Class 8

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

HBSE 8th Class Hindi बस की यात्रा Textbook Questions and Answers

कारण बताएँ

प्रश्न 1.
“मैंने उस कंपनी के हिस्सेदार की तरफ पहली बार श्रद्धाभाव से देखा।”
लेखक के मन में हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा क्यों जग गई ?
उत्तर:
लेखक के मन में बस कंपनी के हिस्सेदार साहब के लिए श्रद्धा इसलिए जाग गई कि वह इतनी खटारा बस को चलाने का साहस जुटा रहा था। कंपनी का हिस्सेदार अपनी पुरानी बस की खूब तारीफ कर रहा था। ऐसे व्यक्ति के प्रति श्रद्धा भाव ही उमड़ता है।

प्रश्न 2.
“लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफर नहीं करते।”
लोगों ने यह सलाह क्यों दी?
उत्तर:
लोगों ने लेखक को यह सलाह इसलिए दी क्योंकि इस बस का कोई भरोसा नहीं है कि यह कब और कहाँ रुक जाए, शाम बीतते ही रात हो जाती है और रात रास्ते में कहाँ बितानी पड़ जाए। कुछ पता नहीं रहता। उनके अनुसार यह बस डाकिन की तरह है।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

प्रश्न 3.
“ऐसा जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं।”
लेखक को ऐसा क्यों लगा ?
उत्तर:
जब बस का इंजन स्टार्ट हुआ तब सारी बस झनझनाने लगी। लेखक को ऐसा प्रतीत हुआ कि पूरी बस ही इंजन है। मानो वह बस के भीतर न बैठकर इंजन के भीतर बैठा हुआ हो।

प्रश्न 4.
“गजब हो गया। ऐसी बस अपने आप चलती है।”
लेखक को यह सुनकर हैरानी क्यों हुई ?
उत्तर:
लेखक ने बस की बुरी हालत देखकर बस-कंपनी के हिस्सेदार से पूछा था कि क्या यह बस चलती भी है। तब उसने उत्तर दिया था कि हाँ, यह बस भली प्रकार चलती है और अपने आप चलती है। यह सुनकर लेखक को हैरानी हुई कि इतनी जर्जर बस बिना धक्का दिए अपने आप चलती है।

प्रश्न 5.
“मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था।”
लेखक पेड़ों को दुश्मन क्यों समझ रहा था?
उत्तर:
लेखक को पेड़ों से डर इसलिए लग रहा था कि कहीं उसकी बस किसी पेड़ से टकरा न जाए। एक पेड़ के निकल जाने पर वह दसरे पेड़ का इंतजार करता कि बस कहीं इस पेड़ से न टकरा जाए। उसे हर पेड़ अपना दुश्मन लग रहा था।

पाठ से आगे

प्रश्न 1.
‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ किसके नेतृत्व में, किस उद्देश्य से तथा कब हुआ था? इतिहास की उपलब्धत पुस्तकों के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन महात्मा गाँधी के नेतृत्व में 1930 में अंग्रेजी सरकार से असहयोग करने तथा स्वराज पारित के लिए किया गया था।

प्रश्न 2.
सविनय अवज्ञा का उपयोग व्यंग्यकार ने किस रूप में किया है? लिखिए।
उत्तर:
सविनय अवज्ञा आंदोलन 1930 में सरकारी आदेशों का पालन न करने के लिए किया गया था। इसमें अंग्रेजी सरकार के साथ सहयोग न करने की भावना थी। 12 मार्च 1930 को इसी कड़ी में दांडी मार्च किया गया। नमक कानून 1930 में तोड़ा गया। लेखक ने इसका उपयोग इस संदर्भ में किया है कि आंदोलन के दौरान जिस प्रकार अंग्रेजों के दमन पूर्वक कार्यों से भारतीय जनता झकी नहीं विनम्रपूर्वक अपने संघर्ष में बढ़ी रही उसी प्रकार यह बस भी अपने खटारा और टूटी-फूटी होने के बावजूद चल ही रही है या कहें कि चलाई जा रही है। बस का ढाँचा जवाब दे रहा था, किंतु वह चल ही रही थी।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

प्रश्न 3.
आप अपनी किसी यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभवों को याद करते हुए एक लेख लिखिए।
उत्तर:
कुछ समय पूर्व की बात है चाचा जी के बुलावे पर मैं और मेरा मित्र रोहित ऊधमपुर जाने के लिए तैयार हुए। तैयारी अचानक बन गई अतः आरक्षण की व्यवस्था नहीं हो पाई। सामान्य डिब्बे से ही सफर करना पड़ा। यह विचार बना कि गाड़ी से पठानकोट तक चला जाए। उसके बाद सांबा तक बस द्वारा व वहाँ से उधमपुर। अधिक सामान की आवश्यकता नहीं थी अतः एक बैग लेकर दिल्ली जंक्शन के प्लेटफार्म नं. 11 की ओर रुख किया। T.V. स्क्रीन से पता चला कि गाड़ी प्लेटफार्म पर पहुँचने वाली है। हमने टिकट लिए। खुले पैसे की कमी से 6 रुपए का नुकसान उठाना पड़ा। गाड़ी प्लेटफार्म पर लग चुकी थी। हम पुल से नीचे उतरकर जनरल डिब्बे की ओर चल पड़े। बोतल का पानी रास्ते में ही समाप्त हो चुका था।

अतः यह तय हुआ कि रोहित पानी ले आए। ठंडे पानी की मशीन पर लगर खाने जैसी भीड़ हो रही थी। जैसे तैसे पानी भरकर डिब्बे में सवार हो गए। यह देखकर हम खुश थे कि अधिक भीड़ नहीं थी। लेकिन हमारी यह खुशी पश्चिम बंगाल के मार्क्सवादी शासन (कुशासन) की तरह स्थायी नहीं थी। पता चला कि हाथों में झंडे, डंडे तथा जेब पर बिल्ले लगाए किसान यूनियन के लोग इसी डिब्बे पर नजरे गड़ाए लपके आ रहे थे। महिलाओं, पुरुषों और बच्चों ने थोड़ी ही देर में डिब्बे को रैली स्थल में बदल दिया। हालत यह थी कि अब हम चाहकर बाहर भी नहीं जा सकते थे। शाहरूख खान के ‘छैयाँ-छैयाँ’ वाले गाने के स्मरण ने मन को कुछ-कुछ राहत दी।

मन बहलाना

अनुमान कीजिए यदि बस जीवित प्राणी होती, वह बोल सकती तो वह अपनी बुरी हालत और भारी बोझ के कष्ट को किन शब्दों में व्यक्त करती? लिखिए।
मैं एक बहुत पुरानी और बूढी बस हूँ। मेरी हालत जर्जर हो चुकी है। अब मैं लंबी यात्रा करने लायक नहीं रह गई हूँ। मैं तो थोड़ा-बहुत टहल ही सकती हूँ। मुझ पर सवारियों का बोझ मत लादो। मैं तुम्हारा बोझ सहन नहीं कर सकती। मैं इस बोझ से दबकर दम तोड़ दूंगी। अब तो मैं एक वृद्धा की तरह हूँ। तुम्हें तो मेरा सम्मान करना चाहिए। तुम मेरे कष्टों को बढ़ाओ मत। अब मुझे चलने में तकलीफ होती है। अब मैं आराम करना चाहती हूँ। मुझे चैन से रहने दो।

भाषा की बात

1. बस, वश, बस तीन शब्द हैं-इनमें बस सवारी के अर्थ में, वश अधीनता के अर्थ में और बस पर्याप्त (काफी) के अर्थ में प्रयुक्त होता है जैसे- बस से चलना होगा। मेरे वश में नहीं है। अब बस करो।
उपर्युक्त वाक्य के समान तीनों शब्दों से युक्त आप भी दो-दो वाक्य बनाइए।
बस : 1. यह बस बहुत सुविधाजनक है।
2. मेरठ से बस का सफर दो घंटे का है।

वश : 1. इस स्थिति पर मेरा वश नहीं है।
2. यह काम सरकार के वश में ही है।

बस : 1. तुम्हें बस झगड़ना ही आता है।
2. बस मैं नहीं जा सकता।

2. “हम पाँच मित्रों ने तय किया कि शाम चार बजे की बस से चलें। पन्ना से इसी कंपनी की बस सतना के लिए घंटे भर बाद मिलती है।” ने, की, से आदि शब्द वाक्य के दो शब्दों के बीच संबंध स्थापित कर रहे हैं। ऐसे शब्दों को कारक कहते हैं। इसी तरह जब दो वाक्यों को एक साथ जोड़ना होता है ‘कि’ का प्रयोग होता है।

कहानी में से दोनों प्रकार के चार वाक्यों को चुनिए।
→ बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी।

  • हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी।
  • मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है
  • झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।

3. “हम फौरन खिड़की से दूर सरक गए। चाँदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी।” ‘सरकना’ और ‘रेंगना’ जैसी क्रिया दो प्रकार की गति बताती है। ऐसी कुछ और क्रियाएँ एकत्र कीजिए जो गति के लिए प्रयुक्त होती हैं, जैसे-घूमना इत्यादि। उन्हें वाक्यों में प्रयोग कीजिए।

  • पकड़ना – हमने गाड़ी पकड़नी चाही।
  • धड़कना – दिल तेजी से धड़क रहा था।

4. “काँच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था।”
इस वाक्य में ‘बच’ शब्द को दो तरह से प्रयोग किया गया है। एक ‘शेष’ के अर्थ में और दूसरा सुरक्षा के अर्थ में।
नीचे दिए गए शब्दों को वाक्यों में प्रयोग करके देखो। ध्यान रहे, एक ही शब्द वाक्य में दो बार आना चाहिए, और शब्दों के अर्थ में कुछ बदलाव होना चाहिए।
(क) जल
(ख) फल
(ग) हार।
जल : नदियों का जल पवित्र होता है।
वह आग से जल गया।

फल : फल खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है।
अच्छे काम का अच्छा फल मिलता है।

हार : गले का हार सुंदर है।
हम मैच हार गए।

5. भाषा की दृष्टि से देखें तो हमारी बोलचाल में प्रचलित अंग्रेजी शब्द फर्स्ट क्लास में दो शब्द हैं-फर्स्ट और क्लास। क्लास का विशेषण है फर्स्ट। चूँकि फर्स्ट संख्या है, फर्स्ट क्लास संख्यावाचक विशेषण का उदाहरण है। महान आदमी में किसी आदमी की विशेषता है महान। यह गुणवाचक विशेषण है। संख्यावाचक विशेषण और गुणवाचक विशेषण के उदाहरण खोजकर लिखिए।
चतुर व्यक्ति, सुंदर स्त्री, सच्चा आदमी। – गुणवाचक विशेषण
तीसरा आदमी, चार अमरूद। संख्यावाचक विशेषण

बस की यात्रा Summary in Hindi

बस की यात्रा पाठ का सार

लेखक और उसके मित्रों ने तय किया कि वे शाम चार बजे की बस से पन्ना जाएँगे। वहाँ से इसी कंपनी की बस सतना के लिए एक घंटे बाद मिलती है जो जबलपुर की ट्रेन मिला (पकड़ा) देती है। दो लोगों को सुबह काम पर हाजिर होना था अतः यह रास्ता अपनाना ठीक समझा गया। यद्यपि समझदार लोगों ने शाम की बस से सफर करने को मना किया था, पर वे माने नहीं। बस बहुत बूढी अर्थात् पुरानी थी। उन लोगों को लगा कि यह बस तो पूजा के योग्य है क्योंकि इसकी दशा वृद्धा स्त्री के समान थी। बस कंपनी के हिस्सेदार ने बताया कि यह बस भली प्रकार चलती है। डॉक्टर मित्र ने कहा कि यह बस अनुभवी है और हमें बेटों की तरह गोद में लेकर चलेगी। लेखक को विदा करने आए लोगों ने ऐसा भाव प्रकट किया कि मानो वे उन्हें अंतिम विदा दे रहे हों।

खैर बस का इंजन स्टार्ट हो गया। बस के अधिकांश शीशे टूटे हुए थे। उन लोगों को लगा कि इंजन उनकी सीट के नीचे है। वैसे बस के सभी हिस्से एक-दूसरे से असहयोग कर रहे थे। एकाएक बस रुक गई। पता चला पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। बस का ड्राइवर बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे नली से इंजन में पहुँचाने लगा। लेखक को अब बस के किसी हिस्से का भरोसा नहीं था। उसे डर लगने लगा कि बस किसी पेड़ से टकरा जाएगी। बस फिर रुक गई। उसका इंजन खोलकर ठीक किया गया तो वह बहुत धीमी रफ्तार से चलने लगी। बस पुलिया पर पहुंची ही थी उसका एक टायर फट गया। वह तो बस की स्पीड कम थी अन्यथा वह नाले में जा गिरती। लेखक बस को श्रद्धाभाव से देखने लगा। काफी देर में एक पुराना घिसा हुआ टायर लगाया गया तब वह कहीं चली। लेखक ने समय पर पन्ना पहुँचने की उम्मीद छोड़ दी थी। अब तो हँसी-मजाक चालू हो गया।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 3 बस की यात्रा

बस की यात्रा शब्दार्थ

तय = निश्चित (Fix), वयोवृद्ध = आयु से बूढ़े (Old person), वृद्धावस्था = वृद्ध अवस्था = बुढ़ापा (Old age), विश्वसनीय = विश्वास (भरोसा) करने लायक (Faithful), अंतिम = आखिरी (Last), निमित्त = बहाना (Cause), स्टार्ट = चालू (Start),रंक = गरीब (Poor), असहयोग = अ+असहयोग = सहयोग न करना (Non co-operation), सविनय = स+विनय = विनयपूर्वक (Respectfully), अवज्ञा = आज्ञा न मानना (Not obey order), ब्रेक फेल = ब्रेकों का काम न करना (Brake fail), दृश्य = नजारा (Scene), इत्तफाक = संयोग (By chance), अंत्येष्टि = अंतिम संस्कार (Last ceremony), उत्सर्ग = बलिदान (Sacrifice), बेताबी = बेचैनी (Restlessness).।

बस की यात्रा गद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

1. बस को देखा तो श्रद्धा उमड़ पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदियों के अनुभव के निशान लिए हुए थी। लोग इसलिए इससे सफर नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा
प्रसंग:
प्रस्तुत गद्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘वसंत. भाग-3’ में संकलित पाठ ‘बस की यात्रा’ से अवतरित है। यह पाठ हास्य-व्यंग्य में रचा गया है। इसके लेखक हैं प्रसिद्ध व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई।।

व्याख्या : इस गद्यांश में लेखक ने बस की जीर्ण-शीर्ण दशा पर व्यंग्य किया है। बस बहुत पुरानी थी। इस बस को देखकर वृद्ध स्त्री का दृश्य सामने आ रहा था। इस बस को देखकर लेखक के पान में श्रद्धा भावना उत्पन्न हुई। यह बस बहुत बूढ़ी अर्थात् पुरानी (कबाड़) थी। इसकी हालत देखकर लगता था कि यह सदियों का अनुभव अपने अंदर समेटे हुए है। जिस प्रकार कोई नूढी स्त्री अनुभवी होती है, वही दशा इस बस की थी। लेखक व्यंग्य करते हुए कहता है कि लोग इसमें सफर करने से इसलिए कतराते थे कि बुढ़ापे में चलते समय इसे कष्ट होगा। वृद्ध व्यक्ति तो पूजा करने के योग्य होता है अतः इस पुरानी बस की भी पूजा ही की जानी चाहिए। भला इस पर सवारी कैसे की जा सकती है।

यहाँ व्यंग्य यह है कि बस की हालत इतनी जर्जर थी कि वह सामान्य ढंग से चल ही नहीं सकती थी। उसकी हालत खस्ता थी।

2. बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि यह गाँधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दूसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुजर रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता सीट बॉडी को छोड़कर आगे निकल गई है। कभी लगता कि सीट को छोड़कर बॉडी आगे भागी जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेदभाव मिट गए। यह समझ में नही आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हम पर बैठी है।

प्रसंग : प्रस्तुत गद्यांश हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना ‘बस की यात्रा’ से लिया गया है। लेखक पुरानी बस में यात्रा के अनुभव को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत करता है।

व्याख्या : लेखक और उसके मित्र पुरानी खटारा बस में सवार हो गए। बस का चलना कठिन लग रहा था, पर वह बस चल ही पड़ी। लेखक को लगा कि यह बस उस समय जरूर जवान रही होगी जब महात्मा गाँधी का असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था। (व्यंग्य यह है कि बस की खस्ता हालत को देखकर लेखक ने इसे असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय बताया अर्थात् बस बहुत पुरानी थी) मानो इसे इस प्रकार की पूरी ट्रेनिंग मिल चुकी थी। बस भलीभाँति जानती थी। कि किस प्रकार असहयोग किया जाता है। बस का हर कल-पुर्जा एक दूसरे से असहयोग कर रहा था अर्थात् उनमें कोई तालमेल न था। बस की सीटें बस की बॉडी से अलग हो रही थीं। कभी सीट बस की बॉडी से आगे निकल जाती थी तो कभी बॉडी सीट को पीछे छोड़कर आगे चली जाती थी। यह आँख-मिचौली का खेल 8-10 मील तक चलता रहा। फिर सारे अंतर मिट गए। लेखक की समझ में यह नहीं आ रहा था कि वह सीट पर बैठा है अथवा सीट उसके ऊपर चढ़ी है।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 8th Class Hindi लाख की चूड़ियाँ Textbook Questions and Answers

कहानी से

प्रश्न 1.
बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव चाव से क्यों जाता था और बदलू को ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ क्यों कहता था? ..
उत्तर:
बचपन में लेखक अपने मामा के गाँव बड़े चाव के साथ जाता था। उसके चाव का कारण यह था कि वहाँ उसे ढेर सारी लाख की रंग-बिरंगी गोलियाँ मिलती थीं। ये गोलियाँ उसका मन मोह लेती थीं। बदलू लेखक के मामा के गाँव का था अतः उसे उसको ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था, पर वह ‘बदलू मामा’ न कहकर ‘बदलू काका’ कहता था। इसका कारण यह था कि गाँव के सभी बच्चे उसे ‘बदलू काका’ ही कहा करते थे। लेखक भी उनकी देखा-देखी उसे ‘बदलू काका’ ही कहता था।

प्रश्न 2.
वस्तु विनिमय क्या है? विनिमय की प्रचलित पद्धति क्या है?
उत्तर:
‘वस्तु विनिमय’ में एक वस्तु को दूसरी वस्तु देकर लिया जाता था। वस्तु के लिए पैसे नहीं लिए जाते थे। वस्तु के बदले वस्तु ली-दी जाती थी। लोग अनाज देकर चूड़ियाँ ले लेते थे।

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प्रश्न 3.
“मशीनी युग ने कितने हाथ काट दिए हैं।’-पंक्ति में लेखक ने किस व्यथा की ओर संकेत किया है?
उत्तर:
इस पंक्ति में लेखक ने इस व्यथा की ओर संकेत किया है कि मशीनों के आगमन के साथ कारीगरों के हाथों से काम-धंधा छिन गया। मानो उनके हाथ ही कट गए हों। मशीनों ने लोगों को बेरोजगार बना दिया। .

प्रश्न 4.
बदलू के मन में ऐसी कौन-सी व्यथा थी, जो लेखक से छिपी न रह सकी?
उत्तर:
बदलू के मन में इस बात की व्यथा की मशीनी युग के प्रभावस्वरूप उस जैसे अनेक कारीगरों को बेरोजगारी और उपेक्षा का शिकार होना पड़ा है। अब लोग कारीगरी की कद्र न करके दिखावटी चमक पर अधिक ध्यान देते हैं। ।

प्रश्न 5.
मशीनी युग से बदलू के जीवन में क्या बदलाव आया?
उत्तर:
मशीनी युग से बदलू के जीवन में यह बदलाव आया कि वह बेरोजगार हो गया। काम न करने से उसका शरीर भी ढल गया, उसके हाथों-माथे पर नसें उभर आईं। अब वह बीमार रहने लगा।

कहानी से आगे

प्रश्न 1.
आपने मेले-बाजार आदि में हाथ से बनी चीजों को बिकते देखा होगा। आपके मन में किसी चीज को बनाने की कला को सीखने की इच्छा हुई हो और आपने कोई कारीगरी सीखने का प्रयास किया हो तो उसके विषय में लिखिए।
उत्तर:
मैंने मेले-बाजार में तरह-तरह की रंग-बिरंगी काँच के छोटे-छोटे बीकरों में रखी मोमबत्तियाँ बिकती देखीं। मेरे मन में भी यह इच्छा उत्पन्न हुई कि मैं भी इनको बनाने की कला सीखू। मैंने हस्तशिल्प कार्यशाला में एक सप्ताह का प्रशिक्षण लिया। अब मैं स्वयं इस प्रकार की कलात्मक मोमबत्तियाँ आसानी से बना लेता हूँ। मैं इनकी बिक्री करके कुछ धन भी कमा लेता हूँ।

प्रश्न 2.
लाख की वस्तुओं का निर्माण भारत के किन-किन राज्यों में होता है? लाख से चूड़ियों के अतिरिक्त क्या-क्या चीजें बनती हैं? ज्ञात कीजिए।
उत्तर:
लाख की वस्तुओं का निर्माण राजस्थान में सबसे अधिक होता है। यह काम गुजरात में भी होता है क्योंकि यह राज्य राजस्थान से सटा हुआ है। – लाख से चूड़ियाँ बनती हैं। – लाख से खिलौने बनते हैं।

अनुमान और कल्पना

प्रश्न 1.
घर में मेहमान आने पर आप उसका अतिथि-सत्कार कैसे करेंगे?
उत्तर:
घर में मेहमान आने पर हम उन्हें आदर सहित बिठाएँगे।

  • उनके आने पर प्रसन्नता प्रकट करेंगे।
  • उन्हें पीने के लिए चाय, कॉफी, लस्सी या शर्बत देंगे।
  • बाद में उन्हें खाना खिलाएँगे।
  • उनके साथ प्रेमपूर्वक बातचीत करेंगे।

प्रश्न 2.
आपको अपनी छुट्टियों में किसके घर जाना सबसे अच्छा लगता है? वहाँ की दिनचर्या लिखिए। अलग कैसे होती है?
उत्तर:
हमें छुट्टियों में अपने नाना-नानी के घर जाना सबसे अच्छा लगता है, क्योंकि वे हमें बहुत प्यार करते हैं। वहाँ की दिनचर्या बहुत ही मस्ती भरी होती है। वहाँ हमें स्कूल जाने की चिंता नहीं होती। अतः हम वहाँ देर तक सोते हैं और धूप निकल आने पर उठते हैं। वहाँ हम आस-पास के बच्चों के साथ घूमने जाते हैं। घर पर हमें नाश्ता भी बड़ा मजेदार मिलता है। नाश्ता करके हम खेलने निकल जाते हैं। दोपहर का खाना काफी देर से होता है। घर के आँगन में खेलते-कूदते और मस्ती करते हैं। इस प्रकार दिन भर मौज-मस्ती चलती रहती है।

प्रश्न 3.
मशीनी युग में अनेक परिवर्तन आए दिन होते रहते हैं। आप अपने आस-पास से इस प्रकार के किसी परिवर्तन का उदाहरण चुनिए और उसके बारे में लिखिए।
उत्तर:
मशीनी युग में अनेक परिवर्तन आए दिन होते रहते हैं। हमारे आस-पास भी इस प्रकार के परिवर्तन होते रहते हैं। पहले हमारे घर के पास कई स्त्रियाँ दाल पीसने का काम करती थीं। वे बड़ी-बड़ी सिलों पर पत्थर के बट्टों से दाल पीसकर कुछ रुपए कमा लेती थीं। प्रायः हलवाई उनसे दाल पिसवाते थे। अब दाल पीसने की मशीनें आ गई हैं। अब वही काम मशीन थोड़ी ही देर में कर देती है। इससे उनका काम छिन गया है।

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प्रश्न 4.
बाजार में बिकने वाले सामानों की डिज़ाइनों में हमेशा परिवर्तन होता रहता है। आप इन परिवर्तनों को किस प्रकार देखते हैं। आपस में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
बाजार में अनेक प्रकार के सामान बिकते हैं। इनमें खाने-पीने के सामानों के अतिरिक्त पहनने-ओढ़ने के कपड़े भी होते हैं। मनोरंजन के भी बहुत सामान बाजार में मिलते हैं। इन सामानों में डिजाइनों में हमेशा परिवर्तन आता रहता है, विशेषकर कपड़ों के डिजाइनों में।

प्रश्न 5.
हमारे खान-पान, रहन-सहन और कपड़ों में भी बदलाव आ रहा है। इस बदलाव के पक्ष-विपक्ष में बातचीत कीजिए और बातचीत के आधार पर लेख तैयार कीजिए।
उत्तर:
आज के युग में हमारे खान-पान, रहन-सहन तथा कपड़ों में अनेक प्रकार के बदलाव आ रहे हैं। इस बदलाव के पक्षविपक्ष में बड़े लोगों से बातचीत करने पर यह कहा जा सकता है: बदलाव प्रकृति का नियम है। हर युग में बदलाव आता रहा है और आता रहेगा। इस बदलाव को कोई रोक नहीं सकता। यद्यपि बड़े लोग इसे देर से स्वीकार करते हैं, पर युवा पीढ़ी इसे तुरंत अपना लेती है। बड़े लोग इसे फैशन का नाम दे देते हैं तथा प्रारंभ में इसका विरोध करते हैं, पर कुछ समय बीत जाने के उपरांत वे भी इसे स्वीकार कर लेते हैं।

भाषा की बात

1. ‘बदलू को किसी बात से चिढ़ थी तो काँच की चूड़ियों से’ और बदलू स्वयं कहता है।-“जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है लाख में कहाँ संभव है?” ये पंक्तियाँ बदलू की दो प्रकार की मनोदशाओं को सामने लाती हैं। दूसरी पंक्ति में उसके मन की पीड़ा है। इसमें व्यंग्य भी है। हारे हुए मन.से, या दुखी मन से अथवा व्यंग्य में बोले गए वाक्यों के अर्थ सामान्य नहीं होते। कुछ व्यंग्य वाक्यों को ध्यानपूर्वक समझकर एकत्र कीजिए और उनके भीतरी अर्थ की व्याख्या करके लिखिए।

‘वहाँ की औरतें अपने मरद का हाथ पकड़कर सड़कों पर घूमती भी हैं और फिर उनकी कलाइयाँ नाजुक होती हैं। लाख की चूड़ियाँ पहनें तो मोच न आ जाए।’
→ इस कथन में शहरी स्त्रियों पर व्यंग्य किया गया है। शहर की औरतों को बेशर्म बताया गया है क्योंकि वे सड़कों पर अपने मर्द (पति) का हाथ पकड़कर घूमती हैं।

→ दूसरा व्यंग्य उनकी कलाई की नाजुकता पर किया गया है कि वे लाख की चूड़ियों का बोझ झेल ही नहीं सकती।

→ ‘आजकल सब काम मशीन से होता है। जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?

→ बदलू मशीनी युग पर व्यंग्य करता है। मशीनों ने लोगों को बेरोजगार बना दिया। लोग सुंदरता के पीछे भागते हैं, मजबूती की परवाह किसे है।

2. बदलू कहानी में दृष्टि से पात्र है और भाषा की बात (व्याकरण) की दृष्टि से संज्ञा है। किसी भी व्यक्ति, स्थान, वस्तु, विचार अथवा भाव को संज्ञा कहते हैं। संज्ञा को तीन भेदों में बांटा गया है –
(क) व्यक्तिवाचक संज्ञा जैसे-शहर, गाँव, पतली-मोटी, गोल, चिकना इत्यादि

(ख) जातिवाचक संज्ञा जैसे–चरित्र, स्वभाव, वजन, आकार आदि द्वारा जानी जाने वाली संज्ञा।

(ग) भाववाचक संज्ञा, जैसे–सुंदरता, नाजुक, प्रसन्नता इत्यादि जिसमें कोई व्यक्ति नहीं है और न आकार, वचन परंतु उसका अनुभव होता है। पाठ से तीनों प्रकार की संज्ञाएँ चुनकर लिखिए।

  • व्यक्तिवाचक संज्ञाएँ – रज्जो, बदलू
  • जातिवाचक संज्ञाएँ – चूड़ियाँ, स्त्रियाँ, काँच, सड़क, काका, मशीन, चारपाई, गोली।
  • भाववाचक संज्ञाएँ – पढ़ाई, सुंदरता, व्यथा
  • गाँव की बोली के शब्द : मरद (मर्द), लला (लाल), बखत (वक्त), मचिया (खाट), पियाज (प्याज), तमाखू (तंबाकू) आदि।

3. गाँव की बोली में कई शब्दों के उच्चारण बदल जाते हैं। कहानी में बदलू बक्त (समय) को बखत, उम्र (वय/आयु) को उमर कहता है। इस तरह के अन्य शब्दों को खोजिए जिनके रूप में परिवर्तन हुआ हो, अर्थ में नहीं।
विद्यार्थी स्वयं करों

HBSE 8th Class Hindi लाख की चूड़ियाँ Important Questions and Answers

प्रश्न 1.
बदलू कौन था? उसका व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था और वास्तव में वह बहुत ही सुंदर चूड़ियाँ बनाता था। उसकी बनाई हुई चूड़ियों की खपत भी बहुत. थी। उस गाँव में तो सभी स्त्रियाँ उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ पहनती ही थीं आस-पास के गाँवों के लोग भी उससे चूड़ियाँ ले जाते थे परंतु वह कभी भी चूड़ियों को पैसों से बेचता न था। उसका अभी तक वस्तु-विनिमय का तरीका था और लोग अनाज के बदले उससे चूड़ियाँ ले जाते थे। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। कभी भी उसे किसी से झगड़ते नहीं देखा गया।

प्रश्न 2.
जब कई वर्ष बाद लेखक बदलू से मिलने गया तब उसने क्या शिकायत की?
उत्तर:
बदलू ने लेखक को बताया कि उसका काम तो कई साल से बंद है। उसकी बनाई हुई चूड़ियाँ कोई पूछे तब तो। गाँव-गाँव में काँच का प्रचार हो गया है। वह कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, मशीन युग है न यह, लला! आजकल सब काम मशीन से होता है। खेत भी मशीन से जोते जाते हैं और फिर जो सुंदरता काँच की चूड़ियों में होती है, लाख में कहाँ संभव है?

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

प्रश्न 3.
बदलू लेखक को मलाई क्यों नहीं खिला पाया?
उत्तर:
पहले बदलू के पास एक गाय थी। वह उसके दूध की मलाई लेखक को खिलाया करता था। अब वह गाय बिक चुकी थी क्योंकि बदलू के पास उसको खिलाने को कुछ नहीं था अतः अब मलाई होती ही न थी।

लाख की चूड़ियाँ गद्यांशों पर आधारित अर्थग्रहण संबंधी प्रश्न

1. वैसे तो मेरे मामा के गाँव का होने के कारण मुझे बदलू को ‘बदलू मामा’ कहना चाहिए था परंतु मैं उसे ‘बदलू मामा’ न कहकर बदलू काका कहा करता था जैसा कि गाँव के सभी बच्चे उसे कहा करते थे। बदलू का मकान कुछ ऊँचे पर बना था। मकान के सामने बड़ा-सा सहन था जिसमें एक पुराना नीम का वृक्ष लगा था। उसी के नीचे बैठकर बदलू अपना काम किया करता था। बगल में भट्ठी दहकती रहती जिसमें वह लाख पिघलाया करता।

सामने एक लकड़ी की चौखट पड़ी रहती जिस पर लाख के मुलायम होने पर वह उसे सलाख के समान पतला करके चूड़ी का आकार देता। पास में चार-छह विभिन्न आकार की बेलननुमा मुंगेरियाँ रखो रहतीं जो आगे से कुछ पतली और पीछे से मोटी होतीं। लाख की चूड़ी का आकार देकर वह उन्हें मुंगेरियों पर चढ़ाकर गोल और चिकना बनाता और तब एक-एक कर पूरे हाथ की चूड़ियाँ बना चुकने के पश्चात वह उन पर रंग करता।
प्रश्न:
1. लेखक को बदलू को किस संबोधन से पुकारना चाहिए था पर वह किस संबोधन से पुकारता था और क्यों?
2. बदलू का मकान कैसा था?
3. बदलू अपना काम कहाँ करता था?
4. वह अपना काम कैसे करता था?
5. वह किससे चूड़ी बनाता था तथा कैसे?
उत्तर:
1. लेखक को बदलू को ‘मामा’ से संबोधित करना चाहिए था क्योंकि वह उसके मामा के गाँव से था, पर वह उसे ‘बदलू काका’ कहकर संबोधित करता था क्योंकि गाँव के सभी बच्चे उसे ‘बदलू काका’ ही कहते थे।
2. बदलू का मकान कुछ ऊँचाई पर बना था। उसके मकान के सामने बड़ा सा आँगन था और उसमें नीम का पेड़ लगा हुआ था।
3. बदलू नीम के पेड़ के नीचे बैठकर अपना काम करता था।
4. वह दहकती भट्ठी पर लाख पिघलाता रहता था। वह लाख को मुलायम करके चूड़ी का आकार देता। इसके लिए वह विभिन्न आकार की मुंगरियों पर चढ़ाकर गोल करता था?
5. वह लाख से चूड़ी बनाता था। इसके बाद वह चूड़ियों पर रंग करता था।

2. मैं बहुधा हर गर्मी की छुट्टी में अपने मामा के यहाँ चला जाता और एक-आध महीने वहाँ रहकर स्कूल खुलने के समय तक वापस आ जाता। परंतु दो-तीन बार ही मैं अपने मामा के यहाँ गया होऊँगा। जब मेरे पिता की एक दूर के शहर में बदली हो गई और एक लंबी अवधि तक मैं अपने मामा के गाँव न जा सका। तब लगभग आठ-दस वर्षों के बाद जब मैं वहाँ गया तो इतना बड़ा हो चुका था कि लाख की गोलियों में मेरी रूचि नहीं रह गई थी। अत: गाँव में होते हुए भी कई दिनों तक मुझे बदलू का ध्यान न आया।

इस बीच मैंने देखा कि गाँव में लगभग सभी स्त्रियाँ काँच की चूड़ियाँ पहने हैं। विरले ही हाथों में मैंने लाख की चूड़ियाँ देखीं। तब एक दिन सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया। बात यह हुई कि बरसात में मेरे मामा की छोटी लड़की आँगन में फिसलकर गिर पड़ी और उसके हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई और उससे खून बहने लगा। मेरे मामा उस समय घर पर न थे। मुझे ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी। तभी सहसा मुझे बदलू का ध्यान हो आया और मैंने सोचा कि उससे मिल आऊँ। अतः शाम को मैं घूमते-घूमते उसके घर चला गया। बदलू वहीं चबूतरे पर नीम के नीचे एक खाट पर लेटा था।
प्रश्न:
1. लेखक काफी समय तक मामा के गाँव क्यों नहीं जा सका?
2. वहाँ जाकर लेखक ने स्त्रियों में क्या परिवर्तन देखा?
3. लेखक को बदलू की याद कैसे आई?
4. लेखक को बदलू कहाँ मिला?
उत्तर:
1. लेखक के पिता की बदली किसी दूर के शहर में हो गई थी। इसी कारण वह 8-10 वर्षों तक मामा के गाँव नहीं जा सका।
2. लंबे समय के बाद जब लेखक मामा के गाँव गया तो उसने देखा कि अब वहाँ की अधिकांश स्त्रियाँ लाख की चूड़ियों के स्थान पर काँच की चूड़ियाँ पहने हुए हैं। किसी-किसी स्त्री ने ही लाख की चूड़ी पहन रखी थी।
3. लेखक की मामा की छोटी लड़की के हाथ की काँच की चूड़ी टूटकर उसकी कलाई में घुस गई थी और खून बहने लगा था। उस समय उसके मामा घर पर नहीं थे और लेखक को ही उसकी मरहम-पट्टी करनी पड़ी थी। तभी उसे बदलू की याद हो आई।
4. जब लेखक बदलू से मिलने उसके घर गया तब वह उसे | चबूतरे पर नीम के पेड़ के नीचे एक खाट पर लेटा हुआ मिला।

लाख की चूड़ियाँ Summary in Hindi

लाख की चूड़ियाँ पाठ का सार

लेखक को सारे गाँव में बदलू सबसे अच्छा लगता था क्योंकि वह उसे लाख की सुंदर-सुंदर गोलियाँ बनाकर देता था। लेखक उसे ‘बदलू काका’ कहा करता था। बदलू काका नीम के पेड़ के नीचे बैठकर दहकती भट्ठी पर लाख पिघला कर उसे चूड़ी का आकार देता था। वह बेलननुमा मुँगेरियों पर लाख को चढ़ाकर उसे चूड़ियों का आकार देता था और बाद में उन पर रंग करता था। वह बीच-बीच में हुक्का पीता रहता था। वह बचपन में लेखक को ‘लला’ कहता था और एक मचिया पर बिठाता था। वहीं लेखक उसे चूड़ियाँ बनाते देखता रहता था। बदलू मनिहार था। चूड़ियाँ बनाना उसका पैतृक पेशा था। गाँव की सभी स्त्रियाँ उसी की बनाई चूड़ियाँ पहनती थीं। बदलू स्वभाव से बहुत सीधा था। विवाह के अवसर पर उसकी चूड़ियों का मूल्य बढ़ जाता था। वह काँच की चूड़ियों से चिढ़ता था।

वह लेखक से बचपन में उसकी पढ़ाई के बारे में पूछता रहता था। कभी-कभी बदलू उसकी अच्छी खातिर भी करता था। बदलू उसके लिए लाख की एक-दो गोलियाँ बना देता था। बदलू लेखक के मामा के गाँव में रहता था। लेखक के पिता की बदली दूर के शहर में हो गई थी। अतः वह लंबे समय तक मामा के गाँव न जा सका। जब वह गाँव गया तो उसने गाँव की लगभग सभी स्त्रियों को काँच की चूड़ियाँ पहने देखा। एक शाम को वह बदलू से मिला तो सहसा उसने लेखक को पहचाना नहीं। फिर लेखक ने अपना नाम जनार्दन बताकर गोलियों की बात याद दिलाई, लेकिन वह फिर भी चुप रहा। बदलू ने उसे बताया कि अब उसका लाख की चूड़ियाँ बनाने का काम कई साल से बंद है क्योंकि अब उसकी बनाई चूड़ियों की पूछ नहीं होती। सभी को काँच की सुंदर चूड़ियाँ चाहिए। अब तक बदलू का शरीर भी ढल चुका था। उसे बुरी तरह खाँसी आ रही थी। उसके मन में व्यथा छिपी थी, जिसे लेखक ने भाँप लिया।

लेखक ने विषय बदलने के लिए पूछा-काका, अब की आम की फसल कैसी है? उसने जवाब दिया-अच्छी है और यह कहकर उसके लिए अपनी बेटी से कहकर आम मँगवाए। फिर लेखक ने गाय के बारे में पूछा तो वह बोला-गाय को दो साल पहले बेच दिया, कहाँ से खिलाता उसे? तभी उसकी बेटी रज्जो एक डलिया में ढेर से आम ले आई। बेटी ने चार-पाँच सिंदूरी आम छाँटकर उसे दे दिए। लेखक ने देखा कि रज्जो की गोरी-गोरी कलाइयों पर लाख की चूड़ियाँ फब रही थीं। बदलू बोला-यही आखिरी जोड़ा बनाया था, जमींदार साहब की बेटी के लिए। वे दस आने दे रहे थे, बदलू ने वह जोड़ा नहीं दिया और कह दिया-शहर से ले आओ। लेखक को यह सुनकर प्रसन्नता हुई कि बदलू ने हारकर भी हार नहीं मानी। उसका व्यक्तित्व टूटने वाला नहीं था।

HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 2 लाख की चूड़ियाँ

लाख की चूड़ियाँ शब्दार्थ

विभिन्न = तरह-तरह की (Different), पैतृक = पिता का (Paternal), विनिमय = बदल-बदल (Exchange), नाजुक = कोमल (Tender), विरले = कोई-कोई (not common), स्मृति पटल = मस्तिष्क में याद (Memory), अतीत = पुराना समय (old period), व्यथा = मन की तकलीफ (Agony)।

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HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 1 ध्वनि

Haryana State Board HBSE 8th Class Hindi Solutions Vasant Chapter 1 ध्वनि Textbook Exercise Questions and Answers.

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HBSE 8th Class Hindi ध्वनि Textbook Questions and Answers

कहानी से

प्रश्न 1.
कवि को ऐसा विश्वास क्यों है कि उसका अंत अभी नहीं होगा?
उत्तर:
कवि को ऐसा विश्वांस इसलिए है कि अभी उसके जीवन में काफी उत्साह और ऊर्जा है। वह युवा पीढ़ी को आलस्य की दशा से उबारना चाहता है। अभी उसे का काम करना है। वह स्वयं को काम के सर्वथा उपयुक्त माना है।

प्रश्न 2.
फूलों को अनंत तक विकसित करने के लिए कवि कौन-कौन-सा प्रयास करता है?
उत्तर:
फूलों को अनंत तक विकसित करने के लिए कवि उन्हें कलियों की स्थिति से निकालकर खिले फूल बनाना चाहता है। वह कलियों पर वासंती स्पर्श का हाथ फेरकर खिला देगा। वह युवकों को काव्य-प्रेरणा से अनंत का द्वारं दिखा देमा।

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प्रश्न 3.
कवि पुष्पों की तन्द्रा और आलस्य दूर हटाने के लिए क्या करना चाहता है?
उत्तर:
कवि पुष्पों की तन्द्रा (नींद) और आलस्य को दूर | हटाने के लिए उन पर हाथ फेरेगा और उनको खिला देगा। जो काम वसंत करता है, वही काम कवि भी करेगा। कलियाँ आलस्य में पड़े युवकों की प्रतीक हैं। वह उनके आलस्य को दूर भगा देगा।

कविता से आगे

प्रश्न 1.
वसंत को ऋतुराज क्यों कहा जाता है? आपस में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
वसंत को ऋतुराज कहा जाता है क्योंकि यह सभी ऋतुओं का राजा है। वसंत को सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना जाता है। इस ऋतु में प्रकृति पूरे यौवन पर होती है। इस ऋतु में उसकी छटा देखते ही बनती है। यह ऋतु मुर्दो में भी जान डाल देती है। यह ऋतु सभी को अच्छी लगती है।

प्रश्न 2.
वसंत ऋतु में आने वाले त्योहारों के विषय में जानकारी एकत्र कीजिए और किसी एक त्योहार पर निबंध लिखिए।
उत्तर:
वसंत ऋतु में आने वाले त्योहार – वसंत पंचमी : वसंत पंचमी पर सर्दी घटने लगती है। लोग पीले वस्त्र पहनते हैं तथा पीली वस्तुएँ खाते हैं। बागों में बहार चरम सीमा पर होती है।

महाशिवरात्रि : भगवान शंकर की पूजा-अर्जना की जाती है। यज्ञ तथा मेलों आदि का आयोजन होता है।

होली : यह फागुन मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। यह मस्ती भरा त्योहार है। यह रंगों का त्योहार है। भारत विभिन्न ऋतुओं का देश है। वसंत को ऋतुराज की संज्ञा दी जाती है। रंगों का त्योहार होली ऋतुराज वसंत के आने का सूचक है। शीत ऋतु के उपरांत वसंत में प्रकृति अनगिनत रंगों के फूलों से सज जाती है। सर्वत्र प्रकृति के रंग-बिरंगे का ही साम्राज्य होता है। रंग-बिरंगे पुष्प एवं सरसों के पीले पुष्पों को देखकर मन प्रसन्न हो जाता है

और मस्ती में झूम उठता है। इस रंग-बिरंगे वसंत में ही होली का शुभागमन होता है। होली का त्योहार प्रति वर्ष फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली का त्योहार दो दिन तक प्रमुख रूप से मनाया जाता है। पूर्णिमा की रात्रि को होलिका दहन होता है। लोग रात को अपने घरों में ही होली जलाते हैं तथा रबी की फसल की जौ और गेहूँ आदि की बालियाँ भूनते हैं। परस्पर भूने अन्न के दानों का आदान-प्रदान करते हुए अभिवादन करते हैं। अगले दिन प्रातः से ही सभी आबाल वृद्ध एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाते हैं। एक दूसरे के गले मिलते हैं। सभी भेद-भाव भुलाकर रंग डालते हैं। लोगों के चेहरे और कपड़े रंग-बिरंगे हो जाते हैं। लोग मस्ती में गाते, बजाते, नाचते हैं। इस प्रकार होली पारस्परिक प्रेम और सौहार्द का परिचायक है।

रंगों के पर्व होली का पौराणिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से भी विशेष महत्त्व हैं। एक पौराणिक आख्यान के अनुसार हिरण्यकश्यप नामक दैत्यराज था। वह अत्यंत अत्याचारी एवं क्रूर था। उसने भक्त स्वभाव के अपने पुत्र प्रह्लाद पर अनेक अत्याचार किए। हिरण्यकश्यप चाहता था कि प्रह्लाद अपने पिता को ही भगवान् माने। इसलिए वह ईश्वर भक्त प्रहलाद से सदैव कुद्ध रहता था। अनेक अत्याचारों के असफल होने पर उसने एक अंतिम उपाय किया। हिरण्यकश्यप की एक होलिका नाम की बहन थी जिसे आग में न जलने का वरदान प्राप्त था। उसने होलिका के सहयोग से प्रहलाद को जलाने की बात सोची। वह फाल्गुन मास की पूर्णिमा को प्रह्लाद की गोद में लेकर आग में बैठ गई। भगवान् की कृपा से होलिका तो जल गई परंतु प्रहलाद सकुशल बच गया। कहते हैं कि तभी से इस दिन होलिका का दहन किया जाता है। एक ऐसी भी मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव ने तीसरा नेत्र खोलकर कामदेव को भस्म किया था। अतः यह पर्व मदन-दहन पर्व बन गया।

रंगों का त्योहार होली हमें पारस्परिक प्रेम एवं सौहार्द का संदेश देता है। इस दिन शत्रु भी अपनी शत्रुता भूलकर मित्र बन जाते हैं, परंतु कुछ लोग अपनी विकृत मानसिकता का प्रयोग होली में करते हैं। वे शराब पीकर ऊद्यम मचाते हैं, कई बार प्रदूषित रंगों से आँखों एवं चमड़ी के रोग हो जाते हैं। उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। हमें शालीनता के साथ गुलाल लगाकर प्रेमपूर्वक होली खेलनी चाहिए ताकि समाज में स्नेह एवं प्रेम का सौहार्द बढ़े।

प्रश्न 3.
“ऋतु परिवर्तन का जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है”-इस कथन की पुष्टि आप किन-किन बातों से कर सकते हैं? लिखिए।
उत्तर:
लोगों के जीवन पर ऋतु-परिवर्तन का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ता है। शीत ऋतु में हम काँपते रहते हैं तो वसंत ऋतु का आगमन हमें मस्ती एवं उल्लास से भर देता है। फिर ग्रीष्म ऋतु का आगमन होता है। धरती तपने लगती है। पसीना छूटता है। लोग वर्षा की कामना करते हैं। वर्षा ऋतु जीवन में उल्लास लेकर आती है। अन्न उपजाने के लिए वर्षा ऋतु की बड़ी आवश्यकता होती है। इस प्रकार सभी ऋतुओं से लोगों का जीवन प्रभावित होता है।

अनुमान और कल्पना

1. कविता की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़कर बताइए कि इनमें किस ऋतु का वर्णन है?
फूटे हैं आमों में बौर
भौंर वन-वन टूटे हैं।
होली मची ठौर-ठौर
सभी बंधन छूटे हैं।

कविता की इन पंक्तियों में वसंत ऋत का वर्णन है। वसंत में ही होली का त्योहार आता है। आमों के बौर भी इसी ऋतु में फूटते हैं।

2. स्वप्न भरे कोमल-कोमल हाथों को अलसाई कलियों पर फेरते हुए कवि कलियों को प्रभात के आने का संदेश देता है, उन्हें जगाना चाहता है और खुशी-खुशी अपने जीवन के अमृत से उन्हें सींचकर हरा-भरा करना चाहता है। फूलों-पौधों के लिए आप क्या-क्या करना चाहेंगे?
हम फूल-पौधों के लिए ये काम करना चाहेंगे:

  • उन्हें पानी से सीचेंगे।
  • उनमें समय-समय पर खाद डालना चाहेंगे।
  • फूलों को पूरी तरह खिलने देंगे। उनको तोड़ेंगे नहीं।

3. कवि अपनी कविता में एक कल्पनाशील कार्य की बात बता रहा है। अनुमान कीजिए और लिखिए कि उसके बताए कार्यों का और किन-किन संदों से संबंध जुड़ सकता है? जैसे नन्हे-मुन्ने बालक को माँ जगा रही हो…
माँ अपने नन्हें-नन्हें बालक को जगाती है। उस पर प्यार भरा हाथ फेरती है।
→ माली भी पौधों पर अपना प्यार भरा हाथ फेरता है, उन्हें सींचता है, उनका विकास करता है।

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भाषा की बात

1. ‘हरे-भरे’, ‘पुष्प-पुष्प’ में एक शब्द की एक ही अर्थ में पुनरावृत्ति हुई है। कविता के ‘हरे-हरे ये पात’ वाक्यांश में ‘हरे-हरे’ शब्द युग्म पत्तों के लिए विशेषण के रूप में प्रयुक्त हुए हैं। यहाँ पात शब्द बहुवचन में प्रयुक्त है। ऐसा प्रयोग भी होता है, जब कर्ता या विशेष्य एकवचन में हो और कर्म या क्रिया या विशेषण बहुवचन में; जैसे-वह लंबी-चौड़ी बातें करने लगा। कविता में एक ही शब्द का एक से अधिक अर्थों में प्रयोग होता है-तीन बेर खाती है तीन बेर खाती है।” जो तीन बार खाती थी वह तीन बेर खाने लगी है। एक शब्द ‘बेर’ का दो अर्थ में प्रयोग करने से वाक्य में चमत्कार आ गया। इसे यमक अलंकार कहा जाता है।

कभी-कभी उच्चारण की समानता से शब्दों की पुनरावृत्ति का आभास होता है। जबकि दोनों दो प्रकार के शब्द होते हैं, जैसे-मन का मनका।

ऐसे वाक्यों को एकत्र कीजिए जिनमें एक ही शब्द की पुनरावृत्ति हो। ऐसे प्रयोगों को ध्यान से देखिए और निम्नलिखित पुनरावृत शब्दों का वाक्य में प्रयोग कीजिए-बातों-बातों में, रह-रहकर, लाल-लाल, सुबह-सुबह, रातों-रात, घड़ी-घड़ी।।

काली घटा का घमंड घटा (घटा बादल की घटा, कम हुआ)

  • माँ का लाल गुस्से में लाल हो गया।
  • रात में घड़ी प्रातःकालीन घड़ी की ओर जा रही थी।
  • कनक कनक तै सौ गुनी मादकता अधिकाय।

2. ‘कोमल गात, मृदुल वसंत, हरे-हरे ये पात’:
विशेषण जिस संज्ञा (या सर्वनाम) की विशेषता बताता है, उसे विशेष्य कहते हैं। ऊपर दिए गए वाक्यांशों में गात, वसंत और पात शब्द विशेष्य हैं, क्योंकि इनकी विशेषता (विशेषण) क्रमशः कोमल, मृदुल और हरे-हरे शब्द बता रहे हैं।

हिंदी विशेषणों के सामान्यतया चार प्रकार माने गए हैं – गुणवाचक विशेषण, परिमाणवाचक विशेषण, संख्यावाचक विशेषण और सार्वनामिक विशेषण।

  • गुणवाचक विशेषण – सुंदर बालक, लंबी मेज
  • परिमाणवाचक विशेषण – दो किलो चीनी, थोड़ा चावल
  • संख्यावाचक विशेषण – चार केले, पाँचवाँ बालक
  • सार्वनामिक विशेषण – वह घर, यह बोतल

कविता से आगे

1. वसंत पर अनेक सुंदर कविताएँ हैं। कुछ कविताओं का संकलन तैयार कीजिए।

2. शब्दकोश में ‘वसंत’ शब्द का अर्थ देखिए। शब्दकोश में शब्दों के अर्थों के अतिरिक्त बहुत-सी अलग तरह की जानकारियाँ भी मिल सकती हैं। उन्हें अपनी कॉपी में लिखिए।

वसंत पर कविताएँ:
ब्रजभाषा के श्रेष्ठ कवि पद्ममाकर ने अपने शब्दों में वसंत की शोभा का वर्णन करते हुए कहा है –
कूलन में केलिन में कछारन में
कंजन में क्यारिन में कलित कलीन किलकत है।
कहै पद्ममाकर पराग हूँ मैं, पोन हूँ मैं
पानन में, पीकन में, पलाशन पगंत है।
कछार में, दिशा में, दूनी में, देश-देशन में
बनन में, बागन में बगरयो वसंत है।
श्री सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने तो वसंत की समृद्धता और ऐश्वर्यता की तुलना मठ के प्रधान महंत से की है :
आए महंत वसंत
मखमल के झले पड़े हाथी-सा टीला
बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
चँवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत
आए महंत वसंत।

शब्दकोश में वसंत के अर्थ:

  • छह ऋतुओं में से एक ऋतु जो चैत्र-वैशाख में आती है
  • कामदेव का सहचर
  • अतिसार
  • एक वृत्त
  • एक राग।

ध्वनि Summary in Hindi

ध्वनि कवि-परिचय

प्रश्न: सूर्यकांत त्रिपाठी “निराला’ का जीवन एवं साहित्य का परिचय दीजिए।
उत्तर:
जीवन-परिचय : निराला जी का जन्म सन् 1897 ई. में बंगाल के महिषादल राज्य में मेदिनीपुर नामक गाँव में हुआ था। इनके पिता श्री रामसहाय त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के जिला उन्नाव के निवासी थे और आजीविका के लिए महिषादल (बंगाल) चले गये थे। निराला की आरंभिक शिक्षा घर पर ही हुई। इन्होंने संस्कृत, बंगला और अंग्रेजी का अध्ययन घर पर ही किया। उनकी साहित्य के अतिरिक्त-दर्शनशास्त्र व संगीत के प्रति रुचि थी। इनकी विचारधारा पर स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद का गहरा प्रभाव पड़ा। अपने निराले व्यक्तित्व के कारण ये हिंदी साहित्य जगत में ‘निराला’ उपनाम से प्रसिद्ध हुए।

रचनाएँ : ‘परिमल’, ‘अनामिका’, ‘गीतिका’, ‘अपरा’, ‘नये पत्ते’, ‘राम की शक्ति-पूजा’, ‘तुलसीदास’ (काव्य) अलका’, ‘निरुपमा’, ‘चोटी की पकड़’ (उपन्यास) ‘लिली’, ‘सखी’, ‘चतुरी चमार’ (कहानी संग्रह) प्रबंध की प्रतिमा’, ‘प्रबंध पद्म’ (निबंध : संग्रह) ‘रवींद्र-कविता-कानन’, ‘पतन और पल्लव’ (आलोचना) ‘समन्वय’, ‘मतवाला’, ‘सुधा’ (पत्रिका) आदि।

साहित्यगत विशेषताएँ : यद्यपि निराला हिंदी-साहित्य में कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं तथापि वे गद्य पर समान अधिकार रखते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा के दर्शन उनकी काव्य रचनाओं एवं उपन्यास, कहानी, निबंध, रेखाचित्र और आलोचना के क्षेत्र में दिखाई देते हैं। पत्र-संपादक के क्षेत्र में भी लौह-लेखनी ने प्रसिद्धि पाई। उनकी आरंभिक कविताओं में छायावाद के दर्शन होते हैं। इसके अतिरिक्त उनकी गणना उच्च कोटि के रहस्यवादी और प्रगतिवादी कवियों में की जाती है। उन्होंने शृंगार, प्रेम, प्रकृति सौंदर्य, राष्ट्र-प्रेम आदि विषयों पर काव्य रचना की। उनके साहित्य में जहाँ दलित समाज के प्रति सहानुभूति का भाव है, वहाँ शोक शोषक वर्ग पर कटु व्यंग्य है।

भाषा-शैली : निराला ने काव्य की पुरानी परंपराओं को त्याग कर काव्य-शैली को नई दिशा प्रदान की। हिंदी काव्य में ‘स्वच्छंद-छंद’ निराला जी की देन है। निराला की कविताओं में संगीतात्मकता है। यद्यपि उनके साहित्य की भाषा तत्सम प्रधान है, तथापि उनकी प्रगतिवादी रचनाएँ बोलचाल की भाषा में हैं।

ध्वनि कविता का सार

इस कविता में कवि निराला कहते हैं कि अभी उनका अंत नहीं होने वाला है। जो आलोचक यह कह रहे थे कि अब निराला के कवि-जीवन का अंत होने वाला है कवि उनको इस कविता के माध्यम से करारा उत्तर देता है। कवि कहता है कि अभी तो उसके कवि-जीवन का उत्कर्ष हुआ है। उसके जीवन में वसंत की बहार आई हुई है। वह अपनी कविताओं के माध्यम से निद्रामग्न युवा पीढ़ी को आशा का संदेश देकर जागृत करेगा। वह एक-एक फूल अर्थात् एक-एक युवक से आलस्य को दूर भगा देगा और उनके जीवन में अमृत सींच देगा। वह उनको स्वर्ग जैसे सुखों का द्वार दिखा देगा। अभी उसे बहुत कुछ करना है। अभी उसका अंत नहीं आया है।

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ध्वनि काव्याशों की सप्रसंग व्याख्या

1. अभी न होगा मेरा अंत
अभी-अभी ही तो आया है
मेरे वन में मृदुल वसंत
अभी न होगा मेरा अंत।
हरे-हरे ये पात,
डालियाँ, कलियाँ, कोमल गात।
मैं ही अपना स्वप्न-मृदुल-कर
फेरूँगा निद्रित कलियों पर
जगा एक प्रत्यूष मनोहर।

शब्दार्थ : मृदुल – कोमल सुखद (Tender), वन = जंगल, बगीचा, जीवन (Garden), अंत = समाप्ति (End), पात – पत्ते (Leaves), गात – शरीर (Body), निद्रित = नींद में (Drowsy), प्रत्यूष = प्रातःकालीन समय (time of early morning), मनोहर = सुंदर (Beautiful), कर * हाथ (Hands)।

प्रसंग : प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित कविता ‘ध्वनि’ से अवतरित है। इसमें कवि अपने कवि जीवन के उत्कर्ष काल का वर्णन करता है।

व्याख्या : कवि आलोचकों को उत्तर देते हुए कहता है कि अभी मेरे कवि-जीवन का अंत नहीं होने वाला है। अभी-अभी तो मेरे जीवन में वसंत की बहार आई है अर्थात् मेरे कवि-जीवन का उत्कर्ष हुआ है। कवि के वन में अर्थात् जीवन में कोमल वसंत का आगमन अभी ही हुआ है। अतः अभी उसका अंत नहीं होने वाला। – अभी उसका शरीरं यौवन की मस्ती से भरपूर है। कवि अपने कोमल हाथों को इन कलियों पर फेरकर उनमें एक प्रात:कालीन सवेरे को जागृत कर देगा। कवि के कहने का भाव यह है कि जो युवक नींद में पड़े हुए हैं, वह उनको प्रेरित करके उनमें नए उत्कर्ष के स्वप्न जगा देगा। वह उनका आलस्य दूर या गलथा उनमें उत्साह का संचार कर देगा।

विशेष :
1. ‘अभी-अभी’, ‘हरे-हरे’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
2. ‘कलियाँ कोमल’ में अनुप्रास अलंकार है।

2. पुष्प-पुष्प से तंद्रालस लालसा खींच लूँगा मैं,
अपने नव जीवन का अमृत सहर्ष सींच दूंगा मैं,
द्वार दिखा दूंगा फिर उनको।
हैं मेरे वे जहाँ अनंत
अभी न होगा मेरा अंत।

शब्दार्थ : पुष्प – फूल (Flower), तंद्रालस = आलस्य (Laziness sleepness), नव = नया (New), सहर्ष = खुशी के साथ (withjoy), द्वार = दरवाजा (Door), अनंत = जिसका अंत न हो (Endless)।

प्रसंग : प्रस्तुत काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित कविता ‘ध्वनि’ से अवतरित है। इसमें कवि अपने कवि-कर्म का परिचय देते हुए कहता है :

व्याख्या : कवि कहता है कि मैं एक-एक फूल से आलस्य . को खींच लूँगा अर्थात् आलस्य में पड़े प्रत्येक युवक के मन से आलस्य की भावना को दूर कर दूंगा और उनके मन में नए जीवन का अमृत प्रसन्नतापूर्वक भर दूंगा। (वसंत भी यही काम करता है। वह लोगों में नव जीवन का संचार करता है।)

कवि युवा वर्ग के मन से आलस्य, निराशा की भावना को दूर करके उनको अमरता का द्वार दिखा देगा। कवि के जीवन में अभी वसंत आया ही है। अतः उसका अभी अंत नहीं होने वाला है।

विशेष:
1. ‘पुष्प-पुष्प’ में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
2. ‘सहर्ष सींच’ में अनुप्रास अलंकार है।
3. खड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) सीमन्तिनीषु का _________ राजा ___________ गुणोत्तमः?
(ख) कं सञ्जघान _________ का _________ गङ्गा?
(ग) के _________ कं _________ न बाधते शीतम्।
(घ) वृक्षाग्रवासी न च _________, _________ न च शूलपाणिः।
उत्तरम्:
(क) सीमन्तिनीषु का शान्ता? राजा कोऽभूत् गुणोत्तमः?
(ख) कं सञ्जघान कृष्णः? का शीतलवाहिनी गङ्गा?
(ग) के दारपोषणरता:? कं बलवन्तं न बाधते शीतम्?
(घ) वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः, त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः

प्रश्न 2.
श्लोकाशान् योजयत-

कि कुर्यात् कातरो युद्धेअत्रैवोक्तं न बुध्यते।
विद्वद्भिः का सदा वन्ध्यातक्रं शक्रस्य दुर्लभम्।
कं स्ज्जघान कृष्णःमृगात् सिह: पलाथते।
कथं विष्णुपदं प्रोक्तंकाशींतलवाहिनी गड़ा।

उत्तरम्:

कि कुर्यात् कातरो युद्धेमृगात् सिह: पलाथते।
विद्वद्भिः का सदा वन्ध्याअत्रैवोक्तं न बुध्यते।
कं स्ज्जघान कृष्णःकाशींतलवाहिनी गड़ा।
कथं विष्णुपदं प्रोक्तंतक्रं शक्रस्य दुर्लभम्।

प्रश्न 3.
उपयुक्तकथनानां समक्षम् ‘आम’ अनुपयुक्तकथनानां समक्ष ‘न’ इति लिखत-
उपयुक्तकथनानां समक्षम् ‘आम’ अनुपयुक्तकथनाना समक्ष ‘न’ इति लिखत-
यथा – सिंहः करिणां कुलं हन्ति। [आम]
(क) कातरो युद्धे युद्ध्यते।
(ख) कस्तूरी मृगात् जायते।
(ग) मृगात् सिंहः पलायते।
(घ) कंस: जघान कृष्णम्।
(ङ) तक शक्रस्य दुर्लभम्।
(च) जयन्तः कृष्णस्य पुत्रः।
उत्तरम्:
(क) कातरो युद्धे युध्यते। [न]
(ख) कस्तूरी मृगात् जायते। [आम]
(ग) मृगात् सिंहः पलायते। [न]
(घ) कंसः जघान कृष्णम्। [न]
(ङ) तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्। [आम]
(च) जयन्तः कृष्णस्य पुत्रः। [न]

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः

प्रश्न 4.
अधोलिखितानां पदानां लिङ्ग विभक्तिं वचनञ्च लिखत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः - 1
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः - 2

प्रश्न 5.
कोष्ठकान्तर्गतानां पदानामुपयुक्तविभक्तिप्रयोगेन अनुच्छेदं पूरयत-
एकः काकः __________ (आकाश) डयमानः आसीत्। तृषार्तः सः __________ (जल) अन्वेषणं करोति। तदा सः __________ (घट) अल्पं __________ (जल) पश्यति। सः __________ (उपल) आनीय __________ (घट) पातयति। जलं __________ (घट) उपरि आगच्छति। __________ (काक) सानन्दं जलं पीत्वा तृप्यति।
उत्तरम्:
एकः काकः आकाशे (आकाश) डयमानः आसीत्। तृषार्तः सः जलस्य (जल) अन्वेषणं करोति। तदा सः घटे (घट) अल्पं जलं (जल) पश्यति। सः उपलान् (उपल) आनीय घटे (घट) पातयति। जलं घटे (घट) उपरि आगच्छति। काकः (काक) सानन्दं जलं पीत्वा तृप्यति।

योग्यता-विस्तारः

प्रस्तुत पाठ में दी गयी पहेलियों के अतिरिक्त कुछ अन्य पहेलियाँ अधोलिखित हैं। उन्हें पढ़कर स्वयं समझने की कोशिश करें और ज्ञानवर्धन करें यदि न समझ पायें तो उत्तर देखें।

(क) चक्री त्रिशूली न हरो न विष्णुः।
महान् बलिष्ठो न च भीमसेनः।
स्वच्छन्दगामी न च नारदोऽपि
सीतावियोगी न च रामचन्द्रः।।

(ख) न तस्यादिर्न तस्यान्तः मध्ये यस्तस्य तिष्ठति।
तवाप्यस्ति ममाप्यस्ति यदि जानासि तद्वद॥

(ग) अपदो दूरगामी च साक्षरो न च पण्डितः।
अमुखः स्फुटवक्ता च यो जानाति स पण्डितः।
उत्तर:
(क) वृषभः
(ख) नयनम्
(ग) पत्रम्

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मूलपाठः

कस्तूरी जायते कस्मात्?
को हन्ति करिणां कुलम्?
किं कुर्यात् कातरो युद्ध?
मृगात् सिंहः पलायते ॥1॥

सीमन्तिनीषु का शान्ता?
राजा कोऽभूत् गुणोत्तमः?
विद्वद्भिः का सदा वन्द्या?
अत्रैवोक्तं न बुध्यते ॥2॥

कं सञ्जधान कृष्णः?
का शीतलवाहिनी गङ्गा?
के दारपोषणरताः?
के बलवन्तं न बाधते शीतम् ॥3॥

वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः
त्रिनेत्रधारौ न च शूलपाणिः।
त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी
जलं च विचन्न घटो न मेघ: ॥4॥

भोजनान्ते च किं पेयम्?
जयन्तः कस्य वै सुतः?
कथं विष्णुपदं प्रोक्तम्?
तक्र शक्रस्य दुर्लभम् ॥5॥

अन्वयः
1. कस्तूरी कस्मात् जायते?
करिणां कुलं कः हन्ति?
कातरः युद्ध किं कुर्यात्?
मृगात् सिंहः पलायते।

2. सीमन्तिनीषु का शान्ता?
क: गुणोत्तमः राजा अभूत?
विद्वद्भिः सदा का वन्द्या?

3. कृष्णः क सञ्जधान?
का शीतलवाहिनी गङ्गा?
के दारपोषणरताः?
शीतं कं बलवन्तं न बाधते?

4. वृक्षाग्रवासी पक्षिराज: च ना
त्रिनेत्रधारी (किन्तु) शूलपाणिः च न।
त्वग्वस्त्रधारी (परन्तु) सिद्धयोगी च न।
जलं च बिभ्रत् न घटः न (च) मेघः।

5. भोजनान्ते कि पेयम्?
जयन्तः कस्य वै सुतः?
विष्णुपदं कथं प्रोक्तम्?
तक्र शक्रस्य दुर्लभम्।

सन्धिविच्छेदः
कोहन्ति = कः + हन्ति।
कातरो युद्धे = कातरः + युद्धे।
कोऽभूत = कः + अभूत् (को + अभूत्)।
गुणोत्तमः = गुण + उत्तमः।
अत्रैवोक्तम् = अत्र + एव + उक्तम्।
वृक्षाग्रवासी = वृक्ष + अग्रवासी।
बिभ्रन्न = ब्रिभत् + न।
भोजनान्ते = भोजन + अन्ते।
प्रोक्तम् = प्र + उक्तम्।

पदार्थबोध:
हन्ति = मारता/ती है (मारयति)।
करिणाम् = हाथियों के (गजानाम्)।
कातरः = कायर (भीत:)।
सीमन्तिनीषु = नारियों में (नारीषु, महिलासु)।
अभूत् = हुआ (अजायत)।
बुध्यते = जाना जाता है (ज्ञायते)।
सञ्जधान = मारा (अमारयत्, अहन्)।
कसञ्जधान् = कंस को मारा (कंसममारयत्)।
शीतलवाहिनी = शीतलधारा वाली (शैत्यवाहिनी)।
काशीतलवाहिनी = काशी की भूमि पर बहने वाली (वाराणसीतलवाहिनी)।
दारपोषणरताः = पत्नी के पोषण में लीन (पत्नीपोषणलीनाः)।
केदारपोषणरताः = खेत के कार्य में संलग्न (क्षेत्रकार्यरताः)।
बलवन्तम् = बलवान् को (शक्तिमन्तम्)।
कम्बलवन्तम् = कम्बल वाले को (कम्बलवस्त्रधारिणम्)।
बाधते = बाधित करता है (सीदति)।
वृक्षाग्रवासी = पेड़ों पर रहने वाला (तरुवासी)।
पक्षिराजः = पक्षियों का राजा (गरुड़) (वैनतेयः)।
त्रिनेत्रधारी = तीन नेत्रों वाला (शिव) (नारिकेलः, शिवः)।
शूलपाणिः = त्रिशूलधारी (शंकरः, शूली)।
त्वम् = त्वचा, छाल (वल्कलः)।
बिभ्रत् = भरा हुआ (परिपूर्णः)।
विष्णुपदम् = मोक्ष (मोक्षः)।
तक्रम् = छाछ, मठा (घृतशेषः)।
शक्रस्य = इन्द्र का (इन्द्रस्य)।
दुर्लभम् = कठिन (कठिनम्)।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 15 प्रहेलिकाः

प्रहेलिकानामुत्तरान्वेषणाय सङ्केताः
प्रथमा प्रहेलिका – अन्तिम चरणे क्रमशः त्रयाणां प्रश्नानां त्रिभिः पदैः उत्तरं दत्तम्।

द्वितीया प्रहेलिका – प्रथम-द्वितीय-तृतीय चरणेषु प्रथमस्य वर्णस्य अन्तिमवर्णेन संयोगात् उत्तरं प्राप्यते।

तृतीया प्रहेलिका – प्रत्येकं चरणे प्रथमद्वितीययोः प्रथमत्रयाणां वा वर्णानां संयोगात् तस्मिन् चरणे प्रस्तुतस्य प्रश्नस्य उत्तरं प्राप्यते।

चतुर्थप्रहेलिकायाः उत्तरम् – नारिकेलफलम्।

पञ्चमप्रहेलिकायाः उत्तरम् – प्रथम-प्रहेलिकावत्।

पहेलियों का उत्तर खोजने के संकेत
पहली पहेली – अन्तिम चरण (चौथी पंक्ति) में ऊपर के तीनों प्रश्नों के उत्तर क्रमश: तीन शब्दों में दिए गए हैं।

दूसरी पहेली – प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय (तीनों) चरणों के पहले तथा अन्तिम वर्ण का मिलान करने से उत्तर मिलता है।

तीसरी पहेली – प्रत्येक चरण में पहले दोनों या पहले तीनों वर्गों को मिलाने से उसका उत्तर मिलता है।

चौथी पहेली का उत्तर नारियल।

पाँचवीं पहेली का उत्तर – पहली पहेली के समान।

सरलार्थः
1. कस्तूरी किससे उत्पन्न होती है?
कौन मारता है हाथियों के कुल को?
कायर युद्ध में क्या करता है?
‘हरिण से’, ‘शेर’, ‘भाग जाता है।’
(ये तीनों ही क्रमशः उत्तर हैं।)

2. (i) नारियों में कौन शान्त है? (सीता)
(ii) गुणों में उत्तम राजा कौन हुआ है? (राम)
(ii) विद्वानों द्वारा सदा कौन पूजी जाती है? (विद्या)
इन्हीं में कहा गया है, पता नहीं चल रहा है।

3. कृष्ण ने किसे मारा? (कंस को)
शीतलधारा वाली गंगा कहाँ है? (काशी में)
स्त्री के पोषण में कौन लगे रहते हैं? (किसान)
किस बलवान् को सर्दी नहीं लगती? (कम्बल वाले को)

4. वृक्ष पर रहता है लेकिन पक्षिराज (गरुड़) नहीं है।
तीन नेत्रों वाला है, लेकिन शिव नहीं है।
छाल के वस्त्र पहनता है लेकिन योगी नहीं है।
जल से भरा हुआ है फिर भी न घड़ा है और न बादल।
उत्तर है- नारियल।

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5. भोजन के अन्त में क्या पीना चाहिए? (छाछ)
जयन्त किसका पुत्र था? (इन्द्र का)
मोक्ष कैसा कहा गया है? (दुर्लभ)
मट्ठा दुर्लभ है इन्द्र के लिए।

प्रहेलिकाः Summary

प्रहेलिकाः पाठ-परिचयः

मनोरञ्जनहीन व हास्यविहीन जीवन को नरक माना जा सकता है। पहेलियाँ मनोरञ्जन की प्राचीन विधा हैं। ये प्रायः विश्व की सारी भाषाओं में उपलब्ध हैं। संस्कृत के कवियों ने इस परम्परा को अत्यन्त समृद्ध किया है। पहेलियाँ जहाँ हमें आनन्द देती हैं, वहीं समझ-बूझ की हमारी मानसिक व बौद्धिक प्रक्रिया को अधिक तेज बनाती हैं। इस पाठ में संस्कृत प्रहेलिका (पहेली) बूझने की परम्परा के कुछ रोचक उदाहरण प्रस्तुत किए गए हैं। रोचकपूर्ण ढंग से ज्ञानवर्धन करने के लिए पहेलियाँ उत्तम साधन हैं।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
एकपदेन उत्तरत-
(क) सूर्यः कस्यां दिशायाम् उदेति?
उत्तरम्:
पूर्वदिशायाम्

(ख) आर्यभटस्य वेधशाला कुत्र आसीत्?
उत्तरम्:
पाटलिपुत्रे

(ग) महान् गणितज्ञ: ज्योतिर्विच्च कः अस्ति?
उत्तरम्:
आर्यभटः

(घ) आर्यभटेन कः ग्रन्थः रचितः?
उत्तरम्:
आर्यभटीयम्

(ङ) अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम किम् अस्ति?
उत्तरम्:
आर्यभटम्।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

प्रश्न 2.
सन्धिविच्छेदं कुरुत-
ग्रन्थोऽयम् – ______ + _________
सूर्याचलः – ______ + _________
तथैव – ______ + _________
कालातिगामिनी – ______ + _________
प्रथमोपग्रहस्य – ______ + _________
उत्तरम्:
ग्रन्थोऽयम् – ग्रन्थः + अयम्
सूर्याचलः – सूर्य + अचलः
तथैव – तथा + एव
कालातिगामिनी – काल + अतिगामिनी
प्रथमोपग्रहस्य – प्रथम + उपग्रहस्य

प्रश्न 3.
अधोलिखितपदानां विपरीतार्थकपदानि लिखत-
उदयः – __________
अचल: – __________
अन्धकारः – __________
स्थिरः – __________
समादरः – __________
उत्तरम्:
उदयः – अस्तः
अचल: – चलः
अन्धकारः – प्रकाशः
स्थिरः – अस्थिरः
समादरः – निरादरः

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

प्रश्न 4.
अधोलिखितानि पदानि आधृत्य वाक्यानि रचयत-
साम्प्रतम् – _______________
निकषा – _______________
परितः – _______________
उपविष्टः – _______________
कर्मभूमिः – _______________
वैज्ञानिक: – _______________
उत्तरम्:
साम्प्रतम् – (अब) साम्प्रतं क्रीडनीयम्।
निकषा – (निकट) गृह निकषा मन्दिरम् अस्ति।
परितः – (चारों ओर) विद्यालय परितः वृक्षाः सन्ति।
उपविष्टः – (बैठा हुआ) सः उपविष्टः पठति।
कर्मभूमिः – (कर्मभूमि) पठनमेव में कर्मभूमिः।
वैज्ञानिक: – (वैज्ञानिक) अहं वैज्ञानिकः भवितुम् इच्छामि।

प्रश्न 5.
मञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
नौकाम्, पृथिवी, तदा, चला, अस्तं
(क) सूर्यः पूर्वदिशायाम् उदेति पश्चिमदिशि च __________ गच्छति।
(ख) सूर्यः अचलः पृथिवी च __________।
(ग) __________ स्वकीये अक्षे घूर्णति।
(घ) यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते __________ चन्द्रग्रहणं भवति।
(ङ) नौकायाम् उपविष्टः मानवः __________ स्थिरामनुभवति।
उत्तरम्:
(क) अस्तं
(ख) चला
(ग) पृथिवी
(घ) तदा
(ङ) नौकाम्

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

प्रश्न 6.
उदाहरणानुसारं पदपरिचयं ददत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः -1
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः -2

प्रश्न 7.
‘मति’ शब्दस्य रूपाणि पूरयत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः -3
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः -4

योग्यता-विस्तारः

आर्यभट को अश्मकाचार्य नाम से भी जाना जाता है। यही कारण है कि इनके जन्मस्थान के विषय में विवाद है। कोई इन्हें पाटलिपुत्र का कहते हैं तो कोई महाराष्ट्र का।

आर्यभट ने दशमलव पद्धति का प्रयोग करते हुए π (पाई) का मान निर्धारित किया। उन्होंने दशमलव के बाद के चार अंकों तक π के मान को निकाला। उनकी दृष्टि में π का मान है 3.1416। आधुनिक गणित में π का मान, दशमलव के बाद सात अंकों तक जाना जा सका है, तदनुसार π = 3.14169261

भारतीयज्योतिषशास्त्र- वैदिक युग में यज्ञ के काल अर्थात् शुभ मुहूर्त के ज्ञान के लिए ज्योतिषशास्त्र का उद्भव हुआ। कालान्तर में इसके अन्तर्गत ग्रहों का संचार, वर्ष, मास, पक्ष, वार, तिथि, घंटा आदि पर गहन विचार किया जाने लगा। लगध, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य, बालगंगाधर तिलक, रामानुजन् आदि हमारे देश के प्रमुख ज्योतिषशास्त्री हैं। आर्यभटीयम्, सौरसिद्धान्तः, बृहत्संहिता, लीलावती, पञ्चसिद्धान्तिका आदि ज्योतिष के प्रमुख संस्कृत ग्रन्थ हैं।

आर्यभटीयम्- आर्यभट ने 499 ई. में इस ग्रन्थ की रचना की थी। यह ग्रन्थ 20 आर्याछन्दों में निबद्ध है। इसमें ग्रहों की गणना के लिए कलि संवत् (499 ई.में 3600 कलि संवत्) को निश्चित किया गया है।

गणितज्योतिष- संख्या के द्वारा जहाँ काल की गणना हो, वह गणितज्योतिष है। ज्योतिषशास्त्र की तीन विधाओं यथा-सिद्धान्त, फलित एवं गणित में यह सर्वाधिक प्रमुख है।

फलितज्योतिष- इसके अन्तर्गत ग्रह नक्षत्रों आदि की स्थिति के आधार पर भाग्य, कर्म आदि का विवेचन किया जाता है।

वेधशाला- ग्रह, नक्षत्र आदि की गति, स्थिति की. जानकारी जहाँ गणना तथा यान्त्रिक विधि के आधार पर ली जाये वह वेध शाला है। यथा-जन्तर-मन्तर।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

मूलपाठः

पूर्वदिशायाम् उदेति सूर्यः पश्चिमदिशायां च अस्तं गच्छति इति दृश्यते हि लोके। परं न अनेन अवबोध्यमस्ति यत्सूर्यो गतिशील इति। सूर्योऽचल: पृथिवी च चला या स्वकीये अक्षे घूर्णति इति साम्प्रतं सुस्थापितः सिद्धान्तः। सिद्धान्तोऽयं प्राथम्येन येन प्रवर्तितः, स आसीत् महान् गणितज्ञः ज्योतिर्विच्च आर्यभटः।

पृथिवी स्थिरा वर्तते इति परम्परया प्रचलिता रूढिः तेन प्रत्यादिष्टा। तेन उदाहृतं यद् गतिशीलायां नौकायाम् उपविष्टः मानवः नौकां स्थिरामनुभवति, अन्यान् च पदार्थान् गतिशीलान् अवगच्छति। एवमेव गतिशीलायां पृथिव्याम् अवस्थितः मानवः पृथिवीं स्थिरामनुभवति सूर्यादिग्रहान् च गतिशीलान् वेत्ति।

476 तमे ख्रिस्ताब्दे (षट्सप्तत्यधिकचतुःशततमे वर्षे) आर्यभटः जन्म लब्धवानिति तेनैव विरचिते ‘आर्यभटीयम्’ इत्यस्मिन् ग्रन्थे उल्लिखितम्। ग्रन्थोऽयं तेन त्रयोविंशतितमे वयसि विरचितः। ऐतिहासिकस्त्रोतोभिः ज्ञायते यत् पाटलिपुत्र निकषा आर्यभटस्य वेधशाला आसीत्। अनेन इदम् अनुमीयते यत् तस्य कर्मभूमिः पाटलिपुत्रमेव आसीत्।

आर्यभटस्य योगदानं गणितज्योतिषा सम्बद्धं वर्तते यत्र संख्यानाम् आकलनं महत्त्वम् आदधाति। आर्यभटः फलितज्योतिषशास्त्रे न विश्वसिति स्म। गाणितीयपद्धत्या कृतप आकलनमाधृत्य एव तेन प्रतिपादितं यद् ग्रहणे राहु-केतुनामको, दानवौ नास्ति कारणम्। तत्र तु सूर्यचन्द्रपृथिवी इति त्रीणि एव कारणानि। सूर्य परितः भ्रमन्त्याः पृथिव्याः, चन्द्रस्य परिक्रमापथेन संयोगाद् ग्रहणं भवति। यदा पृथिव्याः छायापातेन चन्द्रस्य प्रकाशः अवरुध्यते तदा चन्द्रग्रहणं भवति। तथैव पृथ्वीसूर्ययोः मध्ये समागतस्य चन्द्रस्य छायापातेन सूर्यग्रहणं दृश्यते।

समाजे नूतनानां विचाराणां स्वीकारे प्रायः सामान्यजनाः काठिन्यमनुभवन्ति। भारतीयज्योतिःशास्त्रे तथैव आर्यभटस्यापि विरोधः अभवत्। तस्य सिद्धान्ताः उपेक्षिताः। स पण्डितम्मन्यानाम् उपहासपात्रं जातः। पुनरपि तस्य दृष्टि: कालातिगामिनी दृष्टा। आधुनिकैः वैज्ञानिकैः तस्मिन्, तस्य च सिद्धान्ते समादरः प्रकटितः। अस्मादेव कारणाद् अस्माकं प्रथमोपग्रहस्य नाम आर्यभट इति कृतम्।

वस्तुतः भारतीयायाः गणितपरम्परायाः अथ च विज्ञानपरम्परायाः असौ एकः शिखरपुरुषः आसीत्।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

सन्धिविच्छेद:
सूर्यो गतिशील इति = सूर्यः + गतिशीलः + इति।
सूर्योऽचलः = सूर्य+ + अचल:।
सिद्धान्तोऽयम् = सिद्धान्तः + अयम्।
ज्योतिर्विच्च = ज्योतिः + विद् + च।
प्रत्याविष्य = प्रति + आदिष्य।
ख्रिस्ताब्दे = ख्रिस्त + अब्दे।
सप्तत्यधिक = सप्तति + अधिक।
तेनैव = तेन + एव।
इत्यस्मिन् = इति + अस्मिन्।
उल्लिखितम् = उत् + लिखितम्।
ग्रन्थोऽयम् = ग्रन्थः + अयम्।
नास्ति = न + अस्ति।
तथैव = तथा + एव।
आर्यभटस्यापि = आर्यभटस्य + अपि।
पुनरपि = पुनः + अपि।

संयोगः
अवबोध्यमस्ति = अवबोध्यम् + अस्ति।
स्थिरामनुर्भवति = स्थिराष्य + अनुभवति।
एवमेव = एवम् + एव।
लब्धवानिति = लब्धवान् + इति।
पाटलिपुत्रमेव = पाटलिपुत्रम् + एव।
आकलनमाधृत्य = आकलनम् + आधृत्य।
समागतस्य = सम् + आगतस्य।
काठिन्यमनुभवन्ति = काठिन्यम् + अनुभवन्ति।
समादरः = सम् + आदरः।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

पदार्थबोध:
उदेति = उदित होता है (उद्गच्छति, चकास्ति)।
लोके = संसार में (संसारे, जगति)।
अवबोध्यम् = जानने योग्य (ज्ञातव्यम्, ज्ञानीयम्)।
अचलः = गतिहीन, स्थिर (स्थिर:)।
चला = अस्थिर, गतिशील (गतिशीला, अस्थिरा)।
स्वकीये = अपने (आत्मीये)।
अक्षे = धुरी पर (ध्रुवके)।
घूर्णति = घूमती है (घूर्णनं करोति)।
सुस्थापितः = भली-भाँति स्थापित (सम्यक् स्थापितः)।
प्राथम्येन = प्राथमिकता से (प्राथमिकतया)।
ज्योतिविद् = ज्योतिषी (ज्योतिष्क:)।
रूढ़िः = प्रथा, परम्परा।
प्रत्यादिष्टा = खण्डन किया (खण्डितवान्)।
ख्रिस्ताब्दे = ईस्वी में (ईस्वीये)।
षट्सप्ततिः = छिहत्तर (षडधिकसप्ततिः)।
वयसि = आयु में (आयौ)।
निकषा = निकट (समीपे)।
वेधशाला = ग्रह-नक्षत्रों को जानने की प्रयोगशाला (ग्रह-ज्ञानशाला)।
आकलनम् = गणना।
आदधाति = रखता है (धारयति)।
भ्रमन्त्याः = घूमने वाली की (घूर्णन्त्याः )।
छायातपेन = छाया पड़ने से (छायावशात्)।
अवरुध्यते = रुक जाता है (अवबाध्यते)।
अपरत्र = दूसरी ओर (अन्यत्र)।
अवस्थितः = स्थित (स्थितः)।
उपेक्षिताः = नहीं माने गए (तिरस्कृताः)।
पण्डितम्मन्यानाम् = स्वयं को अधिक विद्वान् मानने वालों की (विद्वन्मन्यानाम्)।
कालातिगामिनी = समय को लाँघने वाली (कालजयिनी)।
प्रकटितः = प्रकट किया (प्रदर्शितः)।
असौ = वह (स:)।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

सरलार्थ:
सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है, यह देखा जाता है संसार में। परन्तु इससे यह नहीं समझना चाहिए कि सूर्य गतिशील है, ऐसा। सूर्य स्थिर है और पृथ्वी गतिशीला है जो अपने अक्ष (धुरी) पर घूमती है यह सिद्धान्त अब पूरी तरह स्थापित है। यह सिद्धान्त सबसे पहले जिसने स्थापित किया वे थे-महान् गणितज्ञ और ज्योतिषी ‘आर्यभट’। ‘पृथ्वी स्थिर है’ इस परम्परा वाली प्रथा को उन्होंने नकार दिया। उन्होंने उदाहरण दिया कि ‘गतिशील नौका में बैठा हुआ व्यक्ति नौका के स्थिर होने का अनुभव करता है और दूसरे पदार्थों को गतिशील समझता है।’ इसी प्रकार गतिशीला पृथ्वी में स्थित मानव पृथ्वी को स्थिर समझता है और सूर्यादि ग्रहों को गतिशील जानता है।

476 ई. सन् में आर्यभट ने जन्म लिया यह उनके द्वारा रचित ‘आर्यभटीयम्’ नामक ग्रन्थ में लिखित है। यह ग्रन्थ उन्होंने तेईसवें (23वें) वर्ष में रचा। ऐतिहासिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) के निकट आर्यभट की वेधशाला थी। इससे यह अनुमान किया जाता है कि उनकी कर्मभूमि पाटलिपुत्र ही थी।

आर्यभट का योगदान गणित-ज्योतिष से सम्बन्धित है, जहाँ संख्याओं का आंकलन (गणना) महत्त्व रखता है। आर्यभट फलित ज्योतिष शास्त्र में विश्वास नहीं करते थे। गणितीय पद्धति से किए गए आंकलन को ही आधार मानकर उन्होंने प्रतिपादित किया कि ग्रहण में राहु व केतु राक्षस कारण नहीं है। इसमें सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी ये तीन ही कारण हैं। सूर्य के चारों ओर घूमती हुई पृथ्वी के व चन्द्रमा के परिक्रमा पथ से संयोग होने के कारण ग्रहण होता है। जब पृथ्वी की छाया पड़ने से चन्द्रमा का प्रकाश रुक जाता है, तब चन्द्रग्रहण होता है। वैसे ही पृथ्वी और सूर्य के बीच आए हुए चन्द्रमा की छाया पड़ने से सूर्यग्रहण दिखाई देता है।

समाज में नए विचारों को अपनाने में प्रायः सामान्य लोग कठिनाई का अनुभव करते हैं। भारतीय ज्योतिष शास्त्र में उसी प्रकार आर्यभट का विरोध भी हुआ। उसके सिद्धान्तों की उपेक्षा की गई। वे स्वयं को विद्वान् मानने वाले लोगों में उपहास के पात्र बने। फिर भी उनकी दृष्टि काल को लाँघने वाली थी। आधनिक वैज्ञानिकों के द्वारा उनमें व उनके सिद्धान्तों में आदर प्रकट किया गया है। इसी कारण से हमारे प्रथम उपग्रह का नाम ‘आर्यभट’ रखा गया।

वास्तव में ये भारतीय गणित-परम्परा तथा विज्ञान-परम्परा के शिखर (श्रेष्ठ) पुरुष थे।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 14 आर्यभटः

आर्यभटः Summary

आर्यभटः पाठ-परिचयः

ज्ञान-विज्ञान की सुदीर्घ परम्परा भारतवर्ष की अमूल्य निधि है। इस परम्परा को प्रबुद्ध मनीषियों ने सम्पोषित किया। आर्यभट इन्हीं मनीषियों में अग्रगण्य थे। दशमलव पद्धति आदि के प्रारम्भिक प्रयोक्ता आर्यभट ने गणित को नयी दिशा दी। इन्हें एवं इनके सिद्धान्तों को तत्कालीन रूढ़िवादियों का विरोध झेलना पड़ा। वस्तुतः गणित को विज्ञान बनाने वाले तथा गणितीय गणना पद्धति के द्वारा आकाशीय पिण्डों (नक्षत्रों) की गति का प्रवर्तन करने वाले ये प्रथम आचार्य थे। आचार्य आर्यभट के इसी वैदुष्य का उद्घाटन प्रस्तुत पाठ में है। अधिक जानकारी के लिए योग्यता-विस्तार: द्रष्टव्य है।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
अधोलिखिताना प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत-
(क) इयं धरा कैः स्वर्णवद् भाति?
उत्तरम्:
शस्यैः

(ख) भारतस्वर्णभूमिः कुत्र राजते?
उत्तरम्:
क्षिती

(ग) इयं केषां महाशक्तिभिः पूरिता?
उत्तरम्:
अणूनाम्

(घ) इयं भूः कस्मिन् युतानाम् अस्ति?
उत्तरम्:
प्रबन्धे

(ङ) अत्र किं सदैव सुपूर्णमस्ति?
उत्तरम्:
खाद्यान्नभाण्डम्।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

प्रश्न 2.
समानार्थकपदानि पाठात् चित्वा लिखत-
(क) पृथिव्याम् ________। (क्षितौ / पर्वतेषु / त्रिलोक्याम्)
(ख) सुशोभते ________। (लिखते / भाति / पिबति)
(ग) बुद्धिमताम् ________। (पर्वणाम् / उत्सवानाम् / विपश्चिज्जनानाम्)
(घ) मयूराणाम् ________। (शिखीनाम् / शुकानाम् / पिकानाम्)
(ङ) अनेकेषाम् ________। (जनानाम् / वैज्ञानिकानाम् / बहूनाम्)
उत्तरम्:
(क) क्षिती
(ख) भाति
(ग) विपश्चिज्जानाम्
(घ) शिखीनाम्
(ङ) बहूनाम्।

प्रश्न 3.
श्लोकांशमेलनं कृत्वा लिखत-
(क) त्रिशूलाग्निनागैः पृथिव्यास्त्रघोरैः – नदीनां जलं यत्र पीयूषतुल्यम्
(ख) सदा पर्वणामुत्सवानां धरेयम् – जगद्वन्दनीया च भू:देवगेया
(ग) वने दिग्गजानां तथा केसरीणाम् – क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः
(घ) सुपूर्ण सदैवास्ति खाद्यान्नभाण्डम् – अणूनां महाशक्तिभिः पूरितेयम्
(ङ) इयं वीरभोग्या तथा कर्मसेव्या – तटीनामियं वर्तते भूधराणाम्
उत्तरम्:
(क) त्रिशूलाग्निागैः पृथिव्यास्त्रधौरेः – अणूनां महाशक्तिभिः पूरितेयम्।
(ख) सदा पर्वणामुत्सवानां धरेयम् – क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः
(ग) वने दिग्गजानां तथा केसरीणाम् – तटीनामियं वर्तते भूधराणाम्
(घ) सुपूर्ण पीयूषतुल्यम् खाद्यान्नभाण्डम् – नदीनां जलं यत्र पीयूषतुल्यम्
(ङ) इयं वीरभोग्या तथा कर्मसेव्या – जगद्वन्दनीया च भूः देवगेया

प्रश्न 4.
चित्रं दृष्ट्वा (पाठात्) उपयुक्तपदानि गृहीत्वा वाक्यपूर्ति कुरुत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः - 1
(क) अस्मिन् चित्रे एका _________ वहति।
(ख) नदी ___________ नि:सरति।
(ग) नद्याः जलं ________ भवति।
(घ) ________ शस्यसेचनं भवति।
(ङ) भारतः ________ भूमिः अस्ति।
उत्तरम्:
(क) नदी
(ख) पर्वतात्
(ग) पीयूषतुल्यं
(घ) नद्याः जलेन

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

प्रश्न 5.
चित्राणि दृष्ट्वा (मञ्जूषातः) उपयुक्तपदानि गृहीत्वा वाक्यपूर्ति कुरुत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः - 2
(क) अस्मिन् चित्रे एका __________ दृश्यन्ते।
(ख) एतेषाम् अस्त्राणां __________ युद्धे भवति।
(ग) भारतः एतादृशानां __________ प्रयोगेण विकतिसदेशः मन्यते।
(घ) अत्र परमाणुशक्तिप्रयोगः अपि __________।
(छ) आधुनिकैः अस्त्रैः __________ अस्मान् शत्रुभ्यः रक्षन्ति।
(च) __________ सहायतया बहूनि कार्याणि भवन्ति।
उत्तरम्:
(क) अस्त्राणि
(ख) प्रयोगः
(ग) अस्त्राणाम्
(घ) भवति
(छ) सैनिकाः
(च) उपग्रहाणाम्।

प्रश्न 6(अ).
चित्रं दृष्ट्वा संस्कृते पञ्चवाक्यानि लिखत।
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः - 3
उत्तरम्:
(क) इदं दीपावली-महोत्सवस्य चित्रम् अस्ति।
(ख) चित्रे एक सुन्दर विशाल च भवनमस्ति।
(ग) भवनस्य आंगने जनाः सन्ति।
(घ) जनाः नार्यः च दीपान प्रज्वालयन्ति।
(ङ) इदं पर्व सम्पूर्ण भारते-अन्यत्र च मानयन्ति।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

प्रश्न 6(आ).
चित्रं दृष्ट्वा संस्कृते पञ्चवाक्यानि लिखत।
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः - 4
उत्तरम्:
(क) इदं रक्षाबंधन पर्व इत्यस्य चित्रं वर्तते।
(ख) रक्षाबंधन राष्ट्रियां पर्व अस्ति।
(ग) अस्मिन भगिनी भ्रातुः हस्ते रक्षासूत्रं बन्धति।
(घ) प्राता भगिन्याः सुरक्षायाः आश्वासनं ददाति।
(ङ) इदं पर्व भगिनीभ्रातो; महत् पर्व वर्तते।

प्रश्न 7.
अत्र चित्रं दृष्ट्वा संस्कृतभाषया पञ्चवाक्येषु प्रकृतेः वर्णनं कुरुत।
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः - 5
उत्तरम्:
(क) अस्मिन् चित्रे एकं वनं दृश्यते।
(ख) वने महान्तो वृक्षाः विलसन्ति।
(ग) वृक्षाः फलच्छायाप्रदायकाः भवन्ति।
(घ) वृक्षः काष्ठानि प्राप्यन्ते।
(ङ) वनेन पर्यावरण संरक्ष्यते।

योग्यता-विस्तारः

प्राचीन काल में भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था, इसी भाव को ग्रहण कर कवि ने प्रस्तुत पाठ में भारतभूमि की प्रशंसा करते हुए कहा है कि आज भी यह भूमि विश्व में स्वर्णभूमि बनकर ही सुशोभित हो रही है।

कवि कहते हैं कि आज हम विकसित देशों की परम्परा में अगग्रण्य होकर मिसाइलों का निर्माण कर रहे हैं, परमाणु शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं। इसी के साथ ही साथ हम ‘उत्सवप्रियाः खलु मानवाः नामक उक्ति को चरितार्थ भी कर रहे हैं कि ‘अनेकता में एकता है हिंद की विशेषता’ इसी आधार पर कवि के उद्गार हैं कि बहतु मतावलम्बियों के भारत में होने पर भी यहाँ ज्ञानियों, वैज्ञानिकों और विद्वानों की कोई कमी नहीं है। इस धरा ने सम्पूर्ण विश्व को शिल्पकार, इंजीनियर, चिकित्सक, प्रबंधक, अभिनेता, अभिनेत्री और कवि प्रदान किए हैं। इसकी प्राकृतिक सुषमा अद्भुत है। इस तरह इन पद्यों में कवि ने भारत के सर्वाधिक महत्त्व को उजागर करने का प्रयास किया है।

पाठ में पर्वो और उत्सवों की चर्चा की गई है ये समानार्थक होते हुए भी भिन्न हैं। पर्व एक निश्चित तिथि पर ही मनाए जाते हैं, जैसे – होली, दीपावली, स्वतन्त्रता दिवस, गणतंत्र दिवस इत्यादि। परन्तु उत्सव व्यक्ति विशेष के उद्गार एवं आहाद के द्योतक हैं। किसी के घर सतानोत्पत्ति उत्सव का रूप ग्रहण कर लेती है तो किसी को सेवाकार्य में प्रोन्नति प्राप्त कर लेना, यहाँ तक कि बिछुड़े हुए बंधु-बांधवों से अचानक मिलना भी किसी उत्सव से कम नहीं होता है।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

मूलपाठः

सुपूर्ण सदैववास्ति खाद्यान्नभाण्डं नदीनां जलं यत्र पीयूषतुल्यम।
इयं स्वर्णवद् भाति शस्यैधरेयं क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः ॥1॥

त्रिशुलाग्निनागैः पृथिव्यस्वघोरैः अणूनां महाशक्तिभिः पूरितेयम्।
सदा राष्ट्ररक्षारतानां धरेयम् क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः ॥2॥

इय वीरभोग्या तथा कर्मसेव्या जगद्वन्दनीया च भूः देवगेया।
सदा पर्वणामुत्सवानां धरेयं क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः ॥3॥

इदं ज्ञानिना चैव वैज्ञानिकानां विपश्चिज्जनानामियं संस्कृतानाम्।
बहूनां मतानां जनानां धरेयं क्षितौ राजतै भारतस्वर्णभूमिः ॥4॥

इयं शिल्पिनां यन्त्रविद्याधराणां भिषक्शास्त्रिणां भूः प्रबन्धे युतानाम्।
नटानां नटीना कवीनां धरेयं क्षितौ राजतै भारतस्वर्णभूमिः ॥5॥

वने दिग्गजानां तथा केशरीणां तटीनामियं वर्तते भूधराणाम्।
शिखीनां शुकानां पिकानां धरेयं क्षितौ राजतै भारतस्वर्णभूमिः ॥6॥

अन्वयः
1. इयम् धरा खाद्यान्नभाण्डम् सुपूर्णम् अस्ति यत्र नदीनाम् जलम् पीयूषतुल्यम् (अस्ति), इयम् शस्यैः स्वर्णवत भाति, इयम् भारतस्वर्णभूमिः क्षितौ रजते।

2. इयम् घोरै-त्रिशूल-अग्नि-नागैः पृथिवी अस्त्रैः राष्ट्ररक्षारतानाम् अणूनाम् महाशक्तिभिः पूरिता (अस्ति), इयम् भारतस्वर्णभूमिः सदा क्षितौ राजतै।

3. इयम् वीरभोग्या कर्मसेव्या तथा जगत वन्दनीया देवगेयाः च भूः (अस्ति), पर्वणामुत्सवानाम् इयम् भारतस्वर्णभूमिः क्षिती राजते।

4. इयम् धरा संस्कृतानाम् विपश्चिज्जनानाम् ज्ञानिनाम् वैज्ञानिकानाम् च एव, इयम् बहूनाम मतानाम जनानाम् भारतस्वर्णभूमि क्षितौ राजते।

5. इयम् धरा नटानाम् नटीनाम् कवीनाम् शिल्पिनाम् यन्त्रविद्या-धराणाम् भिशक्शास्त्रिणाम् भूः प्रबन्धे युतानाम् इयम् भारतस्वर्णभूमिः क्षितौ राजते।

6. इयम् धरा वने दिग्गजानाम् केसरीणाम् तथा भूधराणाम् तटिनाम् शिखीनाम् शुकानाम् पिकानाम् इयम् भारतस्वर्णभूमिः क्षितौ राजते।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

सन्धिविच्छेदः
खाद्यान्न = खाद्य + अन्न।
शस्यैधरेयम् = शस्यैः + धरा + इयम्।
त्रिशूलाग्नि = त्रिशूल + अग्नि।
पृथिव्यस्वघोरै = पृथिवी + अस्त्रघोरै।
पूरितेयम् = पूरिता + इयम्।
धरेयम् = धर + इयम्।
विपश्चिज्जनानामियम् = विपश्चित + जनानाम् + इयम्।
दिग्गजानाम् = दिक् + गजानाम्।

संयोग:
पर्वणामुत्सवानाम् = पर्वणाम् + उत्सवानाम्।
तटीनामियम् = तटीनाम् + इयम्।

पदार्थबोध:
भाण्डम् = भण्डार (प्रचुरता)।
पीयूषतुल्यम् = अमृत समान (सुधातुल्यम्)।
स्वर्णवन = सोने जैसा (काञ्चनमिव)।
भाति = सुशोभित हो रही है (शोभते)।
क्षिती – पृथ्वी पर (धरायाम्)।
धरेयम् – यह धरती (इयं वसुधा)।
राजते = सुशोभित है (सुशोभते)।
त्रिशूलाग्निनागैः = त्रिशूल-अग्नि-नाग-पृथ्वी-आकाश पाँच मिसाइलों के नाम हैं (एतानि महास्त्राणि सन्ति)।
पर्वणामुत्सवानाम् = पूर्वो और उत्सवों की (शुभ-अवसराणाम्)।
विपश्चिज्जनानाम् = विद्वानों की (विदुषाम्)।
यन्त्रविद्याधराणाम् = यन्त्र विद्या जानने वालों की (यन्त्रविद्या जानताानाम् जानानम)।
प्रबंधे युतानाम् = प्रबंधकों की (प्रबन्धकानाम्)।
भूधराणाम् = पहाड़ों की (पर्वतानाम्)।
नटीनाम् = नदियों की (नदीनाम्)।
केसरीणाम् = शेरों की (सिंहानाम्)।
दिग्गजानाम् = हाथियों की (हस्तीनाम्)।
शिखीनाम् = मोरों की (मयूराणाम्।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 13 क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः

सरलार्थ-
1. यह धरती खाद्यान्न भण्डारों से परिपूर्ण है, जहाँ की नदियों का पानी अमृत के समान है, सोने के समान चमक वाली यह भारतभूमि धरती पर राज करती है, सुशोभित है।

2. यह स्वर्णभूमि भारत भूमि देश रक्षा में लगे त्रिशूल, अग्नि, नाग, पृथ्वी और आकाश मिसाइलों व परमाणु शक्तियों से संपन्न है, ऐसी यह धरती संपूर्ण पृथ्वी पर राज करती है।

3. यह वीर भोग्या व कर्मसेव्या है, जगत् वन्दनीय है, इसका (यशोगान) देवता भी करते हैं। ऐसी भारत स्वर्ण भूमि अनेक पर्वो उत्सवों की भूमि सदा धरती पर राज करती है।

4. यह धरती संस्कृत विद्वानों, ज्ञानियों, वैज्ञानिकों की भूमि है। अनेक धर्मावलम्बी लोगों की यह भारत स्वर्णभूमि संपूर्ण विश्व पर राज करती है।

5. यह धरती कवियों अभिनेता-अभिनेत्रियों, डॉक्टर-इंजीनियरों, शिल्पियों, मशीन के जानकारों, भूमि प्रबंधकों की भूमि है। यह भारत स्वर्णभूमि संपूर्ण धरती पर सदा विराजती है।

6. यह वसुंधरा जंगल में हाथियों, सिंहों, नदियों, पर्वतों की भूमि है। मोर, तोते, कोयल आदि से शोभित यह भारतभूमि सदा पृथ्वी पर शोभित है।

भावार्थ-
पाठ का केंद्रीय भाव भारत की चहुंमुखी प्रगति का वर्णन करता है।

क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः Summary

क्षितौ राजते भारतस्वर्णभूमिः पाठ-परिचयः

संस्कृत के मूर्धन्य विज्ञान कवि कृष्णचन्द्र त्रिपाठी की रचना से संकलित श्लोकों में देश के गौरव का गुणगान, यशोगान किया गया। अनाज, कला, प्रौद्योगिकी, वन संपदा, सामरिक शक्ति, परमाणु-शक्ति सम्पन्नता का वर्णन किया गया है। छात्र इन श्लोकों को गाएँ और देश की ताकत का अनुभव करें, इसलिए यह संकलन किया गया है।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
उच्चारणं कुरुत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः - 1
उत्तरम्:
शिक्षकसहायतया छात्राः शुद्धम् उच्चारणं कुर्युः।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

प्रश्न 2.
अधोलिखितेषु पदेषु प्रयुक्तां विभक्तिं वचनं च लिखत-

पदानिविभक्तिःवचनम्
यथा- भ्रमणायचतुर्थीएकवचनम्
वस्तूनि
प्लास्टिकेन
विकीर्णानि
मसिर्यष्ट्या
स्यूतकेषु
काष्ठपीठे
पृथिव्याम्

उत्तरम्:

पदानिविभक्तिःवचनम्
यथा- भ्रमणायचतुर्थीएकवचनम्
वस्तूनिप्रथमा, द्वितीया चबहुवचनम्
प्लास्टिकेनतृतीयाएकवचनम्
विकीर्णानिप्रथमा, द्वितीया चबहुवचनम्
मसिर्यष्ट्यातृतीयाएकवचनम्
स्यूतकेषुसप्तमीबहुवचनम्
काष्ठपीठेसप्तमीएकवचनम्
पृथिव्याम्सप्तमीएकवचनम्

प्रश्न 3.
एकपदेन उत्तरत-
(क) मसियष्टी-जलकूपी-प्रभृतिनि वस्तूनि केन पदार्थेन निर्मितानि?
उत्तरम्:
प्लास्टिकेन।

(ख) उपवनस्य द्वारे कानि क्षिप्तानि सन्ति?
उत्तरम्:
प्लास्टिकस्यूतकानि।

(ग) मृत्तिकायां किं वस्तु न कदापि विनश्यति?
उत्तरम्:
प्लास्टिकम्।

(घ) अस्माकं प्रयासः कस्य रक्षणे अपेक्षितः?
उत्तरम्:
पर्यावरणस्य।

प्रश्न 4.
प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
(क) चेनम्मायाः सविधे कानि वस्तूनि आसन्?
उत्तरम्:
चेनम्मायाः सविधे कङ्कतम्, कुण्डलम्, केशबन्धः, घटिपट्टिका, कङ्कणम् इति वस्तूनि आसन्।

(ख) पूर्वं प्राय: केन पदार्थेन निर्मितानि वस्तूनि प्राप्यन्ते स्म?
उत्तरम्:
पूर्व प्रायः कासेन, चर्मणा, लौहेन, लाक्षया, मृत्तिकया, काष्ठेन वा पदार्थेन निर्मितानि वस्तूनि प्राप्यन्ते स्म।

(ग) कानि कानि वस्तूनि पर्यावरणं दूषयन्ति?
उत्तरम्:
प्लास्टिक निर्मितानि सर्वाणि वस्तूनि पर्यावरणं दूषयन्ति।

(घ) प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां लयाभावात् किं भवति?
उत्तरम्:
प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां लयाभावात् पर्यावरणस्य क्षतिः भवति।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

प्रश्न 5.
अधोलिखितानां पदानां लकारं पुरुषं वचनञ्च लिखत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः - 2
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः - 3

प्रश्न 6.
मञ्जूषातः अङ्कानां कृते पदानि चिनुत-
चतुःपञ्चाशत्, सप्तषष्टिः, द्वासप्ततिः, षडशीतिः, चतुर्नवतिः, सप्तनवतिः, पञ्चसप्ततिः, अष्टानवतिः
67 – ________
86 – ________
98 – ________
97 – ________
54 – ________
72 – ________
94 – ________
75 – ________
उत्तरम्:
67 – सप्तषष्टिः
86 – षडशीतिः
98 – अष्टानवतिः
97 – सप्तनवतिः
54 – चतुःपञ्चाशत्
72 – द्वासप्ततिः
94 – चतुर्नवतिः
75 – पञ्चसप्ततिः

योग्यता-विस्तारः

संस्कृत में अकरान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द के रूप प्राप्त नहीं होते हैं। लेकिन लड़कियों के अकारान्त नाम होते हैं। इनके उदाहरण हैं-परमिन्दर, रोजलिन, कचनार आदि। यहाँ प्रश्न उठता है कि किस रूप में इन नामों को संस्कृत में लिखा जाए। इसलिए इस पाठ में व्यञ्जनान्त (परमिन्दर्) रूप में रखा गया है। संस्कृत में इन्हें व्यञ्जनान्त (परमिन्दर् रोजलिन्, कचनार) मानकर रूप चलाये जाने चाहिए।

परियोजना-कार्यम्

चलिए, आगामी अवकाश में एक अभ्यास करते हैं। सुबह जगने से लेकर रात सोने के समय तक बाजार से आनेवाली और प्रतिदिन काम में आने वाली वस्तुओं को ध्यानपूर्वक देखें और इनकी एक सूची बनाएँ। उनके लिए संस्कृत में क्या प्रयोग होता है यह जानने का प्रयास करें। सूची में हर वस्तु के नाम के आगे यह लिखें कि वह किस चीज की बनी है। इसमें प्लास्टिक की बनी हुई चीजों को छाँटकर एक जगह लिखें और यह आकलन करने का प्रयत्न करें कि प्रतिदिन हम कितनी मात्रा में प्लास्टिक का उपयोग करते हैं।

संस्कृत में वाक्य में पहले ‘अपि’ लगाने से वाक्य प्रश्न वाचक हो जाता है। जैसे-अपि प्रविशामः? क्या हम भीतर चलें?

धातु-संयुक्त तुमुन् प्रत्यय के अनुस्वार का लोप करके उसके आगे कामा/कामः जोड़ने से अमुक कार्य करना चाहने वाली/चाहने वाला यह मुहावरेदार प्रयोग होता है। जैसे-गन्तुकामा, वक्तुकामा, कर्तुकामः इत्यादि। इस प्रक्रिया के आधार पर नीचे लिखे वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद करें-
(क) राम क्या कहना चाहता है? – अपि रामः वक्तुकाम:?

(ख) क्रिस्तीना कहाँ जाना चाहती है? – क्रिस्तीना कुत्र गन्तुकामा?

(ग) वह करना क्या चाहता है? – सः किं कर्तुकामः?

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

मूलपाठः

(काश्चन बालिकाः भ्रमणाय निर्गताः परस्परमालपन्ति)

रिपञ्ची – परमिन्दर! परमिन्दर! एहि आगच्छ, उपवनं प्रविशामः।

परमिन्दर् – अरे! उपवनस्य द्वारे एव प्लास्टिकस्यूतकानि क्षिप्तानि इतस्ततः विकीर्णानि।

कचनार् – जनाः प्रमादं कुर्वन्ति। प्लास्टिकपुटकेषु खाद्यवस्तूनि गृहीत्वा भक्षयति, परं तानि पुटकानि मार्गे यत्र कुत्रापि क्षिपन्ति।

रोजलिन् – महती इयं समस्या। अपि प्रविशामः?

रिपञ्ची – अस्तु प्रविशामः। (सर्वाः उपवने प्रविशन्तिा)

कचनार् – कुत्र उपविशामः?

रिपञ्ची – अस्मिन् काष्ठपीठं पविशामः। (सर्वाः उपविशन्ति)

रिपञ्ची – अपि पश्यथ, ध्यं यत्रोपविष्टाः तत्र कानि वस्तूनि सन्ति?

परमिन्दर् – आम्। आम्। गहनि वस्तूनि परितो विकीर्णानि।

कचनार् – यथा स्यूतः, जलपी, कनकम् इत्यादीनि।

रोजलिन् – हला, आत्मानम पाया।

चेनम्मा – आम्। आम्। पश्या: सविधे कङ्कतम्, कुट्का , बेशबन्धः, घटिपट्टिका, कङ्कम इत्यादीनि सर्वाणि विराजन्ते। किमसि वक्तुकामा?

रिपञ्ची – इदं ध्यातव्यं यद् एतानि सर्वाणि वस्तूनि प्रायः प्लास्टिकेन निर्मित नि सन्ति।

कचनार – पूर्वं तु प्रायः कार्पासेन, चर्मणा, लौहेन, लाक्षया, मृत्तिकया काष्ठेन वा निर्मितानि वस्तूनि एव प्राप्यन्ते स्म। अधुना तत् स्थाने प्लास्टिक-निर्मितानि वस्तूनि परितः विकीर्णानि सन्ति। एतानि अल्पमूल्यानि अपि सन्ति।

चेनम्मा – अहो! कलमस्तु विस्मृतः। कोऽपि एतत अनुमातुं शक्नोति यत् एकस्मिन् कलमे कति मसियष्टयः प्रयुज्यन्ते।

परमिन्दर् – अनुमीयते यत् प्रत्येक छात्रा प्रतिसप्ताह स्वकलमे एका मसियष्टिं पूरयति। तात्पर्यम् इदमस्ति यत् एकस्मिन्नेव वर्षे न्यूनान्यून प्रायः पञ्चाशत् मसियष्टयः तया प्रयुक्ताः भवन्ति।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

चेनम्मा – परं किं वयम् एकस्मिन् वर्षे एकस्यैव कलमस्य प्रयोगं कुर्मः?

सामूहिकस्वरः – नहि, नहि। वर्षे तु प्रायशः बहवः कलमा: विलुप्यन्ते।

रिपञ्ची – एका छात्रा त्रिषु मासेषु एकं कलम क्रीणाति। अर्थात् एकस्मिन् वर्षे चतुरः कलमान् क्रीणाति।

रोजलिन् – अपरं च कलमेन सह मसियष्टिः अपि प्लास्टिकावरणे समावेश्यते। तर्हि आहत्य प्रतिवर्षम् एका छात्रा प्रायः पञ्चाशन्मसियष्टीनां चतुर्भिः कलमैः

चतुःपञ्चाशद्धिः आवरणैः प्रयोगं करोति।

कचनार् – भवतु, बहुधा प्रयुक्तस्य प्लास्टिकस्य दूरगामिनः घातकाः परिणामाः वयं न द्रष्टुं शक्नुमः। प्लास्टिकं कदापि न गलति, न च अपक्षीयते। यथा-अन्यानि

वस्तूनि विनश्य मृत्तिकायां विलीयन्ते।

चेनम्मा – प्लास्टिकस्य मृत्तिकायां लयाभावात् अस्माकं पर्यावरणस्य कृते महती क्षतिः भवति।

रिपञ्ची – एकेन पदार्थेन अपरः पदार्थः सृज्यते, अथवा विनष्टं वस्तु मृत्तिकायां मिलति। परं प्लास्टिके इयं प्रक्रिया असम्भवा एव।

परमिन्दर् – कल्पयतु, यदि शतं वर्षाणि यावत् प्लास्टिक-निर्मिताना पदार्थानां निर्माणप्रक्रिया पृथिव्यां प्रचलिष्यति तर्हि किं स्यात? (सर्वाः सखेदं विमृशन्ति।)

रोजलिन् – अत्र विषादेन किम्? सर्वप्रथमं तु शिक्षकाणां सहयोगेन प्लास्टिकस्य विविधपक्षाः विचारणीयाः। अस्माकं प्रयासोऽपि पर्यावरणस्य रक्षणे अपेक्षितः।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

सन्धिविच्छेदः
काश्चन = काः + चन।
इतस्ततः = इतः + ततः।
कुत्रापि = कुत्र + अपि।
यत्रोपविष्टाः = यत्र + उपविष्टाः।
परितो विकीर्णानि = परितः + विकीर्णानि।
इत्यादीनि = इति + आदीनि।
यद् एतानि = यत् + एतानि।
कलमस्तु = कलमः + तु।
कोऽपि = कः + अपि।
प्रत्येकम् = प्रति + एकम्।
एकस्मिन्नेव = एकस्मिन् + एव।
न्यूना-न्यूनम् = न्यूनात् + न्यूनम्।
एकस्यैव = एकस्य + एव।
कदापि = कदा + अपि।
लयाभावात् = लय + अभावात्।
प्रयासोऽपि = प्रयास: + अपि।

संयोगः
परस्परमालपन्ति = परस्परम् + आलपन्ति।
आत्मानमपि = आत्यानम् अपि।
किमसि = किम् असि।
इदमस्ति = इदम् + अस्ति।

पदार्थबोध:
काश्चन = कुछ (स्त्री.) (काश्चित्)।
आलपन्ति = बातें कर रही हैं (चर्चपन्ति)।
प्लास्टिक स्थतानि = प्लास्टिक के थैलियाँ/पॉलीथीन।
क्षिप्तानि = फेंकी हुई हैं (विकीर्णानि)।
पुटकानि = छोटी थैलियाँ (पाउच) (लघुस्यूतानि)।
काष्ठपीठे = बेंच पर (काष्टमञ्चे)।
जलकूपी – पानी की बोतल (वारिकूपी)।
हला = सखी! (आलि!)।
कङ्कतम् = कंघा (केशप्रसाधनी)।
केशबन्ध = हेयर बैंड (अलकबन्धः)।
घटिपट्टिका = घड़ी की बैल्ट (घटिबन्धिनी)।
कार्पासेन = कपास से (तूलेन)।
लाक्षया = लाख से (लाक्षातत्त्वेन)।
कलमः = लेखनी, पैन (लेखनी)।
परितः = चारों तरफ (सर्वतः)।
मसियष्य्यः = रिफिल (मसिवर्तिकाः)।
न्यूनान्यूनम् = कम-से-कम (अल्पादल्पम्)।
प्रायशः = अधिकांशतः (अधिकांशतः)।
आहत्य = कुल मिलाकर (योजयित्वा)।
विलीयन्ते = लुप्त हो जाते हैं (विलुप्यन्ते)।
अपक्षीयते = नष्ट हो जाता है (नश्यते)।
लयाभावात् = लय/नष्ट न होने के कारण (विलीनाभावात्)।
सुज्यते = बनाया जाता है (निर्दीयते)।
कल्पयतु = कल्पना कीजिए (अनुमीयताम्)।
प्रयासः = कोशिश (प्रयत्नः)।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

सरलार्थः
(कुछ बालिकाएँ घूमने के लिए निकली हुई परस्पर वार्तालाप कर रही हैं।)

रिपञ्ची – परमिन्दर्! परमिन्दर! यहाँ आओ, उद्यान में प्रवेश करते हैं।

परमिन्दर् – अरे! बगीचे के द्वार पर ही फैकी गई प्लास्टिक की थैलियाँ इधर-उधर बिखरी पड़ी हैं।

कचनार – लोग प्रमाद (लापरवाही) करते हैं। प्लास्टिक की थैलियों में खाद्य वस्तुएँ लेकर खाते हैं, परन्तु उन (छोटी) थैलियों (पाउचों) को रास्ते में जहाँ-कहीं भी फेंक देते हैं।

रोजलिन् – बहुत बड़ी है यह समस्या। क्या हम प्रवेश करें?

रिपञ्ची – अच्छा प्रवेश करते हैं। (सभी बगीचे में प्रवेश करते हैं।)

कचनार – हम कहाँ बैठे?

रिपञ्ची – इस लकड़ी की बैंच पर बैठते हैं। (सभी बैठती हैं।)

रिपञ्ची – क्या तुम सब देख रही हो? हम जहाँ बैठे हैं वहाँ कौन-सी वस्तुएँ हैं?

परमिन्दर् – हाँ, हाँ। बहुत वस्तुएँ चारों तरफ फैली पड़ी हैं।

कचनार – जैसे थैलियाँ, पानी की बोतल, गेंद आदि।

रोजलिन् – सखी! अपना भी देखो।

चेनम्मा – हाँ। हाँ। देख ही रही हूँ। मेरे पास कंघा, कण्डल, हेयर बैंड, घड़ी का पट्टा, कंगन आदि सभी स्थित हैं। क्या कहना चाहती हो?

रिपञ्ची – यह ध्यान देना चाहिए कि ये सारी वस्तुएँ अधिकांशतः प्लास्टिक से बनती हैं।

कचनार् – पहले तो प्रायः कपास से, चमड़े, लोहे से, लाख से, मिट्टी से या लकड़ी से बनी हुई वस्तुएँ ही मिलती थीं। अब उसके स्थान पर प्लास्टिक से बनी वस्तुएँ चारों ओर बिखरी हुई हैं। ये कम कीमत की भी हैं।

चेनम्मा – अरे! कलम को तो भूल ही गई। कोई यह अनुमान कर सकता है कि एक कलम (पैन) में कितने रिफिल प्रयोग में लाए जाते हैं?

परमिन्दर् – अनुमान है कि प्रत्येक छान्ना प्रति सप्ताह अपनी कलम में एक (नया) रिफिल डालती है। तात्पर्य यह है कि एक ही वर्ष में वह कम-से-कम पचास रिफिल प्रयोग में लाती है।

चेनम्मा – परन्तु क्या हम एक वर्ष में एक ही कलम का प्रयोग करते हैं?

सामूहिक स्वर – नहीं, नहीं। वर्ष में तो प्रायः अनेक कलम विलुप्त हो जाती हैं।

रिपञ्ची – एक छात्रा तीन महीनों में एक पैन (कलम) खरीदती है। अर्थात् एक वर्ष में चार कलम खरीदती है।

रोजलिन् – और दूसरे कलम के साथ रिफिल भी प्लास्टिक के कवर में डाली जाती है। तो जोड़कर प्रतिवर्ष एक छात्रा प्रायः पचास रिफिल, चार कलम और चौवन कवरों का प्रयोग करती है।

कचनार् – ठीक है, बहुत प्रयोग होने वाले प्लास्टिक के दूरगामी और घातक परिणामों को हम देख नहीं सकते हैं। प्लास्टिक कभी गलता नहीं है और नष्ट भी नहीं होता है। जैसे दूसरी वस्तुएँ नष्ट होकर मिट्टी में मिल जाती हैं।

चेनम्मा – प्लास्टिक का मिट्टी में विलय न होने से पर्यावरण के लिए भारी क्षति होती है।

रिपञ्ची – एक पदार्थ से दूसरा पदार्थ बनता है या नष्ट वस्तु मिट्टी में मिल जाती है। परन्तु प्लास्टिक में यह प्रक्रिया असम्भव है।

परमिन्दर – कल्पना करो, यदि सौ वर्ष तक प्लास्टिक से बने पदार्थों की निर्माण प्रक्रिया पृथ्वी पर चलेगी तो क्या होगा? (सभी खेद सहित विचार करती हैं।)

रोजलिन् – इसमें विषाद (खेद) करने से क्या? सबसे पहले तो शिक्षकों के प्रयोग से प्लास्टिक के विविध पक्षों का विचार करना चाहिए। हमारा प्रयास भी पर्यावरण की रक्षा में आवश्यक है।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 12 कः रक्षति कः रक्षितः

कः रक्षति कः रक्षितः Summary

कः रक्षति कः रक्षितः पाठ-परिचयः

मानवीय सभ्यता में पाषाण, ताम्र, लौह आदि युगों का अपना इतिहास है। वर्तमान युग को ‘प्लास्टिक युग’ कहना उचित होगा। प्रस्तुत पाठ पर्यावरण पर केन्द्रित है। हमारे जीवन में प्लास्टिक का इस सीमा तक प्रवेश हो चुका है कि हम इसके बिना दैनिक जीवन चलाने की कल्पना भी नहीं कर पाते जबकि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए घातक है। प्लास्टिक के बढ़ते हुए उपयोग पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए इस पाठ में पर्यावरण तथा प्रदूषण की समस्या के प्रति संवेदनशील समझ विकसित करने का प्रयास किया गया है।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले

अभ्यासः

प्रश्न 1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत-
(क) महाराष्ट्रस्य प्रथमा महिला शिक्षिका का आसीत्?
उत्तरम्:
महाराष्ट्रस्य प्रथमा महिला शिक्षिका ‘सावित्री बाई फुले’ आसीत्।

(ख) कस्य समुदायस्य’बालिकानां कृते सावित्री अपरं विद्यालय प्रारब्धवती?
उत्तरम्:
अस्पृष्टस्य समुदायस्य बालिकानां कृते सावित्री अपरं विद्यालयं प्रारब्धवती।

(ग) कीदृशीनां कुरीतीनां सावित्री विरोधम् अकरोत्।
उत्तरम्:
सामाजिक कुरीतीनां सावित्री विरोधम् अकरोत्।

(घ) किमर्थं शीर्णवस्त्रावृता: नार्यः कूपात् जलं ग्रहीतुं वारिताः?
उत्तरम्:
निम्नवर्गत्वात् शीर्णवस्त्रावृताः नार्यः कृपात् जलं ग्रहीतुं वारिताः।

(ङ) सावित्र्याः मृत्युः कथम् अभवत्?
उत्तरम्:
सावित्र्याः मृत्यु असाध्यरोगेण अभवत्।

(च) तस्याः द्वयोः काव्यसङ्कलनयोः नामनी के?
उत्तरम्:
तस्याः द्वयोः काव्यसङ्कलनयोः नामनी
1. काव्य फुले
2. सुबोधरलाकरः च।

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प्रश्न 2.
अधोलिखितानि पदानि आधृत्य वाक्यानि रचयत-
स्वकीयम् – __________
सविनोदम् – __________
सक्रिया – __________
प्रदेशस्य – __________
मुखरम् – __________
सर्वथा – __________
उत्तरम्:
स्वकीयम् – (अपना) स्वकीयं कार्यं कुरु।
सविनोदम् – (हास्यपूर्वक), सः सविनोदम् आचरति।
सक्रिया – (क्रियाशीला) सा सदैव सक्रिया दृश्यते।
प्रदेशस्य – (प्रदेश की) प्रदेशस्य उन्नतिः करणीया।
मुखरम् – (स्पष्ट रूप से) सः मुखरम् एव वदति।
सर्वथा – (बिल्कुल) सः सर्वथा सत्यं वदति।

प्रश्न 3.
अधोलिखितानां पदानां विलोमपदांनि लिखत-
उपरि – ___________
आदानम् – ___________
परकीयम् – ___________
विषमता – ___________
व्यक्तिगतम् – ___________
आरोहः
उत्तरम्:
उपरि – अधः
आदानम् – प्रदानम्
परकीयम् – स्वकीयम्
विषमता – समता
व्यक्तिगतम् – सार्वजनिकम्
आरोहः – अवरोहः

प्रश्न 4.
अधोलिखितानां पदाना लिङ्ग, विभक्ति, वचन च लिखत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले - 1
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले - 2

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले

प्रश्न 5.
उदाहरणमनुसृत्य लकारपरिवर्तनं कुरुत-

वर्तमानकालःअतीतकालः
यथा- सा शिक्षिका अस्ति।सा शिक्षिका आसीत्।
(क) सा अध्यापने संलग्ना भवति।
(ख) सः त्रयोदशवर्षकल्पः अस्ति।
(ग) महिला: तडागात् जलं नयन्ति।
(घ) वयं प्रतिदिनं पाठं पठामः।
(ङ) यूयं कि विद्यालयं गच्छथ?
(च) ते बालकाः विद्यालयात् गृहं गच्छन्ति।

उत्तरम्:

वर्तमानकालःअतीतकालः
यथा- सा शिक्षिका अस्ति।सा शिक्षिका आसीत्।
(क) सा अध्यापने संलग्ना भवति।सा अध्यापने संलग्ना अभवत्।
(ख) सः त्रयोदशवर्षकल्पः अस्ति।स: त्रयोवशवर्षकल्प: आसीत्।
(ग) महिला: तडागात् जलं नयन्ति।महिला: तडागात् जलम आनयन्।
(घ) वयं प्रतिदिनं पाठं पठामः।वयं प्रतिदिनं पाठं अपठाम।
(ङ) यूयं कि विद्यालयं गच्छथ?यूयं किं विद्यालयम् अगच्छत?
(च) ते बालकाः विद्यालयात् गृहं गच्छन्ति।ते बालका: विद्यालयात् गृहम् अगच्छन्।

मूलपाठः

उपरि निर्मितं चित्रं पश्यत। इदं चित्रं कस्याश्चित् पाठशालायाः वर्तते। इयं सामान्या पाठशाला नास्ति। इयमस्ति महाराष्ट्रस्य प्रथमा कन्यापाठशाला। एका शिक्षिका गृहात् पुस्तकानि आदाय चलति। मार्गे कश्चित् तस्याः उपरि धूलिं कश्चित् च प्रस्तरखण्डान् क्षिपति। परं सा स्वदृढनिश्चयात् न विचलति। स्वविद्यालये कन्याभिः सविनोदम् आलपन्ती सा अध्यापने संलग्ना भवति। तस्याः स्वकीयम् अध्ययनमपि सहैव प्रचलति। केयं महिला? अपि यूयमिमां महिला जानीथ? इयमेव महाराष्ट्रस्य प्रथमा महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले नामधेया।
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले - 3

जनवरी मासस्य तृतीये दिवसे 1831 तमे ख्रिस्ताब्दे महाराष्ट्रस्य नायगाँव-नाम्नि स्थाने सावित्री अजायत। तस्याः माता लक्ष्मीबाई पिता च खंडोजी इति अभिहिती। नववर्षदेशीया सा ज्योतिबा फुले महोदयेन परिणीता। सोऽपि तदानीं त्रयोदशवर्षकल्पः एव आसीत्। यतोहि सः स्त्रीशिक्षायाः प्रबलः समर्थकः आसीत् अतः सावित्र्याः मनसि स्थिता अध्ययनाभिलाषा उत्सं प्राप्तवती। इतः परं सा साग्रहम् आङ्ग्लभाषाया अपि अध्ययनं कृतवती।

1848 तमे ख्रिस्ताब्दे पुणे नगरे सावित्री ज्योतिबामहोदयेन सह कन्यानां कृते प्रदेशाय प्रथम विद्यालयम् आरभत। तदानीं सा केवल सप्तदशवर्षीया आसीत्। 1851 तमे ख्रिस्ताब्वे अस्पृश्यत्वात् तिरस्कृतस्य समुदायस्य बालिकानां कृते पृथक्तया तया अपरः विद्यालयः प्रारब्धः।

सामाजिककुरीतीनां सावित्री मुखर विरोधम् अकरोत्। विधवानां शिरोमुण्डनस्य निराकरणाय सा साक्षात् नापितैः मिलिता। फलतः केचन नापिताः अस्यां रूढी सहभागिताम् अत्यजन्। एकदा सावित्र्या मार्गे दृष्टं यत् कूपं निकषा शीर्णवस्त्रावृताः तथाकथिताः निम्नजातीयाः काश्चित् नार्यः जलं पातुं याचन्ते स्म। उच्चवर्गीयाः उपहासं कुर्वन्तः कूपात् जलोद्धरणं अवारयन्। सावित्री एतत् अपमान सोढुं नाशक्नोत्। सा ताः स्त्रियः निजगृहं नीतवती। तडागं दर्शयित्वा अकथयत् च यत् यथेष्ट जल नयत। सार्वजनिकोऽयं तडागः। अस्मात् जलग्रहणे नास्ति जातिबन्धनम्। तया मनुष्याणां समानतायाः स्वतन्त्रतायाश्च पक्षः सर्वदा सर्वथा समर्थितः।

‘महिला सेवामण्डल’ ‘शिशुहत्या प्रतिबन्धक गृह’ इत्यादीनां संस्थानां स्थापनायां फुलेवम्पत्योः अवदानम् महत्त्वपूर्णम्। सत्यशोधकमण्डलस्य गतिविधिषु अपि सावित्री अतीव सक्रिया आसीत्। अस्य मण्डलस्य उद्देश्यम् आसीत् उत्पीडिताना समुदायानां स्वाधिकारान् प्रति जागरणम् इति।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले

सावित्री अनेकाः संस्थाः प्रशासनकौशलेन सञ्चालितवती। दुर्भिक्षकाले प्लेग-काले च सा पीडितजनानाम् अश्रान्तम् अविरतं च सेवाम् अकरोत्। सहायता-सामग्री-व्यवस्थायै सर्वथा प्रयासम् अकरोत्। महारोगप्रसारकाले सेवारता सा स्वयम् असाध्यरोगेण ग्रस्ता 1897 तमे ख्रिस्ताब्बे निधनं गता।

साहित्यरचनया अपि सावित्री महीयते। तस्याः काव्यसङ्कलनद्वयं वर्तते ‘काव्यफुले’ ‘सुबोधरलाकर’ चेति। भारतदेशे महिलोत्थानस्य गहनावबोधाय सावित्रीमहोदयाया: | जीवनचरितम् अवश्यम् अध्येतव्यम्।

सन्धिविच्छेदः
कस्याश्चित् = कस्याः + चित्।
नास्ति = न + अस्ति।
कश्चित् = कः + चित्।
विद्यालये = विद्या + आलये।
सहैव = सह + एव।
केयम् = का + इयम्।
ख्रिस्ताब्दे = ख्रिस्त + अब्दे।
सोऽपि = सः + अपि।
यतोहि = यतः + हि।
अध्ययनाभिलाषा = अध्ययन + अभिलाषा।
प्राप्तवती = प्र + आप्तवती।
साग्रहम् = स + आग्रहम्।
आङ्ग्लभाषाया = अपिआङ्ग्लभाषायाः + अपि।
शिरोमुण्डनस्य = शिरः + मुण्डनस्य।
काश्चित् = काः + चित्।
जलोद्धारणम् = जल + उद्धारणम्।
नाशक्नोत् = न + अशक्नोत्।
यथेष्टम् = यथा + इष्टम्।
सार्वजनिकोऽयम् = सार्वजनिकः + अयम्।
नास्ति = न + अस्ति।
स्वतन्त्रतायाश्च = स्वतन्त्रताया: + च।
इत्यादीनाम् = इति + आदीनाम्।
स्वाधिकारान = स्व + अधिकारान।
रत्नाकरः = रत्न + आकर:।
चेति = च + इति।
महिलोत्थानस्य = महिला + उत्थानस्य।
गहनावबोधाय = गहन + अवबोधाय।
महोदया = महा + उदया।

संयोगः
इयमस्ति = इयम् अस्ति।
अध्ययनमपि = अध्ययनम् + अपि।
यूयमिमाम् = यूयम् + इमाम्।
इयमेव = इयम् + एव।

पदार्थबोध:
वर्तते = है (अस्ति, विद्यते)।
आदाय = लेकर (गृहीत्वा)।
प्रस्तरखण्डान् = पत्थर के टुकड़ों को (पाषाणखण्डान्)।
अजायन = पैदा हुई (जन्म लेभे)।
अभिहितौ = (दोनों) कहे गए हैं (कथितौ)।
परिणीता = ब्याही गई (ऊढा, विवाहिता)।
यतो हि = क्योंकि (यस्मात्)।
प्रारब्धः = आरम्भ किया (समारब्धः)।
निराकरणाय = दूर करने के लिए (निराकर्तुम्)।
नापितः = नाई (केशकर्तकः)।
रूढौ = रूढ़ि में (परम्परायाम्)।
निकषा = निकट (समीपे)।
सोढुम् = सहने में (सहनार्थम्)।
उत्पीडितानाम् = सताए हुओं का (प्रताडितानाम्)।
अश्रान्तम् = बिना थके हुए (अक्लान्तम्)।
महीयते = बढ़-चढ़कर है (विशिष्यते)।
पद्यबद्धम् = कविता के रूप में (काव्यात्मकम्)।
गहनावबोधाय = गहराई से समझने के लिए (गूढचिन्तनाय)।
निधनम् = मृत्यु को (मृत्युम्)।
अध्येतव्यम् = पढ़ना चाहिए (पठितव्यम्)।

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सरलार्थ:
ऊपर बने हुए चित्र को देखो। यह चित्र किसी पाठशाला का है। यह साधारण पाठशाला नहीं है। यह है महाराष्ट्र की पहली कन्या पाठशाला। एक शिक्षिका घर से पुस्तकें लेकर चलती है। मार्ग में कोई उस पर धूल फेंकता है और कोई पत्थर के टुकड़े। परन्तु वह अपने दृढ़ निश्चय से नहीं हटती। अपने विद्यालय में बालिकाओं से हँसी-मजाक से बातें करती हुई वह (उन्हें) पढ़ाने में लगी रहती है। उसका अपना अध्ययन भी साथ ही चलता है। कौन है यह महिला? क्या तुम सब इस महिला को जानते हो? यह ही महाराष्ट्र की प्रथम महिला शिक्षिका है जिसका नाम ‘सावित्री बाई फुले’ है।

जनवरी महीने के तीसरे दिन सन् 1831 ईस्वी में महाराष्ट्र के नायगाँव नामक स्थान पर सावित्री जन्मी। उसकी माता का नाम लक्ष्मीबाई तथा पिता खंडोजी थे। नौ वर्ष वाली वह ज्योतिबा फुले महोदय से ब्याही गई। वे भी तब तेरह वर्ष के ही थे। क्योंकि वह स्त्रीशिक्षा के प्रबल समर्थक थे इसलिए सावित्री के मन में स्थित
अध्ययन की अभिलाषा स्रोत को पा गई। इससे पहले उसने ङ्के पूर्वक आडाला था अध्ययन भी किया।

सन् 1848 ई. में, पुणे नगर में सावित्री ने ज्योतिबा महोदय के साथ कन्याओं के लिए प्रदेश का पहला विद्यालय प्रारम्भ किया। तब वह केवल सत्रह वर्ष की थी। सन् 1851 ई. में छुआछूत से तिरस्कृत समुदाय की बालिकाओं के लिए उसने अलग से विद्यालय आरम्भ किया।

सामाजिक कुरीतियों का सावित्री ने मुखर विरोध किया। विधवाओं के सिर मुंडाने का निराकरण करने के लिए वह साक्षात् नाइयों से मिली। परिणामतः कुछ नाइयों ने इस रूढ़ि का साथ छोड़ दिया। एक बार सावित्री ने मार्ग में देखा कि कुएँ के पास फटे-पुराने कपड़े में लिपटी तथाकथित निम्न जाति की कुछ नारियाँ जल पीने के लिए माँग रही थीं। उच्च वर्ग वालों ने उपहास करते हुए कुएँ से जल निकालने के लिए रोक दिया। सावित्री यह अपमान नहीं सह सकी। वह उन स्त्रियों को अपने घर ले गई और तालाब दिखाकर कहा कि जितना चाहो उतना जल ले लो। यह तालाब सार्वजनिक है। इससे जल लेने में जाति का बन्धन नहीं है। उसने मनुष्यों की समानता व स्वतन्त्रता के पक्ष का पूरी तरह व हमेशा समर्थन किया।

‘महिला सेवा मण्डल’, ‘शिशु हत्या प्रतिबन्धक गृह’ इत्यादि संस्थाओं की स्थापना में फुले दम्पत्ति का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सत्यशोधक मण्डल की गतिविधियों पर भी सावित्री अत्यधिक सक्रिय थी। इस मण्डल का उद्देश्य था-“सताए हुए समुदायों को अपने अधिकारों के लिए जागृत करना।”

सावित्री ने अपने प्रशासन कौशल से अनेक संस्थाओं का सञ्चालन किया। अकाल और प्लेग के समय उसने पीड़ित लोगों की बिना थके सेवा की। सहायता-सामग्री की व्यवस्था के लिए भरसक प्रयास किया। महामारी फैलने के समय सेवा में लगी हुई वह स्वयं असाध्य रोग से ग्रस्त होकर सन् 1897 ई. में स्वर्गवासी हो गई।

साहित्य रचना में भी सावित्री आगे है। उसके दो काव्य संकलन हैं-‘काव्यफुले’ और ‘सुबोध रत्नाकर’। भारत देश में महिलाओं के उत्थान की गहन जानकारी के लिए सावित्री महोदया के जीवन चरित्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 11 सावित्री बाई फुले

सावित्री बाई फुले Summary

सावित्री बाई फुले पाठ-परिचयः

भारतवर्ष में प्राचीन काल में विदुषियों का उल्लेख मिलता है। कालान्तर में एक ऐसा कलंकित काल आया जब स्त्री शिक्षा लगभग समाप्त हो गई। शिक्षा हमारा अधिकार है। हमारे समाज में कई समुदाय इससे लम्बे समय तक वञ्चित रहे हैं। उन्हें इस अधिकार को पाने के लिए लम्बा संघर्ष करना पड़ा है। लड़कियों को तो और ज्यादा अवरोध झेलना पड़ता रहा है। प्रस्तुत पाठ इस संघर्ष का नेतृत्व करने वाली सावित्री बाई फुले के योगदान पर केन्द्रित है। जब-जब स्त्री शिक्षा के इतिहास की बात होगी, तब-तब फुले जैसी नारियों को चिरकाल तक स्मरण किया जाएगा।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 10 नीतिनवनीतम्

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 10 नीतिनवनीतम् Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 10 नीतिनवनीतम्

अभ्यासः

प्रश्न 1.
अधोलिखितानि प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) नृणां संभवे कौ क्लेशं सहेते?
उत्तरम्:
मातापितरौ।

(ख) कीदृशं जलं पिबेत्?
उत्तरम्:
वस्त्रपूतम्।

(ग) नीतिनवनीतम् पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित?
उत्तरम्:
मनुस्मृतेः।

(घ) कीदृशीं वाचं वदेत्?
उत्तरम्:
सत्यपूताम्।

(ङ) उद्यानम् कैः निनादै: रम्यम्?
उत्तरम्:
भृङ्गैः।

(च) दुःखं किं भवति?
उत्तरम्:
परवशम्।

(छ) आत्मवशं किं भवति?
उत्तरम्:
सुखम्।

(ज) कीदृशं कर्म समाचरेत्?
उत्तरम्:
मनः पूतम्।

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प्रश्न 2.
अधोलिखिताना प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत-
(क) पाठेऽस्मिन् सुखदु:खयों: किं लक्षणम् उक्तम्?
उत्तरम्:
पाठेऽस्मिन् सुखदुःखयोः लक्षणम् इदम् उक्तम्-सर्वपरवशं दुःखम्, सर्वम् आत्मवशं सुखम् इति।

(ख) वर्षशतैः अपि कस्य निष्कृतिः कर्तुं न शक्या?
उत्तरम्:
वर्षशतैः अपि तस्य (मातापित्रोः कष्टस्य) निष्टकृतिः कर्तुं न शक्या।

(ग) “त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते”-वाक्येऽस्मिन् त्रयः के सन्ति?
उत्तरम्:
मातापितरौ आचार्यः च त्रयः सन्ति।

(घ) अस्माभिः कीदृशं कर्म कर्तव्यम्?
उत्तरम्:
अस्माभिः अन्तरात्मनः परितोष कर्म कर्तव्यम्।

(ङ) अभिवादनशीलस्य कानि वर्धन्ते?
उत्तरम्:
अभिवादनशीलस्य आयुर्विद्या यशोबलानि वधन्ते।

(च) सर्वदा केषां प्रियं कुर्यात्?
उत्तरम्:
सर्वदा मातृपितृ-आचार्याणां प्रियं कुर्यात।

प्रश्न 3.
स्थूलपदान्यवलम्बय प्रश्ननिर्माणं कुरुत-
(क) वृद्धोपेसेविनः आयुर्विद्या यशो बलं न वर्धन्ते।
उत्तरम्:
कस्य आयुर्विद्या यशो बलं न वर्धन्ते।

(ख) मनुष्यः सत्यपूतां वाचं वदेत्।
उत्तरम्:
मनुष्यः कीदृशीं वाचं वदेत्?

(ग) त्रिषु तुष्टेषु सर्व तपः समाप्यते?
उत्तरम्:
त्रिषु तुष्टेषु सर्व किम् समाप्यते?

(घ) मातापितरौ नृणां सम्भवे क्लेशं सहेते।
उत्तरम्:
को नृणां सम्भवे क्लेशं सहेते?

(ङ) तयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्।
उत्तरम्:
तयोः नित्यं किम् कुर्यात्?

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 10 नीतिनवनीतम्

प्रश्न 4.
संस्कृतभाषयां वाक्यप्रयोगं कुरुत-
(क) विद्या
उत्तरम्:
विद्या – विद्या भोगकरी यशःकरी अर्थकरी च भवति।

(ख) तपः
उत्तरम्:
तपः – मातृपितृगुरुणां सेवा एवं महत् तपः।

(ग) समाचरेत्
उत्तरम्:
समाचरेत् – सर्वदा मनसा पूतं व्यवहारं समाचरेत्।

(घ) परितोषः
उत्तरम्:
परितोषः – आत्मनः परितोषः एव सुखकरः।

(ङ) नित्यम्
उत्तरम्:
नित्यम् – मानवैः नित्यं सत्कर्म आचरितव्यम्।

प्रश्न 5.
शुद्धवाक्यानां समक्षम् आम् अशुद्धवाक्यानां समक्षं च नैव इति लिखत-
(क) अभिवादनशीलस्य किमपि न वर्धते।
उत्तरम्:
नैव।

(ख) मातापितरौ नृणां सम्भवे कष्टं सहेते।
उत्तरम्:
आम्।

(ग) आत्मवशं तु सर्वमेव दुःखमस्ति।
उत्तरम्:
नैव।

(घ) येन पितरौ आचार्यः च सन्तुष्टाः तस्य सर्वं तपः समाप्यते।
उत्तरम्:
आम्।

(ङ) मनुष्यः सदैव मनः पूतं समाचरेत्।
उत्तरम्:
आम्।

(च) मनुष्यः सदैव तदेव कर्म कुर्यात् येनान्तरात्मा तुष्यते।
उत्तरम्:
आम्।

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प्रश्न 6.
समुचितपदने रिक्तस्थानानि पूरयत-
(क) मातापित्रे: तपसः निष्कृतिः __________ कर्तुमशक्या। (दशवरपि / षष्टिः वरपि / वर्षशतैरपि)।
(ख) नित्यं वृद्धोपसेविनः __________ वर्धन्ते। (चत्वारि / पञ्च / षट्)।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु __________ सर्व समाप्यते। (जप: / तप / कम)।
(घ) एतत् विद्यात् __________ लक्षणं सुखदु:खयोः। (शरीरेण / समासेन / विस्तारेण)
(ङ) दृष्टिपूतम् न्यसेत् __________। (हस्तम् / पादम् / मुखम्)
(च) मनुष्यः मातापित्रो: आचार्यस्यय च सर्वदा __________ कुर्यात्। (प्रियम् / अप्रियम् / अकार्यम्)
उत्तरम्:
(क) मातापित्रेः तपसः निष्कृतिः वर्षशतैरपि कर्तुमशक्या।
(ख) नित्यं वृद्धोपसेविन: चत्वारि वर्धन्ते।
(ग) त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्व समाप्यते।
(घ) एतत् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।
(ङ) दृष्टिपूतम् न्यसेत् पादम्।
(च) मनुष्यः मातापित्रोः आचार्यस्यय च सर्वदा प्रियम् कुर्यात्।

प्रश्न 7.
मञ्जूषातः चित्वा उचिताव्ययेन वाक्यपूर्ति कुरुत-
तावत्, अपि, एव, यथा, नित्यं, यादृशम्।
(क) तयोः ____________ प्रियं कुर्यात्।
(ख) ____________ कर्म करिष्यसि। तादृशं फलं प्राप्स्यसि।
(ग) वर्षशतैः ____________ निष्कृतिः न कर्तुं शक्या।
(घ) तेषु ____________ त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते।
(ङ) ____________ राजा तथा प्रजा।
(च) यावत् सफलः न भवति ____________ परिश्रमं कुरु।
उत्तरम्:
(क) तयोः नित्यं प्रियं कुर्यात्।
(ख) यादृशं कर्म करिष्यसि। तादृशं फलं प्राप्स्यसि।
(ग) वर्षशतैः अपि निष्कृतिः न कर्तु शक्या।
(घ) तेषु एव त्रिषु तुष्टेषु तपः समाप्यते।
(ङ) यथा राजा तथा प्रजा।
(च) यावत् सफलः न भवति तावत् परिश्रमं कुरु।

योग्यता-विस्तारः

भावविस्तारः संस्कृत वाङ्मय में जीवनोपयोगी कर्तव्य-पालन का निर्देश सुवचनों एवं नीतिसंबंधी श्लोकों के माध्यम से उपस्थापित किये गए हैं। उन्हें खोलने वालों की आवश्यकता है। जीवन-पथ पर चलते हुए जब ‘क्या करें, क्या न करें’ की स्थिति उत्पन्न होती है, तब संस्कृत के ये अनमोल वचन हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। नीतिशतक, विदुरनीति, चाणक्यनीतिदर्पण आदि ऐसे ही महान् ग्रन्थ हैं जिनमें श्लोकों का विशाल भण्डार है।
कुछ समानान्तर श्लोके

कर्मणा मनसा वाचा चक्षुषाऽपि चतुर्विधम्। प्रसादयति लोकं यस्त लोको नु प्रसीदति॥
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥

प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात्तदेव वक्तव्यं वचने का दरिद्रता।
यस्मिन् देशे न सम्मानो न प्रीतिर्न च बान्धवाः। न च विद्यागमः कश्चित् न तत्र दिवस वसेत्।

व्याकरणम् :
1. संधि की आवृत्ति
शिष्टाचारः – शिष्ट + आचारः
वृद्धोपसेविन – वृद्धः + उपसेविनः
आयुर्विद्या – आयुः + विद्या
यशो बलम् – यशः + बलम्
वर्षशतैरपि – वर्षशतैः + अपि
तयोर्नित्यं – तयोः + नित्यम्
कुर्यादाचार्यस्य – कुर्यात् + आचार्यस्य
तेष्वेव – तेषु + एव
सर्वमात्मवशम् – सर्वम् + आत्मवशम्
कुर्वतोऽस्य – कुर्वतः + अस्य
परितोषोऽन्तरात्मनः = परितोषः + अन्तरात्मनः
ववेद्वाचम् = वदेत् + वाचम

2. विधिलिङ् के विविध प्रयोग – (किसी भी काम को) करना चाहिए, इस अर्थ में विधिलिङ् का प्रयोग होता है। पाठ में आए कुछ शब्दों के प्रयोग अधोलिखित हैं-
स्यात् – (अस् धातु)
पिबेत् – (पा धातु)
वर्जयेत् – (व धातु)
वदेत् – (वद् धातु)

महान्तं प्राप्य सदबुद्धा
सत्यजेन्न लघुजनम्।
यत्रास्ति सूचिका कार्य
कृपाणाः किं करिष्यति।

सौहार्द प्रकृतेः शोभा
विचित्रे खलु संसारे नास्ति किञ्चित् निरर्थकम्।
अवश्स्वेत् धावने वीरः भारस्य वहने खरः॥

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ये श्लोक भी इसी बात की पुष्टि करते हैं कि संसार में कोई भी छोटा या बड़ा नहीं है। संसार की क्रियाशीलता, गीतशीलता में सभी का अपना-अपना महत्त्व है सभी के अपने-अपने कार्य हैं, अपना-अपना योगदान है, अतः हमें न तो किसी कार्य को छोटा या बड़ा, तुच्छ या महान् समझना चाहिए और न ही किसी प्राणी को आपस में मिल जुल कर सौहार्दपूर्ण तरीके से जीवन यापन से ही प्रकृति का सौन्दर्य है। विभिन्न प्राणियों से संबंधित निम्नलिखित श्लोकों को भी पढ़िए और रसास्वादन कीजिए-

इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्॥

काकचेष्टः बकध्यानी शनोनिद्रः तथैव च।
अल्पाहारः गृहत्यागः विद्यार्थी पञ्चलक्षणम्॥

स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजङ्गमः।
हसन्नपि नृपो हन्ति, मानयन्नपि दुर्जनः।।

प्राप्तव्यमर्थ लभते मनुष्यो,
देवोऽपि त लयितुं न शक्तः।
तस्मान शोचामि न विस्मयो मे
पदस्मदीयं नहि तत्परेषाम्॥

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥

वस्तुतः मित्रों के बिना कोई भी जीना पसन्द नहीं करता, चाहे उसके पास बाकी सभी अच्छी चीजें क्यों न हों। अतः हमें सभी के साथ मिलजुल कर अपने आस-पास के वातावरण की सुरक्षा और सुन्दरता में सदैव सहयोग करना चाहिए।

अकिञ्चनस्य, दान्तस्य, शान्तस्य समचेतसः।
मया सन्तुष्टमानसः, सर्वाः सुखमयाः दिशः॥

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मूलपाठः

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः।
चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥1॥

यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम्।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥2॥

तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्व समाप्यते ॥3॥

सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥4॥

यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥5॥

दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥6॥

अन्वयः
1. तस्य अभिवादनशीलस्य नित्यम् वृद्धोपसेविनः (च) चत्वारि आयुः विद्या यशः बलम् (च) वर्धन्ते।

2. नृणाम् सम्भवे मातापितरौ यम् क्लेशम् सहेते तस्य निष्कृतिः वर्षशतैः अपि कर्तुम् न शक्या।

3. नित्यम् तयोः (मातापित्रो:) आचार्यस्य च सर्वदा प्रियम् कुर्यात्। तेषु त्रिषु तुष्टेषु एव सर्वम् तपः समाप्यते।

4 सर्वम् दुःखम् परवशम् (भवति) सर्वम् सुखम् आत्मवशम् (भवति)। एतत् समासेन सुखदुःखयोः लक्षणम् विद्यात्।

5. यत् कर्म कुर्वतः अस्य अन्तरात्मनः परितोष: स्यात्। प्रयत्नेन तत् (कर्म) कुर्वीत विपरीतम् तु वर्जयेत्।

6. दृष्टिपूतम् पादम् न्यसेत्, वस्त्रपूतम् जलम् पिबेत्। सत्यपूताम् वाचम् वदेत्, मनःपूतम् समाचरेत्।।

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सन्धिविच्छेदः
वृद्धोपसेविन = वृद्ध + उपसेविनः।
आयुर्विद्या = आयु: + विद्या।
यशो बलम् = यशः + बलम्।
निष्कृतिः = निः + कृतिः।
वर्षशतैरपि = वर्षशतै: + अपि।
तयोर्नित्यम् = तयो: + नित्यम्।
कुर्यावाचार्यस्य = कुर्यात् + आचार्यस्य।
तेष्वेव = तेषु + एव।
एतद्विद्यात = एतत् + विद्यात्।
कुर्वतोऽस्य = कुर्वतः + अस्या
परितोषोऽन्तरात्मनः = परितोष: + अन्त: + आत्मनः।
ववेद्वाचम् = वदेत् + वाचम्।
समाचरेत = सम + आचरेत्।

संयोगः
सर्वमात्मवशम् = सर्वम् + आत्मवशम्।

पदार्थबोध:
वृद्धोपसेविन = बुजुर्गों की सेवा करने वाले का (वृद्ध-सेवारतस्य)।
अभिवादनशीलस्य = नमस्कार करने के स्वभाव वाले का (नमस्कुर्वतः जनस्य)।
नृणाम् = मानवों का (मानवानाम्)।
सम्भवे = जन्म में (जन्मनि)।
परितोषः = खुशी (सन्तुष्टिः)।
अन्तरात्मनः = मन का (हृदयस्य, मनस)।
कुर्वीत = करना चाहिए (करणीयम्)।
न्यसेत् = रखना चाहिए (तिष्ठेत्)।
समासेन = संक्षेप में (संक्षेपेण)।

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सरलार्थ-
1. नमस्कार करने के स्वभाव वाले का और बुजुर्गों की सेवा करने के गुण वाले उस (व्यक्ति) की ये चार चीजें-उम्र, विद्या, यश और बल बढ़ते हैं।

2. मानवों के जन्म में माँ-बाप जो कष्ट झेलते हैं उसका निस्तार सैकड़ों वर्षों से भी नहीं किया जा सकता।

3. प्रतिदिन उन माता-पिता और गुरु के लिए प्रिय करें। उन तीनों के प्रसन्न होने पर सारी तपस्याएं समाप्त हो जाती हैं अर्थात् सफल होती हैं।

4. सब दुःख पराधीनता में और सब सुख स्वाधीनता में हैं। संक्षेप में सुख-दुःख का यही लक्षण समझना चाहिए, समझें।

5. जो कार्य करने से इस अंतरात्मा की प्रसन्नता हो, उसे प्रयासपूर्वक करना चाहिए और प्रतिकूल कार्यों का त्याग करना चाहिए।

6. नज़रों से देखकर (ज़मीन पर) पैर रखें, शुद्ध वस्त्र से छना हुए शुद्ध जल पीयें, सच बात बोलें और शुद्ध मन से आचरण करें।

भावार्थ-
मानव को सदाचार का पालन करना, माता-पिता-अध्यापक की खुशी का ध्यान करना और सुखः दुःखादि के बारे में सतर्कतापूर्ण होना चाहिए।

नीतिनवनीतम् Summary

नीतिनवनीतम् पाठ-परिचयः

यह पाठ ‘मनुस्मृति’ के कुछ श्लोकों का संकलन है। मुख्यतः सदाचार का वर्णन है। माँ-बाप और गुरुजनों की सेवा करने वाले विनीत मानव को मिलने वाले लाभा का वर्णन है। सुख-दुख में समभाव रखना, स्वयं को खुश करने वाले कार्य करना और विपरीत कार्यों से दूर रहना, विचार-विमर्शपूर्वक सच्चाई की राह चलना इत्यादि सदाचारों का जिक्र किया गया है।

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HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

Haryana State Board HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

अभ्यासः

प्रश्न 1.
उच्चारणं कुरुत-
सुप्रभातम्                महत्त्वाधायिनी                        पर्वपरम्पराभिः
चतुर्विंशतिः              द्विसप्ततितमे                          वंशवृक्षनिर्मितानाम्
सप्तभगिन्यः             प्राकृतिकसम्पद्भिः                   वंशोद्योगोऽयम्
गुणगौरवदृष्ट्या         पुष्पस्तबकसदृशानि                 अन्ताराष्ट्रियख्यातिम्
उत्तरम्:
शिक्षकसहायतया स्वयमेव कुर्युः।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

प्रश्न 2.
प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत-
(क) अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?
उत्तरम्:
अष्टाविंशतिः।

(ख) प्राचीनेतिहासे काः स्वाधीनाः आसन्?
उत्तरम्:
सप्तभगिन्यः।

(ग) केषां समवायः ‘सप्तभगिन्यः’ इति कथ्यते?
उत्तरम्:
सप्तराज्यानाम्।

(घ) अस्माकं देशे कति केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति?
उत्तरम्:
सप्त।

(ङ) सप्तभगिनी-प्रदेशे क: उद्योगः सर्वप्रमुख:?
उत्तरम्:
वंशोद्योगः।

प्रश्न 3.
अधोलिखितपदेषु प्रकृति-प्रत्ययविभागं कुरुत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 1
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 2

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

प्रश्न 4.
पाठात् चित्वा तद्भवपदानां कृते संस्कृतपदानि लिखत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 3
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 4

प्रश्न 5.
भिन्न प्रकृतिकं पदं चिनुत-
(क) गच्छति, पठति, धावति, अहसत्, क्रीडति।
उत्तरम्:
अहसत्।

(ख) छात्रः, सेवकः, शिक्षक:, लेखिका, क्रीडकः।
उत्तरम्:
लेखिका।

(ग) पत्रम्, मित्रम्, पुष्पम्, आम्रः, नक्षत्रम्।
उत्तरम्:
आनः।

(घ) व्याघ्रः, भल्लूकः, गजः, कपोतः, वृषभः, सिंहः।
उत्तरम्:
कपोतः।

(ङ) पृथिवी, वसुन्धरा, धरित्री, यानम्, वसुधा।
उत्तरम्:
यानम्।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

प्रश्न 6.
मञ्जूषातः क्रियापदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत-
सन्ति, अस्ति, प्रतीयन्ते, वर्तते, इच्छामि, निवसन्ति, वर्तन्ते
(क) अयं प्रयोगः प्रतीकात्मक: ___________।
(ख) सप्त केन्द्रशासितप्रदेशा: ___________।
(ग) अत्र बहवः जनजातीयाः ___________।
(घ) अहं किमपि श्रोतुम् ___________।
(ङ) तत्र हस्तशिल्पिनां बाहुल्यं ___________।
(छ) गुणगौरवदृष्ट्या इमानि बृहत्तराणि ___________।
उत्तरम्:
(क) अयं प्रयोगः प्रतीकात्मक: वर्तते।
(ख) सप्त केन्द्रशासितप्रदेशाः सन्ति।
(ग) अत्र बहवः जनजातीयाः निवसन्ति।
(घ) अहं किमपि श्रोतुम् इच्छामि।
(ङ) तत्र हस्तशिल्पिना बाहुल्यम् अस्ति।
(च) सप्तभगिनीप्रदेशाः रम्याः हृद्याः च वर्तन्ते।
(छ) गुणगौरवदृष्ट्या इमानि बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।

प्रश्न 7.
विशेष्य-विशेषणानाम् उचितं मेलनम् कुरुत-
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 5
उत्तरम्:
HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः - 6

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

योग्यता-विस्तारः

अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि-युक्तं तथा द्वयम्।
सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मतम्॥

यह राज्यों के नामों को याद रखने का एक सरल तरीका है। इसका अर्थ है अ से आरम्भ होने वाले दो, म से आरम्भ होने वाले तीन, न से नगालैण्ड और त्रि से त्रिपुरा का बोध होता है। इसी प्रकार अठारह पुराणों के नाम याद रखने के लिये यह श्लोक प्रसिद्ध है-

मद्वयं भद्वयं चैव ब्रत्रयं वचतुष्टयम्।
अ-ना-प-लिंग-कूस्कानि पुराणानि प्रचक्षते॥

‘सप्तभगिनी’ इस उपनाम का सर्वप्रथम प्रयोग 1972 में श्री ज्योति प्रसाद सैकिया ने आकाशवाणी के साथ भेंटवार्ता के क्रम में किया था।
इनके अन्तर्गत आने वाले राज्यों का उल्लेख प्राचीन ग्रन्थों में भी प्राप्त होता है।
यथा-महाभारत, रामायण, पुराण आदि।
इन राज्यों की राजधानी क्रमशः इस प्रकार हैं-

अरुणाचल प्रदेश – इटानगर
असम – दिसपुर
मणिपुर – इम्फाल
मिजोरम – ऐजोल
मेघालय – शिलाङ्ग
नगालैण्ड – कोहिमा
त्रिपुरा – अगरतला

बिहू, मणिपुरी, नानक्रम आदि इस प्रदेश के प्रमुख नृत्य है।

नगा, मिजो, खासी, असमी, बांग्ला, पदम, बोडो, गारो, जयन्तिया आदि यहाँ की प्रमुख भाषाएँ हैं।

सप्तसंख्या पर कुछ-अन्य प्रचलित नाम हैं-
सप्तसिन्धु – ‘सप्तभगिनी’ के समान सप्तसिन्धु भी हैं। ये सप्तसिन्धु हैं-सिन्धु, शुतुद्री (सतलुज), इरावती (इरावदी), वितस्ता (झेलम), विपाशा (व्यास), असिक्नी (चिनाब) और सरस्वती।

सप्तपर्वत – महेन्द्र, मलय, हिमवान्, अर्बुद, विन्ध्य, सह्याद्रि, श्रीशैल।

सप्तर्षि – मरीचि, पुलस्त्य, अंगिरा, क्रतु, अत्रि, पुलह, वसिष्ठ।

कृष्णनाथ की पुस्तक अरुणाचल यात्रा (वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर 2002) पठनीय है।

परियोजना-कार्यम् :

पाठ में स्थित अद्वयं ….. वाली पहेली से सातों राज्यों के नाम को समझो।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

मूलपाठः

अध्यापिका – सुप्रभातम्।

छात्राः – सुप्रभातम्। सुप्रभातम्।

अध्यापिका – भवतु। अद्य किं पठनीयम्?

छात्राः – वयं सर्वे स्वदेशस्य राज्यानां विषये ज्ञातुमिच्छामः।

अध्यापिका – शोभनम्। वदत। अस्माकं देशे कति राज्यानि सन्ति?

सायरा – चतुर्विंशतिः महोदये!

सिल्वी – न हि न हि महाभागे! पञ्चविंशतिः राज्यानि सन्ति।

अध्यापिका – अन्यः कोऽपि….?

स्वरा – (मध्ये एव) महोदये! मे भगिनी कथयति यदस्माकं देशे अष्टाविंशतिः राज्यानि सन्ति। एतद तिरिच्य सप्त केन्द्रशासितप्रदेशाः अपि सन्ति।

अध्यापिका – सम्यग्जानाति ते भगिनी। भवतु, अपि जानीथ यूयं यदेतेषु राज्येषु सप्तराज्यानाम् एकः समवायोऽस्ति यः सप्तभगिन्यः इति नाम्ना प्रथितोऽस्ति।

सर्वे – (साश्चर्यम् परस्परं पश्यन्तः) सप्तभगिन्यः? सप्तभगिन्यः?

निकोलसः – इमानि राज्यानि सप्तभगिन्यः इति किमर्थ कथ्यन्ते?

अध्यापिका – प्रयोगोऽयं प्रतीकात्मको वर्तते। कदाचित् सामाजिक-सांस्कृतिक-परिदृश्यानां साम्या इमानि उक्तोपाधिना प्रथितानि।

समीक्षा – कौतूहलं मे न खलु शान्तिं गच्छति, श्रावयतु तावद् यत् कानि तानि राज्यानि?

अध्यापिका – शृणुत! अद्वयं मत्रयं चैव न-त्रि-युक्तं तथा द्वयम्। सप्तराज्यसमूहोऽयं भगिनीसप्तकं मनम्।। इत्थं भगिनी सप्तके इमानि राज्यानि सन्ति-अरुणाचलप्रदेशः, असमः, मणिपुरम्, मिजोरमः, मेघालयः, नगालैण्डः, त्रिपुरा चेति। यद्यपि क्षेत्रपरिमाणैः इमानि लघूनि वर्तन्ते तथापि गुणगौरवदृष्ट्या बृहत्तराणि प्रतीयन्ते।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

सवें – कथम्? कथम्?

अध्यापिका – इमाः सप्तभगिन्यः स्वीये प्राचीनेतिहासे प्राय: स्वाधीनाः एव दृष्टाः। न केनापि शासवेन इमाः स्वायत्तीकृताः। अनेक-संस्कृति-विशिष्टायां भारतभूमौ एतासां भगिनीनां संस्कृतिः महत्त्वाधायिनी इति।

तन्वी – अयं शब्दः सर्वप्रथम कदा प्रयुक्तः?

अध्यापिका – श्रुतमधु रशब्दोऽयं सर्वप्रथम विगतशताब्दस्य द्विसप्ततितमे वर्षे त्रिपुराराज्यस्योद्घाटनक्रमे वेनापि प्रवर्तितः। अस्मिन्नेव काले एतेषां राज्यानां पुनः सङ्घटनं विहितम्।

स्वरा – अन्यत् किमपि वैशिष्ट्यमस्ति एतेषाम्?

अध्यापिका – नूनम् अस्ति एव। पर्वत-वक्ष-पुष्प- प्रतिभिः प्राकृतिकसम्पद्धिः सुसमृद्धानि सन्ति इमानि राज्यानि। भारतवृक्षे च पुष्प-स्तबकसदृशानि विराजन्ते एतानि।

राजीवः – भवति! गृहे यथा सर्वाधिका रम्या मनोरमा च भगिनी भवति तथैव भारतगृहेऽपि सर्वाधिकाः रम्याः इमा: सप्तभगिन्यः सन्ति।

अध्यापिका – मनस्यागता ते इयं भावना परमकल्याणमयी परं सर्वे न तथा अवगच्छन्ति। अस्तु, अस्ति तावदेतेषां विषये किञ्चिद् वैशिष्ट्यमपि कथनीयम्। सावहितमनसा शृणुतजनजाति बह ल प दे शो ऽयम्। गारो-खासी-नगा-मिजो-प्रभृतयः बहवः जनजातीयाः अत्र निवसन्ति। शरीरेण ऊर्जस्विनः एतत्प्रादेशिकाः बहुभाषाभिः समन्विताः, पर्वपरम्पराभिः परिपूरिताः, स्वलीला- कलाभिश्च निष्णाताः सन्ति।

मालती – महोदये! तत्र तु वंशवृक्षा अपि प्राप्यन्ते?

अध्यापिका – आम्। प्रदेशेऽस्मिन् हस्तशिल्पानां बाहुल्यं वर्तते। अन्न वस्त्राभूषणेभ्य: गृहनिर्माणपर्यन्तं प्रायः वंशवृक्षनिर्मितानां वस्तूनाम् उपयोग: क्रियते। यतो हि अत्र वंशवृक्षाणां प्राचुर्य विद्यते। साम्प्रतं वंशो द्योगोऽयं अन्ताराष्ट्रियख्यातिम् अवाप्तोऽस्ति।

अभिनवः – भगिनीप्रदेशोऽयं बह्वाकर्षकः ज्ञायते।

सलीमः – किं भ्रमणाय भगिनीप्रदेशोऽयं समीचीनः?

सर्वे छात्राः – (उच्चैः) महोदये! आगामिनि अवकाशे वयं तत्रैव गन्तुमिच्छामः।

स्वरा – भवत्यपि अस्माभिः सार्द्ध चलतु।

अध्यापिका – रोचते मेऽयं विचारः। एतानि राज्यानि तु भ्रमणार्थं स्वर्गसदृशानि इति।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

सन्धिविच्छेदः
चतुर्विंशतिः = चतुः + विंशतिः।
महोदये = महा + उदये।
कोऽपि = कः + अपि।
यदस्माकम् = यत् + अस्माकम्।
एतदतिरिच्य = एतत् + अतिरिच्य।
सम्यग्जानाति = सम्यक् + जानाति।
यदेतेषु = यत् + एतेषु।
समवायोऽस्ति = समवायः + अस्ति।
प्रथितोऽस्ति = प्रथितः + अस्ति।
साश्चर्यम् = साश + आपचर्यम्।
प्रयोगोऽयम् = प्रयोगः + अयम्।
प्रतीकात्मकोवर्तते = प्रतीक + आत्मकः + वर्तते।
साम्या इमानि = साम्यात् + इमानि।
उक्तोपाधिना = उक्त + उपाधिना।
तावद् यत् = तावत् + यत्।
समूहोऽयम् = समूह: + अयम्।
चेति = च + इति।
यद्यपि = यदि + अपि।
तथापि = तथा + अपि।
प्राचीनेतिहासे = प्राचीन + इतिहासे।
स्वाधीना = स्व + अधीना:।
केनापि = केन + अपि।
स्वायत्तीकृताः = स्व + आयन्तीकृताः।
महत्त्वाधायिनी = महत्त्व + आधायिनी।
शब्दोऽयम् = शब्दः + अयम्।
राज्यस्योद्घाटनक्रमे = राज्यस्य + उत् + घाटनक्रमे।
अस्मिन्नेव = अस्मिन् + एव।
सङ्घटनम् = सम् + घटनम्।
तथैव = तथा + एव।
भारतगृहेऽपि = भारतगृहे + अपि।
मनस्यागता = मनसि + आगता।
तावदेतेषाम् = ताव् + एतेषाम्।
किञ्चित् = किम् + चित्।
प्रदेशोऽयम् = प्रदेशेः + अयम्।
कलाभिश्च = कलाभिः + च।
वंशवृक्षा अपि = वंशवृक्षाः + अपि।
प्रदेशेऽस्मिन् = प्रदेशे + अस्मिन्।
वस्त्राभूषणेभ्यः = वस्त्र + आभूषणेभ्यः।
यतो हि = यतः + हि।
वंशोद्यागोऽयम् = वंश + उद्योग + अयम्।
अवाप्तोऽस्ति = अव + आप्तः + अस्ति।
बह्वाकर्षकः = बहु + आकर्षक:।
भवत्यपि = भवती + अपि।
मेऽयम् = मे + अयम्।
भ्रमणार्थम् = भ्रमण + अर्थम।

HBSE 8th Class Sanskrit Solutions Ruchira Chapter 9 सप्तभगिन्यः

संयोगः
ज्ञातुमिच्छामः = ज्ञातुम् + इच्छामः।
किमर्थम् = किम् + अर्थम्।
किमपि = किम् + अपि।
वैशिष्ट्यमस्ति = वैशिष्ट्यम् + अस्ति।
गन्तुमिच्छामः = गन्तुम् + इच्छामः।

पदार्थबोध:
बाढम् = हाँ, अच्छा, ठीक है (अस्तु, शोभनम्)।
ज्ञानुम् = जानने हेतु (अवगन्तुम्)।
कति = कितने (किंपरियाणं, किंमात्रम्)।
भगिनी = बहन (स्वस)।
प्रतिरिच्य = अलावा (अतिरिक्तम्)।
भवतु = अच्छा (अस्)।
समवायः = समूह (समाहारः, समुच्चयः)।
प्रथितः = प्रसिद्ध (प्रख्यातः, प्रसिद्ध)।
प्रतीकात्मकः = सांकेतिक (सांकेतिकः)।
कदाचित् = सम्भवतः (कदाचन्)।
साम्या = समानता के कारण (समानतया)।
उक्तोपाधिना = कही गई उपाधि से (कथितोपा धेना)।
नाम्नि = नाम में (नामके)।
संशयः = सन्देह (सन्देहः)।
अपरतः = दूसरी ओर (अन्यतः)।
क्षेत्रपरिमाणैः = क्षेत्रफल से (क्षेत्रफलैः)।
बृहत्तराणि = बड़े (विशालानि)।
स्वाधीना: = स्वतन्त्र (स्वतन्त्राः)।
महत्त्वाधायिनी = महत्त्व को रखने वाली (महत्त्वशालिनी)।
प्रभृतिभिः = आदि से (आदिभिः)।
विहित्तम् = विधिपूर्वक किया गया (सम्यककृतम्)।
पुष्पस्तबकसदृशानि = फूलों के गुच्छे के समान (कुसुमगुच्छसदृशानि)।
हृद्या = पारी (मनोहरा, प्रिया, रम्या)।
सावहितमनसा = सावधान मन में (सावधान चित्तेन)।
ऊर्जस्विनः = ऊर्जा युक्त (शक्तिमन्तः)।
परिपूरिताः = पूर्ण (सम्पूर्णाः)।
आम् = हाँ (बाढम्)।
अवाप्तः = प्राप्त (प्राप्तः)।
सार्द्धम् = साथ (सह)।
चलतु = चलो (आगच्छतु)।

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सरलार्थः
अध्यापिका – सुप्रभात।

छात्रगण – सुप्रभात। सुप्रभात।

अध्यापिका – ठीक है। आज क्या पढ़ना है?

छात्रगण – हम सब अपने देश के राज्यों (प्रदेशों) के विषय में जानना चाहते हैं।

अध्यापिका – ठीक है। बोलो। हमारे देश में कितने राज्य है?

सायरा – चौबीस, महोदया।

सिल्वी – नहीं, नहीं महोदया! पच्चीस राज्य हैं।

अध्यापिका – दूसरा कोई भी?

स्वरा – (बीच में ही) महोदया! मेरी बहन कहती है- कि हमारे देश में अट्ठाईस राज्य हैं। इसके अलावा सात केन्द्रशासित प्रदेश भी हैं।

अध्यापिका – सही जानती है तुम्हारी बहन। उचित है, क्या तुम सब जानते हो कि इन राज्यों में सात राज्यों का एक समूह है जो ‘सात बहनें’ इस नाम से प्रसिद्ध है।

सभी – (आश्चर्य सहित परस्पर देखते हुए) सात बहनें? सात बहनें?

निकोलस – ये सात राज्य ‘सात बहनें’ क्यों कहे जाते हैं?

अध्यापिका – यह प्रयोग सांकेतिक है। सम्भवतः सामाजिक व सांस्कृतिक परिदृश्यों की समानता से यह उपाधि प्रसिद्ध है।

समीक्षा – मेरा कुतूहल शान्त नहीं हो रहा है। सुनाइए तो वे कौन-से राज्य हैं?

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अध्यापिका – सुनिये!
दो ‘अ’ (‘अ’ से आरम्भ होने वाले), तीन ‘म’ (‘म’ से आरम्भ होने वाले), एक ‘न’ (‘न’ से आरम्भ होने वाला) तथा एक ‘त्रि’ (‘त्रि’ से आरम्भ होने वाला) से युक्त ये दो। यह सात राज्यों का समूह भगिनीसप्तक माना गया है। इस प्रकार भगिनी सप्तक में ये राज्य हैं-
1. अरुणाचल प्रदेश
2. असम
3. मणिपुर
4. मिजोरम
5. मेघालय
6. नगालैण्ड
7. त्रिपुरा।
जबकि क्षेत्रफल में ये छोटे हैं फिर भी गुण और गौरव की दृष्टि से बहुत बड़े हैं। सभी – कैसे? कैसे?

अध्यापिका – य सात बहनें अपने प्राचीन इतिहास में प्रायः स्वतन्त्र ही दिखती हैं। किसी भी शासक ने इन्हें अपने अधीन नहीं किया था। अनेक संस्कृति की विशेषता वाली भारत भूमि में इन बहनों की संस्कृति विशेष महत्त्व वाली है।

तन्वी – यह शब्द सबसे पहले कब प्रयुक्त हुआ?

अध्यापिका – सुनने में मधुर लगने वाला यह शब्द सबसे पहले पिछली शताब्दी के बहत्तरवें वर्ष (1972) में त्रिपुरा राज्य के उद्घाटन के क्रम में किसी ने फैलाया। इस समय फिर से इन राज्यों का संगठन किया गया।

स्वरा – दूसरी भी कोई विशेषता है इनकी?

अध्यापिका – अवश्य ही है। पर्वत, वृक्ष, पुष्प आदि प्राकृतिक सम्पदाओं से समृद्ध हैं ये राज्य। ये भारत रूपी वृक्ष में फूलों के गुलदस्ते के समान सुशोभित हैं।

राजीव – आप! जैसे घर में बहन सबसे अधिक प्रिय और मनोहर होती है वैसे ही भारत रूपी घर में ये सात बहनें सबसे मनोहर हैं।

अध्यापिका – तुम्हारे मन में आई हुई यह भावना बहुत कल्याण वाली है, परन्तु सभी ऐसा नहीं समझते हैं। ठीक है, इनके विषय में कुछ विशेप कथनीय है। सावधान मन से सुनिए- यह प्रदेश जनजातियों से बहुल है। गारो, खासी, नगा, मिजो आदि अनेक जनजातियाँ यहाँ रहती हैं। शरीर से इस प्रदेश के लोग अनेक भाषाओं से युक्त, पर्वो की परम्पराओं वाले, अपने करतबों और कलाओं में कुशल हैं।

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मालती – महोदया! वहाँ तो बाँस के पेड़ भी पाए जाते है।

अध्यापिका – हाँ। इस प्रदेश में हस्तकला की प्रमुखता है। यहाँ वस्त्रों व आभूषणों से लेकर गृहनिर्माण तक अक्सर बाँस के पेड़ से बनी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है। क्योंकि यहाँ बाँस के पेड़ों की अधिकता है। अब यहाँ का बाँस उद्योग अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि पा चुका है।

अभिनव – यह बहनों वाला प्रदेश बहुत आकर्षक है।

सलीम – क्या यह प्रदेश भ्रमण के लिए उचित है?

सभी छात्र – (जोर से) महोदया! आगामी अवकाश में हम वहीं जाना चाहते हैं।

स्वरा – आप भी हमारे साथ चलिए।

अध्यापिका – गह विनार मुझे प्रिय है। ये राज्य भ्रमण के लिए स्वर्ग के समान हैं।

सप्तभगिन्यः Summary

सप्तभगिन्यः पाठ-परिचयः

भारतवर्ष अपनी भौगोलिक विशेषताओं का एक अनोखा संगम है। ‘सप्तभगिनी’ यह एक उपनाम है। उत्तर-पूर्व के सात राज्य विशेष को उक्त उपाधि दी गयी है। इन राज्यों का प्राकृतिक सौन्दर्य अत्यन्त विलक्षण है। इन्हीं के सांस्कृतिक और सामाजिक वैशिष्ट्य को ध्यान में रखकर प्रस्तुत पाठ का सृजन किया गया है।

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