Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Sociology Solutions Chapter 1 भारतीय समाज : एक परिचय

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Solutions Chapter 1 भारतीय समाज : एक परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Solutions Chapter 1 भारतीय समाज : एक परिचय

HBSE 12th Class Sociology भारतीय समाज : एक परिचय Textbook Questions and Answers

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की लगभग कितने प्रतिशत जनसंख्या आपकी या आपसे छोटी आयु के लोगों की है?
(A) 40%
(B) 50%
(C) 55%
(D) 60%
उत्तर:
40%

प्रश्न 2.
किस प्रक्रिया के द्वारा हमें बचपन से ही अपने आसपास के संसार को समझना सिखाया जाता है?
(A) संस्कृतिकरण
(B) समाजीकरण
(C) सांस्कृतिक मिश्रण
(D) आत्मवाचक।
उत्तर:
समाजीकरण।

प्रश्न 3.
भारत किस राष्ट्र का उपनिवेश था?
(A) अमेरिका
(B) फ्रांस
(C) इंग्लैंड
(D) जर्मनी।
उत्तर:
इंग्लैंड।

HBSE 12th Class Sociology Solutions Chapter 1 भारतीय समाज : एक परिचय

प्रश्न 4.
अंग्रेज़ों ने भारत को अपना उपनिवेश बनाना कब शुरू किया?
(A) 1660 के बाद
(B) 1700 के बाद
(C) 1650 के बाद
(D) 1760 के बाद।
उत्तर:
1760 के बाद।

प्रश्न 5.
औपनिवेशिक शासन ने पहली बार भारत को ………………. किया।
(A) एकीकृत
(B) विभाजित
(C) ब्रिटिश राज में शामिल
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
एकीकृत।

प्रश्न 6.
औपनिवेशिक शासन ने भारत को कौन-सी ताकतवर प्रक्रिया से अवगत करवाया?
(A) प्रशासकीय एकीकरण
(B) पूँजीवादी आर्थिक परिवर्तन
(C) आधुनिकीकरण
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत किस प्रकार का एकीकरण भारत को भारी कीमत चुकाकर उपलब्ध हुआ?
(A) आर्थिक
(B) राजनीतिक
(C) प्रशासनिक
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 8.
उपनिवेशवाद ने ही अपने शत्रु …………………… को जन्म दिया।
(A) राष्ट्रवाद
(B) व्यक्तिवाद
(C) पाश्चात्यवाद
(D) पूँजीवाद।
उत्तर:
राष्ट्रवाद।

प्रश्न 9.
औपनिवेशवाद प्रभुत्व के सांझे अनुभवों ने समुदाय के विभिन्न भागों को …………………… करने में सहायता प्रदान की।
(A) विभाजित
(B) एकीकृत
(C) विकसित
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
एकीकृत।

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प्रश्न 10.
किस प्रक्रिया ने नए वर्गों व समुदायों को जन्म दिया?
(A) राष्ट्रवाद
(B) संस्कृतिकरण
(C) उपनिवेशवाद
(D) व्यक्तिवाद।
उत्तर:
उपनिवेशवाद।

प्रश्न 11.
किस वर्ग ने स्वतंत्रता प्राप्ति के अभियान में अगवाई की?
(A) ग्रामीण मध्य वर्ग
(B) नगरीय मध्य वर्ग
(C) ग्रामीण उच्च वर्ग
(D) नगरीय उच्च वर्ग।
उत्तर:
नगरीय मध्य वर्ग।

प्रश्न 12.
‘ब्रितानी उपनिवेशवाद’ निम्न में से किस व्यवस्था पर आधारित था?
(A) पूँजीवादी
(B) व्यावसायिकता
(C) व्यावहारिकता
(D) सभी।
उत्तर:
सभी।

प्रश्न 13.
भारत में राष्ट्रवादी भावना पनपने का कारण था?
(A) जातिवाद
(B) भाषावाद
(C) क्षेत्रवाद
(D) उपनिवेशवाद।
उत्तर:
उपनिवेशवाद।

प्रश्न 14.
इनमें से किस संरचना एवं व्यवस्था में उपनिवेशवाद ने नवीन परिवर्तन उत्पन्न किये?
(A) राजनीतिक
(B) आर्थिक
(C) सामाजिक
(D) सभी में।
उत्तर:
सभी में।

अति लघू उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में कितने प्रमुख धर्म पाए जाते हैं तथा यहाँ पाया जाने वाला प्रमुख धर्म कौन-सा है?
उत्तर:
भारत में सात प्रमुख धर्म पाए जाते हैं तथा यहाँ पर पाया जाने वाला प्रमुख धर्म हिंदू धर्म है।

प्रश्न 2.
भारत में कितनी प्रमुख भाषाएँ बोली जाती हैं तथा यहाँ कितने प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी है?
उत्तर:
भारत में 22 प्रमुख भाषाएँ बोली जाती हैं तथा यहाँ पर 40% के लगभग लोगों की मातृभाषा हिंदी है।

प्रश्न 3.
भारत में कौन-से राज्यों का जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक तथा सबसे कम है?
उत्तर:
पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व है तथा सबसे कम घनत्व अरुणाचल प्रदेश में है।

प्रश्न 4.
भारत में कितने प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों तथा नगरीय क्षेत्रों में रहती है?
उत्तर:
भारत में 68% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 32% जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में रहती है।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में कितनी भाषाओं को मान्यता प्राप्त है तथा हिंदी के बाद कौन-सी भाषा सबसे अधिक प्रयुक्त होती है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है तथा हिंदी के बाद सबसे अधिक प्रयक्त होने वाली भाषा बांग्ला है।

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प्रश्न 6.
भारत में सबसे कम प्रचलित धर्म कौन-सा है तथा किस राज्य में बौद्ध धर्म सबसे अधिक प्रचलित है?
उत्तर:
भारत में सबसे कम प्रचलित धर्म पारसी धर्म है तथा महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म सबसे अधिक प्रचलित है।

प्रश्न 7.
भारत में प्रचलित चार वेदों के नाम बताएं।
उत्तर:
भारत में प्रचलित चार वेदों के नाम हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा सामवेद।

प्रश्न 8.
भारत का सबसे प्राचीन वेद कौन-सा है?
उत्तर:
ऋग्वेद भारत का सबसे प्राचीन वेद है।

प्रश्न 9.
उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में कौन-से धाम हैं?
उत्तर:
बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम उत्तर भारत में हैं तथा रामेश्वरम दक्षिणी भारत में है।

प्रश्न 10.
पूर्वी भारत तथा पश्चिमी भारत में कौन-से धाम हैं?
उत्तर:
जगन्नाथपुरी पूर्वी भारत का धाम है तथा द्वारिकापुरी पश्चिमी भारत का धाम है।

प्रश्न 11.
क्षेत्रवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब लोग अपने क्षेत्र को प्यार करते हैं तथा दूसरे क्षेत्रों से नफ़रत करते हैं तो उसे क्षेत्रवाद कहा जाता है।

प्रश्न 12.
भारत में पुरुषों तथा महिलाओं की साक्षरता दर कितनी है?
उत्तर:
भारत में पुरुषों की साक्षरता दर 75% है तथा महिलाओं की साक्षरता दर 54% है।

प्रश्न 13.
भारत में राष्ट्रीय एकता में कौन-सी रुकावटें हैं?
उत्तर:
जातिवाद, सांप्रदायिकता, आर्थिक असमानता इत्यादि ऐसे कारक हैं जो राष्ट्रीय एकता के रास्ते में रुकावटें हैं।

प्रश्न 14.
देश में राष्ट्रीय एकता को कैसे स्थापित किया जा सकता है?
उत्तर:
देश में धर्म से जुड़े संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर, सारे देश में शिक्षा का एक ही पाठ्यक्रम बनाकर तथा जातिवाद को खत्म करके देश में राष्ट्रीय एकता को स्थापित किया जा सकता है।

प्रश्न 15.
मध्यकाल में पश्चिमी उपनिवेशवाद का सबसे ज्यादा प्रभाव रहा। (उचित/अनुचित)
उत्तर:
अनुचित।

प्रश्न 16.
भारत में पूँजीवाद के कारण उपनिवेशवाद प्रबल हुआ। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 17.
उपनिवेशवाद से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
उपनिवेशवाद क्या है?
उत्तर:
यह प्रक्रिया औद्योगिक क्रांति के पश्चात् शुरू हुई जब पश्चिमी देशों के पास अधिक पैसा तथा बेचने के लिए अत्यधिक माल उत्पन्न होना शुरू हुआ। पश्चिमी अथवा शक्तिशाली देशों के द्वारा एशिया तथा अफ्रीका के देशों को जीतने की प्रक्रिया तथा जीते हुए देशों में अपना शासन स्थापित करने की प्रक्रिया को उपनिवेशवाद कहा जाता है।

प्रश्न 18.
कौन-कौन से देशों ने एशिया तथा अफ्रीका में अपने उपनिवेश स्थापित किए?
उत्तर:
उपनिवेशवाद का दौर 18वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक चला। इसमें मुख्य साम्राज्यवादी देश थे-इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी, इटली इत्यादि। बाद में इसमें रूस, अमेरिका, जापान जैसे देश भी शामिल हो गए।

प्रश्न 19.
भारत में राष्ट्रवाद कब उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
भारत में अंग्रेजों ने अपना राज्य स्थापित किया तथा यहां पश्चिमी शिक्षा देनी शुरू की। इससे 19वीं सदी के मध्य के बाद धीरे-धीरे भारत में राष्ट्रवाद उत्पन्न होना शुरू हुआ।

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प्रश्न 20.
सांप्रदायिकता का अर्थ बताएं।
उत्तर:
सांप्रदायिकता और कुछ नहीं बल्कि एक विचारधारा है जो जनता में एक धर्म के धार्मिक विचारों का प्रचार करने का प्रयास करती है तथा यह धार्मिक विचार अन्य धार्मिक समूहों के धार्मिक विचारों के बिल्कुल ही विपरीत होते हैं।

प्रश्न 21.
जातीय का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी देश, प्रजाति इत्यादि का ऐसा समूह जिसके सांस्कृतिक आदर्श समान हों। एक जातीय समूह के लोग यह विश्वास करते हैं कि वह सभी ही एक पूर्वज से संबंध रखते हैं तथा उनके शारीरिक लक्षण एक समान हैं। इस समूह के सदस्य एक-दूसरे के साथ कई लक्षणों से पहचाने जाते हैं जैसे कि भाषायी, संस्कृति, धार्मिक इत्यादि।

प्रश्न 22.
भारतीय समाज में कैसे परिवर्तन आए?
उत्तर:
उपनिवेशिक दौर में एक विशेष भारतीय चेतना ने जन्म लिया। अंग्रेज़ों ने पहली बार संपूर्ण भारत को एकीकृत किया तथा पूँजीवादी आर्थिक परिवर्तन और आधुनिकीकरण की शक्तिशाली प्रक्रियाओं से भारत का परिचय कराया। इनसे भारतीय समाज में बहुत-से परिवर्तन आए।

प्रश्न 23.
भारत में राष्ट्रवाद कैसे उत्पन्न हुआ?
उत्तर:
अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक एकीकरण किया। उन्होंने यहां पश्चिमी शिक्षा का प्रसार किया। भारतीयों ने पश्चिमी शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की तथा इससे उपनिवेशवाद के शत्रु राष्ट्रवाद का जन्म हुआ।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कौन-कौन सी विभिन्नताएं पाई जाती हैं?
उत्तर:
भारत की भौगोलिक विभिन्नता के कारण भारत में कई प्रकार की विभिन्नताएं पाई जाती हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. खाने-पीने की विभिन्नता-भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में खाने-पीने में बहुत विभिन्नता पाई जाती है। उत्तर भारत में लोग गेहूं का ज्यादा प्रयोग करते हैं। दक्षिण भारत तथा तटीय प्रदेशों में चावल का सेवन काफ़ी ज्यादा है। कई राज्यों में पानी की बहुतायत है तथा कहीं पानी की बहुत कमी है। कई प्रदेशों में सर्दी बहुत ज्यादा है इसलिए वहाँ गर्म कपड़े पहने जाते हैं तथा कई प्रदेश गर्म हैं या तटीय प्रदेशों में ऊनी वस्त्रों की ज़रूरत नहीं पड़ती। इस तरह खाने-पीने तथा कपड़े डालने में विभिन्नता है।

2. सामाजिक विभिन्नता-भारत के अलग-अलग राज्यों के समाजों में भी विभिन्नता पाई जाती है। हर क्षेत्र में बसने वाले लोगों के रीति-रिवाज, रहने के तरीके, धर्म, धर्म के संस्कार इत्यादि सभी कुछ अलग-अलग हैं। हर जगह अलग-अलग तरह से तथा अलग-अलग भगवानों की पूजा होती है। उनके धर्म अलग होने की वजह से रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं।

3. शारीरिक लक्षणों की विभिन्नता-भौगोलिक विभिन्नता के कारण से यहाँ के लोगों में विभिन्नता भी पाई जाती है। मैदानी क्षेत्रों के लोग लंबे-चौड़े तथा रंग में साफ़ होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में लोग नाटे पर चौड़े होते हैं तथा रंग भी सफेद होता है। दक्षिण भारतीय लोग भूमध्य रेखा के निकट रहते हैं इसलिए उनका रंग काला या सांवला होता है।

4. जनसंख्या में विभिन्नता-भौगोलिक विभिन्नता के कारण यहाँ के लोगों में विभिन्नता भी पाई जाती है। मैदानी क्षेत्रों के लोग लंबे चौड़े तथा रंग में साफ होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में लोग नाटे पर चौड़े होते हैं तथा रंग भी सफेद होता है। दक्षिण भारतीय लोग भूमध्य रेखा के निकट रहते हैं इसलिए उनका रंग काला या सांवला होता है।

प्रश्न 2.
भारत की सांस्कृतिक विविधता के बारे में बताएं।
उत्तर:
भारत में कई प्रकार की जातियां तथा धर्मों के लोग रहते हैं जिस कारण से उनकी भाषा, खान-पान, रहन सहन, परंपराएं, रीति-रिवाज इत्यादि अलग-अलग हैं। हर किसी के विवाह के तरीके, जीवन प्रणाली इत्यादि भी अलग अलग हैं। हर धर्म के धार्मिक ग्रंथ अलग-अलग हैं तथा उनको सभी अपने माथे से लगाते हैं। जिस प्रदेश में चले जाओ वहाँ का नृत्य अलग-अलग है। वास्तुकला, चित्रकला में भी विविधता देखने को मिल जाती है। हर किसी जाति या धर्म के अलग-अलग त्योहार, मेले इत्यादि हैं। सांस्कृतिक एकता में व्यापारियों, कथाकारों, कलाकारों इत्यादि का भी योगदान रहा है। इस तरह यह सभी सांस्कृतिक चीजें अलग-अलग होते हुए भी भारत में एकता बनाए रखती हैं।

प्रश्न 3.
भारतीय समाज की रूप-रेखा के बारे में बताएं।
अथवा
भारतीय समाज की संरचना का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय समाज को निम्नलिखित आधारों पर समझा जा सकता है-
1. वर्गों का विभाजन-पुराने समय में भारतीय समाज जातियों में विभाजित था पर आजकल यह जाति के स्थान पर वर्गों में बँट गया है। व्यक्ति के वर्ग की स्थिति उसकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है। शिक्षा, पैसे इत्यादि के कारण अलग-अलग वर्गों का निर्माण हो रहा है।

2. धर्म निरपेक्षता-पुराने समय में राजा महाराजाओं के समय में धर्म को काफ़ी महत्त्व प्राप्त था। राजा का जो धर्म होता था उसकी ही समाज में प्रधानता होती थी पर आजकल धर्म की जगह धर्म-निरपेक्षता ने ले ली है। व्यक्ति अन्य धर्मों को मानने वालों से नफ़रत नही करता बल्कि प्यार से रहता है। हर कोई किसी भी धर्म को मानने तथा उसके रीति-रिवाजों को मानने को स्वतंत्र है। समाज या राज्य का कोई धर्म नहीं है। भारतीय समाज में धर्म-निरपेक्षता देखी जा सकती है।

3. प्रजातंत्र-आज का भारतीय समाज प्रजातंत्र पर आधारित है। पुराने समय में समाज असमानता पर आधारित था परंतु आजकल समाज में समानता का बोल-बाला है। देश की व्यवस्था चुनावों तथा प्रजातंत्र पर आधारित है। इसमें प्रजातंत्र के मल्यों को बढ़ावा मिलता है। इसमें किसी से भेदभाव नहीं होता तथा किसी को उच्च या निम्न नहीं समझा जाता है।

प्रश्न 4.
आश्रम व्यवस्था के बारे में बताएं।
उत्तर:
हिंदू समाज की रीढ़ का नाम है-आश्रम व्यवस्था। आश्रम शब्द श्रम शब्द से बना है जिसका अर्थ है प्रयत्न करना। आश्रम का शाब्दिक अर्थ है जीवन यात्रा का पड़ाव। जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। इसलिए व्यक्ति को एक पड़ाव खत्म करके दूसरे में जाने के लिए स्वयं को तैयार करना होता है। यह पड़ाव या आश्रम है। हमें चार आश्रम दिए गए हैं-
1. ब्रह्मचर्य आश्रम-मनुष्य की औसत आयु 100 वर्ष मानी गई है तथा हर आश्रम 25 वर्ष का माना गया है। पहले 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम के माने गए हैं। इसमें व्यक्ति ब्रह्म के अनुसार जीवन व्यतीत करता है। वह विद्यार्थी बन कर अपने गुरु के आश्रम में रह कर हर प्रकार की शिक्षा ग्रहण करता है तथा गुरु उसे अगले जीवन के लिए तैयार करता है।

2. गृहस्थ आश्रम-पहला आश्रम तथा विद्या खत्म करने के बाद व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। यह 26-50 वर्ष तक चलता है। इसमें व्यक्ति विवाह करवाता है, संतान उत्पन्न करता है, अपना परिवार बनाता है. जीवन यापन करता है, पैसा कमाता है तथा दान देकर लोगों की सेवा करता है। इसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है।

3. वानप्रस्थ आश्रम-यह तीसरा आश्रम है जोकि 51-75 वर्ष तक चलता है। जब व्यक्ति इस उम्र में आ जाता है तो वह अपना सब कुछ अपने बच्चों को सौंपकर भगवान की भक्ति के लिए जंगलों में चला जाता है। इसमें व्यक्ति घर की चिंता छोड़कर मोक्ष प्राप्त करने में ध्यान लगाता है। जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों को सलाह भी दे सकता है।

4. संन्यास आश्रम-75 साल से मृत्यु तक संन्यास आश्रम चलता है। इसमें व्यक्ति हर किसी चीज़ का त्याग कर देता है तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान की तरफ ध्यान लगा देता है। वह जंगलों में रहता है, कंद मूल खाता है तथा मोक्ष के लिए वहीं भक्ति करता रहता है तथा मृत्यु तक वहीं रहता है।

प्रश्न 5.
वर्ण व्यवस्था में सबसे ऊंची स्थिति किस की थी?
उत्तर:
वर्ण व्यवस्था में चार प्रकार के वर्ण बताये गये हैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं चौथा वर्ण। इन सभी में से सबसे ऊंची स्थिति या दर्जा ब्राह्मणों का माना गया था, बाकी तीनों वणों को ब्राह्मणों के बाद की स्थिति प्राप्त थी। सभी वर्गों से ऊपर की स्थिति के मुख्य कारण माने गये कि उस वर्ग ने समाज का धार्मिक क्षेत्र में एवं शिक्षा के क्षेत्र में मार्ग-दर्शन करना था। अर्थ यह है कि समाज को शिक्षा प्रदान करना था। इस प्रकार माना गया है कि ब्राह्मण वर्ण के व्यक्तियों को राज दरबारों में ‘राज गुरु’ का दर्जा प्राप्त होगा और राज्य प्रबंधन के विषय में राजा उनसे सलाह मशविरा करेगा एवं मार्गदर्शन लेगा। इस विषय में कोई भी व्यक्ति इस वर्ण के विरुद्ध नहीं बोल सकता था, परंतु इस बारे में राजा पुरोहित (राजगुरु) की आज्ञा मानने को बाध्य नहीं होता था। सामान्यतः उनकी राय को मान ही लिया जाता था।

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प्रश्न 6.
आश्रम व्यवस्था के सामाजिक महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
आश्रम व्यवस्था, व्यक्ति के जीवन का सर्वपक्षीय विकास है। इस व्यवस्था में व्यक्ति के जैविक, भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास की ओर पूरा ध्यान दिया गया था। यह व्यवस्था मनुष्य को उसके सामाजिक कर्तव्यों के प्रति सचेत करती थी। व्यक्ति को उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने में भी सहायक होती थी। आश्रम व्यवस्था में अपने अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों की ओर ज्यादा ध्यान दिलाती थी। इस कारण से समाज में ज्यादा संगठन सहयोग एवं संतुलन बनाये रखा जाता था। इस व्यवस्था में व्यक्ति की सभी आवश्यकताओं का ध्यान भी रखा जाता था। भावार्थ कि आदमी का संपूर्ण विकास भी होता था। इस व्यवस्था के अनुसार वह अपनी सारी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को सही ढंग से निभा सकता था।

प्रश्न 7.
पुरुषार्थ के भिन्न-भिन्न आधार कौन-से हैं?
अथवा
पुरुषार्थ के मुख्य उद्देश्य क्या-क्या हैं?
उत्तर:
पुरुषार्थ का अर्थ है व्यक्ति का ‘मनोरथ’ या इच्छा। इस प्रकार मनुष्य की इच्छा सुखी जीवन जीने की होती है, पुरुषार्थ प्रणाली व्यक्ति की इन्हीं इच्छाओं, ‘आवश्यकता और ज़रूरतों को, जोकि मानवीय जीवन का आधार होती हैं पूरा करती है। मनुष्य की इन्हीं सारी आवश्यकताओं एवं इच्छाओं को पुरुषार्थ प्रणाली में ‘चार भागों’ में विभक्त कर दिया गया है और ये चारों भाग हैं ‘धर्म’, ‘अर्थ’, ‘काम’ और ‘मोक्ष’। इन सभी भागों में व्यक्ति अलग-अलग तरह के कार्य संपन्न करता है। धर्म का कार्य है व्यक्ति को नैतिक नियमों में रहना और सही आचरण करना। ‘अर्थ’ के संबंध में व्यक्ति धन को कमाता एवं खर्च करता है और अपनी भौतिक इच्छाओं की पूर्ति करता है।

‘काम’ के पुरुषार्थ में वह अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा करता है। विवाह इत्यादि करके संतान उत्पत्ति करके अपने वंश को आगे बढ़ाता है। इसी परंपरा में वह अंतिम पुरुषार्थ जोकि ‘मोक्ष’ माना गया है को ओर अग्रसर होता है जोकि मनुष्य का अंतिम उद्देश्य जाना जाता है। इस तरह से पुरुषार्थ मनुष्य के कर्तव्यों को निश्चित करता है एवं हर समय उसका मार्गदर्शन करता है।

प्रश्न 8.
संस्कार क्या होते हैं?
अथवा
संस्कार कौन-कौन से होते हैं?
उत्तर:
संस्कार, शरीर की शुद्धि के लिए होते हैं, इस प्रकार व्यक्ति के जन्म से ही संस्कार शुरू हो जाते हैं। कई संस्कार तो जन्म से पहले ही हो जाते हैं और सारी जिंदगी चलते रहते हैं। हमारे गृह सूत्र के अनुसार 11 संस्कार हैं। ‘गोत्र’ धर्म अनुसार इनकी संख्या चालीस है। इस तरह मनु स्मृति में नौ संस्कारों के विषय में बताया गया है। इनमें से कुछ निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण संस्कार हैं-

  • गर्भाधान संस्कार
  • जाति धर्म संस्कार
  • नामकरण संस्कार
  • निष्करण संस्कार
  • मुंडन संस्कार
  • चूड़ाधर्म संस्कार
  • कर्ण वेध संस्कार
  • सवित्री संस्कार
  • समवर्तन संस्कार
  • विवाह संस्कार
  • अंतेष्ठि संस्कार।

प्रश्न 9.
वर्ण की उत्पत्ति का परंपरागत सिद्धांत बताएं।
उत्तर:
परंपरागत पुरुष सिद्धांत-वर्ण प्रणाली की उत्पत्ति की सबसे पहली चर्चा ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त’ में मिलती है, ऋग्वेद के गद्यांश में इस व्यवस्था का वर्णन है, इसी को ‘पुरुष-सूक्त’ कहा गया है। ‘पुरुष-सूक्त’ में सामाजिक व्यवस्था की तुलना एक पुरुष के साथ प्रतीक के रूप में की गई है, जोकि ‘सर्वव्यापी पुरुष’ या समूची मानव जाति का प्रतीक है। इस पुरुष को विश्व पुरुष, सर्वपुरुष या परम पिता परमात्मा भी कहा गया है। इस ‘विश्व पुरुष’ के अलग-अलग अंगों को अर्थात् शारीरिक अंगों को चारों वर्गों की उत्पत्ति की तरह दर्शाया गया है। इस ‘विश्व पुरुष’ के मुंह से ‘ब्राह्मणों’ की उत्पत्ति, बांहों से ‘क्षत्रियों की उत्पत्ति जांघों से ‘वैश्यों’ की उत्पत्ति एवं पैरों से ‘चौथे वर्ण’ की उत्पत्ति के बारे में बताया गया है।

यह सभी प्रतीकात्मक है। इस व्यवस्था में ‘ब्राह्मण’ का कार्य मानव जाति को ज्ञान एवं उपदेश देना है जो मुंह के द्वारा ही संभव है। मनुष्य की बाहें (बाजू) शक्ति का प्रतीक हैं, इसलिए ‘क्षत्रिय’ का मुख्य कार्य समाज या देश की रक्षा करना है, वैश्यों के बारे में कहीं कुछ मतभेद मिलते हैं पर उनकी उत्पत्ति के बारे में जंघा से जो दर्शाया गया, जिससे यह प्रतीत होता है कि इस वर्ग का काम मुख्य रूप से भोजन उपलब्ध करवाना भावार्थ खेती इत्यादि या ‘व्यापार’ करना दर्शाया गया है।

इसी प्रकार चौथे वर्ण की उत्पत्ति को पैरों से माना गया है, जो यह पूरे शारीरिक ढांचे की सेवा करता है, इस तरह चौथे वर्ण का कार्य पूरे समाज की सेवा करना था। इस तरह इस ‘विश्व पुरुष’ के विभिन्न अंगों से वर्ण निकले हैं या पैदा हुए हैं। इस प्रकार जैसी उनकी उत्पत्ति हुई, उसी अनुसार उनको कार्य दिये गये हैं। इस तरह ये सभी अलग-अलग न होकर एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

प्रश्न 10.
वर्ण की उत्पत्ति का रंग का सिद्धांत बताएं।
उत्तर:
वर्ण या रंग का सिद्धांत-वर्ण शब्द का अर्थ है रंग। महाभारत में भृगु ऋषि ने भारद्वाज मुनि को वर्ण प्रणाली की उत्पत्ति का आधार आदमी की चमड़ी के रंग अनुसार बताया है। इस सिद्धांत के अनुसार सबसे पहले ‘ब्रह्मा’ से ‘ब्राह्मणों’ की उत्पत्ति हुई। इसके पश्चात् क्षत्रिय, वैश्य और चौथे वर्ण की। इस उत्पत्ति का मुख्य कारण मनुष्य की चमड़ी का रंग था। इस विचारधारा के अनुसार ‘ब्राह्मणों’ का रंग ‘सफ़ेद’, क्षत्रिय का ‘लाल’, वैश्यों का ‘पीला’ एवं चौथे वर्ण को ‘काला’ रंग प्राप्त हुआ।

भृगु ऋषि के अनुसार वर्ण का सिद्धांत सिर्फ रंग केवल चमड़ी के रंग के आधार पर न होकर बल्कि ‘कर्म’ एवं ‘गुणों’ पर आधारित है। उनके अनुसार जो लोग क्रोध करते हैं, कठोरता एवं वीरता दिखाते हैं वे ‘रजोगुण’ प्रधान होते हैं वहीं ‘क्षत्रिय’ कहलवाये। इसी प्रकार जिन लोगों ने खेतीबाड़ी एवं खरीद-फरोख्त में रुचि दिखाई वे पीत गुण (पित्तगुण) ‘वैश्य’ कहलवाये। जो लोग (प्राणी) लालची, लोभी और हिंसात्मक प्रवृत्ति के थे, वे लोग ‘सामगुण’ वाले कहलवाये गये। इस तरह रंग के आधार एवं कार्य-कलापों के लक्षणों के आधार पर वर्ण व्यवस्था की नींव रखी गई।

प्रश्न 11.
वर्ण की उत्पत्ति के कर्म तथा धर्म का सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर:
कर्म एवं धर्म का सिद्धांत-मनु स्मृति में वर्ण धर्म के लिए अलग-अलग तरह का महत्त्व बताया गया है, इसमें कर्मों की महत्ता का वर्णन है। मनु के अनुसार शक्ति को अपने वर्ण द्वारा निर्धारित कार्य ही करने चाहिए। उसे अपने से उच्च या निम्न वर्गों वाला कार्य नहीं करना चाहिए। यह हो सकता है कुछ लोग अपने वर्ण अनुसार कार्य ठीक ढंग से न कर पायें, पर फिर भी उन्हें अपने वर्ण धर्म का पालन ज़रूर करना चाहिए। मनु स्मृति अनुसार किसी और वर्ण के कार्य को करने की अपेक्षा अपने वर्ण कार्य को आधा कर लेना ही अच्छा होता है।

इस सिद्धांत के अनुसार ‘वर्णों’ का प्रबंध, समाज की आवश्यकतानुसार होता है और यह था भी इसी प्रकार। इस सिद्धांत के अनुसार जो कार्य थे, वे थे-धार्मिक कार्यों की पूर्ति, समाज एवं राज्य का प्रबंध, आर्थिक कार्य और सेवा करने के कार्य। इन्हीं सभी कार्यों को करने हेतु ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं चौथे वर्ण से पूर्ति हुई। इस सिद्धांत अनुसार कर्म के साथ धर्म भी जुड़ा हुआ है। हिंदुओं की मान्यतानुसार पिछले जन्मों के कर्म वर्तमान जीवन को निर्धारित करते हैं। पिछले जन्म के कर्मों के आधार पर विभिन्न तरह के लोग अलग-अलग सामाजिक ज़रूरतों की पूर्ति करते हैं। इस तरह अपने अगले जन्म के निर्धारण के लिए व्यक्ति को वर्तमान में सही कार्य करने होंगे।

प्रश्न 12.
वर्ण की उत्पत्ति का गुणों का सिद्धांत बताएं।
उत्तर:
गुणों का सिद्धांत-वर्ण प्रणाली की उत्पत्ति के संबंध में ‘गुणों’ को आधार माना गया है। इस सिद्धांत के अनुसार, सभी इंसान जन्म के समय ‘निम्न’ होते हैं। ज्यों-ज्यों व्यक्ति गुणों को अपनाता जाता है त्यों-त्यों उसका समाज में वर्ण भी निश्चित होता जाता है। इस सिद्धांत अनुसार ज्यों-ज्यों व्यक्ति को संस्कार मिलते हैं और वह इन संस्कारों द्वारा, जीवन की अलग-अलग अवस्थाओं में प्रवेश करता है और भिन्न-भिन्न गुणों को धारण करता जाता है।

इस तरह जीवन के तरीके एवं गुणों के आधार पर वर्ण का निर्धारण होता है। इसी के आधार पर ही वर्गों का वर्गीकरण होता है। इन्हीं ‘गुणों के सिद्धांत’ का वर्णन एवं व्याख्यान ‘गीता’ में भी किया गया है। इस सिद्धान्त को “त्रिगुण’ सिद्धांत भी कहा गया है। हिंदुओं की विचारधारा अनुसार मानवीय कार्यों में तीन प्रकार के गुणों को वर्णित किया गया है और वे गुण हैं-‘सतोगुण’, ‘रजोगुण’। ‘तमोगुण’ इस प्रकार ‘सतोगुण’ में सद्विचार, अच्छी सोच और सदाचार शामिल है।

‘रजोगुण’ में भोग-विलास, ऐश्वर्य का जीवन, अहंकार और बहादुरी का शुमार है। इन सभी गुणों में सभी से नीचे ‘तमोगुण’ आता है, जिसमें अशिष्टता, असभ्यता, अति भोग विलास इत्यादि को शामिल किया गया था। इस तरह ‘सतोगुण’ वाले व्यक्तियों को ब्राह्मणों की श्रेणी में रखा गया था। दूसरी श्रेणी में ‘रजोगुण’ वालों में क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ग को शामिल किया गया था।

अंत में ‘तमोगुण’ वाली प्रवृत्ति के व्यक्तियों को चौथे वर्ण का दर्जा दिया गया था। इस व्यवस्था के अंतर्गत प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे मौके मिलते हैं, जिसमें वह अपनी प्रतिभा का विकास कर सकता है। इस सिद्धांत के अनुसार हर व्यक्ति को उसके स्वभाव (प्रकृति के अनुरूप) उसकी स्थिति एवं कार्य’ दिये जाते हैं, जोकि सामाजिक व्यवस्था के अनुरूप ही होते हैं।

प्रश्न 13.
वर्ण की उत्पत्ति के द्विज तथा जन्म के सिद्धांत का वर्णन करें।
उत्तर:
(i) द्विज सिद्धांत-भारद्वाज मुनि ने भृगु ऋषि के वर्ण सिद्धांत को मान्यता नहीं दी, फिर अपना ‘द्विज सिद्धांत’ पेश किया। इस अनुसार सबसे पहले ‘ब्राह्मण’ पैदा हुए, जिसे ‘द्विज’ का नाम दिया गया। द्विज लोग अपने कार्य-कलापों के आधार पर चार भिन्न-भिन्न श्रेणियों में बांटे गये, जिन्हें चार वर्ण कहा गया है। इन्हीं लोगों में से जो लोग ज्यादा ‘गुस्सैल’ एवं साहसी थे उन्हें क्षत्रिय कहा जाने लगा। इसी तरह जो व्यक्ति अपने ‘द्विज धर्म’ को छोड़कर खेतीबाड़ी एवं व्यापार करने लगे उन्हें ‘वैश्य’ की श्रेणी में माना गया और जो लोग अपना धर्म त्याग कर झूठ बोलने लग गये और अति भोगी-विलासी बन गये उन्हें ‘चौथा वर्ण’ कहा जाने लगा।

(ii) जन्म का सिदधांत-विदवान बी० के० चटोपाध्याय ने जन्म को वर्ण का कारण बताया है। इस संदर्भ में उन्होंने महाभारत की कई उदाहरणों का उल्लेख किया है। इस विषय में उन्होंने द्रोणाचार्य का वर्णन किया है जिसमें वह बताते हैं कि जन्म के आधार पर ही द्रोणाचार्य ‘क्षत्रिय’ जैसा कार्य करते हुए ब्राहमण कहलाये। इसी प्रकार पांडवों के स्वभाव में भारी अंतर होते हुए भी वे सभी क्षत्रिय कहलवाये। इसलिए यह स्पष्ट है कि परिवर्तनशील गुणों के आधार पर वर्ण को निर्धारित नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 14.
व्यक्ति को जीवन में कौन-से ऋण उतारने पड़ते हैं?
उत्तर:
व्यक्ति को जीवन में तीन ऋण उतारने पड़ते हैं तथा वह हैं देव ऋण, पितृ ऋण तथा ऋषि ऋण। देव ऋण उतारने के लिए व्यक्ति को देव यज्ञ करना पड़ता है तथा पवित्र अग्नि में भेंट देनी पड़ती है। यह ऋण व्यक्ति को इसलिए अदा करना पड़ता है ताकि उसको देवी-देवताओं से पानी, हवा, भूमि इत्यादि प्राकृतिक साधन प्राप्त होते हैं। पितृ का अर्थ है हमारे पूर्वज तथा बड़े बुजुर्ग। व्यक्ति अपने माता-पिता तथा पूर्वजों का ऋणि होता है क्योंकि वह उसे जन्म देकर बड़ा करते हैं।

इसलिए उसे यह ऋण उतारना पड़ता है। व्यक्ति ऋषियों का भी ऋणी होता है क्योंकि व्यक्ति को इनसे ही आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है तथा उसे उनसे ही विद्या भी प्राप्त होती है। इसलिए व्यक्ति अपने गुरुओं का ऋणी होता है। इसलिए व्यक्ति को ब्रह्म यज्ञ करके, पढ़ाई करके तथा औरों को पढ़ाने के द्वारा गुरु के प्रति अपना ऋण चुकाना पड़ता है। इस प्रकार व्यक्ति को अपने जीवन में यह तीन ऋण उतारने पड़ते हैं।

प्रश्न 15.
वर्ण व्यवस्था का क्या अर्थ है?
उत्तर:
भारतीय हिंदू संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद का मिश्रण। इसके अनुसार परमात्मा को मिलना सबसे बड़ा सुख है, साथ-साथ में इस दुनिया के सुखों को अनदेखा नहीं किया जा सकता। इसलिए इन दोनों तरह के सुखों के मिश्रण के लिए, हिंदू संस्कृति में एक व्यवस्था बनाई गई है जिसे ‘वर्ण-व्यवस्था’ कहते हैं। वर्ण प्रणाली एवं वर्ण व्यवस्था, हिंदू सामाजिक व्यवस्था का मूल आधार होने के साथ-साथ हिंदू धर्म का एक अटूट अंग है।

इसलिए वर्ण के साथ संबंधित कर्तव्यों को ‘वर्ण धर्म’ कहा जाता है। वर्ण प्रणाली में व्यक्ति एवं समाज के बीच में जो संबंध है उन्हें क्रमानुसार पेश किया गया है, जिसकी सहायता से व्यक्ति सामाजिक संगठन को ठीक ढंग से चलाने में अपनी मदद देता है। वर्ण प्रणाली के द्वारा भारतीय समाज को चार अलग-अलग भागों में बांटा गया है ताकि सामाजिक कार्य ठीक ढंग से चल सकें।

निबंधात्मकपश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में एकता के कौन-कौन से तत्त्व थे?
उत्तर:
प्राचीन भारत में एकता के निम्नलिखित तत्त्व थे:
1. ग्रामीण समाज-प्राचीन भारत ग्रामीण समाज पर आधारित था। जीवन पद्धति ग्रामीण हुआ करती थी। लोगों का मुख्य कार्य कृषि हुआ करता था। काफ़ी ज़्यादा लोग कृषि या कृषि से संबंधित कार्यों में लगे रहते थे। जजमानी व्यवस्था प्रचलित थी। धोबी, लोहार इत्यादि लोग सेवा देने का काम करते थे। इनको सेवक कहते थे। बड़े-बड़े ज़मींदार सेवा के बदले पैसा या फसल में से हिस्सा दे देते थे। यह जजमानी व्यवस्था पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती थी। इस सबसे ग्रामीण समाज में एकता बनी रहती थी। नगरों में बनियों का ज्यादा महत्त्व था पर साथ ही साथ ब्राह्मणों इत्यादि का भी काफ़ी महत्त्व हुआ करता था। यह सभी एक-दूसरे से जुड़े हुआ करते थे जिससे समाज में एकता रहती थी।

2. संस्थाएं-समाज की कई संस्थाओं में गतिशीलता देखने को मिल जाती थी। परंपरागत सांस्कृतिक संस्थाओं में से नियुक्तियाँ होती थीं। शिक्षा के विद्यापीठ हुआ करते थे और बहुत-सी संस्थाएं हुआ करती थीं जो कि भारत में एकता का आधार हुआ करती थीं। ये संस्थाएं भारत में एकता का कारण बनती थीं।

3. भाषा-सभी भाषाओं की जननी ब्रह्म लिपि रहती है। हमारे सारे पुराने धार्मिक ग्रंथ जैसा कि वेद, पुराण इत्यादि सभी संस्कृत भाषा में लिखे हुए हैं। संस्कृत भाषा को पूरे भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस को देववाणी भी कहते हैं क्योंकि यह कहा जाता है कि देवताओं की भी यही भाषा है।

4. आश्रम व्यवस्था-भारतीय समाज में एकता का सबसे बड़ा आधार हमारी संस्थाएं जैसे आश्रम व्यवस्था रही है। हमारे जीवन के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गई है जैसे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। व्यक्ति को इन्हीं चार आश्रमों के अनुसार जीवन व्यतीत करना होता था तथा इनके नियम भी धार्मिक ग्रंथों में मिलते थे। यह आश्रम व्यवस्था पूरे भारत में प्रचलित थी क्योंकि हर व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य है मोक्ष प्राप्त करना जिसके लिए सभी इसका पालन करते थे। इस तरह यह व्यवस्था भी प्राचीन भारत में एकता का आधार हुआ करती थी।

5. पुरुषार्थ-जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य होते हैं जिन्हें पुरुषार्थ कहते हैं। यह हैं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। शुरू में सिर्फ ब्राह्मण हुआ करते थे। परंतु धीरे-धीरे और वर्ण जैसे क्षत्रिय, वैश्य तथा चतुर्थ वर्ण सभी का अंतिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति या मोक्ष प्राप्त करना होता था तथा सभी को इन पुरुषार्थों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना होता था। धर्म का योग अपनाते हुए, अर्थ कमाते हुए, समाज को बढ़ाते हुए मोक्ष को प्राप्त करना ही व्यक्ति का लक्ष्य है। सभी इन की पालना करते हैं। इस तरह यह भी एकता का एक तत्त्व था।

6. कर्मफल-कर्मफल का मतलब होता है काम। कर्म का भारतीय संस्कृति में काफ़ी महत्त्व है। व्यक्ति का अगला जन्म उसके पिछले जन्म में किए गए कर्मों पर निर्भर है। अगर अच्छे कर्म किए हैं तो जन्म अच्छी जगह पर होगा नहीं तो बुरी जगह पर। यह भी हो सकता है कि अच्छे कर्मों के कारण आपको जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। इसी को कर्म फल कहते हैं। यह भी प्राचीन भारतीय समाज में एकता का एक तत्त्व था।

7. तीर्थ स्थान-प्राचीन भारत में तीर्थ स्थान भी एकता का एक कारण हुआ करते थे। चाहे ब्राहमण हो या क्षत्रिय, या वैश्य सभी हिंदुओं के तीर्थ स्थान एक हुआ करते थे। सभी को एकता के सूत्र में बाँधने में तीर्थ स्थानों का काफ़ी महत्त्व हुआ करता था। मेलों, उत्सवों, पर्यों पर सभी इकट्ठे हुआ करते थे। तीर्थ स्थानों पर विभिन्न जातियों के लोग आया करते थे, संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ करता था। इस तरह वह एकता के सूत्र में बँध जाते थे। काशी, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, रामेश्वरम्, वाराणसी, प्रयाग तथा चारों धाम प्रमुख तीर्थ स्थान हुआ करते थे। इस तरह इन सभी कारणों को देख कर हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत में काफ़ी एकता हुआ करती थी तथा उस एकता के बहुत-से कारण हुआ करते थे जिनका वर्णन ऊपर किया गया है।

प्रश्न 2.
प्राचीन भारतीय समाज की सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताओं के बारे में बताओ।
उत्तर:
प्राचीन भारतीय समाज की निम्नलिखित सामाजिक-सांस्कृतिक विशेषताएं थीं-
1. धर्म-हिंदू विचारधारा के अनुसार जीवन को संतुलित, संगठित तथा ठीक ढंग से चलाने के लिए कुछ नैतिक आदर्शों को बनाया गया है। ये सारे नैतिक आदर्श धर्म का रूप लेते हैं। इस तरह धर्म सिर्फ आत्मा या परमात्मा की ही व्याख्या नहीं करता बल्कि मनुष्य के संपूर्ण नैतिक जीवन की व्याख्या करता है। यह उन मानवीय संबंधों की भी व्याख्या करता है जो कि सामाजिक व्याख्या के आधार हैं। इस तरह धर्म एक अनुशासन है जो मनुष्य की आत्मा का विकास करके समाज को पूरा करता है तथा इस तरह धर्म प्राचीन भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।

2. कर्मफल तथा पुनर्जन्म-पुराणों तथा धार्मिक ग्रंथों में लिखा गया है कि व्यक्ति को कर्म करने की आज़ादी है तथा इसी के अनुसार व्यक्ति जैसा कर्म करेगा उसको उसी के अनुसार फल भी भोगना पड़ेगा। उसके कर्मों के आधार पर ही उसे अलग-अलग योनियों में जन्म प्राप्त होगा। व्यक्ति के जीवन का परम उद्देश्य है जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति, जिस को मोक्ष कहते हैं। इसलिए व्यक्ति को उस प्रकार के कार्य करने चाहिए जोकि उसे मोक्ष प्राप्त करने में मदद करें। इससे समाज भी अनुशासन में रहता है।

3. परिवार-परिवार भी प्राचीन भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता थी। प्राचीन भारत में संयुक्त परिवार, पितृ-सत्तात्मक, पितृस्थानी, पितृवंशी इत्यादि परिवार के प्रकार हुआ करते थे। परिवार में पिता की सत्ता चलती थी तथा उसे ही सर्वोच्च स्थान प्राप्त था। परिवार में पुत्र का महत्त्व काफ़ी ज्यादा था क्योंकि धर्म के अनुसार कई संस्कारों तथा यज्ञों के लिए पुत्र ज़रूरी हुआ करता था। परिवार समाज की मौलिक इकाई माना जाता था तथा परिवार ही समाज का निर्माण करते थे।

4. विवाह-भारतीय समाज में चाहे प्राचीन हो या आधुनिक विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता है। एक विवाह के प्रकार को आदर्श विवाह माना गया है। विवाह को तोड़ा नहीं जा सकता था। किसी खास हालत में ही दूसरा विवाह करवाने की आज्ञा थी। विवाह के बाद ही परिवार बनता था इसलिए विवाह को गृहस्थ आश्रम की नींव माना जाता है। इस तरह प्राचीन भारतीय समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता विवाह प्रथा हुआ करती थी।

5. राज्य-प्राचीन भारतीय समाज में राज्य एक महत्त्वपूर्ण विशेषता हुआ करती थी। राज्य का प्रबंध राजा करता था तथा राजा और प्रजा के संबंध बहुत अच्छे हुआ करते थे। राज्य का कार्यभार सेनापति, अधिकारी, मंत्रीगण संभाला करते थे यानि कि अधिकारों का बँटवारा था। इससे यह कह सकते हैं कि प्रजा की भी सुना जाती थी। चाहे राजा किसी की बात मानने को बाध्य नहीं होता था पर फिर भी उसे प्रजा के कल्याण के कार्य करने पड़ते थे।

6. स्त्रियों की स्थिति-प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को कई प्रकार के अधिकार प्राप्त थे। कोई भी यज्ञ पत्नी के बिना पूरा नहीं हो सकता था। स्त्री को शिक्षा लेने का अधिकार प्राप्त था। उसे अर्धांगिनी कहते थे। चाहे बाद के समय में स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी गिरावट आ गई थी क्योंकि कई विद्वानों ने स्त्रियों के ऊपर पुरुषों के नियंत्रण पर जोर दिया है तथा कहा है कि स्त्री हमेशा पिता, पति तथा पुत्र के नियंत्रण में रहनी चाहिए। प्राचीन काल में स्त्रियों की स्थिति फिर भी ठीक थी पर समय के साथ-साथ इनमें गिरावट आ गई थी।

7. शिक्षा-प्राचीन समय में शिक्षा को एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। पहले तीन वर्गों को शिक्षा लेने का अधिकार प्राप्त था। शिक्षा गुरुकुल में ही मिलती थी। वेदों पुराणों का पाठ पढ़ाया जाता था। गुरु शिष्य के आचरण के नियम भी विकसित थे तथा शिक्षा लेने के नियम भी विकसित थे।

8. व्यक्ति और सामाजिक संस्थाएं-व्यक्ति तथा सामाजिक संस्थाएं प्राचीन समाज का महत्त्वपूर्ण आधार हुआ करती थीं। पुरुषार्थ, आश्रम व्यवस्था समाज का आधार हुआ करते थे। चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष हुआ करते थे। व्यक्ति चौथे पुरुषार्थ यानि कि मोक्ष प्राप्त करने के लिए पहले तीन पुरुषार्थों के अनुसार जीवन व्यतीत करते थे। इसके साथ आश्रम व्यवस्था भी मौजूद थी।

जीवन को चार आश्रमों-ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास आश्रमों में बाँटा गया था। व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति के लिए अपना जीवन इन चारों आश्रमों के अनुसार व्यतीत करते थे। यह सभी भारतीय समाज को एकता प्रदान करते थे। इसी के साथ कर्म की विचारधारा भी मौजूद थी कि व्यक्ति जिस प्रकार के कर्म करेगा उसी प्रकार से उसे योनि या मोक्ष प्राप्त होगा। मोक्ष जीवन का अंतिम लक्ष्य होता था तथा सभी उसको प्राप्त करने के प्रयास करते थे।

प्रश्न 3.
पश्चिमीकरण के भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़े हैं? उनका वर्णन करो।
अथवा
पश्चिमीकरण अथवा पश्चिमी संस्कृति के कारण भारतीय समाज में क्या परिवर्तन आ रहे हैं? उनका वर्णन करो।
अथवा
भारत में पश्चिमीकरण के प्रभावों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
पश्चिमीकरण के भारतीय समाज पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े:
(i) परिवार पर प्रभाव-पश्चिमीकरण के कारण शिक्षित युवाओं तथा महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ गई। इस कारण लोगों ने ग्रामीण क्षेत्रों में अपने संयुक्त परिवारों को छोड़ दिया तथा वह शहरों में केंद्रीय परिवार बसाने लगे। परिवार के सदस्यों के संबंधों के स्वरूप, अधिकारों तथा दायित्व में परिवर्तन हुआ।

(ii) विवाह पर प्रभाव-पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के अंतर्गत लोगों में विवाह के धार्मिक संस्कार के प्रति श्रद्धा कम हो गई तथा इसे एक समझौता समझा जाने लगा। प्रेम विवाह तथा तलाकों का प्रचलन बढ़ गया, अंतर्जातीय विवाह बढ़ने लग गए। एक विवाह को ही ठीक समझा जाने लगा। विवाह को धार्मिक संस्कार न मानकर एक समझौता समझा जाने लगा जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है।

(ii) नातेदारी पर प्रभाव-भारतीय समाज में नातेदारी की मनुष्य के जीवन में अहम् भूमिका रहती है। मगर पश्चिमीकरण के कारण व्यक्तिवाद, भौतिकवाद, गतिशीलता तथा समय धन है, आदि अवधारणाओं का भारतीय संस्कृति में तीव्र विकास हुआ। इससे ‘विवाह मूलक’ तथा ‘रक्त मूलक’ (Iffinal & Consaguineoun) दोनों प्रकार की नातेदारियों पर प्रभाव पड़ा। द्वितीयक एवं तृतीयक (Secondary & Tertiary) संबंध शिथिल पड़ने लगे। प्रेम विवाहों तथा कोर्ट विवाहों में विवाहमूलक नातेदारी कमज़ोर पड़ने लगी।

(iv) जाति प्रथा पर प्रभाव-सहस्रों वर्षों से भारतीय समाज की प्रमुख संस्था, जाति में पश्चिमीकरण के कारण अनेक परिवर्तन हुए। अंग्रेजों ने भारत में आने के बाद बड़े-बड़े उद्योग स्थापित किये और यातायात तथा संचार के साधनों जैसे-बस, रेल, रिक्शा, ट्राम इत्यादि का विकास व प्रसार किया। इसके साथ-साथ भारतीयों को डाक, तार, टेलीविज़न, अख़बारों, प्रैस, सड़कों व वायुयान आदि सविधाओं को परिचित कराया। बड़े-साथ उदयोगों की स्थापना की गई। इनके कारण विभिन्न जातियों के लोग एक स्थान पर उद्योग में कार्य करने लग पड़े।

एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए आधुनिक यातायात के साधनों का प्रयोग होने लगा। इससे उच्चता व निम्नता की भावना में भी कमी आने लगी। एक जाति के सदस्य दूसरी जाति के व्यवसाय को अपनाने लग पड़े।

(v) अस्पृश्यता-अस्पृश्यता भारतीय जाति व्यवस्था का अभिन्न अंग रही है मगर समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व पर आधारित पश्चिमी मूल्यों ने जातीय भेदभाव को कम किया। जाति तथा धर्म पर भेदभाव किये बिना सभी के लिये शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश की अनुमति, सभी के लिए एक जैसी शिक्षा व्यवस्था, समान योग्यता प्राप्त व्यक्तियों के लिये समान नौकरियों पर नियुक्ति आदि कारकों से अस्पृश्यता में कमी आई। अंग्रेजों ने औद्योगीकरण व नगरीकरण को बढ़ावा दिया। विभिन्न जातियों के लोग रेस्टोरेंट, क्लबों में एक साथ खाने-पीने एवं बैठने लग पड़े। अतः पश्चिमीकरण के कारण भारत में अस्पृश्यता में कमी आई।

(vi) स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन -अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय भारत में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न थी। सती प्रथा, पर्दा प्रथा तथा बाल-विवाह का प्रचलन था तथा विधवा पुनर्विवाह पर रोक होने के कारण महिलाओं की स्थिति काफ़ी दयनीय थी। अंग्रेज़ों ने सती प्रथा को अवैध घोषित किया तथा विधवा विवाह को पुनः अनुमति दी। पश्चिमी शिक्षा के प्रसार व प्रचार के माध्यम से बूंघट प्रथा में कमी आई।

पश्चिमीकृत महिलाओं ने पैंट-कमीज़ पहननी आरंभ की। लाखों महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आई और उन्होंने केवल घर को संभालने की पारंपरिक भूमिका को त्यागकर पुरुषों के साथ कंधा मिलाकर दफ्तरों में विभिन्न पदों पर नौकरी करनी आरंभ कर दी। इस तरह स्त्रियां अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में सफ़ल हुईं।

(vii) नव प्रशासनिक व्यवस्था का विकास–अंग्रेजी शासनकाल में भारत में आधुनिक नौकरशाही का विकास किया गया। असंख्य नये प्रशासनिक पदों का सृजन किया गया। भारतीय असैनिक सेवाएं (Indian Civil Services) प्रारंभ की जिनके माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं द्वारा उच्च अधिकारियों का चयन किया जाने लगा। नौकरशाही की बड़ी संरचना का निर्माण किया।

(viii) आर्थिक संस्थाओं का विकास-ब्रिटेन के भारत में शासनकाल के दौरान अनेक आर्थिक संस्थाओं का विकास हुआ। बैंकों की स्थापना की गई। श्रम विभाजन एवं विशेषीकरण का विकास हुआ। देश में पूंजीवाद का बीजारोपण हुआ। कृषि एवं औद्योगिक श्रमिकों की समस्याएं बढ़ीं। वर्ग संघर्षों में बढ़ावा हुआ। हड़ताल, घेराव, तोड़-फोड़ तथा तालाबंदी होने लगी। आर्थिक संस्थाओं के विकास ने आज़ादी सेर आज़ादी के बाद देश में अर्थव्यवस्था को नया मोड़ दिया।

प्रश्न 4.
उपनिवेशवाद का क्या अर्थ है? औपनिवेशिक काल में भारत में किस प्रकार राष्ट्रवाद का उदय हुआ?
अथवा
भारत में राष्ट्रवाद के विकास के दो कारण लिखिए।
अथवा
उपनिवेशवाद ने अपने शत्रु राष्ट्रवाद को जन्म दिया। इस कथन की पुष्टि करें।
अथवा
‘उपनिवेशवाद की समझ’ के संदर्भ में विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर:
उपनिवेशवाद की प्रक्रिया औद्योगिक क्रांति के पश्चात् शुरू हुई जब पश्चिमी देशों के पास अधिक पैसा तथा बेचने के लिए अत्यधिक माल उत्पन्न होना शुरू हुआ होगा। पश्चिमी अथवा शक्तिशाली देशों के द्वारा एशिया तथा अफ्रीका के देशों को जीतने की प्रक्रिया तथा जीते हुए देशों में अपना शासन स्थापित करने की प्रक्रिया को उपनिवेशवाद कहा जाता है। उपनिवेशवाद का दौर 18वीं शताब्दी से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक चला। इसमें मुख्य साम्राज्यवादी देश थे इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी तथा इटली इत्यादि। बाद में इसमें रूस, अमेरिका तथा जापान जैसे देश भी शामिल हो गए।

भारत में राष्ट्रवाद के उदय के कारण :-भारत में राष्ट्रवाद के उदय के निम्नलिखित कारण थे:
(i) देश का राजनीतिक एकीकरण-ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने सभी भारतीय राज्यों को इकट्ठा करके देश का राजनीतिक एकीकरण कर दिया। इससे देश में राजनीतिक एकता स्थापित हुई तथा देश को एक ही प्रशासन तथा कानून प्राप्त हुए। लोगों में उपनिवेशवाद विरोधी भावनाओं के आने से एक राष्ट्रीय दृष्टिकोण का उदय हुआ।

(ii) जनता का आर्थिक शोषण-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी तथा ब्रिटिश राज्य की सरकारों ने भारत के आर्थिक शोषण की नीति अपनाई। भारत की आर्थिक संपदा ब्रिटेन को जाने लगी तथा देश का आर्थिक विकास रुक गया। इसका परिणाम बेरोज़गारी, निर्धनता तथा सूखे के रूप में सामने आया। किसानों के ऊपर नयी भूमि व्यवस्थाएं लाद दी गईं। इस प्रकार की आर्थिक दुर्दशा से जनता में रोष उत्पन्न हो गया तथा उन्होंने उपनिवेशवाद का विरोध करना शुरू कर दिया।

(iii) पश्चिमी शिक्षा तथा विचार-भारत की ब्रिटिश विजय से भारतीयों को यूरोपियन लोगों में संपर्क आने का मौका प्राप्त हुआ। 19वीं शताब्दी में यूरोपीय देशों में राष्ट्रवादी आंदोलन चल रहे थे। भारतीयों ने पश्चिमी शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की तथा पश्चिमी पुस्तकें पढ़नी शुरू की। समानता, स्वतंत्रता तथा भाईचारे के पश्चिमी विचारों का भारतीयों पर भी प्रभाव पड़ा। इससे भारतीयों को उपनिवेशवाद के परिणामों तथा भारत के शोषण का पता चला। इससे भारत के लोगों में जागृति उत्पन्न हो गयी।

(iv) प्रैस का योगदान-जनता को जागृत करने में प्रैस का बहुत बड़ा योगदान होता है। भारतीय तथा ब्रिटिश प्रैस ने भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न की। बहुत से समाचारपत्र छपने शुरू हो गए जिन्होंने जनता को उपनिवेशवाद के विरुद्ध जागृत किया।

(v) सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का योगदान-सामाजिक तथा धार्मिक सुधार आंदोलनों ने भारतीयों में चेतना जागृत की। राजा राम मोहनराय, देवेंद्र नाथ, दयानंद सरस्वती, विवेकानंद, ईश्वरचंद्र विद्यासागर इत्यादि ने देश में राष्ट्रवाद जगाने में बड़ी भूमिका अदा की, जिस कारण जनता धीरे-धीरे जागृत हो गयी।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि देश में उपनिवेशवाद के विरोध में राष्ट्रवाद की भावना उत्पन्न करने में बहुत से कारणों का योगदान था।

HBSE 12th Class Sociology Solutions Chapter 1 भारतीय समाज : एक परिचय

प्रश्न 5.
पुरुषार्थों के आधारों के महत्त्व का वर्णन करो।
उत्तर:
हिंदू धर्म शास्त्रों में जीवन के चार उद्देश्य दिए गए हैं तथा इन चार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए चार मुख्य पुरुषार्थ भी दिए गए हैं। इन पुरुषार्थों के आधारों का महत्त्व इस प्रकार है
1. धर्म का महत्त्व-धर्म का हमारे सामाजिक जीवन में बहुत महत्त्व है क्योंकि धर्म व्यक्ति की अलग-अलग इच्छाओं, ज़रूरतों, कर्तव्यों तथा अधिकारों में संबंध स्थापित करता है। यह इन सभी को व्यवस्थित तथा नियमित भी करता है। जब व्यक्ति तथा समाज अपने कर्तव्यों की धर्म के अनुसार पालना करते हैं तो समाज में शांति तथा व्यवस्था स्थापित हो जाती है तथा वह उन्नति की तरफ कदम बढ़ाता है।

धार्मिक शास्त्रों में लिखा गया है कि अगर व्यक्ति अर्थ तथा काम की पूर्ति धर्म के अनुसार करे तो ही वह ठीक है तथा अगर वह इन की पूर्ति धर्म के अनुसार न करे तो समाज में नफ़रत, द्वेष इत्यादि बढ़ जाते हैं। यह कहा जाता है कि धर्म ही सच है। इसके अलावा सब कुछ झूठ है। व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन धर्म के बिना संभव ही नहीं है। धर्म प्रत्येक व्यक्ति का तथा और सभी पुरुषार्थों का मार्ग दर्शन करता है। इस तरह धर्म का हमारे लिए बहुत महत्त्व है।

2. अर्थ का महत्त्व-मनष्य की आर्थिक ज़रूरतों की पर्ति अर्थ दवारा होती है। धर्म से संबंधित सभी कार्य अर्थ की मदद से ही पूर्ण होते हैं। व्यक्ति की प्रत्येक प्रकार की इच्छा अर्थ तथा धन द्वारा ही पूर्ण होती है। व्यक्ति को अपने जीवन में पाँच यज्ञ पूर्ण करने ज़रूरी होते हैं तथा यह अर्थ की मदद से ही हो सकते हैं। व्यक्ति अपने धर्म की पालना भी अर्थ की मदद से ही कर सकता है। पुरुषार्थ व्यवस्था में अर्थ को काफ़ी महत्त्व दिया गया है ताकि वह उचित तरीके से धन इकट्ठा करे तथा अपनी ज़रूरतें पूर्ण करे। व्यक्ति को अपने जीवन में कई ऋणों से मुक्त होना पड़ता है तथा यह अर्थ की मदद से ही हो सकते हैं। इस तरह अर्थ का हमारे जीवन में बहुत महत्त्व है।

3. काम का महत्त्व-अगर समाज तथा संसार की निरंतरता को कायम रखना है तो यह काम की मदद से ही संभव है। व्यक्ति को काम से ही मानसिक तथा शारीरिक सुख प्राप्त होते हैं। इस सुख को प्राप्त करने के बाद ही वह अंतिम उद्देश्य अर्थात् मोक्ष को प्राप्त करने की तरफ बढ़ता है। काम से ही स्त्री तथा पुरुष का मिलन होता है तथा संतान उत्पन्न होती है।

काम से ही व्यक्ति में बहुत-सी इच्छाएं जागृत होती हैं जिससे मनुष्य समाज में रहते हुए अलग-अलग कार्य करता है तथा समाज का विकास करता है। धर्म तथा अर्थ के लिए काम बहुत ही आवश्यक है। काम की सहायता से व्यक्ति अपनी पत्नी तथा बच्चों के साथ धार्मिक ऋणों से मुक्त होता है तथा काम की मदद से पैदा इच्छाओं को पूर्ण करने के लिए धन कमाता है। इस तरह काम भी हमारे लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

4. मोक्ष का महत्त्व-चार पुरुषार्थों में से अंतिम पुरुषार्थ है मोक्ष। हिंदू शास्त्रों में सभी कार्य मोक्ष को ही ध्यान में रखकर निश्चित किए गए हैं। मोक्ष की इच्छा ही व्यक्ति को बिना किसी चिंता तथा दुःख के अपने कार्य सुचारु रूप के लिए प्रेरित करती है। प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य होता है मोक्ष प्राप्त करना तथा इसलिए ही वह अपना कार्य सुचारु रूप से करता है। इस तरह हम कह सकते हैं कि प्रत्येक पुरुषार्थ के आधारों का अपना-अपना महत्त्व है तथा व्यक्ति अंतिम पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए पहले तीन पुरुषार्थों के अनुसार कार्य करता है।

 भारतीय समाज : एक परिचय HBSE 12th Class Sociology Notes

→ हम सभी समाज में रहते हैं तथा हमें समाज के बारे में कुछ न कुछ अवश्य ही पता होता है। इस प्रकार समाजशास्त्र भी एक ऐसा विषय है जिसे कोई भी शून्य से शुरू नहीं करता। समाजशास्त्र में हम समाज का अध्ययन करते हैं तथा हमें समाज के बारे में कुछ न कुछ अवश्य ही पता होता है।

→ हमें और विषयों का ज्ञान तो विद्यालय, कॉलेज इत्यादि में जाकर प्राप्त होता है परंतु समाज के बारे में हमारा ज्ञान बिना किसी औपचारिक शिक्षा प्राप्त किए ही बढ़ जाता है। इसका कारण यह है कि हम समाज में रहते हैं, पलते हैं तथा इसमें ही बड़े होते हैं। हमारा इसके बारे में ज्ञान अपने आप ही बढ़ता रहता है।

→ इस पाठ्य-पुस्तक का उद्देश्य भारतीय समाज से विद्यार्थियों का परिचय कराना है परंतु इसका परिचय सहज बोध से नहीं बल्कि समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से करवाना है। यहां पर उन सामाजिक प्रक्रियाओं की तरफ संकेत किया जाएगा जिन्होंने भारतीय समाज को एक आकार दिया है।

→ अगर हम ध्यान से भारतीय समाज का अध्ययन करें तो हमें पता चलता है कि उपनिवेशिक दौर में एक विशेष भारतीय चेतना उत्पन्न हुई। अंग्रेजों के शासन अथवा उपनिवेशिक शासन ने न केवल संपूर्ण भारत को एकीकृत किया बल्कि पूँजीवादी आर्थिक परिवर्तन तथा आधुनिकीकरण जैसी शक्तिशाली प्रक्रियाओं से भारत को परिचित कराया। उस प्रकार के परिवर्तन भारतीय समाज में लाए गए जो पलटे नहीं जा सकते थे। इससे समाज भी वैसा हो गया जैसा पहले कभी भी नहीं था।

→ औपनिवेशिक शासन में भारत का आर्थिक, राजनीतिक तथा प्रशासनिक एकीकरण हुआ परंतु इसकी भारी कीमत चुकाई गई। उपनिवेशिक शासन द्वारा भारत का शोषण किया गया तथा यहां प्रभुत्व स्थापित किया गया। इसके घाव के निशान अभी भी भारतीय समाज में मौजूद हैं। एक सच यह भी है कि उपनिवेशवाद से ही राष्ट्रवाद की उत्पत्ति हुई।

→ ऐतिहासिक दृष्टि से ब्रिटिश उपनिवेशवाद में भारतीय राष्ट्रवाद को एक आकार प्राप्त हुआ। उपनिवेशवाद के गलत प्रभावों ने हमारे समुदाय के अलग-अलग भागों के एकीकृत करने में सहायता की। पश्चिमी शिक्षा के कारण मध्य वर्ग उभर कर सामने आया जिसने उपनिवेशवाद को उसकी अपनी ही मान्यताओं के आधार पर चुनौती दी।

→ यह एक जाना-पहचाना सत्य है कि उपनिवेशवाद तथा पश्चिमी शिक्षा ने परंपराओं को दोबारा खोजने के कार्य (Rediscovery) को प्रोत्साहित किया। इस खोज के कारण ही कई प्रकार की सांस्कृतिक तथा सामयिक गतिविधियों का विकास हुआ। इससे राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय स्तरों पर समुदाय के नए उत्पन्न रूपों को सुदृढ़ता प्राप्त हुई।

→ उपनिवेशवाद के कारण भारत में बहुत-से नए वर्ग तथा समुदाय उत्पन्न हुए जिन्होंने हमारे स्वतंत्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नगरों में विकसित हुआ मध्य वर्ग राष्ट्रवाद का प्रमुख वाहक था जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के कार्य को नेतृत्व प्रदान किया। उपनिवेशिक हस्तक्षेपों के कारण हमारे धार्मिक तथा जातीय समुदायों को एक निश्चित रूप प्राप्त हुआ। इन्होंने भी बाद के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समकालीन भारतीय समाज का भावी इतिहास जिन जटिल प्रक्रियाओं द्वारा विकसित हुआ तथा इसका अध्ययन ही हमारा उद्देश्य है।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
1990 के बाद भारतीय राजनीति में उभरती प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1990 के बाद भारतीय राजनीति में उभरने वाली प्रमुख प्रवृत्तियां इस प्रकार हैं:

1. दलीय प्रणाली का बदला हुआ स्वरूप (Changing Nature of Party System):
भारत में दलीय प्रणाली के स्वरूप में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। नवम्बर 1989, मई-जून 1991, अप्रैल-मई 1996 और फरवरी मार्च 1998 के लोकसभा के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ जिस कारण चारों बार अल्पमत की सरकार बनी जिन्हें अपने अस्तित्व के लिए विभिन्न दलों पर निर्भर रहना पड़ा। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनाव में किसी भी दल या गठबन्धन को बहुमत नहीं मिला।

कांग्रेस ने अन्य दलों के समर्थन से ‘संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन’ के नाम से सरकार बनाई। 2014 एवं 2019 में हुए 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनावों में यद्यपि भाजपा ने अकेले ही (282 सीटें एवं 303 सीटें) लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया, परन्तु भाजपा ने दोनों ही बार श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन) का ही निर्माण किया। इससे स्पष्ट होता है कि भारत में दलीय प्रणाली के स्वरूप में परिवर्तन आया है।

2. शक्तिशाली विरोधी दल का उदय (Rise of Powerful Opposition Party):
1977 ई० के आम चुनावों के बाद केन्द्र में जनता पार्टी की सरकार बनी। जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और कांग्रेस को केवल 153 सीटें प्राप्त हुईं। कांग्रेस की इस हार से केन्द्र में पहली बार संगठित विरोधी दल का उदय हुआ।

3. राजनीति में जातिवाद की भूमिका (Role of Casteism in Politics):
भारतीय राजनीति में जातिवाद एक महत्त्वपूर्ण तथा निर्णायक तत्त्व रहा है। स्वतन्त्रता के पश्चात् जाति का प्रभाव कम होने की अपेक्षा बढ़ा ही है जो राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है। चुनावों के समय उम्मीदवारों का चयन जाति के आधार पर किया जाता है। नेताओं का उत्थान व पतन जाति के समर्थन पर ही निर्भर करता है।

4. बहु-दलीय प्रणाली के साथ-साथ साम्प्रदायिक दलों का अस्तित्व (Existence of Communal parties with Multy Party System):
भारत में साम्प्रदायिक दल भी पाए जाते हैं यद्यपि धर्म-निरपेक्ष राज्य में साम्प्रदायिक दलों का भविष्य उज्ज्वल नहीं है तथा उनके प्रचार और गतिविधियों से देश का राजनीतिक वातावरण दूषित हो जाता है।

5. सरकार के निर्माण में स्वतन्त्र सदस्यों की भूमिका (Role of Independent Members to make Govt.):
भारत में बहु-दलीय व्यवस्था होने के साथ-साथ संसद् तथा राज्य विधानसभाओं में स्वतन्त्र सदस्यों की संख्या बहुत पाई जाती है। स्वतन्त्र सदस्य स्वस्थ प्रजातन्त्र के हित में नहीं है। दल-बदल के लिए स्वतन्त्र सदस्य काफ़ी हद तक ज़िम्मेवार हैं। स्वतन्त्र सदस्य जब चाहे किसी दल के साथ मिल सकते हैं और जब चाहे बाहर आकर फिर स्वतन्त्र हो जाते हैं। लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक है कि स्वतन्त्र उम्मीदवारों को कोई विशेष सफलता नहीं मिलनी चाहिए।

6. चुनावों में हिंसा का प्रयोग (Use of Violence in Elections):
भारत के चुनावों में कुछ राजनीतिक दल अपने राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसक साधनों का प्रयोग करते हैं।

7. भारतीय राजनीति का अपराधीकरण होना (Criminalisation of Indian Politics):
स्वतन्त्रता के बाद भारतीय राजनीति में धीरे-धीरे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का समावेश होता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार उत्तर प्रदेश की विधानसभा में 200 के लगभग विधायक आपराधिक प्रवृत्ति के हैं। इतनी बड़ी संख्या में अपराधियों का विधानसभा में पहुंचना भारत जैसे लोकतन्त्र के लिए हानिकारक है।

8. असैद्धान्तिक चुनावी गठजोड़ (Non-Principle Alliances of Political Parties):
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में एक मुख्य प्रवृत्ति असैद्धान्तिक चुनावी गठजोड़ का होना है। प्राय: सभी राजनीतिक दल अपने हितों की पूर्ति के लिए सिद्धान्तहीन समझौते करने के लिए तत्पर रहते हैं। अप्रैल-मई, 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनावों में प्रायः सभी दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए।

9. प्रादेशिक दलों की भूमिका (Role of Regional Parties):
भारतीय राजनीति में अन्य प्रवृत्ति उभर कर आई है और वह है केन्द्रीय राजनीति में प्रादेशिक दलों की भूमिका। अप्रैल-मई, 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी तथा कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों ने कई क्षेत्रीय दलों से चुनावी गठजोड़ किया। यह प्रादेशिक दल लोगों की क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का कर राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करते हैं।

10. राष्ट्रीय समस्याओं की जगह क्षेत्रीय समस्याओं पर बल (More importance to Regional Problem than National Problem):
भारतीय राजनीति की एक अन्य प्रवृत्ति यह है कि चुनाव प्रचार अभियान में प्रायः राष्ट्रीय विषयों को पीछे छोड़कर क्षेत्रीय समस्याओं पर बल दिया जाने लगा।

11. राजनीति में भ्रष्टाचार (Corruption in Politics):
भारत की राजनीति में भ्रष्टाचार ने अपना स्थान बना लिया है। प्राय: सभी राजनीतिक दल चुनावों के अवसर पर एक-दूसरे के ऊपर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। राजनीतिज्ञ चुनाव जीतने के लिए प्रायः भ्रष्ट साधनों का उपयोग करते हैं। मन्त्री पद पर आसीन उम्मीदवार अपने पद और शासन की मशीनरी का अनुचित प्रयोग करते हैं।

12. कांग्रेस के आधिपत्य की समाप्ति (End of Congress Party Dominance):
भारत में लम्बे समय तक विशेषकर 1977 तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, परन्तु वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व समाप्त हो चुका है और उसकी जगह अन्य दलों ने ले ली है।

प्रश्न 2.
जनता दल के उदय एवं विभाजन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
भारतीय राजनीति में वर्ष 1988 का एक विशेष महत्त्व है क्योंकि इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर एक नए राजनीतिक दल ‘जनता दल’ का निर्माण किया गया है। जिस प्रकार 1978 में कांग्रेस की एकता स्थिर न रहने के कारण दल दो भागों में विभाजित हो गया था, उसी प्रकार 1987 में एक बार फिर कांग्रेस (आई) के कई प्रमुख नेताओं ने इस दल से त्याग-पत्र दे दिया।

इन नेताओं में भूतपूर्व वित्त मन्त्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह, श्री रामधन, श्री अरुण नेहरू, श्री आरिफ मोहम्मद खां जैसे प्रमुख नेता शामिल थे। कांग्रेस (आई) से पृथक् होकर 2 अक्तूबर, 1987 को श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने ‘जन मोर्चा’ के गठन की घोषणा की। इसका मुख्य उद्देश्य देश के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक ढांचे में लोकतान्त्रिक तथा क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने के उद्देश्य से देश व्यापी आन्दोलन छेड़ना था।

इसके साथ ही भारत में काफ़ी लम्बे समय से विपक्षी दल एक ऐसे नये राजनीतिक दल का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे जो कांग्रेस (आई) का सशक्त विकल्प बन सके। ये विपक्षी दल इस दिशा के प्रति निरन्तर प्रयास करते रहे। अन्त में 26 जुलाई, 1988 को चार विपक्षी दलों जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस (स) और जन मोर्चा के विलय की औपचारिक घोषणा कर दी गई और एक नये राजनीतिक दल को स्थापित किया गया।

इस नये दल का नाम समाजवादी जनता दल रखा गया। इस दल के गठन की घोषणा करने में हरियाणा के मुख्यमन्त्री श्री देवी लाल की प्रमुख भूमिका रही। इसके उपरान्त राजनीति में पिछले महीनों की कशमकश के बाद 11 अक्तूबर, 1988 को बंगलौर में ‘जनता दल’ के गठन की विधिवत् घोषणा कर दी गई।श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को उस नये दल का प्रधान मनोनीत किया गया। इस नये दल का भारतीय राजनीति-नए बदलाव चुनाव चिह्न ‘चक्र के बीच हलधर’ होगा तथा दल का झण्डा हरे रंग का होगा जिस पर चुनाव चिह्न सफ़ेद रंग में ऊपर से अंकित होगा।

जनता दल का विभाजन-23 अक्तूबर, 1990 को भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। भतपूर्व प्रधानमन्त्री वी० पी० सिंह ने त्याग-पत्र देने के स्थान पर लोकसभा में अपना बहमत सिद्ध करने का निर्णय किया। 7 नवम्बर, 1990 को लोकसभा का अधिवेशन बुलाया गया। जनता दल के असन्तुष्ट सांसदों ने नेतृत्व परिवर्तन की मांग की। 5 नवम्बर, 1990 को प्रधानमन्त्री वी० पी० सिंह से इस्तीफा देने की मांग करने वाले जनता दल के असन्तुष्ट सांसदों ने जनता दल संसदीय पार्टी की बैठक का बहिष्कार कर चौधरी देवी लाल के निवास स्थान पर बैठक की और श्री चन्द्रशेखर को अपना नेता चुना।

दूसरी ओर संसदीय पार्टी की नियमित बैठक में एक प्रस्ताव पारित कर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को वर्तमान स्थिति से निपटने के लिए उचित कदम उठाने के लिए अधिकृत किया गया।श्री चन्द्रशेखर सहित जनता दल के तीस असन्तुष्ट सांसदों को पार्टी से निकाल दिया गया। इस प्रकार 5 नवम्बर, 1990 को जनता दल का विधिवत् विभाजन हो गया। फरवरी, 1992 में जनता दल का पुनः विभाजन हो गया, जबकि अजीत सिंह गुट जनता दल से अलग हो गया। 28 जुलाई, 1993 को जनता दल में तीसरा विभाजन हुआ जब जनता दल (अ) के सात सांसदों ने कांग्रेस (इ) के पक्ष में अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान किया और अगस्त, 1993 में सभी सांसद् कांग्रेस (इ) में शामिल हो गए।

28 जून, 1994 को जनता दल में चौथा विभाजन हुआ। जनता दल के 14 सदस्य जॉर्ज फर्नांडीस के नेतृत्व में जनता दल से पृथक् हो गए और उन्होंने जनता दल (ज) का गठन किया। 20 अक्तूबर, 1994 को जनता दल (ज) ने अपने दल का नाम समता पार्टी रख लिया और 23 नवम्बर, 1994 को चुनाव आयोग ने समता पार्टी को राष्ट्रीय राजनीतिक दल के रूप में मान्यता प्रदान की।

परन्तु 24 मार्च, 1999 को चुनाव आयोग ने इसकी राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता समाप्त करते हुए इसे राज्य स्तर के दल के रूप में मान्यता प्रदान की। 21 जुलाई, 1999 को जनता दल का सातवीं बार विभाजन हुआ। इस दिन जनता दल के नेता शरद यादव वाले गुट (राम विलास पासवान, जे० एच० पटेल आदि) के साथ समता पार्टी व लोक शक्ति का विलय हो गया।

इस नए दल का नाम जनता दल (यूनाइटेड ) रखा गया। दूसरी ओर जनता दल के दूसरे गुट ने जिसमें मधु दण्डवते, एस० आर० बोम्मई, सी० एम० इब्राहिम आदि सम्मिलित थे, एच० डी० देवेगौड़ा के नेतृत्व में जनता दल (सैक्यूलर) के नाम से अलग दल बना लिया। 30 सितम्बर, 2000 को चुनाव आयोग ने जनता दल (सैक्यूलर) एवं जनता दल (यूनाइटिड) दोनों की राष्ट्रीय दल के रूप में मान्यता रद्द कर दी।

चुनाव आयोग ने जनता दल के चुनाव चिह्न ‘चक्र’ को जब्त करके जनता दल (सैक्यूलर) को ‘ट्रैक्टर चलाता किसान’ एवं जनता दल (यूनाइटिड) को ‘तीर’ चुनाव चिह्न प्रदान किया। 28 नवम्बर, 2000 को जनता दल का आठवां विभाजन हुआ। इस दिन जनता दल के नेता राम विलास पासवान अपने समर्थकों के साथ जनता दल से अलग हो गए और उन्होंने ‘जनशक्ति’ नाम से एक नई पार्टी बना ली।

प्रश्न 3.
भारतीय जनता पार्टी के उदय पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
यद्यपि जुलाई, 1979 में जनता पार्टी का विभाजन दोहरी सदस्यता के प्रश्न पर हुआ था, परन्तु विभाजन के बाद भी दोहरी सदस्यता का विवाद समाप्त नहीं हुआ। 19 मार्च, 1980 को जनता पाटी के केन्द्र संसदीय बोडे ने बहुमत से फैसला किया कि जनता पार्टी का कोई भी अधिकारी, विधायक और संसद सदस्य राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की रोजमर्रा की गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सकता। बोर्ड की बैठक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण अडवानी और श्री नाना जी देशमुख ने बोर्ड के इस निर्णय का विरोध किया और इस सम्बन्ध में तैयार किए गए प्रस्ताव में अपना विमत दर्ज कराया।

बाद में अलग से एक वक्तव्य जारी कर इन नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि भू० पू० जनसंघ घटक अभी पार्टी को भले ही न छोड़े पर वह अपने संख्या बल के आधार पर पार्टी के नेतृत्व को जल्दी ही चुनौती देगा। इस वक्तव्य में जनसंघ घटक ने साफ-साफ कहा कि संसदीय बोर्ड और राष्ट्रीय कार्यकारिणी का गठन चुनाव से नहीं हुआ। वे तदर्थ हैं और इनका तथा उनके सभी पदाधिकारियों का शीघ्र चुनाव होना चाहिए, परन्तु पार्टी के अध्यक्ष श्री चन्द्रशेखर ने पार्टी का राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाने की मांग को रद्द करते हुए घोषणा की कि राष्ट्रीय कार्यकारिणी को ऐसे मामलों में फैसला लेने का अन्तिम अधिकार है।

4 अप्रैल को जनता पार्टी का एक और विभाजन प्रायः निश्चित हो गया, जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने अपने संसदीय बोर्ड के प्रस्ताव का अनुमोदन कर पार्टी के विधायकों और पदाधिकारियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यों में भाग लेने पर रोक लगा दी। अनुमोदन प्रस्ताव के पक्ष में 17 सदस्यों ने और विरोध में 14 सदस्यों ने मत दिए। श्री अडवानी के शब्दों में, “जनता पार्टी की कार्यसमिति में पहली बार मतदान हुआ और वह भी किसी एक गुट को पार्टी से निकालने के लिए।”

5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों ने नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन किया और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया। सम्मेलन की अध्यक्षता श्रीमती विजयराजे सिंधिया ने की। 6 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व विदेश मन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया। यद्यपि जनता पार्टी का विभाजन राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ, जनसंघ के सम्बन्धों पर हुआ था फिर भी जनसंघ को पुनर्जीवित नहीं किया गया, क्योंकि श्री वाजपेयी के शब्दों में हमारे साथ पिछले तीन वर्ष का अनुभव है, व्यापक सम्पर्क है जिन्हें हम अपने आन्दोलन का भाग बनाएंगे और इसलिए भी कि वे लोग हमारे साथ आएं जो कभी जनसंघ में नहीं थे या जिनका राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से कोई नाता ही नहीं था।

इस गुट को कुछ ऐसे लोगों को भी अपने पक्ष में करने में सहायता मिली जिनका सम्बन्ध राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या जनसंघ से नहीं था। भूतपूर्व आवास मन्त्री सिकन्दर बख्त और भूतपूर्व विधि मन्त्री शान्ति भूषण तथा संसद् सदस्य राम जेठमलानी इनमें प्रमुख थे। इस सम्मेलन में लगभग चार हजार प्रतिनिधि शामिल हुए और दो दिन का यह समारोह एक राजनीतिक दल के वार्षिक अधिवेशन की तरह ही संचालित किया गया। भारतीय जनता पार्टी का प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन 27 दिसम्बर, 1980 को मुम्बई में हआ। इस सम्मेलन में 55 हज़ार प्रतिनिधियों ने भाग लिया। 6 हजार से भी अधिक स्त्रियों ने इस सम्मेलन में भाग लिया जो अपने आप में स्वतन्त्रता के बाद किसी राजनीतिक दल के लिए एक कीर्तिमान ही है।

पार्टी की सदस्यता (Membership of Party):
पार्टी के संविधान की धारा 7 के अनुसार कोई भी भारतीय नागरिक जो 18 वर्ष या इससे अधिक आयु का हो और जो संविधान की धारा 2 को स्वीकार करता हो, सदस्यता के फार्म (Annextured) में लिखित घोषणा करने पर एवं वर्णित शुल्क देने पर पार्टी का सदस्य बन सकता है, किन्तु शर्त यह है कि वह व्यक्ति किसी भी अन्य राजनीतिक दल का सदस्य नहीं होना चाहिए।

साधारणतया व्यक्ति अपने स्थायी निवास अथवा उस जगह पर जहां पर यह कार्य करता हो, दल का सदस्य बन सकता है। नवम्बर, 2019 में भारतीय जनता पार्टी की सदस्य संख्या 18 करोड़ से अधिक थी। भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री अमित शाह के अनुसार सदस्यता के विषय में भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी पार्टी बन गई। जबकि जनसंघ की सदस्य संख्या कभी भी 12 लाख के ऊपर नहीं गई थी।

भारतीय जनता पार्टी का सामाजिक आधार (Social Base of Bharatiya Janata Party):
भारतीय जनता पार्टी एक राष्ट्रवादी दल है। नि:संदेह इस पार्टी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सदस्यों का प्रभुत्व है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि इस पार्टी का सामाजिक आधार केवल राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तक ही सीमित है। आरम्भ में इस पार्टी को अल्पसंख्यकों का समर्थन न होने के बराबर प्राप्त था क्योंकि यह पार्टी अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की नीति की विरोधी थी। मुसलमान और ईसाइयों का इसका समर्थन बहुत कम प्राप्त है। पर हरिजनों और जनजातियों तथा कबीलों में इस पार्टी की लोकप्रियता धीरे-धीरे बढ़ रही है।

मई, 1982 में होने वाले उप-चुनावों में और 1987 में हरियाणा विधानसभा के चुनाव में इसने सुरक्षित स्थान जीत कर यह प्रमाणित कर दिया कि अनुसूचित जातियों और पिछड़े लोगों में भी इसका प्रभाव है। सरकारी कर्मचारी और शिक्षित वर्ग भारतीय जनता पार्टी के महान् समर्थक हैं। श्रमिकों में इसका समर्थन बढ़ता जा रहा है। भारतीय मजदूर संघ, जिसकी सदस्यता 20 लाख से अधिक है, भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं। मध्य वर्ग के व्यापारी इसके समर्थक हैं।

ध्येय तथा उद्देश्य (Aims and Objects):
पार्टी संविधान की धारा 2 में कहा गया है-‘पार्टी राष्ट्रीय समन्वय, लोकतन्त्र, सकारात्मक धर्म-निरपेक्ष, गांधीवादी, समाजवाद और मूल्यों पर आधारित राजनीति के लिए कृत-संकल्प है। पार्टी आर्थिक और राजनीतिक सत्ता के विकेन्द्रीकरण में विश्वास रखती है।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 4.
भारत में क्षेत्रीय दलों का महत्त्व क्यों बढ़ता जा रहा है ?
अथवा
गठबन्धन राजनीति में क्षेत्रीय दलों की बढ़ती भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
क्षेत्रीय दल का अर्थ-आमतौर पर राज्य दलों (State Parties) को ही क्षेत्रीय राजनीतिक दल कहा जाता है। किसी राजनीतिक दल को चुनाव आयोग द्वारा राज्य-दल (State Party) के रूप में मान्यता दी जाती है।। चनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों को क्षेत्रीय दल के रूप में मान्यता देने का आधार-इसके लिए अध्याय 8 का लघु उत्तरीय प्रश्न नं० 9 देंखे। राजनीतिक व्यवस्था में क्षेत्रीय दलों का योगदान-भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का महत्त्व दिन-प्रतिदिन अधिक बढ़ रहा है। वर्तमान समय में चुनाव आयोग ने 8 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय दल के रूप में तथा 53 राजनीतिक दलों को राज्य स्तरीय दल के रूप में मान्यता प्रदान की हुई है।

पंजीकृत दलों को चुनाव आयोग की मान्यता तो प्राप्त नहीं होती लेकिन उन्हें चुनाव में भाग लेने का अधिकार प्राप्त होता है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की बढ़ रही महत्ता का अनुमान इस तथ्य से ही लगाया जा सकता है कि 19 मार्च, 1998 को श्री अटल बिह के नेतत्वाधीन जिस भारतीय जनता पार्टी ने केन्द्र में सरकार स्थापित की थी उस सरकार में 18 राजनीतिक दल सम्मिलित थे, जिनमें से मात्र दो राजनीतिक दल ही राष्ट्रीय स्तर के थे। इसके अतिरिक्त सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनावों से पहले और बाद में भी क्षेत्रीय दलों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। इन चुनावों से पहले लगभग सभी राष्ट्रीय दलों ने क्षेत्रीय दलों के साथ गठबन्धन किया और उन्हें सत्ता में भागीदार बनाने का वायदा किया।

भारतीय जनता पार्टी ने 24 दलों के साथ मिलकर एक महान् गठबन्धन (Grand Alliance) बनाया जिसे राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन का नाम दिया गया। लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने के बाद इस गठबन्धन के अधिकांश सदस्यों को सरकार में भी सम्मिलित किया गया। 2004 के 14वीं लोकसभा चुनावों में भी किसी एक दल को बहुमत नहीं मिला। जिसके कारण कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (United Progressive Alliance-U.P.A.) का निर्माण किया गया, जिसमें कई क्षेत्रीय दलों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2009 के लोकसभा के चुनावों के पश्चात् भी कांग्रेस ने केन्द्र में सरकार बनाने के लिए कई क्षेत्रीय दलों का समर्थन लिया।

2014 एवं 2019 में भी भारतीय जनता पार्टी द्वारा 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनावों में स्पष्ट बहुमत प्राप्त होने के बावजूद भी गठबन्धन सरकार का निर्माण किया गया। केन्द्र में सरकार स्थापित करने के अलावा अनेकों राज्यों में भिन्न-भिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने सरकारें बनाई हैं। समय-समय पर पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, जम्मू-कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस, असम में असम गण परिषद्, आन्ध्र प्रदेश में तेलुगू देशम, तमिलनाडु में डी० एम० के० और कई अन्य राज्यों में अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की सरकारें बनी हैं।

क्षेत्रीय राजनीतिक दल भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का अटूट अंग बन गए हैं। आने वाले समय में भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में इन दलों की भूमिका और भी अधिक महत्त्वपूर्ण बनेगी और यह दल राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करते रहेंगे। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की महत्ता के कारण ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और अन्य राष्ट्रीय राजनीतिक दल क्षेत्रीय राजनीतिक दलों से चुनाव गठबन्धन करने के लिए विवश हैं।

प्रश्न 5.
भारत में मिली-जुली या गठबन्धन सरकारों की राजनीति की व्याख्या करें।
अथवा
भारत में गठबन्धन की राजनीति का क्या अर्थ है ? गठबन्धन सरकार के मुख्य लक्षण बताइये।
अथवा
गठबन्धन सरकार से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् 26 जनवरी, 1950 को भारतीय संविधान लागू किया गया। जिसके तहत भारत में लोकतान्त्रिक प्रणाली की व्यवस्था की गई है। सन् 1952 से लेकर वर्तमान समय तक भारत में 17 आम चुनाव हो चुके हैं। भारत में मिली-जुली सरकारों के निर्माण का इतिहास भी भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के साथ ही जुड़ा है। भारत में मिली-जुली सरकारों की राजनीति के अध्ययन से पूर्व हमें मिली-जुली सरकार के अर्थ से परिचित होना ज़रूरी है।

भारत में मिली-जुली सरकारों के लिए कई शब्दों का प्रयोग होता है, जिनमें मुख्य हैं ‘जनता सरकार’, ‘राष्ट्रीय मोर्चा सरकार’, ‘संयुक्त मोर्चा सरकार’, राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन, संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन तथा ‘मिली-जुली सरकार’ ली-जुली सरकार का साधारण अर्थ है कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। चुनावों से पूर्व या चुनावों के बाद कई दल मिलकर अपना साझा कार्यक्रम तैयार करते हैं।

उसके आधार पर वे मिलकर चुनाव लड़ते हैं अथवा अपनी सरकार बनाते हैं। मिली-जुली सरकार का निर्माण प्राय: उस स्थिति में किया जाता है, जब प्रायः किसी एक दल को चुनावों के बाद स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हुआ हो। तब दो या दो से अधिक दल मिलकर संयुक्त सरकार का निर्माण करते हैं। ऐसी सरकार में प्राय: सभी राजनीतिक दल अपने दलों के संकीर्ण व विशेष हितों को त्याग कर एक निश्चित कार्यक्रम पर अपनी सहमति प्रकट करते हैं। इन मिली-जुली सरकारों की अपनी कुछ विशेषताएं होती हैं, जिनका वर्णन निम्नलिखित है

1. समझौतावादी कार्यक्रम-मिले-जुले मन्त्रिमण्डलों की पहली विशेषता यह है कि उनका राजनीतिक कार्यक्रम समझौतावादी होता है। सरकार निर्माण के कुछ दिन बाद ही मन्त्रिमण्डल के घटक दलों के शीर्षस्थ नेता मिलकर मिली जुली सरकार के लिए राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक कार्यक्रम तैयार करते हैं, इसके सम्बन्ध में वह समझौता करते हैं, जिसमें कि प्रत्येक दल की बातों को व कार्यक्रम को ध्यान में रखा जाता है। अतः मिले-जुले मन्त्रिमण्डलों की पहली प्रवृत्ति अथवा विशेषता समझौतावादी है।

2. सर्वसम्मत नेता-मिली-जुली सरकार के निर्माण से पूर्व सभी दल मिलकर अपने नेता का चुनाव करते हैं। नेता का चुनाव प्रायः सर्वसम्मत ढंग से किया जाता है। यद्यपि मिली-जुली सरकार का एक सर्वसम्मत नेता होता है, फिर भी घटक दलों के नेता व उनके अस्तित्व को दृष्टि विगत नहीं किया जाता। इसके कारण सरकार में एकता बनी रहती है।

3. सर्वसम्मत निर्णय-मिली-जुली सरकार में शामिल घटक दल किसी भी राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय समस्या का हल सर्वसम्मति से करते हैं। कोई भी राजनीतिक समस्या पैदा होने पर घटक दलों की संयुक्त बैठक बुलाई जाती है, जिससे उक्त समस्या पर घटक दलों की राय जानी जाती है। प्रत्येक दल द्वारा दिए गए सुझावों को विशेष महत्त्व दिया जाता है ताकि कोई दल यह महसूस न करे कि उसके अस्तित्व को अनदेखा कर दिया गया है।

4. मिल-जुल कर कार्य करना-मिली-जुली सरकार में शामिल सभी घटक दल मिल-जुलकर कार्य करते हैं। प्रत्येक दल को कोई न कोई महत्त्वपूर्ण विभाग अवश्य सौंपा जाता है। इस विभाग की कुशलता आदि उस दल के ऊपर निर्भर करती है। एक दल द्वारा किया गया गलत कार्य सभी दलों द्वारा किया गया गलत कार्य समझा जाएगा। इसीलिए सभी दल मिल-जुल कर कार्य करते हैं।

भारत में मिली-जुली सरकारों की राजनीति का अध्ययन निम्नलिखित शीर्षकों के अन्तर्गत किया जा सकता है

1. स्वतन्त्रता से पूर्व मिली-जुली सरकार (Coalition Government before Independence):
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में मिली-जली सरकार के निर्माण का इतिहास स्वतन्त्रता प्राप्ति के पर्व से आरम्भ होता है। भारत के लिए नया संविधान बनाने के लिए कैबिनेट मिशन के द्वारा एक अन्तरिम सरकार का गठन किया गया। इस सरकार में भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों कांग्रेस, मुस्लिम लीग, अकाली दल आदि को शामिल किया गया।

2. मिली-जुली सरकार 1952 से 1967 (Coalition Government from 1952 to 1967):
भारत में पहले संसदीय चुनाव सन् 1952 में हुए। इन चुनावों के समय चुनाव आयोग ने 14 राजनीतिक दलों को राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक दल के रूप में मान्यता दी। इन चुनावों में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ, क्योंकि उस समय कोई राजनीतिक दल कांग्रेस के समान स्तर का नहीं था, फिर भी पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने अपने मन्त्रिमण्डल में भारतीय राजनीति-नए बदलाव डॉ० बी० आर० अम्बेदकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, गोपाल स्वामी आयंगर जैसे गैर-कांग्रेसी सदस्य भी सम्मिलित किए। श्री लाल बहादुर शास्त्री व श्रीमती इन्दिरा गांधी के शासन काल में सभी मन्त्री कांग्रेस से ही लिए गए थे।

3. मिली-जुली सरकार की राजनीति 1967 से 1977 तक (Coalition Government Politics from 1967 to 1977):
चौथे आम चुनावों के पश्चात् यद्यपि कांग्रेस को केन्द्र में पूर्ण बहुमत प्राप्त हुआ, परन्तु कई राज्यों में मिली-जुली सरकारें बनीं। सन् 1969 में कांग्रेस में विभाजन के पश्चात् इन्दिरा गांधी की सरकार को साम्यवादी दल के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ा। सन् 1967 के चुनाव के पश्चात् बिहार, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा आदि प्रान्तों में मिली-जुली सरकारों के बनने और गिरने का सिलसिला आरम्भ हो गया, परन्तु केन्द्र में कांग्रेस की ही सरकार बनी।

4. केन्द्र में पहली मिली-जुली सरकार (First Coalition Government in the Centre in 1977):
केन्द्र में पहली मिली-जुली सरकार का निर्माण। मार्च, 1977 में लोकसभा चुनाव हुए और इन चुनावों में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई। जनता पार्टी व उसके सहयोगी दलों को 300 स्थान प्राप्त हुए। केन्द्र में स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् गैर-कांग्रेसी सरकार की स्थापना हुई। केन्द्र में यह मिली-जुली सरकार का पहला प्रयोग था। जनता पार्टी की सरकार में कांग्रेस संगठन, भारतीय लोकदल, जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी, विद्रोही कांग्रेस, अकाली दल, द्रमुक आदि दल शामिल हुए।

5. राष्ट्रीय मोर्चा सरकार 1989 (National Front Government 1989):
1989 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में राष्ट्रीय मोर्चा की मिली-जुली सरकार बनी। राष्ट्रीय मोर्चा और जनता दल ने मिलकर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में राष्ट्रीय मोर्चे के सबसे महत्त्वपूर्ण घटक जनता दल को 141 स्थान प्राप्त हुए, परन्तु कांग्रेस (स), तेलुगू देशम तथा डी० एम० के० को कोई सफलता प्राप्त नहीं हुई। विश्वनाथ प्रताप सिंह को राष्ट्रीय मोर्चा संसदीय दल का नेता चुना गया और उन्होंने केन्द्र में दूसरी मिली-जुली सरकार का निर्माण किया।

भारतीय जनता पार्टी और वामपंथी दलों ने राष्ट्रीय मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन 23 अक्तबर, 1990 को भारतीय जनता पार्टी द्वारा अपना समर्थन वापस लेने व जनता दल में विभाजन के कारण राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार को लोकसभा में विश्वास मत प्राप्त नहीं हो सका और 7 नवम्बर, 1990 को प्रधानमन्त्री. वी० पी० सिंह ने अपने पद से त्याग–पत्र दे दिया। मई-जून, 1991 को लोकसभा के मध्यावधि चुनावों में यद्यपि किसी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, परन्तु कांग्रेस को लोकसभा में सबसे अधिक स्थान प्राप्त हुए और कांग्रेस ने अपनी अल्पमत सरकार बनाई और 1996 तक कांग्रेस सत्ता में रही।।

6. संयुक्त मोर्चा सरकार 1996 (United Front Government 1996):
चुनाव आयोग ने कुछ राज्य स्तरीय क्षेत्रीय दलों को भी मान्यता प्रदान की। अप्रैल-मई, 1996 के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ जिसके कारण मिली-जुली सरकार बनाने की सम्भावनाएं बहुत बढ़ गईं। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी और उसे 161 स्थान प्राप्त हुए। दूसरे नम्बर पर कांग्रेस रही, जिसको 140 स्थान प्राप्त हुए। कांग्रेस को इतने कम स्थान पहले कभी भी किसी भी लोकसभा चुनाव में प्राप्त नहीं हुए। जनता दल को 45, मार्क्सवादी पार्टी को 32, भारतीय साम्यवादी दल को 12, समता पार्टी को 8, कांग्रेस (ति०’) को 4 और जनता पार्टी को कोई विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई।

इन चुनावों में क्षेत्रीय दलों को भारी सफलता प्राप्त हुई जिनमें डी० एम० के० को 17, तमिल मनीला कांग्रेस को 20, तेलुगू देशम पार्टी को 16, समाजवादी पार्टी को 16, अकाली दल को 8, शिवसेना को 15, असम गण परिषद् को 5, हरियाणा विकास पार्टी को 3, मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस को 2 और बहुजन समाज पार्टी को 11 स्थान प्राप्त हुए, जिसके कारण सरकार के निर्माण में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बढ़ गई। राष्ट्रपति डॉ० शंकर दयाल शर्मा ने 16 मई, 1996 को लोकसभा में सबसे बड़े दल भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित किया।

16 मई, 1996 को भारतीय जनता पार्टी ने अपने सहयोगी दलों सम दल, शिव सेना और हरियाणा विकास पार्टी के सहयोग से मिली-जुली सरकार का गठन किया, परन्तु इससे पहले 10 मई, 1996 को 10 राजनीतिक दलों जनता दल, भारतीय साम्यवादी दल, भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी), अखिल भारतीय इन्दिरा कांग्रेस (तिवारी), डी० एम० के०, तमिल मनीला कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, मध्य प्रदेश कांग्रेस, मस्लि लीग, जनता पार्टी ने मिलकर संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया।

19 मई, 1996 को इस मोर्चे में असम गण परिषद् और तेलुगू देशम पार्टी भी शामिल हो गईं। इस तरह 12 दलों के सहयोग से मिलकर संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया गया और श्री हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवेगौड़ा को संयुक्त मोर्चे का नेता चुना गया। इस मोर्चे को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बाहर से बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी। परन्तु इससे पूर्व केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी का निर्माण किया जा चुका था, राष्ट्रपति ने 31 मई, 1996 तक भाजपा को लोकसभा में अपना बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया, परन्तु प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 28 मई, 1996 को ही अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया, क्योंकि उन्हें आभास हो गया था कि बहुमत उनके साथ नहीं है।

29 मई को राष्ट्रपति ने संयुक्त मोर्चा के नेता एच० डी० देवेगौड़ा को 1 जून, 1996 को अपनी सरकार बनाने का निमन्त्रण दिया। जून, 1996 को एच० डी० देवेगौड़ा ने 13 दलों द्वारा गठित संयुक्त मोर्चे से मिली-जुली सरकार का निर्माण किया। जनतान्त्रिक गठबन्धन सरकार 1999, 2014 एवं 2019 (National Democratic Alliance Government 1999, 2014 and 2019)-सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनाव में किसी भी एक राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ, परन्तु भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन को बहुमत प्राप्त हो गया। 24 राजनीतिक दलों के सहयोग से मिलकर बने राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के 70 सदस्यीय मन्त्रिमण्डल ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 13 अक्तूबर, 1999 को शपथ ग्रहण की।

इस सरकार में अधिकतर क्षेत्रीय दल सम्मिलित हैं। इन चुनावों ने भारतीय राजनीति में मिली-जुली सरकारों के युग का मार्ग और प्रशस्त किया। अप्रैल-मई, 2014 में हुए 16वीं 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन ने क्रमश: 335 एवं 355 सीटें जीतीं, तथा दोनों बार श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया। संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार-2004 एवं 2009 (United Progressive Alliance Government -2004 and 2009)- अप्रैल-मई, 2004 में 14वीं तथा अप्रैल-मई, 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव हुए।

इन चुनावों में भी किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। अत: दोनों बार कई दलों ने मिलकर कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (United Progressive Alliance-UPA) का निर्माण किया तथा डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाई। उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि गठबन्धन सरकारों को अपने अस्तित्व के लिए विभिन्न दलों के सहयोग पर निर्भर रहना पड़ा। इसके कारण ही त्रिशंकु संसद् (Hung Parliament) का जन्म हुआ।

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प्रश्न 6.
भारत में गठबन्धन सरकार की उत्पत्ति के लिए उत्तरदायी कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में गठबन्धन सरकार की उत्पत्ति के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

1. कांग्रेस के आधिपत्य की समाप्ति-1989 के बाद कांग्रेस के आधिपत्य वाली स्थिति पहले जैसी नहीं रही। इसके विरुद्ध अनेक राजनीतिक दल आ गए जिससे गठबन्धनवादी सरकारों का दौर शुरू हुआ।

2. क्षेत्रीय दलों में वृद्धि-क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण किसी भी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा या विधानसभा में बहुमत मिलना कठिन हो गया है। इससे राजनीतिक दल आपस में गठबन्धन बनाने लगे हैं।

3. दल-बदल-भारत में दल-बदल विरोधी कानून होने के बावजूद भी दल-बदल की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पाई है। दल-बदल के कारण सरकारों का अनेक बार पतन हुआ और जो नई सरकारें बनीं वे भी गठबन्धन करके बनीं।

4. क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा–प्राय: केन्द्र में बनी राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा की है। इससे क्षेत्रीय स्तर के दलों ने मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार गठबन्धनकारी दौर की शुरुआत की।

5. राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा-वर्तमान समय में प्रत्येक नेता मन्त्री पद प्राप्त करना चाहता है, इसलिए वह किसी तरह का समझौता करने के लिए तैयार रहता है।

6. लोगों का राष्ट्रीय दलों पर अविश्वास-गठबन्धन सरकारों के बनने का एक कारण यह है कि लोगों का राष्ट्रीय दलों पर विश्वास कम होता जा रहा है तथा वे क्षेत्रीय दलों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

प्रश्न 7.
गठबन्धन सरकार के विभिन्न रूपों का वर्णन करें।
उत्तर:
गठबन्धन सरकार के कई रूप हो सकते हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. समान रूप से प्रभावशाली दो विरोधी गठबन्धन-इस प्रकार का गठबन्धन उस समय अस्तित्व में आता है, जब एक राज्य या प्रान्त में दो समान रूप से प्रभावशाली विरोधी गठबन्धन हो तथा उस राज्य या प्रान्त में अन्य छोटे-छोटे दल भी पाए जाते हों । इस प्रकार की स्थिति में दोनों बड़े विरोधी दल अन्य छोटे-छोटे दलों से समझौता करके अधिक-से-अधिक सीटें जीतकर सत्ता में आना चाहते हैं। इस प्रकार की स्थिति द्वि-दलीय व्यवस्था के रूप में कार्य करती है।

2. एक दल की प्रधानता वाला गठबन्धन-गठबन्धन सरकार का एक रूप दल की प्रधानता वाला गठबन्धन है। इस प्रकार के गठबन्धन के सभी छोटे-छोटे दल एक बड़े दल के साथ मिलकर गठबन्धन का निर्माण करते हैं। छोटे-छोटे दल यद्यपि महत्त्वपूर्ण होते हैं, परन्तु वे सरकार को पूर्ण रूप से प्रभावित नहीं कर पाते। इस प्रकार के गठबन्धन में से यदि एक-दो छोटे दल बाहर भी हो जाएं तो भी सरकार के अस्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

3. राष्ट्रीय सरकार-गठबन्धन सरकार का एक रूप राष्ट्रीय सरकार का भी है। राजनीतिक दल संसद में अपने अपने आनुपातिक प्रतिनिधित्व के आधार पर सरकार का गठन करते हैं। इस प्रकार की सरकार का निर्माण किसी राष्ट्रीय संकट या चुनावों से पूर्व किया जाता है।

4. नकारात्मक आधार पर निर्मित गठबन्धन सरकार- इस प्रकार का गठबन्धन प्रायः चुनावों के बाद ही बनता है, तथा सरकार बनाई जाती है। इस प्रकार का गठबन्धन ऐसे दलों का गठबन्धन होता है, जो किसी दूसरे विरोधी दल या गठबन्धन को सरकार बनाने से रोकना चाहते हों। ऐसे गठबन्धन अवसरवादिता के उदाहरण माने जाते हैं।

प्रश्न 8.
2004 के 14वें लोकसभा चुनावों एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
2004 में हुए लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election held in 2004) अप्रैल-मई, 2004 में 14वीं लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए। ये चुनाव पाँच चरणों में कराये गए थे, और इसमें 66 करोड़ मतदाताओं में से 58 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया गया। 14वीं लोकसभा चुनाव पूर्णतः इलेक्ट्रॉनिक चुनाव मशीन द्वारा करवाए गये थे। इस चुनाव में दलीय स्थिति इस प्रकार रहीं

राजनीतिक दलसीटें जीतीं
कांग्रेस गठबन्धन219
कांग्रेस145
डी० एम० के०16
एन० सी० पी०9
टी० आर० एस०5
पी० एम० के०6
एम० डी० एम० के०4
आर० जे० डी०23
जे० एम० एम०5
एल० जे० एन० एस० पी०3
जे० के० पी० डी० पी०1
एम० यू० एल1
आर० पी० भाई०1
(ए) राजग186
भाजपा138
एस० एच० एस०12
टी० डी० पी०5
अकाली दल8
जनता दल (यू)7
ए० आई० टी० सी०2
बी० जे० डी०11
एम० एन० एफ०1
आई० एफ० डी० पी०1
एन० पी० एफ०1
अन्य136
सी॰ पी० आई० (एम)43
सी० पी० आई०10
एस० पी०36
जनता दल (एस०)4
ए० आई० एफ० बी०3
ए० आई० एम० आई० एम०1
बी० एन० पी०1
के० ई० सी०1
इनैलो4
बी० एस० पी०18
आर० एल० डी०3
जे० के० एन०2
एस० जे० पी० (आर०)1
आर० एस० पी०3
ऐ० जी० पी०2
एन० एल० पी०1
एस० डी० एफ०1
एल० टी० एस० पी०1
एस० एच० एस०12

दलीय स्थिति के अध्ययन से पता चलता है कि मतदाताओं ने किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत प्रदान नहीं किया।

संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण (Formation of United Progressive Alliance)-2004 के लोकसभा के चुनावों में जब किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं हुआ तब भाजपा गठबन्धन एवं कांग्रेस गठबन्धन ने सरकार बनाने के प्रयास तेज़ कर दिये। अन्ततः अधिकांश गैर कांग्रेस एवं गैर भाजपा गठबन्धन दलों ने कांग्रेस गठबन्धन को समर्थन देने का निर्णय किया जिससे कांग्रेस गठबन्धन के लिए सरकार बनाने का रास्ता साफ़ हो गया।

कांग्रेस एवं सहयोगी दलों ने अपने गठबन्धन को संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (United Progressive Alliance-UPA) का नाम दिया। यद्यपि दलीय स्थिति देखने के पश्चात् हम यह कह सकते हैं कि कांग्रेस एवं भाजपा की सीटों में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं था, परन्तु अन्य दलों ने कांग्रेस को समर्थन देकर संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार बनाने में मदद की। गठबन्धन के नेता के रूप में श्रीमती सोनिया का प्रधानमन्त्री बनना लगभग तय लग रहा था, परन्तु भाजपा एवं कुछ अन्य वर्गों के विरोध के कारण श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वेच्छा से प्रधानमन्त्री बनने भारतीय राजनीति-नए बदलाव से इन्कार कर दिया।

अत: गठबन्धन में कांग्रेस के नेता डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाने पर सहमति बनी, परिणामस्वरूप 22 मई, 2004 को डॉ. मनमोहन सिंह ने भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली। इस प्रकार लगभग 20 दलों की गठबन्धन सरकार अस्तित्व में आई। संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार को वामपंथियों ने बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया। कांग्रेस के पश्चात् वामपंथी दलों ने सर्वाधिक 63 सीटें जीतीं।

अतः गठबन्धन सरकार पर वामपंथी दलों का विशेष प्रभाव है तथा डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार कोई भी नीतिगत निर्णय लेने से पहले वामपंथी दलों से विचार-विमर्श अवश्य करती है। संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन लगभग 20 दलों का एक गठबन्धन है। अत: गठबन्धन ने सभी सहयोगी दलों को खुश करने का प्रयास किया। गठबन्धन ने सर्वप्रथम अपना न्यूनतम सांझा कार्यक्रम (Common Minimum Programme) बनाया, जिसमें सभी दलों की विशेष नीतियों को शामिल किया। मन्त्रिपरिषद् के निर्माण में भी सहयोगी दलों को स्थान दिया गया।

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प्रश्न 9.
2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों एवं संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन पर एक नोट लिखें। (Write a note on 15th Lok Sabha Elections and United Progressive Alliance.)
उत्तर:
2009 में हुए लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election held in 2009)
अप्रैल-मई, 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनाव सम्पन्न हुए, ये चुनाव पांच चरणों में कराये गए थे। इसमें 71 करोड़ 40 लाख मतदाताओं में से लगभग 60 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मत का प्रयोग किया था। 15वीं लोकसभा के चुनाव भी पूर्ण रूप से इलैक्ट्रोनिक चुनाव मशीन से करवाए गए थे। इस चुनाव में दलीय स्थिति इस प्रकार रही

राजनीतिक दलसीटें जीतीं
1. कांग्रेस206
2. भाजपा116
3. सपा23
4. बसपा21
5. जद (यू)20
6. टी०एम०सी०19
7. डी०एम०के०18
8. माकपा16
9. बीजद14
10. शिवसेना11
11. एन० सी० पी०9
12. अन्ना द्रमुक9
13. टी० डी० पी०6
14. रालोद5
15. अकाली दल4
16. राजद4
17. भाकपा4
18. नेशनल कान्फ्रेंस3
19. जद (एस)3
20. अन्य23
21. निर्दलीय9

दलीय स्थिति के अध्ययन से पता चलता है कि मतदाताओं ने किसी भी एक दल को पूर्ण बहुमत प्रदान नहीं किया।

संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन द्वारा सरकार का निर्माण (Formation of Govt. by U.P.A.) यद्यपि 2009 के चुनाव में भी किसी एक दल या गठबन्धन को पूर्व बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था, कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील . गठबन्धन को 2004 के चुनावों के मुकाबले में अधिक सीटें मिली थीं। स्वयं कांग्रेस को 1991 के पश्चात् 200 से अधिक सीटें प्राप्त हुई थीं। अतः सरकार बनाने के लिए राष्ट्रपति ने डॉ. मनमोहन को आमन्त्रित किया। डॉ. मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति को अपने समर्थन में 322 सांसदों की सूची सौंपी, जिसमें यू० पी० ए० के दलों के अतिरिक्त राजद, बसपा सपा तथा जनता दल (एस) का भी समर्थन शामिल था।

परिणामस्वरूप 22 मई, 2009 को डॉ. मनमोहन सिंह ने पुनः भारत के प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली। उल्लेखनीय बात यह है कि 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यू०पी०ए० की सरकार बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले वामपंथी दल इस सरकार में शामिल नहीं हुए।

प्रश्न 10.
सन 2014 में हए 16वीं लोकसभा के चनावों एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन पर एक नोट लिखो।
उत्तर:
भारत में 16वीं लोकसभा के चुनाव अप्रैल-मई 2014 में 9 चरणों में करवाए गए। इन चुनावों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं

  • इन चुनावों में अब तक सबसे अधिक 66.38% मतदान हुआ।
  • इन चुनावों में 60 लाख मतदाताओं ने नोटा (None of the Above-Nota) बटन दबाया।
  • इन चुनावों में मतदाताओं की संख्या 81 करोड़ 40 लाख थी, जिसमें से लगभग 55 करोड मतदाताओं ने मतदान दिया।
  • इन चुनावों में अधिकतम खर्च सीमा 70 लाख थी।
  • इन चुनावों में 1687 राजनीतिक दलों ने भाग लिया, जिसमें 6 राष्ट्रीय एवं 54 क्षेत्रीय राजनीतिक दल शामिल थे।
  • इन चुनावों में अब तक सर्वाधिक 61 महिलाएं चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची। इन चुनावों के चुनाव परिणाम इस प्रकार रहे

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उपरोक्त चुनाव परिणामों से स्पष्ट है, कि भाजपा ने जहां 282 सीटें जीतीं वहीं इसके गठबन्धन को भाजपा सहित 334 सीटें प्राप्त हुईं। अत: भाजपा एवं राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन के नेता श्री नरेन्द्र मोदी को 26 मई, 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई गई। श्री नरेन्द्र मोदी ने 26 मई, 2014 को ही अपनी मंत्रिपरिषद् का भी निर्माण किया, जिसमें कुल 45 मंत्री शामिल थे, इसमें 23 कैबिनेट मंत्री, 10 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री तथा 12 राज्यमंत्री शामिल थे। श्री नरेन्द्र मोदी ने 5 जुलाई, 2016 को अपनी मंत्रिपरिषद् का विस्तार एवं पुनर्गठन किया। इस प्रकार मंत्रिपरिषद् की कुल संख्या 75 हो गई। इसमें 26 कैबिनेट मंत्री, 13 स्वतंत्र प्रभार वाले राज्यमंत्री तथा 36 राज्यमंत्री शामिल थे।

प्रश्न 11.
सन् 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनावों एवं राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन पर एक नोट लिखो।
उत्तर:
भारत में 17वीं लोकसभा के चुनाव अप्रैल-मई, 2019 में 7 तरणों में करवाए गए थे। इन चुनावों की मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं

  • इन चुनावों में 67.11 मतदान हुआ।
  • इन चुनानों में मतदाताओं की गिनती 90 करोड़ थी।
  • इन चुनावों में 2200 से अधिक राजनीतिक दलों ने भाग लिया, जिसमें 7 राष्ट्रीय एवं 59 क्षेत्रीय दल शामिल थे।
  • इन चुनावों में अब तक सर्वाधिक 78 महिलाएं चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंची।
  • इन चुनावों के लिए पूरे भारत में कुल 10 लाख मतदाता केन्द्र बनाए गये थे।
  • इन चुनावों से सभी मतदाता केन्द्रों पर ई० वी० एम० मशीनों के साथ-साथ वी० वी० पी० ए० टी० (V.V.P.A.T. Voter Verifiable Paper Anchit Irail) का भी प्रयोग किया गया।
  • इन चुनावों में लगभग 99.3% मतदाताओं के पास पहचान पत्र थे।

इन चुनावों के चुनाव परिणाम इस प्रकार रहे

Result Status
Status Known for 542 out of 542 Constituencies
PartyWon
Aam Aadmi Party1
AJSU Party1
All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam1
All India Majlis-E-Ittehadul Muslimeen2
All India Trinamool Congress22
All India United Democratic Front1
Bahujan Samaj Party10
Bharatiya Janata Party303
Biju Janata Dal12
Communist Party of India2
Communist Party of India (Marxist)3
Dravida Munnetra Kazhagam23
Indian National Congress52
Indian Union Muslim League3
Jammu \& Kashmir National Conference3
Janata Dal (Secular)1
Janata Dal (United)16
Jharkhand Mukti Morcha1
Kerala Congress (M)1
Lok Jan Shakti Party6
Mizo-National Front1
Naga Peoples Front1
National People’s Party1
Nationalist Congress Party5
Nationalist Democratic Progressive Party1
Revolutionary Socialist Party1
Samajwadi Party5
Shiromani Akali Dal2
Shivsena18
Sikkim Krantikari Morcha1
Telangana Rashtra Samithi9
Telugu Desam3
Yuvajana Sramika Rythu Congress Party22
Other8
Total542

प्रश्न 12.
भारत में गठबन्धन की राजनीति का क्या अर्थ है ? गठबन्धन सरकार का भारतीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ा ?
अथवा
भारतीय राजनीति पर गठबन्धन सरकार के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में गठबन्धन राजनीति का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 5 देखें। गठबन्धन सरकार का भारतीय राजनीति पर प्रभाव

1. अस्थाई सरकार:
गठबन्धन सरकारों के कारण भारत में अस्थिरता बढ़ी है क्योंकि विभिन्न दल अपने स्वार्थी हितों की खातिर मिलकर सरकार बनाते हैं। अतः यह पता नहीं होता कि कब वह सरकार से अलग हो जाएं।

2. नीतियों में निरन्तरता का अभाव:
गठबन्धन सरकार द्वारा बनाई जाने वाली नीतियों में निरन्तरता नहीं होती है। मिली-जुली सरकार कभी भी दीर्घकालीन एवं प्रभावशाली नीतियां नहीं बना पाती।

3. राष्ट्रीय एकता को खतरा:
गठबन्धन सरकार में शामिल दल केवल अपने हितों की पूर्ति में ही लगे रहते हैं। उन्हें देश की रक्षा की कोई चिन्ता नहीं होती।

4. प्रधानमन्त्री की कमज़ोर स्थिति:
गठबन्धन सरकार में प्रधानमन्त्री की स्थिति कमजोर होती है, जिसके कारण वह देश को अच्छा नेतृत्व नहीं दे पाता।

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प्रश्न 13.
“1989 के चुनावों के बाद गठबन्धन की राजनीति का युग आरम्भ हुआ, जिसमें राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठ-जोड़ नहीं करते।” व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर गठबन्धन राजनीति का दौर है। वर्तमान समय कोई भी राजनीतिक दल अपने दम पर सरकार नहीं बना सकता। अत: वह अन्य दलों से गठबन्धन करता है। इस गठबन्धन का कोई वैचारिक या नैतिक आधार नहीं होता, बल्कि सत्ता प्राप्ति होता है। इस प्रकार के गठबन्धन की शुरुआत 1989 के पश्चात् शुरू हुई। 1989 के चुनाव के अवसर पर जनता दल ने मार्क्सवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबन्धन किया।

1991, 1996, 1998, 1999, 2004 2009 तथा 2014 के लोकसभा के चुनावों के अवसर पर लगभग सभी दलों ने अवसरवादी समझौते किए। 1996 में तमिलनाडु विधानसभा और लोकसभा चुनाव के लिए द्रमुक और तमिल मनीला कांग्रेस (T.M.C.) के बीच सीटों का समझौता हुआ। कांग्रेस (इ) ने अन्ना द्रमुक के साथ समझौता किया।

नवम्बर, 1993 में उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव के अवसर पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी में समझौता हुआ। 1 जून, 1995 को यह समझौता टूट गया और बहुजन समाज पार्टी ने समाजवादी पार्टी से अपना समर्थन वापस ले लिया। मई, 1996 में 13 दलों ने मिलकर संयुक्त मोर्चे का निर्माण किया। इन 13 दलों के इकट्ठे होने का एक ही उद्देश्य था, सत्ता पर कब्ज़ा करना।

मार्च, 1998 में भारतीय जनता पार्टी तथा उसके सहयोगी दलों ने केन्द्र में सरकार का निर्माण किया। इस सरकार में अनेक ऐसे दल शामिल थे जिसकी नीतियां परस्पर विरोधी थीं। 15 मई, 1999 को भारतीय जनता पार्टी सहित 24 राजनीतिक दलों ने मिलकर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन नाम से एक महान गठबन्धन बनाया। इस गठबन्धन का उद्देश्य केन्द्र में सत्ता प्राप्त करना था। सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में हुए लोकसभा के चुनावों में इस गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ और इसने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई।

इस प्रकार यह गठबन्धन अपने उद्देश्य में सफल रहा। 2004 के 14वीं लोकसभा के चुनाव के अवसर पर भारतीय जनता पार्टी ने जहां अनेक घोटालों में संलिप्त जयललिता से चुनावी समझौता किया, वहीं काग्रेस ने अपने कट्टर विरोधी डी० एम० के० के साथ चुनाव समझौता किया। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं, अप्रैल-मई 2014 में हुए 16वीं एवं अप्रैल-मई 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में भी लगभग सभी राजनीतिक दलों ने सिद्धान्तहीन समझौते किए थे। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने जो गठजोड़ किए उनका आधार विचारधारा नहीं बल्कि सत्ता प्राप्ति था।

प्रश्न 14.
साम्प्रदायिकता का क्या अर्थ है ? साम्प्रदायिकता के प्रभावों को दूर करने के उपायों का वर्णन करें।
अथवा
भारत में साम्प्रदायिकता को समाप्त करने के लिए मुख्य उपायों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता का अर्थ:
साम्प्रदायिकता का अभिप्राय है धर्म अथवा जाति के आधार पर एक-दूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना। ए० एच० मेरियम (A.H. Merriam) के अनुसार, “साम्प्रदायिकता अपने समुदाय के प्रति वफादारी की अ की ओर संकेत करती है जिसका अर्थ भारत में हिन्दुत्व या इस्लाम के प्रति पूरी वफादारी रखना है।”

डॉ० इ० स्मिथ (Dr. E. Smith) के अनुसार, “साम्प्रदायिकता को आमतौर पर किसी धार्मिक ग्रुप के सीमित स्वार्थी, विभाजकता और आक्रमणशील दृष्टिकोण से जोड़ा जाता है।”

के० पी० करुणाकरण (K.P. Karunakarn) के अनुसार, “भारत में साम्प्रदायिकता का अर्थ वह विचारधारा है जो किसी विशेष धार्मिक समुदाय या किसी विशेष जाति के सदस्यों के हितों के विकास का समर्थन करती है।” साम्प्रदायिकता के प्रभाव को कम करने के उपाय शक्षा द्वारा साम्प्रदायिकता को दर करने का सबसे अच्छा साधन शिक्षा का प्रसार है। जैसे-जैसे शिक्षित की संख्या बढ़ती जाएगी, धर्म का प्रभाव भी कम हो जाएगा और साम्प्रदायिकता की बीमारी भी दूर हो जाएगी।

2. प्रचार के द्वारा समाचार:
पत्रों, रेडियो तथा टेलीविज़न के द्वारा साम्प्रदायिकता के विरुद्ध प्रचार करके भ्रातृ की भावना उत्पन्न की जा सकती है।

3. नागरिक अपना दायित्व पूरा करें:”
नागरिकों को अपने दायित्व के प्रति सचेत होना चाहिए और शान्ति स्थापना में प्रशासन की मदद करनी चाहिए। प्रशासन दंगों को दबा सकता है, नागरिकों की मदद के लिए गश्त की व्यवस्था भी कर सकता है, लेकिन सन्देह का वातावरण खत्म करना नागरिकों का दायित्व है।

4. साम्प्रदायिक दलों का अन्त करके:
सरकार को सभी ऐसे दलों को समाप्त कर देना चाहिए जो साम्प्रदायिकता पर आधारित हों। चुनाव आयोग को साम्प्रदायिक पार्टियों को मान्यता नहीं देनी चाहिए।

5. धर्म और राजनीति को अलग करके:
साम्प्रदायिकता को रोकने का एक महत्त्वपूर्ण उपाय यह है कि राजनीति को धर्म से अलग रखा जाए।

6. सामाजिक और आर्थिक विकास:
साम्प्रदायिक तत्व लोगों के आर्थिक पिछड़ेपन का पूरा फायदा उठाते हैं। अतः ज़रूरत इस बात की है कि जहां-जहां कट्टरपंथी ताकतों का बोलबाला है वहां की गरीब बस्तियों के निवासियों की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं के हल के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

7. आपसी विवाह के द्वारा:
अन्तर्जातीय विवाह करके साम्प्रदायिकता को समाप्त किया जा सकता है।

प्रश्न 15.
भारत में बढ़ती हुई म्प्रदायिक प्रवृत्तियों के भारतीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय राजनीति पर साम्प्रदायिकता के पड़ने वाले प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता ने निम्नलिखित प्रकार से भारतीय राज्य व्यवस्था को प्रभावित किया है
1. साम्प्रदायिकता और राजनीतिक दल:
भारत में अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण साम्प्रदायिकता के आधार पर हुआ है।

2. साम्प्रदायिकता के आधार पर उम्मीदवारों का चयन:
चुनाव में धर्म की भावना महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। चुनाव के समय उम्मीदवारों का चयन करते समय धर्म भी अन्य आधारों में से एक महत्त्वपूर्ण आधार होता है। प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चुनाव करते समय धर्म को महत्त्व देते हैं और जिस चुनाव क्षेत्र में जिस धर्म के अधिक मतदाता होते हैं प्रायः उसी धर्म का उम्मीदवार उस चुनाव क्षेत्र में खड़ा किया जाता है। प्रायः सभी राजनीतिक दल चुनावों में वोट पाने के लिए धार्मिक तत्त्वों के साथ समझौता करते हैं।

3. धर्म तथा मतदान व्यवहार (Religion and Voting Behaviour):
चुनाव के समय मतदाता भी धर्म से प्रभावित हो कर अपने मत का प्रयोग करते हैं। प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय के लोग अपनी संख्या के आधार पर अपना महत्त्व समझने लगे हैं। प्रायः यह देखा गया है कि मुस्लिम मतदाता और सिक्ख मतदाता अधिकतर अपने धर्म से सम्बन्धित उम्मीदवार को वोट डालते हैं। मई-जून, 1991 में दसवीं लोकसभा के चुनावों के अवसर पर राम भक्तों ने भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में मतदान किया।

4. दबाव समूह तथा धर्म (Pressure Groups and Religion):
भारतीय राज्य-व्यवस्था में धर्म प्रधान दबाव समूह भी महत्त्वपूर्ण बनते जा रहे हैं। धर्म प्रधान दबाव समूह समय-समय पर शासन की नीतियों को प्रभावित करते रहते हैं। वे अपने सदस्यों के हितों की पूर्ति के लिए नीति निर्माताओं को प्रभावित कर अपने कार्य में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। अनेक धर्म प्रधान संगठन राजनीतिक मामलों में विशेष रुचि लेते हैं और अपनी मांगों को स्वीकार करवाने के लिए राजनीतिक दलों से सौदेबाजी करते हैं।

5. धर्म के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग (Demand for States Re-organisation on the basis of Religion):
भारत में कई बार अप्रत्यक्ष रूप से धर्म के आधार पर पृथक् राज्यों की मांग की गई है। पंजाब में अकालियों की पंजाबी सूबा की मांग कुछ हद तक धर्म के प्रभाव का परिणाम थी।

6. धर्म के आधार पर अस्थिरता (Unstability on the basis of Religion):
राजनीति को धार्मिक आधार देकर राष्ट्र में अस्थिरता की स्थिति पैदा करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं। धर्म के नाम पर राजनीतिक संघर्ष होते रहते हैं।

प्रश्न 16.
भारत में साम्प्रदायिकता की उत्पत्ति और विकास के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत में साम्प्रदायिकता की उत्पत्ति और विकास के निम्नलिखित कारण हैं

1. सांप्रदायिक दल-साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने में साम्प्रदायिक दलों का महत्त्वपूर्ण हाथ है। भारत में अनेक साम्प्रदायिक दल पाए जाते हैं।

2. राजनीति और धर्म-साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि राजनीति में धर्म घुसा हुआ है। धार्मिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है। पंजाब के धार्मिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है जोकि पिछले कई वर्षों से चिंता का विषय बना हुआ है।

3. सरकार की उदासीनता-हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि संघीय और राज्यों की सरकारों ने दृढ़ता से इस समस्या को हल करने का प्रयास नहीं किया है। कभी भी इस समस्या की विवेचना गंभीरता से नहीं की गई।

4. साम्प्रदायिकता शिक्षा-कई प्राइवेट स्कूलों तथा कॉलेजों में धर्म-शिक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता है।

5. पारिवारिक वातावरण-कई घरों में साम्प्रदायिकता की बातें होती रहती हैं जिनका बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और बड़े होकर वे भी साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देते हैं।

6. विभिन्न धार्मिक स्थानों का एक स्थान पर होना-कई बार विभिन्न धार्मिक स्थानों का साथ-साथ होना या एक ही स्थान पर मंदिर, मस्जिद का होना साम्प्रदायिकता का कारण बन जाता है। एक स्थान पर पहले एक धार्मिक स्थान होने और बाद में विभिन्न धर्म के धार्मिक स्थान बन जाने से भी साम्प्रदायिकता को बढ़ावा मिलता है। राम जन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद विवाद ने साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया है।

प्रश्न 17.
गठबन्धन सरकार की सफलता हेतु मुख्य सुझावों का वर्णन करें।
उत्तर:
गठबन्धन सरकार की सफलता हेतु निम्नलिखित उपाय किये जा सकते हैं

  • गठबन्धन सरकार का एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम होना चाहिए।
  • गठबन्धन सरकार का एक सर्वसम्मत नेता होना चाहिए।
  • गठबन्धन सरकार में सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिये जाने चाहिए।
  • गठबन्धन सरकार में परस्पर समन्वय बनाकर कार्य करना चाहिए।
  • गठबन्धन सरकार के माध्यम से राजनीतिक अस्थिरता के प्रयास नहीं करने चाहिए।
  • गठबन्धन में शामिल क्षेत्रीय दलों को उचित सम्मान देना चाहिए।
  • गठबन्धन में शामिल क्षेत्रीय दलों को प्रधानमन्त्री पर अनावश्यक दबाव नहीं बनाना चाहिए।
  • गठबन्धन सरकार दल-बदल का मंच नहीं बननी चाहिए।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
1990 के दशक में सहभागी उमड़ के कोई चार पक्ष लिखें।
उत्तर:
1. लोगों की सहभागिता में वृद्धि-1990 के दशक में लोगों की राजनीतिक सहभागिता में वृद्धि हुई। पिछले दशकों की अपेक्षा इस दशक में लोगों के राजनीतिक ज्ञान, रुचि एवं गतिविधियों में वृद्धि हुई।

2. विभिन्न दलों की सत्ता में भागीदारी-1989 से सत्ता कई दलों में विभाजित रही। इस दौरान जनता दल, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, डी० एम० के०, अन्ना डी० एम० के०, तेलुगू देशम, नेशनल कान्फ्रेंस, शिरोमणि अकाली दल, इनैलो, शिवसेना, बीजू जनता दल, तृणमूल पार्टी तथा असम गण परिषद जैसे दलों ने भी केन्द्र स्तर पर सत्ता में भागीदारी की।

3. क्षेत्रीय दलों का प्रभाव- भारतीय राजनीति में लोकतान्त्रिक उमड़ का एक पक्ष यह रहा है कि 1990 के दशक में क्षेत्रीय दलों ने भारतीय राजनीति को प्रभावित किया।

4. दलित एवं पिछड़े वर्गों का उभरना-भारतीय राजनीति में लोकतान्त्रिक उमड़ का एक पक्ष अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभरना है।

प्रश्न 2.
जनता दल का निर्माण किन कारणों से हुआ? इसके मुख्य घटकों के नाम लिखिए।
उत्तर:
1988 में एक नए राजनीतिक दल, जनता दल की स्थापना की गई। 1987 में, कांग्रेस के कई प्रमुख नेताओं ने पार्टी का त्याग करके ‘जन मोर्चा’ का निर्माण किया। इसके साथ ही अनेक नेता एक ऐसे नये राजनीतिक दल का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे, जो कांग्रेस का विकल्प बन सके। 26 जुलाई, 1988 को चार विपक्षी दलों जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस (स) और जन मोर्चा के विलय से एक नये राजनीतिक दल की स्थापना की गई। इस नये दल का नाम समाजवादी जनता दल रखा गया। 11 अक्तूबर, 1988 को बैंगलोर में समाजवादी जनता दल का नाम बदलकर जनता दल कर दिया गया। श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को जनता दल का प्रधान मनोनीत किया गया।

प्रश्न 3.
जनता दल का कार्यक्रम एवं नीतियां लिखें।
उत्तर:

  • जनता दल का लोकतन्त्र में दृढ़ विश्वास है और उत्तरदायी प्रशासनिक व्यवस्था को अपनाने के पक्ष में है।
  • जनता दल ने भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए सात सूत्रीय कार्यक्रम अपनाने की बात कही है।
  • पार्टी राजनीति में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए लोकपाल की नियुक्ति के पक्ष में है।
  • पार्टी पंचायती राज संस्थाओं को अधिक-से-अधिक स्वायत्तता देने के पक्ष में है।

प्रश्न 4.
भारतीय जनता पार्टी का उदय किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी का उदय (जन्म) 1980 में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के मुद्दे को लेकर असहमति के कारण हुआ। 19 मार्च, 1980 को जनता पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड ने बहुमत से फैसला किया कि जनता पार्टी का कोई भी अधिकारी, विधायक और सांसद् राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दैनिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता। परन्तु बोर्ड की बैठक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी तथा श्री नाना जी देशमुख ने बोर्ड के इस निर्णय का विरोध किया।

4 अप्रैल, 1980 को जनता पार्टी का एक और विभाजन प्रायः निश्चित हो गया, जब पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने अपने संसदीय बोर्ड के प्रस्ताव का अनुमोदन कर पार्टी के विधायकों, सांसदों और पदाधिकारियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यों में भाग लेने पर रोक लगा दी। 5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों ने नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन किया और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया। 6 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व विदेश मन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया।

प्रश्न 5.
भारत में गठबन्धन सरकार के उदय के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
1. कांग्रेस के आधिपत्य की समाप्ति-1989 के बाद कांग्रेस के आधिपत्य वाली स्थिति पहले जैसी नहीं रही। इसके विरुद्ध अनेक राजनीतिक दल आ गए जिससे गठबन्धनवादी सरकारों का दौर शुरू हुआ।

2. क्षेत्रीय दलों में वृद्धि-क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण किसी भी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा या विधानसभा में बहुमत मिलना कठिन हो गया है। इससे राजनीतिक दल आपस में गठबन्धन बनाने लगे हैं।

3. दल-बदल-भारत में दल-बदल विरोधी कानून होने के बावजूद भी दल-बदल की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पाई है। दल-बदल के कारण सरकारों का अनेक बार पतन हुआ और जो नई सरकारें बनीं वे भी गठबन्धन करके बनीं।

4. क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा-प्रायः केन्द्र में बनी राष्ट्रीय दलों की सरकारों ने क्षेत्रीय हितों की उपेक्षा की है। इससे क्षेत्रीय स्तर के दलों ने मुद्दों पर आधारित राजनीति के अनुसार गठबन्धनकारी दौर की शुरुआत की।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 6.
भारत द्वारा नई आर्थिक नीति अपनाने के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर:
भारत द्वारा निम्नलिखित कारणों से नई आर्थिक नीति अपनाई गई

  • भारत में सन् 1980 तक आर्थिक सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी थी, इस प्रक्रिया को बढ़ाना अवश्यक था।
  • भारत का सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) इस दौरान केवल 36% की दर से बढ़ रहा था। इसे बढ़ाने के लिए नई आर्थिक नीति की आवश्यकता थी।
  • भारत में निर्यात की मात्रा कम थी, जबकि आयात की मात्रा अधिक थी, अत: निर्यात की मात्रा बढ़ाने के लिए नई आर्थिक नीति की आवश्यकता थी।
  • भारत पर लगातार बढ़ रहे विदेशी कर्जे को कम करने के लिए भी नई आर्थिक नीति की आवश्यकता थी।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के उदय का वर्णन करें।
उत्तर:
26 अप्रैल, 1999 को मात्र 13 माह पुरानी लोकसभा को राष्ट्रपति के० आर० नारायणन ने प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सलाह पर भंग कर दिया। सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनाव करवाए गए। परन्तु इन चुनावों से पहले मई, 1999 में 24 राजनीतिक दलों ने मिलकर राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन-राजग (National Democratic Alliance—NDA) के नाम से एक महान् गठबन्धन बनाया।

इस गठबन्धन में अधिकतर वे दल ही सम्मिलित थे, जो बारहवीं लोकसभा में भाजपा गठबन्धन सरकार में सम्मिलित थे। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता भी अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री के रूप में पेश किया। इस गठबन्धन ने उन राजनीतिक दलों, जिन्होंने राष्ट्रीय हित से ऊपर राजनीतिक निषेधवाद, संकीर्ण निजी हितों और सत्ता के लालच को अपना स्वार्थ बनाया है, पर आरोप लगाया कि उन्होंने 1999 के चुनाव अनावश्यक रूप से राष्ट्र पर थोप दिये हैं।

राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने सितम्बर-अक्तूबर, 1999 में हुए 13वीं लोकसभा के चुनावों में 297 सीटों पर विजय प्राप्त की तथा श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। परन्तु 2004 के 14वीं एवं 2009 के 15वीं लोकसभा के चुनावों में इस गठबन्धन को हार का सामना करना पड़ा। परंतु 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनाव जीतकर इस गठबन्धन ने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया।

प्रश्न 8.
संयक्त प्रगतिशील गठबन्धन का निर्माण किस प्रकार हआ ?
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (United Progressive Alliance-UPA) का निर्माण 14वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् हुआ। अप्रैल-मई, 2004 के 14वीं लोकसभा के चुनावों में भी किसी दल को बहुमत प्राप्त नहीं हुआ। अधिकांश गैर भाजपा गठबन्धन तथा गैर कांग्रेस गठबन्धन दलों जैसे भारतीय साम्यवादी दल, भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी), जनता दल (एस०) तथा लोकजन शक्ति पार्टी ने कांग्रेस गठबन्धन को अपना समर्थन दिया।

परिणामस्वरूप 22 मई, 2004 को गठबन्धन के नेता डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री पद की शपथ दिलाई गई। 27 मई, 2004 को कांग्रेस गठबन्धन को विधिवत् रूप से संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन का नाम दिया गया तथा इस गठबन्धन ने अपना एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी जारी किया। भारतीय साम्यवादी दल, भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी) ने इस गठबन्धन को बाहर से समर्थन देने का निर्णय किया।

प्रारम्भिक तौर पर गठबन्धन के नेता के रूप में श्रीमती सोनिया गाँधी का प्रधानमन्त्री बनना लगभग तय माना जा रहा था, परन्तु भाजपा एवं कुछ अन्य वर्गों के विरोध के. कारण श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वेच्छा से प्रधानमन्त्री बनने से इन्कार कर दिया। अतः गठबन्धन में कांग्रेस के नेता डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाने पर सहमति बनी। अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् पुनः इस गठबन्धन की सरकार बनी तथा डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमन्त्री बने। 2014 एवं 2019 के लोकसभा चुनावों में इस गठबन्धन को हार का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 9.
साम्प्रदायिकता से आपका क्या तात्पर्य है ? संक्षेप में लिखें।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता का अभिप्राय है धर्म जाति के आधार पर एक-दूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना। . एक धार्मिक समुदाय को दूसरे समुदायों और राष्ट्रों के विरुद्ध उपयोग करना साम्प्रदायिकता है। ए० एच० मेरियम के अनुसार, “साम्प्रदायिकता अपने समुदाय के प्रति वफादारी की अभिवृत्ति की ओर संकेत करती है जिसका अर्थ भारत में हिन्दुत्व या इस्लाम के प्रति पूरी वफ़ादारी रखना है।” के० पी० करुणाकरण के अनुसार, “भारत में साम्प्रदायिकता का अर्थ वह विचारधारा है जो किसी विशेष धार्मिक समुदाय या जाति के सदस्यों के हितों का विकास का समर्थन करती है।”

प्रश्न 10.
भारतीय राजनीति पर साम्प्रदायिकता के कोई चार प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
साम्प्रदायिकता ने निम्नलिखित ढंगों से भारतीय लोकतन्त्र को प्रभावित किया है-

(1) भारत में अनेक राजनीतिक दलों का निर्माण धर्म के आधार पर हुआ है।

(2) चुनावों में साम्प्रदायिकता की भावना महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। प्राय: सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों का चुनाव करते समय साम्प्रदायिकता को महत्त्व देते हैं और जिस चुनाव क्षेत्र में जिस समुदाय के अधिक मतदाता होते हैं प्राय: सभी राजनीतिक दल चुनावों में वोट डालने के लिए साम्प्रदायिक तत्त्वों के साथ समझौता करते हैं।

(3) राजनीतिक दल ही नहीं बल्कि मतदाता भी धर्म से प्रभावित होकर अपने मत का प्रयोग करते हैं।

(4) धर्म के नाम पर राजनीतिक संघर्ष और साम्प्रदायिक झगड़े होते रहते हैं।

प्रश्न 11.
भारत में नई आर्थिक नीति पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
अथवा
भारत की ‘नई आर्थिक नीति’ की कोई चार मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
भारत में नई आर्थिक नीति की घोषणा सन् 1991 में की गई थी, जिसकी मुख्य विशेषताएं इस प्रकार हैं
1. परमिट राज की समाप्ति-1991 की नई आर्थिक के अन्तर्गत परमिट राज की समाप्ति करके भारतीय बाजारों को मुक्त एवं उदारवादी व्यवस्था में परिवर्तित किया गया।

2. राजकोषीय नीति-1991 की आर्थिक नीति की घोषणा के अन्तर्गत राजकोषीय नीति की भी घोषणा की गई, सार्वजनिक खर्चे को नियन्त्रित करके राजस्व को बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया। इस नीति में केन्द्र एवं राज्य सरकार पर सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करके राजकोषीय अनुशासन को लागू करने की बात की गई।

3. विदेशी खाते सम्बन्धी नीति-1991 की आर्थिक नीति के अन्तर्गत विदेशी खाते के घाटे को कम करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए।

4. कीमत नीति-1991 की आर्थिक नीति के अन्तर्गत सब्सिडी को धीरे-धीरे कम करके कई वस्तुओं जैसे पेट्रोलियम पदार्थों, खादों, रेलवे तथा बसों के किरायों तथा चीनी के दामों में वृद्धि की गई। इसके साथ-साथ सभी क्षेत्रों में कीमत नीतियों को लोचशील बनाने का प्रयास किया गया।

प्रश्न 12.
भारत में साम्प्रदायिकता के कोई चार कारण लिखें।
अथवा
भारत में साम्प्रदायिकता के विकास के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर:
1. साम्प्रदायिक दल-साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने में साम्प्रदायिक दलों का महत्त्वपूर्ण हाथ है। भारत में अनेक साम्प्रदायिक दल पाए जाते हैं।

2. राजनीति और धर्म–साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि राजनीति में धर्म घुसा हुआ है। धार्मिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है। पंजाब के धार्मिक स्थानों का इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है जोकि पिछले कई वर्षों से चिन्ता का विषय बना हुआ है।

3. सरकार की उदासीनता-हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह है कि संघीय और राज्यों की सरकारों ने दृढ़ता से इस समस्या को हल करने का प्रयास नहीं किया है। कभी भी इस समस्या की विवेचना गम्भीरता से नहीं की गई।

4. साम्प्रदायिक शिक्षा-कई प्राइवेट स्कूलों तथा कॉलेजों में धर्म-शिक्षा के नाम पर साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाता है।

प्रश्न 13.
भारत में साम्प्रदायिकता को रोकने के कोई चार उपाय लिखें।
उत्तर:

  • साम्प्रदायिकता को रोकने का सबसे अच्छा साधन शिक्षा का प्रसार है।
  • साम्प्रदायिक दलों को समाप्त कर देना चाहिए।
  • धर्म एवं राजनीति को अलग-अलग रखना चाहिए।
  • सरकार को अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा के लिए विशेष कदम उठाने चाहिए और उनमें सुरक्षा की भावना पैदा करनी चाहिए।

प्रश्न 14.
गठबन्धन सरकार के भारतीय राजनीति पर पड़ने वाले कोई चार प्रभावों का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • गठबन्धन सरकार के कारण भारतीय राजनीति में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हुई है।
  • गठबन्धन सरकारों में प्रधानमन्त्री की स्थिति कमजोर हई है।
  • गठबन्धन सरकार में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा है।
  • गठबन्धन सरकारों के कारण दल-बदल को बढ़ावा मिला है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 15.
गठबन्धन सरकार के कोई चार मुख्य लक्षण बताइए।
उत्तर:
1. समझौतावादी कार्यक्रम-गठबन्धन सरकार का पहला लक्षण यह है, कि उनका राजनीतिक कार्यक्रम समझौतावादी होता है। गठबन्धन सरकार का कार्यक्रम बनाते प्रत्येक दल की बातों व कार्यक्रम का ध्यान रखा जाता है।

2. सर्वसम्मत नेता-गठबन्धन सरकार में सभी दल मिलकर अपने नेता का चुनाव करते हैं। नेता का चुनाव प्रायः सर्वसम्मत ढंग से किया जाता है।

3. सर्वसम्मत निर्णय-गठबन्धन सरकार में शामिल घटक दल किसी भी राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय समस्या का हल सर्वसम्मति से करते हैं।

4. मिल-जुल कर कार्य करना-गठबन्धन सरकार में शामिल सभी घटक दल मिल-जुलकर कार्य करते हैं।

प्रश्न 16.
गठबन्धन राजनीति से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
गठबन्धन सरकार का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
गठबन्धन की राजनीति का साधारण अर्थ है कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। चुनावों से पूर्व या चुनावों के बाद कई दल मिलकर अपना साझा कार्यक्रम तैयार करते हैं। उसके आधार पर वे मिलकर चुनाव लड़ते हैं अथवा अपनी सरकार बनाते हैं । गठबन्धन सरकार का निर्णय प्रायः उस स्थिति में किया जाता है, जब प्राय: किसी एक दल को चुनावों के बाद स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हुआ हो। तब दो या दो से अधिक दल मिलकर संयुक्त सरकार का निर्माण करते हैं। ऐसी सरकार में प्रायः सभी राजनीतिक दल अपने दलों के संकीर्ण व विशेष हितों को त्याग कर एक निश्चित कार्यक्रम पर अपनी सहमति प्रकट करते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1990 के दशक में सहभागी उमड़ के कोई दो पक्ष लिखें।
उत्तर:
(1) 1990 के दशक में लोगों की राजनीतिक सहभागिता में वृद्धि हुई। पिछले दशकों की अपेक्षा इस दशक में लोगों के राजनीतिक ज्ञान, रुचि एवं गतिविधियों में वृद्धि हुई है।

(2) 1990 के दशक में जनता दल, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, डी० एम० के०, अन्ना डी० एम० के०, तेलुगू देशम, नेशनल कान्फ्रेंस, शिरोमणि अकाली दल, इनैलो, शिवसेना, बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस तथा असम गण परिषद् जैसे दलों ने भी केन्द्र स्तर पर सत्ता में भागीदारी की।

प्रश्न 2.
जनता दल के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1980 के दशक के अन्त में अनेक नेता एक ऐसे नये राजनीतिक दल का निर्माण करने का प्रयास कर रहे थे, जो कांग्रेस का विकल्प बन सके। 26 जुलाई, 1988 में चार विपक्षी दलों जनता पार्टी, लोकदल, कांग्रेस (स) और जन मोर्चा के विलय से एक नये राजनीतिक दल की स्थापना की गई। इस नये राजनीतिक दल का नाम समाजवादी जनता दल रखा गया। 11 अक्तूबर, 1988 को बंगलौर में समाजवादी जनता दल का नाम बदल कर जनता दल कर दिया तथा श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को जनता दल का प्रधान मनोनीत किया।

प्रश्न 3.
भारतीय जनता पार्टी का जन्म किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी का जन्म 1980 में जनता पार्टी में दोहरी सदस्यता के मुद्दे को लेकर असहमति के कारण हुआ। 19 मार्च, 1980 को जनता पार्टी के केन्द्रीय संसदीय बोर्ड ने बहुमत से फैसला किया कि जनता पार्टी का कोई भी अधिकारी, विधायक और सांसद् राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की दैनिक गतिविधियों में भाग नहीं ले सकता।

परन्तु बोर्ड की बैठक में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्री लाल कृष्ण आडवाणी तथा श्री नाना जी देशमुख ने इस निर्णय का विरोध किया। 5 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व जनसंघ के सदस्यों ने नई दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन किया, और एक नई पार्टी बनाने का निश्चय किया। 6 अप्रैल, 1980 को भूतपूर्व विदेशमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में भारतीय जनता पार्टी के नाम से एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का गठन किया गया।

प्रश्न 4.
भारत में गठबन्धनवादी सरकारों के निर्माण के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
(1) 1989 के बाद राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस के आधिपत्य की पूर्ण रूप से समाप्ति हो गई। कांग्रेस के विरुद्ध अनेक राजनीतिक दल आ गए हैं, जिससे गठबन्धनवादी सरकारों का दौर शुरू हुआ।

(2) क्षेत्रीय दलों की बढ़ती संख्या के कारण किसी भी एक राष्ट्रीय दल को लोकसभा या विधानसभा में बहुमत मिलना कठिन हो गया है, इससे राजनीतिक दल आपस में गठबन्धन बनाने लगे हैं।

प्रश्न 5.
राजीव गांधी सरकार ने दल-बदल विरोधी अधिनियम कब पास किया ?
उत्तर:
राजीव गांधी सरकार ने दल-बदल विरोधी अधिनियम सन् 1985 में लागू किया।

प्रश्न 6.
संयुक्त मोर्चे के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
संयुक्त मोर्चे का निर्माण 11 मई, 1996 को किया गया। इस मोर्चे में गैर भाजपा एवं गैर कांग्रेसी दल शामिल हुए, जिनमें जनता दल, भारतीय साम्यवादी दल, भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी), तिवारी कांग्रेस, डी० एम० के०, तमिल मनीला कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस, मुस्लिम लीग तथा जनता पार्टी प्रमुख थे। 1996 में भाजपा गठबन्धन सरकार गिरने के बाद संयुक्त मोर्चे ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार का निर्माण किया था।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन-राजग (National Democratic Alliance-NDA) का निर्माण मई, 1999 में भारतीय जनता पार्टी एवं इसके सहयोगी दलों ने किया। इस गठबन्धन में अधिकतर वे दल ही सम्मिलित थे, जो बारहवीं लोकसभा में भाजपा गठबन्धन सरकार में सम्मिलित थे। राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन ने भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी को प्रधानमन्त्री के रूप में पेश किया।

इस गठबन्धन ने 1999 में हुए 13वीं लोकसभा के चुनावों में 297 सीटों पर विजय प्राप्त की, तथा श्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। परन्तु, 2004 के 14वीं एवं 2009 के 15वीं लोकसभा के चुनावों में इस गठबन्धन को हार का सामना करना पड़ा। जबकि 2014 एवं 2019 के चुनावों में इस गठबन्धन को ऐतिहासिक जीत प्राप्त हुई।

प्रश्न 8.
साम्प्रदायिकता का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
साम्प्रदायिकता से अभिप्राय है धर्म अथवा जाति के आधार पर एक-दूसरे के विरुद्ध भेदभाव की भावना रखना, एक धार्मिक समुदाय को दूसरे समुदायों और राष्ट्र के विरुद्ध उपयोग करना साम्प्रदायिकता है। ए० एच० मेरियम (A.H. Merriam) के अनुसार, “साम्प्रदायिकता अपने समुदाय के प्रति वफादारी की अभिवृत्ति की ओर संकेत करती है जिसका अर्थ भारत में हिन्दुत्व या इस्लाम के प्रति पूरी वफादारी रखना है।”

प्रश्न 9.
केन्द्र में इस समय किस राजनीतिक दल की सरकार है ?
उत्तर:
केन्द्र में इस समय भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार है, और इस गठबन्धन सरकार के प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी हैं।

प्रश्न 10.
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन पर नोट लिखें।
उत्तर:
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (United Progressive Alliance-UPA) का निर्माण मई, 2004 में कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों ने किया। इस गठबन्धन का अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को बनाया गया तथा कांग्रेस के नेताडॉ० मनमोहन सिंह को प्रधानमन्त्री बनाने का निर्णय लिया, जिन्होंने 22 मई, 2004 को अपनी सरकार बनाई। इस गठबन्धन ने अपना एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम भी जारी किया, जिसमें सभी सहयोगी दलों की मुख्य नीतियों को शामिल किया। मई, 2009 में भी डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में इस गठबन्धन की सरकार बनी। परंतु 2014 एवं 2019 के चुनावों में इस गठबन्धन को हार का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 11.
अप्रैल-मई 2019 में हुए 17वीं लोक सभा के चुनावों में किस गठबन्धन को सफलता प्राप्त हुई ?
उत्तर:
अप्रैल-मई 2019 में हुए 17वीं लोक सभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन को सफलता प्राप्त हुई। इस गठबन्धन को 355 सीटें प्राप्त हुईं तथा इसने श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया।

प्रश्न 12.
शाहबानो केस क्या था ?
उत्तर:
शाहबानो केस (1985) एक 62 वर्षीया तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो से सम्बन्धित था। उसने अपने भूतपूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने के लिए अदालत में याचिका दायर की। सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया। परन्तु कुछ मुस्लिम नेताओं ने इसे ‘पर्सनल ला’ में हस्तक्षेप माना। अतः सरकार ने 1986 में मुस्लिम महिला कानन (तलाक से सम्बन्धित अधिकारों) पास किया। इस कानन द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त कर दिया गया।

प्रश्न 13.
त्रिशंकु संसद् से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
त्रिशंकु संसद् का अर्थ यह है कि चुनावों के बाद किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत न मिलना। तब दो या दो से अधिक दल मिलकर सरकार का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 14.
1990 के पश्चात् भारतीय राजनीति में उभार के दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • राजनीतिक जागरूकता-1990 के पश्चात् भारतीय राजनीति में उभार का एक प्रमुख कारण लोगों में राजनीतिक जागरूकता का आना था।
  • क्षेत्रीय दलों का उदय-1990 के पश्चात् भारतीय राजनीति में उभार का एक अन्य प्रमुख कारण क्षेत्रीय दलों का उदय था।

प्रश्न 15.
‘गठबन्धन’ का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर:
गठबन्धन की राजनीति का साधारण अर्थ है कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। चुनावों से पूर्व या चुनावों के बाद कई दल मिलकर अपना साझा कार्यक्रम तैयार करते हैं। उसके आधार पर वे मिलकर चुनाव लड़ते हैं अथवा अपनी सरकार बनाते हैं। गठबन्धन सरकार का निर्णय प्रायः उस स्थिति में किया जाता है, जब प्रायः किसी एक दल को चुनावों के बाद स्पष्ट बहुमत प्राप्त न हुआ हो। तब दो या दो ये अधिक दल मिलकर संयुक्त सरकार का निर्माण करते हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 16.
‘गठबन्धन सरकार’ की कोई दो विशेषतायें लिखिए।
उत्तर:

  • गठबन्धन सरकार का राजनीतिक कार्यक्रम समझौतावादी होता है।
  • गठबन्धन सरकार में सभी दल मिलकर अपने नेता का चुनाव करते हैं।

प्रश्न 17.
भारत में साम्प्रदायिकता को रोकने के लिए कोई दो सुझाव दीजिये।
उत्तर:

  • भारत में साम्प्रदायिकता को रोकने के लिए शिक्षा का प्रसार करना।
  • साम्प्रदायिक दलों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. 1990 के दशक में लोकतान्त्रिक उमड़ का क्या कारण है ?
(A) अत्यधिक क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति
(B) राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का बढ़ता महत्त्व
(C) लोगों में राजनीतिक जागरूकता
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. जनता दल की स्थापना कब हुई ?
(A) 1989
(B) 1992
(C) 1993
(D) 1995
उत्तर:
(A) 1989

3. 1989 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में जनता दल ने किसके नेतृत्व में सरकार बनाई ?
(A) एस० आर० बोम्मई
(B) चौ० देवी लाल
(C) श्री वी० पी० सिंह
(D) श्री चन्द्रशेखर।
उत्तर:
(C) श्री वी० पी० सिंह।

4. भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कब हुई ?
(A) 1977
(B) 1980
(C) 1982
(D) 1984
उत्तर:
(B) 1980

5. संयुक्त मोर्चा की स्थापना किस वर्ष में हुई ?
(A) 1996
(B) 1998
(C) 1999
(D) 2000
उत्तर:
(A) 1996

6. 1996 में किस दल की सरकार केवल 13 दिन तक चली ?
(A) कांग्रेस
(B) भारतीय जनता पार्टी
(C) संयुक्त मोर्चा
(D) जनता दल।
उत्तर:
(B) भारतीय जनता पार्टी।

7. भारत में नई आर्थिक नीति कब अपनाई गई ?
(A) 1989 में
(B) 1985 में
(C) 1950 में
(D) 1991 में।
उत्तर:
(D) 1991 में।

8. बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं
(A) मायावती
(B) कांशीराम
(C) (A) और (B) दोनों
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) मायावती।

9. राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन (N.D.A.) का गठन कब हुआ?
(A) सन् 1977 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1998 में
(D) सन् 1999 में।
उत्तर:
(D) 1999 में।

10. भारत में कौन-सी दलीय प्रणाली पाई जाती है?
(A) एक दलीय प्रणाली
(B) द्विदलीय प्रणाली
(C) बहु दलीय प्रणाली
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(C) बहुदलीय प्रणाली।

11. संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (UPA) का गठन कब हुआ?
(A) सन् 1998 में
(B) सन् 1999 में
(C) सन् 2004 में
(D) सन् 2009 में।
उत्तर:
(C) सन् 2004 में।

12. 2019 के 17वें लोकसभा चुनावों में किस गठबन्धन की सरकार बनी ?
(A) संयुक्त मोर्चा की
(B) राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की
(C) संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की
(D) साम्यवादी दलों के गठबन्धन की।
उत्तर:
(B) राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की।

13.
2014 के 16वीं लोकसभा के चुनावों में किस गठबन्धन की सरकार बनी?
(A) संयुक्त मोर्चा की
(B) राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की
(C) संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की
(D) वाम पंथी गठबन्धन की।
उत्तर:
(B) राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की।

14. किस वित्त मन्त्री ने नई आर्थिक नीति की घोषणा की ?
(A) जसवंत सिंह
(B) डॉ. मनमोहन सिंह
(C) मुरली मनोहर जोशी
(D) डॉ० प्रणव मुखर्जी।
उत्तर:
(B) डॉ. मनमोहन सिंह।

15. बाबरी मस्जिद का विध्वंस कब हुआ?
(A) 6 दिसम्बर, 1992 को
(B) 11 दिसम्बर, 1992 को
(C) 13 दिसम्बर, 1992 को
(D) 25 नवम्बर, 1990 को।
उत्तर:
(A) 6 दिसम्बर, 1992 को।

16. गुजरात में साम्प्रदायिक दंगे कब हुए ?
(A) 1990
(B) 2000
(C) 1996
(D) 2002
उत्तर:
(D) 2002

17. गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का मुख्य कारण था
(A) आरक्षण विवाद
(B) गोधरा काण्ड
(C) 1984 के दिल्ली के दंगे
(D) मण्डल आयोग।
उत्तर:
(B) गोधरा काण्ड।

18. सन् 2004 के संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यू० पी० ए०) सरकार में अधिकतम मंत्री किस दल के थे?
(A) भारतीय जनता पार्टी
(B) कांग्रेस पार्टी
(C) कम्युनिस्ट पार्टी
(D) समाजवादी पार्टी।
उत्तर:
(B) कांग्रेस पार्टी।

19. सन् 2014 में लोकसभा का कौन-सा चुनाव हुआ था ?
(A) चौदहवां चुनाव
(B) पंद्रहवां चुनाव
(C) सोलहवां चुनाव
(D) सत्रहवां चुनाव।
उत्तर:
(C) सोलहवां चुनाव।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

20. केन्द्र में गठबन्धन सरकारों का दौर कब शुरू हुआ था ?
(A) 1989 में
(B) 2009 में
(C) 1996 में
(D) 2004 में।
उत्तर:
(A) 1989 में।

21. जनमोर्चा का गठन किया गया :
(A) 2 अक्टूबर, 1980
(B) 2 अक्टूबर, 1986
(C) 2 अक्टूबर, 1987
(D) 2 अक्टूबर, 1992
उत्तर:
(C) 2 अक्टूबर 1987

22. किसने जनमोर्चा का गठन किया था ?
(A) सोनिया गांधी
(B) नरसिम्हा राव
(C) लाल कृष्ण आडवाणी
(D) वी० पी० सिंह।
उत्तर:
(D) वी० पी० सिंह।

23. जनता दल का प्रथम अध्यक्ष किसे नियुक्त किया गया था ?
(A) वी० पी० सिंह
(B) लाल कृष्ण आडवाणी
(C) डॉ. मनमोहन सिंह
(D) अटल बिहारी वाजपेयी।
उत्तर:
(A) वी० पी० सिंह।

24. भारतीय जनता पार्टी ने राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार से समर्थन कब वापिस लिया था ?
(A) 23 अक्टूबर, 1990
(B) 23 अक्टूबर, 1991
(C) 23 अक्टूबर, 1992
(D) 23 अक्टूबर, 1993
उत्तर:
(A) 23 अक्टूबर, 1990

25. वी० पी० सिंह के पश्चात् देश का प्रधानमन्त्री कौन बना था ?
(A) राजीव गांधी
(B) श्रीमती सोनिया गांधी
(C) चन्द्रशेखर
(D) नरसिम्हा राव।
उत्तर:
(C) चन्द्रशेखर।

26. भारतीय जनता पार्टी का वर्तमान अध्यक्ष कौन है ?
(A) अटल बिहारी वाजपेयी
(B) जे० पी० नड्डा
(C) लाल कृष्ण आडवाणी
(D) सुषमा स्वराज।
उत्तर:
(B) जे० पी० नड्डा।

27. भारत में कितने मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं ?
(A) 5
(B) 6
(C) 7
(D) 8
उत्तर:
(D) 8

28. भारत में मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल हैं
(A) 40
(B) 42
(C) 43
(D) 53
उत्तर:
(D) 53

29. 2019 के 17वीं लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को कितनी सीटें मिली ?
(A) 209
(B) 52
(C) 226
(D) 216
उत्तर:
(B) 52

30. 2019 के 17वीं लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को कितनी सीटें मिली ?
(A) 303
(B) 86
(C) 181
(D) 216
उत्तर:
(A) 303

निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) भारत में ……………. के दशक से लोकतान्त्रिक उमड़ एवं गठबन्धनवादी राजनीति में वृद्धि हुई।
उत्तर:
1990

(2) श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या …………… में की गई।
उत्तर:
1984

(3) 1988 में ………….. का गठन हुआ।
उत्तर:
जनता दल

(4) राजग सरकार का गठन …………. में हुआ।
उत्तर:
1999

(5) संप्रग (UPA) सरकार का गठन ………….. में हुआ।
उत्तर:
2004

(6) 1989 में ………… प्रधानमन्त्री बने।
उत्तर:
वी० पी० सिंह

(7) बाबरी मस्जिद का विध्वंस 6 दिसम्बर, ……… को हुआ।
उत्तर:
1992

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
वर्तमान समय में कांग्रेस का चुनाव चिह्न क्या है ?
उत्तर:
वर्तमान समय में कांग्रेस का चुनाव चिह्न हाथ है ।

प्रश्न 2.
जनता दल का गठन कब किया गया ?
उत्तर:
जनता दल का गठन 1988 में किया गया।

प्रश्न 3.
‘मण्डल आयोग’ की सिफ़ारिशों को किस प्रधानमन्त्री द्वारा लागू किया गया ?
उत्तर:
श्री० वी० पी० सिंह द्वारा।

प्रश्न 4.
इस समय केन्द्र में किसकी सरकार कार्यरत है ?
उत्तर:
इस समय केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार कार्यरत है।

प्रश्न 5.
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सन् 1980 में हुई।

प्रश्न 6.
संयुक्त मोर्चा की स्थापना किस वर्ष हुई ?
उत्तर:
संयुक्त मोर्चा की स्थापना 1996 में हुई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 7.
1996 में किस दल की सरकार केवल 13 दिन तक चली ?
उत्तर:
1996 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार केवल 13 दिन तक चली।

प्रश्न 8.
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की स्थापना कब की गई ?
उत्तर:
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की स्थापना सन् 1999 में की गई।

प्रश्न 9.
2019 के 17वें लोकसभा चुनावों में किस गठबन्धन की सरकार बनी ?
उत्तर:
राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की।

प्रश्न 10.
वर्तमान में ‘बहुजन समाज पार्टी’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन है ?
उत्तर:
कुमारी मायावती।

प्रश्न 11.
वर्तमान में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (U.P.A.) का अध्यक्ष कौन है ?
उत्तर:
वर्तमान में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (U.P.A.) की अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी है।

प्रश्न 12.
‘बहुजन समाज पार्टी’ का चुनाव चिह्न क्या है ? .
उत्तर:
बहुजन समाज पार्टी का चुनाव चिह्न ‘हाथी’ है।

प्रश्न 13.
आजकल भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन हैं ?
उत्तर:
जे० पी० नड्डा।

प्रश्न 14.
संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (U.P.A.) का गठन कब हुआ था ?
उत्तर:
सन् 2004 में।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद से आप क्या समझते हैं ? क्षेत्रवाद के विकास के क्या कारण हैं ?
उत्तर:
क्षेत्रवाद का अर्थ (Meaning of Regionalism):
भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् राजनीति में जो नए प्रश्न उभरे हैं, उनमें क्षेत्रवाद (Regionalism) का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। क्षेत्रवाद से अभिप्राय किसी देश के उस छोटे-से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागृत है। प्रो० डी० सी० गुप्ता (D.C. Gupta) के अनुसार, “क्षेत्रवाद का अर्थ देश की अपेक्षा किसी विशेष क्षेत्र से प्यार है।” – फ्रॉसटर (Froster) के मतानुसार क्षेत्रवाद से अभिप्राय एक देश के उस छोटे से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक आदि से अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक है।”

प्रो० एस० आर० माहेश्वरी (S.R. Maheshwari) के अनुसार, “क्षेत्रवाद के किसी खास क्षेत्र के पारस्परिक समानता और एकरूपता के अलावा बाकी देश से अलग विभिन्नता की भावना का होना ज़रूरी है।” भारत की राजनीति को क्षेत्रवाद और क्षेत्रीय आन्दोलनों ने बहुत अधिक क्षेत्रीय आकांक्षाएँ प्रभावित किया है और यह भारत के लिए एक जटिल समस्या बन रही है और आज भी विद्यमान है।

आज यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि वह कौन है तो वह भारतीय कहने के स्थान पर बंगाली, बिहारी, पंजाबी, हरियाणवी आदि कहना पसन्द करेगा। यद्यपि संविधान के अन्तर्गत प्रत्येक नागरिक को भारत की ही नागरिकता दी गई है तथापि लोगों में क्षेत्रीयता व प्रान्तीयता की भावनाएं इतनी पाई जाती हैं कि वे अपने क्षेत्र या प्रान्त के लिए राष्ट्रीय हित को बलिदान करने के लिए तत्पर रहते हैं। 1950 से लेकर आज तक क्षेत्रवाद की समस्या भारत सरकार को घेरे हए है और विभिन्न क्षेत्रों में आन्दोलन चलते रहते हैं।

क्षेत्रवाद के विकास के कारण (Reasons for development of Regionalism) क्षेत्रवाद भावना की उत्पत्ति एक कारण से न होकर अनेक कारणों से होती है, जिनमें मुख्य निम्नलिखित हैं

1. भौगोलिक एवं सांस्कृतिक कारण:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जब राज्यों का पुनर्गठन किया गया तब राज्य की पुरानी सीमाओं को भुलाकर नहीं किया गया बल्कि उनको पुनर्गठन का आधार बनाया गया है। इसी कारण एक राज्य के रहने वाले लोगों में एकता की भावना नहीं आ पाई। प्रायः भाषा और संस्कृति क्षेत्रवाद की भावनाओं को उत्पन्न करने में बहुत सहयोग देते हैं।

2. ऐतिहासिक कारण:
क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में इतिहास का दोहरा सहयोग रहा है-सकारात्मक सकारात्मक योगदान के अन्तर्गत शिव सेना का उदाहरण दिया जा सकता है और नकारात्मक के अन्तर्गत द्रविड़ मुनेत्र कड़गम का कहना है कि प्राचीनकाल से ही उत्तरी राज्य दक्षिणी राज्यों पर शासन करते आए हैं।

3. भाषा:”
भारत में सदैव ही अनेक भाषाएं बोलने वालों ने कई बार अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आन्दोलन किए हैं। भारत सरकार ने भाषा के आधार पर राज्यों का गठन करके ऐसी समस्या उत्पन्न कर दी है जिसका अन्तिम समाधान निकालना बड़ा कठिन होता है।

4. जाति:
जाति ने भी क्षेत्रवाद की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही, वहां पर क्षेत्रवाद का उग्र रूप देखने को मिलता है। यही कारण है कि महाराष्ट्र और हरियाणा में क्षेत्रवाद का उग्र स्वरूप देखने को मिलता है।

5. धार्मिक कारण:
धर्म भी कई बार क्षेत्रवाद की भावनाओं को बढ़ाने में सहायता करता है। पंजाब में अकालियों की पंजाबी सूबे की मांग कुछ हद तक धर्म के प्रभाव का परिणाम थी।

6. आर्थिक कारण:
क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में आर्थिक कारण महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। भारत में जो थोड़ा बहुत आर्थिक विकास हुआ है उसमें बहुत असमानता रही है। कुछ प्रदेशों का अधिक विकास हुआ है और कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। इसका कारण यह रहा है कि जिन व्यक्तियों के हाथों में सत्ता रही है उन्होंने अपने क्षेत्रों के विकास की ओर ही अधिक ध्यान दिया। अत: पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसलिए इन क्षेत्रों के लोगों में क्षेत्रवाद की भावना उभरी और इन्होंने अलग राज्यों की मांग की।

7. राजनीतिक कारण:
क्षेत्रवाद की भावनाओं को भड़काने में राजनीतिज्ञों का भी हाथ रहा है। कई राजनीतिज्ञ यह सोचते हैं कि यदि उनके क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जाएगा तो इससे उनको राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति हो जाएगी अर्थात् उनके हाथ भी सत्ता लग जाएगा।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 2.
पंजाब समस्या पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पंजाब उत्तर भारत का एक महत्त्वपूर्ण राज्य है। इस राज्य की अधिकांश जनसंख्या सिक्ख समुदाय से सम्बन्धित है। 1966 में पंजाब राज्य का विभाजन करके हरियाणा नाम का एक नया राज्य बना दिया गया। पंजाब में अकाली दल महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय राजनीतिक दल है। अकाली दल ने जनसंघ के साथ मिलकर 1967 एवं 1977 में पंजाब में अपनी सरकार बनाई। अकाली दल एवं कांग्रेस में सदैव मतभेद रहे हैं। 1980 में जब अकाली चुनाव हार गए तो उन्होंने केन्द्र में कांग्रेस के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया। उस समय अकाली दल की मांग थी कि

  • चण्डीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाया जाए।
  • दूसरे राज्यों के पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब में मिलाया जाए।
  • पंजाब का औद्योगिक विकास किया जाए।
  • भाखड़ा नंगल योजना पंजाब के नियन्त्रणाधीन हो।
  • देश के सभी गुरुद्वारे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के प्रबन्ध में हों।

पंजाब में धीरे-धीरे अशांति बढ़ने लगी थी। अतः केन्द्र की श्रीमती इंदिरा गांधी की सरकार ने ‘आपरेशन ब्लू स्टार’ के अन्तर्गत पंजाब में कार्यवाही की। इसके विरोध में 31 अक्तूबर, 1984 को श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या कर दी गई। जिससे दिल्ली में सिक्ख विरोधी दंगे शुरू हो गए। एक अनुमान के अनुसार इन दंगों में लगभग 2000 सिख पुरुष, स्त्री एवं बच्चे मारे गए। इस तरह पंजाब समस्या एवं सिक्ख विरोधी दंगों के कारण देश की एकता एवं अखण्डता के लिए खतरा पैदा हो गया।

इसीलिए प्रधानमन्त्री श्री राजीव ने पंजाब में शान्ति बनाये रखने के लिए अकाली नेताओं से समझौता किया। जिसे पंजाब समझौते के नाम से भी जाना जाता है। पंजाब समझौता-जन, 1985 में पंजाब के राज्यपाल अर्जन सिंह ने अकाली नेताओं से पंजाब समस्या पर प्रारम्भिक बातचीत शुरू कर दी। 24 जुलाई, 1985 की शाम भारतीय इतिहास की एक विशिष्ट शाम थी क्योंकि इस दिन बड़े लम्बे समय से चली आ रही पंजाब समस्या को हल किया गया।

प्रधानमन्त्री राजीव गांधी और अकाली नेताओं लौंगोवाल, सुरजीत सिंह बरनाला तथा बलवन्त सिंह) में समझौता हुआ। पंजाब समझौते का सभी राजनीतिक दलों और पंजाब की आम जनता ने स्वागत किया। 26 जुलाई, 1985 को अकाली दल ने आनन्दपुर में प्रधानमन्त्री राजीव गांधी और सन्त हरचन्द सिंह लौंगोवाल के बीच हुए समझौते को अपनी स्वीकृति दे दी।

20 अगस्त, 1985 को संगरूर से 4 किलोमीटर दूर शरंपुर गांव के एक गुरद्वारे में राजनीतिक भाषण के बाद सन्त लौंगोवाल हो रही अरदास में माथा टेकने के लिए नीचे झुके ही थे कि धड़ाधड़ गोलियां चलीं। सन्त लौंगोवाल को तीन गोलियां लगीं और संगरूर अस्पताल में उनका देहान्त हो गया। सन्त लौंगोवाल की हत्या का गहरा आघात न केवल अकाली दल को लगा बल्कि समस्त भारत शोक में डूब गया।

25 अगस्त को सुरजीत सिंह बरनाला को अकाली दल का कार्यकारी अध्यक्ष चुना गया। – प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी और अकाली दल के अध्यक्ष श्री हरचन्द सिंह लौंगोवाल के बीच हुए समझौते का विवरण इस प्रकार है

1. मारे गए निरपराध व्यक्तियों के लिए मुआवज़ा:
एक सितम्बर, 1982 के बाद हुई किसी कार्यवाही या आन्दोलन में मारे गए लोगों को अनुगृह राशि के भुगतान के साथ सम्पत्ति की क्षति के लिए मुआवज़ा दिया जाएगा।

2. सेना में भर्ती:
देश के सभी नागरिकों को सेना में भर्ती का अधिकार होगा और चयन के लिए केवल योग्यता ही आधार रहेगा।

3. नवम्बर दंगों की जांच:
दिल्ली में नवम्बर में हुए दंगों की जांच कर रहे रंगनाथ मिश्र आयोग का कार्यक्षेत्र बढ़ाकर उसमें बोकारो और कानपुर में हुए उपद्रवों की जांच को भी शामिल किया जाएगा।

4. सेना से निकाले हुए व्यक्तियों का पुनर्वास:
सेना से निकाले हुए व्यक्तियों को पुनर्वास और उन्हें लाभकारी रोजगार दिलाने के प्रयास किए जाएंगे।

5. अखिल भारतीय गुरुद्वारा कानून:
भारत सरकार अखिल भारतीय गुरुद्वारा कानून बनाने पर सहमत हो गई। इसके लिए शिरोमणि अकाली दल और अन्य सम्बन्धियों के साथ सलाह-मश्वरा और संवैधानिक ज़रूरतें पूरी करने के बाद विधेयक लागू किया जाएगा।

6. लम्बित मकद्दमों का फैसला:
सशस्त्र सेना विशेषाधिकार कानन को पंजाब में लाग करने वाली अधिसचना वापस ली जाएगी। वर्तमान विशेष न्यायालय केवल विमान अपहरण तथा शासन के खिलाफ युद्ध के मामले सुनेगी। शेष मामले सामान्य न्यायालयों को सौंप दिए जाएंगे और यदि आवश्यक हुआ तो इसके बारे में कानून बनाया जाएगा।

7. सीमा विवाद:
चण्डीगढ़ का राजधानी परियोजना क्षेत्र और सुखना ताल पंजाब को दिए जाएंगे। केन्द्र शासित प्रदेश के अन्य पंजाबी क्षेत्र पंजाब को तथा हिन्दी भाषी क्षेत्र हरियाणा को दिए जाएंगे।

प्रश्न 3.
भारतीय सरकार किस प्रकार लोकतान्त्रिक बातचीत का रास्ता अपनाते हुए कश्मीर समस्या के समाधान की दिशा में प्रयत्नशील रही है ? व्याख्या कीजिए।
अथवा
कश्मीर समस्या पर एक विस्तृत नोट लिखिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ और पाकिस्तान की भी स्थापना हुई। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर 22 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता मांगी और कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की।

भारत में कश्मीर का विधिवत् विलय हो गया, परन्तु पाकिस्तान का आक्रमण जारी रहा और पाकिस्तान ने कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और अब भी उस क्षेत्र पर जिसे ‘आज़ाद कश्मीर’ कहा जाता है, पाकिस्तान का कब्जा है। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। भारत सरकार ने कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया और 1 जनवरी, 1949 को कश्मीर का युद्ध विराम हो गया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर की समस्या को हल करने का प्रयास किया पर यह समस्या अब भी है।

इसका कारण यह है कि भारत सरकार कश्मीर को भारत का अंग मानती है जबकि पाकिस्तान कश्मीर में जनमत संग्रह करवा कर यह निर्णय करना चाहता है कि कश्मीर भारत में मिलना चाहता है या पाकिस्तान के साथ। परन्तु पाकिस्तान की मांग गलत और अन्यायपूर्ण है, इसलिए इसे माना नहीं जा सकता। भारत ने सदैव ही कश्मीर समस्या को हल करने का प्रयास किया है, परन्तु पाकिस्तान के अड़ियल रवैये के कारण इसमें सफलता नहीं मिली।

शिमला समझौता:
1972 में हुए शिमला समझौते के अन्तर्गत कश्मीर समस्या को बातचीत द्वारा हल करने की बात कही गई है, भारत ने इस दिशा में लगातार प्रयास भी किया है, परन्तु पाकिस्तान की और से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिले।

1. लाहौर घोषणा:
जनवरी, 1999 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी बस से लाहौर गए तथा जम्मू-कश्मीर समस्या को हल करने की पहल की।

2. आगरा शिखर वार्ता:
जम्मू-कश्मीर सहित अन्य समस्याओं पर बातचीत के लिए भारत ने पाकिस्तान के शासक जनरल परवेज मुशरफ को भारत आने का निमन्त्रण दिया तथा आगरा में दोनों देशों में शिखर वार्ता हुई। परन्तु पाकिस्तान के कारण यह बातचीत सफल न हो सकी।

महत्त्वपूर्ण नोट:
भारत सरकार ने 5-6 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर ने सम्बन्धित धारा 370 को समाप्त कर दिया तथा स्पष्ट किया, कि अब केवल पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे वाले (पी० ओ० के०-P.O.K.) पर ही बातचीत होगी।

प्रश्न 4.
उत्तर-पूर्वी राज्यों की चुनौतियों एवं उसकी अनुक्रियाओं पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैण्ड, मिज़ोरम एवं त्रिपुरा) से मिलकर बनता है। इन सात राज्यों को सात बहनें भी कहकर बुला लिया जाता है। ये सातों राज्य भारत के अन्य राज्यों की तरह अधिक उन्नति नहीं कर पाए हैं। इसी कारण यहां पर आर्थिक तथा सामाजिक पिछड़ापन पाया जाता है जिसके कारण यहां पर विदेशी ताकतों के समर्थन पर कुछ अलगाववादी तत्त्व अशान्ति फैलाते रहते हैं।

इन राज्यों की अधिकतर जातियां पिछड़ी हुई हैं। संचार साधनों की कमी है, भाषा की विभिन्नता, यातायात के साधनों की कमी तथा अधिकांशतः बेरोज़गारी पाई जाती है, जिसके कारण यहां के स्थानीय निवास अलगाववादी गुटों के बहकावे में आ जाते हैं। इन सभी राज्यों में अपने अलग-अलग राजनीतिक दल हैं, जो सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं, इन क्षेत्रीय दलों का वर्णन इस प्रकार है

1. नागालैण्ड (Nagaland):
नागालैण्ड उत्तर-पूर्व का एक महत्त्वपूर्ण राज्य है। इसकी जनसंख्या लगभग 20 लाख है। इसकी राजधानी कोहिमा है। नागालैण्ड में अनेक जातियां एवं कबीले पाए जाते हैं। इसमें यूनाइटिड डेमोक्रेटिक फ्रण्ट, नागा नेशनल डेमोक्रेटिक पार्टी तथा नागा नेशनल सोशलिस्ट काऊंसिल जैसे राजनीतिक दल पाए जाते हैं। अन्तिम दल अलगाववादियों से सम्बन्धित है।

2. मणिपुर (Manipur):
मणिपुर की जनसंख्या लगभग 27 लाख है। इसकी राजधानी इम्फाल है तथा यहां की मुख्य भाषा मणिपुरी है तथा इसमें कुल 9 ज़िले हैं। मणिपुर 1972 में राज्य बना। इसमें मणिपुर हिल यूनियन, कूकी नेशनल एसेम्बली तथा मणिपुर जनमुक्ति सेना जैसे क्षेत्रीय दल पाए हैं। अन्तिम दल अलगाववादी दल है।

3. मेघालय (Meghalaya):
मेघालय भी उत्तर-पूर्वी क्षेत्र का एक महत्त्वपूर्ण राज्य है। इस राज्य की राजधानी शिलांग है। यहां की जनसंख्या लगभग 29 लाख है तथा यहां की मुख्य भाषा खासी, गारो तथा अंग्रेज़ी है। मेघालय के कुछ क्षेत्रीय दल आल पार्टी हिल लीडर्स कान्फ्रेंस तथा हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी हैं।

4. त्रिपुरा (Tripura):
त्रिपुरा राज्य की राजधानी अगरतला है। यहां की जनसंख्या लगभग 36 लाख है। यहां की मुख्य भाषाएं बंगला और काकबरक है। त्रिपुरा में चार ज़िले हैं। त्रिपुरा को 1972 में राज्य का दर्जा प्राप्त हुआ। यहां पर कई छोटे-छोटे क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं। इनमें त्रिपुरा उपजाति युवा समिति तथा त्रिपुरा जनमुक्ति संगठन सेवा प्रमुख हैं।

5. मिज़ोरम (Mizoram):
मिज़ोरम राज्य की राजधानी आइजोल है। इसकी जनसंख्या लगभग 10 लाख है तथा मिज़ो और अंग्रेज़ी यहां की मुख्य भाषाएं हैं। मिज़ोरम को 1987 में भारत का 23वां राज्य बनाया गया। मिज़ोरम के मुख्य क्षेत्रीय दल पीपुल्स कान्फ्रेंस तथा मिज़ो यूनियन पार्टी। मिज़ोरम में एक अलगाववादी संगठन मिजो नेशनल फ्रंट भी है, जो हिंसक कार्यवाहियों में संलग्न रहता है।

6. असम (Assam):
भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के राज्यों में सबसे बड़ा राज्य असम है। यहां की जनसंख्या लगभग 3 करोड़ है। यहां की मुख्य भाषा असमिया है तथा यहां की राजधानी दिसपुर है। असम में उल्फा नामक एक उग्रवादी एवं अलगाववादी संगठन पाया जाता है। असम का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल असम गण परिषद् है।

प्रश्न 5.
‘असम आन्दोलन सांस्कृतिक गौरव और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था।’ इस कथन का औचित्य निर्धारित कीजिए।
उत्तर:
भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैण्ड, मिज़ोरम एवं त्रिपुरा) से मिलकर बनता है। इन सात राज्यों को सात बहनें भी कहकर बुला लिया जाता है। ये सातों राज्य भारत के अन्य राज्यों की तरह अधिक उन्नति नहीं कर पाए हैं। इसी कारण यहां पर आर्थिक तथा सामाजिक पिछड़ापन पाया जाता है जिसके कारण यहां पर विदेशी ताकतों के समर्थन पर कुछ अलगाववादी तत्त्व अशान्ति फैलाते रहते हैं। इन राज्यों की अधिकतर जातियां पिछड़ती हुई हैं।

संचार साधनों की कमी है, भाषा की विभिन्नता, यातायात के साधनों की कमी तथा अधिकांशतः बेरोज़गारी पाई जाती है, जिसके कारण यहां के स्थानीय निवासी अलगाववादी गुटों के बहकावे में आ जाते हैं। इन सभी राज्यों में अपने अलग-अलग राजनीतिक दल हैं, जो सत्ता प्राप्ति के लिए संघर्ष करते हैं। असम पूर्वोत्तर भारत का एक महत्त्वपूर्ण राज्य है। असम राज्य में शामिल अलग-अलग धर्मों एवं भाषायी समुदायों ने सांस्कृतिक अभियान और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण असम से अलग होने की मांग की।

इसे ही असम आन्दोलन कहा जाता है। आज़ादी के समय में मणिपुर एवं त्रिपुरा को छोड़कर शेष क्षेत्र असम कहलाता था। गैर-असमी लोगों को यह लगा कि असम सरकार हम पर असमिया भाषा थोपने का प्रयास कर रही है, तो इन लोगों ने असम सरकार के इस प्रयास का विरोध किया। इसके साथ-साथ गैर-असमी लोग यह सोचने को मजबूर हो गये कि आर्थिक तौर पर पिछड़ने का एक मुख्य कारण उनका गैर-असमी होना है।

अत: इन गैर-असमी लोगों ने असम से अलग होने की मांग उठाई। जिसके परिणामस्वरूप केन्द्र सरकार ने धीरे-धीरे असम को बांटकर मेघालय, मिज़ोरम और अरुणाचल प्रदेश नामक नये राज्य बनाये।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रवाद क्या है ?
उत्तर:
क्षेत्रवाद से अभिप्राय किसी देश के छोटे-से क्षेत्र से है जो आर्थिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागृत है। भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् राजनीति में जो नए प्रश्न उभरे हैं, उनमें क्षेत्रवाद का प्रश्न एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। भारत की राजनीति को क्षेत्रवाद ने बहुत प्रभावित किया है। यह भारत के लिए एक जटिल समस्या बन रही है और आज भी विद्यमान है। आज यदि किसी व्यक्ति से पूछा जाए कि वह कौन है तो वह भारतीय कहने के स्थान पर बंगाली, बिहारी, पंजाबी, हरियाणवी आदि कहना पसन्द करेगा।

प्रश्न 2.
क्षेत्रीयवाद की प्रकृति के कोई चार दुष्परिणाम लिखें।
अथवा
भारतीय राजनीति पर क्षेत्रवाद’ के कोई चार प्रभाव लिखो।
अथवा
क्षेत्रीय राजनीति के कोई चार दुष्परिणाम बताइये।
उत्तर:
(1) क्षेत्रवाद के आधार पर राज्य केन्द्रीय सरकार से सौदेबाज़ी करते हैं। यह सौदेबाज़ी न केवल आर्थिक विकास के लिए होती है, बल्कि कई बार कई महत्त्वपूर्ण समस्याओं के समाधान के लिए भी होती है।

(2) क्षेत्रवाद ने कुछ हद तक भारतीय राजनीति में हिंसक विधियों को उभारा है। कुछ राजनीतिक दल इसे अपनी लोकप्रियता का साधन बना लेते हैं। ..

(3) चुनावों के समय भी क्षेत्रवाद का सहारा लिया जाता है। क्षेत्रीयता के आधार पर राजनीतिक दल उम्मीदवारों का चुनाव करते हैं और क्षेत्रीय भावनाओं को भड़का कर वोट प्राप्त करने की चेष्टा की जाती है।

(4) मन्त्रिमण्डल का निर्माण करते समय क्षेत्रवाद की प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से देखने को मिलती है। मन्त्रिमण्डल में प्रायः सभी मुख्य क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को लिया जाता है।

प्रश्न 3.
भारत में क्षेत्रवाद की उत्पत्ति के कोई चार कारण लिखिए।
अथवा
भारत में क्षेत्रवाद’ के कोई चार कारण लिखो।
अथवा
भारतीय क्षेत्रीयवाद के कोई चार कारण बताइये।
उत्तर:
(1) क्षेत्रवाद की उत्पत्ति का महत्त्वपूर्ण कारण भाषा का विवाद है। क्षेत्रीयवाद की समस्या स्पष्ट रूप से भाषा से सम्बन्धित है। भाषा के आधार पर अलग राज्य के निर्माण के लिए आन्दोलन होते रहते हैं।

(2) जाति ने क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है, वहीं पर क्षेत्रीयवाद का उग्र रूप देखने को मिलता है।

(3) क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में आर्थिक कारणों ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। अविकसित क्षेत्रों ने अलग राज्य की स्थापना के लिए आन्दोलन किए। पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरी कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते।

(4) धर्म भी कई क्षेत्रवाद की भावनाओं को बढ़ाने में सहायता करता है।

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प्रश्न 4.
क्षेत्रीय असन्तुलन क्या है ?
उत्तर:
भारत में संघीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई है। भारत में 28 राज्य और 8 संघीय क्षेत्र हैं। क्षेत्रीय असन्तुलन का अर्थ यह है कि भारत के विभिन्न राज्यों तथा क्षेत्रों का विकास एक जैसा नहीं है। कुछ राज्यों का आर्थिक विकास बहुत अधिक हुआ है और वहां के लोगों का जीवन स्तर भी ऊंचा है जबकि कुछ राज्यों का विकास बहुत कम हुआ है तथा वहां के लोगों का जीवन स्तर भी बहुत निम्न स्तर का है।

भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के विकास स्तर और लोगों के जीवन स्तर में पाए जाने वाले अन्तर को क्षेत्रीय असन्तुलन का नाम दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, केरल आदि राज्य अत्यधिक विकसित हैं। जबकि बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश आदि अति पिछड़े हुए क्षेत्र हैं।

प्रश्न 5.
क्षेत्रीय असन्तुलन भारतीय लोकतन्त्र पर क्या प्रभाव डाल रहा है ?
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन भारतीय लोकतन्त्र पर मुख्य रूप से निम्नलिखित प्रभाव डाल रहा है

(1) पिछड़े क्षेत्रों के लोगों में असन्तुष्टता की भावना बड़ी तेजी से बढ़ रही है और ऐसे क्षेत्रों के लोगों का यह सोचना है कि उनके पिछड़ेपन के लिए सरकार जिम्मेवार है काफ़ी हद तक उचित प्रतीत होता है।

(2) क्षेत्रीय असन्तुलन से लोगों में क्षेत्रवाद की भावना उत्पन्न हो रही है। क्षेत्रवाद ने पृथक्कतावाद की भावना को जन्म दिया है।

(3) क्षेत्रीय असन्तुलन ने अनेक क्षेत्रीय दलों को जन्म दिया है और ये दल राष्ट्र की अपेक्षा अपने क्षेत्र के हित को अधिक महत्त्व देते हैं।

(4) क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण कई क्षेत्रों में आतंकवाद का उदय हुआ है। आतंकवाद ने हमारे लोकतन्त्र को बुरी तरह से प्रभावित किया है।

प्रश्न 6.
भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन के कोई चार कारण बताओ।
उत्तर:
(1) भौगोलिक विषमताओं ने क्षेत्रीय असन्तुलन पैदा किया है। परिस्थितियों के कारण भारत में एक ओर राजस्थान जैसा मरुस्थल है जो कम उपजाऊ है, तो दूसरी ओर पंजाब जैसे उपजाऊ क्षेत्र हैं।

(2) भाषा की विभिन्नता ने क्षेत्रीय असन्तुलन पैदा किया है।

(3) ब्रिटिश सरकार ने कुछ क्षेत्रों का विकास किया और कुछ का नहीं किया, जिससे क्षेत्रीय असन्तुलन पैदा हुआ। अंग्रेज़ों ने कोलकाता, मुम्बई और चेन्नई का अधिक विकास किया। इन क्षेत्रों के लोगों का जीवन स्तर अन्य क्षेत्रों से कहीं अधिक ऊंचा है।

(4) क्षेत्रीय असन्तुलन का एक महत्त्वपूर्ण कारण नेताओं की भूमिका है। जिस क्षेत्र का वह नेता है, अपने क्षेत्र के विकास की ओर अधिक ध्यान देता है जिससे अन्य क्षेत्र अविकसित रह जाते हैं।

प्रश्न 7.
क्षेत्रवाद को समाप्त करने के कोई चार सुझाव दीजिए।
अथवा
भारत में क्षेत्रीयवाद की बढ़ती प्रवृत्ति को समाप्त करने के कोई चार सुझाव दीजिए।
अथवा
भारत में क्षेत्रीयवाद को समाप्त करने के लिए कोई चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:
(1) पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष प्रयास किए जाएं। पिछड़े क्षेत्रों में विशेषकर बिजली, यातायात व संचार के साधनों का विकास किया जाए।

(2) क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वाले दलों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

(3) जो प्रशासनिक अधिकारी आदिवासी क्षेत्रों में नियुक्त किए जाएं उन्हें विशेष प्रशिक्षण दिया जाए और उन्हीं को नियुक्त किया जाए जो इन क्षेत्रों के बारे में थोड़ा बहुत ज्ञान भी रखते हों।

(4) केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल में सभी क्षेत्रों को उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए।

प्रश्न 8.
‘क्षेत्रीय असन्तुलन भारत में क्षेत्रवाद के प्रमुख कारण हैं।’ व्याख्या करो।
उत्तर:
क्षेत्रीय असन्तुलन से अभिप्राय विभिन्न क्षेत्रों के बीच प्रति व्यक्ति आय, साक्षरता दरों, स्वास्थ्य और चिकित्सा सेवाओं की उपलब्धता, औद्योगीकरण का स्तर आदि के आधार पर अन्तर पाया जाना है। भारत में विभिन्न राज्यों के बीच व्यापक पैमाने पर असन्तुलन पाया जाता है। क्षेत्रीय भिन्नताओं एवं असन्तुलन के कारण क्षेत्रीय भेदभाव को बढावा मिलता है।

भारत में क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण क्षेत्रवादी भावनाओं को बल मिला है। इसके कारण कई क्षेत्रों ने पृथक राज्य की मांग की है। बिहार और पश्चिमी बंगाल में झारखण्ड, उत्तर प्रदेश में उत्तराँचल (उत्तराखंड) और मध्य प्रदेश में छत्तीसगढ़ राज्यों की मांग क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण ही की गई थी। क्षेत्रीय असन्तुलन ने क्षेत्रवादी हिंसा, आन्दोलनों व तोड़-फोड़ को बढ़ावा दिया है। अनेक क्षेत्रीय दल क्षेत्रीय असन्तुलन के कारण ही बने हैं जो अब क्षेत्रवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। क्षेत्रीय असन्तुलन ने अन्तर्राज्यीय विवादों को बढ़ावा दिया है जिससे क्षेत्रवादी भावनाएं और भी उग्र हो गई हैं।

प्रश्न 9.
क्षेत्रीय दल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
चुनाव आयोग उस राजनीतिक दल को राज्य अथवा क्षेत्रीय स्तर के दल के रूप में मान्यता देता है जिसने लोकसभा अथवा विधानसभा के चुनावों में कुल पड़े वैध मतों का 6 प्रतिशत मत प्राप्त किया हो और विधानसभा में कम-से-कम 2 सीटें जीती हों, अथवा राज्य विधानसभा में कुल सीटों की कम-से-कम तीन प्रतिशत सीटें या कम से-कम तीन सीटें (इनमें से जो भी अधिक हो) प्राप्त की हों। जिस राजनीतिक दल ने लोकसभा के किसी आम चुनाव में या लोकसभा की प्रत्येक 25 सीटों पर एक जीत या इससे किसी अन्य आबंटित हिस्से में इसी अनुपात में जीत हासिल की हो।

इसके विकल्प के तौर पर सम्बन्धित राज्य में पार्टी द्वारा खड़े किये गए उम्मीदवारों को सभी संसदीय क्षेत्रों में मतदान का कम से कम 6 प्रतिशत मत प्राप्त होना चाहिए। इसके अलावा इसी आम चुनाव में पार्टी को राज्य में कम-से-कम एक लोकसभा सीट पर जीत भी हासिल होनी चाहिए। राज्य स्तरीय दल को क्षेत्रीय दल भी कहा जाता है और क्षेत्रीय दल का अस्तित्व राज्य के बाहर भी हो सकता है। चुनाव आयोग ने 53 राज्य स्तरीय दलों को मान्यता प्रदान की हई है।

प्रश्न 10.
क्षेत्रीय पार्टियों की उत्पत्ति के भारत में कारण बताएं।
उत्तर:
भारत में राष्ट्रीय दलों के साथ अनेक क्षेत्रीय दल भी पाए जाते हैं। चुनाव आयोग ने 53 दलों को राज्य स्तर के दलों के रूप में मान्यता दी हुई है। क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1. भौगोलिक कारण:
भारत एक विशाल देश है। इसकी भौगोलिक बनावट में विभिन्नताएं पाई जाती हैं। मिज़ो हिल्स पीपुल्स युनियन तथा सिक्किम संग्राम परिषद जैसे दलों के लिए भौगोलिक कारण ही उत्तरदायी हैं।

2. जातिवाद:
भारत में विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं। भारत में अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का निर्माण जाति के आधार पर हआ है। उदाहरण के लिए तमिलनाड़ में डी० एम० के० तथा अन्ना० डी० एम० के० ब्राह्मण विरोधी या गैर-ब्राह्मण के दल हैं।

3. धर्म:
धर्म भी क्षेत्रीय दलों के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण कारण है।

4. आर्थिक पिछड़ापन:
भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली आर्थिक असमानताओं ने असंतुष्ट लोगों को क्षेत्रीय दलों में संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया है।

प्रश्न 11.
शिरोमणि अकाली दल की कोई चार नीतियां लिखिए।
उत्तर:

  • शिरोमणि अकाली दल ने आनन्दपुर साहिब के प्रस्ताव को राष्ट्रीय एकता को बढ़ाने वाला बताया है और इस प्रस्ताव में वर्णित सच्चे संघवाद को लागू करने की बात की है।
  • चण्डीगढ़ और हरियाणा की सीमा के साथ लगते पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब में मिलाने की मांग की गई है।
  • शिरोमणि अकाली दल ने सतलुज-यमुना लिंक नहर परियोजना को रद्द करने की बात कही है।
  • पंजाब में हर हालत में शान्ति बनाई रखी जाएगी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 12.
अखिल भारतीय अन्नाद्रमुक दल की कोई चार नीतियां लिखिए।
उत्तर:

  • अन्ना डी० एम० के० श्री सी० एन० अन्नादुराय के सिद्धान्तों में पूरा विश्वास रखती है।
  • पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा-पत्र में तमिलनाडु में ईमानदार और कुशल प्रशासन स्थापित करने का वायदा किया है।
  • यह दल लोकतन्त्र में विश्वास रखता है। इस दल का विश्वास है कि सरकार की शक्तियों का स्रोत जनता है और सरकार को अपनी नीतियों का निर्माण जनमत को ध्यान में रखकर करना चाहिए।
  • यह दल समाजवाद का समर्थन करता है। इस पार्टी का मुख्य उद्देश्य लोकतन्त्रीय समाजवाद की स्थापना करना है।

प्रश्न 13.
नेशनल कान्फ्रेंस पार्टी के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
नेशनल कान्फ्रैंस जम्मू-कश्मीर का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है। इस दल के वर्तमान अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला हैं। नेशनल कान्फ्रैंस राज्य स्वायत्तता के पक्ष में है। नेशनल कान्फ्रैंस ने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को स्थायी माना है, जिसे बदला नहीं जा सकता। परन्तु नेशनल कान्फ्रैंस अनुच्छेद 370 को रखने के पक्ष में है और इसमें किसी प्रकार का संशोधन करने के पक्ष में नहीं है।

पार्टी जम्मू-कश्मीर की एकता व अखण्डता को बनाए रखने के पक्ष में है। पार्टी धर्म-निरपेक्षता में विश्वास रखती है और राज्य में से कट्टरपंथियों को समाप्त करने के पक्ष में है। पार्टी राज्य में सभी समुदायों में साम्प्रदायिक सद्भावना बनाए रखने के लिए वचनबद्ध है। पार्टी देश की सुरक्षा, एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए सभी तरह के प्रयास करने के लिए तैयार है।

पार्टी केन्द्र से टकराव की नीति अनुसरण करने के पक्ष में नहीं है और राज्य के विकास के लिए केन्द्र में हर तरह की सहायता चाहती है। आजकल जम्मू-कश्मीर की सरकार पृथक्कतावादी तत्त्वों को कुचलने में लगी हुई है।

प्रश्न 14.
1984 के सिक्ख विरोधी दंगों का संक्षिप्त रूप में विवेचन करें।
अथवा
इन्दिरा गांधी की हत्या तथा सिक्ख विरोधी दंगों पर संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
सन् 1984 के सिक्ख विरोधी दंगों का प्रमुख कारण प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या करना था। इस हत्या के विरोध में दिल्ली एवं इसके आस-पास के क्षेत्रों में सिक्ख विरोधी दंगे आरम्भ हो गए। सिक्खों पर जानलेवा हमले किये गये, कई सिक्खों के बाल काट दिये गए तथा कई सिक्खों पर तेजाब फेंके गए। सिक्ख विरोधी हिंसा का यह दौर कई दिनों तक जारी रहा। इस हिंसा में लगभग 2000 सिक्ख मारे गए।

प्रश्न 15.
राजीव लोंगोवाल समझौते की मुख्य बातों का वर्णन करें।
अथवा
‘पंजाब समझौते’ पर एक नोट लिखिए।
अथवा
1985 के पंजाब-समझौते के ‘मुख्य प्रावधान’ क्या थे ?
उत्तर:
राजीव-लोंगोवाल समझौता 24 जुलाई, 1985 को हुआ था, जिसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं

1. मारे गए निरपराध व्यक्तियों के लिए मुआवज़ा:
एक सितम्बर, 1982 के बाद हुई किसी कार्यवाही का आन्दोलन में मारे गए लोगों को अनुग्रह राशि के भुगतान के साथ सम्पत्ति की क्षति के लिए मुआवज़ा दिया जायेगा।

2. सेना में भर्ती:
देश के सभी नागरिकों को सेना में भर्ती का अधिकार होगा और चयन के लिए केवल योग्यता ही आधार रहेगा।

3. नवम्बर दंगों की जांच:
दिल्ली में नवम्बर में हुए दंगों की जांच कर रहे रंगनाथ मिश्र आयोग का कार्यक्षेत्र बढाकर उसमें बोकारो और कानपुर में हए उपद्रवों की जांच को भी शामिल किया जायेगा।

4. सेना से निकाले हए व्यक्तियों का पनर्वास:
सेना से निकाले हए व्यक्तियों को पुनर्वास और उन्हें लाभकारी रोज़गार दिलाने के प्रयास किये जायेंगे।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्षेत्रीयवाद से क्या अभिप्राय है?
अथवा
क्षेत्रीयवाद के अर्थ को स्पष्ट करें।
उत्तर:
क्षेत्रवाद से अभिप्राय किसी देश के उस छोटे से क्षेत्र से है जो औद्योगिक, सामाजिक आदि कारणों से अपने पृथक् अस्तित्व के लिए जागृत है। क्षेत्रवाद केन्द्रीयकरण के विरुद्ध क्षेत्रीय इकाइयों को अधिक शक्ति व स्वायत्तता प्रदान करने के पक्ष में है।

प्रश्न 2.
‘क्षेत्रवाद’ के उदय के कोई दो कारण लिखें।
अथवा
क्षेत्रीयवाद के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
1. क्षेत्रवाद का एक महत्त्वपूर्ण कारण भाषावाद है। भारत में सदैव ही अनेक भाषाएं बोलने वालों ने कई बार अलग राज्य के निर्माण के लिए व्यापक आन्दोलन किए हैं।

2. जातिवाद-जातिवाद ने भी क्षेत्रीयवाद की उत्पत्ति में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जिन क्षेत्रों में किसी एक जाति की प्रधानता रही है, वहां पर क्षेत्रवाद का उग्र रूप देखने को मिलता है।

प्रश्न 3.
क्षेत्रीयवाद को समाप्त करने के कोई दो सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • पिछड़े हुए क्षेत्रों के विकास के लिए विशेष प्रयास किये जाएं।
  • क्षेत्रीयवाद को बढ़ावा देने वाले दलों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए।

प्रश्न 4.
अलगाववाद के अर्थ की व्याख्या करें।
उत्तर:
अलगाववाद से अभिप्राय एक राज्य से कुछ क्षेत्र को अलग करके स्वतन्त्र राज्य की स्थापना की मांग है। अर्थात् सम्पूर्ण इकाई से अलग अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाए रखने की मांग अलगाववाद है। अलगाववाद का उदय तब होता है जब क्षेत्रवाद की भावना उग्र रूप धारण कर लेती है। उदाहरण के लिए भारत में मिज़ो आन्दोलन, नागालैण्ड आन्दोलन इत्यादि आन्दोलन भारतीय संघ से अलग होने के लिए चलाए गए। यह पृथक्कतावाद के उदाहरण हैं।

प्रश्न 5.
भारत में अलगाववाद आन्दोलन के दो उदाहरण लिखो।
उत्तर:
भारत में कई बार क्षेत्रीय आन्दोलन भारत से अलग होने के लिए किए जाते रहे हैं, जिनमें कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं

  • 1960 में डी०एम०के० तथा अन्य तमिल दलों ने तमिलनाडु को भारत से अलग करवाने का आन्दोलन किया।
  • असम के मिज़ो हिल के लिए जिले के लोगों ने भारत से अलग होने की मांग की और इस मांग को पूरा करवाने के लिए उन्होंने मिज़ो नेशनल फ्रंट की स्थापना की।

प्रश्न 6.
अलगाववाद के दो कारण लिखें।
उत्तर:
1. राजनीतिक कारण:
अलगाववाद की भावनाओं को भड़काने में राजनीतिज्ञों का भी हाथ रहा है। कई राजनीतिज्ञ यह सोचते हैं कि यदि उनके क्षेत्र को अलग राज्य बना दिया जाएगा तो इससे उनकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति हो जाएगी।

2. आर्थिक पिछड़ापन:
अलगाववाद की उत्पत्ति में आर्थिक पिछड़ापन महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। कुछ प्रदेशों का भारत में अधिक विकास हुआ है और कुछ क्षेत्रों का विकास बहुत कम हुआ है। अतः पिछड़े क्षेत्रों में यह भावना उभरती है कि यदि सत्ता उनके पास होती तो उनके क्षेत्र पिछड़े न रह जाते। इसलिए इन क्षेत्रों में अलग राज्य की मांग को लेकर अलगाववाद उत्पन्न होता है।

प्रश्न 7.
भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के विकास के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
क्षेत्रीय दलों की उत्पत्ति के मुख्य कारण अग्रलिखित हैं

1. भौगोलिक कारण-भारत एक विशाल देश है। इसकी भौगोलिक बनावट में विभिन्नताएं पाई जाती हैं। मिज़ो हिल्स पीपुल्स यूनियन तथा सिक्किम संग्राम परिषद् जैसे दलों के लिए भौगोलिक कारण ही उत्तरदायी हैं।

2. जातिवाद-भारत में विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं। भारत में अनेक क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का निर्माण जाति के आधार पर हुआ है। उदाहरण के लिए तमिलनाडु में डी० एम० के० तथा अन्ना० डी० एम० के० ब्राह्मण विरोधी या गैर-ब्राह्मण के दल हैं।

3. धर्म-धर्म भी क्षेत्रीय दलों के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण कारण है।

4. आर्थिक पिछड़ापन-भारत के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में पाई जाने वाली आर्थिक असमानताओं ने असंतुष्ट लोगों को क्षेत्रीय दलों में संगठित होने के लिए प्रोत्साहित किया है।

प्रश्न 8.
भारत में दलगत व्यवस्था की कोई दो चनौतियां लिखिए।
उत्तर:

      • भारत में दलों के अन्दर संगठनात्मक चुनाव समय पर नहीं होते।
  • भारत में दलगत अनुशासनहीनता पाई जाती है।

प्रश्न 9.
प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की हत्या कब और किनके द्वारा की गई ?
उत्तर:
प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी की हत्या 31 अक्तूबर, 1984 को उनके अंगरक्षकों द्वारा ही की गई।

प्रश्न 10.
भारत में उभरती क्षेत्रीय आकांक्षाओं से हमें क्या सीख मिलती है ?
उत्तर:

  • क्षेत्रीय आकांक्षाएं लोकतान्त्रिक राजनीति का अभिन्न अंग है।
  • क्षेत्रीय आकांक्षाओं का हल लोकतान्त्रिक संवाद से निकालना चाहिए।

प्रश्न 11.
धारा 370 किससे सम्बन्धित थी ?
उत्तर:
धारा 370 जम्मू-कश्मीर से सम्बन्धित थी। इस धारा के अन्तर्गत जम्मू-कश्मीर को अन्य राज्यों के मुकाबले विशेष दर्जा प्रदान किया गया था। जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान था तथा अपना झण्डा था। भारतीय संविधान के सभी प्रावधान इस पर लागू नहीं होते। परन्तु 5-6 अगस्त, 2019 को धारा 370 को समाप्त कर दिया।

प्रश्न 12.
किन्हीं दो क्षेत्रीय दलों के नाम एवं उनके राज्य लिखिए।
अथवा
किन्हीं दो क्षेत्रीय दलों के नाम तथा उनसे सम्बन्धित राज्यों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • नेशनल कान्फ्रेंस-यह दल जम्मू-कश्मीर राज्य में सक्रिय है।
  • डी० एम० के०-यह दल तमिलनाडु में सक्रिय है।

प्रश्न 13.
आस (AASU) का पूरा नाम लिखें।
उत्तर:
आसू (AASU) का पूरा नाम ऑल असम स्टूडेंटस यूनियन (All Asam Student Union) है।

प्रश्न 14.
1980 में अकाली दल की क्या मांगें थीं ?
उत्तर:

  • चण्डीगढ़ को पंजाब की राजधानी बनाया जाए।
  • दूसरे राज्यों के पंजाबी भाषी क्षेत्रों को पंजाब में मिलाया जाए।
  • पंजाब का औद्योगिक विकास किया जाए।
  • भाखड़ा-नंगल योजना पंजाब के नियन्त्रणाधीन हो।
  • देश के सभी गुरुद्वारे शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी के प्रबन्ध में हों।

प्रश्न 15.
राजीव-लौंगोवाल समझौता कब हुआ ? इसका मुख्य उद्देश्य क्या था ?
अथवा
पंजाब समझौता कब हुआ? इसका क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
राजीव-लौंगोवाल समझौता 24 जुलाई, 1985 को हुआ। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य पंजाब में शान्ति स्थापित करना था।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 16.
‘नक्सलवादी आन्दोलन’ क्या है ?
उत्तर:
सन् 1964 में साम्यवादी दल में फूट पड़ गई। दोनों दलों के संसदीय राजनीति में व्यस्त होने के कारण इन दलों के सक्रिय व संघर्षशील कार्यकर्ता दलों से अलग होकर जन कार्य करने लगे। सन् 1967 में बंगाल में साम्यवादी दल की सरकार बनी। इसी समय दार्जिलिंग में नक्सलवादी नामक स्थान पर किसानों ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि पश्चिमी बंगाल की सरकार ने इसे दबा दिया। परंतु इस आंदोलन की प्रतिक्रिया पंजाब, उत्तर प्रदेश और कश्मीर में भी हुई। इससे नक्सलवादी आन्दोलन का विरोध किया गया जिसके परिणामस्वरूप मई, 1967 में भारी हिंसक घटनाएं हुईं। यह आन्दोलन तेज़ी से राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया।

प्रश्न 17.
श्रीमती इन्दिरा गांधी की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी की मृत्यु 31 अक्तूबर, 1984 को हुई।

प्रश्न 18.
किस स्थान पर हिन्दी को राजभाषा बनाने के खिलाफ आन्दोलन चला?
उत्तर:
तमिलनाडु में हिन्दी को राजभाषा बनाने के खिलाफ आन्दोलन चला।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. क्षेत्रवाद के उदय के मुख्य कारण हैं
(A) भौगोलिक एवं सांस्कृतिक कारण
(B) ऐतिहासिक कारण
(C) भाषावाद
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. निम्न में से कौन-सा क्षेत्रीय दल है ?
(A) डी० एम० के०
(B) अकाली दल
(C) तेलुगू देशम
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. डी० एम० के० पार्टी की स्थापना कब हुई ?
(A) 1956
(B) 1949
(C) 1955
(D) 1947
उत्तर:
(B) 1949

4. अन्ना डी० एम० के० पार्टी की स्थापना हुई
(A) 1972
(B) 1975
(C) 1967
(D) 1952
उत्तर:
(A) 1972

5. तेलगू देशम पार्टी की स्थापना कब हुई ?
(A) 1956
(B) 1977
(C) 1982
(D) 1961
उत्तर:
(C) 1982

6. शिरोमणि अकाली दल निम्नलिखित में से किस राज्य का प्रमुख क्षेत्रीय दल है ?
(A) जम्मू-कश्मीर
(B) पंजाब
(C) दिल्ली
(D) हरियाणा
उत्तर:
(B) पंजाब।

7. मास्टर तारा सिंह एवं सन्त फतेह सिंह इत्यादि ने किस वर्ष ‘पंजाबी सूबा’ की मांग के लिए आन्दोलन शुरू किया ?
(A) 1960
(B) 1965
(C) 1971
(D) 1963
उत्तर:
(A) 1960

8. शिरोमणि अकाली दल तथा जनसंघ ने किस वर्ष पंजाब में गठबन्धन सरकार का निर्माण किया ?
(A) 1967
(B) 1975
(C) 1952
(D) 1957
उत्तर:
(A) 1967

9. पंजाब समझौता कब हुआ ?
(A) 1971
(B) 1985
(C) 1988
(D) 2002
उत्तर:
(B) 1985

10. नेशनल कान्फ्रेंस सक्रिय क्षेत्रीय दल है
(A) हरियाणा में
(B) महाराष्ट्र में
(C) जम्मू-कश्मीर में
(D) लद्दाख में।
उत्तर:
(C) जम्मू-कश्मीर में।

11. निम्न में से कौन-सा राज्य उत्तर-पूर्वी क्षेत्र से सम्बन्धित है ?
(A) नागालैण्ड
(B) असम
(C) मणिपुर
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

12. असम गण परिषद् किस राज्य से सम्बन्धित है ?
(A) असम
(B) केरल
(C) त्रिपुरा
(D) मिजोराम।
उत्तर:
(A) असम।

13. श्रीमती इन्दिरा गांधी की हत्या कब हुई ?
(A) 1 जनवरी, 1986
(B) 30 जून, 1984
(C) 31 अक्तूबर, 1984
(D) 1 अगस्त, 1984
उत्तर:
(C) 31 अक्तूबर, 1984

14. भारत में राज्यों का पुनर्गठन किया गया है
(A) राजनीतिक आधार पर
(B) भाषाई आधार पर
(C) आर्थिक आधार पर
(D) धार्मिक आधार पर।
उत्तर:
(B) भाषाई आधार पर।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

15. भारत में कौन-सा भाषाई फार्मूला लागू किया गया है ?
(A) तीन-भाषाई फार्मूला
(B) दो-भाषाई फार्मूला
(C) एक-भाषाई फार्मूला
(D) चार-भाषाई फार्मूला।
उत्तर:
(A) तीन-भाषाई फार्मूला।

16. जम्मू एवं कश्मीर’ को भारतीय संविधान की किस धारा के द्वारा विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया था ?
(A) धारा 360
(B) धारा 365
(C) धारा 370
(D) धारा 3721
उत्तर:
(C) धारा 370

17. धारा 370 को कब समाप्त किया गया ?
(A) 5-6 अगस्त, 2019
(B) 5-6 अगस्त, 2018
(C) 5-6 अगस्त, 2017
(D) 5-6 अगस्त, 2016
उत्तर:
(A) 5-6 अगस्त, 2019

18. “Caste in Indian Politics” पुस्तक लिखी
(A) रजनी कोठारी ने
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू
(C) मोरिस जोंस ने
(D) एंड्रे पेटीली (Andre Peteille) ने।
उत्तर:
(A) रजनी कोठारी ने।

19. निम्नलिखित में से कौन-सी भाषा भारत की सरकारी भाषा है ?
(A) इंग्लिश
(B) हिन्दी
(C) उर्दू
(D) संस्कृत।
उत्तर:
(B) हिन्दी।

20. भारतीय संघ के राज्यों की सरकारी भाषा निश्चित की जाती है
(A) संसद् द्वारा
(B) मन्त्रिमण्डल द्वारा
(C) मुख्यमन्त्री द्वारा
(D) राज्य विधानमण्डल द्वारा।
उत्तर:
(D) राज्य विधानमण्डल द्वारा।

21. भारतीय संविधान द्वारा कितनी भाषाओं को मान्यता दी गई है ?
(A) 18
(B) 25
(C) 17
(D) 22
उत्तर:
(D) 22

22. कौन-सा राज्य हिन्दी से अंग्रेजी को अधिक अधिमान देता है ?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) मध्य प्रदेश
(C) तमिलनाडु
(D) बिहार।
उत्तर:
(C) तमिलनाडु।

23. डी० एम० के० एवं आल इंडिया अन्ना डी० एम० के० निम्नलिखित में से किस राज्य के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल हैं ?
(A) आन्ध्र प्रदेश
(B) बिहार
(C) मध्य प्रदेश
(D) तमिलनाडु।
उत्तर:
(D) तमिलनाडु।

24. “भारत में नए संविधान का निर्माण करते समय सबसे प्रमुख कठिनाइयों में से एक भाषायी प्रदेशों की मांग को संतुष्ट करना तथा इसी प्रकार की दूसरी मांग को संतुष्ट करना होगा।” यह किसका कथन
(A) मोरिस जोन्स
(B) रजनी कोठारी
(C) बी० एन० राव
(D) श्री निवासन।
उत्तर:
(C) बी० एन० राव।

25. ‘मिजो नेशनल फ्रंट’ नामक पार्टी के संस्थापक निम्नलिखित में से कौन थे ?
(A) लालडेंगा
(B) बेअन्त सिंह
(C) पी० के० महन्त
(D) ममता बनर्जी।
उत्तर:
(A) लालडेंगा।

26. 1984 में ‘आपरेशन ब्लू-स्टार’ किस राज्य में चलाया गया ?
(A) बिहार
(B) पंजाब
(C) हरियाणा
(D) उड़ीसा।
उत्तर:
(B) पंजाब।

27. “भारत तो एक है, किंतु वे लोग कहां हैं, जिन्हें भारतीय कहा जा सके।” यह किसका कथन है ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू
(B) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(C) डॉ. राजेंद्र प्रसाद
(D) जय प्रकाश नारायण।
उत्तर:
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू।

28. भारत में किस दशक को स्वायतत्ता की मांग के दशक के रूप में देखा जाता है ?
(A) 2000
(B) 1970
(C) 1980
(D) 1990
उत्तर:
(C) 1980

29. द्रविड़ आन्दोलन की बागडोर किसके हाथ में थी ?
(A) रामाराव
(B) करुणानिधि
(C) जयललिता
(D) ई० वी० रामास्वामी नायकर ‘पेरियार’।
उत्तर:

30. डी० एम० के० ने किस भाषा का विरोध किया ?
(A) पंजाबी
(B) अंग्रेज़ी
(C) हिन्दी
(D) तमिल।
उत्तर:
(C) हिन्दी।

31. नेशनल कान्फ्रेंस के किस नेता ने सन् 1974 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के साथ समझौता किया ?
(A) शेख अब्दुल्ला
(B) फारुख अब्दुल्ला
(C) कर्ण सिंह
(D) उमर अब्दुल्ला।
उत्तर:
(A) शेख अब्दुल्ला।

निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) 1947 से पहले जम्मू-कश्मीर का शासक ……….. था।
उत्तर:
हरि सिंह

(2) नेशनल कांफ्रेंस ने ………….. के नेतृत्व में जन-आन्दोलन चलाया।
उत्तर:
शेख अब्दुल्ला

(3) ई० वी० रामास्वामी नायकर ………… के नाम से प्रसिद्ध थे।
उत्तर:
पेरियर

(4) ………… से जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी राजनीति ने सर उठाया।
उत्तर:
1989

(5)……….. के दशक को स्वायत्तता की मांग के दशक के रूप में देखा जा सकता है।
उत्तर:
1980

(6) 1966 में पंजाब और …………. के नाम के राज्य बनाए गए।
उत्तर:
हरियाणा

(7) धारा 370…………. राज्य से सम्बन्धित थी।
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर

(8)…………. दक्षिण भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन माना जाता है।
उत्तर:
द्रविड़ आन्दोलन

(9) 1984 में हरिमंदिर साहिब में हुई सैनिक कार्यवाही को ……….. के नाम से जाना जाता है।
उत्तर:
आप्रेशन बलू स्टार

(10) अक्तूबर, 1984 में प्रधानमन्त्री ………….. की हत्या की गई।
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में कौन-सा भाषाई फार्मूला लागू किया गया है ?
उत्तर:
भारत में त्रि-भाषाई फार्मूला लागू किया गया है।

प्रश्न 2.
नेशनल कांफ्रैंस कहां पर सक्रिय क्षेत्रीय दल है ?
उत्तर:
नेशनल कांफ्रैंस जम्मू-कश्मीर में सक्रिय क्षेत्रीय दल है।

प्रश्न 3.
बोडो आन्दोलन किस राज्य में चलाया गया ?
उत्तर:
बोडो आन्दोलन असम में चलाया गया।

प्रश्न 4.
5 जून, 1984 को ऑपरेशन ब्लूस्टार किस राज्य में चलाया गया था ?
उत्तर:
पंजाब में।

प्रश्न 5.
जम्मू कश्मीर को किस धारा के द्वारा विशेष संवैधानिक दर्जा दिया गया था ?
उत्तर:
संविधान की धारा 370 के द्वारा।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 6.
तेलुगू देशम पार्टी किस राज्य का क्षेत्रीय दल है?
उत्तर:
आन्ध्र प्रदेश का।

प्रश्न 7.
धारा 370 किससे सम्बन्धित थी?
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर से।

प्रश्न 8.
राजीव-लोगोंवाल समझौता कब हुआ?
उत्तर:
24 जुलाई, 1985 को।

प्रश्न 9.
1947 से पहले जम्मू-कश्मीर का शासक कौन था?
उत्तर:
1947 से पहले जम्मू-कश्मीर का शासक हरि सिंह था।

प्रश्न 10.
5 जून, 1984 को ऑपरेशन ब्लू स्टार किस राज्य में चलाया गया था?
उत्तर:
पंजाब में।

प्रश्न 11.
तमिलनाडु में कौन-से क्षेत्रीय दल की सरकार है ?
उत्तर:
तमिलनाडु में अन्नाद्रुमुक की सरकार है।

प्रश्न 12.
‘आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव’ कब पास किया गया ?
उत्तर:
सन् 1973 में।

प्रश्न 13.
‘मिजो नेशनल फ्रंट’ नामक पार्टी के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर:
‘मिजो नेशनल फ्रंट’ नामक पार्टी की स्थापना लाल डेंगा ने की थी।

प्रश्न 14.
डी० एम० के० तथा ए० आई० डी० एम० के० किस राज्य के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल हैं ?
उत्तर:
तमिलनाडु।

प्रश्न 15.
भाषा के आधार पर पंजाब राज्य का पुनर्गठन कब हुआ ?
उत्तर:
सन् 1966 में।

प्रश्न 16.
उत्तराखण्ड, झारखण्ड एवं छत्तीसगढ़ राज्यों का गठन कब हुआ ?
उत्तर:
सन् 2000 में।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जन आन्दोलन का क्या अर्थ है ? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
जन आन्दोलन का अर्थ-जो आन्दोलन लोगों की किसी समस्या या जनहित को लेकर चलाए जाते हैं, उन्हें जन आन्दोलन कहते हैं। ऐसे आन्दोलन के साथ अधिक से अधिक लोग जुड़े हुए होते हैं। एक आन्दोलन के साथ जितने अधिक लोग जुड़ते जायेंगे वह आंदोलन और अधिक लोकप्रिय होता जायेगा। उदाहरण के लिए भ्रष्टाचार के खिलाफ श्री अन्ना हजारे द्वारा चलाया गया आन्दोलन एक जन आन्दोलन ही था।

विशेषताएं:
(1) जन आन्दोलनों ने समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी जो अपनी समस्याओं को चुनावी राजनीति के माध्यम से हल नहीं कर पा रहे थे।

(2) जन आन्दोलन सामाजिक समूहों के लिए अपनी बात उचित ढंग से रखने के बेहतर मंच बनकर उभरे हैं।

(3) इन आंदोलनों ने जनता के क्रोध एवं तनाव को एक सार्थक दिशा देकर लोकतंत्र को मजबूत किया।

(4) इन आंदोलनों ने भारतीय लोकतंत्र के जनाधार को बढ़ाया है।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में चलाए गए किसान आन्दोलनों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद किसान आन्दोलन (Peasant Movements after Independence) स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने निश्चय किया कि उसे कृषकों की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। भारत सरकार ने इस दिशा में कई कदम उठाए, फिर भी कृषकों ने कई आन्दोलन किए, जिनका वर्णन निम्नलिखित है

1.तिभागा आन्दोलन (Tibhaga Movement):
तिभागा आन्दोलन 1946-47 में बंगाल में आरम्भ हुआ। यह आन्दोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों एवं बटाईदारों का संयुक्त प्रयास था। इस आन्दोलन का मुख्य कारण सन् 1943 में बंगाल में पड़ा भीषण अकाल था। इस आन्दोलन के कारण कई गांवों में किसान सभा का शासन स्थापित हो गया। परन्तु औद्योगिक मजदूर वर्ग और मझोले किसानों के समर्थन के बिना यह शीघ्र ही समाप्त हो गया।

2. तेलंगाना आन्दोलन (Telangana Movement):
तेलंगाना आन्दोलन हैदराबाद राज्य में 1946 में जागीरदारों द्वारा की जा रही जबरन एवं अत्यधिक वसूली के विरोध में चलाया गया क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन था। इस आन्दोलन में किसानों ने मांग की कि उनके सभी ऋण माफ कर दिए जाएं, परन्तु ज़मींदारों ने उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया। क्रान्तिकारी किसानों ने पांच हजार गुरिल्ला सैनिक तैयार किए और ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। गुरिल्ला सैनिकों ने ज़मींदारों के हथियार छीन लिए और उन्हें भगा दिया, परन्तु भारत सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर यह आन्दोलन समाप्त हो गया।

3. नक्सलवाड़ी आन्दोलन (Naxalbari Movement):
सन् 1964 में साम्यवादी दल में फूट पड़ गई। दोनों दलों के संसदीय राजनीति में व्यस्त होने के कारण इन दलों के सक्रिय व संघर्षशील कार्यकर्ता दलों से अलग होकर जन कार्य करने लगे। सन् 1967 में बंगाल में साम्यवादी दल की सरकार बनी। इसी समय दार्जिलिंग में नक्सलवाड़ी नामक स्थान पर किसानों ने विद्रोह कर दिया। यद्यपि पश्चिमी बंगाल की सरकार ने इसे दबा दिया।

परन्तु इस आन्दोलन की प्रतिक्रिया पंजाब, उत्तर प्रदेश और कश्मीर में भी हुई। इससे नक्सलवाड़ी आन्दोलन का विरोध किया गया, जिसके परिणामस्वरूप मई, 1967 में भारी हिंसक घटनाएं हुईं। यह आन्दोलन तेज़ी से राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया। केन्द्र सरकार का ध्यान इस तरफ आकर्षित हुआ क्योंकि सन् 1948 के बाद यह किसानों का मुख्य हिंसक विद्रोह था और ऐसे समय में हुआ था जब पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों की सरकार सत्तारूढ़ थी।

4. आधुनिक आन्दोलन (Modern Movement):
अपने हितों की रक्षा के लिए किसान समय-समय पर आन्दोलन करते रहे हैं। पिछले कई वर्षों से कपास के दामों में कमी होने के कारण कपास उत्पादक राज्यों, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब आदि के किसानों में असंतोष भर गया। मार्च, 1987 में गुजरात के किसानों ने अपनी मांगें मनवाने के लिए विधान सभा का घेराव करने की योजना बनाई। सरकार ने गुजरात विधानसभा (गांधीनगर) की किलेबन्दी कर दी। पुलिस ने किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार किए और किसानों ने पुलिस के अत्याचारों के विरुद्ध ग्रामबंद की अपील की, जिसके कारण गुजरात के अनेक शहरों में दूध और सब्जी की समस्या कई दिनों तक रही।

मनों का मल्यांकन (Evaluation of Peasant Movements):स्वतन्त्रता प्राप्ति के वर्षों के बाद भी किसानों की समस्याएं वैसी ही बनी हुई हैं जैसी कि ब्रिटिश काल में थीं। इससे जाहिर होता है कि स्वतन्त्रता से पूर्व और स्वतन्त्रता के बाद किए गए सभी किसान आन्दोलन असफल रहे हैं। अपनी सफलता के कारण ये आन्दोलन किसानों को न्याय न दिला सके। यद्यपि किसानों की स्थिति और भूमि सुधार की दिशा में सरकार ने काफ़ी यत्न किए हैं, परन्तु वह ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ ही सिद्ध हुए हैं। इन किसान आन्दोलनों की असफलता के महत्त्वपूर्ण कारण हैं, किसान आन्दोलन के अच्छे संगठन की कमी, किसानों में अज्ञानता, अन्धविश्वास, आसन्न स्थिति, क्रान्तिकारी तथा उद्देश्यपूर्ण विचारधारा की कमी और योग्य नेतृत्व का अभाव।

राजनीतिक दल और किसान आन्दोलन (Peasant Movements and Political Parties):भारत के सभी प्रमुख दलों का किसानों के प्रति व्यवहार स्वार्थपूर्ण रहा है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस पार्टी ने किसानों के हितों की रक्षा, भूमिहीन किसानों और बन्धुओं मजदूरों की सुरक्षा और उन्नति की गारन्टी दी थी। परन्तु यह अपने उद्देश्य में असफल रही है।

ज़मींदार और समृद्ध किसान कांग्रेस दल के लिए ‘वोट बैंक’ का काम करते हैं और उसे ग़रीब वर्ग का समर्थन दिलवाते हैं। परन्तु कांग्रेस की नीतियों से विमुख होकर किसान वर्ग वामपंथी दलों की तरफ झुका है। वामपंथी दलों ने किसानों के हितों की रक्षा के लिए कई आन्दोलन चलाए हैं और उनका सफल नेतृत्व भी किया है।

वामपंथी दलों ने पश्चिमी बंगाल, केरल, त्रिपुरा, पंजाब, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि के किसानों को संगठित करके किसानों की मांगों को पूरा करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। किसानों के हितों के सम्बन्ध में जो कुछ भी आज उपलब्ध हुआ है, वह वामपंथी दलों के सक्रिय सहयोग के कारण हुआ है। किसानों में संगठन की कमी के कारण उनकी आर्थिक स्थिति पिछड़ी हुई है।

किसान वर्ग में राजनीतिक चेतना न होने के कारण उन पर धर्म और जाति का विशेष प्रभाव रहा है। राजनीतिज्ञ किसानों की जातीय और धार्मिक भावनाओं को भड़का कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करते हैं। किसानों की राजनीति में अधिक सक्रिय न होने के कारण भारतीय राजनीति पिछड़ी हुई है, जिसके कारण सवर्ण हिन्दुओं और हरिजनों तथा आदिवासियों के बीच जाति संघर्ष पैदा हुआ है।

बिहार, उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में सवर्ण हिन्दुओं ने और खेतिहर हरिजनों ने अपनी जातीय सेनाएं तैयार कर रखी हैं, जो कि खूनी संघर्ष करती हैं। आज धनी किसान अधिक साधन उत्पन्न और समृद्ध हो रहे हैं। यह वर्ग ही किसान आन्दोलन का नेतृत्व करते हैं तथा राजनीतिक दल चाहे वह सत्तारूढ़ दल हो अथवा विपक्षी दल, किसान रैलिय आयोजन करके अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए और किसानों के मत अपने पक्ष में बटोरने के लिए करते रहते हैं।

आज किसान आन्दोलन की आड़ में क्षेत्रीय और अल्पसंख्यक नेतृत्व भी उभरने लगा है। इसके अतिरिक्त उत्तर और दक्षिण भारत में चलाए जाने वाले किसान आन्दोलनों में एक बड़ा भारी अन्तर पाया जाता है। वह अन्तर है उत्तर भारत की अपेक्षा दक्षिण भारत के किसान आन्दोलन में पिछड़ी जातियों का प्रमुख हाथ रहा है और वह उन में बढ़-चढ़ कर भाग लेती रही हैं। राजनीतिक दल इस तरह के आन्दोलन कर्ताओं को प्रोत्साहित करते रहे हैं कि किसानों को संगठित होकर विशाल रैलियों व आन्दोलनों के माध्यम से सरकार पर किसानों की मांगों को मनवाने के लिए दबाव डालना चाहिए।

इसी कारण से स्वतन्त्रता के बाद किसानों के कई दबाव समूह उभरकर सामने आए हैं। । आज चाहे कोई भी राजनीतिक दल हो, उसमें उद्योगपतियों की एक सशक्त लॉबी सक्रिय है। इनके माध्यम से यह उद्योगपति किसान आन्दोलन को गुमराह करने की कोशिश करते हैं।

इनका प्रयास रहता है कि किसान आन्दोलन का नेतृत्व किसी तरह राजनीतिक दलों के हाथों में आ जाए ताकि वे अपने हितों की पूर्ति कर सकें। वास्तव में आज जो भी आन्दोलन देश में सक्रिय है, चाहे वह किसान आन्दोलन हो या छात्र आन्दोलन और चाहे अन्य आन्दोलन, उनमें राजनीतिज्ञ किसी-न-किसी रूप में ज़रूर संलिप्त होते हैं। ये सभी आन्दोलन अपने ही ढंग की राजनीति को उभार रहे हैं।

भारत सरकार द्वारा समय-समय पर निश्चित की गई योजनाओं और नीतियों से देश के लगभग एक चौथाई किसानों को ही लाभ मिला है और तथाकथित हरित क्रान्ति के नाम पर किसानों के बीच आर्थिक असमानता बढ़ी है। हरित क्रान्ति से यद्यपि देश का उत्पादन बढ़ा है, परन्तु यह एक सीमित क्षेत्र तक ही पनप सकी है। सिंचाई के साधनों की उपलब्धता न होने के कारण देश के किसानों को प्राकृतिक साधनों, वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। दो या तीन वर्ष बाद किसानों को बाढ़ अथवा सूखे का सामना करना पड़ता है।

अतः किसानों को चाहिए कि वे संगठित होकर यह मा “एक निश्चित अवधि में देश के प्रत्येक खेत में पानी का इन्तज़ाम होना चाहिए। सिंचाई सरकारी होगी।” किसानों को अपने आन्दोलनों का नेतृत्व स्वयं करना चाहिए क्योंकि राजनीतिक दलों का उद्देश्य लोगों को मूर्ख बना कर सत्ता प्राप्त करना रहा है। किसानों को उन लोगों और पाखण्डी राजनीतिज्ञों से बचना चाहिए, जोकि अपने-आपको किसानों का मसीहा कहलाते हैं, जोकि स्वयं तो वातानुकूलित कमरों में बैठते हैं और उनके किसान भाई अपनी मौलिक आवश्यकताओं को भी तरसते हैं। उन्हें ऐसे लोगों से भी बचना होगा, जिनका एक पैर गांव में तथा दूसरा पांव शहर में रहता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 3.
महिला आन्दोलन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
प्राचीन काल से ही पुरुष प्रधान समाज रहा है और आज भी काफ़ी हद तक समाज में और सार्वजनिक जीवन में पुरुषों का ही अधिक महत्त्व है। स्त्रियों को दासी मान कर पांव की जूती के समान दर्जा दिया जाता रहा था। जन आन्दोलन का उनका कार्य क्षेत्र घर की चारदीवारी रहा था और उनको पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त नहीं थे। स्त्रियों का मुख्य कर्त्तव्य पुरुषों की सेवा करना, बच्चे पैदा करना, बच्चों का पालन करना तथा पति को परमेश्वर मान कर जीवन यापन करना रहा है। स्त्रियों के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव किया जाता रहा है और आज भी संसार के अधिकांश देशों में स्त्रियों की स्थिति विशेष अच्छी नहीं है केवल पिछड़े देशों में ही नहीं, बल्कि संसार के अन्य देशों में भी स्त्रियों की स्थिति शोचनीय है।

यद्यपि संसार के कई देशों में स्त्रियों को पुरुषों के समान अधिकार दिए गए हैं, किन्तु व्यवहार में स्त्रियों को समानाधिकार प्राप्त नहीं हैं। राजनीतिक क्षेत्र में स्त्रियों का महत्त्व और भी कम है। निःसन्देह भारत, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस आदि देशों में स्त्रियों को मताधिकार और चुने जाने का अधिकार प्राप्त है, परन्तु व्यवहार में इन देशों में भी स्त्रियां राजनीति में अधिक सक्रिय नहीं हैं।

निर्णय निर्माण में तो स्त्रियां बहुत ही कम भागीदार हैं। स्त्रियों में राजनीतिक चेतना आने के बावजूद भी रूढ़िवादी पुरुष प्रधान समाज के कारण प्रगतिशील परिवर्तन नहीं हो रहे हैं। अत: आज भी स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। यद्यपि आज भी स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं है, परन्तु स्त्रियों में मानसिक परिवर्तन अवश्य आया है।

स्त्रियों के अन्दर व्यक्तित्व की भावना जाग उठी है और वे अपने हितों की रक्षा के लिए प्रयत्नशील हैं। संसार के अनेक विकसित देशों में स्त्रियों ने पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त करने के लिए आन्दोलन चलाए हैं और उन्हें काफ़ी सफलता भी प्राप्त हुई हैं। अनेक पुरुष संगठनों ने भी स्त्रियों के इन आन्दोलनों का समर्थन किया है। आज स्त्रियां अपने हितों एवं अधिकारों की रक्षा के लिए संगठित होकर संघर्ष के मार्ग पर चल पड़ी हैं और स्त्रियों के इस आन्दोलन को ही स्त्रीवाद कहा जाता है। Feminism शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द Female से बना है, जिसका अर्थ है स्त्री या स्त्रियों सम्बन्धी। स्त्रीवाद स्त्रियों के हितों की रक्षा से सम्बन्धित आन्दोलन है।

1. ऑक्सफोर्ड शब्दकोष (Oxford Dictionary) के अनुसार, “स्त्रीवाद स्त्रियों के दावों की मान्यता, उनकी सफलताओं तथा उनके अधिकारों का समर्थन करता है।”

2. रैनडो हाऊस शब्दकोष (Randow House Dictionary) के अनुसार, “स्त्रीवाद पुरुषों के समान स्त्रियों के सामाजिक तथा राजनीतिक अधिकारों के समर्थन का सिद्धान्त है। स्त्रीवाद स्त्रियों के अधिकारों की प्राप्ति के लिए संगठित आन्दोलन है।” विभिन्न विद्वानों की परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि स्त्रीवाद (Feminism) एक ऐसा आन्दोलन है. जो स्त्रियों की समस्याओं का आलोचनात्मक मल्यांकन करता है तथा स्त्रियों को समान अधिकार दिलवाने के लिए प्रयत्नशील है।

स्त्रीवाद स्त्रियों को उन्नति के लिए अधिक सुविधाएं व अवसर दिलाने के लिए प्रयत्नशील है। केवल स्त्रियां ही नहीं बल्कि अनेक पुरुष भी इन आन्दोलनों में सक्रिय भाग ले रहे हैं और इन आन्दोलनों का समर्थन कर रहे हैं।

3. जॉन चारवेट (John Charvet) के अनुसार, “स्त्रीवाद का मूल विचार यह है कि मौलिक महत्त्व की दृष्टि से पुरुषों और स्त्रियों में कोई भेद नहीं है। इस स्तर पर समाज में पुरुष प्राणी या स्त्री प्राणी नहीं बल्कि वे केवल मानव प्राणी या व्यक्ति है। व्यक्तियों का स्वभाव और महत्त्व उनके लिंग भेद से स्वतन्त्र है।” महिला आन्दोलन की उत्पत्ति व विकास (Origin and Development of Women Movement) स्त्रियों की समानता की धारणा का इतिहास बहुत पुराना है।

भारतीय वैदिक काल में स्त्री को सामाजिक व धार्मिक दृष्टि से अनेक अधिकार प्राप्त थे। कोई भी धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान व यज्ञ स्त्री बिना अधूरा माना जाता था। उसे कुल लक्ष्मी व देवी आदि उपनामों से पुकारा जाता था वेदों में तो यहां तक लिखा है कि जहां-जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवताओं का निवास होता है। उत्तर वैदिक काल में नारी के स्थान व सम्मान में कमी आनी शुरू हो गई।

उसे धीरे-धीरे वर चुनने व शिक्षा प्राप्ति के अधिकारों से वंचित कर दिया गया। महात्मा बुद्ध ने तो अपने शिष्य आनन्द के बार-बार अनुरोध करने पर स्त्रियों को भिक्षुणियां बनने की अनुमति दी थी। राजपूतों और तुर्कों के काल में स्त्रियां, चारदीवारी में बन्द हो गईं और पर्दा व कन्यावध जैसी सामाजिक कुरीतियों द्वारा इनका शोषण किया जाता रहा है।

15वीं शताब्दी में गुरु नानक देव जी ने स्त्रियों की समानता और स्त्रियों की श्रेष्ठता का प्रचार किया। भक्ति आन्दोलन और सुधार आन्दोलनों ने स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए अनेक यत्न किए। 18वीं शताब्दी में अनेक विद्वानों ने पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों की कड़ी आलोचना की। बोरन डी हुलबैक (Boron D Holbach) ने स्त्रियों को शिक्षा न दिया जाने का विरोध किया और इस बात पर जोर दिया कि समाज की उन्नति के लिए स्त्रियों को शिक्षा देना अति ज़रूरी है।

अनेक फ्रांसीसी विद्वानों ने स्त्रियों को पुरुषों के समान शिक्षा देने का समर्थन किया। मेरी उलम्पी डी गोज़ज (Marie Olympe D. Goages) ने 1791 ई० में “स्त्रियों के अधिकारों की घोषणा” (Declaration of Women) प्रकाशित की और इस बात की मांग की कि, “जब हमें स्त्रियों को फांसी के फंदे पर लटकने का अधिकार है तो हमें न्यायालयों की कुर्सी पर भी बैठने का अधिकार है।”

1792 ई० में एक अंग्रेज़ स्त्री मेरी वुलस्टोनकराफट (Mary Wollstonecraft) ने स्त्रियों के अधिकारों का समर्थन व रक्षा (A Vindication of the Rights of Women) नामक एक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में मेरी वुलस्टोनकराफट ने इस बात पर जोर दिया है कि स्त्रियों के शरीर का प्रयोग किया जाता है, किन्तु उनके दिमाग को जंग लगने दिया जाता है। मेरी ने स्त्रियों को शिक्षा दिए जाने पर बल दिया और यह भी कहा कि अनेक स्त्रियां ब्रिटिश संसद् की सदस्या बनने के योग्य हैं।

परन्तु इन विद्वानों के विचारों के बावजूद स्त्रियों की दशा में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ और न ही 17वीं शताब्दी के अन्त तक कोई विशेष संगठन शुरू हुआ। शैले (Shelley), फलोरेंस नाइटिंगेल (Florence Nightingale), एलिजाबेथ गैसकल (Elizabeth Gaskall), राबर्ट ओवन (Robert Oven) और एलिजाबेथ फराई (Elizabeth Fry) आदि ने अस्पतालों, कारखानों तथा अन्य स्थानों पर काम कर रही स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए प्रयत्न किए।

1820 ई० में अमेरिका में United Tailoresses Society of New York और Lady Shoe Bender of Cynu Massachusetts नामक संगठनों की स्थापना की गई, परन्तु इन संगठनों को कोई विशेष सफलता न मिली क्योंकि इन संगठनों को पुरुषों का समर्थन प्राप्त नहीं था। अमेरिका में 1824 ई० में स्त्रियों ने पहली बार हड़ताल की। इस हड़ताल का पुरुषों ने भी काफ़ी सीमा तक समर्थन किया।

1848 ई० में एलिजाबेथ केडी स्टेनटन (Elizabeth Cady Stanton) तथा लुकरीसियन मट (Lucretin Matt) द्वारा बुलाई कन्वेंशन में की गई घोषणा अमेरिकन स्त्रियों के अधिकारों के लिए चलाए गए आन्दोलनों से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इस घोषणा में स्पष्ट कहा गया था कि मानव जाति का इतिहास पुरुषों द्वारा स्त्रियों पर किए गए अत्याचारों का इतिहास है। अमेरिका के गृह युद्ध (1861-65) ने स्त्रियों को कुछ अधिकार दिलवाने में बहुत सहायता की। स्त्रियों के लिए एक कॉलेज खोला गया और उन्हें सरकारी नौकरियां देने की भी व्यवस्था की गईं। 19वीं शताब्दी के अन्त में स्त्रियों को अनेक अधिकार दिए गए।

स्त्रियों को मताधिकार की प्राप्ति (Attainment of right to vote by women)-जे० एस० मिल (J. S. Mill) स्त्री मताधिकार का भारी समर्थक था। उसके विचारानुसार मताधिकार देने में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। स्त्रियों को मताधिकार न देना उसे बहुत अन्यायपूर्ण लगता था। मिल स्त्रियों को वही समर्थन देना चाहता था, जो पुरुषों को प्राप्त था। उस का कहना है कि, “स्त्री और पुरुषं में कोई अन्तर है भी तो पुरुष की अपेक्षा मत देने के अधिकार की आवश्यकता नारी को अधिक है क्योंकि शारीरिक दृष्टि से पुरुष की तुलना में निर्बल होने के कारण उसे रक्षा के लिए कानून और समाज पर निर्भर रहना पड़ता है।”

अमेरिका में 1920 ई० में तथा इंग्लैण्ड में 1928 ई० में स्त्रियों को मताधिकार दिया गया। फ्रांस में द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् स्त्रियों को मताधिकार दिया गया। भारतीय संविधान के अन्तर्गत स्त्रियों को पुरुषों समान अधिकार दिए गए हैं। संविधान में यह स्पष्ट लिखा गया है कि लिंग के आधार पर किसी प्रकार का स्त्रियों के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। अमेरिका में 1964 ई० में “नागरिक अधिकार अधिनियम” (Civil Rights Act) के अन्तर्गत नौकरियों में लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता है। इंग्लैण्ड में 1967 ई० में अमेरिका में 1975 ई० में गर्भपात के अधिकार को कानूनी मान्यता दी गई।

1960 ई० के पश्चात् स्त्रियों को स्वतन्त्रता दिलवाने के लिए अनेक संगठनों की स्थापना की गई है और अनेक आन्दोलन चलाए गए हैं। 1963 ई० में बैट्टी फ्राईडन (Betty Friden) ने “The Ferminine Mystique” नामक पुस्तक प्रकाशित की। इस पुस्तक में स्त्रीवाद आन्दोलन के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् स्त्रियों में राजनीतिक जागृति का काफ़ी विकास हुआ है। भारत जैसे देश में आज अनेक महिला संगठन स्त्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं। इन संगठनों में मुख्य संगठन इस प्रकार है-All India Women Conference, National Council of Women in India, Bharatiya Grameen Mahila Sangh, National Federation of Indian Women आदि।

यूरोप के अनेक देशों में, विशेषकर अमेरिका में स्त्रियों के अधिकारों के लिए चलाए गए आन्दोलन उग्र रूप धारण कर चुके हैं। स्त्रीवाद के उग्र रूप की समर्थक स्त्रियां केवल समान अधिकारों की बात करती है बल्कि पुरुषों की आवश्यकता का भी खण्डन करती है। इसलिए अमेरिका में हमें एक स्त्री का दूसरी स्त्री के साथ विवाह का उदाहरण मिलता है। परन्तु स्त्रीवाद का यह रूप समाज एवं मानव के हित में नहीं है क्योंकि समाज को बनाए रखने के लिए स्त्री पुरुष सम्बन्ध होना आवश्यक है।

प्रश्न 4.
महिला सशक्तिकरण हेतु संवैधानिक प्रावधानों का उल्लेख करें।
उत्तर:
महिला सशक्तिकरण और विकास के लिए यह आवश्यक है कि महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाया जाए। प्राय: सभी राजनीतिक दल, महिला संघ व सामाजिक संगठन निरन्तर इस बात पर बल देते रहे हैं कि जब तक स्थानीय संस्थाओं, विधानमण्डलों और संसद् में महिलाओं की स्थिति में सुधार नहीं हो सकता। 73वें और 74वें संशोधन द्वारा ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए कुल निर्वाचित पदों का एक तिहाई भाग आरक्षित किया गया है।

इससे महिला सशक्तिकरण आन्दोलन को बल मिला। संसद् और राज्य विधानमण्डलों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित रखने के लिए कई बार प्रयास किए जा चुके हैं, लेकिन इसमें सफलता प्राप्त नहीं हुई। विभिन्न राजनीतिक दल अपनी रैलियों, घोषणा-पत्रों, सार्वजनिक स्थानों आदि पर तो महिलाओं के लिए संसद् व राज्य विधान सभाओं में एक-तिहाई स्थान दिलाने का जोर-शोर से प्रचार करते हैं, लेकिन जब संसद् में महिला आरक्षण विधेयक पेश किया जाता है तो उसे पास नहीं होने दिया जाता।

प्रश्न 5.
राष्ट्रीय महिला आयोग के प्रमुख कार्यों का सविस्तार वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में महिलाओं की रक्षा तथा उनकी स्थिति में सुधार के लिए राष्ट्रीय महिला आपेक्षा महिला आयोग निम्नलिखित कार्य करता है

1. महिलाओं का सर्वांगीण विकास-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के सर्वांगीण विकास पर विशेष बल देता है, तथा इससे सम्बन्धित कई प्रकार के कार्य करता है।

2. महिलाओं से सम्बन्धित कानूनों की समीक्षा करना-राष्ट्रीय महिला आयोग सरकार द्वारा समय-समय पर महिला कल्याण के लिए जो कानून बनाए जाते हैं, उनकी समीक्षा करता है तथा आवश्यकता पड़ने पर उससे संशोधन हेतु सुझाव भी देता है।

3. महिलाओं से सम्बन्धित कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा करना-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं से सम्बन्धित कानूनी सुरक्षा उपायों की समीक्षा एवं जांच-पड़ताल करता है तथा इन कानूनों को प्रभावशाली ढंग से लागू करने के लिए समय-समय पर सरकार को परामर्श भी देता है।

4. महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करना-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करता है। यदि कोई व्यक्ति या अधिकारी इन अधिकारों की अवहेलना करता है, तो राष्ट्रीय महिला आयोग इस घटना को सम्बन्धित अधिकारी के समक्ष उठाता है।

5. लिंग भेदभाव को समाप्त करना-राष्ट्रीय महिला आयोग समाज में से लिंग भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास करता है। यह आयोग महिलाओं से सम्बन्धित समस्याओं से सम्बन्धित खोज करके, उसको समाप्त करने का सुझाव देता है।

6. महिलाओं को सामाजिक-आर्थिक विकास-वर्तमान में भी समाज में महिलाओं की सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अतः राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए अनेक कार्य करता है।

7. घरेलू हिंसा से बचाव-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं को घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

8. वार्षिक प्रतिवेदन देना-राष्ट्रीय महिला आयोग प्रति वर्ष महिलाओं की स्थिति से सम्बन्धित प्रतिवेदन केन्द्रीय सरकार को देता है तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी राज्य सरकार को भी प्रतिवेदन दे सकता है। ..

9. महिलाओं से सम्बन्धित सुधार गृहों तथा जेलों का निरीक्षण करना-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं से सम्बन्धित सुधार गृहों तथा जेलों आदि का समय-समय पर निरीक्षण करता है उनमें सुधार के लिए सिफारिशें प्रस्तुत करता है।

10. महिलाओं के कल्याण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा दिया गया कोई कार्य करना-राष्ट्रीय महिला आयोग कोई ऐसा कार्य करता है, जो महिलाओं के कल्याण के लिए केन्द्र सरकार द्वारा उसे सौंपा जाए। .

11. राष्ट्रीय महिला आयोग अपने समक्ष किसी भी व्यक्ति को बुलाने एवं उसकी उपस्थिति विश्वसनीय बनाने की शक्ति प्राप्त है ।

12. शपथ पत्रों की जांच करना-राष्ट्रीय महिला आयोग को शपथ पत्रों की जांच करने की शक्ति प्राप्त है।

13. न्यायालय से महिलाओं से सम्बन्धित रिकार्ड प्राप्त करना-राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं से सम्बन्धित कोई रिकार्ड किसी न्यायलय या कार्यालय से प्राप्त कर सकता है।

14. सबूतों एवं प्रलेखों की जांच-राष्ट्रीय महिला आयोग को सबूतों एवं प्रलेखों की जांचे के आदेश देने का अधिकार प्राप्त है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 6.
पर्यावरण एवं विकास से प्रभावित लोगों के आन्दोलनों का वर्णन करें।
उत्तर:
विकासशील देश निरन्तर विकास के लिए प्रयत्न करते रहते हैं और अल्पविकसित राष्ट्र भी अपने अस्तित्व . के लिए तथा अपने-अपने देश की आवश्यकताओं के लिए हमेशा संघर्षरत रहते हैं। विकास के इन प्रयत्नों के फलस्वरूप विश्व के पर्यावरण पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। सभ्यता के प्रारम्भिक युग में मानव की आवश्यकताएं अत्यधिक सीमित थीं और मानव जनसंख्या भी कम थी। आवश्यकताओं के सीमित होने व जनसंख्या के कम होने के कारण प्रकृति के चक्कर (Cycle of Nature) पर कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता था, क्योंकि मनुष्य प्रकृति के अपार भण्डार से जो कुछ व्यय करता था, वह वापिस प्रकृति में, बिना क्षति पहुंचाए किसी-न-किसी रूप में, विलीन हो जाता था।

किन्तु जहां एक ओर जनसंख्या का निरन्तर विस्तार हो रहा है, वहां दूसरी ओर सभ्यता और प्रौद्योगिकी के विकास के कारण मानव उपभोग का स्तर ऊंचा होता जा रहा है, जिसके कारण विश्व के सभी राष्ट्रों-विकसित, विकासशील एवं अल्पविकसित द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन इतना अधिक बढ़ गया है कि प्राकृतिक साधनों की कमी होनी शुरू हो गई है और पर्यावरण के प्रदूषण की समस्याएं पैदा हो गई हैं।
पर्यावरण क्षरण एवं विकास के कारण विश्व के अधिकांश लोग नकारात्मक ढंग से प्रभावित हुए हैं।

इसका प्रभाव भारत जैसे विकासशील देश में भी बहुत पड़ा है। इसी कारण विश्व के साथ-साथ भारत में भी पर्यावरण क्षरण एवं विकास के विरुद्ध समय-समय पर आन्दोलन होते रहे हैं। भारत में पर्यावरण से सम्बन्धित सर्वप्रथम आन्दोलन को चिपको आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। चिपको आन्दोलन 1972 में हिमालय क्षेत्र में उत्पन्न हुआ। चिपको आन्दोलन का अर्थ है-पेड़ से चिपक जाना अर्थात् पेड़ को आलिंगन बद्ध कर लेना। चिपको आन्दोलन की शुरुआत उस समय हुई जब एक ठेकेदार ने गांव के समीप पड़ने वाले जंगल के पेड़ों को काटने का फैसला किया।

लेकिन गांव वालों ने इसका विरोध किया। परन्तु जब एक दिन गांव के सभी पुरुष गांव से बाहर गए हुए थे, तब ठेकेदार ने पेड़ों को काटने के लिए अपने कर्मचारियों को भेजा। इसकी जानकारी जब गांव की महिलाओं को मिली, तब वे एकत्र होकर जंगल पहुंच गईं तथा पेड़ों से चिपक गईं। इस कारण ठेकेदार के कर्मचारी पेड़ों को काट न सके। इस घटना की जानकारी पूरे देश में समाचार माध्यमों के द्वारा फैल गई। पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित इस आन्दोलन को ? प्राप्त है। चिपको आन्दोलन के बाद भारत में नर्मदा बचाओ आन्दोलन बांध विरोधी आन्दोलन, उद्योगों एवं कारखानों को शहर से बाहर स्थापित करने की योजना, ताजमहल को बचाने की योजना, बसों एवं आटो रिक्शा में सी० एन० जी० के प्रयोग जन आन्दोलन का उदय की योजना शुरू की गई।

इन योजनाओं में लोगों के साथ-साथ भारत की न्यायपालिका ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। नर्मदा बचाओ आन्दोलन में लोगों की भागीदारी इतनी अधिक थी, कि विश्व बैंक ने भी इस योजना से अपने आपको अलग कर लिया। इसके साथ-साथ भारत में टिहरी बांध परियोजना नर्मदा घाटी परियोजना तथा शांत घाटी परियोजना से सम्बन्धित भी पर्यावरणीय आन्दोलन चलाए। टिहरी बांध परियोजना के विरुद्ध चलने वाला आन्दोलन भारत का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला आन्दोलन माना जाता है। टिहरी बांध परियोजना का विरोध करने के लिए लोगों ने स्वतन्त्रता सेनानी वीरेन्द्र दत्त सखलानी के नेतृत्व में टिहरी बांध परियोजना विरोधी संघर्ष समिति का निर्माण किया।

टिहरी बांध से टिहरी शहर के पानी में डूब जाने का खतरा था। आगे चलकर इस योजना से समाज सेवी सुन्दर लाल बहुगुणा भी जुड़ गए तथा टिहरी बांध परियोजना का विरोध करने के लिए उन्होंने आमरण अनशन भी किया तथा प्रधानमन्त्री द्वारा इस योजना की समीक्षा के आश्वासन पर ही उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ा था। शांत घाटी परियोजना केरल में शुरू की गई थी। इस परियोजना का विरोध करने के लिए ‘केरल शास्त्र साहित्य परिशट्’ की स्थापना की गई इस सभा का मुख्य तर्क यह था कि यदि यह परियोजना पूरी होती है, तो इससे जंगली जीवों को बहुत हानि पहुंचेगी। इसी कारण इस परियोजना को बन्द ही कर दिया गया।

पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन नर्मदा बचाओ आन्दोलन को माना जाता है। यद्यपि यह आन्दोलन 1970 के दशक में ही शुरू हो गया था, परन्तु इसमें तेजी 1980 के दशक में आई। इस आन्दोलन को चलाने वालों में मेधा पाटकर, बाबा आमटे तथा सुन्दर लाल बहुगुणा शामिल हैं। इनके प्रयासों से समाज के अन्य वर्गों से भी इन्हें समर्थन मिला।

आन्दोलन के समर्थकों की मांग है कि बांध परियोजना के पूर्ण होने पर कई लाख लोग बेघर हो जाएंगे, अतः सरकार इनके पुनर्वास की पूर्ण व्यवस्था करे। परन्तु सम्बन्धित अधिकारियों द्वारा लोगों के पुनर्वास को अधिक गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा था। इसी कारण इस आन्दोलन के साथ समाज के अन्य वर्गों के लोग भी जुड़ गए तथा यह आन्दोलन और तेज़ हो गया तथा जो देश इस परियोजना में धन लगा रहे थे, वो पीछे हट गए।

यहां पर यह बात उल्लेखनीय है कि भारत में पर्यावरण से सम्बन्धित, नर्मदा बचाओ आन्दोलन, जैसे कई और आन्दोलन भी सफलतापूर्वक चले हैं, परन्तु कुछ ऐसे आन्दोलन भी रहे हैं जो सफलता प्राप्त नहीं कर पाए। जैसे 1985 में भोपाल में ‘यूनियन कारबाइड गैस’ दुर्घटना द्वारा लगभग 3000 लोग मारे गए। इस घटना के विरुद्ध भी एक सफल आन्दोलन चलाया जा सकता था, क्योंकि इसमें तात्कालिक तौर पर ही 3000 लोग मारे जा चुके थे। क्योंकि इस दुर्घटना के लिए एक विदेशी कम्पनी यनियन कारबाइड कार्पोरेशन उत्तरदायी थी, अत: उसके विरुद्ध न तो भारतीय सरकार और न ही स्थानीय लोग ही उचित कार्यवाही कर पाए।

निष्कर्ष (Conclusion)-उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है, कि भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् लोगों में पर्यावरण से सम्बन्धित जागरुकता बढ़ी तथा भारतीय लोगों ने पर्यावरण को खराब करने वाली परियोजनाओं के विरुद्ध सफल आन्दोलन चलाए।

प्रश्न 7.
भारत में महिलाओं के उत्थान के लिए उठाए गए मुख्य कदम बताएं।
उत्तर:
भारत में महिलाओं के उत्थान के लिए निम्नलिखित कदम उठाए गए हैं

(1) महिलाओं के उत्थान के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955, हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम-1956, स्त्रियों एवं लड़कियों का अनैतिक व्यापार निषेध कानून, 1956 तथा दहेज विरोधी कानून, 1960 कानून बनाया गया।

(2) सन् 1972 में कामकाजी महिलाओं के लिए आवास गृह योजना आरम्भ की गई।

(3) भारत में महिलाओं एवं लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए 1958 में एक परिषद् की स्थापना की गई जिसे लड़कियों तथा स्त्रियों की शिक्षा के लिए राष्ट्रीय परिषद् कहा जाता है।

(4) 1987 में विशेष तौर पर ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाली महिलाओं के लिए प्रशिक्षण एवं रोजगार हेतु कार्यक्रम शुरू किया गया।

(5) 1982 में स्त्रियों पर होने वाले अत्याचार को रोकने के लिए शिक्षात्मक कार्यक्रम प्रारम्भ किया गया।

(6) सन् 1977 में संकट ग्रस्त स्त्रियों के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण एवं रोज़गार तथा आवासीय व्यवस्था का प्रावधान किया गया।

(7) सन् 1992 में 73वें एवं 74वें संशोधनों द्वारा ग्रामीण एवं शहरी स्थानीय संस्थाओं में महिलाओं के लिए कुल निर्वाचित पदों का एक तिहाई भाग आरक्षित किया गया।

(8) 20 अगस्त, 1995 में को इन्दिरा महिला योजना आरम्भ की गई ।

(9) सन् 1992 में राष्ट्रपति महिला आयोग का गठन किया गया।

(10) सन् 2001 में महिला सशक्तिकरण नीति का निर्माण किया गया।

(11) सन् 2005 में घरेलू महिला हिंसा विरोधी कानून लागू किया गया।

प्रश्न 8.
आरक्षण की नीति का भारतीय राजनीति पर प्रभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीति पर आरक्षण की नीति का निम्नलिखित ढंग से प्रभाव पड़ा है :-

  • आरक्षण की नीति ने दलितों का सर्वांगीण विकास हुआ है।
  • आरक्षण की नीति ने दलितों में वर्गीय चेतना का विकास किया है।
  • जाति आधारित राजनीतिक दलों और दबाव समूहों का निर्माण हुआ है।
  • आरक्षण की नीति के कारण दलितों में विशिष्ट वर्ग का विकास हुआ है।
  • आरक्षण की नीति के कारण समाज में सामाजिक तनाव बढ़ा है।
  • आरक्षण की नीति के कारण दलितों को एक वोट बैंक के रूप में देखा जाने लगा है।
  • आरक्षण की नीति ने मतदान व्यवहार को भी प्रभावित किया है।
  • आरक्षण की नीति के कारण अन्य कई जातियों ने भी आरक्षण की मांग करनी आरम्भ कर दी है।
  • आरक्षण की नीति के कारण बहुत तेजी से राजनीति का जातीयकरण हुआ है।
  • आरक्षण की नीति ने गठबंधन की नीति को बढ़ावा दिया है।

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प्रश्न 9.
मण्डल आयोग के गठन एवं उसकी सिफ़ारिशों का वर्णन करें।
उत्तर:
काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ी जाति आयोग-संविधान के अनुच्छेद 340 के अन्तर्गत अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जन-जातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई लेकिन पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी। इसलिए पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने के लिए भारत सरकार ने 1953 में गांधीवादी विचारक काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ी जाति आयोग की स्थापना की। इस आयोग ने 30 मार्च, 1955 को राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।

इस आयोग ने पिछड़ी जातियों के रूप में 2399 जातियों की पहचान की। इस आयोग ने सभी स्त्रियों को पिछड़ी जाति में शामिल करने की सिफारिश की

(1) आयोग ने प्रथम श्रेणी की सरकारी नौकरियों में 25 प्रतिशत, दूसरी श्रेणी में 33 प्रतिशत, तीसरी तथा चौथी श्रेणी में 40 प्रतिशत आरक्षण की भी सिफारिश की। आयोग ने सभी तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षण संस्थाओं में 70 प्रतिशत स्थान आरक्षित रखने की भी मांग की लेकिन इन सिफ़ारिशों के सम्बन्ध में आयोग के सारे सदस्य एक मत नहीं थे।

आयोग के सात में से तीन सदस्यों ने तो यह भी नहीं माना कि जातीयता पिछड़ेपन का कारण है। स्वयं आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर ने सरकार को लिखे अपने प्रशस्ति-पत्र में अपनी सिफ़ारिशों के परिणाम पर सन्देह प्रकट किया था। इसलिए 1956 में संसद् में एक रिपोर्ट के साथ अपने स्मृति-पत्र में आयोग द्वारा निर्णय एकमत के अभाव के आधार इसे अस्वीकार कर दिया और 1961 में राज्यों को सूचित किया गया कि उन्हें अपने स्तर पर ‘समुचित आधार’ खोजने की स्वतन्त्रता है। इस सम्बन्ध में यह उचित होगा कि यदि राज्य

आर्थिक मापदण्ड को व्यवहार में लाएं। इसका परिणाम यह निकला कि पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण का विषय उलझता. चला गया। राज्यों ने अपने स्तर पर पिछड़ेपन के आधार ढूंढने के प्रयास किए। इससे न केवल भेदभाव बढ़े बल्कि पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था राजनीति का शिकार हो गई। प्रान्तीय स्तर पर अनेक हिंसक आरक्षण समर्थक तथा आरक्षण विरोधी आन्दोलन हुए।

तमिलनाडु में 50 प्रतिशत, कर्नाटक में 48 प्रतिशत, केरल में 30 प्रतिशत कोटा निर्धारित किया गया जबकि पंजाब में केवल 5 प्रतिशत और राजस्थान, दिल्ली एवं उड़ीसा में यह व्यवस्था बिल्कुल भी नहीं है जन आन्दोलन का उदय जैसा कि स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न व्यवस्थाओं से राज्य स्तर पर अनेक विवादों एवं हिंसक कार्यवाहियों का जन्म हुआ।

मण्डल आयोग की स्थापना-काका कालेलकर आयोग की सिफारिशों के भेदभाव को दूर करने के लिए मोरारजी देसाई की प्रधानता में जनता पार्टी की सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमन्त्री बिन्देश्वरी प्रसाद मण्डल की अध्यक्षता में 20 सितम्बर, 1978 को दूसरे पिछड़ी जाति आयोग का गठन किया। इस आयोग में अध्यक्ष के अतिरिक्त पांच अन्य सदस्य रखे गए। इस आयोग का उद्देश्य सामाजिक एवं शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की पहचान करके उनके उत्थान के लिए दिशा निर्धारित करना था। इस आयोग ने 31 दिसम्बर, 1980 को राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस रिपोर्ट में कालेलकर रिपोर्ट की तरह तथ्यों के अभाव को स्वीकार किया गया, फिर भी आयोग की कार्यविधि में सुधार कहा जा सकता है जो कि काफ़ी खोजबीन पर आधारित थी।

मण्डल आयोग की सिफ़ारिशें-आयोग ने कुल 3743 पिछड़ी जातियों को वर्गीकृत किया जिसमें हिन्दुओं के साथ-साथ अन्य धर्मों को भी शामिल किया गया। आयोग के अनुसार देश भर में इनकी संख्या 52 प्रतिशत है। मण्डल आयोग की मुख्य सिफ़ारिश यह है कि पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों, शिक्षण संस्थाओं के प्रवेश में 27 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए।

आयोग ने इस सिफ़ारिश के पक्ष में यह तर्क दिया कि यदि 22.5 प्रतिशत जनसंख्या वाले हरिजनों एवं जन-जातियों के लिए उतनी ही आरक्षण की व्यवस्था हो सकती है तो 52 प्रतिशत पिछड़ी जातियों के लिए 27 प्रतिशत क्यों नहीं किया जा सकता। इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट में जाति को पिछड़ेपन का आधार मानते हुए सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के लिए 11 मापदण्ड प्रस्तुत किए जिनको मुख्य रूप से तीन शीर्षकों के अन्तर्गत वर्गीकृत किया गया

  • सामाजिक
  • शैक्षणिक
  • आर्थिक। इन. 11 मापदण्डों का वर्णन इस प्रकार हैं

1. सामाजिक मापदण्ड (Social Standard):
ऐसी जातियां या वर्ग जिनको सामाजिक तौर पर निम्न जातियों या वर्गों द्वारा पिछड़ा हुआ.माना जाता है।

(2) ऐसी जातियां या वर्ग जो मुख्य तौर पर शारीरिक श्रम पर निर्भर हैं।

(3) ऐसी जातियां या वर्ग जिनमें राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से अधिक महिलाएं तथा 10 प्रतिशत से ज्यादा पुरुष ग्रामीण क्षेत्र में तथा कम-से-कम 10 प्रतिशत से अधिक महिलाएं एवं 5 प्रतिशत से अधिक पुरुष शहरी क्षेत्र में 17 साल की आयु से पहले ही वैवाहिक पाए जाते हैं।

(4) ऐसी जातियां या वर्ग जहां कार्यों में महिलाओं की भागीदारी राज्य के औसत से कम-से-कम 25 प्रतिशत अधिक है।

2. शैक्षणिक मापदण्ड (Educational Standard):
(1) ऐसी जातियां या वर्ग जहां 5 से 15 साल की आयु वर्ग में कभी स्कूल न जाने वाले बच्चों की संख्या राज्य के अनुपात से कम-से-कम 25 प्रतिशत अधिक है।

(2) ऐसी जातियां या वर्ग जहाँ स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की संख्या राज्य के औसत से कम-से-कम 25 प्रतिशत अधिक है।

(3) ऐसी जातियां या वर्ग जिनमें 10वीं पास लोगों की संख्या राज्य के औसत से कम-से-कम 25 प्रतिशत कम है।

3. आर्थिक मापदण्ड (Economic Standard):

  • ऐसी जातियां या वर्ग जिनकी पारिवारिक सम्पत्ति का मूल्य राज्य के औसत से कम-से-कम 25 प्रतिशत कम है।
  • ऐसी जातियां या वर्ग जिनमें कच्चे घरों में रहने वाले परिवारों की संख्या राज्य के औसत से 25 प्रतिशत से अधिक है।
  • ऐसी जातियां या वर्ग जहां 50 प्रतिशत से अधिक परिवारों के लिए पीने के पानी का स्रोत आधा किलोमीटर से दूर है।
  • ऐसी जातियां या वर्ग जिनमें उपभोक्ता ग्रहण (Consumption Loan) लेने वाले परिवारों की संख्या राज्य के औसत से कम-से-कम 25 प्रतिशत अधिक है।

मण्डल आयोग ने उपरोक्त मापदण्डों के आधार पर 1931 के जनगणना आंकड़ों से वर्ग समुदाय सम्बन्धी आंकड़े प्राप्त किए तथा उनको पांच प्रमुख शीर्षकों के अधीन इस प्रकार बांटा है
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इस प्रकार मण्डल आयोग ने कुल जनसंख्या के 52 प्रतिशत भाग को पिछड़े वर्ग के रूप में माना। इसमें हिन्दू तथा गैर-हिन्दू दोनों समुदायों के पिछड़े वर्गों को शामिल किया गया है। आयोग ने यह भी माना है कि धर्म परिवर्तन के बाद यह समह जाति रूढिवादिता तथा पिछडेपन से स्वतन्त्र नहीं हो सके हैं। आयोग ने इनके लिए जाति आधार की अपेक्षा अग्रलिखित आधारों का प्रयोग किया है

(A) धर्म परिवर्तन करने वाले सभी अछूत जातियां तथा
(B) कुछ हिन्दू जातियों को व्यावसायिकता के आधार पर भी पिछड़े वर्गों में शामिल किया। इन जातियों में बार्बर, धोबी, गुज्जर, लुहार आदि वर्णन योग्य हैं। आयोग ने सभी महिलाओं को भी पिछड़े वर्गों में रखा।

27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश:
मण्डल आयोग का यह मानना है कि पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने से दलितों की स्थिति में परिवर्तन आएगा। इसलिए आयोग ने पिछड़े वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए संविधान की धारा 15 (4), 16 (4) तथा सर्वोच्च न्यायालय के उन सब निर्णयों का पालन किया है जिसके अनुसार देश में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक नहीं किया जा सकता। इसलिए आयोग ने पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत
आरक्षण की निम्नलिखित योजना प्रस्तुत की

  • अन्य पिछड़े वर्गों के उन सदस्यों को जो खुली प्रतियोगिता द्वारा नियुक्त किए गए हैं, 27 प्रतिशत आरक्षण के अन्तर्गत न माने जाएं।
  • आरक्षण की यही व्यवस्था पदोन्नति के लिए सभी स्तरों पर लागू मानी जाएगी।
  • आरक्षित पद यदि रिक्त है तो उसे तीन वर्ष तक आरक्षित रखा जाए। इसके बाद इसे गैर-आरक्षित कर दिया जाए।
  • अनुसूचित जातियों एवं जन-जातियों की तरह पिछड़े वर्ग के उम्मीदवार को भी सीधी भर्ती के मामले में आय सीमा में छूट दी जाए।

मण्डल आयोग ने सिफारिश की थी कि पिछड़े वर्गों से सम्बन्धित 27 प्रतिशत आरक्षण की यह व्यवस्था सभी सार्वजनिक उद्यमों, सरकारी सहायता प्राप्त निजी उद्यमों, विश्वविद्यालयों तथा उनसे सम्बन्धित कॉलेजों में लागू की जानी चाहिए। आयोग ने यह स्पष्ट किया है कि जिन राज्यों में 27 प्रतिशत से अधिक की व्यवस्था लागू की जा चुकी है उसे वैसा ही रखा जाए अर्थात् अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण कम-से-कम था।

आयोग का यह भी मानना था कि शिक्षा के माध्यम से पिछड़े वर्गों की सामाजिक दशा में सुधार किया जा सकता है। इसलिए इन वर्गों के विद्यालयों के लिए व्यावसायिक शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए। पिछड़े वर्ग के विद्यार्थियों के लिए तकनीकी एवं व्यावसायिक संस्थाओं में प्रशिक्षण की अधिक सुविधा होनी चाहिए।

पिछड़े वर्गों की सहायता के लिए आयोग ने वित्तीय संस्थाओं तथा सहकारी संस्थाओं की भी सिफ़ारिश की। इन वर्गों में औद्योगिक उद्यमों को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य सरकारों को भी अपने स्तर पर वित्तीय तथा तकनीकी संस्थाओं की स्थापना का सुझाव दिया। आयोग ने केन्द्र तथा राज्य सरकारों को वर्तमान भूमि सम्बन्धों को बदलने के लिए भूमि सुधार कानूनों के निर्माण तथा उसे लागू करने के लिए कहा।

आयोग ने यह भी सिफ़ारिश की कि आरक्षण की व्यवस्था को लागू करने के लिए एक पिछड़ा वर्ग विकास निगम (Backward Class Development Corporation) का निर्माण किया जाए। मण्डल आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की इस सिफ़ारिश से लोगों के दिलों में धड़कन बढ़ जाएगी, पर क्या इसी एक तथ्य के कारण एक बड़े सामाजिक हित के कार्य को रोक दिया जाए ?

प्रश्न 10.
ताड़ी विरोधी आन्दोलन क्या था ? इस आन्दोलन का आरम्भ क्यों हुआ?
उत्तर:
ताड़ी विरोधी आन्दोलन शराब माफिया के विरुद्ध चलाया गया एक महत्त्वपूर्ण आन्दोलन था। इस आन्दोलन का आरम्भ 1990 के दशक में आध्र-प्रदेश में हुआ। ताड़ी सामान्यतः देसी शराब को कहते हैं। इस प्रकार की शराब का निर्माण घरों में ही हो जाता है। ताड़ी के विरोध में आन्ध्र प्रदेश की महिलाओं ने आन्दोलन चलाया। उन्होंने इसके निर्माण एवं वितरण पर रोक लगाने की मांग की। इस आन्दोलन के प्रारम्भ होने के निम्नलिखित कारण थे

  • ताड़ी पीने के कारण लोगों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही थी।
  • ताड़ी पीने के कारण लोगों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति खराब हो रही थी, जिसका प्रभाव प्रतिदिन के कार्यों एवं खेती बाड़ी पर पड़ रहा था।
  • ताड़ी पीने के कारण पुरुष कोई कार्य नहीं करते थे, जिससे सारा कार्य महिलाओं को करना पड़ता था।
  • ताड़ी बनाने वाले लोगों को ताड़ी पीने के लिए प्रोत्साहित करते थे, और प्रायः कृषि भूमि कर्ज में चली जाती है।
  • ताड़ी के नशे में पुरुष घरों में महिलाओं एवं बच्चों से मारपीट करते थे। (6) ताड़ी के कारण घरों एवं गांवों में तनाव रहने लगा था।

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प्रश्न 11.
जन अथवा सामाजिक आन्दोलन भारतीय लोकतन्त्र को कैसे सुदृढ़ बनाते हैं ? इनकी क्या सीमाएं हैं ?
उत्तर:
जन अथवा सामाजिक आन्दोलन भारतीय लोकतन्त्र को सुदृढ़ बनाते हैं। जन आन्दोलन अथवा सामाजिक आन्दोलन का अर्थ केवल सामूहिक कार्यवाही ही नहीं होता, बल्कि आन्दोलन का एक काम सम्बन्धित लोगों को अपने अधिकारों एवं कर्तव्यों के प्रति जागरूक बनाना भी है। भारत में चलने वाले विभिन्न सामाजिक आन्दोलनों ने लोगों को इस सम्बन्ध में जागरूक बनाया है, तथा लोकतन्त्र को मज़बत किया है।

भारत में समय-समय ताड़ी विरोधी आन्दोलन, नर्मदा बचाओ आन्दोलन तथा सरदार सरोवर परियोजना से सम्बन्धित आन्दोलन चलते रहते हैं। इन आन्दोलनों ने कहीं-कहीं भारतीय लोकतन्त्र को मज़बूत ही किया है। इन सभी आन्दोलनों का उद्देश्य भारतीय दलीय राजनीति की समस्या को दूर करना था।

सामाजिक आन्दोलन ने उन वर्गों के सामाजिक-आर्थिक हितों को उजागर किया, जोकि समकालीन राजनीतिक द्वारा नहीं उभारे जा रहे थे। इस प्रकार सामाजिक आन्दोलनों ने समाज के गहरे तनाव और जनता के क्रोध को एक सकारात्मक दिशा देकर भारतीय लोकतन्त्र को सुदृढ़ किया है। इसके साथ-साथ सक्रिय राजनीति भागेदारी के नये-नये रूपों के प्रयोगों ने भी भारतीय लोकतन्त्र के जनाधार को बढ़ाया है।

ये आन्दोलन जनसाधारण की उचित मांगों को उभार कर सरकार के सामने रखते हैं तथा इस प्रकार जनता के एक बड़े भाग को अपने साथ जोड़ने में सफल रहते हैं। अत: जिस आन्दोलन में इतनी बड़ी संख्या में लोग भाग लेते हैं, उसको समाज की स्वीकृति भी प्राप्त होती है तथा इससे देश में लोकतन्त्र को मजबूती भी मिलती है।

प्रश्न 12.
दलित पैंथर्स की गतिविधियों एवं सफलताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
दलित पैंथर्स की स्थापना सन 1972 में महाराष्ट्र में हई। दलित पैंथर्स दलित यवाओं का एक संगठन था। दलित पँथर्स नामक संगठन में ज्यादातर शहर की मलिन बस्तियों में रहने वाले युवा शामिल थे। दलित पैंथर्स के निम्नलिखित उद्देश्य थे–

  • जाति आधारित असमानता को समाप्त करना इस संगठन का मुख्य उद्देश्य था।
  • आरक्षण के कानूनों को लागू करना।
  • सामाजिक न्याय की स्थापना करना।
  • छुआछूत को पूरी तरह समाप्त करना।

गतिविधियां एवं सफलताएं-महाराष्ट्र के अलग-अलग क्षेत्रों में दलितों पर बढ़ रहे अत्याचार से लड़ना दलित पैंथर्स की मुख्य गतिविधि थी। इस संगठन के बार-बार मांग करने पर 1989 में एक कानून बनाया गया, जिसके अन्तर्गत दलित पर अत्याचार करने पर कठोर सजा का प्रावधान किया गया।

इस संगठन का व्यापक विचारात्मक एजेण्डा जाति प्रथा को समाप्त करना तथा भूमिहीन, गरीब किसान, शहरी औद्योगिक मज़दूर और दलित सहित सभी वंचित वर्गों का एक संगठन बनाना था। इस दौरान अनेक आत्मकथाएं एवं साहित्यिक रचनाएं लिखी गईं। दलितों के दबे-कुचले जीवन के अनुभव इन रचनाओं में अंकित थे। इस रचनाओं से मराठी भाषा के साहित्य पर बड़ा प्रभाव पड़ा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
लोकप्रिय आन्दोलन का क्या अर्थ है ? दल आधारित एवं गैर-दल आधारित आन्दोलन की व्याख्या करें।
उत्तर:
लोकप्रिय आन्दोलन का अर्थ यह है कि एक आन्दोलन के साथ अधिक-से-अधिक लोगों को जुड़ना। एक आन्दोलन के साथ जितने अधिक लोग जुड़ते जायेंगे, वह आन्दोलन उतना ही अधिक लोकप्रिय होता जायेगा। जो आन्दोलन किसी संगठित दल द्वारा चलाया जाए, उसे दल आधारित आन्दोलन कहा जाता है तथा जो आन्दोलन बिना किसी दल के द्वारा चलाया जाए, उसे गैर-दल आधारित आन्दोलन कहा जाता है। गुजरात आन्दोलन एवं बिहार आन्दोलन दल आधारित आन्दोलन माने जाते हैं तथा चिपको आन्दोलन एवं नर्मदा बचाओ गैर-दल आधारित आन्दोलन माने जातें हैं।

प्रश्न 2.
किन्हीं चार किसान आन्दोलनों का वर्णन करें।
उत्तर:
1. तिभागा आन्दोलन-तिभागा आन्दोलन 1946-47 में बंगाल में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों एवं बंटाईदारों का संयुक्त प्रयास था। इस आन्दोलन का मुख्य कारण भीषण अकाल था।

2. तेलंगाना आन्दोलन-तेलंगाना आन्दोलन हैदराबाद राज्य में 1946 में जागीरदारों द्वारा की जा रही जबरन एवं अत्यधिक वसूली के विरोध में चलाया गया क्रान्तिकारी किसान आन्दोलन था। क्रान्तिकारी किसानों ने पांच हज़ार गुरिल्ला सैनिक तैयार किए और ज़मीदारों के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। भारत सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर यह आन्दोलन समाप्त हो गया।

3. नक्सलबाड़ी आन्दोलन-नक्सलबाड़ी आन्दोलन 1967 में साम्यवादी सरकार के समय शुरू हुआ। धीरे-धीरे यह आन्दोलन पंजाब, उत्तर-प्रदेश तथा काश्मीर में भी फैल गया।

4. आधुनिक आन्दोलन-1980 के दशक में महाराष्ट्र, गुजरात तथा पंजाब के किसानों ने कपास के दामों को कम किए जाने के विरोध में आन्दोलन किया। 1987 में किसानों द्वारा गुजरात विधानसभा का घेराव किये जाने के कारण पुलिस ने किसानों पर तरह-तरह के अत्याचार किए।

प्रश्न 3.
महिला कल्याण के लिए संसद् द्वारा पारित किन्हीं दो अधिनियमों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
भारत में महिलाओं की स्थिति सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से अत्यन्त पिछड़ी हुई है। महिलाओं के कल्याण के लिए स्वतन्त्रता से पूर्व भी समाज सुधारकों तथा राष्ट्रीय नेताओं ने अनेक सराहनीय प्रयास किए। ब्रह्म समाज, आर्य समाज, प्रार्थना समाज तथा अनेक सामाजिक आन्दोलनों द्वारा महिलाओं के प्रति अन्याय का विषय प्रमुखता से उठाया गया।

19वीं शताब्दी में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम (1829), विधवा पुनर्विवाह अधिनियम (1856), सिविल मैरिज अधिनियम (1872) आदि अनेक कदम उठाए गए। स्वतन्त्रता के बाद महिलाओं के कल्याण के लिए अनेक कानून बनाए गए जिनमें तीन कानूनों का वर्णन इस प्रकार हैं-

  • हिन्दू विवाह अधिनियम (1955),
  • हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम (1956),
  • दहेज निषेध अधिनियम (1961),
  • गर्भपात अधिनियम (1971), बाल-विवाह पर रोक (संशोधन अधिनियम) 1978,
  • दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम (1984) आदि।

प्रश्न 4.
राष्ट्रीय महिला आयोग पर नोट लिखिए।
उत्तर:
राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए की गई है। इस आयोग में एक अध्यक्ष और 5 अन्य सदस्य होते हैं। अध्यक्ष की नियुक्ति केन्द्र सरकार द्वारा की जाती है। वर्तमान समय में श्रीमती गिरिजा व्यास राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष हैं। अन्य सदस्यों की नियुक्ति ऐसे व्यक्तियों में से की जाती है, जो कानून के जानकार हों तथा प्रशासनिक योग्यता रखते हों, तथा महिलाओं के कल्याण के इच्छुक हों। आयोग का एक सचिव होता है, जिसकी नियुक्ति केन्द्र सरकार करती है। आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों का कार्यकाल 3 साल से अधिक नहीं हो सकता। केन्द्र सरकार किसी सदस्य को समय से पहले भी हटा सकती है।

प्रश्न 5.
भारत में महिलाओं की सक्षमता के लक्ष्य को पूरा करने में राष्ट्रीय महिला आयोग की भूमिका बताइए।
उत्तर:
भारत में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए 1990 में संसद् ने एक कानून बनाया जो कि 31 जनवरी, 1992 को अस्तित्व में आया। इस कानून के तहत महिला राष्ट्रीय आयोग (National Woman Commission) की स्थापना की गई। महिला राष्ट्रीय आयोग को बहुत अधिक और व्यापक कार्य दिये गए हैं। महिला राष्ट्रीय आयोग वे सभी कार्य करता है, जो महिलाओं की उन्नति एवं अधिकार से जुड़े हुए हैं।

यह आयोग महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संसद् को कानून बनाने के लिए उस पर दबाव डालती है। संसद् द्वारा पास किये गए ऐसे कानूनों की आयोग समीक्षा करता है, जो महिलाओं के अधिकारों से सम्बन्धित हैं। यह आयोग महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की जांच करता है, तथा दोषी को दण्ड दिलवाने की सिफारिश करता है। इसके साथ-साथ यह आयोग महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए प्रयासरत रहता है।

प्रश्न 6.
‘ताड़ी विरोधी आन्दोलन’ के कोई चार प्रभाव बताइए।
उत्तर:

  • ताड़ी विरोधी आन्दोलन के कारण महिलाओं में काफ़ी जागरूकता फैली।
  • महिलाएं अब घरेलू हिंसा के मुद्दे पर खुलकर बोलने लगीं।
  • इस आन्दोलन के कारण दहेज प्रथा, कार्य स्थल एवं सार्वजनिक स्थानों पर यौन उत्पीड़न के मामले मुख्य मुद्दे बन गए।
  • आन्दोलन के कारण लैंगिक समानता के सिद्धान्त पर आधारित व्यक्तिगत एवं सम्पत्ति कानूनों की मांग की जाने लगी।

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प्रश्न 7.
महिलाओं की सामाजिक स्थिति पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
“यत्र नार्यास्तु पूजयन्ते, रमन्ते तत्र देवता” अर्थात् जहां नारी की उपासना होती है वहां देवताओं का निवास होता है। नारी के विषय में इसी प्रकार की अनेक गर्वोक्तियां अनादि काल से सुनाई पड़ रही हैं। परन्तु वास्तव में समाज में नारी की स्थिति इसके सर्वथा विपरीत है। प्रत्येक समाज का स्वरूप इस प्रकार का बना हुआ है कि इसमें पुरुष की प्रधानता बनी रहे।

ऐसी स्थिति में स्त्री के विषय में कहा जाता है कि वह दोहरी दासता की शिकार है। एक दासता पुरातन रूढ़ियों व परम्पराओं की ओर दूसरी पुरुष की। जैसे ही नारी के कदम घर की दहलीज़ से बाहर निकलते हैं, सामाजिक बाधाएं उस पर हावी हो जाती हैं। विशेषतः मुस्लिम समाज में पर्दा प्रथा को स्वीकार किया गया है।

कट्टरपन्थी यह तय करते हैं कि विशेष समुदाय के लोग क्या पहनें और क्या खाएं तथा कैसे अपने उत्सव मनाएं। मुसलमानों में स्त्रियों को पर्दा करने अथवा बुर्का ओढ़ने के नियमों को कट्टरता से पालन करना पड़ता है। ऐसा न करने पर उन्हें कठोर दण्ड का भागीदार बनाना पड़ता है। भेदभाव के कारण स्त्रियों को समुचित शिक्षा व्यवस्था भी नहीं दिलाई जाती जिसके परिणामस्वरूप स्त्रियां निरक्षर रह जाती हैं।

विशेष रूप से विकासशील राज्यों में महिलाओं की सबसे बड़ी समस्या अशिक्षा है। 1991 में किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार संसार की 33.6 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर थीं। 1991 में की गई जनगणना के आंकड़े भी दर्शाते हैं कि भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की निरक्षरता दर अधिक है। अशिक्षा के कारण स्त्रियां न तो अपने अधिकारों को समझ पाती हैं और न ही उनकी रक्षा कर सकती हैं। इसलिए वे अनवरत शोषण की शिकार बनी रहती हैं।

प्रश्न 8.
भारत में किसान आन्दोलन’ की विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • किसान आन्दोलन के कारण भारत में किसानों की स्थिति अच्छी एवं मज़बूत हुई।
  • किसान आन्दोलन पूर्ण रूप से संगठित नहीं थे।
  • बड़े-बड़े जमीदारों ने अपने आप को किसान नेता के रूप में स्थापित करके अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति की।
  • किसान आन्दोलन में स्थायित्व का अभाव पाया जाता है।

प्रश्न 9.
महिला सशक्तिकरण हेतु भारतीय संविधान में दिए गए विभिन्न अनुच्छेदों में से किन्हीं चार अनुच्छेदों का वर्णन करें।
अथवा
भारत में महिला सशक्तिकरण हेतु संवैधानिक प्रावधान का उल्लेख करें।
उत्तर:
(1) संविधान के अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत महिलाओं को भी सभी नागरिकों सहित कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण प्राप्त है।

(2) अनुच्छेद 15 के अनुसार भेदभाव की मनाही की गई है। इसका अभिप्राय है कि राज्य महिलाओं के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता। अनुच्छेद 15 के अन्तर्गत ही यह व्यवस्था की गई है कि राज्य महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए विशेष कदम उठा सकता है।

(3) अनुच्छेद 39 (क) के अनुसार राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा कि सभी स्त्री-पुरुषों को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों।

(4) अनुच्छेद 39 (घ) के अनुसार स्त्रियों और पुरुषों को समान काम के लिए समान वेतन मिले।

प्रश्न 10.
‘चिपको आन्दोलन’ करने वालों की मुख्य मांगें क्या थी ?
उत्तर:

  • जंगल की कटाई का कोई भी ठेका बाहरी व्यक्ति को न दिया जाए।
  • स्थानीय लोगों का जल, जंगल, जमीन जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण होना चाहिए।
  • सरकार लघु उद्योगों के लिए कम कीमत पर सामग्री उपलब्ध कराए।
  • सरकार मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी की व्यवस्था करे।

प्रश्न 11.
टिहरी बांध परियोजना के विरोध में चलाए गए आन्दोलनों पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
टिहरी बांध परियोजना के विरुद्ध चलने वाला आन्दोलन भारत का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला आन्दोलन माना जाता है। टिहरी बांध परियोजना का विरोध करने के लिए लोगों ने स्वतन्त्रता सेनानी वीरेन्द्र दत्त सखलानी के नेतृत्व में ‘टिहरी बांध परियोजना विरोधी संघर्ष समिति’ का निर्माण किया। टिहरी बांध से टिहरी शहर के पानी में डूबने का खतरा था। समाज सेवी सुन्दर लाल बहुगुणा ने इस परियोजना का विरोध करने के लिए आमरण अनशन किया तथा प्रधानमन्त्री द्वारा इस योजना की समीक्षा के आश्वासन पर ही उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ा था।

प्रश्न 12.
मण्डल आयोग के बारे में क्या जानते हैं ? इसकी किन्हीं दो सिफ़ारिशों को लिखिए।
उत्तर:
1 जनवरी, 1979 को जनता पार्टी की सरकार ने मण्डल आयोग का गठन किया। इस आयोग के चार सदस्य थे और बिहार के भूतपूर्व मुख्यमन्त्री बी० पी० मण्डल इसके अध्यक्ष थे। इस आयोग का कार्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप वर्गों की पहचान करना तथा उनके विकास के लिए सुझाव देना था। मण्डल कमीशन ने 13 दिसम्बर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की। मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 3743 पिछड़ी जातियों की पहचान की। मण्डल आयोग की मुख्य सिफ़ारिशें निम्नलिखित हैं

  • सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण होना चाहिए।
  • अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के कल्याण के लिए बनाए गए कार्यक्रम के लिए धन केन्द्रीय सरकार को देना चाहिए।
  • भूमि सुधार शीघ्र किए जाएं ताकि छोटे किसानों को अमीर किसानों पर निर्भर न रहना पड़े।
  • अन्य पिछड़े वर्गों को लघु उद्योग लगाने के लिए सहायता दी जाए तथा उन्हें प्रोत्साहित किया जाए।
  • अन्य पिछड़े वर्गों के लिए विशेष शिक्षा योजनाएं लागू की जाएं।

प्रश्न 13.
आरक्षण नीति के पक्ष में कोई चार तर्क दें।
उत्तर:
1. आर्थिक उन्नति में सहायक-आरक्षण की नीति का समर्थन करने वालों का मत है कि इससे समाज के ग़रीब वर्गों के लिए वर्षों से रुके हुए व्यवसाय के अवसर खुलेंगे, जिससे उनकी आर्थिक उन्नति होगी।

2. सामाजिक सम्मान में वृद्धि-आरक्षण की नीति के फलस्वरूप कमजोर वर्ग के लोग सार्वजनिक सेवा के किसी भी उच्च पद को प्राप्त करने में सफल हो सकेंगे, जिससे उनके सामाजिक सम्मान में वृद्धि होगी।

3. राजनीतिक चेतना में वृद्धि-कमजोर वर्गों के शिक्षित लोग अब अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति पहले से अधिक जागरूक हैं। यह सब साक्षरता की व्यवस्था लागू करने के परिणामस्वरूप ही सम्भव हो पाया है।

4. राजनीतिक भागीदारी में वृद्धि-आरक्षण की नीति के कारण समाज के उच्च वर्गों के साथ-साथ निम्न वर्गों को भी शासन प्रणाली और राजनीतिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी निभाने का अवसर मिलता है।

प्रश्न 14.
आरक्षण के विरोध में कोई चार तर्क दें।
उत्तर:
1. जातिवाद को बढ़ावा-आरक्षण आर्थिक आधार पर न होकर जातिगत आधार पर तय किया गया है। इसलिए इस व्यवस्था का लाभ उठाने के लिए जातिवाद को बहुत अधिक बढ़ावा मिला है।

2. आरक्षण का लाभ सभी लोगों को नहीं मिला-आरक्षण का लाभ अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों के सभी लोगों को नहीं मिल पाया है। इसका लाभ इन जातियों के एक छोटे से वर्ग ने उठाया है।

3. निर्भरता को बढ़ावा-आरक्षण के कारण अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों तथा पिछड़े वर्गों की आत्म निर्भरता में कमी हई है। ये जातियां स्वेच्छा से अपनी उन्नति करने की अपेक्षा आरक्षण को सीढी बनाकर ऊपर उठना चाहते हैं। ये जातियां आरक्षण के बिना अपना विकास सम्भव नहीं मानती हैं।

4. समानता के सिद्धान्त के विरुद्ध-भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 से 18 में सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान किया गया है। परन्तु आरक्षण की व्यवस्था इस समानता के विरुद्ध है।

प्रश्न 15.
दलित पैंथर्स कौन थे ? उनका उद्देश्य क्या था ?
अथवा
दलित पैंथर्स ने कौन-से मुद्दे उठाए ?
उत्तर:
दलित पैंथर्स दलित युवाओं का एक संगठन था। दलित पैंथर्स नामक संगठन में ज्यादातर शहर की मलिन बस्तियों में रहने वाले युवा शामिल थे। दलित पैंथर्स के निम्नलिखित उद्देश्य थे

  • जाति आधारित असमानता को समाप्त करना इस संगठन का मुख्य उद्देश्य था।
  • आरक्षण के कानूनों को लागू करना।
  • सामाजिक न्याय की स्थापना करना।
  • छुआछूत को पूरी तरह समाप्त करना।

प्रश्न 16.
चिपको आन्दोलन के विभिन्न पहलू बताइए।
उत्तर:
चिपको आन्दोलन के निम्नलिखित पहलू सामने आए

(1) चिपको आन्दोलन का एकदम नया पहलू यह था कि इसमें महिलाओं ने सक्रिय भागेदारी की।

(2) महिलाओं ने शराबखोरी की लत के खिलाफ भी आवाज़ उठाई।

(3) आन्दोलन के कारण सरकार ने अगले 15 सालों के लिए हिमालयी क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी, ताकि बनाच्छादन फिर से ठीक स्थिति में लाया जा सके।

(4) चिपको आन्दोलन सत्तर के दशक और उसके बाद के वर्षों में देश के विभिन्न भागों में शुरू हुए कई जन आन्दोलनों का प्रतीक बन गया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 17.
नर्मदा बचाओ आन्दोलन क्या था ? इसके विरुद्ध क्या आलोचना की गई है ?
उत्तर:
नर्मदा बांध परियोजना के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आन्दोलन चलाया गया। पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन नर्मदा बचाओ आन्दोलन को माना जाता है। इस आन्दोलन को चलाने में मेधा पाटकर, बाबा आमटे तथा सुन्दर लाल बहुगुणा शामिल हैं। आन्दोलन के समर्थकों की मांग है कि बांध परियोजना के पूर्ण होने पर कई लाख लोग बेघर हो जाएंगे, अतः सरकार इनके पुनर्वास की पूर्ण व्यवस्था करे।

परन्तु नर्मदा बचाओ आन्दोलन को सफलता के साथ-साथ कुछ आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ा है। आलोचकों के अनुसार आन्दोलन का नकारात्मक रुख विकास प्रक्रिया, पानी की उपलब्धता तथा आर्थिक विकास में बाधा उत्पन्न कर रहा है। इसी कारण यह आन्दोलन मुख्य विपक्षी दलों के बीच अपना महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं बना पाया है।

प्रश्न 18.
‘सूचना के अधिकार’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सूचना का अर्थ यह है, कि नागरिकों को ज्ञात होना चाहिए कि सरकार उनके कल्याण के लिए क्या-क्या योजनाएं बना रही हैं। किस योजना पर कितना धन एवं क्यों खर्च कर रही है। इस प्रकार की जानकारी जब हम सरकार से प्राप्त करते हैं, तो उसे सूचना कहते हैं। सन् 2005 में पारित सूचना के अधिकार के कानून में यह प्रावधान किया गया है, कि कोई भी नागरिक सलाह, विचार, ई-मेल, अभिलेख, दस्तावेज़, प्रेस विज्ञापन तथा मीडिया द्वारा प्रसारित आंकड़ों से ऐसी प्रत्येक सूचना सरलता से प्राप्त कर सकते हैं, जिस तक कि किसी सार्वजनिक अधिकारी की कानूनी पहुंच हो। सूचना प्राप्त करने के लिए आवेदनकत्तो को 10 रु. के मामूली शुल्क के साथ दस्तावेजों की प्रतिलिपि अथवा सी० डी० जन सूचना अधिकारी को देनी होगी।

प्रश्न 19.
जन आन्दोलन की कोई चार विशेषताएं लिखिए।
अथवा
जन आन्दोलनों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • जन आन्दोलनों ने समाज के उन नए वर्गों की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं को अभिव्यक्ति दी जो अपनी समस्याओं को चुनावी राजनीति के माध्यम से हल नहीं कर पा रहे थे।
  • जन आन्दोलन सामाजिक समूहों के लिए अपनी बात उचित ढंग से रखने के बेहतर मंच बन कर उभरे।
  • इन आन्दोलनों ने जनता के क्रोध एवं तनाव को एक सार्थक दिशा देकर लोकतन्त्र को मज़बूत किया।
  • इन आन्दोलनों ने भारतीय लोकतन्त्र के जनाधार को बढ़ाया है।

प्रश्न 20.
सूचना के अधिकार की चार विशेषताएं लिखो।
उत्तर:

  • वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना-सूचना के अधिकार से वास्तविक लोकतंत्र की स्थापना होती है।
  • भ्रष्टाचार की समाप्ति सूचना के अधिकार से प्रशासन में से भ्रष्टाचार की समाप्ति होती है।
  • कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी-सूचना के अधिकार से लोगों को कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी मिलती है।
  • कार्यकुशलता में वृद्धि–सूचना के अधिकार से कर्मचारियों की कार्यकुशलता में वृद्धि होती है।

प्रश्न 21.
राष्ट्रीय महिला आयोग के कोई चार कार्य लिखें।
अथवा
राष्ट्रीय महिला आयोग के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय महिला आयोग संसद् द्वारा पास किए गए उन कानूनों की समीक्षा करता है जो महिलाओं के अधिकारों से सम्बन्धित है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की जांच करता है तथा दोषी को दण्ड दिलवाने की सिफ़ारिश करता है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक अधिकार दिलाने के लिए प्रयासरत रहता है।
  • महिलाओं से सम्बन्धित किसी भी मामले के बारे में और विशेष करके जिन कठिनाइयों में महिलाएं काम करती हैं, उनके बारे में सरकार को नियतकालीन रिपोर्ट देना।

प्रश्न 22.
भारतीय किसान यूनियन की मुख्य माँगें क्या थी ?
उत्तर:
भारतीय किसान यूनियन की मुख्य माँगें निम्नलिखित थीं

  • भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूँ के सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोत्तरी की मांग की।
  • कृषि उत्पादों के अन्तर्राज्जीय आवाजाही पर लगी पाबंदियों को हटाने की मांग की।
  • समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने की मांग।
  • किसानों के बकाया कर्ज माफ करने तथा किसानों के लिए पेंशन का प्रावधान करने की मांग।

प्रश्न 23.
महिला सशक्तिकरण वर्ष 2001 की मुख्य घोषणाएं बताएं।
उत्तर:

  • महिलाओं को आर्थिक पक्ष से सुदृढ़ बनाने के लिए राष्ट्रीय महिला कोष गठित किया जाएगा।
  • महिलाओं को आत्म-निर्भर बनाने के लिए ‘स्वशक्ति योजना’ लागू की जाएगी।
  • आपदाग्रस्त महिलाओं के पुनर्वास के लिए ‘स्वधार योजना’ चलाई जाएगी।
  • महिलाओं को संसद एवं राज्य की विधानसभाओं में 33% स्थान आरक्षित करने के प्रयत्न किये जायेंगे।

प्रश्न 24.
महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता के कारण बताइये।
उत्तर:

  • महिलाओं को पुरुषों के समान अधिकार प्राप्त न होना।
  • महिलाओं की आर्थिक स्थिति निम्न स्तर की होना एवं इसके लिए पुरुषों पर निर्भर होना।
  • सामाजिक स्तर पर महिलाओं का कमजोर होना।
  • महिलाओं को राजनीतिक अधिकार प्राप्त न होना।

आत लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
कृषक आन्दोलन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जो आन्दोलन कृषकों के हितों की पूर्ति के लिए चलाए जाते हैं, उन्हें कृषक आन्दोलन कहते हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है, अत: यहां पर किसानों से सम्बन्धित दबाव समूहों द्वारा किसानों को अपने हितों की पूर्ति के लिए जागरूक करके आन्दोलन करते रहते हैं। उदाहरण के लिए स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत में तिभागा आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन, नक्सलवादी आन्दोलन चलाए गए।

प्रश्न 2.
किन्हीं दो किसान आन्दोलनों के नाम लिखें।
उत्तर:
1.तिभागा आन्दोलन-तिभागा आन्दोलन 1946-1947 में बंगाल में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन मुख्यतः जोतदारों के विरुद्ध मझोले किसानों एवं बंटाईदारों का संयुक्त प्रयास था। इस आन्दोलन का मुख्य कारण भीषण अकाल था।

2. तेलंगाना आन्दोलन तेलंगाना आन्दोलन हैदराबाद राज्य में 1946 में जागीरदारों द्वारा की जा रही जबरन एवं अत्यधिक वसूली के विरोध में चलाया गया क्रान्तिकारी आन्दोलन था। क्रान्तिकारी किसानों ने पांच हज़ार गुरिल्ला सैनिक तैयार किए और ज़मींदारों के विरुद्ध संघर्ष आरम्भ कर दिया। भारत सरकार द्वारा हस्तक्षेप करने पर यह आन्दोलन समाप्त हो गया।

प्रश्न 3.
महिला सशक्तिकरण का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
महिला सशक्तिकरण से अभिप्राय महिलाओं को अपने व्यक्तित्व के विकास के पूर्ण अवसर उपलब्ध करवाना है, ताकि वे समाज में पुरुषों के समान सामाजिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण विश्वास के साथ कार्य कर सके। महिला सशक्तिकरण के लिए यह अनिवार्य है कि महिलाओं को उनकी वर्तमान उपेक्षित स्थिति से मुक्ति दिलाई जाए। उन्हें आर्थिक क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाया जाए। सामाजिक और राजनीतिक जीवन में उन्हें आगे बढ़ने के अवसर दिए जाएं। इन सबसे अधिक महिलाओं को भी इंसान समझा जाए और उन्हें समाज में अपनी भमिका निभाने का मौका दिया जाए।

प्रश्न 4.
मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत महिलाओं के कल्याण के बारे में क्या व्यवस्थाएं की गई हैं ?
उत्तर:
मौलिक अधिकारों के अन्तर्गत महिलाओं के कल्याण के बारे में निम्नलिखित व्यवस्थाएं की गई हैं

  • संविधान के अनुच्छेद 14 के अन्तर्गत महिलाओं को भी सभी नागरिकों सहित कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण प्राप्त है।
  • अनुच्छेद 15 के अनुसार भेदभाव की मनाही की गई है। इसका अभिप्राय है कि राज्य महिलाओं के साथ लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता।
  • अनुच्छेद 15 के अन्तर्गत ही यह व्यवस्था की गई है कि राज्य महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए विशेष कदम उठा सकता है।

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प्रश्न 5.
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में महिलाओं के कल्याण सम्बन्धी क्या व्यवस्थाएं की गई हैं ?
उत्तर:
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धान्तों में महिलाओं के कल्याण के विषय में निम्नलिखित व्यवस्थाएं की गई हैं

  • राज्य अपनी नीति का संचालन इस प्रकार करेगा कि सभी स्त्री-पुरुषों को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त हों (अनुच्छेद 39)
  • स्त्रियों और पुरुषों के समान काम के लिए समान वेतन मिले। (अनुच्छेद 39)

प्रश्न 6.
महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति, 2001 के दो मुख्य उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:
महिला सशक्तिकरण की राष्ट्रीय नीति, 2001 के प्रमुख उद्देश्य इस प्रकार हैं

  • न्याय प्रणाली को बेहतर बनाकर महिलाओं के विरुद्ध होने वाले भेदभाव की मनाही।
  • सकारात्मक आर्थिक तथा सामाजिक नीतियों द्वारा ऐसा वातावरण बनाना जिसमें महिलाएं अपनी पूर्ण क्षमता की पहचान कर सकें और उनके व्यक्तित्व का पूर्ण विकास हो सके।

प्रश्न 7.
राष्ट्रीय महिला आयोग के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय महिला आयोग संसद् द्वारा पास किए गए उन कानूनों की समीक्षा करता है जो महिलाओं के अधिकारों से सम्बन्धित है।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों की जांच करता है तथा दोषी को दण्ड दिलवाने की सिफ़ारिश करता है।

प्रश्न 8.
आप महिला सशक्तिकरण के लिए कौन-कौन से सुझाव देंगे ?
उत्तर:
(1) महिलाओं के लिए उचित शिक्षा व्यवस्था की जाए ताकि उनका मानसिक विकास हो सके। इससे उनका दृष्टिकोण व्यापक होगा और वे अपने अधिकारों के प्रति सजग होंगी।

(2) महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव किया जाना चाहिए। महिलाएं भी पुरुषों के समान क्षमतावान और सूझबूझ रखती हैं। महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए अवसर प्रदान किए जाने चाहिएं।

प्रश्न 9.
टिहरी बांध परियोजना के विरुद्ध-चलाए गए आन्दोलन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
टिहरी बांध परियोजना के विरुद्ध चलने वाला आन्दोलन भारत का सबसे लम्बे समय तक चलने वाला | माना जाता है। टिहरी बांध परियोजना का विरोध करने के लिए लोगों ने स्वतन्त्रता सेनानी वीरेन्द्र दत्त सखलानी में टिहरी बांध परियोजना विरोधी संघर्ष समिति’ का निर्माण किया। टिहरी बांध से टिहरी शहर के पानी में का खतरा था। समाजसेवी सुन्दर लाल बहुगुणा ने इस परियोजना का विरोध करने के लिए आमरण अनशन किया तथा प्रधानमन्त्री द्वारा इस योजना की समीक्षा के आश्वासन पर ही उन्होंने अपना आमरण अनशन तोड़ा था।

प्रश्न 10
चिपको आन्दोलन पर एक नोट लिखें।
अथवा
चिपको आन्दोलन का आरम्भ कब और किस राज्य से हआ ?
उत्तर:
चिपको आन्दोलन 1972 में हिमालय क्षेत्र में उत्पन्न हुआ। चिपको आन्दोलन का अर्थ है-पेड़ से चिपक जाना अर्थात् पेड़ को आलिंगनबद्ध कर लेना। जब एक ठेकेदार ने गांव के समीप जंगल में अपने कर्मचारियों को पेड़ काटने के लिए भेजा तो गांव की महिलाएं आकर पेड़ों से चिपक गई। जिसके कारण कर्मचारी पेड़ कहीं काट सके। पर्यावरण संरक्षण वे सम्बन्धित इस आन्दोलन का भारत में विशेष स्थान है।

प्रश्न 11.
‘नर्मदा बचाओ आन्दोलन’ पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
नर्मदा बांध परियोजना के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आन्दोलन चलाया गया। पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित सबसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन नर्मदा बचाओ आन्दोलन को माना जाता है। इस आन्दोलन को चलाने में मेधा पाटकर, बाबा आमटे तथा सुन्दर लाल बहुगुणा शामिल हैं। आन्दोलन के समर्थकों की मांग है कि बांध परियोजना के पूर्ण होने पर कई लाख लोग बेघर हो जाएंगे, अतः सरकार इनके पुनर्वास की पूर्ण व्यवस्था करें।

प्रश्न 12.
मण्डल आयोग के बारे में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
मण्डल आयोग ने राष्ट्रपति को अपनी रिपोर्ट कब पेश की थी?
उत्तर:
मण्डल आयोग की स्थापना जनता पार्टी की सरकार ने 1979 में की थी। इस आयोग का कार्य सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए वर्गों की पहचान करना तथा उनके विकास के लिए सुझाव देना था। मण्डल आयोग ने 13 दिसम्बर, 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को प्रस्तुत की। मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट में 3743 पिछड़ी जातियों की पहचान की।

प्रश्न 13.
‘मण्डल कमीशन’ की किन्हीं दो सिफ़ारिशों का उल्लेख कीजिये।
उत्तर:

  • सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग के लिए 27% आरक्षण होना चाहिए।
  • अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए बनाए गए कार्यक्रमों के लिए धन केन्द्र सरकार को देना चाहिए।

प्रश्न 14.
‘अन्य पिछड़े वर्ग का सम्पन्न तबका’ (Creamy Layer) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
सम्पन्न तबका पिछड़े वर्गों में वह वर्ग है जो सामाजिक आर्थिक व शैक्षणिक दृष्टि से काफ़ी सम्पन्न है और जो राजनीतिक कारणों से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का लाभ उठा रहा है। इस शब्द का प्रयोग सर्वोच्च न्यायालय ने 1992 में एक निर्णय में किया था जिसमें कहा गया कि यह वर्ग यदि सामाजिक आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न है तो उसे पिछड़ा वर्ग से अलग किया जाए क्योंकि इसे पिछड़ा वर्ग नहीं माना जा सकता।

प्रश्न 15.
मण्डल आयोग की सिफ़ारिशों को कब लागू किया गया और किस प्रकार सरकार ने लागू किया ?
उत्तर:
मण्डल आयोग की सिफारिशों को राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने 8 अगस्त, 1990 को लागू करने के लिए आदेश जारी किया।

प्रश्न 16.
एन० एफ० एफ० का पूरा नाम लिखिए। मछुआरों के जीवन के लिए एक बड़ा संकट कैसा आ खड़ा हुआ है ?
उत्तर:
एन० एफ० एफ० का पूरा नाम नेशनल फिशवर्कर्स फोरम है। केन्द्र सरकार की एक नीति के अन्तर्गत व्यावसायिक जहाजों को गहरे समुद्र में मछली मारने की इजाजत दी गई थी, जिसमें मछुआरों के जीवन के लिए एक बड़ा संकट खड़ा हो गया।

प्रश्न 17.
जन आन्दोलन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
जन आन्दोलन से अभिप्राय आन्दोलन के साथ अधिक लोगों का जुड़ना ताकि वे अपने सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति कर सकें। जन आन्दोलन के साथ जितने अधिक लोग जुड़ते जाएंगे, वह आन्दोलन उतना ही अधिक लोकप्रिय होता जाएगा। जन आन्दोलन भारतीय लोकतन्त्र को सुदृढ़ बनाते हैं। जन आन्दोलन का अर्थ केवल सामूहिक कार्यवाही ही नहीं होता, बल्कि आन्दोलन का एक काम सम्बन्धित लोगों को अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों के प्रति जागरूक भी बनाता है। भारत में चलने वाले विभिन्न सामाजिक आन्दोलनों ने लोगों को इस सम्बन्ध में जागरूक बनाया है, तथा लोकतन्त्र को मज़बूत किया है।

प्रश्न 18.
‘चिपको आन्दोलन’ का मुख्य उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
‘चिपको आन्दोलन’ का मुख्य उद्देश्य वृक्षों (वनों) की रक्षा करना था।

प्रश्न 19.
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित किन्हीं दो आन्दोलनों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • चिपको आन्दोलन।
  • नर्मदा बचाओ आन्दोलन।

प्रश्न 20.
हरियाणा में शराबबन्दी कब लागू हुई थी ?
उत्तर:
हरियाणा में शराबबन्दी सन् 1996 में लागू हुई थी।

प्रश्न 21.
किस स्थान पर हिन्दी को राजभाषा बनाने के खिलाफ आन्दोलन चला ?
उत्तर:
हिन्दी को राजभाषा बनाने के खिलाफ तमिलनाडु में आन्दोलन चलाया गया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 22.
महाराष्ट्र में दलितों के हितों की रक्षा के लिये कौन-सा संगठन बना ?
उत्तर:
महाराष्ट्र में दलितों के हितों की रक्षा के लिये दलित पैन्थर्स नाम का संगठन बना।

प्रश्न 23.
किन्हीं दो किसान आन्दोलनों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • तिभागा आन्दोलन,
  • तेलगांना आन्दोलन।

प्रश्न 24.
‘सूचना के अधिकार’ का आन्दोलन कब शुरू हुआ तथा इसका नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर:
‘सूचना के अधिकार’ का आन्दोलन सन् 1990 में शुरू हुआ तथा प्रारम्भ में इसका नेतृत्व मजदूर किसान शक्ति संगठन ने किया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्न में से कौन-सा किसान आन्दोलन माना जाता है ?
(A) तिभागा आन्दोलन
(B) तेलंगाना आन्दोलन
(C) नक्सलवादी आन्दोलन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना कब की गई ?
(A) 1920
(B) 1924
(C) 1936
(D) 1930
उत्तर:
(C) 1936

3. वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए कितने स्थानों का आरक्षण किया गया है ?
(A) 69
(B) 84
(C) 40
(D) 89
उत्तर:
(B) 84

4. महिला आन्दोलन किससे सम्बन्धित है ?
(A) पुरुषों से
(B) महिलाओं से
(C) बच्चों से
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) महिलाओं से।

5. निम्न में से कौन-सा पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित आन्दोलन माना जाता है ?
(A) चिपको आन्दोलन
(B) नर्मदा बचाओ आन्दोलन
(C) टिहरी बांध परियोजना के विरुद्ध आन्दोलन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

6. निम्न में से कौन पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित है ?
(A) सुन्दर लाल बहुगुणा
(B) मेधा पाटकर
(C) बाबा आमटे
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

7. मण्डल आयोग में कितने सदस्य थे ?
(A) दो
(B) तीन
(C) चार
(D) पाँच।
उत्तर:
(C) चार।

8. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद महिलाओं के कल्याण से सम्बन्धित है ?
(A) अनुच्छेद 39
(B) अनुच्छेद 10
(C) अनुच्छेद 30
(D) अनुच्छेद 54
उत्तर:
(A) अनुच्छेद 39

9. राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग का गठन कब किया गया ?
(A) सन् 1993 में
(B) सन् 1992 में
(C) सन् 1991 में
(D) सन् 1990 में।
उत्तर:
(A) सन् 1993 में।

10. आन्ध्र प्रदेश में चलाए गए शराब (ताड़ी) विरोधी आन्दोलन का सम्बन्ध था
(A) पेड़ काटने से
(B) छुआछूत पर पाबन्दी लगाने से
(C) शराब की बिक्री पर पाबन्दी लगाने से
(D) गऊ सुरक्षा से।
उत्तर:
(C) शराब की बिक्री पर पाबन्दी लगाने से।

11. 2019 में हुए 17वीं लोकसभा के चुनावों में कितनी महिलाएं निर्वाचित हुई थीं ?
(A) 73
(B) 80
(C) 78
(D) 71
उत्तर:
(C) 78

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

12. भारत में प्रतिवर्ष कब महिला दिवस मनाया जाता है ?
(A) 1 जनवरी
(B) 26 जनवरी
(C) 20 फरवरी
(D) 8 मार्च।
उत्तर:
(D) 8 मार्च।

13. भारत में ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ की स्थापना निम्न में से किस वर्ष में हुई ?
(A) 1990 में
(B) 1991 में
(C) 1992 में
(D) 1995 में।
उत्तर:
(C) 1992 में।

14. मेधा पाटेकर निम्नलिखित आन्दोलन से सम्बन्धित है ?
(A) किसान आन्दोलन
(B) महिला आन्दोलन
(C) चिपको आन्दोलन
(D) नर्मदा बचाओ आन्दोलन।
उत्तर:
(D) नर्मदा बचाओ आन्दोलन

15. किसान आन्दोलन के मुख्य नेता थे।
(A) वी० पी० सिंह
(B) महेन्द्र सिंह टिकैत
(C) रामकृष्ण हेगड़े
(D) राजीव गांधी।
उत्तर:
(B) महेन्द्र सिंह टिकैत।

16. चिपको आन्दोलन का क्या उद्देश्य था ?
(A) वनों की रक्षा करना
(B) शिक्षा को बढ़ावा देना
(C) खेलों को बढ़ावा देना
(D) मनोरंजन को बढ़ावा देना।
उत्तर:
(A) वनों की रक्षा करना।

17. दहेज निषेध अधिनियम पास किया गया
(A) 1950
(B) 1958
(C) 1961
(D) 1977
उत्तर:
(C) 1961

18. घरेलू हिंसा से महिलाओं की सुरक्षा सम्बन्धी अधिनियम किस वर्ष पारित हुआ ?
(A) 2002
(B) 2003
(C) 2005
(D) 2017
उत्तर:
(C) 2005

19. किस वर्ष को महिला सशक्तिकरण वर्ष का नाम दिया गया ?
(A) 2001
(B) 1990
(C) 2003
(D) 2005
उत्तर:
(A) 2001

20. जन-आन्दोलन लोकतन्त्र को
(A) कमज़ोर करते हैं
(B) समाप्त करते हैं
(C) मजबूत करते हैं
(D) प्रभावित नहीं करते।
उत्तर:
(C) मज़बूत करते हैं।

21. मण्डल आयोग की सिफारिशों को किस वर्ष में लागू किया गया था?
(A) 1971 में
(B) 1977 में
(C) 1990 में
(D) 1991 में।
उत्तर:
(C) 1990 में।

22. ‘चिपको आन्दोलन’ का उद्देश्य था
(A) आर्थिक शोषण से रक्षा
(B) महिलाओं से रक्षा
(C) वनों की रक्षा
(D) दलितों की रक्षा।
उत्तर:
(C) वनों की रक्षा।

23. महाराष्ट्र में दलितों के हितों की रक्षा के लिए कौन-सा संगठन बनाया गया ?
(A) दलित पँथर्स
(B) मंडल आयोग
(C) पिछड़ा वर्ग आयोग
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) दलित पैंथर्स।

24. दलित पैन्थर्स संगठन की कब स्थापना की गई ?
(A) 1980
(B) 1976
(C) 1972
(D) 1975
उत्तर:
(C) 1972

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

25. ताड़ी विरोधी आन्दोलन किस राज्य में शुरू किया गया ?
(A) बिहार
(B) आन्ध्र प्रदेश
(C) गुजरात
(D) केरल।
उत्तर:
(B) आन्ध्र प्रदेश।

26. चिपको आन्दोलन किस राज्य से सम्बन्धित है ?
(A) उत्तराखण्ड
(B) हरियाणा
(C) उड़ीसा
(D) केरल।
उत्तर:
(A) उत्तराखण्ड।

निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) चिपको आन्दोलन का सम्बन्ध ………. प्रदेश से है।
उत्तर:
उत्तराखण्ड

(2) भारत में स्वतन्त्रता के पश्चात् ……….. का प्रतिमान अपनाया।
उत्तर:
नियोजित विकास

(3) ……… मराठी के एक प्रसिद्ध कवि हैं।
उत्तर:
नामदेव दसाल

(4) डॉ० अम्बेदकर ……….. के नेता माने जाते हैं।
उत्तर:
दलितों

(5) महेन्द्र सिंह टिकैत ………. के अध्यक्ष थे।
उत्तर:
भारतीय किसान यूनियन

(6) मछुआरों के राष्ट्रीय संगठन का नाम …………. है।
उत्तर:
नेशनल फिशवर्कर्स फोरम

(7) वर्तमान में लोकसभा में अनुसूचित जातियों के लिए …….. स्थानों का आरक्षण किया गया है।
उत्तर:
84

(8) 1989 में प्रधानमन्त्री ………….. ने मण्डल आयोग रिपोर्ट को लाग किया।
उत्तर:
वी० पी० सिंह

(9) 73वें एवं 74वें संशोधन द्वारा स्थानीय निकायों में ……….. को आरक्षण प्रदान किया गया है ?
उत्तर:
महिलाओं

(10) मेघा पाटेकर …….. आन्दोलन से सम्बन्धित हैं।
उत्तर:
पर्यावरण

(11) 1972 में महाराष्ट्र में दलित हितों की रक्षा के लिए …………… नामक संगठन बनाया गया।
उत्तर:
दलित पैन्थर्स

(12) ‘चिपको आन्दोलन’ का उद्देश्य ……. करना था।
उत्तर:
वृक्षों (वनों) की रक्षा

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
मण्डल आयोग के अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर:
मण्डल आयोग के अध्यक्ष बी० पी० मण्डल थे।

प्रश्न 2.
ताड़ी विरोधी आन्दोलन किस राज्य में शुरू हुआ था ?
उत्तर:
ताड़ी विरोधी आन्दोलन आंध्र प्रदेश में शुरू हुआ था।

प्रश्न 3.
मेघा पाटेकर किस आन्दोलन से सम्बन्धित हैं ?
उत्तर:
नर्मदा बचाओ आन्दोलन से।

प्रश्न 4.
महिलाओं की घरेलू हिंसा से सुरक्षा कानून कब पास हुआ ?
उत्तर:
सन् 2005 में।

प्रश्न 5.
पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित किसी एक आन्दोलन का नाम बताइये।
उत्तर:
चिपको आन्दोलन।

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प्रश्न 6.
‘चिपको आन्दोलन’ किस राज्य से सम्बन्धित है ?
उत्तर:
उत्तराखण्ड से।

प्रश्न 7.
किस प्रधानमन्त्री ने ‘मंडल आयोग’ की सिफ़ारिशों को लागू किया ?
उत्तर:
मंडल आयोग की सिफारिशों को वी० पी० सिंह ने लागू किया।

प्रश्न 8.
आन्ध्र-प्रदेश में सन् 1990 में महिलाओं द्वारा कौन कौन-सा आन्दोलन प्रारम्भ किया गया ?
उत्तर:
ताड़ी विरोधी आन्दोलन।

प्रश्न 9.
सूचना का अधिकार सम्बन्धी कानून किस वर्ष पारित हुआ ?
उत्तर:
सूचना का अधिकार सम्बन्धी कानून. सन् 2005 में पारित हुआ।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
वचनबद्ध नौकरशाही से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
भारत में वचनबद्ध नौकरशाही का अर्थ स्पष्ट करें। इस अवधारणा के विकास एवं समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:
वचनबद्ध अथवा प्रतिबद्ध नौकरशाही का अर्थ यह है कि नौकरशाही किसी विशिष्ट राजनीतिक दल के सिद्धान्तों एवं नीतियों से बन्धी हुई रहती है और उस दल के निर्देशों से ही कार्य करती है। वचनबद्ध अथवा प्रतिबद्ध नौकरशाही निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र होकर कार्य नहीं करती, बल्कि इसका कार्य किसी दल विशेष की योजनाओं को बिना कोई प्रश्न उठाए आंखें मूंद कर लागू करना होता है। साम्यवादी देशों में जैसे कि चीन में वचनबद्ध नौकरशाही पाई जाती है।

सितम्बर, 1991 तक सोवियत संघ में वचनबद्ध नौकरशाही पाई जाती रही है। चीन में एक ही राजनीतिक दल (साम्यवादी दल) है और वहां पर नौकरशाही साम्यवादी दल के सिद्धान्तों एवं लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। नौकरशाही का परम कर्त्तव्य साम्यवादी दल के लक्ष्यों को पूरा करने में सहयोग देना है।

भारत में प्रतिबद्ध नौकरशाही की बात कही जाती है, परन्तु नौकरशाही किसी दल के सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्ध न होकर संविधान के सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्ध है। लोकतन्त्र में वचनबद्ध नौकरशाही सफल नहीं हो सकती क्योंकि चुनाव के पश्चात् कोई भी दल सत्ता में आ सकता है। इसलिए प्राय: सभी लोकतान्त्रिक देशों में नौकरशाही की तटस्थता पर बल दिया जाता है ताकि नौकरशाही स्वतन्त्र और निष्पक्ष होकर कार्य कर सके।

संविधान में लोक सेवाओं की स्वतन्त्रता, निष्पक्षता एवं तटस्थता को बनाए रखने के लिए व्यापक रूप से व्यवस्था की गई है। अखिल भारतीय सेवाएं तथा केन्द्रीय सेवाओं की नियुक्ति राज्य सेवा आयोग द्वारा की जाती है और राज्य सेवाओं की नियुक्ति राज्य सेवा आयोग द्वारा की जाती है। लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) की निष्पक्षता और स्वतन्त्रता को बनाए रखने के लिए संविधान में काफ़ी उपाय किए गए हैं। संघ या संयुक्त लोक सेवा

आयोग के सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है। लोक सेवा आयोग के सदस्य निश्चित अवधि के लिए नियुक्त किए जाते हैं और उन्हें निश्चित अवधि से पूर्व राष्ट्रपति तभी हटा सकता है जब उनके विरुद्ध भ्रष्टाचार का कोई गम्भीर अभियोग हो और इस विषय में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश द्वारा भली प्रकार जांच करके यह निष्कर्ष न निकाल लिया हो कि अभियोग ठीक है।

लोक सेवा आयोग की स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता के अतिरिक्त लोक सेवाओं की स्वतन्त्रता तथा निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए भी कई प्रकार के उपाय किए गए हैं। लोक सेवाओं के सदस्यों की नियुक्ति योग्यता के आधार पर की जाती है और योग्यता की जांच लिखित परीक्षा एवं इण्टरव्यू के आधार पर की जाती है। लोक सेवक एक स्थायी कर्मचारी होता है और रिटायर होने की आयु तक अपने पद पर रहता है।

संविधान के अनुसार किसी लोक सेवक को तब तक पद से हटाया या अवनत नहीं किया जा सकता, जब तक उसको दोष-पत्र (Charge Sheet) न दिया जाए और उसको अपनी रक्षा के लिए उसका उत्तर देने के लिए अवसर न दिया जाए। लोक सेवक राजनीतिक तौर पर तटस्थ होता है,

वह केवल अपने मत का प्रयोग कर सकता है। संविधान के अनुसार कानून द्वारा लोक सेवाओं, सेवाओं की शर्तों और नियुक्ति को नियमित करने की शक्ति विधानमण्डलों को है। लोक सेवक की सेवा की अवधि के उसके वेतन एवं भत्तों को उसके हितों के विरुद्ध परिवर्तित नहीं किया जा सकता और न ही उसे उसका छोटा अधिकारी दण्ड दे सकता है। लोक सेवक अपनी जिम्मेवारियों को तटस्थता से निभाते हैं और केवल संविधान के सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्ध होते हैं।

परन्तु 1969 में वचनबद्ध नौकरशाही (Committed Bureaucracy) का प्रश्न काफ़ी महत्त्वपूर्ण बन गया, विशेषकर उस समय जब तत्कालीन स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अपने सार्वजनिक भाषणों में प्रशासनिक मशीनरी को देश की प्रगति में बाधा कह कर, उसकी आलोचना शुरू की। वचनबद्ध नौकरशाही का प्रश्न उस समय उत्पन्न हुआ जब कार्यकारिणी और न्यायालयों में झगड़ा उत्पन्न हुआ और अन्त में कांग्रेस पार्टी का विभाजन भी हुआ। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने नई नीति अपनाते हुए प्रत्येक समस्या को जनता के सामने प्रस्तुत करके अन्तिम निर्णय लेने की नीति अपनाई। स्वर्गीय इन्दिरा गांधी ने अपने विरोधियों पर चारों ओर से हमला किया और इसमें नौकरशाही की भी आलोचना की और इस बात पर बल दिया कि नौकरशाही वचनबद्ध होनी चाहिए।

यह विचार कि नौकरशाही ‘वचनबद्ध की भावना’ से ओत-प्रोत नहीं होनी चाहिए शीघ्र ही स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी के चेलों में लोकप्रिय हो गया। तत्कालीन कांग्रेस के अन्तरिम अध्यक्ष (Interim President) श्री जगजीवन राम ने पार्टी के बम्बई अधिवेशन में जो दिसम्बर, 1969 में हुआ, वचनबद्ध नौकरशाही के विचार को औपचारिक रूप दिया जब उन्होंने इस सिद्धान्त का अपने अध्यक्षीय भाषण में जोरदार समर्थन किया।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने नौकरशाही पर रूढ़िवादी होने का आरोप लगाना शुरू कर दिया और इस बात पर बल देना शुरू कर दिया कि नौकरशाही को जनता की इच्छाओं और राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के अनुसार बदलना होगा। नियुक्ति की नीति इस प्रकार होनी चाहिए कि लोक सेवक सामाजिक एवं आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति में सहायक हो ताकि लोकतन्त्र, धर्म-निरपेक्षवाद तथा समाजवाद जैसे आदर्शों की पूर्ति की जा सके।
तत्कालीन स्वर्गीय प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और उनके शिष्यों ने वचनबद्ध ‘नौकरशाही’ का समर्थन तो किया, रष्ट नहीं था कि वे ‘वचनबद्ध’ का क्या अर्थ लेते हैं।

उन्होंने जानबझ कर साम्यवादी देशों की वचनबद्ध नौकरशाही की प्रणाली का उल्लेख नहीं किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के वचनबद्ध नौकरशाही के बारे में जो कुछ कहा उससे ऐसा प्रतीत होता था कि जैसे वे ऐसी नौकरशाही चाहते हैं जो राजनीति के निर्देशक सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्ध हो। इसीलिए अशोक मेहता ने कहा था कि, “लोकतन्त्र में यह समझना आसान नहीं है कि ‘वचनबद्ध नौकरशाही’ का क्या अर्थ है। लोकतन्त्र प्रणाली में सरकारें बदलती हैं, उनके राजनीतिक उद्देश्यों में परिवर्तन आते रहते हैं, इसलिए यह समझना कठिन होता है कि नौकरशाही किन विचारों के लिए वचनबद्ध हो।”

‘वचनबद्ध नौकरशाही’ पर कांग्रेस के नेताओं के ज़ोर देने से उन लोगों में सन्देह उत्पन्न हो गया, जिन्होंने साम्यवादी देशों में ‘वचनबद्ध नौकरशाही’ का अध्ययन किया हुआ था। अतः वे यह समझने लगे कि ‘वचनबद्ध नौकरशाही’ का सिद्धान्त बड़ा खतरनाक है क्योंकि यह देश को सर्वसत्तावाद (Totalitarianism) की ओर ले जाएगा।

इस बात का भय था कि लोकतन्त्रात्मक सरकार के साथ यह सिद्धान्त मेल नहीं खाता और जब एक स्थान पर दूसरा दल सत्ता में आएगा तो अराजकता उत्पन्न हो जाएगी। ‘वचनबद्ध नौकरशाही’ का सिद्धान्त सर्वसत्तावाद राज्य में ही पनप सकता है। सी० राजगोपालाचार्य (C. Rajagopalachari) जैसे राजनीतिज्ञों ने वचनबद्ध नौकरशाही’ (Committed Bureaucracy) पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह सिद्धान्त देश को बर्बाद कर देगा।

‘हिन्दुस्तान टाइम्ज़’ (The Hindustan Times) के सम्पादक ने 3 दिसम्बर, 1969 को उस समय के राजनीतिक वातावरण के सन्दर्भ में लिखा था, “यदि सेवकों को श्रीमती इन्दिरा गांधी की सरकार और नीतियों के प्रति, उड़ीसा है तो उनको दिल्ली में जनसंघ प्रशासन के प्रति, पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु के प्रति, उड़ीसा में स्वतन्त्र पार्टी के प्रशासन के प्रति, मद्रास में डी० एम० के० के प्रति, पंजाब में अकाली प्रशासन के प्रति आदि वचनबद्ध होना पड़ेगा।”

इसमें सन्देह नहीं है कि ‘वचनबद्ध नौकरशाही’ का विचार भारत के लिए बहुत खतरनाक है। इस सिद्धान्त का सम्बन्ध लोकतन्त्रात्मक प्रणाली से न होकर उस शासन प्रणाली से है जिसमें एक ही दल हो जैसे कि साम्यवादी देशों में। इस सिद्धान्त का अभिप्राय है कि नौकरशाही सत्ताधारी पार्टी की विचारधारा के प्रति शपथबद्ध है। इसलिए यह सिद्धान्त उसी देश में लागू हो सकता है जहां पर एक ही विचारधारा निष्ठुरता से शासन कर रही हो।

लोकतन्त्रात्मक राज्यों में इस सिद्धान्त को नहीं अपनाया जा सकता क्योंकि लोकतन्त्रात्मक शासन प्रणाली में अनेक राजनीतिक दल होते हैं और दल सत्ता में आते-जाते रहते हैं। अत: नौकरशाही का परम कर्त्तव्य यह होता है कि वे तटस्थता से कुशलतापूर्वक अपने कार्यों को करें। उनका राजनीति एवं किसी दल की विचारधारा से कोई सम्बन्ध नहीं होता। लोक सेवाओं की सेवाओं के नियमों के प्रति निष्ठा एवं श्रद्धा को ‘वचनबद्ध’ के विचार से नहीं मिलाया जाना चाहिए।

नौकरशाही की निष्पक्षता का मूल्यांकन (Critical Appraisal of Uncommitted Bureaucracy)
1971 के लोकसभा के चुनाव में स्वर्गीय श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारी बहुमत प्राप्त हुआ और चुनाव के साथ ही वचनबद्ध नौकरशाही का खतरनाक सिद्धान्त समाप्त हो गया क्योंकि कांग्रेस को इतना अधिक बहुमत प्राप्त हुआ था कि अब लोकतन्त्रात्मक साधनों द्वारा अपने प्रगतिशील कार्यक्रम और सुधारों को लागू कर सकती थी। नौकरशाही की निष्पक्षता एवं स्वतन्त्रता को बनाए रखने में संघ लोक सेवा आयोग ने महत्त्वपूर्ण रोल अदा किया है।

संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य बटुक सिंह ने लोक सेवा आयोग को भारतीय लोकतन्त्र का मज़बूत स्तम्भ कहा है। संविधान की धाराएं संघ लोक सेवा आयोग को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से पूर्ण स्वतन्त्रता की गारण्टी देती हैं। परन्तु व्यावहारिक रूप में सरकार ने संविधान की धाराओं को इस प्रकार लागू किया है कि लोक सेवा की स्वतन्त्रता सीमित हो गई है और नौकरशाही की स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता से वर्तमान सरकार ने खेलने की कोशिश की है तथा इसके लिए कई उदाहरण भी दिए जा सकते हैं, जिनमें कुछ इस प्रकार हैं

(1) संघ लोक सेवा आयोग अधिनियम 1958 के अनुसार सरकार के लिए कई प्रकार के अधिकारियों की नियुक्ति के लिए तदर्थ (Adhoc) नियुक्तियों के लिए और उन नियुक्तियों के लिए जहां पर नियुक्ति शीघ्र करना अनिवार्य है तथा उन नियुक्तियों का लोक सेवा आयोग में उल्लेख करने से अनावश्यक देरी होगी, संघ लोक सेवा आयोग को सलाह लेना अनिवार्य नहीं है।

यद्यपि हम उन कारणों से सरकार के साथ सहमत हैं जिनके कारण यह अधिनियम पास किया गया, परन्तु इस अधिनियम के गलत प्रयोग की सम्भावना भी बहुत अधिक है। इस अधिनियम के द्वारा सरकार बड़ी आसानी से लोक सेवा आयोग के क्षेत्राधिकार को सीमित कर सकती है। जिन अधिकारियों की नियुक्ति सरकार की इच्छा पर की गई है, वे स्वतन्त्र और निष्पक्ष नहीं हो सकते।

(2) नौकरशाही के वास्तविक रोल से स्पष्ट होता है कि कई अधिकारी सत्ता पार्टी के नेताओं की सहायता इसलिए करते हैं ताकि इनके कुछ लाभ उठा सकें। चुनाव के दिनों में नौकरशाही की सत्ता पार्टी की सहायता देखने लायक होती है और अधिकारी यह सहायता इसलिए करते हैं ताकि उनसे बाद में पदोन्नति, एवं अच्छी नौकरी प्राप्त कर सकें। प्रो० भाम्बरी (Bhambri) ने ठीक ही कहा है कि “भारतीय नौकरशाही कांग्रेस के शासन में कांग्रेस के साथ सांठ गांठ करके कांग्रेस के हित अथवा नेताओं के व्यक्तिगत हित के लिए काम करती है ताकि उनसे लाभ उठा सके।”

(3) भारतीय नौकरशाही की एक सर्वगत विशेषता भ्रष्टाचार है। भ्रष्टाचार होने के कारण-वेतन कम होना, पदोन्नति के कम अवसर तथा कर्मचारियों में ईमानदारी का न होना इत्यादि है। कई बार तो भ्रष्टाचार के षड्यन्त्रों में बड़े-बड़े अधिकारी भी शामिल होते हैं और उन्हें कई बार राजनीतिज्ञों का सहयोग भी प्राप्त होता है।

(4) भ्रष्टाचार की तरह भारतीय नौकरशाही की एक विशेषता यह भी है कि यह जी-हजूरियों से भरी पड़ी है। नौजवान कर्मचारी शीघ्र ही समझ जाता है कि स्वतन्त्रता और स्पष्टवादिता से काम नहीं चलेगा और वह शीघ्र ही अपने बड़े अधिकारी की जी-हजूरी करनी शुरू कर देता है।

यह आम देखने में आया है कि जी-हजूरी करने वाले कर्मचारी शीघ्र पदोन्नति तथा अन्य लाभ प्राप्त कर लेते हैं जबकि ईमानदार और परिश्रमी कर्मचारी जी-हजूरी न करने के कारण कई वर्ष पदोन्नति प्राप्त नहीं कर पाते। गेरवाला (Gerwala) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “अधिक कर्मचारी अपने बड़े अधिकारियों को चापलूसी द्वारा प्रसन्न करने में लगे रहते हैं, जिससे प्रशासन की कुशलता की क्षति होती है।”

निष्कर्ष (Conclusion)-इसमें सन्देह नहीं है कि भारतीय नौकरशाही में कई दोष पाए जाते हैं, परन्तु इसके बावजूद भारतीय नौकरशाही को ‘वचनबद्ध’ नहीं कहा जा सकता। भारतीय नौकरशाही स्वतन्त्र एवं लाल-फीताशाही (Red tapism), भ्रष्टाचार आशाभंग (Frustrations) इत्यादि बुराइयां शासन की देन हैं।

यद्यपि आलोचकों ने राज्य सेवा आयोग को ‘Packed house’ कहा है, तथापि संघ लोक सेवा आयोग को ऐसा नहीं कहा जा सकता। संघ लोक सेवा आयोग को भारतीय लोकतन्त्र के स्तम्भों में से एक स्तम्भ माना जाता है और संघ लोक सेवा आयोग की स्वतन्त्रता और निष्पक्षता पर ही नौकरशाही की स्वतन्त्रता एवं निष्पक्षता काफ़ी सीमा तक निर्भर करती है।

प्रश्न 2.
वचनबद्ध न्यायपालिका से क्या तात्पर्य है ? वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए सरकार द्वारा प्रयोग किए गए उपायों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1973 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों श्री जे० एम० शैलट, श्री के० एस० हेगड़े तथा श्री ए० एन० ग्रोवर की उपेक्षा करके श्री ए० एन० राय को नियुक्त किया। इस नियुक्ति से उस समय एक राजनीतिक एवं न्यायिक विवाद पैदा हो गया। श्री ए० एन० राय की नियुक्ति के विरोध में तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने पद से त्याग-पत्र दे दिया। इससे यह प्रश्न उठने लगा कि क्या न्यायपालिका सरकार के प्रति वचनबद्ध होनी चाहिए या स्वतन्त्र ।

स्वतन्त्र न्यायपालिका की धारणा एवं भारतीय न्यायपालिका (Concept of Independent Judiciary and Indian Judiciary)-स्वतन्त्र न्यायपालिका से निम्नलिखित अर्थ लिया जाता है

  • न्यायपालिका का सरकार के अन्य विभागों से स्वतन्त्र होना।
  • न्यायपालिका द्वारा किये जाने वाले निर्णयों पर कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का प्रभाव नहीं होना चाहिए।
  • न्यायाधीश स्वतन्त्र हों, ताकि वे बिना किसी भय एवं पक्ष के निर्णय कर सकें।

भारत में सैद्धान्तिक तौर पर स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका की व्यवस्था की गई। न्यायपालिका को स्वतन्त्र बनाए रखने के लिए संविधान में निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
  • न्यायाधीशों की योग्यताओं का वर्णन संविधान में किया गया है।
  • न्यायाधीश एक निश्चित आयु पर सेवानिवृत्त होते हैं।
  • न्यायाधीशों के पद की सुरक्षा की गई है, उन्हें केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।
  • न्यायाधीशों को उचित वेतन एवं भत्ते दिए जाते हैं।
  • सेवानिवृत्त होने के पश्चात् सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश किसी न्यायालय में वकालत नहीं कर सकते।

वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा का उदय (Origin of the Idea of Committed Judiciary)-1973 में स्वामी केशवानन्द भारती एवं अन्य ने 24वें तथा 25वें संवैधानिक संशोधनों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। ये संशोधन संसद् को सभी अधिकारों में हस्तक्षेप करने से शामिल थे, जिसमें समुदाय बनाना तथा धर्म की स्वतन्त्रता भी शामिल थी। स्वामी केशवानन्द भारती मुकद्दमे की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की एक 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने की।

13 में से 9 न्यायाधीशों (श्री एस० एम० सीकरी, जे० एम० रौलट, के० एस० हेगड़े, ए० एन० ग्रोवर, बी० जगमोहन रेडी, डी० जी० पालेकर, एच० आर० खन्ना, ए० के० मुखर्जी तथा वाई० वी० चन्द्रचड) ने यह निर्णय । मौलिक अधिकारों सहित संविधान में संशोधन कर सकती है, परन्तु संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती। चार अन्य न्यायाधीशों (श्री ए० एन० राय, के० के० मैथ्यू, एम० एच० बेग तथा एस० एन० द्विवेदी) ने इस निर्णय पर हस्ताक्षर नहीं किए।

केशवानन्द भारती के मुकद्दमे में सरकार एवं न्यायपालिका में मतभेद बढ़ गए, क्योंकि 1973 में सरकार का नेतृत्व श्रीमती इन्दिरा गांधी कर रही थीं, अतः यह विवाद श्रीमती गांधी एवं न्यायालय के बीच हुआ, जिसमें जीत न्यायालय की हुई, क्योंकि न्यायालय ने संसद् की संविधान में संशोधन करने की शक्ति को सीमित कर दिया। इसी कारण श्रीमती गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा को आगे बढ़ाया। 1975 में आपात्काल के समय वचनबद्ध न्यायपालिका का सिद्धान्त कार्यपालिका का सिद्धान्त बन गया।

वचनबद्ध न्यायपालिका के मा सरकार द्वारा प्रयोग किए गए उपाय (Tactics used by Govt. to make Committed Judiciary) तत्कालीन श्रीमती गांधी की सरकार ने न्यायपालिका को वचनबद्ध बनाने के लिए अग्रलिखित उपाय किए

1. न्यायाधीशों की नियुक्ति में वरिष्ठता की अनदेखी (Supersession of Judges):
श्रीमती इन्दिरा गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में वरिष्ठता की अनदेखी की तथा उन न्यायाधीशों को पदोन्नत किया जो सरकार के प्रति वफादार थे। उदाहरण के लिए श्रीमती गांधी ने श्री जे० एम० शैलट, के० एस० हेगड़े तथा ए० एन० ग्रोवर की वरिष्ठता की अनदेखी करके श्री ए० एन० राय को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करवाया। अतः तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने पदों से त्याग-पत्र दे दिया। 1977 में पुनः श्री एच० आर० खन्ना की वरिष्ठता की अनदेखी करके श्री एम० एच० बेग को सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करवाया गया।

2. न्यायाधीशों का स्थानान्तरण (Transfer of Judges):
श्रीमती इन्दिरा गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों के स्थानान्तरण का सहारा भी लिया। उन्होंने 1981 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश इस्माइल को केरल उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाकर भेजा तथा पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के० बी० एन० सिंह को मद्रास उच्च न्यायालय स्थानान्तरित करवाया।

3. रिक्त पदों को भरने से मना करना (Refusal to fill Vacancies):
सरकार ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए कई बार रिक्त पदों को भरने से भी मना कर दिया या अपनी असमर्थता व्यक्त की।

4. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश का प्रावधान (Provision of Acting Chief Justice):
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के संवैधानिक प्रावधान को भी वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए प्रयोग किया गया।

5. अन्य पदों पर नियुक्तियां (Appointments on other Posts):
सरकार ने सेवा निवृत्त न्यायाधीशों में से उन्हें राज्यपाल, राजदूत, मन्त्री या किसी आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जो सरकार के प्रति वफादार थे अथवा सरकार की नीतियों के अनुसार चलते थे।

6. अस्थायी न्यायाधीशों की नियुक्ति (Appointment of Temporary Judges):
वचनबद्ध न्यायपालिका का एक अन्य उपाय अस्थाई न्यायाधीशों की नियुक्ति करना था। सरकार अस्थाई तौर पर नियुक्ति करके न्यायाधीश की कार्यप्रणाली एवं व्यवहार का अध्ययन करती थी, कि वह सरकार के पक्ष में कार्य कर रहा है या विपक्ष में।

7. कम वेतन (Meagre Salaries):
न्यायाधीशों को अन्य विभागों के मुकाबले कम वेतन मिलता था।

8. न्यायपालिका की आलोचना (Criticism of Judiciary):
न्यायाधीशों द्वारा लिए जाने वाले निर्णयों की प्रायः अधिकारियों द्वारा आलोचना की जाती थी जबकि ऐसा करना संविधान के विरुद्ध था।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि भारत में एक समय ऐसा आया जब वचनबद्ध न्यायपालिका को बढ़ावा मिलने लगा था, परन्तु वास्तविकता यह है कि न्यायपालिका सभी प्रकार के बन्धनों से स्वतन्त्र होनी चाहिए तभी न्यायपालिका संविधान की रक्षा कर सकेगी तथा लोगों के अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 3.
बिहार आन्दोलन एवं गुजरात के नव-निर्माण आन्दोलन ने भारतीय लोकतन्त्र को किस प्रकार प्रभावित किया ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. गुजरात में नवनिर्माण आन्दोलन (Navnirman Movement in Gujarat):
गुजरात में 1970 के दशक में नवनिर्माण आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। 1960 के दशक में गुजरात के प्रमुख शहर अहमदाबाद में बहुत विकास कार्य हुए। इसी शहर से 1974 में गुजरात में नवनिर्माण आन्दोलन की शुरुआत हुई। अहमदाबाद के एल० डी० इन्जीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद के कारण अहमदाबा गया तथा आगे चलकर इस असन्तोष ने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का रूप धारण कर लिया।

इस एक घटना से अहमदाबाद राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में आ गया। गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन उन लोगों के विरुद्ध था, जो हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति के समर्थक थे। यह आन्दोलन इतना व्यापक था कि गुजरात के मुख्यमन्त्री चिमनभाई पटेल को त्याग पत्र देना पड़ा। प्रायः यह कहा जाता है कि 1975 में श्रीमती गांधी ने जो आपात्काल की घोषणा की थी, उसका एक प्रमुख कारण गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन भी था।

नवनिर्माण आन्दोलन धीरे-धीरे सम्पूर्ण गुजरात में फैल गया तथा अनेक लोग इस आन्दोलन से जुड़ गए। कांग्रेस पार्टी ने नवनिर्माण आन्दोलन के विरुद्ध एक चुनावी रणनीति तैयार की, जिसे क्षत्रिय-हरिजन-आदिवासी तथा मुस्लिम मिलन का नाम दिया गया। 1980 के गुजरात विधानसभा चुनावों में इस योजना को सफलता भी मिली। परन्तु इससे उच्च जातियों को पहली बार यह अनुभव हुआ कि शक्ति उच्च वर्गों से निकल कर मध्यवर्ग की ओर जा रही है।

2. बिहार आन्दोलन (Bihar Movement):
बिहार आन्दोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में चलाया गया था। बिहार आन्दोलन शासन में भ्रष्टाचारी एवं अयोग्य कर्मचारियों के विरुद्ध चलाया गया था। इस आन्दोलन को पूर्ण या व्यापक क्रान्ति (Total Revolution) भी कहा जाता है। जयप्रकाश नारायण ने 1975 में बिहार के लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि बिहार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य समाज एवं व्यक्ति के सभी पक्षों में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना है। यह उद्देश्य ऐसा नहीं है, जिसे एक दिन या एक वर्ष में प्राप्त कर लिया जाए, बल्कि अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें एक लम्बे समय तक बिहार आन्दोलन को जारी रखना होगा।

बिहार आन्दोलन में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को भी हल करने का प्रयास किया गया। अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के विषय में बोलते हुए जय प्रकाश नारायण ने कहा कि ये जातियां आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई हैं। उच्च जाति के लोगों द्वारा अब भी इन जातियों का शोषण किया जा रहा है।

कई बार तथाकथित उच्च जाति के लोग इन जातियों के लोगों को जिन्दा जला भी देते हैं। अत: इस समस्या के समाधान के लिए हल खोजना आवश्यक है। बिहार आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को इन अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के विकास के लिए कार्य करना होगा। जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन के चार पक्षों का वर्णन किया-प्रथम संघर्ष, द्वितीय निर्माण, तृतीय प्रचार तथा चतुर्थ संगठन।

जयप्रकाश नारायण ने तात्कालिक परिस्थितियों में निर्माण कार्य पर अधिक बल दिया। उनके अनुसार बिहार आन्दोलन के कार्यकर्ताओं को समाज में से सामाजिक कुरीतियों (जातिवाद, छुआछूत, साम्प्रदायिकता तथा दहेज प्रथा) को दूर करना होगा। थामस वेबर का कहना है कि, जयप्रकाश नारायण दलविहीन लोकतान्त्रिक व्यवस्था के पक्षधर थे। उनकी इच्छा वास्तविक लोकतन्त्र के अन्तर्गत एक ऐसे समाज की स्थापना की थी, जिसमें असमानता न हो तथा सभी लोगों को अपने विकास के लिए समान अवसर प्राप्त हों।

जहां गुजरात में गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन चल रहा था, वहीं बिहार में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार आन्दोलन चल रहा था। इन दोनों आन्दोलनों ने केन्द्र में कांग्रेस सरकार को भी चुनौतियां पेश की तथा श्रीमती गांधी ने इन आन्दोलनों के दबाव में आकर आपात्काल की घोषणा की।

प्रश्न 4.
1975 में की गई आपात्कालीन घोषणा के कारणों की विस्तृत व्याख्या करें।
उत्तर:
1970 का दशक भारतीय राजनीति के लिए सर्वाधिक परिवर्तनशील एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। यह दशक कांग्रेस पार्टी विशेषकर प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के लिए विशेष महत्त्व रखता है। जहां इस दशक के शुरुआत में (1971) पाकिस्तान को युद्ध में हराकर श्रीमती गांधी पूरे देश में लोकप्रिय हो गईं, वहीं 1975 तक आते-आते भारतीय राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितियां इतनी बदल गईं कि श्रीमती गांधी को देश में आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। जो श्रीमती गांधी 1971 में देश में सर्वाधिक लोकप्रिय नेता थीं, उन्हें अपनी रक्षा के लिए 25 जून, 1975 को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी।

इतना ही नहीं 1977 में हुए आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी एवं स्वयं श्रीमती गांधी को पराजय का सामना भी करना पड़ा। जून, 1975 में श्रीमती इन्दिरा गांधी को निम्नलिखित कारणों से आपात्कालीन घोषणा करनी पड़ी

1.1971 के युद्ध में हुआ अत्यधिक खर्च (Enormous Expenditure of 1971 War):
1975 में लागू की गई आपात्काल की घोषणा का एक प्रमुख कारण 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध को माना जाता है। इस युद्ध में भारत को बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ा। इसके अतिरिक्त पूर्वी पाकिस्तान से आए करोड़ों शरणार्थियों का भार भी भारत पर पड़ा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था खराब हो गई। श्रीमती गांधी का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा धन के अभाव के कारण पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, जिससे लोगों में असन्तोष फैला।

2. अधिक एवं अच्छी फसल का पैदा न होना (No Production of Enough and good crops):
1972 1973 में भारत में फसल भी अच्छी नहीं हुई। दूसरे शब्दों में सरकार को कृषि क्षेत्र में भी असफलता मिल रही थी, जिससे भारत का आर्थिक विकास नहीं हो पा रहा था।

3. तेल संकट (Oil Crises):
1973 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल संकट पैदा हो गया। 1973 में ओपेक देशों (OPEC-Organisation of Pertroleum Exporting Countries) ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात मनवाने के लिए तेल का उत्पादन कम कर दिया। इसे तेल कूटनीति (Oil Diplomacy) के नाम से भी जाना जाता है। इस तेल संकट के कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर तेल की कीमतें बढ़ गईं। तेल की कीमतें बढ़ने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी उसका प्रभाव देखा जाने लगा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति और खराब हो गई।

4. औद्योगिक उत्पाद में कमी (Decreasing Industrial Production):
भारत में प्रशिक्षित एवं कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों तथा कर्मचारियों के होने के बावजूद भी भारत के औद्योगिक उत्पाद में निरन्तर कमी हो रही थी, जिससे कर्मचारियों में असन्तोष बढ़ रहा था।

5. रेलवे की हड़ताल (Railway Strike):
1975 में की गई आपात्कालीन घोषणा का एक कारण रेलवे कर्मचारियों द्वारा की गई हड़ताल भी थी जिससे यातायात व्यवस्था बिल्कुल खराब हो गई।

6. गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन (Gujarat Navnirman Movement):
अहमदाबाद के एल० डी० इन्जीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद के कारण अहमदाबाद में असन्तोष फैल गया तथा आगे चलकर इस असन्तोष ने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का रूप धारण कर लिया। इस एक घटना से अहमदाबाद राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में आ गया। यह आन्दोलन इतना व्यापक था कि गुजरात के मुख्यमन्त्री चिमनभाई पटेल को त्याग-पत्र देना पड़ा। 1975 में श्रीमती गांधी ने जो आपात्काल की घोषणा की थी, उसका एक प्रमुख कारण गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन भी था।

7. बिहार आन्दोलन (Bihar Movement):
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में बिहार में चलाया गया बिहार आन्दोलन भी 1975 में आपात्काल की घोषणा का एक प्रमुख कारण था, क्योंकि इस आन्दोलन के कारण जयप्रकाश नारायण ने लोगों को श्रीमती इन्दिरा गांधी के विरुद्ध एकजुट कर दिया था। बिहार आन्दोलन ने केन्द्र में कांग्रेस सरकार को चुनौतियां पेश की तथा श्रीमती गांधी ने इन आन्दोलनों के दबाव में आपात्काल की घोषणा की। .

8. श्रीमती गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करना (Mrs. Gandhi’s Election Declare illegal) :
श्रीमती गांधी द्वारा 1975 में आपातकाल की घोषणा का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को अवैध घोषित करना था। श्रीमती गांधी को छ: वर्ष तक संसद् की सदस्यता न ग्रहण करने की सज़ा दी गई। परन्तु अदालत ने श्रीमती गांधी को अपील का एक मौका देते हुए अपने निर्णय को स्थगित रखा।

अदालत ने साथ ही यह भी कहा कि श्रीमती गांधी अपना प्रधानमन्त्री का कार्यकाल पूरा कर सकती हैं, परन्तु इस दौरान वह न तो संसद् में भाषण दे सकती हैं, न ही किसी विषय में मतदान कर सकती हैं और न ही वेतन प्राप्त कर सकती हैं। इस प्रकार के निर्णय से श्रीमती गांधी के लिए परिस्थितियां एकदम प्रतिकूल हो गईं, क्योंकि विरोधी दलों ने इस आधार पर उनसे त्याग-पत्र की मांग की तथा श्रीमती गांधी के विरुद्ध एकजुट होकर आन्दोलन करने लगे। इन परिस्थितियों पर काबू पाने के लिए श्रीमती इन्दिरा गांधी ने 25 जून, 1975 को आपात्काल की घोषणा की।

प्रश्न 5.
सन् 1975 में घोषित आपात्काल के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1975 में श्रीमती गांधी के लिए राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियां इतनी खराब हो गईं कि उन्हें 25 जून, 1975 को भारत में पहली बार आन्तरिक सुरक्षा के आधार पर आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। इससे पहले जब भी आपात्काल की घोषणा की गई, वह युद्ध के समय की गई थी। राष्ट्रपति फखरूदीन अली अहमद एवं संसद् पर श्रीमती गांधी का प्रभाव होने के कारण आपात्काल की घोषणा की स्वीकृति में भी कोई बाधा नहीं आई।

आपात्काल की घोषणा के बाद श्रीमती गांधी ने अपने विरोधियों को जेलों में डालना शुरू कर दिया। उन्होंने गुजरात तथा तमिलनाडु की विधानसभाओं को भंग कर दिया। आन्तरिक सुरक्षा कानून (Maintenance of Internal Security Act-MISA) के अन्तर्गत लोगों को बिना कारण बताए कानूनी हिरासत में ले लिया जाता था तथा इस कानून के अन्तर्गत न्यायपालिका को भी कारण बताने की आवश्यकता नहीं थी।

संजय गांधी ने देश की जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए नसबन्दी कार्यक्रम चलाया। दिल्ली की आबादी को कम करने का प्रयास किया तथा गन्दी बस्तियों को हटाया। इस दौरान प्रैस की स्वतन्त्रता पर पाबन्दी लगा दी गई। लोगों को अपने विचार व्यक्त करने की आजादी नहीं थी। परन्तु मार्च, 1977 में श्रीमती गांधी ने आपात्काल की घोषणा समाप्त कर दी तथा नये चुनाव करवाये। इन चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, यहां तक कि श्रीमती गांधी स्वयं भी चुनाव हार गई।

आपात्काल के संवैधानिक एवं उत्तर संवैधानिक पक्ष (Constitutional and Extra Constitutional dimensions of Emergency)-आपात्काल के दौरान कुछ संवैधानिक एवं उत्तर संवैधानिक पक्ष भी सामने आए। श्रीमती गांधी ने संविधान में 39वां संवैधानिक संशोधन किया। इस संशोधन द्वारा राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री तथा स्पीकर के चुनाव से सम्बन्धित मुकद्दमों की सुनवाई की सर्वोच्च न्यायालय की शक्ति समाप्त कर दी गई। इसके स्थान पर सरकार ने यह घोषणा की कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमन्त्री तथा स्पीकर के चुनाव से सम्बन्धित मुकद्दमों की सुनवाई एक आयोग करेगा।

39वें संशोधन की उपधारा 4 के अन्तर्गत उपरोक्त पदों से सम्बन्धित चुनावों को न्यायालय में चुनौती देने की शक्ति को समाप्त कर दिया गया। इस संशोधन को पास करने का मुख्य उद्देश्य श्रीमती गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय से राहत दिलाना था। 39वें संवैधानिक संशोधन को संसद् एवं राष्ट्रपति ने केवल चार दिनों में अपनी-अपनी स्वीकृति दे दी। श्रीमती गांधी के निर्वाचन सम्बन्धी सुनवाई के समय महान्यायवादी ने 39वें संशोधन के आधार पर इस मुकद्दमे को खारिज करने की बात की।

परन्तु राज नारायण (श्रीमती गांधी के विरुद्ध चुनाव लड़ने वाले व्यक्ति) के वकील ने 39वें संशोधन को संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध बताया। क्योंकि यह संशोधन स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव के विरुद्ध है। परन्तु उच्च न्यायालय की पीठ के पांच में से चार न्यायाधीशों ने 39वें संशोधन को वैध ठहराया तथा इस संशोधन के आधार पर श्रीमती गांधी के निर्वाचन को पूर्ण रूप से वैध ठहराया।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री ए० एन० राय ने बड़े विचित्र ढंग से यह विचार व्यक्त किया कि ‘प्रजातन्त्र’ संविधान का मूल ढांचा है, परन्तु स्वतन्त्र तथा निष्पक्ष चुनाव नहीं। इस प्रकार श्रीमती गांधी के निर्वाचन को वैध ठहराने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक बड़ी कवायद की गई। इसे ही प्रतिबद्ध न्यायपालिका के रूप में जाना जाता है।

आपात्काल के विरोध का दमन (Resistance of Emergency):
श्रीमती गांधी की सरकार ने आपात्काल का विरोध कर रहे लोगों का कठोरतापूर्वक दमन किया। आपात्काल की घोषणा के कुछ घण्टों के अन्दर ही प्रमुख विरोधी नेताओं को पकड़कर जेल में डाल दिया गया। विरोधी नेताओं एवं लोगों के विरुद्ध मीसा कानून के तहत कार्यवाही की गई।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि आपात्काल की घोषणा करके श्रीमती गांधी ने राजनीतिक एवं न्यायिक व्यवस्था को अपनी इच्छानुसार चलाना चाहा। परन्तु यह घटना आगे चलकर (1977 के चुनावों में) श्रीमती गांधी एवं कांग्रेस पार्टी के लिए हानिकारक साबित हुई।

प्रश्न 6.
देश में 1975 ई० में घोषित आपात्काल से हमें क्या सबक मिले ? वर्णन करें।
उत्तर:
श्रीमती गांधी के लिए राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियां इतनी खराब हो गईं कि उन्हें 25 जून, 1975 को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद एवं संसद् पर श्रीमती गांधी का प्रभाव होने के कारण आपात्काल की घोषणा की स्वीकृति में भी कोई बाधा नहीं आई। आपात्काल की घोषणा के बाद श्रीमती गांधी ने अपने विरोधियों को जेलों में डालना शुरू कर दिया। उन्होंने गुजरात एवं तमिलनाडु विधानसभाओं को भंग कर दिया।

मीसा (MISA) कानून के अंतर्गत लोगों को बिना कारण बताए कानूनी हिरासत में ले लिया जाता था तथा इस कानून के अन्तर्गत न्यायपालिका को भी कारण बताने की आवश्यकता नहीं थी। आपात्कालीन परिस्थितियों में श्रीमती गांधी का छोटा बेटा संजय गांधी उनके लिए सबसे अधिक मददगार बना हुआ था। संजय गांधी ने जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए नसबंदी कार्यक्रम चलाया। प्रैस की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। परन्तु मार्च, 1977 में श्रीमती गांधी ने आपात्काल की घोषणा समाप्त करके नये चुनाव करवाये। इन चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि श्रीमती गांधी स्वयं भी चुनाव हार गईं। आपात्काल से जो सबक हमें मिलें उनका वर्णन इस प्रकार है

  • नौकरशाही एवं न्यायपालिका को सदैव स्वतन्त्र रखना चाहिए ताकि लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की . जा सके।
  • सरकार को सदैव संविधान के अनुसार शासन करना चाहिए।
  • सरकार को सदैव जनता एवं विरोधी दल का सम्मान करना चाहिए।
  • आपात्काल में एक सबक यह मिला कि भारत में लोकतन्त्र की जड़ें बहुत मज़बूत हैं तथा उसे आसानी से समाप्त नहीं किया जा सकता।
  • आपातकाल के पश्चात् भारत में कुछ संवैधानिक उलझनों को ठीक किया गया, जैसे-अन्दरूनी आपात्काल केवल सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में ही लगाया जा सकता है, इसके लिए भी आवश्यक है कि मन्त्रिपरिषद् राष्ट्रपति को लिखित सलाह दे।
  • आपातकाल के पश्चात् नागरिक अधिकारों के कई संगठन अस्तित्व में आए।

प्रश्न 7.
1977 में जनता पार्टी की स्थापना का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में जनता पार्टी की स्थापना का वही महत्त्व है जो स्वतन्त्रता के पूर्व कांग्रेस पार्टी की स्थापना का था। यदि कांग्रेस पार्टी ने भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से छुड़ाया और उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान की तो जनता पार्टी ने कांग्रेस सरकार विशेषकर, श्रीमती इन्दिरा गांधी, संजय गांधी व बंसी लाल की तानाशाही से जनता को राहत दिलाई। 1 मई, 1977 का दिवस स्वतन्त्र भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा। भविष्य के इतिहासकार 1 मई, 1977 को उसी दृष्टि से देखेंगे जिस प्रकार कल के इतिहासकार 1885 सन् को देखते हैं।

यद्यपि 1 मई, 1977 को जनता पार्टी का विधिवत् जन्म हुआ, परन्तु व्यवहार में जनता पार्टी की स्थापना जनवरी, 1977 में हो गई थी। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की जनवरी, 1977 में चुनाव की घोषणा करने के पश्चात् जेलों में बन्द राजनीतिक नेताओं को धीरे-धीरे रिहा किया गया। कांग्रेस संगठन, जनसंघ, भारतीय लोकदल तथा सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं और विद्रोही कांग्रेस नेताओं ने यह अनुभव किया कि प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की तानाशाही से छुटकारा पाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी का निर्माण अति आवश्यक है।

श्री जयप्रकाश नारायण 1974 से ही इन दलों को एक दल बनाने का आग्रह कर रहे थे, अतः श्री जयप्रकाश नारायण के प्रयासों के फलस्वरूप संगठन कांग्रेस जनसंघ, भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर जनवरी, 1977 में जनता पार्टी की स्थापना करके भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया। विद्रोही कांग्रेस सदस्य चन्द्रशेखर, मोहन धारिया और रामधन आदि भी जनता पार्टी में शामिल हुए। जनता पार्टी ने श्री मोरारजी देसाई को पार्टी का अध्यक्ष और चौधरी चरण सिंह को उपाध्यक्ष चुना।

एक राष्ट्रीय समिति (National Committee) की स्थापना की, जिसमें 27 सदस्य थे। चार महासचिव-श्री लाल कृष्ण अडवानी, श्री सुरेन्द्र मोहन, रामधन और सिकन्दर बख्त नियुक्त किये गए। राष्ट्रीय समिति ने 31 जनवरी को चुनाव में भाग लेने की विधिवत् घोषणा की। मार्च के चुनाव घोषणा-पत्र में कहा गया कि जनता पार्टी कुछ महज़ पुरानी पार्टियों का गठबन्धन नहीं है वरन् यह एक नई और राष्ट्रीय पार्टी है जिसे संगठन कांग्रेस, भारतीय लोकदल, जनसंघ तथा समाजवादी दल और स्वतन्त्र कांग्रेस-जनों ने सफल बनाने का व्रत लिया है और यह घोषणा-पत्र इस संघबद्ध संकल्प का पुष्टि-प्रमाण है।

लोकसभा के चुनाव के समय जनता पार्टी के नेताओं ने कहा था कि समय के अभाव के कारण जनता पार्टी के चारों घटकों का विधिवत् विलय नहीं किया जा सका। उन्होंने जनता से वायदा किया था कि चुनाव के पश्चात् शीघ्र ही चारों दल विधिवत् रूप से जनता पार्टी में सम्मिलित हो जाएंगे। इन नेताओं ने अपने इस वायदे को शीघ्र ही पूरा किया, जबकि 1 मई, 1977 को हर्ष और उल्लास के वातावरण में जनता पार्टी का विधिवत् उदय हुआ।

जब संगठन कांग्रेस, जनसंघ, भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी के पिछले अध्यक्षों ने नए दल में अपनी-अपनी पार्टी के विलय की घोषणा की और प्रतिनिधियों के विशाल समूह में पार्टी ने स्थापना का प्रस्ताव सर्व-सम्मति से स्वीकार किया। प्रगति मैदान के भव्य ‘हॉल ऑफ नेशन्स’ में जनता पार्टी की स्थापना का सम्मेलन हुआ।

चारों दलों के अध्यक्षों ने अपने-अपने ढंग से और संक्षेप में घोषणा की कि उनकी पार्टियों ने अपने अस्तित्व समाप्त कर जनाकांक्षाओं की क्रान्तिकारी की प्रतीक जनता पार्टी में विलीन होने का विधिवत् निश्चय किया है। अपने-अपने दलों को विसर्जित करके उन्हें जनता पार्टी में शामिल करने के निर्णयों की घोषणा भारतीय लोकदल की ओर से चौधरी चरण सिंह ने, संगठन कांग्रेस की तरफ से श्री अशोक मेहता ने, सोशलिस्ट पार्टी की ओर से श्री जार्ज फर्नांडीज़ ने और जनसंघ की ओर से श्री लालकृष्ण अडवानी ने की।

श्री चन्द्रशेखर-“मैं यहां आपका स्वागत और अभिनन्दन करता हूं। अब समाज बदलने का एक बड़ा काम आपको और हमें मिलकर करना है।” कांग्रेस फॉर डैमोक्रेसी के अध्यक्ष श्री जगजीवन राम ने गगनभेदी नारों के बीच अपनी पार्टी के जनता पार्टी में विलय की घोषणा की। दल के महासचिव श्री नाना जी देशमुख ने सम्मेलन का संयोजन किया और जनता पार्टी को “पंच प्रवाही का पावन संगम” बताया।

प्रधानमन्त्री श्री मोरारजी देसाई ने, जो दल के अध्यक्ष थे, नया दल जनता को समर्पित करने का प्रस्ताव किया, जिसमें कहा गया कि जनता पार्टी का प्रादुर्भाव भारतीय जनता के द्वारा अपनी खोई हुई स्वाधीनता को प्राप्त करने और लोकतन्त्र के राजपथ पर अपनी खण्डित जनता के द्वारा पुनः आरम्भ करने के संकल्प से हुआ था, प्रचण्ड जन समर्थन और उत्साहपूर्ण तथा प्रबल जन-स्वीकृति का ही परिणाम था कि विगत चुनावों में जनता पार्टी को ऐतिहासिक विजय प्राप्त हो सकी। अब वह अपने कोटि-कोटि समर्थकों और शुभचिन्तकों को अपने परिवार में सम्मिलित होने का निमन्त्रण देती है ताकि वह जन-संकल्प की पूर्ति का उपयोगी एवं जीवन्त उपकरण बन सकें।

जन-सहयोग का आह्वान करते हुए प्रस्ताव में कहा गया : जनता पार्टी जनता की समस्त आशा-आकांक्षाओं की अमूल्य धरोहर लेकर चल रही है। जनता पार्टी और सरकार को जितना अधिक सक्रिय सहयोग जनता की ओर से प्राप्त होगा, उतनी ही अधिक मात्रा में वे इन आशाओं-आकांक्षाओं की पूर्ति की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे। जनता की गहरी सूझ-बूझ और उसके सहयोग के बिना पूर्ण लोकतन्त्र की स्थापना तथा इस प्राचीन देश का पुनर्जीवन, जिसमें स्वतन्त्रता, समता और बंधुता के आदर्श फलीभूत हो सकें, सम्भव नहीं है।

प्रस्ताव में सभी निष्ठावान और समर्पित देशवासियों को दल में आने के लिए आमन्त्रित किया गया ताकि वे इसमें शामिल होकर इसे हमारे “राष्ट्र के भाग्य के निर्माण का विशिष्ट उपकरण बनाने में सहायक हों।”. 2 अप्रैल, 1977 को जनता पार्टी की संसदीय दल की कार्यकारिणी ने अपनी पहली बैठक में दल के संविधान पर विचार किया और इसे तैयार करने के लिए एक आठ-सदस्यीय समिति की स्थापना की और पार्टी का संविधान तैयार किया गया।

उद्देश्य (Aims)-जनता पार्टी के संविधान की धारा 2 में पार्टी के उद्देश्यों को स्पष्ट किया गया है, जिसमें लिखा हुआ है-“स्वाधीनता संग्राम के दौरान जिन उदात्त निष्ठाओं ने हमारा मार्ग प्रशस्त किया था और जो विरासत में हमें गांधी जी के आदर्शों के रूप में मिलीं, उनसे प्रेरणा लेकर जनता पार्टी एक लोकतान्त्रिक, धर्म-निरपेक्ष और समाजवादी राष्ट्र के निर्माण के लिए कृत-संकल्प है। वह ऐसी राज्य-व्यवस्था में विश्वास करती है जिसमें आर्थिक और राजनीतिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण निश्चित रूप में हो। वह शान्तिमय तथा लोकतान्त्रिक तरीकों से विरोध प्रकट करने के अधिकार को मानती है, जिनमें सत्याग्रह और अहिंसक विरोध शामिल है।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 8.
1977 के आम चुनावों में जनता पार्टी की जीत के क्या कारण थे ?
अथवा
सन् 1977 ई० में हुए छठी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के कारणों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1977 के छठे आम चुनाव कई कारणों से भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चनावों में पहली बार केन्द्र में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा तथा उसका भारतीय राजनीति पर एकाधिकार पूरी तरह समाप्त हो गया। इन चुनावों में मतदाताओं ने जनता पार्टी को ऐतिहासिक जीत दिलवाई। 1977 के लोकसभा चुनावों की दलीय स्थिति इस प्रकार है

राजनीतिक दलसीटें जीवीं
1. जनता पार्टी272
2. कांग्रेस फार डेमोक्रेसी22
3. कांग्रेस153
4. सी०पी०आई०7
5. सी०पी०एम०22
6. ए०डी०एम०के०18
7. डी०एम०के०1
8. अकाली दल9
9. अन्य37

1977 के चुनावों में जनता पार्टी की जीत एवं कांग्रेस पार्टी की हार के निम्नलिखित कारण थे

1. आपात्काल की घोषणा (Declaration of Emergency):
1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का सबसे बड़ा एवं तात्कालिक कारण श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा की गई आपात्काल की घोषणा थी। इस घोषणा के विरोध में सभी राजनीतिक दल एक जुट हो गए तथा जनता पार्टी का निर्माण किया तथा 1977 के चुनावों में इस पार्टी को
आपात्काल के कारण जीत प्राप्त हुई।

2. आपात्काल के दौरान अत्याचार (Excesses during Emergency):
श्रीमती गांधी ने न केवल आपात्काल ही लाग किया बल्कि लोगों पर कई प्रकार के अत्याचार भी किये गए। लोगों की स्वतन्त्रताओं को निलम्बित कर दिया गया। कोई भी व्यक्ति या दल सत्ताधारी पार्टी एवं आपातकाल के विरुद्ध नहीं बोल सकता था। इस कारण लोगों में कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध असन्तोष पैदा हुआ तथा उन्होंने कांग्रेस पार्टी को हराकर जनता पार्टी को जितवाया।

3. संजय गांधी की (Role of Sanjay Gandhi):
आपात्काल के समय उत्तर संवैधानिक तत्त्व (Extra Constitutional Element) के रूप में संजय गांधी का उभरना था। संजय गांधी सभी प्रकार की शक्तियों का प्रयोग कर रहे थे, परन्तु वे किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं थे। आपातकाल के समय संजय गांधी द्वारा निभाई गई भूमिका के प्रति भी लोगों में असन्तोष था।

4. मीसा कानून (Implemention of MISA):
आपात्काल के दौरान श्रीमती गांधी ने मीसा कानून (MISA) लागू किया, जिसके अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए तथा मुकद्दमा चलाए जेल में डाला जा सकता था। इस कानून के कारण किसी भी व्यक्ति का जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति सुरक्षित नहीं थी।

5. धन (Constitutional Amendments) :
आपातकाल के समय जब सभी महत्त्वपूर्ण विरोधी नेता जेलों में बन्द थे, तब सरकार ने संविधान में 39वां एवं 42वां संशोधन पास करके न्यायपालिका की शक्तियों को घटाकर कार्यपालिका की शक्तियों को बढ़ा दिया। इस प्रकार के संशोधन संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थे।

6. संजय गांधी को महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में प्रस्तुत करना (Elevation of Sanjay Gandhi as a great Leader) आपातकाल के दौरान श्रीमती गांधी ने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को महत्त्वपूर्ण नेता के रूप में प्रस्तुत किया तथा कांग्रेसी नेताओं को अधिक महत्त्व नहीं दिया।

7. युवा कांग्रेस का अनावश्यक महत्त्व (Unwanted Importance of Youth Congress) :
आपात्काल के समय कांग्रेस के अनुभवी नेताओं की अपेक्षा युवा कांग्रेस को अधिक महत्त्व दिया गया। आपात्काल के समय युवा कांग्रेस द्वारा निभाई गई भूमिका से न केवल पुराने कांग्रेसी नेता ही नाराज़ थे, बल्कि जन साधारण लोगों में भी इसके प्रति नाराज़गी थी।

8. जगजीवन राम का त्याग-पत्र (Resignation of Jagjivan Ram):
आपात्काल के समय जगजीवन राम जैसे श्रीमती गांधी के वफादार नेता भी उनके साथ नहीं रहे तथा कांग्रेस एवं सरकार से त्याग-पत्र दे दिया। इससे लोगों को यह अनुभव हुआ कि शासन के ऊपरी स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है।

9. अनिवार्य नसबंदी (Compulsory Sterilization):
आपात्काल के समय संजय गांधी द्वारा चलाया गया नसबंदी कार्यक्रम भी कांग्रेस की हार का एक प्रमुख कारण बना। यद्यपि भारत की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी तथा लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट ल जनसंख्या वृद्धि को रोकने के उपाय करने आवश्यक थे, परन्तु इसके लिए अनिवार्य नसबंदी कार्यक्रम की आवश्यकता नहीं थी। इसके अन्तर्गत लोगों को जबरदस्ती अस्पताल भेजकर उनकी नसबंदी कर दी जाती थी। इस कारण कई लोगों की मृत्यु भी हो गई।

10. कीमतों का बढ़ना (Rising Prices):
श्रीमती गांधी की सरकार सभी प्रकार के उपाय करके भी कीमतों की वृद्धि को नहीं रोक पा रही थी तथा 1971 के चुनावों में उनके द्वारा दिया गया ‘गरीबी हटाओ’ का नारा भी दम तोड़ता नज़र आ रहा था।

11. कर्मचारियों की खराब दशा (Pitiable Condition of the Employees):
कीमतों के बढ़ने से सरकारी कर्मचारियों की दशा खराब होने लगी, क्योंकि उनका वेतन निश्चित था तथा उस वेतन से वे बढ़ती हुई महंगाई में अपनी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रहे थे।

12. बोनस की समाप्ति (Abolition of Bonus):
कांग्रेस पार्टी ने सार्वजनिक क्षेत्रों के कर्मचारियों के बोनस को भी समाप्त कर दिया, जिससे कर्मचारी वर्ग भी कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध हो गया।

13. प्रेस पर प्रतिबन्ध (Censorship on Press):
आपात्काल के समय श्रीमती गांधी ने प्रेस पर प्रतिबन्ध लगा दिया। कोई भी समाचार-पत्र या पत्रिका सरकार एवं कांग्रेस पार्टी के विरुद्ध नहीं लिख सकती थी। समाचार-पत्र एवं पत्रिका में प्रकाशित होने वाली खबरों को पहले सरकार द्वारा पास किया जाता था। इस तरह के प्रतिबन्ध से भी लोगों में असन्तोष था।

निष्कर्ष (Conclusion):
उपरोक्त वर्णन के आधार पर कहा जा सकता है कि 1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार एवं जनता पार्टी की जीत के कई कारण थे, परन्तु उस समय महत्त्वपूर्ण कारण आपात्काल की घोषणा थी, जिसके कारण अधिकांश मतदाता कांग्रेस के विरुद्ध हो गये।

प्रश्न 9.
1977 के लोकसभा चुनावों के किन्हीं तीन निष्कर्षों का वर्णन करें।
उत्तर:
1977 के छठे आम चुनाव कई कारणों से भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चुनावों में पहली बार केन्द्र में कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा तथा उसका भारतीय राजनीति पर एकाधिकार पूरी तरह समाप्त हो गया। 1977 के लोकसभा चुनावों के तीन निष्कर्ष निम्नलिखित रहे

1. कांग्रेस के एकाधिकार की समाप्ति:
1977 के चुनावों का सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि पिछले तीन दशकों से कांग्रेस पार्टी का चला आ रहा प्रभुत्व समाप्त हो गया।

2. केन्द्र में प्रथम गठबंधन सरकार का निर्माण:
1977 के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में पहली बार गठबंधन सरकार का निर्माण हआ। विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी के झण्डे के नीचे गठबंधन सरकार का निर्माण किया। जनता पार्टी को मार्च, 1977 के लोकसभा के चुनाव में भारी सफलता प्राप्त हुई। 542 सीटों में से जनता पार्टी को 272 सीटें और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी को 28 सीटें प्राप्त हुईं।

चूंकि 1 मई, 1977 को कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी जनता पार्टी में विलय हो गई, इसलिए जनता पार्टी की लोकसभा में संख्या 300 हो गई। याद रहे, कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी ने जनता पार्टी के झंडे और चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ा था। इस प्रकार जनता पार्टी ने कांग्रेस को करारी हार दी, अत: जनता पार्टी की सरकार बनी। यह प्रथम अवसर था जब केंद्र में गैर-कांग्रेस सरकार की स्थापना हुई थी।

3. नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों का संघ:
1977 के चुनावों के पश्चात् कुछ स्वयं सेवी संस्थाओं ने नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों के संघ का निर्माण किया। यह संगठन नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनमत तैयार करवाता था, संवैधानिक संगठनों को उचित ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करता था। इस संगठन के कार्यकर्ता मानवाधिकारों के हनन की जाँच करके उसका प्रकाशन करवाते थे तथा सार्वजनिक गोष्ठियों में उस पर विचार करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय की शरण भी लेते थे।

प्रश्न 10.
नागरिक स्वतन्त्रताओं के संगठनों के उदय का वर्णन करें।
उत्तर:
1975 में सरकार द्वारा की गई आपात्काल की घोषणा ने भारतीय लोगों में कई सन्देह पैदा कर दिये। लोगों में स्वतन्त्र भारत में पहली बार यह सन्देह पैदा हुआ कि जिस लोकतन्त्र को वे अपने अधिकारों की सुरक्षा की गारंटी मानते थे, उसी लोकतन्त्र का सहारा लेकर सरकार ने आपात्काल की घोषणा कर दी तथा लोगों के सभी प्रकार के अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं पर प्रतिबन्ध लगा दिया। आपात्काल के समय लोगों के मौलिक अधिकारों को स्थगित कर दिया गया, प्रैस पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, न्यायपालिका की शक्ति को सीमित कर दिया गया तथा जो लोग आपात्काल का विरोध करते थे, उन्हें जेलों में डाल दिया जाता था।

आपात्काल के समय निरोधक नज़रबन्दी का भी बहुत प्रयोग किया गया। इससे पता चलता है कि जो धाराएं लोगों के जीवन की सुरक्षा की गारंटी हैं, उनमें भी कुछ कमियां मौजूद हैं। अतः आपात्काल की समाप्ति के पश्चात् यद्यपि लोकतन्त्र की स्थापना हुई, परन्तु उसमें नागरिक समाज की सीमा में वृद्धि कर दी गई। आपात्काल से पहले लोगों ने नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों की आवश्यकता अनुभव नहीं की, परन्तु आपात्काल के समय एवं इसके पश्चात् लोगों को इसकी कमी अनुभव होने लगी। अतः आपात्काल एवं इसके पश्चात् नागरिक स्वतन्त्रता संगठनों के उदय एवं प्रसार में कुछ प्रगति हुई जिसका वर्णन इस प्रकार है

1. नागरिक स्वतन्त्रता आन्दोलन का उदय (Rise of Civil Liberties Movements):
आपात्काल की घोषणा से कुछ समय पहले सरकार ने न्यायपालिका, वैज्ञानिक संस्थाओं के विकास एवं सामाजिक आर्थिक उन्नति के लिए कुछ पद्धतियों का वर्णन किया, जिसमें श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा दिया गया 20 सूत्रीय कार्यक्रम एवं संजय गांधी द्वारा दिया गया 4 सूत्रीय कार्यक्रम शामिल है। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य ग़रीबी हटाने के लक्ष्य को प्राप्त करना था, जिसमें कि देश का सामाजिक एवं आर्थिक विकास हो सके। परन्तु साथ ही इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए वचनबद्ध नौकरशाही एवं वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा की मांग की गई। सरकार ने यह आशा प्रकट की कि सभी लोग इसमें अपना सहयोग दें।

2. गांधीवादी दृष्टिकोण (Gandhian Approach):
गांधीवादी दृष्टिकोण जयप्रकाश नारायण से सम्बन्धित था। जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन के समय दल विहीन लोकतन्त्र तथा पूर्ण क्रान्ति का नारा दिया। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने विनोबा भावे के भूदान आन्दोलन को भी इसमें शामिल किया। जयप्रकाश नारायण ने इसके लिए गुजरात एवं बिहार के युवा छात्रों को शामिल किया तथा एक नवनिर्माण समिति का गठन किया।

इस समित्ति का उद्देश्य सार्वजनिक जीवन से भ्रष्टाचार को समाप्त करना था। इन सभी कारणों से भारत में नागरिक स्वतन्त्रताओं की सुरक्षा का आन्दोलन शुरू हुआ तथा इससे नागरिक स्वतन्त्रता के लिए लोगों का संगठन एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों का संघ नाम के दो संगठन सामने आए।

3. नक्सलवादी दृष्टिकोण (Naxalite’s Approach):
नक्सलवादी पद्धति बंगाल, केरल एवं आन्ध्र प्रदेश में सक्रिय थी। नक्सलवाद वामदलों से अलग हुआ गुट था, क्योंकि इनका वामदलों से मोह भंग हो गया था। इन्होंने लोगों की स्वतन्त्रता एवं मांगों को पूरा करने के लिए हिंसा का सहारा लिया, परन्तु सरकारों ने इस प्रकार के आन्दोलन को समाप्त करने के लिए बल प्रयोग का सहारा लिया।

4. नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों का संघ (People’s Union for Civil Liberties and Democratic Rights):
नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का उदय अक्तबर. 1976 में हआ। संगठन ने न केवल आपातकाल में ही बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहने के लिए कहा। क्योंकि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में भी प्रायः मानवाधिकारों का हनन होता रहता है।

कई युवाओं को नक्सलवादी कहकर मार दिया जाता है, जबकि वे नक्सलवादी नहीं होते। 1980 में नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का नाम बदलकर ‘नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों का संघ’ रख दिया गया, तथा इस संगठन का प्रचार-प्रसार पूरे देश में किया गया। यह संगठन नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनमत तैयार करवाता था। यह संगठन संवैधानिक संगठनों को भी उचित ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करता था। यह संगठन मानवाधिकारों के हनन की जांच करके, उसका प्रकाशन करवाते थे तथा सार्वजनिक गोष्ठियों में उस पर विचार-विमर्श करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय की शरण भी लेते थे।

नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों की समस्याएं (Problems of the Organisation of Civil Liberties) नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों के संघ को अपने कार्यों एवं लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कई प्रकार की समस्याओं . का भी सामना करना पड़ता है, जिनका वर्णन इस प्रकार है लोकतान्त्रिक व्यवस्था का संकट

  • प्रायः इस प्रकार की संस्थाओं को राष्ट्र विरोधी कहकर इनकी आलोचना की जाती है।
  • नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों की गतिविधियां आतंकवादियों से भी प्रभावित रही हैं।
  • नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों की सफलता से कुछ ऐसे असामाजिक तत्त्व भी इसमें शामिल हो गए हैं, जो इन संगठनों की विश्वसनीयता को अपनी गतिविधियों से कम कर रहे हैं।
  • कुछ तथाकथित ऐसे समाज सुधारक भी इन संगठनों से जुड़ गए हैं, जिनके लिए यह केवल एक व्यवसाय

प्रश्न 11.
जिन सरकारों को लोकतन्त्र विरोधी माना जाता है, मतदाता उन्हें भारी दण्ड देते हैं। 1975-1977 की आपातकालीन स्थिति के सन्दर्भ में इस कथन की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
1975 में श्रीमती गांधी के लिए राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक परिस्थितियां इतनी खराब हो गईं कि उन्हें 25 जून, 1975 को भारत में पहली बार आन्तरिक सुरक्षा के आधार पर आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। इससे पहले जब भी आपात्काल की घोषणा की गई, वह युद्ध के समय की गई थी। राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद एवं संसद् पर श्रीमती गांधी का प्रभाव होने के कारण आपात्काल की घोषणा की स्वीकृति में भी कोई बाधा नहीं आई।

आपात्काल की घोषणा के बाद श्रीमती गांधी ने अपने विरोधियों को जेलों में डालना शुरू कर दिया। उन्होंने गुजरात तथा तमिलनाडु की विधानसभाओं को भंग कर दिया। आन्तरिक सुरक्षा कानून (Maintenance of Internal Security Act-MISA) के अन्तर्गत लोगों को बिना कारण बताए कानूनी हिरासत में ले लिया जाता था तथा इस कानून के अन्तर्गत न्यायपालिका को भी कारण बताने की आवश्यकता नहीं थी।

इस दौरान प्रेस की स्वतन्त्रता पर पाबन्दी लगा दी गई। लोगों को अपने विचार व्यक्त करने की आजादी नहीं थी। परन्तु मार्च, 1977 में श्रीमती गांधी ने आपात्काल की घोषणा समाप्त कर दी तथा नये चुनाव करवाये। इन चुनावों में कांग्रेस को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा, यहां तक कि श्रीमती गांधी स्वयं भी चुनाव हार गईं। भारतीय मतदाताओं ने आपातकाल के दौरान की गई गलतियों के लिए कांग्रेस सरकार को दण्डित किया। नोट-आपात्काल में कांग्रेस द्वारा की गई गलतियों के लिए प्रश्न नं० 8 देखें।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 12.
“सरकार अगर अस्थिर हो और इसके भीतर झगड़े हों तो मतदाता ऐसी सरकार को कड़ा दण्ड देते हैं।” जनता पार्टी के शासन के सन्दर्भ में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में जनता पार्टी की स्थापना का वही महत्त्व है जो स्वतन्त्रता के पूर्व कांग्रेस पार्टी की स्थापना का था। यदि कांग्रेस पार्टी ने भारतीयों को ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से छुड़ाया और उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान की तो जनता पार्टी ने कांग्रेस सरकार विशेषकर श्रीमती इन्दिरा गांधी, संजय गांधी व बंसी लाल की तानाशाही से जनता को राहत दिलाई। 1 मई, 1977 का दिवस स्वतन्त्र भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा।

भविष्य के इतिहासकार 1 मई, 1977 को उसी दृष्टि से देखेंगे जिस प्रकार कल के इतिहासकार 1855 सन् को देखते हैं। यद्यपि 1 मई, 1977 को जनता पार्टी का विधिवत् जन्म हुआ, परन्तु व्यवहार में जनता पार्टी की स्थापना जनवरी, 1977 में हो गई थी। 1977 के चुनावों में जनता पार्टी को भारी एवं ऐतिहासिक चुनावी सफलता मिली तथा मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।

परन्तु यह सरकार सफलतापूर्वक कार्य नहीं कर पाई, जिसके कई कारण थे। इस पार्टी के घटक दलों में तालमेल का अभाव था। प्रत्येक नेता बड़े पद की इच्छा रखे हुए था जिसके कारण इनमें लगातार खींचातान चलती रही। जनता पार्टी के पास एक ठोस कार्यक्रम, नीति एवं दिशा का अभाव था। यह पार्टी कांग्रेस की नीतियों में कोई मूलभूत बदलाव नहीं ला सकी।

धीरे-धीरे जनता पार्टी में आन्तरिक कलह बढ़ती गई, परिणामस्वरूप मोरारजी देसाई की सरकार ने 18 माह बाद ही अपना बहुमत खो दिया। इसके पश्चात् चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमन्त्री बने, परन्तु वे भी अधिक समय तक सत्ता नहीं सम्भाल सके। परिणामस्वरूप 1980 के चुनावों में जनता ने जनता पार्टी को हराकर पुनः श्रीमती इन्दिरा को जिता दिया तथा जनता पार्टी को इसकी अस्थिरता एवं आन्तरिक झगड़े की सज़ा दी।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
‘वचनबद्ध नौकरशाही’ क्या है ?
अथवा
बचनबद्ध नौकरशाही से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वचनबद्ध अथवा प्रतिबद्ध (Committed) नौकरशाही का अर्थ यह है कि नौकरशाही किसी विशिष्ट राजनीतिक दल के सिद्धान्तों एवं नीतियों से बंधी हुई रहती है और उस दल के निर्देशन में ही कार्य करती है। प्रतिबद्ध नौकरशाही निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र होकर कार्य नहीं करती बल्कि इसका कार्य किसी दल विशेष की योजनाओं को बिना कोई प्रश्न उठाए आंखें मूंद कर लागू करना होता है। लोकतान्त्रिक देशों में नौकरशाही प्रतिबद्ध नहीं होती।

इंग्लैण्ड, अमेरिका, स्विट्ज़रलैण्ड आदि देशों में नौकरशाही प्रतिबद्ध नहीं है, परन्तु साम्यवादी देशों में जैसे कि चीन में वचनबद्ध नौकरशाही पाई जाती है। चीन में एक ही राजनीतिक दल (साम्यवादी दल) है और वहां पर नौकरशाही साम्यवादी दल के सिद्धान्तों एवं लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्ध है। नौकरशाही का परम कर्त्तव्य साम्यवादी दल के लक्ष्यों को पूरा करने में सहयोग देना है।

भारत में भी प्रतिबद्ध नौकरशाही की बात कही जाती है, परन्तु भारत में नौकरशाही किसी दल के सिद्धान्तों के प्रति वचनबद्ध न होकर संविधान के प्रति वचनबद्ध है। कोई भी दल सत्ता में क्यों न हो, नौकरशाही का कार्य राजनीतिक कार्यपालिका की नीतियों को नियम के अनुसार लागू करना है।

प्रश्न 2.
वचनबद्ध न्यायपालिका से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
वचनबद्ध न्यायपालिका से अभिप्राय ऐसी न्यायपालिका से है, जो एक दल विशेष या सरकार विशेष के प्रति वफ़ादार हो तथा सरकार के निर्देशों एवं आदेशों के अनुसार ही चले। 1973 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों श्री जे०एम० शैलट, श्री के०एस० हेगड़े तथा श्री ए०एन० ग्रोवर की उपेक्षा करके श्री ए०एन० राय को नियुक्त किया। इस नियुक्ति से उस समय एक राजनीतिक एवं न्यायिक विवाद पैदा हो गया। श्री ए०एन० राय की नियुक्ति के विरोध में तीनों वरिष्ठ न्यायाधीशों ने अपने पद से त्याग दिया। इससे यह प्रश्न उठने लगा कि क्या न्यायपालिका सरकार के प्रति वचनबद्ध होनी चाहिए या स्वतन्त्र। प्रश्न 3. भारत में वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा का उदय कैसे हुआ ?
उत्तर:
1973 में स्वामी केशवानन्द भारती एवं अन्य ने 24वें तथा 25वें संवैधानिक संशोधनों को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। ये संशोधन संसद् को सभी अधिकारों में हस्तक्षेप से सम्बन्धित थे, जिसमें समुदाय बनाना तथा धर्म की स्वतन्त्रता भी शामिल थी। स्वामी केशवानन्द भारती मुकद्दमे की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय की एक 13 सदस्यीय संविधान पीठ ने की। 13 में से 9 न्यायाधीशों ने यह निर्णय दिया कि संसद् मौलिक अधिकारों सहित संविधान में संशोधन कर सकती है, परन्तु संविधान के मूलभूत ढांचे में परिवर्तन नहीं कर सकती।

इस निर्णय से सरकार एवं न्यायपालिका में मतभेद बढ़ गए, क्योंकि 1973 में सरकार का नेतृत्व श्रीमती इन्दिरा गांधी कर रही थीं, अत: यह विवाद श्रीमती गांधी एवं न्यायालय के बीच हुआ, जिसमें जीत न्यायालय की हुई, क्योंकि न्यायालय ने संसद् की संविधान में संशोधन करने की शक्ति को सीमित कर दिया। इसी कारण श्रीमती गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा को आगे बढ़ाया। 1975 में आपात्काल के समय वचनबद्ध न्यायपालिका का सिद्धान्त कार्यपालिका का सिद्धान्त बन गया।

प्रश्न 4.
‘वचनबद्ध’ न्यायपालिका के लिए इन्दिरा गांधी सरकार द्वारा किन उपायों का प्रयोग किया गया था ?
उत्तर:
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति में वरिष्ठता की अनदेखी-श्रीमती गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में वरिष्ठता की अनदेखी की। श्रीमती गांधी ने श्री ए०एन० राय को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी करके सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया था।

2. न्यायाधीशों का स्थानान्तरण-श्रीमती गांधी ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों के स्थानान्तरण का सहारा भी लिया। उन्होंने 1981 में मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश इस्माइल को केरल उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बनाकर भेजा।

3. रिक्त पदों को भरने से मना करना-सरकार ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए कई बार रिक्त पदों को भरने से भी मना कर दिया।

4. अन्य पदों पर नियुक्तियां-सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से उन्हें राज्यपाल, राजदूत, मन्त्री या किसी आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जो सरकार के प्रति वफादार थे।

प्रश्न 5.
गुजरात में नवनिर्माण आन्दोलन कब आरम्भ हुआ ?
अथवा
गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
गुजरात में 1970 के दशक में नवनिर्माण आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। अहमदाबाद के एल० डी० इन्जीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद के कारण अहमदाबाद में असन्तोष फैल गया तथा आगे चलकर इस असन्तोष ने गुजरात नवनिर्माण का रूप धारण कर लिया। इस एक घटना से अहमदाबाद राष्ट्रीय राजनीति के केन्द्र में आ गया। गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन उन लोगों के विरुद्ध था, जो हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति के समर्थक थे। यह आन्दोलन इतना व्यापक था कि गुजरात के मुख्यमन्त्री चिमनबाई पटेल को त्याग-पत्र देना पड़ा।

नवनिर्माण आन्दोलन धीरे-धीरे सम्पूर्ण गुजरात में फैल गया तथा अनेक लोग इस आन्दोलन से जुड़ गए। कांग्रेस पार्टी ने नवनिर्माण आन्दोलन के विरुद्ध एक चुनावी रणनीति तैयार की, जिसे क्षत्रिय-हरिजन-आदिवासी तथा मुस्लिम मिलन (Kshatriya-Harijan-Adivasi-Muslim Combine-KHAM) का नाम दिया। 1980 के गुजरात विधानसभा चुनावों में इस योजना को सफलता मिली, परन्तु इससे उच्च जातियों को पहली बार यह अनुभव हुआ कि शक्ति उच्च वर्गों से निकलकर मध्यम वर्ग की ओर जा रही है।

प्रश्न 6.
‘बिहार आन्दोलन’ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
अथवा
‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
बिहार आन्दोलन जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में चलाया गया था। बिहार आन्दोलन शासन में भ्रष्टाचारी एवं अयोग्य कर्मचारियों के विरुद्ध चलाया गया था। इस आन्दोलन को पूर्ण या व्यापक क्रान्ति (Total Revolution) भी कहा जाता है। जय प्रकाश नारायण ने 1975 में बिहार के लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि बिहार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य समाज एवं व्यक्ति के सभी पक्षों में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना है।

यह उद्देश्य ऐसा नहीं है, जिसे एक दिन या एक वर्ष में प्राप्त कर लिया जाए, बल्कि अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें एक लम्बे समय तक बिहार आन्दोलन जारी रखना होगा। बिहार आन्दोलन में अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं को भी हल करने का प्रयास किया गया। जय प्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन के चार पक्षों का वर्णन किया-प्रथम संघर्ष, द्वितीय निर्माण, तृतीय प्रचार तथा चतुर्थ संगठन। जय प्रकाश नारायण ने तात्कालिक परिस्थितियों में निर्माण कार्य पर अधिक जोर दिया।

प्रश्न 7.
आपात्काल के मुख्य चार कारण लिखो।
अथवा
1975 में आपात्काल की घोषणा के कोई चार कारण लिखिये।
अथवा
श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा 1975 में की गई आपातस्थिति की घोषणा के कोई तीन कारण लिखिए।
उत्तर:
1. 1971 के युद्ध में अत्यधिक खर्च-1975 में लागू की गई आपात्काल की घोषणा का एक प्रमुख कारण 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध को माना जाता है। इस युद्ध में भारत को बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था खराब हो गई।

2. अधिक एवं अच्छी फसल का पैदा न होना-1972-73 में भारत में फसल भी अच्छी नहीं हुई। दूसरे शब्दों में सरकार को कृषि क्षेत्र में असफलता मिल रही थी।

3. गुजरात एवं बिहार आन्दोलन-आपात्काल की घोषणा का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण गुजरात का नवनिर्माण आन्दोलन तथा बिहार आन्दोलन था। इन दोनों आन्दोलनों ने श्रीमती गांधी को भयभीत कर दिया।

4. श्रीमती गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित करना-श्रीमती गांधी द्वारा 1975 में आपात्काल की घोषणा का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को अवैध घोषित करना था।

प्रश्न 8.
आपातकाल के दौरान आम जनता व शासन पर नियन्त्रण के लिए कौन-कौन से कदम उठाए गए ?
उत्तर:
(1) आपात्काल की घोषणा के बाद श्रीमती गांधी ने अपने विरोधियों को जेलों में डालना शुरू कर दिया। उन्होंने गुजरात एवं तमिलनाडु विधानसभाओं को भंग कर दिया।

(2) मीसा (MISA) कानून के अन्तर्गत लोगों को बिना कारण बताए कानूनी हिरासत में ले लिया जाता था तथा इस कानून के अन्तर्गत न्यायपालिका को भी कारण बताने की आवश्यकता नहीं थी।

(3) सरकार ने जनसंख्या को नियन्त्रित करने के लिए नसबंदी कार्यक्रम चलाया।

(4) प्रेस की स्वतन्त्रता पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

प्रश्न 9.
1977 के चुनाव तथा जनता पार्टी के गठन का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की जनवरी, 1977 में चुनाव की घोषणा करने के पश्चात् जेलों में बन्द राजनीतिक नेताओं को धीरे-धीरे रिहा किया गया। कांग्रेस संगठन, जनसंघ, भारतीय लोकदल तथा सोशलिस्ट पार्टी के नेताओं और विद्रोही कांग्रेस नेताओं ने यह अनुभव किया कि प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी की तानाशाही से छुटकारा पाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी का निर्माण अति आवश्यक है।

श्री जयप्रकाश नारायण 1974 से ही इन दलों को एक दल बनाने का आग्रह कर रहे थे, अत: श्री जयप्रकाश नारायण के प्रयासों के फलस्वरूप संगठन कांग्रेस, जनसंघ, भारतीय लोकदल और सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर जनवरी, 1977 में जनता पार्टी की स्थापना करके भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन ला दिया। विद्रोही कांग्रेस सदस्य चन्द्रशेखर, मोहन धारिया और रामधन आदि भी जनता पार्टी में शामिल हुए। 1977 के चुनावों में जनता पार्टी ने 542 सीटों में से 300 सीटें जीतीं। इस प्रकार जनता पार्टी ने कांग्रेस को करारी हार दी।

प्रश्न 10.
सन् 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की विजय के कोई चार उत्तरदायी कारण लिखिए।
अथवा
1977 में हुए छठी लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की हार के कोई चार कारण बताएं।
उत्तर:
1. आपात्काल घोषणा-1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार एवं जनता पार्टी की जीत का स बड़ा एवं तात्कालिक कारण श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा की गई आपात्काल की घोषणा थी। इस घोषणा के कारण अगले चुनावों में लोगों ने जनता पार्टी को वोट दिए।

2. संजय गांधी की भूमिका- आपात्काल के समय उत्तर-संवैधानिक तत्त्व के रूप में संजय गांधी का उभरना था। आपात्काल के समय संजय गांधी द्वारा निभाई गई भूमिका के प्रति लोगों में असन्तोष था।

3. मीसा कानून-आपात्काल के दौरान श्रीमती गांधी ने मीसा कानून लागू किया, जिसके अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को बिना कारण बताए तथा मुकद्दमा चलाए जेल में डाल दिया जाता था। इस कानून के कारण किसी भी व्यक्ति का जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति सुरक्षित नहीं थी।

4. संवैधानिक संशोधन- आपात्काल के समय सरकार ने संविधान में 39वां एवं 42वां संशोधन करके न्यायपालिका की शक्तियों को घटाकर कार्यपालिका की शक्तियों को बढ़ा दिया। इस प्रकार के संशोधन संविधान की मूल भावना के विरुद्ध थे।

प्रश्न 11.
नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का उदय अक्तूबर, 1976 में हुआ। इस संगठन ने न केवल आपात्काल में ही बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहने के लिए कहा। क्योंकि प्रजातान्त्रिक व्यवस्था में भी प्राय: मानवाधिकारों का हनन होता रहता है। उदाहरण के लिए कई युवाओं को नक्सलवादी कहकर मार दिया जाता है, जबकि वे नक्सलवादी नहीं होते हैं।

1980 में नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का नाम बदलकर ‘नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों का संघ’ रख दिया गया तथा इस संगठन का प्रचार-प्रसार पूरे देश में किया गया। यह संगठन नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनमत तैयार करवाता था, संवैधानिक संगठनों को उचित ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करता था। इस संगठन के कार्यकर्ता मानवाधिकारों के हनन की जांच करके उसका प्रकाशन करवाते थे तथा सार्वजनिक गोष्ठियों में उस पर विचार करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय की शरण भी लेते थे।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 12.
आपात्काल से हमें मिलने वाली किन्हीं चार शिक्षाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • आपातकाल की पहली शिक्षा तो यह है कि भारत से लोकतंत्र को समाप्त कर पाना बहुत कठिन है।
  • आपात्काल के समय आपातकाल से सम्बन्धित कुछ प्रावधानों में उलझाव सामने आए जिसे बाद में ठीक कर लिया गया।
  • आपात्काल से प्रत्येक नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हुआ।
  • नौकरशाही तथा न्यायपालिका को स्वतंत्र रखना चाहिए, ताकि लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की जा सके।

प्रश्न 13.
1975 में आपात्काल की घोषणा के कोई चार परिणाम लिखिए।
उत्तर:
(1) आपात्काल का विरोध करने के लिए लगभग सभी विरोधी दल एकत्र हो गए तथा लोगों को आपातकाल के विरुद्ध आन्दोलन करने के लिए प्रेरित करने लगे। इन दलों ने आपस में मिलकर जनता पार्टी नाम के एक दल का भी निर्माण किया।

(2) आपातकाल के दौरान ही नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का उदय अक्तूबर, 1976 में हुआ। इस संगठन ने न केवल आपात्काल में ही बल्कि सामान्य परिस्थितियों में भी लोगों को अपने अधिकारों के प्रति सतर्क रहने के लिए कहा।

(3) आपात्काल के समय 42वां संवैधानिक संशोधन पास हुआ। (4) आपात्काल की घोषणा के कारण 1977 के चुनावों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
‘वचनबद्ध नौकरशाही’ से आपका क्या अभिप्राय है ?
अथवा
वचनबद्ध नौकरशाही से क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
वचनबद्ध नौकरशाही का अर्थ यह है कि नौकरशाही किसी विशिष्ट राजनीतिक दल के सिद्धान्तों एवं नीतियों से बन्धी हुई रहती है और उस दल के निर्देशों से ही कार्य करती है। वचनबद्ध नौकरशाही निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र होकर कार्य नहीं करती, बल्कि इसका कार्य किसी दल विशेष की योजनाओं को बिना कोई प्रश्न उठाए आंखें मूंद कर लागू करना होता है।

प्रश्न 2.
‘वचनबद्ध न्यायपालिका’ से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
वचनबद्ध न्यायपालिका से अभिप्रायः ऐसी न्यायपालिका से है, जो एक दल विशेष या सरकार विशेष के प्रति वफ़ादार हो तथा उसके निर्देशों एवं आदेशों के अनुसार ही चले। 1973 में प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के पद पर तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की उपेक्षा करके श्री ए०एन० राय को नियुक्त किया, जिससे वचनबद्ध न्यायपालिका से सम्बन्धित विवाद पैदा हो गया।

प्रश्न 3.
वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए सरकार द्वारा प्रयोग किये गए किन्हीं दो उपायों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • सरकार ने वचनबद्ध न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायाधीशों की वरिष्ठता की अनदेखी की।
  • सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीशों में से उन्हें राज्यपाल, राजदूत, मन्त्री या किसी आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया, जो सरकार के प्रति वफ़ादार थे।

प्रश्न 4.
भारतीय न्यायपालिका को स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष बनाये रखने के लिए संविधान में क्या उपाय किये गए हैं ?
उत्तर:

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है।
  • न्यायाधीशों की योग्यताओं का वर्णन संविधान में किया गया है।
  • न्यायाधीश एक निश्चित आयु पर सेवानिवृत्त होते हैं।
  • न्यायाधीशों को केवल महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है।

प्रश्न 5.
गुजरात के नवनिर्माण आन्दोलन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
गुजरात में 1970 के दशक में नवनिर्माण आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। अहमदाबाद के एल०डी० इन्जीनियरिंग महाविद्यालय के छात्रावास में खाने में 20% की वृद्धि पर विवाद के कारण अहमदाबाद में असन्तोष फैल गया। गुजरात नव-निर्माण आन्दोलन उन लोगों के विरुद्ध था, जो हरित क्रान्ति एवं श्वेत क्रान्ति के समर्थक थे। यह आन्दोलन इतना व्यापक था कि गुजरात के मुख्यमन्त्री चिमन भाई पटेल को त्याग-पत्र देना पड़ा।

प्रश्न 6.
आपात्काल से पूर्व बिहार आन्दोलन कब और किसके नेतृत्व में चलाया गया ?
अथवा
1974 में बिहार आन्दोलन को किस नाम से पुकारा जाता है और उसका क्या उद्देश्य था ?
उत्तर:
बिहार आन्दोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 में चलाया गया था। जयप्रकाश नारायण ने इसे पूर्ण या व्यापक क्रान्ति भी कहा है। जयप्रकाश नारायण ने 1975 में बिहार के लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि बिहार आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य समाज एवं व्यक्ति के सभी पक्षों में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन लाना है। यह उद्देश्य ऐसा नहीं है, जिसे एक दिन या एक वर्ष में प्राप्त कर लिया जाए, बल्कि अपने उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए हमें एक लम्बे समय तक बिहार आन्दोलन जारी रखना होगा।

प्रश्न 7.
जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन के कितने पक्षों का वर्णन किया और तात्कालिक परिस्थितियों में किस पक्ष पर अधिक जोर देने के लिए कहा ?
उत्तर:
जयप्रकाश नारायण ने बिहार आन्दोलन के चार पक्षों-प्रथम संघर्ष, द्वितीय निर्माण, तृतीय प्रचार एवं चतुर्थ संगठन का वर्णन किया तथा तात्कालिक परिस्थितियों में निर्माण कार्य पर अधिक बल दिया।

प्रश्न 8.
1975 में की गई आपात्काल घोषणा के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
(1) 1975 में लागू की गई आपात्काल की घोषणा का एक मुख्य कारण 1971 में हुए पाकिस्तान के साथ युद्ध को माना जाता है। इस युद्ध में भारत को बहुत अधिक धन खर्च करना पड़ा। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था खराब हो गई।

(2) श्रीमती गांधी द्वारा 1975 में आपात्काल की घोषणा का सबसे महत्त्वपूर्ण एवं तात्कालिक कारण इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा उनके निर्वाचन को अवैध घोषित करना था।

प्रश्न 9.
1977 के आम चुनावों में जनता पार्टी की जीत के कोई दो कारण बताएं।
अथवा
1977 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
(1) 1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार एवं जनता पार्टी की जीत का सबसे बड़ा एवं तात्कालिक कारण श्रीमती गांधी द्वारा की गई आपात्काल की घोषणा थी।

(2) आपात्काल के समय उत्तर-संवैधानिक तत्त्व के रूप में संजय गांधी का उभरना था। आपात्काल के समय संजय गांधी द्वारा निभाई गई भूमिका के प्रति लोगों में असन्तोष था।

प्रश्न 10.
आपात्काल से क्या तात्पर्य है?
उत्तर:
श्रीमती गांधी ने 25 जून, 1975 को भारत में पहली बार आन्तरिक सुरक्षा के आधार पर आपात्काल की घोषणा की। इससे पहले जब भी आपात्काल की घोषणा की गई, वह युद्ध के समय की गई थी। राष्ट्रपति फखरूदीन अली अहमद एवं संसद् पर श्रीमती गांधी का प्रभाव होने के कारण आपात्काल की घोषणा की स्वीकृति में भी कोई बाधा नहीं आई।

आपात्काल की घोषणा के बाद श्रीमती गांधी ने अपने विरोधियों को जेलों में डालना शुरू कर दिया उन्होंने गुजरात तथा तमिलनाडु की विधानसभाओं को भंग कर दिया। आन्तरिक सुरक्षा कानून (Maintenance of Internal Security Act MISA) के अन्तर्गत लोगों को बिना कारण बताए कानूनी हिरासत में ले लिया जाता था तथा इस कानून के अन्तर्गत न्यायपालिका को भी कारण बताने की आवश्यकता नहीं थी।

प्रश्न 11.
‘नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों का संघ’ के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1980 में नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों के संघ का नाम बदलकर ‘नागरिक स्वतन्त्रताओं के लिए लोगों का संघ’ रख दिया गया। यह संगठन नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनमत तैयार करवाता था, संवैधानिक संगठनों को उचित ढंग से कार्य करने के लिए प्रेरित करता था। इस संगठन के कार्यकर्ता मानवाधिकारों के हनन की जांच करके उसका प्रकाशन करवाते थे तथा सार्वजनिक गोष्ठियों में उस पर विचार करते थे तथा आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय की भी शरण लेते थे।

प्रश्न 12.
नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों की किन्हीं दो समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • प्रायः नागरिक स्वतन्त्रता के संगठनों को राष्ट्र विरोधी कहकर इनकी आलोचना की जाती है।
  • कुछ तथाकथित ऐसे समाज सुधारक भी इन संगठनों से जुड़ गए हैं, जिनके लिए यह केवल एक व्यवसाय है।

प्रश्न 13.
प्रेस सेंसरशिप किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
प्रेस सेंसरशिप का अर्थ है कि प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को कुछ भी छापने या दिखाने से पहले उसकी स्वीकृति सरकार से लेनी होती है। सरकार ही इस बात का निर्णय करती है कि क्या दिखाया या छापना चाहिए और क्या नहीं। सन् 1975-1977 में आपात्काल के दौरान सरकार ने प्रेस की आजादी पर रोक लगा दी। समाचार-पत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले अनुमति लेना ज़रूरी है।

प्रश्न 14.
आपात्काल के दौरान पुलिस एवं नौकरशाहों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
आपात्काल के दौरान पुलिस एवं नौकरशाही सरकार के साथ रही। पुलिस ने मनमाने ढंग से लोगों को गिरफ्तार करके सरकार की सहायता की एवं नौकरशाही सरकार के प्रति वचनबद्ध बनी रही।

प्रश्न 15.
चारू मजूमदार का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
चारू मजूमदार एक क्रान्तिकारी समाजवादी नेता थे। उनका जन्म 1918 में हुआ। चारू मजूमदार ने तिभागा आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया था। इन्होंने भारतीय साम्यवादी दल (मार्क्सवादी लेनिनवादी) की स्थापना की। वे किसान विद्रोह के माओवादी धारा में विश्वास रखते थे। 1972 में पुलिस हिरासत में उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 16.
लोकनायक जय प्रकाश नारायण का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
लोकनायक जयप्रकाश नारायण का जन्म 1902 में हुआ। वे मार्क्सवादी विचारधारा में विश्वास रखते थे। उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। उन्होंने भारत छोड़ो आन्दोलन में हिस्सा लिया। स्वतन्त्रता के बाद नेहरू डल में शामिल होने से मना किया। वे बिहार आन्दोलन के प्रमुख नेता थे। 1979 में उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 17.
मोरारजी देसाई के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री थे। उनका जन्म 1896 में हुआ। वे स्वतन्त्रता सेनानी तथा गांधीवादी नेता थे। वे बांबे प्रांत के मुख्यमन्त्री भी रहे हैं। 1969 में कांग्रेस के पश्चात् वे कांग्रेस (ओ) में शामिल हुए। 1995 में उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 18.
चौ० चरण सिंह का जीवन परिचय लिखें।
उत्तर:
चौ० चरण सिंह 1979 में भारत के दूसरे गैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री बने। वे एक प्रमुख स्वतन्त्रता सेनानी थे। वे ग्रामीण एवं कृषि विकास के समर्थक थे। 1967 में उन्होंने भारतीय क्रान्ति दल की स्थापना की। वे उत्तर प्रदेश के दो बार मुख्यमन्त्री बने। 1987 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 19.
जगजीवन राम के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
जगजीवन राम का जन्म 1908 में हुआ। वे बिहार के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता एवं स्वतन्त्रता सेनानी थे। वे संविधान सभा के सदस्य थे। 1977-1979 के बीच वे देश के उप-प्रधानमन्त्री रहे। उन्होंने स्वतन्त्रता के बाद नेहरू मन्त्रिमण्डल में श्रम मन्त्री का कार्यभार सम्भाला। उनका निधन 1986 में हो गया।

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प्रश्न 20.
जनता पार्टी के गठन के बारे में लिखिए।
उत्तर:
जनता पार्टी का गठन आपात्काल के पश्चात् 1 मई, 1977 को विधिवत रूप से हुआ। इस पार्टी में अधिकांश वे दल एवं नेता शामिल थे, जिन्होंने आपात्काल का विरोध किया था जैसे कांग्रेस संगठन, जनसंघ, भारतीय लोकदल तथा सोशलिस्ट पार्टी इत्यादि। जय प्रकाश नारायण ने इस पार्टी के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोरारजी देसाई को पार्टी का अध्यक्ष एवं चौ० चरण सिंह को पार्टी का उपाध्यक्ष चुना गया था।

प्रश्न 21.
इन्दिरा गांधी की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
इन्दिरा गांधी की मृत्यु 31 अक्तूबर, 1984 को हुई।

प्रश्न 22.
इंदिरा गांधी के ‘बीस सूत्री कार्यक्रम’ में शामिल किन्हीं चार विषयों का नाम लिखें।
उत्तर:

  • भूमि सुधार।
  • भू-पुनर्वितरण।
  • खेतिहर मजदूरों के पारिश्रमिक पर पुनर्विचार।
  • प्रबंधन में कामगारों की भागीदारी।

प्रश्न 23.
‘नक्सलवादी आन्दोलन’ क्या है ?
उत्तर:
सन् 1964 में साम्यवादी दल में फूट पड़ गई। दोनों दलों के संसदीय राजनीति में व्यस्त होने के कारण इन दलों के सक्रिय व संघर्षशील कार्यकर्ता दलों से अलग होकर जन कार्य करने लगे । सन् 1967 में बंगाल में साम्यवादी दल की सरकार बनी। इसी समय दार्जिलिंग में नक्सलवाड़ी नामक स्थान पर किसानों ने विद्रोह कर दिया।

यद्यपि पश्चिमी बंगाल की सरकार ने इसे दबा दिया। परन्तु इस आन्दोलन की प्रतिक्रिया पंजाब, उत्तर प्रदेश और कश्मीर में भी हुई। इससे नक्सलवाड़ी आन्दोलन का विरोध किया गया। जिसके परिणामस्वरूप मई, 1967 में भारी हिंसक घटनाएं हुईं। यह आन्दोलन तेज़ी से राज्य के अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया।

प्रश्न 24.
डॉ० राम मनोहर लोहिया कौन थे ?
उत्तर:
डॉ० राम मनोहर लोहिया भारत के एक महान् समाजवादी चिंतक थे। उनका जन्म 23 मार्च, 1910 को उत्तर-प्रदेश के फैजाबाद जिले में हुआ था। सन् 1952 में उन्होंने प्रजा समाजवादी दल का निर्माण किया। सन् 1967 के चौथे आम चुनावों के परिणामों को उन्होंने ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का युग बनाया।

प्रश्न 25.
आपात्काल ने जनसंचार के साधनों पर क्या प्रभाव डाला ?
उत्तर:
आपात्काल ने जनसंचार के साधनों पर बड़ा नकारात्मक प्रभाव डाला। मीडिया को नियन्त्रित करने के लिए प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई। समाचार-पत्रों को कहा गया कि कुछ भी छापने से पहले सरकार की अनुमति लेना आवश्यक है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. किस भारतीय नेता ने वचनबद्ध नौकरशाही एवं वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा को जन्म दिया ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू
(B) सरदार पटेल
(C) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(D) मोरारजी देसाई।
उत्तर:
(C) श्रीमती इन्दिरा गांधी।

2. 1973 में किस न्यायाधीश को तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी करके भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया ?
(A) जे० एम० शैलट
(B) के० एस० हेगड़े
(C) एन० एन० ग्रोवर
(D) ए० एन० राय।
उत्तर:
(D) ए० एन० राय।

3. केशवानन्द भारती मुकद्दमे का निर्णय कब हुआ ?
(A) 1973
(B) 1971
(C) 1977
(D) 1976
उत्तर:
(A) 1973

4. किस मुकद्दमे में संविधान के मूलभूत ढांचे की धारणा का जन्म हुआ ?
(A) केशवानन्द भारती मुकद्दमा
(B) मिनर्वा मिल्स मुकद्दमा
(C) अयोध्या विवाद
(D) गोलकनाथ मुकद्दमा।
उत्तर:
(A) केशवानन्द भारती मुकद्दमा।

5. निम्नलिखित में से किस राज्य में नव-निर्माण’आन्दोलन चला’ था?
(A) पंजाब
(B) बिहार
(C) हरियाणा
(D) गुजरात।
उत्तर:
(D) गुजरात।

6. आपात्काल की समाप्ति के बाद देश में छठी लोकसभा के चुनाव कब हुए?
(A) जनवरी 1977 में
(B) मार्च 1977 में
(C) जनवरी 1978 में
(D) मार्च 1978 में।
उत्तर:
(B) मार्च 1977 में।

7. भारत में चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है
(A) राष्ट्रपति को
(B) संसद् को
(C) मुख्य न्यायाधीश को
(D) चुनाव आयोग को।
उत्तर:
(D) चुनाव आयोग को।

8. आपात्काल की घोषणा के समय भारत का प्रधानमंत्री कौन था?
(A) चौ० चरण सिंह
(B) श्री राजीव गांधी
(C) श्रीमती इंदिरा गांधी
(D) श्री मोरार जी देसाई।
उत्तर:
(C) श्रीमती इंदिरा गांधी।

9. जनता पार्टी की सरकार द्वारा आपात्काल की ज्यादतियों की जाँच हेतु ‘शाह आयोग’ की नियुक्ति कब की गई थी?
(A) मई 1976 में
(B) मई 1977 में
(C) मई 1978 में
(D) जून 1979 में।
उत्तर:
(B) मई 1977 में।

10. 1980 में हुए 7वें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी को कितने लोकसभा स्थानों पर विजय मिली ?
(A) 350
(B) 353
(C) 363
(D) 373
उत्तर:
(B) 353

11. देश में प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री निम्नलिखित में से कौन बना?
(A) श्री जगजीवन राम
(B) चौधरी चरण सिंह
(C) श्री मोरार जी देसाई
(D) श्री अटल बिहारी बाजपेयी।
उत्तर:
(C) श्री मोरार जी देसाई।

12. बिहार आन्दोलन को किसने चलाया ?
(A) जयप्रकाश नारायण
(B) लालू प्रसाद यादव
(C) मोरारजी देसाई
(D) अटल बिहारी बाजपेयी।
उत्तर:
(A) जयप्रकाश नारायण।

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13. आपात्काल की घोषणा कब की गई ?
(A) 25 जून, 1975
(B) 30 जून, 1975
(C) 13 अगस्त, 1975
(D) 1 नवम्बर, 1975
उत्तर:
(A) 25 जून, 1975

14. जनता पार्टी की स्थापना हुई
(A) 1976
(B) 1975
(C) 1977
(D) 1978
उत्तर:
(C) 1977

15. 1977 के आम चुनावों में किस पार्टी की विजय हुई ?
(A) कांग्रेस पार्टी
(B) जनता पार्टी
(C) भारतीय जनता पार्टी
(D) कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी।
उत्तर:
(B) जनता पार्टी।

16. 1977 के चुनावों में जनता पार्टी को कितनी सीटें मिलीं ?
(A) 272
(B) 172
(C) 310
(D) 292
उत्तर:
(A) 272

17. 1977 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं ?
(A) 53
(B) 153
(C) 253
(D) 309
उत्तर:
(B) 153

18. 1977 में स्वतन्त्रता से सम्बन्धित किस संगठन का निर्माण हुआ ?
(A) नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों का संघ
(B) आपात्कालीन विरोधी संगठन
(C) तानाशाही विरोधी संगठन
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) नागरिक स्वतन्त्रता एवं लोकतान्त्रिक अधिकारों के लिए लोगों का संघ।

19. शाह आयोग की स्थापना किस सरकार ने की थी ?
(A) जनता पार्टी की सरकार
(B) कांग्रेस सरकार ने
(C) भारतीय जनता पार्टी की सरकार
(D) जनता दल की सरकार
उत्तर:
(A) जनता पार्टी की सरकार।

20. जनता पार्टी की सरकार द्वारा आपात्काल की ज्यादतियों की जांच हेतु शाह आयोग की नियुक्ति कब की गई ?
(A) मई 1977 में
(B) मई 1978 में
(C) मार्च 1976 में
(D) मार्च 1979 में।
उत्तर:
(A) मई 1977 में।

21. शाह आयोग के अनुसार निवारक नज़रबंदी कानून के अन्तर्गत लगभग कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया ?
(A) 111000
(B) 90000
(C) 70000
(D) 85000
उत्तर:
(A) 111000

22. 1980 के लोकसभा के चुनाव में किस पार्टी को अधिकतम सीटें प्राप्त हुईं थीं ?
(A) कांग्रेस पार्टी
(B) जनता पार्टी
(C) साम्यवादी दल
(D) भारतीय जनता पार्टी।
उत्तर:
(A) कांग्रेस पार्टी।

23. 1980 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को कितने सीटें मिलीं ?
(A) 153
(B) 253
(C) 353
(D) 410
उत्तर:
(C) 353

24. जनता पार्टी के पतन का कारण था ?
(A) गुटबाज़ी
(B) कल्याणकारी नीति
(C) शिक्षा नीति
(D) कर नीति।
उत्तर:
(A) गुटबाजी।

25. श्री मोरार जी देसाई कब प्रधानमन्त्री बने थे ?
(A) 1975
(B) 1976
(C) 1977
(D) 1964
उत्तर:
(C) 1977

26. चौ० चरण सिंह कब भारत के प्रधानमन्त्री बने थे ?
(A) 1980
(B) 1977
(C) 1967
(D) 1979
उत्तर:
(D) 1979

27. भारत में ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ का आह्वान किस नेता ने किया था ?
(A) श्री मोरार जी देसाई
(B) श्री जय प्रकाश नारायण
(C) चौधरी चरण सिंह
(D) श्री बिनोवा भावे।
उत्तर:
(B) श्री जय प्रकाश नारायण।

28. 1947 में रेलवे कर्मचारियों की देशव्यापी हड़ताल का नेतृत्व किस नेता ने किया?
(A) श्री जय प्रकाश नारायण
(B) श्री जार्ज फर्नाडिंस
(C) श्री मोरार जी देसाई
(D) चौधरी चरण सिंह।
उत्तर:
(B) श्री जार्ज फर्नाडिंस।

29. भारत का प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमन्त्री निम्नलिखित में से कौन था ?
(A) श्री जगजीवन राम
(B) श्री चौधरी चरण सिंह
(C) श्री मोरारजी देसाई
(D) श्री वी० पी० सिंह।
उत्तर:
(C) श्री मोरारजी देसाई।

30. ‘इन्दिरा इज इंडिया, इंडिया इज़ इंदिरा’ का नारा निम्नलिखित में से किसने दिया था ?
(A) डी० के० बरूआ
(B) इन्दिरा गांधी
(C) संजय गांधी
(D) राजीव गांधी।
उत्तर:
(A) डी० के० बरूआ।

31. आपातकाल के दौरान हुए किस संवैधानिक संशोधन को ‘लघु संविधान’ तक कहा गया है ?
(A) 38वां संशोधन
(B) 39वां संशोधन
(C) 40वां संशोधन
(D) 42वां संशोधन।
उत्तर:
(C) 40वां संशोधन।

32. भारत में सम्पूर्ण क्रान्ति’ का आह्वान निम्नलिखित में से किस नेता ने किया था?
(A) श्री मोरार जी देसाई
(B) चौधरी चरण सिंह
(C) श्री चारु मजूमदार
(D) श्री जय प्रकाश नारायण।
उत्तर:
(D) श्री जय प्रकाश नारायण।

निम्न रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) ……………. भारतीय नेता ने वचनबद्ध नौकरशाही एवं वचनबद्ध न्यायपालिका की धारणा को जन्म दिया।
उत्तर:
श्रीमती इंदिरा गांधी

(2) 1977 में …………. भारत के प्रधानमन्त्री बने।
उत्तर:
श्री मोरार जी देसाई

(3) 26 जून, 1975 को देश में ……………… की घोषणा की गई।
उत्तर:
आपातकाल

(4) जून 1975 को देश में आपात्काल की घोषणा प्रधानमंत्री ………… ने की।
उत्तर:
श्रीमती इंदिरा गांधी

(5) बिहार आन्दोलन के प्रमुख नेता …………… थे।
उत्तर:
जय प्रकाश नारायण

(6) 1975 में जय प्रकाश नारायण ने जनता के …………. का नेतृत्व किया।
उत्तर:
संसद् मार्च

(7) 1974 में देश में …………….. हड़ताल हुई।
उत्तर:
रेल

(8) सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मौलिक ढांचे की व्यवस्था ……….. के मुकद्दमे में दी।
उत्तर:
केशवानन्द भारती

(9) 1975 में आन्तरिक आपात्काल संविधान के अनुच्छेद ………… के अन्तर्गत लगाया गया।
उत्तर:
352

(10) 42वें संशोधन द्वारा लोकसभा का कार्यकाल 5 साल से बढ़ाकर ………. कर दिया गया।
उत्तर:
6 साल

(11) शाह आयोग का गठन ………….. में किया गया।
उत्तर:
मई

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में सम्पूर्ण क्रान्ति का आह्वान किस नेता ने किया?
उत्तर:
श्री जय प्रकाश नारायण ने।

प्रश्न 2.
किस संवैधानिक संशोधन द्वारा लोकसभा की अवधि 5 वर्ष से बढ़ाकर 6 वर्ष कर दी गई थी ?
उत्तर:
42वें संवैधानिक संशोधन द्वारा।

प्रश्न 3.
भारत में प्रथम गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री कौन बना ?
उत्तर:
श्री मोरारजी देसाई।

प्रश्न 4.
भारत में प्रतिबद्ध नौकरशाही एवं प्रतिबद्ध न्यायपालिका’ रूपी धारणा को किसने जन्म दिया?
उत्तर:
श्रीमती इंदिरा गांधी ने।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकट

प्रश्न 5.
1974 में छात्र आन्दोलन ने किस राज्य में राष्ट्रव्यापी आन्दोलन का रूप ले लिया?
उत्तर:
गुजरात में।

प्रश्न 6.
चौधरी चरण सिंह कब भारत के प्रधानमन्त्री रहे ?
उत्तर:
चौधरी चरण सिंह जुलाई 1979 से जनवरी 1980 के बीच भारत के प्रधानमन्त्री रहे।

प्रश्न 7.
1977 के चनाव के बाद भारत का प्रधानमन्त्री कौन बना ?
उत्तर:
1977 के चुनाव के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमन्त्री बने।

प्रश्न 8.
प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई कितने समय तक प्रधानमन्त्री रहे ?
उत्तर:
मोरारजी देसाई 1977 से 1979 तक प्रधानमन्त्री रहे।

प्रश्न 9.
1977 का चुनाव विपक्ष ने किस नारे पर लड़ा ?
उत्तर:
विपक्ष ने ‘लोकतन्त्र बचाओ’ के नारे पर चुनाव लड़ा।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० जवाहर लाल नेहरू के बाद राजनीतिक उत्तराधिकार पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे। वे इस पद पर 1947 से 1964 तक रहे। मई, 1964 में पं० नेहरू की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय देश की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां ठीक नहीं थीं। राजनीतिक तौर पर 1962 में चीन से हार, भारत में पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक स्तर पर भारत में बढ़ती हुई ग़रीबी एवं पड़ने वाला भयंकर अकाल। इन परिस्थितियों में पं० नेहरू का जाना भारत के लिए एक त्रासदी से कम नहीं था।

पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे। कुछ विदेशी विद्वानों का यह मत था कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारत में लोकतन्त्र समाप्त हो जाएगा तथा पाकिस्तान की तरह सैनिक तानाशाही स्थापित हो जाएगी क्योंकि भारत में पं० नेहरू के पश्चात् ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो पं० नेहरू की तरह प्रजातन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में पूरी तरह विश्वास रखता हो तथा उसे चला सकता हो।

परन्तु विदेशी विद्वानों की ऐसी भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं, बल्कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारतीय लोकतन्त्र और अधिक मज़बूत होकर विश्व परिदृश्य पर उभरा। पं० नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पहले श्री लाल बहादुर शास्त्री तथा बाद में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सफलतापूर्वक कार्य किया।

1. श्री लाल बहादर शास्त्री-पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु 27 मई, 1964 को हुई और प्रधानमन्त्री का पद रिक्त हो गया, परन्तु प्रधानमन्त्री पद के लिए कांग्रेस में कोई बड़ा घमासान या संघर्ष नहीं हुआ। कांग्रेस के मुख्य नेताओं में प्रधानमन्त्री पद के लिए एकमतता न होने के कारण श्री लाल बहादुर शास्त्री को एक मध्यमार्गी उम्मीदवार के रूप में भारत का प्रधानमन्त्री बनाया गया। इस एक घटना से भारत सहित पूरे विश्व में यह सन्देश पहुंचा कि कांग्रेस पार्टी एक राजनीतिक दल के रूप में परिपक्व हो गई है तथा भारत पं० नेहरू के पश्चात् भी लोकतन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में गहरा विश्वास रखता है।

शास्त्री जी नेहरूवादी समाजवादी थे, वे उदारवादी, सरल भाषी परन्तु दृढ़ संकल्पी थे। उन्होंने 9 जून, 1964 को प्रधानमन्त्री के पद का कार्यभार सम्भाला। पं० नेहरू के मन्त्रिमण्डल में वे एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार के रूप में जाने जाते थे। पं० नेहरू के आग्रह पर शास्त्री जी ने असम में भाषायी दंगों एवं श्रीनगर में हज़रत बल दरगाह से चोरी हुए एक पवित्र समृति चिह्न से उत्पन्न हुई समस्याओं को कुशलतापूर्वक सुलझाया। शास्त्री जी ने जब देश की बागडोर सम्भाली, उस समय भारत विकट समस्याओं में घिरा हुआ था।

भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी अनुभव हो रही थी। अतः शास्त्री जी ने कृषि पर विशेष ध्यान दिया। इसलिए उन्होंने ‘जय जवान जय किसान’ का नारा दिया। शास्त्री जी की सरल एवं उदार छवि के कारण पाकिस्तान ने अपनी सैनिक शक्ति से भारत को डराने का प्रयास किया तथा 1965 में जम्मू कश्मीर पर भयंकर आक्रमण भी कर दिया।

परन्तु शास्त्री जी की सूझ-बूझ एवं कुशल नेतृत्व से भारत ने न केवल पाकिस्तान का साहसपूर्वक सामना ही किया, बल्कि युद्ध में विजयी होकर उभरे। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हुआ और ताशकन्द में ही जनवरी, 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। शास्त्री जी लगभग 20 महीने ही देश के प्रधानमन्त्री रहे थे, परन्तु इस छोटी सी अवधि में भी उन्होंने देशवासियों पर गम्भीर छाप छोड़ी।

2. श्रीमती इन्दिरा गांधी-शास्त्री जी की असामयिक मृत्यु के पश्चात् देश एवं कांग्रेस के सामने पुनः यह प्रश्न पैदा हो गया कि देश का प्रधानमन्त्री कौन बने। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं की यह राय थी कि पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए क्योंकि पं० नेहरू की बेटी होने के कारण उन्हें देश एवं विदेश में ख्याति एवं सम्मान प्राप्त है। परन्तु कांग्रेस में मोरारजी देसाई इस पक्ष में नहीं थे कि श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए, बल्कि वह स्वयं देश का प्रधानमन्त्री बनना चाहते थे।

अत: उन्होंने मत विभाजन का सुझाव दिया। अतः 19 जनवरी, 1966 को कांग्रेस में नेतृत्व के लिए पहली बार मतदान हुआ। यह देश एवं कांग्रेस के लिए एक ऐतिहासिक दिन था, क्योंकि पं० नेहरू के जीवनकाल में इस प्रकार के मत-विभाजन के विषय में सोचा भी नहीं जा सकता था। इस मत विभाजन में श्रीमती इन्दिरा गांधी के पक्ष में 355 एवं विपक्ष में 169 वोट पड़े। मत विभाजन से स्पष्ट पता चलता है कि अधिकांश कांग्रेसी पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को ही देश का प्रधानमन्त्री बनाना चाहते थे।

कुछ विद्वानों का यह मत है कि अधिकांश कांग्रेसियों ने श्रीमती गांधी को इसलिए प्रधानमन्त्री बनाया, क्योंकि वे केन्द्र में अपने लिए एक अहानिकारक व्यक्ति को प्रधानमन्त्री के रूप में देखना चाहते थे। इस दृष्टिकोण में श्रीमती गांधी, मोरारजी देसाई के मुकाबले कांग्रेसी नेताओं के लिए कम हानिकारक थीं। 1967 में होने वाले लोकसभा के चुनावों में भी जीतकर श्रीमती गांधी देश की प्रधानमन्त्री बनी रहीं। अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में श्रीमती गांधी ने ऐसे कई कार्य किए जिससे कांग्रेस प्रणाली- चुनौ देश प्रगति कर सके।

उन्होंने कृषि कार्यों को बढ़ावा दिया। ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया तथा देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। श्रीमती गांधी को 1971 में असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा जब पूर्वी पाकिस्तान के कारण भारत एवं पाकिस्तान के मध्य भयंकर युद्ध शुरू हो गया। परन्तु 1971 का युद्ध भारत एवं श्रीमती गांधी के लिए एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ तथा इस युद्ध के जीतने पर विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि पं० नेहरू के बाद भी उनके राजनीतिक उत्तराधिकारियों ने देश को कुशल नेतृत्व प्रदान किया तथा देश को विकास के पथ पर ले गए।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 2.
1967 के गैर-कांग्रेसवाद एवं चुनावी बदलाव का वर्णन करें।
उत्तर:
1967 के चौथे आम चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चुनावों में पहली बार कांग्रेस को ऐसा अनुभव हुआ कि जनता पर से उसकी पकड़ ढीली हो रही है। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। केन्द्र में जहां कांग्रेस मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई, वहीं 8 राज्य विधानसभाओं (बिहार, केरल, मद्रास, उड़ीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर-प्रदेश तथा पश्चिम का सामना करना पड़ा। परिणामस्वरूप कांग्रेस 8 में से 7 राज्यों में सरकार बनाने में असफल रही।

उत्तर प्रदेश में उसने जोड़-तोड़ करके सरकार बनाई, परन्तु वह अधिक समय तक नहीं चल पाई। केन्द्र में कांग्रेस पार्टी को मुश्किल से ही बहुमत प्राप्त हो पाया था। 1967 के चौथे आम चुनावों में लोकसभा की 520 सीटों के लिए मतदान हुआ, जिसमें विभिन्न दलों की स्थिति इस प्रकार रही
HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 Img 2
चौथी लोकसभा की दलीय स्थिति से यह स्पष्ट पता चलता है कि जिस कांग्रेस पार्टी ने पहले तीन आम चुनावों में जिन विरोधी दलों को बुरी तरह से हराया, वे दल चौथे लोक सभा चुनाव में बहुत अधिक सीटों पर चुनाव जीत गए। इसी तरह राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति 1967 के आम चुनाव में ठीक नहीं थी। 16 राज्यों की जिन विधानसभाओं के लिए चुनाव हुए उनमें से 8 राज्य विधानसभाओं में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। 1967 में हुए राज्य विधानसभाओं के चुनावों वाले राज्यों में से कुछ राज्य विधानसभाओं में दलीय स्थिति अग्र प्रकार
से रही
HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 Img 1
उपरोक्त दलीय स्थिति (मध्य प्रदेश को छोड़कर) को देखकर यह कहा जा सकता है कि 1967 के चुनाव बहुत बड़े उल्ट फेर वाले रहे। इस चुनाव में केन्द्र में कांग्रेस जहां अपनी सरकार बनाने में सफल रही, वहीं 7 राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं। इससे पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर गैर-कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 3.
1969 में कांग्रेस में विभाजन के क्या कारण थे ?
उत्तर:
1969 का वर्ष कांग्रेस पार्टी के आन्तरिक राजनीति के लिए ऐतिहासिक वर्ष रहा। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा भूमि सुधार लागू करना, बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना तथा राष्ट्रपति के पद के लिए कांग्रेस के अधिकारिक उम्मीदवार (नीलम संजीवा रेड्डी) के विरुद्ध अपना उम्मीदवार (वी० वी० गिरी) खड़ा करना, जैसी कुछ ऐसी घटनाएं थीं, जिन्हें निजलिंगप्पा तथा सिंडीकेट ने पसन्द नहीं किया। इसीलिए कांग्रेस में धीरे-धीरे आन्तरिक कलह बढ़ती रही, जो आगे चलकर विभाजन के रूप में सामने आई। 1969 में कांग्रेस में विभाजन के मुख्य कारण इस प्रकार थे

1. दक्षिण-पंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह (Tussle over drift to Right or Left):
1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्य विधानसभाओं में हार का सामना करना पड़ा। अतः कांग्रेस में यह मंथन होने लगा, कि किस तरह कांग्रेस को राज्यों में मज़बूत किया जाए। कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह विचार था कि राज्यों में कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि कुछ अन्य कांग्रेसियों का यह मत पा कि कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा की अपेक्षा वामपंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चलना चाहिए। इस प्रकार की कलह 1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक मुख्य कारण बनी।।

2. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद (Difference over the candidate of the post of President):
कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर भी मतभेद था। श्रीमती इन्दिरा गांधी जहां ज़ाकिर हसैन को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहती थी, वहीं कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

3. युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह (Tussle between Yuva Turks and Syndicate):
1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन का एक कारण युवा तुर्क (चन्द्रशेखर, चरणजीत यादव, मोहन धारीया, कृष्ण कान्त एवं आर० के० सिन्हा) तथा सिंडीकेट (कामराज, एस० के० पाटिल, अतुल्य घोष एवं निजलिंगप्पा) के बीच होने वाली कलह थी। जहां युवा तुर्क बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं राजाओं के प्रिवी पों को समाप्त करने के पक्ष में था, वहीं सिंडीकेट इसका विरोध कर रहा था।

4. 1969 का राष्ट्रपति चुनाव (Election of President 1969):
कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य महा पूर्ण कारण 1969 में हुआ राष्ट्रपति का चुनाव था। मई, 1969 में राष्ट्रपति जाकिर हुसैन की मृत्यु के पश्चात् देश का राष्ट्रपति कौन बनेगा, एक विषय पर कांग्रेस में मतभेद थे। 1971 में होने वाले लोकसभा चुनावों के विषय में कांग्रेस एवं दलों का यह अनुमान था कि 1971 के चुनावों में यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता तो उस स्थिति में राष्ट्रपति की भमिका महत्त्वपर्ण हो जायेगी. क्योंकि तब राष्ट्रपति अपने विवेक के आधार पर किस बनाने के लिए आमन्त्रित करेगा।

अत: प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी पसन्द का राष्ट्रपति चाहते थे। प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने पार्टी की संसदीय बोर्ड की बैठक में जगजीवन राम का नाम राष्ट्रपति पद के लिए उठाया, परन्तु सिंडीकेट ने इसका विरोध किया तथा उन्होंने नीलम संजीवा रेड्डी का नाम राष्ट्रपति पद के लिए अनुमोदित किया, जिसे स्वीकार कर लिया। परन्तु श्रीमती गांधी इससे सन्तुष्ट नहीं हुईं तथा उन्होंने अपनी ही पार्टी के अधिकारिक उम्मीदवार के विरुद्ध अपना उम्मीदवार (वी० वी० गिरी) खड़ा कर दिया तथा वी० वी० गिरी चुनाव जीत भी गए। इस घटना से कांग्रेस के आन्तरिक मतभेद बढ़ गए।

5. मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना (Taking away Finance Department from Morarji Desai):
1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य कारण प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना था। मोरारजी देसाई ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए मन्त्रिमण्डल से त्याग-पत्र दे दिया। सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री की इस कार्यवाही का विरोध किया। मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेने के बाद मन्त्रिमण्डल ने सर्वसम्मति से बैंकों के राष्ट्रीयकरण के प्रस्ताव को पास कर दिया

6. सिंडीकेट पर दक्षिणपंथियों के साथ गुप्त समझौते का आरोप (Alleged secret deal of the Syndicate with Rightist Parties):
कांग्रेस ने जब राष्ट्रपति पद के लिए नीलम संजीवा रेड्डी को आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया, तो कार्यवाहक राष्ट्रपति वी० वी० गिरी ने भी राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। सिंडीकेट को यह लगा कि वी० वी० गिरी ने श्रीमती इन्दिरा गांधी के कहने पर घोषणा की है, जबकि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ऐसे किसी भी घटनाक्रम से अपने आप को अलग बताया। परन्तु सिंडीकेट को यह आभास हो गया कि राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार (नीलम संजीवा रेडी) के लिए राह आसान नहीं है।

अतः निजलिंगप्पा ने इस विषय में जनसंघ तथा स्वतन्त्र पार्टी से बातचीत करनी शुरू की तथा उनसे अनुरोध किया, कि यदि आप नीलम संजीवा रेड्डी के लिए पहली प्राथमिकता नहीं डाल सकते, तो दूसरी प्राथमिकता (Preference) अवश्य डालें। इस पर जगजीवन तथा फखरुद्दीन अली अहमद ने निजलिंगप्पा से यह पूछा कि उन्होंने किस आधार पर उन दलों से बातचीत की। इन दोनों नेताओं ने सिंडीकेट पर दक्षिणपंथियों के साथ गुप्त समझौता करने का आरोप लगाया। इससे कांग्रेस का आन्तरिक वातावरण और खराब हो गया।

7. श्रीमती इन्दिरा गांधी पर साम्यवादियों का साथ देने का आरोप (Alleged Truce of Indira with Communists):
जिस प्रकार जगजीवन राम तथा फखरुद्दीन अली अहमद ने सिंडीकेट पर यह आरोप लगाया कि उन्होंने दक्षिणपंथियों से गुप्त समझौता कर रखा है, वहीं सिंडीकेट ने श्रीमती इन्दिरा गांधी पर यह आरोप लगाया कि वह कांग्रेस में वामपंथ को बढ़ावा दे रही है। इस विषय पर सिंडीकेट एवं श्रीमती इन्दिरा गांधी के समर्थकों के बीच विवाद गहराता जा रहा था।

8. सिंडीकेट द्वारा श्रीमती इन्दिरा गांधी को पद से हटाने का प्रयास (Syndicate tried for removal of Indira from the Post of EM.):
1969 में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार के राष्ट्रपति चुनावों में हार जाने के बाद सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी को पद से हटाने का प्रयास किया। परन्तु इसके विरोध में 60 से अधिक कांग्रेसी सदस्यों ने निजलिंगप्पा के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात की। 23 अगस्त, 1969 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में अधिकांश सदस्यों ने श्रीमती गांधी के पक्ष में विश्वास व्यक्त किया। उपरोक्त घटनाओं के कारण कांग्रेस की आन्तरिक कलह इतनी बढ़ गई कि नवम्बर, 1969 में कांग्रेस का विभाजन हो गया।

प्रश्न 4.
1971 में पांचवें लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत पर एक नोट लिखें।
अथवा
1970 के दशक के प्रारम्भ में इन्दिरा गांधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा चुनाव कई पक्षों से ऐतिहासिक थे। श्रीमती गांधी को जहां व्यक्तिगत स्तर पर लोगों का विश्वास जीतना था, वहीं पर अपनी नीतियों के प्रति लोगों की राय भी जाननी थी। 1971 के लोकसभा चुनावों के परिणामों की जब घोषणा की गई, तो श्रीमती गांधी को लोगों का अभूतपूर्व समर्थन मिला। श्रीमती गांधी को लोकसभा की 518 सीटों में से 352 सीटें प्राप्त हुईं। 1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति इस प्रकार है
HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 Img 3
1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति से साफ पता चलता है कि लोगों ने श्रीमती गांधी को जीताकर उन्हें एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्वीकार कर लिया था। वास्तव में 1971 की कांग्रेस विजय, श्रीमती गांधी की ही विजय मानी जाती है। क्योंकि श्रीमती गांधी ने चुनाव प्रचार में एक तरह से स्वयं को भी एक मुद्दा बना रखा था।

जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विपक्षियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि लोगों ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द किया तथा श्रीमती गांधी को पूर्ण बहुमत प्रदान किया। 1971 के पांचवें लोकसभा चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गांधी एवं कांग्रेस (आर०) की जीत के निम्नलिखित कारण थे

1. श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व (Chrismatic Leadership of Mrs. Gandhi):
1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा कारण श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को कुशलता से पुनर्जीवित किया तथा देश के विकास के लिए कई नीतियां बनाईं। उन्होंने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया तथा महाराजाओं के प्रिवी पर्सी को बन्द कर दिया। 1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं से सम्पर्क साधा तथा मतदाताओं को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों से अवगत कराया।

2. समाजवादी नीतियां (Socialistic Policies):
1971 के चुनावों में कांग्रेस की जीत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण श्रीमती गांधी द्वारा अपनाई गई समाजवादी नीतियां थीं। उन्होंने प्रत्येक चुनाव रैली में समाजवाद के विषय में बढ़-चढ़ कर बातें की। जब किसी ने उनसे जानना चाहा कि वे समाजवाद पर इतना अधिक जोर क्यों दे रही हैं, तो श्रीमती गांधी का उत्तर था कि लोग यही सुनना पसन्द करते हैं। अतः श्रीमती गांधी ने अपने समाजवादी भाषणों तथा नीतियों से 1971 का चुनाव जीता था।

3. ग़रीबी हटाओ का नारा (Slogan of Garibi Hatao):
1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारण उनके द्वारा दिया गया, ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा था। इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जिसे मतदाताओं ने पसन्द नहीं किया और भारी संख्या में लोगों ने कांग्रेस को वोट डालें। ग़रीबी हटाने के लिए श्रीमती गांधी ने चुनाव घोषणा पत्र में नीतियों एवं कार्यक्रमों का वर्णन किया।

4. कांग्रेस दल पर श्रीमती गांधी की पकड़ (Hold of Mrs. Gandhi on Congress Party):
1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि श्रीमती गांधी की अपने दल पर पूरी पकड़ एवं प्रभाव था। 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पश्चात् श्रीमती गांधी पूरी तरह पार्टी पर छा गईं। कांग्रेस पार्टी में कोई भी नेता उनकी आज्ञा की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

5. श्रीमती गांधी के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण (Polarisation of vote in favour of Mrs. Gandhi):
1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि इन चुनावों में वोटों का ध्रुवीकरण श्रीमती गांधी एवं उनकी पार्टी के पक्ष में हुआ। समाज के सभी वर्गों ने श्रीमती गांधी के पक्ष में वोट डाले। यही कारण था, कि श्रीमती गांधी 1971 के चुनावों में प्रथम तीन चुनावों का इतिहास दोहरा सकीं। उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि 1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने मतदाताओं की इच्छाओं को भांप लिया था तथा उसी के अनुसार अपनी नीतियां एवं कार्यक्रम बनाए, जिसके कारण श्रीमती गांधी को इतनी बड़ी चुनावी सफलता मिली।

प्रश्न 5.
‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा चुनाव कई पक्षों से ऐतिहासिक माने जाते हैं। इन चुनावों में भारी बहुमत से जीतकर श्रीमती गांधी जहां कांग्रेस की निर्विवाद नेता बन गई हैं, वहीं उन्होंने भारतीय राजनीति में एक नये नारे को जन्म दिया, जिसे ‘ग़रीबी हटाओ’ कहा जाता है। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार श्रीमती गांधी की चुनावी विजय में इस नारे की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी।

इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। परन्तु मतदाताओं ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द करते हुए श्रीमती गांधी को भारी बहुमत से विजय दिलाई। श्रीमती गांधी के इस नारे ने जहां मतदाताओं को प्रभावित किया वहां पुनर्गठन के दौर से गुजर रही कांग्रेस में नये रक्त का संचार भी किया। श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे के अन्तर्गत ग़रीबों के निरन्तर विकास की बात कही।

‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा। इससे मतदाताओं को यह आभास हुआ कि कांग्रेस पार्टी वास्तव में ही ग़रीबों की ग़रीबी दूर करना चाहती है, अतः उन्होंने बाकी सभी दलों को हराते हुए श्रीमती गांधी एवं उनके दल को विजयी बनाया।

परन्तु 1971 के चुनावों के पश्चात् भारत एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कुछ ऐसी घटनाएं घटीं कि श्रीमती गांधी के लिए अब ‘ग़रीबी हटाओ’ के अन्तर्गत शुरू किये गए कार्यक्रमों के लिए आबंटित धन में कमी करना आवश्यक हो गया। 1971 में पाकिस्तान के साथ युद्ध, बढ़ती हुई महंगाई एवं मुद्रा स्फीति की दर तथा 1973 में विश्व स्तर पर पैदा हुए तेल संकट ने श्रीमती गांधी के ‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम को गहरा आघात पहुंचाया। 1974-1975 में श्रीमती गांधी ने ग़रीबी उन्मूलन के लिए जो धन आबंटित किया था, उनमें एक तिहाई की कटौती कर दी गई। परन्तु इसके साथ ही श्रीमती गांधी ने कुछ अन्य प्रयास भी किए। श्रीमती गांधी ने 1975 में ग़रीबी हटाने के लि शुरुआत की, जिसके द्वारा गरीबी को (विशेषकर ग्रामीण ग़रीबी को) दूर करने का प्रयास किया गया। परन्तु ये उपाय पर्याप्त नहीं थे।

जब श्रीमती गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा कमजोर पड़ने लगा, तब जनता ने जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में श्रीमती गांधी के विरुद्ध आन्दोलन शुरू कर दिया तथा श्रीमती गांधी की राजनीतिक विफलताओं एवं कमजोरियों को लोगों के सामने लाना शुरू कर दिया। दूसरे शब्दों में जय प्रकाश नारायण ने श्रीमती गांधी के लिए राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट खड़ा कर दिया।

इसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उनके निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया। परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलने लगीं कि अन्ततः श्रीमती गांधी को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। केवल पांच साल के अन्दर ही श्रीमती गांधी की ‘गरीबी हटाओ’ की राजनीति असफल हो गई तथा 1977 के चुनावों में लोगों ने श्रीमती गांधी को ऐतिहासिक पराजय का सामना करवाया तथा सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 6.
1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के सन्दर्भ में सिंडीकेट’ से क्या अभिप्राय है ? सिंडीकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर:
1960 के दशक में कांग्रेस पार्टी में एक समूह बहुत अधिक शक्तिशाली था, जिसे सिंडीकेट कहा जाता है। सिंडीकेट में अनुभवी कांग्रेसी नेता शामिल थे, जिनमें कामराज, एस० के० पाटिल, अतुल्य घोष एवं निजलिंगप्पा शामिल थे। सिंडीकेट ने कांग्रेस की नीतियों एवं कार्यक्रमों एवं निर्णयों को सर्वाधिक प्रभावशाली ढंग से प्रभावित किया।

मई, 1964 में पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात् किसे देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए, यह बहुत बड़ा प्रश्न था। इस समस्या को हल करने में सिंडीकेट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सिंडीकेट ने श्री लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमन्त्री बनवाने में कांग्रेस में सहमति बनाई। जनवरी, 1966 में श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारत की प्रधानमन्त्री बनाने में सिंडीकेट ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं तथा मुख्यमन्त्रियों ने श्रीमती इन्दिरा गांधी को भारत की प्रधानमन्त्री बनना स्वीकार कर लिया, परन्तु मोरारजी देसाई स्वयं प्रधानमन्त्री बनाना चाहते थे।

अत: उन्होंने नेतृत्व के लिए प्रतियोगिता करने का निर्णय किया। सिंडीकेट ने इस बात को सुनिश्चित किया कि मत विभाजन के समय श्रीमती इन्दिरा गांधी की जीत निश्चित हो। अतः सिंडीकेट की सहायता से ही श्रीमती इन्दिरा गांधी कांग्रेस संसदीय दल की नेता चुनी गईं। इस प्रकार श्री जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनवाने में तथा अलग-अलग राज्यों में मुख्यमन्त्री एवं राज्यपालों के सम्बन्ध में निर्णय लेने में भी इस संगठन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० जवाहर लाल नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकार पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं०. जवाहर लाल नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री थे। वे इस पद पर 1947 से 1964 तक रहे। मई, 1964 में पं० नेहरू की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के समय देश की राजनीतिक एवं आर्थिक परिस्थितियां ठीक नहीं थीं। राजनीतिक तौर पर 1962 में चीन से हार, भारत में पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता तथा आर्थिक स्तर पर भारत में बढ़ती हुई ग़रीबी एवं पड़ने वाला भयंकर अकाल, इन परिस्थितियों में पं० नेहरू का जाना भारत के लिए एक त्रासदी से कम नहीं था। पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् उनके राजनीतिक उत्तराधिकारी को लेकर तरह-तरह के प्रश्न उठने लगे।

कुछ विदेशी विद्वानों का यह मत था कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् ऐसा कोई भी नेता नहीं है, जो पं० नेहरू की तरह प्रजातन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में पूरी तरह विश्वास रखता हो तथा उसे चला सकता हो। परन्तु विदेशी विद्वानों की ऐसी भविष्यवाणियां सच साबित नहीं हुईं, बल्कि पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् भारतीय लोकतन्त्र और अधिक मज़बूत होकर विश्व परिदृश्य पर उभरा। पं० नेहरू के राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में पहले श्री लाल बहादुर शास्त्री तथा बाद में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सफलतापूर्वक कार्य किया।

प्रश्न 2.
श्री लाल बहादुर शास्त्री के विषय में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
पं० नेहरू के उत्तराधिकारी के रूप में श्री लाल बहादुर शास्त्री पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
पं० नेहरू की मृत्यु के पश्चात् कांग्रेस के मुख्य नेताओं में प्रधानमन्त्री पद के लिए एकमतता न होने के कारण श्री लाल बहादुर शास्त्री को एक मध्यमार्गी उम्मीदवार के रूप में भारत का प्रधानमन्त्री बनाया गया। इस एक घटना से श्व में यह सन्देश पहंचा कि कांग्रेस पार्टी एक राजनीतिक दल के रूप में परिपक्व हो गयी है तथा भारत पं० नेहरू के पश्चात् भी लोकतन्त्र एवं संसदीय प्रणाली में गहरा विश्वास रखता है। शास्त्री जी नेहरूवादी समाजवादी थे, वे उदारवादी, सरलभाषी परन्तु दृढ़ संकल्पी थे। उन्होंने 9 जून, 1964 को प्रधानमन्त्री के पद का कार्यभार सम्भाला। पं० नेहरू के मन्त्रिमण्डल में वे एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार के रूप में जाने जाते थे।

पं० नेहरू के आग्रह पर शास्त्री जी ने असम में भाषायी दंगों एवं श्रीनगर में हजरत बल दरगाह से चोरी हुए एक पवित्र स्मृति चिह्न से उत्पन्न हुई समस्याओं को कु पूर्वक सुलझाया। शास्त्री जी ने जब देश की बागडोर सम्भाली, उस समय भारत विकट समस्याओं से घिरा हुआ था। भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी अनुभव हो रही थी।

अतः शास्त्री जी ने कृषि पर विशेष ध्यान दिया। इसीलिए उन्होंने जय जवान जय किसान का नारा दिया। शास्त्री जी ने अपनी सूझ-बूझ से न केवल 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण का सामना ही किया, बल्कि युद्ध में पाकिस्तान को हराया। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकन्द में समझौता हुआ और ताशकन्द में ही जनवरी, 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। शास्त्री जी लगभग 20 महीने ही देश के प्रधानमन्त्री थे, परन्तु इस छोटी-सी अवधि में भी उन्होंने देशवासियों पर गम्भीर छाप छोड़ी।

प्रश्न 3.
श्री लाल बहादुर शास्त्री के उत्तराधिकारी के रूप में श्रीमती इन्दिरा गांधी पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के पश्चात् देश एवं कांग्रेस के सामने पुन: यह प्रश्न पैदा हो गया कि देश का प्रधानमन्त्री कौन बने। अधिकांश कांग्रेसी नेताओं की यह राय थी कि पं० नेहरू की बेटी श्रीमती इन्दिरा गांधी को देश का प्रधानमन्त्री बनाया जाए। परन्तु मोरारजी देसाई भी प्रधानमन्त्री बनने के इच्छुक थे, इसलिए उन्होंने मत विभाजन का सुझाव दिया।

मत विभाजन में श्रीमती गांधी के पक्ष में 355 एवं विपक्ष में 169 वोट पड़े। कुछ विद्वानों का यह मत था कि अधिकांश कांग्रेसियों ने श्रीमती गांधी को इसलिए प्रधानमन्त्री बनाया क्योंकि वे केन्द्र में अपने लिए एक अहानिकारक व्यक्ति को प्रधानमन्त्री के रूप में देखना चाहते थे। इस दृष्टिकोण से श्रीमती गांधी, मोरारजी देसाई के मुकाबले कांग्रेसी नेताओं के लिए कम हानिकारक थीं।

1967 में होने वाले लोकसभा के चुनावों में भी जीतकर श्रीमती गांधी देश की प्रधानमन्त्री बनी रहीं। अपने प्रधानमन्त्रित्व काल में श्रीमती गांधी ने ऐसे कई कार्य किये जिससे देश प्रगति कर सके। उन्होंने कृषि कार्यों को बढ़ावा दिया। ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया तथा देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। श्रीमती गांधी को 1971 में असामान्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, जब पूर्वी पाकिस्तान के कारण भारत एवं पाकिस्तान के मध्य भयंकर युद्ध शुरू हो गया। परन्तु 1971 का युद्ध भारत एवं श्रीमती गांधी के लिए एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ तथा इस युद्ध के जीतने पर विश्व में भारत की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

प्रश्न 4.
1967 के गैर-कांग्रेसवाद एवं चुनावी बदलाव का वर्णन करें।
अथवा
1967 में हुए चौथे आम चुनाव पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1967 के चौथे आम चुनाव भारतीय राजनीति में ऐतिहासिक महत्त्व रखते हैं। इन चुनावों में पहली बार कांग्रेस को यह अनुभव हुआ कि जनता पर से उसकी पकड़ ढीली हो रही है। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। केन्द्र में जहां कांग्रेस मुश्किल से बहुमत प्राप्त कर पाई. वहीं 8 राज्य विधानसभाओं (बिहार, केरल, मद्रास, उडीसा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल) में हार का सामना करना पड़ा।

लोकसभा की कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को केवल 283 सीटें ही मिल पाईं। अत: जिस कांग्रेस पार्टी ने पहले तीन आम चुनावों में जिन विरोधी दलों को बुरी तरह से हराया, वे दल चौथे लोकसभा चुनाव में बहुत अधिक सीटों पर चुनाव जीत गए। इसी तरह राज्यों में भी कांग्रेस की स्थिति 1967 के आम चुनावों में 1967 के आम चुनाव बहुत बड़े उलट-फेर वाले रहे। इससे पहली बार भारत में बड़े पैमाने पर गैर कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 5.
कांग्रेस में फूट के मुख्य कारण क्या थे ?
उत्तर:
1. दक्षिण पंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह-1967 के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को कई राज्य विधानसभाओं में हार का सामना करना पड़ा। अत: कांग्रेस के कुछ सदस्यों का यह विचार था कि राज्यों में कांग्रेस को दक्षिण-पंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए, जबकि कुछ अन्य कांग्रेसियों का यह मत था कि कांग्रेस को वामपंथी विचारधारा वाले दलों के साथ मिलकर चलना चाहिए।

2. राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद-कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर मतभेद था। श्रीमती इन्दिरा गांधी जहां जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहती थीं, वहीं कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

3. युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह-1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन का एक कारण युवा तुर्क तथा सिंडीकेट के बीच होने वाली कलह थी। जहां युवा तुर्क बैंकों के राष्ट्रीयकरण एवं राजाओं के प्रिवी पों को समाप्त करने के पक्ष में था, वहीं सिंडीकेट इसका विरोध कर रहा था।

4. मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना-1969 में कांग्रेस के विभाजन का एक अन्य कारण प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी द्वारा मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना था। मोरारजी देसाई ने इस पर अपना विरोध दर्ज कराते हुए मन्त्रिमण्डल से त्याग-पत्र दे दिया। सिंडीकेट ने प्रधानमन्त्री की इस कार्यवाही का विरोध किया।

प्रश्न 6.
1971 में पांचवें लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की जीत के क्या कारण थे ?
अथवा
1970 के दशक में इन्दिरा गांधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हई थी?
उत्तर:
1. श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व-1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत का सबसे बड़ा कारण श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व था। 1969 में कांग्रेस के विभाजन के बाद श्रीमती गांधी ने कांग्रेस को कुशलता से पुनर्जीवित किया। श्रीमती गांधी ने व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं से सम्पर्क साधा तथा मतदाताओं को अपनी नीतियों एवं कार्यक्रमों से अवगत कराया।

2. समाजवादी नीतियां-1971 के चुनावों में कांग्रेस की जीत का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कारण श्रीमती गांधी द्वारा अपनाई गई समाजवादी नीतियां थीं। उन्होंने प्रत्येक चुनाव रैली में समाजवाद के विषय में बढ़-चढ़ कर बातें की। जब किसी ने उनसे जानना चाहा कि वे समाजवाद पर इतना अधिक ज़ोर क्यों दे रही है, तो श्रीमती गांधी का उत्तर था, कि
लोग यही सुनना पसन्द करते हैं।

3. ग़रीबी हटाओ का नारा-1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक सबसे महत्त्वपूर्ण कारण उनके द्वारा दिया गया, ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा था। इस नारे के बल पर श्रीमती गांधी ने अधिकांश ग़रीबों के वोट अपनी झोली में डाल लिए। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जिसे मतदाताओं ने पसन्द नहीं किया।

4. कांग्रेस दल पर श्रीमती गांधी की पकड़-1971 में श्रीमती गांधी की जीत का एक अन्य कारण यह था कि श्रीमती गांधी की अपने दल पर पूरी पकड़ एवं प्रभाव था। 1969 में कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पश्चात् श्रीमती गांधी पूरी तरह पार्टी पर छा गई। कांग्रेस पार्टी में कोई भी नेता उनकी आज्ञा की अवहेलना करने का साहस नहीं कर सकता था।

प्रश्न 7.
‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति का वर्णन करें।
अथवा
‘ग़रीबी हटाओ’ का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
1971 के चुनावों में श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव विश्लेषकों के अनुसार श्रीमती गांधी की चुनावी विजय में इस नारे की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। श्रीमती गांधी ने जहां ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विरोधियों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया। परन्तु मतदाताओं ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसन्द कांग्रेस प्रणाली-चुनौतियां और पुनर्स्थापना । करते हुए श्रीमती गांधी को भारी बहुमत से विजय दिलाई। ‘ग़रीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक-से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा।

परन्तु 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध एवं विश्व स्तर पर पैदा हुए तेल संकट के कारण श्रीमती गांधी ने ग़रीबी हटाओ कार्यक्रमों के लिए आबंटित धन में कमी करनी शुरू कर दी। जब श्रीमती गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा कमजोर पड़ने लगा, तब जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में लोगों ने श्रीमती गांधी के विरुद्ध आन्दोलन करके राजनीतिक एवं संवैधानिक संकट पैदा कर दिया।

इसी समय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने श्रीमती गांधी के निर्वाचन को अवैध घोषित कर दिया। परिस्थितियां इतनी तेजी से बदलने लगी कि अन्ततः श्रीमती गांधी को आपात्काल की घोषणा करनी पड़ी। केवल पांच साल के अन्दर ही श्रीमती गांधी की ‘ग़रीबी हटाओ’ की राजनीति असफल हो गई तथा 1977 के चुनावों में लोगों ने श्रीमती गांधी को ऐतिहासिक पराजय का सामना करवाया तथा सत्ता जनता पार्टी को सौंप दी।

प्रश्न 8.
क्या 1969 में कांग्रेस विभाजन को रोका जा सकता था ? यदि विभाजन नहीं होता तो यह किस प्रकार 1970 की राजनीति को प्रभावित करता।
उत्तर:
1969 की तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उस समय कांग्रेस के विभाजन को रोका नहीं जा सकता था, क्योंकि कांग्रेस के दोनों गुटों में तनाव एवं अविश्वास बहुत बढ़ चुका था। परन्तु यदि कांग्रेस का विभाजन न होता, तो कांग्रेस 1970 की राजनीति को और अधिक ढंग से प्रभावित कर सकती थी। उदाहरण के लिए कांग्रेस 1971 के चुनावों में और अधिक प्रभावशाली जीत दर्ज कर सकती थी। श्रीमती इन्दिरा गांधी सम्भवत: इतनी शक्तिशाली एवं सर्वमान्य नेता बन जाती है कि उन्हें आपात्काल लगाने की आवश्यकता न पड़ती तथा जनता पार्टी का इस प्रकार उदय न होता।

प्रश्न 9.
निम्नलिखित किस सन्दर्भ में हैं
(क) जय जवान, जय किसान
(ख) गरीबी हटाओ
(ग) इन्दिरा हटाओ
(घ) ग्रैंड एलाइंस ?
उत्तर:
(क)जय जवान, जय किसान-जय जवान, जय किसान का नारा भारत के प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री ने 1960 के दशक में दिया, क्योंकि उस समय भारत को युद्धों का सामना भी करना पड़ रहा था तथा साथ ही भारत में खाद्यान्न संकट भी पैदा हुआ था।

(ख) गरीबी हटाओ-गरीबी हटाओ का नारा श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सन् 1971 में दिया ताकि भारत में गरीबी को कम किया जा सके।

(ग) इन्दिरा हटाओ-इन्दिरा हटाओ का नारा सन् 1971 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के विरोधी दलों एवं सिंडीकेट ने दिया था, ताकि श्रीमती गांधी को चुनावों में हराकर उनकी शक्ति को कम किया जा सके।

(घ) ग्रैंड एलाइंस-1971 के चुनावों से पहले श्रीमती इन्दिरा गांधी को हराने के लिए विरोधी दलों ने गठबन्धन किया जिसे ग्रैंड एलाइंस कहा गया।

प्रश्न 10.
1960 के दशक को ‘खतरनाक’ दशक क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
1960 के दशक को ‘खतरनाक’ दशक इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इस दशक में भारत को कई पक्षों से समस्याओं का सामना करना पड़ा। राजनीतिक स्तर पर पं० जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु तथा 1966 में उनके उत्तराधिकारी श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु भारत के लिए अपूर्णनीय क्षति थी। इसके साथ-साथ इस दशक में भारत को दो युद्धों का सामना करना पड़ा।

1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तथा 1965 में पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया। इसी दशक में भारत में भारी खाद्यान्न संकट पैदा हुआ। इसी दशक में भारत में गरीबी, असमानता, साम्प्रदायिकता तथा क्षेत्रीय विवाद भी अनसुलझे थे। इसके अतिरिक्त 1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया। इसीलिए 1960 के दशक को खतरनाक दशक कहा जाता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 11.
‘कांग्रेस प्रणाली’ के पुनर्स्थापन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1971 के पांचवें लोकसभा की दलीय स्थिति से साफ पता चलता है कि लोगों ने लोगों ने श्रीमती गांधी को जीत दिला कर उन्हें एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्वीकार कर लिया था। वास्तव में 1971 की कांग्रेस विजय, श्रीमती लोगों ने लोगों ने श्रीमती गांधी को राजनीतिक विज्ञान । गांधी की ही विजय मानी जाती है।

क्योंकि श्रीमंती गांधी ने चुनाव प्रचार में एक तरह से स्वयं को भी एक मुद्दा बना रखा था। जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विपक्षियों ने ‘इंदिरा हटाओ’ का नारा दिया। चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया कि लोगों ने ‘ग़रीबी हटाओ’ के नारे को अधिक पसंद किया गया तथा श्रीमती गांधी को पूर्ण बहुमत प्रदान किया।

1972 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए जिनमें वे अधिकतर राज्यों में श्रीमती इन्दिरा गांधी की पार्टी ने ही चुनाव जीता। इन दो लगातार जीतों ने कांग्रेस के पुनर्स्थापन में सहायता की। परन्तु कांग्रेस के 1971 से पहले के प्रभुत्व एवं बाद के प्रभुत्व में अन्तर था, जिनका वर्णन इस प्रकार है

(1) श्रीमती गांधी की कांग्रेस पार्टी नये अंदाज में बनी थी तथा इन्दिरा गांधी ने जो कुछ भी किया वह पुरानी कांग्रेस को पुनर्जीवित करने का काम नहीं था।

(2) इन्दिरा गांधी की कांग्रेस पार्टी को उसी प्रकार की लोकप्रियता प्राप्त थी जो लोकप्रियता पुरानी कांग्रेस को अपने शुरुआती दौर में प्राप्त थी। परन्तु नहीं कांग्रेस पुरानी कांग्रेस से कई मायनों में अलग थी। नई कांग्रेस अपने नेता की लोकप्रियता पर निर्भर थी। इस पार्टी का ढांचागत संगठन भी कमज़ोर था। इस पार्टी में कई गुट नहीं थे। इस प्रकार कहा जा सकता है कि इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस प्रणाली को पुनर्स्थापित अवश्य किया, परन्तु उसकी प्रकृति को बदलकर।

(3) पुरानी कांग्रेस प्रत्येक तनाव एवं संघर्ष को सहन कर लेती थी, परन्तु नई कांग्रेस में इसका अभाव था।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
पं० नेहरू का उत्तराधिकारी कौन बना ?
उत्तर:
पं० नेहरू के उत्तराधिकारी श्री लाल बहादुर शास्त्री बनें। श्री लाल बहादुर शास्त्री एक प्रधान समझौताकर्ता, मध्यस्थ तथा समन्वयकार थे। शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया। शास्त्री जी ने अपनी सूझ-बूझ से न केवल 1965 में पाकिस्तान के आक्रमण का सामना किया, बल्कि युद्ध में पाकिस्तान को हराया। सोवियत संघ के प्रयासों से 1966 में भारत-पाकिस्तान के बीच ताशकंद में समझौता हआ और ताशकंद में ही 1966 में शास्त्री जी की संदिग्ध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 2.
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी का राजनीतिक उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की उत्तराधिकारी श्रीमती इन्दिरा गांधी बनी। मोरार जी देसाई के आग्रह पर प्रधानमन्त्री पद के लिए कराये गए मत विभाजन में अधिकांश कांग्रेसी नेताओं ने श्रीमती गांधी के पक्ष में मत दिया। प्रधानमन्त्री बनने के बाद श्रीमती गांधी ने कृषि क्षेत्र को बढ़ावा दिया, ग़रीबी को हटाने के लिए कार्यक्रम घोषित किया, देश की सेनाओं का आधुनिकीकरण किया तथा 1974 में पोखरण में ऐतिहासिक परमाणु विस्फोट किया। 1971 में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराया, जिसके कारण बांग्लादेश नाम का एक नया देश अस्तित्व में आया।

प्रश्न 3.
लाल बहादुर शास्त्री के काल में भारत को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा उनमें से किन्हीं दो के नाम लिखें।
अथवा
कोई दो चुनौतियाँ बताइये जिनका सामना लाल बहादुर शास्त्री के काल में भारत को करना पड़ा ?
उत्तर:

  • भारत में अकाल पड़ने से खाद्यान्न की कमी हो गई थी।
  • भारत को सन् 1965 में पाकिस्तान से युद्ध लड़ना पड़ा।

प्रश्न 4.
भारत में चौथे आम चुनाव कब हुए और उसमें क्या परिणाम निकले ?
अथवा
चौथे आम चुनाव कब हुए थे ?
उत्तर:
भारत में चौथे आम चुनाव 1967 में हुए। इन चुनावों में भारतीय मतदाताओं ने कांग्रेस को वैसा समर्थन नहीं दिया, जो पहले तीन आम चुनावों में दिया था। लोकसभा की कुल 520 सीटों में से कांग्रेस को केवल 283 सीटें ही मिल पाईं। इसके साथ-साथ कांग्रेस को 8 राज्य विधानसभाओं में भी हार का सामना करना पड़ा। इससे पहली बार भारत में गैर कांग्रेसवाद की लहर चली तथा राज्यों में कांग्रेस का एकाधिकार समाप्त हो गया।

प्रश्न 5.
सन् 1969 में कांग्रेस पार्टी में हुए विभाजन का मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
(1) 1967 के चुनावों में मिली हार के बाद कुछ कांग्रेसी दक्षिणपंथी दलों के साथ जबकि कुछ कांग्रेसी वामपंथी दलों के साथ समझौते का समर्थन कर रहे थे, जिसमें कांग्रेस में मतभेद बढ़ा।

(2) कांग्रेस में 1967 में होने वाले राष्ट्रपति के चुनावों को लेकर मतभेद था। श्रीमती गांधी डॉ. जाकिर हुसैन को राष्ट्रपति बनना चाहती थीं, वही कामराज जैसे कांग्रेसियों ने इसका विरोध किया।

प्रश्न 6.
दल विरोधी अधिनियम कब पास करवाया गया?
उत्तर:
दल विरोधी अधिनियम सन् 1985 एवं 2003 में पास किये गए।

प्रश्न 7.
गरीबी हटाओ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
गरीबी हटाओ का नारा 1971 के पांचवें लोक सभा चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने दिया। श्रीमती गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के अन्तर्गत ग़रीबों के निरन्तर विकास की बात कही। ‘गरीबी हटाओ’ कार्यक्रम के अन्तर्गत 1970-71 से नीतियां एवं कार्यक्रम बनाये जाने लगे तथा इस कार्यक्रम पर अधिक-से-अधिक धन खर्च किया जाने लगा। इससे मतदाताओं को यह आभास हुआ कि कांग्रेस पार्टी वास्तव में ही गरीबों की गरीबी दूर करना चाहती है, अत: उन्होंने बाकी सभी दलों को हराते हुए श्रीमती गांधी एवं उनके दल को विजयी बनाया।

प्रश्न 8.
1969 में कांग्रेस विभाजन के पश्चात् बने दो राजनीतिक दलों के नाम बताएं।
उत्तर:
1969 में कांग्रेस विभाजन के पश्चात् जो दो दल सामने आए, उनके नाम कांग्रेस (आर) (Congress (R) Requisitioned) तथा कांग्रेस (ओ) (Congress (O)-organisation) थे। कांग्रेस (आर) का नेतृत्व श्रीमती गांधी कर रही थीं, वहीं कांग्रेस (ओ) का नेतृत्व सिंडीकेट कर रहा था।

प्रश्न 9.
सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी ने किसे अपना उम्मीदवार बनाया था?
उत्तर:
सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में इंदिरा गांधी ने श्री० वी० वी० गिरी को अपना उम्मीदवार बनाया था।

प्रश्न 10.
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से किस पर निर्भर थी ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए चुनाव में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से श्रीमती इन्दिरा गांधी पर निर्भर थी।

प्रश्न 11.
श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् भारत का प्रधानमंत्री कौन बना ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् भारत का प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी बनी।

प्रश्न 12.
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा कब और कहां से मशहूर हुआ ?
उत्तर:
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा सन् 1967 से हरियाणा से मशहूर हुआ।

प्रश्न 13.
किन्हीं चार राज्यों के नाम लिखिए जहां, 1967 के चुनावों के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं ?
उत्तर:

  • बिहार
  • पंजाब
  • उड़ीसा
  • राजस्थान।

प्रश्न 14.
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी मुख्य रूप से किस-किस पर निर्भर थी ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए चुनावों में कांग्रेस पार्टी इन्दिरा गांधी पर मुख्य रूप से निर्भर थी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 15.
प्रिवी पर्सेस की समाप्ति पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय देशी रियासतों के भारत में विलय के समय सरकार ने राज परिवारों को यह आश्वासन दिया था कि रियासतों के तत्कालीन शासक परिवार को निश्चित मात्रा में निजी सम्पदा रखने का अधिकार होगा। इसके साथ ही सरकार की तरफ से उन्हें कुछ विशेष भत्ते भी दिए जाएंगे। ये दोनों चीजें इस बात को आधार मानकर निश्चित की जाएंगी कि जिस राज्य का विलय भारत में किया जाना है, उसका विस्तार, राजस्व और क्षमता कितनी है। इस व्यवस्था को ही ‘प्रिवी पर्स’ कहा गया।

प्रश्न 16.
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमन्त्री कौन बना ?
उत्तर:
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी बनीं।

प्रश्न 17.
उन दो नेताओं के नाम लिखें, जिन्होंने निम्नलिखित नारे दिए ?
(1) ‘जय जवान जय किसान’ तथा
(2) ‘गरीबी हटाओ’।
उत्तर:
जय जवान जय किसान का नारा श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने तथा ग़रीबी हटाओ का नारा श्रीमती इन्दिरा गांधी जी ने दिया था।

प्रश्न 18.
पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद कौन भारत के प्रधानमन्त्री बने ?
उत्तर:
पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद लाल बहादुर शास्त्री भारत के प्रधानमन्त्री बने।

प्रश्न 19.
‘ग्रैंड-एलायंस’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1967 के चुनावों में मिली असफलता एवं 1969 में राष्ट्रपति के चुनाव को लेकर कांग्रेस में हुए विभाजन के कारण श्रीमती गांधी पूरी क्षमता से अपनी सरकार नहीं चला पा रही थी। अतः 1971 में उन्होंने मध्यावधि चुनाव करवाने की घोषणा की। इस चुनाव में सभी विपक्षी दलों ने मिलकर एक विशाल गठबन्धन बनाया, जिसे ‘ग्रैंड एलायंस’ कहा जाता है।

इस ग्रैंड एलायंस में भारतीय जनसंघ, स्वतन्त्र पार्टी, भारतीय क्रान्ति दल तथा एस० एम० पी० जैसे विरोधी दल शामिल थे। इन दलों ने ‘इन्दिरा हटाओ’ का नारा दिया, जबकि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया। चुनावों में मतदाताओं ने श्रीमती गांधी को भारी जनसमर्थन प्रदान किया तथा ‘ग्रैंड एलायंस’ को चुनावों में निराशा हाथ लगी।

प्रश्न 20.
‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा किस तरह की राजनीति से सम्बन्धित है?
उत्तर:
आया राम, गया राम’ का मुहावरा दल-बदल की राजनीति से सम्बन्धित है। इस तरह की परिस्थितियों ने भारत में राजनीतिक अस्थिरता पैदा की है।

प्रश्न 21.
सन् 1971 का चुनाव, कांग्रेस पार्टी ने किस चुनाव निशान पर लड़ा था?
उत्तर:
सन् 1971 का चुनाव, कांग्रेस पार्टी ने गाय-बछड़ा, चुनाव निशान पर लड़ा था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. पं० जवाहर लाल नेहरू का उत्तराधिकारी बना?
(A) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(B) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(C) डॉ० राधा कृष्ण
(D) श्रीमती इन्दिरा गांधी।
उत्तर:
(B) श्री लाल बहादुर शास्त्री।

2. 1967 के लोकसभा के चुनावों में कांग्रेस को कितनी सीटें मिली थी ?
(A) 283
(B) 330
(C) 350
(D) 400
उत्तर:
(A) 283

3. 1971 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी को सीटें मिली थी ?
(A) 300
(B) 325
(C) 352
(D) 390
उत्तर:
(C) 352

4. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद भारत का प्रधानमन्त्री कौन बना ?
(A) चौ० चरण सिंह
(B) मोरार जी देसाई
(C) इन्दिरा गांधी
(D) जगजीवन राम।
उत्तर:
(C) इन्दिरा गांधी।

5. कांग्रेस का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1968
(B) 1969
(C) 1970
(D) 1971
उत्तर:
(B) 1969

6. युवा तुर्क में कौन शामिल था ?
(A) चन्द्रशेखर
(B) मोहनधारिया
(C) कृष्ण कांत
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

7. सिंडीकेट में कौन शामिल था ?
(A) कामराज
(B) निजलिंगप्पा
(C) एस० के० पाटिल
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

8. 1969 के राष्ट्रपति चुनावों में कांग्रेस पार्टी का उम्मीदवार था
(A) नीलम संजीवा रेड्डी
(B) वी० वी० गिरी
(C) मोरार जी देसाई
(D) श्रीमती इन्दिरा गांधी।
उत्तर:
(A) नीलम संजीवा रेड्डी।

9. 1969 के राष्ट्रपति चुनावों में श्रीमती गांधी ने किस उम्मीदवार का समर्थन किया ?
(A) जगजीवन राम
(B) नीलम संजीवा रेड्डी
(C) वी० वी० गिरी
(D) मोरार जी देसाई।
उत्तर:
(C) वी० वी० गिरी।

10. पांचवीं लोकसभा चुनाव में किस दल को जीत प्राप्त हुई ?
(A) कांग्रेस
(B) स्वतन्त्र दल
(C) जनसंघ
(D) जनता पार्टी।
उत्तर:
(A) कांग्रेस।

11. 1971 के पांचवीं लोकसभा चुनाव में ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा किसने दिया ?
(A) कामराज
(B) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(C) श्री० अटल बिहारी बाजपेयी
(D) मोरार जी देसाई।
उत्तर:
(B) श्रीमती इन्दिरा गांधी।

12. कांग्रेस में प्रथम बार फूट पड़ी
(A) 1968 में
(B) 1969 में
(C) 1967 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1969 में।

13. 1969 में कांग्रेस विभाजन का मुख्य कारण था ?
(A) कांग्रेस में दक्षिणपंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह
(B) राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद
(C) युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

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14. 1971 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी की विजय का कारण था-
(A) श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व
(B) कांग्रेस की समाजवादी नीतियां
(C) ग़रीबी हटाओ का नारा
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

15. “जय जवान जय किसान” का नारा किसने दिया था ?
(A) इन्दिरा गांधी
(B) चौ० चरण सिंह
(C) लाल बहादुर शास्त्री
(D) महात्मा गांधी।
उत्तर:
(C) लाल बहादुर शास्त्री।

16. चौथी लोकसभा के चुनाव निम्नलिखित वर्ष में हुए
(A) 1971 में
(B) 1969 में
(C) 1967 में
(D) 1966 में।
उत्तर:
(C) 1967 में।

17. कांग्रेस पार्टी द्वारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा कौन-से लोक सभा चुनाव में प्रमुख था?
(A) 1971
(B) 1977
(C) 1980
(D) 1984
उत्तर:
(B) 1971

18. लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई
(A) 1965 में
(B) 1967 में
(C) 1966 में
(D) 1970 में
उत्तर:
(C) 1966 में।

19. ‘गरीबी हटाओ’ का नारा निम्नलिखित राजनीतिक दल में से किसने दिया था?
(A) कम्युनिस्ट पार्टी
(B) कांग्रेस पार्टी
(C) जनसंघ पार्टी
(D) बहुजन समाज पार्टी।
उत्तर:
(B) कांग्रेस पार्टी।

20. 1967 के चौथे लोकसभा चुनाव में जनसंघ को सीटें मिलीं
(A) 35
(B) 42
(C) 55
(D) 47
उत्तर:
(A) 35

21. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद कांग्रेस का पहली बार विभाजन किस वर्ष हुआ ?
(A) 1967 में
(B) 1969 में
(C) 1970 में
(D) 1965 में।
उत्तर:
(B) 1969 में।

22. ‘पांचवां आम-चुनाव’ कब हुआ ?
(A) 1967 में
(B) 1969 में
(C) 1971 में
(D) 1972 में।
उत्तर:
(C) 1971 में

23. वर्ष 1971 में भारत में कौन-सा आम चनाव हआ था ?
(A) चौथा
(B) पांचवां
(C) छठा
(D) सातवां।
उत्तर:
(B) पांचवां।

24. प्रीवी पर्स की समाप्ति कब की गई ?
(A) 1971 में
(B) 1972 में
(C) 1973 में
(D) 1974 में।
उत्तर:
(A) 1971 में।

25. श्रीमती इन्दिरा गांधी की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 30 अक्तूबर, 1982
(B) 31 अक्तूबर, 1984
(C) 31 अक्तूबर, 1985
(D) 31 अक्तूबर, 1986
उत्तर:
(B) 31 अक्तूबर, 1984

26. 1967 के चुनावों को ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नाम किसने दिया था ?
(A) राम मनोहर लोहिया
(B) मोरार जी देसाई
(C) जगजीवन राम
(D) चन्द्रशेखर।
उत्तर:
(A) राम मनोहर लोहिया।

27. राम मनोहर लोहिया की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 1935
(B) 1952
(C) 1962
(D) 1967
उत्तर:
(D) 1967

28. ‘आया राम गया राम’ की कहावत किस राज्य से सम्बन्धित है ?
(A) बिहार
(B) हरियाणा
(C) उत्तर-प्रदेश
(D) हिमाचल प्रदेश।
उत्तर:
(B) हरियाणा।

29. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु हुई
(A) मई 1964 में
(B) मई 1967 में
(C) मई 1962 में
(D) मई 1965 में।
उत्तर:
(A) मई 1964 में।

30. पांचवें आम चुनाव के बाद भारत के प्रधानमन्त्री बने
(A) इन्दिरा गांधी
(B) राजीव गांधी
(C) अटल बिहारी वाजपेयी
(D) चन्द्रशेखर।
उत्तर:
(A) इन्दिरा गांधी।

31. ‘आया राम, गया राम’ का मुहावरा निम्नलिखित किस से सम्बन्धित है
(A) मिश्रित सरकार
(B) जातिवाद
(C) दल बदल
(D) साम्प्रदायिकता।
उत्तर:
(C) दल बदल।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने ………….. का नारा प्रमुख नारा दिया है।
उत्तर:
ग़रीबी हटाओ

(2) ‘गरीबी हटाओ’ का नारा ………….. राजनैतिक दल ने दिया था।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी

(3) ‘आया राम गया राम’ का मुहावरा ……….. प्रकार की राजनीति से सम्बन्धित है।
उत्तर:
दल-बदल

(4) पांचवें आम चुनाव के बाद …………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी

(5) सन् 1969 में ……………….. राष्ट्रीय दल में विभाजन हुआ।
उत्तर:
कांग्रेस

(6) दल-बदल विरोधी अधिनियम वर्ष ……….. में पास हुआ।
उत्तर:
1985 एवं 2003

(7) पं० नेहरू जी की मृत्यु के बाद ………………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
लाल बहादुर शास्त्री

(8) सन् 1971 का चुनाव कांग्रेस पार्टी ने …………. चुनाव निशान पर लड़ा था।
उत्तर:
गाय-बछड़ा

(9) 1967 में श्री मोरार जी देसाई को…………बना दिया गया ?
उत्तर:
उप-प्रधानमंत्री

(10) श्री लाल बहादुर शास्त्री ने ………… का नारा दिया था।
उत्तर:
जय जवान, जय किसान

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(11) ‘प्रिवी पर्स’ की समाप्ति सन् ………….. में की गई।
उत्तर:
1971

(12) ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा ………… नेता ने दिया था।
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी

(13) ‘आया राम गया राम’ का मुहावरा ……….. राज्य में मशहूर हुआ।
उत्तर:
हरियाणा

(14) सन् 1969 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने ………….. को अपना उम्मीदवार बनाया था।
उत्तर:
श्री०वी०वी० गिरी

(15) पांचवां आम चुनाव सन् ………… में हुआ।
उत्तर:
1971

(16) नेहरू जी की मृत्यु के बाद …………. भारत के प्रधानमंत्री बने।
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री

(17) सोवियत संघ के ………… नगर में श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु हुई।
उत्तर:
ताशकंद

(18) 1960 के दशक को ……………….. दशक कहा जाता है।
उत्तर:
खतरनाक

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
चौथे आम चुनाव के बाद केन्द्र में किस दल की सरकार बनी ?
उत्तर:
चौथे आम चुनाव के बाद केन्द्र में कांग्रेस दल की सरकार बनी।

प्रश्न 2.
“जय जवान, जय किसान” का नारा किसने दिया ?
उत्तर:
“जय जवान, जय किसान” का नारा श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया।

प्रश्न 3.
प्रिवी पर्स की समाप्ति कब की गई ?
उत्तर:
सन् 1971 में।

प्रश्न 4.
सन् 1971 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भारत का प्रधानमंत्री कौन बना था ?
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी।

प्रश्न 5.
किस वर्ष में इन्दिरा गांधी को अनुशासनहीनता के लिए कांग्रेस पार्टी से निष्कासित किया गया था ?
उत्तर:
सन् 1969 में।

प्रश्न 6.
श्रीमती इंदिरा गांधी ने कौन-सा नारा दिया?
उत्तर:
‘गरीबी हटाओ।

प्रश्न 7.
‘आया राम-गया राम’ का मुहावरा किससे सम्बन्धित है ?
उत्तर:
दल-बदल (हरियाणा) से।

प्रश्न 8.
‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा किस नेता ने दिया ?
उत्तर:
श्रीमती इन्दिरा गांधी।

प्रश्न 9.
पं० नेहरू जी की मत्य के बाद भारत के प्रधानमन्त्री कौन बने ?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का क्या अर्थ है ? भारत की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
नेहरू जी की विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
भारत की विदेश नीति’ के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ- प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है। विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। रुथना स्वामी के अनुसार, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहारों का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

भारतीय विदेश नीति के मुख्य सिद्धान्त-भारतीय विदेश नीति के निर्माता भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू माने जाते हैं। स्वतन्त्रता के पश्चात् उन्होंने भारतीय विदेश नीति में जिन तत्त्वों का समावेश किया, वे आज भी विद्यमान हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1: गुट-निरपेक्षता (Non-Alignment):
भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है। भारत एक गुट-निरपेक्ष देश है और इसकी विदेश नीति भी गुट-निरपेक्षता पर आधारित है। पं० नेहरू ने कहा था-“जहां तक सम्भव हो, हम इन शक्ति-गुटों से अलग रहना चाहते हैं, जिनके कारण पहले भी महायुद्ध हुए हैं और भविष्य में हैं।” गुट-निरपेक्षता का अर्थ है-अपनी स्वतन्त्र नीति । जनता सरकार ने मार्च, 1977 में सत्ता में आने पर गुट-निरपेक्षता की नीति पर बल दिया। श्रीमती इन्दिरा गांधी और उसके बाद राजीव गांधी की सरकार ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। आजकल संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार भी गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण कर रही है।

2. साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशवादियों का विरोध (Opposition of Imperialists and Colonialists):
भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्यवाद का शिकार रहा है, जिस कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है।

3. जाति, रंग व भेदभाव की नीति के विरुद्ध (Opposite to the Policy of Caste, Colour and Discrimination):
भारत की विदेश नीति का एक अन्य मूल सिद्धान्त यह है कि भारत ने जाति, रंग, भेदभाव की भारत के विदेश सम्बन्ध नीति के विरुद्ध सदैव आवाज़ उठाई है। भारत शुरू से ही जाति-पाति के बन्धन को समाप्त करने के पक्ष में रहा है और उसने अपनी विदेश नीति द्वारा समय-समय पर ऐसे प्रयत्न किए हैं जिनसे इस नीति को विश्व में समाप्त कर सके।

4. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध (Friendly Relations with other Countries):
भारत की विदेश नीति की एक अन्य विशेषता यह है कि भारत विश्व के अन्य देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाने के लिए सदैव तैयार रहता है। भारत ने न केवल मित्रतापूर्ण सम्बन्ध एशिया के देशों से ही बढाए हैं, बल्कि उसने विश्व के अन्य देशों से भी सम्बन्ध बनाए हैं।

5. एशिया-अफ्रीकी देशों का संगठन (Unity of Afro-Asian Countries):
भारत ने पारस्परिक आर्थिक तथा राजनीतिक सम्बन्धों को मजबूत बनाने के लिए एशिया और अफ्रीका के देशों को संगठित करने का प्रयास किया है। भारत का विचार है कि देश संगठित होकर उपनिवेशवाद का अच्छी तरह से विरोध कर सकेंगे तथा अन्य एशियाई और अफ्रीकी देशों की स्वतन्त्रता के लिए वातावरण उत्पन्न कर सकेंगे। भारत ने इन देशों को गुट-निरपेक्षता का रास्ता दिखाया तथा अनेक देशों ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया और इस प्रकार गुट-निरपेक्ष देशों का एक गुट बन गया। 24 मई, 1994 को दक्षिण अफ्रीका गुट-निरपेक्ष देशों के आन्दोलन का 110वां सदस्य बन गया।

6. संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को महत्त्व देना (Importance to Principles of United Nations):
भारत की विदेश नीति में संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों को भी महत्त्व दिया गया और भारत द्वारा सदा ही प्रयास किया गया है कि वह विश्व-शान्ति स्थापित करने के लिए युद्धों को रोके। भारत ने सदैव संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों का पालन किया है और किसी देश पर हमला नहीं किया है। भारत शान्ति का पुजारी है।

7. राष्ट्रमण्डल की सदस्यता (Membership of Commonwealth of Nations):
भारत की विदेश नीति की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता राष्ट्रमण्डल की सदस्यता है। राष्ट्रमण्डल की सदस्यता ने भारत को अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में अधिक प्रभावशाली भूमिका अदा करने योग्य बनाया है।

8. अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत तटस्थ नहीं है (India is not Neutral in International Politics):
यद्यपि भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार गुट-निरपेक्षता है, परन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में बिल्कुल भाग नहीं लेता। भारत किसी गुट में शामिल न होने के कारण ठीक को ठीक और ग़लत को ग़लत कहने वाली नीति अपनाता है। पं० नेहरू के शब्द आज भी सजीव हैं “जहां स्वतन्त्रता के लिए खतरा उपस्थित हो, न्याय की धमकी दी जाती हो अथवा जहां आक्रमण होता हो, वहां न तो हम तटस्थ रह सकते हैं और न ही तटस्थ रहेंगे।”

9. पंचशील (Panchsheel):
भारत की विदेश नीति का एक और महत्त्वपूर्ण भाग है-पंचशील, जो भारत की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को एक महत्त्वपूर्ण देन है। यह सिद्धान्त 1954 में बड़ा लोकप्रिय हुआ जब भारत और चीन के बीच तिब्बत के प्रश्न पर सन्धि हुई। राज्यों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखने के लिए पांच सिद्धान्तों की रचना की गई, जिन्हें पंचशील के नाम से पुकारा जाता है। भारत द्वारा जब भी कोई निर्णय अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर लिया जाता है तो वह इन पांच सिद्धान्तों को सामने रखकर लिया जाता है। भारत ने सदैव प्रयास किया है कि इन पांच सिद्धान्तों को अन्य देश भी स्वीकार करें।

10. क्षेत्रीय सहयोग (Regional Co-operation) :
यद्यपि भारत में एक महाशक्ति बनाने के सारे लक्षण पाए जाते हैं, परन्तु भारत ने कभी भी महाशक्ति बनने का प्रयत्न नहीं किया। भारत का सदा ही क्षेत्रीय सहयोग में विश्वास रहा है। भारत ने क्षेत्रीय सहयोग की भावना को विकसित करने के लिए 1985 में क्षेत्रीय सहयोग के लिए ‘दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ’ (South Asian Association of Regional Co-operation) की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे संक्षेप में, ‘सार्क’ (SAARC) कहा जाता है। इस संघ में भारत के अतिरिक्त पाकिस्तान, बांग्ला देश, श्रीलंका, भूटान, नेपाल, अफगानिस्तान तथा मालद्वीप भी शामिल हैं।

11. नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और वातावरण की सुरक्षा का प्रश्न (New International Economic order and question of the protection of Environment):
पिछले कुछ वर्षों से नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना और वातावरण की सुरक्षा का प्रश्न भारत की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण भाग बन गया है। भारत विश्व में से अन्याय पर आधारित अर्थव्यवस्था समाप्त करके न्यायपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना करना चाहता है, ताकि विकासशील देश विकसित देशों के वित्तीय संगठनों से आर्थिक मदद प्राप्त कर सकें। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर किये जाने वाले ऐसे प्रयत्नों का भारत ने सदैव समर्थन किया है, जिससे पर्यावरण की सुरक्षा की जा सके।

अन्त में हम कह सकते हैं कि, भारत की विदेश नीति प्रो० हीरेन मुखर्जी (Prof. Hiren Mukherjee) के शब्दों में यह है कि, “उपनिवेशवाद का विरोध ……… सारी नस्लों को पूरी समानता ………… गुट-निरपेक्षता ………. एशिया तथा अफ्रीका को संसार की राजनीति में नए उभर रहे तत्त्वों के रूप में मान्यता …………. अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को समाप्त करना और विवादों को हिंसा तथा युद्ध के बिना हल करना भारत की विदेश नीति के मूल सिद्धान्त हैं।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 2.
‘विदेश नीति’ का अर्थ स्पष्ट करें। भारत की विदेश नीति के निर्धारक तत्त्व बताइये।
अथवा
भारत की ‘विदेश नीति’ के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। भारतीय विदेश नीति के निर्धारक तत्त्व-सन् 1947 से पूर्व भारत की कोई अपनी विदेश नीति नहीं थी। ब्रिटेन की जो विदेश नीति होती थी वही भारत सरकार की विदेश नीति थी। यदि जर्मनी ब्रिटेन का शत्रु होता, तो भारत सरकार भी उसे अपना शत्रु मानती थी। 1947 में स्वतन्त्र होने के पश्चात् भारत को स्वतन्त्र विदेश नीति का निर्माण करना था। स्वतन्त्र भारत के संविधान में उन नीति निर्देशक सिद्धान्तों का वर्णन कर दिया गया है जिनका अनुसरण इस देश को करना है। स्वतन्त्र भारत ने जिस विदेश नीति का अनुसरण किया है वह भी राष्ट्रीय हितों पर आधारित है। इस नीति को निर्धारित करने में अनेक तत्त्वों ने सहयोग दिया है। ये तत्त्व निम्नलिखित हैं

1.संवैधानिक आधार (Constitutional Basis):
भारत के संविधान में राजनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए इस विषय में भी निर्देश दिए गए हैं। अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को निम्नलिखित कार्य करने के लिए कहा गया है

(क) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
(ख) दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।
(ग) अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, समझौतों तथा कानूनों के लिए सम्मान उत्पन्न करना।
(घ) अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाना। राजनीति के इन निर्देशक सिद्धान्तों ने भारत की विदेश नीति को निर्धारित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

2. भौगोलिक तत्त्व (Geographical Factors):
भारत में विदेश नीति को निर्धारित करने में भौगोलिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत का समुद्र तट बहुत विशाल है। भारत की सुरक्षा के लिए नौ-सेना का शक्तिशाली होना अति आवश्यक है और इसलिए भारत अपनी नौ-सेना को शक्तिशाली बनाने के लिए लगा हुआ है। भारत की सीमाएं पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बर्मा (म्यनमार) के साथ लगती हैं। कश्मीर राज्य के कुछ प्रदेश ऐसे भी हैं, जिनकी सीमा अफ़गानिस्तान और रूस के साथ लगती है यद्यपि इस समय वे पाकिस्तान के कब्जे में हैं। इन देशों को लगती अपनी सीमाओं को ध्यान में रखकर ही भारत ने अपनी विदेश नीति का निर्धारण किया है।

3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background):
लगभग 200 वर्ष के दीर्घकाल तक भारत को अंग्रेजों की दासता में रहना पड़ा, फलस्वरूप भारत अन्य राष्ट्रों की तुलना में ग्रेट ब्रिटेन के सम्पर्क में अधिक रहा और इसी कारण इंग्लैण्ड की सभ्यता व संस्कृति का भारत पर विशेष रूप से प्रभाव पड़ा। चिरकाल तक साम्राज्यवाद के कारण शोषित व परतन्त्र रहने के कारण भारत की विदेश नीति पर प्रभाव पड़ा है और अब इसकी विदेश नीति का मुख्य सिद्धान्त साम्राज्यवाद तथा औपनिवेशवाद का विरोध करना है अ एशिया व अफ्रीका में होने वाले स्वाधीनता संघर्षों का समर्थन करता रहा है।

4. आर्थिक तत्त्व (Economic Factors) :
भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्त्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। भारत में उस समय अनाज की भारी कमी थी और वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं। भारत अनाज और अन्य आवश्यक वस्तुओं के आयात के लिए अमेरिका और ब्रिटेन पर निर्भर करता था। भारत का विदेशी व्यापार मुख्यत: ब्रिटेन व अमेरिका के साथ था। जिन मशीनरियों व खाद्य सामग्रियों को विदेशों से मंगवाना होता है वह भी उसे इन देशों से ही मुख्यतः प्राप्त करनी होती हैं और इनके साथ ही अमेरिका व ब्रिटेन की पर्याप्त पूंजी भारत के अनेक कल-कारखानों में लगी हुई है।

ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक था कि भारत की विदेश नीति पश्चिमी पूंजीवादी राज्यों के प्रति सद्भावनापूर्ण रही। 1950 के पश्चात् भारत और सोवियत संघ धीरे-धीरे एक-दूसरे के नज़दीक आने लगे और भारत सोवियत संघ तथा अन्य समाजवादी देशों से तकनीकी तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करने लगा। दोनों गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त करने के लिए भारत ने गट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। वास्तव में भारत की विदेश नीति और उसके आर्थिक विकास में घनिष्ठ सम्बन्ध है।

5. राष्ट्रीय हित (National Interest):
विदेश नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 4 दिसम्बर, 1947 को संविधान सभा में पण्डित नेहरू ने कहा था कि आप कोई भी नीति अपनाएं, विदेश नीति का निर्धारण करने की कला राष्ट्रीय हित के सम्पादन में ही निहित है। पं. नेहरू ने गट-निरपेक्षता और विश्व-शान्ति की स्थापना को भारत की विदेश नीति का आधार इसलिए बनाया ताकि भारत गुटों से अलग रहकर अपना आर्थिक तथा औद्योगिक विकास कर सके। यदि भारत गुटों की नीति में फंस जाता तो दोनों गुटों से आर्थिक सहायता न पा सकता। अत: भारत के हित को देखते हुए ही गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाया गया है। भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रमण्डल (Commonwealth of Nations) का सदस्य रहना स्वीकार किया।

6. विचारधारा का प्रभाव (Impact of Ideology):
विदेश नीति का निर्माण करने में उस देश की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है। राष्ट्रीय आन्दोलन के समय कांग्रेस ने अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में तरह-तरह के आदर्श संसार के सामने प्रस्तुत किए थे। कांग्रेस ने सदैव विश्व-शान्ति और शान्तिपूर्ण सह-जीवन का समर्थन तथा साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद का घोर विरोध किया। सत्तारूढ़ होने पर कांग्रेस को अपनी विदेश नीति का निर्माण इन्हीं आदर्शों पर करना था। कांग्रेस महात्मा गांधी के आदर्शों तथा सिद्धान्तों से भी काफी प्रभावित थी।

अत: भारत की विदेश नीति गांधीवाद से काफी प्रभावित थी, इसलिए भारत की विदेश नीति में विश्व-शान्ति पर बहुत जोर दिया जाता है। समाजवादी देशों के प्रति भारत की सहानुभूति बहुत कुछ मार्क्सवादी प्रभाव का परिणाम मानी जाती है। पश्चिम के उदारवाद का भी भारत की विदेश नीति पर काफ़ी प्रभाव है। हमारी विदेश नीति के निर्माता पं० नेहरू पश्चिमी लोकतन्त्रीय परम्पराओं से बहुत प्रभावित थे। वे पश्चिमी लोकतन्त्र तथा साम्यवाद दोनों की अच्छाइयों को पसन्द करते थे और उनकी बुराइयों से दूर रहना चाहते थे। अत: गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया गया।

7. अन्तर्राष्ट्रीय तत्त्व (International Factors):
भारत की विदेश नीति के निर्धारण में अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भारत स्वतन्त्र हुआ उस समय सोवियत गुट और अमरीकी गुट में शीत-युद्ध चल रहा था। संसार के प्रायः सभी देश उस समय दो गुटों में विभाजित थे। पं० जवाहरलाल नेहरू ने किसी एक गुट में शामिल होने के स्थान पर दोनों गुटों से अलग रहना देश के हित में समझा।

अतः भारत ने गुट-निरपेक्ष नीति का अनुसरण किया। पिछले कुछ वर्षों से अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति में परिवर्तन हुआ है। अमेरिका और चीन के सम्बन्धों में सुधार हुआ है लेकिन अमेरिका और पाकिस्तान बहुत नज़दीक हैं। इस अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति के कारण भारत और सोवियत संघ और समीप आए। 1991 में सोवियत संघ के विघटन होने के बाद विश्व में अमेरिका ही एकमात्र सुपर पॉवर रह गया है। इसीलिए भारत भी अमेरिका के साथ अपने आर्थिक, सामाजिक सम्बन्धों को मज़बूत बनाने पर बल दे रहा है।

8. सैनिक तत्त्व (Military Factors):
सैनिक तत्त्व ने भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित किया है। स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत सैनिक दृष्टि से बहुत निर्बल था। इसलिए भारत ने दोनों गुटों से सैनिक सहायता प्राप्त करने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाई। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध में अमेरिका ने खुलेआम पाकिस्तान का साथ दिया और भारत पर दबाव डालने के लिए अपना सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेजा तो भारत को सोवियत संघ से 20 वर्षीय सन्धि करनी पड़ी। आजकल अमेरिका पाकिस्तान को आधुनिकतम हथियार दे रहा है, जिसका भारत ने अमेरिका से विरोध किया है, पर अमेरिका अपनी नीति पर अटल है। अतः भारत को भी अपनी रक्षा के लिए रूस तथा अन्य देशों से आधुनिकतम हथियार खरीदने पड़ रहे हैं।

9. राष्ट्रीय संघर्ष (National Struggle):
भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन ने विदेश नीति के निर्माण में महत्त्वपूर्ण

  • राष्ट्रीय आन्दोलन ने भारत में महाशक्तियों के संघर्ष का मोहरा बनने से बचने का संकल्प उत्पन्न किया।
  • अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्र में गुट-निरपेक्ष रहते हुए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की भावना जागृत हुई।
  • प्रत्येक तरह के उपनिवेशवाद, जातिवाद व रंग-भेद का विरोध करने का साहस हुआ।
  • स्वाधीनता संघर्ष के लिए सहानुभूति उत्पन्न हुई।

10. वैयक्तिक तत्त्व (Personal Factors):
भारतीय विदेश नीति पर इस राष्ट्र के महान् नेताओं के वैयक्तिक तत्त्वों का भी प्रभाव पड़ा। पण्डित नेहरू के विचारों से हमारी विदेश नीति पर्याप्त प्रभावित हुई। पण्डित नेहरू उपनिवेशवाद व फासिस्टवाद के घोर विरोधी थे और वे समस्याओं का समाधान करने के लिए शान्तिपूर्ण मार्ग के समर्थक थे। वह मैत्री, सहयोग व सह-अस्तित्व के पोषक थे।

साथ ही अन्याय का विरोध करने के लिए शक्ति प्रयोग के समर्थक थे। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने अपने विचारों द्वारा हमारी विदेश नीति के ढांचे को ढाला। पण्डित नेहरू के अतिरिक्त डॉ० राधाकृष्णन, कृष्णा मेनन, पाणिक्कर जैसे महान् नेताओं के विचारों ने भी हमारी विदेश नीति को प्रभावित किया। स्वर्गीय शास्त्री जी व भूतपूर्व प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी के काल में हमने अपनी विदेश नीति के मूल तत्त्वों को कायम रखते हुए इसमें व्यावहारिक तत्त्वों का भी प्रयोग किया।

प्रश्न 3.
भारत-चीन के मध्य विवाद के उन मुख्य विषयों का वर्णन करें जो 1962 के युद्ध का कारण बने।
अथवा
भारत और चीन के बीच मतभेदों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत एवं चीन एशिया के दो महत्त्वपूर्ण देश हैं। भारत और चीन के मध्य पहले गहरी मित्रता थी, परन्तु धीरे-धीरे दोनों देशों में मतभेद बढ़ते रहे, जिनके कारण अन्ततः 1962 में दोनों देशों के बीच एक युद्ध भी हुआ। इस युद्ध के निम्नलिखित कारण माने जा सकते हैं

1. तिब्बत समस्या (Tibet Problem)-भारत-चीन के बीच हुए युद्ध का एक कारण तिब्बत की समस्या थी। सन् 1914 में इन दोनों देशों के बीच सीमा निर्धारण करने के लिए शिमला में एक सम्मेलन हुआ था जिसमें आर्थर हेनरी मैकमोहन ने भाग लिया था। शिमला-सन्धि में यह निर्णय हुआ था कि

  • तिब्बत पर चीन का आधिपत्य रहेगा परन्तु बाह्य तिब्बत को अपने कार्य में पूरी आज़ादी रहेगी।
  • चीन तिब्बत के आन्तरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
  • चीन कभी भी तिब्बत को अपने राज्य का प्रान्त घोषित नहीं करेगा।

बाह्य तिब्बत और भारत के बीच की ऊंची पर्वत श्रेणियों को सीमा मान कर एक नक्शे में लाल पैंसिल से निशान लगा दिए तथा इस सीमा रेखा को मैकमोहन लाइन का नाम दिया गया। सीमा-विवाद के समय चीन ने भी इसी रेखा का समर्थन किया। कश्मीर की उत्तरी सीमा को स्पष्ट करते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने 1899 में चीन को लिखा था कि भारत के विदेश सम्बन्ध इसकी पूर्वी सीमा 80 अक्षांश पूर्वी देशान्तर है। इससे स्पष्ट है कि अक्साई चीन भारतीय सीमा के अन्तर्गत है और वह सीमा ऐतिहासिक है।

स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद भारत को तिब्बत में निम्नलिखित बहिदेशीय (Extra-territorial) अधिकार मिले :

  • तिब्बत और ब्रिटिश भारतीय व्यापारियों के झगड़ों में बचाव पक्ष पर देश की विधि लागू होती थी और उसी देश का न्यायाधीश सुनवाई के समय अध्यक्षता करता था।
  • यदि तिब्बत में ब्रिटिश-राज्य के लोगों के बीच विवाद होते थे तो उनका निर्णय ब्रिटिश अधिकारी ही करते थे।
  • ब्रिटिश एजेंटों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ फ़ौज रखने का अधिकार था।
  • गेट टुंग के यान टुंग से व्यॉणट्सी तक टेलीफोन और टेलीग्राफ संस्थाओं पर भी ब्रिटिश अधिकारियों का अधिकार था।
  • तिब्बत में भारत सरकार के ग्यारह विश्राम-गृह थे।

चीन ने तिब्बत की सत्ता तथा भारत के अधिकारों का सम्मान न करते हुए 7 अक्तूबर, 1950 को तिब्बत में अपने सैनिक भेज दिए। जब भारत ने इस ओर चीन का ध्यान आकर्षित करवाया तो उसने कठोर शब्दों में अपेक्षा की। नये नक्शों में चीन ने भारत की लगभग 50 हज़ार वर्गमील सीमा चीन प्रदेश के अन्तर्गत दिखाई। श्री नेहरू द्वारा इसका विरोध करने पर चीनी प्रधानमन्त्री ने कहा कि ये नक्शे राष्ट्रवादी सरकार के पुराने नक्शों की नकल हैं और समय मिलने पर इसे ठीक कर लिया जाएगा।

चीनियों ने आक्साईचिन के पठार में सड़क बना ली। लद्दाख में कई सैनिक चौकियां स्थापित कर ली। सन् 1958 में लद्दाख के खरनाम किले पर भी कब्जा कर लिया गया। 31 मार्च, 1957 में दलाईलामा ने चीनियों के दमन से भयभीत होकर भारत में राजनीतिक शरण ली। चीन ने इसका विरोध किया। श्री चाऊ-एन-लाई ने भारत को लिखा कि “मैकमोहन रेखा चीन के तिब्बत क्षेत्र के विरुद्ध अंग्रेजों की आक्रमणकारी नीति का परिणाम था। कानूनी तौर पर इसे वैध नहीं माना जा सकता।”

सन् 1959 को भारत पर आरोप लगाया कि वह तिब्बत में सशस्त्र विद्रोहियों को संरक्षण दे रहा है। चीन ने भारत के लगभग 90,000 किलोमीटर प्रदेश पर दावा करते हुए कहा कि भारतीय सेनाएं इस प्रदेश में घुसकर चीन की अखण्डता को चुनौती दे रही हैं। __ 1960 में भारत और चीन के प्रधानमन्त्रियों ने दिल्ली में एक संयुक्त-विज्ञप्ति में यह माना कि दोनों देशों में कुछ मतभेद हैं। यह तनाव और भी बढ़ा जब 1962 में गलवान घाटी की भारतीय पुलिस चौकी को चीनियों ने घेर लिया।

2. मानचित्र से सम्बन्धित समस्या (Problem Regarding Maps):
भारत एवं चीन के मध्य 1962 में युद्ध का एक कारण दोनों देशों के बीच मानचित्र के रेखांकित भू-भाग था। चीन ने 1954 में प्रकाशित अपने मानचित्र में कुछ ऐसे भाग प्रदर्शित किये थे जो वास्तव में भारतीय भू-भागों में थे। जब इस मुद्दे को चीन के साथ उठाया गया, तो उसने कहा कि यह पुराना मानचित्र है, नये मानचित्र में इस गलती को सुधार लिया जायेगा, परन्तु 1955 में चीन ने बराहोती पर कब्जा किया, तत्पश्चात् शिपकी दर्रा के द्वारा भारतीय भू-क्षेत्र की अवमानना की।

3. सीमा विवाद (Boundary Dispute):
भारत-चीन के बीच विवाद का एक कारण सीमा विवाद था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ता गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 4.
1962 में भारत-चीन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन करें। युद्ध से सम्बन्धित कोलम्बो समझौते का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत एवं चीन के मध्य 1962 में हुए युद्ध की परिस्थितियां बहुत पहले बननी शुरू हो गई थीं। अन्ततः चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत की उत्तरी सीमा पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हमले के कारण भारतीय फ़ौजें जब तक सम्भली तब तक चीन ने सैनिक चौकियों पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत के कहने पर तेजी से सैन्य सामग्री भेजी। चीन ने अचानक 21 नवम्बर, 1962 को एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा कर दी। इसके साथ ही द्वि-सूत्रीय योजना की घोषणा भी की

(1) चीनी सेनाएं 7 नवम्बर, 1962 की वास्तविक नियन्त्रण रेखा (Actual Line of Control) से 20 किलोमीटर अपनी ओर हट जाएंगी और सेना 1 दिसम्बर से हटना शुरू करेंगी।

(2) चीनी सेना के हटने से खाली क्षेत्र पर चीन सरकार अपनी असैनिक चौकियां स्थापित करेगी। इन चौकियों की स्थिति का पता भारत सरकार को उसके दूतावास द्वारा दिया जाएगा। चीन ने भारत सरकार को इन शर्तों को मानने के लिए कहा। इसके साथ ही भारत को 7 नवम्बर, 1959 को अपनी सेनाओं को अपने ही क्षेत्र में 20 किलोमीटर हटने के लिए कहा।

विपरीत स्थितियों के कारण भारत ने चीन की एक-पक्षीय युद्ध-विराम घोषणा को मान लिया परन्तु द्वि-सूत्रीय योजना को नहीं माना और घोषित किया कि जब तक चीन 8 सितम्बर, 1962 की स्थिति तक नहीं लौट जाता तब तक कोई वार्ता नहीं होगी। चीन के इस आक्रमण के बाद हिन्दी चीनी भाई-भाई का युग समाप्त हुआ और भारत और चीन एक-दूसरे के शत्रु गए। उन्हीं दिनों भारत की संसद ने एक सर्वसम्मत प्रस्ताव द्वारा यह संकल्प किया कि “भारत जब तक चीन द्वारा बलात् अधिकृत किए गए अपने क्षेत्र को खाली न करा लेगा तब तक चैन नहीं लेगा।”

चीन के इस आक्रमण के कारण भारत गुट-निरपेक्ष नीति की कड़ी आलोचना हुई परन्तु पं० नेहरू ने इस नीति पर गहरा विश्वास प्रकट किया। भारत की विदेश नीति में अब यथार्थवाद की ओर झुकाव शुरू हुआ। पं० नेहरू ने यह घोषणा कि-“अतीत में हम निर्धनता और निरक्षरता की मानवीय समस्याओं में इतने उलझे रहे कि हमने प्रतिरक्षा की आवश्यकताओं के प्रति तुलनात्मक दृष्टि से बहुत कम ध्यान दिया। यह स्पष्ट है कि अब हम इस ओर अधिक ध्यान देंगे। हम अपनी सेनाओं को सुदृढ़ बनायेंगे तथा जहां तक सम्भव होगा सेना के लिए आवश्यक शस्त्र सामग्री अपने ही देश में तैयार करेंगे।”

कोलम्बो प्रस्ताव और चीन का दुराग्रह-श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार) कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मिस्र और घाना ने दिसम्बर 1962 में भारत-चीन वार्ता के लिए कोलम्बो सम्मेलन का आयोजन किया। श्रीमती भण्डारनायके स्वयं प्रस्ताव लेकर नई दिल्ली और पीकिंग गईं। इसके बाद 19 जनवरी, 1963 को यह प्रस्ताव प्रकाशित किए गए जिनकी मुख्य बातें निम्नलिखित थीं

  • युद्ध-विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा ले।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • विवाद का अन्तिम हल होने तक चीन द्वारा खाली किया गया क्षेत्र असैनिक क्षेत्र हो जिसकी निगरानी दोनों पक्षों द्वारा नियुक्त गैर-सैनिक चौकियां करें।
  • पूर्वी नेफा क्षेत्र दोनों सरकारों द्वारा मान्य वास्तविक नियन्त्रण रेखा युद्ध-विराम रेखा का रूप ले। शेष क्षेत्रों के बारे में दोनों देश भावी वार्ताओं में निर्णय करें।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शान्तिपूर्ण ढंग से किया जाए।

कोलम्बो प्रस्ताव का उद्देश्य दोनों देशों में गतिरोध की स्थिति को खत्म करना था। चीन ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने का विश्वास दिलाया और भारत ने कुछ स्पष्टीकरण मांगे। पूर्वी क्षेत्र में भारतीय सेना मैकमोहन लाइन तक जा सकेगी और चीनी सेना भी अपने पूर्व तक जा सकेगी लेकिन विवादपूर्ण क्षेत्रों से उसे दूर रहना होगा। इस स्पष्टीकरण के बाद भारत ने अपनी सहमति दे दी परन्तु चीन ने कुछ शर्ते जोड़ दी जिससे यह प्रस्ताव महत्त्वहीन हो गया। इससे चीन का रुख स्पष्ट हो गया कि वह भारत के साथ अपने विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाना नहीं चाहता था।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 5.
भारत और पाकिस्तान के बीच 1965 में हुए युद्ध से पहले की घटनाओं का वर्णन करें।
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ परन्तु साथ ही भारत का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। अतः पाकिस्तान भारत का पड़ोसी देश है जिस कारण भारत-पाक समस्याओं का विशेष महत्त्व है। कावदश सम्बन्ध पाकिस्तान को भारत की अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने की नीति बिल्कुल पसन्द नहीं थी। पाकिस्तान अन्य देशों से सहायता प्राप्त करने तथा अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपना महत्त्व बढ़ाने के लिए पश्चिमी गुट में सम्मिलित हो गया और CENTO तथा SEATO आदि क्षेत्रीय तथा सैनिक संगठनों का सदस्य बन गया। परन्तु भारत ने उन गुटों की नीति की अपेक्षा गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

विस्थापित सम्पत्ति, देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति, नहरी पानी, सीमा निर्धारण, वित्तीय और व्यापारिक समायोजन, जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर और कच्छ के विवादों के लिए भारत और पाकिस्तान में युद्ध होते रहे हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी रही है। कश्मीर के विवाद को छोड़कर अन्य सभी विवादों एवं समस्याओं का हल लगभग हो चुका है। 1948 में कश्मीर को लेकर दोनों देशों में युद्ध हुआ फिर इसी समस्या को लेकर 1965 में युद्ध हुआ और 1971 में बंगला देश के मामले पर युद्ध हुआ। जब तक कश्मीर की समस्या का पूर्णरूप से हल नहीं होता तब तक दोनों देशों में स्थायी रूप से मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं हो सकते।

भारत और पाकिस्तान में निम्नलिखित विवादों के कारण अच्छे सम्बन्ध नहीं रहे हैं :

1. जूनागढ़ और हैदराबाद का भारत में मिलाया जाना:
भारतीय क्षेत्र की रियासत जूनागढ़ के नवाब ने जब अपनी रियासत को पाकिस्तान में मिलाना चाहा तो जनता ने विद्रोह कर दिया। नवाब स्वयं पाकिस्तान भाग गया और रियासत के दीवान तथा वहां की पुलिस की प्रार्थना पर 9 नवम्बर, 1947 को भारत सरकार ने रियासत का शासन अपने हाथों में ले लिया। फरवरी, 1948 में जनमत संग्रह में भारत के पक्ष में 1 लाख 90 हजार से भी अधिक मत आए जबकि पाकिस्तान के पक्ष में केवल 91 मत पड़े।

हैदराबाद की रियासत भी पूरी तरह भारतीय क्षेत्र में थी। 1947 में निज़ाम ने भारत के साथ एक ‘यथा-पूर्व-स्थिति’ में समझौता किया। लेकिन हैदराबाद के प्रशासन में प्रभावशाली मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठन ‘मजलिस-ए-ईहादउल’ के रजाकारों ने रियासत में भयानक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी। तब जनता और निज़ाम की रक्षा के लिए पुलिस की और रजाकारों ने आत्म-समर्पण कर दिया। हैदराबाद सरकार ने समस्या को सुरक्षा परिषद में रखा और इसका अन्तिम हल तब हुआ जब दिसम्बर, 1948 में भारत ने सुरक्षा परिषद् से स्पष्ट कह दिया कि वह अब इस प्रश्न के वाद-विवाद में कोई भाग नहीं लेगी।

2. ऋण अदा करने का प्रश्न:
स्वतन्त्र भारत ने पुरानी सरकार के कर्ज का भार सम्भाला। इसके अनुसार उसे 5 वर्ष में पाकिस्तान से 300 करोड़ रुपया लेना था लेकिन पाकिस्तान ने कर्जे को चुकाने का नाम तक नहीं लिया जबकि भारत ने पाकिस्तान को दिये जाने वाले ₹ 5 करोड़ का कर्ज चुका दिया।

3. विस्थापित सम्पत्ति तथा अल्पसंख्यकों की रक्षा का प्रश्न:
1947 से 1957 तक लगभग 90 लाख मुसलमान भारत से पाकिस्तान गए और इतने ही गैर मुस्लिम पाकिस्तान से भारत आए। दोनों ही क्षेत्रों के लोग अपने पीछे विशाल मात्रा में चल और अचल सम्पत्ति छोड़ गए। यह अनुमान लगाया जाता है कि मुसलमानों ने भारत में ₹300 करोड़ की और भारतीयों ने पाकिस्तान में ₹ 3 हजार करोड़ की सम्पत्ति छोड़ी थी।

पाकिस्तान समस्या के सभी सुझावों को ठुकराता गया। अल्पसंख्यकों की रक्षा की समस्या भी दोनों के सामने थी। 1950 में साम्प्रदायिक उपद्रवों को रोकने और अल्पसंख्यकों में रक्षा की भावना उत्पन्न करने के लिए दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों के बीच ‘नेहरू-लियाकत’ समझौता हुआ जिसका पाकिस्तान ने कभी पालन नहीं किया और दुःखी शरणार्थी भारत में आते रहे।

4. नहरी पानी विवाद:
भारत और पाकिस्तान के बीच एक और समस्या नदियों के हिस्से के सम्बन्ध में थी। पंजाब के विभाजन के कारण पानी के प्रश्न पर कठिन स्थिति पैदा हो गई। सतलुज, व्यास और रावी नदियों के हैडवर्क्स भारत में रह गए लेकिन नदियों की दृष्टि से 25 में से केवल 20 नहरें भारत में आईं और एक नहर दोनों देशों में आई।

दोनों देशों की सहमति से यह विवाद मध्यस्थता के लिए विश्व बैंक को सौंप दिया गया। इसके प्रयत्नों से 19 सितम्बर, 1960 को भारत और पाक में सिन्ध बेसिन के पाने के बंटवारे में ‘नहरी समझौता’ (Indo-Pak Canal Water Treaty) हुआ। इस समझौते के अनुसार यह निश्चय किया गया कि 10 वर्ष की अवधि के बाद, जो पाकिस्तान की प्रार्थना पर 3 वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकेगी, तीनों पूर्वी नदियों का पानी भारत के अधिकार में रहेगा जबकि तीनों पश्चिमी नदियों का पानी पाकिस्तान के अधिकार में; केवल इनका सीमित पानी उत्तर की ओर के जम्मू और कश्मीर

प्रान्त में प्रयोग किया जाएगा। यह तय हुआ कि 10 वर्ष तक भारत पूर्वी नदियों से पाकिस्तान की प्रत्येक वर्ष घटती हुई मात्रा में पानी देगा और नई नहरों के निर्माण के लिए पाकिस्तान को आवश्यक मात्रा में धन भी देगा। यदि पाकिस्तान भारत से पानी देने वाली अवधि में 3 वर्ष की वृद्धि के लिए प्रार्थना करेगा तो प्रार्थना स्वीकृत होने पर उसी अनुपात में भारत द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली राशि में कटौती कर दी जाएगी। 12 जनवरी, 1961 को इस सन्धि की शर्ते लागू कर दी गईं। यह सन्धि पाकिस्तान के लिए विशेष लाभदायक थी।

5. कश्मीर विवाद (Kashmir Controversy):
स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत था। इसका क्षेत्रफल 1,34,00 वर्ग कि० मी० और जनसंख्या 40 लाख थी। इनमें से लगभग 77% मुसलमान, 20% हिन्दू तथा 3% सिक्ख, बौद्ध आदि थे। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबायली लोगों (Tribesmen) को प्रेरणा और सहायता देकर 20 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। 24 अक्तूबर, 1947 को श्रीनगर को बिजली प्रदान करने वाले मदुरा बिजली घर पर अधिकार कर लिया गया। इस पर महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता मांगी और कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की।

27 अक्तूबर, 1947 को भारत सरकार ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान से कबायलियों को मार्ग न देने के लिए कहा परन्तु पाकिस्तान उन्हें पूरी सहायता देता रहा। इस पर लार्ड माऊंटबेटन के परामर्श पर भारत सरकार ने 1 जनवरी, 1948 की संयुक्त राष्ट्र चार्टर की 34वीं और 35वीं धारा के अनुसार सुरक्षा परिषद् से पाकिस्तान के विरुद्ध शिकायत की और अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को आक्रमणकारियों की सहायता बन्द करने को कहे।

कश्मीर और संयुक्त राष्ट्र–सुरक्षा परिषद् कश्मीर विवाद का कोई समाधान ढूंढ़ने में असफल रही है। इसका मुख्य कारण यह था कि सुरक्षा परिषद् का उद्देश्य एक न्यायपूर्ण निर्णय करना नहीं रहा है। अपितु दोनों पक्षों में किसी भी मूल्य पर समझौता कराना रहा है। सुरक्षा परिषद् के सामने भारत की शिकायत के बाद दो मुख्य प्रश्न थे

(1) क्या पाकिस्तान ने आक्रमण किया है ?
(2) क्या कश्मीर का भारत में अधिमिलन (Accession) वैधानिक है? इन दोनों प्रश्नों के तथ्य स्पष्ट थे, परन्तु सुरक्षा परिषद् ने इनका उत्तर देने के अतिरिक्त आक्रमण के शिकार भारत और आक्रमणकारी पाकिस्तान को समान स्थिति देकर समझौता करवाने का प्रयत्न किया। 21 अप्रैल, 1948 को सुरक्षा-परिषद् ने भारत और पाकिस्तान के विवाद के समाधान के लिए 5 सदस्यों के संयुक्त राष्ट्र आयोग (U.N.C.I.P.) की नियक्ति की। को कश्मीर में युद्ध-विराम हो गया। आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कश्मीर विवाद के समाधान के लिए आधार रूप में निम्नलिखित सिद्धान्तों को सामने रखा

  • पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेनाएं हटा ले और कबायलियों को भी वहां से हटाने का प्रयत्न करे।
  • सेनाओं द्वारा खाली किए गए प्रदेशों का शासन-प्रबन्ध आयोग के निरीक्षण में स्थानीय अधिकारी करेंगे।
  • पाकिस्तानी सेनाओं के हट जाने के पश्चात् भारत भी अपनी सेना के अधिकांश भाग को हटा लेगा।
  • अन्त में एक स्वतन्त्र और निष्पक्ष जनमत संग्रह के द्वारा यह निर्णय किया जाएगा कि कश्मीर भारत में शामिल होगा या पाकिस्तान में।

सुरक्षा परिषद् ने श्री चैस्टर निमिट्ज को जनमत संग्रह का प्रशासक नियुक्त किया, परन्तु दोनों देशों में कोई समझौता न हो सकने के कारण श्री चैस्टर ने त्याग-पत्र दे दिया। फरवरी, 1950 में सुरक्षा-परिषद् ने सर ओवन डिक्सन (Sir Owen Dixon) को तथा उनकी कोशिशों के सफल हो जाने पर 1951 में डॉ० फ्रैंक ग्राहम (Dr. Frank Graham) को समझौता करवाने के लिए नियुक्त किया। 27 मार्च, 1953 को डॉ० ग्राहम ने अपनी अन्तिम रिपोर्ट में इस समस्या को दोनों देशों में सीधी वार्ता के द्वारा सुलझाने पर जोर दिया। इस सुझाव के अनुसार 1953 में दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों में सीधी वार्ता और 1953-54 में सीधा पत्र-व्यवहार हुआ, परन्तु इसका कोई फल नहीं निकला।

1954 में अमेरिका पाकिस्तान को सैनिक सहायता देने को तैयार हो गया। पाकिस्तान का उद्देश्य इस सहायता से अपनी सैनिक स्थिति दृढ़ करना था। इससे बाध्य होकर भारत को भी अपनी नीति बदलनी पड़ी। पं० नेहरू ने घोषणा की- “जनमत संग्रह करने का प्रश्न स्पष्ट रूप से इस शर्त के साथ सम्बद्ध था कि पाकिस्तान कश्मीर से अपनी सेनाएं भारत के विदेश सम्बन्ध हटा लेगा। पिछले 9 वर्षों में पाकिस्तान यह शर्त पूरी करने में असमर्थ रहा है। पाकिस्तान को मिलने वाली सैनिक सहायता और उसकी सैनिक समझौतों की सदस्यता ने कश्मीर में जनमत संग्रह करने के प्रस्ताव के मूल आधार को ही नष्ट कर दिया है।”

26 जनवरी, 1957 को जनता द्वारा निर्वाचित विधान सभा ने कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने का निश्चय किया। पाकिस्तान ने फिर से कश्मीर के प्रश्न को सुरक्षा परिषद् में उठाया। पहले गुन्नार यारिंग (Gunnar Yarring) और फिर डॉ० फ्रैंक ग्राहम को दोनों पक्षों में समझौता करने के लिए भेजा गया परन्तु कोई सफलता नहीं मिली। बाद में दिल्ली, कराची, रावलपिंडी और ढाका में दोनों देशों के विदेश मन्त्रियों के बीच वार्ता हुई। परन्तु पाक विदेश मन्त्री श्री भुट्टो के तनावपूर्ण रुख के कारण ये वार्ताएं 1963 में असफल हो गईं।

प्रश्न 6.
भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए 1965 की युद्ध एवं ताशकंद समझौते का वर्णन करें।
उत्तर:
पाकिस्तान का व्यवहार सदैव भारत विरोधी रहा है। सन् 1965 में भारत को दो बार पाकिस्तानी आक्रमण का शिकार होना पड़ा। पहली बार अप्रैल में कच्छ के रण में और दूसरी बार सितम्बर में कश्मीर में। कच्छ के रण में कुछ सफलताओं के बाद पाकिस्तानी सेनाओं को पीछे हट जाना पड़ा। 30 जून, 1965 को युद्ध-विराम समझौता हो गया और भारत ने अपनी शान्तिप्रियता का परिचय देते हुए कच्छ-सम्बन्धी मतभेदों को एक अन्तर्राष्ट्रीय न्यायाधिकरण के निर्णय के लिए रखने की बात मान ली।

परन्तु पाकिस्तान ने भारत के इस रूख को दुर्बलता समझा और 1965 में युद्ध-विराम रेखा का उल्लंघन करके बड़ी संख्या में घुसपैठिये कश्मीर में भेज दिये। परन्तु भारतीय सेनाओं ने उन्हें पीछे धकेल दिया और हाजीपीर और टिथवाल के पाक-अधिकृत इलाकों को मुक्त करवा लिया। सितम्बर, 1965 को पाकिस्तानी सेनाओं ने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके छम्ब प्रदेश पर आक्रमण कर दिया।

इससे विवश होकर भारत को भी अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पार कर पश्चिमी पाकिस्तान के क्षेत्र में युद्ध को ले जाना पड़ा। पाकिस्तानी सेनाओं के पास आधुनिकतम शस्त्रों के होते हुए भी भारतीय सेनाओं ने उन्हें बुरी तरह हरा दिया। अन्त में सुरक्षा परिषद् के 20 सितम्बर के प्रस्ताव का पालन करते हुए दोनों पक्षों ने 22-23 सितम्बर को सुबह 3.30 बजे युद्ध बन्द कर दिया। इस समय तक भारतीय सेनाएं लाहौर के दरवाजों तक पहुंच चुकी थीं।

युद्ध-विराम के बाद भी दोनों देशों में सामान्य सम्बन्धों की समस्या बनी रही। 10 जनवरी, 1966 को सोवियत संघ के प्रधानमन्त्री श्री कोसीगिन के प्रयत्नों से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हो गया जिसके द्वारा भारत के प्रधानमन्त्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात पर सहमत हो गये कि दोनों देशों के सभी सशस्त्र व्यक्ति 25 फरवरी, 1966 के पूर्व उस स्थान पर वापस बुला लिये जाएंगे जहां वे 5 अगस्त, 1965 के पूर्व थे तथा दोनों पक्ष युद्ध-विराम रेखा पर युद्ध विराम की शर्तों का पालन करेंगे। इस समझौते के द्वारा भारत ने खोया अधिक और पाया कम। यह समझौता पाकिस्तान के लिए अधिक लाभप्रद था तथा आचार्य कृपलानी का यह मत, “श्री लाल बहादुर शास्त्री ने दबाव में आकर हस्ताक्षर किये थे,’ एक बड़ी सीमा तक उचित लगता है।

इससे एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पूरी हुई-भारत और पाकिस्तान में युद्ध स्थिति की औपचारिक समाप्ति। परन्तु पाकिस्तान ने शीघ्र ही भारत विरोधी प्रचार करना शुरू कर दिया। ताशकंद समझौते (Tashkent Agreement)-भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुए 1965 के युद्ध को रुकवाने में सोवियत संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसके प्रयासों से भारत एवं पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ, जिसके मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं

  • दोनों पक्षों का यह प्रयास रहेगा कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बने।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि दोनों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जाये, जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पहले थी।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध प्रचार नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों के उच्चायुक्त एक-दूसरे के देश में वापिस आयेंगे।

प्रश्न 7.
सन् 1971 में हुए भारत-पाक युद्ध के मुख्य कारण बताइए। इसके क्या परिणाम हुए ?
उत्तर:
भारत एवं पाकिस्तान के बीच 1971 में हुए युद्ध का मुख्य कारण पूर्वी पाकिस्तान में होने वाली घटनाएं और उनका भारत पर पड़ने वाला प्रभाव था। 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगला देश) में जनता ने याहियां खां की तानाशाही के विरुद्ध स्वतन्त्रता का आन्दोलन आरम्भ किया। याहिया खां ने आन्दोलन को कुचलने के लिए सैनिक शक्ति का प्रयोग किया।

भारत ने बंगला देश मुक्ति संघर्ष में उसका साथ दिया। लगभग एक करोड़ शरणार्थियों को भारत में आना पड़ा। इससे भारत की आर्थिक व्यवस्था पर बड़ा बोझ पड़ा। भारत ने विश्व के देशों से अपील की कि जब तक बंगला देश की समस्या का संकट हल नहीं हो जाता तब तक पाकिस्तान को किसी प्रकार की आर्थिक सहायता न दी जाए।

सोवियत संघ और अनेक अन्य देशों ने भारत के साथ सहानुभूति प्रकट की। परन्तु चीन और अमेरिका जैसी महान् शक्तियां बंगला देश के प्रश्न को पाकिस्तान का घरेलू मामला बताकर उसे आर्थिक तथा सैनिक सहायता देती रहीं। पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का निश्चय किया और पाकिस्तान के आक्रमण का डटकर मुकाबला किया। 5 दिसम्बर को सुरक्षा परिषद् की बैठक में पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाया कि वह पूर्वी पाकिस्तान में क्रान्तिकारियों को सहायता दे रहा है।

अमेरिका ने पाकिस्तान का समर्थन किया, परन्तु सोवियत संघ ने भारत का पक्ष लिया और वीटो का प्रयोग किया। 6 दिसम्बर को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय संसद् में बंगला देश गणराज्य के उदय की सूचना दी। 16 दिसम्बर, 1971 को ढाका में जनरल नियाजी ने आत्म-समर्पण के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए और लगभग 1 लाख पाक सैनिकों ने आत्म-समर्पण किया।

17 दिसम्बर को रात्रि के 8 बजे ‘एक-पक्षीय युद्ध विराम’ की घोषणा करते हुए श्रीमती गांधी ने याहिया खां को युद्धबन्दी प्रस्ताव मान लेने की अपील की। याहिया खां ने तुरन्त इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इस युद्ध की विजय से भारत का सम्मान बढ़ा और अमेरिका की गहरी कूटनीतिक पराजय हुई। पाकिस्तान के विभाजन से पाकिस्तान का हौसला ध्वस्त हो गया।

शिमला सम्मेलन-श्रीमती गांधी ने पाकिस्तान की हार का कोई अनुभव लाभ न उठाते हुए दोनों देशों की समस्याओं पर विचार करने के लिए जून 1972 में शिमला में एक शिखर सम्मेलन बुलाया। इस सम्मेलन में पाक के तत्कालीन शासक प्रधानमन्त्री भुट्टो ने और भारत की उस समय की प्रधानमन्त्री इन्दिरा गांधी ने भाग लिया। 3 जुलाई को दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस समझौते की महत्त्वपूर्ण बातें निम्नलिखित हैं

(1) दोनों राष्ट्र अपने पारस्परिक झगड़ों को द्विपक्षीय बातचीत और मान्य शांतिपूर्ण ढंगों से हल करने के लिए दृढ़ संकल्प हैं।

(2) दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता और सार्वभौम समानता का सम्मान करेंगे।

(3) दोनों राष्ट्र एक-दूसरे क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी का प्रयोग नहीं करेंगे।

(4) दोनों देशों द्वारा परस्पर विरोधी प्रचार नहीं किया जाएगा।

(5) समझौते में तय पाया गया कि दोनों देश परस्पर सामान्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयत्न करेंगे। संचार व्यवस्था, डाक व्यवस्था, जल, थल, हवाई यात्रा को पुनः चालू करने के लिए वार्ताएं की जाएंगी। आर्थिक तथा व्यापारिक सहयोग के सम्बन्ध में भी शीघ्र वार्ता की जाएगी।

(6) स्थायी शान्ति हेतु भी अनेक प्रयत्न किए जाने का समझौते में उल्लेख था। इसके लिए दोनों देशों को अपनी सेनाओं को अन्तर्राष्ट्रीय सीमा पर वापस बुलाना था।

प्रश्न 8.
भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 के बाद के सम्बन्धों का वर्णन करें।
अथवा
भारत के पाकिस्तान के साथ संबंधों पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
1971 के युद्ध के पश्चात् भारत-पाक के सम्बन्ध काफ़ी खराब हो गए। मार्च, 1977 में जनता सरकार की स्थापना के पश्चात् भारत-पाक सम्बन्धों में सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई। श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनवरी, 1980 में प्रधानमन्त्री बनने पर भारत-पाक सम्बन्ध को सुधारने पर बल दिया, परन्तु सोवियत सेना के अफ़गानिस्तान में होने से स्थिति काफ़ी खराब हो गई। जनवरी-फरवरी, 1982 में पाकिस्तान के विदेश मन्त्री आगाशाह भारत आए और उन्होंने युद्ध-वर्जन सन्धि का प्रस्ताव पेश किया जिस पर श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारत पाक में सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त आयोग की स्थापना का सुझाव दिया।

सहयोग के प्रयास-1985 में भारत और पाकिस्तान के कई मन्त्रियों और अधिकारियों की एक-दूसरे के देशों में यात्राएं हुईं। व्यापार, कृषि, विज्ञान, तकनीकी और संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कुछ समझौते भी हुए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की पाकिस्तान यात्रा-29 दिसम्बर, 1988 को प्रधानमन्त्री राजीव गांधी दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान गए और उनकी पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बेनजीर भुट्टो से भारत-पाक सम्बन्धों पर भी बातचीत हुई। 31 दिसम्बर, 1988 को भारत और पाकिस्तान ने आपसी सम्बन्ध सद्भावनापूर्ण बनाने के उद्देश्य से शिमला समझौते के करीब 16 वर्ष बाद तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें एक-दूसरे के परमाणु संयन्त्रों पर आक्रमण नहीं करने सम्बन्धी समझौता काफ़ी महत्त्वपूर्ण है।

दिसम्बर, 1989 में वी० पी० सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। इस सरकार के अल्पकालीन कार्यकाल में भारत-पाक सम्बन्धों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई। नरसिम्हा राव की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध– राष्ट्रमण्डल शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए भारत और पाक के प्रधानमन्त्री ने 17 अक्तूबर, 1991 को हरारे में बातचीत की। 1 जनवरी, 1992 को भारत और पाकिस्तान द्वारा यह समझौता लागू कर दिया गया, जिससे एक-दूसरे के आण्विक ठिकानों और सुविधाओं पर हमला न करने की व्यवस्था की गई थी।

पाक परमाणु कार्यक्रम-पाक परमाणु कार्यक्रम में भारत काफ़ी समय से चिन्तित है। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिन्तित होकर भारत ने भी मई, 1998 में पांच परमाणु परीक्षण किए जिसके मुकाबले में पाकिस्तान ने छ: परमाणु परीक्षण किए। बस सेवा के लिए भारत-पाक समझौता-17 फरवरी, 1999 को भारत और पाकिस्तान ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा प्रारम्भ करने के लिए एक समझौता किया।

20 जनवरी, 1999 को भारत-पाक सम्बन्धों में एक नया अध्याय उस समय खुला जब भारतीय प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं बस से लाहौर तक गए। ऐतिहासिक लाहौर घोषणा के अन्तर्गत भारत व पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादों को गम्भीरता से हल करने पर सहमत हुए और दोनों ने एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का विश्वास व्यक्त किया।

कारगिल मुद्दा–पाकिस्तान ने लाहौर घोषणा को रौंदते हुए भारत के कारगिल व द्रास क्षेत्र में व्यापक घुसपैठ करवाई। अनंत धैर्य के पश्चात् 26 मई, 1999 को भारत ने पाकिस्तान के इस विश्वासघात का करारा जवाब दिया। 12 अक्तूबर, 1999 को पाकिस्तान में सेना ने शासन पर अपना कब्जा कर लिया। लेकिन पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने भी भारत के साथ सम्बन्धों में मधुरता का कोई संकेत नहीं दिया। आगरा शिखर वार्ता-पाकिस्तान के शासक परवेज़ मुशर्रफ भारत के आमन्त्रण पर जुलाई, 2001 में भारत आए।

भारत में दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता हुई, जिसमें कश्मीर समस्या का समाधान, प्रायोजित आतंकवाद, एटमी लड़ाई खतरा, सियाचिन से सेना की वापसी, व्यापार की सम्भावनाएं, युद्धबन्दियों की रिहाई एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान मुख्य मुद्दे थे, परन्तु मुशर्रफ के अड़ियल रवैये के कारण यह वार्ता विफल रही।

भारतीय संसद पर हमला-13 दिसम्बर, 2001 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद् पर हमला किया जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत खराब हो गये तथा दोनों देशों ने सीमा पर फ़ौजें तैनात कर दीं, परन्तु विश्व समुदाय के हस्तक्षेप एवं पाकिस्तान द्वारा लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए मोहम्मद पर पाबन्दी लगाए जाने से दोनों देशों में तनाव कुछ कम हुआ।

प्रधानमन्त्री वाजपेयी की इस्लामाबाद यात्रा-जनवरी, 2004 में भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी चार दिन के लिए ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (सार्क) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद गए। अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री से मुलाकात की। इस शिखर सम्मेलन से दोनों देशों के बीच तनाव में कमी आई और दोनों ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति व्यक्त की।

मुम्बई पर आतंकवादी हमला-26 नवम्बर, 2008 को पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों ने मुम्बई के होटलों पर कब्जा करके कई व्यक्तियों को मार दिया। भारत ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करने की मांग की, जिसे पाकिस्तान ने नहीं माना, इससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री जुलाई 2009 में मिस्र में 15वें गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दौरान मिले तथा दोनों नेताओं ने परस्पर द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। इस बैठक के दौरान दोनों देशों ने विवादित मुद्दों को परस्पर बातचीत द्वारा हल करने की बात को दोहराया था।

25 फरवरी, 2010 को भारत एवं पाकिस्तान के विदेश सचिवों की नई दिल्ली में बातचीत हुई। इस बातचीत के दौरान भारत ने पाकिस्तान को वांछित आतंकवादियों को भारत को सौंपने को कहा। अप्रैल 2010 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री सार्क सम्मेलन के दौरान भूटान में मिले। इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। नवम्बर 2011 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मालद्वीप में 17वें सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान मिले। इस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सम्बन्धों पर बातचीत की।

दिसम्बर 2012 में पाकिस्तान के आन्तरिक मंत्री श्री रहमान मलिक भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने वीजा नियमों को और सरल बनाया। सितम्बर, 2013 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने द्विपक्षीय मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने सभी विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। मई 2014 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीप मुद्दों पर बातचीत की।

जुलाई 2015 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूस के शहर उफा में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने आतंकवाद एवं द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। 25 दिसम्बर, 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंच कर दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार लाने का प्रयास किया। नवम्बर 2018 में भारत-पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर को बनाने की घोषणा की। करतारपुर साहब सिक्खों का पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के 18 साल बिताए थे।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध न तो सामान्य थे और न ही सामान्य हैं। समय के साथ-साथ दोनों देशों में कटुता बढ़ती जा रही है। यह खेद का विषय है कि दोनों देशों में इस कड़वाहट को दोनों देशों के पढ़े-लिखे नागरिक भी दूर करने में असफल रहे। वास्तव में दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तब तक स्थापित नहीं हो सकते जब तक कि दोनों देशों के बीच अनेक विवादास्पद मुद्दों को हल नहीं किया जाता।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 9.
भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाने के मुख्य कारण बताएं।
उत्तर:
भारत में प्रारम्भिक वर्षों में परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के प्रति दृष्टिकोण आदर्शवादी एवं उदारवादी ही रहा। भारत ने शीत युद्ध के दौरान गुट निरपेक्ष आन्दोलन के विकास पर अधिक बल दिया तथा निशस्त्रीकरण का समर्थन करता रहा। परन्तु 1962 में चीन से युद्ध में हार, 1964 में चीन द्वारा परमाणु विस्फोट तथा 1965 एवं 1971 में पाकिस्तान के साथ दो युद्धों ने भारत की परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के निर्माण पर बहुत अधिक प्रभाव डाला।

1970 के दशक में भारतीय नेतृत्व ने पहली बार अनुभव किया कि भारत को भी परमाणु सम्पन्न राष्ट्र बनना है। 1970 के दशक से लेकर वर्तमान समय तक भारत ने परमाणु नीति एवं परमाणु हथियारों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण सफलताएं प्राप्त की हैं। भारत ने सर्वप्रथम 1974 में एक तथा 1998 में पांच परमाणु परीक्षण करके विश्व को दिखला दिया कि भारत भी एक परमाणु सम्पन्न राष्ट्र है। भारत द्वारा परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार को बनान एवं रखने के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

1. आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना (To Become Self Dependent Nation):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर एक आत्मनिर्भर राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं वे सभी आत्मनिर्भर राष्ट्र माने जाते हैं।

2. न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना (To Achieve the Position of Minimum Deterrent):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है। भारत ने सदैव यह कहा है कि भारत कभी भी पहले परमाणु हथियारों का प्रयोग नहीं करेगा। भारत के पास परमाणु हथियार होने पर कोई भी देश भारत पर हमला करने से पहले सोचेगा।

3. शक्तिशाली राष्ट्र बनना (To Become Strong Nation):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में एक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जितने देश भी परमाणु सम्पन्न हैं, वे सभी के सभी शक्तिशाली राष्ट्र माने जाते हैं। इसके साथ परमाणु हथियारों की धारणा से भारत में केन्द्रीय शक्ति और अधिक मज़बूत एवं शक्तिशाली होती है जोकि बहुत आवश्यक है, क्योंकि जब कभी भी भारत में केन्द्रीय सरकार कमज़ोर हुई है, भारत को नुकसान उठाना पड़ा है।

4. प्रतिष्ठा प्राप्त करना (To achieve Prestige):
भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर विश्व में प्रतिष्ठा प्राप्त करना चाहता है। क्योंकि विश्व के सभी परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों को आदर एवं सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।

5. भारत द्वारा लड़े गए युद्ध (War fought by India):
भारत ने समय-समय पर 1962, 1965, 1971 एवं 1999 में युद्धों का सामना किया। युद्धों में होने वाली अधिक हानि से बचने के लिए भारत परमाणु हथियार प्राप्त करना चाहता है।

6. दो पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार होना (Two Neighbours have a Nuclear Drum):
भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक हैं, क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और इन दोनों देशों के साथ भारत युद्ध भी लड़ चुका है। अतः भारत को अपनी सुरक्षा के लिए परमाणु हथियार बनाने का हक है।

7. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की विभेदपूर्ण नीति (Policy of Nuclear Nation):
परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि (N.P.T.) तथा 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण निषेध सन्धि (C.T.B.T.) को इस प्रकार लागू करना चाहा, कि उनके अतिरिक्त कोई अन्य देश परमाणु हथियार न बना सके। भारत ने इन दोनों सन्धियों को विभेदपूर्ण मानते हुए इन पर हस्ताक्षर नहीं किये तथा अपना परमाणु कार्यक्रम जारी रखा।

प्रश्न 10.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ बताइए। गुट-निरपेक्षता आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य तथा सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
गुट-निरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों तथा सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
गुट निरपेक्ष आन्दोलन का अर्थ-गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी शक्तिशाली राष्ट्र का पिछलग्गू न बनकर अपना स्वतन्त्र मार्ग अपनाना। गुटों से अलग रहने की नीति का तात्पर्य अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में ‘वटस्थता’ कदापि नहीं है। कई पाश्चात्य लेखकों ने गुट-निरपेक्षता के लिए तटस्थता अथवा तटस्थतावाद शब्द का प्रयोग किया है उनमें मौर्गेन्थो, पीस्टर लायन, हेमिल्टन, फिश आर्मस्ट्रांग तथा कर्नल लेवि आदि ने इस नीति के लिए तटस्थता शब्द का प्रयोग कर भ्रम पैदा कर दिया है। वास्तव में दोनों नीतियां शान्ति व युद्ध के समय संघर्ष में नहीं उलझतीं, परन्तु तटस्थता निष्क्रियता व उदासनीता की नीति है, जबकि गुट-निरपेक्षता सक्रियता की नीति है।

तटस्थ देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों या घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्णतया निष्पक्ष रहते हैं और वे किसी अन्तर्राष्ट्रीय घटना या विषय के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त नहीं करते हैं। गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के प्रति निष्पक्ष या उदासीन नहीं होते, अपितु वे इन विषयों में पूर्ण रुचि लेते हैं और प्रत्येक के गुणों को सम्मुख रखते हुए उसके सम्बन्ध में निर्णय करने हेतु स्वतन्त्र होते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी अभिनीत करते हैं। अत: गुट-निरपेक्षता की नीति का अभिप्राय निष्पक्षता या उदासीनता की नीति नहीं है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के उद्देश्य-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के मुख्य उद्देश्य इस प्रकार हैं

1. शान्ति-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्व में शान्ति व्यवस्था और न्याय की स्थापना के लिए प्रयासरत है।

2. सजनात्मकता-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन शीत युद्ध के दौरान उत्पन्न हुई विश्व को नष्ट करने की प्रवृत्ति को समाप्त करके विश्व को सृजनात्मक प्रवृत्ति की ओर मोड़ना चाहता है।

3. आर्थिक न्याय-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विश्व में विद्यमान आर्थिक विषमता को दूर करके सभी देशों और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक न्याय को उपलब्ध करवाने का समर्थक है।

4. निःशस्त्रीकरण-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सभी तरह के अस्त्रों-शस्त्रों को नष्ट करके विवादों का शान्तिपूर्ण ढंग से समाधान करना है ताकि आतंक व भय के माहौल से मुक्ति प्राप्त हो सके।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के सिद्धान्त-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के निम्नलिखित सिद्धान्त हैं

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का प्रमुख सिद्धान्त सैनिक सम्बन्धों का विरोध करना एवं उनसे दूर रहना है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्व को वैचारिक आधार पर बांटने का विरोध करना है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन मित्रता एवं समानता में विश्वास रखता है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन संयुक्त राष्ट्र जैसे विश्व संस्थाओं का समर्थन करता है।

प्रश्न 11.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का क्या अर्थ है ? भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के मुख्य कारण लिखें।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 10 देखें। भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कारण भारत के गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण हैं

1. आर्थिक पुनर्निर्माण–स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश का आर्थिक पुनर्निर्माण था। अतः भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था ताकि सभी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

2. स्वतन्त्र नीति-निर्धारण के लिए- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतन्त्र नीति का निर्धारण कर सके। भारत को स्वतन्त्रता हज़ारों देश प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। किसी एक गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढाने के लिए भारत की प्रतिष्ठा बढाने के लिए गट-निरपेक्षता की नीति का निर्माण किया गया। यदि भारत स्वतन्त्र विदेश नीति का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से अपना निर्णय देता तो दोनों गुट उसके विचारों का आदर करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी होगी और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

4. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता-भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 12.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
(1) भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जन्मदाता है।

(2) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 7वां शिखर सम्मेलन 1983 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में दिल्ली में हुआ।

(3) राजीव गांधी की अध्यक्षता में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग, उत्तर-दक्षिण वार्तालाप, नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र संघ की सक्रिय भूमिका आदि विषयों पर जोर दिया।

(4) भारत की पहल पर ‘अफ्रीका कोष’ कायम किया गया।

(5) भारत ने अफ्रीका कोष को, रु० 50 करोड़ की राशि दी।

(6) भारत को 1986 एवं 1989 में अफ्रीका कोष का अध्यक्ष चुना गया। ऋण, पूंजी-निवेश तथा अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जैसे कई आर्थिक प्रस्तावों का मूल प्रारूप भारत ने बनाया।

(7) 1989 के बेलग्रेड सम्मेलन में भारत ने पृथ्वी संरक्षण कोष कायम करने का सुझाव दिया और सदस्य राष्टों ने इसका भारी समर्थन किया।

(8) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दसवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, वातावरण सुरक्षा, आतंकवाद जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। भारत का यह रुख जकार्ता घोषणा में शामिल किया गया कि आतंकवाद प्रादेशिक अखण्डता एवं राष्ट्रों की सुरक्षा को एक भयानक चुनौती है।

(9) भारत ने ही गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का ध्यान विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण की तरफ खींचा।

(10) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के महत्त्व एवं सदस्य राष्ट्रों की इसमें निष्ठा बनाए रखने के लिए भारत ने द्विपक्षीय मामले सम्मेलन में न खींचने की बात कही जिसे सदस्य राष्ट्रों ने स्वीकार किया।

(11) 1997 में दिल्ली में गुट-निरपेक्ष देशों के विदेश मन्त्रियों का शिखर सम्मेलन हुआ।

(12) बारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, विश्व शान्ति एवं आतंकवाद से निपटने के लिए एक विश्वव्यापी सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव पेश किया, जिसका सदस्य राष्ट्रों ने समर्थन किया।

(13) तेरहवें शिखर सम्मेलन में सक्रिय भूमिका अभिनीत करते हुए भारत ने आतंकवाद एवं इसके समर्थकों की कड़ी आलोचना कर विश्व शान्ति पर बल दिया।

(14) भारत ने क्यूबा में हए 14वें एवं मिस्त्र में हए 15वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हए आतंकवाद को समाप्त करने का आह्वान किया।

(15) भारत ने ईरान में 16वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए सीरिया समस्या एवं ईरान परमाणु विवाद को बातचीत द्वारा हल करने पर जोर दिया।

(16) भारत ने वेनेजुएला (2016) में हए 17वें एवं अजरबैजान में (2019) हए 18वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए विकास के लिए वैश्विक शांति स्थापित करने एवं आतंकवाद को समाप्त करने पर जोर दिया।

प्रश्न 13.
‘गुट-निरपेक्षता’ का क्या अर्थ है ? भारतीय गुट-निरपेक्षता की विशेषताएं बताइये ।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 10 देखें।

1. भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है- भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है क्योंकि भारत ने स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय राज्य नीति से दूर नहीं रखा है, अपितु भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका अभिनीत करता है।

2. सैन्य समझौतों का विरोध-भारत सैन्य समझौतों का विरोध करता है। अतः भारत सेन्टो (CENTO), नाटो (NATO), सीटो (SEATO), वारसा सन्धि (WARSA-PACT) आदि में सम्मिलित नहीं हुआ है।

3. शक्ति राजनीति से दूर रहना-भारत शक्ति राजनीति का विरोध करता है और प्रत्येक राष्ट्र के शक्तिशाली बनने के अधिकार को स्वीकार करता है।

4. शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति-भारत का पंचशील के सिद्धान्तों पर पूर्ण विश्वास है। शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति पंचशील के दो प्रमुख सिद्धान्त हैं। भारत शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का समर्थन करता है।

5. स्वतन्त्र विदेश नीति-भारत अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर कार्यान्वयन करता है। भारत अपनी विदेश नीति का निर्माण किसी भी अन्य देश के प्रभावाधीन नहीं करता, अपितु स्वेच्छा से स्वतन्त्र रूप में करता है। भारत दोनों शक्ति गुटों में से किसी भी गुट का सदस्य नहीं है।

6. निर्गुट देशों के मध्य गुटबन्दी नहीं है-कुछ आलोचकों का मत है कि निर्गुटता की नीति गुट-निरपेक्ष देशों की गुटबन्दी है। किन्तु आलोचकों का यह विचार उचित नहीं है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ गुट-निरपेक्ष देशों का तृतीय गुट स्थापित करना नहीं है।

7. गुट-निरपेक्षता शान्ति की नीति है-भारत एक निर्गुट देश है। भारत की विदेश नीति का प्रमुख उद्देश्य विश्व शान्ति स्थापित करना है। भारत शीत युद्ध एवं सैन्य समझौतों का विरोध करता है क्योंकि वह इन्हें विश्व-शान्ति हेतु भयावह समझता है।

प्रश्न 14.
विदेश नीति से आप क्या समझते हैं ? भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
अथवा
भारत की विदेश नीति के लक्ष्यों एवं उद्देश्यों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
विदेश नीति का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। भारतीय विदेश नीति के लक्ष्य एवं उद्देश्य-भारतीय विदेश नीति के लक्ष्य एवं उद्देश्यों का वर्णन इस प्रकार है

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों, समझौतों तथा कानूनों के लिए सम्मान उत्पन्न करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाना।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का अर्थ बताइये। कोई एक परिभाषा भी दीजिए।
अथवा
विदेश नीति से आपका क्या अभिप्राय है? एक परिभाषा देकर स्पष्ट करें।
उत्तर:
विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का एक समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। विभिन्न राष्ट्र दूसरे राष्ट्रों के व्यवहार में क विदश सम्बन्ध परिवर्तन लाने के लिए और अन्तर्राष्ट्रीय वातावरण को अपने व्यवहार के अनुसार बनाने के लिए विदेश नीति का प्रयोग करता है।

डॉ० महेन्द्र कुमार के शब्दों में , “विदेश नीति कार्यों की सोची समझी क्रिया दिशा है जिससे राष्ट्रीय हित की विचारधारा के अनुसार विदेशी सम्बन्धों में उद्देश्य को प्राप्त किया जा सकता है।” रुथना स्वामी के शब्दों में, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहार का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति के किन्हीं चार मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन कीजिये।
अथवा
भारत की विदेश नीति के कोई चार मुख्य सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:
1. गुट-निरपेक्षता- भारत की विदेश नीति की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता गुट-निरपेक्षता है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी गुट में शामिल न होना और स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करना। भारत सरकार ने सदा ही गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया है।

2. विश्व शान्ति और सुरक्षा की नीति-भारत की विदेश नीति का आधारभूत सिद्धान्त विश्व शान्ति और सुरक्षा बनाए रखना है। भारत अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने के पक्ष में है। भारत ने सदैव विश्व शान्ति की स्थापना की और सुरक्षा की नीति अपनाई है।

3. साम्राज्यवादियों तथा उपनिवेशों का विरोध-भारत स्वयं ब्रिटिश साम्राज्य का शिकार रहा है जिसके कारण भारत ने सदैव साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध किया है। भारत साम्राज्यवाद को विश्व शान्ति का शत्रु मानता है क्योंकि साम्राज्यवाद युद्ध को जन्म देता है।

4. अन्य देशों के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्ध-भारतीय विदेश नीति की एक प्रमुख विशेषता यह है कि भारत विश्व के सभी देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध बनाने का प्रयास करता है।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति के कोई चार निर्धारक तत्व लिखिए।
उत्तर:
1. संवैधानिक आधार-भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए, बताया गया है। अनुच्छेद 51 के अनुसार भारत सरकार को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देना चाहिए तथा दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाने चाहिए।

2. राष्ट्रीय हित-विदेशी नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत ने गुट निरपेक्षता की नीति अपने हितों की रक्षा के लिए अपनाई है।

3. आर्थिक तत्व-भारत की विदेश नीति के निर्धारण में आर्थिक तत्व ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वतन्त्रता के समय भारत की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए भारत ने गट-निरपेक्षता की नीति अपनाई ताकि दोनों गुटों के देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

4. विचारधारा का प्रभाव-विदेश नीति का निर्माण करने में उस देश की विचारधारा का महत्त्वपूर्ण प्रभाव होता है।

प्रश्न 4.
भारत की परमाणु नीति की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत परमाणु शक्ति का प्रयोग विनाशकारी उद्देश्यों के लिए करने के विरुद्ध है। 1974 में भारत ने एक परमाणु धमाका किया था, परन्तु इसके साथ भारत ने यह घोषणा की थी कि भारत का परमाणु धमाका सैनिक लक्ष्यों के लिए नहीं, बल्कि शान्तिमयी उद्देश्यों के लिए है। भारत ने परमाणु अप्रसार सन्धि (Nuclear Non-Proliferation Treaty) के ऊपर हस्ताक्षर नहीं किए हैं क्योंकि भारत इस सन्धि को गैर-परमाणु शक्तियों के लिए पक्षपात वाली सन्धि मानता है।

यद्यपि भारत ने परमाणु बम न बनाने की घोषणा की थी, फिर भी अपने पड़ोसी देशों द्वारा एकत्र की जाने वाली परमाणु सामग्री से चिंतित होकर तथा अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भारत ने 11 मई तथा 13 मई, 1998 को पांच परमाणु विस्फोट किए। यह परमाणु विस्फोट भारत ने अपनी सुरक्षा की दृष्टि से किए हैं। इन विस्फोटों के बाद भारत ने और परमाणु विस्फोट न करने की घोषणा कर दी। इसके साथ ही साथ परमाणु अस्त्रों को पूर्णतः समाप्त करने के पक्ष में है। इसके लिए वह एक आम सहमति वाली सन्धि के निर्माण के पक्ष में है।

प्रश्न 5.
1962 के भारत-चीन युद्ध के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:
1. तिब्बत की समस्या-1962 की भारत-चीन युद्ध की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या थी। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर सुलझाना चाहता था।

2. मानचित्र से सम्बन्धित समस्या-भारत एवं चीन के मध्य 1962 में युद्ध का एक कारण दोनों देशों के बीच मानचित्र में रेखांकित भू-भाग था। चीन ने 1954 में प्रकाशित अपने मानचित्र में कुछ ऐसे भाग प्रदर्शित किये जो वास्तव में भारतीय भू-भाग में थे, अत: भारत ने इस पर चीन के साथ अपना विरोध दर्ज कराया।

3. सीमा विवाद- भारत चीन के बीच युद्ध का एक कारण सीमा विवाद भी था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तुचीन ने नहीं। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

प्रश्न 6.
भारत-चीन सीमा विवाद पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत और चीन एशिया के दो बड़े और पड़ोसी देश हैं। दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव रहा है। इसी विवाद के चलते 1962 में दोनों देशों के बीच एक युद्ध भी हो चुका है। दोनों देशों के बीच तिब्बत एक संवेदनशील विषय है। तिब्बत भारत की उत्तरी सीमा पर स्थित है। पहले यह एक स्वतन्त्र राज्य हुआ करता था। 18वीं शताब्दी में तिब्बत को चीन का एक भाग मान लिया गया। 1950 में चीन ने तिब्बत में व्यापक पैमाने पर घुसपैठ की जिसका भारत ने विरोध किया। 1959 में तिब्बत की राजधानी में अचानक सैनिक गतिविधियां बढ़ गयीं।

तिब्बत के वैधानिक शासक दलाई लामा को बाहर निकाल दिया गया। चीन भारत की तिब्बत के प्रति इस सहानुभूति को पसन्द नहीं करता और भारत के दलाई लामा की शरण को शत्रु जैसी कार्यवाही मानता है। सितम्बर, 1959 में चीनी सरकार ने भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के 1,28,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में औपचारिक रूप से अपना दावा प्रस्तुत किया। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और इसकी 6400 वर्ग किलोमीटर सीमा पर कब्जा कर लिया। आज भी भारत की लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर सीमा चीन के कब्जे में है। चीन इस पर अपना दावा करता है जबकि यह भारत की सीमा है। आज भी दोनों देशों में सीमा विवाद बना हुआ है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 7.
1962 में भारत-चीन के मध्य हुए युद्ध का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत-चीन के मध्य 1962 में हुए युद्ध की परिस्थितियां बहुत पहले बननी शुरू हो गई थीं। अन्तत: चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत की उत्तरी सीमा पर आक्रमण कर दिया। इस अचानक हमले के कारण भारतीय फ़ौजें जब तक सम्भलीं, तब तक चीन ने सैनिक चौंकियों पर कब्जा कर लिया। ब्रिटेन और अमेरिका ने भारत के कहने पर तेजी से सैन्य सामग्री भेजी। चीन ने अचानक 21 नवम्बर, 1962 के एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा कर दी तथा दो सूत्रीय योजना की घोषणा की।

प्रथम, चीनी सेनाएं, 7 नवम्बर, 1959 की वास्तविक नियन्त्रण रेखा से 20 किलोमीटर अपनी ओर हट जायेंगी। द्वितीय, चीनी सेना के हटने से खाली क्षेत्र पर चीन सरकार अपनी असैनिक चौंकियां स्थापित करेगी। विपरीत परिस्थितियों के कारण भारत ने चीन की एक पक्षीय युद्ध-विराम की घोषणा को मान लिया, परन्तु द्विपक्षीय योजना को नहीं माना और यह घोषणा की, कि जब तक चीन 8 सितम्बर, 1962 की स्थिति तक नहीं लौट जाता तब तक कोई वार्ता नहीं होगी।

प्रश्न 8.
कोलम्बो प्रस्ताव के मुख्य प्रावधान लिखें।
उत्तर:
श्रीलंका, बर्मा (म्यांमार), कम्बोडिया, इण्डोनेशिया, मिस्र और घाना ने दिसम्बर, 1962 में भारत-चीन वार्ता लम्बो सम्मेलन आयोजित किया। श्रीमती भण्डारनायके स्वयं प्रस्ताव लेकर दिल्ली और पीकिंग गई। इसके बाद 19 जनवरी, 1963 को यह प्रस्ताव प्रकाशित किये गए, जिनकी मुख्य बातें निम्नलिखित थीं

  • युद्ध-विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण दल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में सैनिक चौंकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा ले।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • विवाद को अन्तिम हल होने तक चीन द्वारा खाली किया गया क्षेत्र असैनिक क्षेत्र हो, जिसकी निगरानी दोनों पक्षों द्वारा नियुक्त गैर सैनिक चौंकियां करें।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शान्तिपूर्ण ढंग से किया जाए।

प्रश्न 9. 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:
1. जूनागढ़ एवं हैदराबाद का भारत में मिलाया जाना-जूनागढ एवं हैदराबाद की रियासतें भारत में मिला लिये जाने से पाकिस्तान को गहरा धक्का लगा तथा वह भारत को सदैव नीचा दिखाने की कार्यवाहियां करने लगा।

2. ऋण अदा करने का प्रश्न-स्वतन्त्र भारत ने पुरानी सरकार के कर्जे का भार सम्भाला। इसके अनुसार इसे 5 वर्ष में पाकिस्तान से 300 करोड़ रुपये लेने थे, लेकिन पाकिस्तान ने कर्जे को चुकाने का नाम तक नहीं लिया।

3. विस्थापित सम्पत्ति तथा अल्प संख्यकों की रक्षा का प्रश्न-1947 से 1957 तक लगभग 90 लाख मुसलमान भारत से पाकिस्तान गये तथा इतने ही गैर मुस्लिम पाकिस्तान से भारत आए। पाकिस्तान ने इन विस्थापितों की सम्पत्ति तथा अल्पसंख्यकों की रक्षा से सम्बन्धित सभी सुझावों को नकार दिया।

4. कश्मीर समस्या-1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध का सबसे बड़ा कारण कश्मीर समस्या थी। अक्तूबर, 1947 में कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर रियासत को भारत में मिलाने की घोषणा कर दी थी, परन्तु पाकिस्तान ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया।

प्रश्न 10.
ताशकंद समझौते के मुख्य प्रावधान लिखें।
उत्तर:
ताशकंद समझौता 1966 में सोवियत संघ में भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ। इस समझौते के मुख्य प्रावधान इस प्रकार हैं

  • दोनों पक्षों का यह प्रयास रहेगा, कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बनें।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे, कि दोनों देशों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जायें, जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पहले थीं।।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक विषयों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के विरुद्ध प्रचार नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों के उच्चायुक्त एक-दूसरे के देश में वापिस आयेंगे।

प्रश्न 11.
पंचशील पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
पंचशील के सिद्धान्त भारत और चीन के प्रधानमंत्री, पण्डित जवाहर लाल व चाऊ-एन-लाई ने बनाए। पंचशील का साधारण अर्थ पांच सिद्धान्त हैं। अप्रैल, 1954 में भारत तथा चीन के मध्य एक व्यापारिक समझौता हुआ था। इस व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धान्त दिए गए जिनको सामूहिक रूप से पंचशील कहा जाता है। इन पांच सिद्धान्तों को भारत तथा चीन ने परस्पर सम्बन्धों को नियमित करने के विषय में स्वीकार किया था। ये सिद्धान्त हैं-

  • परस्पर क्षेत्रीय अखण्डता तथा प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
  • परस्पर आक्रमण न करना।
  • परस्पर आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप न करना।
  • समानता तथा परस्पर लाभ।
  • शान्तिमय सह-अस्तित्व।

प्रश्न 12.
भारत द्वारा परमाणु नीति एवं कार्यक्रम अपनाने के कोई चार कारण लिखें।
उत्तर:
1. आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना-भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर एक आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना चाहता है। विश्व में जिन देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं वे सभी आत्म-निर्भर राष्ट्र हैं।

2. न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना-भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है।

3. दो पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार होना-भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं।

4. परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों की विभेदपूर्ण नीति- परमाणु सम्पन्न राष्ट्रों ने 1968 में परमाणु अप्रसार सन्धि (NPT) तथा 1996 में व्यापक परमाणु परीक्षण सन्धि (C.T.B.T.) के विभेदपूर्ण ढंग से लागू किया, जिसके कारण भारत ने इस पर हस्ताक्षर नहीं किए।

प्रश्न 13.
भारतीय परमाणु नीति के कोई दो पक्ष बताएं।
उत्तर:
भारतीय परमाणु नीति के दो पक्ष निम्नलिखित हैं

1. आत्म रक्षा-भारतीय परमाणु नीति का प्रथम पक्ष आत्म रक्षा है। भारत ने आत्म रक्षा के लिए परमाणु हथियारों का निर्माण किया है, ताकि कोई अन्य देश भारत पर परमाणु हमला न कर सके।

2. प्रथम प्रयोग की मनाही-भारत की परमाणु नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि भारत ने परमाणु हथियारों का युद्ध में पहले प्रयोग न करने की घोषणा कर रखी है।

प्रश्न 14.
भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने वाले किन्हीं चार बाहरी कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन-भारतीय विदेश नीति अन्तर्राष्ट्रीय जैसे यू० एन० ओ०, आई० एम० एफ० तथा वर्ल्ड बैंक प्रभावित करते हैं।
  • अन्तर्राष्ट्रीय जनमत- भारतीय विदेश नीति को अन्तर्राष्ट्रीय जनमत प्रभावित करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय कानून-भारतीय विदेश नीति को अन्तर्राष्ट्रीय कानून प्रभावित करते हैं।
  • विश्व समस्याएं-भारतीय विदेश नीति को मानवीय अधिकारों तथा आतंकवाद की समस्याएं भी प्रभावित करती हैं।

प्रश्न 15.
‘गुट-निरपेक्ष आन्दोलन’ के कोई चार उद्देश्य बताइये।
अथवा
गुट निरपेक्षता के कोई चार उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों को शक्ति गुटों से अलग रखना था।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाना था।
  • सदस्य देशों में सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद को समाप्त करना इसका एक मुख्य उद्देश्य रखा गया।

प्रश्न 16.
भारतीय गुट-निरपेक्षता की कोई चार विशेषताएँ बताइये ।
अथवा
भारत की गुट निरपेक्षता की नीति के मुख्य तत्त्व लिखिए।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आंदोलन की नीति किसी गुट में शामिल होने के विरुद्ध है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने पर बल देती है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति साम्राज्यवाद के विरुद्ध है।
  • गुट-निरपेक्षता की नीति रंग भेदभाव की नीति के विरुद्ध है।

प्रश्न 17.
भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाने के कोई चार कारण लिखिए।
अथवा
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है? भारत द्वारा इस नीति को अपनाने के कोई तीन कारण लिखिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ- इसके लिए अति लघु उत्तरीय प्रश्नों में प्रश्न नं0 4 देखें। भारत द्वारा गुट निरपेक्ष नीति अपनाने के कारण

1. आर्थिक पुनर्निर्माण-स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश का आर्थिक पुनर्निर्माण था। अत: भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था ताकि सभी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

2. स्वतन्त्र नीति-निर्धारण के लिए भारत ने गुट-निपरेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतन्त्र नीति का निर्धारण कर सके। भारत को स्वतन्त्रता हज़ारों देश प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। किसी एक गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति का निर्माण किया गया। यदि भारत स्वतन्त्र विदेश नीति का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से अपना निर्णय देता तो दोनों गुट उसके विचारों का आदर करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी होगी और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

4. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विदेश नीति का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है। विदेश नीति उन सिद्धान्तों और साधनों का समूह है जो राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों को परिभाषित करने, अपने उद्देश्यों को सही बताने और उनको प्राप्त करने के लिए अपनाते हैं। रुथना स्वामी के अनुसार, “विदेश नीति ऐसे सिद्धान्तों और व्यवहारों का समूह है जिनके द्वारा राज्य के अन्य राज्यों के साथ सम्बन्धों को नियमित किया जाता है।”

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति की कोई दो मुख्य विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:

  • भारतीय विदेश नीति का मुख्य आधारभूत सिद्धान्त गुट-निरपेक्षता है।
  • भारतीय विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त राष्ट्रहित की रक्षा करना है।

प्रश्न 3.
भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने वाले दो तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
1. संवैधानिक आधार-भारत के संविधान में राज्यनीति के निर्देशक सिद्धान्तों में केवल राज्य की आन्तरिक नीति से सम्बन्धित ही निर्देश नहीं दिए गए बल्कि भारत को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में किस प्रकार की नीति अपनानी चाहिए इस विषय में भी निर्देश दिए गए हैं। अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बढ़ावा देने, दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध रखने तथा अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाने सम्बन्धी निर्देश दिए गए हैं।

2. राष्ट्र हित-विदेश नीति के निर्माण में राष्ट्रीय हित ने सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने अपने राष्ट्र हितों को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रमण्डल का सदस्य रहना स्वीकार किया। भारत ने राष्ट्र हितों को सामने रखते हुए ही ऐसे कार्य किए हैं जिन्हें उचित कहना कठिन है।

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ स्पस्ट करें।
उत्तर:
भारत एक गुट-निरपेक्ष देश है। भारत की विदेश नीति का मुख्य आधार गुट-निरपेक्षता है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है-अपनी स्वतन्त्र नीति। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है कि किसी गुट में शामिल न होकर स्वतन्त्र रहना। गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण देश प्रत्येक समस्या पर उसके गुण-दोष पर विचार कर अपनी राय कायम करता है। गुट-निरपेक्षता की नीति शान्तिवाद की नीति है।

भूतपूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के अनुसार, “गुट-निरपेक्षता में न तो तटस्थता है और न ही समस्याओं के प्रति उदासीनता। उसमें सिद्धान्तों के आधार पर सक्रिय और स्वतन्त्र रूप से निर्णय करने की भावना निहित है। अपनी इसी आन्तरिक शक्ति के सहारे वह सभी देशों के बीच विश्वास तथा सहयोग को अधिक-से-अधिक बढ़ाने पर बल दे रहा है, ताकि विश्व को युद्ध और आर्थिक विनाश से बचाया जा सके।”

प्रश्न 5.
पंचशील क्या है ?
उत्तर:
पंचशील के सिद्धान्त भारत और चीन के प्रधानमन्त्री, पण्डित जवाहर लाल व चाऊ-एन-लाई ने बनाए। पंचशील का साधारण अर्थ पांच सिद्धान्त हैं। अप्रैल, 1954 में भारत तथा चीन के मध्य एक व्यापारिक समझौता हुआ था। इस व्यापारिक समझौते की प्रस्तावना में पांच सिद्धान्त दिए गए जिनको सामूहिक रूप से पंचशील कहा जाता है। इन पांच सिद्धान्तों को भारत तथा चीन ने परस्पर सम्बन्धों को नियमित करने के विषय में स्वीकार किया था। ये सिद्धान्त हैं-

  • परस्पर क्षेत्रीय अखण्डता तथा प्रभुसत्ता का सम्मान करना।
  • परस्पर आक्रमण न करना
  • परस्पर आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप न करना
  • समानता तथा परस्पर लाभ
  • शान्तिमय सह-अस्तित्व।

प्रश्न 6.
भारत-चीन में हुए 1962 के युद्ध के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
1. तिब्बत की समस्या-1962 के भारत-चीन युद्ध की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या थी। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर सुलझाना चाहता था।

2. सीमा विवाद- भारत-चीन के बीच युद्ध का एक कारण सीमा विवाद भी था। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं किया। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

प्रश्न 7.
कोलम्बो प्रस्ताव के कोई चार प्रावधान लिखें।
उत्तर:

  • युद्ध विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है।
  • चीन पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटा लें।
  • भारत अपनी वर्तमान स्थिति कायम रखे।
  • मध्यवर्ती क्षेत्र का हल शांतिपूर्ण ढंग से किया जाए।

प्रश्न 8.
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ कब और कौन-सा समझौता किया था?
उत्तर:
श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने पाकिस्तान के साथ सन् 1966 में ताशकन्द समझौता किया था।

प्रश्न 9.
ताशकंद समझौते के कोई दो प्रावधान लिखें।
उत्तर:

  • दोनों पक्षों (भारत-पाकिस्तान) का यह प्रयास रहेगा कि संयुक्त राष्ट्र के घोषणा-पत्र के अनुसार दोनों में मधुर सम्बन्ध बनें।
  • दोनों पक्ष इस बात पर सहमत थे कि दोनों देशों की सेनाएं 5 फरवरी, 1966 से पहले उस स्थान पर पहुंच जाएं जहां से 5 अगस्त, 1965 से पहले थीं।

प्रश्न 10.
‘शिमला समझौता’ कब और किसके मध्य सम्पन्न हुआ ?
उत्तर:
1972 को भारत की प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी और पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ, जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसकी मुख्य बातें निम्नलिखित हैं

  • दोनों देश आपसी मतभेदों का शान्तिपूर्ण ढंग से हल करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे की सीमा पर आक्रमण नहीं करेंगे।

प्रश्न 11.
भारत और चीन के मध्य दो मुख्य विवाद कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:

  • भारत और चीन में महत्त्वपूर्ण विवाद सीमा का विवाद है। चीन ने भारत की भूमि पर कब्ज़ा कर रखा है।
  • चीन का तिब्बत पर कब्जा और भारत का दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना।

प्रश्न 12.
भारत-पाकिस्तान के बीच सम्बन्धों में तनाव के मुख्य कारणों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान में कभी भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रहे। इन दोनों में तनाव के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं
(1) भारत-पाक सम्बन्धों में तनाव का महत्त्वपूर्ण कारण कश्मीर का मामला है। पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाया है जिसे भारत नापसन्द करता है।

(2) भारत और पाकिस्तान में तनावपूर्ण सम्बन्धों का एक कारण यह है कि पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से कश्मीर के आतंकवादियों की सभी तरह की सहायता कर रहा है।

प्रश्न 13.
भारत द्वारा परमाणु शस्त्र बनाने के दो मुख्य कारण क्या हैं ?
उत्तर:

  • भारत परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाकर दूसरे देशों के आक्रमण से बचने के लिए न्यूनतम अवरोध की स्थिति प्राप्त करना चाहता है।
  • भारत के लिए परमाणु नीति एवं परमाणु हथियार बनाने इसलिए भी आवश्यक हैं क्योंकि भारत के दो पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के पास परमाणु हथियार हैं और इन दोनों देशों से भारत युद्ध भी लड़ चुका है।

प्रश्न 14.
भारत की परमाणु नीति के विकास के दो पड़ाव लिखें।
उत्तर:

  • भारत ने 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की।
  • भारत ने 1974 एवं 1998 में परमाणु परीक्षण किए। इन परीक्षणों द्वारा भारत ने परमाणु कार्यक्रम को आगे जारी रखने के लिए आवश्यक तथ्य एवं आंकड़े प्राप्त किए।

प्रश्न 15.
पोखरण में भारत ने परमाणु परीक्षण कब किए ?
उत्तर:
भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण सन् 1974 एवं सन् 1998 में किये।

प्रश्न 16.
नेहरू की विदेश नीति के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • दूसरे देशों से मित्रतापूर्ण सम्बन्ध स्थापित करना।
  • गुटों की राजनीति से अलग रहना।

प्रश्न 17.
विदेशी नीति से सम्बन्धित किन्हीं दो नीति निर्देशक सिद्धान्तों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा को बढ़ावा देना।
  • दूसरे राज्यों के साथ न्यायपूर्ण सम्बन्ध बनाए रखना।

प्रश्न 18.
तिब्बत का पठार भारत और चीन में तनाव का एक बड़ा मसला कैसे बना ?
उत्तर:
भारत और चीन के बीच तनाव का एक कारण तिब्बत की समस्या है। 29 अप्रैल, 1954 को भारत ने कुछ शर्तों के साथ तिब्बत पर चीन के आधिपत्य को स्वीकार किया। दोनों देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों में विश्वास व्यक्त किया। मार्च, 1957 में दलाईलामा ने चीनियों के दमन से भयभीत होकर भारत में राजनीतिक शरण ले ली, जिसका चीन ने विरोध किया, तभी से तिब्बत भारत एवं चीन के बीच एक बड़ा मसला बना हुआ है।

प्रश्न 19.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के ऐसे दो उदाहरण दीजिए जिनमें भारत ने स्वतन्त्र रवैया अपनाया है ?
उत्तर:

  • निःशस्त्रीकरण-भारत ने नि:शस्त्रीकरण के मुद्दे पर स्वतन्त्र रवैया अपनाया है तथा किसी के दबाव में नहीं आया।
  • आतंकवाद-भारत ने आतंकवाद जैसे अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दे पर स्वतन्त्र रवैया अपनाया है।

प्रश्न 20.
अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं के ऐसे कोई दो उदाहरण दीजिए, जिनमें भारत ने स्वतन्त्र रवैया अपनाया ?
उत्तर:
1. स्वेज नहर की समस्या-26 जुलाई, 1956 को मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर ब्रिटेन, फ्रांस एवं इज़रायल ने मिस्र पर आक्रमण कर दिया, भारत ने इस आक्रमण की निन्दा करते हुए कहा कि विवाद को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाया जाए।

2. सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप-भारत ने 1979 में सोवियत संघ द्वारा अफगानिस्तान में किए गए सैनिक हस्तक्षेप की निन्दा की।

प्रश्न 21.
मैक्मोहन रेखा से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मैक्मोहन रेखा उत्तर-पूर्व में भारत-चीन सीमा का विभाजन करती है। सन् 1914 में शिमला में हुए ब्रिटिश भारत, चीन और तिब्बत के प्रतिनिधियों के एक सम्मेलन में यह सीमा रेखा निर्धारित करके औपचारिक रूप से सीमा विभाजन किया गया था। इस सीमा रेखा का नाम तत्कालीन भारत मन्त्री आर्थर हेनरी मैक्मोहन के नाम से रखा गया था। भारत ने इस सीमा रेखा को सदैव वैध माना है। यह एक प्राकृतिक सीमा है। क्योंकि यह उत्तर में तिब्बत के पठार और दक्षिण में भारत की पर्वत श्रेणियों से निकलती है। चीन ने इस सीमा रेखा का कभी आदर नहीं किया।

प्रश्न 22.
भारत चीन सीमा विवाद क्या है ?
उत्तर:
भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर तनाव रहा है। सितम्बर, 1959 में चीनी सरकार ने भारत के लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश के 1,28,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में औपचारिक रूप से अपना दावा प्रस्तुत किया। 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण कर दिया और इसकी 6400 वर्ग किलोमीटर सीमा पर कब्जा कर लिया। आज भी भारत की लगभग 90,000 वर्ग किलोमीटर सीमा चीन के कब्जे में है। चीन इस पर अपना दावा करता है जबकि यह भारत की सीमा है। आज भी दोनों देशों में सीमा विवाद बना हुआ है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्न में से कौन-सा पं० नेहरू द्वारा अपनाई गई विदेश नीति का एक तत्त्व है
(A) गुट-निरपेक्षता
(B) साम्राज्यवाद तथा उपनिवेशवाद का विरोध
(C) पंचशील।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. निम्न में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति को निर्धारित करने वाला तत्त्व है-
(A) संवैधानिक आधार
(B) भौगोलिक तत्त्व
(C) राष्ट्रीय हित
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. भारत-चीन युद्ध कब हुआ ?
(A) 1962
(B) 1965
(C) 1971
(D) 1974
उत्तर:
(A) 1962

4. कोलम्बो प्रस्ताव का प्रावधान था
(A) युद्ध विराम का समय भारत-चीन विवाद के शान्तिपूर्ण हल के लिए उचित है
(B) चीन द्वारा पश्चिमी क्षेत्रों में अपनी सैनिक चौकियां 20 किलोमीटर पीछे हटाना
(C) भारत द्वारा अपनी वर्तमान स्थिति को कायम रखना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

5. मैक्मोहन रेखा का निर्धारण किया गया
(A) 1914 में
(B) 1920 में
(C) 1925 में
(D) 1935 में।
उत्तर:
(A) 1914 में।

6. निम्न में से किसने पंचशील के सिद्धान्तों का निर्धारण किया ?
(A) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(C) पं० नेहरू।

7. पंचशील के कितने सिद्धान्त हैं ?
(A) चार
(B) पाँच
(C) सात
(D) आठ।
उत्तर:
(B) पाँच।

8. 1965 में किन दो देशों के बीच युद्ध हुआ ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-चीन
(C) भारत-श्रीलंका
(D) पाकिस्तान-नेपाल।
उत्तर:
(A) भारत-पाकिस्तान।

9. ताशकन्द समझौता किन दो देशों के बीच हुआ ?
(A) भारत-चीन
(B) भारत-पाकिस्तान
(C) भारत-नेपाल
(D) भारत-श्रीलंका।
उत्तर:
(B) भारत-पाकिस्तान।

10. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में किस नए देश का जन्म हुआ ?
(A) नेपाल
(B) भूटान
(C) बंगलादेश
(D) मालद्वीप।
उत्तर:
(C) बंगलादेश।

11. शिमला समझौता किन दो देशों के बीच हुआ ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-चीन
(C) भारत-नेपाल
(D) भारत-श्रीलंका।
उत्तर:
(A) भारत-पाकिस्तान।

12. पं० नेहरू कब से कब तक भारत के प्रधानमन्त्री रहे ?
(A) 1947-1950
(B) 1947-1955
(C) 1947-1962
(D) 1947-1964
उत्तर:
(D) 1947-1964

13. किसके सुझाव पर कश्मीर का विभाजन किया गया था ?
(A) माउण्टबेटन
(B) एम० सी० नाटन
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(A) माउण्टबेटन।

14. भारत द्वारा परमाणु नीति अपनाने का कारण है
(A) आत्म-निर्भर राष्ट्र बनना
(B) शक्तिशाली राष्ट्र बनना
(C) पड़ोसी देशों के पास परमाणु हथियार
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 भारत के विदेश संबंध

15. भारत ने प्रथम परमाणु विस्फोट किस वर्ष किया ?
(A) 1974
(B) 1988
(C) 2000
(D) 2001
उत्तर:
(A) 1974

16. भारत ने द्वितीय परमाणु विस्फोट कब किया ?
(A) 1974
(B) 1985
(C) 1998
(D) 2000
उत्तर:
(C) 1998

17. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का आन्तरिक निर्धारक तत्त्व है ?
(A) संवैधानिक आधार
(B) भौगोलिक तत्त्व
(C) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

18. निम्नलिखित में से कौन-सा भारतीय विदेश नीति का बाहरी निर्धारक तत्त्व है ?
(A) राष्ट्रीय हित
(B) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन
(C) आर्थिक तत्त्व
(D) संवैधानिक आधार।
उत्तर:
(B) अन्तर्राष्ट्रीय संगठन।

19. निम्नलिखित में से कौन-सी भारतीय विदेश नीति की विशेषता है ?
(A) गुट-निरपेक्षता
(B) साम्राज्यवादियों का विरोध
(C) उपनिवेशवादियों का विरोध
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

20. पंचशील के सिद्धान्तों का प्रतिपादन कब किया गया ?
(A) 1954
(B) 1956
(C) 1958
(D) 1960
उत्तर:
(A) 1954

21. निम्नलिखित में से कौन-सा पंचशील का सिद्धान्त है ?
(A) राष्ट्रों को एक-दूसरे की प्रभुसत्ता का सम्मान करना चाहिए
(B) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर आक्रमण नहीं करेगा
(C) एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के आन्तरिक कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करेगा।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

22. भारत में अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार ने परमाणु परीक्षण किया
(A) सन् 1998 में
(B) सन् 1996 में
(C) सन् 1999 में
(D) सन् 1997 में।
उत्तर:
(D) सन् 1998 में।

23. भारत-पाक के मध्य शिमला समझौता कब हुआ?
(A) वर्ष 1962 में
(B) वर्ष 1972 में
(C) वर्ष 1974 में
(D) वर्ष 1976 में।
उत्तर:
(B) वर्ष 1972 में।

24. कारगिल संघर्ष के दौरान भारतीय सेना ने कौन-सा ऑपरेशन चलाया था?
(A) ऑपरेशन विजय
(B) ऑपरेशन सुरक्षा
(C) ऑपरेशन शान्ति
(D) इनमें कोई नहीं।
उत्तर:
(A) ऑपरेशन विजय।

25. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जनक किसको माना जाता है ?
(A) सुकर्णो को
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू को
(C) नेल्सन मंडेला को
(D) सभी को।
उत्तर:
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू को।

26. पाकिस्तान की स्थापना किस वर्ष में हुई ?
(A) 1947 में
(B) 1950 में
(C) 1945 में
(D) 1949 में।
उत्तर:
(A) 1947 में।

27. भारत की विदेश नीति का मुख्य निर्माता किसे माना जाता है ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू
(B) इंदिरा गांधी
(C) महात्मा गांधी
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू।

28. पहला गुट-निरपेक्ष सम्मेलन हुआ
(A) काहिरा में
(B) बेलग्रेड में
(C) कोलम्बो में
(D) नई दिल्ली में।
उत्तर:
(B) बेलग्रेड में।

29. ‘पंचशील समझौता’ किन देशों के मध्य हुआ ?
(A) भारत-श्रीलंका
(B) भारत-नेपाल
(C) भारत-पाकिस्तान
(D) भारत-तीन।
उत्तर:
(D) भारत-चीन।

30. निम्न में से एक भारत का पड़ोसी देश नहीं है ?
(A) चीन
(B) अमेरिका
(C) नेपाल
(D) पाकिस्तान।
उत्तर:
(B) अमेरिका।

31. भारत का पड़ोसी देश नहीं है
(A) पाकिस्तान
(B) नेपाल
(C) अमेरिका
(D) चीन।
उत्तर:
(C) अमेरिका।

32. भारत का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1947
(B) 1948
(C) 1949
(D) 1950
उत्तर:
(A) 1947

33. भारत के विभाजन से कौन-सा नया देश अस्तित्व में आया ?
(A) रूस
(B) जर्मनी
(C) पाकिस्तान
(D) जापान।
उत्तर:
(C) पाकिस्तान।

34. पाकिस्तान ने भारत पर पहली बार कब आक्रमण किया ?
(A) वर्ष 1965 में
(B) वर्ष 1971 में
(C) वर्ष 1984 में
(D) वर्ष 1950 में।
उत्तर:
(A) वर्ष 1965 में।

35. वर्ष 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच कौन-सा समझौता हुआ ?
(A) ताशकन्द समझौता
(B) पंचशील समझौता
(C) शिमला समझौता
(D) कारगिल समझौता।
उत्तर:
(C) शिमला समझौता।

36. प्रधानमन्त्री राजीव गांधी कब चीन की ऐतिहासिक यात्रा पर गए ?
(A) 1985
(B) 1986
(C) 1987
(D) 1988
उत्तर:
(D) 1988

37. बांडुंग में एफ्रो-एशियाई दोनों देशों का सम्मेलन कब हुआ ?
(A) सन् 1952 में
(B) सन् 1955 में
(C) सन् 1956 में
(D) सन् 1972 में।
उत्तर:
(B) सन् 1955 में।

38. क्या वर्तमान समय में नेपाल में लोकतन्त्र पाया जाता है ?
(A) हां
(B) नहीं
(C) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) हां।

39. गुट निरपेक्षता से तात्पर्य है
(A) तटस्थता
(B) तटस्थीकरण
(C) अलगाववाद
(D) किसी भी शक्ति गुट में शामिल न होना।
उत्तर:
(D) किसी भी शक्ति गुट में शामिल न होना।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) चीन ………… दल के शासन वाला देश है।
उत्तर:
साम्यवादी

(2) शिमला समझौता वर्ष ……….. में हुआ।
उत्तर:
1972

(3) 1962 में ……….. और …….. देशों के बीच युद्ध हुआ।
उत्तर:
चीन, भारत

(4) ………. भारत का पड़ोसी देश है।
उत्तर:
पाकिस्तान

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(5) आजकल गुट निरपेक्ष देशों की संख्या ………… है।
उत्तर:
120

(6) 1962 में ……………… ने भारत पर आक्रमण किया।
उत्तर:
चीन

(7) पंचशील समझौते पर ………….. और ……………. दो देशों ने हस्ताक्षर किए।
उत्तर:
भारत, चीन,

(8) भारत द्वारा अपना प्रथम परमाणु परीक्षण सन् ……………. में किया गया था।
उत्तर:
1974

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
विदेश नीति क्या होती है ?
उत्तर:
प्रत्येक देश दूसरे देश के साथ सम्बन्धों की स्थापना में एक विशेष प्रकार की नीति का प्रयोग करता है जिसे विदेश नीति कहा जाता है।

प्रश्न 2.
भारत की विदेश नीति का संवैधानिक आधार लिखें।
उत्तर:
अनुच्छेद 51 के अनुसार राज्य को अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को निपटाने के लिए मध्यस्थ का रास्ता अपनाने सम्बन्धी निर्देश दिए गए हैं।

प्रश्न 3.
भारत की विदेश नीति का कोई एक उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
क्षेत्रीय अखण्डता की रक्षा करना।

प्रश्न 4.
भारत की विदेश नीति का मख्य निर्माता किसे माना जाता है ?
उत्तर:
पं. जवाहर लाल नेहरू को भारत की विदेश नीति का निर्माता माना जाता है।

प्रश्न 5.
लाल बहादुर शास्त्री ने पाकिस्तान के साथ कौन-सा समझौता किया?
उत्तर:
ताशकन्द समझौता।

प्रश्न 6.
‘ताशकन्द समझौता’ किन देशों के मध्य हुआ ?
उत्तर:
भारत-पाकिस्तान के बीच।

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निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
नियोजन से आप क्या समझते हैं ? नियोजन के लक्षणों की व्याख्या करें।
उत्तर:
आधुनिक राज्य पुलिस राज्य न होकर कल्याणकारी राज्य है। आधुनिक राज्य अपने नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक आदि की उन्नति में व्याप्त है। राज्य अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए नियोजन पद्धति को प्रयोग में ला रहे हैं। आज नियोजन की आवश्यकता को व्यापक रूप से स्वीकार कर लिया गया है।

आर्थिक नियोजन की विधि को सबसे पहले रूस ने 1928 में लागू किया। इन योजनाओं के फलस्वरूप कुछ वर्षों में ही रूस संसार की महान् शक्तियों में गिना जाने लगा। आर्थिक नियोजन की सफलता को देखकर संसार के सभी देशों विशेषकर अल्पविकसित देशों ने योजनाओं के मार्ग को अपनाया है।

फिफ्नर और प्रिस्थस (Pfiffner and Presthus) ने ठीक ही कहा है, “सभी संगठनों को यदि वे अपने उद्देश्यों की सफलता प्राप्त करना चाहते हैं तो योजना का निर्माण करना All organisations must plan if they are to achieve their end.”) लीविस (Lewis) ने कहा है, “आज मुख्य बात यह नहीं कि नियोजन हो अथवा नहीं अपितु यह है कि नियोजन का रूप क्या होना चाहिए।

नियोजन का अर्थ एवं परिभाषाएं (Meaning and Definitions of Planning):
नियोजन निर्माण आम व्यक्ति तथा सामूहिक प्रयत्न का एक स्वाभाविक अंग है। फिफ्नर और प्रिस्थस के अनुसार, “नियोजन एक ऐसी विवेकपूर्ण प्रक्रिया है जो सारे मानव-व्यवहार में पाई जाती है।” साधारण शब्दों में नियोजन का अर्थ कम से कम व्यय द्वारा उपलब्ध साधनों का प्रयोग करते हुए पूर्व निश्चित लक्ष्य को प्राप्त करना है। उर्विक (Urwick) के अनुसार, “नियोजन एक बौद्धिक प्रक्रिया है, साधारण रूप से कार्य करने की एक पूर्व निश्चित मानसिक प्रक्रिया है । कार्य करने से पूर्व विचार तथा अनुमानों की अपेक्षा तथ्यों के प्रकाश में कार्य करना है, यह अनुमान लगाने वाली प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया है।”

डिमॉक (Dimock) के शब्दों में, “योजना परिवर्तन के स्थान पर तर्क सम्मत इच्छा का प्रयोग करना है। कार्य करने से पूर्व निर्णय लेना है न कि कार्य आरम्भ करने के बाद सुधारना।” सेक्लर हडसन (Secklar Hudson) के अनुसार, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिए आधार की खोज ही नियोजन है।” (The process of devising a basis for future course of action.) भारतीय विचारक डॉ० अमरेश के अनुसार, “संक्षेप में नियोजन उन भावी कार्यक्रमों के चयन एवं विकास की विधि है जिसके द्वारा एक घोषित लक्ष्य की सहज प्राप्ति होती है।”

जॉन डी० मिलट (John D. Millett) के शब्दों में, “प्रशासकीय प्रयत्न के उद्देश्यों को निश्चित करने तथा उनको प्राप्त करने के लिए उपयुक्त साधनों की व्यवस्था करना ही नियोजन है।” प्रो० के० टी० शाह (K.T. Shah) के अनुसार, “नियोजन एक लोकतन्त्रीय व्यवस्था में उपभोग, उत्पादन, अनुसन्धान, व्यापार तथा वित्त का तकनीकी समायोजन है। यह उन उद्देश्यों के अनुरूप होते हैं जिनका निर्धारण राष्ट्र की प्रतिनिधि संस्थाओं द्वारा होता है।”

डॉ० एम० पी० शर्मा (Dr. M.P. Sharma) के अनुसार, “नियोजन विस्तृत अर्थों में व्यवस्थित क्रिया का स्वरूप है। नियोजन में इस प्रकार समस्त मानवीय क्रियाएं आ जाती हैं भले ही वह व्यक्तिगत हों अथवा सामूहिक।” अमरेश महेश्वरी के अनुसार विभिन्न कार्यक्रमों तथा साधनों के संगठन, संघनन तथा विलीनीकरण की क्रिया को नियोजन कहते हैं। परिभाषाओं से स्पष्ट है कि पूर्व निर्धारित कार्यक्रम को उचित साधनों द्वारा प्राप्त करना ही नियोजन है। व्यापक रूप से नियोजन के अन्तर्गत निम्नलिखित चार क्रम शामिल हैं

  • लक्ष्य का निर्धारण।
  • लक्ष्य की प्राप्ति के लिए नीति का निर्धारण।
  • निश्चित नीति के अनुसार प्रक्रियाओं तथा साधनों का निर्धारण।
  • नियोजन के परिणामों का समुचित रूप से वर्गीकरण तथा विश्लेषण करना।

अच्छे नियोजन के लक्षण (Characteristics of a Good Plan):
एक अच्छी योजना में निम्नलिखित विशेषताएं पाई जाती हैं

1. स्पष्ट उद्देश्य-नियोजन के उद्देश्य की स्पष्ट तथा व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए। नियोजन के लक्ष्य का संक्षिप्त तथा निश्चित होना ज़रूरी है। यदि नियोजन के लक्ष्य स्पष्ट न हों तो अधिकारियों को सफलता नहीं मिलती।

2. साधनों की व्यवस्था- उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधनों तथा उपायों की व्यवस्था होनी चाहिए।

3. लचीलापन-नियोजन में आवश्यकतानुसार लचीलापन होना चाहिए। नियोजन भविष्य से सम्बन्धित होता है और भविष्य में परिस्थितियां बदल सकती हैं। बदलती हुई परिस्थितियों के अनुसार जिसमें आसानी से परिवर्तन लाया जा सके वही सही नियोजन है।

4. समन्वय-नियोजन के विभिन्न अंगों में सन्तुलन होना चाहिए। विभिन्न नियोजनों के बीच समन्वय स्थापित किया जाना ज़रूरी है। विभिन्न नियोजनों के अनुरूप ही मुख्य नियोजन का होना आवश्यक है।

5. व्यावहारिकता-नियोजन में व्यावहारिकता का होना अति आवश्यक है।

6. सिद्धान्त-नियोजन में कार्यों का स्पष्ट विश्लेषण तथा सफलता को मापने के लिए कुछ सिद्धान्तों का प्रतिपादन होना चाहिए।

7. स्पष्ट विषय-वस्तु-किसी भी नियोजन की विषय-वस्तु स्पष्ट होनी चाहिए।

8. पद-सोपान-नियोजन में उसके पद-सोपान का रहना ज़रूरी है।

9. निरन्तरता-नियोजन की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि उसमें निरन्तरता हो। निरन्तरता न होने पर नियोजन पर किया गया खर्च, समय और श्रम बेकार हो जाता है।

प्रश्न 2.
भारत में आर्थिक नियोजन के मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
आर्थिक नियोजन 20वीं शताब्दी की देन है। संसार की लगभग सभी अर्थव्यवस्थाओं ने दसरे महायद्ध के पश्चात् आर्थिक विकास तथा स्थिरता के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए आर्थिक नियोजन की विधि को अपनाया है। भारत ने भी स्वतन्त्रता के पश्चात् आर्थिक नियोजन को अपनाया है। भारत में आर्थिक नियोजन के मुख्य उद्देश्य अग्रलिखित हैं

1. राष्ट्रीय आय तथा प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि-भारत में आर्थिक नियोजन का प्रथम उद्देश्य देश के विभिन्न क्षेत्रों जैसे कृषि, उद्योग आदि का विकास करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है। जनसंख्या की वृद्धि की दर में कमी करके प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि करना भी आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य है।

2. आर्थिक असमानता में कमी-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना है। आर्थिक असमानता क्रान्ति एवं संघर्ष को जन्म देती है। अत: नियोजन का ये उद्देश्य होता है कि सभी वर्गों का विकास किया जाए।

3. क्षेत्रीय असमानताओं में कमी-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य देश में क्षेत्रीय असमानताओं में कमी करना होता है। इसके लिए देश के पिछड़े क्षेत्रों के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है।

4. पूर्ण रोज़गार-आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य रोजगार के अवसर बढ़ाना है ताकि प्रत्येक व्यक्ति को रोज़गार दिया जा सके।

5. उपलब्ध साधनों का पूर्ण उपयोग-आर्थिक नियोजन का एक मुख्य उद्देश्य देश के प्राकृतिक साधनों का पूर्ण उपयोग करना होता है। आर्थिक नियोजन द्वारा वन, जल, भूमि, खनिज पदार्थ आदि प्राकृतिक साधनों का उचित प्रयोग करके देश का आर्थिक विकास करने की कोशिश की जाती है।

6. आर्थिक विकास- भारत में आर्थिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य आर्थिक विकास की बाधाओं को दूर करके देश का आर्थिक विकास करना है।

7. जीवन स्तर में वृद्धि-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा करना है और इसके लिए उत्पादन के समस्त क्षेत्रों में वृद्धि की जाती है।

8. उद्योगों का विकास-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य मूल तथा भारी उद्योगों का विकास करना तथा इस प्रकार देश का तेजी से औद्योगिकीकरण करना है।

9. आत्म निर्भरता-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य देश को अधिक से अधिक आत्म-निर्भर बनाना है ताकि देश दूसरे देशों पर कम-से-कम निर्भर रहे।

10. सामाजिक उद्देश्य-आर्थिक नियोजन का उद्देश्य मनुष्य का सम्पूर्ण विकास करना होता है। अत: नियोजन का उद्देश्य सामाजिक कल्याण में वृद्धि करना भी है। आर्थिक नियोजन का एक मुख्य उद्देश्य समाज के निर्धन तथा शोषित वर्ग को सुरक्षा प्रदान करना है।

निष्कर्ष (Conclusion):
संक्षेप में भारत में आर्थिक नियोजन का मूल उद्देश्य लोकतन्त्रीय तथा कल्याणकारी कार्य विधियों द्वारा देश का तीव्र गति से आर्थिक विकास करना है। योजना आयोग के शब्दों में, “भारत में योजनाकरण का केन्द्रीय उद्देश्य लोगों के जीवन-स्तर को ऊंचा उठाना तथा उन्हें समृद्ध जीवन व्यतीत करने के लिए अधिकाधिक सुविधाओं की व्यवस्था करना है।”

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 3.
योजना आयोग की रचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
योजना आयोग के प्रमुख कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
रचना (Composition):
योजना आयोग की रचना समय-समय पर बदलती रहती थी। आरम्भ में इसके कुल छः सदस्य थे और इनमें योजना आयोग के अध्यक्ष प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे। प्रधानमन्त्री योजना आयोग का अध्यक्ष होता था और इसके अतिरिक्त आयोग का उपाध्यक्ष भी होता था।

योजना आयोग के उपाध्यक्ष का कैबिनेट मन्त्री का स्तर होता था और सदस्यों का स्तर मन्त्री का होता था। योजना आयोग का एक स्थायी सचिव भी होता था जो मन्त्रिमण्डल का सचिव भी होता था। पूर्णकालिक सदस्यों के अतिरिक्त वित्त मन्त्री, गृहमन्त्री आदि भी योजना आयोग के अल्पकाल के सदस्य होते थे। योजना आयोग मुख्य रूप से तीन विभागों द्वारा कार्य करते थे-

  • कार्यक्रम सलाहकार समिति,
  • सामान्य सचिवालय तथा
  • तकनीकी विभाग।

कार्य (Functions):
योजना आयोग जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री थे, भारत में एक शक्तिशाली तथा प्रभावशाली परामर्शदात्री अभिकरण के रूप में प्रकट हुए हैं। इसके कार्य इस प्रकार थे

(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों तो उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।

(2) देश के साधनों के अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

(3) नियोजन में स्वीकृति कार्यक्रम तथा परियोजनाओं के बारे में प्राथमिकताएं निश्चित करना।

(4) योजना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को इंगित करना तथा राष्ट्र की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना के लिए स्वस्थ वातावरण उत्पन्न करना।

(5) योजना के लिए विभिन्न यन्त्रों का जुटाना जो उसकी विभिन्न सेवाओं पर काम आ सके।

(6) समय-समय पर योजना की प्रगति का मूल्यांकन करना और नीति तथा उपायों में आवश्यकतालमेल करना।

(7) वर्तमान आर्थिक व्यवस्था, प्रचलित नीतियों, उपायों तथा विकास-कार्यक्रमों के विचार-विमर्श के लिए इसके कर्त्तव्य के पालन को आसान बनाने के लिए आवश्यक सिफ़ारिशें करना अथवा केन्द्रीय या राज्य सरकारों द्वारा सुझावों हेतु भेजी जांच की सिफारिश करना।

(8) राष्ट्र के विकास में लोगों का सहयोग प्राप्त करना।

(9) देश के औद्योगिक विकास के लिए नियोजन करना।

(10) केन्द्र और राज्य सरकारों की विकास योजनाओं का निर्माण करना। (नोट-एक जनवरी 2015 को केन्द्र सरकार ने योजना आयोग को समाप्त करके इसके स्थान पर ‘नीति आयोग’ की स्थापना की थी।)

प्रश्न 4.
नीति आयोग पर एक संक्षिप्त लिखें।
उत्तर:
भारत में स्थापित योजना आयोग की प्रासंगिकता 1990 के दशक में कम होने लगी। लाइसैंस राज समाप्त होने के बाद यह बिना किसी प्रभावी अधिकार के सलाहकार संस्था के तौर पर काम करता रहा। योजना आयोग की रचना, कार्यप्रणाली तथा इसकी प्रासंगिकता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे थे। योजना आयोग के अनुसार 28 रु० की आय वाला व्यक्ति ग़रीबी रेखा से ऊपर है, जबकि आयोग ने अपने दो शौचालयों पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिये थे।

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का कहना था, कि “हम दिल्ली सिर्फ इसलिए आते हैं, ताकि आयोग हमें बता सके कि हम अपना धन कैसे खर्च करें।” पूर्व केन्द्रीय मन्त्री कमल नाथ योजना आयोग को ‘आमचेयर एडवाइजर तथा नौकरशाहों का पार्किंग लॉट’ कहकर व्यंग्य कर चुके हैं। स्वतन्त्र मूल्यांकन कार्यालय (आई०ई०ओ०) ने आयोग को आई०ए०एस० अधिकारियों का अड्डा बताया है।

यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने योजना आयोग को ‘जोकरों का समूह’ कहा था। इन सभी कारणों से योजना आयोग जैसी पुरानी संस्था को समाप्त करके एक नई संस्था बनाने का विचार काफी समय से उठ रहा था। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने 1998 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में कहा था, कि “विकास की बदलती आवश्यकताओं के लिए योजना आयोग का फिर गठन होगा।”

भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमन्त्री थे, तब वे कई बार योजना आयोग की अप्रासंगिकता की बात उठा कर एक नयी संस्था की वकालत कर चुके थे। इसलिए जब वे मई, 2014, में देश के प्रधानमंत्री बने, तभी से उन्होंने योजना आयोग के स्थान पर एक नई संस्था या आयोग को बनाने पर जोर दिया।

7 दिसम्बर, 2014 को नई दिल्ली में मुख्यमन्त्रियों की बैठक में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने योजना आयोग के स्थान पर नई व्यवस्था बनाने को समय की ज़रूरत बताया तथा उन्होंने कहा, कि अब योजना की प्रक्रिया ‘ऊपर से नीचे’ की बजाय ‘नीचे से ऊपर’ करने की आवश्यकता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो न केवल सृजनात्मक रूप से चिंतन कर सके, बल्कि संघात्मक ढांचे को मजबूत बनाने के साथ ही राज्यों में नई ऊर्जा का संचार भी कर सके। इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखकर एक जनवरी, 2015 को योजना आयोग को समाप्त करके नीति आयोग (NITI AAYOG-NATIONAL INSTITUTION FOR TRANSFORMING INDIA) क स्थापना की गई।

नीति आयोग की रचना (Composition of NITI Aayog)-नीति आयोग की रचना निम्नलिखित ढंग से की गई है

  • अध्यक्ष-प्रधानमन्त्री
  • उपाध्यक्ष-इसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री करेंगे।
  • सी०ई०ओ०-सी०ई०ओ० केन्द्र के सचिव स्तर का अधिकारी होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री निश्चित कार्यकाल के लिए करेंगे।
  • गवर्निंग काऊंसिल-इसमें सभी मुख्यमंत्री तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
  • पूर्णकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम पांच सदस्य होंगे।
  • अंशकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम दो पदेन सदस्य होंगे।
  • पदेन सदस्य- इसमें अधिकतम चार केन्द्रीय मन्त्री होंगे।
  • विशेष आमंत्रित सदस्य-इसमें विशेषज्ञ होंगे, जिन्हें प्रधानमन्त्री मनोनीत करेंगे।

5 जनवरी, 2015 को प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अरविन्द पनगड़िया को नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया, जिन्होंने 14 जनवरी, 2015 को अपना कार्यभार संभाल लिया। प्रधानमंत्री ने 11 जनवरी, 2015 को सिन्धुश्री खुल्लर को आयोग का पहला सी०ई०ओ०, (C.E.O. Chief Executive Officer) मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया। 31 दिसम्बर, 2015 को सिन्धुश्री खुल्लर की सेवानिवृत्ति के पश्चात् श्री अमिताभ कांत को नीति आयोग का सी० ई० ओ० नियुक्त किया गया। 5 अगस्त, 2017 को श्री राजीव कुमार को श्री अरविन्द पनगड़िया के स्थान पर नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया।

विभाग (Department):
नीति आयोग में कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए तीन विभागों की भी व्यवस्था की गई है

  • पहला अन्तर्राज्जीय परिषद् की तरह कार्य करेगा।
  • दूसरा विभाग लम्बे समय की योजना बनाने तथा उसकी निगरानी करने का काम करेगा।
  • तीसरा विभाग डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर तथा यू०आई०डी०ए०आई० (UIDAI) को मिलाकर बनाया जायेगा।

उद्देश्य (Objectives):
नीति आयोग के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • सशक्त राज्य से सशक्त राष्ट्र-इस सूत्र से सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) को बढ़ाना।
  • रणनीतिक तथा दीर्घावधि के लिए नीति तथा कार्यक्रम का ढांचा बनाना।
  • ग्रामीण स्तर पर योजनाएं बनाने के तन्त्र को विकसित करना।
  • आर्थिक प्रगति से वंचित रहे वर्गों पर विशेष ध्यान देना।
  • राष्टीय सरक्षा के हितों व आर्थिक नीति में तालमेल बिठाना।

नीति आयोग का गठन भी योजना आयोग की तरह मन्त्रिमण्डल के प्रस्ताव से हआ है परन्त दोनों में महत्त्वपूर्ण अन्तर यह है, कि नीति आयोग की गतिविधियों में मुख्यमन्त्री एवं निजी क्षेत्र के विशेषज्ञों की महत्त्वपूर्ण भूमिका होगी। इस प्रकार प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा स्थापित नीति आयोग ‘टीम इण्डिया तथा सहकारी संघवाद’ के विचार को साकार करेगा, जबकि पं० नेहरू के समय के योजना आयोग की प्रकृति केन्द्रीयकृत थी, इसलिए योजना आयोग को सुपर केबिनेट भी कहा जाने लगा था।

नीति आयोग की अध्यक्षता प्रधानमन्त्री करेंगे। इसकी गवर्निंग काऊंसिल में सभी राज्यों के मुख्यमन्त्री तथा केन्द्र शासित प्रदेशों के उप-राज्यपाल सदस्य के रूप में शामिल होंगे। नीति आयोग प्रधानमन्त्री तथा सभी मुख्यमन्त्रियों के लिए विकास का राष्ट्रीय एजेण्डा तैयार करने के लिए एक ‘थिंक टैंक’ की तरह काम करेगा। नीति आयोग जन केन्द्रित, सक्रिय तथा सहभागी विकास एजेण्डा के सिद्धान्त पर आधारित है। इससे सहकारी संघवाद की भावना बढ़ेगी। नीति आयोग की मुख्य भूमिका या कार्य राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के अलग-अलग नीतिगत विषयों पर केन्द्र तथा राज्य सरकारों को जरूरी रणनीतिक व तकनीकी परामर्श देना है।

नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी, 2015 को हुई, जिसमें प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी, वित्त मन्त्री श्री अरुण जेटली तथा आयोग के उपाध्यक्ष श्री अरविंद पनगडिया शामिल थे। इनके अतिरिक्त बैठक में विजय केलकर, नितिन देसाई, अशोक गुलाटी, सुबीर गोकर्ण, बिमल जालान, पार्थसारथी सोम, जी०एन० वाजपेयी, राजीव कुमार, राजीव लाल, मुकेश बुरानी, आर० वैद्यनाथन तथा बालाकृष्णन जैसे अर्थशास्त्रियों ने भी भाग लिया। इस बैठक में अर्थव्यवस्था की विकास दर फिर तेज़ करने, रोज़गार के अवसर बढ़ाने तथा ढांचागत संरचना सहित महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने जैसे विषयों पर विचार-विमर्श हुआ।

नीति आयोग की दूसरी महत्त्वपूर्ण बैठक 8 फरवरी, 2015 को हुई, इसमें नीति आयोग के सभी सदस्यों ने भाग लिया। इस बैठक में प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने निम्नलिखित बातों पर बल दिया

(1) प्रधानमन्त्री ने आर्थिक सुधारों की धीमी गति, विकास की धीमी गति, मेक इन इण्डिया को मिलते कम समर्थन तथा मैन्यूफैक्चरिंग गतिविधियों में कमी को देखते हुए राज्यों से सक्रिय सहयोग की अपील की।

(2) प्रधानमन्त्री ने राज्यों को आपसी मतभेद भुलाकर विकास दर को तेज़ करने, निवेश बढ़ाने तथा रोजगार पैदा करने की अपील की।

(3) उन्होंने मुख्यमन्त्रियों से अपने-अपने राज्यों में एक नोडल अफसर नियुक्त करने की अपील की ताकि, राज्य लम्बित मुद्दों को हल तथा परियोजनाओं को जल्दी पूरा करने के लिए अवश्यक कदम उठा सकें।

(4) उन्होंने विकास के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा ग़रीबी को बताया तथा इसे दूर करने को सबसे बड़ी चुनौती बताया।

(5) उनके अनुसार नीति आयोग सहकारी और प्रतिस्पर्धी संघवाद का एक नया मॉडल बनायेगा।

(6) नीति आयोग की इस बैठक में प्रधानमन्त्री ने तीन उप-समितियां बनाने की घोषणा की, जोकि केन्द्र की 66 योजनाओं को ठीक से संगठित करने, कौशल विकास तथा स्वच्छ भारत योजना को निरन्तर चलाए रखने के लिए सुझाव देंगी।

(7) उन्होंने कहा, कि केन्द्र सभी के लिए एक ही नीति के सिद्धान्त से हटकर, नीतियों तथा राज्यों की ज़रूरत के उचित समन्वय पर बल देगा।

(8) उन्होंने मुख्यमन्त्रियों को परियोजनाओं को धीमी करने के कारणों पर खुद ध्यान देने की अपील की। (9) उन्होंने ग़रीबी समाप्त करने के लिए राज्यों से टास्क फोर्स गठित करने की अपील की।

(10) उन्होंने मख्यमन्त्रियों तथा उपराज्यपालों से फ्लैगशिप योजनाओं, ढांचागत योजनाओं, स्वच्छता मिशन, मेक इन इण्डिया अभियान, बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना, स्मार्ट सिटी, डिजिटल इण्डिया, स्किल इण्डिया, प्रधानमन्त्री सिंचाई योजना तथा 2022 तक सभी के लिए घर उपलब्ध कराने जैसी केन्द्र की योजनाओं की सफलता के लिए सुझाव मांगे।

स्पष्ट है कि योजना आयोग को समाप्त करके बनाये गये नीति आयोग पर देश के विकास के लिए कारगार नीतियां एवं योजनाएं बनाने का दबाव रहेगा। यह सही है कि योजना आयोग द्वारा पूरे देश के लिए लगभग एक जैसी नीति बनाना सही तरीका नहीं था क्योंकि भारत में कुछ राज्य कृषि प्रधान हैं, तो कुछ राज्यों में उद्योगों की अधिकता है। किसी राज्य की प्रति व्यक्ति आय अधिक है, तो किसी की कम। इसलिए पूरे देश के लिए एक ही तरह की नीति व्यावहारिक सिद्ध नहीं हो रही थी। इसलिए नीति बनाते हुए विभिन्नताओं का सही विचार आवश्यक है। यदि नीति आयोग में ऐसा होना सम्भव हो तो उचित रहेगा।

प्रश्न 5.
खाद्य संकट से आपका क्या अभिप्राय है? खाद्य संकट के प्रमुख परिणामों का वर्णन करें।
उत्तर:
खाद्य संकट से अभिप्राय खाने पीने की वस्तुओं का कम होना है। 1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति राजनीतिक बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल था। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफी हद तक प्रभावित किया। भारत में आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी।

खाद्य संकट के प्रमुख परिणाम

  • खाद्य संकट के कारण भारत में बड़े पैमाने पर कुपोषण फैला।
  • बिहार के कई भागों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का आहार 2200 कैलोरी से घटकर 1200 कैलोरी रह गया।
  • 1967 में बिहार में मृत्यु दर पिछले साल की तुलना में 34% बढ़ गई।
  • खाद्य संकट के कारण देश में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ने लगीं।
  • खाद्यान्न संकट ने देश की राजनीतिक परिस्थितियों को भी प्रभावित किया।
  • देश को चावल एवं गेहूं का आयात करना पड़ा। जिससे भारत की विदेशी पूंजी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
  • नियोजन के प्रति नागरिकों का विश्वास हिलने लगा।
  • योजना बनाने वालों को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा ताकि खाद्य संकट को टाला जा सके।

प्रश्न 6.
हरित क्रान्ति से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रभावों का वर्णन करो।
अथवा
हरित क्रांति क्या है ? हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति, राजनीतिक बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया।

भारत के आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी जिसने भारतीय नेतृत्व को चिन्ता में डाल दिया कि किस प्रकार इन स्थितियों से बाहर निकला जाए। अतः भारतीय नीति निर्धारकों ने कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि करने का निर्णय किया, ताकि भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो जाए। यहीं से भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत मानी जाती है। हरित क्रान्ति का मुख्य उद्देश्य देश में पैदावार को बढ़ाकर भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाना था। हरित क्रांति की मुख्य विशेषताएं या तत्त्व निम्न प्रकार से हैं

1. कृषि का निरन्तर विस्तार (Continued Expansion of Agriculture Sector):
हरित क्रान्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण उद्देश्य या तत्त्व भारत में कृषि क्षेत्र का निरन्तर विस्तार एवं विकास करना था। यद्यपि स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय से ही भारत में कृषि क्षेत्र का विस्तार जारी था परन्तु 1960 के मध्य में इस ओर अधिक ध्यान दिया गया और यह कार्य हरित क्रान्ति के अन्तर्गत किया गया।

2. दोहरी फसल का उद्देश्य (Aim of Double Cropping):
हरित क्रान्ति का एक अन्य महत्त्वपूर्ण तत्त्व या उद्देश्य यह था कि साल में दो मौसमी फ़सलें बोई जाएं। साधारण रूप से भारत में प्रतिवर्ष एक मौसमी फसल ही काटी जाती थी, इसका प्रमुख कारण यह था कि प्रतिवर्ष भारत में एक ही मौसमी वर्षा होती थी। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अब प्रतिवर्ष दो मौसमी वर्षा करके दो मौसमी फ़सलें काटने का निर्णय लिया गया।

एक फ़सल प्राकृतिक वर्षा के आधार पर होनी तथा दूसरी कृत्रिम वर्षा के आधार होगी। कृत्रिम वर्षा के लिए सिंचाई सुविधाओं एवं यन्त्रों की ओर विशेष ध्यान दिया गया। प्राकृतिक वर्षा के समय जो पानी व्यर्थ चला जाता है उसे अब एक जगह एकत्र किया जाने लगा तथा नी का प्रयोग उस मौसमी फ़सल के लिए किया जाने लगा जब प्राकृतिक वर्षा नहीं होती थी। इस तरह भारत में अब एक वर्ष में दो मौसमी फ़सलें होने लगीं तथा खाद्यान्न पदार्थों की अधिकाधिक पैदावार होने लगी।

3. अच्छे बीजों का प्रयोग (Use of Good Qualities Seeds):
हरित क्रान्ति का एक तत्त्व या उद्देश्य अच्छे बीजों का प्रयोग करना था ताकि फ़सल ज्यादा हो। इसके लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (Indian Council for Agriculture Research) का 1965 एवं 1973 में पुनर्गठन किया गया। भारत में चावल, गेहूं, मक्का तथा बाजरा की विशेष किस्में तैयार की गईं।

4. भारत में कृषि का मशीनीकरण भी किया गया। इसके अन्तर्गत किसानों को कृषि यन्त्र खरीदने के लिए कृषि ऋण प्रदान किया गया।

5. हरित क्रांति के अन्तर्गत कृषि क्षेत्रों में सिंचाई की व्यवस्था का प्रबन्ध एवं विस्तार किया गया। 6. हरित क्रांति के अन्तर्गत खेतों में कीटानाशक दवाओं एवं रासायनिक खादों का प्रयोग किया जाने लगा। तीसरी पंचवर्षीय योजना में हरित क्रान्ति को सफल बनाने के लिए विशेष जोर दिया गया। तीसरी पंचवर्षीय योजना में अच्छी किस्म के बीजों पर ध्यान दिया गया। सिंचाई साधनों का विस्तार किया गया। किसानों को कृषि के विषय में और अधिक शिक्षित किया गया।

हरित क्रान्ति की सफलताएं (Achievements of Green Revolution):
भारत में हरित क्रान्ति के कुछ अच्छे परिणाम सामने आए जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि (Record Increasement in Production) हरित क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूँ का आयात करता था, वह अब गेहूँ को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि (Increasement in Crop Field)-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

3. औद्योगिक विकास को बढ़ावा (Promotion of Industrial Development) हरित क्रान्ति के कारण भारत में न केवल कृषि क्षेत्र को ही फायदा हुआ बल्कि इसने औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा दिया। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अच्छे बीजों, अधिक पानी, खाद तथा कृत्रिम यन्त्रों की आवश्यकता थी, जिसके लिए उद्योग लगाए गए। इससे लोगों को रोजगार भी प्राप्त हुआ है।

4. बांधों का निर्माण (Making of Bandh)हरित क्रान्ति के लिए वर्षा के पानी को संचित करने की आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए कई जगहों पर बांधों का निर्माण किया गया जिससे कई लोगों को रोजगार मिला।

5. जल विद्युत् शक्ति को बढ़ावा (Promotion Water Energy)-बांधों द्वारा संचित किए गए पानी का जल विद्युत् शक्ति के उत्पादन में प्रयोग किया गया।

6. विदेशों में भारतीय किसानों की मांग (Demand of Indian Farmers in Foreign)-भारत की हरित क्रान्ति से कई देश इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने भारतीय किसानों को अपने देश में बसाने के लिए प्रोत्साहित किया। कनाडा जैसे देश ने भारत सरकार से किसानों की मांग की। जिसके कारण पंजाब एवं हरियाणा से कई किसान कनाडा में जाकर बस गए।

7. विदेशी कों की वापसी-हरित क्रान्ति के समय या उससे पहले भारत ने विदेशी संस्थाओं से जो भी कर्जे लिए थे, उन्हें वापिस कर दिया गया।

8. राजनीतिक स्थिति में बढ़ोत्तरी (Increasement of Political Status)-भारत में हरित क्रान्ति का एक सकारात्मक प्रभाव यह पड़ा कि भारत की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अच्छी छवि बन गई। हरित क्रान्ति के परिणाम भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो गया, जिससे भारत को अमेरिका पर खाद्यान्न के लिए निर्भर नहीं रहना पडा और इसका प्रभाव 1971 की पाकिस्तान के साथ लडाई में देखा गया।

9. बुनियादी ढांचे में विकास (Development of Infrastructure) हरित क्रान्ति की एक सफलता यह रही कि इसके परिणामस्वरूप भारत में बुनियादी ढांचे में उत्साहजनक विकास देखने को मिला। हरित क्रान्ति द्वारा पैदा हुई समस्याएं (Problems Emerged by Green Revolution) हरित क्रान्ति से भारत में जहां विकास के नये द्वार खुले, वहीं इससे सम्बन्धित कई समस्याएं भी पैदा हुईं

  • हरित क्रान्ति के कारण भारत में चाहे खाद्यान्न संकट समाप्त हो गया, परन्तु वह थोड़े समय के लिए ही था। आज भी भारत में खाद्यान्न संकट पैदा हो जाता है।
  • भारत में 1980 के दशक में वर्षा न होने से हरित क्रान्ति से कुछ विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो पाया।
  • हरित क्रान्ति के बावजूद 1998 में भारत को प्याज आयात करना पड़ा।
  • भारत को 2004 में चीनी आयात करनी पड़ी।
  • हरित क्रान्ति की सफलता पूरे भारत में न होकर केवल उत्तरी राज्यों में ही दिखाई पड़ती है।
  • कालाहाण्डी जैसे क्षेत्रों में लोग आज भी भूख के कारण मर रहे हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 7.
हरित क्रान्ति तथा इसके राजनीतिक कुप्रभावों का वर्णन करें।
अथवा
हरित क्रान्ति किसे कहते हैं ? इसके राजनैतिक प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हरित क्रान्ति का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 6 देखें। हरित क्रान्ति के राजनीतिक प्रभाव-हरित क्रान्ति के निम्नलिखित राजनीतिक प्रभाव पड़े

  • हरित क्रान्ति के कारण पंचवर्षीय योजना को कुछ समय के लिए रोक दिया गया।
  • हरित क्रान्ति के समय भारत में राजनीतिक अस्थिरता का दौर रहा।
  • हरित क्रान्ति के दौरान होने वाले चुनावों के परिणामस्वरूप अनेक राज्यों में गठबन्धन सरकारों का निर्माण हुआ।
  • हरित क्रान्ति के दौरान दल-बदल को बढ़ावा मिला।
  • हरित क्रांन्ति के दौरान प्रशासनिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 8.
विकास का अर्थ बताइये। विकास के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विकास का अर्थ (Meaning of Development)-विकास एक व्यापक एवं सार्वभौमिक धारणा है, जिसको विभिन्न सन्दर्भो में विभिन्न अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है। वर्तमान भौतिकवादी युग में व्यक्ति व समाज के विकास की अवधारणा का अर्थ प्रायः आर्थिक विकास से ही लिया जाता है। विभिन्न परिभाषाओं के आधार पर ये कहा जा सकता है कि विकास एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है जिसमें ढांचों में, दृष्टिकोणों और संस्थाओं में परिवर्तन, आर्थिक सम्पदा में वृद्धि, असमानताओं में कमी और निर्धनता का उन्मूलन शामिल है। परम्परागत समाज से आधुनिक विकसित समाज में परिवर्तन करने की प्रक्रिया को विकास कहते हैं।

1. एल्फ्रेड डायमेन्ट (Alfred Diamant) के अनुसार, “राजनीतिक विकास एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा एक राजनीतिक व्यवस्था के नए प्रकार के लक्ष्यों को निरन्तर सफल रूप में प्राप्त करने की क्षमता बनी रहती है।”

2. चुतर्वेदी (Chaturvedi) के अनुसार, “विकास एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज के उद्देश्यों को प्राप्त किया जाता है। विकास का उद्देश्य है-एक प्राचीन एवं पिछड़ी हुई व्यवस्था को आधुनिक व्यवस्था में बदलना।”

3. लूसियन पाई (Lucian Pye) के अनुसार, “राजनीतिक विकास संस्कृति का वितरण और जीवन के प्रतिमानों के नए भागों के अनुकूल बनाना, उन्हें उनके साथ मिलाना या उनके साथ सामंजस्य बिठाना है।”

विकास के उद्देश्य (Objectives of Development)-विकास के निम्नलिखित उद्देश्य होते हैं

1. न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति-विकास का प्रथम महत्त्वपूर्ण लक्ष्य गरीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। चिकित्सा सुविधाएं, स्वास्थ्य, पेयजल, कपड़ा, मकान, भोजन आदि आवश्यक पदार्थों की सुविधाएं आम जनता को दी जाएंगी।

2. गरीबी व बेरोज़गारी को दूर करना-पिछड़े तथा विकासशील देशों का एक महत्त्वपूर्ण लक्ष्य आर्थिक पुनर्निर्माण करके गरीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना है। विकसित देश भी बेरोज़गारी की समस्या को हल करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

3. प्राकृतिक साधनों का विकास-विकासशील देशों का लक्ष्य प्राकृतिक साधनों का शोषण करके देश का आर्थिक विकास करना है।

4.विकास की ऊंची दर-आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए आर्थिक विकास की ऊंची दर को प्राप्त करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय आय तथा शुद्ध प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि की जाए।

5. आत्म-निर्भरता-अल्पविकसित तथा विकासशील देशों का लक्ष्य अपने देश को आत्म-निर्भर बनाना है।

6. समाज कल्याण के कार्य-विकासशील देश लोगों के आर्थिक तथा समाज कल्याण के कार्यों को निम्न स्तर के लोगों तक पहुंचाने का लक्ष्य रखते हैं। गरीब वर्गों और विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सरकार को भारी निवेश का रास्ता अपनाना पड़ेगा। विश्व के अनेक देशों में बेकारी भत्ता (Unemployment Allowance) दिया जाता है। विश्व के अनेक विकसित देशों में बेरोजगारों को बेकारी भत्ता, नि:शुल्क तथा अनिवार्य प्राइमरी शिक्षा, वृद्धों को पेंशन इत्यादि अनेक सुविधाएं दी गई हैं और विकासशील देश इन सुविधाओं को देने का प्रयास कर रहे हैं।

7. लोकतन्त्रीय पद्धति से विकास-लोकतन्त्र पद्धति के द्वारा ही विकास कार्य किए जाने चाहिए। लोकतन्त्र विकास का विरोधी नहीं है। यह ठीक है कि अधिनायकवादी देशों में विकास की गति तीव्र होती है और अधिनायक विकास की जो दिशा तय करता है उसी दिशा में विकास होता है।

परन्तु अधिनायकवादी देशों ने जनसहयोग के अभाव में विकास में जनता की न तो रुचि होती है और न ही विकास के लाभ आम जनता तक पहुंचते हैं। उदाहरण के तौर पर साम्यवादी देशों में विकास के प्रतिमानों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता था जबकि वास्तविकता बिल्कुल उसके विपरीत थी। अत: विकास जनसहयोग से ही होना चाहिए ताकि विकास या लाभ आम जनता में समानता के आधार पर वितरित किया जा सके।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
प्रथम पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) प्रथम योजना का सर्वप्रथम उद्देश्य द्वितीय विश्व युद्ध तथा देश के विभाजन के फलस्वरूप देश में जो आर्थिक अव्यवस्था तथा असन्तुलन पैदा हो चुका था उसको ठीक करना था।

(2) प्रथम योजना का दूसरा उद्देश्य देश में सर्वांगीण सन्तुलित विकास का प्रारम्भ करना था ताकि राष्ट्रीय आय निरन्तर बढ़ती जाए और लोगों के रहन-सहन का स्तर ऊंचा उठ सके। यह आर्थिक विकास, प्रचलित सामाजिक-आर्थिक ढांचे में सुधार लाकर किया जाना था।

(3) योजना का तीसरा मुख्य उद्देश्य उत्पादन-क्षमता में वृद्धि तथा आर्थिक विषमता को यथासम्भव कम करना था।

(4) प्रथम योजना का एक उद्देश्य मुद्रा-स्फीति के दबाव को कम करना भी था।

प्रश्न 2.
दूसरी पंचवर्षीय योजना के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय आय में पर्याप्त वृद्धि की जाए ताकि लोगों के रहन-सहन के स्तर में सुधार हो सके।
  • देश का औद्योगिक विकास तीव्र गति से किया जाए और इसके लिए आधारभूत तथा भारी उद्योगों के विकास पर विशेष बल दिया जाए।
  • रोज़गार के अवसरों में अधिक-से-अधिक विस्तार किया जाए।
  • धन तथा आय के बंटवारे में असमानता को कम किया जाए तथा आर्थिक सत्ता को विकेन्द्रित किया जाए।

प्रश्न 3.
तीसरी पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
(1) राष्ट्रीय आय में वार्षिक वृद्धि दर 5 प्रतिशत से अधिक किया जाए तथा विनियोग इस प्रकार हो कि यह विकास दर आगामी पंचवर्षीय योजनाओं में उपलब्ध हो सके।

(2) खाद्यान्नों में आत्म-निर्भरता प्राप्त की जाए तथा कृषि उत्पादन में इतना विकास किया जाए जिससे उद्योगों तथा निर्यात की आवश्यकताएं पूरी हो सकें।

(3) आधारभूत उद्योगों जैसे इस्पात, कैमिकल उद्योग, ईंधन तथा विद्युत् उद्योगों का विस्तार किया जाए तथा मशीन निर्माण की क्षमता को इस प्रकार बढ़ाया जाए कि आगामी दस वर्षों में इस क्षेत्र में लगभग आत्म-निर्भर हो जाएं तथा औद्योगिक विकास के लिए भविष्य में मशीनरी की आवश्यकताएं देश में पूरी हो सकें।

(4) देश की मानव शक्ति का अधिक-से-अधिक प्रयोग किया जाए तथा रोजगार के अवसरों में पर्याप्त वृद्धि की जाए।

प्रश्न 4.
विकास का समाजवादी मॉडल क्या है?
अथवा
विकास के समाजवादी मॉडल का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
(1) विकास का समाजवादी मॉडल उत्पादन तथा वितरण के साधनों को समस्त समाज की सम्पत्ति मानता है। अतः समाजवादी उत्पादन तथा वितरण के साधनों पर राज्य का नियन्त्रण स्थापित करना चाहते हैं।

(2) विकास का समाजवादी मॉडल व्यक्ति की अपेक्षा समाज के विकास को अधिक महत्त्व देता है।

(3) विकास का समाजवादी मॉडल नियोजित अर्थव्यवस्था का समर्थन करता है। नियोजित अर्थव्यवस्था के द्वारा ही देश का विकास किया जा सकता है।

(4) विकास का समाजवादी मॉडल आर्थिक क्षेत्र में स्वतन्त्र प्रतियोगिता समाप्त करके सहयोग की भावना पैदा करने के पक्ष में है।

प्रश्न 5.
विकास के पूंजीवादी मॉडल से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
विकास का पूंजीवादी मॉडल क्या है ?
उत्तर:

  • विकास का पूंजीवादी मॉडल खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ार मूलक अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल अर्थव्यवस्था में सरकार के गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप को उचित नहीं मानता।
  • विकास का पंजीवादी मॉडल लाइसेंस/परमिशन को समाप्त करने के पक्ष में है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल भौतिक विकास में विश्वास रखता है।

प्रश्न 6.
पांचवीं पंचवर्षीय योजना के कोई चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
1. निर्धनता को दूर करना-पांचवीं योजना का मुख्य उद्देश्य निर्धनता को दूर करना था। निर्धनता दूर करने का अभिप्राय यह है कि देशवासियों की कम-से-कम इतनी आय अवश्य होनी चाहिए कि वे अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा कर सकें।

2. आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति- पांचवीं योजना का एक मुख्य उद्देश्य देशवासियों की आधारभूत न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति की व्यवस्था करना था।

3. रोज़गार की अधिकाधिक व्यवस्था–उत्पादन बढ़ाने वाले रोजगार का विस्तार करना ताकि अधिक लोगों को रोज़गार दिया जा सके।

4. आर्थिक स्वावलम्बन-पांचवीं योजना का एक मुख्य लक्ष्य आर्थिक आत्म-निर्भरता की प्राप्ति है। विदेशी सहायता को 1978-79 तक बिल्कुल शून्य करना इस योजना का लक्ष्य था।

प्रश्न 7.
छठी पंचवर्षीय योजना के मुख्य चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय आय की विकास दर का लक्ष्य 5.2 % निर्धारित किया गया। प्रति व्यक्ति आय की विकास दर का लक्ष्य 3.3 % रखा गया।
  • कृषि की विकास दर का लक्ष्य 4 प्रतिशत, उद्योगों का 7 प्रतिशत प्रतिवर्ष तथा निर्यात का 10 प्रतिशत प्रतिवर्ष निर्धारित किया गया था।
  • बचत की दर 24.5 प्रतिशत तथा निवेश की दर 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष निर्धारित की गई थी।
  • जनसंख्या की वृद्धि दर को 2.5 प्रतिशत प्रतिवर्ष से कम करके 1.86 प्रतिशत प्रतिवर्ष करने का लक्ष्य रखा गया।

प्रश्न 8.
सातवीं पंचवर्षीय योजना के चार मुख्य उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • योजना का विकेन्द्रीकरण होगा और विकास के काम में सब लोगों का सहयोग लिया जाएगा।
  • ग़रीबी और बेरोजगारी कम की जाएगी। रोजगार के अवसरों में 4 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य रखा गया।
  • क्षेत्रीय असमानता कम की जाएगी।
  • शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण की सुविधाएं अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुंचाई जाएंगी।

प्रश्न 9.
आठवीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • देश में पर्याप्त रोजगार अवसर पैदा करना।
  • जनसंख्या की वृद्धि दर को कम करना।
  • प्राथमिक शिक्षा को सर्वव्यापक बनाना।
  • कृषि क्षेत्र में विविधता को बढ़ावा देना।

प्रश्न 10.
नौवीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • बचत दर को बढ़ाकर 28.6% करना।
  • विकास दर को सात प्रतिशत प्रतिवर्ष करना।
  • कीमतों को स्थिर रखना।
  • जनसंख्या वृद्धि दर को कम करना।

प्रश्न 11.
10वीं पंचवर्षीय योजना के चार उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • प्रति व्यक्ति आय को दुगुनी करना।
  • विकास दर को 8% प्रतिवर्ष करना।
  • निर्धनता को बढ़ावा देना।
  • कृषि क्षेत्र को बढ़ावा देना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 12.
नियोजन का अर्थ बताओ।
उत्तर:
वर्तमान समय में नियोजन का विशेष महत्त्व है। नियोजन से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी करना है। कुछ विशेष उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विधि निर्धारित करना ही नियोजन कहलाता है। हडसन ने नियोजन की परिभाषा देते हुए कहा है, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिए आधार की खोज नियोजन है।” मिलेट के अनुसार, “प्रशासकीय कार्य के उद्देश्यों को निर्धारित करना तथा उनकी प्राप्ति के साधनों पर विचार करने को नियोजन कहते हैं।” हैरिस के शब्दों में, “आय तथा कीमत के सन्दर्भ की गति में साधनों के बंटवारे को प्रायः नियोजन कहते हैं।”

प्रश्न 13.
भारत में नियोजन के कोई चार मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
1. राष्ट्रीय आय में वृद्धि-भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य देश की राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है।

2. क्षेत्रीय असन्तुलन में कमी-विभिन्न योजनाओं का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य क्षेत्रीय असन्तुलन को कम करना रहात अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जा सके। इस दिशा में भारत सरकार ने योजना अवधि में पिछड़े क्षेत्रों के विकास हेतु विशेष कार्यक्रम लागू किए हैं।

3. आर्थिक असमानता में कमी-नियोजन का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य आर्थिक असमानता को कम करना है। रोज़गार-नियोजन का मुख्य उद्देश्य रोज़गार के अवसर बढ़ाना है।

प्रश्न 14.
भारत में आर्थिक नियोजन को अपनाने के कोई चार कारण लिखिये।
अथवा
भारत में योजना पद्धति को क्यों अपनाया गया ?
उत्तर:
नियोजन की आवश्यकता मुख्यतः निम्नलिखित कारणों से अनुभव की जाती है

  • नियोजन के द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करके समाज की उन्नति की जा सकती है।
  • आर्थिक न्याय तथा सामाजिक समता पर आधारित अच्छे समाज के निर्माण को सम्भव बनाने के लिए नियोजन ‘अति आवश्यक है।
  • नियोजन से श्रमिकों तथा निर्धनों की शोषण से सुरक्षा की जा सकती है।
  • नियोजन से राष्ट्र की पूंजी थोड़े-से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं होती।

प्रश्न 15.
अच्छे नियोजन की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
अच्छे नियोजन की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं

  • नियोजन के उद्देश्य की स्पष्ट तथा व्यापक व्यवस्था होनी चाहिए।
  • उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक साधनों तथा उपायों की व्यवस्था होनी चाहिए।
  • नियोजन में आवश्यकतानुसार लचीलापन होना चाहिए।
  • नियोजन के विभिन्न अंगों में सन्तुलन होना चाहिए।

प्रश्न 16.
योजना आयोग के कोई चार कार्य लिखिए।
उत्तर:
योजना आयोग के मख्य कार्य निम्नलिखित थे

(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और जो साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।

(2) देश के साधनों का अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

(3) नियोजन में स्वीकृत कार्यक्रम तथा परियोजनाओं के बारे में प्राथमिकताएं निश्चित करना।

(4) योजना के मार्ग में आने वाली बाधाओं को इंगित करना तथा राष्ट्र की राजनीतिक तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए योजना के लिए स्वस्थ वातावरण उत्पन्न करना।

प्रश्न 17.
योजना आयोग की कार्यप्रणाली की आलोचना क्यों की जाती थी ?
उत्तर:
भारत में स्थापित योजना आयोग की प्रासंगिकता 1990 के दशक में कम होने लगी। लाइसैंस राज समाप्त होने के बाद यह बिना किसी प्रभावी अधिकार के सलाहकार संस्था के तौर पर काम करता रहा। योजना आयोग की रचना, कार्यप्रणाली तथा इसकी प्रासंगिकता पर समय-समय पर सवाल उठते रहे थे। योजना आयोग के अनुसार 28 रु० की आय वाला व्यक्ति ग़रीबी रेखा से ऊपर है, जबकि आयोग ने अपने दो शौचालयों पर 35 लाख रुपये खर्च कर दिये थे।

तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता का कहना था, कि “हम दिल्ली सिर्फ इसलिए आते हैं, ताकि आयोग हमें बता सके कि हम अपना धन कैसे खर्च करें।” पूर्व केन्द्रीय मन्त्री कमल नाथ योजना आयोग को ‘आमचेयर एडवाइजर तथा नौकरशाहों का पार्किंग लॉट’ कहकर व्यंग्य कर चुके हैं।

स्वतन्त्र मूल्यांकन कार्यालय (आई०ई०ओ०) ने आयोग को आई०ए०एस० अधिकारियों का अड्डा बताया है। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने योजना आयोग को ‘जोकरों का समूह’ कहा था। इन सभी कारणों से योजना आयोग जैसी पुरानी संस्था को समाप्त करके एक नई संस्था बनाने का विचार काफी समय से उठ रहा था।

प्रश्न 18.
नीति आयोग की स्थापना कब की गई ? इसकी रचना का वर्णन करें।
उत्तर:
एक जनवरी, 2015 को योजना आयोग को समाप्त करके नीति आयोग (NITI AAYOG NATIONAL INSTITUTION FOR TRANSFORMING INDIA) की स्थापना की गई।

नीति आयोग की रचना (Composition of NITI Aayog)-नीति आयोग की रचना निम्नलिखित ढंग से की गई है

  • अध्यक्ष–प्रधानमन्त्री
  • उपाध्यक्ष- इसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री करेंगे।
  • सी०ई०ओ०-सी०ई०ओ० केन्द्र के सचिव स्तर का अधिकारी होगा, जिसकी नियुक्ति प्रधानमन्त्री निश्चित कार्यकाल के लिए करेंगे।
  • गवर्निंग काऊंसिल- इसमें सभी मुख्यमंत्री तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के उपराज्यपाल शामिल होंगे।
  • पूर्णकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम पांच सदस्य होंगे।
  • अंशकालिक सदस्य- इसमें अधिकतम दो पदेन सदस्य होंगे।
  • पदेन सदस्य-इसमें अधिकतम चार केन्द्रीय मन्त्री होंगे।
  • विशेष आमंत्रित सदस्य-इसमें विशेषज्ञ होंगे, जिन्हें प्रधानमन्त्री मनोनीत करेंगे।

प्रश्न 19.
नीति आयोग में कितने विभागों की व्यवस्था की गई है ?
उत्तर:
नीति आयोग में कुशलतापूर्वक कार्य करने के लिए तीन विभागों की भी व्यवस्था की गई है

  • पहला अन्तर्राज्जीय परिषद् की तरह कार्य करेगा।
  • दूसरा विभाग लम्बे समय की योजना बनाने तथा उसकी निगरानी करने का काम करेगा।
  • तीसरा विभाग डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर तथा यू०आई०डी०ए०आई० (UIDAI) को मिलाकर बनाया जायेगा।

प्रश्न 20.
नीति आयोग के उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
नीति आयोग के कुछ महत्त्वपूर्ण उद्देश्य निर्धारित किए गए हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • सशक्त राज्य से सशक्त राष्ट्र-इस सूत्र से सहकारी संघवाद (Co-operative Federalism) को बढ़ाना।
  • रणनीतिक तथा दीर्घावधि के लिए नीति तथा कार्यक्रम का ढांचा बनाना।
  • ग्रामीण स्तर पर योजनाएं बनाने के तन्त्र को विकसित करना।
  • आर्थिक प्रगति से वंचित रहे वर्गों पर विशेष ध्यान देना।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों व आर्थिक नीति में तालमेल बिठाना।

प्रश्न 21.
विकास के किन्हीं तीन उद्देश्यों का वर्णन करें।
अथवा
विकास के किन्हीं चार उद्देश्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
विकास के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  • विकास का प्रथम महत्त्वपूर्ण उद्देश्य ग़रीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना हैं।
  • आर्थिक पुनर्निर्माण करके ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना है।
  • विकास का लक्ष्य प्राकृतिक साधनों का विकास करना है।
  • विकास की ऊँची दर प्राप्त करना।

प्रश्न 22.
भारत में योजना पद्धति को क्यों अपनाया गया ?
उत्तर:
भारत में योजना पद्धति को निम्नलिखित कारणों से अपनाया गया

  • नियोजन के द्वारा आर्थिक तथा सामाजिक जीवन के विभिन्न अंगों में समन्वय स्थापित करके समाज की उन्नति की जा सकती है।
  • आर्थिक न्याय तथा सामाजिक समता पर आधारित अच्छे समाज के निर्माण को सम्भव बनाने के लिए नियोजन अति आवश्यक है।
  • आर्थिक नियोजन से श्रमिकों तथा निर्धनों की शोषण से सुरक्षा की जा सकती है।
  • आर्थिक नियोजन से राष्ट्र की पूंजी थोड़े से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं होती।

प्रश्न 23.
राष्ट्रीय विकास परिषद् के मुख्य कार्य लिखें।
उत्तर:
राष्ट्रीय विकास परिषद् के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

  • समय-समय पर राष्ट्रीय योजना के कार्य की समीक्षा करना।
  • राष्ट्रीय विकास को प्रभावित करने वाली सामाजिक व आर्थिक नीति के महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना।
  • राष्ट्रीय योजना के अन्तर्गत निश्चित लक्ष्यों और उद्देश्यों की सफलता के लिए उपायों की सिफ़ारिश करना।

इसके अन्तर्गत जनता से सक्रिय सहयोग प्राप्त करना. प्रशासकीय सेवाओं की कार्यकशलता में सधार करना। पिछडे प्रदेशों तथा वर्गों का पूर्ण विकास करना तथा सभी नागरिकों द्वारा समान मात्रा में बलिदान के माध्यम से राष्ट्रीय विकास के लिए साधनों का निर्माण करने के उपायों की सिफ़ारिश करना भी सम्मिलित है।

प्रश्न 24.
सार्वजनिक क्षेत्र से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सार्वजनिक क्षेत्र से अभिप्राय उन व्यवसायों तथा आर्थिक क्रिया-कलापों से है जिनके साधनों पर सरकार का स्वामित्व होता है और जिनका प्रबन्ध व नियन्त्रण सरकार के हाथों में ही होता है। सार्वजनिक क्षेत्र में आर्थिक क्रियाओं का संचालन मुख्य रूप से सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर ही किया जाता है।

सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत राज्य द्वारा सार्वजनिक उद्यमों की स्थापना की जाती है। वे सभी उद्योग-धन्धे तथा व्यावसायिक गतिविधियां जिन पर सरकार का स्वामित्व होता है, सार्वजनिक क्षेत्र कहलाता है। प्रो० ए० एच० हैन्सन के अनुसार, “सरकार के स्वामित्व और संचालन के अन्तर्गत आने वाले औद्योगिक, कृषि एवं वित्तीय संस्थानों से है।”

राय चौधरी एवं चक्रवर्ती के अनुसार, “लोक उद्यम या आधुनिक उपक्रम व्यवसाय का वह स्वरूप है जो सरकार द्वारा नियन्त्रित और संचालित होता है तथा सरकार उसकी या तो स्वयं एकमात्र स्वामी होती है अथवा उसके अधिकांश हिस्से सरकार के पास होते हैं।” इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में लोक उद्यमों का वर्णन इस प्रकार मिलता है, “लोक उद्योग का आशय ऐसे उपक्रम से है जिस पर केन्द्रीय, प्रान्तीय अथवा स्थानीय सरकार का स्वामित्व होता है। ये उद्योग अथवा उपक्रम मूल्य के बदले वस्तुओं एवं सेवाओं की पूर्ति करते हैं तथा सामान्यतया स्वावलम्बी आधार पर चलाए जाते हैं।”

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प्रश्न 25.
सार्वजनिक क्षेत्र की विशेषताएं लिखें।
उत्तर:

  • सार्वजनिक क्षेत्र एक व्यापक धारणा है जिसमें सरकार की समस्त आर्थिक तथा व्यावसायिक गतिविधियां शामिल की जाती हैं।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के अन्तर्गत स्थापित किए जाने वाले विभिन्न उद्यमों, निगमों तथा अन्य संस्थाओं पर सरकार का स्वामित्व, प्रबन्ध तथा संचालन होता है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर पूर्ण रूप से राष्ट्रीय नियन्त्रण होता है और सार्वजनिक क्षेत्र में एकाधिकार की प्रवृत्ति पाई जाती है।

प्रश्न 26.
हरित क्रान्ति की मुख्य चार विशेषताएं बताइये।
उत्तर:
1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि-हरित-क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूँ का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूँ का आयात करता था, वह अब गेहूँ को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

3. औद्योगिक विकास को बढ़ावा-हरित क्रान्ति के कारण भारत में न केवल कृषि क्षेत्र को ही फायदा हुआ बल्कि इसने औद्योगिक विकास को भी बढ़ावा दिया। हरित क्रान्ति के अन्तर्गत अच्छे बीजों, अधिक पानी, खाद तथा कृत्रिम यन्त्रों की आवश्यकता थी, जिसके लिए उद्योग लगाए गए। इससे लोगों को रोज़गार भी प्राप्त हुआ।

4. बांधों का निर्माण-हरित क्रान्ति के लिए वर्षा के पानी को संचित करने की आवश्यकता अनुभव हुई जिसके लिए कई जगहों पर बाँधों का निर्माण किया गया जिससे कई लोगों को रोजगार मिला।

प्रश्न 27.
‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था उस व्यवस्था को कहते हैं, जहां पर पूंजीवादी तथा समाजवादी अर्थव्यवस्था का मिश्रित रूप पाया जाता है। इस प्रकार की अर्थव्यवस्था में वैयक्तिक क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र दोनों की व्यवस्था की जाती है। सार्वजनिक क्षेत्र वाले उद्योगों का प्रबन्ध राजकीय निगम और व्यक्तिगत क्षेत्र के उद्योगों का प्रबन्ध व्यक्तिगत रूप से उद्योगपतियों द्वारा किया जाता है। भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था पाई जाती है।

प्रश्न 28.
हरित क्रान्ति की आवश्यकता पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
1960 के मध्य में भारत को राजनीतिक एवं आर्थिक मोर्चे पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। राजनीतिक मोर्चे पर पाकिस्तान से युद्ध के बाद पैदा हुई स्थिति तथा राजनीति बदलाव तथा आर्थिक मोर्चे पर भारत में पड़ने वाला भयंकर अकाल था। इन सभी परिस्थितियों ने भारत की अर्थव्यवस्था को काफ़ी हद तक प्रभावित किया।

भारत में आर्थिक विकास में कमी आने लगी तथा विशेषकर खाद्य पदार्थों की कमी होने लगी, जिसने भारतीय नेतृत्व को चिन्ता में डाल दिया कि किस प्रकार इन स्थितियों से बाहर निकला जाए। अतः भारतीय नीति निर्धारकों ने कृषि उत्पादन में तेजी से वृद्धि करने का निर्णय किया ताकि भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बन जाए। यहीं से भारत में हरित क्रान्ति की शुरुआत मानी जाती है। हरित क्रान्ति का मुख्य उद्देश्य देश में पैदावार को बढ़ाकर भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बनाना था।

प्रश्न 29.
आर्थिक विकास के भारतीय मॉडल की मुख्य विशेषताएं क्या हैं ?
उत्तर:

  • भारत में मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया है।
  • भारत के आर्थिक विकास में नियोजन को महत्त्व प्रदान किया गया है।
  • भारत में आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं का निर्माण किया जाता है।
  • भारत में कृषि के साथ-साथ औद्योगिकीकरण पर भी बल दिया गया है।

प्रश्न 30.
‘नियोजित विकास’ की कोई चार उपलब्धियां लिखें।
अथवा
भारत में नियोजन की कोई चार उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • नियोजन विकास से देश का संतुलित विकास सम्भव हो पाया है।
  • नियोजित विकास से श्रमिकों एवं कमजोर वर्गों का शोषण कम हुआ है।
  • नियोजित विकास से भारत खाद्यान्न क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो पाया है।
  • इससे राष्ट्र की पूंजी थोड़े-से व्यक्तियों के हाथों में एकत्रित नहीं हो पाई है।

प्रश्न 31.
भारत में ‘खाद्य संकट’ के क्या परिणाम हुए थे ?
उत्तर:

  • खाद्य संकट से भारत में बड़े स्तर पर कुपोषण फैला।
  • बिहार के कई भागों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का आहार 2200 कैलोरी से घटकर 1200 कैलोरी रह गया।
  • 1967 में बिहार में मृत्यु दर पिछले साल की तुलना में 34% बढ़ गई।
  • खाद्य संकट के कारण देश में खाद्यान्न की कीमतें बढ़ गईं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विकास का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
विकास एक बहुपक्षीय प्रक्रिया है जिसमें ढांचों में, दृष्टिकोणों और संस्थाओं में परिवर्तन, आर्थिक सम्पदा में वृद्धि, असमानताओं में कमी और निर्धनता का उन्मूलन शामिल है। परम्परागत समाज से आधुनिक विकसित समाज में परिवर्तन करने की प्रक्रिया को विकास कहते हैं।

प्रश्न 2.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था किस प्रकार की थी ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था बहुत ही पिछड़ी अवस्था में थी। भारत की कृषि व्यवस्था खराब अवस्था में थी। स्वतन्त्रता के समय भारतीय अर्थव्यवस्था औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था थी। अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का इतनी बुरी तरह से शोषण किया कि भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह खराब हो गई। परिणामस्वरूप स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गतिहीन, अर्द्ध सामन्ती तथा असन्तुलित अर्थव्यवस्था बन कर रह गई।

प्रश्न 3.
‘हरित क्रान्ति’ का अर्थ लिखिए।
उत्तर:
हरित क्रान्ति से अभिप्राय कृषि उत्पादन में होने वाली उस भारी वृद्धि से है, जो कृषि की नई नीति अपनाने के कारण हुई है। जे० जी० हारर के अनुसार, “हरित क्रान्ति शब्द 1968 में होने वाले उन आश्चर्यजनक परिवर्तनों के लिए प्रयोग में लाया जाता है, जो भारत के खाद्यान्न उत्पादन में हुआ था तथा अब भी जारी है।” हरित क्रान्ति से न केवल आर्थिक एवं सामाजिक बल्कि राजनीतिक ढांचा भी प्रभावित हुआ।

प्रश्न 4.
भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य क्या है ?
उत्तर:
भारत में नियोजन का मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय असन्तुलन को कम करके राष्ट्रीय आय में वृद्धि करना है, ताकि लोगों के जीवन स्तर में सुधार किया जा सके।

प्रश्न 5.
भारत में हरित क्रान्ति को अपनाने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • हरित क्रान्ति अपनाने का प्रथम कारण खाद्य संकट को दूर करना था।
  • हरित क्रान्ति अपनाने का दूसरा कारण कृषि के लिए आधुनिक यन्त्रों एवं साधनों का प्रयोग करना था।

प्रश्न 6.
भारतीय विकास की योजना में सर्वोच्च प्राथमिकता किसे दी जाती है ?
उत्तर:
भारतीय विकास की योजना में सर्वोच्च प्राथमिकता कृषि विकास को दी जाती है।

प्रश्न 7.
हरित क्रान्ति की कोई दो असफलताएं या सीमाएं लिखें।
उत्तर:
(1) हरित क्रान्ति के कारण भारत में चाहे खाद्यान्न संकट समाप्त हो गया, परन्तु वह थोड़े समय के लिए ही था। आज भी भारत में खाद्यान्न संकट पैदा हो जाता है।
(2) हरित क्रान्ति की सफलता पूरे भारत में न होकर केवल उत्तरी राज्यों में ही दिखाई पड़ती है।

प्रश्न 8.
हरित क्रान्ति की कोई दो मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
1. उत्पादन में रिकार्ड वृद्धि-हरित क्रान्ति की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि इससे भारत में रिकार्ड पैदावार हुई। 1978-79 में भारत में लगभग 131 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन हुआ तथा जो देश गेहूं का आयात करता था, वह अब गेहूं को निर्यात करने की स्थिति में आ गया।

2. फ़सल क्षेत्र में वृद्धि-हरित क्रान्ति के परिणामस्वरूप भारत में फ़सल क्षेत्र में व्यापक वृद्धि हुई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 नियोजित विकास की राजनीति

प्रश्न 9.
सन् 2015 में, योजना आयोग की जगह कौन-सा आयोग बनाया गया ? उसके उपाध्यक्ष का नाम लिखिए।
उत्तर:
सन् 2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनाया गया तथा इसके पहले उपाध्यक्ष का नाम श्री अरविंद पनगड़िया था। वर्तमान समय में नीति आयोग के उपाध्यक्ष श्री राजीव कुमार हैं।

प्रश्न 10.
विकास के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
उत्तर:
विकास का मुख्य उद्देश्य ग़रीब जनता की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति करना है, तथा प्राकृतिक संसाधनों का विकास करके देश को आत्मनिर्भर बनाता है।

प्रश्न 11.
मिश्रित अर्थव्यवस्था (Mixed Economy) से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के प्रायः दो रूप माने जाते हैं। एक रूप पूंजीवादी अर्थव्यवस्था तथा दूसरे को समाजवादी अर्थव्यवस्था कहा जाता है। जहां अर्थव्यवस्था के इन दोनों रूपों का अस्तित्व हो उस अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 12.
योजना आयोग के कोई दो कार्य लिखिए।
उत्तर:
(1) देश के भौतिक, पूंजीगत, मानवीय, तकनीकी तथा कर्मचारी वर्ग सम्बन्धी साधनों का अनुमान लगाना और जो साधन राष्ट्रीय आवश्यकता की तुलना में कम प्रतीत होते हों उनकी वृद्धि की सम्भावनाओं के सम्बन्ध में अनुसन्धान करना।
(2) देश के साधनों का अधिकतम प्रभावशाली तथा सन्तुलित उपयोग के लिए योजना बनाना।

प्रश्न 13.
कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए क्या प्रयत्न किए गए ?
उत्तर:

  • कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए सिंचाई साधनों का विस्तार किया गया।
  • कृषि क्षेत्र में सुधार लाने के लिए उन्नत किस्म के बीजों के प्रयोग पर बल दिया गया।

प्रश्न 14.
नियोजन का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
नियोजन से अभिप्राय किसी कार्य को व्यवस्थित ढंग से करने के लिए तैयारी करना है। हडसन के अनुसार, “भावी कार्यक्रम के मार्ग को निश्चित करने के लिये आधार की खोज नियोजन है।”

प्रश्न 15.
भारत में पहली पंचवर्षीय योजना कब लागू हुई ? अब तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं ?
उत्तर:
भारत में पहली पंचवर्षीय योजना सन् 1951 में लागू हुई। अब तक 12 पंचवर्षीय योजनाएँ पूरी हो चुकी हैं। 12वीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल अप्रैल 2012 से मार्च 2017 तक था।

प्रश्न 16.
निजी क्षेत्र में क्या-क्या शामिल है ?
उत्तर:
निजी क्षेत्र में खेती-बाड़ी, व्यापार एवं उद्योग शामिल हैं।

प्रश्न 17.
भारत में योजना आयोग का गठन करने का मुख्य उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:
भारत में योजना आयोग का गठन करने का मुख्य उद्देश्य नियोजित विकास करना था।

प्रश्न 18.
भारत में खाद्य संकट के क्या परिणाम हुए थे ?
उत्तर:

  • सरकार को गेहूं का आयात करना पड़ा।
  • सरकार को अमेरिका जैसे देशों से विदेशी मदद भी स्वीकार करनी पड़ी।

प्रश्न 19.
विकास का पूंजीवादी मॉडल क्या है ?
उत्तर:

  • विकास का पूंजीवादी मॉडल खुली प्रतिस्पर्धा और बाज़ार मूलक अर्थव्यवस्था में विश्वास रखता है।
  • विकास का पूंजीवादी मॉडल अर्थव्यवस्था में सरकार के गैर-ज़रूरी हस्तक्षेप को उचित नहीं मानता।

प्रश्न 20.
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विकास के लिए किस प्रकार की अर्थव्यवस्था का चुनाव किया गया था?
उत्तर:
आज़ादी के समय विकास के सवाल पर प्रमुख मतभेद कायम था। विकास के सम्बन्ध में मुख्य मुद्दा यह था कि विकास के लिए कौन-सा मॉडल अपनाया जाए ? विकास का पूंजीवादी मॉडल या विकास का साम्यवादी मॉडल। पूंजीवादी मॉडल के समर्थक देश के औद्योगीकरण पर अधिक बल दे रहे थे, जबकि साम्यवादी मॉडल के समर्थक कृषि के विकास एवं ग्रामीण क्षेत्र की ग़रीबी को दूर करना आवश्यक समझते थे। इन परिस्थितियों में सरकार दुविधा में पड़ गई, कि विकास का कौन-सा मॉडल अपनाया जाए। परन्तु आपसी बातचीत तथा सहमति के बीच का रास्ता अपनाते हुए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाया गया।

प्रश्न 21.
निजी क्षेत्र क्या हैं ?
उत्तर:
निजी क्षेत्र उसे कहा जाता है, जिसे सरकार द्वारा न चलाकर व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह द्वारा अपने लाभ के लिए चलाया जाता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. भारत में प्रथम पंचवर्षीय योजना किस वर्ष लागू की गई ?
(A) 1951
(B) 1960
(C) 1957
(D) 1962
उत्तर:
(A) 1951

2. अब तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएं लागू की जा चुकी हैं ?
(A) 7
(B) 8
(C) 11
(D) 12
उत्तर:
(D) 12

3. 11वीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल क्या था ?
(A) 1992-1997
(B) 1997-2002
(C) 2002-2007
(D) 2007-2012
उत्तर:
(D) 2007-2012

4. योजनाबद्ध विकास की प्रेरणा भारत को मिली
(A) सोवियत रूस से
(B) अमेरिका से
(C) ब्रिटेन से
(D) पाकिस्तान से।
उत्तर:
(A) सोवियत रूस से।

5. ‘बाम्बे योजना’ कब प्रकाशित की गई ?
(A) वर्ष 1942 में
(B) वर्ष 1944 में
(C) वर्ष 1945 में
(D) वर्ष 1950 में।
उत्तर:
(B) वर्ष 1944 में।

6. भारत में किस वर्ष घोर अकाल पड़ा था ?
(A) वर्ष 1965-67 में
(B) वर्ष 1967-69 में
(C) वर्ष 1967-71 में
(D) वर्ष 1967-73 में।
उत्तर:
(A) वर्ष 1965-67 में।

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7. उच्च उत्पादकता के लिए फसल क्षेत्र मांग करता है :
(A) अधिक पानी की
(B) अधिक उर्वरक की
(C) अधिक कीटनाशकों की
(D) उपर्युक्त सभी की।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी की।

8. “नियोजन विस्तृत अर्थों में व्यवस्थित क्रिया का स्वरूप है, नियोजन में इस प्रकार समस्त मानवीय क्रियाएं आ जाती हैं, भले ही वह व्यक्तिगत हों अथवा सामूहिक।” यह किसका कथन है ?
(A) प्रो० के० टी० शर्मा
(B) डॉ० एम० पी० शर्मा
(C) उर्विक
(D) बैंथम।
उत्तर:
(B) डॉ० एम० पी० शर्मा।

9. योजना आयोग का अध्यक्ष कौन होता था ?
(A) राष्ट्रपति
(B) प्रधानमन्त्री
(C) वित्त मन्त्री
(D) योजना मन्त्री।
उत्तर:
(B) प्रधानमन्त्री।

10. भारत में योजना आयोग की कब नियुक्ति की गई थी ?
(A) 1952
(B) 1950
(C) 1956
(D) 1960
उत्तर:
(B) 1950

11. योजना आयोग किस तरह की संस्था थी ?
(A) असंवैधानिक
(B) गैर-संवैधानिक
(C) संवैधानिक
(D) अति-संवैधानिक।
उत्तर:
(D) अति-संवैधानिक।

12. निम्नलिखित में से कौन नियोजन की उपलब्धि है ?
(A) राष्ट्रीय आय में वृद्धि
(B) सामाजिक विकास
(C) उत्पादन में आत्मनिर्भरता
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी।

13. “समाजवाद हमारी समस्याओं का एकमात्र समाधान है।” ये शब्द किसने कहे थे ?
(A) महात्मा गांधी ने
(B) सरदार पटेल ने
(C) जवाहर लाल नेहरू ने
(D) डॉ० लॉस्की ने।
उत्तर:
(C) जवाहर लाल नेहरू ने।

14. 1992 तक भारत में किस प्रकार की अर्थव्यवस्था थी ?
(A) साम्यवादी अर्थव्यवस्था
(B) पूंजीवादी अर्थव्यवस्था
(C) समाजवादी अर्थव्यवस्था
(D) मिश्रित अर्थव्यवस्था।
उत्तर:
(D) मिश्रित अर्थव्यवस्था।

15. सोवियत रूस ने विकास का कौन-सा मॉडल अपनाया था ?
(A) समाजवादी मॉडल
(B) पूंजीवादी मॉडल
(C) मिश्रित मॉडल
(D) कल्याणकारी मॉडल।
उत्तर:
(A) समाजवादी मॉडल।

16. एक जनवरी 2015 को योजना आयोग के स्थान पर किस नये आयोग की स्थापना हुई. ?
(A) नीति आयोग
(B) पानी आयोग
(C) केन्द्र आयोग
(D) राज्य आयोग।
उत्तर:
(A) नीति आयोग।

17. भारत की विकास योजना का उद्देश्य है
(A) आर्थिक विकास
(B) आत्मनिर्भरता
(C) सामाजिक विकास
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

18. ‘जनता-योजना’ के जनक थे
(A) मोंटेक सिंह
(B) मनमोहन सिंह
(C) मोरारजी देसाई
(D) एम० एन० राय।
उत्तर:
(D) एम० एन० राय।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष विकास के दो ही मॉडल थे, पहला उदारवादी-पूंजीवादी मॉडल तथा दूसरा . ………… मॉडल था।
उत्तर:
समाजवादी

(2) योजना आयोग की स्थापना मार्च, …………. में की गई।
उत्तर:
1950

(3) योजना आयोग का अध्यक्ष ………… होता है।
उत्तर:
प्रधानमन्त्री

(4) 1944 में उद्योगपतियों ने देश में नियोजित अर्थव्यवस्था चलाने का एक संयुक्त प्रस्ताव तैयार किया, जिसे …………. के नाम से जाना जाता है।
उत्तर:
बाम्बे प्लान

(5) ……….. में प्रथम पंचवर्षीय योजना का प्रारूप जारी हुआ।
उत्तर:
1951

(6) दूसरी पंचवर्षीय योजना में भारी उद्योगों के विकास पर जोर दिया गया। ………….. के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों और योजनाकारों के एक समूह ने यह योजना तैयार की थी।
उत्तर:
पी०सी० महालनोबिस

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
हरित क्रान्ति किस दशक में हुई ?
उत्तर:
हरित क्रान्ति 1960 के दशक में हुई।

प्रश्न 2.
भारत में योजना आयोग की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
योजना आयोग की स्थापना मार्च 1950 में की गई।

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प्रश्न 3.
भारत में कैसी अर्थव्यवस्था लागू की गई ?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत की दलीय प्रणाली की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय दलीय प्रणाली की निम्नलिखित विशेषताएं हैं
1. भारत में बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली है।

2. एक दल के प्रभुत्व युग का अन्त-भारत में लम्बे समय तक विशेषकर 1977 तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, परन्तु वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व समाप्त हो चुका है और उसकी जगह अन्य दलों ने ले ली है।

3. सैद्धान्तिक आधारों का अभाव-राजनीतिक दलों का सैद्धान्तिक आधारों पर संगठित होना अनिवार्य है, परन्तु हमारे देश में ऐसे दलों का अभाव है जो ठोस राजनीतिक तथा आर्थिक सिद्धान्तों पर संगठित हों।

4. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों की महत्ता निरन्तर बढ़ती जा रही है।

5. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-भारतीय दलीय प्रणाली की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें क्षेत्रीय दलों की महत्ता लगातार बढ़ती जा रही है।

6. व्यक्तित्व का प्रभाव-लगभग प्रत्येक भारतीय राजनीतिक दल में किसी विशेष प्रतिनिधित्व की अति महानता है। कांग्रेस में सर्वप्रथम पण्डित जवाहर लाल नेहरू, फिर श्रीमती इन्दिरा गांधी तथा बाद में श्री राजीव गांधी दल का केन्द्र बिन्दु बने हुए थे तथा वर्तमान में श्रीमती सोनिया गांधी एवं श्री राहुल गांधी दल का केन्द्र बिन्दु हैं। भारतीय जनता पार्टी में श्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण अडवाणी का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। वर्तमान समय में यह पार्टी श्री नरेन्द्र मोदी एवं श्री अमित शाह के नेतृत्व में चल रही है। भारतीय राजनीतिक दलों में सिद्धान्तों की अपेक्षा व्यक्तित्व की अधिक महत्ता है।

7. दलों में गुटबन्दी-कोई भी ऐसा भारतीय राजनीतिक दल नहीं है, जो गुटबन्दी का शिकार न हो। दलों में यह गुटबन्दी विभिन्न राजनीतिक के व्यक्तित्व की महानता का कारण है।

8. घोषित सिद्धान्तों का बलिदान-भारतीय राजनीतिक दल अपने सिद्धान्तों को कोई अधिक महत्ता नहीं देते। राजनीतिक लाभ के लिए ये दल अपने घोषित सिद्धान्तों का शीघ्र ही बलिदान कर देते हैं।

प्रश्न 2.
भारत में विरोधी दल की क्या भमिका है? इसका संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में विरोधी दल निम्नलिखित भूमिका निभाता है

1. आलोचना-भारत में विरोधी दल का मुख्य कार्य सरकार की नीतियों की आलोचना करना है। विरोधी दल संसद् के अन्दर और संसद के बाहर सरकार की आलोचना करते हैं। विरोधी दल यह आलोचना मन्त्रिमण्डल सदस्यों से विभिन्न प्रश्न पूछ कर, वाद-विवाद तथा अविश्वास प्रस्ताव पेश करके करते हैं।

2. वैकल्पिक सरकार- भारत में संसदीय शासन प्रणाली होने के कारण विरोधी दल वैकल्पिक सरकार बनाने के लिए तैयार रहता है। यद्यपि विरोधी दल को सरकार बनाने के ऐसे अवसर बहुत ही कम मिलते हैं।

3. शासन नीति को प्रभावित करना-विरोधी दल सरकार की आलोचना करके सरकार की नीतियों को प्रभावित करता है। कई बार सत्तारूढ़ दल विरोधी दल के सुझावों को ध्यान में रखकर अपनी नीति में परिवर्तन
करते हैं।

4. लोकतन्त्र की रक्षा-विरोधी दल सरकार के तानाशाह बनने से होकर लोकतन्त्र की रक्षा करता है।

5. उत्तरदायी आलोचना-विरोधी दल केवल सरकार की आलोचना करने के लिए आलोचना नहीं करते बल्कि सरकार को विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए सुझाव भी देते हैं। आवश्यकता पड़ने पर विरोधी दल सरकार को पूर्ण सहयोग देता है।

6. अस्थिर मतदाता को अपील करना-विरोधी दल सत्तारूढ़ दल को आम चुनाव में हराने का प्रयत्न करता है। इसके लिए विरोधी दल सत्तारूढ़ दल की आलोचना करके मतदाताओं के सामने यह प्रमाणित करने का प्रयत्न करता है कि यदि उसे अवसर दिया जाए तो वह देश का शासन सत्तारूढ़ दल की अपेक्षा अच्छा चला सकता है। विरोधी दल अस्थायी मतदाताओं को अपने पक्ष में करके चुनाव जीतने का प्रयत्न करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 3.
भारत में एक दल की प्रधानता के कारण लिखें।
उत्तर:
प्रारम्भिक वर्षों में भारत में एक दल की प्रधानता के निम्नलिखित कारण थे

1. कांग्रेस में सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था (Congress as Respresentative of all Shades of Opinion):
कांग्रेस पार्टी की प्रधानता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था, कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था। वास्तव में कांग्रेस स्वयं में एक ‘महान् गठबन्धन’ (Grand Alliance) था। कांग्रेस पार्टी उग्रवादी, उदारवादी, दक्षिण पंथी, साम्यवादी तथा मध्यमार्गी नेताओं का एक महान् मंच था, जिसके कारण लोग इसी पार्टी को मत दिया करते थे।

2. विरोधी दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे (Opposition Parties as Disgruntled children of the Congress Party):
स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक वर्षों में जितने भी विरोधी राजनीतिक दल थे, उनमें से अधिकांश राजनीतिक दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे। समाजवादी पार्टी, प्रजा समाजवादी पार्टी, संयुक्त समाजवादी पार्टी, 29 जनसंघ, राम राज्य परिषद् तथा हिन्दू महासभा जैसी पार्टियों के सम्बन्ध कभी-न-कभी कांग्रेस से ही रहे हैं। अत: लोगों ने उस समय कांग्रेस से अलग हुए दलों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस को ही वोट देना उचित समझा।

3. 1967 के पश्चात् भी केन्द्र में कांग्रेस की प्रधानता (Dominance of Congress at the Centre level even after 1967 Elections):
यद्यपि 1967 के चुनावों के पश्चात् राज्यों में से कांग्रेस की प्रधानता समाप्त हो गई, परन्तु केन्द्र में अभी भी कांग्रेस की शक्तिशाली सरकार थी, जो राज्यों की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका रखती थी।

4. राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में समानता (Similarity of Programmes of all Parties):
कांग्रेस एवं उसकी विरोधी पार्टियों के कार्यक्रमों एवं नीतियों में कोई बहुत अधिक अन्तर नहीं था, बल्कि उनमें समानताएं अधिक थीं। जिसके कारण मतदाताओं ने अन्य पार्टियों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देना उचित समझा।

5. गठबन्धन सरकारों की असफलता (Failure of Coalition govt.):
कांग्रेस की प्रधानता का एक कारण राज्यों में गठबन्धन सरकारों की असफलता थी। 1967 के आम चुनावों के पश्चात् आधे राज्यों में गैर-कांग्रेसी गठबन्धन सरकारें बनीं, परन्तु गैर-कांग्रेसी नेता अपने निजी स्वार्थों के लिए आपस में ही उलझते रहे, जिस कारण गठबन्धन सरकारें सफल न हो सकी तथा लोगों का गैर-कांग्रेसी सरकारों से मोहभंग हो गया।

6. राजनीतिक दल-बदल (Political Defection):
1967 के आम चुनावों के पश्चात् जो राजनीतिक दल-बदल हुए, उससे परोक्ष रूप में आगे चलकर कांग्रेस पार्टी ही अधिक शक्तिशाली हुई।

प्रश्न 4.
भारत में ‘एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली’ किसी दूसरे देश की एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है ? एक दल के प्रभुत्व का अर्थ क्या यह है कि भारत में वास्तविक प्रजातन्त्र नहीं है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दें।
उत्तर:
भारत में एक दल के प्रभुत्व वाली प्रणाली किसी दूसरे देश की इसी तरह की प्रणाली से सर्वथा भिन्न है। क्योंकि भारत में उस दल में भी प्रजातान्त्रिक तत्त्व पाये जाते हैं तथा भारत में एक दल के प्रभुत्व के होते हुए भी वास्तविक तौर पर प्रजातन्त्र पाया जाता है, जिसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं

  • भारत में निर्धारित तौर पर चुनाव होते रहे हैं।
  • भारत में सभी दलों को चुनावों में भाग लेने का अधिकार है।
  • भारत के सभी वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मतदान का अधिकार प्राप्त है।
  • भारत में विरोधी दल पाया जाता है।
  • विरोधी दलों एवं लोगों को सरकार की आलोचना करने का अधिकार प्राप्त है।
  • चुनावों के पश्चात् उसी दल की सरकार बनती है, जिसे बहुमत प्राप्त हो।
  • भारतीय नागरिकों को संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकार प्रदान किये गए हैं।
  • मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गई है।

प्रश्न 5.
भारत में 1952 के आम चुनाव पूरी दुनिया के लोकतंत्र के लिए किस प्रकार मील का पत्थर साबित हुए ? व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में 1952 के प्रथम आम चुनाव दुनिया के लोकतन्त्र के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए, क्योंकि यह चुनाव कई पक्षों से अनूठा तथा इसको सफलतापूर्वक करवाने में कई बाधाएं थीं। स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाने के लिए चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची का होना आवश्यक था तथा चुनाव क्षेत्रों का सीमांकन भी आवश्यक था। भारतीय चुनाव आयोग ने इन कार्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया। 1952 में लगभग 17 करोड़ मतदाताओं ने 3200 विधायक और लोकसभा के 489 सांसदों का चुनाव करना था। इस प्रकार का कार्य हिमालय पर चढ़ाई करने जैसा था।

भारतीय मतदाताओं में केवल 15 प्रतिशत मतदाता ही साक्षर थे। अतः चुनाव आयोग को विशेष मतदान पद्धति के बारे में सोचना पड़ा। भारत में चुनाव करवाने केवल इसलिए ही मुश्किल नहीं थे, बल्कि अधिकांश भारतीय मतदाता अनपढ़ ग़रीब एवं प्रजातान्त्रिक प्रक्रियाओं से अनभिज्ञ थे, जबकि जिन देशों में लोकतान्त्रिक चुनाव सफलतापूर्वक होते थे, वे अधिकांश विकसित देश थे और उन विकसित देशों में भी महिलाओं को मताधिकार प्राप्त नहीं था।

जबकि भारत में 1952 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धान्त को अपनाया गया था। अतः भारत में स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव करवाना बहुत मुश्किल कार्य था। एक भारतीय सम्पादक ने “इस चुनाव को इतिहास का सबसे बड़ा जुआ कहा था। आर्गनाइजर पत्रिका के अनुसार, “पं. जवाहर लाल नेहरू अपने जीवित रहते ही यह देख लेंगे कि सार्वभौम मताधिकार का सिद्धान्त असफल रहा है।”

1952 में हुए प्रथम चुनाव की सम्पूर्ण प्रक्रिया पूरे होने में लगभग छ: महीने लगे। अधिकांश सीटों पर मुकाबला भी हुआ तथा हराने वाले उम्मीदवारों ने भी माना, कि चुनाव निष्पक्ष हुए। विदेशी आलोचकों ने भी चुनावों की निष्पक्षता को स्वीकार किया। चुनावों के बाद हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा कि “सर्वत्र यह बात स्वीकृत की जा रही है, कि भारतीय जनता ने विश्व के इतिहास में लोकतन्त्र के सबसे बड़े प्रयोग को सफलतापूर्वक पूरा किया।” इसीलिए कहा जाता है. कि 1952 के चुनाव दुनिया के लोकतन्त्र के इतिहास के लिए मील का पत्थर साबित हुए।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारतीय दलीय व्यवस्था की कोई चार विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
1. भारत में बहु-दलीय प्रणाली-भारत में बहु-दलीय प्रणाली है।

2. एक दल के प्रभुत्व युग का अन्त-भारत में लम्बे समय तक विशेषकर 1977 तक कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व रहा, परन्तु वर्तमान समय में कांग्रेस पार्टी का प्रभुत्व समाप्त हो चुका है और उसकी जगह अन्य दलों ने ले ली है।

3. सैद्धान्तिक आधारों का अभाव-राजनीतिक दलों का सैद्धान्तिक आधारों पर संगठित होना अनिवार्य है, परन्तु हमारे देश में ऐसे दलों का अभाव है जो ठोस राजनीतिक तथा आर्थिक सिद्धान्तों पर संगठित हों।

4. क्षेत्रीय दलों की बढ़ रही महत्ता-वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों की महत्ता निरन्तर बढ़ती जा रही है।

प्रश्न 2.
एक प्रजातन्त्रीय राज्य के लिए राजनीतिक दल क्यों अनिवार्य हैं ?
उत्तर:
आधुनिक युग राष्ट्रीय राज्यों का युग है। आधुनिक समय के ऐसे राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र असम्भव है क्योंकि इन राज्यों की जनसंख्या तथा आकार अत्यधिक है। आधुनिक समय में अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र अथवा प्रतिनिधि लोकतन्त्र ही सम्भव है। राजनीतिक दलों के बिना इस प्रकार के लोकतन्त्र की सम्भावना नहीं हो सकती। संयुक्त कार्यक्रम के आधार पर चुनाव लड़ने के लिए, सरकार का निर्माण करने के लिए और विपक्षी दल की भूमिका अभिनं करने के लिए राजनीतिक दलों की आवश्यकता है। इसी कारण कहा जा सकता है “राजनीतिक दल नहेंद्र नहीं।” (No political parties, no democracy.)

प्रश्न 3.
लोकतन्त्र में राजनीतिक दलों की भूमिका स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:

  • लोकतन्त्रीय सिद्धान्तों के अनुसार चुनाव में भाग लेना।
  • शासक दल अथवा विपक्षी दल के रूप में भूमिका निभाना।
  • लोगों को राजनीतिक रूप में जागृत करना।
  • सरकार तथा लोगों में एक योजक का काम करना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

प्रश्न 4.
91वें संशोधन द्वारा दल-बदल को रोकने के लिए क्या उपाय किए गए हैं ?
उत्तर:
दल-बदल को रोकने के लिए 52वें संशोधन द्वारा बनाया गया कानून पूरी तरह दल-बदल रोकने में सफल नहीं रहा। इसी कारण दल-बदल कानून को और अधिक शक्तिशाली बनाने के लिए दिसम्बर, 2003 में संविधान में 91वां संशोधन किया गया।

इस कानून (संवैधानिक संशोधन) द्वारा यह व्यवस्था की गई, कि दल-बदल करने वाला कोई सांसद या विधायक सदन की सदस्यता खोने के साथ-साथ अगली बार चुनाव जीतने तक अथवा सदन के शेष कार्यकाल तक (जो भी पहले हो), मन्त्री पद या लाभ का कोई अन्य पद प्राप्त नहीं कर सकेगा। इस कानून के अन्तर्गत सांसदों या विधायकों के दल-बदल करने के लिए एक तिहाई सदस्य संख्या की अनिवार्यता को समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 5.
कांग्रेस पार्टी को ‘छतरी संगठन’ क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की स्थापना सन् 1885 में की गई। कांग्रेस पार्टी की स्थापना के समय भारत में राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी थीं, कि समाज का प्रत्येक वर्ग भारत को स्वतन्त्र देखना चाहता था। इसीलिए जब 1885 में कांग्रेस पार्टी की स्थापना की गई, तब समाज का प्रत्येक वर्ग अपने छोटे-मोटे मतभेद भुलाकर कांग्रेस के मंच पर आ गया। कांग्रेस में सभी धर्मों, जातियों, भाषाओं, क्षेत्रों तथा समुदायों के लोग शामिल थे। इसीलिए पामर (Palmer) ने कांग्रेस पार्टी को एक ‘छाता संगठन’ कहा है। आगे चलकर डॉ० अम्बेदकर ने कांग्रेस पार्टी की तुलना एक सराय से की थी जिसके द्वार समाज के सभी वर्गों के लिए खुले हुए थे।

प्रश्न 6.
भारत में एक दल के प्रभुत्व के किन्हीं चार कारणों का उल्लेख करें।
उत्तर:
1. सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व-कांग्रेस पार्टी की प्रधानता का सबसे महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि इसमें देश के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व प्राप्त था।

2. विरोधी दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे-स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रारम्भिक वर्षों में जितने भी विरोधी दल थे उनमें से अधिकांश दल कांग्रेस में से ही निकले हुए थे। अत: लोगों ने अलग हुए गुटों को वोट देने की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देना उचित समझा।

3. राजनीतिक दलों के कार्यक्रमों में समानता-कांग्रेस एवं उसकी विरोधी पार्टियों के कार्यक्रमों में काफ़ी समानता पाई जाती थी। इसलिए भी मतदाता अन्य दलों की अपेक्षा कांग्रेस पार्टी को ही वोट देते थे।

4. गठबन्धन सरकारों की असफलता-कांग्रेस की प्रधानता का एक कारण राज्यों में गठबन्धन सरकारों की असफलता थी। जिसके कारण लोगों का गैर-कांग्रेसी सरकारों से मोह भंग हो गया।

प्रश्न 7.
कांग्रेस पार्टी की राज्य स्तर पर असमान प्रधानता की व्याख्या करें।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की राज्य स्तर पर असमान प्रधानता का अर्थ यह है, कि केन्द्र की तरह राज्यों में कांग्रेस पार्टी . सदैव प्रधान नहीं रही। 1977 तक कांग्रेस पार्टी की केन्द्र स्तर पर प्रधानता बनी रही। परन्तु इसी दौरान राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की पूरी प्रधानता नहीं रही। क्योंकि कुछ राज्यों में क्षेत्रीय या अन्य दलों का उदय हो चुका था।

जैसे, भारतीय साम्यवादी दल, मार्क्सवादी दल, अकाली दल, द्रविड़ कड़गम, क्रान्तिकारी समाजवादी पार्टी, फारवर्ड ब्लॉक तथा नेशनल कान्फ्रेंस। इन दलों ने समय-समय पर अपने-अपने राज्यों में सरकार बनाकर राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की प्रधानता को चुनौती थी। इसीलिए कहा जाता है, कि राज्य स्तर पर कांग्रेस पार्टी की असमान प्रधानता थी।

प्रश्न 8.
कांग्रेस के गठबन्धनवादी स्वरूप की व्याख्या करें।
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी यद्यपि 1977 तक केन्द्र में शासन करती रही। परन्तु राज्यों में कांग्रेस की पूरी प्रधानता नहीं रही तथा समय-समय पर क्षेत्रीय तथा अन्य दलों ने कांग्रेस पार्टी को चुनावों में पराजित भी किया। इसी कारण कांग्रेस पार्टी ने कई राज्यों में अन्य दलों से समझौता करके अपनी सरकारें बनवाने का प्रयास किया।

1954 में कांग्रेस पार्टी ने कोचीन में पी० एस० पी० की अल्पमत सरकार भी बनवाई। 1957 में उड़ीसा में कांग्रेस पार्टी ने दूसरे आम चुनावों में एक स्थानीय दल गणतन्त्र परिषद् से गठबन्धन किया। 1970 के अन्त में केन्द्र में भी कांग्रेस ने अपनी सरकार को चलाने के लिए साम्यवादी दलों का सहारा लिया। इन सब उदाहरणों से स्पष्ट है, कि यद्यपि कांग्रेस की प्रधानता रही है, परन्तु समय-समय पर उसे गठबन्धन राजनीति को स्वीकार करना पड़ा है।

प्रश्न 9.
भारत में एक पार्टी का प्रभत्व विश्व के और देशों में एक पार्टी के प्रभत्व से किस प्रकार भिन्न था ?
उत्तर:
भारत में एक पार्टी का प्रभुत्व विश्व के और देशों में एक पार्टी के प्रभुत्व से सर्वथा भिन्न था। उदाहरण के लिए भारत और मैक्सिको में दोनों देशों में एक खास समय में एक ही दल का प्रभुत्व था। परन्तु दोनों देशों में एक दल के प्रभुत्व के स्वरूप में मौलिक अन्तर था, जहां भारत में लोकतान्त्रिक आधार पर एक दल का प्रभुत्व कायम था, वहीं मैक्सिको में एक दल की तानाशाही पाई जाती थी तथा लोगों को अपने विचार रखने का अधिकार नहीं था।

इसी प्रकार सोवियत संघ एवं चीन में भी एक पार्टी का प्रभुत्व पाया जाता था, परन्तु इन देशों में भी राजनीतिक दल प्रजातान्त्रिक आधारों पर संगठित नहीं हुए थे, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रजातान्त्रिक आधार पर संगठित हुई थी।

प्रश्न 10.
स्वतन्त्रता के शुरू के वर्षों में विपक्षी दलों को यद्यपि कहने भर का प्रतिनिधित्व मिल पाया, फिर भी इन दलों ने हमारी शासन-व्यवस्था के लोकतान्त्रिक चरित्र को बनाये रखने में किस प्रकार निर्णायक भूमिका निभाई ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के शुरू के वर्षों में विपक्षी दलों को यद्यपि कहने भर का प्रतिनिधित्व मिल पाया फिर भी इन दलों ने हमारी शासन-व्यवस्था को लोकतान्त्रिक चरित्र को बनाये रखने में निर्णायक भूमिका निभाई है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के शुरुआती वर्षों में सी०पी०आई०, जनसंघ, स्वतन्त्र पार्टी तथा सोशलिस्ट पार्टी जैसी पार्टियां भारत में विपक्षी दल की भूमिका निभाती थीं।

इन दलों ने समयानुसार एवं आवश्यकतानुसार सत्ताधारी कांग्रेस दल की अनुचित नीतियों एवं कार्यक्रमों की आलोचना की। ये आलोचनाएं सैद्धान्तिक तौर पर सही होती थीं। इन विपक्षी दलों ने अपनी सक्रिय गतिविधियों से कांग्रेस दल पर अंकुश बनाये रखा तथा लोगों को राजनीतिक स्तर पर एक विकल्प प्रदान करते रहे।

प्रश्न 11.
प्रथम तीन चुनावों में मुख्य विपक्षी दल कौन-से थे ?
उत्तर:
प्रथम तीन आम चुनावों में मुख्य विपक्षी दलों में सी० पी० आई०, एस० पी०, प्रजा समाजवादी पार्टी, जनसंघ तथा स्वतंत्र पार्टी शामिल हैं।

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प्रश्न 12.
‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सन् 1924 में हुई। इस पार्टी को 1952 के लोकसभा चुनावों में 16 सीटें, 1957 के चुनावों में 27 सीटें एवं 1962 के चुनावों में 29 सीटें प्राप्त हुईं। इस पार्टी ने 1957 में केरल में विश्व की पहली लोकतांत्रिक साम्यवादी सरकार का निर्माण किया। 1959 में चीन के साथ सम्बन्ध के बारे में भारतीय साम्यवादी दल में दो गुट बन गए और 1962 में चीन के आक्रमण ने इस मतभेद को और अधिक बढ़ा दिया।

एक गुट ने चीन के आक्रमण को आक्रमण कहा और इसका मुकाबला करने के लिए भारत सरकार के देने का वचन दिया, परन्तु दूसरे गुट ने जो चीन के प्रभाव में था, इसे सीमा सम्बन्धी विवाद कह कर पुकारा, परिणामस्वरूप 1964 में वामपंथी सदस्य जिनकी संख्या लगभग एक तिहाई थी, भारतीय साम्यवादी दल से अलग हो गए और मार्क्सवादी दल की स्थापना की।

प्रश्न 13.
‘भारतीय जनसंघ’ पार्टी पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
भारतीय जनसंघ पार्टी की स्थापना सन् 1951 में हुई थी। इसके संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे। जनसंघ अपनी विचारधारा, सिद्धांत एवं कार्यक्रम के आधार पर अन्य दलों से भिन्न था। यह दल एक देश, एक संस्कृति एवं राष्ट्र पर जोर देता था। जनसंघ का कहना था, कि भारत एवं पाकिस्तान को मिलाकर ‘अखण्ड भारत’ बनाया जाए।

यह दल अंग्रेज़ी को हटाकर हिन्दी को राजभाषा बनाने के पक्ष में था। इस दल ने धार्मिक एवं सांस्कृतिक अल्पसंख्यकों को ‘विशेष सुविधाएं देने का विरोध किया। सन् 1952 के चुनावों में इस दल को 3 सीटें मिली, 1957 के चुनावों में इस दल को 4 सीटें मिलीं। इस दल के मुख्य नेताओं में श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी, श्री दीनदयाल उपाध्याय एवं श्री बलराम मधोक शामिल थे।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राजनीतिक दल किसे कहते हैं ?
उत्तर:
राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का समूह है जो सार्वजनिक मामलों पर एक-से विचार रखते हों और संगठित होकर अपने मताधिकार द्वारा सरकार पर अपना नियन्त्रण स्थापित करना चाहते हों ताकि अपने सिद्धान्तों को लागू कर सकें। गिलक्राइस्ट के शब्दानुसार, “राजनीतिक दल ऐसे नागरिकों का संगठित समूह है जिनके राजनीतिक विचार एक से हों और एक राजनीतिक इकाई के रूप में कार्य करके सरकार पर नियन्त्रण रखने का प्रयत्न करते हों।”

प्रश्न 2.
भारत में कांग्रेस पार्टी की स्थापना कब हुई ? इसके मुख्य संस्थापक का नाम लिखिए।
उत्तर:
कांग्रेस की स्थापना सन् 1885 में हुई तथा इसके संस्थापक का नाम ए० ओ० ह्यूम था।

प्रश्न 3.
भारत में साम्यवादी दल की स्थापना कब हुई? इसका विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
भारत में साम्यवादी दल की स्थापना सन् 1924 में हुई और इसका विभाजन सन् 1964 में हुआ।

प्रश्न 4.
स्वतन्त्रता के बाद भारत द्वारा किस शासन प्रणाली को चुना गया था ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता के बाद भारत द्वारा संसदीय शासन प्रणाली को चुना गया था।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में चुनाव कराने की जिम्मेवारी किसे सौंपी गई है ?
अथवा
भारत में चुनाव कराने की जिम्मेवारी किसे सौंपी गई है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में चुनाव कराने की जिम्मेवारी चुनाव आयोग को सौंपी गई है।

प्रश्न 6.
भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी का 1964 में विभाजन हआ। इसका क्या कारण था ?
उत्तर:
भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना 1924 में की गई थी। 1959 में चीन के साथ सम्बन्ध के बारे में भारतीय साम्यवादी दल में दो गुट बन गए और 1962 के चीन के आक्रमण ने इस मतभेद को और अधिक बढ़ा दिया। एक गुट ने चीन के आक्रमण को आक्रमण कहा और इसका मुकाबला करने के लिए भारत सरकार को पूरी सहायता देने का वचन दिया, परन्तु दूसरे गुट ने जो चीन के प्रभाव में था, इसे सीमा सम्बन्धी विवाद कह कर पुकारा। परिणामस्वरूप 1964 में वामपंथी सदस्य जिनकी संख्या लगभग एक तिहाई थी, भारतीय साम्यवादी दल से अलग हो गए और मार्क्सवादी दल की स्थापना की।

प्रश्न 7.
भारतीय जनसंघ की स्थापना कब हुई ? इसके संस्थापक कौन थे ?
उत्तर:
भारतीय जनसंघ की स्थापना सन् 1951 में हुई। इसके संस्थापक श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

प्रश्न 8.
किस विद्वान् ने कांग्रेस पार्टी को एक सराय कहा और क्यों ?
उत्तर:
डॉ० भीम राव अम्बेदकर ने कांग्रेस पार्टी को सराय कहा था, क्योंकि कांग्रेस पार्टी के द्वार समाज के सभी वर्गों के लिए खुले हुए थे। डॉ० अम्बेदकर के अनुसार कांग्रेस पार्टी के द्वार मित्रों, दुश्मनों, चालाक व्यक्तियों, मूों तथा यहां तक कि सम्प्रदायवादियों के लिए भी खुले हुए थे।

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प्रश्न 9.
भारतीय जनसंघ ने किस विचारधारा पर जोर दिया था ?
उत्तर:

  • भारतीय जनसंघ ने एक देश, एक संस्कृति और एक राष्ट्र के विचार पर जोर दिया।
  • जनसंघ का विचार था कि भारतीय संस्कृति और परम्परा के आधार पर भारत आधुनिक प्रगतिशील और ताकतर बन सकता है।

प्रश्न 10.
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मौलाना अबुल कलाम का पूरा नाम अबुल कलाम मोहियुद्दीन अहमद था। इनका जन्म 1888 में हुआ तथा निधन 1958 में हुआ। अबुल कलाम इस्लाम के प्रसिद्ध विद्वान् थे। वे प्रसिद्ध स्वतन्त्रता सेनानी, कांग्रेसी नेता तथा हिन्दू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। उन्होंने भारत विभाजन का विरोध किया। वे संविधान सभा के सदस्य थे, तथा स्वतन्त्र भारत के पहले शिक्षा मन्त्री थे।

प्रश्न 11.
भारत की दलीय व्यवस्था के कोई दो लक्षण दीजिए।
उत्तर:

  • भारत में बहुदलीय व्यवस्था पाई जाती है।
  • भारत में राजनीतिक दलों का चुनाव आयोग के पास पंजीकरण होता है।

प्रश्न 12.
डॉ० भीम राव अम्बेदकर पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
डॉ० भीम राव अम्बेदकर का जन्म महाराष्ट्र में 1891 में हुआ। डॉ० अम्बेदकर कानून के विशेषज्ञ एवं संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे। डॉ० अम्बेदकर जाति विरोधी आन्दोलन के नेता तथा पिछड़े वर्गों को न्याय दिलाने के संघर्ष के प्रेरणा स्रोत माने जाते थे। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् नेहरू मन्त्रिमण्डल में मन्त्री बने, परन्तु 1951 में हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर असहमति जताते हुए पद से इस्तीफा दिया। 1956 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 13.
राजकुमारी अमृतकौर के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
राजकुमारी अमृतकौर गांधीवादी स्वतन्त्रता सेनानी थीं, उनका जन्म 1889 में कपूरथला के राजपरिवार में हुआ। उन्होंने अपनी माता के अनुसार ईसाई धर्म अपनाया। वह संविधान सभी की सदस्य भी रहीं तथा नेहरू मन्त्रिमण्डल में स्वास्थ्य मन्त्री का कार्यभार सम्भाला। सन् 1964 में उनका निधन हो गया।

प्रश्न 14.
सी० राजगोपालाचारी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।।
उत्तर:
सी० राजगोपालाचारी का जन्म 1878 में हुआ। सी० राजगोपालाचारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं प्रसिद्ध साहित्यकार थे। वे संविधान सभा के सदस्य थे, वे भारत के प्रथम भारतीय गवर्नर-जनरल बने। वे केन्द्र सरकार में मन्त्री तथा मद्रास के मुख्यमन्त्री भी रहे। उन्होंने 1959 में स्वतन्त्र पार्टी की स्थापना की। उनकी सेवाओं के लिए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1972 में उनका देहान्त हो गया।

प्रश्न 15.
श्यामा प्रसाद मुखर्जी के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म 1901 में हुआ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी संविधान सभा के सदस्य थे। वे हिन्द महासभा के महत्त्वपूर्ण नेता तथा भारतीय जनसंघ के संस्थापक थे। उन्होंने 1950 में पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को लेकर मतभेद होने पर नेहरू मन्त्रिमण्डल से इस्तीफा दिया। वे कश्मीर को स्वायत्तता देने के विरुद्ध थे। कश्मीर नीति पर जनसंघ के प्रदर्शन के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया तथा 1953 में हिरासत में ही उनकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 16.
चुनाव से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
चुनाव एक ऐसी विधि है, जिसके द्वारा मतदाता अपने प्रतिनिधि चुनते हैं। चुनाव प्रत्यक्ष भी हो सकते हैं, और अप्रत्यक्ष भी हो सकते हैं।

प्रश्न 17.
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार किसे कहते हैं ?
उत्तर:
सार्वभौम वयस्क मताधिकार का अभिप्राय यह है कि निश्चित आयु के वयस्क नागरिकों को बिना किसी भेदभाव के मत देने का अधिकार देना है। वयस्क होने की आय राज्य द्वारा निश्चित की जाती है। भारत में मताधिकार की आयु पहले 21 वर्ष थी, परन्तु 61वें संशोधन एक्ट द्वारा यह आयु 18 वर्ष कर दी गई है।

प्रश्न 18.
साम्यवादी दल, सन् 1964 में हुए विभाजन के बाद किन दो राजनीतिक दलों में बंटा था ?
उत्तर:
साम्यवादी दल, सन् 1964 में हुए विभाजन के भारतीय साम्यवादी दल तथा भारतीय साम्यवादी (मार्क्सवादी) दल में बंटा हुआ था।

प्रश्न 19.
गठबन्धन से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
गठबन्धन सरकार का साधारण अर्थ है, कई दलों द्वारा मिलकर सरकार का निर्माण करना। चुनावों से पूर्व या चुनावों के बाद कई दल मिलकर अपना साझा कार्यक्रम तैयार करते हैं। उसके आधार पर वे मिलकर चुनाव लड़ते . हैं अथवा अपनी सरकार बनाते हैं। भारत में सबसे पहले केन्द्र में 1977 में गठबन्धन सरकार बनी।

प्रश्न 20.
‘एक दलीय प्रभत्व’ का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था उसे कहते हैं, जहां बहुदलीय पद्धति के अन्तर्गत किसी एक दल की प्रधानता होती है। एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था में यद्यपि अन्य भी कई दल होते हैं, परंतु उनका राजनीतिक महत्व अधिक नहीं होता, क्योंकि लोगों का उन्हें अधिक समर्थन प्राप्त नहीं होता। ऐसी व्यवस्था में मतदाता केवल एक ही दल को अधिक महत्त्व देते हैं। भारत एक दलीय प्रभुत्व व्यवस्था का एक प्रत्यक्ष उदाहरण रहा है।

प्रश्न 21.
‘एक दल की प्रधानता का युग’ कौन-से काल को कहा जाता है ?
उत्तर:
एक दल की प्रधानता का युग सन् 1952 से 1962 तक के काल को कहा जाता है, क्योंकि इन तीनों चुनावों में केन्द्र एवं राज्य स्तर पर कांग्रेस का ही प्रभुत्व था।

प्रश्न 22.
भारत में एक दल की प्रधानता का युग कब समाप्त हुआ ?
उत्तर:
भारत में एक दल की प्रधानता का युग सन् 1967 में हुए चौथे आम चुनाव के बाद समाप्त हुआ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. दूसरा आम चुनाव कब हुआ?
(A) 1950 में
(B) 1952 में
(C) 1957 में
(D) 1962 में।
उत्तर:
(C) 1957 में।

2. निम्नलिखित में से किसने कांग्रेस को छाता संगठन (Umbrella organisation) की संज्ञा दी ?
(A) महात्मा गांधी ने
(B) जवाहर लाल नेहरू ने
(C) पामर ने
(D) बाल गंगाधर तिलक ने।
उत्तर:
(C) पामर ने।

3. किसने कांग्रेस की तुलना सराय से की है ?
(A) गोपाल कृष्ण गोखले
(B) लाला लाजपत राय
(C) डॉ० अम्बेदकर
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(C) डॉ० अम्बेदकर।

4. निम्न में से एक दल को ‘छाता संगठन’ के नाम से सम्बोधित किया गया।
(A) सोशलिस्ट पार्टी
(B) कांग्रेस दल
(C) भारतीय जनसंघ
(D) हिन्दू महासभा।
उत्तर:
(B) कांग्रेस दल।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

5. भारत में चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है
(A) राष्ट्रपति को
(B) संसद् को
(C) मुख्य न्यायाधीश को
(D) चुनाव आयोग को।
उत्तर:
(D) चुनाव आयोग को।

6. निम्नलिखित में से किस नेता ने कांग्रेस को जन-आन्दोलन का रूप दिया ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू ने
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने
(C) विनोबा भावे
(D) महात्मा गांधी ने।
उत्तर:
(D) महात्मा गांधी ने।

7. भारत के प्रथम मुख्य चुनाव उपयुक्त कौन थे ?
(A) टी० एन० शेषन
(B) सुकुमार सेन
(C) एम० एस० गिल
(D) हुकुम सिंह।
उत्तर:
(B) सुकुमार सेन।

8. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना कब हुई ?
(A) 1885 में
(B) 1886 में
(C) 1905 में
(D) 1895 में।
उत्तर:
(A) 1885 में।

9. भारत में एक दल की प्रधानता का युग किस नेता से जुड़ा है ?
(A) सरदार पटेल
(B) पं० नेहरू
(C) महात्मा गांधी
(D) लाल बहादुर शास्त्री
उत्तर:
(B) पं० नेहरू।

10. प्रथम तीन आम चुनावों में किस राजनीतिक दल का प्रभुत्व बना रहा ?
(A) कम्युनिस्ट पार्टी का
(B) समाजवादी पार्टी का
(C) कांग्रेस पार्टी का
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(C) कांग्रेस पार्टी का।

11. स्वतन्त्र भारत में एक दल की प्रधानता का युग निम्नलिखित वर्ष से आरम्भ होता है
(A) 1952 में
(B) 1957 में
(C) 1950 में
(D) 1951 में।
उत्तर:
(A) 1952 में।

12. प्रथम आम चुनावों में कांग्रेस को लोकसभा में कितने स्थान प्राप्त हुए थे?
(A) 361
(B) 401
(C) 364
(D) 370
उत्तर:
(C) 364

13. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन कब हुआ ?
(A) 1962 में
(B) 1964 में
(C) 1975 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1964 में।

14. 1952 के पहले आम चुनाव में लोकसभा के साथ-साथ निम्न के लिए भी चुनाव कराए गए थे
(A) भारत के राष्ट्रपति का चुनाव
(B) राज्य विधानसभा का चुनाव
(C) राज्य सभा का चुनाव
(D) प्रधानमन्त्री का चुनाव।
उत्तर:
(B) राज्य विधानसभा का चुनाव।

15. भारतीय जनसंघ के संस्थापक कौन थे ?
(A) सी० राजगोपालाचारी
(B) डॉ० श्यामा प्रसाद
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(B) डॉ० श्यामा प्रसाद।

16. राष्ट्रीय मंच पर किस नेता के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई ?
(A) महात्मा गांधी
(B) गोपाल कृष्ण गोखले
(C) डॉ० अम्बेदकर
(D) पं० नेहरूं।
उत्तर:
(A) महात्मा गांधी।

17. भारतीय जनता पार्टी की जड़ें किस पार्टी में पाई जाती हैं ?
(A) साम्यवादी पार्टी
(B) स्वतन्त्र पार्टी
(C) भारतीय जनसंघ
(D) कांग्रेस पाटी।
उत्तर:
(C) भारतीय जनसंघ।

18. सन् 1957 के चुनावों के बाद निम्नलिखित किस राज्य में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ ?
(A) राजस्थान में
(B) मद्रास में
(C) आन्ध्र प्रदेश में
(D) केरल में।
उत्तर:
(D) केरल में।

19. भारतीय जनसंघ की स्थापना निम्नलिखित वर्ष में हुई :
(A) 1950 में
(B) 1951 में
(C) 1952 में
(D) 1949 में।
उत्तर:
(B) 1951 में।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

20. स्वतन्त्र भारत में पहला आम चुनाव कब हुआ ?
(A) 1952 में
(B) 1957 में
(C) 1948 में
(D) 1950 में।
उत्तर:
(A) 1952 में।

21. सन् 1952 से 1966 तक भारत के राजनीतिक मंच पर
(A) एक दल की प्रधानता रही
(B) दो-दलीय प्रधानता रही
(C) तीन दलीय प्रधानता रही
(D) बहु-दलीय प्रधानता रही।
उत्तर:
(A) एक दल की प्रधानता रही।

22. भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना निम्नलिखित किस वर्ष में हुई-
(A) 1950 में
(B) 1924 में
(C) 1964 में
(D) 1934 में।
उत्तर:
(B) 1924 में।

23. ‘भारतीय जनसंघ’ की स्थापना किस वर्ष हुई ?
(A) 1950 में
(B) 1951 में
(C) 1957 में
(D) 1960 में।
उत्तर:
(B) 1951 में।

24. प्रथम आम चुनाव में लोकसभा में 16 स्थान प्राप्त करके कौन-सा दल कांग्रेस के बाद दूसरे स्थान पर रहा ?
(A) जनसंघ
(B) समाजवार्दी पार्टी
(C) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
(D) हिन्दू महासभा।
उत्तर:
(C) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी।

25. 1957 में केरल विधानसभा में किस दल की सरकार बनी ?
(A) साम्यवादी दल
(B) कांग्रेस पार्टी
(C) स्वतन्त्र पार्टी
(D) जनसंघ
उत्तर:
(A) साम्यवादी दल।

26. भारत में तीसरा आम चुनाव सम्पन्न हुआ
(A) 1961 में
(B) 1962 में
(C) 1960 में
(D) 1963 में।
उत्तर:
(B) 1962 में।

27. भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी में विभाजन कब हुआ ?
(A) 1962 में
(B) 1964 में
(C) 1957 में
(D) 1970 में।
उत्तर:
(B) 1964 में।

28. विश्व में सबसे पहले कहां पर निर्वाचित ढंग से साम्यवादी दल की सरकार बनी ?
(A) केरल
(B) मास्को
(C) हवाना
(D) गुजरात।
उत्तर:
(A) केरल।

29. भारत में वयस्क मताधिकार की आयु निश्चित की गई है
(A) 20 वर्ष
(B) 21 वर्ष
(C) 18 वर्ष
(D) 19 वर्ष।
उत्तर:
(C) 18 वर्ष।

30. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस स्थान पर हुई ?
(A) दिल्ली में
(B) बम्बई में
(C) लखनऊ में
(D) कलकत्ता में।
उत्तर:
(B) बम्बई में।

31. 1984 में कांग्रेस ने लोकसभा का चुनाव किसके नेतृत्व में लड़ा?
(A) इंदिरा गांधी
(B) मोरार जी देसाई
(C) राजीव गांधी
(D) देवराज अर्स।
उत्तर:
(C) राजीव गांधी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 एक दल के प्रभुत्व का दौर

32. भारत के प्रथम चुनाव आयुक्त थे :
(A) बलराम जाखड़
(B) हुकुम सिंह
(C) सुकुमार सेन
(D) शिवराज पाटिल।
उत्तर:
(C) सुकुमार सेन।

33. मुख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय निम्नलिखित को जाता है
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) राजेन्द्र प्रसाद
(C) गोपाल कृष्ण गोखले
(D) ए० ओ० ह्यम।
उत्तर:
(D) ए० ओ० ह्यूम।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करें

(1) साम्यवादी पार्टी की स्थापना वर्ष ………… में हुई।
उत्तर:
1924

(2) भारत में एक दल की प्रधानता का युग ……….. भारतीय नेता से जुड़ा हुआ है।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू

(3) केन्द्र स्तर पर कांग्रेस पार्टी की प्रधानता वर्ष …………… में समाप्त हो गई।
उत्तर:
1977

(4) पामर ने कांग्रेस को एक …………. संगठन कहा।
उत्तर:
छाता

(5) एस० ए० डांगे …………… पार्टी के नेता थे।
उत्तर:
साम्यवादी

(6) भारत के चुनाव आयोग का गठन ………… में हुआ।
उत्तर:
1950

(7) स्वतंत्र भारत में पहला आम चुनाव सन् …………….. में हुआ।
उत्तर:
1952

(8) सन् 1957 के चुनावों के पश्चात् पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का गठन ……….. राज्य में हुआ।
उत्तर:
केरल

(9) भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष ……………… थे।
उत्तर:
श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
भारत में किस प्रकार की दलीय प्रणाली पाई जाती है ?
उत्तर:
भारत में बहु-दलीय प्रणाली पाई जाती है।

प्रश्न 2.
मख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय किस व्यक्ति को जाता है ?
उत्तर:
मुख्य रूप से कांग्रेस की स्थापना का श्रेय ए० ओ० ह्यूम को जाता है।

प्रश्न 3.
भारत में एक दल की प्रधानता किस दल से सम्बन्धित रही है ?
उत्तर:
भारत में एक दल की प्रधानता कांग्रेस दल से सम्बन्धित रही है।

प्रश्न 4.
किस युग में कांग्रेस पार्टी ने मध्यवर्गीय व्यापारियों, पाश्चात्य शिक्षित व्यापारियों, वकीलों एवं भू-स्वामियों को एक मंच प्रदान किया ?
उत्तर:
उदारवादी युग में।

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प्रश्न 5.
कांग्रेस दल किस सन् में राष्ट्रीय चरित्र वाले एक जनसभा के रूप में अस्तित्व में आया ?
उत्तर:
कांग्रेस दल 1905 से 1918 तक के काल में राष्ट्रीय चरित्र वाले एक जनसभा के रूप में अस्तित्व में आया।

प्रश्न 6.
राष्ट्रीय मंच पर किस नेता के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई ?
उत्तर:
राष्ट्रीय मंच पर महात्मा गांधी के आगमन से कांग्रेस पार्टी एक जन आन्दोलन में बदल गई।

प्रश्न 7.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन सन् 1964 में हुआ।

प्रश्न 8.
प्रथम आम चुनावों के समय कितने राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय दल विद्यमान थे ?
उत्तर:
प्रथम आम चुनावों में 14 राष्ट्रीय स्तर एवं 52 राज्य स्तर के दल विद्यमान थे।

प्रश्न 9.
कांग्रेस पार्टी की स्थापना किस वर्ष हुई ?
उत्तर:
कांग्रेस पार्टी की स्थापना सन् 1885 में हुई।

प्रश्न 10.
भारत में मतदाता दिवस कब मनाया जाता है ?
उत्तर:
भारत में मतदाता दिवस 25 जनवरी को मनाया जाता है।

प्रश्न 11.
भारत में चुनाव कराने की जिम्मेदारी किसे सौंपी गई है ?
उत्तर:
चुनाव आयोग को।

प्रश्न 12.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक कौन थे ?
उत्तर:
ए० ओ० ह्यम।

प्रश्न 13.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन कब हुआ ?
उत्तर:
सन् 1964 में।

प्रश्न 14.
भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष कौन थे ?
उत्तर:
भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी थे।

प्रश्न 15.
श्री एस० ए० डांगे किस दल के प्रमुख नेता थे ?
उत्तर:
भारतीय साम्यवादी दल।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

निबन्धात्मक प्रश्न 

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण की समस्या सभी राष्ट्रों के सामने आती है। यह समस्या विशेषकर उन देशों की है जिन्होंने द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् स्वतन्त्रता प्राप्त की। आज भी यह समस्या तीसरे विश्व (Third World) के देशों के लिए बनी हुई है।

राष्ट्र-निर्माण का अर्थ (Meaning of Nation-Building):
राष्ट्र निर्माण के सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हैं। एक इतिहासकार राष्ट्रों के विकास (Growth of Nations) की शब्दावली का प्रयोग करता है जबकि एक राजनीतिज्ञ राष्ट्र निर्माण (Nation-Building) की भाषा बोलता है। समाजशास्त्री राष्ट्र विकास (Nation Development) जैसे शब्दों का प्रयोग करता है। राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा राष्ट्र निर्माण की चुनौतियां ।

कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। यह सामाजिक प्रक्रिया कई प्रकार की संस्थाओं में पाई जाती है। इसके कई स्वरूप होते हैं जिनके द्वारा राष्ट्र निर्माण का कार्य होता है। डेविड ए० विलसन (David A. Wilson) के शब्दों में, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनैतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।’

लुसियन पाई (Pye) के मतानुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफ़ादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

गिलक्राइस्ट (Gilchrist) ने राष्ट्र की परिभाषा इस प्रकार दी है, “राष्ट्र राज्य तथा राष्ट्रीयता का योग है।”

ब्लंट्शली (Bluntschli) के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण मनुष्यों के ऐसे समूह को कहते हैं जो विशेषतया भाषा और रीति-रिवाज द्वारा एक समान सभ्यता में बंधे हुए हों, जिससे उनमें एकता और समस्त विदेशियों से भिन्नता की भावना पैदा होती है।”

नाविको (Navicow) कहता है कि, “राष्ट्र एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक एकता है और सामाजिक विकास का उच्चतम उत्पादन है।” कुछ विद्वान् राष्ट्र निर्माण को राजनीतिक विकास समझते हैं। परन्तु वास्तव में राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास नहीं है। राजनीतिक विकास का अर्थ समाज का सामूहिक राजनीतिक परिवर्तन होता है। (Total Political Formation of Society.) राजनीतिक परिवर्तन के भिन्न-भिन्न पक्ष होते हैं।

आल्मण्ड और पॉवेल (Almond and Powell) के अनुसार, “राजनीतिक विकास अर्थात् राजनीतिक परिवर्तन में चार मुख्य समस्याएं होती हैं।” वे हैं-राज्य निर्माण, राष्ट्र निर्माण, राजनीतिक भागेदारी, कल्याण और विभाजन। (State building, Political Participation, Welfare and Distribution.) इसका अर्थ यह है कि राष्ट्र निर्माण न तो राज्य निर्माण है और न ही इसको राजनीतिक विकास कहा जा सकता है क्योंकि आल्मण्ड के मतानुसार राज्य निर्माण का अर्थ है एक राज्य में नये ढांचों की रचना और सरकार के चले हुए ढांचों का पुनर्गठन और उसकी अधिक क्रिया। इससे अभिप्राय यह है कि राज्य निर्माण का अर्थ है आधुनिक राजनीतिक ढांचों के सभी रूपों की रचना।

इसके विपरीत राष्ट्र निर्माण एक ढांचे सम्बन्धी समस्या नहीं है, राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों और नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

साधारण शब्दों में इसका अर्थ यह है कि परम्परावादी संकुचित वफ़ादारों को समाप्त होना चाहिए जैसे कि परिवार, जाति, धर्म, आदि के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर सम्पूर्ण प्रणाली तथा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी होनी चाहिए। इससे अभिप्राय यह है कि एक देश में राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) हो जहां एक व्यक्ति सीमित वफ़ादारियों की तुलना में राज्य के प्रति वफादारियों को अधिक महत्त्व दें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की परिभाषा दीजिए और राष्ट्र निर्माण के मुख्य तत्त्वों का उल्लेख करें।
अथवा
राष्ट्र निर्माण का अर्थ स्पष्ट करें। राष्ट्र निर्माण के मुख्य तत्वों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण का अर्थ- इसके लिए प्रश्न नं० 1 देखें। राष्ट्र निर्माण के तत्त्व-इसके लिए पाठ्य-पुस्तक का प्रश्न नं० १ देखें।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 3.
“राष्ट्र निर्माण” के मार्ग में बाधक तत्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाले बाधक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत को विदेशी गुलामी से स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 को प्राप्त हुई थी। इस दीर्घ समय में भारत राष्ट्र निर्माण के आदर्श को प्राप्त नहीं कर सका है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत में कुछ ऐसी समस्याएं विद्यमान हैं जो राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधाएं सिद्ध हुई हैं। ऐसी कुछ समस्याएं अथवा बाधाएं इस प्रकार हैं

1. साम्प्रदायिकता (Communalism):
भारत बहुधर्मी देश है। अंग्रेजों ने भारत के इस बहुधर्मी स्वरूप को अपने राजनीतिक हितों के लिए प्रयोग किया था। उन्होंने भारतीयों में ‘फूट डालो तथा राज्य करो’ की नीति (Policy of divide and rule) को ग्रहण किया था। अंग्रेजों ने विशेष रूप से हिन्दुओं तथा मुसलमानों में पारस्परिक वैर विरोध बढ़ाने के लिए विशेष प्रयत्न किये थे।

उनके ऐसे प्रयत्नों के कारण ही 1947 में साम्प्रदायिक आधार पर भारत का विभाजन हुआ था। इस विभाजन के साथ ही भारत में साम्प्रदायिकता समाप्त न हुई, बल्कि अनेक कारणों ने साम्प्रदायिकता को और भी अधिक उत्तेजित किया तथा अन्त में यह समस्या राष्ट्रीय एकीकरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण संकट अथवा बाधा बन गई।

2. जातिवाद (Casteism):
साम्प्रदायिकता की तरह जातिवाद भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में एक बड़ी बाधा है। जातिवाद के तथ्य ने लोगों को तुच्छ विचारों वाले मनुष्य बना दिया है। अनेक लोग राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा जाति हितों को प्राथमिकता देते हैं। उनकी ऐसी प्रवृत्ति ही राष्ट्रीय एकीकरण के मार्ग में बड़ी बाधा है।

3. भाषावाद (Linguism):
जिस तरह भारत एक बह-धर्मी देश है उसी तरह भारत एक बह-भाषाई देश भी है। भारतीय संविधान ने हिन्दी सहित भारत की 22 भाषाओं को मान्यता दी है। परन्तु भारत में बोलने वाली भाषाएं कई सैंकड़ों में हैं। भारतीय लोग अपनी भाषा के साथ बहुत अनुराग रखते हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि सभी लोगों को अपनी मातृ-भाषा से प्रेम होता है। परन्तु भारत में भाषा को एक राजनीतिक तथ्य बना दिया गया है। भाषावाद तथा साम्प्रदायिकता का गम्भीर संगम कर दिया है तथा यह संगम राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा बना हुआ है।

4. क्षेत्रवाद (Regionalism):
भारत एक विशाल देश है जिसके कई क्षेत्र (Regions) हैं। कई क्षेत्रों को भाषा के आधार पर राज्यों के रूप में संगठित किया गया है। लोगों की क्षेत्रवाद की भावना इतनी अधिक बलवान् है कि राष्ट्रीय सरकार इन विवादों को सम्बन्धित लोगों की प्रसन्नतानुसार हल नहीं कर सकी है। क्षेत्रवाद की इस बलवान भावना के कारण ही भारत के कई भागों में पृथक्कवाद का स्वर भी उठा है। इस तरह क्षेत्रवाद अथवा प्रदेशवाद राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा बन गया है।

5. साम्प्रदायिक राजनीतिक दल (Communal Political Parties):
भारत के कुछ राजनीतिक दल साम्प्रदायिक आधारों पर संगठित किए गए हैं। कुछ ऐसे दल भी हैं जिसका संगठन जाति अथवा भाषा के आधार पर किया गया है। ऐसे राजनीतिक दल दोनों की धार्मिक, जातीय अथवा भाषाई भावनाओं को अपने राजनीतिक हितों के लिए उत्तेजित करते हैं। इस तरह की नीतियों वाले राजनीतिक दल भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में रुकावट सिद्ध होते हैं।

6. राजनीतिक अवसरवादिता (Political Opportunism):
भारत में लगभग सभी राजनीतिक दलों में राजनीतिक अवसरवादिता पाई जाती है। राजनीतिक व्यक्ति यह देखते हैं कि उसके दल को राजनीतिक लाभ किस तरह हो सकता है। राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए विरोधी विचारों वाले राजनीतिक दल चुनाव गठबन्धन कर लेते हैं। इसका परिणाम यह निकला है कि अधिकतर नेताओं तथा उनके समर्थकों में अपने स्वार्थी हितों के अतिरिक्त राष्ट्र अथवा समाज के हितों के विषय में सोचने अथवा कुछ करने की कोई रुचि नहीं रही है। ऐसी रुचि का अभाव भी राष्ट्र निर्माण के आदर्श के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है।

7. ग़रीबी तथा निरक्षरता (Poverty and Illiteracy):
भारत में ग़रीबी तथा निरक्षरता व्यापक स्तर पर पाई जाती है। ऐसे लोगों को राष्ट्र निर्माण के अर्थों का ज्ञान शायद तब तक न हो सके जब तक ग़रीबी तथा निरक्षरता से उनकी मुक्ति नहीं हो जाती है।

8. आन्दोलनों तथा हिंसा की राजनीति (Politics of Agitation and Violence):
भारतीय राजनीति वास्तव में आन्दोलनों की राजनीति बन गई है। छोटी-छोटी बातों के लिए भी हड़तालों, धरनों, रैलियों इत्यादि का सहारा लिया जाता है। हिंसक घटनाएं लोगों में एक-दूसरे के प्रति घृणा उत्पन्न करती हैं। इस तरह आन्दोलनों तथा हिंसा की राजनीति भी राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधा सिद्ध हो रही है।

9. अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना (Sence of Insecurity in Minorities):
भारत में अनेक ही धार्मिक, भाषाई तथा सांस्कृतिक अल्पसंख्यक है। संविधान ने इन अल्पसंख्यकों को अपनी संस्कृति तथा भाषा की सुरक्षा का अधिकार दिया हुआ है परन्तु इसके बावजूद भारत में रहते अल्पसंख्यकों को असुरक्षा की भावना अनुभव होती है। इस तरह अल्पसंख्यकों तथा बहुसंख्यकों में अविश्वास की भावना बढ़ती जा रही है तथा भावना राष्ट्र निर्माण के लिए बाधा सिद्ध होगी।

10. अपर्याप्त संसाधन (Inadequate Resources):
भारत में धन एवं पर्याप्त संसाधनों की कमी है, जिसके कारण राष्ट्र निर्माण के कार्यों में बाधा पहुंचती है।

प्रश्न 4.
राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के उपायों का वर्णन कीजिए। 2014, 18)
उत्तर:
भारतीय राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली रुकावटों को निम्नलिखित उपायों द्वारा दूर किया जा सकता है

1. शिक्षा प्रणाली में सुधार (Reforms in Educational System):
प्रचलित भारतीय शैक्षिक प्रणाली में क्रान्तिकारी सुधार किए जाने अनिवार्य हैं। शिक्षा को वास्तविक जीवन से सम्बन्धित करने की अति आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त शैक्षिक प्रणाली में ऐसे सुधार करने चाहिए जिनके फलस्वरूप शिक्षा रोज़गार प्रधान (Employment Oriented) हो तथा विद्यार्थियों में हथकरघों का गुण विकसित करे।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना ही नहीं होना चाहिए बल्कि विद्यार्थियों में देश-भक्ति तथा राष्ट्रवाद की भावना तथा राष्ट्रीय चरित्र का विकास होना चाहिए। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो विद्यार्थियों में धर्म-निरपेक्षता का गुण विकसित कर सके तथा उनके दृष्टिकोण को विशाल कर सके।

2. ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को दूर करना (Removal of Poverty and Unemployment):
जब तक बेरोज़गारी को समाप्त नहीं किया जाता तब तक ग़रीबी की भी समाप्ति नहीं हो सकती। ये दोनों आर्थिक बुराइयां परस्पर सम्बन्धित हैं तथा दोनों की समाप्ति के बिना राष्ट्र निर्माण का कार्य सफल नहीं हो सकता।

3. सन्तुलित आर्थिक विकास (Balanced Economic Development):
भारत के विभिन्न भागों अथवा क्षेत्रों का सन्तुलित विकास होना अनिवार्य है। यदि कुछ क्षेत्र अधिक विकसित हों तथा कुछ अधिक पिछड़े होंगे तो उनमें ईर्ष्या अथवा पारस्परिक विरोध की भावना उत्पन्न हो सकती है। इस पारस्परिक विरोध के अतिरिक्त पिछड़े हुए क्षेत्रों के लोगों में ऐसा असन्तोष फैलता है कि वह धीरे-धीरे राष्ट्रीय मुख्य धारा से दूर होते जाते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए देश के सभी क्षेत्रों का सन्तुलित विकास होना चाहिए।

4. भाषा की समस्या का समाधान (Solution of Language Problem):
भारत में भाषा की समस्या भी गम्भीर रूप की है। भाषा की समस्या का समाधान करने के लिए तीन भाषाई फार्मूला तैयार किया गया था। इस फार्मूले ने भाषा सम्बन्धी समस्या की गम्भीरता को कुछ कम तो अवश्य किया है परन्तु समस्या पूरी तरह हल नहीं हुई। भाषा सम्बन्धी समस्या को हल किए बिना राष्ट्र निर्माण के आदर्श की प्राप्ति असम्भव है।

5. भारतीय भाषाओं की एक साझी लिपि (Common Script for all Indian Languages):
राष्ट्र निर्माण के कार्य की सफलता के लिए सभी भारतीय भाषाओं की एक सांझी लिपि का विकास करना अनिवार्य है। यूरोप के कई देशों में कई भाषाएं बोली जाती हैं तथा रोमन लिपि को सभी भाषाओं की एक सांझी लिपि के रूप में ग्रहण किया जाता है।

आचार्य विनोबा भावे तथा श्री राज नारायण ने देवनागरी लिपि को सभी भारतीय भाषाओं की सांझी लिपि के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया था। यदि कोई सांझी लिपि ग्रहण कर ली जाए तो विभिन्न भाषाएं बोलने वाले भारतीयों में वह लिपि साझी कड़ी का काम कर सकती है।

6. स्वस्थ राजनीतिक वातावरण (Healthy Political Atmosphere):
यदि देश के राजनीतिक वातावरण में आवश्यक सुधार न किए गए तो राष्ट निर्माण का आदर्श मात्र कल्पना बन कर ही रह जाएगा। इसलिए यह अनिवार्य है कि राजनीतिक बुराइयों को दूर करके राजनीतिक वातावरण स्वस्थ बनाया जाए।

7. स्वच्छ प्रशासन (Clean Administration):
राजनीतिक भ्रष्टाचार ने प्रशासन को भी भ्रष्ट बना दिया है। आज प्रशासन के प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार की भरमार है। धन के बल से प्रशासकीय अधिकारियों से गैर-कानूनी कार्य भी करवाए जाते हैं। यह भी सत्य है कि रिश्वत दिए बिना उचित कार्य कम ही होते हैं। प्रशासन में बेइमानी, रिश्वतखोरी को समाप्त करने की आवश्यकता है। ऐसी बुराइयों को समाप्त करने से ही स्वच्छ प्रशासन सम्भव हो सकता है।

8. साम्प्रदायिक राजनीतिक दलों तथा संगठनों पर प्रतिबन्ध (Ban on Communal Parties and Organisations):
राष्ट्र निर्माण की प्राप्ति के लिए यह भी आवश्यक है कि ऐसे राजनीतिक दलों तथा संगठनों पर प्रतिबन्ध लगाया जाए जो लोगों में साम्प्रदायिकता की घृणा उत्पन्न करते हैं।

9. दल प्रणाली में सुधार (Reforms in Party System):
हमारे देश में बहुदलीय प्रणाली है। ठोस सिद्धान्तों पर आधारित राजनीतिक दलों का अभाव है। दलों में आन्तरिक लोकतन्त्र का भी अभाव है। गुटबन्दी अथवा आन्तरिक धड़ेबन्दी लगभग प्रत्येक भारतीय राजनीतिक दल की विशेषता बन चुकी है। इतने अधिक राजनीतिक दल राष्ट्रीय एकता के लिए स्वयं ही संकट बन जाते हैं। राष्ट्र निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि दल प्रणाली में ऐसे सुधार किए जाएं।

10. भावनात्मक एकीकरण (Emotional Integration):
राष्ट्र निर्माण के लिए भारतीयों में भावनात्मक एकीकरण का होना है। भावनात्मक एकीकरण एक प्रकार की भावना है जिसका स्थान लोगों के मन तथा दिमागों में हैं। भावनात्मक एकीकरण की प्राप्ति सत्ताधारी कानूनों द्वारा नहीं हो सकती। यह तो एक आन्तरिक भावना है जो स्वयं ही विकसित हो सकती है तथा लोगों को जागृत करने से उनके मन में उत्पन्न की जा सकती है। भारतीय राष्ट्र निर्माण के आदर्श की प्राप्ति के लिए भारतीयों में पारस्परिक भावनात्मक साझेदारी विकसित की जानी अनिवार्य है।

प्रश्न 5.
विभाजन की विरासतों का वर्णन करें।
अथवा
1947 में भारत विभाजन से उत्पन्न समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत लगभग 200 वर्षों तक ब्रिटेन के अधीन रहा। एक लम्बे स्वतन्त्रता संग्राम के कारण भारत को 15 अगस्त, 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। परन्तु भारत की स्वतन्त्रता के साथ-साथ भारत का दुःखद विभाजन हो गया तथा पाकिस्तान नाम का एक नया स्वतन्त्र राज्य अस्तित्व में आया। भारत विभाजन के समय हमें बहुत-सी समस्याएं विरासत के रूप में मिलीं। जैसे रिफ्यूजियों के पुनर्वास की समस्या, कश्मीर समस्या, राज्यों के गठन एवं पुनर्गठन की समस्या तथा भाषा से सम्बन्धित राजनीतिक विवाद। इन समस्याओं से निपटने के लिए पं० नेहरू एवं सहयोगियों ने क्या दृष्टिकोण अपनाया, उनका वर्णन इस प्रकार है

1. शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या (Problem of resettlement of Refugee):
भारत के विभाजन के फलस्वरूप जो पहली समस्या हमें विरासत के रूप में मिली, वह थी शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या। जब भारत का विभाजन होना निश्चित हो गया, तो बड़ी संख्या में जो लोग पाकिस्तान को छोड़कर भारत आए, उन्हें ही वास्तव में शरणार्थी कहा जाता है। पाकिस्तान छोड़कर भारत आने वाले लोगों की संख्या लाखों में थी।

अतः सरकार के सामने इन लोगों के पुनर्वास की मुश्किल समस्या सामने थी। भारत सरकार को न केवल इन शरणार्थी लोगों को भारत में रहने के लिए घरों की ही व्यवस्था करनी थी, बल्कि उन्हें मनोवैज्ञानिक आधार पर यह समझाना भी था, कि जिस प्रकार वे पाकिस्तान में सुरक्षित जीवन व्यतीत कर रहे थे, वैसा ही सुरक्षित जीवन उन्हें अब भारत में भी प्रदान किया जायेगा।

परन्तु विभाजन के समय दोनों ओर से जिस प्रकार कत्लेआम किया जा रहा था, वैसी स्थिति में लोगों को किसी भी प्रकार का ढाढस या विश्वास दिलाना मुश्किल था, क्योंकि इस विभाजन के कारण लाखों लोगों को अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा था यही कारण था, कि विभाजन के समय भारत आने वाले लोग, जिन्हें हम शरणार्थी कहते हैं, काफ़ी डरे हुए थे,

इसके साथ ही इन लोगों को अपनी ज़मीन जायदाद की चिन्ता भी सता रही थी कि बार्डर के दूसरी ओर (हिन्दुस्तान) जाकर हमें हमारी सम्पत्ति एवं जायदाद के मुआवजे के रूप में कुछ प्राप्त भी होगा, या नहीं। शरणार्थियों की इस प्रकार की समस्याओं ने तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० नेहरू एवं उनके सहयोगियों के सामने मुश्किलें खड़ी कर रखी थीं तथा पं० नेहरू एवं उनके सहयोगियों के लिए इस प्रकार की समस्या से निपटना एक चुनौती थी।

समस्या का समाधान (Settlement of the Problems) यद्यपि शरणार्थियों की समस्या भारत के विभाजन की सबसे बड़ी समस्या थी, परन्तु भारत सरकार को इस समस्या को निपटाना ही था, अन्यथा भारत में अराजकता की स्थिति पैदा होने का खतरा था, तथा जो लोग अपना सब कुछ छोड़कर भारत आए उन्हें यह लगे कि उन्होंने भारत आकर कोई गल्ती नहीं की।

इस समस्या को हल करने के लिए भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० नेहरू ने दूरदर्शिता का परिचय दिया तथा लोगों के पुनर्वास को बड़े ही संयम ढंग से व्यावहारिक रूप प्रदान किया। पं० नेहरू ने शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए सर्वप्रथम एक पुनर्वास मन्त्रालय (Resettlement Ministry) का निर्माण किया, जिसको शरणार्थी लोगों के पुनर्वास की ज़िम्मेदारी सौंपी गई।

शरणार्थियों को अस्थाई तौर पर ठहराने के लिए जगह-जगह कैम्प लगाए। जैसे-जैसे इन लोगों के रहने की पूर्णकालिक व्यवस्था होने लगी, वैसे-वैसे उन्हें इन कैम्पों से निकालकर उन स्थानों पर भेजा जाने लगा। पं० नेहरू ने शरणार्थियों को मुआवजे के रूप में यथा-योग्य जमीन जायदाद प्रदान की। उन्हें सभी प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक अधिकार प्रदान किये गए। 1955 में नागरिकता कानून बना कर इन शरणार्थियों को भारत का नागरिक बनाया गया। इस प्रकार पं० नेहरू ने अपने सकारात्मक दृष्टिकोण से एक बड़ी ही जटिल समस्या का समाधान किया।

2. कश्मीर की समस्या (The Kashmir Problem)-कश्मीर की समस्या भारत एवं पाकिस्तान के बीच एक प्रमुख समस्या बनी हुई है। भारत के विभाजन स्वरूप कश्मीर समस्या पैदा हुई। स्वतन्त्रता से पहले कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय यह निर्णय लिया गया कि इस बात का फैसला स्वयं कश्मीर करेगा कि वह भारत में शामिल होना चाहता है या पाकिस्तान में या स्वतन्त्र राज्य बनना चाहेगा। कश्मीर के राजा हरि सिंह ने कश्मीर को एक स्वतन्त्र राज्य ही बनाये रखने का निर्णय लिया। परन्तु पाकिस्तान सदैव ही कश्मीर को अपने राज्य में शामिल करने के लिए उत्सुक रहा। अतः उसने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया।

15 अक्तूबर, 1947 को लगभग 5000 आक्रमणकारियों ने कश्मीर के अन्दर ओवन के किले (Fort Owen) की घेराबन्दी शुरू कर दी। 22 अक्तूबर, तक इस घुसपैठ ने एक पूर्ण आक्रमण का रूप धारण कर लिया। यह बात सर्वविदित थी, कि आक्रमणकारियों में अधिकांशतः पाकिस्तानी सैनिक थे। इस आक्रमण से कश्मीर के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया। इससे भारत का चिन्तित होना भी स्वाभाविक था, क्योंकि इस प्रकार की घटना का भारत में अवश्य प्रभाव पड़ता। अत: कश्मीर समस्या का समाधान पं० नेहरू एवं सरदार पटेल के लिए एक मुश्किल चुनौती थी।

समस्या के समाधान का प्रयास (Efforts to resolve the Problem)-कश्मीर के राजा हरि सिंह को जब यह लगने लगा, कि कश्मीर पर पाकिस्तान का कब्जा हो जायेगा, तो उसने भारत से सहायता मांगी। भारत ने सहायता का आश्वासन देते हुए कश्मीर को भारत में शामिल होने की बात कही, जिसे राजा हरि सिंह ने मान लिया। इस पर पं० नेहरू एवं सरदार पटेल ने भारतीय सेना को कश्मीर में भेजा, इसके साथ भारत ने पाकिस्तान से यह आग्रह किया कि, वह कश्मीर में अपनी सैनिक गतिविधियां बन्द करें।

परन्तु पाकिस्तान ने इससे इन्कार कर दिया। जब भारत सरकार एवं माऊंटबेटन को यह लगने लगा, कि कश्मीर की समस्या को इस ढंग से नहीं सुलझाया जा सकता तो, पं० नेहरू इस समस्या को संयुक्त राष्ट्र के सामने ले गए, ताकि इसका कोई सर्वमान्य हल निकल सके। परन्तु कश्मीर की समस्या काफ़ी सालों तक बनी रही। अन्तत: 5-6 अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया तथा यह स्पष्ट किया, कि अब केवल पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे वाले (पी० ओ० के०-POK) पर ही बातचीत होगी।

3. राज्यों का गठन एवं पुनर्गठन की समस्या-इसके लिए प्रश्न नं० 6 देखें। प्रश्न 6. भारत में राज्यों के पुनर्गठन पर एक विस्तृत लेख लिखें।
उत्तर:
भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप विरासत के रूप में जो दूसरी बड़ी समस्या मिली, वह थी, देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले भारत दो भागों में बंटा हआ था-ब्रिटिश भारत (British India) एवं देशी राज्य (Native States) । ब्रिटिश भारत का शासन तत्कालीन भारत सरकार के अधीन था, जबकि देशी राज्यों का शासन देशी राजाओं के हाथों में था। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के मार्ग में देशी रियासतें सदैव बाधा बनी रहीं। इन देशी रियासतों ने संवैधानिक गतिरोधों को बढ़ावा दिया। जब कभी भी भारत की संवैधानिक समस्या को हल करने का प्रयास किया जाता, तो इन देशी रियासतों के भविष्य की समस्या पैदा हो जाती थी।

स्वतन्त्र भारत के निर्माण के भावी ढांचे में देशी रियासतों के लिए व्यवस्था करना संविधान निर्माताओं के लिए हमेशा सिरदर्द बना रहा। स्वतन्त्रता प्राप्ति से पहले भारत में देशी रियासतों की संख्या लगभग 565 थी, इसके अन्तर्गत भारत की जनसंख्या का 20% भाग तथा भारत के क्षेत्रफल का लगभग 45% भाग आता था, अतः इतनी बड़ी जनसंख्या एवं क्षेत्रफल को भारत से अलग नहीं किया जा सकता था और उस स्थिति में तो बिल्कुल नहीं, जब अधिकांश देशी रियासतें भारत के आन्तरिक हिस्सों में विद्यमान थीं।

इन देशी रियासतों में जनसंख्या, क्षेत्र एवं आर्थिक दृष्टिकोण के आधार पर पर्याप्त अन्तर पाए जाते थे, जहां एक ओर कश्मीर, हैदराबाद तथा मैसूर जैसे ऐसे देशी राज्य थे जोकि कई यूरोपीय राज्यों से भी बड़े थे, तो वहीं दूसरी ओर काठियावाड़ तथा पश्चिमी भारत के देशी राज्य नक्शों में सूई की नोक से अधिक बड़े नहीं थे। ये देशी राज्य भारत में विलय को तैयार नहीं थे, जोकि भारत की कानून व्यवस्था के लिए काफ़ी हानिकारक स्थिति थी। वी० पी० मेनन का कहना है, कि, “निराशावादी भविष्यवक्ताओं ने यह भविष्यवाणी की, कि भारतीय स्वतन्त्रता की नौका देशी रियासतों की चट्टानों से टकरा कर चूर-चूर हो जायेगी।” इस प्रकार देशी रियासतों की भारत में विलय की समस्या भारत सरकार के सामने खड़ी थी।

समस्या का समाधान (Resettlement of the Problems) यद्यपि देशी रियासतों की भारत में विलय की समस्या एक महत्त्वपूर्ण समस्या थी, परन्तु पं० नेहरू एवं तत्कालीन गृहमन्त्री सरदार पटेल ने इस समस्या को बड़े ही सुनियोजित ढंग से सुलझाया। देशी रियासतों की समस्या के हल के लिए पं० नेहरू ने 27 जून, 1947 को एक विभाग की स्थापना की, जिसे राज्य विभाग (State’s Department) कहा जाता है। पं० नेहरू ने सरदार पटेल को इस विभाग का मन्त्री एवं वी० पी० मेनन को इसका सचिव नियुक्त किया।

देशी रियासतों का भारत में विलय तीन चरणों के अन्तर्गत किया गया। प्रथम एकीकरण, द्वितीय-अधिमिलन, तृतीय-प्रजातन्त्रीकरण। एकीकरण (Integration) के अन्तर्गत वे देशी रियासतें आती हैं, जिन्होंने सरदार पटेल के परामर्श पर स्वयं ही भारत में विलय होना स्वीकार कर लिया था। अधिकांश देशी रियासतें इसी आधार पर भारत में शामिल हो गईं।

जबकि अधिमिलन (Accession) के अन्तर्गत जूनागढ़ एवं हैदराबाद जैसी रिय ो शामिल किया गया, क्योंकि इन्होंने स्वेच्छा से भारत में शामिल होना स्वीकार नहीं किया था, परन्तु सरदार पटेल ने अपने रणनीतिक कौशल एवं सूझ-बूझ से इन दोनों रियासतों को भारत में विलय होने के लिए मजबूर कर दिया।

तीसरा चरण इन संस्थाओं के प्रजातन्त्रीकरण (Democratisation) से सम्बन्धित है। देशी रियासतों को प्रजातान्त्रिक ढांचे में ढालना भारत सरकार के लिए प्रमुख समस्या थी। इस समस्या के लिए प्रान्तों में प्रजातान्त्रिक एवं प्रतिनिधिक संस्थाओं की स्थापना की गई। इन प्रान्तों में भी संसदीय शासन प्रणाली लागू की गई तथा निर्वाचित विधानसभाओं की व्यवस्था की गई। इस प्रकार पं० नेहरू एवं सरदार पटेल की सूझ-बूझ से देशी रियासतों की समस्या का समाधान हो पाया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 7.
‘भाषा’ पर राजनीतिक विवाद की समस्या का वर्णन करें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के पश्चात् संविधान निर्माताओं के सामने एक प्रमुख समस्या सरकारी भाषा को लेकर थी। भारत के बहुत बड़े भाग में हिन्दी भाषा बोली जाती है लेकिन विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। भाषायी विविधता को देखते हुए भी संविधान निर्माता इस बात पर सहमत थे कि भारत के लिए एक सामान्य भाषा का होना आवश्यक है।

संविधान सभा के बहुत-से सदस्य हिन्दी को सरकारी भाषा बनाने के पक्ष में थे जबकि अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से आए सदस्यों ने इसका विरोध किया। इनका मानना था कि यदि हिन्दी को सरकारी भाषा घोषित कर दिया गया तो प्रतियोगी सरकारी नौकरियों में हिन्दी बोलने वाले व्यक्तियों का प्रभुत्व स्थापित हो जाएगा और ग़ैर-हिन्दी भाषी क्षेत्र पिछड़ जाएंगे।

परन्तु हिन्दी भाषा के समर्थकों का विचार था कि, क्योंकि भारत के लगभग 40 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलने वाले हैं, अतः हिन्दी स्वाभाविक रूप से सरकारी भाषा होनी चाहिए। उनका यह भी मानना था कि यदि अंग्रेज़ी को सरकारी भाषा घोषित किया गया तो इससे सरकार और लोगों में दूरियां बढ़ जाएंगी क्योंकि विदेशी भाषा होने के कारण लोग इससे भावनात्मक रूप से जुड़ नहीं पाएंगे।

अन्ततः संविधान सभा में यह निर्णय लिया गया कि हिन्दी भारत की सरकारी भाषा होगी। (अनुच्छेद 343) लेकिन अंग्रेजी भाषा अगले 15 वर्षों तक संघीय सरकार के अधिकारिक कार्यों के लिए जारी रहेगी। इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 345 में यह भी व्यवस्था की गई कि राज्य विधानमण्डल के कानून द्वारा कोई राज्य अधिकारिक रूप से किसी अन्य भाषा को सरकारी कार्यों के लिए प्रयोग कर सकता है।

यद्यपि अंग्रेजी भाषा संविधान लागू होने के 15 वर्षों तक सरकारी भाषा के रूप में जारी रहनी थी, परन्तु 1955 में श्री जी० बी० खेर (G.B. Kher) की अध्यक्षता में गठित सरकारी भाषा आयोग ने अंग्रेजी भाषा के स्थान पर हिन्दी भाषा का प्रयोग करने पर बल दिया। भाषा आयोग ने और भी कई महत्त्वपूर्ण सिफ़ारिशें कीं। लेकिन भाषा आयोग की सिफारिशों पर गैर-हिन्दी क्षेत्रों में तीखी प्रतिक्रिया हुई। इसके विरोध में देश के कई स्थानों पर व्यापक प्रदर्शन हुए।

सरकारी भाषा विधेयक, 1963 (Official Language Bill, 1963):
अप्रैल, 1963 में संसद् में औपचारिक रूप से सरकारी भाषा विधेयक प्रस्तुत किया गया। साथ ही प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू को यह भी आश्वासन देना पड़ा कि हिन्दी भाषा को गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों पर थोपा नहीं जाएगा। हिन्दी का सरकारी भाषा बनना और भाषायी विवाद (Hindi to be an official Language and Lingual Conflicts)-26 जनवरी, 1965 को हिन्दी सरकारी भाषा बन गई।

लेकिन जब इसको लागू करने का प्रश्न आया तो भारत के अधिकांश प्रदेशों में भारी प्रदर्शन एवं दंगे हुए। विशेषतया मद्रास, बंगाल और केरल में हिन्दी विरोधी जबकि उत्तरी राज्यों-राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि में हिन्दी के समर्थन में प्रदर्शन हुए।

भाषायी विवाद के दिनों में सितम्बर-अक्तूबर, 1961 में दिल्ली में हुए राष्ट्रीय एकता सम्मेलन में यह सुझाव दिया गया था कि सैकेण्डरी शिक्षा के लिए त्रि-भाषा फार्मूला प्रयोग में लाया जाए। यह कहा गया कि हिन्दी भाषी राज्यों में हिन्दी और अंग्रेजी के साथ-साथ एक और आधुनिक भाषा अपनाई जाएगी और गैर-हिन्दी भाषी राज्यों में क्षेत्रीय भाषा और अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी भाषा को पढ़ाए जाने की व्यवस्था की जाए।

धीरे-धीरे हिन्दी अंग्रेजी भाषा का स्थान ले लेगी। लेकिन त्रि-भाषीय फार्मूला एक मज़ाक बन कर रह गया। 1965 में हिन्दी विरोधी दंगों को शान्त करने के लिए प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने यह आश्वासन दिया, कि हिन्दी को सरकारी स्तर पर लाने का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है, कि अंग्रेजी को भारत से बाहर निकाला जा रहा है, गैर-हिन्दी भाषी राज्य तब तक अंग्रेजी का प्रयोग करते रहेंगे, जब तक वे हिन्दी प्रयोग के लिए तैयार नहीं हो जाते।

प्रश्न 8.
स्वतंत्र भारत के सामने मुख्य चुनौतियां क्या थीं ?
उत्तर:
स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी निम्नलिखित चुनौतियां थीं

1. राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती-स्वतत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय एकीकरण की थी। स्वतंत्रता के समय लगभग 565 देशी रियासतों को भारत में शामिल करने की बड़ी चुनौती थी। इन सभी रियासतों की बोली, भाषा, खान-पान, रहन-सहन तथा पहरावा सब कुछ भिन्न-भिन्न था। अधिक अनेकता वाला देश कभी भी एकजुट नहीं रह सकता। इसीलिए देश के नेताओं के सामने देश के भविष्य को लेकर गम्भीर प्रश्न खड़े थे। जिसका हल किया जाना आवश्यक था।

2. विकास की चुनौती-स्वतंत्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी एक अन्य बड़ी चुनौती विकास की थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता थी, क्योंकि अंग्रेज़ भारत को बहुत बुरी दशा में छोड़कर गए थे। अतः सभी प्रकार के क्षेत्र में विकास की आवश्यकता थी। साथ ही साथ भारतीय नेताओं को इस बात की भी व्यवस्था करनी थी कि विकास ऐसा हो, जिससे सभी वर्गों का कल्याण हो।

3. लोकतन्त्र की स्थापना की चुनौती-स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में नेताओं के समक्ष लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की भी चुनौती थी। ताकि समाज के सभी वर्गों को भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिल सके। इसके लिए भारत में संसदीय शासन प्रणाली की व्यवस्था की गई, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई। लोगों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए तथा राज्य के नीति निर्देशक तत्त्वों की व्यवस्था की गई।

प्रश्न 9.
भारत विभाजन के अच्छे व बरे परिणामों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत का विभाजन सन् 1947 में हुआ। इस विभाजन के अच्छे एवं बुरे परिणामों का वर्णन इस प्रकार है

(क) भारत विभाजन के अच्छे परिणाम

  • भारत विभाजन से लोगों को आजादी अपेक्षाकृत जल्दी मिल गई।
  • विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् कानून व्यवस्था को लागू करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् प्रशासन को उचित एवं कुशलतापूर्वक चलाया जाने लगा।

(ख) भारत विभाजन के बुरे परिणाम

  • सन् 1947 में बड़े पैमाने पर एक जगह की आबादी को दूसरी जगह जाना पड़ा।
  • धर्म के नाम पर एक समुदाय के लोगों ने दूसरे समुदायों के लोगों को बेरहमी से कत्ल किया।
  • भारत विभाजन से महिलाओं को अमानवीय यातनाएं झेलनी पड़ी।
  • भारत विभाजन से देश की एकता एवं अखण्डता को गहरा धक्का लगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण से आपका क्या तात्पर्य है ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों और नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

साधारण शब्दों में, इसका अर्थ यह है कि परम्परावादी संकुचित वफ़ादारियों को समाप्त होना चाहिए जैसे कि परिवार, जाति, धर्म आदि के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर सम्पूर्ण प्रणाली तथा राष्ट्र के प्रति वफ़ादारी होनी चाहिए। इससे अभिप्राय यह है कि एक देश में राष्ट्रीय एकीकरण (National Integration) हो जहां एक व्यक्ति सीमित वफ़ादारियों की तुलना में राज्य के प्रति वफ़ादारियों को अधिक महत्त्व दें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की परिभाषा दें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण की निम्नलिखित परिभाषाएं हैं

(1) डेविड ए० विल्सन के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।”

(2) ब्लंटशली के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण मनुष्यों के ऐसे समूह को कहते हैं, जो विशेषतया भाग और रीति-रिवाज द्वारा एक समान सभ्यता में बंधे हुए हैं, जिससे उनमें एकता और समस्त विदेशियों से भिन्नता की भावना उत्पन्न हो।”

(3) लूसियन पाई के मतानुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफ़ादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

(4) प्रेडियर फोडरे के अनुसार, “नस्ल की साझ और भाषा, आदतें, रीति-रिवाज और धर्म की समानता ऐसे तत्त्व हैं, जो राष्ट्र का निर्माण करते हैं।”

प्रश्न 3.
राष्ट्र निर्माण के विषय में लूसियन पाई के विचारों का वर्णन करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण के विषय में लूसियन पाई के विचारों को तीन भागों में बांटा जा सकता है

1. सामूहिक जन-सम्बन्धी-राजनीतिक विकास को जब जन-सम्बन्धी स्तर से देखते हैं तो इसका अर्थ यह हो जाता है कि लोगों के आदर्श में क्या मुख्य परिवर्तन आया है। वे सरकार और उच्च स्तरीय अधिकारियों इत्यादि के निर्णयों का पालन कैसे करते हैं ? और राजनीतिक निर्णयों में किस तरह और किस हद तक भागीदार है। इसको गण का सिद्धान्त (Principal of Quality) कहा जा सकता है।

2. सरकार के स्तर सम्बन्धी राजनीतिक विकास के साथ प्रजातन्त्र प्रणाली में अधिक शक्ति (सामर्थ्य) उत्पन्न हो जाती है। इसका अर्थ है कि जन सम्बन्धी मामलों के प्रतिबन्ध की सामर्थ्य तथा जन साधारण की मांगों के साथ चलने की सामर्थ्य । एक अविकसित राजनीतिक प्रणाली में इस प्रकार का सामर्थ्य बहुत कम होता है।

3. नीति के संगठन सम्बन्धी-राजनीतिक प्रणाली के संगठन के विषय में यह कहा जा सकता है कि एक विकसित हो रही राजनीतिक प्रणाली में संगठन सम्बन्धी भिन्नता अधिक होती है और भागीदारी संस्थाओं का समूहीकरण भी 15 अधिक होता है। इससे यह पता चलता है कि पाई (Pye) की राजनीतिक विकास की धारणा आल्मण्ड (Almond) के राजनीतिक विकास की धारणा से भिन्न है क्योंकि वह सामर्थ्य का एक नया तत्त्व प्रस्तुत करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 4.
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है

1. औद्योगीकरण. औद्योगीकरण राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करता है। जैसे ही एक देश औद्योगिक उन्नति करता लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वे अपनी परानी आदतों और परम्पराओं को त्याग देते हैं।

2. ध्यम का प्रसार एक राष्ट्र में जन-माध्यम के साधनों का विकास और प्रसार भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देता है। जन-माध्यम के साधनों में समाचार-पत्र, प्रसारण, डाक एवं तार प्रबन्ध, सड़कें, रेलें, वायु सेवाएं, चलचित्र, टेलीविज़न आदि शामिल हैं। इन साधनों द्वारा नागरिकों में अधिक जानकारी तथा चेतनता उत्पन्न होती है।

3. धर्म-निरपेक्ष संस्कृति का प्रसार-धर्म-निरपेक्ष संस्कृति भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देती है क्योंकि कट्टर धर्म कई बार नागरिकों में फूट और घृणा पैदा करता है। इसके विपरीत यदि एक देश में लोग धर्म-निरपेक्ष संस्कृति को अपना लें तो उनका दृष्टिकोण विशाल हो जाता है।

4. राजनीतिक भागीदारी-राजनीतिक भागीदारी भी राष्ट्र-निर्माण में अपनी भूमिका निभाती है। इसका अर्थ यह है कि लोगों को राष्ट्र की राजनीतिक क्रियाओं में भाग लेना चाहिए। यदि वे राजनीतिक क्रियाओं, जनता के कामों और निर्णयों में भाग लेते रहें तो राष्ट्र निर्माण में वृद्धि होती है। राजनीतिक भागीदारी के साथ अवसरों की समानता भी उत्पन्न होती है। इससे जाति-पाति के प्रभावों को भी पराजित किया जाता है।

प्रश्न 5.
राष्ट्र निर्माण के किन्हीं चार बाधक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के चार बाधक तत्त्वों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • जातिवाद राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा है।
  • भाषावाद ने राष्ट्र निर्माण के मार्ग में बाधाएं पैदा की हैं।
  • क्षेत्रवाद ने राष्ट्र निर्माण की भावना को हानि पहुंचाई है।
  • भारत में कुछ सांप्रदायिक दल पाए जाते हैं, जो राष्ट्र निर्माण के मार्ग में रुकावट सिद्ध होते हैं।

प्रश्न 6.
भारतीय संघ में हैदराबाद को शामिल करने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता के समय भारत में लगभग 565 देशी रियासतें थीं। ब्रिटिश सरकार ने इन रियासतों को यह निर्णय करने की छूट दे दी थी, कि वे भारत में शामिल हों, या पाकिस्तान में या स्वतन्त्र राज्य के रूप में अपने आपको बनाये रखें। तत्कालीन परिस्थितियों में हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय किया। परन्तु हैदराबाद का निजाम परोक्ष रूप से पाकिस्तान समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित था। इसका क्षेत्रफल 132000 वर्ग किलोमीटर था।

इसकी जनसंख्या लगभग एक करोड़ चालीस लाख थी। इस जनसंख्या में से लगभग 85% जनसंख्या हिन्दू थी। भारत के गृहमन्त्री सरदार पटेल को यह अन्देशा था कि आने वाले समय में हैदराबाद पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत के लिए खतरा पैदा कर सकता है। हैदराबाद के निजाम ने पाकिस्तान से हथियार खरीद कर हिन्दुओं पर अत्याचार करने शुरू कर दिये।

सरदार पटेल ने लॉर्ड माऊण्टबेटन की मदद से निजाम को यह समझाने का पूरा प्रयास किया कि हैदराबाद को भारत में मिलाने में ही हित है। परन्तु निजाम ने सभी प्रयासों को नकार दिया। तत्पश्चात् सरदार पटेल ने हैदराबाद के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही करने का आदेश दिया। 13 सितम्बर, 1947 से 18 सितम्बर, 1947 तक दोनों पक्षों में युद्ध हुआ परन्तु हैदराबाद के लड़ाकुओं को भारतीय सेना के सामने हथियार डालने ही पड़े। हैदराबाद को भारत में मिला लेने की अनेक मुसलमान नेताओं ने तारीफ की।

प्रश्न 7.
भारतीय संघ में जूनागढ़ को शामिल करने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
जूनागढ़ गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक राज्य था। इसमें बाबरियावाड़, मानावदार तथा मंगरोल नामक जागीरें शामिल थीं। जूनागढ़ की लगभग 80% जनसंख्या हिन्दू थी। जूनागढ़ के नवाब महाबत खान ने पाकिस्तान के साथ शामिल होने का निर्णय किया। सितम्बर, 1947 में जब पाकिस्तान ने जनागढ के शामिल होने की स्वीकृति का अनुमोदन किया तो भारत सरकार को गहरा धक्का लगा।

क्योंकि भौगोलिक परिस्थितियों के आधार पर जूनागढ़ भारत में ही शामिल हो सकता था, परन्तु जूनागढ़ के शासक के न मानने पर सरदार पटेल ने, जूनागढ़ के शासकों के विरुद्ध बल प्रयोग का आदेश दिया। जूनागढ़ में भारतीय सैनिकों का सामना करने की क्षमता नहीं थी। अत: पहले अरजी हुकूमत (अरजी अर्थात् लोगों द्वारा प्रार्थना तथा हुकूमत अर्थात् शासन) को आमन्त्रित किया गया तत्पश्चात् भारतीय सरकार को 1 दिसम्बर, 1947 में करवाये गए जनमत संग्रह में जूनागढ़ के लगभग 99% लोगों ने भारत में शामिल होने की बात कही।

प्रश्न 8.
पाण्डिचेरी तथा गोवा के भारत में शामिल होने की घटना पर नोट लिखें।
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् पाण्डिचेरी फ्रांस तथा गोवा पुर्तगाल के अधीन थे। फ्रांस पाण्डिचेरी को भारत में शामिल करने के पक्ष में नहीं था। परिणामस्वरूप भारतीय सैनिकों ने कार्यवाही करके पाण्डिचेरी को भारतीय संघ में शामिल कर लिया। इसी तरह पुर्तगाल भी गोवा पर से अपना अधिकार छोड़ना नहीं चाहता था। अतः पुर्तगाल ने भारत द्वारा पेश किये गए सभी प्रस्तावों का विरोध किया।

परिणामस्वरूप 18 दिसम्बर, 1961 को भारतीय सेना ने गोवा, दमन व दीयू को पुर्तगाल से मुक्त कराके भारत में शामिल कर लिया। भारतीय प्रधानमन्त्री ने इसे मात्र पुलिस कार्यवाही की संज्ञा दी। लगभग 3000 पुर्तगाली सैनिक युद्धबन्दी बना लिए गए, जिन्हें बाद में छोड़ दिया गया। 1987 में गोवा भारत का 25वां राज्य बन गया।

प्रश्न 9.
कश्मीर समस्या पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। 15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ और पाकिस्तान की भी स्थापना हुई। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों को प्रेरणा और सहायता देकर 22 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर पर आक्रमण कर दिया। कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत से सहायता मांगी और कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की।

भारत में कश्मीर का विधिवत् विलय हो गया, परन्तु पाकिस्तान का आक्रमण जारी रहा और पाकिस्तान ने कुछ क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और अब भी उस क्षेत्र पर जिसे ‘आजाद कश्मीर’ कहा जाता है, पाकिस्तान का कब्जा है। भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को खदेड़ दिया। भारत सरकार ने कश्मीर का मामला संयुक्त राष्ट्र को सौंप दिया और 1 जनवरी, 1949 को कश्मीर का युद्ध विराम हो गया।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने कश्मीर की समस्या को हल करने का प्रयास किया पर यह समस्या काफ़ी सालों तक बनी रही। अन्ततः 5-6-अगस्त, 2019 को भारत सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया तथा यह स्पष्ट किया, कि अब केवल पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे वाले (पी० ओ० के०-POK) पर ही बातचीत होगी।

प्रश्न 10.
‘भाषावाद’ का अर्थ स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारत एक बहु-भाषी देश है। यहां पर सैंकड़ों भाषाएं बोली जाती हैं। संविधान के द्वारा देवनागरी लिपि की हिन्दी भाषा को केन्द्र सरकार की सरकारी भाषा निश्चित किया है। इसके अतिरिक्त संविधान द्वारा हिन्दी सहित 22 भाषाओं को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। भारतीय लोगों को अपनी मातृ-भाषा के प्रति बहुत ज्यादा लगन और श्रद्धा है। इसीलिए भारत में भाषावाद का विकास हुआ है। भारतीय संघ के राज्यों का संगठन भी भाषा के आधार पर किया गया है।

इस तथ्य ने भी भारत में भाषावाद के विकास को प्रोत्साहित किया है। भाषावाद भारतीय लोकतन्त्र की कार्यशीलता पर बुरे प्रभाव डाल रहा है। कई राजनीतिक दलों का निर्माण भाषा के आधार पर किया गया है।

कई राज्यों के लोग भाषा के आधार पर पृथक् राज्यों के निर्माण की मांग कर रहे हैं। लोगों की भाषा के प्रति निष्ठा राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय भावना के विकास के मार्ग में रुकावट बन रही है। भाषावाद कई लोगों के मत व्यवहार को प्रभावित करता है। दक्षिण भारत के लोगों की विरोधता के कारण हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा सरकारी रूप से नहीं दिया जा सका है। यह पूर्णतया राष्ट्रीय विकास के रास्ते में रुकावट बन रहा है।

प्रश्न 11.
भारत विभाजन के अच्छे परिणाम बताइये।
उत्तर:

  • भारत विभाजन से लोगों को आजादी अपेक्षाकृत जल्दी मिल गई।
  • विभाजन के पश्चात् भारत एवं पाकिस्तान में रह रहे अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् कानून व्यवस्था को लागू करना आसान हो गया।
  • विभाजन के पश्चात् प्रशासन को उचित ढंग से चलाया जाने लगा।

प्रश्न 12.
भारतीय राजनीति में भाषा की भूमिका पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
भाषा ने भारतीय राजनीति को निम्नलिखित ढंगों से प्रभावित किया है
1. राष्ट्रीय एकता को खतरा-राष्ट्रीय एकता के लिए एक सामान्य भाषा का होना अति आवश्यक है। संविधान निर्माताओं ने यही बात सोचकर हिन्दी को राष्ट्र भाषा घोषित किया था। परन्तु भाषा के विवाद ने राष्ट्रीय एकता व अखण्डता को करारी चोट पहुंचायी है। दक्षिण के राज्य और उत्तर के राज्यों में मुख्य विवाद का कारण भाषा ही है।

2. भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन–राज्य पुनर्गठन कानून 1956 के आधार पर भारत को 14 राज्यों तथा 6 संघीय क्षेत्रों में विभाजित किया गया। परन्तु राज्यों के 1956 के पुनर्गठन से समस्या समाप्त नहीं हुई, बल्कि उसके बाद भी अनेक राज्यों का पुनर्गठन किया गया और आज भारत में 28 राज्य और 8 संघीय क्षेत्र हैं। आज भी अनेक क्षेत्रों के भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की मांग उठाई जाती है।

3. क्षेत्रवाद की भावना का विकास-भाषा के आधार पर ही लोगों में क्षेत्रवाद की भावना का विकास हुआ है और विभिन्न भाषा बोलने वाले पृथक् राज्य की मांग करते हैं जिससे भारत की एकता खतरे में पड़ सकती है।

4. सीमा विवाद-भाषा के कारण अनेक राज्यों में सीमा विवाद उत्पन्न हुए हैं और आज भी अनेक राज्यों के बीच यह विवाद चल रहे हैं। उदाहरणस्वरूप पंजाब और हरियाणा, महाराष्ट्र और कर्नाटक तथा केरल इत्यादि में सीमा विवाद विद्यमान है।

प्रश्न 13.
राष्ट्र निर्माण के मार्ग की बाधाओं को दूर करने के कोई चार उपाय लिखिए।
उत्तर:

  • राष्ट्र निर्माण के मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए शिक्षा प्रणाली में सुधार करना आवश्यक है। शिक्षा को वास्तविक जीवन से सम्बन्धित करने की आवश्यकता है।
  • बेरोज़गारी एवं ग़रीबी को दूर करना आवश्यक है।
  • राष्ट्र निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए देश में संतुलित आर्थिक विकास होना चाहिए।
  • राष्ट्र निर्माण की बाधाओं को दूर करने के लिए लोगों को स्वच्छ एवं पारदर्शी प्रशासन दिया जाना आवश्यक है।

प्रश्न 14.
विभाजन से उत्पन्न किन्हीं चार समस्याओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत विभाजन से उत्पन्न कोई चार समस्याएं लिखें।
उत्तर:

  • विभाजन से उत्पन्न पहली जो समस्या थी, वह थी शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या।
  • भारत के विभाजन की दूसरी समस्या कश्मीर की समस्या है। भारत के विभाजन स्वरूप ही कश्मीर की समस्या पैदा हई है।
  • भारत के विभाजन के परिणामस्वरूप जो एक अन्य समस्या पैदा हुई, वह थी देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना।
  • भारत के विभाजन के कारण राज्यों के पुनर्गठन की समस्या भी पैदा हुई।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियाँ

प्रश्न 15.
स्वतन्त्रता के बाद, पिछले छः दशकों में राष्ट्रीय एकता से सम्बन्धित सीखे पाठों में से किन्हीं चार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय एकता के लिए धर्म-निरपेक्षता का होना आवश्यक है, ताकि सभी लोगों को धर्म की स्वतन्त्रता प्राप्त हो।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए साम्प्रदायिक सद्भावना का होना भी आवश्यक है।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए लोगों का शिक्षित होना आवश्यक है, ताकि उन्हें अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्यों का ज्ञान हो।
  • राष्ट्रीय एकता के लिए राजनीतिक दलों का स्वस्थ आधारों पर संगठित होना आवश्यक है, राजनीतिक दल धर्म या जाति के आधार पर संगठित न होकर राजनीतिक और आर्थिक आधार पर संगठित होने चाहिएं।

प्रश्न 16.
मणिपुर और जूनागढ़ के रजवाड़े भारतीय संघ का अंग कैसे बने ?
उत्तर:
मणिपुर- मणिपुर की विधानसभा में भारत के विलय के प्रश्न पर सहमति नहीं थी। मणिपुर कांग्रेस चाहती थी कि इस रियासत को भारत में मिला दिया जाए, जबकि अन्य पार्टियां इसके विरुद्ध थीं। परन्तु भारत सरकार ने मणिपुर पर भारत में विलय के लिए दबाव डाला, जिसमें उसे सफलता भी मिली। मणिपुर के महाराजा बोधचन्द्र सिंह ने भारत में विलय से सम्बन्धित दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किये। जूनागढ़- इसके लिए प्रश्न नं0 7 देखें।

प्रश्न 17.
राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी नेहरू जी के दृष्टिकोण की व्याख्या करें।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी नेहरू जी के दृष्टिकोण का वर्णन इस प्रकार है

  • संसदीय शासन प्रणाली-राष्ट्र निर्माण के लिए नेहरू जी संसदीय शासन प्रणाली को लागू करना चाहते थे।
  • धर्म-निरपेक्ष राज्य-नेहरू जी राष्ट्र निर्माण के लिए धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना चाहते थे।
  • न्याय एवं स्वतन्त्रता-नेहरू जी ने राष्ट्र निर्माण के लिए न्याय एवं स्वतन्त्रता का समर्थन किया।
  • मिश्रित अर्थव्यवस्था-पं० नेहरू राष्ट्र के निर्माण के लिए मिश्रित अर्थव्यवस्था को अपनाए जाने के पक्ष थे।

प्रश्न 18.
स्वतन्त्र भारत के सामने उपस्थित किन्हीं चार मुख्य चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
स्वतन्त्र भारत के सामने राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी निम्नलिखित चुनौतियां थीं

1. राष्ट्रीय एकीकरण की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी सबसे बड़ी चुनौती राष्ट्रीय एकीकरण की थी।

2. विकास की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय भारत के समक्ष राष्ट्र निर्माण सम्बन्धी एक अन्य बड़ी चुनौती विकास की थी। स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय लगभग प्रत्येक क्षेत्र में सुधार की आवश्यकता थी, क्योंकि अंग्रेज़ भारत को बहुत बुरी दशा में छोड़कर गए थे।

3. लोकतन्त्र की स्थापना की चनौती-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत में नेताओं के समक्ष लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की भी चुनौती थी ताकि समाज के सभी वर्गों को भारत की राजनीतिक प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर मिल सके।

4. धार्मिक कट्टरता की चुनौती-स्वतन्त्रता के समय धार्मिक कट्टरता भी एक चुनौती थी।

प्रश्न 19.
भारत विभाजन के चार प्रमुख कारण बताइये।
उत्तर:
1. अंग्रेजों की कुटिल नीति – भारत विभाजन का प्रमुख कारण अंग्रेजों की कुटिल नीतियां थीं, क्योंकि अंग्रेज़ जाते-जाते भारत को कमज़ोर करना चाहते थे।

2. जिन्ना की हठधर्मिता – भारत विभाजन का एक अन्य कारण जिन्ना की हठधर्मिता थी।

3. भारतीय नेताओं की शांति की इच्छा – भारत का विभाजन इसलिए भी हुआ, क्योंकि भारतीय नेताओं को यह आशा थी, कि विभाजन के बाद शायद भारत में शांति स्थापित हो जाए।

4. साम्प्रदायिक दंगे – भारत विभाजन का एक अन्य कारण उस दौरान हुए भीषण साम्प्रदायिक दंगे हैं।

प्रश्न 20.
राष्ट्र के किन्हीं चार तत्वों का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्र निर्माण के किन्हीं चार तत्वों का वर्णन करें।
अथवा
राष्ट्र को जन्म देने वाले चार तत्व बताइये।।
उत्तर:
1.सामान्य मातृभूमि-प्रत्येक मनुष्य को अपनी मातृभूमि अर्थात् अपने जन्म-स्थान से प्यार होना स्वाभाविक ही है। एक ही स्थान या प्रदेश पर जन्म लेने वाले व्यक्ति मातृभूमि से प्यार करते हैं और इस प्यार के कारण वे आपस में एक भावना के अन्दर बन्ध जाते हैं।

2. वंश की समानता-कुछ लेखकों ने राष्ट्रीयता के लिए वंश पर जोर दिया है। वंश अथवा जाति की समानता से अभिप्राय व्यक्तियों के उस समूह से है जो एक ही पूर्वजों से सम्बन्धित हैं और वे रूप, आकार, रंग, कद आदि की कुछ शारीरिक समानताएं रखते हैं।

3. सामान्य भाषा-सामान्य भाषा राष्ट्रवाद का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। भाषा के द्वारा ही एक मनुष्य अपने विचारों को प्रकट कर सकता है।

4. सामान्य धर्म-सामान्य धर्म से भी एकता उत्पन्न होती है। धर्म के नाम पर लोग इकट्ठे हो जाते हैं और धर्म के नाम पर अपना जीवन भी बलिदान दे देते हैं।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण का अर्थ बताइए।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना प्रकट होती है। राष्ट्र निर्माण राजनीतिक विकास के सांस्कृतिक पक्ष पर जोर देता है। इसके अनुसार एक राष्ट्र में ऐसी प्रक्रिया हो जिसके द्वारा लोग अपने छोटे-छोटे कबीलों, गांवों एवं नगरों के प्रति वफ़ादारी के स्थान पर विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली को वफ़ादारी प्रदान करें।

प्रश्न 2.
राष्ट्र निर्माण की कोई दो परिभाषाएं लिखें।
अथवा
राष्ट्र की कोई एक परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
1. डेविड ए० विल्सन के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण से अभिप्राय वह सामाजिक प्रक्रिया अथवा प्रक्रियाएं हैं, जिनके द्वारा कुछ समूहों में राष्ट्रीय चेतना उभरती है तथा यह समूह कुछ-न-कुछ संगठित सामाजिक संरचनाओं के माध्यम से समाज के लिए राजनीतिक स्वायत्तता प्राप्त करते हैं।”

2. लुसियन पाई के अनुसार, “राष्ट्र निर्माण का अर्थ है, वह प्रक्रिया जिसके द्वारा लोग छोटे कबीलों, गांवों, नगरों या छोटी रियासतों के प्रति वफादारी और बन्धनों को विशाल केन्द्रीय राजनीतिक प्रणाली की ओर मोड़ लेते हैं।”

प्रश्न 3.
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करो।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण को प्रभावित करने वाले तत्त्वों का वर्णन इस प्रकार है

1. औद्योगीकरण – औद्योगीकरण राष्ट निर्माण को प्रभावित करता है। जैसे ही एक देश औद्योगिक उन्नति करता है वैसे ही वहां के लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वे अपनी पुरानी आदतों और परम्पराओं को त्याग देते हैं।

2. जन-माध्यम का प्रसार – एक राष्ट्र में जन-माध्यम के साधनों का विकास और प्रसार भी राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान देता है। जन-माध्यम के साधनों में समाचार-पत्र, प्रसारण, डाक एवं तार प्रबन्ध, सड़कें, रेलें, वायु सेवाएं, चलचित्र, टेलीविज़न आदि शामिल हैं। इन साधनों द्वारा नागरिकों में अधिक जानकारी तथा चेतनता उत्पन्न होती है।

प्रश्न 4.
3 जून, 1947 को ब्रिटिश गवर्नर जनरल माऊण्टबेटन ने क्या घोषणा की ?
उत्तर:
3 जून, 1947 का दिन भारतीय इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इस दिन ब्रिटिश गवर्नर जनरल माऊण्टबेटन ने यह घोषणा की, कि ब्रिटिश सरकार जून, 1948 की अपेक्षा अगस्त, 1947 में सत्ता भारतीयों को सौंप देगी।

प्रश्न 5.
हैदराबाद को भारत में किस प्रकार शामिल किया गया ?
उत्तर:
स्वतन्त्रता प्राप्ति एवं भारत के विभाजन के पश्चात् हैदराबाद के निजाम उसमान अली खान ने हैदराबाद को स्वतन्त्र रखने का निर्णय किया। परन्तु परोक्ष रूप से निजाम पाकिस्तान समर्थक था। हैदराबाद भारत के केन्द्र में स्थित था तथा इसकी 85% जनसंख्या हिन्दू थी। हैदराबाद कभी भी भारतीय सुरक्षा को खतरा पैदा कर सकता था। अतः सरदार पटेल के काफ़ी मनाने के बाद भी निज़ाम जब नहीं माना तो भारत ने सैनिक कार्यवाही करके हैदराबाद को भारत में मिला लिया।

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प्रश्न 6.
जूनागढ़ को भारत में किस प्रकार शामिल किया गया ?
उत्तर:
जूनागढ़ गुजरात के दक्षिण-पश्चिम में स्थित एक राज्य था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् जूनागढ़ ने पाकिस्तान में शामिल होने का निर्णय किया। परन्तु भारत की सुरक्षा की दृष्टि से यह उचित नहीं था। अन्ततः भारत द्वारा बल प्रयोग करने के बाद पहले अरजी हुकूमत को आमन्त्रित किया गया, तत्पश्चात् शासन सम्भालने के लिए भारत को आमन्त्रित किया गया।

प्रश्न 7.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत द्वारा किन दो चुनौतियों का सामना किया जा रहा था ?
उत्तर:

  • शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत द्वारा शरणार्थियों के पुनर्वास की समस्या का सामना किया जा रहा था।
  • राज्यों के पुनर्गठन की समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय विरासत के रूप जो दूसरी बड़ी समस्या मिली, वह थी देशी रियासतों का स्वतन्त्र भारत में विलय करना।

प्रश्न 8.
उन वास्तविक राज्यों के नाम बताएं, जिनमें से निम्नलिखित राज्य बने
1. मेघालय
2. गुजरात।
उत्तर:

  1. मेघालय- मेघालय, असम राज्य से अलग होकर राज्य बना है।
  2. गुजरात-गुजरात, बम्बई प्रेजीडेंसी से अलग होकर राज्य बना है।

प्रश्न 9.
राज्यों का पुनर्गठन क्या है ? यह कब किया गया ?
उत्तर:
राज्यों के पुनर्गठन का अर्थ है कि राज्यों का भाषा के आधार पर पुनः गठन करना। भारत में राज्यों का पुनर्गठन 1956 में किया गया।

प्रश्न 10.
मुहम्मद अली जिन्नाह के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
मुहम्मद अली जिन्नाह का जन्म कराची में 1876 में हुआ। जिन्नाह ने द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त दिया, तथा पाकिस्तान की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 11.
महात्मा गांधी ने 14 अगस्त, 1947 को कहा, “कल का दिन हमारे लिए खुशी का दिन भी होगा और गमी का भी।” इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
महात्मा गांधी के अनुसार 15 अगस्त, 1947 को खुशी का दिन इसलिए होगा, क्योंकि इस दिन भारत आजाद होगा जबकि गमी का दिन इसलिए होगा, क्योंकि इस दिन भारत का विभाजन होगा।

प्रश्न 12.
भारत के विभाजन के दो मुख्य कारण बताएँ।
उत्तर:

  • भारत के विभाजन का प्रमुख कारण अंग्रेजों की कुटिल नीतियां थीं, जो जाते-जाते भारत को कमज़ोर करना चाहते थे।
  • भारत विभाजन के लिए जिन्नाह की हठधर्मिता भी ज़िम्मेदार थी।

प्रश्न 13.
किस अधिनियम के अन्तर्गत भारत को स्वतन्त्रता प्राप्त हुई ?
उत्तर:
भारत को भारतीय स्वतन्त्रता अधिनियम 1947 के अन्तर्गत स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।

प्रश्न 14.
देश विभाजन के समय कश्मीर का राजा कौन था ?
उत्तर:
देश विभाजन के समय कश्मीर का राजा हरि सिंह था।

प्रश्न 15.
वर्तमान में कितनी भाषाओं को संविधान के द्वारा मान्यता दी गई है ?
उत्तर:
वर्तमान में 22 भाषाओं को संविधान द्वारा मान्यता दी गई है।

प्रश्न 16.
देश के विभाजन के समय भारत के गवर्नर जनरल कौन थे ?
उत्तर:
देश के विभाजन के समय भारत के गर्वनर जनरल लार्ड माऊण्टबेटन थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. गुजरात राज्य का निर्माण हुआ
(A) वर्ष 1959 में
(B) वर्ष 1958 में
(C) वर्ष 1960 में
(D) वर्ष 1957 में।
उत्तर:
(C) वर्ष 1960 में।

2. द्वि-राष्ट्र सिद्धान्त का प्रतिपादन किया
(A) कांग्रेस ने
(B) मुस्लिम लीग ने
(C) हिन्दू महासभा ने
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) मुस्लिम लीग ने।

3. विभाजन से पहले भारत की जनसंख्या थी
(A) लगभग 36 करोड़
(B) लगभग 40 करोड़
(C) लगभग 50 करोड़
(D) लगभग 38 करोड़।
उत्तर:
(A) लगभग 36 करोड़।

4. भारत में राष्ट्र निर्माण में निम्न बाधा है
(A) अनपढ़ता
(B) बेरोजगारी
(C) जातिवाद
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

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5. हरियाणा राज्य का गठन हुआ
(A) वर्ष 1966 में
(B) वर्ष 1967 में
(C) वर्ष 1968 में
(D) उपर्युक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) वर्ष 1966 में।

6. सीमा आयोग के अध्यक्ष कौन थे ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) सरदार पटेल
(C) लिरिल रेडक्लिफ
(D) जॉन साइमन।
उत्तर:
(D) लिरिल रेडक्लिफ।

7. भारत के विभाजन से उत्पन्न समस्याएं हैं
(A) भौगोलिक दूरी की समस्या
(B) गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों की समस्या
(C) शरणार्थियों की समस्या
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी।

8. निम्नलिखित में से किसे पुलिस कार्य द्वारा पुर्तगालियों से मुक्त करवाया गया था ?
(A) पांडिचेरी
(B) कारगिल
(C) गोवा
(D) कश्मीर।
उत्तर:
(C) गोवा।

9. निम्नलिखित में से कौन-सा तत्व राष्ट्र निर्माण में बाधा डालता है ?
(A) भौगोलिक एकता
(B) शिक्षा का प्रसार
(C) राजनीतिक भागीदारी
(D) साम्प्रदायिकता।
उत्तर:
(D) साम्प्रदायिकता।

10. निम्नलिखित में से भारत के प्रथम गहमन्त्री कौन थे ?
(A) महात्मा गांधी
(B) डॉ० अम्बेदकर
(C) पं० नेहरू
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
(D) सरदार पटेल।

11. राज्य पुनर्गठन अधिनियम को कब लागू किया गया था ?
(A) 10 जून, 1956 को
(B) 15 अगस्त, 1947 को
(C) 20 जनवरी, 1948 को
(D) 1 नवम्बर, 1956 को।
उत्तर:
(D) 1 नवम्बर, 1956 को।

12. हैदराबाद के शासक को कहा जाता था
(A) नवाब
(B) राजा
(C) निजाम
(D) महाराजा।
उत्तर:
(C) निजाम।

13. राज्य बनने से पहले हरियाणा किस राज्य का अंग था ?
(A) मुम्बई
(B) पंजाब
(C) राजस्थान
(D) गुजरात।
उत्तर:
(B) पंजाब।

14. भारतीय संविधान को लागू किया गया
(A) 26 जनवरी, 1948 को
(B) 26 जनवरी, 1950 को
(C) 15 अगस्त, 1947 को
(D) 28 जनवरी, 1949 को।
उत्तर:
(B) 26 जनवरी, 1950 को।

15. भारत में कितनी भाषाओं को संवैधानिक मान्यता प्राप्त है ?
(A) 22 भाषाओं को
(B) 24 भाषाओं को
(C) 18 भाषाओं को
(D) 25 भाषाओं को।
उत्तर:
(A) 22 भाषाओं को।

16. भारत के पहले प्रधानमंत्री थे
(A) डॉ. मनमोहन सिंह
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू
(C) श्रीमती इंदिरा गांधी
(D) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद।
उत्तर:
(B) पं० जवाहर लाल नेहरू।

17. विभाजन के समय भारत में कुल देशी रियासतों की संख्या थी :
(A) 560
(B) 562
(C) 565
(D) 665.
उत्तर:
(C) 565.

18. अलग आन्ध्र प्रदेश राज्य का उदय किस वर्ष में हुआ ?
(A) 1957 में
(B) 1956 में
(C) 1952 में
(D) 1959 में।
उत्तर:
(C) 1952 में।

रिक्त स्थानों की पूर्ति करो

(1) स्वतन्त्रता के बाद सबसे बड़ी चुनौती ……….. की थी।
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण

(2) स्वतन्त्रता के समय भारतीय रियासतों की संख्या ………… थी।
उत्तर:
565

(3) हैदराबाद की रियासत के शासक को ……….. कहते थे।
उत्तर:
निजाम

(4) ………… में राज्य पुनर्गठन अधिनियम पास हुआ।
उत्तर:
1956

(5) असम से अलग करके 1972 में …………. राज्य बनाया गया।
उत्तर:
मेघालय

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(6) भारत 15 अगस्त, ………… को स्वतन्त्र हुआ।
उत्तर:
1947

(7) 15 अगस्त, 1947 को लाल किले की प्राचीर से ………… ने ऐतिहासिक भाषण दिया।
उत्तर:
पं० जवाहर लाल नेहरू

(8) स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत के समक्ष कई ……….. थीं।
उत्तर:
चुनौतियाँ

(9) 26 जनवरी, 1950 को भारतीय ………… लागू किया गया।
उत्तर:
संविधान।

एक शब्द में उत्तर दें

प्रश्न 1.
राष्ट्र निर्माण के लिए किन तत्वों का होना अनिवार्य है ?
उत्तर:
राष्ट्र निर्माण के लिए भाषायी एकता, सामान्य संस्कृति तथा भौगोलिक एकता जैसे महत्वपूर्ण तत्त्वों का होना अनिवार्य है।

प्रश्न 2.
भारत में राष्ट्र निर्माण में कौन-से तत्त्व बाधा डालते हैं ?
उत्तर:
भारत में राष्ट्र निर्माण में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा जातिवाद इत्यादि जैसे तत्त्व बाधा डालते हैं।

प्रश्न 3.
हजोग, चकमा, सन्थाल तथा अन्य अनेक गैर-बंगाली समूह जिन्होंने पूर्वी पाकिस्तान छोड़ दिया था, वे बसने के लिए कहां गए ?
उत्तर:
भारत।

प्रश्न 4.
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री कौन थे ?
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू थे।

प्रश्न 5.
भारत के प्रथम गृहमन्त्री कौन थे ?
उत्तर:
भारत के प्रथम गृहमन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल थे।

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