Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. 1998 में भारत पर आर्थिक प्रतिबंध क्यों लगा दिए गए थे?
(A) भारत ने पाकिस्तान पर युद्ध थोप दिया था।
(B) भारत ने यू० एन० ओ० के विरुद्ध कुछ कार्य किए थे।
(C) भारत ने परमाणु परीक्षण किए थे
(D) भारत अमेरिका के विरुद्ध था।
उत्तर:
भारत ने परमाणु परीक्षण किए थे।

2. भारत में उदारीकरण तथा विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया कब शुरू हुई थी?
(A) 1980 के बाद
(B) 1991 के बाद
(C) 1981 के बाद
(D) 2004 के बाद।
उत्तर:
1991 के बाद।

3. भारत के किस वित्त मंत्री ने उदारीकरण तथा विश्वव्यापीकरण की प्रक्रिया शुरू की थी?
(A) मनमोहन सिंह
(B) पी० चिदंबरम
(C) जसवंत सिंह
(D) यशवंत सिंहा।
उत्तर:
मनमोहन सिंह।

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4. किस प्रधानमंत्री ने मनमोहन सिंह को भारत का वित्त मंत्री नियुक्ति किया था?
(A) चंद्रशेखर
(B) वाजपेयी
(C) नरसिम्हा राव
(D) वी० पी० सिंह।
उत्तर:
नरसिम्हा राव।

5. नियंत्रित अर्थव्यवस्था से अनावश्यक प्रतिबंधों को हटा लेने को …………………….. कहते हैं।
(A) निजीकरण
(B) विश्वव्यापीकरण
(C) उदारीकरण
(D) आधुनिकीकरण।
उत्तर:
उदारीकरण।

6. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जिसमें अलग-अलग देशों के बीच मुक्त व्यापार, सेवाओं, पूंजी निवेश तथा लोगों का आदान प्रदान होता है।
(A) निजीकरण
(B) विश्वव्यापीकरण
(C) आधुनिकीकरण
(D) उदारीकरण।
उत्तर:
विश्वव्यापीकरण।

7. भारतीय अर्थव्यवस्था पर विश्वव्यापीकरण का अच्छा प्रभाव क्या पड़ा?
(A) विश्व निर्यात में भारत के हिस्से में वृद्धि
(B) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में वृद्धि
(C) विदेशी मुद्रा में वृद्धि
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

8. सार्वजनिक उपक्रमों को व्यक्तिगत हाथों में देने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
(A) निजीकरण
(B) विश्वव्यापीकरण
(C) आधुनिकीकरण
(D) उदारीकरण।
उत्तर:
निजीकरण।

9. उदारीकरण का मुख्य उद्देश्य क्या हैं?
(A) रोज़गार के अधिक साधन विकसित करना
(B) विदेशी निवेश को आकर्षित करना
(C) निजी क्षेत्रों को अधिक स्वतंत्रता देना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

10. इनमें से कौन-सा उदारीकरण का लक्षण है?
(A) अधिकतर उद्योगों में लाइसेंस व्यवस्था खत्म करना
(B) सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण करना
(C) विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की सीमा बढ़ाना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

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11. विश्वव्यापीकरण का क्या सिद्धांत है?
(A) देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी निवेश के लिए खोलना
(B) कस्टम कर को कम-से-कम रखना
(C) सार्वजनिक उपक्रमों का विनिवेश
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

12. इनमें से कौन-सा उदारीकरण का दुष्परिणाम है?
(A) बेरोज़गारी का बढ़ना
(B) विदेशी कर्ज के बोझ का बढ़ना
(C) निर्यात में कमी तथा आयात में वृद्धि
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विश्व व्यापार संगठन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन एक अंतर्राष्ट्रीय संगठन है जिसे 1955 में संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों द्वारा स्थापित किया गया है। यह संगठन अलग-अलग विधानों, नियमों तथा नीतियों के द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार तथा सेवाओं का नियमन करता है। इसका मुख्यालय जेनेवा में है।

प्रश्न 2.
संस्कृति के मिलन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आजकल का समय भूमंडलीकरण का समय है जिसमें संसार भर के लोगों की जीवन पद्धति एक समान हो गई है। इसके साथ-साथ उनके उपभोग तथा प्रयोग की वस्तुएं भी एक समान हैं। इसी को ही संस्कृति का मिलन कहते हैं।

प्रश्न 3.
भूमंडलीकरण ग्राम का क्या अर्थ है?
उत्तर:
बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने व्यापार तथा संबंधों को बढ़ाने के लिए अलग-अलग देशों में अलग-अलग कंपनियां तथा उद्यमों की स्थापना कर रही हैं। इससे संपूर्ण विश्व एक वैश्विक ग्राम में परिवर्तित हो रहा है। इसे ही भूमंडलीय ग्राम का नाम दिया जाता है अर्थात् संपूर्ण विश्व एक ग्राम की भांति हो गया है।

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण के बारे में लोगों के क्या विचार हैं?
उत्तर:
भूमंडलीकरण के बारे में दो प्रकार के विचार व्याप्त हैं। कुछ लोगों का कहना है कि भूमंडलीकरण से विश्व एक बेहतर विश्व के रूप में सामने आएगा। परंतु कुछ लोगों को डर है कि इससे अमीर लोगों को तो बहुत ही लाभ होगा तथा निर्धन लोगों की हालत बद से बदतर होती चली जाएगी।

प्रश्न 5.
भूमंडलीकरण का सामाजिक क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण ने सामाजिक संबंधों तथा धार्मिक पहचान को काफी प्रभावित किया है। इसने लोगों के फैशन, खाने-पीने, उपभोग की प्रवृत्ति तथा जीवन-शैली पर काफ़ी प्रभाव डाला है। अब संसार के एक
भाग में दूसरे भाग की हरेक चीजें मौजूद हैं।

प्रश्न 6.
उपभोग की संस्कृति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया से संसार में उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आज का आधुनिक समाज उपभोग का समाज है तथा लगभग सभी ही एक जैसी वस्तुओं का उपभोग करते हैं। इस उपभोगवादी समाज की संस्कृति को उपभोग की संस्कृति कहा जाता है।

प्रश्न 7.
उदारीकरण का क्या अर्थ है?
अथवा
मुक्तिकरण से क्या तात्पर्य है?
अथवा
उदारीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं। यह एक आर्थिक प्रक्रिया है तथा यह समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

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प्रश्न 8.
आर्थिक सुधारों का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अर्थव्यवस्था के उदारीकरण का अर्थ है भारतीय व्यापार को नियमित करने वाले नियमों और वित्तीय नियमनों को हटा देना। इसके लिए कुछ उपाय किए गए हैं जिन्हें आर्थिक सुधार भी कहा जाता है। यह सुधार भारतीय अर्थव्यवस्था के सभी प्रमुख क्षेत्रों में आए हैं।

प्रश्न 9.
पारराष्ट्रीय निगम कौन-से होते हैं?
उत्तर:
पारराष्ट्रीय निगम ऐसी कंपनियां होती हैं जो एक-से-अधिक देशों में अपने माल का उत्पादन करती हैं अथवा बाज़ार सेवाएं प्रदान करती हैं तथा एक-से-अधिक देशों में अपने उत्पाद बेचती हैं। यह अपेक्षाकृत छोटी फर्मे भी हो सकती हैं तथा विशाल अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान भी हो सकते हैं।

प्रश्न 10.
भूमंडलीकरण के दो सिद्धांत बताएं।
उत्तर:

  • विदेशी निवेश के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोल देना क्योंकि इस व्यवस्था में आपको और देशों में भी मुक्त व्यापार की आज्ञा होती है।
  • इसमें सीमा शुल्क को काफी हद तक कम कर दिया जाता है ताकि विदेशी उत्पाद आपके देश में अधिक महंगा न हो।

प्रश्न 11.
कॉरपोरेट संस्कृति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
कॉरपोरेट संस्कृति प्रबंधन के सिद्धांत का एक भाग है जो किसी कंपनी के तमाम सदस्यों को संगठनात्मक शक्ति की सहायता से किसी चीज़ की उत्पादकता तथा प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रोत्साहित करती है।

प्रश्न 12.
उदारीकरण क्या होता है?
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उदयोगों तथा व्यापार पर से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं। यह एक आर्थिक प्रक्रिया है तथा यह समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

प्रश्न 13.
भूमंडलीकरण क्या होता है?
अथवा
भूमंडलीकरण या वैश्वीकरण क्या है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है अर्थात् एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूंजी तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहते हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है।

प्रश्न 14.
उदारीकरण के क्या कारण होते हैं?
उत्तर:

  • देश में रोज़गार के साधन विकसित करने के लिए ताकि लोगों को रोजगार मिल सके।
  • उद्योगों में ज्यादा-से-ज्यादा प्रतिस्पर्धा पैदा करना ताकि उपभोक्ता को ज्यादा से ज्यादा लाभ प्राप्त हो सके।

प्रश्न 15.
निजीकरण क्या होता है?
उत्तर:
लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देशों जहां पर मिश्रित प्रकार की अर्थव्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रम होते हैं जोकि सरकार के नियंत्रण में होते हैं। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपना ताकि यह और ज्यादा लाभ कमा सकें। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने को निजीकरण कहते हैं।

प्रश्न 16.
भारत पर भूमंडलीकरण का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  • भारत की विश्व निर्यात के हिस्से में वृद्धि हुई।
  • भारत में विदेशी निवेश में वृद्धि हुई।
  • भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा।

प्रश्न 17.
उदारीकरण की प्रक्रिया किस नीति से संबंधित है?
उत्तर:
उदारीकरण की प्रक्रिया विदेशी कंपनियों के लिए देश के दरवाज़े खोलने से संबंधित है।

प्रश्न 18.
भूमंडलीकरण का संबंध भारत की कौन-सी नीति से है?
उत्तर:
संसार की सभी देशों में कर मुक्त व्यापार हो तथा संसार के अलग-अलग हिस्सों में मिलने वाली वस्तुएं सभी के लिए उपलब्ध हों।

प्रश्न 19.
भारत के किसी एक महानगर का नाम बताएं।
उत्तर:
दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई भारत के महानगर हैं।

प्रश्न 20.
उदारीकरण की नीति के अंतर्गत विश्व व्यापार संगठन में भागीदारी होती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 21.
इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था भूमंडलीकरण का एक आयाम है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 22.
उपग्रह-प्रौद्योगिकी की सहायता से हम सुदूर बैठे मित्रों को अपने दस्तावेज भेज सकते हैं। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 23.
भूमंडलीकरण का एक आयाम लिखें।
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था भूमंडलीकरण का एक आयाम है।

प्रश्न 24.
किसी एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था का नाम लिखिए।
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन, वर्ल्ड बैंक इत्यादि।

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प्रश्न 25.
पहली बार वित्त का भूमंडलीकरण किस कारण से हुआ?
उत्तर:
वस्तुओं की पूर्ति के लिए।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उदारीकरण से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
उदारीकरण पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के गैर ज़रूरी प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से गैर ज़रूरी प्रतिबंधों को हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं।

उदारीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व के अलग-अलग देशों के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों को अधिक विस्तार की दृष्टि से भूमंडल के सदस्य देशों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि विश्व में मुक्त बाज़ार फैल सके तथा बेहतर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। इस नीति से अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता बढ़ती है तथा निजी उद्योगों में सार्वजनिक उद्योगों की अपेक्षा बेहतर परिणाम देने की क्षमता होती है।

प्रश्न 2.
भूमंडलीकरण की प्रक्रिया का अर्थ समझाएं।
अथवा
भूमंडलीकरण के बारे में संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है। अन्य शब्दों में एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहा जाता है।

इस प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है। इस प्रकार विश्व अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहा जाता है। भूमंडलीकरण के द्वारा सारी दुनिया एक विश्व ग्राम बन गई है।

प्रश्न 3.
इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था आर्थिक भूमंडलीकरण को कैसे सहारा देता है?
उत्तर:
इलेक्ट्रॉनिक अर्थव्यवस्था एक ऐसा कारक है जिसने आर्थिक भूमंडलीकरण को सहारा दिया है। केवल कंप्यूटर के माउस को दबाने से ही बैंक, निगम, निधि प्रबंधक तथा निवेशकर्ता अपने पैसे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इधर से उधर भेज सकते हैं।

चाहे इस प्रकार एक ही क्षण में इलेकट्रॉनिक मुद्रा इधर से उधर भेजने का यह ढंग काफ़ी खतरनाक है। भारत में मुख्यतया इसकी चर्चा शेयर मार्किट में होने वाले उतार-चढ़ाव के लिए की जाती है। यह उतार-चढ़ाव विदेशी निवेशकों द्वारा लाभ के लिए बड़ी मात्रा में शेयर बेचने या खरीदने के कारण आता है। ऐसे सौदे संचार क्रांति के कारण ही मुमकिन हो पाए हैं।

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण तथा रोज़गार का क्या संबंध है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण तथा श्रम के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण मुददा रोज़गार तथा भमंडलीकरण के बीच के संबंधों का है। बडे-बडे शहरों में मध्य वर्ग के यवाओं के लिए सचना प्रौदयोगिकी की क्रांति तथा भमंडलीकरण ने रोज़गार के नए-नए अवसर प्रदान कर दिए हैं। कॉलेज से नाम के लिए बी०ए०/बी० कॉम या बीएस०सी० की डिग्री लेने के स्थान पर वे कंप्यूटर केंद्रों से कंप्यूटर की भाषाएं सीख कर नौकरियां प्राप्त कर रहे हैं।

वे कॉल सेंटरों में या व्यापार प्रक्रिया बाहमोपयोजन (बी०पी०ओ०) कंपनियों में नौकरियां प्राप्त कर रहे हैं। वे विशाल शौपिंग माल्स में काम कर रहे हैं या हाल ही में खोले गए विभिन्न जलपान ग्रहों में नौकरी करते हैं। परंतु कई बार ऐसा भी हो रहा है कि निम्न वर्गों के लोगों के रोज़गार भूमंडलीकरण के कारण छिन भी रहे हैं।

प्रश्न 5.
पारराष्ट्रीय निगमों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
भूमंडलीकरण को प्रेरित तथा संचालित करने वाले कारकों में पारराष्ट्रीय निगमों की भूमिका काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। पारराष्ट्रीय निगम ऐसी कंपनियां होती हैं जो अपने माल का उत्पादन एक से अधिक देशों में करती हैं या बाज़ार सेवाएं प्रदान करती हैं। यह छोटी कंपनियां भी हो सकती हैं, इनकी एक या दो फैक्ट्रियां उस देश से बाहर स्थित होती हैं जहां वह मूल रूप से स्थित हैं।

इसके साथ ही यह बड़े ही विशाल अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठान भी हो सकते हैं जिनका व्यापार संपूर्ण विश्व में फैला हुआ है जैसे कि कोका कोला, पैप्सी, जनरल मोटर्स, कोडैक, कोलगेट पामोलिव इत्यादि। भले ही इन निगमों का अपना एक स्पष्ट राष्ट्रीय आधार हो, फिर भी वे भूमंडलीय बाजारों तथा भूमंडलीय मुनाफा कमाना चाहती हैं। अब तो कुछ भारतीय निगम भी अंतर्राष्ट्रीय बन रहे है

प्रश्न 6.
भारत में सेलफोनों की संख्या में अत्याधिक वृद्धि क्यों हुई है?
उत्तर:
भारत में सेलफोन पहली बार 1995 में बजने शुरू हुए थे। उस समय मोबाइल सेवा काफ़ी महँगी थी तथा यह हरेक व्यक्ति नहीं ले सकता था। परंतु धीरे-धीरे इस सेवा ने सस्ता होना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे नई मोबाइल कंपनियां आगे आनी शुरू हो गई जिससे कंपनियों में प्रतिस्पर्धा होनी शुरू हो गई। टेलीकाम विभाग में ट्राई (नियामन आयोग) बनाया हुआ है जिसने मँहगी मोबाइल दरों पर लगाम कसनी शुरू कर दी।

पहले Incoming Calls पर पैसे लगने बंद हुए तथा फिर धीरे धीरे फोन करने के पैसे लगने कम होने शुरू हो गए। अब तो यह हाल है कि 1 पैसे प्रति 1 सैकेंड के हिसाब से पैसे लिए जाते है। मासिक शुल्क बहुत ही कम हो गए हैं। मोबाइल कंपनियां कई प्रकार की आर्कषक स्कीमें लेकर आ रही हैं ताकि ग्राहकों को लुभाया जा सके।

इसके साथ-साथ मोबाइल हैंडसैटों के मूल्य में काफ़ी कमी आई है। यही कारण है कि अब हरेक व्यक्ति मोबाईल ले रहा है। यहाँ तक कि रिक्शा चालकों, रेहड़ी खींचने वालों के पास भी मोबाईल है। यही कारण है कि भारत में सेलफोनों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हो गई है।

प्रश्न 7.
भूस्थानीकरण में कुछ उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
भूस्थानीकरण एक ऐसी रणनीति है जो साधारणतया विदेशी कंपनियां अपना बाज़ार बढ़ाने के लिए स्थानीय परंपराओं के साथ व्यवहार में लाई जाती है। टी.वी. चैनल जैसे कि स्टार, एम.टी.वी., चैनल वी, कार्टून नेटवर्क इत्यादि सभी विदेशी चैनल हैं परंतु भारत में यह भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं।

यहां तक कि मैक्डॉनल्डस भी भारत में अपने निरामिष और चिकन के उत्पाद ही बेचता है, गोमांस के उत्पाद नहीं जो विदेशों में बहुत लोकप्रिय हैं। नवरात्रि पर्व के समय तो मैक्डॉनल्डस भी चिकन बेचना छोड़कर विशुद्ध निरामिष हो जाता है। संगीत के क्षेत्र में भांगड़ा पॉप, इंडिपॉप, फ्युजन म्यूज़िक तथा रीमिक्स गीतों की लोकप्रियता बढ़ रही है। इसे भी भूस्थानीकरण का ही एक रूप तथा उदाहरण कहा जा सकता है।

प्रश्न 8.
भूमंडलीकरण से राजनीतिक परिदृश्य में किस प्रकार परिवर्तन आया है?
उत्तर:
1990 में यू०एस०एस०आर० में समाजवाद का विघटन हो गया जो कि कई प्रकार से एक बड़ा परिवर्तन था। इस घटना ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया। इस कारण ही भूमंडलीकरण को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक नीतियों के प्रति एक विशेष आर्थिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण पैदा हो गया। इन परिवर्तनों को आम तौर पर नव-उदारवादी आर्थिक उपाय भी कहा जाता है।

भारत में उदारीकरण की नीति के अंतर्गत बहुत से ठोस कदम उठाए गए। मौटे तौर पर, इन नीतियों में मुक्त व्यापार से संबंधित राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाई देती है। इसलिए यह नीति राज्य की ओर से विनियमन तथा आर्थिक सहायता (सब्सिडी) दोनों की ही आलोचक है।

इस प्रकार भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में राजनीतिक दूरदर्शिता उतनी ही आवश्यक है जिनती कि आर्थिक दूरदर्शिता। यह अलग बात है कि वर्तमान भूमंडलीकरण से अलग भूमंडलीकरण की भी संभावनाएं हैं। इस प्रकार हम एक समावेशात्मक (Inclusive) भूमंडलीकरण की कल्पना भी कर सकते हैं जिसमें समाज के सभी भाग शामिल होते हैं।

भूमंडलीकरण के साथ एक और महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम भी घटित हो रहा है तथा वह है राजनीतिक सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय रचनातंत्र। इस संबंध में यूरोपीय संघ, दक्षिण एशियाई राष्ट्र संघ (एशियान), दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग सम्मेलन (सार्क) तथा दक्षिण एशियाई व्यापार संघों का परिसंघ (बोर्डस) क्षेत्रीय संघों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शा रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठनों तथा अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों का सामने आना भी एक और राजनीतिक आयाम पेश करता है। अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठन एक ऐसा संगठन होता है जिसे सहभागी सरकारें स्थापित करती हैं तथा जिसे एक विशेष पारराष्ट्रीय कार्यक्षेत्र पर नियंत्रण रखने, नज़र रखने तथा उसे विनियमित करने का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। जैसे कि W.T.O. को संसार भर में व्यापार प्रथाओं पर लागू नियमों का ध्यान रखना होता है।

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निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूमंडलीकरण क्या होता है? इसके सिद्धांतों का वर्णन करो।
अथवा
भूमंडलीकरण के अर्थ की व्याख्या करें।
अथवा
भूमंडलीकरण क्या है? भूमंडलीकरण के प्रमुख सिद्धांत क्या हैं?
उत्तर:
भारत में 1991 में नयी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं। भूमंडलीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण इन नीतियों के तीन प्रमुख पहलू हैं। भारत में 1980 के दशक के दौरान भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। नयी आर्थिक नीतियों या आर्थिक सुधारों के माध्यम से इसे गति प्रदान करने की कोशिश की गई। वैश्वीकरण आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के चलते भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं में कई प्रकार के परिवर्तन सामने आए।

भमंडलीकरण का अर्थ (Meaning of Globalization)-भमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है। अन्य शब्दों में एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूंजी तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहते हैं।

इस प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है। इस तरह विश्व अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहा जाता है। भूमंडलीकरण के द्वारा सारी दुनिया एक विश्व ग्राम बन गई है।

भूमंडलीकरण के सिद्धांत-(Principles of Globalization):
भूमंडलीकरण के अंतर्गत कई महत्त्वपूर्ण बातों पर बल दिया जाता है। निश्चित कार्यक्रमों को अपनाने तथा आर्थिक नीतियों को अपनाने पर भी जोर दिया जाता है। भूमंडलीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं-
(i) विदेशी निवेश के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोल दिया जाता है क्योंकि इस व्यवस्था में आपको और देशों में भी मुक्त व्यापार की आज्ञा होती है तथा आप भी किसी और देश में निवेश कर सकते हैं। देश में विदेशी निवेश आता है तो एक तरफ देश आर्थिक तौर पर समृद्ध होता है तथा दूसरी तरफ देश में रोज़गार के नए साधन उत्पन्न होते है।

(ii) इसका दूसरा सिद्धांत यह है कि इसमें सीमा शुल्क को काफ़ी हद तक कम कर दिया जाता है ताकि अगर कोई बाहर से आकर आपके देश में अपनी चीज़ बेचना चाहता है तो वह उत्पाद बहुत महंगा न हो जाए। इसलिए सीमा शुल्क को कम कर दिया जाता है।

(iii) सार्वजनिक क्षेत्रों के प्रतिष्ठानों का विनिवेश भी कर दिया जाता है। भूमंडलीकरण के साथ-साथ निजीकरण भी चलता है। निजीकरण होता है सरकार की कंपनियों का ताकि वह भी निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें तथा मुनाफा कमा सकें। इसलिए सरकारी कंपनियों का विनिवेश कर दिया जाता है।

(iv) निजी क्षेत्र के निवेश को बढावा दिया जाता है ताकि निजी क्षेत्र बड़े-बड़े उदयोग लगाएं। इसके कई फायदे हैं। एक तो सरकार को कर के रूप में आमदनी होगी तथा दूसरी तरफ रोज़गार के साधन बढ़ेंगे तथा बेरोज़गारी की समस्या भी हल होगी।

(v) इसमें सरकार बुनियादी ढांचे के विकास पर अधिक पैसा खर्च करती है। इसका कारण यह है कि अगर आप विदेशियों को अपने देश में निवेश के लिए आकर्षित करना चाहते हों तो उन्हें निवेश के लिए बढ़िया बुनियादी ढांचा भी देना पड़ेगा ताकि उनको कोई परेशानी न हो तथा ज्यादा-से-ज्यादा विदेशी निवेश देश में आ सके।

(vi) इसमें मुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया जाता है। मुक्त व्यापार का अर्थ है बिना सीमा शुल्क दिए किसी भी देश में जाकर व्यापार करना। ऐसा करने से बगैर कीमतों के इज़ाफे के सारी दुनिया की चीजें हमारे सामने होती हैं तथा हम किसी भी चीज़ को खरीद सकते हैं।

(vii) विश्व बैंक, विश्व व्यापार निधि तथा विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है क्योंकि एक तो यह व्यापार तथा और सुविधाओं के लिए अलग-अलग देशों को कर देते हैं तथा विश्व व्यापार संगठन पूरे विश्व के व्यापार का संचालन करता है। इसलिए इनके दिशा-निर्देशों का पालन करना ही पड़ता है।

प्रश्न 2.
उदारीकरण क्या होता है? उदारीकरण से क्या समस्याएं पैदा होती हैं?
अथवा
भारतीय समाज पर उदारीकरण के क्या प्रभाव पड़ रहे हैं?
अथवा
भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण के माध्यम से भारतीय समाज में क्या-क्या परिवर्तन हुए हैं? व्याख्या करें।
अथवा
उदारीकरण क्या है? भारतीय अर्थव्यवस्था के उदारीकरण की विवेचना करें।
उत्तर:
1991 में डॉ० मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद नयी आर्थिक नीति लागू की गई। उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमंडलीकरण इस नीति की प्रमुख विशेषताएं थीं। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का तेज़ गति से उदारीकरण किया जाने लगा तथा यह उदारीकरण की प्रक्रिया अब भी जारी है। यह एक आर्थिक प्रक्रिया तथा समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

उदारीकरण का अर्थ (Meaning of Liberalization)-नियंत्रित अर्थव्यवस्था के गैर-ज़रूरी प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उदयोगों तथा व्यापार पर से गैर-ज़रूरी प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं।

उदारीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व के अलग अलग देशों के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों को ज्यादा विस्तार की नज़र से भूमंडल के सदस्य देशों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि विश्व में मुक्त व्यापार फैल सके तथा बेहतर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। इस नीति से अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता बढ़ती है तथा निजी उद्योगों में सार्वजनिक उद्योगों की अपेक्षा ज्यादा बेहतर परिणाम देने की क्षमता होती है।

उदारीकरण की समस्याएं (Problems of Liberalization)-उदारीकरण से भारत जैसे देश में बहुत सी समस्याएं पैदा हुई हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) बेरोज़गारी में वृद्धि (Increase in Unemployment)-भारत में 1990 में बेरोजगारी की दर 6% थी जो 1999 में बढ़कर 7% हो गई। यह सिर्फ उदारीकरण का ही परिणाम है। देश में 36% लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं क्योंकि उनके पास मूल सुविधाओं की कमी है। घरेलू उद्योगों तथा रोजगार में सीधा संबंध होता है क्योंकि घरेलू रोज़गार बहुत से लोगों को रोजगार देता है।

अगर उद्योगों की संख्या बढ़ेगी जो ज्यादा लोगों को रोज़गार प्राप्त होगा पर अगर उद्योग कम होंगे तो बेरोज़गारी बढ़ेगी तथा ग़रीबी भी साथ ही साथ बढ़ेगी। हमारे देश में उदारीकरण की प्रक्रिया 17 साल से चल रही है। बड़े-बड़े उद्योग तो लग रहे हैं पर कुटीर तथा घरेलू उद्योग खत्म हो रहे हैं जिससे बेरोज़गारी में वृद्धि हुई है। इस तरह उदारीकरण की प्रक्रिया से बेरोज़गारी में वृद्धि हुई है।

(ii) उदारीकरण के गलत परिणाम-उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ कर्मचारियों को निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। जब उदारीकरण की नीति अपनायी गयी थी तो यह कहा गया था कि इस प्रक्रिया से देश की सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। लेकिन 17 वर्षों के उदारीकरण की प्रक्रिया के बाद भी हमारी अर्थव्यवस्था पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है।

आज भी देश की 36% जनता ग़रीबी की रेखा से नीचे रहती है। इन वर्षों में चाहे भारत को तकनीकी रूप से लाभ ही हुआ है पर बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जैसे कि कुटीर उद्योगों का खत्म होना, जिनमें उदारीकरण की प्रक्रिया के गलत परिणाम निकले हैं।

(iii) विदेशी कर्ज का बढ़ता बोझ-आर्थिक सुधारों का पहला दौर 1991 से 2001 तक चला। 2001 में दूसरा दौर शुरू हुआ। इस दौर में यह सोचा गया कि देश के आर्थिक विकास की दर तेज़ होगी पर हुआ इसका उल्टा। देश के आर्थिक विकास तथा आर्थिक सुधार के रास्ते पर कदम धीरे हो गए हैं।

देश के लिए 8% की आर्थिक विकास की दर का लक्ष्य रखा गया है जोकि बहत दर की कौडी लगता है। वित्त मंत्री तरह-तरह के उपायों की घोषणा कर रहे हैं पर फिर भी यह मुमकिन नहीं लगता। इसके साथ-साथ देश के ऊपर विदेशी कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। आज हमारे देश के ऊपर 110 अरब डालर के करीब विदेशी कर्ज है जिससे हर भारतीय विदेशों का कर्जदार बन गया है। यह भी उदारीकरण की प्रक्रिया की वजह से ही हुआ है।

(iv) निर्यात में कमी तथा आयात का बढ़ना (Decrease in Export and Increase in Import)-उदारीकरण की प्रक्रिया में निर्यात में भी कमी आती है तथा आयात में भी बढ़ोत्तरी होती है। 1991 के मुकाबले 1996 में निर्यात कम हुआ था तथा आयात बढ़ा था। यह इस वजह से होता है कि उदारीकरण से पश्चिम की या विदेशी चीजें हमारे देश में आईं जिस वजह से लोगों में विदेशी चीजें लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी। जिस वजह से आयात ज्यादा हो गया पर निर्यात उसी अनुपात में न बढ़ पाया जिस वजह से व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी तथा व्यापार संतुलन में कमी आई।

आयात बढ़ने तथा उदारीकरण की प्रक्रिया से देसी उद्योगों पर भी प्रभाव पड़ा। आराम से ठीक दामों पर तथा अच्छी विदेशी चीज़ के मिलने के कारण भी आयात में बढ़ोत्तरी हुई तथा देशी उदयोगों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

(v) रुपये की कीमत का गिरना (Decline in Value of Rupee)-उदारीकरण की वजह से भारतीय रुपए की कीमत में भी काफ़ी गिरावट आई है। 1991 में जिस डालर की कीमत ₹ 18 थी वह 1996 में ₹ 36 तथा 2001 में यह ₹ 47 तक पहुंच गया था। आजकल यह ₹ 66 के करीब है।

यह सब उदारीकरण की वजह से है तथा यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होता। किसी देश की मुद्रा की कीमत कम होने से महंगाई बढ़ती है जोकि हमारे देश के गरीब लोगों के लिए ठीक नहीं है। विकसित देशों को तो इससे लाभ हो सकता है पर विकासशील देशों के लिए यह नुकसानदायक है। इस तरह उदारीकरण के कारण रुपए की विनिमय दर में निरंतर गिरावट आ रही है।

(vi) सरकार की आमदनी में कमी आना (Decline in the Income of Govt.)-उदारीकरण की एक विशेषता है कि इसमें सरकार को उत्पादों पर सीमा शुल्क कम करना पड़ता है ताकि विदेशी चीजें उस देश के मूल्य पर मिल सकें। सीमा शुल्क कम करने से सरकार के राजस्व या आमदनी कम होती है जिसका सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके अलावा विदेशी चीज़ों की गुणवत्ता भारतीय उत्पादों के मामले काफ़ी अच्छी होती है तथा कई मामलों में यह सस्ती भी होती है।

जिस वजह से विदेशी चीजें भारतीय चीज़ों के मुकाबले ज्यादा बिकती हैं। इसके अलावा विदेशी चीजें भारतीय चीज़ों से तकनीक के मामले में भी अच्छी होती हैं क्योंकि भारतीय तकनीक इतनी अच्छी है। उदाहरण के तौर पर चीनी उत्पादों ने भारतीय बाजार में हलचल ला दी है। इस तरह जितनी ज्यादा ये चीजें हमारे देश में आएंगी उतनी ही सरकार की आमदनी में कमी होगी। अगर भारतीय चीजें बिकेंगी ही नहीं तो यह सरकार को क्या कर देंगे। इस तरह भी आमदनी में कमी आती है।

(vii) सरकारों का बढ़ता घाटा (Increasing deficit of Governments)-उदारीकरण की वजह से केंद्र तथा राज्य सरकारों के घाटे भी बढ़ रहे हैं। आमदनी कम हो रही है। खर्च या तो बढ़ रहे हैं या फिर कम हो रहे हैं। ज़रूरी चीजों के दाम बढ़ रहे हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही है, ग़रीबी बढ़ रही है। सरकार के पास अपने काम पूरे करने के लिए पैसा नहीं है। देश के बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। सरकार के बढ़ते घाटे की वजह से विकास कार्य या तो नहीं हो रहे हैं या फिर अगर हो रहे हैं तो कम हो रहे हैं जिस वजह से देश पर काफ़ी प्रभाव पड़ रहा है।

इस तरह उदारीकरण के देश पर काफ़ी गलत प्रभाव भी पड़ रहे हैं। अगर हमें उदारीकरण से लाभ लेना है तो सबसे पहले हमें अपने वित्तीय अनुशासन को सुधारना होगा। हमें अपने मूलभूत ढांचे को सुधारना होगा, ऊर्जा के क्षेत्र में प्रगति करनी होगी, नयी तकनीकों का प्रयोग करना होगा तथा और भी बहत से सधार करने होंगे तभी उदारीकरण के लाभ उठा सकते हैं। इनके साथ-साथ कुछ कानूनों में भी सुधार करना होगा तभी उदारीकरण पूर्ण रूप से सफल हो पाएगा।

प्रश्न 3.
भारत पर भूमंडलीकरण के प्रभावों की चर्चा करें।
अथवा
भूमंडलीकरण के प्रभावों की व्याख्या करें।
अथवा
भूमंडलीकरण से भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़े हैं?
अथवा
भारतीय अर्थव्यवस्था पर भूमंडलीकरण के प्रभावों की विवेचना कीजिए।
अथवा
भूमंडलीकरण के भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव की व्याख्या कीजिए।
अथवा
भूमंडलीकरण के दो प्रभाव बताइये।
उत्तर:
(i) भारत में विदेशी निवेश (Foreign Investment in India) विदेशी निवेश वृद्धि भी भूमंडलीकरण का एक लाभ है क्योंकि विदेशी निवेश से अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता बढ़ती है। भारत में निरंतर विदेशी निवेश बढ़ रहा है। 1995-96 से 2000-01 के दौरान इसमें 53% की वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान वार्षिक औसत लगभग $ 500 करोड़ विदेशी निवेश हुआ।

(ii) विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves)-आयात के लिए विदेशी मुद्रा आवश्यक है। जून, 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ One Billion था जिससे सिर्फ दो सप्ताह की आयात आवश्यकताएं ही परी की जा सकती थीं। जुलाई, 1991 में भारत में नयी आर्थिक नीतियां अपनायी गईं। भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण को बढ़ावा दिया गया जिस वजह से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में काफ़ी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। फलस्वरूप वर्तमान समय में देश में $ 390 Billion के करीब विदेशी मुद्रा है। इससे पहले कभी भी देश में इतना विदेशी मुद्रा का भंडार नहीं था।

(iii) सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर (Growth of Gross Domestic Product)-भूमंडलीकरण से सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है। देश में 1980 के दशक में वृद्धि दर 5.63% तथा 1990 के दशक के दौरान वृद्धि दर 5.80% रहा। इस तरह सकल घरेलू उत्पादन में थोड़ी सी वृद्धि हुई। आजकल यह 7% के करीब है।

(iv) बेरोज़गारी में वृद्धि (Increase in Unemployment)-भूमंडलीकरण से बेरोज़गारी बढ़ती है। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया तथा मलेशिया में भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण आर्थिक संकट आया। फलस्वरूप लगभग एक करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा तथा वे ग़रीबी रेखा से नीचे आ गए। 1990 के दशक के शुरू में देश में बेरोज़गारी दर 6% थी जो दशक के अंत में 7% हो गई। इस तरह भूमंडलीकरण से रोजगार विहीन विकास हो रहा है।

(v) कृषि पर प्रभाव (Impact on Agriculture) देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों का हिस्सा लगभग 29% है जबकि यह अमेरिका में 2%, फ्रांस तथा जापान में 5.5% है। अगर श्रम शक्ति की नज़र से देखें तो भारत की 69% श्रम शक्ति को कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों में रोज़गार प्राप्त है जबकि अमेरिका तथा इंग्लैंड में ऐसे कार्यों में 2.6% श्रम शक्ति कार्यरत है। विश्व व्यापार के नियमों के अनुसार विश्व को इस संगठन के सभी सदस्य देशों को कृषि क्षेत्र निवेश के लिए विश्व के अन्य राष्ट्रों के लिए खोलना है। इस तरह आने वाला समय भारत की कृषि तथा अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती भरा रहने की उम्मीद है।

(vi) शिक्षा व तकनीकी सुधार (Educational and Technical reforms)-भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण का शिक्षा पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है तथा तकनीकी शिक्षा में तो चमत्कार हो गया है। आज संचार तथा परिवहन के साधनों की वजह से दूरियां काफ़ी कम हो गई हैं। आज अगर किसी देश में शिक्षा तथा तकनीक में सुधार आते हैं तो वह पलक झपकते ही सारी दुनिया में पहुंच जाते हैं। इंटरनेट तथा कंप्यूटर ने तो इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है।

(vii) वर्गों के स्वरूप में परिवर्तन (Change in the form of Classes) भूमंडलीकरण ने वर्गों के स्वरूप में भी परिवर्तन ला दिया है। 20वीं सदी में सिर्फ तीन प्रमुख वर्ग-उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग थे पर आजकल वर्गों की संख्या काफ़ी ज्यादा हो गई है। प्रत्येक वर्ग में ही बहुत से उपवर्ग बन गए हैं जैसे मजदूर वर्ग, डॉक्टर वर्ग, शिक्षक वर्ग इत्यादि के उनकी आय के अनुसार वर्ग बन गए हैं।

(viii) निजीकरण (Privatization)-भूमंडलीकरण का एक अच्छा प्रभाव यह है कि निजीकरण देखने को मिल रहा है। विकसित तथा विकासशील देशों में बहुत से सार्वजनिक उपक्रम निजी हाथों में चल रहे हैं तथा यह अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इसी से प्रेरित होकर और ज्यादा सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है।

(x) उद्योग धंधों का विकास (Development of Industries)-आर्थिक विकास की ऊँची दर प्राप्त करने के लिए विदेशी पूंजी निवेश से काफ़ी सहायता मिलती है। इससे न सिर्फ उद्योगों को लाभ मिलता है बल्कि उपभोक्ता को अच्छी तकनीक, अच्छे उत्पाद मिलते हैं तथा साथ ही साथ भारतीय उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की प्रेरणा मिलती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 भूमंडलीकरण और सामाजिक परिवर्तन

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण के स्थानीय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ते हैं?
अथवा
स्थानीय संस्कृति पर भूमंडलीकरण के प्रभावों की संक्षिप्त व्याख्या करें।
उत्तर:
सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि स्थानीय संस्कृति होती क्या है। स्थानीय संस्कृति वह है जो कि किसी देश या समाज की भौगोलिक सीमा के बीच ही फैले या सीमित रहे। चाहे एक ही देश में कई सांस्कृतिक समूहों का वास होता है तथा यह अलग-अलग समूह इकट्ठे रहते हैं जैसे कि भारत में होता है।

ऐसा कहते हैं कि भारत में अनेक संस्कृतियों का संगम होता है। यहाँ पर विविधता तथा विभिन्नता देखने को मिल जाती है तथा इसके साथ इन विभिन्नताओं में एकता भी पाई जाती है। इससे यह साबित होता है कि देश या समाज की परंपरागत संस्कृति स्थानीय संस्कृति होती है। इन्हें हम उप-संस्कृति भी कह सकते हैं।

भूमंडलीकरण का प्रभाव उन सभी देशों या समाजों की परंपरागत संस्कृतियों पर पड़ता है जो व्यापारिक संबंधों की वजह से आधुनिक संस्कृति के संपर्क में आते हैं। क्योंकि आधुनिक या पाश्चात्य संस्कृति विकसित देशों में पैदा हुई है इसलिए इस संस्कृति की भाषा अंग्रेज़ी है। भूमंडलीकरण के स्थानीय संस्कृति पर जो प्रभाव पड़ते हैं वे निम्नलिखित हैं

बाहरी संस्कृति के कुछ हिस्सों को ग्रहण करना-यह भी देखा गया है कि जिस-जिस देश में भूमंडली संस्कृति पहुँची है उस देश की संस्कृति ने पाश्चात्य संस्कृति के कुछ लक्षणों को अपनी ज़रूरत के अनुसार ग्रहण कर लिया है। उदाहरण के तौर पर भारत के शहरों में अंग्रेज़ी आम तौर पर प्रयोग होती है। खाने-पीने में पश्चिमी तरीके प्रयोग होते हैं, क्लबों, होटलों, नए-नए फैशनों इत्यादि का प्रयोग बढ़ रहा है।

इतना ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों पर भी भूमंडलीकरण का प्रभाव देखने को मिल रहा है। परन्तु यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य है कि चाहे लोग पश्चिमी संस्कृति को अपना रहे हैं पर फिर भी उन्होंने अपनी संस्कृति, रीति-रिवाजों, परंपराओं, विधियों इत्यादि को बना कर रखा हुआ है। इस तरह यह देखा गया है कि भूमंडलीकरण संस्कृति तथा स्थानीय संस्कृति साथ-साथ बने रह सकते हैं। इस के बारे में हम चार कारणों का आगे उल्लेख कर रहे हैं-
(i) स्थानीय संस्कृति के लोग अपने लोगों के साथ सामुदायिक तौर पर जुड़े होते हैं तथा उनमें अपने क्षेत्रीय समुदाय के लोगों के साथ भावनात्मक संबंध भी होता है। यही वजह है कि स्थानीय संस्कृति में लोग बाहर की संस्कृति के सभी विचारों, लक्षणों को नहीं अपना सकते।

(ii) स्थानीय संस्कृति की यह मुख्य विशेषता होती है कि यह लचीली तथा टिकाऊ होती है। स्थानीय लोग अपने मूल्यों, विश्वासों, भाषा, परंपराओं, धर्म-कर्म इत्यादि के साथ गहरे रूप से जुड़े हुए होते हैं। यही वजह है कि स्थानीय संस्कृति में लोग अपनी संस्कृति की जगह बाहरी संस्कृति को पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाते हैं।

(iii) मनुष्य लंबे समय से अलग-अलग उप-संस्कृतियों का प्रतिफल रहा है। यही वजह है कि वह भूमंडल वाली संस्कृति के साथ पूरी तरह घुल-मिल नहीं पाता है क्योंकि दुनिया के लोगों का यह मानना है कि कहीं हम सब इस भुंमडलीय संस्कृति के गुलाम न बन जाएं। यही वजह है कि भूमंडलीय संस्कृति के साथ पूरी तरह एकरूपता स्थापित नहीं की जा सकती।

(iv) बहुत-से व्यक्ति अपने लिए सांस्कृतिक विविधता को सम्मान देते हैं। यह लोग नए-नए विचारों, तौर तरीकों, भाषा, नई चीज़ों, नए अनुभवों को पसंद करते हैं ताकि वह जीवन से बोर न हों तथा जीवन में हमेशा नवीनता बनी रहे। यही कारण है कि स्थानीय संस्कृति के लोग अपने पुराने रीति-रिवाजों, विचारों, परंपराओं इत्यादि को छोड़ नहीं पाते हैं क्योंकि उनके लिए इन सब चीज़ों का एक खास मूल्य होता है। उदाहरण के तौर पर चाहे हम जितना मर्जी भूमंडलीकरण के समय में रह रहे हैं पर फिर भी हम अपने पूर्वजों की पूजा करना नहीं भूले हैं, हम अपने परंपरागत संगीत को भी नहीं भूले हैं।

भारतीय समाज सहयोग तथा समन्वय पर टिका हुआ है। भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण की वजह से लोभ, द्वेष, हिंसा, भोगवादी इत्यादि भावनाएं लोगों में आ रही हैं। इस वजह से ही मनुष्य का अस्तित्व भी खतरे में आ गया है। भूमंडलीकरण के नाम पर पश्चिमी देशों का प्रयोग किया हुआ सामान हमें परोसा जा रहा है।

पश्चिमी देशों द्वारा बनाई संचार सामग्री आज सारी दुनिया में धाक जमाए हुए हैं। हर कोई इसके आगे-पीछे भाग रहा है। आज सहयोग, हमदर्दी, प्यार, समन्वय इत्यादि मूल्यों में गि वट आ रही है जो कभी हमारे समाज के आधार हुआ करते थे। इस तरह भूमंडलीय संस्कृति या विश्व की संस्कृति की वजह से स्थानीय या उप-संस्कृति धीरे-धीरे खत्म हो रही है।

प्रश्न 5.
भूमंडलीकरण से संचार व्यवस्था किस प्रकार प्रभावित हुई है?
अथवा
भूमंडलीकरण और मीडिया के संबंधों की जानकारी दीजिए।
उत्तर:
संसार में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तथा दूरसंचार के आधारभूत ढांचे में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। इस कारण भूमंडलीय संचार व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। अब अगर हम अपने घर से अथवा दफ्तर से बाहरी संसार से संपर्क बनाना चाहते हैं तो उसके बहुत से साधन मौजूद हैं जैसे कि टैलीफोन (लैंडलाइन तथा मोबाइल), फैक्स मशीनें, इंटरनेट, ई-मेल, डिजिटल तथा केबल टी०वी० इत्यादि। वैसे अगर देखा जाए तो संसार में बहुत से ऐसे स्थान हैं जिनके बारे में हमें पता तक नहीं है परंतु संचार व्यवस्था की सहायता से हम इसका आसानी से पता कर सकते हैं।

इसे डिजिटल विभाजन का सूचक माना जाता है। इस डिज़िटल विभाजन के बावजूद प्रौद्योगिकी के यह अलग अलग रूप दूरी तथा समय को संकुचित या कम तो करते ही हैं। पृथ्वी पर दो दूर-दूर विपरीत दिशाओं के स्थान मुंबई तथा वाशिंगटन में बैठे व्यक्ति न केवल आपस में बातचीत कर सकते हैं बल्कि अगर चाहें तो दस्तावेज़, कागज़ तथा चित्र इत्यादि को एक-दूसरे को उपग्रह प्रौद्योगिकी की सहायता से भेज भी सकते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में मोबाइल फोनों में भी बहुत अधिक वृद्धि हुई है। अगर देखा जाए तो नगरों तथा गांवों दोनों में रहने वाले लोगों के लिए मोबाइल जीवन का एक अहम् हिस्सा बन गया है। इस तरह मोबाइलों के प्रयोग में भारी वृद्धि हुई है तथा इनके प्रयोग के ढंगों में भी काफ़ी परिवर्तन आ गया है।

प्रश्न 6.
भूमंडलीकरण से राजनीतिक परिदृश्य में किस प्रकार परिवर्तन आया है?
उत्तर:
1990 में यू०एस०एस० आर में समाजवाद का विघटन हो गया जो कि कई प्रकार से एक बड़ा परिवर्तन था। इस घटना ने भूमंडलीकरण की प्रक्रिया को और तेज़ कर दिया। इस कारण ही भूमंडलीकरण को प्रोत्साहित करने वाली आर्थिक नीतियों के प्रति एक विशेष आर्थिक तथा राजनीतिक दृष्टिकोण पैदा हो गया। इन परिवर्तनों को आम तौर पर नव-उदारवादी आर्थिक उपाय भी कहा जाता है। भारत में उदारीकरण की नीति के अंतर्गत बहुत से ठोस कदम उठाए गए।

मौटे तौर पर, इन नीतियों में मुक्त व्यापार से संबंधित राजनीतिक दूरदर्शिता दिखाई देती है। इसलिए यह नीति राज्य की ओर से विनियमन तथा आर्थिक सहायता (सब्सिडी) दोनों की ही आलोचक है। इस प्रकार भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में राजनीतिक दूरदर्शिता उतनी ही आवश्यक है जिनती कि आर्थिक दूरदर्शिता। यह अलग बात है कि वर्तमान भूमंडलीकरण से अलग भूमंडलीकरण की भी संभावनाएं हैं। इस प्रकार हम एक समावेशात्मक (Inclusive) भूमंडलीकरण की कल्पना भी कर सकते हैं जिसमें समाज के सभी भाग शामिल होते हैं।

भूमंडलीकरण के साथ एक और महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम भी घटित हो रहा है तथा वह है राजनीतिक सहयोग के लिए अंतर्राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय रचनातंत्र। इस संबंध में यूरोपीय संघ, दक्षिण एशियाई राष्ट्र संघ (एशियान), दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग सम्मेलन (सार्क) तथा दक्षिण एशियाई व्यापार संघों का परिसंघ (बोर्डस) क्षेत्रीय संघों की महत्त्वपूर्ण भूमिका को दर्शा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठनों तथा अंतर्राष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों का सामने आना भी एक और राजनीतिक आयाम पेश करता है।

अंतर्राष्ट्रीय सरकारी संगठन एक ऐसा संगठन होता है जिसे सहभागी सरकारें स्थापित करती हैं तथा जिसे एक विशेष पारराष्ट्रीय कार्यक्षेत्र पर नियंत्रण रखने, नज़र रखने तथा उसे विनियमित करने का उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। जैसे कि W.T.O. को संसार भर में व्यापार प्रथाओं पर लागू नियमों का ध्यान रखना होता है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत में औद्योगीकरण की नींव किसने रखी थी?
(A) अंग्रेजों ने
(B) मुग़लों ने
(C) भारत सरकार ने
(D) पुर्तगालियों ने।
उत्तर:
अंग्रेजों ने।

2. इनमें से कौन-सा भारत का प्रथम आधुनिक उद्योग था?
(A) रूई, जूट
(B) कोयला खाने
(C) रेलवे
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

3. 1991 में कुल कार्यकारी जनसंख्या में से कितने लोग बड़े उद्योगों में नौकरी कर रहे थे?
(A) 35%
(B) 28%
(C) 40%
(D) 38%
उत्तर:
28%

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4. 1991 में लोग छोटे पैमाने के एवं परंपरागत उद्योगों में कार्यरत् थे?
(A) 40%
(B) 62%
(C) 72%
(D) 80%
उत्तर:
72%

5. 1990 के बाद भारत सरकार ने ………………… की नीति को अपनाया है।
(A) पश्चिमीकरण
(B) उदारीकरण
(C) सरकारी नियंत्रण
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
उदारीकरण।

6. सार्वजनिक कंपनियों को निजी क्षेत्र की कंपनियों को बेचने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
(A) विनिवेश
(B) उदारीकरण
(C) विश्वव्यापीकरण
(D) औद्योगीकरण।
उत्तर:
विनिवेश।

7. निजीकरण की जाने वाली पहली सार्वजनिक कंपनी कौन-सी थी?
(A) नाल्को
(B) वी० एस० एन० एल०
(C) माडर्न फूड
(D) आई० पी० सी० एल०
उत्तर:
मार्डन फूड।

8. औद्योगीकरण का क्या नुकसान होता है?
(A) प्रदूषण का बढ़ना
(B) कुटीर उद्योगों का ख़ात्मा
(C) बेरोज़गारी का बढ़ना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

9. इनमें से कौन मशीनों के प्रति पागलपन का विरोधी था?
(A) महात्मा गाँधी
(B) जवाहर लाल नेहरू
(C) सुभाष चंद्र बोस
(D) इंदिरा गाँधी।
उत्तर:
महात्मा गाँधी।

10. टेलरिज्म का आविष्कारक कौन था?
(A) ऐल्फरिड टेलर
(B) फ्रेडरिक विनस्लो टेलर
(C) मार्लिन टेलर
(D) आर्कराइट।
उत्तर:
फ्रेडरिक विनस्लो टेलर।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
असंगठित अथवा अनौपचारिक क्षेत्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
असंगठित अथवा अनौपचारिक क्षेत्र का अर्थ उन श्रमिकों या कामगारों से है जो रोजगार के अस्थायी स्वरूपों, निरक्षरता, अज्ञानता, बिखरे हुए तथा छोटे उद्योगों जैसे कुछेक कारणों के कारण अपने साझे हितों के लिए अपने आपको संगठित करने में असमर्थ होते हैं। हमारे देश में 90% के लगभग लोग असंगठित क्षेत्र में कार्य करते हैं।

प्रश्न 2.
लघु उद्योग से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सरकार ने लघु उद्योगों को उसमें निवेश किए जाने वाले पैसे या पूँजी की मात्रा के अनुसार परिभाषित किया है। आजकल के समय में जिस उद्योग में 1 करोड़ तक का निवेश किया गया है उसे लघु उद्योग कहा जाता है। 1950 में यह सीमा पाँच लाख रुपये थी।

प्रश्न 3.
सरकार लघु उद्योगों को कैसे प्रोत्साहित करती है?
उत्तर:

  • लघु उद्योगों को कम ब्याज पर ऋण प्रदान किया जाता है।
  • लघु उद्योगों के द्वारा उत्पादित कुछ वस्तुओं को कर मुक्त रखा गया है।
  • देश में औदयोगिक बस्तियों या Focal Points की अलग-अलग शहरों में स्थापना की गई है ताकि लघु उद्योगों को विकसित किया जा सके।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास

प्रश्न 4.
औदयोगिक क्षेत्र में अलगाव की स्थिति से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आजकल औद्योगिक क्षेत्र में श्रम विभाजन का काफ़ी महत्त्व है। श्रम विभाजन के कारण व्यक्ति को एक ही कार्य बार-बार करना पड़ता है। इससे उस व्यक्ति की और चीज़ उत्पादित करने की क्षमता खत्म हो जाती है तथा वह किसी और कार्य को नहीं कर पाता है इसे ही अलगाव कहा जाता है।

प्रश्न 5.
औद्योगीकरण का आपसी संबंधों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
उत्तर:
लोग गाँवों में परिवारों को छोड़कर उद्योगों में कार्य करने के लिए नगरों की तरफ भागते हैं। कार्य मिलने के पश्चात् वह अपनी पत्नी व बच्चों को भी शहर में बुला लेते हैं। इससे गांवों के संयुक्त परिवार टूट जाते हैं तथा रिश्तेदारों में दूरियां भी बढ़ जाती हैं।

प्रश्न 6.
संरक्षण की नीति किस मान्यता पर आधारित है?
उत्तर:
एक मान्यता यह है कि विकसित देशों के उत्पाद की तुलना में देशी उत्पाद उनका सामना नहीं कर पाएंगे। इसलिए घरेलू उद्योगों को अगर कुछ समय के लिए संरक्षण दे दिया जाए तो वह विकसित देशों के उत्पादों के सामने खड़े हो पाएंगे। इसलिए उन्हें सरकार की तरफ से संरक्षण दे दिया जाता है। संरक्षण की नीति इस मान्यता पर आधारित है।

प्रश्न 7.
विनिवेश क्या है?
उत्तर:
मिश्रित अर्थव्यवस्था में कुछ सार्वजनिक उद्यम होते हैं जिन पर सरकार का नियंत्रण होता है। जब सरकार इन सार्वजनिक उद्योगों में अपना हिस्सा किसी निजी उद्योग या व्यक्ति को बेचकर उससे अलग हो जाती है तो इसे विनिवेश कहा जाता है। उदाहरण के लिए NALCO, IPCL, VSNL इत्यादि।

प्रश्न 8.
मज़दूर संघ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी भी उद्योग, मिल या कारखाने में कार्य करने वाले मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए सभी मजदूर इकट्ठे होकर एक संघ का निर्माण करते हैं जिसे मज़दूर संघ कहा जाता है। उद्योग के सभी मज़दूर इसके सदस्य होते हैं।

प्रश्न 9.
आउटसोर्सिंग सर्विस से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब आउटसोर्सिंग कंपनी किसी कार्य को सस्ती दर पर विकासशील देशों की छोटी कंपनियों से करवाती है तो इसे आउटसोर्सिंग सर्विस कहा जाता है। बहुत-सी बहुराष्ट्रीय कंपनियां आजकल भारत में ऐसे ही कार्य करवा रही हैं।

प्रश्न 10.
बड़े उद्योग की कोई एक विशेषता दें।
उत्तर:

  1. बड़े उद्योग में उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है तथा उस उत्पादन का वितरण भी बड़े पैमाने पर होता है।
  2. बड़े उद्योग में अधिक उत्पादन के लिए मशीनों का प्रयोग किया जाता है तथा श्रमिकों के स्थान पर मशीनों से कार्य लिया जाता है।

प्रश्न 11.
लघु उद्योग की एक उदाहरण दें।
उत्तर:
हथकरघा उद्योग, घरों में साबुन तैयार करना, चटाई इत्यादि तैयार करना लघु उद्योग की उदाहरण हैं।

प्रश्न 12.
लघु उद्योग किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह उद्योग जो घरों से शुरू हो सकते हैं, जिन्हें लगाने में अधिक पूँजी की आवश्यकता नहीं होती तथा जिनमें मशीनों के स्थान पर व्यक्तिगत श्रम का अधिक महत्त्व होता है उन्हें लघु उद्योग कहा जाता है।

प्रश्न 13.
बड़े उद्योग की एक उदाहरण दें।
उत्तर:
कार बनाने की फैक्ट्री, स्कूटर-मोटरसाइकिल बनाने की फैक्ट्री, कपड़ा उद्योग, लोहा उद्योग इत्यादि बड़े उद्योग की उदाहरण हैं।

प्रश्न 14.
निजीकरण का संबंध कौन-सी नीति से है?
उत्तर:
निजीकरण का संबंध सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने से है।

प्रश्न 15.
‘वर्ग’ कैसी सामाजिक व्यवस्था है?
उत्तर:
वर्ग एक खुली हुई सामाजिक व्यवस्था है जिसे कभी भी परिवर्तित किया जा सकता है।

प्रश्न 16.
सामाजिक वर्ग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सामाजिक वर्ग एक ऐसे व्यक्तियों का समूह होता है जिनमें किसी न किसी आधार पर कोई न कोई समानता अवश्य होती है।

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प्रश्न 17.
पूँजीवाद किसे कहते हैं?
उत्तर:
पूँजीवाद अर्थव्यवस्था का एक प्रकार है जिसमें सभी कुछ व्यक्तिगत हाथों में निर्भर होता है तथा सरकार की भागीदारी न के बराबर होती है।

प्रश्न 18.
श्रम विभाजन क्या है?
उत्तर:
श्रम विभाजन एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कार्यों का बँटवारा होता है या अलग-अलग लोग अलग-अलग कार्य करने में माहिर होते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाजशास्त्र ने औद्योगीकरण की शुरुआती दशा में कौन-से कार्य किए थे?
उत्तर:
जब औद्योगीकरण एक नयी धारणा थी तथा जब मशीनों ने एक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया था उस समय समाजशास्त्र ने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए थे। कार्ल मार्क्स, मैक्स वैबर तथा एमील दुर्खाइम जैसे समाजशास्त्रियों ने तो उद्योगों से संबंधित कई संकल्पों के साथ अपने आपको जोड़ा। यह थी नगरीकरण जिन आमने-सामने के उन संबंधों को बदला जोकि ग्रामीण समाजों में मिलते थे। ग्रामीण समाज के लोग अपने या जान पहचान के भूमि मालिकों के खेतों में कार्य करते थे, उन संबंधों की जगह आधुनिक कारखाने तथा कार्यस्थलों के अज्ञात व्यावसायिक संबंध सामने आ गए।

औद्योगीकरण के कारण विस्तृत श्रम विभाजन सामने आता है। लोगों को संपूर्ण उत्पादन के एक छोटे से पुर्जे को बनाना होता है जिस कारण वह कार्य का अंतिम रूप नहीं देख पाते हैं। चाहे यह कार्य बार-बार होता है तथा थकावट वाला होता है परंतु यह बेरोज़गार होने से अच्छा होता है। मार्क्स के अनुसार यह स्थिति अलगाव की होती है। इसमें लोग अपने कार्य से खुश नहीं होते। उनकी जीविका भी इस बात पर निर्भर करती है कि मशीनें मानवीय श्रम के लिए कितना काम छोड़ती हैं।

प्रश्न 2.
औद्योगीकरण के समाज पर क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर:

  1. श्रम विभाजन-औदयोगीकरण के समाज में श्रम विभाजन उत्पन्न हआ जिसमें किसी चीज़ का उत्पादन कई चरणों में होता है। हरेक व्यक्ति अलग-अलग कार्य करता है।
  2. यातायात के साधनों का विकास-इसके कारण यातायात के साधन विकसित हो गए । कच्चे माल को लाने तथा उत्पादित माल को बाज़ार तक पहुँचाने के लिए यह साधन विकसित हुए।
  3. उत्पादन का बढ़ना-इस कारण उत्पादन घरों से निकल कर फैक्टरियों में आ गया जहां उत्पादन मशीनों के साथ होता है। मशीनें उत्पादन तेजी से करती हैं जिससे उत्पादन बढ़ गया।
  4. जाति प्रथा का कम होना-उद्योगों में अलग-अलग जातियों के लोग इकट्ठे मिल कर कार्य करते हैं, इससे जाति प्रथा का प्रभाव कम हो गया।

प्रश्न 3.
भारत में स्वतंत्रता के प्रारंभिक वर्षों में औद्योगीकरण की दशा का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत के प्रथम आधुनिक उद्योग रूई, जूट, कोयला खाने तथा रेलवे थे। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने की पर बल दिया। इसमें सुरक्षा, ऊर्जा खनन, परिवहन तथा संचार और कई अन्य परियोजनाओं को शामिल किया जिन्हें सरकार कर सकती थी। यह निजी क्षेत्र के उद्योगों की प्रगति के लिए भी ज़रूरी था। सरकारी मिश्रित आर्थिक नीति में सरकार लाइसेंसिग नीति से यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि यह उद्योग अलग-अलग भागों में फैले हों।

स्वतंत्रता के बाद यह बड़े शहरों से निकल कर बड़ौदा, कोयंबटूर, बैंगलोर, पूना, फरीदाबाद, राजकोट जैसे शहरों में फैल गए। सरकार कई और छोटे पैमाने के उद्योगों को सहायता देकर प्रोत्साहित कर रही है। कई वस्तुएं जैसे कि कागज़, लकड़ी का सामान, लेखन सामग्री, शीशा, चीनी मिट्टी जैसे छोटे पैमाने के क्षेत्रों के लिए आरक्षित थे। 1991 तक कुल कार्यकारी जनसंख्या में से सिर्फ 28% ही बड़े उद्योगों में कार्य करते थे। 72% लोग छोटे व परंपरागत उद्योगों में कार्य करते थे।

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प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण व उदारीकरण से भारतीय उद्योगों में क्या परिवर्तन आए?
उत्तर:

  1. भारतीय उद्योग विदेशी निवेश के लिए खोल दिए गए तथा विदेशी कंपनियों ने भारतीय उद्योगों का अधिग्रहण करना शुरू कर दिया।
  2. भारतीय दुकानों पर विदेशी माल आसानी से उपलब्ध होने लग गया जो पहले उपलब्ध नहीं होता था।
  3. सरकार ने सार्वजनिक कंपनियों का विनिवेश करके उन्हें निजी उद्योगों को बेचना शुरू कर दिया। निजी उद्योगों ने सरकारी कर्मचारियों की छंटनी शुरू कर दी।
  4. अधिकांश कंपनियों ने अपने स्थायी कर्मचारियों की छंटनी करके अपने कार्य बाहरी स्रोतों जैसे कि छोटी कंपनियों से करवाने शुरू कर दिए।

प्रश्न 5.
आजकल लोग किस तरह काम पाते हैं?
उत्तर:
आजकल फैक्ट्री में कामगारों को रोजगार देने का तरीका भिन्न होता है। आजकल काम दिलाने वालों का महत्त्व कम हो गया है। यूनियन तथा कार्यकारिणी दोनों ही अपने लोगों को काम दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ कामगार यह भी चाहते हैं कि उनके बच्चों को उनका कार्य दे दिया जाए।

बहुत-सी फैक्ट्रियों में बदली कामगार होते हैं, जोकि छुट्टी पर गए श्रमिकों की जगह कार्य करते हैं। बहुत से बदली श्रमिक एक ही उद्योग में काफी लंबे समय तक कार्य कर रहे होते हैं। परन्तु उन्हें सबके जैसी सुरक्षा तथा स्थायी पद नहीं दिया जाता। इसे संगठित क्षेत्र में अनुबंधित कार्य कहते हैं।

प्रश्न 6.
टेलरिज्म या औदयोगिक इंजीनियरिंग व्यवस्था का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इस व्यवस्था में कार्य को छोटे-से-छोटे पुनरावृत्ति तत्त्वों में तोड़कर श्रमिकों में बाँट दिया जाता था। कामगारों को निश्चित समय में कार्य को खत्म करना ही पड़ता था। इसके लिए स्टाप वाच की सहायता भी ली जाती थी। कार्य को जल्दी खत्म करने के लिए असैंबली लाइन सामने आयी।

हरेक श्रमिक को कन्वेयर बेल्ट के साथ बैठकर अंतिम उत्पाद के केवल एक पुर्जे को उसमें जोड़ना था। कार्य करने की गति को बेल्ट की गति के साथ व्यवस्थित किया गया। 1980 के दशक में प्रत्यक्ष नियंत्रण की जगह अप्रत्यक्ष नियंत्रण की व्यवस्था की गई थी जहां कामगारों को प्रेरित तथा प्रबोधित करने का प्रावधान था। परंतु हम कभी-कभी ही इस पुरानी टेलरिज्म प्रक्रिया को बचा हुआ पाते हैं।

प्रश्न 7.
औद्योगीकरण का श्रमिकों पर क्या नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:

  1. अधिक मशीनों वाले उद्योगों में कम लोगों को काम दिया जाता है परंतु जो भी होते हैं उन्हें भी मशीनी गति से कार्य करना पड़ता है जिससे उनमें काम के प्रति लगाव नहीं रहता।
  2. कामगारों को कार्य करने के समय के दौरान विश्राम का काफ़ी कम समय मिलता है जिस कारण वह 40 वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते बुरी तरह थक जाता है तथा स्वैच्छिक अवकाश ले लेता है।
  3. कंपनियां बाहरी स्रोतों से कार्य करवाती है। अगर सप्लाई समय पर नहीं आती तो कामगारों में तनाव आ जाता है तथा अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  4. सप्लाई न आने की स्थिति में उत्पादन का लक्ष्य देर से होता है और जब वह आ जाता है तो उसे रखने के लिए उन्हें भाग दौड़ करनी पड़ती है। ऐसा करने में वह पूरी तरह निढाल हो जाते हैं।

प्रश्न 8.
भारत में उद्योगों की विभाजित श्रेणियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
1956 में बनी भारतीय औद्योगिक नीति के अनुसार भारतीय उद्योगों को तीन श्रेणियों में बाँटा गया है तथा वह हैं-

  1. प्रथम श्रेणी-इस श्रेणी से सुरक्षा से संबंधित उद्योग, रेल यातायात, डाकघर, परमाणु शक्ति के उत्पादन तथा नियंत्रण जैसे उद्योग रखे गए थे। केंद्र सरकार ही इनके संचालन तथा विकास को संभालती है।
  2. द्वितीय श्रेणी-12 उद्योग जैसे कि मशीनें, औजार, दवाएं, रबड़, जल यातायात, उवर्रक, सड़क यातायात इत्यादि इस श्रेणी में रखे गए थे। इनके विकास में सरकार अधिक हिस्सा डालेगी।
  3. तृतीय श्रेणी-इस श्रेणी में वह सभी उद्योग शामिल किए गए जो निजी क्षेत्र के लिए रखे गए थे। चाहे निजी क्षेत्र इनका विकास करते हैं परंतु सरकार चाहे तो इनकी स्थापना भी कर सकती है।

प्रश्न 9.
खानों में किस प्रकार मजदूरों का शोषण होता है?
उत्तर:

  1. छोटी तथा खुली खानों में नियमों का पालन नहीं किया जाता। मजदूरों को ठेकेदारी व्यवस्था के अंतर्गत रखा जाता है तथा उन्हें बराबर वेतन नहीं दिया जाता।
  2. ठेकेदार मजदूरों का रजिस्टर भी ठीक नहीं रखते। दुर्घटना होने की स्थिति में ठेकेदार मज़दूरों को किसी भी प्रकार का लाभ नहीं देते हैं।
  3. खानों में भूमि के नीचे जाकर कार्य करना पड़ता है जिस कारण गैसों के उत्सर्जन तथा ऑक्सीजन के बंद होने से कामगारों को साँस से संबंधित बीमारियां भी हो जाती हैं।
  4. खान के फटने या किसी चीज़ के गिरने से उन्हें चोट का सामना करना पड़ता है परंतु कोई उनका इलाज नहीं करता।

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निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
1992 में बंबई की एक मिल में हड़ताल हुई। इस हड़ताल के बारे में दिए गए परिच्छेद को पढ़ें तथा उसके बाद दिए गए प्रश्नों के संक्षिप्त उत्तर दें-
उत्तर:
जय प्रकाश भिलारे-मिल के भूतपूर्व कामगारः महाराष्ट्र गिरनी कामगार संघ के महासचिवः कपड़ा मिल के कामगार केवल अपना वेतन और महँगाई भत्ता लेते हैं इसके अलावा उन्हें कोई और भत्ता नहीं मिलता। हमें केवल पाँच दिन का आकस्मिक अवकाश मिलता है। दूसरे उद्योगों के कामगारों को अन्य भत्ते जैसे यातायात, स्वास्थ्य संबंधी सुविधाएँ इत्यादि मिलने शुरू हो गए साथ ही 10-12 दिन का आकस्मिक अवकाश भी।

इससे कपड़ा मिल के कामगार भड़क गए…… 22 अक्तूबर, 1981 को स्टैंडर्ड मिल के कामकार डॉ० दत्ता सामंत के घर गए और उनसे अपनी अगुआई करने को कहा। पहले सामंत ने मना कर दिया, उन्होंने कहा कि कपड़ा मिलें बी०आई०आर०ए० के अंतर्गत आती हैं, और मुझे इसके बारे में अधिक जानकारी भी नहीं है। परंतु ये कामगार किसी भी हालत में ना नहीं सुनना चाहते थे। वे रात भर उनके घर के बाहर चौकसी करते रहे और अंत में सुबह सामंत मान गए।

लक्ष्मी भाटकर-हड़ताल की सहभागीः मैंने हड़ताल का समर्थन किया। हम रोज़ाना गेट के बाहर बैठ जाते थे और सलाह करते थे कि आगे क्या करना होगा। हम समय-समय पर संगठित होकर मोर्चे भी निकालते थे…….. मोर्चे बहुत बड़े हुआ करते थे……. हमने कभी किसी को लूटा या चोट नहीं पहुँचाई मुझे कभी-कभी बोलने के लिए कहा गया, लेकिन मैं भाषण नहीं दे सकती। मेरे पाँव बुरी तरह काँपने लगते हैं। इसके अलावा मैं अपने बच्चों से भी डरती हूँ-वो क्या कहेंगे?

वो सोचेंगे कि यहाँ हम भूखे मर रहे हैं और वो वहाँ अपना फोटो अखबार में छपवा रही है…….. एक बार हमने सेंचुरी मिल के शोरूम की तरफ़ भी मोर्चा निकाला। हमें गिरफ्तार करके बोरीवली ले जाया गया। मैं अपने बच्चों के बारे में सोच रही थी। मैं खाना नहीं खा पाईं मैं अपने बारे में सोचने लगी कि हम लोग कोई अपराधी नहीं, मिल के कामगार हैं। हम अपने खून पसीने की कमाई के लिए लड़ रहे हैं?

किसन सालुंके-स्पिन मिल्स का भूतपूर्व कामगारः सेंचुरी मिल में हड़ताल शुरू हुए मुश्किल से डेढ़ महीना ही हुआ होगा कि आर०एम०एम०एस० वालों ने मिल खुलवा दी। वे ऐसा कर सकते हैं क्योंकि उन्हें राज्य और सरकार दोनों का समर्थन प्राप्त है। वे बाहर के लोगों को बिना उनके बारे में पूरी तरह जाने मिल के अंदर ले आए……. भोसले (तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री) ने 30 रुपए बढ़ाने की पेशकश की।

दत्ता सामंत ने इस विषय पर विचार करने के लिए मीटिंग बुलाई आगे के सारे क्रियाकलाप यहीं होते थे। हमने कहा, ‘हमें यह नहीं चाहिए’। अगर हड़ताल के नेताओं के पास कोई मर्यादा, कोई बातचीत नहीं है, हम बिना किसी उत्पीड़न के काम पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं हैं।

दत्ता इसवालकर-मिल चाल्स टेनैंट एसोसिएशन के अध्यक्ष : (प्रेसीडेंट) कांग्रेस ने बाबू रेशिम, रमा नायक और अरुण गावली जैसे सभी गुंडों को स्ट्राइक खत्म करवाने के लिए जेल से बाहर कर दिया।

हमारे पास स्ट्राइक तोड़ने वालों को मारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था। हमारे लिए यह जीवन मृत्यु का प्रश्न था। भाई भोंसले-1982 की हड़ताल में आर०एम०एम०एस० के महासचिव : हमने तीन महीने की हड़ताल के बाद लोगों को वापस काम पर बुलाना शुरू कर दिया…. हम सोचते थे, कि अगर लोग काम पर जाना चाहते हैं तो उन्हें जाने देना चाहिए, वास्तव में यह उनकी सहायता ही थी….

माफिया गैंग के बीच में आ जाने के बारे में, मैं उसके लिए उत्तरदायी था….. ये दत्ता सामंत जैसे लोग सुविधाजनक समय का इंतजार कर रहे हैं, और आराम से काम पर जाने वालों का इंतज़ार कर रहे हैं। हमने परेल एवं अन्य स्थानों पर प्रतिपक्षी समूहों को तैयार किया था। स्वाभाविक रूप से वहाँ कुछ झगड़ा कुछ खूनखराबा हो सकता था…. जब रमा नायक की मृत्यु हुई तो उस वक्त के मेयर भुजबल उसके सम्मान में अपनी ऑफ़िस की कार में आए। इन लोगों की ताकतों को एक समय या अन्य अनेक लोगों द्वारा राजनीति में इस्तेमाल किया गया।

किसन सालुंके-भूतपूर्व मिल कामगार : वह मुश्किल समय था हमने अपने सारे बर्तन बेच दिए थे। हमें अपने बर्तनों को सीधा उठाकर ले जाते हुए शर्म आती थी इसलिए हम उन्हें बोरियों में लपेटकर बेचने के लिए दुकानों पर ले जाते थे। वो ऐसे दिन थे जब हमारे पास खाने के लिए पानी के अलावा कुछ नहीं था, लकड़ी के बुरादे को ईंधन की जगह जलाते थे। मेरे तीन बेटे हैं। कई बार बच्चों के पीने के लिए दूध नहीं होता था, मुझसे उनकी यह भूख बर्दाश्त नहीं होती थी। मैं अपनी छतरी लेकर घर से बाहर चला जाता था।

सिंदु मरहने-भूतपूर्व मिल कामगारः आर०एम०एम०एस० वाले और गुंडे मुझे भी जबरदस्ती काम पर वापस ले जाने के लिए आए। पर मैंने जाने से इन्कार कर दिया…. जो महिलाएँ मिल में रह कर काम कर रही थीं उनके साथ क्या हो रहा था इस बारे में तरह-तरह की अफवाहें चारों तरफ़ फैली थीं। वहाँ बलात्कार की घटनाएँ घटी थीं।

प्रश्न 2.
1. 1982 की कपड़ा मिल हड़ताल के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों का वर्णन कीजिए।
2. कामगार हड़ताल पर क्यों गए?
3. दत्ता सामंत ने किस तरह हड़ताल की नेतागिरी स्वीकार की?
4. हड़ताल तोड़ने वालों की क्या भूमिका थी?
5. माफिया गिरोहों ने किस तरह इन स्थानों पर अपनी जगह बनाई?
6. इस हड़ताल के दौरान महिलाएँ कैसे परेशान, हुईं, और उनके मुख्य सरोकार क्या थे?
7. हड़ताल के दौरान कामगार और उनके परिवार कैसे अपने आप को बचाए रख पाए?
उत्तर:
1. 1982 की कपड़ा मिल हड़ताल के मजदूरों ने अपने वेतन, बोनस, छुट्टी इत्यादि के मुद्दों को लेकर हड़ताल की थी।

2. मिल के कामगारों ने वेतन, महँगाई भत्ते के अतिरिक्त मिलने वाली और सुविधाओं तथा भत्तों की माँग को लेकर हड़ताल की थी।

3. जब मजदूरों ने काफ़ी अधिक आग्रह किया तो ही दत्ता सामंत ने हड़ताल की नेतागिरी स्वीकार की थी।

4. हड़ताल तोड़ने वालों की इसमें काफ़ी बड़ी भूमिका थी। उन्हें सरकार तथा राज्य दोनों का ही समर्थन प्राप्त था तथा इसलिए ही उन्होंने मिल को जबरन ही खुलवा दिया था।

5. सरकार ने माफिया के गुंड़ों जैसे कि बाबू रेशिम, रमा नायक और अरुण गवली को जेल से छोड़ दिया। इन सभी ने दबाव डालकर इन स्थानों पर अपनी जगह बनाई।

6. महिलाओं को बेइज्जत किया गया, उन्हें मोर्चा निकालने के कारण जेल भेज दिया गया। महिलाओं का मुख्य सरोकार मेहनत मजदूरी करके इज्ज़त के साथ अपने बच्चों का पेट भरना था।

7. हड़ताल का समय काफ़ी मुश्किल समय था। इस समय के दौरान उन्होंने अपने घरों के बर्तन बेचे, वस्तुएं बेची ताकि वह अपने परिवारों को बचा कर रख सकें।

प्रश्न 3.
उदारीकरण की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर:
1991 में भारत में आर्थिक नीति लागू की गई। उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमंडलीकरण इस नीति की प्रमुख विशेषताएं हैं। उदारीकरण की प्रक्रिया 20वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुई। चाहे भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया लगभग तीन दशक से चली आ रही है पर सरकारों में बदलाव के साथ-साथ उदारीकरण की नीतियों तथा गति में भी परिवर्तन आता रहा है। उदारीकरण के महत्त्वपूर्ण पहलू तथा विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(i) उद्योगों को लाइसेंस मुक्त करना ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोग निजी तौर पर पूंजी लगाकर उद्योगों का विकास कर सकें।

(ii) उदयोगों को अनावश्यक प्रतिबंधों से मुक्त करना ताकि उदयोग लगाते समय कोई झिझके न तथा उदयोगों में तेजी से प्रगति हो।

(iii) प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देना ताकि देश में विदेशी मुद्रा बढ़े तथा उद्योग ज्यादा-से-ज्यादा लग सकें।

(iv) उद्योगों को बाज़ार की ज़रूरतों के अनुसार उत्पादन करने की छूट देना ताकि मार्किट में चीज़ों के उत्पादन पर किसी एक कंपनी का एकाधिकार न हो तथा मूल्यों में बढ़ोत्तरी न हो।

(v) उद्योगों की मांग तथा अपनी क्षमता के अनुसार वस्तुओं का उत्पादन करने की अनुमति देना।

(vi) उद्योगों तथा व्यापार को नौकरशाही के चंगुल से मुक्त करना क्योंकि व्यापार तथा उद्योगों में सबसे ज्यादा अडंगे नौकरशाही ही डालती है। अगर नौकरशाही अड़गे न डाले तो उद्योग तेज़ गति से तरक्की करेंगे।

(vii) अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण को कम करना ताकि लोग निजी तौर पर उद्योग लगाने के लिए आगे आएं तथा देश का औद्योगिक विकास हो सके।

(viii) सीमा शुल्क कम करना ताकि आयात-निर्यात को बढ़ावा मिल सके। आयात बढ़ने से कीमतें नियंत्रण में रहेंगी तथा निर्यात बढ़ने से देश के आंतरिक व्यापार में वृद्धि होगी।

(ix) वस्तुओं तथा सेवाओं के आयात-निर्यात से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना ताकि व्यापार में बढ़ोत्तरी हो सके।

(x) सार्वजनिक उपागमों को समाप्त करना तथा उनको निजी उद्योगों में बदलना क्योंकि सार्वजनिक उपागमों में सरकारी नियंत्रण ज्यादा होता है तथा उनमें मुनाफा कमाने की क्षमता कम होती है पर निजी हाथों में उद्योगों के आ जाने से कार्यक्षमता बढ़ जाती है तथा निजी क्षेत्र हमेशा मुनाफा कमाने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। इस तरह सार्वजनिक उपागमों को निजी हाथों में देने से उनकी कार्यक्षमता बढ़ेगी तथा मुनाफा कमाने के मौके ज्यादा बढ़ेंगे।

प्रश्न 4.
भूमंडलीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1991 में देश में आर्थिक सुधार शुरू होने के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में तेजी आ गई। भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न चरणों में भूमंडलीकरण किया जा रहा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भूमंडलीकरण में 50 राष्ट्रों में सिंगापुर प्रथम तथा भारत 49वें स्थान पर है।

इससे पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण की गति अभी धीमी है। भूमंडलीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ा उसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-
(i) भारत की विश्व निर्यात हिस्से में वृद्धि (Increase of Indian Share in World Export)-भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के चलते भारत का विश्व में निर्यात का हिस्सा बढ़ा है।

20वीं शताब्दी के आखिरी दशक के दौरान भारत की वस्तुओं तथा सेवाओं में 125% की वृद्धि हुई है। 1990 में भारत का विश्व की वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात में हिस्सा 0.55% था जोकि 1999 में बढ़कर 0.75% हो गया था।

(ii) भारत में विदेशी निवेश (Foreign Investment in India)-विदेशी निवेश वृद्धि भी भूमंडलीकरण का एक लाभ है क्योंकि विदेशी निवेश से अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता बढ़ती है। भारत में निरंतर विदेशी निवेश बढ़ रहा है। 1995-96 से 2000-01 के दौरान इसमें 53% की वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान वार्षिक औसत लगभग $ 500 करोड़ विदेशी निवेश हुआ।

(iii) विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) आयात के लिए विदेशी मुद्रा आवश्यक है। जून, 1991 में विदेशी मुद्रा भंडार सिर्फ One Billion था जिससे सिर्फ दो सप्ताह की आयात आवश्यकताएं ही पूरी की जा सकती थीं। जुलाई, 1991 में भारत में नयी आर्थिक नीतियां अपनायी गईं।

भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण को बढ़ावा दिया गया जिस वजह से देश के विदेशी मुद्रा भंडार में काफ़ी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई। फलस्वरूप वर्तमान समय में देश में $ 300 Billion के करीब विदेशी मद्रा है। इससे पहले कभी भी देश में इतना विदेशी मद्रा का भंडार नहीं था।

(iv) सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर (Growth of Gross Domestic Product)-भूमंडलीकरण से सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है। देश में 1980 के दशक में वृद्धि दर 5.63% तथा 1990 के दशक के दौरान वृद्धि दर 5.80% रहा। इस तरह सकल घरेलू उत्पादन में थोड़ी सी वृद्धि हुई।

(v) बेरोज़गारी में वृद्धि (Increase in Unemployment)-भूमंडलीकरण से बेरोज़गारी बढ़ती है। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया तथा मलेशिया में भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण आर्थिक संकट आया। फलस्वरूप लगभग एक करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा तथा वे ग़रीबी रेखा से नीचे आ गए। 1990 के दशक के शुरू में देश में बेरोजगारी दर 6% थी जो दशक के अंत में 7% हो गई। इस तरह भूमंडलीकरण से रोजगार विहीन विकास हो रहा है।

(vi) कृषि पर प्रभाव (Impact on Agriculture)-देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों का हिस्सा लगभग 29% है जबकि यह अमेरिका में 2%, फ्रांस तथा जापान में 5.5% है। अगर श्रम शक्ति की नजर से देखें तो भारत की 69% श्रम शक्ति को कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों में रोजगार प्राप्त है जबकि अमेरिका तथा इंग्लैंड में ऐसे कार्यों में 2.6% श्रम शक्ति कार्यरत है। विश्व व्यापार के नियमों के अनुसार विश्व को इस संगठन के सभी सदस्य देशों को कृषि क्षेत्र निवेश के लिए विश्व के अन्य राष्ट्रों के लिए खोलना है। इस तरह आने वाला समय भारत की कृषि तथा अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती भरा रहने की उम्मीद है।

(vii) शिक्षा व तकनीकी सुधार (Educational and technical reforms) भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण का शिक्षा पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है तथा तकनीकी शिक्षा में तो चमत्कार हो गया है। आज संचार तथा परिवहन के साधनों की वजह से दूरियां काफ़ी कम हो गई हैं। आज अगर किसी देश में शिक्षा तथा तकनीक में सुधार आते हैं तो वह पलक झपकते ही सारी दुनिया में पहुंच जाते हैं। इंटरनेट तथा कंप्यूटर ने तो इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है।

(viii) वर्गों के स्वरूप में परिवर्तन (Change in the form of Classes) भूमंडलीकरण ने वर्गों के स्वरूप में भी परिवर्तन ला दिया है। 20वीं सदी में सिर्फ तीन प्रमुख वर्ग-उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग थे पर आजकल वर्गों की संख्या काफी ज्यादा हो गई है। प्रत्येक वर्ग में ही बहत से उपवर्ग बन गए हैं जैसे मज़दर वर्ग. डॉक्टर वर्ग. शिक्षक वर्ग इत्यादि के उनकी आय के अनुसार वर्ग बन गए हैं।

(ix) निजीकरण (Privatization)-भूमंडलीकरण का एक अच्छा प्रभाव यह है कि निजीकरण देखने को मिल रहा है। विकसित तथा विकासशील देशों में बहुत से सार्वजनिक उपक्रम निजी हाथों में चल रहे हैं तथा यह अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इसी से प्रेरित होकर और ज्यादा सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है।

(x) उद्योग-धंधों का विकास (Development of Industries) आर्थिक विकास की ऊँची दर प्राप्त करने के लिए विदेशी पूंजी निवेश से काफ़ी सहायता मिलती है। इससे न सिर्फ उद्योगों को लाभ मिलता है बल्कि उपभोक्ता को अच्छी तकनीक, अच्छे उत्पाद मिलते हैं तथा साथ ही साथ भारतीय उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की प्रेरणा मिलती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 औद्योगिक समाज में परिवर्तन और विकास

प्रश्न 5.
भारत में मज़दूर संघों की भूमिका पर प्रकाश डालें तथा किसी लंबी चली हड़ताल के बारे में बताएं।
उत्तर:
हमारे देश में बहुत से मजदूर संघ मजदूरों के हितों के लिए कार्य करते हैं परंतु बहुत से मज़दूर संघों में क्षेत्रीयवाद तथा जातिवाद जैसी कई समस्याएँ होती हैं। कई बार काम को बुरी दशाओं के कारण मज़दूर हड़ताल कर देते हैं। वे काम करने नहीं जाते. तालाबंदी होने की स्थिति में मालिक मिल का दरवाजा बंद करके मज़दरों को अंदर जाने नहीं देते हैं। हड़ताल करना काफी मुश्किल निर्णय होता है क्योंकि मालिक बाहर से मजदूर बुलाने की कोशिश करते हैं। श्रमिकों के लिए वेतन के बिना रहना मुश्किल होता है। इस समय पर मजदूर संघ उनके हितों के लिए लड़ते हैं तथा मालिकों पर दबाव बनाते हैं ताकि उनकी मांगों को माना जा सके।

यहां हम 1982 में बंबई कपड़ा मिल में हुई सामंत हड़ताल के बारे में बता सकते हैं जो व्यापार संघ के नेता डॉ० दत्ता सामंत के नेतृत्व में हुई थी। इस हड़ताल के कारण लगभग ढाई लाख मज़दूर तथा उनके परिवार प्रभावित हुए। मजदूरों की माँग थी कि उन्हें अधिक वेतन दिया जाए तथा अपना संघ बनाने की आज्ञा दी जाए। बंबई इंडस्ट्रियल रिलेशंस एक्ट के अनसार संघ बनाने केलिए अनुमति लेनी चाहिए तथा अनमति लेने के लिए हडताल नहीं होनी चाहिए।

कांग्रेस द्वारा समर्थित राष्ट्रीय मिल मजदूर संघ ही एकमात्र मान्यता प्राप्त संघ था तथा उसने बाहर से मजदूर की मांगों को नहीं सुना। धीरे-धीरे दो साल बाद मजदूरों ने काम पर जाना शुरू कर दिया क्योंकि वह हड़ताल से परेशान हो चुके थे। लगभग एक लाख मज़दूर बेरोज़गार हो गए तथा वह अपने गाँवों को लौट गए या दिहाड़ी पर कार्य करने लग गए। बाकी आसपास के क्षेत्रों के बिजली करघा क्षेत्रों
में कार्य करने चले गए।

प्रश्न 6.
औद्योगीकरण की क्या विशेषताएं होती हैं?
उत्तर:
औद्योगीकरण की विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित हैं-
(i) मशीनों से उत्पादन-औद्योगीकरण की प्रक्रिया में उत्पादन मशीनों से होता है न कि हाथों से। इस प्रक्रिया में नयी-नयी मशीनों का ईजाद होता है तथा उन मशीनों की मदद से उत्पादन बढ़ाया जाता है। प्राचीन समाजों में उत्पादन हाथों से होता था इसलिए औद्योगीकरण इतनी उन्नत अवस्था में नहीं था। औद्योगीकरण में उत्पादन नयी मशीनों से तथा ज़्यादा मात्रा में होता है।

(ii) औद्योगीकरण का संबंध उत्पादन की प्रक्रिया से होता है-औद्योगीकरण का संबंध उत्पादन की प्रक्रिया से होता है क्योंकि इस प्रक्रिया के दौरान उत्पादन बढ़ जाता है। इसमें मशीनों की मदद से उत्पादन किया जाता है तथा उत्पादन भी ज़्यादा मात्रा में होता है।

(iii) औद्योगीकरण में परंपरागत शक्ति का प्रयोग नहीं होता-परंपरागत शक्ति वह शक्ति होती है जो मानव शक्ति या पशु शक्ति पर आधारित होती है। औद्योगीकरण में इस मानव या पशु शक्ति की बजाए पेट्रोल, डीज़ल, कोयला, विद्युत् या परमाणु शक्ति का प्रयोग होता है क्योंकि परंपरागत शक्ति की अपेक्षा यह शक्ति ज़्यादा तेज़ी से मशोनों को चलाती है तथा आजकल की मशीनें भी इसी शक्ति से चलती हैं।

(iv) औद्योगीकरण में उत्पादन तेज़ी से होता है-इस प्रक्रिया में उत्पादन बहुत तेज़ गति से होता है। प्राचीन समय में क्योंकि उत्पादन हाथों से होता था इसलिए उत्पादन बहुत कम हुआ करता था परंतु औद्योगीकरण में उत्पादन मशीनों से होता है इसलिए उत्पादन भी ज्यादा मात्रा में होता है। क्योंकि आजकल जनसंख्या भी काफ़ी बढ़ गई है इसलिए उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा मशीनों का प्रयोग होता है ताकि ज्यादा उत्पादन किया जा सके।

(v) औद्योगीकरण में आर्थिक विकास होता है-इस प्रक्रिया में आर्थिक विकास होना ज़रूरी है। उदयोग लग जाते हैं जो न सिर्फ अपने देश की ज़रूरतें परी करते हैं बल्कि दसरे देशों की भी जरूरतें परी करते हैं। इस वजह से ये ज्यादा मुनाफ़ा कमाते हैं तथा देश के लिए भी पैसा कमाते हैं। पैसा कमाने के साथ ये देश को काफ़ी कर भी देते हैं जिससे देश को काफ़ी आमदनी हो जाती है जो कि देश के विकास में खर्च होती है। लोगों को उद्योगों में काम मिलता है जिससे उनका जीवन स्तर ऊँचा होता है जिससे देश का आर्थिक विकास होता है।

(vi) औद्योगीकरण से प्राचीन मान्यतएं टूट जाती हैं-औद्योगीकरण से प्राचीन मान्यताएं टूट जाती हैं। उदाहरण के तौर पर, भारत में इस प्रक्रिया के फलस्वरूप संयुक्त परिवार की मान्यता तथा परंपरा में विघटन हो गया है। इस वजह से संयुक्त परिवार टूट कर केंद्रीय परिवारों में बदल रहे हैं। इस तरह और भी की परंपराओं जैसे जाति प्रथा, विवाह नाम की संस्था में भी बहुत से परिवर्तन आ रहे हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि औद्योगीकरण में प्राचीन परंपराएं टूट जाती हैं।

(vii) औद्योगीकरण में नए वर्गों का उदय होता है-औद्योगीकरण में नए-नए वर्ग सामने आते हैं। अमीर वर्ग, गरीब वर्ग, मध्यम वर्ग, मालिक वर्ग, मज़दूर वर्ग जैसे कई और वर्ग हमारे सामने आते हैं। इस वजह से कइयों को पैसा आ जाता है, कइयों के पास कम हो जाता है। कई ट्रेड यूनियन इत्यादि जैसे वर्ग सामने आ जाते हैं जोकि हमारे समाज में जरूरी हो जाते हैं।

(vii) औद्योगीकरण में प्राकृतिक साधनों का पूरी तरह प्रयोग होता है-इस प्रक्रिया में देश के प्राकृतिक साधनों का पूरी तरह प्रयोग होता है। मशीनों से उत्पादन की वजह से कोयला, डीज़ल, पेट्रोल, बिजली इत्यादि शक्ति का प्रयोग होता है जोकि प्राकृतिक साधनों का हिस्सा होते हैं। इसके अलावा कच्चे माल के लिए कृषि पर तथा भूमि पर ज़रूरत से ज्यादा बोझ पड़ता है जिससे प्राकृतिक साधनों का विनाश होना शुरू हो जाता है।

(ix) औदयोगीकरण में कई तकनीकों का प्रयोग होता है-औदयोगीकरण में हमेशा नई तकनीकों का प्रयोग होता रहता है क्योकि औद्योगीकरण में नयी-नयी मशीनों का प्रयोग होता है। इस वजह से नए-नए आविष्कार होते रहते हैं जिसके कारण हमारे सामने नयी-नयी मशीनें आती हैं जिनका प्रयोग उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस तरह हमने देखा कि औद्योगीकरण में बहुत-सी विशेषताएं होती हैं पर इस प्रक्रिया की वजह से कई समस्याएं भी आती हैं।

प्रश्न 7.
औद्योगीकरण के समाज पर क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर:
औद्योगीकरण के समाज पर बहुत से अच्छे-बुरे प्रभाव पड़ते हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) श्रम विभाजन-प्राचीन समय में किसी चीज़ का उत्पादन परिवार में ही हुआ करता था। सभी को उस चीज़ के उत्पादन से संबंधित कार्य आते थे तथा वे सभी मिल-जुल कर कार्य करके उसका उत्पादन कर लिया करते थे। पर औद्योगीकरण की वजह से काम मशीनों पर होना शुरू हो गया जिस वजह से श्रम विभाजन का संकल्प हमारे सामने आया।

किसी चीज़ का उत्पादन कई चरणों में होता है। हर चरण में अलग-अलग काम होते हैं। अब हर कोई अलग-अलग काम करता है, जैसे कपड़ा बनाने में कोई किसी मशीन को चलाता है, कोई किसी मशीन को। अगर कोई रंगाई करता है तो यह भी श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण का काम हो जाता है। इस तरह हर काम में श्रम विभाजन हो गया है। हर कोई एक खास काम करता है तथा उसका उसी काम में विशेषीकरण हो जाता है। यह औद्योगीकरण की वजह से हुआ है।

(ii) यातायात के साधनों का विकास-औद्योगीकरण की वजह से यातायात से साधनों का भी विकास हुआ है। फैक्टरियों में उत्पादन के लिए कच्चे माल की ज़रूरत होती है। कच्चे माल की फैक्टरियों तक दूर-दूर के इलाकों से पहुँचाने के लिए ट्रेन, ट्रकों इत्यादि जैसे यातायात के साधनों का विकास हुआ है। इसके अलावा बने हुए माल को फैक्टरी से बाज़ार तक पहुँचाने के लिए भी इन यातायात के साधनों की जरूरत होती है जिनका धीरे-धीरे विकास हो गया। इस तरह औद्योगीकरण की वजह से यातायात के साधनों का विकास तेजी से हुआ।

(iii) फैक्टरियों के उत्पादन में बढ़ौतरी-औदयोगीकरण की वजह से चीजों का उत्पादन घरों से निकल कर फैक्टरी में आ गया जहां पर उत्पादन हाथों की बजाए मशीनों से होता है। हाथों से उत्पादन धीरे-धीरे होता है पर मशीनों से उत्पादन तेजी से होता है। चाहे जनसंख्या के बढ़ने से खपत में भी बढ़ोत्तरी हुई पर इसके साथ-साथ नए-नए आविष्कार हुए जिनसे उत्पादन भी और बढ़ता गया। इस तरह चीज़ों के उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी औद्योगीकरण की वजह से हुई।

(iv) शहरों के आकार में बढ़ौतरी-औद्योगीकरण के बढ़ने से शहरों के आकार भी बढ़ने लगे। उद्योग शहरों में लगते थे जिस वजह से गांवों के लोग शहरों की तरफ जाने लगे। रोज़-रोज़ गांव में जाना मुमकिन नहीं था इसलिए लोग अपने परिवार भी शहर ले जाने लगे। जनसंख्या के बढ़ने से शहरों में जनसंख्या कम होने लगी जिस वजह से धीरे-धीरे शहरों के आकार बढ़ने लगे तथा धीरे-धीरे नगरीयकरण का संकल्प हमारे सामने आया।

(v) पूंजीवाद-औद्योगीकरण की वजह से पूंजीवाद का भी जन्म हुआ। जब घरों में उत्पादन हुआ करता था तो ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत नहीं होती थी क्योंकि उत्पादन कम होता था तथा उत्पादन घर में ही हो जाता था पर औदयोगीकरण ने फैक्टरी प्रथा को जन्म दिया। फैक्टरी बनाने के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की ज़रूरत पड़ी। फैक्टरी बनाने के लिए, कच्चा माल खरीदने के लिए, बनी हुई चीज़ को बाज़ार में बेचने के लिए, मज़दूरों को तनख्वाह देने तथा कई और कामों के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की ज़रूरत पड़ी।

जिनके पास पैसा था उन्होंने बड़ी-बड़ी फैक्टरियां खड़ी कर ली तथा धीरे-धीरे पैसे की मदद से और पैसा कमाने लग गए। इसके साथ-साथ समाज में कई और वर्ग जैसे व्यापारी, मालिक, मज़दूर, दलाल इत्यादि हमारे सामने आए तथा व्यापार में भी बढ़ोत्तरी हुई। पैसे की मदद से उत्पादित चीजें और देशों को भेजी जाने लगी जिससे और पैसा आने लगा। इस पैसे की वजह से और देशों पर कब्जे होने लगे जिसे हम साम्राज्यवाद कहते हैं। इसने और देशों का शोषण करने को प्रेरित किया। इस तरह पूंजीवाद का जन्म हुआ जिसने कई और समस्याओं को जन्म दिया।

(vi) कुटीर उद्योगों का ख़त्म होना-इसकी वजह से गांवों में लगे कुटीर उद्योग ख़त्म हो जाते हैं। इसमें उत्पादन मशीनों से होता है जोकि सस्ता तथा अच्छा भी होता है। पर कुटीर उद्योग में क्योंकि उत्पादन हाथों से होता है जिस वजह से वह महंगा तथा मशीनों जैसा अच्छा भी नहीं होता है। इस तरह फैक्टरियों का माल बिकने लग जाता है तथा कुटीर उद्योगों का माल बिकना बंद हो जाता है जिस वजह से इन कुटीर उद्योगों में आर्थिक संकट आ जाता है तथा यह धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण कुटीर उद्योगों के विनाश का कारण बनता है।

(vii) रहने की जगह की समस्या-उद्योग नगरों में लगते हैं। गाँवों से हजारों लोग शहरों में इन उद्योगों में काम की तलाश में आते हैं जिस वजह से शहरों में रहने की जगह की या मकानों की समस्या हो जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए कई-कई लोग एक कमरे में रहते हैं जिस वजह से उनमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं। इसी के साथ गंदी बस्तियां भी पनप जाती हैं जो शहरों में गंदगी फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

(viii) बेकारी-औद्योगीकरण की वजह से बेकारी की समस्या भी बढ़ जाती है। पुराने तरीकों से उत्पादन हाथों से होता है जिस वजह से सभी को काम मिल जाता है पर इस प्रक्रिया में नए-नए आविष्कार होते रहते हैं तथा मशीनें भी आती रहती हैं जिस वजह से मजदूरों को काम से हटा दिया जाता है। उनकी जगह मशीनें आ जाती हैं। एक एक मशीन दस-दस मज़दूरों का काम कर सकती है। वे मजदूर बेकार हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण बेकारी की समस्या को भी बढ़ावा देता है द्धनहीं जाती, उन्हें प्रदूषण में काम करना पड़ता है जिस वजह से उनके स्वास्थ्य पर काफ़ी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

(ix) स्वास्थ्य की समस्या-औद्योगीकरण का एक और प्रभाव मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इन उद्योगों का वातावरण मजदूरों की सेहत के लिए काफ़ी हानिकारक होता है। वहां ताजी हवा नहीं जाती, उन्हें प्रदूषण में काम करना पड़ता है जिस वजह से उनके स्वास्थ्य पर काफ़ी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों का मुख्य पेशा क्या है?
(A) कृषि
(B) नौकरी
(C) व्यापार
(D) उद्योग।
उत्तर:
कृषि।

2. कितने प्रतिशत भारतीय जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है?
(A) 60%
(B) 70%
(C) 80%
(D) 50%
उत्तर:
70%.

3. भारत में अंदाजन कितने गांव हैं?
(A) 4 लाख
(B) 5 लाख
(C) 6 लाख
(D) 4.5 लाख।
उत्तर:
6 लाख।

4. कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी किस पर निर्भर करती है?
(A) नई तकनीक
(B) उन्नत बीज
(C) रासायनिक उर्वरक
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

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5. किस क्रांति ने कृषि उत्पादन के क्षेत्र में अत्यधिक बढ़ौत्तरी की है?
(A) हरित क्रांति
(B) श्वेत क्रांति
(C) नीली क्रांति
(D) पीली क्रांति।
उत्तर:
हरित क्रांति।

6. 1793 में ज़मींदार व्यवस्था किसने शुरू की थी?
(A) लॉर्ड विलियम बैंटिक
(B) लॉर्ड कार्नवालिस
(C) लॉर्ड माऊँटबेंटन
(D) लॉर्ड डलहौज़ी।
उत्तर:
लॉर्ड कार्नवालिस।

7. कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए सबसे पहले कौन-सा कार्यक्रम शुरू किया गया था?
(A) IRDP
(B) IADP
(C) CDP
(D) SJSY
उत्तर:
IADP

8. भारत में रैय्यतवाड़ी प्रथा किसने शुरू की थी?
(A) लॉर्ड डलहौज़ी
(B) लॉर्ड कार्नवालिस
(C) लॉर्ड बैंटिक
(D) लॉर्ड माऊँटबेटन।
उत्तर:
लॉर्ड बैंटिक।

9. हरित क्रांति के द्वारा किस चीज़ का उत्पादन बढ़ाया गया?
(A) गेहूँ
(B) चावल
(C) a + b दोनों
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
a + b दोनों।

10. कृषि उत्पादन कैसे बढ़ाया जा सकता है?
(A) मशीनों का प्रयोग करके
(B) उन्नत बीजों का प्रयोग करके
(C) कैमिकल उर्वरक प्रयोग करके
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

11. हरित क्रांति का अधिक लाभ उत्तर भारतीय प्रदेशों ने क्यों उठाया था?
(A) उपजाऊ भूमि के कारण
(B) सिंचाई के साधनों की उपलब्धता के कारण
(C) निवेश के लिए पैसा होने के कारण
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

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12. जब कुछ किसान इकट्ठे होकर कृषि करते हैं तो उसे क्या कहते हैं?
(A) सहकारी कृषि
(B) एकत्रता कृषि
(C) इकट्ठ कृषि
(D) ज़मींदारी व्यवस्था।
उत्तर:
सहकारी कृषि।

13. रैय्यत का क्या अर्थ है?
(A) ज़मींदार
(B) किसान
(C) मज़दूर
(D) सरकार।
उत्तर:
किसान।

14. इनमें से कौन-सी ज़मींदारी व्यवस्था की विशेषता है?
(A) ज़मींदार भूमि का स्वामी होता था।
(B) ज़मींदार अपनी भूमि ग़रीब किसानों को कृषि करने के लिए देता था।
(C) ज़मींदार किसानों से लगान इकट्ठा करके सरकार को देता था।
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

15. महलवाड़ी प्रथा में भूमि का स्वामी कौन होता था?
(A) किसान
(B) परिवार
(C) गाँव
(D) जमींदार।
उत्तर:
गाँव।

16. महलवाड़ी प्रथा में लोगों से लगान कौन इकट्ठा करता था?
(A) नंबरदार
(B) ज़मींदार
(C) परिवार
(D) सरकार।
उत्तर:
नंबरदार।

17. ज़मींदार उन्मूलन की क्या विशेषता थी?
(A) बंजर भूमि सरकार के हाथों में आ गई
(B) ज़मींदारों को उनकी भूमि का मुआवजा दिया गया
(C) मुआवजा नगद या किस्तों में दिया गया
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

18. भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् कौन-सा भूमि सुधार किया गया?
(A) ज़मींदार प्रथा का खात्मा
(B) भूमि के स्वामित्व की सीमा तय करना
(C) काश्तकारी व्यवस्था में सुधार
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

19. हरित क्रांति की हानि क्या थी?
(A) सीमित क्षेत्रों में आई थी
(B) सीमित फसलों को प्रोत्साहित किया था
(C) अमीरों को अधिक लाभ हुआ
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

20. हरित क्रांति का मुख्य आधार क्या था?
(A) फसलों का मूल्य निर्धारित करना
(B) कीटनाशकों का प्रयोग
(C) तकनीकों तथा उर्वरकों का प्रयोग
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

21. प्राचीन भारत में किस प्रकार की व्यवस्था थी?
(A) जाति प्रथा
(B) वर्ग व्यवस्था
(C) सामाजिक व्यवस्था
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
जाति प्रथा।

22. आधुनिक भारत में किस प्रकार की व्यवस्था मिल जाती है?
(A) जाति प्रथा
(B) वर्ग व्यवस्था
(C) सामाजिक व्यवस्था
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
वर्ग व्यवस्था।

23. इनमें से कौन-सा वर्ग नगरों में देखने को मिल जाता है?
(A) व्यापारी वर्ग
(B) अध्यापक वर्ग
(C) ट्रेड यूनियन
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

24. इनमें से कौन-सा वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिल जाता है?
(A) छोटे किसान
(B) पूंजीपति किसान
(C) सज्जन किसान
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

25. क्या यह मुमकिन है कि सभी व्यक्तियों की सामाजिक स्थिति एक जैसी हो जाए?
(A) हाँ
(B) नहीं
(C) कह नहीं सकते
(D) पता नहीं।
उत्तर:
नहीं।

26. उस समूह को ……………… समूह कहते हैं जिसे समाज में कोई विशेष स्थान प्राप्त होता है।
(A) सज्जन
(B) अभिजात
(C) विशेष
(D) पूंजीपति।
उत्तर:
अभिजात।

27. उस व्यक्ति को …………….. किसान कहते हैं जिसने रिटायर होने के पश्चात् अपना पैसा कृषि में लगा दिया है।
(A) मध्यमवर्गीय
(B) पूंजीपति
(C) सीमांट
(D) सज्जन।
उत्तर:
सज्जन।

28. ……………… किसान उस समूह का सदस्य होता है जो कृषि कार्यों में इस तरह पूंजी निवेश करता ताकि अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त हो सके।
(A) मध्यमवर्गीय
(B) पूंजीपति
(C) सीमांत
(D) सज्जन।
उत्तर:
पूंजीपति।

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29. इनमें से कौन-सा संविदा खेती का समाजशास्त्रीय महत्त्व रखता है?
(A) सभी व्यक्तियों को उत्पादन प्रक्रिया से जोड़ना
(B) बहुत से व्यक्तियों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देना
(C) देशीय कृषि-ज्ञान को निरर्थक बना देना।
(D) (B) व (C) दोनों।
उत्तर:
(B) व (C) दोनों।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन समय में भारत में किस प्रकार की व्यवस्था थी?
उत्तर:
प्राचीन समय में भारत में जाति व्यवस्था थी जोकि जातियों में स्तरीकरण पर निर्भर थी।

प्रश्न 2.
आजकल भारतीय समाज में किस प्रकार की व्यवस्था आगे आ रही है?
उत्तर:
आजकल भारतीय समाज में जाति व्यवस्था की जगह वर्ग व्यवस्था आगे आ रही है।

प्रश्न 3.
शहरों में किस प्रकार के वर्ग देखने को मिल जाते हैं?
उत्तर:
शहरों में व्यवसायी, अध्यापक, मध्यम वर्ग तथा और कई प्रकार के वर्ग देखने को मिल जाते हैं।

प्रश्न 4.
गांवों में आजकल किस प्रकार के वर्ग देखने को मिलते हैं?
उत्तर:
गांवों में आजकल छोटे किसान, मध्यमवर्गीय किसान, पूंजीपति किसान तथा मज़दूर या बगैर भूमि के किसान देखने को मिल जाते हैं।

प्रश्न 5.
गांव की पहचान किस तरह होती है?
उत्तर:
आम तौर पर गांव की पहचान जाति के आधार पर होती है।

प्रश्न 6.
क्या मनुष्यों के समाज में सभी व्यक्तियों की स्थिति या पद एक समान हो सकते हैं?
उत्तर:
जी नहीं, मनुष्यों के समाज में सभी व्यक्तियों की स्थिति या पद एक समान नहीं हो सकते हैं क्योंकि ऐसा करने से शक्ति संतुलन बिगड़ सकता है।

प्रश्न 7.
भारत के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध कब तथा क्यों लगे थे?
उत्तर:
कुछ देशों ने भारत के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे क्योंकि सन् 1998 में भारत ने पोखरन (राजस्थान में) परमाणु परीक्षण किए थे।

प्रश्न 8.
भारत में उदारीकरण तथा भूमंडलीकरण कब शुरू हुए थे?
उत्तर:
भारत में उदारीकरण तथा किरण 1991 के बाद शुरू हुए जब नरसिम्हा राव सरकार में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने थे।

प्रश्न 9.
भारत में कितने टेलीफोन एक्सचेंज हैं?
उत्तर:
भारत में 35000 के करीब टेलीफोन एक्सचेंज हैं।

प्रश्न 10.
भारत में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा कब हुई थी?
उत्तर:
भारत में नयी औद्योगिक नीति की घोषणा 1991 में हुई थी।

प्रश्न 11.
जाति वर्ग में क्यों बदल रही है?
उत्तर:
जाति-प्रथा में बहुत से बंधन जैसे विवाह, खाने-पीने इत्यादि पर बंधन हुआ करते थे परंतु नगरीकरण, औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण इत्यादि की वजह से जाति-प्रथा कमज़ोर पड़ रही है तथा उसकी जगह वर्ग व्यवस्था सामने आ रही है।

प्रश्न 12.
सन् 2000 में भारत में खाद्यान्न का कितना उत्पादन हुआ था?
उत्तर:
सन् 2000 में भारत में खाद्यान्न का उत्पादन 250 मिलियन टन के करीब हुआ था।

प्रश्न 13.
भारत में ज़मींदारी प्रथा कब शुरू हुई थी?
अथवा
ज़मींदारी व्यवस्था किसने शुरू की?
उत्तर:
भारत में ज़मींदारी प्रथा लार्ड कार्नवालिस द्वारा 1793 में शुरू हुई थी।

प्रश्न 14.
लगान क्या होता है?
उत्तर:
जो पैसा किसान हरेक वर्ष ज़मींदार को भूमि के कर के रूप में देता हैं उसे लगान कहते हैं।

प्रश्न 15.
कृषि को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले कौन-सा कार्यक्रम चलाया गया था?
उत्तर:
कृषि को बढ़ावा देने के लिए सबसे पहले IADP (Intensive Agricultural District Programme) 1960-61 में चलाया गया था।

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प्रश्न 16.
रैय्यतवाड़ी प्रथा कब शुरू हुई थी?
उत्तर:
रैय्यतवाड़ी प्रथा 1792 में मद्रास प्रांत में लार्ड विलियम बैंटिंक ने शुरू की थी।

प्रश्न 17.
यूरिया या खाद क्या होती है?
उत्तर:
ये वे रासायनिक पदार्थ होते हैं जिनसे भूमि की खाद्यान्न पैदा करने की क्षमता बढ़ती है। उदाहरण के तौर पर पोटाश, नाइट्रोजन, फॉस्फेट इत्यादि।

प्रश्न 18.
किस खाद्यान्न का उत्पादन भारत में ज्यादा है?
उत्तर:
चावल का उत्पादन भारत में सबसे ज्यादा है।

प्रश्न 19.
हरित क्रांति के फलस्वरूप कौन-सी फसलों का उत्पादन बढ़ा है?
उत्तर:
हरित क्रांति के फलस्वरूप चावल तथा गेहूँ का उत्पादन बढ़ा है।

प्रश्न 20.
सामाजिक स्तरीकरण की खुली व बंद व्यवस्था में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
वर्ग सामाजिक स्तरीकरण में खुली व्यवस्था है जिसकी सदस्यता व्यक्ति की योग्यता पर आधारित होती है तथा इसे कभी भी बदला जा सकता है। परंतु सामाजिक स्तरीकरण की बंद व्यवस्था जाति होती है जिसकी सदस्यता जन्म पर आधारित होती है तथा योग्यता होते हुए भी व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता।

प्रश्न 21.
भूमि सुधार से आप क्या समझते हैं?
अथवा
भूमि सुधार का अर्थ बताएं।
उत्तर:
आज़ादी से पहले भूमि, कृषि, कृषक बीच की कड़ियों व सरकार के बीच संबंधों के कुछ दोष थे जिन्हें दूर करने के लिए कुछ सुधार किए गए जिन्हें भूमि सुधार कहा गया। ज़मींदारों का उन्मूलन बिचौलियों का उन्मूलन, गरीबों को भूमि देना इत्यादि इन सुधारों में शामिल था।

प्रश्न 22.
गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या होता है?
उत्तर:
गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि ही होता है। भूमि से उत्पादन उनके स्रोत का मुख्य साधन है। भारत की 70% के करीब जनसंख्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर करती है।

प्रश्न 23.
भारत में कितने गाँव हैं?
उत्तर:
भारत में 5,50,000 के करीब गाँव हैं।

प्रश्न 24.
कृषि के उत्पादन में विकास किस चीज़ पर निर्भर करता है?
उत्तर:
कृषि के उत्पादन में विकास भूमि के लिए किए गए सुधारों, नई-नई तकनीकों के प्रयोग, नए आविष्कारों को प्रयोग करने से होता है।

प्रश्न 25.
हरित क्रांति से पहले भारत में खाद्यान्न की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
हरित क्रांति से पहले भारत अपनी जरूरतों के अनुसार उत्पादन नहीं कर पाता था तथा उसे अपनी ज़रूरतें पूरी करने के लिए बाहर के देशों से खाद्यान्न मंगवाना पड़ता था।

प्रश्न 26.
किस क्रांति से भारत में कृषि उत्पादन में बहुत विकास हुआ था?
उत्तर:
हरित क्रांति से भारत में कृषि उत्पादन में बहुत विकास हुआ था।

प्रश्न 27.
हरित क्रांति में उत्पादन में बढ़ोत्तरी किन वैज्ञानिकों की कोशिशों का नतीजा है?
उत्तर:
हरित क्रांति में उत्पादन में बढ़ोत्तरी का श्रेय डॉ० एम० एस० स्वामीनाथन तथा डॉ० बोरमान बोरलाग को जाता है।

प्रश्न 28.
हरित क्रांति से धनी किसानों को कैसे ज्यादा लाभ हुआ?
उत्तर:
हरित क्रांति से नई तकनीकें, बीज तथा खादें हमारे सामने आईं तथा इन सब चीज़ों को खरीदना धनी किसानों के लिए ही मुमकिन था। इसलिए हरित क्रांति से धनी किसानों को ज्यादा लाभ हुआ।

प्रश्न 29.
भूमि सुधार के क्या कारण थे?
उत्तर:

  • भूमि सुधार का पहला कारण कृषि के क्षेत्र तथा उत्पादन में वृद्धि करना था।
  • दूसरा कारण दलालों या मध्यस्थों को खत्म करके किसानों का शोषण खत्म करना था ताकि किसानों को भूमि मिल सके।

प्रश्न 30.
चकबंदी क्या होती है?
उत्तर:
यह भूमि को इकटठा करने की व्यवस्था है। अगर किसी किसान की एक ही गाँव में अलग-अलग जगह जोतने लायक ज़मीन होती थी तो उस किसान को एक ही जगह इकट्ठी ज़मीन दे दी जाती था या उन्हें एक ही स्थान पर संगठित कर दिया जाता था। उसे चकबंदी कहा जाता था।

प्रश्न 31.
सहकारी खेती क्या होती है?
उत्तर:
सहकारी खेती का अर्थ है कि छोटे-छोटे भूमि के टुकड़ों के मालिक इकट्ठे होकर अपनी जमीन इकट्ठी करके सहकारिता के आधार पर खेती करना तथा उस भूमि से होने वाली आय को अपनी भूमि के अनुसार बांट लेना। इससे व्यक्ति अपनी भूमि का मालिक भी बना रहता है तथा कृषि संबंधी काम भी मिल-बांट कर हो जाते हैं। उससे जो लाभ होता है उसे बांट लिया जाता है।

प्रश्न 32.
काश्तकारी प्रथा क्या होती है?
उत्तर:
हमारे देश में 40% खेती इसी काश्तकारी प्रथा से होती है। इस प्रथा के अनुसार जब व्यक्ति अपनी भूमि पर खुद खेती नहीं करता बल्कि किसी ओर की जमीन जोतने के लिए दे देता है। इसके लिए जोतने वाला व्यक्ति ज़मीन के मालिक को किराया देता है। जोतने वाले को काश्तकार कहते हैं।

प्रश्न 33.
आर्थिक विकास क्या होता है?
उत्तर:
जब जीव जीने के लिए सभी ज़रूरी साधनों का विकास हो जाए या जीवन जीने के ज़रूरी साधन आराम से उपलब्ध हों तो हम कह सकते हैं कि आर्थिक विकास हो गया है।

प्रश्न 34.
हरित क्रांति से सबसे अधिक विकास उत्तर भारत के प्रदेशों को क्यों पहुँचा है?
उत्तर:
हरित क्रांति से सबसे अधिक विकास उत्तर भारत के प्रदेशों को इन क्षेत्रों में उपलब्ध अच्छी उपजाऊ जमीन तथा कृषि के लिए उपलब्ध सिंचाई की काफ़ी ज्यादा सुविधाओं की वजह से है।

प्रश्न 35.
उत्पादन में सुधार कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:

  • अच्छे बीजों का प्रयोग करके उत्पादन सुधारा जा सकता है।
  • रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करके भी उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।

प्रश्न 36.
ज़मींदारी प्रथा भारत में कब खत्म हुई थी?
उत्तर:
आज़ादी से पहले भारत में काफ़ी ज्यादा ज़मींदारी प्रथा प्रचलित थी। आजादी के बाद ज़मींदारी प्रथा खत्म कर दी गई। 1950 के बाद सभी राज्यों ने ज़मींदारी प्रथा के विरुद्ध कानून बनाए जिस वजह से यह ज़मींदारी प्रथा हमारे देश में खत्म हो गई।

प्रश्न 37.
हरित क्रांति क्या है?
अथवा
हरित क्रांति किसे कहते हैं?
अथवा
हरित क्रांति क्या होती है?
अथवा
हरित क्रांति से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भारत में नई तकनीकों, नए बीजों तथा उर्वरकों के प्रयोग से कृषि के उत्पादन के क्षेत्र में जो वृद्धि हुई है उसे हरित क्रांति कहते हैं।

प्रश्न 38.
भारत का आर्थिक विकास किस तरह कृषि पर निर्भर करता है?
उत्तर:
भारत का आर्थिक विकास इस तरह कृषि पर निर्भर करता है कि भारत की 70% के करीब जनसंख्या कृषि पर निर्भर करती है। ये लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आमदनी के लिए कृषि पर ही निर्भर करते हैं। अगर देश को विकास करना है तो इन लोगों का विकास ज़रूरी है। इसीलिए अगर यह 70% लोग तरक्की करेंगे तो ही देश आर्थिक तौर पर तरक्की कर पाएगा।

प्रश्न 39.
जाति वर्ग में क्यों बदल रही है?
उत्तर:
जाति-प्रथा में बहुत से बंधन जैसे विवाह, खाने-पीने इत्यादि पर बंधन हुआ करते थे परंतु नगरीकरण, औद्योगीकरण, पश्चिमीकरण इत्यादि की वजह से जाति-प्रथा कमज़ोर पड़ रही है तथा उसकी जगह वर्ग व्यवस्था सामने आ रही है।

प्रश्न 40.
अभिजात वर्ग या Elite Group क्या होता है?
उत्तर:
Elite का मतलब होता है विशिष्ट अर्थात् जिसे समाज में कोई विशेष (खास) या उच्च स्थिति प्राप्त हो उसे अभिजात या Elite कहते हैं। इस तरह अभिजात वर्ग वह वर्ग होता है जिसे समाज में कोई विशिष्ट स्थान प्राप्त हो।

प्रश्न 41.
सज्जन किसान कौन होते हैं?
उत्तर:
इस किसान वर्ग में काफ़ी ऐसे लोग होते हैं जो सरकारी, गैर-सरकारी, सैनिक तथा असैनिक सेवाओं में कार्यरत थे तथा रिटायर हो चुके हैं। अपनी नौकरी से प्राप्त धन को वह कृषि फार्मों में लगाते हैं तथा विकास करते हैं।

प्रश्न 42.
मध्यमजातीय किसान कौन होते हैं?
उत्तर:
इस प्रकार के किसान मध्यम जातियों के समूह होते हैं। यह बीच की जातियों के होते हैं। यह न तो बहुत अमीर होते हैं तथा न ही ग़रीब होते हैं। इसलिए इन्हें मध्यमवर्गीय कहते हैं।

प्रश्न 43.
पूंजीपति किसान कौन होते हैं?
उत्तर:
पूंजीपति किसान वर्ग एक ऐसा वर्ग है जो कृषि कार्यों में इस तरह से पूंजी निवेश करता है ताकि अधिक से-अधिक लाभ प्राप्त हो सकें। यह खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ाने के लिए ऋण, अन्न प्रौद्योगिकी, मंडियों, यातायात तथा दरसंचार के साधनों तथा सस्ते श्रमिकों इत्यादि का प्रयोग करता है।

प्रश्न 44.
उदारीकरण क्या होता है?
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं। यह एक आर्थिक प्रक्रिया है तथा यह समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

प्रश्न 45.
भूमंडलीकरण क्या होता है?
उत्तर:
भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है अर्थात् एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूंजी तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहते हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है।

प्रश्न 46.
उदारीकरण के क्या कारण होते हैं?
उत्तर:

  • देश में रोज़गार के साधन विकसित करने के लिए ताकि लोगों को रोजगार मिल सके।
  • उद्योगों में ज्यादा-से-ज्यादा प्रतिस्पर्धा पैदा करना ताकि उपभोक्ता को ज्यादा-से-ज्यादा लाभ प्राप्त हो सके।

प्रश्न 47.
निजीकरण क्या होता है?
उत्तर:
लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देशों जहां पर मिश्रित प्रकार की अर्थव्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रम होते हैं जोकि सरकार के नियंत्रण में होते हैं। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपना ताकि यह और ज्यादा लाभ कमा सकें। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने को निजीकरण कहते हैं।

प्रश्न 48.
ज़मींदारी व्यवस्था क्या है?
उत्तर:
इस प्रथा को लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में शुरू किया था। इसके अनुसार ज़मींदारों को भूमि का मालिक मान लिया गया तथा उनका लगान निश्चित कर दिया गया। ज़मींदार आगे भूमि किराए पर देकर छोटे किसानों से जितना मर्जी चाहे लगान वसूल कर सकते थे। इससे छोटे किसानों का शोषण होना शुरू हो गया।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

प्रश्न 49.
महलवारी प्रथा का क्या अर्थ है?
अथवा
महलवारी व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
यह प्रथा अंग्रेजों के समय 19वीं सदी की शुरुआत में शुरू की थी जिसके अनुसार गांव के पूरे समुदाय को ही भूमि का मालिक मानकर उसका लगान निश्चित कर दिया जाता था। समुदाय का एक व्यक्ति गांव के सभी घरों से निश्चित लगान इकट्ठा करके सरकार तक पहुंचाता था परंतु इस प्रथा में लगान काफी अधिक होता था।

प्रश्न 50.
रैय्यतवाड़ी व्यवस्था क्या है?
अथवा
रैयतबाड़ी व्यवस्था में रैयत’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
रैय्यत का अर्थ है किसान अथवा कृषक। यह प्रथा लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने चलाई थी जिसमें सरकार का सीधा संपर्क कृषक या रैय्यत के साथ होता था। इसमें हरेक रैय्यत का लगान निश्चित कर दिया जाता था तथा वह सीधे सरकार को ही इसका भुगतान करते थे। परंतु इसमें लगान काफी अधिक निश्चित किया जाता था।

प्रश्न 51.
किसी शैक्षणिक वर्ग का उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
अध्यापकों का वर्ग शैक्षणिक वर्ग का उदाहरण है।

प्रश्न 52.
हरित क्रांति से किस वस्तु का उत्पादन बढ़ा।
उत्तर:
हरित क्रांति से गेहूँ तथा चावल का उत्पादन बढ़ा।

प्रश्न 53.
पूँजीपति वर्ग क्या होता है?
उत्तर:
वह वर्ग जिसके पास बहुत-सा पैसा होता है जिसकी सहायता से वह नए उद्योग लगाता है ताकि और पैसा कमाया जा सके तथा जो मजदूरों का शोषण करता है उसे पूँजीपति वर्ग कहते हैं।

प्रश्न 54.
भारत में हरित क्रांति किस क्षेत्र में आई?
उत्तर:
भारत में हरित क्रांति कृषि क्षेत्र में गेहूँ तथा चावल में उत्पादन के क्षेत्र में आई।

प्रश्न 55.
कृषक वर्ग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जो वर्ग कृषि करके तथा चीज़ों को उगा कर अपना गुजारा करता है उसे कृषक वर्ग कहते हैं।

प्रश्न 56.
ज़मींदार किसे कहते हैं?
उत्तर:
गांवों में मिलने वाला शक्तिशाली व्यक्ति जिसके पास बहुत-सा पैसा तथा भूमि होती है, जो भूमि को किसानों को किराए पर देता है तथा स्वयं कम कार्य करता है उसे ज़मींदार कहते हैं।

प्रश्न 57.
कृषि मज़दूर किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह मज़दूर जो कृषि के क्षेत्र में किसानों के पास कार्य करता है उसे कृषि मजदूर कहते हैं।

प्रश्न 58.
हरित क्रांति का संबंध कृषि तथा उद्योग में से किससे है?
उत्तर:
हरित क्रांति का संबंध कृषि से है।

प्रश्न 59.
निर्धनता (गरीबी) रेखा से नीचे रहने वाले व्यक्ति आर्थिक आधार पर उच्च, मध्य तथा निम्न में से किस वर्ग में आते हैं?
उत्तर:
निर्धनता रेखा से नीचे रहने वाले व्यक्ति आर्थिक आधार पर निम्न वर्ग में आते हैं।

प्रश्न 60.
भारत में हरित क्रांति (दूध, फल या कृषि) किस क्षेत्र में आई?
उत्तर:
भारत में हरित क्रांति कृषि क्षेत्र में आई।

प्रश्न 61.
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कितने प्रकार की भू-काश्तकारी व्यवस्थाएं थीं?
अथवा
स्वतंत्रता से पूर्व भारत में कितनी भू-व्यवस्थाएँ प्रचलित थीं?
उत्तर:
तीन प्रकार की-ज़मींदारी व्यवस्था, रैयतवाड़ी तथा महलवाड़ी व्यवस्था।

प्रश्न 62.
भारत में हरित क्रांति किस क्षेत्र से संबंधित है?
उत्तर:
भारत में हरित क्रांति खाद्यानों के उत्पादन बढ़ाने से संबंधित है।

प्रश्न 63.
ग्राम पंचायत की सभा का अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर:
ग्राम पंचायत की सभा का अध्यक्ष सरपंच या प्रधान होता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उदारीकरण के क्या मुख्य उद्देश्य हैं?
उत्तर:
उदारीकरण के निम्नलिखित उद्देश्य हैं-

  • उदारीकरण का मुख्य उद्देश्य उद्योगों में रोज़गार के अवसर बढ़ाना था।
  • विदेशी निवेश को आकर्षित करना ताकि रोज़गार के अवसर बढ़े।
  • अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के साथ भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में खड़ा करना।
  • निजी क्षेत्र को ज्यादा-से-ज्यादा स्वतंत्रता प्रदान करना।
  • देश की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना।

प्रश्न 2.
उदारीकरण नीति की विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  • उदारीकरण के तहत कुछ विशेष चीज़ों को छोड़कर लाइसैंस राज की नीति को खत्म कर दिया गया ताकि सारे उद्योग आराम से विकसित हो सकें।
  • उदारीकरण के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण करना शुरू कर दिया गया है ताकि घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों को लाभ में बदला जा सके।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के लिए अब बहुत कम उद्योग रह गए हैं ताकि सभी उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सके।
  • देश में विदेशी निवेश की सीमा भी बढ़ा दी गई है। कई क्षेत्रों में तो यह 51% तथा कई क्षेत्रों में पूर्ण निवेश तथा कई क्षेत्रों में यह 74% तक रखी गई है।

प्रश्न 3.
भूमंडलीकरण की विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने भूमंडलीकरण की चार विशेषताओं का वर्णन किया है-

  • भूमंडलीकरण में लोगों के लिए नए-नए उपकरण आ गए हैं क्योंकि अब विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियां हर देश में आ रही हैं।
  • अब कंपनियों के लिए नए-नए बाजार खुल गए हैं क्योंकि भूमंडलीकरण में कंपनियां किसी भी देश में मुक्त व्यापार कर सकती हैं।
  • भूमंडलीकरण में कार्यों के संपादन के लिए नए-नए कर्ता आगे आ गए हैं जैसे रैडक्रास, विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.)।
  • भूमंडलीकरण के कारण नए-नए नियम सामने आए हैं जैसे पहले नौकरी पक्की होती थी पर अब यह पक्की न होकर ठेके पर होती है।

प्रश्न 4.
भारत में उदारीकरण को कितने चरणों में बांटा जा सकता है?
उत्तर:
भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया को चार चरणों में बांटा जा सकता है-

  • 1975 से 1980 का काल
  • 1980 से 1985 का काल
  • 1985 से 1991 का काल
  • 1991 से आगे का काल।

प्रश्न 5.
भूमंडलीकरण के कोई चार सिद्धांत बताओ।
उत्तर:

  • विदेशी निवेश के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोलना।
  • सीमा शुल्क कम-से-कम करना।
  • सरकारी क्षेत्रों के प्रतिष्ठानों का विनिवेश करना।
  • निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देना।

प्रश्न 6.
ज़मींदारी व्यवस्था क्या होती है?
उत्तर:
आज़ादी के समय कृषि योग्य कुल भूमि में से 1/4 भाग पर ज़मींदारी व्यवस्था प्रचलित थी। ज़मींदारी व्यवस्था ब्रिटिश शासन में लार्ड कार्नवालिस ने 1793 में बंगाल में शुरू की थी। इस व्यवस्था के अंदर जमींदार भूमि का मालिक होता है पर यह जरूरी नहीं है कि वह अपनी भूमि पर आप ही कृषि करे।

कृषि करने के लिए वह अपनी भूमि किसानों को दे देता था। वह किसानों से लगान इकट्ठा करता था तथा सरकार को राजस्व या कर देता था। भूमि, किसान, जमींदार तथा सरकार के बीच इस तरह एक संबंध स्थापित हो जाता था। यह प्रथा बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार तथा मद्रास राज्यों में प्रचलित थी।

प्रश्न 7.
ज़मींदारी प्रथा की विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  • भूमि का स्वामित्व ज़मींदार के पास होना।
  • ज़मींदारों द्वारा कृषि के लिए भूमि काश्तकारों को सौंपना।
  • काश्तकारों द्वारा ज़मींदार को लगान देना।
  • ज़मींदार द्वारा सरकार को राजस्व का भुगतान करना।

प्रश्न 8.
रैय्यतवाड़ी व्यवस्था क्या होती थी?
उत्तर:
आज़ादी के समय कृषि भूमि में से 36% भाग पर रैय्यतवाड़ी प्रथा प्रचलित थी। लार्ड विलियम बैंटिंक ने ज़मींदारी प्रथा के दोषों को दूर करने के लिए रैय्यतवाड़ी व्यवस्था शुरू की थी। यह एक हिंदू प्रथा थी। इस भूमि व्यवस्था के अंतर्गत भूमि का स्वामित्व जिस व्यक्ति या परिवार के पास होता था वही सरकार को राजस्व का भुगतान करता था। रैय्यत का अर्थ है जोतदार या कृषक या किसान। एक निश्चित अवधि तक सरकार को राजस्व देने के पश्चात् वह रैय्यत भूमि का मालिक बन जाता था। रैय्यत भूमि को किराए पर किसी ओर किसान को भी दे सकता था।

प्रश्न 9.
महलवारी व्यवस्था क्या होती थी?
उत्तर:
महलवारी भूमि व्यवस्था की एक और महत्त्वपूर्ण व्यवस्था थी। इस व्यवस्था में भूमि का स्वामित्व पूरे गांव के पास होता था। गांव के नियंत्रण अधीन भूमि को शामलाट भूमि के नाम से जाना जाता था। इस भूमि को गांवों के विभिन्न परिवारों में बांट दिया जाता था जो निश्चित लगान देते थे। विभिन्न सदस्यों तथा परिवारों से लंबरदार लगान इकट्ठा किया करता था जिसके बदले उसे पाँच प्रतिशत दलाली मिलती थी। इसके बाद गांव सरकार को निश्चित राजस्व का भुगतान करता था। इस व्यवस्था में भी कृषक का सरकार के साथ कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं होता था।

प्रश्न 10.
ज़मींदारी उन्मूलन की क्या विशेषताएं थीं?
उत्तर:

  • गांव की बंजर भूमि चरागाह इत्यादि सरकार के कब्जे में आ गई।
  • सभी राज्यों में ज़मींदारों से ज़मीन लेकर उन्हें मुआवजा दे दिया गया।
  • कुछ राज्यों में मुआवजा नकद तथा कुछ राज्यों में यह किस्तों में दिया गया।
  • जिस भूमि पर जमींदार खुद खेती करते थे वह उन्हीं के पास रहने दी गई।

प्रश्न 11.
हरित क्रांति क्या थी? इसका भारत में क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारत में योजना बना कर कृषि के क्षेत्र में उत्पादन को बढ़ाया गया इससे उत्पादन के क्षेत्र में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई। कृषि के उत्पादन के क्षेत्र में इतनी ज्यादा वृद्धि को हरित क्रांति कहते हैं। इस तरह हरित क्रांति शब्द का प्रयोग उस तेज़ गति से हुए परिवर्तन से है जो भारत के खाद्यान्न उत्पादन में हुआ था।

भारत में हरित क्रांति का बहत महत्त्व है क्योंकि हरित क्रांति जो कि 1966-67 के बाद शरू हई थी, की वजह से भारत खादयान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर हो गया था। आजादी के बाद से 1965 तक भारत के पास खाद्यान्न की कमी थी। उसे बाहर से अपनी ज़रूरतों के लिए खाद्यान्न मंगवाना पड़ता था पर हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्म-निर्भर बना दिया था।

प्रश्न 12.
आज़ादी के बाद भारत में कौन-कौन से भूमि सुधार किए गए हैं?
अथवा
स्वतंत्रता के बाद कृषीय सुधारों के लिये क्या सुझाव दिये गये हैं?
उत्तर:
आज़ादी के बाद भारत में निम्नलिखित भूमि सुधार किए गए हैं-

  • सबसे पहले ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन किया गया।
  • किसी व्यक्ति के लिए भूमि रखने की अधिकतम सीमा रखी गई।
  • चकबंदी को लागू किया गया।
  • काश्तकारी प्रथा में बहुत से सुधार किए गए।
  • सहकारी खेती तथा भूमि संबंधी नए तरीकों से रिकार्ड रखे गए।

प्रश्न 13.
जोतों की सीमाओं का क्या अर्थ है? इसमें सुधार कैसे किए गए?
अथवा
भू-सीमा निर्धारण से क्या तात्पर्य है?
अथवा
हदबंदी अधिनियम क्या है?
उत्तर:
जोतों की सीमाओं का अर्थ है किसी व्यक्ति के पास कृषि योग्य भूमि एक सीमा तक होनी चाहिए उससे अधिक नहीं। इस सीमा से पहले किसी के पास तो हज़ारों एकड़ भूमि थी तथा कइयों के पास कुछ भी नहीं। इसलिए सभी को भूमि देने के लिए व्यक्ति के पास कृषि योग्य भूमि रखने की सीमा निर्धारित की गई जिसे जोतों की सीमाएं कहा गया। इसके लिए कई प्रकार के अधिनियम बनाए गए। 1973 के बाद हरियाणा तथा पंजाब में यह सीमा क्रमश 18 एकड़ तथा 27 एकड़ निश्चित कर दी गई। जिसके पास इन सीमा से अधिक भूमि थी उनसे भूमि ले ली गई तथा भूमिहीन किसानों में बांट दी गई।

प्रश्न 14.
देश में भूमि सुधार क्यों किए गए थे?
अथवा
भूमि सुधार के चार उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:
(i) देश में कई किसानों के पास सैंकड़ों एकड़ भूमि थी तथा कइयों के पास बिल्कुल भी नहीं थी। भूमिहीन किसानों को भूमि देने के लिए भूमि सुधार लागू किए गए।

(ii) स्वतंत्रता के बाद देश के नेताओं को लगा कि अगर देश में से असमानता को निकाल कर सामाजिक तथा आर्थिक समानता स्थापित करनी है तो भूमि सुधार लागू करने ही होंगे। इसलिए भूमि सुधार लागू किए गए।

(iii) देश में किसानों की निम्न स्थिति का सबसे बड़ा कारण सरकार तथा छोटे किसानों के बीच मध्यस्थों की मौजूदगी थी। इसलिए सरकार को लगा कि किसानों की आर्थिक स्थिति को ठीक करने के लिए मध्यस्थों का उन्मूलन ज़रूरी है तथा यह भूमि सुधारों का मुख्य उद्देश्य था।

(iv) स्वतंत्रता के समय देश को अपनी खाद्यान ज़रूरतों को पूर्ण करने के लिए खाद्यान को आयात करना पड़ता था। इसलिए सरकार ने भूमि सुधारों को लागू किया ताकि खाद्यान आवश्यकताओं को पूर्ण किया जा सके।

प्रश्न 15.
कृषिक या ग्रामीण वर्ग संरचना और जाति के मध्य पाए जाने वाले विभिन्न संबंधों को वर्गीकृत कीजिए।
उत्तर:
ग्रामीण वर्ग संरचना तथा जाति के बीच काफ़ी गहरा संबंध पाया जाता है। आम तौर पर यह सोचा जाता है कि दोनों के बीच गहरे संबंध ही होंगे। साधारणतयाः हम यह सोचते हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों की उच्च जातियों के पास अधिक भूमि तथा अधिक धन होता है तथा यह कल्पना ठीक ही साबित होती है। ग्रामीण समाज में उच्च जातियों का दबदबा पाया जाता है। बहुत-से क्षेत्रों में ग्रामीण समाज में उच्च जातियों में ब्राह्मण कम ही होते हैं तथा यह जाट अथवा वैशा जातियों से संबंधित होती है।

बहुत ही कम बार ऐसा होता है कि ब्राह्मण कृषि कार्यों में लगे होते हैं तथा निम्न जातियों के लोगों के पास अधिक भूमि होती है। प्रसिद्ध समाजशास्त्री एम० एन० श्रीनिवास ने प्रबल जाति का संकल्प दिया है जोकि ग्रामीण क्षेत्रों में पाई जाती है। पंजाब, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश में जाट प्रबल जाति के रूप में पाए जाते हैं। जाट लोगों के पास अधिक भूमि होती है तथा इनके पास अच्छा जीवन जीने के भरपूर साधन होते हैं।

प्रश्न 16.
भूदान आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
भूदान आंदोलन को विनोबा भावे ने स्वतंत्रता के बाद चलाया था। उस समय बहुत से ऐसे ज़मींदार थे जिनके पास सैंकड़ों एकड़ भूमि थी। वह स्वयं इस पर कृषि नहीं करते थे बल्कि ग़रीब किसानों को किराए पर देते थे। वह स्वयं न तो भूमि पर कृषि करते थे तथा न ही करने को इच्छुक थे। दूसरी तरफ हज़ारों लाखों ऐसे निर्धन किसान थे जिनके पास एक इंच भी भूमि नहीं थी। स्वतंत्रता के पश्चात् आंध्र प्रदेश तथा बंगाल में ज़मींदारों के विरुद्ध विद्रोह शुरू हो गया तथा ऐसा लगता था कि सब कुछ लाल हो जाएगा।

परंतु इससे पहले ही विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन शुरू कर दिया। विनोबा भावे ने ज़मींदारों को कुल 40 लाख एकड़ भूमि ग़रीबों को दान करने को कहा। इसके लिए उन्होंने अहिंसात्मक संघर्ष भी किया। 3 साल के भीतर ही 27,40,000 एकड़ भूमि उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में एकत्रित कर ली गई है।

राज्यों ने भूदान आंदोलन के समय कई प्रकार के कानून बनाए। इस आंदोलन के अंतर्गत 50 लाख एकड़ भूमि निर्धन किसानों को दान कर दी गई परंतु यह अपने 150 लाख एकड़ भूमि के लक्ष्य से पिछड़ गया। इस आंदोलन ने ग्रामीण समाज की restructuring की तथा सदियों से चली आ रही निर्धनता और दुःखों को ख़त्म करने में सहायता की।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

प्रश्न 17.
समाचार-पत्रों को पढ़ें, दूरदर्शन अथवा रेडियो के समाचार सुनें तथा बताएं कि कब-कब ग्रामीण क्षेत्रों को इनमें शामिल किया जाता है? किस तरह के मुद्दे आमतौर पर बताएं जाते हैं?
उत्तर:
अगर हम रोज़ाना के समाचार-पत्र पढ़ें अथवा दूरदर्शन या रेडियो के समाचार सुनें तो हमें पता चलता है कि ग्रामीण क्षेत्रों के बहुत से मुद्दों को इनमें लगातार शामिल किया जाता है। कृषि उत्पादन के क्षेत्र में आने वाली मुश्किलें, उनमें प्रयोग होने वाले बीज, उर्वरक, कीटनाशक, उन्हें मिलने वाली बिजली, सिंचाई का पानी, उनके उत्पाद का सही मूल्य इत्यादि ऐसे मुद्दे हैं जो इनमें बार-बार शामिल होते हैं। रेडियो के आकाशवाणी जालंधर पर रोज़ाना कृषि करने के अलग-अलग ढंगों के बारे में बताया जाता है।

किसानों को उत्पादन बढ़ाने के नए-नए ढंग, नए उन्नत बीज तथा उर्वरक, समय-समय पर मिलने वाली सब्सिडी इत्यादि के बारे में विस्तार से बताया जाता है। परंतु आजकल कुछेक नए मुद्दे ऐसे हैं जो आजकल सामने आ रहे हैं तथा वह हैं किसानों की ऋणग्रस्तता तथा किसानों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति।

कृषि की आधुनिक मशीनों को खरीदने के लिए किसान कर्जा लेते हैं। परंतु जब वह कर्जा वापिस नहीं कर पाते हैं तो वह आत्महत्या कर लेते हैं। इसके साथ बढ़ती लागत, कृषि का विस्तार, राज्य द्वारा कृषि के विकास के लिए किए जाने वाले कार्य ऐसे मुद्दे हैं जो आजकल के समाचारों की सुर्खियां बन रहे हैं।

प्रश्न 18.
भूमि चकबंदी पर निबंध लिखें।
उत्तर:
भूमि सुधार की तीसरी मुख्य श्रेणी में भूमि की चकबंदी या हदबंदी के कानून थे। इन कानूनों के अनुसार एक विशेष परिवार के लिए कृषि योग्य भूमि रखने की उच्चतम सीमा निर्धारित की गई। प्रत्येक क्षेत्र में हदबंदी भूमि के प्रकार, उपज तथा कई अन्य प्रकार के कारकों पर निर्भर थी। जो ज़मीन अधिक उपजाऊ थी, उसकी हदबंदी कम थी परंतु कम उपजाऊ भूमि की तथा बिना पानी वाली भूमि की हदबंदी अधिक सीमा तक थी।

यह राज्यों का कार्य था कि वह निश्चत करे कि अतिरिक्त भूमि (हदबंदी सीमा से अधिक भूमि) को वह अधिगृहित कर लें और इसे भूमिहीन परिवारों को तय की गई श्रेणी के अनुसार दोबारा वितरित कर दें जैसे कि अनुसूचित जातियों व जनजातियों। परंतु अधिकतर राज्यों में यह कानून दंतविहीन ही साबित हुए हैं।

इसमें बहुत से ऐसे बचाव के रास्ते थे जिससे परिवारों व घरानों ने अपनी भूमि को राज्यों को देने से बचा लिया। लोगों ने अपनी बच्चों के नाम पर भूमि कर दी तथा अधिकतर मामलों में उन्होंने अपने रिश्तेदारों, नौकरों तथा कई स्थानों पर तो बेनामी स्थानों पर भूमि की मल्कियत बदल दी।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ज़मींदारी प्रथा के बारे में आप क्या जानते हैं? ज़मींदारी व्यवस्था की विशेषताओं तथा दोषों का वर्णन करो।
अथवा
जमींदारी व्यवस्था में भारतीय समाज पर दुष्परिणामों की व्याख्या करें।
उत्तर:
हमारे देश में आजादी से पहले कृषि के क्षेत्र में ज़मींदारी प्रथा प्रचलित थी। आज़ादी के समय कृषि योग्य कुल भूमि में से 25% अर्थात एक चौथाई भाग पर ज़मींदारी व्यवस्था प्रचलित थी। ज़मींदारी व्यवस्था ब्रिटिश शासन काल में लार्ड कार्नवालिस ने 1793 में बंगाल में शुरू की। इस व्यवस्था के अंर्तगत ज़मींदार भूमि का स्वामी होता है पर यह जरूरी नहीं कि वह अपनी भूमि पर स्वयं ही कृषि करे। कृषि करने के लिए वह अपनी भूमि किसानों को दे देता था।

वह किसानों से लगान इकट्ठा करता था तथा सरकार को राजस्व या कर देता था। ब्रिटिश सरकार ने ज़मींदारों को बड़े-बड़े भू-भाग का स्वामित्व प्रदान किया ताकि उन्हें ज़मींदारों से राजस्व के रूप में निश्चित पैसा नियमित रूप से मिलता रहे। ज़मींदारों की संख्या कम होने के कारण उनसे संपर्क रख पाना भी आसान था। ज्यादातर मामलों में ज़मींदारों ने स्वयं कृषि करने की जगह भूमि काश्तकारों को पट्टे पर दे दी।

काश्तकारों में से भी ज्यादातर ने आगे कई व्यक्तियों को भूमि सौंप दी। इस तरह ज़मींदार की भूमि बहुत सारे काश्तकारों तथा उप-काश्तकारों में बंटती चली गई। हरेक उप-काश्तकार उत्पादन में से निश्चित मात्रा में अनाज या धनराशि के रूप में काश्तकार को लगान देता था तथा इस तरह प्रथम काश्तकार ज़मींदार को निश्चित लगान देता था जिसमें से ज़मींदार सरकार को राजस्व का भुगतान करता था। ज़मींदार प्रथा बंगाल के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार तथा मद्रास राज्यों में प्रचलित थी।

ज़मींदारी प्रथा की विशेषताएं (Characteristics of Zamindari System)-ज़मींदारी प्रथा की विशेषताएं निम्नलिखित हैं-

  • ज़मींदारी प्रथा की सबसे पहली विशेषता यह है कि भूमि की मलकीयत ज़मींदार के पास ही रहती थी चाहे वह आगे काश्तकारों या उप-काश्तकारों को पट्टे पर दी हुई थी।
  • इस प्रथा में भूमि पर कृषि ज़मींदार खुद नहीं किया करते थे बल्कि यह उन्होंने आगे काश्तकारों को पट्टे पर दी होती थी।
  • काश्तकार भी कई बार खुद कृषि नहीं किया करते थे बल्कि वह भी आगे भूमि उप-काश्तकारों को कृषि करने के लिए दिया करते थे।
  • यहां पर काश्तकार ज़मींदार को या तो अपनी तरफ से या उप-काश्तकारों से लगान इकट्ठा करके दिया करते थे।
  • ज़मींदार काश्तकारों से लगान इकट्ठा करके सरकार को राजस्व या कर का भुगतान किया करता था।
  • इस में भूमि के असली काश्तकार तथा सरकार के बीच कोई सीधा संपर्क नहीं होता था।
  • क्योंकि असली काश्तकार तथा सरकार के बीच कोई सीधा संबंध नहीं होता था इसलिए ज़मींदार इन दोनों के बीच मध्यस्थ या बिचौलिए की भूमिका निभाता था।
  • ज़मींदार जो लगान इकट्ठा करता था तथा सरकार को जो राजस्व का भुगतान करता था उसमें भारी अंतर होता था क्योंकि उसे
  • एक बंधी हुई धनराशि सरकार को देनी होती थी पर वह अपनी मनमर्जी से काश्तकारों से लगान वसूल करता था।
  • इस व्यवस्था में ज़मींदारों द्वारा काश्तकारों तथा उप-काश्तकारों का बहुत ज्यादा शोषण होता था क्योंकि ज़मींदार काश्तकारों से अपनी मनमर्जी का लगान वसूल करते थे।
  • काश्तकारों का बाढ़, अकाल, सूखे आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं में ज़मींदार या सरकार की तरफ से सुरक्षा का अभाव होता था क्योंकि जमींदार या सरकार को सिर्फ लगान से मतलब होतालथा।
  • काश्तकार भूमि के रख-रखाव तथा भूमि की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने के प्रति उदासीन होते थे क्योंकि उन को पता होता था कि यह भूमि जिस पर वह कृषि कर रहे हैं यह उनकी अपनी नहीं है तथा यह कभी भी उनके हाथ से जा सकती है।
  • इस प्रथा में ज़मींदारों में कई बुराइयां आ गई थीं क्योंकि उनके पास पैसा आने लग गया था जिस वजह से उन्होंने विलासिता में अपना जीवन शुरू कर दिया था।

ज़मींदारी प्रथा के दोष (Demerits of Zamindari System)-

  • जमींदारी प्रथा का सबसे बड़ा दोष यह था कि भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजन हो जाता था क्योंकि भूमि काश्तकारों से आगे उप-काश्तकारों में बंट जाती थी।
  • काश्तकारों में पट्टे की भूमि पर सुरक्षा का अभाव होता था क्योंकि उन्हें पता होता था कि यह ज़मीन उनकी अपनी नहीं है, पता नहीं है कि कब यह ज़मीन उनके हाथ से निकल जाए।
  • लगान के प्रतिशत में निश्चितता तथा किसी प्रकार के नियमों का अभाव होता था क्योंकि ज़मींदार तो सरकार को एक निश्चित रकम लगान के रूप में दिया करते थे पर वह काश्तकारों से अपनी मर्जी के अनुसार लगान वसूल किया करते थे। कई बार तो यह उत्पादन का आधा भाग होता था।
  • इस प्रथा में असली कृषकों का शोषण हुआ करता था क्योंकि उनके द्वारा उत्पादित चीज़ों का ज्यादातर भाग जमींदार लगान के रूप में ले जाया करता था।
  • असली कृषकों के पास भूमि का स्वामित्व नहीं होता था क्योंकि भूमि तो उनको पट्टे पर मिली होती थी जो कभी भी छिन सकती थी।
  • सरकार का असली कृषकों के साथ कोई प्रत्यक्ष संपर्क नहीं होता था क्योंकि सरकार का संबंध तो सिर्फ ज़मींदार से हुआ करता था।
  • जमींदार किसानों से लगान की उच्च दर वसूलते थे। कभी-कभी तो यह कुल उपज का दो तिहाई भाग भी होता था।

प्रश्न 2.
हरित क्रांति के आने से क्या-क्या समस्याएं उत्पन्न हुईं? उनका वर्णन करो।
उत्तर:
आजादी के बाद भारत की सबसे बड़ी समस्या थी देश की बढ़ रही जनसंख्या के लिए खाद्यान्न उत्पन्न करने की। 1950 से लेकर 1960 तक के सालों में भारत को अपनी जनता की खाद्यान्न की ज़रूरत पूरा करने के लिए बाहर के देशों या विदेशों से खाद्यान्न आयात करना पड़ता था। परंतु उस समय सरकार के सामने यह प्रश्न था कि देश की खाद्यान्न की ज़रूरत को कैसे पूरा किया जाए। इसलिए कई कमेटियां बनाई गईं तथा उन सब कमेटियों को ध्यान में रखते हुए जो कुछ भी सरकार ने किया उसका परिणाम हमारे सामने आया हरित क्रांति के रूप में।

हरित क्रांति के पहले ही साल भारत का खाद्यान्न का उत्पादन 25% तक बढ़ गया। इस तरह हरित क्रांति ने न सिर्फ देश की खाद्यान्न की ज़रूरत को पूरा किया बल्कि देश में इतना खाद्यान्न होने लग गया कि भारत इसे बाहर के देशों को भी भेजने या निर्यात करने लग गया। हरित क्रांति के हमारे देश को बहुत से फायदे हुए पर इन फायदों के साथ-साथ कुछ समस्याएं भी पैदा हो गईं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) सीमित प्रदेश (Limited States) सबसे पहली समस्या हरित क्रांति के साथ यह हुई कि यह सिर्फ कुछ एक प्रदेशों में आई न कि पूरे भारत में। जिन राज्यों में सिंचाई के साधन काफ़ी अच्छे थे जैसे पंजाब, हरियाणा वहां पर हरित क्रांति ने जबरदस्त बदलाव ला कर रख दिया परंतु बहुत से प्रदेश इस हरित क्रांति से अछूते ही रहे।

जिन राज्यों में हरित क्रांति आई वह आर्थिक रूप से काफ़ी समृद्ध हो गए पर जिन राज्यों में यह नहीं आई वह आर्थिक रूप से पिछड़े ही रहे। इस तरह आर्थिक स्तर पर क्षेत्रीय असमानता फैल गई। उदाहरण के तौर पर पंजाब जैसा छोटा-सा प्रदेश देश का सबसे अमीर प्रदेश बन गया था। इस तरह सिर्फ उन राज्यों में ही कृषि का विकास हुआ जो पहले ही कृषि के क्षेत्र में उन्नत थे। जो राज्य पहले भी कृषि में पिछड़े हुए थे वे अब भी पिछड़े हुए हैं।

(ii) सीमित फसलें (Limited Number)- इस हरित क्रांति का एक और दोष यह रहा कि यह सिर्फ कछ एक फसलों तक ही सीमित रही। इसके क्षेत्र में सभी फसलें नहीं आईं। इस वजह से सिर्फ गेहूँ, चावल, ज्वार, मक्का, बाजरा इत्यादि फसलों का उत्पादन बढ़ा। व्यापारिक महत्त्व की फसलें जैसे कपास, चाय, जूट इत्यादि के उत्पादन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई। इन फसलों में स्थिति ज्यों की त्यों बनी रही। इस तरह कुछ एक फसलों को छोड़ कर यह और क्षेत्रों में क्रांति नहीं ला पायी।

(iii) अमीर किसानों को ज्यादा लाभ-हरित क्रांति से एक और समस्या उभर कर सामने आई कि इसने सिर्फ अमीर किसानों को ही ज्यादा लाभ पहुंचाया। ग़रीब किसानों की हालत में इससे कोई सुधार नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि हरित क्रांति लाने के लिए यह जरूरी है कि आप ट्रैक्टर, नए उन्नत बीजों. नए रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करें। अगर आप इनका प्रयोग नहीं करेंगे तो आपके लिए हरित क्रांति का कोई फायदा नहीं होगा।

इस तरह इन सब के लिए पैसे की ज़रूरत थी और पैसा सिर्फ अमीर किसान ही खर्च कर सकते थे। अमीर किसानों ने पैसा खर्च किया और वे ज्यादा अमीर हो गए। जिन किसानों के पास 10-15 एकड़ तक से ऊपर तक की जमीन थी वहे तो हरित क्रांति से काफ़ी ज्यादा लाभ ले गए पर जिनके पास 5 एकड़ से कम भूमि थी उनकी स्थिति और भी खराब हो गई। इस तरह बड़े किसानों के लिए तो यह हरित क्रांति सिद्ध हुई पर छोटे किसानों को फायदे की बजाए नुकसान ही हुआ।

(iv) आर्थिक असमानता का बढ़ना-हरित क्रांति ने आर्थिक असमानता को भी बढ़ाया। बड़े-बड़े किसान जो पैसा खर्च कर सकते थे उन्होंने पैसा खर्च किया तथा उससे और ज्यादा पैसा कमाया पर जिन किसानों के पास ज़मीन कम थी या जो छोटे किसान थे उनको इससे कोई फायदा नहीं हुआ और उनकी स्थिति जैसी की तैसी बनी रही। इस तरह एक तरफ बढ़ती अमीरी तथा दूसरी तरफ बढ़ती ग़रीबी या जस की तस की स्थिति से आर्थिक असमानता में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई।

इस तरह हम हरित क्रांति का सही लाभ तभी उठा सकते हैं जब इसका सही लाभ सभी वर्गों को प्राप्त हो न कि कुछ वर्गों को। अगर इसका लाभ सिर्फ कुछेक वर्गों को हुआ तो इस प्रकार की क्रांति का कोई फायदा नहीं है।

प्रश्न 3.
आज़ादी के बाद भारत में कौन-से भूमि सुधार किए गए? इन सुधारों के क्या परिणाम निकले?
अथवा
भूमि सुधार के चार लाभ बताएँ।
अथवा
भारत में भूमि सुधारों की व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत में भूमि सुधार (Land Reforms in India)-आज़ादी से पहले भूमि, कृषि, कृषक बीच की कड़ियों व सरकार के बीच संबंधों के दोषों को देखते हुए इनमें तुरंत परिवर्तन करना अनिवार्य था। भारत स्वतंत्रता के समय अविकसित राष्ट्र था। उद्योगों का बहुत कम विकास हो पाया था। तकनीक व विज्ञान क्षेत्र भी पिछड़ा हुआ था। देश तथा लोगों की आय का मुख्य साधन कृषि करना ही था। उस समय 80 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों में रहते थे।

जो अधिकतर कृषि कार्य करते थे। गांव में उच्च निम्न-संपन्न वर्ग को छोड़कर अन्य लोगों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति दयनीय थी। इससे निपटने के लिए सरकारी एवं गैर-सरकारी स्तर पर प्रयास अति आवश्यक थे ताकि कृषि संबंधों में सुधार लाया जा सके। सरकार ने भूमि व्यवस्था व कृषि संबंधों को सुधारने संबंधी कानूनों का निर्माण किया।

इन्हें लागू किया, विनोबा भावे तथा अन्य कई सामाजिक कर्ताओं ने जन-आंदोलनों के माध्यम से कृषि संबंधों को सुधारने में सराहनीय योगदान दिया। देश में भूमि सुधार के उद्देश्य से किए गए प्रयासों व कार्यों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-

1. भूमि की चकबंदी (Consolidation of Land)-देश में लाखों किसानों की भूमि इधर-उधर बिखरी पड़ी थी। खेत दूर-दूर थे। इस प्रकार उन्हें एक स्थान पर उनकी भूमि के बराबर भूमि मुहैया करवाई गई ताकि कृषि करने में उन्हें कठिनाई न हो।

2. सहकारी कृषि को प्रोत्साहन (To Encourage Co-operative Farming)-विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में सहकारी कृषि को प्रोत्साहित किया गया है। फलस्वरूप वर्तमान समय में देश में दस हज़ार सहकारी समितियों के अंतर्गत लाखों सदस्य लाखों हेक्टेयर भूमि पर सहकारी कृषि कर रहे हैं।

3. बिचौलियों का उन्मूलन (Abolition of Intermediaries)-सरकार ने स्वतंत्रता के पश्चात् कृषक एवं राज्य के बीच बिचौलियों/मध्यस्थों के उन्मूलन के लिए कानूनों का निर्माण किया। 1948 में सर्वप्रथम चेन्नई राज्य ने ऐसा कानून बनाया। पश्चिमी बंगाल में ज़मींदारों तथा अनुपस्थित भू-स्वामियों के रूप में कृषि क्षेत्र में बिचौलिया प्रथा विकट रूप में थी, सबसे पहले ज़मींदारी व्यवस्था इसी राज्य में प्रारंभ की गई।

ज़मींदारी उन्मूलन कानून का निर्माण इस प्रदेश में 1954-55 में किया गया। साम्यवादी राज्यों-रूस व चीन के विपरीत भारत में ज़मींदारों से भूमि लेने के बदले उन्हें मुआवजा दिया जाने लगा। केरल में मुआवजे की राशि “मार्किट मूल्य” के समान थी, इस तरह अरबों रुपये की धन राशि बिचौलियों को देनी पड़ी।

4. भूमि-स्वामित्व के अभिलेख (Records of Land-ownership)-भूमि-स्वामित्व संबंधी रिकार्ड का सही रख-रखाव किया जाने लगा। अधिकतर राज्यों ने भू-स्वामित्व अभिलेख ठीक कर लिए हैं। हिमाचल प्रदेश ने तो सन् 2000-2001 में किसान पुस्तकें तैयार की हैं। जिनमें उनकी भूमि-संबंधी पूरी सूचना दी गई है ताकि किसानों को अपनी भूमि संबंधी जानकारी रहे।

5. जोतों की सीमाओं का निर्धारण (Ceiling of Holdings)-अधिकतम सीमा जोतों में निर्धारित की गई। ऐसी सीमा निर्धारण संबंधी विभिन्न राज्यों में अधिनियम दो चरणों में बनाए गए। प्रथम सन् 1972 से पूर्व तथा द्वितीय 1973 व उसके पश्चात् निर्मित कानून। हरियाणा एवं पंजाब में 1973 से पूर्व सिंचाई एवं गैर-सिंचाई वाली भूमि क्रमशः 27 एवं 100 एकड़ तक रखने की अनुमति थी, जबकि 1973 के पश्चात् यह सीमा क्रमशः 18 एकड़ तथा 27 एकड़ कर दी गई। जबकि हिमाचल प्रदेश में 1973 के पश्चात् जोत सीमा क्रमशः 10 एकड़ तथा 15 एकड़ तय की गई।

6. काश्तकारी व्यवस्था में सुधार (Reform in Tenancy System)-पट्टेदारों को स्वतंत्रता से पूर्व सामान्य उत्पादन का आधा तथा कई मामलों में तीन-चौथाई भाग लगान के रूप में देना होता था। मगर प्रथम पंचवर्षीय योजना में यह सिफारिश की गई कि पट्टेदार से लगान के रूप में 20-25 प्रतिशत से अधिक न लिया जाए।

तत्पश्चात् विभिन्न राज्यों द्वारा अधिनियम पारित किए गए व अधिकांश राज्यों में लगान प्रतिशत 25 प्रतिशत या इससे कम है। कुछ एक राज्यों (जैसे तमिलनाडु में सिंचित एवं शुष्क भूमि के लिए लगान दर 45% तथा 25% है।) में इससे अधिक लगान भी लिया जाता है। पट्टेदारों को पट्टे का स्वामित्व प्रदान किया गया है उन्हें पट्टे की सुरक्षा भी प्रदान की गई।

7. भू-स्वामित्व के अभिलेख (Records of Land-ownership)-भू-स्वामित्व संबंधी रिकार्ड का सही रख रखाव किया जाने लगा। ज्यादातर राज्यों ने भू-स्वामित्व अभिलेख ठीक कर दिये। हिमाचल प्रदेश ने तो सन् 2000-01 में किसान पुस्तकें तैयार की हैं जिसमें उनकी भूमि संबंधी पूरी सूचना दी गई है ताकि किसानों को अपनी भूमि संबंधी जानकारी रहे।

सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रयासों का परिणाम (Consequences of Governmental and Non-Governmental Efforts)-भारतीय समाज में भूमि सुधारों के उद्देश्य से किये गये सरकारी, गैर-सरकारी प्रयासों के अच्छे परिणाम निकले, जिनका संक्षिप्त ब्यौरा निम्नलिखित है-

  • कृषकों के शोषण का अंत हुआ।
  • भूमिहीन किसानों को भू-स्वामित्व प्राप्त हुआ।
  • सामंतवाद का अंत हो गया।
  • कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई।
  • लाखों कृषक सरकार के प्रत्यक्ष संपर्क में आये।
  • भूमि के असमान वितरण में भारी कमी आई।
  • सरकार की आय में वृद्धि हुई।
  • कृषकों की आर्थिक दशा में सुधार हुआ।
  • भूमि के अभिलेखों का ठीक रख-रखाव होने लगा।
  • देश की अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ हुई।
  • कृषि में किसानों द्वारा पूंजी निवेश में रुचि बढ़ी, भूमि का विकास किया जाने लगा।
  • भूमिहीन किसानों की भूमि वितरण से व्यर्थ तथा बंजर भूमि का सदुपयोग होने लगा।
  • लगान का नियमन किया गया।

प्रश्न 4.
हरित क्रांति क्या है? इसके कौन-से प्रमुख आधार हैं?
अथवा
हरित क्रांति के प्रमुख आधार कौन-कौन से हैं? सविस्तार वर्णन करें।
उत्तर:
हरित क्रांति कृषि उत्पादन को बढ़ाने का एक नियोजित एवं वैज्ञानिक तरीका है। पंचवर्षीय योजनाओं का मूल्यांकन करने के पश्चात् यह स्पष्ट हो गया कि यदि हमें खाद्यान्न में आत्म-निर्भरता प्राप्त करनी है तो उत्पादन संबंधी नवीन तरीकों व तकनीकों का प्रयोग करना होगा। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतवर्ष में सन् 1966-67 में कृषि में तकनीकी परिवर्तन आरंभ हुए। इसके अंतर्गत अधिक उपज वाली नयी किस्मों (विशेषतः गेहूँ व चावल की खेती आती है।) सिंचाई के विकसित साधनों तथा कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाने लगा।

कृषि में उन्नत साधनों के प्रयोग को ही ‘हरित क्रांति’ का नाम दिया गया। यहां पर हरित शब्द ग्रामीण क्षेत्रों के हरे भरे खेतों के लिये प्रयुक्त हुआ है और क्रांति व्यापक रूप से परिवर्तन को दर्शाती है। हरित क्रांति के पहले चरण में गहन कृषि जिला कार्यक्रम शुरू किये गये जिसके अंतर्गत पहले तीन ज़िलों और बाद में सौलह-ज़िलों को शामिल किया गया। चुने गये जिलों में कृषि की उन्नत विधियां, खाद्य बीज एवं सिंचाई का एक साथ प्रयोग करने के कारण इस कार्यक्रम को पैकेज प्रोग्राम भी कहा गया।

सन् 1967-68 में इस कार्यक्रम को देश के अन्य भागों में भी शुरू कर दिया गया। लेकिन उसमें विस्तार कार्य के लिए स्टाक छोटे पैमाने पर रखा गया है। इसी कारण इसे गहन कृषि क्षेत्रीय कार्यक्रम भी कहा गया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों को कृषि संबंधी नई तकनीक, ज्ञान, साख, एवं उत्पादन के नवीन साधनों का वितरण किया गया ताकि कृषि उत्पादन में अधिक-से-अधिक वृद्धि की जा सके।

हरित क्रांति के प्रमुख आधार (Main bases of Green Revolution)
1. उत्पाद का सही मूल्य (Determination of Price of Produce)-सरकार ने किसानों को उनके उत्पादन का सही मूल्य दिलाने, शोषण से छुटकारा पाने तथा मूल्यों में आने वाली गिरावट से सुरक्षा प्रदान कराने के लिये उचित मूल्य की गारंटी दी है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए कृषि मूल्य आयोग की स्थापना की गई। यह आयोग समय-समय पर उपज की वसूली और खरीद मूल्य के बारे में सुझाव देता रहता है।

2. पशु-पालन विकास (Development of Animal Husbandry) देश में पशुओं की नस्ल सुधार उनके रोगों की रोकथाम, दुधारू एवं उन्नत नस्ल पशुओं का विकास, भेड़ पालन, सुअर पालन, मुर्गी पालन एवं डेयरी विकास को विशेष महत्त्व दिया गया है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में पशु-पालन व कृषि का गहरा संबंध है। कृषि उत्पादकता में तभी वृद्धि की जा सकती है यदि हमारा पशु पालन सही व उन्नत तरीकों पर आधारित हो।

अन्यथा नहीं। भारत में डेयरी विकास तथा ग्रामीण रोजगार व आय में वृद्धि करने के उद्देश्य से सन् 1988 में डेयरी विकास के टेकनोलोजी मिशन की स्थापना की गई। 1966-1976 में दग्ध उत्पादन 6.8 करोड से बढ़ 1997-98 में 7.2 करोड़ टन हो गया। यह पश-पालन को बढ़ावा देने के कारण संभव हो

3. निगमों की स्थापना (Establishment of Corporation षि के विकास के लिये विभिन्न प्रकार के कृषि उपकरण तथा मशीनों एवं गोदामों की व्यवस्था के लिये सरकार ने कृषि उद्योग निगम (Agricultural Industry Corporation) की स्थापना की। इसी के साथ कृषि में उत्पादित माल की ब्रिकी प्रोसेसिंग एवं संग्रह के लिये 1953 में राष्ट्रीय सरकारी विकास निगम की स्थापना की गई। उन्नत बीजों की बिक्री के लिये राष्ट्रीय बीज निगम तथा भारतीय राजकीय कार्य निगम स्थापित किये गये हैं। अनेक राज्यों ने भी अपने बीज निगम खोले हैं। राष्ट्रीय बीज निगम के अनाज, तिलहन, दाल इत्यादि के प्रमाणित बीज तैयार किये हैं।

4. कीटनाशक औषधियों का प्रयोग (Use of Insecticides)-ऐसा अनुमान है कि फसलों का एक चौथाई भाग कीटनाशकों, पतंगों, चूहों इत्यादि द्वारा नष्ट किया जाता है। फ़सलों को कीड़े-मकोड़ों से होने वाली हानि से बचाने के लिये ये आवश्यक है कि कीटनाशक दवाओं का प्रयोग किया जाये ताकि उत्पादन को बढ़ाया जा सके। हरित क्रांति में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने के लिये यह एक उत्तम उपाय है। पौधों की सुरक्षा के लिये दवाओं का प्रयोग किया जाए ताकि पेड़-पौधे समय से पहले नष्ट न हों। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए पौध संरक्षण केंद्रों की स्थापना की गई।

5. बहु फ़सल कार्यक्रम (Multi Crop Programme) बहु फ़सल कार्यक्रम के अंतर्गत थोड़े समय में पक कर तैयार हो जाने वाली फ़सलें बोई जाती हैं। जैसे-सब्जियां, मक्का, ज्वार, बाजरा इत्यादि। हरित क्रांति में अधिक उपज देने वाली किस्मों के साथ-साथ अल्पाविधि वाली फ़सलें भी विकसित की गईं। फ़सलों के नये तरीके भी अपनाये गये, जिससे पैदावार में काफ़ी वृद्धि हुई। वर्तमान समय में लगभग 930 हैक्टेयर भूमि पर बहु फ़सल कार्यक्रम को लागू किया गया है तथा इसके सकारात्मक परिणाम भी आये हैं।

6. सिंचाई को बढ़ावा (Promotion of Irrigation) किसान की कृषि कार्य के लिये वर्षा पर निर्भरता कम करने के लिये बड़ी-बड़ी सिंचाई परियोजनाएं प्रारंभ की गईं। डैम बनाये गये नहरें खुदवाई गईं, लघु सिंचाई परियोजनाएं प्रारंभ की गईं। इन परियोजनाओं में भू-गर्भ जल योजना पंपसैट, निजी ट्यूब्वेलों, फिल्टर प्वाईंट आदि का विकास किया गया।

इन योजनाओं के कारण भूमि की सिंचाई में काफ़ी विकास हुआ तथा पैदावार में भी वृद्धि हुई। लघु सिंचाई कार्यक्रम के दौरान 1970-71 में जहां 207 हैक्टेयर भूमि की सिंचाई की गई। वहीं 1997 98 में 14.4 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई लघु सिंचाई कार्यक्रम के तहत की गई। वर्तमान समय में किसानों की निजी पंपसैटों एवं ट्यूब्वेलों की संख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है।

7. भूमि सुधार (Land Reforms) भूमि सुधारों की देश में हरित क्रांति लाने में विशेष भूमिका रही है। कानूनों द्वारा अधिकतम भूमि रखने की सीमा तय की गई। भूमि की चकबंदी की गई। भूमि संबंधी अभिलेख (Records) तैयार किये गये। जमींदारों से फालतू भूमि लेकर भूमिहीन किसानों में बांटी गई।

8. यांत्रिक खेती (Mechanical Farming) यांत्रिक खेती को प्रोत्साहन देने तथा किसानों को आधुनिक कृषि संबंधी मशीनें, ट्रैक्टर, इत्यादि खरीदने के लिये सरकार अन्य सहायता प्रदान करती है। सस्ती दर पर ऋण देती है तथा इसका मुख्य उद्देश्य देश भर में खेती की उत्पादकता को बढ़ावा तथा किसानों में सामाजिक व आर्थिक असमानता को दूर करना है।

सरकार के इन प्रयासों के फलस्वरूप ही किसान कृषि मशीनरी का प्रयोग कर पाया जिससे पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। 1997-98 की अवधि में ट्रैक्टरों में, 2,51,200 तथा 13,100 पावर टिलरों का निर्माण हुआ जोकि पहले की तुलना में अधिक है। 9वीं पंचवर्षीय योजना में भी इन उपकरणों को अधिक लोकप्रिय बनाने तथा इनके उपयोग पर बल दिया गया।

9. उर्वरकों का अधिक प्रयोग (More use of Fertilizers) उत्पादन को बढ़ाने के लिये रासायनिक उर्वरकों का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाने लगा है। देश भर में रासायनिक खाद के उत्पादन के लिये पूर्व स्थापित कारखानों की उत्पादन क्षमता को भी बढ़ाया गया। कई नयी इकाइयों की स्थापना की गई। उर्वरकों का आयात किया जाने लगा। नाइट्रोजन, यूरिया, अपनी मांग का, तथा पोटाश के खादों के उपयोग के नये स्तर प्राप्त किये गये।

देश में 1986-87 में खादों का प्रयोग 86.4 लाख टन था जो बढ़कर 1997-98 में 163 लाख टन हो गया है। भारत केवल मात्र अपनी मांग का 60 प्रतिशत ही पूरा कर पाता है जबकि 40 प्रतिशत खादों के लिये विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है।

10. उन्नत बीजों का प्रयोग (Use of high yield variety seeds)-अधिक उपज देने वाला कार्यक्रम 1982-83 में 4 करोड़ 77 लाख हेक्टेयर पर भूमि में लागू किया गया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत गेहूँ, धान, मक्का, ज्वार, बाजरा आदि की फ़सलों को चुना गया। परंतु सबसे अधिक सफलता गेहूँ को प्राप्त हुई। इसके साथ ही सन् 1990-91 में चावल, गेहूँ, मक्का तथा दालों का. उत्पादन 17.63 करोड़ टन था जो 1997-98 में बढ़कर 19.11 करोड़ टन हो गया।

वर्तमान समय में देश में कुल खाद्यान्न उत्पादन 20 करोड टन से अधिक ‘होने लगा है। इस कार्यक्रम के तहत नयीं विकसित तकनीकों के साथ-साथ रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशक दवाओं तथा अन्य साधनों का प्रयोग भी किया जाता है जिससे फ़सलों के उत्पादन में और भी वृद्धि होती जाती है। पंजाब, हरियाणा एवं उत्तर प्रदेश में अधिक उपज देने वाली अनाज की किस्मों में वृद्धि होती जा रही है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह स्पष्ट है कि हरित क्रांति के अंतर्गत अधिक उपज देने वाली फ़सलों का विकास, रासायनिक खादों का अधिक प्रयोग, कीटनाशक दवाओं का प्रयोग, यांत्रिक खेती, लघु सिंचाई सुविधाओं का विकास, भूमि सुधार, पशु पालन का विकास तथा कृषि उत्पादन का उचित मूल्य निर्धारण इत्यादि अनेक कार्यक्रमों को शामिल किया गया है। इन सब कार्यक्रमों का संयुक्त उद्देश्य कृषि उत्पादन में वृद्धि करना ही है।

प्रश्न 5.
हरित क्रांति के सामाजिक, आर्थिक प्रभावों का वर्णन करो।
अथवा
भारतीय समाज पर हरित क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
जहाँ हरित क्रांति लागू हुई, उन क्षेत्रों में (विशेषकर ग्रामीण) सामाजिक संबंधों में क्या परिवर्तन देखे गए?
उत्तर:
हरित क्रांति ने देश की उत्पादकता में काफ़ी वृद्धि की है। इसके परिणामस्वरूप देश की खाद्यान्नों के उत्पादन में बहुत बढ़ोत्तरी हुई। साथ ही गैर-पारंपरिक (Traditional) फ़सलों जैसे-सोयाबीन, सूरजमुखी, ग्रीष्मकालीन मूंग, मूंगफली आदि को बढ़ावा दिया गया। हरित क्रांति के कारण ही खाद्यान्नों का उत्पादन जो 1967-68 में 9.5 करोड़ टन था, वह 1997-98 में बढ़कर 19.11 तथा 2002-03 में 21 करोड़ टन हो गया। इन लाभों के बावजूद हरित क्रांति के साथ कुछ एक नयी समस्याएं भी उत्पन्न हुईं जो निम्नलिखित हैं-

1. वर्ग संघर्ष (Class Struggle) हरित क्रांति के प्रभाव के कारण गांवों में पाई जाने वाली वर्ग व्यवस्था में भी परिवर्तन आया है। क्रांति के लाभों के कारण जो किसान मज़दूर वर्ग की श्रेणी में आये थे, अब आर्थिक रूप से संपन्न और उच्च वर्ग की श्रेणी में आने लगे हैं। इसमें ग्रामों की परंपरागत वर्ग व्यवस्था परिवर्तित हो रही है। इसके साथ ही आर्थिक संपन्नता के आधार पर ये खेतीहर मजदूर वर्ग अब राजनीतिक शक्ति भी प्राप्त करना चाह रहे हैं जो पहले भू-स्वामियों और उच्च जातियों में निहित थी। अतः ग्रामों में वर्ग संघर्ष एवं जातीय संघर्ष हरित क्रांति का परिणाम माना जा रहा है।

2. खाद्यान्नों की कीमत में वृद्धि (Increase in the Price of food-grains) हरित क्रांति के परिणामस्वरूप कृषि उत्पादकता में वृद्धि हुई है। परंतु रासायनिक खादों, बीजों, कीटनाशक औषधियों एवं नये कृषि यंत्रों के महंगा होने के कारण कृषि उपज की लागत में वृद्धि हुई है। फलस्वरूप छोटे व सीमांत किसान इन विधियों का प्रयोग नहीं कर पाते जिससे इनका लाभ केवल बड़े किसानों को ही अधिक हो जाता है। महंगी कृषि प्रौद्योगिकी के कारण खाद्यान्नों की कीमतें बढ़ी हैं।

3. खेतीहर मज़दूर और ग़रीब हुए (Agricultural Labourers become Poor)-अनेक विचारकों का मत है कि हरित क्रांति के प्रभावों के परिणामस्वरूप गांवों में बेकारी और बेरोज़गारी की समस्या बड़ी है। खेतीहर मज़दूरी की वास्तविक मज़दरी भी कम हई है। प्रणव वर्धन के “पंजाब और हरियाणा” के 15 जिलों के अध्ययन के आधार पर यह निष्कर्ष निकला है कि हरित क्रांति के कारण खेतीहर श्रमिकों की वास्तविक मजदूरी कम हुई है। इसी प्रकार अन्य विचारक जैसे-उमा श्री वास्तव, आर० डी० क्राऊन तथा ए० ओ० हैडी के अध्ययनों से इस बात का पता चलता है कि भारत जैसे देश में कृषि में यंत्रीकरण की यह नीति उचित नहीं है। इससे कृषक की स्थिति निम्न ही रही है।

4. राजनीतिक प्रभाव (Political Impact) हरित क्रांति के परिणामस्वरूप धनी किसान राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अधिक शक्तिशाली बन गये हैं। धनी किसान समय-समय पर भूमि संबंधी सुधार अधिनियमों को लागू करने में रुकावट पैदा करते हैं, जिसके कारण भू-सुधार कानूनों को लागू करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। बिहार राज्य में छोटे एवं मध्यम दर्जे के किसानों ने नयी तकनीक का प्रयोग करके अपनी कृषि आय में वृद्धि कर ली है, जिससे वह राजनीतिक शक्ति को भी मजबूत करने में लगे हुए हैं।

5. उन्नत कृषि प्रौद्योगिकी छोटे किसानों की पहुंच से बाहर होती गई (Advance Technology become beyond the reach of Small Farmers)-हरित क्रांति में लघु और ग़रीब किसानों, भूमिहीन कृषि मजदूरों की सामाजिक आर्थिक स्थिति और कमजोर हुई है। नयी तकनीक, उन्नत बीज, उर्वरक, कीटनाशक दवाएं, सिंचाई आदि जैसे निवेश लघु एवं सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर है। इसमें लघु किसानों और धनी किसानों के बीच की दूरी बढ़ गई है।

6. आर्थिक असमानता में वृद्धि (Increase in Economic Inequality)-हरित क्रांति के परिणामस्वरूप विभिन्न क्षेत्रों की आय में असमानता विकसित हुई है। इसका कारण यह है कि अधिक उपज देने वाली किस्मों के बीजों का प्रयोग देश के कुछ ही क्षेत्रों में ही हुआ। जबकि अधिकतर क्षेत्रों में कृषि कार्य परंपरागत तरीकों से ही किये जाते रहे हैं। इन क्षेत्रों में नयी तकनीक व पुरानी तकनीक के प्रयोग के परिणामस्वरूप उत्पादन क्षमता में असमानता विकसित हो गई है और इसी असमानता से विभिन्न क्षेत्रों की आय भी असमान हो गई है। अतः हरित क्रांति ने देश में आर्थिक असमानता को बढ़ावा दिया है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 ग्रामीण समाज में विकास एवं परिवर्तन

प्रश्न 6.
ग्रामीण क्षेत्रों में किस प्रकार के वर्ग पाए जाते हैं? उनका वर्णन करो।
उत्तर:
आज़ादी के बाद भारत में तेज़ गति से आर्थिक विकास हुआ है। आर्थिक विकास के लिए नियोजित प्रयास किए जा रहे हैं जिसके फलस्वरूप ग्रामीण क्षेत्रों में नए समूह तथा वर्ग विकसित हो रहे हैं जिनमें से प्रमुख वर्गों का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) भूस्वामी किसान (Land Owner Farmer)-आज़ादी प्राप्त करने के बाद भारत में आज़ादी से पहले से चली आ रही भूमि व्यवस्थाओं को बदलने के प्रयास किए। ज़मींदारों से कानूनी तरीके से तथा भू-दान आंदोलन द्वारा फालतू ज़मीन लेकर लाखों भूमिहीन किसानों में बांटी गई। प्रत्येक भूमिहीन किसान को एक-एक एकड़ जमीन मुफ्त दी गई। इसके फलस्वरूप लाखों भूमिहीन किसान भू-स्वामी किसान बन गए।

पहले वे ज़मींदारों के लिए जमींदारों की ज़मीन पर कृषि किया करते थे। अब वह अपनी ज़मीन पर खेती करने लगे। 1992 तक 50 लाख लोगों में 50 लाख एकड़ ज़मीन बांटी गई। ज़मीन का मालिक बनने पर किसानों में कृषि कार्यों में रुचि बढ़ी। देश में हरित क्रांति के बाद थोड़ी ज़मीन पर भी अधिक उत्पादन होने लगा जिससे किसानों की आर्थिक दशा सुधरने लगी। उन्नत बीजों, उर्वरकों, कृषि औजारों तथा सिंचाई आदि पर उन्होंने धन निवेश करना प्रारंभ किया। आजकल छोटे से छोटे किसान के पास भी ट्रैक्टर हैं।

(ii) सज्जन किसान (Gentleman Farmer)-सज्जन किसान भी भू-स्वामी किसानों का एक वर्ग है। इन किसानों के पास ज़मींदारों की तरह बड़े-बड़े ज़मीन के टुकड़े नहीं हैं। इनमें ऐसे किसान शामिल होते है, जिन्हें ज़मीन या तो अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई या फिर उन्होंने खुद ज़मीन खरीदी है। इस किसान वर्ग में काफी ऐसे लोग भी शामिल होते हैं जो सरकारी या गैर-सरकारी नौकरियां करते हैं. सैनिक तथा असैनिक सेवाओं में लगे थे, रिटायर हो चुके हैं, अपना छोटा-छोटा कारोबार करते हैं।

सज्जन किसान गेहूं, मक्की तथा धान इत्यादि की पारंपरिक खेती तो करते हैं इसके अलावा वह फल, फूल, साब्जियां इत्यादि भी उगाते हैं। उन्नत बीजों, उर्वरकों, यांत्रिक हल, सिंचाई सुविधाओं तथा धैशर इत्यादि का प्रयोग करते हैं जिससे उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ती है। इस तरह इनकी खेती में पारंपरिक आधुनिक कृषि प्रणाली के तत्त्व देखे जा सकते हैं।

(iii) मध्यम जातीय एवं मध्यम वर्गीय किसान (Middle Caste and Middle Class Farmer)-स्वतंत्रता के बाद भारतीय समाज के ग्रामीण क्षेत्रों में शक्तिशाली मध्यम जातीय तथा मध्यम वर्गीय किसानों के समूह का विकास हुआ है। इसे मध्यम जातीय इसलिए कहते हैं क्योंकि जातीय संस्तरण में इनकी स्थिति उच्च जातियों से निम्न तथा निम्न जातियों से उच्च है। इस वर्ग को मध्यम वर्गीय किसान भी कहते हैं क्योंकि यह न तो ज़मींदार हैं तथा न ही ये भूमिहीन किसान हैं।

इनकी स्थिति बड़े किसानों तथा भूमिहीन किसानों के बीच की है। औद्योगीकरण तथा नगरीकरण का लाभ उठाने के लिए काफ़ी बड़े-बड़े किसान, उच्च जातियों से संबंधित बड़े किसान नगरों में स्थानांतरित हो गए। उन्होंने उद्योगों की स्थापना करनी प्रारंभ कर दी। ऐसे हालातों में ग्रामीण क्षेत्रों से मध्यम जातीय तथा मध्यम वर्गीय किसान वर्ग विकसित हुआ।

(iv) पूंजीपति किसान (Capitalist Farmer)-अंत में पूंजीपति किसान वर्ग एक ऐसा वर्ग है जो कृषि कार्यों में इस तरह से पूंजी निवेश करता है ताकि अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त किया जा सके। यह वर्ग आजादी से पहले के ज़मींदार वर्ग से अलग है क्योंकि ज़मींदार वर्ग सरकार तथा किसान के बीच विचौलिया हुआ करता था। उत्पादन तथा उत्पादकता बढ़ाने के लिए वह विशेष प्रयास नहीं करता था।

जबकि पूंजीपति किसान खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के लिए ऋण अन्न प्रौद्योगिकी, मंडियों, यातायात तथा दूर संचार के साधनों तथा सस्ते श्रमिकों इत्यादि का प्रयोग करता है। चाहे पूंजीपति किसान वर्ग देश की कुल आबादी का छोटा सा भाग है पर देश की घरेलू खपत तथा निर्यात के लिए खाद्यान्न उत्पादन करने में इस वर्ग की अहम भूमिका है। भू-स्वामी किसान, सज्जन किसान, मध्यम जातीय तथा मध्यम वर्गीय किसान तथा पूंजीपति किसानों के वर्गों का विकास आजादी के बाद हुआ। इस तरह सभी प्रकार के वर्गों का संबंध कृषि से है तथा यह वर्ग मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

प्रश्न 7.
भारत की आज़ादी के बाद ग्रामीण समाज में कौन-से परिवर्तन आए? उनकी व्याख्या करें।
उत्तर:
देश की स्वतंत्रता के बाद जिन-जिन प्रदेशों मे हरित क्रांति आई उन प्रदेशों में ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक संबंधों और प्रकृति में बहुत से बदलाव आए जैसे कि

  • अधिक कृषि के कारण कृषि मजदूरों का बढ़ना।
  • अनाज के स्थान पर नगद भुगतान।
  • प्रारंपरिक बंधनों का कमज़ोर होना अथवा किसान व मजदूर के पुश्तैनी संबंधों में कमी आना।
  • मुफ़्त दिहाड़ी मजदूरों के वर्ग का सामने आना।

प्रसिद्ध समाज शास्त्री जान ब्रेमन ने किसानों तथा मजदूरों के संबंधों की प्रकृति में परिवर्तन के बारे में बताया है। यह परिवर्तन उन सभी क्षेत्रों में आए जहां कृषि का व्यापारीकरण हुआ अर्थात जहां फसलों को बाज़ार में वेचने के लिए उगाया गया। कुछ विद्वानों के अनुसार मज़दूर संबंधों में यह बदलाव पूंजीवादी कृषि के काम आया। पूंजीवादी व्यवस्था में उत्पादन, उत्पादन के साधनों, मजदूरों के पृथक्करण तथा मुफ़्त दिहाड़ी मजदूरों के प्रयोग पर आधारित होता है।

आजकल विकसित क्षेत्रों में किसान बाजार के लिए उत्पादन कर रहे हैं। कृषि में व्यापारीकरण के कारण ग्रामीण क्षेत्र विस्तृत अर्थ व्यवस्था से जुड़ रहे हैं। इस कारण गांवों की तरफ पूंजी का निवेश बढ़ा है तथा व्यापार के अवसर व रोजगार बढ़ गए। परंतु हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में यह परिर्वतन अंग्रेजों के समय ही शुरू हो गए थे। 19वीं सदी में महाराष्ट्र में जमीन के बड़े टुकड़ों पर कपास का उत्पादन करके किसानों को सीधे विश्व बाजार से जोड़ दिया गया।

चाहे इसकी गति स्वतंत्रता के बाद तेज़ हुई क्योंकि सरकार ने खाद्यान उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक सुविधाएं ग्रामीण क्षेत्रों में मुहईया करवाई। सरकार ने सड़कें, सिंचाई की सुविधाएं तथा सहकारी समितियां उपलब्ध करवाई। ग्रामीण विकास के सरकारी प्रयासों से न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था तथा कृषि में परिर्वतन आए बल्कि कृषक संरचना तथा ग्रामीण समाज में भी परिवर्तन आए। 1960 तथा 1970 के दशक में हरित क्रांति आई तथा बड़े किसानों ने कृषि के क्षेत्र में निवेश करना शुरू किया जिससे वह समृद्ध हो गए।

आंध्र प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश तथा मध्य गुजरात में प्रबल जातियों के संपन्न किसानों ने कृषि से होने वाले लाभ को और प्रकार के व्यापारों में पैसा लगाना शुरू किया। इससे नए उद्यमी समूह सामने आए जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों से कस्बों की तरफ पलायन किया। इससे नए क्षेत्रीय अभिजात वर्ग सामने आए जो आर्थिक और राजनीतिक रूप से शक्तिशाली हो गए। वर्ग संरचना में इस परिर्वतन से ग्रामीण क्षेत्रों तथा कस्बों में उच्च शिक्षा के संस्थान शुरू हो गए जिससे ग्रामीण लोग अपने बच्चों को पढ़ाने लग गए। इनमें से बहुत ने व्यावसायिक अर्थव्यवसथा अथवा व्यापार करना शुरु किया तथा नगरों के मध्य वर्ग के विस्तार में योगदान दिया।

प्रश्न 8.
भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण का ग्रामीण समाज पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
भूमंडलीकरण से भारतीय कृषि व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
वैश्वीकरण का भारतीय कृषि व्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1980 के दशक के उत्तरार्ध से ही भारत में उदारीकरण की नीति अपनायी जा रही है जिसका देश के ग्रामीण समाज तथा कृषि पर काफ़ी प्रभाव पड़ा है जिसका वर्णन इस प्रकार है-
(i) भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में विश्व व्यापार संगठन में भागीदारी होती है जिसका मुख्य उद्देश्य मुक्त अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार स्थापित करना है। इसके लिए भारतीय बाजारों को आयात के लिए खोलने की ज़रूरत है। दशकों तक भारतीय बाजार बंद बाज़ार था परन्तु भूमंडलीकरण के कारण अब यह अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से प्रतियोगिता करने को तैयार है।

बहुत सी ऐसी वस्तुएं हैं, जैसे कि कई प्रकार के फल तथा खाद्यान्न सामग्री जो आयात पर प्रतिबंध होने के कारण कुझ समय पहले तक उपलब्ध नहीं थी। कुछ समय पहले तक भारत गेहूं के क्षेत्र में आत्मनिर्भर था परंतु पिछले वर्ष इसे आयात करना पड़ा। इस तरह भूमंडलीकरण के कारण ग्रामीण समाज अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार से प्रतिस्पर्धा कर रहा है।

(ii) कृषि के भूमंडलीकरण के कारण कृषि विस्तृत अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में शामिल हो गई है जिसका किसानों तथा ग्रामीण समाज पर सीधा प्रभाव पड़ा है। जैसे पंजाब तथा कर्नाटक में किसानों ने बहु राष्ट्रीय कंपनियों (कोक, पेप्सी) से कुछ निश्चित फसलें उगाने (टमाटर, आलू) का ठेका लिया है। यह कंपनियां उन फसलों को निर्यात या प्रसंस्करण के लिए खरीद लेती हैं। इस प्रकार की संविदा खेती या ठेका करने वाली कृषि में कंपनियां निश्चित फसलें उगाने को कहती हैं, बीज तथा और वस्तुएं निवेश के रूप में उपलब्ध करवाती हैं।

इसके साथ ही वह जानकारी तथा कार्यकारी पूंजी भी देती हैं। इसके बदले में किसान पूर्व निर्धारित मूल्य पर फसल बेचने का आश्वासन देते हैं। फूल, अंगूर, अंजीर, अनार, कपास, तिलहन संविदा खेती की प्रमुख फसलें हैं। संविदा खेती बहुत से लोगों को उत्पादन प्रक्रिया से अलग कर देती हैं तथा उनके अपने प्राचीन ज्ञान को निरर्थक कर देती है। इसके अलावा इन फसलों को उगाने में उवर्रकों तथा कीटनाशकों का अधिक प्रयोग होता है जिस कारण यह पर्यावरण की दृष्टि से ठीक नहीं है।

(iii) कृषि के भूमंडलीकरण के कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियां बीज, कीटनाशकों तथा उर्वरकों के विक्रेता के रूप में सामने आएं हैं। पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में सरकारी कार्यक्रमों की कमी के कारण इन कंपनियां के एजेंटों ने अपने पाँव जमा लिए हैं। यह एजेंट किसानों को बीजों तथा कृषि की जानकारी के एकमात्र स्रोत होते हैं तथा यह एजेंट अपने उत्पाद बेचने को इच्छुक होते हैं। इसलिए किसान महंगी खादों, कीटनाशकों का प्रयोग करने को बाध्य हुए हैं। इससे किसान ऋणी हो गए हैं तथा पर्यावरण का संकट भी उत्पन्न हो गया है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत किस प्रकार का देश है?
(A) कल्याणकारी
(B) तानाशाही
(C) राजतंत्र
(D) कुलीनतंत्र।
उत्तर:
कल्याणकारी।

2. …………………. एक कानूनी किताब या दस्तावेज़ है जिसमें देश को चलाने के सभी नियम दिए गए हैं?
(A) महाकाव्य
(B) आचार संहिता
(C) संविधान
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
संविधान।

3. भारतीय संविधान कब लागू हुआ था?
(A) 26 जनवरी, 1947
(B) 26 जनवरी, 1950
(C) 26 जनवरी, 1952
(D) 26 जनवरी 1949
उत्तर:
26 जनवरी, 1950.

4. संविधान बनाने वाली Drafting Committee के अध्यक्ष कौन थे?
(A) लाल बहादुर शास्त्री
(B) महात्मा गांधी
(C) जवाहर लाल नेहरू
(D) डॉ० अंबेदकर।
उत्तर:
डॉ० अंबेदकर।।

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5. सभी भारतीयों को कितने मौलिक अधिकार दिए गए हैं?
(A) छः
(B) चार
(C) पाँच
(D) सात।
उत्तर:
छः।

6. …………….. एक समूह है जिसकी वैधानिक संस्थाएं उसके नाम से जानी जाती हैं, जिसका अपना एक भौगोलिक क्षेत्र होता है तथा जिसे शक्ति के शारीरिक पक्ष को प्रयोग करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है?
(A) देश
(B) सरकार
(C) राज्य
(D) राजनीतिक दल।
उत्तर:
राज्य।

7. सामाजिक नियोजन का मुख्य उद्देश्य क्या है?
(A) देश का सर्वपक्षीय विकास
(B) देश के एक पक्ष का विकास
(C) अपने देश के साथ और देशों का विकास
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
देश का सर्वपक्षीय विकास।

8. आज तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएं बन चुकी हैं?
(A) नौ
(B) दस
(C) आठ
(D) बारह।
उत्तर:
बारह।

9. देश में योजना आयोग कब बना था?
(A) 1952
(B) 1951
(C) 1954
(D) 1950
उत्तर:
1950

10. योजना आयोग का अध्यक्ष कौन होता है?
(A) प्रधानमंत्री
(B) वित्त मंत्री
(C) राष्ट्रपति
(D) वित्त सचिव।
उत्तर:
प्रधानमंत्री।

11. पहली पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल क्या था?
(A) 1950-1955
(B) 1952-1957
(C) 1951-1956
(D) 1953-1958
उत्तर:
1951-1956

12. पंचवर्षीय योजनाओं का माडल किस देश से लिया गया था?
(A) यू० एस० एस० आर०
(B) ब्रिटेन
(C) अमेरिका
(D) जर्मनी।
उत्तर:
यू० एस० एस० आर० (U.S.S.R.)।

13. स्थानीय स्वः संस्थाओं में स्त्रियों को कितना आरक्षण दिया गया है?
(A) एक तिहाई
(B) पाँचवां हिस्सा
(C) एक चौथाई
(D) दसवां हिस्सा।
उत्तर:
एक तिहाई।

14. सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जनजातियों को कितना आरक्षण दिया गया है?
(A) 10%
(B) 15%
(C) 7.5%
(D) 27%
उत्तर:
7.5%

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15. संसद् में अनुसूचित जनजातियों के लिए कितने स्थान आरक्षित हैं?
(A) 39
(B) 41
(C) 49
(D) 46
उत्तर:
41

16. पहली पंचवर्षीय योजना का क्या उद्देश्य था?
(A) कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ करनाड्ड
(B) औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना
(C) सामाजिक कल्याण के अधिक-से-अधिक कार्यक्रम बनाना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

17. सभी भारतीयों को कितने मौलिक कर्तव्य दिए गए हैं?
(A) छः
(B) दस
(C) आठ
(D) नौ।
उत्तर:
दस।

18. पंचवर्षीय योजनाओं से देश में क्या परिवर्तन आया?
(A) शिक्षा का फैलाव
(B) स्त्रियों की स्थिति में सुधार
(C) पिछड़े वर्गों का उत्थान
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

19. नियोजित विकास का क्या लाभ है?
(A) समय की बचत
(B) सभी क्षेत्रों का विकास
(C) पैसे की बचत
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

20. इनमें से कौन-सा पंचायती राज का एक स्तर है?
(A) पंचायत
(B) ब्लॉक समिति
(C) जिला परिषद्
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

21. ………………. एक नियमों की व्यवस्था है जिसे सरकार द्वारा लोगों पर लागू किया जाता है?
(A) कानून
(B) संविधान
(C) राज्य
(D) सरकार।
उत्तर:
कानून।

22. देश के लिए कानून कौन बनाता है?
(A) संसद्
(B) लोक सभा
(C) राज्य सभा
(D) प्रदेश की वैधानिक संस्था।
उत्तर:
संसद्।

23. राज्य के लिए कानून कौन बनाता है?
(A) संसद्
(B) राज्य विधान सभा
(C) राज्य सभा में
(D) लोकसभा।
उत्तर:
राज्य विधान सभा।

24. भारत में पंचायती राज्य व्यवस्था कब लागू हुई थी?
(A) 1952
(B) 1959
(C) 1955
(D) 1962
उत्तर:
1959

25. ग्राम सभा की अधिक-से-अधिक समयावधि कितनी होती है?
(A) 4 साल
(B) 5 साल
(C) 6 साल
(D) असीमित।
उत्तर:
5 साल।

26. पंचों और सरपंचों की नियुक्ति कैसे होती है?
(A) प्रत्यक्ष चुनाव के द्वारा
(B) जिले के डी० सी० द्वारा नियुक्ति
(C) जिले के संसद् सदस्य द्वारा नियुक्ति
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
प्रत्यक्ष चुनाव के द्वारा।

27. पंचायती राज्य की तीन स्तरीय संरचना में सबसे निम्न स्तर कौन-सा है?
(A) ब्लॉक समिति
(B) पंचायत
(C) जिला परिषद्
(D) नगर कौंसिल।
उत्तर:
पंचायत।

28. पंचायती राज्य की तीन स्तरीय संरचना में बीच का स्तर कौन-सा है?
(A) ब्लॉक समिति
(B) पंचायत
(C) नगर कौंसिल
(D) जिला परिषद्।
उत्तर:
ब्लॉक समिति।

29. पंचायती राज्य की तीन स्तरीय संरचना में सबसे उच्च स्तर कौन-सा है?
(A) नगर निगम
(B) ब्लॉक समिति
(C) पंचायत
(D) जिला परिषद्।
उत्तर:
जिला परिषद्।

30. पंचायत समिति द्वारा बनाई गई योजनाओं को कौन लागू करता है? .
(A) B.D.O.
(B) S.S.P.
(C) D.C.
(D) S.D.M.
उत्तर:
B.D.O.

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31. किस कानून से बहु-विवाह की प्रथा समाप्त कर दी गई थी?
(A) हिंदू तलाक कानून, 1955
(B) हिंदू विवाह अधिनियम, 1955
(C) हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956
(D) दहेज निषेध कानून, 1961.
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955

32. अस्पृश्यता अपराध अधिनियम कब पास हुआ था?
(A) 1949
(B) 1954
(C) 1955
(D) 1961
उत्तर:
1955

33. नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कब पास हुआ था?
(A) 1975
(B) 1974
(C) 1977
(D) 1976
उत्तर:
1976.

34. प्राचीन पंचायती राज्य व्यवस्था में क्या कमी थी?
(A) लगातार चुनाव की कमी
(B) वित्तीय साधनों की कमी
(C) लोगों द्वारा दिलचस्पी न लेना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

35. इनमें से कौन-सा पंचायत का कार्य है?
(A) पीने के पानी का प्रबंध
(B) सड़कें बनाना
(C) स्कूल का प्रबंध
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

36. ग्राम सभा में गाँव के सभी ………………… सदस्य होते हैं।
(A) बालिग
(B) बच्चे
(C) जवान
(D) स्त्रियाँ।
उत्तर:
बालिग।

37. इनमें से कौन-सा पंचायत समिति की आय का स्रोत है?
(A) अनुदान
(B) मेलों से आय
(C) मार्कीट से आय
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

38. विकेंद्रीकरण का अर्थ है ……………….. का ऊपर से नीचे तक विभाजन।
(A) कार्यों
(B) शक्तियों
(C) व्यवस्था
(D) देश।
उत्तर:
शक्तियों।

39. पंचायत का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यता होनी चाहिए?
(A) वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
(B) वह दिवालिया घोषित न किया गया हो
(C) उसकी आयु 21 वर्ष से अधिक होनी चाहिए
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

40. भारतीय संविधान की प्रस्तावना इनमें से किसे सुनिश्चित करने का प्रयास करती है?
(A) धार्मिक न्याय
(B) सामाजिक न्याय
(C) राजनीतिक न्याय
(D) उपर्युक्त सभी को।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी को।

41. इनमें से कौन-सा 1931 के कराची कांग्रेस संकल्प घोषणा पत्र में शामिल था?
(A) धार्मिक स्वतंत्रता
(B) धर्म निरपेक्ष राज्य
(C) वयस्क मताधिकार।
(D) उपर्युक्त सभी को।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक नियोजन का मुख्य उदेश्य क्या होता है?
उत्तर:
सामाजिक नियोजन का मुख्य उदेश्य देश का हर तरफ से विकास करना होता है।

प्रश्न 2.
हमारे देश में अब तक कितनी पंचवर्षीय योजनाएं बन चुकी हैं?
उत्तर:
हमारे देश में अब तक 12 पंचवर्षीय योजनाएं बन चुकी हैं।

प्रश्न 3.
हमारे देश में अब तक कितनी एकवर्षीय योजनाएं लागू हो चुकी हैं?
उत्तर:
हमारे देश में अब तक तीन एकवर्षीय योजनाएं 1966-69 तक लागू हो चुकी हैं।

प्रश्न 4.
हमारे देश के योजना आयोग को कब बनाया गया था?
उत्तर:
हमारे देश के योजना आयोग को 1950 में बनाया गया था।

प्रश्न 5.
योजना आयोग का अध्यक्ष कौन होता है?
उत्तर:
योजना आयोग का अध्यक्ष हमेशा प्रधानमंत्री होता है क्योंकि हमारे संविधान के अनुसार योजना आयोग का अध्यक्ष हमेशा प्रधानमंत्री ही होगा।

प्रश्न 6.
महिला अधिकारिता दिवस कब मनाया गया था?
उत्तर:
महिला अधिकारिता दिवस सन् 2001 में मनाया गया था।

प्रश्न 7.
पहली पंचवर्षीय योजना की अवधि क्या थी?
अथवा
प्रथम पंचवर्षीय योजना कब लागू की गई?
उत्तर:
पहली पंचवर्षीय योजना की अवधि 1951-1956 तक थी।

प्रश्न 8.
पहली पंचवर्षीय योजना में कितने रुपये खर्च करने का प्रावधान था?
उत्तर:
पहली पंचवर्षीय योजना में ₹ 1960 करोड़ खर्च करने का प्रावधान था।

प्रश्न 9.
दूसरी तथा तीसरी पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल बताएं।
उत्तर:
दूसरी पंचवर्षीय योजना 1956-1961 तक थी तथा तीसरी पंचवर्षीय योजना 1961-1966 तक थी।

प्रश्न 10.
दूसरी तथा तीसरी पंचवर्षीय योजना में कितने रुपये खर्च करने का प्रावधान था?
उत्तर:
दूसरी योजना में ₹ 4672 करोड़ तथा तीसरी पंचवर्षीय योजना में ₹ 8577 करोड़ खर्च करने का प्रावधान था।

प्रश्न 11.
तीन एकवर्षीय योजनाओं में कितने रुपये खर्च किए गए?
उत्तर:
तीन एकवर्षीय योजनाओं में ₹ 6625 करोड़ खर्च किए गए।

प्रश्न 12.
चौथी, पाँचवीं तथा छठी पंचवर्षीय योजनाओं का कार्यकाल बताएं।
उत्तर:
चौथी पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1969-74, पाँचवीं का 1974-79 तथा छठी पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1979-85 तक था।

प्रश्न 13.
इन तीन योजनाओं में कितने पैसे खर्च किए गए?
उत्तर:
चौथी योजना में ₹ 15779 करोड़, पाँचवीं योजना में ₹ 39,426 करोड़ तथा छठी पंचवर्षीय योजना में ₹ 1,10,467 करोड़ खर्च किए गए।

प्रश्न 14.
सातवीं तथा आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि बताएं।
उत्तर:
सातवीं तथा आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि क्रमशः 1985-90 तथा 1992-97 थी।

प्रश्न 15.
सातवीं तथा आठवीं पंचवर्षीय योजनाओं में कितने पैसे खर्च किए गए?
उत्तर:
सातवीं योजना में ₹ 2,21,436 करोड़ तथा आठवीं पंचवर्षीय योजना में ₹ 4,74,121 करोड़ खर्च किए गए।

प्रश्न 16.
नौवीं तथा दसवीं पंचवर्षीय योजनाओं की अवधि बताएं।
उत्तर:
नौवीं योजना की अवधि 1997-2002 तथा दसवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि 2002-2007 तक है।

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प्रश्न 17.
नौवीं योजना में कितने रुपये खर्च किए गए?
उत्तर:
नौवीं योजना में ₹ 8,59,200 करोड़ खर्च किए गए।

प्रश्न 18.
दसवीं पंचवर्षीय योजना में कितने रुपये खर्च किए जाएंगे?
उत्तर:
दसवीं पंचवर्षीय योजना में ₹ 15.92,300 करोड़ खर्च किए जाएंग।

प्रश्न 19.
पंचवर्षीय योजनाओं का मॉडल भारत ने किस देश से लिया था?
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं का मॉडल भारत ने सोवियत संघ (U.S.S.R.) से लिया था।

प्रश्न 20.
आर्थिक विकास मख्यतः किन बातों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
आर्थिक विकास मुख्यतः उद्योगों के होने तथा अधिक उत्पादन होने, कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी, विदेशी निवेश के बढ़ने, देश में सामान की खपत, आयात-निर्यात इत्यादि पर निर्भर करता है।

प्रश्न 21.
भारतीय संविधान की क्या विशेषताएँ हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान इतना लचकीला तथा आसान है कि इसमें परिवर्तन किया जा सकता है तथा साथ ही साथ इतना कठोर है कि इसे परिवर्तित करने के लिए संसद् तथा राज्य विधानसभाओं के दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता है।

प्रश्न 22.
बहु विवाह की प्रथा किस कानून द्वारा खत्म की गई थी?
उत्तर:
बहु विवाह प्रथा को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के द्वारा खत्म किया गया था।

प्रश्न 23.
पुत्र गोद लेने का कानून कब पास हआ था?
उत्तर:
पुत्र गोद लेने या हिंदू दत्तक पुत्र गोद लेने का कानून 1950 में पास हुआ था।

प्रश्न 24.
दहेज निरोधक कानून कब पास हुआ?
उत्तर:
दहेज निरोधक कानून पहली बार 1961 में तथा दूसरी बार 1986 में पास हुआ था।

प्रश्न 25.
अस्पृश्यता अपराध कानून कब पास हुआ था?
उत्तर:
अस्पृश्यता अपराध कानून 1955 में पास हुआ था पर यह कारगर सिद्ध नहीं हुआ था। इसलिए इसमें संशोधन करके नागरिक संरक्षण अधिकार कानून 1976 में पास हुआ था।

प्रश्न 26.
विधवा पुनर्विवाह कानून कब पास हुआ था?
उत्तर:
विधवा पुनर्विवाह कानून 1856 में पास हुआ था।

प्रश्न 27.
सती प्रथा विरोधी कानून कब पास हुआ था?
उत्तर:
सती प्रथा विरोधी कानून 1829 में पास हुआ था।

प्रश्न 28.
प्रभुत्व जाति होने के लिए कौन-सी विशेषताएँ आवश्यक हैं?
उत्तर:
प्राचीन समय में उच्च जाति, धन का होना प्रभुत्व जाति होने के लिए आवश्यक था। परंतु आधुनिक समय में जाति का प्रभाव कम हो गया है। इसलिए अधिक जनसंख्या का होना ही प्रभुत्व जाति के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 29.
भारत किस प्रकार का राज्य है?
उत्तर:
भारत एक कल्याणकारी राज्य है जिसका मुख्य उद्देश्य जनता के कल्याण में कार्य करना है।

प्रश्न 30.
संविधान क्या होता है?
उत्तर:
संविधान एक कानूनी किताब या दस्तावेज़ है जिसमें देश पर शासन करने के तरीके तथा प्रणालियाँ लिखी हुई हैं।

प्रश्न 31.
भारत देश का संविधान कब लागू हुआ था?
उत्तर:
भारत देश का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ था, तभी हमारा देश गणतंत्र बना था।

प्रश्न 32.
संविधान बनाने वाली Drafting Committee के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
संविधान बनाने वाली Drafting Committee के अध्यक्ष डॉ० अंबेदकर थे।

प्रश्न 33.
भारत के नागरिकों को कितने मौलिक अधिकार दिए गए हैं?
उत्तर:
भारत के नागरिकों को छः (6) मौलिक अधिकार दिए गए हैं।

प्रश्न 34.
राज्य क्या होता है?
अथवा
राज्य की परिभाषा दें।
अथवा
राज्य क्या है?
अथवा
राज्य को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
राज्य वह समूह है जिसमें समाज में चल रही विभिन्न वैधानिक संस्थाएं उसके नाम से जानी जाती हैं तथा उसका निश्चित भू-भाग होता है जिसमें उसे शक्ति के शारीरिक पक्ष का प्रयोग करने का पूरा अधिकार होता है।

प्रश्न 35.
पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य उद्देश्य देश का हर तरफ से विकास करना है तथा राज्यों को उनके हक के मुताबिक विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए पैसा देना है। इससे देश का सामाजिक तथा आर्थिक विकास होता है।

प्रश्न 36.
कल्याणकारी राज्य क्या होता है?
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य में राज्य अपने नागरिकों तथा जनता के कल्याण करने की ज़िम्मेवारी उठाता है तथा उनके कल्याण के प्रयास करता है।

प्रश्न 37.
कल्याणकारी राज्य किस प्रकार की भूमिका निभाता है?
उत्तर:
कल्याणकारी राज्य देश में नागरिकों के कल्याण में सबसे अहम भूमिका अदा करता है। देश के कमजोर तथा पिछड़े वर्गों के आर्थिक विकास के लिए वह कार्य करता है। महिलाओं तथा बच्चों के लिए विधान रखता है ताकि कोई उनका शोषण न कर सके। इस तरह कल्याणकारी राज्य बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है।

प्रश्न 38.
नियोजन क्या होता है?
उत्तर:
नियोजन एक व्यवस्था होती है जिसके आधार पर समाज या व्यक्तिगत तौर पर लक्ष्यों की पूर्ति के लिए प्रयास किए जाते हैं।

प्रश्न 39.
सामाजिक नियोजन क्या होता है?
उत्तर:
यह वह व्यवस्था या विधि है जिसकी मदद से समाज की विभिन्न प्रकार की सामाजिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान के प्रयास किए जाते हैं।

प्रश्न 40.
आर्थिक नियोजन क्या होता है?
उत्तर:
यह वह योजना या कार्यक्रम है जिसमें हम आर्थिक तौर के सभी पक्षों जैसे कृषि, व्यापार, संपत्ति, संचार, परिवहन के साधनों के विकास के कार्य या प्रयास करते हैं।

प्रश्न 41.
हमारे देश में सामाजिक नियोजन की क्या ज़रूरत है?
उत्तर:
हमारे देश में विभिन्न धर्मों, जातियों के लोग रहते हैं। इन सबको एक-दूसरे के निकट लाने के लिए तथा इस निकटता में से निकली समस्याओं के समाधान के लिए सामाजिक नियोजन की बहुत ज़रूरत है।

प्रश्न 42.
राज्य तथा सरकार में क्या अंतर है?
उत्तर:
राज्य स्थायी होती है उसे कोई हिला नहीं सकता पर सरकार अस्थायी होती है जोकि पाँच साल या उससे पहले भी बदल सकती है। राज्य के कुछ लक्ष्य होते हैं, सरकार उन लक्ष्यों को प्राप्त करने का साधन है।

प्रश्न 43.
पंचायत किसे कहते हैं?
उत्तर:
पंचायत का अर्थ है-पाँच व्यक्तियों की सभा यां पंचों का समूह। पंचायती राज का अर्थ पंचों या पाँच व्यक्तियों द्वारा शासन करने के आधार पर समझा जा सकता है। इसे स्थानीय स्वशासन भी कह सकते हैं।

प्रश्न 44.
पंचायती राज के तीन स्तर कौन-कौन से हैं?
अथवा
नई पंचायती राज व्यवस्था के तीन स्तर कौन से हैं?
अथवा
पंचायती राज संस्थाओं के स्तरों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
पंचायती राज के तीन स्तर हैं-

  • पंचायत-गांव के स्तर पर
  • पंचायत समिति-ब्लॉक स्तर पर
  • जिला परिषद्-ज़िला के स्तर पर।

प्रश्न 45.
कानून क्या हैं?
अथवा
सामाजिक अधिनियम किसे कहते हैं?
उत्तर:
नियमों व सिद्धांतों की वह व्यवस्था जिसे जनता पर सरकार द्वारा लागू किया जाता है उसे कानून कहते है।

प्रश्न 46.
देश के लिए कानून कौन बनाता है?
उत्तर:
देश के लिए कानून देश की संसद् बनाती है तथा राज्य के लिए कानून राज्य के विधानमंडल बनाते हैं।

प्रश्न 47.
भारत में पंचायती राज व्यवस्था कब लागू हुई थी?
उत्तर:
भारत में पंचायती राज व्यवस्था 1959 में लागू हुई थी।

प्रश्न 48.
ग्राम पंचायत का गठन कितने समय के लिए होता है?
उत्तर:
ग्राम पंचायत का गठन 73वें संशोधन के अनुसार 5 साल के लिए होता है पर इसे पहले भी भंग किया जा सकता है।

प्रश्न 49.
ग्राम पंचायत में कितने सदस्य होते हैं?
उत्तर:
हमारे देश में ग्राम पंचायत के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं है। हरेक राज्य में यह भिन्न-भिन्न है। हरियाणा में यह संख्या 6 से 20 तक है।

प्रश्न 50.
ग्राम पंचायत के सदस्यों तथा प्रधान का चुनाव कैसे होता है?
उत्तर:
भारत में प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली चलती है ताकि लोगों के प्रतिनिधियों को चुना जा सके। इस तरह ग्राम पंचायत के पंचों तथा सरपंच का चुनाव भी प्रत्यक्ष चुनाव प्रणाली से होता है।

प्रश्न 51.
पंचायत समिति तथा जिला परिषद् किस स्तर पर गठित होते हैं?
उत्तर:
पंचायत समिति ब्लॉक स्तर पर तथा जिला परिषद् जिला स्तर पर गठित होते हैं।

प्रश्न 52.
पंचायत समिति द्वारा बनाई योजनाओं को कौन लागू करता है?
उत्तर:
पंचायत समिति द्वारा बनाई गई योजनाओं को ब्लॉक विकास अधिकारी (Block Development Officer) लागू करता है।

प्रश्न 53.
पुरानी पंचायत राज व्यवस्था में क्या त्रुटियां थीं?
उत्तर:

  1. नियमित चुनावों का अभाव था।
  2. पंचायतों के पास वित्तीय साधन नहीं थे।
  3. लोगों की इन संस्थाओं में कम रुचि थी।
  4. सरकारी अधिकारियों का इनके ऊपर अत्यधिक नियंत्रण था।

प्रश्न 54.
कानून कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
कानून दो प्रकार के होते हैं-

  1. दीवानी कानून
  2. फ़ौजदारी कानून।

प्रश्न 55.
गाँवों के विकास के लिए पंचायती राज में कौन-सी संस्थाएं कार्य करती हैं?
उत्तर:
गाँवों के विकास के लिए पंचायती राज में तीन संस्थाएं कार्य करती हैं।

  1. गाँव में पंचायत
  2. ब्लॉक में पंचायत समिति
  3. जिले में जिला परिषद्।

प्रश्न 56.
ग्राम सभा क्या है?
उत्तर:
यह सभा गाँव में बनती है। गाँव के सभी बालिग मर्द तथा औरतें इसके सदस्य होते हैं तथा यही लोग पंचायत का निर्माण करते हैं।

प्रश्न 57.
पंचायत की आय के कोई दो साधन बताओ।
उत्तर:

  1. सरकार से मिलने वाली ग्रांट
  2. मकानों पर लगे टैक्स से आमदनी
  3. शामलाट ज़मीन से आमदनी।

प्रश्न 58.
पंचायत के कोई चार कार्य बताओ।
उत्तर:

  1. गाँव में पीने के पानी का प्रबंध करना।
  2. गाँवों में सड़कों का निर्माण करना।
  3. गाँवों की सफाई रखने की व्यवस्था करनी।
  4. गाँवों में बिजली का प्रबंध करना।

प्रश्न 59.
पंचायत समिति की आय के कोई तीन साधन बताओ।
उत्तर:

  1. सरकार से ग्रांट मिलना
  2. मेलों से आमदनी
  3. मंडियां लगने से आय की प्राप्ति।

प्रश्न 60.
पंचायत समिति के कोई दो कार्य बताओ।
उत्तर:

  1. अपने क्षेत्र के विकास के लिए योजनाएं बनाना तथा उन्हें लागू करना।
  2. अपने क्षेत्र के अंतर्गत आती पंचायतों के काम-काज की निगरानी करना।

प्रश्न 61.
जिला परिषद् की आय के कोई दो साधन बताओ।
उत्तर:

  1. सरकार द्वारा प्राप्त ग्रांट
  2. अपनी संपत्ति से मिलती आमदनी
  3. उस क्षेत्र में से इकट्ठे हुए करों का कुछ भाग।

प्रश्न 62.
जिला परिषद् के प्रमुख कार्य क्या है?
उत्तर:

  1. अपने क्षेत्र में आती पंचायत समितियों के काम का निरीक्षण करना।
  2. अपने क्षेत्र में चल रहे विकास कार्यों का निरीक्षण करना।

प्रश्न 63.
ग्राम पंचायत का सदस्य बनने के लिए क्या योग्यता चाहिए?
उत्तर:
ग्राम पंचायत का सदस्य बनने के लिए 21 वर्ष की आयु होनी चाहिए। चुनाव लड़ने वाला व्यक्ति राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ने तथा पंचायतों का चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य न ठहराया गया हो।

प्रश्न 64.
उदारीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं। यह एक आर्थिक प्रक्रिया है तथा यह समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया हैं।

प्रश्न 65.
निजीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर:
लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देशों में मिश्रित प्रकार की व्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रम होते हैं। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपना, ताकि यह अधिक लाभ कमा सकें, निजीकरण कहलाता है।

प्रश्न 66.
मौलिक अधिकारों से आप क्या समझते हैं?
अथवा
मौलिक अधिकार क्या हैं?
अथवा
मौलिक अधिकारों की परिभाषा दें।
उत्तर:
हमारे देश के संविधान ने देश के सभी नागरिकों को कुछ मूलभूत अधिकार प्रदान किए हुए हैं जिन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है। यह अधिकार व्यक्ति के लिए अच्छा जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं जिस कारण इन्हें मौलिक अधिकार कहा जाता है।

प्रश्न 67.
भारतीय नागरिकों को संविधान में दिए गए प्रमुख मौलिक अधिकारों का वर्णन करें।
अथवा
मौलिक अधिकारों का एक उदाहरण दें।
अथवा
भारतीय संविधान में दिए गए मौलिक अधिकारों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
किन्हीं दो मौलिक अधिकारों का वर्णन करें।
अथवा
कोई दो मौलिक अधिकार लिखिए।
उत्तर:

  1. समानता का अधिकार
  2. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  3. स्वतंत्रता का अधिकार
  4. सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार
  5. शोषण के विरुद्ध अधिकार
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 68.
संवैधानिक उपचारों के अधिकार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
यह अधिकार देश के सभी नागरिकों को दिया गया है। इसके अनुसार अगर कोई और व्यक्ति, राज्य सरकार अथवा केन्द्र सरकार किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन या उनमें हस्तक्षेप करने का प्रयास करता है तो वह व्यक्ति न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर अपने अधिकार वापिस पा सकता है।

प्रश्न 69.
लोकतंत्र क्या है?
अथवा
लोकतंत्रीकरण से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
लोकतंत्र सरकार का ही एक प्रकार है जिसमें जनता का शासन चलता है। इसमें जनता के प्रतिनिधि साधारण जनता में से बालिगों को वोट देने के अधिकार से चुने जाते हैं तथा यह प्रतिनिधि ही जनता का प्रतिनिधित्व करते है और उनकी तरफ से बोलते हैं। यह कई संकल्पों जैसे कि समानता, स्वतंत्रता तथा भाईचारे में विश्वास रखता है तथा यह ही इसके कार्यवाहक आधार है।

प्रश्न 70.
दबाव समूह क्या होता है?
अथवा
दबाव समूह से आप क्या समझते हैं?
अथवा
दबाव समूह क्या है?
उत्तर:
दबाव समूह वह संगठित अथवा असंगठित समूह होते हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा अपने हितों को बढ़ावा देते हैं। उनके कुछ उद्देश्य होते हैं तथा वे सरकार पर दबाव डालकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रयास करते हैं। यह प्रत्यक्ष रूप से कभी भी चनाव नहीं लड़ते बल्कि अपने प्रभाव से स रखते हैं। ट्रेड यूनियन, किसान संघ इसकी उदाहरणें हैं।

प्रश्न 71.
स्थानीय स्वः शासन का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जब स्थानीय स्तर पर जनता का शासन स्थापित हो जाए तो उसे स्थानीय स्वः शासन कहते हैं। इसमें जनता स्थानीय स्तर पर अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है तथा वह प्रतिनिधि स्थानीय स्तर पर ही जनता की समस्याओं का समाधान करते हैं।

प्रश्न 72.
राज्य क्या होता है?
उत्तर:
राज्य वह समूह है जिसमें समाज में चल रही विभिन्न वैधानिक संस्थाएं उसके नाम से जानी जाती हैं तथा उसका निश्चित भू-भाग होता है जिसमें उसे शक्ति के शारीरिक पक्ष का प्रयोग करने का पूरा अधिकार होता है।

प्रश्न 73.
पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर:
पंचवर्षीय योजनाओं का मुख्य उद्देश्य देश का हर तरफ से विकास करना है तथा राज्यों को उनके हक के मुताबिक विकास कार्यों पर खर्च करने के लिए पैसा देना है। इससे देश का सामाजिक तथा आर्थिक विकास होता है।

प्रश्न 74.
संगठित अपराध किसे कहते हैं?
उत्तर:
आजकल के समय में लोग एक निश्चित योजना बनाकर, हथियारों के साथ अपराध करते हैं। उन्हें ही संगठित अपराध कहा जाता है।

प्रश्न 75.
सफेद कॉलर अपराध का एक उदाहरण दें।
उत्तर:
नेताओं, अफसरों इत्यादि द्वारा किया जाने वाला घोटाला सफेद कॉलर अपराध का उदाहरण है।

प्रश्न 76.
चार नीति निर्देशक सिद्धांतों के नाम दें।
उत्तर:
राज्य बाल मजदूरी को रोकेगा, राज्य समान कार्य के लिए समान वेतन सुनिश्चित करेगा, सभी नागरिकों के लिए आजीविका के उपयुक्त स्रोत विकसित करेगा तथा देश की प्राचीन धरोहरों की रक्षा करेगा।

प्रश्न 77.
समानता के अधिकार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समानता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है जिसके अनुसार देश के सभी नागरिक कानून की दृष्टि में समान हैं तथा किसी के साथ भी जाति, वर्ण, रंग, भाषा, आयु, प्रजाति इत्यादि में आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।

प्रश्न 78.
शैक्षणिक अधिभार से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शैक्षणिक अधिकार का अर्थ यह है कि सरकार 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगी।

प्रश्न 79.
भारत के किसी एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल का नाम बताएं।
उत्तर:
इंडियन नैशनल लोकदल हरियाणा राज्य में मौजूद क्षेत्रीय राजनीतिक दल है।

प्रश्न 80.
ग्राम पंचायत का उप-प्रधान कैसे निर्वाचित किया जाता है?
उत्तर:
ग्राम पंचायत के निर्वाचित सदस्य अर्थात पंच अपने में से ही एक उप प्रधान का चुनाव करते हैं।

प्रश्न 81.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि ‘भारत एक समाजवादी ……………… है।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि भारत एक समाजवादी पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

प्रश्न 82.
स्वतंत्रता के अधिकार क्या है?
उत्तर:
स्वतंत्रता के अधिकार के अनुसार भारत में सभी नागरिक स्वतंत्र हैं तथा किसी भी देशी, विदेशी प्रभाव से मुक्त है।

प्रश्न 83.
भारत के किसी एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल का नाम बताएँ।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भारत का एक राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं।

प्रश्न 84.
ग्राम पंचायत के प्रधान का चुनाव कैसे किया जाता है?
उत्तर:
ग्राम पंचायत के प्रधान का चुनाव प्रत्यक्ष मतदान के द्वारा होता है।

प्रश्न 85.
भारतीय संविधान में लिखा है कि भारत एक प्रजातंत्रीय …………………….. है।
उत्तर:
भारतीय संविधान में लिखा है कि भारत एक प्रजातन्त्रीय गणराज्य है।

प्रश्न 86.
अस्पृश्यता में उन्मूलन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अस्पृश्यता में उन्मूलन का अर्थ है कि देश में से विधानों के द्वारा अस्पृश्यता का खात्मा कर दियागया है तथा जो भी अस्पृश्यता का पालन करेगा उसे विधानों के अनुसार कठोर दंड दिया जाएगा।

प्रश्न 87.
कोई एक मौलिक कर्तव्य बताएं।
उत्तर:
संविधान का पालन करना तथा इसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज व राष्ट्रीय गान का सम्मान करना

प्रश्न 88.
ग्राम पंचायत की मीटिंग की अध्यक्षता प्रधान या पंच में से कौन करता है?
उत्तर:
ग्राम पंचायत की मीटिंग की अध्यक्षता प्रधान करता है।

प्रश्न 89.
किन्हीं दो राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के नाम बताएँ।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी, बहुजन समाज पार्टी भारत के राष्ट्रीय राजनीतिक दल हैं।

प्रश्न 90.
भारत का संविधान 15 अगस्त, 1947 या 26 जनवरी, 1950 में से किस दिन लागू किया गया?
उत्तर:
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया।

प्रश्न 91.
‘संविधान दवारा 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है।’ यह कथन सत्य है या असत्य?
उत्तर:
यह कथन सत्य है कि संविधान द्वारा 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों को शिक्षा का अधिकार प्रदान किया गया है।

प्रश्न 92.
ग्राम सभा तथा ग्राम पंचायत में क्या अंतर है?
उत्तर:
एक ग्राम सभा में ग्राम के सभी बालिग सदस्य होते हैं तथा ग्राम पंचायत ग्राम सभा द्वारा चुनी हुई संस्था होती है जिसमें एक प्रधान तथा कई पंच होते हैं।

प्रश्न 93.
आपके राज्य में ग्राम पंचायत के सदस्यों के चुनाव में वोट डालने की न्यूनतम आयु क्या है?
उत्तर:
हमारे राज्य में ग्राम पंचायत के सदस्यों के चुनाव में वोट डालने की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है।

प्रश्न 94.
‘शिक्षा का अधिकार’ कितनी आयु तक के बच्चों को दिया गया है?
उत्तर:
शिक्षा का अधिकार 6-14 वर्ष तक की आयु तक के बच्चों को दिया गया है।

प्रश्न 95.
पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों का कितने वर्ष के लिए चुनाव किया जाता है?
उत्तर:
पंचायती राज संस्थाओं के सदस्यों का चुनाव 5 वर्ष के लिए होता है।

प्रश्न 96.
अपने राज्य में सक्रिय किन्हीं दो राजनीतिक दलों के नाम बताएं।
उत्तर:
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस, इंडियन नैशनल लोकदल, बी० जे० पी० हमारे राज्य के सक्रिय राजनीतिक दल हैं।

प्रश्न 97.
26 जनवरी, 1950 को किस देश का संविधान लागू किया गया?
उत्तर:
26 जनवरी, 1950 को भारत का संविधान लागू किया गया।

प्रश्न 98.
अभिव्यक्ति का अधिकार क्या है?
उत्तर:
वह अधिकार जिसके अंतर्गत सभी को अपनी बात कहने की स्वतंत्रता हो, अभिव्यक्ति का अधिकार है।

प्रश्न 99.
अनुसूचित जनजाति किसे कहते हैं?
उत्तर:
वह जनजाति जिसका नाम संविधान में दर्ज है, उसे अनुसूचित जनजाति कहते हैं।

प्रश्न 100.
भारत में दल प्रणाली का स्वरूप किस प्रकार का है?
उत्तर:
भारत में बहुदलीय व्यवस्था है अर्थात् यहाँ बहुत से राजनीतिक दल होते हैं।

प्रश्न 101.
अनुसूचित जाति क्या है?
उत्तर:
जिस जाति का नाम संविधान में कुछ विशेष व्यवस्थाओं को पाने के लिए दर्ज हो, उसे अनुसूचित जाति कहते हैं।

प्रश्न 102.
मौलिक अधिकार के हनन पर भारत के किस न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है?
उत्तर:
मौलिक अधिकार के हनन पर उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।

प्रश्न 103.
भारत की राजकीय भाषा कौन-सी है?
उत्तर:
हिंदी भारत की राजकीय भाषा है।

प्रश्न 104.
प्रभुजाति का स्थानीय सोपान में कौन-सा स्थान होता है?
उत्तर:
प्रभुजाति का स्थानीय सोपान में सबसे उच्च स्थान होता है।

प्रश्न 105.
किंही दो दबाव समूहों का नाम बताएं।
उत्तर:
नर्मदा बचाओ आंदोलन, चिपको आंदोलन दो दबाव समूह हैं।

प्रश्न 106.
संविधान में किस अनुच्छेद द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है?
उत्तर:
संविधान के अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया है।

प्रश्न 107.
जाति कैसी सामाजिक व्यवस्था है?
उत्तर:
जाति एक बंद सामाजिक व्यवस्था है जिसमे शामिल होना या निकलना मुमकिन नहीं है।

प्रश्न 108.
भारतीय संविधान में कौन-सी भाषा मान्यता प्राप्त नहीं हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान में अंग्रेजी को मान्यता प्राप्त नहीं हैं क्योंकि इसे संपर्क भाषा कहा गया है।

प्रश्न 109.
सरकार के तीन अंग कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
विधानपालिका (Legislative), कार्यपालिका (Executive) तथा न्यायपालिका (Judiciary), सरकार के तीन अंग हैं।

प्रश्न 110.
भारत में नयी पंचायती राज व्यवस्था कब शरू हई?
उत्तर:
भारत में नयी पंचायती राज व्यवस्था 1993 में शुरू हुई थी।

प्रश्न 111.
भारत की राजकीय भाषा कौन-सी है?
उत्तर:
हिंदी भारत की राजकीय भाषा है।

प्रश्न 112.
राज्य के अनिवार्य तत्त्व कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
भौगोलिक क्षेत्र, जनसंख्या, प्रभुसत्ता तथा सरकार राज्य के चार अनिवार्य तत्त्व हैं।

प्रश्न 113.
सरकार का अर्थ एवं परिभाषा लिखें।
उत्तर:
सरकार राज्य का वह अनिवार्य तत्त्व है. जिसे उसका प्रशासन चलाने के लिए निर्मित किया जाता है।

प्रश्न 114.
एक पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल क्या होता है?
उत्तर:
एक पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

प्रश्न 115.
हिंदू विवाह अधिनियम कब पास हुआ?
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम सन् 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 116.
संवैधानिक प्रावधान से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
किसी विशेष कार्य को करने के लिए जो उपबंध अथवा प्रावधान संविधान में रखे गए हों उन्हें संवैधानिक प्रावधान कहा जाता है।

प्रश्न 117.
पंचवर्षीय योजना से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
हमारे देश का विकास करने के लिए पाँच वर्षों के लिए जो योजना तैयार की जाती है उसे पंचवर्षीय योजना कहा जाता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पंचायती राज संस्थाओं के कोई चार कार्य बताओ।
अथवा
ग्राम पंचायत के कोई दो प्रमुख कार्य बताएँ।
अथवा
पंचायती राज्य संस्थाओं के कोई पाँच कार्य लिखिए।
उत्तर:

  1. पीने के पानी का प्रबंध, बिजली का प्रबंध करना।
  2. कृषि विस्तार के प्रयास करने।
  3. पशुपालन, दुग्ध उद्योग और कुक्कुट पालन का विकास करना।
  4. सड़कें, पुलियाँ, पुल, फेरी, जलमार्ग तथा संचार के अन्य साधनों का प्रबंध करना।
  5. शिक्षा का प्रबंध करना।
  6. बाज़ार तथा मेले लगवाने।

प्रश्न 2.
पंचायती राज प्रणाली की विशेषताएं बताओ।
अथवा
नई पंचायती राज प्रणाली की कोई चार विशेषताएं लिखें।
उत्तर:

  1. पंचायती राज प्रणाली में तीन स्तरीय संरचना होती है।
  2. इनमें ग्राम सभा की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण होती है।
  3. इनमें चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर होता है।
  4. इस प्रणाली में महिलाओं, अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण होता है।
  5. पंचायती राज संस्थाओं के वित्तीय अधिकार तथा कार्यों का वितरण होता है।

प्रश्न 3.
पंचायत समिति के कौन-कौन सदस्य होते हैं?
उत्तर:

  1. पंचायत समिति के लिए प्रत्यक्ष रूप से चुने हुए सदस्य।
  2. लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के सदस्य जो उस क्षेत्र से संबंधित हों।
  3. पंचायत समिति क्षेत्र से ग्राम पंचायतों के कुल प्रधानों में से 1/5 भाग।
  4. राज्य सभा के सदस्य।

प्रश्न 4.
मैकाइवर के अनुसार कानून कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:

  1. राष्ट्रीय कानून (National Law)
  2. अंतर्राष्ट्रीय कानून (International Law)
  3. संवैधानिक कानून (Constitutional Law)
  4. साधारण कानून (Ordinary Law)
  5. सार्वजनिक कानून (Public Law)
  6. व्यक्तिगत कानून (Private Law)
  7. सामान्य कानून (General Law)
  8. प्रशासनिक कानून (Administrative Law)।

प्रश्न 5.
भारत में विकेंद्रीकरण का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
विकेंद्रीकरण का अर्थ है शक्तियों का बंटवारा। इसका अर्थ है शक्तियों का ऊपर से लेकर नीचे तक शक्तियों का बंटवारा। भारत में विकेंद्रीकरण का बहुत महत्त्व है क्योंकि भारत एक लोकतंत्र है। लोकतंत्र की सबसे पहली शर्त है कि राजनीति में जनता की भागीदारी। जनता की भागीदारी तभी संभव है जब हर स्तर पर चुनाव हो। हर स्तर पर चुनाव होने से लोए चुने जाएंगे। अगर वह चुने गए हैं तो उनको शक्तियों की जरूरत पड़ेगी।

उनको शक्तियां मिलेंगी ऊपर से तथा यह शक्तियां तभी मिल सकती हैं अगर शक्तियों का केंद्रीकरण न होकर विकेंद्रीकरण हो। वैसे भी भारत में बहुत-सी समस्याएं पायी जाती हैं। इन समस्याओं को केंद्र में बैठकर हल नहीं किया जा सकता। इनको उसी स्तर पर हल किया जा सकता है जहाँ पर यह हैं तथा उसके लिए शक्तियों का विकेंद्रीकरण चाहिए।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 6.
विकेंद्रीकरण व्यवस्था की कोई चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर:
विकेंद्रीकरण व्यवस्था में शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो जाता है। आजादी के बाद हमारे देश में विकेंद्रीकरण की व्यवस्था अपनायी गई ताकि हमारा देश सही मायनों में लोकतंत्र बन सके। विकेंद्रीकरण व्यवस्था की चार विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(i) विकेंद्रीकरण व्यवस्था में शासन व्यवस्था लोकप्रिय रहती है क्योंकि इस व्यवस्था में हर किसी को सत्ता हथियाने का मौका मिलता है। लोकतंत्र जितना व्यापक होगा जनता उतनी ही सक्रिय होगी। इसलिए इससे शासन व्यवस्था लोकप्रिय रहती है।

(ii) विकेंद्रीकरण में निर्णय जल्दी ले लिए जाते हैं। अगर यह व्यवस्था न हो तो निर्णय लेने में समय लग जाएगा क्योंकि वह राजधानी से आएगा पर इस व्यवस्था में मौके पर ही निर्णय हो जाते हैं। इसमें बड़े-बड़े अधिकारियों से आज्ञा की ज़रूरत नहीं पड़ती।

(iii) इस व्यवस्था में प्रशासन में लचीलापन आ जाता है। कर्मचारियों को उनके अधिकार क्षेत्र में निर्णय लेने की स्वतंत्रता रहती है। जिन लोगों के लिए वे काम करते हैं वह उनके निकट होते हैं इसलिए वह मौके के अनुसार निर्णय ले लेते हैं।

(iv) इस व्यवस्था में एक अधिकारी के पास काम का बोझ नहीं रहता। अगर यह व्यवस्था न हो तो छोटे अधिकारियों के पास कोई काम न होगा तथा बड़े अधिकारी काम के बोझ तले दब जाएंगे। इस तरह यह व्यवस्था काम को अलग-अलग स्तरों पर बांट देती है।

प्रश्न 7.
विकेंद्रीकरण व्यवस्था के चार अवगुण बताओ।
उत्तर:
इस व्यवस्था के अवगुण निम्नलिखित हैं-
(i) इस व्यवस्था से शासन में एकरूपता का अभाव होता है। ऊपर बैठे अधिकारी काम करने के नीति निर्देश तो दे देते हैं पर छोटे अधिकारी उस नीति में मौके तथा समय के अनुसार संशोधन कर देते हैं जिस वजह से ऊपर तथा नीचे वालों की नीति में भिन्नता आ जाती है।

(ii) इस व्यवस्था का एक और अवगुण यह है कि इससे खर्च बढ़ जाता है। कर्मचारियों की तनख्वाह, कार्यालय, उसके खर्च यह सब सरकार को सहन करने पड़ते हैं जोकि बहुत ज्यादा होते हैं।

(iii) इस समस्या से राष्ट्रीय हितों को नुकसान पहुंचता है। अधिकारी स्थानीय समस्याओं को निपटाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि वह सिर्फ स्थानीय क्षेत्र के बारे में सोचते रहते हैं देश के बारे में नहीं सोचते।।

(iv) इस व्यवस्था में केंद्र के नियंत्रण का अभाव होता है। कर्मचारी अपनी मर्जी से काम करते हैं। कई बार तो केंद्र सरकार द्वारा बनाई नीतियों की भी अवहेलना हो जाती है। उनमें स्वेच्छाचारी की प्रवृत्ति बढ़ जाती है।

प्रश्न 8.
भारत के संविधान में महिलाओं के लिए प्रावधान है?
अथवा
महिलाओं के कल्याण के लिए क्या संवैधानिक प्रावधान हैं?
उत्तर:
भारत की कुल जनसंख्या में से आधी आबादी महिलाओं की है। सदियों से उनकी स्थिति निम्न रही है तथा उनको पैरों की जूती समझा जाता था। इसलिए संविधान में उनके कल्याण के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 15 के अनुसार सरकार महिलाओं के हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध तथा उनको विशेष सुविधाएँ प्रदान कर सकती हैं। अनुच्छेद 39 में यह प्रावधान है कि महिलाओं व पुरुषों को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाएगा।

अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य महिलाओं को प्रसूति सहायता का प्रबंध करेगा। अनुच्छेद 51 में लिखा है कि प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य है कि वह महिलाओं के गौरव को अपमान पहुँचाने वाली परंपराओं को त्याग दें। 73वें तथा 74वें संवैधानिक संशोधनों से महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं में एक तिहाई सीटें आरक्षित की गई हैं।

प्रश्न 9.
हमारे संविधान में बच्चों के लिए क्या प्रावधान है?
अथवा
बच्चों के कल्याण के लिए क्या संवैधानिक प्रावधान है?
उत्तर:
भारतीय संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों में बच्चों का भी उल्लेख किया गया है। अनुच्छेद 15 के अनुसार सरकार बच्चों के हितों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबन्ध कर सकती है। उन्हें विशेष सुविधाएं मुहैया करवा सकती है। अनुच्छेद 39 के अनुसार बच्चों को आर्थिक संकट से विवश होकर ऐसे कार्य न करने पड़ें जोकि उनकी आयु व स्वास्थ्य के अनुकूल न हो।

इसलिए सरकार ऐसी नीति का निर्माण करे जिससे बच्चों व युवकों के शोषण तथा नैतिक एवं भौतिक पतन से रक्षा हो सके। अनुच्छेद 45 में लिखा है कि सरकार 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क तथा आवश्यक शिक्षा का प्रबंध करे।

प्रश्न 10.
संविधान ने अनुसूचित जातियों के लिए क्या प्रावधान रखे हैं?
उत्तर:

  1. संविधान के अनुच्छेद 275 के अनुसार केंद्र सरकार राज्यों को जनजातीय कल्याण के लिए विशेष धनराशि देगी।
  2. अनुच्छेद 325 के अनुसार सभी को (जनजातियों को भी) वयस्क मताधिकार प्राप्त है।
  3. अनुच्छेद 330 व 332 के अनुसार वर्तमान समय में अनुसूचित जातियों के लिए लोकसभा में 41 तथा राज्यों की विधानसभाओं में 527 स्थान आरक्षित हैं।
  4. अनुच्छेद 335 के अनुसार जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों में 7.5% स्थान आरक्षित हैं।
  5. अनुच्छेद 338 के अनुसार राष्ट्रपति अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए विशेष अधिकारी की नियुक्ति करेगा जो प्रत्येक वर्ष राष्ट्रपति को रिपोर्ट करेगा।

प्रश्न 11.
पहली पंचवर्षीय योजना के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
1951 में जब पहली पंचवर्षीय योजना शुरू हुई तो उस समय देश विभाजन तथा द्वितीय विश्व युद्ध की वजह से आर्थिक संकट से गुजर रहा था। इसलिए पहली पंचवर्षीय योजना के निम्नलिखित मुख्य उदेश्य रखे गए

  • देश में कृषि व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाएगा।
  • देश में कृषि का विकास किया जाएगा ताकि देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्म-निर्भर हो सके।
  • ज्यादा से ज्यादा समाज कल्याण के कार्यक्रम बनाना।
  • औद्योगिक विकास को बढ़ाना।
  • रोज़गार बढ़ाने वाले क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान देना।
  • विस्थापितों के पुनर्वास के लिए ज्यादा से ज्यादा काम करना।

इस योजना के बजट 1960 करोड़ में से 45% राशि कृषि पर खर्च की गई। प्रथम योजना में विकास दर का लक्ष्य 2.2% रखा गया पर 3.7% तक विकास दर पहुँच गई थी।

प्रश्न 12.
दूसरी पंचवर्षीय योजना के क्या लक्ष्य थे?
उत्तर:
द्वितीय पंचवर्षीय योजना के लिए प्रमुख लक्ष्य था तेज़ गति से देश का औद्योगीकरण करना। इसके लिए 1956 में औद्योगिक नीति की घोषणा भी की गई। इसके लक्ष्य निम्नलिखित थे-

  • तेज़ गति से देश का औद्योगीकरण करना।
  • मूल तथा बड़े उद्योगों की स्थापना पर बल दिया जाए ताकि भारतीय समाज में समाजवादी अर्थव्यवस्था का विकास किया जा सके।
  • उद्योगों का विकास ताकि रोज़गार के साधनों का ज्यादा विकास हो सके।
  • राष्ट्रीय आय तथा देश के लोगों के रहन-सहन में वृद्धि करना।
  • आर्थिक साधनों का देश की जनता में समान रूप में वितरण करना।

इसके लिए दूसरी पंचवर्षीय योजना में 4672 करोड़ रुपये खर्च किए गए। विकास दर का लक्ष्य 46% रखा गया पर उपलब्धि 4.2% ही रही। छोटे बड़े उद्योगों में 14,000 विस्थापितों को नौकरियां दी गईं तथा 22,000 लोगों को व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए।

प्रश्न 13.
तीसरी पंचवर्षीय योजना के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
तीसरी पंचवर्षीय योजना में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखा गया तथा कृषि तथा औद्योगिक विकास की दर को बढ़ाने का प्रयास किया गया।

  • देश को कृषि के उत्पादन क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाना।
  • कृषि तथा औद्योगिक विकास की दर को बढाना।
  • राष्ट्रीय आय में वृद्धि ताकि देश में चल रही योजनाओं को पूरा किया जा सके।
  • रोजगार के साधन बढ़ाने में प्रयास करना।
  • देश की उन्नति के लिए अवसर उपलब्ध करवाना।
  • उद्योगों के लिए बिजली, ईंधन इत्यादि उपलब्ध करवाना ताकि ज्यादा से ज्यादा उत्पादन किया जा सके।

इस पूरी योजना के दौरान ₹ 8577 करोड़ खर्च किए गए। विकास दर का लक्ष्य तो 5% का था पर उपलब्धि 2.8% ही रही। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, समाज कल्याण इत्यादि के लिए काफ़ी पैसा रखा गया ताकि देश के औद्योगिक विकास के साथ-साथ सामाजिक विकास भी हो सके।

प्रश्न 14.
चौथी पंचवर्षीय योजना के क्या लक्ष्य थे?
उत्तर:
चौथी पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1969-1974 तक का था। इसके अंतर्गत निम्नलिखित लक्ष्य रखे गए-

  • कृषि उत्पादन में और साधनों को लगाना ताकि खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि हो सके।
  • परिवहन उद्योगों तथा शक्ति, बिजली इत्यादि के साधनों को विकसित करना।
  • ग्रामीण जनता की आय बढ़ाने के लिए कृषि उत्पादन पर ज्यादा ज़ोर देना।
  • निर्यात बढ़ाने तथा आयात कम करने के लिए प्रयास करना।
  • ग्रामीणों को अधिक सुविधाएं प्रदान करना।

इस कार्यकाल में ₹ 15,779 करोड़ खर्च किए गए तथा देश में विकास की दर का लक्ष्य 5.5% रखा गया था पर उपलब्धि 3.4% थी।

प्रश्न 15.
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना के क्या लक्ष्य थे?
उत्तर:
पाँचवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1974-79 था तथा इसमें निम्नलिखित उद्देश्य थे-

  • पाँचवीं पंचवर्षीय योजना का प्रमुख लक्ष्य गरीबी हटाओ था।
  • एक और लक्ष्य देश को आत्मनिर्भर बनाना था।
  • देश में वृद्धि का लक्ष्य 5.5% रखा गया।
  • जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करने की कोशिश करना।
  • गरीब लोगों को सस्ते दामों पर अनाज उपलब्ध करवाना।
  • निर्यात बढ़ाने तथा आयात कम करने पर बल देना।
  • समाज में बढ़ रही आर्थिक असमानताओं को कम करना।

इस योजना के अंतर्गत ₹ 39426 करोड़ खर्च किए गए। विकास दर के लिए लक्ष्य 5.5% रखा गया पर उपलब्धि 5% ही थी। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों व ग्रामीण उदयोगों के विकास पर काफ़ी ध्यान दिया गया।

प्रश्न 16.
छठी पंचवर्षीय योजना में कौन-से प्रमुख लक्ष्य रखे गए थे?
उत्तर:
छठी पंचवर्षीय योजना दो बार बनी थी। पाँचवीं योजना केंद्र में सरकार बदलने के कारण 1979 की बजाए 1978 में ही खत्म कर दी गई। जनता पार्टी ने छठी योजना (1978-83) को लागू किया पर 1980 में फिर सरकार पुनः परिवर्तित हो गई जिस वजह से 1980-85 के लिए छठी पंचवर्षीय योजना बनाई गई जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • इस योजना का प्रमुख उद्देश्य ग़रीबी उन्मूलन (Poverty Eradication) था।
  • बढ़ रही जनसंख्या पर नियंत्रण लगाना।
  • शक्ति के देसी साधनों का विकास करना।
  • आर्थिक तथा क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करना।
  • दो प्रमुख समस्याओं ग़रीबी तथा बेरोज़गारी को कम करना।
  • विकास दर को ठीक तरीके से बढ़ाना जो कि 5.2% रखी गई थी।
  • विकास कार्यों में सभी क्षेत्रों की भागीदारी तथा सभी लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित करना।

छठी पंचवर्षीय योजना की पूरी अवधि के दौरान ₹ 1,10,467 करोड़ खर्च किए गए। विकास दर का लक्ष्य 5.2% पर रखा गया था पर यह दर असल में 5.5% पर रही थी।

प्रश्न 17.
सातवीं पंचवर्षीय योजना के प्रमुख लक्ष्यों के बारे में बताओ।
उत्तर:
सातवीं विकास योजना 1985 में शुरू होकर 1990 तक चली। इस योजना ने विकास, आधुनिकीकरण जैसे सिद्धांतों को मुख्य रूप से सामने रखा तथा अग्रलिखित लक्ष्य रखे गए-

  • मुख्य लक्ष्य ग़रीबी उन्मूलन रखा गया।
  • बेरोज़गारी में कमी लाने के प्रयास किए जाएंगे।
  • विकास दर को तेज़ किया जाएगा।
  • उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे।
  • ग़रीबी को कम करने के प्रयास किए जाएंगे।

इस अवधि के दौरान 2,21,436 करोड़ रुपये खर्च किए गए तथा 5% की विकास दर का लक्ष्य रखा गया था पर प्राप्ति 5.8% थी। इस दौरान गरीबी हटाने के काफी प्रयास किए गए। समाज सुधार पर काफ़ी पैसे खर्च किए गए तथा ग़रीबी हटाने के भी काफी प्रयास किए गए।

प्रश्न 18.
आठवीं पंचवर्षीय योजना के क्या उद्देदश्य थे?
उत्तर:
आठवीं पंचवर्षीय योजना की अवधि 1992-97 थी। चाहे सातवीं योजना 1990 में ही खत्म हो गई थी पर 1990-92 के दौरान केंद्र में सरकार में परिवर्तनों तथा अन्य कारणों की वजह से यह योजना 1990 में लागू न हो सकी तथा 1992 में लागू हुई। इसके उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • भारतीय समाज में परिवर्तन के लिए इस योजना में प्रावधान किए गए।
  • महिलाओं के सशक्तिकरण, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों में उत्थान के लिए विशेष प्रयास किए जाएंगे।
  • ग्रामीण विकास को प्राथमिकता दी जाएगी।
  • लोगों में साक्षरता दर बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे। 15-25 वर्ष की आयु के अनपढ़ लोगों को साक्षर बनाया जाएगा।
  • सभी गांवों में साफ पीने के पानी का प्रबंध तथा प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध करवाना।
  • खाद्यान्न का उत्पादन बढ़ना ताकि निर्यात बढ़ाया जा सके।
  • परिवहन, संचार के साधनों का विकास करना।
  • विदेशी निवेश को बढ़ावा देना।

आठवीं योजना के अंतर्गत 4,74,121 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस योजना में विकास दर का लक्ष्य 5.6% रखा गया था पर उपलब्ध हुई थी 6.6%। इसका मतलब इस योजना में विकास दर काफ़ी तेजी से बढ़ी थी।

प्रश्न 19.
नौवीं पंचवर्षीय योजना में क्या लक्ष्य रखे गए थे?
उत्तर:
नौवीं पंचवर्षीय योजना का कार्यकाल 1997 से 2002 तक का था। इस योजना में अग्रलिखित लक्ष्य रखे गए थे-

  • इसमें कृषि व ग्रामीण विकास मुख्य उद्देश्य रखे गए।
  • सभी वर्गों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान की जाएगी।
  • जनसंख्या वृद्धि को रोकने के प्रयास किए जाएंगे।
  • पिछड़े वर्गों का सशक्तिकरण किया जाएगा।
  • लोगों की पंचायती राज संस्थाओं में भागीदारी बढ़ायी जाएगी।
  • केंद्र तथा राज्य सरकारों के राजस्व घाटे को कम किया जाएगा।
  • सरकार की वित्तीय हालत को सुधारने के प्रयास किए जाएंगे।
  • निर्यात बढ़ाने के लिए नीति निर्माण किया जाएगा।

इसी योजना के दौरान राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 तथा स्वास्थ्य नीति 2001 का निर्माण किया गया था। इस योजना के दौरान 8,59,200 करोड़ रुपये खर्च किए गए। विकास दर का लक्ष्य 6.5% रखा गया था क्योंकि पिछली योजना में 6.6% की दर को प्राप्त किया गया था पर इस बार प्राप्ति की दर 5.5% रही जोकि लक्ष्य में काफ़ी पीछे थी।

प्रश्न 20.
दसवीं पंचवर्षीय योजना के क्या उद्देश्य रखे गए थे?
उत्तर:
दसवीं पंचवर्षीय योजना 2002 में शुरू हुई थी। इसमें कुल 15,92,300 करोड़ रुपये 2007 तक खर्च करने का प्रावधान है। इस अवधि में विकास दर का लक्ष्य 8% निर्धारित किया गया है। इस पंचवर्षीय योजना में भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं में निश्चित परिवर्तन लाने के लिए निम्नलिखित लक्ष्य तय किये गए-

  • साक्षरता दर 75% प्राप्त करना ताकि लोगों का सार्वभौमिक विकास हो सके।
  • शिशु, मृत्युदर 45% प्राप्त करना।
  • मातृ मृत्युदर 2% पहुँचाना।
  • सभी प्रमुख नदियों तथा दूषित नदियों की सफ़ाई करना।
  • पंचायती राज को मज़बूत करने के प्रयास करने।
  • वाणिज्य तथा उद्योगों को बढ़ावा देना ताकि देश का औद्योगिक विकास हो सके।
  • 2007 तक ग़रीबी अनुपात कम करने के प्रयास करने तथा ज्यादा से ज्यादा लोगों को ग़रीबी की रेखा से ऊपर उठाना।
  • विद्युत् क्षमता को बढ़ावा देना ताकि देश विद्युत् (Electricity) के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो सके।

प्रश्न 21.
भारत में पंचवर्षीय योजनाओं की उपलब्धियों की विवेचना करें।
उत्तर:

  1. सरकार ने देश का सर्वपक्षीय विकास करने के लिए पंचवर्षीय योजनाएं शुरू की। इसलिए ही देश का विकास हो पाया है।
  2. पंचवर्षीय योजनाएं शुरू होने से ही देश का औद्योगिक विकास हुआ है तथा देश के कोने-कोने में उद्योग स्थापित हो गए हैं।
  3. पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए पैसा तथा प्रावधान रखे गए जिस कारण देश का कृषि उत्पादन काफ़ी बढ़ गया है।
  4. स्वतंत्रता के समय देश के आर्थिक विकास की दर कुछ भी नहीं थी। परंतु पंचवर्षीय योजनाओं के कारण अब यह 9% तक पहुंच गई है।
  5. पंचवर्षीय योजनाओं में महिलाओं, अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के उत्थान के प्रावधान रखे गए जिस कारण इनकी सामाजिक स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आया है।

प्रश्न 22.
स्वतंत्र भारत के किन्हीं चार सामाजिक विधानों का वर्णन कीजिए।
अथवा
भारत में बने मुख्य सामाजिक विधानों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  1. अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955-इस विधान के अनुसार देश में अस्पृश्यता के प्रयोग को गैर कानूनी घोषित किया गया तथा प्रयोग करने वाले के विरुद्ध दंड का प्रावधान रखा गया।
  2. हिंदू विवाह कानून 1955-इस विधान के अनुसार देश में एक से अधिक विवाह करवाना गैर कानूनी घोषित किया गया तथा एक विवाह को मान्यता दी गई।
  3. दहेज निरोधक कानून 1961-इस विधान के अनुसार किसी के लिए भी दहेज लेना तथा देना गैर-कानूनी घोषित किया गया।
  4. हिंदू दत्तक पुत्र गोद लेने का कानून 1950-इस विधान के अनुसार हिंदुओं को पुत्र गोद लेने की आज्ञा दी गई।

प्रश्न 23.
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था में विकेंद्रीकरण की क्या भूमिका है?
उत्तर:
विकेंद्रीकरण का अर्थ है देश में शक्तियों का विभाजन अर्थात् शक्तियों को उच्च स्तर से लेकर निम्न स्तर तक इस प्रकार विभाजित कर दिया जाए कि कार्य करते समय कोई समस्या ही न रहे। इस कारण ही देश की अर्थव्यवस्था में विकेंद्रीकरण की काफ़ी बड़ी भूमिका है। अगर अर्थव्यवस्था में कोई प्रतिबंध नहीं होंगे तथा इसमें लचकीलापन होगा तो देश का आर्थिक विकास निश्चित होगा।

देश के आर्थिक विकास के लिए अलग-अलग स्तरों पर आर्थिक शक्तियों का विभाजन भी आवश्यक है ताकि आर्थिक कार्य करते समय कोई बाधा न आए तथा यह तो अर्थव्यवस्था में विकेंद्रीयकरण के कारण ही मुमकिन है। मुक्त अर्थव्यवस्था से भी आर्थिक विकास मुमकिन हो पाएगा।

प्रश्न 24.
पंचायती राज की तीन स्तरीय व्यवस्था का वर्णन कीजिए।
अथवा
किस प्रकार स्थानीय स्वैः सरकार गाँव के स्तर पर कार्य करती है?
अथवा
पंचायती राज का क्या अर्थ है?
अथवा
त्रि-स्तरीय पंचायती राज प्रणाली की व्याख्या कीजिए।
अथवा
नई पंचायती राज व्यवस्था क्या है?
उत्तर:
73वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार पंचायती राज्य में तीन स्तरीय ढाँचे की व्यवस्था की गई है। गाँव के स्तर पर लोकतंत्र की सबसे पहली संस्था अर्थात् ग्राम सभा है जोकि गाँव के सभी बालिगों की सभा है तथा वह यह ग्राम सभा ही पंचायत तथा सरपंच का चुनाव करती है। पंचायत गाँव के हितों तथा आवश्यकताओं का ध्यान रखती है। दूसरा स्तर है पंचायत समिति का ब्लॉक स्तर पर तथा ब्लॉक की सभी पंचायतें इसकी सदस्य होती हैं।

यह अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों का कार्य देखती है। इसका एक चेयरमैन तथा कई चुने हुए तथा मनोनीत सदस्य होते हैं। तीसरा स्तर होता है ज़िला परिषद् का जोकि जिले के स्तर पर होता है। एक जिले की सभी पंचायत समितियाँ इसकी सदस्य होती हैं। एम० पी०. एम० एल० ए०. कमिश्नर इत्यादि अपने पद के कारण इसके सद कुछ चुने हुए सदस्य भी होते हैं। जिला परिषद् अपने क्षेत्र में आने वाली ब्लॉक समितियों तथा पंचायतों द्वारा किए गए कार्यों की देख-रेख करती है।

प्रश्न 25.
ग्राम सभा क्या होती है? इसके कौन-से कार्य होते हैं?
अथवा
ग्राम सभा क्या होती है?
उत्तर:
ग्राम सभा गाँव के सभी बालिग व्यक्तियों की एक सभा है जो सरपंच तथा पंचायत का चुनाव अपने वोट डालने के अधिकार के द्वारा करती है। ग्राम सभा कई प्रकार के कार्य करती है जैसे कि-

  • ग्राम सभा सरपंच, पंचायत तथा इसके सदस्यों का चुनाव करती है।
  • सरपंच ग्राम सभा में पंचायत का बजट पेश करता है तथा ग्राम सभा उसके ऊपर चर्चा करती है।
  • यह गाँव में किए जाने वाले विकास कार्यों के बारे में निर्णल लेती है।
  • यह पंचायत से गाँव से संबंधित किसी भी विषय पर प्रश्न पूछ सकती है।

प्रश्न 26.
स्थानीय स्वैः सरकार का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जहाँ पर बहुत से भाषायी, जातीय तथा धार्मिक समूह होते हैं, स्थानीय स्वैः सरकार का निम्नलिखित कारणों के कारण बहुत महत्त्व है-

  • स्थानीय हितों से संबंधित मुद्दे स्थानीय लोगों द्वारा ही समझे जा सकते हैं जैसे कि पानी का प्रबंध, सड़कों की सफ़ाई तथा रोशनी इत्यादि। इसलिए स्थानीय स्वैः सरकार का बहुत महत्त्व है।
  • स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक कार्य करने से लोगों को स्थानीय सरकार के बारे में काफ़ी जानकारी प्राप्त होती
  • स्थानीय कार्य स्थानीय सरकार द्वारा कम लागत पर अच्छे ढंग से हो सकते हैं।

प्रश्न 27.
ग्राम पंचायत के प्रमुख कार्यों का वर्णन करें।
अथवा
पंचायत की दो महत्त्वपूर्ण शक्तियाँ बताइए।
उत्तर:

  1. ग्राम पंचायत का सबसे पहला कार्य गांव के लोगों के सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के स्तर को ऊँचा उठाना होता है।
  2. गांव की पंचायत गांव में स्कूल खुलवाने तथा लोगों को अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करती
  3. ग्राम पंचायत ग्रामीण समाज में मनोरंजन के साधन जैसे कि फ़िल्में, मेले लगवाने तथा लाइब्रेरी खुलवाने का भी प्रबंध करती है।
  4. पंचायत लोगों को कृषि की नई तकनीकों के बारे में बताती है, नए बीजों, उन्नत उर्वरकों का भी प्रबंध करती
  5. यह गांव में कुएं, ट्यूबवैल इत्यादि लगवाने का प्रबंध करती है तथा नदियों के पानी की भी व्यवस्था करती
  6. यह गांवों का औद्योगिक विकास करने के लिए गांव में उद्योग लगवाने का भी प्रबंध करती है।

प्रश्न 28.
न्याय पंचायत का क्या अर्थ है?
उत्तर:
गांवों के लोगों में झगड़े होते रहते हैं जिस कारण उनके झगड़ों का निपटारा करना आवश्यक होता है। इसलिए 5-10 ग्राम सभाओं के लिए एक न्याय पंचायत का निर्माण किया जाता है। न्याय पंचायत लोगों के बीच होने वाले झगडों को खत्म करने में सहायता करती है। इसके सदस्य चने जाते हैं तथा सरपंच पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाता है। इन सदस्यों को पंचायत से प्रश्न पूछने का भी अधिकार होता है।

प्रश्न 29.
पंचायत समिति अथवा ब्लॉक समिति के बारे में बताएं।
अथवा
पंचायत समिति किसे कहते हैं?
अथवा
पंचायत समिति क्या है?
उत्तर:
पंचायती राज्य संस्थाओं के तीन स्तर होते हैं। सबसे निचले गांव के स्तर पर पंचायत होती है। दूसरा स्तर ब्लॉक का होता है। जहां पर ब्लॉक समिति अथवा पंचायत समिति का निर्माण किया जाता है। एक ब्लॉक में आने वाली पंचायतें, पंचायत समिति के सदस्य होते हैं तथा इन पंचायतों के प्रधान अथवा सरपंच इसके सदस्य होते हैं।

पंचायत समिति के इन सदस्यों के अतिरिक्त और सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष तौर पर किया जाता है। पंचायत समिति अपने क्षेत्र में आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह गांवों के विकास के कार्यक्रमों को चैक करती है तथा पंचायतों को गांव के कल्याण करने के लिए निर्देश देती है। यह पंचायती राज्य के दूसरे स्तर पर है।

प्रश्न 30.
जिला परिषद् का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पंचायती राज्य के सबसे ऊंचे स्तर पर है जिला परिषद् जो कि जिले के बीच आने वाली पंचायतों के कार्यों का ध्यान रखती है। यह भी एक प्रकार की कार्यकारी संस्था होती है। पंचायत समितियों के चेयरमैन चुने हुए सदस्य, उस क्षेत्र के लोक सभा, राज्य सभा तथा विधान सभा के सदस्य सभी जिला परिषद् के सदस्य होते हैं। यह सभी जिले में आने वाले गांवों के विकास का ध्यान रखते हैं। जिला परिषद् कृषि में सुधार, ग्रामीण बिजलीकरण, भूमि सुधार, सिंचाई, बीजों तथा उर्वरकों को उपलब्ध करवाना, शिक्षा, उद्योग लगवाने जैसे कार्य करती है।

प्रश्न 31.
पंचायती राज्य की समस्याएं बताएं।
उत्तर:

  1. लोगों के अनपढ़ तथा अंधविश्वासों में फंसे हुए होने के कारण वह परिवर्तन को जल्दी स्वीकार नहीं करते जो पंचायती राज्य संस्थाओं के रास्ते में सबसे बड़ी समस्या है।
  2. गांवों में अच्छे तथा ईमानदार नेताओं की कमी होती है तथा वह केवल अपने विकास पर ही ध्यान देते हैं गांवों के विकास पर नहीं।
  3. अच्छे पढ़े-लिखे लोग धीरे-धीरे शहरों में बस रहे हैं जिससे गांव में पढ़े-लिखे नेताओं की कमी है।
  4. सरकारी अफ़सर, पंचों तथा सरपंचों से मिलकर गांव को मिलने वाले ज्यादातर पैसे को स्वयं ही खा जाते हैं तथा गांव का विकास रुक जाता है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 32.
सरपंच के बारे में कुछ बताएं।
उत्तर:
ग्रामे पंचायत के मुखिया को सरपंच अथवा चेयरपर्सन कहा जाता है। अलग-अलग राज्यों में इसे अलग अलग नामों से पुकारा जाता है जैसे कि अध्यक्ष, प्रैजीडेंट, सरपंच, मुखिया, प्रधान, सभापति इत्यादि। अधिकतर राज्यों में सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष तथा सीधे तौर पर किया जाता है अर्थात् ग्राम सभा के जिन सदस्यों को वोट देने का अधिकार प्राप्त है तथा जो ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करते हैं, वह वोटर ही ग्राम पंचायत के सरपंच का चुनाव भी करते हैं। सरपंच पंचायत की बैठकों की अध्यक्षता करता है। वह सरकार द्वारा मिले पैसे को गांव के विकास कार्यों में लगाता है तथा गांव के सर्वपक्षीय विकास का प्रयास करता है।

प्रश्न 33.
ग्राम पंचायत की आय के साधन के बारे में बताएं।
उत्तर:

  1. पंचायत को राज्य सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त टैक्स लगाने का अधिकार प्राप्त है जैसे कि संपत्ति कर, पश कर, पेशा कर, मार्ग कर, चंगी कर इत्यादि इनसे उसे आय होती है।
  2. ग्राम पंचायत कई प्रकार के जुर्माने भी लगा सकती है तथा फ़ीस भी इकट्ठी कर सकती है जिससे उसे आय प्राप्त होती है।
  3. पंचायतों को प्रत्येक वर्ष सरकार से ग्रांटें प्राप्त होती हैं जिससे उसकी आय बढ़ती है।
  4. पंचायत को कड़ा-कर्कट, गोबर बेचने से आय, मेलों से आय, पंचायत की संपत्ति से भी आय प्राप्त हो जाती है।
  5. इनके अतिरिक्त यह राज्य सरकार की मंजूरी से कर्जा भी ले सकती है।

प्रश्न 34.
73वें संवैधानिक संशोधन की कुछ विशेषताएं बताएं।
उत्तर:
1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन किया गया तथा इसमें स्थानीय सरकार से संबंधित कुछ प्रावधान किए गए। इस संशोधन की कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं:

  • अब पंचायती राज्य में तीन स्तरीय ढाँचा स्थापित किया गया है तथा यह है गाँव के लिए पंचायत, ब्लॉक के लिए ब्लॉक समिति तथा जिले के लिए जिला परिषद्।
  • अब स्थानीय सरकारों के लिए हरेक 5 वर्ष बाद चुनाव करवाना ज़रूरी कर दिया गया।
  • स्थानीय सरकारों की कुल सीटों में से 1/3 स्थान स्त्रियों के लिए आरक्षित कर दिए गए।
  • अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुसार स्थान आरक्षित रखे गए।
  • एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था राज्य चुनाव आयोग का गठन किया गया ताकि स्वतंत्र चुनाव करवाए जा सकें।

प्रश्न 35.
दबाव समूह और आंदोलन राजनीति को किस तरह प्रभावित करते हैं?
उत्तर:
दबाव समूह संगठित अथवा असंगठित समूह होते हैं जो सरकार की नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा अपने हितों को बढ़ावा देते हैं। आंदोलन भी राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं परंतु दोनों ही प्रत्यक्ष रूप से चुनाव में भाग नहीं लेते। दोनों ही एक अथवा दूसरे ढंग से राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। दोनों ही निम्नलिखित ढंगों से राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं
(i) यह दबाव समूह तथा आंदोलन किसी विशेष मुद्दे पर आंदोलन चलाते हैं ताकि जनता का समर्थन हासिल किया जा सके। यह दोनों ही संचार माध्यमों की सहायता लेते हैं ताकि जनता का ध्यान अधिक-से-अधिक खींचा जा सके।

(ii) यह साधारणतया हड़ताल करवाते हैं, रोषमार्च निकालते हैं तथा सरकारी कार्यों में बाधा पहुँचाने का प्रयास करते हैं। यह हड़ताल की घोषणा करते हैं तथा धरने पर बैठते हैं ताकि अपनी आवाज़ उठा सकें। अधिकतर फैडरेशन तथा यूनियनें सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए यही ढंग प्रयोग करते हैं।

(iii) साधारणतया व्यापारी समूह लॉबी का निर्माण करते हैं जिसके कुछ आम हित होते हैं ताकि सरकार पर उसकी नीतियाँ बदलने के लिए दबाव बनाया जा सके।

प्रश्न 36.
दबाब समूहों और राजनीतिक दलों के आपसी संबंधों का स्वरूप कैसा होता है, वर्णन करें।
उत्तर:
साधारणतया दबाव समूह कुछ लोगों के समूह होते हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। उनके कुछ उद्देश्य होते हैं तथा वह सरकार पर दबाव डालकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के प्रयास करते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य सरकारी नीतियों को प्रभावित करना होता है।

साधारणतया इन समूहों के सदस्य वह लोग होते हैं जिनके कुछ सामान्य हित, उद्देश्य होते हैं। यह कभी भी चुनाव लड़ने का प्रयास नहीं करते परंतु इनके अपने ही कुछ विचार होते हैं। राजनीतिक दलों तथा दबाव समूहों के आपसी संबंधों का स्वरूप अग्रलिखित प्रकार का होता है-
(i) कई केसों में यह दबाव समूह राजनीतिक दलों द्वारा बनाए गए तथा निर्देशित किए जाते हैं। तब यह दबाव समूह उन राजनीतिक दलों की बाजुओं के रूप में कार्य करते हैं। उदाहरण के तौर पर अलग-अलग राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई लेबर यूनियनें।

(ii) कई बार आंदोलन ही राजनीतिक दलों को जन्म दे देते हैं। अगर आंदोलन के उद्देश्य अधिक खिंच जाए तो कई बार यह राजनीतिक दल का भी रूप ले लेते हैं। उदाहरण के तौर पर DMK तथा AIADMK की जड़ें भी आंदोलनों से ही निकली हैं।

(iii) कई बार राजनीतिक दल तथा हित समूह एक-दूसरे के विरुद्ध आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। तब उनमें प्रत्यक्ष रिश्ते नहीं होते बल्कि उनमें बातचीत होती है। उनके विचार एक-दूसरे के विपरीत होते हैं।

प्रश्न 37.
दबाव समूहों की गतिविधियाँ लोकतांत्रिक सरकार के कामकाज में कैसे उपयोगी होती है?
अथवा
क्या दबाव समूह तथा आंदोलनों का प्रभाव लोकतंत्र के लिए अच्छा है? टिप्पणी करें।
उत्तर:
दबाव समूह कुछ लोगों का समूह है जो अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं। समान हितों, पेशों से संबंधित लोग इस प्रकार के समूह का निर्माण करते हैं। शुरुआत में तो यह ही लगता है कि दबाब समूह लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है क्योंकि ये किसी विशेष समूह के हितों को प्राप्त करने के लिए सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं। लोकतंत्र में सरकार को समाज के सभी समूहों में हितों का ध्यान रखना पड़ता है।

इनके विरुद्ध एक और कारक यह जाता है कि यह समूह सत्ता को हथियाने का प्रयास तो करते हैं परंतु बिना किसी उत्तरदायित्व के लिए। राजनीतिक दलों की तरह यह समूह चुनाव में जनता के सामने आने को बाध्य नहीं होते तथा ये किसी के प्रति ज़िम्मेदार भी नहीं होते। ये जनता में किसी प्रकार का समर्थन तथा धन भी नहीं लेते हैं। कई बार तो ये अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के लिए, अपनी संपदा के बल पर जनता के का प्रयास करते हैं।

परंतु दूसरी तरफ दबाव समूह तथा आंदोलन लोकतंत्र के लिए आवश्यक भी होते हैं। अगर देश में सभी को समान अवसर प्राप्त नहीं हो रहे हैं तो यह समाज के लिए ठीक नहीं है। साधारणतया सरकार अमीर तथा प्रभावशाली लोगों के दबाव में आ जाती है। आंदोलन तथा जल-कल्याण समूह इस समय इस नियंत्रण को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं तथा यह समय-समय पर सरकार को आम जनता की आवश्यकताओं के बारे में बता सकते हैं।

यहाँ तक कि अलग-अलग हित समूह भी इसमें महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अगर एक हित समूह अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सरकार पर दबाव डालता है तो दूसरा समूह इसके विरुद्ध जा सकता है तथा पहले समूह के रास्ते में रोड़े अटका सकता है। यहाँ से ही सरकार को जनता की आवश्यकताओं का पता चल जाता है तथा वह अलग-अलग हितों वाले समूहों के हितों का ध्यान रखती है।

प्रश्न 38.
दबाव समूह और राजनीतिक दल में क्या अंतर है?
अथवा
राजनीतिक दल तथा दवाब समूह में क्या अंतर है?
उत्तर:
एक दबाव समूह संगठित अथवा असंगठित समूह हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं तथा अपने हितों को बढ़ावा देते हैं। इनके कुछ उद्देश्य होते हैं तथा यह अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सरकार पर दबाव डालते हैं। साधारणतया इन समूहों के सदस्यों के कुछ सामान्य हित होते हैं।

यह अपने प्रभाव के कारण सत्ता को अपने नियंत्रण में रखते हैं। परंतु राजनीतिक दल एक संगठित संस्था है जो प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़कर तथा विचारधारा को जीतकर देश की राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। एक राजनीतिक दल के सदस्यों की विचारधारा तथा उद्देश्य एक जैसे ही होते हैं।

दबाव समूह तथा राजनीतिक दल में महत्त्वपूर्ण अंतर यह है कि दबाव समूह कभी भी प्रत्यक्ष रूप से चुनाव नहीं लड़ता बल्कि यह पिछले दरवाज़े से सत्ता को नियंत्रण में रखते हैं। परंतु, दूसरी तरफ राजनीतिक दल प्रत्यक्ष रूप से चुनाव लड़कर सत्ता को अपने हाथों में लेने का प्रयास करते हैं। दबाव समूह संगठित भी हो सकते हैं तथा असंगठित भी परंतु राजनीतिक दल हमेशा ही संगठित समूह होते हैं।

प्रश्न 39.
लोकतंत्र का क्या अर्थ है?
उत्तर:
लोकतंत्र सरकार का ही एक प्रकार है जिसमें जनता शासन चलता है। इसमें जनता के प्रतिनिधि साधारण जनता में बालिगों के वोट देने के अधिकार से चुने जाते हैं तथा यह प्रतिनिधि ही जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं तथा उनकी तरफ से बोलते हैं। यह कई संकल्पों जैसे कि समानता, स्वतंत्रा तथा भाईचारे में विश्वास रखता है तथा यह ही इसमें कार्यवाहक आधार हैं। इसके पीछे मूल विचार यह है कि समाज में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता होनी चाहिए।

इसमें हरेक व्यक्ति को संविधान के अनुसार बोलने तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। समाज तथा व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए इसमें कार्यवाहक आधार हैं। इसके पीछे मूल विचार यह है कि समाज में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता होनी चाहिए। इसमें हरेक व्यक्ति को संविधान के अनुसार बोलने तथा संगठन बनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। समाज तथा व्यक्ति के संपूर्ण विकास के लिए इसमें पूर्ण क्षमता होनी चाहिए।

प्रश्न 40.
राजनीतिक दल की कोई चार विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  1. प्रत्येक राजनीतिक दल की भिन्न-भिन्न नीतियां होती हैं।
  2. प्रत्येक दल के सदस्य अच्छी तरह संगठित होते हैं और वह दल भी अच्छी तरह से संगठित व सुदृढ़ होता
  3. इसके सभी सदस्य एक ही नीति पर विश्वास करते हैं।
  4. इनके सदस्यों का एक साझा कार्यक्रम होता है।
  5. प्रत्येक अच्छा राजनीतिक दल देश के हितों का ध्यान रखता है।

प्रश्न 41.
राजनीतिक दलों के कोई चार कार्य बताओ।
उत्तर:

  1. यह लोकमत बनाते हैं।
  2. यह राजनीतिक शिक्षा देते हैं।
  3. यह उम्मीदवार चुनने में सहायता करते हैं।
  4. यह लोगों की कठिनाइयों को सब तक पहुंचाते हैं।
  5. यह राष्ट्रीय हितों को महत्त्व देते हैं।

प्रश्न 42.
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय संविधान की प्रस्तावना पर संक्षिप्त टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान की प्रस्तावना का संक्षिप्त वर्णन है-
हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुल्क सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
73वें संवैधानिक संशोधन में पंचायती राज्य संबंधी विशेषताओं का वर्णन करो।
(Explain the characteristics of Panchayati Raj according to 73rd constitutional amendment.)
अथवा
नई पंचायती राज प्रणाली की विशेषताओं की व्याख्या करें।
अथवा
पंचायती राज के आदर्शों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दिसंबर, 1992 में 73वां संवैधानिक संशोधन संसद् में पास हुआ तथा अप्रैल, 1993 में राष्ट्रपति ने इस संशोधन को मान्यता दे दी। इस संवैधानिक संशोधन द्वारा जो पंचायती राज्य प्रणाली स्थापित की गयी, उसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(1) 73वीं संवैधानिक संशोधन से पहले स्थानीय स्तर पर स्वः शासन के संबंध में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं थी। इस संशोधन से संविधान में नयी अनुसूची तथा नया भाग जोड़ा गया। इस अनुसूची तथा भाग में संपूर्ण व्यवस्थाएं पंचायती राज्य प्रणाली से संबंधित हैं कि नयी व्यवस्था में किस तरह की व्यवस्थाएं हैं।

(2) इस संशोधन से संविधान में ग्राम सभा की परिभाषा दी गई है जिसके अनुसार पंचायत के क्षेत्र में आने वाले गांव या गांव के जिन लोगों का नाम वोटर सूची में दर्ज है, वह सभी लोग ग्राम सभा के सदस्य होंगे। राज्य विधानमंडल कानून द्वारा ग्राम सभा की व्यवस्था कर सकता है तथा उसको कुछ कार्य सौंप सकता है। इस तरह ग्राम सभा की स्थापना राज्य विधानमंडल की तरफ से पास किए गए कानून के द्वारा होगी तथा वह ही उसके कार्य भी निश्चित करेगा।

(3) ग्राम सभा की परिभाषा के साथ ही पंचायत की परिभाषा दी गयी है तथा कहा गया कि पंचायत स्वैः-शासन पर आधारित ऐसी संस्था है जिसकी स्थापना ग्रामीण क्षेत्र में राज्य सरकार द्वारा की जाती है।

(4) इस संवैधानिक संशोधन द्वारा संविधान में यह व्यवस्था की गई है कि अब ग्रामीण क्षेत्र में स्वै-शासन की तीन स्तरीय पंचायती राज्य प्रणाली की स्थापना की जाएगी। सबसे निम्न स्तर गांव पर पंचायत, बीच के स्तर ब्लॉक पर ब्लॉक समिति तथा जिला स्तर पर जिला परिषद् होगी परंतु राज्य सरकार इनको कोई और नाम भी दे सकती है।

(5) इस संवैधानिक संशोधन में यह कहा गया है कि नयी प्रणाली के अंतर्गत संपूर्ण जिले को पंचायती स्तर पर चुनाव क्षेत्रों में बाँटा जाएगा तथा पंचायतों, ब्लॉक समिति तथा जिला परिषद् के सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से होगा अर्थात् वह प्रत्यक्ष तौर पर लोगों द्वारा बालिग वोट अधिकार के आधार पर चुने जाएंगे।

(6) इस संशोधन के अनुसार पंचायत के अलग-अलग स्तरों पर चुनाव के लिए, वोटरों की संख्या तथा सूची तैयार करवाने की जिम्मेवारी राज्य चुनाव आयोग की होगी। इस आयोग में राज्य चुनाव कमिश्नर को राज्य का राज्यपाल नियुक्त करेगा। उसका कार्यकाल, सेवा की शर्ते इत्यादि भी राज्यपाल की तरफ से बनाए गए नियमों के अनुसार निश्चित किए जाएंगे। राज्य चुनाव कमिश्नर को उस तरीके से हटाया जा सकता है जैसे उच्च न्यायालय के जज को हटाया जा सकता है।

(7) गाँव की पंचायत के प्रधान के बारे में 73वीं शोध में यह व्यवस्था की गई है कि गाँव की पंचायत के प्रधान का चुनाव सीधे तौर पर लोगों द्वारा किया जाएगा।

(8) गाँव की पंचायत के प्रधान का चुनाव करने के साथ-साथ यह भी व्यवस्था की गई है कि पंचायत के प्रधान को उसके कार्यकाल खत्म होने से पहले भी हटाया जा सकता है और उसको हटाने का अधिकार ग्राम सभा को दिया गया है। ग्राम सभा सरपंच को तब ही उसके पद से हटा सकती है यदि उस क्षेत्र की पंचायत इस बात की सिफारिश करे। इस प्रकार की सिफ़ारिश के लिए यह ज़रूरी है कि उस सिफ़ारिश के पीछे पंचायत के सभी सदस्यों का बहुमत और मौजूदगी अनिवार्य है।

इसके लिए एक विशेष बैठक बुलाई जाएगी और इस बैठक में ग्राम सभा के 50% सदस्य होने ज़रूरी हैं। यदि इस बैठक में ग्राम सभा उस सिफ़ारिश को मौजूद सदस्यों के बहुमत के साथ पास कर दे तो सरपंच या प्रधान को हटाया जा सकता है।

(9) इसी तरह पंचायती समिति या ब्लॉक समिति और जिला परिषद् के सदस्य भी लोगों द्वारा चुने जाएंगे और इनके प्रधान इनके सदस्यों द्वारा और उनके बीच में से ही चुने जाएंगे। पंचायत की तरह इनके प्रधानों को भी हटाया जा सकता है। प्रधान को दो-तिहाई बहुमत से हटाया जा सकता है।

(10) इन तीनों स्तरों पर स्थान भी आरक्षित रखे गए हैं।

  • निम्न जातियों एवं कबीलों में प्रत्येक पंचायत में स्थान आरक्षित रखे गए हैं। आरक्षित करने की गिनती उनके उस क्षेत्र की जनसंख्या के अनुपात में होगी।
  • इन आरक्षित स्थानों में एक-तिहाई सीटें औरतों के लिए आरक्षित रखी जाएंगी।
  • पंचायतों, ब्लॉक समितियों और जिला परिषदों में भी स्त्रियों के लिए एक-तिहाई स्थान आरक्षित रखे जाएंगे। इसके साथ-साथ इन संस्थाओं के प्रधानों के लिए भी स्थान औरतों के लिए आर रखे जाएंगे।

(11) इस संशोधन के अनुसार इन सभी संस्थाओं का कार्यकाल 5 सालों के लिए निश्चित कर दिया गया। किसी भी संस्था का कार्यकाल 5 साल से ज्यादा नहीं हो सकता। यदि राज्य सरकार को किसी पंचायत के अव्यवस्थित प्रबंधन के बारे में पता चले तो वह उसको 5 साल से पहले ही भंग कर सकती है परंतु 6 महीने के अंदर उसका दोबारा चुनाव किया जाना जरूरी है। यदि कोई पंचायत 5 साल से पहले भंग हो तो नई चुनी गई पंचायत बाकी रहता कार्यकाल पूरा करेगी।

(12) यदि कोई व्यक्ति राज्य के कानून अधीन राज्य विधान सभा का चुनाव नहीं लड़ सकता तो वह पंचायत का चुनाव भी नहीं लड़ सकता। परंतु यहाँ आयु में फ़र्क है। राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ने हेतु 25 साल की उम्र होना आवश्यक है परंतु पंचायत के चुनाव के लिए 21 वर्ष की आयु निश्चित की गई है।

(13) राज्य विधानमंडल के कानून के अधीन पंचायत को कुछ अधिकार एवं ज़िम्मेदारियाँ दी जाएंगी। पंचायत को आर्थिक विकास एवं सामाजिक न्याय हेतु योजनाएं तैयार करने और लागू करने के अधिकार दिए गए हैं।

(14) इसके साथ-साथ राज्य विधानमंडल कानून पास करके पंचायत को कुछ छोटे-छोटे टैक्स लगाने की शक्ति भी दे सकता है ताकि वह अपनी आमदनी में भी वृद्धि कर सकें। इसके साथ राज्य सरकार अपने द्वारा लगाए टैक्सों अथवा शल्कों में से कुछ हिस्सा पंचायतों को भी देगी और साथ ही उनको गांवों के विकास के लिए सहायता के रूप में ग्रांट देने की व्यवस्था भी करेगी।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि 73वीं संवैधानिक शोध द्वारा पंचायती राज के लिए कई महत्त्वपूर्ण व्यवस्थाएं की गई हैं जिसके साथ पंचायती राज्य की महत्ता काफ़ी बढ़ गई है। नई व्यवस्था को प्रभावशाली बनाने हेतु कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं और अब पंचायती राज्य प्रणाली काफ़ी प्रभावशाली बन गई है।

प्रश्न 2.
73वीं संवैधानिक संशोधन के अनुसार नई पंचायती राज प्रणाली की विशेषताएं लिखो।
अथवा
पंचायती राज व्यवस्था के अर्थ और संरचना की व्याख्या करें।
अथवा
पंचायती राज व्यवस्था पर निबंध लिखें।
अथवा
पंचायती राज संस्थाओं के गठन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
भारत में पंचायती राज संस्थाओं के विकास तथा गठन की व्याख्या कीजिए।
अथवा
जनजातीय क्षेत्रों में पंचायती राज व्यवस्था पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
भारत में नई पंचायती राज व्यवस्था लाग की गई। परे देश में पंचायती राज संस्थाओं में एकरूपता लाने के लिए संसद् में संवैधानिक संशोधन पेश किया गया। इसे 22 दिसंबर, 1992 को लोकसभा तथा 23 दिसंबर, 1992 को राज्यसभा ने पास कर दिया। 23 अप्रैल, 1993 को राष्ट्रपति ने इसे अपनी स्वीकृति प्रदान की। इस नई पंचायती राज प्रणाली की विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित है-

(i) तीन स्तरीय संरचना (Three tier Structure)-73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा पूरे देश के लिए पंचायतों की तीन स्तरीय संरचना का प्रावधान किया गया। यह तीन स्तर निम्नलिखित हैं-

  • ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर पर)
  • पंचायत समिति (ब्लॉक स्तर पर)
  • जिला परिषद् (जिला स्तर पर)।

(ii) बनावट (Composition)–तीनों स्तर की पंचायती राज संस्थाओं की सदस्य संख्या राज्य के विधानमंडल द्वारा तय की जाएगी। ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत में एक प्रधान, एक उप-प्रधान होता है। पंचों की संख्या राज्य सरकार पर निर्भर करती है। हर राज्य में यह संख्या अलग-अलग है।

(iii) ग्राम सभा (Gram Sabha)-पंचायत के अंतर्गत जितने भी गांव आते हैं उन गांवों के लोगों के नाम मतदाता सूची में होते हैं। वे सब सामूहिक रूप से ग्राम सभा का निर्माण करते हैं। ग्राम सभा की स्थापना के लिए विभिन्न राज्यों में अलग-अलग जनसंख्या निर्धारित की है।

(iv) सदस्यों की योग्यताएं (Qualifications of Members)-पंचायती राज संस्थाओं का चुनाव लड़ने के लिए न्यूनतम आयु 21 वर्ष आवश्यक है। इसके अलावा चुनाव लड़ने के इच्छुक लोग विधानसभा का चुनाव लड़ने के योग्य हों।

(v) प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Election) ग्राम पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद् के सदस्यों का चुनाव अपने-अपने क्षेत्र के मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष रूप से किया जाता है। मतदाता बनने के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष है।

(vi) अध्यक्षों तथा उपाध्यक्षों का चुनाव (Election of Chairpersons and Vice Chairpersons)-714 पंचायत के प्रधान तथा उप प्रधान का चुनाव लोगों के द्वारा पंचों के साथ ही प्रत्यक्ष मतदान द्वारा किया जाता है। पंचायत समिति तथा जिला परिषद् के अध्यक्षों तथा उपाध्यक्षों का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से किया जाता है अर्थात् पंचायत समिति तथा जिला परिषद् के सदस्य अपने-अपने अध्यक्षों तथा उपाध्यक्षों का चुनाव करते हैं।

(vii) कार्यकाल (Tenure) प्रत्येक स्तर की पंचायती राज संस्था का कार्यकाल 5 वर्ष है। यह कार्यकाल पंचायतों की प्रथम बैठक की तिथि से प्रारम्भ होता है।

(viii) कार्य तथा शक्तियां (Functions and Powers)-राज्य विधानमंडल पंचायतों को निम्नलिखित विषयों से संबंधित कार्य सौंप सकता है

(a) 1 1वीं अनुसूची में अंकित विषयों से संबंधित कार्य
(b) सामाजिक न्याय तथा आर्थिक विकास से संबंधित योजनाओं का निर्माण तथा कार्यान्वयन।

(ix) आरक्षण (Reservation) तीनों स्तर की पंचायती राज संस्थाओं में अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान है। प्रत्येक स्तर की पंचायत में अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित किए जाते हैं।

कुल स्थानों में से 1/3 स्थान महिलाओं के लिए आरक्षित हैं अर्थात् हरेक श्रेणी अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा सामान्य श्रेणी में से 1/3 स्थानों पर महिलाएं ही चुनाव लड़ सकती हैं। आरक्षित स्थानों के चुनाव क्षेत्रों में राज्य द्वारा समय-समय पर परिवर्तन किया जाता है। आरक्षण संबंधी नियम अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष पद के लिए भी लागू होते हैं।

प्रश्न 3.
ग्राम सभा के बारे में आप क्या जानते हैं? वर्णन करो।
उत्तर:
नयी पंचायत प्रणाली में सबसे पहले ग्राम सभा आती है। ग्राम सभा की सदस्यता प्राप्त करने के लिए कम से-कम आयु. 18 वर्ष है। ग्राम पंचायत के क्षेत्राधिकार में 18 वर्ष या इससे अधिक आयु वाले सभी सदस्यों का नाम मतदाता सूची में अंकित कर दिया जाता है। परंतु उन व्यक्तियों का नाम मतदाता सूची में अंकित नहीं किया जाता जिन्हें पागल या दिवालिया घोषित किया हो। विभिन्न राज्यों ने अपने-अपने कानून बना कर ग्राम सभा की सदस्य संख्या निर्धारित की है। कुछ राज्यों में ग्राम सभा की सदस्य संख्या अग्रलिखित है-

  • हिमाचल प्रदेश-1500-4500
  • हरियाणा-500-4500
  • पंजाब-200-4500.

अधिवेशन (Session)-ग्राम सभा का अधिवेशन एक वर्ष में कम-से-कम दो बार बुलाया जाना जरूरी है। अधिवेशन कब बुलाए जाएं इस संबंध में अपनी-अपनी व्यवस्था है। जैसे हिमाचल तथा राजस्थान में ग्राम सभा के अधिवेशन गर्मियों तथा सर्दियों में बुलाए जाते हैं। इनके अलावा ग्राम सभा के 1/5 सदस्यों की मांग पर विशेष अधिवेशन भी बुलाया जा सकता है। अधिवेशन में गणपूर्ति सदस्य की संख्या का 1/10 भाग है। इसलिए अधिवेशन में ग्राम सभा के 1/10 सदस्यों का होना ज़रूरी है। अधिवेशन की अध्यक्षता ग्राम पंचायत के प्रधान द्वारा की जाती है। इसका अध्यक्ष सरपंच होता है।

ग्राम सभा के कार्य-इसके कार्य तथा शक्तियां निम्नलिखित हैं-

  • ग्रामसभा अपनी आमदनी के अनुसार अपना साल का बजट पास करती है।
  • पंचायत द्वारा किए गए खर्चों की एक कापी ग्राम सभा को भी दी जाती है ताकि इसके अधिवेशन में इस रिर्पोट पर चर्चा हो सके।
  • ग्राम पंचायत कई प्रकार के कर लगाती है। पर उनकी मंजूरी ग्राम सभा द्वारा दी जाती है।
  • ग्राम सभा गांव के प्रधान, ग्राम पंचायत के सदस्यों का चुनाव करती है।
  • ग्राम सभा ग्राम प्रधान को हटा भी सकती है।

इनके अलावा अपने क्षेत्र के विकास की योजनाएं बनाना, लोक कल्याण कार्यों के लिए स्वैच्छिक धन इकट्ठा करना इत्यादि ग्राम सभा के और प्रमुख कार्य हैं।

प्रश्न 4.
ग्राम पंचायत के बारे में आप क्या जानते हैं?
अथवा
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत पंचायतों को किन-किन शक्तियों से पुष्ट किया गया है?
अथवा
पंचायत क्या है? पंचायतों को कौन-कौन सी शक्तियां प्रदान की गई हैं?
उत्तर:
ग्राम पंचायत पंचायती राज संस्थाओं के तीन स्तरों में से सबसे निम्न स्तर पर है-
(i) गठन (Composition)-ग्राम पंचायत में एक प्रधान, एक उपप्रधान तथा 5-13 सदस्य होते हैं जिन्हें पंच कहा जाता है। अंतः प्रधान व उपप्रधान के साथ ग्राम पंचायत की कुल संख्या 7-15 तक होती है। सदस्यों की संख्या क्षेत्र की जनसंख्या के अनुसार तय की जाती है।

जनसंख्यासदस्यसंख्या
150 तक5
1500-2500 तक7
2500-3500 तक9
3500-4500 तक11
4500-से अधिक13

(ii) प्रत्यक्ष चुनाव (Direct Election)-प्रधान, उपप्रधान तथा अन्य सदस्यों का चुनाव ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा किया जाता है। पंचायत के सभी सदस्य प्रत्यक्ष चुनाव के द्वारा 5 वर्ष के लिए चुने जाते हैं।

(iii) आरक्षण (Reservation) ग्राम पंचायत में अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या में. अनुपात के अनुसार स्थान आरक्षित होते हैं। इसके अलावा 1/3 स्थान महिलाओं के लिए भी आरक्षित होते हैं।

(iv) कार्यकाल (Tenure)-ग्राम पंचायत का कार्यकाल 73वें संशोधन के अनुसार 5 वर्ष निश्चित कर दिया यदि सरकार को लगता है कि कोई ग्राम पंचायत ठीक तरीके से काम नहीं कर रही है तो सरकार उसे 5 वर्ष से पहले भी भंग कर सकती है पर 6 महीने के अंदर चुनाव करवाए जाने ज़रूरी हैं।

(v) योग्यताएं (Qualifications)-ग्राम पंचायत का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताओं का होना ज़रूरी है-

  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  • वह 21 वर्ष से ज्यादा की आयु का होना चाहिए।
  • वह पागल या दिवालिया घोषित नहीं होना चाहिए।
  • वह किसी सरकारी पद पर नौकरी न करता हो।

हरेक ग्राम पंचायत का एक सरपंच होता है। जिसका चुनाव प्रत्यक्ष चुनाव के द्वारा ग्राम सभा के सदस्यों द्वारा होता है। सरपंच ग्राम पंचायतों की बैठकों की अध्यक्षता करता है तथा गांव के विकास कार्यों को देखता है। उसकी अनुपस्थिति में ग्राम पंचायत की बैठक की अध्यक्षता उप सरपंच करता है जिसका चुनाव ग्राम पंचायत के सदस्य अपने बीच में से करते हैं।

(vi) बैठकें-ग्राम पंचायत की एक महीने में कम-से-कम दो बैठकें होनी ज़रूरी हैं। किसी आवश्यक काम के लिए पंचायत के सदस्य बहुमत के साथ बैठक जल्दी भी बुला सकते हैं।

(vii) ग्राम पंचायत के कार्य (Functions of Gram Panchayat)-ग्राम पंचायत के निम्नलिखित कार्य हैं-

  • यह क्षेत्र में विकास का बजट बनाती है तथा उसे ग्राम सभा के आगे पेश करती है।
  • डेयरी उद्योग तथा मुर्गीपालन उद्योग को प्रोत्साहन देना।
  • सड़क के दोनों ओर वृक्ष लगवाने का काम करना।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन देना।
  • पीने के पानी के लिए कँओं या सरकारी पानी का प्रबन्ध करना।
  • पुलों तथा पुलियों का निर्माण तथा मुरम्मत के कार्य करना।
  • श्मशान भूमि तथा कब्रिस्तान की देखभाल करना।
  • कुएँ, तालाब इत्यादि बनवाना तथा उनकी रक्षा करना।
  • मेलों तथा मंडियों का आयोजन करना।
  • गांव में सड़कों, नालियों को बनवाने का प्रबंध करना।
  • महामारियों के विरुद्ध उपचारात्मक प्रबंध करने।
  • गांव में अस्पताल, डिस्पैंसरी इत्यादि का प्रबंध करना।
  • पुस्तकालयों तथा वाचनालयों की स्थापना करना तथा उनकी देखभाल करना।
  • प्राथमिक शिक्षा के केंद्रों, स्कूलों इत्यादि का प्रबंध करना।
  • किसी सरकारी कर्मचारी, जो ठीक काम न करता हो, उसकी शिकायत जिलाधीश को पहुँचाना।
  • अनुसूचित जातियों के कल्याण के कार्य करने।

प्रश्न 5.
पंचायत समिति के बारे में आप क्या जानते हैं? वर्णन करें।
अथवा
पंचायत समिति के गठन, कार्य तथा चुनाव की विवेचना करें।
उत्तर:
पंचायती राज व्यवस्था में दूसरे स्तर या बीच के स्तर की इकाई है। पंचायत समिति एक ब्लॉक में जितनी पंचायतें आती हैं उन सब के सरपंच इस के मैंबर होते हैं।
(i) गठन (Composition)-नयी पंचायती राज व्यवस्था के अंतर्गत खंड स्तर पर पंचायत समिति की स्थापना की गई है। पंचायत समिति में निम्नलिखित सदस्य होते हैं-

  • पंचायत समिति के प्रत्यक्ष रूप से चुने हुए सदस्य।
  • लोकसभा तथा राज्य विधानसभा के सदस्य जो उस क्षेत्र से संबंधित हों।
  • पंचायत समिति क्षेत्र से ग्राम पंचायतों के कुल प्रधानों में से 1/5 भाग।
  • राज्य सभा का सदस्य।

(ii) कार्यकाल (Tenure) ग्राम पंचायत की तरह पंचायत समिति का कार्यकाल भी 5 वर्ष होता है पर अगर सरकार चाहे तो उसे पहले भी भंग कर सकती है।

(iii) आरक्षण (Reservation)-पंचायत समिति में अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के लिए पंचायत समिति में स्थान आरक्षित होते हैं। यह आरक्षण उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात के मुताबिक होता है। इसके अलावा इसमें महिलाओं के लिए आरक्षण है। यह आरक्षण अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों को मिला कर 1/3 होता है।

(iv) अध्यक्ष व उपाध्यक्ष (Election of Chairperson and Vice Chairperson)-शपथ ग्रहण के पश्चात् पंचायत समिति के सदस्य को अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष चुनते हैं। इस प्रकार अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का अप्रत्यक्ष का चुनाव होता है।

(v) समिति का सदस्य बनने के लिए योग्यता (Qualifications)-पंचायत समिति का सदस्य बनने के लिए निम्नलिखित योग्यताएं होनी चाहिएं

  • वह भारत का नागरिक होना चाहिए।
  • वह दिवालिया या पागल घोषित न हुआ हो।
  • उसकी उम्र 21 वर्ष से ऊपर होनी चाहिए।
  • वह किसी सरकारी पद या नौकरी पर न हो।

(vi) पंचायत समिति के कार्य (Functions of Panchayat Samiti)-पंचायत समिति के क्षेत्र में विकास के जों कार्य पंचायत समिति द्वारा किए जाते हैं उनका वर्णन निम्नलिखित है

  • अपने क्षेत्र में कुटीर उद्योगों, कारीगरी के विकास इत्यादि कार्यों को प्रोत्साहन देना ताकि औद्योगिक क्षेत्र के रूप में विकास हो सके।
  • अपने क्षेत्र की विकास योजनाओं को लागू करना तथा रोजगार के अवसर पैदा करने की कोशिश करनी।
  • अपने क्षेत्र में आती पंचायतों के कार्यों का निरीक्षण करना तथा उनके बजट तथा खर्च पर निगरानी रखना।
  • स्वास्थ्य केंद्रों की स्थापना, प्रसूति केंद्रों की स्थापना के प्रबंध करने।
  • पीने के पानी तथा सड़कों को बनवाने के प्रयास करने।
  • मेले तथा मंडियों को लगवाने का कार्य करना।

(vii) बैठकें (Meetings)-पंचायत समिति की साल में कम-से-कम दो बैठकें होनी चाहिएं। दो बैठकों के बीच 6 महीने से ज्यादा समय नहीं होना चाहिए। पर ज़रूरत पड़ने पर सदस्य बहुमत के साथ पहले भी बैठक बुला सकते हैं।

प्रश्न 6.
जिला परिषद् के बारे में आप क्या जानते हैं? वर्णन करो।
उत्तर:
जिला स्तर की पंचायती राज संस्था को जिला परिषद् कहते हैं। प्रत्येक जिले में एक जिला परिषद संस्था होती है। इसमें नगरपालिका क्षेत्रों को छोड़ कर जिले के सभी क्षेत्र सम्मिलित होते हैं।
(i) ज़िला परिषद् का गठन (Composition of Zila Parishad)-प्रत्येक जिला परिषद् के निम्नलिखित सदस्य होते हैं

  • प्रत्यक्ष रूप में वयस्क आधार पर जिला परिषद् के लिए निर्वाचित सदस्य।
  • जिले से संबंधित विधायक तथा लोकसभा के सदस्य।
  • राज्य सभा के ऐसे सदस्य जिनका नाम जिले में मतदाता के रूप में पंजीकत हो।
  • जिले की सभी पंचायत समितियों के अध्यक्ष।

यदि जिला परिषद् के सदस्यों में विधायकों, सांसदों तथा समिति अध्यक्षों की संख्या चुने हुए सदस्यों से अधिक हो जाए तो समिति अध्यक्षों में से केवल 1/5 को बारी-बारी निर्धारित अवधि के लिए चुना जाएगा।

(ii) आरक्षण (Reservation) ग्राम पंचायत तथा पंचायत समिति की तरह जिला परिषद् में भी अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित होते हैं। यह स्थान उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुसार होता है। महिलाओं के लिए भी 1/3 स्थान आरक्षित होते हैं।

(iii) बैठकें (Meetings)-पंचायत समिति की तरह जिला परिषद् की एक वर्ष में कम-से-कम चार बैठकें जरूरी हैं। बैठकों के मध्य तीन महीनों से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। अध्यक्ष बैठकों की अध्यक्षत है तथा उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष बैठकों की अध्यक्षता करता है। जिला परिषद् के 1/3 सदस्यों की मांग पर विशेष बैठक भी बुलाई जा सकती है।

(iv) कार्यकाल (Tenure)-जिला परिषद् का कार्यकाल 73वें संशोधन के अनुसार 5 साल का होता है पर अगर सरकार चाहे तो उसे अयोग्यता या भ्रष्टाचार के आधार पर समय से पहले भी भंग किया जा सकता है।

इसके अलावा जिला परिषद् अपने क्षेत्र में कार्य करने के लिए विशेष समितियां गठित करती है। उदाहरण के तौर पर वित्त के लिए समिति, कार्य समिति, शिक्षा समिति, कल्याण समिति इत्यादि। जिला परिषद् के निर्णयों को लागू करने के लिए तथा रोज़ाना के कार्य करने के लिए एक सचिव. की नियुक्ति होती है तथा उसे सरकार द्वारा वेतन भी मिलता है।

(v) जिला परिषद् के कार्य-जिला परिषद् अपने क्षेत्र में निम्नलिखित कार्य करता है-

  • इसका मुख्य काम अपने क्षेत्र में आती पंचायत समितियों के कार्यों का निरीक्षण करना है। इसके साथ-साथ यह सभी पंचायत समितियों के कार्यों में समन्वय पैदा करने की कोशिश करती है।
  • यह पंचायत समितियों के लिए विकास योजनाएं बनाती है तथा उनको कार्यान्वित करने के प्रयास करती है।
  • यह पंचायत समितियों के बजट का निरीक्षण तथा उनको स्वीकृति प्रदान करती है।
  • यह विकास संबंधी योजनाओं के लिए सरकार को सुझाव देती है।
  • सरकार अपनी नीतियों के अमल के लिए जिला परिषद् को कार्य सौंपती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 7.
पंचायती राज का क्या महत्त्व है?
अथवा
पंचायती राज तथा सामाजिक रूपांतरण का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में पंचायती राज की शुरुआत 1959 में हुई थी। पर 73वें संवैधानिक संशोधन के साथ भारत के सभी राज्यों में एक प्रकार की प्रणाली स्थापित की गई। इसके बाद से पंचायती राज ने भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। इन कार्यों की वजह से ही ग्रामीण क्षेत्रों में काफ़ी सुधार हुए तथा पंचायती राज के महत्त्व को काफ़ी ज्यादा बढ़ा दिया। इस तरह पंचायती राज का महत्त्व निम्नलिखित है-
(i) जनता का शासन (Administration of People)-पंचायती राज व्यवस्था को हम जनता का शासन कह सकते हैं क्योंकि पंचायती राज के हरेक स्तर पर जनता का हाथ होता है। चुनावों के समय सब कुछ जनता के हाथ में होता है कि किसको चनना है तथा किसको नहीं चनना है।

चनावों के बाद जीते हए व्यक्तियों को जनता की समस्याओं को निपटाने के कार्य करने पड़ते हैं। पानी का प्रबंध, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा ऐसी बुनियादी सुविधाएं हैं जो पंचायती राज के हर स्तर को मुहैया करवानी ही पड़ती हैं। उस चुने हुए व्यक्ति को पता होता है कि अगर वह लोगों के लिए काम नहीं करेगा तो दोबारा जनता उसे नहीं चुनेगी। इस तरह उसे जनता से डर कर कार्य करने पड़ते हैं तथा हमेशा जनता का शासन चलता रहता है।

(ii) लोकतंत्र (Democracy)-पंचायती राज से लोकतंत्र को बल मिलता है। लोकतंत्र का मतलब है लोगों का राज तथा पंचायती राज बनाया भी इसीलिए गया था कि लोग अपने ऊपर स्वयं राज करें। इसमें जनता स्वयं अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। वह जब भी चाहे इन प्रतिनिधियों से मिल कर अपनी समस्याओं के बारे में बता सकते हैं। ग्राम स्तर पर ग्राम सभा होती है जिसमें ग्राम के सभी वयस्क सदस्य होते हैं।

इनकी वर्ष में दो बार बैठक ज़रूर होती है जिसमें पंचायत द्वारा किए कार्यों, उनकी योजनाओं, उनके बजट तथा खर्च इत्यादि की चर्चा होती है। इस तरह लोगों को यह पता चलता रहता है कि उनके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि क्या कर रहे हैं जो कि लोकतंत्र की पहली निशानी है।

(iii) लोगों को आत्म-निर्भर बनाना (To make the people Self-reliance)-पंचायती राज का एक और महत्त्व यह है कि इसका उद्देश्य गांवों को आत्म-निर्भर बनाना है। इसका कानून बनाते समय इस बात का ध्यान रखा गया कि पंचायती राज के हर स्तर को उनकी ज़रूरतों के मुताबिक अधिकार तथा कर लगाने की शक्तियां मिलें।

हर पंचायत को अपने गांव की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए तथा समस्याओं के समाधान के लिए पर्याप्त अधिकार होते हैं जिनकी मदद से वह अपनी समस्याओं का हल करते हैं। ग्राम पंचायत गांव के विकास के लिए कई प्रकार की योजनाएं बना कर उन्हें ग्राम सभा से पास करवाती है।

इन योजनाओं को पूरा करने के लिए अगर सरकार की तरफ से पैसा मिल जाए तो ठीक है नहीं तो उसे कई प्रकार के कर लगाने का अधिकार भी है ताकि उसे अपने विकास कार्य पूरे करने के लिए सरकार की तरफ न देखना पड़े। इस तरह ग्राम आत्म-निर्भर हो जाते हैं।

(iv) अधिकारों तथा कर्तव्यों का ज्ञान (Knowledge of Rights and Duties)-पंचायती राज व्यवस्था से लोगों को अपने गांव के प्रति कर्तव्यों तथा उनके अधिकारों के बारे में पता चलता है। मतदाता के रूप में तथा ग्रामसभा के सदस्य के रूप में एक व्यक्ति के क्या अधिकार होते हैं यह चुनाव के समय तथा ग्राम सभी की मीटिंग के समय उसे पता चल जाते हैं। इसके अलावा इन से उसे कर्तव्यों के बारे में भी पता चलता है।

अगर ग्रामसभा में ग्राम पंचायत गांव के विकास के लिए कोई कर लगाती है तो आजकल सभी आराम से वह कर दे देते हैं क्योंकि उन्हें पता होता है कि यह पैसा इकट्ठा हो कर गांव के विकास के ऊपर ही लगेगा।

(v) कृषि का विकास (Development of Agriculture)-पंचायती राज का एक और महत्त्व है कि इसने कृषि के विकास में काफ़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद् का एक महत्त्वपूर्ण कार्य यह है कि यह अपने क्षेत्र में कृषि के विकास तथा उत्पादन बढ़ाने के लिए कार्य करते हैं। इनके पास बहुत से सरकारी कर्मचारी होते हैं जिनका काम लोगों को नई तकनीक, नए बीजों तथा नई खाद के बारे में जानकारी देना है ताकि लोग इनको अपना कर उत्पादन में बढ़ोत्तरी कर सकें।

इसके अतिरिक्त यह पंचायती राज संस्थाएं अपने क्षेत्र में बीजों का, खादों का भी प्रबंध करती है ताकि इनकी कमी न हो। इसका फायदा यह ही है कि एक तो उत्पादन बढ़ने से देश खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो जाता है तथा इसके साथ-साथ लोगों की आर्थिक उन्नति भी होती है। इस तरह पंचायती राज संस्थाएं लोगों की आर्थिक उन्नति के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य करती हैं।

(vi) महिलाओं तथा निम्न जातियों को आगे आने की प्रेरणा (Motivation for Women and Lower ca to come forward) सदियों से हमारे देश में महिलाओं तथा निम्न जातियों को दबाया जाता रहा, जिस वजह से इनकी स्थिति हमेशा निम्न रही है। पंचायती राज से संबंधित कानून बनाते समय यह ध्यान रखा गया कि इनको भी आगे आने का मौका मिल सके। इनके लिए सभी संस्थाओं में आरक्षण रखे गए हैं।

अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए उस क्षेत्र में उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार आरक्षण रखा गया है। इसके अलावा महिलाओं की शासन में भागीदारी बढ़ाने के लिए उनके लिए हर जगह 1/3 स्थान आरक्षित रखे गए हैं। इस वजह से अब महिलाओं तथा निम्न जातियों की शासन में भागीदारी काफ़ी बढ़ गई तथा उनको आगे आने का मौका प्राप्त हो गया है।

प्रश्न 8.
विभिन्न कानूनों से समाज में क्या परिवर्तन आए हैं? उनका वर्णन करो।
उत्तर:
कानून भारतीय समाज में परिवर्तन के महत्त्वपूर्ण कारक रहे हैं। आजादी से पहले ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा को खत्म करने, विधवा पुनर्विवाह को आज्ञा प्रदान करने, बाल-विवाह पर रोक लगाने, हिंदू स्त्रियों में संपत्ति अधिकार के बारे में तथा विवाह संबंधी कई अधिनियम पास किए। आजादी के बाद विशेष तौर पर 1954 से 1956 के दौरान देश में बहुत से महत्त्वपूर्ण विधान बनाए गए।

इन सभी विधानों का भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव पड़ा। विभिन्न विधानों से भारतीय समाज में होने वाले प्रमुख परिवर्तनों तथा विधानों ने भारतीय समाज पर जो महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-
(i) महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन (Change in the Status of Women) विभिन्न कानूनों को बनाएं जाने से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ है। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से विधवा को अपने पति की संपत्ति का सीमित अधिकार दिया गया। इस अधिनियम द्वारा स्त्री पुरुष को संपत्ति का समान अधिकार प्रदान किया गया।

हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम द्वारा विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति दे दी गई। महिलाओं को पुत्र गोद लेने का अधिकार प्रदान किया गया। स्त्रियों व कन्याओं का अनैतिक व्यापार गैर-कानूनी घोषित किया गया। दहेज निरोधक कानून बनाए गए। महिलाओं के लिए पंचायती राज स्तर पर आरक्षण रखे गए। इन विधानों से भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन आया।

(ii) विवाह के स्वरूप में परिवर्तन (Change in form of Marriage) सदियों से भारतीय समाज में एक विवाह, बहुविवाह, बहुपत्नी तथा बहुपति विवाह प्रथाएं प्रचलित थीं। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत बहुविवाह को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। एक विवाह को कानूनी मान्यता तथा कोर्ट मैरिज को भी कानूनी मान्यता मिल गई।

(iii) निरर्थक रीतियों में कमी (Decline in Obsolete Conventions)-भारतीय समाज में सती प्रथा, दहेज प्रथा, बाल-विवाह तथा अस्पृश्यता आदि कई कुरीतियां प्रचलित रही हैं। सती प्रथा निषेध अधिनियम द्वारा सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। वर्तमान समय में सती प्रथा भारतीय समाज में खत्म हो चुकी है। दहेज निरोधक कानून 1961 तथा 1986 के अनुसार दहेज लेना तथा देना भी कानूनन जुर्म घोषित कर दिया गया है।

बाल विवाह भी खत्म कर दिया गया है तथा विवाह के लिए आय लड़कियों के लिए 18 वर्ष तथा लड़कों के लिए 21 वर्ष निर्धारित कर दी गई है। बाल विवाह को भी गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। अस्पृश्यता की समाप्ति के लिए अस्पृश्यता कानून 1955 तथा नागरिक संरक्षण अधिकार कानून 1976 बना दिए गए हैं।

(iv) अंतर्जातीय संबंधों में परिवर्तन (Decline in Inter Caste Relations)-सामाजिक विधानों द्वारा अंतर्जातीय संबंधों में परिवर्तन आए हैं। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 द्वारा अंतर्जातीय विवाह को कानूनी अनुमति मिल गई है। अंतर्जातीय विवाहों को सरकार द्वारा प्रोत्साहन दिया जा रहा है। अस्पृश्यता को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है। फलस्वरूप उच्च व निम्न जातियों में अंतःक्रिया बढ़ी है। अब इन दोनों में काफ़ी ज्यादा अंतः क्रिया हो रही है तथा यह मिल जुल कर कर रहे हैं।

(v) विवाह नियमों में परिवर्तन (Change in Rules of Marriage)-पारंपरिक रूप से हिंदू विवाह एक धार्मिक संस्कार रहा है। परंतु विभिन्न विधानों के निर्माण के बाद विवाह एक धार्मिक संस्कार न रह कर एक समझौता मात्र रह गया है। विवाह जन्म जन्मांतर का पवित्र बंधन माना जाता है।

मगर कानून द्वारा तलाक को स्वीकृति मिल गई है अर्थात् निश्चित कानूनी प्रक्रिया के द्वारा विवाह विच्छेद को अनुमति दे दी गई है। विवाह संबंधी अन्य नियमों में। परिवर्तन आए हैं। अंतर्जातीय विवाह को कानूनी अनुमति मिल गई है। विवाह की न्यूनतम आयु निर्धारित कर दी गई है। विवाह की अनिवार्यता समाप्त कर दी गई है।

(vi) बंधुआ मज़दूरी प्रथा अधिनियम 1976 के तहत किसी व्यक्ति को बंधुआ मजदूरी नहीं करवायी जा सकती। किसी को बंधुआ मजदूरी के लिए मजबूर करने वाले या इसके लिए कर्ज देने वाले को 3 साल की कैद तथा ₹ 2000 जुर्माना हो सकता है।

(vii) बाल मजदूरी रोकने के लिए भी अधिनियम बना है। 14 साल से कम उम्र के बच्चे से फैक्टरी या दुकान में काम करवाना अपराध माना गया है।

प्रश्न 9.
पंचायती राज में सुधार के लिए क्या किया जा सकता है?
उत्तर:
भारत में पंचायती राज प्रणाली 1959 में लागू हुई थी। इस प्रणाली का मुख्य उद्देश्य शक्तियों का विकेंद्रीकरण था। पर समय के साथ पंचायती राज प्रणाली कमज़ोर पड़ती गई तथा इसमें काफ़ी त्रुटियां आनी शुरू हो गईं। इन त्रुटियों को सरकार ने समझा तथा 1993 में संविधान में संशोधन करके 73वां संवैधानिक संशोधन पास किया गया।

इसमें पंचायती राज के हर पहलु को ध्यान में रखा गया था पर फिर भी आज के समय में इस व्यवस्था में काफ़ी त्रुटियां पायी जाती हैं। जो सपना प्रजातंत्र या लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण का देखा गया था वह पूरा नहीं हो पाया है। इसमें बहुत से सुधारों की आवश्यकता है तथा इनमें निम्नलिखित तरीकों से सुधार किया जा सकता है-
(i) इन में सुधार लाने के लिए सबसे पहले यह ज़रूरी है कि ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को अपने अधिकारों के साथ साथ कर्तव्यों की जानकारी भी होनी चाहिए। अगर ग्रामीण लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता होगी तो वह ग्राम सभा में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले सकेंगे तथा इसके साथ ही उनको अपने कर्तव्यों के बारे में भी पता चल जाएगा।

(ii) अगला ज़रूरी कदम यह है कि इन पंचायती राज के सभी स्तरों की संस्थाओं को पूर्ण स्वतंत्रता तथा स्वायत्तता देनी चाहिए ताकि यह पूण आजादी से अपने क्षेत्र के विकास के कार्य कर सकें। सरकार को इनके कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए ताकि वह अपने क्षेत्र के विकास के लिए बगैर किसी डर के कार्य कर सकें।

(iii) सरकार द्वारा इन संस्थाओं के कार्यों पर तथा इन संस्थाओं पर गैर-ज़रूरी नियंत्रण नहीं रखना चाहिए। ज्यादा नियंत्रण की सूरत में काम में कमी आ जाती है तथा काम भी ठीक तरीके से नहीं हो पाता है।

(iv) पंचायती संस्थाओं के सरकारी कर्मचारियों तथा इन संस्थाओं के सदस्यों को गैर-सरकारी या सरकारी संस्थाओं से प्रशिक्षण दिलाना चाहिए ताकि यह गांवों के विकास के लिए कार्य कर सकें तथा इस प्रशिक्षण का फायदा सीधे से गांव के लोगों को मिल सके तथा वह इसको अपनी भूमि पर प्रयोग कर सकें।

(v) पंचायतों में ब्लॉक समिति में तथा जिला परिषद् में कार्य करने वाले कर्मचारियों को अच्छी तनख्वाह मिलनी चाहिए ताकि वह पूरा दिल लगा कर अपने क्षेत्र में विकास के कार्य कर सकें।

(vi) पंचायती राज के तीनों स्तरों पंचायत, पंचायत समिति तथा जिला परिषद् के कार्यों में आपसी तालमेल होना चाहिए ताकि यह एक दूसरे से मिल जुल कर अपने क्षेत्र का विकास कर सकें।

(vii) ग्राम सभा को और अधिकार देकर अधिक शक्तिशाली बनाना चाहिए ताकि पंचायतों के कार्यों पर निगरानी रखी जा सके तथा इन में आम जनता की भागीदारी बढ़ायी जा सके।

(viii) इन संस्थाओं के लिए कर्मचारियों की भर्ती के समय सही उम्मीदवारों को ही भर्ती करना चाहिए ताकि वह गांवों की समस्याओं को समझ कर उनको हल करने की कोशिश कर सकें।

(ix) पंचायतों की जमीनों पर नाजायज कब्जों को छुड़वाने के लिए सरकार को विशेष प्रयास करने चाहिए ताकि इन ज़मीनों से होने वाली आमदनी को पंचायतें गांवों के विकास कार्यों पर लगा सकें।

(x) राज्य तथा केंद्र सरकार को इन संस्थाओं को ज्यादा से ज्यादा ग्रांट देनी चाहिए ताकि ये संस्थाएं अपने क्षेत्र में विकास कार्यों को तेज़ी से चला सकें।

प्रश्न 10.
संविधान ने राज्य के निर्देशक सिद्धांत जो सरकार को दिए हैं, उनका वर्णन करो।
अथवा
राज्य में नीति निर्देशक सिद्धांतों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
राजनीति के निर्देशक सिद्धांत संविधान के चौथे भाग अनुच्छेद 36 से 51 में अंकित हैं। आयरलैंड के संविधान से प्रेरणा पाकर तथा संविधान सभा के संवैधानिक परामर्शदाता सर बी० एन राव (Sir B.N. Rao) के सुझाव के बाद निर्देशक सिद्धांतों को संविधान में शामिल किया गया है। डॉ० बी० आर० अंबेदकर के अनुसार, “निर्देशक सिद्धांत देश में विशेष रूप से सामाजिक तथा आर्थिक प्रजातंत्र स्थापित करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।’ निर्देशक सिद्धांतों को निम्नलिखित श्रेणियों में बाँटा जा सकता हैं-

  • सामान्य सिद्धांत (General Principles)
  • समाजवादी सिद्धांत (Socialist Principles)
  • उदारवादी सिद्धांत (Liberal Principles)
  • गांधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)

इन सब श्रेणियों का वर्णन निम्नलिखित हैं-
(i) सामान्य सिद्धांत (General Principles)-सामान्य सिद्धांतों के अंदर कई ऐसे सिद्धांत हैं जिनमें राज्य का अर्थ तथा उसके कार्यों का जिक्र किया गया है। प्रमुख सिद्धांत हैं-“राज्य समस्त भारत में एक समान आचार संहिता लागू करेगा”-अनुच्छेद 44 “राज्य न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग करने के लिए कार्यवाही करेगा।” देश में स्थित ऐतिहासिक महत्त्व तथा कलात्मक रुचि के स्थानों या वस्तुओं को नष्ट होने या हटाए जाने को बचाना राज्य का कर्तव्य है।”

पर्यावरण की रक्षा तथा सुधार के लिए तथा देश में वनों तथा वन्य-जीवन की रक्षा के लिए राज्य प्रयास करेगा।” अनुच्छेद में लिखा है, राज्य के अंतर्गत भारत सरकार तथा संसद्, समस्त राज्य सरकारें तथा विधानमंडल तथा भारत सरकार की सारी शक्तियाँ आती हैं।”

(ii) समाजवादी सिद्धांत (Socialist Principles)-राज्य कुछ ऐसे कदम उठाए जिससे स्त्री पुरुष को समान कार्य के लिए समान वेतन मिले-अनुच्छेद 39 (d) “व्यक्तियों तथा क्षेत्रों में आय की असमानताएं कम हों।” इसके अतिरिक्त राज्य गर्भवती महिलाओं के लिए प्रसूति सहायता का प्रबंध करेगा। श्रमिकों, स्त्रियों, पुरुषों के स्वास्थ्य तथा कम उम्र के बच्चों का दुरुपयोग होने से रोकेगा।

(iii) उदारवादी सिद्धांत (Libral Exploitation) निर्देशक सिद्धांत में कुछ उदारवादी सिद्धांत हैं जैसे, “राज्य संविधान लागू होने के 10 वर्षों के अंदर 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा का प्रबंध करने की कोशिश करेगा।’-अनुच्छेद 45-अनुच्छेद 47 के अनुसार राज्य लोगों के भोजन तथा जीवन स्तर को ऊँचा उठाने तथा उनके स्वास्थ्य को सुधारने का प्रयत्न करेगा।”

(iv) गाँधीवादी सिद्धांत (Gandhian Principles)-कई ऐसे सिद्धांत हैं जोकि गांधीवादी विचारधारा पर आधारित हैं। उदाहरण के तौर पर अनुच्छेद 40 के अनुसार राज्य गांव में पंचायतें स्थापित करके तथा उन्हें ऐसी शक्तियां प्रदान करेगा, जिससे वे स्थानीय स्वशासन की इकाइयों के रूप में काम कर सके। राज्य समाज के कमज़ोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के शैक्षणिक तथा आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का प्रयल करेगा तथा उन्हें शोषण से बचाएगा।

(v) अंतर्राष्ट्रीय सिद्धांत (International Principles) अंतर्राष्ट्रीय निर्देशक सिद्धांतों में ऐसे सिद्धांत सम्मिलित हैं जिनका संबंध विश्व के अन्य देशों से है जैसे राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति तथा सुरक्षा को बढ़ावा देने का प्रयत्न करेगा।

राज्य अंतर्राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थता द्वारा निपटाए जाने के यत्न को प्रोत्साहित करेगा। – राजनीति के यह निर्देशक सिद्धांत भावी सरकारों के निर्देश है कि उन्हें किस प्रकार की व्यवस्था का विकास करेंगे पर यह मौलिक अधिकारों की तरह न्यायसंगत नहीं हैं। इन्हें न्यायालय द्वारा लागू नहीं करवाया जा सकता है। चाहे ने को बाध्य नहीं है पर फिर भी सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपनी किसी भी प्रकार की नीति बनाते समय इन निर्देशों को ध्यान में रखे।

प्रश्न 11.
भारतीय नागरिकों को मिले हुए मौलिक अधिकारों तथा मौलिक कर्तव्यों का वर्णन करो।
अथवा
मौलिक कर्तव्यों की व्याख्या करें।
अथवा
भारतीय नागरिकों के मौलिक कर्तव्य क्या हैं?
अथवा
मौलिक अधिकारों की विवेचना कीजिए।
अथवा
भारतीय नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
मौलिक अधिकार-(Fundamental Rights):
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हो गया था तथा इसी दिन हमारा देश गणतंत्र बन गया था। संविधान के तीसरे अध्याय में मौलिक अधिकारों का जिक्र है। संविधान में कुल 7 मौलिक अधिकार दिए गए थे पर 1979 में 44वें संवैधानिक संशोधन द्वारा “संपत्ति का अधिकार” मौलिक अधिकारों की सूची में से निकाल दिया गया था। आजकल भारत के सभी नागरिकों को निम्नलिखित 6 मौलिक अधिकार दिए गए हैं :

  • समानता का अधिकार (Right to Equality)
  • स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation)
  • धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom)
  • सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार (Cultural and Educational Rights)
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)

अब इन मौलिक अधिकारों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
(i) समानता का अधिकार (Right to Equality) सभी भारतीय नागरिक कानून के सामने समान हैं। भारत में किसी भी व्यक्ति के साथ रंग, नस्ल, जाति, धर्म या जन्म स्थान के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जा सकता है। सबको समान अवसर उपलब्ध हैं। अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता की समाप्ति कर दी गई है अर्थात् अस्पृश्यता पर कानून द्वारा रोक लगा दी गई है।

(ii) स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Freedom)-अनुच्छेद 19 के तहत सभी भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित स्वतंत्रताएं प्रदान की गई हैं –

  • भाषण देने तथा विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता (Freedom of Speech and expression)
  • बिना शस्त्र शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने की स्वतंत्रता (Freedom to assemble peacefully without arms)
  • समितियां तथा संघ स्थापित करने की स्वतंत्रता (Freedom to form Associations and unions)
  • समस्त भारत में घूमने फिरने की स्वतंत्रता (Freedom to move freely throughout the territory of India)
  • भारत के किसी भी भाग में रहने तथा निवास स्थान बनाने की स्वतंत्रता (Freedom to reside and settle in any part of terroitory of India)
  • किसी भी पेशे को अपनाने या व्यवसाय, व्यापार कारोबार की स्वतंत्रता (Freedom to Practise any profession or to carry on any occupation, trade and business)

इनके अलावा हरेक भारतीय नागरिक को जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के अधिकार भी प्राप्त हैं।

(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation)-किसी भी भारतीय का कोई शोषण नहीं करेगा क्योंकि संविधान में शोषण के विरुद्ध निम्नलिखित प्रावधान हैं-

  • मानवीय व्यापार तथा बलपूर्वक मज़दूरी की मनाही (Prohibition of traffic in human beings and forced Labour)
  • बालश्रम की मनाही (Prohibition of child labour)

14 साल की उम्र तक के बच्चों को फैक्ट्रियों, दुकानों पर काम पर नहीं लगाया जा सकता। यह कानूनन जुर्म है तथा इसके लिए सजा का प्रावधान हैं। इसके अलावा बंधुआ मजदूरी करवाना भी कानूनन जुर्म है।

(iv) धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (Right to Religious Freedom)-संविधान को बनाने वाले भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे। वह जानते थे कि भारत में कई धर्मों के अनुयायी निवास करते हैं। इसलिए संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का प्रावधान रखा गया है कि किसी भी धर्म को मानने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता, धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता, किसी विशेष धर्म के विकास के लिए कर न देने की स्वतंत्रता इत्यादि। इसके अलावा सरकारी शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा की मनाही की गई है।

(v) सांस्कृतिक तथा शैक्षणिक अधिकार (Cultural and Educational Rights) हरेक भारतीय को अपनी लिपि, भाषा तथा संस्कृति की सुरक्षा करने का अधिकार प्राप्त है। धार्मिक तथा भाषायी अल्पसंख्यक समूह अपने लिए शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना कर सकते हैं। सभी भारतीयों को सरकार द्वारा सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश पाने की स्वतंत्रता है।

(vi) संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies)-प्रत्येक भारतीय को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने मौलिक अधिकारों को लागू करवाने या उनकी सुरक्षा के लिए सीधे उच्चतम न्यायालय जा सकता है। अगर किसी व्यक्ति को ऐसा लगता है कि सरकार या कोई और उसके मौलिक अधिकारों को उससे छीन रहा है या वापस ले रहा है तो वह उनको वापस पाने के लिए न्यायालय में भी जा सकता है। इसको संवैधानिक उपचारों का अधिकार कहते हैं।

मौलिक कर्तव्य-(Fundamental Duties):
संविधान में भारतीय नागरिकों को अगर मौलिक अधिकार दिए गए हैं तो उनके साथ-साथ कुछ मौलिक कर्तव्य भी दिए गए हैं। चाहे मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का जिक्र नहीं था पर 1976 में आपात्काल के समय के दौरान 42वें संवैधानिक संशोधन के द्वारा संविधान के चौथे भाग में अनुच्छेद 51-A में अग्रलिखित दस मौलिक कर्तव्य दिए गए हैं-
(a) संविधान का पालन करना तथा इसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज व राष्ट्रीय गान का सम्मान करना। (To abide by the constitution and respect its ideas, institutions, National flag and National Anthem.)

(b) स्वतंत्रता के लिए राष्ट्रीय संघर्ष को प्रेरित करने वाले राष्ट्रीय आदर्शों का सम्मान तथा अनुसरण करना। (To cherish and follow the noble ideals which inspired our National Struggle for freedom.)

(c) भारत की प्रभुसत्ता को बनाए रखना तथा उसकी रक्षा करना (To uphold and protect the Sovereignty, Unity and Integrity of India)

(d) देश की रक्षा करना तथा ज़रूरत पड़ने पर राष्ट्र के लिए अपनी सेवा प्रदान करना। (To defend the Country and render National Service when called upon to do so.)

(e) धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय तथा वर्गीय विभिन्नताओं से ऊपर उठकर भारत के सभी नागरिकों के बीच सदभाव तथा आपसी भाईचारे का विकास करना तथा महिलाओं के गौरव को अपमान पहुंचाने वाले कार्यों का त्याग करना। (To promote harmony and the Spirit of common brotherhood amogest all the people of India transcending religious, linguistic, regional and sectional diversities and to renounnce practices derogatory to the dignity of women.)

(f) अपनी समृद्ध विरासत तथा संयुक्त संस्कृति का सम्मान करना तथा उसको सुरक्षित रखना। (To Value and preserve the rich heritage of our composite culture.)

(g) वैज्ञानिक सोच व मानवतावाद विकसित करना। (To develop Scientific temper and humanism.)

(h) जंगलों, झीलों, नदियों तथा वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखना तथा सुधारना। (To protect and improve natural environment including forests, lakes, rivers and wild life.)

(i) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना तथा हिंसा का त्याग करना। (To safeguard public property and adjure violence.)

(j) व्यक्तिगत तथा सामूहिक गतिविधियों में उत्कृष्टता के लिए प्रयास करना। (To Strive towards excellence in spheres of individual and collective activities.)

चाहे मौलिक कर्तव्यों के पीछे कानूनी शक्ति नहीं है तथा न ही इन्हें कानूनी मान्यता प्राप्त है पर यह ऐसे आदर्श हैं जिनको मानने से राष्ट्र के विकास में योगदान दिया जा सकता है। इसलिए सभी भारतीयों को इनका पालन करना चाहिए।

प्रश्न 12.
पंचवर्षीय योजनाओं के माध्मय से भारतीय समाज में क्या-क्या परिवर्तन आए हैं? उनका वर्णन करो।
अथवा
पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा भारतीय समाज पर लाए गए प्रमुख परिवर्तनों की व्याख्या करें।
अथवा
देश के स्वतंत्र होने पर ‘नियोजित विकास के कार्यक्रमों में किन-किन बातों की ओर ध्यान केंद्रित किया गया?
उत्तर:
1952 से लेकर 2013 तक भारत में बारह पंचवर्षीय योजनाएं तथा तीन एक वर्षीय योजनाएं लाग हो चुकी थीं। 2002 से 2007 तक के समय के लिए दसवीं पंचवर्षीय योजना का निर्माण किया गया। पिछले 53 सालों में भारतीय समाज में बहुत ज्यादा परिवर्तन आए हैं। हम अगर कोई भी क्षेत्र उठा कर देख ले हमें यह परिवर्तन तो देखने को मिल ही जाएंगे। इन परिवर्तनों का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) शिक्षा का प्रसार (Spread of Education)-1951 में पहली पंचवर्षीय योजना लागू होने के समय भारत में साक्षरता दर 18% थी जो कि सन् 2011 में बढ़कर 75 % हो गई है। अगर साक्षरता दर बढ़ी है तो वह इस वजह से कि सभी पंचवर्षीय योजनाओं में शिक्षा पर अच्छा पैसा खर्च किया गया है ताकि लोग पढ़ लिखकर अपनी तथा देश की तरक्की में अपना योगदान दे सके।

उच्चशिक्षा का भी बहुत ज्यादा प्रसार हुआ। इस समय देश में हजारों मैडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, विश्वविद्यालय तथा कई और प्रकार के कॉलेज हैं जो कि देश के लाखों नौजवानों में उच्चशिक्षा का प्रसार कर रहे हैं जोकि देश के विकास के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है।

(ii) वंचित या निम्न बों का उत्थान (Upliftment of Deprived Sections)-अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां तथा अन्य पिछड़े वर्ग (SC’s, ST’s and OBC’S) भारतीय समाज के प्रमुख वंचित वर्ग हैं जिन्हें सदियों से भारतीय समाज में उनके मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया था। इन लोगों के स्तर को ऊपर उठाने के लिए संविधान तथा पंचवर्षीय योजनाओं में विशेष प्रावधान किए गए हैं।

इन सभी वर्गों के सदस्यों के लिए नौकरियों तथा शैक्षणिक संस्थाओं में आरक्षण दिया गया है। इसके अतिरिक्त अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में उनकी जनसंख्या के मुताबिक स्थान आरक्षित किए गए हैं। उन उपेक्षित वर्गों के लिए कई कल्याण कार्यक्रम कार्यन्वित किए गए हैं। प्रत्येक पंचवर्षीय योजना में इनके कल्याण हेतु काफ़ी पैसा रखा जाता रहा है ताकि इनकी स्थिति तथा स्तर को ऊपर उठाया जा सके। फलस्वरूप इन वर्गों की स्थिति में काफी सुधार हुआ है।

(iii) महिलाओं की स्थिति में सुधार (Improvement in the Status of Women) स्वतंत्रता से पहले भारतीय समाज में महिलाओं की स्थिति काफ़ी निम्न थी। सदियों से इनको पैरों की जूती समझा जाता रहा है। भारतीय समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था प्रचलित थी जिसमें महिलाओं का काम सिर्फ परिवार की सेवा करना होता था।

उनको किसी तरह के अधिकार प्राप्त नहीं थे। यहां तक कि उन्हें शिक्षा भी नहीं लेने दी जाती थी। पर आजादी के बाद संविधान में भी तथा पंचवर्षीय योजनाओं में भी महिलाओं के उत्थान के लिए काफ़ी प्रावधान रखे गए ताकि इनका स्तर ऊपर उठाया जा सके। विभिन्न योजनाओं के तहत महिला कल्याण के अनेक कार्यक्रम चलाए गए।

उनके सशक्तिकरण के लिए स्थानीय स्वशासन निकायों यानि कि पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में उनके लिए एक तिहाई पद आरक्षित किए गए। उनके उत्थान के लिए हरेक पंचवर्षीय योजना में काफ़ी पैसा रखा गया। उनकी साक्षरता की तरफ विशेष ध्यान दिया गया जिस वजह से 1951 में जो महिला साक्षरता दर 9% से भी कम थी वह 2011 में बढ़कर 65.5% से अधिक हो गई है।

(iv) ग्रामीण पुनर्निर्माण (Rural Reconstruction)-आजादी से पहले ग्रामीण इलाकों की हालत काफ़ी खराब थी। इसलिए ग्रामीण क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के लिए सभी पंचवर्षीय योजनाओं में खास प्रावधान किए गए। विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं के तहत ग्रामीण पुनर्निर्माण के लिए कार्यक्रम चलाए गए।

एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP), इंदिरा आवास योजना, गांधी कुटीर योजना, सामुदायिक विकास कार्यक्रम (CDP) तथा पंचायती राज संस्थाओं को मजबूत करना इत्यादि के द्वारा गांवों का पुनर्निर्माण हुआ है। हरित क्रांति तथा भूमि सुधारों से ग्रामीण समुदाय की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। ग्रामीण इलाकों के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में अच्छा पैसा रखा गया था क्योंकि असली भारत तो गांवों में बसता है।

(v) अंतर्जातीय संबंधों में परिवर्तन (Change in Inter Caste Relations)-संविधान के अनुच्छेद 17 के द्वारा भारत में अस्पृश्यता को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान कर दी गई। जाति के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी भारतीयों को समान मौलिक अधिकार प्रदान किए गए। फलस्वरूप जातीय भेदभाव में कमी आई है। निम्न जातियों के सदस्यों में गतिशीलता बढ़ी है। उच्च तथा निम्न जातियों के सदस्यों में समीपता बढ़ी है।

(vi) कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्र में परिवर्तन (Changes in Agricultural and Industrial Sectors) लगभग सभी पंचवर्षीय योजनाओं में कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्रों के विकास को प्रमुख लक्ष्य बनाया गया। आजादी के 10-15 साल के समय में भारत को खाद्यान्न आयात करना पड़ता था। पर इन पंचवर्षीय योजनाओं के प्रावधानों के फलस्वरूप हरित क्रांति आई तथा उसके 10 साल के अंदर ही भारत खाद्यान्न के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो गया।

इसी तरह औद्योगिक क्षेत्र या उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए भी सभी पंचवर्षीय योजनाओं में विशेष प्रावधान रखे गए। 1951 में कुल खाद्यान्न उत्पादन 5 करोड़ टन था वह आजकल 20-21 करोड़ टन हो गया है। लघु, कुटीर तथा बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की गई जिस वजह से किसानों, उद्योगपतियों तथा औद्योगिक क्षेत्र में काम करने वालों की आय में काफ़ी वृद्धि हुई है।

(vii) जनसंख्यात्मक परिवर्तन (Demographic Changes)-बढ़ती जनसंख्या भारत की प्रमुख समस्या रही है। स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण के माध्यम से सन् 2000 तक देश में 25 करोड़ बच्चे पैदा होने से रोके गए। 1951-2001 के दौरान जन्म दर कम होकर 40 से 27 तथा मृत्यु दर 27 से कम होकर 9 तक पहुंच गई है। इसी अवधि में जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष से बढ़कर 63 वर्ष तथा शिशु मृत्यु दर 146 से कम होकर 70 हो गई है। यह सब ही सभी पंचवर्षीय योजनाओं में रखे गए प्रावधानों का परिणाम है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि भारत ने पिछले 53 सालों में इन पंचवर्षीय योजनाओं के फलस्वरूप काफ़ी ज्यादा प्रगति की है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 13.
योजनाबद्ध विकास के क्या लाभ होते हैं?
उत्तर:
योजना वह व्यवस्था होती है जिसके आधार पर लक्ष्यों की पूर्ति के प्रयास किए जाते हैं। अगर किसी काम को करने के लिए योजना बनाई जाएगी तो वह काम सही समय पर भी हो जाएगा तथा साधन भी व्यर्थ नहीं जाएंगे। अगर किसी कार्य को करने के लिए योजना नहीं बनाई जाएगी तो हो सकता है कि प्रयास भी व्यर्थ ही चला जाए। इसलिए किसी कार्य को करने के लिए योजना बनाना ज़रूरी है। इसी के साथ योजनाबद्ध विकास के भी बहुत से लाभ हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) समय की बचत योजना बनाकर विकास करने से समय की बचत होती है। हो सकता है कि अगर हम योजना न बनाएं तो हम व्यर्थ ही अपना समय तथा साधन खर्च करते जाएं तथा उससे हमारा लक्ष्य न मिल पाए। योजना बनाने से हमें पता होता है कि किस दिशा में हमें काम करना है। इससे समय की बचत तो होती ही हैं पर साथ ही साथ हमारे साधन व्यर्थ होने से बच जाते हैं।

(ii) कम समय में लक्ष्य की प्राप्ति-हरेक योजना बनाते समय उस योजना के कुछ लक्ष्य निर्धारित कर लिए जाते हैं तथा उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समय भी निर्धारित कर लिया जाता है। अगर ऐसा न हो तो हम बगैर दिशा के कार्य करते जाएंगे तथा लक्ष्य भी प्राप्त नहीं होगा। इस तरह योजनाबद्ध विकास से कम समय में लक्ष्य की प्राप्ति होती है।

(iii) सभी क्षेत्रों का विकास-अगर योजनाबद्ध तरीके से कार्य किया जाएगा तो सभी क्षेत्रों का ठीक तरीके से विकास होगा। अगर योजनाबद्ध तरीके से काम न किया जाए तो हो सकता है कि किसी एक क्षेत्र का तो बहुत ज्यादा विकास हो जाए तथा किसी क्षेत्र का विकास कम हो या हो ही न।

इस तरह वह क्षेत्र पूरी तरह अविकसित रह जाएगा। इसलिए सभी क्षेत्रों का ठीक तरीके से विकास करने के लिए योजनाबद्ध तरीके से काम करना ज़रूरी है। इसके लिए सारे क्षेत्र को इकाई मानकर काम किया जाता है तथा उसके सभी क्षेत्रों का ध्यान रखा जाता है।

(iv) औद्योगिक विकास–अगर देश का औद्योगिक विकास करना है तो वह योजनाबद्ध तरीके से ही होगा। अगर उद्योग लगाना है तो उसके लिए योजना बनानी ही पड़ेगी। उद्योग के लिए पैसा कहां से आएगा, माल बनाने के लिए कच्चामाल, माल बनाने के लिए मज़दूर, माल बेचने के लिए मंडी का प्रबंध, इन सबके लिए एक योजना की ज़रूरत होती है।

अगर योजना न बनाई जाए तो वह उद्योग नहीं चल पाएगा। अगर उद्योग लगाने में पैसा कम पड़ गया तो, माल बनाने के लिए कच्चा माल न मिला तो, माल न बिका तो क्या होगा? यह कुछ ऐसे प्रश्न हैं जिनके लिए योजना बनाने की ज़रूरत है। इसलिए औद्योगिक विकास के लिए योजनाबद्ध विकास की जरूरत होती है।

(v) कृषि के विकास के लिए- कृषि के विकास के लिए भी योजनाबद्ध तरीके की ज़रूरत होती है। कृषि के लिए अच्छे बीज, अच्छी खाद, तकनीक उपलब्ध करवाना, उत्पादन को बढ़ाने तथा बेचने के लिए योजना की ज़रूरत होती है। अगर किसी एक चरण में भी योजना न बनायी गई तो सारा कार्य खराब हो जाएगा तथा जिस क्षेत्र में हम विकास के बारे में सोच रहे हैं वह क्षेत्र विकसित नहीं हो पाएगा। इसलिए कृषि के विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके की ज़रूरत है।

(vi) निम्न जातियों में विकास के लिए हमारे देश में सदियों से निम्न जातियों का शोषण होता आया है। इसलिए इनको ऊपर उठाने के लिए एक योजनाबद्ध प्रयास की जरूरत थी। यही किया गया तथा संविधान में इनके लिए आरक्षण रखे गए। पंचवर्षीय योजनाओं में इनके उत्थान के लिए काफ़ी कुछ किया गया। आज निम्न जातियां ऊँची जातियों के साथ खड़ी हैं तथा उनकी निम्न स्थिति काफ़ी अच्छी हो गई है। यह सब विकास योजनाबद्ध तरीके से ही हुआ है।

इस तरह और सभी क्षेत्रों चाहे घर में हो या देश में विकास के लिए योजनाबद्ध तरीके की ही ज़रूरत होती है।

प्रश्न 14.
लोकतांत्रिक समाज में हित समूह व दबाव समूह कौन-कौन से कार्य करते हैं?
उत्तर:
दबाव व हित समूह वह संगठित या असंगठित समूह हैं जो सरकारी नीतियों को प्रभावित करते हैं तथा अपने हितों को बढ़ावा देते हैं। उनके कुछ उद्देश्य होते हैं तथा वे सरकार पर अलग-अलग प्रकार से दबाव डालकर अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, लोकतांत्रिक समाज में यह कई प्रकार के कार्य करते हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है:
(i) आंदोलन चलाना-यह दबाव समूह किसी विशेष मुद्दे पर तथा विशेष उद्देश्य के लिए आंदोलन चलाते हैं ताकि जनता का समर्थन हासिल किया जा सके। इसके लिए यह संचार माध्यमों जैसे कि टी०वी०, समाचार-पत्र इत्यादि का सहारा लेते हैं तथा जनता का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं।

(ii) हड़तालें करवाना तथा रोष मार्च निकालना-दबाव समूह साधारणतया हड़तालें करवाते हैं, रोष मार्च निकालते हैं तथा सरकारी कार्यों में बाधा पहुँचाने का प्रयास करते हैं ताकि सरकार तक अपनी बात पहुँचा सकें। यह हड़ताल की घोषणा करते हैं तथा धरनों पर बैठकर अपनी आवाज़ उठाते हैं। अधिकतर फैडरेशन तथा यूनियनें सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए इसी ढंग का प्रयोग करते हैं।

(iii) लॉबी का निर्माण करना-साधारणतया दबाव समूह लॉबी का निर्माण करते हैं। इस लॉबी के कुछ आम हित होते हैं तथा यह हितों को प्राप्त करने के लिए कार्य करते हैं।

(iv) राजनीतिक दलों का समर्थन-हरेक दबाव व हित समूह किसी-न-किसी राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ होता है। यह समूह चुनाव के समय अपने-अपने राजनीतिक दल का तन-मन-धन से समर्थन करते हैं ताकि वह चुनाव जीत कर उनकी मांगे पूरी करें।

(v) कानून बनाने वाली समितियों को प्रभावित करना-जब भी कोई विधेयक संसद् में कानून बनाने के लिए पेश किया जाता है तो यह विधेयक संसद् की विधायी समितियों को सौंप दिया जाता है ताकि वह इसके गुणों तथा दोषों पर समीक्षा कर सकें। यह दबाव समूह विधायी समूहों के सदस्यों को प्रभावित करते हैं ताकि विधेयक के मुख्य लक्षण अपने हितों के अनुसार करवा सकें।

इस प्रकार लोकतांत्रिक समाज में हित व दबाव समूह कई प्रकार के कार्य करते हैं।

प्रश्न 15.
भारतीय लोकतंत्र में दबाव समूहों एवं राजनीतिक दलों की भूमिका की चर्चा करें।
अथवा
भारत में राजनीतिक दलों की भूमिका बताएं।
अथवा
लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की क्या भूमिका रहती है? विवेचना करें।
अथवा
दबाव समूहों की भारतीय लोकतंत्र में भूमिका की चर्चा करें।
अथवा
सरकार के लोकतांत्रिक प्रारूप में राजनीतिक दलों और दबाव समूहों की क्या भूमिका है?
अथवा
राजनीतिक दल की भूमिका बताइए।
उत्तर:
भारत में लोकतंत्र को प्रभावी बनाने में देश में उपस्थित दबाव समूहों तथा राजनीतिक दलों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इसका संक्षिप्त वर्णन अधोलिखित है-
दबाव समूहों की भूमिका-(Role of Pressure Groups):
1. सार्वजनिक नीतियों में के निर्माण को प्रभावित करना (To influence the making of Public Policies and Laws)-प्रत्येक दबाव समूह के लिए यह आवश्यक होता है कि वे सरकार के दवारा बनाई जाने वाली नीतियों को अपने सदस्यों के हितों की सुरक्षा के लिए प्रभावित करें। दबाव समूह सार्वजनिक सभाओं, प्रदर्शनियों एवं बातचीत के माध्यम से सरकार की नीतियों तथा कानूनों के निर्माण को अपने हित के लिए प्रयोग करने का प्रयास करते हैं।

2. राजनीतिक दलों को अपने प्रभावाधीन रखना (To keep the Political Parties under their influence) दबाव समूह सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए राजनीतिक दलों को अपने प्रभाव से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इसके लिए वे राजनीतिक दलों को गप्त रूप से चंदा इत्यादि भी देते हैं। इस प्रकार अपने हितों की सुरक्षा हेतु दबाव समूह सरकार से सहायता लेते रहते हैं।

3. प्रचार करना (To make Propaganda)-धर्म, जाति, इत्यादि के नाम पर जनता का समर्थन प्राप्त करने के लिए तथा अपने उद्देश्यों का प्रचार करने की आवश्यकता को देखते हुए दबाव समूह कई प्रकार के आंदोलन भी चलाते हैं ताकि जनता को प्रभावित किया जा सके।

4. सरकारी अधिकारियों से संपर्क स्थापित करना (To Establish contacts with Governmental Authorities)-दबाव समूहों को अपने उद्देश्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक होता है कि वे सरकारी अधिकारियों से संपर्क स्थापित करें। वर्गीय दबाव समूह (Sectional Pressure Groups) विशेष रूप से सरकारी गोधा संबंध रखते हैं क्योंकि सरकार अधिकारियों के माध्यम से ही उनको सरकार की नीतियों की जानकारी मिलती है।

राजनीतिक दलों की भूमिका-(Role of Political Parties):
1. गठबंधन की राजनीति का विकास (Side of Coalitional Politics)-भारत में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के अस्तित्व में आने से गठबंधन की राजनीति का विकास हुआ है। पिछले छः चुनावों में लटकती संसद् (Hung Parliament) के अस्तितत्व में आने से यह बात स्पष्ट हो गई है कि कोई भी राजनीतिक दल गठबंधन किए बिना राजनीतिक शक्ति को ग्रहण नहीं कर सकता।

15वीं लोकसभा के चुनाव भी मुख्यतः तीन गठबंधनों राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, कांग्रेस व उसके सहयोगी दलों का गठबंधन तथा वामपंथी दलों के गठबंधन के बीच लड़े गए। राजनीति में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का महत्त्व इतना अधिक बढ़ गया है कि भविष्य में भी कोई दल गठबंधन किए बिना चुनाव में सफलता ग्रहण नहीं कर सकता है।

2. क्षेत्रवाद का बढ़ता प्रभाव (Increasing Influence of Regionalism)-राजनीति में बढ़ता क्षेत्रवाद लोगों में राष्ट्रवादी भावना को कम करने में अहम् भूमिका निभाता है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों ने क्षेत्रवाद को काफ़ी अधिक प्रेरित किया है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव कुछ क्षेत्र विशेष तक ही सीमित होता है। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की सरकारों का निर्माण जहां पर होता है। उन राज्यों में ही अब वह दल अधिक सक्रिय भी रहते हैं।

3. केंद्र में साझा सरकारों का आगमन (Advent of Coalitional Governments at the Centre)-देश में क्षेत्रीय राजनीतिक दलों में बढ़ोत्तरी के परिणामस्वरूप ही केंद्र में साझा सरकारों का गठन होना आरंभ हुआ है। अनेकों क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधि जब चुन कर लोकसभा के सदस्य बनते हैं तो उससे साझा सरकारों का निर्माण होता है। 1989 से लेकर वर्तमान समय तक लोकसभा के चुनावों के पश्चात् साझा सरकारें अस्तित्व में आईं।

4. संघवाद का नवीन रूप (New form of Federalism)-जब देश में कांग्रेस की राजनीतिक प्रमखता थी तब भारत में सहयोगी संघवाद का अस्तित्व था। केंद्र और राज्यों में एक ही दल की सरकार होने के कारण केंद्र और राज्यों के बीच तनाव कम था। लेकिन वर्तमान समय में क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण केंद्रवाद की (Centralism) की प्रवृत्ति का विकास होना रुक गया है। क्षेत्रीय दल केंद्रीयकरण के विरुद्ध हैं और राज्यों को अधिक-से-अधिक शक्तियां देने के हक में हैं। क्षेत्रीय दलों के ऐसे दृष्टिकोण के कारण केंद्र सरकार के लिए संघवाद-विरोधी कोई भी कार्यवाही करना मुश्किल हो गया है, क्योंकि कई क्षेत्रीय दल स्वयं सरकार में शामिल हैं।

प्रश्न 16.
लोकतंत्र का क्या अर्थ है? इसकी विशेषताओं, गुणों तथा अवगुणों का वर्णन करें।
उत्तर:
लोकतंत्र सरकार का ही एक प्रकार है जिसमें जनता का शासन होता है। इसमें जनता के प्रतिनिधि वोटरों के द्वारा, बालिगों द्वारा वोट देने की प्रक्रिया के द्वारा चुने जाते हैं। यह स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे के संकल्पों में विश्वास रखती है तथा यह ही इसके कार्यात्मक आधार हैं। इसमें समाज तथा व्यक्तिगत लोगों के विकास का पूर्ण स्कोप होता है। इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
(i) जनता का शासन-लोकतंत्र में प्रशासन प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा चलाया जाता है तथा लोकतंत्र में हरेक निर्णय बहुमत से लिया जाता है।

(ii) जनता के हित-लोकतंत्र में प्रशासन को जनता के हितों के अनुसार चलाया जाता है तथा कमज़ोर तबके का सरकार द्वारा अच्छे ढंग से ध्यान रखा जाता है।

(iii) समानता का सिद्धांत-लोकतंत्र का मुख्य सिद्धांत समानता का सिद्धांत है। लोकतंत्र में हरेक व्यक्ति को समान समझा जाता है। किसी के साथ जन्म, शिक्षा, संपदा, जाति इत्यादि किसी भी आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता है। सभी नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त हैं। हरेक व्यक्ति को Universal Adult Franchise के अनुसार वोट देने का अधिकार प्राप्त है।

(iv) बहुमत का शासन-लोकतंत्र बहुमत का शासन है। लोकतंत्र में सभी निर्णय बहुमत द्वारा लिए जाते हैं। जिस दल को चुनाव में बहुमत प्राप्त होता है वह ही सरकार बनाता है। यहां तक कि सभी निर्णय बहुमत द्वारा ही लिए जाते हैं।

लोकतंत्र के गुण अथवा लाभ-
आधुनिक समय में लोकतंत्र को सबसे अच्छा शासन माना जाता है। इसलिए ही अधिकतर देशों ने लोकतंत्र के सिदधांत को अपनाया है। इसके कुछ लाभ हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) यह जनमत पर आधारित है-लोकतंत्र शासन की एक व्यवस्था है जोकि जनमत पर आधारित है तथा जिसमें शासन को जनता की इच्छा के अनुसार चलाया जाता है। तानाशाही तथा राजतंत्र में जनता की इच्छा को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता तथा इसमें कानूनों को भी जनमत के अनुसार ही बनाया जाता है।

(ii) यह समानता के सिद्धांत पर आधारित है-लोकतंत्र में सभी व्यक्तियों को समान समझा जाता है। किसी को म. लिंग. संपदा के आधार पर कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं होता है। साधारण जनता को निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी का अधिकार दिया गया है तथा सभी को समान समझा जाता है।

(iii) उत्तरदायी सरकार–तानाशाही तथा राजतंत्र में सरकार किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं होती परंतु लोकतंत्र में सरकार जनता तथा संसद् के प्रति जवाबदेह होती है। सरकार को जनमत के अनुसार ही कार्य करना पड़ता है। यह जनमत के विरुद्ध कार्य नहीं करती है अन्यथा इसे अगले चुनावों में जनता द्वारा सत्ता से उखाड़ कर फेंक दिया जाता है।

(iv) शक्तिशाली तथा सक्षम सरकार-लोकतंत्र में सरकार शक्तिशाली तथा सक्षम होती है। शासन को जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता है तथा उन्हें जनता का समर्थन प्राप्त होता है। शासक जनता के समर्थन से प्रेरित होते हैं। इसलिए ही वह अपने निर्णय संपूर्ण शक्ति के साथ लेते हैं। शासन जनमत से नियंत्रित होते हैं तथा यह अपने निर्णयों के लिए जनता के प्रति उत्तरदायी होते हैं। इस प्रकार यह सक्षम रूप से कार्य करते हैं।

लोकतंत्र के अवगुण- लोकतंत्र के लाभों को देखने के बाद हम कह सकते हैं कि यह शासन सबसे अच्छा है परंतु यह ठीक नहीं है। इस व्यवस्था के कुछ अवगुण भी हैं जिनका वर्णन इस प्रकार है-
(i) समानता का सिद्धांत अप्राकृतिक है-लोकतंत्र का मुख्य आधार समानता का सिद्धांत है परंतु आलोचक यह कहते हैं कि समानता का सिद्धांत ही अप्राकृतिक है। यहां तक कि प्रकृति ने मनुष्यों में समानता नहीं रखी है। कुछ लोग बेवकूफ हैं, कुछ शक्तिशाली, कुछ चालाक तथा कुछ कमज़ोर। अगर प्रकृति ने भी इस प्रकार का भेदभाव रखा है तो किस प्रकार सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक समानता को रखा जा सकता है। समानता का सिद्धांत इसका सबसे बड़ा अवगुण है कि सभी को समान अधिकार दिए गए हैं।

(ii) गुणों की बजाए संख्या को महत्त्व देना-लोकतंत्र में गुणों की बजाए संख्या को अधिक महत्त्व दिया जाता है। दूसरे शब्दों में लोकतंत्र में सभी निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। अगर 100 बेवकूफ यह कहें कि कोई चीज़ ठीक है तथा 99 बदधिमान यह कहें कि यह गलत है तो 100 बेवकफों का निर्णय ही माना जाएगा। जनता के प्रतिनिधि भी बहुमत से चुने जाते हैं। हरेक बेवकूफ तथा बुद्धिमान को वोट देने का अधिकार है तथा ग़लत व्यक्ति भी जनता का प्रतिनिधि बन सकता है।

(iii) यह जवाबदेह सरकार का गठन नहीं करता-चाहे लोकतंत्र में सरकार जनता के प्रति जवाबदेह होती है परंतु ऐसा असल में होता नहीं है। चुनाव के बाद नेता कभी भी जनता का ध्यान नहीं रखते हैं तथा जनता के पास दोबारा अगले चुनावों के समय ही आते हैं। बहुमत वाला दल कभी भी विरोधी अथवा अल्पसंख्यक दलों की परवाह नहीं करता है।

(iv) अस्थिर तथा कमज़ोर सरकार-लोकतंत्र में सरकार अस्थिर तथा कमज़ोर होती है। बहदलीय व्यवस्था में सरकार तेज़ी से बदलती है। बहुमत के अभाव में कई दल इकट्ठे मिलकर सरकार का गठन करते हैं। इस प्रकार की मिश्रित सरकार को कभी भी तोड़ा जा सकता है। समस्या के समय, लोकतांत्रिक सरकार कमज़ोर सरकार सिद्ध होती है। निर्णय काफ़ी तेजी से नहीं लिए जाते हैं।

प्रश्न 17.
राजनीतिक दल का क्या अर्थ है? परिभाषाओं सहित वर्णन करें।
अथवा
राजनीतिक दल क्या है?
उत्तर:
राजनीतिक दल प्रत्येक प्रकार की सरकारों में मिल जाते हैं। अन्य प्रकार की सरकारों की तुलना में लोकतंत्र में राजनीतिक दल की बहुत महत्ता है। बहुत सारे विद्वानों ने इसको परिभाषित करने की कोशिश की है। परंतु प्रत्येक अच्छे राजनीतिक दल की अपनी विशेषताएं होती हैं। इस प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल से यह आशा की जाती है कि वह कछ आरंभिक कार्य करे जिनके बिना उसका अस्तित्व नहीं रह सकता।

राजनीतिक दल की महत्ता इसलिए अधिक होती है क्योंकि यह लोगों एवं सरकार के बीच एक कड़ी का कार्य करते हैं। कुछ राजनीतिक दल इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनका अपने सदस्यों पर इतना कड़ा नियंत्रण होता है कि वह इस दल को छोड़ नहीं सकते। इस प्रकार कुछ राजनीतिक दल इतने कमज़ोर होते हैं कि उनका अपने सदस्यों पर नियंत्रण नहीं होता और यह सदस्य कभी भी अपने दल को छोड़कर चले जाते हैं।

कुछ समाजों में एक दलीय (दल की) व्यवस्था होती है। वहां पर एक ही दल सत्तासीन रहता है और अन्य दलों को बनने भी नहीं दिया जाता है। कुछ समाजों में बहुदलीय व्यवस्था होती है। वहां पर दलों का काफ़ी भंडार होता है। किसी भी राजनीतिक दल की कठोरता व कमजोरी उसके सदस्यों की शक्ति पर निर्भर करती है। इसकी वैधता भी उसकी सत्ता में आने पर निर्भर करती है। लोकतंत्र में इसकी लोकप्रियता और जनता में विश्वास इस बात पर निर्भर करता है कि पिछले चुनावों में उसे कितनी वोटें प्राप्त हुईं।

परिभाषाएं प्रत्येक राजनीतिक दल लोगों के द्वारा बनाया होता है। जिनका किसी राजनीतिक विषय पर साझा कार्यक्रम होता है और यह उस विषय को लागू करने हेतु Common line of action पर सहमति प्रकट करते हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल केवल अकेला या फिर दूसरे दलों के साथ मिलकर सत्ता में आने की कोशिश करता है।
(1) बर्क (Burke) के अनुसार, “ये कुछ व्यक्तियों की संस्था है, जो कि राष्ट्रीय हितों को बढ़ाने के लिए इकट्ठे होते हैं, और वो कुछ साझे राजनीतिक सिद्धांतों को मानते हैं।”

(2) गिलक्रिस्ट (Gilchrist) के अनुसार, “ये लोगों का एक व्यवस्थित समूह है, जो कुछ राजनीतिक विचार साझे रखते हैं और जो एक राजनीतिक इकाई में बंध कर सरकार के ऊपर नियंत्रण रखने की कोशिश करते हैं।”

(3) फ़ाइनर (Finer) के अनुसार, “एक राजनीतिक दल एक संगठित इकाई है, जो कि इच्छुक सदस्यों पर आधारित है, और वो अपनी शक्ति को राजनीतिक सत्ता को प्राप्त करने में खर्च करता है।”

(4) जी० सी० फील्ड (G.C. Field) के अनुसार, “एक राजनीतिक दल कुछ नहीं, बल्कि लोगों की इच्छुक सभा है, जिसका महत्त्व राजनीतिक सत्ता प्राप्त करना होता है।”

इस प्रकार, इन उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि राजनीतिक दल एक संगठित समूह है, जो कुछ नियमों के साथ बंधा हुआ होता है, इसकी सदस्यता इच्छा पर निर्भर करती है, जो कभी भी ग्रहण की जा सकती है, और छोड़ी भी जा सकती है। यह लोगों की सभा है जिसका एकमात्र उद्देश्य सत्ता प्राप्ति करना होता है। इसके लिए सभी मिलकर कोशिश करते हैं। इनके सदस्यों के विचार साझे होते हैं क्योंकि यह एक दल के साथ संबंध रखते हैं।

प्रश्न 18.
राजनीतिक दल की विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
(1) प्रत्येक राजनीतिक दल को यह विश्वास होता है कि उसके कुछ विरोधी अवश्य होते हैं। यदि वह आज नहीं हैं तो आने वाले दिनों में बन जायेंगे। प्रत्येक राजनीतिक दल का एक संगठन होता है। इसलिए यह अपने आप में ही एक संस्था होती है।

(2) क्योंकि राजनीतिक विचार एवं इच्छाएं सभी लोगों की भिन्न-भिन्न होती हैं। इस प्रकार राजनीतिक दल की नीतियां भी अलग-अलग होती हैं। प्रत्येक राजनीतिक दल कुछ विशेष नीतियों के कारण स्वयं को दूसरे राजनीतिक दलों से अलग सिद्ध करता है। प्रत्येक राजनीतिक दल का उद्देश्य होता है सत्ता प्राप्त करना और जिसके पास यह शक्ति है, वह इसे कायम रखना चाहता है।

(3) एक अच्छे राजनीतिक दल की यह विशेषता होती है कि ये पूर्ण तौर पर संगठित होता है और इसके सदस्य भी अनुशासित होते हैं। दल का इन पर पूर्ण नियंत्रण होता है। वह अपनी पार्टी या दल के सिद्धांतों को खुशी के साथ स्वीकार करते हैं और वह इनको मानते हुए अपनी कठिनाइयों को भी भूल जाते हैं। वह दल के नियंत्रण को अन्य वस्तुओं से ऊपर रखते हैं।

(4) राजनीतिक दल की एक विशेषता यह होती है कि इसके सदस्यों का कुछ Common नीतियों पर विश्वास होना चाहिए और इन्हें उनको कुछ विशेष अवसरों पर दिखाना चाहिए।

(5) इसकी नीतियों एवं कार्यों में निरंतरता होनी चाहिए। इसको स्वयं को कुछ विशेष नीतियों पर संगठित रखना चाहिये। क्योंकि किसी भी नेता का चमत्कार अधिक समय तक टिका नहीं रह सकता। जैसे कि 1984 से 1989 तक राजीव गांधी के साथ हुआ था। जब उस नेता का चमत्कार समाप्त हो जायेगा तो वह भी स्वतः समाप्त हो जायेगा।

(6) एक अच्छे राजनीतिक दल के सदस्यों का एक साझे कार्यक्रम एवं कार्य करने में विश्वास होना चाहिए। जो कि इसकी भावी नीतियों के अनुसार होते हैं। यदि ऐसा नहीं होगा तो झगड़े बढ़ेंगे और दलों में फूट पड़ेगी।

(7) इसकी ज़िम्मेदारियों को लेने के लिए तैयार रहना पड़ेगा और केवल उस दल के ही दोष नहीं गिनवाने चाहिए, जो दल सत्ता के बीच हो और वह स्वयं विरोधी दल में है। जब आवश्यकता पड़ने पर उसे सरकार बनाने के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

(8) एक राजनीतिक दल को जन समर्थन प्राप्त होना चाहिए या उसकी लोकप्रियता लोगों के बीच में होनी चाहिए। यदि यह नहीं होगी तो लोग उसे कभी सत्ता नहीं सौंपेगे और यह अपनी राजनीतिक नीतियों को पूरा नहीं कर पायेगा।

(9) एक राजनीतिक दल को देश के हितों के ऊपर राज्य के या क्षेत्रीय हितों को महत्त्व नहीं देना चाहिए और इसको विदेशियों के स्थान पर देश के लोगों का समर्थन लेना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल को देश के हित को ध्यान में रखकर अपनी नीतियों को बनाना चाहिए।

(10) प्रत्येक राजनीतिक दल को संवैधानिक साधनों में पूर्ण विश्वास होना चाहिए। जो राजनीतिक दल
साधनों के अतिरिक्त अन्य किसी साधनों में विश्वास करता है, उसको किसी भी प्रकार की सरकार में कार्य नहीं करने देना चाहिए। उसकी दूसरी गतिविधियों के ऊपर भी तुरंत रोक लगा देनी चाहिए।

(11) प्रत्येक अच्छे राजनीतिक दल का एक राष्ट्रीय चरित्र होना चाहिए और उसे किसी विशेष समूह, जाति या क्षेत्र की अगुवाई नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक अच्छे राजनीतिक दल में बहुत-सी अच्छी विशेषताएं होनी चाहिएं और ऐसे कार्य करने चाहिए जो कि देश के निर्माण में सहायक सिद्ध हों।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 भारतीय लोकतंत्र की कहानियाँ

प्रश्न 19.
राजनीतिक दल के कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
प्रत्येक प्रकार की सरकारों में राजनीतिक दलों के लिए कुछ कार्य करने आवश्यक होते हैं। यद्यपि ये सरकारें या राजनीतिक दल संगठनों के अनुसार भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इनके कार्य किये बिना लोकतंत्र को चलाना काफ़ी कठिन है। राजनीतिक दलों के कार्यों का वर्णन निम्नलिखित है-
1. यह लोकमत बनाते हैं लोगों की कभी भी एकमत राय नहीं होती है। यद्यपि लोगों के अनेक भिन्न-भिन्न मत होते हैं, परंतु उनका देश हेतु कोई विशेष महत्त्व नहीं होता है। यह राजनीतिक दलों का कार्य होता है कि वह भिन्न-भिन्न मतों को इकट्ठा करके एक लोकराज्य का निर्माण करें और उसे एक संगठित रूप प्रदान करें। यदि राजनीतिक दल ऐसा नहीं करेंगे तो भिन्न-भिन्न राय बेकार चली जायेगी, यह केवल इन दलों के कारण ही इसे आकार मिलता है, और यह किसी विशेष दिशा में बन जाते हैं।

2. यह राजनीतिक शिक्षा देते हैं-साधारणतयः लोग अपने-अपने कार्यों में व्यस्त होते हैं और उनके पास राजनीतिक शिक्षा लेने का कोई भी साधन नहीं होता। अपनी बढ़ती हुई आवश्यकताओं के कारण वह केवल आर्थिक कार्यों की तरफ ही ध्यान देते हैं। केवल चुनावों के समय ही राजनीतिक दल, बड़ी-बड़ी मीटिंगें, जुलूस आदि करते हैं और लोगों को राजनीतिक तौर पर शिक्षित करते हैं। यहां पर ही लोगों को देश की कठिनाइयों का पता चलता है। इस प्रकार राजनीतिक दल लोगों को राजनीतिक शिक्षा देते हैं।

3. यह चुने गये और चुने जाने वालों में कड़ी होती है-राजनीतिक दल चुने गये और चुनने वालों में कड़ी का कार्य करते हैं। इन दलों के अतिरिक्त लोगों के विचारों को पता करने का कोई साधन नहीं होता है। इसी प्रकार लोगों के पास अपनी कठिनाइयों को सरकार के पास पहुंचाने का अन्य कोई साधन नहीं होता है।

राजनीतिक दलों के सदस्य हमेशा लोगों के नज़दीक रहते हैं ताकि वह लोगों के विचारों को जानकर अपने दल को बता सकें। इस तरह यह चुने गये और चुनने वालों के बीच कड़ी का कार्य करते हैं।

4. उम्मीदवार चुनने में सहायता करते हैं राजनीतिक दल चुनावों के समय उम्मीदवार चुनने में सहायता करते हैं। वोटर आमतौर पर उम्मीदवारों को उसके विचारों को नहीं जानते। दलों के बिना लोगों के लिए सही प्रत्याशी का चयन करना मुमकिन नहीं होता। उम्मीदवार सदैव अपने राजनीतिक दल के नाम से जाना जाता है। उसको उसकी पार्टी की वजह से ही वोट मिलते हैं। इस प्रकार राजनीतिक दल लोगों को अपना सही प्रत्याशी चुनने में सहायता करते हैं।

5. लोगों की कठिनाइयां सरकार तक पहुंचाते हैं राजनीतिक दल सदैव लोगों की कठिनाइयां सरकार तक पहुंचाने में सहायता करते हैं। जब कोई राजनीतिक दल सत्ता में नहीं होता तो वह लोगों की शरण में जाता है। वह उनकी कठिनाइयों को सुनकर, उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर सरकार तक पहुंचाते हैं। चाहे वह इनको बढ़ा-चढ़ा कर बताते हैं परंतु इसके साथ कम-से-कम सरकार को उनकी कठिनाइयों के बारे में पता चलता है और वह उनको दूर करने की कोशिश करती है।

6. राष्ट्रीय हितों को महत्ता-प्रत्येक राजनीतिक दल क्षेत्रीय हितों पर किसी विशेष समूह के हितों के विपरीत राष्ट्रीय हितों को महत्त्व देता है। यह साधारण सी बात है यदि कोई दल किसी जाति समूह तक सीमित रहकर कार्य करेगा तो वह संपूर्ण लोगों में प्रसिद्ध नहीं हो सकेगा। इसलिए प्रत्येव राजनीतिक दल अपने आपको राष्ट्रीय दल के रूप में पेश करता है। इस प्रकार देश के हितों को क्षेत्रीय हितों पर महत्त्व प्राप्त हो जाता है। प्रत्येक राजनीतिक दल अपने चुनाव घोषणा-पत्र को राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर बनाता है ताकि अधिकाधिक लोग उसकी तरफ आकर्षित हों।

7. यह सदभावना एवं सहयोग लाते हैं-राजनीतिक दल सरकार के भिन्न-भिन्न अंगों में तालमेल बिठाकर उनमें सहयोग लाने की कोशिश करते हैं। जो दल सरकार में होता है वह इस बात का विशेष ध्यान रखता है कि सरकार के भिन्न-भिन्न अंग संपर्क रूप से कार्य करें। अन्य दल कार्य को सही तरीके के साथ चलाने में सहायता करते हैं।

8. राजनीतिक स्थिरता लाने में सहायता करते हैं-राजनीतिक दल राजनीतिक स्थिरता लाने में सहायता करते हैं। यह अस्थिरता की स्थिति में से बाहर निकलने की पूरी कोशिश करते हैं ताकि देश संपन्न रूप से चल सके। किसी भी प्रकार हो यह जोड़-तोड़ कर सरकार बनाने में सहायता करता है।

9. नये राजनीतिक नेताओं की भर्ती करते हैं-प्रत्येक राजनीतिक दल ऐसे नेताओं को अपने दल में भर्ती करना चाहता है जो लोगों को अपनी तरफ खींच सकें। यदि सही नेता राजनीतिक दल के पास हो तो यह काफ़ी देर तक सत्ता में रह सकता है। इस प्रकार प्रत्येक राजनीतिक दल सदैव ऐसे नेता की तलाश में रहता है जो लोगों की नब्ज पर हाथ रख सके।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत को धर्म निष्पक्षता किसने प्रदान की है?
(A) राज्य
(B) सरकार
(C) जनता
(D) संविधान।
उत्तर:
संविधान।

2. उस देश को क्या कहते हैं जो किसी विशेष धर्म का नहीं बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करता है?
(A) कल्याणकारी राज्य
(B) धर्म निष्पक्ष
(C) लोकतांत्रिक
(D) तानाशाही।
उत्तर:
धर्म निष्पक्ष।

3. इनमें से कौन-सा धर्म निष्पक्षता का आवश्यक तत्त्व है?
(A) धार्मिक कट्टरवाद का बढ़ना
(B) धार्मिक गतिविधियों का बढ़ना
(C) धार्मिक कट्टरवाद का खात्मा
(D) धार्मिक गतिविधियां का खात्मा।
उत्तर:
धार्मिक कट्टरवाद का खात्मा।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

4. इनमें से कौन-सा धर्म निष्पक्षता का मुख्य आधार है?
(A) धर्म
(B) तार्किकता तथा विज्ञान
(C) धार्मिक कट्टरवाद
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
तार्किकता तथा विज्ञान।

5. हमारा देश ………………… संस्कृति से काफी प्रभावित हुआ है।
(A) उत्तरी
(B) दक्षिणी
(C) पूर्वी
(D) पश्चिमी।
उत्तर:
पश्चिमी।

6. किसने कहा था कि धर्म निष्पक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का सम्मान तथा समानता?
(A) गाँधी
(B) नेहरू
(C) मौलाना अबुल कलाम
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
गाँधी।

7. भारत में पर्दा प्रथा किसने शुरू की थी?
(A) हिंदुओं ने
(B) मुसलमानों ने
(C) सिक्खों ने
(D) पारसियों ने।
उत्तर:
मुसलमानों ने।

8. 2011 के सर्वेक्षण के अनुसार भारत की कितने प्रतिशत जनसंख्या मुसलमान है?
(A) 10%
(B) 13%
(C) 14%
(D) 16%
उत्तर:
13%

9. इनमें से कौन-सी किताब एम० एन० श्रीनिवास ने लिखी है?
(A) Cultural change in India
(B) Social change in Modern India
(C) Geographical change in Modern India
(D) Regional change in Modern India.
उत्तर:
Social change in Modern India

10. प्राचीन भारत में कौन-सी धार्मिक भाषा प्रयुक्त होती थी?
(A) पाली
(B) हिंदी
(C) संस्कृत
(D) पंजाबी।
उत्तर:
संस्कृत।

11. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जिसमें निम्न जातियों के लोग उच्च जातियों की नकल करना शुरू कर देते हैं?
(A) पश्चिमीकरण
(B) संस्कृतिकरण
(C) धर्म निष्पक्षता
(D) आधुनिकीकरण।
उत्तर:
संस्कृतिकरण।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

12. जब किसी देश का समाज अथवा संस्कृति परिवर्तित होना शुरू हो जाए तो उसे क्या कहते हैं?
(A) सामाजिक परिवर्तन
(B) धार्मिक परिवर्तिन
(C) सांस्कृतिक परिवर्तन
(D) उद्विकासीय परिवर्तन।
उत्तर:
सांस्कृतिक परिवर्तन।

13. प्राचीन समय से आज तक मनुष्य ने जो भी प्राप्त किया है उसे क्या कहते हैं?
(A) सभ्यता
(B) संस्कृति
(C) समाज
(D) चीजों का एकत्र।
उत्तर:
संस्कृति।

14. संस्कृति किस प्रकार का व्यवहार है?
(A) पैतृक
(B) सामाजिक
(C) समाज
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
सामाजिक।

15. इस्लाम ने हमारे समाज को किस प्रकार प्रभावित किया है?
(A) हमारे समाज में पर्दा प्रथा आई
(B) जाति व्यवस्था की पाबंदियां अधिक कठोर हो गई
(C) विवाह से संबंधित पाबंदियां और कठोर हो गईं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

16. धर्म निष्पक्षता को अपनाने का क्या कारण है?
(A) कम होते धार्मिक संस्थान
(B) आधुनिक शिक्षा
(C) पश्चिमी संस्कृति को अपनाना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

17. धर्म निष्पक्षता ने किस प्रकार हमारे देश के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है?
(A) पवित्रता तथा अपवित्रता के संकल्पों में परिवर्तन
(B) परिवार की संस्था में परिवर्तन।
(C) ग्रामीण समुदाय में बहुत से परिवर्तन आए हैं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

18. परिवार की संस्था में धर्म निष्पक्षता के कारण किस प्रकार के परिवर्तन आये हैं?
(A) संयुक्त परिवारों का टूटना
(B) एकांकी परिवारों का बढ़ना
(C) परिवार में बड़ों का कम होता नियंत्रण
(D) a + b + c.
उत्तर:
a + b + c

19. धर्म निष्पक्षता के कारण ग्रामीण समुदाय में किस प्रकार का परिवर्तन आया है?
(A) चुनी हुई पंचायतों का सामने आना
(B) समृद्धि पर आधारित सम्मान
(C) अंतर्जातीय विवाहों का बढ़ना
(D) a + b + c
उत्तर:
a + b + c

20. भारत में इस्लाम का प्रभाव पड़ना कब शुरू हुआ?
(A) 13वीं शताब्दी
(B) 14वीं शताब्दी
(C) 15वीं शताब्दी
(D) 16वीं शताब्दी।
उत्तर:
13वीं शताब्दी।

21. The Caste Disability Prohibition Act कब पास हुआ था?
(A) 1842
(B) 1846
(C) 1850
(D) 1854
उत्तर:
1850

22. इनमें से कौन-सा धर्म निष्पक्षता का कारण है?
(A) नगरीकरण
(B) यातायात तथा संचार के साधन
(C) आधुनिकी शिक्षा
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

23. इनमें से कौन-सा अधिकार नागरिकों को भारतीय संविधान ने दिया है?
(A) संपत्ति का अधिकार
(B) साधारण अधिकार
(C) मौलिक अधिकार
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
मौलिक अधिकार।

24. पश्चिमीकरण का सिद्धांत किसने दिया था?
(A) श्रीनिवास
(B) मजूमदार
(C) घुर्ये
(D) मुखर्जी।
उत्तर:
श्रीनिवास।

25. पश्चिमीकरण का हमारे देश पर क्या प्रभाव पड़ा?
(A) जाति प्रथा कमजोर हो गई
(B) तलाक बढ़ गए
(C) केंद्रीय परिवार सामने आए
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

26. इनमें से कौन-सा पश्चिमीकरण का परिणाम है?
(A) संस्थाओं में परिवर्तन
(B) शिक्षा का फैलना
(C) मूल्यों में परिवर्तन
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

27. इनमें से कौन-सी संस्कृतिकरण की विशेषता है?
(A) स्थिति परिवर्तन
(B) उच्च जातियों की नकल
(C) कई माडल
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

28. संस्कृतिकरण का निम्न जातियों पर क्या प्रभाव पड़ा?
(A) निम्न जातियों में गतिशीलता
(B) निम्न जातियों की स्थिति में सुधार
(C) निम्न जातियों के पेशे में परिवर्तन
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

29. इनमें से कौन-सा देश भारत में पश्चिमीकरण का माडल है?
(A) ब्रिटेन
(B) अमेरिका
(C) जर्मनी
(D) फ्रांस।
उत्तर:
ब्रिटेन।

30. इनमें से कौन-सा पश्चिमीकरण का लक्षण है?
(A) आधुनिकीकरण से अलग
(B) भारतीय समाज पर ब्रिटिश संस्कृति का प्रभाव
(C) केवल शहरियों तक ही सीमित नहीं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

31. आधुनिकीकरण का मुख्य आधार क्या है?
(A) अच्छाई
(B) बुराई
(C) अच्छाई तथा बुराई
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
अच्छाई तथा बुराई।

32. कोई चीज़ जो पहले से नईं तथा अच्छी हो उसे क्या कहते हैं?
(A) आधुनिक
(B) औद्योगिक
(C) प्राचीन
(D) नगरीय।
उत्तर:
आधुनिक।

33. धर्म-निष्पक्षता, शिक्षा, नगरीकरण, नए अधिकार, मशीनें इत्यादि ……………. के लिए आवश्यक है।
(A) औद्योगिकरण
(B) आधुनिकीकरण
(C) संस्कृतिकरण
(D) नगरीकरण।
उत्तर:
आधुनिकीकरण।

34. भारत में कौन-सा उद्योग आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से प्रभावित हुआ है?
(A) कपड़ा उद्योग
(B) लोहा उद्योग
(C) चीनी उद्योग
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

35. भारत में आधुनिकीकरण लाने के लिए कौन उत्तरदायी है?
(A) मुगल शासक
(B) भारत सरकार
(C) ब्रिटिश सरकार
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार।

36. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जो परिवर्तन पर आधारित है तथा जो किसी चीज़ की अच्छाई तथा बुराई के बारे में बताती है?
(A) संस्कृतिकरण
(B) औद्योगीकरण
(C) नगरीकरण
(D) आधुनिकीकरण।
उत्तर:
आधुनिकीकरण।

37. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जिसमें निम्न जातियाँ उच्च जातियों में मिल जाती हैं?
(A संस्कृतिकरण
(B) नगरीकरण
(C) औद्योगीकरण
(D) आधुनिकीकरण।
उत्तर:
संस्कृतिकरण।

38. आधुनिकीकरण के लिए क्या आवश्यक है?
(A) शिक्षा का उच्च स्तर
(B) यातायात तथा संचार के साधनों में विकास
(C) उद्योगों को प्राथमिकता देना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

39. 19वीं सदी के सुधार आंदोलनों में किन कुरीतियों को रोकने के लिए विशेष बल दिया गया?
(A) सती प्रथा
(B) बाल विवाह
(C) विधवाओं के साथ दुर्व्यवहार
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

40. इनमें से कौन-सी संकल्पना श्री एम. एन. श्रीनिवास की देन है?
(A) संस्कृतिकरण
(B) पश्चिमीकरण
(C) प्रबल जाति
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संस्कृतिकरण की अवधारणा किस ने दी है?
उत्तर:
संस्कृतिकरण की अवधारणा एम० एन० श्रीनिवास ने दी है।

प्रश्न 2.
पश्चिमीकरण की अवधारणा किस ने दी है?
उत्तर:
पश्चिमीकरण की अवधारणा एम० एन० श्रीनिवास ने दी है।

प्रश्न 3.
भारत किस प्रकार का राज्य है?
उत्तर:
भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है तथा धर्म-निरपेक्षता उसे संविधान ने दी है।

प्रश्न 4.
धर्म-निरपेक्ष देश किसे कहते हैं?
उत्तर:
धर्म-निरपेक्ष देश वह होता है जहां किसी एक खास धर्म का आदर न होकर बल्कि सभी धर्मों का आदर हो तथा देश का अपना कोई धर्म न हो। सारे धर्म उसके लिए बराबर हों।

प्रश्न 5.
धर्म-निरपेक्षता का ज़रूरी तत्त्व क्या है?
उत्तर:
धार्मिक कट्टरता (संकीर्णता) का खात्मा धर्म-निरपेक्षता का ज़रूरी तत्त्व होता है।

प्रश्न 6.
धर्म-निरपेक्षता से किस जाति का प्रभाव कम हुआ है?
उत्तर:
धर्म-निरपेक्षता से ब्राह्मण जाति का प्रभाव कम हुआ है क्योंकि अब सभी धर्म तथा जातियां बराबर हैं।

प्रश्न 7.
धर्म-निरपेक्षता का मुख्य आधार क्या होता है?
उत्तर:
विज्ञान तथा तार्किकता धर्म-निरपेक्षता का मुख्य आधार होता है।

प्रश्न 8.
कहां की संस्कृति ने हमारे देश को प्रभावित किया है?
उत्तर:
पश्चिम की संस्कृति ने हमारे देश को प्रभावित किया है।

प्रश्न 9.
गांधी जी के अनुसार धर्म-निरपेक्ष क्या होता है?
उत्तर:
गांधी जी के अनुसार सभी धर्मों का आदर तथा बराबरी धर्म-निरपेक्ष का अर्थ होता है।

प्रश्न 10.
भारत में पर्दा प्रथा किसने शुरू की थी?
उत्तर:
भारत में पर्दा प्रथा मुसलमानों ने शुरू की थी।

प्रश्न 11.
भारत में कितने मुस्लिम रहते हैं?
उत्तर:
भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार 13% मुसलमान रहते हैं।

प्रश्न 12.
संस्कृतिकरण के दो सहायक कारक बताओ।
उत्तर:
औद्योगीकरण तथा नगरवाद संस्कृतिकरण के दो सहायक कारक हैं।

प्रश्न 13.
श्रीनिवास ने किस किताब में संस्कृतिकरण की व्याख्या की है?
अथवा
आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन नामक पुस्तक किस विचारक से संबंधित है?
उत्तर:
श्रीनिवास ने किताब लिखी थी Social Change in Modern India जिस में उन्होंने संस्कृतिकरण की व्याख्या की है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 14.
आधुनिकीकरण के मुख्य आधार क्या होते हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण के मुख्य आधार अच्छाई और बुराई होते हैं।

प्रश्न 15.
कौन-सी चीज़ आधुनिक होती है?
उत्तर:
जो चीज़ पुरानी चीज़ की जगह नयी तथा अच्छी हो उस चीज़ को आधुनिक कहते हैं।

प्रश्न 16.
आधुनिकीकरण के लिए क्या ज़रूरी है?
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता, शिक्षा, नगरीयकरण, नयी मशीनें, नए आविष्कार आधुनिकीकरण के लिए जरूरी हैं।

प्रश्न 17.
भारत में आधुनिकीकरण कब शुरू हुआ था?
उत्तर:
भारत में आधुनिकीकरण अंग्रेज़ों के आने के बाद शुरू हुआ जब उन्होंने यहां पर पश्चिमी शिक्षा का प्रसार तथा नयी फैक्टरियां लगानी शुरू की।

प्रश्न 18.
भारत में आधुनिकीकरण से प्रभावित तीन उद्योगों के नाम बताएं।
उत्तर:

  1. कपड़ा उद्योग
  2. लोहा उद्योग
  3. चीनी उद्योग।

प्रश्न 19.
संस्कृतिकरण से किस में परिवर्तन होता है?
उत्तर:
संस्कृतिकरण से जाति व्यवस्था की संरचना में परिवर्तन होता है जब छोटी जाति के लोग बड़ी जाति में मिलने की कोशिश करते हैं।

प्रश्न 20.
रामकृष्ण मिशन की स्थापना किसने की थी?
उत्तर:
रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने 1897 में की थी।

प्रश्न 21.
ब्रह्म समाज की स्थापना किसने की?
अथवा
ब्रह्म समाज की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
ब्रह्म समाज की स्थापना राजा राम मोहन राय ने 1820 में की।

प्रश्न 22.
सत्य शोधक समाज किसने चलाया था?
उत्तर:
सत्य शोधक समाज ज्योतिबा फूले ने ब्राह्मणों के खिलाफ चलाया था।

प्रश्न 23.
ज्योतिबा फूले ने पहला स्कूल कहाँ खोला था?
उत्तर:
ज्योतिबा फूले ने पहला स्कूल पूना में खोला था।

प्रश्न 24.
किसने लड़कियों के लिए सबसे पहला स्कूल खोला था?
उत्तर:
1851 में ज्योतिबा फूले ने सबसे पहले लड़कियों के लिए स्कूल खोला था।

प्रश्न 25.
D.A.V. का पूरा नाम क्या है?
उत्तर:
D.A.V. का पूरा नाम दयानंद ऐंग्लो वैदिक है।

प्रश्न 26.
जनजातीय आंदोलन क्यों शुरू हुए थे?
उत्तर:
जनजातीय आंदोलन अपनी संस्कृति को बचाने के लिए शुरू हुए थे ताकि वह औरों की संस्कृति में न मिल जाएं।

प्रश्न 27.
आधुनिक भारत का पिता (Father of Modern India) किसे कहा जाता है?
उत्तर:
राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का पिता (Father of Modern India) कहा जाता है।

प्रश्न 28.
समाज सुधार क्या होता है?
उत्तर:
जब समाज में चल रही कुरीतियों के विरुद्ध समाज के समझदार व्यक्ति कोई आंदोलन करें तथा उन कुरीतियों को बदलने का प्रयास करें तो उसे समाज सुधार कहते हैं।

प्रश्न 29.
समाज सुधार में गतिशीलता क्यों होती है?
उत्तर:
समाज सुधार में गतिशीलता इसलिए होती है क्योंकि समाज सुधार सभी समाजों तथा सभी युगों में एक समान नहीं होता। इसलिए यह गतिशील है।

प्रश्न 30.
समाज कल्याण क्या होता है?
उत्तर:
समाज कल्याण में उन संगठित सामाजिक कोशिशों या प्रयासों को शामिल किया जाता है जिनकी मदद से समाज के सारे सदस्यों को अपने आप को ठीक तरीके से विकसित करने की सुविधाएं मिलती हैं। समाज कल्याण के कार्यों में निम्न तथा पिछड़े वर्गों की तरफ विशेष ध्यान दिया जाता है ताकि समाज का हर तरफ से विकास तथा कल्याण हो सके।

प्रश्न 31.
समाज कल्याण के क्या उद्देश्य होते हैं?
उत्तर:

  1. पहला उद्देश्य यह है कि समाज के सदस्यों के हितों की पूर्ति उनकी ज़रूरतों के अनुसार होती रहे।
  2. ऐसे सामाजिक संबंध स्थापित करना जिससे लोग अपनी शक्तियों का पूरी तरह विकास कर सकें।

प्रश्न 32.
भारत के आज़ादी के आंदोलन से हमें क्या मिला?
उत्तर:
भारत के आजादी के आंदोलन से हमें आजादी मिली। इस आंदोलन में भारत की सारी जनता बगैर किसी भेदभाव के एक-दूसरे से कंधे से कंधा मिलाकर लड़ी जिस वजह से उनमें राष्ट्रीयता की भावना का विकास हुआ। निम्न जातियों में भी चेतना आई तथा वह उच्च जातियों के समान खड़े हो गए।

प्रश्न 33.
किन्हीं तीन समाज सुधारकों के नाम बताओ।
उत्तर:

  1. राजा राममोहन राय
  2. सर सैयद अहमद खान
  3. स्वामी दयानंद सरस्वती
  4. स्वामी विवेकानंद।

प्रश्न 34.
बेसिक शिक्षा की धारणा किसने दी थी?
उत्तर:
बेसिक शिक्षा की धारणा महात्मा गांधी ने 1937 में दी थी।

प्रश्न 35.
समाज कल्याण तथा समाज सुधार में कोई मुख्य फर्क बताओ।
उत्तर:
समाज कल्याण तथा समाज सुधार में मुख्य फर्क यह है कि समाज कल्याण में समाज की निम्न जातियों, पिछड़े वर्गों के सर्वांगीण विकास के लिए कार्य किए जाते हैं जबकि समाज सुधार में समाज में फैली हुई कुरीतियों को दर कर उनमें बदलाव लाने के प्रयास किए जाते हैं।

प्रश्न 36.
स्वदेशी आंदोलन के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:

  1. भारत की विरासत को महत्त्व देना तथा उसे स्पष्ट करना।
  2. देश के रचनात्मक निर्माण के प्रयास करने।

प्रश्न 37.
रामकृष्ण मिशन का प्रमुख उद्देश्य।
उत्तर:

  1. आत्मत्याग करने वाले साधु-संतों को बाहर भेजना ताकि वे वेदों का प्रचार कर सकें।
  2. मानवीयता के लिए बगैर किसी जात-पात, धर्म, रंग, स्थान के भेदभाव के कार्य करना।

प्रश्न 38.
थियोसोफिकल सोसाइटी के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:

  1. हिंदू धर्म में पुनः चेतना जगाना ताकि सोए हुए हिंदू जाग सकें।
  2. विश्व भ्रातरी भाव का तथा विश्व के सभी धर्मों की एकता का प्रचार करना।

प्रश्न 39.
सत्यशोधक समाज के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:

  1. उस समय समाज में चली आ रही ब्राह्मणों की उच्चता या श्रेष्ठता को चुनौती देना।
  2. शिक्षा, समानता, स्त्रियों की आजादी के प्रयास करने।

प्रश्न 40.
आर्य समाज का प्रमुख उद्देश्य।
उत्तर:

  1. आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य गुरुकुल प्रथा पर आधारित हिंदुओं की प्राचीन शिक्षा प्रणाली को दोबारा – जीवित करना।
    वेदों के प्रचार पर ज़ोर देना।
  2. उच्च स्तर पर अंग्रेज़ी शिक्षा को महत्त्व देना।

प्रश्न 41.
राजनीतिक आंदोलन क्या होता है?
उत्तर:
जो आंदोलन राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए चलाए जाएं उन्हें राजनीतिक आंदोलन कहते हैं। जैसे भारत की आज़ादी का आंदोलन।

प्रश्न 42.
सांस्कृतिक आंदोलन क्या होता है?
उत्तर:
जो आंदोलन अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए चलाया जाए उसे सांस्कृतिक आंदोलन कहते हैं। जैसे जनजातीय आंदोलन।

प्रश्न 43.
आज़ादी से पहले जाति आंदोलन क्यों चलाए गए थे?
उत्तर:

  1. आज़ादी से पहले जाति आंदोलन इसलिए चलाए गए थे ताकि ब्राह्मणों की और जातियों के ऊपर श्रेष्ठता का विरोध किया जा सके।
  2. जाति स्तरीकरण में अपनी जाति की स्थिति को ऊपर उठाया जा सके।

प्रश्न 44.
स्वामी विवेकानंद के जीवन का क्या मकसद था?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद के जीवन का मकसद आध्यात्मिकता को बढ़ावा देना तथा दैनिक जीवन के बीच की खाई को खत्म करना था।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 45.
आर्य समाज की कोई दो विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  1. आर्य समाज ने विधवा विवाह का प्रचार तथा बाल विवाह का विरोध किया।
  2. आर्य समाज ने अस्पृश्यता को समाप्त करने तथा सभी को वेदों को पढ़ने की स्वतंत्रता पर जोर दिया।

प्रश्न 46.
पारसियों के सुधार आंदोलन के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:

  1. पारसी स्त्री शिक्षा पर जोर दे रहे थे।
  2. पारसियों के सुधार आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य विवाह संबंधी रूढ़िवादिता को खत्म करना था।

प्रश्न 47.
मद्रास में भारतीय संघ की स्थापना किसने की थी?
उत्तर:
डॉ० ऐनी बेसेंट तथा श्रीमती काडसिस ने मद्रास में भारतीय संघ की स्थापना की थी।

प्रश्न 48.
भगत आंदोलन क्या होता है?
उत्तर:
भारत में निम्न जातियां उच्च जातियों के विचारों, तौर-तरीकों, व्यवहारों का अनुसरण करती हैं। इस प्रकार की रुचि तथा अनुसरण की प्रक्रिया को भगत आंदोलन कहते हैं।

प्रश्न 49.
सुधार आंदोलनों को सामाजिक आंदोलन क्यों कहते हैं?
उत्तर:
असल में सुधार आंदोलनों का मुख्य उद्देश्य समाज में पाई जाने वाली धार्मिक तथा सामाजिक कुरीतियों को दूर करना था इसलिए इन आंदोलनों को सामाजिक आंदोलन कहते हैं।

प्रश्न 50.
भारत में समाज सुधार आंदोलन क्यों शुरू हुए?
उत्तर:
अंग्रेजों के आने के बाद भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रसार हुआ। इस शिक्षा को ग्रहण करते-करते समाज के बहुत से सुलझे हुए लोगों को पता चला कि उनके समाज में जो रीतियां, जैसे सती प्रथा, बाल विवाह इत्यादि चल रही हैं वह असल में रीतियां नहीं बल्कि कुरीतियां हैं। उन्हें पश्चिमी देशों में जाने तथा वहां के लोगों से बातें करने का मौका मिला जिससे उनकी आँखें खुल गईं तथा अपने समाज में फैली कुरीतियों, कुप्रथाओं, अंधविश्वासों को दूर करने के लिए सुधार आंदोलन चल पड़े।

प्रश्न 51.
सर्वोदय शब्द किसने दिया था?
उत्तर:
सर्वोदय शब्द महात्मा गांधी ने दिया था। उनके अनुसार सिद्धांतों वाला व्यक्ति और लोगों को जीवित रखने के लिए खुद मर जाता है।

प्रश्न 52.
हमारे समाज में सती प्रथा क्यों प्रचलित थी?
उत्तर:

  1. हमारे समाज में सती प्रथा इसलिए प्रचलित थी क्योंकि विवाह को जन्मों का संबंध माना जाता था। इसलिए पति की मृत्यु के पश्चात् पत्नी को भी मरना पड़ता था।
  2. इसके साथ एक और भी भावना थी कि ऐसा करने से भगवान् खुश हो जाएंगे तथा सती को मोक्ष प्राप्त हो जाएगा।

प्रश्न 53.
विवेकानंद के प्रचार के मुख्य अंश क्या थे?
उत्तर:

  1. जीवन ही धर्म है। इसलिए जीवन को धर्म मानकर जीना चाहिए।
  2. जीव की सेवा करना शिव की सेवा करने के समान है।
  3. ईश्वर मनुष्य के अंदर ही वास करता है।
  4. मनुष्यों की सेवा करने के लिए आधुनिक तकनीकों का प्रयोग ज़रूरी है।

प्रश्न 54.
पुराने समय में किस धार्मिक भाषा का प्रयोग होता था?
उत्तर:
पुराने समय में संस्कृत का धार्मिक भाषा के रूप में प्रयोग होता था।

प्रश्न 55.
संस्कृतिकरण क्या है?
उत्तर:
जब निम्न हिंदू जातियों के लोग उच्च हिंदू जातियों की नकल करने लग जाएं तथा अपने आप को उच्च जाति में मिलाने की कोशिश करें तो उस प्रक्रिया को संस्कृतिकरण कहते हैं।

प्रश्न 56.
सांस्कृतिक परिवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
जब किसी समाज या देश की संस्कृति में परिवर्तन होने लग जाएं तो उसे सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 57.
धर्म-निरपेक्षता का अर्थ दीजिए।
अथवा
धर्म-निरपेक्षीकरण से आप क्या समझते हैं?
अथवा
पंथ निरपेक्षीकरण क्या है?
उत्तर:
धर्म-निरपेक्षता को लौकिकीकरण भी कहते हैं। इसका मतलब यह है कि जो पहले धार्मिक था वह अब धार्मिक नहीं रहा। अब सभी धर्म बराबर हो गए हैं तथा कोई धर्म छोटा-बड़ा नहीं है। धर्म-निरपेक्षता में विचारों परंपराओं, धर्म इत्यादि में विज्ञान या तार्किकता लाने का प्रयास किया जाता है।

प्रश्न 58.
पश्चिमीकरण से आप क्या समझते है?
अथवा
पश्चिमीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब हमारे देश में पश्चिम के देशों के विचारों, तौर-तरीकों इत्यादि को अपनाया जाता है तो उसे पश्चिमीकरण कहते हैं।

प्रश्न 59.
असंस्कृतिकरण क्या होता है?
उत्तर:
यह संस्कृतिकरण का बिल्कुल उल्टा है। जब उच्च जाति के लोग निम्न जाति के लोगों के कार्य अपना लें तो उसे असंस्कृतिकरण कहते हैं। उदाहरण के तौर पर, किसी ब्राह्मण का जूतों की दुकान खोलना। यह आजकल ही मुमकिन है।

प्रश्न 60.
संस्कृति क्या होती है?
उत्तर:
जो कुछ भी मनुष्य ने प्राचीन समय से लेकर आज तक अपनी बुद्धिमता से हासिल किया है वह उसकी संस्कृति होती है। यह ऐसे विचारों, भावों, तरीकों का जोड़ है जो एक पीढ़ी द्वारा दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित किया जाता है। संस्कृति एक सीखा हुआ व्यवहार है।

प्रश्न 61.
पुनः संस्कृतिकरण क्या होता है?
उत्तर:
जब एक निम्न जाति के लोग उच्च जाति के लोगों के हाव-भाव, रहने-सहने के तरीके या संस्कृति अपनाते हैं तो वह संस्कृतिकरण होता है। पर जब निम्न जाति के लोग उच्च जाति की संस्कृति को छोड़ कर दोबारा अपनी संस्कृति या तौर-तरीकों को अपना लेते हैं तो उसे पुनः संस्कृतिकरण कहते हैं।

प्रश्न 62.
इस्लाम धर्म ने हमारे समाज पर क्या प्रभाव डाले हैं?
उत्तर:

  1. इस्लाम धर्म से ही परदा प्रथा हमारे समाज में आई।
  2. इस्लाम धर्म ने ही हमारी जाति प्रथा पर प्रभाव डाला उसके प्रतिबंध और सख्त हो गए।
  3. इस्लाम धर्म की वजह से हमारे विवाह संबंधी बंधन और सख्त हो गए।

प्रश्न 63.
संस्कृतिकरण की कोई दो विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  1. संस्कृतिकरण में निम्न जाति द्वारा उच्च जाति का अनुसरण किया जाता है।
  2. यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
  3. इसमें निम्न वर्गों का सामाजिक परिवर्तन हो जाता है।

प्रश्न 64.
पश्चिमीकरण ने हमारे समाज पर क्या प्रभाव डाले?
अथवा
भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के कोई दो प्रभाव बताइये।
उत्तर:

  1. पश्चिमीकरण की वजह से जाति प्रथा कमजोर हुई।
  2. इस की वजह से विवाह संबंध-विच्छेद तथा तलाक बढ़ने लगे।
  3. इस की वजह से औरतों ने घर से बाहर निकलना शुरू कर दिया।

प्रश्न 65.
प्रभु जाति क्या होती है?
उत्तर:
वह जाति जिसके पास कृषि योग्य भूमि ज्यादा होती है तथा जिसका निम्न जातियां अनुसरण करती हैं वह प्रभु जाति होती है।

प्रश्न 66.
आधुनिकीकरण किसे कहते हैं?
अथवा
आधुनिकीकरण का क्या अर्थ है?
अथवा
आधुनिकीकरण क्या है?
अथवा
आधुनिकीकरण की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
वह प्रक्रिया जो परिवर्तन की प्रक्रिया पर आधारित होती है तथा जिसमें अच्छे बुरे, नई पुरानी इत्यादि भावनाओं का आभास होता है, वह आधुनिकीकरण की प्रक्रिया होती है। धर्म निरपेक्षता, शिक्षा, नगरीकरण, नई मशीनें, नए अधिकार इत्यादि आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक है।

प्रश्न 67.
आधुनिकीकरण के तीन नकारात्मक प्रभाव बताएं।
उत्तर:

  1. आधुनिकीकरण के कारण ग्रामीण क्षेत्रों के संयुक्त परिवार टूट रहे हैं तथा केंद्रीय परिवार सामने आ रहे हैं।
  2. भोग विलास की चीजें बढ़ रही हैं जिसका नई पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है।
  3. इस कारण लोगों में अनैतिकता बढ़ रही है तथा समाज में अनैतिक कार्य बढ़ रहे हैं।

प्रश्न 68.
आधुनिकीकरण को संभव बनाने के लिए कौन-सी प्रमुख परिस्थितियाँ आवश्यक हैं?
उत्तर:
आधुनिकीकरण को संभव बनाने के लिए सरकार की दृढ़ शक्ति, जनता की राय, उच्च शिक्षा का होना, धन की बहुतायत, उद्योगों का होना इत्यादि अति आवश्यक है।

प्रश्न 69.
आधुनिकता की परिभाषा एस० सी० दूबे के अनुसार बताएं।
उत्तर:
दूबे के अनुसार, “आधुनिकीकरण एक प्रक्रिया है जो परंपरागत या अर्ध परंपरागत व्यवस्था से किन्हीं इच्छित प्रारूपों तथा उनसे जुड़ी हुई सामाजिक संरचना के स्वरूपों, मूल्यों, प्रेरणाओं तथा सामाजिक आदर्श नियमों की ओर होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।

प्रश्न 70.
आधुनिकीकरण के लिए क्या ज़रूरी है?
अथवा
आधुनिकीकरण को संभव बनाने के लिए कौन-सी प्रमुख परिस्थितियां आवश्यक हैं?
उत्तर:

  1. इसके लिए शिक्षा का स्तर अच्छा होना चाहिए।
  2. यातायात तथा संचार के साधनों का विकास होना चाहिए।
  3. संचार के माध्यमों का भी विकास होना चाहिए।
  4. कृषि की जगह उद्योग ज्यादा होने चाहिएं।

प्रश्न 71.
भारत एक ………………. देश है।
उत्तर:
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है।

प्रश्न 72.
संस्कृति के मूर्त भाग को ……………….. कहते हैं।
उत्तर:
संस्कृति के मूर्त भाग को भौतिक संस्कृति कहते हैं।

प्रश्न 73.
शिक्षा की परिभाषा दें।
उत्तर:
ब्राउन तथा रासेक के अनुसार, “शिक्षा अनुभव की वह संपूर्णता है जो किशोर और वयस्क दोनों की अभिवृत्तियों को प्रभावित करती है तथा उनके व्यवहारों का निर्धारण करती है।”

प्रश्न 74.
शिक्षा के दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  1. शिक्षा व्यक्ति को घटनाओं का सही विश्लेषण करने का ज्ञान देकर उसे समाज का अंग बना देती है।
  2. शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण कार्य समाज में से अनैतिकता, हिंसा, संघर्ष, स्वार्थ इत्यादि बुराइयों को दूर करना तथा इसके स्थान पर नैतिकता, प्यार इत्यादि का विकास करना है।

प्रश्न 75.
औपचारिक शिक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर:
औपचारिक शिक्षा वह शिक्षा होती है जो हम औपचारिक तौर पर स्कूल, कालेज, विश्वविद्यालय इत्यादि में जाकर प्राप्त करते हैं। इस तरह की शिक्षा में स्पष्ट पाठ्यक्रम निश्चित किया जाता है तथा उसके अनुसार ही शिक्षा दी जाती है।

प्रश्न 76.
अनौपचारिक शिक्षा किसे कहते हैं?
उत्तर:
अनौपचारिक शिक्षा वह होती है जो व्यक्ति स्कूल, कॉलेज में नहीं बल्कि अपने रोजाना के अनुभव, अन्य व्यक्तियों के विचारों, परिवार, पड़ोस इत्यादि से प्राप्त करता है। व्यक्ति जो कुछ भी अपने रोज़ाना जीवन से सीखता है उसे अनौपचारिक शिक्षा कहते हैं।

प्रश्न 77.
संस्कृति किसे कहते हैं?
उत्तर:
आदिकाल से लेकर आज तक जो कुछ मनुष्य ने प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है। विचार, फिलासफी, भावनाएं, मशीनें, कारें, बसें, शिक्षा इत्यादि सब कुछ संस्कृति का हिस्सा है।

प्रश्न 78.
सभ्यता किसे कहते हैं?
उत्तर:
संस्कृति के विकसित रूप को सभ्यता कहते हैं अर्थात् जब संस्कृति विकसित हो जाती है तो सभ्यता की स्थिति सामने आती है।

प्रश्न 79.
ब्रह्म समाज का प्रमुख उद्देश्य।
उत्तर:
ब्रह्म समाज का प्रमुख उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, जाति प्रथा, विधवा विवाह की मनाही इत्यादि को दूर करता था।

प्रश्न 80.
वेद ………………….. का धार्मिक ग्रंथ है।
अथवा
वेद किस धर्म के धार्मिक ग्रंथ हैं?
उत्तर:
वेद हिंदुओं का धार्मिक ग्रंथ है।

प्रश्न 81.
कुरान ………………….. का धार्मिक ग्रंथ है।
उत्तर:
करान मसलमानों का धार्मिक ग्रंथ है।

प्रश्न 82.
आर्य समाज के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
आर्य समाज में संस्थापक दयानंद सरस्वती थे।

प्रश्न 83.
संस्कृतिकरण का प्रभुजाति मॉडल क्या है?
उत्तर:
ब्राह्मण संस्कृतिकरण का प्रभुजाति मॉडल है।

प्रश्न 84.
बाइबल …………………. का धार्मिक ग्रंथ है।
उत्तर:
बाइबल इसाइयों का धार्मिक ग्रंथ है।

प्रश्न 85.
संस्कृतिकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया?
उत्तर:
संस्कृतिकरण शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम एम० एन० श्रीनिवास ने किया था।

प्रश्न 86.
संस्कृतिकरण का वर्ण मॉडल क्या है?
उत्तर:
संस्कृतिकरण का वर्ण मॉडल ब्राह्मण वर्ण है।

प्रश्न 87.
‘गुरुग्रंथ साहिब’ किस धर्म के अनुयायियों की धार्मिक पुस्तक है?
उत्तर:
‘गुरुग्रंथ साहिब’ सिक्ख धर्म के अनुयायियों की धार्मिक पुस्तक है।

प्रश्न 88.
संस्कृतिकरण की अवधारणा प्रो० एम० एन० श्रीनिवासन ने दी है। यह कथन सही है या गलत।
उत्तर:
यह कथन सही है कि संस्कृतिकरण की अवधारणा प्रो० एम० एन० श्रीनिवासन ने दी है।

प्रश्न 89.
भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है या नहीं?
उत्तर:
भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है।

प्रश्न 90.
स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की या ‘ब्रह्म समाज’ की?
उत्तर:
स्वामी दयानंद सरस्वती ने ‘आर्य समाज’ की स्थापना की।

प्रश्न 91.
भारत पर पश्चिमीकरण के अंतर्गत किस देश का प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
भारत पर पश्चिमीकरण के अंतर्गत इंग्लैंड का प्रभाव पड़ा।

प्रश्न 92.
भारत के किसी प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यक का नाम बताएँ।
उत्तर:
मुस्लिम समुदाय भारत का प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यक समुदाय है।

प्रश्न 93.
भारत में उपनिवेशवाद का अंत कब हुआ?
उत्तर:
भारत में उपनिवेशवाद का अंत 15 अगस्त, 1947 को हुआ जब भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

प्रश्न 94.
गीता किस धर्म से संबंधित धार्मिक पुस्तक है?
उत्तर:
गीता हिंदू धर्म से संबंधित धार्मिक पुस्तक है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 95.
संस्कृतिकरण का संबंध किसमें परिवर्तन होने से है?
उत्तर:
संस्कृतिकरण का संबंध जाति में परिवर्तन होने से है।

प्रश्न 96.
भारत सरकार किस धर्म को मान्यता प्रदान करती है?
उत्तर:
भारत सरकार किसी एक धर्म को नहीं बल्कि सभी धर्मों को समान रूप से मान्यता प्रदान करती है।

प्रश्न 97.
पश्चिमीकरण का संबंध किससे है?
उत्तर:
पश्चिमीकरण का संबंध पश्चिमी देशों की संस्कृति अपनाने से है।

प्रश्न 98.
राजा राममोहन राय को किस व्यक्तित्व के रूप में जाना जाता है?
उत्तर:
राजा राममोहन राय को भारतीय परिवर्तन के जनक या पितामह के रूप में जाना जाता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
समाज सुधार आंदोलनों की मदद से हम क्या परिवर्तन ला सकते हैं?
उत्तर:
भारत एक कल्याणकारी राज्य है जिसमें हर किसी को समान अवसर उपलब्ध होते हैं। पर कल्याणकारी राज्य का उद्देश्य जनता के जीवन को सुखमय बनाना है। पर यह तभी संभव है अगर समाज में फैली हुई कुरीतियों तथा अंध-विश्वासों को दूर कर दिया जाए। इन को दूर सिर्फ समाज सुधारक आंदोलन ही कर सकते हैं। सिर्फ कानून बनाकर कुछ हासिल नहीं हो सकता। इसके लिए समाज में सुधार ज़रूरी हैं। कानून बना देने से सिर्फ कुछ नहीं होगा।

उदाहरण के तौर पर बाल विवाह, दहेज प्रथा, विधवा विवाह, बच्चों से काम न करवाना। इन सभी के लिए कानून हैं पर ये सब चीजें आम हैं। दहेज लिया दिया, यहां तक कि मांग कर लिया जाता है, बाल विवाह होते हैं, विधवा विवाह को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता। हमारे समाज के विकास में यह चीजें सबसे बड़ी बाधाएं हैं। अगर हमें समाज का विकास करना है तो हमें समाज सुधार आंदोलनों की आवश्यकता है। इसलिए हम समाज सुधार आंदोलनों के महत्त्व को भूल नहीं सकते।

प्रश्न 2.
सामाजिक आंदोलन की कोई चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  1. सामाजिक आंदोलन हमेशा समाज विरोधी होते हैं।
  2. सामाजिक आंदोलन हमेशा नियोजित तथा जानबूझ कर किया गया प्रयत्न है।
  3. इसका उद्देश्य समाज में सुधार करना होता है।
  4. इसमें सामूहिक प्रयत्नों की ज़रूरत होती है क्योंकि एक व्यक्ति समाज में परिवर्तन नहीं ला सकता।

प्रश्न 3.
सामाजिक आंदोलन की किस प्रकार की प्रकृति होती है?
उत्तर:

  1. सामाजिक आंदोलन संस्थाएं नहीं होते हैं क्योंकि संस्थाएं स्थिर तथा रूढ़िवादी होती हैं तथा संस्कृति का ज़रूरी पक्ष मानी जाती हैं। यह आंदोलन अपना उद्देश्य पूरा होने के बाद खत्म हो जाते हैं। सामाजिक आंदोलन समितियां भी नहीं हैं क्योंकि समितियों का
  2. एक विधान होता है। यह आंदोलन तो अनौपचारिक, असंगठित तथा परंपरा के विरुद्ध होता है।
  3. सामाजिक आंदोलन दबाव या स्वार्थ समूह भी नहीं होते बल्कि यह आंदोलन सामाजिक प्रतिमानों में बदलाव की मांग करते हैं।

प्रश्न 4.
ब्रह्म समाज के मुख्य उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
राजा राममोहन राय ने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की थी जिसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  1. इनका मुख्य उद्देश्य समाज में फैली कुरीतियों जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, जाति प्रथा, विधवा विवाह की मनाही इत्यादि को दूर करना था।
  2. यह समाज स्त्रियों को शिक्षा देकर समाज में ऊँचा दर्जा दिलाने के पक्ष में था।
  3. ब्रह्म समाज अंतर्जातीय विवाहों को भी करवाने के पक्ष में था।
  4. ब्रह्म समाज के प्रयत्नों से ही सती प्रथा निरोधक कानून 1829 तथा विधवा पुनर्विवाह कानून 1856 . बना था।

प्रश्न 5.
19वीं तथा 20वीं शताब्दी के कुछ संगठनों के नाम बताओ जिन्होंने समाज सुधार के कार्य किए थे।
उत्तर:

  1. आर्य समाज
  2. ब्रह्म समाज
  3. प्रार्थना समाज
  4. संगत सभा
  5. रामकृष्ण मिशन
  6. हरिजन सेवक संघ
  7. विधवा विवाह संघ
  8. आर्य महिला समाज।

प्रश्न 6.
मुसलमानों में जो सुधार कार्य किए गए उनका वर्णन करो।
उत्तर:
मुसलमानों में सुधार आंदोलन चलाने का श्रेय सर सैय्यद अहमद खान को जाता है। 1857 के पश्चात उन्होंने देखा कि मुसलमान अंग्रेजों के विरोधी हैं तथा अंग्रेज़ उन पर अत्याचार कर रहे हैं तथा इन्हें दबा रहे हैं। इसलिए मुस्लिमों को ऊपर उठाने के लिए उन्होंने सुधार कार्य शुरू किए। उन्होंने मुस्लिमों में फैली बुराइयों को दूर करने के प्रयास किए। उन्होंने एक पत्रिका निकाली जिसमें मुसलमानों को नई तकनीकें अपनाने के लिए उत्साहित किया।

उन्हीं की कोशिशों से 1875 में अलीगढ़ में एक स्कूल खोला गया जो 1918 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में तबदील हो गया। उन्होंने बहु-पत्नी विवाह, पर्दा प्रथा, बाल विवाह के विरुद्ध प्रचार किया। वह स्त्री शिक्षा के समर्थक थे। इसी तरह कई और मुस्लिम समाज सुधारकों ने मुस्लिमों में जागृति लाने के प्रयास किए। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई जिनके प्रयासों के फलस्वरूप पाकिस्तान की स्थापना हुई।

प्रश्न 7.
स्वदेशी आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
स्वदेशी आंदोलन का अर्थ है लोगों के दवारा देश में ही बनी चीज़ों का उपयोग करना, अपने देश की संस्कृति का प्रचार व प्रसार करना, राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहन देना, देसी उद्योगों की स्थापना करना। इस के साथ साथ विदेशी चीजों, शैक्षणिक संस्थानों, बैंकों, दुकानों आदि का बहिष्कार करना। यह शुरू हुआ था 1905 के बाद जब अंग्रेजों ने भारतीयों में फूट डालने की नीयत से बंगाल को दो भागों में बांट दिया।

इसके विरोध में लोगों ने बंगाल में स्वदेशी आंदोलन शुरू कर दिया जो कि शीघ्र ही पूरे देश में फैल गया। इसमें स्वदेशी चीज़ों को बढ़ावा दिया गया तथा विदेशी चीज़ों का बहिष्कार किया गया। आम जनता ने भी इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया। इसके परिणामस्वरूप स्वदेशी चीज़ों की खपत बढ़ गई, भारतीय उद्योगों का विकास हुआ, राष्ट्रीय शिक्षा को प्रोत्साहन मिला तथा सरकार के विरुदध व्यापक जनाधार बन गया।

प्रश्न 8.
जनजातीय आंदोलन क्यों शुरू हुए थे?
उत्तर:
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सैंकड़ों जनजातियों के लोग रहते हैं। इनकी अपनी विशिष्ट जीवन शैली होती है। उनकी ज़रूरतें भी कम होती हैं। वह अपनी संस्कृति व अलग जनजातीय पहचान बनाए रखने के प्रति बहुत सचेत होते हैं। यदि जनजाति के सदस्यों को लगे कि उनकी संस्कृति से छेड़छाड़ की जा रही है, इसमें परिवर्तन करने की कोशिश की जा रही है या उनकी मांगों की अनदेखी की जा रही है या उनकी अपनी अलग पहचान बनाए रखने में कोई खतरा है तो वे आंदोलन का रास्ता अपना लेते हैं।

इसके अलावा अन्य समदायों, धर्मों तथा वर्गों के लोगों के प्रभाव के कारण निश्चित तरह के परिवर्तन की इच्छा से भी जनजातियों के लोग आंदोलन करने लगते हैं। उदाहरण के तौर पर बिहार से झारखंड राज्य अलग करने की मांग को लेकर आंदोलन हुआ। बिरसा मुंडा ने मुंडा जनजाति में ईसाइयत के विरुद्ध आंदोलन चलाया। बिरसा को मुंडा जनजाति के लोग बिरसा भगवान् कहते थे। उसके कहने के फलस्वरूप इस जनजाति के उन लोगों, जिन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया था, ने हिंदू धर्म को पुनः अपना लिया तथा मूर्ति पूजा, हिंदू कर्म-कांडों तथा रीति-रिवाजों का पालन करने लगे।

प्रश्न 9.
पारसियों में सुधार आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
19वीं शताब्दी में भारतीय समाज के अलग-अलग समुदायों तथा वर्गों के लोगों ने सामाजिक तथा धार्मिक आंदोलन चलाए। पारसी भी समाज सुधार आंदोलनों में पीछे नहीं रहे। सन् 1851 में पारसी नेताओं दादा भाई नौरोजी (Dadabhai Naoroji), नौरोजी फुरदोंजी (Naoroji Furdonji) तथा जे० बी० बाचा (J.B. Bacha) इत्यादि ने मिलकर ‘रेहनुमाइ मजदयासन सभा’ या धार्मिक सुधार सभा का गठन किया।

पारसी धर्म में सुधार लाना तथा इस धर्म के सदस्यों को आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के साथ जोड़ना इस सभा का प्रमुख उद्देश्य था। 1900 में पारसियों ने धार्मिक सम्मेलन का आयोजन किया। इन सब गतिविधियों के अलावा पत्रिकाओं व समाचार-पत्रों में लेखों, भाषणों तथा बैठकों के माध्यम से पारसी नेताओं ने पारसी धर्म के अनुयायियों को धार्मिक रूढ़ियों व अंध-विश्वासों को छोड़ने के लिए प्रेरित किया। स्त्रियों की दशा सुधारने तथा उनकी शिक्षा के लिए उन्होंने विशेष प्रयत्न किए। इन सब प्रयासों के कारण पारसी आज भारतीय समाज के सबसे पश्चिमीकृत वर्ग बन गए हैं।

प्रश्न 10.
राजा राममोहन राय ने भारत के समाज सुधारों में क्या योगदान दिया था?
अथवा
समाज, धर्म और स्त्रियों की परिस्थिति में सुधार करने के लिए राजा राममोहन राय ने क्या प्रयास किया?
उत्तर:
राजा राममोहन राय को आधुनिक भारत का पिता भी कहते हैं। उन्होंने भारतीय समाज सुधार आंदोलन में बहुत बड़ा योगदान दिया जिसका वर्णन निम्नलिखित है-

  • राजा राममोहन राय की कोशिशों के फलस्वरूप भारतीय समाज में चली आ रही बहुत बड़ी कुरीति सती प्रथा को 1829 में कानून बनाकर ब्रिटिश सरकार ने गैर-कानूनी घोषित कर दिया था।
  • राजा राममोहन राय ने 1828 में ब्रहमो समाज की स्थापना की जो काफी समय तक भारतीय समाज की कुरीतियों को दूर करने में लगा रहा।
  • राजा राममोहन राय ने पश्चिमी शिक्षा का समर्थन किया क्योंकि उन्होंने खुद भी पश्चिमी शिक्षा ग्रहण की थी तथा उन्होंने युवाओं को भी पश्चिमी शिक्षा लेने के लिए प्रेरित किया।
  • उन्होंने जाति प्रथा, जो कि भारतीय समाज को काफ़ी हद तक खोखला कर चुकी थी, के विरुद्ध भी जमकर आवाज़ उठाई।
  • उन्होंने स्त्रियों को ऊपर उठाने के काफी प्रयास किए। वह सती प्रथा, बाल विवाह के विरोधी तथा विधवा विवाह और स्त्रियों की शिक्षा के बहुत बड़े समर्थक थे।

प्रश्न 11.
रामकृष्ण मिशन के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
रामकृष्ण मिशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  • सभी जातियों व संप्रदायों के लोगों को दयायुक्त, दानयुक्त तथा मानवीय कार्य करवाना।
  • सामाजिक कुरीतियों तथा अंधविश्वासों को खत्म करना।
  • स्त्रियों का स्थान उच्च करने के लिए कार्य करना।
  • सब जीवमात्र की सेवा का प्रचार करना।
  • मनुष्य की शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक क्षमताओं का विकास करना।
  • आत्मत्यागी तथा व्यावहारिक अध्यात्मवादी साधुओं को रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों के प्रचार तथा प्रसार के लिए तैयार करना।

प्रश्न 12.
भारत में समाज सुधार आंदोलन क्यों शुरू हुए?
उत्तर:
भारत में समाज सुधार आंदोलन निम्नलिखित कारणों से शुरू हुए-

  • भारतीय समाज में फैली कुरीतियों को धर्म के साथ जोड़ा हुआ था।
  • समाज का जातीय आधार पर विभाजन था तथा जाति धर्म के आधार पर बनी हुई थी। जाति के नियमों को तोड़ना पाप माना जाता था।
  • भारतीय समाज में स्त्रियों की दशा काफ़ी निम्न थी जिस वजह से उनका कोई महत्त्व नहीं रह गया था।
  • भारतीय समाज में अशिक्षा का बोलबाला था।
  • जाति प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह की मनाही इत्यादि बहुत-सी कुरीतियां समाज में फैली हुई थीं।

इन सब कारणों की वजह से शिक्षित समाज सुधारकों ने समाज सुधार करने की ठानी तथा समाज सुधार आंदोलन शुरू हो गए।

प्रश्न 13.
समाज में फैली कुरीतियों के बारे में गांधी जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
समाज में फैली बहुत-सी बुराइयों या कुरीतियों पर गांधी जी के निम्नलिखित विचार थे-

  • गांधी जी के अनुसार निम्न जातियों को उच्च जातियों के बराबर होना चाहिए। इसलिए उन्होंने निम्न जातियों के लोगों को हरिजन का नाम दिया तथा उनके उत्थान के कई कार्य किए।
  • स्त्रियां भी उनके अनुसार पुरुषों के समान हैं। इसलिए गांधी जी ने स्त्रियों को भी राष्ट्रीय आंदोलन में आमंत्रित किया जिस वजह से लाखों स्त्रियां इस आंदोलन में कूद पड़ी।
  • गांधी जी नशाखोरी के भी विरुद्ध थे। इसलिए उन्होंने 1926 में इसके विरुद्ध आंदोलन चलाया था।
  • उनके अनुसार जब तक भारतीय समाज से अस्पृश्यता खत्म नहीं हो जाती तब तक आजादी का कोई फायदा नहीं है।
  • गांधी जी दहेज प्रथा के भी विरुद्ध थे। उनके अनुसार दहेज लेने वाले देश के गद्दार हैं।

प्रश्न 14.
आज़ादी से पहले चले सामाजिक आंदोलनों की विशेषताएं क्या थी?
उत्तर:
आज़ादी से पहले चले सामाजिक आंदोलनों की निम्नलिखित विशेषताएं थीं-

  • आजादी से पहले चले सामाजिक आंदोलनों की पहली विशेषता यह थी कि हिंदू धर्म को तार्किक रूप से स्थापित करना क्योंकि इसने मुस्लिम शासकों तथा अंग्रेजों के कई थपेड़ों को झेला था।
  • महिलाओं, हरिजनों तथा शोषित वर्गों को ऊपर उठाना ताकि यह वर्ग भी और वर्गों की तरह सर उठाकर जी सकें।
  • ये आंदोलन परंपरागत रूढ़िवादी विचारधाराओं को समाप्त करके उनकी जगह नयी व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे।
  • ये आंदोलन जाति व्यवस्था की असमानता की बेड़ियों को तोड़कर समानता तथा भाईचारे की भावना को स्थापित करना चाहते थे।
  • ये आंदोलन भारतीय जनता में प्यार, भाईचारे, सहनशीलता, त्याग आदि भावनाओं का विकास करना चाहते थे।

प्रश्न 15.
क्रांतिकारी आंदोलन की क्या विशेषताएं होती हैं?
उत्तर:
क्रांतिकारी आंदोलन की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं-

  • क्रांतिकारी आंदोलन प्रचलित पुरानी व्यवस्था को उखाड़ कर उसकी जगह नयी व्यवस्था को लागू करना चाहते हैं।
  • क्रांतिकारी आंदोलन में हिंसात्मक तथा दबाव वाले तरीके अपनाए जाते हैं।
  • क्रांतिकारी आंदोलन हमेशा तभी चलाए जाते हैं जब सामाजिक बुराइयों को दूर करना हो।
  • क्रांतिकारी आंदोलन हमेशा निरंकुश शासन में तथा उसे खत्म करने के लिए चलाए जाते हैं।
  • क्रांतिकारी आंदोलनों में हमेशा उग्रता तथा तीव्रता पाई जाती है।

प्रश्न 16.
सुधारवादी आंदोलन की क्या विशेषताएं होती हैं?
उत्तर:
सुधारवादी आंदोलन की निम्नलिखित विशेषताएं होती हैं-

  • सुधारवादी आंदोलन प्राचीन सामाजिक व्यवस्था में सुधार करना चाहता है।
  • सुधारवादी आंदोलनों की गति हमेशा धीमी होती है।
  • सुधारवादी आंदोलनों में हमेशा शांतिपूर्ण तरीके अपनाए जाते हैं तथा यह समाज में शांतिपूर्ण परिवर्तन के लिए चलाए जाते हैं।
  • यह आम तौर पर प्रजातांत्रिक देशों में पाया जाता है।

प्रश्न 17.
सिंह सभा आंदोलन के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
सिंह सभा आंदोलन के निम्नलिखित उद्देश्य थे-

  • सिक्ख धर्म में पवित्रता पुनः स्थापित करना।
  • सिक्ख धर्म तथा संस्कृति संबंधी साहित्य का विकास करना।
  • धर्म परिवर्तित सिक्खों को वापिस सिक्ख धर्म में वापस लाना।
  • सिक्खों में प्रचलित अंधविश्वासों तथा कुरीतियों को दूर करना।
  • शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार करना।
  • स्त्री-पुरुषों को समान अधिकार दिलवाना
  • सिक्ख धर्म के प्रचार तैयार कर इसके प्रचार के लिए कार्य करना।

प्रश्न 18.
ब्रहम समाज तथा आर्य समाज में अंतर बताओ।
उत्तर:
ब्रह्म समाज तथा आर्य समाज में अंतर निम्नलिखित हैं-

  • आर्य समाज का एक पवित्र ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ है जबकि ब्रह्म समाज का कोई ग्रंथ नहीं है।
  • आर्य समाज में वेदों को ही हर चीज़ का मूल माना गया है जबकि ब्रह्म समाज में ऐसा कुछ नहीं है।
  • आर्य समाजी स्वदेशी भाषा को पढ़ने पर जोर देते थे पर ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय अंग्रेजी भाषा की पढ़ाई पर जोर देते थे।
  • आर्य समाज ने स्त्री शिक्षा पर विशेष जोर दिया पर राजा राममोहन राय ने सती प्रथा को खत्म करने पर जोर दिया।
  • आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती वैदिक संस्कृति अपनाने पर जोर देते थे पर राजा राममोहन राय को पश्चिमी संस्कृति अपनाने में कोई परेशानी नहीं थी।

प्रश्न 19.
पश्चिमीकरण के क्या परिणाम हो सकते हैं?
अथवा
भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
पश्चिमीकरण के परिणाम निम्नलिखित हैं-
(i) संस्थाओं में परिवर्तन-पश्चिमीकरण की वजह से हमारे समाज में चल रही कई प्रकार की संस्थाओं में बहुत से परिवर्तन आ गए हैं। विवाह, परिवार, जाति प्रथा, धर्म इत्यादि संस्थाओं में जो रूढ़िवादिता पहले देखने को मिलती थी वह अब देखने को नहीं मिलती।

(ii) मूल्यों में परिवर्तन-इस वजह से मूल्यों में परिवर्तन हो रहा है। शिक्षा प्राप्त करके सभी को समानता के अधिकार के बारे में पता चल रहा है। अब हर कोई अपने बारे में पहले सोचता है परिवार के बारे में वह बाद में सोचता है। अब व्यक्तिवादिता तथा रस्मी संबंध बढ़ रहे हैं।

(iii) अब धर्म का उतना महत्त्व नहीं रह गया है जितना पहले था। पहले हर व्यक्ति धर्म से डरता था, सारे धार्मिक काम किया करता था पर अब व्यक्ति धर्म का प्रयोग सिर्फ उतना ही करता है जितनी ज़रूरत होती है। यह सब पश्चिमीकरण का ही परिणाम है।

(iv) पश्चिमीकरण की वजह में हमारे समाज में शिक्षा का प्रसार हो रहा है। आज हमारे देश की साक्षरता दर 65% से ऊपर है तथा यह आगे भी बढ़ेगी। इसके साथ ही स्त्रियों को भी शिक्षा प्राप्त होने लग गई है तथा उनकी आजादी बढ़ गई है।

प्रश्न 20.
संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के बारे में बताएं।
अथवा
संस्कृतिकरण की संक्षेप में चर्चा कीजिए।
उत्तर:
प्रो० एम० एन० श्रीनिवास के अनुसार, “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिंदू जाति या जनजाति या अन्य समूह अपनी प्रथाओं, कर्म-कांड, विचारधारा तथा जीवन शैली को उच्च समूह की दिशा में बदल लेता है। साधारणतया ऐसे परिवर्तनों के बाद वह जाति स्थानीय समुदाय द्वारा जातीय सोपान में उच्च स्थान का दावा करने लगती है। आम तौर पर ऐसा दावा करने के एक-दो पीढ़ियों के बाद उसे स्वीकृति मिल जाती है।

कभी-कभी कोई जाति ऐसे स्थान का दावा करती है जिसे मानने के लिए पड़ोसी जाति सहमत नहीं होती है।” इस तरह संस्कृतिकरण निम्न जाति या समूह की परंपराओं, कर्म-कांडों, विचारधारा तथा जीवन शैली में उच्च जाति की दिशा में परिवर्तनों की प्रक्रिया है। ऐसे परिवर्तनों के कुछ समय के बाद उक्त समूह जातीय संस्तरण में प्राप्त पारंपरिक स्थान से उच्च स्थान प्राप्ति का दावा करते हैं।

प्रश्न 21.
पश्चिमीकरण की प्रक्रिया का अर्थ समझाएं।
अथवा
पश्चिमीकरण क्या है?
अथवा
पश्चिमीकरण पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
उत्तर:
साधारणतया पश्चिमीकरण का अर्थ पश्चिमी देशों के भारत पर प्रभाव से लिया जाता है। पश्चिमी देशों में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी तथा अमेरिका ऐसे राष्ट्र हैं जिनका भारतीय समाज पर काफ़ी प्रभाव रहा है। एम० एन० श्रीनिवास ने इसी पश्चिमीकरण की व्याख्या की है। उनके अनुसार, “पश्चिमीकरण शब्द को मैंने ब्रिटिश के 150 से अधिक वर्ष के शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज व संस्कृति में उत्पन्न हुए परिवर्तनों के लिए प्रयोग किया है और यह शब्द विभिन्न स्वरों-प्रौद्योगिकी, संस्थाओं, विचारधाराओं तथा मूल्यों आदि में परिवर्तनों से संबंधित है।”

प्रश्न 22.
धर्म-निरपेक्षता का क्या अर्थ है?
अथवा
धर्म-निरपेक्षतावाद पर अपने विचार व्यक्त कीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज 20वीं शताब्दी से ही पवित्र समाज से एक धर्म निरपेक्ष समाज में परिवर्तित हो रहा है। इस शताब्दी के अनेक विद्वानों ने यह महसूस किया कि धर्म निरपेक्षता के आधार पर ही विभिन्न धर्मों का देश भारत संगठित रह पाया है। धर्म-निरपेक्षता के आधार पर राज्य के सभी धार्मिक समूहों एवं धार्मिक विश्वासों को एक समान माना जाता है।

निरपेक्षता का अर्थ समानता या तटस्थता से है। राज्य सभी धर्मों को समानता की नज़र से देखता है तथा किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता है। धर्म निरपेक्षता ऐसी नीति या सिद्धांत है जिसके अंतर्गत लोगों को किसी विशेष धर्म को मानने या पालन के लिए बाध्य नहीं किया जाता है।

प्रश्न 23.
संस्कृतिकरण तथा पश्चिमीकरण में भेद बताएं।
उत्तर:

संस्कृतिकरणपशिचमीकरण
(i) संस्कृतिकरण में कई प्रकार की चीज़ें खाने-पीने पर प्रतिबंध लगाया जाता है।(i) पश्चिमीकरण में किसी चीज़ के खाने पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जाता है।
(ii) यह एक रूढ़िवादी प्रक्रिया है।(ii) यह एक तार्किक प्रक्रिया है।
(iii) संस्कृतिकरण की प्रक्रिया स्वदेशी तथा आंतरिक है।(iii) पश्चिमीकरण की प्रक्रिया विदेशी तथा बाहरी है।
(iv) संस्कृतिकरण की प्रक्रिया बहुत पुराने समय से चली आ रही है।(iv) पशिचमीकरण की प्रक्रिया अंग्रेज़ों के भारत आने के काफ़ी देर बाद शुरू हुई है।
(v) संस्कृतिकरण करने वाली जाति गतिशीलता करके उच्च स्थिति पर पहुंच जाती है।(v) पश्चिमीकरण में जाति की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आता।
(vi) संस्कृतिकरण की प्रक्रिया समाज की कुछ निम्न जातियों तक ही सीमित होती है।(vi) पश्चिमीकरण की प्रक्रिया में सभी जातियां समान रूप से हिस्सा लेती हैं।

प्रश्न 24.
आप पश्चिमी, आधुनिक, पंथनिरपेक्ष तथा सांस्कृतिक प्रकार के व्यवहार को किस रूप में परिभाषित करेंगे क्या आप इन शब्दों के सामान्य अर्थ एवं समाजशास्त्रीय अर्थ में कोई अंतर पाते हैं?
उत्तर:
जब कोई पश्चिम के देशों के विचारों, तौर-तरीकों इत्यादि को अपनाता है तो उसे पश्चिमी कहा जाता है। इस तरह पश्चिमी देशों के प्रभाव को पश्चिमी कहते हैं। आधुनिक वह होता है जिसमें परिवर्तन आ रहा होता है तथा जिसमें अच्छे बुरे, नये पुराने का आभास होता है जो व्यक्ति पश्चिमी देशों की संस्कृति के प्रभाव में आकर कार्य करता है तथा जो प्राचीन परंपराओं को छोड़कर नई परंपराओं को अपनाता है उसे आधुनिक कहते हैं।

पंथ निरपेक्ष को धर्म निरपेक्षता भी कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि जो पहले धार्मिक था वह अब धार्मिक नहीं रहा। अब सभी धर्म बराबर हो गए हैं तथा कोई धर्म छोटा बड़ा नहीं है। धर्म-निरपेक्षता में विचारों, परंपराओं, धर्म इत्यादि में विज्ञान या तार्किकता लाने का प्रयास किया जाता है। पंथनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया में धर्म का प्रभाव कम हो जाता है तथा । धर्म का प्रभाव बढ़ जाता है। इस तरह ही सांस्कृतिक शब्द का अर्थ जीवन के स्वीकृत ढंगों में होने वाले परिवर्तन से है चाहे वह किसी भी क्षेत्र में हो।

अगर हम ध्यान से देखें तो इन शब्दों के समाजशास्त्रीय अर्थ तथा सामान्य अर्थ में कोई विशेष अंतर नहीं है। इसका कारण यह है कि यह संकल्प समाजशास्त्रियों द्वारा दिए गए हैं तथा उन्होंने इनकी व्याख्या जीवन की साधारण दशाओं के अनुसार ही की है।

प्रश्न 25.
आधुनिकता तथा परंपरा के मिश्रण के कुछ उदाहरणों के बारे में बताएं जो आप दिन-प्रतिदिन की जिंदगी में और व्यापक स्तर पर पाते हैं।
उत्तर:
संस्कृति के दो प्रकार होते हैं-भौतिक तथा अभौतिक। आधुनिकता के साधन भौतिकता के भाग हैं तथा परंपरा अभौतिक संस्कृति का हिस्सा है। हमारे जीवन में आधुनिकता तथा परंपरा के मिश्रण की बहुत-से उदाहरण मिल जाएंगे। उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति ने टी० वी०, फ्रिज बेचने का शोरूम बनाया है, यह आधुनिकता है, परंतु वह अपनी दुकान को बुरी नजर से बचाने के लिए या तो नींबू मिर्चे या फिर हंडिया (नज़रबट्ट) लटका देता है।

यह आधुनिकता तथा परंपरा का मिश्रण है। हम नई कार लेकर आते हैं परंतु घर जाने की बजाए पहले मंदिर जाते हैं ताकि कार के लिए आशीर्वाद प्राप्त करें। आमतौर पर ट्रकों, बसों, ट्रैक्टरों इत्यादि के पीछे लिखा होता है ‘बुरी नज़र वाले तेरा मुँह काला’। यह भी आधुनिकता तथा परंपरा के मिश्रण के उदाहरण हैं। हम लोगों ने पश्चिमी समाज के रहन सहन, कपड़े पहनने घर बनाने के ढंग तो अपना लिए हैं, परंतु हमारे विचार अभी भी वहीं पर अटके हुए हैं जहां पर यह 100 साल पहले थे। यह भी आधुनिकता तथा परंपरा के मिश्रण की उदाहरणें हैं।

इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अंग्रेजों के आने के पश्चात् हमने आधुनिकता या फिर कहें कि पश्चिमी समाज के तौर तरीकों, जीवन जीने के ढंगों को अपनाना तो शुरू कर दिया है। परंतु हम अभी भी अपने जाति संबंधी विचारों या धार्मिक विचारों को छोड़ नहीं पाये हैं। हमारे विचार अभी भी प्राचीन समाज में ही अटके पड़े हैं तथा यही कारण है कि आने वाली पीढ़ी तथा जाने वाली पीढ़ी के विचारों में हमेशा ही अंतर रहता है।

प्रश्न 26.
क्या आपको संस्कृतिकरण की प्रक्रिया में लैंगिक आधार पर सामाजिक भेदभाव के सबूत दिखते हैं?
उत्तर:
अगर हम संस्कृतिकरण की प्रक्रिया तथा भारतीय समाज की संरचना की तरफ देखें तो हमें लैंगिक आधार पर सामाजिक भेदभाव में बहुत से सबूत मिल जाएँगे। हम उदाहरण ले सकते हैं प्राचीन समाज की जब स्त्रियों को शिक्षा नहीं प्रदान की जाती थी। उन्हें किसी प्रकार में अधिकार प्राप्त नहीं थे। स्त्रियों के साथ-साथ निम्न जातियों के लोगों को भी शोषण से भरपूर जीवन व्यतीत करना पड़ता था। इन लोगों का जीवन नर्क के समान था।

सदियों से इनके साथ ऐसा व्यवहार होता चला आ रहा था। स्वतंत्रता के पश्चात भारतीय संविधान बना तथा इन सभी शोषित वर्गों तथा अन्य वर्गों को समान अधिकार दिए गए। 1955 के अस्पृश्यता अपराध कानून से निम्न वर्गों की निर्योग्यताएं समाप्त कर दी गई। स्त्रियों की समाज में स्थिति को ऊपर उठाने के लिए कई प्रकार के विधानों का निर्माण किया गया। इनके कल्याण के कई कार्यक्रम चलाए गए।

इन सब प्रयासों के फलस्वरूप स्त्रियों तथा निम्न जातियों को कई प्रकार के अधिकार प्राप्त हुए तथा उन्हें अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने का अवसर प्राप्त हुआ। निम्न जातियों में लोगों ने सामाजिक संस्तरण में अपनी स्थिति को ऊँचा किया। स्त्रियों ने उच्च शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की तथा उसके बाद वह आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर होना शुरू हो गई।

अगर हम आज के समाज पर दृष्टि डालें तो हमें पता चलता है कि कई क्षेत्रों में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिला कर कार्य कर रही हैं। चाहे समाज में लैंगिक आधार पर सामाजिक भेदभाव के सबूत आज भी मिल जाते हैं, परंतु अब यह लैंगिक भेदभाव धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है तथा स्त्रियाँ अपने आपको ऊँचा उठाने के भरसक प्रयास कर रही हैं ताकि यह लैंगिक भेदभाव खत्म हो जाए।

प्रश्न 27.
उन सभी छोटे-बड़े तरीकों का अवलोकन करें जहां पश्चिमीकरण से हमारा जीवन प्रभावित होता है।
अथवा
भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अगर हम अपने रोजाना के जीवन का अवलोकन करें तो हम देख सकते हैं कि हमारे जीवन का हरेक पक्ष पश्चिमीकरण से प्रभावित हुआ है। हम हरेक पक्ष के बारे में अलग-अलग देख सकते हैं। पहले हम धोती-कुर्ता, कुर्ता पायजामा इत्यादि पहना करते थे, परंतु अब पैंट, शर्ट, कोट, पैंट, जीन्स, टी शर्ट, टाई, ट्रैक सूट इत्यादि पहनते हैं जो कि पश्चिमी देन है। पहले हम नीचे बैठ कर साधारण खाना जैसे कि सब्जी, रोटी, दाल इत्यादि खाते थे परंतु अब हम डाइनिंग टेबल पर बैठ कर खाना खाते हैं।

खाने के प्रकार भी बदल गए हैं। रोटी का स्थान सैंडविच, बर्गर, पिज्जा, हॉट डाग इत्यादि ने ले लिया है। पहले चाय तथा मदिरा का सेवन होता था, परंतु अब चाय, कॉफी, व्हिसकी, जिन, कोल्ड ड्रिंक, शेक इत्यादि का सेवन होता है। पहले मनोरंजन के साधनों में बड़े बजुर्गों की कहानियाँ होती थीं परंतु अब उनके स्थान पर रेडियो, टेलीविज़न, कम्प्यूटर, इंटरनेट इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। गर्मी में फ्रिज का ठंडा पानी तथा ए० सी० प्रयोग होता है और सर्दी में गीज़र का गर्म पानी तथा गर्म हवा वाला ब्लोअर प्रयोग होता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि हमारे जीवन का प्रत्येक पक्ष पश्चिमीकरण से प्रभावित हुआ है।

प्रश्न 28.
उन दो संस्कृतियों की तुलना करें जिनसे आप परिचित हों। क्या नृजातीय नहीं बनना कठिन नहीं है?
उत्तर:
हम भारतीय सस्कृति तथा पाश्चात्य संस्कृति के वाकिफ हैं। भारतीय संस्कति धर्म से प्रेरित है तथा पाश्चात्य संस्कृति विज्ञान तथा तर्क से प्रेरित है। भारतीय संस्कृति तथा पाश्चात्य संस्कृति एक दूसरे से विपरीत हैं जहां के संस्कार रूढ़ियां, व्यवहार के ढंग, रहन-सहन, खाने-पीने कपड़े पहनने के ढंग एक-दूसरे से बिल्कुल ही अलग हैं।

हम कह सकते हैं कि नृजातीय बनना कठिन है क्योंकि हम दूसरी संस्कृति के भौतिक हिस्से को तो तेजी से अपना लेते हैं परन्तु अभौतिक संस्कृति को अपनाना बहुत मुश्किल होता है जिस कारण हम दूसरी संस्कृति को पूर्णतया अपना नहीं सकते हैं तथा नृजातीय नहीं बन सकते हैं।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 29.
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए दो विभिन्न उपागमों की चर्चा करें।
उत्तर:
सांस्कृतिक परिवर्तनों का अध्ययन करने के लिए प्राकृतिक परिवर्तन का अध्ययन आवश्यक है क्योंकि प्राकृतिक परिवर्तन किसी भी स्थान की सांस्कृति को पूर्णतया परिवर्तित कर सकते हैं। बाढ़, सूखा, भूकम्प, गर्मी, सर्दी इत्यादि किसी भी स्थान की संस्कृति पर गहरा प्रभाव डालते हैं। इसके साथ ही क्रान्तिकारी परिवर्तनों का अध्ययन भी बहुत आवश्यक है।

जब किसी संस्कृति में तेज़ी से परिवर्तन आथा है तो उस संस्कृति के मूल्यों तथा अर्थव्यवस्था में तेजी से परिवर्तन आते हैं। क्रान्तिकारी परिवर्तन राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण ही आते हैं जिससे उस समाज की संस्कृति में परिवर्तन आ जाता है। इस प्रकार सांस्कृतिक परिवर्तनों के अध्ययन के लिए प्राकृतिक परिवर्तनों तथा क्रान्तिकारी परिवर्तनों का अध्ययन आवश्यक है।

प्रश्न 30.
आधुनिकीकरण की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर:
1. सामाजिक भिन्नता-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के कारण समाज के विभिन्न क्षेत्र काफ़ी Complex हो गए तथा व्यक्तिगत प्रगति भी पाई गई। इस वजह से विभेदीकरण की प्रक्रिया भी तेज हो गई।

2. सामाजिक गतिशीलता-आधुनिकीकरण के द्वारा प्राचीन सामाजिक, आर्थिक तत्त्वों का रूपांतरण हो जाता है, मनुष्यों के आदर्शों की नई कीमतें स्थापित हो जाती हैं तथा गतिशीलता बढ़ जाती है।

प्रश्न 31.
आधुनिकीकरण द्वारा लाए गए दो परिवर्तन बताएं।
उत्तर:
1. धर्म-निरपेक्षता-भारतीय समाज में धर्म-निरपेक्षता का आदर्श स्थापित हुआ। किसी भी धार्मिक समूह का सदस्य देश के ऊंचे से ऊंचे पद को प्राप्त कर सकता है। प्यार, हमदर्दी, सहनशीलता इत्यादि जैसे गुणों का विकास समाज में समानता पैदा करता है। यह सब आधुनिकीकरण के कारण है।

2. औद्योगीकरण-औद्योगीकरण की तेजी के द्वारा भारत की बढ़ती जनसंख्या की ज़रूरतें पूरी करनी काफ़ी आसान हो गईं। एक तरफ बड़े पैमाने के उद्योग शुरू हुए तथा दूसरी तरफ घरेलू उद्योग तथा संयुक्त परिवारों का खात्मा हुआ।

प्रश्न 32.
आधुनिकीकरण तथा सामाजिक गतिशीलता का क्या संबंध है?
उत्तर:
सामाजिक गतिशीलता आधुनिक समाजों की मुख्य विशेषता है। शहरी समाज में कार्य की बांट, विशेषीकरण, कार्यों की भिन्नता, उद्योग, व्यापार, यातायात के साधन तथा संचार के साधनों इत्यादि ने सामाजिक गतिशीलता को काफ़ी तेज़ कर दिया। प्रत्येक व्यक्ति अपनी योग्यता, बुद्धि के साथ गरीब से अमीर बन जाता है।

जिस कार्य से उसे लाभ प्राप्त होता है वह उस कार्य को करना शुरू कर देता है। कार्य के लिए वह स्थान भी परिवर्तित कर लेता है। इस तरह सामाजिक गतिशीलता की प्रक्रिया के द्वारा परंपरावादी कीमतों की जगह नई कीमतों का विकास हुआ। इस तरह निश्चित रूप में कहा जा सकता है कि आधुनिकीकरण से सामाजिक गतिशीलता बढ़ती है।

प्रश्न 33.
आधुनिकीकरण से नए वर्गों की स्थापना होती है। कैसे?
उत्तर:
आधुनिकीकरण की प्रक्रिया व्यक्ति को प्रगति करने के कई मौके प्रदान करती है। इस वजह से कई नए वर्गों की स्थापना होती है। समाज में यदि सिर्फ एक ही वर्ग होगा तो वह वर्गहीन समाज कहलाएगा। इसलिए आधुनिक समाज में कई नये वर्ग अस्तित्व में आए हैं।

आधुनिक समाज में सबसे ज्यादा महत्त्व पैसे का होता है। इसलिए लोग जाति के आधार पर नहीं बल्कि राजनीति तथा आर्थिक आधारों पर बंटे हुए होते हैं। वर्गों के आगे आने का कारण यह है कि अलग-अलग व्यक्तियों की योग्यताएं समान नहीं होतीं। मजदूर संघ अपने हितों की प्राप्ति के लिए संघर्ष का रास्ता भी अपना लेते हैं। अलग-अलग कार्यों के लोगों ने तो अलग-अलग अपने संघ बना लिए हैं।

प्रश्न 34.
धर्म-निरपेक्षता में ज़रूरी तत्त्व क्या है?
उत्तर:

  1. धार्मिक विघटन-धार्मिक विश्वासों में परिवर्तन पाया गया, व्यावहारिक लाभों को महत्ता प्राप्त हुई। अर्थात् किसी भी धार्मिक क्रिया के बिना आजकल लोगों को प्रभावित किया जा सकता है।
  2. तार्किकता-प्रत्येक कार्य तथा समस्या के ऊपर तर्क के आधार पर विचार किया जाता है जिससे प्राचीन अन्ध-विश्वासों में कमी हो जाती है।
  3. विभेदीकरण-समाज के अलग-अलग हिस्से जैसे आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक इत्यादि एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं तथा धर्म का प्रभाव इन सभी क्षेत्रों में कम हो गया है।

प्रश्न 35.
धर्म-निरपेक्षता के दो कारण बताएं।
उत्तर:

  1. आधुनिक शिक्षा-आधुनिक शिक्षा के द्वारा उच्च तथा निम्न की भावना खत्म हुई तथा व्यक्ति को स्थिति भी उसकी योग्यता के आधार पर प्राप्त हुई। लोगों की भावना में भी बढ़ोत्तरी हुई।
  2. यातायात तथा संचार के साधनों का विकास-यातायात तथा संचार के साधनों के विकास के साथ लोग एक दूसरे के नजदीक आए, अस्पृश्यता, उच्च निम्न के भेदभाव में कमी आई तथा बराबरी वाले संबंध स्थापित हुए।

प्रश्न 36.
धर्म-निरपेक्षता द्वारा लाए गए दो परिवर्तन बताएं।
उत्तर:

  1. पवित्र तथा अपवित्र के संकल्प में परिवर्तन-प्राचीन समय से चले आ रहे पवित्रता तथा अपवित्रता के विचारों में कमी आयी। हर तरह का तथा प्रत्येक जाति का खाना पवित्र माना गया। सभी धर्मों में बराबरी के संबंध स्थापित हुए।
  2. संस्कारों में परिवर्तन-हिन्दू धर्म से संबंधित संस्कार जैसे बच्चे के जन्म से सम्बन्धित, विधवा से संबंधित इत्यादि संस्कार खत्म हो गए। व्यक्तिगत योग्यता महत्त्वपूर्ण हो गई।

प्रश्न 37.
धर्म-निरपेक्षता का परिवार पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
भारत में शुरू से ही संयुक्त परिवार प्रणाली प्रमुख रही है क्योंकि ज्यादातर लोग कृषि के ऊपर निर्भर करते थे जिसमें ज्यादा व्यक्तियों की ज़रूरत होती थी। विकास के पक्ष से भी भारत काफ़ी पीछे था। परंतु धर्म-निरपेक्षता के प्रभाव में प्राचीन परंपराओं के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बदला। परिवार के कई तरह के कार्य दूसरी संस्थाओं के पास चले गए। संयुक्त परिवार प्रथा बिल्कुल ही कमज़ोर पड़ गई है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक आंदोलनों ने भारतीय समाज में क्या परिवर्तन लाए? उनका वर्णन करो।
उत्तर:
भारतीय समाज में 19वीं सदी आते-आते बहुत-सी कुरीतियां फैली हुई थीं। इन कुरीतियों ने भारतीय समाज को बुरी तरह जकड़ा हुआ था। इसी समय भारत के ऊपर अंग्रेज़ कब्जा कर रहे थे। इसके साथ-साथ वह पश्चिमी शिक्षा का प्रसार भी कर रहे थे। बहुत से अमीर भारतीय पश्चिमी शिक्षा ले रहे थे।

शिक्षा लेने के बाद जब वह भारत पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भारतीय समाज बहुत-सी कुरीतियों में जकड़ा हुआ है। इसलिए उन्होंने सामाजिक आंदोलन चलाने का निर्णय लिया ताकि इन कुरीतियों को दूर किया जा सके। इन सामाजिक आंदोलनों की जगह जो परिवर्तन भारतीय समाज में आए उनका वर्णन निम्नलिखित है-

(i) सती-प्रथा का अंत (End of Sati System)-भारत में सती प्रथा सदियों से चली आ रही थी। अगर किसी औरत के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उसे जिंदा ही पति की चिता में जलना पड़ता था। इस अमानवीय प्रथा को ब्राह्मणों ने चलाया हुआ था। सामाजिक आंदोलनों की वजह से ब्रिटिश सरकार इस अमानवीय प्रथा के विरुद्ध हो गई तथा उसने 1829 में सती प्रथा विरोधी अधिनियम पास कर दिया तथा सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया। इस तरह सदियों से चली आ रही यह प्रथा खत्म हो गई। यह सब सामाजिक आंदोलन के कारण ही हुआ।

(ii) बाल-विवाह का खात्मा (End of Child Marriage)-बहुत-से कारणों की वजह से भारतीय समाज में बाल विवाह हो रहे थे। पैदा होते ही या 4-5 साल की उम्र में ही बच्चों का विवाह कर दिया जाता था चाहे उन को विवाह का अर्थ पता हो या न हो। सामाजिक आंदोलनों की वजह से ब्रिटिश सरकार ने विवाह की न्यूनतम आयु निश्चित कर दी। 1860 में ब्रिटिश सरकार ने कानून बना कर विवाह की न्यूनतम आयु 10 वर्ष निश्चित कर दी।

(iii) विधवा-पुनर्विवाह (Widow Remarriage)-सदियों से हमारे समाज में विधवाओं को पुनर्विवाह की इजाजत नहीं थी। विधवाओं की स्थिति बहुत बद्तर थी। उनको किसी पारिवारिक समारोह में भाग लेने की इजाजत नहीं थी। वह घुट-घुट कर मरती रहती थीं। उनको अपनी जिंदगी आराम से जीने का अधिकार नहीं था।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कोशिशों की वजह से अंग्रेजों ने 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास किया जिससे विधवाओं को दोबारा विवाह करने की इजाजत मिल गई। इस तरह विधवाओं को कानूनी रूप से विवाह करने तथा अपनी जिंदगी आराम से जीने का अधिकार मिल गया।

(iv) पर्दा-प्रथा की समाप्ति (End of Purdah System)-मुस्लिमों में बरसों से पर्दा प्रथा चली आ रही थी। औरतों को हमेशा पर्दे के पीछे रहना पड़ता था। वही कहीं आ जा भी नहीं सकती थीं। यह प्रथा धीरे-धीरे सारे भारत में फैल गई। बड़े-बड़े समाज सुधारकों ने पर्दा प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठायी। यहां तक कि सर सैय्यद अहमद खान ने भी इसके विरुद्ध आवाज़ उठायी। इस तरह धीरे-धीरे पर्दा प्रथा कम होने लग गई तथा समय आने के साथ यह भी खत्म हो गई।

(v) दहेज-प्रथा में परिवर्तन (Change in Dowry System)-दहेज वह होता है जो विवाह के समय लड़की का पिता अपनी खुशी से लड़के वालों को देता था। धीरे-धीरे इसमें भी बुराइयां आनी शुरू हो गईं। लड़के वाले दहेज मांगने लगे जिस वजह से लड़की वालों को बहुत तकलीफें उठानी पड़ती थीं। इसके विरुद्ध भी आंदोलन चले जिस वजह से ब्रिटिश सरकार ने तथा आज़ादी के बाद 1961 में सरकार ने दहेज लेने या देने को गैर-कानूनी घोषित कर दिया।

(vi) भारतीय समाज में बहुत समय से अस्पृश्यता चली आ रही थी। इसमें छोटी जातियों को स्पर्श भी नहीं किया जाता था। इन सामाजिक आंदोलनों में अस्पृश्यता के विरुद्ध आवाज़ उठी। जिस वजह से इसे गैर-कानूनी घोषित करने के लिए वातावरण तैयार हो गया तथा आजादी के बाद इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया।

(vii) भारतीय समाज में अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध था। इन सामाजिक आंदोलनों की वजह से अंतर्जातीय विवाह को बल मिला जिस वजह से आजादी के बाद इसे भी कानूनी मंजूरी मिल गई।

(viii) इन आंदोलनों की वजह से भारतीय समाज के आधार जाति व्यवस्था पर गहरी चोट लगी। सभी आंदोलनों ने जाति प्रथा के विरुद्ध आवाज़ उठायी जिस वजह से धीरे-धीरे जाति व्यवस्था खत्म होने लगी तथा आज भारत में जाति व्यवस्था अपनी आखिरी कगार पर खड़ी है।

(ix) सभी सामाजिक आंदोलन एक बात पर तो ज़रूर सहमत थे तथा वह थी स्त्री शिक्षा। हमारे समाज में स्त्रियों का स्तर काफ़ी निम्न था। उनको किसी भी चीज़ का अधिकार प्राप्त नहीं था। इन सभी आंदोलनों ने स्त्री शिक्षा के लिए कार्य किए जिस वजह से स्त्री शिक्षा को विशेष बल मिला। आज उसी वजह से स्त्री-पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी है।

इन सब चीजों को देखकर यह स्पष्ट है कि भारत में 19वीं सदी से शुरू हुए सामाजिक आंदोलनों की वजह से भारतीय समाज में बहुत-से परिवर्तन आए।

प्रश्न 2.
भारत में समाज सुधारक आंदोलन चलाने के लिए क्या सहायक हालात थे?
उत्तर:
भारत में सदियों से बहुत-सी कुरीतियां चली आ रही थीं। भारतीयों को इन कुरीतियों में पिसते-पिसते सदियां हो चली थी पर भारतीय इनमें पिसते ही जा रहे थे तथा इनके खिलाफ कोई आवाज़ भी उठ नहीं रही थी। 18वीं सदी के आखिरी दशकों में अंग्रेजों ने भारत पर हकूमत करनी शुरू की। इसके साथ-साथ उन्होंने भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रसार भी शुरू किया।

भारतीयों ने पश्चिमी शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की तथा धीरे-धीरे उन्हें समझ आनी शुरू हो गई कि भारतीय समाज में जो प्रथाएं चल रही हैं वह सब बेफिजूल की हैं जो कि ब्राहमणों ने अपना स्वामित्व स्थापित करने के लिए चलाई थीं। जब अंग्रेज़ों ने भारत पर हकूमत करनी शुरू की तो उस समय भारत में कुछ ऐसे हालात पैदा हो गए जिनकी वजह से भारत में समाज सुधारक आंदोलनों की शुरुआत हुई। इन हालातों का वर्णन निम्नलिखित है-

(i) पश्चिमी शिक्षा (Western Education)-अंग्रेजों के भारत आने के बाद भारत में पश्चिमी शिक्षा का प्रसार भी शुरू हुआ। पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के साथ-साथ उन्हें विज्ञान के बारे में यूरोप की प्रगति के बारे में भी पता चला। इस पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने का यह असर हुआ कि उनको पता चलने लग गया कि उनके समाज में जो प्रथाएं चल रही हैं उनका कोई अर्थ नहीं है। यही वजह है कि उन्होंने देश में सामाजिक आंदोलन चलाने शुरू किए और सामाजिक परिवर्तन आने शुरू हो गए।

(ii) यातायात के साधनों का विकास (Development of Means of Transport)-अंग्रेजों ने भारत में चाहे अपने फायदे के लिए यातायात के साधनों का विकास किया पर उससे भारतीयों को भी बहुत फायदा हुआ। भारतीय इन यातायात के साधनों की वजह से एक-दूसरे के आगे आए तथा एक-दूसरे से मिलने लगे।

पश्चिमी शिक्षा ग्रहण चुके भारतीय भी देश के कोने-कोने पहुंचे तथा उन्होंने लोगों को समझाया कि यह सब प्रथाएं उनके फायदे के लिए नहीं बल्कि नुकसान के लिए हैं जिससे लोगों को यह समझ आने लग गया। इस तरह यातायात के साधनों के विकास के साथ भी आंदोलनों के लिए हालात विकसित हुए।

(iii) भारतीय प्रेस की शुरुआत (Indian Press)-अंग्रेजों के आने के बाद भारत में प्रेस की शुरुआत हुई। आंदोलनों के संचालकों ने लोगों को समझाने के साथ छोटे-छोटे अखबार तथा पत्रिकाएं निकालनी भी शुरू की ताकि भारतीय इनको पढ़ कर समझ सकें कि ये बुराइयां हमारे समाज में कितनी गहरी पैठ बना चुकी हैं तथा इनको यहां से निकालना बहुत ज़रूरी है। इस तरह प्रेस की शुरुआत ने भारतीयों को यह समझा दिया कि इन कुरीतियों को दूर करना कितना ज़रूरी है।

(iv) मिशनरियों का बढ़ता प्रभाव (Increasing Effect of Missionaries)-जब से अंग्रेज़ भारत में आए रियों को भी सहायता देनी शरू की। अंग्रेज़ों ने इनको आर्थिक सहायता के साथ राजनीतिक सहायता भी देनी शुरू की। इन मिशनरियों का कार्य ईसाई धर्म का प्रचार करना था पर इनका प्रचार करने का तरीका अलग था। वह पहले समाज कल्याण का कार्य करते थे। लोगों की तकलीफ दूर करते थे फिर इनमें ईसाई धर्म का प्रचार करते थे।

धीरे-धीरे लोग ईसाई धर्म को अपनाने लग गए। इससे समाज सुधारकों को बड़ी निराशा हुई क्योंकि भारतीय लोग अपना धर्म छोड़ कर विदेशी धर्म अपनाने लग गए थे। इन समाज सुधारकों ने भारतीयों को मिशनरियों के प्रभाव से बचाने के लिए समाज सुधारक आंदोलन चलाने शुरू कर दिए। इस तरह ईसाई मिशनरियों के प्रभाव की वजह से भी यह आंदोलन शुरू हो गए।

कुप्रथाएं (So many ills in Indian Society)-जिस समय भारत में सुधार आंदोलन शुरू हुए उस समय भारतीय समाज में बहुत-सी कुप्रथाएं फैली हुई थीं। सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, दहेज प्रथा, अस्पृश्यता इत्यादि कुप्रथाएं तथा इनके साथ जुड़े हुए बहुत से अंधविश्वास भी भारतीय समाज में फैले हुए थे। लोग भी इन सब से तंग आ चुके थे। जब यह आंदोलन शुरू हुए तो लोगों ने इन सुधारों को हाथों हाथ लिया जिस वजह से इन आंदोलनों को अच्छे हालात मिल गए तथा यह समाज सुधार के आंदोलन सफल हो गए।

प्रश्न 3.
भारतीय समाज सुधार आंदोलनों के नेताओं के बारे में आप क्या जानते हैं? उनका वर्णन करें।
उत्तर:
वैसे तो भारत में समाज सुधार के बहुत से आंदोलन चले। इन आंदोलनों में बहुत से महान् व्यक्तियों ने भाग लिया। इन महान व्यक्तियों में से कुछ प्रमुख सुधारकों का वर्णन निम्नलिखित है-

(i) राजा राममोहन राय (Raja Ram Mohan Roy)-राजा राममोहन राय का नाम समाज सुधारकों में सबसे अग्रणी है। वह आधुनिक भारत में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने समाज सुधार के कार्य प्रारम्भ किए। इसलिए आधुनिक भारत का पिता भी कहते हैं। उन्होंने 1814 में आत्मीय सभा का गठन किया था। इसमें उन्होंने दनिया के अलग-अलग धर्मों को छोड़कर दुनिया के एक धर्म की स्थापना का विचार पेश किया। उस समय भारत में अमानवीय सती प्रथा प्रचलित थी।

उन्होंने अंग्रेजों को इस प्रथा के बारे में अवगत करवाया तथा उन्हीं के यत्नों से 1829 में सती प्रथा विरोधी कानून पास किया। इसमें सती प्रथा को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। इस तरह यह दर्दनाक प्रथा खत्म हो गई। उन्होंने मूर्ति पूजा तथा धार्मिक अंध-विश्वासों के कारण इनके खिलाफ आवाज़ उठाई।

उन्होंने 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की जिसने भारतीय समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ जम कर आवाज़ उठाई। अपने अंतिम वर्षों में वह इंग्लैंड चले गए जहाँ 1833 में उनकी मृत्यु हो गई। भारतीय समाज के लिए उनका दिया योगदान अविस्मरणीय है जिसको कभी भुलाया नहीं जा सकता।

(ii) देवेंद्रनाथ ठाकुर (Devendera Nath Thakur)-राजा राममोहन राय की मृत्यु के बाद ऐसा लगा कि ब्रह्म समाज खत्म हो जाएगा पर 1845 में ब्रह्म समाज का भार देवेंद्रनाथ ठाकुर ने अपने हाथों में ले लिया तथा वह इसके लिए प्रेरणा स्रोत बन गए। 1839 में उन्होंने तत्त्वबोधिनी सभा की स्थापना की तथा इस सभा का लक्ष्य उन्होंने सत्य की शिक्षा देना रखा।

वह तत्त्वबोधिनी पत्रिका के संपादक भी रहे। 1847 में इस सभा ने ऋग्वेद का अनुवाद भी किया। 1847 में ही वह बनारस गए तथा उन्होंने वेदों का ज्ञान प्राप्त करके ब्रह्म धर्म नामक पुस्तक प्रकाशित करवाई। उन्होंने राजा राममोहन राय की तरह विधवा विवाह तथा स्त्री शिक्षा पर काफ़ी ज़ोर दिर इनकी मृत्यु हो गई थी।

(iii) केशवचंद्र सेन (Keshav Chandra Sen) केशवचंद्र सेन ने 1861 में ब्रह्म समाज के कार्यों में ध्यान देना शुरू किया तथा संगीत सभा की स्थापना की। आपने 1861 में Indian Mirror नामक पत्रिका प्रकाशित की। इस पत्रिका की मदद से ही उन्होंने अपने समाज सुधार के आंदोलन को आगे बढ़ाया।

आपने 1863 में ‘वामा बोधिनी’ नामक पत्रिका प्रकाशित की जिसमें उन्होंने स्त्रियों की दशा सुधारने के लिए तथा अंतर्जातीय विवाह का प्रचार किया। 1868 में आपने ब्रह्म समाज के संदेश घर-घर तक पहुंचाने के लिए ‘भारतवर्ष ब्रहम समाज’ की स्थापना की। 1884 में आपका देहांत हो गया।

(iv) स्वामी दयानंद सरस्वती (Swami Dayanand Saraswati)-आपका जन्म सन् 1824 में हुआ था। आपका पहला या असली नाम मूलशंकर था। आपने 24 वर्ष की उम्र में ही संन्यास ले लिया तथा अलग-अलग शहरों में घूमकर अपने उपदेशों का प्रचार किया।

1871 से 1873 आप गंगा किनारे घूमते रहे तथा स्कूलों का प्रब करते रहे। 1874 में आपने मूर्ति पूजा का सख्त विरोध किया तथा 1875 में उन्होंने बंबई में आर्य समाज की स्थापना की। 1877 में आपने पंजाब में जगह-जगह आर्य समाज की स्थापना की। उन्होंने जाति प्रथा, बाल विवाह, विधवा विवाह पर रोक, धर्म परिवर्तन को रोकने के विरुद्ध आवाज़ उठाई।

आपके द्वारा दयानंद वैदिक संस्थाओं की स्थापना की गई तथा इसमें सिर्फ भारतीय ही पढ़ा सकते थे। इन संस्थाओं में नैतिक शिक्षा के महत्त्व पर जोर दिया गया। आपने जाति प्रथा का विरोध किया। आपके यत्नों से ही हिंदू धर्म छोड़ चुके लोग वापस हिंदू धर्म को अपनाने लग गए। आपके यत्नों से ही अंतर्जातीय विवाह शुरू हो गए। 1883 में आपका निधन हो गया।

(v) स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekananda)-आप स्वामी रामकृष्ण के परम शिष्य थे। आपने 1883 में शिकागो में हई Parliament of Religion में भाग लिया। वहां पर आपने जो अपने विचार प्रस्तुत किए उनसे उनकी काफ़ी प्रसिद्धि हो गई। आपने उस सभा में वेदों की शिक्षा संबंधी बात की तथा आपकी बातें सुनने के पश्चात् लोगों को लगने लग गया कि उस सभा में आप ही श्रेष्ठ व्यक्ति हैं।

आप कहते थे कि ईश्वर एक है तथा सर्वव्यापक है। प्रत्येक जीव में ईश्वर बसता है। जब मनुष्य अपने आप पर काबू पा लेता है तो वह पूर्ण हो जाता है तथा भगवान् को प्राप्त कर लेता है। सारा संसार धर्म के ऊपर तथा धर्म के अनुसार ही चलता है। आपने राजा राममोहन राय की तरह विश्व धर्म की बात की जिसने भारतीयों के साथ-साथ विदेशियों को भी प्रभावित किया। आपके विचारों से प्रभावित होकर आपके शिष्यों की गिनती बढ़ती चली गई।

आपने अस्पृश्यता तथा जाति प्रथा के विरुद्ध जम कर प्रचार किया तथा आप चाहते थे कि अलग-अलग धर्मों तथा जातियों में एकता बनी रहे। आपने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की ताकि धार्मिक भेदभाव को समाप्त किया जा सके। इस मिशन की मदद से आपने शिक्षा का प्रसार, बाढ़ पीड़ितों की सहायता, पशु पालन, अनाथालय, स्कूलों कॉलेजों की स्थापना की तथा देशवासियों को पुनर्जीवित करने तथा जाति-पाति के भेदभाव मिटाने के प्रयास किए। आपकी मृत्यु 1902 में हो गई थी।

प्रश्न 4.
भारत में महिलाओं में चले सुधार आंदोलन का वर्णन करो।
उत्तर:
भारतीय समाज में समय-समय पर अनेक ऐसे आंदोलन शुरू हुए हैं जिनका मुख्य उद्देश्य स्त्रियों की दशा में सुधार करना रहा है। भारतीय समाज एक पुरुष-प्रधान समाज है जिसके परिणामस्वरूप महिलाओं ने अपने शोषण, उत्पीड़न इत्यादि के लिए अपनी स्थिति में सुधार के लिए आवाज़ उठाई है। पारंपरिक समय से ही महिलाएं बाल-विवाह, सती–प्रथा, विधवा विवाह पर रोक, पर्दा प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों का शिकार होती आई हैं।

महिलाओं को इन सब शोषणात्मक कुप्रथाओं से छुटकारा दिलवाने के देश के समाज सुधारकों ने समय-समय पर आंदोलन चलाये हैं। इन आंदोलनों में समाज सुधारक तथा उनके द्वारा किये गए प्रयास सराहनीय रहे हैं। इन आंदोलनों की शुरुआत 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में ही हो गई थी। राजा राममोहन राय, दयानंद सरस्वती, केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ऐनी बेसेंट इत्यादि का नाम इन समाज सुधारकों में अग्रगण्य है।

सन् 1828 में राजा राममोहन राय द्वारा ब्रह्म समाज की स्थापना तथा 1829 में सती प्रथा अधिनियम का बनाया जाना उन्हीं का प्रयास रहा है। स्त्रियों के शोषण के रूप में पाये जाने वाले बाल-विवाह पर रोक तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रचलित कराने का जनमत भी उन्हीं का अथक प्रयास रहा है। इसी तरह महात्मा गांधी, स्वामी दयानंद सरस्वती, ईश्वरचंद्र, विदयासागर जी ने भी कई ऐसे ही प्रयास किये जिनका प्रभाव महिलाओं के जीवन पर सकारात्मक रूप से पड़ा है।

महर्षि कर्वे स्त्री-शिक्षा एवं विधवा पुनर्विवाह के समर्थक रहे । इसी प्रकार केशवचंद्र सेन एवं ईश्वरचंद्र विद्यासागर के प्रयासों के अंतर्गत ही 1872 में ‘विशेष विवाह अधिनियम’ तथा 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम बना। इन अधिनियमों के आधार पर ही विधवा पुनर्विवाह एवं अंतर्जातीय विवाह को मान्यता दी गई। इनके साथ ही कई महिला संगठनों ने भी महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए कई आंदोलन शुरू किये।

महिला आंदोलनकारियों में ऐनी बेसेंट, मैडम कामा, रामाबाई रानाडे, मारग्रेट नोबल आदि की भूमिका प्रमुख रही है। भारतीय समाज में महिलाओं को संगठित करने तथा उनमें अधिकारों के प्रति साहस दिखा सकने का कार्य अहिल्याबाई व लक्ष्मीबाई ने प्रारंभ से किया था। भारत में कर्नाटक में पंडिता रामाबाई ने 1878 में स्वतंत्रता से पूर्व पहला आंदोलन शुरू किया था तथा सरोज नलिनी की भी अहम् भूमिका रही है।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व प्रचलित इन आंदोलनों के परिणामस्वरूप ही अनेक ऐसे अधिनियम पास किये गए जिनका महिलाओं की स्थिा स्थति सधार में योगदान रहा है। इसी प्रयास के आधार पर स्वतंत्रता पश्चात अनेक अधिनियम जिनमें 1955 का हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 का हिंदू उत्तराधिकार का अधिनियम एवं 1961 का दहेज निरोधक अधिनियम प्रमुख रहे हैं।

इन्हीं अधिनियमों के तहत स्त्री-पुरुष को विवाह के संबंध में समान अधिकार दिये गए तथा स्त्रियों को पृथक्करण, विवाह-विच्छेद एवं विधवाओं को पुनर्विवाह की अनुमति प्रदान की गई है। इसी प्रकार संपूर्ण भारतीय समाज में समय-समय पर और भी ऐसे कई आंदोलन चलाए गए हैं जिनका एकमात्र उद्देश्य स्त्रियों को शोषण का शिकार होने से बचाना रहा है।

वर्तमान समय में स्त्री-पुरुष के समान स्थान व अधिकार पाने के लिए कई आंदोलनों के माध्यम से एक लंबा रास्ता तय करके ही पहुंच पाई है। समय-समय पर राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा महिला संगठनों के प्रयासों के आधार पर ही वर्तमान महिला जागृत हो पाई है। इन सब प्रथाओं के परिणामस्वरूप ही 1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया गया।

इसके साथ ही विभिन्न राज्यों में महिला विकास निगम [Women Development Council (WDC)] का निर्माण किया गया है जिसका उद्देश्य महिलाओं को तकनीकी सलाह देना तथा बैंक या अन्य संस्थाओं से ऋण इत्यादि दिलवाना है। वर्तमान समय में अनेक महिलाएं सरकारी एवं गैर-सरकारी क्षेत्रों में कार्यरत हैं। आज स्त्री सभी वह कार्य कर रही है जो कि एक पुरुष करता है।

महिलाओं के अध्ययन के आधार पर भी वह निष्कर्ष निकलता है कि वर्तमान समय में महिला की परिस्थिति, परिवार में भूमिका, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता, राजनीतिक एवं कानूनी भागीदारी में काफ़ी परिवर्तन आया है। आज महिला स्वतंत्र रूप से किसी भी आंदोलन, संस्था एवं संगठन से अपने आप को जोड़ सकती है। महिलाओं की विचारधारा में इस प्रकार के परिवर्तन अनेक महिला स्थिति सुधारक आंदोलनों के परिणामस्वरूप ही संभव हो पाये हैं।

आज महिला पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित की जाती हैं तथा इसके साथ ही महिला सभाओं एवं गोष्ठियों का भी संचालन किया जा रहा है जिसका प्रभाव महिला की स्थिति पर पूर्ण रूप से सकारात्मक पड़ रहा है। विभिन्न महिला आंदोलनों ने न केवल महिलाओं की स्थिति सुधार में ही भूमिका निभाई है, बल्कि इन आंदोलनों के आधार पर समाज में अनेक परिवर्तन भी आये हैं, अतः महिला आंदोलन सामाजिक परिवर्तन का भी एक उपागम रहा है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 5.
ब्रह्म समाज के बारे में आप क्या जानते हैं? इसके उद्देश्यों एवं उपलब्धियों का वर्णन करो।
अथवा
ब्रह्म समाज के प्रमुख उद्देश्यों एवं उपलब्धियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
ब्रह्म समाज (Brahmo Smaj)-ब्रह्म समाज की स्थापना आधुनिक भारतीय पुनर्जागरण के जनक राजा राममोहन राय ने 20 अगस्त, 1828 ई० में की। ब्रह्म समाज का शाब्दिक अर्थ है “एक ईश्वर समाज” यह समाज मूल रूप से ब्राह्मणों का समाज था जिसमें अन्य जातियों के लोग नहीं जा सकते थे। लेकिन इसके कार्यकाल में निरंतर वृधि होती गई जिसके कारण ब्रह्म समाज के कार्यक्रमों में अन्य जातियों के लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लेना आरंभ कर दिया।

राजा राममोहन राय के पश्चात् देवेंद्र नाथ टैगोर तथा केशवचंद्र सेन आदि समाज सुधारकों ने ब्रह्म समाज को सशक्त नेतृत्व प्रदान किया। उन्होंने देश के विभिन्न भागों में लघु पुस्तिकाओं, पत्रिकाओं, सभाओं एवं गोष्ठियों के माध्यम से इसका प्रचार एवं प्रसार किया। परिणामस्वरूप पहले 1866 तक केवल 54 ब्रह्म समाज स्थापित हुए थे जिनकी संख्या 1911 में बढ़कर 184 हो गई।

उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारतीय समाज में अनेक बुराइयां, कुरीतियां, अंध-विश्वास एवं कुसंस्कार प्रचलित थे। बाल-विवाह की संख्या अधिक थी। विधवा विवाह पर रोक थी। सती प्रथा प्रचलित थी, जिसके कारण स्त्रियों की सामाजिक स्थिति काफ़ी निम्न व कमज़ोर थी। जाति प्रथा, छुआछूत, जाति के आधार पर उच्च जातियों को विशेषाधिकार तथा निम्न जाति व वर्गों के लोगों को कम ही सामाजिक एवं धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने दिया जाता था।

यह उस समय भारतीय समाज की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा थी। विभिन्न वर्गों के सदस्यों को इन कुरीतियों से छुटकारा दिलवाना आवश्यक था। ब्रह्म समाज की स्थापना तथा इसके सिद्धांतों को कार्यांवित कर निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति इसी दिशा में एक बड़ा कदम था।

ब्रह्म समाज के उद्देश्य (Objectives of Brahmo Smaj)-ब्रह्म समाज के उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  • नारी वर्ग का उत्थान करना।
  • बाल विवाह एवं बहु-विवाह को समाप्त करना।
  • सती प्रथा का अंत करना।
  • पर्दा प्रथा का अंत करना।
  • नारी शिक्षा तथा विधवा पुनर्विवाह को प्रोत्साहित करना।
  • अस्पृश्यता तथा जाति प्रथा के अन्य दोषों को समाप्त करना।
  • ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन करना।
  • मानवतावाद को बढ़ावा देना।
  • सेना तथा न्यायपालिका का भारतीयकरण करने के लिए कार्य करना।

ब्रहम समाज के कार्य एवं उपलब्धियां (Works and Achievements of Brahmo Smaj) विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए ब्रह्म समाजी मुख्यतः तीन स्तरों पर अपनी गतिविधियां संचालित करते थे। प्रथम, देश के विभिन्न भागों में ब्रह्म समाजों की स्थापना कर, उनमें संगठन के उद्देश्यों एवं सिद्धांतों के ऊपर विचार करना, द्वितीय, अपने सिद्धांतों का लोगों में प्रचार एवं प्रसार करते थे।

तृतीय, विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ब्रिटिश सरकार से सहयोग पाते थे। ब्रह्म समाजी के लोग विभिन्न स्थानों पर बैठकें करते थे। सम्मेलनों व संगोष्ठियों का आयोजन करते थे। अपने सिद्धांतों को जन-जन में पहुँचाने के लिए लघु पुस्तिकाएं छपवा कर उनमें बांटते थे। अपने सुधारवादी कार्यों के बारे में अधिक-से-अधिक जागरूकता का विकास करते थे। सन् 1829 में अपने अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार से ‘सती प्रथा’ के विरुद्ध कानून पास करवाया।

इसी तरह 1872 ई० में बहु विवाह प्रथा पर भी प्रतिबंध लगवाने हेतु कानून पारित करवाया। इसी तरह बाल-विवाह व पर्दा प्रथा को कम करने के लिए सफल प्रयास करवाया। लोगों में जातीय आधार पर भेदभाव कम करने के प्रति जनसमर्थन को बढ़ावा दिया। नारी शिक्षा हेतु ब्रह्म समाज ने सराहनीय कार्य किये। इसी तरह लोगों को भाईचारे का संदेश दिया। लोगों को आध्यात्मिक विकास हेतु प्रेरणा दी। इसी तरह भारतीय समाज में पाई जाने वाली कई सामाजिक बुराइयों को कम करने में ब्रह्म समाज का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

प्रश्न 6.
आर्य समाज के बारे में आप क्या जानते हैं? इसकी उपलब्धियों का वर्णन करो।
अथवा
आर्य समाज के प्रमुख उद्देश्यों एवं उपलब्धियों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
आर्य समाज (Arya Smaj)-सन् 1875 ई० में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्य समाज की स्थापना मुंबई में की। इस समाज की स्थापना का मुख्य उद्देश्य समाज में प्रचलित रूढ़िवादिता, आडंबरों, पाखंडों तथा अज्ञानता को दूर करना था। 19वीं शताब्दी में भारतीय समाज विशेषतः हिंदू समाज में कई प्रकार की बुराइयां विकसित हो गई। उस समय धार्मिक क्षेत्रों में अनेक देवताओं की पूजा की जाती थी।

इस तरह अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा करने वाले लोग आपस में नफरत व द्वेष रखते थे। ईसाई मिशनरी हिंदुओं में धर्म परिवर्तन करवाकर उन्हें ईसाई बनाने में लगी थी। जाति व्यवस्था भी काफ़ी जटिल हो गई थी। समाज सहस्रों जातियों एवं उपजातियों में विभाजित था। जातीय आधार पर विभिन्न वर्गों में भेदभाव बढ़ गया था। स्त्रियों से संबंधित अनेक कुरीतियां जैसे सती प्रथा, पर्दा प्रथा, विधवा विवाह पर प्रतिबंध, नवजात लड़कियों की हत्या तथा दहेज के कारण महिलाओं की काफ़ी निम्न अवस्था आदि प्रचलित थीं। इन समस्याओं का निराकरण आवश्यक था।

आर्य समाज के कार्य व उपलब्धियां (Works and Achievements of Arya Smaj)-आर्य समाज ने अपनी स्थापना के 125 वर्षों के भीतर भारतीय समाज में विभिन्न क्षेत्रों में कई सुधारवादी कार्य किये। समाज में प्रचलित कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को कम करने के लिए कार्य किये। इसके लिए ‘कन्या विद्यालयों’ एवं ‘कन्या महाविद्यालयों’ की स्थापना करवाई, ताकि उनमें ज्ञानरूपी प्रकाश जलाकर अज्ञानता रूपी अंधेरे को दूर किया जा सके।

विधवाओं की स्थिति सुधारने हेतु कई ‘विधवा ग्रह’ (Widow Home) खोले गये, ताकि वहाँ पर विधवाएं जिंदगी व्यतीत कर सके। वेदों के अनुसार हवन, यज्ञ करने और करवाने, वेदों को सुनने एवं सुनाने पर बल दिया गया। जाति के आधार पर असमानता का विरोध किया गया। धार्मिक क्षेत्रों में वेदों की वापसी (Back to Vedas) का नारा देकर लोगों को वेदों की महत्ता के बारे में बताया गया।

अनाथों के लिये ‘अनाथालय’ खोले: ऐग्लो वैदिक (Dayanand Anglo Vedic-D.A.V.) पाठशालाएं एवं महाविद्यालय (Universities) की स्थापना की गई। उपरोक्त शिक्षा क्षेत्र में आर्य समाज ने सराहनीय कार्य किये। इससे न केवल देश की साक्षरता दर में बढ़ोत्तरी च शिक्षा प्राप्त करके हज़ारों नवयुवक देश की सेवा के लिये तैयार हो गये। स्वामी दयानंद सरस्वती देश की स्वतंत्रता के पक्षधर थे, इसलिए उन्होंने नारा दिया “भारत, भारतवासियों के लिए है।”

प्रश्न 7.
प्रार्थना समाज के उद्देश्यों तथा उपलब्धियों का वर्णन करो।
उत्तर:
प्रार्थना समाज (Prathna Smaj)-सन् 1867 ई० में मुंबई में प्रार्थना समाज की स्थापना की गई, यह मूलतः ब्रह्म समाज की एक शाखा ही थी जिसकी स्थापना केशवचंद्र की सहायता से (प्रेरणा से) गोविंद रानाडे के नेतृत्व में की गई। महाराष्ट्र में ब्रह्म समाज के अनेक नेताओं ने प्रार्थना समाज की नींव डालने व इसे निश्चित स्वरूप करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। प्रार्थना समाज के अनुयायी इसे हिंदू धर्म में ही एक आंदोलन मानते थे जिस पर अनेक संतों जैसे ‘तुकाराम’, ‘नामदेव’ व ‘रामदास’ का गहरा प्रभाव था।

प्रार्थना समाज के उद्देश्य (Objectives of Prarthna Smaj):

  • प्रार्थना समाज की शिक्षाओं का प्रचार व प्रसार करना।
  • स्त्रियों की स्थिति में सुधार करना।
  • जातीय भेदों को दूर करना।
  • अनाथों की स्थिति में सुधार करना।
  • शिक्षा को प्रोत्साहन करना।

प्रार्थना समाज के कार्य व उपलब्धियां-(Works and Achievements of Prarthna Smaj):
प्रार्थना समाज के नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने भारतीय समाज के पिछड़े वर्गों को सुधारने तथा कुरीतियों एवं अंधविश्वासों को दूर करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की गई है। इसके विभिन्न क्षेत्रों में किये कार्यों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-

  • महिलाओं की स्थिति में सुधार करने के लिए ‘आर्य महिला समाज’ की स्थापना की। विधवा आश्रम खोले, कन्या पाठशालाओं की स्थापना की।
  • विधवा पुनर्विवाह व अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहन देने के लिए कार्य किये।
  • निम्न जाति के लोगों की सामाजिक स्थिति सुधारने के उद्देश्य से दलित वर्ग मिशन की स्थापना की।
  • अनाथों एवं बेसहारा बच्चों की देखभाल के लिए पंठरपुर में अनाथालय खोले गये। बाल विवाह को कम करने के लिये निरंतर प्रयास किये गये हैं।
  • मुंबई में रात्रि-विद्यालय (Night School) खोला गया ताकि मजदूर वर्ग शिक्षा ग्रहण कर सके। इस तरह प्रार्थना समाज ने अंतर्जातीय भेदभाव दूर करने के लिये अंतर्जातीय खान-पान को बढ़ावा दिया गया।

प्रश्न 8.
राम कृष्ण मिशन के उद्देश्यों तथा कार्यों का वर्णन करो।
अथवा
रामकृष्ण मिशन के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
राम कृष्ण मिशन (Ram Krishna Mission)-सन् 1897 ई० में स्वामी विवेकानंद ने कोलकाता के निकट वैलूर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण परमहंस के परम भक्त एवं प्रिय शिष्य थे। विवेकानंद ने अपने गुरु के आध्यात्मिक ज्ञान को लोगों तक पहुँचाने के लिए इस मिशन की स्थापना की। कुशाग्र बुद्धि, मन-मोहक व्यक्तित्व, मधुर वाणी तथा धारा प्रवाह वक्ता दयानंद ने देश व विदेश में इस मिशन की शाखाओं की स्थापना की।

कुशल प्रचारक व संगठक (Organisor) होने के कारण उन्होंने सन् 1902 में अपनी मृत्यु से पहले ही इस मिशन की नींव काफ़ी मज़बूत कर दी थी। उनके पश्चात् भी मिशन के कार्यकर्ताओं ने इसके प्रचार व प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी। यही कारण है कि सन् 1961 में इस मिशन की भारत में 102 शाखाएं तथा अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, सिंगापुर, श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यनमार (बर्मा), फिजी तथा मोरिशस आदि विश्व के विभिन्न देशों में 36 शाखाएँ थीं।

राम कृष्ण मिशन के उद्देश्य (Objectives of Ram Krishna Mission)-इस मिशन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

  • आत्मत्यागी तथा व्यावहारिक अध्यात्मवादी साधुओं को रामकृष्ण परमहंस के उपदेशों के प्रचार व प्रसार के लिये तैयार करना।
  • सभी जाति व संप्रदायों के लोगों से दयायुक्त, दानयुक्त तथा मानवीय कार्य करवाना।
  • सामाजिक कुरीतियों व अंधविश्वासों को समाप्त करना।
  • स्त्रियों का स्थान उच्च करने के लिए कार्य करना।
  • सेवा के सिद्धांत (सब जीवन मात्र की सेवा) का प्रचार करना।
  • मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक क्षमताओं का विकास करना।

राम कृष्ण मिशन के कार्य, उपलब्धियां एवं योगदान (Works, Achievements and Contribution of Ram Krishna Mission)-राम कृष्ण मिशन के कार्यों एवं समाज सुधार में इसके योगदान का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-

  • शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए जगह-जगह पाठशालाएं एवं महाविद्यालय खोले गये। सन् 1961 में मिशन द्वारा खोले गये शैक्षणिक संस्थाओं में लगभग 65 हजार विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण कर रहे थे।
  • स्वास्थ्य सेवाओं को बढ़ावा देने के लिए अनेक अस्पताल खोले। सन् 1961 ई० में मिशन द्वारा संचालित बारह शैयायुक्त अस्पताल तथा 68 बाह्य रोगी (Outdoor Patient) अस्पताल थे।
  • मिशन के सिद्धांतों के प्रचार के लिये अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में लगभग एक दर्जन पत्रिकाएं प्रकाशित हो रही हैं।
  • मिशन द्वारा सभाओं, संगोष्ठियों, लेखों तथा पत्रिकाओं के माध्यम से बाल-विवाह, बाल हत्या, पर्दा प्रथा, जातीय आधार पर भेदभाव तथा स्त्री-पुरुष में असमानता का कड़ा विरोध किया जाता है। फलतः लोगों में समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व, आत्मत्याग, आत्मसम्मान, परोपकार आदि भावनाओं का संचार हुआ।
  • लोगों में अंधविश्वासों, कुरीतियों, पश्चिमी संस्कृति के अंधानुकरण के विरुद्ध जागृति आई। देशवासियों में देश प्रेम व राष्ट्रवाद की भावना भी विकसित हुई।
  • मिशन ने समय-समय पर बाढ़ पीड़ितों, भूकंप प्रभावित तथा सूखा ग्रस्त क्षेत्रों में लाखों लोगों की सहायता की।

राम कृष्ण मिशन के विभिन्न क्षेत्रों में योगदान के बारे में डॉ० के० के० दत्ता कहते हैं, “राम कृष्ण मिश आध्यात्मिक उत्थान, आत्मा की जागृति और आधुनिक भारत के सांस्कृतिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है, इस संसार को मानव समाज में धर्म के सही महत्त्व का ज्ञान प्राप्त हुआ तथा विभिन्न देशों को प्यार, स्वतंत्रता तथा एक सूर का संदेश मिला।”

प्रश्न 9.
पश्चिमीकरण के भारतीय समाज पर क्या प्रभाव पड़े हैं?
अथवा
पश्चिमीकरण के कारण भारतीय समाज में क्या परिवर्तन आ रहे हैं? उनका वर्णन करो।
अथवा
भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के प्रभावों की व्याख्या करें।
अथवा
पश्चिमीकरण के प्रभाव बताइए।
उत्तर:
पश्चिमीकरण ने भारतवर्ष को काफ़ी ज्यादा प्रभावित किया है। भारत का शायद ही ऐसा कोई कोना होगा जो पश्चिमीकरण से प्रभावित न हुआ होगा। इस तरह भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित है-
1. परिवार पर प्रभाव-पारंपरिक रूप से भारत में संयुक्त परिवार पाए जाते रहे हैं जिनमें तीन-चार पीढ़ियां इकट्ठी रहती थीं। पश्चिमीकरण से भारत में व्यक्तिवाद, भौतिकवाद तथा तर्कवाद को बढ़ावा मिला। इससे परिवार में समूहवाद में कमी आई। परिवार के सदस्यों में बलिदान तथा त्याग की भावना कम हुई। शिक्षित युवाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना बढ़ी।

उन्होंने कर्ता के आदेशों को मानना कम किया। महिलाओं में भी अपने लिए पहचान बनाए रखने के लिए चेतना बढ़ी है। महिलाओं तथा युवाओं में आई चेतना की वजह से संयुक्त परिवार तेज़ गति से टूटने लगे। इनकी जगह केंद्रीय परिवार लने लगे। इस तरह पश्चिमीकरण से परिवार व्यवस्था पर संरचनात्मक तथा प्रकार्यात्मक प्रभाव पड़े। परिवार के सदस्यों के संबंधों के स्वरूप, अधिकारों तथा दायित्व में परिवर्तन हुआ।

2. विवाह पर प्रभाव-इंग्लैंड के निवासियों के विचारों, मूल्यों और आदर्शों ने भारतीय विवाह प्रणाली को काफ़ी प्रभावित किया। इनके भारत आने से पहले अंतर्विवाही प्रथा, विधवा विवाह की मनाही, बाल विवाह, कुलीन विवाह तथा कन्यादान का प्रथा थी। विवाह को एक धार्मिक संस्कार माना जाता था। विवाह में सपिंड, सगोत्र व सप्रवर के नियमों का पालन होता था तथा तलाक नाम की कोई चीज़ नहीं थी।

परंतु पश्चिम के विचारों, मूल्यों तथा आदर्शों की वजह से विवाह के कई नियमों में परिवर्तन हुए। बाल विवाह पर रोक लगाना तथा देरी से विवाह करना, विधवाओं को दोबारा विवाह की छूट, प्रेम विवाह का प्रचलन बढ़ा तथा कोर्ट मैरिज होने लगी, तलाकों की गिनती में बढ़ोत्तरी हुई तथा कुलीन तथा बहुविवाह की संख्या में कमी आई। एक विवाह को ही ठीक माना जाने लगा। पश्चिमीकरण के कारण विवाह अब एक समझौता मात्र बन कर रह गया है। प्रेम विवाह तथा कोर्ट मैरिज के बढ़ने के साथ-साथ तलाकों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है।

3. नातेदारी पर प्रभाव (Impact on Kinship)-भारतीय समाज में नातेदारी की मनुष्य के जीवन में अहम भूमिका रहती है। मगर पश्चिमीकरण के कारण व्यक्तिवाद, भौतिकवाद, गतिशीलता तथा समय धन है, आदि अवधारणाओं का भारतीय संस्कृति में तीव्र विकास हआ। इससे ‘विवाह मलक’ तथा ‘रक्त मूलक’ (Affinal & Consaguineoun) दोनों प्रकार की नातेदारियों पर प्रभाव पड़ा।

द्वितीयक एवं तृतीयक (Secondary & Tertiary) संबंध शिथिल पड़ने लगे।प्रेम विवाहों तथा कोर्ट विवाहों में विवाहमूलक नेतादारी कमज़ोर पड़ने लगी। विवाह, जन्म दिवस तथा उत्सवों पर नातेदारी का स्थान मित्र मंडली एवं सहकर्मी लेने लगे। पश्चिमी समाजों में नातेदारी को विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता।

इसलिए अनेक समानांतर संबंधियों को एक ही शब्द से संबोधित किया जाता है। इन शब्दों का भारतीय समाज में बढ़ता प्रचलन नातेदारी के महत्त्व में परिवर्तनों का द्योतक है, जैसे चाचा, ताया, फूफा, मौसा तथा मामा पांच अलग-अलग संबंधी हैं, जिनके लिये अंकल (Uncle) शब्द का प्रयोग किया जाने लगा है। इस तरह चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई-बहिनों को (Cousin) कहा जाने लगा है।

4. जाति प्रथा पर प्रभाव (Impact on Caste System) सहस्त्रों वर्षों से भारतीय समाज की प्रमुख संस्था, जाति में पश्चिमीकरण के कारण अनेक परिवर्तन हुए। अंग्रेजों ने भारत में आने के बाद बड़े-बड़े उद्योग स्थापित किये और यातायात तथा संचार के साधनों जैसे-बस, रेल, रिक्शा, ट्राम इत्यादि का विकास व प्रसार किया। इसके साथ-साथ भारतीयों को डाक, तार, टेलीविज़न, अखबारों, प्रेस, सड़कों व वायुयान आदि सुविधाओं को परिचित कराया।

बड़े साथ उद्योगों की स्थापना की गई। इनके कारण विभिन्न जातियों के लोग एक स्थान पर उद्योग में कार्य करने लग गए। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए आधुनिक यातायात के साधनों का प्रयोग होने लगा। इससे उच्चता व निम्नता की भावना में भी कमी आने लगी। एक जाति के सदस्य दूसरी जाति के व्यवसाय को अपनाने लग गए। सेवाओं के बदले अनाज के स्थान पर पैसे दिये जाने लगे और पैसे के आधार पर दूसरी जाति के सदस्यों की सेवाएं ली जाने लगीं।

एक साथ काम करने के कारण खान-पान संबंधी जातीय प्रतिबंध भी कमज़ोर पड़ने लगे। भारतीय समाज में जातीय आधार पर पंचायतों के गठन के स्वरूप में भी कमी आई। पश्चिम के समानता के मूल्यों एवं वैज्ञानिक ज्ञान ने भारतीय समाज में जातीय भेदभाव को कम किया तथा समानता के विचारों का प्रसार किया।

5. अस्पृश्यता (Untouchability)-अस्पृश्यता भारतीय जाति व्यवस्था का अभिन्न अंग रही थी। मगर समानता, स्वतंत्रता, बंधुत्व पर आधारित पश्चिमी मूल्यों ने जातीय भेदभाव को कम किया। जाति तथा धर्म पर भेदभाव किये बिना सभी के लिये शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश की अनुमति, सभी के लिये एक जैसी शिक्षा व्यवस्था, समान योग्यता प्राप्त व्यक्तियों के लिये समान नौकरियों पर नियुक्ति आदि कारकों से अस्पृश्यता में कमी आई। अंग्रेज़ों ने औद्योगीकरण व नगरीयकरण को बढ़ावा दिया। विभिन्न जातियों के लोग रेस्टोरेंट, क्लबों में एक साथ खाने-पीने एवं बैठने लग गए। अतः पश्चिमीकरण के कारण भारत में अस्पृश्यता में कमी आई।

6. धार्मिक जीवन पर प्रभाव (Impact on Religious life)-भारत में अंग्रेज़ी शासन से पूर्व अनेक धार्मिक अंधविश्वासों, कर्मकांडों, पाखंडों आदि का प्रचलन था। पाश्चात्य शिक्षा के प्रभाव एवं इसाई धर्म प्रचारकों के धर्म प्रचार के कारण धार्मिक एवं सुधारवादी अंदोलन आरंभ किये गए। इन सबके कारण बहुत से धार्मिक अंधविश्वास एवं धार्मिक बुराइयां समाप्त हो गईं।

कई लोगों ने धर्म परिवर्तन कर अपने आपको ईसाई बना लिया। हिंदू धर्म में भी समानतावाद व मानवतावाद आदि तत्त्वों को बढ़ावा मिला। अतः पश्चिमी प्रभाव के कारण कई बुराइयों का अंत हुआ। इसके साथ ही लोगों में धार्मिक विश्वासों एवं प्रभाव में कमी आई। हिंदू धर्म में धर्मांधता में कमी आई तथा धर्म में तर्कवाद तथा ईसाई धर्म का भारतीयकरण हुआ।

7. स्त्रियों की प्रस्थिति में परिवर्तन (Change in Status of Women)-अंग्रेजों के भारत में आगमन के समय भारत में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न थी। सती प्रथा पर्दा प्रथा तथा बाल-विवाह का प्रचलन था तथा विधवा पनर्विवाह पर रोक होने के कारण महिलाओं की स्थिति काफ़ी दयनीय थी। अंग्रेजों ने सती प्रथा को अवैध घोषित किया तथा विधवा विवाह को पुनः अनुमति दी। पश्चिमी शिक्षा के प्रसार व प्रचार के माध्यम से चूंघट प्रथा में कमी आई।

पश्चिमीकृत महिलाओं ने पैंट-कमीज़ पहननी आरंभ की। लाखों महिलाओं में अपने अधिकारों के प्रति चेतना आई और उन्होंने केवल घर को संभालने की पारंपरिक भूमिका को त्यागकर पुरुषों के साथ कंधा मिलाकर दफ्तरों में विभिन्न पदों पर नौकरी करनी आरंभ कर दी। इस तरह स्त्रियां अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने में सफ़ल हुई।

8. शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव (Impact in the field of Education)-भारत की परंपरागत शिक्षा प्रणाली पर भी पश्चिम का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। अंग्रेजों के भारतवर्ष में आने से पूर्व यहां शिक्षा में गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी तथा शिक्षा सभी लोगों के लिये उपलब्ध नहीं थी। शैक्षणिक संस्थाओं में संस्थाओं में साधारणतया उच्च जाति के लोग ही प्रवेश कर सकते थे, निम्न जाति के लोगों को पाठशालाओं में शिक्षा की अनुमति नहीं थी, अगर पिछड़ी जाति के लोग शैक्षणिक संस्थाओं में दाखिला ले भी लेते थे तो उनके साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता था।

लेकिन अंग्रेजों के आने के बाद अंग्रेजी संस्थाएं स्थापित की गई तथा साथ ही सार्वभौमिक शिक्षा प्रणाली आरंभ की गई जिसमें सभी जातियों एवं वर्गों के लोग शिक्षा ग्रहण करने लगे। लार्ड मैकाले ने 1835 में भारत में अंग्रेजी शिक्षा की नींव रखी। अंग्रेज़ी शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों को राजकीय एवं प्रशासनिक सेवा में प्राथमिकता दी जाने लगी।

इस शिक्षा ग्रहण उपरांत भारतीयों के विचारों, मूल्यों, आदर्शों व जीवन शैली में अभूतपूर्व परिवर्तन आये। अंग्रेजी शिक्षा ने ही भारतीयों में राष्ट्रीयता एकता व समानता की भावना विकसित की। वर्तमान समय में कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून आदि की दी जाने वाली शिक्षा व परीक्षण अंग्रेज़ी शिक्षा की ही देन है।

9. सामाजिक आदर्श व मूल्यों पर प्रभाव (Impact on Social Norms and Values) लोक रीतियों, रूढ़ियों, परंपराओं, प्रथाओं, नियमों, कानूनों एवं व्यवहारों के तरीकों, विश्वासों, शिष्टाचारों, अनुष्ठानों, मूल्यों, कलाओं तथा साहित्य के रूप में भारतीय समाज की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर है। अंग्रेज़ों के भारत में शासन स्थापित करने तथा ब्रिटेन वासियों के भारतवासियों के साथ प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष संपर्क बढ़ने से इन सांस्कृतिक तत्त्वों में काफ़ी परिवर्तन आये।

इनका पश्चिमीकरण हुआ। अभिवादन करने में चरण-स्पर्श व प्रणाम का स्थान हाथ मिलाना, गुड मार्निंग करना ले रहे हैं। प्रथाओं को कानून का चोला पहनाया जा रहा है। जैसे-सती प्रथा को कानूनी अवैध करार दिया गया। विधवा पुनर्विवाह की अनुमति दी गई। विवाह, जन्म दिन तथा अन्य उत्सवों पर नातेदारियों, सगे संबंधियों, मित्रों तथा अन्य लोगों को उनके घर स्वतः जाकर आमंत्रित करने को अपेक्षा निमंत्रण कार्ड (Invitation-Card) देकर निमंत्रण दिया जाने लगा।

10. जीवन शैली पर प्रभाव (Impact on Way of life)-भारत की जीवन पद्धति पर पश्चिम का काफ़ी प्रभाव पड़ा है। बड़े-बड़े नगरों व शहरों में रिक्शाचालकों तक अंग्रेजी बोलते हुए देखे गये हैं। पहले यहां पर धोती-कुर्ता या पजामा पहना जाता था, वहीं आजकल कोट, पैंट, बुशर्ट, टाई, मौजा ही पहनने लगे। अंग्रेज़ी फ़ैशन ने भारतीय फैशन पर अपना काफ़ी रंग चढ़ाया। महिलाओं में ऊंची ऐड़ी के सैंडिल, साड़ी, ब्लाऊज, जीन तथा मैकसी, इत्यादि का प्रयोग होता है।

समाज में शिक्षित लोग मकानों की सजावट व बनावट-रहन सहन के ढंग तथा उत्सवों या पार्टियों आदि में पश्चिमी मान्यताओं का अनुकरण करते हुए देखे जाते हैं। सौंदर्य प्रसाधनों का भी अधिकाधिक प्रयोग प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता है। अब लोग विलासता को वस्तुएं, टेलीविज़न, फ्रिज, टेप रिकार्ड, कपड़े धोने की मशीन, कार आदि को भी अपने जीवन का अंग बना रहे हैं। अंग्रेजी संगीत में बढ़ती हुई रुचि, क्लब संस्कृति का प्रसार, पश्चिमी तरीकों से पार्टियों का आयोजन, छुरी और कांटों से मेज पर बैठकर भोजन करना, पश्चिमी जीवन शैली के बढ़ते हुए प्रभाव को दर्शाता

11. भाषाओं पर प्रभाव (Impact on Languages)-सन् 1835 में लार्ड मैकाले ने अंग्रेज़ी भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में लागू किया। तत्पश्चात् ब्रिटिश शासन के दौरान तथा स्वतंत्रोपरांत भारत में निरंतर अंग्रेजी भाषा का प्रचार-प्रसार बढ़ता गया। यद्यपि अंग्रेज़ी-संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 18 भाषाओं में से नहीं है। इसे संपर्क भाषा (link language) के रूप में अपनाया गया है।

मगर वर्तमान समय में देश की अच्छी शैक्षणिक संस्थाओं तथा विशेषतः विश्वविद्यालयों तथा महाविश्वविद्यालयों में या तो अंग्रेजी विषय पढ़ाया जाता है या फिर विज्ञान, इंजीनियरिंग मैडीकल तथा व्यावसायिक कोरों में अंग्रेजी शिक्षा का माध्यम है। आधुनिक प्रजातंत्र, संसदीय प्रणाली तथा वर्तमान नौकरशाही तथा नागरिकों को दिये गये मौलिक अधिकार अंग्रेजों की ही देन हैं।

12. विश्वास एवं शिष्टाचार (Beliefs and Etiquettes)-प्राचीन काल से भारतीय समाज के अपने विशिष्ट विश्वास एवं शिष्टाचार रहे है। पश्चिमी सभ्यता के सम्पर्क में आने से इनमें अंतर आया है। पौराणिक काल से भारतीय समाज में चंद्रमा एवं सूर्य का मानवीकरण करके इन्हें शक्तियों के रूप में माना जाता रहा है। ये विश्वास किया जाता रहा कि राहू और केतू के दोनों तरफ से घेर लेने के कारण सूर्य ग्रहण (Solar Eclipse) लगता है तथा ग्रहण के समय सूर्य घोर संकट में होता है।

मगर पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान के भारत में प्रसार से शिक्षित वर्ग में यह वैज्ञानिक मान्यता के रूप में विकसित हुई है कि सूर्य ग्रहण एक खगोलीय घटना मात्र है जिसमें चंद्रमा के सूर्य एवं पृथ्वी की रेखा में आने से सूर्य की रोशनी पृथ्वी पर आने से रुक जाती है। शिष्टाचारों का भी पश्चिमीकरण हुआ है। चरण-स्पर्श, तथा दंडवत् करने के स्थान पर हाथ मिलाना, अतिथि को दूध-लस्सी के बजाए ठंडा पेय या काफ़ी देना आदि सभ्याचार भारत में पश्चिमीकरण के कारण ही है।

13. नव-प्रौद्योगिकी लागू करना (Introducting of New Technology)-अंग्रेजों ने भारत में नव शिल्पास्त्र लागू किया। उन्नत तकनीक के भारत में लागू करने से भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप एवं लोगों की जीवन-शैली में कई परिवर्तन आये। उन्होंने रेलों का विकास किया (सन् 1853 में प्रथम रेलगाड़ी मुंबई से थाने के बीच प्रारंभ की। सड़कों का निर्माण किया, प्रेस विकसित की। घरेलू उपयोग के लिये स्टील के बर्तन बनाये।

बसों, रेलों, तथा जहाजों का निर्माण तथा डाक-तार एवं छापखाने (Printing press) के विकास से यातायात एवं दूरसंचार में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। लोगों ने पारंपरिक रूप से भूमि पर बैठकर पत्ती में खाना खाने की जगह कुर्सी-मेज पर बैठकर स्टील की थाली प्लेट में चम्मच-छुरी-कांटे के साथ खाना आरंभ किया।

औदयोगीकरण (Industrialisation) अंग्रेजों ने भारत में अपने शासनकाल के आरंभ में ही यहां की अमूल्य वस्तुओं तथा कच्चे माल को इंग्लैंड ले जाना प्रारंभ किया। अपने देश में इस कच्चे माल से नई-नई वस्तुओं का निर्माण करके उन्हें भारत में बेचना आरंभ कर दिया। उन्नत तकनीक से मशीनों द्वारा निर्मित वस्तुएं सस्ती एवं अधिक गुणवत्ता वाली होती थीं। जबकि भारतीयों द्वारा भारत में लघु एवं कुटीर उद्योग में निर्मित वस्तुएं अपेक्षाकृत महंगी तथा कम गुणवत्ता वाली होती थी।

फलस्वरूप भारतीय उद्योग को काफ़ी धक्का लगा। ज़मींदारी व्यवस्था लागू करने एवं उद्योगों पर ब्रिटिश उद्योग व्यापार के विपरीत प्रभाव पड़ने से देश की अर्थव्यवस्था काफ़ी कमज़ोर हो गई। तत्पश्चात् अंग्रेजों ने बड़े पैमाने पर बड़े उद्योग (Heavy Industries) स्थापित किये। इनमें वस्तुओं का निर्माण मशीनों से किया जाने लगा। स्थानीय बाजार की खपत से अधिक वस्तुएं तैयार की गईं जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार बढ़ा। मगर अंग्रेजों ने भारतीय संसाधनों का दोहन कर जो धन एकत्रित किया उसका निरंतर इंग्लैंड को प्रवाह होता गया।

प्रश्न 10.
धर्म निरपेक्षता क्या होती है? धर्म निरपेक्षता के क्या कारण हैं?
अथवा
धर्मनिरपेक्षीकरण से आप क्या समझते हैं?
अथवा
धर्मनिरपेक्षीकरण के दो कारक लिखें।
अथवा
पंथनिरपेक्षीकरण पर विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर:
धर्म निरपेक्षता का अर्थ (Meaning of Secularism)-भारतीय समाज 20वीं शताब्दी से ही पवित्र समाज (Sacred Society) से एक धर्म निरपेक्ष समाज (Secular Society) में परिवर्तित हो रहा है। इस शताब्दी के अनेक विद्वानों, विचारकों एवं राजनीतिज्ञों ने यह महसूस किया कि धर्म निरपेक्षता के आधार पर ही विभिन्न धर्मों का देश भारत संगठित रह पाया है। धर्म निरपेक्षता के आधार पर राज्य के सभी धार्मिक समूहों व धार्मिक विश्वासों को एक समान माना जाता है।

निरपेक्षता का अर्थ समानता या तटस्थता से है। राज्य सभी धर्मों को समानता की दृष्टि से देखता है तथा किसी के साथ भी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता है। धर्म निरपेक्षता ऐसी नीति या सिद्धांत है, जिसके अंतर्गत लोगों को किसी विशेष धर्म को मानने या पालन करने के लिये बाध्य नही किया जाता है।

धर्म निरपेक्षीकरण का अर्थ (Meaning of Secularization) धर्म निरपेक्षीकरण को उस सामाजिक एवं सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है जिनके द्वारा धार्मिक एवं परंपरागत व्यवहारों में धीरे-धीरे तार्किकता या वैज्ञानिकता का समावेश होता जाता है। अनेक विद्वानों ने धर्म निरपेक्षीकरण को अग्रलिखित परिभाषाओं से परिभाषित किया है।

डॉ० एम० एन० श्रीनिवास (Dr. M.N. Srinivas) के शब्दों में “धर्म निरपेक्षीकरण अथवा लौकिकीकरण शब्द का यह अर्थ है कि जो कुछ पहले धार्मिक माना जाता था, वह अब वैसा नहीं माना जा रहा है, इसका अर्थ विभेदीकरण की प्रक्रिया से भी है जो कि समाज के विभिन्न पहलुओं, आर्थिक, राजनीतिक, कानूनी और नैतिक के एक दूसरे से अधिक पृथक होने से दृष्टिगोचर होती है।”

डॉ० राधा कृष्णन (Dr. Radha Krishnan) के अनुसार, “लौकिकीकरण या धर्म निरपेक्षीकरण, धार्मिक निरपेक्षता व धार्मिक सहअस्तित्ववाद है।” उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर धर्म-निरपेक्षीकरण एक सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें मानव के व्यवहार की व्याख्या धर्म के आधार पर नहीं, अपितु तार्किक आधार पर की गई है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत धर्म का प्रभाव कम हो जाता है तथा घटनाओं को कार्य-कारण संबंधों के आधार पर समझा जाता है।

आत्मगतता व भावुकता (Subjectivity and Emotionality) का स्थान वस्तु निष्ठता (Objectivity) एवं वैज्ञानिकता ने ले ली है। अतः धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया में, धार्मिकता का ह्रास, बुद्धिवाद के महत्त्व, विभेदीकरण, वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता, तथा व्यक्ति को किसी भी धर्म या धार्मिक सोपान की सदस्यता प्राप्त करने की स्वतंत्रता व अधिकार होता है।।

धर्म निरपेक्षीकरण के कारण (Factor of Secularization) धर्म निरपेक्षीकरण से भारतीय समाज में सामाजिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टिकोणों में काफ़ी परिवर्तन किये गये हैं। इन क्षेत्रों में प्रभाव को देखने से पहले उन कारणों को जानना ज़रूरी है जिन्होंने धर्म निरपेक्षीकरण को संभव बनाया है। धर्म-निरपेक्षीकरण के विकास के निम्नोक्त कारक हैं-
1. धार्मिक संगठनों में कमी (Lack of Religious Organisations)-धार्मिक निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का विकास धार्मिक संगठनों का अभाव कारण रहा है। भारतीय समाज में अनेक धर्मों के संप्रदाय पाए जाते हैं। इन संप्रदायों में हिंदू धर्म ही एक ऐसा संप्रदाय है जिनके अनेक मत पाये जाते हैं। बाकी धर्मों जैसे सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम, इन सभी में एक ही मत व संप्रदाय होता है। इसी कारण ये लोग अपने संप्रदाय के प्रति काफ़ी कठोर विचारधारा के होते हैं।

इसके विपरीत हिंदू धर्म में अनेक मतों के कारण कोई अच्छा संगठन नहीं है। एक हिंदू दूसरे हिंदू की धार्मिक आधार पर निंदा या आलोचना करता है। इस सबका प्रभाव हिंदू धर्म पर पड़ा। एक ओर तो लोग उच्च जातियों के अत्याचारों एवं शोषण से दुखी होकर हिंदू धर्म को अपनाया दूसरी ओर पढ़े-लिखे हिंदू इस धार्मिक कट्टरता से दूर होते चले गये। यह लोग हिंदू धर्म में पाये जाने वाले विश्वासों, अंधविश्वासों, कर्मकांडों, आदर्शों व मूल्य का विरोध कर रहे थे। भारतीय समाज में यह सभी कारण धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया में सहयोग देते आ रहे हैं।

2. भारतीय संस्कृति (Indian Culture) भारतीय संस्कृति का अपने आप ही निरपेक्षीकरण हो रहा है क्योंकि भारतवर्ष एक धर्म निरपेक्ष (Secular Republic) गणराज्य है। एक धर्म निरपेक्ष राज्य होने के कारण अनेक धर्मों व जातियों के संप्रदाय एक-दूसरे के नज़दीक आते रहते हैं तथा एक दूसरे संप्रदाय की अच्छाइयां व बुराइयों का भी ज्ञान अर्जित करते रहते हैं तथा उनका मूल्यांकन करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य संस्कृति ने भी धर्म निरपेक्षीकरण के आधार पर परिवर्तनों में अहम भूमिका निभाई है।

3. यातायात एवं संचार (Transportation and Communications) यातायात व संचार की सुविधाओं में माज में गतिशीलता को बढ़ावा मिला है। इन्हीं साधनों की वजह से नये-नये नगरों, व्यवसायों व उद्योगों का भी विकास हुआ। इन विभिन्न साधनों के द्वारा विभिन्न प्रकार के धर्म, जाति, प्रदेश व देश के लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं। संपर्क में आने से ही आपसी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। इससे विभिन्न धर्मों की तार्किक आलोचना की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिला। इससे पवित्र-अपवित्र एवं अस्पृश्यता के विचारों में कमी आई। ये सभी तत्त्व धर्म-निरपेक्षीकरण के विकास को प्रोत्साहित करते हैं।

4. पाश्चात्य संस्कृति (Western Culture)-भारतीय संस्कृति के ऊपर भी पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय जीवन के सभी पहलुओं पर प्रभाव डाला है। यहां के धर्म, कला, साहित्य, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक जीवन में कई परिवर्तनों को पाश्चात्य संस्कृति के संदर्भ में समझा जा सकता है। वास्तव में धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया के विकास में पाश्चात्य संस्कृति का ही मूल रूप से सहयोग रहा है।

5. आधुनिक शिक्षा (Modern Education)–वर्तमान समय की शिक्षा पद्धति ने भी धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया के विकास में सर्वोपरि भूमिका निभाई है। भारतवर्ष में आधुनिक शिक्षा पद्धति पाश्चात्य शिक्षा का ही रूप है। शिक्षा पद्धति में पाश्चात्य मूल्यों के विकास के साथ भारतीय मूल्यों में भी परिवर्तन हुआ। इसका प्रभाव सबसे अधिक धार्मिक विश्वासों व मूल्यों पर पड़ा आधुनिक शिक्षित व्यक्ति केवल मात्र धर्म के आधार पर अंध-विश्वासों, नियमों या बंधनों को नहीं अपनाता।

मूल्यांकन के पश्चात् ही अपने आपको उन बंधनों से बांधता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति ने व्यक्ति की सोच को व्यावहारिकता व वैज्ञानिकता के आधार पर विकसित किया है। इसके साथ ही स्त्री शिक्षा को भी बढ़ावा मिला है। शिक्षा पद्धति में आये हुए परिवर्तनों के कारण ही भारतीय समाज में लिप्त कई बुराइयों जैसे-छुआछूत, अस्पृश्यता की भावना, जातीय आधार, उच्च शिक्षा आदि में कमी आई है। सहशिक्षा (Co-education) को भी अवसर दिया जाता है।

6. नगरीयकरण (Urbanization)-नगरीयकरण ने धर्म निरपेक्षीकरण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। शहरों व नगरों में ही धर्म निरपेक्षवाद सबसे अधिक विकसित हुआ। नगरों में ऐसे वह सब साधन मौजूद होते हैं, जैसे विकसित यातायात व संचार की सुविधाएं, उच्च शिक्षा, भौतिकवाद, तार्किकतावाद या विवेकवाद, व्यक्तिवादिता, फैशन, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव इत्यादि जो मिलकर धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का विकास करते हैं।

प्रश्न 11.
धर्म निरपेक्षता के भारतीय सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़े?
अथवा
धर्मनिरपेक्षीकरण के भारतीय समाज पर प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक, जीवन पर धर्म निरपेक्षता के प्रभाव (Impact of Secularization on Indian Social and Cultural Life)-डॉ० एम० एन० श्रीनिवास ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति Social change in Modern India में धर्म-निरपेक्षीकरण के भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर पड़े अनेक प्रभावों एवं परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों का सविस्तार उल्लेख किया जिसका वर्णन अग्रलिखित है-
1. पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा में परिवर्तन (Change in the Concept of Purity and Pollution)-धर्म रण के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा काफ़ी परिवर्तित हई है। इसके प्रभाव के कारण, जाति, व्यवसाय, खान-पान, विवाह, पूजा-अर्चना, संबंधी अनेक धारणाओं में धर्म का प्रभाव कम हुआ है तथा अपवित्रता संबंधी कट्टर विचारों में भी कमी आई है।

विभिन्न जातियों के व्यक्ति आपस में इकट्ठे होकर रेल, बस आदि में यात्रा करते हैं। मिलकर रैस्टोरैंट या रेस्तरां आदि में खाते-पीते हैं। एक जाति दूसरी जाति के व्यवसाय को अपना रही है। निम्न जाति के व्यक्ति उच्च जाति के व्यवसायों को अपना रहे हैं जिससे उनकी सामाजिक स्थिति भी पहले से बेहतर हुई है।

संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के आधार पर भी निम्न जातियों ने उच्च जाति की उच्च जीवन-शैली को अपनाया है। वर्तमान समय में परंपरागत पवित्रता एवं अपवित्रता संबंधी विचारधारा में परिवर्तन हुआ है। अब लोग किसी भी चीज़ को तार्किकता व स्वास्थ्य नियमों के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करने लगे हैं। इन सब तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि धर्म निरपेक्षीकरण ने भारतीयों की विचारधारा में अनेक आधारों पर परिवर्तन किये।

2. जीवन चक्र एवं संस्कार में परिवर्तन (Change in Life Cycle and Rituals)-संस्कार हिंदू धर्म का मूल आधार माने जाते हैं। भारतीय समाज में मुख्यतः हिंदू धर्म में प्रत्येक कार्य का आरंभ संस्कारों के आधार पर ही होता है। हिंदू धर्म के अंतर्गत जब एक बच्चा अपनी मां के गर्भ में आता है, तभी ही गर्भदान संस्कार पूरा कर दिया जाता है तथा इसके पश्चात् समय-समय पर दूसरे संस्कार जैसे-चौल, नामकरण, उपनयन (जनेऊ संस्कार), समावर्तन, विवाह आदि किए जाते हैं। जब व्यक्ति अपना शरीर त्याग देता है तो भी अंतिम संस्कार (अंत्येष्टि) किया जाता है अर्थात् हिंदू समाज
की नींव संस्कारों के बीच ही गडी हई है।

वर्तमान समय में बढ़ते धर्म-निरपेक्षीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण इन संस्कारों का संक्षिप्तिकरण हो रहा है। कुछ एक संस्कारों को ही पूरा किया जाता है तथा अन्य संस्कार जैसे-नामकरण, चौथ एवं उपाकर्म इत्यादि को पूरा नहीं किया जाता। ब्राह्मणों एवं उच्च जातियों में विधवा का मुंडन संस्कार किया जाता था जो अब लगभग न के बराबर है। इसके साथ ही कुछ एक संस्कारों को एक साथ ही मिला दिया गया है; जैसे-उपनयन संस्कार विवाह के आरंभ में ही संपन्न करवा दिया जाता है। वर्तमान समय में दैनिक जीवन के कर्मकांड जैसे-स्नान, पूजा, अर्चना, वेद, पाठ, भजन-कीर्तन इत्यादि के लिये भी व्यक्ति नाम मात्र समय देता है। ये सब परिवर्तन बढ़ते धार्मिक निरपेक्षीकरण के कारण ही हैं।

3. परिवार में परिवर्तन (Change in Family) भारतीय समाज में संयुक्त परिवार (Joint family) पारिवारिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण रूप है। सामाजिक जीवन में परिवार एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था माना जाता है। कृषि मुख्य व्यवसाय होने के कारण भारतीय समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था को ही उचित व्यवस्था माना जाता था।

परिवार में सभी सदस्य मिलकर साझे रूप से ज़मीन पर खेती करते तथा साझे रूप से ही अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिये अपनी आय का खर्च करते थे। संयुक्त परिवार में संपूर्ण पारिवारिक सदस्य सामान्य हित के लिये कार्य करते थे। संयुक्त परिवार में एक साथ तीन या अधिक पीढ़ियों के सदस्य इकट्ठे एक ही घर में ही रहते थे।

वर्तमान में बदलती परिस्थितियों के अनुसार संयुक्त परिवार में भी परिवर्तन हुआ। आज संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। इनकी जगह एकाकी परिवार विकसित हो रहे हैं। संयुक्त परिवारों में जो कार्य पारिवारिक सदस्य मिल-जुल कर एक-दूसरे के सहयोग से पूरा करते थे, आज वही कार्य अनेक दूसरी समितियों व संस्थाओं को हस्तांतरित हो रहे हैं।

वर्तमान समय में परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के विचारों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता। इसके साथ अब बड़े बूढ़े भी अपनी विचारधारा को नयी पीढ़ी के साथ परिवर्तित कर रहे हैं। परिवारों में जिन त्यौहारों को धार्मिकता के आधार पर परंपरागत रूप से मनाया जाता था। उन त्यौहारों को धार्मिक तथा सामाजिक अवसर अधिक माना जाता है। इन सब आधारों पर स्पष्ट हो जाता है कि पारिवारिक संस्था को धर्म निरपेक्षीकरण ने पूर्णतः प्रभावित किया है।

4. ग्रामीण समुदाय में परिवर्तन (Change in Rural Community)-धर्म निरपेक्षीकरण का प्रभाव नगरों के साथ-साथ ग्रामीण समुदाय में भी देखने को मिलता है। ग्रामीण समुदायों में जातीय पंचायतों के स्थान पर निर्वाचित पंचायतों का विकास हो रहा है। जहां पर भी ये जातीय पंचायतें अगर हैं भी तो वहां पर ये धार्मिक लक्ष्यों के आधार पर नहीं बल्कि राजनैतिक उद्देश्यों को लेकर संगठित की गई हैं।

ग्रामीण समाज में प्रतिष्ठा व सम्मान जातीय या धार्मिकता के आधार पर होता था, वहां अब धन व संपत्ति के आधार पर होने लगा है। वर्तमान समय में निम्न जातियों के व्यक्तियों को भी धन के आधार पर उच्च जाति के व्यक्तियों से अधिक सम्मान दिया जाने लगा है। ग्रामीण समाजों पर परिवार व विवाह संबंधों में भी धर्म निरपेक्षीकरण के परिणामस्वरूप अंतर्विवाह (Intercaste-marriage) का प्रचलन बढ़ा है।

ग्रामों में धार्मिक उत्सव को धार्मिकता के आधार पर कम तथा सामाजिक उत्सवों के रूप में अधिक मनाया जाने लगा है। उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को मूल रूप से प्रभावित किया है। इस प्रक्रिया ने एक और नये सांस्कृतिक मूल्यों के विकास में योगदान दिया है तो दूसरी ओर भारतीय प्रथागत अथवा परंपरागत मूल्यों, आदर्शों को भी विघटित करने में अपनी भूमिका निभाई है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 2 सांस्कृतिक परिवर्तन

प्रश्न 12.
संस्कृतिकरण क्या होता है? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
अथवा
संस्कृतिकरण पर निबंध लिखें।
अथवा
संस्कृतिकरण के अर्थ और विशेषताओं की व्याख्या करें।
अथवा
संस्कृतिकरण की परिभाषा दें तथा इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
संस्कृतिकरण की परिभाषा दीजिए। संस्कृतिकरण की प्रमुख विशेषताओं की व्याख्या करें।
अथवा
संस्कृतिकरण पर विस्तृत चर्चा कीजिए।
उत्तर:
संस्कृतिकरण का अर्थ (Meaning of Sanskritization)-प्रो० श्रीनिवास ने भारतीय समाज में विभिन्न व्यक्तियों से संबंधित निश्चित पहलुओं में परिवर्तनों की प्रक्रिया को संस्कृतिकरण का नाम दिया। उन्होंने, अपनी पुस्तक ‘Social Change in Modern India’ में लिखा है कि भारतीय इतिहास में संस्कृतिकरण की प्रक्रिया निरंतर चलती रही है और अब भी यह जारी है।

प्रो० एम० एन० श्रीनिवास ने ‘आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन’ नामक कृति में संस्कृतिकरण के अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है, “संस्कृतिकरण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोई निम्न हिंदू जाति या जनजाति या अन्य समूह अपनी प्रथाओं, कर्मकांड, विचारधारा तथा जीवन शैली के उच्च व बहुधा ‘द्विज’ की दिशा में बदल लेता है”

श्रीनिवास उसके आगे लिखते हैं, “साधारण तथा ऐसे परिवर्तनों के पश्चात् वह जाति स्थानीय समुदाय द्वारा जातीय सोपान में प्रदत्त स्थान से उच्च स्थान का दावा करने लगती है। सामान्यतः ऐसा दावा कुछ समय के पश्चात् बल्कि एक-दो पीढ़ियों के पश्चात् किया जाता है जिसकी उसे स्वीकृति मिल जाती है। कभी-कभी कोई जाति ऐसे स्थान का दावा करती है जिसे मानने के लिए पड़ोसी जाति सहमत नहीं होती है।”

उपरोक्त सत्र दवारा स्पष्ट है कि संस्कतिकरण निम्न जाति, जनजाति एवं अन्य समह की परंपराओं. कर्मकांडों. विचारधारा तथा जीवन शैली में उच्च व्यक्ति व द्विज की दिशा में परिवर्तनों की प्रक्रिया है। ऐसे परिवर्तनों के कुछ समय के पश्चात उक्त समूह जातीय संस्कृति में प्राप्त पारंपरिक स्थान से उच्च स्थान प्राप्ति का दावा करते हैं।

संस्कृतिकरण की विशेषताएं
(Characteristics of Sanskritization)
1. पदमूलक परिवर्तन (Positional Changes)-संस्कृतिकरण द्वारा निम्न जातियों, जनजातियों में केवल पदमूलक परिवर्तन होते हैं। इस संबंध में श्रीनिवास लिखते हैं, “संस्कृतिकरण से व्यवस्था में पदमूलक परिवर्तन होते हैं। इसके कारण संरचनात्मक परिवर्तन नहीं होते। इससे अभिप्राय यह है कि एक जाति अपनी पड़ोसी जाति से ऊपर जाती है व दूसरी नीचे आ जाती है परंतु ऐसा केवल स्थिर सोपानात्मक व्यवस्था के अंतर्गत ही होता है। इससे व्यवस्था में परिवर्तन नहीं होता है।”

2. संस्कृतिकरण केवल ब्राह्मणीकरण नहीं है। (Sanskritization is not Merely Brahmani-zation) श्रीनिवास ने अपने अध्ययनों में यह पाया कि ‘कुर्ग’ ब्राह्मणों की जीवन पद्धति का अनुकरण कर रहे हैं। मगर श्रीनिवास के अतिरिक्त योगेंद्र सिंह ने भी इस बात के माना है कि संस्कृतिकरण केवल ब्राह्मणीकरण नहीं है। यह ब्राह्मणीकरण से वृहद् अवधारणा है जिसमें क्षत्रियकरण तथा वैश्यकरण भी सम्मिलित है। क्योंकि निम्न जातियां क्षत्रियों व वैश्य की परंपराओं व विचारधाराओं का भी अनुसरण करती हैं।

3. संस्कृतिकरण के कई प्रारूप हैं (Sanskritization has many Models)-संस्कृतिकरण का वर्ण ही केवल एक प्रारूप नहीं है, कई प्रारूप हैं। मिल्टन सिंगर (Milton Singer) ने कहा है, “संस्कृतिकरण के एक या दो नहीं बल्कि कम से कम तीन या चार आदर्श मौजूद हैं।”

4. उच्च जातियों का अनुकरण (Imitation of High Castes) निम्न जातियां, जनजातियां तथा अन्य समूह हिंदू जातियों की परंपराओं, लोक रीतियों, विचारधाराओं एवं व्यवहार के तरीकों को अपनाती हैं। वे द्विजों द्वारा किए जाने वाले कर्मकांडों को करती हैं। यद्यपि जाति व्यवस्था के अंतर्गत निम्न जातियों को ऐसा करने की मनाही है। संस्कृति निम्न वर्गों द्वारा उच्च जातियों की जीवन शैली के अनुकरण की प्रक्रिया है।

संतिकरण का संबंध समह से है (Sanskritization is Related to Group)-संस्कतिकरण के दवारा समूह की स्थिति में परिवर्तन आता है। यह अकेले व्यक्ति व परिवार से संबंधित नहीं है क्योंकि यदि व्यक्ति संस्कृतिकरण द्वारा उच्च जातीय स्थिति का दावा करने लगे तो संभव है कि उसे अपनी जाति के अन्य सदस्यों के विरोध, हास्य व व्यंग्य, निंदा व चर्चा कर सामना करना पड़े।

6. निरंतर प्रक्रिया (Continuous Process)-संस्कृतिकरण एक निरंतर प्रक्रिया है जो अविरुद्ध जारी रहती है। श्रीनिवास का मानना है कि केवल दक्षिण भारत के वर्गों में ही संस्कृतिकरण नहीं पाया जाता बल्कि देश को विभिन्न भागों, ग्रामीण, जनजातीय तथा नगरीय समुदाय में भी यह प्रक्रिया पाई जाती है।

7. गैर-हिंदुओं का भी संस्कृतिकरण होता है (There is also Sanskritization of Non-Hindu) केवल हिंदू जातियों का ही नहीं बल्कि गैर-हिंदू जातियों का भी संस्कृतिकरण होता है। भारत की जनजातियों; जैसे भील, गोंड, औगज आदि का संस्कृतिकरण हुआ। उसके बाद वह हिंदू कहलाईं।

8. संस्कृतिकरण विरोध रहित नहीं है (Sanskritization is not without Opposition)-संस्कृतिकरण विरोध रहित नहीं है, जब निम्न जाति पूर्व प्राप्त सामाजिक स्थिति से उच्च स्थिति का दावा करती है तब उच्च जातियों द्वारा उसका विरोध होता है। क्योंकि निम्न जातियों के ऐसा करने से उनका स्थान पड़ोसी जाति से ऊपर (उच्च) हो जाता है। फलस्वरूप पड़ोसी उच्च जाति की कथित जाति से सामाजिक दूरी तो घटती ही है बल्कि उसका अपना स्थान पहले से निम्न हो जाता है। श्रीनिवास का मानना है कि उत्तरी बिहार में जब राजपूतों और ब्राह्मणों ने अहीरों को विजों के प्रतीक चिन्हों को अपनाने से रोका तो उनके बीच संघर्ष आरंभ हो गया।

निम्न वर्गों में सामाजिक परिवर्तन (Social Changes Among Lower Classes)-संस्कृतिकरण निम्न वर्गों, निम्न जातियों, जनजातियों तथा ऐसे अन्य समूहों में सामाजिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत निम्न जातियों की लोक रीतियों, रूढ़ियों, परंपराओं, प्रथाओं, मूल्यों, शिष्टाचारों, विश्वासों, कर्मकांडों तथा मान्यताओं में परिवर्तन आता है।

10. उच्चतर स्थिति का दावा (Claim of Higher Status)-संस्कृतिकरण के द्वारा निम्न जातियां तथा जनजातियां, जातीय सोपान में उन्हें जो स्थान प्राप्त होता है, उससे उच्च स्थान होने का दावा करती हैं। श्रीनिवास लिखते हैं. “हमें भारत की 1921 की जनगणना रिपोर्ट से पता चलता है कि उत्तर भारत के अहीरों ने उपनयन डालकर क्षत्रिय कहलाना आरंभ कर दिया।”

प्रश्न 13.
संस्कृतिकरण के निम्न जातियों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
भारतीय समाज में संस्कृतिकरण से जाति व्यवस्था पर कई प्रभाव पड़े। इस प्रक्रिया के चलते जाति एवं वर्ग नहीं रह पाया विशेषतः निम्न जातियों में अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए प्रयास जारी हैं। इससे उनके पारंपरिक जातीय प्रतिबंध शिथिल होते हैं। संस्कृतिकरण से निम्न जातियों पर पड़ने वाले प्रभावों व इससे निम्न जातियों में होने वाले परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है
(1) संस्कृतिकरण से निम्न जातियों में गतिशीलता बढ़ी।

(2) संस्कृतिकरण से निम्न जातियों की प्रस्थिति में सुधार हुआ है। उच्च जातियों की परंपराओं, कर्मकांडों, विचारधारा व जीवन शैली को अपनाने के कुछ समय के पश्चात् निम्न जातीय समूह अपने से तुरंत ऊपर जाति से उच्च स्थान होने का दावा करने लगी हैं। जब वे स्थानीय जातीय सोपान (Local Caste Hierarchy) में वांच्छित स्थान ग्रहण कर लेती हैं तो उससे उनमें पदमूलक सुधार (Positional) होता है।

(3) संस्कृतिकरण से निम्न जातियों की व्यावसायिक स्थिति में परिवर्तन आए हैं। उन्होंने अशुद्ध एवं अपवित्र समझे जाने वाले अपने पारंपरिक व्यवसाय छोड़ने प्रारंभ किए तथा शुद्ध व्यवसायों को अपनाया। यद्यपि पवित्र व्यवसायों को अपनाने की उनको मनाही है मगर पवित्रता के प्रति उनकी बढ़ती चेतना के कारण उन्होंने उच्च कहे जाने वाले व्यवसायों को अपनाना प्रारंभ किया है।

(4) संस्कृतिकरण से उनकी संस्कृति-लोक रीतियां, परंपराएं, प्रथाएं, विश्वास, मूल्य, व्यवहार व शिष्टाचार के तरीकों में परिवर्तन हुआ। उन्होंने उच्च जातियों की जीवन शैली का अनुकरण करना प्रारंभ किया जिससे उनकी जीवन पद्धति प्रभावित हुई।

(5) संस्कृतिकरण से निम्न जातियों के धार्मिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ा। उन्होंने उच्च जातियों द्वारा किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों को अपनाना प्रारंभ किया है। यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ करना प्रारंभ किया हैं। अशुद्धता का परित्याग तथा शुद्ध कार्यों को अपनाया है। हिंदू त्योहारों को मानने लगे हैं।

(6) उनकी आर्थिक स्थिति पर भी गहरा प्रभाव पड़ा। उद्योगों में व सरकारी नौकरियों में उनके प्रवेश से उनकी आय में वृद्धि हुई। वह शैक्षणिक, तकनीकी व व्यावसायिक योग्यता प्राप्त कर उच्च पदों पर कार्यरत होने लगे। आधुनिक व्यवसायों से उनकी आय बढ़ी जिससे उनकी आर्थिक स्थित में सुधार हुआ।

(7) निम्न जातियों के सामाजिक जीवन में भी काफ़ी परिवर्तन आए हैं। जातीय प्रतिष्ठा में सुधार करने के लिए इनके सदस्यों ने शिक्षा प्राप्त करनी प्रारंभ की है। उद्योगों, कार्यालयों व प्रशासन में नौकरियां प्राप्त की हैं। इससे उनकी समाज के उच्च वर्गों से अंतःक्रिया होने लगी। फलस्वरूप जातीय सामाजिक दूरी में कमी आई।

(8) आर्थिक स्थिति में सुधार, शिक्षा ग्रहण करने, नगरों के लिए स्थानांतरण व आवागमन और संचार साधनों के उपयोग से निम्न जातियों के रहन-सहन में परिवर्तन आया। उन्होंने पक्के भवन बनाने आरंभ किए। घर में फर्नीचर, मेज-कुर्सियां, दीवान, टी०वी०, फ्रिज, पंखे, रसोई-गैस आदि सुख-सुविधा की प्रत्येक वस्तु रखना प्रारंभ की।

(9) संस्कृतिकरण से निम्न जातियों के अपने मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी पड़े हैं। उनमें गतिशीलता के बढ़ने, पवित्र व्यवसायों को अपनाने, उच्च शिक्षा ग्रहण करने, धार्मिक स्थलों पर भ्रमण करने से हीनता की भावना (Inferiority Complex) में कमी आई।

प्रश्न 14.
पश्चिमीकरण क्या होता है? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
अथवा
पाश्चात्यकरण की चार विशेषताएँ बताएँ।
अथवा
पश्चिमीकरण का अर्थ बताएँ तथा इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
अथवा
पश्चिमीकरण क्या है? पश्चिमीकरण के प्रमुख तत्वों एवं विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
अथवा
पश्चिमीकरण की कोई तीन विशेषताएँ लिखें।
अथवा
पश्चिमीकरण को परिभाषित करें।
उत्तर:
पश्चिमीकरण का अर्थ (Meaning of Westernization) आम तौर पर पश्चिमीकरण का अर्थ पश्चिमी देशों के भारत पर प्रभाव से लिया जाता है। पश्चिमी देशों में इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी व अमेरिका ऐसे राष्ट्र हैं जिनका भारतीय समाज पर काफ़ी प्रभाव रहा है। भारत में विशेषतयः शिक्षित वर्ग इन देशों के लोगों की जीवन शैली का अनुकरण करते रहे हैं। प्रो० एम० एन० श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण की बहुपक्षीय विवेचना की है।

अन्य समाजशात्रियों ने भी अत्र-कुत्र पश्चिमीकरण के अर्थ की व्याख्या की है हालांकि अधिकांश विद्वानों ने अपना ध्यान भारतीय समाज पर पश्चिमीकरण के प्रभावों की व्याख्या करने पर केंद्रित किया है। एम० एन० श्रीनिवास ने अपनी कृति ‘आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन’ में लिखा है, “पश्चिमीकरण शब्द के मैंने ब्रिटिश के डेढ़ सौ से अधिक वर्ष के शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज व संस्कृति में उत्पन्न हुए परिवर्तनों के लिए प्रयोग किया है और यह शब्द विभिन्न स्तरों संस्थाओं, प्रौद्योगिकी, विचारधाराओं व मूल्यों आदि में होने वाले परिवर्तनों से संबंधित है।”

श्रीनिवास ने पश्चिमीकरण के अंतर्गत केवल ब्रिटिश शासन या इंग्लैंड के भारत पर प्रभावों को ही सम्मिलित किया है।

पश्चिमीकरण की विशेषताएं
(Characteristics of Westernization)
1. स्वतंत्रता उपरांत जारी (Continue After Independence)-पश्चिमीकरण की प्रक्रिया अंग्रेजों के भारत से चले जाने के साथ समाप्त नहीं हुई। मगर यह देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी निरंतर जारी है। भार के लगातार बढ़ते प्रचार-प्रसार, ब्रिटिश की तरह खाने-पीने की आदतों, शिष्टाचारों (चरण-स्पर्श के स्थान पर गुड मार्निंग, गुड-इवनिंग, स्वीट ड्रीमज़ आदि अभिव्यक्तियों का प्रयोग करना) विचारधाराओं (भारतीय राष्ट्रपति का ब्रिटिश रानी की तरह संवैधानिक मुखिया होना तथा मंत्रिमंडल के पास वास्तविक शक्तियों का होना) से पता चलता है कि भारत का वर्तमान समय में भी पश्चिमीकरण हो रहा है।

2. पश्चिमीकरण आधुनिकीकरण से भिन्न है (Westernization is Different from Modernization) यद्यपि पश्चिमीकरण से आधुनिकीकरण की बढ़ावा मिलता है परंतु यह दोनों एक-दूसरे से भिन्न धारणाएं है। पश्चिमीकरण का संबंध ब्रिटिश संपर्क में आने के पश्चात् भारत समाज पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे सभी प्रकार के प्रभावों से है जबकि आधुनिकीकरण के अंतर्गत पश्चिमी देशों इंग्लैंड, जर्मनी, फ्रांस, रूस व अमेरिकी गैर-पश्चिमी राष्ट्रों जापान एवं चीन आदि के भारत पर सकारात्मक प्रभावों को सम्मिलित किया जाता है। इसके अतिरिक्त बदलते अंतर्राष्ट्रीय परिवेश के प्रभाव तथा भारत में ज्ञान-विज्ञान तथा भारत में ज्ञान-विज्ञान तथा तकनीक के विकास के कारण हुए परिवर्तन का भी आधुनिकीकरण कहा जाता है।

3. ब्रिटिश संस्कृति का भारतीय समाज पर प्रभाव (Impact of British Culture on Indian Society) पश्चिमीकरण भारतीय समाज पर ब्रिटिश संस्कृति का प्रभाव है। यद्यपि भारत पर अनेक अन्य पश्चिमी समाजों का काफ़ी प्रभाव रहा है मगर पश्चिमीकरण के अंतर्गत अन्य पश्चिमी देशों की संस्कृतियों का प्रभाव सम्मिलित नहीं है। इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए श्रीनिवास ने कहा है, “पश्चिमीकरण शब्द की मैंने ब्रिटिश के डेढ़ सौ से अधिक वर्ष के शासन के परिणामस्वरूप भारतीय समाज एवं संस्कृति में उत्पन्न हुए परिवर्तनों के लिए प्रयोग किया है।”

4. पश्चिमीकरण शहरी लोगों तक ही सीमित नहीं है। (Westernization is not Confined to Urbanites) ब्रिटिश काल के दौरान पश्चिमीकरण के प्रभाव उन शहरी लोगों या बड़े नगरों तक सीमित नहीं थे जिनके संपर्क में अंग्रेज़ आये बल्कि हज़ारों ग्रामीण श्रमिक, छोटे कर्मचारी सैनिकों के रूप में अंग्रेजों के संपर्क में आये तथा जिससे सुदूर स्थित गांवों का पश्चिमीकरण हुआ।

5. जटिल प्रक्रिया (Complex Process)-पश्चिमीकरण काफ़ी जटिल प्रक्रिया है। भारतीय समाज में विभिन्न क्षेत्रों, जातियों, समुदायों, वर्गों तथा समूहों पर पश्चिमीकरण के एक जैसे प्रभाव नहीं पड़े। सुशिक्षित ब्रिटिश प्रशासन, सेनाओं में कार्यरत तथा शहरी लोग अशिक्षित तथा ग्रामीणों से अधिक पश्चिमीकृत हो गये। जैन धर्म के अनुयायी अधिक तथा मुसलमान कम पश्चिमीकृत हुए।

श्रीनिवास ने अपनी कृति ‘आधुनिक भारत में सामाजिक परिवर्तन’ में लिखा है “पश्चिमीकरण का स्वरूप व गति एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में तथा जनसंख्या एक भाग से दूसरे भाग में भिन्न रही है। कुछ लोगों की वेषभूषा, भोजन के तरीके, भाषा, खेलकूद तथा उपयोग की जाने वाली वस्तुएं पश्चिमीकृत हो गईं जबकि अन्य समूहों ने पश्चिमी ज्ञान, विज्ञान, कलाओं तथा साहित्य को अपना लिया।”

6. चेतन एवं अचेतन प्रक्रिया (Conscious and Unconscious Process)-पश्चिमीकरण चेतन एवं अचेतन प्रक्रिया है। संस्कृति के कुछ पहलुओं जैसे-भाषा व तकनीक इत्यादि को सोच-समझा कर भारतवर्ष में लागू किया गया। भारतीयों द्वारा चेतन रूप में इन्हें अपनाया गया। मगर पश्चिमीकरण के तरीकों, मूल्यों, शिष्टाचारों, खान-पान की आदतों तथा विश्वासों को अचेतन रूप में भारतीयों ने ग्रहण किया। चरण स्पर्श के स्थान पर हाथ मिलाकर तथा गुड मार्निंग करके अभिवादन करना, भूमि पर आसन बिछा कर हाथ से भोजन ग्रहण करने के स्थान पर कुर्सी-मेज पर चम्मच से खाना-खाना इसके उदाहरण हैं।

7. नैतिक रूप से तटस्थ (Ethically Neutral)—पश्चिमीकरण द्वारा भारतीय समाज में कई प्रकार के अच्छे व बुरे, नकारात्मक एवं सकारात्मक तथा संगठनात्मक एवं विघटनात्मक परिवर्तन आये। पश्चिमीकरण का संबंध परिवर्तनों के सकारात्मक व नकारात्मक पहलओं से नहीं है। इसके अंतर्गत सभी प्रकार के परिवर्तन आते हैं। अर्थात पश्चिमीकरण नैतिक रूप से तटस्थ है।

8. इसमें प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव सम्मिलित (It Includes Direct and Indirects Impacts) ब्रिटिश के भारत पर शासन के दौरान अंग्रेज़ों का सहस्त्रों भारतीयों से प्रत्यक्ष संपर्क हुआ। लेकिन करोड़ों ऐसे भारतीय भी हैं जिनके साथ कभी भी प्रत्यक्ष संपर्क नहीं हुआ। फिर भी उन पर काफ़ी ब्रिटिश प्रभाव पड़ा।

कई लोग ब्रिटिश काल में विभिन्न पदों पर कार्यरत थे। अंग्रेजों के संपर्क में उन पर कई प्रभाव पड़े। इन लोगों ने ब्रिटिश संस्कृति का अपने पारिवारिक सदस्यों में बीजारोपण किया। ऐसे परिवारों से ब्रिटिश संस्कृति उनके संपर्क में आई तथा अन्य लोगों में फैलती गई। अतः पश्चिमीकरण के अंतर्गत ब्रिटिश के भारतीय समाज पर सभी प्रकार के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष प्रभाव सम्मिलित हैं।

प्रश्न 15.
भारत में आधुनिकीकरण के कौन-से लक्षण देखे जा सकते हैं? उनका विस्तार से वर्णन करो।
उत्तर:
चाहे अंग्रेजों ने भारत में आधुनिकीकरण की नींव रखी थी तथा उसके लिए कुछ प्रयास भी किए थे पर वे इतने काफ़ी नहीं थे कि उन से देश आधुनिक हो जाए। आजादी के पश्चात् सरकार ने देश को विकसित करने की ठानी तथा बहुत से प्रयास किए गए ताकि भारत को भी पश्चिमी देशों की तरह आधुनिक बनाया जा सके।

आज हमारे सामने कुछ ऐसे लक्ष्ण हैं जिनको देखकर हम कह सकते हैं कि भारत आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है चाहे वह पूरी तरह आधुनिक नहीं हुआ है। आधुनिकीकरण के इन लक्षणों का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) औद्योगीकरण-आज़ादी से पहले हमारे देश में गिनती के ही कुछ उद्योग थे पर आज़ादी के बाद तेज़ी से उद्योग बढ़े हैं क्योंकि उद्योग लगाने के लिए जो हालात चाहिए वे मिल गए थे। चाहे औद्योगीकरण आधुनिकीकरण का लक्षण नहीं है फिर भी यह आधुनिकीकरण के लिए जरूरी है क्योंकि देश में उद्योग लगने से पैसा आएगा, देश का आर्थिक विकास होगा. जनता को रोजगार मिलेगा।

आज भारत में उदयोग तेजी से बढ़ रहे हैं। दनिया में उदयोगों के मामले में हम काफी पीछे हैं। इस तरह आधुनिकीकरण के लिए पहली शर्त ज्यादा उद्योग की होती है, वह हमारे देश में तेज़ी से अब बढ़ रही है।

(ii) धर्म निरपेक्षता-जब भारत पर राजाओं-महाराजाओं का राज था तो वह किसी एक धर्म को प्रोत्साहित किया करते थे तथा बाकी धर्मों को नफ़रत की दृष्टि से देखा जाता था। अंग्रेजों के आने के बाद स्थिति बदल गई। उन्होंने किसी भी धर्म को विशेष महत्त्व नहीं दिया क्योंकि वो तो यहां पर पैसा कमाने आए थे।

अंग्रेजों के पश्चात् आज़ादी के बाद भारत सरकार तथा संविधान में भी धर्म निरपेक्षता की नीति अपनायी गई ताकि किसी विशेष धर्म को महत्त्व न मिले तथा सभी धर्मों को बराबर मौका मिले। आजकल के समय में आधुनिकीकरण की यह शर्त है कि देश धर्म होना चाहिए तथा यही नीति भारत में अपनायी गई। इस तरह हम कह सकते हैं कि आधुनिकीकरण की अगली शर्त यानि कि धर्म-निरपेक्षता, हमारा देश पूरी कर रहा है।

(iii) नगरीयकरण-आधुनिकीकरण का अगला लक्षण नगरीयकरण या नगरों का बढ़ना है। हमारे देश पर यह बात लागू होती है। आज से तकरीबन 100 साल पहले हमारी तकरीबन 90% जनसंख्या गांवों में रहती थी पर आज़ादी के पश्चात् इसमें तेजी से कमी आयी। 1991 की जनगणना के अनुसार 25% जनता तथा 2001 की जनगणना के अनुसार 29% जनता शहरों में रहती है।

इसका यह अर्थ हुआ कि जनसंख्या तेजी से गांवों को छोड़कर शहरों की तरफ जा रही है तथा शहरों का तेजी से विकास हो रहा है। अगर हम शहरों के आकार की तरफ देखें तो पिछले दो-तीन दशकों में शहरों के आकार दगने हो गए हैं। इसका अर्थ है कि नगरीयकरण में बढ़ोत्तरी हो रही है। इस तरह हमारा देश आधुनिकीकरण का यह लक्षण भी पूरा करता है।

(iv) शिक्षा-यह कहा जाता है कि जितना ज्यादा कोई देश साक्षर होगा उतना ज्यादा वह आधुनिक होगा क्योंकि शिक्षा का सीधा संबंध आधुनिकता से होता है। अगर हम पश्चिमी देशों की तरफ देखें तो वह आज के समय में आधुनिक माने जाते हैं पर इसके साथ हमें वहां की साक्षरता दर भी देखनी चाहिए। जापान की साक्षरता दर 100%, इंग्लैंड की 99%, रूस की 99.2%, अमरीका की 98% है। इनके अलावा यूरोपीय देशों की साक्षरता-दर काफ़ी ऊँची है क्योंकि ये लोग शिक्षा पर बहुत ज्यादा पैसा खर्च करते हैं।

ये लोग कुल बजट का 19-20% पैसा शिक्षा पर खर्च करते हैं जबकि हमारा देश सिर्फ 3-3.5% ही खर्च करता है पर अब इसमें धीरे-धीरे बढ़ोत्तरी हो रही है। हमारे देश की साक्षरता दर में भी काफ़ी तेज़ी से बढ़ोत्तरी हो रही है। 1991 की जनगणना के अनुसार हमारी साक्षरता दर 52% थी जो 2001 में बढ़कर 65% तक पहुँच गई है। इस तरह हम आधुनिकता की यह शर्त भी पूरी करते हैं।

(v) पश्चिमीकरण-अगर हम ध्यान से देखें तो पश्चिमीकरण को ही आधुनिकीकरण मान लिया जाता है। हमारे देश के ऊपर अंग्रेजों ने 150 सालों से ज्यादा राज किया था तथा यहां पर पश्चिमीकरण की नींव भी उन्होंने रखी थी। उन्होंने ही यहां पर पश्चिमी शिक्षा की शुरुआत की, पश्चिम की तर्ज पर यहां पर उद्योग लगवाने शुरू किए, यातायात जैसे ट्रेन तथा संचार जैसे तार-डाक इत्यादि की शुरुआत की।

इसके अलावा उन्होंने यहां की शासन पद्धति में भी बदलाव किया तथा इसे भी पश्चिम की तर्ज पर चलाया। आधुनिकीकरण की वजह से जो क्रांति यातायात तथा संचार के साधनों, शिक्षा तथा और कई क्षेत्रों में आयी है, आज़ादी के पश्चात् वह हमारे देश में भी आयी है। हमारे देश में भी पश्चिम की तर्ज पर यातायात, संचार, शिक्षा के साधन विकसित हो गए हैं जिनको देख कर हम कह सकते हैं कि भारत आधुनिकता की तरफ बढ़ रहा है।

(vi) सामाजिक परिवर्तन-आधुनिकीकरण का एक और ज़रूरी लक्षण सामाजिक परिवर्तन है। सामाजिक परिवर्तन से मतलब न सिर्फ देखने वाली चीजों में बदलाव बल्कि हमारे सोचने के तरीकों, विचारों में भी परिवर्तन होना चाहिए। यह सब भारत में हो रहा है। भारत के सामाजिक ढाँचे, उसकी संरचना में काफ़ी हद तक परिवर्तन आ गए हैं तथा आ रहे हैं।

यह सब भारत सरकार की कोशिशों का नतीजा है। जाति प्रथा जो हमारे समाज का मुख्य आधार हुआ करती थी अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। इसकी जगह तरह-तरह के वर्ग ले रहे हैं। इसके अलावा हमारे समाज में कई प्रकार की समस्याएं थीं जो खत्म हो गयी है या हो रही हैं। लोगों के सोचने, रहन-सहन के तरीकों में परिवर्तन आ रहे हैं जो कि आधुनिकता की निशानी है।

(vii) गतिशीलता तथा नए वर्गों का विकास-आधुनिकता की एक और निशानी गतिशीलता भी होती है। गतिशीलता का मतलब होता है एक जगह को छोड़ कर दूसरी जगह जाना तथा यह सब भारत में हो रहा है। लोग गांवों को छोड़कर शहरों की तरफ जा रहे हैं, अपनी पुरानी नौकरियां छोड़कर नई नौकरियां तलाश कर रहे हैं। यह सब गतिशीलता है।

इस गतिशीलता की वजह से जाति प्रथा में बंधन टूट रहे हैं तथा समाज में नए नए वर्गों का उदय हो रहा है। अब कुछ लोग अगर किसी बात में समानता रखते हैं तो वह एक वर्ग का निर्माण करते हैं चाहे वे किसी भी जाति से हों। इस तरह सामाजिक गतिशीलता तथा नए वर्गों का विकास सामाजिक समृद्धि को बढ़ाता है जोकि आधुनिकीकरण का एक लक्षण है।

प्रश्न 16.
आधुनिकीकरण क्या होता है? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
अथवा
आधुनिकीकरण की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना करें।
अथवा
आधुनिकीकरण से आप क्या समझते हैं? आधुनिकीकरण की प्रमुख विशेषताओं की विवेचना कीजिए।
अथवा
आधुनिकता क्या है?
उत्तर:
आधुनिकीकरण का अर्थ (Meaning of Modernization)-आधुनिकीकरण एक वृहद् अवधारणा है। यह सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है। आधुनिकीकरण अंग्रेजी के शब्द मॉडर्नाइजेशन (Modernization) का हिंदी रूपांतर है जिसका प्रादुर्भाव लैटिन भाषा के मोडो (Modo) शब्द से हुआ। मोडो का अर्थ है प्रचलन अर्थात् जो वस्तु धारणा तकनीक तथा व्यवस्था प्रचलित है, अपेक्षाकृत नवीन एवं श्रेष्ठ है। वह आधुनिक है तथा आधुनिक होने की प्रक्रिया को आधुनिकीकरण कहते हैं।

अर्थात् पारंपरिक में आधुनिकता की और परिवर्तनों की प्रक्रिया आधुनिकीकरण है।” अनेक विद्वानों ने आधुनिकीकरण का अर्थ स्पष्ट करने के लिये निम्नलिखित परिभाषाएं परिभाषित की हैं, आइजनस्टेड (Eisenstadt) ने अपनी कृति आधुनिकीकरण प्रक्रिया एवं परिवर्तन में लिखा है, “आधुनिकीकरण उन सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक स्वरूपों की दिशा में परिवर्तन है, जो सतारहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी में पश्चिमी यूरोप व उत्तरी अमेरिका में तत्पश्चात् अन्य यूरोपीय देशों में तथा उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी में दक्षिण अमरीकी, एशियाई तथा अफ्रीकन देशों में हुए।”

यह परिभाषा आधुनिकीकरण की ऐतिहासिक दृष्टिकोण से व्याख्या करती है। इसमें 17वीं से 20वीं शताब्दी के दौरान विश्व के विभिन्न देशों में सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक क्षेत्रों में हुए परिवर्तनों को आधुनिकीकरण का नाम दिया है।

दूबे के शब्दों में, “आधुनिकीकरण एक प्रक्रिया है जो परंपरागत या अर्ध परंपरागत व्यवस्था से किन्हीं इच्छित प्रारूपों तथा उनसे जुड़ी हुई सामाजिक संरचना के स्वरूपों, मूल्यों, प्रेरणाओं तथा सामाजिक आदर्श नियमों की ओर होने वाले परिवर्तनों को स्पष्ट करती है।” दूबे ने प्रौद्योगीकरण तथा सामाजिक संरचना के विभिन्न पहलुओं में होने वाले परिवर्तनों को आधुनिकीकरण कहा है।

आधुनिकीकरण की विशेषताएं / तत्त्व
(Characteristics/Elements of Modernization)
1. नगरीयकरण (Urbanization)-नगरीयकरण आधुनिकीकरण की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है। मानव समुदाय जनजातीय से ग्रामीण तथा जनजातीय एवं ग्रामीण से नगरीय जीवन की ओर परिवर्तित होता है। समाज में जितना अधिक नगरीयकरण होगा वह उतना ही अधिक आधुनिक कहलाएगा। स्विट्ज़रलैण्ड, अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा फ्रांस आदि आधुनिक समाजों में विकासशील समाजों की अपेक्षा कहीं अधिक आधुनिक समाज नगरीकरण हुआ है।

2. औद्योगीकरण (Industrialization)-औद्योगीकरण का अर्थ है-उद्योगों का विकास। औद्योगीकरण से . समाज में गुणात्मक परिवर्तन आता है। औद्योगीकरण समाज में प्रगति का परिणाम है। इसमें प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त होता है। विज्ञान एवं तकनीकी के विकास से उद्योगों की स्थापना में सहायता मिलती है तथा उद्योगों में बड़े पैमानों पर उत्तम गुणवत्ता वाली अपेक्षाकृत सस्ती वस्तुओं के निर्माण से प्रबल प्रगति को बढ़ावा मिलता है। अतः औद्योगीकरण आधुनिकीकरण का आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।

3. धर्म निरपेक्ष शिक्षा (Secular Education) शिक्षा जाति, धर्म व समुदाय, लिंग, रंग तथा जन्म के स्थान के पार पर निर्मित समूहों तक सीमित न होकर सबके लिये उपलब्ध हो। अर्थात् समाज के सभी वर्गों को शिक्षा ग्रहण करने का समान अवसर प्राप्त हो उसी को आधुनिकीकरण कहा जा सकता है।

4. शिक्षा का प्रसार (Expansion of Education) शिक्षा के प्रसार से आधुनिकीकरण के द्वार खुलते हैं। किसी भी समाज शिक्षा का जितनी गति से प्रसार व प्रचार होगा उस समाज में उतनी गति से आधनिकीकरण होगा। अमरीका, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी एवं इटली तथा स्विट्ज़रलैंड आदि सब देशों में साक्षरता दर लगभग शतप्रतिशत है। उच्च शिक्षा का भी काफ़ी प्रसार हुआ। फलस्वरूप यह समाज आधुनिकीकृत हो पाए हैं।

5. वैज्ञानिक प्रकृति (Scientific Temper)-वैज्ञानिक प्रकृति से अभिप्राय है मनुष्य में कार्य-कारण के आधार पर घटनाओं को समझने की प्रवृत्ति का विकास। वैज्ञानिक प्रवृत्ति का विकास आधुनिकीकरण का लक्षण है। इस विकास से व्यक्ति तथ्यों का विश्लेषण तर्क, विवेकशीलता एवं वृद्धि के आधार पर करता है। वह किसी भी चीज़ का अंधानुकरण नहीं करता है। किसी भी समाज में आधुनिकीकरण की गति इस बात से प्रभावित होती है कि वहां पर कितने लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण पाया जाता है।

6. संचार एवं यातायात साधनों का विकास (Development of Means of Communication and Transportation) संचार एवं यातायात के साधनों में विकास के कारण लोगों में आपसी संबंध बढ़ते हैं। इससे विभिन्न कार्य अपेक्षाकृत कम समय में पूर्ण किये जाते हैं। औद्योगीकरण को गति मिलती है। संचार एवं यातायात के साधनों के उन्नत का अर्थ है कि संबंधित समाज उन्नत है। वर्तमान समय में मोबाइल, टेलीफोन, ई-मेल (E Mail), फैक्स (Fax) से संचार व्यवस्था में क्रांति आई है तथा बस, रेल व हवाई संपर्क से मानव जीवन में सकारात्मक गुणात्मक (Positive qualitative) परिवर्तन आए हैं।

7. एकाकी परिवारों का विकास (Development of Nuclear Family)-अनेक समाजशास्त्रियों का यह मानना है कि संयुक्त परिवार परंपरा का तथा एकाकी परिवार आधुनिकता का प्रतीक है। आधुनिकीकरण से एकाकी परिवारों का विकास हो रहा है तथा एकाकी परिवार आधुनिकीकरण को दर्शाते हैं जिसमें पति-पत्नि व अनेक अविवाहित बच्चे एक साथ रहते हैं। ऐसे परिवारों के सदस्यों को अधिक स्वतंत्रता प्राप्त होती है।

8. विशिष्ट भूमिकाएं (Specialization Roles)-किसी भी क्षेत्र में विशेष ज्ञान प्राप्त करके विशिष्ट भूमिका अभिनीत करना आधुनिकीकरण का एक तत्त्व है। व्यक्ति द्वारा विशेष शिक्षा ग्रहण करके डॉक्टर वैज्ञानिक, मैनेजर, वकील या अन्य व्यावसायिक (Professional) की भूमिका निभाना व्यक्ति की विशिष्ट भूमिकाएं हैं।

9. शक्ति के निर्जीव स्रोतों का दोहन (Exploitation of Inanimate Sources of Power) लेवी (Levi) ने अपनी कृति ‘Modernization of Structure and Society’ में इस बात पर बल दिया है। शक्ति तथा अधिकाधिक दोहन (Exploitation) आधुनिकीकरण का संकेत चिन्ह है। निर्जीव स्रोतों का दोहन करके उसको समाज की प्रगति के लिये उपयोग आधुनिकीकरण है।

10. प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि (Increase in per Capita Income)-प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि आधुनिकीकरण का सूचक है। समाज में कितना आधुनिकीकरण हुआ है। वहां की प्रति व्यक्ति आय से इस बात का अनुमान लगाया जाता है। पश्चिमी समाजों का पूर्वी समाजों से अधिक आधुनिकीकरण हुआ है। पूर्व में भी भारत की अपेक्षा जापान का कहीं अधिक आधुनिकीकरण हआ है।

11. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग (International Co-operation)-भूमंडलीकरण के चलते विश्व का कोई भी समाज अन्य समाजों से अलग नहीं रह सकता। प्रगति, विकास तथा विविध आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये अन्य देशों का सहयोग आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र [United Nation(U.N.)], विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation), अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization), विश्व स्वास्थ्य संगठन (World Health Organisation), यूनेस्को (Unesco), सार्क (Saarc), नाटो (Nato), आई० एम० एफ० (I.M.F) तथा विश्व बैंक (World Bank) आदि का निर्माण अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को दर्शाता है। अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से आधुनिकीकरण को गति मिलती है।

12. लोकतंत्रीकरण (Democratization)-लोकतंत्रीकरण का अर्थ है लोगों की, लोगों के लिये तथा लोगों के द्वारा सरकार की स्थापना करना। सभी नागरिकों को मौलिकाधिकार प्रदान करना। सरकार की लोगों के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करना, मौलिक अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करने, स्वतंत्र तथा निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना करना, लोगों की राजनीति में भागीदारी बढ़ाना, जीवन में आगे बढ़ने के लिये समान अवसर प्रदान करना इत्यादि। वर्तमान समय में विश्व के अधिकतर राष्ट्रों में लोकतंत्रीय शासन व्यवस्था अपनाई गई है। जो आधुनिकीकरण के विभिन्न चरणों से गुजर रही है। अब भारतीय लोकतंत्र में परिपक्वता आ रही है।

13. राष्ट्रीयता की भावना का विकास (Development of feeling of Nationality)-जाति, धर्म क्षेत्र, रंग तथा लिंग आदि संकीर्ण विचारों से ऊपर उठकर राष्ट्रीयता की भावना का विकास आधुनिकीकरण है। ऐसे समाज में स्थानीय निष्ठाओं की अपेक्षा राष्ट्रीयता की भावना को अधिक महत्त्व दिया जाता है।

14. तार्किक नौकरशाही (Rational Bureaucracy)-नौकरशाही किसी भी समाज के प्रशासनिक ढांचे की रीड़ की हड्डी होती है। नौकरशाही के तार्किक होने से प्रशासनिक कुशलता बढ़ती है। यह आधुनिकीकरण का प्रतीक है।

15. लोगों की राजनैतिक भागीदारी में वृद्धि (Increasing Political Participation of the People) लोगों का राजनीतिक व्यवस्था के बारे में ज्ञान तथा उनका राजनीतिक गतिविधियों में सहभागिता अंतः संबंधित है। राजनीतिक गतिविधियों में वोट डालना, विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधाराओं का ज्ञान रखना, देश के सम्मुख प्रमुख समस्याओं के बारे में विचार-विमर्श करना, सरकार के कार्यों का विशलेषण करना इत्यादि लोगों में क्रियाशीलता से देश के शासन में परिपक्वता, कुशलता तथा जवाबदेही विकसित होती है। इसलिये राजनीतिक जनसहभागिता आधुनिकीकरण का कारक है।

16. पश्चिमीकरण (Westernization)-पश्चिमीकरण भी आधुनिकीकरण का एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है जिसमें मानवतावाद, व्यक्तिवाद, भौतिकवाद, तर्कवाद, लौकिकीकरण (Secularisation) तथा कर्मवाद पर विशेष बल दिया जाता है। जो समाज पश्चिमीकृत है वह काफ़ी सीमा तक आधुनिक भी है। क्योंकि पश्चिमी देशों में आधुनिकीकरण हुआ है। हालाकि जापान जैसे ही कुछ देशों में पश्चिमीकरण के बिना ही आधुनिकीकरण हुआ है।

प्रश्न 17.
भारत पर आधुनिकीकरण के प्रभावों का वर्णन करो।
अथवा
आधुनिकीकरण के कारण भारत में आए परिवर्तनों का वर्णन करें।
अथवा
आधुनिकीकरण तथा पश्चिमीकरण से भारतीय समाज में क्या-क्या परिवर्तन हुए? उदाहरण देकर वर्णन कीजिए।
अथवा
भारतीय समाज में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता के पश्चात् आधुनिकीकरण और आधुनिकीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव निम्नलिखित है-
1. शहरीकरण (Urbanization) भारतीय समाज में निरंतर शहरीकरण हो रहा है। सन् 1901 में कुल ख्या के 11% लोग शहरों में रहा करते थे। सन् 2011 की जनसंख्या की गणना के अनुसार शहरों में 32% लोग रहते थे। इसी प्रकार स्वतंत्रोपरांत 1951 में हुई देश में प्रथम जनगणना के अनुसार कल शहर 2844 थे जो कि 1991 में बढ़कर 3696 हो गये।

इसी प्रकार 1951 की गणना के अनुसार देश में 74 ऐसे शहर थे जिनकी जनसंख्या एक लाख या उससे अधिक थी जबकि 1991 में यह संख्या 300 के ऊपर तक चली गई। 10 लाख या उससे अधिक जनसंख्या वाले शहरों की तीव्र गति से वृद्धि हो रही है। 1901 में केवल एक शहर इस श्रेणी में था, 1951 में यह पांच हो गये। 1991 में 23 नगरों की जनसंख्या 10 लाख या उससे अत्यधिक हो गई। 33% जनसंख्या इन्हीं 23 शहरों में निवास करती है। 25.7 लाख आबादी के साथ मुंबई सबसे बड़ा शहर है।

2. औद्योगीकरण (Industrialization)-स्वतंत्रता के उपरांत भारत में अभूतपूर्व गति से औद्योगीकरण हुआ। उद्योगों का विकास दूसरी पंचवर्षीय योजना का प्रमुख लक्ष्य था। इस अवधि में देश में औद्योगिक क्रांति आ गई। बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की गई। जिसमें उत्पादन घरेलू खपत के लिए ही नहीं बल्कि विदेशी व्यापार के लिये किया जाने लगा। जुलाई, 1991 से निजीकरण, उदारीकरण, भूमंडलीकरण (Privatization, libralization, Globalization) को विशेष बढ़ावा दिया गया। उद्योगों में पूंजीनिवेश के लिये नियमों का सरलीकरण किया गया। निवेशों को अधिक सुरक्षा प्रदान की गई।

3. पश्चिमीकरण (Westernization)-ब्रिटिश काल के दौरान भारतीय समाज में हुए परिवर्तनों को पश्चिमीकरण कहते हैं। अंग्रेजों के प्रभावाधीन भारत में सामंतवाद, लौकिकीकरण तथा तर्कवाद का विकास हुआ। देश में नववर्ग का उदय हुआ। यातायात एवं संचार साधनों तथा उद्योगों का विकास हुआ। लोकतंत्रीकरण का विकास हुआ। प्रशासनिक, वैधानिक, न्यायिक ढांचे तथा बैंकिंग, बीमा आदि वित्तीय संस्थाओं का विकास हुआ। भारतीय समाज में पश्चिमीकरण से आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिला।

4. प्रौद्योगिक विकास (Technological Development)-भारत में तकनीकी एवं प्रौद्योगिकी का विकास बड़ी तीव्र गति से हो रहा है। देश में हवाई जहाज़, समुद्री जहाज़, रेल, टैंक, सुपर कंप्यूटर , प्रक्षेपास्त्र, (Missile), उपग्रहों का विकास भारत में बढती प्रौदयोगिकी का स्वयं ही सिदध प्रमाण है। अंतरिक्ष प्रौदयोगिकी (Space Technology) में तो भारत सुपर पावर (Super Power) बन गया है। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास ने तो देश को एक परिवार के रूप में परिवर्तित कर दिया है।

मोबाइल पर अगम्य क्षेत्रों, पहाड़ों, जंगलों से व्यक्ति मोबाइल पर भारत में ही नहीं विश्व के किसी भी क्षेत्र में लोगों से बात कर सकता है। इंटरनैट (Internet) से सूचना क्रांति आ गई है। बायो-प्रौद्योगिकी (Bio-Technology) के क्षेत्र में काफ़ी वृद्धि हुई है।

5. लोकतंत्रीकरण (Democratization)-“भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है” धर्म, प्रजाति, जाति व जन्म, स्थान के आधार पर भेदभाव किये बिना सभी भारतीयों को समान रूप से मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। किसी भी व्यवसाय को अपनाने, देश के किसी भी भाग में घूमने-फिरने, वयस्क मताधिकार, चुने जाने का सभी नागरिकों को अधिकार है। प्रदेश की सरकारें जनता द्वारा 5 वर्ष के लिये चुनी जाती है।

जो सरकार जनता के हितों की अनदेखी करती है। जनता उसे आगामी चुनावों में वोट न डालकर बदल देती है। स्वतंत्र न्यायपालिका, स्वतंत्र प्रैस, संवैधानिक शक्तियां प्राप्त नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (Comptroller and Auditor General of India) तथा चुनाव आयोग देश के लोकतंत्र को सशक्त आधार प्रदान करते हैं। लेकिन देश के लगभग एक तिहाई लोग निरक्षर तथा ग़रीबी रेखा के नीचे होने के कारण विशेषतः ऐसे लोग अपने अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाते।

नित नये क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के गठन के कारण, पुराने दलों में विभाजन के कारण तथा राजनीतिज्ञों की वाक्-पटुता के कारण सांसद् और विधान सभाओं में कई अपराधी जीत कर चुने जाते हैं। राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण तथा. अपराध के बढ़ते राजनीतिकरण के कारण भारत की लोकतंत्र की गरिमा को आघात पहुंचता है।

6. शिक्षा का प्रसार (Expansion of Education)-स्वतंत्रोपरांत साक्षरता दर बढ़ाने के उद्देश्य से देश में विभिन्न स्तरों के लाखों शैक्षिक संस्थान खोले गये। 20वीं शताब्दी विशेषतः स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति की है। सन् 1901 में देश की साक्षरता दर मात्र 5 प्रतिशत थी, जिसमें स्त्रियों एवं पुरुषों में साक्षरता दर क्रमशः 0.60 प्रतिशत तथा 9.83 प्रतिशत थी अर्थात् 500 महिलाओं में से केवल 1 महिला शिक्षित थी।

1951 में देश में साक्षरता दर 18 प्रतिशत थी लेकिन सन 2011 में जनगणना के अनुसार साक्षरता दर 75 प्रतिशत है। पुरुष और महिला में साक्षरता दर लगभग 82% तथा 65% है। केरल, मिज़ोरम, गोआ, महाराष्ट्र तथा हिमाचल प्रदेश सबसे अधिक साक्षर राज्य हैं। बिहार तथा झारखण्ड सबसे कम साक्षरता दर वाले राज्य हैं। केंद्र शासित प्रदेशों में लक्ष्यद्वीप तथा दिल्ली में सबसे अधिक साक्षर है।

7. आवागमन एवं संचार साधनों का विकास (Development of Transportation and Communication) भारत में स्वतंत्रोपरांत यातायात एवं दूरसंचार के साधनों में काफ़ी विकास हुआ है। देश के कोने-कोने को राष्ट्रीय उच्चमार्गों (National Highways) तथा रेलमार्गों (Railways Lines) से जोड़ा गया है। बसों, रेलों, कारों, टैक्सियों, हवाई जहाजों, नावों तथा समुद्री जहाजों से यातायात के साधनों में क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं। डाक एवं तार, दूरभाष, (Telephone) मोबाइल फोन, पेज़र, फैक्स, ई-मेल तथ इंटरनैट इत्यादि संचार माध्यमों से संचार क्षेत्र में क्रांतिकारी विकास हुआ है। अतः यातायात एवं संचार साधनों से भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की गति बढी

8. जनभागीदारी में वृद्धि (Increase in People Participation)-स्वतंत्रोपरांत देश में कई लोकसभा तथा अनेक बार राज्यों की विधान-सभाओं, पंचायती राज संस्थाओं तथा नगरपालिकाओं के चुनाव हो चुके हैं जिसमें लोगों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। देश की जनता की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक गतिविधियों में बढ़ती भागीदारी भारतीय समाज के आधुनिकीकरण का सूचक है।

9. मानवतावाद (Humanitarianism)-आज़ादी के पश्चात् भारत में मानवतावाद को बढ़ाने पर विशेष बल दिया गया। जाति, धर्म, रंग, लिंग तथा जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव किये बिना सभी भारतीयों को मौलिक अधिकार प्रदान किये गये। पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों (SCs, STs and OBCs) के उत्थानार्थ अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम चलाए गये हैं।

10. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का विकास (Development of International Cooperation)-भारत के अंतर्राष्ट्रीय सहयोग में निरंतर वदधि हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सरक्षा स्थापित करने के उददेश्य से 24 अक्तबर, 1945 को गठित विश्व के सबसे बड़े संगठन संयुक्त राष्ट्र (United Nations) का भारत मूल सदस्यों में से है। भारत विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन तथा दक्षेस (SAARC) आदि अंतर्राष्ट्रीय संगठनों का सदस्य है जिसमें वह सक्रिय रूप से भाग लेता है। विश्व के विभिन्न देशों में संघर्षों के समाधान हेतु भी भारत शांति सेनाएं भेजकर महत्पूर्ण योगदान देता है।

11. विशिष्ट भूमिकाएं (Specialized Roles)-विभिन्न क्षेत्रों में विशिष्ट भूमिकाएं अभिनीत करने के लिये बल दिया जाता है। डॉक्टर, इंजीनियर, प्राध्यापक, वैज्ञानिक, या व्यावसायिक पेशेवर (Professionals) अपनी अलग अलग भूमिका निभाते हैं। विभिन्न विषयों समाज शास्त्र, राजनीति शास्त्र, अंग्रेजी, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, इत्यादि के अलग-अलग प्राध्यापक होते हैं। अपने-अपने क्षेत्र में विशेषीकरण (Specialization) प्राप्त व्यक्तियों द्वारा भूमिका अभिनीत करना आधुनिकीकरण को दर्शाता है।

12. मशीनी सैन्यीकरण (Mechanical Militarization) स्वतंत्रता के समय भारतीय सेना मुख्यतः पैदल सेना (Marching army) थी। वर्तमान समय में तीनों सेनाओं, थल सेना, वायसेना, जलसेना, (Army, Airforce and Navy) के पास आधुनिकतम हथियार एवं संयंत्र हैं। स्वचालित हथियार टैंक, लड़ाकू जहाज़, मिग 21, 27 व 29 मिराज तथा जगुआर) युद्धपोत, पनडुब्बियां प्रेक्षपास्त्र (अग्नि, पृथवी, त्रिशूल तथा नाग इत्यादि) परमाणु हथियारों तथा अन्य उपकरणों से युक्त भारतीय सेनाएं विश्व की आधुनिक सेनाओं में से एक है। जिनमें लगभग 14 लाख सैनिक देश की सीमाओं को सुरक्षा प्रदान करते हैं।

13. कृषि विकास (Agricultural Development)-भारत में स्वतंत्रता के पश्चात् कृषि का विकास हुआ है। आजादी के बाद कुछ वर्षों तक खाद्यान्न आपूर्ति के लिये विदेशों से अनाज आयात करता था। मगर उन्नत बीजों (High Yield Variety Seeds) उर्वरकों (Fertilizers) तथा कीटनाशकों (Insecticides) के विकास, वैज्ञानिक कृषि उपकरणों में उपयोग तथा सिंचाई व्यवस्था के विकास के कारण 1960 के दशक के मध्य 1965-66 में देश में हरित क्रांति आई।

खाद्यान्न उत्पादन तथा उत्पादकता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। वैज्ञानिक तरीकों से खेती करने, हल के स्थान पर ट्रैक्टरों का प्रयोग आदि से जहां 1950 में देश में लगभग 5 करोड़ टन का उत्पादन होता था। वर्तमान समय में 20 करोड़ टन से अधिक खाद्यान्न उत्पन्न होने लगा। अब भारत खाद्यान्नों का निर्यात करने लगा है। कृषि भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है। कृषि विकास से प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हुई है तथा विभिन्न उद्योगों के लिये पर्याप्त सस्ता कच्चा माल मिलने लगा है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. भारत किस प्रकार का देश है?
(A) धर्म निरपेक्ष
(B) दो धर्मों को मानने वाला
(C) विशेष धर्म को मानने वाला
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
धर्म निरपेक्ष।

2. भारत को धर्म-निष्पक्षता किसने प्रदान की है?
(A) राज्य
(B) सरकार
(C) जनता
(D) संविधान।
उत्तर:
संविधान।

3. हम कहाँ पर व्यापारी, अध्यापक, मध्य वर्ग, ट्रेड युनियन जैसे वर्ग देख सकते हैं?
(A) कस्बे में
(B) गाँव में
(C) शहरों में
(D) कहीं नहीं।
उत्तर:
शहरों में।

4. कहाँ पर हम सीमांत तथा छोटे किसान, ज़मींदार, मज़दूर जैसे वर्ग देख सकते हैं?
(A) गाँव में
(B) शहर में
(C) कस्बे में
(D) बड़े शहरों में।
उत्तर:
गाँव में।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

5. भारत में विश्वव्यापीकरण तथा उदारीकरण की प्रक्रिया कब शुरू हुई थी?
(A) 1990 से पहले
(B) 1990 के बाद
(C) 1991 के बाद
(D) 1985 के बाद।
उत्तर:
1991 के बाद।

6. उदारीकरण की प्रक्रिया किस प्रधानमंत्री ने शुरू की थी?
(A) राजीव गाँधी
(B) चंद्रशेखर
(C) वी० पी० सिंह
(D) पी० वी० नरसिम्हा राव।
उत्तर:
पी० वी० नरसिम्हा राव।

7. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था दूसरे देशों की अर्थव्यवस्था में मिल जाती है?
(A) निजीकरण
(B) विश्वव्यापीकरण
(C) उदारीकरण
(D) संस्कृतिकरण।
उत्तर:
विश्वव्यापीकरण।

8. सार्वजनिक उपक्रमों को व्यक्तिगत पार्टियों को बेचने की प्रक्रिया को क्या कहते हैं?
(A) विश्वव्यापीकरण
(B) उदारीकरण
(C) निजीकरण
(D) संस्कृतिकरण।
उत्तर:
निजीकरण।

9. सामाजिक परिवर्तन कब आवश्यक हो जाता है?
(A) शिक्षा प्राप्त करने के बाद
(B) नौकरी प्राप्त करने के बाद
(C) विवाह के बाद
(D) बच्चों के बाद।
उत्तर:
शिक्षा प्राप्त करने के बाद।

10. हमारा समाज किस प्रकार औद्योगीकरण से प्रभावित हुआ है?
(A) शहर बढ़ रहे हैं
(B) वातावरण प्रदूषित हो रहा है।
(C) उत्पादन बढ़ रहा है
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

11. नगर की इनमें से कौन-सी विशेषता है?
(A) अधिक जनसंख्या
(B) द्वितीयक संबंध
(C) गैर-कृषि पेशे
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

12. उस प्रक्रिया को क्या कहते हैं जिसमें गांव की स्थिति में परिवर्तन आ जाता है तथा उसमें नगरों जैसे लक्षण आने शुरू हो जाते हैं?
(A) नगरीकरण
(B) संस्कृतिकरण
(C) औद्योगीकरण
(D) आधुनिकीकरण।
उत्तर:
नगरीकरण।

13. इनमें से कौन-सी नगरीकरण की विशेषता है?
(A) औपचारिक संबंध
(B) परिवारों का टूटना
(C) अधिक गतिशीलता
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

14. नगरों में जनसंख्या क्यों बढ़ती है?
(A) सुख-सुविधाओं का उपलब्ध होना
(B) रोज़गार के अधिक साधन
(C) तकनीक का प्रयोग
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

15. इनमें से कौन-सा समाज औद्योगीकरण के कारण ग्रामीण से स्थानांतरित होकर नगरीय देश बना?
(A) जापान
(B) अमेरिका
(C) ब्रिटेन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) जापान।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक परिवर्तन क्यों होता है?
उत्तर:
जब शिक्षा लेने के बाद व्यक्ति शिक्षित हो जाता है तो सामाजिक परिवर्तन होना ज़रूरी होता है।

प्रश्न 2.
औद्योगीकरण का कोई एक प्रभाव बताओ।
उत्तर:
औद्योगीकरण से नगर बढ़ते हैं तथा वातावरण दूषित होता है।

प्रश्न 3.
नीली क्रांति क्या होती है?
उत्तर:
मछलियों के उत्पादन को बढ़ाने को नीली क्रांति कहते हैं।

प्रश्न 4.
हरित क्रांति क्या होती है?
उत्तर:
कृषि के उत्पादन को बढ़ाने को हरित क्रांति कहते हैं।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

प्रश्न 5.
श्वेत क्रांति क्या होती है?
उत्तर:
दूध के उत्पादन को बढ़ाने को श्वेत क्रांति कहते हैं।

प्रश्न 6.
सामाजिक क्रांति क्यों आती है?
उत्तर:
जब समाज में आर्थिक समानता न हो, असमानता कुछ ज्यादा ही हो तथा व्यक्ति के मौलिक मानवीय अधिकारों का दमन हो रहा हो तो सामाजिक क्रांति आती है।

प्रश्न 7.
किसके कहने के अनुसार आर्थिक आधार पर समाज में क्रांति आएगी?
उत्तर:
कार्ल मार्क्स के कहने के अनुसार समाज में आर्थिक आधार पर क्रांति आएगी।

प्रश्न 8.
कौन-सी क्रांति बिना हिंसा के आती है?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति बिना हिंसा के आती है।

प्रश्न 9.
चक्रीय कार्य-कारण का क्या अर्थ होता है?
उत्तर:
जब एक परिवर्तन के कारण किसी और जगह भी परिवर्तन आए तो उसे चक्रीय कार्य-कारण कहते हैं।

प्रश्न 10.
भारत में I.R.D.P. कब शुरू हुए थे?
उत्तर:
भारत में I.R.D.P. 1952 में शुरू हुए थे।

प्रश्न 11.
भारत में C.D.P. कब शुरू हुए थे? (Community Development Programme.)
उत्तर:
भारत में C.D.P. 1952 में शुरू हुए थे।

प्रश्न 12.
एम० एन० श्रीनिवास ने कौन-सी धारणाएं दी हैं?
उत्तर:
एम० एन० श्रीनिवास ने संस्कृतिकरण तथा पश्चिमीकरण की धारणाएं दी हैं।

प्रश्न 13.
सामाजिक परिवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
जब सामाजिक संबंधों में परिवर्तन शुरू हो जाए तो उसे सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 14.
प्रगति क्या होती है?
उत्तर:
जो परिवर्तन हमारी इच्छानुसार हो उसे प्रगति कहते हैं।

प्रश्न 15.
सांस्कृतिक परिवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
हमारी संस्कृति, हमारे विचारों, धर्म, संस्थाओं, व्यवहार इत्यादि में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 16.
क्या सामाजिक परिवर्तन के बारे में निश्चितता से कहा जा सकता है कि सामाजिक परिवर्तन आएगा?
उत्तर:
जी नहीं, सामाजिक परिवर्तन के बारे में निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि सामाजिक परिवर्तन आएगा।

प्रश्न 17.
सरल तथा जटिल समाजों में किस गति से परिवर्तन आते हैं?
उत्तर:
सरल समाजों में धीमी गति से तथा जटिल समाजों में तेज़ गति से परिवर्तन आते हैं।

प्रश्न 18.
उद्विकास क्या होता है?
उत्तर:
समाज के सरलता से जटिलता की तरफ जाने को उद्विकास कहते हैं।

प्रश्न 19.
मार्गन के अनुसार उद्विकास की कितनी अवस्थाएं हैं?
उत्तर:
मार्गन के अनुसार उद्विकास की तीन अवस्थाएं हैं।

प्रश्न 20.
किसी नयी खोज के कारण होने वाले परिवर्तन को क्या कहते हैं?
उत्तर:
किसी नयी खोज के कारण होने वाले परिवर्तन को रेखीय परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 21.
किस समाजशास्त्री ने धर्म में विकास को अलग हिस्सों में विभाजित किया है?
उत्तर:
अगस्ते काम्ते ने धर्म में विकास को अलग हिस्सों में विभाजित किया है।

प्रश्न 22.
भारत का सबसे बड़ा उद्योग कौन-सा है?
उत्तर:
भारत का सबसे बड़ा उद्योग कपड़ा उद्योग है।

प्रश्न 23.
सुधारवादी आंदोलन क्या थे?
उत्तर:
जिन आंदोलनों ने भारतीय समाज में फैली बुराइयों को दूर करने के प्रयास किए, उन को सुधारवादी आंदोलन कहते हैं।

प्रश्न 24.
सामाजिक परिवर्तन किस प्रकृति के होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन सामाजिक प्रकृति के होते हैं।

प्रश्न 25.
पूंजीवाद का जन्म क्यों हुआ?
उत्तर:
पूंजीवाद का जन्म प्रोटेस्टेंट धर्म की वजह से हुआ था।

प्रश्न 26.
क्रांति क्या होती है?
उत्तर:
जब समाज में चल रहे असंतोषों की वजह से सामाजिक तथा राजनीतिक परिवर्तन का प्रयास किया जाए तो उसे क्रांति कहते हैं।

प्रश्न 27.
मार्गन के अनुसार उद्विकास की कौन-सी तीन अवस्थाएं हैं?
उत्तर:
मार्गन के अनुसार उद्विकास की तीन अवस्थाएं-जंगली अवस्था, बर्बरता की अवस्था तथा सभ्यता की अवस्थाएं हैं।

प्रश्न 28.
बर्बरता अवस्था में किन संगठनों का विकास हुआ था?
उत्तर:
बर्बरता अवस्था में आर्थिक संगठनों जैसे कि पूंजीवाद का विकास हुआ था।

प्रश्न 29.
रेखीय परिवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
जब नए आविष्कारों की वजह से परिवर्तन तथा सीधी रेखा में विकास होता जाए तो उसे रेखीय परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 30.
सांस्कृतिक परिवर्तन किसे कहते हैं?
उत्तर:
हमारी संस्कृति, हमारे विचारों, धर्म, संस्थानों, व्यवहार इत्यादि में होने वाले परिवर्तन को सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि हमारी संस्कृति में होने वाले परिवर्तनों को सांस्कृतिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 31.
सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
जब समाज के अधिकतर लोगों के विचारों, कार्य करने के ढंगों इत्यादि में परिवर्तन आना शुरू हो जाए तो उसे सामाजिक परिवर्तन कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि जब समाज के अधिकतर अंगों, संस्थाओं, विचारों इत्यादि में परिवर्तन आना शुरू हो जाए उसे सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 32.
नगरीकरण की प्रक्रिया कब हमारे सामने आती है?
उत्तर:
जब नगरों की जनसंख्या का घनत्व बढ़ जाए, यातायात के साधनों का विकास होना शुरू हो जाए, नगरों के आकार में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाए, उत्पादन बड़े पैमाने पर होना शुरू हो जाए तो नगरीकरण की प्रक्रिया हमारे सामने आती है।

प्रश्न 33.
हरेक परिवर्तन को प्रगति क्यों नहीं कह सकते?
उत्तर:
जब परिवर्तन व्यक्ति की ऐच्छिक दिशा में हो तो उसे प्रगति कहते हैं परंतु परिवर्तन हमारे मन की इच्छा के अनुसार नहीं होता। जो परिवर्तन हमारी इच्छा के अनुसार नहीं होता उसे प्रगति नहीं कह सकते। इस तरह हरेक परिवर्तन प्रगति नहीं हो सकता।

प्रश्न 34.
नगर क्या होता है?
उत्तर:
नगर किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में बसा वह समुदाय है जिसमें ज्यादा जनसंख्या, गैर-कृषि कार्यों की भरमार, अव्यक्तिक संबंध, औपचारिक नियंत्रण तथा द्वितीय समूहों की प्रधानता होती है।

प्रश्न 35.
नगरीयकरण किसे कहते हैं?
अथवा
शहरीकरण से क्या तात्पर्य है?
अथवा
नगरीकरण की प्रक्रिया से आप क्या समझते हैं?
अथवा
नगरीकरण क्या है?
उत्तर:
नगरीयकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें गांव की स्थिति में परिवर्तन आ जाता है तथा उसमें शहरों या नगरों जैसे लक्षण आने शुरू हो जाते हैं अर्थात् वहां का रहन-सहन शहरों जैसा हो जाता है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

प्रश्न 36.
नगरीयकरण की तीन विशेषताएं बताओ।
उत्तर:

  1. नगरीयकरण में संबंध औपचारिक होते हैं।
  2. नगरीयकरण में गतिशीलता अधिक होती है।
  3. नगरीयकरण में परिवार टूटने लग जाते हैं।

प्रश्न 37.
औद्योगीकरण का क्या अर्थ है?
अथवा
औद्योगीकरण की परिभाषा दें।
अथवा
औद्योगीकरण किसे कहते हैं?
अथवा
औद्योगीकरण की प्रक्रिया क्या है?
अथवा
औद्योगीकरण का अर्थ बताइए।
अथवा
औद्योगीकरण क्या है?
उत्तर:
औद्योगीकरण एक प्रक्रिया है जिसमें उत्पादन घरेलू स्तर से आगे निकल कर कारखानों तक पहुँच जाता है तथा उत्पादन बड़े स्तर पर शुरू हो जाता है।

प्रश्न 38.
विकास क्या होता है?
उत्तर:
जब किसी भी चीज़ के बारे में ज्यादा जानकारी हो जाए या जब कोई चीज़ आगे बढ़नी शुरू हो जाए तो उसे विकास कहते हैं।

प्रश्न 39.
विकास किससे संबंधित होता है?
उत्तर:
विकास का संबंध सिर्फ परिवर्तन से होता है। यह अच्छे बुरे से या इसका किसी चीज़ की विशेषता से कोई संबंध नहीं होता।

प्रश्न 40.
संरचनात्मक परिवर्तन क्या होता है?
उत्तर:
सामाजिक संबंधों तथा सामाजिक संस्थाओं में होने वाले परिवर्तनों को संरचनात्मक परिवर्तन कहते हैं। विवाह, परिवार में होने वाले परिवर्तन संरचनात्मक परिवर्तन होते हैं।

प्रश्न 41.
औद्योगीकरण के क्या ग़लत परिणाम हो सकते हैं?
उत्तर:

  1. औद्योगीकरण से प्रदूषण फैलता है।
  2. औद्योगीकरण से छोटे उद्योगों का नाश होता है।
  3. औद्योगीकरण से पैसा कुछ हाथों में ही केंद्रित हो जाता है।

प्रश्न 42.
नगरों में जनसंख्या बढ़ने के क्या कारण हैं?
उत्तर:
नगरों में सभी सुख-सुविधाओं का उपलब्ध होना, रोज़गार के ज्यादा साधन, कम होती भूमि, तकनीक का प्रयोग, रोजगार की तलाश की वजह से नगरों में जनसंख्या बढ़ रही है।

प्रश्न 43.
जनसंख्या के बढ़ने से दसलक्षी शहरों की संख्या कितनी बढ़ गई?
उत्तर:
जनसंख्या के बढ़ने से दसलक्षी शहरों की संख्या काफ़ी बढ़ गई है। पहले केवल चार दसलक्षी शहर होते थे-दिल्ली, मुंबई, कोलकाता तथा चेन्नई परंतु अब यह संख्या 15 से ऊपर पहुंच गई है। जैसे कि अहमदाबाद, बैंगलुरू, चंडीगढ़, लखनऊ इत्यादि।

प्रश्न 44.
उपनिवेशवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
एक स्तर पर, एक देश के द्वारा दूसरे देश पर शासन को उपनिवेशवाद कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि जब किसी शक्तिशाली देश द्वारा कमज़ोर देश पर अपने लाभ के लिए कब्जा कर लिया जाता है तो उसे उपनिवेशवाद कहते हैं।

प्रश्न 45.
ऐसे किसी एक भारतीय शहर का नाम बताएं जिसकी जनसंख्या एक करोड़ या इससे अधिक हो।
उत्तर:
मम्बई, दिल्ली. कोलकाता ऐसे भारतीय शहर हैं जिनकी जनसंख्या एक करोड या इससे अधिक है।

प्रश्न 46.
कस्बे का न्यूनतम जनसंख्या घनत्व कितने व्यक्ति प्रति वर्ग कि०मी० होना आवश्यक है?
उत्तर:
कस्बे का जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति कि०मी० होना आवश्यक है।

प्रश्न 47.
भारत में कस्बा घोषित करने के लिए न्यूनतम जनसंख्या कितनी तय की गई है?
उत्तर:
भारत में कस्बा घोषित करने के लिए न्यूनतम जनसंख्या 5000 तय की गई है।

प्रश्न 48.
औद्योगीकरण का संबंध उद्योगों की स्थापना से है या इनको हटाने से है?
उत्तर:
औद्योगीकरण का संबंध उद्योगों की स्थापना से है।

प्रश्न 49.
चंडीगढ़ एक कस्बा है या शहर?
उत्तर:
चंडीगढ़ एक शहर है।

प्रश्न 50.
अपने राज्य में स्थित किसी बड़े उद्योग का नाम लिखें।
उत्तर:
मारूति उद्योग हमारे राज्य में स्थित एक बड़ा उद्योग है।

प्रश्न 51.
नगरीकरण की कोई एक विशेषता बताएँ।
उत्तर:
नगरीकरण में नगरों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती है तथा लोग गांवों को छोड़ कर नगरों की तरफ रहने के लिए जाते हैं।

प्रश्न 52.
सामाजिक परिवर्तन की किसी एक प्रक्रिया का नाम बताएँ।
उत्तर:
आधुनिकीकरण, पश्चिमीकरण, धर्मनिरपेक्षीकरण, संस्कृतिकरण इत्यादि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाएं हैं।

प्रश्न 53.
औद्योगीकरण की प्रक्रिया का संबंध किस गतिविधि से है?
उत्तर:
औद्योगीकरण की प्रक्रिया का संबंध उद्योगों की प्रगति से है।

प्रश्न 54.
सामाजिक परिवर्तन का कोई एक कारक बताएं।
उत्तर:
जनसंख्या के अधिक घटने-बढ़ने से सामाजिक परिवर्तन होता है।

प्रश्न 55.
औद्योगीकरण की कोई एक विशेषता लिखिए।
उत्तर:
औद्योगीकरण में उत्पादन घरों से निकल कर बड़े-बड़े कारखानों में चला जाता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
सामाजिक परिवर्तन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सामाजिक संबंधों, सामाजिक संगठन, सामाजिक संरचना, सामाजिक अंतक्रिया में होने वाले किसी भी प्रकार के परिवर्तन को सामाजिक परिवर्तन का नाम दिया जाता है। समाज में होने वाले हरेक प्रकार का परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन नहीं होता। केवल सामाजिक संबंधों, सामाजिक क्रियाओं इत्यादि में पाया जाने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन होता है।

संक्षेप में हम कह सकते हैं कि लोगों के जीवन जीने के ढंगों में पाया जाने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन होता है। यह हमेशा सामूहिक तथा सांस्कृतिक होता है। जब भी मनुष्यों के व्यवहार में परिवर्तन आता है तो हम कह सकते हैं कि सामाजिक परिवर्तन हो रहा है।

प्रश्न 2.
सामाजिक परिवर्तन के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन के बहुत से प्रकार हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

  • परिवर्तन-किसी भी चल रही या मौजूद स्थिति में बदलाव को परिवर्तन कहते हैं। यह परिवर्तन अच्छा तथा बुरा दोनों हो सकते हैं।
  • वृद्धि-परिवर्तन एक दिशा में होता है तथा इस दिशा को वृद्धि कहते हैं। वृद्धि की गति भी होती है तथा यह गति धीमी तथा तेज़ दोनों तरह से हो सकती है।
  • उद्विकास-जब परिवर्तन निश्चित स्तरों से होकर गुजरता है तो उस प्रक्रिया को उद्विकास कहते हैं।
  • प्रगति-प्रगति हमेशा अच्छाई के लिए होती है। जब परिवर्तन हमारी इच्छित तथा मर्जी की दिशा में होता है तो उसे प्रगति कहते हैं।
  • क्रांति-जब परिवर्तन तेज़ी से तथा अकस्मात होता है तो उसे क्रांति कहते हैं। इससे परंपराओं, राजनीति में तेजी से बदलाव आ जाता है। यह हिंसात्मक तथा अहिंसात्मक भी हो सकती है।
  • विकास-इस प्रकार के परिवर्तन में परिवर्तन एक अवस्था से होकर दूसरी अवस्था में पहुंचता है। इस तरह परिवर्तन अपेक्षित दिशा तथा अपने लक्ष्य की ओर नियोजित होता है।

प्रश्न 3.
आधुनिकीकरण की कोई चार विशेषताएं बताओ।
अथवा
आधुनिकीकरण की किन्हीं तीन विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  1. आधुनिकीकरण में हर तरफ तकनीक का बोल-बाला होता है।
  2. इसमें औद्योगीकरण का पक्ष भी शामिल होता है। उद्योगों पर ज्यादातर लोग आश्रित होते हैं।
  3. इसमें साक्षरता दर काफ़ी ज्यादा होती है।
  4. संचार के साधन विकसित रूप में पाए जाते हैं।
  5. यातायात के साधनों का विकसित रूप हमारे सामने होता है।

प्रश्न 4.
आप कैसे कह सकते हैं कि परिवर्तन एक तुलनात्मक प्रक्रिया है?
उत्तर:
यह सही है कि परिवर्तन एक तुलनात्मक प्रक्रिया है क्योंकि परिवर्तन को किसी से तुलना करके ही समझा जा सकता है। किसी समाज में ज्यादा परिवर्तन होते हैं किसी में कम, यह तो हम उन दोनों समाजों की तुलना करके ही समझ सकते हैं। पुराने समय में लोग हल से कृषि करते थे, आजकल ट्रैक्टर से कृषि करते हैं। यह परिवर्तन है पर यह तभी समझा जा सकता है जब हम दोनों समाजों की तुलना करेंगे। इसके साथ ही यह भी पता चल जाता है कि परिवर्तन है या नहीं तथा अगर है तो कितना। यह तो सिर्फ तुलना करके ही समझा जा सकता है।

प्रश्न 5.
सामाजिक परिवर्तन सामाजिक जीवन में होने वाला परिवर्तन कैसे है?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन का मतलब होता है समाज में चल रहे मूल्यों, आदर्शों, विधियों, परिमापों, व्यवस्था में परिवर्तन चाहे यह परिवर्तन तकनीकी या किसी और कारणों की वजह से क्यों न आए हों। इससे यह स्पष्ट है कि समाज में चल रहे आदर्शों, नियमों में आने वाले बदलावों को सामाजिक परिवर्तन कहते हैं तथा ये परिवर्तन किसी कारण से भी आ सकते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि सामाजिक जीवन में आने वाले परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।

प्रश्न 6.
नगरीयकरण की क्या विशेषताएं होती हैं?
उत्तर:

  1. नगरीयकरण की प्रमुख विशेषता यह होती है कि यहां संबंध अस्थायी होते हैं तथा अपने कार्य खत्म होने के बाद संबंध खत्म कर दिए जाते हैं।
  2. नगरीयकरण की दूसरी प्रमुख विशेषता घनी आबादी का होना है। लोग नगरों में जगह कम होने की वजह से छोटे-छोटे घरों में तथा ज्यादा तादाद में रहते हैं।
  3. नगरीयकरण में गतिशीलता पायी जाती है। लोग अपना घर, कारोबार, नौकरी कभी भी छोड़कर कहीं भी जा सकते हैं।
  4. नगरीयकरण में व्यवसाय में कृषि संबंधों कार्यों की कमी पायी जाती है। लोगों की व्यवसाय संबंधी निर्भरता कृषि पर कम और कार्यों पर ज्यादा होती है।
  5. नगरों में लोग अपनी संस्कृति का आदान-प्रदान करते हैं। अलग-अलग संस्कृतियों के लोग इकट्ठे रहते हैं जिस वजह से उनमें संस्कृतियों का आदान-प्रदान हो जाता है।
  6. नगरों में लोगों में समायोजन की क्षमता होती है। जैसी परिस्थितियां व्यक्ति के सामने आती हैं वह उनके अनुसार ही स्वयं को ढाल लेता है।

प्रश्न 7.
विकास तथा प्रगति में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
विकास तथा प्रगति में अंतर निम्नलिखित हैं-

विकासप्रगति
(i) विकास क्रमिक परिवर्तन होता है।(i) प्रगति क्रमिक परिवर्तन भी हो सकता है तथा नहीं भी।
(ii) विकास अपने-आप हो जाता है।(ii) प्रगति अपने-आप नहीं होती बल्कि यह योजनाबद्ध प्रयास होता है।
(iii) विकास परिवर्तन की स्वाभाविक प्रक्रिया है।(iii) प्रगति हमेशा इच्छित दिशा में परिवर्तन होता है।
(iv) विकास की प्रक्रिया हमेशा समाज में चलती रहती है।(iv) प्रगति अपने-आप नहीं होती। इसको तो योजनाबद्ध तरीके से चलाना पड़ता है।
(v) परिवर्तन में सबसे पहले विकास आता है।(v) परिवर्तन में प्रगति दूवितीय स्थान पर आती है।
(vi) विकास अनुभव व अनुमान पर आधारित होता है।(vi) प्रगति को उपयोगिता के आधार पर मापा जाता है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

प्रश्न 8.
तकनीक तथा नगरीकरण का आपस में क्या संबंध हैं?
उत्तर:
तकनीक की वजह से बड़े-बड़े उद्योग शुरू हो गए तथा देश का औद्योगीकरण हो गया है। औद्योगीकरण के कारण बड़े-बड़े नगर उन उद्योगों के पास बस गए। शुरू के गाँवों में उद्योगों में कार्य करने के लिए आने वाले मज़दूरों के लिए आस-पास बस्तियां बस गईं। फिर उन बस्तियों के जीवन जीने के लिए तथा चीजें मुहैया करवाने के लिए दुकानें तथा बाजार खुल गए।

फिर लोगों के लिए होटल, स्कूल, कॉलेज, दफ्तर, व्यापारिक कंपनियां खुल गई तथा दफ्तर बन गए। इस प्रकार धीरे-धीरे इनके कारण शहरों का विकास हुआ तथा शहरीकरण बढ़ गया। इस प्रकार नगरीकरण को बढ़ाने में तकनीक का सबसे बड़ा हाथ है।

प्रश्न 9.
संरचनात्मक परिवर्तन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन को दो भागों में विभाजित किया जाता है तथा वह है संरचनात्मक तथा सांस्कृतिक। परिवर्तन की प्रक्रिया संरचनात्मक सामाजिक संबंधों, परिवार, नातेदारी, जाति, व्यावसायिक समूह इत्यादि से संबंधित होती है। अगर इनमें कोई परिवर्तन आता है तो उसे संरचनात्मक परिवर्तन कहते हैं। हम उदाहरण ले सकते हैं कृषि से संबंधित कार्यों की। प्राचीन समय में कृषि का कार्य परिवार के सदस्य ही करते थे तथा कृषि प्राचीन परंपरागत ढंगों से होती थी।

परंतु आधुनिक समय में कृषि यंत्रों के साथ तथा किराए पर मज़दूर लेकर होती है और उत्पादन बाजार के लिए होता है। इसे ही संरचनात्मक परिवर्तन कहते हैं। हम एक और उदाहरण ले सकते हैं संयुक्त परिवार की जो पहले होते थे। आधुनिक समय में केंद्रीय परिवार सामने आ रहे हैं तथा परिवार की संरचना तथा कार्य बदल गए हैं। इसे ही संरचनात्मक परिवर्तन कहा जाता है। पश्चिमीकरण, औद्योगीकरण तथा आधुनिकीकरण जैसी प्रक्रियाओं के कारण संरचनात्मक परिवर्तन हो जाता है।

प्रश्न 10.
नगरीकरण के कारण कौन-सी समस्याएं उत्पन्न होती हैं?
उत्तर:
नगरों में बसी हुई गंदी बस्तियां कई प्रकार के अपराधों का केंद्र होती है। अधिक जनसंख्या तथा पेशे होने के कारण यहां अपराध अधिक होते हैं। निर्धनता तथा बेरोज़गारी व्यक्ति को जल्दी अमीर बनने के लिए अपराध करने को प्रेरित करते हैं। बड़े घरों की लड़कियाँ अपने खर्चे पूर्ण करने के लिए काल गर्ज़ बन जाती हैं।

शहरों में स्मगलिंग का कार्य भी अधिक होता है। स्मगलिंग, नशा बेचना, बैंक डकैतियां, दुकानें लूटना, गंदी बस्तियां, निर्धनता, अपराध, बेरोजगारी, अनैतिकता इत्यादि जैसी समस्याएँ शहरों में आम देखने को मिल जाती हैं तथा यह सब नगरीकरण के कारण ही होता है।

प्रश्न 11.
स्वतंत्रता के बाद देश में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में आए परिवर्तनों का वर्णन करें।
अथवा
भारत में औद्योगीकरण तथा नगरीयकरण पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
स्वतंत्रता से पहले देश में काफ़ी कम उद्योग स्थापित हुए थे क्योंकि विदेशी सरकार से उद्योगों को स्थापित करने में सुविधाएं प्राप्त नहीं होती थी। 1947 से पहले देश में इस्पात का उत्पादन करने वाली दो ही इकाइयाँ थीं। परंतु 1947 के बाद यह काफ़ी तेजी से बढ़ गई। सरकार ने पंचवर्षीय योजनाएं बनाईं जिनका मुख्य उद्देश्य औद्योगिक विकास करना था। इसके बाद तो देश का औद्योगिक विकास तेज़ी से शुरू हुआ।

इस्पात के उद्योग, ट्रैक्टर, कारों, स्कूटरों, मोटर साइकलों, इलेक्ट्रॉनिक्टस, उर्वरकों, कैमीकल, भारी उद्योगों के क्षेत्र में तो देश ने काफ़ी प्रगति कर ली। वस्त्र उत्पादों के क्षेत्र में तो देश का विश्व में अग्रणी स्थान है। कोयला, जहाजरानी, पेट्रोलियम उत्पादों के उद्योग इत्यादि के क्षेत्र में भी देश ने काफी तेजी से विकास किया है। 1991 के बाद तो देश में विदेशी निवेश की बाढ़ आ गई जिससे देश में और तेज़ी से उद्योग लगने शुरू हो गए।

प्रश्न 12.
भारत में आज़ादी के बाद उद्योगों के क्षेत्र में क्या-क्या महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं?
उत्तर:

  1. आजादी के बाद देश में उद्योगों का तेज़ी से विकास हुआ है तथा उद्योगों में उत्पादन आधुनिक मशीनों से शुरू हो गया है।
  2. अब उद्योगों में उत्पादन तेजी से होना शुरू हो गया है जिससे देश का निर्यात बढ़ गया है।
  3. उद्योगों में नई-नई मशीनों का प्रयोग होना शुरू हो गया है जिनका प्रयोग उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है।
  4. श्रमिकों के हितों के लिए श्रमिक संघ निर्मित हुए हैं ताकि उद्योगों में कार्य कर रहे श्रमिकों के लाभ के लिए कार्य किया जा सके।

प्रश्न 13.
भारतीय समाज पर नगरीकरण के पाँच प्रभावों का वर्णन कीजिए।
अथवा
स्वतंत्र भारत में नगरीकरण के प्रभावों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:

  1. नगरीकरण की प्रक्रिया के कारण भारतीय समाज की जनसंख्यात्मक संरचना बदल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों की जनसंख्या कम हो रही हैं तथा नगरों की जनसंख्या बढ़ रही है।
  2. नगरीकरण के कारण भारतीय समाज की कई संस्थाएं जैसे कि संयुक्त परिवार, जाति व्यवस्था खत्म हो गई है तथा केंद्रीय परिवार सामने आ रहे हैं।
  3. नगरीकरण के कारण लोगों में व्यक्तिवादिता बढ़ रही है तथा लोग अब केवल अपने हितों की पूर्ति के बारे में ही सोचते हैं।
  4. नगरीकरण की प्रक्रिया के कारण सुविधाएं बढ़ रही हैं जिससे उनका जीवन आसान हो गया है।
  5. नगरीकरण के कारण नगरों में रोजगार प्राप्त करने के मौके बढ़ गए हैं तथा रोजगार के अवसरों की तो बाढ़ सी आ गई है।

प्रश्न 14.
आज़ादी के बाद के सालों भारत में कई औद्योगिक शहरों का उद्भव और विकास हुआ। उनका संक्षिप्त विवरण दें।
अथवा
भारतीय समाज में नगरीकरण पर एक निबंध लिखिए।
अथवा
भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
चाहे आज़ादी से पहले अंग्रेजों ने भारत में बहुत से उद्योग स्थापित किए थे, परंतु वह ठीक ढंग से विकसित न हो पाए। आजादी के पश्चात् भारत सरकार ने देश में औद्योगीकरण की प्रक्रिया को तेजी से चलाने का निश्चय किया तथा उसके लिए सरकार ने उद्योगों को कई प्रकार के प्रोत्साहन दिए। इस कारण ही बोकारो, भिलाई, राऊरकेला, दुर्गापुर जैसे शहर सामने आए। यह औद्योगिक शहर बिहार, झारखंड जैसे प्रदेशों में स्थित हैं।

इन प्रदेशों में औद्योगिक शहरों के सामने आने का कारण यह है कि यहाँ पर सभी खनिज पदार्थ पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अतिरिक्त गुजरात में सूरत, अहमदाबाद, पंजाब में फगवाड़ा जैसे शहर कपड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध हुए। मुंबई के नज़दीक बाम्बे हाई का पिकास हुआ जहां से तेल निकाला जाता है। काँडला, विशाखापट्टनम जैसे शहर बंदरगाहों के कारण विकसित हुए। अहमदाबाद, डालमिया नगर, पोरबंदर, सतना, सूरतपुर इत्यादि जैसे शहर सीमेंट उद्योग के कारण सामने आए। इस प्रकार आज़ादी के बाद बहुत से शहर उद्योगों के कारण ही विकसित हुए।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगीकरण की क्या विशेषताएं होती हैं?
उत्तर:
औद्योगीकरण की विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) मशीनों से उत्पादन-औद्योगीकरण की प्रक्रिया में उत्पादन मशीनों से होता है न कि हाथों से। इस प्रक्रिया में नयी-नयी मशीनों का ईजाद होता है तथा उन मशीनों की मदद से उत्पादन बढ़ाया जाता है। प्राचीन समाजों में उत्पादन हाथों से होता था इसलिए औद्योगीकरण इतनी उन्नत अवस्था में नहीं था। औद्योगीकरण में उत्पादन नयी मशीनों से तथा ज्यादा मात्रा में होता है।

(ii) औद्योगीकरण का संबंध उत्पादन की प्रक्रिया से होता है-औद्योगीकरण का संबंध उत्पादन की प्रक्रिया से होता इस प्रक्रिया के दौरान उत्पादन बढ़ जाता है। इसमें मशीनों की मदद से उत्पादन किया जाता है तथा उत्पादन भी ज्यादा मात्रा में होता है।

(iii) औद्योगीकरण में परंपरागत शक्ति का प्रयोग नहीं होता-परंपरागत शक्ति वह शक्ति होती है जो मानव शक्ति या पशु शक्ति पर आधारित होती है। औद्योगीकरण में इस मानव या पशु शक्ति की बजाए पेट्रोल, डीज़ल, कोयला, विद्युत् या परमाणु शक्ति का प्रयोग होता है क्योंकि परंपरागत शक्ति की अपेक्षा यह शक्ति ज्यादा तेज़ी से मशीनों को चलाती है तथा आज-कल की मशीनें भी इसी शक्ति से चलती हैं।

(iv) ओद्योगीकरण में उत्पादन तेज़ी से होता है-इस प्रक्रिया में उत्पादन बहुत तेज़ गति से होता है। प्राचीन समय में क्योंकि उत्पादन हाथों से होता था इसलिए उत्पादन बहुत कम हुआ करता था परंतु औद्योगीकरण में उत्पादन मशीनों से होता है इसलिए उत्पादन भी ज्यादा मात्रा में होता है। क्योंकि आजकल जनसंख्या भी काफी बढ़ गई है इसलिए उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादा मशीनों का प्रयोग होता है ताकि ज्यादा उत्पादन किया जा सके।

(v) औदयोगीकरण में आर्थिक विकास होता है-इस प्रक्रिया में आर्थिक विकास होना ज़रूरी है। इस में बहत सारे उद्योग लग जाते हैं जो न सिर्फ अपने देश की ज़रूरतें पूरी करते हैं बल्कि दूसरे देशों की भी ज़रूरतें पूरी करते हैं। इस वजह से ये ज्यादा मुनाफ़ा कमाते हैं तथा देश के लिए भी पैसा कमाते हैं। पैसा कमाने के साथ ये देश को काफ़ी कर भी देते हैं जिससे देश को काफ़ी आमदनी हो जाती है जो कि देश के विकास में खर्च होती है। लोगों को उद्योगों में काम मिलता है जिससे उनका जीवन स्तर ऊँचा होता है जिससे देश का आर्थिक विकास होता है।

(vi) औद्योगीकरण से प्राचीन मान्यताएं टूट जाती हैं-औद्योगीकरण से प्राचीन मान्यताएं टूट जाती हैं। उदाहरण के लिए, भारत में इस प्रक्रिया के फलस्वरूप संयुक्त परिवार की मान्यता तथा परंपरा में विघटन हो गया है। इस वजह से संयुक्त परिवार टूट कर केंद्रीय परिवारों में बदल रहे हैं। इस तरह और भी कई परंपराओं जैसे जाति प्रथा, विवाह नाम की संस्था में भी बहुत से परिवर्तन आ रहे हैं। इस तरह हम कह सकते हैं कि औद्योगीकरण में प्राचीन परंपराएं टूट जाती हैं।

(vii) औद्योगीकरण में नए वर्गों का उदय होता है-औद्योगीकरण में नए-नए वर्ग सामने आते हैं। अमीर वर्ग, ग़रीब वर्ग, मध्यम वर्ग, मालिक वर्ग, मज़दूर वर्ग जैसे कई और वर्ग हमारे सामने आते हैं। इस वजह से कइयों को पैसा आ जाता है, कइयों के पास कम हो जाता है। कई ट्रेड यूनियन इत्यादि जैसे वर्ग सामने आ जाते हैं जोकि हमारे समाज में ज़रूरी हो जाते हैं।

(viii) औद्योगीकरण में प्राकृतिक साधनों का पूरी तरह प्रयोग होता है-इस प्रक्रिया में देश के प्राकृतिक साधनों का पूरी तरह प्रयोग होता है। मशीनों से उत्पादन की वजह से कोयला, डीज़ल, पेट्रोल, बिजली इत्यादि शक्ति का प्रयोग होता है जोकि प्राकृतिक साधनों का हिस्सा होते हैं। इसके अलावा कच्चे माल के लिए कृषि पर तथा भूमि पर आवश्यकता से अधिक बोझ पड़ता है जिससे प्राकृतिक साधनों का विनाश होना शुरू हो जाता है।

(ix) औद्योगीकरण में कई तकनीकों का प्रयोग होता है-औद्योगीकरण में हमेशा नई तकनीकों का प्रयोग होता रहता है क्योंकि औद्योगीकरण में नयी-नयी मशीनों का प्रयोग होता है। इस वजह से नए-नए आविष्कार होते रहते हैं जिसके कारण हमारे सामने नयी-नयी मशीनें आती हैं जिनका प्रयोग उत्पादन को बढ़ाने के लिए किया जाता है।

प्रश्न 2.
औद्योगीकरण की वजह से क्या समस्याएं आती हैं? उनका वर्णन करो।
उत्तर:
औद्योगीकरण से समाज को बहुत सारे लाभ होते हैं जैसे पैसा बढ़ता है, आर्थिक विकास होता है, उत्पादन बढ़ता है, नए वर्गों का निर्माण होता है पर भारत जैसे देश में, जहां व्यक्ति जातीय बंधनों में बंधा होता है, औद्योगीकरण की वजह से कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) आर्थिक संकट-औद्योगीकरण की वजह से कई बार आर्थिक विकास की बजाए आर्थिक संकट भी आ जाता है। उत्पादन बहुत ज्यादा होता है पर कई बार ऐसा होता है कि उत्पादन तो ज्यादा होता है पर खपत ज्यादा नहीं होती या कम हो जाती है। उत्पादन तो उसी तरह से चलता रहता है पर खपत कम होने की वजह से तथा फैक्टरी में इकट्ठा होता जाता है जिस वजह से उस उद्योग में आर्थिक संकट आ जाता है।

(ii) बेकारी-औद्योगीकरण की वजह से बेकारी की समस्या भी बढ़ जाती है। पुराने तरीकों से उत्पादन हाथों से होता है जिस वजह से सभी को काम मिल जाता है पर इस प्रक्रिया में नए-नए आविष्कार होते रहते हैं तथा मशीनें आती रहती हैं जिस वजह से मजदूरों को काम से हटा दिया जाता है। उनकी जगह मशीनें आ जाती हैं। एक-एक मशीन दस-दस मजदूरों का काम कर सकती है। वे मज़दूर बेकार हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण बेकारी की समस्या को भी बढ़ावा देता है।

(iii) कुटीर उद्योगों का खत्म होना-औद्योगीकरण की वजह से गांवों में लगे कुटीर उद्योग भी खत्म हो जाते हैं। औद्योगीकरण में उत्पादन मशीनों से होता है जो कि सस्ता तथा अच्छा भी होता है। पर कुटीर उद्योगों में क्योंकि होता है जिस वजह से वह महंगा तथा मशीनों जैसा अच्छा भी नहीं होता है।

इस तरह फैक्टरियों का माल बिकने लग जाता है तथा इन कुटीर उद्योगों का माल बिकना बंद हो जाता है जिस वजह से इन कुटीर उद्योगों में आर्थिक संकट आ जाता है तथा ये धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण कुटीर उद्योगों के विनाश का कारण बनता है।

(iv) संयुक्त परिवारों में विघटन-औद्योगीकरण की प्रक्रिया संयुक्त परिवारों में विघटन का कारण बनती है। उद्योग शहरों में लगते हैं जिसके लिए उनमें काम करने के लिए लोगों को गांव में अपने संयुक्त परिवारों को छोड़ना पड़ता है। धीरे-धीरे सभी अपने संयुक्त परिवारों को छोड़ कर शहरों में चले जाते हैं। पहले तो वो अकेले जाते हैं पर धीरे-धीरे अपनी पत्नी तथा बच्चों को भी शहरों में ले जाते हैं तथा केंद्रीय परिवार का निर्माण करते हैं। इस तरह संयुक्त परिवार, जो भारतीय समाज की विशेषता हुआ करते थे, वह टूट जाते हैं तथा इसका कारण सिर्फ औद्योगीकरण ही है।

(v) जाति प्रथा का कमज़ोर होना-अगर हम प्राचीन भारतीय समाज को देखें तो जाति प्रथा बहुत मज़बूत हुआ करती थी पर आज के समय में बहुत कमज़ोर पड़ गई है। इसके कमज़ोर पड़ने की सबसे बड़ी वजह औद्योगीकरण है। जाति प्रथा की विशेषता विभिन्न जातियों में मेल-जोल तथा खाने-पीने पर पाबंदियां हुआ करती थीं। पर औद्योगीकरण ने इन पाबंदियों को तोड़ दिया है।

फैक्टरियों में सभी लोग मिल कर काम करते हैं तथा कोई किसी से यह नहीं पूछता कि वह किस जाति से है क्योंकि फैक्टरी में काम योग्यता के आधार पर मिलता है न कि जाति के आधार पर। सभी जातियों के लोग मिल-जुल कर काम करते हैं, खाने के समय मिल-जुल कर खाते हैं तथा यह नहीं पूछते कि वह किस जाति से है। इस तरह जाति प्रथा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताएं मेल-जोल तथा खाने-पीने पर पाबंदियां को औद्योगीकरण ने खत्म कर दिया है। इस तरह जाति प्रथा को कमजोर करने में औदयोगीकरण का बहुत बड़ा हाथ है।

(vi) स्त्रियों का घर की चार दीवारी से बाहर निकलना-औद्योगीकरण की वजह से स्त्रियां घर की चार दीवारी से बाहर निकलना शुरू हो गई हैं। उद्योगों में मशीनें चलाने के अतिरिक्त अन्य बहुत-से कार्य होते हैं। स्त्रियों में साक्षरता दर के बढ़ने की वजह से वह भी दफ्तरों में काम करना शुरू हो गई हैं। स्त्रियां अब काफ़ी हद तक आर्थिक रूप से पति या पिता पर निर्भर न रह कर आत्म-निर्भर हो गई हैं जिस वजह से वे समानता का अधिकार मांगती हैं जिसे देने में मर्द आनाकानी करते हैं।

इस तरह मर्दो तथा स्त्रियों में अहं का टकराव होता है तथा घर टूटने तथा लड़ाई-झगड़ों का खतरा पैदा हो जाता है। इसके अलावा महिलाओं के घर से बाहर काम करने के लिए जाने की वजह से बच्चों के पालन-पोषण में कमी आई है जो कि आजकल क्रैच में होता है। इस वजह से बच्चों में आजकल अच्छे गुणों की कमी पायी जाती है जो कि सिर्फ माता-पिता ही बच्चों में डाल सकते हैं। माता-पिता के पास इसके लिए समय नहीं होता। इस तरह स्त्रियों की स्वतंत्रता नयी प्रकार की समस्याएं पैदा कर रही है।

(vii) प्रेम-विवाह, अंतर्जातीय-विवाह तथा तलाक-औरतों के घर से बाहर निकलने से तथा जाति प्रथा की परंपराओं के टूटने की वजह से अब प्रेम विवाह तथा अंतर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं। शिक्षा के बढ़ने की वजह से लड़का-लड़की कॉलेज में मिलते हैं तथा उनमें प्यार हो जाता है तथा बाद में वह प्रेम-विवाह कर लेते हैं।

इसके अलावा औरतों के दफ्तरों में मर्दो के साथ काम करने की वजह से उनमें मेल-जोल बढ़ता है तथा धीरे-धीरे उनमें प्यार हो जाता है। वह विवाह कर लेते हैं। दोनों ही हालातों में यह ज़रूरी नहीं कि दोनों एक ही जाति के हों। वह अलग-अलग जातियों के भी हो सकते हैं। इस तरह प्रेम विवाह तथा अंतर्जातीय विवाहों की संख्या में बढ़ोत्तरी हो रही है। इनके अलावा एक बड़ी समस्या जिस-का समाज को सामना करना पड़ रहा है वह है तलाक की समस्या।

औरतें अब आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर हो गई हैं जिस वजह से वह किसी के अधिकार के अंदर नहीं रहना चाहती जिस वजह से पति-पत्नी के अहं में टकराव होता है तथा बात तलाक तक आ जाती है। इसके साथ ही प्रेम विवाह रोमांच पर आधारित होता है।

जब रोमांच खत्म हो जाता है तथा जिंदगी की सच्चाई भी सामने आ जाती है तो प्यार भी खत्म होना शुरू हो जाता है तथा झगड़े शुरू हो जाते हैं। इस वजह से तलाक तक बात पहुँच जाती है। अंतर्जातीय विवाह में कई बार दोनों की संस्कृति, परंपराएं, रहन-सहन नहीं मिल पाते जिस वजह से झगड़े शुरू हो जाते हैं तथा बात तलाक तक पहुँच जाती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

प्रश्न 3.
औद्योगीकरण के समाज पर क्या प्रभाव पड़ते हैं?
अथवा
उद्योगों से किस तरह समाज में विकास होता है?
उत्तर:
औद्योगीकरण के समाज पर बहुत से अच्छे-बुरे प्रभाव पड़ते हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) श्रम विभाजन-प्राचीन समय में किसी चीज़ का उत्पादन परिवार में ही हुआ करता था। सभी को उस चीज़ के उत्पादन से संबंधित कार्य आते थे तथा वे सभी मिल-जुल कर कार्य करके उसका उत्पादन कर लिया करते थे। परंतु औद्योगीकरण की वजह से काम मशीनों पर होना शुरू हो गया जिस वजह से श्रम विभाजन का संकल्प हमारे सामने आया। किसी चीज़ का उत्पादन कई चरणों में होता है।

हर चरण में अलग-अलग काम होते हैं। अब हर कोई अलग-अलग काम करता है, जैसे कपड़ा बनाने में कोई किसी मशीन को चलाता है, कोई किसी मशीन को। अगर कोई रंगाई करता है तो यह भी श्रम विभाजन तथा विशेषीकरण का काम हो जाता है। इस तरह हर काम में श्रम विभाजन हो गया है। हर कोई एक खास काम करता है तथा उसका उसी काम में विशेषीकरण हो जाता है। यह औद्योगीकरण की वजह से हुआ है।

(ii) यातायात के साधनों का विकास-औद्योगीकरण की वजह से यातायात के साधनों का भी विकास हुआ है। फैक्टरियों में उत्पादन के लिए कच्चे माल की ज़रूरत होती है। कच्चे माल को फैक्टरियों तक दूर-दूर के इलाकों से पहुँचाने के लिए ट्रेन, ट्रकों इत्यादि जैसे यातायात के साधनों का विकास हुआ। इसके अलावा बने हुए माल को फैक्टरी से बाज़ार तक पहुँचाने के लिए भी इन यातायात के साधनों की आवश्यकता होती है जिनका धीरे-धीरे विकास हो गया। इस तरह औद्योगीकरण की वजह से यातायात के साधनों का विकास तेज़ी से हुआ।

(iii) फैक्टरियों के उत्पादन में बढ़ोत्तरी-औद्योगीकरण की वजह से चीजों का उत्पादन घरों से निकल कर फैक्टरी में आ गया जहां पर उत्पादन हाथों की बजाए मशीनों से होता है। हाथों से उत्पादन धीरे-धीरे होता है परंतु मशीनों से उत्पादन तेजी से होता है। चाहे जनसंख्या के बढ़ने से खपत में भी बढ़ोत्तरी हुई पर इसके साथ-साथ नए-नए आविष्कार हुए जिन से उत्पादन भी और बढ़ता गया। इस तरह चीज़ों के उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी औद्योगीकरण की वजह से हुई।

(iv) शहरों के आकार में बढ़ोत्तरी-औद्योगीकरण के बढ़ने से शहरों के आकार भी बढ़ने लगे। उद्योग शहरों में लगते थे जिस वजह से गांवों के लोग शहरों की तरफ जाने लगे। रोज़-रोज़ गांव में जाना मुमकिन नहीं था इसलिए लोग अपने परिवार भी शहर ले जाने लगे। जनसंख्या के बढ़ने से शहरों में जनसंख्या बढ़ने लगी जिस वजह से धीरे धीरे शहरों के आकार बढ़ने लगे तथा धीरे-धीरे नगरीयकरण का संकल्प हमारे सामने आया।

(v) पंजीवाद-औदयोगीकरण की वजह से पंजीवाद का भी जन्म हआ। जब घरों में उत्पादन हआ करता था तो ज्यादा पूंजी की ज़रूरत नहीं होती थी क्योंकि उत्पादन कम होता था तथा उत्पादन घर में ही हो जाता था पर औद्योगीकरण ने फैक्टरी प्रथा को जन्म दिया। फैक्टरी बनाने के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की ज़रूरत पड़ी। फैक्टरी बनाने के लिए, कच्चा माल खरीदने के लिए, बनी हुई चीज़ को बाज़ार में बेचने के लिए, मजदूरों को तनख्वाह देने तथा कई और कामों के लिए बहुत ज्यादा पूंजी की ज़रूरत पड़ी।

जिनके पास पैसा था उन्होंने बड़ी-बड़ी फैक्टरियां खड़ी कर ली तथा धीरे-धीरे पैसे की मदद से और पैसा कमाने लग गए। इसके साथ-साथ समाज में कई और वर्ग जैसे व्यापारी, मालिक, मजदूर, दलाल इत्यादि हमारे सामने आए तथा व्यापार में भी बढ़ोत्तरी हुई। पैसे की मदद से उत्पादित चीजें और देशों को भेजी जाने लगी जिससे और पैसा आने लगा। इस पैसे की वजह से और देशों पर कब्जे होने लगे जिसे हम साम्राज्यवाद कहते हैं। इसने और देशों का शोषण करने को प्रेरित किया। इस तरह पूंजीवाद का जन्म हुआ जिसने कई और समस्याओं को जन्म दिया।

(vi) कुटीर उद्योगों का खत्म होना-इसकी वजह से गांवों में लगे कुटीर उद्योग खत्म हो जाते हैं। इसमें उत्पादन मशीनों से होता है जोकि सस्ता तथा अच्छा भी होता है। कुटीर उद्योग में क्योंकि उत्पादन हाथों से होता है जिस कारण वह महंगा तथा मशीनों जैसा अच्छा भी नहीं होता है। इस तरह फैक्टरियों का माल बिकने लग जाता है तथा कुटीर उद्योगों का माल बिकना बंद हो जाता है जिस वजह से इन कुटीर उद्योगों में आर्थिक संकट आ जाता है तथा यह धीरे-धीरे बंद हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण कुटीर उद्योगों के विनाश का कारण बनता है।

(vii) रहने की जगह की समस्या-उद्योग नगरों में लगते हैं। गांवों से हज़ारों लोग शहरों में इन उद्योगों में काम की तलाश में आते हैं जिस वजह से शहरों में रहने की जगह की या मकानों की समस्या हो जाती है। इस समस्या से निपटने के लिए कई-कई लोग एक कमरे में रहते हैं जिस वजह से उनमें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं। इसी के साथ गंदी बस्तियां भी पनप जाती हैं जो शहरों में गंदगी फैलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।

(viii) बेकारी-औद्योगीकरण की वजह से बेकारी की समस्या भी बढ़ जाती है। पुराने तरीकों से उत्पादन हाथों से होता है जिस वजह से सभी को काम मिल जाता है पर इस प्रक्रिया में नए-नए आविष्कार होते रहते हैं तथा मशीनें भी आती रहती हैं जिस वजह से मजदूरों को काम से हटा दिया जाता है। उनकी जगह मशीनें आ जाती हैं। एक एक मशीन दस-दस मजदूरों का काम कर सकती है। वे मजदूर बेकार हो जाते हैं। इस तरह औद्योगीकरण बेकारी की समस्या को भी बढ़ावा देता है।

(ix) स्वास्थ्य की समस्या-औद्योगीकरण का एक और प्रभाव मजदूरों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इन उद्योगों का वातावरण मजदूरों की सेहत के लिए काफ़ी हानिकारक होता है। वहां ताजी हवा नहीं जाती, उन्हें प्रदूषण में काम करना पड़ता है जिस वजह से उनके स्वास्थ्य पर काफ़ी हानिकारक प्रभाव पड़ता है।

प्रश्न 4.
सामाजिक परिवर्तन क्या है? इसकी विशेषता का वर्णन करो।
अथवा
सामाजिक परिवर्तन से आप क्या समझते हैं? सामाजिक परिवर्तन की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करें।
अथवा
सामाजिक परिवर्तन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
सामाजिक परिवर्तन का अर्थ (Meaning of Social Changes)-साधारण शब्दों में परिवर्तन का अर्थ समाज में घटित होने वाले परिवर्तनों से समझा जाता है अर्थात् परिवर्तन शब्द समय की किसी अवधि में आए परिवर्तन को स्पष्ट करता है। प्रारंभ में सामाजिक विचारकों ने उद्विकास (evolution), प्रगति (Progress) एवं सामाजिक परिवर्तन तीन अवधारणाओं का एक ही अर्थ माना जाता है। केवल आगबर्न पहले ऐसे विद्वान हुए जिन्होंने 1922 में अपनी पुस्तक (Social change) में इन सभी अवधारणाओं का अंतर समझाया।

सामाजिक परिवर्तन के बारे में विभिन्न विद्वानों की निम्नलिखित परिभाषाएं हैं किंग्सले डेविस (Kingsley Devis) के अनुसार, “सामाजिक परिवर्तन से हमारा अभिप्रायः उन परिवर्तनों से है जो सामाजिक संगठन अर्थात् समाज की संरचना और कार्यों में उत्पन्न होते हैं।”

गिन्सबर्ग (Ginsberg) के शब्दों में, “सामाजिक परिवर्तन से हमारा अभिप्राय सामाजिक ढांचे में परिवर्तन से है। उदाहरण के रूप में समाज के आकार, उनके विभिन्न अंगों की बनावट या संतुलन अथवा उसके संगठन के प्रकारों में होने वाले परिवर्तन से है।’

जेन्सन (Jenson) का मानना है कि, “सामाजिक परिवर्तन को लोगों के कार्य करने तथा विचार करने के तरीकों में होने वाले रूपांतर के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।” मैकाइवर एवं पेज (MacIver and Page) के अनुसार, “समाजशास्त्री होने के नाते हमारी विशेष रुचि प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक संबंधों से है। केवल इन सामाजिक संबंधों में होने वाले परिवर्तन को ही सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”

पर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर सामाजिक परिवर्तन लोगों के जीवन में होने वाले परिवर्तन को दर्शाता है। सामाजिक परिवर्तन सामाजिक संबंधों में परिवर्तन है। सामाजिक परिवर्तन उन परिवर्तनों को कहा जाता है जो मानवीय संबंधों, व्यवहारों, प्रथाओं, परंपराओं, संस्थाओं, मूल्यों, कार्यविधियों, प्रकार्यों व सामाजिक व्यवस्था व संरचना है।

सामाजिक परिवर्तन की विशेषताएं (Characteristics of Social Change) सामाजिक परिवर्तन एक आवश्यक एवं सर्वव्यापी प्रक्रिया है। लेकिन स्थिर व गतिशील समाजों में इसकी प्रकृति अलग-अलग देखने को मिलती है। इन विभिन्नताओं को देखते हुए सामाजिक परिवर्तन की निम्नलिखित विशेषताएं हैं-
1. सामाजिक परिवर्तन अनेक तत्त्वों की अंतः क्रिया का परिणाम होता है (Social Change is a result of the interaction of a number of factor)-सामाजिक परिवर्तन किसी एक तत्त्व के प्रभाव के कारण नहीं होता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि कोई विशेष तत्त्व प्रौद्योगिकी में परिवर्तन, आर्थिक विकास या जलवायु संबंधी दशाएं सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न करती है।

लेकिन इसे एकलवादी सिद्धांत कहा जाता है जोकि सामाजिक परिवर्तन की किसी अकेले तत्त्व के आधार पर समीक्षा करता है। यह एकलवादी सिद्धांत सामाजिक परिवर्तन की सही व्याख्या नहीं करता। क्योंकि सामाजिक परिवर्तन किसी एक तत्त्व नहीं बल्कि अनेक तत्त्वों सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, भौगोलिक तथा प्राकृतिक आदि का परिणाम हो सकता है।

2. सामाजिक परिवर्तन एक जटिल तथ्य है (Social Change is a Complex Phenomenon)-सामाजिक परिवर्तन एक गुणात्मक परिवर्तन है परिवर्तन की मात्रा को मापा या तोला नहीं जा सकता। अतः यह एक जटिल तथ्य है। किसी भौतिक वस्तु या भौतिक संस्कृति में होने वाले परिवर्तन की मात्रा का माप या तोल किया जा सकता है। मूल्यों, विचारों, विश्वासों, संस्थाओं एवं व्यवहारों में होने वाले परिवर्तनों को माप-तोल के आधार पर व्यक्त नहीं कर सकते। सामाजिक परिवर्तन को सरलता से समझा भी नहीं जा सकता।

3. सामाजिक परिवर्तन की गति समरूप नहीं होती है (Speed of Social Changes is not Uniform)-यद्यपि सामाजिक परिवर्तन प्रत्येक समाज की आवश्यक घटना है। फिर भी परिवर्तन की प्रकृति प्रत्येक समाज में अलग अलग होती है। कई समाजों में तो परिवर्तन की गति इतनी धीमी होती है कि लोगों को परिवर्तन का अहसास तक नहीं होता है। आधुनिक समय में भी कई ऐसे समाज अब भी हैं जिनके परिवर्तन की गति काफ़ी धीमी है। नगरीय समाजों में ग्रामीण समाजों से तीव्र रूप से परिवर्तन आता है। इसी कारण नगरीय समुदाय अत्यधिक विकसित होता है। सामाजिक परिवर्तनों की गति समय, स्थान एवं परिस्थितियों के ऊपर निर्भर करती है।

4. सामाजिक परिवर्तन एक अनिवार्य घटना है (Social Change Occurs as an Essential Law)-परिवर्तन प्राकृतिक नियम है तथा सामाजिक परिवर्तन एक सामाजिक तथ्य है। परिवर्तन सुनियोजित प्रयत्नों का परिणाम भी हो सकता है। कई बार व्यक्ति परिवर्तन का विरोध करता है। फिर भी परिवर्तन के ऊपर उसके परिवर्तन के विरुद्ध प्रयासों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। मनुष्य की इच्छाओं, आवश्यकताओं एवं परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर समाज में भी परिवर्तन होता है।

5. सामाजिक परिवर्तन सामुदायिक परिवर्तन है (Social Change is Community Change) सामाजिक परिवर्तन का संबंध किसी व्यक्ति विशेष, जाति, समूह, संस्था एवं प्रजाति में होने वाले परिवर्तन से नहीं है, बल्कि यह संपूर्ण सामुदायिक जीवन में घटित होने वाले परिवर्तन हैं। सामाजिक परिवर्तन किसी एक व्यक्ति के जीवन या कुछ एक व्यक्तियों के जीवन प्रतिमानों में परिवर्तन नहीं है बल्कि संपूर्ण समुदाय में परिवर्तित घटना से होता है। सारे सामुदाय पर परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन कहलाता है। यह वैयक्तिक न होकर सामाजिक होता है।

6. सामाजिक परिवर्तन सार्वभौमिक है (Social Change is a Universal Phenomenon) कोई भी समाज ऐसा नहीं जिसमें परिवर्तन न पाया जाए अर्थात् कोई भी समाज गतिहीन नहीं होता। प्राचीन समाज हो या आधुनिक ग्रामीण या नगरीय समाज सभी में परिवर्तन होता है। समाज में दिन-प्रतिदिन अनेक गतिशील प्रभावों के कारण अस्थिरता पाई जाती है।

जनसंख्या में वृद्धि और प्रौद्योगिकी के विस्तार के कारण भौतिक पदार्थों में परिवर्तन आता रहता है। विचारधाराओं और सामाजिक मूल्यों व आदर्शों में भी नये तत्त्व सम्मिलित होते जाते हैं। जिससे सामाजिक संस्था संरचना की प्रकृति भी बदलती जाती है। परिवर्तन की गति कम या अधिक होना समाज की प्रकृति पर निर्भर करता है।

7. सामाजिक परिवर्तन की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती (Prediction of Social Change is not Possible) सामाजिक परिवर्तन का निश्चित रूप से पूर्वानुमान लगाना संभव नहीं है। औद्योगीकरण व नगरीयकरण के कारण भारत में संयुक्त परिवार प्रथा, जाति प्रथा एवं विवाह प्रणाली में कौन-कौन से परिवर्तन आयेंगे इसके साथ ही इनके प्रभाव के कारण लोगों के विचारों, विश्वासों व मनोवृत्तियों, मूल्यों व आदर्शों आदि पर किस प्रकार के परिवर्तन आयेंगे यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता।

कई बार आकस्मिक कारणों से भी परिवर्तन होते हैं। जिनके बारे में पहले सोचा तक भी नहीं होता है। जैसे ‘भुज’ गुजरात में भूकंप आने से वहां मूलभूत सामाजिक परिवर्तन आए हैं। विश्व युद्धों के दौरान या बाद में कई सामाजिक मूलभूत परिवर्तन आये जिनके बारे में कभी पहले सोचा भी नहीं गया। मई, 1998 में परमाणु बम का भारत में परीक्षण करने पर प्रतिक्रिया स्वरूप विश्व समुदाय ने भारत पर अनेक आर्थिक पाबंदियां लगाईं जिसने भारतीय समाज के परिवर्तनों की गति एवं स्वरूप को प्रभावित किया। इस तरह सामाजिक परिवर्तन अनेक कारकों पर निर्भर करते हैं जिनका सही पूर्वानुमान भविष्यवाणी करना संभव नहीं होता है।

प्रश्न 5.
सामाजिक परिवर्तन लाने वाले कारकों का वर्णन करो।
अथवा
सामाजिक परिवर्तन में जनांकिक कारकों का वर्णन करें।
अथवा
सामाजिक परिवर्तन के मुख्य कारकों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
किसी भी घटना के घटने का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। सामाजिक परिवर्तन को भली-भांति समझने के लिए उन कारकों का जानना आवश्यक है जो इस परिवर्तन को संभव बनाते हैं। इस विषय में एक प्रसिद्ध रोमन कवि का कथन है कि, “वह व्यक्ति सबसे सुखी है जो वस्तुओं के कारणों को जान लेता है।” विभिन्न विचारकों के भिन्न कारकों को सामाजिक परिवर्तन के लिए जिम्मेदार ठहराया है जैसे कार्ल मार्क्स ने आर्थिक कारक को, वेबर ने धर्म को व ऑगबर्न ने सांस्कृतिक विलंबना को सामाजिक परिवर्तन के कारक माना है।

इन सबके आधार पर सामाजिक परिवर्तन के लिए सामूहिक कारक उत्तरदायी होते हैं। इस वाक्य के विचारक ए० एम० रोज़ (A.M. Rose) का कथन है कि, “सामाजिक परिवर्तन का कोई कारक या कारकों की एक श्रृंखला सभी समाजों में सभी परिवर्तनों के लिए उत्तरदायी नहीं है और न ही सिर्फ एक कारक ही किसी एक परिवर्तन के लिए उत्तरदायी है।”

1. आर्थिक कारक (Economic Factors)-सृष्टि के प्रारंभिक काल से ही मानव की सबसे पहली आवश्यकता भूख थी। मानव ने भूख को मिटाने के लिए इधर-उधर भटकना शुरू किया तथा इसके साथ ही अनेक वस्तुओं का भी उपयोग किया व अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के अनेक साधनों की खोज कर डाली। इस प्रकार समय के साथ-साथ उसने कई प्रकार के संबंध स्थापित किए व कई व्यवस्थाओं का भी निर्माण किया। प्रारंभिक मानव सभ्यता व संस्कृति के विकास हेतु अपनी आदतों, व्यवहारों, इच्छाओं व साधनों में परिवर्तन करता हुआ सामाजिक प्राणी में परिवर्तित हो गया।

2. भौगोलिक व प्राकृतिक कारक (Geographical or Natural Factors)-प्राकृतिक व भौगोलिक कारक मानवीय संबंधों, व्यवहार के तरीकों, विश्वासों को प्रभावित व परिवर्तित करते हैं। सुगम्य व अगम्य क्षेत्रों का सामाजिक परिवर्तन की गति पर प्रभाव पड़ता रहता है। नदियां, जंगल, पहाड़, अकाल, ऋतुएं, बाढ़ व भूकंप का सामाजिक जीवन पर निरंतर प्रभाव रहता है। जनवरी, 2001 में भुज (गुजरात) में व 1905 में कांगड़ा में विनाशकारी भूकंप, उड़ीसा में बाढ़, राजस्थान में सूखा आदि ने संबंधित क्षेत्रों के लोगों की जीवन शैली बदल डाली।

ऐसी प्राकृतिक आपदाओं के कारण वर्तमान समय में भी भारत में लाखों लोग प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण करके उनकी पूजा करते हैं। वायु, सूर्य, चंद्रमा, शनि, बृहस्पति, नदियों, पर्वतों व अग्नि आदि की पूजा इसके कुछेक उदाहरण हैं। भौगोलिक परिस्थितियों के कारण निश्चित सामाजिक मल्य शिष्टाचार, विश्वास, नियम, आदर्श, कानन व व्यवहार के तरीके निश्चित स्वरूप धारण करते हैं।

रामपुर हिमाचल प्रदेश में “लवी का मेला’ शरद ऋतु से संबंधित हैं। अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियां मानव के स्वास्थ्य, कार्यक्षमता कार्यकुशलता को बढ़ाती है। खान-पान, पहरावे, धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करती हैं। किंतु प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों का मानव की कार्यकुशलता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।

3. मनोवैज्ञानिक कारक (Psychological Factors) मानसिक असंतोष, तनाव जिज्ञासा व इच्छा इत्यादि मनौवैज्ञानिक कारक है जो मानव को निश्चित तरह से क्रियाएं व व्यवहार करने को प्रेरित करते हैं। मानसिक असंतोष के कारण व्यक्ति सामाजिक मूल्य आदर्शों का उल्लंघन तक कर देता है। निश्चित उद्देश्यों की पूर्ति न कर पाने, जीवन में अपने लिए संगठन व समाज के लिए कुछ करने की इच्छा व सामाजिक व्यवस्था से निराशा असंतोष को जन्म देती है।

वर्तमान समय में उग्रवाद, आतंकवाद, मूल्यों का पतन व अनेक आदर्श नियमों के उल्लंघन के लिए ज़िम्मेदार कारकों में से मानसिक असंतोष एक है। कुछ नया करने व जानने की इच्छा के कारण अनेक जिज्ञासु नए नए आविष्कार कर डालते हैं। जो सामाजिक परिवर्तनों को जन्म देते हैं। मानसिक असंतोष व जिज्ञासा से विवाह विच्छेद, हत्या, आत्महत्या, बाल-अपराध व वैश्यावृति, खोजें, आविष्कार, सामाजिक विघटन व प्रगति के तत्त्वों का जन्म होता है जो सामाजिक परिवर्तनों का रास्ता प्रशस्त करते हैं।

4. जनांकिक कारक (Demographic Factors)-विविध जनांकिक कारक किसी भी समाज की सामाजिक संरचना व सामाजिक व्यवस्था के परिवर्तनों को गति व दिशा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करते हैं। जनसंख्या के प्रमुख कारकों में कुल जनसंख्या जन्म दर व मृत्यु दर जीवन प्रत्याशा (Life Expactancy) लिंग अनुपात (Sex Ratio), साक्षरता दर, ग्रामीण व नगरीय जनसंख्या व आयु संरचना आदि सम्मिलित हैं। भारतीय समाज के 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल जनसंख्या लगभग 121 करोड़ है।

जबकि एक सौ दस वर्ष पूर्व 1901 में भारत की जनसंख्या 24 करोड़ से भी कम थी। 1991-2011 के दौरान बीस वर्षों में देश की कुल जनसंख्या में लगभग 32 करोड़ की वृद्धि हुई। भारतीय समाज में विभिन्न पहलुओं ग़रीबी, बेरोज़गारी, जीवन स्तर, स्वास्थ्य स्तर, साक्षरता, संस्कृति संबंधों की व्यवस्था आदि अनेक पहलुओं का प्रभाव पड़ा है। इसी तरह देश की साक्षरता दर में परिवर्तनों से सामाजिक परिवर्तन हो रहे हैं।

स्त्रियों की साक्षरता दर 0.60% से 65.5% पहुंच गई। अतः 1901 में 500 में से केवल 3 महिलाएं साक्षर थीं। महिलाओं में शिक्षा के तीव्रगति से प्रचार व प्रसार से उनमें आत्मविश्वास का विकास हुआ, जागरूकता बढ़ी, जिससे विवाह, परिवार, स्त्रियों की स्थिति, आर्थिक क्रियाओं, विश्वासों, सोच मनोवृत्तियों, रुचियों में परिवर्तन हुआ। जैसे जनसंख्या के एक कारक साक्षरता का सामाजिक परिवर्तनों में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा इसी प्रकार जनसंख्यात्मक कारकों से सामाजिक परिवर्तन हुए हैं।

5. सांस्कृतिक कारक (Cultural Factors)-सामाजिक परिवर्तनों के विभिन्न कारकों में सांस्कृतिक कारक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चूंकि संस्कृति, व्यक्ति के विश्वासों, विचारों, मूल्यों, धर्म, प्रथा, नैतिकता आदि से निर्मित होती है। जैसे ही किसी समाज की संस्कृति में परिवर्तन आता है वैसे ही सांस्कृतिक तत्त्व भी परिवर्तित हो जाते हैं। सांस्कृतिक तत्त्वों का संबंध व्यक्तियों के व्यवहारों, आदतों व तरीकों से है। स्वाभाविक रूप से उनमें भी परिवर्तन आ जाता है।

इस प्रकार संस्कृति के विभिन्न तत्त्वों में होने वाला परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता समाज में संस्कृति ही निर्धारित करती है कि अमुक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति के साथ-क्या संबंध होगा व उस संबंध के आधार पर वह दूसरे व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करेगा। परिवार के सदस्यों के परस्पर व्यवहार करने के व सदस्यों के बीच किस प्रकार का संबंध होगा. यह सब संस्कति दवारा तय होता है। संस्कृति के भौतिक और अभौतिक दो पक्ष होते हैं।

भौतिक पक्ष का संबंध भौतिक वस्तुओं जैसे मशीन, कलपुर्जे, कार व रेलगाड़ी से है जबकि अभौतिक संस्कृति का संबंध समाज में प्रचलित रूढ़ियों, आदर्शों, नियमों व मूल्यों से है। सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया में भौतिक पक्ष आगे बढ़ता जाता है जबकि अभौतिक पक्ष पिछड़ जाता है।

संस्कृति का भौतिक पहलू व्यक्ति की आदतों में परिवर्तन को बढ़ावा देता है व अभौतिक पक्ष व्यक्ति के व्यवहारों में परिवर्तन को योग देता है। जब भी किसी समाज के लोगों की आदत व व्यवहार में परिवर्तन आता है तो सामाजिक परिवर्तन होना शुरू हो जाता है। संस्कृति केवल सांस्कृतिक क्षेत्र में ही परिवर्तन को संभव नहीं बनाती बल्कि यह आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक प्रयोगीकरण के क्षेत्र में भी परिवर्तन की दिशा में अपना योगदान देती है।

6. प्राणीशास्त्रीय कारक (Biological Factors) डार्विन (Darvin) के अनुसार प्राणीशास्त्रीय कारक सामाजिक परिवर्तन लाने में काफ़ी महत्त्वपूर्ण हैं। शारीरिक रूप से शक्तिशाली व साहसिक, मानसिक दृष्टि से अधिक बुद्धिमान व्यक्ति सामाजिक परिवर्तनों का रास्ता प्रशस्त करते हैं। जन्मदर, मृत्यु, औसत आयु व लिंग अनुपात प्राणीशास्त्रीय कारक हैं।

लिंगानुपात के आधार पर समाज में विवाह का स्वरूप, परिवार का गठन, आर्थिक गतिविधियां व राजनीतिक क्रियाएं प्रभावित होती हैं। जहां पुरुष व स्त्रियों की संख्या लगभग समान होती है वहां सामान्यतः एक विवाह प्रचलित होता है। बहुपति व बहुपत्नी विवाह प्रचलन के लिए भी लिंगानुपात कारक हैं।

7. वैचारिक कारक (Ideological Factors) विचारधाराएं सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करती हैं। गांधीवाद, पूंजीवाद, मार्क्सवाद व समतावाद आदि विचारधाराओं ने विश्व के विभिन्न समाजों में मूलभूत परिवर्तन किए। साम्यवाद, पूंजीवाद व समतावाद का विकास अनेक विद्वानों के सामूहिक प्रयत्नों का फल है। गांधी जी ने सत्याग्रह व अहिंसा के दवारा ब्रिटिश सरकार को भारत स्वतंत्र करने के लिए बाध्य किया, मार्क्सवाद के प्रभावाधीन विश्व के अनेक देशों ने सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक व्यवस्था में मार्क्सवाद को अपनाया।

महात्मा बुद्ध ने भारतीय समाज में अनावश्यक व खर्चीले कर्मकांडों का विरोध किया तथा अहिंसा एवं सादगी को जीवन में अपनाने पर बल दिया। पूंजीवाद व साम्यवाद विचारधाराओं के आधार पर द्वितीय महायुद्ध से लेकर 1990 के दशक के आरंभ तक विश्व दो गुटों में बंटा रहा जिसने “शीत युद्ध” को जन्म दिया। इन विचारधाराओं के प्रभाव के कारण इनको अपनाने वाले राष्ट्रों में परिवर्तनों की प्रक्रिया, दिशा व गति में काफ़ी अंतर रहा है।

8. प्रौद्योगिक कारक (Technological Factors)-वर्तमान समय में प्रौद्योगिक कारक सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारण हैं। प्रौदयोगिक का अर्थ उन उन्नत प्रविधियों से है जिनके दवारा व्यक्ति की भौतिक आवश्यकताओं भी है। विज्ञान के क्षेत्र में होने वाली प्रगति ने अनेक आविष्कारों को जन्म दिया है। इन आविष्कारों के आधार पर यंत्रीकरण में वृद्धि हुई और यंत्रीकरण के परिणामस्वरूप ही उत्पादन प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन आये हैं।

जैसे उत्पादन प्रणाली में परिवर्तन आता है वैसे ही सामाजिक संबंधों, व्यवस्था, संरचना, भूमिका एवं भी परिवर्तन आ जाता है। साधारण रूप से इसी को सामाजिक परिवर्तन कहा जाता है। भाप के इंजन के आविष्कार से मानव का सामाजिक जीवन इतना परिवर्तित हो गया जिसकी पहले किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी। यातायात एवं संचार की सुविधाओं के विस्तार व प्रसार से एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने से स्थानीय गतिशीलता में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।

औद्योगीकरण व नगरीयकरण की प्रक्रिया के आधार पर नगरों में उद्योगों का विकास बढ़ा जिससे नगरों में घनी बस्तियों का निर्माण हुआ। इसी प्रकार रेडियो, टेलीफोन, टेलीविज़न, कंप्यूटर, ई मेल, प्रेस व मशीनों के आविष्कार ने संपूर्ण सामाजिक संरचना को परिवर्तित रूप दिया। नवीन प्रौद्योगिकी ने न केवल पाश्चात्य देशों को ही बल्कि भारत व एशियाई देशों को भी काफ़ी हद तक प्रभावित किया।

मानव वर्तमान समय में धर्म व जाति से बाहर निकल कर अपनी सोच को विकसित करने में लगा हुआ है। प्रौद्योगिकी के विकास के कारण स्त्रियों के अधिकारों व उनकी आर्थिक स्वतंत्रता में भी वृद्धि हुई है। समाज में युवा पीढ़ी की शक्ति व अधिकारों में वृद्धि हुई है। इन सब पहलुओं को देखने से स्पष्ट होता है कि प्रौद्योगिकी विकास सामाजिक परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण कारक है।

9. राजनीतिक कारक (Political Factors)-आज तक समाज में जो परिवर्तन हुए हैं वह राजनीतिक उथल पुथल के कारण हुए हैं। बीयरस्टीड का कथन है कि, “कई लेखकों के अनुसार सामाजिक परिवर्तन युद्धों, लड़ाइयों, विजय, पराजय, वंशों व महायुदधों की कहानी हैं।”

इतिहास का लेखन कार्य सैन्य शक्ति के आधार पर ही था व सामाजिक परिवर्तन के बारे में भी सैन्य सिद्धांत (Military Theory) ही पाया जाता था। इस सिद्धांत के समर्थकों के अनुसार धार्मिक एवं दार्शनिक नेता समाज में अपना प्रभाव सैन्य शक्ति धारण करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा कम डाल पाते हैं। जिसके कारण परिवर्तन की मात्रा इन नेताओं की अपेक्षा राजनीतिक सत्ता प्राप्त व्यक्ति के द्वारा अधिक पायी जाती है। इस प्रकार इतिहास को युद्धों के संदर्भ में ही समझा जाना चाहिए व युद्धों के आधार पर परिवर्तन सामाजिक परिवर्तन कहलाता है।

सामाजिक परिवर्तन से पहले राजनीतिक परिवर्तन स्पष्ट दिखाई देने लगता है। युद्ध और क्रांति होकर शांत हो जाते हैं। देश की व्यवस्था एक के बाद दूसरे राजनेता के पास आती रहती है। इस सबके परिणामस्वरूप सामाजिक व्यवस्था पूर्ण रूप से परिवर्तित रूप धारण कर लेती है।

सन् 1947 का परिवर्तन अंग्रेजी शासकों को उखाड़ फेंक कर सत्ता अपने हाथ में लेने का परिवर्तन है तथा स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भी अनेक राजनीतिक पार्टियां अपने आपको राजगद्दी पर बिठाने के लिए प्रयास करती रहती हैं। यही प्रयास आगे सामाजिक परिवर्तन के रूप में स्पष्ट दिखाई देते हैं।

न लोगों एवं विदवानों का योगदान (Contribution of Greatmen and Scholars)-किसी भी समाज के परिवर्तन में वहां के महान् लोगों व विद्वानों की विशेष भूमिका रहती है। महात्मा बुद्ध, महावीर, संत कबीर, राजा राम मोहन राय, तुलसीदास, स्वामी विवेकानंद जी, दयानंद सरस्वती, टैगोर, महात्मा गांधी तथा नेहरू आदि ने भारतीय समाज में अनेक परिवर्तनों का मार्ग प्रशस्त किया।

पेरेटो का भारत की इस पृष्ठभूमि को देखते हुए यह विचार कि इतिहास अभिजात्य वर्ग की कब्र है (History is the graveyard of elites) सार्थक है। इन भारतीय संत-महात्माओं, विद्वानों व अनेक अन्य बुद्धिजीवियों ने भारतीय समाज के मूलभूत ढांचों में परिवर्तन किए।

प्रश्न 6.
औद्योगीकरण के परिणामों का वर्णन करो।
अथवा
औद्योगीकरण के भारतीय समाज पर परिणामों की व्याख्या करें।
उत्तर:
सन् 1947 के पश्चात् भारतवर्ष में बढ़ते औद्योगीकरण का लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा है। जिसका वर्णन निम्नलिखित है-
1. सामुदायिक भावना में परिवर्तन (Change in Community Feelings)-औद्योगीकरण की प्रक्रिया का प्रभाव ग्रामीण समुदाय एवं नगरीय समुदाय दोनों पर पड़ा है। लेकिन ग्रामीण समुदाय में जहां पर सामुदायिक भावना का सुदृढ़ रूप देखने को मिलता है। औद्योगीकरण के कारण नगरीय जनसंख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है। जिसके परिणामस्वरूप सामुदायिक भावना कम हुई है।

2. सामाजिक नियंत्रण में कमी (Decline in Social Control)-औदयोगीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप नगरीय जनसंख्या में वृद्धि हुई है। जिसके कारण जातीय एवं सामाजिक संगठनों की शक्ति कम होती गई। जातीय एवं सामाजिक आधार पर संगठनों के निर्बल होने के परिणामस्वरूप सामुदायिक भावना घटती गई तथा सामाजिक नियंत्रण में कमी आ गई।

3. नगरीयकरण की प्रक्रिया का विकास (Development of the Process of Urbanisation)-नगरीयकरण की प्रक्रिया का विकास उद्योग ही रहे हैं। औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप ही नगरों का विकास आरंभ हुआ। जहां पर उद्योग स्थापित किये जाते हैं वहां पर लोग गांवों से आकर काम करने के लिये नगरों में बस जाते हैं। धीरे धीरे ऐसे स्थान औद्योगिक नगरों के रूप में जाने लग जाते हैं।

4. यातायात एवं संचार का विकास (Development of Transportation and Communication)-भारत में बड़े-बड़े उद्योग-धंधों के विकास के कारण यातायात एवं संचार का तीव्र गति से विकास हुआ है। यातायात एवं संचार के साधन: जैसे-रेल, बस, सड़क एवं समद्री यातायात के साधनों में वदधि होने से लोगों को व्यापार इत्यादि करने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना या फिर अपना उत्पादन पहुंचाना काफ़ी सरल हो गया। उद्योगों के यंत्रीकरण से उत्पादन में तीव्रता से वृद्धि हुई है।

5. धर्म के महत्त्व में कमी (Decline in the Importance of Religion)-औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय समाज में धर्म के महत्त्व को भी कम किया है। उद्योगों में कार्य करने हेतु ग्रामीण समुदाय के लोग नगरों में आकर बस जाते हैं। नगरों में भौतिकवाद का अधिक महत्त्व होता है जिससे नगरों में रहने एवं संपर्क में आने पर ग्रामीण लोग भी नास्तिक प्रवृत्ति के होने लग गये हैं। अतः धर्म का महत्त्व व प्रभाव स्वतः कम होता गया।

6. परिवार व्यवस्था में परिवर्तन (Change in Family System)-उद्योगों का विकास शहरों व नगरों में होने के कारण गांवों के अधिकतर लोग शहरों में आकर अपना रोज़गार करने लग पड़े। अपनी रोजी-रोटी को अर्जित करने हेतु उन्हें अपने पैतृक मकान व निवास स्थान तक छोड़ने भी पड़े।

जिससे ग्रामीण इलाकों में पाई जाने वाली संयुक्त परिवार प्रथा भी धीरे-धीरे टूटने लगी। इसके स्थान पर एकाकी परिवारों का उद्गम होने लग पड़ा। जिन कार्यों को पहले परिवार के आधार पर पूरा किया जाता था, उन कार्यों को अन्य संस्थाएं पूरा करने लग गईं हैं। परिवार के मुखिया को भी कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाने लगा। वर्तमान में भी परिवार नियोजन बढ़ने से परिवार छोटे होते जा रहे हैं।

7. श्रम-विभाजन (Devision of Labour)-ग्रामीण कुटीर उद्योगों में एक परिवार के व्यक्ति मिलकर ही संपूर्ण कार्य कर लेते थे। लेकिन जब उत्पादन कार्य बड़ी-बड़ी मशीनों के आधार पर किया जाने लगा, तो संपूर्ण उत्पादन क्रिया को छोटे-छोटे भागों में बांट दिया गया। इसके परिणामस्वरूप श्रम का विभाजन का विकास आरंभ हुआ।

श्रम विभाजन के अंतर्गत एक व्यक्ति संपूर्ण उत्पादन प्रक्रिया में केवल एक भाग को कर सकता है। उदाहरणार्थ कार निर्माण में कुछ व्यक्ति टायर बनाने कुछ व्यक्ति इंजन बनाने तथा कुछ व्यक्ति दूसरे पुर्जे बनाने के विशेषज्ञ होते हैं। जिस व्यक्ति को जिस क्षेत्र में निपुणता होती है, उसे उसी क्षेत्र से संबंधित कार्य भी दिया जाता है। अतः उद्योगों के विकास के कारण श्रम-विभाजन एवं विशेषीकरण में प्रर्याप्त वृद्धि हुई है।

8. व्यक्तिवाद एवं समाजवाद (Individualisim and Socialism)-पूंजीवाद के विकास के कारण देश में व्यक्तिवादिता एवं समाजवादी विचारधारा का भी विकास हुआ। अधिकाधिक पूंजी संग्रह के लिये व्यक्ति हमेशा अपने हित व स्वार्थ के लिये ही कार्य करने लगा। जिसके कारण वह अपनी जाति व समूह व समुदाय से अलग होता गया।

इसके साथ ही उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों एवं उद्योगपतियों के बीच भी अंतर बढ़ गया। अनेक समस्याओं के आधार पर श्रमिकों एवं पूंजीपतियों के बीच झगड़े-आरंभ हो गये। श्रमिकों ने अपनी समस्या के हल के लिये तथा पूंजीपतियों से निपटने के लिये अनेक यूनियनों का भी विकास किया जिसके परिणामस्वरूप भारत में समाजवादी एवं साम्यवादी विचारधाराओं का विकास हुआ।

9. पूंजीवाद का विकास (Development of Capitalism)-औद्योगीकरण के आधार पर ही भारत में पूंजीवाद का विकास हुआ है। औद्योगीकरण से पहले लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि तथा कुटीर उद्योग होते थे। इस व्यवसाय को करने के लिए अधिक पूंजी की आवश्यकता नहीं होती थी।

उत्पादन स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता था। व्यक्ति की भूमि ही उसकी संपत्ति होती थी। जैसे-जैसे ही बड़े-बड़े उद्योगों का विकास हुआ, वैसे ही संपूर्ण अर्थव्यवस्था में परिवर्तन हुआ। उद्योग स्थापित करने के लिये अधिक पूंजी की आवश्यकता हुई तथा माल खरीदने व बेचने के लिये दलालों व एजेंटों की भी आवश्यकता महसूस की गई। पहले जहां पर वस्तु विनिमय की व्यवस्था थी अब मुद्रा व्यवस्था विकसित हो गई है।

परिणामस्वरूप मुद्रा का भी संग्रह आसान हो गया जिसने पूंजी का अधिक संग्रह किया और उसने ही कारखाना या उद्योग भी लगाया। धीरे-धीरे पूंजी में वृद्धि होती गई तथा श्रमिकों का लाभ पूंजीपतियों को मिलने लगा। पूंजीपति और धनी होते गये और श्रमिक और ग़रीब होते गये। औद्योगीकरण ने ही समाज में दो वर्गों पूंजीपति वर्ग और श्रमिक वर्ग (Capitalistic and Labourer Class) का उदय भी किया।

अतः यह कहा जा सकता है कि औद्योगीकरण सामाजिक परिवर्तन की एक प्रक्रिया के रूप में विकसित हुआ है। इस प्रक्रिया का प्रभाव व्यक्ति के आर्थिक सामाजिक एवं राजनैतिक जीवन पर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

एक ओर जहां इस प्रक्रिया में सामाजिक व्यवस्था व संरचना में सकारात्मक परिवर्तन किये हैं। वहां दूसरी ओर कछ ऐसे परिणाम इस प्रक्रिया के उभर कर सामने आए हैं जिसके कारण हमारी संरचना एवं व्यवस्था विघटित भी हुई है। कुल मिला कर औद्योगीकरण एक परिवर्तन की प्रक्रिया है, जिसने व्यक्ति के जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है।

प्रश्न 7.
नगरीकरण का क्या अर्थ है? भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया का वर्णन करें।
अथवा
नगरीकरण क्या है?
उत्तर:
नगरीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र से नगरों की ओर आते हैं। इस प्रक्रिया के अंतर्गत नगरों की जनसंख्या में वृद्धि होती जाती है। नगरों का विकास अचानक या एक तरफा नहीं होता है बल्कि ग्रामीण समुदाय धीरे-धीरे नगरों के रूप में विकसित होते जाते हैं। अतः गांव नगर की पहली अवस्था है। ग्रामीण समुदाय में धीरे-धीरे परिवर्तन के फलस्वरूप नगरों की विशेषताओं का जब विकास हो जाता है तो इस परिवर्तन को नगरीकरण कहा जाता है।

एण्डर्सन (Anderson) के मतानुसार, “नगरीकरण एक तरफा प्रक्रिया नहीं बल्कि दो तरफा प्रक्रिया है। इसमें न केवल गांवों से नगरों की तरफ गमन तथा कृषि व्यवसाय से कारोबार, व्यापार, सेवाओं एवं धंधों की ओर परिवर्तन ही शामिल है बल्कि प्रवासियों की मनोवृत्तियों, विश्वासों, मूल्यों तथा व्यावहारिक प्रतिमानों में भी परिवर्तन सम्मिलित होता है।”

बर्गेल (Bergal) के शब्दों में, “हम ग्रामीण क्षेत्रों के नगरीय क्षेत्रों में रूपांतरित होने की प्रक्रिया को नगरीकरण कहते हैं।”

सामान्यतः नगरीकरण एक प्रक्रिया है जो मूलरूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था से नगरीय अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन को दर्शाती है। जब ग्रामीण समुदायों में धीरे-धीरे उद्योग-धंधों, शिक्षा संस्थाओं तथा व्यापार केंद्रों इत्यादि का विकास हो जाता है तब वहां पर विभिन्न जाति, वर्ग, धर्म एवं संप्रदाय के लोग आकर बस जाते हैं। जनसंख्या में वृद्धि होती है, विभिन्न रोज़गार की सुविधाएं विकसित हो जाती हैं।

बड़े पैमाने पर उत्पादन तथा यातायात व संचार सुविधाओं का विकास हो जाता है। इसके साथ ही संबंधों की संरचना में भी परिवर्तन होता है। द्वैतीयक संबंध विकसित होते हैं तो यह प्रक्रिया नगरीकरण की प्रक्रिया कहलाना शुरू कर देती है। विश्व के अन्य देशों की अपेक्षा भारतवर्ष में नगरीकरण की प्रक्रिया अधिक विकसित नहीं हो पाई है। इसका कारण यहां पर ग्रामीण समुदायों की बहुलता तथा कृषि मुख्य व्यवसाय है।

भारत में नगरीकरण की प्रक्रिया/भारत में नगरों का विकास-(Urbanization in India/Urban Development in India):
भारतवर्ष में नगरों के विकास के अनेक कारकों एवं परिस्थितियों की क्रियाशीलता के परिणामस्वरूप अनेक नये नगरों का विकास हुआ तथा पुराने नगरों के विकास में भी वृद्धि हुई। भारत में भी विश्व के अन्य भागों की तरह ही नगरों का विकास ग्रामीण क्षेत्र से लोगों के प्रवास के द्वारा हुआ। सन् 1951 में नगरीय जनसंख्या 6 करोड़ 22 लाख थी जो 2011 में बढ़कर अढ़ाई गुना अर्थात् 38 करोड़ हो गई।

शताब्दी के अंत तक अर्थात् सन् 2000 तक जनसंख्या के 35 करोड़ हो जाने की आशंका थी। इस शताब्दी के अंत तक अर्थात् 1996 से 2000 तक नगरीय भारत में वार्षिक जनसंख्या वृद्धि दर 3.4 प्रतिशत होने की संभावना थी जबकि ग्रामीण भारत की जनसंख्या में केवल 0.7 प्रतिशत वृद्धि होने की संभावना थी।

नगरीय जनसंख्या की वृद्धि के साथ ही नगरीय क्षेत्रों में भी वृद्धि हुई है। 1971 की जनगणना के अनुसार, भारत में 1921 नगर थे जिनमें 69 नगरीय संग्रह भी सम्मिलित थे। 1991 में इसकी संख्या 3301 हो गई। 1951 एवं 2001 के मध्य नगरीकरण की प्रवृत्ति की ओर धीमी, परंतु निरंतर वृद्धि निम्नलिखित आधार पर हुई है-
तालिका : भारत में नगरीय जनसंख्या
(TABLE : URBAN POPULATION IN INDIA)

वर्ष
(Year)
नगरीय जनसंख्या का प्रतिशत
Percentage of Urban Population
195117.3
196118.0
197119.9
198123.73
199125.2
200127.88
201132.2

प्रश्न 8.
नगरीकरण के निर्धारक तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतवर्ष में नगरीकरण या नगरीय विकास को निर्धारित करने वाले तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. अनुकूल भौगोलिक पर्यावरण (Favourable Geographic Enviroment) नगर के विकास में भौगोलिक पर्यावरण एक आवश्यक तत्त्व है। जहां पर्यावरण अनुकूल होता है, वहीं नगर विकसित हो जाता है। भौगोलिक पर्यावरण के अनुकूल होने से व्यक्ति अपनी रोज़मर्रा की आवश्यकताओं को सरलतापूर्वक पूरा कर सकते हैं। भारतवर्ष में अनेक प्राचीन नगरों का विकास गंगा, यमुना एवं सिंधु नदियों के किनारे पर हुआ है। भारत में गंगा नदी के किनारे एक सौ से अधिक कस्बों एवं नगरों का विकास हुआ है।

2. अधिक खाद्य सामग्री (Surplus Food Stuffs)-गाँव में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि होता है। ग्रामों में जब व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के अतिरिक्त अधिक खादय सामग्री का उत्पादन करने लगे तो वहाँ पर अधिक व्यक्ति रहना प्रारंभ कर देते हैं। धीरे-धीरे इन स्थानों पर जनसंख्या वृद्धि तथा नये उद्योगों व मंडियों इत्यादि का विकास शुरू हो जाता है। परिणामस्वरूप गाँव नगरों में परिवर्तित होने लगते हैं।

3. आवागमन के साधनों का आविष्कार (Invention of the Means of Transport)-प्राचीन समय में ग्रामों से अतिरिक्त खाद्य सामग्री को नगरों तक पहुँचाने के लिए पहिए, नावों तथा पशुओं का प्रयोग किया जाता था। आवागमन के साधनों ने भी नगर के विकास में अहम भूमिका निभाई है।

4. नगरों का आकर्षण (Attraction of the Cities)-अपने जीवन को अधिक से अधिक सुखमय एवं खुशहाल बनाने के लिए, शिक्षा ग्रहण करने तथा रोजगार पाने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों के व्यक्ति नगरों की ओर खिंचते चले जाते हैं। इससे भी नगरों का अधिक विकास हुआ है। भारतवर्ष में पाटलिपुत्र नगर के रूप में नालंदा विश्वविद्यालय के कारण विकसित हुआ माना जाता है।

5. सांस्कृतिक तथा आर्थिक महत्त्व (Cultural and Economic Importance)-किसी भी क्षेत्र की संस्कति तथा आर्थिक सुविधाएं भी नगरों के विकास में अपनी अहम भूमिका अभिनीत करते हैं। भारतवर्ष में भी नगरों का विकास विभिन्न क्षेत्रों में सांस्कृतिक तथा आर्थिक महत्त्व के कारण हुआ है।

जैसे-ढाका का विकास व्यापारिक कारणों से हुआ माना जाता है तथा पाटलिपुत्र (आधुनिक पटना) का नगर के रूप में विकास नालंदा विश्वविद्यालय के कारण हुआ है। इसी प्रकार बरेली व मुरादाबाद जैसे नगरों के विकास में भी इन्हीं कारकों का योगदान रहा है। भारतवर्ष में अनेक राजाओं के शासन के समय में अनेक स्थानों पर विशेष उद्योग-धंधों और दस्तकारी इत्यादि के विकास के परिणामस्वरूप भी अनेक नगरों का विकास हुआ है।

6. धार्मिक महत्त्व (Religious Importance)-भारतवर्ष में अनेक स्थान ऐसे हैं जो धार्मिक दृष्टि से पवित्र माने जाते हैं। इन स्थानों की धार्मिक उपयोगिता के कारण ही नगरों का रूप धारण कर लिया है। इनमें जैसे हरिद्वार, मथुरा, काशी, प्रयाग, गया, आनंदपुर साहिब आदि ऐसे ही नगर हैं जिनका विकास धार्मिक उपयोगिता के कारण हुआ है।

7. सैनिक छावनियों की स्थापना (Establishment of Army Camps)-प्राचीन समय से ही प्रायः विजयी वर्ग पराजित वर्ग पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से गाँवों के इर्द-गिर्द सैनिक छावनियां स्थापित कर लेते हैं। ये धीरे-धीरे नगरों का रूप धारण कर लेते हैं। भारतवर्ष में भी नगरों का विकास जैसे-दिल्ली, कोलकाता, आगरा का विकास इसी आधार पर हुआ है।

प्रश्न 9.
नगरीकरण की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने वाले तत्त्वों का वर्णन करें।
अथवा
नगरीय विकास की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
नगरीय विकास की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करने वाले सहायक तत्त्व निम्नलिखित हैं-
1. औदयोगिकीकरण एवं वाणिज्यीकरण (Industrialization and Commercialization)-जब से औदयोगिक क्षेत्र में क्रांति आई है तब से ही नगरीय विकास में भी वृद्धि हुई है। उद्योगों में नई प्रविधियों, यंत्रों के आविष्कार तथा औद्योगिक उद्यमों में अपार पूंजी के निवेश से दीर्घकालीन उद्योगों की स्थापना हुई। ग्रामीण व्यक्ति अधिक वेतन पाने की चाहत से अपने ग्रामीण व्यवसायों को छोड़कर औद्योगिक क्षेत्रों में प्रविष्ट हुए।

इस प्रकार भारत में इस्पात केंद्र जमशेदपुर तथा शिकागो, लिवरपूल आदि विश्व के महान् औद्योगिक नगरों के रूप में विकसित हो गये। पहले लोग उपजाऊ भूमि तथा अनुकूल जलवायु के कारण निश्चित क्षेत्र में निवास स्थान बनाने को प्राथमिकता देते थे, लेकिन वर्तमान समय में लोहे, कोयले तथा सोने इत्यादि संबंधी कार्यों के लिए विभिन्न केंद्रों की ओर स्थानांतरित होते हैं।

औद्योगिकीकरण के साथ-साथ व्यापार एवं वाणिज्य ने भी नगरों के विस्तार एवं विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की है। प्राचीन समय में भी नगरों का विकास उन स्थानों पर ही अधिक हआ है जहां पर सामान वितरण आसानी से किया जा सकता था। वर्तमान समय में वाणिज्य-व्यापार के विकास से नगरों के विकास में वृद्धि की है। इस प्रकार औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया तथा व्यापार-वाणिज्य नगरीकरण की प्रक्रिया में अहम् भूमिका अभिनीत करते हैं।

2. अधिक साधन (Surplus Resources)-जब समाज या समूह अपनी आवश्यकता पूर्ति से अधिक साधनों का विकास कर लेता है, तो उस विकास के परिणामस्वरूप नगरों का विकास होना आरंभ हो जाता है। प्राचीन समय में व्यक्ति इन साधनों की प्राप्ति व्यक्ति पर विजय प्राप्त करने के बाद करता था। लेकिन वर्तमान समय में मनुष्य ने प्रकृति पर विजय प्राप्त कर उत्पाद शक्ति को बढ़ाया है। अपने ज्ञान के विकास के साथ प्रौद्योगिक प्रगति के कारण सका थोड़े-से व्यक्ति अधिक व्यक्तियों के समान कार्य करने में समर्थ हैं। प्रकृति के ऊपर मनुष्य का नियंत्रण नगरों के विकास का एक कारण है।

3. यातायात तथा संचार का विकास (Development of Transportation and Communication) यातायात तथा संचार की सुविधाओं ने भी नगरों के विकास में प्रोत्साहन दिया है। उद्योग कच्चे माल एवं निर्मित माल के वितरण के लिए यातायात पर निर्भर रहते हैं।

औद्योगिक नगर में यातायात एवं संचार की सुविधाएं अत्यावश्यक रखाना प्रणाली के आरंभ के समय स्थानीय यातायात अधिक विकसत नहीं था जिसके परिणामस्वरूप मिकों को वहीं निवास करना पड़ता था, जिसके कारण बड़ी-बड़ी बस्तियों का निर्माण हुआ। वर्तमान समय में नगरों में इन सुविधाओं के अधिक विकास के कारण नगर को विभिन्न क्षेत्रों, जैसे-निवास क्षेत्र, श्रमिक क्षेत्र, बाजार क्षेत्र तथा औद्योगिक क्षेत्र में विभाजित कर दिया गया।

4. शिक्षा संबंधी सुविधाएं (Educational Facilities) नगरों के विकास में शिक्षा संबंधी सुविधाओं की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राचीन समय में मुख्य शिक्षा संस्थान नगरों या शहरों में ही स्थित थे। मुख्य प्रशिक्षण संस्थान, महाविद्यालय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, तकनीकी शिक्षा संबंधी तथा कृषि विश्वविद्यालय भी नगरों में ही अधिकतर पाये जाते हैं।

अनेक प्रकार के कला केंद्र एवं संग्रहालय व पुस्तकालय भी नगरों में ही देखने को मिलते हैं। इन सब सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए ग्रामवासी नगरों की तरफ जा रहे हैं, जिससे नगरीकरण की प्रक्रिया में वृद्धि होती देखी जा सकती है।

5. मनोरंजनात्मक सुविधाएं (Recreational Facilities) नगरों में मनोरंजनात्मक सुविधाएं पर्याप्त रूप में पाई जाती हैं। मनोरंजन के उद्देश्य से अनेक प्रकार के क्लब, थियेटर एवं नृत्यगृह नगरों में विकसित किये गये हैं, जिनका उद्देश्य दूसरे क्षेत्रों में रह रहे व्यक्तियों ज्यादातर बच्चे और वयस्कों को अपनी ओर आकर्षित करना है। इस प्रकार नगरों के विकास में यह सब साधन भी अहम् भूमिका निभाते हैं।

6. नगर का आर्थिक आकर्षण (Economic Pull of City)-नगर वैयक्तिक उन्नति तथा विकास का आधार है। आधुनिक समय में अच्छा वेतन पाने में, वाणिज्य व्यापार करने में नगर नवयुवकों की सहायता करता है। नगर में रहकर व्यक्ति को अपनी आवश्यकता पूर्ति हेतु अच्छा रोज़गार व वेतन प्राप्त होता है, जिसके कारण वह नगरों में रहना पसंद करते हैं।

ग्राम की अपेक्षा नगर में सुविधाएं अधिक एवं अच्छी होती हैं। नगर में रहते हुए व्यापारी वर्ग भी अधिक-से-अधिक लाभ कमाता है। नगर में जीवन स्तर को उच्च करने की अधिक संभावनाओं के परिणामस्वरूप नगरों का विकास दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 1 संरचनात्मक परिवर्तन

प्रश्न 10.
शहरों में रहने वाले लोगों को किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर:
अगर हम हमारे वर्तमान समाज को देखें तो इस को बदलने में औद्योगीकरण तथा शहरीकरण का प्रमुख रोल रहा है। पर इनके साथ-साथ शहरों में रह रहे लोगों को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) रहने की समस्या-शहरों में सबसे बड़ी समस्या रहने की जगह यानि कि मकानों की समस्या है। गांवों से शहरों की तरफ पलायन बादस्तूर जारी रहता है जिस वजह से शहरों की आबादी काफ़ी बढ़ जाती है। आबादी तो बढ़ जाती है पर रहने के लिए जगह तो वही रहती है। इसलिए या तो आस-पास के जंगलों की कटाई करके नए मकान बनाए जाते हैं या एक-एक कमरे में कई लोग एक साथ रहते हैं। इसके अलावा धीरे-धीरे गंदी बस्तियों का भी निर्माण हो जाता है जहां पर रहना अपने आप में एक समस्या होती है।

(ii) स्वास्थ्य की समस्या-शहरों में लोगों को स्वास्थ्य की समस्या का भी सामना करना पड़ता है। बड़ी-बड़ी फैक्टरियों से निकले धुएं से होता प्रदूषण, यातायात के साधनों से होता प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, गंदी बस्तियां कुछ ऐसे तरीके हैं जिन की वजह से व्यक्ति के स्वास्थ्य को कुछ न कुछ हो ही जाता है यानि कि कोई न कोई बीमारी लग ही जाती है।

इस तरह शोरगुल, मक्खी, मच्छर, गंदा पानी, नाले इत्यादि से भी लोगों के स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है। जब गांवों से लोग पलायन करके आते हैं तो काफ़ी ताकतवर तथा हृष्ट-पुष्ट होते हैं पर धीरे-धीरे शहरों के दूषित वातावरण में रहकर उनका स्वास्थ्य भी गिरने लगता है।

(iii) जनसंख्या का बढ़ना-शहरों में जनसंख्या हमेशा बढ़ती रहती है जिस वजह से कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। एक तरफ तो ज्यादा जन्म दर तथा कम मृत्यु दर की वजह से जनसंख्या बढ़ती है तथा दूसरी तरफ गांवों से रोजगार की तलाश में लोग शहरों की तरफ आते हैं जिस वजह से जनसंख्या में दुगनी रफ्तार से बढोत्तरी होती है। जनसंख्या तो तेजी से बढ़ती रहती है पर आवास की समस्या, ज्यादा जनसंख्या की वजह से सु कमी हो जाती है। जनसंख्या बढ़ने से शिक्षा तथा और कई प्रकार की कमी हो जाती है।

(iv) अपराध की समस्या-गांवों की अपेक्षा शहरों में अपराध की समस्या बहुत बड़ी समस्या है। गांवों में आम तौर पर झगड़े या अपराध भूमि से संबंधित होते हैं पर शहरों में इनकी प्रकृति अलग प्रकार की होती है। शहरों में डाके, चोरी, हत्या, बलात्कार इत्यादि हर तरह के अपराध होते हैं।

लोगों के बीच औपचारिक संबंध होते हैं, पड़ोसी तक को पता नहीं होता कि पड़ोस में क्या हो रहा है जिस वजह से अपराधी आराम से अपराध करके निकल जाते हैं तथा किसी को पता नहीं चलता। शहरों में अपराध नियोजित ढंग से होते हैं जिस कारण अपराध आसानी से हो जाते हैं। इस तरह शहर के लोगों को इस प्रकार की समस्या का सामना करना पड़ रहा है।

(v) मनोरंजन की समस्या-शहरों में यह भी एक बड़ी समस्या है क्योंकि शहरों में प्रत्येक कार्य पैसे से होता है। गांव में तो घर में, पंचायत में या चौपाल में बड़े-बूढ़ों के साथ बैठ कर बातें करके व्यक्ति अपना मनोरंजन कर लेता है- सब नहीं होता। शहरों में या तो सिनेमा है या फिर घमने की कोई जगह जहां पर जाने के लिए पैसा खर्च करना पड़ता है। इस तरह अगर पैसा नहीं है तो आप अपना मनोरंजन नहीं कर सकते।

(vi) सामाजिक समस्याएं-शहरों में और जो समस्याएं पाई जाती हैं वह सब समस्याएं प्रकृति से सामाजिक हैं। वेश्यावृत्ति, भिक्षावृत्ति इत्यादि ऐसी समस्याएं हैं जो केवल शहरों में पाई जाती हैं। शहरों में औरतें भी दफ्तरों में काम करती हैं जिस वजह से कई बार वे अपने पति की यौन इच्छाओं की पूर्ति नहीं कर पातीं।

पति असंतुष्ट रहने लग जाता है जिस वजह से वे घर से बाहर अपनी यौन संतुष्टि के लिए जाते हैं जिससे वेश्यावृत्ति को बढ़ावा मिलता है। इसके साथ-साथ भिक्षावृत्ति एक और समस्या है जो शहरों में ज्यादा होती है। प्रत्येक गली, नुक्कड़, लाल बत्ती पर भिखारी मिल जाएंगे जो कि बहुत बड़ी समस्या है।

इस तरह चाहे और भी शहरों में समस्याएं हैं पर ऊपर लिखी समस्याएं बहुत महत्त्वपूर्ण हैं; इनका समाधान होना चाहिए।

प्रश्न 11.
भारतीय समाज पर उपनिवेशवाद के प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
1. सामाजिक एकता पर प्रभाव (Impact onSocial Unity)-ब्रिटिश सरकार ने भारत में ‘फूट डालो तथा राज करो’ (Divide and Rule) की नीति अपनाई। भारतीय हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच वैर-विरोध के बीज डाले। मिंटो मार्ले (Minto Marley) ने सन् 1909 में मुसलमानों के लिए अलग सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् 1919 तथा 1935 के अधिनियमों द्वारा सिखों, इसाइयों तथा हरिजनों के लिए भी ऐसे प्रतिनिधित्व स्वीकार कर लिए। इस सबसे भारतीय धार्मिक समुदायों तथा अगड़ी व पिछड़ी जातियों के सौहार्दपूर्ण संबंधों में कड़वाहट आ गई।

2. ग्राम्य जीवन पर प्रभाव (Impact on Rural Life)-प्राचीन काल से भारतीय गाँव छोटे गणतंत्र रहे हैं। गांव के अनुभवी व्यक्ति पंच-परमेश्वर ग्रामीण क्षेत्र के झगड़े निपटाते रहे हैं। ब्रिटिश सरकार के नए कानूनों को अपनाया। पंचायतों तथा पंच-परमेश्वरों को विशेष महत्व नहीं दिया। फलस्वरूप ग्राम्य जीवन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

3. कृषि पर प्रभाव (Impact on Agriculture)-कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी रही है। कृषि क्षेत्र पर नियंत्रण करने तथा आसानी से राजस्व एकत्रित करने के लिए अंग्रेजों ने भारत में ज़मींदारी व्यवस्था लागू की। इस व्यवस्था के तहत सरकार ने ज़मीन के बड़े-बड़े भाग ज़मींदारों को दे दिए। जमींदार भू-स्वामी बन गए। उन्होंने कषि कार्य के लिए जमीन जोतकारों (Tillers) को दे दी। जोतकार जमींदारों को लगान तथा ज़मींदार सरकार को राजस्व देते थे।

ज़मींदार किसानों तथा सरकार के बीच में विचोलिए बन गए। वे जोतकारों से मनमाने ढंग से बहुत अधिक लगान वसूल करते थे। इसके अतिरिक्त वे जब चाहे ज़मीन को पूर्व जोतकारों से लेकर अन्य जोतकारों को दे देते थे। जोतकारों को सदैव इस बात को लेकर असुरक्षा रहती कि कहीं ज़मींदार उनसे ज़मीन वापिस न ले लें। इसलिए उन्होंने ज़मीन की देखभाल कम करना शुरू कर दी जिससे खाद्यान्न उत्पादन में भारी गिरावट आई। इस प्रकार ब्रिटिश उपनिवेशवाद से कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

4. व्यापार तथा उद्योग पर प्रभाव (Impact on Trade and Industry)-अंग्रेज़ शासकों का उद्देश्य भारतीय व्यापारियों तथा उद्योगपतियों की बजाए ब्रिटिश व्यापारियों तथा उद्योगपतियों को बढ़ावा देना था। प्रारंभ में भारत से कच्चा माल इंग्लैंड ले जाकर अपने कारखानों में वस्तुएं निर्मित कर भारत में महंगे दामों में बेचा जाता था।

बाद में भारत में ही ब्रिटिश उद्योगपतियों तथा ईस्ट इंडिया कंपनी ने कारखाने लगा लिए। भारत के कच्चे माल को सस्ते भाव खरीदकर इन कारखानों में वस्तुएँ निर्मित की जाने लगी तथा उन्हें मनमाने दामों में बेचा जाने लगा। फलस्वरूप भारत में औद्योगिक उत्पाद एवं इसकी खपत तो बढ़ी परंतु भारतीय उद्योग जगत को इससे भारी नुकसान हुआ।

5. सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर प्रभाव (Impact on Social and Culture life)-ब्रिटिशवासी स्वयं को श्रेष्ठ तथा भारतीयों को निम्न श्रेणी के नागरिक के रूप में लेते थे। कई स्थानों पर लिखा होता था कि भारतीयों तथा कुत्तों को मालरोड पर आने की अनुमति नहीं है। इसके अतिरिक्त सन् 1835 में अंग्रेज़ी को भारत में शिक्षा के माध्यम के रूप में अपनाया गया। इस सबके चलते भारतीयों में हीनता की भावना का विकास हुआ। जबकि विधवा विवाह अनुमति तथा सती प्रथा के विरुद्ध कानून निर्माण कर भारतीय समाज को सुधारने के प्रयास भी किए गए।

6. यातायात तथा संचार साधनों का विकास (Development of Means of Transportation and Comunication)-भारत में बड़े-बड़े नगरों, मंडियों तथा बंदरगाहों को सड़कों तथा रेलमार्गों के द्वारा जोड़ा गया। डाक-तार तथा टेलीफोन आदि संचार साधनों का विकास किया गया।

भले ही ब्रिटिश शासन ने भारत में अपने व्यापारिक व राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए ये कदम उठाए। मगर इस सबसे देशवासियों को देश के एक कोने से दूसरे कोने के निवासियों के संपर्क में आने का सुअवसर मिल गया। परिणामस्वरूप भारतवासियों को एकता के सूत्र में बंधने में सहायता मिली।

7. राष्ट्रीय एकीकरण (National Unification)-ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत सैंकड़ों छोटी-छोटी रियासतों में बंटा हुआ था। अंग्रेजों ने इन रियासतों के राजाओं को पराजित कर अपने अधीन कर लिया। इससे पूरे भारत को एक राष्ट्रीय स्वरूप मिला। भारत में राजनीतिक एकता स्थापित हुई।

8. लोकतंत्रात्मक संस्थाओं का विकास (Development of Democratic institutions)-इंग्लैंड विश्व में लोकतंत्र की जननी है। इसके भारत में शासन के कारण देश में वयस्क चुनाव प्रणाली, महिलाओं को अधिकार, संसद्, लोक सभा तथा राज्य सभा तथा स्वतंत्र न्यायपालिका आदि अपूर्व लोकतंत्रात्मक संस्थाओं के विकास में सहायता मिली।

9. प्रशासन पर प्रभाव (Impact on Administration) ब्रिटिश उपनिवेशवाद से भारत में नई प्रशासनिक व्यवस्था का विकास हुआ। भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के माध्यम से उच्च प्रशासनिक अधिकारियों की नियुक्ति की जाने लगी। इससे नौकरशाही का विकास जोकि देश की स्वतंत्रता के छः सात दशकों के पश्चात् भी भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
निम्न में से कौन-सा कथन सत्य है?
(A) भारत में अनेक जनजातियां हैं
(B) भारतीय समाज अनेक जातियों में विभाजित है
(C) भारत में विभिन्न धर्म और संप्रदाय हैं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 2.
चक्रवर्ती नरेश बनने के लिए किस भारतीय शासक ने भारत के राजनीतिक एकीकरण का प्रयास किया था?
(A) चंद्रगुप्त मौर्य ने
(B) सम्राट अशोक ने
(C) हर्षवर्धन ने
(D) उपर्युक्त सभी ने।
उत्तर:
चंद्रगुप्त मौर्य ने।

प्रश्न 3.
केंद्र और राज्यों के बीच, अतिरिक्त सहायक सरकारी भाषा कौन-सी है?
(A) अंग्रेजी
(B) हिंदी
(C) राज्य-विशेष की भाषा
(D) उर्दू
उत्तर:
अंग्रेजी।

प्रश्न 4.
भारतीयों ने किस आधार पर विविधता बनाए रखी है?
(A) भाषा की विविधता के आधार पर
(B) व्यवहार की विविधता के आधार पर
(C) मूल्यों, आदर्शों व संस्कारों की विविधता के आधार पर
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 5.
भारतीय एकीकरण में बाधक कारक कौन-से हैं?
(A) अनेक भाषाएँ
(B) जातीय भिन्नताएं।
(C) धार्मिक विभिन्नताएं
(D) भाषावाद, धर्मवाद, जातिवाद इत्यादि।
उत्तर:
भाषावाद, धर्मवाद, जातिवाद इत्यादि।

प्रश्न 6.
वर्तमान राजनेताओं के कारण भारत में
(A) सामुदायिक सद्भाव बढ़ा है
(B) धार्मिक सद्भाव कम हुआ है
(C) जातीय सद्भाव बढ़ा है
(D) जातीय वैमनस्य कम हुआ है।
उत्तर:
धार्मिक सद्भाव कम हुआ है।

प्रश्न 7.
भारतीय समाज में किसे धार्मिक संस्कार माना जाता है?
(A) विवाह
(B) परिवार
(C) दहेज
(D) जाति प्रथा।
उत्तर:
विवाह।

प्रश्न 8.
राष्ट्रीय एकता को कैसे स्थापित किया जा सकता है?
(A) धर्म से जुड़े संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर
(B) सारे देश की शिक्षा का एक ही पाठ्यक्रम बनाकर
(C) जातिवाद को खत्म करके
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 9.
सन 2001 में हरियाणा की साक्षरता दर कितनी थी?
(A) 58%
(B) 63%
(C) 68%
(D) 73%
उत्तर:
68%

प्रश्न 10.
त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय एकीकरण कांफ्रेंस का दिल्ली में आयोजन कब किया गया?
(A) सितंबर 28, 1961
(B) नवंबर 1960
(C) 1965
(D) 1962
उत्तर:
सितंबर 28, 1961.

प्रश्न 11.
वेद और पुराण कौन-सी भाषा में लिखे गये हैं?
(A) संस्कृत
(B) अवधी
(C) भोजपुरी
(D) उर्दू।
उत्तर:
संस्कृत।

प्रश्न 12.
हिंदू धर्म के चार धाम (मठ) किसने स्थापित किये थे?
(A) स्वामी दयानंद
(B) गांधी जी
(C) श्री शंकराचार्य
(D) ज० ला० नेहरू।
उत्तर:
श्री शंकराचार्य।

प्रश्न 13.
इनमें से कौन-सा समूह भारत में अल्पसंख्यक है?
(A) मुस्लिम
(B) सिक्ख
(C) पारसी
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 14.
मुसलमानों में सुधार आंदोलन किसने चलाया था?
(A) मोहम्मद अली
(B) जिन्नाह
(C) सर सैय्यद अहमद खान
(D) रहमत अली।
उत्तर:
सर सैय्यद अहमद खान।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 15.
हमारे देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह कौन-सा है?
(A) पारसी
(B) सिक्ख
(C) मुसलमान
(D) जैन।
उत्तर:
मुसलमान।

प्रश्न 16.
संविधान के किस अनुच्छेद के अनुसार धार्मिक तथा भाषायी अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने तथा उनका प्रशासन करने का अधिकार है?
(A) अनुच्छेद 22
(B) अनुच्छेद 25
(C) अनुच्छेद 27
(D) अनुच्छेद 30
उत्तर:
अनुच्छेद 30

प्रश्न 17.
अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना कब हुई थी?
(A) 1980
(B) 1975
(C) 1976
(D) 1978
उत्तर:
1978

प्रश्न 18.
हमारे देश में अल्पसंख्यकों को किस समस्या का सामना करना पड़ता है?
(A) कम शिक्षा
(B) योग्य नेतृत्व की कमी
(C) असुरक्षा की भावना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 19.
भारत के प्राचीनतम निवासी कौन हैं?
(A) जनजातियां
(B) आर्य
(C) सिक्ख
(D) मुस्लिम।
उत्तर:
जनजातियां।

प्रश्न 20.
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज को हम कितने कालों में विभाजित कर सकते हैं?
(A) 6
(B) 7
(C) 3
(D) 4
उत्तर:
6

प्रश्न 21.
निम्न में से कौन-सा स्थान धार्मिक स्थान नहीं है?
(A) अमृतसर
(B) अजमेर शरीफ
(C) वैष्णों देवी
(D) ताजमहल।
उत्तर:
ताजमहल।

प्रश्न 22.
भारत को धर्म-निष्पक्षता किसने प्रदान की है?
(A) राज्य
(B) सरकार
(C) जनता
(D) संविधान।
उत्तर:
संविधान।

प्रश्न 23.
उस देश को क्या कहते हैं जो किसी विशेष धर्म का नहीं बल्कि सभी धर्मों का सम्मान करता है?
(A) कल्याणकारी राज्य
(B) धर्म-निष्पक्ष
(C) लोकतांत्रिक
(D) तानाशाही।
उत्तर:
धर्म-निष्पक्ष।

प्रश्न 24.
इनमें से कौन-सा धर्म-निष्पक्षता का आवश्यक तत्त्व है?
(A) धार्मिक कट्टरवाद का बढ़ना
(B) धार्मिक गतिविधियों का बढ़ना
(C) धार्मिक कट्टरवाद का खात्मा
(D) धार्मिक गतिविधियां का खात्मा।
उत्तर:
धार्मिक कट्टरवाद का खात्मा।

प्रश्न 25.
इनमें से कौन-सा धर्म-निष्पक्षता का मख्य आधार है?
(A) धर्म
(B) तार्किकता तथा विज्ञान
(C) धार्मिक कट्टरवाद
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
तार्किकता तथा विज्ञान।

प्रश्न 26.
किसने कहा था कि धर्म निष्पक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का सम्मान तथा असमानता?
(A) गाँधी
(B) नेहरू
(C) मौलाना अबुल कलाम
(D) सरदार पटेल।
उत्तर:
गांधी।

प्रश्न 27.
इस्लाम ने हमारे समाज को किस प्रकार प्रभावित किया है?
(A) हमारे समाज में पर्दा प्रथा आयी
(B) जाति व्यवस्था की पाबंदियां अधिक कठोर हो गईं
(C) विवाह से संबंधित पाबंदियां और कठोर हो गईं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 28.
धर्म-निष्पक्षता को अपनाने का क्या कारण है?
(A) कम होते धार्मिक संस्थान
(B) आधुनिक शिक्षा
(C) पश्चिमी संस्कृति को अपनाना
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 29.
धर्म-निष्पक्षता ने किस प्रकार हमारे देश के सामाजिक जीवन को प्रभावित किया है?
(A) पवित्रता तथा अपवित्रता के संकल्पों में परिवर्तन
(B) परिवार की संस्था में परिवर्तन
(C) ग्रामीण समुदाय में बहुत से परिवर्तन आए हैं
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 30.
परिवार की संस्था में धर्म-निष्पक्षता के कारण किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं?
(A) संयुक्त परिवारों का टूटना
(B) एकांकी परिवारों का बढ़ना
(C) परिवार में बड़ों का कम होता नियंत्रण
(D) a + b + c
उत्तर:
a + b + c

प्रश्न 31.
धर्म-निष्पक्षता के कारण ग्रामीण समुदाय में किस प्रकार का परिवर्तन आया है?
(A) चुनी हुई पंचायतों का सामने आना
(B) समृद्धि पर आधारित सम्मान
(C) अंतर्जातीय विवाहों का बढ़ना
(D) a + b + c
उत्तर:
a + b + c

प्रश्न 32.
भारत में इस्लाम का प्रभाव पड़ना कब शुरू हुआ?
(A) 13वीं शताब्दी
(B) 14वीं शताब्दी
(C) 15वीं शताब्दी
(D) 16वीं शताब्दी।
उत्तर:
13वीं शताब्दी।

प्रश्न 33.
निम्नलिखित में से कौन-सा अल्पसंख्यक नहीं है?
(A) मुसलमान
(B) क्षत्रिय
(C) सिक्ख।
उत्तर:
क्षत्रिय।

प्रश्न 34.
हरियाणा में निम्नलिखित में से कौन-सा धार्मिक समुदाय अल्पसंख्यक नहीं है?
(A) ईसाई
(B) सिख
(C) हिंदू
(D) मुस्लिम।
उत्तर:
हिंदू।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 35.
निम्नलिखित में से किसका गठन शहरी क्षेत्रों में नहीं किया जाता है?
(A) ग्राम सभा
(B) ग्राम पंचायत
(C) ब्लाक समिति
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 36.
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना किस वर्ष हुई?
(A) 1757
(B) 1857
(C) 1885
(D) 1985
उत्तर:
1885

प्रश्न 37.
पंचायती राज संस्थाओं की निम्नोक्त में से कौन-सी इकाई का गठन जिला स्तर पर किया गया है?
(A) ग्राम सभा
(B) ग्राम पंचायत
(C) खंड समिति
(D) जिला परिषद्।
उत्तर:
जिला परिषद्।

प्रश्न 38.
भारत में निम्नलिखित में से कौन धार्मिक अल्पसंख्यक नहीं हैं?
(A) सिख
(B) ईसाई
(C) जैन
(D) हिंदू।
उत्तर:
हिंदू।

प्रश्न 39.
निम्नोक्त में से कौन-सी भारतीय एकता के लिए चुनौती नहीं है?
(A) संप्रदायवाद
(B) जातिवाद
(C) भाषावाद
(D) राष्ट्रवाद।
उत्तर:
राष्ट्रवाद।

प्रश्न 40.
निम्नलिखित में से धार्मिक संप्रदाय भारत में अल्पसंख्यक है?
(A) मुस्लिम
(B) सिख
(C) ईसाई
(D) इनमें से सभी।
उत्तर:
इनमें से सभी।

प्रश्न 41.
संप्रदायवाद का संबंध निम्नलिखित में से किससे हैं?
(A) जाति से
(B) धर्म से
(C) भाषा से
(D) क्षेत्र से।
उत्तर:
धर्म से।

प्रश्न 42.
भारत में सबसे ज्यादा जनजातीय लोग किस प्रदेश में निवास करते हैं?
(A) पंजाब में
(B) हरियाणा में
(C) मध्य प्रदेश में
(D) दिल्ली में।
उत्तर:
मध्य प्रदेश में।

प्रश्न 43.
भारत की राजकीय भाषा क्या है?
(A) हिंदी
(B) उर्दू
(C) पंजाबी
(D) मराठी।
उत्तर:
हिंदी।

प्रश्न 44.
वर्तमान समय में भारत में कुल कितने राज्य हैं?
(A) 20
(B) 25
(C) 30
(D) 28
उत्तर:
28

प्रश्न 45.
इस्लाम धर्म के प्रवर्तक कौन हैं?
(A) गुरु नानक देव जी
(B) हज़रत मुहम्मद
(C) गौतम बुद्ध
(D) महावीर।
उत्तर:
हज़रत मुहम्मद।

प्रश्न 46.
राज्य कौन-सी संस्था है?
(A) राजनीतिक
(B) सामाजिक
(C) धार्मिक
(D) सांस्कृतिक।
उत्तर:
धार्मिक।

प्रश्न 47.
‘वॉट इज सेक्युलरिज्म’ नामक पुस्तक किसने लिखी है?
(A) राजीव भार्गव
(B) मैक्स वैबर
(C) डेविड मिल्लर
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
राजीव भार्गव।

प्रश्न 48.
‘स्त्री-पुरुष तुलना’ नामक पुस्तक किसने लिखी?
(A) ताराबाई शिंदे
(B) गोबिंद रानाडे
(C) सावित्री बाई फूले
(D) राजा राम मोहन राय।
उत्तर:
ताराबाई शिंदे।

प्रश्न 49.
भारत में जैन धर्म में लोगों की प्रतिशतता क्या है?
(A) 1.9%
(B) 0.8%
(C) 2.3%
(D) 0.4%
उत्तर:
0.4%.

प्रश्न 50.
पुरुषों और स्त्रियों के बीच असमानता का क्या कारण है?
(A) प्राकृतिक
(B) सामाजिक
(C) जैविक
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
सामाजिक।

प्रश्न 51.
इनमें से कौन-सी चुनौती भारत में विविधता के कारण उत्पन्न हुई है?
(A) क्षेत्रीयता
(B) जातीयता
(C) सांप्रदायिकता
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 52.
इंडिया गेट स्थित है :
(A) मुंबई में
(B) आगरा में
(C) कोलकता में
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
इनमें से कोई नहीं।

प्रश्न 53.
निम्न में से किस सिद्धांत के अनुसार किसी क्षेत्र विशेष में लोगों के समूह को स्वतंत्रता एवं सम्प्रभुता प्राप्त होती है?
(A) समाजवादी
(B) राष्ट्रवादी
(C) भौतिकवादी
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
राष्ट्रवादी।

प्रश्न 54.
सामाजिक संसाधनों तक असमान पहुँच कहलाती है :
(A) सामाजिक विषमता
(B) आर्थिक विषमता
(C) राजनीतिक विषमता
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
सामाजिक विषमता।

प्रश्न 55.
इनमें से भारतीय उपमहाद्वीप की किस विशेषता से विद्वान् आकर्षित हुए हैं?
(A) संयुक्त परिवार
(B) जाति
(C) एकल परिवार
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में कितने प्रमुख धर्म पाए जाते हैं तथा यहाँ पाया जाने वाला प्रमुख धर्म कौन-सा है?
उत्तर:
भारत में सात प्रमुख धर्म पाए जाते हैं तथा यहाँ पर पाया जाने वाला प्रमुख धर्म हिंदू धर्म है।

प्रश्न 2.
भारत में कितनी प्रमुख भाषाएँ बोली जाती हैं तथा यहाँ कितने प्रतिशत लोगों की मातृभाषा हिंदी है?
उत्तर:
भारत में 22 प्रमुख भाषाएँ बोली जाती हैं तथा यहाँ पर 40% लोगों की मातृभाषा हिंदी है।

प्रश्न 3.
भारत में कौन-से राज्यों का जनसंख्या घनत्व सबसे अधिक तथा सबसे कम है?
उत्तर:
पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक जनसंख्या घनत्व है तथा सबसे कम घनत्व अरुणाचल प्रदेश में है।

प्रश्न 4.
भारत में कितने प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों तथा नगरीय क्षेत्रों में रहती है?
उत्तर:
भारत में 66% जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में तथा 34% जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में रहती है।

प्रश्न 5.
भारतीय संविधान में कितनी भाषाओं को मान्यता प्राप्त है तथा हिंदी के बाद कौन-सी भाषा सबसे अधिक प्रयुक्त होती है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को मान्यता प्राप्त है तथा हिंदी के बाद सबसे अधिक प्रयुक्त होने वाली भाषा बांग्ला है।

प्रश्न 6.
भारत में सबसे कम प्रचलित धर्म कौन-सा है तथा किस राज्य में बौद्ध धर्म सबसे अधिक प्रचलित है?
उत्तर:
भारत में सबसे कम प्रचलित धर्म पारसी धर्म है तथा महाराष्ट्र में बौद्ध धर्म सबसे अधिक प्रचलित है।

प्रश्न 7.
2001 में भारत का जनसंख्या घनत्व कितना था तथा भारत में 1000 पुरुषों के पीछे कितनी महिलाएं हैं?
उत्तर:
2001 में भारत का जनसंख्या घनत्व 324 था तथा भारत में 1000 पुरुषों के पीछे 927 महिलाएं हैं।

प्रश्न 8.
भारत के किन राज्यों में सबसे कम तथा सबसे अधिक जनसंख्या है?
उत्तर:
सिक्किम राज्य में सबसे कम तथा उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक जनसंख्या है।

प्रश्न 9.
इस्लाम धर्म के संस्थापक कौन थे तथा इस्लाम धर्म की धार्मिक पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर:
इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद साहब थे तथा कुरान इस्लाम धर्म की धार्मिक पुस्तक है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 10.
सिक्ख धर्म के संस्थापक कौन थे तथा सिक्ख धर्म की धार्मिक पुस्तक का नाम बताएं।
उत्तर:
गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के संस्थापक थे तथा सिक्ख धर्म की धार्मिक पुस्तक गुरु ग्रंथ साहिब है।

प्रश्न 11.
बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे तथा महावीर जैन जैन धर्म के संस्थापक थे।

प्रश्न 12.
हिंदी भाषा को संविधान में मान्यता कब प्राप्त हुई थी तथा भारत के कितने राज्यों की राजकीय भाषा हिंदी
उत्तर:
14 सितंबर, 1949 को हिंदी भाषा को संविधान ने मान्यता प्रदान की तथा भारत के 6 राज्यों की राजकीय भाषा हिंदी है।

प्रश्न 13.
किस राज्य में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं सबसे अधिक तथा किस राज्य में सबसे कम हैं?
उत्तर:
केरल में पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं सबसे अधिक तथा हरियाणा में सबसे कम हैं।

प्रश्न 14.
अब तक कितनी लोकसभाएं गठित हो चुकी हैं तथा लोकसभा के कितने सदस्य हो सकते हैं?
उत्तर:
अब तक 14 लोकसभाएं गठित हो चुकी हैं तथा लोकसभा के सदस्यों की अधिकतम संख्या 550 हो सकती है।

प्रश्न 15.
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य …………….. है।
उत्तर:
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है।

प्रश्न 16.
कोंकण तथा मालाबार किसे कहते हैं?
उत्तर:
भारत में समुद्री तट के उत्तरी भाग को कोंकण कहते हैं तथा समुद्री तट के दक्षिणी भाग को मालाबार कहा जाता है।

प्रश्न 17.
इंडो यूरोपियन तथा प्राविड़ियन भाषा परिवार भारत के किन क्षेत्रों में पाए जाते हैं?
उत्तर:
इंडो यूरोपियन भाषाएं उत्तर भारत में तथा द्राविड़ियन भाषा परिवार दक्षिण भारत में पाए जाते हैं।

प्रश्न 18.
भारत में सबसे उपजाऊ मैदान कौन-सा है तथा भारत में मरुस्थल कहाँ पर है?
उत्तर:
भारत में सबसे उपजाऊ मैदान सिंधु-गंगा का मैदान है तथा भारत में मरुस्थल राजस्थान में है।

प्रश्न 19.
उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत में कौन-से धाम है?
उत्तर:
बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम उत्तर भारत में है तथा रामेश्वरम दक्षिणी भारत में है।

प्रश्न 20.
पूर्वी भारत तथा पश्चिमी भारत में कौन-से धाम हैं?
उत्तर:
जगन्नाथपुरी पूर्वी भारत का धाम है तथा द्वारिकापुरी पश्चिमी भारत का धाम है।

प्रश्न 21.
क्षेत्रवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब लोग अपने क्षेत्र को प्यार करते हैं तथा दूसरे क्षेत्रों से नफरत करते हैं तो उसे क्षेत्रवाद कहा जाता है।

प्रश्न 22.
भारत में पुरुषों तथा महिलाओं की साक्षरता दर कितनी है?
उत्तर:
भारत में पुरुषों की साक्षरता दर 82% है तथा महिलाओं की साक्षरता दर 65% है।

प्रश्न 23.
भारत में राष्ट्रीय एकता में कौन-सी रुकावटें हैं?
उत्तर:
जातिवाद, सांप्रदायिकता, आर्थिक असमानता इत्यादि ऐसे कारक हैं जो राष्ट्रीय एकता के रास्ते में रुकावटें है।

प्रश्न 24.
देश में राष्ट्रीय एकता को कैसे स्थापित किया जा सकता है?
उत्तर:
देश के धर्म से जुड़े संगठनों पर प्रतिबंध लगाकर, सारे देश में शिक्षा का एक ही पाठ्यक्रम बनाकर तथा जातिवाद को खत्म करके देश में राष्ट्रीय एकता को स्थापित किया जा सकता है।

प्रश्न 25.
भारत में साक्षरता दर ………………. है।
उत्तर:
भारत में साक्षरता दर 74.04% है।

प्रश्न 26.
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का संसार में कौन-सा स्थान है?
उत्तर:
क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का संसार में सातवां स्थान है।

प्रश्न 27.
भारत के ………………. राज्य की साक्षरता दर सबसे अधिक है।
उत्तर:
भारत के केरल राज्य की साक्षरता दर सबसे अधिक है।

प्रश्न 28.
भारत में प्रचलित चार वेदों के नाम बताएं।
उत्तर:
भारत में प्रचलित चार वेदों के नाम हैं-ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा सामवेद।

प्रश्न 29.
भारत का सबसे प्राचीन वेद कौन-सा है?
उत्तर:
ऋग्वेद भारत का सबसे प्राचीन वेद है।

प्रश्न 30.
भारत में जनगणना ………………… वर्षों के बाद होती है।
उत्तर:
भारत में जनगणना दस वर्षों के बाद होती है।

प्रश्न 31.
भारतीय संविधान कब लागू हुआ था?
उत्तर:
भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को लाग हुआ था।

प्रश्न 32.
भारत सरकार का औपचारिक मुखिया कौन होता है?
उत्तर:
भारत सरकार का औपचारिक मुखिया राष्ट्रपति होता है।

प्रश्न 33.
भारतीय समाज को कितने कालों में विभाजित किया जा सकता है?
उत्तर:
भारतीय समाज को चार कालों में विभाजित किया जा सकता है।

प्रश्न 34.
किस लिपि को सभी भारतीय भाषाओं की जननी कहते हैं?
उत्तर:
ब्रह्मी लिपि।

प्रश्न 35.
वर्तमान में भारत में कितने राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश हैं?
उत्तर:
भारत में 29 राज्य तथा सात केंद्र शासित प्रदेश हैं।

प्रश्न 36.
भारत का सबसे ऊँचा पर्वत कौन-सा है?
उत्तर:
हिमालय पर्वत।

प्रश्न 37.
भौगोलिक दृष्टि से भारत को कितने भागों में बांटा जा सकता है?
उत्तर:
भौगोलिक दृष्टि से भारत को पाँच भागों में बांटा जा सकता है।

प्रश्न 38.
धर्म शास्त्रों के अनुसार जीवन में ………………. आश्रम होते हैं।
उत्तर:
धर्म शास्त्रों के अनुसार जीवन में चार आश्रम होते हैं।

प्रश्न 39.
चार आश्रमों के नाम बताएं।
उत्तर:
चार आश्रम हैं-ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, वानप्रस्थ आश्रम तथा संन्यास आश्रम।

प्रश्न 40.
भारतीय समाज का प्राचीनकाल कब से कब तक चला था?
उत्तर:
3000 ई० पू० से 700 ई० पू० तक।

प्रश्न 41.
धार्मिक बहुलतावाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अगर किसी स्थान पर कई धर्मों को मानने वाले लोग रहते हों तो इसे धार्मिक बहुलतावाद का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 42.
परसंस्कृति ग्रहण किसे कहते हैं?
उत्तर:
जब लोग अपनी संस्कृति को खोए बिना दूसरी संस्कृति के तत्त्वों को ग्रहण करते हैं तो उसे परसंस्कृति ग्रहण कहते हैं।

प्रश्न 43.
विभिन्नता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब किसी चीज़ में बहुत-से प्रकार मिलें तो उसे विभिन्नता कहते हैं।

प्रश्न 44.
युग्मन का क्या अर्थ है?
उत्तर:
वह प्रक्रिया जिससे समाज के अलग-अलग अंग इकट्ठे होते हैं उसे युग्मन कहते हैं।

प्रश्न 45.
हरियाणा की साक्षरता दर कितनी है?
उत्तर:
हरियाणा की साक्षरता दर 68% है।

प्रश्न 46.
पश्चिमी तट मैदान के उत्तरी भाग को क्या कहते हैं?
उत्तर:
पश्चिमी तट मैदान के उत्तरी भाग को कोंकण कहते हैं।

प्रश्न 47.
जैनियों के कितने तीर्थंकर हुए हैं?
उत्तर:
जैनियों के चौबीस तीर्थंकर हुए हैं-प्रथम ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें वर्धमान महावीर तक।

प्रश्न 48.
भारत की सभी भाषाओं को कितने भाषा परिवारों में बांटा जा सकता है?
उत्तर:
भारत की सभी भाषाओं को मुख्यता छ: भाषा परिवारों में बांटा जा सकता है।

प्रश्न 49.
भारत का सबसे प्रमुख भाषा परिवार कौन-सा है?
उत्तर:
भारत का सबसे प्रमुख भाषा परिवार इंडो-आर्यन भाषा परिवार है।

प्रश्न 50.
………………. भाषा को देववाणी भी कहा जाता है।
उत्तर:
संस्कृत भाषा को देववाणी भी कहा जाता है।

प्रश्न 51.
किस भारतीय सम्राट् ने चक्रवर्ती नरेश बनने के लिए भारत के राजनीतिक एकीकरण का प्रयास किया था?
उत्तर:
चंद्रगुप्त मौर्य ने।

प्रश्न 52.
संस्कृतियों के सात्मीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
संस्कृतियों के एकीकरण को संस्कृतियों के सात्मीकरण का नाम दिया जाता है।

प्रश्न 53.
अल्पसंख्यक का अर्थ बताएं।
अथवा
अल्पसंख्यक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जब समाज में जनसंख्या में कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व कम होता है तो उसे अल्पसंख्यक कहते हैं।

प्रश्न 54.
भारत का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह कौन-सा है?
अथवा
भारत में अल्पसंख्यकों में सर्वाधिक जनसंख्या किसकी है?
उत्तर:
मुस्लिम समुदाय।

प्रश्न 55.
भारत में कौन-सा समुदाय अल्पसंख्यक नहीं है?
उत्तर:
हिंदू समुदाय।

प्रश्न 56.
भारत में कुछ अल्पसंख्यक समुदायों के नाम बताएं।
उत्तर:
मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, बौद्ध, जैनी इत्यादि समुदाय भारत में अल्पसंख्यक हैं।

प्रश्न 57.
भारत के किस राज्य में सबसे अधिक मुसलमान रहते हैं?
उत्तर:
उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मुसलमान रहते हैं।

प्रश्न 58.
भारत के किन राज्यों में सबसे अधिक सिक्ख तथा ईसाई रहते हैं?
उत्तर:
पंजाब में सबसे अधिक सिक्ख तथा केरल में सबसे अधिक ईसाई रहते हैं।

प्रश्न 59.
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री किस समुदाय से संबंध रखते हैं?
उत्तर:
भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू समुदाय से संबंधित हैं।

प्रश्न 60.
भारत की राष्ट्र भाषा कौन-सी है?
उत्तर:
हिंदी।

प्रश्न 61.
भारत में कौन-सी भाषा सबसे अधिक बोली जाती है?
उत्तर:
हिंदी भाषा भारत में सबसे अधिक बोली जाती है।

प्रश्न 62.
भारत में अल्पसंख्यक आयोग ……………… में बना था।
उत्तर:
भारत में अल्पसंख्यक आयोग 1978 में बना था।

प्रश्न 63.
मुस्लिम लीग की स्थापना ………………….. में हुई थी।
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना सन् 1906 में हुई थी।

प्रश्न 64.
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दोबारा गठन कब हुआ था?
उत्तर:
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का दोबारा गठन सन् 2000 में हुआ था।

प्रश्न 65.
भारत की कुल जनसंख्या का कितने प्रतिशत लोग हिंदू तथा मुस्लिम हैं?
उत्तर:
भारत की कुल जनसंख्या का 79.5% लोग हिंदू तथा 13.6% लोग मुसलमान हैं।

प्रश्न 66.
भारत में कितने प्रतिशत ईसाई तथा सिक्ख रहते हैं?
अथवा
भारतीय समुदाय में ईसाई समुदाय की प्रतिशतता क्या है?
उत्तर:
भारत में 2.4% ईसाई तथा 1.7% सिक्ख रहते हैं।

प्रश्न 67.
सिक्ख धर्म की स्थापना …………….. ने की थी।
उत्तर:
सिक्ख धर्म की स्थापना गरु नानक देव जी ने की थी।

प्रश्न 68.
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के कितने सदस्य होते हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के सात सदस्य होते हैं।

प्रश्न 69.
शिरोमणि गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी का गठन किस दशक में हुआ था?
उत्तर:
1920 वाले दशक में।

प्रश्न 70.
सिक्खों के गुरुद्वारों को महंतों के कब्जे से छुड़ाने के लिए किस धार्मिक संस्था का गठन हुआ था?
उत्तर:
शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 71.
सिक्ख शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सिक्ख शब्द का अर्थ है शिष्य।

प्रश्न 72.
भारत में मिलने वाले मुख्य धर्म कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
भारत में इस समय सात प्रकार के धर्म मुख्य रूप से पाए जाते हैं। हिंदू (79.8%), मुसलमान (13.6%), इसाई (2.4%), सिक्ख (1.7%), बौद्ध (0.8%), जैन (0.4%), पारसी तथा अन्य जनजातीय धर्म (0.4%)।

प्रश्न 73.
भारत में कौन-कौन सी प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं?
उत्तर:
भारत में मुख्य रूप से 22 भाषाएं बोली जाती हैं-

  • हिंदी
  • पंजाबी
  • मराठी
  • कोंकणी
  • तमिल
  • तेलुगू
  • कन्नड़
  • कश्मीरी
  • मलयालम
  • संस्कृत
  • गुजराती
  • बंगला
  • उड़िया
  • उर्दू
  • सिंधी
  • नेपाली
  • मणिपुरी
  • असमी
  • डोगरी
  • संथाली
  • मैथिली
  • बोडो भाषा।

प्रश्न 74.
विभिन्नता में एकता से क्या अर्थ है?
उत्तर:
विभिन्नता में एकता से हमारा अर्थ है बहुत सारी विभिन्नता होते हुए भी सभी आपस में एकजुट हैं। जैसे हमारे देश में कई प्रकार के धर्म, संस्कृतियाँ, प्रजातियाँ पाई जाती हैं पर फिर भी यह सब एक-दूसरे के साथ बंधे हुए हैं। भारत की विभिन्नताओं में जो एकता है वह कहीं और देखने को नहीं मिल सकती।

प्रश्न 75.
भारत को कई प्रजातियों का घर क्यों कहते हैं?
उत्तर:
भारत को कई प्रजातियों का घर इसलिए कहते हैं क्योंकि यहाँ पर कई प्रकार की प्रजातियां रहती हैं। शुरू में भारत में द्रविड़ रहते थे। फिर यहाँ पर आर्य लोग आए। फिर भारत पर कई प्रकार की प्रजातियों ने आक्रमण किया और यहाँ पर बस गए। धीरे-धीरे ये सभी प्रजातियाँ यहाँ के समाज में समा कर उसका अंग बन गईं। इस तरह अगर भारत को प्रजातियों का अजायबघर भी कहा जाए तो इसमें अतिशयोक्ति नहीं होगी।

प्रश्न 76.
धार्मिक बहुलतावाद क्या होता है?
उत्तर:
अगर किसी जगह पर कई प्रकार के धर्मों को मानने वाले लोग रहते हों तो उसे धार्मिक बहुलतावाद कहते हैं। भारत एक धार्मिक बहुलतावाद वाला देश है क्योंकि इसमें कई प्रकार के धर्मों के लोग एक साथ मिलकर एक ही जगह पर रहते हैं।

प्रश्न 77.
क्षेत्रीय विभिन्नता प्राचीन संस्कृति को कैसे बचाती है?
उत्तर:
यह ठीक है कि क्षेत्रीय विभिन्नता प्राचीन संस्कृति को बचाती है। अगर सारे देश की संस्कृति एक-सी हो जाए तो अलग-अलग संस्कृतियों की महत्ता ही खत्म हो जाएगी। अलग-अलग क्षेत्रों में हम अलग-अलग प्रकार के पहनावे, रहने-सहने के ढंग, खाने के तरीके देख सकते हैं तथा उससे यह जान सकते हैं कि वह किस प्रदेश का रहने वाला है। इससे संस्कृति भी महफूज रह जाती है।

प्रश्न 78.
क्षेत्रवाद (Regionalism) क्या होता है?
अथवा
क्षेत्रवाद को परिभाषित करें।
अथवा
क्षेत्रवाद का अर्थ बताएं।
अथवा
क्षेत्रवाद किसे कहते हैं?
अथवा
क्षेत्रवाद क्या है?
उत्तर:
जब कोई अपने क्षेत्र को प्यार करने लगे और दूसरे क्षेत्रों से नफ़रत करने लगे तो उल्ले क्षेत्रवाद कहते हैं। अपने क्षेत्र के लोगों को बढावा देना भी क्षेत्रवाद का एक रूप है। इसमें दूसरे क्षेत्र के लोगों को विदेशी समझा जाता है। उदाहरण के तौर पर पंजाब में बिहारी को विदेशी समझा जाता है।

प्रश्न 79.
क्षेत्रवाद को कैसे दूर किया जा सकता है?
उत्तर:

  • कानून की सहायता से
  • यातायात तथा संचार के साधनों को बढ़ाकर
  • यात्राओं को बढ़ावा देकर
  • भारत की एक ही भाषा का विकास करके
  • राष्ट्रीय एकता में कार्यक्रम बनाकर
  • सांस्कृतिक सम्मेलन करवाकर इत्यादि।

प्रश्न 80.
क्षेत्रीयता राष्ट्रीय एकता में किस तरह रुकावट बनती है?
उत्तर:
क्षेत्रीयता में अपने क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाती है तथा दूसरे क्षेत्र को विदेशी समझा जाता है। दूसरे क्षेत्र के व्यक्ति से घृणा की जाती है। इस तरह क्षेत्रीयता से आपसी समानता तथा भाई-चारे की भावना खत्म हो जाती है। इसमें मानवतावाद न होकर क्षेत्रवाद की भावना पनपती है जोकि भारत जैसे देश की एकता में एक बहुत बड़ी रुकावट है।

प्रश्न 81.
भारत की एकता को कैसे स्थाई रखा जा सकता है?
उत्तर:
भारत की एकता को स्थाई रखने का एक उपाय है क्षेत्रवाद की भावना से ऊपर उठ कर राष्ट्रीय भावना को अपनाना। अगर हम अपने क्षेत्र की परवाह और हितों का ध्यान रखेंगे तो देश की एकता टूट जाएगी पर अगर हम अपने हितों को त्याग कर देश के हितों के बारे में सोचेंगे तथा उसके लिए काम करेंगे तो देश की एकता को स्थाई रखा जा सकता है।

प्रश्न 82.
भारत की भौगोलिक विभिन्नता के बारे में कुछ बताएं।
उत्तर:
भारत में भौगोलिक विभिन्नता पाई जाती है। उत्तर भारत में बर्फ से ढके हिमालय पर्वत हैं। दक्षिण में पठार है। भारत तीन तरफ से सागर से घिरा हुआ है। यहाँ मरुस्थल (राजस्थान) भी है तथा यहाँ संसार के उपजाऊ प्रदेशों में से एक गंगा का मैदान भी है। कई क्षेत्रों में बहुत कम वर्षा (राजस्थान) होती है तथा कई स्थानों (मेघालय) में सबसे ज्यादा वर्षा होती है। कई क्षेत्रों में घनी जनसंख्या है तथा कई क्षेत्रों में बहुत कम जनसंख्या है।

प्रश्न 83.
भारत में खाने-पीने में किस प्रकार की विभिन्नता मिलती है?
उत्तर:
भारत में खाने-पीने में भी विभिन्नता पाई जाती है। उत्तर भारत में गेहूँ के साथ सब्जियाँ तथा दालें खाई जाती हैं। दक्षिण भारत में चावल का अधिक सेवन होता है। तटीय क्षेत्रों में चावल के साथ मछली का ज्यादा सेवन होता है। हरेक क्षेत्र में अपने अलग-अलग खाना पकाने तथा खाना खाने के ढंग हैं।

प्रश्न 84.
राष्ट्रीय एकता में भाषा का महत्त्व बताओ।
उत्तर:
अगर किसी देश में राष्ट्रीय एकता को बरकरार रखना है तो उसमें भाषा का बहुत बड़ा महत्त्व है। एक भाषा होने से अलग-अलग प्रदेशों के लोग आपस में बात कर सकते हैं, एक-दूसरे से अपने विचार बाँट सकते हैं जिससे उनके मन की बात बाहर आ सकती है जिससे वह क्षेत्रीयता की भावना से ऊपर उठकर राष्ट्र के बारे में सोचने लगते हैं। इस तरह राष्ट्रीय एकता में भाषा का काफ़ी महत्त्व होता है।

प्रश्न 85.
राष्ट्रीय एकीकरण में कौन-कौन सी रुकावटें होती हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय एकीकरण में जातिवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, सांप्रदायिकता, आतंकवाद, इत्यादि के साथ-साथ हड़तालें, जातीय दंगे प्रमुख रुकावटें होती हैं।

प्रश्न 86.
राष्ट्रीय एकीकरण कैसे किया जा सकता है?
उत्तर:
राष्ट्रीय एकीकरण के लिए ज़रूरी है अपने निजी हितों को छोड़कर देश के हितों की तरफ ध्यान देना। अगर सभी लोग, राजनीतिक दल, जातियां, धार्मिक संस्थाएं अपने-अपने हित छोड़कर राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर काम करें तो यह हो सकता है। वोट की राजनीति से ऊपर उठ कर देश की समस्याओं तथा एकीकरण के बारे में सोचना चाहिए।

प्रश्न 87.
भारत में धार्मिक विभिन्नता के दुष्परिणाम कौन-से हो सकते हैं?
उत्तर:

  • धार्मिक कट्टरवादिता
  • विभिन्न धर्मों का विरोध
  • सामाजिक असंतुलन एवं विघटन
  • प्रगति में रुकावट
  • धर्म परिवर्तन
  • राष्ट्रीय एकता में बाधक
  • हिंसा को बढ़ावा
  • सांप्रदायिकता।

प्रश्न 88.
भारत की इंडो आर्यन भाषा परिवार तथा द्रविड़ भाषा परिवार के बारे में बताओ।
उत्तर:
इंडो आर्यन भाषाएं आर्यों के भारत आने के साथ आईं। यह सबसे बड़ा भाषायी समूह है। हिंदी, पंजाबी, बंगाली, गुजराती, मराठी, असामी, उड़िया, उर्दू, संस्कृत, कश्मीरी, सिंधी, पहाड़ी, राजस्थानी, बिहारी इस समूह की प्रमुख भाषाएं हैं। इस तरह संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में से दक्षिण भारत की चार भाषाएं द्रविड़ भाषायी हैं बाकी इंडो आर्यन हैं।

प्रश्न 89.
भारत की भाषाओं को कितने भागों में बाँटा गया हैं?
उत्तर:
भारत की भाषाओं को चार भागों में बांटा गया है

  • इंडो यूरोपियन जिसमें उत्तर भारतीय भाषाएं आती हैं।
  • द्रविड़ भाषा परिवार जिसमें मध्य तथा दक्षिण भारत की भाषाएँ आती हैं।
  • आस्ट्रिक भाषा परिवार जिसमें अंडमान निकोबार की भाषाएं आती हैं।
  • चीनी तिब्बती भाषा परिवार जिसमें हिमालय की ढालों पर रहने वाले लोग आते हैं।

प्रश्न 90.
भारत के किन-किन क्षेत्रों में एकता पाई जाती है?
उत्तर:

  • संस्कृतियों में एकता
  • धार्मिक एकता
  • भौगोलिक एकता
  • भाषायी एकता
  • सामाजिक एकता
  • कला के संबंध में एकता।

प्रश्न 91.
कर्मफल क्या होता है?
उत्तर:
कर्म का मतलब होता है काम। कर्म का भारतीय संस्कृति में काफ़ी महत्त्व है। भारतीय शास्त्रों में यह लिखा है कि व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जन्म में किए कर्मों पर निर्भर करता है। अगर आपने अच्छे कर्म किए हैं तो आपका जन्म अच्छे परिवार में होगा तथा यह भी हो सकता है कि आपको जन्म मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। अगर आपके कर्म बुरे हैं तो आपको अपने अगले जीवन में दुःख देखने पड़ेंगे तथा हो सकता है कि आपको मुक्ति भी न मिले। इसी को कर्मफल कहते हैं। कर्मों के अनुसार ही मनुष्य को अगला जन्म प्राप्त होता है।

प्रश्न 92.
सांप्रदायिकता का अर्थ बताएँ।
अथवा
संप्रदायवाद को परिभाषित करें।
अथवा
संप्रदायवाद क्या हैं?
अथवा
सांप्रदायिकता क्या है?
उत्तर:
सांप्रदायिकता और कुछ नहीं बल्कि एक विचारधारा है जो जनता में एक धर्म के धार्मिक विचारों का प्रचार करने का प्रयास करता है तथा यह धार्मिक विचार और धार्मिक समूहों के धार्मिक विचारों के बिल्कुल ही विपरीत होते हैं। यह एक विचारधारा है जो यह कहती है कि एक धर्म के सदस्य एक समुदाय के सदस्य हैं तथा अलग-अलग धर्मों के सदस्य एक समुदाय का निर्माण नहीं कर सकते।

प्रश्न 93.
संविधान के निर्माता भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य क्यों बनाना चाहते थे?
उत्तर:
संविधान के निर्माता भारत को एक धर्म-निरपेक्ष राज्य बनाना चाहते थे क्योंकि उन्हें सांप्रदायिकता का भय था। भारत में बहुत-से धर्म पाए जाते हैं तथा वह चाहते थे कि किसी भी धर्म को दूसरे धर्म से अधिक महत्त्व न दिया जाए। सभी धर्मों को समान महत्त्व दिया जाए ताकि समाज में सांप्रदायिक दंगे न भड़कें।

प्रश्न 94.
जाति-प्रथा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जाति प्रथा समाज में विभाजन की एक व्यवस्था है जिसमें खाने-पीने, रहने, पेशे, सामाजिक रिश्तों से संबंधित नियम दिए गए हैं। जाति प्रथा में चार मुख्य जातियां पाई जाती हैं तथा व्यक्ति को उसके जन्म के आधार पर जाति प्राप्त होती हैं। व्यक्ति योग्यता होते हुए भी अपनी जाति को बदल नहीं सकता है।

प्रश्न 95.
जातिवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब राजनेता चुनावी लाभ के लिए जातिगत चेतना का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं तो इस प्रक्रिया को जातिवाद कहा जाता है। जाति के नेता जाति से संबंधित चेतना को जगाते हैं ताकि उनकी जाति के लोग उन्हें वोट दें। यह जातिवाद है।

प्रश्न 96.
जातिवाद के हमारे समाज पर पड़ने वाले दो प्रभाव बताएं।
उत्तर:

  • जातिवाद को बढ़ावा देना धर्म निरपेक्षता तथा धर्म-निरपेक्ष समाज के विकास में सबसे बड़ा बाधक है।
  • जातिवाद राष्ट्रीय एकता को कमज़ोर करता है क्योंकि यह अलग-अलग जातियों में जाति से संबंधित चेतना को जागृत करता है।

प्रश्न 97.
जाति प्रथा को कैसे ख़त्म किया जा सकता है?
उत्तर:

  • जाति प्रथा से संबंधित कानूनों को ठीक ढंग से लागू करके जाति प्रथा को ख़त्म किया जा सकता है।
  • राजनेताओं को जातिगत राजनीति करनी बंद कर देनी चाहिए।
  • राजनीति में जातिवाद का प्रयोग करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्यवाही होनी चाहिए।
  • अलग-अलग जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह को अधिक-से-अधिक प्रोत्साहित करना चाहिए।

प्रश्न 98.
प्रदत्त पहचान से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
जो पहचान व्यक्ति को उसकी योग्यता से नहीं बल्कि जन्म से प्राप्त होती है उसे प्रदत्त पहचान कहते हैं। इसमें संबंधित व्यक्तियों की पसंद या नापसंद शामिल नहीं होती। इस प्रकार की पहचान व्यक्ति को अपने परिवार जाति अथवा समुदाय से प्राप्त होती है।

प्रश्न 99.
राष्ट्र क्या है? इसकी एक परिभाषा दीजिए।
अथवा
राष्ट्र किसे कहते हैं?
अथवा
राज्य को पारिभाषित करें।
अथवा
राष्ट्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
सरल शब्दों में राष्ट्र एक प्रकार का बड़े स्तर का समुदाय ही होता है, यह कई समुदायों से मिलकर बना एक समुदाय है। राष्ट्र के सदस्य एक ही राजनीतिक सामूहिकता का हिस्सा बनने की इच्छा रखते हैं। मैक्स वैबर के अनुसार, “राष्ट्र एक ऐसा निकाय होता है जो एक विशेष क्षेत्र में विधि सम्मत एकाधिकार का सफलतापूर्ण दावा करता है।

प्रश्न 100.
विशेषाधिकार अल्पसंख्यक कौन होते हैं?
उत्तर:
हरेक देश में कुछ धार्मिक, भाषायी अथवा किसी और आधार के समूह होते हैं जिन्हें अल्पसंख्यक कहा जाता है। इस प्रकार जब किसी अल्पसंख्यक समूह के साथ कोई विशेषक जोड़ दिया जाता है तो उसे विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक कहते हैं।

प्रश्न 101.
अल्पसंख्यक का समाजशास्त्रीय अर्थ बताइए।
अथवा
धार्मिक अल्पसंख्यक से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
अल्पसंख्यक शब्द का समाज शास्त्रीय अर्थ यह है कि अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य एक सामूहिकता निर्मित करते हैं अर्थात् उनमें अपने समूह के प्रति एकात्मता, एकजुटता तथा उससे संबंधित होने की प्रबल भावना होती है। यह भावना हानि या असुविधा से जुड़ी होती है क्योंकि पूर्वाग्रह तथा भेदभाव का शिकार होने का अनुभव साधारणतया अपने समूह के प्रतिनिष्ठा और दिलचस्पी की भावनाओं को बढ़ाता है।

प्रश्न 102.
73वें संवैधानिक संशोधन दुवारा – – – के लिए पंचायती राज संस्थाओं में 33% सीटें आरक्षित की गई।
उत्तर:
73वें संवैधानिक संशोधन द्वारा महिलाओं के लिए पंचायती राज संस्थाओं में 33% सीटें आरक्षित की गईं।

प्रश्न 103.
श्रीमद्भागवत् गीता किसने लिखी?
उत्तर:
श्रीमद्भागवत् गीता महर्षि वेद व्यास ने लिखी थी।

प्रश्न 104.
गुरु ग्रंथ साहिब किस समुदाय की धार्मिक पुस्तक है?
उत्तर:
गुरु ग्रंथ साहिब सिख समुदाय की धार्मिक पुस्तक है।

प्रश्न 105.
बौद्ध धर्म के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
गौतम बुद्ध बौद्ध धर्म के संस्थापक थे।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 106.
ऋग्वेद किस धर्म की धार्मिक पुस्तक है?
उत्तर:
ऋग्वेद हिंदू धर्म की धार्मिक पुस्तक है।

प्रश्न 107.
जैनों के 24वें तीर्थंकर का क्या नाम है?
उत्तर:
जैनों के 24वें तीर्थंकर का नाम महावीर हैं।

प्रश्न 108.
भारत की राजकीय भाषा कौन-सी है?
उत्तर:
हिंदी भारत की राजकीय भाषा है।

प्रश्न 109.
विश्व की प्राचीनतम पुस्तक का क्या नाम है?
उत्तर:
ऋग्वेद विश्व की प्राचीनतम पुस्तक है।

प्रश्न 110.
सिखों के दसवें गुरु कौन थे?
उत्तर:
गुरु गोबिंद सिंह सिखों के दसवें गुरु थे।

प्रश्न 111.
– – – रामकृष्ण मिशन के संस्थापक हैं?
उत्तर:
स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण मिशन के संस्थापक हैं।

प्रश्न 112.
सिख धर्म के पहले गुरु कौन थे?
उत्तर:
गुरु नानक देव जी सिख धर्म के पहले गुरु थे।

प्रश्न 113.
हिंदुओं की किसी एक धार्मिक पुस्तक का नाम बताइए।
उत्तर:
रामायण हिंदुओं की धार्मिक पुस्तक है।

प्रश्न 114.
स्वामी दयानंद ने सन् 1875 में …………………. समाज की स्थापना की।
उत्तर:
स्वामी दयानंद ने सन् 1875 में आर्य समाज की स्थापना की।

प्रश्न 115.
भारत के किसी एक धार्मिक अल्पसंख्यक का नाम बताइए।
उत्तर:
इसाई भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं।

प्रश्न 116.
हिंदू भारत में धार्मिक अल्पसंख्यक हैं या बहुसंख्यक?
उत्तर:
हिंदू भारत में धार्मिक बहुसंख्यक हैं।

प्रश्न 117.
दिल्लीवासी होना जातिवाद/क्षेत्रवाद/भाषावाद/संप्रदायवाद में किसको दर्शाता है?
उत्तर:
दिल्लीवासी होना क्षेत्रवाद को दर्शाता है।

प्रश्न 118.
संप्रदायवाद, क्षेत्रवाद तथा वैज्ञानिक सोच में से कौन-सी भारत के प्रगति में बाधा नहीं हैं?
उत्तर:
वैज्ञानिक सोच भारत की प्रगति में बाधा नहीं है।

प्रश्न 119.
सूचना का अधिकार अधिनियम कब पास हुआ?
उत्तर:
सूचना का अधिकार अधिनियम सन् 2005 में पास हुआ।

प्रश्न 120.
भारत में ………………….. राज्य हैं।
उत्तर:
भारत में 29 राज्य हैं।

प्रश्न 121.
भाषायी राज्य भारतीय एकता को मज़बूत करने में सहायता देते हैं। (सत्य या असत्य)।
उत्तर:
भाषायी राज्य भारतीय एकता को मजबूत करने में सहायता देते हैं-सत्य।

प्रश्न 122.
ब्रह्म समाज की स्थापना किस वर्ष में हुई थी?
उत्तर:
ब्रह्म समाज की स्थापना सन् 1829 में हुई थी।

प्रश्न 123.
आत्मसात्करणवादी नीतियाँ भारत को जोड़ने में मदद करती हैं। (सत्य या असत्य)।
उत्तर:
आत्मसात्करणवादी नीतियाँ भारत को जोड़ने में मदद करती हैं-सत्य।

प्रश्न 124.
भारत का संविधान कब पारित किया गया था?
उत्तर:
संविधान सभा ने संविधान को 26 नवंबर, 1949 को पारित कर दिया था परन्तु यह 26 जनवरी 1950 को लागू किया गया था।

प्रश्न 125.
भारतीय राष्ट्र राज्य में कितनी भाषाएं व बोलियाँ बोली जाती हैं?
उत्तर:
भारतीय राष्ट्र राज्य में 1652 भाषाएं व बोलियाँ बोली जाती हैं।।

प्रश्न 126.
क्या भारतीयों ने अंग्रेज़ी भाषा में उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाएँ की हैं? (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 127.
‘इंडिया गेट’ एक दरगाह है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत।

प्रश्न 128.
नववर्ष का त्योहार ‘पोंगल’ केरल में मनाया जाता हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत।

प्रश्न 129.
भारत को अंग्रेज़ी माध्यम में शिक्षा की सुविधा ब्रिटिश शासन की देन नहीं है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत।

प्रश्न 130.
महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति में बराबर की हिस्सेदारी दिलाने में कौन सहायता करता है?
उत्तर:
कानून इस कार्य में सहायता करता है।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में कौन-कौन सी विभिन्नताएं पाई जाती हैं?
उत्तर:
भारत की भौगोलिक विभिन्नता की वजह से भारत में कई प्रकार की विभिन्नताएं पाई जाती हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. खाने-पीने की विभिन्नता-भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में खाने-पीने में बहुत विभिन्नता पाई जाती हैं। उत्तर भारत में लोग गेहूं का ज्यादा प्रयोग करते हैं। दक्षिण भारत तथा तटीय प्रदेशों में चावल का सेवन काफ़ी ज्यादा है। कई राज्यों में पानी की बहुतायत है तथा कहीं पानी की बहुत कमी है। कई प्रदेशों में सर्दी बहुत ज्यादा है इसलिए वहाँ गर्म कपड़े पहने जाते हैं तथा कई प्रदेश गर्म हैं या तटीय प्रदेशों में ऊनी वस्त्रों की ज़रूरत नहीं पड़ती। इस तरह खाने-पीने तथा कपड़े डालने में विभिन्नता है।

2. सामाजिक विभिन्नता-भारत के अलग-अलग राज्यों के समाजों में भी विभिन्नता पाई जाती है। हर क्षेत्र में बसने वाले लोगों के रीति-रिवाज, रहने के तरीके, धर्म, धर्म के संस्कार इत्यादि सभी कुछ अलग-अलग हैं। हर जगह अलग-अलग तरह से तथा अलग-अलग भगवानों की पूजा होती है। उनके धर्म अलग होने की वजह से रीति-रिवाज भी अलग-अलग हैं।

3. शारीरिक लक्षणों की विभिन्नता- भौगोलिक विभिन्नता की वजह से यहाँ के लोगों में विभिन्नता भी पाई जाती है। मैदानी क्षेत्रों के लोग लंबे चौड़े तथा रंग में साफ होते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में लोग नाटे पर चौड़े होते हैं तथा रंग भी सफेद होता है। दक्षिण भारतीय लोग भूमध्य रेखा में निकट रहते हैं इसलिए उनका रंग काला या सांवला होता हैं।

4. जनसंख्या में विभिन्नता-भारत में जनसंख्या में भी काफ़ी विभिन्नता है। जहाँ कई राज्य जैसे पंजाब, हरियाणा काफ़ी घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं वहीं राजस्थान, मेघालय जैसे प्रदेशों में जनसंख्या काफी कम है।

प्रश्न 2.
एकता की भावना को धर्म कैसे कम करता है?
उत्तर:
धर्म को हम एक सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में देखते हैं पर फिर भी इसकी करनी और कथनी में अंतर है। आजकल धर्म का प्रयोग राजनीतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए होता है। धर्म को कई प्रकार से एकता की भावना को कम करने के लिए प्रयोग किया जाता है जैसे-

  • कई धार्मिक संगठन अपने धर्म के लोगों को अपनी तरफ करने के लिए उनकी भावनाओं को भड़काते हैं जिससे लोगों की एकता कम होती है।
  • जो शिक्षण संस्थाएं किसी धर्म से संबंधित होती हैं वह अपने धर्म का ज्यादा प्रचार करते हैं तथा और धर्मों को ऊपर नहीं आने देते।
  • नेता लोग वोट प्राप्त करने के लिए लोगों को भड़काते हैं तथा अपनी राजनीति करते हैं जिससे लोग धर्म के नाम पर एक-दूसरे के साथ लड़ते रहते हैं।
  • कई जातियों ने राजनीतिक दलों में अपने समूह बना लिए जो अपनी जाति या धर्म के लिए काम करते हैं जिससे एकता कम होती है।

प्रश्न 3.
भारत की सांस्कृतिक विविधता के बारे में बताएं।
उत्तर:
भारत में कई प्रकार की जातियां तथा धर्मों के लोग रहते हैं जिस कारण से उनकी भाषा, खान-पान, रहन-सहन, परंपराएं, रीति-रिवाज इत्यादि अलग-अलग हैं। हर किसी के विवाह के तरीके, जीवन प्रणाली इत्यादि भी अलग-अलग हैं। हर धर्म के धार्मिक ग्रंथ अलग-अलग हैं तथा उनको सभी अपने माथे से लगाते हैं।

जिस प्रदेश में चले जाओ वहाँ का नृत्य अलग-अलग है। वास्तुकला, चित्रकला में भी विविधता देखने को मिल जाती है। हर जाति या धर्म के अलग-अलग त्योहार, मेले इत्यादि हैं। सांस्कृतिक एकता में व्यापारियों, कथाकारों, कलाकारों इत्यादि का भी योगदान रहा है। इस तरह यह सभी सांस्कृतिक चीजें अलग-अलग होते हुए भी भारत में एकता बनाए रखती हैं।

प्रश्न 4.
भारतीय समाज की रूप-रेखा के बारे में बताएं।
उत्तर:
भारतीय समाज को निम्नलिखित आधारों पर समझा जा सकता है-
1. वर्गों में विभाजन-पुराने समय में भारतीय समाज जातियों में बँटा हुआ था पर आजकल यह जाति के स्थान पर वर्गों में बँट गया है। व्यक्ति के वर्ग की स्थिति उसकी सामाजिक स्थिति पर निर्भर करती है। शिक्षा, पैसे इत्यादि की वजह से अलग-अलग वर्गों का निर्माण हो रहा है।

2. धर्म-निरपेक्षता-पुराने समय में राजा महाराजाओं के समय में धर्म को काफ़ी महत्त्व प्राप्त था। राजा का जो धर्म होता था उसकी ही समाज में प्रधानता होती थी पर आजकल धर्म की जगह धर्म-निरपेक्षता ने ले ली है। व्यक्ति अन्य धर्मों को मानने वालों से नफ़रत नहीं बल्कि प्यार से रहता है। हर कोई किसी भी धर्म को मानने तथा उसके रीति-रिवाजों को मानने को स्वतंत्र है। समाज या राज्य का कोई धर्म नहीं है। भारतीय समाज में धर्म-निरपेक्षता देखी जा सकती है।

3. प्रजातंत्र-आज का भारतीय समाज प्रजातंत्र पर आधारित है। पुराने समय में समाज असमानता पर आधारित था पर आजकल समाज में समानता का बोलबाला है। देश की व्यवस्था चुनावों तथा प्रजातंत्र पर आधारित है। इसमें प्रजातंत्र के मूल्यों को बढ़ावा मिलता है। इसमें किसी से भेदभाव नहीं होता तथा किसी को उच्च या निम्न नहीं समझा जाता है।

प्रश्न 5.
आश्रम व्यवस्था के बारे में बताएं।
उत्तर:
हिंदू समाज की रीढ़ का नाम है-आश्रम व्यवस्था। आश्रम शब्द श्रम शब्द से बना है जिसका अर्थ है प्रयत्न करना। आश्रम का शाब्दिक अर्थ है जीवन यात्रा का पड़ाव। जीवन को चार भागों में बाँटा गया है। इसलिए व्यक्ति को एक पड़ाव खत्म करके दूसरे में जाने के लिए खुद को तैयार करना होता है। यह पड़ाव या आश्रम है। हमें चार आश्रम दिए गए हैं-
1. ब्रह्मचर्य आश्रम-मनुष्य की औसत आयु 100 वर्ष मानी गई है तथा हर आश्रम 25 वर्ष का माना गया है। पहले 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम के माने गए हैं। इसमें व्यक्ति ब्रह्म के अनुसार जीवन व्यतीत करता है। वह विद्यार्थी बन कर अपने गुरु के आश्रम में रह कर हर प्रकार की शिक्षा ग्रहण करता है तथा गुरु उसे अगले जीवन के लिए तैयार करता है।

2. गृहस्थ आश्रम-पहला आश्रम तथा विद्या खत्म करने के बाद व्यक्ति गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। यह 26-50वर्ष तक चलता है। इसमें व्यक्ति विवाह करवाता है, संतान उत्पन्न करता है, अपना परिवार बनाता है,जीवन यापन करता है, पैसा कमाता है तथा दान देकर लोगों की सेवा करता है। इसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं की पूर्ति करता है।

3. वानप्रस्थ आश्रम-यह तीसरा आश्रम है जोकि 51-75 वर्ष तक चलता है। जब व्यक्ति इस उम्र में आ जाता है तो वह अपना सब कुछ अपने बच्चों को सौंपकर भगवान् की भक्ति के लिए जंगलों में चला जाता है। इसमें व्यक्ति घर की चिंता छोड़कर मोक्ष प्राप्त करने में ध्यान लगाता है। जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों को सलाह भी दे सकता है।

4. संन्यास आश्रम-75 साल से मृत्यु तक संन्यास आश्रम चलता है। इसमें व्यक्ति हर किसी चीज़ का त्याग कर देता है तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए भगवान की तरफ ध्यान लगा देता है। वह जंगलों में रहता है, कंद मूल खाता है तथा मोक्ष के लिए वहीं भक्ति करता रहता है तथा मृत्यु तक वहीं रहता है।

प्रश्न 6.
जाति व्यवस्था की कोई चार विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  • जाति की सदस्यता जन्म के आधार द्वारा
  • जाति में सामाजिक संबंधों पर प्रतिबंध होते हैं।
  • जाति में खाने-पीने के बारे में प्रतिबंध होते हैं।
  • जाति में अपना कार्य पैतृक आधार पर मिलता है।
  • जाति एक अंतर-वैवाहिक समूह है, विवाह संबंधी बंदिशें हैं।
  • जाति में समाज अलग-अलग हिस्सों में विभाजित होता है।
  • जाति प्रणाली एक निश्चित पदक्रम है।

प्रश्न 7.
जाति चेतनता क्या है?
उत्तर:
जाति व्यवस्था की यह सबसे बड़ी त्रुटि थी कि उसमें कोई भी व्यक्ति अपनी जाति के प्रति ज़्यादा सचेत नहीं होता था और यह कमी हर व्यवस्था में भी पाई जाती थी। क्योंकि इस व्यवस्था में व्यक्ति की स्थिति उसकी जाति के आधार पर निश्चित होती इसलिए व्यक्तिगत तौर पर उतना जागरूक ही नहीं होता।

जब कि उसकी स्थिति एवं पहचान उनके जन्म के अनुसार ही होनी है, तो उसे पता होता था कि उसे कौन-कौन से कार्य और कैसे करने हैं। यदि कोई व्यक्ति उच्च जाति में जन्म ले लेता है तो उसे पता होता था कि उसके क्या कर्तव्य हैं, यदि उसका जन्म निम्न जाति में हो जाता था, तो उसे पता ही होता था कि उसे सारे समाज की सेवा करनी है और इस स्वाभाविक। प्रक्रिया में दखल-अंदाज़ी नहीं करता था और उसी को दैवी कारण मानकर अपना जीवन-यापन करता जाता था।

प्रश्न 8.
जाति सामाजिक एकता में रुकावट है। कैसे?
उत्तर:
इस व्यवस्था से क्योंकि समाज का विभाजन कई भागों में हो जाता है, इसलिए सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस व्यवस्था में हर जाति के अपने नियम एवं प्रतिबंध होते हैं। इस तरह से अपनी जाति के अलावा दूसरी जाति से कोई ज्यादा लगाव नहीं होता, क्यों जो उन्हें पता होता है कि उन्हें नियमों के अनुसार आचरण करना होता है। इस प्रथा में हमेशा उच्च वर्ग, निम्न वर्ग के लोगों का शोषण करते हैं।

इस प्रकार से जाति भेद होने के कारण एक दूसरे के प्रति नफरत की भावना भी उजागर हो जाती है। इस तरह से यह भेदभाव समाज की एकता में बाधक बन जाता है और इस व्यवस्था की यह कमी थी, कोई व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर भी अपनी जाति को बदल नहीं सकता, सामाजिक ढांचे का संतुलन बिगड़ जाता है और यही समाज की उन्नति में बाधक बन जाती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 9.
सांप्रदायिक राजनीति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सांप्रदायिक राजनीति का अर्थ है राजनीति में धर्म का प्रयोग तथा इसमें कहा जाता है कि एक धर्म धर्म से श्रेष्ठ है। इसमें एक धर्म दूसरे धार्मिक समूह से बिल्कुल ही विपरीत होता है तथा उनकी माँगें भी एक-दूसरे से विरुद्ध होती हैं। सांप्रदायिक राजनीति का एक ही आधार होता है कि धर्म के आधार पर समुदायों का निर्माण भी हो सकता है।

यह कहता है कि एक धर्म के लोग एक ही समुदाय से संबंधित होते हैं तथा उनके विचार भी एक जैसे ही होते हैं। यह सांप्रदायिक राजनीति यह भी कहती है कि अलग-अलग धर्मों के अनुयायी एक समुदाय का निर्माण नहीं कर सकते। अपने घटिया दृष्टिकोण से सांप्रदायिक राजनीति यह कहती है कि अलग-अलग धर्मों के लोग एक समान नहीं होते तथा एक विशेष क्षेत्र में मिल-जुल कर नहीं रह सकते।

प्रश्न 10.
‘सांप्रदायिकता का विचार बहुत खतरनाक है।’ टिप्पणी करें।
उत्तर:
सांप्रदायिकता का मूल विचार है कि एक विशेष धर्म का और धर्मों की कीमत पर उत्थान। यह एक विचारधारा है जो यह कहती है कि एक धर्म के सदस्य एक समुदाय के सदस्य हैं तथा अलग-अलग धर्मों के सदस्य एक समुदाय का निर्माण नहीं कर सकते। भारत जैसे देश में, जहां कई धर्म रहते हैं, सांप्रदायिकता बहुत ही ख़तरनाक है। क्योंकि-

  • राजनीतिक नेता अधिक-से-अधिक मत प्राप्त करने के लिए धर्म का प्रयोग करते हैं तथा इससे समाज का धर्म के अनुसार सामाजिक विभाजन हो जाता है।
  • सांप्रदायिकता में, एक धर्म की मांगें दूसरे धर्मों की मांगों से बिल्कुल ही विपरीत होती हैं जिस कारण अलग अलग धर्मों के अनुयायियों में तनाव तथा अविश्वास उत्पन्न हो जाता है।
  • सांप्रदायिकता यह कहती है कि एक विशेष धर्म और धर्मों से श्रेष्ठ है जिस कारण सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

प्रश्न 11.
जाति व्यवस्था के राजनीति में प्रयोग करने की क्या हानियां हैं?
उत्तर:
जाति व्यवस्था उनके लिए काफ़ी लाभदायक है जो इसका प्रयोग राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए करते हैं, परंतु साधारणतया इसकी कई हानियां अथवा नकारात्मक प्रभाव हैं जोकि निम्नलिखित हैं

  • अगर जाति व्यवस्था को राजनीति में प्रयोग किया जाए तो राजनीतिक दल अलग-अलग जातियों में बँट जाएंगे जिससे अलग-अलग जातियों में संघर्ष बढ़ जाता है।
  • राजनीतिक दलों तथा अलग-अलग जातियों में विभाजन से जातीय संघर्ष बढ़ जाता है।
  • अलग-अलग जातियों के नेता एक-दूसरे के विरुद्ध प्रचार करते हैं जिससे अलग-अलग जातियों में तनाव बढ़ जाता है। इससे हमारा ध्यान और महत्त्वपूर्ण मुद्दों जैसे कि निर्धनता, बेरोजगारी, शिक्षा इत्यादि से हट जाता है।

प्रश्न 12.
सांप्रदायिकता के क्या आधार हैं?
उत्तर:
सांप्रदायिकता एक विचारधारा है जो जनता में एक ही धर्म के धार्मिक विचारों को फैलाती है तथा यह विचार और धार्मिक समूहों के विचारों से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं। इसके मुख्य आधार हैं-

  • यह विचारधारा कहती है कि अलग-अलग धर्मों के लोग एक ही समुदाय से संबंधित नहीं होते।
  • यह विचारधारा कहती है कि एक ही धर्म के लोग एक ही समुदाय से संबंधित होते हैं तथा उनके मौलिक हित भी एक जैसे ही होते हैं।
  • यह विचारधारा कहती है कि अलग-अलग धर्मों के लोगों में कोई भी समानता नहीं होती है। उनके हित निश्चित तौर पर अलग-अलग होते हैं।

प्रश्न 13.
जाति व्यवस्था की वर्तमान स्थिति क्या है?
उत्तर:
यह ठीक है कि सरकार और समाज द्वारा जाति प्रथा के प्रभाव को कम करने के लिए बहुत-से कदम उठाए गए, परंतु फिर भी हम इसके प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। लोग अभी भी अपने बच्चों का विवाह अपनी ही जाति में करना पसंद करते हैं। हम अभी भी देश की प्राचीन जाति व्यवस्था का प्रभाव महसूस कर सकते हैं।

अस्पृश्यता अभी भी ख़त्म नहीं हुई है। यह अभी भी चल रही है। निम्न जातियों के लोग अभी भी अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं जिस कारण वह और समाज से पिछड़े हुए हैं। उच्च जातियों के लोगों का अभी भी देश की राजनीति और समाज पर गहरा प्रभाव है। यह ठीक है कि जाति प्रथा का प्रभाव पहले से कम फिर भी हम कह सकते हैं कि देश में जाति प्रथा व्याप्त है।

प्रश्न 14.
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जाति व्यवस्था हानिकारक है। क्यों?
उत्तर:
लोकतांत्रिक व्यवस्था में जात-पात का संकल्प हानिकारक है क्योंकि-

  • असल में यह संकल्प लोकतंत्र के मूल नियमों-स्वतंत्रता, समानता तथा भाईचारे के विरुद्ध है।
  • यह संकल्प वोट बैंक की राजनीति को बढ़ावा देता है तथा इस कारण ही अलग-अलग जातियों के नेताओं ने आर्थिक मुद्दों को पीछे धकेल दिया है।
  • यह संकल्प जाति के हितों को बढ़ावा देता है तथा राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध है।
  • यह संकल्प एक ही जाति के हितों को महत्त्व देता है जिस कारण और जातियों के हितों की अनदेखी हो जाती है।

प्रश्न 15.
भारत में सांप्रदायिकता के अलग-अलग कारणों का वर्णन करें।
अथवा
संप्रदायवाद की समस्या के कारण क्या हैं? बताइये।
अथवा
भारत में सांप्रदायिकता के प्रमुख कारण क्या हैं?
अथवा
भारत में साम्प्रदायिकता के मुख्य कारण कौन-से हैं?
उत्तर:
सांप्रदायिकता और कुछ नहीं बल्कि एक विचारधारा है जो लोगों में एक ही धर्म के धार्मिक विचारों को बढ़ावा देती है तथा यह विचार और धार्मिक समूहों के धार्मिक विचारों से बिल्कुल ही विपरीत होते हैं। इसके मुख्य कारण इस प्रकार हैं-
(i) सबसे पहले ब्रिटिश लोगों ने भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। वह भारत पर राज्य करना चाहते थे जिस कारण उन्होंने भारत में ‘बांटो तथा राज्य करो’ की नीति प्रयोग की। उनकी इस नीति ने भारत में सांप्रदायिकता के बीज बो दिए।

(ii) राजनीतिक दल भी इसके लिए उत्तरदायी है। हरेक राजनीतिक दल अपना वोट बचाना चाहता है। इसलिए ही वह एक विशेष धर्म की भावनाओं को भड़का देते हैं तथा इसका परिणाम देश में सांप्रदायिक दंगों के रूप में सामने आता है।

(iii) हमारे राजनेता भी सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने के लिए उत्तरदायी हैं। वह चुनाव जीतने के लिए अपने धर्म के लोगों की भावनाओं को भड़काते हैं तथा इससे सांप्रदायिकता बढ़ जाती है।

(iv) ब्रिटिश लोगों ने कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए मुसलमानों को बढ़ावा दिया। यहां तक कि मुस्लिम लीग भी बना दी गई। उनकी मुस्लिमों को बढ़ावा देने की नीति ने देश में सांप्रदायिकता के बीज बो दिए।

प्रश्न 16.
‘भारतीय राजनीति से जाति व्यवस्था को अलग नहीं किया जा सकता।’ इस कथन की व्याख्या करें।
उत्तर:
यह ठीक है कि भारतीय राजनीति से जाति व्यवस्था को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि यह भारतीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह कथन ठीक है क्योंकि-
(i) हमारे देश में निम्न जातियों के हितों की रक्षा के लिए बहुत-से राजनीतिक दल आगे आए। इन निम्न जातियों के नेताओं को मंत्री पद भी दिए गए ताकि वे जातियां उन दलों के प्रति वफादार रहें।

(ii) देश में कुछ दबाव समूह ऐसे भी हैं जो विशेष जातियों से संबंधित होते हैं। वे सरकार पर अपनी मांगें मनवाने के लिए दबाव डालते हैं। ये राजनीतिक दलों के टिकटों के वितरण के समय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथा चुनाव के समय तो और भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये अपनी ही जाति के नेता के पक्ष में चुनाव प्रचार भी करते हैं।

(iii) अनुसूचित जातियों को शैक्षिक संस्थाओं तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया है। यहां तक कि राजनीतिक दल भी उन्हें और आरक्षण दिलाने का प्रयास करते हैं ताकि उनकी वफ़ादारी को जीता जा सके।

इस प्रकार इस व्याख्या को देख कर हम कह सकते हैं कि जाति व्यवस्था को भारतीय राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था का एक अभिन्न अंग है।

प्रश्न 17.
स्वतंत्रता के बाद भारत की भाषा नीति पर विचार करें।
उत्तर:
(i) भाषायी राज्यों का गठन-स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन की मांग उठी तथा सरकार ने एक कमीशन की सिफ़ारिशें मंजूर कर ली कि राज्यों का भाषायी आधार पर पुनर्गठन किया जाए। इसलिए ही कई राज्यों का भाषायी आधार पर गठन किया गया जैसे कि आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु इत्यादि। इससे भारतीय राज्यों में एकता बढ़ी है तथा अलग-अलग राज्यों में तनाव की संभावना कम हुई है।

(ii) भाषा से संबंधित नीति-भारत एक बहुभाषायी देश है जहाँ पर लोग बहुत-सी भाषाएँ बोलते हैं। चाहे हिंदी हमारी राष्ट्र भाषा है परंतु फिर भी भारतीय संविधान में 22 भाषाएँ दी गई हैं। हरेक राज्य अपनी भाषा तथा संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए स्वतंत्र है। अगर कोई व्यक्ति केंद्र सरकार की कोई परीक्षा दे रहा है तो वह किसी भी दी गई भाषा में परीक्षा दे सकता है।

राज्यों की अपनी ही भाषा होती है। चाहे 1965 में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग बंद कर दिया गया परंतु राज्यों ने माँग की कि इसे चालू रखा जाए। केंद्र सरकार ने भी ऐसा ही किया। इस प्रकार संघीय सरकार की भाषा से संबंधित नीति ने भारत को जोड़ने में सहायता की तथा यहाँ पर श्रीलंका जैसी स्थिति पैदा होने के अवसर काफ़ी हद तक ख़त्म कर दिए।

प्रश्न 18.
क्षेत्रवाद को कैसे कम किया जा सकता है?
अथवा
क्षेत्रवाद को दूर करने के लिए दो सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • सरकार को हरेक क्षेत्र, हरेक राज्य को समान तथा उस क्षेत्र की मांगों के अनुसार अनुदान तथा सहायता देनी चाहिए ताकि उनमें असंतोष न फैले।
  • किसी विशेष क्षेत्र को और क्षेत्रों के ऊपर अधिक महत्त्व न दिया जाए ताकि और क्षेत्रों के लोगों में हीनता की भावना न आए।
  • देश में शिक्षा की दर बढ़ानी चाहिए तथा उन्हें उच्च शिक्षा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ताकि लोग पढ़-लिख कर क्षेत्रवाद की भावना से ऊपर उठ कर देश के हितों के लिए कार्य करें।
  • देश में अधिक-से-अधिक रोज़गार के साधन उपलब्ध करवाए जाने चाहिए ताकि लोगों का ध्यान इस ओर न जाए।

प्रश्न 19.
प्रदत्त पहचानों तथा सामुदायिक भावना की तीन विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  • लोग प्रदत्त पहचानों तथा सामुदायिक भावना से काफ़ी गहरे रूप से जुड़े होते हैं। यह हमारी दुनिया को सार्थकता प्रदान करते हैं तथा हमें एक पहचान प्रदान करते हैं कि हम कौन हैं।
  • प्रदत्त पहचाने तथा सामुदायिक भावनाएँ सर्वव्यापक होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की एक मातृ-भूमि होती है। एक मातृ-भाषा होती है, उनका एक परिवार होता है तथा निष्ठा भी होती है।
  • हम सभी अपनी अपनी प्रदत्त पहचानों के प्रति समान रूप से प्रतिबद्ध तथा वफादार होते हैं। चाहे हरेक की प्रदत्त पहचानों में कुछ अंतर होता है। परंतु फिर भी प्रतिबद्धता की संभावना लगभग अधिकांश लोगों में पाई जाती हैं।
  • प्रदत्त पहचान संबंधी द्वंद्व या विवाद की स्थिति में परस्पर सम्मत सच्चाई के किसी भाव को स्थापित करना बहुत कठिन होता है।

प्रश्न 20.
भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है। कैसे?
उत्तर:
यह सच है कि भारत एक धर्म-निरपेक्ष राज्य है। संविधान में यह घोषणा की गई है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य होगा। परंतु धर्म, भाषा तथा अन्य कारकों को सार्वजनिक क्षेत्र में पूर्णतया निष्कासित नहीं किया गया है। सच तो यह है कि इन समुदायों को व्यक्त रूप से मान्यता दी गई है। अंतर्राष्ट्रीय मानकों की दृष्टि से अल्पसंख्यक धर्मों को अत्यंत प्रबल संवैधानिक सुरक्षा प्रदान की गई है।

संविधान ने हरेक धर्म को उसकी संस्कृति को बचा कर रखने, उसके प्रचार प्रसार करने की आज्ञा दी है। हरेक व्यक्ति को कोई भी धर्म मानने तथा अपनाने की आज्ञा दी गई है। संविधान में यह भी कहा गया है कि सभी धर्म कानून की दृष्टि में समान हैं तथा किसी भी धर्म के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। सरकार तथा राज्य का कोई धर्म नहीं होगा। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है।

प्रश्न 21.
सिक्खों में सुधार आंदोलन कैसे तथा कब चले?
उत्तर:
सिक्ख धर्म की स्थापना गुरु नानक देव जी ने की थी। 19वीं शताब्दी आते-आते सिक्ख धर्म में काफ़ी बुराइयां आ चुकी थीं। गुरुद्वारों पर महंतों का कब्जा था तथा उन्होंने गुरुद्वारों को अपनी अय्याशी का अड्डा बनाया हुआ था। इन महंतों के ऊपर अंग्रेज़ों का हाथ था। सबसे पहले 1880 के दशक में सिंह सभा की स्थापना हुई तथा इन की स्थापना कई जगहों पर हुई। इन का मुख्य उद्देश्य सिक्खों को ईसाई बनने से रोकना, सिक्खों को अपने धर्म पर टिके रहना तथा सिक्ख धर्म का प्रचार करना था।

इसके बाद 1920 वाले दशक में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी की स्थापना हुई ताकि गुरुद्वारों को महंतों के चंगुल से छुड़ाया जा सके। बहुत संघर्ष के बाद इनको सफलता मिल गई। उसके बाद यह कमेटी सिक्खों में सुधार तथा धर्म प्रचार का कार्य करती आयी है।

प्रश्न 22.
सिक्ख धर्म की विशेषताएं बताओ।
उत्तर:
सिक्ख शब्द का अर्थ है शिष्य या चेला। इसका मतलब है कि जो भी कोई सिक्ख बनेगा वह अपने गुरु की आज्ञा तथा सीख का पालन करेगा। इस तरह सिक्खों में दस गुरुओं से सिक्ख धर्म का विकास हुआ। इनका पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब है जिनमें गुरुओं की बाणी दर्ज है। सिक्ख धर्म के अनुसार ईश्वर एक है तथा उसी में आस्था रखनी चाहिए, सारे लोग ईश्वर की नज़र में समान हैं इसलिए हमें ऊँच-नीच की भावना को त्याग देना चाहिए। हमें मानव तथा मानवता से प्रेम करना चाहिए, अगर गुरु या ईश्वर को पाना है तो हमें भक्ति का मार्ग अपनाना चाहिए तथा सांसारिक जीवन में रहते हुए ही भक्ति भी करनी चाहिए।

प्रश्न 23.
मुसलमानों में सुधार आंदोलन किस ने तथा कब चलाया?
उत्तर:
मुसलमानों में सुधार आंदोलन चलाने वाले व्यक्ति का नाम था सर सैय्यद अहमद खान। उन्होंने 1857 में बाद देखा कि किस तरह अंग्रेज़ मुसलमानों को दबा रहे हैं। उन्होंने मुसलमानों से अंग्रेजों का वफ़ादार बनने की अपील की ताकि अंग्रेज़ मुसलमानों को ऊपर उठाने के कार्य कर सकें। वह मुसलमानों को एक मंच पर लाए तथा उन्होंने मुसलमानों को अंग्रेजों के विरुद्ध न जाने के लिए कहा। उन्होंने कई स्कूल कॉलेज खोले जिनमें अलीगढ़ कॉलेज सबसे प्रसिद्ध हुआ।

उन्होंने औरतों की शिक्षा पर जोर दिया। उन्होंने पर्दा प्रथा तथा तीन बार कहने पर तलाक हो जाने का विरोध किया ताकि मुस्लिम महिलाओं को ऊपर उठाया जा सके। उन्होंने कई अनाथ आश्रमों की स्थापना भी की। इसके अलावा अहमदिया आंदोलन भी चला जिसने इस्लाम धर्म में सुधार करने का बीड़ा उठाया। खान अब्दुल गफ्फार खान ने भी N.W.F.P. में मुसलमानों के उद्धार के लिए काफ़ी काम किया।

प्रश्न 24.
देश में एकता कायम रखने में अल्पसंख्यक क्या भूमिका निभा सकते हैं?
उत्तर:

  • अल्पसंख्यक को पढ़ना-लिखना चाहिए ताकि वे अपने आपको धर्म-जाति जैसी चीजों से ऊपर उठा सकें।
  • हिंदू तथा मुसलमानों में लगातार मेल-जोल बढ़ते रहना चाहिए ताकि सांप्रदायिक दंगे न हो।
  • मुसलमानों को ज्यादा शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ताकि वे आर्थिक तौर पर सुदृढ़ हो सकें तथा दंगों के बारे में न सोचें।
  • सरकार को अल्पसंख्यकों को हर प्रकार की सुरक्षा देनी चाहिए ताकि वे अपने आपको सुरक्षित महसूस करके देश की एकता के लिए काम करें।

प्रश्न 25.
अल्पसंख्यकों को किस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर:

  • यूं तो हमारे देश में धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं है पर फिर भी अल्पसंख्यक यह महसूस करते हैं कि उनके साथ धर्म के आधार पर भेदभाव होता है जिस वजह से वह हमेशा असुरक्षा की भावना में जीते हैं।
  • अल्पसंख्यकों में शिक्षा का बहुत ज्यादा अभाव है। भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समूह मुसलमानों में साक्षरता दर सबसे कम है। शिक्षा न होना कई और समस्याओं जैसे बेरोज़गारी, गरीबी इत्यादि को जन्म देती है।
  • सांस्कृतिक पृथक्कता की वजह से अल्पसंख्यक समूह अपने आपको और समूहों से अलग रखने का प्रयास करते हैं जिस वजह से वह मुख्य धारा से दूर हो जाते हैं।
  • आर्थिक तौर पर भी अल्पसंख्यक गरीब हैं क्योंकि साक्षरता दर कम होने की वजह से उनको अच्छा काम जिसमें ज्यादा पैसा ही मिल नहीं पाता तथा वह गरीब रह जाते हैं।

प्रश्न 26.
अल्पसंख्यक आयोग के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1978 में अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई थी। इसका एक अध्यक्ष तथा एक सदस्य होता है जोकि अल्पसंख्यक समूह से ही होता है। आयोग अल्पसंख्यकों की शिकायतों को सुनता है, अल्पसंख्यकों की स्थिति का समय-समय पर मूल्यांकन करता है। उनमें सदस्यों के कल्याण के लिए सरकार के सामने सुझाव पेश करता है। भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए भी एक भिन्न आयोग होता है। 1993 में अल्पसंख्यक आयोग की जगह राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की गई थी।

प्रश्न 27.
सूचना के अधिकार में नागरिकों को क्या अधिकार दिए हैं?
उत्तर:
सूचना के अधिकार में नागरिकों को अधिकार हैं-

  • किसी भी सूचना के लिए अनुरोध करने
  • दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ लेने
  • दस्तावेज़ों, कार्यों और अभिलेखों का निरीक्षण करने
  • कार्य की सामग्रियों के प्रमाणित नमूने लेने का अधिकार है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन भारत में एकता के कौन-कौन से तत्त्व थे?
उत्तर:
भारत का समाज बहुत प्राचीन है। इतिहासकारों के अनुसार यह 3000 ईसा पूर्व से शुरू होकर 700 ई० तक चला। इस तरह यह लगभग 3700 साल तक चला तथा इन सैंकड़ों सालों के दौरान भारतीय संस्कृति ने बहुत तरक्की की। इसी समय के दौरान भारतीय समाज की मूल परंपराएं विकसित हुईं। इसी समय भारतीय सामाजिक संगठन के आधारों तथा परंपराओं का भी विकास हुआ। वर्ण व्यवस्था, आश्रम व्यवस्था, जाति व्यवस्था इत्यादि आधारशिलाएं इसी समय दौरान पैदा हुईं तथा धर्म, कर्म, पुरुषार्थ, पुनर्जन्म इत्यादि विचारधाराएं भी इस समय आगे आईं।

चाहे प्राचीन काल के आधारों और विचारधाराओं तथा आज के आधारों तथा विचारधाराओं में काफ़ी परिवर्तन आ चुके हैं पर फिर भी भारतीय समाज में किसी-न-किसी तरह इन संस्थाओं का महत्त्व देखने को मिल जाता है। इनकी वजह से ही कई प्रकार की विभिन्नताओं के होते हुए भी भारत में एकता नज़र आती है। इस तरह प्राचीन भारत में एकता के निम्नलिखित तत्त्व थे-
1. ग्रामीण समाज-प्राचीन भारत ग्रामीण समाज पर आधारित था। जीवन पद्धति ग्रामीण हुआ करती थी। लोगों का मुख्य कार्य कृषि हुआ करता था। काफ़ी ज्यादा लोग कृषि या कृषि से संबंधित कार्यों में लगे रहते थे। जजमानी व्यवस्था प्रचलित थी। धोबी, चर्मकार, लोहार इत्यादि लोग सेवा देने का काम करते थे। इनको सेवक कहते थे। बड़े बड़े ज़मींदार सेवा के बदले पैसा या फसल में से हिस्सा दे देते थे। यह जजमानी व्यवस्था पीढ़ी दर पीढ़ी चलती थी। इस सबसे ग्रामीण समाज में एकता बनी रहती थी। नगरों में बनियों का ज्यादा महत्त्व था पर साथ ही साथ ब्राह्मणों इत्यादि का भी काफ़ी महत्त्व हुआ करता था। यह सभी एक-दूसरे से जुड़े हुआ करते थे जिससे समाज में एकता रहती थी।

2. संस्थाएं-समाज की कई संस्थाओं में गतिशीलता देखने को मिल जाती थी। परंपरागत सांस्कृतिक संस्थाओं में से नियुक्तियाँ होती थीं। शिक्षा के विद्यापीठ हुआ करते थे और बहुत सारी संस्थाएं हुआ करती थीं जो कि भारत में एकता का आधार हुआ करती थीं। ये संस्थाएं भारत में एकता का कारण बनती थीं।

3. भाषा-सभी भाषाओं की जननी ब्रह्म लिपि रहती है। हमारे सारे पुराने धार्मिक ग्रंथ जैसा कि वेद, पुराण इत्यादि सभी संस्कृत भाषा में लिखे हुए हैं। संस्कृत भाषा को पूरे भारत में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इस को देववाणी भी कहते हैं क्योंकि यह कहा जाता है कि देवता की भी यही भाषा है।

4. आश्रम व्यवस्था- भारतीय समाज में एकता का सबसे बड़ा आधार हमारी संस्थाएं जैसे आश्रम व्यवस्था रही है। हमारे जीवन के लिए चार आश्रमों की व्यवस्था की गई है जैसे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास। व्यक्ति को इन्हीं चार आश्रमों के अनुसार जीवन व्यतीत करना होता था तथा इनके नियम भी धार्मिक ग्रंथों में मिलते थे। यह आश्रम व्यवस्था पूरे भारत में प्रचलित थी क्योंकि हर व्यक्ति का अंतिम लक्ष्य है मोक्ष प्राप्त करना जिसके लिए सभी इसका पालन करते थे। इस तरह यह व्यवस्था भी प्राचीन भारत में एकता का आधार हुआ करती थी।

5. पुरुषार्थ-जीवन के चार प्रमुख लक्ष्य होते हैं जिन्हें पुरुषार्थ कहते हैं। यह है धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष। शुरू में सिर्फ ब्राह्मण हुआ करते थे। पर धीरे-धीरे और वर्ण जैसे क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र सभी का अंतिम लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति या मोक्ष प्राप्त करना होता था तथा सभी को इन पुरुषार्थों के अनुसार अपना जीवन व्यतीत करना होता था। धर्म का योग अपनाते हुए, अर्थ कमाते हुए, समाज को बढ़ाते हुए मोक्ष को प्राप्त करना ही व्यक्ति का लक्ष्य है। सभी इन की पालना करते थे। इस तरह यह भी एकता का एक तत्त्व था।

6. कर्मफल-कर्मफल का अर्थ होता है काम। कर्म का भारतीय संस्कृति में काफ़ी महत्त्व है। व्यक्ति का अगला जन्म उसके पिछले जन्म में किए गए कर्मों पर निर्भर है। अगर अच्छे कर्म किए हैं तो जन्म अच्छी जगह पर होगा नहीं तो बुरी जगह पर। यह भी हो सकता है कि अच्छे कर्मों की वजह से आपको जीवन मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाए। इसी को कर्म फल कहते हैं। यह भी प्राचीन भारतीय समाज में एकता का एक तत्त्व था।

7. तीर्थ स्थान-प्राचीन भारत में तीर्थ स्थान भी एकता का एक कारण हुआ करते थे। चाहे ब्राह्मण हो या क्षत्रिय या वैश्य सभी हिंदुओं के तीर्थ स्थान एक हुआ करते थे। सभी को एकता के सूत्र में बाँधने में तीर्थ स्थानों का काफ़ी महत्त्व हुआ करता था। मेलों, उत्सवों, पर्वो पर सभी इकट्ठे हुआ करते थे। तीर्थ स्थानों पर विभिन्न जातियों के लोग आया करते थे, संस्कृति का आदान-प्रदान हुआ करता था।

इस तरह वह एकता के सूत्र में बँध जाते थे। काशी, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, रामेश्वरम्, वाराणसी, प्रयाग, चारों धाम प्रमुख तीर्थ स्थान हुआ करते थे। इस तरह इन सभी कारणों को देख कर हम कह सकते हैं कि प्राचीन भारत में काफ़ी एकता हुआ करती थी तथा उस एकता के बहुत-से कारण हुआ करते थे जिनका वर्णन ऊपर किया गया है।

प्रश्न 2.
भारतीय समाज में विभिन्नता में एकता का वर्णन करो।
उत्तर:
भारत की सांस्कृतिक धरोहर इसके बहुजातीय, बहुधर्मी और बहुप्रजातीय समूहों की देन है। इस देश में जहाँ पर सोलह सौ से ज्यादा मातृभाषाएं अथवा बोलियां हैं और तीन हजार से ज्यादा जातियों में समाज का विभाजन हुआ है। उनके विश्वास, मान्यताएं, आदर्श और मूल्यों में काफ़ी भिन्नताएं हैं। इन भिन्नताओं के बाद भी इस देश में एकता दिखाई देती है। इन विविधताओं के बाद भी यह देश एकता के सूत्र में बंधा है इसके विभिन्न कारण हैं, उन्हें हम निम्न आधार पर देखेंगे-
1. भौगोलिक कारक (Geographical Factors)-भौगोलिक दृष्टि से भारत एक भिन्नताओं एवं विविधताओं का देश है। देश के उत्तर में विश्व की सबसे ऊँची पर्वत श्रेणी हिमालय है। सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र भारत में बहुत बड़े मैदानी क्षेत्र का निर्माण करते हैं। भारत में विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्र जैसे-गारो, खासी, मेघालय, पालमपुर आदि पाए जाते हैं तथा बहुत शुष्क मरुस्थल जैसे-थार भी पाए जाते हैं। यहाँ बहुत-से उपजाऊ क्षेत्रों के होने के साथ-साथ बंजर क्षेत्र भी हैं। पूरे वर्ष बर्फ से ढके क्षेत्र, शुष्क, मरुस्थलीय क्षेत्र भी पाए जाते हैं। कई बहुत घनी जनसंख्या क्षेत्र जैसे-उत्तर प्रदेश और कई निम्न घनत्व वाले क्षेत्र जैसे-सिक्किम भारत में हैं।

2. सामाजिक कारक (Social Factors)-सामाजिक भिन्नताओं में समाज की मूलभूत संस्था विवाह के भिन्न भिन्न स्वरूप देखने को मिलते हैं। कई जातियों में भ्रातृक बहुपति विवाह तो मुसलमानों में बहुपत्नी विवाह की प्रथा पाई जाती है। संयुक्त परिवार तथा एकाकी परिवार भी सामाजिक विविधता को दर्शाते हैं। कुछ ऐसे समूह हैं जिनके सदस्यों में ‘हम की भावना’ पाई जाती है जैसे परिवार, नातेदारी, पड़ोस आदि और कई ऐसे भी समूह हैं जिनकी सदस्यता सैंकड़ों, लाखों में है।

जैसे नगरीय समुदाय, राजनीतिक दल, औद्योगिक केंद्र। शहरी समुदायों में वर्षों पड़ोस में रहने के बावजूद एक दूसरे को नहीं पहचानते जबकि गांवों में पड़ोसी से संबंधित प्रत्येक पहलू का ध्यान एवं ज्ञान होता है। भारतीय समाज जातीय आधार पर भी हज़ारों समूहों में बंटा है परंतु इन विविधताओं के बावजूद भी समाज में विभिन्न आधारों पर एकता पाई जाती है।

भारत में विवाह एवं संयुक्त परिवार मुख्य परिवार व्यवस्थाएँ हैं। लेकिन अधिकांश स्थानांतरित व्यक्ति अपने परिवार व अन्य सदस्यों से त्यौहारों, उत्सवों पर मिलते हैं। राष्ट्रीय पर्यों तथा सामाजिक पर्यों को देश भर में मनाया जाना अपने आप में एकता का प्रतीक है।

3. धार्मिक कारक (Religious Factors)-भारत में हिंदू, बौद्ध, जैन, सिक्ख, मुस्लिम धर्म के लोग वैदिक एवं महाकाव्य काल से ही रह रहे हैं। फिर मुग़लों के पतन के पश्चात् अंग्रेजों के भारत आगमन के कारण इसाई धर्म भी भारतीय समाज का अभिन्न अंग बन गया। हिंदू तीन हजार से अधिक जातियों, मुसलमान 94 जातियों में बँटे हैं। इसी तरह इसाइयों में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक, बौद्ध धर्म में हीनयान एवं महायान, जैनों में पीतांबर एवं श्वेतांबर संप्रदाय हैं।

परंतु विभिन्न धार्मिक समूहों में कई बार दंगे भी भड़क उठते हैं। जैसे-27 फरवरी, 2002 में गुजरात में ‘गोधरा कांड’ देश की धार्मिक विविधता के अकार्य हैं। इन सबके बावजूद भी भारत की धार्मिक विविधता में भी आंतरिक एकता पाई जाती है। कहने को तो हिंदू, बौद्ध, जैन एवं सिक्ख चार अलग-अलग धर्म हैं परंतु यह सभी धर्म हिंदू धर्म से ही निकले हैं।

भारतीय मुसलमानों का भी काफ़ी भारतीयकरण हुआ है। भारत में इसाइयों की संख्या भले ही अधिक लगती हो परंतु इसाई मिशनरियों ने भारी संख्या में हिंदुओं को ईसाई बनाया है परंतु धर्म परिवर्तन से उनके विश्वासों एवं मूल्य-आदर्शों में परिवर्तन नहीं हुआ है। होली, दिवाली, दशहरा, ईद, गुरुपर्व, क्रिसमिस, गुडफ्राई-डे सभी भारतीय हर्षोल्लास से मनाते हैं।

4. जातीय कारक (Caste Factors)-प्रायः सभी धर्मों के अनुयायी अनेक जातियों एवं उपजातियों में बँटे हुए हैं। वैदिक काल से प्रारंभ हए कर्म एवं गण के आधार पर चार वर्ण अंतःवर्ण (Intra-Varna) से हजारों जातियों में परिवर्तित हो गए। अहीर जाति में 1700 तथा ब्राह्मणों की 639 की उपजातियां थीं। वर्तमान समय में 3000 जातियां पाई जाती हैं। केवल हिंदुओं में ही नहीं बल्कि मुसलमानों में भी 94 जातियाँ पाई जाती हैं।

बौद्धों में हीनयान-महायान, जैनों में श्वेतांबर-पीतांबर, ईसाइयों में प्रोटेस्टैंट तथा कैथोलिक संप्रदाय भी हिंदुओं की जातियों की तरह ही विभाजित हैं। प्रत्येक जाति के अपने-अपने विश्वास, मान्यताएं एवं महापुरुष रहे हैं। स्वतंत्रोपरांत सरकार द्वारा जातीय समूह को चार श्रेणियों में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गों तथा सामान्य (general) श्रेणी में वर्गीकृत कर दिया गया है।

पिछड़े वर्ग एवं जातियों के विभिन्न संस्थाओं में आरक्षण के कारण जातीय स्तरीकरण काफ़ी कम हुआ है। विभिन्न जातियों के सदस्यों द्वारा बसों-गाड़ियों में एक साथ सफर करने, शैक्षणिक संस्थाओं में इकट्ठे शिक्षा ग्रहण करने एवं सरकारी कार्यालयों तथा औदयोगिक केंद्रों में इकट्ठे काम करने से जातीय बंधनों में शिथिलता आई है।

5. जनजातीय कारक (Tribal Factor)-देश के पहाड़ों, जंगलों तथा दुर्गम क्षेत्रों में सैंकड़ों जनजातीय समूह निवास करते हैं। भारतीय संविधान में ही 560 जनजातियों का उल्लेख किया गया है जोकि देश में जनजातीय विविधता का परिचायक है। जैसे-गौंड, भील, मुंडा, नागा आदि। जनजाति अपनी पहचान बनाने हेतु आंदोलन का सहारा भी लेती हैं।

नवंबर, 2000 में झारखंड, छत्तीसगढ़, उत्तरांचल तथा स्वतंत्रता के बाद में मिज़ोरम, नागालैंड, मेघालय आदि प्रदेशों का निर्माण जनजातीय संघर्ष एवं आंदोलनों का प्रतिफल है। जनजातीय विविधता के कारण खतरा तब पैदा होता है जब वह अलग होने के लिए आंदोलन का रास्ता अपनाती हैं।

तीय विविधता में भी एकता का निवास है। लगभग 90% जनजातीय सदस्यों का हिंदकरण हो गया है। ये लोग हिंदू देवी-देवताओं की आराधना करते हैं। इतनी बड़ी आबादी द्वारा जनजातियों द्वारा हिंदू धर्म के विश्वासों तथा अनुष्ठानों का अनुकरण करना जनजातीय विभिन्नता में एकता को दर्शाता है।

6. भाषायी कारक (Linguistic Factors)-भारत एक बहुभाषी समाज है और भारतीय संविधान में 14 भाषाओं को मान्यता प्रदान की है। कुछ सालों पश्चात् सिंधी, नेपाली, कोंकणी और मणिपुरी को संविधान में संम्मिलित कर लिया गया। हिंदी को राष्ट्रीय या राजकीय भाषा, अंग्रेज़ी को संपर्क भाषा के रूप में मान्यता मिली। भाषा के आधार पर भारतीय समाज कितना विभाजित है इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि सन् 1953 में तमिलनाडु से अलग कर तेलगू भाषी आंध्र प्रदेश की स्थापना की गई थी।

दक्षिण भारत के लोग हिंदी भाषा को अपनाने के समर्थ में नहीं हैं। परंतु इतनी विविधता के बावजूद भाषाई एकता पाई जाती है। देश के अधिकांश लोग हिंदी बोलते, पढ़ते, लिखते व समझते हैं। दक्षिण भारत में मुख्यतः द्रविड़ भाषाओं (तमिल, तेलुगू, कन्नड़, मलयालम) और उत्तरी व पश्चिमी भारत में इंडो आर्यन भाषाओं का प्रयोग होता है। भारत में शिक्षा प्रचार प्रसार के कारण ही यह संभव हुआ है कि देश के सभी लोग हिंदी या अंग्रेजी में आपस में विचार-विमर्श कर सकते हैं।

7. सजातीय कारक (Ethnic Factors)-भारतीय समाज को यदि प्रजातियों का अजायबघर कहा जाए तो यह गलत नहीं होगा। भारतीय समाज बहुजनीय (Polygenetico) है। यह कई प्रजातियों का मिश्रण है। भारत में मुख्य तौर पर छः प्रजातियों-प्रोटो ऑस्ट्रेलायड, द्रविड़ (मैडिट्रेनियन), नीग्रिटो, मंगोलायड, नौर्डिक आर्य तथा ब्राची सेफाल के लक्षण पाए जाते हैं परंतु श्वेत एवं अश्वेतों के बीच अफ्रीका एवं अमेरिका आदि देशों की तरह भारतीय प्रजातियों में संघर्ष नहीं पाए जाते हैं। वास्तव में विभिन्न प्रजातियों के सदस्य अंतः प्रजातीय विवाह तथा सांस्कृतिक रूप से इस प्रकार घुल-मिल गए हैं कि उनकी पूर्णतः अलग प्रजाति के रूप में पहचान करना कठिन है।

8. सांस्कृतिक कारक (Cultural Factors)-लोकरीतियों, प्रथाओं, आदर्शों, मूल्यों, नियमों, विश्वासों, भाषाओं तथा साहित्य आदि सभी में सांस्कृतिक आधार पर काफ़ी भिन्नताएं पाई जाती हैं। विभिन्न नृत्यों जैसे हिमाचल में नाटी, पंजाब में भांगड़ा एवं गिद्दा, तमिलनाडु में भरतनाट्यम, कर्नाटक में कत्थक आदि में भी विविधता पाई जाती है।

विभिन्न धर्मों में, मेलों में, त्योहारों में, उत्सवों को मनाने के आधार पर भी भारत में विभिन्नताएँ पाई जाती हैं। दक्षिण भारत में पोंगल, गणेश चतुर्थी आदि और उत्तर भारत में दीवाली, लोहड़ी, भूमर आदि बड़े धूमधाम से मनाए जाते हैं। इसी प्रकार वेशभूषा के आधार पर दक्षिण भारत में लुंगी, राजस्थान में धोती-कुर्ता व सिर पर साफा, पंजाब में सलवार-कुर्ता आदि पहनने का प्रचलन है।

इस प्रकार भारतीय संस्कृति बहुरंगी माला की तरह है। वास्तव में भारतीय समाज में विदेशियों के (अंग्रेज़ों) आगमन पर अपने सांस्कृतिक तत्त्वों का भारतीयकरण करके अपनाया। लेकिन सहिष्णुता, शिष्टाचार, भारतीयता में आस्था एवं विश्वास ऐसे सांस्कृतिक तत्त्व हैं जो पूरे देश में साझे रूप में देखने को मिलते हैं। हमारे वेद, पुराण, ग्रंथ, उपनिषद् आदि भी पूरे देश को एक सूत्र में पिरोते हैं।

9. कलाएँ, साहित्य एवं शिक्षा (Arts, Literature and Eduction)-भारतीय समाज में कलाओं के आधार पर नृत्य, संगीत, मूर्तिकला, चित्रकला आदि में काफ़ी भिन्नताएँ पाई जाती हैं। नृत्यों में कथकली, गिद्दा, भांगड़ा, गरबा, कुची पुड़ी इत्यादि नाम उल्लेखनीय हैं। अलग-अलग भाषाओं में लोकगीत, कीर्तन, भजन, गज़ल, टप्पा आदि विभिन्नता दर्शाते हैं। संस्कृत, अंग्रेज़ी, उर्दू, हिंदी, बंगाली, मराठी आदि उदाहरण साहित्यिक क्षेत्र में विविधता दर्शाते हैं।

साक्षरता के आधार पर या शैक्षणिक आधार पर प्रकांड पंडित, प्राध्यापक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि व्यावसायिक तथा दूसरी तरफ निरक्षर, अज्ञानी लोग शैक्षणिक विविधता दर्शाते हैं। इन विविधताओं के बावजूद कलाओं, साहित्य एवं शिक्षाओं में एकता झलकती है। कालिदास का संस्कृत में, टैगोर का बंगाली में, राधाकृष्णन का अंग्रेज़ी में साहित्य भारतवासियों के लिए उत्तम उदाहरण हैं।

10. भावनात्मक कारक (Emotional Factors)-भावनात्मक विविधता में लोगों की निष्ठा जातीय, धार्मिक, भाषायी, क्षेत्रीय तथा सामुदायिक आदि आधारों पर बँटी हुई है। भारतीय व्यक्ति अपने आप को भारतीय कहने की अपेक्षा, बंगाली, मराठी, पंजाबी, हिमाचली, राजपूत, पारसी, ब्राह्मण आदि कहने में ज्यादा गौरव महसूस करता है। वह स्वयं को सबसे पहले जाति, धर्म, क्षेत्र आदि से संबंधित मानता है और इसके उपरांत ही भारत का नागरिक समझता है।

भारत दो सौ सालों के उपरांत गुलामी की जंजीरें तोड़कर आज़ाद हुआ और स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती मना पाया क्योंकि देशवासियों में भावनात्मक एकता पाई जाती रही है। विशेष परिस्थितियों में जैसे युद्ध के समय, खेल अवसरों पर, प्राकृतिक त्रासदियों (जैसे सुनामी) के समय भारतीयों में देशभक्ति, देशप्रेम, आत्म-समर्पण, बलिदान, त्याग, राष्ट्रवादिता तथा भारतीयता की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। कारगिल संघर्ष के दौरान भारतीयों में अभूतपूर्व भावनात्मक एकता देखने को मिली जब देशवासियों ने तन-मन-धन से अपने देश के हितों की रक्षा, एकता व अखंडता के लिए सेवा व समर्पण भाव दिखाया। क्रिकेट जैसे खेलों में भी समाज में भावनात्मक एकता दृष्टिगोचर होती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 3.
भारत में धार्मिक विविधता के कौन-से कारक हैं?
उत्तर:
धर्म में विविधता दो प्रकार की है-

  • आंतर धार्मिक विविधता (Intra-religious diversity)
  • अंतः धार्मिक विविधता (Inter-religious diversity)

1. आंतर धार्मिक विविधता (Intra-religious Diversity)-भारत के विभिन्न धर्मों (हिंदू, इस्लाम, ईसाई, सिक्ख, जैन, बौदध) में अनेकता के अनेक कारक विदयमान हैं। हिंदू धर्म में आर्य समाज, ब्रहम समाज, शैव, शाक्त, वैष्णव, वाम पंथी, कृष्ण भक्त, हनुमान भक्त, पेड़-पौधों की, पशुओं आदि की पूजा करने वाले लोग हैं। जातीय संस्तरण में ब्राह्मण सबसे उच्च स्थान पर थे। हिंदू धर्म में उच्च जातियों के लोगों को पवित्र और निम्न जातियों के लोगों को निम्न और अपवित्र माना जाता था।

निम्न जातियों को पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ आदि करने पर रोक है। कई वेदों, उपनिषदों, मनुस्मृति में उल्लेख है किं ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण, क्षत्रिय भुजाओं से, वैश्य टांगों से तथा निम्न जातियां पैरों से पैदा हुए थे जिसके कारण जातीय आधार पर अस्पृश्यता पाई जाती थी। इस्लाम धर्म में शिया और सुन्नी, इसाई धर्म में प्रोटेस्टेंट एवं कैथोलिक संप्रदाय पाए जाते हैं। इसी प्रकार सिक्ख धर्म में नामधारी, अकाली, निरंकारी, सेवापंथी आदि संप्रदाय पाए जाते हैं। बौद्ध धर्म में हीनयान तथा महायान और जैनों में श्वेतांबर तथा पीतांबर प्रमुख संप्रदाय हैं।

2. अंतःधार्मिक भिन्नता (Inter-Religious Diversity) भारतीय समाज में हिंदू, मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन तथा पारसी आदि प्रमुख धर्मों के अनुयायी पाए जाते हैं। इन धर्मों में विविधता एवं अनेकता अग्रलिखित आधारों पर पाई जाती है-
(i) अलग भगवान् (Different Gods)-प्रत्येक धर्म के अपने-अपने इष्ट देवता हैं जैसे हिंदुओं मे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, शक्ति, कृष्ण, राम आदि, मुसलमानों में हज़रत मुहम्मद, ईसाइयों में ईसा मसीह, सिक्खों के गुरु नान लेकर गुरु गोबिंद तक दस गुरु, बौदधों के महात्मा बुद्ध; जैनों के चौबीस तीर्थंकर-प्रथम ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें वर्धमान महावीर तथा पारसियों जरथस्त्र ईश्वर, भगवान एवं धार्मिक गुरु माने जाते हैं।

(ii) धार्मिक ग्रंथ (Religious Books)-धार्मिक पुस्तकों में हिंदुओं में वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भगवत गीता आदि धार्मिक पुस्तकें हैं। इसी प्रकार ईसाइयों में बाइबल, मुस्लिमों में कुरान, सिक्खों में गुरु ग्रंथ साहिब तथा पारसियों में अवेस्तां पवित्र धार्मिक पुस्तकें हैं।

(iii) एकैश्वरवाद तथा बहुदेववाद (Monotheism and Polythesism)-ईश्वरों की संख्या पर आधारित हिंदुओं में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, राम, कृष्ण, नरसिंह, शक्ति आदि विभिन्न भगवान् के रूपों की पूजा की जाती है। सिक्खों में दस गुरु, मुस्लिमों में अल्ला आदि। लेकिन सिक्ख, ईसाई, मुसलमान तथा पारसी एक ईश्वर में विश्वास रखते हैं। बौद्ध धर्म के लोग ईश्वर के अस्तित्व संबंधी कोई टिप्पणी नहीं करते जबकि जैन धर्म के अनुयायी ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते।

(iv) मूर्ति-पूजा (Idol Worship)-मूर्ति-पूजा के आधार पर हिंदू अपने सभी देवताओं की परिकल्पना एक निश्चित आकार की मूर्ति के रूप में करते हैं, परंतु ईसाई एवं मुसलमान मूर्ति-पूजा का कड़ा विरोध करते हैं।

(v) धार्मिक विश्वासों में विविधता (Diversity in Religious Beliefs)-विश्वासों के आधार पर हिंदू पुनर्जन्म, आत्मा की अनश्वरता, पाप-पुण्य तथा धार्मिक अनुष्ठानों में विश्वास रखते हैं। परंतु मुस्लिम पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते। ईसाइयों का मानना है कि ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र एवं दूत हैं। इसी प्रकार सिक्ख कर्मकांडों का विरोध करते हैं। गुरु नानक देव जी ने हिंदुओं के अनुष्ठानों का कड़ा विरोध किया है। बौद्ध पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं परंतु जैन धर्म के अनुयायी इस बात में विश्वास नहीं करते कि ईश्वर है। उनके अनुसार शरीर को कठोर कष्ट दिया जाना चाहिए।

(vi) पारस्परिक विरोधी (Mutually Opposing) भारतीय धर्मों के अनेक तत्त्व अन्य धर्मों का विरोध करते हैं या फिर अन्य धार्मिक मान्यताओं से विपरीत हैं। हिंदू धार्मिक मान्यतानुसार ब्राह्मण सभी जातियों में सर्वोच्च हैं। हिंदू पशु-पक्षियों की पूजा करते हैं, चढ़ते सूर्य को जल चढ़ाते हैं, मूर्तिपूजा करते हैं और पुनर्जन्म में भी विश्वास रखते हैं। मुसलमान व ईसाई मूर्ति पूजा के विरुद्ध हैं। बौद्ध, सिख एवं जैन ब्राह्मणों की सर्वोच्च स्थिति के कट्टर विरोधी हैं तथा हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों एवं कर्मकांडों का विरोध करते हैं।

इन सबसे सिद्ध होता है कि धार्मिक विश्वासों में भिन्नता, अनेकता एवं पारस्परिक धार्मिक विरोधाभास पाए जाते हैं। कई बातों में एक धर्म विश्वास करता है तो दूसरा अविश्वास।

प्रश्न 4.
भारत में धार्मिक एकता के कारण बताओ।
उत्तर:
भारत में पाए जाने वाले विभिन्न धर्मों में आंतरिक एकता पाई जाती है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. एक हिंदू धर्म में आंतरिक एकता (Internal Unity in Hinduism) यद्यपि हिंदू धर्म के लोग विभिन्न देवी-देवताओं, असंख्य समाजों को, विभिन्न संप्रदायों में, विश्वासों में बँटे हुए हैं तथापि हिंदू धर्म में आंतरिक एकता पाई जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, त्रिदेव के रूप हैं, विष्णु अवतार-राम, कृष्ण, नरसिंह, वाराह आदि एक ही रूप हैं और एक ही ईश्वर है।

वास्तव में हिंदू धर्म बहुत व्यापक धर्म है और वृहद् अवधारणा हैं। यह केवल पवित्र वस्तुओं में, अनुष्ठानों में विश्वास करने तक ही सीमित नहीं है। इसमें समाज द्वारा मान्यता प्राप्त मूल्यों एवं आदर्शों की अनुपालना भी शामिल है जैसे बड़ों का आदर करना, छोटों को प्यार करना, ज़रूरतमंदों की सहायता करना आदि। अतः हिंदू धर्म में विविधताओं में एकता की अनूठी व्यवस्था है।

2. भारतीय मूल के धर्मों में एकता (Unity among Religions of Indian Origin)-हिंदू, बौद्ध, जैन तथा सिक्ख धर्मों में ऐतिहासिक कारणों तथा व्यावहारिक कारणों से एकता के अनेक तत्त्व विद्यमान हैं। बौद्ध धर्म के संस्थापक महात्मा बुद्ध स्वयं एक हिंदू क्षत्रिय थे। जैन धर्म के तीर्थंकर (चौबीसवें) महावीर जैन भी क्षत्रिय थे।

सिक्ख धर्म के संस्थापक गरु नानक जी ने हिंद धर्म के लोगों के कारण ही सिक्ख धर्म को स्थापित किया था। परंत इन सभी ने हिंदू धर्म में प्रचलित आडंबरों का विरोध किया। हिंदू एवं सिख धर्म में मौलिक एकता का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि असंख्य हिंदू अपने एक पुत्र को हिंदू तथा दूसरे को सिक्ख बनाते हैं। हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) सभी धर्मों के अनुयायियों पर समान रूप से लागू होते हैं।

3. भारतीय एवं गैर-भारतीय मल के धर्मों में एकता (Unity between Religions of Indian and Non-Indian Orisin)-हिंद. बौदध, सिक्ख एवं जैन भारतीय मल के धर्म हैं। परंत इस्लाम, ईसाई तथा पारसी गैर-भारतीय मल के धर्म हैं। हिंदू तथा विदेशी मूल के धर्मों में कई समानताएँ पाई जाती हैं। पारसी धर्म के लोग हिंदुओं की तरह उपनयन अथवा जनेऊ संस्कार करते हैं। उनमें यज्ञ, हवन, आहुतियों, आचमन, दान तथा अनेक हिंदुओं के अनुष्ठानों का प्रचलन है।

वे पित्रों का श्राद्ध भी करते हैं। कई भारतीय ईसाइयों एवं निम्न वर्ग के लोगों ने जातीय स्थिति से छुटकारा पाने हेतु धर्म परिवर्तन भी किया और कई लोग धर्मांतरण के कारण हिंदुओं से ईसाई भी बने लेकिन व्यवहार में मूल धर्म, धार्मिक ग्रंथों, मूल्यों, देवी-देवताओं में उनकी आस्था बनी रही। भारतीय मुसलमानों का भी काफ़ी भारतीयकरण हुआ है। अतः भारत में धर्मों की आपस में एकता के काफ़ी तत्त्व विद्यमान हैं।

4. धार्मिक त्योहारों एवं राष्ट्रीय पर्यों को मिलकर मनाना (To celebrate Religious and National festivals together)-देश के विभिन्न धार्मिक समुदायों के धार्मिक त्योहार-दीवाली, दशहरा, जन्माष्टमी, राम नवमी, महाशिवरात्रि, ईद-उल-जुहा, ईद-उल-फितर, क्रिसमिस, गुड फ्राइडे, गुरु नानक जन्म दिवस और राष्ट्रीय त्योहार जैसे गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती, स्वतंत्रता और राष्ट्रीय त्योहार जैसे गणतंत्र दिवस, गांधी जयंती, स्वतंत्रता दिवस आदि आपस में मिल-जुल कर, खुशियों से मनाते हैं। पूरा भारतवर्ष इन त्योहारों को मनाने हेतु बढ़-चढ़ कर भाग लेता है।

5. धर्म-निरपेक्षवाद एवं समतावाद (Secularism and Equalitarianism)-भारत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है। सभी धर्मों के अनुयायी अपने-अपने धर्म के विकास एवं प्रचार के लिए स्वतंत्र हैं। सभी धर्मों को समान मौलिक अधिकार दिए गए हैं। संविधान में हर धर्म के हितों की रक्षा हेतु कई प्रावधान भी प्रदान किए गए हैं। संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 द्वारा धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार दिए गए हैं। इस अनुच्छेद के अनुसार कोई भी व्यक्ति किसी भी धर्म को स्वीकार कर उसका प्रचार प्रसार कर सकता है। आयोग संविधान में धार्मिक अल्पसंख्यकों संबंधी प्रावधानों का मूल्यांकन करता है तथा उन्हें लागू करवाने हेतु यथोचित कदम भी उठाता है।

प्रश्न 5.
कौन-से भाषायी कारकों की वजह से भारत में विविधता पाई जाती है?
उत्तर:
भाषा अपनी बात कहने का अथवा अपना पक्ष रखने का प्रमख साधन है। यह प्रथम सांस्का संस्कृति की प्रमुख वाहक है। भाषा विचारों के आदान-प्रदान की मूलाधार है परंतु यह एक बहुत ही जटिल व्यवस्था स और अमेरिका के भाषाविदों के अनुसार विश्व में कुल 2796 भाषाएं बोली जाती हैं जिनमें से 1200 भाषाएँ अमरीकी एवं भारतीय जन-जातियों के लोग बोलते हैं। मंदारिन (Mandarin) भाषा विश्व की सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है।

उसके बाद अंग्रेजी और तृतीय स्थान पर हिंदी सर्वाधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली भाषाएँ हैं। भारत में राष्ट्रीय, स्थानीय और प्रांतीय स्तर पर भिन्न-भिन्न भाषाएं बोली जाती हैं। भारतीय समाज में बोली जाने वाली भाषाओं के आँकड़ों के मुताबिक भारत में कुल मातृ भाषाएँ 16 52 हैं। इनमें से केवल 22 भाषाओं को ही संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है। देश में बोली जाने वाली कुल 826 भाषाओं में से 723 भारतीय मूल की तथा 103 विदेशी मूल अथवा गैर-भारतीय भाषाएँ हैं।

प्रमुख भाषाओं के नाम (Names of Main Languages)
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं। उनमें से प्रमुख भाषाओं के नाम अग्रलिखित सारणी में दिए गए हैं-
HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ 1
संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाएँ (Languages Recognised by Constitution)-भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में भाषाओं की सूची दी गई है। पहले मान्यता प्राप्त भाषाओं की संख्या 1 4 थी परंतु 1992 में संविधान में तबदीली के तहत इन भाषाओं की संख्या बढ़कर 18 हो गई। देवनागरी लिपि (Devanagri script) में हिंदी को 14 सितंबर, 1949 को राजकीय भाषा (official language) के रूप में अपनाया गया। 2003 में आठवीं अनुसूची में संशोधन करके चार अन्य भाषाओं को मान्यता दी गई।

गैर-सवैधानिक मान्यता प्राप्त प्रमुख भाषाएँ (Non-Constitutionally Recognised Major Languages) भारतीय संविधान में मान्यता प्राप्त भाषाओं के अलावा तालिका में निर्दिष्ट तेरह भाषाएँ पाँच लाख या इससे अधिक लोगों द्वारा बोली जाती हैं। इनमें से हिमाचल प्रदेश में बोली जाने वाली पहाड़ी भाषा प्रमुख है। एक-से लोग मंडयाली तथा सिरमारी हि० प्र० के क्रमशः मंडी व सिरमौर जिले में बोलते हैं। 673 अन्य भारतीय भाषाएँ तथा 10 3 गैर–भारतीय भाषाएँ अपेक्षाकृत कम लोगों द्वारा बोली जाती हैं।

भारत के भाषा परिवार (Indian Language Families)-भारत की सभी भाषाओं को मुख्य रूप से छः भाषा परिवारों में बाँटा जा सकता है

  • नीग्रोइट (Negroid)
  • ऑस्ट्रिक (Austric)
  • चीनी-तिब्बती (Sino-Tibetan)
  • द्रविड़ (Dravadian)
  • इंडो-आर्यन (Indo-Aryan)
  • अन्य भाषा परिवार (Other Language Families)

इन छः भाषा परिवारों में भी भारत में बोली जाने वाली अधिकांश भाषाएँ दो भाषा परिवारों से संबंधित है जिनका वर्णन निम्नलिखित ह-
1. इंडो-आर्यन भाषा परिवार (Indo-Aryan Language Family)-आर्यों के आगमन के साथ इंडो-आर्यन भाषाओं का आगमन हुआ। यह एक ऐसा भाषाई समूह है जो देश की कुल आबादी का तीन-चौथाई हिस्सा घेरे हुए है।
इस समूह की प्रमुख भाषाएँ-

  • हिंदी
  • पंजाबी
  • बंगाली
  • गुजराती
  • मराठी
  • असमी
  • उड़िया
  • उर्दू
  • संस्कृत
  • कश्मीरी
  • सिंधी
  • पहाड़ी
  • राजस्थानी तथा
  • भोजपुरी।

इनसे स्पष्ट है कि संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त 22 भाषाओं में से दक्षिण की चार भाषाओं को छोड़कर सभी इंडो-आर्यन भाषा परिवार से संबंधित हैं।

2. द्रविड़ भाषा परिवार (Dravid Language Family) तमिल, तेलुगू, कन्नड़ एवं मलयालम प्रमुख द्रविड़ भाषाएँ हैं।
प्रमुख भाषाओं की भारत में स्थिति (Position of Major Languages in India)-हिंदी भाषा सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है। यह भाषा करीब 30% लोगों द्वारा बोली जाती है जो लगभग 24.78 करोड़ लोगों का समूह है। इसके बाद तेलगू भाषा, फिर बंगला भाषा और मराठी का चौथे पर स्थान है। भोजपुरी एवं राजस्थानी ही ऐसी दो भाषाएँ हैं जो 3 करोड़ से अधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाती हैं परंतु इन भाषाओं को संविधान से मान्यता प्राप्त नहीं है।

भारत की प्रमुख भाषाओं की विभिन्न राज्यों में स्थिति (Position of different languages in Indian States) हिंदी भाषा छः प्रदेशों की राजकीय भाषा है-हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश दिल्ली दि। हिंदी के अतिरिक्त विभिन्न राज्यों की राजकीय भाषा को निम्नलिखित सारिणी में दर्शाया जा सकता है-

राज्यराजकीय भाषा
1. असमअसमी
2. पशिचमी बंगालबंगाली
3. गुजरातगुजराती
4. महाराष्ट्रमराठी
5. उड़ीसाउड़िया
6. पंजाबपंजाबी
7. जम्मू-कश्मीरउर्दू
8. तमिलनाडुतमिल
9. आंध्र प्रदेशतेलुगू
10. कर्नाटककन्नड़
11. केरलमलयालम

इसके अतिरिक्त असम में आसामी भाषा लगभग 57% लोग बोलते हैं, कर्नाटक में कन्नड़ 65% जनसंख्या बोलती है, 55% जम्मू-कश्मीर के लोग कश्मीरी बोलते हैं, जबकि उर्दू यहाँ की राजकीय भाषा है। अंग्रेजी भाषा भारत की संपर्क भाषा है परंतु राजकीय भाषा नहीं। यह भाषा संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं में से नहीं है।

प्रश्न 6.
किस तरह भारत में भाषाई विविधता में एकता पाई जाती है?
उत्तर:
भाषाई विविधता में एकता विद्यमान है और इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए इसे निम्नलिखित शीर्षकों के अंतर्गत स्पष्ट किया गया है-
1. हिंदी एवं भाषाई एकता (Hindi and Liguistic Unity)-ग्यारहवीं शताब्दी में हिंदी भाषा की नींव रखी गई। साहित्यकारों ने अपनी लेखनी के माध्यम से इसे काफ़ी समृद्ध किया। तुलसीदास, कबीर, सूरदास, तिलक, दयानंद, बंकिमचंद्र चैटर्जी तथा महात्मा गांधी आदि ने हिंदी में साहित्य लिखकर इसे काफ़ी लोकप्रियता दी है। इस भाषा को हमारी भारतीय जनसंख्या का सबसे बड़ा हिस्सा समझता, बोलता एवं लिखता है। अपने घरों में टी०वी० मनोरंजन का साधन हिंदी ही प्रयोग करता है। यह सरल और आम बोलचाल की भाषा है।

14 सितंबर, 1949 के दिन हिंदी भाषा को संविधान से मान्यता प्राप्त हुई। छः राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में हिंदी को राजकीय भाषा घोषित किया गया। पूरे भारत में लोग हिंदी बोलते, समझते हैं और अहिंदी भाषा प्रदेशों में भी इसका काफ़ी प्रचलन है। देश की प्रथम पत्रिका का प्रकाशन हिंदी में ही हुआ था। हालांकि हिंदी पूर्णतः राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। मगर यह देश की सामान्य भाषा अथवा लोक भाषा है।

2. इंडो-आर्यन भाषा परिवार एवं भाषाई एकता (Indo-Aryan Language Family and Linguistic Unity) इंडो-आर्यन भाषा परिवार भारतीय समाज का सबसे बड़ा भाषाई समूह है। हिंदी, पंजाबी, कश्मीरी, पहाड़ी, संस्कृत आदि इस भाषा समूह के अंतर्गत आते हैं। काफ़ी शब्द ऐसे हैं जो बिल्कुल कम परिवर्तन के साथ उसी रूप में प्रचलित हैं।

जैसे-माता को पंजाबी, हिमाचली, बंगाली, आसामी आदि सभी भाषाओं में ‘माँ’ बोला जाता है। उसी प्रकार ‘पानी’ को भी इन सभी भाषाओं में ‘पानी’ ही कहा जाता है। इसीलिए इन भाषाओं को समझना कठिन नहीं है। इन भाषाओं में शायद ही ऐसे कोई तकनीकी शब्द हों जो किसी की समझ में न आते हों।

वास्तव में भारत के छोटे जनजातीय समूहों में ही देश की अधिकांश भाषाएँ प्रचलित हैं। ये भाषाएँ भाषाई दर्शाती हैं, परंतु विभिन्न भाषाओं में आंतरिक एकता पाई जाती है। भाषाई विविधता एक समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 6 सांस्कृतिक विविधता की चुनौतियाँ

प्रश्न 7.
धर्म-निरपेक्षता क्या होती है? धर्म-निरपेक्षता के क्या कारण हैं?
अथवा
धर्म-निरपेक्षवाद से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
धर्म-निरपेक्षवाद क्या है?
अथवा
‘धर्म-निरपेक्षवाद’ पर संक्षिप्त नोट लिखें।
अथवा
धर्म निरपेक्षता से आप क्या समझते हैं? इसका विस्तार से वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-निरपेक्षता का अर्थ (Meaning of Secularism) भारतीय समाज 20वीं शताब्दी से ही पवित्र समाज (Sacred Society) से एक धर्म निरपेक्ष (Secular Society) में परिवर्तित हो रहा है। इस शताब्दी के अनेक विद्वानों, विचारकों एवं राजनीतिज्ञों ने यह महसूस किया कि धर्म-निरपेक्षता के आधार पर ही विभिन्न धर्मों का देश भारत संगठित रह पाया है। धर्म-निरपेक्षता के आधार पर राज्य के सभी धार्मिक समूहों व धार्मिक विश्वासों को एक समान माना जाता है।

निरपेक्षता का अर्थ समानता या तटस्थता से है। राज्य सभी धर्मों को समानता की दृष्टि से देखता है तथा किसी के साथ भी धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता है। धर्म-निरपेक्षता ऐसी नीति या सिद्धांत है, जिसके अंतर्गत लोगों को किसी विशेष धर्म को मानने या पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाता है।

धर्म निरपेक्षीकरण का अर्थ (Meaning of Secularization)-धर्म निरपेक्षीकरण को उस सामाजिक एवं सांस्कतिक प्रक्रिया के रूप में समझा जा सकता है जिनके दवारा धार्मिक एवं परंपरागत व्यवहारों में धीरे-धीरे तार्किकता या वैज्ञानिकता का समावेश होता जाता है। अनेक विद्वानों ने धर्म निरपेक्षीकरण को अग्रलिखित परिभाषाओं से परिभाषित किया है

डॉ० एम० एन० श्रीनिवास (Dr. M.N. Srinivas) के शब्दों में, “धर्म निरपेक्षीकरण या लौकिकीकरण शब्द का यह अर्थ है कि जो कुछ पहले धार्मिक माना जाता था, वह अब वैसा नहीं माना जा रहा है, इसका अर्थ विभेदीकरण की प्रक्रिया से भी है जो कि समाज के विभिन्न पहलुओं, आर्थिक, राजनीतिक, कानूनी और नैतिक के एक-दूसरे से अधिक पृथक् होने से दृष्टिगोचर होती है।” डॉ० राधा कृष्णन (Dr. Radha Krishnan) के अनुसार, “लौकिकीकरण या धर्म निरपेक्षीकरण, धार्मिक निरपेक्षता व धार्मिक सह-अस्तित्ववाद है।”

उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर धर्म-निरपेक्षीकरण एक सांस्कृतिक एवं सामाजिक प्रक्रिया है, जिसमें मानव के व्यवहार की व्याख्या धर्म के आधार पर नहीं, अपितु तार्किक आधार पर की गई है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत धर्म का प्रभाव कम हो जाता है तथा घटनाओं को कार्य-कारण संबंधों के आधार पर समझा जाता है।

आत्मगतता व भावुकता (Subjectivity and Emotionality) का स्थान वस्तुनिष्ठता (Objectivity) एवं वैज्ञानिकता ने ले ली है। अतः धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया में, धार्मिकता का ह्रास, बुद्धिवाद के महत्त्व, विभेदीकरण, वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता तथा व्यक्ति को किसी भी धर्म या धार्मिक सोपान की सदस्यता प्राप्त करने की स्वतंत्रता व अधिकार होता है।

धर्म निरपेक्षीकरण के कारण (Factor of Secularization)-धर्म-निरपेक्षीकरण से भारतीय समाज में सामाजिक एवं सांस्कृतिक दोनों ही दृष्टिकोणों में काफ़ी परिवर्तन किये गये हैं। इन क्षेत्रों में प्रभाव को देखने से पहले उन कारणों को जानना ज़रूरी है जिन्होंने धर्म निरपेक्षीकरण को संभव बनाया है। धर्म-निरपेक्षीकरण के विकास के निम्नोक्त कारक हैं-

1. धार्मिक संगठनों में कमी (Lack of Religious Organisations) धार्मिक निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का विकास धार्मिक संगठनों का अभाव भी रहा है। भारतीय समाज में अनेक धर्मों के संप्रदाय पाए जाते हैं। इन संप्रदायों में हिंदू धर्म ही एक ऐसा संप्रदाय है जिनके अनेक मत पाये जाते हैं। बाकी धर्मों जैसे सिक्ख, ईसाई, मुस्लिम, इन सभी में एक ही मत व संप्रदाय होता है। इसी कारण ये लोग अपने संप्रदाय के प्रति काफ़ी कट्टर विचारधारा के होते हैं।

इसके विपरीत हिंदू धर्म में अनेक मतों के कारण कोई अच्छा संगठन नहीं है। एक हिंदू दूसरे हिंदू की धार्मिक आधार पर निंदा या आलोचना करता है। इस सबका प्रभाव हिंदू धर्म पर पड़ा। एक ओर तो लोग ब्राह्मणों के अत्याचारों एवं शोषण से दुःखी होकर हिंदू धर्म को अपनाया दूसरी ओर पढ़े-लिखे हिंदू इस धार्मिक कट्टरता से दूर होते चले गये। ये लोग हिंदू धर्म में पाये जाने वाले विश्वासों, अंधविश्वासों, कर्मकांडों, आदर्शों व मूल्य का विरोध कर रहे हैं। भारतीय समाज में ये सभी कारण धर्म निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया में सहयोग देते आ रहे हैं।

2. भारतीय संस्कृति (Indian Culture)-भारतीय संस्कृति का अपने आप ही निरपेक्षीकरण हो रहा है क्योंकि भारतवर्ष एक धर्म निरपेक्ष (Secular Republic) गणराज्य है। एक धर्म निरपेक्ष राज्य होने के कारण अनेक धम जातियों के संप्रदाय एक-दूसरे के नज़दीक आते रहते हैं तथा एक-दूसरे संप्रदाय की अच्छाइयां व बुराइयों का भी ज्ञान अर्जित करते रहते हैं तथा उनका मूल्यांकन करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त पाश्चात्य संस्कृति ने भी धर्म निरपेक्षीकरण के आधार पर परिवर्तनों में अहम् भूमिका निभाई है।

3. यातायात एवं संचार (Transportation and Communications)-यातायात व संचार की सुविधाओं में उन्नति होने से समाज में गतिशीलता को बढ़ावा मिला है। इन्हीं साधनों की वजह से नये-नये नगरों, व्यवसायों व उदयोगों का भी विकास हुआ। इन विभिन्न साधनों के द्वारा विभिन्न प्रकार के धर्म, जाति, प्रदेश व देश के लोग एक दूसरे के संपर्क में आते हैं। संपर्क में आने से ही आपसी विचारों का आदान-प्रदान हुआ। इससे विभिन्न धर्मों की तार्किक आलोचना की प्रवृत्ति को भी बढ़ावा मिला। इससे पवित्र-अपवित एवं छुआछूत के विचारों में कमी आई। ये सभी तत्त्व धर्म-निरपेक्षीकरण के विकास को प्रोत्साहित करते हैं।

4. पाश्चात्य संस्कृति (Western Culture)-भारतीय संस्कृति के ऊपर भी पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पाश्चात्य संस्कृति ने भारतीय जीवन के सभी पहलओं पर प्रभाव डाला है। यहां के धर्म, कला, साहित्य, सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक जीवन में कई परिवर्तनों को पाश्चात्य संस्कृति के संदर्भ में समझा जा सकता है। वास्तव में धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया के विकास में पाश्चात्य संस्कृति का ही मूल रूप से सहयोग रहा है।

5. आधुनिक शिक्षा (Modern Education) वर्तमान समय की शिक्षा पद्धति ने भी धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया के विकास में सर्वोपरि भूमिका निभाई है। भारतवर्ष में आधुनिक शिक्षा पद्धति पाश्चात्य शिक्षा का ही रूप है। शिक्षा पद्धति में पाश्चात्य मूल्यों के विकास के साथ भारतीय मूल्यों में भी परिवर्तन हुआ। इसका प्रभाव सबसे अधिक धार्मिक विश्वासों व मूल्यों पर पड़ा आधुनिक शिक्षित व्यक्ति केवल मात्र धर्म के आधार पर अंध-विश्वासों, नियमों या बंधनों को नहीं अपनाता।

मूल्यांकन के पश्चात् ही अपने आपको उन बंधनों से बांधता है। वर्तमान शिक्षा पद्धति ने व्यक्ति की सोच को व्यावहारिकता व वैज्ञानिकता के आधार पर विकसित किया है। इसके साथ ही स्त्री शिक्षा को भी बढ़ावा मिला है। शिक्षा पद्धति में आये हुए परिवर्तनों के कारण ही भारतीय समाज में लिप्त कई बुराइयों जैसे-छुआछूत, अस्पृश्यता की भावना, जातीय आधार, उच्च शिक्षा आदि में कमी आई है। सहशिक्षा (Co-education) को भी अवसर दिया जाता है।

6. नगरीयकरण (Urbanization)-नगरीयकरण ने धर्म निरपेक्षीकरण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। शहरों व नगरों में ही धर्म निरपेक्षवाद सबसे अधिक विकसित हुआ। नगरों में ऐसे वह सब साधन मौजूद होते हैं, जैसे विकसित यातायात व संचार की सुविधाएं, उच्च शिक्षा, भौतिकवाद, तार्किकतावाद या विवेकवाद, व्यक्तिवादिता, फैशन, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव इत्यादि जो मिलकर धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया का विकास करते हैं।

प्रश्न 8.
धर्म निरपेक्षता के भारतीय सामाजिक जीवन पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक, जीवन पर धर्म निरपेक्षता के प्रभाव (Impact of Secularization on Indian Social and Cultural Life)-डॉ० एम० एन० श्रीनिवास ने अपनी सुप्रसिद्ध कृति Social change in Modern India में धर्म-निरपेक्षीकरण के भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर पड़े अनेक प्रभावों एवं परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों का सविस्तार उल्लेख किया जिसका वर्णन निम्नवत् है-
1. पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा में परिवर्तन (Change in the Concept of Purity and Pollution)-धर्म निरपेक्षीकरण के परिणामस्वरूप भारतीय समाज में पवित्रता एवं अपवित्रता की धारणा काफ़ी परिवर्तित हुई है। इसके प्रभाव के कारण, जाति, व्यवसाय, खान-पान, विवाह, पूजा-अर्चना, संबंधी अनेक धारणाओं में धर्म का प्रभाव कम हुआ है तथा अपवित्रता संबंधी कट्टर विचारों में भी कमी आई है। विभिन्न जातियों के व्यक्ति आपस में इकट्ठे होकर रेल, बस आदि में यात्रा करते हैं।

मिलकर रैस्टोरैंट या रेस्तरां आदि में खाते-पीते हैं। एक जाति दूसरी जाति के व्यवसाय को अपना रही है। निम्न जाति के व्यक्ति उच्च जाति के व्यवसायों को अपना रहे हैं जिससे उनकी सामाजिक स्थिति भी पहले से बेहतर हुई है। संस्कृतिकरण की प्रक्रिया के आधार पर भी निम्न जातियों ने उच्च जाति की उच्च जीवन-शैली को अपनाया है।

वर्तमान समय में परंपरागत पवित्रता एवं अपवित्रता संबंधी विचारधारा में परिवर्तन हुआ है। अब लोग किसी भी चीज़ को तार्किकता व स्वास्थ्य नियमों के आधार पर स्वीकार या अस्वीकार करने लगे हैं। इन सब तथ्यों के आधार पर स्पष्ट है कि धर्म निरपेक्षीकरण ने भारतीयों की विचारधारा में अनेक आधारों पर परिवर्तन किये।

2. जीवन चक्र एवं संस्कार में परिवर्तन (Change in Life Cycle and Rituals)-संस्कार हिंदू धर्म का मूल हैं। भारतीय समाज में मुख्यतः हिंदू धर्म में प्रत्येक कार्य का आरंभ संस्कारों के आधार पर ही होता है। हिंदू धर्म के अंतर्गत जब एक बच्चा अपनी मां के गर्भ में आता है, तभी ही गर्भदान संस्कार पूरा कर दिया जाता है तथा इसके पश्चात् समय-समय पर दूसरे संस्कार जैसे-चौल, नामकरण, उपनयन (जनेऊ संस्कार), समावर्तन, विवाह आदि किए जाते हैं। जब व्यक्ति अपना शरीर त्याग देता है तो भी अंतिम संस्कार (अंत्येष्टि) किया जाता है अर्थात् हिंदू समाज की नींव संस्कारों के बीच ही गड़ी हुई है।

वर्तमान समय में बढ़ते धर्म निरपेक्षीकरण के बढ़ते प्रभाव के कारण इन संस्कारों का संक्षिप्तिकरण हो रहा है। कुछ एक संस्कारों को ही पूरा किया जाता है तथा अन्य संस्कार जैसे-नामकरण, चौथ एवं उपाकर्म इत्यादि को पूरा नहीं किया जाता। ब्राह्मणों एवं उच्च जातियों में विधवा का मुंडन संस्कार किया जाता था जो अब लगभग न के बराबर है।

इसके साथ ही कुछ एक संस्कारों को एक साथ ही मिला दिया गया है; जैसे-उपनयन संस्कार विवाह के आरंभ में ही संपन्न करवा दिया जाता है। वर्तमान समय में दैनिक जीवन के कर्मकांड जैसे-स्नान, पूजा, अर्चना, वेद, पाठ, भजन-कीर्तन इत्यादि के लिये भी व्यक्ति नाम मात्र समय देता है। ये सब परिवर्तन बढ़ते धार्मिक निरपेक्षीकरण के कारण ही हैं।

3. परिवार में परिवर्तन (Change in Family)-भारतीय समाज में संयुक्त परिवार (Joint family) पारिवारिक व्यवस्था का महत्त्वपूर्ण रूप है। सामाजिक जीवन में परिवार एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संस्था माना जाता है। कृषि मुख्य व्यवसाय होने के कारण भारतीय समाज में संयुक्त परिवार व्यवस्था को ही उचित व्यवस्था माना जाता था। परिवार में सभी सदस्य मिलकर साझे रूप से ज़मीन पर खेती करते तथा साझे रूप से ही अपनी आवश्यकता पूर्ति के लिये अपनी आय का खर्च करते थे।

संयुक्त परिवार में संपूर्ण पारिवारिक सदस्य सामान्य हित के लिये कार्य करते थे। संयुक्त परिवार में एक साथ तीन या अधिक पीढ़ियों के सदस्य इकट्ठे घर (एक) में ही रहते थे। वर्तमान में बदलती परिस्थितियों के अनुसार संयुक्त परिवार में भी परिवर्तन हुआ। आज संयुक्त परिवारों का विघटन हो रहा है। इनकी जगह एकांगी परिवार विकसित हो रहे हैं।

संयुक्त परिवारों में जो कार्य पारिवारिक सदस्य मिल-जुल कर एक-दूसरे के सहयोग से पूरा करते थे, आज वही कार्य अनेक दूसरी समितियों व संस्थाओं को हस्तांतरित हो रहे हैं। वर्तमान समय में परिवार के वरिष्ठ सदस्यों के विचारों को कोई महत्त्व नहीं दिया जाता।

इसके साथ अब बड़े-बूढ़े भी अपनी विचारधारा को नयी पीढ़ी के साथ परिवर्तित कर रहे हैं। परिवारों में जिन त्योहारों को धार्मिकता के आधार पर परंपरागत रूप से मनाया जाता था। उन त्योहारों को धार्मिक तथा सामाजिक अवसर अधिक माना जाता है। इन सब आधारों पर स्पष्ट हो जाता है कि पारिवारिक संस्था को धर्म-निरपेक्षीकरण ने पूर्णतः प्रभावित किया है।

4. ग्रामीण समुदाय में परिवर्तन (Change in Rural Community)-धर्म-निरपेक्षीकरण का प्रभाव नगरों के साथ-साथ ग्रामीण समुदाय में भी देखने को मिलता है। ग्रामीण समुदायों में जातीय पंचायतों के स्थान पर निर्वाचित पंचायतों का विकास हो रहा है। जहां पर भी ये जातीय पंचायतें अगर हैं भी तो वहां पर ये धार्मिक लक्ष्यों के आधार पर नहीं बल्कि राजनैतिक उद्देश्यों को लेकर संगठित की गई हैं। ग्रामीण समाज में प्रतिष्ठा व सम्मान जातीय या धार्मिकता के आधार पर होता था, वहां अब धन व संपत्ति के आधार पर होने लगा है।

वर्तमान समय में निम्न जातियों के व्यक्तियों को भी धन के आधार पर उच्च जाति के व्यक्तियों से अधिक सम्मान दिया जाने लगा है। ग्रामीण समाजों पर परिवार व विवाह संबंधों में भी धम-निरपेक्षीकरण के परिणामस्वरूप अंतर्विवाह (Intercaste-marriage) का प्रचलन बढ़ा है। ग्रामों में धार्मिक उत्सव को धार्मिकता के आधार पर कम तथा सामाजिक उत्सवों के रूप में अधिक मनाया जाने लगा है।

उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि धर्म-निरपेक्षीकरण की प्रक्रिया ने भारतीय समाज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन को मूल रूप से प्रभावित किया है। इस प्रक्रिया ने एक और नये सांस्कृतिक मूल्यों के विकास में योगदान दिया है तो दूसरी ओर भारतीय प्रथागत अथवा परंपरागत मूल्यों, आदर्शों को भी विघटित करने में अपनी भूमिका निभाई है।

प्रश्न 9.
भारतीय समाज पर जातिवाद का क्या प्रभाव पड़ा? जातिवाद को कैसे समाप्त किया जा सकता है?
अथवा
जातिवाद की समस्या को दूर करने के लिए सुझाव दीजिए।
उत्तर:
भारतीय समाज पर जातिवाद के प्रभाव:

  • जातिवाद के कारण भारतीय समाज हज़ारों जातियों तथा उप-जातियों में विभाजित हो गया जिनके अपने ही नियम, परिमाप थे।
  • जातिवाद के कारण भारतीय समाज को स्थिरता प्राप्त हुई तथा समाज बाहरी हमलों के कारण खिन्न-भिन्न होने से बच गया।
  • मध्य काल में भारतीय समाज पर अनेकों आक्रमणकारियों ने आक्रमण किए। जातिवाद के कारण भारतीय समाज की संस्कृति न केवल सुरक्षित रही बल्कि इसने विदेशी संस्कृतियों का भी आत्मसात कर लिया।
  • जाति प्रथा ने अपने आपको विदेशी प्रभाव से बचाने के लिए अलग-अलग जातियों पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए ताकि उनकी संस्कृति के प्रभाव से समाज को बचाया जा सके।
  • आधुनिक समय में जातिवाद के कारण उच्च तथा निम्न जातियों में द्वेष बढ़ गया है। निम्न जातियों को सरकार द्वारा कई सुविधाएं प्राप्त हैं जिस कारण उच्च जातियों को उनसे ईर्ष्या होने लगी है तथा उनमें ईर्ष्या बढ़ गई है।
  • निम्न जातियों को सरकार द्वारा जातिवाद के कारण ही हरेक स्थान पर आरक्षण प्राप्त हुआ है जिस कारण उनकी सामाजिक स्थिति ऊँची हो रही है।
  • जातिवाद के कारण अलग-अलग जातियों के नेता अपनी नेतागिरी चमकाने के लिए जातीय भावनाओं को भड़काते हैं ताकि अपनी जाति के लोगों की वोटें प्राप्त की जा सकें। इस कारण जातीय दवेष बढ़ रहा है।

जातिवाद को समाप्त करने के उपाय:

  • सभी राजनीतिक दलों को चाहिए कि वह जातिवाद का प्रयोग चुनावों में न करें ताकि जातिगत द्वेष बढ़ने की बजाए कम हो सके।
  • लोगों को अच्छी शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए ताकि वह जातिगत भावना से ऊपर उठ कर ठीक नेता का चुनाव कर सकें जो उनके विकास की बातें करे न कि अपनी नेतागिरी चमकाने की।
  • सरकारी कानूनों को ठीक ढंग से लागू करना चाहिए ताकि जातिगत भावनाओं को भड़काने वालों को कठोर दंड दिया जा सके।
  • अगर सरकार जातीय आधार पर कोई वित्तीय सहायता प्रदान करती है तो उसे तत्काल ही समाप्त कर देना चाहिए।
  • जनता भी इसमें अच्छी भूमिका निभा सकती है। जनता स्वयं ही ऐसे नेताओं तथा भावनाओं का बहिष्कार कर सकती है जो जातिवाद का प्रयोग करते हों।

प्रश्न 12.
भारतीय समाज में अल्पसंख्यकों का वर्णन करें।
अथवा
भारत के विभिन्न धार्मिक समूहों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
अगर किसी देश में अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा हैं तो वह है भारत। भारत की लगभग 18% जनसंख्या अल्पसंख्यक है जो कि जनसंख्या के मुकाबले काफ़ी ज्यादा है। इनका वर्णन निम्नलिखित है-

राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक (Minorities at National Level)-भारतीय समाज में लगभग छः धार्मिक अल्पसंख्यक तथा सैकड़ों भाषाई अल्पसंख्यक समूह हैं। इन दोनों का वर्णन निम्नलिखित है-
1. धार्मिक अल्पसंख्यक (Religious Minorities)-भारत में धर्म के आधार पर शेष बाकी धर्म अल्पसंख्यक हैं क्योंकि और धर्मों की जनसंख्या के मुकाबले हिंदुओं की जनसंख्या काफ़ी ज्यादा है। निम्नलिखित तालिका से यह स्पष्ट हो जाएगा-

2011 में (प्रतिशत)
(a)हिंदू79.5 %
(b)मुस्लिम13.4 %
(c)ईसाई2.4 %
(d)सिक्ष2.1 %
(e)बौद्ध0.8 %
(f)जैन0.4 %
(g)पारसी तथा अन्य0.4 %

इस तालिका से हमें यह पता चलता है कि-

  • भारत में हिंदुओं को छोड़कर बाकी और धर्म अल्पसंख्यक है।
  • सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह मुस्लिम समुदाय है।
  • ईसाई दूसरे तथा सिक्ख तीसरे स्थान पर आते हैं।
  • बौद्ध, पारसी तथा जैन ऐसे अल्पसंख्यक समूह हैं जिनकी जनसंख्या हरेक की एक करोड़ से भी कम है।
  • मुस्लिम, पारसी तथा ईसाई विदेशी मूल में अल्पसंख्यक हैं तथा सिक्ख, बौद्ध तथा जैन भारतीय मूल के अल्पसंख्यक हैं।
  • पिछले आंकड़ों से पता चलता है कि ईसाइयों की जनसंख्या लगातार कम हो रही है।
  • हिंदू बहुसंख्यक हैं जो कि कुल जनसंख्या का 82% हैं।
  • हिंदुओं की जनसंख्या प्रतिशत में भी कमी हो रही है।

2. भाषाई अल्पसंख्यक (Linguistic Minorities)-भारतीय समाज में सैंकड़ों भाषाई अल्पसंख्यक समूह हैं क्योंकि यह कहा जाता है कि हर 12 कोस के बाद भाषा बदल जाती है। भारत में सबसे ज्यादा हिंदी बोली जाती है। प्रमुख भारतीय भाषाओं में से 2 करोड़ से ज्यादा किसी भाषा को बोलने वालों की सारणी निम्नलिखित है-

क्रमांकभाषाबोलने वालों की संख्या (करोड़ों में)
(a)हिंदी24.78
(b)तेलुगू7.20
(c)बंगला7.17
(d)मराठी6.62
(e)तमिल6.06
(f)उर्दू4.61
(g)गुजराती4.13
(h)मलयालम3.53
(i)कन्नड़3.47
(j)उड़िया3.17

इस तरह हमारे संविधान में कुछ भाषाओं का जिक्र है जिनको मान्यता प्राप्त है। वे हैं-आसामी, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, मलयालम, मराठी, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, तमिल, तेलुगू, उर्दू, नेपाली, मणिपुरी, कोंकणी तथा डोगरी, संथाली, बोडो, मैथिली, सिंधी। ऊपर दी हुई तालिका में से निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती हैं-

  • देश में सबसे ज्यादा हिंदी भाषा बोली जाती है।
  • 30% लोग हिंदी बोलते हैं।
  • तेलुगू, बंगला, मराठी तथा तमिल सबसे बड़े भाषाई अल्पसंख्यक समूह हैं।
  • भारत में 826 भाषाएं बोली जाती हैं।
  • भारतीय संविधान ने 22 भाषाओं को मान्यता दी है।
  • भारत में 700 से अधिक भारतीय मूल की भाषाओं को बोलने वाले अल्पसंख्यक समूह हैं।
  • देश में 100 से ज्यादा विदेशी मूल के भाषाएं बोलने वाले अल्पसंख्यक समूह हैं।

इस तरह हम देख सकते हैं कि भारत में बहुसंख्यक समूह हिंदू समुदाय का है तथा भाषा भी सबसे ज्यादा हिंदी ही बोली जाती है। बाकी सब धार्मिक तथा भाषाई समूह अल्पसंख्यक हैं।

प्रश्न 13.
अल्पसंख्यकों के उत्थान के लिए क्या संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं?
अथवा
धार्मिक अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए क्या-क्या कदम उठाए गए हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अल्पसंख्यकों को देश की मुख्य या राष्ट्रीय धारा से जोड़ने के लिए अनेक संवैधानिक प्रावधान तथा सरकारी प्रयास किए गए हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) सभी भारतीयों को धर्म, जाति, लिंग, जन्म स्थान के भेद के बिना समान मौलिक अधिकार प्राप्त हैं। अनुच्छेद 14 से 18 द्वारा सभी भारतीयों को समानता का अधिकार दिया गया है तथा धर्म, जाति, भाषा इत्यादि के आधार पर किसी भी व्यक्ति से कोई भेदभाव नहीं किया जा सकता।

(ii) अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत सभी भारतीय नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार दिया गया है। अनुच्छेद 25 के अनुसार व्यक्ति किसी भी धर्म को अपना सकता है तथा धर्म प्रचार कर सकता है।

(iii) अनुच्छेद 29 तथा 30 के अनुसार सभी भारतीयों को शोषण के विरुद्ध अधिकार प्राप्त है। अनुच्छेद 29 के तहत कोई भी धर्म के आधार पर भेदभाव के बिना किसी भी शिक्षण संस्थान में प्रवेश पा सकता है तथा अपनी भाषा, लिपि तथा संस्कृति को बनाए रख सकता है।

(iv) अनुच्छेद 30 के अनुसार धार्मिक तथा भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षा संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार प्राप्त है। इसके अलावा भारत को धर्म निरपेक्ष राज्य घोषित किया गया है। इसलिए राज्य का न तो अपना धर्म है तथा किसी भी धार्मिक समूह को राज्य का सरंक्षण प्राप्त नहीं है।

(v) अनुच्छेद 300 के अनुसार राज्य भी शिक्षण संस्था को सहायता देते समय किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करेगा।

(vi) अनुच्छेद 350 के अनुसार देश के अल्पसंख्यकों में बच्चों को प्राथमिक शिक्षा उनकी मातृ भाषा में दी जाए।

इसके अलावा एक अल्पसंख्यक आयोग का 1978 में गठन किया गया जिसका एक अध्यक्ष तथा एक सदस्य होता है जोकि अल्पसंख्यक समूह से ही होता है। आयोग अल्पसंख्यकों की शिकायतों को सुनता है, उनकी स्थिति का समय-समय पर मूल्यांकन करता है। उनके सदस्यों की समस्याओं के समाधान के लिए सरकार को सुझाव पेश करता है। भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए भी एक भिन्न आयोग है जोकि उनकी शिकायतों, समस्याओं तथा उनसे संबंधित मुददों का अध्ययन करता है। 1993 में अल्पसंख्यक आयोग की जगह राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन किया गया है। इसके बाद सन् 2000 में इसका फिर पुनर्गठन किया गया। इसके कार्य हैं

  • अल्संख्यकों के लिए संरक्षणों की क्रियाशीलता का मूल्यांकन करना।
  • सभी संरक्षण क लागू तथा अधिक कारगर बनाने के लिए सुझाव देना।
  • अल्पसंख्यकों को सुरक्षा तथा अधिकारों से वंचित किए जाने संबंधी शिकायतों को सुनना।
  • इनके साथ होने वाले भेदभाव के प्रश्न संबंधी अध्ययन तथा शोध कार्य करना।
  • अल्पसंख्यकों के लिए सही वैधानिक तथा कल्याणकारी कदमों के लिए सुझाव देना।
  • सरकार को समय-समय पर रिपोर्ट देना।

इस तरह अल्पसंख्यकों के लिए संवैधानिक प्रावधान किए गए हैं ताकि वह बहुसंख्यकों के साथ इकट्ठे रह सकें तथा अपने आपको असुरक्षित महसूस न करें।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मंडल आयोग ने पिछड़े वर्ग के लिए कितने प्रतिशत आरक्षण की सिफ़ारिश की थी?
(A) 16.7%
(B) 27%
(C) 30%
(D) 17%
उत्तर:
27%.

प्रश्न 2.
भारत में अनुसूचित जातियां लगभग कितने प्रतिशत हैं?
(A) 17%
(B) 27%
(C) 7%
(D) 37%.
उत्तर:
27%.

प्रश्न 3.
अनुसूचित जातियां, अन्य जातियों से किस आधार पर पृथक् हैं?
(A) अस्पृश्यता
(B) धार्मिक अशुद्धता
(C) सामाजिक प्रतिबंध
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 4.
सबसे पहले हरिजन शब्द का प्रयोग किसने किया था?
(A) अंबेदकर
(B) महात्मा गांधी
(C) संविधान
(D) घूर्ये।
उत्तर:
महात्मा गांधी।

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प्रश्न 5.
नागरिक अधिकार संरक्षण कानून कब पास हुआ था?
(A) 1975
(B) 1976
(C) 1977
(D) 1978
उत्तर:
1976

प्रश्न 6.
इनमें से धार्मिक निर्योग्यता चुनो।
(A) धार्मिक पुस्तकें पढ़ने पर पाबंदी
(B) धार्मिक संस्कार करने की पाबंदी
(C) मंदिरों में जाने पर पाबंदी।
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 7.
संविधान के अनुसार कौन-सा वर्ग पिछड़ा है?
(A) जिसके पास पैसा नहीं है
(B) जो सामाजिक तथा शैक्षिक आधार पर पिछड़े हों
(C) धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग
(D) अस्पृश्य समूह।
उत्तर:
जो सामाजिक तथा शैक्षिक आधार पर पिछडे हों।

प्रश्न 8.
संविधान के किस अनुच्छेद में राष्ट्रपति को जनजातियों को अनुसूचित जनजाति में घोषित करने का प्रावधान
(A) 342 में
(B) 346 में
(C) 356 में
(D) 370 में।
उत्तर:
342 में।

प्रश्न 9.
कौन-सा कथन असत्य है?
(A) आरक्षण का लाभ सभी संबंधित जातियों को समान रूप से मिलता है
(B) आरक्षण का आधार जाति नहीं आर्थिक होना चाहिए
(C) आरक्षण का लाभ संबंधित जातियों के कुछ ऊपरी सतह के व्यक्ति ही ले पाए हैं
(D) आरक्षण अंतर्जातीय तनावों में वृद्धिकारक है।
उत्तर:
आरक्षण का लाभ सभी संबंधित जातियों को समान रूप से मिलता है।

प्रश्न 10.
अनुसूचित जातियों को हरिजन (नाम) किसने कहा?
(A) नेहरू जी
(B) गांधी जी
(C) तुकाराम
(D) नामदेव।
उत्तर:
गांधी जी।

प्रश्न 11.
1991 की जनगणना के अनुसार भारत में अनुसूचित जनजाति की प्रतिशत संख्या थी
(A) 6.28%
(B) 7.28%
(C) 8.28%
(D) 9.28%
उत्तर:
7.28%

प्रश्न 12.
नारी को किसका प्रतीक माना जाता है?
(A) पैसे का
(B) बच्चे पैदा करने का
(C) ज्ञान का
(D) समाज का।
उत्तर:
ज्ञान का।

प्रश्न 13.
प्रतिकूल लिंग अनुपात के लिए कौन-सी प्रवृत्ति ज़िम्मेदार है?
(A) पुत्र को वरीयता
(B) पुत्रियों से भेदभाव
(C) दहेज प्रचलन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
पुत्र को वरीयता।

प्रश्न 14.
आर्थिक स्वतंत्रता के कारण स्त्रियों में कौन-सी प्रवृत्ति आगे आ रही है?
(A) विवाह न करने की प्रवृत्ति
(B) तलाक दर में बढ़ोत्तरी
(C) छोटा परिवार रखने की प्रवृत्ति
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 15.
विधवा विवाह का सबसे अधिक प्रचार किसने किया था?
(A) दयानंद सरस्वती
(B) विवेकानंद
(C) राजा राममोहन राय
(D) ईश्वर चंद्र विद्यासागर।
उत्तर:
ईश्वरचंद्र विद्यासागर।

प्रश्न 16.
किस काल को स्त्रियों के लिए काला युग कहा जाता है?
(A) मध्य काल
(B) वैदिक काल
(C) उत्तर वैदिक काल
(D) आधुनिक काल।
उत्तर:
मध्य काल।

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प्रश्न 17.
किस कानून ने बहुविवाह प्रथा को समाप्त कर दिया था?
(A) हिंदू विवाह एक्ट 1955
(B) हिंदू उत्तराधिकार एक्ट 1956
(C) अस्पृश्यता अपराध एक्ट 1955
(D) दहेज निरोधक एक्ट 1961
उत्तर:
हिंदू विवाह एक्ट, 1955.

प्रश्न 18.
किस युग में नारी को देवी तथा शक्ति का नाम दिया गया था?
(A) वैदिक युग
(B) उत्तर वैदिक काल
(C) मध्य युग
(D) आधुनिक युग।
उत्तर:
वैदिक युग।

प्रश्न 19.
विधवाओं के लिए आश्रमों की व्यवस्था किसने शुरू की थी?
(A) महर्षि कार्वे
(B) स्वामी दयानंद
(C) ज्योतिबा फूले
(D) विवेकानंद सरस्वती।
उत्तर:
महर्षि कार्वे।

प्रश्न 20.
केंद्रीय परिवार में आजकल स्त्री का पुरुष के साथ क्या संबंध है?
(A) नौकरानी का
(B) साथी का
(C) रिश्तेदार का
(D) सिर्फ बच्चों की माँ का।
उत्तर:
साथी का।

प्रश्न 21.
कौन-से काल में नारी की सामाजिक प्रस्थिति पुरुषों के समान थी?
(A) वैदिक काल
(B) मध्य काल
(C) आधुनिक काल
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
वैदिक काल।

प्रश्न 22.
वी० पी० सिंह सरकार ने 27% आरक्षण की घोषणा कब की थी?
(A) 13 अगस्त, 1990
(B) जनवरी, 1991
(C) 26 जनवरी, 1992.
उत्तर:
13 अगस्त, 1990.

प्रश्न 23.
निम्नलिखित में से कौन-सा वर्ग पिछड़ा नहीं माना जाता है?
(A) अनुसूचित जाति
(B) अनुसूचित जनजाति
(C) अन्य पिछड़ा वर्ग
(D) सामान्य वर्ग।
उत्तर:
सामान्य वर्ग।

प्रश्न 24.
2001 की जनगणना निम्नोक्त में से किस राज्य में जनजाति जनसंख्या है?
(A) हरियाणा
(B) पंजाब
(C) दिल्ली
(D) असम।
उत्तर:
असम।

प्रश्न 25.
निम्नलिखित में से कौन-सा निम्न जातियों का समूह है?
(A) अनुसूचित जातियाँ
(B) अनुसूचित जनजातियाँ
(C) उच्च जातियाँ
(D) सामान्य वर्ग।
उत्तर:
अनुसूचित जातियाँ।

प्रश्न 26.
2001 की जनगणना के अनुसार निम्नलिखित में से किस राज्य में जनजातीय जनसंख्या नहीं है?
(A) उत्तर प्रदेश
(B) असम
(C) मेघालय
(D) हरियाणा।
उत्तर:
हरियाणा।

प्रश्न 27.
मंडल आयोग ने निम्नोक्त में से किसकी पहचान की?
(A) अन्य पिछड़ा वर्ग की।
(B) अनुसूचित जाति की
(C) अनुसूचित जनजाति की
(D) धार्मिक अल्पसंख्यक की।
उत्तर:
अन्य पिछड़ा वर्ग की।

प्रश्न 28.
अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित आयोग कौन-सा है?
(A) श्रीनिवास
(B) कुरियन
(C) मंडल
(D) गांधी।
उत्तर:
मंडल।

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में से किस वर्ष वर्ग जातीय आधार पर जनगणना नहीं हुई?
(A) 1921
(B) 1931
(C) 2001
(D) 2011
उत्तर:
2001

प्रश्न 30.
भारतीय समाज में निम्नलिखित में से किस श्रेणी के लिए संविधान में विशेष अधिकारों का प्रावधान नहीं है?
(A) अनुसूचित जाति
(B) अनुसूचित जनजाति
(C) अन्य पिछड़ा वर्ग
(D) सामान्य वर्ग।
उत्तर:
सामान्य वर्ग।

प्रश्न 31.
‘पिछड़े वर्ग’ आयोग की रिपोर्ट कब पेश की गई थी?
(A) 1852 में
(B) 1853 में
(C) 1952 में
(D) 1953 में।
उत्तर:
1953 में।

प्रश्न 32.
निम्न में से कौन सामाजिक स्तरीकरण के आधार हैं?
(A) जाति
(B) वर्ग
(C) लिंग
(D) ये सभी।
उत्तर:
ये सभी।

प्रश्न 33.
निम्न में से कौन-कौन से अन्यथा सक्षम की श्रेणी में आते हैं?
(A) दृष्टि बाधित
(B) अपाहिज
(C) शारीरिक रूप से बाधित
(D) ये सभी।
उत्तर:
ये सभी।

प्रश्न 34.
बहिष्कार, अनादर और शोषण-ये किसके आयाम हैं?
(A) जाति के
(B) जनजाति के
(C) अस्पृश्यता के
(D) उपर्युक्त सभी के।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी के।

प्रश्न 35.
स्त्री पुरुष तुलना लिखी गई।
(A) 1782 में
(B) 1882 में
(C) 1982 में
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
1982 में।

प्रश्न 36.
चार वर्षों का वर्गीकरण लगभग कितने साल पुराना है?
(A) 2000
(B) 3000
(C) 4000
(D) 5000
उत्तर:
3000

प्रश्न 37.
जनजातीय जनसंख्या का कितने प्रतिशत मध्य भारत में रहता है?
(A) 50%
(B) 65%
(C) 85%
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
65%

प्रश्न 38.
निम्न में से कौन-सा सामाजिक भेदभाव का स्पष्ट रूप है?
(A) महिलाएँ
(B) अन्य पिछड़े वर्ग
(C) अस्पृश्यता
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
अस्पृश्यता।

प्रश्न 39.
सामाजिक विषमता एवं सामाजिक बहिष्कार सामाजिक है, क्योंकि :
(A) यह व्यक्ति से संबंधित है
(B) यह समूह से संबंधित है
(C) यह सामाजिक है, आर्थिक नहीं
(D) (B) व (C) दोनों हैं।
उत्तर:
(B) व (C) दोनों है।

प्रश्न 40.
जनजातीय जनसंख्या का कितने प्रतिशत भाग पूर्वोत्तर राज्यों में निवास करता है?
(A) 2.5%
(B) 4.5%
(C) 11%
(D) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
11%

प्रश्न 41.
निम्न में से क्या हमारे समाज की विशेषताओं में सबसे बड़ी चिंता का विषय रहा है?
(A) असीमित विषमता
(B) अपवर्जन
(C) बहिष्कार
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अन्य पिछड़ा वर्ग क्या होता है?
अथवा
अन्य पिछड़े वर्ग कौन से हैं?
उत्तर:
जो लोग मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं वे पिछड़े वर्ग में आते हैं। अनुसूचित जनजातियां, अनुसूचित जातियां, छोटे किसान, भूमिहीन लोग सभी इस श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 2.
सत्य शोधक समाज की स्थापना क्यों तथा किसने की थी?
उत्तर:
सत्य शोधक समाज की स्थापना 1873 में ज्योतिबा फूले ने की थी। क्योंकि वे पश्चिमी भारत के पिछड़े वर्गों को ऊपर उठाना चाहते थे।

प्रश्न 3.
सत्य शोधक समाज के आंदोलन को क्या नाम दिया गया था?
उत्तर:
सत्य शोधक समाज के आंदोलन को सांस्कृतिक क्रांति का नाम दिया गया था।

प्रश्न 4.
झूम खेती या स्थानांतरित खेती कौन करता है?
उत्तर:
झूम खेती या स्थानांतरित खेती जनजाति के लोग करते हैं।

प्रश्न 5.
भारत की सबसे ज्यादा उन्नति करने वाली जनजाति कौन सी है?
उत्तर:
भारत की सबसे ज़्यादा उन्नति करने वाली जनजाति नागा जनजाति है।

प्रश्न 6.
नागा जाति …………………. में रहती है।
उत्तर:
नागा जाति नागालैंड में रहती है।

प्रश्न 7.
टोडा जनजाति किस पशु की पूजा करती है?
उत्तर:
टोडा जनजाति में भैंस की पूजा की जाती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

प्रश्न 8.
किस जनजाति में गांव को मुंड कहते हैं?
उत्तर:
टोडा जनजाति में गांव को मुंड कहते हैं।

प्रश्न 9.
अस्पृश्यता अधिनियम का खाका किसने तैयार किया था?
उत्तर:
अस्पृश्यता अधिनियम का खाका डॉ० कैलाशनाथ माटजू ने तैयार किया था।

प्रश्न 10.
भारत की सबसे बड़ी जनजाति कौन-सी है?
उत्तर:
संथाल।

प्रश्न 11.
संथाल जनजाति कहां पायी जाती है?
उत्तर:
बिहार तथा झारखंड में।

प्रश्न 12.
खासी जनजाति में किस प्रकार का समाज पाया जाता है?
उत्तर:
खासी जनजाति में मात-सत्तात्मक समाज पाया जाता है।

प्रश्न 13.
टोटम क्या होता है?
उत्तर:
टोटम कोई प्रतीक या चिन्ह होता है जिसको पवित्र मानकर उसकी पूजा की जाती है। यह कोई जानवर, पेड़, पौधा, पत्थर इत्यादि भी हो सकता है।

प्रश्न 14.
किस राज्य में जनजातियों की संख्या सबसे अधिक है?
उत्तर:
मध्य प्रदेश में सबसे अधिक जनजातियां रहती हैं।

प्रश्न 15.
भारत की कितने प्रतिशत जनसंख्या पिछड़ी जातियों की है?
उत्तर:
52.04% जनसंख्या।

प्रश्न 16.
हरिजन छात्रों को छात्रवृत्ति तथा मार्ग व्यय देने का कार्यक्रम कब शुरू हुआ था?
उत्तर:
हरिजन छात्रों को छात्रवृत्ति तथा मार्ग व्यय देने का कार्यक्रम 1952-53 में शुरू हुआ था।

प्रश्न 17.
गांधी जी ने अस्पृश्य जातियों को क्या नाम दिया था?
अथवा
अनुसूचित जाति को हरिजन (नाम) किसने कहा?
अथवा
हरिजन शब्द से आप क्या समझते हैं तथा यह किसने दिया?
अथवा
हरिजन शब्द का अर्थ दीजिए।
उत्तर:
गांधी जी ने अस्पृश्य जातियों को हरिजन का नाम दिया था। हरि का अर्थ है भगवान् तथा जन का अर्थ है बच्चे। इस तरह हरिजन का अर्थ है भगवान् के बच्चे।

प्रश्न 18.
डॉ० बी० आर० अंबेदकर ने क्यों तथा किस धर्म को अपनाया था?
उत्तर:
डॉ० बी० आर० अंबेदकर ने अस्पृश्यता के अभिशाप से तंग आकर अपनी जाति के लोगों के साथ बौद्ध धर्म अपना लिया था।

प्रश्न 19.
गोलमेज़ सम्मेलन कितने तथा कब हुए थे?
उत्तर:
1931-32 में तीन गोलमेज़ सम्मेलन हुए थे।

प्रश्न 20.
डॉ० अंबेदकर ने गोलमेज़ सम्मेलन में क्या मांग रखी थी?
उत्तर:
डॉ० अंबेदकर ने गोलमेज़ सम्मेलन में हरिजनों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग रखी थी।

प्रश्न 21.
क्या हरिजनों को गोलमेज़ सम्मेलन में अलग मताधिकार मिल गया था?
उत्तर:
जी हां, मिल गया था।

प्रश्न 22.
अस्पृश्यता अपराध कानून कब पास हुआ था?
उत्तर:
अस्पृश्ता अपराध कानून 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 23.
अस्पृश्यता कानून में क्या प्रावधान था?
उत्तर:
अस्पृश्यता कानून में यह प्रावधान था कि अस्पृश्यता को बढ़ावा देना कानूनन जुर्म है। जो कोई इस का प्रयोग करेगा उसे 6 महीने कैद या जुर्माना या दोनों इकट्ठे हो सकते हैं।

प्रश्न 24.
पूना पैक्ट कब और किन में हुआ था?
उत्तर:
पूना पैक्ट 1931 में महात्मा गांधी तथा लॉर्ड इर्विन में हुआ था।

प्रश्न 25.
पूना पैक्ट में अस्पृश्य जातियों के लिए क्या प्रावधान था?
उत्तर:
पूना पैक्ट के अनुसार अस्पृश्य जातियों को समाज का अंग समझा गया।

प्रश्न 26.
अस्पृश्य जातियों को अनुसूचित नाम कब से दिया गया?
उत्तर:
1935 में अस्पृश्य जातियों को अनुसूचित जातियों का नाम दिया गया।

प्रश्न 27.
नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम क्यों तथा कब पास हुआ था?
उत्तर:
1955 के अस्पृश्यता अपराध कानून में बहुत-सी कमियां थीं। इन कमियों को दूर करने के लिए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिकार 1976 में पास हुआ था।

प्रश्न 28.
लोकसभा में हरिजनों के लिए कितने स्थान सुरक्षित रखे गए हैं?
उत्तर:
लोकसभा में हरिजनों के लिए 79 स्थान सुरक्षित रखे गए हैं।

प्रश्न 29.
अनुसूचित जातियों को कब और नागरिकों के समान अधिकार मिलने शुरू हो गए?
उत्तर:
आजादी के बाद अनुसूचित जातियों को और नागरिकों को समान अधिकार मिलने शुरू हो गए।

प्रश्न 30.
गांधी जी ने हरिजनों के लिए कौन-सी संस्था बनायी थी?
उत्तर:
गांधी जी ने हरिजनों के उत्थान के लिए हरिजन सेवक संघ नाम की संस्था बनायी थी।

प्रश्न 31.
अनुच्छेद 15 की धारा 7 क्या कहती है?
उत्तर:
अनुच्छेद 15 की धारा 7 के अनुसार अस्पृश्यता को बढ़ावा देने वाले को दंड दिया जाएगा।

प्रश्न 32.
पहला कांग्रेसी मंत्रिमंडल कब बना था?
उत्तर:
1936 में।

प्रश्न 33.
देश में आपात्काल (Emergency) कब लागू हुआ था?
उत्तर:
देश में आपात्काल 1975 में लागू हुआ था।

प्रश्न 34.
अनुसूचित जातियों के लिए संसद् में आरक्षण कब तक है?
उत्तर:
2020 तक।

प्रश्न 35.
बिहार राज्य पिछड़ा वर्ग संघ कब बना था?
उत्तर:
1947 में।

प्रश्न 36.
झूम कृषि कौन करता है?
उत्तर:
झूम कृषि जनजातियों के लोग करते हैं।

प्रश्न 37.
जनजाति की कोई विशेषता बताएं।
उत्तर:
यह निश्चित भू-भाग में रहती है, इनकी अपनी ही संस्कृति और भाषा होती है तथा जीवन जीने का ढंग आदिम होता है।

प्रश्न 38.
जनजातियों के लोग कौन-सी समस्याओं का सामना करते हैं?
उत्तर:
जनजातियों के लोग अशिक्षा, अत्यधिक निर्धनता, अंधविश्वास जैसी बहुत-सी समस्याओं का सामना करते हैं।

प्रश्न 39.
नागा, खासी, गोंड, संथाल, कूकी, भील इत्यादि क्या हैं?
उत्तर:
यह सब जनजातियों के नाम हैं।

प्रश्न 40.
कुछ सामाजिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
शिक्षा लेने की पाबंदी, कुओं से पानी भरने की पाबंदी, उच्च जातियों से मेल-जोल की पाबंदी इत्यादि।

प्रश्न 41.
कुछ धार्मिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
धार्मिक संस्कार करने की पाबंदी, मंदिरों में जाने की पाबंदी, धार्मिक पुस्तकें पढ़ने की पाबंदी इत्यादि।

प्रश्न 42.
निर्योग्यता का अर्थ बताएं।
उत्तर:
उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों पर लगाई जाने वाली पाबंदी को निर्योग्यता कहते हैं।

प्रश्न 43.
सुधार आंदोलन का अर्थ बताएं।
उत्तर:
स्त्रियों तथा निम्न जातियों को ऊपर उठाने के लिए चलाए गए आंदोलन को सुधार आंदोलन कहते हैं।

प्रश्न 44.
मंडल आयोग की मुख्य सिफ़ारिश क्या थी?
उत्तर:
पिछड़ी जातियों के लिए सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण।

प्रश्न 45.
जनजातियों के बच्चों को शिक्षा लेने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा सकता है?
उत्तर:
उनके बच्चों को छात्रवृत्तियां देकर, मुफ्त किताबें देकर, उनके क्षेत्रों में स्कूल खोलकर उन्हें शिक्षा लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

प्रश्न 46.
जनजातियों के क्षेत्रों में कैसे सुधार किया जा सकता है?
उत्तर:
उनके क्षेत्रों में यातायात के साधनों का विकास करके, उन्हें रोजगार उपलब्ध करवा कर तथा सस्ते ऋण देकर उनमें सुधार किया जा सकता है।

प्रश्न 47.
संविधान के अनुसार अनुसूचित जातियों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
संविधान के अनुसार अनुसूचित जातियों की संख्या 2 1 2 है।

प्रश्न 48.
संविधान के किस अनुच्छेद में जनजातियों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान है?
उत्तर:
अनुच्छेद 335.

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प्रश्न 49.
जनजातियों के लिए लोकसभा में कितने स्थान आरक्षित हैं?
उत्तर:
जनजातियों के लिए लोकसभा में 41 स्थान आरक्षित हैं।

प्रश्न 50.
राज्य विधानसभाओं में जनजातियों के लिए कितने स्थान आरक्षित हैं?
उत्तर:
राज्य विधानसभाओं में जनजातियों के लिए 527 स्थान आरक्षित हैं।

प्रश्न 51.
जनजातियों के लिए सभी सेवाओं की नौकरियों में कितने स्थान आरक्षित हैं?
उत्तर:
जनजातियों के लिए सभी सेवाओं की नौकरियों में 7.5% स्थान आरक्षित हैं।

प्रश्न 52.
पिछड़े वर्गों की क्या समस्याएं होती हैं?
उत्तर:
अशिक्षा, ऋणग्रस्तता, व्यवसाय चुनने की समस्या इत्यादि पिछड़े वर्गों की समस्याएं होती हैं।

प्रश्न 53.
काका केलकर आयोग क्यों तथा किस लिए बनाया गया था?
उत्तर:
काका केलकर आयोग 29 जनवरी, 1953 को पिछड़ों के कल्याण के लिए सुझाव देने के लिए बनाया गया था।

प्रश्न 54.
मंडल आयोग का गठन कब हुआ था और इसके अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
मंडल आयोग का गठन 20 दिसंबर, 1978 को हुआ था तथा इसके अध्यक्ष बी० पी० मंडल थे।

प्रश्न 55.
भारतीय संविधान के किस अनुच्छेद के तहत अनुसूचित जनजातियों की पहचान की जाती है?
उत्तर:
अनुच्छेद 335 तथा 336.

प्रश्न 56.
डॉ० अंबेदकर ने अस्पृश्यता से तंग आकर कौन-सा धर्म अपना लिया था?
उत्तर:
डॉ० अंबेदकर ने अस्पृश्यता से तंग आकर बौद्ध धर्म अपना लिया था।

प्रश्न 57.
संविधान के किस अनुच्छेद के अनुसार सभी लोग सार्वजनिक तथा धार्मिक स्थानों पर जाने के लिए स्वतंत्र
उत्तर:
अनुच्छेद 330 तथा 332.

प्रश्न 58.
………………… को भारतीय समाज का स्वर्णिम युग कहते हैं।
उत्तर:
वैदिक काल को भारतीय समाज का स्वर्णिम युग कहते हैं।

प्रश्न 59.
उत्तर वैदिक काल का समय बताएं।
उत्तर:
ईसा से 600 वर्ष पहले से 300 सन् तक।

प्रश्न 60.
महात्मा गांधी ने महिलाओं के उत्थान के लिए क्या किया?
उत्तर:
महात्मा गांधी ने महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में लाने का प्रयास किया ताकि वह घर की चारदीवारी से निकल कर आत्म-निर्भर बन सकें।

प्रश्न 61.
शारदा बिल क्या था?
उत्तर:
शारदा बिल 1929 में पास हुआ था। इस बिल के अनुसार बाल विवाह पर पाबंदी लगा दी गई थी।

प्रश्न 62.
शारदा बिल के अनुसार विवाह के लिए क्या उम्र होनी चाहिए?
उत्तर:
शारदा बिल के अनुसार विवाह के लिए न्यूनतम आयु 14 वर्ष लड़कियों के लिए तथा 18 वर्ष लड़कों के लिए निश्चित की गई।

प्रश्न 63.
विधवा विवाह कानून कब पास हआ था?
उत्तर:
विधवा विवाह कानून 1856 में पास हुआ था।

प्रश्न 64.
विधवा विवाह कानून किस की कोशिशों का नतीजा था?
उत्तर:
विधवा विवाह कानून ईश्वर चंद्र विद्यासागर की कोशिशों का नतीजा था।

प्रश्न 65.
किस वेद ने विधवा पुनर्विवाह को मान्यता दी है?
उत्तर:
अथर्ववेद ने विधव वाह को मान्यता दी है।

प्रश्न 66.
किसने राज्यों को लिंग, धर्म तथा जाति के आधार पर भेद न रखने को कहा है?
उत्तर:
भारतीय संविधान ने राज्यों को किसी भी प्रकार का भेद न रखने को कहा है।

प्रश्न 67.
भारत में कानून क्यों सफल नहीं हो पाए हैं?
उत्तर:
लोगों के अशिक्षित होने की वजह से कानून भारत में सफल नहीं हो पाए हैं।

प्रश्न 68.
वैदिक युग में नारी को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
वैदिक युग में नारी को देवी तथा शक्ति का नाम दिया गया था।

प्रश्न 69.
किस युग में औरतों का धार्मिक अधिकार खत्म कर दिया गया था?
उत्तर:
उत्तर वैदिक काल में औरतों का धार्मिक अधिकार खत्म कर दिया गया था।

प्रश्न 70.
बाल विवाह तथा पर्दा प्रथा क्यों शुरू हुए?
उत्तर:
विदेशी आक्रमणों की वजह से तथा रक्त शुद्धता बनाए रखने के लिए बाल विवाह तथा पर्दा प्रथा शुरू हुए।

प्रश्न 71.
स्त्रियां पुरुषों पर निर्भर क्यों थीं?
उत्तर:
अशिक्षित होने की वजह से स्त्रियां पुरुषों पर हर प्रकार से निर्भर थीं।

प्रश्न 72.
गर्भपात को कानूनी मान्यता कब मिली थी?
उत्तर:
सन 1971 में।

प्रश्न 73.
किस वर्ष को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया था?
उत्तर:
1975 को अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में मनाया गया था।

प्रश्न 74.
……………….. राज्य में महिलाएं पुरुषों से अधिक हैं।
उत्तर:
केरल में महिलाएं पुरुषों से अधिक हैं।

प्रश्न 75.
कब यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता?
उत्तर:
अगर पति पत्नी के बिना यज्ञ करे तो उस यज्ञ को पूर्ण नहीं माना जाता।

प्रश्न 76.
पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय नारी में क्या परिवर्तन आया?
उत्तर:
पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय नारी घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर पश्चिमी नारी बन गई।

प्रश्न 77.
मुस्लिम स्त्रियों की क्या स्थिति है?
उत्तर:
मुस्लिम स्त्रियों की स्थिति आज भी दयनीय है क्योंकि उनको न तो कोई अधिकार प्राप्त है तथा आज भी मुस्लिम मर्द चार विवाह कर सकते हैं।

प्रश्न 78.
दहेज निरोधक अधिनियम प्रथम कब पास हुआ था?
उत्तर:
दहेज निरोधक अधिनियम 1961 में पास हुआ था।

प्रश्न 79.
दहेज निरोधक अधिनियम की प्रमुख धारा क्या थी?
उत्तर:
दहेज निरोधक अधिनियम के अनुसार विवाह तय करते समय या विवाह के समय अगर कोई आर्थिक शर्त रखी जाएगी तो यह दंडनीय अपराध है तथा इसके लिए सज़ा तथा जुर्माना तथा दोनों भी हो सकते हैं।

प्रश्न 80.
बालिग और नाबालिग में क्या अंतर है?
उत्तर:
बालिग की उम्र 18 साल से ऊपर तथा नाबालिग की उम्र 18 साल से कम होती है।

प्रश्न 81.
ज्ञान का प्रतीक कौन माना जाता है?
उत्तर:
ज्ञान का प्रतीक नारी मानी जाती है।

प्रश्न 82.
औरतों को वोट देने का अधिकार कब प्राप्त हुआ?
उत्तर:
औरतों को वोट देने का अधिकार 1935 में प्राप्त हुआ।

प्रश्न 83.
विवाहित स्त्रियों की संपत्ति संबंधी अधिनियम कब पास हुआ था?
उत्तर:
विवाहित स्त्रियों की संपत्ति संबंधी अधिनियम 1874 में पास हुआ था।

प्रश्न 84.
महिलाओं की भारतीय समिति की स्थापना किसने की थी?
उत्तर:
श्रीमती ऐनी बेसेंट ने।

प्रश्न 85.
स्त्रियों को संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिनियम कब पास हुआ था?
उत्तर:
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत स्त्रियों को भी पुरुषों के समान पिता की संपत्ति में उत्तराधिकार का अधिकार मिल गया था।

प्रश्न 86.
किस कानून ने बहु-विवाह प्रथा को समाप्त कर दिया था?
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत बहु-विवाह की प्रथा को खत्म कर दिया था।

प्रश्न 87.
किस प्रकार के विवाह को हिंदू विवाह अधिनियम 1955 ने मान्यता दी थी?
उत्तर:
इस अधिनियम ने एक विवाह को मान्यता दी थी।

प्रश्न 88.
आजकल स्त्रियों की स्थिति कैसी है?
उत्तर:
आजकल स्त्रियों की स्थिति धीरे-धीरे ऊंची हो रही है।

प्रश्न 89.
संयुक्त तथा केंद्रीय परिवारों में स्त्रियों की कैसी स्थिति होती है?
उत्तर:
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की निम्न स्थिति होती है तथा केंद्रीय परिवारों में उच्च स्थिति होती है।

प्रश्न 90.
स्त्रियों की स्थिति पर सुधार आंदोलनों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
बाल विवाह कम हो गए, सती प्रथा खत्म हो गई तथा विधवा विवाह होने शुरू हो गए।

प्रश्न 91.
पिछड़ा वर्ग किसे कहते हैं?
उत्तर:
जो लोग मेहनत मजदूरी करके अपना पेट पालते हैं वे पिछड़े वर्ग में आते हैं। अनुसूचित जनजातियां, अनुसूजित जातियां, छोटे किसान, भूमिहीन लोग सभी इस श्रेणी में आते हैं।

प्रश्न 92.
जनजाति क्या होती है?
उत्तर:
जनजाति व्यक्तियों का वह समूह होता है जो दूर जंगलों या पहाड़ों में आदिम या पुरातन अवस्था में रहता है तथा जिसकी अपनी ही संस्कृति, भाषा, रहन-सहन, खाना-पीना होते हैं।

प्रश्न 93.
झूम कृषि किसे कहते हैं?
उत्तर:
झूम कृषि जनजाति के लोग करते हैं। जब एक स्थान पर उत्पादन कम हो जाता है तो ये लोग उस स्थान पर कृषि करना छोड़ देते हैं तथा किसी और स्थान पर जाकर वन को काटकर उस स्थान को साफ कर देते हैं। फिर वह उस स्थान पर कृषि करना शुरू कर देते हैं। इसी को झूम अथवा स्थानांतरित कृषि कहते हैं।

प्रश्न 94.
निर्योग्यता का क्या अर्थ है?
उत्तर:
प्राचीन समय में जाति प्रथा व्याप्त थी तथा समाज उच्च और निम्न जातियों में विभाजित था। उच्च जातियों द्वारा निम्न जातियों पर बहुत-सी पाबंदियां लगी होती थीं। इन पाबंदियों को निर्योग्यता कहा जाता था। निर्योग्यताएं कई प्रकार की होती हैं जैसे कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक इत्यादि।

प्रश्न 95.
सामाजिक तथा आर्थिक निर्योग्यता का अर्थ बताएं।
उत्तर:
ऊँची जातियों के निम्न जातियों के साथ सामाजिक मेल-जोल पर पाबंदियां हुआ करती थीं। इनको निम्न जातियों की सामाजिक निर्योग्यताएं कहते थे। इसी प्रकार निम्न जातियों के लोगों को कुछ कार्य करने की पाबंदी होती थी ताकि वे उस कार्य को करके पैसे न कमा सकें। इसे आर्थिक निर्योग्यता कहते हैं।

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प्रश्न 96.
धार्मिक. निर्योग्यता क्या होती थी?
उत्तर:
प्राचीन समाज उच्च तथा निम्न जातियों में बँटा हुआ था। निम्न जातियों के मंदिरों में जाने, धार्मिक ग्रंथ पढ़ने तथा धार्मिक संस्कार करने पर पाबंदी हुआ करती थी क्योंकि निम्न जातियों को अपवित्र तथा अस्पृश्य समझा जाता था। इसको ही धार्मिक निर्योग्यताएं कहा जाता था।

प्रश्न 97.
वंचित समूह किसे कहते हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
हरेक समाज में कुछ ऐसे समूह होते हैं जो आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक तथा राजनीतिक दृष्टि से कमज़ोर होते हैं। इन समूहों को वंचित समूह कहा जाता है। उदाहरण के लिए अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां, महिलाएं, अन्य पिछड़े वर्ग इत्यादि।

प्रश्न 98.
क्षतिपूर्ति विभेद नीति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
हरेक समाज में कुछ वंचित समूह होते हैं। जब इन वंचित समूहों को समान अवसर उपलब्ध करवाने के लिए उनके लिए विशेष अतिरिक्त अवसरों का प्रावधान किया जाए तो इस नीति को क्षतिपूर्ति विभेद नीति कहा जाता है। उदाहरण के लिए भारत में वंचित समूहों के लिए आरक्षण रखा गया है।

प्रश्न 99.
संविधान में पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए किए गए प्रावधान बताएं।
उत्तर:
संविधान में अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा अन्य पिछड़े वर्गों के कल्याण के लिए प्रावधान रखे गए हैं। उन्हें शिक्षण संस्थाओं, सरकारी नौकरियों में आरक्षण दिया गया है ताकि वह सामाजिक स्थिति सुधार सकें। उन्हें अपनी भाषा, संस्कृति इत्यादि के विकास के अवसर प्रदान किए गए हैं। अल्पसंख्यकों को अपना धर्म मानने की छूट दी गई है।

प्रश्न 100.
कुछ सामाजिक निर्योग्यताओं के बारे में बताएं।
उत्तर:

  • निम्न जातियों के लिए उच्च जातियों के कुंओं से पानी लेने की पाबंदी थी।
  • निम्न जातियों को शिक्षा ग्रहण करने की पाबंदी थी।।
  • निम्न जातियां उच्च जातियों के लोगों से मेल-जोल नहीं रख सकती थीं।
  • निम्न जातियां उच्च जातियों के लोगों के सामने नहीं जा सकती थीं।

प्रश्न 101.
कुछ धार्मिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:

  • निम्न जातियों पर धार्मिक पुस्तकें पढ़ने पर पाबंदी थी।
  • निम्न जातियों के लोग मंदिरों में नहीं जा सकते थे।
  • वह धार्मिक संस्कार नहीं कर सकते थे।
  • वह मंदिरों के कुओं के नज़दीक नहीं जा सकते थे।

प्रश्न 102.
हरिजनों की सामाजिक स्थिति को कैसे ऊँचा किया जा सकता है?
उत्तर:

  • जाति प्रथा को खत्म करके उनकी सामाजिक स्थिति को ऊँचा किया जा सकता है।
  • गंदे पेशों को खत्म करना चाहिए।
  • अस्पृश्यता विरोधी प्रचार होने चाहिएं।
  • अलग-अलग प्रकार की निर्योग्यताएं खत्म होनी चाहिएं।
  • उनमें शिक्षा का प्रचार तथा प्रसार होना चाहिए।

प्रश्न 103.
भारत में कितने अनुसूचित जातियों तथा अनुसूचित जनजातियों के लोग रहते हैं?
उत्तर:
1991 की जनगणना के अनुसार भारत में 13.82 करोड़ लोग अनुसूचित जातियों के लोग रहते हैं जो कि देश की जनसंख्या का 16.48% हैं। सन् 2001 की जनसंख्या के अनुसार भारत में 6.7 करोड़ लोग अनुसूचित जनजातियों के है जो कि कुल जनसंख्या का 8.28% होते हैं।

प्रश्न 104.
स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले कुछ अपराध बताएं।
उत्तर:
स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले अपराधों में से कुछेक हैं दहेज हत्या, छेड़ छाड़, बलात्कार, पत्नी का शारीरिक उत्पीड़न, भ्रूण हत्या इत्यादि।

प्रश्न 105.
पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय नारी की स्थिति में क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर:
पश्चिमी शिक्षा प्राप्त करने के बाद भारतीय नारी घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर पश्चिमी नारी बन गई। उसने शिक्षा प्राप्त करनी शुरू की जिससे उसने नौकरी करके स्वयं कमाना शुरू कर दिया।

प्रश्न 106.
अंग्रेज़ों के समय स्त्रियों के लिए बनाए कुछ कानूनों के नाम बताओ।
उत्तर:

  • सती प्रथा निरोधक अधिनियम, 1829.
  • विधवा विवाह अधिनियम, 1856.
  • विवाहित स्त्रियों का संपत्ति संबंधी अधिनियम, 1874.
  • बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929.

प्रश्न 107.
स्वतंत्रता के पश्चात् स्त्रियों के लिए बनाए कुछ कानूनों के नाम बताएं।
उत्तर:

  • विशेष विवाह अधिनियम, 1954.
  • हिंद विवाह अधिनियम, 1955.
  • हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम, 1956.
  • दहेज निरोधक अधिनियम, 1961, 1986.

प्रश्न 108.
अल्पसंख्यक क्या होता है?
अथवा
अल्पसंख्यक समुदाय किसे कहते हैं?
उत्तर:
किसी समाज में जब जनसंख्या में कुछ लोगों का प्रतिनिधित्व कम होता है उन्हें अल्पसंख्यक कहते हैं। इसका अर्थ यह है कि कुल जनसंख्या में से कोई समूह जो धर्म, जाति या किसी आधार पर कम संख्या में होते हैं उन्हें अल्पसंख्यक कहा जाता है।

प्रश्न 109.
भारत में अल्पसंख्यक शब्द किन लोगों के लिए प्रयोग होता है? उदाहरण दें।
उत्तर:
भारत में अल्पसंख्यक शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग होता है जो धार्मिक है जो धार्मिक दृष्टि से कम पाए जाते हैं। मुसलमान, सिक्ख, बौद्ध, ईसाई, जैन धर्मों के लोग भारत में अल्पसंख्यक समूह है।

प्रश्न 110.
भारत में अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में बताएं।
उत्तर:

  • भारत में अल्पसंख्यकों में शिक्षा का अभाव है।
  • भारत में अल्पसंख्यक के नेता ठीक नहीं हैं।
  • भारत में अल्पसंख्यकों असुरक्षा की भावना के साथ जीते हैं।
  • भारत में अल्पसंख्यक अधिक निर्धन हैं।

प्रश्न 111.
भारत में हिंदुओं, सिक्खों, ईसाइयों तथा मुसलमानों की संख्या कितनी है?
उत्तर:
1991 की जनसंख्या के अनुसार भारत में हिंदू कुल जनसंख्या का 79.8%, सिक्ख 1.7%; ईसाई 2.4% तथा मुसलमान 13.2% थे।

प्रश्न 112.
पश्चिमी संस्कृति का भारतीय स्त्रियों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
पश्चिमी सभ्यता के भारत में आने से भारत की नारियों में जागृति आ गई। पहले जो औरत घर की चारदीवारी में घुट-घुट कर रहती थी अब वह सारे बंधन तोड़कर घर से बाहर निकल कर काम करने लग गई है। उसने समाज में फैले अन्याय तथा कुरीतियों का विरोध किया तथा अपने बारे में सोचना शुरू कर दिया है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

प्रश्न 113.
मुस्लिम राजाओं के समय में स्त्रियों की कैसी स्थिति थी?
उत्तर:
मुस्लिम राजाओं या मध्य काल में स्त्रियों की स्थिति बहुत खराब थी। स्त्रियों को किसी प्रकार के अधिकार नहीं थे। उनको चीज़ तथा पैरों की जूती समझा जाता था। अगर किसी राजा को कोई स्त्री पसंद आ जाती थी तो वह उसे उठा लेता था। स्त्रियां घर की चारदीवारी में रहती थीं। उनका मुख्य काम बच्चे पैदा करना तथा घर की देखभाल करना होता था।

प्रश्न 114.
दहेज प्रथा कैसे पैदा हुई?
उत्तर:
हर किसी की इच्छा होती है कि उसकी लड़की का विवाह उससे उच्च परिवार में हो जिसे कि कुलीन विवाह .. कहते हैं। कुलीन विवाह की वजह से उच्च परिवार के लड़कों की मांग बढ़ गई जिस वजह से उच्च परिवार के लड़कों की कमी हो गई। इस वजह से इन लड़कों की कीमत बढ़ गई तथा दहेज प्रथा भी यहीं से शुरू हो गई।

प्रश्न 115.
दहेज निरोधक कानून 1986 में क्या प्रावधान था?
उत्तर:
पहला दहेज निरोधक कानून 1961 में पास हुआ था पर उसमें कुछ कमियां थीं। इन कमियों को दूर करने के लिए दहेज निरोधक कानून 1986 पास किया गया जिसमें यह प्रावधान था कि दहेज लेने या देने वाले व्यक्ति को 5 वर्ष की सज़ा या 15,000 रुपये जुर्माना या दोनों भी हो सकते हैं।

प्रश्न 116.
आजकल स्त्रियों की क्या स्थिति है?
उत्तर:
आजकल स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार प्राप्त हो गए हैं। अब औरतें घरों से बाहर निकल कर दफ्तरों में काम कर रही हैं। अब औरत हर वह काम कर रही है जो पहले सिर्फ पुरुष किया करते थे। वह पढ़ रही है, नौकरी कर रही है, घर संभाल रही है। आज स्त्रियों का भी पश्चिमीकरण हो गया है।

प्रश्न 117.
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की क्या दशा होती है?
उत्तर:
संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न होती है। स्त्रियों का काम घर संभालने का होता है। उनको न तो कोई अधिकार प्राप्त होता है तथा न ही वह घर से बाहर जा सकती हैं। किसी मामले में न तो उसकी सलाह ली जाती है तथा न ही उसकी बात मानी जाती है। इस तरह उसकी स्थिति काफ़ी खराब होती है।

प्रश्न 118.
केंद्रीय परिवारों में स्त्रियों की किस प्रकार की स्थिति होती है?
उत्तर:
केंद्रीय परिवारों में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी होती है। इन परिवारों में स्त्रियां घर से बाहर जाकर नौकरी करती हैं। घर के हर फैसले में उनकी सलाह ली जाती है तथा ज्यादातर उनकी बात मान ली जाती है क्योंकि वह पुरुष के साथ कमाने के मामले में कंधे से कंधा मिला कर खड़ी होती है। इस तरह केंद्रीय परिवारों में स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी होती है। ..

प्रश्न 119.
प्रांरभिक सुधार आंदोलनों के कौन-से नेताओं ने स्त्री सुधार में योगदान दिया था?
उत्तर:
प्रांरभिक सुधार आंदोलनों के प्रसिद्ध नेता थे राजा राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, केशव चंद्र सेन, ज्योतिबा फूले, स्वामी दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, महर्षि कार्वे, गोविंद रानाडे इत्यादि। इन सभी ने स्त्रियों की निर्योग्यताओं की आलोचना की तथा स्त्री सुधार के लिए कदम उठाए।

प्रश्न 120.
असक्षमता से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो किसी बीमारी, विकलांगता अथवा बेसहारा होने के कारण स्थायी/ अस्थायी रूप से कार्य करने में अक्षम होते हैं। उनकी इस प्रकार की स्थिति को असक्षमता कहते हैं।

प्रश्न 121.
निर्धनता का असक्षमता से क्या संबंध है?
उत्तर:
निर्धनता का असक्षमता से गहरा संबंध है। इसका कारण यह है कि निर्धन स्त्रियां कपोषण, बीमारियों. अधिक लोगों में घर में दुर्घटना इत्यादि का शिकार हो जाती हैं तथा असक्षमता आ जाती है। इस कारण होकर असक्षक्त तथा विकलांग हो जाते हैं।

प्रश्न 122.
कौन-से काल में नारी की सामाजिक प्रस्थिति पुरुषों के समान थी?
उत्तर:
वैदिक काल में नारी की सामाजिक प्रस्थिति पुरुषों के समान थी।

प्रश्न 123.
कोई एक मूलभूत अधिकार बताइए।
उत्तर:
जीवन जीने का अधिकार हमारा मूलभूत अधिकार है।

प्रश्न 124.
सामाजिक विषमता में सामाजिक क्या है?
उत्तर:
सामाजिक विषमता तथा बहिष्कार सामाजिक व्यक्ति है, परंतु यह अलग-अलग समूहों के लिए है। इन्हें सामाजिक इस भावना में कहा जाता है कि यह आर्थिक नहीं है। वास्तव में यह व्यवस्थित तथा संगठनात्मक है।

प्रश्न 125.
बीसवीं शताब्दी के दौरान सन् – – – में जाति के आधार पर अंतिम जनगणना की गई।
उत्तर:
बीसवीं शताब्दी के दौरान सन् 1931 में जाति के आधार पर अंतिम जनगणना की गई।

प्रश्न 126.
बी.पी. मंडल – – – आयोग के अध्यक्ष थे जिन्होंने ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ के लिए आरक्षण की सिफ़ारिश की?
उत्तर:
बी.पी. मंडल मंडल आयोग के अध्यक्ष थे जिन्होंने ‘अन्य पिछड़े वर्ग’ के लिए आरक्षण की सिफ़ारिश की।

प्रश्न 127.
महात्मा गांधी ने निम्न जातियों के लिए किस शब्द का प्रयोग किया?
उत्तर:
महात्मा गांधी ने निम्न जातियों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया।

प्रश्न 128.
उत्तरी भारत की किसी प्रमुख जनजाति का नाम बताएँ।
उत्तर:
गद्दी उत्तरी भारत की प्रमुख जनजाति है जो अधिकतर हिमाचल प्रदेश में पाई जाती है। प्रश्न 129. निम्न जातियों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया? उत्तर:निम्न जातियों के लिए ‘हरिजन’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम महात्मा गांधी ने किया था।

प्रश्न 130.
मलाई परत को ‘अन्य – – – वर्ग के अंतर्गत आरक्षण से बाहर रखा गया है?
उत्तर:
मलाई परत को ‘अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आरक्षण से बाहर रखा गया है।

प्रश्न 131.
‘गद्दी, लहोले, स्पीतन तथा किन्नौरे’ जनजातियाँ किस प्रदेश में पाई जाती हैं?
उत्तर:
‘गद्दी, लहोले, स्पीतन तथा किन्नौरे’ जनजातियाँ हिमाचल प्रदेश में पाई जाती हैं।

प्रश्न 132.
अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण – – – आयोग की सिफारिशों के अनुसार दिया गया।
उत्तर:
अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार दिया गया।

प्रश्न 133.
अनुसूचित जातियों का संबंध उच्च या निम्न जाति में से किससे है?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों का संबंध निम्न जाति से है।

प्रश्न 134.
जनजातीय समाज का संबंध जाति या क्षेत्र विशेष में से किससे है?
उत्तर:
जनजातीय समाज का संबंध क्षेत्र विशेष से है।

प्रश्न 135.
भारत में लड़के के विवाह की न्यूनतम आयु ………………. वर्ष तय की गई है।
उत्तर:
भारत में लड़के के विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष तय की गई है।

प्रश्न 136.
भारत में लड़की के विवाह के लिए न्यूनतम आयु ………………. वर्ष तय की गई है।
उत्तर:
भारत में लड़की के विवाह के लिए न्यूनतम आयु 18 वर्ष तय की गई है।

प्रश्न 137.
………………. राज्य में अनुसूचित जनजाति नहीं पाई जाती है।
उत्तर:
हरियाणा राज्य में अनुसूचित जनजाति नहीं पाई जाती है।

प्रश्न 138.
जाति, धर्म तथा जनजाति में से कौन-सा क्षेत्रीय समूह है?
उत्तर:
जाति, धर्म तथा जनजाति में से जनजाति एक क्षेत्रीय समूह है।

प्रश्न 139.
सामाजिक असमानता क्या है?
उत्तर:
समाज के अलग-अलग वर्गों में व्यापत असमानता अथवा ना बराबरी को सामाजिक असमानता कहते हैं।

प्रश्न 140.
सामाजिक स्तरीकरण की परिभाषा दें।
उत्तर:
वह व्यवस्था जो एक समाज में लोगों का वर्गीकरण करते हुए एक अधिक्रमित संरचना में इन्हें श्रेणीबद्ध करती है उसे सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं।

प्रश्न 141.
भेदभाव क्या है?
उत्तर:
अगर कोई वर्ग किसी अन्य वर्ग के साथ कई आधारों पर अंतर रखे तो उसे भेदभाव कहा जाता है।

प्रश्न 142.
सत्यशोधक समाज के उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
सत्यशोधक समाज के उद्देश्य थे निम्न जातियों को समाज में ऊपर उठाना तथा स्त्रियों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देना।

प्रश्न 143.
संस्कृतिकरण की अवधारणा किसने दी थी?
उत्तर:
संस्कृतिकरण की अवधारणा एम० एन० श्रीनिवास ने दी थी।

प्रश्न 144.
सत्यशोधक समाज की स्थापना किसने की थी?
उत्तर:
सत्यशोधक समाज की स्थापना ज्योतिबा फूले ने की थी।

प्रश्न 145.
अक्षमता एक ………………….. कमज़ोरी है।
उत्तर:
अक्षमता एक शारीरिक कमजोरी है।

प्रश्न 146.
जाति प्रथा में पूर्वाग्रह पाया जाता है। सत्य या असत्य।
उत्तर:
जाति प्रथा में पूर्वाग्रह पाया जाता है-सत्य।

प्रश्न 147.
सावित्री बाई फूले ने किस जाति की शिक्षा के लिए कार्य किया?
उत्तर:
सावित्री बाई फूले ने निम्न जाति की शिक्षा के लिए कार्य किया।

प्रश्न 148.
किस जाति समूह के ज्यादातर लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे (BPL) की श्रेणी में आते हैं?
उत्तर:
निम्न जाति के ज्यादातर लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे आते हैं।

प्रश्न 149.
जनजातीय समाज की ……………….. तथा ……………….. विशेषताएं हैं।
उत्तर:
जनजातीय समाज की अलग भौगोलिक क्षेत्र तथा अलग भाषा विशेषताएं हैं।

प्रश्न 150.
भीम राम अंबेडकर का जन्म ………………. में हुआ।
उत्तर:
भीम राम अंबेडकर का जन्म 4 अप्रैल, 1891 में हुआ।

प्रश्न 151.
अछूत मानी जाने वाली जातियों का अधिक्रम में कोई स्थान नहीं है। (सही/गलत)
उत्तर:
गलत।

प्रश्न 152.
सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़ों को क्या कहा जाता है:
उत्तर:
अन्य पिछड़े वर्ग।

प्रश्न 153.
जाति व्यवस्था ही विशेष जातियों में पैदा हुए व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभावपूर्ण व्यवहार को लागू करती है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 154.
अस्पृश्यता को अखिल भारतीय प्रघटना मानना अनुचित है। (उचित/अनुचित)
उत्तर:
अनुचित।

प्रश्न 155.
अक्षमता एक जैविक कमज़ोरी है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 156.
बहिष्कार बहिष्कृत लोगों की इच्छाओं के विरुद्ध कार्यान्वित होता है। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

प्रश्न 157.
सीमांत किसान और भूमिहीन लोग निम्न जातीय समूहों में होते हैं। (सही/गलत)
उत्तर:
सही।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जनजातियों को शिक्षा लेने के लिए कैसे प्रोत्साहित किया जा रहा है?
उत्तर:
जनजातियों के बच्चों को शिक्षा लेने के लिए निम्नलिखित तरीकों से प्रोत्साहित किया जा रहा है-

  • उनके बच्चों को पढ़ने के लिए छात्रवृत्तियां दी जा रही हैं।
  • उनके बच्चों में मुफ्त किताबें बांटी जाती हैं।
  • जनजातीय क्षेत्रों में स्कूल खोले जा रहे हैं।
  • विदेशों में पढ़ने के लिए इनके बच्चों को छात्रवृत्तियां दी जाती हैं।
  • इनके क्षेत्रों में क्षेत्रीय कॉलेज खुल रहे हैं जिनमें इनको रोज़गार संबंधी शिक्षा दी जाती है ताकि यह पढ़-लिख कर अपना काम कर सकें।

प्रश्न 2.
जनजातियों को कौन-सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है?
उत्तर:
(i) जनजातीय लोग इतने दूर घने जंगलों या पहाड़ों में रहते हैं जहां यातायात के साधन तथा संचार की सुविधाएं भी नहीं पहुंच पाई हैं जिस वजह से वह आज के वैज्ञानिक युग की तरक्की से अनजान हैं।

(ii) इन लोगों का और जातियों के लोगों से लगातार शोषण हो रहा है। जब इन लोगों को पैसे की ज़रूरत होती है तो साहूकार बहुत ज्यादा ब्याज वसूलते हैं तथा इन की बनाई चीजें कम दाम पर खरीदते हैं। इन तरह इन का लगातार शोषण हो रहा है।

(iii) आजकल नए उद्योग लगने शुरू हो गए हैं जहां पर उद्योगों के मालिक इन लोगों को कम मजदूरी पर काम पर रख लेते हैं। कम मजदूरी की वजह से इनकी आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है।

(iv) आजकल नए-नए अफसर इनके क्षेत्रों में जाने लग गए हैं जहां पर अफसर इनके अंदरूनी मामलों में दखल देते हैं। इस वजह से भी इन लोगों की अफसरों के साथ समन्वय करने की समस्या आ रही है।

प्रश्न 3.
राज्य सरकारें जनजातियों के सुधार के लिए क्या-क्या कदम उठा रही हैं?
उत्तर:

  • उन्हें निशुल्क शिक्षा दी जा रही है।
  • उन्हें छात्रवृत्तियां दी जा रही हैं।
  • उन्हें मुफ्त किताबें दी जा रही हैं।
  • उनकी भूमि पर सिंचाई की व्यवस्था की जा रही है।
  • उनमें छोटे-छोटे उद्योगों का विकास किया जा रहा है।
  • उनके क्षेत्रों में यातायात तथा संचार के साधनों का विकास किया जा रहा है।
  • उन्हें सस्ते ऋण उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।
  • उनके लिए चिकित्सा, पेयजल, कानूनी सहायता इत्यादि सुविधाओं की व्यवस्था की जा रही है।
  • कई गैर-सरकारी संस्थाओं को इनकी मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

प्रश्न 4.
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम में किस प्रकार की निर्योग्यताएं हटा ली गई हैं?
उत्तर:

  • अब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को मंदिर या किसी पूजा स्थल पर जाने से नहीं रोकेगा।
  • होटलों, पार्को, क्लबों इत्यादि में भी हर किसी को आने-जाने की छूट होगी।
  • अब प्रत्येक व्यक्ति किसी भी तालाब, नदी या कुएं से पीने या नहाने के लिए पानी भर सकेगा।
  • अगर कोई इन निर्योग्तायों को मानेगा तो उसे कैद या जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।

प्रश्न 5.
1976 का नामरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम क्या था?
उत्तर:
1955 में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम पास हुआ था। यह पास तो हो गया था पर इसमें कई कमियां थीं। सबसे पहली तो यह कि यह अच्छी तरह लागू नहीं हो पाया था। लोग अब भी अस्पृश्यता का प्रयोग करते थे। इसलिए न कमियों को दूर करने के लिए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 में पास हुआ था। इस अधिनियम के अंतर्गत जो कोई भी एक बार अस्पृश्यता के प्रयोग के लिए दंडित हो गया तो वह संसद् या विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ पाएगा। कोई सरकारी कर्मचारी अगर इस का प्रयोग करेगा तो उसे दंड दिया जाएगा। केंद्र सरकार द्वारा उठाये गए कदमों की रिपोर्ट हर वर्ष संसद् में पेश होगी तथा राज्य सरकारों को भी इसके बारे में निर्देश दिए गए।

प्रश्न 6.
20 सूत्री कार्यक्रम क्या था?
उत्तर:
1975 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपात्काल घोषित कर दिया तथा निर्बल तथा शोषित वर्ग को ऊपर उठाने के लिए 20 सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की जिस की मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं –

  • सीमा से ज्यादा भूमि भूमिहीनों को दी जाएगी।
  • बेगार प्रथा को गैर-कानूनी घोषित किया जाएगा।
  • खेती करने वाले मजदूरों के लिए न्यूनतम वेतन घोषित किया जाएगा।
  • ज्यादा बिजली उत्पादन के कार्यक्रम चलाए जाएंगे।
  • कपड़े में सुधार तथा उसके वितरण की व्यवस्था की जाएगी।
  • आर्थिक अपराध करने वालों को कठोर सज़ा दी जाएगी।
  • पूँजी नियोजन की व्यवस्था को सरल किया जाएगा।
  • यातायात के लिए राष्ट्रीय परमिट व्यवस्था को शुरू किया जाएगा।
  • विद्यार्थियों को जरूरी चीजें सही मूल्यों पर दी जाएंगी।
  • पढ़े-लिखे लोगों के लिए रोज़गार की ट्रेनिंग की व्यवस्था की जाएगी।
  • उत्पादन बढ़ाकर वितरण प्रणाली ठीक की जाएगी।
  • ग़रीबों को घर बनाने के लिए जमीन दी जाएगी।
  • ग्रामीणों के ऊपर के कर्ज को खत्म किया जाएगा।
  • 50 लाख हक्टेयर जमीन पर सिंचाई की व्यवस्था की जाएगी।
  • छोटे उद्योगों को बढ़ाने के लिए योजना बनाई जाएगी।
  • शहरों में खाली पड़ी भूमि को ग़रीबों में बांटा जाएगा।
  • तस्करी खत्म करने के लिए कठोर कदम उठाए जाएंगे।
  • उद्योगों में मजदूरों को हिस्सा दिलाया जाएगा।
  • मध्यम वर्ग को आय कर में राहत दी जाएगी।
  • विद्यार्थियों को किताबें सस्ती कीमत पर उपलब्ध करवाई जाएंगी।

प्रश्न 7.
जनजातियों के गोत्र का महत्त्व बताओ।
उत्तर:

  • गोत्र अपने सदस्यों के व्यवहारों पर नियंत्रण रखता है। व्यक्ति को नियंत्रण में रहने की शिक्षा भी गोत्र ही देता है।
  • प्राचीन समाजों में जनजातियों की शासन व्यवस्था गोत्र के मुखिया ही किया करते थे। कई जनजातियां एक परिषद् निर्माण करती थीं जिसके सदस्य गोत्रों के मुखिया हुआ करते थे।

प्रश्न 8.
सुधार आंदोलनों से स्त्रियों की स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
सुधार आंदोलन राजा राममोहन राय की कोशिशों के बाद शुरू हुए तथा उसके बाद कई और समाज सुधारक आगे आए जिन्होंने स्त्रियों की स्थिति ऊपर उठाने के लिए बहुत काम किए जिनकी वजह से स्त्रियों की स्थिति में निम्नलिखित प्रभाव पड़े-

  • अब विधवा विवाह होने शुरू हो गए।
  • अब सती प्रथा काफी कम हो गई थी।
  • बाल विवाह भी कम हो गए थे।
  • स्त्रियों की शिक्षा पर ध्यान दिया जाने लगा।
  • जाति प्रथा कमज़ोर हुई जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति में काफी सुधार हुए।

प्रश्न 9.
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति किस प्रकार की थी?
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी थी क्योंकि:

  • स्त्रियों को परिवार में काफ़ी अधिकार प्राप्त थे।
  • स्त्रियों को शिक्षा लेने, संपत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था।
  • स्त्रियां यज्ञ करती थीं।
  • ज्ञान के मामले में वे पुरुषों के बराबर थीं।
  • विधवा विवाह प्रचलित था।
  • समाज में स्त्रियों का बहुत सम्मान था।
  • उनका अपमान समाज का अपमान माना जाता था।

प्रश्न 10.
आधुनिक समय में औरतों की स्थिति किस प्रकार की है?
अथवा
आधुनिक युग में नारी की स्थिति स्पष्ट कीजिए।
अथवा
स्वतंत्रता के पश्चात् महिलाओं की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अब स्त्रियों की स्थिति काफी अच्छी है क्योंकि-
(i) अब औरत घर में सिर्फ दासी नहीं रह गई है। उसको घर में हर प्रकार के अधिकार प्राप्त हैं। घर के प्रत्येक काम में उसकी सलाह ली जाती है तथा उसकी बात मानी जाती है। घर का हर काम खाना बनाने से बच्चों की शिक्षा तक सब उसके सहारे चलता है।

(ii) आजकल विधवा विवाह हो रहे हैं, बाल-विवाह बहुपत्नी विवाह खत्म हो गए हैं। औरतों को तलाक का अधिकार मिल गया है। औरतें शिक्षा प्राप्त करने के लिए बाहर जा रही हैं।

(iii) आजकल औरतों को संपत्ति रखने का अधिकार, पिता की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार प्राप्त है। औरतें घर से बाहर जा कर नौकरियां कर रही हैं तथा आर्थिक तौर पर आत्म निर्भर हो रही हैं।

(iv) अब औरतों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई सविधाएं दी जा रही हैं। मफ्त शिक्षा, छात्रवत्तियां इत्यादि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनसे औरतों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। अब उनमें साक्षरता दर भी काफी तेजी से बढ़ रही है।

(v) अब स्त्रियां राजनीति में भी आगे आ रही हैं, इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी, जयललिता, अंबिका सोनी, सुषमा स्वराज, उमा भारती, वसुंधरा राज सिंधिया इत्यादि कुछ ऐसे नाम हैं जो राजनीतिक क्षेत्र में काफ़ी आगे हैं।

प्रश्न 11.
स्त्रियों की स्थिति में सुधार के क्या कारण हैं?
उत्तर:
भारत में आज स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी सुधार आया जिसके कारणों का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) स्त्रियों की स्थिति सुधारने के लिए सबसे पहले प्रयास शुरू किए गए थे जब राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध तथा विधवा विवाह के लिए आवाज़ उठायी थी। उनकी वजह से 1829 में सती प्रथा निरोधक कानून बना तथा 1856 में विधवा विवाह कानून से विधवा विवाह को मंजूरी मिल गई थी जिस कारण से भारतीय समाज के दो अभिशाप दूर हो गए।

(ii) इनके बाद भारत में कई संस्थाएं बनीं जैसे कि प्रार्थना समाज, सत्य शोधक समाज, आर्य समाज, ब्रमों समाज जिन्होंने स्त्रियों के लिए आवाज़ उठायी, उन्होंने स्त्रियों की शिक्षा तथा उनके उत्थान पर भी जोर दिया। रामाबाई रानाजे, गोविंद रानाडे इत्यादि नाम इनमें काफ़ी प्रमुख हैं।

(iii) इनके बाद श्रीमती ऐनी बेसेंट, कस्तूरबा गांधी इत्यादि ने भी औरतों के उत्थान के लिए आवाज़ उठाई तथा उनकी स्थिति सुधारने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

(iv) आज़ादी के बाद कई तरह के कानून पास हुए जिन की मदद से औरतों को बहुत से अधिकार प्राप्त हो गए।

(v) पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में स्त्रियों की स्थिति में काफी परिवर्तन आए।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

प्रश्न 12.
आज़ादी के बाद पास हुए ऐसे अधिनियमों के नाम बताओ जिन की वजह से स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन हुए।
उत्तर:

  • हिंदू विवाह अधिनियम 1955।
  • विशेष विवाह अधिनियम 1954।
  • हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम 1956।
  • हिंद गोद लेना तथा भरण पोषण अधिनियम 1956।
  • अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955।
  • हिंदू नाबालिग तथा संरक्षण अधिनियम 1956।
  • बाल विवाह निरोधक अधिनियम 19781
  • दहेज निरोधक अधिनियम 1961।
  • अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 1956।
  • हिंदू विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम 1976।
  • दहेज निरोधक अधिनियम 1961, 1986।
  • मातृत्व हित लाभ अधिनियम 19761
  • मुस्लिम महिला तलाक के अधिकारों का संरक्षण अधिनियम 1986।

प्रश्न 13.
भारतीय समाज में स्त्रियों की निम्न दशा के क्या कारण थे?
उत्तर:
भारतीय समाज में स्त्रियों की निम्न दशा के निम्नलिखित कारण थे-

  • भारतीय समाज में परुष प्रधानता की वजह से।
  • औरतों का पुरुषों पर आर्थिक तौर पर निर्भर होने की वजह से।
  • औरतों के अशिक्षित होने की वजह से।
  • संयुक्त परिवारों में स्त्रियों के दबे रहने की वजह से।
  • कई प्रकार की स्त्री विरोधी प्रथाओं जैसे बाल विवाह, सती प्रथा, विधवा विवाह के न होने की वजह से।
  • हिंदू धार्मिक ग्रंथों की वजह से।

प्रश्न 14.
स्त्रियों को किस प्रकार की शिक्षा देनी चाहिए?
उत्तर:

  • स्त्रियों को ऐसी शिक्षा देनी चाहिए जिससे वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो सकें।
  • स्त्रियों की शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जिससे वे आर्थिक तौर पर आत्म निर्भर हो सकें।
  • स्त्रियों की शिक्षा उनके स्वास्थ्य, खाने-पीने, परिवार नियोजन इत्यादि के बारे में होनी चाहिए।
  • ऐसी शिक्षा होनी चाहिए जिससे उनका हर प्रकार से विकास हो सके।

प्रश्न 15.
सती प्रथा के बारे में बताएं।
उत्तर:
सती प्रथा पुराने समय में प्रचलित थी। इस प्रथा में अगर किसी पत्नी के पति की मृत्यु हो जाती थी तो उस औरत को उसके पति की चिता पर जीवित ही बिठा दिया जाता था ताकि वह भी अपने पति के साथ ही मर जाए। उस औरत को सती कहते थे तथा इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता था। इसमें औरतों को सती होने के लिए मज़बूर किया जाता था। अगर पत्नी अपनी मर्जी से तैयार हो जाती थी तो ठीक है नहीं तो उसे जबरदस्ती पति की जलती चिता में डाल दिया जाता था। इसका विरोध सबसे पहले राजा राममोहन राय ने किया था तथा उनके प्रयासों की वजह से ही उस समय के गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिंक (Lord William Bentinck) ने इस प्रथा के विरुद्ध कानून पास किया जिसका नाम सती प्रथा निवारण अधिनियम 1829 था।

प्रश्न 16.
शिक्षा ने महिलाओं के हालात बदलने में कैसे मदद की है?
उत्तर:
शिक्षा ने महिलाओं के हालात बदलने में बहुत मदद की है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

  • शिक्षा की वजह से औरतों में अपने अधिकारों के प्रति जागृति पैदा हुई है जिस वजह से वह अब अपने अधिकारों के लिए लड़ने लग गई हैं।
  • शिक्षा की वजह से औरतें अब घर से बाहर निकल कर दफ्तरों में काम करने लग गई हैं।
  • बाहर काम करने की वजह से औरतें पैसा कमाने लग गई हैं जिस वजह से वे आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर हो गई हैं।
  • शिक्षा प्राप्त करने की वजह से औरतों की सामाजिक स्थिति अच्छी हो गई है। अब कोई भी उनका शोषण करने से पहले दस बार सोचता है क्योंकि अब औरतों की सुरक्षा के लिए बहुत से कानून बन गए हैं।
  • शिक्षा प्राप्त करने की वजह से अब औरतें राजनीतिक क्षेत्रों में भी काफ़ी आगे आ रही हैं। सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, अंबिका सोनी इत्यादि इसकी उदाहरणें हैं।
  • अब औरतें शिक्षा प्राप्त करने की वजह से अंतरिक्ष तक में जाने लग गई हैं। कल्पना चावला इसका उदाहरण है। अब औरतें वे सारे काम करने लग गई हैं जो पहले मर्दो के होते थे। जैसे सेना, पुलिस या जहाज़ तक उड़ा रही हैं।
  • शिक्षा प्राप्त करने की वजह से औरतें दफ्तरों में काम करने लग गई हैं, जिस वजह से संयुक्त परिवार टूट कर केंद्रीय परिवारों में बदल गए हैं तथा औरतों की स्थिति परिवारों में अच्छी हो गई है।

प्रश्न 17.
अनुसूचित जातियों की समस्याएं बताएं।
उत्तर:

  • अनुसूचित जातियों की सामाजिक स्थिति निम्न होती थी।
  • इनको सार्वजनिक स्थानों के प्रयोग पर प्रतिबंध होता था।
  • इनके साथ सार्वजनिक मेल-जोल पर प्रतिबंध होता था।
  • ये जातियां किसी उच्च जाति के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकती थे।
  • अनुसूचित जातियों को शिक्षा लेने का भी अधिकार नहीं था।
  • यह लोग धार्मिक स्थानों पर नहीं जा सकते थे।

प्रश्न 18.
अनुसूचित जातियों पर थोपी गई निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:

  • अनुसूचित जातियों के लोग धार्मिक कर्मकांड नहीं कर सकते थे तथा उनको धार्मिक ग्रंथों, उपनिषदों, श्लोकों को पढ़ने की मनाही थी।
  • अनुसूचित जातियों के लोग सार्वजनिक स्थानों जैसे कि मंदिर, कुओं, होटलों, पंचायतों, सड़कों इत्यादि का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे।
  • अनुसूचित जातियों के लोग शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते थे क्योंकि प्राचीन शिक्षा धर्म पर आधारित होती थी तथा वह धार्मिक मूल्यों को पढ़ नहीं सकते थे।
  • अनुसूचित जातियों के लोग उच्च जातियों के घरों पर कार्य करते थे जिसकी एवज में थोड़ा सा भोजन तथा थोड़े से पैसे प्राप्त हो जाते थे। इस कारण उनकी स्थिति काफ़ी निम्न थी।
  • वह उच्च जातियों के सामने नहीं आ सकते थे तथा उनके साथ संबंध रखने की भी पाबंदी थी।

प्रश्न 19.
निर्योग्यताओं के परिणाम बताएं।
उत्तर:

  • निर्योग्यताओं के कारण उच्च तथा निम्न जातियों में संघर्ष बढ़ गया।
  • निर्योग्यताओं का एक ग़लत परिणाम यह निकला कि निम्न जातियों के लोगों का आर्थिक जीवन काफ़ी निम्न . हो गया।
  • निर्योग्यताओं के कारण अनुसूचित जातियों के ऊपर बहुत अत्याचार होते थे।
  • इन निर्योग्यताओं के कारण अनुसूचित जातियों के लोगों का जीवन स्तर काफ़ी निम्न हो गया।

प्रश्न 20.
अनुसूचित जातियों की धार्मिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
अनुसूचित जातियों को धार्मिक क्रियाओं, धार्मिक कर्मकांडों को करने की मनाही थी। इसके साथ ही वह धार्मिक ग्रंथ, उपनिषद् श्लोक इत्यादि भी पढ़ नहीं सकते थे। प्राचीन समय में शिक्षा धर्म पर आधारित होती थी। इसलिए अनुसूचित जातियों के लोगों को धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने की मनाही थी। वह मंदिरों में नहीं जा सकते थे तथा पूजा-पाठ भी नहीं कर सकते थे। यहां तक कि वह अपने घरों में धार्मिक ग्रंथ नहीं रख सकते थे, न ही पढ़ सकते थे तथा न ही धार्मिक कर्मकांड कर सकते थे।

प्रश्न 21.
अनुसूचित जातियों की सामाजिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
इन लोगों को हिंदू समाज का अंग नहीं, बल्कि समाज से अलग समझा जाता था। वह शहर अथवा गांव ते थे। वह उच्च जातियों के सामने भी नहीं आ सकते थे। यदि वह उनके सामने आ जाते थे तो उन्हें दंड दिया जाता था। यह लोग सार्वजनिक स्थानों का प्रयोग नहीं कर सकते थे। यह लोग मंदिरों, कुओं, सड़कों इत्यादि का प्रयोग नहीं कर सकते थे। ये लोग शिक्षा भी प्राप्त नहीं कर सकते थे। यह लोग सूर्य से अस्त रहते ही गांव में अपना कार्य करने आते थे तथा सूर्यास्त में ही वापिस चले जाते थे।

प्रश्न 22.
अनुसूचित जातियों की शैक्षिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
प्राचीन समय में शिक्षा धर्म पर आधारित होती थी तथा प्रत्येक व्यक्ति धार्मिक शिक्षा प्राप्त करता था परंतु अनुसूचित जातियों के व्यक्तियों को शिक्षा लेने की आज्ञा नहीं थी क्योंकि उनको धार्मिक शिक्षा लेने अथवा धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने की आज्ञा नहीं थी। उनको किसी भी शैक्षिक संस्था अथवा गुरुकुल में दाखिला नहीं मिलता था। यदि किसी को किसी तरह प्रवेश मिल भी जाता था तो उसके साथ काफ़ी ग़लत व्यवहार किया जाता था।

प्रश्न 23.
अनुसूचित जातियों की आर्थिक निर्योग्यताएं बताएं।
उत्तर:
अनुसूचित जातियों के मुख्य पेशे सफ़ाई करना, गंदगी उठाना, चमड़े का कार्य करना इत्यादि थे। समाज में इन पेशों को बहुत निम्न दृष्टि से देखा जाता था जिस कारण इन अनुसूचित जातियों के लोगों को उनके कार्य के लिए बहुत ही कम पैसे मिलते थे। कम पैसे मिलने के कारण उन्हें दो वक्त का भोजन भी नसीब नहीं होता था। यदि कोई विवाह, जन्म अथवा मृत्यु का मौका आ जाए तो उन्हें साहूकारों से कर्ज़ लेना पड़ता था तथा वह तमाम आयु कर्जा वापिस नहीं कर सकते थे। इस प्रकार अपने कार्य की कम मजदूरी मिलने के कारण उनके जीवन में काफ़ी निर्धनता थी।

प्रश्न 24.
संविधान के Article 16. की व्याख्या करें।
उत्तर:
संविधान के Article 16 के अनुसार देश के किसी भी नागरिक से धर्म, जाति, रंग, प्रजाति इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। सरकार किसी के साथ भी किसी आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगी। सरकार अनुसूचित जातियों के लोगों को सरकारी संस्थाओं में नियुक्त करने के प्रयास करेगी।

प्रश्न 25.
संविधान के Article 17. की व्याख्या करें।
उत्तर:
संविधान के Article 17 में यह कहा गया है कि अस्पश्यता को मानना एक दंडनीय अपराध है तथा इसको देश में से ख़त्म किया जाता है। सभी के लिए अस्पृश्यता की practice करना मना है। यदि कोई अस्पृश्यता अथवा अस्पृश्य शब्द का प्रयोग करता है तो उसे देश की न्याय व्यवस्था के अनुसार दंड दिया जाएगा।

प्रश्न 26.
संविधान के Article 338. की व्याख्या करें।
उत्तर:
संविधान के Article 338 में यह कहा गया है कि राष्ट्रपति राज्यों में राज्यपालों को अनुसूचित जातियों तथा कबीलों के विकास के लिए एक विशेष अधिकारी को नियुक्त करने के लिए निर्देश देगा। वह अधिकारी अनुसूचित जातियों तथा कबीलों से संबंधित सभी समस्याओं के विषय पर खोज करके उनके हल के संबंध में रिपोर्ट राज्यपाल तथा राष्ट्रपति को देगा। अब इस उपबंध को ख़त्म कर दिया गया है।

प्रश्न 27.
अस्पृश्यता अपराध कानून 1955 क्या था?
उत्तर:
प्राचीन समय से ही भारत में अस्पृश्यता की प्रथा चली आ रही थी जिस कारण प्राचीन समय से ही निम्न जातियां दबी हुई थीं। चाहे संविधान में इस प्रथा के विरुद्ध प्रावधान रखे गए परंतु फिर भी यह प्रथा चलती रही। इसलिए भारत सरकार ने 1955 में अस्पृश्यता अपराध कानून पास किया जिसमें कहा गया है कि अस्पृश्यता की प्रथा को मानने वाले को तीन महीने की कैद अथवा 50 रुपये जुर्माना अथवा दोनों हो सकते हैं। प्रत्येक प्रकार का सार्वजनिक स्थल अनुसूचित जातियों के लिए खोल दिया गया है। अब वह किसी भी स्थान पर जा सकते हैं, किसी भी शैक्षिक संस्था में प्रवेश पा सकते हैं। उनके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

प्रश्न 28.
अलग-अलग कालों में स्त्रियों की स्थिति की व्याख्या करें।
उत्तर:
वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी तथा ऊंची थी। इस काल में स्त्री को धार्मिक तथा सामाजिक कार्यों को पूर्ण करने के लिए आवश्यक माना जाता है। उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों का आदर-सम्मान कम हो गया। बाल-विवाह शुरू हो गए जिससे उसे शिक्षा प्राप्त करनी मुश्किल हो गई। स्मृति काल में स्त्री की स्थिति और निम्न हो गई। उसे हर समय निगरानी में रखा जाता था तथा उसका सम्मान केवल मां के रूप में ही रह गया था। मध्य काल में तो जाति प्रथा के कारण उसे कई प्रकार के प्रतिबंधों के बीच रखा जाता था परंतु आधुनिक काल में उसकी स्थिति को ऊंचा उठाने के लिए कई प्रकार की आवाजें उठी तथा आज उसकी स्थिति मर्दो के समान हो गई है।

प्रश्न 29.
स्त्रियों की निम्न स्थिति के कारण बताएं।
उत्तर:

  • संयुक्त परिवार प्रथा में स्त्री को घर की चारदीवारी तथा कई प्रकार के प्रतिबंधों में रहना पड़ता था जिस कारण उसकी स्थिति निम्न हो गई।
  • समाज में मर्दो की प्रधानता तथा पितृ सत्तात्मक परिवार होने के कारण स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न हो गई।
  • बाल विवाह के कारण स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने का मौका प्राप्त नहीं होता था जिससे उनकी स्थिति निम्न हो गई।
  • स्त्रियों के अनपढ़ होने के कारण वह अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं थीं तथा उनकी स्थिति निम्न ही रही।
  • स्त्रियां मर्दो पर आर्थिक तौर पर निर्भर होती थीं जिस कारण उन्हें अपनी निम्न स्थिति को स्वीकार करना पड़ता था।

प्रश्न 30.
स्त्रियों की धार्मिक व आर्थिक निर्योग्यताएं बताएं।
अथवा
महिलाओं के साथ किए जाने वाले भेदभाव का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(i) वैदिक काल में स्त्रियों को धार्मिक कर्म-कांडों के लिए आवश्यक माना जाता था परंतु बाल विवाह के शुरू होने से उनका धार्मिक ज्ञान ख़त्म होना शुरू हो गया जिस कारण उन्हें यज्ञों से दूर किया जाने लगा। शिक्षा प्राप्त न कर सकने के कारण उनका धर्म संबंधी ज्ञान ख़त्म हो गया तथा वह यज्ञ तथा धार्मिक कर्मकांड नहीं कर सकती थी। आदमी के प्रभुत्व के कारण स्त्रियों के धार्मिक कार्यों को बिल्कुल ही ख़त्म कर दिया गया। उसको मासिक धर्म के कारण अपवित्र समझा जाने लगा तथा धार्मिक कार्यों से दूर कर दिया गया।

(ii) स्त्रियों को बहुत-सी आर्थिक निर्योग्यताओं का सामना करना पड़ता था। वैदिक काल में तो स्त्रियों को संपत्ति रखने का अधिकार प्राप्त था परंतु समय के साथ-साथ यह अधिकार ख़त्म हो गया। मध्य काल में वह न तो संपत्ति तथा न ही पिता की संपत्ति में से हिस्सा ले सकती थी। वह कोई कार्य नहीं कर सकती थी जिस कारण उसे पैसे के संबंध में स्वतंत्रता हासिल नहीं थी। आर्थिक तौर पर वह पिता, पति तथा बेटों पर निर्भर थी।

प्रश्न 31.
स्त्रियों की स्थिति में आ रहे परिवर्तनों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • पढ़ने-लिखने के कारण स्त्रियां पढ़-लिख रही हैं।
  • औद्योगिकीकरण के कारण स्त्रियां अब उद्योगों तथा दफ्तरों में कार्य कर रही हैं।
  • पश्चिमी संस्कृति के विकास के कारण उनकी मानसिकता बदल रही है तथा उन्हें अपने अधिकारों का पता चल रहा है।
  • भारत सरकार ने उन्हें ऊपर उठाने के लिए कई प्रकार के कानूनों का निर्माण किया है जिस कारण उनकी स्थिति ऊंची हो रही है।
  • संयुक्त परिवारों के टूटने से वह घर की चारदीवारी से बाहर निकल रही है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अनुसूचित जाति क्या होती है? इनकी सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का वर्णन करो।
अथवा
अनुसूचित जाति क्या है?
अथवा
अनुसूचित जातियों की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
अथवा
अनुसूचित जाति में पाये जाने वाले भेदभाव बताइए।
उत्तर:
वैदिक काल से 20वीं शताब्दी तक भारतीय समाज में हजारों वर्ग थे। सैंकड़ों वर्षों के बाद भी भारत में सभी वर्ग समान रूप से प्रगति नहीं कर पाए। बहुत-सी निर्योग्यताओं के कारण सैंकड़ों जातियां व अन्य वर्ग विकास यात्रा में काफ़ी पिछड़े रहे। अनुसूचित जाति वर्ग भारतीय समाज का प्रमुख उपेक्षित वर्ग रहा है। यह कई निम्न जातियों का समूह है।

सबसे पहले अनुसूचित जाति शब्द का प्रयोग साइमन कमीशन ने अप्रैल, 1935 में किया। कुछ विशेष सुविधाएं देने के लिए 429 अछूत जातियों की सूची तैयार की गई। जिन जातियों के नाम इस सूची में शामिल थे उन्हें अनुसूचित जातियां कहा जाने लगा। आज़ादी के बाद संविधान में भी निम्न जातियों की सूची अनुसूची में दी गई जिसकी संख्या में राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिमंडल की सलाह पर परिवर्तन किया जा सकता है। संविधान में इनकी संख्या 212 बताई गई है।

अनुसूचित जाति का अर्थ (Meaning of Scheduled Castes)-अनुसूचित जातियों को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता रहा है। जाति के आधार पर हुई अंतिम जनगणना 1931 में इन्हें अस्पृश्य जातियों को बाहरी जातियां के रूप में कहा गया। महात्मा गांधी ने इन्हें हरिजन कहा था। डॉ० बी० आर० अंबेदकर का कहना था कि प्राचीन काल में इन्हें बाहरी जातियां तथा भग्न पुरुष कहा जाता था। वास्तव में निम्न जातियों का यह समूह वैदिक काल के चौथे वर्ण का परिवर्तित रूप है। अलग-अलग विद्वानों ने इस शब्द की अपने-अपने तरीके से व्याख्या की है जिनका वर्णन निम्नलिखित है –
(i) डी० एन० मजूमदार (D.N. Majumdar) के अनुसार, “अस्पृश्य जातियाँ वे हैं जो अनेक सामाजिक तथा राजनीतिक निर्योग्तयाओं का शिकार हैं इनमें से अनेक निर्योग्यताएं उच्च जातियों द्वारा परंपरागत तौर पर लागू की गई हैं।”

(ii) जी० एस० घुरिये (G.S. Ghuriye) के अनुसार, “मैं अनुसूचित जातियों की परिभाषा उन समूहों के रूप में करता हूँ, जिनका उल्लेख अनुसूचित जातियों में आदेश में किया गया हो।’ . भारत के संविधान में अनुसूचित जातियों की सूची डाली गई है लेकिन उनकी परिभाषा नहीं दी गई है। संविधान के अनुसार, “संविधान के अनुच्छेद 341 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया कि अमूक जातियां, जनजातियां या जातियों, प्रजातियों या जनजातियों के भाग या उनके अंतर्गत समूह संविधान के अभिप्रायों के लिए उस राज्य के संबंध में अनुसूचित मानी जाएंगी।”

उपरोक्त विवरणों से स्पष्ट है कि अनुसूचित जाति उन निम्न वर्गों का समूह है जिनको विशेष सुविधाएं प्रदान करने के लिए उनके नाम संविधान की सूची में अंकित हैं। यह निम्न जातियों का समूह है। देश के प्रत्येक जिले व प्रदेश में ये पाए जाते हैं। इनकी संस्कृति, भाषा, देवी, देवता, व्यवसाय भी उनके निवास के क्षेत्र के अनुसार भिन्न भिन्न हैं। उनकी अनेक सामाजिक एवं धार्मिक निर्योग्यताएं भी हैं। 1991 की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 13.80 करोड़ थी जो कि देश की जनसंख्या का 16.7% था। उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जातियों की जनसंख्या सबसे ज्यादा है।

अनुसूचित जातियों की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याएं – (Social and Economic Problems of Scheduled Castes):
इनकी अनेक सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक तथा राजनीतिक निर्योग्यताएं थीं जिनके कारण इन निम्न वर्गों को कई प्रकार की सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता थी जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) निम्न सामाजिक स्थिति (Low Social Status)-इन अनुसूचित जातियों की सामाजिक संस्तरण में निम्न स्थिति थी। इसके अलावा इनमें अनेक सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक निर्योग्यताएं थीं जिनकी वजह से इनमें हीनता की भावना घर कर गई थी। इनकी स्थिति सुधारने के रास्ते में भी अनेक प्रतिबंध थे।

(ii) सार्वजनिक स्थलों में उपयोग पर रोक (Restriction on use of Public Places)-समाज के इस वर्ग में सदस्यों को सार्वजनिक स्थलों पर जाने से रोक थी। वे सार्वजनिक कुओं से पानी नहीं भर सकते, सार्वजनिक पार्को तथा अन्य स्थलों पर भी नहीं जा सकते थे। अगर वे ऐसा करते थे या सामाजिक परंपराओं को तोड़ते थे तो उनको दंड दिया जाता थे।

(iii) सामाजिक संपर्क पर प्रतिबंध (Restriction on Social Contact)- इन जातियों को समाज के अन्य वर्गों के साथ अंतक्रिया करने पर भी प्रतिबंध थे। उन्हें उच्च जातियों से सामाजिक दूरी बनाए रखना ज़रूरी होता था। उन्हें जन्मदिन, होली, दीवाली या किसी और त्योहार के मौकों पर बुलाया नहीं जाता था तथा न ही उच्च जाति के लोग अनुसूचित जातियों के उत्सवों में भाग लेते थे। इस तरह इन से सामाजिक दूरी बना कर रखी जाती थी।

(iv) अस्पृश्यता (Untouchability) अनुसूचित जातियों को आमतौर पर अस्पृश्य जातियाँ कहा जाता था जिसका मतलब था कि निम्न जातियों के सदस्य उच्च जातियों के सदस्यों को छू भी नहीं सकते थे। ऐसा कहा जाता
था कि उनके स्पर्श से उच्च जाति के लोग अपवित्र हो जाएंगे।

(v) आवासीय निर्योग्यताएं (Habitational Disabilities) अनुसूचित जातियों के लोग और जातियों के लोगों के साथ गांव में नहीं रह सकते थे। वे तो पक्के घर भी नहीं बना सकते। आमतौर पर वे गांव से बाहर घर बना कर रहते थे ताकि और जातियों से शारीरिक दूरी बना कर रखी जा सके।

(vi) विवाह संबंधी प्रतिबंध (Marriage Related Restrictions)-अनुसूचित जाति के सदस्य अपने से उच्च जाति के सदस्यों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित नहीं कर सकते क्योंकि जातीय नियमों के अनुसार जाति अंतर्विवाही होती थी। इस तरह इनके साथ विवाह करने पर भी प्रतिबंध थे।

(vii) धार्मिक निर्योग्यताएं (Religious Disabilities)-अनुसूचित जातियों के सदस्यों को धार्मिक स्थलों पर जाने से प्रतिबंध रहा था। वह किसी भी मंदिर में पूजा तो दूर प्रवेश भी नहीं कर सकते थे। उन्हें अपने घरों में भी धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन तथा पूजा पाठ व धार्मिक कर्मकांडों की भी मनाही थी।

(viii) शैक्षणिक निर्योग्यताएं (Educational Disabilities)-अनुसूचित जातियों को शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था। वैदिक काल से ही इन्हें को शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नहीं था, यदि कोई किसी शिक्षण संस्थान में प्रवेश पा भी जाता था तो उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था। इसी वजह से इन लोगों में साक्षरता दर काफ़ी निम्न थी।

(ix) भूमिहीन कृषक (Landless Farmers)-इन जातियों की काफ़ी संख्या कृषि संबंधी कार्य भी करती रही थी लेकिन वे बड़े किसानों के पास श्रमिकों के रूप में कार्य किया करते थे। अधिकांश मामलों में इन जातियों के लोग भूमिहीन कृषि मज़दूर होते थे। कई बार तो ये बंधुआ मजदूर के रूप में भी कार्य करते थे।

(x) पेशों के चुनाव का अभाव (Lack of Choice of Occupations)-इन जातियों को अपनी पसंद का व्यवसाय करने की मनाही थी। उन्हें चमड़े, सफाई तथा इस प्रकार के अन्य निम्न स्तर के व्यवसाय करने की आज्ञा होती थी। इस प्रकार के कामों की वजह से इनकी आय भी काफ़ी कम होती थी।

(xi) आर्थिक शोषण (Economic Exploitation)–आर्थिक रूप से समाज का यह सबसे शोषित वर्ग रहा था। अधिक काम के उपरांत भी उन्हें नाममात्र पैसे या बहुत कम वेतन दिया जाता था। उनकी अथक सेवाओं के बदले उन्हें दो वक्त का भरपेट भोजन प्राप्त नहीं होता था तथा जिनके यहां वे काम करते थे उनके जूठे तथा बासी भोजन पर उन्हें अपना पेट भरना पड़ता था।

प्रश्न 2.
अनुसूचित जातियों की समस्याओं के समाधान के लिए किस तरह के प्रयास किए गए हैं?
अथवा
अनुसूचित जातियों के कल्याण के लिए उठाये गए कदमों का वर्णन कीजिए।
अथवा
अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं में समाधान के लिए सरकारी एवं गैर-सरकारी प्रयासों की विवेचना कीजिए।
अथवा
समाज का जनजातियों के प्रति क्या रवैया है?
अथवा
तियों का हित करने के लिए किन-किन आरक्षणों को शामिल किया गया?
उत्तर:
अनुसूचित जातियों की समस्याओं के समाधान के लिए बहुत से सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रयास हुए हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) निम्न जातियों द्वारा प्रयास (Efforts by Low Castes) स्वतंत्रता से पहले तथा बाद में अनुसूचित जातियों की समस्याओं के समाधान के लिए कई संगठित प्रयास हुए हैं। डॉ० बी० आर० अंबेदकर के नेतृत्व में 1920 में अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ तथा अखिल भारतीय दलित वर्ग फैडरेशन की स्थापना की गई। निम्न जातियों के महान् नेता ज्योतिबा फूले ने पूना में सत्य शोधक समाज की स्थापना की जिसके माध्यम से निम्न जातियों को समाज में उचित स्थान दिलवाने तथा उनकी निर्योग्यताओं को समाप्त करने के विशेष प्रयत्न किए गए।

(ii) उच्च जातियों के प्रयास (Efforts by High Castes)-उच्च जाति से संबंधित समाज सुधारकों ने भी निम्न जातियों को ऊपर उठाने में काफ़ी प्रयास किए जिससे निम्न जातियों में अपने अधिकारों के प्रति जागृति आयी। राजा राममोहन राय का ब्रह्म समाज, दयानंद सरस्वती का आर्य समाज तथा विवेकानंद के रामकृष्ण मिशन नामक संगठनों ने निम्न जातियों की समस्याओं तथा अधिकारों के प्रति जागरूकता का विकास किया तथा शिक्षा के प्रचार द्वारा अस्पृश्य जातियों में नई चेतना जगाई। महात्मा गांधी ने इन्हें हरिजन कहा तथा 1932 में हरिजन सेवक संघ की स्थापना की ताकि हरिजनों को ऊपर उठाया जा सके।

(iii) अन्य संगठनों के प्रयास (Efforts by Other Organizations)-आज़ादी के बाद निम्न जातियों के कर्मचारियों, व्यापारियों तथा अन्य व्यवसायों से संबंधित व्यक्तियों ने कई संगठनों का निर्माण किया। उनके ये संगठन अपनी समस्याओं के समाधान के लिए हमेशा सरकार पर दबाव बनाए रखते हैं।

(iv) संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)-संविधान में बिना किसी जाति का भेद किए हर किसी को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। अनुच्छेद 15 के अंतर्गत जाति धर्म के आधार पर भेदभाव की मनाही है। अनुच्छेद 16 के अंतर्गत सरकारी नौकरियों में किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं होगा। अनुच्छेद 17 द्वारा अस्पृश्यता दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। अनुच्छेद 2 5 के द्वारा सभी धार्मिक स्थल सभी जातियों के लिए खोल दिए गए हैं। अनुच्छेद 29 के अनुसार सरकारी सहायता प्राप्त संस्थाओं में किसी को जाति धर्म के आधार पर शिक्षा प्राप्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 330, 332, 334, द्वारा संसद् तथा राज्य विधानसभाओं में इन के लिए विशेष आरक्षण का प्रावधान है। इस के अलावा कई और प्रावधान किए गए हैं ताकि अनुसूचित जातियों को ऊपर उठाया जा सके।

(v) स्थानीय सरकारों में प्रतिनिधित्व (Representation in Local Self Governments)-देश के ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में अलग-अलग स्तर पर स्थानीय सरकारों का गठन किया जाता है। 73वें संवैधानिक संशोधन तथा 74वें संशोधन के द्वारा देश के ग्रामीण क्षेत्रों में पंचायती राज्य संस्थाओं के गठन का प्रावधान है। इन सभी संस्थाओं में अनुसूचित जातियों की संख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित किए गए हैं। इसी तरह नगर पालिकाओं, परिषदों में भी उनके लिए स्थान आरक्षित हैं।

(vi) कल्याण एवं सलाहकार संगठन (Welfare and Advisory Boards)- कल्याण मंत्रालय केंद्र व राज्यों द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों में समन्वय करता है। सरकार संसदीय समितियां बना कर अनुसूचित जातियों हे कार्यक्रमों की जांच करती है। राज्य सरकारों ने भी अलग-अलग कल्याण विभागों का गठन किया हुआ है। देश में स्वयं सेवी संगठन इनकी समस्याओं के समाधान के कार्य कर रहे हैं। सरकार इन संगठनों को सरकारी सहायता देकर उनकी मदद कर रही है ताकि ये संस्थाएं ज्यादा-से-ज्यादा काम कर सकें।

(vii) सरकारी नौकरियों में आरक्षण (Reservation in Govt. Services) अनुसूचित जातियों के ज्यादा से ज्यादा लोग सरकारी नौकरियां प्राप्त कर सकें इसलिए उन्हें आरक्षण प्रदान किया गया है। भारतीय स्तर पर होने वाली नियुक्तियों में 15% पद उनके लिए आरक्षित हैं। ऐसे प्रावधान राज्यों में भी किए गए हैं। इसके अतिरिक्त आयु सीमा में भी विशेष छूट दी जाती है।

(viii) शैक्षणिक सविधाएं (Educational Facilities)-अनसचित जातियों में साक्षरता दर काफी निम्न रही है। 1991 में भारत की साक्षरता दर 52.19% पी पर अनुसूचित जातियों में यह 37.41% थी। इससे यह स्पष्ट है कि 1991 में अनुसूचित जातियों के लगभग दो तिहाई लोग निरक्षर थे। इनकी साक्षरता दर बढ़ाने तथा शैक्षणिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं।
निःशुल्क शिक्षा, छात्रवृत्तियां, मुफ्त पुस्तकें तथा जगह जगह पर स्कूल खोलकर शिक्षा ग्रहण करने के लिए इन्हें प्रेरित किया जा रहा है।

(ix) कल्याणकारी कार्यक्रम (Welfare Programmes)-इनके कल्याण के लिए केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। भूमिहीनों को मुफ्त भूमि आबंटन, उन्हें ऋण उपलब्ध करवाना, काम आर्थिक अनदान देना इत्यादि ऐसे कार्य हैं जो इनके लिए किए जा रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में पर्याप्त धन राशि समाज के इस वर्ग के उत्थान के लिए रखी जाती है।

प्रश्न 3.
अनुसूचित जनजाति क्या होती है? उनकी समस्याओं का वर्णन करो।
अथवा
भारतीय जनजातियों की प्रमुख समस्याओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
अनुसूचित जनजातियों की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं?
अथवा
अनुसूचित जनजाति क्या है?
उत्तर:
वर्तमान समय में भारत के प्रमुख चार वर्गों-सामान्य वर्ग, अनुसूचित जातियां, अनुसूचित जनजातियां तथा अन्य पिछड़े वर्गों में से प्रथम वर्ग को छोड़ कर अन्य तीनों वर्ग उपेक्षित रह गए। अनुसूचित जातियां तो कई प्रकार की निर्योग्यताओं की वजह से कमजोर रह गईं जबकि अनुसूचित जनजातियों में इस प्रकार की निर्योग्यताएं नहीं थीं। यह लोग पहाड़ों, जंगलों, घाटियों तथा दुर्गम क्षेत्रों में रहने के कारण उपेक्षित रह गए।

अनुसूचित जनजाति का अर्थ (Meaning of Scheduled Tribe) आजकल इन्हें अलग-अलग नामों से जाना जाता है। रिजले ने इन्हें आदिवासी कहा है। हट्टन ने इन्हें आदिम जातियां कहा है। सर वेन्स ने इन्हें पर्वतीय जनजातियां कहा है क्योंकि यह पहाड़ों, दुर्गम क्षेत्रों में रहते थे। गिसवर्ट ने इन्हें ‘प्री लिटरेट’ (Pre-literate) कहा है। इनको वनवासी तथा वन्यजाती भी कहा जाता है।

वास्तव में अनुसूचित जनजातियां ऐसी जनजातियों का समूह है। संविधान के अनुच्छेद 342 (1) के अनुसार, “राष्ट्रपति सार्वजनिक सूचना द्वारा जनजातियों, जनजाति समुदायों या जनजाति के भीतर समूहों की घोषणा करेंगे। इस अधिसूचना में जो जनजातियां, जनजाति समुदाय या जनजातियों के भीतर समूह परिगठित किए जाएंगे, वे सब अनुसूचित जनजातियां कहलाएंगे।

इंपीरियल गजेटियर ऑफ इंडिया (Imperial Gazetteer of India) के अनुसार, “एक जनजाति परिवारों का एक ऐसा संकलन है जिसका एक नाम होता है, जो एक बोली बोलती है, एक सामान्य भू-भाग पर अधिकार रखती है या अधिकार जताती है और प्रायः अंतर्विवाह नहीं करती रही है।”

चार्ल्स विनिक (Charles Winick) के अनुसार, “एक जनजाति में क्षेत्र, भाषा, सांस्कृतिक समरूपता तथा एक सूत्र में बंधने वाला सामाजिक संगठन आता है तथा यह सामाजिक संगठन उपसमूहों जैसे गोत्रों या गांवों को सम्मिलित कर सकता है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि जनजाति परिवारों का एक ऐसा समूह है जो सामान्यतः एक निश्चित क्षेत्र में निवास करता है, जिसकी सामान्य भाषा, धर्म, संस्कृति होती है और साधारणतया अंतर्विवाही होता है।

जनजातीय समस्याएं – (Tribal Problems):
भारतीय जनजातियों की बहुत सी समस्याएं हैं। ये समस्याएं अंतः संबंधित तथा अंतः निर्भर हैं जिन्हें अलग-अलग करके समझा नहीं जा सकता। जनजातियों की विभिन्न समस्याओं का वर्णन निम्नलिखित है-
1. दुर्गम निवास स्थान (Unapproachable Habitation)-भारत की ज्यादातर जनजातियां दुर्गम क्षेत्रों, जंगलों, पहाड़ों, घाटियों इत्यादि में निवास करती हैं। ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में यातायात तथा संचार के साधनों का विशेष विकास नहीं हो पाया है जिससे जनजातीय क्षेत्रों का नगरों के साथ ज्यादा संपर्क नहीं हो पाया है। यातायात के साधनों के अभाव के कारण जनजातीय लोगों में गतिशीलता नहीं हो पाती है। ऐसे स्थानों पर सुविधाओं का पहुँचना बहुत मुश्किल है जिस वजह से शिक्षा, यातायात, संचार, विज्ञान की सुख सुविधाओं से यह लोग वंचित रह जाते हैं।

2. प्रतिकूल जलवायु (Inhospitable Climatic Conditions)-पहाड़ों में रहने के कारण जनजातीय क्षेत्रों की आमतौर पर प्रतिकूल जलवायु होती है जिससे उनका जीवन काफ़ी मुश्किल होता है। विपरीत मौसम के कारण अनेक जनजातियां घुमंतु जीवन व्यतीत करती हैं तथा प्रतिकूल जलवायु की वजह से यह लोग रहने की जगह बदल लेते हैं।

3. कृषि भूमि का अभाव (Lack of Agricultural Land)-इन क्षेत्रों में कृषि भूमि काफ़ी कम होती है। कठिन क्षेत्रों में कृषि योग्य भूमि के विकास करने में आदिवासियों को कड़ा परिश्रम करना पड़ता है तब कहीं छोटे-छोटे खेत बनते हैं। सिंचाई व्यवस्था के अभाव में पानी के लिए वर्षा पर निर्भर रहना पड़ता है। अनियमित वर्षा, वैज्ञानिक उपकरणों के अभाव की वजह से लोगों की समस्या और बढ़ गई है।

4. ऋणों में दबे होना-जनजातियों के अधिकांश सदस्य पूरी उम्र ऋणों से मुक्त नहीं हो पाते हैं। जब वह पैदा होते हैं उन पर ऋण होता है, सारी उम्र वे ऋण चुकाते रह जाते हैं तथा अपनी संतान के लिए भी वे ऋण छोड़कर मर जाते हैं। विवाह, जन्म, मृत्यु के समय वह साहूकारों से ब्याज पर ऋण लेते हैं। साहूकार ऊँची दर का ब्याज लेते हैं। कर्ज चुकाने के लिए साहूकार इन लोगों को बंधुआ मज़दूर रख लेते हैं। पैसे कमाने के अच्छे साधन न होने की वजह से ये ऋण चक्र से मुक्त नहीं हो पाते हैं।

5. ग़रीबी (Poverty)-आमतौर पर भारतीय जनजातियों की आर्थिक स्थिति काफ़ी निम्न होती है। कृषि के लिए भूमि की कमी, वर्षा पर निर्भरता, उद्योगों का न होना, कम आय, आय के सीमित स्रोत, सुविधाओं के अभाव की वजह से इन लोगों की आर्थिक स्थिति काफ़ी कमज़ोर रहती है। गरीबी के कारण गिरता स्वास्थ्य स्तर, नशाखोरी इत्यादि ने उनके जीवन को नर्क बना दिया है। गरीबी की वजह से लोग उनका शोषण करते हैं।

6. नशाखोरी की आदत (Habit of Drug-Addiction)-जनजातीय समूहों के ज्यादातर सदस्यों को मादक द्रव्यों की आदत लग जाती है। वे जो चावल, गुड़ इत्यादि से बनी शराब का प्रयोग करते हैं। कई बार ज़हरीली शराब पीने से कई लोग मर जाते हैं। इनके अलावा चरस, अफीम, गांजा, तंबाकू इत्यादि पदार्थों का भी सेवन करते हैं। उत्सवों, त्योहारों, मेलों पर यह कई-कई दिनों तक मादक पदार्थों का सेवन करते हैं जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य काफ़ी गिर जाता है।

7. वेश्यावृति (Prostitution) वेश्यावृति भी जनजातीय लोगों की एक मुख्य समस्या है। गैर-जनजातीय लोग जनजातीय लोगों के सादेपन या भोलेपन का फायदा उठाते हैं। उनकी गरीबी, अनपढ़ता, ऋणग्रस्तता, जीवन की तड़क भड़क के प्रति आकर्षण का और लोगों ने फायदा उठाना शुरू कर दिया। जनजातीय स्त्रियों से यौन संबंध स्थापित किए जाने लगे। इनको धन का लालच देकर इनकी औरतों को वेश्यावृति के लिए प्रोत्साहित किया गया।

8. अनपढ़ता (Illiteracy) विभिन्न जनजातीय समूहों में साक्षरता दर काफ़ी कम है क्योंकि इनके क्षेत्रों में शिक्षा का प्रसार काफ़ी कम हुआ है। जो शिक्षण संस्थाएं खोली गईं वे उनके क्षेत्रों से दूर थीं इस वजह से इन लोगों ने अपने बच्चों को पढ़ने नहीं भेजा। भाषा की वजह से भी शिक्षा लेने में मुश्किल आयी। शिक्षा प्राप्त करके भी इन लोगों को दिक्कतें आयीं। इन सब की वजह से इनमें साक्षरता दर काफ़ी कम है। शिक्षा के न होने की वजह से यह लोग आधुनिकता का फायदा नहीं उठा पाते हैं।

9. भाषा की समस्या (Problem of Language)-बाहरी संस्कृतियों के साथ संपर्क में आने के कारण ये लोग और लोगों की भाषा सीखने लगे, जिस की वजह से ये औरों की बोली तो सीख गए पर धीरे-धीरे अपनी भाषा भूलने लगे। इससे वे अपने समुदाय से कटने शुरू हो जए तथा उनमें समुदाय भावना कम होने लग गई। एकता कम होनी शुरू हो गई तथा उनके अपने अस्तित्व को खतरा पड़ना शुरू हो गया।

10. धर्म व जादू (Religion and Magic)-हिंदू तथा ईसाई मिशनरियों ने योजना बना कर जनजातियों में धर्म प्रचार का कार्य किया। इस प्रक्रिया में जनजातीय विश्वासों, कर्मकांडों तथा मान्यताओं का भी विश्वास उड़ाया जाता था। जनजातीय समूहों को अपने धर्म में अविश्वास होने लगा। भूत-प्रेत, आत्माओं में विश्वास के कारण इन में जादू टोना भी प्रचलित था। इसका प्रयोग वे बिमारियों से मुक्ति पाने के लिए करते थे। इस तरह की रूढ़िवादिता तथा धर्म प्रचारकों द्वारा जनजातीय लोगों का धर्म परिवर्तन आदिवासियों की मुख्य समस्या है।

प्रश्न 4.
जनजातीय समस्याओं को दूर करने के लिए क्या-क्या प्रयास किए गए हैं?
अथवा
अनुसूचित जनजातियों की समस्याओं को दूर करने के लिए क्या उपाय किए गए?
अथवा
जनजातियों के प्रति भेदभाव मिटाने के लिए राज्यों व अन्य संगठनों द्वारा उठाए गए कदमों को बताइए।
अथवा
अनुसूचित जनजातियों का हित करने के लिए किन-किन आरक्षणों को शामिल किया गया?
उत्तर:
भारतीय समाज में संगठन व संतुलन बनाए रखने के लिए यह ज़रूरी है कि जनजातीय समस्याओं का समाधान किया जाए। इसके लिए आज़ादी के बाद कई प्रकार के सरकारी तथा गैर-सरकारी प्रयास किए गए हैं, जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)-आज़ादी के बाद निम्न वर्गों को ऊपर उठाने के लिए संविधान में प्रावधान रखे गए हैं। जनजातियों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। उनके लिए संविधान में विभिन्न प्रावधान रखे गए हैं जो कि निम्नलिखित हैं –

  • अनुच्छेद 244 तथा 324 में राज्यपालों को जनजातियों से संबंधित विशेषाधिकार दिए गए हैं।
  • अनुच्छेद 275 के अनुसार जनजातीय कल्याण के लिए केंद्र सरकार राज्य सरकारों को पैसा देगी।
  • अनुच्छेद 325 के अनुसार किसी को भी किसी भी आधार पर मत देने से वंचित नहीं किया जाएगा।
  • अनुच्छेद 330 तथा 332 के अनुसार अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के लिए लोकसभा तथा राज्य विधान सभाओं में स्थान आरक्षित हैं।
  • अनुच्छेद 335 में सरकारी नौकरियों में इनके लिए आरक्षण का प्रावधान है।

(ii) वैधानिक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व (Representation in Legislative Bodies) कानून निर्माण में भागीदारी देने के लिए इनके लिए लोकसभा तथा विधानसभाओं में स्थान आरक्षित रखे गए हैं। लोकसभा की 545 में से 41 स्थान तथा विधान सभाओं की 4047 स्थानों में से 527 स्थान इनके लिए सुरक्षित हैं। यह आरक्षण हर 10 वर्ष के बाद बढ़ाया जाता रहा है। अब यह 2010 तक है।

(iii) सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व (Respresentation in Govt. Services)-आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के लिए जनजातियों को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया गया है। सभी सेवाओं में उनके लिए 7.5% पद आरक्षित हैं जबकि राज्यों में यह उनकी जनसंख्या के अनुपात से आरक्षित होते हैं।

(iv) शैक्षणिक सुविधाएं (Educational Facilities) विभिन्न जनजातियों में निरक्षरता को दूर करने के लिए जनजातीय क्षेत्रों में जगह-जगह स्कूल तथा प्रशिक्षण केंद्र खोले गए हैं। उन्हें निःशुल्क शिक्षा दी जाती है उन्हें मुफ्त पुस्तकें दी जाती हैं, उन्हें छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। इनके लिए शिक्षण संस्थानों में स्थान आरक्षित किए गए हैं। उनमें शिक्षा योजनाएं चलाकर उनमें साक्षरता दर बढ़ाने के प्रयास जारी हैं।

(v) कल्याणकारी कार्यक्रम (Welfare Programmes)-जनजातियों को ऊपर उठाने के लिए बहुत से कल्याणकारी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं तथा इन कार्यक्रमों के लिए पंचवर्षीय योजनाओं में धन रखा जाता है। पहली, दूसरी, तीसरी तथा चौथी पंचवर्षीय योजनाओं में लगभग 20 करोड़, 43 करोड़, 51 करोड़ तथा 75 करोड़ जनजातियों के कल्याण पर खर्च किए गए। पांचवीं, छठी तथा सातवीं पंचवर्षीय योजनाओं में 1102 करोड़, 55 3 5 करोड़ तथा ₹ 7073 करोड़ खर्च किए गए। नौवीं योजना में ₹ 15,965 करोड़ खर्च करने का प्रावधान था।

शिक्षा प्राप्त करने के लिए जनजातियों के छात्रों के लिए छात्रवृत्तियां दी जाती हैं। जनजातीय छात्रवास खोले गए हैं। उनके लिए सहकारी समितियां, अनुसंधान संस्थाएं तथा आश्रम खोले गए हैं। इन सबसे पता चलता है कि सरकार इनके उत्थान के लिए कितनी चिंतित है।

(vi) कल्याण तथा सलाहकार संगठन (Welfare and Advisory Organizations)-इनकी समस्याओं के समाधान के लिए समय-समय पर समितियां गठित की जाती हैं। विभिन्न राज्यों में इनके कल्याण के कार्यक्रम चलाने के लिए स्वतंत्र विभाग खोले गए हैं। भारत सरकार ने 1968 तथा 1971 में संसदीय समितियों का गठन किया ताकि जनजातियों के लिए चल रहे कार्यक्रमों का मूल्यांकन किया जा सके। आजकल 30 सदस्यों की स्थायी संसदीय समिति इन कल्याण के कार्यक्रमों की जांच करती है।

इसके अलावा जनजातीय तथा गैर-जनजातीय लोगों द्वारा भी जनजातीय लोगों के उत्थान के प्रयास किए जाते रहे हैं ताकि ये लोग भी और सामान्य वर्गों की तरह आज के समय के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकें तथा समाज में ऊपर उठ सकें। इन सभी के प्रयासों के फलस्वरूप अब ये लोग धीरे-धीरे ऊपर उठ रहे हैं।

प्रश्न 5.
जनजातीय समस्याओं के समाधान के लिए अपने सुझाव दें।
उत्तर:
भारतीय संविधान में अनुसूचित जनजातियों के उत्थान के लिए खास प्रावधान किए गए हैं। केंद्र तथा राज्य सरकारों ने इनको ऊपर उठाने के लिए कई प्रकार के कार्यक्रम बनाए तथा उनको कार्यान्वित करने के लिए करोड़ों रुपये खर्च भी किए, पर फिर भी आज़ादी के 63 सालों के बाद भी ये समूह पूरी तरह आगे नहीं आ पाए हैं तथा बहुत सारे जनजातीय समूह आज भी पिछड़े हुए हैं।

न तो ये राष्ट्रीय मुख्यधारा में मिल पाए हैं तथा न ही ये अपने आपको भारतीय समाज का अंग समझते हैं। इनको ऊपर उठाने के लिए निम्नलिखित प्रयोग करने चाहिए ताकि ये भी और जातियों की तरह ऊपर उठ सकें।

(i) इन लोगों की कृषि संबंधी समस्या हल की जानी चाहिए। इसको भूमि आबंटित करनी चाहिए तथा इनको स्थानांतरित खेती की जगह स्थायी खेती करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।

(ii) इनके इलाकों में यातायात की समस्या हल की जानी चाहिए। इनके इलाकों तक सड़कों तथा रेल की पटरियों का निर्माण होना चाहिए ताकि यह और इलाकों में आराम से आ जा सकें तथा अपने
आपको मुख्यधारा से जोड़ सकें।

(iii) इन लोगों को दोबारा वन या पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए तथा खाना बनाने के लिए गैस इत्यादि मुहईया करवानी चाहिए।

(iv) इन लोगों की नशे की समस्या को हल के लिए इन को शराब के सेवन की जगह और किसी पेय के सेवन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इनमें नशे की लत हटाने के लिए यहां नशा निरोधक केंद्र खोले जाने चाहिएं ताकि यह नशे की आदत छोड़ सकें।

(v) वेश्यावृत्ति की समस्या खत्म करने के लिए उनमें साक्षरता दर बढ़ानी चाहिए ताकि यह लोग पढ़-लिखकर किसी स्वरोजगार के तरीके ढूंढ़ सकें तथा वेश्यावृत्ति की तरफ न मुड़ सकें। ग़रीबी दूर करने के लिए उन्हें ऋण उपलब्ध करवाने चाहिए ताकि वह कोई काम-धंधा कर सकें।

(vi) इनकी सारी समस्याओं की जड़ अनपढ़ता है। अनपढ़ता दूर करने के लिए उनमें शिक्षा का ज्यादा प्रसार करना चाहिए तथा किसी व्यवसाय से संबंधित प्रशिक्षण केंद्र खोलने चाहिएं। छात्रों को निःशुल्क शिक्षा तथा मुफ्त किताबें उपलब्ध करवाई जानी चाहिएं।

(vii) स्वास्थ्य संबंधी समस्या को हल करने के लिए इनके क्षेत्रों में ज्यादा से ज्यादा अस्पताल तथा डिस्पैंसरियां खोली जानी चाहिएं तथा इन लोगों को चिकित्सा तथा दवाइयां मुफ्त उपलब्ध करवानी चाहिएं। इन लोगों को भी प्राथमिक चिकित्सा संबंधी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि ज़रूरत पड़ने पर वह इसका प्रयोग कर सकें।

(viii) भाषा की समस्या हल करने के लिए इनको प्राथमिक या माध्यमिक स्तर तक स्थानीय भाषा में शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

(ix) धार्मिक समस्याओं को हल करने के लिए इनमें धर्म परिवर्तन रोका जाना चाहिए। इनको धीरे-धीरे हिंदुओं में मिला देना चाहिए क्योंकि ये लोग पिछड़े हुए हिंदू हैं। जादू टोने को कम करने के लिए विज्ञान का प्रचार करना चाहिए।

(x) राजनीतिक समस्याओं को हल करने के लिए इनकी उचित मांगों को स्वीकार करना चाहिए तथा इनके पिछड़ेपन को दूर करने के लिए इनमें मानवाधिकारों का उल्लंघन रोकना चाहिए।

(xi) इन्हें उच्च वर्गों की तरह सम्मान देना चाहिए। इनके साथ ऐसा व्यवहार करना चाहिए ताकि उनमें देश प्रेम व राष्ट्रभक्ति की भावना पैदा हो जाए। उनकी मान्यताओं विश्वासों से भी छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए ताकि वे चैन से जी सकें।

प्रश्न 6.
अन्य पिछड़े वर्ग का क्या अर्थ है? इनकी समस्याओं का वर्णन करो।
अथवा
अन्य पिछड़े वर्ग से आपका क्या तात्पर्य है?
अथवा
अन्य पिछड़े वर्ग किसे कहते हैं?
अथवा
अन्य पिछड़े वर्ग पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
अनुसूचित जातियों तथा जनजातियों के अलावा भी भारतीय समाज में एक ऐसा बड़ा वर्ग रहा है जो सैंकड़ों सालों से उपेक्षित रहा है। अगड़ी जातियों, समुदायों से नीचे तथा अनुसूचित जातियों से ऊपर समाज का बहुत बड़ा वर्ग है जो विभिन्न कारणों से उपेक्षित रहा है तथा भारतीय समाज की विकास यात्रा में निरंतर पिछड़ता गया। इसी वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग कहते हैं।

अन्य पिछड़े वर्ग का अर्थ (Meaning of O.B.C.)-पिछड़ा वर्ग भारतीय समाज का बहुसंख्यक ऐसा वर्ग है जो सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा भौगोलिक कारणों से कमज़ोर रह गया है। स्वतंत्रता के बाद इनके लिए अन्य पिछड़ा वर्ग शब्द का प्रयोग किया गया। ये हिंदुओं के द्रविड़ों हरिजनों के बीच की जातियों का समूह है। इसके अलावा इसमें गैर-हिंदुओं, अनुसूचित जातियों व जनजातियों को छोड़ कर अन्य निम्न वर्गों को शामिल किया जाता है। – इस शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1917-18 में किया गया था। देश की आजादी के बाद इत्र कुत्र पिछड़े वर्ग अन्य पिछड़े वर्ग शब्दों का प्रयोग किया गया। संविधान में इस शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है।

सुभाष तथा बी० पी० गुप्ता द्वारा तैयार किये गए राजनीति कोष में पिछड़े वर्ग की परिभाषा दी गई है। उनके अनुसार, “पिछड़े हुए वर्ग से मतलब समाज के उस वर्ग से है जो सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक निर्योग्यताओं के कारण समाज के अन्य वर्गों की तुलना में नीचे स्तर पर हों।”

विभिन्न राज्यों के पिछड़ेपन को आंकने के अलग-अलग पैमाने हैं। संविधान की धारा 340 में राष्ट्रपति तथा अनुच्छेद 15 व 16 के अनुसार राज्य सरकारें आयोगों का गठन कर पिछड़े वर्ग की आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिक स्थिति का पता लगा सकती हैं।

अन्य पिछड़े वर्गों की समस्याएं – (Problems of Other Backward Classes):
पिछड़े वर्गों की समस्याओं का वर्णन निम्नलिखित है –
1. भूमिहीन कृषकों की समस्या-भारत के ज्यादातर भागों में ऊँची जातियों का अधिकार माना गया है। गांव में ये लोग बिना भूमि के कृषक होते हैं तथा इन्हें और लोगों की भूमि पर काम करना पड़ता है। इस तरह उनके मालिक उनका शोषण करते हैं तथा ये लोग अपने मालिकों की दया पर निर्भर होते हैं।

2. व्यवसाय चुनने की समस्या-इस वर्ग के सदस्य आमतौर पर सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक तौर पर पिछड़े हुए होते हैं जिस वजह से उनके सामने व्यवसाय चुनने की समस्या पैदा हो जाती है। आर्थिक तथा शैक्षिक तौर पर भी ये लोग पिछड़े हुए होते हैं जिस वजह से भी ये अपनी मर्जी का व्यवसाय नहीं चुन सकते।

3. वेतन की समस्या-इन लोगों की एक और समस्या यह है कि इन लोगों को न तो पूरा वेतन मिलता है तथा न ही समय पर मिलता है। ये लोग ज्यादातर उच्च जाति के लोगों के खेतों में काम करते हैं तथा इन्हें नकद वेतन कम ही मिलता है। इन्हें इनके मालिक वेतन के बदले अनाज दे देते हैं जो इनके गुज़ारे के लिए पूरा नहीं पड़ता है। गांव में धोबी, लोहार, कुम्हार इत्यादि काम करते हैं तथा कम आमदनी की वजह से इनका गुजारा बड़ी मुश्किल से चलता है।

4. शिक्षा की समस्या-इन लोगों की एक और बड़ी समस्या यह है कि यह लोग अशिक्षित होते हैं। गरीबी की वजह से इनके बच्चे शिक्षा नहीं ले पाते हैं। उच्च शिक्षा आजकल काफी महंगी हो गई है जिस वजह से इनके बच्चे अशिक्षित रह जाते हैं तथा आर्थिक रूप से पिछड़ जाते हैं।

5. ऋणग्रस्तता की समस्या-इन लोगों की एक महत्त्वपूर्ण समस्या ऋणग्रस्तता की है। आम तौर पर ये गरीब होते हैं जिस वजह से जन्म, मौत, शादी, विवाह के समय पर इन्हें कर्ज लेना पड़ता है। साहूकार इनसे मनमर्जी का ब्याज वसूलते हैं। सारी उम्र यह कर्ज चुकाते रह जाते हैं। आदमी मर जाता है पर कर्ज खत्म नहीं होता। फिर यह कर्जा उसके बच्चों को उतारना पड़ता है। इस तरह यह हमेशा कर्ज में डूबे रहते हैं।

इस तरह इसके अलावा और बहुत सी समस्याएं हैं जिनकी वजह से पिछड़े वर्गों का जीवन नर्क बना हुआ है।

प्रश्न 7.
काका कालेलकर तथा मंडल आयोग की सिफारिशों के बारे में बताएं।
अथवा
मंडल आयोग का संबंध किस वर्ग से है? इस आयोग की प्रमुख सिफारिशें कौन-सी हैं?
उत्तर:
काका कालेलकर तथा मंडल आयोग दोनों ही केंद्र सरकार द्वारा गठित किए गए थे। इनका गठन विभिन्न आधारों पर पिछड़े वर्गों की पहचान करने तथा उनके कल्याण के लिए सुझाव देने के लिए किया गया था।
I. काका कालेलकर आयोग (Kaka Kalelkar Commission)-29 जनवरी, 1953 को काका कालेलकर की अध्यक्षता में केंद्र सरकार ने एक आयोग बनाया। अखिल भारतीय स्तर पर पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए यह पहला वर्ग था। आयोग के अध्यक्ष काका कालेलकर थे इसलिए इसे काका कालेलकर आयोग भी कहते हैं।

आयोग के कार्य व उद्देश्य (Functions and Objectives of Commission)-इस आयोग का गठन निम्नलिखित पिछड़ी जातियों से संबंधित सूचना एकत्रित करने तथा अपने सुझाव देने के लिए किया गया था।

  • पिछड़े वर्गों के पिछड़ेपन होने संबंधी मानदंड निर्धारित करना।
  • पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करना।
  • पिछड़े वर्गों की समस्याओं को दूर करने के लिए सुझाव देना।

पिछड़ेपन की कसौटियां (Criteria of Backwardness)-इस आयोग ने निम्नलिखित चार मानदंडों के आधार पर पिछड़ी जातियों की सूची तैयार की।

  • जातीय संस्तरण में निम्न स्थान।
  • शिक्षा का अभाव।
  • सरकारी नौकरियों में कम प्रतिनिधित्व।
  • व्यापार व उद्योगों में कम प्रतिनिधित्व।

आयोग की सिफारिशें (Recommendations of Commission)-आयोग ने व्यक्ति या परिवार की बजाए जाति को पिछड़ेपन का आधार माना तथा उनकी समस्याओं के समाधान के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए-

  • राष्ट्रीय एकता तथा प्रगति के प्रोत्साहन की नीति बनाना तथा उसको लागू करना।
  • सामाजिक, धार्मिक निर्योग्यताओं को दूर करने के लिए कानून का निर्माण करना।
  • सरकारी कार्यों से जातीय भावना भड़काने वाले कार्यों पर प्रतिबंध लगाना।
  • पिछड़े वर्गों में तेज़ गति से शिक्षा का प्रसार करना।
  • सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए जनसंचार का उपयोग करना।
  • विवाह तथा उत्तराधिकार के निर्धारण के लिए कानून का निर्माण करना।
  • पिछड़े वर्गों की महिलाओं के कल्याण के लिए विशेष सहायता देना।

लेकिन केंद्र सरकार ने जाति को पिछड़ेपन का आधार नहीं माना तथा राज्यों को निर्देश दिया कि वह पिछड़े वर्गों की पहचान करें तथा उनके कल्याण के लिए कार्य करें।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 5 सामाजिक विषमता एवं बहिष्कार के स्वरूप

II. मंडल आयोग (Mandal Commission)-जनता पार्टी ने चुनावों में किए अपने वायदे को पूरा करने के लिए पिछड़े वर्गों को सरकारी सेवा तथा शिक्षा संस्थानों में आरक्षण देने के लिए 20 दिसंबर, 1978 को एक आयोग का गठन किया तथा इस आयोग के अध्यक्ष बी० पी० मंडल थे।

आयोग के कार्य तथा उद्देश्य (Functions and Objectives of Commission) – मंडल आयोग को पिछड़े वर्ग से संबंधित निम्नलिखित तथ्य इकट्ठे करने तथा अपने सुझाव देने के लिए बनाया गया था।

  • पिछड़े वर्गों के पिछड़ेपन के मापदंड निर्धारित करना।
  • पिछड़े वर्गों के उत्थान के सुझाव देना।
  • केंद्र व राज्य सेवाओं में पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण की संभावनाओं का पता लगाना।
  • इकट्ठे किए जाने वाले तथ्यों के आधार पर सुझाव देना।

पिछड़ेपन की कसौटियाँ (Criteria for Backwardness)-मंडल आयोग ने पिछड़े वर्ग निर्धारण के लिए तीन मापदंडों का चयन किया था वह थे सामाजिक, शैक्षणिक तथा आर्थिक। इन्हें कई भागों में विभाजित किया। प्रत्येक मानदंड के लिए महत्त्व अलग-अलग दिया गया।

आयोग की सिफ़ारिशें (Recommendations of the Commission)-पिछड़े वर्गों में कल्याण के लिए मंडल आयोग द्वारा दी गई सिफ़ारिशें निम्नलिखित हैं –

  • सार्वजनिक सेवाओं में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण।
  • अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27% आरक्षण क्योंकि संविधान के अनुसार अनुसूचित जातियों, जनजातियों के लिए आरक्षण 50% से ज्यादा नहीं हो सकता।।
  • अन्य पिछड़े वर्गों में तकनीकी, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा शैक्षणिक योग्यता बढ़ाना।
  • भूमि सुधारों को उच्चतम प्राथमिकता देना।

मंडल आयोग की रिपोर्ट में भी कई गलतियां थीं।

अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए सामाजिक आधार को ज्यादा महत्त्व दिया गया। आयोग ने सिर्फ 1% जनसंख्या का नमूने के तौर पर अध्ययन कर अन्य पिछड़े वर्गों का निर्धारण कर दिया। जातीय संबंधी जानकारी के लिए 1931 की जनगणना को आधार माना जबकि 50 वर्षों में देश की जातियों के अनेकों परिवर्तन आए थे।

फिर भी इन त्रुटियों को नज़र अंदाज करते हुए 1989 में जनता दल के बने प्रधानमंत्री वी० पी० सिंह ने 7 अगस्त, 1990 को इस रिपोर्ट को लागू करने की घोषणा कर दी। इस तरह इसके बाद 1992 के उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद ये सिफारिशें यानि कि 27% आरक्षण पिछड़ी जातियों के लिए लागू हो गया।

प्रश्न 8.
विभिन्न युगों में स्त्रियों की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
दुनिया तथा भारत में लगभग आधी जनसंख्या स्त्रियों की है पर अलग-अलग देशों में स्त्रियों की स्थिति समान नहीं है। हिंदू शास्त्रों में स्त्री को अर्धांगिनी माना गया है तथा हिंदू समाज में इनका वर्णन लक्ष्मी, दुर्गा, काली, सरस्वती इत्यादि के रूप में किया गया है। स्त्री को भारत में भारत माता कह कर भी बुलाते हैं तथा उसके प्रति अपना आभार तथा श्रद्धा प्रकट करते हैं। यहां तक कि कई धार्मिक यज्ञ तथा कर्मकांड स्त्री के बगैर अधूरे माने जाते हैं।

उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी थी पर मध्य युग आते-आते स्त्रियों की स्थिति काफ़ी दयनीय हालत में पहंच गई। 19वीं शताब्दी में बहत-से समाज सधारकों ने स्त्रियों की स्थिति सधारने का प्रयास किया। 20वीं सदी में स्त्रियां अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गईं तथा उन्होंने आज़ादी के आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिए। इसी के साथ उनके दृष्टिकोण में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया तथा इनकी राजनीतिक तथा आर्थिक क्षेत्र में काफ़ी भागीदारी बढ़ गई।

फिर भी इन परिवर्तनों, जोकि हम आज देख रहे हैं, के बावजूद समाज में स्त्रियों की स्थिति अलग-अलग कालों में अलग-अलग रही है जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. वैदिक काल (Vedic Age) वैदिक काल को भारतीय समाज का स्वर्ण काल भी कहा जाता है। इस युग में स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी थी। उस समय का साहित्य जो हमारे पास उपलब्ध है उसे पढ़ने से पता चलता है कि इस काल में स्त्रियों को शिक्षा ग्रहण करने, विवाह तथा संपत्ति रखने के अधिकार पुरुषों के समान थे। परिवार में स्त्री का स्थान काफ़ी अच्छा होता था तथा स्त्री को धार्मिक तथा सामाजिक कार्य पूरा करने के लिए बहुत ज़रूरी माना जाता था।

इस समय में लड़कियों की उच्च शिक्षा पर काफ़ी ध्यान दिया जाता था। उस समय पर्दा प्रथा तथा बाल विवाह जैसी कुरीतियां नहीं थीं, चाहे बहू-पत्नी विवाह अवश्य प्रचलित थे पर स्त्रियों को काफ़ी सम्मान से घर में रखा जाता था। विधवा विवाह पर प्रतिबंध नहीं था। सती प्रथा का कोई विशेष प्रचलन नहीं था इसलिए विधवा औरत सती हो भी सकती थी तथा नहीं भी। वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान ही थी। इस युग में स्त्री का अपमान करना पाप समझा जाता था तथा स्त्री की रक्षा करना वीरता का काम समझा जाता था। भारत में स्त्री की स्थिति काफ़ी उच्च थी तथा पश्चिमी देशों में वह दासी से ज़्यादा कुछ नहीं थी। यह काल 4500 वर्ष पहले था।

2. उत्तर वैदिक काल (Post Vedic Period)- यह काल ईसा से 600 वर्ष पहले (600 B.C.) शुरू हुआ तथा ईसा के 3 शताब्दी (300 A.D.) बाद तक माना गया। इस समय में स्त्रियों को वह आदर सत्कार, मान-सम्मान न मिल पाया जो उन को वैदिक काल में मिलता था। इस समय बाल-विवाह प्रथा शुरू हुई जिस वजह से स्त्रियों को शिक्षा प्राप्ति में कठिनाई होने लगी। शिक्षा न मिल पाने की वजह से उनका वेदों का ज्ञान खत्म हो गया या न मिल पाया जिस वजह से उनके धार्मिक संस्कारों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

इस काल में स्त्रियों के लिए पति की आज्ञा मानना अनिवार्य हो गया तथा विवाह करना भी ज़रूरी हो गया। इस काल में बहु-पत्नी दा प्रचलित हो गई थी तथा स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न हो गयी थी। इस काल में विधवा विवाह पर नियंत्रण लगना शुरू हो गया तथा स्त्रियों का काम सिर्फ घर की ज़िम्मेदारियां पूरी करना रह गया था। इस युग में आखिरी स्तर पर आते-आते स्त्रियों की स्वतंत्रता तथा अधिकार काफ़ी कम हो गए थे तथा उनकी स्वतंत्रता पर नियंत्रण लगने शुरू हो गए थे।

3. स्मृति काल (Smriti Period) इस काल में मनु स्मृति में दिए गए सिद्धांतों के अनुरूप व्यवहार करने पर ज्यादा ज़ोर देना शुरू हो गया था। इस काल में बहुत-सी संहिताओं जैसे मनु संहिता, पराशर संहिता तथा याज्ञवल्क्य संहिता रचनाओं की रचना की गई। इसलिए इस काल को धर्म शास्त्र काल के नाम से भी पुकारा जाता है। इस काल में स्त्रियों की स्थिति पहले से भी ज्यादा निम्न हो गई। स्त्री का सम्मान सिर्फ माता के रूप में रह गया था। विवाह करने की उम्र और भी कम हो गई तथा समाज में स्त्री को काफ़ी हीन दृष्टि से देखा जाता था।

मनुस्मृति में तो यहां तक लिखा है कि स्त्री को हमेशा कड़ी निगरानी में रखना चाहिए, छोटी उम्र में पिता की निगरानी में, युवावस्था में पति की निगरानी में तथा बुढ़ापे में पुत्रों की निगरानी में रखना चाहिए। इस काल में विधवा विवाह पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया तथा सती प्रथा को ज्यादा महत्त्व दिया जाने लगा। स्त्रियों का मुख्य धर्म पति की सेवा माना गया। विवाह 10-12 वर्ष की उम्र में ही होने लगे। स्त्री का अपना कोई अस्तित्व नहीं रह गया था। स्त्रियों के सभी अधिकार पति या पुत्र को दे दिए गए। पति को देवता कहा गया तथा पति की सेवा ही उसका धर्म रह गया था।

4. मध्य काल (Middle Period) मध्यकाल में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना के बाद तो स्त्रियों की स्थिति बद से बदतर होती चली गई। ब्राह्मणों ने हिंदू धर्म की रक्षा, स्त्रियों की इज्जत तथा रक्त की शुद्धता बनाए रखने के लिए स्त्रियों के लिए काफ़ी कठोर नियमों का निर्माण कर दिया था। स्त्री शिक्षा काफ़ी हद तक खत्म हो गई तथा पर्दा प्रथा काफ़ी ज्यादा चलने लगी। लड़कियों के विवाह की उम्र भी घटकर 8-9 वर्ष ही रह गई। इस वजह से बचपन में ही उन पर गृहस्थी का बोझ लाद दिया जाता था।

सती प्रथा काफ़ी ज्यादा प्रचलित हो गई थी तथा विधवा विवाह पूरी तरह बंद हो गए थे। स्त्रियों को जन्म से लेकर मृत्यु तक पुरुष के अधीन कर दिया गया तथा उनके सारे अधिकार लिए गए। मध्य काल का समय स्त्रियों के लिए काला युग था। परिवार में उसकी स्थिति शून्य के समान थी तथा उसे पैर की जूती समझा जाता था। स्त्रियों को ज़रा-सी गलती पर शारीरिक दंड दिया जाता था। अधिकार भी वापस ले लिया गया था।

5. आधुनिक काल (Modern Age)-अंग्रेजों के आने के बाद आधुनिक काल शुरू हुआ। इस समय औरतों के उद्धार के लिए आवाज़ उठनी शुरू हुई तथा सबसे पहले आवाज़ उठाई राजा राममोहन राय ने जिनके यत्नों की वजह से सती प्रथा बंद हुई। विधवा विवाह को कानूनी मंजूरी मिल गई। फिर और समाज सुधारक जैसे कि दयानंद सरस्वती, गोविंद रानाडे, रामाबाई रानाडे, विवेकानंद इत्यादि ने भी स्त्री शिक्षा तथा उनके अधिकारों के लिए आवाज़ उठायी।

इनके यत्नों की वजह से स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार होने लगा। स्त्रियों को शिक्षा प्राप्त होने लगी तथा वह घर की चार-दीवारी से बाहर निकल कर देश के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने लगीं। शिक्षा की वजह से वह नौकरी करने लगी तथा राजनीतिक क्षेत्र में भी हिस्सा लेने लगी जिस वजह से वह आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर ने लगी। आजकल स्त्रियों की स्थिति काफ़ी अच्छी है क्योंकि शिक्षा तथा आत्म निर्भरता की वजह से स्त्री को अपने अधिकारों का पता चल गया है। आज से संपत्ति रखने, पिता की जायदाद से हिस्सा लेने तथा हर तरह के वह अधिकार प्राप्त हैं जो पुरुषों को प्राप्त हैं।

प्रश्न 9.
हिंदू महिलाओं की निम्न स्थिति के क्या कारण हैं?
उत्तर:
विभिन्न युगों या कालों में स्त्रियों की स्थिति कभी अच्छी या कभी निम्न रही है। वैदिक काल में तो यह बहुत अच्छी थी पर धीरे-धीरे काफ़ी निम्न होती चली गई। वैदिक काल के बाद तो विशेषकर मध्यकाल से लेकर ब्रिटिश काल अर्थात् आजादी से पहले तक स्त्रियों की स्थिति निम्न रही है। स्त्रियों की निम्न स्थिति का सिर्फ़ कोई एक कारण नहीं है बल्कि अनेकों कारण हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. संयुक्त परिवार प्रणाली (Joint Family System) भारतीय समाज में संयुक्त परिवार प्रथा मिलती है। स्त्रियों की दयनीय स्थिति बनाने में इस प्रणाली की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। इस प्रथा में स्त्रियों को संपत्ति रखने या किसी और प्रकार के सामाजिक अधिकार नहीं होते हैं। स्त्रियों को घर की चारदीवारी में कैद रखना पारिवारिक सम्मान की बात समझी जाती थी। परिवार में बाल विवाह को तथा सती प्रथा को महत्त्व दिया जाता था जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति काफ़ी निम्न होती थी।

2. पितृसत्तात्मक परिवार (Patriarchal Family)-भारतीय समाज में ज्यादातर पितृसत्तात्मक परिवार देखने को मिल जाते हैं। इस प्रकार के परिवार में परिवार का हरेक कार्य पिता की इच्छा के अनुसार ही होता है। बच्चों के नाम के साथ पिता के वंश का नाम जोड़ा जाता है। विवाह के बाद स्त्री को पति के घर जाकर रहना होता है। पारिवारिक मामलों तथा संपत्ति पर अधिकार पिता का ही होता है। इस प्रकार के परिवार में स्त्री की स्थिति काफ़ी निम्न होती है क्योंकि घर के किसी काम में स्त्री की सलाह नहीं ली जाती है।

3. कन्यादान का आदर्श (Ideal of Kanyadan)-पुराने समय से ही हिंद विवाह में कन्यादान का आदर्श प्रचलित रहा है। पिता अपनी इच्छानुसार अपनी लड़की के लिए अच्छा-सा वर ढूंढ़ता है तथा उसे अपनी लड़की दान के रूप में दे देता है। पिता द्वारा किया गया कन्या का यह दान इस बात का प्रतीक है कि पत्नी के ऊपर पति का परा अधिकार होता है। इस तरह दान के आदर्श के आधार पर भी स्त्रियों की स्थिति समाज में निम्न ही रही है।

4. बाल विवाह (Child Marriage)-बाल विवाह की प्रथा के कारण भी स्त्रियों की स्थिति निम्न रही है। इस प्रथा के कारण छोटी उम्र में ही लड़कियों का विवाह हो जाता है जिस वजह से न तो वह शिक्षा ग्रहण कर पाती हैं तथा न ही उन्हें अपने अधिकारों का पता लगता है। पति भी उन पर आसानी से अपनी प्रभुता जमा लेते हैं जिस वजह से स्त्रियों को हमेशा पति के अधीन रहना पड़ता है।

5. कुलीन विवाह (Hypergamy)-कुलीन विवाह प्रथा के अंतर्गत लड़की का विवाह या तो बराबर के कुल में या फिर अपने से ऊँचे कुल में करना होता है, जबकि लड़कों को अपने से नीचे कुलों में विवाह करने की छूट होती है। इसलिए लड़की के माता-पिता छोटी उम्र में ही लड़की का विवाह कर देते हैं ताकि किसी किस्म की उन्हें तथा लड़की को परेशानी न उठानी पड़े। इस वजह से स्त्रियों में अशिक्षा की समस्या हो जाती है तथा उनकी स्थिति निम्न ही रह जाती है।

6. स्त्रियों की अशिक्षा (Illiteracy)-शिक्षा में अभाव के कारण भी हिंदू स्त्री की स्थिति दयनीय रही है। बाल-विवाह के कारण शिक्षा न प्राप्त कर पाना जिसकी वजह से अपने अधिकारों के प्रति जागरूक न होना स्त्रियों की निम्न स्थिति का महत्त्वपूर्ण कारण रहा है। अज्ञान के कारण अनेक अंधविश्वासों, कुरीतियों, कुसंस्कारों तथा सामाजिक परंपराओं के बीच स्त्री इस प्रकार जकड़ती गई कि उनसे पीछा छुड़ाना एक समस्या बन गई।

स्त्रियों को चारदीवारी के अंदर रखकर पति को परमेश्वर मानने का उपदेश उसे बचपन से ही पढ़ाया जाता था तथा पूरा जीवन सबके बीच में रहते हुए सबकी सेवा करते हुए बिता देना स्त्री का धर्म समझा जाता रहा है। इन सब चीज़ों के चलते स्त्री अपने अधिकारों के प्रति जागरूक नहीं हो पाई तथा उसका स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता ही चला गया।

7. स्त्रियों की आर्थिक निर्भरता (Economic Dependency of Women)-पुराने समय से ही परिवार का कर्ता पिता या पुरुष रहा है। इसलिए परिवार के भरण-पोषण या पालन-पोषण का भार उसके कंधों पर ही होता है। स्त्रियों का घर से बाहर जाना परिवार के सम्मान के विरुद्ध समझा जाता था। इसलिए आर्थिक मामलों में हमेशा स्त्री को पुरुष के ऊपर निर्भर रहना पड़ता था। परिणामस्वरूप स्त्रियों की स्थिति निम्न से निम्नतम होती गई।

8. ब्राह्मणवाद (Brahmanism) कुछ विचारकों का यह मानना है कि हिंदू धर्म या ब्राह्मणवाद स्त्रियों की निम्न स्थिति का मुख्य कारण है क्योंकि ब्राह्मणों ने जो सामाजिक तथा धार्मिक नियम बनाए थे उनमें पुरुषों को उच्च स्थिति तथा स्त्रियों को निम्न स्थिति दी गई थी। मनु के अनुसार भी स्त्री का मुख्य धर्म पति की सेवा करना है। मुसलमानों ने जब भारत में अपना राज्य बनाया तो उनके पास स्त्रियों की कमी थी क्योंकि वह बाहर से आए थे तथा उन्हें हिंदू स्त्रियों से विवाह पर कोई आपत्ति नहीं थी।

इस वजह से हिंदू स्त्रियों को मुसलमानों से बचाने के लिए हिंदुओं ने विवाह संबंधी नियम और कठोर कर दिए। बाल विवाह को बढ़ावा दिया गया तथा विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध लगा दिए गए। सती प्रथा तथा पर्दा प्रथा को बढावा दिया गया जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति और निम्न होती चली गई।

प्रश्न 10.
स्वतंत्रता के बाद महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए क्या प्रयास किए गए हैं?
अथवा
स्वतंत्रता के पश्चात महिलाओं की स्थिति का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
देश की आधी जनसंख्या स्त्रियों की है। इसलिए देश के विकास के लिए यह भी ज़रूरी है कि उनकी स्थिति में सुधार लाया जाये। उनसे संबंधित कुप्रथाओं तथा अंधविश्वासों को समाप्त किया जाए। स्वतंत्रता के बाद भारत के संविधान में कई ऐसे प्रावधान किये गये जिनसे महिलाओं की स्थिति में सुधार हो। उनकी सामाजिक स्थिति बेहतर बनाने के लिए अलग-अलग कानून बनाए गए। आजादी के बाद देश की महिलाओं के उत्थान, कल्याण तथा स्थिति में सुधार के लिए निम्नलिखित प्रयास किए गए हैं-
1. संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)-महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए संविधान में निम्नलिखित प्रावधान हैं

  • अनुच्छेद 14 के अनुसार कानून के सामने सभी समान हैं।
  • अनुच्छेद 15 (1) द्वारा धर्म, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भारतीय से भेदभाव की मनाही है।
  • अनुच्छेद 15 (3) के अनुसार राज्य, महिलाओं तथा बच्चों के लिए विशेष प्रावधान करें।
  • अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्य रोज़गार तथा नियुक्ति के मामलों में सभी भारतीयों को समान अवसर प्रदान करें।
  • अनुच्छेद 39 (A) के अनुसार राज्य, पुरुषों तथा महिलाओं को आजीविका के समान अवसर उपलब्ध करवाएं।
  • अनुच्छेद 39 (D) के अनुसार पुरुषों तथा महिलाओं को समान कार्य के लिए समान वेतन दिया जाए।
  • अनुच्छेद 42 के अनुसार राज्य कार्य की न्यायपूर्ण स्थिति उत्पन्न करें तथा अधिक-से-अधिक प्रसूति सहायता प्रदान करें।
  • अनुच्छेद 51 (A) (E) के अनुसार स्त्रियों के गौरव का अपमान करने वाली प्रथाओं का त्याग किया जाए।
  • अनुच्छेद 243 के अनुसार स्थानीय निकायों-पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में एक तिहाई स्थानों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान है।

2. कानून (Legislations)-महिलाओं के हितों की सुरक्षा तथा उनकी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए कई कानूनों का निर्माण किया गया जिनका वर्णन निम्नलिखित है-

  • सती प्रथा निवारण अधिनियम, 1829, 1987 (The Sati Prohibition Act)
  • हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856 (The Hindu Widow Remarriage Act)
  • बाल विवाह अवरोध अधिनियम (The Child Marriage Restraint Act)
  • हिंदू स्त्रियों का संपत्ति पर अधिकार (The Hindu Women’s Right to Property Act) 1937.
  • विशेष विवाह अधिनियम (Special Marriage Act) 1954.
  • हिंदू विवाह तथा विवाह विच्छेद अधिनियम (The Hindu Marriage and Diworce Act) 1955 & 1967.
  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (The Hindu Succession Act) 1956.
  • दहेज प्रतिबंध अधिनियम (Dowry Prohibition Act) 1961, 1984. 1986.
  • मातृत्व हित लाभ अधिनियम (Maternity Relief Act) 1961, 1976.
  • मुस्लिम महिला तलाक के अधिकारों का संरक्षण अधिनियम (Muslim Women Protection of Rights of Diworce) 1986.

ऊपर लिखे कानूनों में से चाहे कुछ आजादी से पहले बनाए गए थे पर उनमें आजादी के बाद संशोधन कर लिए गए हैं। इन सभी विधानों से महिलाओं की सभी प्रकार की समस्याओं जैसे दहेज, बाल विवाह, सती प्रथा, संपत्ति का उत्तराधिकार इत्यादि का समाधान हो गया है तथा इनसे महिलाओं की स्थिति सुधारने में मदद मिली है।

3. महिला कल्याण कार्यक्रम (Women Welfare Programmes)-स्त्रियों के उत्थान के लिए आज़ादी के बाद कई कार्यक्रम चलाए गए जिनका वर्णन निम्नलिखित है

  • 1975 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया तथा उनके कल्याण के कई कार्यक्रम
  • 1982-83 में ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक तौर पर मज़बूत करने के लिए डवाकरा कार्यक्रम चलाया जा रहा है।
  • 1986-87 में महिला विकास निगम की स्थापना की गई ताकि अधिक से अधिक महिलाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त हों।
  • 1992 में राष्ट्रीय महिला आयोग का पुनर्गठन किया गया ताकि महिलाओं के ऊपर बढ़ रहे अत्याचारों को रोका जा सके।

4. देश में महिला मंडलों की स्थापना की गई। यह महिलाओं के वे संगठन हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के कल्याण के लिए कार्यक्रम चलाते हैं। इन कार्यक्रमों पर होने वाले खर्च का 75% पैसा केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड देता

5. शहरों में कामकाजी महिलाओं को समस्या न आए इसीलिए सही दर पर रहने की व्यवस्था की गई है। केंद्रीय समाज कल्याण बोर्ड ने होस्टल स्थापित किए हैं ताकि कामकाजी महिलाएं उनमें रह सकें।

6. केंद्रीय समाज कल्याण मंडल ने सामाजिक आर्थिक कार्यक्रम देश में 1958 के बाद से चलाने शुरू किए ताकि ज़रूरतमंद, अनाथ तथा विकलांग महिलाओं को रोजगार उपलब्ध करवाया जा सके। इसमें डेयरी कार्यक्रम भी शामिल है।

इस तरह आज़ादी के पश्चात् बहुत सारे कार्यक्रम चलाए गए हैं ताकि महिलाओं की सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाया जा सके। अब महिला सशक्तिकरण में चल रहे प्रयासों की वजह से भारतीय महिलाओं का बेहतर भविष्य दृष्टिगोचर होता है।

प्रश्न 11.
भारतीय महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन के कारणों का वर्णन करो।
उत्तर:
आज के समय में भारतीय महिलाओं की स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आए हैं। महिलाओं की जो स्थिति आज से 50 वर्ष पहले थी उसमें तथा आज की महिला की स्थिति में काफ़ी फर्क है। आज महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर बाहर दफ्तरों में काम कर रही हैं। पर यह परिवर्तन किसी एक कारण की वजह से नहीं आया है। इसमें कई कारण हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
1. स्त्रियों की साक्षरता दर में वृद्धि-आज़ादी से पहले स्त्रियों की शिक्षा की तरफ़ कोई ध्यान नहीं देता था पर आजादी के पश्चात् भारत सरकार की तरफ से स्त्रियों की शिक्षा के स्तर को बढ़ाने के लिए कई उपाय किए गए जिस वजह से स्त्रियों की शिक्षा के स्तर में काफ़ी वृद्धि हुई। सरकार ने लड़कियों को पढ़ाने के लिए मुफ्त शिक्षा, छात्रवृत्तियां प्रदान की, मुफ्त किताबों का प्रबंध किया ताकि लोग अपनी लड़कियों को स्कूल भेजें।

इस तरह धीरे-धीरे स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार हुआ तथा उनका शिक्षा स्तर बढ़ने लगा। आजकल हर क्षेत्र में लड़कियाँ उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। शिक्षा की वजह से उनके विवाह भी देर से होने लगे जिस वजह से उनका जीवन स्तर ऊंचा उठने लगा। आज लड़कियां भी लड़कों की तरह बढ़-चढ़ कर शिक्षा ग्रहण करती हैं। इस तरह स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण उनमें शिक्षा का प्रसार है।

2. औद्योगीकरण-आज़ादी के बाद औद्योगीकरण का बहुत तेजी से विकास हुआ। शिक्षा प्राप्त करने की वजह से औरतें भी घर की चारदीवारी से बाहर निकल कर नौकरियां करने लगीं जिस वजह से उनके ऊपर से पाबंदियां हटने लगीं। औरतें दफ्तरों में और पुरुषों के साथ मिलकर काम करने लगीं जिस वजह से जाति प्रथा की पाबंदियां खत्म होनी शुरू हो गईं। औरों के साथ मेल-जोल से प्रेम विवाह के प्रचलन बढ़ने लगे। दफ्तरों में काम करने की वजह से उनकी पुरुषों पर से आर्थिक निर्भरता कम हो गई जिस वजह से स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी सुधार हुआ। इस तरह औरतों की स्थिति सुधारने में औद्योगीकरण की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।

3. पश्चिमी संस्कृति-आजादी के बाद भारत पश्चिमी देशों के संपर्क में आया जिस वजह से वहां के विचार, वहां की संस्कृति हमारे देश में भी आयी। महिलाओं को उनके अधिकारों, उनकी आजादी के बारे में पता चला जिस वजह से उनकी विचारधारा में परिवर्तन आना शुरू हो गया। इस संस्कृति की वजह से अब महिलाएं मर्दो के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ी होनी शुरू हो गईं। दफ्तरों में काम करने की वजह से औरतें आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर हो गईं तथा उनमें मर्दो के साथ समानता का भाव आने लगा। कुछ महिला आंदोलन भी चले जिस वजह से महिलाओं में जागरूकता आ गई तथा उनकी स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया।

4. अंतर्जातीय विवाह-आजादी के बाद 1955 में हिंदू विवाह कानून पास हुआ जिससे अंतर्जातीय विवाह को कानूनी मंजूरी मिल गई। शिक्षा के प्रसार की वजह से औरतें दफ्तरों में काम करने लग गईं, घर से बाहर निकली जिस वजह से वह अन्य जातियों के संपर्क में आईं। प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह होने लगे जिस वजह से लोगों की विचारधारा में परिवर्तन आने लग गए। इस वजह से अब लोगों की नज़रों में औरतों की स्थिति ऊँची होनी शुरू हो गई। औरतों की आत्म निर्भरता की वजह से उन्हें और सम्मान मिलने लगा। इस तरह अंतर्जातीय विवाह की वजह से दहेज प्रथा या वर मूल्य में कमी होनी शुरू हो गई तथा स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन आना शुरू हो गया।

5. संचार तथा यातायात के साधनों का विकास-आज़ादी के बाद यातायात तथा संचार के साधनों में विकास होना शुरू हुआ। लोग एक-दूसरे के संपर्क में आने शुरू हो गए। लोग गांव छोड़कर दूर-दूर शहरों में जाकर रहने लगे जिस वजह से वे अन्य जातियों के संपर्क में आए। इसके साथ ही कुछ नारी आंदोलन चले तथा सरकारी कानून भी बने ताकि महिलाओं का शोषण न हो सके। इन साधनों के विकास की वजह से स्त्रियां पढ़ने लगीं, नौकरियां करने लगी तथा लोगों की विचारधारा में धीरे-धीरे परिवर्तन होने शुरू हो गए।

6. विधानों का निर्माण-चाहे आज़ादी से पहले भी महिलाओं में उत्थान के लिए कई कानूनों का निर्माण हुआ था पर वह पूरी तरह लागू नहीं हुए थे क्योंकि हमारे देश में विदेशी सरकार थी। पर 1947 के पश्चात् भारत सरकार ने इन कानूनों में संशोधन किए तथा उन्हें सख्ती से लागू किया।

इसके अलावा कुछ और नए कानून भी बने जैसे कि हिंदू विवाह कानून, हिंदू उत्तराधिकार कानून, दहेज प्रतिबंध कानून इत्यादि ताकि स्त्रियों का शोषण होने से रोका जा सके। इन क की वजह से स्त्रियों का शोषण कम होना शुरू हो गया तथा स्त्रियां अपने आपको सुरक्षित महसूस करने लग गईं। अब कोई भी स्त्रियों का शोषण करने से पहले दस बार सोचता है क्योंकि अब कानून स्त्रियों के साथ है। इस तरह कानूनों की वजह से भी स्त्रियों की स्थिति में काफ़ी परिवर्तन आए हैं।

7. संयुक्त परिवार का विघटन-यातायात तथा संचार के साधनों के विकास, शिक्षा, नौकरी, दफ्तरों में काम, अपने घर या गांव या शहर से दूर काम मिलना तथा औद्योगीकरण की वजह से संयुक्त परिवारों में विघटन आने शुरू हो गए। पहले संयुक्त परिवारों में स्त्री घर में ही घुट-घुट कर मर जाती थी पर शिक्षा के प्रसार तथा दफ्तरों में नौकरी करने की वजह से हर कोई संयुक्त परिवार छोड़कर अपना केंद्रीय परिवार बसाने लगा जो कि समानता पर आधारित होता है।

संयुक्त परिवार में स्त्री को पैर की जूती समझा जाता है पर केंद्रीय परिवारों में स्त्री की स्थिति पुरुषों के समान होती है जहां स्त्री आर्थिक या हर किसी क्षेत्र में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी होती हैं। इस तरह संयुक्त परिवारों के विघटन ने भी स्त्रियों की स्थिति में परिवर्तन करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। – इन कारणों के अलावा और बहुत-से कारण हैं जिन्होंने स्त्रियों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है पर ऊपर दिए गए कारण उन सभी कारणों से ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एडम स्मिथ किस देश से संबंध रखते थे?
(A) इंग्लैंड
(B) अमेरिका
(C) फ्रांस
(D) जर्मनी।
उत्तर:
इंग्लैंड।

प्रश्न 2.
एडम स्मिथ ने कौन-सी किताब लिखी थी?
(A) द रिचनेस आफ नेशन्स
(B) द वेल्थ ऑफ नेशन्स
(C) द मार्कीट इकॉनामी
(D) द वीकली मार्कीट।
उत्तर:
द वेल्थ ऑफ नेशन्स।

प्रश्न 3.
उस बल को एडम स्मिथ ने क्या नाम दिया था जो लोगों के लाभ की प्रवृत्ति को समाज के लाभ में बदल देता
(A) खुला व्यापार
(B) लेसे-फेयर
(C) अदृश्य हाथ
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
अदृश्य हाथ।

प्रश्न 4.
इनमें से किसका एडम स्मिथ ने समर्थन किया था?
(A) खुला व्यापार
(B) अदृश्य हाथ
(C) लेसे-फेयर
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
अदृश्य हाथ।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 5.
समाजशास्त्री मानते हैं कि ………………. सामाजिक संस्थाएँ हैं जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित है।
(A) बाजार
(B) परिवार
(C) विवाह
(D) नातेदारी।
उत्तर:
बाज़ार।

प्रश्न 6.
ज़िला बस्तर किस प्रदेश में स्थित है?
(A) पंजाब
(B) बिहार
(C) मध्य प्रदेश
(D) छत्तीसगढ़।
उत्तर:
छत्तीसगढ़।

प्रश्न 7.
किन क्षेत्रों में साप्ताहिक बाज़ार एक पुरानी संस्था है?
(A) जन-जातीय
(B) नगरीय
(C) ग्रामीण
(D) औद्योगिक।
उत्तर:
जन-जातीय।

प्रश्न 8.
किस मानवविज्ञानी के अनुसार बाज़ार का महत्त्व केवल उसकी आर्थिक क्रियाओं तक सीमित नहीं है?
(A) एडम स्मिथ
(B) एल्फ्रेड गेल
(C) जोंस
(D) मैकाइवर तथा पेज।
उत्तर:
एल्फ्रेड गेल।

प्रश्न 9.
औपनिवेशिक काल में ग्रामीण क्षेत्रों में कौन-सी व्यवस्था प्रचलित थी?
(A) जजमानी प्रथा
(B) रुपये का लेन-देन
(C) पारंपरिक प्रथा
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
जजमानी प्रथा।

प्रश्न 10.
इनमें से कौन-से समूह का मुख्य कार्य व्यापार करना है?
(A) ब्राह्मण
(B) क्षत्रिय
(C) वैश्य
(D) शूद्र।
उत्तर:
वैश्य।

प्रश्न 11.
किस प्रक्रिया के कारण भारत में नए बाज़ार सामने आए?
(A) आधुनिकीकरण
(B) संस्कृतिकरण
(C) पश्चिमीकरण
(D) उपनिवेशवाद।
उत्तर:
उपनिवेशवाद।

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प्रश्न 12.
इनमें से कौन-सा व्यापारिक समुदाय भारत में हर जगह पाया जाने वाला तथा सबसे अधिक जाना माना समुदाय है?
(A) मारवाड़ी
(B) नाकरट्टार
(C) चेट्टीयार
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
मारवाड़ी।

प्रश्न 13.
‘अदृश्य हाथ’ की संज्ञा देन है
(A) स्मिथ की
(B) मार्क्स की
(C) दुर्खीम की
(D) एम० एन० श्रीनिवास की।
उत्तर:
स्मिथ की।

प्रश्न 14.
इनमें से सामाजिक संस्था है-
(A) जाति..
(B) जनजाति
(C) बाज़ार
(D) सभी।
उत्तर:
सभी।

प्रश्न 15.
‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ नामक पुस्तक किसने लिखी
(A) एम० एन० श्रीनिवास
(B) कार्ल मार्क्स
(C) एडम स्मिथ
(D) रॉबर्ट माल्थस।
उत्तर:
एडम स्मिथ।

प्रश्न 16.
उदारवाद किस दशक में शुरू हुआ?
(A) 1960
(B) 1980
(C) 1970
(D) 1990.
उत्तर:
1990

प्रश्न 17.
पूंजीवाद का सिद्धांत किसने दिया?
(A) श्रीनिवास
(B) वेबर
(C) दूबे
(D) मार्क्स।
उत्तर:
वेबर।

प्रश्न 18.
आधुनिक काल में किस सदी से जाति तथा व्यवसाय के बीच संबंध ढीले हुए हैं?
(A) 18वीं
(B) 19वीं
(C) 20वीं
(D) इनमें से किसी में नहीं।
उत्तर:
20वीं।

प्रश्न 19.
इनमें से किस राजनीतिक अर्थशास्त्री ने बाज़ार अर्थव्यवस्था को समझने का प्रयास किया?
(A) एडम स्मिथ
(B) मार्क्स
(C) वेबर
(D) इनमें से कोई में नहीं।
उत्तर:
एडम स्मिथ।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
एडम स्मिथ कौन थे?
अथवा
‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ किताब किसकी है?
उत्तर:
एडम स्मिथ इंग्लैंड के सबसे चर्चित राजनीतिक अर्थशास्त्री थे जिन्होंने पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ लिखी थी।

प्रश्न 2.
एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक में किस बात की व्याख्या की थी?
उत्तर:
एडम स्मिथ ने अपनी पुस्तक ‘द वेल्थ ऑफ नेशंस’ में इस बात की व्याख्या की कि कैसे खुली बाजार अर्थव्यवस्था में तार्किक स्वयं-लाभ आर्थिक समृद्धि को बढ़ावा देता है।

प्रश्न 3.
बाज़ार का क्या अर्थ है?
अथवा
बाज़ार की परिभाषा दें।
अथवा
बाज़ार का अर्थ बताएं।
अथवा
बाज़ार या मंडी किसे कहते हैं?
अथवा
‘द वेल्थ ऑफ नेशन्स’ किलाब किसकी है?
उत्तर:
अर्थशास्त्र में क्रय-विक्रय के स्थान को बाजार कहा जाता है अर्थात् जहां चीजें बेची तथा खरीदी जाती हैं परंतु समाजशास्त्र में बाज़ार सामाजिक संस्थाएं हैं जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित हैं।

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प्रश्न 4.
एडम स्मिथ के अनुसार बाज़ारी अर्थव्यवस्था का क्या अभिप्राय है.?
उत्तर:
एडम स्मिथ के अनुसार बाजारी अर्थव्यवस्था व्यक्तियों में आदान-प्रदान या सौदों का एक लंबा क्रम है, जो अपनी क्रमबद्धता के कारण स्वयं ही एक कार्यशील और स्थिर व्यवस्था की स्थापना करती है। यह तब भी होता है जब करोड़ों के लेन-देन में शामिल लोगों में से कोई भी इसकी स्थापना का इरादा नहीं रखता।

प्रश्न 5.
खुले व्यापार का अर्थ बताएं।
अथवा
खुले व्यापार का समर्थन किसने किया?
उत्तर:
एडम स्मिथ के अनुसार खुले व्यापार का अर्थ एक ऐसे बाज़ार से है जो किसी भी प्रकार की राष्ट्रीय या अन्य रोकथाम से मुक्त हो, अर्थात् जिस पर कोई सरकारी नियंत्रण या हस्तक्षेप न हो। अगर हो तो भी वह इतना कम हो कि व्यापार में कोई बाधा उत्पन्न न हो।

प्रश्न 6.
लेसे-फेयर की नीति किसे कहा गया?
उत्तर:
फ्रांसीसी भाषा के शब्द लेसे-फेयर का अर्थ है बाजार को अकेला छोड़ दिया जाए या हस्तक्षेप न किया जाए। इसका अर्थ है कि बाज़ार सरकारी नियंत्रण से मुक्त हो तथा इसमें सरकार का कोई दखल न हो।

प्रश्न 7.
साप्ताहिक बाज़ार का क्या अर्थ है?
अथवा
साप्ताहिक बाज़ार क्या है?
अथवा
साप्ताहिक बाज़ार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
मुख्यतया साप्ताहिक बाजार आदिवासी क्षेत्रों में लगते हैं जहां पर आदिवासी वनों से इकट्ठी की हुई चीजें तथा अपनी उत्पादित वस्तुएं बेचने तथा उस कमाए हुए पैसे से अपनी आवश्यकता की वस्तुएं खरीदने आते हैं। यह बाज़ार चीज़ों के विनिमय के साथ-साथ उनके मेल-मिलाप की प्रमुख संस्था भी बन जाती है।

प्रश्न 8.
अल्पकालीन बाज़ार का अर्थ बताएं।
उत्तर:
अल्पकालीन बाज़ार, बाजार की वह स्थिति है जिसमें अगर किसी चीज़ की मांग बढ़ जाती है तो चीज़ के उत्पादक को एक सीमा तक पूर्ति बढ़ाने का समय मिल जाता है। यह सीमा उस उत्पादक के गोदाम अथवा माल इकट्ठा करके रखने तक की क्षमता होती है। इस बाज़ार के मूल्य को बाज़ार मूल्य कहते हैं।

प्रश्न 9.
दीर्घकालीन बाज़ार का अर्थ बताएं।
उत्तर:
दीर्घकालीन बाज़ार, बाज़ार की वह स्थिति है जिसमें वस्तु की मांग के अनुसार उसकी पूर्ति को कम या अधिक किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में वस्तु की मांग तथा पूर्ति में सामन्जस्य स्थापित हो सकता है। इस बाज़ार के मूल्य को सामान्य मूल्य कहते हैं।

प्रश्न 10.
जजमानी व्यवस्था का क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
यह गांवों में मिलने वाली व्यवस्था थी जिसमें भिन्न जातियां उच्च जातियों को अपनी सेवाएं देती थीं। इस सेवा की एवज में उन्हें फसल के पश्चात् अनाज अथवा और वस्तुएं प्राप्त हो जाती थीं।

प्रश्न 11.
विनिमय का क्या अर्थ है?
उत्तर:
अगर हम आम व्यक्ति के शब्दों में देखें तो विनिमय दो पक्षों के बीच होने वाली वस्तुओं तथा सेवाओं के लेन-देन को कहते हैं। अर्थशास्त्र में विनिमय दो पक्षों के बीच होने वाले वैधानिक, ऐच्छिक तथा आपसी धन का लेन देन होता है।

प्रश्न 12.
पण्यीकरण कब होता है?
अथवा
वस्तुकरण से आप क्या समझते हैं?
अथवा
पण्यीकरण से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
पण्यीकरण तब होता है जब कोई वस्तु बाज़ार में बेची खरीदी न जा सकती हो और अक वह बेची-खरीदी जा सकती है अर्थात् अब वह बाज़ार में बिकने वाली चीज़ बन गई है। जैसे श्रम और कौशल अब ऐसी चीजें हैं जो खरीदी व बेची जा सकती हैं।

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प्रश्न 13.
उदारीकरण क्या होता है?
उत्तर:
नियंत्रित अर्थव्यवस्था के अनावश्यक प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से अनावश्यक प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक, प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं। यह एक आर्थिक प्रक्रिया है तथा यह समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

प्रश्न 14.
भूमंडलीकरण क्या होता है?
अथवा
भूमंडलीकरण की परिभाषा लिखें।
अथवा
भूमंडलीकरण का अर्थ बताइए।
उत्तर:
भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है अर्थात् एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूंजी तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहते हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है।

प्रश्न 15.
उदारीकरण के क्या कारण होते हैं?
उत्तर:

  1. देश में रोजगार के साधन विकसित करने के लिए ताकि लोगों को रोजगार मिल सके।
  2. उद्योगों में ज्यादा-से-ज्यादा प्रतिस्पर्धा पैदा करना ताकि उपभोक्ता को ज्यादा-से-ज्यादा लाभ प्राप्त हो सके।

प्रश्न 16.
निजीकरण क्या होता है?
उत्तर:
लोकतांत्रिक तथा समाजवादी देशों जहां पर मिश्रित प्रकार की अर्थव्यवस्था होती है। इस अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक उपक्रम होते हैं जोकि सरकार के नियंत्रण में होते हैं। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी
हाथों में सौंपना ताकि यह और ज्यादा लाभ कमा सकें। इन सार्वजनिक उपक्रमों को निजी हाथों में सौंपने को निजीकरण कहते हैं।

प्रश्न 17.
भारत पर भूमंडलीकरण का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:

  1. भारत की विश्व निर्यात के हिस्से में वृद्धि हुई।
  2. भारत में विदेशी निवेश में वृद्धि हुई।
  3. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा।

प्रश्न 18.
हुंडी का क्या अर्थ है?
उत्तर:
हुंडी एक विनिमय बिल कर्ज पत्र की तरह थी जिसे व्यापारी लंबी दूरी के व्यापार में इस्तेमाल करते थे। देश के एक कोने से एक व्यापारी द्वारा जारी हुई हुंडी दूसरे कोने में व्यापारी द्वारा स्वीकार की जाती थी।

प्रश्न 19.
संस्था का क्या अर्थ है?
उत्तर:
समाज ऐसी कार्य प्रणालियों को विकसित करता है जो व्यक्तियों तथा समितियों को समाज द्वारा स्वीकृत तरीके बताती है। इन कार्य प्रणालियों, नियमों तथा तरीकों को संस्थाएँ कहते हैं।

प्रश्न 20.
विनिमय का अर्थ बताएं।
उत्तर:
किसी वस्तु के लेन-देन को विनिमय कहा जाता है अर्थात् वस्तु के स्थान पर किसी अन्य वस्तु के लेन देन को विनिमय कहते हैं।

प्रश्न 21.
‘द डिवीज़न ऑफ लेबर इन सोसायटी’ (The Division of Labour in Society) पुस्तक किसने लिखी थी?
उत्तर:
‘द डिवीज़न ऑफ लेबर इन सोसायटी’ पुस्तक के लेखक इमाइल दुर्खाइम थे।

प्रश्न 22.
पारंपरिक व्यापारिक समुदाय कौन-से होते हैं?
उत्तर:
जो समुदाय प्राचीन समय से लेकर आज तक व्यापार ही करते आये हों उन्हें पारंपरिक व्यापारिक समुदाय कहते हैं। उदाहरण के लिए वैश्य, मारवाड़ी इत्यादि।

प्रश्न 23.
मारवाड़ी व्यापार में क्यों सफल हुए?
उत्तर:
मारवाड़ी व्यापार में सफल अपने गहन सामाजिक तंत्रों की वजह से हुए हैं।

प्रश्न 24.
कब भारत पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से जुड़ गया था?
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत पूँजीवादी अर्थव्यवस्था से और अधिक जुड़ गया।

प्रश्न 25.
बाज़ार सार्वभौमिक रूप से हर कहीं पाए जाते हैं (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 26.
मुद्रा की अनुपस्थिति में विनिमय करने की प्रणाली वस्तु विनिमय कहलाती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 27.
सरल समाजों में बाज़ार एक आर्थिक सत्ता होती है। (हाँ/नहीं)
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 28.
जिस काम के लिए कोई पैसा न दिया जाये उसे …………………… कहते हैं।
उत्तर:
जिस काम के लिए कोई पैसा न दिया जाये उसे बेगार कहते हैं।

प्रश्न 29.
‘अदृश्य हाथ’ की अवधारणा किसने दी?
उत्तर:
‘अदृश्य हाथ’ की अवधारणा एडम स्मिथ ने दी थी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 30.
उपनिवेशवादी शासन के दौरान प्रचलित दो आधुनिक व्यापारिक नगर कौन-से थे?
उत्तर:
बंबई, मद्रास, कलकत्ता इत्यादि।

प्रश्न 31.
सिल्क रूट प्रसिद्ध व्यापारिक मार्ग हैं। (हा/नहीं)
उत्तर:
हां।

प्रश्न 32.
उपनिवेशवादी शासन में भारतीय मज़दूरों को कहाँ-कहाँ भेजा गया था?
उत्तर:
उपनिवेशवादी शासन में भारतीय मजदूरों को ब्रिटेन के उपनिवेशों जैसे कि दक्षिण अफ्रीका, फिजी इत्यादि देशों में भेजा गया था।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
उदारीकरण के क्या मुख्य उद्देश्य हैं?
उत्तर:
उदारीकरण के निम्नलिखित मुख्य उद्देश्य हैं-

  • उदारीकरण का मुख्य उद्देश्य उद्योगों में रोजगार के अवसर बढ़ाना था।
  • विदेशी निवेश को आकर्षित करना ताकि रोज़गार के अवसर बढ़े।
  • अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के साथ भारतीय कंपनियों को प्रतिस्पर्धा में खड़ा करना।
  • निजी क्षेत्र को ज्यादा-से-ज्यादा स्वतंत्रता प्रदान करना।
  • देश की उत्पादन क्षमता में वृद्धि करना।

प्रश्न 2.
उदारीकरण नीति की विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  • उदारीकरण के तहत कुछ विशेष चीजों को छोड़कर लाइसैंस राज की नीति को खत्म कर दिया गया ताकि सारे उद्योग आराम से विकसित हो सकें।
  • उदारीकरण के तहत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण करना शुरू कर दिया गया है ताकि घाटे में चल रहे सार्वजनिक उपक्रमों को लाभ में बदला जा सके।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के लिए अब बहुत कम उद्योग रह गए हैं ताकि सभी उद्योगों को बढ़ावा दिया जा सके।
  • देश में विदेशी निवेश की सीमा भी बढ़ा दी गई है। कई क्षेत्रों में तो यह 51% तथा कई क्षेत्रों में पूर्ण निवेश तथा कई क्षेत्रों में यह 74% तक रखी गई है।

प्रश्न 3.
भूमंडलीकरण की विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने भूमंडलीकरण की चार विशेषताओं का वर्णन किया है-

  • भूमंडलीकरण में लोगों के लिए नए-नए उपकरण आ गए हैं क्योंकि अब विश्व की बड़ी-बड़ी कंपनियां हर देश में आ रही हैं।
  • अब कंपनियों के लिए नए-नए बाज़ार खुल गए हैं क्योंकि भूमंडलीकरण में कंपनियां किसी भी देश में मुक्त व्यापार कर सकती हैं।
  • भूमंडलीकरण में कार्यों के संपादन के लिए नए-नए कर्ता आगे आ गए हैं जैसे रैडक्रास, विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.)।
  • भूमंडलीकरण के कारण नए-नए नियम सामने आए हैं जैसे पहले नौकरी पक्की होती थी पर अब यह पक्की न होकर ठेके पर होती है।

प्रश्न 4.
भारत में उदारीकरण को कितने चरणों में बांटा जा सकता है?
उत्तर:
भारत में उदारीकरण की प्रक्रिया को चार चरणों में बांटा जा सकता है-

  • 1975 से 1980 का काल
  • 1980 से 1985 का काल
  • 1985 से 1991 का काल
  • 1991 से आगे का काल।

प्रश्न 5.
भूमंडलीकरण के कोई चार सिद्धांत बताओ।
उत्तर:

  • विदेशी निवेश के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोलना।
  • सीमा शुल्क कम-से-कम करना।
  • सरकारी क्षेत्रों के प्रतिष्ठानों का विनिवेश करना।
  • निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देना।

प्रश्न 6.
जनजातीय साप्ताहिक बाज़ार में क्या परिवर्तन आए हैं?
अथवा
जनजातीय क्षेत्रों में साप्ताहिक बाज़ारों के स्वरूप में क्या परिवर्तन आया है?
उत्तर:
समय के साथ जनजातीय साप्ताहिक बाज़ार में भी परिवर्तन आए हैं। अंग्रेजों के समय इनके दूर-दराज के इलाकों को क्षेत्रीय तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ दिया गया। इनके क्षेत्रों में सड़कों का निर्माण किया गया तथा इनके क्षेत्रों को बाहर के लोगों के लिए खोल दिया गया ताकि इनके समृद्ध जंगलों तथा खनिजों तक पहुंचा जा सके।

इस कारण इनके क्षेत्रों में व्यापारी, साहूकार तथा अन्य गैर-जनजातीय लोग आने लग गए। इनके बाजारों में नई प्रकार की वस्तुएं आ गईं। जंगल के उत्पादों को बाहरी लोगों को बेचा जाने लगा। आदिवासियों को खदानों तथा बगानों में मज़दूर रखा जाने लगा। साप्ताहिक बाज़ार में बाहर की वस्तुएं आने से यह लोग पैसा कर्ज़ पर लेकर उन्हें खरीदने लगे जिससे वह दरिद्र हो गए।

प्रश्न 7.
उपभोग का क्या अर्थ है?
उत्तर:
किसी भी वस्तु के उत्पादन के साथ-साथ उपभोग का होना भी अति आवश्यक होता है क्योंकि बिना उत्पादन के खपत नहीं हो सकती। उपभोग का अर्थ है किसी भी वस्तु का उपभोग करना एवं उपभोग का अर्थ है, वह गुण जो किसी वस्तु को मानव की आवश्यकता पूरा करने के योग्य बनाता है। यह प्रत्येक समाज का मुख्य कार्य होता है कि वह उपभोग को समाज के लिए नियमित व नियंत्रित करे।

प्रश्न 8.
विनिमय का अर्थ बताएं।
उत्तर:
किसी भी वस्तु के लेन-देन को वर्तमान में ‘Exchange’ कहते हैं। इसका अर्थ है किसी वस्तु के स्थान पर किसी दूसरी वस्तु को लेना या देना। विनिमय वर्तमान में ही नहीं, बल्कि पुरातन समाज से ही चला आ रहा है। यह कई प्रकार का होता है, वस्तु के बदले वस्तु, सेवा के बदले सेवा, वस्तु के बदले धन, सेवा के बदले धन, यह दो प्रकार का होता है, प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष। विनिमय सर्वप्रथम वस्तुओं का वस्तुओं के साथ, सेवा के बदले वस्तुओं के साथ और सेवा के बदले सेवा के लेने-देने के साथ होता है। अप्रत्यक्ष विनिमय में तोहफे का विनिमय सर्वोत्तम होता है।

प्रश्न 9.
विभाजन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
आम व्यक्ति के लिए विभाजन का अर्थ वस्तुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान के ऊपर ले जाने से और बेचने से है। परंतु अर्थशास्त्र में विभाजन वह प्रक्रिया है, जिसके साथ किसी आर्थिक वस्तु का कुल मूल्य उन व्यक्तियों में बांटा जाता है, जिन्होंने उस वस्तु के उत्पादन में भाग लिया। भिन्न-भिन्न लोगों एवं समूहों का विशेष योगदान होता है जिस कारण उन्हें मुआवजा मिलना चाहिए। इस तरह उन्हें दिया गया धन या पैसा मुआवजा विभाजन होता है। जैसे ज़मीन के मालिक को किराया, मज़दूर को मज़दूरी, पैसे लगाने वाले को ब्याज, सरकार को टैक्स आदि के रूप में इस विभाजन का हिस्सा प्राप्त होता है।

प्रश्न 10.
पूंजीवाद का क्या अर्थ है?
उत्तर:
पूंजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है, जिसमें निजी संपत्ति की बहुत महत्ता होती है। पूंजीवाद में उत्पादन बड़े स्तर पर होता है और अलग-अलग पूंजीवादियों में बहुत अधिक मुकाबला देखने को मिलता है। पूंजीपति अधिक से-अधिक लाभ प्राप्त करने की कोशिश करता है और इसी कारण से वह निवेश भी करता है। इसमें धन एवं उधार की काफी महत्ता होती है। पूंजीवाद का सबसे बड़ा लक्षण इसके मजदूरों का शोषण होता है।

प्रश्न 11.
पूंजीवाद की विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  • पूंजीवाद में बड़े स्तर पर उत्पादन होता है।
  • पूंजीवाद का आधार निजी संपत्ति होता है।
  • पंजीवाद में भिन्न-भिन्न वर्गों में बहत अधिक उपयोगिता होती है।
  • पूंजीवाद में पूंजीपति लाभ कमाने हेतु निवेश करता है।
  • पूंजीवाद में मज़दूर का शोषण होता है और उसकी स्थिति दयनीय होती है।
  • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में धन एवं उधार की काफ़ी महत्ता होती है।

प्रश्न 12.
अतिरिक्त मूल्य का क्या अर्थ है?
अथवा
अतिरिक्त मूल्य क्या हैं?
उत्तर:
अतिरिक्त मूल्य का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया था। यह उसने अपनी पुस्तक ‘दास कैपीटल’ में दिया था। मार्क्स के अनुसार किसी व्यक्ति का वह मूल्य है जो उसे अपनी श्रम शक्ति के एवज में प्राप्त होता है। दूसरे शब्दों में पूँजीवादी युग में मज़दूर अपने श्रम को पूँजीपतियों को अपना जीवन चलाने के लिए बेचता है। जिसका मूल्य उसे कुछेक सिक्कों के रूप में मिलता है।

यही मूल्य उसकी मज़दूरी है। इस प्रकार मार्क्स के अनुसार पूंजीपति की यह नीति थी कि मजदूरों को कम से कम मजदूरी देकर अधिक से अधिक कार्य करवाया जो। इस प्रकार जो अधिक लाभ होता है उसे पूँजीपति हड़प कर जाता है तथा जो मार्क्स के अनुसार मजदूरों का ही अधिकार है तथा उन्हें ही मिलना चाहिए। इस मानवीय श्रम के लिए मूल्य को मज़दूरों को उनकी मज़दूरी के रूप में नहीं दिया जाता। यही अतिरिक्त मूल्य है जो मज़दूरों द्वारा उत्पन्न की जाती है तथा पूंजीपतियों द्वारा हड़प कर ली जाती है।

प्रश्न 13.
उत्पादन विधि का क्या अर्थ है?
उत्तर:
उत्पादन विधि वह है जो कुल्हाड़ी, लोहे की कुदाल, हल, ट्रैक्टर, मशीनों इत्यादि की सहायता से की जाती है। मनुष्य उत्पादन के साधनों का प्रयोग करके अपने उत्पादन कौशल के आधार पर ही भौतिक वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा यह सभी तत्व इक्ट्ठे मिल कर उत्पादन की शक्तियों का निर्माण करते हैं। उत्पादन की विधियों पर पूंजीपतियों का अधिकार होता है तथा वह इन की सहायता से अतिरिक्त मूल्य का निर्माण करके मज़दूर वर्ग का शोषण करता है। इन उत्पादन की विधियों की सहायता से वह अधिक अमीर होता जाता है जिनका प्रयोग वह मजदूर वर्ग को दबाने के लिए करता है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
भूमंडलीकरण क्या होता है? इसके सिद्धांतों का वर्णन करो।
अथवा
भूमंडलीकरण की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत में 1991 में नयी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं। भूमंडलीकरण, उदारीकरण तथा निजीकरण इन नीतियों के तीन प्रमुख पहलू हैं। भारत में 1980 के दशक के दौरान भूमंडलीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। नयी आर्थिक नीतियों या आर्थिक सुधारों के माध्यम से इसे गति प्रदान करने की कोशिश की गई। वैश्वीकरण आर्थिक विकास को प्रभावित करने वाली एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया के चलते भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं में कई प्रकार के परिवर्तन सामने आए।

भूमंडलीकरण का अर्थ (Meaning of Globalization)-भूमंडलीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें एक देश की अर्थव्यवस्था का संबंध अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं से जोड़ा जाता है। अन्य शब्दों में एक देश के अन्य देशों के साथ वस्तु, सेवा, पूँजी तथा श्रम के अप्रतिबंधित आदान-प्रदान को भूमंडलीकरण कहते हैं। इस प्रक्रिया के माध्यम से विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाएं एक-दूसरे के संपर्क में आती हैं। व्यापार का देशों के बीच मुक्त आदान-प्रदान होता है। इस तरह विश्व अर्थव्यवस्थाओं के एकीकरण की प्रक्रिया को वैश्वीकरण कहा जाता है। भूमंडलीकरण के द्वारा सारी दुनिया एक विश्व ग्राम बन गई है।

भूमंडलीकरण के सिद्धांत
(Principles of Globalization)
भूमंडलीकरण के अंतर्गत कई महत्त्वपूर्ण बातों पर बल दिया जाता है। निश्चित कार्यक्रमों को अपनाने तथा आर्थिक नीतियों को अपनाने पर भी जोर दिया जाता है। भूमंडलीकरण के प्रमुख सिद्धांत निम्नलिखित हैं
(i) विदेशी निवेश के लिए देश की अर्थव्यवस्था को खोल दिया जाता है क्योंकि इस व्यवस्था में आपको और देशों में भी मुक्त व्यापार की आज्ञा होती है तथा आप भी किसी और देश में निवेश कर सकते हैं। देश में विदेशी निवेश आता है तो एक तरफ देश आर्थिक तौर पर समृद्ध होता है तथा दूसरी तरफ देश में रोजगार के नए साधन उत्पन्न होते हैं।

(ii) इसका दूसरा सिद्धांत यह है कि इसमें सीमा शुल्क को काफ़ी हद तक कम कर दिया जाता है ताकि अगर कोई बाहर से आकर आपके देश में अपनी चीज़ बेचना चाहता है तो वह उत्पाद बहुत महंगी न हो जाए। इसलिए सीमा शुल्क को कम कर दिया जाता है।

(iii) सार्वजनिक क्षेत्रों के प्रतिष्ठानों का विनिवेश भी कर दिया जाता है। भूमंडलीकरण के साथ-साथ निजीकरण भी चलता है। निजीकरण होता है सरकार की कंपनियों का ताकि वह भी निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकें तथा मुनाफा कमा सकें। इसलिए सरकारी कंपनियों का विनिवेश कर दिया जाता है।

(iv) निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा दिया जाता है ताकि निजी क्षेत्र बड़े-बड़े उद्योग लगाएं। इसके कई लाभ हैं। एक तो सरकार को कर के रूप में आमदनी होगी तथा दूसरी तरफ रोज़गार के साधन बढ़ेंगे तथा बेरोज़गारी की समस्या भी हल होगी।

(v) इसमें सरकार बुनियादी ढांचे के विकास पर अधिक पैसा खर्च करती है। इसका कारण यह है कि अगर आप विदेशियों को अपने देश में निवेश के लिए आकर्षित करना चाहते हों तो उन्हें निवेश के लिए बढ़िया बुनियादी ढांचा भी देना पड़ेगा ताकि उनको कोई परेशानी न हो तथा ज्यादा-से-ज्यादा विदेशी निवेश देश में आ सके।

(vi) इसमें मुक्त अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया जाता है। मुक्त व्यापार का अर्थ है बिना सीमा शुल्क दिए किसी भी देश में जाकर व्यापार करना। ऐसा करने से बगैर कीमतों के इज़ाफे के सारी दुनिया की चीजें हमारे सामने होती हैं तथा हम किसी भी चीज़ को खरीद सकते हैं।

(vii) विश्व बैंक, विश्व व्यापार निधि तथा विश्व व्यापार संगठन के दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है क्योंकि एक तो यह व्यापार तथा और सुविधाओं के लिए अलग-अलग देशों को कर देते हैं तथा विश्व व्यापार संगठन पूरे विश्व के व्यापार का संचालन करता है। इसलिए इनके दिशा-निर्देशों का पालन करना ही पड़ता है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 2.
भूमंडलीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1991 में देश में आर्थिक सुधार शुरू होने के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में तेजी आ गई। भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न चरणों में भूमंडलीकरण किया जा रहा है। एक सर्वेक्षण के अनुसार भूमंडलीकरण में 50 राष्ट्रों में सिंगापुर प्रथम तथा भारत 49वें स्थान पर है। इससे पता चलता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण की गति अभी धीमी है। भूमंडलीकरण का भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न पहलुओं पर क्या प्रभाव पड़ा उसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित है-
(i) भारत की विश्व निर्यात हिस्से में वृद्धि (Increase of Indian Share in World Export)-भूमंडलीकरण की प्रक्रिया के चलते भारत का विश्व में निर्यात का हिस्सा बढ़ा है। इस तथ्य की पुष्टि निम्नलिखित आंकड़ों से होती है-

भारत का विश्व निर्यात में हिस्सा – (Indian Share in World Export):
HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में 1
इस तालिका में दर्शाए-प्रिए आंकड़ों से पता चलता है कि 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक के दौरान भारत की वस्तुओं तथा सेवाओं में 125% की वृद्धि हुई है। 1990 में भारत का विश्व की वस्तुओं तथा सेवाओं के निर्यात में हिस्सा 0.55% था जोकि 1999 में बढ़कर 0.75% हो गया था।

(ii) भारत में विदेशी निवेश (Foreign Investment in India)-विदेशी निवेश वृद्धि भी भूमंडलीकरण का एक लाभ है क्योंकि विदेशी निवेश से अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता बढ़ती है। भारत में निरंतर विदेशी निवेश बढ़ रहा है। 1995-96 से 2000-01 के दौरान इसमें 53% की वृद्धि हुई। इस अवधि के दौरान वार्षिक औसत लगभग $ 390 करोड़ विदेशी निवेश हुआ।

(iii) विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves)-आयात के लिए विदेशी मुद्रा आवश्यक है। जून, 1991 में विदेशी मद्रा भंडार सिर्फ One Billion $ था जिससे सिर्फ दो सप्ताह की आयात आवश्यकताएं ही परी की जा सकती थीं। जलाई, 1991 में भारत में नयी आर्थिक नीतियां अपनायी गईं। भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण को बढ़ावा दिया गया जिस के कारण देश के विदेशी मुद्रा भंडार में काफ़ी तेजी से बढ़ोत्तरी हुई। फलस्वरूप वर्तमान समय में देश में 390 Billion के करीब विदेशी मुद्रा है। इससे पहले कभी भी देश में इतना विदेशी मुद्रा का भंडार नहीं था।

(iv) सकल घरेलू उत्पाद वृद्धि दर (Growth of Gross Domestic Product)-भूमंडलीकरण से सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि होती है। देश में 1980 के दशक में वृद्धि दर 5.63% तथा 1990 के दशक के दौरान वृद्धि दर 5.80% रहा। इस तरह सकल घरेलू उत्पादन में थोड़ी सी वृद्धि हुई। आज कल यह 7% के करीब है।

(v) बेरोज़गारी में वृद्धि (Increase in Unemployment) भूमंडलीकरण से बेरोज़गारी बढ़ती है। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक में मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, सिंगापुर, इंडोनेशिया तथा मलेशिया में भूमंडलीकरण के प्रभाव के कारण आर्थिक संकट आया। फलस्वरूप लगभग एक करोड़ लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा तथा वे ग़रीबी रेखा से नीचे आ गए। 1990 के दशक के शुरू में देश में बेरोज़गारी दर 6% थी जो दशक के अंत में 7% हो गई। इस तरह भूमंडलीकरण से रोज़गार विहीन विकास हो रहा है।

(vi) कृषि पर प्रभाव (Impact on Agriculture)-देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों का हिस्सा लगभग 29% है जबकि यह अमेरिका में 2%, फ्रांस तथा जापान में 5.5% है। अगर श्रम शक्ति की नज़र से देखें तो भारत की 69% श्रम शक्ति को कृषि तथा इससे संबंधित कार्यों में रोजगार प्राप्त है जबकि अमेरिका तथा इंग्लैंड में ऐसे कार्यों में 2.6% श्रम शक्ति कार्यरत है। विश्व व्यापार के नियमों के अनुसार विश्व को इस संगठन के सभी सदस्य देशों को कृषि क्षेत्र निवेश के लिए विश्व के अन्य राष्ट्रों के लिए खोलना है। इस तरह आने वाला समय भारत की कृषि तथा अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती भरा रहने की उम्मीद है।

(vii) शिक्षा व तकनीकी सुधार-भूमंडलीकरण तथा उदारीकरण का शिक्षा पर भी काफ़ी प्रभाव पड़ा है तथा तकनीकी शिक्षा में तो चमत्कार हो गया है। आज संचार तथा परिवहन के साधनों के कारण दूरियां काफ़ी कम हो गई हैं। आज अगर किसी देश में शिक्षा तथा तकनीक में सुधार आते हैं तो वह पलक झपकते ही सारी दुनिया में पहुंच जाते हैं। इंटरनेट तथा कंप्यूटर ने तो इस क्षेत्र में क्रांति ला दी है।

(viii) वर्गों के स्वरूप में परिवर्तन (Change in the form of Classes)-भूमंडलीकरण ने वर्गों के स्वरूप में भी परिवर्तन ला दिया है। 20वीं सदी में सिर्फ तीन प्रमख वर्ग-उच्च वर्ग. मध्यम वर्ग तथा निम्न वर्ग थे पर आजकल वर्गों की संख्या काफ़ी ज्यादा हो गई है। प्रत्येक वर्ग में ही बहुत से उपवर्ग बन गए हैं जैसे मजदूर वर्ग, डॉक्टर वर्ग, शिक्षक वर्ग इत्यादि के उनकी आय के अनुसार वर्ग बन गए हैं।

(ix) निजीकरण (Privatization)-भूमंडलीकरण का एक अच्छा प्रभाव यह है कि निजीकरण देखने को मिल रहा है। विकसित तथा विकासशील देशों में बहुत से सार्वजनिक उपक्रम निजी हाथों में चल रहे हैं तथा यह अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं। इसी से प्रेरित होकर और ज्यादा सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण हो रहा है।

(x) उद्योग-धंधों का विकास (Development of Industries)-आर्थिक विकास की ऊँची दर प्राप्त करने के लिए विदेशी पूंजी निवेश से काफ़ी सहायता मिलती है। इससे न सिर्फ उद्योगों को लाभ मिलता है बल्कि उपभोक्ता को अच्छी तकनीक, अच्छे उत्पाद मिलते हैं तथा साथ ही साथ भारतीय उद्योगों को अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में प्रतिस्पर्धा करने की प्रेरणा मिलती है।

प्रश्न 3.
उदारीकरण क्या होता है? उदारीकरण से क्या समस्याएं पैदा होती हैं?
अथवा
उदारीकरण की अवधारणा की व्याख्या कीजिए।
अथवा
उदारवादिता का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1991 में डॉ. मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री बनने के बाद नयी आर्थिक नीति लागू की गई। उदारीकरण, निजीकरण तथा भूमंडलीकरण इस नीति की प्रमुख विशेषताएं थीं। 20वीं शताब्दी के आखिरी दशक के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था का तेज़ गति से उदारीकरण किया जाने लगा तथा यह उदारीकरण की प्रक्रिया अब भी जारी है। यह एक आर्थिक प्रक्रिया तथा समाज में आर्थिक परिवर्तनों की प्रक्रिया है।

उदारीकरण का अर्थ (Meaning of Liberalization)-नियंत्रित अर्थव्यवस्था के गैर-ज़रूरी प्रतिबंधों को हटाना उदारीकरण है। उद्योगों तथा व्यापार पर से गैर-ज़रूरी प्रतिबंध हटाना ताकि अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धात्मक. प्रगतिशील तथा खुली बन सके, इसे उदारीकरण कहते हैं।

उदारीकरण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विश्व के अलग अलग देशों के बीच व्यापारिक तथा आर्थिक संबंधों को ज्यादा विस्तार की नज़र से भूमंडल के सदस्य देशों को ऐसी सुविधाएं प्रदान करने के लिए प्रेरित किया जाता है ताकि विश्व में मुक्त व्यापार फैल सके तथा बेहतर अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संबंधों के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। इस नीति से अर्थव्यवस्था की कार्यकुशलता बढ़ती है तथा निजी उद्योगों में सार्वजनिक उद्योगों की अपेक्षा ज्यादा बेहतर परिणाम देने की क्षमता होती है।

उदारीकरण की समस्याएं (Problems of Liberalization)-उदारीकरण से भारत जैसे देश में बहुत-सी समस्याएं पैदा हई हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है-
(i) बेरोज़गारी में वृदधि (Increase in Unemployment)-भारत में 1990 में बेरोज़गारी की दर 6% थी जो 1999 में बढ़कर 7% हो गई। यह सिर्फ उदारीकरण का ही परिणाम है। देश में 36% लोग ग़रीबी की रेखा के नीचे रहते हैं क्योंकि उनके पास मूल सुविधाओं की कमी है। घरेलू उद्योगों तथा रोजगार में सीधा संबंध होता है क्योंकि घरेलू रोज़गार बहुत से लोगों को रोजगार देता है।

अगर उद्योगों की संख्या बढ़ेगी जो ज्यादा लोगों को रोजगार प्राप्त होगा पर अगर उद्योग कम होंगे तो बेरोज़गारी बढ़ेगी तथा ग़रीबी भी साथ ही साथ बढ़ेगी। हमारे देश में उदारीकरण की प्रक्रिया 14 वर्ष से चल रही है। बड़े-बड़े उद्योग तो लग रहे हैं, परंतु कुटीर तथा घरेलू उद्योग खत्म हो रहे हैं जिससे कि बेरोज़गारी में वृद्धि हुई है। इस तरह उदारीकरण की प्रक्रिया से बेरोज़गारी में वृद्धि हुई है।

(ii) उदारीकरण के गलत परिणाम (Evil Consequences of Liberalization)- उदारीकरण की प्रक्रिया के साथ-साथ कर्मचारियों को निकालने की प्रक्रिया भी शुरू हो गई है। जब उदारीकरण की नीति अपनायी गयी थी तो यह कहा गया था कि इस प्रक्रिया से देश की सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। लेकिन 14 वर्षों के उदारीकरण की प्रक्रिया के बाद भी हमारी अर्थव्यवस्था पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। आज भी देश की 36% जनता गरीबी की रेखा से नीचे रहती है। इन वर्षों में चाहे भारत को तकनीकी रूप से लाभ ही हुआ है पर बहुत से ऐसे क्षेत्र हैं, जैसे कि कटीर उदयोगों का खत्म होना, जिनमें उदारीकरण की प्रक्रिया के गलत परिणाम

(iii) विदेशी कर्ज का बढ़ता बोझ (Increasing pressure of foreign debt)-आर्थिक सुधारों का पहला दौर 1991 से 2001 तक चला। 2001 में दूसरा दौर शुरू हुआ। इस दौर में यह सोचा गया कि देश के आर्थिक विकास की दर तेज़ होगी पर हुआ इसका उल्टा। देश के आर्थिक विकास तथा आर्थिक सुधार के रास्ते पर कदम धीरे हो गए हैं।

देश के लिए 8% की आर्थिक विकास की दर का लक्ष्य रखा गया है जोकि बहुत दूर की कौड़ी लगता है। वित्त मंत्री तरह-तरह के उपायों की घोषणा कर रहे हैं पर फिर भी यह मुमकिन नहीं लगता। इसके साथ-साथ देश के ऊपर विदेशी कर्ज का बोझ लगातार बढ़ रहा है। आज हमारे देश के ऊपर 110 अरब डालर के लगभग विदेशी कर्ज़ है जिससे हर भारतीय विदेशों का कर्जदार बन गया है। यह भी उदारीकरण की प्रक्रिया की वजह से ही

(iv) निर्यात में कमी तथा आयात का बढ़ना (Decrease in Export and Increase in Import)-उदारीकरण की प्रक्रिया में निर्यात में भी कमी आती है तथा आयात में भी बढ़ोत्तरी होती है। 1991 के मुकाबले 1996 में निर्यात कम हुआ था तथा आयात बढ़ा था। यह इस वजह से होता है कि उदारीकरण से पश्चिम की या विदेशी चीजें हमारे देश में आईं जिस के कारण लोगों में विदेशी चीजें लेने की प्रवृत्ति भी बढ़ी।

जिस के कारण आयात ज्यादा हो गया पर निर्यात उसी अनुपात में न बढ़ पाया जिस के कारण व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी तथा व्यापार संतुलन में कमी आई। आयात बढ़ने तथा उदारीकरण की प्रक्रिया से देसी उद्योगों पर भी प्रभाव पड़ा। आराम से ठीक दामों पर तथा अच्छी विदेशी चीज़ के मिलने के कारण भी आयात में बढ़ोत्तरी हुई तथा देशी उद्योगों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।

(v) रुपये का मूल्य का गिरना (Decline in Value of Rupee)-उदारीकरण की वजह से भारतीय रुपए की कीमत में भी काफ़ी गिरावट आई है। 1991 में जिस डालर की कीमत ₹ 18 थी वह 1996 में ₹ 36तथा 2001 में यह ₹ 47 तक पहुंच गया था। आजकल यह ₹ 71 के लगभग है। यह सब उदारीकरण की वजह से है तथा यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए ठीक नहीं होता।

किसी देश की मुद्रा की कीमत कम होने से महंगाई बढ़ती है जोकि हमारे देश के गरीब लोगों के लिए ठीक नहीं है। विकसित देशों को तो इससे लाभ हो सकता है पर विकासशील देशों के लिए यह नुकसानदायक है। इस तरह उदारीकरण के कारण रुपए की विनिमय दर में निरंतर गिरावट आ रही है।

(vi) सरकार की आय में कमी आना (Decline in the Income of Govt.)-उदारीकरण की एक विशेषता है कि इसमें सरकार को उत्पादों पर सीमा शुल्क कम करना पड़ता है ताकि विदेशी चीजें उस देश के मूल्य पर मिल सके। सीमा शुल्क कम करने से सरकार के राजस्व या आमदनी कम होती है जिसका सीधा प्रभाव अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इसके अलावा विदेशी चीज़ों की गुणवत्ता भारतीय उत्पादों के मामले काफ़ी अच्छी होती है तथा कई मामलों में यह सस्ती भी होती है।

जिस वजह से विदेशी चीजें भारतीय चीज़ों के मुकाबले ज्यादा बिकती हैं। इसके अलावा विदेशी चीजें भारतीय चीजों से तकनीक के मामले में भी अच्छी होती हैं क्योंकि भारतीय तकनीक इतनी अच्छी नहीं है। उदाहरण के तौर पर चीनी उत्पादों ने भारतीय बाजार में हलचल ला दी है। इस तरह जितनी ज्यादा ये चीजें हमारे देश में आएंगी उतनी ही सरकार की आमदनी में कमी होगी। अगर भारतीय चीजें बिकेंगी ही नहीं तो यह सरकार को क्या कर देंगे। इस तरह भी आमदनी में कमी आती है।

(vii) सरकारों का बढ़ता घाटा (Increasing deficit of Governments)-उदारीकरण की वजह से केंद्र तथा राज्य सरकारों के घाटे भी बढ़ रहे हैं। आमदनी कम हो रही है। खर्च या तो बढ़ रहे हैं या फिर कम हो रहे हैं। ज़रूरी चीज़ों के दाम बढ़ रहे हैं, बेरोज़गारी बढ़ रही है, ग़रीबी बढ़ रही है। सरकार के पास अपने काम पूरे करने के लिए पैसा नहीं है। देश के बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च हो जाता है। सरकार के बढ़ते घाटे की वजह से विकास कार्य या तो नहीं हो रहे हैं या फिर अगर हो रहे हैं तो कम हो रहे हैं जिस वजह से देश पर काफ़ी प्रभाव पड़ रहा है।

इस तरह उदारीकरण के देश पर काफ़ी गलत प्रभाव भी पड़ रहे हैं। अगर हमें उदारीकरण से लाभ लेना है तो वित्तीय अनुशासन को सुधारना होगा। हमें अपने मूलभूत ढांचे को सुधारना होगा, ऊर्जा के क्षेत्र में प्रगति करनी होगी, नयी तकनीकों का प्रयोग करना होगा तथा और भी बहुत से सुधार करने होंगे तभी हम उदारीकरण के लाभ उठा सकते हैं। इनके साथ-साथ कुछ कानूनों में भी सुधार करना होगा तभी उदारीकरण पूर्ण रूप से सफल हो पाएगा।

प्रश्न 4.
पूंजीवाद के बारे में आप क्या जानते हैं? विस्तार सहित लिखो।
अथवा
पूँजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझाइये।
अथवा
पूंजीवाद को एक सामाजिक व्यवस्था के रूप में समझाइये।
उत्तर:
पूंजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसमें निजी संपत्ति की बहुत महत्ता होती है। पूंजीवाद एक दम से ही किसी स्तर पर नहीं पहुंचा बल्कि उसका धीरे-धीरे विकास हुआ है। इसके विकास को देखने के लिए हमें इसका अध्ययन आदिम समाज में करना होगा।

आदिम समाज में वस्तुओं के लेन-देने की व्यवस्था आदान-प्रदान में बदलने की व्यवस्था थी। उस समय लाभ का  विचार प्रत्यक्ष रूप से सामने नहीं आया था। लोग चीजों के लाभ के लिए एकत्र नहीं करते थे बल्कि उन दिनों के लिए एकत्र करते थे जब चीज़ों की कमी होती थी या फिर सामाजिक प्रसिद्धि के लिए एकत्र करते थे। व्यापार आमतौर पर सेवा व चीज़ों के देने पर निर्भर मरता था। आर्थिक कारक जैसे कि मजदूरी, निवेश, व्यापारिक लाभ के बारे में आदिम समाज को पता नहीं था।

मध्यवर्गी समाज में व्यापार व वाणिज्य थोड़े से उन्नत हो गए। चाहे शुरू में व्यापार आदान-प्रदान की व्यवस्था पर आधारित था पर धीरे-धीरे पैसा व्यापार करने का एक माध्यम बन गया। पैसा चाहे संपत्ति नहीं था, पर यह संपत्ति का सूचक था। इसका उत्पादक शक्तियों के लक्षणों पर पूरा प्रभाव था। सिमल के अनुसार पैसे की संस्था के आधुनिक पश्चिमी समाज में व्यवस्थित होने के कारण जिंदगी के हरेक हिस्से पर बहुत गहरे प्रभाव पड़े।

इसने मालिक व नौकर को आजादी दी। वस्तुओं तथा सेवाओं के बेचने तथा खरीदने वाले पर भी असर पड़ा क्योंकि इससे व्यापार के दोनों ओर से रस्मी रिश्ते पैदा हो गए। सिमल के अनुसार पैसे ने हमारी ज़िन्दगी की फिलासफ़ी में बहुत परिवर्तन ला दिए। इसने हमें Practical बना दिया क्योंकि अब हम प्रत्येक चीज़ को पैसे में तोलने लग पड़े। सामाजिक सम्पर्क, सम्बन्ध गैर-रस्मी तथा अव्यक्तक हो गए। मानवीय संबंध भी ठंडे हो गए।

आधुनिक समय के आरंभिक दौर में आर्थिक गतिविधियां आमतौर पर सरकारी ताकतों द्वारा संचालित होती थीं। इससे हमें यूरोपीय लोगों के राज्य की सरकार अधीन इकट्ठे होकर आगे बढ़ने का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है। इस समय में आर्थिक गतिविधियां राजनैतिक सत्ता द्वारा संचालित हैं ताकि राज्य का लभ तथा खज़ाना बढ़ सके। देश व्यापारियों की देख-रेख में चलता था तथा व्यापारी एक आर्थिक संगठन की भान्ति लाभ कमाने में लगे हुए हैं। उत्पादक शक्तियां भी व्यापारिक कानून द्वारा संचालित होती हैं।

इसके पश्चात् औद्योगिक क्रांति आई जिसने उत्पादन के तरीकों को बदल दिया। व्यापारिक नीतियां लोगों का भला करने में असफल रहीं। चीजों के उत्पादन करने के लिए Laissez faire की नीति अपनाई गई। इस नीति के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपने व्यक्तिगत हित देख सकता था। उस पर कोई बंधन नहीं था। राज्य ने आर्थिक कार्य में दखल देना बंद कर दिया। समनर के अनुसार राज्य में व्यापार व वाणिज्य पर लगे सारे प्रतिबंध हटा लेने चाहिएं व आदान-प्रदान व पैसे को इकट्ठा करने पर लगी सभी पाबंदियां हटा लेनी चाहिएं। एडम स्मिथ ने इस समय चार सिद्धांतों का वर्णन किया।

  • व्यक्तिगत हित की नीति।
  • दखल न देने की नीति।
  • प्रतियोगिता का सिद्धान्त।
  • लाभ को देखना।

इन सिद्धांतों का उस समय पर काफ़ी प्रभाव पड़ा। इन नियमों के प्रभाव अधीन व औद्योगिक क्रांति के कारण संपत्ति व उत्पादन की मलकीयत की नई व्यवस्था सामने आई। जिसको पूंजीवाद का नाम दिया गया। औद्योगिक क्रांति के कारण घरेलू उत्पादन कारखानों के उत्पादन में बदल गया। कारखानों में काम छोटे-छोटे भागों में बंटा होता था तथा प्रत्येक मज़दूर थोड़ा सा छोटा सा काम करता था। इससे उत्पादन बढ़ गया। समय के साथ-साथ बड़े कारखाने लग गए। इन बड़े कारखानों के मालिक निगम अस्तित्व में आ गए। पूंजीवाद के साथ-साथ श्रम-विभाजन, विशेषीकरण व लेन-देन भी पहचान में आया।

इस उत्पादन व लेन-देन की व्यवस्था में उत्पादन के साधन के मालिक व्यक्तिगत लोग थे और उन पर कोई सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं थी। संपत्ति बिल्कुल निजी थी तथा वह राज्य, धर्म, परिवार व अन्य संस्थाओं की पाबंदियों से स्वतंत्र थे। फैक्टरियों के मालिक कुछ भी करने को स्वतंत्र थे। उनका उद्देश्य केवल लाभ था।

उन पर बिना लाभ की चीजों का उत्पादन करने का कोई बंधन नहीं था। उत्पादन का तरीका लाभ वाला था और सरकार ने दखल न देने की नीति अपनाई तथा इस दिशा में मालिक का साथ दिया।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 4 बाज़ार एक सामाजिक संस्था के रूप में

प्रश्न 5.
बाज़ार का क्या अर्थ है? बाज़ार के प्रमुख लक्षणों का वर्णन करें।
उत्तर:
दैनिक बोलचाल की भाषा में बाज़ार शब्द को विशेष वस्तु के बाज़ार के रूप में प्रयोग किया जाता है जैसे कि फलों का बाजार, सब्जी का बाजार अर्थात् हम इसे अर्थव्यवस्था से संबंधित करते हैं। परंतु यह एक सामाजिक संस्था भी है। समाजशास्त्रियों के अनुसार बाज़ार वह सामाजिक संस्थाएं है जो विशेष सांस्कृतिक तरीकों द्वारा निर्मित है।

बाजारों का नियंत्रण तो विशेष सामाजिक वर्गों द्वारा होता है तथा इसका अन्य सामाजिक संस्थाओं, सामाजिक प्रक्रियाओं तथा संरचनाओं से भी विशेष संबंध होता है। आर्थिक दृष्टिकोण से बाजार में केवल ऑर्थिक क्रियाओं तथा संस्थाओं को भी शामिल किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि बाज़ार में केवल लेन-देन तथा सौदे ही होते हैं जोकि पैसे पर आधारित होते हैं।

ऐली के अनुसार, “बाज़ार का अर्थ हम उन सभी क्षेत्रों से लेते हैं जिसके अंदर किसी वस्तु-विशेष की मूल्य निर्धारण करने वाली शक्तियां कार्यशील होती हैं।” इसी प्रकार मैक्स वैबर के अनुसार, “बाजार स्थिति का अर्थ विनिमय के किसी भी विषय के लिए उसे द्रव्य में परिवर्तित करने के उन सभी अवसरों से है जिनके बारे में बाज़ार स्थिति में सहभागी सभी जानते हैं कि वह उन्हें प्राप्त है तथा वह दामों तथा प्रतिस्पर्धा की दृष्टि से उनकी मनोवृत्तियों के लिए संदर्भपूर्ण हैं।”

बाज़ार के लक्षण
(Features of Market)
बाज़ार के प्रमुख लक्षण निम्नलिखित हैं-
1. आपसी लेन-देन-बाजार का सबसे प्रमुख लक्षण आपसी लेन-देन का है। बाजार वैसे भी आपसी लेन-देन पर ही आधारित होता है। इसमें या तो चीजों के बदले में चीजें, चीज़ों के बदले में पैसे अथवा चीज़ों के बदले में सेवाएं प्रदान की जाती हैं। अगर आपसी लेन-देन ही नहीं होगा तो हम बाज़ार के बारे में सोच भी नहीं सकते।

2. निरंतर प्रक्रिया-बाज़ार एक निरंतर चलने वाली संस्था है। हम चाहे प्राचीन समाज अथवा आधुनिक समाज, ग्रामीण समाज देखें अथवा जन-जातीय समाज, बाज़ार प्रत्येक प्रकार के समाज में मौजूद है। अगर किसी व्यक्ति को परिवार चलाना है तो वह बाज़ार में आएगा ही तथा खरीददारी भी करेगा। इससे बाज़ार का नियमन भी बना रहता

3. अव्यक्तिगत संबंध-बाजार का एक और महत्त्वपूर्ण लक्षण है कि इसमें अव्यक्तिगत संबंध होते हैं। चाहे लोग बाज़ार के दुकानदारों को जानते होते हैं परंतु उनके संबंध एक सीमा तक ही सीमित होते हैं। अगर संबंध घनिष्ठ भी हैं तो भी यह बाज़ार के नियमों को अधिक प्रभावित नहीं करते हैं। दुकानदार अपना लाभ तो लेगा ही चाहे वह कम ही क्यों न हों। बाजार में संबंध दो अजनबी व्यक्तियों के बीच भी बन सकते हैं।

4. माध्यम के रूप में द्रव्य-बाज़ार के नियमों के अनुसार विनिमय में द्रव्य का प्रयोग किया जाता है। यह द्रव्य किसी भी रूप, चीज़ों, धन अथवा सेवाओं के रूप में हो सकता है। द्रव्य के हिसाब से चीज़ों की मात्रा कम अथवा अधिक भी हो सकती है। द्रव्य की मात्रा के हिसाब से ही सौदे होते हैं तथा चीज़ों का लेन-देन होता है।

5. संबंध समझौते पर आधारित-बाज़ार में संबंध समझौते पर आधारित होते हैं। यह संबंध अव्यक्तिगत होते हैं। समझौते की शर्ते सभी पर मान्य होती हैं तथा सभी को इन्हें मानना ही पड़ता है अन्यथा क्षतिपूर्ति की मांग भी की जा सकती है। आज के औद्योगिक समाजों के समझौते पर आधारित संबंधों की मांग बढ़ती जा रही है।

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HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

Haryana State Board HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

बहुविकल्पीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कौन-सा कथन असत्य है?
(A) वर्ग का मुख्य आधार आर्थिक है
(B) वर्ग में स्थिति अर्जित की जाती है
(C) वर्ग परिवर्तन असंभव नहीं है
(D) उपर्युक्त सभी कथन असत्य है।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी कथन असत्य है।

प्रश्न 2.
पूँजीपति और सर्वहारा वर्ग विभाजन किसकी देन है?
(A) मैक्स वैबर
(B) इमाइल दुर्थीम
(C) कार्ल मार्क्स
(D) स्वामी दयानंद।
उत्तर:
कार्ल मार्क्स।

प्रश्न 3.
निम्न में से कौन-सी विशेषता जनजाति की नहीं है?
(A) सामान्य नाम
(B) सामान्य क्षेत्र
(C) सामान्य बोली
(D) बहिर्विवाह।
उत्तर:
बहिर्विवाह।

प्रश्न 4.
कौन-सा कथन असत्य है?
(A) जाति में सामाजिक परिस्थिति अर्जित की जाती है
(B) वर्ग में सामाजिक स्थिति प्रदत्त होती है
(C) जनजाति एक अर्जित समूह है
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 5.
जाति को बनाए रखने में कौन-सी विशेषता सर्वाधिक अनिवार्य है?
(A) अंतर्विवाह वंशानुगत सदस्यता
(B) जातिगत व्यवसाय
(C) जातिगत विशेषधिकार
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 6.
किस वेद में पुरुष सूक्त में जाति की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है?
(A) ऋग्वेद
(B) यजुर्वेद
(C) अथर्ववेद
(D) सामवेद।
उत्तर:
ऋग्वेद।

प्रश्न 7.
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम कब पास हुआ था?
(A) 1956
(B) 1954
(C) 1955
(D) 1957
उत्तर:
1955

प्रश्न 8.
भारत की सबसे बड़ी जनजाति कौन-सी है?
(A) संथाल
(B) मुंडा
(C) टोडा
(D) हो।
उत्तर:
मुंडा।

प्रश्न 9.
किस संस्था ने भारतीय समाज को बुरी तरह विघटित किया है?
(A) जाति व्यवस्था
(B) वर्ग व्यवस्था
(C) संयुक्त परिवार
(D) दहेज प्रथा।
उत्तर:
जाति व्यवस्था।

प्रश्न 10.
इनमें से कौन-सा वर्ग का आधार है?
(A) पैसा
(B) पेशा
(C) जन्म
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 11.
जाति व्यवस्था का एक प्रकार्य बताइए।
(A) सामाजिक स्थिति को निश्चित करना
(B) अपनी योग्यताओं व क्षमताओं से प्राप्त करना
(C) सामाजिक संबंध स्वतंत्र रूप से रखना
(D) व्यवस्था को इच्छानुसार चुनना।
उत्तर:
सामाजिक स्थिति को निश्चित करना।

प्रश्न 12.
नातेदारी संगठन व्यक्तियों के उस समूह को कहते हैं, जो परस्पर-
(A) रक्त संबंधी होते हैं
(B) वैवाहिक संबंधी होते हैं
(C) रक्त और वैवाहिक संबंधी होते हैं
(D) रक्त या वैवाहिक संबंधी होते हैं
उत्तर:
रक्त संबंधी होते हैं।

प्रश्न 13.
सभी सगोत्रीय व्यक्ति रक्त संबंधी होने के कारण
(A) बहिर्विवाही होते हैं
(B) अंतर्विवाही होते हैं
(C) एकविवाही होते हैं
(D) उपर्युक्त सभी होते हैं।
उत्तर:
बहिर्विवाही होते हैं।

प्रश्न 14.
निम्न में से कौन-सा धर्म विधवा व तलाकशुदा स्त्री से विवाह को प्रोत्साहन देता है?
(A) ईसाई
(B) मुस्लिम
(C) हिंदू
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
ईसाई।

प्रश्न 15.
निम्न में से कौन-सा कार्य परिवार से संबंधित नहीं है?
(A) वैध यौन संबंध
(B) समाज स्वीकृत संतोनत्पत्ति
(C) नातेदारी समूह निर्माण
(D) औपचारिक शिक्षा देना।
उत्तर:
वैध यौन संबंध।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 16.
हिंदू विवाह के उद्देश्यों का सही क्रम क्या है?
(A) धर्म, प्रजनन, रीत
(B) प्रजनन, धर्म, रीत
(C) रीत, प्रजनन, धर्म
(D) उपर्युक्त कोई नहीं।
उत्तर:
धर्म, प्रजनन, रीत।

प्रश्न 17.
अपने ही समूह में विवाह को क्या कहते हैं?
(A) समूह विवाह
(B) एक विवाह
(C) अंतर्विवाह
(D) बहिर्विवाह।
उत्तर:
अंतर्विवाह।

प्रश्न 18.
परिवार के स्वरूप में परिवर्तन क्यों आ रहा है?
(A) नगरीकरण तथा औद्योगीकरण के कारण
(B) स्त्रियों के घर से बाहर निकलने के कारण
(C) स्त्रियों की शिक्षा बढ़ने के कारण
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

प्रश्न 19.
बच्चे का समाजीकरण सबसे पहले कहाँ शुरू होता है?
(A) परिवार में
(B) स्कूल में
(C) पड़ोस में
(D) खेल समूह में।
उत्तर:
परिवार में।

प्रश्न 20.
हिंदू विवाह को क्या समझा जाता है?
(A) समझौता
(B) धार्मिक संस्कार
(C) मित्रता
(D) सहयोग की प्रक्रिया।
उत्तर:
धार्मिक संस्कार।

प्रश्न 21.
हिंदू विवाह अधिनियम कब लागू हुआ?
(A) 1950
(B) 1952
(C) 1955
(D) 1953
उत्तर:
1955

प्रश्न 22.
एक व्यक्ति के जीवन में परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण समूह है क्योंकि-
(A) सदस्यों का एक-दूसरे के प्रति निःस्वार्थ समर्पण होता है।
(B) सदस्य रक्त, विवाह तथा दत्तक ग्रहण द्वारा संबंधित होते हैं।
(C) परिवार अपने सदस्यों को आर्थिक तथा सामाजिक समर्थन प्रदान करता है।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 23.
वह नातेदारी व्यवहार जिसमें मामा महत्त्वपूर्ण माना जाता है।
(A) साहप्रसीवता
(B) परिहार
(C) मातुलेय
(D) परिहास संबंध।
उत्तर:
मातुलेय।

प्रश्न 24.
दहेज निषेध कानून प्रथम बार कब लागू हुआ?
(A) 1960
(B) 1959
(C) 1958
(D) 1961
उत्तर:
1961

प्रश्न 25.
परिवार का महत्त्वपूर्ण प्रकार्य है
(A) भौतिक सुरक्षा प्रदान करना
(B) आर्थिक समर्थन प्रदान करना
(C) सामाजिक मानदंडों के अनुसार बच्चे का समाजीकरण करना।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 26.
एक गोत्र ऐसा नातेदारी (स्वजन) समूह होता है-
(A) जिसके सदस्य अपने आपको किसी ज्ञात पूर्वज के वंशज मानते हैं।
(B) जिसके सदस्यों का विश्वास होता है कि वे एक ही मिथकीय पूर्वज के वंशज हैं।
(C) जिसके उदाहरण हैं माता-पिता तथा बच्चे
(D) उपरोक्त कोई नहीं।
उत्तर:
जिसके सदस्य अपने आपको किसी ज्ञात पूर्वज के वंशज मानते हैं।

प्रश्न 27.
संयुक्त परिवार में-
(A) परिवार में मुखिया के आदेशों का पालन करना होता है।
(B) सदस्यों की प्रस्थिति उनकी आय या व्यावसायिक उपलब्धि पर आधारित नहीं होती।
(C) प्रत्येक सदस्य, दूसरे सदस्य के सुख-दुःख को बाँटता है।
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 28.
नातेदारी व्यक्ति के लिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि-
(A) यह उसे स्थिति एवं पहचान प्रदान करती है
(B) यह मनोवैज्ञानिक सुरक्षा प्रदान करती है
(C) यह उसके व्यवहार तथा भूमिका को परिभाषित सुनिश्चित करती है
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
उपरोक्त सभी।

प्रश्न 29.
भारत में लिंग निर्धारण परीक्षणों को एक अधिनियम द्वारा कब निषिद्ध किया गया?
(A) 1990
(B) 1993
(C) 1994
(D) 1991
उत्तर:
1990

प्रश्न 30.
निम्न में से कौन-सा मानव समाज की मूल संस्थाओं में से नहीं है?
(A) नातेदारी
(B) आर्थिक
(C) राजनीति
(D) खेलकूद।
उत्तर:
खेलकूद।

प्रश्न 31.
निम्नलिखित में से कौन केंद्रक (एकांकी) परिवार का सदस्य नहीं है?
(A) माता
(B) पिता
(C) नाना
(D) भाई।
उत्तर:
नाना।

प्रश्न 32.
जनजाति निम्नोकत में से कौन-सा समूह है?
(A) भौगोलिक
(B) भाषाई
(C) संजातीय
(D) इनमें से सभी।
उत्तर:
इनमें से सभी।

प्रश्न 33.
पति-पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे कैसे परिवार का निर्माण करते हैं?
(A) केंद्रक परिवार
(B) नगरीय परिवार
(C) संयुक्त परिवार
(D) ग्रामीण परिवार।
उत्तर:
केंद्रक परिवार।

प्रश्न 34.
विधवा पुनर्विवाह अधिनियम कब पास किया गया?
(A) 1852 में
(B) 1856 में
(C) 1860 में
(D) 1864 में
उत्तर:
1856 में।

प्रश्न 35.
निम्नलिखित में से कौन सी विशेषता संयुक्त परिवार की नहीं है?
(A) बड़ा आकार
(B) छोटा आकार
(C) सामान्य रसोई
(D) मुखिया की भूमिका।
उत्तर:
छोटा आकार।

प्रश्न 36.
निम्न में से वर्ग एक क्या है?
(A) समाज
(B) समिति
(C) खुली व्यवस्था
(D) बंद व्यवस्था।
उत्तर:
खुली व्यवस्था।

प्रश्न 37.
मातृ-वंशीय परिवार प्रथा प्रचलित है :
(A) खासी परिवारों में
(B) भील
(C) संथाल
(D) ओरांव।
उत्तर:
खासी परिवारों में।

प्रश्न 38.
जब कोई वंश पूर्णतः वंशानुक्रम पर आधारित होता है तो कहलाता है:
(A) वर्ण
(B) वर्ग
(C) समूह
(D) जाति।
उत्तर:
जाति।

प्रश्न 39.
निम्न में से कम-से-कम किस आयु का बच्चा सामाजिक संबंधों के बारे में जानता है?
(A) 6 वर्ष का
(B) 10 वर्ष का
(C) 18 वर्ष का
(D) उपर्युक्त सभी।
उत्तर:
उपर्युक्त सभी।

अति लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
……………… व्यवस्था ने हमारे समाज को बाँट दिया है।
उत्तर:
जाति व्यवस्था ने हमारे समाज को बाँट दिया है।

प्रश्न 2.
शब्द Caste किस भाषा के शब्द से निकला है?
उत्तर:
शब्द Caste पुर्तगाली भाषा के शब्द से निकला है।

प्रश्न 3.
जाति किस प्रकार का वर्ग है?
उत्तर:
बंद वर्ग।

प्रश्न 4.
जाति प्रथा में किसे अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी?
उत्तर:
जाति प्रथा में ब्राह्मणों को अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी।

प्रश्न 5.
अंतर्विवाह का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब व्यक्ति को अपनी ही जाति में विवाह करवाना पड़ता है तो उसे अंतर्विवाह कहते हैं।

प्रश्न 6.
जाति में व्यक्ति का पेशा किस प्रकार का होता है?
उत्तर:
जाति में व्यक्ति का पेशा जन्म पर आधारित होता है अर्थात् व्यक्ति को अपने परिवार का परंपरागत पेशा अपनाना पड़ता है।

प्रश्न 7.
जाति में आपसी संबंध किस पर आधारित होते हैं?
उत्तर:
जाति में आपसी संबंध उच्चता तथा निम्नता पर आधारित होते हैं।

प्रश्न 8.
अगर जाति आवृत्त है तो वर्ग ………………. है।
उत्तर:
अगर जाति आवृत्त है तो वर्ग अनावृत्त है।

प्रश्न 9.
आवृत्त जाति व्यवस्था का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जो वर्ग बदला नहीं जा सकता उसे आवृत्त जाति व्यवस्था कहते हैं।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 10.
कच्चा भोजन तथा पक्का भोजन बनाने के लिए क्या प्रयोग होता है?
उत्तर:
कच्चा भोजन बनाने के लिए पानी तथा पक्का भोजन बनाने के लिए घी का प्रयोग होता है।

प्रश्न 11.
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम तथा नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम कब पास हुए थे?
उत्तर:
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम 1955 में तथा नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1976 में पास हुआ था।

प्रश्न 12.
हिंदू विवाह अधिनियम …………….. में पास हुआ था।
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 में पास हुआ था।

प्रश्न 13.
अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1955 में किस बात पर प्रतिबंध लगा दिया गया था?
उत्तर:
इस अधिनियम में किसी भी व्यक्ति को अस्पृश्य कहने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।

प्रश्न 14.
सामाजिक स्तरीकरण का क्या अर्थ है?
उत्तर:
समाज को उच्च तथा निम्न वर्गों में विभाजित करने की प्रक्रिया को सामाजिक स्तरीकरण कहते हैं।

प्रश्न 15.
भारत में लगभग कितनी जातियाँ पाई जाती हैं?
उत्तर:
भारत में लगभग 3000 जातियाँ पाई जाती हैं।

प्रश्न 16.
जनजातियों के व्यवसाय किस पर आधारित होते हैं?
उत्तर:
जनजातियों के व्यवसाय जंगलों पर आधारित होते हैं।

प्रश्न 17.
जाति किस प्रकार के विवाह की अनुमति देती है?
उत्तर:
जाति अंतर्विवाह की अनुमति देती है।

प्रश्न 18.
जनजातीय समाज का आकार कैसा होता है?
उत्तर:
जनजातीय समाज छोटे आकार के होते हैं।

प्रश्न 19.
जो लोग आम जीवन से दूर जंगलों पहाड़ों में रहते हैं उन्हें क्या कहते हैं?
उत्तर:
जो लोग आम जीवन से दूर जंगलों पहाड़ों में रहते हैं उन्हें जनजाति अथवा कबीला कहते हैं।

प्रश्न 20.
प्राचीन भारतीय समाज कितने भागों में विभाजित था?
उत्तर:
प्राचीन भारतीय समाज चार भागों में विभाजित था।

प्रश्न 21.
जाति व्यवस्था का क्या लाभ था?
उत्तर:
इसने हिंदू समाज का बचाव किया, समाज को स्थिरता प्रदान की तथा लोगों को एक निश्चित व्यवसाय प्रदान किया था।

प्रश्न 22.
परंपरागत तथा आदिम समाजों में वर्ग स्थिति में महत्त्वपूर्ण कारक कौन-सा था?
उत्तर:
परंपरागत तथा आदिम समाजों में वर्ग स्थिति में महत्त्वपूर्ण कारक धर्म था।

प्रश्न 23.
जनजातियों में किस चीज़ का अधिक महत्त्व होता है?
उत्तर:
जनजातियों में टोटम का अधिक महत्त्व होता है।

प्रश्न 24.
मजूमदार ने जनजातियों को कितने वर्गों में बांटा है?
उत्तर:
मजूमदार ने जनजातियों को तीन वर्गों में बांटा है।

प्रश्न 25.
नीलगिरी पहाड़ियों में कौन-सी जनजाति रहती है?
उत्तर:
नीलगिरी पहाड़ियों में टोडा जनजाति रहती है।

प्रश्न 26.
भारत की सबसे बड़ी जनजाति कौन-सी है?
उत्तर:
मुंडा भारत की सबसे बड़ी जनजाति है।

प्रश्न 27.
खासी जनजाति किस राज्य में पाई जाती है?
उत्तर:
असम में।

प्रश्न 28.
जनजातीय समाज आकार में कैसा होता है?
उत्तर:
जनजातीय समाज आकार में छोटा होता है।

प्रश्न 29.
जनजातीय जीवन किस पर आधारित होती है?
उत्तर:
जनजातीय जीवन बंधुता पर आधारित है।

प्रश्न 30.
भारत में आजकल कितनी जनजातियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
आजकल भारत में 425 के लगभग जनजातियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 31.
जनजातीय भाषाएं किस से संबंधित हैं?
उत्तर:
जनजातियों की भाषाएं आस्ट्रिक, द्रविड़ियन तथा तिब्बती चीनी से संबंधित हैं।

प्रश्न 32.
सजातीय विवाह क्या होता है?
उत्तर:
अपनी ही जाति, उपजाति या समूह में विवाह करना सजातीय विवाह होता है।

प्रश्न 33.
घुमंतू जनजाति क्या होती है?
उत्तर:
यह शिकारी तथा भोजन इकट्ठा करने वाली जनजाति होती है जो कि घने जंगलों में घूमती है। यह अपना भोजन इकट्ठा करने के लिए घूमते रहते हैं। कुछ नागा जनजातियाँ इसी श्रेणी में आती हैं।

प्रश्न 34.
झूम खेती कौन करता है?
उत्तर:
झूम खेती जनजातीय समूह करते हैं।

प्रश्न 35.
झारखंड में कौन-सी जनजातियाँ पायी जाती हैं?
उत्तर:
मुंडा, उराव, संथाल इत्यादि जनजातियाँ पायी जाती हैं।

प्रश्न 36.
अंग्रेज़ों ने जनजातियों को किस आधार पर अलग किया?
उत्तर:
अंग्रेजों ने जनजातियों को धार्मिक तथा स्थानीय आधारों पर अलग किया।

प्रश्न 37.
नीलगिरी पहाड़ियों में कौन-सी जनजाति रहती है?
उत्तर:
टोडा जनजाति नीलगिरी पहाड़ियों में रहती है।

प्रश्न 38.
सबसे अधिक जनजातियाँ किस राज्य में पायी जाती हैं?
उत्तर:
सबसे अधिक जनजातियाँ मध्य प्रदेश में पायी जाती हैं।

प्रश्न 39.
एक विवाह का क्या अर्थ है?
उत्तर:
जब एक पुरुष एक स्त्री से विवाह करता है तो उसे एक विवाह कहते हैं।

प्रश्न 40.
बहुविवाह के कितने प्रकार हैं?
उत्तर:
बहुविवाह के तीन प्रकार हैं।

प्रश्न 41.
विविवाह में एक पुरुष की कितनी पत्नियां होती हैं?
उत्तर:
द्विविवाह में एक पुरुष की दो पत्नियां होती हैं।

प्रश्न 42.
बहुपति विवाह में एक स्त्री के कितने पति हो सकते हैं?
उत्तर:
बहुपति विवाह में एक स्त्री के कई पति हो सकते हैं।

प्रश्न 43.
पितृ सत्तात्मक परिवार में …………………. की शक्ति अधिक होती है।
उत्तर:
पितृ सत्तात्मक परिवार में पिता की शक्ति अधिक होती है।

प्रश्न 44.
मातृ सत्तात्मक परिवार में ………………. की सत्ता चलती है।
उत्तर:
मात सत्तात्मक परिवार में माता की सत्ता चलती है।

प्रश्न 45.
किस परिवार में वंश का नाम पिता के नाम से चलता है?
उत्तर:
पितृवंशी परिवार में वंश का नाम पिता के नाम से चलता है।

प्रश्न 46.
रक्त संबंधी परिवार में कौन-से संबंध पाए जाते हैं?
उत्तर:
रक्त संबंधी परिवार में रक्त संबंध पाए जाते हैं।

प्रश्न 47.
आगमन परिवार का अर्थ बताएं।
उत्तर:
जिस परिवार में व्यक्ति जन्म लेता तथा बड़ा होता है उसे आगमन परिवार कहते हैं।

प्रश्न 48.
कौन-से परिवार को संतान पैदा करने वाला परिवार कहा जाता है?
उत्तर:
जन्म परिवार को।

प्रश्न 49.
नातेदारी कितने प्रकारों में बांटी जा सकती है?
उत्तर:
नातेदारी तीन प्रकारों में बांटी जा सकती है।

प्रश्न 50.
रक्त संबंधी किस नातेदारी के भाग होते हैं?
उत्तर:
रक्त संबंधी सगोत्र नातेदारी के भाग होते हैं।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 51.
सिबलिंग (Sibling) का अर्थ बताएं।
उत्तर:
सगे भाई बहन को सिबलिंग कहा जाता है।

प्रश्न 52.
हाफ सिबलिंग (Half Sibling) का अर्थ बताएं।
उत्तर:
सौतेले भाई-बहन को हाफ सिबलिंग कहा जाता है।

प्रश्न 53.
एक रेखीय संबंधी कौन-से होते हैं?
उत्तर:
वंशक्रम की सीधी रेखा के साथ संबंधित रिश्तेदारों को एक रेखीय संबंधी कहते हैं।

प्रश्न 54.
वंश समूह का अर्थ बताएं।
उत्तर:
माता अथवा पिता के रक्त संबंधियों को मिलाकर वंश समूह बनता है।

प्रश्न 55.
गोत्र ………………… का विस्तृत रूप है।
उत्तर:
गोत्र वंश समूह का विस्तृत रूप है।

प्रश्न 56.
सदस्यों के आधार पर परिवार के कितने तथा कौन-से प्रकार होते हैं?
उत्तर:
सदस्यों के आधार पर परिवार के तीन प्रकार केंद्रीय परिवार, संयुक्त परिवार तथा विस्तृत परिवार होते हैं।

प्रश्न 57.
विवाह के आधार पर परिवार के कितने तथा कौन-से प्रकार होते हैं?
उत्तर:
विवाह के आधार पर परिवार के दो प्रकार-एक विवाही परिवार तथ होते हैं।

प्रश्न 58.
वंश के आधार पर कितने प्रकार के परिवार होते हैं?
उत्तर:
चार प्रकार के परिवार।

प्रश्न 59.
अंतर्विवाह क्या है?
उत्तर:
जब व्यक्ति केवल अपनी ही जाति में विवाह करवा सकता हो उसे अंतर्विवाह कहा जाता है।

प्रश्न 60.
बर्हिविवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर:
जब व्यक्ति को अपनी गोत्र के बाहर परंतु अपनी जाति के अंदर विवाह करवाना पड़े तो उसे बर्हिविवाह कहते हैं।

प्रश्न 61.
केंद्रीय परिवार का अर्थ बताएं।
अथवा
मूल परिवार क्या है?
उत्तर:
वह परिवार जिसमें पति पत्नी तथा उनके बिनब्याहे बच्चे रहते हों उसे केंद्रीय परिवार अथवा मूल परिवार कहा जाता है।

प्रश्न 62.
मुस्लिम तलाक कानून कंब पास हुआ था?
उत्तर:
मुस्लिम तलाक कानून, 1954 में पास हुआ था।

प्रश्न 63.
ईसाइयों का तलाक कानून …………………. में पास हुआ था।
उत्तर:
ईसाइयों का तलाक कानून 1869 में पास हुआ था।

प्रश्न 64.
हिंदू विधवा पुनर्विवाह कब पास हुआ था?
उत्तर:
सन् 1856 में।

प्रश्न 65.
किस समुदाय में मेहर की प्रथा प्रचलित है?
उत्तर:
मुस्लिम समुदाय में।

प्रश्न 66.
विशेष विवाह अधिनियम कब पास हुआ था?
उत्तर:
विशेष विवाह अधिनियम 1954 में पास हुआ था।

प्रश्न 67.
संयुक्त परिवार के विघटित होने का क्या कारण है?
उत्तर:
पश्चिमीकरण, औद्योगिकीकरण, आधुनिक शिक्षा, यातायात के साधनों का विकास इत्यादि के कारण संयुक्त परिवार विघटित हो रहे हैं।

प्रश्न 68.
संयुक्त परिवार में संपत्ति पर किसका अधिकार होता है?
उत्तर:
संयुक्त परिवार में संपत्ति पर परिवार के सभी सदस्यों का अधिकार होता है।

प्रश्न 69.
टेलर के अनुसार परिवार की प्रकृति क्या थी?
उत्तर:
टेलर के अनुसार आदिम परिवार मातृ प्रधान थे।

प्रश्न 70.
केंद्रीय परिवार की एक विशेषता बताएं।
उत्तर:
केंद्रीय परिवार में पति पत्नी तथा उनके बिन-ब्याहे बच्चे रहते हैं तथा परिवार के सभी सदस्यों को समान अधिकार प्राप्त होते हैं।

प्रश्न 71.
परिवार के आरंभिक कार्य क्या हैं?
उत्तर:
परिवार के आरंभिक कार्य हैं लैंगिक संबंधों की पूर्ति, बच्चे पैदा करना तथा बच्चों का पालन-पोषण करना।

प्रश्न 72.
गारो जनजाति में वंश परंपरा किस प्रकार की होती है?
उत्तर:
गारो जनजाति में वंश परंपरा पितृस्थानीय प्रकार की होती है।

प्रश्न 73.
माता-पिता, भाई-बहन, माँ-बेटा, पिता-पुत्री का संबंध कैसा होता है?
उत्तर:
इन सब का संबंध रक्त का होता है।

प्रश्न 74.
मातृवंशी परिवार में संपत्ति किसको मिलती है?
उत्तर:
मातृवंशी परिवार में संपत्ति पुत्री को प्राप्त होती है।

प्रश्न 75.
पति-पत्नी, जमाई-ससुर, जीजा-साला इत्यादि किस प्रकार के संबंध हैं?
उत्तर:
विवाह संबंधी हैं।

प्रश्न 76.
नातेदारी की …………………. श्रेणियां हैं।
उत्तर:
नातेदारी की तीन श्रेणियां हैं।

प्रश्न 77.
नातेदारी की प्राथमिक श्रेणी में कितने प्रकार के संबंध होते हैं?
उत्तर:
नातेदारी की प्राथमिक श्रेणी में 8 प्रकार के संबंध होते हैं।

प्रश्न 78.
माता-पिता व बच्चों का संबंध नातेदारी की कौन-सी श्रेणी में आता है?
उत्तर:
प्राथमिक श्रेणी में।

प्रश्न 79.
जिसके सदस्य अपने आपको किसी जात पूर्वज के वंशज मानते हैं ऐसा समूह ……………. कहलाता
उत्तर:
गोत्र।

प्रश्न 80.
किसी एक ऐसी मुख्य जनजाति का नाम बताइये जिसकी भाषा द्रविड़ भाषा परिवार की हो।
उत्तर:
इरूला, कुर्ग।

प्रश्न 81.
जनजातीय लोग कौन-से इलाके में अधिक रहते हैं?
उत्तर:
जनजातीय लोग मुख्यता पहाड़ियों, वनों, ग्रामीण मैदान और नगरीय औद्योगिक इलाकों में रहते हैं।

प्रश्न 82.
एक ऐसा परिवार जिसमें नवविवाहिता दंपत्ति वर के मामा के निवास स्थान पर रहते हैं, कहलाता है …………….।
उत्तर:
मातृवंशीय परिवार।

प्रश्न 83.
वह परिवार जिसमें एक व्यक्ति का जन्म होता है ……………… कहलाता है।
उत्तर:
जनन परिवार।

प्रश्न 84.
एक व्यक्ति का जीजा किस श्रेणी की नातेदारी का होगा?
उत्तर:
द्वितीय श्रेणी की नातेदारी।

प्रश्न 85.
जनजाति में बंधुआ मज़दूरी का कारण क्या है?
उत्तर:
इसका कारण उनके ऊपर चढ़ा कर्ज है। वह कर्ज चुका नहीं पाते हैं जिस कारण उन्हें बंधुआ मजदूरी करनी पड़ती है।

प्रश्न 86.
जाति का अर्थ बताएँ।
अथवा
जाति क्या है?
अथवा
जाति का अर्थ लिखें।
उत्तर:
हिंदू सामाजिक प्रणाली में एक उलझी हुई एवं दिलचस्प संस्था है जिसका नाम ‘जाति व्यवस्था’ है। यह शब्द पुर्तगाली शब्द ‘Casta’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘जन्म’। इस प्रकार यह एक अंत-वैवाहिक जिसकी सदस्यता जन्म के ऊपर आधारित है। इसमें कार्य (धंधा) पैतृक एवं परंपरागत होता है।

प्रश्न 87.
जाति व्यवस्था की कोई तीन विशेषताएं बतायें।
अथवा
जाति की एक विशेषता लिखिए।
अथवा
जाति की कोई दो सामान्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  1. जाति की सदस्यता जन्म के आधार द्वारा होती है।
  2. जाति में सामाजिक संबंधों पर प्रतिबंध होते थे।
  3. जाति में खाने-पीने के बारे में प्रतिबंध होते थे।

प्रश्न 88.
पुरातन भारतीय समाज कितने भागों में विभाजित था?
उत्तर:
चार भागों में-

  1. ब्राह्मण-जो शिक्षा देने का काम किया करते थे।
  2. क्षत्रिय-जो देश की रक्षा करते थे तथा राज्य चलाते थे।
  3. वैश्य-जो व्यापार या खेती करते थे।
  4. चौथा वर्ण-जो अन्य तीन वर्गों की सेवा किया करते थे।

प्रश्न 89.
संस्कृति में हस्तांतरण में जाति की क्या भूमिका है?
उत्तर:
प्रत्येक जाति की अपनी संस्कृति, रहन-सहन, खाने-पीने, काम करने के ढंग तथा कुछ खास गुर होते हैं। व्यक्ति जब बचपन से ही इन सब को देखता है तो धीरे-धीरे वह इन सब को सीख जाता है। इस तरह जाति संस्कृति के हस्तांतरण में विशेष भूमिका निभाती है।

प्रश्न 90.
जाति प्रथा दैवी शक्ति से भी मज़बूत कैसे हैं?
उत्तर:
सदियों से जाति प्रथा हमारे समाज के राजनीतिक तथा सामाजिक संगठन का आधार थी। हर किसी को जाति प्रथा के नियम मानने ही पड़ते थे। व्यक्ति भगवान का आदेश तो ठुकरा सकता था, परंतु अपनी जाति के आदेश उसे मानने ही पड़ते थे। इसलिए हम कह सकते हैं कि जाति प्रथा देवी शक्ति से भी ज्यादा मज़बूत थी।

प्रश्न 91.
जाति व्यवस्था के कोई तीन प्रभाव बताओ।
उत्तर:

  1. जाति व्यवस्था से समाज में श्रम विभाजन होता था।
  2. जाति व्यवस्था से सामाजिक संगठन बना रहता था।
  3. जाति व्यवस्था से राजनीतिक स्थिरता बनी रहती थी।
  4. जाति व्यवस्था बेरोज़गारी को कम करती थी।

प्रश्न 92.
जाति व्यवस्था के कोई तीन लाभ बताओ।
उत्तर:

  1. जाति से व्यवसाय निश्चित हो जाता था।
  2. जाति व्यवस्था समाज को स्थिरता प्रदान करती थी।
  3. जाति व्यवस्था में विवाह करने में परेशानी नहीं होती थी।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 93.
जाति की दो परिभाषाएं दीजिए।
अथवा
जाति की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:

  1. होकार्ट के अनुसार, “जाति तो केवल कुछ ऐसे परिवारों का इकठ्ठ होती है जिन्हें जन्म से ही धार्मिक संस्कारों के आधार पर अलग-अलग प्रकार के कार्य सौंपे जाते हैं।”
  2. कूले के अनुसार, “जब एक वर्ग पूर्णतया वंशानुक्रमण पर आधारित होता है, तो हम उसे जाति कहते हैं।”

प्रश्न 94.
जाति व्यवस्था के तीन दोष अथवा हानियां बताएं।
उत्तर:

  1. जाति व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष यह था कि इस व्यवस्था में निम्न जातियों का शोषण होता था।
  2. जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज में अस्पृश्यता की प्रथा को जन्म दिया था।
  3. जाति व्यवस्था व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधक होती है।

प्रश्न 95.
जाति व्यवस्था में कौन-से परिवर्तन आ रहे हैं?
अथवा
जाति व्यवस्था में किसी एक परिवर्तन को बताइए।
अथवा
जाति प्रथा में कोई दो परिवर्तन बताएं।
उत्तर:
आधुनिक समय में शिक्षा के बढ़ने से, औद्योगिकीकरण के आने से, संचार के साधनों, नगरीकरण इत्यादि के कारण बहुत से परिवर्तन जाति व्यवस्था में आए हैं। जाति व्यवस्था के प्रत्येक प्रकार के प्रतिबंध समाप्त हो रहे हैं, अंतर्जातीय विवाह बढ़ रहे हैं, निम्न जातियों का प्रभुत्व बढ़ रहा है, प्रत्येक प्रकार का भेदभाव खत्म हो रहा है तथा व्यवसाय की विशेषता खत्म हो गई है।

प्रश्न 96.
अनुसूचित जनजाति किसे कहते हैं?
अथवा
जनजाति का अर्थ लिखें।
अथवा
जनजाति से आप क्या समझते हैं?
अथवा
अनुसूचित जनजाति के बारे में बताइए।
अथवा
जनजाति क्या होती है?
उत्तर:
जनजाति एक ऐसा समुदाय होता है जो हमारी सभ्यता से दूर पहाड़ों, वनों तथा जंगलों में रहता है। इन समुदायों की अपनी ही अलग संस्कृति, अलग भाषा, अलग धर्म तथा खाने-पीने और रहने के अलग ही ढंग होते हैं। ये न तो किसी के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं तथा न ही किसी को अपने कार्यों में हस्तक्षेप करने की आज्ञा देते हैं। जिस जनजाति का नाम संविधान में दर्ज है उसे अनुसूचित जनजाति कहते हैं।

प्रश्न 97.
जनजाति की एक परिभाषा दीजिए।
अथवा
जनजाति को परिभाषित करें।
अथवा
जनजाति क्या है?
उत्तर:
भारत में इंपीरियल गजेटियर के अनुसार, “जनजाति परिवारों का ऐसा समूह है जिसका एक सामान्य नाम होता है, जो एक सामान्य भाषा का प्रयोग करता है, एक सामान्य प्रदेश में रहता है अथवा रहने का दावा करता है और प्रायः अंतर्विवाह करने वाला नहीं होता, चाहे शुरू में उसमें अंतर्विवाह करने की रीति रही हो।”

प्रश्न 98.
जनजाति की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  1. कबीला बहुत-से परिवारों का समूह होता है जिसमें साझा उत्पादन होता है तथा उस उत्पादन से वह अपनी आवश्यकताएं पूर्ण करते हैं।
  2. कबीलों के लोग एक साझे भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं तथा एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने के कारण यह शेष समाज से अलग होते तथा रहते हैं।

प्रश्न 99.
टोटम का अर्थ बताएं।
उत्तर:
जनजातियों में टोटम के प्रति बहुत श्रद्धा होती है। यह टोटम एक काल्पनिक पूर्वज, पेड़, फल, पशु, पत्थर इत्यादि कुछ भी हो सकता है। जनजाति के सदस्य टोटम को पवित्र मानते हैं। उसे वह खाते या नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। फल व पौधे के रूप में टोटम में दैवी शक्ति है वे ऐसा विश्वास करते हैं।

प्रश्न 100.
परिवार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
परिवार उस समूह को कहते हैं जो यौन संबंधों पर आधारित है तथा जो इतना छोटा व स्थायी है कि उससे बच्चों की उत्पत्ति तथा पालन-पोषण हो सके। इस प्रकार परिवार पति-पत्नी व उनके बच्चों से मिलकर बनता है। पति-पत्नी के बीच किसी न किसी प्रकार के स्थायी संबंध परिवार की मुख्य विशेषता है।

प्रश्न 101.
संयुक्त परिवार को परिभाषित करें।
अथवा
ग्रामीण भारतीय परिवार की परिभाषा दीजिए।
अथवा
संयुक्त परिवार क्या है?
अथवा
संयुक्त परिवार का अर्थ बताएँ।
अथवा
संयुक्त परिवार किसे कहते हैं?
उत्तर:
ग्रामीण भारतीय परिवार मुख्यतः संयुक्त परिवार होते हैं। इसलिए इरावती कार्वे के अनुसार, “एक संयुक्त परिवार उन व्यक्तियों का समूह है जो सामान्यतया एक मकान में रहते हैं, जो एक ही रसोई में पका भोजन करते हैं, जो सामान्य संपत्ति के भागी होते हैं, जो सामान्य रूप से पूजा में भाग लेते हैं तथा जो किसी न किसी प्रकार से एक-दूसरे के रक्त संबंधी होते हैं।”

प्रश्न 102.
परिवार की दो विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  1. परिवार पति-पत्नी तथा उनके बच्चों से मिलकर बनता है। इस प्रकार पति-पत्नी के बीच किसी न किसी प्रकार के स्थायी संबंध परिवार की मुख्य विशेषता है। प्रत्येक संस्कृति में यह संबंध स्थायी होते हैं।
  2. वैवाहिक संबंध के आधार पर परिवार का जन्म होता है। यह संबंध समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं। इन संबंधों के आधार पर पति-पत्नी में लिंग संबंध से संतान उत्पन्न होती है जिन्हें मान्यता प्राप्त होती है।

प्रश्न 103.
परिवार के दो आर्थिक कार्य बताएं।
अथवा
परिवार का एक प्रकार्य लिखें।
उत्तर:

  1. परिवार में व्यक्ति की संपत्ति पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती है। परिवार अपने सदस्यों में समान रूप से सम्पत्ति विभाजित करता है।
  2. प्रत्येक आवश्यकता पूर्ण करने के लिए धन की आवश्यकता होती है। परिवार की हरेक प्रकार की आवश्यकता, खाने-पीने, रहने तथा पहनने की व्यवस्था परिवार द्वारा ही पूर्ण की जाती है।

प्रश्न 104.
परिवार के दो सामाजिक कार्य बताएं।
उत्तर:

  1. बच्चों का समाजीकरण करने में परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। परिवार में रहकर ही बच्चा अच्छी आदतें सीखता है तथा समाज का एक अच्छा नागरिक बनता है।
  2. यदि हम सामाजिक नियंत्रण के साधनों की तरफ देखें तो परिवार की इसमें सबसे बड़ी भूमिका है क्योंकि परिवार ही व्यक्ति को नियंत्रण में रहना सिखाता है।

प्रश्न 105.
संयुक्त परिवार को बनाकर रखने वाले दो कारक बताएं।
उत्तर:

  1. धर्म ने संयुक्त परिवार को बनाकर रखा है। धर्म भारतीय सामाजिक संगठन का मूल आधार है। अनेक प्रकार के धार्मिक कार्य संयुक्त रूप से करने होते हैं जिस कारण संयुक्त परिवार बना रह पाया है।
  2. हमारा देश कृषि प्रधान देश है। जहाँ पर कृषि करने के लिए बहुत से व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। इस कारण भी संयुक्त परिवार बने रहे।

प्रश्न 106.
परिवार के मनोरंजनात्मक कार्य के बारे में बताएँ।
उत्तर:
परिवार अपने सदस्यों को मनोरंजन के लिए भी सुविधाएं प्रदान करता है। रात के समय परिवार के सभी सदस्य इकट्ठे मिलकर खाना खाते हैं और अपने विचारों व मुश्किलों को एक-दूसरे के सामने प्रकट करते हैं। परिवार के वृद्ध सदस्य बच्चों को दिलचस्प कथा-कहानियां सुनाकर उनका मनोरंजन करते हैं। त्योहारों के समय या किसी अन्य जश्न (खुशी) के समय परिवार के सारे सदस्य नाचते व गाते हैं।

प्रश्न 107.
केंद्रीय परिवार क्या है?
अथवा
एकाकी (मूल) परिवार किसे कहते हैं?
अथवा
केंद्रक परिवार को पारिभाषित करें।
उत्तर:
केंद्रीय परिवार वह परिवार है जिसमें पति-पत्नी व उनके अविवाहित बच्चे रहते हैं। विवाह के बाद बच्चे अपना अलग घर कायम कर लेते हैं। यह सबसे छोटे परिवार होते हैं। यह परिवार अधिक प्रगतिशील होते हैं व उनके निर्णय तर्क के आधार पर होते हैं। इसमें पति-पत्नी को बराबर का दर्जा हासिल होता है।

प्रश्न 108.
केंद्रीय परिवार की विशेषताएं बताएं।
उत्तर:

  1. केंद्रीय परिवार या इकाई परिवार आकार में छोटा होता है।
  2. केंद्रीय परिवार में संबंध सीमित होते हैं।
  3. परिवार के प्रत्येक सदस्य को महत्ता मिलती है।

प्रश्न 109.
केंद्रीय परिवार के तीन गुण बताएं।
उत्तर:

  1. केंद्रीय परिवारों में स्त्रियों की स्थिति ऊँची होती है।
  2. इसमें रहन-सहन का दर्जा उच्च वर्ग का होता है।
  3. व्यक्ति को मानसिक संतुष्टि मिलती है।

प्रश्न 110.
केंद्रीय परिवार के अवगुण बताएं।
उत्तर:

  1. यदि माता या पिता में से कोई बीमार पड़ जाए तो घर के कामों में रुकावट आ जाती है।
  2. इसमें बेरोज़गार व्यक्ति का गुजारा मुश्किल से होता है।
  3. पति की मौत के पश्चात यदि स्त्री अशिक्षित हो तो परिवार की पालना कठिन हो जाती है।

प्रश्न 111.
विस्तृत परिवार का क्या अर्थ है?
उत्तर:
इस प्रकार के परिवार संयुक्त परिवार से ही बनते हैं। जब संयुक्त परिवार आगे बढ़ जाते हैं तो वह विस्तृत परिवार कहलाते हैं। इसमें माता-पिता, उनके भाई-बहन, बेटे-बेटियां व पोते-पोतियां आदि इकट्ठे रहते हैं। बच्चों के दादा-दादी भी इसमें रहते हैं। इस प्रकार इसमें कम से कम तीन पीढ़ियां रहती हैं।

प्रश्न 112.
संयुक्त परिवार का अर्थ बताएं।
उत्तर:
संयुक्त परिवार एक मुखिया की ओर से शासित अनेकों पीढ़ियों के रक्त संबंधियों का एक ऐसा समूह है जिनका निवास, चूल्हा व संपत्ति संयुक्त होते हैं। वह सब कर्तव्यों व बंधनों में बंधे रहते हैं। संयुक्त परिवार की विशेषताएं हैं-

  • साँझा चूल्हा
  • साँझा निवास
  • साँझी संपत्ति
  • मुखिया का शासन
  • बड़ा आकार।

आजकल इस प्रकार के परिवारों की अपेक्षा केंद्रीय परविार चलन में आ गए हैं।

प्रश्न 113.
पितृ-मुखी परिवार क्या है?
अथवा
पितृवंशी परिवार क्या है?
अथवा
पितृसत्तात्मक परिवार क्या है?
उत्तर:
जैसे कि नाम से ही ज्ञात होता है कि इस प्रकार के परिवारों की सत्ता या शक्ति पूरी तरह से पिता के हाथ में होती है। परिवार के संपूर्ण कार्य पिता के हाथ में होते हैं। वह ही परिवार का कर्ता होता है। परिवार के सभी छोटे या बड़े कार्यों में पिता का ही कहना माना जाता है। परिवार के सभी सदस्यों पर पिता का ही नियंत्रण होता है। इस तरह का परिवार पिता के नाम पर ही चलता है। पिता के वंश का नाम पुत्र को मिलता है।

प्रश्न 114.
मात-वंशी परिवार क्या है?
अथवा
मातृसत्तात्मक परिवार क्या है?
अथवा
मातृ-वंशी परिवार की परिभाषा दो।
उत्तर:
जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है कि परिवार में सत्ता या शक्ति माता के हाथ ही होती है। बच्चों पर माता के रिश्तेदारों का अधिकार अधिक होता है न कि पिता के रिश्तेदारों का। स्त्री ही मूल पूर्वज मानी जाती है। संपत्ति का वारिस पत्र नहीं बल्कि माँ का भाई या भांजा होता है। परिवार माँ के नाम से चलता है। इस प्रकार के परिवार भारत में कुछ कबीलों में जैसे गारो, खासी आदि में मिल जाता है।

प्रश्न 115.
प्रतिबंधित बहु-पत्नी विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर:
इस प्रकार के विवाह में पत्नियों की संख्या सीमित कर दी जाती है। वह एक बंधित सीमा से अधिक पत्नियां नहीं रख सकता। मुसलमानों में प्रतिबंधित बहु-पत्नी विवाह आज भी प्रचलित है जिसके अनुसार एक व्यक्ति के लिए पत्नियों की संख्या ‘चार’ तक निश्चित कर दी गई है।

प्रश्न 116.
अप्रतिबंधित बहु-पत्नी विवाह का अर्थ बताएं।
उत्तर:
इस प्रकार के विवाह में पत्नियों की संख्या की कोई सीमा नहीं होती जितनी मर्जी चाहे पत्नियां रख सकता है। भारत में प्राचीन समय में इस प्रकार का विवाह प्रचलित था। जब राजा महाराजा बिना गिनती के पत्नियां या रानियां रख सकते थे।

प्रश्न 117.
मातृ-सत्तात्मक परिवार कौन-सा होता है?
उत्तर:
वह परिवार जहां सारे अधिकार माता के हाथ में होते हैं, परिवार माता के नाम पर चलता है तथा परिवार पर माता का नियंत्रण होता है, उसे मात-सत्तात्मक परिवार कहते हैं।

प्रश्न 118.
विवाह के आधार पर परिवार के कितने प्रकार होते हैं?
उत्तर:
विवाह के आधार पर परिवार तीन प्रकार के होते हैं-

  • एक विवाही परिवार
  • बहु विवाही परिवार
  • समूह विवाही परिवार।

प्रश्न 119.
बहु विवाही परिवार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर:
बहु विवाही परिवार दो प्रकार के होते हैं-

  • बहु पत्नी विवाही परिवार
  • बहु पति विवाही परिवार।

प्रश्न 120.
नातेदारी क्या होती है?
अथवा
नातेदारी क्या है?
अथवा
नातेदारी किसे कहते हैं?
उत्तर:
नातेदारी समाज से मान्यता प्राप्त संबंध है जो अनुमानित या वास्तविक वंशावली संबंधों पर आधारित है। नातेदारी का दूसरा नाम रिश्तेदारी भी है।

प्रश्न 121.
नातेदारी कितने प्रकार की होती है?
उत्तर:
नातेदारी दो प्रकार की होती है-

  • रक्त मूलक या रक्त संबंधी नातेदारी।
  • विवाह मूलक या विवाह से बनी नातेदारी।

प्रश्न 122.
संयुक्त परिवार के लाभों का वर्णन करो।
उत्तर:

  1. संयुक्त परिवार भूमि बंटने से बचाता है।
  2. संयुक्त परिवार श्रम विभाजन करता है।
  3. संयुक्त परिवार में खर्च में बचत हो जाती है।

प्रश्न 123.
संयुक्त परिवार के दोषों का वर्णन करो।
उत्तर:

  1. संयुक्त परिवार व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधक है।
  2. संयुक्त परिवार में स्त्रियों की दुर्दशा हो जाती है।
  3. संयुक्त परिवार में पारिवारिक कलह आम रहती है।

प्रश्न 124.
संयुक्त परिवार की विशेषताओं का वर्णन करो।
उत्तर:

  1. संयुक्त परिवार का आकार बड़ा होता है।
  2. संयुक्त परिवार के कर्ता अर्थात् पिता की प्रधानता होती है।
  3. संयुक्त परिवार में संपत्ति, निवास तथा रसोई संयुक्त होती है।

प्रश्न 125.
एकाकी अथवा केंद्रीय परिवार के दो कार्य बताएं।
उत्तर:

  1. घर एक ऐसा स्थान है जहाँ पर व्यक्ति आकर अपनी थकावट दूर कर सकता है। विवाह के बाद अपना घर बनाना तथा उसकी व्यवस्था करना केंद्रीय परिवार का मुख्य कार्य है।
  2. केंद्रीय परिवार अपने सामाजिक मूल्यों, मान्यताओं तथा रहन-सहन के ढंगों को अपनी नई पीढ़ी को ठीक तरह से बताता है तथा सिखाता है।

प्रश्न 126.
केंद्रीय परिवार तथा संयुक्त परिवार में दो मुख्य अंतर बताएं।
अथवा
एकल परिवार और संयुक्त परिवार की तुलना करें।
उत्तर:

संयुक्त परिवारकेंद्रीय परिवार
(1) संयुक्त परिवार में स्त्रियों की स्थिति निम्न स्तर की होती है । वे पूर्ण रूप से आदमियों के अधीन होती हैं।(1) केंद्रीय परिवार में स्त्रियों की स्थिति पुरुषों के समान होती है। परिवार में प्यार व समानता और मित्रता वाले संबंध मिलते हैं।
(2) संयुक्त परिवार में कर्त्ता का निरंकुश शासन चलता है। प्रत्येक निर्णय वही लेता है और शेष सदस्य उसका पालन करते हैं।(2) केंद्रीय परिवार में महत्त्वपूर्ण पारिवारिक निर्णय में सभी की राय ली जाती है। सभी को अपना जीवन अपनी इच्छा अनुसार जीने का अधिकार होता है।

प्रश्न 127.
वर्ग निर्धारण के कौन-से आधार हैं?
उत्तर:
वर्ग निर्धारण के बहुत से आधार हैं जैसे कि पैसा, संपत्ति, शिक्षा, रहने का स्थान, पेशा, निवास स्थान की अवधि, व्यवसाय की प्रकृति, धर्म, परिवार तथा नातेदारी।

प्रश्न 128.
हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु – – – वर्ष है?
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार लड़की के विवाह की न्यूनतम आयु 18 वर्ष है।

प्रश्न 129.
हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार लड़के के विवाह की न्यूनतम आयु – – – – वर्ष है।
उत्तर:
हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार लड़के के विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष है।

प्रश्न 130.
सामान्यतः संयुक्त तथा केंद्रक में से कौन-से परिवार की सदस्य संख्या अधिक होती है?
उत्तर:
सामान्यतः संयुक्त परिवार की सदस्य संख्या अधिक होती है।

प्रश्न 131.
………………… देश में विश्व की सबसे जटिल जाति व्यवस्था पाई जाती है।
उत्तर:
भारत देश में विश्व की सबसे जटिल जाति व्यवस्था पाई जाती है।

प्रश्न 132.
परिवार तथा नातेदारी में से कौन-सी वृहद (बड़ी) है?
उत्तर:
परिवार तथा नातेदारी में से नातेदारी बड़ी है।

प्रश्न 133.
किसी एक सामाजिक संस्था का नाम बताएँ।
उत्तर:
परिवार एक सामाजिक संस्था है।

प्रश्न 134.
विशेष विवाह अधिनियम कब पास हुआ?
उत्तर:
विशेष विवाह अधिनियम 1954 में पास हुआ था।

प्रश्न 135.
किसी एक सामाजिक संस्था का नाम लिखें।
उत्तर:
विवाह, परिवार सामाजिक संस्थाएं हैं।

प्रश्न 136.
सामान्य संपत्ति किस परिवार की विशेषता है?
उत्तर:
सामान्य संपत्ति संयुक्त परिवार की विशेषता है।

प्रश्न 137.
जाति एक बंद ……………….. है।
उत्तर:
जाति एक बंद वर्ग है।

प्रश्न 138.
जाति व्यवस्था ……………….. पर आधारित है।
उत्तर:
जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 139.
जाति एक नवीनतम सांस्कृतिक संस्थान है। (हां/नहीं)।
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 140.
जाति व्यवस्था व्यक्तियों को किस आधार पर वर्गीकृत करती है?
उत्तर:
जाति व्यवस्था व्यक्तियों को पेशे व जन्म के आधार पर वर्गीकृत करती है।

प्रश्न 141.
खंडात्मक संगठन क्या है?
उत्तर:
जो संगठन अलग-अलग खंडों या टुकड़ों में किसी आधार पर विभाजित हों उन्हें खंडात्मक संगठन कहा जाता है।

प्रश्न 142.
वर्गों को क्रम से लिखिए।
उत्तर:

  1. ब्राह्मण
  2. क्षत्रिय
  3. वैश्य, तथा
  4. शुद्र।

प्रश्न 143.
जनजातियों को कितने भाषायी परिवारों में बाँटा गया है?
उत्तर:
दो आधारों पर-स्थायी विशेषक तथा अर्जित विशेषक।

प्रश्न 144.
जाति भारतीय उपमहाद्वीप से जुड़ा अनूठा संस्थान है। (सत्य/असत्य)
उत्तर:
सत्य।

प्रश्न 145.
शारीरिक प्रजातीय दृष्टि से जनजातियों का वर्गीकरण किन-किन श्रेणियों में किया गया है?
उत्तर:
शारीरिक प्रजातीय दृष्टि से जनजातियों के लोगों को नीग्रिटो, आर्टेलॉयड, द्रविड तथा आर्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है।

प्रश्न 146.
पत्नी स्थानिक परिवार कौन-सा है?
उत्तर:
जब विवाह के पश्चात पति-पत्नी के घर रहने के लिए चला जाता है तो इसे पत्नी स्थानिक परिवार कहते हैं।

लघु उत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पदक्रम क्या होता था?
उत्तर:
जाति प्रणाली में एक निश्चित पदक्रम होता था। भारत वर्ष में ज्यादातर भागों में ब्राह्मण वर्ण की जातियों को समाज में ऊँचा स्थान प्राप्त था, इसी प्रकार दूसरे क्रम में क्षत्रिय आते थे। वर्ण व्यवस्था के अनुसार जैसा तीसरा स्थान ‘वैश्यों’ का था। इसी क्रम के अनुसार सबसे बाद वाले क्रम में चौथा निम्न जातियों का था। समाज में किसी भी व्यक्ति की स्थिति भारत के ज्यादा भागों में उसी प्रकार से ही निश्चित की जाती थी। ब्राह्मणों को ज़्यादा आदर व सत्कार दिया जाता था और निम्न वर्ग भाव व्यक्तियों से दुर्व्यवहार होता है।

प्रश्न 2.
जाति का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन होता था। व्याख्या करें।
अथवा
खंडात्मक संगठन क्या है?
उत्तर:
जाति प्रथा ने भारतीय सामाजिक ढांचे को अथवा भारतीय समाज को कई हिस्सों में बांट दिया है, सामान्यतः इसके चार भाग ही माने जाते हैं। इस प्रकार से इन चारों भागों में सबसे पहले भाग में ‘ब्राह्मण’ आते थे। दूसरे भाग में क्षत्रिय आते थे। इसके बाद वाला भाग वैश्यों को मिला था और आखिर वाला तथा चौथा भाग निम्न जातियों का माना गया था। इस तरह से हर खंड अथवा हिस्से का समाज में अपना-अपना दर्जा था। उसी प्रकार समाज में उनका स्थान, स्थिति अथवा कार्य प्रणाली थी, जिसमें उनको अपने रीति-रिवाजों के अनुसार चलना था। इसके अनुसार जाति के सदस्यों को अपने संबंधों का दायरा भी अपनी जाति तक ही सीमित रखना होता था। इस व्यवस्था में हर जाति अपने आप में एक संपूर्ण जीवन बिताने की एक ‘सामाजिक इकाई’ मानी जाती थी।

प्रश्न 3.
जाति के कार्यों का वर्णन करें।
अथवा
जाति का एक प्रकार्य बताइए।
उत्तर:
जाति व्यवस्था की प्रथा में जाति भिन्न तरह से अपने सदस्यों की सहायता करती है, उसमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं-

  • जाति व्यक्ति के व्यवसाय का निर्धारण करती है।
  • व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती है।
  • प्रत्येक व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा प्रदान करती है।
  • व्यक्ति एवं जाति के रक्त की शुद्धता बरकरार रखती है।
  • जाति राजनीतिक स्थिरता प्रदान करती है।
  • जाति अपने तकनीकी रहस्यों को गुप्त रखती है।

प्रश्न 4.
जाति सामाजिक एकता में रुकावट थी। कैसे?
उत्तर:
इस व्यवस्था से क्योंकि समाज का विभाजन कई भागों में हो जाता है, इसलिए सामाजिक संतुलन बिगड़ जाता है। इस व्यवस्था में प्रत्येक जाति के अपने नियम एवं प्रतिबंध होते थे। इस तरह से अपनी जाति के अतिरिक्त दूसरी जाति से कोई ज्यादा लगाव नहीं होता क्योंकि उन्हें पता होता था कि उन्हें नियमों के अनुसार आचरण करना होता था।

इस प्रथा में हमेशा उच्च वर्ग, निम्न वर्ग के लोगों का शोषण करते थे। जाति भेद होने के कारण एक-दूसरे के प्रति नफरत की भावना भी उजागर हो जाती थी। यह भेदभाव समाज की एकता में बाधक बन जाता था। और इस व्यवस्था की यह कमी थी, कोई व्यक्ति अपनी योग्यता के आधार पर भी अपनी जाति को बदल नहीं सकता था। यह सामाजिक ढांचे का संतुलन बिगाड़ देती है और यह समाज की उन्नति में बाधक बन जाती थी।

प्रश्न 5.
जाति व्यवस्था के लाभों के बारे में बताएं।
उत्तर:
जाति व्यवस्था के लाभ निम्नलिखित हैं-
(i) हिंदू समाज का बचाव-जाति व्यवस्था ने मध्यकाल में मुसलमानों के आक्रमणों के समय हिंदू समाज की रक्षा की थी। यदि जाति व्यवस्था में विवाह, खाने-पीने तथा अन्य प्रतिबंध न होते तो हिंदू समाज मुसलमानों में मिल गया होता।

(ii) व्यवसाय निश्चित करना-जाति व्यवस्था ने हमेशा से ही हर जाति के व्यवसाय निश्चित किए हैं। ब्राहमण. क्षत्रिय, वैश्यों तथा निम्न जातियों के काम हमेशा उनकी जाति जन्म से ही निश्चित हो जाते थे। इससे हर किसी को काम मिल जाता था।

(iii) धार्मिक आधार बनाना-जाति व्यवस्था ने हमेशा समाज को धार्मिक आधार भी दिया है। प्रत्येक जाति के धार्मिक कर्तव्य निश्चित होते थे कि किस जाति ने किस प्रकार के धार्मिक संस्कारों का पालन करना है।

(iv) सामाजिक स्थिरता प्रदान करना-जाति व्यवस्था ने समाज को स्थिरता भी प्रदान की है। प्रत्येक जाति के काम, उसकी स्थिति, रुतबा निश्चित हुआ करता था। उच्च तथा निम्न जाति के बीच एक प्रकार का संबंध बना रहता था जिससे उनके संबंध स्थिर रहते थे तथा समाज में भी स्थिरता रहती थी।

प्रश्न 6.
जाति प्रथा की हानियों का वर्णन करें।
उत्तर:
जाति प्रथा की हानियों का वर्णन निम्नलिखित है-
(i) समाज को बांट देना-जाति प्रथा ने समाज को कई भागों में बांट दिया है। इस कारण इन जातियों में एक दूसरे के प्रति नफरत पैदा हो गई तथा उनमें दुश्मनी भी हो गई। इस तरह समाज में नफरत फैलाने में जाति व्यवस्था का बहुत बड़ा हाथ है।

(ii) व्यक्तिगत विकास में बाधा-जाति व्यवस्था हर किसी का पेशा निश्चित कर देती है। चाहे कोई व्यक्ति अपनी जाति का काम करना चाहता हो या न उसे वह काम करना ही पड़ता था। जाति व्यवस्था व्यक्तिगत योग्यता में बहुत बड़ी बाधक है।

(iii) समाज के विकास में रुकावट-जाति प्रथा समाज के विकास में रुकावट है। हर कोई अपनी जाति, अपने लोगों के उत्थान के बारे में सोचता है। कोई समाज के विकास में ध्यान नहीं देता। इस तरह जाति समाज के विकास में बहुत बड़ी बाधक है।

(iv) समाज सुधार में बाधक-जाति प्रथा के कारण निम्न जाति, शूद्र, अस्पृश्यता इत्यादि संकल्प हमारे सामने आए हैं। इसने निम्न जातियों के लोगों को नीचा ही रखा, उनको ऊपर नहीं आने दिया। इस तरह समाज सुधार में जाति प्रथा एक बाधक है।

(v) लोकतंत्र की विरोधी-जाति प्रथा लोकतंत्र की विरोधी है। लोकतंत्र समानता, भाईचारे तथा स्वाधीनता के विचारों का समर्थक है बल्कि जाति प्रथा में इन सब चीज़ों की कोई परवाह नहीं है।

प्रश्न 7.
जाति प्रथा ने हमारे समाज को किस तरह प्रभावित किया है?
उत्तर:

  • जाति प्रथा ने सामाजिक गतिशीलता को चोट पहुँचायी है। व्यक्ति अपने पेशे के कारण से अपनी जगह छोड़कर कहीं और नहीं जा सकता।
  • जाति प्रथा ने समाज तथा व्यक्ति के आर्थिक विकास में भी रुकावट डाली है क्योंकि ऊँची जाति के व्यक्ति निम्न जाति के व्यक्तियों के साथ काम करना पसंद नहीं करते।
  • जाति प्रथा व्यक्तिगत कुशलताओं को बाहर नहीं आने देती।।
  • आजकल राजनीति में जातिगत वोटों का बोलबाला है क्योंकि सभी अपनी ही जाति के लोगों से वोट मांगते हैं।
  • जाति के राजनीति में आने से विभिन्न जातियों में दुश्मनी बढ़ी है।
  • जाति प्रथा सांप्रदायिक दंगों के लिए भी कई बार कारण बन जाती है।

प्रश्न 8.
औद्योगीकरण ने जाति प्रथा को किस तरह प्रभावित किया है?
उत्तर:

  • औद्योगीकरण के कारण बड़े-बड़े नगर बस गए जहां लोग बिना किसी भेदभाव के रहने लगे।
  • औद्योगीकरण से पैसा बढ़ा जिससे जाति व्यवस्था के स्थान वर्ग व्यवस्था सामने आयी है।
  • औद्योगीकरण से देशों के अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में बढ़ोत्तरी हुई जिससे लोग, जाति तथा देश छोड़कर अन्य देशों में बसना शुरू हो गए।
  • औद्योगीकरण के कारण लोग फैक्टरियों में मिलकर काम करने लगे जिससे अस्पृश्यता की भावना को धक्का लगा।
  • इसके कारण से लोगों ने शिक्षा ग्रहण करनी शुरू की जिससे उनके विचार उदारवादी हो गए।

प्रश्न 9.
जाति प्रथा में कौन-कौन से परिवर्तन आ रहे हैं?
अथवा
जाति प्रथा में क्या-क्या परिवर्तन हो रहे हैं?
उत्तर:
पुराने समय में जो कुछ भी जाति प्रथा का आधार था उन सभी में आजकल परिवर्तन आ रहे हैं, जैसे कि-

  • आजकल लोग जाति से बाहर विवाह कर रहे हैं।
  • आजकल खाने-पीने के प्रतिबंध कोई नहीं मानता।
  • ब्राह्मणों की प्रभुता काफी सीमा तक खत्म हो गई है।
  • आजकल व्यक्ति कोई भी व्यवसाय अपना सकता है।
  • अस्पृश्यता को कानून की सहायता से खत्म कर दिया गया है।

प्रश्न 10.
विवाह की कोई चार विशेषताओं के बारे में बताओ।
उत्तर:
विवाह की चार विशेषताएं निम्नलिखित हैं-
1. यौन संबंधों को नियमित करना-विवाह की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह स्त्री-पुरुष के यौन संबंधों को नियमित करता है। विवाह के बाहर यौन संबंधों को गैर-कानूनी करार दिया जाता है। इसलिए यौन संबंध निश्चित तथा नियमित करना विवाह का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य है।

2. संतान पैदा करना-विवाह की दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता है कि इससे संतान पैदा होती है। समाज की नियमितता तथा समाज के चलते रहने के लिए यह ज़रूरी है कि पीढ़ी आगे बढ़े। अगर पीढ़ी आगे बढ़ेगी तभी समाज आगे बढ़ेगा। इसलिए संतान पैदा करना विवाह का एक और उद्देश्य है।

3. परिवार की स्थापना-समाज बहुत सारे परिवारों का एक समूह है। विवाह के बाद पति-पत्नी परिवार का निर्माण पूरा करते हैं। बच्चे पैदा होने के बाद परिवार पूरा हो जाता है। इस तरह विवाह के बाद ही परिवार का निर्माण हो पाता है जोकि समाज के बनने के लिए बहुत ज़रूरी है।

4. बच्चों का पालन-पोषण-विवाह के बाद ही परिवार का निर्माण होता है जहां बच्चे पैदा होते हैं तथा उनका पालन-पोषण होता है। विवाह के बाहर पैदा हुए बच्चों का पालन-पोषण न तो अच्छी तरह हो पाता है तथा न ही उन्हें पिता तथा परिवार का नाम मिल पाता है। इस तरह विवाह से पैदा हुए बच्चों का पालन-पोषण अच्छी तरह हो जाता है।

प्रश्न 11.
परिवार की कोई चार विशेषताएं बताओ।
उत्तर:
1. पति-पत्नी में संबंध-परिवार पति-पत्नी तथा उनके बच्चों से मिलकर बनता है। इस तरह पति-पत्नी के बीच किसी न किसी प्रकार के स्थायी संबंध परिवार की मुख्य विशेषता है। प्रत्येक संस्कृति में यह संबंध स्थायी होते हैं।

2. स्थायी लिंग संबंध-वैवाहिक संबंध के आधार पर परिवार का जन्म होता है। ये संबंध समाज द्वारा स्वीकृत होते हैं। इन संबंधों के आधार पर पति-पत्नी में लिंग संबंध से संतान उत्पन्न होती है जिनको मान्यता प्राप्त होती है।

3. रक्त संबंधों का बंधन-परिवार की एक और विशेषता यह है कि परिवार के सदस्यों में रक्त संबंधों का होना है। ये रक्त संबंध वास्तविक भी हो सकते हैं तथा काल्पनिक भी। परिवार के सदस्य समान पूर्वज की संतान होते हैं।

4. सदस्यों के पालन-पोषण की आर्थिक अवस्था-परिवार में उसके सदस्य. बच्चों. बढों. स्त्रियों आदि के पालन पोषण की आर्थिक अवस्था होती है। परिवार के कमाने वाले सदस्य अन्य सदस्यों के पालन-पोषण का ज़रूरी प्रबंध करते हैं। इस तरह परिवार के सदस्य अधिकार तथा कर्तव्य के बंधनों में बंधे हए होते हैं।

प्रश्न 12.
परिवार के कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर:
1. जैविक कार्य-

  • संतान की उत्पत्ति
  • सदस्यों की सुरक्षा
  • भोजन, आवास तथा कपड़े की व्यवस्था
  • बच्चों की सुरक्षा तथा देखभाल।

2. आर्थिक कार्य-

  • श्रम विभाजन
  • आय का प्रबंध
  • संपत्ति की देखभाल।

3. सामाजिक कार्य-

  • स्थिति को निश्चित करना
  • समाजीकरण
  • सामाजिक नियंत्रण
  • सामाजिक विरासत का संग्रह तथा विस्तार।

4. धार्मिक शिक्षा प्रदान करना।

5. बच्चों के मनोरंजन संबंधी कार्य।

6. राजनीतिक कार्य-बच्चों को अधिकारों तथा कर्तव्यों का पाठ पढ़ाना।

प्रश्न 13.
निवास के आधार पर परिवार कितने प्रकार का होता है?
उत्तर:
निवास के आधार पर परिवार तीन प्रकार के होते है-
1. पितृ स्थानीय परिवार-जब विवाह के बाद पत्नी अपने पति के घर जाकर रहने लग जाती है तो उसे पितृ स्थानीय परिवार कहते हैं।

2. मातृ स्थानीय परिवार-जब विवाह के बाद पति अपनी पत्नी के घर जाकर रहने लग जाए तो उसे मातृ स्थानीय परिवार कहते हैं। यह पितृ स्थानीय परिवार के बिल्कुल उलट है।

3. नवस्थानीय परिवार-जब विवाह के पश्चात् पति-पत्नी किसी के घर न जाकर अपना नया घर बसाते हैं तो उसे नवस्थानीय परिवार कहते हैं।

प्रश्न 14.
नातेदारी के कितने प्रकार पाए जाते हैं?
अथवा
रक्तमूलक नातेदारी क्या है?
अथवा
रक्तमूलक नातेदारी किसे कहते हैं?
उत्तर:
नातेदारी के दो प्रकार पाए जाते हैं-
1. समरक्त संबंधी-रक्त या प्रजनन के आधार पर जो संबंधी पाए जाएं, उन्हें समरक्त संबंधी कहते हैं, जैसे माता-पिता का अपने बच्चों के साथ संबंध। माता, पिता, भाई, बहन के साथ संबंध इसी श्रेणी में आता है। यह संबंध सामाजिक मान्यताओं तथा जैविक तथ्यों पर आधारित होते हैं।

2. विवाह संबंधी नातेदारी-वह संबंध जोकि विवाह होने के पश्चात् बनते हैं, वह विवाह संबंधी नातेदारी होती है। यहां एक बात ध्यान रखने योग्य है कि केवल पति-पत्नी ही इस श्रेणी में नहीं आते बल्कि लड़का-लड़की के रिश्तेदारों के जो संबंध बनते हैं, वह भी इसी श्रेणी में आते हैं, जैसे कि दामाद, जीजा, साला, साली, ननद, बहू इत्यादि।

प्रश्न 15.
नातेदारी संबंधों का क्या महत्त्व होता है?
अथवा
नातेदारी का समाज में क्या महत्त्व है?
उत्तर:

  1. नातेदारी संबंधों से परिवार में सत्ता का निर्धारण होता है।
  2. नातेदारी संबंधों से विवाह के समय काफी मदद मिलती है। कौन किस खानदान से है, कौन उसका रिश्तेदार है, यह काफ़ी महत्त्वपूर्ण होता है।
  3. हिंदू जीवन के धार्मिक संस्कारों तथा कर्मकांडों को पूरा करने के लिए नातेदारों, रिश्तेदारों की बहुत जरूरत होती है।
  4. व्यक्ति के जीवन में बहुत से सुख-दुःख आते हैं। उस समय सबसे ज्यादा ज़रूरत नातेदारों की पड़ती है।

प्रश्न 16.
कबीला अथवा जनजाति का क्या अर्थ है?
उत्तर:
कबीला अथवा जनजाति व्यक्तियों का एक ऐसा समूह है जो हमारी सभ्यता से दूर पहाड़ों, जंगलों, घाटियों इत्यादि में आदिम तथा प्राचीन अवस्था में रहता है। यह समूह एक विशेष भौगोलिक क्षेत्र में रहता है जिसकी अपनी ही अलग भाषा, अपनी संस्कृति, अपना ही धर्म होता है। ये समूह अंतर्वैवाहिक समूह होते हैं तथा प्यार, पेशे तथा उद्योगों के विषय में कुछ नियमों की पालना करते हैं। ये लोग हमारी संस्कृति, सभ्यता तथा समाज से बिल्कुल ही अलग होते हैं। अलग-अलग कबीले अपनी सामाजिक संरचना, भाषा, संस्कृति इत्यादि जैसे कई पक्षों के आधार पर एक-दूसरे से अलग होते हैं।

प्रश्न 17.
कबाइली समाज किसे कहते हैं?
उत्तर:
कबीला एक ऐसा समूह है जो हमारी सभ्यता, संस्कृति से दूर पहाड़ों, जंगलों, घाटियों इत्यादि में आदिम तथा प्राचीन अवस्था में रहता है। इन कबीलों में पाए जाने वाले समाज को कबाइली समाज कहा जाता है। कबाइली समाज वर्गहीन समाज होता है। इसमें किसी प्रकार का स्तरीकरण नहीं पाया जाता है। प्राचीन समाजों में कबीले को बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामाजिक समूह माना जाता था।

कबाइली समाज की अधिकतर जनसंख्या पहाड़ों अथवा जंगली इलाकों में पाई जाती है। यह समाज साधारणतया स्वःनिर्भर होते हैं जिनका अपने ऊपर नियंत्रण होता है तथा यह किसी के भी नियंत्रण से दूर होते हैं। कबाइली समाज, शहरी समाजों तथा ग्रामीण समाजों की संरचना तथा संस्कृति से बिल्कुल ही अलग होते हैं।

प्रश्न 18.
सामाजिक स्तरीकरण के प्रकार के रूप में वर्ग तथा जाति में चार अंतर बताएं।
अथवा
जाति तथा वर्ग में दो अंतर बताइए।
अथवा
वर्ग और जाति में अंतर करें।
उत्तर:

वर्गजाति
(i) वर्ग की सदस्यता व्यक्तिगत योग्यता पर निर्भर होती है।(i) जाति की सदस्यता जन्म पर निर्भर होती है।
(ii) वर्ग में हम एक-दूसरे के वर्ग में विवाह कर सकते हैं।(ii) जाति में हम दूसरी जाति में विवाह नहीं कर सकते।
(iii) वर्ग में सामाजिक संबंधों तथा खाने-पीने पर कोई प्रतिबंध नहीं होता।(iii) जाति में जातियों में संबंधों तथा खाने-पीने संबंधी पाबंदियां होती हैं।
(iv) व्यक्ति कोई भी व्यवसाय अपना सकता है।(iv) व्यक्ति का पेशा उसके वंश या जाति के अनुसार होता है।
(v) व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत योग्यता से अपना वर्ग बदल सकता है।(v) व्यक्ति चाह कर भी या योग्यता रखते हुए भी अपनी जाति नहीं बदल सकता।
(vi) वर्ग के कई आधार जैसे कि धन, शिक्षा, व्यवसाय इत्यादि होते हैं।(vi) जाति का आधार केवल जन्म होता है।
(vii) वर्ग की कोई पंचायत नहीं होती।(vii) जाति की अपनी जाति पंचायत होती है।
(viii) वर्ग में व्यक्तिगत योग्यता की प्रधानता होती है।(viii) जाति में व्यक्तिगत योग्यता का कोई मूल्य नहीं होता केवल आपके परिवार तथा जाति का महत्त्व होता है।

प्रश्न 19.
आज के समय में जाति व्यवस्था की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
अगर आज के सामाजिक परिदृश्य को ध्यान से देखा जाए तो हमारे देश में जाति व्यवस्था कमजोर हो रही है। अब इस बात का कोई महत्त्व नहीं रह गया है कि वह किस समूह से संबंध रखता है। जाति व्यवस्था की संरचनात्मक व्यवस्था भी कमजोर हो रही है। जातीय भेदभाव, धार्मिक निषेध, जातीय मेल-जोल की पांबदियां खत्म हो रही हैं। अब जाति का व्यवसाय के साथ कोई संबंध नहीं रह गया है।

गांवों की जजमानी व्यवस्था भी खत्म हो रही है। आजकल ग्रामीण क्षेत्रों में बहुसंख्यक समूहों का दबदबा है न कि जातीय समूहों का। चाहे वैवाहिक क्षेत्र में जाति व्यवस्था का कुछ प्रभाव देखने को मिल जाता है, परंतु फिर भी प्राचीन समय वाला प्रभाव खत्म हो गया है। औद्योगीकरण, नगरीकरण, संस्कृतिकरण, पश्चिमीकरण जैसी प्रक्रियाओं ने इसे काफ़ी सीमा तक प्रभावित किया है।

प्रश्न 20.
जनजातीय पहचान (Tribal Identity) से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
जनजातीय पहचान का अर्थ है जनजातियों की सामाजिक तथा सांस्कृतिक धरोहर को संभाल कर रखना ताकि बाहरी संस्कृतियों के संपर्क में आने से उनकी संस्कृति का अस्तित्व खत्म न हो जाए। आजकल जनजातियां अपने आपको उपेक्षित महसूस कर रही हैं जिस कारण ही जनजातीय पहचान का मुद्दा सामने आया है।

जनजातीय समाज में ईसाई मिशनरियों के प्रभाव, शिक्षा के प्रसार के कारण लोग अपना धर्म बदल रहे हैं, संस्कृति को भूल रहे हैं, लोग आधुनिक बन रहे हैं। इससे उनकी मूल संस्कृति नष्ट हो रही है। इस कारण ही उनमें जनजातीय पहचान की चेतना उत्पन्न हो रही है ताकि उनकी विशेष संस्कृति, धर्म, भाषा इत्यादि को बचा कर रखा जा सके।

प्रश्न 21.
नातेदारी की श्रेणियों के बारे में बताएं।
अथवा
नातेदारी के दो प्रकार बताइये।
उत्तर:
नातेदारी की श्रेणियों को निकटता की मात्रा के आधार पर तीन भागों में बांटा जा सकता है-
(i) प्राथमिक नातेदारी-आमने-सामने की प्रत्यक्ष नातेदारी को प्राथमिक नातेदारी कहते हैं। यह 8 प्रकार की होती हैं जैसे कि पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन, माता-पुत्र इत्यादि।

(ii) द्वितीयक नातेदारी-जो नातेदारी प्राथमिक नातेदारों के द्वारा बने उसे द्वितीयक नातेदारी कहते हैं। जैसे कि पिता का भाई चाचा, माता का भाई मामा इत्यादि। इनके साथ हमारा संबंध प्राथमिक नातेदारों द्वारा बनता है। यह 33 प्रकार के होते हैं।

(iii) तृतीयक नातेदारी-जो नातेदारी द्वितीयक नातेदारों द्वारा बनती है उसे तृतीयक नातेदारी कहते हैं। जैसे कि पिता के भाई की पत्नी चाची, माता के भाई की पत्नी मामी इत्यादि। यह 151 प्रकार के होते हैं।

प्रश्न 22.
परिहास प्रथा क्या है?
उत्तर:
परिहास या हँसी मज़ाक के संबंधों में हँसी मज़ाक, यौन संबंधी अश्लील कथन, गाली गलौच इत्यादि का समावेश होता है। इस प्रकार के संबंधों में स्वतंत्रता पाई जाती है। इस प्रकार का व्यवहार आमतौर पर विवाह संबंधियों में मिलता है जैसे कि देवर-भावी, ननद-भाभी, जीजा-साली इत्यादि कई बार तो इस प्रकार के संबंधों में यौन संबंध तक स्थापित हो जाते हैं। एक विद्वान् के अनुसार कई बार तो इस प्रकार के संबंधों में इतनी घनिष्ठता आ जाती है कि वह विवाह तक कर लेते हैं।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
जाति व्यवस्था का क्या अर्थ है? इसकी विशेषताएं बताएं।
अथवा
जाति व्यवस्था की परिभाषा दीजिए।
अथवा
जाति व्यवस्था से आप क्या समझते हैं?
अथवा
जाति की विशेषताएँ लिखें।
अथवा
जाति की परिभाषा देकर अर्थ बताएँ।
अथवा
जाति प्रथा व्यवस्था से आप क्या समझते हैं? विस्तार कीजिये।
अथवा
जाति व्यवस्था क्या है? जाति की सबसे सामान्य निर्धारित विशेषताएं कौन-सी हैं?
उत्तर:
जाति का अर्थ (Meaning of Caste System)-जाति शब्द अंग्रेजी भाषा के शब्द CASTE का हिंदी रूपांतर है, जो कि पुर्तगाली शब्द CASTA से लिया गया है। CASTA एक पुर्तगाली शब्द है, जिसका अर्थ है नस्ल। इसी प्रकार शब्द CASTE का लातीनी भाषा के शब्द CASTUS से भी गहरा संबंध है, जिसका अर्थ शुद्ध नस्ल होता है। जाति व्यवस्था जन्म पर आधारित होती थी। व्यक्ति को तमाम आयु उस जाति से संबंधित रहना पड़ता था जिस जाति में उसने जन्म लिया है। जब व्यक्ति जन्म लेता था उसी समय ही उसके जीवन जीने के ढंग निश्चित कर दिए जाते थे तथा उस पर कई प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए जाते थे। व्यक्ति पर जो भी प्रतिबंध जाति व्यवस्था द्वारा लगा दिए जाते हैं, उसके लिए उन्हें मानना आवश्यक होता था।

यह जाति व्यवस्था भारतीय सामाजिक व्यवस्था के मूल आधारों में से एक है तथा हिंदू सामाजिक जीवन के लगभग सभी पहलू इससे प्रभावित हुए हैं। इसका प्रभाव इतना शक्तिशाली रहा है कि भारत में बसने वाले प्रत्येक समूह तथा समुदाय को इसने प्रभावित किया है।

जाति शब्द संस्कृत के शब्द ‘जन’ से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘जन्म’। जाति शब्द अंग्रेजी के शब्द CASTE (कास्ट) का हिंदी रूपांतर है जो कि पुर्तगाली शब्द Casta से लिया गया है। चाहे ये और भी सामाजिक व्यवस्थाओं में भी पाया जाता है, परंतु भारत में इसका विकसित रूप ही नज़र आता है।

परिभाषाएं-जाति व्यवस्था की कई प्रमुख समाज शात्रिस्यों ने निम्नलिखित ढंग से परिभाषाएं दी हैं-
(1) रिज़ले (Risley) के अनुसार, “जाति परिवारों और परिवारों के समूह का संकल्प है’ जिसका इसके अनुरूप नाम होता है और वो काल्पनिक पूर्वज मनुष्य या दैवी के वंशज होने का दावा करते हैं जो समान पैतृक कार्य अपनाते हैं और वे विचारक जो इस विषय को ‘देव योग’ मानते हैं इसे ‘समजाति-समुदाय’ मानते हैं।”

(2) राबर्ट बीयरस्टेड (Robert Bierstdt) के अनुसार, “जब वर्ग प्रथा का ढांचा एक या अधिक विषयों पर पूरी तरह बंद होता है तो उसको ‘जाति प्रथा’ कहा जाता है।”

(3) बलंट (Blunt) के अनुसार, “जाति एक अंतर वैवाहिक समूह या अंतर वैवाहिक समूहों का इकट्ठ है जिसका एक नाम है, जिसकी सदस्यता वंशानुगत है जोकि अपने सदस्यों के ऊपर सामाजिक सहवास के संबंध में कुछ प्रतिबंध लगाती है, एक सामान्य परंपरागत पेशे को करती है या एक सामान्य उत्पत्ति का दावा करती है और आमतौर पर एक समरूप समुदाय को बनाने वाली समझी जाती है।’

(4) मैकाइवर तथा पेज (Maclver and Page) के अनुसार, “जब स्थिति पूरी तरह पूर्व निश्चित होती हो व्यक्ति बिना किसी आशा को लेकर पैदा होते हों तो वर्ग जाति का रूप धारण कर लेती है।’

(5) जे० एच० हट्टन (J.H. Hutton) के अनुसार, “जाति एक ऐसी व्यवस्था है जिसके अंतर्गत एक समाज एक आत्म केंद्रित तथा एक-दूसरे से पूर्ण रूप से अलग इकाइयों में बंटा रहता है। इन विभिन्न इकाइयों में परस्पर संबंध उच्च निम्न के आधार पर तथा संस्कारों के आधार पर निर्धारित होते हैं।”

इस तरह इन परिभाषाओं को देखकर हम कह सकते हैं कि जाति एक अन्तर्विवाहित समूह होता है। इस की सदस्यता जन्म पर आधारित होती है। पेशा परंपरागत होता है और जातियों के खाने-पीने तथा रहन-सहन की पाबंदी होती है तथा विवाह संबंधी कठोर पाबंदियां होती हैं।

जाति व्यवस्था की विशेषताएँ
1. सदस्यता जन्म के ऊपर आधारित है (Membership is based upon Birth) इस प्रथा के अनुसार कोई भी व्यक्ति अपनी जाति का निर्धारण स्वयं नहीं कर सकता, किसी की भी जाति उसके जन्म के आधार पर ही निश्चित की जाती है। जिस भी जाति में वह व्यक्ति जन्म लेता था उसी के अनुसार, उसकी जाति निश्चित हो जाती थी।

2. सामाजिक-संबंधों के ऊपर प्रतिबंध (Restrictions upon Social Relations) समाज को अलग-अलग जातियों में विभाजित किया गया था। कोई उच्च जाति से संबंध रखता था तो कोई निम्न जाति से। जाति प्रथा में इस भावना को तो पाया ही जाता था। उच्च जाति वाले हमेशा शहरों एवं गाँवों में रहते थे और निम्न जाति वालों को बाहर रहना पड़ता था। इस तरह निम्न जाति वाले अपने आपको ऊँची जाति वालों से दूर रखना या रहना ही ठीक समझते थे।

3. खाने-पीने पर प्रतिबंध (Restrictions upon Eatables}-जाति प्रणाली में यह बात स्पष्ट रूप से बतायी जाती थी कि व्यक्तियों को किन-किन वर्गों के लोगों के साथ उठना-बैठना होता था और किन-किन लोगों के साथ खाने-पीने पर प्रतिबंध था। इस प्रकार से भोजन को भी दो श्रेणियों में बांटा गया था जोकि दो तरह से तैयार होता था। नं० 1 भोजन जो कि घी द्वारा तैयार किया जाता था एवं पकाया जाता था, उसे पक्का भोजन कहा गया है और उसे ब्राह्मणों द्वारा तैयार किया जाता या उसके गुरु द्वारा तैयार किया जाता था।

इसी प्रकार कच्चा भोजन, जोकि पानी द्वारा तैयार किया जाता था। इस प्रकार यदि ब्राह्मण वर्ग द्वारा कच्चा भोजन भी तैयार किया जाता था, तो दूसरी जाति के लोग उसे ग्रहण कर लेते थे परंतु दूसरी जातियों द्वारा तैयार कच्चा भोजन ब्राह्मण कभी भी ग्रहण नहीं करते थे। ब्राह्मण लोग, क्षत्रियों एवं वैश्यों द्वारा पकाया हुआ भोजन स्वीकार कर लेते थे।

4. व्यवसाय अपनाने हेतु पाबंदियां (Restrictions upon Occupation)-जाति प्रथा में विशेष, परंपरागत धंधों को अपनाया जाता था। यदि किसी जाति का कोई विशेष व्यवसाय होता था तो उसे वही पेशा ही अपनाना पड़ता था। इस प्रकार व्यक्ति के पास कोई पसंद या पहल यानि की कोई Choice नहीं होती थी अर्थात् वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं कर सकता था।

परंतु इसमें कुछ धंधों में जैसे कि व्यापार, खेतीबाड़ी और सुरक्षा के मामलों में, नौकरी संबंधी कई विभागों में वह अपनी योग्यता के आधार पर कार्य करने के भी प्रावधान थे। कई समूहों को कोई भी पेशा अपनाने की छूट थी। परंतु कई जाति-समूहों जैसे की लोहारों, बढ़ई, बारबर, कुम्हार इत्यादि को अपने परंपरागत कार्यों को ज्यादातर अपनाना पड़ता था।

इस प्रणाली में ब्राह्मणों को विशेष कार्य अर्थात् शिक्षा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण कार्य मिला हुआ था। क्षत्रियों को सुरक्षा का जिम्मा मिला हुआ था। वैश्यों को खेतीबाड़ी, पशुपालन एवं व्यापार के लिए विकल्प खुले थे।

5. विवाह संबंधी पाबंदियां (Restrictions for Marriages)-जाति प्रथा में जातियों को इस तरह से विभाजित किया जाता था कि आगे उनकी उपजातियां भी बनाई गई थीं। इन उपजातियों में यह बंधन था कि अपने सदस्यों को दूसरी जाति में विवाह करने से रोकते थे। अपनी जाति के अंदर ही विवाह करने की प्रथा को जाति विशेष की विशेषता माना जाता था। इस प्रणाली में कुछ उपजातियों को दूसरी जातियों में भी विवाह का कुछ हालातों में किसी लड़की से विवाह कर सकते थे। परंतु यह आम नियम था कि एक व्यक्ति अपनी ही उपजाति में विवाह कर सकता था। इस प्रकार यदि वह नियमों का उल्लंघन करता था तो उसे अपनी उपजाति में से बाहर निकाल दिया जाता था।

6. समाज का अलग-अलग हिस्सों में विभाजन (Segmantal Division of Society)-जाति प्रथा के अनुसार समाज को कई भागों में बांटा गया था और हर हिस्से के सदस्यों का दर्जा, स्थान और कार्य निश्चित कर दिये गये थे। इसलिए सदस्यों में अपने समूह का एक हिस्सा होने की चेतना पैदा होती थी अर्थात् वह अपने समूह का एक अटूट अंग बन जाते थे। समाज का इस तरह हिस्सों में बंट जाने के कारण एक जाति के सदस्यों का सामाजिक अंतर, कार्य का दायरा ज्यादातर अपनी जाति तक ही सीमित हो जाता था।

जाति के नियमों की पालना न करने वालों को जाति की पंचायत दंड भी दे सकती थी। भिन्न-भिन्न जातियों के रहन-सहन के ढंग और रस्मों-रिवाजों में भी अंतर होता था। एक ही जाति के लोग प्रायः अपनी ही जाति के लोगों से अंतर कार्य करते थे। हर जाति अपने आप में एक-एक संपूर्ण सामाजिक जीवन जीने वाली सामाजिक इकाई होती थी।

7. पदक्रम (Hierarchy)-जाति प्रथा में एक निश्चित पदक्रम होता था। भारत में ज़्यादातर सभी भागों में सबसे ऊपर का दर्जा ब्राह्मणों को दिया गया था। इसी क्रम में दूसरे स्थान पर क्षत्रियों को रखा गया था। तीसरे स्थान पर वैश्यों को और इसी सामाजिक पदक्रम में सबसे बाद में यानि कि चौथे स्थान पर निम्न जातियों को रखा गया था। इस तरह से समाज में सभी व्यक्तियों की स्थिति को पदक्रम के आधार पर निश्चित किया गया था।

8. प्रत्येक जाति कई उपजातियों में बंटी होती है (Every caste is divided into many sub-castes) हमारे देश में तीन हज़ार के लगभग जातियां पाई जाती हैं तथा यह सभी जातियां आगे बहुत-सी उपजातियों में बंटी हुई थीं। व्यक्ति को अपना जीवन इन उपजातियों के नियमों के अनुसार व्यतीत करना पड़ता था तथा व्यक्ति को केवल अपनी ही उपजाति में विवाह करवाना पड़ता था।

9. अंतर्वैवाहिक (Endogamous)-जाति प्रथा में विवाह से संबंधित बहुत-सी पाबंदियां थीं। व्यक्ति के ऊपर अपनी जाति से बाहर विवाह करवाने की पाबंदी थी। यही नहीं व्यक्ति को केवल अपनी ही उपजाति में विवाह करवाना पड़ता था। जो व्यक्ति जाति प्रथा के नियमों को तोड़ता था उसे साधारणतया जाति से बाहर ही निकाल दिया मजूमदार के अनुसार संस्कृति के संघर्ष तथा नस्ली मेल-मिलाप ने भारत में उच्च तथा निम्न दर्जे के समूहों की रचना की।

नस्ली मिश्रण के कई कारण थे जैसे आर्यों में स्त्रियों की कमी, उन्नत द्राविड़ संस्कृति, उनकी मात प्रधान व्यवस्था, देवी-देवताओं की पूजा, एक जगह पर जीवन व्यतीत करने की इच्छा, अलग-अलग रीति-रिवाज इत्यादि। आर्य लोगों द्वारा द्राविड़ लोगों को जीतने के पश्चात् उनमें आपसी मेल-मिलाप तथा सांस्कृतिक संघर्ष चलता रहा। इस कारण कई सामाजिक समहों का निर्माण हआ जो अंतर्विवाहित बन गए। यहां से प्रत्येक समह या जाति का दर्जा इस समूह की रक्त शुद्धता तथा दूसरे समूहों से अलग रहने के आधार पर निर्धारित हो गया।

नस्ली सिद्धांत की आलोचना होती है क्योंकि इस सिद्धांत ने वैवाहिक संबंधों पर रोक के बारे में तो बताया है परंतु खाने-पीने के नियमों का कोई वर्णन नहीं किया है। मुसलमान तथा ईसाई सांस्कृतिक भिन्नता होने के बावजूद भी जाति का रूप धारण नहीं कर सके हैं। इस तरह जाति प्रथा की उत्पत्ति कई कारणों के कारण हुई है केवल एक कारण की वजह से नहीं।

3. भौगोलिक सिद्धांत (Geographical Theory)-जाति प्रथा की उत्पत्ति के संबंध में भौगोलिक सिद्धांत गिलबर्ट (Gilbert) ने दिया है। उसके अनुसार जातियों का निर्माण अलग-अलग समूहों के देश के अलग-अलग भागों में बसने के कारण हुआ है। यह विचार तमिल साहित्य में भी दिया गया है। इस विचार की पुष्टि कई उदाहरणों के कारण होती है।

जैसे सरस्वती नदी के किनारे रहने वाले ब्राह्मण सारस्वत ब्राह्मण कहलाए तथा कन्नौज में रहने वाले कनौजिए हो गए। इस तरह कई और जातियों के नाम भी उनके निवास स्थान के आधार पर पड़ गए। परंतु इस सिद्धांत को ज्यादातर विद्वानों ने नकार दिया है क्योंकि किसी भी एक भौगोलिक क्षेत्र में कई जातियां मिलती हैं परंतु उनमें से सभी के नाम उस क्षेत्र से संबंधित नहीं होते।

4. व्यावसायिक या पेशे से संबंधित सिद्धांत (Occupational Theory)-व्यवसाय के आधार पर जाति प्रथा की उत्पत्ति का सिद्धांत नेसफील्ड तथा डाहलमैन (Nesfield and Dahlman) ने दिया है। नेसफील्ड के अनुसार जातियों की उत्पत्ति अलग-अलग व्यवसायों के आधार पर हुई है तथा उसने नस्ली कारकों को नकार दिया है। जाति व्यवस्था के अस्तित्व में आने से बहुत पहले ही नस्ली मिश्रण बढ़ चुका था। उसके अनुसार जाति प्रथा की उत्पत्ति धर्म के कारण भी नहीं हुई है क्योंकि धर्म वह कट्टर आधार नहीं दे सकता जो जाति व्यवस्था के लिए ज़रूरी है। इस तरह नेसफील्ड के अनुसार केवल व्यवसाय ही जाति प्रथा की उत्पत्ति के लिए ज़िम्मेदार है।

डाहलमैन के अनुसार शुरू में भारतीय समाज तीन भागों में बँटा हुआ था तथा वह थे-रोहित, शासक तथा बुर्जुआ। इन तीनों वर्गों के व्यवसाय धार्मिक, राजनीतिक तथा आर्थिक क्रियाओं से संबंधित थे। इनके समूह व्यवसाय तथा रिश्तों के आधार पर छोटे-छोटे समूहों में बंट गए। यह पहले व्यावसायिक निगमों तथा धीरे-धीरे बड़े व्यावसायिक संघों का रूप धारण कर गए। आगे चल कर संघ जाति के रूप में विकसित हो गए।

की भी आलोचना हई है। जाति प्रथा का धर्म से कोई सीधा संबंध न बताना उचित नहीं है। यह सिद्धांत नस्ली सिद्धांतों से दूर है क्योंकि उच्च तथा निम्न सामाजिक समूहों में कुछ-न-कुछ नस्ली अंतर ज़रूर है। इसके साथ ही यदि जाति प्रथा की उत्पत्ति व्यावसायिक संघों के कारण ही हुई तो यह केवल भारत में ही क्यों आगे आई और देशों में क्यों नहीं। इस तरह इस सिद्धांत में इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है।

5. विकासवादी सिद्धांत (Evolutionary Theory)-इस सिद्धांत को डैनज़िल इबैटस्न (Denzil Ibbetson) ने दिया है। उसके अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति चार वर्णों के आधार पर न होकर आर्थिक आधार पर बने संघों द्वारा हुई है। उसके अनुसार पहले लोग खानाबदोशों की तरह रहते थे तथा जाति व्यवस्था अस्तित्व में नहीं आई थी। लोगों में खून का रिश्ता होता था तथा उच्च-निम्न की भावना नहीं थी।

परंतु धीरे-धीरे इकठे रहने से आर्थिक विकास शुरू हुआ तथा लोग कृषि कार्य करने लगे। समय के साथ-साथ आर्थिक जीवन के जटिल होने के कारण श्रम विभाजन की आवश्यकता महसूस हुई। राजाओं का यह कर्तव्य बन गया कि वह ऐसी आर्थिक नीति का निर्माण करें जोकि श्रम विभाजन तथा व्यावसायिक भिन्नता पर आधारित हो।

इस कारण कई नए वर्ग अस्तित्व में आए। एक जैसा कार्य करने के कारण सामुदायिक भावना का विकास हुआ। समय के साथ-साथ इन वर्गों ने अपने हितों की रक्षा के लिए संघ बना लिए। प्रत्येक संघ ने अपने भेदों को गुप्त रखने के लिए अंतर्विवाह की नीति अपनायी। इस तरह जाति वैवाहिक होने के कारण जाति प्रथा उत्पन्न हई। धीरे-धीरे इन समहों ने सामाजिक सामाजिक पदक्रम में अपना स्थान बना लिया।

इस सिद्धांत की भी आलोचना हुई है क्योंकि व्यवसाय के आधार पर संघ तो सभी समाजों में मिलते हैं पर केवल भारत में ही जाति प्रथा क्यों विकसित हुई। आर्थिक कारक को बहुत-से कारकों में से एक कारक तो माना जा सकता है पर केवल एक ही कारक नहीं।

6. धार्मिक सिद्धांत (Religious Theory)-इस सिद्धांत को होकार्ट तथा सेनार्ट ने दिया है। होकार्ट के अनुसार जाति व्यवस्था की उत्पत्ति तथा भारतीय समाज का विभाजन धार्मिक कर्मकांडों तथा सिद्धांतों के कारण हुआ है। प्राचीन भारतीय समाज में धर्म बहुत महत्त्वपूर्ण था जिस में देवताओं को बलि भी दी जाती थी। बलि की प्रथा में पूजा पाठ तथा मंत्र पढ़ना शामिल था जिसमें कई व्यक्तियों की ज़रूरत पड़ती थी। धीरे-धीरे धार्मिक कार्य करने वाले लोग संगठित हो गए तथा उन्होंने अलग-अलग जातियों का रूप धारण कर लिया। होकार्ट के अनुसार प्रत्येक जाति का व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता है तथा व्यवसाय का मूल आधार धार्मिक है न कि आर्थिक।

सेनार्ट के अनुसार भोजन संबंधी प्रतिबंध धार्मिक कारणों के कारण पैदा हुए तथा लोग जातियों तथा उपजातियों में विभाजित हो गए। परंतु कई समाजशास्त्रियों के अनुसार जाति व्यवस्था एक सामाजिक संस्था है न कि धार्मिक। इसलिए यह सिद्धांत ठीक नहीं प्रतीत होता है। जाति व्यवस्था बहुत ही जटिल है परंतु इसकी उत्पत्ति का बहुत ही सरल वर्णन किया गया है जोकि ठीक नहीं है।

7. माना सिद्धांत (Mana Theory) हट्टन का कहना है कि आर्य लोगों के भारत आने से पहले भी जाति व्यवस्था के तत्त्व भारत में मौजूद थे। जब आर्य लोग भारत में आए तो उन्होंने इन तत्त्वों को अपने हितों की रक्षा के लिए दृढ किया। उनसे पहले भारत में सामाजिक विभाजन ज्यादा स्पष्ट नहीं था परंतु आर्यों ने इसे अलग किया तथा अपने आपको इस व्यवस्था में सब से ऊपर रखा।

हट्टन का कहना था कि यह प्रारंभिक अवस्था थी। जाति व्यवस्था के प्रतिबंधों को उसने माना तथा टैबु की मदद से स्पष्ट किया है। प्राचीन समाजों में माना को अदृश्य आलौकिक शक्ति समझा जाता था जो कि प्रत्येक प्राणी में होती है तथा छूने से एक-दूसरे में भी आ सकती है।

कबीलों के लोग यह मानते हैं कि माना शक्ति के कारण ही लोगों में भिन्नता होती थी। माना के डर से ही यह लोग बाहर के व्यक्तियों से दूर रहते हैं। अपने समूहों में भी वह उन लोगों को नहीं छूते थे जिनको दुष्ट समझा जाता था। इस तरह कबीले के लोगों के बीच कुछ चीजों पर प्रतिबंध लगा दिया जाता है जिनको टैबु कहते हैं। लोगों में यह डर होता था कि टैबु को न मानने वालों के ऊपर दैवी प्रकोप हो जाएगा।

हट्टन के अनुसार माना तथा टैबु को मानने वाले हिंदू, इस्लाम, पारसी तथ बुद्ध धर्म को मानने वालों में भी मिलते हैं। आर्य लोगों के आने से पहले भी भारत में माना तथा टैबु से संबंधित भेदभाव मिलते थे। इस कारण विवाह, खाने-पीने, कार्यों इत्यादि से संबंधित प्रतिबंध अलग-अलग समूहों में मिलते थे। इस कारण जब जाति व्यवस्था शुरू हुई तो उसमें कई प्रकार की पाबंदियां लगा दी गईं।

कई विद्वानों ने इस बात की आलोचना की है तथा कहा है कि चाहे माना, टैबु संसार के अन्य कबीलों में भी मिलते हैं परंतु हमें जाति व्यवस्था कहीं भी नहीं मिलती है। इसके साथ कबीलों की संस्कृति संपूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हट्टन ने कोई ऐसे तथ्य भी पेश नहीं किए जिस के आधार पर माना जा सके कि आर्य लोगों से पहले भी भारत में मूल निवासी माना तथा टैबु के आधार पर बँटे हुए थे।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 3.
जाति प्रथा के लाभों तथा हानियों का वर्णन करो।
अथवा
जाति व्यवस्था के कार्य अथवा लाभ स्पष्ट करें।
उत्तर:
जाति व्यक्ति, समुदाय तथा समाज के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य करती है इसलिए यह संस्था सैंकड़ों वर्षों से भारतीय समाज का आधार रही है। जाति प्रथा के बहुत से लाभ तथा हानियां हैं जिन का वर्णन निम्नलिखित है

जाति प्रथा के लाभ (Advantages of Caste System)-
(i) सामाजिक स्थिति निर्धारित करना (Determining Social Status)-जाति अपने सदस्यों को जन्म से ही निश्चित स्थिति प्रदान करती थी। व्यक्ति शिक्षा. गरीबी-अमीरी, आय तथा लिंग या व्यक्तिगत योग्यता से अपनी जाति परिवर्तित नहीं कर सकता था। जाति के आधार पर ब्राह्मणों की स्थिति सबसे ऊपर तथा शेष की इनसे निम्न होती थी।

(ii) सरल श्रम विभाजन (Simple Division of Labour)-जाति प्रथा में श्रम विभाजन हुआ करता था। हर किसी को एक काम उसके परिवार तथा जाति के अनुसार मिल जाता था। विभिन्न जातियों द्वारा निश्चित कार्य करना समाज में श्रम विभाजन का अच्छा उदाहरण है। हर किसी को निश्चित कार्य देने के कारण समाज में श्रम विभाजन हो जाता था।

(iii) जीवन साथी चुनने में सहायक (Helpful in choosing Life Male)-जाति अंतर्विवाही होती है। इसलिए व्यक्ति के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी जाति में ही विवाह करे। इससे जीवन साथी चुनने में सरलता हो जाती है।

(iv) व्यवसाय निर्धारित करना (To determine Occupation)-जातियों का अपना-अपना व्यवसाय होता है। इसके सदस्य अपनी जाति के अनुरूप व्यवसाय करते हैं। व्यवसाय पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है।

(v) रक्त की शुद्धता (Purity of Blood)-जाति अंतर्विवाह तथा बहिर्विवाह में नियमों पर आधारित है। अपनी जाति के अंदर विवाह करवाना तथा बहिर्विवाह का मतलब अपने सपिंड, सप्रवर तथा सगोत्र से बाहर विवाह करवाना होता है। इससे रक्त की शुद्धता बनी रहती है।

(vi) व्यवहारों पर नियंत्रण (Control on Behaviour)-प्रत्येक जाति के अपने मूल्य, प्रतिमान तथा नियम होते हैं। जाति नियम यह तय करते हैं कि किस जाति के साथ किस प्रकार के संबंध रखे जाएं। छूतछात, धर्म, खानपान, व्यवसाय इत्यादि संबंधी नियमों के द्वारा जाति अपने सदस्यों के व्यवहारों को नियंत्रित तथा निर्देशित करती है।

(vii) सामाजिक सुरक्षा (Social Security)-जाति अपने सदस्यों की स्थिति का निर्धारण करती है। जाति के सदस्य ज़रूरत पड़ने पर गरीबों, अनाथों, बच्चों तथा विधवाओं की सहायता करके उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं।

(viii) मानसिक सुरक्षा (Psychological Security)-जाति व्यवस्था में व्यक्ति की सामाजिक स्थिति जन्म से ही निर्धारित हो जाती है। कई प्रकार के नियम जाति तय करती है। जातीय लोक रीतियां तथा प्रथाएं भी स्पष्ट होती हैं जिनके कारण व्यक्ति को मानसिक शांति व सुरक्षा का अहसास होता है।

(ix) सामाजिक स्थिरता (Social Stability)-भारत पर बहुतों ने आक्रमण किए। सैंकड़ों वर्ष विदेशियों ने यहां पर राज किया। इस विदेशी शासन के दौरान भी जाति प्रथा ने अपनी संस्कृति को बचा कर रखा तथा सामाजिक स्थिरता प्रदान की।

जाति प्रथा की हानियां (Disadvantages of Caste System):
(i) निम्न जातियों का शोषण (Exploitation of Low Castes)-जाति प्रथा में निम्न जातियों का शोषण होता था। उनसे कठोर परिश्रम करवाया जाता था जिसके बदले में पूरी मजदूरी भी नहीं दी जाती थी। उनसे निम्न स्तर के घृणित कार्य करवाये जाते थे। उन पर कई प्रकार के प्रतिबंध हुआ करते थे। इस तरह उनका शोषण हुआ करता था।

(ii) अस्पृश्यता (Untouchability)- जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज में अस्पृश्यता या छूतछात को जन्म दिया। कई क्षेत्रों में तो जाति का उग्र रूप भी देखने को मिलता था कि कुछेक निम्न जाति के लोगों की परछाईं मात्र से अन्य जाति के लोग अपने आप को दूषित समझते थे।

(iii) धर्म परिवर्तन (Religion Conversion)-निम्न जातियों को उनकी निम्न स्थिति का अहसास करवा कर मिशनरी धर्म प्रचारक उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए उत्साहित करते हैं। समाज में उचित स्थान न मिलने के कारण निम्न जाति के सदस्य धर्म परिवर्तन कर लेते थे ताकि जाति व्यवस्था से छुटकारा मिल सके।

(iv) व्यक्तित्व विकास में बाधक (Hindrance in Personality Development)-जाति व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास में बाधक होती है। व्यक्ति योग्यता होते हुए भी अपना विकास नहीं कर सकते थे। व्यक्ति उच्चता तथा निम्नता की भावना से ग्रसत रहते हैं जिस के कारण व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता है।

(v) राष्ट्रीय एकता में बाधक (Hindrance in National Unity)-जाति के आधार पर समाज तथा समुदाय छोटे-छोटे भागों में विभाजित हो जाता है। व्यक्ति की निष्ठा जाति के प्रति अधिक तथा राष्ट्र के प्रति कम हो जाती है। अपनी जाति के सदस्यों में हम की भावना रहती है जबकि अन्य जातियों के प्रति घृणा की भावना विकसित हो जाती है जिससे सांप्रदायिक दंगे हो जाते हैं। इस तरह यह राष्ट्रीय एकता में बाधक है।

(vi) स्त्रियों की निम्न स्थिति (Low Status of Women)-जाति प्रथा द्वारा बाल विवाह का प्रचलन, विधवा विवाह की मनाही तथा स्त्रियों को शिक्षा के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है। जाति व्यवस्था में स्त्री की कोई जाति नहीं होती। वह जिस जाति के पुरुष से विवाह करती है उसी की जाति उसकी जाति बन जाती है। इन सबसे स्त्रियों की सामाजिक स्थिति निम्न हो जाती है।

प्रश्न 4.
जाति प्रथा में आ रहे परिवर्तनों का वर्णन करें।
अथवा
जाति व्यवस्था में आये आधुनिक परिवर्तन स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भारतीय जाति व्यवस्था में लगातार संरचनात्मक एवं प्रकार्यात्मक परिवर्तन होते रहे हैं। इन परिवर्तनों की गति स्थान तथा हालातों के अनुसार भिन्न-भिन्न रही है। आजादी के बाद जाति प्रथा में काफी तेज़ी से परिवर्तन आए हैं जिनका वर्णन निम्नलिखित है:
(i) उच्च जातियों की स्थिति में गिरावट (Decline in status of Brahmins)-जाति व्यवस्था की शुरुआत से ही उच्च जातियों का प्रत्येक क्षेत्र में विशेष महत्त्व रहा है। परी जाति व्यवस्था उनके इर्द-गिर्द घमती थी। जाति के संस्तंरण में उनका सर्वोच्च स्थान रहा है। परंतु शिक्षा के प्रसार, विज्ञान के विकास, नए पदों का सृजन, पश्चिमीकरण, संस्कतिकरण, आधनिकीकरण, नगरीकरण इत्यादि के कारण उनकी स्थिति में गिरावट आई है। आजकल गैर-ब्राहमणों की स्थिति उनकी शिक्षा, पैसे या सत्ता के कारण उच्च है। इस तरह उच्च जातियों की स्थिति में काफ़ी गिरावट आई है।

(ii) अंतर्जातीय संबंधों में परिवर्तन (Change in Inter Caste Relations)-प्राचीन काल से ही भारतीय समाज में जजमानी व्यवस्था प्रचलित रही है जिसके चलते विभिन्न जातियों में अंतर्निर्भरता बनी रहती थी। परंतु अंतर्जातीय संबंधों में अब काफी परिवर्तन हुए हैं। पैसे के प्रचलन, उद्योगों के विकास तथा शिक्षा के प्रचार तथा प्रसार के कारण विभिन्न जातियों ने अपने परंपरागत व्यवसाय छोड़ने शुरू कर दिए हैं। सेवाओं के आदान-प्रदान में भी काफ़ी परिवर्तन हुए हैं। लोग पैसे देकर चमड़े, बांस, मिट्टी इत्यादि की चीजें खरीदने लग गए हैं। अच्छी चीजें उपलब्ध होने के कारण लोग बाज़ार जाने लग गए हैं। पढ़े-लिखे युवाओं द्वारा भी परंपरागत काम छोड़ने के कारण अंतर्जातीय संबंधों का स्वरूप बदला है।

(iii) अस्पृश्यता में कमी (Decline in Untouchability)-जाति प्रथा में अस्पृश्यता का बोलबाला था। पर आज़ादी के बाद इसमें कमी आयी है। औद्योगीकरण के कारण सभी जातियों के लोग मिल कर काम करते हैं। 1955 में अस्पृश्यता कानून भी पास हो गया जिसके अनुसार अस्पृश्यता को मानना गैर कानूनी है। होटलों, क्लबों में सभी को प्रवेश मिलने से अस्पृश्यता में काफी कमी आयी है। कानून की वजह से भी इसमें काफ़ी कमी आई है।

(iv) वैवाहिक परिवर्तन (Matrimonial Changes)-हिंदू विवाह कानून 1955 द्वारा अंतर्जातीय विवाह की अनुमति प्रदान की गई है। अंतर्विवाह जाति प्रथा का सार रहा है। समाचार पत्रों में प्रकाशित वैवाहिक विज्ञापनों में Caste No bar का लिखा होना इस बात का प्रमाण है कि अब लोगों में जाति में विवाह करवाना ज़रूरी नहीं रह गया है। अब प्रेम विवाह बढ़ रहे हैं जिससे पता चलता है कि वैवाहिक प्रतिबंध ढीले हो रहे हैं।

(v) जन्म के महत्त्व में कमी (Importance of Birth is Declining)-भारतीय समाज में पारंपरिक दृष्टि से व्यक्ति जिस जाति में जन्म लेता है उसकी सामाजिक स्थिति उसी जाति के अनुसार ही हो जाती है। लेकिन आजकल व्यक्ति के जन्म के आधार पर स्थिति का महत्त्व कम होता जा रहा है। उसकी व्यक्तिगत योग्यता तथा कुशलता का महत्त्व बढ़ रहा है। आजकल व्यक्ति की सामाजिक स्थिति समाज में जन्म से नहीं बल्कि गुणों तथा कर्मों तथा उपलब्धियों के कारण है। व्यक्ति को जाति की सदस्यता जन्म से प्राप्त होती है। जन्म के महत्त्व में कमी आने से जातीय आधार पर सामाजिक स्थिति के निर्धारण में परिवर्तन हुआ है।

(vi) व्यावसायिक गतिशीलता में वृद्धि (Increase in Occupational Mobility)-भारतीय समाज में जातिगत व्यवसायों में काफ़ी गतिशीलता आई है। बहुत सारे नए व्यवसायों का विकास हुआ है। लाखों नए पदों का विकास हुआ है। विभिन्न पदों के लिए शैक्षिक योग्यता ज़रूरी है इसलिए सभी ने शिक्षा लेनी शुरू की। शिक्षा तथा प्रशिक्षण प्राप्त करके कोई भी किसी भी पद का पात्र बन सकता है। निम्न जाति का सदस्य संस्कृत तथा वेदों का विशेष ज्ञान प्राप्त करके यज्ञ भी करवा सकता है। आजकल कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यवसाय को अपना सकता है। इससे व्यावसायिक गतिशीलता का पता चलता है।

(vii) भोजन प्रतिबंधों में कमी (Decline in Food Restrictions)-जातीय आधार पर भोजन संबंधी नियम काफी शिथिल हुए हैं। पढ़ी-लिखी नई पीढ़ियों में कच्चे तथा पक्के भोजन की अवधारणा खत्म होती जा रही है। होटलों, ढाबों, लंगरों, मंदिरों में किस जाति का व्यक्ति भोजन बांट रहा है इसके बारे में कोई पता नहीं चलता है। होटल, क्लब में जाकर व्यक्ति यह नहीं पूछता है कि किस ने खाना बनाया या परोसा है। इस तरह भोजन प्रतिबंधों में काफी हद तक कमी आई है।

प्रश्न 5.
कबीला अथवा जनजाति क्या होती है? इसकी विशेषताओं का वर्णन करो।
अथवा
जनजातीय समुदाय क्या है?
उत्तर:
हमारे देश में एक सभ्यता ऐसी होती है जो हमारी सभ्यता से दूर पहाड़ों, जंगलों, घाटियों इत्यादि में आदिम तथा प्राचीन अवस्था में रहती है। इस सभ्यता को कबीला, आदिवासी, जनजाति इत्यादि जैसे नामों से पुकारा जाता है। भारतीय संविधान में इन्हें पट्टीदर जनजाति भी कहा गया है। कबाइली समाज वर्गहीन समाज होता है। इसमें किसी प्रकार का स्तरीकरण नहीं पाया जाता है। प्राचीन समाजों में कबीले को बहुत ही महत्त्वपूर्ण सामाजिक समूह माना जाता था।

कबाइली समाज की अधिकतर जनसंख्या पहाड़ों अथवा जंगली इलाकों में पाई जाती है। यह लोग संपूर्ण भारत में पाए जाते हैं। – यह समाज आमतौर पर स्वः निर्भर होते हैं जिनका अपने ऊपर नियंत्रण होता है तथा यह किसी के भी नियंत्रण से दूर होते हैं। कबाइली समाज शहरी समाजों तथा ग्रामीण समाजों की संरचना तथा संस्कृति से बिल्कुल ही अलग होते हैं। इनको हम तीन श्रेणियों में बांट देते हैं-शिकार करने वाले तथा मछली पकड़ने वाले और कंदमूल इकट्ठा करने वाले, स्थानांतरित तथा झूम कृषि करने वाले तथा स्थानीय रूप से कृषि करने वाले। यह लोग हमारी संस्कृति, सभ्यता तथा समाज से बिल्कुल ही अलग होते हैं।

जनजाति की परिभाषाएँ
(Definitions of Tribe)
(1) इंपीरियल गजेटियर आफ इंडिया (Imperial Gazetear of India) के अनुसार, “कबीला परिवारों का एक ऐसा समूह होता है जिसका एक नाम होता है, इसके सदस्य एक ही भाषा बोलते हैं तथा एक ही भू-भाग में रहते हैं तथा अधिकार रखते हैं अथवा अधिकार रखने का दावा करते हैं तथा जो अंतर्वैवाहिक हों चाहे अब न हों।”

(2) गिलिन तथा गिलिन (Gillin and Gillin) के अनुसार, “कबीला स्थानीय कुलों तथा वंशों की एक व्यवस्था है जो एक समान भू-भाग में रहते हैं, समान भाषा बोलते हैं तथा एक जैसी ही संस्कृति का अनुसरण करते हैं।’

इस तरह इन अलग-अलग परिभाषाओं के आधार पर हम कह सकते हैं कि कबीले छोटे समाजों के रूप में एक सीमित क्षेत्र में पाए जाते हैं। कबीले अपनी सामाजिक संरचना, भाषा, संस्कृति जैसे कई पक्षों के आधार पर एक दूसरे से अलग-अलग तथा स्वतंत्र होते हैं। हरेक जनजाति की अलग ही भाषा, संस्कृति, परंपराएं, खाने-पीने इत्यादि के ढंग होते हैं।

इनमें एकता की भावना होती है क्योंकि यह एक निश्चित भू-भाग में मिलजुल कर रहते हैं। यह बहुत से परिवारों का एकत्र समूह होता है जिस में काफ़ी पहले अंतर्विवाह भी होता था। आजकल इन कबाइली लोगों को भारत सरकार तथा संविधान ने सुरक्षा तथा विकास के लिए बहुत सी सुविधाएं जैसे कि आरक्षण इत्यादि दिए हैं तथा धीरे-धीरे यह लोग मुख्य धारा में आ रहे हैं।

जनजाति की विशेषताएँ
(Characteristics of a Tribe)
1. परिवारों का समूह (Collection of Families)-जनजाति बहुत-से परिवारों का समूह होता है जिन में साझा उत्पादन होता है। वह जितना भी उत्पादन करते हैं उससे अपनी ज़रूरतें पूर्ण कर लेते हैं। वह कुछ भी इकट्ठा नहीं करते हैं जिस कारण उनमें संपत्ति की भावना नहीं होती है। इस कारण ही इन परिवारों में एकता बनी रहती है।

2. साझा भौगोलिक क्षेत्र (Common Territory) कबीलों में लोग एक साझे भौगोलिक क्षेत्र में रहते हैं। एक ही भौगोलिक क्षेत्र में रहने के कारण यह बाकी समाज से अलग होते हैं तथा रहते हैं। यह और समाज की पहुँच से बाहर होते हैं क्योंकि इन की अपनी ही अलग संस्कृति होती है तथा यह किसी बाहर वाले का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते इसलिए यह बाकी समाज से कोई रिश्ता नहीं रखते। इनका अपना अलग ही एक संसार होता है। इनमें सामुदायिक भावना पायी जाती है क्योंकि यह साझे भू-भाग में रहते हैं।

3. साझी भाषा तथा साझा नाम (Common Language and Common Name)-प्रत्येक कबीले की एक अलग ही भाषा होती है जिस कारण यह एक-दूसरे से अलग होते हैं। हमारे देश में कबीलों की संख्या के अनुसार ही उनकी भाषाएं पायी जाती हैं। हरेक जनजाति का अपना एक अलग नाम होता है तथा उस नाम से ही यह कबीला जाना जाता है।

4. खंडात्मक समाज (Segmentary Society)-प्रत्येक जनजातीय समाज दूसरे जनजातीय समाज से कई आधारों जैसे कि खाने-पीने के ढंगों, भाषा, भौगोलिक क्षेत्र इत्यादि के आधार पर अलग होता है। यह कई आधारों पर अलग होने के कारण एक-दूसरे से अलग होते हैं तथा एक-दूसरे का हस्तक्षेप पसंद नहीं करते। इनमें किसी भी आधार पर भेदभाव नहीं पाया जाता। इस कारण इनको खंडात्मक समूह भी कहते हैं।

5. साझी संस्कृति (Common Culture)-प्रत्येक जनजाति के रहन-सहन के ढंग, धर्म, भाषा, टैबु इत्यादि एक-दूसरे से अलग होते हैं। परंतु यह सभी एक ही कबीले में समान होते हैं। इस तरह सभी कुछ अलग होने के कारण एक ही कबीले के अंदर सभी कबीले के अंदर सभी व्यक्तियों की संस्कृति भी समान ही होती है।

6. आर्थिक संरचना (Economic Structure)-प्रत्येक जनजाति के पास अपनी ही भूमि होती है जिस पर वह अधिकतर स्थानांतरित कृषि ही करते हैं। वह केवल अपनी ज़रूरतों को पूर्ण करना चाहते हैं जिस कारण उनका उत्पादन भी सीमित होता है। वह चीज़ों को एकत्र नहीं करते जिस कारण उनमें संपत्ति को एकत्र करने की भावना कारण ही जनजातीय समाज में वर्ग नहीं होते। प्रत्येक चीज़ पर सभी का समान अधिकार होता है तथा इन समाजों में कोई भी उच्च अथवा निम्न नहीं होता है।

7. आपसी सहयोग (Mutual Cooperation)-कबीले का प्रत्येक सदस्य कबीले के और सदस्यों को अप सहयोग देता है ताकि कबीले की सभी आवश्यकताओं को पूर्ण किया जा सके। कबीले में प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षा भी प्राप्त होती है। अगर कबीले के किसी सदस्य के साथ किसी अन्य कबीले के सदस्य लड़ाई करते हैं तो पहले कबीले के अन्य सदस्य अपने साथी से मिलकर दूसरे कबीले से संघर्ष करने के लिए तैयार रहते हैं। प्रत्येक जनजाति के मुखिया का यह फर्ज होता है कि वह अपने कबीले का मान सम्मान रखे। कबीले के मुखिया के निर्णय को संपूर्ण कबीले द्वारा मानना ही पड़ता है तथा वह मुखिया के निर्णय की इज्जत भी इसी कारण ही करते हैं। कबीले के सभी सदस्य कबीले के प्रति वफ़ादार रहते हैं।

8. राजनीतिक संगठन (Political Organization)-कबीलों में गांव एक महत्त्वपूर्ण इकाई होता है तथा 10-12 गांव मिलकर एक राजनीतिक संगठन का निर्माण करते हैं। यह बहुत सारे संगठन अपनी एक कौंसिल बना लेते हैं तथा प्रत्येक कौंसिल का एक मुखिया होता है। प्रत्येक कबाइली समाज इस कौंसिल के अंदर ही कार्य करता है। कौंसिल का वातावरण लोकतांत्रिक होता है। कबीले का प्रत्येक सदस्य कबीले के प्रति वफ़ादार होता है।

9. कार्यों की भिन्नता (Division of Labour)-कबाइली समाज में बहुत ही सीमित श्रम-विभाजन तथा विशेषीकरण पाया जाता है। लोगों में भिन्नता के कई आधार होते हैं जैसे कि उम्र, लिंग, रिश्तेदारी इत्यादि। इनके अतिरिक्त कुछ कार्य अथवा भूमिकाएं विशेष भी होती हैं जैसे कि एक मुखिया तथा एक पुजारी होता है। साथ में एक वैद्य भी होता है जो बीमारी के समय दवा देने का कार्य भी करता है।

10. स्तरीकरण (Stratification)-कबाइली समाजों में वैसे तो स्तरीकरण होता ही नहीं है, अगर होता भी है तो वह भी सीमित ही होता है क्योंकि इन समाजों में न तो कोई वर्ग होता है तथा न ही कोई जाति व्यवस्था होती है। केवल लिंग अथवा रिश्तेदारी के आधार पर ही थोड़ा-बहुत स्तरीकरण पाया जाता है।

प्रश्न 6.
भारत में मिलने वाले अलग-अलग कबीलों के राजनीतिक संगठनों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत में मिलने वाले कबीलों को हम तीन भागों में बांट सकते हैं-

  • उत्तर पूर्वी कबीले (North Eastern Tribes)
  • मध्य भारतीय कबीले (Central Indian Tribes)
  • दक्षिण भारतीय कबीले (South Indian Tribes)

अब हम इनका वर्णन विस्तार से करेंगे।
1. उत्तर पूर्वी कबीलों के राजनीतिक संगठन (Political Organization of North Eastern Tribes)-उत्तर पूर्वी क्षेत्र में हम त्रिपुरा, मिज़ोरम, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, असम, अरुणाचल प्रदेश इत्यादि जैसे प्रदेश ले सकते हैं। इन प्रदेशों के प्रमुख कबीले नागा, मिज़ो, अपातनी (Apatani), लुशाई, जंतिया, गारो, खासी इत्यादि आते हैं।

असम में मिलने वाले कबीलों में लोकतांत्रिक राजनीतिक संगठन पाए जाते हैं। इनमें अधिकतर कबीलों में भूमि के सामूहिक स्वामित्व को मान्यता प्राप्त है तथा साथ ही साथ भूमि पर व्यक्तिगत अधिकारों को भी मान्यता प्राप्त है। एक गांव के लोग कहीं पर भी कृषि करने को स्वतंत्र हैं। चाहे गांव के अलग-अलग परिवारों की आर्थिक स्थिति अलग होती है। परंतु इस अंतर से इनके समाज में कठोर सामाजिक स्तरीकरण उत्पन्न नहीं हुआ है। इनमें से अधिकतर कबीले बहिर्वैवाहिक गोत्रों में बंटे होते हैं, बाकी बचे कबीले गांव के समुदायों में गोत्र व्यवस्था के बिना रहते हैं। यह अलग अलग गोत्र अपने मुखिया के अंतर्गत कार्य करते हैं।

खासी कबीले में मुखिया की मृत्यु के बाद उसकी पदवी बड़ी बहन के बड़े पुत्र को प्राप्त होती है। अगर कोई आदमी मौजूद नहीं है तो बड़ी बहन की बड़ी बेटी को मुखिया बनाया जाता है। प्राचीन समय में खासी कबीला 25 खासी प्रदेशों में बँटा हुआ था जो कि एक-दूसरे से स्वतंत्र थे।

इन कबीलों में प्रशासन लोकतांत्रिक होता था जिसका कि एक मुखिया भी होता था। खासी कबीले में मुखिया न तो लोगों पर कोई कर लगा सकता था, न ही वह स्वतंत्र तौर पर कोई नीति बना सकता था तथा न ही उसको भूमि या जंगल से संबंधित कोई अधिकार था। जनता की राय के अनुसार निर्णय लिए जाते थे। निर्णय लेने के लिए कबीले के सभी बालिगों की सभा बुलाई जाती थी तथा लोगों को इसमें भाग लेना ही पड़ता था। लुशाई कबीले में चाहे मुखिया के पास अधिक अधिकार थे परंतु, यहां भी उसके लिए गांव के बुजुर्गों या सभा के निर्णय के विरुद्ध जाना मुमकिन नहीं था। चाहे मुखिया या और पद पैतृक थे परंतु प्रशासन लोकतांत्रिक होता था।

गारो कबीले में राजनीतिक प्रशासन लोकतान्त्रिक रूप से ही चलता था। गारो कबीले में कोई मुखिया (Chiefs) नहीं होते केवल एक Headman होता है जो कि कबीले का नाममात्र का मुखिया होता है। गांव या कबीले में सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय गांव की कौंसिल अथवा सभा द्वारा लिए जाते हैं जिसमें परिवारों के बुजुर्ग सदस्य होते हैं। नागा कबीले के राजनीतिक संगठन में बहुत अधिक विविधता (Diversity) देखने को मिल जाती है। कुछ नागा कबीले मुखिया की निरंकुश (Autocratic) मर्जी पर चलते हैं जबकि कुछ नागा कबीलों में लोकतांत्रिक गांव की सभा होती है जिस में Headman को बहुत ही कम अधिकार होते हैं।

अधिकतर नागा कबीलों को अत्याचारी, हिंसक, रक्त के प्यासे समझा जाता है परंतु इस तरह के विचार बनाना ठीक नहीं है। चाहे अधिकतर नागा कबीलों को लड़ाई के मैदान में देखा जा सकता है परंतु इस को सामाजिक ऐतिहासिक दृष्टि से देखना चाहिए। बहुत-से लोग यह देखकर हैरान होते हैं कि इस तरह की अव्यवस्था में स्थिर प्रशासन कैसे स्थापित हो सकता है जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने आप में एक कानून है। परंतु इन हालातों में भी लचकीले प्रकार का राजनीतिक संगठन देखने को मिल जाता है। कोनयाक (Konyak) कबीले में तो मुखिया को बहुत अधिक अधिकार प्राप्त होते हैं। नागा कबीले में तो प्राकृतिक आपदाओं तथा प्राकृतिक शक्तियों के विरुद्ध सुरक्षा के लिए राजनीतिक संगठन तो हमेशा प्रयास करते रहते हैं।

2. मध्य भारत के कबीले (Central Indian Tribes)-भारत में सबसे अधिक कबीले मध्य प्रदेश, बिहार तथा उड़ीसा के इस क्षेत्र में ही पाए जाते हैं। इन कबीलों में गोत्रों की एकता के आधार पर राजनीतिक संगठन के कुछ तत्त्व एक जैसे हैं। गांव के मुखिया की सहायता के लिए बुजुर्गों की एक सभा होती है जो गांव के प्रशासन की देख-रेख करती है। इस सभा में निर्णय या तो आम राय से लिए जाते हैं अथवा बहुमत से लिए जाते हैं तथा मुखिया के लिए सभा के निर्णय के विरुद्ध जाना मुश्किल नहीं होता है।

इस क्षेत्र के बहुसंख्यक कबीले भील, गौंड तथा ऊराओं लोग हैं। ऊराओं लोगों ने ‘Parha’ संगठन का निर्माण किया है जो कि बहुत-से पड़ोसी गांवों का संगठन होता है जिस में एक केंद्रीय संगठन ‘परहा पंच’ होता है। प्रत्येक ऊराओं परहा में कई गांव होते हैं। इनमें से एक गांव को रहा (राजा) गांव कहते हैं, दूसरे गांव को दीवान कहते हैं, तीसरे को पनरी (राजा का क्लर्क) कहते हैं, चौथे को कोतवाल गांव कहते हैं और सभी गांवों में से किसी को भी अधिक सत्ता प्राप्त नहीं है तथा उन्हें प्रजा कहा जाता है। राजा गांव को परहा का मुखिया गांव कहा जाता है। परहा के प्रत्येक गांव का अपना एक झंडा होता है तथा बैज (Badge) होता है जो किसी और गांव का नहीं होता है। परहा कौंसिल का मुख्य कार्य अलग अलग गांवों के बीच झगड़े निपटाना है।

संथाल लोगों में सब से निम्न राजनीतिक सत्ता गांव के मुखिया के पास होती है जिसे मंझी (Manjhi) कहा जाता है। मंझी तथा गांव के अन्य बुजुर्ग एक-दूसरे से मिलते हैं तथा गांव के मसलों के बारे में चर्चा करते हैं। मुखिया को विवाह के समय कुछ उपहार भी मिलते हैं तथा उसके पास बिना किराए की ज़मीन भी होती है। मंझी के पास सिविल तथा नैतिक सत्ता भी होती है। अपने दैनिक कार्यों के लिए उप-मुखिया उसकी मदद करता है।

मुंडा लोगों में गांव के मुखिया को मुंडा ही कहा जाता है परंतु धार्मिक मुखिया को ‘पहां’ (Pahan) कहा जाता है। 12 गांवों को मिला कर एक पट्टी अथवा परहा का निर्माण होता है जिसके मुखिया को ‘मनकी’ (Manki) कहा जाता है। गांवों के मुखिया एक समूह का निर्माण करते हैं जिनमें मनकी सबसे प्रभावशाली होता है। गौंड लोगों में मूल राजनीतिक इकाई गांव होता है। गांव के मुखिया को पटेल अथवा मंडल कहा जाता है। गांव के कुछ बुजुर्ग उसकी गांव के कार्य करने लोग बिहार के बस्तर जिले में पाए जाते हैं। चाहे बस्तर के हिंदू राजा की इन लोगों पर कोई प्रभुता नहीं होती है परंतु फिर भी उस को सभी गौंड समूहों का आध्यात्मिक मुखिया माना जाता है।

3. दक्षिण भारतीय कबीले (South Indian Tribes) यह कबाइली क्षेत्र एक तथ्य से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है तथा वह तथ्य यह है कि इस क्षेत्र में तकनीकी तथा आर्थिक रूप से संसार के सबसे पिछड़े हुए कबीले रहते हैं। इस क्षेत्र के अधिकतर कबीले छोटे-छोटे समूह बना कर रहते हैं तथा वह या तो जंगलों में फैले (dispersed) हुए होते हैं या फिर गांवों के किसानों के पास कार्य करते हैं। आम तौर पर यह लोग अपने अनुसार ही जीवन जीते हैं तथा यह किसी बाहरी शक्ति के साथ संपर्क तथा हस्तक्षेप से दूर रहना ही पसंद करते हैं।

अंडेमान तथा निकोबार द्वीप समूहों के कबीले अभी भी आर्थिक विकास की शिकारी तथा भोजन इकट्ठा करने वाली अवस्था में जी रहे हैं। इनमें से बहुत से घुमन्तू समूह होते हैं परंतु फिर भी यह एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में ही घूमते रहते हैं। प्रत्येक स्थानीय समूह में 5-10 परिवार होते हैं तथा हरेक समूह का अपना ही मुखिया होता है। यह स्थानीय समूह अलग ही रहते तथा कार्य करते हैं। चाहे विशेष शिकार करने के समय अथवा कुछ उत्सवों के समय यह अस्थायी तौर पर एक-दूसरे से मिल जाते हैं। इन स्थानीय समूहों के मुखिया ही इनके अंदरूनी मामलों की देख-रेख करते हैं।

कई और घुमंतु कबीलों में समूह के मुखिया नाम की कोई पदवी नहीं है। परिवारों के मुखिया इकट्ठे बैठते हैं तथा जब भी कोई समस्या सामने आती है तथा निर्णय लेने होते हैं तो वह सभी इकट्ठे होकर मसले का निपटारा करते हैं। अलार (Allar) तथा अरंडर (Arandar) लोगों में कोई मुखिया नहीं होता है। समूह के बुजुर्गों में एक जगह एकत्र होने के समय पर समुदाय के मसलों पर चर्चा होती है तथा इनका निर्णय सभी को मानना ही पड़ता है। जो लोग निर्णय को नहीं मानते हैं वह समूह को छोड़ कर चले जाते हैं तथा दूसरे समूह का हिस्सा बन जाते हैं। कदार (Kadar) लोगों में मुखिया की संस्था अब खत्म हो गई है।

केरल के अदियार (Adiyar) कबीले में मुखिया का पद पैतृक होता है। यदि पद के लिए पुत्र ठीक नहीं है तो भतीजे को पद प्राप्त हो जाता है। मुखिया एक विशेष पद है परंतु वह एक निरंकुश
(Autocratic) शासक नहीं होता है। वह केवल बुजुर्गों की मीटिंग की प्रधानता करता है जिसमें समुदाय के मामलों की चर्चा होती है।

प्रश्न 7.
जनजातीय विवाह क्या होता है? जनजातियों में जीवन साथी चुनने के कौन-कौन से तरीके हैं?
उत्तर:
भारत में जनजातीय विवाह (Tribal Marriage in India)-भारत में सैंकड़ों जनजातीय समूह निवास करते हैं। प्रत्येक जनजाति में अपनी अलग संस्कृति, रीति-रिवाज, विश्वास एवं धर्म होता है। अलग संस्कृति होने के कारण इनकी अलग पहचान भी होती है। भारत में कुछ जनजातियां त्योहारों या उत्सवों के अवसर पर विवाह पूर्व या विवाहेत्तर यौन संबंध स्थापित करने की अनुमति प्रदान करती हैं। परंतु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि इन समाजों में विवाह संबंधी कोई नियम ही नहीं है।

विवाह संबंधी अनेक नियम भी जनजाति की अपनी अलग पहचान बनाते हैं। जनजातियों में आमतौर पर एक विवाह की प्रथा पाई जाती है। विभिन्न जनजातियों थेडा, अंडमानी, चेंचू, कादर इत्यादि सबसे कम विकसित जनजातियां हैं। जीवन साथी के चुनाव में भी जनजातीय समाजों में अनेक नियम व निषेधों की पालना की जाती है।

जनजाति में विवाह के प्रकार (Types of Marriage in Tribes) भारतवर्ष में भारतीय जनजातियों में पाए जाने वाले विवाह के प्रमुख स्वरूपों का वर्णन निम्नलिखित है:
1. एक विवाही प्रथा (Monogamy)-भारत की अधिकतर जनजातियों में एक विवाह की प्रथा का प्रचलन है। एक विवाह प्रथा के अंतर्गत एक व्यक्ति, एक समय में केवल एक ही विवाह कर सकता है। भारतीय मुख्यः जनजातियों, जैसे संथाल, मुंडा, ओकाओ, हो, गोंड, भील, कोर्वा, जुआंगा, लीठा, बिरहोल, भोत, मिना, कादर, मीजो इत्यादि में एक विवाही प्रथा ही प्रचलित है।

2. बहु विवाह प्रथा (Polygamy) बहु विवाह प्रथा के अंतर्गत व्यक्ति एक समय में एक से अधिक स्त्री/पुरुषों के साथ विवाह कर सकता है। भारत की अनेक जनजातियों में बहु विवाह प्रचलित है।

बहु विवाह दो प्रकार का है।

  • बहु पति विवाह (Polyandry)
  • बहु पत्नी विवाह Polygany)।

1. बहु पति विवाह (Polyandry)-बहु पति विवाह प्रथा के अंतर्गत एक स्त्री के एक समय में अनेक पति होते हैं अर्थात अनेक पति एक पत्नी। भारत की कई जनजातियों में यह प्रथा पाई जाती है। भारत आर्य तथा मंगोल जनजातियों, थेडा, कोटा, खासा तिब्बत के लोगों में भी सामान्यतया इसी प्रथा का पालन होता है। बहु पति विवाह के भी आगे दो रूप हैं।

भ्रातृत्व बहु पति और अभ्रातृत्व बहु पति विवाह-भ्रातृत्व बहु पति विवाह में कई सगे भाइयों की एक ही समय में एक ही पत्नी होती है। हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में भ्रातृत्व बहुपति प्रथा पाई जाती है। अभ्रातृत्व बहुपति प्रथा के अंतर्गत अनेक पति आपस में सगे भाई नहीं होते। अनेक विभिन्न व्यक्ति एक स्त्री से विवाह करते हैं तथा उनकी पत्नी थोड़े-थोड़े समय के लिए बारी-बारी सबके पास जाती है। टोडा, नापर, कोटा, मन्ना आदि जनजातियों में यही प्रथा प्रचलित है।

2. बह पत्नी विवाह (Polygany)-इस प्रथा के अंतर्गत एक समय में एक पुरुष की एक से अधिक पत्नियां होती हैं। बहू पत्नी विवाह का यह रूप अनेक भारतीय जनजातियों में पाया जाता है। इन जनजातियों के समाज में इस प्रथा का पालन करना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता है। नागा, गोंड, थेडा, लोशाई, पालियन, पुलामो इत्यादि जनजातियों में बहु पत्नी विवाह प्रथा ही पाई जाती है।

भारतीय जनजातियों में उपर्युक्त विवाह के स्वरूपों के अतिरिक्त कुछ विवाह अधिमानिक अर्थात् आदेशात्मक भी होते हैं। अधिमानक (Preferential) विवाहों के अंतर्गत चचेरे, ममेरे, भाई-बहनों का विवाह (Cross Cousin Marriage) नियोग एवं भगिनीयता (Levirate & Sorarate) विवाह आते हैं। चचेरे, ममेरे, भाई-बहिन किसी व्यक्ति के परिवार के दोनों ओर से भी हो सकते हैं अर्थात् पिता की बहन या माता के भाई या पिता के भाई के बच्चे भी हो सकते हैं।

ये विवाह अपने चाचा, मामा इत्यादि के बच्चों में किया जाता है। इस तरह नियोग तथा भगिनीयता विवाह भी इसी समाज में पाया जाता है। नियोग (Levirate) विवाह में एक व्यक्ति अपने मृत भाई की विधवा पत्नी से विवाह कर सकता है। भगिनीयता विवाह में व्यक्ति का विवाह साली (Sister in Law) से किया जाता है। नियोग और भगिनीयता विवाह विशेष रूप से अंतर पारिवारिक दायित्वों की स्वीकृति पर बल देते हैं। इन प्रथाओं में विवाह के दो व्यक्तियों की अपेक्षा दो परिवारों के बीच संबंध को अधिक मान्यता दी जाती है।

जनजातियों में जीवन साथी चुनने के तरीके – (Tribal ways of Choosing & Life-Mate):
जनजातियों में विवाह यौन सुख, संतान उत्पत्ति व आपसी सहयोग के विकास के लिए किया जाता है। हिंदू समाज की तरह जनजातियों में विवाह एक धार्मिक संस्कार नहीं माना जाता बल्कि इसमें विवाह को एक सामाजिक समझौते के रूप में देखा जाता है। जनजातियों में मुख्यतः निम्न प्रकार के विवाह संबंध विकसित किये जाते हैं-

1. सह-पलायन विवाह (Elopment Marriage)-विवाह योग्य लड़का-लड़की दोनों घर से भाग जाते हैं तथा विवाह कर लेते हैं। उसे सह-पलायन कहते हैं। इसके बाद बड़े-बूढ़े व्यक्ति इनकी जोड़ी को स्वीकार कर लेते हैं। यह विवाह पद्धति मुख्यतः वधू की ऊंची कीमत के कारण विकसित हुई मानी जाती है। सह-पलायन या घर से भाग कर विवाह का प्रचलन मुख्यतः किन्नौर, लाहौल स्पीति, छोटा नागपुर एवं झारखंड की जनजाति में है। झारखंड राज्य में ‘हो’ जनजाति में इस विवाह को राजी-खुशी विवाह कहा जाता है।

2. विनिमय विवाह (Marriage by Exchange)-इस प्रकार की विवाह प्रथा में दो परिवार स्त्रियों का आपस में आदान-प्रदान करते हैं। यह विवाह की विधि वधू की ऊंची कीमत के भुगतान से बचने के लिए विकसित की गई है। ये विवाह प्रथा संपूर्ण भारतवर्ष में किसी न किसी रूप में देखी जा सकती है। इस प्रथा के अंतर्गत एक व्यक्ति अपनी पत्नी प्राप्त करने के लिए उसके बदले में अपनी बहिन या परिवार की कोई स्त्री देता है। ये विधि खासी जनजाति की विशेषता है।

3. खरीद विवाह (Marriage by Purchase)-इस विवाह का रूप प्रारंभिक जनजातियों समाजों में अत्यधिक प्रचलित था। इस विवाह में वधू का मूल्य चुकाया जाता है। वधू के मूल्य का भुगतान नगद या फिर वस्तु के रूप में किया जाता है। मुख्य जनजातियां मुंडा, ओराओ, हो, संथाल, नागा, रेग्मां आदि में खरीद विवाह ही प्रचलित है। खरीद विवाह को क्रय विवाह भी कहा जाता है।

4. लूट विवाह (Marriage by Capture)-भारतीय जनजातियों में वधू प्राप्त करने का तरीका लूटकर विवाह करना है। यह प्रथा जनजातियों में वधू का अत्यधिक मूल्य का होने के कारण प्रचलित है। स्त्रियां लूटकर विवाह करने की प्रथा उत्तर:पूर्वीय क्षेत्र की नागा जनजातियों में अधिक प्रचलित है। इस प्रथा में एक जनजाति के लोग अपनी शत्रु जनजाति पर हमला करते हैं तथा लड़कियों को उठाकर ले जाते हैं। विवाह की ये प्रथा नागा, संथाल, मुंडा, गौंड, भील तथा पाई आदि जनजातियों में पायी जाती है।

5. सेवा विवाह (Marriage by Service)-इस विवाह प्रथा में लड़का अपने ससर के घर विवाह पूर्व एक निश्चित समय तक उसकी सेवा करता है। इस अवधि के पश्चात् यदि वधू का पिता उसकी सेवा से संतुष्ट होता है तो अपनी बेटी का हाथ उसे देता है। यदि वह उसके कार्य से असंतुष्ट होता है तो वर को घर से निकाल दिया जाता है। सेवा अवधि व सेवा स्वरूप भिन्न-भिन्न जातियों में भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। गौंड, बैगा आदि जनजातियों में ये प्रथा पाई जाती है।

6. हठ विवाह (Marriage by Intrusion) हठ विवाह के अंतर्गत एक व्यक्ति किसी स्त्री के साथ आत्मीयता के संबंध बनाता है। परंतु किसी न किसी बहाने से विवाह करने से हट जाता है तो वह स्त्री अपने-आप पहल करके उस व्यक्ति के घर में घुस जाती है। व्यक्ति के माता-पिता उसको मारते-पीटते हैं और प्रताड़ित करते हैं। यदि कन्या यह सह लेती है तो पड़ोस के लोग उस युवक को उस कन्या से विवाह के लिए बाध्य कर देते हैं। कई जनजातियों में इस विवाह को अनादर विवाह कहा जाता है।

7. परीवीक्षा विवाह (Probationary Marriage)-इस विवाह के फलस्वरूप एक युवक निश्चित समय के लिए युवती के घर उसके पिता के साथ रहता है। इस परीवीक्षा काल में युवक व युवती यदि दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं तो उनका विवाह कर दिया जाता है अन्यथा दोनों अलग-अलग हो जाते हैं। इसमें क्षतिपूर्ति के रूप में युवक, युवती को कुछ दान देता है। इस परीवीक्षा अवधि में यदि युवती गर्भवती हो जाए तो युवक को उससे विवाह करना ही पड़ता है। मणिपुर की कूकी जनजाति में यह विवाह प्रथा प्रचलित है।

8. परीक्षा विवाह (Marriage by Test)-इस परीक्षा विवाह के अंतर्गत व्यक्ति तभी विवाह कर सकता है जब वह अपने आपको इसके लिए प्रमाणित कर लेता है। इस प्रथा में होली के अवसर पर सभी विवाह के इच्छुक नौजवान लड़के तथा लड़कियां एक पेड़ के नीचे या खंबे के पास इकट्ठे होकर (वृत्त बनाकर) नृत्य करते हैं। उस पेड़ या खंबे की चोटी पर नारियल और गुड़ बांधा जाता है। युवतियां पेड़ या खंबे के चारों ओर वृत्त बनाकर नृत्य करती हैं तथा युवक युवतियों के वृत्त के चारों और वृत्त बनाकर नाचते हैं।

हर युवक पेड़ या खंबे के नज़दीक पहुंचने की कोशिश करता है। युवतियां इन्हें रोकने का पूरा प्रयास करती हैं। यहां तक कि युवक को रोकने के लिए उसे डंडे तक से भी पीटा जाता है। इस सबके बावजूद भी यदि युवक पेड़ या खंबे तक पहुंचने में कामयाब हो जाता है और नारियल व गुड़ प्राप्त कर लेता है तो उसे नृत्य करती हुई किसी भी युवती के साथ विवाह करने की अनुमति मिल जाती है। उपर्युक्त स्वरूपों के आधार पर कहा जा सकता है कि अनेक जनजातियां अपने-अपने आधार पर विवाह के अनेक स्वरूपों को अपनाए हुए हैं।

प्रश्न 8.
परिवार का क्या अर्थ है? इसकी परिभाषाओं तथा विशेषताओं की व्याख्या करें।
उत्तर:
परिवार का अर्थ (Meaning of Family)-परिवार शब्द अंग्रेजी के शब्द ‘Family’ का हिंदी रूपांतर है। Family शब्द रोमन शब्द (Famulous) ‘फैमलयस’ से लिया गया है, जिसका अर्थ है ‘नौकर’ या ‘दास’.। इस तरह से रोमन कानून में परिवार से अभिप्राय है एक ऐसा समूह जिसमें नौकर या दास, मालिक या सदस्य शामिल हैं जो कि रक्त संबंधों के आधार पर एक-दूसरे से संबंधित हों। इससे स्पष्ट है कि परिवार कुछ लोगों का इकट्ठा होना नहीं, बल्कि उनमें संबंधों की व्यवस्था है।

यह एक ऐसी संस्था है, जिसमें औरत और आदमी का समाज से मान्यता प्राप्त लिंग संबंधों (Sex Relations) को स्थापित करता है। संक्षेप में, परिवार व्यक्तियों का वह समूह है, जो कि विशेष “नाम” से पहचाना जाता है जिसमें स्त्री एवं पुरुष का स्थायी लिंग संबंध हो, और इसी प्रक्रिया में सदस्यों के पालन-पोषण की व्यवस्था हो तथा उनमें रक्त के संबंध हों और वे एक विशेष निवास स्थान पर रहते हों।

परिवार ‘शब्द’ का सही अर्थ जानने के लिए यह आवश्यक है कि समाज शास्त्रियों की ओर से दी गई सभी परिभाषाओं को ठीक तरह से देख लें। इन सभी में थोड़ा-बहुत अन्तर तो है ही क्योंकि हर विद्वान् ने अपने दृष्टिकोण से और अपने-अपने हालातों के अनुसार परिभाषा दी है। इन सभी का वर्णन निम्न प्रकार से है-
(1) आगबर्न और निमकॉफ (Ogburn and Nimcoff) के अनुसार, “परिवार बच्चों सहित या बच्चों रहित, पति-पत्नी या अकेला एक आदमी या औरत और बच्चों की एक स्थाई सभा है।”

(2) मैकाइवर और पेज़ (Maclver and Page) के अनुसार, “परिवार एक ऐसा समूह है जो कि निश्चित एवं स्थायी लिंग संबंधों द्वारा परिभाषित किया जाता है, जो बच्चों को पैदा करने एवं पालन-पोषण के अवसर प्रदान करता है।”

(3) मर्डोक (Mardock) के अनुसार, “परिवार एक ऐसा समूह है जिसकी विशेषताएं हमारा निवास स्थान, आर्थिक सहयोग और संतान की उत्पत्ति या प्रजनन हैं, इसमें दोनों लिंगों के बालिग शामिल होते हैं और इसमें कम से-कम दो के मध्य सामाजिक दृष्टि से स्वीकृत लिंग संबंध होता है और लिंग संबंधों से बने इन बालिगों के अपने या गोद लिए हुए एक या इससे ज्यादा बच्चे होते हैं।” इस तरह उपरोक्त सभी समाज शास्त्रियों द्वारा दी गई परिवार की परिभाषाएं देखते हुए, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि परिवार एक ऐसा समूह है, जिसमें आदमी एवं औरत के लैंगिक संबंधों को समाज की तरफ से मान्यता प्राप्त होती है।

इस तरह से यह एक जैविक इकाई है जिसमें लैंगिक संबंधों की पूर्ति एवं संतुष्टि होती है और उससे बच्चे पैदा किए जाते हैं, बच्चों का पालन-पोषण किया जाता है और उन्हें बड़ा किया जाता है। इस तरह यहां पर लिंग संबंधों को विधिपूर्वक स्वीकार किया जाता है और यह आर्थिक आधार पर भी टिका है। इसमें बच्चों की ज़िम्मेदारी भी शामिल है।

इस प्रकार परिवार व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक आवश्यकता है। चाहे इसके अर्थों के बारे में अलग-अलग समाजशास्त्रियों के विचारों में भिन्नता पाई जाती है, परंतु सभी इस बात पर सहमत हैं कि परिवार ही एक ऐसा समूह है जिसमें मर्द तथा स्त्री के लैंगिक संबंधों को मान्यता प्रदान की जाती है तथा यह एक सर्वव्यापक समूह है जो प्रत्येक समाज में पाया जाता है। परिवार को एक जैविक इकाई के रूप में भी माना जा सकता है।

परिवार की विशेषताएँ
(Characteristics of Family)
1. परिवार एक सर्वव्यापक समूह है (Family is a universal group)-परिवार को एक सर्वव्यापक समूह माना जाता है क्योंकि यह प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक काल में पाया जाता रहा है। अगर इसे मनुष्यों के इतिहास के पहले समूह या संस्था के रूप में माने तो ग़लत नहीं होगा। व्यक्ति किसी-न-किसी परिवार में ही जन्म लेता है तथा वह तमाम उम्र उस परिवार का सदस्य बनकर ही रहता है। प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी परिवार का सदस्य हमेशा ही होता है। इस कारण ही इसे सर्वव्यापक समूह माना जाता है। यहां तक कि व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी परिवार में ही होती है।

2. परिवार छोटे आकार का होता है (Family is of small size)-प्रत्येक परिवार छोटे तथा सीमित आकार का होता है। इसका कारण यह है कि व्यक्ति का जिस समूह अथवा परिवार में जन्म होता है उसमें या तो रक्त संबंधी या वैवाहिक संबंधी ही शामिल किए जाते हैं। प्राचीन समय में तो संयुक्त परिवार होते थे जिनमें बहुत से रिश्तेदार जैसे कि दादा-दादी, ताया-तायी, चाचा-चाची, उनके बच्चे इत्यादि शामिल होते थे। परंतु समय के साथ साथ बहत से कारणों के कारण समाज में परिवर्तन आए तथा संयुक्त परिवारों की जगह मूल परिवार सामने आए जिनमें केवल माता-पिता तथा उनके बिन विवाहित बच्चे रहते हैं। विवाह के बाद बच्चे अपना अलग मूल परिवार बना लेते हैं। इस प्रकार परिवार छोटे तथा सीमित आकार का होता है जिसमें रक्त संबंधी अथवा वैवाहिक संबंधी ही शामिल होते हैं।

3. परिवार का भावात्मक आधार होता है (Family has emotional base)-प्रत्येक परिवार का भावात्मक आधार होता है क्योंकि परिवार में रहकर ही व्यक्ति में बहुत-सी भावनाओं का विकास होता है। परिवार को समाज का आधार माना जाता है तथा व्यक्ति की मूल प्रवृत्तियां परिवार पर ही निर्भर होती हैं। बहुत-सी भावनाएं तथा क्रियाएं इसमें शामिल होती हैं जैसे कि पति-पत्नी के बीच संबंध, बच्चों का पैदा होना, वंश को आगे बढ़ाना, परिवार को आगे बढ़ाना, परिवार की संपत्ति को सुरक्षित रखना। परिवार में रहकर ही व्यक्ति में बहुत-सी भावनाओं का विकास होता है जैसे कि प्यार, सहयोग, हमदर्दी इत्यादि। इन सबके कारण ही परिवार समाज की प्रगति में अपना योगदान देता है।

4. परिवार का सामाजिक संरचना में केंद्रीय स्थान होता है (Family has a central position in Social Structure)-परिवार एक सर्वव्यापक समूह है तथा यह प्रत्येक समाज में पाया जाता है। इसे समाज का पहला समूह भी कहा जाता है जिस कारण समाज का संपूर्ण ढांचा ही परिवार पर निर्भर करता है। समाज में अलग-अलग सभाएं भी परिवार के कारण ही निर्मित होती हैं तथा इस वजह से ही परिवार को सामाजिक संरचना में केंद्रीय स्थान प्राप्त है।

प्राचीन समय में तो परिवार के ऊपर ही सामाजिक संगठन निर्भर करता था। व्यक्ति के लगभग सभी प्रकार के कार्य परिवार में ही पूर्ण हो जाया करते थे। चाहे आधुनिक समाज में बहुत-सी और संस्थाएं सामने आ गई हैं तथा परिवार के कार्य इन संस्थाओं द्वारा ले लिए गए हैं, परंतु फिर भी व्यक्ति से संबंधित बहुत से ऐसे कार्य हैं जो केवल परिवार ही कर सकता है और कोई संस्था नहीं कर सकती है।

5. परिवार का रचनात्मक प्रभाव होता है (Family has a formative influence)-परिवार नाम की संस्था ऐसी संस्था है जिससे व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास पर एक रचनात्मक प्रभाव पड़ता है तथा इस कारण ही सामाजिक संरचना में परिवार को सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। अगर बच्चे का सर्वपक्षीय विकास करना है तो वह केवल परिवार में रहकर ही हो सकता है। परिवार में ही बच्चे को समाज में रहन-सहन, व्यवहार करने के ढंगों का पता चलता है।

बहुत से मनोवैज्ञानिक तो यहां तक कहते हैं कि शुरू के सालों में ही बच्चे ने जो कुछ बनना होता है वह बन जाता है। बाद की उम्र में तो उसमें केवल अच्छाई तथा बुराई जैसी चीजें ही विकसित होती हैं। बच्चा परिवार में जो कुछ होते हुए देखता है वह उसके अनुसार ही सीखता है तथा वैसा ही बन जाता है। इस प्रकार परिवार या व्यक्ति के व्यक्तित्व पर एक रचनात्मक प्रभाव पड़ता है।

6. यौन संबंधों को मान्यता (Sanction of Sexual relations)-व्यक्ति जब विवाह करता है तथा परिवार का निर्माण करता है तो ही उसके तथा उसकी पत्नी के लैंगिक अथवा यौन संबंधों को समाज द्वारा मान्यता प्राप्त होती है। परिवार के साथ ही मर्द तथा स्त्री एक-दूसरे से यौन संबंध स्थापित करते हैं। प्राचीन समाजों में यौन संबंध स्थापित करने के लिए कोई नियम नहीं थे तथा कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री से यौन संबंध स्थापित कर सकता था। इस कारण ही परिवार का कोई भी रूप हमारे सामने नहीं आया था तथा समाज साधारणतया विघटित रहते थे। इस प्रकार परिवार के कारण ही मर्द तथा स्त्री के संबंधों को मान्यता प्राप्त होती है।

प्रश्न 9.
परिवार के भिन्न-भिन्न प्रकारों की व्याख्या करें।
अथवा
परिवार के विभिन्न प्रकारों या स्वरूपों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यह संसार बहुत ही बड़ा है। इसमें कई प्रकार के समाज एवं सामाजिक इकाइयां पाई जाती हैं। हरेक समाज की अपनी उसकी भौगोलिक स्थिति के अनुसार, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशेषताएं होती हैं। इसी कारण उन समाजों में अलग-अलग तरह के परिवार पाए जाते हैं। यह इस तरह होता है कि हर समाज के अलग-अलग रीति रिवाज, आदर्श विश्वास एवं संस्कृति होती है। एक ही देश, जैसे भारत में कई तरह के समाज पाए जाते हैं।

उदाहरण के तौर पर, पितृ सत्तात्मक, मातृ सत्तात्मक समाज। इसी तरह से परिवारों के भी अनेक रूप हैं। इन्हीं रूपों को संख्या के आधार पर, विवाह के आधार पर, सत्ता के आधार पर एवं वंश के आधार पर तथा रहने के आधार पर विभाजित किया जा सकता है। हम अभी इनको अलग-अलग तरीके से देखने की कोशिश करेंगे।

1. विवाह के आधार पर परिवार की किस्म (On the basis of marriage)-
A. एक-विवाही परिवार (Monogamous Family)-इस तरह के परिवार में व्यक्ति एक ही औरत के साथ विवाह कर सकता है और उसी के साथ रहता हुआ सन्तान की उत्पत्ति करता है। आजकल इसी विवाह को आदर्श विवाह एवं ऐसे परिवार को सही परिवार माना जाता है।

B. बहु-विवाही परिवार (Polygamous Family)-इस तरह के परिवार में, जब एक आदमी एक से ज्यादा औरतों के साथ विवाह कर सकता है या फिर एक औरत, एक से ज्यादा पतियों से विवाह करती है तो इस प्रकार के विवाह को बहु-विवाही कहते हैं। यह भी आगे दो प्रकार का होता है-
(i) बहु-पति विवाह (Polyandrous Family)-जब कोई औरत एक से ज्यादा पतियों के साथ विवाह करवाती है, तो बहु-पति विवाह होता है। इस विवाह की विशेषता यह होती है कि एक औरत के कई पति होते हैं। इनमें यह भी दो प्रकार के होते हैं

  • इसमें औरत के सभी पति सगे भाई होते हैं।
  • दूसरी अवस्था में यह आवश्यक नहीं कि वे सभी सगे भाई हों।

(ii) बहु-पत्नी विवाह (Polygamous Family) इस प्रकार के विवाहों में, पति यानि कि आदमी एक से ज्यादा औरतों से विवाह करवाता है। इस प्रकार के परिवारों में एक आदमी की कई पत्नियां होती हैं। इस प्रकार के विवाह मुसलमानों में आमतौर पर मिल जाते हैं। इस तरह से मुस्लिम समुदाय में चार पलियां रखने की आज्ञा दी गई है। पुराने जमाने में हिंदू राजे-महाराजे भी कई पत्नियां रखते थे। सन् 1955 में हिंदू विवाह कानून के आधार पर हिंदुओं को एक से ज्यादा पत्नियां रखने का अधिकार नहीं है। परंतु भारत में अभी कई कबीलों में वही पुरानी परंपरा कायम है, जैसे नागा, गोण्ड, जिनमें इस तरह के परिवार अभी भी पाए जाते हैं।

2. सदस्यों के आधार पर परिवार की किस्में (Family on the basis of members)-सदस्यों के आधार पर परिवार के तीन प्रकार हैं-
A. केन्द्रीय परिवार (Nuclear Family)-यह एक छोटा परिवार होता है, जिसमें एक पति एवं पत्नी और उनके अविवाहित बच्चे शामिल होते हैं। इस परिवार में बाकी कोई भी रिश्तेदार या सदस्य नहीं होता। आजकल समाज में इन्हीं परिवारों की अधिकता है। इन परिवारों के सदस्य आमतौर पर शहरों में नौकरी करते हैं और जब उनके बच्चे विवाह करवा लेते हैं, तो वे भी एक केंद्रीय परिवार को जन्म दे देते हैं।

B. संयुक्त परिवार (Joint Family)-इस तरह के परिवार में बहुत सारे सदस्य होते हैं, जिसमें दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-भौजाई एवं ताया-तायी, उनके बच्चे, भाई-बहन आदि सभी इस प्रकार से शामिल होते हैं। इस प्रकार के परिवार अभी भी गाँवों में पाये जाते हैं।

C. विस्तृत परिवार (Extended Family) इस तरह के परिवार, संयुक्त परिवारों से ही बनते हैं। जब संयुक्त परिवार आगे बड़े हो जाते हैं, तो वे “विस्तृत परिवार’ कहलाते हैं। इनमें सभी भाई, उनके बच्चे विवाह के उपरांत भी साथ में रहते हैं चाहे उनके भी आगे बच्चे हो जायें। आजकल के समाजों में, इस तरह के परिवार मुमकिन नहीं हैं। प्राचीन काल में ऐसा हो जाता था, क्योंकि उनके काम-धंधे एक ही हुआ करते थे।

3. वंश नाम के आधार पर परिवार के प्रकार (On the basis of Nomenclature) इस आधार पर परिवार की चार तरह की किस्में मिलती हैं-
(i) पितृ-वंशी परिवार (Patrilineal Family) इस तरह का परिवार पिता के नाम से ही चलता है। इसका अर्थ ता का नाम उसके पुत्र को मिलता है और पिता के वंश का महत्त्व होता है। आजकल इस तरह के परिवार मिल जाते हैं।

(ii) मातृ-वंशी परिवार (Matrilineal Family)-इस तरह के परिवार माँ के नाम के साथ चलते हैं, जिसका अर्थ है कि बच्चे के नाम के साथ माता के वंश का नाम आएगा। माता के वंश का नाम बच्चों को प्राप्त होगा। इस प्रकार के परिवार भारत के कुछ कबीलों में भी मिल जाते हैं।

(iii) दो वंश नामी परिवार (Bilinear Family)-इस प्रकार के परिवारों में बच्चे को दोनों वंशों के नाम प्राप्त होते हैं और दोनों वंशों के नाम साथ-साथ में व्यक्ति के साथ चलते हैं।

(iv) अरेखकी परिवार (Non-Unilinear Family)-इस प्रकार के परिवारों में वंश के नाम का निर्धारण सभी नज़दीक के रिश्तेदारों के आधार पर होता है। इसको अरेखकी परिवार कहते हैं।

4. रिश्तेदारों के प्रकार के आधार पर परिवारों की किस्म (On the basis of types of Relatives)-इस प्रकार के परिवार भी दो प्रकार के होते हैं-
(i) रक्त संबंधी परिवार (Consanguine Family)-इस प्रकार के परिवारों में रक्त संबंधों का स्थान सबसे ऊपर होता है और इनमें किसी भी प्रकार के लिंग संबंध नहीं होते। इस परिवार में पति-पत्नी भी होते हैं, परंतु यह परिवार के आधार नहीं होते। इस परिवार में सदस्यता जन्म के आधार के कारण प्राप्त होती है। ये स्थायी होते हैं। तलाक भी इन परिवारों के अस्तित्व को समाप्त नहीं कर सकता।

(ii) विवाह संबंधियों का परिवार (Conjugal Family)-इस प्रकार के परिवारों में पति-पत्नी और उनके बिन ब्याहे बच्चे होते हैं अर्थात् जिनका विवाह अभी नहीं हुआ होता। इसमें पति-पत्नी और उनके रिश्तेदार भी शामिल होते हैं। यह परिवार किसी की मौत के बाद या फिर तलाक के बाद भी भंग हो सकता है।

5. रहने के स्थान के आधार पर आधारित परिवार (Family on the basis of Residence)-इस प्रकार के परिवार तीन तरह के होते हैं-
(i) पितृ-स्थानी परिवार (Patrilocal Family)-इस प्रकार के विवाह के बाद, लड़की अपने परिवार को छोड़कर अपने पति के घर रहने लग जाती है और इस तरह अपना परिवार बसाती है। इस तरह के परिवार आमतौर पर मिल जाते हैं।

(ii) मातृ-स्थानी परिवार (Matrilocal Family)-इस प्रकार के परिवार उपरोक्त परिवार से बिल्कुल विपरीत होते हैं। इनमें लड़की अपने पिता का घर छोड़कर नहीं जाती, वह उसी घर में ही रहती है। इसमें पति अपने पिता का घर छोड़कर, पत्नी के घर आकर रहने लग जाता है। इसको मातृ-स्थानी परिवार कहते हैं। ‘गारो’, खासी इत्यादि कबीलों में इस प्रकार के विवाह पाए जाते हैं।

(iii) नव-स्थानी-परिवार (Neo-Local-Family)-इस प्रकार के परिवार दोनों तरह की किस्मों से अलग हैं। इस तरह के विवाह के पश्चात् पति-पत्नी कोई भी एक-दूसरे के माता-पिता के घर नहीं जाते और न ही वहां रहते हैं। इसके विपरीत वे अपना और घर बनाते हैं और वहां पर जाकर रहते हैं। इस परिवार को नव-स्थानी परिवार कहा जाता है। आजकल के औद्योगीकरण के युग में बड़े-बड़े शहरों में, इस तरह के परिवार आम देखने में मिलते हैं।

6. सत्ता के आधार पर परिवार के प्रकार (On the basis of Authority)-इस तरह के परिवार भी दो तरह के होते हैं-
(i) पितृ सत्तात्मक परिवार (Patriarchal Family)-जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है, कि इस तरह के परिवार में शक्ति पिता के हाथों में होती है। परिवार के सभी कार्य पिता की मर्जी के अनुसार होते हैं। वह ही परिवार का कर्ता होता है। इस तरह से परिवार के सारे छोटे-बड़े कार्य का फैसला वह स्वयं ही करता है। भारत में इस तरह के परिवार ज्यादातर पाए जाते हैं।

(ii) मातृ-सत्तात्मक परिवार (Matriarchal Family)-इस तरह से यह भी नाम से ही प्रतीत होता कि इस तरह के परिवार में शक्ति माता के हाथ में होती है। मातृ सत्तात्मक परिवार में सभी फैसले एवं कर्ता माता होती है। बच्चों के ऊपर ज्यादा अधिकार माता का होता है। स्त्री ही इसमें मूल पूर्वज मानी जाती है। इसमें संपत्ति का वारिस माता का पुत्र नहीं होता, बल्कि उसका भाई अथवा ‘भांजा’ होता है। कई तरह के कबीलों जैसे गारो, खासी आदि में ऐसा आमतौर पर देखने को मिलता है।

प्रश्न 10.
एकाकी अथवा केंद्रीय परिवार का क्या अर्थ है? विशेषताओं सहित व्याख्या करें।
उत्तर:
केंद्रीय परिवार के अर्थ एवं परिभाषाएं-परिवार को संख्या के आधार पर दो भागों में बांटा जा सकता है, केंद्रीय एवं संयुक्त परिवार। इसमें केंद्रीय परिवार छोटा परिवार माना जाता है, इसमें माता-पिता तथा उनके कुंवारे बच्चे ही रहते हैं। संयुक्त परिवार में दादा-दादी, माता-पिता, ताया-तायी और उनके सभी बच्चे साथ में ही रहते हैं। इस प्रकार से केंद्रीय परिवारों की परिभाषा भिन्न-भिन्न विद्वानों ने अपने तरीके से की है। इनमें से कुछ प्रमुख निम्नलिखित हैं-
(1) मर्डोक के अनुसार- केंद्रीय परिवार एक शादीशुदा आदमी और उसकी औरत और उनके बच्चों को मिलाकर बनता है, जबकि यह हो सकता है कि और व्यक्ति भी उनके साथ एक परिवार बना कहै।”

(2) इसी प्रकार से विदवान आर०पी० देसाई ने अपने शब्दों में इसकी परिभाषा इस प्रकार से दी है- ”केंद्रीय परिवार वह है, जिसके सदस्य, अपने दूसरे रिश्तेदारों के साथ संपत्ति, आमदनी, अधिकार एवं कर्तव्यों द्वारा संबंधित न हों, जैसे कि रिश्तेदार से रिश्तेदारी की उम्मीद की जाती है।”

इस प्रकार उपरोक्त परिभाषाओं के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि इकाई परिवार में केवल माता-पिता, उनके कुंवारे बच्चे ही रहते हैं और फिर जब उनका विवाह हो जाता है तो वे अपना अलग घर बना कर चले जाते हैं अर्थात् अपने अलग घर में रहते हैं। इस तरह से यह परिवार विवाह के आधार पर ही जुड़े होते हैं। इनका आकार भी छोटा ही होता है। इसमें नया जोड़ा अपना अलग घर बना कर रहता है। इसलिए इसको प्रजनन परिवार भी कहा गया है।

केंद्रीय अथवा इकाई परिवार की विशेषताएँ
(Characteristics of Nuclear Family)
1. छोटा आकार (Small Size)-इस तरह के परिवारों की सबसे मुख्य विशेषता यह है कि इनका आकार बहुत छोटा होता है, क्योंकि इसमें केवल माता-पिता और उनके कुंवारे बच्चे ही रहते हैं। इनमें सदस्यों की संख्या सीमित होती है, जैसे कि आजकल दो या तीन बच्चों का चलन है। इस तरह से जब यह बच्चे विवाह करते हैं तो यह अपने नए घर में जाकर रहते हैं।

2. सीमित संबंध (Limited Relations) केंद्रीय परिवार में ज़्यादा से ज्यादा आठ रिश्तों को माना गया है अथवा शामिल किया गया है, जैसे कि पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माता-पुत्र, पिता-पुत्री, माता-पुत्री, बहन-भाई, भाई भाई, बहन-बहन। इनमें द्वितीय रक्त के संबंधों का महत्त्व कम माना गया है। उन सदस्यों के साथ संबंध भी रस्मी तौर पर ही होते हैं। केंद्रीय परिवारों में व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति अपने परिवार द्वारा ही करता है।

3. प्रत्येक सदस्य का महत्त्व (Importance of every member) केंद्रीय परिवार में पति-पत्नी तथा उनके बिन ब्याहे बच्चे ही रहते हैं तथा यह समानता पर आधारित होते हैं। इस प्रकार के परिवार में दो पीढ़ियों के लोग ही रहते हैं तथा सभी को समान स्थिति ही प्राप्त होती है। पत्नी तथा बच्चों की स्थिति भी इसमें समान ही होती है। घर के सभी सदस्यों में कार्य बँटे हुए होते हैं। माता-पिता अपने बच्चों का अच्छे ढंग से पालन-पोषण करते हैं, उन्हें अच्छी शिक्षा देते हैं ताकि वह अपना भविष्य बना सकें। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य को परिवार में समान महत्त्व प्राप्त होता है।

4. बराबर सत्ता (Common authority) संयुक्त परिवारों में घर की सत्ता परिवार के बड़े बुजुर्गों के हाथ में ही होती है तथा पत्नी और बच्चों का कोई महत्त्व नहीं होता है। परंतु केंद्रीय परिवार इसके बिल्कुल विपरीत होते हैं जिनमें घर की सत्ता सभी के हाथ में समान रूप से होती है। घर में केवल पति या पिता की ही सत्ता नहीं चलती है बल्कि पत्नी तथा बच्चों की भी सत्ता चलती है।

घर की प्रत्येक छोटी-बड़ी समस्या को हल करने के लिए उनकी सलाह ली जाती है। इसमें सभी की व्यक्तिगत योग्यता को महत्त्व प्राप्त होता है। यह परिवार परंपरागत परिवारों से अलग होते हैं तथा आधुनिक समाजों में चलते हैं।

5. वैवाहिक व्यवस्था (Marital System) केंद्रीय परिवार विवाह होने के बाद ही सामने आते हैं। अगर देखा जाए तो विवाह के बाद ही केंद्रीय परिवार निर्मित होते हैं। इस प्रकार के परिवार में पति-पत्नी तथा उनके बिन ब्याहे बच्चे रहते हैं। विवाह होने के बाद बच्चे अपना अलग घर बसाते हैं। प्राचीन समाजों में अधिक बच्चे हुआ करते थे परंतु आजकल के समय में केवल एक या दो बच्चे ही होते हैं। इस प्रकार के परिवार का आधार ही विवाह है तथा इस प्रकार के परिवार में बच्चे अपनी इच्छा से विवाह करवाते हैं।

6. व्यक्तिवादी दृष्टिकोण (Individualistic Outlook) संयुक्त परिवारों में परिवार के सभी सदस्य परिवार के हितों के लिए कार्य करते हैं तथा अपने हितों की तिलांजलि दे देते हैं। परंतु केंद्रीय परिवारों में ऐसा नहीं होता है। केंद्रीय परिवारों में लोग केवल अपने हितों को ही देखते हैं। उन्हें परिवार के हितों से कुछ लेना देना नहीं होता है। अगर परिवार पर कोई समस्या आती है तो यह घर छोड़ कर ही चले जाते हैं। उनका दृष्टिकोण सामूहिक नहीं बल्कि व्यक्तिवादी होता है।

प्रश्न 11.
संयुक्त परिवार क्या होता है? इसकी विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है। जहां पर 70% के करीब जनसंख्या कृषि अथवा उससे संबंधित कार्यों पर निर्भर करती है। कृषि के कार्य में बहुत से व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है जिस कारण यहां पर संयुक्त परिवार प्रथा पाई जाती है। यही प्रथा परंपरागत भारतीय समाज की विशेषता भी है। ग्रामीण समाजों में गतिशीलता कम होती है जिस कारण भी लोग अपने घर छोड़ कर केंद्रीय परिवार बसाना पसंद नहीं करते।

जैसे कि नाम से ही स्पष्ट है संयुक्त परिवार में एक दो नहीं बल्कि तीन अथवा चार पीढ़ियों के लोग इकट्ठे मिल कर रहते हैं। इस प्रकार संयुक्त परिवार में पड़दादा, पड़दादी, दादा-दादी, माता-पिता, ताया-तायी, चाचा-चाची तथा उनके बच्चे सभी शामिल होते हैं तथा इकठे मिल कर रहते हैं। संयुक्त परिवार में चाहे परिवार की संपत्ति घर के मुखिया के हाथों में होती है परंतु सभी का उस पर बराबर का अधिकार होता है।

परिभाषाएँ (Definitions) संयुक्त परिवार प्रणाली की सत्ता पिता के हाथ में होती थी। इस प्रणाली में पिता का कहना माना जाता था। इसमें पिता का कहना पत्थर के ऊपर लकीर वाला कार्य था। इसमें पिता की भूमिका एक निरंकुश शासक की तरह होती थी। इस प्रणाली में लड़के विवाह के पश्चात् भी उसी परिवार में ही रहते थे। अब भी अगर कई जगहों पर यदि संयुक्त प्रणाली है, तो उसमें विवाह के उपरांत सभी बच्चों को साथ में रहना होता है। इसी तरह उनकी आने वाली संतानें भी इकट्ठी रहती हैं।

(1) किंगस्ले डेविस (Kingslay Davis) के अनुसार, “संयुक्त परिवार में वे आदमी होते हैं, जिनके पूर्वज भी इकट्ठे हों, औरतों का विवाह न हुआ हो और अगर हुआ हो तो उनको समूह में शामिल किया जाए। ये सभी सदस्य एक ही निवास स्थान पर रहते हों या इनके मकान एक-दूसरे के निकट होते हैं। किसी भी हालत में, जब तक संयुक्त परिवार इकट्ठा है, इसके सदस्य इसी के लिए मेहनत करते हैं और कुल संपत्ति का बराबर का हिस्सा प्राप्त करते हैं।”

(2) कार्वे (Karve) के अनुसार, “संयुक्त परिवार, उन आदमियों का समूह है, जोकि एक ही घर में रहते हैं और वे सभी एक ही रसोई में खाना बनाते हैं और वे सभी संयुक्त जायदाद के मालिक होते हैं। इस तरह वे सभी किसी न-किसी रक्त संबंधों से संबंधित होते हैं।”

इस प्रकार इन परिभाषाओं को देखकर हम कह सकते हैं कि संयुक्त परिवार में कई पीढ़ियों के लोग रहते हैं। यह सभी लोग एक साझे निवास स्थान पर रहते हैं तथा एक ही रसोई में पका हुआ भोजन खाते हैं।

संयुक्त परिवार में घर की सत्ता घर के मर्दो के हाथों में होती है जिस कारण घर की स्त्रियों की स्थिति भी निम्न होती है। घर की संपत्ति चाहे बड़े बुजुर्गों के हाथों में होती है परंतु सभी सदस्यों का इसमें समान अधिकार होता है। प्रत्येक सदस्य को उसके सामर्थ्य के अनुसार कार्य दिया जाता है तथा वह अपना कार्य अपना उत्तरदायित्व समझ कर पूर्ण करते हैं।

संयुक्त परिवार की विशेषताएँ
(Characteristics of Joint Family)
1. बड़ा आकार (Large in Size)-संयुक्त परिवार आकार में बहुत बड़ा होता है। इसमें माता-पिता के अतिरिक्त, उनके भाई-बहन, भाई, पुत्र, पुत्रियां एवं पौत्र इत्यादि सभी एक जगह इकट्ठे रहते हैं। इन सभी के अतिरिक्त इनके दादा-दादी भी मिलकर सभी के साथ रहते हैं। इस तरह से संयुक्त परिवार में कम-से-कम तीन पीढ़ियों के सदस्य शामिल होते हैं। संयुक्त परिवार में पिता के वंश से संबंधित कई पीढ़ियां इसमें रहती हैं। वे सभी मिलकर एक ही चारदीवारी के अंदर रहते हैं अर्थात् एक ही घर में रहते हैं। इस तरह से ये परिवार संख्या की दृष्टि से आकार में बड़े माने गए हैं।

2. संयुक्त संपत्ति (Joint or Common Property) संयुक्त परिवारों में सारी संपत्ति पर सभी का बराबर का अधिकार होता है। हर सदस्य इसमें अपनी योग्यता के आधार पर अपना योगदान डालता है। इसमें से जिस सदस्य को जितनी ज़रूरत होती है, वह खर्च कर लेता है। इस तरह परिवार का कर्ता जोकि प्रायः परिवार का बड़ा सदस्य होता है, सारी संपत्ति की देखभाल करता है। इस प्रकार से सारी संपत्ति के सभी. बराबर के मालिक होते हैं, परंतु परिवार का मुखिया इसको संभाल कर रखता है।

3. सहयोग की भावना (Feeling of Cooperation)-इस तरह के परिवारों में, सभी सदस्य एक-दूसरे की सहायता करते हैं। इसमें कोई सदस्य ज्यादा काम करता है या कोई सदस्य कम कार्य करता है, उससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। इस मुद्दे पर कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं होता। ऐसे परिवारों के सभी सदस्य एक निश्चित लक्ष्य के लिए कार्य करते हैं और वही उद्देश्य ही उन परिवारों के अस्तित्व को बचा कर रखता है।

4. संयुक्त रसोई (Common Kitchen)-संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सभी का खाना एक ही रसोई में तैयार होता है और सभी मिल-जुल कर उसे बनाते हैं। इस प्रक्रिया में इकट्ठे मिल-जुल कर खाते हैं और अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, ताकि उनका आपसी प्यार बना रहे।

5. संयुक्त निवास स्थान (Common Residence) संयुक्त परिवार की विशेषताओं में यह भी एक प्रमुख विशेषता है कि उसके सभी सदस्य एक ही जगह पर अर्थात् एक ही मकान में रहते हैं। अगर उनकी रिहाइश को अलग-अलग कर दिया जाए, तो वह संयुक्त परिवार न होकर केंद्रीय परिवार हो जाएगा।

6. सदस्यों की सुरक्षा (Security of all Members) संयुक्त परिवार की यह भी एक मुख्य विशेषता है कि यह परिवार अपने सभी सदस्यों की हर तरह से सुरक्षा करते हैं। इन परिवारों में उन सभी का संपत्ति पर अधिकार होता है। यदि कोई सदस्य बीमार हो जाये या उसके साथ कोई सुख-दुःख हो, परिवार के सभी सदस्य, उसकी देखभाल करते हैं।

उसके दुःख अथवा बीमारी पर जो भी खर्च आए, परिवार उसको सहन करता है। यदि किसी मर्द की अचानक मृत्यु हो जाए तो उसके बाद उसकी पत्नी की ज़िम्मेदारी पूरा परिवार मिलकर संभालता है। उसके बच्चों की देख-रेख भी यही परिवार करता है। इस तरह से इस तरह के परिवारों के सभी सदस्य, उनकी संतानें अथवा स्त्रियां पूरी तरह से सुरक्षित होती हैं।

7. संस्कृति की निरंतरता (Continuity of Culture) संयुक्त परिवार का यह मख्य लक्षण है कि उसका कर्ता या परिवार का मुखिया अपने परिवार के सदस्यों पर पूरा अधिकार रखता है और इन परिवारों में पीढ़ियों से इकट्ठे रह रहे होते हैं और अगर यह परंपरा चलती रहे तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी ऐसा ही रहता है और उनके प्रेम प्यार में कोई कमी नहीं आती। यदि पिता ने अपने संस्कार पुत्र को दे दिए, वही आगे पुत्र ने अपने पुत्र को दे दिए, इस तरह से उनकी सभ्यता की धरोहर अर्थात् संस्कृति पीढ़ी से अगली पीढ़ी तक चलती रहती है और उसकी निरंतरता बरकरार रहती है।

8. श्रम विभाजन (Division of Labour)-संयुक्त परिवार में सभी सदस्यों के कामों को बांट दिया जाता है। जिसको जो कार्य सौंप दिया जाता है, वह उसे अपना धर्म समझ कर निभाता है। कोई भी सदस्य अपनी मर्जी के अनुसार कार्य को बदल नहीं सकता। औरतें आमतौर पर घर पर रहकर, घर के काम करती हैं और घर के मर्द, बाहर जाकर रोटी-रोज़ी की समस्या का हल करते हैं अर्थात् कमाने की ज़िम्मेदारी आदमियों के ऊपर होती है।

इन परिवारों में कर्ता के स्थान को सबसे ऊपर माना गया है। इसके पश्चात् उसकी पत्नी का दूसरा नंबर होता है अर्थात् स्त्रियों में सबसे ज्यादा आदर कर्ता की पत्नी का होता है। इन परिवारों में विधवा स्त्री को ज़्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता। इस तरह से सदस्यों की स्थिति भी उनके कार्य के अनुसार देखी जाती है। उसे उसकी स्थिति के अनुसार ही काम दिया जाता है।

9. संयुक्त परिवार में कर्ता की भूमिका (Role of Karta in Joint Family)-संयुक्त परिवार में कर्ता की भूमिका सबसे ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होती है। इसमें प्रायः परिवार का सबसे ज़्यादा आयु का व्यक्ति अर्थात् कोई बुजुर्ग ही उसका कर्ता होता है। परिवार के सभी महत्त्वपूर्ण फैसले लेने का अधिकार उसे ही होता है और उसी तरह ही वह फैसला लेता भी है।

सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात कि वह उस परिवार की संपत्ति की चाहे वह चल हो या अचल, उसकी देखभाल उसे ही करनी पड़ती है। इन सारे कार्यों में बाकी परिवार के सदस्य उसकी आज्ञा का पालन करते हैं। इन परिवारों में यदि कर्ता की मृत्यु हो जाती है, तो उस परिवार का बड़ा लड़का फिर देखभाल करता है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन

प्रश्न 12.
संयुक्त परिवार में लाभों तथा हानियों का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त परिवार के लाभ
(Merits of Joint Family)
1. सांस्कृतिक सुरक्षा (Cultural Security)-संयुक्त परिवारों के लाभों को देखने के लिए सबसे पहला पक्ष जो हमें नज़र आता है वह है उसका सामाजिक पक्ष। उसमें हम देख सकते हैं कि ये परिवार हमें सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। बच्चों की देखभाल एवं पालन-पोषण मिल कर करते हैं।

इनमें सबसे पहले हम देखते हैं कि यह परिवार हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचा कर रखते हैं; जैसे पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने से बड़ों का सम्मान करना, सभी के साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा करना और अपने कार्यों को अपना धर्म समझ कर पूरा करना। क्योंकि जो तीन पीढ़ियों के सदस्य इसमें रहते हैं, उनमें एक-दूसरे से मिलकर रहने की भावना रहती है। यह सभी तो इसकी संस्कृति होती है और यह व्यवस्था इसको स्थायी रूप से संभाल कर रखती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित करती चली जाती है।

2. सामाजिक सुरक्षा (Social Security)-संयुक्त प्रणाली अपने सदस्यों की, दुर्घटना, बीमारी एवं बेरोज़गारी अथवा अचानक किसी की मृत्यु हो जाये तो उन हालातों में रक्षा करती है अर्थात् देखभाल करती है। इस प्रकार यह अपने सदस्यों के लिए एक प्रकार की ‘बीमा कंपनी’ जैसा कार्य करती है। यह परिवार अपने बूढ़ों अथवा विधवा औरतों को भी सामाजिक सुरक्षा प्रदान करते हैं।

इन परिवारों में बच्चों की देखभाल भी अपने से बड़े सदस्यों द्वारा अपना समझ कर होती है। यदि कोई सदस्य मानसिक एवं शारीरिक तौर पर किसी भी पक्ष से कमज़ोर है, ये सदस्य उनकी देखभाल एवं रक्षा मिलजुल कर करते हैं। उन्हें किसी भी प्रकार की असुरक्षा महसूस नहीं होने देते। उन्हें भी बराबरी का दर्जा एवं संपत्ति में बराबरी का अधिकार होता है।

3. बच्चों का पालन-पोषण (Taking Care of Children) संयुक्त परिवार में बच्चों के विकास की तरफ पूरा ध्यान दिया जाता है। इन परिवारों में बच्चों में नैतिक नियमों का विकास बहुत ही अच्छा होता है। इन परिवारों में रहते हुए उदारता, सहयोग, प्यार, बड़ों की आज्ञा मानना एवं समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने की कला, तो इन परिवारों का प्रमुख लक्षण है।

इन गुणों में सबसे प्रमुख है, दूसरों के लिए जीने की कला, जो इन परिवारों में सबसे पहले सीखने को मिलती है। संयुक्त परिवार में सभी बच्चों के ऊपर नियंत्रण भी, उनको अनुशासन में रहने की आदत डालनी होती है। इसी तरह ही यह परिवार अपने बच्चों का पालन-पोषण करता है और परिवार का हर सदस्य उसमें बराबर की रुचि लेता है।

4. सामाजिक नियंत्रण (Social Control)-बगैर किसी ज़बरदस्ती के इस परिवार के सदस्यों को नियंत्रण में रहने की आदत पड़ जाती है। वे सभी स्वयं ही इस नियंत्रण को मान लेते हैं क्योंकि उन्हें इसमें सभी की भलाई नज़र आती है। सदस्यों के आपसी संबंध एवं स्नेह प्यार के सामने यह नियंत्रण गौण नज़र आता है।

संयुक्त परिवार में कर्ता को सभी अधिकार दिए गए हैं, और वही अपने इस अधिकार को अपने परिवार की भलाई के लिए ही इस्तेमाल करता है। यदि कोई सदस्य कोई ग़लत काम करता है तो वह अपने अधिकार का इस्तेमाल कर उसे डांट-फटकार भी सकता है। परंतु कोई भी सदस्य उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं कर सकता। इस तरह से यह परिवार अपने सदस्यों की सभी सामाजिक क्रियाओं पर पैनी नज़र रखते हैं और यही नियंत्रण ही उनको समाज में प्रतिष्ठा दिलाता है।

5. मनोरंजन का केंद्र (Centre of Recreation) संयुक्त परिवार अपने सभी सदस्यों को सही दिशा प्रदान करते हुए हर सुखद मौके का इंतज़ार करते रहते हैं। त्योहार इत्यादि, विवाह शादी का अवसर हो अथवा कोई धार्मिक कार्य या कोई और कोई भी सुखद मौका, उसे सभी सदस्य मिलजुल कर, हंसी-खेल करते हुए मनाते हैं।

बच्चे-बूढ़े, जवान और स्त्रियां इन्हीं अवसरों पर खूब मनोरंजन करते हैं और लोक गीतों, कहावतों, गानों और खेलों का आनंद मिलजुल कर लेते हैं और इन्हीं खेलों अथवा बातों-बातों में कई बार अपने तजुर्षों की बातें भी बच्चों को सिखा देते हैं। इस तरह से वे अपना मनोरंजन भी करते रहते हैं।

6. चिंताओं से मुक्ति (Least Tensions of Life)-संयुक्त परिवार में बड़ी से बड़ी समस्या का हल आसानी से मिल जाता है। यदि कोई समस्या आ भी जाए, तो उसे सभी मिलजुल कर सुलझाते हैं। इन परिवारों में जो सहयोग की भावना होती है, उसका यही लाभ होता है कि सदस्यों के दिमाग पर कोई बोझ नहीं पड़ता और सभी आराम से खुशी-खुशी जीवन को जीते हैं।

संयुक्त परिवार की हानियाँ
(Demerits of Joint Family)
1. व्यक्तित्व के विकास में कमी (Lack of Personality Development) संयुक्त परिवार प्रणाली में यह कमी है कि इसमें व्यक्ति की अपनी योग्यता सही रूप में उभर कर सामने नहीं आ पाती क्योंकि उनके कार्यों का विभाजन इस तरीके से हो जाता है कि व्यक्ति अपनी योग्यता का इस्तेमाल ही नहीं कर पाता।

व्यक्ति को अपने बड़ों के कहने पर अर्थात् कर्ता की इच्छानुसार कार्य करना होता है, वह सदस्य अपनी इच्छानुसार अपने बच्चों एवं पत्नी के साथ स्वतंत्रता के साथ समय नहीं बिता पाता। वह कई बार चाहते हुए भी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं कर पाता, वह कोई भी कार्य अपने बड़ों की पसंद के बगैर नहीं कर सकता। इस प्रणाली में यह बहुत कमी है कि व्यक्ति अपनी प्रतिभा को सही तरह से दिखा नहीं पाता, क्योंकि उसके ऊपर पारिवारिक नियंत्रण होते हैं।

2. औरतों की निम्न दशा (Low Status of Women) संयुक्त परिवार आमतौर पर पित-प्रधान होता है, अर्थात् इन परिवारों में पुरुषों का ज्यादा दबदबा होता है। इन परिवारों में पुरुषों की बात को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है, औरतों को परिवारों में ज्यादा अधिकार नहीं दिए जाते। उनकी ज़िम्मेदारी केवल रसोई और बच्चों की देखभाल की है।

संयुक्त परिवार में औरत की हैसियत सिर्फ बच्चों को पैदा करना और घर की चारदीवारी के अंदर ज़िन्दगी को जीना मात्र होता है। इस तरह की व्यवस्था में हमेशा आदमी और औरतों में तकरार अथवा लड़ाई-झगड़ा रहता है। इन परिवारों में औरत आर्थिक तौर पर पुरुष के ऊपर निर्भर होती है, इसलिए उनकी सामाजिक स्थिति दयनीय ही होती है।

3. खालीपन की प्रवृत्ति (Carelessness) संयुक्त परिवार प्रणाली में यह सबसे ज्यादा कमी पाई जाती है आदमी में निकम्मापन आ जाता है अर्थात् उनको रोजी-रोटी की कोई समस्या तो होती नहीं, इस कारण उनमें खाली रहने अथवा आलस्य की प्रवृत्ति का जन्म हो जाता है और वह काम ही नहीं करना चाहते। इस समस्या के होते हुए कुछ सदस्यों को उन खाली सदस्यों का भी बोझ उन्हें ही उठाना पड़ता है और उनका काफ़ी समय उनको समझाने बुझाने एवं उनके हिस्से के कार्यों को करने में जाता है। इस तरह से ये प्रणाली व्यक्ति के निकम्मेपन को एक तरह से बढ़ाती है।

4. संघर्षपूर्ण स्थिति (Conflicts) संयुक्त परिवारों में आपसी लड़ाई-झगड़े बहुत होते हैं। इन परिवारों में कई बार एक भाई दूसरे भाई का दुश्मन बन जाता है। इस बात की चरम सीमा इतनी हो जाती है कि वह अपने भाई को मारने में भी संकोच नहीं करता। इस तरह से घर की शांति नष्ट हो जाती है।

इन परिवारों में कई बार स्त्रियों के कारण तनाव की स्थिति बन जाती है। कई बार ननद और भाभी की नहीं बनती। किसी जगह सास और बहु में क्लेश रहता है। कई बार व्यक्ति समझता है कि उसे अपनी योग्यता के अनुसार कोई अधिकार प्राप्त नहीं हैं, ऐसी स्थिति में आपसी संघर्ष अपने आप जगह बना लेता है और कई बार ऐसी स्थितियों के कारण पूरा परिवार नष्ट हो जाता है।

5. ज़्यादा संतानोत्पत्ति (More Children)-संयुक्त परिवारों में क्योंकि सभी बच्चों के पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी होती है कि कोई भी आदमी इस बात के ऊपर नियंत्रण नहीं रखता कि उसको कितने बच्चों को पैदा करना है। संयुक्त परिवार में उनकी शिक्षा एवं पालन-पोषण की ज़िम्मेदारी सभी की होने के कारण से कोई भी परिवार नियोजन की तरफ ध्यान ही नहीं देता। जिनके ज़्यादा बच्चे होते हैं या कम बच्चे होते हैं, उन सभी की तरह होने के कारण, और यदि किसी के बच्चे कम होंगे और उसे कोई सीधा लाभ मिलेगा, इस कारण सभी ज़्यादा बच्चों को जन्म देते जाते हैं।

6. ग़रीबी को जन्म (Leads to Poverty) हर रोज की कलह-क्लेश, औरतों की निम्न स्थिति, निरंकुश विचारधारा का समाज, कर्तव्यों की तरफ विमुखता और ज़्यादा संतान की उत्पत्ति; यह सभी कारण, परिवार की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर देते हैं और फिर समय के साथ-साथ इन परिवारों में अपनी नैतिक जिम्मेदारी को न समझना, यह सब परिवार को गरीब बना देता है।

परिवार का बढ़ते जाना और जमीन का न बढना और संपत्ति का स्थिर रहना, गरीबी का कारण बन जाता है। इसमें संपत्ति क्योंकि सभी की इकट्ठी होती है, उसकी सही ढंग से कोई भी देखभाल नहीं करता, इस कारण से बाद में उन्हें ही बदहाली झेलनी पड़ती है।

7. अन्य मिश्रित समस्याएँ (Other Mixed Problems)-उपरोक्त समस्याओं के अलावा कई मनोवैज्ञानिक एवं कानूनी समस्याएं, मुकद्दमेबाजी इत्यादि, किसी को उसकी योग्यताओं अथवा क्षमताओं के आधार पर अधिकार न मिलना, यह सभी वस्तुएं. या कारण, आदमी को मनोवैज्ञानिक आधार पर तोड़ देती है।

प्रश्न 13.
संयुक्त परिवारों के विघटित होने के क्या कारण हैं? व्याख्या करें।
अथवा
क्या आपके विचार में संयुक्त परिवार प्रणाली टूट रही है? व्याख्या करें।
अथवा
संयुक्त परिवार में परिवर्तन के लिए ज़िम्मेदार प्रमुख कारणों की व्याख्या कीजिए।
अथवा
क्या संयुक्त परिवार परिवर्तित/विघटित हो रहे हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर हां में ही है। जी हां, आजकल हमारे विचार से संयुक्त परिवार प्रणाली टूट रही है। ये टूटने का जो सिलसिला है, एक-दो वर्षों में नहीं हुआ, बल्कि यह बदलाव कई वर्षों के परिवर्तन का परिणाम है। यह सभी परिवर्तन कई भिन्न-भिन्न कारणों से आए, जिसके परिणामस्वरूप परिवारों की बनावट और उसके रूप में अद्भुत बदलाव देखने को मिलते हैं, उनमें से कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं, जिनको हम विस्तारपूर्वक इस संदर्भ में देखेंगे-

1. पैसों का महत्त्व (Importance of Money)-आधुनिक समाज में व्यक्ति ने पैसा कमाकर अपनी जीवन शैली में कई तरह के परिवर्तन ला दिए हैं और इस शैली को कायम रखने के लिए उसे हमेशा ज्यादा से ज़्यादा पैसों की ज़रूरत पड़ती है। इस प्रक्रिया में वह अपनी योग्यता के अनुसार अपनी कमाई में बढ़ौतरी करने की कोशिश में लगा रहता है। उसके रहने-सहने का तरीका बदलता जा रहा है और ऐश्वर्य की सभी वस्तुएं आज उसके जीवन के लिए सामान्य और आवश्यकता की वस्तुएं बनती जा रही हैं और इन सभी को पूरा करने के लिए पैसा अति आवश्यक है।

इस तरह हम कह सकते हैं कि वह उन सीमित साधनों से ज़्यादा सदस्यों की ज़रूरतों को पूरा नहीं कर सकता। इस कारण संयुक्त परिवारों का महत्त्व कम हो रहा है और आदमी अपने परिवारों से अलग रहना पसंद करता है। यह उसकी ज़रूरत भी है और मजबूरी भी, इस कारण वह अपने परिवारों से अलग रहने लग गया है।

2. पश्चिमी प्रभाव (Impact of Westernization)-भारत में अंग्रेजों के शासनकाल और उसके बाद भारतीय समाज में कई तरह से सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन हुए, जिससे कि हमारी संस्कृति और व्यवहार इत्यादि में कई जिनके कारण व्यक्तिवाद का जन्म होने लगा। आधनिक शिक्षा प्रणाली ने लोगों के जीवन को से रहने के तरीके सिखाए।

इस तरह से भौतिकतावादी सोच के कारण, आधनिकता की चकाचौंध से लोगों का गांवों से शहरों की ओर पलायन शुरू हो गया और लोगों में संयुक्त परिवार से लगाव कम होना शुरू हो गया। इसका अंत में परिणाम यह निकला कि संयुक्त परिवार प्रणाली टूटने लगी और इकाई अथवा केंद्रीय परिवार का उद्भव शुरू हो गया। लोगों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली और औरतों की स्वतंत्रता के कारण, नौकरी करने वालों का शहरों में पलायन ने संयुक्त परिवारों का अस्तित्व समाप्त करना शुरू कर दिया और टूटना दिन-प्रतिदिन जारी है।

3. औद्योगीकरण (Industrialization) आधुनिक समाज को आज औद्योगिक समाज की संज्ञा दी जाती है। जगह-जगह पर कारखानों और नये-नये तरीकों से समाज में तबदीलियां नज़र आती हैं। हर रोज़ नये-नये आविष्कारों के कारण समाज में कार्य करने के तरीकों एवं मशीनीकरण का चलन बढ़ता जा रहा है। घरों में कार्य करने वाले लोग अब कारखानों में काम करने लगे हैं। लोग अब अपने पैतृक कार्यों को छोड़कर उद्योगों में जा रहे हैं।

लोगों ने महसूस करना शुरू कर दिया है कि इस दौड़ में अगर रहना है तो मशीनों का सहारा लेना ही पड़ेगा और इस बदलाव के कारण, शहरीकरण और भौगोलिक दृष्टि से कारखानों का बढ़ना इत्यादि लोगों को पलायन करवाता है। इस कारण लोगों ने संयुक्त परिवारों को छोड़कर, जहां पर उन्हें रोटी-रोज़ी मिली, वे उधर चल पड़े और यह सभी कुछ हुआ, उद्योगों के लगने की वजह से। इस तरह औद्योगीकरण के कारण संयुक्त परिवार प्रणाली में कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं, जिससे यह बात साफ हो जाती है कि इकाई परिवारों का चलन या अस्तित्व, उद्योगों की वजह से बढ़ रहा है।

4. सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) आधनिक समाज में व्यक्ति की स्थिति. उसकी योग्यता के आधार पर आंकी जाती है। इसलिए उसे ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और ज्यादा धन कमाना पड़ता है। हर व्यक्ति समाज में ऊपर उठना चाहता है। संयुक्त परिवार में व्यक्ति की स्थिति उसकी योग्यता के आधार पर न होकर अपने परिवार की हैसियत के अनुसार आंकी जाती है। इस प्रकार वह परिश्रम ही नहीं करता। औद्योगीकरण और शिक्षा के प्रसार ने व्यक्ति को गतिशील कर दिया है।

यातायात के साधनों और संचार के माध्यम से आदमी के लिए दूरियां कम हो गई हैं। उसका सोचने का तरीका बदलता जा रहा है। इस नए समाज में उसके जिंदगी के मूल्य भी बदल गए और वह भौतिकवाद की ओर अग्रसर है और उसी प्रक्रिया में उसमें भी तेजी आनी स्वाभाविक है और इस कारण वह संयुक्त परिवार के बंधनों से मुक्त होना चाहता है। इसी कारण से भी संयुक्त परिवारों का टूटना निरंतर जारी है।

5. यातायात के साधनों का विकास (Development of means of Communication and Transport) यहीं पर बस नहीं आधुनिक यातायात के साधनों में आया बदलाव भी अपने आप में इस सोच का कारण बना है। व्यक्ति को इन्हीं सुविधाओं के कारण ही नई राहों पर चलना आसान हो गया है। हर क्षेत्र में काम करने की संभावनाओं को इन्हीं साधनों ने बढ़ा दिया है, आज कोई भी व्यक्ति पचास-सौ किलोमीटर को कुछ भी नहीं समझता।

प्राचीन काल में यह सुविधाएं नहीं थीं या बहुत ही कम थीं, इस कारण से लोग एक ही जगह पर रहना पसंद करते थे। आज के युग में इन साधनों ने व्यक्ति की दूरियों को कम कर दिया है। इनकी वजह से भी आदमी बाहर अपने काम-धंधों को आसानी से कर पाता है और संयुक्त परिवार का मोह छोड़कर केंद्रीय परिवार की सभ्यता को अपना रहा है।

6. जनसंख्या में बढ़ोत्तरी (Increase in Population)-भारत में जनसंख्या बड़ी तेज़ी से बढ़ रही है। इससे कुछ ही समय में ही प्रत्येक परिवार में ऐसी स्थिति आ जाती है कि परिवार की भूमि या जायदाद सारे सदस्यों के पालन पोषण के लिए काफ़ी नहीं होती और नौकरी या व्यवसाय की खोज में सदस्यों को परिवार छोड़ना पड़ता है। इसलिए भी संयुक्त परिवारों में विघटन हो रहा है।

7. शहरीकरण और आवास की समस्या (Problem of Urbanization and Immigration) संयुक्त परिवारों के टूटने का एक और महत्त्वपूर्ण कारण देश का तेजी से बढ़ता शहरीकरण है, जिससे लोग गांव छोड़कर शहरों में आ रहे हैं। जबकि शहरों में मकानों की भारी कमी है। शहरों में मकान कम ही नहीं छोटे भी होते हैं। इसलिए मकानों की समस्या के कारण ही शहरों में संयुक्त परिवारों में विघटन हो रहा है।

8. स्वतंत्रता और समानता के आदर्श (Ideals of Independence and Equality) संयुक्त परिवार एक तरह से तानाशाही राजतंत्र है जिसमें परिवार के मुखिया का निर्देश शामिल होता है। इसका कहना सबको मानना पड़ता है व कोई उसके विरुद्ध बोल नहीं सकता। इसलिए यह आधुनिक विचारधारा के विरुद्ध है। आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से नए नौजवान लड़के और लड़कियों में समानता और स्वतंत्रता की भावना से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं।

प्रश्न 14.
परिवार की संस्था में किस प्रकार के परिवर्तन आ रहे हैं? उनका वर्णन करें।
अथवा
परिवार के ढांचे तथा कार्यों में आ रहे परिवर्तनों का वर्णन करें।
अथवा
परिवार की संरचना के बदलते आयाम की व्याख्या कीजिए।
अथवा
संयुक्त परिवार में प्रमुख परिवर्तन क्या-क्या हुए हैं?
अथवा
परिवार में हुए किन्हीं दो परिवर्तनों का वर्णन करें।
अथवा
परिवार का अर्थ बताते हुए परिवार की संरचना में हुए नवीन परिवर्तनों पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
परिवर्तन प्रकृति का नियम है। इस संसार में कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसमें उसके उत्पन्न होने से लेकर खत्म होने तक कोई परिवर्तन न आया हो। इस प्रकार समाज में सामाजिक संस्थाएं भी, जो हमारी सहायता के लिए बनाई गई थीं, इन सामाजिक संस्थाओं में भी समय के साथ-साथ परिवर्तन आ रहे हैं। इसी प्रकार परिवार नाम की संस्था शरू हई थीं उस समय से लेकर आज तक इसमें बहत परिवर्तन आ चके हैं।

उसके ढांचे के साथ-साथ कार्यों में भी बहुत से परिवर्तन आए हैं। ढांचा पक्ष से पहले संयुक्त परिवार होते थे अब वह केंद्रीय परिवारों में बदल रहे हैं। कार्यात्मक पक्ष से भी बहुत परिवर्तन आए हैं तथा इसके बहुत से कार्य और संस्थाओं के पास चले गए हैं। परिवार में आए परिवर्तनों का वर्णन इस प्रकार है-
1. केंद्रीय परिवारों का बढ़ना (Increasing Nuclear Families)-भारतीय समाज का एक परंपरागत ग्रामीण समाज है जहां पर प्राचीन समय में संयुक्त परिवार पाए जाते थे। मुख्य पेशा कृषि होने के कारण परिवार में अधिक सदस्यों की आवश्यकता पड़ती थी। इसलिए संयुक्त परिवार हमारे समाज में पाए जाते थे। परंतु समय के साथ-साथ शिक्षा के बढ़ने से तथा सामाजिक गतिशीलता के बढ़ने से लोग शहरों की तरफ जाने लगे। लोग संयुक्त परिवारों को छोड़कर शहरों में जाकर केंद्रीय परिवार बसाने लगे। इस प्रकार परिवार के ढांचे पक्ष में परिवर्तन आने लग गए तथा संयुक्त परिवारों की जगह केंद्रीय परिवार सामने आने लग गए।

2. आर्थिक कार्यों में परिवर्तन (Change in Economic Functions)-परिवार के आर्थिक कार्यों में भी बहुत से परिवर्तन आए हैं। प्राचीन समय में तो व्यक्ति की आर्थिक क्रियाएं परिवार के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रहती थीं। कार्य परिवार दवारा ही होता था तथा रोटी बनाने या कमाने के कार्य परिवार में ही होते थे जैसे कि गेहूँ उगाने का कार्य या आटा पीसने का कार्य। परिवार में ही जीवन जीने के सभी साधन मौजूद थे।

परंतु समय के साथ-साथ समाज में परिवर्तन आए तथा हमारे समाजों में औद्योगिकीकरण शुरू हुआ। परिवार के आर्थिक कार्य उद्योगों के पास चले गए हैं जैसे कि आटा अब चक्कियों पर पिसता है अथवा कपड़ा बड़ी-बड़ी मिलों में बनता है। इस प्रकार परिवार के आर्थिक उत्पादन के कार्य धीरे-धीरे खत्म हो गए तथा परिवार के आर्थिक कार्य और संस्थाओं के पास चले गए।

3. शैक्षिक कार्यों का परिवर्तित होना (Changes in Educational Functions)-प्राचीन समय में बच्चों को शिक्षा देने का कार्य या तो गुरुकुल में होता था या फिर घर में। बच्चा अगर गुरु के पास शिक्षा लेने जाता भी था तो उसे केवल वेदों, पुराणों इत्यादि की शिक्षा ही दी जाती थी। उसे पेशे अथवा कार्य से संबंधित कोई शिक्षा नहीं दी जा थी तथा यह कार्य परिवार द्वारा ही किया जाता था।

प्रत्येक जाति अथवा परिवार का एक परंपरागत पेशा होता था तथा उस पेशे से संबंधित गुर भी उस परिवार को पता होते थे। वह परिवार अपने बच्चों को धीरे-धीरे पेशे से संबंधित शिक्षा देता जाता था तथा बच्चों की शिक्षा पूर्ण हो जाती थी। परंतु समय के साथ-साथ परिवार के इस कार्य में परिवर्तन आया है।

अब पेशों से संबंधित शिक्षा देने का कार्य परिवार नहीं बल्कि सरकार द्वारा खोले गए Professional Colleges, Medical Colleges, Engineering Colleges, I.I.M.’s, I.I.T.’s, I.T.I.’s Fruit करते हैं। बच्चा इनमें से पेशे से संबंधित शिक्षा ग्रहण करके अपना स्वयं का पेशा अपनाता है तथा परिवार का परंपरागत पेशा छोड़ देता है। इस प्रकार परिवार का शिक्षा देने का परंपरागत कार्य और संस्थाओं के पास चला गया है।

4. पारिवारिक एकता का कम होना (Decreasing Unity of Family)-प्राचीन समय में संयुक्त परिवार हुआ करते थे तथा परिवार के सभी सदस्य परिवार के हितों के लिए कार्य करते थे। वह अपने हितों को परिवार के हितों पर त्याग देते थे। परिवार के सदस्यों में पूर्ण एकता होती थी। सभी सदस्य परिवार के बुजुर्ग की बात माना करते थे तथा अपने फर्ज़ अच्छे ढंग से पूर्ण किया करते थे। परंतु समय के साथ-साथ पारिवारिक एकता में कमी आई।

संयुक्त परिवार खत्म होने शुरू हो गए तथा केंद्रीय परिवार सामने आने लग गए। परिवार के सभी सदस्यों के अपने अपने हित होते हैं तथा कोई भी परिवार के हितों पर अपने हितों का त्याग नहीं करता है। सभी के अपने-अपने आदर्श होते हैं जिस कारण कई बार तो वह घर ही छोड़ देते हैं। इस प्रकार समय के साथ-साथ पारिवारिक एकता में कमी आई है।

5. सामाजिक कार्यों में परिवर्तन (Change in Social Functions)-परिवार के सामाजिक कार्य भी काफी बदल गए हैं। प्राचीन समय में परिवार सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में काफी महत्त्वपूर्ण कार्य करता था। परिवार दस्यों पर पर्ण नियंत्रण रखता था। उसकी अच्छी-बरी आदतों पर नज़र रखता था तथा उसे समय-समय पर ग़लत कार्य न करने की चेतावनी देता था। सदस्य भी परिवार के बुजुर्गों से डरते थे, जिस कारण वह नियंत्रण में रहते थे। परंतु समय के साथ-साथ व्यक्ति पर पारिवारिक नियंत्रण कम होने लग गया तथा नियंत्रण के औपचारिक साधन सामने आने लग गए जैसे कि पुलिस, सेना, न्यायालय, जेल इत्यादि।

इसके साथ प्राचीन समय में स्त्री अपने पति को परमेश्वर समझती थी तथा उसे भगवान् का दर्जा देती थी। पति की इच्छा के सामने वह अपनी इच्छा का त्याग कर देती थी। परंतु अब यह धारणा बदल गई है। अब पत्नी पति को परमेश्वर नहीं बल्कि अपना साथी अथवा दोस्त समझती है जिससे कि वह अपनी समस्याएं साझी कर सके।

पहले परिवार बच्चों का पालन-पोषण करते थे तथा बच्चों के बड़ा होने तक उनका उत्तरदायित्व निभाते थे। परंतु आजकल के समय में केंद्रीय परिवार होते हैं तथा स्त्रियां नौकरी करती हैं जिस कारण बच्चा परिवार में नहीं पलता बल्कि क्रेचों में पलता है। इस प्रकार परिवार के बहुत से सामाजिक कार्य बदल कर और संस्थाओं के पास चले गए हैं।

6. धार्मिक कार्यों में परिवर्तन (Change in Religious Functions)-प्राचीन समय में चाहे बच्चों को गुरु के आश्रम में धार्मिक शिक्षा दी जाती थी तथा उसे वहीं पर वेदों, पुराणों इत्यादि की शिक्षा दी जाती थी परंतु फिर भी परिवार उसे धार्मिक शिक्षा भी देता था। उसे धर्म तथा नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता था। समय-समय पर परिवार में धार्मिक संस्कार, यज्ञ तथा अनुष्ठान होते रहते थे जिससे बच्चों को धर्म के बारे में काफी कुछ पता चलता रहता था। इस प्रकार परिवार में ही बच्चों की धार्मिक शिक्षा हो जाती थी। परंतु समय के साथ बहुत से आविष्कार हुए, की तथा विज्ञान प्रत्येक बात को तर्क पर तोलता है।

लोग विज्ञान की शिक्षा लेकर धर्म को भूलने लग गए। अब लोग प्रत्येक धार्मिक संस्कार को तर्क की कसौटी पर तोलने लग गए हैं कि यह क्यों और कैसे है। अब लोगों के पास धार्मिक अनुष्ठानों के लिए समय नहीं है। अब लोग धार्मिक कार्यों के लिए थोड़ा-सा ही समय निकाल पाते हैं तथा वह भी अपने समय की उपलब्धता के अनुसार। अब लोग विवाह जैसे धार्मिक संस्कार को सामाजिक उत्सव की तरह मनाते हैं ताकि अधिक से अधिक लोगों को बुलाया जा सके। लोग इनमें अधिक से अधिक पैसा खर्च जिस कारण धार्मिक क्रियाओं का महत्त्व कम हो गया है। इस प्रकार परिवार में धार्मिक कार्य कम हो गए हैं।

इस प्रकार इस व्याख्या को देखकर हम कह सकते हैं कि परिवार के कार्यों तथा ढांचे में बहुत परिवर्तन आ गए हैं। परिवार के बहुत से कार्य और संस्थाओं के पास चले गए। चाहे यह परिवर्तन समय के साथ-साथ आए हैं परंतु फिर भी हम कह सकते हैं कि परिवार का व्यक्ति के जीवन में जो महत्त्व है उसका स्थान कोई और संस्था नहीं ले सकती है।

प्रश्न 15.
परिवार से सामाजिक कार्यों की व्याख्या करें।
उत्तर:
(i) बच्चों का समाजीकरण (Socialization of Children) बच्चों का समाजीकरण करने में परिवार सबसे महत्त्वपूर्ण साधन है। अगर बच्चा परिवार में रहकर अच्छी आदतें सीखता है तो उससे वह समाज का एक अच्छा नागरिक बनता है। बच्चे का समाज के साथ संपर्क भी परिवार के कारण ही स्थापित होता है। बच्चा जब पैदा होता है तो वह सबसे पहले अपने माता-पिता पर निर्भर होता है क्योंकि उसकी भूख-प्यास जैसी ज़रूरतें परिवार ही पूर्ण करता है। व्यक्ति को परिवार से ही समाज स्थिति तथा भूमिका भी प्राप्त होती है। व्यक्ति को अगर कोई पद प्रदान किया जाता है तो वह भी परिवार के कारण ही किया जाता है। इस प्रकार परिवार व्यक्ति के समाजीकरण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(ii) संस्कृति की सुरक्षा तथा हस्तांतरण (Protection and transmission of culture)-जो कुछ भी आज तक मनुष्य ने प्राप्त किया है वह उसकी संस्कृति है तथा यह संस्कृति परिवार के कारण ही सुरक्षित रहती है तथा पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित की जाती है। यह प्रत्येक परिवार का उत्तरदायित्व होता है कि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को अच्छी-अच्छी आदतें, रीति-रिवाज, परंपराएं, मूल्य, आदर्श इत्यादि सिखाए। बच्चे चेतन या अचेतन मन से यह सब धीरे-धीरे ग्रहण करते हैं।

वह वही सब कुछ सीखते तथा ग्रहण करते हैं जो वह अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। प्रत्येक परिवार के कुछ आदर्श, परंपराएं तथा रीति-रिवाज होते हैं तथा परिवार इन सभी चीज़ों को धीरे-धीरे बच्चों को प्रदान करता जाता है। इस प्रकार बच्चा इन सभी को ग्रहण करता है तथा परिवार के आदर्शों के अनुसार जीवन व्यतीत करता है। इस प्रकार परिवार समाज की संस्कति को सरक्षित रखता है तथा उसे एक पीढी से दसरी पीढ़ी की तरफ हस्तांतरित करती है।।

(iii) व्यक्तित्व का विकास (Development of personality) परिवार में रहकर बच्चा बहुत सी नई आदतें सीखता है, बहुत-से नए आदर्श, मूल्य इत्यादि ग्रहण करता है जिससे उसका समाजीकरण होता रहता है। परिवार व्यक्ति की ग़लत प्रवृत्तियों को नियंत्रित करता है, उसे कई प्रकार के उत्तरदायित्व सौंपता है, उसमें अच्छी आदतें डालता है तथा उसमें स्वः का विकास करने में सहायता करता है।

परिवार में रहकर ही बच्चे में बहुत-से गुणों का विकास होता है जैसे कि प्यार, सहयोग, अनुशासन, हमदर्दी इत्यादि तथा यह सब कुछ उसके व्यक्तित्व के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। बच्चे को परिवार में रहकर कई प्रकार की शिक्षा प्राप्त होती है जिससे उसका व्यक्तित्व और विकसित हो जाता है तथा वह समाज में रहने के तौर-तरीके सीखता जाता है।

(iv) व्यक्ति को स्थिति प्रदान करना (To provide status to individual)-परिवार में बच्चे को यह पता चल जाता है कि परिवार में और समाज में उसकी स्थिति क्या है तथा उसे कौन-सी भूमिका निभानी है। प्राचीन समाजों में तो बच्चे को प्रदत्त स्थिति प्राप्त हो जाती थी अर्थात् जिस प्रकार के परिवार में वह जन्म लेता था उसे उसकी ही स्थिति प्राप्त हो जाती थी।

उदाहरण के तौर पर राजा के परिवार में पैदा हुए बच्चे को राजा जैसा सम्मान प्राप्त हो जाता था तथा निर्धन के घर पैदा हुए बच्चे को न के बराबर सम्मान प्राप्त होता था। निर्धन व्यक्ति के बच्चों की स्थिति हमेशा निम्न होती थी। इस प्रकार परिवार के कारण ही व्यक्ति को समाज में स्थिति प्राप्त होती थी। चाहे आधुनिक समय में व्यक्ति स्थिति को अर्जित करने में लग गए हैं परंतु फिर भी परंपरागत समाजों में आज भी व्यक्ति को प्रदत्त स्थिति प्राप्त होती है। इस प्रकार परिवार व्यक्ति को स्थिति प्रदान करता है।

(v) व्यक्ति पर नियंत्रण रखना (To keep control on individual)-अगर हम सामाजिक नियंत्रण के साधनों की तरफ देखें तो परिवार की इसमें सबसे बड़ी भूमिका है क्योंकि परिवार ही व्यक्ति को नियंत्रण में रहना सिखाता है। परिवार बच्चे में अच्छी-अच्छी आदतें डालता है ताकि उसमें ग़लत आदतों का विकास न हो सके। बच्चे पर माता पिता नियंत्रण रखते हैं, उस के झूठ बोलने पर उसे डाँटते हैं, उसे बड़ों के साथ सही प्रकार से बोलने के लिए कहते हैं, उसे समाज द्वारा बनाए गए नियमों के बारे में बताते हैं ताकि वह समाज का ज़िम्मेदार नागरिक बन सके तथा समाज में उनके परिवार का सम्मान और बढ़ जाए। परिवार में रहकर बच्चा अनुशासन में रहना सीखता है तथा अपने व्यवहार और क्रियाओं पर नियंत्रण रखना सीखता है।

अगर बच्चा परिवार के सदस्यों के साथ ही ठीक ढंग से व्यवहार नहीं करेगा तो वह समाज के और सदस्यों के साथ ठीक ढंग से कैसे व्यवहार करेगा। बच्चा परिवार के दूसरे सदस्यों को कार्य करता देखकर बहुत-सी बातें सीखता है। अगर परिवार के सदस्य ग़लत कार्य करेंगे तो बच्चा भी वह सब कुछ ग्रहण करेगा परंतु अगर परिवार के सदस्य ग़लत कार्य न करके अच्छी बातें करेंगे तो बच्चे भी अच्छी बातें करेंगे तथा वे नियंत्रण में रहेंगे। इस प्रकार परिवार सामाजिक नियंत्रण के साधन के रूप में बहुत ही महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।

(vi) विवाह करने में सहायता प्रदान करना (To give help in settling marriage) अगर कोई व्यक्ति विवाह करना चाहे तो सबसे पहले उससे परिवार, खानदान या वंश के बारे में पूछा जाता है ताकि उसकी पृष्ठभूमि के बारे में पता चल सके। अगर वह अच्छे परिवार से संबंध रखता है तो विवाह करने में कोई परेशानी नहीं होती परंतु अगर वह किसी निम्न श्रेणी के परिवार से संबंध रखता है तो विवाह करने में काफ़ी समस्या आती है। परिवार अपने बच्चों का विवाह करवाना अपना कर्तव्य समझता है ताकि वंश आगे बढ़ सके। अगर परिवार यह कर्तव्य पूर्ण नहीं करता तो उसे समाज में अच्छी स्थिति प्राप्त नहीं होती। इसलिए परिवार व्यक्ति का विवाह करने में सहायता प्रदान करता है।

(vii) पेशा प्रदान करना (To provide occupation)-चाहे आजकल के समय में तो परिवार का यह कार्य काफ़ी कम हो गया है परंतु प्राचीन समाजों में तथा परंपरागत समाजों में भी यह कार्य काफ़ी महत्त्वपूर्ण होता है। भारतीय समाज में प्राचीन समय में जाति प्रथा प्रचलित थी जिसमें चार महत्त्वपूर्ण वर्ण हुआ करते थे-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र।

प्रत्येक वर्ग में पैदा हुआ बच्चा केवल अपने ही वर्ण का पेशा अपना सकता था अर्थात् ब्रा परिवार में पैदा हुआ बच्चा केवल ब्राह्मण का ही कार्य कर सकता था तथा शूद्र परिवार में घर पैदा हुआ बच्चा केवल उस परिवार का ही कार्य अपना सकता था। चाहे आधुनिक समय में यह कार्य कम हो गया है तथा लोक परिश्रम करके अपनी मर्जी का पेशा अपना रहे हैं परंतु फिर भी व्यापारियों, दुकानदारों के बच्चे अपने परिवार का पेशा ही अपनाते बाह्मण हैं।

(viii) शिक्षा देना (To give education)-जब बच्चा पैदा होता है तो उसे समाज में रहने के नियम पता नहीं होते हैं। उसमें पशु प्रवृत्ति होती है तथा वह प्रत्येक चीज़ को अपना समझता है। परिवार ही उस की पशु प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखता है तथा उसे समाज में रहने के नियम सिखाता है। इस प्रकार बच्चे को सबसे पहली शिक्षा परिवार में ही प्राप्त होती है। धर्म की शिक्षा, पेशे की शिक्षा, नियम सीखने की शिक्षा इत्यादि जैसी शिक्षा बच्चे को परिवार में ही मिलती है। चाहे आजकल के समय में औपचारिक शिक्षा देने का कार्य और संस्थाओं के पास चला गया है, परंतु फिर भी बच्चे को शिक्षा देने का कार्य परिवार ही करता है।

प्रश्न 16.
नातेदारी क्या होती है? इसके प्रकार बताओ।
उत्तर:
मानव इतिहास के आरंभिक चरणों से ही अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये मनुष्यों ने समूहों एवं झुंडों में रहना आरंभ किया। उसके द्वारा निर्मित समूह ही नातेदारी व्यवस्था के उद्विकास का प्रथम चरण था। उद्विकास की लंबी प्रक्रिया से गुजरने के बाद ही यह वर्तमान स्वरूप में विकसित हुई।

समाजों की पृष्ठभूमि, सामाजिक संस्कृति, आर्थिक दशाओं द्वारा नातेदारी का स्वरूप एवं आकार निर्धारित किया जाता है। नातेदारी सर्वव्यापी संस्था है। लेकिन सभी समाजों में इसका स्वरूप, रीतियां, संबंधों की घनिष्ठता तथा घनिष्ठ संबंधियों की संख्या में अंतर पाया जाता है। नातेदारी के लिये बंधुत्व, संगोत्रता एवं स्वजनता आदि संज्ञाओं का प्रयोग किया जाता है।

नातेदारी व्यवस्था का अर्थ (Meaning of Kinship System) रैडक्लिफ ब्राऊन के शब्दों में, “नातेदारी सामाजिक उद्देश्यों के लिये स्वीकृत वंश संबंध है जो कि सामाजिक संबंधों के परंपरात्मक संबंधों का आधार है।”

लैवी स्ट्रास के अनुसार, “नातेदारी व्यवस्था विचारों की एक निरंकुश व्यवस्था है। नातेदारी व्यवस्था में समाज द्वारा मान्यता प्राप्त वे संबंध आते हैं जो कि अनुमानित और वास्तविक संबंधों पर आधारित हों। नातेदारी की यह परिभाषा ‘तिनिक’ ने मानव शास्त्र के शब्द कोष में दी है।” ‘फ़ॉक्स’ ने अपनी कृति ‘नातेदारी एवं विवाह’ में लिखा है “नातेदारी केवल मात्र स्वजन अर्थात् वास्तविक, ख्यात अथवा कल्पित समरक्तता वाले व्यक्तियों के मध्य संबंध है।”

डॉ० रिवर्स ने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक संगठन’ में लिखा है संगोत्रता (बंधुत्व) की मेरी परिभाषा उस संबंध से है जो वंशावलियों के माध्यम से निर्धारित एवं वर्णित की जा सकती है। अतः स्पष्ट है कि नातेदारी ऐसे संबंधियों के बीच संबंधों की व्यवस्था होती है जिनसे हमारा संबंध वंशावली के आधार पर होता है। वंशावली संबंध परिवार के द्वारा विकसित होते हैं।

नातेदारी व्यवस्था के प्रकार/आधार
(Types/Bases of Kinship)
नातेदारी व्यवस्था समाज में दो आधारों पर विकसित होती है-

  • रक्तमूलक नातेदारी (Consenguineous Kinship)
  • विवाहमूलक नातेदारी (Affinal Kinship)

1. रक्तमूलक नातेदारी (Consenguineous Kinship)-रक्तमूलक नातेदारी वह होती है, जिसमें केवल उन्हीं व्यक्तियों को सम्मिलित किया जाता है, जो आपस में रक्त द्वारा संबंधित होते हैं। जैसे माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-ताया-दादा-पिता, पुत्र-पौत्र इत्यादि सब एक-दूसरे से रक्त संबंधी होते हैं। रक्त संबंध के भी दो मूलाधार होते हैं-

  • मातृवंश
  • पितृवंश।

माता के वंश के सभी सदस्य व्यक्ति के रक्त संबंधी होते हैं। इसी प्रकार पिता के रिश्तेदार भी आपस में रक्त संबंधी होते हैं। चाचा, ताया, दादा आदि पिता के वंश तथा मामा, नाना, नानी आदि माता के वंश के रक्त संबंधी हैं।

रक्त संबंधी दो प्रकार के होते हैं-

  • रेखीय नातेदारी (Lineal Kinship)
  • क्षैतिज नातेदारी (Collateral Kinship)।

1. रेखीय नातेदारी में संबंधियों के बीच रक्त संबंध एक रेखा के रूप में होता है, जैसे-परदादा, दादी, पिता, पुत्र, पौत्र इत्यादि। क्षैतिज संबंधी वे होते हैं, जिनका सीधा रक्त संबंध नहीं होता। फिर भी एक ही पूर्वज के साथ संबंधित होने के कारण आपस में रक्त संबंधी होते हैं; जैसे चाचा, ताया, भतीजी इत्यादि। रक्त संबंध वास्तविक के अतिरिक्त काल्पनिक भी होता है। जैसे कई जनजातियों में बहुपति विवाह प्रथा पाई जाती है।

वहां जो भाई पत्नी के गर्भवती होने पर तीर-कमान का संस्कार पूरा करता है, वही होने वाली संतान का पिता माना जाता है। इसी तरह किसी व्यक्ति के द्वारा गोद ली गई संतान भी उसकी अपनी संतान मानी जाती है। अतः यह आवश्यक नहीं कि पिता व संतान का आपस में जैवकीय संबंध (Biological relationship) हो। फिर भी वह रक्त संबंधी माने जाते हैं।

2. विवाहमूलक नातेदारी (Affinal Kinship)-विवाहमूलक नातेदारी ऐसी नातेदारी है जो दो विषम लिंगियों के बीच समाज की स्वीकृति द्वारा स्थापित की जाती है। विवाह के द्वारा पति-पत्नी ही विवाह संबंधी नहीं बनते बल्कि पत्नी के सब रिश्तेदार पति के लिये और पति के सब नातेदार पत्नी के लिये विवाह संबंधी होते हैं। अतः विवाह द्वारा नातेदारी में लगभग दुगुणी वृद्धि हो जाती है। विवाहमूलक नातेदारी में सास, ससुर, जीजा, ननद, साला, साली, बहनोई, ज्येष्ठ, बहु, देवर आदि रिश्तेदार सम्मिलित होते हैं।

प्रश्न 17.
आज के समय में नातेदारी का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
नातेदारी की भूमिका एवं महत्त्व (Role and Importance of Kinship)-नेलसन ग्रेबन ने अपनी कृति “Reading in Kinship’ में लिखा है, “नातेदारी व्यवस्था सर्वव्यापी है। सामाजिक संगठन को समझने के लिये नातेदारी संस्थाओं का ज्ञान महत्त्वपूर्ण है।” डॉ० रिवर्स कहते हैं, “अनेक भारतीय मानव शास्त्रियों (Anthropologists) ने नातेदारी के विभिन्न पक्षों का अध्ययन कर मानव शास्त्रीय ज्ञान को समृद्ध बनाया है।” उन्होंने नातेदारी के मानवशास्त्र के अंतर्गत विकसित किये माडलों (Models) को नातेदारी के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिये प्रयोग किया। नातेदारी को भूमिका एवं महत्त्व का संक्षिप्त वर्णन विभिन्न शीर्षकों के अंतर्गत अधोलिखित है

1. परिस्थति निर्धारण (Determination of Status)-नातेदारी व्यक्ति की जन्म से सामाजिक प्रस्थिति को निर्धारित करती है। उच्च परिवार एवं नातेदारी से संबंधित व्यक्ति की सामाजिक प्रस्थिति उच्च होती है। उदाहरणार्थ राजनीति में मंत्री, एम० एल० ए०, एम० पी० नौकरी में उच्च पद पर कार्यरत तथा उच्च स्तर के वाणिज्य व्यापार करने वालों के परिवार जनों एवं रिश्तेदारों को उच्च प्रस्थिति प्राप्त होती है। चाहे व्यक्ति की निजी उपलब्धियां भी कम हों।

2. वंश एवं उत्तराधिकार का निर्धारण (Determination of Descent and Inheritance)-वंश व्यक्ति का मूल (Root) होता है। परिवार, वंश, गोत्र, मातदल नातेदारी के ही अंग हैं। किस व्यक्ति को अपने पूर्वजों की संपत्ति, चल-अचल, भौतिक-अभौतिक का हस्तांतरण होगा। कौन व्यक्ति उत्तराधिकारी होगा तथा उत्तराधिकार के कितने भाग का उसे अधिकार होगा, ये सब बातें नातेदारी के सदस्यों में विभिन्न नियमों द्वारा तय की जाती हैं।

लूसी मेयर ने अपनी कृति ‘सामाजिक विज्ञान की भूमिका’ में इस संबंध में लिखा है, “किसी व्यक्ति का समाज में स्थान, उसके अधिकार और कर्तव्य, संपत्ति पर उसका दावा अधिकतर दूसरे सदस्यों के साथ, उसके जन्मजात संबंधों पर निर्भर करते हैं। ऐसे समाज में संगठन के चाहे जो भी सिद्धांत हों प्राथमिक समूह व तथा उत्तराधिकार निर्धारित किया जाता है।”

3. समाजीकरण (Socialization)-परिवार एवं परिवारों की समूह नातेदारी व्यक्ति के समाजीकरण की प्राथमिक एजेंसियां (Agencies) हैं। नवजात शिशु सर्वप्रथम अपनी नातेदारी माता-पिता इत्यादि के संपर्क में आता है। वहीं से वह जैविकीय प्राणी (Biological Being) से सामाजिक प्राणी बनना प्रारंभ करता है। संबंधी उसे चलना, बोलना, भाषा, सामाजिक मूल्य तथा व्यवहार के तरीके सिखाते हैं।

4. सामाजिक सुरक्षा (Social Security)-अपने सदस्यों को नातेदारी द्वारा सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने का महत्त्वपूर्ण कार्य किया जाता है। व्यक्ति को जीवन में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। कई बार वह समस्याओं को सफलतापूर्वक सुलझा लेता है। लेकिन कई बार असफलता ही उसके हाथ लगती है। ऐसी स्थिति में परिवार के अन्य संबंधी ही उसे ढांढस बंधवाते हैं। आकस्मिक मृत्यु, आपदा, विपत्ति दुःख, असफलता आदि प्रतिकूल परिस्थितियों में नातेदारी व्यक्ति को उभारने में सहायता करता है। विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसको सहयोग भी देती है।

5. आर्थिक हितों की सुरक्षा (Safeguard of Economic Interests)-नातेदार व्यक्ति के आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं। भारतीय समाज में तो इस क्षेत्र में नातेदारी का महत्त्वपूर्ण स्थान है क्योंकि नातेदारी व्यक्ति को जातिगत व्यवसाय सीखने तथा अपनाने में सहायता करती है। लूसी मेयर द्वारा नातेदारी व्यक्ति के आर्थिक हितों की सुरक्षा प्रदान करने के संबंध में लिखती है, “विभिन्न समाजों में स्वीकृत बंधुत्व के बंधन लोगों को खेती तथा जायदाद पर अधिकार, समान हितों की पूर्ति में परस्पर सहायता तथा दूसरों पर आधिपत्य प्रदान करते हैं। प्रभुता प्राप्त लोगों पर यह दायित्व रहता है कि वे आश्रितों का कल्याण करें। आश्रितों का धर्म आज्ञा पालन है। सभी लोगों का कर्तव्य है कि ऐसे अवसरों पर जहां बंधुत्व (नातेदारी) की मान्यता का प्रश्न है परस्पर सहयोग करें।”

6. मानव शास्त्रीय ज्ञान का आधार (Basis of Anthropological Knowledge)-विश्वभर के प्रमुख मानव शास्त्रियों के प्रारंभिक अध्ययन नातेदारी से ही संबंधित थे। उन्होंने सामाजिक संरचना की इस आधारभूत इकाई का पर्याप्त ज्ञान एकत्रित किया। मैलीनोवस्की, ब्राऊन, मार्गन, लौवी तथा हैनरीमैन आदि मानव शास्त्री उनमें से प्रमुख हैं। इन समाज शास्त्रियों के अध्ययनों से विवाह, परिवार एवं नातेदारी के उदविकास के विभिन्न चरणों का ज्ञान होना प्राप्त होता है।

7. सामाजिक संरचना को समझने में सहायक (Helpful in Understanding Social Structure) सामाजिक संरचना विशेषतः भारतीय सामाजिक संरचना को समझने के लिए नातेदारी के विभिन्न पहलुओं का ज्ञान आवश्यक है। विभिन्न रिश्तेदार आपस में विशेष प्रकार से व्यवहार करते हैं। इसके लिए नातेदारी की रीतियों को समझने की आवश्यकता है। ससुर के समक्ष आने पर बहू द्वारा एकदम चूंघट डाल लेना, पत्नी द्वारा पति के निकटतम संबंधी का नाम न लेना इत्यादि सामाजिक वास्तविकताओं को तभी समझा जा सकता है, यदि नातेदारी व्यवस्था का ज्ञान हो।

8. सामाजिक नियंत्रण (Social Control) नातेदारी सामाजिक नियंत्रण में महत्त्वपर्ण भमिका अभिनीत करती है। विभिन्न रिश्तेदारों को कैसे संबोधित किया जाए, उनके साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाए, बड़ों का आदर, छोटों से प्यार, आदि मूल्यों को नातेदारी अनुपालना सुनिश्चित करवाती है। नातेदारी होने के अहसास मात्र से व्यक्ति कई अवांछनीय कार्य नहीं करते हैं।

प्रत्येक समाज में नातेदारी व्यवस्था पायी जाती है। लेकिन किन तथा कितने व्यक्तियों के बीच घनिष्ठ संबंध पाए जाते हैं, ये प्रत्येक समाज में प्रचलित मूल्यों पर निर्भर करता है। भारतीय समाज में साधारणतया नातेदारी व्यवस्था के अंतर्गत पश्चिमी समाज की अपेक्षा कहीं अधिक संबंधी आते हैं। संबंधी का स्वरूप एवं क्षेत्र सामाजिक मूल्य तय करते हैं। नातेदारी व्यवस्था निश्चित रूप से व्यक्ति के व्यवहारों को नियंत्रित करती है तथा समाज में संगठन, संतुलन, भाईचारे आदि को बढ़ावा देती है।

HBSE 12th Class Sociology Important Questions Chapter 3 सामाजिक संस्थाएँ : निरन्तरता एवं परिवर्तन Read More »