Author name: Bhagya

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संज्ञा

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Sangya संज्ञा Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Vyakaran संज्ञा

नीचे लिखे वाक्यों को पढ़िए और रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए :
1. दिव्या खड़ी है।
2. वह गन्ना चूस रही है।
3. गन्ने में मिठास है।
पहले वाक्य में ‘दिव्या‘ एक लड़की (व्यक्ति) का नाम है।
दूसरे वाक्य में ‘गन्ना‘ एक वस्तु का नाम है।
तीसरे वाक्य में ‘मिठास‘ एक गुण का नाम है।
इन वाक्यों में दिव्या, गन्ना, मिठास शब्द संज्ञाएं हैं।

किसी व्यक्ति (प्राणी), वस्तु, स्थान, गुण या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।

संज्ञा के कुछ उदाहरण देखिए :

  • व्यक्तियों (प्राणियों) के नाम – स्वाति, गौरव, सौरभ, बालक, हाथी, शेर, गाय आदि।
  • वस्तुओं के नाम – मेज़, कुर्सी, कमीज़, ताजमहल आदि।
  • स्थानों के नाम – आगरा, दिल्ली, मुम्बई, नगर आदि।
  • गुणों या भावों के नाम – मिठास, ईमानदारी, बुढ़ापा, सच्चाई आदि।

संज्ञा के कार्य : वाक्य में संज्ञा शब्द कई कार्य करते हैं :

  • कर्ता के रूप में – रमेश पुस्तक पढ़ता है।
  • कर्म के रूप में – रमेश ने पुस्तक को पढ़ा।
  • पूरक के रूप में – रमेश डाक्टर है।
  • क्रिया विशेषण के रूप में – रमेश घर पर है।

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संज्ञा के भेद (Kinds of Noun) :
मुख्य रूप से संज्ञा के तीन भेद हैं : व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक संज्ञा।
1. व्यक्तिवाचक संज्ञा (Proper Noun): जिस संज्ञा से किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान का बोध हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे- महात्मा गांधी, ताजमहल, लाल किला।

2. जातिवाचक संज्ञा (Common Noun) : जो संज्ञा शब्द किसी विशेष व्यक्ति या स्थान को न बताकर सम्पूर्ण जाति का बोध कराए, उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे- गाय, बालक, पुस्तक, घर।

व्यक्तिवाचक संज्ञा का जातिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग
जयचंदों के कारण ही देश को गुलाम होना पड़ा।
[यहाँ ‘जयचंद’ व्यक्ति विशेष न रहकर देशद्रोहियों का प्रतीक बन गया है, अतः यह प्रयोग जातिवाचक संज्ञा का है।]

जातिवाचक संज्ञा का व्यक्तिवाचक संज्ञा के रूप में प्रयोग गांधीजी ने भारत को स्वतंत्र कराया।
[‘गांधी’ जातिसूचक शब्द होते हुए भी यहां महात्मा गांधी के लिए प्रयुक्त हुआ है, अत: यह व्यक्तिवाचक संज्ञा का प्रयोग माना जाएगा।]

3. भाववाचक संज्ञा (Abstract Noun) :
जो संज्ञा शब्द किसी गण, दशा या भाव का बोध कराएँ, भाववाचक संज्ञा कहलाते हैं। जैसे- बुढ़ापा, सुंदरता, मित्रता, गरीबी आदि।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संज्ञा

भाववाचक संज्ञाएँ बनाना (Formation of Abstract Noun) :
भाववाचक संज्ञाएँ पांच प्रकार के शब्दों से बनाई जाती हैं :
1. जातिवाचक संज्ञा से
सज्जन – सज्जनता
विद्वान – विद्वत्ता
मनुष्य – मनुष्यता
पशु – पशुता
शत्रु – शत्रुता
मित्र -मित्रता
साधु – साधुता
कवि – कवित्व
चोर – चोरी

2. विशेषण से-
सुंदर – सुंदरता
आलसी – आलस्य
मीठा -मिठास
सफेद – सफेदी
काला – कालिमा
हरा – हरियाली
चतुर – चतुरता/चतुराई
भोला – भोलापन
मधुर – मधुरता

3. सर्वनाम से-
अपना – अपनापन
मम – ममता
आप – आपा
सर्व – सर्वस्व
अहं – अहंकार
निज – निजत्व

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संज्ञा

4. क्रिया से
उठना – उठान
पढ़ना – पढ़ाई
भूलना – भूल
धकना – थकावट
उतरना – उतराई
हारना – हार

5. अव्यय से
समीप – समीपता
निकट – निकटता

विशेष :
अंग्रेजी व्याकरण के प्रभावस्वरूप संज्ञा के दो अन्य भेद भी माने जाते हैं :
1. समुदायवाचक संज्ञा (Collective Noun) : समूह, गिरोह, झुंड या दल का बोध कराने वाले शब्द समूहवाचक संज्ञा कहलाते हैं। जैसे- सभा, सेना, कक्षा।
2. द्रव्यवाचक संज्ञा (Material Noun) : जिन संज्ञा शब्दों से किसी द्रव्य, पदार्थ, धातु आदि का बोध होता है, उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं।
जैसे- सोना, चाँदी, घी, तेल, कोयला, लोहा।

अभ्यास

1. सही कथनों के लिए ✓ चिह्न तथा गलत कथनों के लिए ✗ चिह्न लगाइए :
(क) ‘मौता’ जातिवाचक संज्ञा है। ।
(ख) ‘मिठास’ भाववाचक संज्ञा है।
(ग) ‘नगर’ व्यक्तिवाचक संज्ञा है।
(घ) ‘सोना’ द्रव्यवाचक संज्ञा है।
(ङ) ‘सेना’ समुदायवाचक संज्ञा है।

2. सही उत्तर के चारों ओर गोल दायरा लगाओ
(क) जो शब्द किसी विशेष व्यक्ति, वस्तु या स्थान का बोध कराए, उसे- जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।

  • व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।
  • भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
  • द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संज्ञा

(ख) जो शब्द किसी जाति का बोध कराए उसे- व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं।

  • जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।
  • समुदायवाचक संज्ञा कहते हैं।

(ग) जिसमें किसी वस्तु/व्यक्ति के भाव अथवा गुण की बात होती है, उसे-

  • जातिवाचक संज्ञा कहते हैं।
  • भाववाचक संज्ञा कहते हैं।
  • द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं।

3. निम्नलिखित शब्दों में से व्यक्तिवाचक, जातिवाचक, भाववाचक, व्यवाचक, समुदायवाचक छांटकर लिखें:
बुढ़ापा, गीता, विद्यार्थी, नारी, अध्यापक, उत्तम, ताजमहल, गंगा, कोमलता, बहन, नदी, पर्वत, हिमालय, सेना, सोना, घी, दल।

4. भाववाचक संज्ञा बनाओ : चोर, साधु, युवक, नारी, काला

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HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Shabd-Nirman शब्द-निर्माण Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

हम जान चुके हैं कि मूल शब्दों से कुछ शब्दांशों या शब्दों को जोड़कर नए शब्दों का निर्माण किया जाता है। यह शब्द निर्माण तीन प्रकार से होता है
1. उपसर्ग (Prefix)
2. प्रत्यय द्वारा (Suffix)
3. समास द्वारा (Compound)

1. उपसर्ग (Prefix) :
वे लघुतम शब्दांश हैं जो शब्द के प्रारंभ में लगकर नए शब्दों का निर्माण करते हैं। जैसे-
अ + धर्म = अधर्म
बे + ईमान = बेईमान
क + पूत = कपूत
सु + पुत्र = सुपुत्र।

हिन्दी में तीन प्रकार के उपसर्ग हैं :
(क) तत्सम उपसर्ग
(ख) तद्भव उपसर्ग
(ग) आगत उपसर्ग

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

(क) तत्सम उपसर्ग : ये उपसर्ग संस्कृत से आए हैं और तत्सम शब्दों में ही लगते हैं। नीचे कुछ प्रचलित तत्सम उदाहरण सहित दिए जा रहे हैं:

उपसर्गअर्थउदाहरण
अधि-ऊपर, श्रेष्ठअधिनायक, अधिवक्ता, अधिपति।
अनु-पीछे, समानअनुभव, अनुकरण, अनुवाद, अनुमान।
अप-बुरा, हीनअपयश, अपमान, अपशब्द।
आ-तक, पर्यंतआजीवन, आमरण, आदान।
उत्-श्रेष्ठ, ऊपरउत्थान, उद्गम, उद्योग, उत्कर्ष।
दुर/दुस-बुरा, कठिनदुस्साहस, दुर्भाग्य, दुर्गुण, दुस्साध्य, दुष्कर।
निर/निस्-नहीं, रहितनिष्काम, निस्संदेह, निर्दोष, निर्जीव, निर्विकार, नीरोग, नीरव।
प्र-अधिक, आगेप्रसिद्ध, प्रयोग, प्रचार, प्रबंध, प्रस्थान।
वि-विदेशविशिष्ट, विदेश, विज्ञान, विक्रय, वियोग।
सम्-समान, संयोगसम्मान, सम्पत्ति, संभव, सम्मेलन, संयम।
सु-अच्छा, श्रेष्ठसुबोध, सुगम, सुपुत्र, स्वागत।
अ/अन्-अभावअभाव, अज्ञान, अधर्म, अनादि, अनुचित, अनधिकार।
कु-बुराकुपुत्र, कुकर्म, कुरूप, कुयोग, कुमति।

(ख) तद्भव उपसर्ग : हिंदी के अपने कुछ उपसर्ग विकसित हुए हैं। हिंदी के अधिकांश तद्भव उपसर्ग संस्कृत के तत्सम उपसा से ही विकसित हुए हैं :

उपसर्गअर्थउदाहरण
अ/अननिषेध, नहींअछूत, अनपढ़, अनहोनी।
निबुरा, कमनिडर, निहत्था।
दुबुरा, कपदुबला, दुसाध्या

(ग) आगत उपसर्ग : विदेशी भाषाओं के शब्दों के आने के साथ-साथ विदेशी भाषाओं के कुछ उपसर्ग भी हिंदी में आ गए हैं। हिंदी में आगत उपसर्ग मुख्यतः अरबी-फारसी के हैं।

उपसर्गअर्थउदाहरण
ब-से, के साथबखूबी, बदौलत, बनाम।
बा-के साथबाअदब, बाकायदा।
बे-बिनाबेअदब, बेवफ़ा।
बद-बुराबदसूरत, बदतमीज़, बदन।
ला-नहीं, अभावलापता, लाजवाब, लापरवाही।
हम-साथ-साथहमसफर, हमजोली, हमराह, हमदम।
सर-मुख्यसरपंच, सरहद।

2. प्रत्यय (Suffix) : प्रत्यय भाषा के वे लघुतम सार्थक खंड हैं जो शब्द के अंत में जुड़कर नए शब्दों का निर्माण करते हैं। प्रत्यय दो प्रकार के होते हैं :
(क) कृत प्रत्यय : क्रिया के मूल रूप (धातु) से जुड़ कर संज्ञा अथवा विशेषण बनाते हैं। कृत् प्रत्यय से बने शब्दों को कृदंत कहते हैं। उदाहरण :

प्रत्ययशब्द
हार-खेलनहार, होनहार।
ऐया-गवैया, खिवैया, पढ़या।
अक्कड़-भुलक्कड़, पियक्कड़, घुमक्कड़
ऊ-खाऊ, उड़ाऊ, स्टू।
दार-देनदार, लेनदार
आलू-झगड़ालू
इयल-सड़ियल, अड़ियल
नी-चटनी, संघनी, ओढ़नी
ई-हँसी, बोली
आई-पढ़ाई, भलाई

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

(क) तद्धित प्रत्यय : जो प्रत्यय संज्ञा, विशेषण, सर्वनाम और अव्यय के बाद लगते हैं और संज्ञा तथा विशेषण शब्द बनाते हैं वे तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं।
संज्ञा से संज्ञा :
-आर – सोना-सुनार, लोहा-लुहार।
-इया – डिब्बा-डिबिया, खाट-खाटिया, लठ-लठिया।
-ई – पहाड़-पहाड़ी, रस्सा-रस्सी, खेत-खेती।
-कार – कला-कलाकार, पत्र-पत्रकार, चित्र-चित्रकार, साहित्य-साहित्यकार।
-गर – जादू-जादूगर, बाजी-बाजीगर।
-दार – किराया-किराएदार, दुकान-दुकानदार।

विशेषण से संज्ञा :
-आस – मीठा-मिठास, खट्टा-खटास।
-आई – अच्छा-अच्छाई, बुरा-बुराई, भला-भलाई।
-आहट – कड़वा-कड़वाहट, गरम-गरमाहट।
-ई – अमीर-अमीरी, गरीब-गरीबी।
-ता/त्व – ला-लघुता, लघुत्व, प्रभु-प्रभुता, प्रभुत्व।
पा/काल – कालापन, बड़ा-बड़प्पन।
-पन मोटा – मोटापा, बूढा-बुढ़ापा।

संज्ञा से विशेषण :
-ई – गुलाब-गुलाबी, पंजाब-पंजाबी।
-ईला – रस-रसीला, चमक-चमकीला।
-ऊ – बाज़ार-बाज़ारू, पेट-पेटू, ढाल-ढालू।
-इक – धर्म-धार्मिक, समाज-सामाजिक, नीति-नैतिक।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

3. समास (Compound): जिस प्रकार किसी शब्द में प्रत्यय और/अथवा उपसर्ग लगाकर नए शब्द बनते हैं, उसी प्रकार दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से भी नए शब्द बनते हैं। शब्द निर्माण की इस विधि को समास कहते हैं; जैसे :
विश्राम + गृह = विश्रामगृह – विश्राम के लिए गृह।
घोड़ा. + सवार = घुड़सवार – घोड़े पर सवार।

सामासिक शब्द में प्राय: दो पद होते हैं। पहले पद को पूर्वपद तथा दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं और समास प्रक्रिया से बने पद को समस्त पद कहते हैं। समस्त पद के दोनों पदों को अलग-अलग करने की प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं; जैसे’गंगाजल’ समस्त पद में दो पद हैं ‘गंगा’ और ‘जल’। इसका विग्रह होगा ‘गंगा का जल’।

समास के भेद : समास के छह भेद होते हैं :
1. तत्पुरुष समास (Determinative Compound)
2. कर्मधारय समास (Appositional Compound)
3. द्विगु समास (Numeral Compound)
4. बहुव्रीहि समास (Attributive Compound)
5. वंद्व समास (Coupulative Compound)
6. अव्ययीभाव समास (Adverbial Compound)

1. तत्पुरुष समास : इस समास में उत्तरपद प्रधान होता है और पूर्वपद गौण होता है। तत्पुरुष समास की रचना में समस्त पदों के बीच में आने वाले परसों जैसे- का, से, पर आदि का लोप हो जाता है युद्ध क्षेत्र – युद्ध + क्षेत्र – युद्ध का क्षेत्र
राजकुमार – राज + कुमार – राजा का कुमार
रसोईघर – रसोई + घर – रसोई के लिए घर
इस्तलिखित – हस्त • लिखित – हस्त (हाथ) से लिखित
पुस्तकालय – पुस्तक + आलय – पुस्तक का आलय
ध्यानमग्न – ध्यान + मग्न – ध्यान में मग्न

2. कर्मधारय समास : कर्मधारय समास में पूर्वपद विशेषण तथा उत्तरपद विशेष्य होता है अथवा पूर्वपद और उत्तरपद में उपमेय-उपमान का संबंध होता है; जैसे-

(i)समस्तपदविशेषण + विशेष्यविग्रह
नीलकमलनील + कमलनीला कमल
कालीमिर्चकाली + मिर्चकाली मिर्च
पनचक्कीपानी + चक्कीपानी से चलने वाली चक्की
नीलगगननील + गगननीला गगन
महाराजामहान + राजामहान राजा
(ii)समस्तपदउपमेय + उपमानविग्रह
कमलनयननयन + कमलकमल के समान नयन
मुखचंद्रमुख + चंद्रचंद्र के समान मुख

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-निर्माण

3. द्विगु समास : जिन समासों का पूर्वपद संख्यावाची शब्द हो, वहाँ द्विगु समास होता है। अर्थ की दृष्टि से यह समास प्रायः समूहवाची होता है। जैसे :
तिरंगा – तीन रंगों का समाहार
चौमासा – चौ (चार) मासों का समाहार

4. बहुब्रीहि समास : बहुव्रीहि समास में दोनों पद गौण होते हैं तथा ये दोनों मिलकर किसी अन्य पद के विषय में कुछ संकेत करते हैं। अन्य पद ही ‘प्रधान’ होता है; जैसे –

समस्त पदगौण पद + गौण पदविग्रहअन्य पद
पीतांबरपीत + अंबरपीला है अंबर (वस्त्र) जिसका= कृष्ण/विष्णु
दशाननदश + आननदस हैं आनन जिसके= रावण

5. वंदव समास : इस समास में दोनों ही पद प्रधान होते हैं तथा दोनों पदों को जोड़ने वाले समुच्चय बोधक अव्यय का लोप हो जाता है। जैसे:

समस्त पदविग्रह
भाई-बहनभाई और बहन
पाप-पुण्यपाप और पुण्य
सुख-दुखसुख और दुख
भला-बुराभला या बुरा

6. अव्ययीभाव समास : इस समास में पूर्वपद अव्यय होता है और समस्त पद भी अव्यय (क्रिया विशेषण) का काम करता है, जैसे-प्रतिदिन, यथाशक्ति। पुनरुक्त शब्दों में समास होने पर भी अव्ययीभाव समास होता है:
जैसे :
साफ-साफ, जल्दी-जल्दी, दिनॉदिन।

समस्त पदविग्रह
प्रत्येकप्रति-एक
आजन्मजन्म से लेकर
यथाशक्तिशक्ति के अनुसार
साफ-साफबिल्कुल स्पष्ट

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HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Shabd-Vichar शब्द-विचार Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

एक से अधिक वर्षों के सार्थक मेल को शब्द कहते हैं।
भाषा में शब्द का विशिष्ट स्थान होता है। शब्द भाषा की स्वतंत्र और अर्थवान इकाई है।
जैसे- कल, कमल, पाठशाला।

हिंदी शब्दों का वर्गीकरण (Classification of words) तीन आधारों पर किया जाता है।
1. स्रोत के आधार पर।
2. रचना के आधार पर।
3. अर्थ के आधार पर।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

1. स्रोत के आधार पर (Based on Origin) :
(क) तत्सम : ‘तत् + सम’ का अर्थ है- उस (संस्कृत) के समान। संस्कृत के वे शब्द जो बिना किसी परिवर्तन के हिंदी में प्रयुक्त हो रहे हैं, तत्सम शब्द कहलाते हैं।
जैसे- अग्नि, सूर्य, मस्तिष्क, नृत्य आदि।

(ख) तद्भव : ‘तत् + भव’ अर्थात् उमसे (संस्कृत से) पैदा हुए। ये सभी शब्द संस्कृत शब्दों से विकसित हुए हैं।
जैसे- दुग्ध से दूध अग्नि से आग सर्प से साँप पत्र से पत्ता

(ग) देशज : देशज का अर्थ है-देश में उत्पन्न। ये शब्द प्रांतीय बोलियों के हैं।
जैसे- पेटी, खड़ाऊँ, ज्योनार, खलिहान, कलेवा आदि।

(घ) विदेशी : विदेशी भाषाओं से लिए गए शब्द विदेशी . कहलाते हैं। हिंदी में अंग्रेजी, तुर्की, फारसी, अरबी, पुर्तगाली, आदि भाषाओं के शब्द प्रयुक्त हो रहे हैं।
उदाहरणार्थ-
अंग्रेजी : स्टेशन, स्कूल, पैंट, कोट, डॉक्टर आदि।
तुर्की : कैंची, चाकू, तोप, कुरता, लाश आदि।
फारसी : फौज़, कागज़, हज़ार, दुकान आदि।।
अरबी : आदमी, औरत, किताब, मकान आदि।
पुर्तगाली : गमला, कमरा, तौलिया, काजू आदि।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

तत्सम – तद्भव शब्द-तालिका
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार-1
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार-2
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार-3
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

(क) रूढ़ : रूढ़ का अर्थ है-प्रसिद्ध। जो शब्द किसी विशेष अर्थ के लिए प्रसिद्ध हो गए हों और जिनके सार्थक खंड (टुकड़े) न हो सकें। उन्हें रूढ़ शब्द कहते हैं।
जैसे- घोड़ा, घर, गाड़ी, मेज, देश आदि।

(ख) यौगिक : यौगिक का अर्थ है-जुड़ा हुआ। ऐसे शब्द दो या दो से अधिक सार्थक खंडों (शब्दों) से मिलकर बनते हैं।
जैसे-
विद्यार्थी (विद्या + अर्थी)
विज्ञान (वि + ज्ञान)
पाठशाला (पाठ + शाला)
सहपाठी (सह + पाठी)

(ग) योगरूढ : ऐसे शब्द जो यौगिक होने के साथ ही किसी विशेष अर्थ में ‘रूढ़ हों’, ‘योगरूढ़’ शब्द कहलाते हैं।
जैसे-
चारपाई [चार पैरों वाली, पर यह ‘खाट’ के अर्थ में रूढ़ हो गई है।]
नीलकंठ [नीले कंठ वाला, पर ‘शिवजी’ के अर्थ में रूढ़ हो गया है।
पंकज [पंक (कीचड़) में उत्पन्न, पर यह ‘कमल’ के अर्थ में रूढ़ हो गया है]

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

3. अर्थ की दृष्टि से शब्दों का वर्गीकरण (Classification of words based on Meaning) :
‘शब्द’ भाषा को अर्थ के स्तर पर लघुतम स्वतंत्र इकाई है किंतु शब्द और अर्थ का प्रायः ऐसा अपरिवर्तनीय संबंध नहीं होता कि एक शब्द का एक ही अर्थ रहे। इस कारण अर्थ के आधार पर शब्दों के चार भेद हो जाते हैं :
1. एकार्थी (Words having one meaning)
2. अनेकार्थी (Words having various meanings)
3. पर्यायवाची या समानार्थी (Synonyms)
4. विलोम या विपरीतार्थी (Antonyms)

1. एकार्थी शब्द : ये वे शब्द हैं, जिनका सामान्यतः एक ही वाच्यार्थ हुआ करता है। व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ, स्थानों के नाम तथा कुछ अन्य संज्ञा शब्द इसी कोटि के शब्द हैं।
जैसे- महात्मा गांधी, गंगा, श्रद्धा, ऋषि, अहंकार आदि।

2. अनेकार्थी शब्द : अनेकार्थी शब्द एक से अधिक अर्थ दे सकता है। जैसे-‘कल’ शब्द के तीन अर्थ हैं : आने वाला और पिछला दिन, चैन, मशीन। इसी प्रकार-
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार-4
कुछ अन्य उदाहरण देखें:
कर : हाथ, किरण, हाथी की सैंड, टैक्स
मुद्रा : मुख का भाव, अंगूठी, सिक्का, मोहर (Stamp)।
अलि : भौंरा, सखी, कोयल।।

  • अनेकार्थी शब्दों का एक भेद है- समरूपी शब्द।

ये शब्द वे हैं, जो स्रोत के अनुसार भिन्न होते हैं, किंतु सम (एक) रूप होने के कारण एक समान लगते हैं, पर उनके अर्थ भिन्न-भिन्न होते हैं।
जैसे-
काम = काम (कामदेव), काम (कम)।
पर = पंख, लेकिन, ऊपर।
आम= आम फल (तद्भव), कच्चा (तत्सम), सामान्य आदमी (विदेशी)।

3. पर्यायवाची या समानार्थी शब्द : यह अनेकार्थी शब्द से उल्टा है। अनेकार्थी में एक शब्द के अनेक अर्थ होते हैं और पर्यायवाची में एक ही अर्थ को बताने वाले अनेक शब्द हैं,
जैसे-
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार-5
अश्व, हय, तुरंग – सभी एक-दूसरे के पर्याय हैं। सभी का अर्थ- ‘घोड़ा’ है।

कुछ अन्य उदाहरण देखो :
फूल पुष्प प्रसून सुमन कुसुम
सूर्य दिनकर दिवाकर मार्तड सूरज
कमल सरोज पंकज पद्म सरसिज
रात रात्रि निशा रजनी विभावरी
पृथ्वी धरती भू धरा भूमि

4. विलोम या विपरीतार्थी शब्द : कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका अर्थ एक-दूसरे से उल्टा (विपरीत) होता है। ये शब्द आपस में विपरीतार्थी शब्द या विलोम शब्द कहलाते हैं।
जैसे –
सुख x दुख
पाप x पुण्य
सत्य x असत्य
जड़ – चेतन
ऊँच x नीच
धर्म x अधर्म

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

अभ्यास

1. सही कथनों के लिए ✓ चिह्न तथा गलत कथनों के लिए ✗ चिह्न लगाइए:
(क) वर्गों के सार्थक मेल को शब्द कहते हैं।
(ख) ‘अग्नि’ तद्भव शब्द है।
(ग) ‘ज्यौनार’ देशज शब्द है।

2. प्रत्येक सही उत्तर के सामने ∆ चिहन बनाओ :
(क) ‘पुस्तकालय’ शब्द

  • रूढ़ है।
  • यौगिक है

(ख) ‘नृत्य’ शब्द

  • तत्सम है
  • तद्भव है

(ग) ‘गमला’ शब्द

  • देशज है
  • विदेशी है

(घ) ‘पेटी’ शब्द

  • विदेशी है
  • तद्भव है।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran शब्द-विचार

3. निम्नलिखित में उदाहरण देकर अंतर स्पष्ट करो :
(क) तत्सम और तद्भव शब्द
(ख) विकारी और अविकारी शब्द

4. रिक्त स्थानों की पूर्ति करो :
(क) जिन शब्दों के सार्थक …………. न हों उन्हें ………. शब्द कहा जाता है।
(ख) ऐसे शब्द जो …… तो होते हैं पर किसी विशेष अर्थ में रूढ़ हो जाते हैं, उन्हें ….. शब्द कहते हैं।

5. नीचे लिखे शब्दों को उचित शीर्षक के नीचे लिखो : घर, स्कूल, परीक्षा, परिश्रम, रोटी, कलेवा, पैंसिल, हाथ, डाक्टर, सूर्य, अमृत, आग, पेटी, नृत्य।

तत्समतद्भवदेशजविदेशी

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HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Sandhi संधि Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Vyakaran संधि

संधि शब्द का अर्थ है जोड़ या मिलन। जब दो शब्द एक दूसरे से मिलते हैं और मिलने के कारण उनमें ध्वनि अथवा ध्वनियों का परिवर्तन होता है, तो उन शब्दों में संधि होना माना जाता है। जैसे
राम + अवतार = रामावतार सधि तीन प्रकार की होती है :
1. स्वर संधि
2. व्यंजन संधि
3. विसर्ग संधि

1. स्वर संधि : स्वर से परे स्वर आने पर शब्दों के मेल में उनमें जो परिवर्तन होता है, उसे स्वर संधि कहते हैं, जैसे-
हिम + आलय = हिमालय
मुनि + ईश्वर = मुनीश्वर

स्वर संधियां पांच प्रकार की होती हैं :
1. दीर्घ संधि
2. गुण संधि
3. वृद्धि संधि
4. यण संधि
5. अयादि संधि

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

(क) दीर्घ संधि : अ-आ से परे अ-आ होने पर दोनों मिलकर आ, इ-ई से परे इ-ई होने पर दोनों मिलकर ई, उ, ऊ होने पर दोनों मिलकर ऊ हो जाता है। इस संधि का परिणाम दीर्घ स्वर होता है, अत: इसे दीर्घ संधि कहते हैं। जैसे –
अ + आ = आ
भाव + अर्थ = भावार्थ
चरण + अमृत = चरणामृत
परम + अर्थ = परमार्थ
देह + अंत = देहात

अ + आ + आ
हिम + आलय = हिमालय
सचिव + आलय = सचिवालय
छात्र + वास = छात्रावास
धर्म + आत्मा = धर्मात्मा

आ + अ = आ
शिक्षा + अर्थी = शिक्षार्थी
रेखा + अंश = रेखांश
विद्या + अर्थी = विद्यार्थी
यथा + अर्थ = यथार्थ

आ + आ = आ
विद्या + आलय = विद्यालय
महा + आशय = महाशय
मुनि + ईश = मुनीश
गिरि + ईश = गिरीश
कपि + ईश = कपीश
हरि + ईश = हरीश
नदी + ईश = नदीश
रजनी + ईश = रजनीश

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

उ+ उ = ऊ
बहु + उद्देशीय = बहुद्देशीय
सु + उक्ति = सूक्ति
भानु + उदय = भानूदय
लघु + उत्तर = लघूत्तर
वधू + उत्सव = वधूत्सव

(ख) गुण संधि : अ अथवा आ के बाद इ अथवा ई हो तो दोनों मिलकर ए, अ अथवा आ के बाद 3 अथवा ऊ हो तो दोनों मिलकर ओ तथा अ अथवा आ के बाद ऋ हो तो दोनों मिलकर अर हो जाते हैं। जैसे – अ, आ + ई, ई = ए
स्व + इच्छा = स्वेच्छा
दिन + ईश = दिनेश
नर + इंद्र = नरेंद्र
रम + ईश्वर = परमेश्वर
महा + इंद्र – महेंद्र
महा + ईश = महेश
यथा + इष्ट – यथेष्ट
लंका + ईश = लंकेश

अ, आ + उ, ऊ = ओ
बहु + उद्देशीय – बहुद्देशीय
सु + उक्ति = सूक्ति
चंद्र + उदय = चंद्रोदय
वीर + उचित = वीरोचित
महा + उत्सव = महोत्सव
पूर्व + उक्त = पूर्वोक्त

अ, आ + ऋ = अर्
ब्रह्म + ऋषि – ब्रह्मर्षि
महा + ऋषि = महर्षि
सप्त + ऋषि = सप्तर्षि
राजा + ऋषि = राजर्षि

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

(ग) वृद्धि संधि : अ अथवा आ के बाद ए अथवा ऐ हो तो दोनों मिलकर ऐ तथा अ अथवा आ के बाद ओ अथवा औ हो तो दोनों को मिलाकर औ हो जाता है।

अ, आ + ए, ऐ = ऐ
एक + एक = एकैक
लोक + एषणा = लोकेषणा
सदा + एव = सदैव
तथा + एव = तथैव

अ, आ + ओ, औ = औ
अधर + गोष्ठ = अधरोष्ठ
परम + औषध = परमौषध
महा + औषध = महौषध

(घ) यण संधि : इ अथवा ई के बाद हु और ई को छोड़कर यदि कोई अन्य स्वर हो तो इ अथवा ई के स्थान पर ‘यु’, उ अथवा ऊ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उनके स्थान पर ‘व्’ और ऋ को छोड़कर कोई अन्य स्वर हो तो उसके स्थान पर ‘र’ हो जाता है। ‘इ’ के स्थान पर ‘य’ यदि + अपि = यद्यपि
प्रति + उत्तर = प्रत्युत्तर
इति + आदि = इत्यादि
प्रति + एक = प्रत्येक

‘उ’ के स्थान पर ‘व’
सु + अल्प = स्वल्प
सु + आगत = स्वागत
अनु + एषण = अन्वेषण

‘ऋ’ के स्थान पर ‘र’
पितृ + आज्ञा = पित्राज्ञा

(ङ) अयादि संधि : ए, ऐ, ओ, औ के बाद यदि कोई भी स्वर हो तो ‘ए’ का ‘अय’, ‘ऐ’ का ‘आय’, ‘ओ’ का ‘अव्’ और का ‘आव’ हो जाता है।
ने + अन = नयन
पो + अन = पवन
गै + अक = गायक
पौ + अक = पावक

टिप्पणी : हिन्दी में ये शब्द रूढ़ या तत्सम माने जाएंगे। संस्कृत के समान इनमें संधि नहीं मानी जाएगी। आजकल इन शब्दों को हिंदी में संधियुक्त नहीं माना जाता।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

2. व्यंजन संधि : व्यंजन से परे व्यंजन या स्वर आने पर जो संधि होती है, उसे व्यंजन संधि कहते हैं। व्यंजन संधि के प्रमुख नियम ये हैं-
(क) वर्ग का तृतीय वर्ण : वर्गों के प्रथम वर्ण से परे वर्गों का तृतीय-चतुर्थ वर्ण, कोई स्वर अधवा य, र, ल, व, ह आदि वर्णों में से कोई वर्ण हो तो पहले वर्ण को अपने वर्ग का तृतीय-वर्ण हो जाता है:
दिक् + अंबर = दिगंबर
भगवत् + गौता = भगवद्गीता
घट् + दर्शन = षड्दर्शन
कृत् + अंत = कृदंत
वाक् + ईश = वागीश
सत् + धर्म = सद्धर्म

(ख) वर्ग का पंचम वर्ण : वर्ग के प्रथम या तृतीय वर्ण से परे पाँचवा वर्ण हो, तो उसके स्थान पर उसी का पाँचवा वर्ण हो जाता है –
वाक् + मय = वाङ्मय
चित् + मय = चिन्मय
षट् + मास = षण्मास
षड् + मुख = षण्मुख
जगत् + नाथ = जगन्नाथ
सत् + मार्ग = सन्मार्ग

(ग) त् के बाद ज या झ हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ज’ हो जाता है:
सत् + जन = सज्जन
उत् + ज्वल = उज्ज्वल
जगत् + जननी = जगज्जननी
विपत् + जाल = विपज्जाल

(घ) त् के बाद ड या ढ हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ज’ हो जाता है :
उत् + डयन = उड्डयन
वृहत् + टीका = वृहट्टीका

(ङ) त् के बाद ल हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘ल’ हो जाता है:
उत् + लास = उल्लास
उत् + लेख = उल्लेख
तत् + लीन – तल्लीन

(च) त् के बाद यदि श हो तो ‘त्’ के स्थान पर ‘च’ और ‘श’ के स्थान पर ‘छ’ हो जाता है।
सत् + शास्त्र = सच्छास्त्र
उत् + श्वास = उच्छवास
उत् + शिष्ट = उच्छिष्ट
तत् + शिव = तच्छिव

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

(छ) यदि ‘त्’ के बाद च/छ हो तो ‘त्’ का ‘च’ हो जाता है
उत् + चारण = उच्चारण
सत् + चरित्र = सच्चरित्र

(ज) त् के बाद ह हो तो ‘त्’ का ‘द्’ और ‘ह’ का ‘ध’ हो जाता है:
तत् + हित = तद्धित
उत् + हार = उद्धार

(झ) ‘म्’ के बाद यदि कोई स्पर्श व्यंजन हो तो ‘म्’ के स्थान पर उसी वर्ग का अंतिम वर्ण हो जाता है:
सम् + कल्प = सइकल्प (संकल्प)
सम् + तोष = सन्तोष (संतोष)
सम् + चय = संचय (संचय)
सम् + भाषण = सम्भाषण (संभाषण)

टिप्पणी : हिन्दी में अब संकल्प, संतोष आदि का प्रयोग ही अधिक हो रहा है। इन्हीं को मानक प्रयोग स्वीकार किया गया है।

(अ) म् के बाद य, र, ल, व, स, श, ह हो तो म् का अनुस्वार हो जाता है:
सम् + योग = संयोग
सम् + वाद = संवाद
सम् + रक्षक = संरक्षक
सम् + शय = संशय
सम् + लग्न = संलग्न
सम् + हार = संहार

अपवाद : यदि सम् के बाद ‘राट्’ हो तो म् का म् ही रहता है। सम् + राट् = सम्राट

(ट) ‘छ’ से पूर्व स्वर हो तो ‘छ’ से पूर्व ‘च’ आ जाता
परि + छेद = परिच्छेद
आ + छादन् = आच्छादन

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

(ठ) हुस्व स्वर इ, उ के बाद यदि ‘र’ हो और ‘र’ के बाद फिर ‘र’ हो तो ह्रस्व स्वर दीर्घ हो जाता है। ‘र’ का लोप हो जाता है।
निर + रस = नीरस
निर + रोग = नीरोग

(ङ) न् का ण होना : यदि ऋ, र, ष के बाद ‘न’ व्यंजन – आता है तो ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है। जैसे-
राम + अयन = रामायण
परि + नाम = परिणाम

3. विसर्ग संधि : विसर्ग से परे स्वर या व्यंजन आने पर जो संधि होती है उसे विसर्ग संधि कहते हैं। विसर्ग संधि के प्रमुख नियम ये हैं-
(क) विसर्ग के पहले ‘अ’ हो और बाद में कोई घोष व्यंजन (वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवां वर्ण, य, र, ल, व, ह) हो तो, विसर्ग का ‘ओ’ हो जाता है :
मनः + बल = मनोबल
मनः + रंजन- मनोरंजन
तमः + गुण = तमोगुण
तपः + वन = तपोवन
रज: + गुण = रजोगुण
मनः + हर = मनोहर
अधः + गति = अधोगति
पयः + धर = पयोधर

(ख) विसर्ग के बाद यदि च, छ हो तो विसर्ग का ‘श’ हो जाता है:
निः + चिंत = निश्चित
निः + छल = निश्छल
दु: + चरित्र = दुश्चरित्र

(ग) विसर्ग के बाद यदि ट्, ठ् हो तो विसर्ग का ष हो जाता है :
धनुः + टंकार = धनुष्टंकार

(घ) विसर्ग के बाद यदि त, थ हो तो विसर्ग का ‘स्’ हो जाता है :
दु: + तर = दुस्तर
नमः + ते = नमस्ते

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran संधि

(ङ) विसर्ग के पहले कोई स्वर हो या बाद में कोई घोष ध्वनि (स्वर, वर्ग का तीसरा, चौथा और पाँचवां वर्ण) एवं य, र, ल, व, ह हो तो विसर्ग का ‘र’ होता है :
निः + जन = निर्जन
निः + यात = निर्यात
निः + बल = निर्बल
निः + लिप्त = निर्लिप्त
निः + विकार = निर्विकार
पुनः + जन्म = पुनर्जन्म
दुः + गुण = दुर्गुण
निः + लोभ = निर्लोभ

(च) विसर्ग से परे श, ष, स हो तो विसर्ग के विकल्प से परे वाला वर्ण हो जाता है।
निः + संदेह = निस्संदेह
दु: + शासन = दुश्शासन

(छ) यदि विसर्ग से पूर्व ‘इ’ अथवा ‘उ’ हो बाद बाद में क, ख, प, फ हो तो विसर्ग श, ष, स् का ‘ए’ हो जाता
निः + कलंक = निष्कलंक
दुः + कर = दुष्कर
निः + पाप = निष्पाप
निः + फल = निष्फल

(ज) विसर्ग से परे क, ख, प, फ हो तो विसर्ग ज्यों का त्यों बना रहता है:

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HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Varn-Vichar : Uchchaaran Aur Vartani वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

इस अध्याय के अंतर्गत निम्नलिखित का अध्ययन किया जाएगा :

  • स्वर एवं स्वरों के भेद
  • व्यंजन एवं व्यंजनों के भेद
  • अक्षर
  • व्यंजन गुच्छ 00 बलाघात
  • अनुतान
  • संगम
  • उच्चारण संबंधी अशुद्धियां और उनमें सुधार

वर्ण :
वर्ण क्या है ? : भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है। इसके लिखित रूप को वर्ण कहते हैं। वर्ण शब्द का प्रयोग ध्वनि और ध्वनि-चिह्न (लिपि-चिह्न) दोनों के लिए होता है। इस प्रकार वर्ण भाषा के मौखिक और लिखित दोनों रूपों के प्रतीक हैं। इसे हम अक्षर भी कह सकते हैं। अक्षर का अर्थ है-उसके और टुकड़े नहीं किए जा सकते।
वर्ण या अक्षर वह छोटी-से-छोटी ध्वनि है, जिसके टुकड़े नहीं किए जा सकते।

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

वर्णमाला (Alphabet) : वर्गों के व्यवस्थित समूह को वर्णमाला कहते हैं।
मानक देवनागरी वर्णमाला (Standard Hindi Alphabet) :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-1

अनुस्वार : ं अं
विसर्ग : : अ:
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-2
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-3

हल् चिह्न ( ) : सभी व्यंजन वर्णों के लिपि चिह्नों में ‘अ’ स्वर रहता है, जैसे – क – क् + अ । जब स्वर रहित व्यंजन का प्रयोग करना हो तो उसके नीचे हल चिह्न लगाया जाता है। वर्णों के भेद (Kinds of Alphabet) : वर्णों को दो भागों में बाँटा जाता है :
1. स्वर (Vowels)
2. व्यंजन (Consonants)

स्वर (Vowels) :
जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास-वायु बिना किसी रुकावट के मुख से निकलती है, उन्हें स्वर कहते हैं।
हिंदी में निम्नलिखित स्वर हैं :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-4
यद्यपि ‘ऋ’ को लिखित रूप में स्वर माना जाता है, परंतु आजकल हिंदी में इसका उच्चारण ‘रि’ के समान होता है।
आजकल अंग्रेजी प्रभाव के कारण ‘ऑ’ ध्वनि हिंदी में अपनी जगह बना चुकी है। यह ‘आ’ और ‘ओ’ के बीच की ध्वनि है। इसका लिपि-चिह्न (ऑ) है।
जैसे – बॉल, डॉक्टर, हॉकी आदि।

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

स्वर के भेद (Kinds of Vowels) :
(क) उच्चारण में लगने वाले समय के आधार पर स्वरों को दो भागों में बाँट सकते हैं :
1. हस्व स्वर (Short vowels)।
2. दीर्घ स्वर (Long vowels)

आइए, अब हम इनके बारे में जानें :
1. ह्रस्व स्वर : जिन स्वरों को सबसे कम समय (एक मात्रा) में उच्चरित किया जाता है, उन्हें हस्व स्वर कहते हैं। ये हैं – अ इ उ (ऋ)
हस्व ‘ऋ’ का प्रयोग केवल संस्कृत के तत्सम शब्दों में होता है, जैसे-
ऋषि, ऋतु, कृषि आदि।
ह्रस्व स्वरों को ‘मूल स्वर’ भी कहते हैं।

2. दीर्घ स्वर : जिन स्वरों के उच्चारण में हस्व स्वरों से अधिक (लगभग दुगुना) समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं। ये स्वर हैं : आ ई ऊ ए ऐ ओ औ
ये स्वर हस्व स्वरों के दीर्घ रूप नहीं हैं, वरन् स्वतंत्र ध्वनियाँ हैं। इन स्वरों में ए तथा औ का उच्चारण संयुक्त स्वर रूप में भी है, जैसे-‘ऐ’ में ‘अ+इ’ दो स्वरों का संयुक्त रूप है। यह उच्चारण तब होता है जब बाद में क्रमशः ‘य’ और ‘व’ आएँ ; जैसे- भैया = भइया, कौआ – कउवा
शेष स्थिति में ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण शुद्ध स्वर की भाँति होता है । जैसे- मैल, कैसा, औरत, कौन आदि।

व्यंजन (Consonants) :
जिन ध्वनियों के उच्चारण में वायु रूकावट के साथ मुँह से बाहर आती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं।
हिंदी वर्णमाला में मूलतः 33 व्यंजन हैं। दो व्यंजन ‘ड’ और ‘ढ़’ क्रमशः ‘ड’ ‘ढ’ से विकसित हुए हैं।
हिंदी में अरबी, फारसी, तुर्की आदि के शब्द आ जाने के कारण आने वाली ध्वनियों के लिए जो व्यंजन बनाए गए हैं, वे हैं-क, ख, ग, फ, ज़ ।

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

प्रयत्न और स्थान की विविधता के अनुसार हिंदी-व्यंजनों की तालिका
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-5

व्यंजनों का वर्गीकरण (Classification of Consonants) :
उच्चारण की दृष्टि से व्यंजन वर्णों को दो प्रकार से विभाजित किया जाता है :
(1) स्थान के आधार पर
(2) प्रयल के आधार पर।
1. स्थान के आधार पर (Places of Pronunciation) :
व्यंजनों का उच्चारण मुख के विभिन्न अवयवों-कंठ, तालु, मूर्धा आदि से किया जाता है। जो वर्ण मुख के जिस भाग से बोला जाता है, वही उस वर्ण का ‘उच्चारण स्थान’ कहलाता है। वर्गों के उच्चारण स्थान इस प्रकार हैं :

वर्ण का नामउच्चारण स्थानवर्ण
कंठ्यकंठ (गले)क, ख, ग, घ, ङ
तालव्यतालुत, छ, ज, झ, ञ, य, श
मूर्धन्यतालु का मूर्धा भागट, ठ, ड, ढ, ण, ड, ढ, ष
दंत्यदाँतों का मूलत, थ, द, ध, न
वर्त्यदंतमूलन, स, ज, र, ल
ओष्ठ्यदोनों होंठप, फ, ब, भ, म
दंतोष्ठ्यनिचले होंठ और ऊपर के दाँतव, फ
स्वरयंत्रीयस्वरयंत्र

2. प्रयत्न के आधार पर (Manner of Articulation) :
व्यंजन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास का कंपन, श्वास की मात्रा तथा जिह्वा आदि अवयवों द्वारा श्वास के अवरोध की प्रक्रिया का नाम प्रयत्न है।
प्रायः यह प्रयत्न तीन प्रकार से होता है :
1. स्वरतंत्री में साँस के कंपन के रूप में।
2. श्वास (प्राण) की मात्रा के रूप में।
3. मुख-अवयवों द्वारा श्वास रोकने के रूप में।
अब हम इन तीनों रूपों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी प्राप्त करेंगे।

1. स्वरतंत्री में श्वास का कंपन : हमारे गले में दो झिल्लियाँ होती हैं, जो वायु के वेग से काँपकर बजने लगती हैं, इन्हें स्वरतंत्री कहते हैं। स्वर-तंत्रियों में होने वाले कंपन के आध र पर व्यंजन वर्णों के दो भेद हैं- अघोष और सघोष।
(क) अघोष (Non-wavering Sound) : जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन नहीं होता, उन्हें अघोष कहते हैं। हिंदी की अघोष ध्वनियाँ ये हैं :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.1
प्रथम तथा द्वितीय व्यंजन तथा
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.2
(ख) सघोष (Wavering Sound) : जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वरतंत्रियों में कंपन होता है, उनको सघोष कहते हैं। हिंदी के सघोष व्यंजन हैं :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.3
ब भ म – वर्गों के तीसरे, चौथे और पाँचवें व्यंजन
तथा HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.4
सभी स्वर सघोष होते हैं।

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

2. श्वास की मात्रा : इस आधार पर व्यंजनों के दो भेद किए जाते हैं :
(क) अल्पप्राण (Non-Aspirated)
(ख) महाप्राण (Aspirated)।

(क) अल्पप्राण (Non-Aspirated) : जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास (प्राण वायु) कम मात्रा में बाहर निकलती है, उन्हें अल्पप्राणं व्यंजन कहते हैं। ये हैं :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.5 ← वर्गों के पहले, तीसरे और पाँचवें वर्ण
तथा HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.7

(ख) महाप्राण (Aspirated) : जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास वायु अधिक मात्रा में बाहर निकलती है, उन्हें महाप्राण कहते हैं। ये हैं :
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-6.6 ← वर्गों के दूसरे और चौथे वर्ण तथा

व्यंजन-गुच्छ :
जब दो या दो से अधिक व्यंजन एक साथ एक श्वास के झटके में बोले जाते हैं, तब उनको ‘व्यंजन-गुच्छ’ कहा जाता है। जैसे-प्यास। शब्द के आदि में प्राय: दो प्रकार के व्यंजन-गुच्छ मिलते हैं :
1. व्यंजन + य, र, ल, व
2. स + य र ल से भिन्न व्यंजन

1.क् + य = क्य (क्यारी)

क् + व = क्व (क्वारा)

क् + र = क्र (क्रम)

2.श् + र = श्र (श्रम)

श् + य = श्य (श्याम)

स् + र = स्र (स्रोत)

3.स् + क = स्क (स्कंध)

स् + त = स्त (स्तन)

स् + न = स्न (स्नान)

स् + फ = स्फ (स्फूर्ति)

4.ग् + य = ग्या (ग्यारह)

ग् + व = ग्व (ग्वाला)

ग् + र = ग्र (ग्राम)

5.स् + ल = स्ल (स्लेट)

स् + ट = स्ट (स्टेशन)

स् + थ = स्थ (स्थल)

शब्द के मध्य तथा अंत में भी अनेक व्यंजन-गुच्छ मिलते हैं ; जैसे- न् + त = अंत, र + म – मार्ग, प् + त – लुप्त आदि।

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

व्यंजन-संयोग :
जब एक व्यंजन के साथ दूसरा व्यंजन आता है और दोनों का उच्चारण अलग-अलग किया जाए तो व्यंजन-संयोग होता है। व्यंजन-संयोग में व्यंजनों को अलग-अलग लिखना चाहिए।
जैसे- जनता = जन् + ता में न् + त का संयोग है।
उलटा = उल्+ टा में ल् + ट का संयोग है।

व्यंजन-द्वित्व :
जब कोई व्यंजन अपने समरूप व्यंजन से मिलता है तो ऐसे रूप को व्यंजन-द्वित्व कहते हैं। जैसेइक्का, पक्का, बच्चा, कट्टर, लड्डू, दिल्ली, लटू, उद्देश्य, थप्पड़, उत्तेजित आदि। Is इन्हें भी समझो : ‘र’ व्यंजन युक्त।

  • जब ‘र’ (स्वर रहित) किसी व्यंजन के पूर्व हो, जैसे – कर्म, धर्म, वर्ष आदि।
  • जब ‘र’ (स्वर सहित) किसी व्यंजन के बाद हो, जैसे – प्रेम, क्रम आदि।
  • यही स्वर सहित ‘र’ ट और ड के साथ वर्तनी के साथ कुछ भिन्न रूप ले लेता है, जैसे-ट्रेन, ट्रक, ड्रम आदि।

दो व्यंजनों के त और श के साथ इसके विशिष्ट रूप बन जाते हैं-
त् + र =त्र त्रिशूल, त्रिभुज, यंत्र
श् + र = श्र श्रम, श्री, आश्रय अन्य

संयुक्त व्यंजन :
क् + ष = क्ष क्षमा, क्षेत्र, क्षत्रिय
ज् + अ = ज्ञ ज्ञान, यज्ञ, विज्ञान
(‘ज्ञ’ का उच्चारण प्रायः ग् + य – ग्य के रूप में किया जाता है।)

वर्ण-विच्छेद :
जब किसी शब्द में प्रयुक्त वर्णों को अलग-अलग किया जाता है, तो उसे ‘वर्ण-विच्छेद’ कहते हैं।
उदाहरण-

विद्यालयव् + इ + द् + य् + आ + ल् + अ + य् + अ
भारतीयभ् + आ + र् + अ + त् + ई + य् + अ
योग्यताय् + ओ + ग् + य् + अ + त् + आ

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बलाघात (Stress):
किसी शब्द के उच्चारण में किसी अक्षर पर जो बल दिया जाता है, उसे बलाघात कहते हैं। किसी भी अक्षर के सभी शब्द समान बल से नहीं बोले जाते। जैसे- ‘राम’ शब्द में ‘रा’ पर बल है। – ‘कबीर’ शब्द में ‘बी’ पर बल है। * बलाघात शब्द स्तर पर भी देखा जाता है, जैसे –
रोको, मत जाने दो।
आज मैं रामायण पढूंगा।
मैं रामायण कल पढूँगा ।

अनुतान (Intonation) :
बोलने में जो सुर का उतार-चढ़ाव (आरोह-अवरोह) होता है, उसे अनुतान कहते हैं। इसका महत्व शब्द एवं वाक्य दोनों स्तरों पर है। ‘अच्छा’ शब्द की विभिन्न अनुतान से –
अच्छा – सामान्य कथन/स्वीकृति
अच्छा ? – प्रश्नवाचक
अच्छा ! – आश्चर्य

संगम (Juncture) :
पदों का सीमा-संकेत संगम कहलाता है। संगम अक्षरों के बीच के हल्के-से विराम को जानना है। दो भिन्न स्थानों पर संगम से दो भिन्न अर्थ निकलते हैं ; जैसे –
सिरका – एक प्रकार का तरल पदार्थ
सिर + का – सिर से संबद्ध
जलसा – उत्सव
जल + सा – जल की तरह
मनका – माला का दाना
मन + का – मन का (भाव)

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

उच्चारण संबंधी अशधियाँ और उनका निराकरण (Correction in Pronunciation):
शुद्ध भाषा लिखने-पढ़ने में शुद्ध उच्चारण का बहुत महत्त्व है। हिंदी में वर्तनी की जो अशुद्धियाँ पाई जाती हैं, उनका एक प्रधान कारण अशुद्ध उच्चारण है। आगे ऐसे शब्दों के उदाहरण दिए जा रहे हैं जिनके उच्चारण में प्रायः अशुद्धि होती है :

तालिका :
1. ह्रस्व स्वर के स्थान पर दीर्घ तथा दीर्घ स्वर के स्थान पर हस्व
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-7.1
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-7.2
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-7.3
2. नासिक्य व्यंजन संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-8
3. अल्पप्राण-महाप्राण संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-10
4. व-ब की अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-9

HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार : उच्चारण और वर्तनी

5. श, ष, स संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-11
6. छ-क्ष संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-12
7. ऋ-र संबंधी अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-13
8. चंद्रबिंदु और अनुस्वार की अशुद्धियाँ
HBSE 8th Class Hindi Vyakaran वर्ण-विचार उच्चारण और वर्तनी-14

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HBSE 7th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Rachana Nibandh-Lekhan निबंध-लेखन Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Rachana निबंध-लेखन

1. मेरा प्रिय मित्र

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। वह समाज में रहकर परस्पर संबंधों का निर्वाह करता है। मनुष्य के जीवन में अनगिनत परिचित होते हैं। प्रायः परिचितों के संबंध स्वार्थों पर आधारित होते हैं। इन परिचितों में एक परिचित मित्र भी होता है। संसार में सच्चे मित्र अल्प मात्रा में ही मिलते हैं। सच्चा मित्र अपने मित्र के दोषों को दूर करता है, उसके लिए हितकारी योजनाएं बनाता है, गोपनीय को छिपाता है तथा उसके गुणों को समाज के समक्ष प्रकट करता है। आपत्ति में सहायता करता है और दुख में साथ नहीं छोड़ता। इस प्रकार एक आदर्श सच्चा मित्र सबसे बड़ा संबंधी होता है।

निपुण मेरा सहपाठी है और प्रिय मित्र है। वह कक्षा का सबसे व्यवहार कुशल और बुद्धिमान छात्र है। प्रत्येक वर्ष वह कक्षा में प्रथम स्थान पर रहता है। विद्यालय के प्रधानाचार्य एवं सभी शिक्षक उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं। उसके मुखमंडल पर सदैव मुस्कान दिखाई देती है। कक्षा का सबसे मेधावी छात्र होने पर भी उसे घमंड नहीं है। अन्य छात्रों की सहायता करने में उसे अपार खुशी मिलती है। निपुण सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेता है।

इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर उसने ऐसा ओजस्वी भाषण दिया कि सभी लोग उसका भाषण सुनकर मंत्रमुग्ध हो गए। उसे विद्यालय के सर्वोत्तम वक्ता का पुरस्कार दिया गया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ वह खेलों में भी रुचि लेता है। वह विद्यालय की क्रिकेट टीम का कैप्टन है। वह अध्ययन के प्रति जितना गंभीर है, उतना ही हँसमुख भी है। उसके चुटकुले और हँसी की फुलझड़ियाँ सुनकर सभी लोट-पोट हो जाते हैं। वह कभी किसी की शिकायत नहीं करता बल्कि अपने साथियों को गलतियाँ सुधारने की बात कहता है। अपने साथियों की अच्छाइयों की हृदय से सराहना करता है। यदि किसी कारणवश वह एक दिन भी नहीं आता तो सभी को उसका अभाव खटकता है।

में सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे निपुण जैसे सच्चा एवं आदर्श मित्र मिला है। मैं चाहता हूँ कि हमारी मित्रता सदैव बनी रहे। उसके पिता एक कॉलेज में प्राध्यापक हैं। पारिवारिक संस्कारों का निपुण पर पूर्ण प्रभाव है। हम सभी का वह प्रेरणा-स्रोत है। कितना अच्छा होता ! यदि मेरे सभी मित्र निपुण जैसे होते। सच्चा मित्र विपत्ति में भी साथ नहीं छोड़ता, यह गुण निपुण में सदैव दिखाई देता है। किसी ने ठीक ही कहा है –
“विपत्ति कसौटी जे कसे, तेई साँचे मीत।”

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2. स्वतंत्रता दिवस

गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-पराधीन सपनेह सख नाहीं। पराधीनता में स्वप्न में भी सुख नहीं है। स्वतंत्रता तो पशु-पक्षियों को भी प्रिय है। जब कोई राष्ट्र परतंत्र हो जाता है तो उसके निवासियों के लिए वह परतंत्रता अभिशाप बन जाती है। भारत जैसा महान् राष्ट्र भी सैकड़ों वर्ष तक पराधीन रहा और आपसी फूट के कारण पराधीनता के अभिशाप को सहन करता रहा। देशवासियों की एकता और शक्ति के कारण भारत 15 अगस्त 1947 को पराधीनता से मुक्त हुआ। यह दिवस भारत में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है।

स्वतंत्रता दिवस भारतवर्ष का राष्ट्रीय पर्व है। सभी भारतवासी संपूर्ण देश में 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। सभी राज्यों की राजधानियों एवं महानगरों में इस दिवस पर विशेष आयोजन होते हैं। सभी राज्य सरकारें इस दिन राज्य के निवासियों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करती हैं। इस दिन देश के सभी भागों में राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। सरकारी भवनों को सजाया जाता है। इस समारोह में देश के सभी लोग सम्मिलित होते हैं। भारत के बाहर रहने वाले भारतीय भी इस दिवस को विदेशों में रहकर मनाते हैं। इस प्रकार स्वतंत्रता दिवस हमारा महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय पर्व है।

स्वतंत्रता दिवस समारोह का विशेष आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में होता है। इस दिन दिल्ली के स्कल एवं कॉलेजों में अवकाश होता है ताकि सभी लोग स्वतंत्रता दिवस समारोह में सम्मिलित हों। दिल्ली में ऐतिहासिक लाल किले के प्राचीर पर प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है। राष्ट्रीय ध्वज को 21 तोपों की सलामी दी जाती है। ध्वजारोहण के उपरांत प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं।

राष्ट्र के नाम प्रसारण में वे राष्ट्र को संपन्न बनाने तथा राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने का आह्वान करते हैं। भाषण के उपरांत वे ‘जयहिंद’ का जयघोष करते हैं जिसे सुनकर श्रोता एवं दर्शकगण जयहिंद का अनुकरण करते हुए सभी दिशाओं को गुंजायमान कर देते हैं। इस दिन अनेक स्थानों पर राष्ट्रीय कवि सम्मेलन एवं मुशायरों का आयोजन होता है। इस दिन देश के लिए प्राणोत्सर्ग करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए जाते हैं तथा उनके त्याग एवं बलिदान का स्मरण किया जाता है।

स्वतंत्रता दिवस एक प्रेरक राष्ट्रीय पर्व है। यह हमें राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने की प्रेरणा देता है। हमें अपनी स्वतंत्रता की रक्षा करनी चाहिए तथा वैमनस्य से दूर रहना चाहिए। हमें ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिए जिससे हमारी स्वतंत्रता एवं राष्ट्रीय एकता को ठेस पहुंचे।

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3. गणतंत्र दिवस

भारतवर्ष पर्वो का देश है। यहाँ अनेक सामाजिक, धार्मिक एवं राष्ट्रीय पर्व मनाए जाते हैं। राष्ट्रीय पर्यों में गणतंत्र दिवस एक महत्त्वपूर्ण पर्व है। इसे सभी भारतीय हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। यह राष्ट्रीय पर्व प्रति वर्ष 26 जनवरी के दिन मनाया जाता है। इसी दिन भारत का संविधान सन् 1950 में लागू हुआ था, तभी से इसे हम गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं।

26 जनवरी का दिन भारतवर्ष में ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। इसी दिन सन् 1930 में रावी नदी के तट पर पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य प्राप्ति का संकल्प लिया गया था। इस महत्त्वपूर्ण दिवस को ही संविधान लागू किया गया तथा इसी दिन 1950 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद को भारत के प्रथम राष्ट्रपति के रूप में शपथ दिलाई गई।

गणतंत्र दिवस का राष्ट्रीय पर्व संपूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है। देश के सभी राज्यों की राजधानियों में, नगरों में, गाँवों में यह पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता है। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे वहाँ ही गणतंत्र दिवस का पर्व मनाते हैं। गणतंत्र दिवस पर्व का मुख्य आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में होता है। इस दिन दिल्ली की शोभा देखते ही बनती है।

26 जनवरी को प्रति वर्ष प्रातः भारत के राष्ट्रपति शाही बग्घी में बैठकर विजय चौक आते हैं। वहाँ भारत के प्रधानमंत्री एवं तीनों सेनाओं के अध्यक्ष उनका स्वागत करते हैं। विजय चौक और राजपथ पर अपार जनसमूह इस उत्सव की शोभा देखने के लिए एकत्रित होता है। राष्ट्रीय ध्वजारोहण के उपरांत तीन सेनाओं द्वारा सलामी का कार्यक्रम होता है। इस दिन भारतीय सेनाओं के आधुनिक शस्त्र-अस्त्रों का प्रदर्शन होता है।

अनेक राज्यों की मनमोहक झांकियाँ प्रदर्शित होती हैं। अनेक अपनी कला प्रदर्शित करते हैं। इस अवसर पर वीर और साहसी बच्चों की झाँकी भी निकलती है। समारोह का ऑतिम चरण बहुत ही आनंददायक होता है। भारतीय वायुसेना के विमान आकाश में अपने कौशल दिखाते हैं तथा आकाश में तिरंगा झंडा बनता है। इस दिन सरकारी भवनों पर रोशनी देखने योग्य होती है।

गणतंत्र दिवस का पर्व हमें राष्ट्रीयता की प्रेरणा देता है। यह दिवस हमें उन शहीदों एवं स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। यह दिवस हमें प्रेरणा देता है कि हम अपने स्वार्थों को भुलाकर, राष्ट्रनिर्माण के कार्य में जुट जाएँ तथा संविधान के अनुकूल आचरण करें तभी इस राष्ट्रीय पर्व की सार्थकता सिद्ध
होगी।

4. दीपों का पर्व-दीपावली

हमारा देश अनेक धर्म, संप्रदायों, जातियों का अद्भुत संगम है। यहाँ के निवासी अपने विश्वास एवं रुचियों के अनुसार अपने-अपने त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। दीपावली भी भारतीयों द्वारा मनाया जाने वाला एक महत्त्वपूर्ण पर्व है। दीपावली दो शब्दों से मिलकर बना है – दीप+अवली अर्थात् दीपों की पंक्ति। इस दिन दीप जलाने का विशेष महत्त्व है, इसलिए इस दिन प्रकाश पर्व है।

दीपावली का पर्व प्रति वर्ष कार्तिक मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। अगर देखा जाए तो दीपावली कई पर्वो का समूह है। दीपावली से पूर्व छोटी दीपावली और उससे पूर्व धनतेरस का पर्व होता है। दीपावली से अगले दिन गोवर्धन पूजा तथा उसके अगले दिन भाईदूज का त्योहार होता है।

इस प्रकार दीपावली के समय सप्ताह पर्यंत हर्षोल्लास का वातावरण बना रहता है। दीपावली को रात्रि में लक्ष्मी पूजन किया जाता है, दीपक या विद्युत दीप जलाकर रोशनी की जाती है। बच्चे आतिशबाजी चलाकर प्रसन्न होते हैं। लक्ष्मी पूजन के उपरांत व्यापारीगण अपने नए बही-खाते प्रारंभ करते हैं।

दीपावली के कई दिन पहले ही लक्ष्मी के आगमन के लिए तैयारी प्रारम्भ हो जाती है। लोग अपने घरों की सफाई करते हैं। उन्हें यथा संभव सजाते हैं। सफाई एवं शुद्धता के वातावरण में जब दीपकों का प्रकाश किया जाता है तो अमावस्या की काली रात्रि भी पूर्णिमा में परिवर्तित हो जाती है। बाजारों में दुकानों की सजावट देखते ही बनती है। इस अवसर पर लोग अपने इष्टमित्रों के यहाँ मिष्ठान्न एवं उपहार प्रदान करके प्रेम एवं सौहार्द बढ़ाते हैं।

दीपावली का पौराणिक एवं ऐतिहासिक दृष्टि से भी विशेष महत्त्व है। एक मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान् श्रीराम लंका के राजा रावण को मारकर सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापस लौटे थे। उनके अयोध्या वापस आने की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपकों की पंक्तियाँ जलाकर प्रकाश किया। तभी से इस दिन दीपकों की पंक्तियाँ जलाने का महत्त्व है। इसी दिन सिक्खों के छठे गुरु गोविंद सिंह की बंधन-मुक्ति हुई थी। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद, जैन तीर्थकर महावीर स्वामी ने भी इसी दिन निर्वाण प्राप्त किया था।

प्रकाश पर्व दीपावली हमें जीवन भर हर्षोल्लास से रहने की प्रेरणा देती है। हमारे जीवन में सदैव ज्ञान का प्रकाश जगमगाता रहे, परन्तु इस प्रकाश पर्व के दिन कुछ लोग जुआ खेलते हैं, यह कानूनी अपराध है। कभी-कभी आतिशबाजी से आग लगने की दुर्घटनाएं हो जाती हैं। आतिशबाजी से वायु-प्रदूषण तथा ध्वनि-प्रदूषण फैलता है। अतः आतिशबाजी का विरोध करके प्रदूषण रहित दीपावली मनाना ही दीपावली की पवित्रता का परिचायक है।

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5. रंगों का त्योहार-होली

भारत विभिन्न ऋतुओं का देश है। वसंत को ऋतुराज की संज्ञा दी जाती है। रंगों का त्योहार होली ऋतुराज वसंत के आने का सूचक है। शीत ऋतु के उपरांत वसंत में प्रकति अनगिनत रंगों के फलों से सज जाती है। सर्वत्र प्रकृति के रंग-बिरंगे सौन्दर्य का ही साम्राज्य होता है। रंग-बिरंगे पुष्प एवं सरसों के पीले पुष्यों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है और मस्ती से झूम उठता है। इस रंग-बिरंगे वसंत में ही होली का शुभागमन होता है।

होली का त्योहार प्रति वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली का त्योहार दो दिन तक प्रमुख रूप से मनाया जाता है। पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन होता है। लोग रात को अपने घरों में भी होली जलाते हैं तथा रबी की फसल की जौ और गेहूँ आदि की बालियाँ भूनते हैं।

परस्पर भूने अन्न के दानों का आदान-प्रदान करते हुए अभिवादन करते हैं। अगले दिन प्रातः से ही सभी आबाल वृद्ध एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं। एक दूसरे के गले मिलते हैं। सभी भेद-भाव भुलाकर रंग डालते हैं। लोगों के चेहरे और कपड़े रंग-बिरंगे हो जाते हैं। लोग मस्ती में गाते, बजाते, नाचते हैं। इस प्रकार होली पारस्परिक प्रेम और सौहार्द का परिचायक है।

रंगों के पर्व होली का पौराणिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्व है। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक दैत्यराज था। वह अत्यंत अत्याचारी एवं क्रूर था। उसने भक्त स्वभाव के अपने पुत्र प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए। हिरण्यकश्यप चाहता था कि प्रह्लाद अपने पिता को ही भगवान् माने। इसलिए वह ईश्वर भक्त प्रह्लाद से सदैव क्रुद्ध रहता था। अनेक अत्याचारों के असफल होने पर उसने एक अंतिम उपाय किया।

हिरण्यकश्यप की एक होलिका नाम की बहन थी जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। उसने होलिका के सहयोग से प्रहलाद को जलाने की बात सोची। वह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। भगवान् की कृपा से होलिका तो जल गई परंतु प्रह्लाद सकुशल बच गया। कहते हैं कि तभी से इस दिन होलिका का दहन किया जाता है। एक.ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म किया था। अतः यह पर्व मदन-दहन पर्व बन गया।

रंगों का त्योहार होली हमें पारस्परिक प्रेम एवं सौहार्द का संदेश देता है। इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भूलकर मित्र बन जाते हैं, परन्तु कुछ लोग अपनी विकृत मानसिकता का प्रयोग होली में करते हैं। वे शराब पीकर ऊधम मचाते हैं, कई बार प्रदूषित रंगों से आँखों एवं चमड़ी के रोग हो जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। हमें शालीनता के साथ गुलाल लगाकर प्रेमपूर्वक होली खेलनी चाहिए ताकि समाज में स्नेह एवं प्रेम का सौहार्द बढ़े।

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6. रक्षाबंधन

भारत पर्वो का देश है। यहाँ वर्ष भर अनेक धार्मिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्व मनाए जाते हैं। सभी भारतीय अपने पर्वो को असीम हर्षोल्लास के साथ मनाते हैं। इन पवों में रक्षाबंधन एक पवित्र और प्रसिद्ध पर्व है। यह पर्व श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है, इसलिए इसे श्रावणी भी कहा जाता है। इस दिन बहनें अपने भाइयों को रक्षासूत्र अर्थात् राखियाँ बाँधती हैं, इसलिए ।यह पर्व रक्षा बंधन के नाम से विशेष प्रसिद्ध है।

रक्षाबंधन से काफी समय पूर्व ही बाजार में रंग-बिरंगी राखियों की दुकानें सज जाती हैं। भाइयों के दूर होने पर बहनें डाक द्वारा अपनी राखियाँ भेजती हैं। पास रहने वाली बहनें अपने भाई के यहाँ स्वयं जाकर राखी बांधती हैं तथा भाई के लिए मंगल कामनाएँ करती हैं। रक्षाबंधन के उपरान्त भाई अपनी बहनों को यथाशक्ति उपहार प्रदान करते हैं तथा बहन की रक्षा का उत्तरदायित्व लेते हैं। कई भाइयों की बहनें नहीं होती तो वे किसी को धर्म-बहन बनाकर रक्षाबंधन करवाते हैं और उसे बहन का प्रेम एवं सम्मान प्रदान करते हैं।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक पर्व नहीं है अपितु ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह पर्व महत्त्वपूर्ण है। यह ऐतिहासिक सत्य है कि राखी का सम्मान केवल हिंदू ही नहीं अपितु मुसलमान भी करते हैं। रानी कर्मवती ने हुमायूँ के लिए राखी भेजी थी और राखी का सम्मान करते हुए हुमायूँ ने गुजरात के बादशाह बहादुरशाह से चित्तौड़ की रक्षा की थी। रक्षाबंधन के विषय में यह कथा भी प्रचलित है कि राजा बलि से विष्णु ने वामन का रूप धारण करके तीन पग पृथ्वी की याचना की थी।

राजा बलि ने घमंड के साथ इसे देना स्वीकार कर लिया। बाद में विष्णु ने विराट रूप धारण करके पहले पग में पृथ्वी और दूसरे में आकाश तथा तीसरे में बलि के शरीर को ही नाप दिया था। कहा जाता है कि तभी से ब्राह्मण अपने यजमानों के यहाँ रक्षाबंधन करते हैं। इसी संदर्भ में देव और दानवों के युद्ध का उल्लेख भी आता है कि देवताओं की विजय की कामना करते हुए बहनों ने राखी बाँधी थी जिसके परिणाम स्वरूप देवताओं की विजय हुई।

आज के अर्थ प्रधान युग में रक्षाबंधन पर्व की सांस्कृतिक भावना लुप्त होती जा रही है। आज की अधिकांश बहनें राखी को धनप्राप्ति का माध्यम समझती हैं। भाई-बहन का पवित्र प्रेम रक्षा बंधन का आधार है। स्वार्थों के कारण पवित्र संबंधों में भी कटुता आ जाती है। हमें अपने स्वार्थों को त्यागकर पवित्र स्नेह भावना के साथ रक्षाबंधन का पर्व मनाना चाहिए। हमें बाहरी दिखावे को त्यागकर सादगी के साथ सांस्कृतिक पवित्रता की रक्षा करते हुए रक्षाबंधन का पर्व मनाना चाहिए, तभी इस पावन पर्व की सार्थकता है।

7. पोंगल

भारत धार्मिक और आध्यात्मिक देश है। भारत के कई पर्व ऐसे हैं जिनकी नींव में मुख्य रूप से धर्म और आध्यात्मिक भावनाएं मिलती हैं। पोंगल में जो कृत्य होते हैं, उनसे यही विदित होता है कि पोंगल एक महान् आध्यात्मिक पर्व है। यह तमिलनाडु का प्रमुख पर्व है। वहाँ इस त्योहार को बहुत धूमधाम से मनाते हैं।

पोंगल पर्व प्राचीन काल से ही मनाया जा रहा है। इसके मूल में दो भावनाएँ काम करती हैं- एक कृषि संबंधी और दूसरी आध्यात्म संबंधी। भारत कृषि प्रधान देश है। कृषि के आधार बैल और गाएँ हैं। पोंगल के दिन तमिलनाडु के लोग बैलों और गायों की पूजा करके अपनी राष्ट्रीय श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

पोंगल उनकी आध्यात्मिक भावना का भी प्रतीक है। पोंगल के दिन तमिलनाडु के लोग गाय के दूध के उफान को अधिक महत्त्व देते हैं। वे दूध के उफान से यह तात्पर्य निकालते हैं कि जिस प्रकार दूध का उफान शुद्ध और शुभ है, उसी प्रकार मेरा मन और अन्त:करण भी शुद्ध और उज्ज्वल होना चाहिए। वे मन की शुद्धता के लिए सूर्य देवता से प्रार्थना करते हैं।

पोंगल प्रति वर्ष पौष मास के प्रारंभ में मनाया जाता है। जिन दिनों भारत में संक्रान्ति पर खिचड़ी का पर्व मनाया जाता है, उन्हीं दिनों तमिलनाडु के लोग पोंगल मनाते हैं। यह पोंगल एक दिन नहीं, पूरे तीन दिन तक मनाया जाता है। तमिलनाडु राज्य के हर घर में लोग सबसे अधिक धूमधाम से पोंगल को ही मनाते हैं।

अगहन के महीने में जब धानों में सुनहली बालें लग जाती हैं, तब लोगों का चित्त पोंगल की याद से पुलकित हो जाता है। ये पोंगल की तैयारी में जुट जाते हैं। पोही के दूसरे दिन अर्थात् पौष कृष्ण प्रतिपदा को पोंगल की धूम मच जाती है। सब लोग शक्ति के अनुसार नई-नई चीजें खरीदते हैं।

पहले दिन तो नई फसल के नए चावलों को पकाकर खाया जाता है। आंध्र में इस दिन रंगोली से घरों को सजाया जाता है। इस दिन को ‘मोंगि पोंगल’ कहते हैं। इस दिन बड़ा आनंद आता है। बच्चे उबले हुए चावलों के चारों ओर जुट जाते हैं और घंटियाँ बजा-बजा कर चिल्लाते हैं- “पोंगलो पोंगल, पोंगलो-पोंगला” सब लोग ध्यान से देखते हैं कि सबसे पहले पतीली में किस ओर का पानी उबलता है इस प्रकार लोग भविष्य पढ़ते हैं। जब भोजन तैयार हो जाता है तो सूर्य की पूजा की जाती है। इस दिन गन्ना चूसना आवश्यक समझा जाता है।

तीसरे दिन ‘मटू पोंगल’ मनाया जाता है। मटू का अर्थ है – पशु। यह दिन बैलों के दिन के रूप में मनाया जाता है। बैल हमारे बहुत काम आते हैं। वे हमारे खेत जोतते हैं, चावल और ईख उगाते हैं। तीसरे दिन वे बैलों की पूजा करते हैं। उन्हें कुमकुम लगाते हैं, कौड़ियों की मालाएँ और घटियाँ पहनाते हैं। कहीं-कहीं बैलगाड़ियों की दौड़ भी होती है।

तमिलनाडु और आंध्र में इसके मनाने में थोड़ा अंतर है। आंध्र में स्त्रियाँ निर्मोत्रत अतिथियों पर अबीर-गुलाल छिड़कती हैं। वे गुड-मिले तिल, बेर और रूमाल देती हैं। अय्यंगार वैष्णवों के यहाँ इस दिन घी-मिली खिचड़ी खाई जाती है। पोंगल यद्यपि तमिलनाडु और आंध्र का पर्व है, पर उसके भीतर जो भावना काम करती है, उसे दृष्टि में रखकर पोंगल को भारत का सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पर्व कहा जा सकता है।

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8. ओणम

हमारे देश के प्रत्येक भाग में कोई न कोई त्योहार प्रमुख रूप से अवश्य मनाया जाता है। ओणम केरल का प्रमुख त्योहार है।

ओणम के विषय में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में महाबलि नामक एक राजा केरल में राज्य करता था। वह अपनी प्रजा से बहुत प्यार करता था। उसके राज्य में केरल धन-धान्य और सुख-शांति से पूर्ण था। प्रजा अपने राजा को भगवान् मानकर पूजती थी। महाबलि अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध था। देवताओं से महाबलि की लोकप्रियता देखी न गई। इंद्र की प्रार्थना पर विष्णु ने महाबलि को राज्य से हटाने की योजना बनाई।

भगवान् वामन का अवतार धारण कर महाबलि के पास गए। वे ब्राह्मण के वेश में थे। महाबलि के पास जाकर तीन पग भूमि तपस्या करने के लिए दान में मांगी। दानी बलि ने बिना सोचे-समझे उसे इसकी अनुमति दे दी। तब वामन ने विराट् रूप धारण कर दो पगों में ही भूलोक और स्वर्गलोक दोनों नाप लिए। तीसरा पग रखने के लिए जगह ही न बची। महाबलि ने

अपना वचन पूरा करने के लिए अपना सिर विष्णु के सम्मुख कर दिया। विष्णु ने महाबलि को पाताल लोक में रहने के लिए कहा। पाताल जाते समय उन्होंने भगवान् से प्रार्थना की कि उसे वर्ष में एक बार अपनी प्रजा के सुख-दुःख देखने का अवसर दिया जाए। भगवान् ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। केरल निवासी अपने राजा के आगमन के उपलक्ष्य में ओणम के रूप में अपने हृदय की प्रसन्नता बिखेरते हैं।

ऐसा माना जाता है कि श्रावण मास के श्रवण नक्षत्र में, जिसे मलयालम में ‘ओणम’ नक्षत्र कहते हैं, प्रति वर्ष महाबलि अपनी प्रजा का हाल देखने आते हैं। यही कारण है कि केरलवासी उस -दिन अपने उल्लास का ऐसा दृश्य उपस्थित करते हैं, जिससे महाबलि अपनी प्रजा को सुखी देखकर संतुष्ट हो सकें। इस पर्व पर विष्णु के साथ महाबलि की पूजा का भी विधान है।

ओणम उत्सव की रंगीनियों में केरल का जीवन नाचता-सा मालूम होता है। ओणम के दिनों में धनाढ्यों के भंडार गरीबों के लिए खुल जाते हैं। ओणम के अवसर पर केरल के सुमधुर गीत, मोह नृत्य-नाटिकाएँ, सुरुचिपूर्ण शृंगार, कलाप्रियता, हाथियों के जलूस, मंदिरों के देवोत्सव सभी अपने चरम उत्कर्ष पर होते हैं।

ओणम के दिनों में केरल के बालक-बालिकाएँ नहा-धोकर और नए वस्त्र पहनकर, हाथों में टोकरियाँ लिए फूल तोड़ने निकल ।पड़ते हैं। गृहणियाँ इन फूलों से घर के आँगन में कलात्मक रंगोली ।बनाती हैं। रंगोली के बीच में विष्णु और महाबलि की मूर्तियों की स्थापना होती है। लोग फूल, अक्षत, नैवेद्य, रोली, सुपारी, लौंग और नारियल चढ़ाकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।

इस उत्सव पर नावों की प्रतियोगिता होती है। सभी वर्ग के लोग इस नौकोत्सव में बड़े उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं। यों तो यह नौका प्रतियोगिता अनेक स्थानों पर होती है, पर एरणाकुलम और कोचीन के बीच में स्थित वेपनाटु कायल झील में जो प्रतियोगिता होती है, वह अपने ढंग की अनूठी होती है। ये नावें विविध आकार प्रकार की होती हैं और खूब सजी होती हैं। ऐसा लगता है, मानो नावों पर स्वर्ग उतर आया हो।

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9. ईद

त्योहारों का हमारे जीवन में विशेष महत्त्व है। त्योहारों के मनाने से हमारा जीवन नीरस होने से बचा रहता है। प्रकृति ने तो अपनी विविधता का प्रबंध कर ही रखा है, पर समाज ने भी, जीवन में ताजगी बनाए रखने के लिए पर्व एवं त्योहारों का चक्र बना रखा है। इससे सामाजिक जीवन में विशेष चहल-पहल आ जाती है।

हमारे अधिकांश त्योहारों का संबंध धर्म के साथ जुड़ा हुआ है। हिन्दुओं में होली, दीपावली, दशहरा आदि का विशेष महत्त्व है तो ईसाईयों में क्रिसमस का मुख्य स्थान है। मुसलमानों में जो त्योहार मनाए जाते हैं, उनमें ईद सर्वाधिक महत्त्व का त्योहार है। यह त्योहार सपी मुसलमानों को परोपकार एवं भाईचारे का संदेश देता है।

ईद से पूर्व रमजान का महीना होता है। मुसलमान इस पूरे महीने भर रोजे रखते हैं। वे अपना सारा समय ईश्वर आराधना में व्यतीत करते हैं। बुरे कार्यों के प्रति सतर्क रहते हैं। इस मास में वे शरीर और मन पर बड़ा अंकुश रखते हैं। दिन में खाना तो दूर पानी तक पीना वर्जित होता है।

रोजे खत्म होने के बाद ईद आती है। इसे ‘ईद-उल-फितर’ कहते हैं। ईद’ शब्द का अर्थ है – लौटना और ‘फितर’ शब्द का अर्थ है – खाना-पीना। मुसलमान भाई एक मास तक रोजा (व्रत) रखने के बाद ईद के दिन खाना-पीना शुरू करते हैं। ईद के दिन घरों में हर प्रकार से उल्लास मनाया जाता है। इस दिन घर में भाँति-भांति की मीठी सेवइयाँ पकती हैं और उन्हें लोगों में प्रसन्नतापूर्वक बाँटा जाता है। इसी कारण इस त्योहार को मीठी ईद भी कहते हैं।

ईद के दिन मुसलमान सूरज निकलने के बाद नमाज पढ़ते हैं। वे ईश्वर को धन्यवाद देते हैं कि उसकी मेहरबानी से वे रमजान का व्रत रखने में सफल हो गए। वे अपने अपराधों के लिए खुदा से क्षमा याचना भी करते हैं। इस दिन वे गरीबों को खूब दान देते हैं। ईद के दिन संसार की मस्जिदों में खूब भीड़ होती है। उस दिन की सामूहिक नमाज का दृश्य देखने योग्य होता है। हजारों लोग पंक्तियों में खड़े होकर और बैठकर नमाज पढ़ते हैं। नमाज के बाद वे एक-दूसरे के गले मिलते हैं। सभी धर्म वाले उन्हें ‘ईद मुबारक’ कहकर गले मिलते हैं। ईद का त्योहार प्रेम और सद्भावना का

त्योहार है। इसे सब धर्मों के लोगों को मिल-जुल कर मनाना चाहिए। इस दिन मुसलमान वर्ष भर का वैर-भाव भुलाकर एक-दूसरे ।को गले लगाते हैं। सभी धर्म वाले उन्हें ‘ईद मुबारक’ कहकर गले ।मिलते हैं। ईद का त्योहार प्रेम और सद्भावना का त्योहार है। इसे ।सब धर्मों के लोगों को मिल-जुलकर मनाना चाहिए। इस दिन ।मुसलमान वर्ष भर का वैर-भाव भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं। यह त्योहार सभी के लिए प्रसन्नता का संदेश लाता है।

बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिलता है। इस अवसर पर उनके लिए नए कपड़े सिलवाए जाते हैं। ईदगाह के पास मेलों का आयोजन किया जाता है। इस दिन सब अपनी चिंताएँ भूलकर प्रसन्नता के सागर में डूब जाते हैं। हम सब भारतीयों को ईद का त्योहार आपस में मिल-जुलकर मनाना चाहिए। इससे साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ता है और राष्ट्रीय एकता की भावना मजबूत होती है।

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10. क्रिसमस

क्रिसमस का त्योहार सारे विश्व में अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है। यह ईसाइयों का प्रमुख त्योहार है। यह प्रति वर्ष 25 दिसंबर को मनाया जाता है। क्रिसमस का त्योहार नव वर्ष तक चलता है।

यह दिन महात्मा ईसा मसीह के जन्म दिन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। आज से लगभग 2000 ई.पू. महात्मा ईसा का जन्म बेथलेहम नामक स्थान पर हुआ था। यह स्थान भूमध्य सागर के पश्चिमी तट के निकट फिलिस्तीन में है। तब यहाँ यहूदी लोग रहते थे लेकिन देश रोम साम्राज्य के अधीन था। ईसा के माता-पिता (मेरी-जांसफ) को जनगणना कराने के लिए बेथलेहम जाना पड़ा। वे रात बिताने के लिए एक अस्तबल में ठहरे।

उसी रात मेरी ने एक बालक को जन्म दिया। इस बालक का नाम जीसस रखा गया। यही बालक आगे चलकर ईसा मसीह के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ईसा मसीह ने लोगों को प्रेम एवं भाई-चारे का संदेश दिया। उन्होंने अपने धर्म की नींव प्रेम और क्षमा पर रखी।

ईसा मसीह के अनुयायी उनका जन्म दिन प्रति वर्ष क्रिसमस के रूप में अत्यंत उल्लासपूर्वक मनाते हैं। कई दिन पहले से गिरजाघरों को सजाना प्रारंभ कर दिया जाता है। बाजारों में खूब चहल-पहल रहती है। लोग अपने प्रियजनों के लिए सुन्दर उपहार खरीदते हैं। इस अवसर पर ‘ग्रीटिंग कार्ड’ भेजने की भी प्रथा है। बच्चों और स्त्री-पुरुषों को नए-नए वस्त्र पहनने का शौक होता है। घरों को भी खूब सजाया जाता है। घर के एक कोने में ‘क्रिसमस ट्री’ बनाया जाता है। एक बूढ़ा व्यक्ति सांताक्लाज बच्चों के लिए मिठाइयाँ एवं उपहार लेकर आता है।

अर्ध रात्रि के समय चर्च की घंटियाँ बज उठती हैं। सभी लोग हर्ष एवं उल्लास से झूम उठते हैं। केक काटकर ईसा मसीह का जन्म दिन मनाया जाता है। चर्च में प्रार्थना की जाती है। बच्चों को खाने के लिए केक और मिठाइयाँ मिलती हैं। उनकी खुशी देखते के अनुयायी मिल-जुलकर मनाते हैं। इससे एकता की भावना बढ़ती है। इस दिन हमें ईसामसीह के उपदेशों का स्मरण कर उन पर चलने का प्रण करना चाहिए।

वस्तुतः क्रिमस मनाने का मूल उद्देश्य महान संत ईसामसीह का पावन स्मरण है, जो दया, प्रेम, क्षमा और धैर्य के अवतार थे। संसार में ईसामसीह के दिव्य संदेश से हर व्यक्ति को विश्व शांति की प्रेरणा प्राप्त होती है।

11. राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी

महात्मा गांधी उन महान् आत्माओं में से एक हैं जिन्होंने अपने नि:स्वार्थ कार्यों से विश्व में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। गांधी जी का जीवन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ है। वे भारतीय स्वतन्त्रता के अग्रदूत थे। उन्होंने सत्य और अहिंसा का मार्ग अपनाकर ब्रिटिश शासन की नींव को हिलाकर रख दिया था। उन्हें सारा संसार महात्मा गांधी के नाम से जानता है। भारतवासी श्रद्धा वश उन्हें ‘राष्ट्रपिता’ और प्यार से ‘बापू’ कहते हैं।

गांधी जी का जन्म 2 अक्तूबर, 1869 ई. को गुजरात के पोरबंदर नामक स्थान पर हुआ। इनके बचपन का नाम मोहन दास था और इनके पिता का नाम कर्मचन्द था। अत: इनका पूरा नाम मोहन दास कर्मचन्द गाँधी था। उनके पिता राजकोट के दीवान थे। भारत में प्रारम्भिक शिक्षा पूरी करने के उपरांत इन्हें बैरिस्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैण्ड भेजा गया। गाँधी जी ने इंग्लैंड में सादा जीवन बिताया। वे विलायत से वकालत की डिग्री लेकर भारत लौटे। इन्होंने मुंबई में प्रैक्टिस शुरू कर दी।

वे झूठे मुकदमें नहीं लेते थे, अतः उनके पास कम मुकदमे आते थे। एक बार एक मुकदर्म के सिलसिले में इन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने गोरों द्वारा भारतीयों के अमानवीय व्यवहार को स्वयं देखा। इससे उनके हृदय को गहरा आघात पहुंचा। यहीं उन्होंने सबसे पहले सत्याग्रह का सफल प्रयोग किया।

सन् 1915 ई. में गांधी जी भारत लौट आए। उन्होंने भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध संगठित किया। सन् 1919 ई. के ‘जलियांवाला बाग हत्याकांड’ का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। सन् 1920 ई. में उन्होंने ‘असहयोग आन्दोलन’ छेड़ दिया। इसी कड़ी में उन्होंने 1930 का प्रसिद्ध ‘नमक सत्याग्रह’ किया। सन् 1942 ई. में गांधी जी ने ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ का नारा देकर संघर्ष का बिगुल बजा दिया। गांधी जी को अनेकों बार जेल की यात्रा करनी पड़ी।

अन्तत: 15 अगस्त, 1947 ई. को भारत स्वतंत्र हो गया। भारत विभाजन के परिणामस्वरूप सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे, अतः शांति स्थापित करने के लिए उन्हें अनशन करना पड़ा। 30 जनवरी, 1948 ई. को प्रार्थना सभा में नाथूराम गोड्से ने उन्हें गोली मारकर इस संसार से विदा कर दिया। गांधी जी के मुख से अंतिम शब्द ‘हे राम’ निकले। इस प्रकार वे ऋषियों की परंपरा में जा मिले।

गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे। वे सत्य को ईश्वर मानते थे। उनकी अहिंसा दुर्बल व्यक्ति की अहिंसा न थी। उनके पीछे आत्मिक बल था। वे अन्याय और अत्याचार के सामने कभी नहीं झुके। वे साध्य और साधन दोनों की पवित्रता पर बल देते थे।

गांधी जी सब मनुष्यों को एक समान मानते थे। धर्म, संप्रदाय, रंग आदि के आधार पर होने वाले भेदभाव को वे कलंक मानते थे। उन्होंने समाज-सुधार के अनेक कार्य किए। हरिजनोद्धार उनका प्रमुख आंदोलन था। उन्होंने हरिजनों को समाज में प्रतिष्ठा दिलवाई। स्त्री-शिक्षा के वे सबसे बड़े हिमायती थे। उन्होंने बाल-विवाह, सती प्रथा, पर्दा प्रथा आदि का डटकर विरोध किया। उन्होंने समाज में महिलाओं को बराबरी का दरजा प्रदान किया।

भारतवासियों के हृदयों में गांधी जी के प्रति असीम श्रद्धा भावना है। उनका नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। उनकी मृत्यु पर पं. नेहरू ने कहा था – “हमारी जिंदगी में जो ज्योति थी, वह बुझ गई और अब चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है।”

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12. नेताजी सुभाषचंद्र बोस

देश के स्वाधीनता आंदोलन के महान सेनानियों में नेताजी सुभाषचंद्र बोस का नाम अत्यंत गर्व के साथ लिया जाता है। इस महान् पुरुष का व्यक्तित्व प्रारंभ से ही ओजस्वी और वीरतापूर्ण रहा। अन्याय और अत्याचार को सहन करना उनके स्वभाव के विरुद्ध था। देश को आजाद कराने के लिए वे किसी भी कुर्बानी को बड़ा नहीं मानते थे। 1857 के बाद पहली बार भारतीयों की सेना को संगठित करके देश से विदेशी सत्ता को समूल उखाड़ फेंकने का प्रयत्न उसी वीर ने किया। उनका ‘जयहिंद’ का नारा देश के कोटि-कोटि कंठों में गूंजने लगा।

सुभाषचंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी, 1897 ई. को उड़ीसा ।के कटक नगर में हुआ। वे बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उन्होंने कोलकाता विश्वविदयालय से बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। पिता की इच्छा का सम्मान करके उन्होंने इंग्लैंड से ।आई.सी.एस. की परीक्षा सम्मानपूर्वक उत्तीर्ण तो कर ली, पर ।अंग्रेजों की नौकरी करना स्वीकार नहीं किया।

सभाष बाब ने स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़ने का निश्चय किया। उन्होंने देशबंधु चितरंजनदास को अपना राजनीतिक गुरु ।बनाया। ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ के स्वागत समारोह का बहिष्कार ।करने में उन्होंने अपनी अद्भुत संगठन क्षमता का परिचय दिया।

सुभाषचंद्र क्रांतिकारियों के निरंतर संपर्क में रहे। उन्हें 1938 और 1939 में कांग्रेस का अध्यक्ष भी चुना गया। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 1941 में वे अंग्रेजों की आँखों में धूल झोंककर भारत से बाहर निकल गए। उन्होंने जर्मनी में हिटलर से भेंट की। वे सिंगापुर चले गए। वहाँ पहुंचकर भारतीय सैनिकों को जापानियों के कब्जे से मुक्त कराया और आजाद हिंद फौज’ का गठन किया। भारत के स्वाधीनता संग्राम के लिए किए गए प्रयत्नों में ‘आजाद हिंद फौज’ का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इस फौज के गठन की विधिवत् घोषणा 5 जुलाई, 1942 को की गई।

सुभाष बाबू की इस आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सैनिकों के विरुद्ध अनेक मोर्चा पर युद्ध किया। युद्ध में विजय प्राप्त करती हुई यह सेना वर्मा की ओर से कई जगह भारत की सीमाओं के अंदर पहुँच गई; जहाँ तिरंगा झंडा गाड़कर आजादी घोषित कर दी गई। सुभाष बोस ने कहा था – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।” अनेक स्थानों पर इस फोज की जीत होने लगी। 1945 में युद्ध का पासा पलटने लगा और मित्र राष्ट्रों की विजय होने लगी। जगह-जगह अंग्रेजों को विजय मिलने से आजाद हिंद फौज को पीछे हटना पड़ा।

भारतमाता और उसकी संतानों को आजाद कराने के लिए सुभाषचंद्र बोस ने जीवन के अंतिम सांस तक अपने युद्ध को जारी रखा। स्वतंत्रता आंदोलन में उनका योगदान सराहनीय रहा। इसे भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित किया गया है। 1997 में उनकी जन्म शताब्दी अत्यंत समारोहपूर्वक मनाई गई। उनका अमर बलिदान भारतीय स्वातंत्र्य-संघर्ष के इतिहास में सदा आदर के साथ याद किया जाता रहेगा।

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13. वसंत ऋतु

भारत त्रातुओं का देश है। यहाँ वर्षा, शरद, हेमंत, शीत, वसंत और ग्रीष्म छः ऋतुएं होती हैं। इन सभी ऋतुओं में वसंत ऋतु का सर्वाधिक महत्त्व है, इसीलिए वसंत को ‘ऋतुराज’ कहा जाता है। वसंत ऋतु का आगमन शीत ऋतु के उपरांत होता है। पौराणिक मतानुसार वसंत को कामदेव का पुत्र बताया जाता है। वसंत के आगमन पर प्रकृति अपनी सज-धज के साथ उसका स्वागत करती है। वसंत ऋतु में प्रकृति की नैसर्गिक सुंदरता अपने उत्कर्ष पर होती वसंत का प्रारंभ मधुमास से होता है।

वसंत का स्वागत करने के लिए पेड़-पौधे अपने पुराने पत्तों रूपी वस्त्रों को त्यागकर नए पत्ते धारण कर लेते हैं। सभी ओर वन और उपवन नए रूप में दिखाई देने लगते हैं। प्रकृति में सर्वत्र हरीतिमा का साम्राज्य होता है। रंग-बिरंगे फूलों पर भ्रमरों की गुंजार मन मोहक लगती है। रंग-बिरंगी तितलियाँ फूलों पर लहराने लगती हैं। खेतों में सरसों के फूल लहराने लगते हैं। वसंत ऋतु में आम के वृक्षों पर मंजरी आ जाती है, उसकी सुगंध से सभी वन-उपवन महकने लगते हैं।

वसंत ऋतु की छटा को देखकर जड़-चेतन सभी के मन में उल्लास छा जाता है। कवि अपनी नई-नई कल्पनाएँ करते हैं। कवियों ने अपनी कल्पना एवं अनुभूतियों से वसंत की अनेक प्रकार से महिमा गाई है। श्री सर्वेश्वरदयाल सक्सेना ने तो वसंत को महन्त का रूपक दे दिया :
“आए महतं वसंत।
मखमल के झूल पड़े, हाथी-सा टोला,
बैठे किशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला,
चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत।”
कवि भावुक हृदय होते हैं और वसंत ऋतु उनकी प्रसुप्त भावनाओं को जगा देती है।

वसंत ऋतु में वसंत पंचमी को वसंतोत्सव मनाया जाता है। वसंत पंचमी को ही ज्ञान की देवी सरस्वती का जन्मोत्सव भी मनाया जाता है। रंगों का पर्व होली भी वसंत ऋतु का मस्ती से भरा पर्व है। इस दिन सभी लोग अपनी भेद-भावना भुलाकर परस्पर होली खेलते हैं और मानवीय एकता का परिचय देते हैं। वसंत ऋतु केवल भारत में ही नहीं संसार में सभी को आनंद देती है। इसलिए वसंत संसार की सबसे प्रिय ऋतु है। इस ऋतु में न अधिक सरदी होती है और न अधिक गरमी होती है। ऐसे समशीतोष्ण समय में प्रकृति सज-धज के साथ अपना सौंदर्य दिखाती है और सभी को अपने सौंदर्य से मोह लेती है।

वसंत ऋतु हमारे जीवन में नई प्रेरणा देती है। मनुष्यों को भी वसंत ऋतु से प्रेरणा लेकर अपने जीवन में आनंद भरना चाहिए और अपने जीवन को सुखमय बनाने के लिए प्रयत्नशील हो जाना चाहिए। इसी में वसंत ऋतु की सच्ची सार्थकता है।

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14. वर्षा ऋतु

भारत में छः ऋतुएँ होती हैं – वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, – हेमंत और शिशिर। वर्षा ऋतु श्रावण और भाद्र (जुलाई-अगस्त) के महीने में रहती है। भारत में इस ऋतु का बहुत महत्त्व है। इसी ऋतु में जल-वृष्टि होती है। इसी वर्षा पर हमारे देश की कृषि निर्भर है। ग्रीष्म ऋतु की तपन के पश्चात् वर्षा का आगमन बड़ा सुखकर प्रतीत होता है।

जून मास में पृथ्वी तवे के समान जलने लगती है। कवि श्रीधर पाठक जेठ मास की गरमी की भीषणता का चित्रण करते हुए लिखते हैं :
‘जेठ के दारुण आतप से,
तप के जगती-तल जावै जला’
इसके पश्चात् हम आकाश की ओर देखने लग जाते हैं। सहसा उमड़ते-घुमड़ते मेघों को देखकर हमारा हृदय उल्लास से भर जाता है।

वर्षा-ऋतु का सौंदर्य इतना मनोहारी होता है कि अनेक कवियों ने उत्साह के साथ इसका वर्णन किया है। ‘रामचरितमानस’ में गोस्वामी तुलसीदास वर्षा का वर्णन इन शब्दों में करते हैं :
वर्षाकाल मेघ नभ छाए। गरजत लागत परम सुहाए।
दामिनि दमक रही घन माहीं खल की प्रीति जथा थिर नाही
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र वर्षा-वर्णन इस प्रकार करते हैं :
कूर्क लगी कोइलें कदंबन पै बैठि फेरि,
धोए-धोए पात हिलि-हिलि सरसै लगे।
फेरि झूमि-झूमि बरषा की ऋतु आई फेरि,
बादर निगोरे झुकि-झुकि बरसै लगे।

वर्षा के आरंभ होते ही कृषि-कार्य आरंभ हो जाता है। गाँवों में नया जीवन जाग उठता है। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ की अधिकांश जनसंख्या कृषि पर निर्भर है। वर्षा न होने पर सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच जाती है। किसान बादलों को पुकारता है-
“ओ धरती के वीर,
तुझे बुलाता कृषक अधीर।”

वर्षा ऋतु में कभी मूसलाधार वृष्टि हुआ करती है। ऐसी स्थिति में चारों ओर जल ही जल दिखाई देता है। नदियाँ, तालाब, झीलें आदि सब जल से उमड़ने लगते हैं। बच्चे आनंदमग्न होकर जल-क्रीड़ा करते हैं। वर्षा में दादुर शोर मचाते हैं, मयूर नृत्य करते हैं और कोयलें कूकने लगती हैं।

हमारा पूरा जीवन वर्षा पर ही आधारित है। वर्षा ऋतु में हम अनेक त्योहार मनाते हैं। इनमें रक्षाबंधन और जन्माष्टमी प्रमुख हैं। स्वतंत्रता दिवस भी इसी ऋतु में आता है। वर्षा ऋतु का उल्लास ग्रामीण युवतियों के झूला-झूलने, गीत गाने आदि में झलकता है। यह ऋतु हमें जीवन के सौंदर्य और कर्म की प्रेरणा देती है।

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15. दिल्ली के दर्शनीय स्थल

दिल्ली भारतवर्ष की राजधानी है। देश के बड़े नगरों में इसकी गणना की जाती है। दिल्ली का ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्त्व है। सबसे पहले महाभारत काल में दिल्ली को पांडवों ने इन्द्रप्रस्थ के रूप में बसाया था। चिड़ियाघर के पास पांडवों का किला पुराने किले के नाम से प्रसिद्ध है। पृथ्वीराज चौहान, मुगल शासक, अंग्रेजी शासकों का भी दिल्ली पर आधिपत्य रहा। 15 अगस्त, 1947 से दिल्ली स्वतंत्र राष्ट्र भारत की राजधानी है। ऐतिहासिक, धार्मिक स्थानों के कारण दिल्ली दर्शनीय है।।

दिल्ली में अनेक दर्शनीय स्थल हैं, जिन्हें देखने के लिए प्रतिदिन हजारों देशी-विदेशी दर्शक आते हैं। इनमें से कुछ प्रमुख निम्न हैं:
लाल किला :
मुगल काल का प्रतीक लाल पत्थर से बना विशाल प्राचीर वाला लाल किला यमुना नदी के किनारे स्थित है। प्रति वर्ष स्वतंत्रता दिवस को लाल किले के प्राचीर पर राष्ट्रीय ध्वजारोहण होता है तथा प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं। लाल किले में दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास सुंदर भवन हैं। लाल किला वास्तुकला का अप्रतिम उदाहरण है।

जामा मस्जिद :
जामा मस्जिद भी मुगल कालीन वास्तुकला का अप्रतिम नमूना है। लाल किले के सामने स्थित इस मस्जिद में हजारों लोग एक साथ नमाज पढ़ सकते हैं।

पुराना किला :
चिड़ियाघर के पास पुराना किला स्थित है। कहा जाता है कि इसे पांडवों ने बनवाया था। इसके पीछे भैरो का प्राचीन मंदिर है।

इंडिया गेट :
स्वाधीनता संग्राम के शहीदों की स्मृति में बना इंडिया गेट दिल्ली का महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थान है। यहाँ विजय चौक से गणतंत्र दिवस की परेड प्रारंभ होती है। यहाँ पर लोग भ्रमण के साथ नौका-विहार का आनंद भी लेते हैं।

कुतुब मीनार : महरौली स्थित कुतुब मीनार एक सुंदर पर्यटन स्थल है। इसके पास चंद्रगुप्त विक्रमादित्य का बनवाया हुआ लौह स्तंभ भी है। इस पर जंग नहीं लगता। इसे देखकर आज के वैज्ञानिक भी आश्चर्यचकित हैं।

चिड़ियाघर : पुराने किले के समीप विशाल चिड़ियाघर है। यहाँ बड़े क्षेत्रफल में अनेक देशी-विदेशी पशु-पक्षी रहते हैं। इन चित्र-विचित्र जीवों को देखकर सभी आबाल वृद्ध आनन्दित होते हैं।

इनके अतिरिक्त दिल्ली के दर्शनीय स्थानों में कनॉट प्लेस, चाँदनी चौक प्रमुख हैं जहाँ लोग मौजमस्ती के साथ खरीदारी करते हैं। कनाट प्लेस में पालिका बाजार भी देखने योग्य है। प्रगति मैदान में प्रति वर्ष अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मेला लगता है, जहाँ अनेक देशी-विदेशी व्यापारी एवं दर्शक आते हैं।

गुरुद्वारा शीशगंज, गुरुद्वारा रकाबगंज, लोटस टेम्पल, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, छतरपुर मंदिर भी दर्शनीय स्थल हैं जहाँ हजारों भक्त श्रद्धा के साथ जाते हैं। राजघाट, शांति वन, विजय घाट, शक्ति स्थल, राष्ट्रीय नेताओं की समाधियाँ हैं जहाँ हजारों लोग प्रतिदिन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। राष्ट्रपति भवन, संसद् भवन आदि भी महत्त्वपूर्ण दर्शनीय स्थल हैं।

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16. हमारा देश भारत सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।’

कवि इकबाल की यह पंक्ति प्रत्येक भारतवासी के मन में गौरव का संचार कर देती है। भारत विश्व का प्राचीनतम देश है। प्राचीन काल में भी यहाँ संस्कृति और सभ्यता सर्वोच्च शिखर पर थी। ज्ञान के स्रोत वेदों का प्रादुर्भाव इसी धरती पर हुआ। अपने ज्ञान एवं सांस्कृतिक उच्चादशों के कारण भारत विश्वगुरु की संज्ञा से अभिहित था। दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। अपने आदर्श एवं आध्यात्मिक मूल्यों के कारण भारत की संस्कृति एवं सभ्यता आज भी विद्यमान है।

भारत भौगोलिक दृष्टि से विश्व के उत्तर पूर्वी गोलार्ध में स्थित है। भूमध्य रेखा के समीप स्थित होने के कारण यहाँ समशीतोष्ण जलवायु पाई जाती है। भारत के उत्तर में हिमालय जैसा विशाल पर्वत है तो दक्षिण में हिंद महासागर इसके पद प्रक्षालन करता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी तथा पश्चिम में अरब सागर है। तीन ओर से समुद्र से घिरा होने के कारण यहाँ सम जलवायु पाई जाती है। यहाँ विभिन्न ऋतुएं होने के कारण अनेक धन-धान्य पाए जाते हैं।

भारत में लोहा, कोयला, अभ्रक, ताँबा आदि खनिजों के विशाल भंडार हैं। भारत के उत्तर में ठण्डी जलवायु पाई जाती है तो दक्षिण में सम जलवायु पाई जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर भारी वर्षा होती है तो राजस्थान वर्षारहित क्षेत्र में सूखा रह जाता है। यहाँ गंगा, यमुना, गोमती, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी आदि नदियाँ अपना अमृतमय जल देकर भारत को सौंचती हैं। अनेक धर्म, संप्रदाय, जाति, भाषा, प्रांतों के लोग यहाँ रहते हैं। इसी विशेषता पर संसार को आश्चर्य है – अनेकता में एकता, भारत की विशेषता।

प्राचीन काल से ही भारत अपने ज्ञान, संस्कृति, व्यापार आदि के लिए प्रसिद्ध रहा है। आज भी हमने बहुमुखी उन्नति की है। हमने पृथ्वी, अग्नि, नाग, त्रिशूल आदि के सफल परीक्षण किए हैं और सिद्ध किया है कि वैज्ञानिक प्रगति में हम किसी देश से पीछे नहीं हैं। जहाँ पहले हम छोटी-मोटी चीजें भी विदेशों से मंगाते थे, वहाँ आज हम बड़ी-बड़ी मशीनें निर्यात करते हैं।

भारत राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, नानक, मीरा, तुलसी, विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, गांधी जैसे महापुरुषों की भूमि है। हम सभी धर्मों का सम्मान करते हुए आपस में प्रेमपूर्वक रहें। देश की अखंडता एवं एकता के लिए यदि आवश्यक हो तो हम अपने प्राणों की बाजी भी लगा दें। यही मेरा और मेरे सपनों का भारत है। यही मेरी मातृभूमि है जिस पर हम अपना सर्वस्व बलिदान कर सकते हैं:
“ऐसी मातृभूमि है मेरी स्वर्गलोक से भी प्यारी, इसके पद कमलों पर मेरा तन, मन, धन सब बलिहारी।”

17. मेरा जीवन लक्ष्य

मानव की प्रवृत्ति है कि वह अपने जीवन में कुछ न कुछ बनने के स्वप्न देखता है। अपने सपनों को साकार करने के लिए वह निरंतर परिश्रम करता है। इस प्रक्रिया में कुछ स्वज तो स्वप्न ही रह जाते हैं किंतु कुछ स्वप्न साकार भी हो जाते हैं। जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य में अदम्य उत्साह, दृढ़ निश्चय, कठोर परिश्रम के गुण तीनों चाहिए। मैं एक विद्यार्थी हूँ और मेरी जीवन यात्रा काफी लंबी है। मैंने अपने जीवन में एक सफल डॉक्टर बनने का स्वप्न देखा है।

मैं डॉक्टर क्यों बनना चाहता हूँ ? इसके पीछे कई कारण हैं। मैंने प्रायः देखा है कि डॉक्टर का व्यवसाय आजकल सेवा-भाव से दूर होता जा रहा है। यह व्यवसाय केवल आर्थिक लाभ के लिए किया जा रहा है। मानवता की सेवा इसमें कहीं नहीं दिखाई देती है। डॉक्टर लोग निर्धन, दीन, हीन रोगियों से भी अपार धनराशि वसूल करना चाहते हैं। धन के अभाव में इस व्यवसाय से निराश लोग या तो इलाज न होने से मर जाते हैं या कहीं छोटे-मोटे झोला डॉक्टरों के चंगुल में फंस जाते हैं।

भारत के गांवों की दशा तो और भी दयनीय है। प्रायः गाँवों में अनुभवी डॉक्टर नहीं हैं। यदि पास के नगरों में हैं भी तो वे ग्रामीण एवं निर्धनों का शोषण करते हैं। इस शोषण से परेशान ग्रामीण जनता इलाज से वंचित रह जाती है और अनेक व्यक्ति काल कवलित हो जाते हैं। इन जानकर मेरे हृदय में अपार वेदनाभूति होती है। मैं चाहता हूँ कि में एक सच्चा चिकित्सक बनकर मानवता की सच्ची सेवा करूँ। इसलिए मैंने सोचा है कि भविष्य में मैं चिकित्सक बनना चाहूँगा तथा ग्रामीण क्षेत्र में रहकर गरीबों की सच्ची सेवा करूंगा।

अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मैं अभी से परिश्रम पूर्वक और दृढ़ निश्चय होकर पढ़ रहा हूँ। मैं जानता हूँ कि डॉक्टर बनने के लिए बहुत परिश्रम करना पड़ता है और कंपटीशन पास करके एम.बी.बी.एस. में प्रवेश लेना भी आसान नहीं है। मैं निराशावादी नहीं हूँ इसलिए कठोर परिश्रम कर रहा हूँ।

ईश्वर की कृपा एवं गुरुजनों का आशीर्वाद मुझे सदैव प्रेरित करते रहते हैं। उनकी कृपा से यदि मेरा डॉक्टर बनने का स्वप्न पूरा हो गया तो मैं गाँव में जाकर अपना क्लीनिक खोलूँगा। गरीब लोगों की नि:शुल्क चिकित्सा करूंगा। कम से कम लाभ कमाकर मानवता की सच्ची सेवा करूँगा।

अपने सेवा-भाव से लोगों में डाक्टरों के प्रति विश्वास पैदा करूँगा तथा प्रयास करूंगा कि मेरे गाँव का कोई भी रोगी शहर को चिकित्सा के लिए न जाए। चिकित्सा के लिए आवश्यक आधुनिक उपकरणों की अपने चिकित्सालय में व्यवस्था करूँगा तथा अनुभवी विशेषज्ञ डॉक्टरों की भी व्यवस्था करूँगा। ईश्वर से प्रार्थना है कि वह मुझे ऐसी शक्ति प्रदान करे कि मैं गांव के लोगों की सच्ची सेवा डॉक्टर बनकर कर सकूँ और रोगियों को नवजीवन प्रदान कर सकूँ।

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18. प्रदूषण – एक समस्या

प्रकृति एवं मनुष्य का अटूट संबंध है। प्रकृति ने मानव के सुखी समृद्ध जीवन के लिए अनगिनत सुविधाएँ प्रदान की हैं। मनुष्य का सुखी जीवन संतुलित प्राकृतिक पर्यावरण पर निर्भर करता है। मानव की बढ़ती जनसंख्या के कारण प्राकृतिक संतुलन असंतुलित हो रहा है। मनुष्य की बढ़ती हुई आवश्यकताएँ प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ रही हैं। पर्यावरण में दूषित तत्त्वों की मात्रा आवश्यकता से बढ़ जाती है और आवश्यक तत्वों की कमी हो जाती है तो पर्यावरण प्राणियों के लिए हानिकारक हो जाता है। अतः पर्यावरण का असंतुलन ही दूसरे अर्थ में प्रदूषण है।

आधुनिक मानव सभ्यता की बढ़ती आवश्यकताओं के कारण प्राकृतिक संतुलन बदल रहा है तथा प्रदूषण बढ़ रहा है। मानव की आवासीय, आयोगिक नगरीकरण, कृषि उत्पादन बढ़ाने की समस्याओं ने प्रकृति संतुलन को बिगाड़कर प्रदूषण को बढ़ाया है। यातायात साधनों ने भी प्रदूषण बढ़ाने में सहयोग किया है। वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से वातावरण में ऑक्सीजन की कमी और कार्बन डाइ-आक्साइड की वृद्धि हो गई है। इसी प्रकार कूड़ा-करकट इधर-उधर फेंकने से जल, वायु, भूमि प्रदूषण को बढ़ावा मिला।

जोर से संगीत सुनने, हॉर्न बजाने से ध्वनि प्रदूषण बढ़ा। इस प्रकार किसी भी प्रकार के प्रदूषण को बढ़ाने में कहीं न कहीं मनुष्य का ही हाथ रहा है। अपने सुखी जीवन के लिए इस प्रदूषण से मुक्ति पानी होगी। नहीं तो आज के प्रदूषित वातावरण में हम अपनी मृत्यु को स्वयं ही निमंत्रण दे रहे हैं। हमें इसका निराकरण अवश्य सोचना चाहिए।

जल सभी प्राणियों एवं पेड़-पौधों के लिए जीवनदायक तत्त्व है। इसमें अनेक कार्बनिक, अकार्बनिक खनिज तत्त्व एवं गैसें घुली होती हैं। ये तत्त्व जब असंतुलित मात्रा में जल में घुल जाते हैं तो जल प्रदूषित होकर हानिकारक हो जाता है। गंगा जैसी पवित्र नदी भी प्रदूषण मुक्त नहीं है। प्रदूषित जल से हैजा, टाइफाइड, पीलिया, आंत्रशोथ आदि रोगों को बढ़ावा मिलता है।

वायुमंडल में भी आवश्यक गैसें एक निश्चित अनुपात में मिश्रित हैं, परन्तु वायुमंडल में यदि ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाए और कार्बन डाइ-आक्साइड, सल्फर डाइ-आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड की मात्रा बढ़ जाए तो वायु प्रदूषण बढ़ने लगता है। पैट्रोल और डीजल का धुआँ वायु प्रदूषण को फैलाता है, अतः इन ईंधनों के स्थान पर सी.एन. जी. के प्रयोग को बढ़ाया जा रहा है। भारत में सामान्य परिस्थिति में 33 प्रतिशत वन होने आवश्यक हैं परंतु इनकी प्रतिशतता केवल 19 प्रतिशत है। अत: वायु प्रदूषण की वृद्धि हो रही है। इसी प्रकार ध्वनि एवं भूमि प्रदूषण भी हमारे लिए हानिकारक हैं।

प्रदूषण की वृद्धि के लिए मुख्य रूप से मानव ही उत्तरदायी है। अत: इसका निराकरण भी उसे ही सोचना होगा। सबसे पहले उसे गंभीर रूप से अपने मानसिक प्रदूषण को हटाना होगा। व्यक्ति किसी भी प्रकार के प्रदूषण की चिन्ता ही नहीं करता। इसलिए गंभीर होकर हमें यातायात के प्रदूषण को रोकना होगा, वृक्षारोपण बढ़ाकर वन संवर्धन करना होगा, ऊंची आवाज वाले वाहनों पर रोक लगानी होगी, पेयजल को शुद्ध करना होगा, रासायनिक विस्फोट को रोकना होगा तथा अन्य उपाय करके मानव जीवन को प्रदूषण मुक्त बनाना होगा तभी मानव जीवन सुखमय हो सकता है।

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19. व्यायाम के लाभ

‘पहला सुख निरोगी काया’ उक्ति के अनुसार स्वस्थ शरीर मानव का सर्वोत्तम सुख है। यदि हमारा शरीर और मन दोनों स्वस्थ हैं तो सारे संसार के सुखों को भोगा जा सकता है, किन्तु शारीरिक या मानसिक अस्वस्थता से हमारा मानव जीवन भी अभिशाप बन जाता है। यदि हमारा शरीर स्वस्थ है तो स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मस्तिष्क भी निवास करता है।

आज के प्रदूषित वातावरण में हमारे शरीर का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रातः कालीन सैर तथा व्यायाम आवश्यक तत्त्व हैं। व्यायाम करने से हमारा शरीर चुस्त, फुर्तीला रहता है, अतः व्यायाम हमारे लिए बहुत लाभदायक है।

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अनेक प्रकार के व्यायाम किए जा सकते हैं : प्रातः कालीन भ्रमण करना, दौड़ लगाना, विभिन्न प्रकार के खेल खेलना, पानी में तैरना, योगासन करना आदि। व्यायाम करते समय व्यक्ति को अपनी अवस्था एवं शारीरिक क्षमता का ध्यान रखकर व्यायाम का चुनाव करना चाहिए। किसी व्यायाम विशेषज्ञ के परामर्श से ही व्यायाम करना चाहिए। हमें ऐसे व्यायाम नहीं करने चाहिए जिन्हें हमारा शरीर स्वीकार न करता हो।

हर आयु वर्ग के लोगों को हल्के-फुल्के व्यायाम अवश्य ही करने चाहिए। विद्यार्थी जीवन में युवावस्था वाले व्यायाम करने चाहिए। इस आयु वर्ग में व्यायाम अति आवश्यक एवं उपयोगी होता है। युवावस्था में ही शरीर की आधारशिला बनती है। यदि युवावस्था में जीवन आलस्य में बिताया तो सारी उम्र का रोना रहेगा।

जो युवक या विद्यार्थी व्यायाम नहीं करते या खेल कूद में भाग नहीं लेते, उनका शरीर बेडौल हो जाता है, स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, आँखें कमजोर हो जाती हैं। ऐसे लोग थोड़ा परिश्रम करने से थक जाते हैं और किसी भी कार्य में रुचि नहीं रहती। अत: मानव-जीवन में व्यायाम करना आवश्यक है।

व्यायाम प्रायः खुली और ताजी हवा में करना चाहिए। व्यायाम करते समय शरीर हल्का और पेट साफ होना चाहिए। प्रात:काल का समय तथा पार्क उपवन आदि का स्थान व्यायाम के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है। भोजन के बाद व्यायाम नहीं करना चाहिए। अनुचित ढंग से किया गया व्यायाम लाभ की अपेक्षा हानि करता है। अच्छे परिणाम के लिए किसी योग्य व्यायाम प्रशिक्षक के निर्देशन में व्यायाम करना चाहिए।

व्यायाम हमारे शरीर को स्वस्थ और चुस्त बनाता है। व्यायाम से शारीरिक शक्ति बढ़ती है, रक्त का संचार होता है, पाचन शक्ति ठीक रहती है, शरीर पर मोटापा हावी नहीं होता, आलस्य दूर होता है और वृद्धावस्था का आक्रमण भी शीघ्र नहीं होता है। व्यायाम से हमारी आयु भी बढ़ जाती है। इस दृष्टि से बचपन से ही व्यायाम की आदत डालनी चाहिए। स्वस्थ शरीर के बारे में ठीक ही कहा गया है – ‘शरीरमायं खलु धर्म साधनम्।’

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20. आदर्श विद्यार्थी

विद्यार्थी का अर्थ होता है- विद्या ग्रहण करने वाला। (विद्या + अधी)। विद्यार्थी जीवन मनुष्य का सबसे सुन्दर, महत्त्वपूर्ण भाग कहा जा सकता है। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने जीवन को चार भागों में बाँटा था- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। इन चारों में ब्रह्मचर्य आश्रम को हम जीवन की नींव कह सकते हैं। यही काल विद्यार्थी जीवन है। यह वह काल है जब मनुष्य सांसारिक चिन्ताओं और कष्टों से परे रहकर विद्या प्राप्ति में अपना ध्यान लगाता है।

आदर्श विद्यार्थी प्रातः काल उठकर शौच आदि से निवृत्त होकर घूमने जाता है। वह खुले स्थान में व्यायाम भी करता है। वहाँ से लौटकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनता है। ठीक समय पर विद्यालय पहुँचता है। वह सभी अध्यापकों का आदर करता है और पढ़ाई में ध्यान लगाता है।

परन्तु यह सब होने मात्र से ही कोई विद्यार्थी आदर्श नहीं बन जाता। विद्यार्जन और सतर्कता आदर्श विद्यार्थी के गुण हैं। केवल पाठ्य-पुस्तकों पर आश्रित रहने से ही विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास नहीं होता। आदर्श विद्यार्थी पाठ्यक्रम से बाहर की पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ भी पढ़ता है। इससे उसका ज्ञान बढ़ता है। वह कूप-मंडूकता के दोष से बच जाता है।

आदर्श विद्यार्थी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहता है। मन और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने के लिए शरीर का स्वस्थ होना आवश्यक है। आदर्श विद्यार्थी नियमित रूप से व्यायाम करता है। वह काम के समय काम करता है और खेल के समय खेलता है।

आदर्श विद्यार्थी ‘सादा जीवन उच्च विचार’ में विश्वास रखता है। वह कभी फैशन के चक्कर में नहीं पड़ता। वह सदाचार और स्वावलंबन के आदर्श को अपने जीवन में उतारता है। आदर्श विद्यार्थी के गुण बताते हुए चाणक्य ने कहा है :
“काक चेष्टा बको ध्यान, स्वान निद्रा तथैव च।
अल्पाहारी गृहत्यागी विद्यार्थी एते पंच लक्षणम्॥”
अर्थात् विद्यार्थी को कौए के समान चेष्टाशील, बगुले के समान ध्यानरत, कुत्ते के समान सावधानं और कम निद्रा लेने वाला, कम खाने वाला तथा घर को त्याग कर विद्या लेने वाला होना चाहिए।

आदर्श विद्यार्थी समाज के प्रति अपने कर्तव्य का पालन करने में कभी पीछे नहीं रहता। वह निर्बलों की सहायता करता है। वह किसी भी प्रकार की तोड़-फोड़ से दूर रहता है। उसका दृष्टिकोण रचनात्मक होता है। वह अनुशासनप्रिय होता है। उसका व्यवहार प्रशंसनीय होता है। वह सब के साथ सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। छात्र जीवन साधना का जीवन है। वर्तमान समय में साधना का अभाव दिखाई देता है। बिना परिश्रम कुछ नहीं मिलता। आदर्श विद्यार्थी बनने के लिए कठोर साधना करनी पड़ती है। संस्कृत में कहा गया है :
“सुखार्थी त्यजेत विद्याम्, विद्यार्थी त्यजेत सुखम्।
सुखार्थिनः कुतो विद्या, विद्यार्थिनः कुतो सुखम्॥”

विद्यार्थी को विनम्र, अनुशासनप्रिय, जिज्ञासु, संयमी आदि गुणों से सम्पन्न होना चाहिए। विद्या हमें विनम्रता का पाठ पढ़ाती है- “विद्या ददाति विनयम”।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि आदर्श विद्यार्थी मानवीय गुणों से युक्त एवं संयमित जीवन बिताने वाला होता है।

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21. विद्यालय का वार्षिकोत्सव

वार्षिकोत्सव का अर्थ है – सालाना जलसा। प्रत्येक विद्यालय का यह सबसे बड़ा उत्सव होता है। हमारे विद्यालय का वार्षिकोत्सव प्रति वर्ष बैसाखी के दिन मनाया जाता है।

बैसाखी से पंद्रह दिन पहले ही हमने बड़े उत्साह से तैयारी आरंभ कर दी। हमारे कला अध्यापक जी सब की सम्मति से उत्सव के इंचार्ज बनाए गए। वे संगीत में बहुत कुशल हैं। नाटक का अभिनय कराना भी इन्हें खूब आता है। इन्होंने विद्यार्थियों को अलग-अलग कविताएं कंठस्थ करने के लिए कहा। एक विद्यार्थी को देशभक्ति का मधुर गीत स्मरण करने की आज्ञा दी। छ: विद्यार्थियों को लेकर एक एकांकी नाटक की तैयारी शुरू करवा दी। इसके अतिरिक्त इन्होंने विद्यालय के कमरों को चित्रों तथा आदर्श वाक्यों से सजाना शुरू करवा दिया।

दिल्ली के उपराज्यपाल महोदय ने हमारे विद्यालय के प्राचार्य की प्रार्थना पर उत्सव का अध्यक्ष बनना स्वीकार कर लिया। बैसाखी के दिन प्रात:काल ही विद्यार्थी सफेद कमीज ओर खाकी पैंट पहने दल-के-दल स्कूल की ओर चल पड़े। स्कूल की ओर आती हर सड़क पर विद्यार्थी ही दिखाई देते थे। स्कूल में खूब सफाई की गई थी। फूलों के गमलों से मागों को सजाया गया था। स्कूल के मुख्य द्वार पर स्कूल का बैंड बज रहा था। पी.टी.आई. छात्रों की कतारें बनवाने लगे। प्राचार्य महोदय ने अध्यापकों में अलग-अलग काम बाँट दिया।

ठीक आठ बजे अध्यक्ष महोदय की कार आ पहुँची। प्राचार्य जी ने अध्यापकों सहित आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। उन्हें फूल-माला पहनाई। इसी समय स्कूल का बैंड गूंज उठा। अध्यक्ष के आने से पूर्व ही शिक्षाधिकारी महोदय भी आ गए थे।

सर्वप्रथम व्यायाम का प्रदर्शन हुआ। इसमें सभी विद्यार्थी शामिल थे। सभी को एक साथ काम करते देखकर अध्यक्ष जी बहुत प्रसन्न हुए। इसके बाद अध्यक्ष महोदय मंच पर पधारे। विद्यार्थियों ने ताली बजाकर उनका अभिनंदन किया। पंडाल में सभी विद्यार्थी एक ओर बैठ गए। दूसरी ओर अभिभावकगण बैठे थे।

प्राचार्य जी ने अध्यक्ष महोदय का परिचय कराया और उनके विद्या-प्रेम की प्रशंसा की। फिर उन्हें फूल माला पहनाई। इसके पश्चात् विद्यालय प्रगति की रिपोर्ट पढ़ी गई। अब सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करने की घोषणा की गई। सर्वप्रथम विद्यार्थियों ने मिलकर ईश्वर-भक्ति की कविता बोली। इसके बाद नाटक आरम्भ हुआ। नाटक के बाद एक गीत हुआ। कव्वाली ने तो समा ही बाँध दिया। यह कार्यक्रम एक घंटे तक चला।

इसके अनंतर अध्यक्ष महोदय ने विद्यार्थियों को पुरस्कार दिए। स्वच्छता, उपस्थिति, पढ़ाई और खेलों में उत्तम छात्रों को पुरस्कार दिए गए। मुझे भी एक पुरस्कार प्राप्त हुआ। अध्यक्ष महोदय ने स्कूल के प्रबंध की सराहना की। उन्होंने विद्या का महत्त्व बतलाया। फिर देश-भक्ति की कविता गाई। तदनंतर प्राचार्य जी ने अध्यक्ष का धन्यवाद किया और समारोह समाप्त हुआ।

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22. विज्ञान वरदान है या अभिशाप

‘विज्ञान’ का शाब्दिक अर्थ है – विशेष या विश्लेषित ज्ञान। मानव आदिकाल से नए-नए आविष्कार करता आया है और उनके बल पर उसने अपना जीवन सजाया-संवारा है। आज हम जिस युग में साँस ले रहे हैं, वह विज्ञान का युग है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान की उपलब्धियों को देखा जा सकता है। विज्ञान के विभिन्न आविष्कारों ने मानव-जीवन को पहले की तुलना में अधिक सुखद एवं सुरक्षित बना दिया है। विज्ञान ने मानव-जीवन को पूरी तरह से बदल दिया है।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि विज्ञान ने मानव को बहुत अधिक सुख-सुविधाएँ प्रदान की हैं। इस प्रकार वह हमारे जीवन में वरदान बनकर आया है। दैनिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान का प्रभाव परिलक्षित होता है। विद्युत के आविष्कार ने मनुष्य के जीवन में प्रकाश लाने के साथ-साथ उसे अनेक उपकरणों को चलाने के लिए शक्ति प्रदान की है। अब हम घर बैठे-बैठे शिमला की ठंडी हवा खा सकते हैं और सरदियों में भी मकान को गरम रख सकते हैं। हमारे टी.वी., फ्रिज, कूलर, गीजर आदि उपकरण भी बिजली से ही चलते हैं।

विज्ञान ने हमें यातायात के द्रुतगामी साधन उपलब्ध कराए हैं। अब मानव अधिक आरामदायक रेलगाड़ियों में यात्रा कर सकता है। यदि उसे बहुत जल्दी हो तो वह वायुयान का सहारा ले सकता है। अब तो जेट-युग का जमाना है। जलयान विदेशी माल ढोने का सस्ता एवं सुलभ साधन है। हजारों किलोमीटर दूर बैठे व्यक्ति से हम टेलीफोन पर बातचीत कर सकते हैं। इससे व्यापारिक क्रिया-कलापों को घर बैठे काफी सहायता मिलती है।

मनोरंजन के क्षेत्र में तो विज्ञान ने अनेक चमत्कारी साधन प्रस्तुत किए हैं। टेलीविजन के माध्यम से ज्ञान और मनोरंजन का अद्भुत कार्य हो रहा है। वी.सी.आर. की सहायता से किसी भी कार्यक्रम को रिकार्ड करके पुनः देखा जा सकता है। संगीत के नित्य नए उपकरण बाजार में आ रहे हैं। रेडियो और टेपरिकार्डर तो अब काफी पुराने हो चुके हैं।

चिकित्सा के क्षेत्र में भी विज्ञान ने काफी प्रगति की है। आज मानव के हृदय और मस्तिष्क की शल्य चिकित्सा संभव हो गई है। अब अनेक जानलेवा बीमारियों पर काबू पा लिया गया है। चिकित्सा विज्ञान ने अंधों को आंखें दी हैं और बहरों को कान। नित्य नई औषधियों का आविष्कार हो रहा है।

परन्तु आज मानव के सामने एक ज्वलंत प्रश्न उठ खड़ा हो गया है कि विज्ञान के नित्य नए आविष्कारों के कारण बदली हुई स्थिति उसके लिए वरदान होगी या अभिशाप? मानव एक ओर तो विज्ञान का उपयोग अपने हित में कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भयंकर अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण कर मानव जाति को भस्मीभूत कर देने की तैयारी भी कर रहा है। विज्ञान अनेक संहारक बमों का आविष्कार कर रहा है।

आज छोटे और कम शक्तिशाली देश इस परमाणु शक्ति से त्रस्त हैं। आज मानव जाति संहार के चौराहे पर खड़ी है। हमें शीघ्र ही इससे बचाव का कोई निर्णय लेना होगा। विज्ञान को अभिशाप होने से बचाने के लिए हथियारों की होड़ समाप्त करनी होगी। इस प्रकार विज्ञान अभिशाप कहलाने के कलंक से बच जाएगा।

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23. परिश्रम का महत्त्व

संसार में सफलता प्राप्त करने का महत्त्वपूर्ण साधन श्रम है। श्रम करके हम जीवन की ऊँची से-ऊँची आकांक्षा को पूरी कर सकते हैं। परिश्रम से सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। यह संसार कर्मक्षेत्र है, अतः कर्म करना ही हम सबका धर्म है। किसी भी कार्य में हमें सफलता तभी प्राप्त होती है, जब हम परिश्रम करते हैं।

श्रम ही जीवन को गति प्रदान करता है। यदि हम श्रम की उपेक्षा करते हैं, तो हमारे जीवन की गति ही रुक जाती है। अकर्मण्यता निराशा को जन्म देती है। परिश्रम करने वाले व्यक्ति भाग्यवादी नहीं होते। कर्मवीर की विशेषताएं बताते हुए हरिऔध जी ने लिखा है –
“देखकर बाधा विविध बहुविघ्न घबराते नहीं,
रह भरोसे भाग्य के दुःख भोग पछताते नहीं।”
श्रम करने वाला व्यक्ति पुरुषार्थ करने में विश्वास रखता है।

ऐसा व्यक्ति इस बात को भली-भांति जानता है कि केवल इच्छा मात्र से सफलता नहीं मिल सकती। संस्कृत में कहा भी गया है –
“उद्यमे न ही सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।”

संसार में प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष करके अपना मार्ग स्वयं बनाना पड़ता है। कवि जगदीश गुप्त ने लिखा भी है –
“सच है महज संघर्ष ही।।
संघर्ष से हटकर जिए तो क्या जिए, हम या कि तुम,
जो नत हुआ वह मृत हुआ, ज्यों चूत से झरकर कुसुम।”

परिश्रम करने से मनुष्य को सबसे बड़ा लाभ यह हैं, उसे आत्मिक शांति प्राप्त होती है, उसका हृदय पवित्र होता है, उसके संकल्पों में दिव्यता आती है, उसे सच्चे ईश्वर की प्राप्ति होती है। जीवन की उन्नति के लिए मनुष्य क्या काम नहीं करता, यहां तक कि बुरे से बुरे काम को भी तैयार हो जाता है, परंतु यदि वह सफलता रूपी ताले की कुंजी परिश्रम को अपने हाथ में ले ले तो सफलता उस मनस्वी के चरणों को चूमने लगती है।

वह उत्तरोत्तर उन्नति और समृद्धि के शिखर पर चढ़ता हुआ जाता है। भारतवर्ष की दासता और पतन का भी कारण यही था कि यहाँ के निवासी अकर्मण्य हो गए थे, परिश्रम करना उन्होंने भुला दिया था। यदि आज भी हम अकर्मण्य और आलसी बने रहे, तो प्राप्त की हुई स्वतंत्रता फिर खो देंगे। आज कठिन साधना की जरूरत है।

परिश्रम से मनुष्य को यश और धन दोनों ही प्राप्त होते हैं। परिश्रम से मनुष्य धनोपार्जन भी करता है। जहां तक यश का संबंध है, वह परिश्रमी व्यक्ति को जीवित रहते हुए भी मिलता है और मृत्यु से अनंतर भी। जीवित रहते हुए समाज में व्यक्ति उसका मान करते हैं, उसकी कीर्ति उसकी जाति और नगर में गाई जाती है। मृत्यु के पश्चात् वह एक आदर्श छोड़ जाता है, जिस पर चलकर भावी सन्तति अपना पथ प्रशस्त करती है।

लोग उसकी यशोगाथा से अपना और अपने बच्चे का मार्ग निर्धारण करते हैं। महामना मालवीय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, महाकवि कालिदास, छत्रपति शिवाजी आदि महापुरुषों का गुणगान करके हम भी अपना मार्ग निश्चित करते हैं। इतिहास साक्षी है कि इन लोगों ने अपने जीवन में कितना श्रम किया और कितने संघर्ष किए, जिसके फलस्वरूप उन्नति के शिखर पर पहुंचे।

परिश्रम के अभाव में व्यक्ति का जीवन निरर्थक है। परिश्रम, मानव की उन्नति का सोपान है। परिश्रम के द्वारा ही व्यक्ति अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करता है। अत: परिश्रम ही जीवन का सार एवं आभूषण है। अत: व्यक्ति को आलस्य त्यागकर कठोर परिश्रम को ही अपने जीवन का उद्देश्य बनाना चाहिए।

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24. पुस्तकालय का महत्त्व

हमारे जीवन में पुस्तकों का बड़ा महत्त्व है। जिस प्रकार शरीर की पुष्टि एवं स्वास्थ्य के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार मस्तिष्क की पुष्टता के लिए पुस्तकों की आवश्यकता होती है। पुस्तके ज्ञान का भण्डार हैं। बड़े-बड़े विद्वान अपना अधिकांश समय पुस्तकं पढ़कर ही व्यतीत करते हैं।

पुस्तकालय शब्द ‘पुस्तक + आलय’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ हे पुस्तकों का घर। पुस्तकालय बनाने की प्रथा अत्यंत प्राचीन काल से है। नालंदा एवं तक्षशिला विश्वविद्यालय के पुस्तकालय अत्यंत भव्य एवं विश्व विख्यात थे। राजा महाराजाओं, ब्रिटिश शासकों आदि को भी पुस्तकालयों की स्थापना का शौक रहा है।

सरकारी एवं गैर सरकारी दोनों क्षेत्रों में पुस्तकालय खोले जा रहे हैं। अनेक धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाएँ पुस्तकालयों की स्थापना करती हैं। प्रायः सभी विद्यालयों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों में पुस्तकालय हैं। निर्धन छात्रों की मदद के लिए ‘बुक-बैंकों’ की भी स्थापना की गई है। चलते-फिरते पुस्तकालय भी जनता की सेवा कर रहे हैं।

पुस्तकालय में हमें अनेक प्रकार की पुस्तकें पढ़ने को मिलती हैं। प्रायः सभी विषयों की पुस्तकें अच्छे पुस्तकालयों में मिल जाती हैं। ज्ञानवर्धक एवं मनोरंजक दोनों प्रकार की पुस्तकें यहाँ मिल जाती हैं। विज्ञान-संबंधी, धार्मिक, पाठ्यक्रम संबंधी लेखकों, ज्योतिष संबंधी आदि पुस्तकें यहाँ उपलब्ध होती हैं।

मनोरंजक पुस्तकों में उपन्यास, नाटक, कहानियां आदि साहित्यिक पुस्तकें मिल जाती हैं। अच्छे-से-अच्छे कवियों, लेखकों, वैज्ञानिकों, दार्शनिकों की पुस्तकें पुस्तकालयों में होती हैं। जो पुस्तके बाजार में सहज उपलब्ध न हों अथवा अत्यधिक महंगी हों उन्हें आसानी से पुस्तकालय में पाया जा सकता है। संदर्भ-ग्रंथ तो पुस्तकालय में ही उपलब्ध होते हैं।

पुस्तकालय का सदुपयोग करना चाहिए। पुस्तकालय के नियमों का पालन करना हमारा कर्तव्य है। हमारे प्रत्येक व्यवहार में अनुशासन होना चाहिए। हमें अन्य पाठकों की सुविधा का भी ध्यान रखना चाहिए। पुस्तकालय में शांति बनाए रखना नितांत आवश्यक है। पुस्तकालय निर्धन वर्ग के छात्रों के लिए तो वरदान स्वरूप हैं।

इसके साथ-साथ शोध कार्य में लगे विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय का बहुत महत्त्व है। . पुस्तकालय स्थापना का कार्य केवल सरकार का ही नहीं मानना चाहिए। समाज के विभिन्न वर्गों को भी इस कार्य में पर्याप्त रुचि लेनी चाहिए। उन्हें अपने-अपने क्षेत्रों में पुस्तकालय स्थापित करने चाहिए। इससे जहाँ पाठकों को लाभ पहुँचता है, वहीं लेखकों का भी उत्साहवर्धन होता है। यह एक पावन कार्य है। इससे समाज प्रबुद्ध बनता है।

पुस्तकालयाध्यक्ष पुस्तकालय का प्राण होता है। उसमें पाठकों की रुचि जानने की क्षमता होनी चाहिए। पुस्तकालय में पस्तकों को शीर्षक, लेखक का नाम, क्रम संख्या आदि में वर्गीकृत करके रखना चाहिए। नई पुस्तकों का परिचय पाठकों को उपलब्ध कराना चाहिए। अधिक से अधिक पुस्तकें पाठकों को जारी की जानी चाहिए। काम से बचने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए।

विद्यालय में पुस्तकालय का विशेष महत्त्व है। पुस्तकालय के बिना विद्यालय की वह स्थिति होती है जो औषधियों के बिना चिकित्सालय की। पुस्तकालय ज्ञान-पिपासा शान्त करने का केन्द्र है। हमें इसका पूरा उपयोग करना चाहिए।

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25. बढ़ती जनसंख्या : एक विकराल समस्या

भारत एक विशाल देश है। विशाल देश में अनेक समस्याओं का होना स्वाभाविक है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से हमारा देश अनेक प्रकार की समस्याओं से जूझ रहा है जिनमें अशिक्षा, बेरोजगारी, सांप्रदायिकता, भ्रष्टाचार, गरीबी आदि समस्याएँ प्रमुख हैं। इन सभी समस्याओं की जननी है – तेजी से बढ़ती हुई भारत की जनसंख्या। उपर्युक्त सभी समस्याओं में विकराल और भयंकर समस्या बढ़ती जनसंख्या की है जो नियंत्रण करने के उपरांत भी सुरसा के मुँह की भाँति बढ़ती ही जा रही है।

बढ़ती जनसंख्या ने अनेक समस्याओं को जन्म दिया है- रोटी, कपड़ा, मकान की कमी, बेरोजगारी, निरक्षरता, कृषि एवं उद्योगों के उत्पादनों में कमी आदि। हम जितना अधिक उन्नति करते हैं या विकास करते हैं जनसंख्या उसके अनुपात से कहीं अधिक बढ़ जाती है। बढ़ती जनसंख्या के समक्ष हमारा विकास बहुत कम रह जाता है और विकास कार्य दिखाई नहीं देते। बढ़ती जनसंख्या के समक्ष सभी सरकारी प्रयास असफल दिखाई देते हैं।

कृषि उत्पादन और औद्योगिक विकास बढ़ती समस्या के सामने नगण्य सिद्ध हो रहे हैं। इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण की अति आवश्यकता है। जनसंख्या की वृद्धि एक स्वाभाविक प्रक्रिया है परंतु स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत इसमें अपार वृद्धि हुई। प्रति 35 वर्षों में भारत की जनसंख्या दुगुनी हो जाती है। अब तो जनसंख्या के आँकड़े 108 करोड़ की संख्या को भी पार कर गए हैं।

जनसंख्या की विकराल वृद्धि के प्रमुख कारण हैं – निरक्षरता, गरीबी, स्त्रियों के विवाह की औसत आयु में कमी, परिवार नियोजन साधनों का न अपनाना तथा स्वास्थ्य सेवाओं का विकास। हमें जनसंख्या वृद्धि को रोकना होगा। भारतीय समाज से लड़के के महत्त्व और पुत्री की उपेक्षा के अंधविश्वास को दूर करना होगा।

पुत्र की कामना में भारतीय परिवारों में पुत्रियों की संख्या अधिक हो जाती है जो भारत की जनसंख्या को और भी बढ़ाती है। स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति के कारण शिशु मृत्युदर में भी कमी आई है। भारत के अधिकांश निवासी स्त्री के उपभोग को मनोरंजन का एकमात्र साधन समझते हैं इसलिए भी जनसंख्या बढ़ती रहती है।

जनसंख्या वृद्धि ने हर क्षेत्र को प्रभावित किया है और देश को विकसित नहीं होने दिया है, अत: इस बढ़ती जनसंख्या पर अंकुश लगाना अति आवश्यक है। इस समस्या के कारण देश की आर्थिक व्यवस्था भी चरमरा उठी है। इसलिए हमें छोटे परिवार के महत्त्व को समझना होगा। दो संतान की अपेक्षा एक संतान के महत्त्व को समझना होगा तथा ‘हम दो हमारा एक’ के नारे को सार्थक सिद्ध करना होगा। परिवार नियोजन के साधन अपनाने होंगे।

लड़के का मोह छोड़ना होगा तथा आगामी भविष्य में अनेक संतानों की उत्पत्ति पर प्रतिबंध लगाना होगा, तभी हम जनसंख्या विस्फोट को रोक सकते हैं। इस दिशा में धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक संगठनों को आगे आकर देश विकास में सहायता करनी होगी, तभी हमारे विकास कार्यक्रम सफल सिद्ध होंगे। 26. भारत गणराज्य के बारहवें राष्ट्रपति डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम डॉ. अब्दुल कलाम देश के उन व्यक्तियों में से एक हैं जिनका नाम लेते ही आँखों के सामने हिन्दुस्तान का नक्शा उभर कर सामने आ जाता है। डॉ. कलाम ‘मिसाइलमैन’ नाम से सारे देश में लोकप्रिय हैं।

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बाद वे दूसरे ऐसे राष्ट्रपति हैं जिनका किसी राजनीतिक पार्टी से लेना-देना नहीं है। महान वैज्ञानिक डॉ. अब्दुल कलाम ने 25 जुलाई, 2002 को भारत गणराज्य का सर्वोच्च पद, राष्ट्रपति के रूप में, ग्रहण किया। यह दिन भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित करने के योग्य डॉ. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को तमिलनाडु राज्य के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यवर्गीय तमिल परिवार में हुआ।

आपके पिता श्री जैनुलाबदीन सामान्य रूप से पढ़े-लिखे थे और कोई धनी व्यक्ति नहीं थे। आपकी माँ आशियम्मा एक आदर्श महिला थी। डॉ. कलाम अपने बचपन के बारे में लिखते हैं- “मैं प्राय: अपनी माँ के साथ ही रसोई में नीचे बैठकर खाना खाया करता था। वे मेरे सामने केले का पत्ता विछाती और फिर उस पर चावल एवं सुगंधित, स्वादिष्ट साँभर देती, साथ में घर का बना आचार और नारियल की ताजा चटनी भी होती।”

कलाम साहब का बचपन आर्थिक संकटों से जूझते हुए बीता। उनकी पूरी शिक्षा उनके गृह राज्य तमिलनाडु में ही हुई। वे उच्च शिक्षा के लिए कभी विदेश नहीं गए। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद आपको घर छोड़ना पड़ा क्योंकि रामेश्वरम् में हायर सेकेण्डरी स्कूल न था। वे रामनाथपुरम के श्वार्ट्ज हाई स्कूल में भरती हुए और हायर सेकेण्डरी परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई के लिए वे त्रिचुरापल्ली के सेंट जोसफ कॉलेज में भरती हुए।

बी० एस. सी. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के आगे पढ़ाई जारी रखने के लिए आपने ट्यूशन पढ़ाए और ‘हिन्दू’ पत्रिका में विज्ञान संबधी लेख लिखे। उन्होंने एयरोनॉटिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया। पढ़ाई खत्म करके वे कैरियर की शुरूआत करने की दुविधा में फंस गए। उन्होंने विदेश जाकर धन कमाने की अपेक्षा देश-सेवा करने का निश्चय किया और 1958 में ‘रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन’ से जुड़ गए। उनकी नियुक्ति हैदराबाद केन्द्र में हुई। पाँच सालों तक वे यहाँ महत्त्वपूर्ण अनुसंधानों में सहायक रहे। 1980 तक उन्होंने यह काम किया। अपने लम्बे सेवा काल में उन्होंने देश को अंतरिक्ष विज्ञान में चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।

1980 में जब समेकित नियंत्रित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम’ चलाया गया तो इसका भार डॉ. कलाम को ही सौंपा गया। उन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अंतरिक्ष अनुसंधान में बिताया है। इसके अलाववा परमाणु क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। मई 1998 में पोखरण में किए गए परमाणु विस्फोट उन्हीं के नेतृत्व में किये गए। उन्होंने ‘अग्नि’ मिसाइल का सफल परीक्षण किया। मिसाइल के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया मानती है।

डॉकलाम दृढ़ इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति हैं। वे भारत को विकसित देश बनाने का सपना पाले हुए हैं। उनका कहना है कि- “हमारा देश एक अरब लोगों का देश है। इसलिए हमें व्यापक दृष्टि से सोचना चाहिए। हमारे युवकों को सपने देखने चाहिए। सपनों को विचारों में बदलना चाहिए। विचारों को कार्यवाही के जरिए हकीकत में बदलना चाहिए।”

डॉ. कलाम तीसरे ऐसे वैज्ञानिक हैं जिन्हे ‘भारत रत्न’ जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया गया है। उन्हें 1981 में पद्मविभूषण और 1990 में पद्म विभूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है। उन पर भारत को गर्व है।

डॉ अब्दुल कलाम में अहंकार छू तक नहीं गया है। वे एक भावुक व्यक्ति हैं। कविताएँ लिखना, वीणा बजाना और बच्चों का संग उन्हें बहुत प्रिय है। वे ‘सादा जीवन उच्च विचार’ में विश्वास रखते हैं। उन्होंने राष्ट्रपति पद की शपथ लेते समय दिए गए भाषण में प्रसिद्ध संत कबीरदास की इस पंक्ति का उल्लेख किया- ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब।’ उनके शपथ-ग्रहण समारोह में बड़ी संख्या में देश के स्कूलों के छात्र-छात्राएँ सम्मिलित हुए। कलाम साहब का व्यक्तित्व अत्यंत प्रेरणादायक है। उनका जीवन तपस्या भरा रहा है। वे अपनी उपलब्धियों का श्रेय अपने शिक्षकों और पथ-प्रदर्शकों को देते हैं।

ईश्वर उन्हें दीर्घायु करे ताकि वे भारत को प्रगतिशील बनाने के सपने को साकार कर सके।

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27. दिल्ली मेट्रो : मेरी मेट्रो

24 दिसंबर, 2002 को दिल्ली निवासियों का एक सुखद सपना पूरा हुआ। इस दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दिल्ली की पहली मेट्रो ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर राजधानी की बहुप्रतीक्षित परियोजना की शुरुआत की गई। यह पहली मेट्रो रेल शाहदरा से तीसहजारी के मध्य दौड़ेगी। इस रूट पर चलने वाली चार कोचों वाली पहली ट्रेन दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को इस साल के अगस्त में ही उपलब्ध हो गई थी। सितंबर से नवंबर तक लगातार इन कोचों को आवश्यक व कड़े सुरक्षा परीक्षणों से गुजारा गया।

दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या, चरमराती सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था और प्रदूषण के बढ़ते स्तर को देखते हुए दिल्ली में मेट्रो रेल सेवा का परिचालन आवश्यक हो गया था। केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार ने संयुक्त रूप से 1995 में DMRC (Delhi Mass Rapid Transport System) का पंजीकरण कराया और अगस्त 1996 में सरकार ने 62.5 कि.मी. लंबाई योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी।

दिल्ली मेट्रो सभी प्रकार की सुविधाओं से सम्पन्न है। यह मेट्रो विश्व की एक आधुनिक सेवा है और यह हमें सिंगापुर और हाँगकाँग तुल्य सुविधाओं का एहसास कराती है। यह समस्त प्रणाली स्वचालित है। यात्रियों की सुविधा के मद्देनजर सभी भूमिगत स्टेशनों पर उचित वातानुकूलन व सुरंगों में जरूरी वेंटीलेशन किया गया है।

सभी स्टेशनों को आधुनिक सुविधाओं से लैस किया गया है। घड़ियाँ तथा ट्रेनों के आवागमन की जानकारी के लिए सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली तथा सी.सी.टी.वी. की व्यवस्था की गई है। स्टेशनों पर ऑप्टिकल फाइबर लाइन द्वारा दूरसंचार प्रणाली का प्रबंध किया गया है।

इन केबलों में ध्वनि व डाटा प्रेषण की क्षमता है। विभिन्न काउंटरों पर यात्रियों के लिए स्मार्ट कार्ड उपलब्ध रहेंगे। प्रवेश व निकास के लिए माइक्रोप्रोसेसर नियंत्रित स्वचालित दरवाजे बनाए गए हैं। अपंग यात्रियों के लिए लिफ्ट जैसी विशेष व्यवस्था की गई है। व्यस्ततम समय में प्रति तीन मिनट के अंतराल पर ट्रेनों को चलाए जाने के लिए अपनी तरह की अनोखी सतत स्वचालित ट्रेन सिग्नलिंग प्रणाली की व्यवस्था की गई है।

इस प्रणाली के प्रयोग से मेट्रो कॉरीडोर में प्रति दो मिनट के अंतराल पर ट्रेनें चलाई जा सकती हैं। मेट्रो कॉरीडोर में एक दिशा में प्रति घंटे 60,000 यात्रियों की वहन-क्षमता है। विशेष सुरक्षा प्रबंधों में ड्रेस गार्ड, फ्लोर प्लेट, हैंड रेल स्पीड डिटेक्शन डिवाइस तथा स्टेप मिसिंग डिवाइस शामिल हैं। ये इंतजाम यात्रियों की सुरक्षा व सुविधाजनक आवागमन के लिए हैं। विकलांग लोगों की सुविधा व सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उन्नत तकनीक युक्त कुल 48 ऐलीवेटरों (लिफ्ट) का प्रबंध किया गया है।

विश्वसनीयता तथा सुरक्षा बनाए रखने के लिए आधुनिक संचार व ट्रेन नियंत्रण प्रणाली लगाई गई है। देश में पहली बार मेट्रो के टिकट व यात्री नियंत्रण के लिए स्वचालित किराया संग्रहण का इंतजाम किया गया है। मेट्रो स्टेशन पर प्रवेश व निकास के लिए स्मार्ट कार्ड से नियंत्रित ऑटोमैटिक दरवाजे लगाये गए हैं।

स्मार्ट कार्ड : एक नवीनीकरण कार्ड है, जिसका बार-बार प्रयोग हो सकता है। ये कार्ड 100, 200 और 500 रुपयों के हैं। इन कार्डो की वैधता एक साल है अर्थात् हर समय टिकट खरीदने के झंझट से मुक्ति। इसके अतिरिक्त तीन दिन की असीमित यात्रा के लिए 50 और 150 रु. के कार्ड खरीदे जा सकते हैं। इसके अलावा यात्रा के लिए सिंगल टोकन भी उपलब्ध हैं। किराया स्वचालित रूप से टिकेटिंग मशीन को कार्ड दिखाने से कटता है। आप अपनी बकाया राशि की जानकारी भी ले सकते हैं। कार्ड में प्रवेश-निकास प्रक्रिया का उपयोग होता है।

टोकन :
एक तरफ की यात्रा (नीला टोकन) तथा वापसी यात्रा के लिए (लाल टोकन) मान्य है। मेट्रो रेल परिसर में रेस्टोरेंट, स्नैक प्वांइट, रिफ्रेशमेंट स्टॉल, न्यूज़पेपर स्टैंड, किताबों के स्टॉल, दवा की दुकानें, ए.टी.एम. और संचार केन्द्र भी होंगे। नशा करने वाले, विध्वंसक कार्यवाही करने वाले, अभद्र व्यवहार और अप्रिय भाषा का प्रयोग करने वालों पर 500 रु. का जुर्माना लगाया सकता है।

खतरनाक हथियार लेकर मेट्रो में यात्रा करने पर चार साल की सजा हो सकती है और 5,000 रु. जुर्माना लग सकता है। ट्रेन की छत पर सफर करने पर यात्रियों को 50 रुपए जुर्माना देना पड़ेगा और ऐसा करने पर एक माह की सजा भी हो सकती है। मेट्रो रेल की किसी भी संपत्ति को क्षति पहुंचाने पर दो महीने की सजा हो सकती है और 250 रु. जुर्माना भी हो सकता है।

दिल्ली मेट्रो रेल हमें सड़क यातायात और भीड़-भाड़ से बचाकर आराम से मौजल तक पहुँचाने में सक्षम है। विद्युत चालित होने के कारण प्रदूषण रहित है। इसकी इलेक्ट्रॉनिक सीढ़ियाँ विकलांगों को ऊंचे प्लेटफार्म तक पहुंचाने में सहायता करती हैं। शाहदरा से तीसहजारी तक की यात्रा केवल 13 मिनट में पूरी हो जाती है। इसका किराया भी कम और वाजिब है। इस ट्रेन के स्वचालित दरवाजे हैं, जिनके बंद हुए बिना ट्रेन नहीं चलती। वातानुकूलित डिब्बे में 350 से अधिक यात्री सुविधाजनक ढंग से यात्रा कर सकते हैं। इस ट्रेन के डिब्बे खरोंच और झटकों से रहित हैं।

यह मेट्रो अत्यंत आरामदायक सुविधाओं से भरपूर है। यह दिल्ली के यातायात के परिवेश को क्रांतिकारी रूप से बदल देगी। ये मेट्रो सेवा दुनिया की आधुनिक सेवा है। विश्वस्तरीय मेट्रो प्रोजेक्ट रिकार्ड समय में शुरु हो गया है और आशा की जाती है कि इसके शेष रूट समय अवधि में चालू हो जाएंगे। इससे हम कम समय में अपने गंतव्य तक पहुंच सकेंगे। यह यात्रा अधिक सुखद एवं है।

HBSE 7th Class Hindi रचना निबंध-लेखन

28. कंप्यूटर : आज की जरूरत अथवा
कंप्यूटर : विज्ञान का अद्भुत वरदान

इक्कीसवीं सदी कंप्यूटर की है। इसका विकास बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हो गया था, लेकिन इसके प्रयोग की नई-नई दिशाएँ इक्कीसवीं सदी में खुलती जा रही हैं। वर्तमान युग को कंप्यूटर युग’ कहें तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।

कंप्यूटर विज्ञान का अत्यधिक विकसित बुद्धिमान यंत्र है। इसके पास ऐसा मशीनी मस्तिष्क है जो लाखों, करोड़ों गणनाएँ पलक झपकते ही कर देता है। पहले इन गणनाओं को करने के लिए सैकड़ों-हजारों मुनीम, लेखपाल दिन-रात परिश्रम करते रहते थे, फिर भी गलतियाँ हो जाती थीं। अब यह यंत्र सेकेंड में बटन दबाते ही निर्दोष गणना प्रस्तुत कर देता है। बैंक का पूरा खाता बटन दबाते ही परदे पर आ जाता है।

दूसरा बटन दबाते ही खाते या बिल की प्रति टाइप होकर आपके हाथों में पहुंच जाती है। कार्यालय का सारा रिकार्ड क्षण भर में सामने आ जाता है। अब न रजिस्टर ढूँढ़ने की आवश्यकता रह गई है और न पन्ना खोलकर एंट्री करने की। सारा काम साफ-सुथरे अक्षरों में मिनटों में हो जाता है।

आप रेलवे बुकिंग केन्द्र पर जाएँ। पहले वहाँ लंबी-लंबी लाइनें लगती थीं। सुबह से शाम हो जाती थी सीट आरक्षित कराने में अब कंप्यूटर की कृपा से यह काम मिनटों में हो जाता है। आप कंप्यूटर की सहायता से देश की किसी भी कंप्यूटर खिड़की से कहीं का भी टिकट खरीद सकते हैं तथा अग्रिम सीट आरक्षित करा सकते हैं। इंटरनेट की सहायता से पूरे रेलवे केंद्र आपस में जुड़ गए हैं। इसी प्रकार हवाई जहाज की सीटें बुक कराई जा सकती मुद्रण के क्षेत्र में कंप्यूटर की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो गई है। पहले एक-एक अक्षर को जोड़कर सारी सामग्री कंपोज़ की जाती थी।

गलती होने पर साँचा खोलना पड़ता था। अब इस सारे झंझट से मुक्ति कंप्यूटर ने दिला दी है। अब तो एक बटन दबाते ही अक्षरों को मनचाहे आकार एवं रूप में ढाला जा सकता है। कभी भी मोटाई घटाई-बढ़ाई जा सकती है। अब चित्र भी कंप्यूटर की सहायता से बनाए जा सकते हैं। अब पुस्तक प्रकाशन इतना कलात्मक एवं विविधतापूर्ण हो गया है कि पुरानी मशीनें तो अब बाबा आदम के जमाने की लगती हैं। कंप्यूटर द्वारा प्रकाशित पुस्तके आकर्षक होती हैं।

संचार के क्षेत्र में कंप्यूटर ने क्रांति ही उपस्थित कर दी है। फैक्स, पेजिंग, मोबाइल के बाद इंटरनेट, चैट, सर्फिग आदि ने मानो सारे संसार को आपके कमरे में कैद कर दिया हो। सूचना तकनीक का विकास दिन-प्रतिदिन नए रूप में हो रहा है। ‘ई-मेल’ सेवा भी बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है। आप अपने कंप्यूटर पर विश्व भर की किसी संस्था अथवा उत्पाद की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आप विश्व के किसी भी कोने के समाचार-पत्र और पुस्तक पढ़ सकते हैं। अपनी लिखित सामग्री कहीं भी भेजी जा सकती है।

रक्षा के उन्नत उपकरणों में कंप्यूटर प्रणाली अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई। भारत ने कंप्यूटर की सहायता से ही अपनी परमाणु क्षमता का विकास किया है। कंप्यूटर की सहायता से हजारों कि. मी. दूर शत्रु पर वार किया जा सकता है। संवेदनशील राडार हो अथवा कृत्रिम उपग्रह सभी में कंप्यूटर प्रणाली की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। कंप्यूटर ने घरेलू उपकरणों में स्वचालित प्रणाली विकसित कर दी है।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कंप्यूटर की सेवाएँ बहुत उपयोगी हैं। इसकी सहायता से बीमारी की जाँच और रोगी का रिकॉर्ड रखने में सहायता मिलती है। आप अपने रोग के बारे में विदेशी डॉक्टर से परामर्श ले सकते हैं। यह सब काम कंप्यूटर कर देता है। कंप्यूटर मनोरंजन के क्षेत्र में भी बच्चों को लुभा रहा है। इस पर तरह-तरह के खेल खेले जा सकते हैं।

निष्कर्ष रूप में हम कह सकते हैं कि कंप्यूटर वर्तमान युग की आवश्यकता बन गया है। सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में भारत ने बहुत प्रगति की है। कंप्यूटर धन एवं समय की बचत कराने में बेजोड़ हैं।

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HBSE 7th Class Hindi रचना पत्र-लेखन

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Rachana Patra-Lekhan पत्र-लेखन Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Rachana पत्र-लेखन

1. अवकाश माँगते हुए प्रधानाचार्य को प्रार्थना पत्र

सेवा में,
प्रधानाचार्य,
सेंट कोलंबस स्कूल,
चंडीगढ़।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मुझे कल रात्रि से ज्वर आ रहा है। डॉक्टर ने ‘वायरल फीवर’ बताया है और चार दिन तक पूर्ण विश्राम का परामर्श दिया है। अत: मैं दिनांक…………….. से ………….. तक चार दिन विद्यालय आने में असमर्थ हूँ।
कृपया मुझे इन चार दिनों का अवकाश प्रदान कर कृतार्थ करें।

धन्यवाद सहित,
आपका आज्ञाकारी शिष्य
मेहुल मैदीरत्ता
कक्षा..
दिनांक…………

HBSE 7th Class Hindi रचना पत्र-लेखन

2. विद्यालय छोड़ने का प्रमाण पत्र (S.L.C.) प्राप्त करने के लिए प्रधानाचार्य को आवेदन-पत्र लिखो।

सेवा में,
प्रधानाचार्य,
समरफील्ड पब्लिक स्कूल,
नई दिल्ली।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं इस स्कूल का सातवीं कक्षा का विद्यार्थी हूँ। मेरे पिताजी का स्थानांतरण मुंबई हो गया है। अगले सप्ताह हमारा परिवार मुंबई चला जाएगा। मुझे वहीं के किसी स्कूल में प्रवेश लेना होगा। इस कार्य हेतु मुझे विद्यालय त्यागने का प्रमाण पत्र (S.L.C.) प्रदान करने की कृपा करें।

धन्यवाद सहित,
आपका आज्ञाकारी शिष्य
मंयक
दिनांक…………

3. आर्थिक सहायता हेतु प्रधानाचार्य को आवेदन पत्र

सेवा में,
प्रधानाचार्य,
होली चाइल्ड पब्लिक स्कूल,
टैगोर गार्डन, नई दिल्ली।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि मैं इस विद्यालय की आठवीं कक्षा की अत्रा हूँ। मैं सातवीं कक्षा की वार्षिक परीक्षा में सभी वर्गों में प्रथम स्थान पर रही थी। मैंने चार सौ मीटर की दौड़ में मंडल स्तर पर प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया था।

पिछले तीन मास से हमारा परिवार आर्थिक समस्या से ग्रस्त है। पिताजी दुर्घटनाग्रस्त होकर बिस्तर पर हैं। उनको पूरी तरह ठीक होने में अभी छह मास का समय लगेगा। परिवार में पिताजी ही एकमात्र कमाऊ सदस्य हैं। उनके इलाज पर भी काफी पैसा लग रहा है।

ऐसी विषम स्थिति में मुझे कक्षा की मासिक फीस जमा कराने में अत्यन्त कठिनाई आ रही है। आपसे विनम्र प्रार्थना है कि छ: मास के लिए मेरी फीस माफ की जाए तथा ‘छात्रनिधि’ से मुझे कुछ आर्थिक सहायता दिलाई जाए।

आपकी इस सामयिक सहायता के लिए मैं आपकी सदैव आभारी रहूंगी।

धन्यवाद सहित,
आपकी आज्ञाकारिणी शिष्या
कनिका छाबड़ा
कक्षा –
दिनांक…………

HBSE 7th Class Hindi रचना पत्र-लेखन

4. अपने मोहल्ले की गंदगी हटवाने के लिए स्वास्थ्य अधिकारी को पत्र

सेवा में,
स्वास्थ्य अधिकारी,
दिल्ली नगर निगम (पश्चिमी क्षेत्र),
राजौरी गार्डन, नई दिल्ली।

महोदय,
सविनय निवेदन है कि राजौरी गार्डन क्षेत्र में गंदगी का साम्राज्य है। यहां पिछले एक मास से सफाई ही नहीं हुई है। सफाई-कर्मचारियों से कई बार प्रार्थना की, किन्तु उसका कोई प्रभाव नहीं हुआ। सड़कों पर भी गंदगी जमा हो रही है।

कूड़े के ढेरों पर मच्छरों का प्रकोप बढ़ता जा रहा है। मलेरिया फैलने की पूरी आशंका है। आपसे विनम्र प्रार्थना है कि यहां सफाई का उचित प्रबंध करवाएं, ताकि हम स्वच्छ वातावरण में सांस ले सकें।

धन्यवाद सहित,
भवदीय
कुन्दन लाल,
सचिव, बी ब्लॉक, राजौरी गार्डन
निवासी संघ
दिनांक…………

5. डाकपाल को शिकायती पत्र

सेवा में,
डाकपाल महोदय,
मुख्य डाकघर,
रमेश नगर,
नई दिल्ली।

महोदय,
मैं आपका ध्यान रमेश नगर (ई. ब्लाक) के डाकिए की लापरवाही की ओर दिलाना चाहती हूँ।

इस क्षेत्र का डाकिया नियमित रूप से डाक वितरण नहीं करता। दिन में दो बार डाक बाँटने के स्थान पर वह केवल एक ही बार आता है। उसके आने का समय निश्चित नहीं है। वह हमारे पत्र इधर-उधर फेंक जाता है। यद्यपि हमने लैटरबॉक्स लगा रखा है, पर वह पत्र उसमें नहीं डालता। उसकी इस लापरवाही के कारण हमारे अनेक आवश्यक पत्र गुम हो जाते हैं। अनियमित डाक-वितरण के कारण अनेक पत्र विलंब से मिलते हैं।

आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप इस क्षेत्र के डाकिए को तत्परता से काम करने के निर्देश दें, ताकि हमें सुचारू रूप से डाक-वितरण का कार्य हो सके।

धन्यवाद सहित,
भवदीय
रचना मैदीरत्ता
ई-249-250, रमेश नगर, नई दिल्ली।
दिनांक…………

HBSE 7th Class Hindi रचना पत्र-लेखन

6. टेलीफोन की खराबी की शिकायत करते हुए ‘नवभारत टाइम्स’ के संपादक को पत्र।

सेवा में,
संपादक,
नवभारत टाइम्स,
नई दिल्ली।

महोदय,
मैं आपके लोकप्रिय समाचार-पत्र के माध्यम से महानगर टेलीफोन निगम के उच्च अधिकारियों का ध्यान अपनी शिकायत की ओर दिलाना चाहता हूँ।

मेरा टेलीफोन नं. 593219 गत दो सप्ताह से खराब है। इसकी शिकायत कई बार की गई है। क्षेत्रीय कार्यालय में कई बार चक्कर लगाने के बावजूद यह टेलीफोन अभी तक ठीक नहीं हो पाया है। महानगर टेलीफोन निगम दावे तो बहुत लंबे-चौड़े करता है, पर वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। नियमित रूप से सेवा-प्रभार लेने के बावजूद उपभोक्ता को सेवा न देना सरासर अन्याय है। आशा है, यह पत्र पढ़कर निगम की कार्य प्रणाली में कुछ सुधार आ जाए।

धन्यवाद सहित,
भवदीय
रामेश्वर शुक्ल
7/22, जीवन पार्क,
नई दिल्ली।
दिनांक……….

7. पुस्तक-विक्रेता को पत्र

सेवा में,
प्रबंधक महोदय,
जीवन बुक्स इंटरनेशनल (प्रा.) लि.,
मानसरोवर गार्डन,
नई दिल्ली।
मान्यवर,

आपका भेजा सूचीपत्र प्राप्त हुआ। मुझे निम्नलिखित पुस्तकों की शीघ्र आवश्यकता है। कृपया नवीनतम संस्करण की ही पुस्तकें भिजवाएँ। मैं सौ रुपए का बैंक-ड्राफ्ट अग्रिम भेज रहा हूँ। कृपया पुस्तकें वी.पी.पी. द्वारा मेरे पते पर शीघ्र भिजवाने की व्यवस्था करें।

1. जीवन भारती (भाग-8)                               3 प्रति
2. जीवन हिन्दी व्याकरण एवं रचना (भाग-7)     2 प्रति
3. जीवन इंटरएक्टिव गणित (भाग-3)               2 प्रति

सधन्यवाद,
भवदीय
धनालक्ष्मी
44/6, टी नगर, चेन्नई (तमिलनाडु)
दिनांक………..
संलग्न – इंडियन बैंक का ड्राफ्ट – ई-74027

8. जन्मदिन पर आमंत्रित करते हुए मित्र को पत्र

5/62. बैंक स्ट्रीट,
बंगलूर
दिनांक…
प्रिय मित्र राहुल,
सप्रेम नमस्ते।

तुम्हें यह जानकर अत्यंत हर्ष होगा कि दिनांक…………. को मेरा जन्मदिन है। इस अवसर पर एक समारोह का आयोजन किया गया है। कार्यक्रम निम्नलिखित है :
दिनांक……..
सायं 7 बजे – केक काटने की रस्म
सायं 7.30 से 8.30 तक – सांस्कृतिक कार्यक्रम
रात्रि 8.30 बजे – प्रीतिभोज

इस समारोह में भाग लेने के लिए मैं तुम्हें आमंत्रित करता हूँ। मुझे पूर्ण आशा है कि तुम समय से पूर्व ही आ जाओगे। अपनी बहन चीकू को भी साथ लेते आना।

तुम्हारा प्रिय मित्र
मनोज

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9. मित्र द्वारा निमंत्रण-पत्र का उत्तर

7/452, गनहिल रोड,
मसूरी।
दिनांक …………
प्रिय मित्र निशान्त,
सप्रेम नमस्ते।

तुम्हारा निमंत्रण पत्र मिला। जन्म दिन के पावन अवसर पर मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करो।

जन्मदिन के अवसर पर मैं एक छोटा-सा उपहार कोरियर द्वारा भेज रहा हूँ। इसे स्वीकार कर कृतार्थ करना। जन्मदिन समारोह में मैं स्वयं तो उपस्थित नहीं हो पाऊँगा। इन दिनों माता जी अस्वस्थ चल रही हैं। उन्हें छोड़कर आना उचित नहीं होगा। आशा है तुम मेरी विवशता को समझोगे।
एक बार पुनः जन्मदिन की शुभकामनाएँ अपने माता-पिता को मेरा चरण-स्पर्श कहना।

तुम्हारा प्रिय मित्र
राहुल

10. आपका मित्र परीक्षा में अच्छे अंक लेकर उत्तीर्ण हुआ, उसे बधाई देते हुए पत्र लिखिए।

सैक्टर-7, कोठी नं. 1218,
पंचकुला।
दिनांक…………
प्रिय नरेंद्र
सप्रेम नमस्ते।

अभी-अभी तुम्हारा पत्र मिला। यह पढ़कर कि तुमने अप विद्यालय में सर्वाधिक 96 प्रतिशत अंक पाए हैं, मुझे कितनी खुश हुई, कैसे लिखू। मेरी बधाई स्वीकार करें।

प्रिय मित्र 96% अंक प्राप्त करना खुशी की बात तो है, परन्तु आश्चर्य की नहीं, क्योंकि तुम्हारी प्रतिभा किसी से छिपी नहीं है। हाँ, इस परिणाम से तुम्हारे ऊपर एक नई जिम्मेदारी आ गई है। । वह यह कि अब भविष्य की परीक्षाओं में तुम इस प्रतिशत को बिल्कुल नीचे नहीं आने दोगे, वरन् ऊँचा ही उठाओगे। इसके लिए तुम्हें चाहे जितना परिश्रम करना पड़े। मेरी शुभकामनाएँ सदा तुम्हारे साथ हैं।

अपने मम्मी-पापा को मेरी ओर से बधाई देना। बच्चों को प्यार।
शेष कुशल है।
तुम्हारा मित्र
भारत मैदीरत्ता

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11. अपने छोटे भाई को पत्र लिखिए, जिसमें परिश्रम का महत्त्व समझाया गया हो।

5/2, कमला नगर,
दिल्ली।
दिनांक………….
प्रिय अनुज,
शुभाशीर्वाद।

आशा है तुम स्वस्थ एवं प्रसन्न होगे। कल माताजी का पत्र प्राप्त हुआ, जिससे पता चला कि इस वर्ष तुम्हें केवल 52% अंक प्राप्त हुए हैं। इतने कम अंक तुम्हें पहले कभी नहीं मिले। संभवत: तुम्हारे परिश्रम में कोई कमी रह गई है।

प्रिय भाई, परिश्रम के बिना जीवन में कोई सफलता नहीं मिलती। परिश्रम ही सफलता की कुंजी है। किसी कवि ने सच ही कहा-
“विद्या, धन उद्यम बिना, कहो सो पावै कौन?
बिना डुलाए ना मिले, ज्यों पंखा की पौन।”

जो व्यक्ति परिश्रम करने से जी चुराता है, वह कभी आगे नहीं बढ़ सकता। परिश्रम के बलबूते पर तो मूर्ख भी चतुर बन जाता है। कालिदास जैसा वज मूर्ख परिश्रम के बलबूते पर ही संस्कृत का इतना प्रकांड विद्वान बन सका।

आशा है तुम परिश्रम के महत्त्व को समझ गए होगे। अगली कक्षा में तुम्हें 75% अंक प्राप्त करने हैं। इसके लिए अभी से परिश्रम करना आरंभ कर दो।

माता जी को सादर-प्रणाम।
तुम्हारा शुभचिंतक
लवाशीष

12. सखी को ग्रीष्मावकाश साथ-साथ बिताने के लिए पत्र

561, सिविल लाइन,
देहरादून।
दिनांक…
प्रिय सखी गरिमा,
सप्रेम नमस्ते।

तुम्हारा पत्र मिला। हमारी वार्षिक परीक्षाएँ समाप्त हो गई हैं। परीक्षा-परिणाम घोषित होने के पश्चात् हमारा विद्यालय दो मास के ग्रीष्मावकाश के लिए बंद हो जाएगा। तुम्हारे विद्यालय में भी अगले मास ग्रीष्मावकाश हो जाएगा।

तुम्हें स्मरण होगा कि पिछले वर्ष तुमने मेरे यहाँ आकर ग्रीष्मावकाश का एक मास बिताने का वायदा किया था। मेरी भी हार्दिक इच्छा है हम दोनों एक मास साथ-साथ रहें। अगले मास देहरादून का मौसम भी सुहावना हो जाएगा। हम यहाँ से एक सप्ताह के लिए मसूरी भी चलेंगे। हम दोनों नृत्य एवं संगीत की कक्षा में दो सप्ताह के कोर्स में भी प्रवेश लेंगे।

अपने कार्यक्रम से मुझे शीघ्र सूचित करना।

शेष कुशल !
तुम्हारी प्रिय सखी
पूजा भारती

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13. पिताजी से रुपये मंगवाने के लिए पत्र

न्यू कांवेंट स्कूल, कोचीन।
दिनांक…………..
पूज्य पिताजी,
सादर प्रणाम।

मैं यहाँ पर कुशलपूर्वक हूँ और आशा करता हूँ कि घर पर भी सब कुशल होंगे। मेरी पढ़ाई बिल्कुल ठीक चल रही है। मुझे आशा है कि मैं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो जाऊँगा। अगले सप्ताह हमारे विद्यालय के विद्यार्थियों को भ्रमण के लिए कुछ ऐतिहासिक स्थानों पर ले जाया जाएगा। मैंने भी वहाँ जाने के लिए नाम लिखवा दिया है। इस कार्यक्रम के लिए विद्यालय ने पचास-पचास रुपये प्रति विद्यार्थी जमा करवाए हैं। इसके अतिरिक्त कुछ पैसे और भी खर्च हो जाएँगे। अतः आप सौ रुपये शीघ्र धनादेश द्वारा भेजने की कृपा करें।

आपका स्नेहभाजन,
कपिल

14. मित्र के पिता की मृत्यु पर शोक पत्र

शाम नाथ मुखर्जी मार्ग, दिल्ली-110006
दिनांक…
प्रिय राजेश,

आपका पत्र 23 तारीख का लिखा हुआ मिला। जब मैंने आपके पिताजी की मृत्यु का समाचार उसमें पढ़ा तो मुझे उस पर एकाएक विश्वास न हुआ। पिछले मास की 30 तारीख को तो मैं उनसे मिला था।

मुझे ऐसी स्वप्न में भी कल्पना नहीं थी कि उनकी मृत्यु इतनी निकट है। प्रिय मित्र, यहाँ मनुष्य असमर्थ हो जाता है। धनी या निर्धन, बलवान या निर्बल, राजा या रंक, मूर्ख या विद्वान सभी एक दिन ईश्वर के नियमानुसार काल का ग्रास बन जाते हैं। भगवान की इच्छा बलवती है। अत: धैर्य और सब्र के सिवा चारा ही क्या है ? मुझे आशा है कि तुम धीरज से काम लोगे तथा सब्र के साथ पूज्य माता जी तथा गीता को धीरज तथा सांत्वना दोगे।

ईश्वर से प्रार्थना है कि स्वर्गवासी आत्मा को सद्गति प्रदान करे तथा आप सबको दुःख को सहने की शक्ति प्रदान करे।

तुम्हारे दुःख में दुःखी
राजनाथ विज

HBSE 7th Class Hindi रचना पत्र-लेखन

15. दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित किसी प्रदर्शनी का विवरण देते हुए अपने मित्र को इसे देखने के लिए निमंत्रित कीजिए।

173, गांधी नगर,
नई दिल्ली।
दिनांक …………..
प्रिय मित्र रहीम, नमस्ते। तुमने कई बार यहाँ आने को लिखा है, पर आते नहीं हो। इस पत्र को देखते ही तुम यहाँ के लिए चल पड़ो, क्योंकि यहाँ के प्रगति मैदान में ‘अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक प्रदर्शनी’ लगी हुई है, जो 10 नवम्बर से 9 दिसंबर तक रहेगी।

यह प्रदर्शनी देखने योग्य है। इसमें भारत की भिन्न-भिन्न भाषाओं की एक लाख से अधिक पुस्तकें प्रदर्शन के लिए रखी गई हैं। यहाँ सौ से अधिक प्रकाशकों ने अपने स्टाल लगाए हैं। यहाँ छोटी-बड़ी, लंबी-चौड़ी, मोटी-पतली, भिन्न-भिन्न रंगों की जिल्दों वाली पुस्तकें देखते ही बनती हैं। शायद ही कोई विषय होगा, जिसकी पुस्तक यहां नहीं हो। लोग बड़े चाव से पुस्तकें खरीदते हैं। यहाँ अमेरिका, इंग्लैंड, रूस और जापान के स्टाल देखने योग्य हैं। तुम देखकर हैरान रह जाओगे।

अपनी वालिदा साहिबा को मेरा सलाम कहना।
तुम्हारा स्नेही
राकेश

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HBSE 7th Class Hindi रचना अनुच्छेद लेखन

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Rachana Anuchchhed-Lekhan अनुच्छेद लेखन Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Rachana अनुच्छेद लेखन

किसी एक वाक्य, सूक्ति या काव्य-पंक्ति के विषय में सात-आठ पंक्तियाँ लिखना अनुच्छेद-लेखन’ कहलाता है। एक अनुच्छेद में एक विचार या भाव का ही विस्तार किया जाता है। सामान्यतः यह 70-80 शब्दों का होता है। अनुच्छेद का रोचक होना आवश्यक उदाहरण के लिए कुछ अनुच्छेद दिए जा रहे हैं :

1. प्रातःकाल का दृश्य

प्रात:काल का दृश्य अत्यंत मनोहारी होता है। इस समय आकाश के रूप में क्षण-क्षण परिवर्तन होता है। ऐसा लगता है जैसे कोई जादू-म्ग होल को मारनों से बाहर निकलकर चहचहाने लगते हैं। ठंडी हवा बहने लगती है। इससे हमारा मन और तन आनंदित हो उठते हैं। हरी घास पर पड़ी ओस की बूँदै मोती-सी चमकती प्रतीत होती हैं। बाग-बगीचों में रंग-बिरंगे फूल मुस्करा रहे होते हैं। पार्कों में लोग सैर और व्यायाम करते दिखाई देते हैं। वास्तव में प्रात:काल का दृश्य मन में आशा और उमंग का संचार कर देता है।

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2. पुस्तकालय

पुस्तकालय में पुस्तकों का संग्रह होता है। सभी विद्यालयों में पुस्तकालय तो होते ही हैं, इसके साथ-साथ सार्वजनिक स्थानों पर लोग पुस्तकालय खोलते हैं। पुस्तकालय ज्ञान के केन्द्र हैं। इनमें मिलने वाली पुस्तकों को पढ़कर जहां हमारा ज्ञान बढ़ता है, वहीं हमारा मनोरंजन भी होता है। पुस्तकालय से निर्धन विद्यार्थी पुस्तकें लेकर पढ़ाई करते हैं। पुस्तकालय के अपने कुछ नियम होते हैं। हमें उनका पालन करना चाहिए। पुस्तकालय में शांति बनाए रखनी चाहिए।

3. जैसा करोगे, वैसा भरोगे

इस संसार का नियम है – जैसा करोगे, वैसा भरोगे। यहां व्यक्ति जैसा काम करता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है। अच्छा कार्य करके व्यक्ति अच्छा फल भोगता है और बुरा काम करके उसे दंड भुगतना ही पड़ता है। कई बार ऐसा भी देखने में आता है कि बुरा कर्म करने वाला फल-फूल रहा है। यह स्थिति अधिक समय तक नहीं रहती। बुरे काम का अंत बुरा अवश्य होता है। आम खाने के लिए आम की गुठली ही बोनी पड़ती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि ऐसे अच्छे कर्म करे जिससे दूसरों को भी शीतलता मिले और स्वयं भी सुख-शांति पा सके।

4. परिश्रम की महिमा

परिश्रम सफलता की कुंजी है। व्यक्ति को परिश्रम से नहीं घबराना चाहिए। परिश्रम से कठिन से कठिन काम भी आसान हो जाता है। परिश्रम से जी चुराने वाला व्यक्ति आलसी बन जाता है। आलसी व्यक्ति के जीवन का कोई लाभ नहीं होता। उसमे कार्य के प्रति उमंग, उत्साह और जोश नहीं होता। जो व्यक्ति परिश्रम करता है, वह कठिनाइयों से कभी नहीं घबराता। परिश्रमी व्यक्ति सदा सफलता प्राप्त करता है। हमें अपना काम सदैव परिश्रमपूर्वक करना चाहिए।

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5. अनेकता में एकता

अनेकता में एकता भारत की विशेषता है। इस विशाल देश में ऊपरी तौर पर अनेक प्रकार की विभिन्नताएं दिखाई देती है। कहीं पर्वत हैं तो कहीं हरे-भरे मैदान और कहाँ गहरे समुद्र। इस देश में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। यहां वेशभूषा और खान-पान की दृष्टि से भी अनेक विभिन्नताएँ हैं। विभिन्न प्रांतों में मौसम भी एक समान नहीं होता। धर्म भी अनेक हैं। इन सभी विभिन्नताओं के होते हुए भी भारत एक है। इन विभिन्नताओं की तह में एकता की भावना छिपी हुई है। भारत की संस्कृति एक है। सभी एक-दूसरे का सम्मान करते हैं।

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HBSE 7th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Muhavare-Lokoktiyan मुहावरे-लोकोक्तियाँ Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

‘मुहावरा’ शब्द अरबी भाषा का है। जिसका अर्थ है-अभ्यास। वस्तुतः शब्दों का ऐसा समुच्चय मुहावरा है जो अपने साधारण अर्थ को छोड़कर किसी विशिष्ट अर्थ को प्रकट करें। प्रयोग के धरातल पर एक ही मुहावरा कई बार अलग-अलग अर्थ दे सकता है। जैसे-
‘आँख लगना’ – मुहावरा
(क) सारी रात जगने के बाद उसकी आँख अभी लगी है।-(अभी नीद आई है।)
(ख) मेरी किताब पर उसकी आँख लगी हुई है। = (पाने की इच्छा)
‘लोकोक्तियां’ या ‘कहावतें’ लोक अनुभव का परिणाम होती हैं। इसे लोक की उक्ति कहा गया है। इसकी उत्पत्ति के लिए विशेष व्यक्ति, स्थान अथवा काल का निर्देश नहीं किया जा सकता। लोकोक्तियाँ स्वयं सिद्ध होती हैं।

लोकोक्ति एवं मुहावरे में अंतर:
(क) लोकोक्ति पूर्ण वाक्य है, जबकि मुहावरा खंड वाक्य है।
(ख) पूर्ण वाक्य होने के कारण लोकोक्ति का प्रयोग स्वतंत्र एवं अपने आप में पूर्ण इकाई के रूप में होता है जबकि मुहावरा किसी वाक्य का अंश बनकर रह जाता है।
(ग) लोकोक्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता जबकि मुहावरों में वाक्य के अनुसार परिवर्तन होता है।
(घ) लोकोक्ति किसी बात के समर्थन अथवा खंडन के लिए प्रयुक्त की जाती है, जबकि मुहावरा वाक्य में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

मुहावरे (Idioms):
प्रमुख मुहावरों के अर्थ एवं प्रयोग नीचे दिए जा रहे हैं-

1. अंग-अंग ढीला होना = थक जाना।
दिन-भर की भाग-दौड़ होने के कारण अब मेरा अंग-अंग ढीला हो रहा है।

2. अंधे की लाठी = एकमात्र सहारा।
पिता के देहांत के बाद अब तो पुत्र गोपाल ही अपनी माँ के लिए अंधे की लाठी है।

3. अक्ल का दुश्मन = मूर्ख व्यक्ति।
तुम तो पूरे अक्ल के दुश्मन हो, तुम्हें सलाह देने का कोई फायदा नहीं।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

4. अंग-अंग मुस्कराना = बहुत प्रसन्न होना।
अपना नंबर मेधावी छात्रों की सूची में पाकर रवि का अंग-अंग मुस्कराने लगा।

5. अपने पैरों पर खड़ा होना = स्वावलंबी होना।
पिता की अचानक मौत के पश्चात् रमेश शीघ्र ही अपने पैरों पर खड़ा हो गया।

6. अंगूठा दिखाना = साफ इंकार करना।
मैंने सुधा से दो दिन के लिए पुस्तक माँगी तो उसने अंगूठा दिखा दिया।

7. अगर-मगर करना = टाल-मटोल करना।
जब हम संस्था की सहायतार्थ सेठ जी के पास चंदा मांगने गए तो वे अगर-मगर करने लगे।

8. आग में घी डालना = क्रोध को भड़काना।
तुम्हारी बातों ने तो रमा और सुधा की लड़ाई में आग में घी डाल दिया।

9. आसमान से बातें करना = बहुत ऊँचा होना।
कनॉट प्लेस की भव्य इमारतें आसमान से बातें करती प्रतीत होती हैं।

10. आकाश-पाताल एक करना = बहुत परिश्रम करना।
परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए राजेश ने आकाश पाताल एक कर दिया।

11. आँखें बिछाना = प्रेम से स्वागत करना।
अभिनेता के स्वागत-समारोह में प्रशंसकों ने आँखें बिछा दीं।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

12. आँखें चुराना = सामने न आना।
अब बेरोजगार पंकज अपने परिचितों से आँखें चुराने लगा

13. आँखें खुलना = होश में आना।
जब सुरेशचन्द्र को उसके साझीदार ने व्यापार में धोखा दिया तब ही उसकी आँखें खुली।

14. आँखों में धूल झोंकना = धोखा देना।
वह ठग मेरी आँखों में धूल झोंककर मेरा रुपयों से भरा बैग ले भागा।

15. आँखें दिखाना = क्रांध प्रकट करना।
अध्यापक द्वारा छात्र को जरा-सा डाँटने पर छात्र आँखें दिखाने लगा।

16. आस्तीन का साँप = विश्वासघाती मित्र।।
राजबीर को क्या मालूम था कि उसका मित्र सुरेश आस्तीन का साँप निकलेगा।

17. आँसू पोंछना = सांत्वना देना।
सड़क दुर्घटना में रमा के माता-पिता की मृत्यु होने पर उसके आँसू पोछने वालों की कतार लग गई।

18. आटे-दाल का भाव मालूम होना = वास्तविक स्थिति का पता चलना।
विवाह के पश्चात् ही तुम्हें आटे-दाल का भाव मालूम पड़ेगा।

19. इधर-उधर की हाँकना = व्यर्थ बोलना।
पिता द्वारा परीक्षा में फेल होने के कारण पूछने पर रमेश इधर-उधर की हाँकने लगा।

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20. ईद का चाँद होना = बहुत दिनों बाद दिखना।
अरे मित्र ! कहाँ रहे इतने दिन ? तुम तो ईद का चाँद हो गए हो।

21, ईंट से ईंट बजाना = नष्ट-भ्रष्ट कर देना।
युद्ध में सैनिक अपने शत्रु की ईंट से ईंट बजा देने को तत्पर रहते हैं।

22. उल्टी गंगा बहाना = नियम के विपरीत कार्य करना।
पंजाब को दिल्ली से गेहूँ भेजना तो उल्टी गंगा बहाना हुआ।

23. उँगली उठाना = दोषारोपण करना।
पर्याप्त सबूत के बिना किसी पर उँगली उठाना तुम्हें शोभा नहीं देता।

24. कफन सिर पर बाँधना = मरने को तैयार रहना।
राजपूतों के लिए कहा जाता था कि वे कफन सिर पर बांधकर युद्ध-क्षेत्र में जाते थे।

25. कंठहार होना = बहुत प्रिय होना।
कांता तो अपने पति के लिए कंठ-हार बनी हुई है।

26. कलई खुलना = भेद खुल जाना।।
आखिरकार सेठ रामलाल के कालाबाजारी होने की कलई खुल ही गई।

27. कलेजे का टुकड़ा = बहुत प्रिय।
सभी बच्चे अपने माता-पिता के कलेजे का टुकड़ा होते

28. कटे पर नमक छिड़कना = दु:खी व्यक्ति को और दु:खी करना।
तुम्हें उस विधवा के कटे पर नमक छिड़कते शर्म आनी चाहिए।

29. कमर टूटना = हिम्मत टुट जाना।
जवान पुत्र की दुर्घटना में मृत्यु होने से रमाकांत जी की तो मानो कमर ही टूट गई है।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

30. कान का कच्चा होना = चुगली पर ध्यान देने वाला।
हमारे अफसर ईमानदार होने के बावजूद कान के कच्चे

31. कान पर जूं न रेंगना = कुछ असर न होना।
राम को उसके पिता ने काफी समझाया, पर उसके कान पर तक न रेंगी।

32. कंगाली में आटा गीला होना = अभाव में अधिक हानि होना।
एक तो प्रदेश में पहले ही बाढ़ से स्थिति खराब थी, अब महामारी फैल गई। इसी को कंगाली में आटा गीला होना कहते हैं।

33. काम आना = वीरगति प्राप्त करना।
देश की सीमाओं पर रक्षा करते हुए कितने ही वीर काम आ गए।

34. खाला जी का घर होना = आसान काम।
आज के युग में सरकारी नौकरी पाना खाला जी का घर नहीं है।

35. खरी-खोटी कहना = बुरा भला कहना।
लड़ाई में सास-बहू ने एक-दूसरे को खूब खरी-खोटी सुनाई।

36. खून-पसीना एक करना = कठोर परिश्रम करना।
परीक्षा में अच्छे अंक पाने के लिए मैंने खून-पसीना एक कर दिया।

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37. गाल बजाना = बहुत अधिक बोलना।
मधु की बातों पर ध्यान मत दो, उसे तो गाल बजाने का शौक है।

38. गागर में सागर भरना = थोड़े शब्दों में बहुत अधिक कहना।
बिहारीलाल ने अपने दोहों में गागर में सागर भर दिया है।

39. गड़े मुर्दे उखाड़ना = बीती बातों को छेड़ना।
गड़े मुर्दे उखाड़ने से अच्छा है कि भविष्य की सुध ली जाए।

40. गुदड़ी का लाल = देखने में सामान्य, भीतर से गुणी व्यक्ति।
लाल बहादुर शास्त्री वास्तव में गुदड़ी के लाल थे।

41. गुड़-गोबर होना = बात बिगड़ जाना।
सारा कार्यक्रम पूरी शानो-शौकत से चल रहा था कि अचानक बारिश आ जाने से सारा गुड़-गोबर हो गया।

42. घी के दीए जलाना = बहुत खुश होना।
विकलांग रमेश जब परीक्षा में प्रथम आया तो उसकी माँ ने घी के दीए जलाए।

43. घर सिर पर उठाना = बहुत शोर करना।
अरे बच्चो, शांत हो जाओ। घर सिर पर क्यों उठा रखा

44. घाट-घाट का पानी पीना = जगह-जगह का अनुभव
प्राप्त करना। तुम रतनलाल को इतनी आसानी से नहीं फंसा सकते, उसने घाट-घाट का पानी पी रखा है।

45. घोड़े बेचकर सोना = निश्चित होकर गहरी नींद सोना।
जब से कमल की परीक्षाएँ समाप्त हुई हैं, वह घोड़े बेचकर सो रहा है।

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46. घाव पर नमक छिड़कना = दु:खी को और सताना।
एक तो रमाकांत को पहले ही पुत्र के देहांत का शोक है, तुम ऊपर से ज्यादा पूछताछ करके क्यों उनके घाव पर नमक छिड़क रहे हो।

47. चेहरे पर हवाइयाँ उड़ना = डर जाना।
पुलिस द्वारा चारों तरफ से घेर लेने के कारण चोरों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं।

48. चिकना घड़ा होना = जिस पर कुछ असर न हो।
रीना तो चिकना घड़ा हो गई है, माँ-बाप की बातों का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

49. चादर से बाहर पैर फैलाना = सामर्थ्य से अधिक खर्च
करना। सोच-समझकर ही खर्च करने में अक्लमंदी है क्योंकि चादर से बाहर पैर फैलाना ठीक नहीं।

50. चोली-दामन का साथ होना = घना संबंधा
परिश्रम और सफलता का तो चोली-दामन का साथ है।

51. छाती पर साँप लोटना = दूसरे की तरक्की देखकर जलना।
पड़ोसिन के पास सोने के जेवरात देखकर पूनम की छाती पर साँप लोटने लगे।

52. छठी का दूध याद आना = कठिनाई का अनुभव होना।
बिना परिश्रम के परीक्षा में बैठने से अनिल को छठी का दूध याद आ गया।

53. छाती पर मूंग दलना = बहुत तंग करना।
रामलाल के मेहमान साल भर उसकी छाती पर मूंग दलते रहते हैं।

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54. छोटा मुँह बड़ी बात = अपनी सीमा से बढ़कर बोलना।
कमल तो छोटा मुँह बड़ी बात ही करता है, उसकी बातों का बुरा मत मानना।

55. जूती चाटना = खुशामद करना।
आज के युवा नौकरी पाने के लिए दूसरों की जूती चाटते फिरते हैं।

56. जान पर खेलना = जोखिम उठाना।
बच्चे को शेर से बचाने के लिए वह बहादुर नौजवान जान पर खेल गया।

57. टका सा जवाब देना = साफ इंकार करना।
मैंने कुछ दिनों के लिए विमल से साइकिल माँगी तो उसने टका सा जवाब दे दिया।

58. तूती बोलना = बहुत प्रभाव होना।
कृष्णकांत के समाज-सेवी होने की तृती सारे शहर में बोल रही है।

59. तिल धरने की जगह न होना = बहुत भीड़ होना।
आज की सभा में इतनी भीड़ थी कि तिल धरने की जगह भी नहीं थी।

60. दाँत काटी रोटी होना = पक्की दोस्ती होना।
रमेश और सुरेश के बीच दाँत काटी रोटी वाली बात है, कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

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61. दाँत खट्टे करना = बुरी तरह हराना।
हमारी सेना ने दुश्मन सेना के दाँत खट्टे कर दिए।

62. दाहिना हाथ होना = बहुत बड़ा सहायक होना।
पुलिस ने एक मुठभेड़ में उस कुख्यात अपराधी के दाहिने हाथ सुक्खा को मार गिराया।

63. दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करना = अधिकाधिक उन्नति।
भगवान करे, तुम दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करो।

64. धरती पर पाँव न पड़ना = अभिमान से भरा होना।
जब से रोता का पति प्रबंधक के पद पर नियुक्त हुआ है, तभी से उसके पाँव धरती पर नहीं पड रहे।

65. नमक हलाल होना = कृतज्ञ होना।
मुझे अपने मालिक के लिए यह कार्य करके उनका नमक हलाल बनना है।

66. निन्यानवे के फेर में पड़ना = रुपये की चिंता करते रहना।
तुम जब से निन्यानवे के फेर में पड़े हो, घर की तरफ से लापरवाह होते जा रहे हो।

67. नौ-दो ग्यारह होना = भाग जाना।
पुलिस को देखते ही चोर नौ-दो ग्यारह हो गया।

68. पर निकलना = स्वच्छदं हो जाना।
कॉलेज में दाखिला लेते ही सारिका के पर निकलने लगे हैं।

69. पहाड़ टूटना = बहुत भारी कष्ट आ जाना।
पिता की आकस्मिक मृत्यु से विमल पर तो मानो पहाड़ ही टूट पड़ा है।

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70. पगड़ी उछालना = अपमानित करना।
बड़े-बूढ़ों की पगड़ी उछालना अच्छी बात नहीं है।

71, पाँव उखड़ जाना = स्थिर न रह पाना।
पुलिस की गोलियों की बौछार के आगे आतंकवादियों के पाँव जल्दी ही उखड़ गए।

72. पारा उतरना = क्रोध शांत होना।
जब तुम्हारा पारा उतरेगा, तभी तुम्हें अपनी गलती का अहसास होगा।

73. पानी-पानी हो जाना = अत्यंत लन्जित होना।
कक्षा में जब सरिता की कलई खुल गई तो वह पानी-पानी हो गई।

74. फूंक-फूंक कर कदम रखना = बड़ी सावधानी से काम करना।
जब से वीरेन्द्र ने अपने साझीदार से व्यापार में धोखा खाया है, वह हर कदम फूंक-फूंक कर रखता है।

75, फूला न समाना = बहुत प्रसन्न होना।
जब से भूपेश का नाम मैडिकल कालेज की प्रवेश-सूची में आया है, वह फूला नहीं समा रहा।

76. बाग-बाग होना = बहुत प्रसन्न होना।
रीता और कांता जब भी मिलती हैं, तो उनके दिल बाग-बाग हो जाते हैं।

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77. बहती गंगा में हाथ धोना = अवसर का फायदा उठाना।
तुम भी क्यों नहीं बहती गंगा में हाथ धो लेते, आखिर तुम्हारा मित्र मंत्री जो बन गया है।

78. बाल बांका न होना = कुछ हानि न होना।
मेरे रहते कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर पाएगा।

79. मुंह की खाना = सबके सामने पराजित होना।
औरंगजेब ने कई बार शिवाजी पर चढ़ाई की, पर सदा मुँह की खाई।

80. मुंह में पानी भर आना = जी ललचाना।
विवाह में अनेकों प्रकार के व्यंजन देखकर बारातियों के मुँह में पानी भर आया।

81. मुट्ठी गरम करना = रिश्वत देना।
कचहरी में काम करवाने के लिए मुझे क्लों की मुट्ठी गरम करनी पड़ी।

82. लहू का चूंट पीकर रह जाना = अपमान सहन कर लेना।
द्रौपदी का अपमान होते देखकर भीम लहू का यूंट पीकर रह गया।

83. लकीर का फकीर होना = रूढ़िवादी होना।
श्यामलाल तो लकीर का फकीर है, बेटी के विवाह में सारी पुरानी रस्में निभाएगा।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

84. लाल-पीला होना = क्रोध करना।
परीक्षा में बेटे की असफलता से पिताजी लाल-पीले होने लगे।

85. सोने पर सुहागा होना = अच्छी चीज का और अच्छा होना।
साधना सुंदर होने के साथ-साथ गुणवती भी है, सोने पर सुहागा है।

86. हाथ मलना = पछताना।
अवसर का फायदा उठाने में ही समझदारी है वरना बाद में हाथ मलते रह जाओगे।

87. हथेली पर सरसों उगाना = असंभव काम को संभव करना।
हिम्मती लोगों के लिए हथेली पर सरसों उगाना बाएं हाथ का काम है।

88. हवाई किले बनाना = काल्पनिक इरादे प्रकट करना।
हवाई किले बनाने से जीवन में सफलता नहीं मिलती, कुछ ठोस काम करके दिखाओ।

89. हवा लगना = शोक लगना।
सीधे-सादे सुनील को भी कॉलेज पहुँचते ही वहाँ की हवा लग गई।

90. हुक्का-पानी बंद करना = मेल-जोल या व्यवहार बंद करना।
गलत आचरण के कारण समाज ने विनोद का हुक्का-पानी बंद कर दिया।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

लोकोक्तियाँ

1. अंत भला सो भला = अच्छे काम का अंत अच्छा ही
होता है। मनोज तुम्हें कितना भी परेशान करे मगर तुम उसका काम कर दो। अंत भला सो भला।

2. अधजल गगरी छलकत जाए = ओछा मनुष्य दिखावा अधिक करता है।
अनिल ने थोड़ा बहुत कंप्यूटर चलाना क्या सीख लिया, स्वयं को इंजीनियर मानने लगा है – अधजल गगरी छलकत जाए।

3. अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग = सब की अलग-अलग राय होना।
यहाँ अनेक विरोधी दल हैं कोई किसी की बात का समर्थन नहीं करता – सब की अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग जो ठहरा।

4. अंधा क्या चाहे दो आंखें = मुंहमांगी वस्तु मिलना।
रामपाल को पढ़ाई में परेशानी हो रही थी, एक दिन एक अध्यापक उसके किराएदार के रूप में आ गया। बस अंधा क्या चाहे दो आंखें।

5. अब पछताए क्या होत जब चिड़ियां चुग गई खेत = नुकसान होने के बाद पछताने से क्या लाभा।
पूरे साल तो पढ़ाई की बजाय आवारागर्दी की और अब फेल होने पर रोते हो, अब पछताए क्या होत है जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।

6. अंधा क्या जाने बसंत की बहार = अनभिज्ञ आदमी को आनंद नहीं मिल सकता।
अजय को कामायनी में क्या दिलचस्पी होगी क्योंकि वह तो पांचवी पास है, अंधा क्या जाने बसंत की बहार।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

7. आम के आम गुठलियों के दाम = दुगुना लाभ।
मैंने जितने में पुस्तक खरीदी थी, उतने ही मूल्य में साल भर पढ़ने के बाद बेच दी। इसी को कहते हैं – आम के आम गुठलियों के दाम।

8. आँख के अंधे नाम नैनसुख = काम के प्रतिकूल नाम होना।
नाम तो तुम्हारा सर्वप्रिय है मगर सबसे लड़ते रहे हो। तुम्हारे लिए ठीक ही कहा गया है – आँख के अंधे नाम नैनसुख।

9. आगे कुआँ पीछे खाई = दोनों ओर मुसीबत।
अगर दोस्त की मदद करता हूं तो पत्नी नाराज होती है और अगर नहीं करता तो दोस्त नाराज होता है। मेरे लिए तो आगे कुऔं पीछे खाई है।

10. आधा तीतर, आधा बटेर = बेमेल वस्तुओं का एक साथ होना।
अरे ! ये क्या फैशन है, धोती कुर्ते के साथ हैट-बूट। लगता है, आधा तीतर, आधा बटेर।

11. आ बैल मुझे मार = जान-बूझकर मुसीबत मोल लेना।
पहले तो सभी को बुला लिया, अब खर्चे का रोना रोते हो। सच है – आ बैल मुझे मार।।

12. आग लगने पर कुआँ खोदना = मुसीबत पूरी तरह से
आ जाने पर बचाव के उपाय करना। पूरे साल तो बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान नहीं दिया और जब परीक्षा सिर पर है तो अध्यापक से ट्यूशन के लिए कहते हो। आग लगने पर कुआँ खोदते हो।

13. आँख के अंधे, गाँठ के पूरे = मूर्ख परन्तु धनी।
राजकुमार जी तो पूरी तरह से इस कहावत को चरितार्थ करते हैं कि आँख के अंधे, गाँठ के पूरे।

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14. उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे = दोषी व्यक्ति ही निदोष को डाटने लगे।
एक तो मेरे रुपये लौटाते नहीं हो और ऊपर से पुलिस को बुलाने की धमकी देते हो। यह भी खूब रही उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।

15. ऊँची दुकान फीका पकवान = दिखावा अधिक, पर भीतर से खोखला।
सेठ रामदयाल की दानवीरता के चर्चे सुनकर हम अपनी संस्था के लिए चंदा माँगने गए तो उन्होंने मात्र पांच रुपये में टरका दिया। सच है – ऊँची दुकान फीका पकवान।

16. एक अनार सौ बीमार = चीज कम, पर चाहने वाले अधिक।
गाँव भर में डॉक्टर एक है और मरीज हर घर में। एक अनार सौ बीमार वाली स्थिति है।

17. एक पंथ दो काज = एक ही उपाय से दो लाभा
ऑफिस के काम से कानपुर जा रहा हूँ, वहाँ बड़े भाई साहब से भी मिल लूँगा – एक पंथ दो काज हो जाएंगे।

18, ओस चाटे प्यास नहीं बुझती = बड़े काम के लिए विशेष
प्रयत्न की आवश्यकता होती है। कारखाना लगाना चाहते हो और वह भी चार-पाँच हजार रुपयों में, ओस चाटे प्यास नहीं बुझती।

19. ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर = कठिन काम को करने में कष्ट सहने पड़ते हैं।
जब तुमने समाज-सेवा करने की ठान ही ली है तो छोटे-मोटे कष्टों से क्या घबराना, जब ओखली में सिर दिया तो मूसलों से क्या डर।

20. कंगाली में आटा गीला = एक कष्ट पर दूसरा कष्ट।
एक तो बेरोजगारी से मैं वैसे ही परेशान था, उस पर चोरी ने मेरे लिए तो कंगाली में आटा गीला करने वाली बात कर

21. का वर्षा जब कृषि सुखाने = अवसर बीत जाने पर सहायता व्यर्थ है।
जब मुझे रुपयों की आवश्यकता थी तब आपने दिए नहीं, अब मैं इन रुपयों का क्या करूँ ? का वर्षा जब कृषि सुखाने।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

22. काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती = बेईमानी बार-बार नहीं फलती।
मसालों में मिलावट करके रतनलाल कई बार ग्राहकों को ठग चुका था, अब की बार रंगे हाथों पकड़ा गया। आखिर काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती।

23. कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली = दो व्यक्तियों की प्रतिष्ठा में जमीन-आसमान का अंतर।
मात्र दो कहानियाँ लिखकर अपनी तुलना प्रेमचंद से करते हो = अरे, कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली।

24. खग ही जाने खग की भाषा = साथी ही साधी का स्वभाव जानता है।
मेरी अपेक्षा तुम ही भूपेश से बात करो, वह तुम्हारा दोस्त भी है। ठीक है न, खग ही जाने खग की भाषा।

25. खोदा पहाड़ी निकली चुहिया = अधिक मेहनत करने पर कम फल मिलना।
सारा दिन मेहनत करने पर मजदुरी मात्र दस रुपये मिली. सोचा था कि बीस मिलेंगे। यह तो वही हुआ खोदा पहाड़ निकली चुहिया।

26. गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास = अवसरवादी होना।
तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास किया जाए, तुम एक बात पर तो टिकते नहीं। तुम्हारे लिए ही किसी ने कहा है – गंगा गए गंगादास, जमुना गए जमुनादास।

27. घर की मुर्गी दाल बराबर = घर की चीज की कद्र नहीं होती।
तुम्हारे बड़े भाई साहब खुद एक वकील हैं और तुम सलाह लेने दूसरों के पास जाते हो। यह तो वही बात हुई घर की मुर्गी दाल बराबर।

28. चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए = बहुत कंजूस होना।
मोहनलाल एक सप्ताह से बीमार है, पर खर्चे के कारण डॉक्टर को नहीं बुलाना चाहता। उसके लिए तो चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए वाली बात होती है।

29. दाल-भात में मूसरचंद = हर बात में टांग अड़ाने वाला।
हम अपना झगड़ा खुद सुलझा रहे थे कि कमल ने बीच में आकर दाल-भात में मूसरचन्द वाली बात कर दी।

HBSE 8th Class Hindi Vyakaran मुहावरे-लोकोक्तियाँ

30. दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम = संशय के कारण दोनों तरफ से हानि।
बेटे को या तो दुकान पर बिठा लो या पढ़ाई पूरी करने दो, वरना उसकी हालत भी ‘दुविधा में दोनों गए, माया मिली न राम’ वाली हो जाएगी।

31. नौ नकद न तेरह उधार = काफी उधार देने के स्थान पर थोड़ा नकद अच्छा है।
अगले महीने तीन हजार देने के वायदे से अच्छा है कि अभी दो हजार दे दो, नौ नकद न तेरह उधार।

32. न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी = झगड़े की जड़ ही नष्ट कर देना।
अगर दोनों परिवारों के बीच झगड़ा इस पेड़ को ही लेकर है तो इसे काट डालो या बेच दो, न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।

33. बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद = अयोग्य को किसी गुणवान की पहचान नहीं होती।
तुमने कभी कश्मीर के सेब खाए हैं जो उन्हें खट्टा बता रहे हो – बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद।

34. भागते चोर की लंगोटी भली = सब कुछ नष्ट होता देख, कुछ बचा लेना अच्छा है।
किरायेदार एक साल का किराया दिए बिना ही भाग गया, मगर गिरवी पड़े जेवर छोड़ गया। मैंने सोचा-भागते चोर की लंगोटी भली।

35. साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे = ऐसी युक्ति, जिससे काम भी बन जाए और हानि भी न हो।
उस पहलवान से सीधे क्यों लड़ते हो, कोई ऐसी युक्ति निकालो कि पॉप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

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HBSE 7th Class Hindi Vyakaran वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ

Haryana State Board HBSE 7th Class Hindi Solutions Hindi Vyakaran Vakya-Rachana ki Ashudhiyan वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 7th Class Hindi Vyakaran वाक्य-रचना की अशुद्धियाँ

वाक्य-रचना की अशुद्धधियाँ निम्नलिखित प्रकार की हो सकती हैं :

HBSE 7th Class Hindi रचना वाक्य विचार

अशुद्धशुद्ध
1. हमारा लक्ष्य देश की चहुमुखी प्रगति होनी चाहिए।हमारा लक्ष्य देश की चहुंमुखी प्रगति होना चाहिए।
2. क्या आप पढ़ लिए हैं?क्या आपने पड़ लिया है?
3. क्या आप आ सकोगे?क्या आप आ सकेंग?
4. प्रधानाचार्य अध्यापक को बुलाए।प्रधानाचार्य ने अध्यापक को बुलाया।
5. सुरेश को योगेश को और मोहन को कल मैंने साथ-साथ देखा था।मैंने सुरेश, योगेश और मोहन को कल साथसाथ देखा था।
6. यहाँ पर कल एक लड़का और लड़की बैठी थी।यहाँ पर कल एक लड़का और लड़की बैठे थे।
7. तुम मेरे मित्र हो मैं आपको भली-भाँति जानता हूँ।तुम मेरे मित्र हो मैं तुम्हें भली-भाँति जानता हूँ।
8 उत्तम चरित्र-निर्माण हमारे लक्ष्य होने चाहिए।उत्तम चरित्र-निर्माण हमारा लक्ष्य होना चाहिए।
9. सावित्री जो सत्यवान की पत्नी थी, वह एक पतिव्रता नारी थी।सत्यवान की पत्नी सावित्री एक पतिव्रता नारी थी।
10. महात्मा गांधी का देश सदा आभारी रहेगा।देश महात्मा गांधी का सदा आभारी रहेगा।
11. केवल यहाँ दो पुस्तकें रखी हैं।यहाँ केवल दो पुस्तकें रखी हैं।
12. खरगोश को काटकर गाजर खिलाओ।गाजर काटकर खरगोश को खिलाओ।
13. हमारे बैल इधर-उधर भटकते हुए पड़ोसियों के खेत में जा पहुंचे।इधर-उधर भटकते हुए हमारे बैल पड़ोसियों के खेत में जा पहुंचे।
14. एक फूलों की माला ले आइए।फूलों की एक माला ले आइए।
15. पुस्तकें ये किसकी हैं ?ये पुस्तकें किसकी हैं?
16. प्रस्तुत पंक्तिया सरोज स्मृति से ली हैं।प्रस्तुत पंक्तियाँ सरोज स्मृति से ली गई हैं।
17. प्रयोग के आधार पर हिंदी शब्दों को दो भागों में विभक्त किया है।प्रयोग के आधार पर हिंदी शब्दों को दो भागों में विभक्त किया गया है।
18. अध्यापक से हिंदी पढ़ाई है।अध्यापक से हिंदी पड़ी है।
19. पुलिस ने डाकुओं का पीछा किया गया।पुलिस के द्वारा डाकुओं का पीछा किया गया।
20. अध्यापक ने हमसे लेख लिखाया।अध्यापक ने हमसे लेख लिखवाया।
21. डाकुओं ने चौकी लूटी गई।डाकुओं द्वारा चौकी लूटी गई।
22. मैं आम खाया गया।मुझसे आम खाया गया।
23. अध्यापक ने कहा गया कि कल सभी छात्र पुस्तकें न लाओ।अध्यापक दवारा कहा गया कि कल सभी छात्र पुस्तकें न लाएँ।
24. हन ने घर गया और सोया।मोहन घर गया और सो गया।
25. सभा में क्रोध प्रकट किया गया।सभा में रोष प्रकट किया गया।
26. पिछले वर्ष यहाँ भूख की भारी घटनाएँ हुईं।पिछले वर्ष यहाँ भुखमरी की भारी घटनाएँ हुईं।
27. जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कथा चरितार्थ होती है।जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ होती है।
28. विष्णु पद में चंद्रमा को देखो।आकाश में चंद्रमा को देखो।
29. उनका मूड़ काट दिया।उसका सिर काट दिया।
30. मकान गिर जाने का संदेह है।मकान गिर जाने का डर है।
31. मैंने उसे एक पुस्तक समर्पण की।मैंने उसे एक पुस्तक समर्पित की।
32. मैंने ऐसा करना पहले से निश्चय कर रखा था।मैंने ऐसा करना पहले से निश्चित कर रखा था।
33. फसल नाश हो गई।फसल नष्ट हो गई। मुझे ईश्वर पर विश्वास है।
34. मुझे ईश्वर पर आत्म-विश्वास है।यह बात निश्चित रूप से नहीं कही जा सकती।
35. यह बात निश्चय रूप से नहीं कही जा सकती।यह शब्द लुप्त हो गया।
36 ह शब्द लोप हो गया।तुम सबसे सुन्दर हो।
37. तुम सबसे सुन्दरतम हो।वहाँ कोई जगह नहीं है।
38. वहाँ कोई एक जगह नहीं है।किसी और लड़के को भेज दो।
39. किसी और दूसरे लड़के को भेज दो।पुरुषों ने साहस न छोड़ा।
40. पुरुषों ने अपना साहस न छोड़ा।यह उत्तम है।
41. यह सबसे उत्तम है।इसमें प्राणीमात्र का कल्याण है।
42. इसमें समस्त प्राणीमात्र का कल्याण है।प्रायः लोग ऐसा मानते हैं।
43. प्राय: सभी लोग ऐसा मानते हैं।मुझे बहुत प्यास लगी है।
44. मुझे भारी प्यास लगी है।उसे बहुत कष्ट उठाना पड़ा।
45. उसे बेशुमार कष्ट उठाना पड़ा।जीवन और साहित्य का घनिष्ठ संबंध है।
46. जीवन और साहित्य का घोर संबंध है।वह नीरोग हो गया।
47. वह आरोग्य हो गया।वे बहुत अच्छे अध्यापक हैं।
48. वे बड़े अच्छे अध्यापक हैं।वहाँ बहुत भीड़ जमा थी।
49. वहाँ भारी-भरकम भीड़ जमा थी।गोपाल तो पूरा खिलाड़ी है।
50. गोपाल तो निपट खिलाड़ी है।यह एक गंभीर समस्या है।
51. यह एक गहरी समस्या है।वह अपना शेष जीवन यहीं बिताएँगे।
52. वह अपना भावी जीवन यहीं बिताएँगे।उसकी तबीयत नासाज है।
53. उसकी तबीयत नाशाद है।डाकुओं द्वारा चौकी लूटी गई।

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