश्वास बहाली–दो या दो से अधिक देशों द्वारा परस्पर विश्वास बहाली के प्रयासों द्वारा भी बाहरी खतरों को कम किया जा सकता है।

प्रश्न 30.
वर्तमान में विश्व के समक्ष किन्हीं चार प्रमुख खतरों के नाम लिखें।
अथवा
किन्हीं चार विश्वव्यापी खतरों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • अकाल, महामारी, प्राकृतिक आपदाओं,
  • अभाव तथा भय,
  • वैश्विक तापवृद्धि तथा अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद,
  • एड्स तथा बर्ड फ्लू से खतरा है।

प्रश्न 31.
विश्वास बहाली की प्रक्रिया से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
विश्वास की बहाली से हमारा अभिप्राय परस्पर प्रतिद्वंद्विता वाले राष्ट्रों के द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र का विश्वास प्राप्त करने के प्रयत्न करने से है। इसके द्वारा परस्पर विरोधी राष्ट्रों में हिंसात्मक गतिविधियों को कम किया जा सकता है। इसके अन्तर्गत विभिन्न राष्ट्र सैन्य टकराव और प्रतिद्वंद्विता को टालने के उद्देश्य से सूचनाओं तथा विचारों का नियमित आदान-प्रदान करते हैं। ऐसे राष्ट्र अपने सैन्य उद्देश्य व लक्ष्य तथा सीमित मात्रा में सामरिक योजनाओं के विषय में भी जानकारी उपलब्ध करवाते हैं।

प्रश्न 32.
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ था?
उत्तर:
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला 13 दिसम्बर, 2001 को हुआ था।

प्रश्न 33.
भारत की सुरक्षा नीति के कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:
भारत दक्षिण एशिया का एक महत्त्वपूर्ण देश है। भारत को पारम्परिक और अपारम्परिक दोनों प्रकार के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। अत: भारत ने सरक्षा की दृष्टि से कछ महत्त्वपूर्ण प्रयास किए हैं।

(1) भारत ने अपनी सैन्य शक्ति को मज़बूत बनाया है तथा लगातार उसे आधुनिक बनाने में लगा हुआ है। भारत के दो महत्त्वपूर्ण पड़ोसियों के पास परमाणु हथियार हैं। अतः अपनी सुरक्षा के लिए भारत ने भी परमाणु हथियारों का निर्माण किया है।

(2) भारत ने सुरक्षा की दृष्टि से अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं एवं कानूनों को और अधिक प्रभावशाली बनाने का प्रयास किया है।

प्रश्न 34.
युद्ध की स्थिति में किसी देश के पास मुख्य विकल्प क्या होते हैं ?
उत्तर:

  • युद्ध के आक्रमणकारी देश को हराना।
  • समर्थक न होने पर आत्म-समर्पण कर देना।

वस्तुनिष्ठ

1. सुरक्षा का अर्थ है
(A) अधीनता से आजादी
(B) खतरे से आज़ादी
(C) समानता से आजादी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(B) खतरे से आज़ादी।

2. वर्तमान समय में मानव जाति को किससे खतरा है ?
(A) परमाणु हथियारों से
(B) आतंकवाद से
(C) प्राकृतिक आपदाओं से
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. 11 सितम्बर, 2001 को किस देश पर आतंकवादी हमला हुआ ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) रूस
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका।
उत्तर:
(D) संयुक्त राज्य अमेरिका।

4. भारत के कितने पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार हैं ?
(A) 2
(B) 4
(C) 5
(D) 6.
उत्तर:
(A) 2.

5. भारत समर्थन करता है ?
(A) युद्ध का
(B) निःशस्त्रीकरण का
(C) आतंकवाद का
(D) परमाणु हथियारों का।
उत्तर:
(B) नि:शस्त्रीकरण का।

6. व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (C.T.B.T.) पर हस्ताक्षर करने की शुरुआत किस वर्ष हुई ?
(A) 1996
(B) 1998
(C) 2000
(D) 2002.
उत्तर:
(A) 1996.

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

7. भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ ?
(A) जनवरी, 2001
(B) मार्च, 2001
(C) जून, 2001
(D) दिसम्बर, 2001.
उत्तर:
(D) दिसम्बर, 2001.

8. विश्व की सुरक्षा को किससे खतरा है ?
(A) आतंकवाद से
(B) ग़रीबी से
(C) परमाणु शस्त्रों से
(D) उपरोक्त सभी से।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी से।

9. वैश्विक सुरक्षा को किससे खतरा है ?
(A) आतंकवाद से
(B) ग़रीबी से
(C) शस्त्रीकरण से
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

10. सीमित परमाणु परीक्षण संधि (L.T.B.T.) किस वर्ष की गई ?
(A) सन् 1963 में
(B) सन् 1965 में
(C) सन् 1970 में
(D) सन् 1975 में।
उत्तर:
(A) सन् 1963 में।

11. परमाणु अप्रसार संधि (N.P.T.) कब की गई ?
(A) सन् 1965 में
(B) सन् 1968 में
(C) सन् 1970 में
(D) सन् 1971 में।
उत्तर:
(B) सन् 1968 में।

12. शक्ति सन्तुलन स्थापित करने के तरीके हैं
(A) गठजोड़
(B) निःशस्त्रीकरण
(C) क्षतिपूर्ति
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

13. विश्व में उभरने वाला खतरे का नया स्त्रोत है
(A) एड्स
(B) आतंकवाद
(C) स्वाइन फ्लू
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

14. किस देश ने अभी तक ‘व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध संधि’ (C.T.B.T.) पर हस्ताक्षर नहीं किये हैं?
(A) ब्रिटेन
(B) फ्रांस
(C) भारत
(D) अमेरिका।
उत्तर:
(C) भारत।

15. “सुरक्षा का अर्थ है शान्ति के खतरे से निपटने के लिए उपाय करना।” यह कथन किसका है ?
(A) लॉस्की
(B) पामर व परकिन्स
(C) सेबाइन
(D) बेंथम।
उत्तर:
(B) पामर व परकिन्स।

16. निम्नलिखित सैन्य संगठन अभी भी मौजूद है :
(A) नाटो (NATO)
(B) सीटो (SEATO)
(C) वारसा पैक्ट (Warsaw Pact)
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) नाटो (NATO).

17. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) द्वारा मानव-अधिकारों की घोषणा कब की गई ?
(A) 10 दिसम्बर, 1948 को
(B) 15 अगस्त, 1947 को
(C) 24 अक्तूबर, 1945 को
(D) 1 मई, 1950 को।
उत्तर:
(A) 10 दिसम्बर, 1948 को।

18. ‘आतंकवाद’ सुरक्षा के लिये किस प्रकार का खतरा है ?
(A) परम्परागत खतरा
(B) अपरम्परागत खतरा
(C) उपरोक्त दोनों
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) अपरम्परागत खतरा।

19. “अन्तिम ग़रीबी समस्त मानव समुदाय के लिए बड़ी समस्या है।” यह कथन किसका है ?
(A) बान की मून
(B) कौफी अन्नान
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(B) कौफी अन्नान।

20. निम्नलिखित में से कौन-सा सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का उपाय नहीं है ?
(A) प्रतिरक्षा
(B) शक्ति सन्तुलन
(C) असीमित सत्ता
(D) नि:शस्त्रीकरण।
उत्तर:
(C) असीमित सत्ता।।

21. पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पुलवामा में आतंकी हमला कब किया ?
(A) 14 फरवरी, 2019
(B) 4 फरवरी, 2018
(C) 14 फरवरी, 2017
(D) 14 फरवरी, 2016.
उत्तर:
(A) 14 फरवरी, 2019.

22. भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकाने बालाकोट पर कब हमला किया ?
(A) 26 फरवरी, 2019
(B) 26 फरवरी, 2018
(C) 26 फरवरी, 2017
(D) 26 फरवरी, 2016.
उत्तर:
(A) 26 फरवरी, 2019.

23. आन्तरिक सुरक्षा को कौन-सा तत्व प्रभावित करता है ?
(A) अलगाववाद
(B) आतंकवाद
(C) भूमि-पुत्र का सिद्धान्त
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

24. भारत में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की स्थापना कब हुई ?
(A) 1993 में
(B) 1994 में
(C) 1990 में
(D) 1996 में।
उत्तर:
(A) 1993 में।

25. मानववाद के प्रति भारत का दृष्टिकोण
(A) सकारात्मक रहा है
(B) विरोधी रहा है
(C) उदासीन रहा है
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) सकारात्मक रहा है।

26. निम्नलिखित में से कौन-सा सुरक्षा की पारम्परिक धारणा का उपाय नहीं है?
(A) प्रतिरक्षा
(B) शक्ति सन्तुलन
(C) असीमित सत्ता
(D) निःशस्त्रीकरण।
उत्तर:
(C) असीमित सत्ता।

27. भारत ने प्रथम परमाणु परीक्षण कब किया?
(A) 1974 में
(B) 1978 में
(C) 1980 में
(D) 1985 में।
उत्तर:
(A) 1974 में।

28. निम्न में से एक विश्वव्यापी खतरा है ?
(A) आतंकवाद
(B) वैश्विक तापवृद्धि
(C) विश्वव्यापी ग़रीबी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

29. सुरक्षा की पारम्परिक अवधारणा का अभिप्राय है ?
(A) शक्ति सन्तुलन
(B) सैन्य संगठनों का निर्माण
(C) निःशस्त्रीकरण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

30. संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की घोषणा की।
(A) सन् 1945 में
(B) सन् 1947 में
(C) सन् 1948 में
(D) सन् 1950 में।
उत्तर:
(C) सन् 1948 में।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 समकालीन विश्व में सरक्षा

31. भारत समर्थन करता है।
(A) युद्ध का
(B) आतंकवाद का
(C) परमाणु हथियारों का
(D) नि:शस्त्रीकरण का।
उत्तर:
(D) नि:शस्त्रीकरण का।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) सुरक्षा का अर्थ ……………. से आजादी है।
उत्तर:
खतरे

(2) भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला सन् ……….. में हुआ।
उत्तर:
2001

(3) भारत की गरीबी का एक मुख्य कारण उसकी ………… जनसंख्या है।
उत्तर:
बढ़ती

(4) भारत निःशस्त्रीकरण का ………… करता है।
उत्तर:
समर्थन

(5) विश्व में …………. ‘मानव अधिकार दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
उत्तर:
10 दिसम्बर

(6) भारत की ग़रीबी का मुख्य कारण उसकी बढ़ती हुई ………….. है।
उत्तर:
जनसंख्या

(7) …………… वैश्विक सुरक्षा के लिए एक खतरा है।
उत्तर:
आतंकवाद

(8) विश्व में …………… अपनी सुरक्षा पर सबसे अधिक धन खर्च करता है।
उत्तर:
अमेरिका।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की घोषणा कब की ?
उत्तर:
10 दिसम्बर, 1948 को।

प्रश्न 2.
वर्तमान में विश्व के समक्ष प्रमुख खतरा कौन-सा है ?
उत्तर:
आतंकवाद।

प्रश्न 3.
क्या एड्स व बर्ड-फ्लू विश्व-सुरक्षा के लिए कोई खतरा है या नहीं ?
उत्तर:
एड्स व बर्ड-फ्लू विश्व-सुरक्षा के लिए गम्भीर खतरा है।

प्रश्न 4.
विश्व सुरक्षा का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
विश्व सुरक्षा का अर्थ है, विश्व की खतरों से मुक्ति।

प्रश्न 5.
‘क्षेत्रीय सुरक्षा’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
किसी क्षेत्र विशेष की रक्षा को क्षेत्रीय सुरक्षा कहा जाता है।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन एवं उसमें भारत की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य युद्धों को रोक कर विश्व में शान्ति की स्थापना करना है। पिछले कुछ वर्षों से विश्व राजनीति में बहत महत्त्वपूर्ण परिव मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र संघ में भी बदलावों की मांग की जा रही है, क्योंकि बदलते परिवेश में संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यप्रणाली तथा इसके अंगों में कुछ दोष उत्पन्न हो गए, जिन्हें दूर करना आवश्यक है। इसीलिए समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न अंगों में पुनर्गठन की मांग की जाती रही है।

1. सुरक्षा परिषद् का पुनर्गठन-संयुक्त राष्ट्र संघ के जिस अंग में सबसे अधिक सुधारों की मांग या पुनर्गठन की बात की जा रही है, वह है, सुरक्षा परिषद् । वास्तव में यह सुरक्षा परिषद् ही है, जहां सदस्य देशों को समान अधिकार नहीं मिले हैं। सरक्षा परिषद में वर्तमान समय में कल 15 सदस्य देश हैं, जिनमें से 5 स्थाई तथा 10 अस्थाई देश हैं। पांच स्थाई देशों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन) को वीटो का अधिकार प्राप्त है जोकि अन्य देशों को प्राप्त नहीं है।

प्राय: यह कहा जाता है कि सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ी, जिस अनुपात में महासभा की संख्या बढ़ी है। अतः सुरक्षा परिषद् में और सदस्यों को शामिल किए जाने की माँग की जाती रही है। विश्व के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण देश जैसे भारत, जर्मनी, जापान तथा ब्राज़ील स्थाई सदस्यता के लिए समय-समय पर अपना दावा पेश करते रहें, परन्तु पांचों स्थाई देश ऐसे किसी भी प्रसार का विरोध कर रहे हैं। कुछ सदस्य देशों का तर्क है कि वीटो की धारणा को समाप्त करना चाहिए, परन्तु स्थाई देश इस पर भी सहमत नहीं है। सदस्यता बढ़ाने के साथ साथ सुरक्षा परिषद् में प्रक्रियात्मक, कार्यप्रणाली, पारदर्शिता तथा उत्तरदायी सुधारों की भी आवश्यकता है।

2. महासभा का पुनर्गठन-संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा एक अन्य महत्त्वपूर्ण अंग है। यद्यपि महासभा में सभी 193 सदस्य देशों को समान अधिकार प्राप्त हैं, परन्तु फिर भी इसमें समय-समय पर सुधारों की मांग उठती रही है। रष्ट्र संघ के भतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने यह सझाव दिया है कि महासभा में सर्वसम्मति की प्रक्रिया को समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ देश अपने विचारों को दूसरों पर थोपने का प्रयास करते हैं। इसके साथ-साथ कोफी अन्नान ने महासभा के प्रस्तावों को लागू करने, महासभा के अध्यक्ष को अधिक शक्तिशाली बनाने पर भी जोर दिया।

3. मानव अधिकार परिषद्-संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग का निर्माण किया था, परन्तु समय-समय पर अमेरिका जैसे देशों ने इस आयोग को बदनाम करने का प्रयास किया। तत्पश्चात् भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने मानवाधिकार आयोग को समाप्त करके एक छोटे परन्तु दृढ़ मानव अधिकार परिषद् की स्थापना की बात कही। इसके आधार पर एक 47 सदस्यीय मानवाधिकार परिषद् बनाई गई।

4. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सेना सम्बन्धी प्रस्ताव-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य युद्धों को रोक कर विश्व में शान्ति बनाए रखना है। परन्तु इसकी अपनी स्थायी सेना नहीं है। संकट के समय यह सदस्य देशों की शान्ति सेना का निर्माण करता है, परन्तु इस प्रकार शान्ति सेना के निर्माण की प्रक्रिया में काफ़ी समय लग जाता है तथा संकट और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए कई विद्वान् समय-समय पर यह विचार देते रहे कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी एक स्थाई सेना होनी चाहिए, जो संकट आने पर जल्दी कार्यवाही कर सके।

भारत की स्थिति-ऊपर जितने भी पुनर्गठन एवं सुधारों की चर्चा की गई है, उन सभी में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका एवं स्थिति है, या हो सकती है। भारत सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता का एक मज़बूत उम्मीदवार है और कई देश इसका समर्थन भी कर रहे हैं। महासभा के पुनर्गठन में भारत अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति दर्ज करा सकता है। नई मानवाधिकार परिषद् के 47 सदस्यों में से एक भारत भी है और यदि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सेना की धारणा वास्तविकता में बदलती है, तो भारत उसमें भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।

प्रश्न 2.
विश्व राजनीति में उभरे नए अन्तर्राष्ट्रीय पात्रों की व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व राजनीति में कुछ नए अन्तर्राष्ट्रीय पात्रों का उदय हुआ है, जिन्हें हम अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों एवं स्वयं सेवी संगठनों (N.G.O.) के रूप में पहचान सकते हैं।

1. अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठन (International Economic Organisation):
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरे नये अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों का वर्णन इस प्रकार है

(1) गैट समझौता (Gatt Agreement):
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् गैट समझौते को सबसे पहला आर्थिक समझौता कहा जा सकता है। गैट समझौते की शुरुआत 1947 में हुई। इसे डंकल समझौता भी कहा जाता है।

(2) विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation-W.T.O.):
1 जनवरी, 1995 को गैट समझौते का स्थान विश्व व्यापार संगठन ने ले लिया। वर्तमान समय में इसकी सदस्य संख्या 161 है। यह संगठन विश्व स्तर पर व्यापार के नियमों को निश्चित करता है।

(3) यूरोपीयन संघ (European Union):
यूरोपीयन संघ यूरोप का एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 1992 में की गई। आज युरोपीयन संघ को विश्व में प्रभावशाली आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जाता है।

(4) आसियान (ASEAN):
आसियान, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का एक क्षेत्रीय आर्थिक संगठन है। इसकी स्थापना 1967 में की गई। आसियान का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास की गति में तेजी लाना है।

(5) सार्क (SAARC):
सार्क अर्थात् दक्षिण-एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन, दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक संगठन है। इसकी स्थापना 1985 में की गई। सार्क का उद्देश्य सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।

2. गैर-सरकारी संगठन (Non-Governmental Organisation-N.G.0.):
गैर-सरकारी संगठनों को भी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरे नये पात्रों के रूप में पहचाना जाता है। गैर-सरकारी संगठन उन्हें कहा जाता है, जो सरकार के संगठन के भाग नहीं होते। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुच्छेद 71 के अनुसार, “गैर-सरकारी संगठन वह है, जो न सरकार है और न ही सदस्य राज्य, उनकी भूमिका केवल सलाहकारी होती है।”

गैर-सरकारी संगठनों को 20वीं शताब्दी में अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ, जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियां एवं समझौते तथा विश्व व्यापार संगठन पूंजीवादियों के पक्ष में कार्य कर रहे हैं, तब इसके प्रति सन्तुलन के लिए मानववादी मुद्दों, पोषणकारी विकास तथा विकासशील देशों की सहायता के लिए गैर-सरकारी संगठनों का उदय हुआ। कुछ महत्त्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन इस प्रकार हैं

(1) अन्तर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसायटी (International Red Cross Society):
अन्तर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसायटी एक महत्त्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन है। इसका मुख्य कार्य युद्ध एवं संकट के समय असहाय लोगों की मदद करना है।

(2) एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International):
एमनेस्टी इंटरनेशनल एक अन्य महत्त्वपूर्ण गैर सरकारी संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिपोर्ट तैयार एवं प्रकाशित करवाता है।

(3) ह्यमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch):
ह्यमन राइट्स वॉच भी एक गैर-सरकारी संगठन है, जिसका मुख्य कार्य मानवाधिकारों की अवहेलना की ओर विश्वभर के मीडिया का ध्यान आकर्षित करवाना है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 24 अक्तूबर, 1945 को अनेक प्रयासों के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारंभिक सदस्य बना। संयुक्त राष्ट्र चार्टर अथवा संविधान में प्रस्तावना के अतिरिक्त 111 अनुच्छेद हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों, नियमों, अंगों तथा इनकी शक्तियों और क्षेत्राधिकारों का उल्लेख है।

संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य (Objectives of the United Nations):
संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना में ही इस संगठन के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। प्रस्तावना में एक आदर्श और गरिमामय विश्व समाज की स्थापना की बात कही गयी है। प्रस्तावना में कहा गया है कि, “हम संयुक्त राष्ट्र के लोग आने वाली पीढ़ियों को उस भावी-विश्व युद्ध से बचाएंगे जिसने हमारे जीवन काल में ही दो बार मानव जाति पर बहुत अधिक अत्याचार किए हैं। हम मनुष्यों के मूल अधिकारों, व्यक्ति के सम्मान और छोटे-बड़े सब राष्ट्र के नर-नारियों के समान अधिकारों में फिर से श्रद्धा बनाएंगे।

हम ऐसा वातावरण उत्पन्न करेंगे जिससे न्याय स्थापित हो सके और अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा संधियों के लिए आदर की भावना बढ़ सके। हम अधिक व्यापक स्वतन्त्रता के द्वारा अपने जीवन स्तर को ऊंचा करेंगे और समाज को प्रगतिशील बनाएंगे तथा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सहिष्णुता और शान्तिपूर्वक अच्छे पड़ोसियों के समान रहने के लिए तथा इस बात को निश्चित करने के लिए कि सैनिक बल प्रयोग सामान्य हित के अतिरिक्त अन्य किसी अवसर पर नहीं किया जाएगा तथा अन्तर्राष्ट्रीय यन्त्र के सब जातियों को आर्थिक सामाजिक उन्नति में प्रयोग करने के लिए यह दृढ निश्चय करते हैं कि उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमेशा सहयोग प्रदान करेंगे।

इसलिए हमारी सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस घोषणा-पत्र को स्वीकार किया है और हम एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना करते हैं जो संयुक्त राष्ट्र के नाम से प्रसिद्ध होगा।” चार्टर के अनुच्छेद एक में संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त सम्बन्धी मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना, आर्थिक, सामाजिक अथवा मानवतावादी स्वरूप पर आश्रित अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना तथा इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के निमित्त एक केन्द्र का कार्य करना।

सानफ्रांसिस्को में आयोजित सम्मेलन में इस उद्देश्य के लिए नियुक्त समिति ने इसके चार उद्देश्य बतलाए

(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना तथा आक्रामक कार्यवाही को रोक कर शान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करना और शान्तिपूर्वक उपायों से उन विवादों का हल निकालना।

(2) विविध राष्ट्रों के बीच समान अधिकार, स्वाभिमान तथा जनता के आत्म-निर्णय के अधिकार के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना तथा विश्वशान्ति को सुदृढ़ करने के लिए विविध उपाय करना।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना तथा मानव अधिकारों तथा मूलभूत स्वाधीनता के अधिकार तथा जाति, रंग, भाषा, धर्म तथा लिंग के आधार पर भेदभाव को मिटाने के लिए प्रयास करना तथा इस दिशा में किये जाने वाले प्रयासों को प्रोत्साहित करना।

(4) उपर्युक्त उद्देश्यों के लिए तथा उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विविध राष्ट्रों के प्रयासों के बीच सामंजस्य की स्थापना के उद्देश्य से एक केन्द्र का कार्य करना। संयक्त राष्ट द्वारा विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति-संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अत्यन्त आदर्शात्मक, व्यापक तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सहयोग को बढ़ावा देने वाले हैं।

लेकिन अपनी स्थापना से लेकर अब तक संयुक्त राष्ट्र को अपने उद्देश्यों की प्राप्ति से आशानुरूप सफलता प्राप्त नहीं हुई है। विशेष रूप से राजनीतिक विषयों पर तो संयुक्त राष्ट्र महाशक्तियों के द्वन्द्व का शिकार होकर रह गया है।महाशक्तियों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए न तो संयुक्त राष्ट्र की कभी चिन्ता की और न अब कर रही है।

लेकिन गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र की सफलता उल्लेखनीय रही है। बीमारियों को दूर करने, मानवाधिकारों की रक्षा, वैज्ञानिक शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रयास सराहनीय रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्त-इसके लिए प्रश्न नं० 4 देखें।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या करो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की प्रस्तावना और अनुच्छेद 1 में संघ के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। लेकिन उद्देश्यों का उल्लेख कर देना ही पर्याप्त नहीं होता। इनकी प्राप्ति के लिए यह भी आवश्यक था कि सदस्यों के मार्ग. दर्शन के लिए कुछ सिद्धान्तों का उल्लेख चार्टर में किया जाता। अत: अनुच्छेद 2 में इन प्रमुख सिद्धान्तों की व्यवस्था । की गई है।

ये सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय आधार के उन नियमों की तरह हैं जो संयुक्त राष्ट्र और उनके सदस्य राज्यों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। अनुच्छेद 2 में स्पष्ट कहा गया है कि अनुच्छेद 1 में दिए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संघ और उसके सदस्य निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार कार्य करेंगे

(1) संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की प्रभुसत्ता की समानता के आधार पर की गई है।

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अन्तर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे ताकि निर्धारित अधिकारों की प्राप्ति सभी को हो सके।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य राज्य अपने विवादों का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग तथा इस प्रकार करेंगे कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा और न्याय को किसी प्रकार का भय न हो।

(4) सभी सदस्य राष्ट्र अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्ता को आघात पहुंचाने वाला कार्य नहीं करेंगे। इसके साथ ही वे कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जो संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र और उद्देश्यों के विपरीत या असंगत हो।

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र के अन्तर्गत लिए गए किसी कार्य के सन्दर्भ में सभी प्रकार की सहायता देंगे अर्थात् उस राष्ट्र की मदद नहीं करेंगे जिसके विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ कोई निरोधात्मक अथवा प्रतिरोधात्मक कार्यवाही कर रहा हो।

(6) विश्व-शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपेक्षित उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ इस बात का प्रयास करेगा कि वे सभी राष्ट्र जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं, घोषणा-पत्र के आधार पर आधारभूत सिद्धान्तों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं।

(7) संयुक्त राष्ट्र संघ किसी भी राज्य के ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जो उसके आन्तरिक हैं, न यह कोई भी कार्य करेगा, जिसको धमकी या दबाव कहा जा सके।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंग कौन-कौन से हैं ? उनकी रचना तथा उनके मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंर्गों का वर्णन करें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् के संगठन, शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर अनुसार 6 मुख्य अंग हैं जिनके द्वारा संघ अपने बहुमुखी कर्तव्यों को पूरा करता है। ये अंग हैं-महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्, ट्रस्टीशिप कौंसिल, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय . तथा सचिवालय। इन अंगों के संगठन, शक्तियों तथा कामों का विवरण नीचे दिया जा रहा है

1. महासभा (The General Assembly):
महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे बड़ा तथा मुख्य चार्टर अंग है। यह एक प्रकार की विश्व संसद् है जिसका मुख्य काम विचार-विमर्श करना है। रचना (Composition) महासभा में संयुक्त राष्ट्र संघ के सारे सदस्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 देश सदस्य हैं। इन 193 देशों के प्रतिनिधियों को मिलाकर महासभा बनती है। हर सदस्य देश इसमें अपने 5 प्रतिनिधि भेज सकता है, परन्तु हर देश का एक ही मत होता है। इसके कार्य तथा शक्तियां (Its power and Functions)-महासभा के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

1. निर्वाचित कार्य-महासभा 2/3 बहुमत से सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों को दो साल के लिए चुनती है। महासभा आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के सदस्य भी चुनती है। यह ट्रस्टीशिप कौंसिल के कुछ सदस्य चुनती है। सुरक्षा परिषद् तथा महासभा अलग-अलग मत प्रयोग करके अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जजों का चुनाव करती है। महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सचिव को नियुक्त करती है।

2. विचारशील कार्य-महासभा का सबसे महत्त्वपूर्ण काम चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना तथा उसके आधार पर सिफ़ारिश करना है।

3. अन्य अंगों पर नियन्त्रण महासभा संयुक्त राष्ट्र के दूसरे अंगों एजेन्सियों पर नियन्त्रण करती है तथा उनके कार्यों का नियन्त्रण करती है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग महासभा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शिक्षा-सम्बन्धी क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए विचार करके सुझाव दे सकती है।

5. बजट-संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट की ज़िम्मेदारी महासभा पर है। महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट पर विचार करती है, उसको पास करती है।

6. संशोधन कार्य-संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में महासभा 2/3 बहुमत से संशोधन करने की सिफ़ारिश कर सकती है।

2. सुरक्षा परिषद् (The Security Council):
सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यपालिका के समान है। चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाने की ज़िम्मेदारी सुरक्षा परिषद् पर है। रचना (Composition)-सुरक्षा परिषद् के कुल 15 सदस्य होते हैं। ये सदस्य दो प्रकार के होते हैं-स्थायी और अस्थायी। पांच सदस्य स्थायी हैं-ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और साम्यवादी चीन। इसके 10 अस्थायी सदस्य दो वर्षों के लिए महासभा चुनती है।

वोट डालने की विधि (Voting Procedure)-सुरक्षा परिषद् में प्रत्येक सदस्य को एक मत डालने का अधिकार दिया गया है। सुरक्षा परिषद् में कार्य-विधि के मामलों (Procedural matters) में जैसे कार्य सूची (Agenda) को तैयार करने के लिए 15 में से कम-से-कम 9 सदस्यों के मत पक्ष में होने चाहिएं, परन्तु अन्य सभी मामलों के लिए 9 मतों में 5 बड़ी शक्तियों अर्थात् अमेरिका, साम्यवादी चीन, रूस, फ्रांस तथा ग्रेट ब्रिटेन के मत अवश्य ही शामिल होने चाहिएं।

सुरक्षा परिषद् के कार्य तथा शक्तियां (Functions and Powers of the Security Council):
संयुक्त राष्ट्र के अंगों में सुरक्षा परिषद् का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके मुख्य कार्य तथा शक्तियां निम्नलिखित हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बनाए रखना,
  • संयुक्त राष्ट्र के नए सदस्यों का चुनाव, 3 संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन।
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् (The Economic and Social Council)

आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् की स्थापना की गई है।

3. रचना (Composition):
आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् की सदस्य संख्या 54 है। ये सदस्य महासभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से तीन वर्ष के लिए चुने जाते हैं और एक-तिहाई सदस्य प्रति वर्ष रिटायर हो जाते हैं। हर सदस्य देश को एक वोट का अधिकार होता है और इस परिषद् के निर्णय साधारण बहुमत से किये जाते हैं।

इसके कार्य (Its Functions) आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के कार्यों का वर्णन चार्टर के अनुच्छेद 55 में किया गया है। सामाजिक-आर्थिक परिषद् सदस्य राज्यों के बीच सामाजिक-आर्थिक सहयोग को बढ़ाने सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण गतिविधियां संचालित करती है।

4. ट्रस्टीशिप कौंसिल (The Trusteeship Council) :
ट्रस्टीशिप कौंसिल जिसने लीग की मैंडेट प्रणाली का स्थान लिया है, का उद्देश्य पिछड़े हुए देशों का विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के लिए तैयार हो सकें। इस प्रणाली के अधीन सुरक्षित प्रदेशों पर निगरानी करने के लिए संयुक्त राष्ट्र-ट्रस्टीशिप कौंसिल की स्थापना की गई। यह परिषद् तीन प्रकार के प्रदेशों की निगरानी करती है

  • वे प्रदेश, जो द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप शत्रु राज्यों से छीने गए।
  • वे प्रदेश, जो लीग के समय मैंडेट प्रणाली के अधीन थे।
  • वे प्रदेश, जो अपनी मर्जी से इस प्रणाली के अधीन किए गए।

रचना (Composition) ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् के सारे स्थाई सदस्य होते हैं। इनके अलावा सुरक्षित प्रदेशों का प्रबन्ध चलाने वाले देश भी इसके सदस्य होते हैं। इन दोनों तरह के कुल सदस्यों के बराबर महासभा इस परिषद् के लिए सदस्य चुनती है। इस परिषद् की साल में दो बैठकें होती हैं। इसके निर्णय बहुमत से होते हैं। इनके उद्देश्य तथा कार्य (Its Aims and Functions) ट्रस्टीशिप कौंसिल के चार मुख्य उद्देश्य हैं, जिनकी पूर्ति यह परिषद् करती हैं। वे अग्रलिखित हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा में वृद्धि करना।
  • सुरक्षित प्रदेशों का विकास करना ताकि वे स्वतन्त्रता के योग्य हो सकें।
  • मौलिक मानवीय अधिकारों के लिए वातावरण बनाना।
  • सामाजिक, आर्थिक तथा व्यापारिक विषयों में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों में समानता लाना।

5. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) :
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का न्यायिक अंग है जिसे विश्व न्यायालय भी कहा जाता है। रचना (Composition) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सरक्षा परिषद अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। जज 9 साल के लिए चुने जाते हैं। एक-तिहाई न्यायाधीश अर्थात् पांच जज हर तीन वर्ष बाद रिटायर होते हैं और उनकी जगह 5 जज चुन लिये जाते हैं।

इसका क्षेत्राधिकार (Its Jurisdiction)-अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों से सम्बन्धित सभी विषय इसके पास ले जाए जा सकते हैं। इस न्यायालय में केवल राज्यों के झगड़े ही ले जाए जा सकते हैं, व्यक्तियों के नहीं। इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार तीन प्रकार का है

  • अनिवार्य क्षेत्राधिकार,
  • ऐच्छिक क्षेत्राधिकार,
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार।

6. सचिवालय (The Secretariat):
संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रबन्धक काम चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है, जिसमें संगठन की ज़रूरत अनुसार कर्मचारी होते हैं जिनका मुखिया महासचिव होता है। महासचिव जिसे संसार का मुख्य प्रशासकीय अधिकारी कहा जा सकता है, सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा नियुक्त करती है। यह 5 साल के लिए चुना जाता है।

सचिवालय के 9 विभाग है और हर भाग का मुखिया उप-महासचिव होता है। संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय में दुनिया के अनेक देशों के नागरिक काम करते हैं, किन्तु उन सबकी वफ़ादारी विश्व संस्था के प्रति होती है। सचिवालय के अधिकारियों के लिए स्वतन्त्र रूप से अपने कार्यों को करने के लिए कई सुविधाएं दी गई हैं। सचिवालय संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों की कार्यवाहियों को लिखता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों को प्रकाशित करता है।

प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका पर एक लेख लिखें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाने के लिए 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ के आरम्भ में 51 सदस्य थे और वर्तमान में सदस्य संख्या 193 है। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य है और इसे विश्व-शान्ति के लिए महत्त्वपूर्ण संस्था मानता है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत के योगदान का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है

1. भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना-भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के लिए सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य बन गया। सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

2. संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता बढ़ाने में भारत की भूमिका-भारत की सदा ही यह नीति रही है कि विश्व शान्ति को बनाए रखने के लिए और संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता के लिए संसार के सभी देशों को, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखते हैं, सदस्य बनना चाहिए। इसलिए 1950 से लेकर अगले 20 वर्षों तक लगातार जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में साम्यवादी चीन को सदस्य बनाने का प्रश्न आया, भारत ने सदैव इसका समर्थन किया।

परन्तु अमेरिका सुरक्षा परिषद् में चीन की सदस्यता के प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग करता रहा। 1972 में अमेरिका के चीन के प्रति दृष्टिकोण बदलने पर ही चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना। भारत ने बंगला देश को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों में भारत का स्थान-संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। 1954 में भारत की श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा (General Assembly) की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। 1956 में स्वर्गीय डॉ० राधाकृष्ण यूनेस्को के प्रधान चुने गये।

भारत आठ बार सुरक्षा परिषद् का सदस्य रह चुका है और 30 सितम्बर, 1991 को भारत ने सुरक्षा परिषद् के अध्यक्ष का कार्यभार एक महीने के लिए सम्भाला। सामाजिक और आर्थिक परिषद् का भारत लगभग निरन्तर सदस्य चला आ रहा है। भारत के डॉ० नगेन्द्र सिंह को 1973 और 1982 में पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया था। फिर फरवरी, 1985 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया था। 1989 में भारत के आर० एस० पाठक को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया।

जनवरी, 2003 में प्रथम भारतीय महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी संयुक्त राष्ट्र नागरिक पुलिस सलाहकार नियुक्त हुई। वे इस प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त होने वाली न केवल प्रथम भारतीय अपितु विश्व की प्रथम महिला अधिकारी भी हैं। 27 अप्रैल, 2012 को न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। नवम्बर, 2017 में दलवीर भण्डारी को पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुन लिया गया।

4. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की दृष्टि से भारत का योगदान-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य विश्व शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। भारत में विश्व-शान्ति सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं

(i) कोरिया की समस्या-1950 में उत्तर कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के प्रतिरोध के लिए भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया। भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने तथा युद्धबन्दियों का आदान-प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत को तटस्थ राष्ट्र आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

(ii) स्वेज नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस और इज़राइल ने मिलकर मित्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें यह कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए। स्वेज नहर समस्या को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(iii) कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बैल्जियम ने कांगो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो भेजी। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र सेना में सबसे बड़ी टुकड़ी भारतीय बटालियन की थी।

(iv) अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करने चाहिएं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

(v) अफ़गानिस्तान की समस्या-अफ़गानिस्तान की समस्या हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(vi) खाड़ी युद्ध-भारत ने फरवरी, 1991 को खाड़ी युद्ध में गैर-सैनिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की तुरन्त बैठक बुलाकर खाड़ी की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करने की मांग की। सुरक्षा परिषद् में पूरी स्थिति की समीक्षा कर यह देखा कि खाड़ी में अमेरिका और बहुराष्ट्रीय देशों की सैनिक कार्रवाई सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव 678 के अनुसार है या नहीं। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत ने अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. उपनिवेशवाद का विरोध-भारत उपनिवेशवाद का सदा ही विरोधी रहा है और भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। बंगला देश को स्वतन्त्र करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिन उपनिवेशों को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयत्न किया है, भारत ने इसका समर्थन किया है।

6. रंग-भेद के विरुद्ध संघर्ष- भारत ने रंग-भेद की नीति को विश्व-शान्ति के लिए खतरा माना है। रंग-भेद पक्षपात का सबसे व्यापक अभ्यास तथा भ्रष्टपूर्ण प्रदर्शित उदाहरण एशिया तथा अफ्रीका के काले वर्गों के प्रति गोरों की धारणा थी। रंग-भेद नीति में दक्षिण अफ्रीकी सरकार सबसे आगे रही है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में कई बार रंग-भेद की नीति के विरुद्ध आवाज़ उठाई और विश्व जनमत तैयार किया, जिसके फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनेक प्रस्ताव पारित किए।

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7. निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में भारत का सहयोग-संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों के ऊपर यह जिम्मेवारी डाली गई है कि वे निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें। भारत की नीति यही है कि निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व-शान्ति को बनाए रखा जा सकता है और अणु शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। भारत पूर्ण निःशस्त्रीकरण के पक्ष में है और उसने संयुक्त राष्ट्र के निःशस्त्रीकरण सम्बन्धी प्रयासों का हमेशा समर्थन किया है।

8. मानव अधिकारों की रक्षा-भारत मानव अधिकारों का महान् समर्थक है। भारत ने अपने नागरिकों को लगभग वे सभी अधिकार दिए हैं, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किए गए हैं। जब भी किसी देश ने मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उसके विरुद्ध आवाज उठाई और संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही की।

9. गट-निरपेक्ष आन्दोलन-भारत गट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक है और इस आन्दोलन ने शीत यद्ध को कम किया है और संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह दो गुटों में विभक्त होने से बचाया है।

10. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में भारत की भूमिका-भारत का सदा यह विचार रहा है कि विश्व-शान्ति की स्थायी स्थापना तभी हो सकती है, यदि आर्थिक और सामाजिक अन्याय को समाप्त किया जाए। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। भारत ने आर्थिक दशा से पिछड़े देशों के विकास पर विशेष बल दिया है और विकसित देशों को अविकसित देशों की अधिक-से-अधिक सहायता करने के लिए कहा है।

11. पर्यावरण की रक्षा-पर्यावरण का प्रदषण मानवता के लिए खतरा बन गया है। संसार के जीवनदायी वन एवं नदियां ही नहीं, धरती, वनस्पतियां और विश्व महासागर भी प्रदूषण की चपेट में आते जा रहे हैं। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार कहा था कि विश्व पर्यावरण की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र को प्रभावशाली कदम उठाने चाहिएं।

12. संयुक्त राष्ट्र की कार्य प्रणाली सुधारने में भारत की भूमिका-1 फरवरी, 1992 को सुरक्षा परिषद् की शिखर बैठक हुई ताकि सुरक्षा परिषद् को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके। भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने 15 – सदस्यीय सुरक्षा परिषद् के विस्तार और विश्व के सबसे बड़े संगठन को और अधिक लोकतान्त्रिकरण पर जोर दिया।

संयुक्त राष्ट्र की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने संयुक्त राष्ट्र के पूर्वगठन और सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता पर बल दिया। इसके अतिरिक्त भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अंगों में विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग की। निष्कर्ष-भारत विश्व-शान्ति व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग देता है और भारत का अटल विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र विश्व-शान्ति को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण यन्त्र है।

प्रश्न 7.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
अथवा
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के सुधार के लिये सुझाव दीजिये।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे शक्तिशाली अंग है। सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का पूरा उत्तरदायित्व सुरक्षा परिषद् को सौंप दिया गया है। यद्यपि सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, तथापि इसमें कुछ कमियां हैं, जिनमें सुधारों की मांग समय-समय पर उठती रहती है। निम्नलिखित कारणों से सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जाती रही है

1. संयुक्त राष्ट्र की बढ़ती हुई सदस्य संख्या-सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग करने वाले राष्ट्रों, जिनमें भारत भी शामिल है, का कहना है कि जिस अनुपात में संयुक्त राष्ट्र में सदस्य राष्ट्रों की संख्या बढ़ी है, उसी अनुपात में सुरक्षा परिषद् में सदस्य राष्ट्रों की संख्या नहीं बढ़ी है। अत: सुरक्षा परिषद् को अधिक लोकतान्त्रिक बनाने के लिए सुरक्षा परिषद् में सदस्यों की संख्या, विशेषकर स्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ायी जानी चाहिए।

2. नई चुनौतियां-विश्व में उभर रही नई चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग चल रही है।

3. असमान प्रभुसत्ता-सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या 15 है, जिनमें 5 स्थाई सदस्य हैं, जिन्हें वीटो (Veto) प्राप्त है, जबकि 10 अस्थाई सदस्य हैं। इससे पता चलता है कि सुरक्षा परिषद् में समानता के अधिकार को मान्यता न देकर असमान प्रभुसत्ता का अस्तित्व पाया जाता है, अतः कई सदस्य राष्ट्र इस भेदभाव को समाप्त करना चाहते हैं।

4. वीटो की समस्या-वीटो की समस्या को समाप्त करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जा रही है।

5. महाशक्तियों के प्रभत्व को कम करना-सरक्षा परिषद में 5 सदस्य राष्ट्रों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस और चीन) को वीटो शक्ति दी गई है, जिससे वे अधिक शक्तिशाली हो गये हैं, अतः उनके प्रभुत्व को कम करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जा रही है।

सुरक्षा परिषद् में किए जाने वाले सुधार

1. सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या बढ़ाई जाए-सुधारों की मांग करने वाले सदस्य राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर इसे अधिक लोकतान्त्रिक बनाने की मांग कर रहे हैं। विशेषकर स्थाई सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी की मांग जोर पकड़ती जा रही है।

2. वीटो की समाप्ति-सुरक्षा परिषद् की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित एवं लोकतान्त्रिक बनाने के लिए या तो वीटो की शक्ति को समाप्त कर देना चाहिए, या फिर इसे सीमित कर देना चाहिए।

3. समान सदस्यता-सुरक्षा परिषद् में अस्थाई सदस्यों की धारणा को समाप्त करके सबको समान स्तर की सदस्यता प्रदान करनी चाहिए।

4. सुरक्षा परिषद् को महासभा के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए-सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग करने वालों का कहना है कि यदि सुरक्षा परिषद् को विश्व के लोगों का विश्वास जीतना है, तो इसे महासभा के प्रति और अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

5. सामाजिक और आर्थिक कार्य सुरक्षा परिषद् को दिए जाने की मांग-कई विचारक कहते हैं कि सुरक्षा परिषद् को केवल राजनीतिक कार्य ही दिये जाते हैं जिससे इसके सदस्यों में सदैव मतभेद उत्पन्न होते रहते हैं, अतः इनमें सहयोग उत्पन्न करने के लिए सुरक्षा परिषद् को कुछ सामाजिक और आर्थिक कार्य भी दिये जाने चाहिएं।

प्रश्न 8.
एक विश्व संस्था के रूप में संयुक्त राष्ट्र की सफलताओं और असफलताओं पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को भावी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए हुई थी। संयुक्त राष्ट्र ने 1945 से लेकर अब तक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को हल किया है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शान्ति को बनाए रखने, युद्धों को रोकने तथा महाशक्तियों में टकराव को रोकने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। संयुक्त राष्ट्र को जहां अनेक सफलताएं प्राप्त हुई हैं वहीं इसे असफलताओं का भी सामना करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की सफलताओं एवं असफलताओं का वर्णन इस प्रकार है

1. राजनीतिक उपलब्धियां-संयुक्त राष्ट्र ने अनेक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें से कुछ विवाद इस प्रकार हैं-रूस-ईरान विवाद, यूनान विवाद, सीरिया और लेबनान की समस्या, इण्डोनेशिया की समस्या कोर्फ़ चैनल विवाद, कोरिया समस्या, स्वेज़ नहर की समस्या, कांगो समस्या, यमन विवाद, कुवैत-ईराक विवाद आदि।

2. निःशस्त्रीकरण-संयक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के लिए अनेक प्रयास किए हैं और आज भी कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के लिए अनेक सम्मेलनों का आयोजन किया है।

3. अन्तरिक्ष का मानव कल्याण के लिए प्रयोग-संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों के फलस्वरूप ही महासभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि बाहरी अन्तरिक्ष का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग-संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के देशों को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जहां अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श होता है। संयुक्त राष्ट्र ने विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है।

5. अन्य उपलब्धियां-संयुक्त राष्ट्र ने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक इत्यादि गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

संयुक्त राष्ट्र की असफलताएं-संयुक्त राष्ट्र को निम्नलिखित मामलों में असफलताओं का मुंह देखना पड़ा है

  • संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का उद्देश्य युद्धों को रोकना और विश्व में शान्ति स्थापित करना है। परन्तु संयुक्त राष्ट्र इस उद्देश्य में पूर्णरूप से सफल नहीं हुआ।
  • संयुक्त राष्ट्र अनेक राजनीतिक तथा अन्य झगड़ों को दूर करने में असफल रहा है।
  • नि:शस्त्रीकरण की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की कोई महान् उपलब्धि नहीं रही है।
  • दक्षिणी अफ्रीका की रंगभेद की नीति के विषय में संयुक्त राष्ट्र कारगर नहीं रहा।
  • मानवाधिकारों की सुरक्षा के बारे में संयुक्त राष्ट्र प्रभावकारी भूमिका नहीं निभा सका।
  • महाशक्तियों की मनमानी रोकने में संयुक्त राष्ट्र बुरी तरह से असफल रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र कब स्थापित हुआ? क्या भारत इसका मूल रूप से सदस्य है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना संविधान है जिसे चार्टर (Charter) कहा जाता है और यह चार्टर सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में तैयार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र का मुख्य कार्यालय अमेरिका के प्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में स्थित है।

आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य थे, परन्तु आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के किन्हीं चार उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना।
  • मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं के लिए सम्मान बढ़ाना।

प्रश्न 3.
भारत की संयुक्त राष्ट्र के भिन्न-भिन्न अंगों में क्या भूमिका रही है ?
उत्तर:
भारत अनेक बार संयुक्त राष्ट्र के भिन्न-भिन्न अंगों का सदस्य रह चुका है, जैसे कि

  • भारत सुरक्षा परिषद् का आठ बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत ने सुरक्षा परिषद् के सदस्य के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • भारत सामाजिक तथा आर्थिक परिषद् का सदस्य अनेक बार रह चुका है और अब पिछले कुछ वर्षों से भारत इस परिषद् का निरन्तर सदस्य चला आ रहा है।
  • 1956 में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्षा चुनी गई।
  • 1956 ई० में राधाकृष्णन यूनेस्को के अध्यक्ष चुने गए।
  • सर बेनेगल राव 1950 के दशक में अन्तर्राष्टीय न्यायालय के जज रह चके हैं।

डॉ० नगेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय य के न्यायाधीश और बाद में मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त श्री रामस्वरूप पाठक अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। 27 अप्रैल, 2012 को न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। नवम्बर, 2017 में दलवीर भण्डारी को पुन: अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुन लिया गया।

प्रश्न 4.
सुरक्षा परिषद् पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। इसके कुल 15 सदस्य होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- स्थायी और अस्थायी। पांच स्थायी सदस्य हैं-अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और इंग्लैंड। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य दो वर्षों के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं। सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (Veto) प्राप्त है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कोई स्थायी सदस्य सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में अपना मत देता है तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।

उल्लेखनीय है कि यदि कोई सदस्य विरोध स्वरूप सुरक्षा परिषद् की बैठक से अनुपस्थित रहता है तो उसे निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाता। सुरक्षा परिषद् का प्रमुख कार्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखना है। इसके अतिरिक्त सुरक्षा परिषद् नए सदस्यों को महासभा की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाती है। इसके अलावा यह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों व महासचिव के चुनाव में भी भाग लेती है। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन के विषय में भी सुरक्षा परिषद् महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के कोई चार कार्य लिखिये।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के महासचिव के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र का एक सचिवालय होता है जिसका मुखिया महासचिव होता है। महासचिव जिसे विश्व का प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी कहा जा सकता है। महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा करती है। यह 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। इस समय श्री एन्टोनियो गुटेरस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव हैं।

(1) महासचिव सचिवालय के सभी कर्मचारियों पर निरीक्षण रखता है। महासचिव संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न गतिविधियों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(2) यह महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक व सामाजिक परिषद्, ट्रस्टीशिप कौंसिल की कार्यवाही में हिस्सा ले सकता है।

(3) यह महासभा के सामने संयुक्त राष्ट्र के कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट पेश करता है।

(4) महासचिव सुरक्षा परिषद् का ध्यान किसी ऐसे विषय की ओर दिलाने का कार्य भी करता है जो अन्तर्राष्टीय शांति एवं सरक्षा के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। महासचिव का अन्तर्राष्टीय शांति बनाने रखने में बड़ा हाथ होता है।

प्रश्न 6.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का हल करने के लिए हेग में एक न्याय का अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय स्थापित किया गया है। इस न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं। न्यायाधीशों का चुनाव महासभा तथा सुरक्षा सुरक्षा परिषद् द्वारा अलग अलग स्वतन्त्र तौर पर किया जाता है। न्यायाधीश 9 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के पास अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय संधियों से सम्बन्धित सभी विषय ले जाए जा सकते हैं। इस न्यायालय में केवल राज्यों के ही झगड़े ले जाए जा सकते हैं, व्यक्तियों के नहीं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार तीन प्रकार का है

  • अनिवार्य क्षेत्राधिकार
  • ऐच्छिक क्षेत्राधिकार
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार।

अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संधियों, अन्तर्राष्ट्रीय कानून, अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व को भंग करने वाले तथ्यों व क्षतिपूर्ति से सम्बन्धित मामलों में सम्बन्धित पक्षों को सुनता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय सम्बन्धित राज्यों की सहमति से ही किसी अभियोग की सुनवाई करता है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र महासभा व सुरक्षा परिषद् को आवश्यकतानुसार किसी मामले में सलाह भी दे सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में भारत की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए 1945 में सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य बन गया। भारत की सिफारिश पर चार्टर में मानवाधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। भारत सुरक्षा परिषद् का आठ बार अस्थायी सदस्य रह चुका है।

भारत ने विश्व शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी संसार में किसी भी भाग में तनाव या झगड़ा उत्पन्न हुआ है तो भारत ने तनाव को कम करने तथा झगड़े को हल करने के प्रयास किए हैं। कोरिया, स्वेज़ नहर, कांगो, साइप्रस, अलजीरिया, लीबिया, अफ़गानिस्तान आदि की समस्याओं को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जब कभी सुरक्षा परिषद् ने किसी देश में शान्ति स्थापित करने के लिए सेनाओं की मांग की तो भारत ने अपनी सेनाएं भेजी हैं।

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प्रश्न 8.
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की दृष्टि से भारत के योगदान की चर्चा करो।
अथवा
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका अभिनीत की है ?
उत्तर:
भारत ने विश्व-शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है
1. कोरिया समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के विरुद्ध भेजी। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया।

2. स्वेज नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए।

3. कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो में भेजी।।

4. अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र के कोई चार सिद्धांत लिखिए।
उत्तर:
(1) संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की प्रभुसत्ता की समानता के आधार पर की गई है।

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अंतर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे ताकि निर्धारित अधिकारों की प्राप्ति सभी को हो सके।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य राज्य अपने विवादों का समाधान शांतिपूर्ण ढंग तथा इस प्रकार करेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय को किसी प्रकार का भय न हो।

(4) सभी सदस्य राष्ट्र अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्ता को आघात पहुंचाने वाला कार्य नहीं करेंगे। इसके साथ ही वे कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जो संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र और उद्देश्यों के विपरीत या असंगत हो।

प्रश्न 10.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ को सफल बनाने के लिए चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रासंगिक सुधार करना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
  • विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए एक शांति संस्थापक आयोग का गठन करना चाहिए।
  • विश्व में व्याप्त किसी भी प्रकार के आतंकवाद की निंदा एवं उसे नियन्त्रित करना।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संघ (UNESCO) पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन जिसे प्रायः यूनेस्को के नाम से पुकारा जाता है, ने राष्ट्र संघ के अधीन बनाई गई अन्तर्राष्ट्रीय विद्वानों के सहयोगी संगठन का स्थान लिया है। यूनेस्को की स्थापना 4 नवम्बर, 1946 की गई। इनकी स्थापना के लिए लन्दन में 1 नवम्बर से 16 नवम्बर, 1945 तक एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में 44 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सम्मेलन की कार्यवाही बड़ी उत्साहपूर्ण वातावरण में चली। विभिन्न पहलुओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया गया। इंग्लैंड तथा फ्रांस की सरकारों के प्रतिनिधियों ने इस संगठन के संविधान का निर्माण किया। लगभग एक वर्ष के बाद संविधान के स्वीकृत होने पर यूनेस्को की 4 नवम्बर, 1946 को विधिवत् स्थापना की गई। समझौते द्वारा संयुक्त राष्ट्र ने इस संगठन को अपने विशिष्ट अभिकरण के रूप में स्वीकार कर लिया। इसका प्रमुख उद्देश्य शिक्षा, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक कार्यों का प्रचार-प्रसार करना है।

प्रश्न 12.
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की कोई चार विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्यों का एक संगठन होता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन में सभी सदस्य राज्यों को समान समझा जाता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का संचालन स्थायी अभिकरणों एवं प्रक्रियाओं द्वारा चलाया जाता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना सदस्य राज्यों द्वारा अपने सामान्य हितों की प्राप्ति के लिए होती है।

प्रश्न 13.
भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे को मजबूत करने वाले दो कारण बताएं।
उत्तर:
1. विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश-भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे का प्रमुख कारण यह है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक एवं जिम्मेदार देश है। भारत में नियमित समय पर चुनाव होते हैं तथा सभी लोगों को समान रूप से मताधिकार प्राप्त हैं।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका-भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे का एक अन्य प्रमुख कारण यह है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सदैव सकारात्मक भूमिका निभाई है तथा विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के संयुक्त राष्ट्र के कार्य में सदैव सहयोग दिया है।

प्रश्न 14.
एक ध्रुवीय युग में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की आवश्यकता के कोई चार कारण लिखिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ की आवश्यकता के कोई चार कारण लिखिये।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र निम्नलिखित कारणों से एक अपरिहार्य संगठन हैं

1. विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपरिहार्य है। विश्व में बढ़ते आतंकवाद एवं भय को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था की ही आवश्यकता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के देशों को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जहां अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श होता है। संयुक्त राष्ट्र ने विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है।

3. मानवाधिकार की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की आवश्यकता है।

4. निःशस्त्रीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र की आवश्यकता है।

प्रश्न 15.
भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से क्या लाभ प्राप्त हुए हैं ?
उत्तर:
भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए हैं

  • भारत के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्व बैंक ने पंचवर्षीय योजनाओं के लिए तकनीकी विशेषज्ञ एवं ऋण उपलब्ध करवाया है।
  • यूनेस्को ने भारत में शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ ने उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के कई क्षेत्रों को कृषि युक्त बनाने का प्रयास किया है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में कई प्रकार की बीमारियों को रोकने एवं समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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प्रश्न 16.
सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्यता के लिए सुझाए गए किन्हीं चार मानदण्डों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सुरक्षा परिषद् में उन नये देशों को शामिल किया जाए, जिनका मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिकॉर्ड अच्छा है।
  • सुरक्षा परिषद् में नये सदस्यों को शामिल करने का एक अन्य मानदण्ड भूगोलिक आधार है।
  • आर्थिक आधार पर भी सुरक्षा परिषद् की सदस्यता बढ़ाये जाने का सुझाव दिया जा रहा है।
  • कुछ विद्वानों का विचार है कि उन देशों को सुरक्षा परिषद् में शामिल किया जाए जिन्होंने विश्व शांति स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 17.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के संगठन एवं कार्य लिखें।
उत्तर:
महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे बड़ा मुख्य चार्टर अंग है। यह एक प्रकार की विश्व संसद् है जिसका मुख्य काम विचार-विमर्श करना है। महासभा में संयुक्त राष्ट्र संघ के सारे सदस्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 देश सदस्य हैं। इन 193 देशों के प्रतिनिधियों को मिलाकर महासभा बनती है। हर सदस्य देश इसमें अपने 5 प्रतिनिधि भेज सकता है, परन्तु हर देश का एक ही मत होता है।

1. निर्वाचित कार्य-महासभा 2/3 बहुमत से सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों को दो साल के लिए चुनती है। महासभा आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के सदस्य भी चुनती है। यह ट्रस्टीशिप कौंसिल के कुछ सदस्य चुनती है। सुरक्षा परिषद् तथा महासभा अलग-अलग मत प्रयोग करके अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जजों का चुनाव करती है। महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सचिव को नियुक्त करती है।।

2. विचारशील कार्य-महासभा का सबसे महत्त्वपूर्ण काम चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना तथा उसके आधार पर सिफ़ारिश करना है।

प्रश्न 18.
राष्ट्र संघ की असफलता के कोई चार कारण बताएं।
उत्तर:
राष्ट्र संघ की असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

  • राष्ट्र संघ में विभिन्न देशों को असमान प्रतिनिधित्व प्राप्त था।
  • राष्ट्र संघ की अपनी कोई सेना नहीं थी।
  • राष्ट्र संघ में ब्रिटेन तथा फ्रांस जैसे बड़े देशों का प्रभाव अधिक था, जबकि कमज़ोर देशों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था।
  • राष्ट्र संघ की असफलता के लिए सदस्य देशों की अव्यावहारिक नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं।

प्रश्न 19.
अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए सुरक्षा परिषद् किन चार तरीकों का प्रयोग करती है ?
उत्तर:
1. वार्ता-इससे अभिप्राय है कि दो राष्ट्रों में अपने विवाद का समाधान करने हेतु बातचीत करना। बातचीत राष्ट्रों के मध्य भी हो सकती है और ऐसी बातचीत उनके प्रतिनिधियों के मध्य भी हो सकती है।

2. सत्सेवा और मध्यस्थता-यदि सम्बद्ध दोनों पक्षों में वार्ता का ढंग अपनाने पर समस्या का कोई समाधान नहीं निकलता तो अन्य देशों द्वारा उस विवाद के समाधान के लिए अपनी सेवाएं प्रदान की जा सकती हैं।

3. वाद-विवाद-यह विधि महासभा या सुरक्षा परिषद् द्वारा ग्रहण की जाती है। महासभा या सुरक्षा परिषद् द्वारा विवादग्रस्त दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को अपने तर्क एवं दावे प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है। इस प्रकार दोनों विरोधी ‘पक्षों को बिना किसी भय के अपने विचार व्यक्त करने के लिए एक मंच मिल जाता है और वाद-विवाद के माध्यम से विवाद के समाधान की आशा बढ़ जाती है।

4. जांच-इस विधि में विवाद के तथ्यों की जांच की जाती है। इस जांच द्वारा उन वास्तविकताओं का पता लगाया जाता है जिनसे विवादी पक्षों के मतभेदों को समाप्त किया जा सके।

प्रश्न 20.
शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व में हुए ऐसे कोई चार परिवर्तन लिखें जिनसे संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावित हुआ है ?
उत्तर:

  • 1991 में सोवियत संघ का पतन हो गया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • पिछले कुछ वर्षों में चीन ने उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
  • 9/11 की आतंकवादी घटना ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावित किया है।
  • विश्व में एड्स, आतंकवाद, जनसंहार, परमाणु हथियार, पर्यावरण क्षरण, वैश्विक तापन, महामारी तथा गृह युद्ध जैसी समस्याएं संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावित कर रही हैं।

प्रश्न 21.
विश्व बैंक के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
विश्व बैंक निम्नलिखित कार्य करता है

  • विश्व बैंक मानवीय विकास से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।
  • विश्व बैंक विश्व स्तर आधारभूत ढांचा तैयार करवाने में अपनी भूमिका निभाता है।
  • विश्व बैंक सदस्य देशों को अनुदान एवं ऋण प्रदान करता है।
  • विश्व बैंक अधिक ग़रीब देशों को अनुदान या ऋण देकर उन्हें वापिस नहीं लेता।

प्रश्न 22.
सितम्बर, 2005 में संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक प्रभावशाली एवं प्रांसगिक बनाने के लिए पास किए गए कोई चार प्रस्ताव लिखें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में सुधार के कोई चार सुझाव दीजिये।
उत्तर:

  • विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए एक शान्ति संस्थापक आयोग का गठन करना चाहिए।
  • विश्व में व्याप्त किसी भी प्रकार के आंतकवाद की निन्दा एवं उसे नियन्त्रित करना।
  • एक लोकतान्त्रिक कोष का गठन करना।
  • यदि कोई देश अपने नागरिकों की रक्षा में सक्षम नहीं है, तो विश्व समुदाय को उसकी रक्षा करनी चाहिए।

प्रश्न 23.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की सुरक्षा परिषद् के कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
सुरक्षा-परिषद् के निम्नलिखित कार्य हैं

(1) सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे मामले पर तुरन्त विचार कर सकती है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के भंग होने का भय हो।

(2) सुरक्षा-परिषद् आक्रामक कार्यवाहियों, विश्व शान्ति के लिए खतरे की सम्भावनाओं और शान्ति भंग किए जाने वाले कार्यों के विषय में कार्यवाही कर सकता है।

(3) सुरक्षा परिषद् प्रादेशिक समस्याएं सुलझाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(4) चार्टर के अनुच्छेद 83 के अनुसार सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र ने जो दायित्व ग्रहण किए हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी सुरक्षा परिषद् की है।

प्रश्न 24.
विश्व व्यापार संगठन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में हुई थी। यह संगठन ‘जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एवं टैरिफ’ के उत्तराधिकारी के रूप में सामने आया है। वर्तमान समय में इसके सदस्यों की संख्या 161 है। यह संगठन वैश्विक व्यापार के नियमों को निश्चित करता है। इस संगठन में प्रत्येक निर्णय सदस्य देशों की सहमति पर लिया जाता है।

यद्यपि यह संगठन विश्व स्तर पर व्यापारिक नियमों को निश्चित करता है, परन्तु फिर भी इस पर अमेरिका, यूरोपीय देशों तथा जापान जैसे देशों का प्रभाव अधिक है, जोकि अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए इस संगठन का दुरुपयोग करते हैं। इसीलिए विकासशील देश इस संगठन की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट नहीं रहते। विकासशील देशों का यहां आरोप है कि विश्व व्यापार संगठन की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है तथा यह संगठन बड़ी शक्तियों के प्रभाव में कार्य करता है।

प्रश्न 25.
ह्यूमन राइट वॉच के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:

  • ह्यूमन राइट वॉच विश्व स्तर पर मानवाधिकारों को बढ़ावा देने वाला एक स्वयं सेवी संगठन है।
  • ह्यूमन राइट वॉच मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर विश्व मीडिया का ध्यान आकर्षित करता है।
  • ह्यूमन राइट वॉच ने बारूदी सुरंगों पर रोक लगाने का प्रयास किया है।
  • ह्यूमन राइट वॉच बाल सैनिकों के प्रयोग को रोकने के लिए प्रयासरत है।।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 26.
विश्व के किन्हीं चार प्रमख अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • विश्व व्यापार संगठन-विश्व व्यापार संगठन की स्थापना सन् 1995 में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों के विषय में नियम बनाने के लिए की गई थी।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष वैश्विक स्तर पर वित्त व्यवस्था की देखभाल करता है।
  • गैट समझौता-गट समझौते का मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विकासशील देशों को समान रूप से भागीदार बनाना है।
  • विश्व बैंक-विश्व बैंक की स्थापना सन् 1946 में हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों में पुनर्निर्माण एवं विकास में सहायता देना है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र का निर्माण कब हुआ था ?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध की भयानक तबाही देखकर संसार के सभी भागों में प्रत्येक मनुष्य सोचने लगा कि यदि ऐसा एक और युद्ध हुआ तो विश्व तथा मानव जाति का सर्वनाश हो जाएगा। अतः अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करने की दिशा में प्रयास किए जाने लगे। इसके लिए किसी विश्व समुदाय का होना ज़रूरी था।

अत: 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है। आरम्भ में उसके 51 राष्ट्र सदस्य थे और वर्तमान में इसके 193 राष्ट्र सदस्य हैं।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में वीटो’ शक्ति का प्रयोग करने वाले देशों के नाम बताइये।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल सदस्य संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य हैं तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो अधिकार प्राप्त है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति कैसे की जाती है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर महासभा करती है। महासचिव के लिए उम्मीदवार का नाम सुरक्षा परिषद् के 9 सदस्यों द्वारा समर्थित होना चाहिए। इन नौ सदस्यों में से पांच सदस्य राजनीतिक विज्ञान ( स्थायी होने चाहिए।

यदि पांच स्थायी सदस्यों में से एक स्थायी सदस्य भी निषेधाधिकार का प्रयोग कर दे तो महासचिव के पद के नामांकित व्यक्ति का नाम निरस्त हो जाता है। सुरक्षा परिषद् द्वारा नामित उम्मीदवार को महासभा में उपस्थिति तथा मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत प्राप्त करना पड़ता है। बहुमत प्राप्त करने के पश्चात् सम्बन्धित उम्मीदवार को संयुक्त राष्ट्र का महासचिव चुन लिया जाता है।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों (Specialised Agencies) के नाम लिखो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम इस प्रकार हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन।
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन।
  • खाद्य एवं कृषि संगठन।

प्रश्न 5.
निषेधाधिकार पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
निषेधाधिकार या वीटो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की महत्त्वपूर्ण शक्ति है। निषेधाधिकार का अर्थ है स्थायी सदस्यों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में किसी प्रस्ताव को पास होने से रोकना। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में वोट डाल दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद् में यदि कोई सदस्य अनुपस्थित रहता है तो उसको निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाएगा।

  • प्रश्न 6.
    संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) के कोई दो उद्देश्य बताइए।
    उत्तर:
  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।

प्रश्न 7.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं

  • दवाओं और स्वास्थ्य से सम्बद्ध वस्तुओं के लिए उचित मानक (Standard) निर्धारित करना।
  • स्वास्थ्य के लिए प्रशासकीय नियमों का अध्ययन करके उनमें सुधारार्थ प्रयास करना।

प्रश्न 8.
हमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की क्यों आवश्यकता पड़ती है? कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन युद्ध और शान्ति के विषयों में मदद करते हैं।
  • राष्ट्रों के समक्ष कई बार ऐसी मुश्किल एवं बड़ी समस्या आ जाती है कि वे अकेला उसका हल नहीं निकाल सकता। इसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) के कोई दो सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र सदस्यों की संप्रभु समानता पर आधारित है।
  • संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अन्तर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे।

प्रश्न 10.
उन भारतीय अधिकारियों के नाम लिखो जो संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य करते रहे हैं।
उत्तर:

  • 1953 में श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्ष चुनी गई।
  • डॉ० राधाकृष्णन और मौलाना अबुल कमाल आजाद यूनेस्को के अध्यक्ष चुने गए।
  • राजकुमारी अमृतकौर विश्व स्वास्थ्य संगठन की अध्यक्ष चुनी गई थी।
  • 1956 में श्री वी० आर० सेठ खाद्य और कृषि संगठन के अध्यक्ष चुने गए थे।
  • डॉ० नगेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश और बाद में मुख्य न्यायाधीश बनाए गए थे।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में भारत की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य बना। सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहन करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

प्रश्न 12.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन से अभिप्राय इस संगठन में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव करने से है। पिछले कुछ वर्षों से विश्व राजनीति में बहुत बदलाव आए हैं और बदलते परिवेश में संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों एवं कार्यप्रणाली में कुछ दोष उत्पन्न हो गए हैं, जिससे कारण समय-समय इसके पुनर्गठन की मांग की जाती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 13.
संयुक्त राष्ट्र संघ के किन दो महत्त्वपूर्ण अंगों में सुधार की मांग की जा रही है ?
उत्तर:
1. सुरक्षा परिषद्-संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में सुधार की सबसे अधिक मांग की जा रही है। क्योंकि इसमें सदस्य देशों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता।

2. महासभा-संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भी समय-समय पर सुधार की मांग ली जाती रही है। भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान के अनुसार महासभा में सर्वसम्मति की प्रक्रिया को समाप्त कर देना चाहिए तथा महासभा अध्यक्ष को आर्थिक शक्तिशाली बनना चाहिए।

प्रश्न 14.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन में भारत की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। भारत सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता का एक मजबूत उम्मीदवार है। नई मानवाधिकार परिषद् के 47 सदस्यों में से एक भारत भी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में सुधारों तथा इसकी स्थाई सेना की धारणा में भी भारत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

प्रश्न 15.
वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
वैश्विक तापवृद्धि से अभिप्राय कई कारणों से विश्व के तापमान के बढ़ने से है। वैश्विक तापवृद्धि क्लोरो फ्लोरो कार्बन कहलाने वाले कुछ रसायनों के फैलाव के कारण हो रही है। वैश्विक तापवृद्धि से समुद्री तटीय देशों के डूबने का खतरा बढ़ गया है क्योंकि समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ने लगी है।

प्रश्न 16.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के कोई दो कार्य बताएं।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष विश्व स्तर पर वित्त व्यवस्था को नियन्त्रित करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विभिन्न देशों की अपील पर उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 17.
विश्व को संयुक्त राज्य अमेरिका से क्यों डर लगता है ? कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति रह गया है।
  • अमेरिका को अपनी इच्छानुसार कार्य करने से कोई देश या संगठन रोकने में सक्षम नहीं है।

प्रश्न 18.
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिन्ह का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ एक विश्व संस्था है। अत: संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिन्ह में विश्व का मानचित्र बना हुआ है, तथा इसे चारों तरफ जैतून की पत्तियां हैं जोकि विश्व शान्ति का सन्देश देती हैं।

प्रश्न 19.
भारत कितनी बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है ?
उत्तर:
भारत अब तक आठ बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत सन् 1950, 1967, 1977, 1972, 1984, छठी बार 1991 में सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत सातवीं बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य जनवरी 2011 से दिसम्बर 2012 तथा आठवीं बार जनवरी 2021 से दिसम्बर, 2022 तक चुना गया है।

प्रश्न 20.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की व्याख्या करें।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का न्यायिक अंग है जिसे विश्व न्यायालय भी कहा जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। जज 9 साल के लिए चुने जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों से सम्बन्धित सभी विषय इसके पास ले जाए जा सकते हैं।

प्रश्न 21.
अन्तर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी (IAEA) के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्टीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी परमाण उर्जा के शान्तिपर्ण उपयोग को बढावा देती है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी समय-समय पर परमाणु सुविधाओं की जांच करती है ताकि नागरिक संयन्त्रों का प्रयोग सैनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए न किया जा सके।

प्रश्न 22.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • एमनेस्टी इंटरनेशनल सम्पूर्ण विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करता है।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल विश्व स्तर पर मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिपोर्ट तैयार करता है तथा उसे प्रकाशित करता है।

प्रश्न 23.
अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन विभिन्न देशों के मजदूरों के वेतन तथा काम करने का समय निश्चिय करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन मज़दूरों में प्रचलित बेकारी को रोकने का प्रयास करता है।

प्रश्न 24.
सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यों के विशेषाधिकार को क्यों समाप्त नहीं किया जा सकता है ? कोई दो कारण दीजिए।
उत्तर:
(1) सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों के विशेषाधिकार इसलिए समाप्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पक्ष में इन देशों को विशेष महत्त्व दिया गया है।

(2) यदि स्थाई सदस्यों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए जाएं, तो हो सकता है कि इन शक्तिशाली देशों की रुचि संयुक्त राष्ट्र संघ में न रहे, तथा ये देश इस संगठन से बाहर आकर अपनी इच्छानुसार कार्य करना शुरू कर दें।

प्रश्न 25.
भारत के संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के दावे के लिए कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर:
(1) भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता इसलिए मिलनी चाहिए, क्योंकि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। भारत में कुल जनसंख्या का 1/5 भाग निवास करता है।

(2) भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी अंगों में दी गई अपनी भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया है।

प्रश्न 26.
भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता का विरोध करने वाले देशों के द्वारा दिए किन्हीं दो तर्कों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • आलोचक देश भारत के परमाणु हथियारों को लेकर चिंतित हैं।
  • आलोचकों का कहना है, कि भारत पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को लेकर सुरक्षा परिषद् में अप्रभावी रहेगा।

प्रश्न 27.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के 6 अंग हैं-

  • महासभा
  • सुरक्षा परिषद्
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्
  • ट्रस्टीशिप कौंसिल
  • अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय
  • सचिवालय।

प्रश्न 28.
सुरक्षा परिषद् के कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे मामलों पर तुरन्त विचार कर सकती है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के भंग होने का भय हो।
  • सुरक्षा परिषद् आक्रामक कार्यवाहियों, विश्व शान्ति के लिए खतरे की सम्भावनाओं और शान्ति भंग किए जाने वाले कार्यों के विषय में कार्यवाही कर सकती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 29.
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका अदा की है ?
उत्तर:
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में बहुत-ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। 1950 में संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्गत उत्तर कोरिया के विरुद्ध भेजी गई सेनाओं में भारत ने भी अपनी सेना भेजी थी। सन् 1956 में मिस्त्र में स्वेज़ नहर के संकट को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के निवेदन पर कांगों में अपनी सेनाएं भेजी तथा 1976 में अरब-इज़रायल विवाद को सुलझाने में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 30.
विश्व के किन्हीं दो अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र संघ-संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945, को विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई थी।
  • विश्व व्यापार संगठन-विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों के विषय में नियम बनाने के लिए की गई थी।

प्रश्न 31.
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अर्थ लिखें।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अर्थ सम्प्रभु राज्यों द्वारा अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बनाए गए संगठनों से लिया जाता है। टुंकिन के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय संगठन राज्यों का ऐसा समूह है, जिसकी स्थापना सन्धि के आधार पर होती है तथा जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है।”

प्रश्न 32.
संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना की कोई दो व्यवस्थाएं बताएं।
उत्तर:

  • भविष्य की पीढ़ियों को युद्ध की विभीषका से बचाना।
  • मानवाधिकारों, मनुष्य के गौरव और उसके महत्त्व, पुरुषों एवं महिलाओं एवं छोटे और बड़े राष्ट्रों के समान अधिकारों पर विश्वास का अनुमोदन करना।

प्रश्न 33.
विश्व व्यापार संगठन कब बना?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन सन् 1995 में बना।

प्रश्न 34.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् के पांच स्थाई सदस्य देशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • अमेरिका
  • इंग्लैण्ड
  • फ्रांस
  • रूस
  • चीन।

प्रश्न 35.
“विश्व व्यापार संगठन” (W.T.0.) क्या है ?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन का निर्माण 1 जनवरी, 1995 को हुआ था। यह संगठन विश्व व्यापार को नियमित और नियन्त्रित करने के लिए उत्तरदायी है। यह संगठन सभी सदस्य राष्ट्रों को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बिना किसी भेदभाव के व्यापार करने की व्यवस्था करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्न में से किसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठन माना जाता है ?
(A) सार्क
(B) आसियान
(C) संयुक्त राष्ट्र संघ
(D) यूरोपीयन संघ।
उत्तर:
(C) संयुक्त राष्ट्र संघ।

2. निम्न में से कौन-सा क्षेत्रीय आर्थिक संगठन है ?
(A) यूरोपीयन संघ
(B) आसियान
(C) सार्क
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. निम्न में से कौन-सा गैर सरकारी संगठन है ?
(A) अन्तर्राष्ट्रीय रेडक्रास सोसाइटी
(B) एमनेस्टी इंटरनेशनल
(C) ह्यमन राइट्स वॉच
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

4. संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्तमान महासचिव कौन हैं ?
(A) एन्टोनियो गुटेरस
(B) बुतरस घाली
(C) कोफी अन्नान
(D) सी० घनपाला।
उत्तर:
(A) एन्टोनियो गुटेरस।

5. निम्न में से कौन-सा संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अभिकरण है ?
(A) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
(B) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(C) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

6. संयुक्त राष्ट्र संघ के अंग हैं
(A) 6
(B) 5
(C) 4
(D) 13
उत्तर:
(A) 6

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

7. संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दिक प्रस्ताव (Millennium Declaration) पर कब हस्ताक्षर किये गए ?
(A) सितम्बर, 1995
(B) जून, 1999
(C) सितम्बर, 2000
(D) मार्च, 2001
उत्तर:
(C) सितम्बर, 2000

8. संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन ‘शान्ति निर्माण आयोग’ की स्थापना कब की गई ?
(A) दिसम्बर, 2005
(B) मार्च, 2003
(C) जून, 2002
(D) अगस्त, 2000
उत्तर:
(A) दिसम्बर, 2005

9. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.0.) का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) जेनेवा
(B) काठमाण्डू
(C) पेरिस
(D) लंदन।
उत्तर:
(A) जेनेवा।

10. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की स्थापना हुई ?
(A) वर्ष, 1951 में
(B) वर्ष, 1955 में
(C) वर्ष, 1941 में
(D) वर्ष, 1945 में।
उत्तर:
(D) वर्ष, 1945 में

11. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल कितने अनुच्छेद हैं?
(A) 395
(B) 111
(C) 174
(D) 152
उत्तर:
(B) 111

12. निम्न में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य है ?
(A) पाकिस्तान
(B) बंग्लादेश
(C) भारत
(D) नेपाल।
उत्तर:
(C) भारत।

13. संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय स्थित है
(A) लंदन में
(B) न्यूयार्क में
(C) नई दिल्ली में
(D) हेग में।
उत्तर:
(B) न्यूयार्क में।

14. प्रारम्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने सदस्य थे ?
(A) 47
(B) 46
(C) 51
(D) 55
उत्तर:
(C) 51

15. वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों की संख्या है
(A) 197
(B) 196
(C) 193
(D) 195
उत्तर:
(C) 193

16. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल होता है
(A) 2 वर्ष
(B) 4 वर्ष
(C) 5 वर्ष
(D) 6 वर्ष।
उत्तर:
(C) 5 वर्ष।

17. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय स्थित है
(A) न्यूयार्क में
(B) बीजिंग में
(C) हेग में
(D) दिल्ली में।
उत्तर:
(C) हेग में।

18. ‘संयुक्त राष्ट्र बाल आपात्कालीन कोष’ (UNICEF) का मुख्यालय स्थित है :
(A) पेरिस में
(B) रोम में
(C) जेनेवा में
(D) न्यूयार्क में।
उत्तर:
(D) न्यूयार्क में।

19. वह पहला कौन-सा भारतीय था, जो महासभा का अध्यक्ष बना ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) सी० राजगोपालाचार्य
(C) एस० राधाकृष्णन
(D) विजयलक्ष्मी पण्डित।
उत्तर:
(D) विजयलक्ष्मी पण्डित।

20. संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के कितने देश स्थायी सदस्य हैं ?
(A) 5
(B) 10
(C) 15
(D) 27
उत्तर:
(A) 5

21. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का मुख्यालय कहां पर स्थित है ?
(A) बीजिंग में
(B) नई दिल्ली में
(C) हेग में
(D) न्यूयार्क में।
उत्तर:
(D) न्यूयार्क में।

22. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में संशोधन की विधि का उल्लेख किस अनुच्छेद में किया गया है ?
(A) 108
(B) 99
(C) 111
(D) 102
उत्तरं:
(A) 108

23. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) न्यूयार्क में
(B) हेग में
(C) नई दिल्ली में
(D) ढाका में।
उत्तर:
(B) हेग में।

24. ‘यूनेस्को’ (UNESCO) का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) नई दिल्ली
(B) पेरिस
(C) कराची
(D) लंदन।
उत्तर:
(B) पेरिस।

25. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना कब हुई ?
(A) 1 जनवरी, 1995 को
(B) 4 दिसम्बर, 1995 को
(C) 8 जनवरी, 1995 को
(D) 3 सितम्बर, 2000 को।
उत्तर:
(A) 1 जनवरी, 1995 को।

26. विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.) अस्तित्व में कब आया ?
(A) 1 जनवरी, 1995 को
(B) 1 फरवरी, 1995 को
(C) 1 दिसम्बर, 1994 को
(D) 1 दिसम्बर, 1995 को।
उत्तर:
(A) 1 जनवरी, 1995 को।

27. निम्न एक भारतीय सन् 1982 में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश चुने गये थे ?
(A) डॉ० नगेंद्र सिंह
(B) डॉ० राधाकृष्णन
(C) एच० एम० बेग
(D) ए० एन० रे।
उत्तर:
(A) डॉ० नगेंद्र सिंह।

28. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का मुख्यालय स्थित है :
(A) जेनेवा में
(B) न्यूयार्क में
(C) वाशिंगटन में
(D) पेरिस में।
उत्तर:
(D) जेनेवा में।

रिक्त स्थान भरें

(1) प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस ……………….. को मनाया जाता है।
उत्तर:
24 अक्तूबर,

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ में ……………….. मूल संस्थापक सदस्य हैं।
उत्तर:
51

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना ……………… 1945 को हुई।
उत्तर:
24, अक्तूबर

(4) भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का …………. देश है।
उत्तर:
संस्थापक

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के ………….. अंग हैं।
उत्तर:
6

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

(6) संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य …………….. की स्थापना करना है।
उत्तर:
विश्व शांति

(7) संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल …………….. अनुच्छेद है।
उत्तर:
111

(8) संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य देशों की संख्या …… है।
उत्तर:
5

(9) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य …………. है।
उत्तर:
विश्व शांति

(10) सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की कुल संख्या …………… है।
उत्तर:
5

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कितने अनुच्छेद हैं ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल 111 अनुच्छेद हैं।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहां स्थित है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय न्यूयार्क में स्थित है।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय इसके कुल कितने सदस्य थे ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय इसके कुल 51 सदस्य थे।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल कितना होता है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय कहां स्थित है ?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में स्थित है।

प्रश्न 6.
कौन-सी भारतीय नागरिक संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनी ?
उत्तर:
विजयलक्ष्मी पण्डित संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनी।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पाकिस्तान एवं नेपाल में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव की चर्चा करें।
उत्तर:
पाकिस्तान एवं नेपाल दक्षिण एशिया के दो महत्त्वपूर्ण देश हैं। इन देशों का दुर्भाग्य यह रहा है कि यहाँ कभी भी लम्बे समय तक लोकतन्त्र कायम नहीं रह पाया है। लोकतन्त्र की स्थापना के कुछ वर्षों के बाद ही इन दोनों देशों में क्रमशः सैनिक तानाशाही एवं राजशाही कायम हो जाती है।

1. पाकिस्तान में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव (Democratisation and its reversals in Pakistan) 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के समय लोकतान्त्रिक पद्धति में विश्वास जताया गया, परन्तु शीघ्र ही इस प्रक्रिया में बाधा पहुंची जब अयूब खान ने पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही लागू कर दी। तब से लेकर वर्तमान समय तक पाकिस्तान में कभी लोकतन्त्र सफलतापूर्वक कायम नहीं रह पाया। अयूब खान के बाद याहया खान तथा जिया उल हक ने पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही को बनाये रखा। पाकिस्तान में लोकतन्त्र को कुछ हद तक सफलता 1990 के दशक में मिली, जब पहले नवाज़ शरीफ तथा बाद में बेनजीर भुट्टो ने लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव जीतकर अपनी-अपनी सरकारें बनाईं।

इन दोनों सरकारों के बनने से यह आशा बंधने लगी थी कि पाकिस्तान अब लोकतन्त्र के मार्ग पर बिना किसी बाधा के चलता रहेगा परन्तु यह आशा ज्यादा समय तक कायम नहीं रह पाई, क्योंकि अक्तूबर, 1999 में पाकिस्तानी सेना के जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथों में ले ली। परवेज मुशर्रफ ने लोकतान्त्रिक ढांचे को समाप्त करके सम्पूर्ण शक्तियाँ अपने हाथों में ले लीं। उनके द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों से यह पता चलता है कि वह लम्बे समय तक पाकिस्तान के शासक बने रहना चाहते थे।

2007 के अन्त में मुशर्रफ ने सेना प्रमुख का पद छोड दिया तथा जनवरी, 2008 में चुनाव करवाने की घोषणा की परन्तु दिसम्बर, 2007 में बेनजीर भुट्टो की एक चुनाव रैली में हत्या कर दी गई। इससे पाकिस्तान में पुनः लोकतन्त्र की बहाली को एक ज़ोरदार झटका लगा। जनवरी में करवाए जाने वाले चुनावों को 18 फरवरी, 2008 को करवाये जाने की घोषणा की गई। इन चुनावों में मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को संयुक्त रूप से बहुमत प्राप्त हुआ तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता सैयद यूसफ रजा गिलानी को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

18 अगस्त, 2008 को परवेज मुशर्रफ ने लगातार बढ़ते दबाव के कारण राष्ट्रपति पद से त्याग-पत्र दे दिया। 6 सितम्बर, 2008 को पाकिस्तान के नये राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। इस चुनाव में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली जरदारी भारी बहुमत से राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इस प्रकार जनवरी, 2008 से लेकर सितम्बर, 2008 तक पाकिस्तान में पुनः लोकतन्त्र को स्थापित करने की प्रक्रिया चलती रही। अब पाकिस्तानी राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर यह दायित्व है, कि वे अपने यहां लोकतान्त्रिक जड़ों को और मज़बूत करें।

2. नेपाल में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव (Democratisation and its reversals in Nepal) नेपाल भारत का एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देश है। नेपाल में भी समय-समय पर लोकतन्त्र की स्थापना की गई, परन्तु वहां पर प्रायः लोकतन्त्र का उलटाव होता रहा है। 1959 में नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना की गई, परन्तु 1962 में नेपाल नरेश महेन्द्र ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समाप्त करके शासन सत्ता पर अपना अधिकार जमा लिया। नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, छात्र संघों तथा श्रम संगठनों ने अनेक निरन्तर आन्दोलन जारी रखा। अन्ततः 1991 में नेपाल में पुनः लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना हुई।

परन्तु इस बार भी नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्थिर होकर कार्य नहीं कर पाई। इसी दौरान नेपाल नरेश वीरेन्द्र एवं उसके परिवार की अज्ञात परिस्थितियों में सामूहिक हत्या कर दी गई। राजा वीरेन्द्र के पश्चात् उनके भाई ज्ञानेन्द्र नेपाल नरेश बने, इनके समय में नेपाल में लोकतन्त्र ठीक तरह से नहीं चल पाया तथा इन्होंने नेपाल में संसद् को भंग करके शासन की सभी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं, जिसके विरोध में नेपाल में व्यापक विरोध आन्दोलन हुए। अन्ततः अप्रैल, 2006 में नेपाल नरेश को आपात्काल की घोषणा वापस लेनी पड़ी। संसद् को पुनः बहाल करना पड़ा तथा गिरिजा प्रसाद कोइराला को देश का प्रधानमन्त्री नियुक्त किया।

नेपाल के सात राजनीतिक दलों ने मिलकर नये संविधान की रचना की तथा 28 मई, 2008 को पिछले 240 वर्षों से चले आ रहे राजतंत्र को सदैव के लिए समाप्त कर दिया। 15 अगस्त, 2008 को संविधान सभा में प्रधानमन्त्री के निर्वाचन के लिए चुनाव हुआ। इस चुनाव में सी० पी० एन० (एम०) के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचण्ड’ प्रधानमन्त्री चुने गए। प्रचण्ड राजशाही समाप्त होने के पश्चात् नेपाल के प्रथम प्रधानमन्त्री बने। परन्तु मई, 2009 में प्रचण्ड ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके स्थान पर सी० पी० एन०-यू० एम० एल० गठबन्धन ने माधव कुमार को नेपाल का प्रधानमन्त्री बनाया।

परंतु माओवादियों के विरोध के कारण माधव कुमार नेपाल को जन, 2010 में अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ा। नेपाल में नवम्बर, 2013 में लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव हुए। इन चुनावों के परिणामों के आधार पर नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेता श्री सुशील कोइराला नेपाल के प्रधानमन्त्री बने। 20 सितम्बर, 2015 संविधान लागू किया गया। यद्यपि वर्तमान समय में नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था बहाल हुई है, परन्तु इसे लम्बे समय तक बनाये रखने की आवश्यकता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 2.
भारत और श्रीलंका के बीच सहयोग और विवाद के क्षेत्रों का परीक्षण कीजिए।
अथवा
भारत के श्रीलंका के साथ पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत और श्रीलंका के सम्बन्ध लगभग दो हज़ार वर्षों से अधिक पुराने हैं। भारत पर ब्रिटिश शासन स्थापित होने पर श्रीलंका भी इंग्लैण्ड के अधीन हो गया। 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब श्रीलंका ने भारत का समर्थन नहीं किया, जिससे भारतीयों की भावना को ठेस पहुंची। यद्यपि तब से लेकर अब तक दोनों के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन आया है और सम्बन्ध सुधरे हैं परन्तु फिर भी दोनों देशों के बीच कुछ विषयों पर मतभेद पाया जाता है। दोनों देशों के बीच पाए जाने वाले विवाद और सहयोग का वर्णन इस प्रकार है

विवाद का विषय
1. श्रीलंका में भारतीय वंशजों की समस्या-भारत और श्रीलंका में तनाव का कारण श्रीलंका में बसे लाखों भारतीयों की समस्या रही है। श्रीलंका की स्वतन्त्रता के समय लगभग 10 लाख भारतीय मूल के नागरिक वहां रह रहे थे। श्रीलंका में 1949 में नागरिक अधिनियम पास कर दिया गया। लगभग सभी भारतीय मूल के निवासियों (8.2 लाख) ने इस अधिनियम के अन्तर्गत नागरिकता के लिए प्रार्थना की परन्तु अक्तूबर, 1964 तक केवल एक लाख 34 हजार व्यक्तियों को ही नागरिकता प्राप्त हुई। श्रीलंका सरकार ने जिन भारतीयों को नागरिकता प्रदान नहीं की थी उन्हें तुरन्त भारत चले जाने के लिए कहा। परन्तु सरकार का कहना था कि जो व्यक्ति कई पीढ़ियों से वहां रहे हैं उनको निकालना गलत है और वे वहीं के नागरिक हैं न कि भारत के। यह समस्या अब भी पूरी तरह से हल नहीं हुई है।

2. तमिल समस्या- भारत और श्रीलंका के सम्बन्धों में तनाव का महत्त्वपूर्ण कारण तमिल समस्या है। 1984 में म्भीर हो गई कि दोनों देशों के सम्बन्धों में काफ़ी तनाव रहा। तमिल समस्या से निपटने के लिए प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने शान्ति सेना भी भेजी। लेकिन आज भी यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। तमिल शरणार्थी-मार्च, 1990 में श्रीलंका से कई हज़ार शरणार्थी भारत आए हैं। इन शरणार्थियों की समस्या आज भी बनी हुई है।

सहयोग के विषय
1. कच्चा टीबू द्वीप:
कच्चा टीबू द्वीप की समस्या को हल करने के लिए जून, 1974 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार कच्चा टीबू द्वीप श्रीलंका को दे दिया गया।

2. संयक्त आयोग की स्थापना:
दोनों देशों के विदेश मन्त्रियों ने जलाई, 1991 में संयक्त आयोग के गठन के समझौते पर हस्ताक्षर किए। 17 फरवरी, 1992 में संयुक्त आयोग की दो दिवसीय बैठक के बाद भारत और श्रीलंका ने व्यापार, आर्थिक और प्रौद्योगिक के क्षेत्र में आपसी सहयोग का दायरा बढ़ाने का फैसला किया।

3. द्विपक्षीय मुक्त व्यापार क्षेत्र:
दिसम्बर, 1998 में श्रीलंका के राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुंगा और भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच दोनों देशों के मध्य एक मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने का समझौता हुआ। इस समझौते के परिणामस्वरूप जहां दोनों देशों का व्यापार बढ़ेगा वहां इन देशों के आपसी सम्बन्ध भी मजबूत होंगे। जून, 2002 में श्रीलंका के प्रधानमन्त्री श्री रानिल विक्रमसिंघे चार दिन की सरकारी यात्रा पर भारत आए। श्री विक्रमसिंघे की इस यात्रा के दौरान भारत ने श्रीलंका को 3 लाख टन गेहूँ उपलब्ध कराने की पेशकश और साथ ही भारतीय उत्पादों की खरीद के लिए 10 करोड़ डॉलर की साख सुविधा की सहमति भी प्रदान की। इससे दोनों देशों के सम्बन्धों में सहयोग उत्पन्न हुआ।

2 जून, 2005 को श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुंगा भारत यात्रा पर आईं। उन्होंने भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ० मनमोहन से द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर बातचीत की। अगस्त, 2008 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह 15वें सार्क सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर गए। इस यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपाक्षे से मिले। इस बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने लिट्टे की समस्या सहित द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

जून, 2011 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे भारत यात्रा पर आए तथा दोनों ने सुरक्षा एवं विकास से सम्बन्धित सात समझौतों पर हस्ताक्षर किये। मई, 2014 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री महिन्द्रा राजपाक्षे भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

मार्च 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने श्रीलंका के लोगों को वीजा ऑन अराइवल देने की घोषणा की। अक्तूबर, 2016 में श्री लंका के राष्ट्रपति श्री सेना भारत हुए बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। मई 2017 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय मुद्दों चर्चा की।

अक्तूबर 2018 में श्रीलंका के प्रधानमन्त्री ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने बुनियादी स्तर के चलाए जाने वाले कार्यक्रमों को गति प्रदान करने पर सहमति प्रकट की। जून, 2019 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा एवं आतंकवाद पर चर्चा की। नवम्बर 2019 में श्री लंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने भारत की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। फरवरी 2020 में श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग एवं सुरक्षा पर बातचीत की।

प्रश्न 3.
भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ, परन्तु साथ ही भारत का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान का जन्म ब्रिटिश शासकों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का परिणाम था। पाकिस्तान भारत का पड़ोसी देश है, जिसके कारण भारत-पाक सम्बन्धों का महत्त्व है। विस्थापित, सम्पत्ति, देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति, नहरी पानी, सीमा-निर्धारण, वित्तीय और व्यापारिक समायोजन, जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर और कच्छ के विवादों के लिए भारत और पाकिस्तान में युद्ध होते रहे हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी रही है।

कश्मीर विवाद (Kashmir Controversy)-स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों (Tribesmen) को प्रेरणा और सहायता देकर कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। इस पर जम्मू-कश्मीर के राजा हरी सिंह ने 22 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की। 27 अक्तूबर को भारत सरकार ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान से कबाइलियों को मार्ग न देने के लिए कहा परन्तु पाकिस्तान पूरी सहायता देता रहा। इस पर लॉर्ड माऊंटबेटन के परामर्श पर भारत सरकार ने 1 जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की 34वीं और 38वीं धारा के अनुसार सुरक्षा परिषद् से पाकिस्तान के विरुद्ध शिकायत की और अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को आक्रमणकारियों की सहायता बन्द करने को कहें।

कश्मीर और संयुक्त राष्ट:
परन्तु सुरक्षा परिषद् कश्मीर विवाद का कोई समाधान करने में असफल रही। 21 अप्रैल, 1948 को सुरक्षा परिषद् ने 5 सदस्यों को भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त आयोग (U.N.C.I.P.) की नियुक्ति की और 1 जनवरी, 1949 को कश्मीर में युद्ध विराम हो गया। सन् 1965 का पाक आक्रमण-सन् 1965 में भारत को दो बार पाकिस्तान के आक्रमण का शिकार होना पड़ा पहली बार अप्रैल में कच्छ के रणक्षेत्र में और दूसरी बार सितम्बर में कश्मीर में।

सितम्बर, 1965 में पाकिस्तानी सेनाओं ने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके छम्ब क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया। अन्त में सुरक्षा परिषद् के 20 सितम्बर के प्रस्ताव का पालन करते हुए दोनों पक्षों ने 22-23 सितम्बर की सुबह 3-30 बजे युद्ध बन्द कर दिया। इस समय तक भारतीय सेनाएँ लाहौर के दरवाजे तक पहंच चुकी थीं। ताशकन्द समझौता-10 जनवरी, 1966 को सोवियत संघ के प्रधानमन्त्री श्री कोसिगन के प्रयत्न से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हो गया जिसके द्वारा भारत के प्रधानमन्त्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात पर सहमत हो गए कि दोनों देशों के सभी सशस्त्र सैनिक 25 फरवरी, 1966 से पूर्व उस स्थान पर वापस बुला लिए जाएंगे जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पूर्व थे तथा दोनों पक्ष युद्ध विराम रेखा पर युद्ध-विराम शर्तों का पालन करेंगे।

1969 में अयूब खां के हाथ से सत्ता निकल कर जनरल याहिया खां के हाथों में आ गई। याहिया खां ने भारत के साथ अमैत्रीपूर्ण नीति का अनुसरण किया। 1971 का युद्ध-1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगला देश) में जनता ने याहिया खां की तानाशाही के विरुद्ध स्वतन्त्रता का आन्दोलन आरम्भ कर दिया। याहिया खां ने आन्दोलन को कुचलने के लिए सैनिक शक्ति का प्रयोग किया। भारत ने बंगला देश के मुक्ति संघर्ष में उसका साथ दिया। मुक्ति संघर्ष के समय लगभग एक करोड़ शरणार्थियों को भारत में आना पड़ा। इससे भारत की आर्थिक व्यवस्था पर बड़ा बोझ पड़ा।

पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का निश्चय किया और पाकिस्तान के आक्रमण का डटकर मुकाबला किया। 5 दिसम्बर को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय संसद् में बंगला देश गणराज्य के उदय की सूचना दी। 16 दिसम्बर, 1971 में ढाका में जनरल नियाज़ी ने आत्म-समर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए और लगभग 1 लाख सैनिकों ने आत्म-समर्पण कर दिया।

शिमला सम्मेलन-3, जुलाई 1972 को दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिमला समझौते के पश्चात् द्वि-पक्षीय वार्तालाप के सिद्धान्तों को प्रोत्साहन दिया गया। मार्च, 1977 में जनता सरकार की स्थापना के पश्चात् भारत-पाक सम्बन्धों में और सुधार हुआ। श्रीमती गांधी सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनवरी, 1980 में प्रधानमन्त्री बनने पर भारत-पाक सम्बन्ध को सुधारने पर बल दिया, परन्तु सोवियत सेना के अफ़गानिस्तान में होने से स्थिति काफ़ी खराब हो गई। जनवरी-फरवरी, 1982 में पाकिस्तान के विदेश मन्त्री आगाशाह भारत आए और उन्होंने युद्ध-वर्जन सन्धि का प्रस्ताव पेश किया जिस पर श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारत-पाक में सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त आयोग की स्थापना का सुझाव दिया।

श्री राजीव गांधी की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध सहयोग के प्रयास-1985 में भारत और पाकिस्तान के कई मन्त्रियों और अधिकारियों की एक-दूसरे के देशों में यात्राएं हुईं। व्यापार, कृषि, विज्ञान, तकनीकी और संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कुछ समझौते भी हुए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की पाकिस्तान यात्रा-29 दिसम्बर, 1988 को प्रधानमन्त्री राजीव गांधी दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान गए और उनकी पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बेनजीर भुट्टो से भारत-पाक सम्बन्धों पर भी बातचीत हुई।

31 दिसम्बर, 1988 को भारत और पाकिस्तान ने आपसी सम्बन्ध सद्भावनापूर्ण बनाने के उद्देश्य से शिमला समझौते के करीब 16 वर्ष बाद तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें एक-दूसरे के परमाणु संयन्त्रों पर आक्रमण नहीं करने सम्बन्धी समझौता काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। राष्टीय मोर्चा सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध दिसम्बर, 1989 में वी० पी० सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। इस सरकार के अल्पकालीन कार्यकाल में भारत-पाक सम्बन्धों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई।

नरसिम्हा राव की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध राष्ट्रमण्डल शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए भारत और पाक के प्रधानमन्त्री ने 17 अक्तूबर, 1991 को हरारे में बातचीत की। 1 जनवरी, 1992 को भारत और पाकिस्तान द्वारा यह समझौता लागू कर दिया गया, जिससे एक-दूसरे के आण्विक ठिकानों और सुविधाओं पर हमला न करने की व्यवस्था की गई थी। पाक परमाणु कार्यक्रम-पाक परमाणु कार्यक्रम में भारत काफी समय से चिन्तित है। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिन्तित होकर भारत ने भी मई, 1998 में पांच परमाणु परीक्षण किए जिसके मुकाबले में पाकिस्तान ने छः परमाणु परीक्षण किए।

बस सेवा के लिए भारत-पाक समझौता-17 फरवरी, 1999 को भारत और पाकिस्तान ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा प्रारम्भ करने के लिए एक समझौता किया। 20 जनवरी, 1999 को भारत-पाक सम्बन्धों में एक नया अध्याय उस समय खुला जब भारतीय प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं बस से लाहौर तक गए। ऐतिहासिक लाहौर घोषणा के अन्तर्गत भारत व पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादों को गम्भीरता से हल करने पर सहमत हुए और दोनों ने एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का विश्वास व्यक्त किया।

कारगिल मुद्दा-पाकिस्तान ने लाहौर घोषणा को रौंदते हुए भारत के कारगिल व द्रास क्षेत्र में व्यापक घुसपैठ करवाई। अनंत धैर्य के पश्चात् 26 मई, 1999 को भारत ने पाकिस्तान के इस विश्वासघात का करारा जवाब दिया। 12 अक्तूबर, 1999 को पाकिस्तान में सेना ने शासन पर अपना कब्जा कर लिया। लेकिन पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने भी भारत के साथ सम्बन्धों में मधुरता का कोई संकेत नहीं दिया। आगरा शिखर वार्ता-पाकिस्तान के शासक परवेज मुशर्रफ भारत के आमन्त्रण पर जुलाई, 2001 में भारत आए। भारत में दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता हुई, जिसमें कश्मीर समस्या का समाधान, प्रायोजित आतंकवाद, एटमी लड़ाई का खतरा, सियाचिन से सेना की वापसी, व्यापार की सम्भावनाएं, युद्धबन्दियों की रिहाई एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान मुख्य मुद्दे थे, परन्तु मुशर्रफ के अड़ियल रवैये के कारण यह वार्ता विफल रही।

भारतीय संसद् पर हमला-13 दिसम्बर, 2001 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद् पर हमला किया जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत खराब हो गये तथा दोनों देशों ने सीमा पर फौजें तैनात कर दी, परन्तु विश्व समुदाय के हस्तक्षेप एवं पाकिस्तान द्वारा लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद पर पाबन्दी लगाए जाने से दोनों देशों में तनाव कुछ कम हुआ।
प्रधानमन्त्री वाजपेयी की इस्लामाबाद यात्रा-जनवरी, 2004 में भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी चार दिन के लिए ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (सार्क) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद गए।

अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री से मुलाकात की। इस शिखर सम्मेलन से दोनों देशों के बीच तनाव में कमी आई और दोनों ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति व्यक्त की। मुम्बई पर आतंकवादी हमला—26 नवम्बर, 2008 को पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों ने मुम्बई के होटलों पर कब्जा करके कई व्यक्तियों को मार दिया। भारत ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बन्द करने की मांग की, जिसे पाकिस्तान ने नहीं माना, इससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुलाई 2009 में मिस्र में 15वें गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दौरान मिले तथा दोनों नेताओं ने परस्पर द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। इस बैठक के दौरान दोनों देशों ने विवादित मुद्दों को परस्पर बातचीत द्वारा हल करने की बात को दोहराया था।

25 फरवरी, 2010 को भारत एवं पाकिस्तान के विदेश सचिवों की नई दिल्ली में बातचीत हुई। इस बातचीत के दौरान भारत ने पाकिस्तान को वांछित आतंकवादियों को भारत को सौंपने को कहा। – अप्रैल, 2010 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री सार्क सम्मेलन के दौरान भूटान में मिले। इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। नवम्बर 2011 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मालद्वीप मे 17वें सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान मिले। इस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सम्बन्धों पर बातचीत की।

दिसम्बर, 2012 में पाकिस्तान के आन्तरिक मंत्री श्री रहमान मलिक भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने वीजा नियमों को और सरल बनाया। सितम्बर, 2013 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने द्विपक्षीय मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने सभी विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। मई, 2014 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

जुलाई, 2015 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूस के शहर उफा में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने आतंकवाद एवं द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। 25 दिसम्बर, 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंच कर दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार लाने का प्रयास किया। 2016 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पठानकोट एवं उरी में आतंकवादी हमले किये, जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत ने 29 सितम्बर, 2016 को सर्जीकल स्ट्राईक करके कई पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों को मार गिराया।

नवम्बर, 2018 में भारत-पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर को बनाने की घोषणा की। यह कॉरिडोर 9 नम्वम्बर, 2019 को खोला गया। करतारपुर साहब सिक्खों का पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के 18 साल बिताए थे। नवम्बर 2018 में सिख समुदाय के लिए भारत एवं पाकिस्तान द्वारा करतारपुर कॉरिडोर खोलने के लिए बनी सहमति एक अच्छा कदम बताया जा सकता है।

14 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पुलवामा में आंतकी हमला करके भारत के 40 सैनिक शहीद कर दिये, जिसके जवाब में भारत ने 26 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी अड्डे बालाकोट में हवाई हमला करके 250 से 300 आतंकवादी मार गिराये। उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट्र रूप से कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध न तो सामान्य थे, और न ही सामान्य हैं। समय के साथ-साथ दोनों देशों में कटुता बढ़ती जा रही है। यह खेद का विषय है कि दोनों देशों में इस कड़वाहट को दोनों देशों के पढ़े-लिखे नागरिक भी दूर करने में असफल रहे। वास्तव में दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तब तक स्थापित नहीं हो सकते जब तक कि दोनों देशों के बीच अनेक विवादास्पद मुद्दों को हल नहीं किया जाता।

प्रश्न 4.
पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों को किस प्रकार सुधारा जा सकता है ?
उत्तर:
भारत एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया के दो महत्त्वपूर्ण और पड़ोसी देश हैं। इन दोनों के सम्बन्ध अधिकांशतः तनावपूर्ण ही रहे हैं, इनके सम्बन्धों को निम्नलिखित ढंग से सुधारा जा सकता है

1. राजनीतिक स्तर पर प्रयास-भारत व पाकिस्तान दोनों राजनीतिक स्तर पर प्रयास करके आपसी सम्बन्धों को सुधार सकते हैं। दोनों देशों को सभी विवादित मुद्दों का शांतिपूर्ण हल खोजना चाहिए। पाकिस्तान को भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियां बन्द कर देनी चाहिएं। दोनों देशों के नेताओं को एक-दूसरे देश की अधिक-से-अधिक यात्राएं करके आपसी विश्वास बढ़ाना चाहिए। दोनों देशों को राजनीतिक समझौते करने चाहिएं। बस-सेवा, रेल सेवा तथा वायु सेवा की शुरुआत इसी प्रकार के समझौते हैं।

2. आर्थिक स्तर पर प्रयास-दोनों देशों को आपसी सम्बन्ध सुधारने के लिए न केवल राजनीतिक स्तर पर ही प्रयास करने चाहिए बल्कि आर्थिक स्तर पर भी प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों को मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली बेरोज़गारी तथा ग़रीबी को दूर करने के प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों को एक-दूसरे की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करना चाहिए।

3. सामाजिक स्तर पर प्रयास- भारत और पाकिस्तान को अपने सम्बन्ध सुधारने के लिए सामाजिक स्तर पर प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों में एक-दूसरे के सगे-सम्बन्धी रहते हैं। दोनों सरकारों को चाहिए कि वे समय-समय इन लोगों को आपस में मिलने की सुविधा प्रदान करें, ताकि दोनों देशों में तनाव कम हो। इस स्तर पर दोनों सरकारों ने कुछ कदम उठाएं भी हैं, जैसे रेल सेवा, बस सेवा तथा वायु सेवा की पुनः शुरुआत इसी प्रकार के प्रयासों में शामिल हैं।

4. सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास-दोनों देशों की सरकारों को अपने सांस्कृतिक सम्बन्ध भी सुधारने चाहिएं। दोनों देशों के बीच साहित्य-कला, संस्कृति तथा खेल गतिविधियों का आदान-प्रदान होना चाहिए। दोनों देशों को वीज़ा की सुविधा को और आसान बनाना चाहिए, ताकि कोई भी इच्छुक कलाकार, साहित्य प्रेमी, बुद्धिजीवी या पत्रकार को वीज़ा लेने में परेशानी न हो।

5. तकनीकी तथा चिकित्सा सेवा का आदान-प्रदान-दोनों देश तकनीकी ज्ञान तथा चिकित्सा के क्षेत्र में भी साथ काम करके आपसी सम्बन्ध सुधार सकते हैं। पिछले कुछ समय में कई पाकिस्तानी बच्चों तथा व्यक्तियों का सफल इलाज भारत में किया गया है। इसी तरह पाकिस्तान तकनीकी क्षेत्र में भी भारत की मदद ले सकता है। उपरोक्त प्रयासों का यदि ईमानदारी से पालन किया जाए तो यकीनी तौर पर भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध सुधर सकते हैं।

प्रश्न 5.
भारत तथा बांग्लादेश के बीच मधुर एवं तनावपूर्ण सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बांग्लादेश के अस्तित्व और उसकी स्वतन्त्रता का श्रेय भारत को है। 1971 में बांग्लादेश स्वतन्त्र देश बना। इससे पूर्व बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा तथा पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। बांग्लादेश की स्वतन्त्रता के लिए भारत के जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी। 6 दिसम्बर, 1971 को भारत ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी।

1971 की मैत्री सन्धि:
शेख मुजीबुर्रहमान 12 जनवरी, 1972 को बांग्लादेश के प्रधानमन्त्री बने। फरवरी, 1972 में जब वे भारत आए तो उन्होंने कहा था, “भारत और बांग्लादेश की मित्रता चिरस्थायी है, उसे दुनिया की कोई ताकत तोड़ नहीं सकती।” 19 मार्च, 1972 को भारत और बांग्लादेश में 25 वर्ष की अवधि के लिए मित्रता और सहयोग की सन्धि हुई। इस सन्धि की महत्त्वपूर्ण बातें इस प्रकार थीं

  • आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे की अखण्डता व सीमाओं का सम्मान करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश किसी तीसरे देश को कोई ऐसी सहायता नहीं देंगे जो दोनों में किसी देश के हित के विरुद्ध हो।
  • दोनों देश उपनिवेशवाद का विरोध करेंगे।

बांग्लादेश को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने में भारत की सहायता-बांग्लादेश ने 9 अगस्त, 1972 को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के लिए प्रार्थना-पत्र भेजा। भारत के प्रयास के फलस्वरूप और रूस से सहयोग से बांग्लादेश . संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया। शेख मुजीबुर्रहमान की भारत यात्रा-1974 में शेख मुजीबुर्रहमान ने भारत यात्रा की तथा 1975 में गंगा जल के . बंटवारे से सम्बन्धित विवाद को बातचीत द्वारा समाप्त करने की कोशिश की।

सम्बन्धों में परिवर्तन-15 अगस्त, 1975 को बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की परिवार सहित हत्या कर दी गई। शेख की हत्या के बाद भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों में तेजी से परिवर्तन आ गया। नवम्बर, 1975 में जनरल ज़ियाउर्रहमान राष्ट्रपति बने। तब से बांग्लादेश में भारत-विरोधी प्रचार तेज़ हो गया।

जनता सरकार और भारत-बांग्लादेश देश सम्बन्ध-मार्च, 1977 में भारत में जनता पार्टी की सरकार बनी और दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार की किरण दिखाई दी। अक्तूबर, 1977 में फरक्का समझौता हुआ। जुलाई, 1983 में भारत तथा बांग्लादेश में तीस्ता (Teesta) नदी में जल-वितरण को लेकर एक तदर्थ समझौता हुआ। अक्तूबर, 1983 में बांग्लादेश के मुख्त मार्शल-ला प्रशासक जनरल इरशाद की दो दिवसीय भारतीय यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ।

नवम्बर, 1985 में भारत तथा बांग्ला देश ने फरक्का के पानी के बंटवारे के सम्बन्ध में अगले तीन वर्षों के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह 1982 के समझौते पर आधारित था। चकमा शरणार्थियों की समस्या-बांग्लादेश से अप्रैल, 1990 में लगभग 60 हजार चकमा शरणार्थी भारत आ चुके हैं। चकमा शरणार्थियों की वापसी के लिए कई बार बातचीत हुई परन्तु अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि बांग्लादेश की सरकार चकमा शरणार्थियों की सुरक्षा को विश्वसनीय गारण्टी नहीं देती।

तीन बीघा गलियारे का हस्तांतरण-26 मई, 1992 को बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री बेगम खालिदा ज़िया भारत आईं। दोनों देशों में तीन बीघा पर एक समझौता हुआ जिसके अन्तर्गत 26 जून, 1992 को भारत ने तीन बीघा गलियारा बांग्लादेश को पट्टे पर सौंप दिया। परन्तु गलियारे पर प्रशासनिक अधिसत्ता भारत की ही रहेगी।

गंगा जल पर भारत व बांग्लादेश के बीच समझौता-12 दिसम्बर, 1996 को भारत और बांग्लादेश में फरक्का गंगा जल बंटवारे पर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ जिससे पिछले दो दशकों से चले आ रहे विवाद का अन्त हो गया। इस समझौते से गंगा में पानी की कमी के मौसम में भी दोनों को बराबर मात्रा में पानी देने की व्यवस्था की गई है। ये समझौता 30 वर्षों के लिए किया गया।

प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद की भारत यात्रा-जून, 1998 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद भारत आईं और उन्होंने प्रधानमन्त्री वाजपेयी से बातचीत की। दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि द्विपक्षीय समस्याओं का हल द्विपक्षीय वार्ता द्वारा होना चाहिए। जनवरी, 1999 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद तीन दिन की यात्रा पर भारत आईं। प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद ने कहा कि उसकी सरकार पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी और भारत के आतंकवादियों को पड़ोसी देशों में गुप्त गतिविधियां चलाने के लिए अपने देश का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगी।

19 जून, 1999 को भारत व बांग्लादेश के सम्बन्धों में सुधार लाने के लिए दोनों देशों के बीच बस सेवा प्रारम्भ की गई। स्वयं भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी कोलकाता से चली इस बस की अगुवाई के लिए ढाका पहुंचे। अपनी इस बांग्लादेश की यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री ने बांग्लादेश को ₹200 करोड़ का कर्ज देने का समझौता किया। इसके अतिरिक्त भारत ने बांग्लादेश से ‘प्रशुल्क रहित आयात’ के लिए भी सैद्धान्तिक रूप से स्वीकृति प्रदान की।

भारत और बांग्लादेश ने 9 अप्रैल, 2000 को अगरतला और ढाका के बीच एक नई बस सेवा चलाने का निर्णय किया। सन् 2000 में दोनों देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध और मजबूत हुए। भारत ने कुछ चुनिंदा बांग्ला देशी वस्तुओं को बिना किसी तटकर के देश में प्रवेश की इजाजत दी। जून, 2005 में दोनों देशों के विदेश सचिवों में अनेक समस्याओं पर बातचीत हुई और दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार हुआ। अप्रैल, 2008 में भारत व बांग्लादेश के बीच 43 वर्षों के पश्चात् कोलकाता तथा ढाका के मध्य ‘मैत्री एक्सप्रेस’ रेलगाड़ी चलाई गई। बांग्लादेश में 29 दिसम्बर, 2008 को आम चुनाव हुए।

इन चुनावों में शेख हसीना की पार्टी को जबरदस्त चुनावी सफलता मिली तथा शेख हसीना देश की प्रधानमन्त्री बनी। शेख हसीना के बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री बनने से भारत-बांग्लादेश सम्बन्ध और अधिक घनिष्ठ होने की आशा बढ़ी है। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा-जनवरी, 2010 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत यात्रा पर आईं।

इस यात्रा के दौरान भारत ने बांग्लादेश को 250 मेगावाट बिजली देने की घोषणा की तथा बांग्लादेश के 300 छात्रों को प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति देने की घोषणा की। दूसरी ओर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने घोषणा की, कि वह अपने क्षेत्र का प्रयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने देंगी। 6-7 सितम्बर, 2011 को भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बांग्ला देश की यात्रा की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने पारस्परिक सहयोग के 4 समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

जून, 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किये। अक्तूबर, 2016 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना बिम्स्टेक में भाग लेने के लिए भारत आई। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। अप्रैल 2017 में बांग्ला देश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना भारत यात्रा पर आई। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। मई 2018 में बंगलादेशी प्रधानमंत्री भारत यात्रा पर आई।

इस दौरान दोनों देशों ने रोहिंय्या मुद्दे सहित द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। अक्तूबर, 2019 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने 7 महत्त्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किये। संक्षेप में भारत ने बांग्लादेश को हर परिस्थिति व समय पर सहायता दी है, लेकिन भारत को बांग्लादेश से वैसा सहयोग प्राप्त नहीं हुआ जिसकी भारत आशा रखता है। 17 दिसम्बर, 2020 को भारत एवं बांग्ला देश के प्रधानमन्त्रियों ने आभासी (Virtual) मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी सम्बन्धों एवं कोरोना महामारी पर चर्चा की।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 6.
भारत और नेपाल के पारस्परिक सम्बन्धों का मूल्यांकन कीजिए।
अथवा
भारत और नेपाल के आपसी सम्बन्धों में विवाद और सहयोग के मुख्य मुद्दों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
नेपाल, भारत और चीन के बीच तिब्बत क्षेत्र में स्थित है और चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। भारत और नेपाल धर्म, संस्कृति और भौगोलिक दृष्टि से एक-दूसरे के जितने करीब हैं, उतने विश्व के शायद ही कोई अन्य देश हों। नेपाल की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक भारत पर निर्भर करती है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। आवागमन पर कोई रोक नहीं है। सन् 1950 से 1960 तक दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत मित्रतापूर्ण रहे। कश्मीर के प्रश्न पर नेपाल ने भारत का समर्थन किया तथा उसे भारत का अभिन्न अंग बताया। भारत ने आर्थिक क्षेत्र से नेपाल की बहुत सहायता की। 1952 में प्रारम्भ किया गया भारतीय सहायता कार्यक्रम धीरे-धीरे आकार तथा क्षेत्र में फैलता गया। नेपाली वित्त मन्त्रालय के एक वक्तव्य के अनुसार सन् 1951 से जुलाई, 1964 के बीच नेपाल द्वारा प्राप्त की गई विदेशी सहायता में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ के बाद भारत का तीसरा स्थान है।

दोनों देशों में तनावपूर्ण काल-1960 में नेपाल महाराजा ने संसद् को भंग कर नेताओं को जेल में डाल दिया। इस पर भारत के प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के महाराजा की आलोचना करते हुए कहा कि, “नेपाल से लोकतन्त्र समाप्त हो गया।” इससे दोनों देशों के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। सहयोग का काल-1975 में नेपाल नरेश भारत आए जिससे दोनों देशों में पुनः अच्छे सम्बन्ध स्थापित हो सके। दिसम्बर, 1977 में प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने नेपाल की यात्रा की और दोनों देशों में मित्रता बढ़ी। जनवरी, 1980 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के पुनः सत्ता में आने पर भारत-नेपाल सम्बन्धों में सुधार हुआ। 3 फरवरी, 1983 को नेपाल के प्रधानमन्त्री भारत आए और दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हुए। भारत ने सड़क निर्माण, बिजली, संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में नेपाल की भरपूर मदद की है। 1987 में दोनों देशों ने संयुक्त आयोग के गठन पर समझौता किया।

तनावपूर्ण सम्बन्ध-भारत-नेपाल व्यापार तथा पारगमन सन्धि नवीकरण न होने से दोनों देशों के सम्बन्धों में कटुता आ गई। भारत एक समन्वित सन्धि के पक्ष में था जबकि नेपाल मार्च, 1989 तक जारी व्यवस्था के तहत दो अलग सन्धियाँ करने के लिए जोर देता रहा। 5 दिसम्बर, 1991 को नेपाल के प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला भारत की दो दिन की यात्रा पर आए। यात्रा की समाप्ति पर 6 दिसम्बर, 1991 को दोनों देशों के बीच पांच सन्धियों पर हस्ताक्षर किए गए।

प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव की नेपाल यात्रा-19 अक्तूबर, 1992 को भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव तीन दिन की यात्रा पर नेपाल गए। भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने, भारत को नेपाल के उदार शो पर निर्यात वद्धि करने और विपल जल संसाधनों का दोनों देशों से साझे हित में प्रयोग करने पर सहमति व्यक्त की। इसके अलावा दोनों देशों में आपसी हित के कई मुद्दों पर बातचीत हुई। नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-अप्रैल, 1995 में नेपाल के प्रधानमन्त्री मनमोहन अधिकारी भारत की यात्रा पर आए और उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार हुआ।

नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-फरवरी, 1996 में नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री शेर बहादुर दोऊबा भारत की यात्रा पर आए। नेपाल और भारत के मध्य आपसी सहयोग में कई समझौते हुए। नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री दोऊबा ने कहा कि उनका देश शीघ्र ही नेपाल भारत के मध्य सम्पन्न 1950 की सन्धि की समीक्षा के लिए एक आयोग गठित करेगा। महाकाली सन्धि-29 फरवरी, 1996 को भारत और नेपाल ने सिंचाई और बिजली उत्पाद के लिए महाकाली नदी के पानी का उपयोग करने के लिए एक सन्धि पर हस्ताक्षर किए।

नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने तथा अन्य विषयों पर बातचीत करने के उद्देश्य से अगस्त, 2000 में नेपाल के प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला भारत की यात्रा पर आए। भारत की सुरक्षा चिन्ता को देखते हुए नेपाली प्रधानमन्त्री ने भारत को यह आश्वासन दिया कि वह अपनी भूमि से भारत के विरुद्ध कोई भी आतंकवादी गतिविधि नहीं चलने देगा और आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत का साथ देगा।। – नेपाल में आपातकाल एवं भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा मदद का आश्वासन-24 नवम्बर, 2001 को नेपाल में माओवादियों ने 50 सुरक्षा कर्मियों की हत्या कर दी, जिस कारण नेपाल में आपात्काल लागू कर दिया गया। 30 नवम्बर, 2001 को भारतीय प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने नेपाल को हर सम्भव सहायता देने की बात की।

1 फरवरी, 2005 को नरेश ज्ञानेन्द्र ने शेर बहादुर दोऊबा सरकार को बर्खास्त करके सत्ता की कमान अपने हाथ में ले ली जिस पर भारत ने नेपाल को सैन्य सप्लाई रोक दी। 29 अप्रैल, 2005 को नरेश ज्ञानेन्द्र ने आपात्काल को हटा दिया और अनेक नेताओं को रिहा कर दिया। भारत ने नेपाल को आंशिक रूप से सैन्य सप्लाई बहाल करने की घोषणा की और नेपाल में शीघ्र ही बहुदलीय लोकतन्त्र की बहाली की उम्मीद जताई। 28 मई, 2008 को नेपाल में राजतन्त्र को सदैव के लिए समाप्त कर दिया गया तथा 15 अगस्त, 2008 को सी०पी०एन० (एम०) के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचण्ड’ को प्रधानमंत्री चुना गया। सितम्बर, 2008 में नेपाली प्रधानमंत्री ‘प्रचण्ड’ भारत यात्रा पर आए, जिससे दोनों देशों के सम्बन्धों में और सुधार आया।

नेपाली राष्ट्रपति की भारत यात्रा-जनवरी, 2010 में नेपाल के राष्ट्रपति श्री राम बरन यादव भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए। जनवरी-फरवरी-2011 में नेपाल के राष्ट्रपति पुनः भारत की 10 दिवसीय यात्रा पर भारत आए तथा भारतीय प्रधानमन्त्री से द्वि-पक्षीय मुद्दों पर बातचीत की, जिसमें भारत-नेपाल मैत्री सन्धि के नवीनीकरण का मुद्दा भी शामिल था।

मई, 2014 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री सुशील कोइराला भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। अगस्त, 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने नेपाल को ₹ 61 अरब की मदद देने की घोषणा की।

अक्तूबर, 2016 में नेपाल के प्रधानमन्त्री पुष्प कमल ‘दहल प्रचण्ड’ बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। अगस्त 2017 में नेपाली प्रधानमन्त्री भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 8 महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये। अगस्त 2018 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए नेपाल की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। 17 अगस्त, 2020 को भारत एवं नेपाल के प्रधानमन्त्रियों के बीच आभासी (Virtual) मुलाकात हुई। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की।

प्रश्न 7.
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) की पृष्ठभूमि एवं इसकी स्थापना के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, अफगानिस्तान और श्रीलंका का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। 14वें सार्क सम्मेलन में जोकि 2007 में भारत में हुआ था, अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था। इस संगठन की स्थापना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग द्वारा दक्षिणी एशिया के लोगों के कल्याण के लिए की गई थी।

सार्क की स्थापना (Establishment of SAARC):
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटों-पूंजीवादी गुट और साम्यवादी गुट में बंट गया था। पूंजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका जबकि साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ करने लगा। विश्व में आर्थिक सहयोग और सुरक्षात्मक उद्देश्यों को लेकर क्षेत्रीय संगठन बनने लगे। आपसी संगठन बनाने की यह प्रक्रिया पूरे यूरोप और धीरे-धीरे विश्व भर में फैलने लगी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुत-से देश स्वतन्त्र हुए थे। ये देश सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक आदि क्षेत्रों में अत्यन्त पिछड़े हुए थे। एक ओर ये नव-स्वतन्त्र देश महाशक्तियों की गुटीय राजनीति से अलग रहना चाहते थे और दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थे।

इस दृष्टि से पिछड़े देशों (तीसरी दुनिया) में क्षेत्रीय संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। विशेषतया एशिया में क्षेत्रीय संगठन बनाने की प्रक्रिया 1967 में आसियान (ASEAN) की स्थापना से प्रारम्भ हुई जिसमें-ब्रुनेई, इण्डोनेशिया, फिलीपीन्स, मलेशिया, सिंगापुर, दारुस्सलाम और थाइलैंड शामिल हुए। तुर्की, ईरान और पाकिस्तान ने भी विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग की व्यवस्था की। जुलाई, 1975 में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए बांग्लादेश, भारत, फिलीपीन्स, लाओस, श्रीलंका, थाइलैंड आदि देशों ने समझौता किया।

दक्षिण एशियाई देशों में सामाजिक, जातीय, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों की सामान्य सांझ है और तीव्र विकास की इच्छा भी है लेकिन इनमें कई बातों पर आपसी अविश्वास की भावना भी देखी जा सकती है। विशेष रूप से इन देशों के सुरक्षात्मक हित, विभिन्न राजनीतिक संस्कृति भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद और इस क्षेत्र में भारत की विशेष स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 70 के दशक के अंत में बांग्लादेश के दिवंगत राष्ट्रपति जिआउर्रहमान ने एक विचार दिया था कि दक्षिण एशिया के सात देशों को मिलकर इस क्षेत्र की समस्याओं पर विचार करना चाहिए और आर्थिक विकास के लिए प्रयास करना चाहिए।

आपसी सहयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग के लिए बांग्लादेश कार्यकारी पत्र (Bangladesh Working paper on South Asian Regional Cooperation) जारी किया गया जिसमें सहयोग के 11 प्रमुख बिन्दुओं पर बल दिया गया। ये 11 प्रमुख बिन्दु थे दूर संचार, यातायात, जहाजरानी, शैक्षणिक व सांस्कृतिक सहयोग, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग, कृषि अनुसंधान, पर्यटन, संयुक्त उपक्रम, बाजार प्रोत्साहन मौसम विज्ञान।

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे की सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

राजनीतिक विज्ञान अनेक अध्ययनों के पश्चात् 1-2 अगस्त, 1983 को दिल्ली में सात देशों-भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हई। इस बैठक में सातों देशों के विदेश मन्त्रियों ने दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते की उद्घोषणा में कहा गया कि दक्षिणी एशिया में आपसी सहयोग लाभदायक, वांछनीय और आवश्यक है और इससे क्षेत्र के लोगों के जीवन को सुधारने में मदद और प्रोत्साहन मिलेगा।

अन्ततः दक्षिणी एशियाई देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन बांग्ला देश की राजधानी ढाका में हुआ जिसमें 8 दिसम्बर, 1985 को सार्क घोषणा-पत्र (Charter) को स्वीकार किया गया। इस प्रकार औपचारिक रूप से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) अस्तित्व में आया। इस संगठन की स्थापना में भारत की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। इसके प्रथम शिखर सम्मेलन के अन्त तक भारत का योगदान इसमें विशेष स्थान रखता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत दक्षिणी एशिया का एक प्रमुख देश है और सार्क की सफलता या असफलता बहुत सीमा तक भारत के सक्रिय सहयोग पर ही निर्भर करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क दक्षिणी एशिया के आठ देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यह एक राजनीतिक संगठन नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी व वैज्ञानिक हितों की पूर्ति के लिए आपसी सहयोग पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन का उदय भी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं से प्रेरित है। सार्क की स्थापना में भारत की सक्रिय भागीदारी रही है।

प्रश्न 8.
सार्क के लक्ष्य और सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, अफगानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। अप्रैल, 2007 में दिल्ली में 14वें सार्क सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हए अन्तर्राष्टीय वातावरण के सन्दर्भ में हई।

इस संगठन की स्थापना बांग्लादेश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसम्बर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC):
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC):
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मजबूत बनाना।
  • एक-दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझबूझ और सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीति गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करे तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 9.
सार्क की महत्त्वपूर्ण गतिविधियां क्या रही हैं ? उनमें भारत की भूमिका क्या है ?
अथवा
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) द्वारा अपने अस्तित्व में किए गए मुख्य कार्य कौन-से हैं ? इनमें भारत की भूमिका क्या रही है ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य इन देशों के बीच अधिकाधिक क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करना है ताकि समस्याएं एक-दूसरे की सहायता से हल हो सकें। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।

दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा।’ सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे को सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

प्रथम शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ का प्रथम शिखर सम्मेलन 1985 में ढाका में हआ। इस सम्मेलन में सभी सदस्यों ने पारस्परिक सहयोग के लिए अपनी वचनबद्धता पर सहमति प्रकट की। द्वितीय शिखर सम्मेलन-द्वितीय शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1986 में भारत में बंगलौर में हुआ।

इन देशों ने 1990 तक सार्वभौमिक प्रतिरक्षण, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, मातृ-शिशु पोषाहार, साफ़ सुरक्षित पेय जल की व्यवस्था और 2000 से पूर्व समुचित आवास के लक्ष्य निर्धारित किए। तृतीय शिखर सम्मेलन-सार्क का तीसरा शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1987 में काठमांडू में हुआ। इस सम्मेलन में तीन ऐतिहासिक निर्णय लिए गए

  • आतंकवाद को समाप्त करने का समझौता हुआ।
  • दक्षिण एशियाई खाद्य सुरक्षा भण्डार की स्थापना का निर्णय किया गया।
  • तीसरा महत्त्वपूर्ण निर्णय सार्क क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा के उपाय करने के लिए पर्यावरण सम्बन्धी अध्ययन करना है।

चौथा शिखर सम्मेलन-सार्क का चौथा सम्मेलन श्रीलंका की अशान्त स्थिति के कारण वहां न होकर 29 सितम्बर, 1988 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुआ। इस सम्मेलन का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह सम्मेलन पाकिस्तान में लोकतन्त्र की बहाली के बाद हुआ। इस सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए

(1) इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रीय संसदों के सदस्य एक विशेष सार्क पत्र दस्तावेज़ पर किसी भी देश की यात्रा कर सकेंगे तथा उन्हें वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होगी।

(2) नशीले पदार्थों के ग़लत प्रयोग को रोकने हेतु जोरदार अभियान जारी रखने का संकल्प किया।

(3) इस सम्मेलन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘सार्क 2000’ का निर्माण है। ‘सार्क 2000’ एक क्षेत्रीय योजना की अवधारणा है। इस योजना द्वारा शताब्दी के अन्त तक इस क्षेत्र के एक अरब से ज्यादा लोगों की आवास, शिक्षा और साक्षरता की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।

(4) संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुसार वर्ष 1989 को ‘बालिका वर्ष’ के रूप में मनाने का आह्वान किया ग

(5) परमाणु निःशस्त्रीकरण का भी निर्णय लिया गया।

(6) शिखर सम्मेलन के निर्णय के अनुसार इस क्षेत्र का कोई भी देश सार्क का सदस्य बन सकता है, यदि वह इसके घोषणा-पत्र के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखता है। कोलम्बो सम्मेलन-21 दिसम्बर, 1991 को सार्क का सम्मेलन कोलम्बो में हुआ। सार्क के सातों देश क्षेत्र में व्यापार को उदार बनाने पर सहमत हो गए। सातों सदस्य देशों ने नि:शस्त्रीकरण की सामान्य प्रवृत्तियों का स्वागत किया। घोषणा-पत्र में मानव अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है।

ढाका शिखर सम्मेलन-12 दिसम्बर, 1992 को सार्क का शिखर सम्मेलन ढाका (बांग्लादेश) में होना था, परन्तु भारत के आग्रह पर स्थगित कर दिया गया और 13 जनवरी, 1993 को शिखर सम्मेलन होना निश्चित किया गया।13 जनवरी को भी यह सम्मेलन न हो सका। यह सम्मेलन 10 और 11 अप्रैल को ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में दक्षेस राष्ट्रों के नेताओं ने सातों राष्ट्रों के बीच एक ‘महाबाज़ार’ का निर्माण करने तथा दक्षिण एशिया के स्वतन्त्र व्यक्तित्व पर विशेष बल दिया।

नई दिल्ली सम्मेलन-2 मई, 1995 को सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की मुख्य उपलब्धि आपसी सहयोग के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था (साप्टा) पर सदस्य राष्ट्रों की सहमति है। सभी सदस्य राज्यों ने वर्ष 1995 को ‘दक्षेस ग़रीबी उन्मूलन वर्ष’ मनाने का फैसला किया। नौवां शिखर सम्मेलन-मई, 1997 में मालदीव की राजधानी माले में सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन हुआ। माले शिखर सम्मेलन में सन् 2001 तक दक्षेस में मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) स्थापित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

दक्षेस का दसवां शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का दसवां शिखर सम्मेलन तीन दिन के लिए कोलम्बो में 28 जुलाई, 1998 को प्रारम्भ हुआ और 31 जुलाई को समाप्त हुआ। दक्षेस ने सदस्य देशों की सभी क्षेत्रों में स्मृद्धि के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक कार्यसूची की घोषणा की। सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट करने और प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण के तहत विश्वभर में परमाणु नि:शस्त्रीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता की अपनी वचनबद्धता को दोहराया।

दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन-दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारत एवं पाकिस्तान के तनाव के बीच 5 एवं 6 फरवरी, 2002 को हुआ। इस सम्मेलन में अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये, जैसे कि आतंकवाद को समाप्त करने एवं दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) को शीघ्र लागू करने के फैसले लिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक और एड्स के मुकाबले के लिए सामूहिक पहल की बात भी दक्षेस घोषणा में कही गई।

12वां सार्क शिखर सम्मेलन, जनवरी-2004:
‘दक्षेस’ देशों का 12वां शिखर सम्मेलन 4 जनवरी, 2004 को इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुआ। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। सम्मेलन के अन्त में 11 पृष्ठों का एक साझा घोषणा-पत्र (इस्लामाबाद घोषणा-पत्र) जारी किया गया। इस सम्मेलन की प्रमुख बातें निम्नलिखित रहीं

  • दक्षिणी एशियाई मुक्त व्यापार व्यवस्था’ (साफ्टा) को मन्जूरी दी गई। यह समझौता 1 जनवरी, 2006 से लागू होगा।
  • दक्षिणी एशिया से ग़रीबी, पिछड़ापन आदि दूर करने के लिए सामाजिक घोषणा-पत्र जारी किया गया।
  • 1987 में किए गए आतंकवाद निरोधक सार्क समझौते की समीक्षा की गई तथा आतंकवाद पर प्रभावी रोकथाम लगाने पर सहमति हुई।
  • दक्षेस पुरस्कार आरम्भ करने का निर्णय लिया गया।

13वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 13वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2005 में ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में एक जुट होकर आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करने की घोषणा की गई।

14वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन अप्रैल, 2007 में भारत में हुआ। इस सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया।

15वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 15वां शिखर सम्मेलन अगस्त, 2008 में श्रीलंका में हुआ। इस सम्मेलन में सार्क क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने एवं आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करने की घोषणा की गई।

16वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 16वां शिखर सम्मेलन 28-29 अप्रैल, 2010 को भूटान की राजधानी थिम्पू में हुआ। सम्मेलन के दौरान 2011-2020 के दशक को ‘डिकेड ऑफ़ इन्ट्रीजनल कनेक्टिविटी इन सार्क के रूप में मानने का निर्णय लिया गया। सम्मेलन में आतंकवाद की आलोचना करते इसे समाप्त करने के लिए पारस्परिक सहयोग पर जोर दिया गया।

17वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 17वां शिखर सम्मेलन 10-11 नवम्बर, 2011 को मालदीव में हुआ। इस सम्मेलन में राष्ट्रों के आपसी व्यापार, आपदा प्रबन्धन, समुद्री दस्युओं से निपटने की समस्या व वैश्विक आर्थिक संकट के मुद्दों पर चर्चा हुई।

18वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 18वां शिखर सम्मेलन 26-27 नवम्बर, 2014 में नेपाल में हुआ। शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र में 36 बिन्दुओं पर 15 साल के भीतर सहमति बनाते हुए आगे बढ़ने पर जोर दिया गया है। इसमें सार्क देशों में आतंकवाद, उग्रवाद और धार्मिक अतिवाद नियंत्रण के लिए तंत्र विकसित करने का उल्लेख किया गया है। साथ ही वीजा सरलीकरण एवं जन-सम्पर्क बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

भारत की भूमिका:

  • सार्क का दूसरा सम्मेलन 1986 में श्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में बैंगलौर में हुआ।
  • 1987 में भारत ने सार्क को ₹ 150 लाख की मदद दी।
  • सार्क द्वारा संरक्षित अन्न भण्डार कायम करने के लिए भारत ने 1,53,200 टन खाद्यान्न का योगदान दिया।
  • 1992 में दिल्ली में सार्क का प्रथम सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
  • पहली दक्षेस विदेश मन्त्रियों की बैठक 1996 को दिल्ली में हुई।
  • सार्क व्यापार मेले का आयोजन भी भारत में किया गया।
  • भारत ने सार्क देशों के समक्ष द्विपक्षीय मुक्त व्यापार का प्रस्ताव रखा।
  • भारत, नेपाल एवं भूटान के साथ मुक्त व्यापार कर रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
दक्षिण एशिया, एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिम में अरब सागर तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी स्थित है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल तथा श्रीलंका को शामिल किया जाता है। अफ़गानिस्तान तथा म्यांयार को भी प्रायः दक्षिण एशिया में ही मान लिया जाता है।

प्रश्न 2.
‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 7-8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैं भारत, मालदीव, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और नेपाल। अप्रैल, 2007 में दिल्ली में हुए 14वें सार्क शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था।

प्रश्न 3.
सार्क के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
अथवा
सार्क (SAARC) के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें।
  • क्षेत्र की अधिक-से-अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति करना।
  • दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्म-विश्वास पैदा करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत करना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में सहयोग करना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 4.
दक्षेस (SAARC) का क्या अर्थ है ? इसके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना अगस्त, 1983 में सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली में बैठक की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1985 में ढाका (बांग्ला देश) में हुआ। इस प्रकार 1985 में सार्क की औपचारिक स्थापना हो गई। सार्क का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के राष्ट्रों की समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाना है और इन राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में विकास करना है।

महत्त्व:

  • सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
  • क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।

प्रश्न 5.
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सभी सदस्य देशों ने प्रारम्भ से ही व्यापारिक उद्देश्यों के लिए आपस में सहयोग करने पर बल दिया है। विशेषतया 90 के दशक में एशियाई क्षेत्र के देशों के लिए आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में सहयोग करना और भी आवश्यक था क्योंकि इस दौरान यूरोप व विश्व के भागों में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए क्षेत्रीय संगठन बन रहे थे।

इससे दक्षिणी एशिया के देशों को उनके साथ व्यापार करने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। इस दृष्टि से 1993 में ढाका शिखर सम्मेलन में सार्क देशों ने आपस में एक ‘सुपर बाज़ार’ स्थापित करने पर बल दिया। इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने ‘दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था’ (साप्टा) पर हस्ताक्षर किए।

दिसम्बर, 1995 तक सभी सदस्य देशों ने साप्टा को स्वीकृति प्रदान कर दी और यह अस्तित्व में आया। ‘साप्टा’ के अन्तर्गत देशों ने आपसी व्यापार पर से विभिन्न वस्तुओं पर से मात्रात्मक एवं गुणात्मक प्रतिबन्ध हटा लिए हैं। अनेक व्यापारिक बाधाओं को हटा लिया गया है। इससे सार्क देशों के बीच सहयोग बढ़ने में सहायता मिली है।

प्रश्न 6.
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा
‘साफ्टा’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
‘साफ्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (साफ्टा) की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हो अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो। ‘साफ्टा’ की स्थापना इसी उद्देश्य के लिए की गई थी।

यह भी आशा की गई थी कि 21वीं शताब्दी के शुरू होने से पहले ‘साप्टा’ का स्थान साफ्टा ले लेगा। सार्क के 10वें शिखर सम्मेलन (ढाका) में यह निर्णय लिया गया कि ‘साफ्टा’ के सम्बन्ध में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की जाए जो 2001 की एक सन्धि तक पहुंचने के लिए अपना निष्कर्ष दे। जनवरी, 2004 में इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुए 12वें सार्क शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के लागू होने से यह आशा की जा सकती है कि इससे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

प्रश्न 7.
सार्क देशों के सम्मुख उपस्थित किन्हीं चार समस्याओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
दक्षेस (सार्क) की किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन करें।
अथवा
दक्षेस (सार्क) के सामने मुख्य समस्याएं क्या हैं ? उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सार्क की सफलता में सदैव भारत-पाक के कटु सम्बन्ध रुकावट पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर पूर्ण विश्वास नहीं रख पा रहे हैं।
  • सार्क के अधिकांश देशों में आन्तरिक अशान्ति एवं अस्थिरता इसके मार्ग में रुकावट है।
  • सार्क देशों में अधिक मात्रा में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा भूखमरी पाई जाती है, जोकि इसकी सफलता में बाधा पैदा करती है।

प्रश्न 8.
सार्क के सचिवालय की रचना का वर्णन करें।
उत्तर:

  • सार्क के चार्टर के अनुच्छेद 8 में सचिवालय की व्यवस्था की गई है। 16 जनवरी, 1987 को बैंगलौर (बंगलुरु) में हुए दूसरे सार्क सम्मेलन में सचिवालय की स्थापना की घोषणा की गई।
  • सार्क का सचिवालय नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में बनाया गया है।
  • सार्क का एक महासचिव होता है, जोकि दो वर्ष के लिए सदस्य राष्ट्रों में से ही चुना जाता है।
  • सचिवालय अपने कार्यों को सात विभागों के माध्यम से सम्पन्न करता है।

प्रश्न 9.
‘शिमला समझौते’ पर एक संक्षिप्त लेख लिखें।
उत्तर:
दिसम्बर, 1971 में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में ऐतिहासिक मात दी। इस युद्ध के पश्चात् 3 जुलाई, 1972 को भारत-पाकिस्तान ने शिमला में एक समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसे शिमला समझौता कहा जाता है। इस समझौते की प्रमुख शर्ते इस प्रकार हैं

  • दोनों राष्ट्र अपने पारस्परिक झगड़ों को द्विपक्षीय बातचीत और मान्य शान्तिपूर्ण ढंगों से हल करने के लिए दृढ़-संकल्प हैं।
  • दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता और सार्वभौम समानता का सम्मान करेंगे।
  • दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी का प्रयोग नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों द्वारा परस्पर विरोधी प्रचार नहीं किया जाएगा।
  • दोनों देश परस्पर सामान्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयत्न करेंगे।

प्रश्न 10.
दक्षिण एशिया में आर्थिक वैश्वीकरण के कोई चार प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण दक्षिण एशिया में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में सूचना क्रान्ति एवं प्रौद्योगिकी का विकास एवं विस्तार हुआ।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ा है।

प्रश्न 11.
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर:
(1) कश्मीर के विषय में दोनों के विचार परस्पर विरोधी हैं तथा कश्मीर की समस्या का समाधान असम्भव प्रतीत होता है।

(2) पाकिस्तान अधिक मात्रा में अमेरिका से सैनिक सहायता प्राप्त करता है, जिसका भारत ने सदा विरोध किया है।

(3) पाकिस्तान भारत को आरम्भ से ही अपना राजनीतिक शत्रु मानता है तथा पाकिस्तान शासक स्वयं को शासन गद्दी पर सुशोभित रखने के लिए भारत विरोधी प्रचार करके पाकिस्तानी लोगों की भावनाओं को प्रायः उत्तेजित करते रहते हैं।

(4) पाकिस्तान की भारत के प्रति आतंकवादी गतिविधियां दोनों देशों में तनाव का कारण बनी रहती हैं।

प्रश्न 12.
दक्षेस (सार्क) की समस्याओं को दूर करने के लिये कोई चार सुझाव दीजिये।
अथवा
दक्षेस (SAARC) को सफल बनाने के लिए कोई चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • दक्षेस देशों को विश्वास बहाली प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रतिरक्षा पर होते व्यय को कम करना चाहिए।
  • क्षेत्र में सांस्कृतिक सम्पर्क के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • टकराव एवं द्वेष पैदा करने वाले मुद्दों को हल करने का प्रयास करना चाहिए।
  • दक्षेस देशों में व्याप्त ग़रीबी, भुखमरी, अशिक्षा, अन्धविश्वास एवं सामाजिक कुरीतियों इत्यादि को दूर करना चाहिए।

प्रश्न 13.
पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता के किन्हीं चार कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता के निम्नलिखित कारण हैं

  • पाकिस्तान में लोकतन्त्र के मार्ग में सेना ने सदैव बाधा उत्पन्न की है।
  • पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता ने भी लोकतन्त्र को सफलतापूर्वक कार्य नहीं करने दिया।
  • पश्चिमी देशों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए पाकिस्तान में लोकतन्त्र को सफल नहीं होने दिया।
  • पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता का एक अन्य कारण उसकी आन्तरिक ढांचागत संरचना है।

प्रश्न 14.
पाकिस्तान में सैनिक शासन की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • पाकिस्तान में संविधान निर्माण के पश्चात् सैनिक शासक जनरल अयूब खान ने शासन पर अपना अधिकार जमा लिया।
  • अयूब खान के पश्चात् जनरल याहिया खान ने शासन सम्भाल लिया।
  • 1977 में जनरल जिया उल हक ने लोकतान्त्रिक सरकार को हटाकर शासन प्रणाली की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
  • 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर अपनी तानाशाही स्थापित कर ली।

प्रश्न 15.
बांग्लादेश में सैनिक शासन की व्याख्या करें।
उत्तर:
सन् 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान में संशोधन करके संसदीय शासन प्रणाली की जगह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाया। उन्होंने अपनी अवामी लीग पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियों को समाप्त कर दिया। परन्तु अगस्त, 1975 में सेना ने उनके खिलाफ बगावत करके उन्हें जान से मार दिया। इसके पश्चात् सैनिक शासक जियाउर्रहमान बांग्लादेश के शासक बने, परन्तु कुछ समय पश्चात् उनकी भी हत्या कर दी गई तथा उनके स्थान पर लेफ्टीनेंट जनरल एच० एम० इरशाद ने बांग्लादेश में सैनिक शासन कायम किया। जनरल इरशाद 1990 तक बांग्लादेश पर शासन करते रहे।

प्रश्न 16.
भारत सरकार किन कारणों से बांग्लादेश सरकार से अप्रसन्न रहती है ?
उत्तर:
भारत सरकार निम्नलिखित कारणों से बांग्लादेश सरकार से नाराज़ रहती है

  • भारत में अवैध रूप से लाखों बांग्लादेशी रह रहे हैं, जिन पर बांग्लादेश की सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।
  • बांग्लादेश में भारत विरोधी कट्टरपंथी बढ़ते जा रहे हैं।
  • बांग्लादेश सरकार द्वारा भारतीय सेना को अपने क्षेत्र के प्रयोग की मनाही करना।
  • भारत एवं म्यांमार के बीच प्राकृतिक गैस समझौते को पूरा न होने देना।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया सात देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल तथा श्रीलंका का एक समूह है, जोकि एक ही भू-राजनीतिक धरातल पर स्थित है, परन्तु प्रत्येक देश अपनी विविधताओं एवं संस्कृतियों के कारण अपना विशिष्ट एवं विभिन्न स्थान रखता है।

प्रश्न 2.
सार्क (दक्षेस) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1985 में ढाका में की गई। सार्क में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, श्रीलंका तथा अफगानिस्तान शामिल हैं। इस संगठन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सदस्य में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।

प्रश्न 3.
दक्षेस (SAARC) के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
अथवा
‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • सार्क का मुख्य उद्देश्य यह है कि दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • सार्क का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि सार्क के सदस्य देश अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करें।

प्रश्न 4.
सार्क (SAARC) का क्षेत्रीय सहयोग के साधन के रूप में क्या प्रभाव पड़ा है ?,
उत्तर:

  • सार्क के कारण दक्षिण एशियाई देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
  • क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।
  • सार्क ने एक संरक्षित अन्न भण्डार की स्थापना की है जो सदस्य राष्ट्रों की आत्म-निर्भरता का सूचक है।

प्रश्न 5.
सीमा पारीय आतंकवाद पर नोट लिखिए।
उत्तर:
भारत पाकिस्तान की ओर से सीमा पारीय आतंकवाद से लम्बे समय से ग्रसित हैं। पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने के लिए अपने यहां आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके, उन्हें सीमा पार अर्थात् भारत भेज देता है, जो भारत आकर निर्दोष लोगों की हत्याएं करते हैं।

प्रश्न 6.
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान में कभी भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रहे। इन दोनों में तनाव के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) भारत-पाक सम्बन्धों में तनाव का एक महत्त्वपूर्ण कारण कश्मीर का मामला है। पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाया है जिसे भारत नापसंद करता है।

(2) भारत और पाकिस्तान में तनावपूर्ण सम्बन्धों का एक कारण यह है कि पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से पंजाब और कश्मीर के आतंकवादियों की सभी तरह से सहायता कर रहा है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 7.
फरवरी, 1996 में भारत और नेपाल के बीच हुई सन्धि का महत्त्व लिखें।
उत्तर:
फरवरी, 1996 में भारत और नेपाल में महाकाली घाटी के समन्वित विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण सन्धि पर हस्ताक्षर करके विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इस सन्धि से दोनों देशों के बीच चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया। इस सन्धि के बाद उम्मीद की जा रही है कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में दोनों देशों में अधिक समीपता आएगी। आर्थिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का विकास होगा।

प्रश्न 8.
‘सार्क’ देशों की एकजुटता में आने वाली किन्हीं दो बाधाओं या समस्याओं का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • सार्क देशों की एकजुटता में सदा ही भारत-पाकिस्तान के कटु सम्बन्ध बाधा पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर विश्वास नहीं कर पाते।

प्रश्न 9.
मार्च, 1972 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई 25 वर्ष की सन्धि की कोई दो बातें बताइए।
उत्तर:

  • दोनों देश एक-दूसरे की अखण्डता का सम्मान करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

प्रश्न 10.
‘शिमला समझौता’ कब और किन के बीच हुआ ?
उत्तर:
शिमला समझौता 3 जुलाई, 1972 को भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुआ।

प्रश्न 11.
सार्क को प्रभावशाली बनाने के लिए भारत द्वारा किए गए कोई दो प्रयास बताएँ।
उत्तर:

  • भारत ने 1987 में सार्क को 150 लाख रुपये की मदद दी।
  • भारत ने सार्क द्वारा संरक्षित अन्न भण्डार कायम करने के लिए 153200 टन खाद्यान्न का योगदान दिया।

प्रश्न 12.
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) की व्याख्या करें।
उत्तर:
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) जनवरी, 1996 में अस्तित्व में आया। साप्टा के अन्त में सार्क देशों ने आपसी व्यापार पर से विभिन्न वस्तुओं पर से मात्रात्मक एवं गुणात्मक प्रतिबन्ध हटा लिए हैं। इसके अन्तर्गत सार्क देशों ने अनेक व्यापारिक बाधाओं को हटा लिया, जिससे इन देशों में आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 13.
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘साफ्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है, जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हों अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो।

प्रश्न 14.
भारत एवं श्रीलंका के बीच किन्हीं दो समान विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • भारत एवं श्रीलंका दोनों ही इंग्लैण्ड के उपनिवेश रहे हैं तथा दोनों देशों को दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।
  • स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् दोनों ही देशों ने सफलतापूर्वक लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना की।

प्रश्न 15.
नेपाल की शासन व्यवस्था की व्याख्या करें। नेपाल एवं बांग्लादेश की शासन व्यवस्थाओं का उदाहरण देते हुए बताएं कि दक्षिण एशियाई लोग किस प्रकार की शासन व्यवस्था चाहते हैं ?
उत्तर:
नेपाल में 2006 तक संवैधानिक राजतन्त्र था तथा राजा ही सभी शक्तियों का स्वामी था तथा राजा ने कई बार सरकार को बर्खास्त करके कार्यपालिका शक्तियां भी अपने हाथों में ले ली थीं। परंतु नेपाल के नागरिकों राजनीतिक दलों ने 2008 में वहां पर प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की। नेपाल एवं बांग्लादेश के उदाहरणों से स्पष्ट है कि दक्षिण एशियाई लोग लोकतान्त्रिक व्यवस्था चाहते हैं।

प्रश्न 16.
(क) SAFTA और (ख) SAARC का पूरा नाम लिखें। सार्क की स्थापना का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर:
(क) SAFTA-South Asia Free Trade Agreement.
(ख) SAARC-South Asian Association for Regional Cooperation. सार्क की स्थापना का कारण-सार्क की स्थापना का मुख्य कारण दक्षिण एशिया के देशों का आर्थिक विकास करना है।

प्रश्न 17.
भारत के कोई चार पड़ोसी देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • चीन
  • पाकिस्तान
  • नेपाल
  • बांग्लादेश।

प्रश्न 18.
बांग्लादेश की स्थापना कब हुई ? इसका मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
बांग्लादेश की स्थापना सन् 1971 में हुई। 1971 से पहले बांग्लादेश पाकिस्तान का ही एक भाग था। 1971 में पाकिस्तानी शासकों के तानाशाही रवैये के विरुद्ध बांग्लादेशियों ने आन्दोलन किया जिसे पाकिस्तान सरकार ने दबाने का भरपूर प्रयास किया। परन्तु भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराकर बांग्लादेश राज्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 19.
शान्ति सेना क्या थी, इसे सफलता क्यों नहीं मिली ?
उत्तर:
1987 में भारत-श्रीलंका के बीच हुए समझौते के अनुसार भारत ने लिट्टे के विरुद्ध अपनी सेनाएं भेजी, जिसे शांति सेना कहा जाता है। परन्तु धीरे-धीरे श्रीलंका में ही इस शांति सेना का विरोध होने लगा, परिणामस्वरूप 1989 से शान्ति सेना वापस भारत आने लगी।

प्रश्न 20.
श्रीलंका में जातीय संघर्ष के कोई दो कारण लिखिये।
उत्तर:

  • श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलियों ने धर्म और भाषा के आधार पर एक नए राज्य के निर्माण के प्रयास शुरू किये गए, जिसका तमिलों ने विरोध किया।
  • श्रीलंका सरकार की तमिलों के प्रति भेदभाव तथा उपेक्षा की नीति ने भी जातीय संघर्ष को बढ़ाया।

प्रश्न 21.
दक्षिण एशिया में शान्ति की स्थापना के दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया में निम्नलिखित ढंग से शान्ति स्थापना की जा सकती है

1. राजनीतिक स्थिरता-दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में राजनीतिक अस्थिरता पाई जाती है। अत: दक्षिण एशिया में शान्ति स्थापना के लिए आवश्यक है कि इन देशों में राजनीतिक स्थिरता पैदा की जाए।

2. आतंकवाद की समाप्ति-प्रायः सभी दक्षिण एशियाई देश आतंकवाद से प्रभावित हैं। अत: दक्षिण एशिया में शान्ति स्थापना के लिए आतंकवाद की समाप्ति आवश्यक है।

प्रश्न 22.
पाकिस्तान की स्थापना कब हुई थी ? इसका मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
पाकिस्तान की स्थापना सन् 1947 में हुई। इसकी स्थापना का मुख्य कारण मुस्लिम लीग की हठधर्मिता एवं जिन्नाह का द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त था।

प्रश्न 23.
पाकिस्तान में लोकतन्त्रीकरण के मार्ग की कोई दो कठिनाइयां लिखिये।
उत्तर:

  • पाकिस्तान में सेना का प्रभाव बहुत अधिक है।
  • पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता अधिक पाई जाती है।

प्रश्न 24.
फरक्का समस्या का संबंध किन दो देशों से है ?
उत्तर:
फरक्का समस्या का संबंध भारत एवं बांग्लादेश से है।

प्रश्न 25.
‘सार्क’ (SAARC) के प्रारम्भिक सदस्य देशों की संख्या कितनी थी? इनके नाम लिखें।
उत्तर:
सार्क प्रारम्भिक सदस्य देशों की संख्या सात थी, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालद्वीप, नेपाल तथा श्रीलंका शामिल हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सा देश दक्षिण एशिया के देशों में शामिल हैं
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) श्रीलंका
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. सार्क एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है
(A) यूरोप का
(B) दक्षिण एशिया का
(C) अफ्रीका का
(D) दक्षिण अमेरिका।
उत्तर:
(B) दक्षिण एशिया का।

3. 14वें सार्क सम्मेलन में किस देश को सार्क में शामिल किया गया ?
(A) अफ़गानिस्तान
(B) भारत
(C) चीन
(D) पाकिस्तान।
उत्तर:
(A) अफ़गानिस्तान।

4. वर्तमान में नेपाल किस प्रकार का राष्ट्र है ?
(A) हिन्दू राष्ट्र
(B) मुस्लिम राष्ट्र
(C) ईसाई राष्ट्र
(D) धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र।
उत्तर:
(D) धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र।

5. भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ ?
(A) 13 दिसम्बर, 1999 को
(B) 11 जनवरी, 2001 को
(C) 13 दिसम्बर, 2001 को
(D) 11 जनवरी, 2002 को।
उत्तर:
(C) 13 दिसम्बर, 2001 को।

6. सार्क की स्थापना कब की गई थी ?
(A) 1990
(B) 1985
(C) 1980
(D) 1979.
उत्तर:
(B) 1985.

7. ‘सार्क’ (SAARC) का प्रथम शिखर सम्मेलन निम्नलिखित देश में हुआ
(A) भारत में
(B) पाकिस्तान में
(C) बांग्लादेश में
(D) श्रीलंका में।
उत्तर:
(C) बांग्लादेश में।

8. ‘सार्क’ (SAARC) का मुख्यालय स्थित है
(A) नई दिल्ली (भारत) में
(B) कराची (पाकिस्तान) में
(C) काठमांडू (नेपाल) में
(D) कोलम्बो (श्रीलंका) में।
उत्तर:
(C) काठमांडू (नेपाल) में।

9. परवेज मुशर्रफ ने किस वर्ष प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट किया था ?
(A) 1999 में
(B) 2000 में
(C) 2001 में
(D) 2002 में।
उत्तर:
(A) 1999 में।

10. नेपाल में लोगों ने किस वर्ष राजतन्त्र के विरुद्ध सफल आन्दोलन किया ?
(A) 2007 में
(B) 2005 में
(C) 2006 में
(D) 2004 में।
उत्तर:
(C) 2006 में।

11. दक्षिण एशियाई देशों में सबसे लोकप्रिय खेल कौन-सा है ?
(A) हॉकी
(B) फुटबाल
(C) क्रिकेट
(D) बॉक्सिंग।
उत्तर:
(C) क्रिकेट।

12. मालदीव कब गणतन्त्र बना ?
(A) 1968 में
(B) 1969 में
(C) 1970 में
(D) 1971 में।
उत्तर:
(A) 1968 में।

13. श्रीलंका ने किस वर्ष स्वतन्त्रता प्राप्त की?
(A) 1947 में
(B) 1957 में
(C) 1948 में
(D) 1958 में।
उत्तर:
(C) 1948 में।

14. 1965 में भारत पर किस देश ने आक्रमण किया था ?
(A) पाकिस्तान
(B) चीन
(C) अमेरिका
(D) इरान।
उत्तर:
(A) पाकिस्तान।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

15. बांग्लादेश की स्थापना हुई :
(A) सन् 1950 में
(B) सन् 1965 में
(C) सन् 1971 में
(D) सन् 1981 में।
उत्तर:
(C) सन् 1971 में।

16. 1971 में बांग्लादेश के मुद्दे पर किस देश ने भारत पर आक्रमण किया ?
(A) श्रीलंका
(B) पाकिस्तान
(C) अमेरिका
(D) जापान।
उत्तर:
(B) पाकिस्तान।

17. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का पड़ोसी देश है ?
(A) पाकिस्तान
(B) अमेरिका
(C) इंग्लैण्ड
(D) रूस।
उत्तर:
(A) पाकिस्तान।

18. निम्न में से एक भारत का पड़ोसी देश नहीं है?
(A) पाकिस्तान
(B) चीन
(C) जापान
(D) बांग्लादेश।
उत्तर:
(C) जापान।

19. भारत का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1919
(B) 1945
(C) 1949
(D) 1947.
उत्तर:
(D) 1947.

20. भारत के विभाजन से कौन-सा नया देश अस्तित्व में आया ?
(A) रूस
(B) जर्मनी
(C) पाकिस्तान
(D) जापान।
उत्तर:
(C) पाकिस्तान।

21. सन् 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय भारत का प्रधानमन्त्री कौन था ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) इन्दिरा गांधी
(C) मोरारजी देसाई
(D) चरण सिंह।
उत्तर:
(B) इन्दिरा गांधी।

22. शिमला समझौता कब हुआ ?
(A) सन् 1962 में
(B) सन् 1972 में
(C) सन् 1974 में
(D) सन् 1976 में।
उत्तर:
(B) सन् 1972 में।

23. ‘शिमला समझौता’ किनके बीच हुआ था?
(A) भारत-चीन के
(B) चीन-पाकिस्तान के
(C) भारत-पाकिस्तान के
(D) भारत-रूस के।
उत्तर:
(C) भारत-पाकिस्तान के।

24. “भूटान अथवा नेपाल पर कोई भी आक्रमण भारत पर आक्रमण माना जायेगा।”यह किसका कथन है ?
(A) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(B) सरदार पटेल
(C) पं० नेहरू
(D) राजगोपालाचार्य।
उत्तर:
(C) पं० नेहरू।

25. ‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना कब हुई?
(A) 1982 में
(B) 1985 में
(C) 1986 में
(D) 1990 में।
उत्तर:
(B) 1985 में।

26. ‘कच्छथीव द्वीप’ विवाद का मसला किन देशों के मध्य है ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-बांग्लादेश
(C) भारत-श्रीलंका
(D) भारत-नेपाल।
उत्तर:
(C) भारत-श्रीलंका।

27. सार्क के अब तक कितने सम्मेलन हो चुके हैं ?
(A) 10
(B) 11
(C) 12
(D) 18.
उत्तर:
(D) 18.

28. 18वां सार्क सम्मेलन कहां पर हुआ ?
(A) नेपाल
(B) पाकिस्तान
(C) भारत
(D) भूटान।
उत्तर:
(A) नेपाल।

29. सार्क का उद्देश्य है
(A) दक्षिण एशियाई देशों में सहयोग बढ़े
(B) दक्षेस के राज्य समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें
(C) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास पैदा करना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

30. ‘सार्क’ (SAARC) के गठन का प्रारम्भिक विचार किस नेता ने दिया ?
(A) राजीव गांधी
(B) जिया उर-रहमान ने
(C) बेनजीर भुट्टो ने
(D) जी० पी० कोइराला ने।
उत्तर:
(B) जिया उर-रहमान ने।

31. सन् 1966 में भारत और पाकिस्तान के बीच कौन-सा समझौता हुआ ?
(A) लाहौर समझौता
(B) ताशकन्द समझौता
(C) शिमला समझौता
(D) आगरा समझौता।
उत्तर:
(B) ताशकन्द समझौता।

32. निम्नलिखित देशों में से सार्क (SAARC) का सदस्य है ?
(A) भारत
(B) इंग्लैण्ड
(C) अमेरिका
(D) रूस।
उत्तर:
(A) भारत।

33. निम्नलिखित देशों में से ‘सार्क’ (SAARC) का सदस्य नहीं है ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) बांग्लादेश
(D) चीन।
उत्तर:
(D) चीन।

34. साफ्टा को कब लागू करने का निर्णय लिया गया ?
(A) 1 जनवरी, 2002
(B) 1 जनवरी, 2003
(C) 1 जनवरी, 2004
(D) 1 जनवरी, 2006.
उत्तर:
(D) 1 जनवरी, 2006.

35. वर्तमान में ‘सार्क’ (SAARC) में कितने देश हैं ?
(A) छह
(B) सात
(C) आठ
(D) नौ।
उत्तर:
(C) आठ।

36. सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन किस देश में हुआ ?
(A) भारत में
(B) पाकिस्तान में
(C) श्रीलंका में
(D) अफ़गानिस्तान में।
उत्तर:
(A) भारत में।

37. निम्न में से एक देश ‘सार्क’ का सदस्य नहीं है ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) भूटान
(D) चीन।
उत्तर:
(A) चीन।

38. अब नेपाल किस प्रकार का राष्ट्र है ?
(A) धर्म निरपेक्ष राष्ट्र
(B) मुस्लिम राष्ट्र
(C) हिन्दू राष्ट्र
(D) ईसाई राष्ट्र।
उत्तर:
(A) धर्म निरपेक्ष राष्ट्र।

39. फरक्का समस्या का सम्बन्ध है
(A) भारत-श्रीलंका से
(B) भारत-बांग्लादेश से
(C) भारत-भूटान से
(D) भारत-चीन से।
उत्तर:
(B) भारत-बांग्लादेश से।

रिक्त स्थान भरें

(1) सन् 2006 से, नेपाल एक ……………….. राज्य है।
उत्तर:
लोकतन्त्रीय,

(2) श्रीलंका ने अंग्रेजों से सन् …………….. में स्वतन्त्रता प्राप्त की।
उत्तर:
1948

(3) कच्चा टीबू द्वीप विवाद का मसला भारत और ………… के बीच है।
उत्तर:
श्रीलंका

(4) पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमन्त्री ………….. हैं।
उत्तर:
इमरान खान

(5) चकमा शरणार्थी समस्या भारत और ………….. के मध्य है।
उत्तर:
बांग्लादेश

(6) पाकिस्तान की स्थापना का मुख्य कारण भारत का ………… था।
उत्तर:
विभाजन

(7) मई 2014 में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री श्री …………….. भारत आए।
उत्तर:
नवाज शरीफ

(8) नेपाल में सन् ……………. में लोकतन्त्र की स्थापना हुई।
उत्तर:
2006

(9) सार्क (SAARC) का सचिवालय …………… में स्थित है।
उत्तर:
काठमाण्डू।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
सार्क (SAARC) के किस सदस्य देश में आज भी राजतंत्र मौजूद है ?
अथवा
किस सार्क (SAARC) देश में वर्तमान में भी राजतंत्र है ?
उत्तर:
भूटान में।

प्रश्न 2.
वर्तमान में SAARC (दक्षेस) के कुल कितने देश सदस्य हैं ?
उत्तर:
वर्तमान में दक्षेस के कुल आठ देश सदस्य हैं।

प्रश्न 3.
बांग्लादेश की स्थापना कब हुई ?
अथवा
बांग्लादेश कब अस्तित्व में आया ?
उत्तर:
बांग्लादेश की स्थापना सन्1971 में हुई।

प्रश्न 4.
दक्षिण एशिया का कौन-सा देश सैनिक तानाशाही से प्रभावित रहा है ?
उत्तर:
पाकिस्तान।

प्रश्न 5.
अमेरिका ने किस वर्ष अफगानिस्तान पर हमला किया ?
उत्तर:
अमेरिका ने अफगानिस्तान पर सन् 2001 में हमला किया।

प्रश्न 6.
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ ?
उत्तर:
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला दिसम्बर, 2001 में हुआ।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 7.
चकमा शरणार्थी समस्या किन दो देशों के मध्य बनी हुई है ?
उत्तर:
भारत-बांग्लादेश के बीच।

प्रश्न 8.
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर:
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का दूसरा स्थान है।

प्रश्न 9.
भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकाने बालाकोट पर कब हमला किया ?
उत्तर:
26 फरवरी, 2019 को।

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