Class 12

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए-

1. संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन किसकी अध्यक्षता में हुआ?
(A) भीमराव अंबेडकर
(B) डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा
(C) बी० एन० राव
(D) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
उत्तर:
(B) डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा

2. संविधान सभा के स्थायी अध्यक्ष थे
(A) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(B) डॉ० भीमराव अंबेडकर
(C) एस० एस० मुखर्जी
(D) सरदार पटेल
उत्तर:
(A) डॉ० राजेंद्र प्रसाद

3. संविधान सभा के सम्मुख ‘उद्देश्य प्रस्ताव’ किसने पारित किया?
(A) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(B) डॉ० भीमराव अंबेडकर
(C) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(D) सरदार पटेल
उत्तर:
(C) पंडित जवाहरलाल नेहरू

4. भारतीय संविधान पास हुआ
(A) 15 अगस्त, 1947
(B) 26 नवंबर, 1949
(C) 26 जनवरी, 1950
(D) 26 नवंबर, 1950
उत्तर:
(B) 26 नवंबर, 1949

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

5. संविधान सभा के सदस्यों की संख्या थी-
(A) 393
(B) 389
(C) 289
(D) 489
उत्तर:
(B) 389

6. संविधान सभा की प्रथम बैठक कहाँ हुई थी?
(A) दिल्ली
(B) बम्बई
(C) कलकत्ता
(D) मद्रास
उत्तर:
(A) दिल्ली

7. संविधान सभा की बैठकें हुईं
(A) लगभग 166
(B) लगभग 184
(C) लगभग 267
(D) लगभग 195
उत्तर:
(A) लगभग 166

8. ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ किसने लिखा था?
(A) अबुल फज़ल ने
(B) मोहम्मद इकबाल ने
(C) बर्नी ने
(D) फिरदौसी ने
उत्तर:
(B) मोहम्मद इकबाल ने

9. भारतीय संविधान लागू हुआ
(A) 26 जनवरी, 1949
(B) 26 जनवरी, 1950
(C) 15 अगस्त, 1950
(D) 26 नवंबर, 1949
उत्तर:
(B) 26 जनवरी, 1950

10. भारतीय संविधान सभा का निर्माण किस योजना के अंतर्गत किया गया?
(A) क्रिप्स योजना
(B) कैबिनेट मिशन योजना
(C) वेवल योजना
(D) गाँधी योजना
उत्तर:
(B) कैबिनेट मिशन

11. संविधान सभा का गठन हुआ
(A) 1944 ई० में
(B) 1942 ई० में
(C) 1946 ई० में
(D) 1950 ई० में
उत्तर:
(C) 1946 ई० में

12. संविधान सभा के चुनाव कब हुए थे ?
(A) जुलाई, 1946 ई०
(B) जुलाई, 1945 ई०
(C) जुलाई, 1944 ई०
(D) जून, 1946 ई०
उत्तर:
(A) जुलाई, 1946 ई०

13. धर्मनिरपेक्ष राज्य का अर्थ क्या था?
(A) एक धर्म पर आधारित राज्य
(B) सभी धर्मों का आदर
(C) हिन्दू धर्म के पक्ष में
(D) इस्लाम के पक्ष में
उत्तर:
(A) सभी धर्मों का आदर

14. संविधान सभा की कितनी धाराएँ हैं?
(A) 390
(B) 392
(C) 395
(D) 398
उत्तर:
(C) 395

15. संविधान सभा के सवैधानिक सलाहकार कौन थे?
(A) डॉ० बी० एन० राय
(B) सरदार पटेल
(C) डॉ० बी० आर० अम्बेडकर
(D) पंडित जवाहरलाल नेहरू
उत्तर:
(A) डॉ० बी० एन० राय

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन कब व किसकी अध्यक्षता में हुआ?
उत्तर:
संविधान सभा का प्रथम अधिवेशन 9 दिसंबर, 1946 को डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में हुआ।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ० राजेंद्र प्रसाद भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष थे।

प्रश्न 3.
संविधान की प्रारूप समिति का गठन कब हुआ?
उत्तर:
संविधान की प्रारूप समिति का गठन 29 अगस्त, 1947 को हुआ।

प्रश्न 4.
संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष कौन थे?
उत्तर:
डॉ०. भीमराव अंबेडकर संविधान सभा की प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे।

प्रश्न 5.
संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार कौन थे?
उत्तर:
संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार श्री बी० एन० राव थे।

प्रश्न 6.
भारतीय संविधान कब पारित हुआ? उत्तर-भारतीय संविधान 26 नवंबर, 1949 को पारित हुआ।

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान कब लागू हुआ?
उत्तर:
भारतीय संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।

प्रश्न 8. भारतीय संविधान में कितनी धाराएँ हैं?
उत्तर:
भारतीय संविधान में 395 धाराएँ हैं।

प्रश्न 9.
भारतीय संविधान ने भारत को कैसा राज्य घोषित किया?
उत्तर:
भारतीय संविधान ने भारत को संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य घोषित किया।

प्रश्न 10.
भारत की राष्ट्रभाषा क्या है?
उत्तर:
भारत की राष्ट्र भाषा हिन्दी है।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान पर किन-किन देशों के संविधानों का प्रभाव है?
उत्तर:
भारतीय संविधान पर इंग्लैंड, अमेरिका, आयरलैंड, कनाडा, दक्षिणी अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया देशों के संविधानों का प्रभाव है।

प्रश्न 12.
भारतीय संविधान में कैसी नागरिकता की व्यवस्था है?
उत्तर:
भारतीय संविधान में इकहरी नागरिकता की व्यवस्था है।

प्रश्न 13.
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल करने की प्रेरणा किस देश के संविधान से ली गई?
उत्तर:
भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों को शामिल करने की प्रेरणा अमेरिका के संविधान से ली गई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 14.
किस योजना ने भारतीय संविधान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन योजना 1946 ने भारतीय संविधान के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।

प्रश्न 15.
भारतीय संविधान सभा का गठन कब हुआ?
उत्तर:
भारतीय संविधान सभा का गठन जुलाई, 1946 में हुआ।

प्रश्न 16.
संविधान सभा के सदस्यों की संख्या कितनी थी?
उत्तर:
संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 389 थी। इनमें से 292 सदस्य ब्रिटिश प्रांतों से तथा 93 देशी रियासतों के तथा 4 चीफ कमिश्नरियों के थे।

प्रश्न 17.
आधुनिक मन एवं भारतीय संविधान के पिता किन्हें कहा जाता है?
उत्तर:
आधुनिक मनु एवं भारतीय संविधान का पिता डॉ० भीमराव अंबेडकर को कहा जाता है।

प्रश्न 18.
भारत के संविधान में कुल कितनी अनुसूचियाँ हैं?
उत्तर:
भारत के संविधान में कुल 12 अनुसूचियाँ हैं।

प्रश्न 19.
संविधान सभा में कितने प्रतिशत सदस्य कांग्रेस दल के थे?
उत्तर:
संविधान सभा में 82 प्रतिशत सदस्य कांग्रेस दल के थे।

प्रश्न 20.
कैबिनेट मिशन ने अपनी संवैधानिक योजना की घोषणा कब की थी?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन ने अपनी संवैधानिक योजना की घोषणा 16 मई, 1946 को की थी।

प्रश्न 21.
संविधान सभा के समक्ष उद्देश्य प्रस्ताव किसने व कब रखा था?
उत्तर:
संविधान सभा के समक्ष उद्देश्य प्रस्ताव पं० जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर, 1946 को रखा था।

प्रश्न 22.
भारतीय संविधान को किस कालावधि में सूत्रबद्ध किया गया? उत्तर-भारतीय संविधान दिसंबर, 1946 से दिसंबर, 1949 की कालावधि में सूत्रबद्ध किया गया।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को क्यों लागू किया गया?
उत्तर:
भारत का संविधान 26 नवंबर, 1949 को बनकर तैयार हो गया था। परंतु इसे दो महीने बाद 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया। इसका मुख्य कारण यह था कि कांग्रेस ने 1930 के लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव पास किया और 26 जनवरी, 1930 का दिन प्रथम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया गया। इसके बाद कांग्रेस ने 26 जनवरी को हर वर्ष इसी रूप में मनाया। इस पवित्र दिवस की याद ताज़ा रखने के लिए भारत का संविधान 26 जनवरी; 1950 को लागू किया गया।

प्रश्न 2.
संविधान सभा की पहली बैठक पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर, 1946 को नई दिल्ली में संविधान सभा हाल में हुई। इसकी अध्यक्षता डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा ने की। इसमें 207 सदस्य उपस्थित थे।

प्रश्न 3.
संविधान सभा के कुछ प्रमुख सदस्यों के नाम बताइए।
उत्तर:
संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों के नाम हैं-राजेंद्र प्रसाद, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सरदार बलदेव सिंह, फ्रैंक एन्थनी, एच०पी० मोदी, अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर, बी०आर० अंबेडकर व के०एम० मुंशी।

प्रश्न 4.
भारत के संविधान में डॉ० राजेंद्र प्रसाद की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
डॉ० राजेंद्र प्रसाद कांग्रेस के प्रमुख सदस्य थे। 11 दिसंबर, 1946 में राजेंद्र प्रसाद को संविधान सभा का अध्यक्ष निर्वाचित किया गया। अध्यक्ष के रूप में संविधान सभा की चर्चाओं को उन्होंने काफी प्रभावित किया। उन्हें विचार प्रकट करने का मौका दिया। राजेंद्र प्रसाद को इस बात का दुःख था कि भारतीय संविधान मूल रूप से अंग्रेजी में था और उसमें किसी भी पद के लिए किसी भी रूप में शैक्षिक योग्यता नहीं रखी गई थी।

प्रश्न 5.
संविधान सभा ने दलितों के लिए क्या प्रावधान किया? ।
उत्तर:
संविधान सभा में दलितों के अधिकारों पर काफी बहस हुई। इन जातियों के लिए सुरक्षात्मक उपायों की माँग की गई। अंत में अस्पृश्यता का उन्मूलन किया गया। दूसरा, इन्हें हिंदू मंदिरों में प्रवेश दिया गया तथा तीसरा, दलितों को विधायिकाओं और नौकरियों में आरक्षण दिया गया।

प्रश्न 6.
डॉ० बी०आर० अंबेडकर कौन थे?
उत्तर:
डॉ० बी०आर० अंबेडकर महान विद्वान, विधिवेत्ता, लेखक, शिक्षाविद् तथा महान् सुधारक थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जीवन भर संघर्ष किया। अंबेडकर अंतरिम सरकार में विधि मंत्री बने। उन्हें संविधान सभा की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। अतः उन्होंने संविधान के प्रारूप को प्रस्तुत किया तथा पास करवाया। उन्हें भारतीय संविधान का पिता भी कहा जाता है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 7.
भारतीय संविधान की आधारभूत मान्यताएँ व सिद्धांत क्या थे?
उत्तर:
भारतीय संविधान की आधारभूत मान्यताएँ और निहित सिद्धांत ये थे कि इसके अनुसार भारत एक धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक राज्य होगा। इसमें बालिग मताधिकार पर आधारित संसदीय प्रणाली को स्वीकार किया गया।

प्रश्न 8.
संविधान ने विषयों का बँटवारा किस प्रकार किया?
उत्तर:
संविधान सभा ने सभी विषयों को निम्नलिखित तीन सूचियों में बाँट दिया

  • केंद्रीय सूची-इस पर केंद्र सरकार कार्य कर सकती थी।
  • राज्य सूची-इसमें वे विषय थे जिन पर राज्य सरकार ने कार्य करना था।
  • समवर्ती सूची-इन विषयों पर राज्य सरकार व केंद्र सरकार दोनों कार्य कर सकती थीं।

प्रश्न 9.
राष्ट्र की भाषा पर महात्मा गाँधी जी के क्या विचार थे?
उत्तर:
राष्ट्र भाषा के संबंध में गाँधी जी के विचार थे कि प्रत्येक को एक ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जिसे लोग आसानी से समझ सकें। हिंदी और उर्दू के मेल से बनी हिंदुस्तानी भाषा भारत की राष्ट्र भाषा होनी चाहिए क्योंकि यह भारतीय जनता के बड़े हिस्से की भाषा है और परस्पर संस्कृतियों के आदान-प्रदान से समृद्ध हुई है। यह एक साझी भाषा है।

प्रश्न 10.
संविधान निर्माण में पटेल की भूमिका किस प्रकार की थी?
उत्तर:
वल्लभ भाई पटेल संविधान सभा के प्रमुख सदस्यों में से एक थे। उन्होंने अनेक रिपोर्टों के प्रारूप लिखने तथा अनेक परस्पर विरोधी विचारों के मध्य सहमति उत्पन्न करने में सराहनीय योगदान दिया।

प्रश्न 11.
भारतीय संविधान में कौन-से दो मौलिक अधिकार दिए गए हैं?
उत्तर:

  • स्वतन्त्रता का अधिकार,
  • समानता का अधिकार।

प्रश्न 12.
भारत के राष्ट्रीय ध्वज के क्रम से रंगों के नाम लिखो।
उत्तर:
केसरिया, सफेद, हरा।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
वयस्क मताधिकार से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
भारत में संविधान के द्वारा ‘स्वतंत्र सम्प्रभु गणतंत्र’ (Independent Sovereign Republic) की स्थापना की गई थी। इस नए गणतंत्र में सत्ता का स्रोत नागरिकों को होना था। इसको कार्यरूप देने के लिए संविधान निर्माताओं ने भारत में एकमुश्त वयस्क मताधिकार प्रदान किया। संविधान निर्माताओं ने भारत के लोगों पर ऐतिहासिक विश्वास व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि विश्व के किसी भी प्रजातंत्र में वहाँ के लोगों को एक बार में ही वयस्क मताधिकार प्राप्त नहीं हुआ।

प्रश्न 2.
धर्म-निरपेक्ष राज्य का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान भारत में धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है। इसका अभिप्राय यह है कि राज्य किसी विशेष धर्म को न तो राज्य धर्म मानता है और न ही किसी विशेष धर्म को संरक्षण तथा समर्थन प्रदान करता है। इसी प्रकार राज्य किसी नागरिक के खिलाफ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं कर सकता। सभी भारतीयों को यह स्वतंत्रता है कि वे किसी भी धर्म को माने, अनुकरण करें अथवा उसका प्रचार-प्रसार करें, परंतु वे दूसरे के धर्म में बाधा पैदा नहीं कर सकते।

प्रश्न 3.
संविधान निर्माण के लिए बनाई प्रमुख समितियों के नाम लिखो।।
उत्तर:
संविधान सभा ने नए संविधान के विभिन्न पक्षों का विस्तार से परीक्षण करने के लिए अनेक समितियों की नियुक्ति की। इन समितियों में से सबसे पहले महत्त्वपूर्ण समितियाँ थीं-संघीय अधिकार समिति (Union Powers Committee), संघीय संविधान समिति (Union Constitution Committee), मौलिक अधिकार समिति (Fundamental Rights Committee), प्रांतीय अधिकार समिति (Provincial Powers Committee) तथा अल्पसंख्यकों के लिए सलाहकार समिति (The Advisory Committee to Minorities)। इन समितियों ने अपने-अपने कार्यक्षेत्र में काम करने के बाद अपने प्रतिवेदन (रिपोटी/सुझावों को संविधान सभा में प्रस्तुत किया।

प्रश्न 4.
भारतीय संविधान में जनता की प्रभुता की स्थापना की गई है। स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि जनता को प्रभुता का स्रोत स्वीकार किया गया है। संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम अब अंग्रेज़ी साम्राज्य के अधीन नहीं हैं अपितु प्रभुसत्ता जनता में निहित है। इस प्रस्तावना से यह स्पष्ट होता है कि संविधान की निर्माता भारतीय जनता है और जनता ही अपनी सरकार को अपने ऊपर राज्य करने के लिए सारी शक्तियाँ प्रदान करती है। इस प्रकार सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत की समस्याओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संविधान निर्माण से तत्काल पहले के वर्ष भारत में बहुत ही उथल-पुथल भरे थे। जहाँ एक ओर यह समय लोगों की महान् आशाओं को पूरा करने का था, वही यह मोहभंग का समय भी था। भारत को स्वतंत्रता तो प्राप्त हो गई थी, परन्तु इसका विभाजन भी हो गया था जिससे भारत में भयावह समस्याएँ खड़ी हो गई थीं। संविधान सभा जब अपना कार्य कर रही थी तो उसके कार्य को इन समस्याओं ने भी प्रभावित किया। फिर हमें यह भी याद रखना चाहिए कि संविधान सभा की दोहरी भूमिका थी; एक ओर वह भारत का संविधान निर्माण करने में संलग्न थी, वहीं दूसरी ओर वह भारत की केंद्रीय असेम्बली के रूप में भी कार्य कर … रही थी। स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय पैदा हुई भारत की प्रमुख समस्याओं का विवरण निम्न प्रकार से है

1. विभाजन और सांप्रदायिक दंगे-विभाजन और उससे जुड़े विभिन्न पक्षों का अध्ययन हमने छठे अध्याय में किया है। यहाँ हम यह उल्लेख करना चाहेंगे कि स्वतन्त्रता-प्राप्ति के समय भारत के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या देश के विभाजन से जुड़ी थी। इसी समस्या से भारत में अनेक विकराल समस्याएँ पैदा हुईं। कांग्रेस ने विभाजन इसलिए स्वीकार कर लिया था कि इसके बाद समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी। सांप्रदायिक दंगे समाप्त हो जाएंगे तथा देश में नवनिर्माण का दौर शुरू होगा। परन्तु जून योजना (विभाजन योजना) को स्वीकार करने के बाद अगस्त, 1947 में पंजाब में भयंकर दंगे शुरू हो गए। लूटपाट, आगजनी, जनसंहार, बलात्कार, औरतों को अगवा करना आदि भयावह दृश्य आम हो गए। पुलिस प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। ये सांप्रदायिक दंगे अगस्त 1947 से अक्तूबर 1947 तक चलते रहे।

इस महाध्वंस में लगभग 10 लाख लोग मारे गए, 50,000 महिलाएँ अगवा कर ली गईं तथा लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अपने घरों से उजाड़ दिए गए। इन सांप्रदायिक दंगों को शान्त करने और हिन्दुओं-मुसलमानों में सद्भावना कायम करने के लिए महात्मा गाँधी ने अदम्य साहस दिखाया। किन्तु गाँधीजी की नीतियों से क्षुब्ध होकर नाथूराम गोडसे नामक व्यक्ति ने 30 जनवरी, 1948 को गाँधीजी की हत्या कर दी, जिसने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया।

2. विस्थापितों की समस्या-विभाजन तथा उससे जुड़ी हिंसा के परिणामस्वरूप अपनी जड़ों से उखड़े हुए (Uprooted) लोगों की भयंकर समस्या उभरकर सामने आयी। जान-माल की सुरक्षा न होने के कारण 1 करोड़ 50 लाख हिंदुओं और सिक्खों को पाकिस्तान से तथा मुसलमानों को भारत से बेहद खराब हालात में देशांतरण करना पड़ा। बहुत कम समय (3 माह) में हुआ यह देशांतरण दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा देशांतरण था। देश की आज़ादी के तुरंत बाद इतनी बड़ी संख्या में उजड़े लोगों को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था। विभाजन से उन्हें उनकी अपनी संपत्ति, मकान, खेत, कारोबार आदि से वंचित होना पड़ा था। उनके परिवार व रिश्तेदार बिछुड़ गए थे या मारे गए थे। उनका सब कुछ छिन गया था। उनमें से अधिकतर लोगों को दंगों के कारण भयंकर दौर से गुजरना पड़ा था। अतः देश की सरकार के सम्मुख इतने बड़े समुदाय के लिए राहत और पुनर्वास की समस्या सबसे बड़ी थी।

3. भारतीय रियासतों की समस्या स्वतंत्र भारत की एकता को सबसे बड़ा खतरा भारतीय देशी रियासतों की स्थिति से उत्पन्न हुआ। इन रियासतों की संख्या लगभग 554 थी। 3 जून, 1947 को भारत के वायसराय ने यह घोषणा की कि 15 अगस्त, 1947 को देशी रियासतें अपने भाग्य का निर्णय स्वयं करेंगी अर्थात् वे भारत या पाकिस्तान दोनों में से किसी एक अधिराज्य में शामिल होंगी या अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रख सकेंगी। स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) तक सरदार पटेल और वी०पी० मेनन ने जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर शेष सभी राज्यों के शासकों को भारतीय संघ में विलय के लिए सहमत तथा बाध्य कर दिया था। काठियावाड़ में स्थित जूनागढ़ के शासक के खिलाफ़ वहाँ की प्रजा ने बगावत कर दी थी। वह जूनागढ़ छोड़कर पाकिस्तान भाग गया था। उसका जनमत के आधार पर भारतीय संघ में विलय कर लिया गया। हैदराबाद के खिलाफ पुलिस कार्रवाई करनी पड़ी तथा कश्मीर की समस्या को लेकर भी भारत को पाकिस्तान से जूझना पड़ा। संविधान सभा की बैठकें इन समस्याओं की पृष्ठभूमि में हो रही थीं। भारत में जो कुछ इस समय घटित हो रहा था उससे संविधान सभा में होने वाली बहस और विचार-विमर्श भी अछूता नहीं था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत

प्रश्न 2.
भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय संविधान का निर्माण एक ऐसी संविधान सभा के द्वारा किया गया जिसे सीमित मताधिकार के आधार पर अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के द्वारा चुना गया था। फिर यह संविधान भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में अपनाए गए मूल्यों तथा आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। इसके निर्माण में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रमुख प्रावधानों का विश्लेषण करने से इसकी निम्नलिखित विशेषताओं का पता चलता है

1. सबसे लम्बा संविधान-भारतीय संविधान की पहली विशेषता यह है कि इसे दुनिया के अनेक संविधानों का अध्ययन करने के बाद बनाया गया है। इसके 22 भाग हैं जिनमें 395 अनुच्छेद (धाराएँ) और 12 अनुसूचियाँ हैं। यह विश्व में सबसे लम्बा और विस्तृत संविधान है। इस संविधान के इतने बड़े होने के कई कारण बताए गए हैं। भारत एक विशाल राष्ट्र था जिसकी अपनी समस्याएँ थीं जो अंग्रेज़ी राज की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के कारण पैदा हो गई थीं। संविधान निर्माताओं ने प्रत्येक समस्या को ध्यान में रखते हुए उसके समाधान के लिए नियम बनाए। संविधान में प्रत्येक ब्यौरा स्पष्ट किया गया। संघ की प्रणाली, मूल अधिकारों तथा नीति-निदेशक तत्त्वों, राजनीतिक संस्थाओं, जनजातियों, अनुसूचित जातियों तथा पिछड़े वर्गों की संस्थाओं तथा आपातकालीन उपबन्धों को विस्तार से स्पष्ट करना पड़ा। इस कारण से यह संविधान भीमकाय बन गया।

2. जन प्रभुता की स्थापना-भारतीय संविधान की एक विशेषता यह है कि जनता को प्रभुता का स्रोत स्वीकार किया गया है। संविधान की प्रस्तावना में कहा गया है कि हम अब अंग्रेज़ी साम्राज्य के अधीन नहीं है अपितु प्रभुसत्ता जनता में निहित है। प्रस्तावना में कहा गया है कि “हम भारत के लोग …… इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।” इस प्रस्तावना से यह स्पष्ट होता है कि संविधान की निर्माता भारतीय जनता है और जनता ही अपनी सरकार को अपने ऊपर राज्य करने के लिए सारी शक्तियाँ प्रदान करती है। इस प्रकार सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है। इस प्रकार संविधान में सही रूप में जनतन्त्र की स्थापना की गई है।

3. भारतीय संघ की स्थापना-भारतीय संविधान के भाग (i) में अनुच्छेद 1 से 4 द्वारा भारतीय संघ की स्थापना की गई है। इसमें साफ लिखा है कि इण्डिया अर्थात् भारत राज्यों का संघ (Union of States) होगा। संविधान में इसके लिए शक्तियों का बँटवारा केन्द्र तथा राज्यों में किया गया है। संघीय संविधान समिति की रिपोर्ट में विभाजन के बाद हुए भारतीय राजनीतिक परिवर्तन को देखते हुए संघीय व्यवस्था में मजबूत केन्द्रीय शासन का प्रस्ताव रखा। देशी रियासतों ने संघीय व्यवस्था की स्थापना में काफी कठिनाई पैदा की। परन्तु देशी रियासतों के एकीकरण (Integration) के साथ इन देशी रियासतों को भारतीय संघ में भाग 2 और भाग 3 के राज्यों के रूप में विलय कर लिया गया।

4. संसदीय शासन-व्यवस्था (Parliamentry System of Government)-भारत में सरकार की संसदीय प्रणाली को स्वीकार किया गया। संविधान के भाग 5 में संघीय सरकार के ढाँचे का वृत्तान्त दिया गया तथा भाग 6 में राज्यों में सरकार के गठन की प्रक्रिया का वर्णन है। इन व्यवस्थाओं के अनुसार केन्द्र तथा प्रान्तों में संसदीय शासन प्रणाली को स्वीकार किया गया। संघीय कार्यपालिका में राष्ट्रपति की व्यवस्था की गई है जिसका चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व की अप्रत्यक्ष प्रणाली द्वारा पाँच साल के लिए किया जाता है। केन्द्र में राष्ट्रपति सवैधानिक मुखिया मात्र है। वास्तविक कार्यपालिका की शक्ति प्रधानमंत्री तथा मन्त्रिमण्डल में निहित है। मन्त्रिमण्डल को संसद के निम्न सदन के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। इसी प्रकार राज्य में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त गवर्नर नाममात्र का मुखिया होता है। वास्तविक शक्ति मुख्यमन्त्री और उसकी मंत्रि-परिषद् में होती है। केन्द्र में प्रधानमन्त्री तथा राज्य में मुख्यमन्त्री सदन में बहुमत वाले दल का नेता होता है। प्रधानमन्त्री या मुख्यमन्त्री तभी तक अपने पद पर बने रह सकते हैं जब तक उन्हें सदन का विश्वास प्राप्त हो। इस प्रकार कार्यपालिका पर भी जनता द्वारा चुनी हुई लोकसभा अथवा विधानसभा का नियन्त्रण होता है, क्योंकि कार्यपालिका इन चुने हुए सदनों के प्रति उत्तरदायी होती है।

5. मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)-राष्ट्रीय संविधान सभा ने मूल अधिकारों के परीक्षण तथा सुझाव प्रस्तुत करने के लिए एक अलग से मूलाधिकार समिति (Fundamental Rights Committee) बनाई। संविधान सभा ने काफी विचार-विमर्श के बाद नागरिकों के मूल अधिकारों तथा उनकी रक्षा की भी व्यवस्था की। संविधान के भाग तीन (अनुच्छेद 12-35) में नागरिकों के मूल अधिकारों का वर्णन किया गया है। मौलिक अधिकारों को छः वर्गों में बाँटा गया है

  • समता का अधिकार (Right to Equality) (अनुच्छेद 14-18)
  • स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom) (अनुच्छेद 19)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (Right against Exploitation) (अनुच्छेद 23-24)
  • धर्म स्वतन्त्रता का अधिकार (Right to Freedom of Religion) (अनुच्छेद 25-28)
  • संस्कृति तथा शिक्षा संबंधी अधिकार (Cultural and Educational Rights) (अनुच्छेद 29-30)
  • सम्पत्ति का अधिकार (Right to Prosperity)

संविधान में मूल अधिकारों के साथ-साथ नागरिकों को संवैधानिक उपचारों का अधिकार (Right to Constitutional Remedies) भी प्रदान किया गया है। इस अधिकार के अनुसार कोई भी व्यक्ति मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकता है। न्यायालय व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा करने में सक्षम है, परन्तु संसद तथा सरकार कुछ विशेष परिस्थितियों जैसे आपातकाल में इन अधिकारों को निलम्बित तथा सीमित कर सकती है।

6. राज्य नीति के निदेशक तत्त्व (Directive Principles of State)-संविधान में राज्य नीति के निदेशक तत्त्वों का विवरण दिया गया है। यद्यपि ये सिद्धान्त किसी न्यायालय द्वारा लागू नहीं करवाए जा सकते हैं, परन्तु फिर भी इन निदेशक तत्त्वों को देश के प्रशासन के लिए बहुत आवश्यक माना गया है। यह अपेक्षा की जाती है कि सभी विधानमण्डलों के लिए जरूरी है कि वे कानून बनाते समय इन सिद्धान्तों को सम्मुख रखेंगे। संविधान के नीति निदेशक तत्त्वों को तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है

(i) वे तत्त्व जिनका उद्देश्य नए समाज की रचना के लिए कल्याणकारी राज्य को बढ़ावा देना था।

(ii) वे तत्त्व जिनका उद्देश्य गाँधी जी के सिद्धान्तों को प्रोत्साहन देना; जैसे ग्राम पंचायतों का गठन, कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन, अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा पिछड़ों के आर्थिक हितों की रक्षा तथा सुधार, मादक द्रव्यों पर नियन्त्रण आदि है।

(iii) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा को प्रोत्साहन देने वाले तत्त्व जिनमें कहा गया कि राज्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा को प्रोत्साहन दे, राष्ट्रों के बीच न्यायोचित तथा सम्मानजनक व्यवहार बनाए रखे, अन्तर्राष्ट्रीय कानून और सन्धियों को स्वीकार करे तथा झगड़ों को बातचीत से सुलझाने के प्रयत्न करे।

7. स्वतन्त्र न्यायपालिका (Independent Judiciary) भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश में एक स्वतन्त्र न्यायपालिका तथा अन्य स्वतन्त्र संस्थाओं की स्थापना की जिन पर कार्यपालिका का कम-से-कम हस्तक्षेप था। संविधान में संघीय न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय के गठन, शक्तियों आदि का वर्णन दिया गया है। न्यायाधीशों की योग्यता, नियुक्ति का ढंग तथा वेतन संविधान में ही तय कर दिए गए ताकि वे सरकार या पार्लियामेन्ट के अनुचित दबाव से बच सकें। न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग रखने की कोशिश की गई है। सारे देश में एक जैसे दीवानी और फौजदारी कानून भी स्थापित किए गए हैं।

8. संकटकालीन उपबन्धों का समावेश (Inclusion of Emergency Provisions)-भारतीय संविधान में देश में आपात्कालीन ते की शक्तियों का उल्लेख किया गया है। संविधान में तीन प्रकार की आपात स्थिति के उपबन्धों का समावेश किया गया है-आपात्काल की घोषणा, संवैधानिक व्यवस्था ठप्प होने सम्बन्धी घोषणा तथा वित्तीय आपात् की घोषणा। संवैधानिक व्यवस्था ठप्प होने सम्बन्धी घोषणा अधिकतर राज्य सरकारों से संबंधित है। इसमें राज्य के गवर्नर द्वारा राष्ट्रपति से राष्ट्रपति शासन लागू करने की बात कही गई है, परन्तु साथ ही यह भी प्रावधान किया गया है कि राष्ट्रपति आपात् स्थिति संबंधी उद्घोषणा को यथाशीघ्र संसद से अनुमोदित करवाएगा।

9. कठोरता तथा लचीलेपन का मिश्रण (Blend of Rigidity and Flexibility)-भारतीय संविधान कठोरता तथा लचीलेपन का एक अपूर्व मिश्रण लिए हुए है। यह न तो इंग्लैण्ड के संविधान के समान लचीला है और न ही उतना कठोर है जितना अमेरिका का संविधान। संविधान निर्माता संविधान को इतना कठोर भी नहीं बनाना चाहते थे कि आवश्यकता पड़ने पर इसे बदला ही नहीं जा सके और न ही इतना लचीला बनाना चाहते थे कि सत्ताधारी दल इसे खिलौना समझकर अपने हितों की सिद्धि के लिए बार-बार इसमें परिवर्तन करता रहे। हमारे संविधान की बहुत-सी धाराएँ ऐसी हैं जिन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता। इनके संशोधन के लिए न केवल संसद के बहुमत का होना आवश्यक है अपितु उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों को दो-तिहाई संशोधन के पक्ष में होना जरूरी है तथा राज्य विधानसभाओं की कम-से-कम आधी संख्या उसे अनुमोदित करे। परन्तु साथ ही संविधान इतना भी कठोर नहीं है कि इसमें संशोधन ही न किया जा सके। उदाहरण के लिए इसमें कई धाराएँ ऐसी हैं जिन्हें साधारण बहुमत से संशोधित किया जा सकता है।

10. वयस्क मताधिकार-भारत में संविधान के द्वारा ‘स्वतंत्र सम्प्रभु गणतंत्र’ (Independent Sovereign Republic) की स्थापना की गई थी। इस नए गणतंत्र में सत्ता का स्रोत नागरिकों को होना था। इसको कार्यरूप देने के लिए संविधान निर्माताओं मताधिकार प्रदान किया। इस पर संविधान सभा में काफी हद तक सहमति थी। संविधान निर्माताओं ने भारत के लोगों पर ऐतिहासिक विश्वास व्यक्त किया। उल्लेखनीय है कि विश्व के किसी भी प्रजातंत्र में वहाँ के लोगों को एक बार में ही वयस्क मताधिकार प्राप्त नहीं हुआ। ब्रिटेन व अमेरिका जैसे देशों में भी प्रारंभ से मताधिकार के लिए संपत्ति अधिकार की शर्ते आयद थीं।

11. धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना (Foundation of Secular State) भारतीय संविधान भारत में धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना करता है। इसका अभिप्राय यह है कि राज्य किसी विशेष धर्म को न तो राज्य धर्म मानता है और न ही किसी विशेष धर्म को संरक्षण तथा समर्थन प्रदान करता है। इसी प्रकार राज्य किसी नागरिक के खिलाफ धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं कर सकता। सभी भारतीयों को यह स्वतन्त्रता है कि वे किसी भी धर्म को माने, अनुकरण करें अथवा उसका प्रचार-प्रसार करें, परन्तु . वे दूसरे के धर्म में बाधा पैदा नहीं कर सकते। संविधान में सभी को समान स्वतन्त्रता और समान अवसर प्राप्त हैं। किसी भी धर्म का व्यक्ति भारत के बड़े-से-बड़े पद पर आसीन हो सकता है।

परन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं है कि राज्य नास्तिक है या धर्म-विरोधी है, अपितु वह धर्म के विषय में धर्म-निरपेक्ष है। धर्म निरपेक्षता का अर्थ केवल धार्मिक सहनशीलता ही है। वेंकटारमन के अनुसार, “भारतीय राज्य न तो धार्मिक है न अधार्मिक है और न ही धर्म विरोधी, किन्तु यह धार्मिक संकीर्णताओं तथा वृत्तियों से बिल्कुल दूर है और धार्मिक मामलों में तटस्थ है।”

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 15 संविधान का निर्माण : एक नए युग की शुरुआत Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. 3 जून, 1947 ई० को निम्नलिखित में से किस योजना की घोषणा की गई थी?
(A) वेवल योजना
(B) कैबिनेट मिशन योजना
(C) क्रिप्स योजना
(D) माउंटबेटन योजना
उत्तर:
(D) माउंटबेटन योजना

2. मुस्लिम सांप्रदायिकता के उदय का कारण था
(A) वहाबी आन्दोलन
(B) सर सैयद अहमद खाँ द्वारा सांप्रदायिक प्रचार
(C) अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

3. “चाहे समस्त भारत को आग लग जाए, तब भी पाकिस्तान नहीं बनेगा – पाकिस्तान मेरे शव पर ही बनेगा।”ये शब्द किसने कहे थे?
(A) महात्मा गांधी ने
(B) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने
(C) सरदार पटेल ने
(D) मोहम्मद अली जिन्नाह ने
उत्तर:
(A) महात्मा गांधी ने

4. पाकिस्तान का निर्माण कब हुआ था ?
(A) 14 अगस्त, 1947 ई० में
(B) 15 अगस्त, 1947 ई० में
(C) 16 अगस्त, 1947 ई० में
(D) 14 अगस्त, 1948 ई० में
उत्तर:
(A) 14 अगस्त, 1947 ई० में

5. पाकिस्तान का प्रस्ताव कब पास किया गया ?
(A) 23 मार्च, 1941 ई० को
(B) 23 मार्च, 1940 ई० को
(C) 23 मार्च, 1942 ई० को
(D) 23 मार्च, 1943 ई० को
उत्तर:
(B) 23 मार्च, 1940 ई० को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

6. अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना हुई
(A) 1906 ई० में
(B) 1907 ई० में
(C) 1908 ई० में
(D) 1909 ई० में
उत्तर:
(A) 1906 ई० में

7. ‘पाकिस्तान’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम किसने किया था ?

(A) रहमत अली
(B) मुहम्मद इकबाल
(C) मुहम्मद अली जिन्नाह
(D) आगा खाँ
उत्तर:
(C) रहमत अली

8. मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस में समझौता हुआ
(A) 1916 ई० में
(B) 1917 ई० में
(C) 1918 ई० में
(D) 1920 ई० में
उत्तर:
(A) 1916 ई० में

9. अखिल भारतीय हिन्दू महासभा की स्थापना कब हुई?
(A) 1916 ई० में
(B) 1915 ई० में
(C) 1917 ई० में
(D) 1918 ई० में
उत्तर:
(B) 1915 ई० में

10. लॉर्ड मिण्टो से मिलने वाले शिष्टमण्डल का अध्यक्ष था
(A) सर अहमद मौलवी
(B) सर आगा खाँ
(C) सर सैयद अहमद खाँ
(D) मोहम्मद इकबाल
उत्तर:
(B) सर आगा खाँ

11. ‘भारत के वफादार मुसलमान’ नामक पुस्तक के रचनाकार का नाम था
(A) लॉर्ड मिण्टो
(B) सर सैयद अहमद खाँ
(C) मोहम्मद इकबाल
(D) सर आगा खाँ
उत्तर:
(B) सर सैयद अहमद खाँ

12. भारत के अंतिम अंग्रेज़ वायसराय थे
(A) लॉर्ड माऊंटबेटेन
(B) डॉ० राजेंद्र प्रसाद
(C) डॉ० राधा कृष्णन
(D) लॉर्ड एटली
उत्तर:
(A) लॉर्ड माऊंटबेटेन

13. जिन्ना को ‘कायदे आजम’ किसने कहा था?
(A) पंडित जवाहरलाल नेहरू ने
(B) महात्मा गाँधी ने
(C) सरदार पटेल ने
(D) लॉर्ड वावेल ने
उत्तर:
(B) महात्मा गाँधी ने

14. मुस्लिम लीग का संविधान कहाँ तैयार किया गया?
(A) लाहौर
(B) कलकत्ता
(C) कराची
(D) दिल्ली
उत्तर:
(C) कराची

15. मुस्लिम लीग ने ‘मुक्ति दिवस’ कब मनाया ?
(A) 22 अक्टूबर, 1939 ई० को
(B) 22 दिसम्बर, 1939 ई० को
(C) 22 नवम्बर, 1940 ई० को
(D) 22 दिसम्बर, 1941 ई० को
उत्तर:
(C) 22 दिसम्बर, 1939 ई० को

16. “निर्दोष लोगों की हत्या से विभाजन अच्छा था।” किसने कहा था?
(A) महात्मा गाँधी
(B) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(C) लॉर्ड माउंटबेटन
(D) सरदार पटेल
उत्तर:
(D) सरदार पटेल

17. मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की माँग की
(A) 1941 ई० में
(B) 1946 ई० में
(C) 1940 ई० में
(D) 1947 ई० में
उत्तर:
(C) 1940 ई० में

18. मुस्लिम लीग का संस्थापक किसे माना जाता है ?
(A) मोहम्मद अली जिन्नाह
(B) मोहम्मद इकबाल
(C) सर आगा खान
(D) सर सैयद अहमद खाँ
उत्तर:
(C) सर आगा खान

19. स्वतन्त्र भारत के प्रथम गवर्नर जनरल थे
(A) लॉर्ड माउंटबेटन
(B) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(C) सरदार पटेल
(D) लॉर्ड वावेल
उत्तर:
(A) लॉर्ड माउंटबेटन

20. कैबिनेट मिशन ने घोषणा की
(A) 16 मई, 1946 को
(B) 17 मई, 1946 को
(C) 18 मई, 1946 को
(D) 20 मई, 1946 को
उत्तर:
(A) 16 मई, 1946 को

21. कैबिनेट मिशन के सदस्य थे
(A) चार
(B) दो
(C) तीन
(D) पाँच
उत्तर:
(C) तीन

22. 1946 में अंतरिम सरकार के कुल सदस्य निश्चित किए
(A) 12
(B) 11
(C) 13
(D) 14
उत्तर:
(D) 14

23. संविधान सभा के चुनाव हुए
(A) जुलाई, 1946
(B) जुलाई, 1947
(C) अगस्त, 1948
(D) अगस्त, 1946
उत्तर:
(A) जुलाई, 1946

24. किस अधिवेशन में काँग्रेस व मुस्लिम लीग में समझौता हुआ था?
(A) लखनऊ
(B) सूरत
(C) लाहौर
(D) बम्बई
उत्तर:
(A) लखनऊ

25. ‘भारत सरकार अधिनियम’ कब पास हुआ?
(अ) 1892 ई० में
(ब) 1909 ई० में
(स) 1919 ई० में
(द) 1935 ई० में
उत्तर:
(द) 1935 ई० में

26. मुस्लिम लीग ने सीधी कार्रवाई आरंभ करने का निर्णय लिया
(A) 16 अगस्त, 1946 को
(B) 19 अगस्त, 1946 को
(C) 15 अगस्त, 1944 को।
(D) 16 अगस्त, 1945 को
उत्तर:
(A) 16 अगस्त, 1946 को

27. मुस्लिम लीग की स्थापना कहाँ हुई थी?
(A) लाहौर
(B) ढाका
(C) पेशावर
(D) बम्बई
उत्तर:
(B) ढाका

28. ‘मुक्ति दिवस’ किस पार्टी ने मनाया था?
(A) मुस्लिम लीग
(B) समाजवादी
(C) काँग्रेस
(D) हिन्दू महासभा
उत्तर:
(A) मुस्लिम लीग

29. भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कौन थे?
(A) सरदार पटेल
(B) महात्मा गाँधी
(C) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(D) सरदार बलदेव सिंह
उत्तर:
(C) पंडित जवाहरलाल नेहरू

30. आजाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति कौन थे?
(A) पंडित जवाहरलाल नेहरू
(B) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद
(C) सरदार पटेल
(D) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(C) डॉ० राजेन्द्र प्रसाद

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
1 अक्तूबर, 1906 को शिमला में मुस्लिम प्रतिनिधिमण्डल वायसराय मिण्टो से किसकी अध्यक्षता में मिला था?
उत्तर:
1 अक्तूबर, 1906 को शिमला में मुस्लिम प्रतिनिधिमण्डल वायसराय मिण्टो से सर आगा खाँ की अध्यक्षता में मिला था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 2.
भारत में व्यवस्थापिका सभाओं की भारतीयों के प्रतिनिधित्व की बात कब और किसने कही?
उत्तर:
भारत में व्यवस्थापिका सभाओं की भारतीयों के प्रतिनिधित्व की बात सन् 1906 में हाऊस ऑफ कॉमन्स में भारत सचिव मार्ले ने कही।

प्रश्न 3.
मुस्लिम लीग की स्थापना कब और कहाँ की गई?
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना ढाका में, 30 दिसंबर, 1906 को की गई।

प्रश्न 4.
मुस्लिम लीग की स्थापना सभा की अध्यक्षता किसने की थी?
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना सभा की अध्यक्षता नवाब बकरूल-मुल्क ने की।

प्रश्न 5.
मुस्लिम लीग का संस्थापक सामान्यतः किसे माना जाता है?
उत्तर:
मुस्लिम लीग का संस्थापक आगा खाँ को माना जाता है।

प्रश्न 6.
मुस्लिम लीग की स्थापना में किन तीन उच्च-वर्गीय (नवाब । नेताओं की भूमिका रही?
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना में आगा खाँ, मोहसिन उल-मुल्क और बकरूल-मुल्क तीन उच्च-वर्गीय (नवाब) मुस्लिम नेताओं की भूमिका रही।

प्रश्न 7.
‘पंजाब हिंदू सभा’ की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
‘पंजाब हिंदू सभा’ की स्थापना 1909 ई० में हुई।

प्रश्न 8.
‘पंजाब हिंद सभा’ की स्थापना में मुख्य भूमिका किसकी थी?
उत्तर:
‘पंजाब हिंदू सभा’ की स्थापना में लाल चंद और यू० एन० मुखर्जी की मुख्य भूमिका थी।

प्रश्न 9.
“एक हिंदू विश्वास में ही नहीं व्यावहारिक जीवन में भी यह अपनाए कि वह पहले हिंदू है और फिर भारतीय।” यह अपील पंजाब के किस हिंदू नेता ने की? –
उत्तर:
यह अपील पंजाब के नेता लाल चंद ने की।

प्रश्न 10.
‘अखिल भारतीय हिंदू सभा’ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
‘अखिल भारतीय हिंदू सभा’ की स्थापना 1915 ई० में की गई।

प्रश्न 11.
पृथक निर्वाचन मण्डल की स्थापना किस भारतीय परिषद् अधिनियम में स्वीकार की गई?
उत्तर:
पृथक् निर्वाचन मण्डल की स्थापना 1909 ई० के मार्ले-मिण्टो अधिनियम में स्वीकार की गई।

प्रश्न 12.
लखनऊ समझौते में कौन-से सांप्रदायिक विचार को स्वीकार करके भारतीय कांग्रेस ने भारी भूल की थी?
उत्तर:
लखनऊ समझौते में पृथक् निर्वाचन-मण्डल सांप्रदायिक विचार को स्वीकार करके भारतीय कांग्रेस ने भारी भूल की थी।

प्रश्न 13.
खिलाफत दिवस कब मनाया गया?
उत्तर:
खिलाफत दिवस 17 अक्तूबर, 1919 को मनाया गया।

प्रश्न 14.
संयुक्त कांग्रेस-लीग योजना कब तैयार की गई जो लखनऊ समझौते के नाम से प्रसिद्ध है?
उत्तर:
संयुक्त कांग्रेस-लीग योजना 1916 ई० में तैयार की गई जो लखनऊ समझौते के नाम से प्रसिद्ध है।

प्रश्न 15.
एम०ए०ओ० कॉलेज, अलीगढ़ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
एम०ए०ओ० कॉलेज, अलीगढ़ की स्थापना 1875 ई० में की गई।

प्रश्न 16.
मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेजों की किस नीति का परिणाम थी?
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और शासन करो’ नीति का परिणाम थी।

प्रश्न 17.
आगा खाँ के नेतृत्व में मुस्लिम शिष्टमण्डल ने लॉर्ड मिण्टो से कहाँ भेंट की?
उत्तर:
आगा खाँ के नेतृत्व शष्टमण्डल ने लॉर्ड मिण्टो से शिमला में भेंट की।

प्रश्न 18.
लीग का संविधान कहाँ तथा कब तैयार किया गया?
उत्तर:
लीग का संविधान 1907 ई० में, कराची में तैयार किया गया।

प्रश्न 19.
‘नोआखली’ आज किस देश में है?
उत्तर:
‘नोआखली’ बांग्लादेश में है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 20.
1916 ई० में कांग्रेस तथा मुस्लिम लीग ने कौन-सा समझौता किया?
उत्तर:
1916 ई० में कांग्रेस तथा लीग ने लखनऊ समझौता किया।

प्रश्न 21.
प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त अंग्रेज़ी नीति के विरुद्ध मुस्लिम लीग ने कौन-सा महान आंदोलन चलाया?
उत्तर:
प्रथम विश्व युद्ध के उपरान्त अंग्रेज़ी नीति के विरुद्ध मुस्लिम लीग ने खिलाफत आंदोलन चलाया।

प्रश्न 22.
सांप्रदायिकता के आधार पर चुनाव-प्रणाली किस गवर्नर-जनरल ने प्रदान की?
उत्तर:
सांप्रदायिकता के आधार पर चुनाव-प्रणाली लॉर्ड मिण्टो ने प्रदान की।

प्रश्न 23.
“मुसलमानों की अंग्रेजों से मित्रता स्थापित हो सकती है, लेकिन अन्य भारतीय संप्रदायों के साथ नहीं….” ये शब्द किसके हैं?
उत्तर:
ये शब्द प्रिंसीपल बेक के हैं।

प्रश्न 24.
‘मुक्ति दिवस’ कब और किसने मनाया?
उत्तर:
22 दिसंबर, 1939 को कांग्रेस के सभी मंत्रिमण्डलों से त्यागपत्र देने पर लीग ने ‘मुक्ति दिवस’ मनाया।

प्रश्न 25.
मुस्लिम राज्य के लिए ‘पाकिस्तान’ नाम कब और किसने दिया?
उत्तर:
मुस्लिम राज्य के लिए ‘पाकिस्तान’ नाम 1933 ई० में रहमत अली ने दिया।

प्रश्न 26.
‘पाकिस्तान का प्रस्ताव’ कब पास किया गया?
उत्तर:
23 मार्च, 1940 को लीग ने लाहौर प्रस्ताव (पाकिस्तान प्रस्ताव पास किया। \

प्रश्न 27.
जिन्ना को ‘कायदे आज़म’ किसने कहा?
उत्तर:
जिन्ना को ‘कायदे आज़म’ गाँधी जी ने कहा।

प्रश्न 28.
माऊंटबेटेन भारत का वायसराय बनकर कब आया?
उत्तर:
माऊंटबेटेन भारत का वायसराय बनकर 22 मार्च, 1947 को आया।

प्रश्न 29.
सी०आर० फार्मूले पर जिन्ना ने क्या प्रतिक्रिया की?
उत्तर:
सी०आर० फार्मूले को जिन्ना ने अंगहीन कीड़े लगे हुए तथा दीमक खाए हुए पाकिस्तान’ की संज्ञा दी।

प्रश्न 30.
देश का बँटवारा कब स्वीकार कर लिया गया?
उत्तर:
3 जून, 1947 को माऊंटबेटेन योजना के तहत देश का बँटवारा स्वीकार कर लिया गया।

प्रश्न 31.
‘पाकिस्तान का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
‘पाकिस्तान’ का निर्माण 14 अगस्त, 1947 को हुआ।

प्रश्न 32.
मुस्लिम लीग ने कैबिनेट योजना को कब स्वीकार किया?
उत्तर:
मुस्लिम लीग ने कैबिनेट योजना को 6 जून, 1946 को स्वीकार किया।

प्रश्न 33.
कांग्रेस ने कैबिनेट योजना को कब स्वीकार किया?
उत्तर:
कांग्रेस ने कैबिनेट योजना को 25 जून, 1946 को स्वीकार किया।

प्रश्न 34.
संविधान सभा के चुनाव कब कराए गए?
उत्तर:
संविधान सभा के चुनाव जुलाई, 1946 को कराए गए।

प्रश्न 35.
मुस्लिम लीग ने सीधी कार्रवाई (Direct Action) आरंभ करने का फैसला कब किया?
उत्तर:
मुस्लिम लीग ने सीधी कार्रवाई आरंभ करने का फैसला 16 अगस्त, 1946 को किया।

प्रश्न 36.
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम कब पारित किया गया?
उत्तर:
भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 18 जुलाई, 1947 को पारित किया गया।

प्रश्न 37.
भारत को स्वतंत्रता कब मिली?
उत्तर:
भारत को स्वतंत्रता 15 अगस्त, 1947 को मिली।

प्रश्न 38.
भारतीय नेताओं को विभाजन के लिए किसने सहमत किया?
उत्तर:
भारतीय नेताओं को विभाजन के लिए लॉर्ड माऊंटबेटेन ने सहमत किया।

प्रश्न 39.
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री कौन बने?
उत्तर:
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू बने।

प्रश्न 40.
“चाहे समस्त भारत को आग लग जाए, तब भी पाकिस्तान नहीं बनेगा-पाकिस्तान मेरे शव पर ही बनेगा।” किसने कहे?
उत्तर:
ये शब्द महात्मा गाँधी ने कहे।

प्रश्न 41.
“निर्दोष लोगों की हत्या से विभाजन अच्छा था।” ये शब्द किसने कहे?
उत्तर:
ये शब्द सरदार पटेल ने कहे।

प्रश्न 42.
“यदि शरीर के एक अंग में विष फैल जाए तो उसे शीघ्र ही काट देना चाहिए ताकि सारा शरीर खराब न हो जाए।” ये शब्द किसने कहे?
उत्तर:
ये शब्द सरदार पटेल ने कहे।

प्रश्न 43.
लॉर्ड वेवल को भारत का वायसराय कब नियुक्त किया गया?
उत्तर:
लॉर्ड वेवलं को भारत का वायसराय 1943 ई० में नियुक्त किया गया।

प्रश्न 44.
लॉर्ड वेवल ने रेडियो पर अपनी योजना की घोषणा कब की?
उत्तर:
लॉर्ड वेवल ने रेडियो पर अपनी योजना की घोषणा 14 जून, 1945 में की।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 45.
वेवल योजना के अनुसार, भारत के राजनीतिक दलों का सम्मेलन कहाँ बुलाया गया?
उत्तर:
वेवल योजना के अनुसार, भारत के राजनीतिक दलों का सम्मेलन शिमला में बुलाया गया।

प्रश्न 46.
जुलाई, 1945 के चुनाव में इंग्लैण्ड में कौन-सा दल विजयी रहा?
उत्तर:
जुलाई, 1945 के चुनाव में इंग्लैण्ड में मजदूर दल विजयी रहा।

प्रश्न 47.
1945 ई० में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री कौन बने?
उत्तर:
1945 ई० में इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री मि० एटली बने।

प्रश्न 48.
बंबई में नौ-सैनिक विद्रोह कब हुआ?
उत्तर:
बंबई में नौ-सैनिक विद्रोह 18 फरवरी, 1946 को हुआ।

प्रश्न 49.
कैबिनेट मिशन भारत कब आया?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन 23 मार्च, 1946 को भारत आया।

प्रश्न 50.
कैबिनेट मिशन के कितने सदस्य थे?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन के तीन सदस्य थे।

प्रश्न 51.
कैबिनेट मिशन ने अपनी घोषणा कब की?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन ने अपनी घोषणा 16 मई, 1946 को की।

प्रश्न 52.
कैबिनेट मिशन द्वारा संविधान सभा के सदस्यों की संख्या कितनी निश्चित की गई?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन द्वारा संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 389 निश्चित की गई।

प्रश्न 53.
कैबिनेट मिशन ने अंतरिम सरकार के कितने सदस्य निश्चित किए?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन ने अंतरिम सरकार के 14 सदस्य निश्चित किए।

प्रश्न 54.
मिशन द्वारा अंतरिम सरकार में भिन्न दलों को किस तरह प्रतिनिधित्व दिया गया?
उत्तर:
कांग्रेस 6, लीग 5, ऐंग्लो इंडियन, पारसी तथा सिक्ख सभी एक-एक।

प्रश्न 55.
‘वन मैन बाउन्ड्री फोर्स’ किसने, किसके लिए कहा है?
उत्तर:
‘वन मैन बाउन्ड्री फोर्स’ माऊंटबेटेन ने महात्मा गाँधी जी के लिए कहा है।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विभाजन से लगभग कितने लोग प्रभावित हुए?
उत्तर:
विभाजन के दौरान भड़की सांप्रदायिक हिंसा, जनसंहार, आगजनी, लूटपाट, अराजकता, अपहरण, बलात्कार आदि घटनाओं से लाखों लोग प्रभावित हुए। अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 2 से 2.5 लाख गैर-मुस्लिम तथा इतने ही मुस्लिम दंगों में मारे गए। लगभग 50 हजार महिलाओं का अपहरण हुआ तथा लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोगों को अपने स्थानों से पलायन करना पड़ा।

प्रश्न 2.
आम लोगों के लिए विस्थापन का अर्थ क्या था?
उत्तर:
आम लोगों के लिए विस्थापन का अर्थ था-अपनी जड़ों से उखड़ जाना या अपने घरों से उजड़ जाना। एक ही झटके में इन लोगों की संपत्ति, घर, दुकानें, खेत, रोजी-रोटी के साधन उनके हाथों से निकल गए। बचपन की यादें छिन गईं। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए तथा वे शरणार्थी बन गए।

प्रश्न 3.
आम लोग विभाजन को क्या बता रहे थे?
उत्तर:
आम लोग विभाजन को सरकारी नजरिए से नहीं देख रहे थे। उनके लिए विभाजन एक भयानक अनुभव था और वे उसे ‘मार्शल ला’, ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे।

प्रश्न 4.
पाकिस्तान में हिंदुओं के बारे में किस प्रकार की रूढ़ छवियाँ हैं?
उत्तर:
विभाजन ने भारत और पाकिस्तान दोनों में रूढ़ छवियों का निर्माण किया। पाकिस्तान में हिंदुओं के बारे में रूढ़ छवि है कि हिंदू काले, कायर, बहुदेववादी तथा शाकाहारी होते हैं।

प्रश्न 5.
द्विराष्ट्र का सिद्धांत क्या था?
उत्तर:
मोहम्मद अली जिन्ना ने द्विराष्ट्र का सिद्धांत दिया। इस सिद्धांत के अनुसार हिंदू और मुस्लिम बिल्कुल दो समाज थे। ये दोनों धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा, साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अलग-अलग थे। इसीलिए भारत में एक नहीं दो पृथक् राष्ट्र यानी हिंदू और मुस्लिम राष्ट्र मौजूद थे।

प्रश्न 6.
‘फूट डालो और राज करो’ का सिद्धांत क्या है?
उत्तर:
लॉर्ड एलफिंस्टन ने साफ-साफ कहा था कि फूट डालो और राज करो प्राचीन समय में रोमन का आदर्श था और अब यह भारत में हमारा भी होना चाहिए। अंग्रेज़ प्रारंभ से ही समझ गए थे कि थोड़े से ब्रिटिश अधिकारी सामूहिक भारतीयों की ताकत की बराबरी नहीं कर सकते। अतः उन्होंने एक समुदाय को दूसरे के खिलाफ भड़काने का प्रयास किया। इस नीति का प्रयोग करके अंग्रेज़ों ने हिंदुस्तान में हिंदुओं और मुसलमानों में फूट डाली और राज़ किया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 7.
मुस्लिम लीग की स्थापना कब हुई? इसके उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
मुस्लिम लीग की स्थापना 30 दिसंबर, 1906 को ढाका में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना और उनमें अंग्रेज़ों के प्रति निष्ठा पैदा करना था।

प्रश्न 8.
हिंदू महासभा पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
हिंदू महासभा की स्थापना 1915 में हुई। इसका प्रभाव उत्तर भारत तक सीमित था। यह पार्टी हिंदुओं के मध्य जाति और समुदाय के भेदभावों को समाप्त करके हिंदू समाज में एकता पैदा करने की कोशिश करती थी। यह मुसलमानों को गैर-समुदायी बताकर अपनी पहचान को परिभाषित करती थी।

प्रश्न 9.
आर्य समाज पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद ने 1875 में बंबई में की थी। 19वीं सदी के अंतिम दशकों और 20वीं सदी के प्रारंभिक दशकों का यह उत्तर-भारतीय हिंदू सुधार आंदोलन-पंजाब में सक्रिय था। आर्य समाज ने वैदिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक शिक्षा पर बल दिया। इसने मुसलमानों को पुनः हिंदू बनाने के लिए शुद्धि आंदोलन चलाया।

प्रश्न 10.
मस्जिद के सामने संगीत बजाने से हिंसा क्यों भड़कती थी?
उत्तर:
अकसर हिंदुओं के द्वारा होली जैसे त्योहार पर नमाज़ के वक्त मस्ज़िद के बाहर संगीत बजाए जाने से हिंदू-मुस्लिम हिंसा भड़क उठती थी। इसका कारण यह था कि रूढ़िवादी मुसलमान संगीत बजाए जाने को अपनी नमाज़ या इबादत में खलल मानते थे।

प्रश्न 11.
1937 के चुनावों ने सांप्रदायिकता को बढ़ावा कैसे दिया?
उत्तर:
1937 के चुनाव में कांग्रेस को भारी सफलता मिली, लेकिन मुसलमानों के लिए आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। मुस्लिम लीग को भी इन क्षेत्रों में सफलता नहीं मिली। लीग ने यू०पी० में कांग्रेस के सामने साझा सरकार बनाने का प्रस्ताव रखा, परंतु इसे कांग्रेस ने अस्वीकार कर दिया। इसके बाद लीग को लगा कि पृथक् निर्वाचन प्रणाली से उसे सत्ता नहीं मिल सकती। अतः उसने उग्र-सांप्रदायिकता का रुख अपना लिया और 1940 में ‘पाकिस्तान’ का प्रस्ताव पास किया।

प्रश्न 12.
कांग्रेस के मंत्रिमण्डलों पर मुस्लिम लीग ने क्या आरोप लगाया?
उत्तर:
1937 के बाद 7 प्रांतों में तथा 1938 में 2 अन्य प्रांतों में कांग्रेसी मंत्रिमण्डल बने। लीग ने सभी प्रांतों में कांग्रेस के शासन के पूरे 27 महीने के काल में कांग्रेस के खिलाफ जोरदार प्रचार किया और कांग्रेस पर आरोप लगाया कि इस शासन में मुसलमानों पर अत्याचार किए जा रहे हैं। कांग्रेस सांप्रदायिक दंगे रोकने में असफल रही है और उर्दू की कीमत पर देवनागरी लिपि में हिंदुस्तानी को बढ़ावा दे रही है।

प्रश्न 13.
पाकिस्तान का प्रस्ताव क्या था?
उत्तर:
मार्च,1940 में मस्लिम लीग ने लाहौर में पाकिस्तान का प्रस्ताव पास किया। इस प्रस्ताव में कहा गया कि “भौगोलिक दृष्टि से सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में चिह्नित किया जाए, जिन्हें बनाने में जरूरत के हिसाब से इलाकों का फिर से ऐसा समायोजन किया जाए कि हिंदुस्तान के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी क्षेत्रों जैसे जिन हिस्सों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, उन्हें इकट्ठा करके ‘स्वतंत्र राज्य’ बना दिया जाए, जिसमें शामिल इकाइयाँ स्वाधीन और स्वायत्त होंगी।

प्रश्न 14.
यूनियनिस्ट पार्टी पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
यूनियनिस्ट पार्टी की स्थापना 1923 में की गई थी। यह पार्टी पंजाब में हिंदू, मुस्लिम और सिक्ख भू-स्वामियों का प्रतिनिधित्व करती थी। यह पार्टी 1923-47 के बीच पंजाब में काफी ताकतवर रही।

प्रश्न 15.
महासंघ या परिसंघ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
आधुनिक राजनीतिक शब्दावली में ‘महासंघ’ या परिसंघ’ का अर्थ है काफी हद तक स्वायत्त और संप्रभु राज्यों का संघ, जिसकी केंद्रीय सरकार के पास केवल सीमित शक्तियाँ होती हैं।

प्रश्न 16.
‘पाकिस्तान’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किसने किया? इसका क्या अर्थ था?
उत्तर:
‘पाकिस्तान’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1933 में कैम्ब्रिज के छात्र चौधरी रहमत अली द्वारा किया गया। पाकिस्तान या पाकिस्तान (पंजाब, अफगान, कश्मीर, सिंध और ब्लूचिस्तान) का अर्थ है पवित्र स्थान।

प्रश्न 17.
लीग के ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
कैबिनेट मिशन की असफलता के बाद लीग ने 16 अगस्त, 1946 को ‘सीधी कार्रवाई दिवस’ घोषित किया तथा ‘लड़कर लेंगे पाकिस्तान’ का नारा दिया। इससे कलकत्ता और अन्य स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़क उठे तथा हजारों लोग मारे गए तथा गृहयुद्ध की स्थिति पैदा हो गई। इन दंगों ने पाकिस्तान का निर्माण अपरिहार्य-सा बना दिया।

प्रश्न 18.
“गाँधीजी एक अकेली फौज थे”, स्पष्ट करें।
उत्तर:
जब अगस्त, 1947 में देश के सभी भागों में दंगे भड़क उठे तो 77 वर्ष के गाँधीजी ने अपने सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को परखने के लिए एक बार सब कुछ दाँव पर लगा दिया। वे दंगों को रोकने और हिंदू-मुसलमानों में सद्भावना स्थापित करने के लिए अकेले ही पूर्वी बंगाल के नोआखली, बिहार के गाँवों, कलकत्ता आदि स्थानों पर गए। वे जहाँ-जहाँ भी गए, लोगों में बिजली-सा प्रभाव होता था। दंगे शांत हो उठते थे। माऊंटबेटेन ने गाँधीजी के प्रभाव को देखते हुए ‘One man boundary my force’ बताया। इस प्रकार दंगों के समय गाँधीजी ‘एक अकेली फौज’ के रूप में कार्य करते रहे और सद्भावना स्थापित करते रहे।

प्रश्न 19.
मुहाज़िर से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विभाजन के समय संयुक्त प्रान्त व बिहार से उर्दू भाषी मुस्लिम लोग भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए। इनमें से अधिकांश सिन्ध प्रान्त में व कराची में जाकर बस गए। इन शरणार्थियों को आज भी मुहाज़िर कहा जाता है तथा इनकी अनेक समस्याएँ अभी भी बनी हुई हैं।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
क्या विभाजन को महाध्वंस कहना उपयुक्त है?
उत्तर:
विभाजन को महाध्वंस कहना उपयुक्त है। महाध्वंस एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें युद्ध जैसी स्थिति में लगभग सब कुछ नष्ट हो जाता है तथा बड़ी संख्या में लोग मारे जाते हैं। विभाजन के समय भी युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए थे। विभाजन सांप्रदायिक हिंसा, जनसंहार, आगजनी, लूटपाट, अराजकता, अपहरण, बलात्कार आदि का पर्याय बन गया था। ‘दंगाई भीड़ों’ ने दूसरे समुदाय के लोगों को निशाना बनाकर मारा। ट्रेनों में सफर कर रहे लोगों पर हिंसक हमले हुए। ट्रेने मौत का पिंजरा बन गईं। यद्यपि हिंसा में पाकिस्तान और हिंदुस्तान में मारे गए लोगों की ठीक-ठीक संख्या बता पाना असंभव है, तथापि अनुमान लगाया जाता है कि 2 लाख से 2.5 लाख गैर-मुस्लिम तथा इतने ही मुस्लिम विभाजन की हिंसा में मारे गए।

यह भी अनुमान लगाया जाता है कि लगभग 1 करोड़ 50 लाख लोग अगस्त, 1947 से अक्तूबर, 1947 के बीच सीमा पार करने पर विवश हुए। पलक झपकते ही इन लोगों की संपत्ति, घर, दुकानें, खेत, रोजी-रोटी के साधन उनके हाथों से निकल गए। वे अपनी जड़ों से उखाड़ दिए गए। लाखों लोगों के प्रियजन मारे गए या बिछुड़ गए या शरणार्थी बन गए। वस्तुतः यह मात्र सम्पत्ति और क्षेत्र का विभाजन नहीं था बल्कि एक महाध्वंस था। 1947 में जो लोग सीमा पार से जिंदा बचकर आ रहे थे, वे विभाजन के फैसले को ‘सरकारी नज़रिए’ से नहीं देख रहे थे। उनके अनुभव भयानक थे और वे उसे ‘मार्शल लॉ’ ‘मारामारी’, ‘रौला’ या ‘हुल्लड़’ जैसे शब्दों से व्यक्त करते थे। वस्तुतः जनहिंसा, आगजनी, लूटपाट, अपहरण, बलात्कार को देखते
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 Img 4
हुए अनेक प्रत्यक्षदर्शियों और विद्वानों ने इसे ‘महाध्वंस’ (होलोकॉस्ट) कहा है। 1947 का हादसा इतना जघन्य था कि ‘विभाजन’ या ‘बँटवारा’ या, ‘तकसीम’ कह देने मात्र से इसके सारे पहलू प्रकट नहीं होते। मानवीय पीड़ा और दर्द का अहसास नहीं होता। महाध्वंस से सामूहिक नरसंहार की भयानकता और अन्य प्रभावों की भीषणता को कुछ हद तक समझा जा सकता है।

प्रश्न 2.
विभाजन ने भारत और पाकिस्तान के बीच में किस प्रकार की रूढ़छवियों का निर्माण किया?
उत्तर:
विभाजन की वजह से दोनों देशों में रूढ़छवियों का निर्माण हुआ। भारत में पाकिस्तान के प्रति नफरत तथा पाकिस्तान में भारत के प्रति नफरत बँटवारे की देन है। इससे दोनों देशों में दुश्मनी के भाव बने रहे हैं। यहाँ तक कि कई बार तो लोग यह भी मान लेते हैं कि भारतीय मुसलमानों की निष्ठा और वफादारी पाकिस्तान के साथ रहती है। इस क्षेत्रातीत (Extra-territorial) निष्ठा जैसी रूढ़ छवि के साथ अन्य आपत्तिजनक और गलत विचार भी गहरे में जुड़े होते हैं। जैसे कि कुछ लोगों को लगता है कि मुसलमान क्रूर, कट्टर और गंदे होते हैं। वे हमलावरों के वंशज हैं। दूसरी ओर ऐसा समझा जाता है कि हिंदू दयालु, उदार और शुद्ध होते हैं और वे सदैव हमले सहते आए हैं।

जहाँ भारत में इस प्रकार की रूढ़छवियाँ हैं वहीं पाकिस्तान में भी इसी प्रकार के विचार प्रचलन में हैं। पत्रकार आर०एम० मर्फी ने अपने अध्ययन में दर्शाया है कि पाकिस्तान में भी रूढ़ छवियां प्रचलन में हैं। उनका कहना है कि कुछ पाकिस्तानियों को लगता है कि मुसलमान निष्पक्ष, बहादुर, एकेश्वरवादी और मांसाहारी होते हैं, जबकि हिंदू काले, कायर, बहुदेववादी तथा शाकाहारी होते हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इन रूढ़ छवियों में से कुछ का निर्माण विभाजन से पहले ही कुछ हिंदुओं व मुसलमानों में हो चुका था परंतु 1947 के विभाजन तथा उससे जुड़ी बर्बरता ने इन छवियों को मजबूत किया है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 3.
क्या विभाजन एक लंबे इतिहास का अंतिम चरण था?
उत्तर:
कुछ भारतीय और पाकिस्तानी इतिहासकार यह मानते हैं कि विभाजन एक लंबे इतिहास का अंतिम चरण था। इस बात में उनका कहना है कि मोहम्मद अली जिन्ना का यह सिद्धांत ठीक था कि भारत में हिंदू और मुस्लिम दो पृथक् राष्ट्र विद्यमान थे। उनके अनुसार यह विचार मध्यकालीन भारत पर भी लागू होता है। ये इतिहासकार इस बात पर बल देते हैं कि 1947 की घटनाएँ (विभाजन) मध्यकाल तथा आधुनिक काल में हुए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों के लंबे इतिहास से जुड़ी हुई हैं। इस प्रकार वे विभाजन को हिंदू-मुस्लिम झगड़ों का चरम बिंदु मानते हैं। परंतु ये विद्वान इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि इन दोनों समुदायों में आपसी मेल-जोल का लंबा इतिहास भी रहा है। दोनों समुदायों के मेल-मिलाप से उर्दू भाषा, संगीत, स्थापत्य, रहन-सहन आदि से नई मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture) का उदय व विकास हुआ। परंतु जो लोग मात्र हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की ही बात करते हैं वे यह आकलन नहीं कर पाते।

प्रश्न 4.
सांप्रदायिकता का अर्थ समझाइए।
उत्तर:
सामान्य भाषा में साम्प्रदायिकता का अभिप्राय राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए धर्म का दुरुपयोग करना है। इस विचारधारा के अंतर्गत एक समुदाय की एकता का एकमात्र आधार धर्म को माना जाता है। बिपिन चंद्र जी ने तीन तत्त्वों पर बल दिया है। प्रथम, एक सांप्रदायिक व्यक्ति का विश्वास होता है कि एक ही धर्म को मानने वालों के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हित भी समान होते हैं। दूसरा-सांप्रदायिकता को मानने वाले यह भी स्वीकार करते हैं कि एक धर्म मानने वालों के सभी प्रकार के हित एक ही नहीं होते, वरन दूसरे धर्म के मानने वालों के हितों से भिन्न भी होते हैं। तीसरा, उक्त दोनों तत्त्व मानने वाले सांप्रदायिक लोग यह कहते हैं कि एक धर्मावलम्बियों के हित दूसरों के विरोधी होते हैं। सांप्रदायिकता के इस स्तर पर पहुँचने पर वह फासीवादी हो जाती है तथा युद्ध की भाषा बोलने लगती है। इसका अर्थ है कि सांप्रदायिकता वह राजनीति है जो धार्मिक समुदायों के बीच विरोध और झगड़े पैदा करती है। सांप्रदायिकता किसी भी समुदाय में एकता पैदा करने के लिए आंतरिक भिन्नताओं को दबाती है। उस समुदाय को किसी अन्य समुदाय के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित करती है।

प्रश्न 5.
अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति विभाजन के लिए किस हद तक जिम्मेदार थी?
उत्तर:
अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को भारत में सांप्रदायिकता के उदय व विकास और अन्ततः विभाजन के लिए जिम्मेदार माना गया है। अंग्रेजों ने हिंदुओं और मुसलमानों में घृणा पैदा करने को राजनीतिक शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। इस नीति से वे भारतीय समाज में अपने समर्थक और आधार को बढ़ाते थे तथा आपसी फूट डालकर भारतीयों को एक होने से रोकते थे। 1857 ई० के बाद अंग्रेजों ने मुसलमानों का दमन किया तथा हिंदुओं को साथ लगाया। परंतु 1870 के दशक में जब शिक्षित भारतीयों में राजनीतिक चेतना आने लगी तो उन्होंने मुसलमानों का पक्ष लेना शुरू किया। उन्हें विशेष रियायतें देने लगे। भारतीयों के मतभेदों को उभारकर उनमें दुर्भावनाएँ पैदा की। अंग्रेज़ों ने कांग्रेस को हिंदू आंदोलन बताया तथा सर सैयद अहमद के साथ मिलकर मुसलमानों को कांग्रेस के आंदोलन से दूर रखने का प्रयास किया। साथ ही उच्चवर्गीय मुसलमानों को अपना संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। 1906 में मुस्लिम लीग का निर्माण करवाया। 1909 के एक्ट में पृथक निर्वाचन प्रणाली प्रारम्भ की। बाद में इसका विस्तार किया। 1940 के बाद तो मुस्लिम लीग को एक प्रकार से भारतीय समस्याओं विशेष रूप से सांप्रदायिक समस्या के हल के लिए वीटो का अधिकार ही दे दिया। इस नीति से भारतीयों में दंगे हुए। स्पष्ट है कि अंग्रेजों की ‘फूट डालो व राज करो’ की नीति भारतं विभाजन के लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है।

प्रश्न 6.
पृथक निर्वाचन प्रणाली ने भारतीय राजनीति को कैसे प्रभावित किया? अथवा संविधान सभा में पृथक चुनाव प्रणाली का विरोध क्यों किया गया?
उत्तर:
पृथक् निर्वाचन पद्धति ने भारतीय राजनीति की प्रकृति को अत्यधिक प्रभावित किया और इसका विरोध हुआ। इस प्रणाली का अभिप्राय था कि धर्म के आधार पर पहचान को स्वीकृति प्रदान की गई। अब पृथक निर्वाचन चुनाव क्षेत्रों में सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़े हो सकते थे तथा मुस्लिम मतदाता ही मत डाल सकते थे। इसका अर्थ यह भी था कि गैर-मुस्लिम मतदाता मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए मतदान नहीं कर सकते थे। ऐसा करके ब्रिटिश सरकार ने चुनाव प्रचार और राजनीति को धार्मिक दीवारों में बाँध दिया। इस पृथक् निर्वाचन प्रणाली ने इस बात को बढ़ावा दिया कि भारतीय समाज हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच बँटा है। इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिला और सांप्रदायिक संगठनों को भी बल मिला। इससे चुनावी राजनीति धार्मिक पहचान को गहरा और पक्का करने लगी। इसने राष्ट्रीय राजनीति को कमजोर किया।

प्रश्न 7.
कैबिनेट मिशन भारत क्यों आया? इसके प्रमुख प्रस्ताव क्या थे?
उत्तर:
15 मार्च, 1946 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एटली ने भारत को जल्दी ही स्वतंत्रता देने की बात कही। अंग्रेज़ भारत से सम्मानजनक ढंग से इंग्लैंड लौट जाना चाहते थे। अतः मार्च, 1946 में कैबिनेट मिशन भारत भेजा गया। इसका लक्ष्य भारत में एक राष्ट्रीय सरकार बनाना तथा भावी संविधान के लिए रास्ता तैयार करना था।

  • प्रस्ताव कैबिनेट मिशन ने 24 मार्च से जून, 1946 तक भारत के सभी नेताओं से वार्ता की तथा पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार कर एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा। इसकी संविधान सभा के लिए चुनाव प्रांतों द्वारा किया जाता था। प्रांतों को तीन भागों में बाँटा गया। ‘क’ समूह में मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार और उड़ीसा को रखा गया। ‘ख’ समूह में पंजाब, सीमा प्रांत और सिंध तथा आसाम और बंगाल को ‘ग’ समूह में रखा गया। प्रांतों में अवशिष्ट (Residual) शक्तियाँ रखी गईं। केंद्र के पास प्रतिरक्षा, विदेशी मामले और संचार व्यवस्था को रखा गया। योजना में यह भी कहा गया कि प्रथम आम चुनाव के बाद कोई भी प्रांत अपने समूह से अलग हट सकता है और 10 वर्ष के बाद प्रांत समूह और केंद्रीय संविधान में परिवर्तन की माँग कर सकता है। इस योजना को कांग्रेस तथा लीग दोनों ने स्वीकार कर लिया।

परंतु कांग्रेस प्रांतों के समूहीकरण को ऐच्छिक मानती थी। 10 जुलाई, 1946 को नेहरू जी ने एक बयान दिया कि कांग्रेस संविधान सभा में सभी अनुबंधों से मुक्त होकर जाएगी। जिन्ना, पहले ही इस योजना से खुश नहीं थे, तत्काल कैबिनेट योजना को अस्वीकार कर दिया।

प्रश्न 8.
वेवल योजना क्यों असफल रही?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध के समय इंग्लैंड की सरकार और भारतीय नेताओं के मध्य गतिरोध को समाप्त करने के उद्देश्य से वेवल ने सभी भारतीय नेताओं को बातचीत के लिए 14 जून, 1945 को आमंत्रित किया। सभी नेता जेलों से रिहा किए गए। वेवल योजना के तहत शिमला कांफ्रेंस हुई जिसमें वेवल ने मुख्य योजना ‘नई कार्यकारी परिषद्’ के निर्माण को लेकर रखी। नई कार्यकारिणी में वायसराय और मुख्य सेनापति को छोड़कर सभी सदस्य भारतीय होने थे तथा सभी समुदायों को संतुलित प्रतिनिधित्व दिया जाना था। हिंदू-मुस्लिम सदस्यों की संख्या बराबर होनी थी। इस कार्यकारिणी परिषद् ने अंतरिम राष्ट्रीय सरकार के रूप में कार्य करना था। परंतु नई परिषद् के निर्माण को लेकर भारतीय दलों में कोई सहमति नहीं बन पाई।

लीग का कहना था कि वह मुस्लिम समुदाय का एकमात्र प्रतिनिधि है, अतः सिर्फ उसे ही परिषद के मुस्लिम सदस्यों को चुनने का हक दिया जाए। दूसरी ओर, कांग्रेस का कहना था कि वह एक राष्ट्रीय संगठन है अतः उसे हिंदू तथा साथ ही मुस्लिम सदस्यों को चुनने का हक दिया जाए। लीग की हठधर्मिता के कारण गतिरोध पैदा हो गया। ऐसे में 14 जुलाई, 1945 को वेवल ने योजना की असफलता की घोषणा कर दी। इससे कांग्रेस व लीग में कटुता बढ़ी तथा योजना की असफलता से देश में निराशा फैली। इस घटना ने देश को विभाजन की ओर धकेला।

प्रश्न 9.
गाँधी जी द्वारा 1947 के दंगों के समय सद्भावना स्थापित करने के प्रयासों का विवरण दीजिए।
उत्तर:
1947 के दंगों के समय महात्मा गाँधी ही थे जो अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी देश में सांप्रदायिक सद्भावना के प्रयासों में लगे थे। 77 वर्ष के बुजुर्ग महात्मा गाँधी ने अहिंसा के अपने सिद्धांत को एक बार फिर परखने के लिए अपना सर्वस्व दाँव पर लगा दिया। उनका विश्वास था कि सत्य और अहिंसा के द्वारा लोगों का हृदय परिवर्तन किया जा सकता है। सचमुच इस संकट की घड़ी में गाँधीजी के नेतृत्व का चरमोत्कर्ष देखा जा सकता है। वे देश की धधकती हुई सांप्रदायिक आग को समाप्त करने के लिए पूर्वी बंगाल के नोआखली से बिहार के गाँवों में निकल पड़े। वे कलकत्ता व दिल्ली में दंगों से झुलसी झुग्गी-झोंपड़ियों तक पहुंचे। उन्होंने लोगों को समझाया कि हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे को न मारें। उन्होंने सभी जगहों पर अल्पसंख्यकों को दिलासा दी।

पूर्वी बंगाल में उन्होंने गाँव-गाँव पैदल पहुँचकर वहाँ के मुसलमानों को हिंदुओं की रक्षा के लिए समझाया। दिल्ली में भी दोनों समुदायों में भरोसा और विश्वास बहाल करने की कोशिश की। जहाँ पर गाँधी जी हिंसा को रोकने और सद्भावना की स्थापना के लिए जाते थे वहाँ पर ‘बिजली’ की गति से असर होता था। लोग अपने हथियार गाँधीजी को समर्पित कर देते थे। जहाँ बड़ी सेना भी शांति बहाल करने में सक्षम नहीं होती थी वहाँ गाँधीजी के पहुंचते ही शान्ति स्थापित हो जाती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव

प्रश्न 10.
इज्जत की रक्षा से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विभाजन के दौरान ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिलते हैं जब परिवार के पुरुषों ने ही परिवार की ‘इज्जत’ की रक्षा के नाम पर अपने परिवार की स्त्रियों को स्वयं ही मार दिया या आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। इन पुरुषों को भय होता था कि शत्रु उनकी औरतों-माँ, बहन, बेटी को नापाक कर सकता था। इसलिए परिवार की मान-मर्यादा को बचाने के लिए खुद ही उनको मार डाला। उर्वशी बुटालिया ने अपनी पुस्तक दि अदर साइड ऑफ साइलेंस में रावलपिंडी जिले के थुआखालसा नामक गाँव की एक इसी प्रकार की दर्दनाक घटना का विवरण दिया है। वे बताती हैं कि बँटवारे के समय सिक्खों के इस गाँव की 90 औरतों ने दुश्मनों के हाथों में पड़ने की बजाय ‘अपनी इच्छा से’ एक कुएँ में कूदकर अपनी जान दे दी थी। इस गाँव के लोग इसे आत्महत्या नहीं शहादत मानते हैं और आज भी दिल्ली के एक गुरुद्वारे में हर वर्ष 13 मार्च को उनकी शहादत की याद में कार्यक्रम आयोजित किया जाता है तथा इस घटना को मर्दो, औरतों व बच्चों को विस्तार से सुनाया जाता है। वस्तुतः इस माध्यम से महिलाओं को अपनी बहनों के बलिदान और बहादुरी को अपने दिलों में संजोने और स्वयं को भी उसी साँचे में ढालने के लिए प्रेरित किया जाता है।

प्रश्न 11.
विभाजन के समय मानवता और सदभावना के पक्ष को उजागर करने वाली कोई एक घटना लिखें।
उत्तर:
विभाजन का एक पहलू जहाँ हिंसा, आगजनी, मार-काट से जुड़ा है, वहीं दूसरा पहलू मानवीय मदद और सद्भावना का भी रहा। ऐसी अनेक घटनाएँ दोनों तरफ देखने को मिलती हैं। उदाहरण के लिए एक ऐसी ही घटना का वर्णन डॉ० खुशदेव सिंह ने अपने संस्मरण में किया है। डॉ० खुशदेव सिंह पेशे से डॉक्टर थे तथा तपेदिक के विशेषज्ञ थे। विभाजन के समय वे हिमाचल प्रदेश में धर्मपुर नामक स्थान पर नियुक्त थे। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के असंख्य शरणार्थियों (हिंदू, सिक्ख, मुसलमान सहित) को भोजन, आश्रय और सुरक्षा प्रदान की। उनकी मानवता व सहृदयता ने धर्मपुर के लोगों का दिल जीत लिया था। उन पर वहाँ के लोगों का वैसा ही विश्वास था जैसा दिल्ली और कई स्थानों पर मुसलमानों को गाँधी जी पर था। डॉ० खुशदेव सिंह ने 1947 के बारे में उल्लेख करते हुए संस्मरण लिखा जिसका शीर्षक-लव इज स्ट्रांगर देन हेट, ए रिमेम्बेरेंस ऑफ 1947 (मोहब्बत नफ़रत से ज्यादा ताकतवर होती है : 1947 की यादें हैं) अपनी इस पुस्तक में डॉक्टर साहब ने अपने कुछ राहत कार्यों का विवरण देते हुए स्पष्ट किया है कि यह “एक इंसान होने के नाते बिरादर इंसानों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए मेरी छोटी-सी कोशिश थी।” उन्होंने 1949 में कराची की दो बार यात्राओं का विवरण बड़े गर्वपूर्वक और हृदयस्पर्शी शब्दों में दिया है।

प्रश्न 12.
व्यक्तिगत स्मृतियों की खूबी का वर्णन करो।
उत्तर:
मौखिक स्रोत के रूप में व्यक्तिगत स्मृतियों की एक महत्त्वपूर्ण खूबी यह है कि इनसे हमें लोगों के अनुभवों और स्मृतियों को गहराई से समझने में सहायता मिलती है। इन स्मृतियों के माध्यम से इतिहासकारों को विभाजन जैसी दर्दनाक घटना के दौरान लोगों को किन-किन शारीरिक और मानसिक पीड़ाओं को झेलना पड़ा, का बहुरंगी एवं सजीव वृत्तांत लिखने में सहायता मिलती है। यहाँ यह उल्लेख करना भी उपयुक्त है कि सरकारी दस्तावेजों में इस तरह की जानकारी नहीं मिलती। ये दस्तावेज नीतिगत और दलगत या विभिन्न सरकारी योजनाओं से संबंधित होते हैं। इन फाइलों व रिपोर्टों में बँटवारे से पहले की वार्ताओं, समझौतों या दंगों और विस्थापन के आँकड़ों, शरणार्थियों के पुनर्वास इत्यादि के बारे में काफी जानकारी मिलती है। परंतु इनसे देश के विभाजन से प्रभावित होने वाले लोगों के रोजाना के हालात, उनकी अंतपीड़ा और कड़वे अनुभवों के बारे में विशेष पता नहीं लगता। यह तो व्यक्तिगत स्मृतियों से ही जाना जा सकता है।

प्रश्न 13.
मौखिक गवाही प्राप्त करने संबंधी क्या कठिनाइयाँ होती हैं?
उत्तर:
विभाजन जैसे विषय पर मौखिक गवाही प्राप्त करना अत्यंत कठिन कार्य है। साक्षात्कारकर्ता को लोगों की पीड़ा के । अहसास को समझने के लिए अत्यंत सूझ-बूझ और संवेदनशीलता से काम लेना होता है। उदाहरण के लिए सबसे पहली समस्या यह होती है कि विभाजन की पीड़ा से गुजरा व्यक्ति उस कड़वे अनुभव को दोहराना नहीं चाहता यानी बलात्कार की पीड़ा से गुजरने वाली महिला को एक अजनबी के समक्ष अपनी व्यथा पुनः बयान करने के लिए तैयार करना सरल कार्य नहीं। इसके लिए कारकर्ता को पीड़ित महिला से आत्मीय संबंध स्थापित करने चाहिएँ ताकि उपयोगी जानकारी मिल सके। मौखिक गवाही प्राप्त करने में एक अन्य समस्या याददाश्त से संबंधित होती है। यह महत्त्वपूर्ण है कि कौन किस घटना को किस तरह से कितना याद रखता है। किन बातों को याद रखता है और किन बातों को भुला देता है। यह कुछ हद तक इस बात पर भी निर्भर करता है कि पीच के वर्षों में उनके अनुभव किस प्रकार के रहे हैं। इस दौरान उनके समुदायों और राष्ट्रों के साथ क्या हुआ है। वस्तुतः स्मृतियों के आधार पर इतिहास लेखन कठिन कार्य है।

प्रश्न 14.
1947 में पंजाब में कानून व्यवस्था की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
1947 में पंजाब में कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। 3 मार्च, 1947 को लाहौर शहर में दंगा भड़कने के साथ ही पंजाब के अन्य शहरों-रावलपिण्डी, मुल्तान, अमृतसर, गुजरात, कैंप बेल, झेलम आदि में मुसलमानों और गैर-मुसलमानों में दंगे भड़क उठे थे। रावलपिण्डी, अटक और मुल्तान में हिंदुओं और सिक्खों पर जोरदार हमले हुए। गाँवों में सिक्ख किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा। भीड़ ने गाँव-के-गाँव जला डाले। बहावलपुर में तत्कालीन समय में नियुक्त अंग्रेज़ अधिकारी पेंडरेल मून (Penderel Moon) ने प्रशासन की पंगुता को रक्तपात का दोषी बताया। अराजकता और प्रशासन की अकर्मण्यता का विवरण करते हुए मून ने लिखा था कि जब मार्च, 1947 में पूरे अमृतसर में भयंकर लूटपाट, रक्तपात और आगजनी हो रही थी, तो पुलिस एक भी गोली नहीं चला पाई। मून ने स्थिति का जीवंत विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा-“24 घंटे से भी ज्यादा समय तक दंगाई भीड़ को इस विशाल व्यावसायिकं शहर में बेरोक-टोक तबाही फैलाने दी गई। बेहतरीन बाजारों को जलाकर राख कर दिया गया, जबकि उपद्रव फैलाने वालों पर एक गोली भी नहीं चलाई गई। ……जिला मजिस्ट्रेट ने अपने विशाल पुलिस बल को शहर में मार्च का आदेश दिया और उसका कोई सार्थक इस्तेमाल किए बिना बापस बुला लिया।”

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न : भारत विभाजन क्यों हुआ? कोई पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
भारत का विभाजन क्यों हुआ? इसके मौलिक कारण क्या थे? विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था? इत्यादि प्रश्नों पर इतिहासकार और विद्वान् एकमत नहीं हैं। यूरोपीय इतिहासकारों और राजनेताओं के अनुसार भारत में यूरोपीय देशों जैसी राष्ट्रीय एकता थी ही नहीं। उनका कहना था कि हिंदुओं तथा मुसलमानों में पारस्परिक दुश्मनी के कारण भारत का विभाजन हुआ। दूसरी ओर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं (महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू आदि) के अनुसार भारत का विभाजन अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का परिणाम था। मोहम्मद अली जिन्ना तथा मुस्लिम लीग के अनुसार भारत में दो राष्ट्र-हिंदू और मुस्लिम, विद्यमान थे। डॉ०बी०आर० अंबेडकर ने हिंदुओं की अलगाववादी भावना को विभाजन का प्रमुख कारण बताया है। उनका कहना है कि इस अलगाववादी नीति के कारण ही मुस्लिम लीग की अलग राज्य की माँग सफल हुई और देश का विभाजन हुआ। इसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं

1. द्विराष्ट्र का सिद्धांत-कुछ भारतीय और पाकिस्तानी इतिहासकार यह मानते हैं कि मोहम्मद अली जिन्ना का यह सिद्धांत ठीक था कि भारत में हिंदू और मुस्लिम दो पृथक् राष्ट्र विद्यमान थे। उनके अनुसार यह विचार मध्यकालीन भारत पर भी लागू होता है। ये इतिहासकार इस बात पर बल देते हैं कि 1947 की घटनाएँ (विभाजन) मध्यकाल तथा आधुनिक काल में हुए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों के लंबे इतिहास से जुड़े हुए हैं। इस प्रकार वे विभाजन को हिंदू-मुस्लिम झगड़ों का चरम बिंदु या अंतिम चरण मानते हैं।

परंतु ये विद्वान् इस बात को नजरअंदाज कर देते हैं कि इन दोनों समुदायों में आपसी मेल-जोल का लंबा इतिहास भी रहा है। यह उल्लेखनीय है कि भारत में मध्यकाल से ही हिंदू-मुसलमानों में आपसी सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने दोनों समुदायों के रिश्तों को मजबूत किया था। दोनों समुदायों के मेल-मिलाप से उर्दू भाषा, संगीत, स्थापत्य, रहन-सहन आदि से नई मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture) का उदय व विकास हुआ। परंतु जो लोग मात्र हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की ही बात करते हैं वे यह आंकलन नहीं कर पाते।

यिक राजनीति-कुछ विद्वानों का यह मानना है कि देश का विभाजन एक ऐसी सांप्रदायिक राजनीति का शिखर था जो 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में शुरू हुई। इन विद्वानों का तर्क है कि अंग्रेज़ों ने मुसलमानों की आरक्षण की माँग को स्वीकार किया। 1909 के भारत सरकार अधिनियम में मुसलमानों के लिए पृथक् निर्वाचन क्षेत्रों का निर्माण किया तथा आगे (1919, 1935 में) इसका विस्तार किया। इस पृथक् निर्वाचन पद्धति में विभाजन के बीज बो दिए गए। इस व्यवस्था ने सांप्रदायिक राजनीति की प्रकृति को अत्यधिक प्रभावित किया। इसका अभिप्राय था कि धर्म के आधार पर पहचान को स्वीकृति

प्रदान की गई। अब इन चुनाव क्षेत्रों में सिर्फ मुस्लिम उम्मीदवार ही खड़े हो सकते थे तथा मुस्लिम मतदाता ही मत डाल सकते थे। इसका अर्थ यह भी था कि गैर-मुस्लिम मतदाता मुस्लिम उम्मीदवारों के लिए मतदान नहीं कर सकते थे। ऐसा करके ब्रिटिश सरकार ने चुनाव प्रचार और राजनीति को धार्मिक दीवारों में बाँध दिया। इस पृथक् निर्वाचन प्रणाली ने इस बात को बढ़ावा दिया कि भारतीय समाज हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच बँटा है जिनके आपसी हित अलग-अलग हैं। इससे अलगाववाद को बढ़ावा मिला और सांप्रदायिक संगठनों को भी बल मिला। इससे चुनावी राजनीति धार्मिक पहचान को गहरा और पक्का करने लगी। दूसरी ओर सांप्रदायिकता (Communalism) ने राष्ट्रीय राजनीति को कमजोर किया। महात्मा गाँधी ने पृथक् निर्वाचन मंडल के प्रभाव पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि मिन्टो-मार्ले सुधारों ने हमारा सर्वनाश कर डाला।

3. अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति (British Policy of Divide and Rule)-अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को भारत में सांप्रदायिकता के उदय व विकास और अन्ततः विभाजन के लिए जिम्मेदार माना गया है। अंग्रेज़ों ने हिंदुओं और मुसलमानों में घृणा पैदा करने को राजनीतिक शस्त्र के रूप में प्रयोग किया। लॉर्ड एलफिंस्टन ने स्पष्ट कहा था कि ‘फूट डालो और राज करो’ प्राचीन में रोमन का आदर्श था, यह हमारा भी होना चाहिए (Divide impera was the old Roman motto and it should be ours.’)। ब्रिटिश प्रारंभ से ही यह समझ गए थे कि सीमित ब्रिटिश अधिकारी सामूहिक भारतीयों की ताकत की बराबरी नहीं कर सकते। अतः उन्होंने एक समुदाय के साथ विशेष व्यवहार कर तथा दूसरे के प्रति उदासीनता दिखाकर मतभेद के बीज बोए।

इस नीति से वे भारतीय समाज में अपने समर्थक और आधार को बढ़ाते थे तथा आपसी फूट डालकर भारतीयों को एक होने से रोकते थे। 1857 ई० के बाद अंग्रेज़ों ने मुसलमानों का दमन किया तथा हिंदुओं को साथ लगाया। परंतु 1870 के दशक में जब शिक्षित भारतीयों में राजनीतिक चेतना आने लगी तो उन्होंने मुसलमानों का पक्ष लेना शुरू किया। उन्हें विशेष रियायतें देने लगे। भारतीयों के मतभेदों को उभारकर उनमें दुर्भावनाएँ पैदा की। अंग्रेज़ों ने कांग्रेस को हिंदू आंदोलन बताया तथा सर सैयद अहमद के साथ मिलकर मुसलमानों को कांग्रेस के आंदोलन से दूर रखने का प्रयास किया। साथ ही उच्चवर्गीय मुसलमानों को अपना संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। 1906 में मुस्लिम लीग का निर्माण करवाया। इस नीति पर चलते हुए उन्होंने आगे बहुत से और कदम उठाए।

4. सांप्रदायिक संगठनों की स्थापना (Formation of Communal Organisations)-20वीं सदी के प्रथम दशक के मध्य से साम्प्रदायिक संगठन बनने लगे। सरकार ने उन्हें प्रोत्साहन दिया। 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई। लीग का मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के राजनीतिक हितों की रक्षा करना तथा मुसलमानों में अंग्रेज़ सरकार के प्रति निष्ठा पैदा करना था। प्रारंभ के वर्षों में लीग ने पृथक् निर्वाचन प्रणाली की मांग की तथा बंगाल विभाजन का समर्थन किया।

  • इसी समय 1909 ई० में लाल चंद और बी० एन मुखर्जी के प्रयासों से पंजाब हिंदू महासभा की स्थापना हई। इनका मूल मंत्र था कि ‘हिंदू पहले हैं और भारतीय बाद में।’ इन्होंने कांग्रेस का विरोध करना शुरू किया तथा कांग्रेस पर आरोप लगाया कि वह हिंदुओं के हितों को नजरअंदाज कर रही है और मुसलमानों के प्रति तुष्टिकरण की नीति अपना रही है। 1915 में तीय हिंदू सभा की स्थापना हुई जो हिंदू सांप्रदायिकता को संगठित रूप देने की दिशा में अगला कदम था।

5. ‘पाकिस्तान’ प्रस्ताव (‘Pakistan’ Resoution)-1937 के बाद जिन्ना की राजनीति पूरी तरह से उग्र-सांप्रदायिकता की राजनीति थी। उन्होंने कांग्रेस और राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध जहर उगलना शुरू कर दिया। उन्होंने दुष्प्रचार किया कि कांग्रेस का आला कमान दूसरे सभी समुदायों और संस्कृतियों को नष्ट करने तथा हिंदू राज्य कायम करने के लिए पूरी तरह दृढ़ प्रतिज्ञ है। उन्होंने मुस्लिम जनता को भयभीत करना शुरू किया कि स्वतंत्र भारत में मुस्लिम और स्लिम और इस्लाम दोनों के ही अस्तित्व को खतरा पैदा हो जाएगा।

1940 में जिन्ना ने अपने ‘द्विराष्ट्रों के सिद्धांत’ को मुस्लिम जनता के समक्ष रखा। इस सिद्धांत की दो मान्यताएँ थीं। पहली मान्यता के अनुसार “हिंदू और मुसलमान बिल्कुल दो समाज थे। धर्म, दर्शन, सामाजिक प्रथा और साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से दोनों अलग-अलग थे ……… इसलिए ये दोनों कौमें एक राष्ट्र नहीं बन सकती थीं।” दूसरी मान्यता यह थी कि यदि भारत एक राज्य रहता है तो बहुमत के शासन के नाम पर सदा हिंदू शासन रहेगा। इसका अर्थ होगा इस्लाम के बहुमूल्य तत्त्व का पूर्ण विनाश और मुसलमानों के लिए स्थाई दासता।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 14 विभाजन को समझना : राजनीति, स्मृति, अनुभव Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अंतर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. “स्वराज की गंध से मेरे नथुने फटने लगे हैं।” ये शब्द निम्नलिखित में से किसने कहे?
(A) जवाहरलाल नेहरू ने
(B) महात्मा गाँधी ने
(C) लाला लाजपतराय ने
(D) गोपाल कृष्ण गोखले ने
उत्तर:
(B) महात्मा गाँधी ने

2. “कानून तोड़ने वाले तुम्हारा स्वागत है।” ये शब्द किसने, किसके लिए कहे?
(A) जवाहरलाल नेहरू ने जनरल डायर के लिए
(B) सरोजिनी नायडू ने गाँधी जी के लिए
(C) महात्मा गाँधी ने लाला लाजपतराय के लिए
(D) लॉर्ड इर्विन ने गाँधी जी के लिए
उत्तर:
(B) सरोजिनी नायडू ने गाँधी जी के लिए

3. ‘खुदाई खिदमतगार सेना’ का गठन किया
(A) महात्मा गाँधी ने
(B) अब्दुल गफ्फार खाँ ने
(C) सर सैयद अहमद खाँ ने
(D) दादा भाई नौरोजी ने
उत्तर:
(B) अब्दुल गफ्फार खाँ ने

4. गाँधी जी ने कपड़ा मिल मजदूरों का समर्थन किया
(A) श्रीनगर में
(B) लखनऊ में
(C) अहमदाबाद में
(D) कलकत्ता में
उत्तर:
(C) अहमदाबाद में

5. गाँधी जी का प्रसिद्ध दांडी मार्च कितने दिनों तक चला?
(A) 21 दिन
(B) 24 दिन
(C) 30 दिन
(D) 8 दिन
उत्तर:
(B) 24 दिन

6. महात्मा गांधी की डांडी यात्रा कब आरम्भ हुई?
(A) 12 मार्च, 1930 ई०
(B) 12 अप्रैल, 1931 ई०
(C) 13 मार्च, 1931 ई०
(D) 14 मार्च, 1932 ई०
उत्तर:
(A) 12 मार्च, 1930 ई०

7. महात्मा गाँधी निम्नलिखित में से किससे प्रभावित हुए?
(A) हैनरी डेविड थोरो
(B) रस्किन
(C) टॉलस्टॉय
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

8. जलियाँवाला बाग हत्याकांड किया गया
(A) जनरल डायर द्वारा
(B) हार्डिंग द्वारा
(C) आकलैंड द्वारा
(D) कर्जन द्वारा
उत्तर:
(A) जनरल डायर द्वारा

9. सर की उपाधि का त्याग किसने किया?
(A) रवींद्रनाथ टैगोर ने
(B) सेठ जमनादास बजाज ने
(C) महात्मा गाँधी ने
(D) मोतीलाल नेहरू ने
उत्तर:
(A) रवींद्रनाथ टैगोर ने

10. गाँधी जी के द्वारा असहयोग आंदोलन समाप्त करने के कारण असंतुष्ट काँग्रेसियों ने निम्नलिखित संगठन बनाया
(A) साम्यवादी दल
(B) स्वराज्य दल
(C) काँग्रेसी समाजवादी दल
(D) उदारवादी दल
उत्तर:
(B) स्वराज्य दल

11. जलियाँवाला बाग हत्याकांड निम्नलिखित में से किस तिथि को घटित हुआ?
(A) 13 अप्रैल, 1919 को
(B) 14 अप्रैल, 1920 को
(C) 13 अप्रैल, 1921 को
(D) 1 जनवरी, 1923 को
उत्तर:
(A) 13 अप्रैल, 1919 को

12. जनरल डायर को उपाधि दी गई
(A) ब्रिटिश राज्य को नष्ट करने वाला
(B) ब्रिटिश राज्य का रक्षक
(C) देशद्रोही
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) ब्रिटिश राज्य का रक्षक

13. चौरी-चौरा की घटना घटित हुई
(A) 5 फरवरी, 1922 को
(B) 10 जनवरी, 1921 को
(C) 15 जुलाई, 1923 को
(D) 5 जनवरी, 1932 को
उत्तर:
(A) 5 फरवरी, 1922 को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

14. तुर्की के खलीफा के अधिकारों को प्राप्त करने हेतु कौन-सा आंदोलन चलाया गया?
(A) खिलाफ़त आंदोलन
(B) असहयोग आंदोलन
(C) होमरूल आंदोलन
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) खिलाफ़त आंदोलन

15. लाला लाजपतराय का निधन हुआ
(A) 1940 ई० में
(B) 1952 ई० में
(C) 1928 ई० में
(D) 1927 ई० में
उत्तर:
(C) 1928 ई० में

16. 1937 के आम चुनाव में कांग्रेस को कितने प्रान्तों में पूर्ण बहुमत मिला था?
(A) 7
(B) 9
(C) 8
(D) 11
उत्तर:
(A) 7

17. साइमन कमीशन के अध्यक्ष थे
(A) महात्मा गाँधी
(B) क्रिप्स
(C) सुभाषचंद्र बोस
(D) सर जॉन साइमन
उत्तर:
(D) सर जॉन साइमन

18. पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित हुआ
(A) लाहौर अधिवेशन में
(B) बंबई अधिवेशन में
(C) पूना अधिवेशन में
(D) रांची अधिवेशन में
उत्तर:
(A) लाहौर अधिवेशन में

19. सविनय अवज्ञा आंदोलन का नेतृत्व किया
(A) पं० जवाहरलाल नेहरू ने
(B) पं० मोतीलाल नेहरू ने
(C) जिन्ना ने
(D) महात्मा गाँधी ने
उत्तर:
(D) महात्मा गाँधी ने

20. 1929 ई० के काँग्रेस अधिवेशन (लाहौर) की अध्यक्षता की
(A) पं जवाहरलाल नेहरू ने
(B) बाल गंगाधर तिलक ने
(C) लाला लाजपतराय ने
(D) महात्मा गाँधी ने
उत्तर:
(A) पं जवाहरलाल नेहरू ने

21. सांप्रदायिक निर्णय घोषित करने वाले ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे
(A) चर्चिल
(B) माउंटबेटन
(C) एटली
(D) मैकडोनाल्ड
उत्तर:
(D) मैकडोनाल्ड

22. साइमन कमीशन भारत कब आया?
(A) 1928 ई० में
(B) 1927 ई० में
(C) 1935 ई० में
(D) 1930 ई० में
उत्तर:
(A) 1928 ई० में

23. साइमन कमीशन को दो वर्ष पूर्व भेजा गया क्योंकि
(A) 1929 ई० में आम चुनाव होने वाले थे
(B) सरकार द्वारा दिखावे के लिए भारतीयों की माँगों की जाँच के लिए
(C) हिंदू-मुस्लिम झगड़ों का सरकार लाभ उठाना चाहती थी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. गाँधी जी ने डांडी यात्रा कहाँ से आरम्भ की?
(A) साबरमती आश्रम
(B) डांडी
(C) काठियावाड़
(D) सूरत
उत्तर:
(A) साबरमती आश्रम

25. प्रथम गोलमेज सम्मेलन प्रारंभ हुआ
(A) 12 नवंबर, 1930
(B) 14 जनवरी, 1931
(C) 15 अगस्त, 1932
(D) 13 जुलाई, 1931
उत्तर:
(A) 12 नवंबर, 1930

26. गाँधी-इर्विन समझौता कब हुआ?
(A) 5 मार्च, 1931
(B) 4 मार्च, 1932
(C) 4 जुलाई, 1945
(D) 5 अगस्त, 1931
उत्तर:
(A) 5 मार्च, 1931

27. दूसरा गोलमेज सम्मेलन हुआ
(A) 7 सितंबर, 1931
(B) 8 दिसंबर, 1933
(C) 4 मई, 1934
(D) 7 सितंबर, 1930
उत्तर:
(A) 7 सितंबर, 1931

28. सरहदी गाँधी किसे कहा जाता है?
(A) महात्मा गाँधी को
(B) पं० जवाहरलाल नेहरू को
(C) सुभाषचंद्र बोस को
(D) अब्दुल गफ्फार खाँ को
उत्तर:
(D) अब्दुल गफ्फार खाँ को

29. सविनय अवज्ञा आंदोलन की पुनरावृत्ति हुई
(A) 1932 ई० में
(B) 1934 ई० में
(C) 1936 ई० में
(D) 1944 ई० में
उत्तर:
(A) 1932 ई० में

30. सांप्रदायिक निर्णय लिया गया
(A) 1932 ई० में
(B) 1934 ई० में
(C) 1935 ई० में
(D) 1936 ई० में
उत्तर:
(A) 1932 ई० में

31. तीसरा गोलमेज सम्मेलन प्रारंभ हुआ
(A) 17 नवंबर, 1932
(B) 24 दिसंबर, 1932
(C) 26 सितंबर, 1932
(D) 16 अगस्त, 1932
उत्तर:
(A) 17 नवंबर, 1932

32. सर्वदलीय सम्मेलन (1928) के अध्यक्ष थे
(A) पं० मोतीलाल नेहरू
(B) पं० जवाहरलाल नेहरू
(C) जिन्ना
(D) महात्मा गाँधी
उत्तर:
(A) पं० मोतीलाल नेहरू

33. 8 अगस्त, 1940 की घोषणा निम्नलिखित द्वारा की गई
(A) लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा
(B) लॉर्ड माऊंटबेटन द्वारा
(C) लॉर्ड वेवल द्वारा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) लॉर्ड लिनलिथगो द्वारा

34. ब्रिटिश सरकार ने भारत में क्रिप्स मिशन भेजा
(A) 1942 ई० में
(B) 1943 ई० में
(C) 1944 ई० में
(D) 1946 ई० में
उत्तर:
(A) 1942 ई० में

35. ‘करो या मरो’ का नारा दिया
(A) जवाहरलाल नेहरू ने
(B) सुभाषचन्द्र बोस ने
(C) महात्मा गाँधी ने
(D) सी०आर० दास ने
उत्तर:
(C) महात्मा गाँधी ने

36. काँग्रेस कार्य समिति के सदस्यों को गिरफ्तार किया गया
(A) 9 अगस्त, 1942 को
(B) 10 जुलाई, 1942 को
(C) 9 अगस्त, 1943 को
(D) 16 दिसंबर, 1943 को
उत्तर:
(A) 9 अगस्त, 1942 को

37. खिलाफत आंदोलन के नेता थे
(A) गाँधी जी और नेहरू
(B) मोहम्मद अली और जिन्ना
(C) शौकत अली और मुहम्मद अली
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) शौकत अली और मुहम्मद अली

38. महात्मा गांधी के राजनीतिक गुरु कौन थे?
(A) दादाभाई नौरोजी
(B) चितरंजन दास
(C) गोपाल कृष्ण गोखले
(D) सरदार पटेल
उत्तर:
(C) गोपाल कृष्ण गोखले

39. लाल कुर्ती दल का नेतृत्व किया
(A) मौलाना आजाद ने
(B) खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने
(C) गाँधी जी ने
(D) नेहरू जी ने
उत्तर:
(B) खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने

40. ‘स्वराज पार्टी का गठन किसने किया था?
(A) महात्मा गाँधी
(B) सरदार पटेल
(C) सी० आर० दास
(D) पंडित जवाहरलाल नेहरू
उत्तर:
(C) सी० आर० दास

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

41. महात्मा गाँधी जी ने किन प्रस्तावों को ‘असफल हो रहे बैंक का उत्तर तिथीय चैक’ बताया

(A) कैबिनेट मिशन प्रस्ताव को
(B) वेवल प्रस्ताव को
(C) क्रिप्स प्रस्ताव को
(D) सी०आर० प्रस्ताव को
उत्तर:
(C) क्रिप्स प्रस्ताव को

42. किस दल ने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का विरोध किया?
(A) समाजवादी
(B) सी० पी० एम०
(C) मुस्लिम लीग
(D) कांग्रेस
उत्तर:
(C) मुस्लिम लीग

43. महात्मा गाँधी किस भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के पक्ष में थे?
(A) हिन्दी
(B) उर्दू
(C) संस्कृत
(D) इंग्लिश
उत्तर:
(A) हिन्दी

44. माउंटबेटन ने विभाजन योजना की घोषणा की
(A) 3 मार्च, 1947
(B) 3 जून, 1947
(C) 3 जनवरी, 1947
(D) 3 अप्रैल, 1947
उत्तर:
(B) 3 जून, 1947

45. भारत ‘एक राष्ट्र नहीं, दो राष्ट्र हैं’ यह कथन किसका है?
(A) मुहम्मद इकबाल का
(B) जिन्ना का
(C) सर सैय्यद अहमद खाँ का
(D) मौलाना आजाद का
उत्तर:
(B) जिन्ना का

46. भारत छोड़ो का प्रस्ताव कहाँ पारित किया गया?
(A) बंबई
(B) दिल्ली
(C) नागपुर
(D) कलकत्ता
उत्तर:
(A) बंबई

47. कौन-सा आंदोलन चौरी-चौरा की घटना के बाद समाप्त किया गया?
(A) भारत छोड़ो आंदोलन
(B) सविनय अवज्ञा आंदोलन
(C) असहयोग आंदोलन
(D) रॉलेट एक्ट
उत्तर:
(C) असहयोग आंदोलन

48. कम्युनल अवार्ड का निर्णय देते समय ब्रिटिश प्रधानमंत्री कौन था?
(A) चर्चिल
(B) रेम्जे मैकडोनाल्ड
(C) एटली
(D) पामस्टोन
उत्तर:
(B) रेम्जे मैकडोनाल्ड

49. असहयोग आंदोलन का कार्यक्रम किस अधिवेशन में स्वीकार किया गया?
(A) अमृतसर अधिवेशन
(B) कलकत्ता अधिवेशन
(C) गया अधिवेशन
(D) नागपुर अधिवेशन
उत्तर:
(B) कलकत्ता अधिवेशन

50. महात्मा गाँधी कितनी बार भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए?
(A) एक बार भी नहीं
(B) दो बार
(C) एक बार
(D) चार बार
उत्तर:
(C) एक बार

51. गाँधी जी दक्षिण अफ्रीका कब पहँचे?
(A) 1890 ई० में
(B) 1893 ई० में
(C) 1895 ई० में
(D) 1899 ई० में
उत्तर:
(B) 1893 ई० में

52. गाँधी जी का जन्म कब हुआ?
(A) 1860 ई० में
(B) 1869 ई० में
(C) 1879 ई० में
(D) 1866 ई० में
उत्तर:
(B) 1869 ई० में

53. महात्मा गाँधी ने ‘व्यक्तिगत सत्याग्रह’ कब आरम्भ किया?
(A) 1942 ई० में
(B) 1940 ई० में
(C) 1941 ई० में
(D) 1943 ई० में
उत्तर:
(B) 1940 ई० में

54. गाँधी जी को 9 अप्रैल, 1919 को किस स्थान पर गिरफ्तार किया गया?
(A) बंबई में
(B) अमृतसर में
(C) दिल्ली में
(D) पलवल में
उत्तर:
(D) पलवल में

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
गाँधी जी ने अपना राजनीतिक जीवन कहाँ से प्रारंभ किया?
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका से।

प्रश्न 2.
1906 में दक्षिणी अफ्रीका में ‘एशियाई’ रजिस्ट्रेशन एक्ट के विरोध में गाँधी जी ने कौन-सी एसोसिएशन की स्थापना की?
उत्तर:
पैसिव रजिस्ट्रेशन एसोसिएशन।

प्रश्न 3.
भारत में गाँधी जी ने पहला सत्याग्रह कब और कहाँ किया?
उत्तर:
1917 में, चंपारन में।

प्रश्न 4.
‘अखिल भारतीय खिलाफत कमेटी’ का गठन कब और कहाँ किया गया?
उत्तर:
सितंबर, 1919 में लखनऊ में।

प्रश्न 5.
जलियाँवाला बाग हत्याकांड की जाँच के लिए किस कमेटी का गठन किया गया?
उत्तर:
1919 में हंटर कमेटी का गठन किया गया।

प्रश्न 6.
‘करो या मरो’ का नारा कब, किसने और किस प्रस्ताव में दिया था?
उत्तर:
8 अगस्त, 1942 को गाँधी जी ने भारत छोड़ो प्रस्ताव में यह नारा दिया था।

प्रश्न 7.
पूना समझौता कब व किनके मध्य हुआ?
उत्तर:
सितंबर, 1932 में गाँधी जी व डॉ० अंबेडकर के मध्य हुआ।

प्रश्न 8.
गाँधी जी ने अपना राजनीतिक गुरु किसे माना?
उत्तर:
गोपाल कृष्ण गोखले को।

प्रश्न 9.
सविनय अवज्ञा आंदोलन कब प्रारंभ हुआ?
उत्तर:
1930 ई० में।

प्रश्न 10.
संवैधानिक गतिरोध को समाप्त करने हेतु लॉर्ड लिनलिथगो ने कौन-सी घोषणा की?
उत्तर:
अगस्त घोषणा, 1940

प्रश्न 11.
व्यक्तिगत सत्याग्रह कब आरंभ किया गया?
उत्तर:
अक्तूबर, 1940 में।

प्रश्न 12.
क्रिप्स मिशन भारत कब आया?
उत्तर:
22 मार्च, 1942 में।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

प्रश्न 13.
क्रिप्स मिशन का अध्यक्ष कौन था?
उत्तर:
सर स्टेफर्ड क्रिप्स।

प्रश्न 14.
जलियाँवाला बाग हत्याकांड कहाँ हुआ था?
उत्तर:
जलियाँवाला बाग हत्याकांड अमृतसर में हुआ था।

प्रश्न 15.
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रस्ताव कब तथा कहाँ पारित किया गया?
उत्तर:
8 अगस्त, 1942 को ऑल इंडिया काँग्रेस कमेटी (A.I.C.C.) द्वारा मुंबई में।

प्रश्न 16.
भारत छोड़ो आंदोलन का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
अंग्रेज़ों को भारत से निकालना।

प्रश्न 17.
भारत छोड़ो आंदोलन का किस दल ने खुल्लमखुल्ला विरोध किया?
उत्तर:
मुस्लिम लीग ने।

प्रश्न 18.
दो समाजवादी नेताओं के नाम लिखें जिन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया?
उत्तर:
जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया।

प्रश्न 19.
“महिलाओं को कमज़ोर कहना उनका अपमान है। यह पुरुषों का महिलाओं के प्रति अन्याय है।” ये शब्द किस महान् राष्ट्रवादी नेता के हैं?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 20.
स्वराज पार्टी का गठन कब और किसने किया?
उत्तर:
1 जनवरी, 1923 को सी०आर० दास (प्रधान) और मोतीलाल नेहरू (महामंत्री) ने।

प्रश्न 21.
गाँधी जी को ‘अर्धनंगा फकीर’ इंग्लैंड के किस राजनेता ने कहा?
उत्तर:
चर्चिल ने।

प्रश्न 22.
‘इंडियन ओपिनीयन’ नामक अखबार 1903 में दक्षिण अफ्रीका में किस भारतीय नेता ने निकाला?
उत्तर:
महात्मा गाँधी ने।

प्रश्न 23.
गाँधी जी द्वारा निकाले गए भारत के दो प्रमुख समाचार-पत्रों के नाम बताओ।
उत्तर:
‘हरिजन’ और ‘यंग-इंडिया’।

प्रश्न 24.
जलियाँवाला बाग हत्याकांड के पश्चात् इंग्लैंड में जनरल डायर की पैरवी के लिए 30 हज़ार पौंड किस समाचार-पत्र ने इकट्ठा करवाया?
उत्तर:
मार्निंग पोस्ट ने।

प्रश्न 25.
असहयोग आंदोलन के दौरान नेशनल कॉलेज कलकत्ता (कोलकात्ता) का प्रधानाचार्य किसको बनाया गया?
उत्तर:
सुभाषचंद्र बोस को।

प्रश्न 26.
10 फरवरी, 1943 को सरकारी हिंसा के विरोध में गाँधी द्वारा 21 दिन के लिए उपवास शुरू करने पर वायसराय की कार्यकारिणी के कौन-से तीन सदस्यों ने त्याग-पत्र दे दिया?
उत्तर:
एम०एम० सेनी, एन०आर० सरकार और ए०पी० मोदी ने।

प्रश्न 27.
“जब दुनिया में हम हर कहीं जीत रहे हैं, ऐसे वक्त में हम एक कमबख्त बूढ़े के सामने कैसे झुक सकते हैं, जो हमेशा हमारा दुश्मन रहा है।” ये शब्द इंग्लैंड के किस प्रधानमंत्री ने किसके संबंध में कहे?
उत्तर:
विंसटन चर्चिल ने, महात्मा गाँधी के बारे में सन् 1943 में कहे।

प्रश्न 28.
‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान ‘काँग्रेस रेडियो’ का गुप्त रूप से संचालन किस शहर से किया गया था, जिसकी पहली उद्घोषिका ऊषा मेहता थी?
उत्तर:
बंबई (मुंबई) से। प्रश्न 29. “मैं देश की बालू से ही काँग्रेस से बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा” ये शब्द किसने और कब कहे? उत्तर-गाँधी जी ने 1942 ई० में।

प्रश्न 30.
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1921 में कितनी हड़तालें हुईं?
उत्तर:
सरकारी आँकड़ों के अनुसार 1921 में 396 हड़तालें हुईं।

प्रश्न 31.
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह कब हुआ?
उत्तर:
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय का उद्घाटन समारोह फरवरी, 1916 में हुआ।

प्रश्न 32.
गाँधी जी द्वारा 1918 ई० में गुजरात में चलाए गए दो सत्याग्रहों के नाम लिखो।
उत्तर:
1918 में गाँधी जी ने गुजरात अहमदाबाद मिलों के मजदूरों की माँग तथा खेड़ा में किसानों की माँगों के लिए सत्याग्रह किया।

प्रश्न 33.
भारत में गाँधी जी ने पहला देशव्यापी सत्याग्रह कौन-सा चलाया?
उत्तर:
1919 ई० में रॉलेट सत्याग्रह चलाया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

प्रश्न 34.
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान पहला ‘स्वतंत्रता दिवस’ कब मनाया गया?
उत्तर:
पहला स्वतंत्रता दिवस 26 जनवरी, 1930 को मनाया गया।

प्रश्न 35.
गाँधी जी ने नमक कानून कब तोड़ा?
उत्तर:
गाँधी जी ने नमक कानून 6 अप्रैल, 1930 को तोड़ा।

प्रश्न 36.
नमक को विरोध प्रतीक चुनने का एक कारण बताओ।
उत्तर:
क्योंकि नमक कर समस्त भारतीयों से जुड़ा था।

प्रश्न 37.
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महाराष्ट्र में किस स्थान पर स्वतंत्र सरकार बनी?
उत्तर:
महाराष्ट्र के सतारा में स्वतंत्र सरकार बनी।

प्रश्न 38.
भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान पूर्वी संयुक्त प्रांत में किस क्षेत्र में स्वतंत्र सरकार बनी?
उत्तर:
पूर्वी संयुक्त प्रांत में बलिया में स्वतंत्र सरकार बनी।

प्रश्न 39.
भारत छोड़ो आंदोलन के समय मिदनापुर में बनी सरकार का नाम लिखें।
उत्तर:
मिदनापुर में बनी सरकार का नाम ‘तमलुक’ था।

प्रश्न 40.
ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार कब बनी?
उत्तर:
1945 में लेबर पार्टी की सरकार बनी।

प्रश्न 41.
15 अगस्त, 1947 को गाँधी जी कहाँ पर थे?
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को गाँधी जी कलकत्ता में थे।

प्रश्न 42.
महात्मा गाँधी कब शहीद हुए?
उत्तर:
30 जनवरी, 1948 को।

प्रश्न 43.
महात्मा गाँधी की आत्मकथा का क्या नाम है?
उत्तर:
महात्मा गाँधी की आत्मकथा का नाम ‘सत्य के साथ मेरे अनुभव’ (My Experiments with Truth) है।

प्रश्न 44.
महात्मा गाँधी का जन्म कब हुआ था?
उत्तर:
महात्मा गाँधी का जन्म 2 अक्तूबर, 1869 में हुआ था।

प्रश्न 45.
नमक सत्याग्रह किस समझौते के बाद स्थगित किया गया?
उत्तर:
गाँधी-इर्विन समझौते के बाद।

प्रश्न 46.
गाँधी जी ने अपने विचार सबसे पहले कौन-सी पुस्तक में रखे?
उत्तर:
गाँधी जी ने अपने विचार सबसे पहले ‘हिंदू स्वराज’ नामक पुस्तक में रखे।

प्रश्न 47.
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार जलियाँवाला बाग हत्याकांड में कितने लोग मारे गए?
उत्तर:
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार जलियाँवाला बाग हत्याकांड में 379 लोग मारे गए।

प्रश्न 48.
असहयोग आंदोलन शुरू होने पर टैगोर ने कौन-सी उपाधि त्यागी?
उत्तर:
असहयोग आंदोलन शुरू होने पर टैगोर ने ‘नाइट हुड’ की उपाधि त्यागी।

प्रश्न 49.
फरवरी, 1924 में जेल से रिहा होने पर गाँधी जी ने किस बात पर जोर दिया?
उत्तर:
फरवरी, 1924 में जेल से रिहा होने पर गाँधी जी ने रचनात्मक कार्यक्रमों पर जोर दिया।

प्रश्न 50.
गाँधी जी ने केवल एक बार काँग्रेस के किस वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता की थी?
उत्तर:
गाँधी जी ने केवल एक बार 1925 ई० में काँग्रेस के बेलगाम अधिवेशन की अध्यक्षता की थी।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
महात्मा गाँधी जी को राष्ट्रपिता क्यों कहते हैं?
उत्तर:
भारतीयों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित करने में महात्मा गाँधी का सबसे अधिक योगदान है, इसलिए उन्हें भारत का ‘राष्ट्रपिता’ कहा जाता है।

प्रश्न 2.
दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों की क्या स्थिति थी?
उत्तर:
19वीं तथा 20वीं सदी के शुरू में भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में नस्ली भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था। उन्हें कुली बुलाया जाता था। उन्हें फुटपाथ पर चलने की अनुमति नहीं थी। वे प्रथम श्रेणी (रेलवे) में यात्रा नहीं कर सकते थे। उनका होटलों में प्रवेश वर्जित था। उन्हें वहाँ अपना पंजीकरण करवाना पड़ता था तथा तीन पौंड सालाना कर देना पड़ता था।

प्रश्न 3.
सत्याग्रह का अर्थ स्पष्ट करें।
उत्तर:
सत्याग्रह का शाब्दिक अर्थ है-सत्य पर दृढ़तापूर्वक अड़े रहना। यह विरोध करने का अहिंसात्मक मार्ग था। गाँधी जी के अनुसार, “सत्य पर अटल रहना ही सत्याग्रह है। सत्याग्रह असत्य का सत्य से और हिंसा को अहिंसा से जीतने का एक नैतिक शस्त्र है।”

प्रश्न 4.
साधन और साध्य की श्रेष्ठता क्या है?
उत्तर:
गाँधी जी साधन और साध्य की पवित्रता में विश्वास रखते थे। इसका अभिप्राय यह है कि आपका लक्ष्य (object) या साध्य भी उत्तम होना चाहिए और उसे प्राप्त करने के साधन भी शुद्ध होने चाहिएँ। स्वतंत्रता श्रेष्ठ लक्ष्य है तो उसे सत्याग्रह जैसे श्रेष्ठ साधन से ही प्राप्त किया जाना चाहिए।

प्रश्न 5.
‘बाल-पाल-लाल’ कौन थे?
उत्तर:
20वीं सदी के आरंभ में काँग्रेस में उग्रराष्ट्रवाद का उदय होने लगा था। महाराष्ट्र में बाल गंगाधर तिलक इसके नेता थे। बंगाल में बिपिनचंद्र पाल यह कार्य कर रहे थे तथा पंजाब में लाला लाजपत राय इस धारा का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन तीनों नेताओं को सारे देश में ‘बाल-पाल-लाल’ के नाम से जाना जाने लगा था।

प्रश्न 6.
गाँधी जी का 1916 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में भाषण क्यों महत्त्वपूर्ण था?
उत्तर:
गाँधी जी ने इस समारोह में उपस्थित अमीर और भद्रजनों को भारत के गरीबों, किसानों और मजदूरों की तरफ ध्यान न देने के लिए लताड़ा था जो उस समारोह में उपस्थित नहीं थे। वस्तुतः वे इस भाषण में यह बता रहे थे कि. राष्ट्रीय आंदोलन में आम लोग नहीं हैं और वे इसे अब सच्चे मायने में लोगों का आंदोलन बनाना चाहते थे।

प्रश्न 7.
अहमदाबाद मिल हड़ताल पर नोट लिखें।
उत्तर:
1918 ई० में गाँधी जी ने अहमदाबाद के फैक्ट्री मालिकों तथा मजदूरों के बीच विवाद में हस्तक्षेप किया। उन्होंने मजदूरों को हड़ताल पर जाने की सलाह दी। स्वयं उन्होंने आमरण अनशन भी रखा। इसका प्रभाव मिल-मालिकों पर पड़ा तथा उन्होंने मज़दूरों का 35% मेहनताना बढ़ाना मान लिया।

प्रश्न 8.
खेड़ा किसान सत्याग्रह पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1918 में खेड़ा के किसानों की फसल समाप्त हो गई थी परंतु सरकार पूरा लगान वसूल करना चाहती थी। गाँधी जी ने किसानों से कहा कि वे लगान न दें। इस पर सरकार ने आदेश निकाले कि लगान उन्हीं से वसूला जाए जो उसे देने में समर्थ हों। इसके बाद संघर्ष वापिस ले लिया गया।

प्रश्न 9.
असहयोग से गाँधी जी का क्या अर्थ था?
उत्तर:
गाँधी जी के अनुसार असहयोग का अर्थ यह है कि यदि सरकार जनता की आशाओं के अनुसार काम नहीं करती है या जनता के कष्टों और शिकायतों को दूर करने की कोशिश नहीं करती है या सरकार भ्रष्ट हो चुकी है तो ऐसी सरकार के साथ सहयोग न करना।

प्रश्न 10.
रॉलेट एक्ट क्या था?
उत्तर:
प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान सरकार ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिया था तथा प्रावधान किया था कि किसी भी व्यक्ति को सरकार विरोधी होने की शंका के आधार पर ही जेल में डाला जा सकता था। विश्वयुद्ध के बाद के लिए सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई जिसमें सिफारिश की गई कि शान्ति बनाए रखने के लिए प्रथम विश्वयुद्ध के समय के कानून ही जारी रहें। इसके आधार पर बने एक्ट को रॉलेट एक्ट कहते हैं। भारतीयों ने इसका विरोध किया तथा इसे ‘काला कानून’ करार दिया।

प्रश्न 11.
असहयोग आंदोलन के नकारात्मक कार्यक्रम क्या थे?
उत्तर:
इस आंदोलन में अहिंसात्मक ढंग से असहयोग करना था। अतः नकारात्मक कार्यक्रम महत्त्वपूर्ण थे। इसमें सरकारी स्कूलों, कॉलेजों का बहिष्कार, सरकारी न्यायालयों का बहिष्कार, चुनावों का बहिष्कार, सरकारी अलंकरणों, पदों का बहिष्कार, सरकारी समारोहों का बहिष्कार तथा विदेशी माल का बहिष्कार मुख्य थे।

प्रश्न 12.
असहयोग आंदोलन को स्थगित क्यों किया गया? अथवा महात्मा गांधी ने “असहयोग आंदोलन” वापिस क्यों लिया?
उत्तर:
यह एक अहिंसात्मक आंदोलन था परंतु 5 फरवरी, 1922 को चौरी-चौरा नामक स्थान पर भीड़ ने थाने में आग लगा दी, जिससे 22 पुलिसकर्मी मारे गए। गाँधी जी को लगा कि आंदोलन में हिंसा प्रवेश कर चुकी है। अतः उन्होंने तत्काल आंदोलन स्थगित कर दिया।

प्रश्न 13.
लोग गाँधी जी में चमत्कारिक शक्तियों की कल्पना करते थे। स्पष्ट करें।
उत्तर:
गाँधी जी जहाँ-जहाँ गए उनके बारे में अनेक अफवाहें फैलती थीं। लोगों का मानना था कि गाँधी जी में चमत्कारिक शक्तियाँ हैं। जैसे संयुक्त प्रान्त में गोरखपुर जिले के लोगों का मानना था कि गाँधी जी को राजा ने किसानों के कष्ट समाप्त करने के लिए भेजा है। वे अंग्रेज़ शासकों से भी ऊँचे हैं। उनके आने से अंग्रेज़ शासक जिले से भाग जाएँगे। गाँधी जी की आलोचना पर अनिष्ट होता है।

प्रश्न 14.
साइमन कमीशन पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
1928 ई० में अंग्रेज़ सरकार ने सर साइमन की अध्यक्षता में एक 7 सदस्यों का कमीशन भारत की तात्कालिक शासन व्यवस्था के कार्यों की जाँच करने के लिए भारत भेजा। इसके सभी सदस्य गोरे थे। इसका भारत में व्यापक विरोध हुआ। मार्च, 1928 में कमीशन वापिस चला गया।

प्रश्न 15.
लाहौर अधिवेशन (1929) का क्या महत्त्व है?
उत्तर:
1929 में आयोजित लाहौर अधिवेशन का महत्त्व यह है कि इस अधिवेशन के अध्यक्ष युवा जवाहरलाल नेहरू थे तथा इस अधिवेशन में काँग्रेस ने ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को अपना लक्ष्य घोषित किया तथा इस संबंध में प्रस्ताव पास किया।

प्रश्न 16.
पूना पैक्ट क्या था?
उत्तर:
गोलमेज सम्मेलनों के बाद अंग्रेज़ सरकार ने सांप्रदायिक निर्णय की घोषणा करते हुए 1932 में निर्णय दिया कि आगे से दलितों को भी पृथक् निर्वाचन का अधिकार दिया जाएगा। गाँधी जी ने इस निर्णय का विरोध करते हुए आमरण अनशन रखा। अंततः गाँधी जी व अम्बेडकर में समझौता हुआ। इसी समझौते को पूना समझौता कहा जाता है। इस समझौते के अनुसार दलित वर्ग ने पृथक् निर्वाचन की बात समाप्त कर दी तथा इसके स्थान पर सामान्य सीटों में आरक्षण की बात को मान लिया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

प्रश्न 17.
व्यक्तिगत सत्याग्रह क्या था?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने पर भारत सरकार ने भारत को भी युद्ध में धकेल दिया था। इसका काँग्रेस ने जोरदार विरोध किया। अक्तूबर, 1939 में काँग्रेस मंत्रिमंडलों ने त्याग-पत्र दे दिया। काँग्रेस चाहती थी कि सरकार आश्वासन दे कि युद्ध के बाद भारत को आजादी दे दी जाएगी व युद्ध काल में युद्ध विभाग भारतीयों के हाथों में सौंपेगी। सरकार ने उपेक्षापूर्ण रवैया अपनाया तो अपनी बातों पर विश्व का ध्यान खींचने तथा देश की जनता को जगाने के लिए काँग्रेस ने 1940-41 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया।

प्रश्न 18.
अंतरिम सरकार की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
केबिनेट मिशन योजना के अनुसार देश में संविधान सभा के चुनाव हुए तथा जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 2 सितंबर, 1946 को अंतरिम सरकार की स्थापना हुई।

प्रश्न 19.
वेवल योजना क्या थी?
उत्तर:
भारत के वायसराय लार्ड वेवल ने मार्च, 1945 में प्रस्ताव रखा कि वायसराय तथा प्रधान सेनापति को छोड़कर वायसराय की काऊंसिल के अन्य सदस्य भारतीय होंगे जिनका चुनाव भारतीय राजनीतिक दलों में से धार्मिक समता के आधार (अर्थात् हिंदू व मुसलमान सदस्य बराबर-बराबर होंगे) पर किया जाएगा।

प्रश्न 20.
दांडी मार्च पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मार्च, 1930 में महात्मा गाँधी ने 240 मील की पैदल यात्रा करके समुद्र तट पर दांडी नामक स्थान पर नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा। इसके पश्चात् नमक घर-घर में बनने लगा और अंग्रेज़ सरकार को भारतीयों को नमक बनाने की अनुमति देनी पड़ी।

प्रश्न 21.
असहयोग आंदोलन के बाद गाँधी जी पर चले मुकद्दमे का निर्णय करते हुए अंग्रेज़ जज़ ने क्या टिप्पणी दी?
उत्तर:
असहयोग आंदोलन के बाद 10 मार्च, 1922 को गाँधी जी को भी बंदी बना लिया गया। उन पर राजद्रोह का आरोप लगाया गया। सजा सुनाने वाले जज सी०एन० ब्रूमफील्ड (C.N. Broomfield) ने आश्चर्यजनक टिप्पणी की। जज ने कहा, “इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि मैंने आज तक जितनी जाँच की है अथवा करूँगा आप उनसे भिन्न श्रेणी के हैं। इस तथ्य को नकारना असंभव होगा कि लाखों देशवासियों की दृष्टि में आप एक महान देशभक्त और नेता हैं। यहाँ तक कि राजनीति में जो लोग आपसे भिन्न मत रखते हैं वे भी आपको उच्च आदर्शों और पवित्र जीवन जीने वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं।” कानून की अवहेलना करने के कारण उन्हें 6 वर्ष की सजा दी गई परंतु साथ ही जज ब्रूमफील्ड ने कहा, “यदि भारत में घट रही घटनाओं की वजह से सरकार के लिए सजा के इन वर्षों में कमी और आपको मुक्त करना संभव हुआ तो इससे मुझसे ज़्यादा कोई प्रसन्न नहीं होगा।”

प्रश्न 22.
गाँधी जी को दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष में गरीब लोगों से क्या प्रेरणा मिली?
उत्तर:
दक्षिण अफ्रीका में गाँधी जी को गरीब मजदूरों का नेतृत्व करने का मौका मिला। वे उन लोगों की बलिदान करने की क्षमता व साहस को देखकर अचंभित हुए। दक्षिण अफ्रीका के संघर्ष के संदर्भ में उन्होंने लिखा कि वे (मजदूर) श्रद्धा से कार्य करते थे तथा उसके बदले में कभी भी वह कोई भी ईनाम पाने की अपेक्षा नहीं करते थे। उन्होंने मुझे प्रेरणा दी। उन्होंने अपने बलिदान, श्रद्धा, महान ईश्वर में गहरी आस्था से वह करने योग्य बनाया जो मैं कर सका। उन्होंने गरीब और अनपढ़ लोगों को सत्याग्रह और अहिंसा का पाठ पढ़ाया और भारत में अंग्रेज़ों के खिलाफ आंदोलन चलाया।

प्रश्न 23.
चंपारन सत्याग्रह पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
चंपारन सत्याग्रह चंपारन के किसानों का यूरोप के ‘बागान मालिक’ अत्यधिक शोषण करते थे। किसानों के स्थानीय नेताओं ने 1916 की लखनऊ में हुई काँग्रेस की वार्षिक बैठक के समय गाँधी जी को चंपारन आने के लिए मना लिया। 1917 में गाँधी जी ने चंपारन पहुँचकर किसानों की स्थिति जानने के लिए विस्तृत पूछताछ शुरू कर दी। इस पर नाराज होकर जिला प्रशासन ने गाँधी जी को चंपारन छोड़ने का आदेश दे दिया परंतु गाँधी जी ने इन आदेशों की पालना करने से साफ मना कर दिया। इसके लिए वे किसी भी तरह का परिणाम भुगतने के लिए तैयार हो गए। इस पर सरकार को अपने आदेश को रद्द करना पड़ा। अब सरकार ने एक जाँच कमेटी बनाई जिसका गाँधी जी को सदस्य बनाया गया। अंततः गाँधी जी के प्रयासों से चंपारन के किसानों का शोषण कम हो गया। भारत में गाँधी जी की यह पहली जीत थी।

प्रश्न 24.
प्रथम विश्वयुद्ध का भारतीयों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों ने अंग्रेज़ों का तन, मन व धन से साथ दिया था। इस आशा में कि उन्हें युद्ध के बाद आत्म-निर्णय का अधिकार दिया जाएगा। इस काल में भारत का कर्ज 411 करोड़ से 781 करोड़ हो गया। अनाज महँगा हो गया। वस्तुओं के दाम बढ़ गए। अनाज व कपड़े में कमी आ गई। युद्ध के बाद सरकार ने सैनिकों व मजदूरों की छंटनी कर दी। साथ ही अकाल-प्लेग से लगभग 120-130 लाख लोग मर गए। इन सबसे भारतीयों में जन-असंतोष पनपा।

प्रश्न 25.
सार्वजनिक भाषण राष्ट्रीय आंदोलन के अध्ययन के महत्त्वपूर्ण स्रोत कैसे हैं?
उत्तर:
राष्ट्रीय आंदोलन में लोगों को संगठित करने और जनमत तैयार करने के लिए गाँधी जी और अन्य राष्ट्रीय नेता सार्वजनिक मंचों पर भाषण देते थे। इन बड़े नेताओं के भाषण संकलित होते तथा समाचार पत्रों में भी प्रकाशित होते थे। इतिहासकार के लिए यह भाषण बड़े महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं क्योंकि इनसे उनकी नीतियों, कार्यक्रमों तथा लोगों को संगठित करने के तरीकों की झलक मिलती है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
असहयोग आंदोलन का महत्त्व लिखें। इसका उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
असहयोग आंदोलन में देश के सभी वर्गों व समुदायों के लोगों ने भाग लिया। अतः अब राष्ट्रीय आंदोलन सही अर्थों में जन-आंदोलन बन गया। यह देश के सारे भागों में फैल गया। काँग्रेस अब मात्र वाद-विवाद वाली संस्था नहीं रही। वह कार्यशील संगठन बन गई। इससे हिंदू-मुस्लिम एकता भी आई। इस आंदोलन से लोगों में अंग्रेजी राज का डर कम हुआ। उन्होंने आत्मनिर्भरता और स्वदेशी पाठ भी सीखा।
असहयोग आंदोलन के मुख्य तीन उद्देश्य थे

  1. रॉलेट एक्ट रद्द करवाना तथा पंजाब की गलतियों को ठीक करवाना।
  2. खिलाफ़त से जुड़ी गलतियों को ठीक करवाना।
  3. स्वराज की माँग स्वीकार करवाना।

प्रश्न 2.
गाँधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन क्यों छेड़ा?
उत्तर:
1942 में क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश राज के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन शुरू करने का फैसला लिया। भारत छोड़ो आंदोलन के निम्नलिखित कारण थे

  1. क्रिप्स मिशन की विफलता से सिद्ध हो गया था कि अंग्रेज़ सरकार भारतीयों की (काँग्रेस की) युद्ध के दौरान तथा युद्ध के बाद की माँगों (युद्ध के बाद स्वतंत्रता का वायदा) को स्वीकार करने वाली नहीं थी।
  2. इसी समय में भारत पर जापानी हमले के खतरे की आशंका बन गई थी। लोगों में जापानी हमले का भय पैदा हो रहा था। गाँधी जी का विश्वास था कि, “भारत में अंग्रेज़ों की उपस्थिति जापान के लिए भारत पर आक्रमण का आमंत्रण है और उनकी वापसी द्वारा यह संताप भी समाप्त हो जाएगा।”
  3. युद्ध के कारण वस्तुओं के अभाव और बढ़ती हुई कीमतों ने लोगों के असंतोष को विस्फोटक स्थिति में पहुँचा दिया था। गाँधी जी इस स्थिति से परिचित थे।

प्रश्न 3.
जलियाँवाला बाग हत्याकांड पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
जलियाँवाला बाग हत्याकांड-प्रथम विश्वयुद्ध से पंजाब ज्यादा प्रभावित हुआ था। वहाँ पर बहुत-से लोगों ने युद्ध में अंग्रेज़ों का साथ दिया था, परंतु इसके बदले रॉलेट एक्ट मिला। गाँधी जी के सत्याग्रह शुरू करने पर पंजाब से भारी समर्थन मिला। लाहौर, गुजरांवाला, अमृतसर, मुल्तान, कसूर आदि स्थानों पर सभाएँ हुई। 30 मार्च, 1919 व 6 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हड़ताल हुईं। सरकार ने स्थानीय नेताओं-डॉ० सत्यपाल और डॉ० किचलू को गिरफ्तार कर लिया। गाँधी जी बंबई से पंजाब के लिए रवाना हुए तो 9 अप्रैल, 1919 को उन्हें पलवल में गिरफ्तार कर वापिस भेज दिया गया। लोग उत्तेजित हो गए। विरोध में जलसे-जुलूस हुए, जिसमें हिंसा भी हुई। 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग में 20 हजार लोग एकत्रित हुए। इन पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी के (रास्ता रोक कर) गोली चलाने के आदेश दे दिए। लगभग 1650 गोलियाँ चलाई गईं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए। मरने वालों की संख्या वास्तव में कहीं ज्यादा थी। जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया।

प्रश्न 4.
खिलाफत आंदोलन क्या था?
उत्तर:
प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की का खलीफा हार गया तथा 1920 में उसके साथ अपमानजनक संधि की गई। भारतीय मुसलमानों में इससे असंतोष था। उन्होंने मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में अंग्रेज सरकार विरोधी और खलीफा के समर्थन में आंदोलन चलाया। यह आंदोलन ‘खिलाफत आंदोलन’ कहलाता है। इस आंदोलन की तीन प्रमुख माँगें थीं-एक पहले के ऑटोमन साम्राज्य के सभी इस्लामी पवित्र स्थलों पर खलीफा का अधिकार बने रहने दिया जाए। दो, जज़ीरात-अल-अरब (अरब, सीरिया, इराक, फिलिस्तीन) इस्लामी प्रभुसत्ता (यानी खलीफा) के अधीन रहे तथा तीन, खलीफा के अधीन इतने क्षेत्र हों कि वह इस्लामी जगत के विश्वास को सुरक्षित बनाए रखने में समर्थ हों।’ आंदोलन चलाने के लिए 1918 में खिलाफत कमेटी का गठन हुआ। महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन असहयोग को खिलाफत के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय हिन्दू और मुस्लिम मिलकर औपनिवेशिक शासन का खात्मा कर देंगे। गाँधी जी हिन्दू-मुस्लिम एकता को स्वराज की प्राप्ति के लिए आवश्यक मानते थे।

प्रश्न 5.
गाँधी जी की जीवन-शैली कैसी थी?
उत्तर:
गाँधी जी की जीवन-शैली से लोगों को लगता था कि वे उनके स्वाभाविक नेता हैं। गाँधी जी उन्हीं की तरह वस्त्र पहनते थे व उन्हीं की तरह रहते थे। वे जन-सामान्य की भाषा बोलते थे। गाँधी जी दूसरे नेताओं की तरह जनसमूह से अलग खड़े नहीं होते थे, बल्कि वे उनसे गहरी सहानुभूति रखते थे और उनसे घनिष्ठ संबंध भी बनाते थे। उल्लेखनीय है कि 1921 में दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान गाँधी जी ने अपना सिर मुंडवा लिया था और गरीबों के साथ अपना तादात्म्य (Identity) स्थापित करने के लिए सूती वस्त्र पहनने शुरू कर दिए थे। इस प्रकार उनके वस्त्रों से जनता के साथ उनका नाता झलकता था। जहाँ दूसरे राष्ट्रवादी नेता पश्चिमी शैली के सूट या भारतीय बन्द गले के कोट जैसे वस्त्र पहनते थे, वहीं गाँधी जी लोगों के बीच एक साधारण धोती में जाते थे।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
असहयोग आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारणों का विवरण दें।
अथवा
‘असहयोग आन्दोलन’ महात्मा गाँधी ने क्यो चलाया था? हालातों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
प्रथम विश्वयुद्ध से पैदा हुई आर्थिक कठिनाइयों, रॉलेट एक्ट, खिलाफत आंदोलन तथा जलियाँवाला बाग हत्याकांड जैसे कारणों ने गाँधी जी को अंग्रेजों के विरुद्ध राष्ट्रीय स्तर पर सत्याग्रह चलाने के लिए मजबूर कर दिया। उन्हें विश्वास हो गया था कि “ब्रिटिश साम्राज्य आज शैतानियत का प्रतीक है।” परिणामस्वरूप गाँधी जी ने असहयोग आंदोलन के रूप में देशव्यापी आंदोलन चलाया।

1. कारण (Causes)
1. प्रथम विश्वयुद्ध के प्रभाव (Effects of the First World War) प्रथम विश्वयुद्ध में भारतीयों ने अंग्रेज़ों का तन, मन व धन से साथ दिया था। इस आशा में कि उन्हें युद्ध के बाद आत्म-निर्णय का अधिकार दिया जाएगा। इस काल में भारत का कर्ज 411 करोड़ से 781 करोड़ हो गया। अनाज महँगा हो गया। वस्तुओं के दाम बढ़ गए। अनाज व कपड़ों में कमी आ गई। युद्ध के बाद सरकार ने सैनिकों व मजदूरों की छंटनी कर दी। साथ ही अकाल-प्लेग से लगभग 120-130 लाख लोग मारे गए। इस सबसे जन-असंतोष पनपा।

2. रॉलेट एक्ट (Rowlatt Act)-1919 में अंग्रेज़ी सरकार ने गाँधी जी की झोली में ऐसा मुद्दा डाल दिया था जिससे वे देशव्यापी आंदोलन खड़ा कर सकते थे। 1914-18 के विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेज़ों ने प्रेस पर प्रतिबंध लगा दिए थे और किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर जेल में डाला जा सकता था। युद्ध के बाद भी सरकार ने सर सिडनी रॉलेट की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिशों पर इन कठोर उपायों को जारी रखने का फैसला लिया। असेंबली में सभी भारतीयों ने इसका विरोध किया। इसे काला कानून (BlackAct) करार दिया गया। साधारण लोगों के लिए इस एक्ट का अर्थ था, “कोई वकील नहीं, कोई दलील नहीं, कोई अपील नहीं।”

रॉलेट एक्ट के जवाब में गाँधी जी ने सत्याग्रह सभा का गठन किया तथा देशभर में एक्ट के खिलाफ अभियान चलाने का निश्चय किया। एक्ट के विरोध में पहले 30 मार्च, 1919 तथा बाद में 6 अप्रैल, 1919 को देशव्यापी हड़ताल का आह्वान किया। 30 मार्च और 6 अप्रैल दोनों ही दिन देश के उत्तरी और पश्चिमी नगरों व कस्बों में हड़ताल रही। चारों ओर बंद के समर्थन में दुकानों । और स्कूलों के बंद होने के कारण जनजीवन ठप्प हो गया। पंजाब, गुजरात और बंगाल में हिंसा की घटनाएँ भी हुईं। परंतु रॉलेट सत्याग्रह से जुड़ी घटनाओं की प्रतिक्रिया आगे बढ़ चुकी थी जिसकी परिणति जलियाँवाला बाग हत्याकांड में हुई।।

3. जलियाँवाला बाग हत्याकांड (Jallianwala Bagh Massacre)-विश्वयुद्ध से पंजाब ज्यादा प्रभावित हुआ था। वहाँ पर बहुत-से लोगों ने युद्ध में अंग्रेज़ों का साथ दिया था। जब वह अपनी सेवा के बदले इनाम की अपेक्षा करते थे, परंतु इसके विपरीत रॉलेट एक्ट मिला। गाँधी जी द्वारा सत्याग्रह शुरू करने पर पंजाब से भारी समर्थन मिला। लाहौर, गुजरांवाला, अमृतसर, मुल्तान, कसूर आदि स्थानों पर सभाएँ हुईं। 30 मार्च, 1919 व 6 अप्रैल, 1919 को अमृतसर में हड़ताल हुई। सरकार ने दमन का सहारा लिया।

स्थानीय नेताओं डॉ० सत्यपाल और डॉ० किचलू को गिरफ्तार कर लिया गया। गाँधी जी बंबई से पंजाब के लिए रवाना हुए तो 9 अप्रैल, 1919 को उन्हें पलवल में गिरफ्तार कर वापिस भेज दिया गया। लोग उत्तेजित हो गए। विरोध में जलसे-जुलूस हुए, जिसमें हिंसा भी हुई। 13 अप्रैल, 1919 को जलियाँवाला बाग में 20 हजार लोग एकत्रित हुए। इस पर जनरल डायर ने बिना चेतावनी के (रास्ता रोक कर) गोली चलाने के आदेश दे दिए। लगभग 1650 गोलियाँ चलाई गईं। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 379 लोग मारे गए। मरने वालों की संख्या वास्तव में इससे भी कहीं ज्यादा थी। जलियाँवाला बाग हत्याकांड ने सारे देश को स्तब्ध कर दिया।

4. खिलाफत आंदोलन (Khilafat Movement)-प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की का खलीफा हार गया तथा 1920 में उसके साथ अपमानजनक संधि की गई। भारतीय मुसलमानों में इससे असंतोष था। उन्होंने मुहम्मद अली और शौकत अली के नेतृत्व में अंग्रेज़ सरकार विरोधी और खलीफा के समर्थन में आंदोलन चलाया। यह आंदोलन ‘खिलाफत आंदोलन’ कहलाता है। आंदोलन चलाने के लिए 1918 में खिलाफ़त कमेटी का गठन हुआ।

गाँधी जी असहयोग आंदोलन चलाने की तैयारी में थे। उन्होंने इस आशा से खिलाफत मुद्दे पर अपना सहयोग दिया कि असहयोग को खिलाफ़त के साथ मिलाने से भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदाय-हिंदू और मुस्लिम मिलकर औपनिवेशिक शासन का खात्मा कर देंगे। गाँधी जी हिंदू-मुस्लिम एकता को स्वराज की प्राप्ति के लिए आवश्यक मानते थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे

प्रश्न 2.
सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारणों का विवरण दें।
उत्तर:
1922 में असहयोग आंदोलन समाप्त हो गया। गाँधी जी को जेल की सजा दी गई व 1924 में रिहा हुए। 1928 ई० में गाँधी जी पुनः सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने पर विचार करने लगे थे। इसी बीच सरकार ने भारत में साइमन कमीशन भेजकर भारतीय राजनीति को एक मुद्दा सौंप दिया, जिसका विरोध करते हुए काँग्रेस और गाँधी जी को अंततः नमक सत्याग्रह या सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करना पड़ा। सविनय अवज्ञा आंदोलन के लिए उत्तरदायी कारणों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

1. साइमन कमीशन (Simon Commission)-साइमन कमीशन को इंग्लैंड की सरकार ने भारत में 1919 के अधिनियम की कार्य-प्रणाली की समीक्षा करने के लिए भेजा था ताकि आगे के सुधारों पर विचार किया जा सके, परंतु इस कमीशन के सभी सदस्य श्वेत थे। परिणामस्वरूप भारत के सभी दलों ने इसका जोरदार विरोध किया। आयोग जहाँ पर भी गया लोगों ने ‘साइमन वापिस जाओ’ (Simon go back) के नारे लगाए। कई स्थानों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया तथा गोलियाँ भी चलाईं। अमृतसर में साइमन का विरोध कर रही भीड़ का नेतृत्व लाला लाजपतराय कर रहे थे। उन पर लाठियों से प्रहार किए गए। उन्हें घातक चोटें आईं। इस कारण 17 नवंबर, 1928 को लाला जी का निधन हो गया।

2. लाहौर अधिवेशन तथा पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव (Lahore Session and Complete Independence Resolution) 1928 में काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में काँग्रेस द्वारा गठित नेहरू समिति ने भारत के लिए संविधान के प्रस्ताव रखे। इस प्रस्ताव में भारत के लिए अधिराज्य (Dominion States) की माँग की थी। इसका युवा सदस्यों (सुभाषचंद्र बोस, जवाहरलाल नेहरू आदि) ने विरोध किया था। तब गाँधी जी ने बचाव करते हुए प्रस्ताव इस शर्त पर पास करवाए थे कि एक वर्ष में अंग्रेज़ सरकार इन प्रस्तावों को स्वीकार नहीं करेगी तो काँग्रेस पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास करेगी। 1929 में दिसंबर के अंत में काँग्रेस ने अपना वार्षिक अधिवेशन लाहौर में किया। यह अधिवेशन दो दृष्टियों से अति महत्त्वपूर्ण था। इसका अध्यक्ष युवा नेता जवाहरलाल नेहरू को बनाया गया जो इस बात का प्रतीक था कि काँग्रेस में युवाओं की भूमिका बढ़ती जा रही थी और इसका नेतृत्व अब युवाओं को सौंपा जाएगा। दूसरा, काँग्रेस ने अपना लक्ष्य ‘पूर्ण स्वराज्य’ अथवा ‘पूर्ण स्वतंत्रता’ को घोषित किया।

3. स्वतंत्रता दिवस मनाना (Celebration of Independence Day) काँग्रेस ने तय किया कि 26 जनवरी, 1930 का दिन सारे देश में एक साथ स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। इस अवसर पर देशभक्ति के गीत गाए जाएँगे तथा राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाएगा। स्वयं गाँधी जी ने स्वतंत्रता दिवस मनाने की रूपरेखा के बारे में सुस्पष्ट निर्देश जारी किए थे। गाँधी जी ने निर्देश दिए कि “यदि (स्वतंत्रता की) उद्घोषणा सभी गाँवों और सभी शहरों में व्यापक स्तर पर की जाए तो अच्छा होगा। अगर सभी जगहों पर एक ही समय में संगोष्ठियाँ हों तो अच्छा होगा।”

26 जनवरी को सारे देश में अति जोश-खरोश से स्वतंत्रता दिवस मनाया गया, राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया। इस दिन लोगों ने प्रतिज्ञा ली कि, “अन्य लोगों की तरह भारतीय लोगों को भी स्वतंत्रता और अपने कठिन परिश्रम के फल का आनंद लेने का अहरणीय अधिकार है और यह कि यदि कोई भी सरकार लोगों को इन अधिकारों से वंचित रखती है या उनका दमन करती है तो लोगों को इन्हें बदलने अथवा समाप्त करने का भी अधिकार है।”

4. गाँधी जी द्वारा आंदोलन की तैयारी (Preparation for the Movement by Gandhiji)-धीरे-धीरे गाँधी जी सत्याग्रह करने का मन बना रहे थे। इसलिए उन्होंने 1929 में यूरोप जाने का विचार त्याग कर सारे देश का दौरा किया। इस जनसंपर्क अभियान से उन्होंने लोगों में अपने रचनात्मक कार्यक्रमों तथा अहिंसा के संदेश को पहुँचाया। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार पर जोर दिया। स्वतंत्रता दिवस मनाने के लिए भी उन्होंने स्पष्ट निर्देश दिए ताकि लोगों को जगाया जा सके। इस बीच फरवरी, 1930 में साबरमती आश्रम में काँग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई। इसमें ‘स्वतंत्रता प्राप्ति’ के लिए गाँधी जी का आंदोलन चलाने की बागडोर सौंप दी गई।

आंदोलन शुरू करने से पूर्व गाँधी जी सरकार को एक बार आगाह करना चाहते थे तथा साथ ही सरकार को निरुत्तर भी करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने वायसराय को 11 माँगें प्रस्तुत की। इन माँगों में प्रमुख थीं-पूर्ण शराब बंदी, नमक कानून हटाना, भू-राजस्व में कमी, सैनिक व्यय को आधा करना, विदेशी वस्त्रों पर तटकर, भारतीय वस्त्र उद्योग रक्षा, राजनीतिक बंदियों की रिहाई आदि । गाँधी जी ने वायसराय को यह भी सूचित किया कि उनकी माँगें न माने जाने पर वह नमक कानून तोड़कर ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ शुरू कर देंगे। वायसराय से उत्तर न मिलने पर 12 मार्च, 1930 को दांडी यात्रा शुरू की तथा 5 अप्रैल, 1930 को दांडी पहुंचे। उन्होंने 6 अप्रैल, 1930 को नमक कानून तोड़कर आंदोलन शुरू किया।

प्रश्न 3.
दांडी यात्रा पर संक्षिप्त लेख लिखें।
उत्तर:
दांडी यात्रा तथा नमक कानून तोड़ने की योजना गाँधी जी ने बहुत सोच-विचार करके बनाई थी। इस योजना के अनुसार 12 मार्च, 1930 को साबरमती आश्रम से गाँधी जी ने अपने 78 अनुयायियों के साथ 241 मील दूर दांडी नामक स्थान के लिए पद यात्रा शुरू की। यात्रा के दौरान मार्ग में पड़ने वाले गाँवों में लोगों का उत्साह अद्भुत था। लोगों ने गाँधी जी का झंडियों, बंदनवारों तथा पुष्पों से स्वागत किया। उन्होंने यात्रियों को फूल-मालाएँ पहनाईं, पांव छुए तथा ‘गाँधी जी की जय’ के नारों का उद्घोष किया। जैसे-जैसे कारवाँ आगे बढ़ता चला गया हज़ारों लोग आकर यात्रा में शामिल होते चले गए। एक अनोखा दृश्य था एक दुबला, पतला आदमी, केवल घुटनों तक धोती पहने, कंधे पर एक लंबा थैला लटकाकर, हाथ में छड़ी पकड़े, तेज कदमों के साथ पगडंडियों पर, चौड़ी सड़कों पर चला जा रहा था और अपार भीड़ उसके साथ मिलने का प्रयास कर रही थी।

प्रारंभ में अंग्रेज़ समर्थक समाचार-पत्रों ने गाँधी जी की इस योजना का बड़ा मजाक उड़ाया था। उसे ‘बाल विहार’ की संज्ञा दी तथा कहा कि, “क्या समुद्र के पानी को केतली में उबालकर महामहिम सम्राट को सिंहासन से हटाया जा सकता है।” वायसराय इर्विन ने भी 20 फरवरी, 1930 को भारत मंत्री को लिखा था कि वर्तमान में नमक आंदोलन से उसकी रात की नींद नहीं उड़ी है, परंतु सरकार तथा उसके समर्थकों का अनुमान गलत था। यात्रा शुरू होने से पहले ही हज़ारों लोग साबरमती आश्रम में जमा होने लगे थे। 11 मार्च सायं को आश्रम में 75,000 हज़ार लोग मौजूद थे जिन्हें गाँधी जी ने अहिंसा का महत्त्व समझाया। यात्रा शुरू होने पर सफलता की खबरें समाचार-पत्रों में आने लगीं। गुजरात के गाँवों के 300 अधिकारियों ने त्याग पत्र दे दिया। जब तक गाँधी जी दांडी पहुंचे तब तक 24 दिनों में सारे देश में हलचल पैदा हो गई तथा सारा देश आंदोलन शुरू करने के लिए गाँधी जी के इशारे का इंतज़ार करने लगा। सुभाषचंद्र बोस ने इस यात्रा की तुलना इल्बा से लौटने पर नेपोलियन के पेरिस मार्च और मुसोलिनी से सत्ता प्राप्त करने हेतु रोम मार्च से की।

24 दिनों में यात्रा पूरी करके गाँधी जी व उनके सहयोगी 5 अप्रैल को दांडी पहुँचे व 6 अप्रैल को प्रातःकाल में गाँधी जी समुद्र तट पर पहुंचे। वहाँ उन्होंने नमक एकत्र कर नमक कानून को भंग कर दिया और इस प्रकार 6 अप्रैल, 1930 को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया।

प्रश्न 4.
भारत छोड़ो आंदोलन की प्रगति का विवरण दीजिए।
उत्तर:
1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के साथ ही सरकार व काँग्रेस में गतिरोध पैदा हो गया था। काँग्रेस ने मंत्रिमंडलों से त्याग-पत्र दे दिया था। 1940 में व्यक्तिगत सत्याग्रह चलाया। 1942 में गाँधी जी को विश्वास हो गया था कि अंग्रेज़ों को भारत छोड़ देना चाहिए। 7 अगस्त, 1942 को बंबई में अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी (AICC) की बैठक शुरू हुई। इस बैठक में वर्धा में पास किए ‘भारत छोड़ो प्रस्ताव’ का अनुमोदन कर दिया गया। साथ ही गाँधी जी ने अहिंसक संघर्ष छोड़ने की मंजूरी दी। 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के बाद अपने भाषण में महात्मा गाँधी ने कहा, “आप लोगों में से प्रत्येक व्यक्ति को अब से स्वयं को स्वतंत्र व्यक्ति समझना चाहिए तथा इस प्रकार का कार्य करना चाहिए कि मानो आप स्वतंत्र हो….. मैं स्वतंत्रता से कम किसी भी वस्तु से संतुष्ट नहीं होऊँगा। हम करेंगे या मरेंगे। हम या तो भारत को स्वतंत्र कराएँगे या इस प्रयास में मर मिटेंगे।”

महात्मा गाँधी और राष्ट्रीय आंदोलन ने गाँधी जी के दिल्ली आगमन (9 सितंबर, 1947) को “बड़ी लंबी और कठोर गर्मी के बाद बरसात की फुहारों के आने” जैसा महसूस किया। सांप्रदायिक सद्भाव स्थापित करने के लिए गाँधी जी ने “सिक्खों, हिंदुओं और मुसलमानों से आह्वान किया कि वे अतीत को भुलाकर अपनी पीड़ा पर ध्यान देने की बजाय एक-दूसरे के प्रति भाईचारे का हाथ बढ़ाने और शांति से रहने का संकल्प लें ….”

उल्लेखनीय है कि सद्भाव स्थापना में गाँधी जी के व्यापक असर को रेखांकित करते हुए माऊंटबेटन ने उन्हें ‘एक अकेली फौज’ (One man Boundary Force) कहा। गाँधी जी की धर्म में गहरी आस्था थी, किन्तु साथ ही वे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत में भी दृढ़ आस्था रखते थे। उन्होंने दो राष्ट्र सिद्धांत’ (अर्थात हिंदू और मुसलमान दो पृथक् राष्ट्र हैं) को कभी भी स्वीकार नहीं किया। गाँधी जी और नेहरू के आग्रह पर काँग्रेस ने विभाजन के बाद “अल्पसंख्यकों के अधिकारों” पर एक प्रस्ताव पास किया। इसमें भारत को बहुधर्मों और बहुत सारी नस्लों का देश स्वीकार किया गया। प्रस्ताव में कहा गया कि पाकिस्तान में जो भी स्थिति हो, भारत “एक लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होगा जहाँ सभी नागरिकों को पूर्ण अधिकार प्राप्त होंगे तथा धर्म के आधार पर भेदभाव के बिना सभी को राज्य की ओर से संरक्षण का अधिकार होगा।” गाँधी जी विभाजन के बाद भारत में मुसलमानों को पूर्ण सम्मानजनक स्थान देने के पक्ष में थे। पंजाब में जब वे दंगे-तबाही मचा रहे थे तब उन्होंने एक लीगी नेता से कहा था कि, “मैं अपने प्राण देकर भी इसका सामना करना चाहता हूँ। मैं मुसलमानों को भारत की सड़कों पर रेंगने नहीं दूंगा। वे आत्मसम्मान के साथ चलेंगे।”

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 13 महात्मा गांधी और राष्ट्रीय आंदोलन : सविनय अवज्ञा और उससे आगे Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. ईस्ट इंडिया कंपनी को ब्रिटेन के राजा से बंबई मिला
(A) 1661 ई० में
(B) 1639 ई० में
(C) 1690 ई० में
(D) 1680 ई० में
उत्तर:
(A) 1661 ई० में

2. सिविल लाइंस में बसाया गया
(A) राजाओं को
(B) कलर्कों को
(C) गोरों को
(D) गरीबों को
उत्तर:
(C) गोरों को

3. सिक्किम के राजा से दार्जीलिंग छीना गया
(A) 1818 ई० में
(B) 1835 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(B) 1835 ई० में

4. हिल स्टेशनों के विकास का उद्देश्य था
(A) सैनिकों को ठहराने के लिए
(B) सीमा की निगरानी करने के लिए
(C) शत्रु पर आक्रमण के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

5. वायसरॉय जॉन लॉरेंस ने अपनी कौंसिल शिमला में स्थानांतरित की
(A) 1840 ई० में
(B) 1850 ई० में
(C) 1860 ई० में
(D) 1864 ई० में
उत्तर:
(D) 1864 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

6. कलकत्ता में फँस की झोंपड़ियों को अवैध घोषित किया गया
(A) 1800 ई० में
(B) 1815 ई० में
(C) 1836 ई० में
(D) 1854 ई० में
उत्तर:
(C) 1836 ई० में

7. बंबई में टाउन हॉल का निर्माण हुआ
(A) 1833 ई० में
(B) 1855 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1866 ई० में
उत्तर:
(A) 1833 ई० में

8. स्वेज नहर को खोला गया
(A) 1869 ई० में
(B) 1879 ई० में
(C) 1889 ई० में
(D) 1899 ई० में
उत्तर:
(A) 1869 ई० में

9. औपनिवेशिक भारत की वाणिज्यिक राजधानी थी
(A) दिल्ली
(B) कलकत्ता
(C) मद्रास
(D) बंबई
उत्तर:
(D) बंबई

10. मद्रास में औपनिवेशिक काल में अधिकतर इमारतें किस शैली में बनीं?
(A) गुजराती शैली में
(B) इंडो-सारासेनिक शैली में
(C) नव-गॉथिक शैली में
(D) नियोक्लासिक शैली में
उत्तर:
(B) इंडो-सारासेनिक शैली में

11. ताजमहल होटल व गेट वे ऑफ इंडिया की स्थापत्य शैली है
(A) परंपरागत गुजराती शैली
(B) मुगलकालीन शैली
(C) इंडो सारासेनिक शैली
(D) नव-गॉथिक शैली
उत्तर:
(A) परंपरागत गुजराती शैली

12. मद्रास हार्बर का निर्माण पूरा हुआ
(A) 1857 ई० में
(B) 1870 ई० में
(C) 1881 ई० में
(D) 1891 ई० में
उत्तर:
(C) 1881 ई० में

13. अंग्रेज़ों द्वारा कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई
(A) 1700 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1784 ई० में
(D) 1800 ई० में
उत्तर:
(C) 1784 ई० में

14. औपनिवेशिक सरकार मानचित्र तैयार करवाती थी
(A) शहरों के विकास की योजना के लिए
(B) सत्ता नियंत्रण के लिए
(C) व्यवसायों के विकास के लिए
(D) उपर्युक्त सभी के लिए
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी के लिए

15. 18वीं शताब्दी के पतनोन्मुख नगर था
(A) सूरत
(B) ढाका
(C) मछलीपट्नम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

16. रेलवे आगमन से नगर अस्तित्व में आया
(A) जमालपुर
(B) बरेली
(C) वाल्टेयर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

17. अंग्रेजों द्वारा फोर्ट विलियम का निर्माण करवाया गया
(A) कलकत्ता में
(B) दिल्ली में
(C) बंबई में
(D) मद्रास में
उत्तर:
(A) कलकत्ता में

18. ब्रिटिश काल में प्रथम पर्वतीय स्थल कौन-सा बना?
(A) शिमला
(B) दार्जीलिंग
(C) नैनीताल
(D) मनाली
उत्तर:
(A) शिमला

19. ‘गेट वे ऑफ इंडिया’ का निर्माण किसके स्वागत के लिए हुआ?
(A) जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी
(B) जमशेद जी टाटा
(C) प्रेमचन्द रायचन्द
(D) लॉर्ड डलहौजी
उत्तर:
(A) जॉर्ज पंचम और उनकी पत्नी

20. औपनिवेशिक काल में किस शहर को भारत का सरताज कहा जाता था?
(A) दिल्ली को
(B) कलकत्ता को
(C) मद्रास को
(D) बंबई को
उत्तर:
(D) बंबई को

21. तेलुगू कोमाटी से अभिप्राय था
(A) बुनकर समुदाय
(B) व्यावसायिक समुदाय
(C) अधिकारीगण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) व्यावसायिक समुदाय

22. जनगणना के आँकड़ों को भ्रामक माना जाता है क्योंकि
(A) लोग प्रायः अपनी बीमारी के बारे में सही नहीं बताते
(B) कुछ लोग ऊँची हैसियत का झूठा दावा करते हैं
(C) घर की औरतों के बारे में जानकारी देना अच्छा नहीं मानते
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

23. अंग्रेज़ों की नजर में ‘ब्लैक टाउन’ केंद्र थे
(A) गदंगी के
(B) बीमारियों के
(C) अराजकता के
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. मुगलकाल में मदुरै और कांचीपुरम प्रसिद्ध थे
(A) व्यापार के लिए
(B) त्योहारों के लिए
(C) मंदिरों के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. औपनिवेशिक काल में कानपुर प्रसिद्ध था
(A) स्टील उत्पादन के लिए
(B) चीनी मिट्टी के बर्तनों के लिए
(C) सूती, ऊनी व चमड़े की वस्तुओं के लिए
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) सूती, ऊनी व चमड़े की वस्तुओं के लिए

26. ‘ब्लैक टाउन’ में रहते थे
(A) गोरे लोग
(B) भारतीय लोग
(C) सैनिक अधिकारी,
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) भारतीय लोग

27. शिमला को राजधानी बनाया
(A) लॉर्ड वेलेज़्ली
(B) जॉन लॉरेंस
(C) लॉर्ड डलहौजी
(D) लॉर्ड कैनिंग
उत्तर:
(B) जॉन लॉरेंस

28. मुगलकाल में राजधानी शहर था
(A) दिल्ली
(B) लाहौर
(C) आगरा
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

29. दक्षिणी भारत का प्रमुख नगर था
(A) मदुरै
(B) कांचीपुरम
(C) हम्पी
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

30. विक्टोरिया टर्मीनस बना है
(A) गुजराती शैली में
(B) नव-गॉथिक शैली में
(C) इंडो सारासेनिक शैली में
(D) नव शास्त्रीय शैली में
उत्तर:
(B) नव-गॉथिक शैली में

31. औपनिवेशिक काल में भारत पश्चिमी तट पर शहर विकसित हुआ
(A) बंबई
(B) मद्रास
(C) कलकत्ता
(D) मदुरै
उत्तर:
(A) बंबई

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

32. अंग्रेज़ी राज के दौरान विकसित हुए शहरों को कहा गया
(A) अंग्रेज़ी शहर
(B) औपनिवेशिक शहर
(C) मुगलकालीन शहर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) औपनिवेशिक शहर

33. फ्रांसीसियों ने किस स्थान को अपना व्यापारिक केन्द्र बनाया था?
(A) कलकत्ता
(B) मद्रास
(C) गोवा
(D) पांडिचेरी
उत्तर:
(D) पांडिचेरी

34. भारत में पहली रेल लाइन कब बिछाई गई?
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1819 ई० में
उत्तर:
(B) 1853 ई० में

35. ‘गंज’ से क्या अभिप्राय है?
(A) औपनिवेशिक शहर
(B) कस्बे का बाजार
(C) गाँव
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) कस्बे का बाजार

36. पुर्तगालियों ने अपना व्यापारिक केन्द्र कहाँ स्थापित किया?
(A) मद्रास में
(B) गोवा में
(C) पांडिचेरी में
(D) बम्बई में
उत्तर:
(B) गोवा में

37. कलकत्ता नगर सुधार पर लॉर्ड वेलेज्ली द्वारा ‘मिनट्स’ कब लिखा गया?
(A) 1803 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1911 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(A) 1803 ई० में

38. अंग्रेजों ने मद्रासपट्टम नाम व्यापारिक बस्ती कब बसाई?
(A) 1600 ई० में
(B) 1639 ई० में
(C) 1803 ई० में
(D) 1911 ई० में
उत्तर:
(B) 1639 ई० में

39. भारत के लिए नए समुद्री मार्ग की खोज किसने की?
(A) कोलंबस ने
(B) वास्कोडिगामा ने
(C) काउंट-डि-लाली ने
(D) लॉर्ड वेलेज़्ली ने
उत्तर:
(B) वास्कोडिगामा ने

40. अंग्रेजों ने फोर्ट सैन्ट जॉर्ज कहाँ बनवाया?
(A) बम्बई में
(B) मद्रास में
(C) दिल्ली में
(D) आगरा में
उत्तर:
(B) मद्रास में

41. अंग्रेजों ने किस स्थान को व्यापारिक केंद्र बनाया?
(A) मद्रास को
(B) पणजी को
(C) कलकत्ता को
(D) पांडिचेरी को
उत्तर:
(C) कलकत्ता को

42. 1911 ई० से पहले भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कहाँ स्थित थी?
(A) दिल्ली
(B) बम्बई
(C) कलकत्ता
(D) मद्रास
उत्तर:
(C) कलकत्ता

43. गेटवे ऑफ इंडिया का निर्माण कब हुआ था?
(A) 1911 ई० में
(B) 1875 ई० में
(C) 1905 ई० में
(D) 1900 ई० में
उत्तर:
(A) 1911 ई० में

44. भारत में प्रथम रेलगाड़ी कब चलाई गई?
(A) 1857 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1843 ई० में
(D) 1856 ई० में
उत्तर:
(B) 1853 ई० में

45. भारत में पहली सूती मिल कहाँ स्थापित की गई?
(A) अमृतसर में
(B) कलकत्ता में
(C) मद्रास में
(D) बम्बई में
उत्तर:
(D) बम्बई में

46. जमशेदपुर किस वस्तु के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हुआ?
(A) चमड़े की वस्तुओं के लिए
(B) स्टील उत्पादन के लिए
(C) काँच के सामान के लिए
(D) रेलवे नगर के रूप में
उत्तर:
(B) स्टील उत्पादन के लिए

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक काल में भारत में कौन-कौन से शहर विकसित हुए?
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में भारत के पश्चिमी तट पर बंबई व पूर्वी तट पर मद्रास और कलकत्ता तीन नगर विकसित हुए।

प्रश्न 2.
अंग्रेजी राज में विकसित शहरों को क्या कहा गया?
उत्तर:
अंग्रेजी राज के दौरान विकसित शहरों को औपनिवेशिक शहर कहा गया।

प्रश्न 3.
छोटे शहरों को क्या कहा गया?
उत्तर:
छोटे शहरों को ‘कस्बा’ कहा गया।

प्रश्न 4.
‘ब्लैक टाउन’ शब्द का क्या अर्थ था ?
उत्तर:
सरकारी रिकॉर्ड्स में भारतीय लोगों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ कहा जाता था।

प्रश्न 5.
कस्बे की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
कस्बे की मुख्य विशेषता जनसंख्या नहीं, बल्कि उसकी विशिष्ट आर्थिक व सांस्कृतिक गतिविधियाँ थीं।

प्रश्न 6.
गाँवों का जीवन-निर्वाह मुख्यतया किस पर निर्भर था?
उत्तर:
गाँवों का जीवन-निर्वाह मुख्यतया कृषि, पशुपालन और वनोत्पादों पर निर्भर था।

प्रश्न 7.
शहरों में खाद्यान्न कहाँ से आता था?
उत्तर:
शहरों में खाद्यान्न हमेशा गाँवों से आता था।

प्रश्न 8.
मुगलकालीन शहर मुख्यतया तथा, आगरा, दिल्ली, लाहौर आदि क्यों प्रसिद्ध थे?
उत्तर:
ये शहर प्रशासन व सत्ता के केंद्र के साथ-साथ घनी जनसंख्या व विशाल भवनों वाले शहर थे।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन शहरों की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
मुगलों के शहर कला व स्थापत्य के केंद्र थे। भव्य महल, किले, उद्यान, द्वार व मस्जिद इन शहरों की विशेषता थी।

प्रश्न 10.
मुगलकालीन स्थापत्य कला कैसी थी?
उत्तर:
मुगलकालीन स्थापत्य कला में इस्लामिक, बौद्ध, जैन व हिंदू भवन-निर्माण शैलियों का बेहतर समावेश था।

प्रश्न 11.
‘मनसब’ से क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
‘मनसब’ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है ‘पद’ अर्थात् मनसबदार मुगलकाल में सैनिक व असैनिक दोनों तरह का अधिकारी होता था।

प्रश्न 12.
16वीं व 17वीं शताब्दी में शहर की शांति और व्यवस्था बनाए रखने का काम किसका था?
उत्तर:
16वीं व 17वीं शताब्दी में शहर की शांति व व्यवस्था बनाए रखने का काम कोतवाल का होता था।

प्रश्न 13.
मुगल साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था कैसी थी?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य की राजनीतिक व्यवस्था केंद्रीकृत थी।

प्रश्न 14.
पुर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा भारत कब पहुँचा?
उत्तर:
पुर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा 1498 ई० में भारत पहुंचा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 15.
पुर्तगालियों ने अपनी पहली व्यापारिक बस्ती कहाँ बसाई?
उत्तर:
पुर्तगालियों ने 1510 ई० में पणजी में अपनी पहली व्यापारिक बस्ती बसाई।

प्रश्न 16.
फ्रांसीसियों ने आरंभिक व्यापारिक कार्यालय कहाँ स्थापित किया?
उत्तर:
फ्रांसीसियों ने शुरू में व्यापारिक कार्यालय पांडिचेरी में स्थापित किया।

प्रश्न 17.
डच व्यापारिक कंपनी ने अपना व्यापारिक कार्यालय कहाँ स्थापित किया?
उत्तर:
1605 ई० में डच व्यापारिक कंपनी ने अपना व्यापारिक कार्यालय मछलीपट्टनम में स्थापित किया।

प्रश्न 18.
व्यापारिक कार्यालय को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
व्यापारिक कार्यालय को कारखाना कहा जाता था।

प्रश्न 19.
यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ भारत से किन वस्तुओं का व्यापार करती थीं?
उत्तर:
यूरोपीय व्यापारिक कंपनियाँ भारत से काली मिर्च, मसाले व वस्त्रों का निर्यात करती थीं।

प्रश्न 20.
औपनिवेशिक प्रशासन व सत्ता के केंद्र कौन-से शहर थे?
उत्तर:
औपनिवेशिक प्रशासन व सत्ता के केंद्र मद्रास, कलकत्ता व बंबई शहर थे।

प्रश्न 21.
कौन-कौन से नगर आर्थिक राजधानियों के रूप में विकसित हुए?
उत्तर:
मद्रास, कलकत्ता व बंबई शहर आर्थिक राजधानियों के रूप में विकसित हुए।

प्रश्न 22.
भारतीयों के लिए सबसे पहले निर्वाचन पद्धति किन संस्थाओं में शुरु की गई?
उत्तर:
नगर निगमों, नगरपालिका व देहात के जिला बोर्डों के लिए निर्वाचन पद्धति प्रारंभ की गई।

प्रश्न 23.
सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना किस गवर्नर-जनरल के काल में हुई?
उत्तर:
सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना 1878 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड लिटन के काल में हुई।

प्रश्न 24.
भारत में सबसे पहले जनगणना कब एवं किसने करवाई?
उत्तर:
सन् 1872 में भारत में अंग्रेज़ सरकार ने पहली अखिल भारतीय जनगणना करवाने का प्रयास किया।

प्रश्न 25.
भारत में हर दस साल बाद दशकीय जनगणना कब से शुरु की गई?
उत्तर:
सन 1881 से भारत में हर दस साल के बाद दशकीय जनगणना नियमित तौर पर करवाई जाती रही।

प्रश्न 26.
अंग्रेजों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज की स्थापना कहाँ की?
उत्तर:
अंग्रेज़ों ने मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज की स्थापना की।

प्रश्न 27.
फोर्ट विलियम कहाँ स्थापित किया गया?
उत्तर:
फोर्ट विलियम कलकत्ता में स्थापित किया गया।

प्रश्न 28.
किलेबंद बंदरगाह नगरों को क्या कहा गया?
उत्तर:
किलेबंद बंदरगाह नगरों को ‘प्रेसीडेंसी’ कहा गया।

प्रश्न 29.
भारत में पहली सूती मिल कहाँ स्थापित की गई?
उत्तर:
भारत में पहली सूती मिल बंबई में स्थापित की गई।

प्रश्न 30.
औपनिवेशिक काल में जमशेदपुर क्यों प्रसिद्ध हुआ?
उत्तर:
जमशेदपुर स्टील उत्पादन के लिए प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 31.
उन बस्तियों को क्या कहा जाता था जहाँ केवल गोरे लोगों को ही बसाया जाता था?
उत्तर:
ऐसी बस्तियाँ जहाँ केवल गोरे लोगों को ही बसाया जाता था सिविल लाइंस कहा जाता था।

प्रश्न 32.
अंग्रेज़ों ने सिक्किम में कौन-सा हिल स्टेशन छीना?
उत्तर:
1835 ई० में अंग्रेज़ों ने सिक्किम से दार्जीलिंग हिल स्टेशन छीना।

प्रश्न 33.
शिमला को राजधानी कब बनाया गया?
उत्तर:
जॉन लॉरेंस ने 1864 ई० में शिमला को राजधानी बनाया गया।

प्रश्न 34.
कलकत्ता में स्टार थियेटर की स्थापना किसने की?
उत्तर:
विनोदनी दासी ने 1883 ई० में स्टार थियेटर, कलकत्ता की स्थापना की।

प्रश्न 35.
तेलुगू कोमाटी से क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
तेलुगू कोमाटी एक समुदाय था जिसने मद्रास में व्यावसायिक सफलता प्राप्त की।

प्रश्न 36.
फोर्ट विलियम (कलकत्ता) के आसपास खाली छोड़े गए मैदान को स्थानीय भाषा में क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
फोर्ट विलियम के आसपास खाली जगह को स्थानीय लोग ‘गारेर मठ’ कहते थे।

प्रश्न 37.
कलकत्ता में गवर्नमेंट हाउस का निर्माण किसने करवाया?
उत्तर:
कलकत्ता में गवर्नमेंट हाउस का निर्माण लॉर्ड वेलेज़्ली ने करवाया।

प्रश्न 38.
लॉर्ड वेलेज़्ली ने कलकत्ता नगर नियोजन के लिए प्रशासकीय आदेश कब जारी किया?
उत्तर:
लॉर्ड वेलेज़्ली ने कलकत्ता नगर नियोजन के लिए प्रशासकीय आदेश 1803 ई० में जारी किया।

प्रश्न 39.
कलकत्ता में नगर नियोजन के कार्य के लिए लॉटरी कमेटी की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
कलकत्ता में नगर नियोजन के कार्य के लिए 1817 ई० में लॉटरी कमेटी की स्थापना की गई।

प्रश्न 40.
कलकत्ता में घास-फूस की झोंपड़ियों को अवैध कब घोषित किया गया?
उत्तर:
आग लगने की आशंका से बचने के लिए कलकत्ता में 1836 ई० में घास-फूस की झोंपड़ियों को अवैध घोषित किया गया।

प्रश्न 41. ‘लॉटरी कमेटी’ क्या थी?
उत्तर:
‘लॉटरी कमेटी’ कलकत्ता के नगर नियोजन करने वाली समिति थी।

प्रश्न 42.
बंबई में एल्फिस्टन सर्किल का निर्माण कब हुआ?
उत्तर:
1860 ई० में बंबई में एल्फिस्टन सर्किल बनाया गया।

प्रश्न 43.
बंबई में ‘चाल’ बनाने का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
बंबई में ‘चाल’ बनाने का उद्देश्य बढ़ती हुई जनसंख्या को आवास प्रदान करना था।

प्रश्न 44.
इंडो-सारासेनिक स्थापत्य शैली से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
इंडो-सारासेनिक स्थापत्य शैली में भारतीय व यूरोपीय दोनों स्थापत्य शैलियों का मिश्रण किया गया है।

प्रश्न 45.
नवशास्त्रीय (नियोक्लासीकल) शैली क्या थी?
उत्तर:
नवशास्त्रीय शैली में बड़े-बड़े स्तंभों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण किया गया।

प्रश्न 46.
18वीं शताब्दी में भारत में तीन प्रसिद्ध बंदरगाहें कौन-सी थीं?
उत्तर:
बंबई, कलकत्ता व मद्रास 18वीं शताब्दी की प्रसिद्ध बंदरगाहें थीं।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 47.
भारत में पहली बार जनगणना कब करवाई गई?
उत्तर:
भारत में पहली बार जनगणना का प्रयास 1872 ई० में किया गया।

प्रश्न 48.
अंग्रेज़ों ने भारत में व्यापारिक राजधानी किस शहर को बनाया?
उत्तर:
ब्रिटिश काल में बम्बई भारत की व्यापारिक राजधानी के तौर पर उभरा।

प्रश्न 49.
भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों का सबसे पहला केंद्र कौन-सा था?
उत्तर:
पश्चिमी तट पर स्थित सूरत की बंदरगाह भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों का पहला केंद्र था।

प्रश्न 50.
मद्रासपट्टम को स्थानीय लोग क्या कहते थे?
उत्तर:
स्थानीय लोग मद्रासपट्टम को चेनापट्नम कहते थे।

प्रश्न 51.
भारत में पहली रेलवे लाइन कब और कहाँ तक बिछाई गई?
उत्तर:
1853 ई० में बम्बई से ठाणे तक पहली रेलवे लाइन बिछाई गई।

प्रश्न 52.
1911 ई० में भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी कलकत्ता से बदलकर किस शहर को बनाया गया?
उत्तर:
1911 ई० में कलकत्ता के स्थान पर दिल्ली को भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की राजधानी बनाया गया।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
कस्बे के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
कस्बे एक छोटे शहर के रूप में गाँव से अलग होते थे। मुगल काल में कस्बा सामान्यतया किसी स्थानीय विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था। इसमें एक छोटा स्थायी बाज़ार होता था, जिसे गंज कहते थे। यह बाजार विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध इत्यादि सामग्री उपलब्ध करवाता था। कस्बे की मुख्य विशेषता जनसंख्या नहीं थी, बल्कि उसकी विशिष्ट आर्थिक व सांस्कृतिक गतिविधियाँ थीं। उन्हीं के कारण उसे ‘ग्रामीण शहर’ कहा जाता था।

प्रश्न 2.
मुगलकालीन शहरों की जीवन-शैली कैसी थी?
उत्तर:
मुगलकालीन शहरी लोगों की जीवन-शैली गाँव से अलग थी। शहरों में मुख्य तौर पर शासक, प्रशासक तथा शिल्पकार व व्यापारी रहते थे। शहरी शिल्पकार किसी विशिष्ट कला में निपुण होते थे। वे प्रायः संपन्न और सत्ताधारी वर्गों की जरूरतों को पूरा करते थे। शहर में रहने वाले सभी लोगों के लिए खाद्यान्न सदैव गाँव से ही आता था। शासक वर्ग किसानों से राजस्व की वसूली करता था।

प्रश्न 3.
शहर व गाँवों में संबंध कैसे थे?
उत्तर:
शहर और गाँव में स्थायी और अस्थायी संबंध रहते थे। शहर के लोगों के लिए खाद्यान्न गाँव से ही आता था। किसान के उत्पादन का एक भाग शहरों की ओर बहता था। प्रायः यह बहाव एक तरफा ही रहता था। फसल बेचकर नकद कर चुकाने के बाद शहर से गाँव की ओर धन व वस्तुओं का बहाव बहुत ही कम था। ग्रामीण लोगों का शहरों से संपर्क कई तरीकों से रहता था। बड़े शहरों में भी ग्रामीण लोगों का आना-जाना बना रहता था। अकाल या किसी अन्य प्राकृतिक आपदा के समय प्रायः लोग जीवित रहने की उम्मीद में शहर की ओर आते थे। कई बार आक्रमणों के समय भी सुरक्षा के लिए गाँव के लोग किलेनुमा शहरों में आकर शरण लेते थे।

प्रश्न 4.
मुगलकालीन शहरों की क्या विशेषताएँ थीं?
उत्तर:
मुगलों के शहर, कला और स्थापत्य के केंद्र थे। भव्य महल, किले, उद्यान, द्वार व मस्जिद इन शहरों की विशेषता थी। विभिन्न मुगल शासकों ने अपनी-अपनी शक्ति, सामर्थ्य और राजनीतिक स्थितियों के अनुरूप शहरों में भवन निर्माण के क्षेत्र में अपना-अपना योगदान दिया। शासकों की व्यक्तिगत रुचि ने भी इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 5.
मुगलकाल में जागीरदार कौन थे?
उत्तर:
मुगलकाल में जागीरदार किसी क्षेत्र का प्रमुख सैनिक था। उसे वेतन में नकद धन नहीं, बल्कि क्षेत्र (जागीर) दिया जाता था। जबकि मनसबदार नकद वेतन प्राप्त करता था।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में शहरों में कोतवाल के क्या कर्त्तव्य थे?
उत्तर:
शहर की सामाजिक व वैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने का काम शहर के कोतवाल का होता था। वह शहर में एक महत्त्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी होता था। शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसके पास एक सैनिक टुकड़ी होती थी। वह शहर में जल-आपूर्ति की देखभाल, गुलामों की बिक्री पर रोक और ‘गिल्ड-मास्टर’ की नियुक्ति करता था। वह जन्म-मृत्यु संबंधी शहर का रिकॉर्ड भी रखता था। वह माप-तोल की व्यवस्था का भी निरीक्षण करता था ताकि व्यापारी वर्ग हेरा-फेरी न करे। इसके अतिरिक्त वह शहर में आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखता था।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक सत्ता के लिए रिकॉर्डस का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
भारत में ब्रिटिश सत्ता मुख्यतः आँकड़ों और जानकारियों के संग्रह पर आधारित थी। ज्ञातव्य है कि ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का लक्ष्य भारत के संसाधनों को अधिकतम स्तर तक निरंतर दोहन करते हुए मुनाफा बटोरना था। इसके लिए वह अपने राजनीतिक नियंत्रण को सुदृढ़ रखना चाहती थी। ये दोनों काम बिना पर्याप्त जानकारियों के संभव नहीं थे। आंकड़ों का सर्वाधिक महत्त्व उनके लिए वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए था।

प्रश्न 8.
सांख्यिकी आँकड़ों का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
शहरों की प्रशासनिक व्यवस्था की दृष्टि से शहरी जनसंख्या के उतार-चढ़ाव की जानकारी महत्त्वपूर्ण थी। सड़क निर्माण, यातायात तथा साफ-सफाई इत्यादि के बारे में निर्णय लेने के लिए विविध जानकारियाँ आवश्यक थीं। अतः सांख्यिकी आँकड़े एकत्रित कर सरकारी रिपोर्टों में प्रकाशित किए जाते थे।

प्रश्न 9.
शहरों में नगरपालिकाओं की स्थापना क्यों की गई?
उत्तर:
लोग नागरिक सेवाओं; जैसे सफाई व्यवस्था, सड़क, जल-आपूर्ति की देखभाल के लिए शहरों में नगरपालिकाओं की स्थापना की गई। बड़े औपनिवेशिक शहरों; जैसे मद्रास, कलकत्ता, बम्बई में ‘कार्पोरेशन’ (नगर-निगम) बनाए गए।”

प्रश्न 10.
नगरपालिका रिकॉर्डस किसे कहा जाता था?
उत्तर:
नगरपालिका व नगर-निगमों की विविध तरह की गतिविधियों के फलस्वरूप विशाल मात्रा में आँकड़े अथवा ‘रिकॉर्डस बनाए गए। ये संस्थाएँ इन रिकॉर्डस को ‘रिकॉर्डस रूम’ में सुरक्षित रखती थीं। इन्हें ‘नगरपालिका रिकॉर्डस’ कहा जाता है। शहरों के इतिहास लेखन के लिए ये काफी महत्त्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध करवाते हैं।

प्रश्न 11.
कंपनी अधिकारियों ने शहरों के मानचित्र क्यों बनवाए?
उत्तर:
किसी स्थान की बनावट व भू-दृश्य को समझने के लिए मानचित्र आवश्यक होते हैं। इसके लिए कंपनी की सेवा में मानचित्र विशेषज्ञ नियुक्त किए जाते थे, जो सटीक वैज्ञानिक औजारों की सहायता से बड़ी सावधानीपूर्वक मानचित्र तैयार करते थे। औपनिवेशिक सत्ता के लिए मानचित्रों के महत्त्व को हम इस तथ्य से भी समझ सकते हैं कि भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा सन् 1878 में लॉर्ड लिटन (गवर्नर-जनरल) के काल में ‘सर्वे ऑफ इण्डिया’ (Survey of India) की स्थापना की गई।

प्रश्न 12.
शहरी मानचित्रों में क्या दर्शाया जाता था?
उत्तर:
शहरों के मानचित्रों में घाट, तालाब, हरियाली के स्थान, नदी-नाले, आवास-बस्तियाँ, बाज़ार, प्रशासनिक कार्यालय, शिक्षण संस्थाएँ, अस्पताल इत्यादि विभिन्न तरह की जानकारियाँ चिह्नित की जाती थीं। निःसंदेह ऐसे मानचित्र औपनिवेशिक शहरों को समझाने के लिए काफी महत्त्वपूर्ण हैं।

प्रश्न 13.
जनगणना आँकड़ों से क्या-क्या जानकारियाँ प्राप्त होती हैं?
उत्तर:
जनगणना आँकड़ों से निम्नलिखित जानकारियाँ प्राप्त होती हैं

  1. जनसंख्या आँकड़ों से लोगों के व्यवसायों के अनुरूप जानकारी प्राप्त होती है।
  2. इनसे आयु, लिंग व जाति संबंधी उपलब्ध सूचनाएँ सामाजिक इतिहास लेखन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
  3. औपनिवेशिक शहरों में ‘श्वेत’ व ‘अश्वेत’ लोगों की संख्या का पता लगाया जा सकता है।
  4. शहरी लोगों के जीवन-स्तर, विभिन्न बीमारियों के दुष्प्रभावों तथा उनसे प्राप्त होने वाले स्रोतों के आँकड़े मिल सकते हैं।

प्रश्न 14.
बंबई अंग्रेजों को कैसे प्राप्त हुई?
उत्तर:
बंबई सात टापुओं पर बसा हुआ था जो पुर्तगालियों के अधीन था। पुर्तगाली राजकुमारी का विवाह ब्रिटेन के राजा के साथ हुआ और बंबई उसे दहेज में मिला। बाद में राजा ने बंबई ईस्ट इण्डिया कंपनी को किराए पर दे दिया।

प्रश्न 15.
अधिकांश लोग जनगणना अधिकारियों को संदेह की दृष्टि से क्यों देखते थे?
उत्तर:
जनगणना अधिकारियों को प्रायः लोग संदेह की दृष्टि से देखते थे। उन्हें लगता था कि कोई नया टैक्स लगाने के लिए अधिकारी जानकारी इकट्ठी कर रहे हैं। कुछ लोग अपने घर की औरतों के बारे में जानकारी देना पसंद नहीं करते थे।

प्रश्न 16.
जनगणना के आँकड़ों की जाँच से औपनिवेशिक शहरों की क्या जानकारी सामने आती है?
उत्तर:
जनगणना आँकड़े ये बताते हैं कि 19वीं सदी व 20वीं सदी के मध्य तक शहरीकरण अत्यधिक धीमा और लगभग स्थिर जैसा रहा। परंपरागत शहरों का पतन हुआ लेकिन अंग्रेज़ों के राजनीतिक नियंत्रण के फलस्वरूप और आर्थिक नीतियों के कारण कलकत्ता, मद्रास व बंबई का विकास तेजी से हुआ। बंदरगाह नगर कुछ ही वर्षों में विशाल शहर बन गए।

प्रश्न 17.
सिविल लाइंस क्या थी? इसकी दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
सिविल लाइंस नए शहरी इलाके थे जहाँ गोरे लोगों को बसाया जाता था। यहाँ का प्रबंध भी गोरों के हाथों में ही होता था। अक्सर यहाँ सैनिक अधिकारियों के लिए बंगले बनाए जाते थे। 1857 ई० के विद्रोह के बाद सुरक्षा की दृष्टि से दो सिविल लाइंस बनाई गईं।

प्रश्न 18.
हिल स्टेशन बनाने के आरंभिक उद्देश्य क्या थे?
उत्तर:
अंग्रेज़ों ने सेना की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए हिल स्टेशनों की स्थापना की। ये सैनिकों को ठहराने, सीमा की निगरानी करने तथा शत्रु पर हमला करने के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान थे।

प्रश्न 19.
हिल स्टेशन औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के लिए किस प्रकार महत्त्वपूर्ण थे?
उत्तर:
पर्वतीय स्थल केवल पर्यटन की दृष्टि से ही अंग्रेज़ों के लिए महत्त्वपूर्ण नहीं थे, बल्कि उनकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़े महत्त्वपूर्ण थे। पर्वतीय ढलानों पर चाय, कॉफी के बागानों का विकास किया गया। इन बागानों के मालिक गोरे लोग थे। 19वीं सदी के मध्य से चाय बागान उद्योग की शुरुआत हुई थी। जल्दी ही यह उद्योग भारत का सबसे बड़ा बागान उद्योग बन चुका था। भारत संसार का सबसे बड़ा चाय उत्पादक व निर्यातक देश बन गया। 1940 ई० तक भारत में पैदा होने वाली चाय का 8 प्रतिशत निर्यात होने लगा। इसी तरह कॉफी व अन्य पर्वतीय बागान भी अंग्रेजों के लिए विशाल मुनाफे का आधार बन गए।

प्रश्न 20.
कलकत्ता को आधुनिक बनाने के लिए कंपनी सरकार ने कौन-से सुधार लागू किए?
उत्तर:
कलकत्ता को आधुनिक बनाने के लिए कंपनी सरकार ने निम्नलिखित सुधार लागू किए

  1. कंपनी सरकार ने गंदे जल की निकासी के लिए भूमिगत नालियों का प्रबंध किया।
  2. शहर में रोशनी का उचित प्रबंध किया गया।
  3. कलकत्ता निवासियों के पीने के लिए स्वच्छ जल का प्रबंध किया।
  4. शहर की सफाई की देखभाल के लिए तीन कमिश्नरों को नियुक्त किया।

प्रश्न 21.
विनोदिनी दासी की आत्मकथा का क्या नाम था? इसकी रचना कब की गई?
उत्तर:
विनोदिनी दासी ने 1910 ई० से 1913 ई० के बीच अपनी आत्मकथा ‘आमार कथा’ की रचना की। यह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली महिला थी। विनोदिनी दासी की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी कि उन्होंने अभिनेत्री, संस्था निर्माता एवं लेखिका के तौर पर अनेक भूमिकाओं को एक-साथ कुशलतापूर्वक निभाया। उन्होंने 1883 ई० में स्टार थियेटर कलकत्ता की स्थापना की। परन्तु तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज ने सार्वजनिक क्षेत्र में उनकी उपस्थिति की प्रशंसा नहीं की।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 22.
लॉर्ड वेलेज़्ली ने 1803 ई० के प्रशासकीय आदेश में क्या आदेश जारी किया?
उत्तर:
वेलेज़्ली ने अपने कलकत्ता मिनट्स में लिखा, “यह सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है कि वह इस विशाल नगर में सड़कों, नालियों और जल-मार्गों में सुधार की एक सम्पूर्ण व्यवस्था बनाकर तथा इमारतों व सार्वजनिक भवनों के निर्माण व प्रसार के बारे में स्थायी नियम बनाकर और हर तरह की गड़बड़ियों को नियंत्रित कर यहाँ के निवासियों को स्वास्थ्य, सुरक्षा और सुविधा उपलब्ध करवाए।”

प्रश्न 23.
लॉटरी कमेटी ने कलकत्ता के पूर्ण विकास के लिए क्या कार्य किए?
उत्तर:
लॉटरी कमेटी ने कलकत्ता के पूर्ण विकास के लिए एक नया नक्शा तैयार करवाया। कमेटी ने शहर के भारतीय आबादी वाले भाग में सड़क का निर्माण करवाया, नदी के किनारों से अवैध कब्जों को हटवाया, भारतीय भाग वाले हिस्से को साफ-सुथरा बनाने के लिए अनेक झोंपड़ियों को हटाकर गरीब मजदूरों को वहाँ से निकाल दिया। हाँ, मज़दूरों को बसाने के लिए कलकत्ता के बाहरी किनारे पर स्थान दे दिया गया।

प्रश्न 24.
अंग्रेज़ों ने भारत में यूरोपीय स्थापत्य शैलियों को क्यों अपनाया?
उत्तर:
अंग्रेज़ों ने भारत में यूरोपीय स्थापत्य शैलियों को निम्नलिखित कारणों से अपनाया

(1) अंग्रेज़ भारत में बाहर से आए थे। वे यूरोपीय स्थापत्य शैली अपनाकर एक जाना-पहचाना-सा भू-दृश्य बना देना चाहते थे, ताकि विदेश में या उपनिवेश में रहते हुए भी घर जैसा महसूस कर सकें।

(2) यूरोपीय शैली को अपनाकर अंग्रेज भारत में अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहते थे। वस्तुतः यह उनके भारत पर अधिकार और सत्ता का प्रतीक भी थी।

(3) अंग्रेज़ों की सोच यह भी थी कि यूरोपीय शैली की इमारतों से उनमें और भारतीय प्रजा के बीच फर्क व फासला साफ दिखाई देगा। वस्तुतः इस माध्यम से अपनी उच्चता की भावना और भारतीय प्रजा के निम्नता के स्तर को साफ तौर पर उजागर करना चाहते थे।

प्रश्न 25.
अंग्रेज़ों द्वारा भारत में नवशास्त्रीय शैली अपनाने के क्या कारण थे?
उत्तर:
इस शैली के माध्यम से अंग्रेज़ रोम की भव्यता के समान साम्राज्यीय भारत (Imperial India) के वैभव को दिखाने के लिए प्रयोग करना चाहते थे। इस शैली के तहत बड़े-बड़े स्तम्भों का निर्माण रेखा-गणितीय संरचनाओं के आधार पर किया जाता औपनिवेशिक शहर : नगरीकरण, नगर-योजना और स्थापत्य था। इस शैली को भारत के उष्ण-कटिबंधीय जलवायु के अनुकूल भी माना गया। बम्बई का टाउन हॉल (1833 ई०) इसी शैली के आधार पर बनाया गया। बहुत सारी व्यावसायिक इमारतें भी इस आधार पर बनाई गईं। इन इमारतों में एल्फिस्टन सर्कल की इमारतें मुख्य थीं।

प्रश्न 26.
स्थापत्य शैलियाँ व इमारतें इतिहास लेखन में बहुत महत्त्वपूर्ण हैं, कैसे? दो कारण बताओ।
उत्तर:
1. सौंदर्य आदर्शों की अनुभूति-स्थापत्य शैलियों और इमारतों से तात्कालिक सौंदर्यात्मक आदर्शों की अनुभूति होती है। औपनिवेशिक शासक अपने इस सौंदर्यात्मक आदर्शों के माध्यम से भी अपनी श्रेष्ठता की भावना को व्यक्त करते थे।

2. सत्ता प्रभुत्व की अभिव्यक्ति इमारतों में प्रभुत्व की भावना भी निहित होती है। यह हमें उन लोगों की सोच व दृष्टि के बारे में बताती है जो उन्हें बनाने वाले थे। उदाहरण के लिए, जैसा कि हमने देखा, औपनिवेशिक इमारतों में नस्ली भेदभाव स्पष्ट झलकता है।

3. नई स्थापत्य शैलियों का विकास-पश्चिमी स्थापत्य शैलियों से प्रभावित होकर बहुत-से सम्पन्न भारतीयों ने अपने भवनों के निर्माण में यूरोपीय शैलियों को अपनाया। वे उन्हें आधुनिकता और सभ्यता का प्रतीक समझने लगे थे।

प्रश्न 27.
‘व्हाइट टाउन’ शब्द का क्या महत्त्व था?
उत्तर:
अंग्रेज़ों ने अनेक शहरों में अपने रहने के स्थानों की किलेबंदी की। इन किलों में अधिकतर यूरोपीय लोग रहते थे। इसलिए इस क्षेत्र को ‘व्हाइट टाउन’ कहा गया। ये अंग्रेज़ों के नस्ली भेद-भाव की सोच को स्पष्ट करते हैं। भारतीय लोग इन बस्तियों में नहीं रह सकते थे।

प्रश्न 28.
‘गंज’ से क्या अभिप्राय था?
उत्तर:
मुगल काल में कस्बे के स्थायी बाजार व छोटे से बाजार को ‘गंज’ कहा जाता था। यह बाजार विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध इत्यादि सामग्री उपलब्ध करवाता था।

प्रश्न 29.
औपनिवेशिक शहरों की सामान्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
बम्बई, मद्रास व कलकत्ता तीनों औपनिवेशिक शहरों में अंग्रेज़ों ने अपने व्यापारिक व प्रशासनिक कार्यालय स्थापित किए। तीनों शहर बंदरगाह नगर विकसित हुए।

प्रश्न 30.
मद्रास में अंग्रेज़ों ने अपना प्रभाव कैसे स्थापित किया?
उत्तर:
1611 ई० में अंग्रेज़ों ने मसुलीपट्टम में अपनी फैक्ट्री स्थापित की। 1639 ई० में मद्रासपट्टम नामक स्थान पर एक व्यापारिक बस्ती बनाई। अंग्रेज़ों ने इस स्थान पर बसने का अधिकार स्थानीय तेलुगू सामंतों से खरीदा।

प्रश्न 31.
शहरी जीवन पर नियंत्रण रखने के लिए अंग्रेज़ कौन-कौन से कार्य करते थे?
उत्तर:
शहरी जीवन की गति व दिशा पर नज़र रखने के लिए अंग्रेज़ नियमित रूप से शहर का सर्वेक्षण, सांख्यिकी आँकड़े इकट्ठे करना तथा शहर के मानचित्र या नक्शे तैयार करवाते थे। इन गतिविधियों के माध्यम से वे शहरी जीवन पर अपना नियंत्रण रखते थे।

प्रश्न 32.
‘गेट वे ऑफ इंडिया’ का निर्माण कब व क्यों किया गया?
उत्तर:
1911 ई० में जॉर्ज पंचम व उनकी पत्नी मैरी के स्वागत में ‘गेट वे ऑफ इंडिया’ का निर्माण किया गया।

प्रश्न 33.
औपनिवेशिक काल में विकसित हुए पर्वतीय स्थानों के नाम लिखें।
उत्तर:
शिमला, माउंटआबू, दार्जिलिंग तथा मनाली इत्यादि पर्वतीय स्थान विकसित हुए। इनका आरंभिक उद्देश्य ब्रिटिश सेना की जरूरतों को पूरा करना था।

प्रश्न 34.
‘इण्डो-सारासेनिक’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
इण्डो-सारासेनिक स्थापत्य शैली में भारतीय व यूरोपीय दोनों शैलियों का सम्मिश्रण है।

प्रश्न 35.
नियोक्लासिक (नवशास्त्रीय) शैली क्या थी? बम्बई में बनी इसी शैली की कुछ इमारतों के नाम बताएँ।
उत्तर:
नियोक्लासिक शैली में बड़े-बड़े स्तंभों के पीछे रेखागणितीय संरचनाओं का निर्माण किया जाता था। इस शैली में बम्बई में टाउन हॉल एवं एल्फिस्टन सर्कल आदि का निर्माण हुआ।

प्रश्न 36.
स्वेज नहर को कब खोला गया? बम्बई पर इसका क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1869 ई० में स्वेज़ नहर को खोला गया। स्वेज़ नहर ने लाल सागर व भूमध्य सागर को मिला दिया जिससे भारत से यूरोप के बीच जलमार्ग की दूरी कम हो गई और बम्बई बंदरगाह से व्यापार में वृद्धि हुई।

प्रश्न 37.
औपनिवेशिक काल में अपनाई गई स्थापत्य शैलियों के नाम लिखें।
उत्तर:
औपनिवेशिक काल में नियोक्लासिक (नवशास्त्रीय), नवगॉथिक व इण्डो-सारासेनिक स्थापत्य शैलियों में इमारतें बनीं।

प्रश्न 38.
वेल्लालार कौन थे?
उत्तर:
वेल्लालार मद्रास की एक स्थानीय ग्रामीण जाति थी। आरंभ में ईस्ट इंडिया कंपनी की नौकरी पाने वालों में इनकी प्रमुख भूमिका थी।

प्रश्न 39.
कलकत्ता में ‘गवर्नमैंट हाउस’ का निर्माण कब व किसने करवाया?
उत्तर:
कलकत्ता में 1803 ई० में लॉर्ड वेलेज्ली ने गवर्नमेंट हाउस का निर्माण करवाया। यह ब्रिटिश सत्ता का प्रतीक था।

प्रश्न 40.
बम्बई के विक्टोरिया टर्मिनस के निर्माण में किस स्थापत्य शैली का प्रयोग किया गया?
उत्तर:
विक्टोरिया टर्मिनस के निर्माण में नव-गॉथिक शैली का प्रयोग किया गया। यह ग्रेट इंडियन पेनिन्स्युलर रेलवे कंपनी का स्टेशन और मुख्यालय हुआ करता था।

प्रश्न 41.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने फोर्ट विलियम की स्थापना कहाँ की? इसकी प्रमुख विशेषता लिखो।
उत्तर:
फोर्ट विलियम किला कलकत्ता में बनवाया गया। इसके चारों ओर सुरक्षा की दृष्टि से एक विशाल खाली मैदान छोड़ा गया, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गेरार मठ’ कहा जाता है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
छोटे शहर या कस्बे गाँवों से किस प्रकार भिन्न थे?
उत्तर:
कस्बे एक छोटे शहर के रूप में गाँव से अलग होते थे। मुगल काल में कस्बा सामान्यतया किसी स्थानीय विशिष्ट व्यक्ति का केंद्र होता था। इसमें एक छोटा स्थायी बाज़ार होता था, जिसे गंज कहते थे। यह बाजार विशिष्ट परिवारों एवं सेना के लिए कपड़ा, फल, सब्जी तथा दूध इत्यादि सामग्री उपलब्ध करवाता था। गाँवों में रहने वाले लोगों का जीवन-निर्वाह मुख्यतः कृषि, पशुपालन और जंगल पर निर्भर था। दूसरी ओर, शहरी लोगों के आजीविका के साधन अलग थे। उनकी जीवन-शैली गाँव से अलग थी। शहरों में मुख्य तौर पर शासक, प्रशासक तथा शिल्पकार व व्यापारी रहते थे। शहरी शिल्पकार किसी विशिष्ट कला में निपुण होते थे, क्योंकि वे प्रायः संपन्न और सत्ताधारी वर्गों की जरूरतों को पूरा करते थे। शहर में रहने वाले सभी लोगों के लिए खाद्यान्न सदैव गाँव से ही आता था।

प्रश्न 2.
औपनिवेशिक काल से पहले शहर व गाँव में संबंध स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शहर और गाँव पूर्ण रूप से पृथक् नहीं थे। उनमें संबंध रहते थे। शहर के लोगों के लिए अनाज गाँव से ही आता था। किसान अपने उत्पाद या तो नकद भूमि कर चुकाने के लिए व्यापारियों को बेचते थे या फिर फसल के हिस्से के रूप में देते थे। दोनों ही रूपों में उनके उत्पादन का एक भाग शहरों की ओर बहता था। प्रायः यह बहाव एक तरफा ही रहता था। शहर से गाँव की ओर धन व वस्तुओं का बहाव बहुत ही कम था, तथापि फेरी वाले और कुछ छोटे व्यापारी कस्बों से सामान गाँवों में बेचने के लिए जाते थे। इससे बाजार का विस्तार और उपभोग की नई शैलियों का सृजन होता था। ग्रामीण लोगों का शहरों से संपर्क कई तरीकों से रहता था। शहरों में भी ग्रामीण लोगों का आना-जाना बना रहता था। अकाल आदि के समय प्रायः लोग जीवित रहने की उम्मीद में शहर की ओर आते थे। कई बार आक्रमणों के समय भी सुरक्षा के लिए गाँव के लोग शहरों में शरण लेते थे। तीर्थ यात्रा भी ग्रामीण लोगों का संबंध शहरों से जोड़ती थी। तीर्थ यात्री बहुत-से शहरों और कस्बों से गुजरते हुए जाते थे।

प्रश्न 3.
भारत में 16वीं और 11वीं सदी के शहर की आंतरिक व्यवस्था पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
16वीं तथा 17वीं शताब्दी के मध्यकालीन शहर औपनिवेशिक शहरों से भिन्न थे। इन शहरों में मुगल सत्ताधारी वर्ग का वर्चस्व होता था। प्रशासकों और अमीरों के साथ-साथ बड़ी संख्या में उनकी सेना रहती थी। अतः इन लोगों के लिए कुछ विशिष्ट सेवाओं की जरूरत पड़ती थी। शिल्पकार अमीर वर्ग के लिए विशिष्ट हस्तशिल्प तैयार करते थे। शहरों में रहने वाले प्रत्येक वर्ग, जाति व समुदाय से यह अपेक्षा रहती थी कि हर व्यक्ति अपने स्थान व कर्तव्य को समझे और उसके अनुरूप कार्य करे। शहर की सामाजिक व वैधानिक व्यवस्था को बनाए रखने का काम शहर के कोतवाल का होता था। शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए उसके पास एक सैनिक टुकड़ी होती थी। जरूरत पड़ने पर वह फौज़दार (मुगल सैन्य अधिकारी) से भी सैनिक सहायता प्राप्त कर सकता था।

शहर में शांति व्यवस्था बनाए रखने के अतिरिक्त कोतवाल सामाजिक-नैतिक और व्यावसायिक गतिविधियों पर भी नज़र रखता था। वह शहर में जल-आपूर्ति की देखभाल करता था। वह जन्म-मृत्यु संबंधी शहर का रिकॉर्ड रखता था। वह माप-तोल की व्यवस्था का भी निरीक्षण करता था। इसके अतिरिक्त वह शहर में आने-जाने वाले लोगों पर नज़र रखता था।
स्पष्ट है कि मुगल सत्ता की शहर की आंतरिक व्यवस्था को बनाए रखने में वह एक महत्त्वपूर्ण प्रतिनिधि था।

प्रश्न 4.
औपनिवेशिक काल में शहरों की जाँच-पड़ताल में जनगणना के आँकड़े किस सीमा तक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं? स्पष्ट करें।
उत्तर:
सन् 1872 में भारत में अंग्रेज़ सरकार ने पहली अखिल भारतीय जनगणना करवाने का प्रयास किया। तत्पश्चात् सन् 1881 से हर दस साल के बाद दशकीय जनगणना करवाई जाती रही। जनगणना के ये आँकड़े शहरीकरण अथवा उसके रुझानों को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं। इनसे निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है

  1. इनसे लोगों के व्यवसायों के अनुरूप जानकारी प्राप्त होती है।
  2. इनसे आयु, लिंग व जाति संबंधी उपलब्ध सूचनाएँ सामाजिक इतिहास लेखन की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं।
  3. शहरी लोगों के जीवन-स्तर, विभिन्न बीमारियों के दुष्प्रभावों तथा उनसे प्राप्त होने वाले स्रोतों के आँकड़े मिल सकते हैं।

इस प्रकार जनसंख्या के आँकड़ों से हमें महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ मिल सकती हैं, लेकिन कई बार सटीकता का भ्रम पैदा हो जाता है अर्थात् लगता है कि ये सभी आँकड़े शहर की बिल्कुल सटीक जानकारी उपलब्ध करवा रहे हैं। यहाँ इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि उपलब्ध आँकड़े में भी गलती की संभावना होती है। अतः इतिहासकार को पता लगाना चाहिए कि आँकड़े क्यों और किसने उपलब्ध करवाए हैं। साथ ही उसे जनगणना के तरीके को भी समझना चाहिए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 5.
ब्रिटिश अधिकारियों ने शहरों व देहातों के मानचित्र बनाने पर जोर क्यों दिया?
उत्तर:
ब्रिटिश अधिकारी यह मानते थे कि किसी स्थान की बनावट व भू-दृश्य को समझने के लिए मानचित्र आवश्यक होते हैं। इसके लिए कंपनी की सेवा में मानचित्र विशेषज्ञ नियुक्त किए जाते थे। वो वैज्ञानिक औजारों की सहायता से बड़ी सावधानीपूर्वक मानचित्र तैयार करते थे। भारत में ब्रिटिश सरकार द्वारा सन् 1878 में लॉर्ड लिटन (गवर्नर-जनरल) के काल में सर्वे ऑफ इण्डिया’ (Survey of India) की स्थापना की गई। बढ़ते हुए शहरों की विकास योजना तैयार करने तथा व्यापारिक संभावनों का पता लगाने के लिए भी अंग्रेज़ शासकों के लिए मानचित्र महत्त्वपूर्ण थे। इन मानचित्रों में घाट, तालाब, हरियाली के स्थान, नदी-नाले, आवास-बस्तियाँ, बाज़ार, प्रशासनिक कार्यालय, शिक्षण संस्थाएँ, अस्पताल इत्यादि विभिन्न तरह की जानकारियाँ चिह्नित की जाती थीं। निःसंदेह ऐसे मानचित्र औपनिवेशिक शहरों को समझाने के लिए काफी महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन साथ ही हमें ब्रिटिश शासकों की सोच में भेदभाव की नीति भी स्पष्ट हो जाती है। उदाहरण के लिए शहर में गरीब बस्तियों को चिह्नित ही नहीं किया जाता था, क्योंकि शासकों के लिए उनका महत्त्व ही नहीं था।

प्रश्न 6.
औपनिवेशिक शहरों के उदय पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
अंग्रेज़ों के राजनीतिक नियंत्रण और आर्थिक नीतियों के चलते कलकत्ता, बम्बई और मद्रास जैसे नए शहरों का उदय हुआ। कुछ वर्षों में ही ये विशाल शहर बन गए। ये शहर शुरु में भारतीय सूती कपड़े, मसाले व अन्य निर्यात उत्पादों के संग्रह डिपो थे। अर्थात् इन बंदरगाह नगरों पर बने गोदामों में भारत के विभिन्न भागों से निर्यात-उत्पादों को लाकर एकत्रित किया जाता था ताकि उन्हें ब्रिटेन भेजा जा सके। इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति ने व्यापार के इस प्रवाह को बदल दिया। अब भारत कच्चे माल का निर्यातक व पक्के माल का आयातक देश बन गया। अर्थात् भारत से रूई, जूट, खाल आदि वस्तुओं का निर्यात होने लगा और ब्रिटेन से कपड़ा भारत में आयात होने लगा। व्यापार के इस नए प्रवाह के कारण कलकत्ता, बम्बई व मद्रास जैसे शहरों में ब्रिटेन में बनी वस्तुएँ उतरने लगी और वे रेलवे के माध्यम से देश के विभिन्न अंचलों में पहुंचने लगीं। दूसरी ओर, कच्चा माल और अनाज अब इन बंदरगाह शहरों की ओर बहने लगा। इसी प्रकार रेलवे स्टेशनों के आस-पास शहर बने। पर्वतीय क्षेत्र में हिल स्टेशन विकसित हुए।

प्रश्न 7.
भारत में शहरों को रेलवे नेटवर्क’ ने किस प्रकार प्रभावित किया?
उत्तर:
भारत में पहली बार 1853 ई० में रेलगाड़ी बम्बई से ठाणे के बीच चलाई गई। इसके बाद तेजी से रेलवे नेटवर्क का विस्तार किया गया। 19वीं सदी के 7वें दशक में कुल 1300 किलोमीटर रेलमार्ग थे जो 1905 तक बढ़कर 45000 किलोमीटर हो गया था। रेलवे नेटवर्क के इस विस्तार ने भारत में बहुत-से शहरों की कायापलट कर दी। अनाज तथा कपास व जूट इत्यादि कच्चे माल को रेलगाड़ी बंदरगाह नगरों तक लाने लगी। इंग्लैंड से आयातित तैयार माल को दूर-दराज के प्रदेशों तक पहुँचाने लगी। इस

हरेक रेलवे स्टेशन ‘मंडी’ (छोटा बाजार) बनने लगा था। वो आयातित वस्तुओं के वितरण तथा कच्चे माल के संग्रह केंद्र बन गए। इसके परिणामस्वरूप नदियों के किनारे बसे तथा पुराने मार्गों पर पड़ने वाले शहरों का महत्त्व कम होता गया। रेल के कारण आर्थिक गतिविधियों का केंद्र पुराने शहरों से दूर होता गया जो उनके पतन का कारण था। उदाहरण के लिए गंगा के किनारे पर स्थित मिर्जापुर पहले कपास और सूती वस्त्रों के संग्रह का केंद्र होता था परंतु ‘रेलवे नेटवर्क’ के बाद यह शहर अपनी पहचान खोने लगा था।
रेलवे विस्तार के साथ रेलवे कॉलोनियाँ और लोको (रेलवे वर्कशॉप) स्थापित हुए। इससे भी कई नए रेलवे शहर, जैसे कि बरेली, जमालपुर, वाल्टेयर आदि अस्तित्व में आए। पहाड़ी क्षेत्रों में रेल जाने से पर्वतीय पर्यटन शहरों का उदय हुआ।

प्रश्न 8.
भारतीय उद्योगों के प्रति औपनिवेशिक सरकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट करें।
उत्तर:
(1) ब्रिटिश सरकार ने नवोदित भारतीय उद्योगों की कोई आर्थिक सहायता नहीं की। उधर बैंकों, वित्तीय कंपनियों तथा बीमा कंपनियों में विदेशी पूँजी का नियंत्रण होने के कारण भारतीय उद्योगपतियों को अंग्रेज़ उद्योगपतियों की तुलना में ऊँची दर पर ब्याज का भुगतान करना पड़ता था।

(2) सरकार की ओर से नवोदित भारतीय उद्योगों को कोई सहायता एवं संरक्षण नहीं मिला। बिना सरकारी संरक्षण के किसी भी देश में औद्योगीकरण संभव नहीं हुआ था।

(3) भारतीय उद्योगपतियों को सहायता पहुँचाने की अपेक्षा सरकार ने विदेशी प्रतियोगियों की सहायता करके भारतीय उद्योग को हानि पहुँचाई। उदाहरण के लिए, रेल के भाड़ों में भेदभाव रखा गया। आंतरिक रेलमार्गों पर माल भाड़े की दर अधिक रखी गई थी।

(4) मुक्त व्यापार नीति (Free Trade Policy) से भी भारत में नवोदित उद्योगों को क्षति पहुँची। उन्हें सरकार की ओर से कोई सहारा भी नहीं मिला।

(5) ब्रिटिश सरकार ने भारत में तकनीकी शिक्षा तथा आधारभूत उद्योगों (इस्पात, मशीन निर्माण, रसायन, तेल और धातु कर्म आदि) को निरुत्साहित किया। परिणामस्वरूप भारतीय उद्योगपतियों को मशीनों के लिए विकसित पूँजीपति देशों पर निर्भर होना पड़ता था। कुशल इंजीनियरों एवं विशेषज्ञों के लिए भी भारतीयों को विकसित देशों पर ही निर्भर रहना पड़ता था।

प्रश्न 9.
सन् 1857 के विद्रोह ने शहरी परिवेश को कैसे प्रभावित किया?
उत्तर:
सन् 1857 के जन-विद्रोह ने भारत में शहरी परिवेश को प्रभावित किया। 1857 के विद्रोह से अंग्रेज़ आतंकित हो गए थे। उन्हें सदैव विद्रोह की आशंका दिखती थी। इसलिए उन्होंने भविष्य में विद्रोह की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए ‘देशियों’ यानी भारतीयों से अलग दूर सुरक्षित बस्तियों में रहने की नीति अपनाई। इस दृष्टि से उन्होंने शहरों की बनावट में निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए
(1) पुराने शहरों अथवा कस्बों के साथ लगते खेतों और चरागाहों को साफ करवाकर नए शहरी क्षेत्र विकसित किए गए। इन्हें ‘सिविल लाइंस’ का नाम दिया गया।

(2) “सिविल लाइंस’ में केवल गोरे लोग निवास करते थे।

(3) सैनिक छावनियों का निर्माण व्यवस्थित तरीके से सुरक्षित स्थानों के रूप में किया गया। इनमें बड़े-बड़े बगीचों में विशाल बंगले, बैरकें, परेड मैदान तथा चर्च आदि बनवाए गए।

(4) छावनियों में कमान ‘गोरे’ अधिकारियों को सौंपी गई। इस प्रकार ये छावनियाँ यूरोपियों के लिए सुरक्षित आश्रय-स्थल शहरी जीवन के मॉडल भी थे।

प्रश्न 10.
औपनिवेशिक काल में पर्वतीय शहर क्यों विकसित हुए?
उत्तर:
पर्वतीय शहर शुरु में सैनिक छावनियाँ बनीं, फिर अधिकारियों के आवास-स्थल और अन्ततः पर्वतीय पर्यटन स्थलों के तौर पर विकसित हुए। प्रारंभ में इनकी स्थापना और बसावट ब्रिटिश सेना की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए की गई थी। इन पर्वतीय शहरों का रणनीतिक दृष्टि से काफी महत्त्व था। विशेषतया यूरोपीय अधिकारियों व सैनिकों को ठहराने, सीमा की सुरक्षा करने तथा शत्रु पर आक्रमण करने के लिए इन शहरों का उपयोग किया गया। धीरे-धीरे ये पर्वतीय शहर ऐसे स्थान बन गए जहाँ सैनिकों को आराम व चिकित्सा के लिए भेजा जाने लगा। वास्तविकता यह थी कि अंग्रेज़ों का ध्यान सेना की सुरक्षा पर था। सैनिकों को बीमारियों से बचाने के लिए पर्वतीय शहरों को भी एक तरह से नई छावनियों के तौर पर ही विकसित किया गया।

पहाड़ी शहरों की जलवायु स्वास्थ्यवर्द्धक थी। इसलिए गर्मियों के दिनों में अंग्रेज़ अपनी राजधानी शिमला बनाते थे। सन् 1864 में गवर्नर-जनरल जॉन लारेंस ने स्थायी रूप से अपने काउंसिल कार्यालय को शिमला में स्थापित कर लिया था। प्रधान सेनापति का आवास भी यहीं बनाया गया। इसके अतिरिक्त अन्य बहुत-से अंग्रेज़ व यूरोपीय अधिकारियों ने अपने निवास स्थल पर्वतीय शहरों पर बनाने शुरु किए। स्पष्ट है कि पर्वतीय शहरों में गोरे लोगों को पश्चिमी सांस्कृतिक जीवन जीने का अवसर मिला। रेलवे नेटवर्क से जोड़ दिए जाने पर ये शहर सम्पन्न वर्गीय भारतीयों के लिए भी महत्त्वपूर्ण हो गए। महाराजा, नवाब, व्यापारी तथा अन्य मध्यवर्गीय लोग इन पर्वतीय शहरों पर पर्यटन के लिए जाने लगे।

प्रश्न 11.
स्थापत्य शैलियाँ ऐतिहासिक दृष्टि से किस प्रकार महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर:
स्थापत्य शैलियाँ अथवा इमारतें हमारे विचारों को आकार देने में सहायक होती हैं। इतिहास लेखन में इनका बहुत महत्त्व है। इनसे निम्नलिखित बातों का पता चलता है

1. सौंदर्य आदर्शों की अनुभूति स्थापत्य शैलियों और इमारतों से तात्कालिक सौंदर्यात्मक आदर्शों की अनुभूति होती है। औपनिवेशिक शासक अपने इस सौंदर्यात्मक आदर्शों के माध्यम से भी अपनी श्रेष्ठता की भावना को व्यक्त करते थे।

2. सत्ता प्रभुत्व की अभिव्यक्ति इमारतों में प्रभुत्व की भावना भी निहित होती है। यह हमें उन लोगों की सोच व दृष्टि के बारे में बताती हैं जो उन्हें बनाने वाले थे। इमारतों के माध्यम से सत्ता अपने प्रभुत्व का अहसास करवाती है।

3. नई स्थापत्य शैलियों का विकास-पश्चिमी स्थापत्य शैलियों से प्रभावित होकर बहुत-से सम्पन्न भारतीयों ने अपने भवनों के निर्माण में यूरोपीय शैलियों को अपनाया।

4. राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पहचान-19वीं सदी के अन्त तक पहुँचते-पहुँचते औपनिवेशिक आदर्शों से अलग हमें राष्ट्रीय व क्षेत्रीयता की पहचान कराने वाली स्थापत्य शैलियों के दर्शन होने लगते हैं। यही वह समय था जब राष्ट्रीय विचारधारा भारत में अपना स्वरूप ग्रहण कर रही थी।

निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि हम उस युग की स्थापत्य शैलियों के माध्यम से राजनीतिक व सांस्कृतिक टकरावों को समझ सकते हैं।

प्रश्न 12.
औपनिवेशिक शहरों (नए शहरों) में सामाजिक जीवन कैसा था?
उत्तर:
नए शहरों का सामाजिक जीवन पहले के शहरों से बिल्कुल अलग था। शहरों में नए सामाजिक वर्ग सामने आ रहे थे

(1) शहरों में मध्यम वर्ग शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउटेंट्स आदि थे। शहरों में मेहनतकश कामगारों का एक नया वर्ग उभर रहा था।

(2) यातायात के साधन; जैसे घोड़ागाड़ी, ट्रामों और बसों के आने से लोगों का शहरों में आना-जाना आसान हो गया। घर से दफ्तर या फैक्ट्री जाना एक नए किस्म के अनुभव होने लगे। यातायात सुविधाओं के कारण लोग शहरों के केंद्र से दूर जाकर बस सकते थे।

(3) शहरों में औरतों के लिए भी नए अवसर थे। सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी थी, यद्यपि सार्वजनिक स्थानों पर औरतों का काम करना अच्छा नहीं मानते थे। उन पर कार्टूनों के माध्यम से व्यंग्य किए गए।

(4) शहरों में कामगार लोगों का जीवन आसान नहीं था। आजीविका की तालाश में लोग गाँवों से शहरों की ओर आ रहे थे। इनमें से अधिकांश पुरुष थे। शहरों में इनके लिए स्थायी नौकरियाँ नहीं थीं। इनके पास पर्याप्त बुनियादी सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं थीं।

प्रश्न 13.
मद्रास शहर की बसावट में अंग्रेजों की जातीय श्रेष्ठता साफ झलकती है, कैसे? स्पष्ट करें।
उत्तर:
मद्रास शहर का विकास निःसन्देह अंग्रेजों की जातीय श्रेष्ठता को दर्शाता है
(1) मद्रास में अंग्रेज़ों ने फोर्ट सेंट जॉर्ज किले का निर्माण करवाया। इस किले में अधिकतर यूरोपीय लोग रहते थे। इसीलिए यह क्षेत्र व्हाइट टाउन के रूप में जाना गया।

(2) किले के भीतर रहने का आधार रंग और धर्म था। भारतीयों को इस क्षेत्र में रहने की अनुमति नहीं थी।

(3) यूरोपीय ईसाई होने के कारण पुर्तगालियों, डचों इत्यादि को व्हाइट टाउन में रहने की छूट थी।

(4) संख्या में कम.होते हुए भी अंग्रेज़ शासक थे। शहर का विकास भी इन्हीं लोगों की जरूरतों व सुविधाओं के अनुरूप ही किया जा रहा था।

(5) व्हाइट टाउन से बिल्कुल अलग ब्लैक टाउन बसाया गया, जो किला-क्षेत्र से दूर उत्तर दिशा में जाकर बसाया गया।

(6) ब्लैक टाउन पुराने भारतीय शहरों के समान ही था। इसमें मन्दिर और बाज़ार के आस-पास रिहायशी मकान बनाए गए थे। इसमें तंग और आड़ी-टेढ़ी गलियाँ थीं।

(7) अलग-अलग जातियों के लोग विशेष मोहल्लों में रहते थे।

प्रश्न 14.
बंगाल में अंग्रेज़ों ने अपने शासन के आरंभ में ही नगर-नियोजन के कार्य को अपने हाथों में क्यों ले लिया?
उत्तर:
बंगाल में अंग्रेज़ों द्वारा नगर-नियोजन का काम अपने हाथों में लेने के कारण इस प्रकार थे

(1) बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला ने 1765 ई० में कलकत्ता पर आक्रमण करके किले पर अधिकार कर लिया जिसे अंग्रेज़ माल गोदाम के रूप में प्रयोग करते थे। सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अंग्रेज़ों ने फोर्ट विलियम का निर्माण करवाया और इसके इर्द-गिर्द एक विशाल खाली मैदान छोड़ा गया।

(2) लॉर्ड वेलेज़्ली ने 1803 ई० में गवर्नमेंट हाउस का निर्माण करवाया जो अंग्रेज़ी सत्ता का प्रतीक था। इसके अतिरिक्त भारतीय जनसंख्या वाले इलाके संकरी गलियों, गंदे तालाबों तथा जल-निकासी की खस्ता हालत के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक थे। वेलेज़्ली ने एक आदेश जारी किया जिसके अनुसार बाजारों, घाटों, कब्रिस्तानों एवं चर्मशोधन इकाइयों को शहर से हटा दिया गया। शहर के सफाई प्रबंध की ओर विशेष ध्यान दिया गया।

प्रश्न 15.
भारत के औपनिवेशिक शहर क्या सही अर्थों में औद्योगिक शहर’ बन सके? स्पष्ट करें।
उत्तर:
रेलवे नेटवर्क’ के माध्यम से भारत में आधुनिक औद्योगिक विकास के अंकुर फूटने लगे। इन शहरों में भारत के विभिन्न ग्रामीण अंचलों से कच्चा माल पहुँचता था। आजीविका की तलाश में कामगार लोग इन शहरों में आ रहे थे अर्थात् यहाँ कच्चा माल भी था और सस्ता श्रम भी उपलब्ध था। ऐसी स्थिति में भारतीय व्यापारियों व उद्यमियों ने कुछ उद्योग लगाने शुरू किए। उदाहरण के लिए, 1853 ई० में बम्बई में कावसजी नाना ने पहली सूती कपड़ा मिल लगाई। भारत में 1905 में 206 सूती कपड़े की मिलें थीं। कलकत्ता के आस-पास जूट मिलें लगाई गईं।

अंग्रेज़ी राज़ के दौरान भारत में औद्योगिक विकास की शुरुआत तो हुई, लेकिन यह विकास बहुत ही धीमा और सीमित रहा। पक्षपातपूर्ण संरक्षणवादी नीतियों ने औद्योगिक विकास को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दिया। वास्तव में कलकत्ता, बम्बई व मद्रास जैसे विशाल शहर मैनचेस्टर या लंकाशायर ब्रिटिश औद्योगिक शहरों की तरह औद्योगिक नगर नहीं बन सके। इनमें रहने वाले अधिकांश मेहनत करने वाली आबादी औद्योगिक मजदूरों की नहीं थी, बल्कि उस श्रेणी में आती थी, जिसे अर्थशास्त्री तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) अर्थात् सेवा-क्षेत्र कहते हैं। इसी चरित्र के कारण इन्हें मुख्यतया औपनिवेशिक शहर कहा गया है।

प्रश्न 16.
भवन निर्माण की इंडो-सारासेनिक शैली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
इण्डो शब्द भारतीय का परिचायक था। सारासेन शब्द का प्रयोग यूरोपीय लोगों द्वारा मुसलमानों के लिए किया जाता था। इण्डो-सारासेनिक शैली भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य शैलियों के तत्त्वों का मिश्रण थी। यह शैली मध्यकालीन भारतीय इमारतों की निर्माण-शैली से प्रभावित थी। मध्यकालीन इमारतों के गुम्बदों, छतरियों, जालियों तथा मेहराबों ने विशेष रूप से अंग्रेज़ शासकों को आकर्षित किया। इस शैली को अपनाकर अंग्रेज़ शासक स्वयं को भारत का वैध तथा स्वाभाविक शासक भी सिद्ध करना चाहते थे। 1911 ई० में इंग्लैण्ड का राजा जॉर्ज पंचम व उसकी पत्नी मैरी भारत में आए। इस अवसर पर उनके स्वागत के लिए ‘गेट वे ऑफ इण्डिया’ का निर्माण करवाया गया। यह परम्परागत गुज़राती शैली का बेहतर उदाहरण है। इसी समय में, जमशेदजी टाटा ने इस शैली में ताजमहल होटल बनवाया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 Img 3

प्रश्न 17.
नव-शास्त्रीय या नियोक्लासिकल शैली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नव-शास्त्रीय शैली का संबंध प्राचीन रोमन भवन-निर्माण शैली से था। अंग्रेज़ों ने इस शैली को विशेष तौर पर भारत के अनुकूल माना। इस शैली में बड़े-बड़े स्तम्भों का निर्माण रेखा-गणितीय संरचनाओं के आधार पर किया जाता था। भूमध्यसागरीय क्षेत्रों में पैदा हुई इस शैली को भारत के उष्ण-कटिबंधीय जलवायु के अनुकूल भी माना गया। बम्बई का टाउन हाल (1833 ई०) इसी शैली के आधार पर बनाया गया। बहुत सारी व्यावसायिक इमारतें भी इस आधार पर बनाई गईं। इन इमारतों में एल्फिस्टन सर्कल की इमारतें मुख्य थीं।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 Img 4

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
औपनिवेशिक शहरों का स्वरूप किस प्रकार का था? वर्णन करें।
उत्तर:
16वीं व 17वीं सदी के शहरों की तुलना में इन शहरों की भौतिक संरचना, परिवेश और सामाजिक जीवन भिन्न था। यह अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक संस्कृति को प्रतिबिम्बित कर रहे थे। इनमें आधुनिकता परिलक्षित हुई, कहने का अभिप्राय है कि ये आधुनिक औद्योगिक शहर नहीं बन पाए बल्कि औपनिवेशिक शहरों के तौर पर ही विकसित हुए उनका स्वरूप निम्नलिखित प्रकार से था- 1. किलेबंद बंदरगाह नगर (Fortified Port Cities)-नए शहरों में मद्रास, कलकत्ता और बम्बई सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे। इन्हें ‘प्रेजीडेंसी शहर’ भी कहा जाता था। इनका विकास ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की व्यापारिक गतिविधियों के चलते उपयोगी बंदरगाहों और संग्रह केंद्रों के रूप में हुआ। 18वीं सदी के अंत तक पहुँचते-पहुँचते ये बड़े नगरों के तौर पर सुस्थापित हो चुके थे। इनमें आकर बसने वाले अधिकांश भारतीय अंग्रेज़ों की वाणिज्यिक गतिविधियों में सहायक बनकर आजीविका कमाने वाले थे। विशेषतः वे निर्यात होने वाले उत्पादों के संग्रह में सहायक थे। बंदरगाह शहरों की बस्तियों में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने कारखाने’ यानी वाणिज्यिक कार्यालय स्थापित कर लिए थे।

यह व्यापारिक कंपनियों के बीच व्यापारिक मुनाफे के लिए प्रतिस्पर्धा का दौर था, जो कई बार तीखे संघर्षों में बदल जाती थी। इसलिए अंग्रेज़ों ने अपनी व्यापारिक बस्तियों व ‘कारखानों’ की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इनकी किलेबंदी करवाई। मद्रास में फोर्ट सेंट जॉर्ज, कलकत्ता में फोर्ट विलियम और इसी प्रकार बम्बई में भी दुर्ग बनवाया गया। इन किलों में वाणिज्यिक कार्यालय थे तथा ब्रिटिश लोगों के रहने के लिए निवास थे।

2. नगर संरचना में नस्ली भेदभाव (Racial Differentiation in Towns Structure)-अंग्रेज़ लोग, जैसा कि बताया गया है, दुर्गों के अंदर बनी बस्तियों में रहते थे। जबकि भारतीय व्यापारी, कारीगर और मज़दूर इन किलों से बाहर बनी अलग बस्तियों में रहते थे। अलग रहने की यह नीति शुरू से ही अपनाई गई थी। अंग्रेज़ों और भारतीयों के लिए अलग-अलग मकान (क्वार्टस) बनाए गए थे। सरकारी रिकॉर्डस में भारतीयों की बस्ती को ‘ब्लैक टाउन’ (काला शहर) तथा अंग्रेजों की बस्ती को ‘व्हाइट टाउन’ यानी गोरा शहर बताया गया है। इस प्रकार नए शहरों की संरचना में नस्ल आधारित भेदभाव शुरू से ही परिलक्षित हुआ। यह उस समय और भी तीखा हो गया जब अंग्रेज़ों का राजनीतिक नियंत्रण स्थापित हो गया।

3. सेवाओं के केंद्र (Centre of Tertiary Sector)-19वीं सदी में इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्रांति के साथ-साथ इन शहरों में नए बदलाव नज़र आए। रेलवे नेटवर्क’ के माध्यम से ये शहर भारत के दूर-दराज के अंचलों से जुड़ गए। धीरे-धीरे इनमें आधुनिक औद्योगिक विकास के अंकुर फूटने लगे। इन शहरों में भारत के विभिन्न ग्रामीण अंचलों से कच्चा माल पहुँचता था। आजीविका की तलाश में कामगार लोग इन शहरों में आ रहे थे अर्थात् यहाँ कच्चा माल भी था और मेहनत करने वाले लोग यानी सस्ता श्रम भी उपलब्ध था। अब उद्योग लगाने के लिए उद्यमी और पूँजी की जरूरत थी। ऐसी स्थिति में उन भारतीय व्यापारियों व उद्यमियों ने कुछ उद्योग लगाने शुरू किए जिनके पास कुछ पूँजी एकत्रित हो चुकी थी। उदाहरण के लिए 1853 में बम्बई में कावसजी नाना ने पहली सूती कपड़ा मिल लगाई। भारत में 1905 में 206 सूती कपड़े की मिलें थीं। कलकत्ता के आस-पास जूट मिलें लगाई गईं। इनमें ब्रिटिश उद्योगपतियों ने भी अपनी पूँजी लगाई। सन् 1901 में भारत में 40 जूट मिलें थीं। पहली जूट मिल 1855 ई० में कलकत्ता के पास रिशरा में स्थापित की गई थी।

निःसंदेह अंग्रेज़ी राज़ के दौरान भारत में औद्योगिक विकास की शुरुआत हुई। लेकिन यह विकास बहुत ही धीमा और सीमित रहा। इसका कारण पक्षपातपूर्ण संरक्षणवादी नीतियाँ थीं। इन नीतियों ने औद्योगिक विकास को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दिया। फैक्ट्री उत्पादन शहरी अर्थव्यवस्था का आधार नहीं बन सका। वास्तव में कलकत्ता, बम्बई व मद्रास जैसे विशाल शहर मैनचेस्टर या लंकाशायर ब्रिटिश औद्योगिक शहरों की तरह औद्योगिक नगर नहीं बन सके। इनमें रहने वाले अधिकांश मेहनत करने वाली आबादी औद्योगिक मजदूरों की नहीं थी, बल्कि उस श्रेणी में आती थी, जिसे अर्थशास्त्री तृतीयक क्षेत्र (Tertiary Sector) अर्थात् सेवा-क्षेत्र कहते हैं। आर्थिक विकास के इसी चरित्र के कारण इन्हें मुख्यतः औपनिवेशिक शहर कहा गया है। इनके विकास से समूचे देश की अर्थव्यवस्था में भी आधुनिकीकरण की दिशा में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन नहीं हुआ।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य

प्रश्न 2.
नए शहरों में उभरते सामाजिक जीवन पर नोट लिखें।
उत्तर:
नए शहरों का सामाजिक जीवन पहले के शहरों से बिल्कुल अलग था। इसमें औपनिवेशिक प्रभुत्व के साथ आधुनिकता झलकती थी। जिन्दगी की गति बहुत तेज़ थी। सामान्य भारतीय इन शहरों में भाग-दौड़ और लोगों के व्यवहार में आ रहे परिवर्तनों से आश्चर्यचकित थे। यहाँ हम नए सामाजिक वर्गों के जीवन को रेखांकित कर रहे हैं

1. मध्य वर्ग (Middle Class)-नए शहर मध्य वर्ग के केन्द्र थे। इस वर्ग में शिक्षक, वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, क्लर्क तथा अकाउंटेंट्स इत्यादि थे। इन शहरों में इस वर्ग के लोगों की माँग निरन्तर बढ़ती जा रही थी। मध्य वर्ग एक नया सामाजिक समूह था जिसके लिए पुरानी पहचान अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं रही थी। इन नए शहरों में पुराने शहरों वाला परस्पर मिलने-जुलने का अहसास खत्म हो चुका था, लेकिन साथ ही मिलने-जुलने के नए स्थल; जैसे कि सार्वजनिक पार्क, टाउन हॉल, रंगशाला और 20वीं सदी में सिनेमा हॉल इत्यादि बन चुके थे। यह स्थल मध्यवर्गीय लोगों के जीवन का हिस्सा बनने लगे।

मध्य वर्ग, समाज में सबसे जागृत वर्ग के तौर पर विकसित हुआ। यह शिक्षित वर्ग था। स्कूल, कॉलेज और पुस्तकालय जैसे नए शिक्षण संस्थान इनकी पहुँच में थे। समाचार-पत्र और पत्रिकाओं में यह लोग अपना मत व्यक्त करते थे। इस वर्ग में से विद्वान लोग स्वयं समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ निकालते थे। इससे वाद-विवाद और चर्चा का नया दायरा उत्पन्न हुआ। सामाजिक और राष्ट्रीय महत्त्व के विषय चर्चा के केन्द्र-बिन्दु बने। राष्ट्रीय-चेतना को प्रसारित करने में इस वर्ग के लोगों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुराने रीति-रिवाज़ों, कर्म-काण्डों और जीवन के तौर-तरीकों पर सवाल उठाए गए। 19वीं सदी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलन उठ खड़ा हुआ। स्पष्ट है कि मध्य वर्ग अपनी नई पहचान और नई भूमिकाओं के साथ अस्तित्व में आया।

2. महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन (Changes in the Condition of Women)-नए शहरों में नए अर्थतंत्र, यातायात व संचार के साधनों के विकास से औरतों के लिए नए अवसर उत्पन्न हुए। फलतः सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की उपस्थिति बढ़ने लगी। वे घरों में नौकरानी, फैक्टरी में मजदूर, शिक्षिका रंग-कर्मी तथा फिल्मों में कार्य करती हुई दिखाई देने लगीं। उल्लेखनीय है कि सार्वजनिक स्थानों पर कामकाज करने वाली महिलाओं को सम्मानित दृष्टि से नहीं देखा जाता था। शिक्षित कामकाजी महिलाओं के ऊपर पेंटिंग और कार्टूनों के माध्यम से व्यंग्य किए गए। 19वीं सदी के अंतिम वर्षों में बनी कालीघट की पेंटिंग इसका एक उदाहरण है।

इसमें पुरुषों की बेचैनी दिखाई देती है कि कैसे एक नए जमाने की शिक्षित महिला एक जादूगरनी है, जो आदमी को भेड़ बनाकर वश में कर लेती है।
अतः स्पष्ट है कि सामाजिक बदलाव सहज रूप से नहीं हो रहे थे। रूढ़िवादी विचारों के लोग पुरानी परम्पराओं और व्यवस्था को बनाए रखने का पुरजोर समर्थन कर रहे थे। वे नहीं चाहते थे कि औरत पढ़-लिखकर काम करने के लिए सार्वजनिक स्थानों पर जाए। वे अभी भी औरत को घर की चारदीवारी के भीतर ही रखना चाहते थे। उन्हें यह डर था कि औरतों के शिक्षित होने से पूरी सामाजिक व्यवस्था ही खतरे में पड़ जाएगी। यहाँ तक कि औरतों की शिक्षा का समर्थन करने वाले समाज-सुधारक भी महिलाओं को अच्छी गृहिणी बनाने की बात कर रहे थे। वे भी उन्हें माँ और पत्नी की परम्परागत भूमिकाओं में ही देखना चाहते थे। उनका यह असंतोष परम्परागत पितृसत्तात्मक समाज को बनाए रखने का ही प्रयास था। दूसरी ओर, शिक्षित मध्यवर्गीय महिलाएँ पत्र-पत्रिकाओं, आत्म-कथाओं और पुस्तकों के माध्यम से स्वयं को अभिव्यक्त करने का प्रयास कर रही थीं।

3. कामगार लोग (Labouring People)-कामगार लोगों के लिए शहरी जीवन एक संघर्ष था। ये लोग इन नए शहरों की तड़क-भड़क से आकर्षित होकर आए थे या फिर आजीविका के नए अवसरों की तलाश में आए। आने वालों में अधिकांशतः पुरुष थे। इन कामगार लोगों के लिए शहर की महँगाई को देखते हुए अपने परिवार को साथ रख पाना आसान नहीं था। अतः बहुत-से लोग अपने परिवार को पीछे गाँव में ही छोड़कर आए थे। शहर में इनकी नौकरी स्थायी नहीं थी। वेतन कम था और खर्चे ज्यादा थे। खाना काफी महँगा था और मकान का किराया भी आमदनी को देखते हुए बहुत ज्यादा था।

इस प्रकार, मज़दूर यानी कामगार लोगों का जीवन गरीबी से पीड़ित था। ये सामान्यतः झोंपड़-पट्टी में रहते थे। इन्हें जीवन की बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी इन लोगों ने अपनी एक अलग जीवंत शहरी संस्कृति’ रच ली थी। वे धार्मिक त्योहारों, मेलों, स्वांगों तथा तमाशों इत्यादि में भाग लेते थे। ऐसे अवसरों पर वे अपने यूरोपीय और भारतीय स्वामियों पर प्रायः कटाक्ष और व्यंग्य करते हुए उनका मज़ाक उड़ाते थे।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 12 औपनिवेशिक शहर : नगर-योजना, स्थापत्य Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. अन्तिम मुगल बादशाह था
(A) औरंगजेब
(B) शाहजहाँ
(C) बहादुरशाह जफर
(D) जहांगीर
उत्तर:
(C) बहादुरशाह जफ़र

2. कानपुर में विद्रोहियों का नेता था
(A) शाहमल
(B) बिरजिस कद्र
(C) नाना साहिब
(D) बहादुरशाह जफ़र
उत्तर:
(C) नाना साहिब

3. वाजिद अलीशाह नवाब था
(A) दिल्ली का
(B) अवध का
(C) हैदराबाद का
(D) बंगाल का
उत्तर:
(B) अवध का

4. पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था
(A) नाना साहिब
(B) तात्या टोपे
(C) कुंवर सिंह
(D) रावतुला राम
उत्तर:
(A) नाना साहिब

5. बिहार में विद्रोहियों का नेता था
(A) कुंवर सिंह
(B) बख्त खाँ
(C) नाना साहिब
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) कुंवर सिंह

6. लॉर्ड डलहौजी ने धार्मिक अयोग्यता अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

7. लॉर्ड केनिंग ने सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम पारित किया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

8. ‘ये गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा। ये शब्द लॉर्ड डलहौजी ने किस रियासत के बारे में कहे?
(A) दिल्ली
(B) अवध
(C) बंगाल
(D) मद्रास
उत्तर:
(B) अवध

9. अवध का अन्तिम नवाब था
(A) शुजाउद्दौला
(B) सिराजुद्दौला
(C) वाजिद अली शाह
(D) बख्त खां
उत्तर:
(C) वाजिद अली शाह

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

10. अवध का अधिग्रहण किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1861 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

11. अवध में विद्रोह की शुरूआत हुई
(A) 10 मई, 1857 को
(B) 4 जून, 1857 को
(C) 8 अप्रैल, 1857 को
(D) 17 जून, 1857 को
उत्तर:
(B) 4 जून, 1857 को

12. अवध का औपचारिक अधिग्रहण के बाद वहाँ भू-राजस्व बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) स्थायी बन्दोबस्त
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त
(C) ठेकेदारी बन्दोबस्त
(D) महालवाड़ी बन्दोबस्त
उत्तर:
(B) एकमुश्त बन्दोबस्त

13. सिंहभूम में कोल आदिवासियों का नेता था
(A) गोनू
(B) बिरसा मुंडा
(C) सिधू मांझी
(D) बिरजिस कद्र
उत्तर:
(A) गोनू

14. मंगल पाण्डे को फाँसी हुई
(A) 8 अप्रैल, 1857 को
(B) 10 मई, 1857 को
(C) 31 मई, 1857 को
(D) 30 जून, 1858 को
उत्तर:
(A) 8 अप्रैल, 1857 को

15. मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर भेजा गया
(A) कलकत्ता
(B) रंगून
(C) बम्बई
(D) लंदन
उत्तर:
(B) रंगून

16. अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके भेजा गया
(A) रंगून
(B) लंदन
(C) मद्रास
(D) कलकत्ता
उत्तर:
(D) कलकत्ता

17. लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया था?
(A) तात्या टोपे
(B) लक्ष्मीबाई
(C) बेगम हजरत महल
(D) नाना साहिब
उत्तर:
(C) बेगम हजरत महल

18. 1857 ई० के विद्रोह का सबसे अधिक व्यापक रूप था
(A) पंजाब में
(B) दिल्ली में
(C) बंगाल में
(D) अवध में
उत्तर:
(D) अवध में

19. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने अवध पर पुनः अधिकार किया
(A) जून, 1857 में
(B) मार्च, 1858 में
(C) सितम्बर, 1858 में
(D) जनवरी, 1858 में
उत्तर:
(B) मार्च, 1858 में

20. विद्रोह के बाद अंग्रेज़ों ने दिल्ली पर नियन्त्रण स्थापित किया
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 17 जून, 1857 को
(C) 20 सितम्बर, 1857 को
(D) 8 अप्रैल, 1858 को
उत्तर:
(C) 20 सितम्बर, 1857 को

21. तात्या टोपे को फांसी हुई
(A) 4 जून, 1857 को
(B) 18 अप्रैल, 1859 को
(C) 10 मई, 1859 को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) 18 अप्रैल, 1859 को

22. आज़मगढ़ घोषणा की गई
(A) 15 मई, 1857 को
(B) 15 जून, 1857 को
(C) 15 जुलाई, 1857 को
(D) 25 अगस्त, 1857 को
उत्तर:
(D) 25 अगस्त, 1857 को.

23. विद्रोही क्या चाहते थे?
(A) अंग्रेजी राज का अन्त
(B) हिन्दू व मुसलमानों में एकता
(C) वैकल्पिक सत्ता की तलाश
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. विद्रोह के दमन के लिए अंग्रेज़ों ने क्या कदम उठाए?
(A) विद्रोहियों पर अमानवीय अत्याचार किए
(B) वफादार शासकों व जमींदारों को भारी इनाम दिए
(C) सारे उत्तरी भारत में मार्शल लॉ लागू कर दिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

25. ‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र ब्रिटेन की पंच नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ
(A) 1854 ई० में
(B) 1856 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ई० में
उत्तर:
(D) 1858 ई० में

26. ‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन ने बनाया
(A) 1857 ई० में
(B) 1858 ई० में
(C) 1859 ई० में
(D) 1860 ई० में
उत्तर:
(C) 1859 ई० में 27. सती प्रथा को अवैध घोषित किया गया
(A) 1820 ई० में
(B) 1824 ई० में
(C) 1825 ई० में
(D) 1829 ई० में
उत्तर:
(D) 1829 ई० में

28. ‘उत्तराधिकार कानून पास किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(A) 1850 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

29. 1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल था
(A) लॉर्ड रिपन
(B) लॉर्ड केनिंग
(C) लॉर्ड डलहौजी
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) लॉर्ड केनिंग

30. 1857 ई० के विद्रोह का तत्कालीन कारण था
(A) अवध का विलय
(B) झांसी का विलय
(C) चर्बी वाले कारतूस
(D) उत्तराधिकार कानून
उत्तर:
(C) चर्बी वाले कारतूस

31. झांसी का अंग्रेजी राज्य में विलय किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1854 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1854 ई० में

32. अवध का विलय किस गवर्नर जनरल ने किया?
(A) लॉर्ड डलहौजी
(B) लॉर्ड वेलेजली
(C) लॉर्ड केनिंग
(D) लॉर्ड रिपन
उत्तर:
(A) लॉर्ड डलहौजी

33. अवध में एकमुश्त बन्दोबस्त लागू किया गया
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1856 ई० में
(D) 1857 ई० में
उत्तर:
(C) 1856 ई० में

34. लखनऊ में विद्रोहियों ने अवध के किस चीफ कमीश्नर को मौत के घाट उतार दिया?
(A) जनरल नील
(B) हैनरी लॉरेंस
(C) कोलिन कैम्पबेल
(D) जनरल हैवलॉक
उत्तर:
(B) हैनरी लॉरेंस

35. ‘बाग डंका शाह’ के नाम से प्रसिद्ध था
(A) शाहमल
(B) नाना साहिब
(C) कुंवर सिंह
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह
उत्तर:
(D) मौलवी अहमदुल्ला शाह

36. विद्रोह को कुचलने में देशी रियासतों ने अंग्रेज़ों का साथ दिया
(A) पटियाला
(B) ग्वालियर
(C) हैदराबाद
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

37. भारत का प्रथम शहीद कौन था?
(A) नाना साहिब
(B) मंगल पांडे
(C) बहादुरशाह
(D) रानी लक्ष्मीबाई
उत्तर:
(B) मंगल पांडे

38. अंग्रेज़ों ने कुशासन की आड़ में किस राज्य को अधिकार में लिया था?
(A) झांसी
(B) सतारा
(C) अवध
(D) हैदराबाद
उत्तर:
(C) अवध

39. ‘फिरंगी’ शब्द किस भाषा का है?
(A) फारसी
(B) अरबी
(C) उर्दू
(D) संस्कृत
उत्तर:
(A) फारसी

40. ब्रिटिश ईस्ट-इण्डिया कंपनी के अधीन सेवारत भारतीय सैनिकों का पहला सैनिक विद्रोह कहाँ हुआ?
(A) मेरठ
(B) बैरकपुर
(C) पटना
(D) वेल्लोर
उत्तर:
(D) वेल्लोर

41. 1857 ई० के विद्रोह के लिए लॉर्ड डलहौजी का वह कौन-सा प्रशासकीय कदम था जो सर्वाधिक उत्तरदायी सिद्ध हुआ ?
(A) भारत में रेलवे. डाक और तार व्यवस्था का प्रचलन
(B) कुशासन के नाम पर देशी राज्यों का ब्रिटिश साम्राज्य में विलय
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन
(D) भारतीय शासकों की पेंशन को बन्द या कम कर देना।
उत्तर:
(C) लैप्स की नीति का अंधाधुंध क्रियान्वयन

42. 1857 ई० का विद्रोह ‘एक राष्ट्रीय विद्रोह’ था न कि ‘एक सैनिक विद्रोह’ यह शब्द किस अंग्रेज़ सांसद और राजनीतिज्ञ “के हैं?
(A) लॉर्ड केनिंग
(B) लॉर्ड डलहौजी
(C) लॉर्ड डिजरायली
(D) लॉर्ड एलनबरो
उत्तर:
(C) लॉर्ड डिजरायली

43.1857 ई० के विद्रोह का आरम्भ कब हुआ?
(A) लखनऊ
(B) मेरठ
(C) बैरकपुर
(D) कानपुर
उत्तर:
(B) मेरठ

44. अंग्रेज़ों ने विद्रोह के किस मुख्य केंद्र पर सबसे पहले पुनर्धिकार किया?
(A) कानपुर
(B) दिल्ली
(C) लखनऊ
(D) झाँसी
उत्तर:
(B) दिल्ली

45. दिल्ली में विद्रोही सेना का सेनानायक कौन था?
(A) अजीमुल्ला
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बाबा कुँवर सिंह
(D) जनरल बख्त खाँ
उत्तर:
(A) अजीमुल्ला

46. 1857 ई० के विद्रोह का कौन-सा नेता बचकर नेपाल भाग गया और बाद में उसकी गतिविधियों का कभी पता नहीं चल पाया?
(A) नाना साहिब
(B) खान बहादुर खाँ
(C) बेगम हज़रत अली
(D) तात्या टोपे
उत्तर:
(A) नाना साहिब

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
दिल्ली में विद्रोहियों को किसने रोकने का प्रयास किया?
उत्तर:
कर्नल रिप्ले ने विद्रोहियों को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास किया।

प्रश्न 2.
सिपाही जब लाल किले पर पहुंचे तो बहादुरशाह जफर क्या कर रहे थे?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर प्रातःकालीन नमाज पढ़कर और सहरी खाकर उठे थे।

प्रश्न 3.
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफर से क्या अनुरोध किया?
उत्तर:
सिपाहियों ने बहादुरशाह जफ़र से नेतृत्व के लिए अनुरोध किया।

प्रश्न 4.
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफर ने क्या किया?
उत्तर:
सिपाहियों के अनुरोध पर बहादुरशाह जफ़र ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया।

प्रश्न 5.
बहादुरशाह जफर द्वारा नेतृत्व स्वीकार करने पर विद्रोह का स्वरूप कैसा हो गया?
उत्तर:
बहादुरशाह के नेतृत्व स्वीकार करने पर यह विद्रोह केवल सिपाहियों का विद्रोह नहीं रहा, बल्कि विदेशी सत्ता के विरुद्ध राजनीतिक विद्रोह बन गया।

प्रश्न 6.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिन्दुओं व मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिन्दुओं व मुसलमानों को देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया।

प्रश्न 7.
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
कानपुर में विद्रोह का नेतृत्व नाना साहिब ने किया।

प्रश्न 8.
नाना साहिब को अन्य किस नाम से जाना जाता था?
उत्तर:
नाना साहिब को धोंधू पंत के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 9.
इलाहाबाद में विद्रोहियों का नेता कौन था?
उत्तर:
मौलवी लियाकत खाँ, जो पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता थे, ने विद्रोह का नेतृत्व व प्रशासन की कमान संभाली।

प्रश्न 10.
बिहार में विद्रोह का नेतृत्व किसके हाथ में था?
उत्तर:
जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवरसिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने बिहार में विद्रोह का नेतृत्व सँभाला।

प्रश्न 11.
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
ग्वालियर व झाँसी में विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तांत्या टोपे ने किया।

प्रश्न 12.
विद्रोह में सिंधिया राजा की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने में अंग्रेज़ों का साथ दिया।

प्रश्न 13.
बंगाल की बैरकपुर छावनी में बगावत का आह्वान किसने किया?
उत्तर:
29 मार्च, 1857 को परेड के समय बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पाण्डे ने बगावत का आह्वान किया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 14.
मंगल पाण्डे को फांसी पर कब लटकाया गया?
उत्तर:
8 अप्रैल, 1857 को मंगल पाण्डे को फांसी पर लटकाया गया।

प्रश्न 15.
लैप्स का सिद्धान्त किस गवर्नर जनरल ने प्रतिपादित किया?
उत्तर:
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया।

प्रश्न 16.
लैप्स के सिद्धान्त द्वारा कौन-कौन से राज्यों का विलय किया गया?
उत्तर:
सतारा, नागपुर, झाँसी तथा उदयपुर राज्यों का लैप्स के सिद्धान्त से अंग्रेज़ी राज्य में विलय किया गया।

प्रश्न 17.
मंगल पाण्डे कौन था?
उत्तर:
मंगल पाण्डे 34वीं नेटिव इन्फ्रेंट्री में एक सैनिक था।

प्रश्न 18.
अंग्रेजों ने बहादुरशाह जफर को बन्दी बनाकर कहाँ भेजा?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र को बन्दी बनाकर रंगून भेजा गया।

प्रश्न 19.
बहादुरशाह जफर की मृत्यु कब हुई?
उत्तर:
रंगून में 1862 में बहादुरशाह जफर की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 20.
रानी लक्ष्मीबाई को वीरगति कब व कहाँ प्राप्त हुई?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई को 17 जून, 1858 को ग्वालियर में वीरगति प्राप्त हुई।

प्रश्न 21.
नाना साहिब ने कानपुर पर अधिकार कब किया?
उत्तर:
नाना साहिब ने कानपुर पर 26 जून, 1857 को अधिकार किया।

प्रश्न 22.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र कब तथा किसने बनाया?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ नामक चित्र टॉमस जोन्स बार्कर द्वारा 1859 में बनाया गया।

प्रश्न 23.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दर्शाया गया है?
उत्तर:
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में यह दिखाने का प्रयास किया गया है कि संकट की घड़ी का अन्त हो चुका है।

प्रश्न 24.
‘इन मेमोरियम’ चित्र कब व किसने बनाया?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र जोजेफ नोएल पेटन द्वारा 1859 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 25.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
‘इन मेमोरियम’ चित्र में अंग्रेज़ औरतें व बच्चे एक-दूसरे से लिपटे दिखाई दे रहे हैं। वे असहाय प्रतीत होते हैं।

प्रश्न 26.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र कब प्रकाशित हुआ?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ नामक चित्र 24 अक्तूबर, 1857 को ब्रिटिश पत्रिका ‘पंच’ में प्रकाशित हुआ।

प्रश्न 27.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ में क्या दिखाने का प्रयास किया गया है?
उत्तर:
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग’ चित्र में केनिंग को दयालु दिखाने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 28.
शाह मल कहाँ का रहने वाला था?
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगना का रहने वाला था।

प्रश्न 29.
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर कौन था?
उत्तर:
1857 के विद्रोह के समय अवध का चीफ कमिश्नर हैनरी लॉरैस था।

प्रश्न 30.
बंगाल आर्मी की पौधशाला किसे कहा गया?
उत्तर:
अवध को बंगाल आर्मी की पौधशाला कहा गया।

प्रश्न 31.
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम कब पारित किया गया?
उत्तर:
धार्मिक अयोग्यता अधिनियम 1850 में पारित किया गया।

प्रश्न 32.
1857 ई० के विद्रोह के समय वहाँ का नवाब कौन था?
उत्तर:
अवध विलय के समय नवाब वाजिद अली शाह वहाँ का नवाब था।

प्रश्न 33.
आज़मगढ़ घोषणा कब की गई?
उत्तर:
25 अगस्त, 1857 को आज़मगढ़ घोषणा की गई।

प्रश्न 34.
झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में कब मिलाया गया?
उत्तर:
लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार 1854 में झाँसी को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 35.
1857 ई० के विद्रोह के समय भारत का गवर्नर जनरल कौन था?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के समय केनिंग भारत का गवर्नर जनरल था।

प्रश्न 36.
अवध में लोगों ने अपना नेता किसे घोषित किया?
उत्तर:
अवध के अपदस्थ नवाब के बेटे बिरजिस कद्र को लोगों ने अपना नेता घोषित किया।

प्रश्न 37.
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त और कौन-सी अफवाह उड़ रही थी?
उत्तर:
कारतूस वाली अफवाह के अतिरिक्त आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट एक अन्य अफवाह थी।

प्रश्न 38.
अवध में विद्रोह कब प्रारम्भ हुआ?
उत्तर:
4 जून, 1857 को अवध में विद्रोह प्रारम्भ हुआ।

प्रश्न 39.
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कहाँ भेजा गया?
उत्तर:
अवध के नवाब वाजिद अली शाह को अपदस्थ करके कलकत्ता भेज दिया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 40.
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
दिल्ली में विद्रोहियों का नेतृत्व बख्त खाँ ने किया।

प्रश्न 41.
विद्रोहियों ने विद्रोह को शुरू करने का क्या तरीका अपनाया?
उत्तर:
सिपाहियों ने विद्रोह शुरू करने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या बिगुल बजाकर किया।

प्रश्न 42.
बरेली में विद्रोह का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ ने विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 43.
दिल्ली में प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए विद्रोहियों ने क्या किया?
उत्तर:
दिल्ली में प्रशासन चलाने के लिए एक प्रशासनिक कौंसिल बनाई गई। इसके कुल 10 सदस्य थे।

प्रश्न 44.
पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किसने किया?
उत्तर:
बु-अली शाह कलंदर मस्जिद के मौलवी ने पानीपत में विद्रोहियों का नेतृत्व किया।

प्रश्न 45.
विद्रोह की शुरूआत किस अफवाह से हुई?
उत्तर:
विद्रोह की शुरूआत चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह से हुई।

प्रश्न 46.
सामान्य सेवा अधिनियम किस गवर्नर-जनरल के काल में पारित हुआ?
उत्तर:
सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम 1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के काल में पास किया गया।

प्रश्न 47.
लॉर्ड डलहौजी ने लैप्स की नीति के तहत कौन-कौन से राज्य हड़पे?
उत्तर:
सतारा, संभलपुर, जैतपुर, उदयपुर, नागपुर तथा झांसी राज्य डलहौजी ने ‘राज्य हड़पने की नीति’ के तहत हड़पे।

प्रश्न 48.
अवध का विलय ब्रिटिश साम्राज्य में कैसे किया गया?
उत्तर:
अवध पर ‘कुशासन’ का आरोप लगाकर उसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाया गया।

प्रश्न 49.
“यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।” लॉर्ड डलहौजी ने यह शब्द किस राज्य के बारे में कहे?
उत्तर:
यह शब्द अवध राज्य के बारे में कहे गए।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मेरठ छावनी में विद्रोह कब शुरू हुआ?
उत्तर:
10 मई, 1857 को मेरठ छावनी में विद्रोह शुरू हुआ। भारतीय पैदल सेना के सिपाहियों ने चर्बी वाले कारतूसों का प्रयोग करने से इंकार कर दिया। कोर्ट मार्शल हुआ और 85 भारतीय सिपाहियों को 8 से लेकर 10 वर्ष तक की कठोर सज़ा दी गई।

प्रश्न 2.
देशी नरेशों के नाम पत्र में बहादुरशाह जफर ने क्या इच्छा प्रकट की?
उत्तर:
देशी नरेशों के नाम पत्र लिखते हुए बहादुरशाह जफ़र ने कहा मेरी यह हार्दिक इच्छा है कि जिस तरीके से भी हो और जिस कीमत पर हो सके फिरंगियों को हिन्दुस्तान से बाहर निकाल दिया जाए। मेरी यह तीव्र इच्छा है कि तमाम हिन्दुस्तान आज़ाद हो जाए। अंग्रेज़ों को निकाल दिए जाने के बाद अपने निजी लाभ के लिए हिन्दुस्तान पर हुकूमत करने की मुझ में जरा भी ख्वाहिश नहीं है। यदि आप सब देशी नरेश दुश्मन को निकालने की गरज से अपनी-अपनी तलवार खींचने के लिए तैयार हों तो मैं अपनी तमाम राजसी शक्तियाँ (Royal Powers) और अधिकार देशी नरेशों के किसी चुने हुए संघ को सौंपने के लिए राजी हूँ।

प्रश्न 3.
बहादुरशाह जफर ने देश के हिंदुओं और मुसलमानों से क्या अपील की?
उत्तर:
बहादुरशाह जफर ने सारे देश के हिंदुओं और मुसलमानों के नाम एक अपील जारी की। इसमें सभी से देश व धर्म के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। बहादुर शाह ने राजपूताना व दिल्ली के आस-पास के देशी शासकों को भी विद्रोह में शामिल होने के लिए पत्र लिखे। विद्रोहियों ने सभी जगह बहादुर शाह को अपना नेता मान लिया। कानपुर में मराठा सरदार नाना साहिब स्वयं को बहादुरशाह का पेशवा घोषित करके उसका प्रशासन चलाने लगा।

प्रश्न 4.
मध्य भारत में विद्रोह के प्रसार के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मध्य भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपुर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मुख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों की वफादारी निभाते रहे। उदाहरण के लिए ग्वालियर के अधिकांश सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेजों का साथ दिया।

प्रश्न 5.
विद्रोही सिपाही मेरठ से दिल्ली क्यों पहुँचे?
उत्तर:
विद्रोही जानते थे कि नेतृत्व व संगठन के बिना अंग्रेजों से लोहा नहीं लिया जा सकता था। यह बात सही है कि विद्रोह के दौरान छावनियों में सैनिकों ने अपने स्तर पर भी कुछ निर्णय लिए थे। फिर भी सिपाही जानते थे कि सफलता के लिए राजनीतिक नेतृत्व जरूरी है। इसीलिए सिपाही मेरठ में विद्रोह के तुरंत बाद दिल्ली पहुंचे। वहाँ उन्होंने बहादुर शाह को अपना नेता बनाया।

प्रश्न 6.
कानपुर में नाना साहिब की अंग्रेज़ों से नाराजगी का क्या कारण था?
उत्तर:
कानपुर में नाना साहिब अपने अपमान से सख्त नाराज थे। क्योंकि उनसे ‘पेशवा’ की पदवी छीन ली गई थी, साथ ही 8 लाख रुपये वार्षिक पेंशन भी अंग्रेज़ों ने बंद कर दी थी।

प्रश्न 7.
शासक व ज़मींदार विद्रोह में भाग क्यों ले रहे थे?
उत्तर:
मुख्यतः अपदस्थ शासक और उजड़े हुए ज़मींदार विद्रोह में भाग ले रहे थे, क्योंकि शासक तो पुनः अपनी राजशाही स्थापित करना चाहते थे और ज़मींदार अपनी जमीनों के लिए लड़ रहे थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो प्रशासनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रशासनिक कारण निम्नलिखित थे

  1. लैप्स के सिद्धान्त के द्वारा झांसी, सतारा, नागपुर आदि रियासतों को अंग्रेजी राज में मिलाना तथा कुशासन का आरोप लगाकर अवध जैसे राज्य को हड़पना।
  2. देशी राजाओं पर सहायक सन्धि थोपना तथा नई भू-राजस्व प्रणालियाँ लागू करना व जटिल कानून व्यवस्था बनाना।

प्रश्न 9.
अवध का विद्रोह इतना व्यापक क्यों था? दो कारण बताओ।
उत्तर:

  1. अवध के नवाब को हटाए जाने पर लोगों में असन्तोष था।
  2. अंग्रेज़ों की भारतीय सेना में अवध के सैनिकों की संख्या अधिक थी। वे अवध की घटनाओं से दुःखी थे।
  3. अवध को अंग्रेज़ी राज्य में मिलाए जाने के कारण वहाँ के दरबारी व कर्मचारी वर्ग बेरोज़गार हो गए। उनमें अंग्रेजों के विरुद्ध भारी रोष था।

प्रश्न 10.
सहायक सन्धि ने देशी राजाओं को किस प्रकार पंगु बना दिया? ।
उत्तर:
सहायक सन्धि की शर्तों के अनुसार देशी राजाओं को सैनिक शक्ति से वंचित कर दिया गया। कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए देशी राजा को अंग्रेज़ों पर निर्भर रहना पड़ता था। अंग्रेजों के परामर्श के बिना वह शासक किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध या सन्धि नहीं कर सकता था।

प्रश्न 11.
अवध में अंग्रेज़ों की रुचि बढ़ने के क्या कारण थे?
उत्तर:
अवध की उपजाऊ जमीन को अंग्रेज़ नील व कपास की खेती के लिए प्रयोग करना चाहते थे तथा अवध को उत्तरी भारत का एक बड़े बाजार के रूप में विकसित करना चाहते थे।

प्रश्न 12.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सैनिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के दो सैनिक कारण निम्नलिखित हैं

  1. सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उसके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।
  2. सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भी भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों की पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह के कोई दो सामाजिक कारण बताओ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के सामाजिक कारण निम्नलिखित हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए कानून बनाने की दिशा में पहलकदमी की। सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए गए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास करके विधवाओं के विवाह को कानूनी मान्यता दी गई।
निःसंदेह ये कदम प्रगतिशील तथा भारतीयों के हित में थे। परंतु रूढ़िवादी भारतीयों ने इन सुधारों को सामाजिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप समझा।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-1835 ई० में लॉर्ड मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली को भारत में लाग किया। अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में पाश्चात्य संस्कृति की ओर झुकाव बढ़ रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। वह अन्य भारतीयों से स्वयं को श्रेष्ठ समझने लगा। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं, हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

प्रश्न 14.
बहादुरशाह जफर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बहादुरशाह जफ़र मुगलों का अन्तिम शासक था। वह 1837 ई० में सिंहासन पर बैठा। 1857 ई० के विद्रोह के समय विद्रोहियों ने उसे सम्राट घोषित करके अपना नेता घोषित किया। विद्रोहियों का साथ देने के कारण उसे कैद करके रंगून भेज दिया गया। 1862 ई० में वहीं उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 15.
ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन का चरित्र विदेशी था।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

प्रश्न 16.
कम्पनी की न्याय व्यवस्था भी असंतोष का कारण थी, कैसे?
उत्तर:
कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय-व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र अमीर वर्ग के हाथ में गरीब आदमी के शोषण का एक हथियार बन गया था।

प्रश्न 17.
मौलवी अहमदुल्ला शाह कौन था?
उत्तर:
फैज़ाबाद के मौलवी अहमदुल्ला शाह ने 1857 ई० के विद्रोह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने लोगों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रेरित किया। अनेक मुसलमान उन्हें पैगम्बर मानते थे। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। 1857 ई० में उन्हें अंग्रेज़ विरोधी प्रचार के कारण जेल में बन्द कर दिया गया। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हैनरी लॉरेंस को पराजित किया।

प्रश्न 18.
अवध अधिग्रहण से ताल्लुकदारों के सम्मान व सत्ता को क्षति पहुँची, कैसे?
उत्तर:
अंग्रेजी राज से ताल्लुकदारों की सत्ता व सम्मान को भी जबरदस्त क्षति हुई। ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों में रहते थे। अपनी-अपनी जागीर में सत्ता व जमीन पर उनका पिछली कई सदियों से नियंत्रण था। ताल्लुकदार नवाब की संप्रभुत्ता (Sovereignty) को स्वीकार करते हुए पर्याप्त स्वायत्तता (Autonomy) रखते थे। इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

प्रश्न 19.
किसानों में असंतोष के क्या कारण थे?
उत्तर:
अंग्रेज़ी राज से संपूर्ण ग्रामीण समाज व्यवस्था भंग हो गई। अंग्रेज़ों की भू-राजस्व व्यवस्था में कोई लचीलापन नहीं था। न तो लगान तय करते वक्त और न ही वसूली में। मुसीबत के समय भी सरकार किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं रखती थी।

प्रश्न 20.
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका किस हद तक उत्तरदायी थी?
उत्तर:
1857 ई० के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक विश्वासों की भूमिका निम्नलिखित कारणों से उत्तरदायी थी

  1. भारत में बढ़ते हुए ईसाई धर्म के प्रसार को खतरा माना जा रहा था।
  2. सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम (1856) के अनुसार किसी भी भारतीय सैनिक को समुद्र पार भेजा जा सकता था। हिन्दू लोग इसे धर्म भ्रष्ट होना समझते थे।
  3. 1856 ई० में सैनिकों को नई एनफील्ड राइफल दी गई। इसमें डालने वाले कारतूसों की सील को मुँह से खोलना पड़ता था। सैनिकों ने इसमें चर्बी लगी समझा और इसे धर्म भ्रष्ट करने का षड्यन्त्र बताया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 21.
किसान व सैनिकों में क्या संबंध थे?
उत्तर:
किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गाँवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी अर्थात वह भी वर्दीधारी ‘किसान’ ही था। वह भी गाँव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था।

प्रश्न 22.
यूरोपीय अधिकारी सैनिकों के साथ कैसा व्यवहार करते थे?
उत्तर:
यूरोपीय अधिकारियों में नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ जाने से अफवाहों की भमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 23.
आजमगढ़ घोषणा में व्यापारियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
षड्यंत्रकारी ब्रिटिश सरकार ने नील, कपड़े, जहाज व्यवसाय जैसी सभी बेहतरीन एवं मूल्यवान वस्तुओं के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। व्यापारियों को दो कौड़ी के आदमी की शिकायत पर गिरफ्तार किया जा सकता है। बादशाही सरकार स्थापित होने पर इन सभी फरेबी तौर-तरीकों को समाप्त कर दिया जाएगा। जल व थल दोनों मार्गों से होने वाला सारा व्यापार भारतीय व्यापारियों के लिए खोल दिया जाएगा। इसलिए प्रत्येक व्यापारी का यह उत्तरदायित्व है कि वह इस संघर्ष में भाग ले।

प्रश्न 24.
आजमगढ़ घोषणा में सरकारी कर्मचारियों के बारे में क्या कहा गया?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार के अंतर्गत प्रशासनिक एवं सैनिक सेवाओं में भर्ती होने वाले भारतीय लोगों को सम्मान नहीं मिलता। उनका वेतन कम होता है और उनके पास कोई शक्ति नहीं होती। प्रशासनिक और सैनिक में प्रतिष्ठा और धन वाले सारे पद केवल गोरों को ही दिए जाते हैं। इसलिए ब्रिटिश सेवा में कार्यरत सभी भारतीयों को अपने धर्म और हितों की ओर ध्यान देना चाहिए तथा अंग्रेजों के प्रति अपनी वफादारी को त्यागकर बादशाही सरकार का साथ देना चाहिए।

प्रश्न 25.
आजमगढ़ घोषणा में पंडितों, फकीरों एवं अन्य ज्ञानी व्यक्तियों के विषय में क्या कहा गया?
उत्तर:
पंडित और फ़कीर क्रमशः हिंदू और मुस्लिम धर्मों के संरक्षक हैं। यूरोपीय इन दोनों धर्मों के शत्रु हैं। जैसाकि सब जानते हैं अब धर्म के कारण ही अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष छिड़ा हुआ है, इसलिए फ़कीरों और पंडितों का कर्त्तव्य है कि “वो मेरे पास आएँ और इस पवित्र संघर्ष में अपना योगदान दें।”

प्रश्न 26.
‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ चित्र में क्या दिखाया गया है?
उत्तर:
टॉमस जोन्स बार्कर के चित्र ‘द रिलीफ ऑफ लखनऊ’ में कोलिन कैम्पबैल के पहुंचने पर खुशी झलक रही है। मध्य में कैम्पबैल के साथ अभिनन्दन की मुद्रा में औट्रम व हैवलॉक दिखाई दे रहे हैं। घटना-क्षण लखनऊ का है। उनके सामने थोड़ी दूरी पर शव और घायल पड़े हैं जो विद्रोहियों की पराजय और मार-काट के साक्षी हैं। नायकों के पास ही घोड़े काफी शांत मुद्रा में दिखाई दे रहे हैं जो इस बात का प्रतीक हैं कि संकट समाप्त हो चुका है।

प्रश्न 27.
हेनरी हार्डिंग के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हेनरी हार्डिंग ने सेना के साजो-सामान के आधुनिकीकरण का प्रयास किया। उसने सेना में एनफील्ड राइफल का इस्तेमाल शुरू किया जिनमें चिकने कारतूस प्रयोग होते थे और सिपाही उनमें चर्बी लगी होने की अफवाह के कारण विद्रोही हो गए।

प्रश्न 28.
कुँवर सिंह कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
कुँवर सिंह बिहार में जगदीशपुर की आरा रियासत का ज़मींदार था। वह लोगों में राजा के नाम से विख्यात था। कुँवर सिंह ने आजमगढ़ व बनारस में अंग्रेज़ी फौज को पराजित किया। उसने छापामार युद्ध पद्धति से अंग्रेज़ों से लोहा लिया। अप्रैल, 1858 में उसकी मृत्यु हो गई।

प्रश्न 29.
नाना साहिब कौन थे? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
नाना साहिब अन्तिम पेशवा बाजीराव द्वितीय का दत्तक पुत्र था। पेशवा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने नाना साहिब को पेशवा नहीं माना और न ही उसे पेंशन दी। 1857 ई० के विद्रोह में विद्रोहियों के आग्रह से वे विद्रोह में शामिल हो गए। कानपुर में उन्होंने सेनापति नील और हेवलॉक को पराजित करके किले पर पुनः अधिकार कर लिया, लेकिन कोलिन कैम्पबेल की सेना के आने बाद नाना साहिब को पुनः पराजित कर दिया गया। वे भागकर नेपाल चले गए। प्रशंसकों ने इसे भी उनकी बहादुरी बताया।

प्रश्न 30.
तात्या टोपे कौन था? उनका संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
तात्या टोपे नाना साहिब की सेना का एक बहादुर व विश्वसनीय सेनापति था। उसने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध गुरिल्ला नीति अपनाकर उनकी नाक में दम कर दिया। उसने अंग्रेज़ जनरल बिन्द्रहैम को परास्त किया। उसने रानी लक्ष्मीबाई का पूर्ण निष्ठा के साथ सहयोग दिया। 1858 ई० में अंग्रेजों ने तात्या टोपे को फाँसी दे दी।

प्रश्न 31.
रानी लक्ष्मीबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
रानी लक्ष्मीबाई झाँसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी थी। राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेज़ों ने उनके दत्तक पुत्र को उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया और लैप्स के सिद्धान्त के अनुसार झाँसी को अंग्रेज़ी साम्राज्य में मिला लिया। 1857 ई० के विद्रोह में स्वयं रानी ने अंग्रेज़ी सेनाओं से टक्कर ली। नाना साहिब के विश्वसनीय सेनापति तात्या टोपे और अफगान सरदारों की मदद से उन्होंने ग्वालियर पर पुनः अधिकार कर लिया। कालपी के स्थान पर अंग्रेजों से संघर्ष करते हुए वह वीरगति को प्राप्त हई। उसकी वीरता हमेशा आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रही।

प्रश्न 32.
शाह मल कौन था? संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर:
शाह मल उत्तर प्रदेश के बड़ौत परगने के जाट परिवार से सम्बन्ध रखते थे। बड़ौत में 84 गाँवों की ज़मींदारी थी। जमीन उपजाऊ थी। लेकिन ऊँची लगान दर के कारण जमीन महाजनों व व्यापारियों के हाथों में जा रही थी। शाहमल ने किसानों को अंग्रेजों के खिलाफ संगठित किया। व्यापारियों व महाजनों के घर लूटे। बही-खाते जलाए, पुल व सड़कें तोड़ीं। शाह मल ने एक अंग्रेज़ अधिकारी के बंगले पर कब्जा करके उसे अपना कार्यालय बनाया और उसे न्याय भवन का नाम दिया। जहाँ वह लोगों के विवादों का निपटारा करने लगा। जुलाई, 1858 में शाह मल अंग्रेजों के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया।

प्रश्न 33.
विद्रोह को राजनीतिक वैधता कैसे मिली?
उत्तर:
बहादुशाह जफर ने स्वयं को भारत का बादशाह घोषित करके विद्रोह का नेता घोषित कर दिया। इससे सिपाहियों के विद्रोह को राजनीतिक वैधता मिल गई। एक सुप्रसिद्ध इतिहासकार के शब्दों में इससे विद्रोह को ‘एक सकारात्मक राजनीतिक अर्थ” (A positive political meaning’) मिल गया।

प्रश्न 34.
1857 का विद्रोह किस अफवाह से शुरू हुआ?
उत्तर:
1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। उल्लेखनीय है कि यह कारतूस नई ‘एनफील्ड राइफल’ के लिए विशेषतौर पर तैयार किए गए थे।

प्रश्न 35.
‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम क्या था?
उत्तर:
1856 ई० में गवर्नर-जनरल लॉर्ड केनिंग के शासन काल में ‘सामान्य सेवा भर्ती अधिनियम’ पास किया गया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष पैदा हुआ।

प्रश्न 36.
‘लेक्स लोसी एक्ट’ (Lex Loci Act, 1850) क्या था?
उत्तर:
1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास किया। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

प्रश्न 37.
महालवाड़ी भूमि कर प्रणाली विद्रोह के लिए क्यों उत्तरदायी थी?
उत्तर:
भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर की बढ़ौतरी व उसे न अदा कर पाने पर सारा गांव-ज़मींदार व किसान प्रभावित होते थे और सभी पर सरकारी जुल्म बरपता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

प्रश्न 38.
लैप्स की नीति क्या थी?
उत्तर:
जिन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा इत्यादि राज्यों में यह नीति विद्रोह को हवा देने में एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

प्रश्न 39.
‘यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा।’ यह शब्द किसने क्यों कहे थे?
उत्तर:
1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” (“A cherry that will drop into our mouth one day”) डलहौज़ी उग्र साम्राज्यवादी नीति का पोषक था। उसने नैतिकता को दाव पर रखते हुए, देशी नरेशों के अस्तित्व को मिटाने तथा उनके राज क्षेत्रों को अंग्रेजी साम्राज्य में मिलाने का निर्णय कर लिया था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 40.
एकमुश्त बन्दोबस्त का ताल्लुकदारों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
1856 ई० में अधिग्रहण के बाद एकमुश्त बंदोबस्त (Summary Settlement of 1856) नाम से भू-राजस्व व्यवस्था लागू की गई, जो इस मान्यता पर आधारित थी कि ताल्लुकदार जमीन के वास्तविक मालिक नहीं हैं। वे भू-राजस्व एकत्रित करने वाले बिचौलिये ही रहे हैं, जो किसानों से कर वसूल करके नवाब को देते थे। उन्होंने ज़मीन पर कब्जा धोखाधड़ी व शक्ति के बल पर किया हुआ है। इस मान्यता के आधार पर ज़मीनों की जाँच की गई और ताल्लुकदारों की ज़मीनें उनसे लेकर किसानों को दी जाने लगीं और उन्हें मालिक घोषित किया गया।

प्रश्न 41.
‘इन मेमोरियम’ चित्र में कैसी भावनाओं को चित्रांकित किया गया है?
उत्तर:
1859 में जोसेफ नोएल पेटन (Joseph Noel Paton) का चित्र ‘इन मेमोरियम’ यानी ‘स्मृति में प्रकाशित हआ। इसमें अंग्रेज़ औरतें और बच्चे लाचार और मासूम स्थिति में परस्पर लिपटे हुए हैं। चित्र में भीषण हिंसा नहीं है फिर भी उस तरफ एक विशेष खामोशी संकेत कर रही है जैसे कुछ अनहोनी होने वाली है, जिसमें मृत्यु और बेइज्जती कुछ भी हो सकता है। दर्शक के मन में बेचैनी और क्रोध की भावना चित्र को निहारने से सहज रूप में उभरती है।

प्रश्न 42.
‘जस्टिस’ नामक चित्र के नीचे पंक्ति में क्या लिखा गया है?
उत्तर:
12 सितंबर, 1857 को पन्च नामक एक पत्रिका में ‘जस्टिस’ नामक प्रकाशित हुए एक चित्र में एक ब्रिटिश स्त्री को हाथ में तलवार और ढाल लिए आक्रामक मुद्रा में दिखाया गया है। प्रतिशोध से तड़पती हुई वह विद्रोहियों को कुचल रही हैं। भारतीय स्त्री-बच्चे डर से दुबके हुए हैं।
चित्र के नीचे एक पंक्ति में लिखा गया है कि “कानपुर में हुए भीषण जन-संहार के समाचार ने समूचे ब्रिटेन में बदले की गहरी इच्छा और भयानक अपमान के भाव को उत्पन्न कर दिया है।”

प्रश्न 43.
‘द क्लिमेंसी ऑफ केनिंग” कॉर्टून में किस चीज को दिखाया गया है?
उत्तर:
24 अक्तूबर, 1857 को पन्च नामक पत्रिका में प्रकाशित एक कॉर्टून (‘The Clemency of Canning’) में कैंनिग को एक सैनिक को क्षमा करते हुए दिखाया गया है। इसमें एक साथ कई भाव प्रकट होते हैं। भारतीय सिपाही को बौना और फटी पैंट में अपमानजनक स्थिति में दिखाया गया है। वहीं अभी भी उसकी तलवार से खून टपक रहा है यानी उसमें बर्बरता कायम है। फिर भी केनिंग एक दयावान बुजुर्ग (उपहास पात्र) के रूप में उसके सिर पर हाथ रखकर उसे क्षमा कर रहा है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के विद्रोह की शुरूआत व प्रसार में अफवाहों व भविष्यवाणियों पर प्रकाश डालिए? लोग इन पर क्यों विश्वास कर रहे थे?
उत्तर:
‘चर्बी वाले कारतूस’ तथा कुछ अन्य अफवाहों व भविष्यवाणियों से विद्रोह की शुरूआत व प्रसार हुआ। लेकिन अ तभी फैलती हैं जब उन अफवाहों में लोगों के मन में गहरे बैठे भय और संदेह की आवाज़ सुनाई देती है। अतः भय और संदेह पैदा करने वाली परिस्थितियों में ही किसी ऐसी घटना के दूसरे कारण छिपे होते हैं।
अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-1857 का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। लेकिन अन्य कई और अफवाहों का भी इसमें योगदान था :

1. ‘चर्बी वाले कारतूस’ (Greased Cartridges)-1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफ़वाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड़यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराजगी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

2. अन्य अफवाहें व भविष्यवाणियाँ-अन्य अफ़वाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट । इसे लोग अंग्रेज़ों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। बल्कि रेल व तार जैसी व्यवस्था के बारे में यही भ्रांति एवं अफवाह थी कि यह भी ईसाई बनाने का एक षड्यंत्र ही है। इसी बीच ‘फूल और चपाती’ बाँटने की रिपोर्ट आ रही थीं और साथ ही यह भविष्यवाणी भी जोर पकड़ रही थी कि अंग्रेजी राज भारत में अपनी स्थापना के सौ वर्ष बाद समाप्त हो जाएगा।

प्रश्न 2.
सहायक संधि प्रणाली की विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
लॉर्ड वेलेजली ने 1798 ई० में भारत में सहायक संधि प्रणाली को अपनाया। इसकी प्रमुख शर्ते इस प्रकार थीं

  • देशी शासक को अपने दरबार में एक अंग्रेज़ रेजीडेंट रखना होता था और इसके परामर्शनुसार ही शासन का संचालन करना था।
  • देशी शासक को अपने राज्य में एक अंग्रेज़ी सहायक सेना को रखना होता था और इस सहायक सेना का व्यय देशी शासक को ही करना था।
  • देशी शासक अंग्रेजों के परामर्श के बिना किसी दूसरे शासक के साथ युद्ध अथवा संधि नहीं कर सकता था।
  • देशी शासक अंग्रेज़ों के अतिरिक्त किसी अन्य यूरोपीय जाति के व्यक्ति को राज्य में नौकरी पर नहीं रख सकता था।
  • देशी शासक को राज्य में सहायक सेना रखने के बदले में एक निश्चित धनराशि कंपनी को देनी होती थी। धनराशि न देने की स्थिति में देशी शासक को अपने राज्य का कुछ भू-भाग अंग्रेजों को देना होता था।

प्रश्न 3.
अंग्रेजों द्वारा अपनाई गई न्याय व्यवस्था विद्रोह के लिए कैसे उत्तरदायी थी?
उत्तर:
ब्रिटिश कंपनी द्वारा स्थापित नई न्याय व्यवस्था भी भारतीयों में असंतोष का एक कारण रही। ‘कानून के सम्मुख समानता’ के सिद्धांत पर आधारित बताई गई इस व्यवस्था में तीन मुख्य दोष थे-अनुचित देरी, न्याय मिलने में अनिश्चितता और अत्यधिक व्यय। इन दोषों के कारण यह नया कानूनी तंत्र गरीब आदमी के शोषण का अमीर वर्ग के हाथ में एक हथियार बन गया अभियोग वर्षों तक चलता रहता था। कोर्ट फीस और वकीलों के खर्चे किसी आम आदमी के बस की बात नहीं थी। इसके अलावा न्यायालयों में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। अमीर व चालाक आदमी झूठे गवाह बनाकर भी अभियोग का निर्णय अपने पक्ष में करवाने में सफल हो जाते थे।

उल्लेखनीय है कि विद्रोह से पहले के वर्षों में अंग्रेजों द्वारा स्थापित नई भूमिकर व्यवस्था तथा भूमि के स्वामित्व को लेकर ग्रामीण वर्गों में कई तरह के अंतर्विरोध उभर आए थे। इसके लिए उन्हें अदालतों के दरवाजे खटखटाने पड़ रहे थे। लेकिन गरीब किसान को न्याय नहीं मिल रहा था। उसकी जमीन महाजनों के हाथों में जा रही थी। अवध में तो किसान, ज़मींदार एवं ताल्लुकदार सभी भूमि के स्वामित्व को लेकर परेशान थे। धड़ाधड़ एक-दूसरे के विरुद्ध मुकद्दमें दायर कर रहे थे। इस प्रवृत्ति पर टिप्पणी करते हुए सादिक-उल-अखबार नामक एक समाचार-पत्र ने लिखा, “वे अपना धन व्यर्थ गंवा रहे हैं और सरकार के खजाने को भर रहे हैं।” वास्तव में, इन परिस्थितियों में यह न्याय-व्यवस्था भी विद्रोह के कारणों में से एक थी।

प्रश्न 4.
विद्रोह की असफलता के कोई पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
विद्रोह की असफलता के कारण निम्नलिखित थे
1. केनिंग की कूटनीति और साम्राज्य बनाए रखने का दृढ़ संकल्प-अंग्रेज़ अधिकारियों की रणनीति और उनके दृढ़ संकल्प की विद्रोह के दमन में विशेष भूमिका रही।

2. संगठन व योजना का अभाव-विद्रोहियों के पास संगठन और योजना का अभाव था। 31 मई की योजना के भी पुख्ता प्रमाण नहीं हैं। यदि थी भी तो कार्यान्वित नहीं हो पाई।

3. अस्त्र-शस्त्रों की कमी-उनके पास केवल वो ही गोला-बारूद व बंदूकें थीं जो उन्होंने ब्रिटिश शस्त्रागारों से लूटे थे। नए हथियारों की आपूर्ति ज्यादा संभव नहीं थी।

4. यातायात व संचार-साधनों पर अंग्रेजों का नियंत्रण-विशेषतः रेल व तार व्यवस्था पर अंग्रेजों का पूर्ण नियंत्रण था।जिनके बारे में एक अंग्रेज़ लेखक ने लिखा था-रेल व तार व्यवस्था ने 1857 ई० की क्रांति में हमारे लिए हजारों मनुष्यों का काम किया।

5. सभी सैनिकों का विद्रोह में शामिल होना-अंग्रेज़ फौज में लगभग आधे भारतीय सिपाही तो विद्रोही हो गए थे, लेकिन शेष सिपाहियों ने विद्रोह को कुचलने में अंग्रेज़ों का पूरा-पूरा साथ दिया।

6. अंग्रेज़ों को देशी शासकों का सहयोग–अधिकांश देशी नरेशों (हैदराबाद, ग्वालियर, पटियाला, नाभा, जींद, कपूरथला, बड़ौदा तथा राजपूताना के अधिकार शासक इत्यादि) विद्रोह के दमन कार्य में अंग्रेज़ों की सहायता की।

7. सीमित जन-समर्थन-उत्तर:भारत के काफी क्षेत्रों में सैनिक विद्रोहियों को व्यापक जन-समर्थन मिला। फिर भी पंजाब, पूर्वी बंगाल, राजस्थान व गुजरात इत्यादि क्षेत्रों में विद्रोह न के बराबर था। दक्षिणी भारत इससे लगभग अछूता रहा। शिक्षित मध्य वर्ग की सहानुभूति भी अंग्रेज़ों के साथ थी।

प्रश्न 5.
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के प्रमुख आर्थिक कारण निम्नलिखित हैं

1. भारत का आर्थिक शोषण भारत में अंग्रेज़ों की व्यवस्था शोषणकारी थी। अपनी राजनीतिक सत्ता का दुरुपयोग करते हुए अंग्रेजों ने कृषकों से अधिकाधिक लगान वसूल किया। कारीगरों को कोड़ियों के भाव अपना माल बेचने के लिए विवश किया। इस प्रकार भारतीय कारीगरों व किसानों की दुनिया देखते-ही-देखते उजड़ गई। बेरोजगारी, बदहाली और भुखमरी छा गई। इसी ने किसान, कारीगर और जन-सामान्य को विद्रोही बना दिया था।

2. महालवाड़ी भूमि-कर व्यवस्था-भूमि-कर की महालवाड़ी व्यवस्था को इरफान हबीब ने इस विद्रोह के लिए मुख्य तौर पर दोषी बताया है। इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमि-कर में वृद्धि करने का प्रावधान था। साथ ही भूमि-कर अदा करने का उत्तरदायित्व सामूहिक रूप से सारे गांव (महाल) पर था। कर न अदा कर पाने पर सारा गांव प्रभावित होता था। यही कारण है कि गांव-के-गांव विद्रोही हो गए थे।

3. भूमि-कर की सख्ती से उगाही-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अधिक-से-अधिक भूमि-कर वसूलना चाहती थी। अकाल और बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं के समय भी भारतीय किसान को अंग्रेजी हुकूमत कोई रियायत नहीं देती थी। सख्ती से डंडे के बल पर पैसा वसूला जाता था। भारतीय किसान भुखमरी की स्थिति में था। कर अदा करने के लिए वह कर्ज-पर-कर्ज लेता था। वास्तव में यही वह जुल्म था जिससे किसान विद्रोही हो गए थे।

4. बेरोजगारी और भुखमरी कंपनी शासन की शोषणकारी नीतियों से जन-सामान्य निरंतर गरीब होता रहा। कई स्थानों पर भुखमरी की स्थिति थी। सर सैयद अहमद खाँ लिखते हैं, “कुछ लोग इतने गरीब थे कि वे एक-एक आने अथवा एक-एक सेर आटे के लिए प्रसन्नतापूर्वक विद्रोहियों के साथ मिल गए।”

प्रश्न 6.
1857 के जनविद्रोह के पूर्व के कुछ वर्षों में अंग्रेज़ अधिकारियों और भारतीय सिपाहियों के बीच सम्बन्ध किस प्रकार बदल गए?
उत्तर:
1857 के जनविद्रोह से पहले, लगभग 15 वर्षों में अधिकारियों और सैनिकों (सिपाहियों) के बीच परस्पर सम्बन्धों में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन उभरे। यह परिवर्तन भी सेना में आक्रोश का एक बड़ा कारण था। 1820 तक के दशक में गोरे अधिकारियों व भारतीय सिपाहियों के बीच संबंधों में काफी मित्रतापूर्ण भाव था। अधिकारी सिपाहियों के साथ तलवारबाज़ी, मल्ल-युद्ध इत्यादि खेलों में भाग लेते थे। इकट्ठे शिकार पर जाते थे। वे भारतीय रीति-रिवाज व संस्कृति में भी रुचि लेते थे और भारतीय भाषाओं से परिचय रखते थे। उनमें अभिभावक का स्नेह और अधिकारी का रौब दोनों था। परंतु 1840 के बाद आए नए अधिकारियों में ये सब बातें नहीं थीं। उनमें नस्ली भेदभाव अधिक था। भारतीय सिपाहियों को वे गाली-गलौच व शारीरिक हिंसा पहुँचाने में कोई परहेज नहीं करते थे। उनके लिए सैनिकों की भावनाओं की कोई कद्र नहीं थी। ऐसी स्थिति में दोनों के बीच दूरियाँ बढ़ जाने से संदेह की भावना का पैदा होना स्वाभाविक था। डर एवं संदेह बढ़ जाने से अफवाहों की भूमिका बढ़ जाती है।

प्रश्न 7.
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए किस प्रकार के कानूनों का सहारा लिया गया?
उत्तर:
1857 के विद्रोह को कुचलने के लिए प्रत्येक ‘गोरे व्यक्ति’ को सर्वोच्च न्यायिक अधिकार प्रदान किए गए। इसके लिए कई कानून पारित किए गए। मई और जून (1857) में समस्त उत्तर भारत में मार्शल लॉ लगाया गया। साथ ही विद्रोह को कुचले जाने वाली सैनिक टुकड़ियों के अधिकारियों को विशेष अधिकार दिए गए। एक सामान्य अंग्रेज़ को भी उन भारतीयों पर मुकद्दमा चलाने व सजा देने का अधिकार था, जिन पर विद्रोह में शामिल होने का शक था। सामान्य कानूनी प्रक्रिया को समाप्त कर दिया गया। इसके अभाव में केवल मृत्यु दंड ही सजा हो सकती थी। अतः यह स्पष्ट कर दिया था कि विद्रोह की केवल एक ही सजा है सजा-ए-मौत।

प्रश्न 8.
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम बताएँ।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह के परिणाम भारतीयों तथा अंग्रेज़ों दोनों के लिए काफी महत्त्वपूर्ण थे। अंग्रेज़ इसके बाद सजग हो गए। जबकि भारतीयों में यह राष्ट्रवाद के लिए एक प्रेरक तत्त्व बन गया। इस विद्रोह के संक्षेप में निम्नलिखित परिणाम निकले

1. प्रशासनिक ढांचे में परिवर्तन-1858 में ब्रिटिश संसद में एक एक्ट पारित करके भारत में कंपनी शासन को समाप्त कर दिया। भारत पर नियंत्रण के लिए लंदन में गृह-विभाग (भारत सचिव तथा उसकी 15 सदस्यीय परिषद्) बनाया गया। भारत में गवर्नर-जनरल (मुख्य प्रशासक) को भारतीय रियासतों के लिए वायसराय (प्रतिनिधि) कहा जाने लगा।

2. उच्च वर्गों के प्रति नई नीति-भारतीय नरेशों को अंग्रेजों ने पर्णतः अधीन रखते हए जनता के आंदोलनों के विरोध में ही नीति जागीरदारों और जमींदारों के साथ अपनाई गई। अतः 1858 के बाद यह भारतीय उच्च वर्ग ब्रिटिश सत्ता का आधार स्तंभ हो गया।

3. फूट डालो और राज करो की नीति-जन संघर्षों के विरुद्ध यह नीति ब्रिटिश प्रशासकों की एक मुख्य शस्त्र बन गई, सैनिकों में भी यही नीति अपनाई गई। हिंदू-मुसलमानों में फूट डलवाने का प्रयास विद्रोह के दौरान और भविष्य में जारी रहा। यह नीति भारत के लिए बहुत ही घातक सिद्ध हुई।

4. समाज-सुधारों के परित्याग की नीति-विद्रोह से पूर्व के कुछ दशकों में ‘समाज-सुधार’ की नीति (उदाहरण के लिए उन्होंने सती-प्रथा, कन्या-वध, बाल-विवाह आदि को अवैध घोषित किया, विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दी) को इसके बाद पूर्णतः त्याग दिया गया।

5. राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरणा-1857 का विद्रोह आजादी के दीवानों के लिए एक प्रमुख प्रेरणा स्रोत बना।

प्रश्न 9.
“अफवाहें तभी फैलती हैं जब उनसे लोगों में भय और संदेह की अनुगूंज सुनाई दे।” स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के शुरू होने तथा उसके घटनाक्रम को निर्धारित करने में अफवाहों की बहुत बड़ी भूमिका थी। उदाहरण के लिए चर्बी लगे कारतूसों की बात या आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट पर सैनिकों सहित लोगों ने मन से विश्वास किया। इन अफवाहों के बारे में अधिकारियों ने अपने स्पष्टीकरण दिए और समझाने-बुझाने का प्रयास भी किया। लेकिन किसी ने विश्वास नहीं किया। इसका कारण था अफवाहों के पीछे का सच, जिसमें लोगों के मन में गहरे बैठे डर और संदेह की गूंज सुनाई देती है। ब्रिटिश नीतियों ने लोगों के मन में गहरे डर को जन्म दिया। उदाहरण के लिए कुछ नीतियों को देखें- .

(1) भारतीय हिन्दू सैनिकों को दूसरे देशों (अफगानिस्तान, मिस्र, तिब्बत, बर्मा आदि) में लड़ने के लिए भेजा जाता था। ये सैनिक मुख्यतः उच्च जातियों से थे और बाहर जाने में अपने धर्म की क्षति समझते थे। जब उन्होंने विरोध किया तो कानून बनाकर उन्हें मजबूर किया गया। इससे यह विश्वास हआ कि सरकार उनके धर्म को नष्ट करना चाहती है।

(2) सामाजिक सुधार कानूनों और पाश्चात्य शिक्षा प्रसार से भी यही प्रकट हो रहा था कि अंग्रेज़ ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए यह सब कुछ कर रहे हैं।

(3) ईसाई मिशनरियों को स्कूलों, छावनियों एवं जेलों सभी जगह अपने धर्म प्रचार की खुली छूट दी गई थी। वास्तव में यहीं अंग्रेजों की नीतियाँ व गतिविधियाँ थीं जो अफवाहों के माध्यम से गूंज रही थीं।

प्रश्न 10.
विद्रोहियों के प्रति अंग्रेज़ों ने दहशत का प्रदर्शन किस प्रकार किया?
उत्तर:
विद्रोह को सख्ती से कुचल दिया गया था, लेकिन इसके उपरान्त ‘दहशत के प्रदर्शन’ की नीति अपनाई गई। इसका उद्देश्य था कि भारतीय भविष्य में विद्रोह को स्मरण करते ही काँप उठे और वे पुनः विद्रोह करने की कभी न सोच सकें। इसलिए यह प्रदर्शन दो स्तरों पर किया गया

1. ब्रिटेन में प्रदर्शन-ब्रिटिश समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी अत्यधिक लोमहर्षक शब्दों में विद्रोह से संबंधित विवरण व कहानियाँ प्रकाशित की गईं। विशेषतः विद्रोहियों की हिंसात्मक कार्रवाइयों को भड़काऊ एवं ‘बर्बर’ रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनको पढ़कर ब्रिटेन के आम लोगों में प्रतिशोध व ‘सबक सिखाने की मांग’ उठी। फलतः विद्रोहियों को कुचलने वाले, घरों व गांवों को जलाने वाले उन लोगों की दृष्टि में नायक बनकर उभरे। इंग्लैण्ड में कितने ही चित्र, रेखाचित्र, पोस्टर, कार्टून आदि बने और प्रकाशित हुए जिनसे प्रतिशोध की भावना को प्रोत्साहन मिला।

2. भारत में प्रदर्शन-इंग्लैण्ड में तो प्रतिशोध (बदला) के लिए मांग उठ रही थी तो भारत में दिल दहला देने वाली मार-काट और पाश्विक अत्याचार किए गए। प्रतिशोध के लिए सार्वजनिक दंड की नीति अपनाई गई। गांव के बाहर पेड़ों पर सरे आम फांसी दी गई। विद्रोही सिपाहियों को तोप के गोलों से उड़ाया गया। इसका उद्देश्य सैनिकों और आम लोगों को सबक सिखाना था।

प्रश्न 11.
दिल्ली पर अंग्रेज़ों के पुनः नियन्त्रण को संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
लॉर्ड केनिंग ने शुरू से ही दिल्ली पर पुनः अधिकार करने की रणनीति अपनाई। क्योंकि वह जानता था कि दिल्ली को विद्रोहियों से छीन लेने से उनकी कमर टूट जाएगी। इसके लिए 8 जून को अंबाला की ओर से आगे बढ़कर अंग्रेज़ी सेना ने दिल्ली को घेर लिया और अंतिम आक्रमण के लिए पंजाब से आने वाली एक दूसरी सैनिक टुकड़ी का इंतजार करने लगी। विद्रोही सिपाहियों ने मिर्जा मुगल तथा बख्त खाँ के नेतृत्व में अंग्रेज़ी सेना पर कई धावे बोले, परंतु कोई जोरदार बड़ा आक्रमण नहीं कर पाए, क्योंकि सिपाहियों में अनुशासन व समन्वय का अभाव था। खजाना खाली था।

सिपाहियों को वेतन देने के लिए भी धन नहीं था। दिल्ली में विद्रोहियों में सर्वाधिक प्रभावशाली सैनिक नेता बख्त खाँ था। नजफगढ़ में उसकी सेना अंग्रेजों से हार गई जो विद्रोहियों के लिए गहरा आघात था। इसी बीच सितंबर के आरंभ तक जॉन निकलसन के नेतृत्व में पंजाब से एक बड़ी सैनिक टुकड़ी पहुँचने से अंग्रेज़ी सेना की शक्ति में और भी वृद्धि हो गई। अंत में पाँच दिन के घमासान संघर्ष के बाद 20 सितंबर, 1857 ई० को अंग्रेज़ी सेना ने विजयी होकर दिल्ली में प्रवेश किया, परंतु निकलसन इस लड़ाई में मारा गया। दिल्ली पर पुनः अधिकार करते ही अंग्रेज़ी सेना ने दिल्लीवासियों पर असीम अत्याचार किए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 12.
कला व साहित्य ने 1857 के घटनाक्रम को जीवित रखने में योगदान दिया। झांसी की रानी के उदाहरण से स्पष्ट करें।
उत्तर:
साहित्य तथा चित्रों में विद्रोह के नेताओं को ऐसे नायकों के रूप में प्रस्तुत किया है जिन्होंने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध हथियार उठाये। उन्हें महान देशभक्त माना गया। देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन में वे हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। अनेक चित्रों व साहित्य में रानी लक्ष्मीबाई की छवि को एक मर्दाना योद्धा के रूप में स्थापित किया गया है। उसे सैनिक वेशभूषा में घोड़े पर सवार, एक हाथ में तलवार व एक हाथ में लगाम थामे युद्ध के मैदान में जाते हुए दिखाया गया है। इससे रानी लक्ष्मीबाई की छवि एक वीरांगना के रूप में उभरकर सामने आई। सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्तियाँ और अधिक जोश भर देती हैं, “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी।”

प्रश्न 13.
1857 ई० के विद्रोह ने भारतीय राजनीति पर दीर्घकालीन प्रभाव डालें। समीक्षा कीजिए।
अथवा
1857 ई० के विद्रोह की विरासत की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
यद्यपि अंग्रेजों के विरुद्ध 1857 ई० का विद्रोह असफल रहा लेकिन भारतीय राजनीति पर इसके दीर्घकालीन प्रभाव पड़े। वास्तव में ब्रिटिश साम्राज्य से मुक्ति के लिए भारतीय जनता का यह पहला शक्तिशाली विद्रोह था जिसमें हिन्दुओं व मुसलमानों ने सारे भेद भुलाकर समान रूप से भाग लिया। भारतीय जनता के मन पर इसने अमिट छाप छोड़ी। आधुनिक राष्ट्रीय आन्दोलन के विकास का आधार तैयार करने में इस विद्रोह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन में 1857 के नायक हमेशा प्रेरणा स्रोत बने रहे। वीरों की गाथाएं घर-घर गाई जाने लगीं। उनके नाम जन-शक्ति का प्रतीक बनें और आज भी उन्हें स्मरण किया जाता है। पूरे देश में इस विद्रोह के 150 वर्ष पूरे होने पर स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक के कार्यक्रम आयोजित किए गए।

प्रश्न 14.
1857 ई० के विद्रोह के दौरान हिन्दुओं तथा मुसलमानों के बीच एकता के महत्त्व की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में हिन्दुओं तथा मुसलमानों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। दोनों समुदायों की एकता सैनिकों, जनता और नेताओं सभी में देखी गई। बहादुरशाह जफ़र को सभी हिंदुओं और मुसलमानों ने अपना नेता माना। हिंदुओं की भावनाओं को ठेस न पहुँचे इसलिए कई स्थानों पर गो हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया गया। स्वयं बादशाह बहादशाह जफ़र की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद व महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई। ब्रिटिश अधिकारियों ने इस एकता को तोड़ने के भरसक प्रयास किए। उदाहरण के लिए बरेली में विद्रोह के नेता खान बहादुर के विरुद्ध हिन्दू प्रजा को भड़काने के लिए वहाँ के अधिकारी जैम्स औट्रम द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया।

प्रश्न 15.
मौलवी अहमदुल्ला शाह पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मौलवी अहमदुल्ला शाह नेताओं में ऐसा ही एक नाम है जिन्हें लोग पैगंबर मानने लगे थे। सन् 1856 में उन्हें अंग्रेज विरोधी प्रचार करते हुए गांव-गांव जाते देखा गया था। उनके साथ हजारों लोग जुड़ गए थे। वे एक पालकी में बैठकर चलते थे। पालकी के आगे-आगे ढोल और पीछे उनके हजारों समर्थक चलते थे। 1857 में उन्हें फैजाबाद की जेल में बंद कर दिया गया। रिहा होने पर 22वीं नेटिव इन्फेंट्री के विद्रोही सिपाहियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। वे बहादुर व ताकतवर थे। साथ ही उनकी ‘पैगंबर’ होने की छवि ने उन्हें लोगों का विश्वास जीतने में सहायता की। बहुत सारे लोगों का विश्वास था कि उन्हें कोई हरा नहीं सकता। उनके पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं। चिनहाट के संघर्ष में उन्होंने हेनरी लारेंस को पराजित किया। मौलवी अहमदुल्ला का वास्तविक नाम सैयद अहमदखान (जियाऊद्दीन) था। वह सूफी संत सैयद फरकान अली का शिष्य था। इसी संत ने उसे अहमदुल्ला शाह का नाम दिया था। उसके विचार जेहादी बनते गए और वह अंग्रेज़ विरोधी प्रचारक बन गया।

प्रश्न 16.
विद्रोहियों के नेता के रूप में राव तुलाराम के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
राव तुलाराम ने रेवाड़ी क्षेत्र में विद्रोहियों को उल्लेखनीय नेतृत्व प्रदान किया। यह इसी क्षेत्र की एक छोटी रियासत के मालिक थे। इनका जन्म 1825 ई० में रामपुरा (रवाड़ी) के स्थान पर हुआ। 1839 ई० में पिता की मृत्यु के बाद इन्होंने रियासत को सँभाला। वह इस बात से नाराज थे कि अंग्रेजों ने अपनी नीति से इस रियासत को एक इस्तमरारी जागीर में बदल दिया अर्थात् ऐसी रियासत जिसमें सत्ता के अधिकार सीमित कर दिए गए हों, केवल भू-राजस्व एकत्र करने का अधिकार छोड़ा गया हो। राव तुलाराम ने 16 नवम्बर, 1857 को नारनौल के स्थान पर अंग्रेज़ों से जमकर लड़ाई की। इसमें हारने के बाद वे राजस्थान के कई राजाओं से सहायता माँगने के लिए गए। फिर सहायता के लिए ईरान व अफगानिस्तान गए। उन्होंने रूस के जार से भी सम्पर्क स्थापित किया। 23 सितंबर, 1863 में काबुल में 38 वर्ष की उम्र में इनका देहान्त हो गया।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
1857 के प्रमुख राजनीतिक कारणों पर संक्षेप में प्रकाश डालें।
उत्तर:
1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी प्रमुख राजनीतिक कारण इस प्रकार थे

1. विस्तार की नीति-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में साम्राज्य स्थापित करने के लिए भारतीय राज्यों को पराजित करके उन्हें सहायक संधि स्वीकार करने के लिए विवश किया। सहायक संधि भारतीय नरेशों को गुलाम बनाने का एक तरीका था। इसे स्वीकार करने वाले देशी राज्य की सैन्य-शक्ति को समाप्त कर दिया जाता था। फिर धीरे-धीरे उसका राज्य-क्षेत्र कंपनी के राज्य में मिलाया जाने लगता था। लेकिन 19वीं शताब्दी के मध्य पहुँचते-पहुँचते इन ‘अधीन’ भारतीय नरेशों को यह भय लगने लगा कि अंग्रेज़ धीरे-धीरे उनके राज्यों का अस्तित्व ही मिटा देंगे। क्योंकि अंग्रेज़ उग्र विस्तार की नीति अपना चुके थे।

2. राज्य हड़पने की नीति-लॉर्ड डलहौजी ने सात भारतीय राज्यों का विलय राज्य हड़पने की नीति के अंतर्गत कर लिया था अर्थात् इन राज्यों के नरेशों की अपनी निजी संतान (पुत्र) नहीं थी और गोद लिए हुए पुत्र को राज्य का उत्तराधिकारी मानने से कंपनी ने स्पष्ट इंकार कर दिया था। झांसी व सतारा में यह नीति विद्रोह का एक बड़ा कारण रही। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई अपने दत्तक पुत्र के राज अधिकार के लिए संघर्ष में उतरी थी।

3. पेंशन व उपाधियों की समाप्ति-कर्नाटक व तंजौर के शासक तथा पेशवा बाजीराव द्वितीय के गोद लिए हुए पुत्र नाना साहिब (धोंधू पंत) की पेंशन व उपाधि दोनों छीन लिए थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय की मृत्यु (1852 ई०) के पश्चात् नाना साहिब को न तो ‘पेशवा’ स्वीकार किया गया और न ही उसे 8 लाख रुपए वार्षिक पेंशन प्रदान की गई। नाना साहिब इस असहनीय अपमान से सख्त नाराज़ हुए। इसी नाराज़गी के कारण उन्होंने विद्रोह में भाग लिया तथा सिपाहियों व जन-विद्रोहियों का अदम्य साहस के साथ नेतृत्व किया।

4. बहादुर शाह जफर के प्रति अनादर भाव-मुगल साम्राज्य का सूर्यास्त तो बहुत पहले ही हो चुका था। उसके पास न तो सैन्य शक्ति थी और न ही राज्य। फिर भी भारत के लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति व आदर-सम्मान दोनों ही था। कंपनी के प्रशासक तब तक मुगल सम्राट के प्रति सम्मान करने का दिखावा करते रहे, जब तक उन्होंने भारत में अपनी स्थिति को मजबूत न कर लिया। लॉर्ड डलहौजी ने मुगल बादशाह बहादुर शाह की उपाधि को समाप्त करके उसे राजमहल व किले से वंचित करने का सुझाव दिया था। लॉर्ड केनिंग ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि बहादुर शाह की मृत्यु के पश्चात् मुगल बादशाह का पद समाप्त कर दिया जाएगा। इसके उत्तराधिकारी को महल व किले में रहने का अधिकार नहीं होगा। सम्राट् के प्रति यह दुर्व्यवहार बहुत-से लोगों के असंतोष का कारण बना।

5. विदेशी सत्ता कंपनी के शासन का चरित्र विदेशी था। इसे तलवार के बल पर स्थापित किया गया था। इस सत्ता के संचालक हज़ारों मील दूर लंदन में बैठे थे। वहीं भारत के लिए शासन संबंधी नीतियाँ व कानून बनाए जाते थे, जिन्हें लागू करने वाले अंग्रेज़ प्रशासनिक अधिकारी अपने जातीय अभिमान से ग्रस्त थे। वे भारतीयों को हीन समझते थे और उनसे मिलने-जुलने में अपनी तौहीन समझते थे।

ब्रिटिश सत्ता का भारत में लक्ष्य जन-कल्याण कभी नहीं रहा। इसका लक्ष्य इंग्लैंड के आर्थिक हितों को लाभ पहुंचाने में निहित था। स्पष्ट है कि इन राजनीतिक कारणों का भी जन-विद्रोह के विस्तार में योगदान रहा है।

प्रश्न 2.
विद्रोहियों के दृष्टिकोण पर एक संक्षिप्त निबन्ध लिखें।
अथवा
विद्रोही क्या चाहते थे? स्पष्ट करें।
उत्तर:
पर्याप्त स्रोतों के अभाव में विद्रोहियों के दृष्टिकोण को समझना इतना सरल नहीं है। वैसे तो इस विद्रोह से संबंधित दस्तावेजों की कमी नहीं है। परन्तु यह सब सरकारी रिकॉर्डस हैं। इनसे अंग्रेज़ अधिकारियों की सोच का तो पता चलता है लेकिन विद्रोहियों का दृष्टिकोण स्पष्ट नहीं होता।

अंग्रेज़ इसमें विजेता थे और विजेताओं का अपना ही दृष्टिकोण होता है। हारने वालों का दृष्टिकोण तो वैसे भी उनके द्वारा दबा दिया जाता है। 19वीं सदी के मध्य में हुए इस विद्रोह में भाग लेने वाले अधिकांश लोग अनपढ़ थे। जो कोई पढ़े-लिखे भी थे, उन्हें भी, जिस तरीके से विद्रोह को कुचला गया उसके चलते, कोई ब्यान दर्ज करवाने का अवसर नहीं मिला। फिर भी विद्रोहियों . द्वारा जारी की गई कुछ घोषणाएँ व इश्तहार मिलते हैं, जिनसे हमें विद्रोहियों के दृष्टिकोण की कुछ झलक मिलती है।

1. एकता की सोच-विद्रोही भारत के सभी सामाजिक समुदायों में एकता (Unity) चाहते थे। विशेषतौर पर हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया गया। उनकी घोषणाओं में जाति व धर्म का भेद किए बिना विदेशी राज़ के विरुद्ध समाज के सभी समुदायों का आह्वान किया गया। अंग्रेज़ी राज से पहले मुगल काल में हिंदू-मुसलमानों के बीच रही सहअस्तित्व की भावना का उल्लेख किया गया। बादशाह बहादुरशाह जफर की ओर से की गई घोषणा में मुहम्मद और महावीर दोनों की दुहाई देते हुए संघर्ष में शामिल होने की अपील की गई। बरेली में विद्रोह के नेता खानबहादुर के विरुद्ध हिंदू प्रजा को भड़काने के लिए अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स औट्रम (James Outram) द्वारा दिया गया धन का लालच भी कोई काम नहीं आया था। अंततः हारकर उसे 50,000 रुपये वापस ख़जाने में जमा करवाने पड़े जो इस उद्देश्य के लिए निकाले गए थे। इसी प्रकार दिल्ली में बकरीद के अवसर पर भी सांप्रदायिक तनाव पैदा करवाने की असफल कोशिश की गई थी।

2. विदेशी सत्ता को समाप्त करने की कोशिश-विद्रोहियों की घोषणाओं में ब्रिटिश राज के विरुद्ध सभी भारतीय सामाजिक होने का आह्वान किया गया। ब्रिटिश राज को एक विदेशी शासन के रूप में शोषणकारी माना गया। इससे संबंधित प्रत्येक चीज़ को पूर्ण तौर पर खारिज किया जा रहा था। अंग्रेजी सत्ता को निरंकुश के साथ-साथ षड़यं के लिए अंग्रेजी राज में कंपनी व्यापार तबाही का मुख्य कारण था। जबकि छोटे-बड़े भूस्वामियों के लिए अंग्रेज़ों द्वारा लागू भू-राजस्व व्यवस्था बर्बादी का कारण थी। अतः व्यापार की नई व्यवस्था तथा भू-राजस्व व्यवस्था को निशाना बनाया गया। अंग्रेज़ी व्यवस्था के कारण जो जीवन-शैली प्रभावित हुई उसे भी उन्होंने इंगित किया। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करना चाहते थे।

धर्म, सम्मान व रोजगार के लिए लड़ने का आह्वान किया गया। इस लड़ाई को एक ‘व्यापक सार्वजनिक भलाई’ घोषित किया गया। विद्रोहियों की घोषणाओं में सर्वाधिक डर इसी बात को लेकर अभिव्यक्त हुआ कि अंग्रेज़ हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहते हैं। वे हमारी जाति व धर्म को भ्रष्ट करके अंततः हमें ईसाई बनाने का प्रयास कर रहे हैं। इस डर और संदेह के कारण अफवाहें जोर पकड़ने लगीं। लोग इनमें विश्वास करने लगे।

3. अन्य उत्पीड़कों के विरुद्ध विद्रोह के दौरान विद्रोहियों के व्यवहार से कुछ एक ऐसा भी लगता है कि वे अंग्रेजी राज़ के साथ-साथ अन्य उत्पीड़कों के भी विरुद्ध थे। वे उन्हें भी नष्ट करना चाहते थे। उदाहरण के लिए उन्होंने सूदखोरों के बही-खाते जला दिये और उनके घरों में तोड़-फोड़ व आगजनी की। शहरी संभ्रांत लोगों को जानबूझ कर अपमानित भी किया। वे उन्हें अंग्रेजों के वफादार और उत्पीड़क मानते थे।

4. विकल्प की तलाश-निःसंदेह अंग्रेजी राज व्यवस्था को विद्रोही उखाड़ फेंकना चाहते थे। इसे उखाड़ने के बाद उनके पास भविष्य की नई राजनीतिक व्यवस्था की योजना नहीं थी। इसलिए वे पुरानी व्यवस्था को ही विकल्प के रूप में देख रहे थे। वे देशी राजा-रजवाड़ा शाही ही पुनः स्थापित करने के लिए लड़ रहे थे। वे 18वीं सदी की पूर्व ब्रिटिश दुनिया को ही दोबारा स्थापित देखना चाहते थे। इसलिए पुराने ढर्रे पर दरबार और दरबारी नियुक्तियाँ की गईं। आदेश जारी किए गए। भू-राजस्व वसूली और सैनिकों के वेतन भुगतान का प्रबंध किया गया। अंग्रेज़ों से लड़ने की योजना बनाने तथा सेना की कमान श्रृंखला निश्चित करने में भी प्रेरणा स्रोत 18वीं सदी का मुगल जगत ही था।

प्रश्न 3.
सन् 1857 के विद्रोह के लिए उत्तरदायी धार्मिक कारणों का संक्षिप्त में वर्णन करें।
उत्तर:
1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में धार्मिक कारणों की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण थी। कई तरह की अफवाहें इस विद्रोह के शुरू होने और इसके फैलने से जुड़ी हुई थीं। इन अफवाहों के विश्वास के पीछे भी धार्मिक भावनाएं थीं। सैनिक और सामान्य लोग सभी इनसे आहत थे। 19वीं सदी के दूसरे दशक से कम्पनी सरकार ने भारतीय समाज को ‘सुधारने के लिए कई कानून बनाए और साथ ही ईसाई प्रचारकों को ईसाई धर्म प्रचार की छूट दी। इनसे विद्रोह की भावनाएं उत्पन्न हुईं। संक्षेप में हम इस संदर्भ में धार्मिक विश्वासों की भूमिका को इस प्रकार रेखांकित कर सकते हैं

1. सामाजिक सुधार कानून-गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बैंटिक (1828-35) ने सती प्रथा, बाल-विवाह, कन्या-वध इत्यादि को रोकने के लिए कानून बनाए। 1856 में विधवा पुनर्विवाह अधिनियम पास किया। इन कानूनों का रूढ़िवादी भारतीयों ने विरोध किया क्योंकि वे इन्हें सामाजिक और धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप बता रहे थे। चूंकि ये एक विदेशी सत्ता द्वारा बनाए गए कानून थे। इसलिए भी लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक था।

2. पाश्चात्य शिक्षा का प्रसार-अंग्रेज़ी शिक्षण संस्थाओं में ईसाई धर्म व पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार धड़ल्ले से किया जा रहा था। नव-शिक्षित वर्ग पश्चिमी रहन-सहन और भाषा को अपनाकर गर्व अनुभव करने लगा था। इससे स्वाभाविक रूप से यह विश्वास होने लगा कि अंग्रेज़ हमारे धर्म को नष्ट करना चाहते हैं और वे हमारे बच्चों को ईसाई बनाना चाहते हैं।

3. ईसाई धर्म का प्रचार-धर्म के मामले में तो भारतीय भयभीत हो गए थे। लोगों में यह डर बैठ गया था कि अंग्रेज़ उन्हें ईसाई बनाना चाहते हैं। मिशनरियों द्वारा स्कूलों में धड़ल्ले से धर्म-प्रचार किया जाता था। जेलों में भी पादरी कैदियों में ईसाई धर्म का प्रचार करते थे। सेना में सरकार की ओर से पादरी नियुक्त किए जाने लगे जो धर्म-प्रचार करते थे। धर्म परिवर्तन करने वाले भारतीय सिपाहियों को पदोन्नति का प्रलोभन दिया जाता था।

4. उत्तराधिकार कानून-1850 ई० में सरकार ने एक उत्तराधिकार कानून (Lex Loci Act, 1850) पास करके लोगों की शंका को विश्वास में बदल दिया था। इस कानून के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म ग्रहण कर ले तो भी वह पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी रह सकता था। अब यदि कोई ईसाई धर्म ग्रहण करता था तो उसे पैतृक संपत्ति में से मिलने वाले हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता था।

5. सामान्य सेवा अधिनियम-1856 ई० में अंग्रेजों ने ‘सामान्य सेवा भती अधिनियम’ पास किया। इसके अनुसार भर्ती के समय ही प्रत्येक सैनिक को यह लिखित रूप में स्वीकार करना होता था कि जहाँ भी (भारत या भारत के बाहर) सरकार उसे युद्ध के लिए भेजेगी, वह जाएगा। इससे सैनिकों में भी असंतोष हुआ क्योंकि वे (अधिकांश उच्च जाति के हिन्दू सैनिक) समझते थे कि वे समुद्र पार जाने से उनकी जाति और धर्म दोनों नष्ट हो जाएंगे।

6. ‘चर्बी वाले कारतूस’ व अन्य अफवाहें-1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। गाय हिंदुओं के लिए पूजनीय थी तो सूअर से मुसलमान घृणा करते थे। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेज़ों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा।

अन्य कई तरह की अफवाहों में से एक थी आटे में हड्डियों के चूरे की मिलावट। इसे लोग अंग्रेजों के एक बड़े षड्यंत्र के रूप में देख रहे थे। उन्हें यह लग रहा था कि हिंदू और मुसलमान सभी भारतीयों के धर्म भ्रष्ट करने के एक षड्यंत्र के तहत ही आटे में गाय व सूअर की हड्डियों का चूरा मिलाया गया है। लोगों ने बाजार के आटे को हाथ तक लगाने से मना कर दिया। अधिकारी वर्ग के समझाने-बुझाने के प्रयास भी कोई काम नहीं आए। स्पष्ट है कि 1857 के घटनाक्रम को निर्धारित करने में बहुत-से धार्मिक विश्वासों की भूमिका रही है, क्योंकि अंग्रेजों की नीतियों से यह विश्वास आहत हो रहे थे।

प्रश्न 4.
जन विद्रोह के प्रसार का विस्तार से वर्णन करें।
उत्तर:
विद्रोह 10 मई को मेरठ से शुरू हुआ। 11 मई को बहादुरशाह जफर ने स्वयं को विद्रोह का नेता घोषित करके समर्थन दे दिया। 12 और 13 मई को उत्तर भारत में शांति नज़र आई। लेकिन दिल्ली में विद्रोहियों के कब्जे और बहादुर शाह के नेतृत्व की सूचना जहाँ-जहाँ पहुंचती गई, वहाँ-वहाँ उत्तर भारत में विद्रोह तेज होता गया। एक महीने के भीतर ही उत्तर भारत की सैन्य छावनियों, शहर व. देहात में बड़े स्तर पर विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। भारत में अंग्रेज़ी सेना में लगभग 2 लाख 32 हजार भारतीय सैनिक थे। इनमें से लगभग आधे. इसमें कूद पड़े। विद्रोह शुरू करने का तरीका (Pattern) लगभग सभी जगह एक जैसा ही था।

सिपाहियों ने विद्रोह शुरू होने का संकेत प्रायः शाम को तोप का गोला दाग कर या फिर बिगुल बजाकर दिया। फिर जेल, सरकारी खजाने, टेलीग्राफ दफ्तर, रिकॉर्ड रूम, अंग्रेज़ों के बंगलों सहित तमाम सरकारी भवनों पर हमले किए गए। रिकॉर्ड रूम जलाए गए। ‘मारो फिरंगियों को’ नारों के साथ हिंदी, उर्दू व फारसी में अपीलें जारी की गईं। बड़े स्तर पर गोरे लोगों पर आक्रमण हुए। हिंदुओं और मुसलमानों ने एकजुट होकर विद्रोह में आह्वान किया। लोग अंग्रेजी शासन के प्रति नफरत से भरे हुए थे। वे लाठी, दरांती, तलवार, भाला तथा देशी बंदूकों जैसे अपने परंपरागत हथियारों के साथ विद्रोह में कूद पड़े। इनमें किसान, कारीगर, दकानदार व नौकरी पेशा तथा धर्माचार्य इत्यादि सभी लोग शामिल थे।
सिपाहियों का यह विद्रोह एक व्यापक ‘जन-विद्रोह’ बन गया।

  • क्षेत्रीय विस्तार-सामाजिक व क्षेत्रीय दोनों तरह से निम्नलिखित क्षेत्र इसकी चपेट में आए

1. उत्तर प्रदेश-इस प्रदेश में लगभग समस्त गांवों, कस्बों और शहरों में यह फैल गया था। जून के पहले सप्ताह तक बरेली, लखनऊ, अलीगढ़, कानपुर, इलाहाबाद, आगरा, मेरठ, बनारस जैसे बड़े-बड़े नगर स्वतंत्र हो चुके थे। विद्रोहियों ने इन पर अधिकार जमा लिया था। बरेली में रूहेला सरदार खान बहादुर खाँ, कानपुर में नाना साहिब (धोंधू पंत) तथा इलाहाबाद में पेशे से एक अध्यापक व वहाबी नेता मौलवी लियाकत खाँ ने प्रशासन की कमान संभाल ली। लखनऊ में अवध के नवाबों के राजवंश ने सत्ता संभाल ली थी परंतु यहाँ विद्रोह का असली नेता अहमदुल्ला शाह था।

2. बिहार में विद्रोह-बिहार में पटना, दानापुर, शाहबाद तथा छोटा नागपुर में काफी बड़े स्तर पर जन-विद्रोह के रूप में फूटा। यहाँ नेतृत्व जगदीशपुर के ज़मींदार कुंवर सिंह व कुछ अन्य स्थानीय ज़मींदारों ने किया।

3. मध्य भारत में विद्रोह-मध्य-भारत के झाँसी, ग्वालियर, इंदौर, सागर तथा भरतपर आदि क्षेत्रों में व्यापक प्रभाव रहा। मख्यतः यहाँ विद्रोह का नेतृत्व झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई और तात्या टोपे ने किया। राजस्थान और मध्य प्रदेश के अधिकतर देशी राजा अंग्रेज़ों के वफादार बने रहे। परंतु कई स्थानों पर जनता और सेना अपने शासकों का साथ छोड़कर विद्रोही हो गई थी। उदाहरण के लिए ग्वालियर के सैनिकों और लोगों ने विद्रोह में भाग लिया, परंतु सिंधिया राजा ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए अंग्रेज़ों का साथ दिया।

4. पंजाब व हरियाणा में विद्रोह-पंजाब में तो अंग्रेज़ों के विरुद्ध जेहलम, स्यालकोट आदि इलाकों में कुछ छिट-पुट घटनाएँ ही हुईं, लेकिन हरियाणा के हांसी, हिसार, रोहतक, रिवाड़ी और दिल्ली के साथ लगते मेवात क्षेत्र में बड़े स्तर पर लोगों ने हथियार उठाए। रिवाड़ी में राव तुला राम व उसके चचेरे भाई राव कृष्ण गोपाल ने इसका नेतृत्व किया। झज्जर में अब्दुल रहमान खाँ, मेवात में सरदार अली हसन खाँ तथा बल्लभगढ़ में राव नाहर सिंह और फर्रुखनगर के नवाब फौजदार खाँ विद्रोहियों के नेता थे।
यह विद्रोह मुख्यतः उत्तर भारत में ही था लेकिन कुछ छुट-पुट घटनाएँ दक्षिण व पूर्वी भारत में भी घटीं। पूर्व में दूर-दराज के क्षेत्र आसाम में भी इस विद्रोह की हवा पहुंची।
इस प्रकार यह उत्तर भारत में एक व्यापक विद्रोह था। बहुत-से अंग्रेज़ अधिकारियों में इससे घबराहट फैल गई थी। उन्हें लगने लगा था कि भारत उनके हाथ से निकल रहा है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान

प्रश्न 5.
अवध में विद्रोह की व्यापकता के कारण स्पष्ट करें।
अथवा
अवध में विद्रोह अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक ‘लोक प्रतिरोध’ में कैसे बदल गया? स्पष्ट करें।
उत्तर:
अन्य स्थानों की अपेक्षा अंग्रेजों के विरुद्ध लोक-प्रतिरोध अवध में अधिक था। लोग फिरंगी राज के आने से अत्यधिक आहत थे। उन्हें लग रहा था कि उनकी दुनिया लुट गई है। वह सब कुछ बिखर गया है, जिन्हें वे प्यार करते थे। अंग्रेजी राज की नीतियों ने किसानों, दस्तकारों, सिपाहियों, ताल्लुकदारों और राजकुमारों को परस्पर जोड़ दिया था। फलस्वरूप यह एक लोक-प्रतिरोध बनकर उभरा।

1. अवध का विलय-अवध का विलय 1856 में विद्रोह फूटने से लगभग एक वर्ष पहले ‘कुशासन’ का आरोप लगाते हुए किया गया था। इसे लोगों ने न्यायसंगत नहीं माना। बल्कि वे इसे अंग्रेज़ों का एक विश्वासघात पूर्ण कदम मान रहे थे। अवध को ब्रिटिश राज में मिलाने की इच्छा काफी पहले से बन चुकी थी। 1851 में ही लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध के बारे में कहा था कि “यह गिलास फल एक दिन हमारे ही मुँह में आकर गिरेगा” उसकी दिलचस्पी अवध की उपजाऊ जमीन को हड़पने में भी थी। यह जमीन नील और कपास की खेती के लिए उपयुक्त थी। अवध के विलय से एक भावनात्मक उथल-पुथल शुरू हो गई। लोगों में नवाब व उसके परिवार से गहरी सहानुभूति थी। वे उन्हें दिल से चाहते थे। जब नवाब लखनऊ से विदा ले रहे थे तो बहुत सारे लोग उनके पीछे विला

2. उच्च वर्गों के हितों को हानि-देशी रियासतों के पतन के बाद परंपरागत दरबारी कुलीन उच्च वर्ग भी बर्बाद हो गया। राजा-नवाबों की ओर से इन परिवारों के सदस्यों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। जन-सामान्य में यह प्रतिष्ठित लोग थे। देशी राज्यों के विलय के बाद इनकी सुख-सुविधा, विशेषाधिकार व प्रतिष्ठा सब खत्म हो गई। इससे असंतोष पनपा और वे विद्रोहियों के सहयोगी बन गए।

3. आश्रित वर्गों को हानि-देशी राज्यों के विलय से सेना व सामान्य वर्ग के लोगों पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ा। हज़ारों सैनिक बेरोज़गार हो गए। कुछ तो रोजी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। अवध की सेना में से 45,000 सिपाहियों को मामूली पेंशन देकर बर्खास्त कर दिया गया था। मात्र 1000 को ब्रिटिश सेना में रखा गया और वे भी कंपनी की नौकरी से खुश नहीं थे। दरबार व उसकी संस्कृति खत्म होने के साथ ही कवि, कारीगर, बावर्ची, संगीतकार, नर्तक, सरकारी कर्मचारी व अन्य बहुत सारे लोगों की आजीविका समाप्त हो गई।

4. ताल्लुकदारों को क्षति-ताल्लुकदार अवध क्षेत्र में वैसे ही छोटे राजा थे जैसे बंगाल में ज़मींदार थे। वे छोटे महलनुमा घरों इनके अपने दुर्ग व सेना थी। 1856 में अवध का अधिग्रहण करते ही इन ताल्लुकदारों की सेनाएँ भंग कर दी गईं और दुर्ग भी ध्वस्त कर दिए गए।

जिनके पास ज़मीन के कागज-पत्र ठीक नहीं थे, उनकी ज़मीनें छीन ली गई थीं। लगभग 21,000 ताल्लुकदारों से ज़मीनें छीन ली गईं। सबसे बुरी मार दक्षिणी अवध के ताल्लुकदारों पर पड़ी। कुछ तो रोज़ी-रोटी को मोहताज़ हो गए थे। उनका सामाजिक सम्मान, स्थिति सब चली गई। ऐसी स्थिति में इन. जागीरदारों ने विद्रोहियों का साथ दिया।

5. किसानों में असंतोष-विद्रोह में बहुत बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया। इससे अंग्रेज़ अधिकारी काफी परेशान हुए थे। उन्हें यह आशा थी कि जिन किसानों को हमने ज़मीन का मालिक घोषित किया है वे तो अंग्रेज़ समर्थक रहेंगे ही। परंतु ऐसा नहीं हुआ। ब्रिटिश व्यवस्था की अपेक्षा वे ताल्लुकदारी को ही बेहतर मान रहे थे। ज़मींदार बुरे वक्त में उनकी सहायता भी करता था। लोगों की दृष्टि में इन ताल्लुकदारों की छवि दयालु अभिभावकों की थी। तीज-त्योहारों पर भी उन्हें कर्जा अथवा मदद मिल जाती थी, फसल खराब होने पर भी उनकी दया-दृष्टि किसानों पर रहती थी। मुसीबत के समय यह नई सरकार कोई सहानुभूति की भावना कृषकों से नहीं रखती थी।

किसान ये जान चुके थे कि अवध में भू-राजस्व की दर का आकलन बहुत बढ़ा-चढ़ा कर किया गया है। कुछ स्थानों पर तो भू-राजस्व की माँग में 30 से 70% तक की वृद्धि हुई थी। इस राजस्व व्यवस्था से सरकार के राजस्व में तो वृद्धि हुई लेकिन किसानों का शोषण कम होने की बजाय बढ़ गया। वस्तुतः इन्हीं कारणों से किसानों ने विदेशी सत्ता के विरुद्ध शस्त्र उठाए।

6. किसान व सेना में संबंध-अवध में किसान और सैनिक परस्पर गहन रूप से जुड़े हुए थे। सेना का गठन गांवों के किसानों तथा ज़मींदारों में से ही किया गया था। बल्कि अवध को तो “बंगाल आर्मी की पौधशाला” (“Nursery of the Bengal Army”) कहा जाता था। यह सैनिक अपने गांव-परिवार से जुड़े हुए थे। हर सैनिक किसी किसान का बेटा, भाई या पिता था। एक भाई खेत में हल जोत रहा था तो दूसरे ने वर्दी पहन ली थी। वह भी गांव में किए जा रहे अंग्रेज़ अधिकारियों के जुल्म से दुखी होता था। स्वाभाविक तौर पर उसमें भी इससे आक्रोश पैदा होता था। भूमि-कर की बढ़ी दरों व कठोरता से उसकी उगाही से किसान त्राही-त्राही कर रहा था। यहीं से अधिकांश सैनिक भर्ती किए हुए थे। नए भू-राजस्व कानूनों से जहाँ किसान, जमींदार ताल्लुकदार सभी पीड़ित थे वहीं सैनिक भी कम दुखी नहीं थे। स्पष्ट हैं कि इन सभी कारणों के संयोजन से ही अवध में विद्रोह एक जबरदस्त लोक-प्रतिरोध का रूप धारण कर गया।

प्रश्न 6.
1857 की घटना के बारे में प्रचलित दो मुख्य विचारधाराओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
अथवा
1857 की घटना ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ था या मात्र एक ‘सैनिक विद्रोह’ था? स्पष्ट करें।
उत्तर:
1857 की घटना की प्रकृति को लेकर इतिहासकारों में काफी मतभेद रहा है। भारतीय देशभक्तों ने आजादी की लड़ाई लड़ते हुए इसे ‘प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम’ की संज्ञा दी, जबकि दूसरी ओर अंग्रेज़ अधिकारियों और लेखकों ने इसे शुद्ध रूप में एक ‘सैनिक विद्रोह’ बताया। आजकल इतिहासकार इसे ‘जन-विद्रोह’ अथवा ‘1857 का आंदोलन’ के नाम से पुकारते हैं। यहाँ हम इन्हीं दो विचारों के तर्कों पर विचार करेंगे कि यह सैनिक विद्रोह था अथवा प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम।

1. सैनिक विद्रोह-अंग्रेज लेखक सर जॉन लारेंस तथा जॉन सीले इत्यादि ने 1857 की घटना को एक सैनिक विद्रोह बताया है। सीले का विचार है कि “यह देशभक्ति की भावना से रहित स्वार्थपूर्ण सैनिक विद्रोह था।” इस विचार के पक्ष में इन लेखकों ने निम्नलिखित तर्क दिए हैं

  • विद्रोह की शुरूआत मेरठ सैनिक छावनी से हुई और इसका प्रभाव क्षेत्र मुख्यतः सैनिकों में था। विशेषतः उत्तर भारत की छावनियों में ही रहा।
  • कुछ स्वार्थी लोगों को छोड़कर आम लोगों ने सैनिकों का साथ नहीं दिया।
  • विद्रोहियों में देश प्रेम , की भावना नहीं थी।
  • सैनिक वेतन, भत्ते व अन्य कुछ छोटी-मोटी समस्याओं से नाराज थे। साथ ही उनकी धार्मिक भावनाओं को ध्यान में न रखने के कारण वे भड़क उठे।
  • सभी जगह विद्रोह पहले सैनिकों ने शुरू किया और बाद में वे शासक उनके साथ मिल गए जिनकी सत्ता छीन ली गई थी।
    अतः इन तर्कों के आधार पर पश्चिमी लेखकों का मत है कि 1857 की घटना एक सैनिक विद्रोह’ से अधिक कुछ नहीं था।

2. प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम-इस मत के समर्थकों में वीर सावरकर, अशोक मेहता, पट्टाभि सीतारमैय्या तथा इतिहासकार ईश्वरीप्रसाद सरीखे महानुभाव हैं। उल्लेखनीय है कि सन् 1909 में वीर सावरकर की पुस्तक ‘1857 का भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम’ आजादी के दीवानों के लिए प्रेरणा स्रोत बन गई थी। इन लेखकों के मुख्य तर्क इस प्रकार हैं

1. विद्रोही देश भक्ति से प्रेरित थे। वे स्वधर्म और स्वराज के लिए लड़े।,

2. विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए यह एक सामूहिक प्रयास था। इसमें हिन्दू, मुसलमान और विभिन्न जातियों के लोगों ने मिलकर संघर्ष किया और बलिदान दिया।
धर्बी वाले कारतूसों’ ने तो मात्र चिंगारी का काम किया। वास्तव में यह ब्रिटिश नीतियों से पैदा हुए दीर्घकालीन असंतोष का परिणाम था। यदि ये ‘कारतूस’ न भी होते तो भी यह मुक्ति का आंदोलन तो चलना ही था। यद्यपि उपरोक्त तर्कों के आधार पर इसे आजादी की पहली लड़ाई बताया गया। तथापि कुछ इतिहासकारों ने इस विचार को भी उचित नहीं माना है। उदाहरण के लिए आर०सी० मजूमदार ने लिखा है, “तथाकथित राष्ट्रीय मुक्ति-संग्राम न तो पहला था, न राष्ट्रीय था और न ही मुक्ति का संग्राम था।”

निष्कर्ष-उपरोक्त दोनों मत अपनी-अपनी दृष्टि का परिणाम हैं। अंग्रेज़ लेखक कभी यह मानने को तैयार नहीं थे कि ब्रिटिश सरकार की नीतियों के कारण यह संग्राम पैदा हुआ। वे अपनी छोटी-मोटी गलतियों; जैसे कि कारतूसों का मामला आदि से ही इसे जोड़कर देखते थे। दूसरी ओर ‘पहला स्वतन्त्रता संग्राम’ बताने वाले लेखक देशभक्ति की भावना से प्रेरित थे और यही भावना पैदा करना चाहते थे। इसलिए उस जमाने में राष्ट्रीय विचारधारा के अभाव में भी उन्होंने इसे राष्ट्रीय आंदोलन बताया। इसकी सबसे बड़ी कमी थी कि विद्रोहियों के सामने भविष्य की स्पष्ट योजना नहीं थी। वे पुरानी व्यवस्था को पुनः स्थापित करने की सोच रहे थे।

प्रश्न 7.
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिक क्यों शामिल हुए?
उत्तर:
1857 ई० के विद्रोह में भारतीय सैनिकों के शामिल होने के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(1) सिपाहियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। एक घुड़सवार सेना के सिपाही को 27 रुपए और पैदल सेना के सिपाही को मात्र 7 रुपए मिलते थे। वर्दी और भोजन का खर्च निकालकर मुश्किल से उनके पास एक या दो रुपए बच पाते थे।

(2) सेना में गोरे व काले के आधार पर भेदभाव आम बात थी। गोरे सैनिकों के अधिकार व सुविधाएँ भारतीय सैनिकों की तुलना में कहीं अधिक थीं। वेतन और भत्तों में भेदभाव किया जाता था। भारतीय सैनिकों के पदोन्नति के अवसर लगभग न के बराबर थे।

(3) सिपाहियों को अपनी जाति तथा धर्म के खोने का भय सता रहा था। सिपाहियों के धर्म और जाति से सम्बन्धित चिह्न पहनने पर रोक लगा दी गई थी। सैनिकों के लिए विदेश में कुछ समय काम करना अनिवार्य कर दिया गया था।

(4) 1857 ई० का विद्रोह मुख्यतः चर्बी वाले कारतूसों की अफवाह को लेकर शुरू हुआ। 1857 ई० के शुरू में ही भारतीय सिपाहियों में एक अफवाह थी कि नए दिए गए कारतूसों में गाय व सूअर की चर्बी लगी हुई है। इन्हीं ‘चर्बी वाले कारतूसों’ ने इन सिपाहियों को अपने दीन-धर्म की रक्षा के लिए एकजुट कर दिया था। अतः दोनों धर्मों के सैनिकों ने इसे अंग्रेजों का धर्म भ्रष्ट करने का षड्यंत्र समझा। इन कारतूसों के प्रति सिपाहियों की नाराज़गी को भांपते हुए ब्रिटिश अधिकारियों ने सिपाहियों को लाख समझाने का प्रयत्न किया परंतु किसी ने इस पर विश्वास नहीं किया। इसने सिपाहियों में अत्यंत रोष उत्पन्न कर दिया था।

(5) सिपाहियों को अपने देशवासियों तथा गाँव के लोगों से बहुत प्रेम था। अतः बहुत-से स्थानों पर सिपाही गाँव की जनता का साथ देने के लिए स्वतंत्रता संग्राम में कूद गए।

(6) अंग्रेज अधिकारी भारतीय सैनिकों से दुर्व्यवहार किया करते थे। वे उन्हें अंग्रेज सिपाहियों की तुलना में हीन समझते थे। वे भारतीय सिपाहियों के रहन-सहन तथा उनकी परम्पराओं का मजाक उड़ाते थे। इसी कारण भारतीय सैनिकों में रोष बढ़ने लगा और वे 1857 ई० में हुए विद्रोह में शामिल हो गए।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 11 विद्रोही और राज : 1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए.

1. वास्कोडिगामा भारत पहुँचा-
(A) 1857 ई० में
(B) 1498 ई० में
(C) 1492 ई० में
(D) 1600 ई० में
उत्तर:
(B) 1498 ई० में

2. प्लासी की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(A) 1757 ई० में

3. प्लासी की लड़ाई में हार हुई
(A) नवाब सिराजुद्दौला
(B) नवाब वाजिद अली शाह
(C) अलीवर्दी खाँ
(D) लॉर्ड क्लाइव
उत्तर:
(A) नवाब सिराजद्दौला

4. बक्सर की लड़ाई हुई
(A) 1757 ई० में
(B) 1764 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1764 ई० में

5. इलाहाबाद की संधि कब हुई?
(A) 1757 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1765 ई० में
(D) 1764 ई० में
उत्तर:
(C) 1765 ई० में

6. ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी का अधिकार कब प्राप्त हुए?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1784 ई० में
(D) 1800 ई० में
उत्तर:
(A) 1765 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

7. भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई
(A) गोवा से
(B) बंगाल प्रांत से
(C) मद्रास से
(D) बंबई से
उत्तर:
(B) बंगाल प्रांत से

8. बंगाल में ठेकेदारी प्रणाली की शुरुआत की
(A) लॉर्ड क्लाइव ने
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने
(C) लॉर्ड कॉनवालिस ने
(D) लॉर्ड डलहौजी ने
उत्तर:
(B) वारेन हेस्टिंग्ज़ ने

9. ब्रिटिश काल में लागू की जाने वाली भू-राजस्व प्रणालियाँ कौन-सी थीं ?
(A) स्थाई बन्दोबस्त
(B) रैयतवाड़ी व्यवस्था
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) उपरोक्त सभी
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी

10. कलेक्टर का मुख्य काम था
(A) दंड देना
(B) चुनाव करवाना
(C) कर एकत्र करवाना
(D) धन बाँटना
उत्तर:
(C) कर एकत्र करवाना

11. बंगाल में स्थायी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने
(B) लॉर्ड डलहौजी ने
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने
(D) लॉर्ड वेलेज्ली ने
उत्तर:
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस ने

12. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1765 ई० में
(B) 1773 ई० में
(C) 1793 ई० में
(D) 1820 ई० में
उत्तर:
(C) 1793 ई० में

13. स्थायी बन्दोबस्त किसके साथ किया गया?
(A) जमींदारों के साथ
(B) मुजारों के साथ
(C) किसानों के साथ
(D) गाँवों के साथ
उत्तर:
(A) जमींदारों के साथ

14. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को मिलता था-
(A) \(\frac{1}{2}\) भाग
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग
(C) \(\frac{10}{11}\) भाग
(D) बिल्कुल भी नहीं
उत्तर:
(B) \(\frac{1}{11}\) भाग

15. वसूल किए गए लगान में से ज़र्मींदार को सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था
(A) \(\frac{1}{5}\) भाग
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग
(C) \(\frac{1}{11}\) भाग
(D) \(\frac{1}{2}\) भाग
उत्तर:
(B) \(\frac{10}{11}\) भाग

16. बंगाल में जोतदार थे
(A) गाँव के मुखिया
(B) प्रांत के नवाब
(C) भूमि पर काम करने वाले
(D) कर एकत्र करने वाले
उत्तर:
(A) गाँव के मुखिया

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

17. जमींदार का वह अधिकारी जो गाँव से भू-राजस्व इकट्ठा करता था, क्या कहलाता था?
(A) मंडल
(B) अमला
(C) लठियात
(D) साहूकार
उत्तर:
(B) अमला

18. ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(B) पिट्स इंडिया एक्ट
(C) 1858 ई० का एक्ट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) रेग्यूलेटिंग एक्ट

19. रेग्यूलेटिंग एक्ट पास किया गया
(A) 1858 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1757 ई० में
उत्तर:
(C) 1773 ई० में

20. रेग्यूलेटिंग के दोषों को दूर करने के लिए एक्ट पास किया गया
(A) पिट्स इंडिया एक्ट
(B) रेग्यूलेटिंग एक्ट
(C) चार्टर एक्ट
(D) रोलेट एक्ट
उत्तर:
(A) पिट्स इंडिया एक्ट

21. पिट्स इंडिया एक्ट पास किया गया
(A) 1773 ई० में
(B) 1784 ई० में
(C) 1813 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1784 ई० में

22. मद्रास प्रेसीडेंसी में मुख्यतः कौन-सी भू-राजस्व प्रणाली लागू की गई?
(A) स्थायी बंदोबस्त
(B) ठेकेदारी प्रणाली
(C) महालवाड़ी प्रणाली
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली
उत्तर:
(D) रैयतवाड़ी प्रणाली

23. दक्कन में किसान विद्रोह कब हुआ?
(A) 1818 ई० में
(B) 1820 ई० में
(C) 1875 ई० में
(D) 1855 ई० में
उत्तर:
(C) 1875 ई० में

24. मद्रास में रैयतवाड़ी बन्दोबस्त किसने लागू किया?
(A) लॉर्ड कॉर्नवालिस
(B) थॉमस मुनरो
(C) लॉर्ड विलियम बैंटिंक
(D) लॉर्ड वेलेजली
उत्तर:
(B) थॉमस मुनरो

25. रैयत कौन थे?
(A) किसान
(B) ज़मींदार
(C) साहूकार
(D) जोतदार
उत्तर:
(A) किसान

26. औपनिवेशिक काल में लागू किए जाने वाले भू-राजस्व थे
(A) इस्तमरारी बंदोबस्त
(B) रैयतवाड़ी बंदोबस्त
(C) महालवाड़ी बंदोबस्त
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

27. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त को कहाँ लागू किया गया?
(A) बंगाल में
(B) पंजाब में
(C) असम में
(D) मद्रास में
उत्तर:
(D) मद्रास में

28. रैयतवाड़ी बन्दोबस्त कब लागू किया गया?
(A) 1820 ई० में
(B) 1793 ई० में
(C) 1795 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(A) 1820 ई० में

29. ब्रिटिश संसद में पाँचवीं रिपोर्ट कब प्रस्तुत की गई?
(A) 1813 ई० में
(B) 1713 ई० में
(C) 1613 ई० में
(D) 1913 ई० में
उत्तर:
(A) 1813 ई० में

30. पहाड़िया लोग कहाँ रहते थे?
(A) कश्मीर की पहाड़ियों में
(B) राजमहल की पहाड़ियों में
(C) मनाली की पहाड़ियों में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) राजमहल की पहाड़ियों में

31. पहाड़िया लोग खेती के लिए क्या प्रयोग करते थे?
(A) हल
(B) कुदाल
(C) नहर
(D) ट्रैक्टर
उत्तर:
(B) कुदाल

32. संथालों ने दामिन-इ-कोह की स्थापना कब की?
(A) 1812 ई० में
(B) 1832 ई० में
(C) 1822 ई० में
(D) 1932 ई० में
उत्तर:
(B) 1832 ई० में

33. संथार्लों का अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह कब हुआ?
(A) 1845 ई० में
(B) 1855 ई० में
(C) 1865 ई० में
(D) 1875 ई० में
उत्तर:
(B) 1855 ई० में

34. संथाल किन लोगों को घृणा से ‘दिकू’ कहते थे?
(A) साहूकार
(B) जमींदार
(C) जोतदार
(D) सभी बाहरी लोगों को
उत्तर:
(D) सभी बाहरी लोगों को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

35. डेविड रिकॉर्डो कौन था?
(A) इंग्लैण्ड का चिकिस्सक
(B) कम्पनी का इंजीनियर
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री
(D) फ्रांस का समाजशास्त्री
उत्तर:
(C) इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री

36. परितीमन कानून कब पारित किया गया?
(A) 1858 ई० में
(B) 1875 ई० में
(C) 1850 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

37. अमेरिका में गृह युद्ध कब आरंभ हुआ था?
(A) 1857 ई० में
(B) 1864 ई० में
(C) 1861 ई० में
(D) 1865 ई० में
उत्तर:
(C) 1861 ई० में

38. 1875 ई० का दक्कन विद्योह कहाँ से प्रारंभ हुआ?
(A) सूपा से
(B) हम्पी से
(C) अहमदनगर से
(D) बम्बई से
उत्तर:
(A) सूपा से

39. रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक माना गया-
(A) ज़मींदार को
(B) रैयत को
(C) नवाब को
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) रैयत को

40. रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया?
(A) 30 वर्षों के लिए
(B) 50 वर्षों के लिए
(C) 20 वर्षों के लिए
(D) हमेशा के लिए
उत्तर:
(A) 30 वर्षों के लिए

41. बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त शुरू किया-
(A) 1793 ई० में
(B) 1818 ई० में
(C) 1773 ई० में
(D) 1784 ई० में
उत्तर:
(B) 1818 ई० में

42. ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई-
(A) 1850 ई० में
(B) 1853 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1858 ‘ई० में
उत्तर:
(C) 1857 ई० में

43. मैनचेस्टर कॉटन कंपनी बनी-
(A) 1853 ई० में
(B) 1857 ई० में
(C) 1858 ई० में
(D) 1859 ई० में
उत्तर:
(D) 1859 ई० में

44. अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हुआ-
(A) 1861 ई० में
(B) 1865 ई० में
(C) 1857 ई० में
(D) 1850 ई० में
उत्तर:
(B) 1865 ई० में

45. पहाड़िया लोग खेती करते थे-
(A) स्थायी खेती
(B) झूम खेती
(C) बागों की खेती
(D) मिश्रित खेती
उत्तर:
(B) झूम खेती

46. दामिन-इ-कोह नामक भू-भाग पर बसाया गया-
(A) संथालों को
(B) ज़मींदारों को
(C) पहाड़ियों को
(D) अंग्रेज़ों को
उत्तर:
(A) संथालों को

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

प्रश्न 1.
वास्कोडिगामा भारत कब आया?
उत्तर:
वास्कोडिगामा 1498 ई० में भारत पहुंचा।

प्रश्न 2.
प्लासी की लड़ाई कब हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई 1757 ई० में हुई।

प्रश्न 3.
प्लासी की लड़ाई किस-किसके मध्य हुई?
उत्तर:
प्लासी की लड़ाई बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला व अंग्रेजों के बीच लड़ी गई।

प्रश्न 4.
बक्सर का युद्ध कब हुआ?
उत्तर:
बक्सर का युद्ध 1764 ई० में हुआ।

प्रश्न 5.
भारत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत किस प्रांत में हुई?
उत्तर:
भारत में बंगाल प्रांत में औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था की शुरुआत हुई।

प्रश्न 6.
अंग्रेजों को दीवानी का अधिकार किस संधि से प्राप्त हुआ?
उत्तर:
1765 ई० में इलाहाबाद की संधि से अंग्रेज़ों को दीवानी का अधिकार प्राप्त हुआ।

प्रश्न 7.
दीवानी के अधिकार का क्या अर्थ था?
उत्तर:
दीवानी के अधिकार का अर्थ था-राजस्व वसूली का अधिकार।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 8.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब व किसने शुरू किया?
उत्तर:
बंगाल में 1793 ई० में गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त शुरू किया। इसे ज़मींदारी बंदोबस्त भी कहा जाता है।

प्रश्न 9.
बंगाल में भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली किसने लागू की?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स ने भू-राजस्व की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की।

प्रश्न 10.
ठेकेदारी (इजारेदारी) प्रणाली को और अन्य किस नाम से पुकारा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली को फार्मिंग प्रणाली (Farming System) भी कहा गया।

प्रश्न 11.
ठेकेदारी प्रणाली का नियंत्रण किसे सौंपा गया?
उत्तर:
ठेकेदारी प्रणाली जिला कलेक्टरों के नियंत्रण में लागू की गई।

प्रश्न 12.
कलेक्टर का मुख्य काम क्या था?
उत्तर:
कलेक्टर का मुख्य काम कर ‘इकट्ठा’ करना था।

प्रश्न 13.
बंगाल में ग्राम-मुखिया को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम-मुखिया को जोतदार या मंडल कहा जाता था।

प्रश्न 14.
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त किसके साथ किया?
उत्तर:
बंगाल में सरकार ने स्थायी बंदोबस्त बंगाल के छोटे राजाओं एवं ताल्लुकेदारों के साथ किया।

प्रश्न 15. बंगाल में स्थायी बंदोबस्त किसने लागू किया?
उत्तर:
बंगाल के गवर्नर जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया।

प्रश्न 16.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त कब लागू किया गया?
उत्तर:
1793 ई० में बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 17.
स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रथा) कहाँ-कहाँ लागू किया गया?
उत्तर:
बंगाल, बिहार, उड़ीसा, बनारस व उत्तरी कर्नाटक में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया।

प्रश्न 18.
स्थायी बंदोबस्त में बंगाल के छोटे राजाओं और ताल्लुकेदारों को किस रूप में वर्गीकृत किया गया?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में छोटे राजाओं व ताल्लुकेदारों को ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

प्रश्न 19.
स्थायी बंदोबस्त की मुख्य विशेषता क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई।

प्रश्न 20.
ज़मींदार को वसूल किए गए लगान में से कितना भाग अपने पास रखना होता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{1}{11}\) भाग अपने पास रखना होता था।

प्रश्न 21. जमींदार को वसूल किए लगान में से कितना भाग सरकारी खजाने में जमा करवाना पड़ता था?
उत्तर:
ज़मींदार को किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac{10}{11}\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।

प्रश्न 22.
ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर रिपोर्ट किस नाम से जानी जाती है?
उत्तर:फरमिंगर रिपोर्ट पाँचवीं रिपोर्ट के नाम से जानी जाती है।

प्रश्न 23.
फरमिंगर रिपोर्ट का संबंध किससे था?
उत्तर:
फरमिंगर रिपोर्ट भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 24.
सूर्यास्त विधि (Sunset Law) से क्या तात्पर्य था?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि का तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारी नीलाम कर दी जाती थी।

प्रश्न 25.
जोतदार कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार (मंडल) कहा जाता था।

प्रश्न 26.
जमीदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी क्या कहलाता था?
उत्तर:
ज़मींदार का कर एकत्र करने वाला अधिकारी ‘अमला’ कहलाता था।

प्रश्न 27.
बंगाल में बटाईदार को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बटाईदार को अधियार या बरगादार कहा जाता था।

प्रश्न 28.
शास्त्रीय (क्लासिकल) अर्थशास्त्री एडम स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम बताओ।
उत्तर:
शास्त्रीय अर्थशास्त्रीय एड्म स्मिथ की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम ‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ (Wealth of Nations) थी।

प्रश्न 29.
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में किस प्रकार के व्यापार का विरोध किया गया?
उत्तर:
‘राष्ट्रों की सम्पत्ति’ पुस्तक में व्यापारिक एकाधिकार का विरोध किया गया।

प्रश्न 30.
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों की क्या कहकर खिल्ली उड़ाई जाती थी?
उत्तर:
ब्रिटेन से लौटे कंपनी के कर्मचारियों को ‘नवाब’ कहकर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती थी।

प्रश्न 31.
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए कौन-सा एक्ट पास किया गया?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया पर नियंत्रण के लिए सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 32.
‘इलाहाबाद की संधि’ कब की गई थी?
उत्तर:
‘इलाहाबाद की संधि’ 12 अगस्त, 1765 को की गई थी।

प्रश्न 33.
रैयत’ शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘रैयत’ शब्द को किसान के लिए प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन क्या थे?
उत्तर:
झूम की खेती, जंगल के उत्पाद व शिकार पहाड़िया लोगों के जीविकापार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
चार्टर एक्ट पास करने का क्या उद्देश्य था?
उत्तर:
चार्टर एक्ट के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 36.
पहाडिया लोगों की खेती का तरीका क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोग झूम खेती करते थे।

प्रश्न 37.
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई ज़मीन का पहाड़िया लोग किस रूप में प्रयोग करते थे?
उत्तर:
कुछ वर्षों के लिए खाली छोड़ी गई परती भूमि को पहाड़िया लोग पशु चराने के लिए प्रयोग करते थे।

प्रश्न 38.
ईस्ट इंडिया कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ क्यों शुरू की?
उत्तर:
संसाधनों का दोहन व प्रशासनिक दृष्टि से कंपनी ने पहाड़िया क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 39. किस ब्रिटिश अधिकारी ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए?
उत्तर:
भागलपुर के कलेक्टर ऑगस्टस क्लीवलैंड (Augustus Cleveland) ने पहाड़िया लोगों से संधि के प्रयास शुरू किए।

प्रश्न 40.
रैयतवाड़ी व्यवस्था कब और कहाँ अपनाई गई ?
उत्तर:
रैयतवाड़ी व्यवस्था सन् 1820 में मद्रास प्रेसीडेंसी में अपनाई गई। इस व्यवस्था का जन्मदाता थॉमस मुनरो को माना जाता है। यह व्यवस्था 30 वर्षों के लिए लागू की गई।

प्रश्न 41.
फ्रांसिस बुकानन ने पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा कब की?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन ने 1810-11 ई० की सर्दियों में पहाड़िया क्षेत्र की यात्रा की।

प्रश्न 42.
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक क्या था?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों की जीवन-शैली का प्रतीक कुदाल था।

प्रश्न 43.
‘दामिन-इ-कोह’ किसे कहा गया?
उत्तर:
‘दामिन-इ-कोह’ उस विस्तृत भू-भाग को कहा गया जो कंपनी सरकार द्वारा संथालों को दिया गया।

प्रश्न 44.
कंपनी सरकार का संथालों के साथ क्या अनुबंध हुआ?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों के साथ यह अनुबंध किया कि उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर खेती करनी थी।

प्रश्न 45.
संथाल लोग दिकू किसे कहते थे?
उत्तर:
सरकारी अधिकारियों, ज़मींदारों व साहूकारों को संथाल दिकू (बाहरी लोग) कहते थे।

प्रश्न 46.
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता कौन था?
उत्तर:
संथाल विद्रोह का मुख्य नेता सिधू मांझी था।

प्रश्न 47.
सीदो (सिधू) ने स्वयं को क्या बताया?
उत्तर:
सीदो ने स्वयं को देवी पुरुष और संथालों के भगवान् ‘ठाकुर’ का अवतार घोषित किया।

प्रश्न 48.
सीदो की हत्या कब की गई?
उत्तर:
1855 ई० में सीदो को पकड़कर मार दिया गया।

प्रश्न 49.
दक्कन क्षेत्र किसे कहा गया?
उत्तर:
बंबई व महाराष्ट्र के क्षेत्र को दक्कन कहा गया।

प्रश्न 50.
साहूकार किसे कहा गया?
उत्तर:
साहूकार, उसे कहा गया जो महाजन और व्यापारी दोनों हो, यानी धन उधार भी देता हो तथा व्यापार भी करता हो।

प्रश्न 51.
दक्कन को अंग्रेज़ी राज क्षेत्र में कब मिलाया गया?
उत्तर:
1818 ई० में पेशवा को हराकर दक्कन को अंग्रेजी राज क्षेत्र में मिला लिया गया।

प्रश्न 52.
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता किसे माना जाता है?
उत्तर:
थॉमस मुनरो को रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली का जन्मदाता माना जाता है।

प्रश्न 53.
रैयतवाड़ी प्रणाली किन प्रांतों में लागू की गई?
उत्तर:
रैयतवाड़ी राजस्व प्रणाली को मद्रास प्रेसीडेंसी में लागू किया गया।

प्रश्न 54.
रैयतवाड़ी प्रणाली में बंदोबस्त किसके साथ किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में सीधा किसानों या रैयत से ही बंदोबस्त किया गया।

प्रश्न 55.
रैयतवाड़ी प्रणाली में भूमि का मालिक किसे माना गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी प्रणाली में किसान को कानूनी तौर पर भूमि का मालिक मान लिया गया। जिस पर वह खेती कर रहा था।

प्रश्न 56.
रैयतवाड़ी बंदोबस्त कितने समय के लिए किया गया?
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया।

प्रश्न 57.
बंबई दक्कन में रैयतवाड़ी बंदोबस्त कब शुरु किया गया?
उत्तर:
बंबई दक्कन में 1818 ई० में रैयत बंदोबस्त शुरु किया गया।

प्रश्न 58.
दक्कन में भयंकर अकाल कब पड़ा?
उत्तर:
1832-34 में दक्कन में भयंकर अकाल पड़ा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 59.
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कौन-सी थी?
उत्तर:
औद्योगिक युग में सबसे अधिक महत्त्व की वाणिज्यिक फसल कपास थी।

प्रश्न 60.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ की स्थापना कब की गई?
उत्तर:
ब्रिटेन में 1857 ई० में ‘क़पास आपूर्ति संघ’ की स्थापना की गई।

प्रश्न 61.
‘मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ कब बनाई गई?
उत्तर:
मैनचेस्टर कॉटन कंपनी’ 1859 ई० में बनाई गई।

प्रश्न 62.
अमेरिका में गृह युद्ध कब शुरु हुआ?
उत्तर:
अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया जो उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका के बीच था।

प्रश्न 63.
अमेरिका का गृह युद्ध कब समाप्त हुआ?
उत्तर:
सन् 1865 में अमेरिका का गृह युद्ध समाप्त हो गया।

प्रश्न 64.
ब्रिटिश सरकार ने परिसीमन कानून कब बनाया?
उत्तर:
1859 ई० में सरकार ने परिसीमन कानून पास किया।

प्रश्न 65.
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
परिसीमन कानून का मुख्य उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था।

प्रश्न 66.
परिसीमन कानून के अनुसार ऋणपत्रों को कितने समय के लिए मान्य माना गया?
उत्तर:
परिसीमन कानून के अनुसार किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋण पत्र तीन वर्ष के लिए मान्य माना गया।

प्रश्न 67.
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने ब्रिटिश संसद में अपनी रिपोर्ट कब प्रस्तुत की?
उत्तर:
‘दक्कन दंगा आयोग’ ने 1878 ई० में अपनी रिपोर्ट ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ के नाम से प्रस्तुत की।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
ठेकेदारी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
बंगाल के नए गवर्नर वारेन हेस्टिंग्स (1772-85) ने भूमि-कर वसूली की ठेकेदारी प्रणाली शुरू की। इसे ‘फार्मिंग प्रणाली’ (Farming System) भी कहा गया है। इसके अंतर्गत उच्चतम बोली लगाने वालों (Bidders) को कर वसूल करने का ठेका दे दिया जाता था। शुरू में ये ठेके पाँच वर्षों के लिए दिए गए, परंतु बाद में वार्षिक ठेके नीलाम किए जाने लगे।

प्रश्न 2.
‘दीवानी’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘दीवानी’ मुगल कालीन प्रशासन में एक महत्त्वपूर्ण पद था। इसका मुख्य कार्य आय-व्यय की व्यवस्था को सुनिश्चित करना था। भू-राजस्व प्रणाली निर्धारण भी दीवान ही करता था। अकबर काल में राजा टोडरमल एक बड़े चतुर, बुद्धिमान दीवान थे।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1793 में गवर्नर-जनरल लॉर्ड कार्नवालिस ने बंगाल में भू-राजस्व की एक नई प्रणाली अपनाई जिसे ‘ज़मींदारी प्रथा’ ‘स्थायी बंदोबस्त’ अथवा ‘इस्तमरारी-प्रथा’ कहा गया। यह प्रणाली बंगाल, बिहार, उडीसा तथा बनारस व उत्तरी कर्नाटक में लाग की गई थी।

प्रश्न 4.
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त लागू करने के निम्नलिखित कारण थे

1. व्यापार व राजस्व संबंधी समस्याओं का समाधान (Solution of Problems Relating to Trade and Land Revenue)-कंपनी के अधिकारियों को यह आशा थी कि भू-राजस्व को स्थायी करने से व्यापार तथा राजस्व से संबंधित उन सभी समस्याओं का समाधान निकल आएगा जिनका सामना वे बंगाल विजय के समय से ही करते आ रहे थे।

2. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट (Crisis in the Bengal Economy)-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

प्रश्न 5.
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर ऊँची रखने के क्या कारण थे?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त में भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी। इसके दो कारण थे : पहला भू-राजस्व किसानों के अधिशेष (surplus) को हड़पने का मुख्य स्रोत था। किसानों से प्राप्त यह धन प्रशासन चलाने के साथ-साथ व्यापार करने के लिए भी उपयोगी था। दूसरा, राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोतरी होने से आय में वृद्धि होगी, उसमें कंपनी सरकार अपना दावा कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने अधिकतम स्तर तक भू-राजस्वों की माँग को निर्धारित किया।

प्रश्न 6.
सूर्यास्त विधि क्या थी?
उत्तर:
सूर्यास्त विधि से तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों की नीलामी की जा सकती थी। इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो या फिर ज़मींदार रैयत से लगान एकत्र कर पाए या ना कर पाए उसे तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी।

प्रश्न 7.
औपनिवेशिक शासन-व्यवस्था से पहले बंगाल में ज़मींदारों के पास क्या-क्या अधिकार थे?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी। साथ ही उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया।

प्रश्न 8.
बंगाल में ज़मींदारों की शक्ति सीमित करने के लिए कंपनी सरकार ने क्या किया?
उत्तर:
ज़मींदारों के सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया। साथ ही उनके सीमा शुल्क के अधिकार को भी खत्म कर दिया गया। उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया।

प्रश्न 9.
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के दो कारण बताओ।
उत्तर:
बंगाल के जोतदारों के शक्तिशाली होने के कारण निम्नलिखित थे

1. विशाल ज़मीनों के मालिक (Became Owner of VastAreas of Land)-जोतदार गाँव में ज़मीनों के वास्तविक मालिक थे। कईयों के पास तो हजारों एकड़ भूमि थी। वे बटाइदारों से खेती करवाते थे।

2. व्यापार व साहूकारी पर नियंत्रण (Control over Trade and Money Landing)-जोतदार केवल भू-स्वामी ही नहीं थे। उनका स्थानीय व्यापार व साहूकारी पर भी नियंत्रण था। वे एक व्यापारी, साहूकार तथा भूमिपति के रूप में अपने क्षेत्र के प्रभावशाली लोग थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 10.
बंगाल में बटाईदारों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
बंगाल में बटाइदारों को अधियार अथवा बरगादार कहा जाता था। वे जोतदार के खेतों में अपने हल और बैल के साथ काम करते थे। वे फसल का आधा भाग अपने पास और आधा जोतदार को दे देते थे।

प्रश्न 11.
बेनामी खरीददारी क्या थी?
उत्तर:
बंगाल में ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी का अपनाया। इसमें प्रायः जमींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे।

प्रश्न 12.
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट या दस्तावेजों का अध्ययन करते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
उत्तर:
इतिहासकार या एक विद्यार्थी को सरकारी रिपोर्ट एवं दस्तावेजों को काफी ध्यान से और सावधानीपूर्वक पढ़ना चाहिए। विशेषतः यह सवाल मस्तिष्क में सदैव रहना चाहिए कि यह किसने एवं किस उद्देश्य के लिए लिखी है। बिना सवाल उठाए तथ्यों को वैसे-के वैसे स्वीकार नहीं कर लिया जाना चाहिए।

प्रश्न 13.
ईस्ट इंडिया कंपनी पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने कौन-कौन से कदम उठाए?
उत्तर:
भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण एवं उसे रेग्युलेट’ करने के लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ पास किया गया। फिर 1784 ई० में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे हर बीस वर्ष के बाद ‘चार्टर एक्टस’ पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम के कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे।

प्रश्न 14.
पहाडिया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण के दो कारण बताओ।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों के मुख्य कारण निम्नलिखित थे

1. अभाव अथवा अकाल (Famine)-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2.शक्ति-प्रदर्शन (To Show Power)-उनका एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

प्रश्न 15.
पहाड़िया लोगों के प्रति कंपनी अधिकारियों का दृष्टिकोण कैसा था?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी पहाड़िया लोगों को असभ्य, बर्बर और उपद्रवी समझते थे। अतः तब तक उनके इलाकों में शासन करना आसान नहीं था जब तक उन्हें सभ्यता की परिधि में न लाया जाए। ऐसे जनजाति लोगों को सुसभ्य बनाने के लिए वो समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए।

प्रश्न 16.
संथालों और पहाड़िया लोगों के संघर्ष को क्या नाम दिया जाता है?
उत्तर:
संथालों और पहाड़िया जनजाति के इस संघर्ष को कुदाल और हल का संघर्ष का नाम दिया जाता है। कुदाल पहाड़िया जनजाति की जीवन-शैली का प्रतीक था तो हल संथालों के जीवन का प्रतीक था। पहाड़िया की तुलना में संथालों में स्थायी जीवन की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति अधिक थी।

प्रश्न 17.
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को क्या लाभ हुआ?
उत्तर:
दीवानी का अधिकार मिलने पर कंपनी को निम्नलिखित लाभ हुए

  • दीवानी मिलने पर कंपनी बंगाल में सर्वोच्च शक्ति बन गई।
  • कंपनी की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ। उसके व्यापार में भी वृद्धि हुई। सुदृढ़ आर्थिक स्थिति के कारण कंपनी के पास विशाल सेना हो गई।

प्रश्न 18.
विलियम होजेज कौन था?
उत्तर:
विलियम होजेज कैप्टन कुक के साथ प्रशांत महासागर की यात्रा करते हुए भारत आया था। वह भागलपुर के कलेक्टर आगस्टस क्लीवलैंड के जंगल के गाँवों पर भ्रमण पर गया था। इन गाँवों और प्राकृतिक सौंदर्य स्थलों के उसने कई एक्वाटिंट (Aquatint) तैयार किए थे। यह ऐसी तस्वीर होती है जो ताम्रपट्टी में अम्ल (Acid) की सहायता से चित्र के रूप में कटाई करके बनाई जाती है।

प्रश्न 19.
कंपनी अधिकारी ने संथाल जनजाति को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसने का निमंत्रण क्यों दिया ?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों की घाटियों और निचली पहाड़ियों पर करना चाहते थे। पहाड़िया लोग हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। ऐसी परिस्थितियों में ही अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ जो पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे पहाड़िया लोगों की अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिंदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया।

प्रश्न 20.
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों की विजय के क्या कारण थे?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन तथा बसाव का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। पहाड़िया लोगों ने संथालों का प्रबल प्रतिरोध किया। परन्तु उन्हें संथालों के मुकाबले पराजित होकर पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय हुई क्योंकि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे। संथाल जनजाति के लोग शक्तिशाली लड़ाकू थे।

प्रश्न 21.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
संथालों के आगमन से पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो वे शिकार पर्याप्त घास व वन-उत्पादों से वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी। वें बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 22.
संथाल विद्रोह के दो कारण बताओ।
उत्तर:
संथाल विद्रोह के दो कारण निम्नलिखित थे

  • बंगाल में अपनाई गई स्थायी भू-राजस्व प्रणाली के कारण संथालों की जमीनें धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलकर ज़मींदारों और साहूकारों के हाथों में जाने लगीं।
  • सरकारी अधिकारी, पुलिस, थानेदार सभी महाजनों का पक्ष लेते थे। वे स्वयं भी संथालों से बेगार लेते थे। यहाँ तक कि संथाल कृषकों की स्त्रियों की इज्जत भी सुरक्षित नहीं थी। अतः दीकुओं (बाहरी लोगों) के विरुद्ध संथालों का विद्रोह फूट पड़ा।

प्रश्न 23.
विद्रोह के दौरान संथालों ने महाजनों और साहूकारों को निशाना क्यों बनाया?
उत्तर:
संथालों ने महाजनों एवं ज़मींदारों के घरों को जला दिया, उन्होंने जमकर लूटपाट की तथा उन बही-खातों को भी बर्बाद कर दिया जिनके कारण वे गुलाम हो गए थे। चूंकि अंग्रेज़ सरकार महाजनों और ज़मींदारों का पक्ष ले रही थी। अतः संथालों ने सरकारी कार्यालयों, पुलिस कर्मचारियों पर भी हमले किए।

प्रश्न 24.
कंपनी सरकार ने संथाल विद्रोह का दमन कैसे किया?
उत्तर:
कंपनी सरकार ने विद्रोहियों को कुचलने के लिए एक मेजर जनरल के नेतृत्व में 10 टुकड़ियाँ भेजीं। विद्रोही नेताओं को पकड़वाने पर 10 हजार का इनाम रखा गया। सेना ने कत्लेआम मचा दिया। गाँव-के-गाँव जलाकर राख कर दिए।

प्रश्न 25.
बुकानन विवरण की दो विशेषताएँ लिखिए। उत्तर:बुकानन विवरण की विशेषताएँ इस प्रकार हैं

(1) बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अबरक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए वाणिज्यिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

(2) बुकानन मात्र भू-खंडों का वर्णन ही नहीं करता अपितु वह सुझाव भी देता है कि इन्हें किस तरह कृषि-क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं।

प्रश्न 26.
दक्कन विद्रोह को दबाने के लिए ब्रिटिश अधिकारियों ने क्या किया?
उत्तर:
इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी घबरा गए। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 27.
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तनों को बताइए।
उत्तर:
दामिन-इ-कोह के निर्माण से संथालों के जीवन में आए दो परिवर्तन इस प्रकार थे

  • दामिन-इ-कोह में संथालों ने खानाबदोश जिंदगी छोड़ दी और स्थायी रूप से बस गए।
  • वे कई प्रकार की वाणिज्यिक फसलों का उत्पादन करने लगे और साहूकारों तथा व्यापारियों से लेन-देन करने लगे।

प्रश्न 28.
ब्रिटेन में ‘कपास आपूर्ति संघ’ व मैनचेस्टर कॉटन कंपनी की स्थापना के क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
1857 ई० में ‘कपास आपूर्ति संघ’ तथा 1859 ई० में मैनचेस्टर कॉटन कंपनी (Menchester Cotton Company) बनाई गई जिसका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को प्रोत्साहित करना था।

प्रश्न 29.
रैयतवाड़ी से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
रैयतवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्था की वह प्रणाली थी जिसके अन्तर्गत रैयत (किसानों) का सरकार से सीधा सम्बन्ध होता था। इस व्यवस्था में बिचौलिये समाप्त कर दिए गए।

प्रश्न 30.
डेविड रिकार्डो कौन था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो 1820 के दशक में इंग्लैण्ड का अर्थशास्त्री था। उसके अनुसार भू-स्वामी को उस समय प्रचलित ‘औसत लगानों’ को प्राप्त करने का हक होना चाहिए। जब भूमि से ‘औसत लगान’ से अधिक प्राप्त होने लगे तो वह भू-स्वामी की अधिशेष आय होगी। जिस पर सरकार को कर लगाने की आवश्यकता होगी।

प्रश्न 31.
पहाड़िया लोग मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण क्यों करते रहते थे?
उत्तर:
पहाड़िया लोगों द्वारा मैदानी क्षेत्रों पर आक्रमण अभाव व अकाल से बचने के लिए, मैदानों में बसे समुदायों पर अपनी शक्ति दिखाने के लिए तथा बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापित करने के लिए भी किए जाते थे।

प्रश्न 32.
जमींदारों पर नियन्त्रण के उद्देश्य से कम्पनी ने कौन-से कदम उठाए?
उत्तर:
ज़मींदारों की शक्ति पर नियंत्रण रखने के लिए उनकी सैन्य टुकड़ियों को भंग कर दिया गया। ज़मींदारों से पुलिस एवं न्याय व्यवस्था का अधिकार छीन लिया गया तथा उनके द्वारा लिया जाने वाला सीमा शुल्क समाप्त कर दिया गया।

प्रश्न 33.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ महत्त्वपूर्ण क्यों थी?
उत्तर:
1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई फरमिंगर की एक रिपोर्ट है। यह ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई, यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के संदर्भ में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी।

प्रश्न 34.
पहाड़िया लोग कौन थे?
उत्तर:
बंगाल में राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्र में रहने वाले लोगों को ‘पहाड़िया’ के नाम से जाना जाता था। ये लोग सदियों से प्रकृति की गोद में निवास करते आ रहे थे। झूम की खेती, जंगल के उत्पाद तथा शिकार उनके जीविकोपार्जन के साधन थे।

प्रश्न 35.
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो विशेषताएँ निम्नलिखित हैं
(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।
(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया। .

प्रश्न 36.
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ लिखो।
उत्तर:
स्थायी बन्दोबस्त की दो हानियाँ निम्नलिखित हैं
(1) इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई।

(2) इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में कृषि उत्पादों में हुई वृद्धि के बावजूद भी सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

प्रश्न 37.
पहाड़िया लोगों द्वारा अपनाई गई झूम खेती क्या थी?
उत्तर:
पहाड़िया लोग जंगल में झाड़ियों को काटकर व घास-फूस को जलाकर ज़मीन का एक छोटा-सा टुकड़ा निकाल लेते थे। यह छोटा-सा खेत पर्याप्त उपजाऊ होता था। घास व झाड़ियों के जलने से बनी राख उसे और भी उपजाऊ बना देती थी। कुछ वर्षों तक उसमें खाने के लिए विभिन्न तरह की दालें और ज्वार-बाजरा उगाते और फिर कुछ वर्षों के लिए उसे खाली (परती) छोड़ देते। ताकि यह पुनः उर्वर हो जाए। ऐसी खेती को स्थानांतरित खेती (Shifting Cultivation) अथवा झूम की खेती कहा जाता है।

प्रश्न 38.
संथाल परगना क्यों बनाया गया?
उत्तर:
संथाल विद्रोह को दबाने के बाद अलग संथाल परगना बनाया गया ताकि आक्रोश कम हो सके। इस परगने में भागलपुर और वीरभूम जिलों का 5500 वर्गमील शामिल किया गया। संथाल परगना में कुछ विशेष कानून लागू किए गए जैसे कि यहाँ यूरोपीय मिशनरियों के अतिरिक्त अन्य बाहरी लोगों के प्रवेश पर रोक लगा दी गई।

प्रश्न 39.
फ्रांसिस बुकानन कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक चिकित्सक था। इसने 1794 से 1815 तक एक चिकित्सक के रूप में बंगाल में कंपनी सरकार में नौकरी की। कुछ वर्ष वह लॉर्ड वेलजली (गवर्नर-जनरल) का शल्य चिकित्सक भी रहा। उसने कलकत्ता में अलीपुर चिड़ियाघर की स्थापना की।

प्रश्न 40.
जंगलों के विनाश के सम्बन्ध में स्थानीय लोगों व बुकानन के दृष्टिकोण में क्या अन्तर था?
उत्तर:
स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। उनका दृष्टिकोण जीवनयापन तक सीमित था। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण आधुनिक पश्चिमी विचारधारा तथा कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था।

प्रश्न 41.
महालवाड़ी प्रणाली के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
महालवाड़ी प्रणाली मुख्यतः संयुक्त प्रांत, आगरा, अवध, मध्य प्रांत तथा पंजाब के कुछ भागों में लागू की गई थी। ब्रिटिश भारत की कुल 30 प्रतिशत भूमि इसके अंतर्गत आती थी। इस बंदोबस्त में महाल अथवा गाँव को इकाई माना गया। भू-राजस्व देने के लिए यह इकाई उत्तरदायी थी। .

प्रश्न 42.
‘पूना सार्वजनिक सभा’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
सन् 1873 में मध्यजीवी बुद्धिजीवियों का एक नया संगठन ‘पूना सार्वजनिक सभा’ ने किसानों के मामले में हस्तक्षेप किया। भू-राजस्व दरों पर पुनः विचार करने के लिए एक याचिका दायर की गई। नई भू-राजस्व दरों के विरुद्ध कुनबी कृषकों को जागृत करने के लिए इस संगठन के कार्यकर्ता दक्कन देहात के गाँवों में भी गए।।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) के दो लाभ बताएँ।।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त (ज़मींदारी प्रथा) काफी विचार-विमर्श के बाद शुरू की गई थी। इसलिए इससे कुछ अपेक्षित लाभ हुए, जो इस प्रकार हैं
1. सरकार की आय का निश्चित होना-सरकार की वार्षिक आय निश्चित हो गई जिससे प्रशासन व व्यापार दोनों को नियमित करने में लाभ हुआ।

2. धन व समय की बचत-इससे कंपनी सरकार को धन व समय दोनों की बचत हुई। प्रतिवर्ष बंदोबस्त निश्चित करने में धन व समय दोनों ही बर्बाद होते. थे।

3. वफादार वर्ग-स्थायी बंदोबस्त से ज़मींदारों का वर्ग अंग्रेजों की नीतियों से धनी हुआ। अतः यह उनका एक वफादार सहयोगी बनता गया। लेकिन यह बात सभी ज़मींदारों पर लागू नहीं हुई।

4. कंपनी के व्यापार में वृद्धि-स्थायी बंदोबस्त से बंगाल में कंपनी की आय सुनिश्चित हो गई। अब वह अपना ध्यान व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ाने में लगा पाई। फलतः इससे उसे व्यापारिक लाभ मिला।

5. ज़मींदारों की समृद्धि-जो ज़मींदार सख्ती के साथ किसानों से लगान वसूलने में सफल हुए, वे समृद्ध होते गए।

प्रश्न 2.
स्थायी बंदोबस्त की हानियों का वर्णन करें।
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के कुछ लाभ कंपनी को मिले। परन्तु यह बंगाल की अर्थव्यवस्था में सुधार नहीं कर सकी। कालांतर में यह कंपनी के लिए भी आर्थिक तौर पर घाटे का सौदा सिद्ध हुई। अतः कुछ विद्वानों ने इस बंदोबस्त की कड़ी आलोचना की है। इसके कुछ निम्नलिखित दुष्परिणाम हुए

1. सरकार को हानि-निःसंदेह इससे सरकार को एक निश्चित वार्षिक आय तो होने लगी। परंतु इस व्यवस्था में समय-समय पर भूमिकर में वृद्धि का अधिकार सरकार के पास नहीं था। इसलिए शुरू में तो यह व्यवस्था सरकार के लिए लाभकारी रही परंतु बाद में सरकार अपने भूमि-कर में वृद्धि नहीं कर सकी।

2. रैयत के हितों की अनदेखी-इस व्यवस्था में, सरकार और रैयत के बीच कोई सीधा संबंध नहीं था। उन्हें ज़मींदारों की दया पर छोड़ दिया गया था। उनके हितों की पूरी तरह उपेक्षा की गई। वे किसान की संपत्ति को बेचकर लगान की पूरी रकम वसूल कर सकते थे। तथापि यह तरीका आसान नहीं था क्योंकि कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी थी।

3. कृषि में पिछड़ापन-ज़मींदारी प्रथा से कृषि अर्थव्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि उसका पिछड़ापन और भी बढ़ता गया। ज़मींदार वर्ग ने कृषि सुधारों में कोई रुचि नहीं दिखाई। दूसरी ओर किसान पर लगान का बोझ बढ़ता गया। उसे चुकाने के लिए वह साहूकारों के चंगुल में फँसता गया। किसान के पास कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए कुछ बच ही नहीं पाता था। फलतः कृषि का पिछड़ापन बढ़ता गया।

4. अनुपस्थित ज़मींदार-इस व्यवस्था में नए जमींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियां खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक ज़मींदार के मध्य परजीवी ज़मींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

5. जमींदारों को हानि-प्रारंभ में स्थायी बंदोबस्त ज़मींदारों के लिए भी काफी हानिप्रद सिद्ध हुआ। बहुत-से ज़मींदार सरकार को निर्धारित भूमि-कर का भुगतान समय पर नहीं कर सके। परिणामस्वरूप उन्हें उनकी ज़मींदारी से वंचित कर दिया गया। समकालीन स्रोतों से ज्ञात होता है कि बर्दवान के राजा (शक्तिशाली ज़मींदार) की ज़मींदारी के अनेक महाल (भू-संपदाएँ) सार्वजनिक तौर पर नीलाम किए गए थे। उस पर राजस्व की एक बड़ी राशि बकाया थी। लेकिन यह कहानी अकेले बर्दवान (अब बर्द्धमान) ” की नहीं थी। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में काफी बड़े स्तर पर ऐसी भू-संपदाओं की नीलामी हुई थी।

प्रश्न 3.
स्थायी बंदोबस्त में ज़मींदार राजस्व राशि के भुगतान में क्यों असमर्थ हुए?
उत्तर:
राजस्व राशि का भुगतान करने में ज़मींदार कई कारणों से असमर्थ रहे। ये कारण सरकार की नीतियों एवं ज़मींदारों की स्थिति से जुड़े हुए थे। संक्षेप में ये कारण इस प्रकार थे

1. राजस्व की ऊँची दर-भू-राजस्व की दर शुरू से ही अपेक्षाकृत काफी ऊँची तय की गई थी क्योंकि राजस्व की दर स्थायी तौर पर निर्धारित करते समय कंपनी के अधिकारियों ने इस तथ्य को ध्यान में रखा कि आगे चलकर खेती के विस्तार तथा कीमतों में बढ़ोत्तरी होने से ज़मींदारों की आय में वृद्धि होगी, लेकिन सरकार अपना दावा उसमें से कभी नहीं कर सकेगी। अतः भविष्य की भरपाई वे शुरू से ही करना चाहते थे। उनकी यह दलील थी कि शुरू-शुरू में यह माँग ज़मींदारों को कुछ अधिक लगेगी परन्तु आगे आने वाले वर्षों में धीरे-धीरे यह सहज हो जाएगी।

2. मंदी में ऊँचा राजस्व-स्थायी बंदोबस्त के लिए राजस्व दर का निर्धारण 1790 के दशक में किया गया। यह मंदी का दशक था। कृषि उत्पादों की कीमतें अपेक्षाकृत कम थीं। ऐसे में रैयत (किसानों) के लिए ऊँची दर का राजस्व चुकाना कठिन था। इस प्रकार ज़मींदार किसानों से राजस्व इकट्ठा नहीं कर पाए और वह सरकार को देय राशि का भुगतान करने में भी असमर्थ रहे।

3. सूर्यास्त विधि-इस व्यवस्था में केवल राजस्वों की दर ही ऊँची नहीं थी वरन वसूली के तरीके भी अत्यंत सख्त थे। इसके लिए सूर्यास्त विधि का अनुसरण किया गया, जिसका तात्पर्य था कि निश्चित तारीख को सूर्य छिपने तक देय राशि का भुगतान न कर पाने पर ज़मींदारियों को नीलाम कर दिया जाए। ध्यान रहे इसमें राजस्वों की माँग निश्चित थी। फसल हो या न हो जमींदार को तो निश्चित तिथि तक सरकारी माँग पूरी करनी होती थी। इसलिए लगान एकत्र न करने वाले बर्बाद हो गए।

4. ज़मींदारों की शक्तियों में कमी-बंगाल में ज़मींदार छोटे राजा थे। उनके पास न्यायिक अधिकार थे और सैन्य टुकड़ियाँ भी थीं। उनकी अपनी पुलिस व्यवस्था थी। कंपनी की सरकार ने उनकी यह शक्तियाँ उनसे छीन लीं। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया। उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। इस प्रकार प्रशासन का केंद्र बिंदु ज़मींदार नहीं बल्कि कलेक्टर बनता गया। ज़मींदार शक्तिहीन होकर पूर्णतः सरकार की दया पर निर्भर हो गया। समकालीन सरकारी दस्तावेजों से पता चलता है कि किस प्रकार सरकारी माँग पूरी न कर पाने वाले ज़मींदारों को ज़मींदारी से वंचित कर दिया जाता था।

5. ग्राम मुखियाओं का व्यवहार-बंगाल में ग्राम के मुखियाओं को जोतदार अथवा मंडल कहा जाता था। यह काफी सम्पन्न किसान (रैयत) थे। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी। अच्छी फसल न होने या फिर सम्पन्न रैयत जान-बूझकर समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे। दोनों ही अवसरों पर ज़मींदार मुसीबत में फंसता था। शक्तियाँ सीमित कर दिए जाने के कारण अब वे आसानी से बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था। परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 4.
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ क्या थी?
उत्तर:
कंपनी के प्रशासन और बंगाल की स्थिति पर सन् 1813 में ब्रिटिश संसद में प्रस्तुत की गई विशेष रिपोर्ट ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के नाम से जानी गई। क्योंकि इससे पूर्व चार रिपोर्ट इस संदर्भ में पहले भी प्रस्तुत हो चुकी थीं। लेकिन यह स्वयं में पहली चार रिपोर्टों से अधिक महत्त्वपूर्ण बन गई क्योंकि भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रशासन व क्रियाकलापों के बारे में यह एक विस्तृत रिपोर्ट थी। इसमें 1002 पृष्ठ थे जिनमें से 800 से अधिक पृष्ठों में परिशिष्ट लगाए गए थे। इन परिशिष्टों में भू-राजस्व से संबंधित आंकड़ों की तालिकाएँ, अधिकारियों की बंगाल व मद्रास में राजस्व व न्यायिक प्रशासन पर लिखी गई टिप्पणियाँ शामिल थीं।

साथ ही जिला कलेक्टरों की अपने अधीन भू-राजस्व व्यवस्था पर रिपोर्ट तथा ज़मींदारों एवं रैयतों के आवेदन पत्रों को सम्मिलित किया गया था। यह साक्ष्य इतिहास लेखन के लिए बहुमूल्य हैं। उल्लेखनीय है कि 1760 से 1800 ई० के बीच चार दशकों में बंगाल के देहात में हुए विभिन्न परिवर्तनों की जानकारी का आधार पाँचवीं रिपोर्ट में शामिल यह तथ्य ही रहे हैं। यह रिपोर्ट हमारे विचारों एवं अवधारणाओं का एक मुख्य आधार रही है।

प्रश्न 5.
ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के क्या कारण थे?
उत्तर:
‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भारत में कंपनी के प्रशासन तथा क्रियाकलापों पर एक विस्तृत रिपोर्ट थी। ब्रिटिश संसद में ‘पाँचवीं रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण थे

1. कंपनी का सत्ता बनना-ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी। परन्तु वे बक्सर के युद्ध के पश्चात् भारत में एक राजनीतिक सत्ता बन गई। फलस्वरूप उसकी गतिविधियों पर सूक्ष्म नज़र रखी जाने लगी। इंग्लैंड में अनेक राजनीतिक समूहों का मत था कि बंगाल की विजय का लाभ केवल ईस्ट इंडिया कंपनी को नहीं मिलना चाहिए, बल्कि ब्रिटिश राष्ट्र को भी मिलना चाहिए।

2. अन्य व्यापारियों का दबाव-ब्रिटेन के अनेक व्यापारिक समूह कंपनी के व्यापार के एकाधिकार का विरोध कर रहे थे। निजी व्यापार करने वाले ऐसे व्यापारियों की संख्या बढ़ रही थी। वे भी भारत के साथ व्यापार में हिस्सेदारी के इच्छुक थे। वे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को एकाधिकार प्रदान करने वाले शाही फरमान को रद्द करवाना चाहते थे। ब्रिटेन के उद्योगपति भी भारत में ब्रिटिश विनिर्माताओं के लिए अवसर देख रहे थे। अतः वे भी भारत के बाजार उनके लिए खुलवाने को उत्सुक थे।

3. कंपनी के भ्रष्टाचार व प्रशासन पर बहस कंपनी के कर्मचारी तथा अधिकारी निजी व्यापार तथा रिश्वतखोरी से बहुत-सा धन लेकर ब्रिटेन लौटते थे। उनकी यह धन संपत्ति अन्य निजी व्यापारियों के मन में ईर्ष्या उत्पन्न करती थी क्योंकि यह व्यापारी भी भारत से शुरू हुई लूट में हिस्सा पाने के इच्छुक थे। कई राजनीतिक समूह ब्रिटिश संसद में भी इस मुद्दे को उठा रहे थे। साथ ही ब्रिटेन के समाचार पत्रों में भी कंपनी अधिकारियों के लोभ व लालच का पर्दाफाश कर रहे थे। इंग्लैंड में कंपनी के बंगाल में अराजक व अव्यवस्थित शासन की सूचनाएँ भी पहुँच रही थी। अतः कंपनी के अधिकारियों में भ्रष्टाचार तथा कुशासन पर इंग्लैंड में बहस छिड़ चुकी थी।

4. कंपनी पर नियंत्रण-स्पष्ट है कि ब्रिटेन में आर्थिक एवं राजनीतिक दबावों के चलते भारत में कंपनी शासन पर नियंत्रण आवश्यक हो गया था। इसके लिए सबसे पहले सन् 1773 में ‘रेग्यूलेटिंग एक्ट’ फिर 1784 में ‘पिट्स इंडिया एक्ट’ तथा आगे और कई एक्ट पास किए गए। इन अधिनियमों के माध्यम से कंपनी को बाध्य किया गया कि वह भारत में अपने राजस्व, प्रशासन इत्यादि के संबंध में नियमित रूप से ब्रिटिश सरकार को सूचना प्रदान करे। साथ ही कंपनी के काम-काज का निरीक्षण करने के लिए कई समितियों का गठन किया गया। ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ भी एक ऐसी ही रिपोर्ट थी जिसे एक प्रवर समिति (Select Committee) द्वारा तैयार किया गया था।

प्रश्न 6.
क्या ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ पूर्णतः निष्पक्ष थी?
अथवा
‘पाँचवी रिपोर्ट’ की आलोचना के कोई दो बिन्दु लिखिए।
उत्तर:
पाँचवीं रिपोर्ट साक्ष्यों की दृष्टि से काफी समृद्ध थी, लेकिन पूर्णतः निष्पक्ष नहीं थी। 8वीं सदी के अंतिम दशकों में यह बंगाल में कंपनी सत्ता के बारे में जानकारी का महत्त्वपूर्ण आधार भी रही। इस आधार पर यह समझा जाता रहा कि बड़े स्तर पर बंगाल के परंपरागत ज़मींदार बर्बाद हो गए थे। उनकी ज़मींदारियाँ नीलाम हो गई थीं। इन पर देय राशि का बकाया सदैव बना रहता था। परन्तु ऐसे सारे निष्कर्ष ठीक नहीं थे। शोधकर्ताओं ने ‘पाँचवीं रिपोर्ट’ के अतिरिक्त समकालीन बंगाल के ज़मींदारों के अभिलेखागारों तथा कलेक्टर कार्यालयों के अन्य अभिलेखों का गहन और सावधानीपूर्वक अध्ययन करके रिपोर्ट के बारे में निम्नलिखित नए निष्कर्ष निकाले

1. पहला–यह रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं थी। जो प्रवर समिति के सदस्य इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले थे उनका प्रमुख उद्देश्य कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करना था। राजस्व प्रशासन की कमियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया।

2. दूसरा-परंपरागत ज़मींदारों की शक्ति का पतन काफी बढ़ा-चढ़ाकर और आंकड़ों के जोड़-तोड़ के साथ पेश किया गया।

3. तीसरा-इसमें ज़मींदारों द्वारा ज़मीनें गँवाने और उनकी बर्बादी का उल्लेख भी अतिशयोक्तिपूर्ण है। ऊपर बताया गया है ज़मींदार नीलामी में अपनी जमीन को बचाने के लिए भी कई तरह के हथकंडे अपनाता था।

प्रश्न 7.
पहाड़िया लोगों के मैदानी लोगों के साथ संबंधों की चर्चा करें।
उत्तर:
पहाड़िया जनजाति के लोग मैदानी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों विशेषतः ज़मींदारों, किसानों व व्यापारियों इत्यादि पर बराबर आक्रमण करते रहते थे। मुख्यतः यह संबंध निम्नलिखित तीन बातों पर आधारित थे

1. अभाव अथवा अकाल-प्रायः ये आक्रमण पहाड़िया लोगों द्वारा अभाव अथवा अकाल की परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए किए जाते थे। मैदानी भागों में, जहाँ सिंचाई से खेती होती थी, वहाँ यह लोग खाद्य-सामग्री की लूट-पाट करके ले जाते थे।

2. शक्ति-प्रदर्शन-पहाड़िया जनजाति के लोग जब बाहरी लोगों पर आक्रमण करते थे तो उनमें एक लक्ष्य शक्ति-प्रदर्शन कर अपनी धाक जमाना भी रहता था। इस शक्ति-प्रदर्शन का लाभ उन्हें आक्रमणों के बाद भी मिलता रहता था।

3. राजनीतिक संबंध-इन आक्रमणों का लाभ पहाड़िया मुखियाओं अथवा सरदारों को बाहरी लोगों के साथ राजनीतिक संबंध स्थापना में मिलता था। आक्रमणों से वे मैदानी ज़मींदारों व व्यापारियों में भय उत्पन्न करते थे। भयभीत हुए ज़मींदार बचाव के लिए मुखियाओं को नियमित खिराज़ का भुगतान करते थे। इसी प्रकार व्यापारियों से वह पथ-कर वसूल करते थे। जो व्यापारी उन्हें यह कर देते थे उनकी जान-माल की सुरक्षा का आश्वासन दिया जाता था। इस प्रकार पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच कुछ संघर्ष और कुछ अल्पकालीन शांति-संधियों से संबंध चलते आ रहे थे।

18वीं सदी के अंतिम दशकों से संबंध परिवर्तन-18वीं सदी के अंतिम दशकों में पहाड़िया और मैदानी लोगों के बीच संबंधों में बदलाव आने लगा। इसका मुख्य कारण ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आर्थिक हित थे। यह पूर्वी बंगाल में अधिक-से-अधिक कृषि क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थी। इसके लिए जंगलों को साफ करके कृषि क्षेत्र के विस्तार को प्रोत्साहन दिया। परिणाम यह हुआ कि जमींदारों और जोतदारों ने उन क्षेत्रों पर अधिकार जमा लिया जो पहले पहाड़िया लोगों के पास थे। यह लोग उनके परती खेतों पर कब्जा करके उनमें धान की खेती करने लगे। इसके लिए उन्हें कंपनी सत्ता का समर्थन प्राप्त था।

प्रश्न 8.
कंपनी सरकार ने राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन क्यों दिया ?
उत्तर:
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार ने निम्नलिखित कारणों से राजमहल के पहाड़ी क्षेत्र में स्थायी कृषि के विस्तार को प्रोत्साहन दिया
1. राजस्व वृद्धि-उस काल में बंगाल की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि पर आधारित थी। इसलिए राजस्व का स्रोत भी कृषि उत्पादन ही था। अतः राजस्व में वृद्धि के लिए उन्होंने कृषि विस्तार पर जोर दिया।

2. कृषि उत्पादों का निर्यात-18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति हो रही थी। बड़े-बड़े उद्योग लग रहे थे। इनमें काम करने वाले लोगों के भोजन व अन्य जरूरतों के लिए कृषि उत्पादों की जरूरत थी। इसलिए कंपनी सरकार कृषि क्षेत्र के विस्तार में रुचि ले रही थी।

3. पहाड़िया के प्रति अधिकारियों का दृष्टिकोण-कंपनी के अधिकारी पहाड़िया लोगों को बर्बर और उपद्रवी समझते थे। ऐसे जनजाति लोगों को सभ्य बनाने के लिए वे समझते थे कि उनके क्षेत्रों में कृषि-विस्तार किया जाए। ताकि पहाड़िया लोग कृषि जीवन अपना सकें, जो उनकी दृष्टि में एक सभ्य सामाजिक जीवन था। वास्तविकता यह थी कि ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपने आर्थिक (संसाधनों का दोहन) और प्रशासनिक दोनों उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए पहाड़िया के क्षेत्रों में घुसपैठ शुरू की।

प्रश्न 9.
अधिकारियों ने पहाड़िया क्षेत्र में संथालों को प्राथमिकता क्यों दी?
उत्तर:
कंपनी अधिकारी कृषि क्षेत्र का विस्तार राजमहल की पहाड़ियों के क्षेत्रों में करना चाहते थे। इसके लिए पहाड़ियों की तुलना में संथाल उन्हें अग्रणी बाशिंदे लगे। इसलिए उन्होंने संथालों को प्राथमिकता दी। उन्होंने पहले ज़मींदारों से इस क्षेत्र में खेती करवाना चाहा परन्तु पहाड़ियों के उपद्रव होने लगे। वे इसके लिए पहाड़िया लोगों को भी स्थायी किसान बनाना चाहते थे। परन्तु इसमें भी उन्हें सफलता नहीं मिली। क्योंकि पहाड़िया लोग प्रकृति-प्रेमी थे। प्रकृति के प्रति उनका दृष्टिकोण आक्रामक नहीं था। वे जंगलों को बर्बाद करके उस क्षेत्र में हल नहीं चलाना चाहते थे। वे छोटे-छोटे खेतों में कुदाली से ही खुरच कर थोड़ी-बहुत फसल लगाने के अभ्यस्त थे। इस फसल से ही उनका जीवन निर्वाह हो जाता था। वह बाज़ार के लिए खेती नहीं करना चाहते थे। वे हल को हाथ लगाना ही पाप समझते थे।

अतः अंग्रेजों को पहाड़ियों को कृषक बनाने में सफलता नहीं मिली। ऐसी परिस्थितियों में अंग्रेज़ अधिकारियों का परिचय संथाल जनजाति के लोगों से हुआ। यह पूरी ताकत के साथ ज़मीन में काम करते थे। उन्हें जंगल काटने में भी कोई हिचक नहीं थी। वे अपेक्षाकृत अग्रणी बाशिदे थे। कंपनी अधिकारियों ने संथालों को राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में बसे महालों (गाँवों) में बसने का निमंत्रण दिया। संथालों के गीतों और मिथकों से पता चलता है कि वे तो खेती के लिए ज़मीन की तलाश में ही भटक रहे थे। अतः उन्होंने अधिकारियों के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया। राजमहल की पहाड़ियों की तलहटी में उन्हें बड़े स्तर पर जंगल क्षेत्र की ज़मीनें आबंटित की गईं।

प्रश्न 10.
‘दामिन-इ-कोह का सीमांकन’ के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
दामिन-इ-कोह नाम उस विस्तृत भू-भाग को दिया गया था जो संथालों को दिया गया था। सन् 1832 तक इस पूरे क्षेत्र का नक्शा बनाया गया। इसके चारों ओर खंबे गाड़कर इसकी परिसीमा निर्धारित की गई। इस परिसीमित क्षेत्र को संथाल भूमि घोषित किया गया। संथालों को इसी में रहते हुए हल से खेती करनी थी। उन्हें अपने जनजातीय जीवन को त्यागना था। कंपनी सरकार ने संथाल कृषकों से एक अनुबंध किया था। इसके अनुसार उन्हें पहले दशक के अंदर प्राप्त भूमि के कम-से-कम दसवें भाग को कृषि योग्य बनाकर उसमें खेती करनी थी।

संथालों को यह अनुबंध पसंद आया। सीमांकन के बाद दामिन-इ-कोह में काफी तेजी से संथालों की बस्तियों में वृद्धि हुई। सन् 1851 में मात्र 13 वर्षों में उनके गाँवों की संख्या 40 से बढ़कर 1473 तक पहुँच चुकी थी। इसी अवधि में उनकी जनसंख्या 3000 से 82,000 तक पहुंच गई। इस प्रकार संथालों को मानो उनकी दुनिया ही मिल गई थी। वे अलग सीमांकित क्षेत्र में काफी परिश्रम से जमीन निकालकर कृषि करने लगे।

प्रश्न 11.
संथालों के आगमन का पहाड़िया लोगों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
राजमहल की पहाड़ियों में संथालों के आगमन का पहाड़िया जनजाति के लोगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। जब उनके जंगल, खेतों तथा गाँवों पर कब्जा किया जा रहा था तो उन्होंने संथालों का तीव्र विरोध किया। परन्तु वे संथालों के मुकाबले पराजित हो गये। उन्हें पहाड़ियों की तलहटी वाला उपजाऊ क्षेत्र छोड़कर जाना पड़ा। इस संघर्ष में संथालों की विजय का कारण यह भी था कि कंपनी सरकार के सैन्यबल उन्हें कब्जा दिलवा रहे थे।

पहाड़िया लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही उनसे छिन गया था। जंगल नहीं रहे तो उन्हें शिकार संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा। उनके पशुओं के लिए पर्याप्त घास नहीं रही। वे अन्य वन-उत्पादों से भी वंचित हो गए। ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में झूम की खेती भी संभव नहीं थी क्योंकि वहाँ ज़मीन गीली नहीं रहती थी। उपजाऊ जमीनें अब उनके लिए दुर्लभ हो गईं क्योंकि उन्हें संथाल क्षेत्र में शामिल कर दिया गया था। वे बंजर, चट्टानी और शुष्क क्षेत्रों में धकेले जा चुके थे। इस सबके परिणामस्वरूप पहाड़िया लोगों के रहन-सहन पर प्रभाव पड़ा। आगे चलकर वह निर्धनता तथा भुखमरी के शिकार रहे।

प्रश्न 12.
बुकानन के विवरण की मुख्य विशेषताओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
फ्रांसिस बुकानन एक कंपनी कर्मचारी था। उसने भारत में 1810-11 में कंपनी के भू-क्षेत्र का सर्वे करके विवरण तैयार किया था। इस विवरण में निम्नलिखित मुख्य विशेषताएँ झलकती हैं

1. खनिजों के बारे में-बुकानन ने अपने विवरण में उन स्थानों को रेखांकित किया. जहाँ लोहा, ग्रेनाइट, साल्टपीटर व अभ्ररक इत्यादि खनिजों के भंडार थे। लोहा व नमक बनाने की स्थानीय पद्धतियों का भी उसने अध्ययन किया। यह सारी जानकारी कंपनी के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण थी।

2. कृषि विस्तार के बारे में-बुकानन ने सुझाव दिए कि किस तरह भू-खंडों को कृषि क्षेत्र में बदला जा सकता है। कौन-सी फसलें बोई जा सकती हैं। कीमती इमारती लकड़ी के पेड़ों का जंगल कहाँ है, उसे कैसे काटा जा सकता है। नए पेड़ कौन-से लगाए जा सकते हैं जिनसे कंपनी को लाभ होगा।

3. स्थानीय निवासियों से अलग दृष्टिकोण-इस विवरण में उसका दृष्टिकोण स्थानीय लोगों से भिन्न था। उदाहरण के लिए स्थानीय लोग जंगलों के विनाश में अपना हित नहीं देखते थे। जबकि बुकानन का दृष्टिकोण कंपनी के वाणिज्यिक हितों से प्रेरित था। इसलिए वह वनवासी लोगों की जीवन-शैली का आलोचक था। वह जंगल के भू-भागों को कृषि क्षेत्र में बदलने का पक्षधर था।

प्रश्न 13.
डेविड रिकार्डो का भू-राजस्व सिद्धांत क्या था?
उत्तर:
डेविड रिकार्डो (David Ricardo) एक प्रमुख अर्थशास्त्री थे। 19वीं सदी के प्रारंभिक वर्षों से उनके आर्थिक सिद्धांत विश्वविद्यालयों में पढ़ाए जाते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी के नए अधिकारी इन सिद्धांतों से प्रभावित थे। अतः बंबई प्रांत (दक्कन) में नई राजस्व प्रणाली अपनाते समय उन्होंने रिकाडों के लगान सिद्धांत को भी ध्यान में रखा। इस सिद्धांत के अनुसार एक भू-स्वामी (चाहे किसान हो या फिर जमींदार) को किसी तत्कालिक अवधि में प्रचलित ‘औसत लगान’ (Average Rent) ही मिलना चाहिए। उसके अनुसार लगान एक भूमिपति की फसल पर हुए कुल खर्च को (श्रम तथा बीज, खाद, पानी सभी तरह का) अलग करने के बाद शुद्ध आय (Net Profit) था। इसलिए इस पर सरकार द्वारा कर लगाना वैध माना गया।

इस सिद्धांत के अनुसार ज़मींदारों को एक किरायाजीवी (Rentier) के रूप में देखा गया। ऐसा वर्ग जो अपनी संपत्ति पर मिलने वाले लगान से विलासी जीवन बिताता है। इसे प्रगति विरोधी प्रवृत्ति माना गया क्योंकि ज़मीन से होने वाले अधिशेष का यह उचित उपयोग नहीं था। रिकार्डो का विचार था कि इस आय पर कर लगाकर उस धन से सरकार स्वयं कृषि विकास को प्रोत्साहन दे। अर्थात् यह उपयोगितावादी विचारधारा (Utilitarianism) के अंतर्गत उत्पन्न एक महत्त्वपूर्ण सिद्धांत था। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ब्रिटेन में हो रहे औद्योगिकीकरण के लिए भारत में कृषि विकास महत्त्वपूर्ण होता जा रहा था।

प्रश्न 14.
रैयतवाड़ी प्रणाली की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
रैयतवाड़ी बंदोबस्त सीधा रैयत (किसानों) से ही किया गया था। सरकार और किसान के बीच कोई बिचौलिया ज़मींदार नहीं था। किसान को कानूनी तौर पर उस भूमि का मालिक मान लिया गया था जिस पर वह खेती कर रहा था। ज़मीन की उपजाऊ शक्ति के अनुरूप सरकार का हिस्सा तय किया गया। यह बंदोबस्त 30 वर्षों के लिए किया गया था। इस अवधि के बाद सरकार पुनः ‘एसैसमेंट’ के द्वारा इसे बढ़ा सकती थी।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि इसमें ज़मींदारों की भूमिका तो नहीं थी, फिर भी व्यवहार में किसानों को इससे कोई लाभ नहीं पहुँचा। क्योंकि इसमें ज़मींदार का स्थान स्वयं सरकार ने ले लिया था अर्थात् सरकार ही ज़मींदार बन गई थी। किसान को अपनी उपज का लगभग आधा भाग कर के रूप में सरकार को देना पड़ता था। इतना भूमिकर (Revenue) नहीं लगान (Rent) ही होता है। इस अर्थ में तो सरकार ही भूमि की वास्तविक स्वामी थी। जिसे बाद में सरकार ने स्वयं भी स्वीकार कर लिया था।

प्रश्न 15.
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कृषि उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
अमेरिकी गृह-युद्ध का भारत के कपास उत्पादकों पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
औद्योगिक युग में वाणिज्यिक फसलों में सबसे अधिक महत्त्व कपास का था। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों के लिए इसे अधिकतर अमेरिका से मँगवाया जाता था। ब्रिटेन में आयात की जाने वाली कुल कपास का लगभग 3/4 भाग यहीं से आता था। वस्त्र निर्माताओं के लिए यह एक चिंता का विषय भी था। यदि कभी अमेरिका से आपूर्ति बंद हो गई तो क्या होगा। इसलिए 1857 ई० में कपास आपूर्ति संघ तथा 1859 ई० में मानचेस्टर कॉटन कंपनी बनाई गई। इनका उद्देश्य दुनिया के प्रत्येक भाग में कपास के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास करना था। इस उद्देश्य के लिए भारत को विशेषतौर पर रेखांकित किया गया। अब तक भारत इंग्लैंड का उपनिवेश बन चुका था। इसके कुछ भागों में कपास के लिए उपयुक्त मिट्टी और जलवायु मौजूद थी। उदाहरण के लिए दक्कन की काली मिट्टी और पंजाब के कुछ भाग में कपास पैदा होती थी। इसके साथ-साथ यहाँ सस्ता श्रम भी था। अतः किसी भी स्थिति में अमेरिका से कपास आपूर्ति बंद होने पर भारत से आपूर्ति की जा सकती थी।

अमेरिका में गृह युद्ध-अमेरिका में सन् 1861 में गृह युद्ध छिड़ गया। इससे ब्रिटेन की कपास आपूर्ति को अचानक आघात पहुँचा। ब्रिटेन के वस्त्र उद्योगों में तहलका मच गया। 1862 ई० में अमेरिका से मात्र 55000 गाँठों का आयात हुआ। जबकि 1861 ई० में 20 लाख कपास की गाँठों का आयात हुआ था। इस स्थिति में भारत से ब्रिटेन को कपास निर्यात के लिए सरकारी आदेश दिया गया। कपास सौदागरों की तो मानों चाँदी ही हो गई। बंबई दक्कन के जिलों में उन्होंने कपास उत्पादन का आँकलन किया। किसानों को अधिक कपास उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया। कपास निर्यातकों ने शहरी साहूकारों को पेशगी राशियाँ दी ताकि वे ये राशियाँ ग्रामीण ऋणदाताओं को उपलब्ध करवा सकें और वे आगे किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें उधार दे सकें।

ऋण समस्या का समाधान-अब किसानों के लिए ऋण की समस्या नहीं थी। साहूकार भी अपनी उधर राशि की वापसी के लिए आश्वस्त था। दक्कन के ग्रामीण क्षेत्रों में इसका महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। किसानों को लंबी अवधि के ऋण प्राप्त हुए। कपास उगाई जाने वाली प्रत्येक एकड़ भूमि पर सौ रुपये तक की पेशगी राशि किसानों को दी गई। चार साल के अंदर ही कपास पैदा करने वाली ज़मीन दोगुणी हो गई। 1862 ई० तक स्थिति यह थी कि इंग्लैंड में आयात होने वाले कुल कपास आयात का 90% भाग भारत से जा रहा था। बंबई में दक्कन में कपास उत्पादक क्षेत्रों में इससे समृद्धि आई। यद्यपि इस समृद्धि का लाभ मुख्य तौर पर धनी किसानों को ही हुआ।

प्रश्न 16.
परिसीमन कानून (1859) क्या था?
उत्तर:
ब्रिटिश सरकार ने रैयत की शिकायतों पर विचार करते हुए 1859 ई० में एक परिसीमन कानून पास किया। जिसका उद्देश्य ब्याज के संचित होने से रोकना था। इसलिए इसमें प्रावधान किया गया कि किसान व ऋणदाता के बीच हस्ताक्षरित ऋणपत्र तीन वर्ष के लिए ही मान्य होगा। यह रैयत को साहूकार के शिकंजे से निकालने का प्रयास था। परन्तु इस कानून का व्यवहार में लाभ रैयत को नहीं, बल्कि साहूकार को होने लगा। क्योंकि ऋण लेना किसान की मजबूरी थी। इसलिए तीन साल के बाद जब वह साहूकार से आगे उधार की माँग करता था तो साहूकार किसान से नए ऋण अनुबंध पर हस्ताक्षर करवाता था। इसमें वह पिछले तीन साल का ब्याज जोड़कर मूलधन में शामिल कर देता था और फिर इस पर नए सिरे से ब्याज शुरू हो जाता था। इस प्रकार साहूकार ने बड़ी चालाकी से इस नए कानून का दुरुपयोग अपने हित के लिए करना शुरू कर दिया। इस प्रक्रिया की जानकारी भी रैयत ने ‘दक्कन दंगा आयोग’ को दी। ‘दक्कन दंगा आयोग’ में किसानों ने दर्ज अपनी शिकायतों में जबरन वसूली से संबंधित अन्याय को भी दर्ज करवाया।

प्रश्न 17.
दक्कन दंगा आयोग की रिपोर्ट के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
1857 के जन-विद्रोह की यादें अभी पुरानी नहीं पड़ी थीं। इसलिए कोई भी कृषक-विद्रोह ब्रिटिश सरकार को खतरे की घंटी जान पड़ता था। दक्कन में हुए कृषक विद्रोह (1875) को बंबई सरकार ने सफलतापूर्वक कुचल दिया था। यद्यपि शांति स्थापित करने में उसे कई महीने लगे। बंबई सरकार में प्रारंभ में तो 1875 के इस कृषक विद्रोह को इतनी गंभीरता से नहीं लिया। परन्तु जब तत्कालिक भारत सरकार (ब्रिटिश) ने दबाव डाला तो इसके लिए एक जाँच आयोग बैठाया गया। इसे ‘दक्कन दंगा आयोग’ नाम दिया गया। 1878 में ब्रिटिश संसद से प्रस्तुत इसकी रिपोर्ट को ‘दक्कन दंगा रिपोर्ट’ कहा गया। यह रिपोर्ट काफी जाँच-पड़ताल के बाद तैयार की गई थी। इसमें मुख्यतः निम्नलिखित सूचनाएँ जुटाई गईं

  • दंगाग्रस्त जिलों में किसानों, साहूकारों तथा चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज किए गए;
  • फसल मूल्यों, मूलधन तथा ब्याज से संबंधित आँकड़े जुटाए गए;
  • भिन्न-भिन्न क्षेत्रों की राजस्व दरों का अध्ययन किया गया;
  • प्रशासन की भूमिका तथा जिला कलेक्टरों द्वारा भेजी गई रिपोर्टों को संकलित किया गया।

अतः यह रिपोर्ट दक्कन विद्रोह को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है।

प्रश्न 18.
इतिहास-लेखन में इतिहासकार सरकारी अभिलेखों का उपयोग किस प्रकार करते हैं?
उत्तर:
इतिहास लेखन के लिए स्रोत आवश्यक हैं। कानून संबंधी रिपोर्ट, दंगा आयोगों की रिपोर्ट तथा अन्य सभी तरह की सरकारी रिपोर्ट इतिहासकार के लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत होते हैं। अंग्रेजी राज व्यवस्था के काल की ये रिपोर्ट इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि इस काल में ‘फाइल कल्चर’ आ चुका था। संविदाओं और अनुबंधों का महत्त्व बढ़ गया था। सरकारी अभिलेखों के बारे में यह बात महत्त्वपूर्ण है कि ये स्वयं में इतिहास नहीं होते। ये इतिहास के पुनर्निर्माण के स्रोत होते हैं। इसलिए इनका उपयोग करते समय इतिहासकार अग्रलिखित बातों को ध्यान में रखते हैं

(1) वे सरकारी रिपोर्टों का अध्ययन अत्यधिक सावधानीपूर्वक करते हैं। विशेषतः इस बात को देखते हैं कि कोई रिपोर्ट किन परिस्थितियों में और क्यों तैयार की गई है। तैयार करने वाले की सोच क्या रही होगी।

(2) सरकारी रिपोर्टों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी होता है अर्थात् किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इन रिपोर्टों से प्राप्त साक्ष्यों को गैर-सरकारी विवरणों, समाचार-पत्रों, संबंधित मामले की ‘कोर्ट’ में दर्ज याचिकाओं व न्यायाधीशों के निर्णयों इत्यादि के ‘साथ मिलान कर लेना चाहिए।

प्रश्न 19.
बेनामी खरीददारी पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
ज़मींदारों ने अपनी ज़मींदारी की भू-संपदा बचाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण हथकंडा बेनामी खरीददारी को अपनाया। इसमें प्रायः ज़मींदार के अपने ही आदमी नीलाम की गई संपत्तियों को महँगी बोली देकर खरीद लेते थे और फिर देय राशि सरकार को नहीं देते थे। ऐसे बेनामी सौदों का विस्तृत विवरण बर्दवान के राजा की ज़मींदारी के मिलते हैं। इस राजा ने सबसे पहले तो अपनी ज़मींदारी का कुछ भाग अपनी माता के नाम कर दिया था क्योंकि कंपनी ने यह घोषित कर रखा था कि स्त्रियों की संपत्ति । नहीं छीनी जाएगी। दूसरा जान-बूझकर भू-राजस्व सरकार के खजाने में जमा नहीं करवाया। फलतः बकाया राशि में वृद्धि होती रही।

अन्ततः नीलामी की नौबत आ गई तो राजा ने अपने ही कुछ आदमियों को बोली के लिए खड़ा कर दिया। उन्होंने सबसे अधिक बोली देकर संपत्ति को खरीद लिया और फिर खरीद की राशि सरकार को देने से मना कर दिया। सरकार को पुनः उस ज़मीन की नीलामी करनी पड़ी और इस बार ज़मींदार के दूसरे एजेंटों ने वैसा ही किया और सरकार को फिर राशि जमा नहीं करवाई। यह प्रक्रिया तब तक दोहराई जाती रही जब तक सरकार और बोली लगाने वाले दोनों ने हार नहीं मान ली।

बोली लगाने वाले नीलामी के समय आना ही छोड़ गए। अन्ततः सरकार को यह संपदा कम कीमत पर पुनः उसी राजा (बर्दवान के ज़मींदार) को ही देनी पड़ी। लेकिन यह तरीका केवल बर्दवान के ज़मींदार ने ही नहीं अपनाया था। बेनामी खरीददारों के सहारे अपनी भू-संपदा दचाने वाले और भी ज़मींदार थे। उल्लेखनीय है कि 1790 के दशक में बंगाल में 12 बड़ी ज़मींदारियाँ थीं। स्थायी बंदोबस्त लागू होने के पहले 8 वर्षों (1793-1801) में इनमें से उत्तरी बंगाल की बर्दवान सहित 4 ज़मींदारियों की बहुत-सी सम्पत्ति नीलाम हुई। लेकिन जितने सौदे हुए, उनमें से 85 प्रतिशत असली थे। सरकार को कुल मिलाकर इनसे 30 लाख की प्राप्ति हुई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन

प्रश्न 20.
अनुपस्थित ज़मींदार व्यवस्था क्या थी?
उत्तर:
स्थायी बंदोबस्त के अंतर्गत नए ज़मींदार वर्ग का उदय हुआ। यह पहले के ज़मींदारों से कई मायनों में अलग था। नए ज़मींदारों में बहुत से लोग शहरी धनिक वर्ग से थे। इन्होंने उन पुराने ज़मींदारों की ज़मींदारियाँ खरीद ली थीं जो समय पर लगान वसूल करके सरकार को जमा नहीं करवा सके थे। प्रो० बिपिन चन्द्र के अनुसार, “1815 ई० तक बंगाल की लगभग आधी भू-संपत्ति पुराने ज़मींदारों के हाथ से निकलकर सौदागरों तथा अन्य धनी वर्गों के पास जा चुकी थी।”

इन नए ज़मींदारों ने अपनी सहूलियत के लिए किसानों से लगान वसूली का काम आगे अन्य इच्छुक लोगों को ज्यादा धन लेकर पट्टे अथवा ठेके पर दे दिया। इस प्रकार खेतिहर किसान और वास्तविक जमींदार के मध्य परजीवी जमींदारों की एक लंबी श्रृंखला (चेन) पैदा हो गई। यह श्रृंखला बंगाल में कई बार तो 50 तक पहुँच गई थी। इस लगानजीवी वर्ग का सारा भार अन्ततः किसान पर ही पड़ता था।

प्रश्न 21.
‘स्थायी बंदोबस्त के कारण बंगाल के जोतदारों की शक्ति में वृद्धि हुई।’ स्पष्ट करें।
उत्तर:
जोतदार बंगाल के गाँवों में संपन्न किसानों के समूह थे। गाँव के मुखिया भी इन्हीं में से होते थे। 18वीं सदी के अंत में ज्यों-ज्यों परंपरागत ज़मींदार स्थायी बंदोबस्त के कारण संकटग्रस्त हुए, त्यों-त्यों इन संपन्न किसानों को शक्तिशाली होने का अवसर मिलता गया।

आर्थिक व सामाजिक दोनों स्तरों में यह गाँवों में प्रभावशाली वर्ग था। कुछ गरीब किसान भी इनके प्रभाव में होते थे। इस सम्पन्न ग्रामीण वर्ग का ज़मींदारों के प्रति व्यवहार काफी नकारात्मक रहता था। जब ज़मींदार का अधिकारी, जिसे सामान्यतः ‘अमला’ कहा जाता था, गाँव में लगान एकत्र करने में असफल रहता और ज़मींदार सरकार को भुगतान न कर पाता तो जोतदारों को बड़ी खुशी होती थी। सम्पन्न रैयत जान-बूझकर भी समय पर ज़मींदार को लगान का भुगतान नहीं करते थे।

ज़मींदार की इस स्थिति के लिए मुख्य तौर पर स्थायी बंदोबस्त उत्तरदायी था। इसमें राजस्व की ऊँची दर तय की गई थी। जमींदार को निश्चित समय पर राजस्व सरकारी खजाने में जमा करवाना होता था। इसके लिए सूर्यास्त विधि कानून लागू किया गया था। साथ ही ज़मींदारों की शक्तियाँ उनसे छीन ली गईं। उनकी स्वायत्तता को सीमित कर दिया गया। उनकी शक्तियाँ मात्र किसानों से लगान इकट्ठा करने और अपनी ज़मींदारी का प्रबंध करने तक ही सीमित कर दी गईं। वास्तव में अंग्रेज़ सरकार ज़मींदारों को महत्त्व तो दे रही थी लेकिन साथ ही वह इन्हें अपने पूर्ण नियंत्रण में रखना चाहती थी। परिणामस्वरूप उनके सैनिक दस्तों को भंग कर दिया गया।

उनके न्यायालयों को कंपनी द्वारा नियुक्त कलेक्टर के नियंत्रण में रख दिया गया। स्थानीय पुलिस प्रबंध भी कलेक्टर ने अपने हाथ में ले लिया। अब वे बाकीदारों के विरुद्ध शक्ति का प्रयोग भी नहीं कर सकते थे। वह बाकीदारों के विरुद्ध न्यायालय में तो जा सकता था परन्तु न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी थी कि वर्षों चलती रहती थी। इसका अहसास इस तथ्य से किया जा सकता है कि अकेले बर्दवान जिले में ही सन् 1798 में 30,000 से अधिक मुकद्दमें बकायेदारों के विरुद्ध लंबित थे।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
बंगाल में स्थायी बंदोबस्त लागू करने के क्या कारण थे? इसकी मुख्य विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:
लॉर्ड कॉर्नवालिस ने निम्नलिखित कारणों से स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी प्रणाली) को लागू किया

1. बंगाल की अर्थव्यवस्था में संकट-1770 के दशक से बंगाल की अर्थव्यवस्था अकालों की मार झेल रही थी। कृषि उत्पादन में निरंतर कमी आ रही थी। अर्थव्यवस्था संकट में फँसती जा रही थी और ठेकेदारी प्रणाली में इससे निकलने के लिए कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

2. कृषि में निवेश को प्रोत्साहन अधिकारी वर्ग यह सोच रहा था कि कृषि में निजी रुचि और निवेश के प्रोत्साहन से खेती, व्यापार और राज्य के राजस्व संसाधनों को विकसित किया जा सकता है।

3. कंपनी सरकार की नियमित आय-कंपनी सरकार अपनी वार्षिक आय को सुनिश्चित करना चाहती थी ताकि प्रशासन व व्यापार की व्यवस्था को वार्षिक बजट बनाकर व्यवस्थित किया जा सके।

4. उद्यमकर्ताओं को लाभ-इससे यह भी उम्मीद थी कि राज्य (कंपनी सरकार) के साथ-साथ उद्यमकर्ता (भूमि व साधनों का मालिक) को भी पर्याप्त लाभ होगा। राज्य की आय नियमित हो जाएगी और वह उद्यमकर्ता से और अधिक माँग नहीं करेगी तो उसका लाभ भी सुनिश्चित होगा।

5. वसूली सुविधाजनक-ज़मींदारी बंदोबस्त लागू करने के पीछे एक व्यावहारिक कारण यह भी था कि रैयत की बजाय ज़मींदारों से कर वसूलना सुविधाजनक था। इसके लिए कम अधिकारियों व कर्मचारियों से भी व्यवस्था की जा सकती थी।

6. वफादार वर्ग-अधिकारियों को यह कारियों को यह उम्मीद थी कि सरकार की नीतियों से पोषित और प्रोत्साहित छोटे (Yeomen Farmers) व बड़े शक्तिशाली ज़मींदारों का वर्ग, सरकार के प्रति वफादार रहेगा।

विशेषताएँ-स्थायी बंदोबस्त (इस्तमरारी) की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(1) यह समझौता बंगाल के राजाओं और ताल्लुकेदारों के साथ कर उन्हें ‘ज़मींदारों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया।

(2) ज़मींदारों द्वारा सरकार को दी जाने वाली वार्षिक भूमि-कर राशि स्थायी रूप से निश्चित कर दी गई। इसीलिए इसे ‘स्थायी बंदोबस्त’ से भी पुकारा गया।

(3) ये ज़मींदार अपनी ज़मींदारी अथवा ‘इस्टेट’ के तब तक पूर्ण तौर पर मालिक थे जब तक वे सरकार को निर्धारित भूमि-कर नियमित रूप से अदा करते रहते थे। उनका यह अधिकार वंशानुगत तौर पर स्वीकार कर लिया गया।

(4) निर्धारित भूमि-कर राशि का समय पर भुगतान न किए जाने पर सरकार उनकी ज़मींदारी अथवा उसका कुछ भाग नीलाम कर सकती थी और इससे वह लगान की वसूली कर सकती थी।

(5) ज़मींदार अपनी ज़मींदारी का मालिक तो था परन्तु व्यवहार में वह गाँव में भू-स्वामी नहीं था बल्कि राजस्व-संग्राहक (समाहत्ता) मात्र था। उसे किसानों से वसूल किए गए लगान में से \(\frac { 1 }{ 11 }\) भाग अपने पास रखना होता था और शेष \(\frac { 10 }{ 11 }\) भाग कंपनी सरकार को देना होता था।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 Img 3

(6) एक ज़मींदारी में बहुत-से गाँव और कभी-कभी तो 400 गाँव तक होते थे। कुल मिलाकर यह ज़मींदारी की एक ‘राजस्व-संपदा’ (Revenue Estate) थी, जिस पर कंपनी सरकार कर निश्चित करती थी।

(7) अलग-अलग गाँवों पर कर निर्धारण व उसे एकत्र करने का कार्य ज़मींदार का था।

(8) इस व्यवस्था में सरकार का रैयत (किसानों) से कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं था। उसका संबंध ज़मींदारों से था।

प्रश्न 2.
सन् 1875 के दक्कन विद्रोह का वर्णन करें। यहाँ के किसान साहूकार के कर्जदार क्यों होते जा रहे थे?
उत्तर:
यह विद्रोह 12 मई, 1875 को महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरू हुआ। यह गाँव जिला पूना (अब पुणे) में पड़ता था। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। उन्हें ‘बाहरी’ और अधिक अत्याचारी समझा गया।

सूपा में व्यापारी और साहूकार रहते थे। यहीं सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्र के कुनबे किसान एकत्र हुए और उन्होंने साहूकारों से उनके ऋण-पत्र (debt bonds) और बही-खाते (Account books) छीन लिए और उन्हें जला दिया। जिन साहूकारों ने बही-खाते और ऋण-पत्र देने का विरोध किया, उन्हें मारा-पीटा गया। उनके घरों को भी जला दिया गया। इसके अलावा अनाज की दुकानें लूट ली गईं। आश्चर्य की बात यह थी कि सूपा के अतिरिक्त दूसरे गाँवों व कस्बों में भी किसानों की यही प्रतिक्रिया सामने आई। इससे साहूकार भयभीत हो गए। वे अपना गाँव छोड़कर भाग गए। यहाँ तक कि वे अपनी संपत्ति और धन भी पीछे छोड़ गए।

स्पष्ट है कि यह मात्र ‘अनाज के लिए दंगा’ (Grain Riots) नहीं था। किसानों का निशाना साफ तौर पर ‘कानूनी दस्तावेज’ अर्थात् बहीखाते और ऋण पत्र थे। इस विद्रोह के फैलने से ब्रिटिश अधिकारी भी घबराए। विशेषतः उन्हें 1857 की जनक्रांति की याद ताजा हो आई। विद्रोही गाँवों में पुलिस चौकियाँ बनाई गईं। यहाँ तक कि इस इलाके को सेना के हवाले करना पड़ा। 95 किसानों को गिरफ्तार करके दंडित किया गया। विद्रोह पर नियंत्रण के बाद भी स्थिति पर नज़र रखी गई। उस समय के समाचार पत्रों की रिपोर्ट से पता चलता है कि किसान योजना बनाकर अपनी कार्यवाही करते थे ताकि अधिकारियों की पकड़ में न आए। क्योंकि किसान अवसर मिलते ही साहूकार के घरों पर हमला बोल देते थे। वास्तव में अंग्रेज़ों की नीतियों के चलते साहूकारों और कृषकों के मध्य परंपरागत संबंध समाप्त हो गए। बदली हुई परिस्थितियों में साहूकार ग्रामीण क्षेत्रों में एक शोषक तत्त्व बनकर उभरा।

ऋणग्रस्तता के कारण-दक्कन में किसान कर्ज के बोझ तले दबता चला गया। सन् 1840 तक स्थिति यह पैदा हो गई थी किसान फसल का खर्च पूरा करने तथा दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी साहूकार से ऊँची दर पर कर्ज़ के लिए विवश हो गया, जो वापिस करना आसान नहीं था। कर्ज़ बढ़ने के कारण किसान की स्थिति खराब होती गई। वह साहूकार पर निर्भर होता गया। संक्षेप में किसान के ऋणग्रस्त होने के निम्नलिखित कारण थे

1. ऊँची भू-राजस्व दर-सन् 1818 में बंबई दक्कन में पहला रैयत से बंदोबस्त किया गया। इसमें राजस्व की माँग इतनी अधिक थी कि लोग अनेक स्थानों पर अपने गाँव छोड़कर भाग गए। वे अपेक्षाकृत बंजर और कम उपजाऊ भूमि पर जाकर खेती करने लगे। वर्षा न होने पर अकाल पड़ जाता और बिना फसल के भूमिकर चुकाना संभव नहीं था। फसल हो या न हो यह कर तो सरकार को चुकाना ही होता था।

2. राजस्व वसूली में सख्ती-कर एकत्रित करवाने वाले जिला कलेक्टरों की किसानों के प्रति कोई सहानुभूति नहीं थी। उनकी फसलें बेचकर राजस्व वसूल किया जाता था। यहाँ तक कि गाँव पर सामूहिक तौर पर जुर्माना भी कर दिया जाता था। प्रायः कलेक्टर अपने जिले का सारा भूमि-कर एकत्रित करके बड़े अधिकारियों के समक्ष अपनी कार्यकुशलता का परिचय देता था। इसके लिए उसकी नीति सदैव कठोर रहती थी। अतः मुसीबत के दिनों में भूमि-कर चुकाने के लिए किसानों को साहूकार की शरण में जाना पड़ा।

3. कृषि-उत्पाद मूल्यों में गिरावट-1830 के आस-पास तक रैयतवाड़ी प्रथा बंबई दक्कन में शुरू हुई जिसमें भूमि-कर की माँग काफी ऊँची थी। इसी दशक में ही मंदी का दौर आ गया जो लगभग 1845 तक चला। फसलों की कीमतों में भारी गिरावट आ गई। यह किसान के लिए बड़ी समस्या के रूप में आया। इसलिए वह कर्ज लेने के लिए विवश हुआ।

4. 1832-34 का अकाल-इस अकाल में लगभग एक-तिहाई पशु धन दक्कन में खत्म हो गया। यहाँ तक कि 50 प्रतिशत मानव जनसंख्या मौत का ग्रास बन गई। जो किसान इस अकाल से किसी तरह जीवित बच गए थे, उन्हें बीज खरीदने, बैल खरीदने, राजस्व चुकाने तथा जीविका चलाने के लिए ऋण लेना ही पड़ा।

सन् 1840 के बाद स्थिति में कुछ परिवर्तन आया। राजस्व की माँग में कुछ कमी की गई। मंदी का दौर भी खत्म हुआ। धीरे-धीरे कृषि उत्पादों की कीमतें बढ़ने लगी, तो किसानों ने नए खेत निकालकर खेती में अधिक रुचि ली। परन्तु इसके लिए भी किसानों को बीज व बैलों की जरूरत थी। अतः साहूकार से ऋण उसे इन परिस्थितियों में भी लेना पड़ा।

प्रश्न 3.
दक्कन में किसान विद्रोह के क्या कारण थे? इसमें किसानों ने साहूकारों के बहीखाते क्यों जला डाले?
उत्तर:
दक्कन मुख्यतः बंबई और महाराष्ट्र के क्षेत्र को कहा गया है। बंबई दक्कन में किसानों ने साहूकारों तथा अनाज के व्यापारियों के खिलाफ़ अनेक विद्रोह किए। इनमें से 1875 का विद्रोह सबसे भयंकर था। यह विद्रोह महाराष्ट्र के एक बड़े गाँव सूपा (Supe) से शुरु हुआ। दो महीनों के अंदर यह विद्रोह पूना और अहमदनगर के दूसरे बहुत-से गाँवों में फैल गया। 100 कि०मी० पूर्व से पश्चिम तथा 65 कि०मी० उत्तर से दक्षिण के बीच लगभग 6500 वर्गकिलोमीटर का क्षेत्र इसकी चपेट में आ गया। हर जगह गुजराती और मारवाड़ी महाजनों और साहूकारों पर आक्रमण हुए। दक्कन के इन किसान विद्रोहों के निम्नलिखित कारण थे

1. रैयतवाड़ी प्रणाली-इस प्रणाली में किसानों को उस भूमि का मालिक माना गया था जिन पर वे खेती करते आ रहे थे। इसमें ज़मींदार तो नहीं थे परंतु सरकार फसल का लगभग आधा भाग किसानों से वसूलती थी। इस प्रणाली में भू-राजस्व की दर भी बहुत ऊँची थी।

2. किसान का ऋणग्रस्त होना-सरकार का लगान किसान पूरा नहीं कर पाता था। इसलिए उसे साहूकार से उधार लेना पड़ता था। कई बार तो उसे दैनिक उपयोग की वस्तुओं के लिए भी ऋण लेना पड़ता था जो उसके लिए वापिस करना आसान नहीं था।

अमेरिका के गृह-युद्ध (1861-65) के दिनों में कपास की माँग में अचानक उछाल आया। कपास के मूल्य में जबरदस्त वृद्धि हुई। इस स्थिति में साहूकार व्यापारियों ने किसानों को खूब अग्रिम धनराशि दी। लेकिन ज्योंहि युद्ध समाप्त हुआ ‘ऋण का यह स्रोत सूख गया’ । युद्ध के बाद कपास के निर्यात में गिरावट आ गई। कपास की माँग खत्म हो गई। किसानों को ऋण मिलना बन्द हो गया और पहले दिए हुए ऋण को लौटाने के लिए दबाव बढ़ गया। 1870 ई० के आस-पास यह स्थिति किसान विद्रोहों के लिए काफी हद तक उत्तरदायी कही जा सकती है।

3. अन्याय का अनुभव-जब साहूकारों ने उधार देने से मना किया तो किसानों को बहुत गुस्सा आया। क्योंकि परंपरागत ग्रामीण व्यवस्था में न तो अधिक ब्याज लिया जाता था और न ही मुसीबत के समय उधार से मनाही की जाती थी। किसान विशेषतः इस बात पर अधिक नाराज़ थे कि साहूकार वर्ग इतना संवेदनहीन हो गया है कि वह उनके हालात पर रहम नहीं खा रहा है। सन् 1874 में साहूकारों ने भू-राजस्व चुकाने के लिए किसानों को उधार देने से स्पष्ट इंकार कर दिया था। वे सरकार के इस कानून को नहीं मान रहे थे कि चल-सम्पत्ति की नीलामी से यदि उधार की राशि पूरी न हो तभी साहूकार जमीन की नीलामी करवाएँ। अब उधार न मिलने से मामला और भी जटिल हो गया और किसान विद्रोही हो उठे।

बही-खातों का जलना-दक्कन विद्रोह तथा देश के अन्य भागों में भी किसानों ने विद्रोहों में बही-खातों को निशाना बनाया। वास्तव में ऋण-प्राप्ति और उसकी वापसी दोनों ही दक्कन के किसानों के लिए एक जटिल प्रक्रिया थी। परंपरागत साहूकारी कारोबार में कानूनी दस्तावेजों का इतना झंझट नहीं था। जुबान अथवा वायदा ही पर्याप्त था। क्योंकि किसी सौदे के लिए परस्पर सामाजिक दबाव रहता था। ब्रिटिश अधिकारी वर्ग बिना विधिसम्मत अनुबंधों के सौदों को संदेह की दृष्टि से देखते थे। विवाद छिड़ने की स्थिति में न्यायालयों में भी ऐसे बंधपत्रों, संविदाओं और दस्तावेजों का ही महत्त्व होता था, जिनमें शर्ते साफ-साफ हस्ताक्षरित होती थीं।

जुबानी लेन-देन कानून के दायरे में कोई महत्त्व नहीं रखता था जबकि परंपरागत प्रणाली में गाँव की पंचायत महत्त्व देती थी। कर्ज़ से डूबे किसान को जब और उधार की जरूरत पड़ती तो केवल एक ही तरीके से यह संभव हो पाता कि वह ज़मीन, गाड़ी, हल-बैल ऋण दाता को दे दे। फिर भी जीवन के लिए तो उसे कुछ-न-कुछ साधन चाहिए थे। अतः वह इन साधनों को साहूकार से किराए पर लेता था। जो वास्तव में उसके अपने ही होते थे। अब उसे अपने ही साधनों का किराया साहूकार को देना होता था। अपनी विवशता के कारण उसे भाडापत्र अथवा किराया नामा में स्पष्ट करना होता कि यह पशु, बैलगाड़ी उसके अपने नहीं हैं।

उसने इन्हें किराए पर लिया है और इसके लिए वह इनका निश्चित किराया प्रदान करेगा। स्पष्ट है कि यह दस्तावेज न्यायालय में साहूकार का पक्ष ही सुदृढ़ करता था। गगजिन अनुबंधों पर वह हस्ताक्षर करता था या अंगूठा लगाता था उनमें क्या लिखा है, वह नहीं जानता था। उधार लेने के लिए हस्ताक्षर जरूरी थे। इसके बिना उन्हें कहीं कर्ज नहीं मिल सकता था। हस्ताक्षरित दस्तावेज़ कोर्ट में प्रायः साहूकार के ही पक्ष में जाता था। अतः इस नई व्यवस्था के कारण किसान बंधपत्रों और दस्तावेजों को अपनी दुःख-तकलीफों का मुख्य कारण मानने लगा। वह तो लिखे हुए शब्दों से डरने लगा। यही वह कारण था कि जब भी कृषक विद्रोह होता था तभी किसान दस्तावेजों को जलाते थे। बहीखाते व ऋण अनुबंध पत्र, उनका पहला निशाना होता था। उसने साहूकार का घर बाद में जलाया, पहले दस्तावेजों को फूंका।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 10 उपनिवेशवाद और देहात : सरकारी अभिलेखों का अध्ययन Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए-

1. मुग़ल शब्द की उत्पत्ति हुई है
(A) मंगोल से
(B) मोगोल से
(C) मोगिल से
(D) मोगोर से
उत्तर:
(A) मंगोल से

2. मुगलों की मातृभाषा क्या थी?
(A) तुर्की
(B) अरबी
(C) फारसी
(D) उर्दू
उत्तर:
(C) फारसी

3. बाबर ने भारत पर आक्रमण किया
(A) 1490 ई० में
(B) 1526 ई० में
(C) 1497 ई० में
(D) 1504 ई० में
उत्तर:
(B) 1526 ई० में

4. ‘तुक-ए-बाबरी’ का लेखक कौन है?
(A) बाबर
(B) जहाँगीर
(C) अबुल फज़्ल
(D) मामुरी
उत्तर:
(A) बाबर

5. बाबर का उत्तराधिकारी कौन था?
(A) हुमायूँ
(B) अकबर
(C) अस्करी
(D) हिन्दाल
उत्तर:
(A) हुमायूँ

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

6. अकबर की पहली सफलता थी
(A) पानीपत की पहली लड़ाई
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई
(C) पानीपत की तीसरी लड़ाई
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) पानीपत की दूसरी लड़ाई

7. राजकुमार सलीम ने शासक बनने के बाद अपना नाम रखा
(A) अकबर
(B) जहाँगीर
(C) शाहजहाँ
(D) आलमगीर
उत्तर:
(B) जहाँगीर

8. जहाँगीर ने न्याय की जंजीर किस किले में लगवाई ?
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) लाहौर
(D) अजमेर
उत्तर:
(A) आगरा

9. किस मुगल शासक को अपने अन्तिम दिनों में अपने पुत्र की कैद में रहना पड़ा?
(A) जहाँगीर को
(B) औरंगजेब को
(C) बहादुरशाह द्वितीय को
(D) शाहजहाँ को
उत्तर:
(D) शाहजहाँ को

10. किस मुगल शासक ने अपने पिता के रहते हुए उत्तराधिकार के युद्ध में सफलता पाई ?
(A) जहाँगीर ने
(B) शाहजहाँ ने
(C) औरंगजेब ने
(D) फरुखसियर ने
उत्तर:
(C) औरंगजेब ने

11. उत्तर मुगलकाल में सैयद बन्धुओं को लोग किस नाम से पुकारते थे ?
(A) वफादार सेवक
(B) राजा बनाने वाले
(C) मित्र मण्डली
(D) देशद्रोही
उत्तर:
(B) राजा बनाने वाले

12. इतिवृत्त किस अंग्रेजी शब्द का हिन्दी अनुवाद है ?
(A) डाक्यूमेन्ट्स
(B) क्रॉनिकल्स
(C) ऑफिशियल लेटर
(D) फरमानज
उत्तर:
(B) क्रॉनिकल्स

13. निम्नलिखित में से कौन-सी लड़ाई बाबर ने नहीं लड़ी ?
(A) कन्वाह का युद्ध
(B) चन्देरी का युद्ध
(C) घाघरा का युद्ध
(D) पानीपत का दूसरा युद्ध
उत्तर:
(A) कन्वाह का युद्ध

14. बाबरनामा किस भाषा में लिखा गया है ?
(A) अरबी
(B) फारसी
(C) उर्दू
(D) तुर्की
उत्तर:
(D) तुर्की

15. मुगलकाल में निम्नलिखित पुस्तक का अनुवाद नहीं हुआ
(A) बाबरनामा
(B) महाभारत
(C) रामायण
(D) हुमायूँनामा
उत्तर:
(D) हुमायूँनामा

16. मुगलकाल में पांडुलिपियों का रचनास्थल कहलाता था
(A) शाही दरबार
(B) कारखाना
(C) दीवान-ए-आम
(D) किताबखाना
उत्तर:
(D) किताबखाना

17. किस मुगल शासक ने गैर-मुसलमानों पर दोबारा जजिया कर लगाया?
(A) हुमायूँ
(B) अकबर
(C) शाहजहाँ
(D) औरंगजेब
उत्तर:
(D) औरंगजेब

18. फतेहपुर सीकरी किस मुगल बादशाह की नई राजधानी थी?
(A) बाबर
(B) हुमायूँ
(C) शेरशाह सूरी
(D) अकबर
उत्तर:
(D) अकबर

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

19. अकबर ने ‘जरीन कलम’ सोने की कलम का पुरस्कार किसे दिया ?
(A) अबुल फज़ल को
(B) बदायूँनी को
(C) मुहम्मद हुसैन को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(C) मुहम्मद हुसैन को

20. इतिवृत्तों की चित्रकारी का उद्देश्य था
(A) पुस्तक की सुन्दरता
(B) शासक व राज्य की पहचान प्रदर्शन
(C) जनता को सन्देश देना।
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

21. इस्लाम की चित्रकारी के बारे में धारणा है
(A) इसका विकास होना चाहिए
(B) खुदा के सृजन के अधिकार को चुनौती है
(C) चित्रकारी करने वाला व्यक्ति अपराधी है
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) खुदा के सृजन के अधिकार को चुनौती है

22. ईरान का वह दरबारी चित्रकार कौन था जिसको पूरे इस्लाम जगत से मान्यता मिली ? वह बाद में भारत आ गया।
(A) विहजाद
(B) अब्दुस समद
(C) मीर सैयद अली
(D) बसावन
उत्तर:
(A) विहजाद

23. अबुल फज़ल के बारे में सत्य है
(A) वह शेख मुबारक नागौरी का पुत्र था
(B) वह फैजी का भाई था
(C) वह अरबी, फारसी, यूनानी व तुर्की का ज्ञाता था
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

24. अबुल फज़ल की हत्या करवाई थी
(A) अकबर ने
(B) सलीम (जहाँगीर ने)
(C) मानसिंह ने
(D) फैजी ने
उत्तर:
(B) सलीम (जहाँगीर ने)

25. अब्दुल हमीद लाहौरी की प्रमुख रचना कौन-सी थी?
(A) अकबरनामा
(B) आइन-ए-अकबरी
(C) बादशाहनामा
(D) आलमगीरनामा
उत्तर:
(C) बादशाहनामा

26. मुगलकाल का कौन-सा इतिवृत्त अभी तक भी फारसी से अनुवादित नहीं हो पाया है ?
(A) अकबरनामा
(B) जहाँगीरनामा
(C) बादशाहनामा
(D) आलमगीरनामा
उत्तर:
(C) बादशाहनामा

27. “हुमायूँनामा” का लेखक कौन था?
(A) अबुल फजल
(B) अब्दुल हमीद
(C) गुलबदन बेगम
(D) नूरजहाँ
उत्तर:
(C) गुलबदन बेगम

28. जज़िया किस मुगल शासक ने हटाया था?
(A) औरंगजेब ने
(B) अकबर ने
(C) शाहजहाँ ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(B) अकबर ने

29. हुमायूँ की पत्नी का नाम था
(A) सुल्तान जहाँ बेगम
(B) जहाँआरा
(C) गुलबदन बेगम
(D) नादिरा
उत्तर:
(D) नादिरा

30. गैर-इस्लामी जनता का विश्वास पाने के लिए अकबर ने कदम उठाया
(A) तीर्थयात्रा व जजिया कर की समाप्ति
(B) सम्मानपूर्वक वैवाहिक संबंध
(C) बलपूर्वक धर्म परिवर्तन की मनाही
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. अकबर ने इस स्थान को राजधानी के रूप में प्रयोग नहीं किया
(A) अजमेर
(B) आगरा
(C) दिल्ली
(D) फतेहपुर सीकरी
उत्तर:
(A) अजमेर

32. अकबर ने लाल किले का निर्माण करवाया
(A) दिल्ली में
(B) लाहौर में
(C) आगरा में
(D) इलाहाबाद मे
उत्तर:
(C) आगरा में

33. अकबर के पिता का नाम था
(A) बाबर
(B) हुमायूँ
(C) औरंगजेब
(D) जहाँगीर
उत्तर:
(B) हुमायूँ

34. अकबर ने फतेहपुर सीकरी में किस विश्व-प्रसिद्ध इमारत का निर्माण करवाया ?
(A) शेख सलीम चिश्ती की दरगाह
(B) बुलन्द दरवाजा
(C) बीरबल का महल
(D) तानसेन का भवन
उत्तर:
(B) बुलन्द दरवाजा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

35. शाहजहाँ ने दिल्ली में मुख्य रूप से बनवाया
(A) जामा मस्जिद
(B) लाल किला
(C) चाँदनी चौक
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

36. औरंगजेब की मृत्यु हुई
(A) दिल्ली में
(B) आगरा में
(C) औरंगाबाद में
(D) लाहौर में
उत्तर:
(C) औरंगाबाद में

37. मुगल दरबार के शिष्टाचार में शामिल था
(A) किसी व्यक्ति के खड़े होने की जगह
(B) अभिवादन का तरीका
(C) शासक से मिलने के लिए नजराना भेंट करना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

38. मुगलकाल में कौन-सी एकमात्र महिला झरोखा दर्शन देती थी ?
(A) गुलबदन बेगम
(B) नूरजहाँ
(C) मुमताज महल
(D) जहाँआरा
उत्तर:
(B) नूरजहाँ

39. मुगलकाल में सबसे खर्चीला दरबारी उत्सव था
(A) शब-ए-बारात
(B) नौरोज
(C) शासक का जन्म दिन
(D) ईद
उत्तर:
(C) शासक का जन्म दिन

40. सिंहासनों के निर्माण पर सबसे अधिक धन खर्च किसने किया ?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहाँगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(D) शाहजहाँ ने

41. अकबर ने तीर्थयात्रा कर कब समाप्त किया?
(A) 1563 ई० में
(B) 1564 ई० में
(C) 1565 ई० में
(D) 1569 ई० में
उत्तर:
(A) 1563 ई० में

42. अकबर ने किस नए धर्म की स्थापना की ?
(A) दीन-ए-इलाही
(B) सूफी मत
(C) सुलह-ए-कुल
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) दीन-ए-इलाही

43. हरम में सबसे उच्च स्थान प्राप्त महिला को कहा जाता था
(A) अगहा
(B) अगाचा
(C) बेगम
(D) पादशाह बेगम
उत्तर:
(D) पादशाह बेगम

44. नूरजहाँ के अतिरिक्त कौन-सी महिला ऐसी थी जिसने राजनीति में खूब हस्तक्षेप किया?
(A) गुलबदन बेगम
(B) जहाँआरा
(C) मुमताज महल
(D) रोशनआरा
उत्तर:
(B) जहाँआरा

45. मुगलकालीन नौकरशाही में शामिल नहीं थे
(A) दरबारी
(B) मनसबदार
(C) जमींदार
(D) जागीरदार
उत्तर:
(C) जमींदार

46. मुगल शासक नौकरशाहों पर नियंत्रण रखते थे
(A) सख्त व्यवहार द्वारा
(B) स्थानांतरण से
(C) मृत्यु के बाद सम्पत्ति जब्त करके
(D) उपर्युक्त सभी से
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी से

47. किस मुगल शासक के काल में प्रांतों की संख्या सबसे अधिक थी ?
(A) अकबर
(B) जहाँगीर
(C) शाहजहाँ
(D) औरंगजेब
उत्तर:
(C) शाहजहाँ

48. ईरानी शासकों के लिए सामान्य रूप से शब्द प्रयोग किया जाता था
(A) सफावी
(B) तुरानी
(C) उजबेग
(D) मंगोलियन
उत्तर:
(A) सफावी

49. मुगलों व ईरानी शासकों के बीच टकराव का मुख्य कारण था
(A) काबुल पर कब्जा
(B) कन्धार पर कब्जा
(C) हैरात का शहर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) कन्धार पर कब्जा

50. थल मार्ग से व्यापार के लिए किस समीपवर्ती राज्य की मुग़लों को आवश्यकता थी ?
(A) चीन
(B) बर्मा
(C) ऑटोमन
(D) ईरान
उत्तर:
(C) ऑटोमन

51. मुगलों के लिए ऑटोमन (तुर्की) साम्राज्य का धार्मिक महत्त्व था
(A) मक्का व मदीना के कारण
(B) धर्म युद्धों के कारण
(C) धर्म की स्वीकृति के लिए
(D) खलीफा के कारण
उत्तर:
(A) मक्का व मदीना के कारण

52. अकबर के काल में जेसुइट मिशन आया
(A) 1580-82 ई० में
(B) 1591 ई० में
(C) 1595 ई० में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

53. जेसुइट का सबसे प्रमुख प्रतिनिधि मण्डल था
(A) एक्या वीणा का
(B) मान्सेरेट का
(C) राल्फ फिन्च का
(D) उपरोक्त सभी का
उत्तर:
(B) मान्सेरेट का

54. मुगलकाल में प्रधानमंत्री को क्या कहा जाता था ?
(A) खानखाना
(B) दीवान
(C) वकील
(D) सदर
उत्तर:
(C) वकील

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

55. मुगलकाल में झरोखा दर्शन का अधिकार किसको था ?
(A) काज़ी को
(B) वज़ीर को
(C) सम्राट को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(C) सम्राट को

56. मुगलकाल में शाही घरानों के घरेलू कार्यों का मंत्री था
(A) खान-ए-सामा
(B) मीर-ए-बहर
(C) मीरबख्शी
(D) नाज़िम
उत्तर:
(A) खान-ए-सामा

57. अकबर ने शासन प्रबन्ध में किस शासक का अनुकरण किया था ?
(A) बहलोल लोधी
(B) शेरशाह सूरी
(C) इब्राहिम लोधी
(D) सिकन्दर लोधी
उत्तर:
(B) शेरशाह सूरी

58. निम्नलिखित में से जहाँगीर के समय का नया मुगल प्रान्त था/थे
(A) उड़ीसा
(B) सिन्ध
(C) कश्मीर
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

59. ‘बादशाहनामा’ का लेखक कौन था ?
(A) गुलबदन बेगम
(B) अब्दुल हमीद लाहौरी
(C) अबुल फज़ल
(D) इब्न-बतूता
उत्तर:
(B) अब्दुल हमीद लाहौरी

60. मुगलकाल में परगने का मुखिया कौन होता था ?
(A) आमिल
(B) मीर-ए-सदर
(C) दीवान-ए-आला
(D) मीर-ए-बहर
उत्तर:
(A) आमिल

61. अन्तिम मुगल बादशाह कौन था?
(A) औरंगजेब
(B) बहादुरशाह
(C) अकबर द्वितीय
(D) बहादुरशाह जफर द्वितीय
उत्तर:
(D) बहादुरशाह जफ़र द्वितीय

62. बुलंद दरवाज़ा का निर्माण फतेहपुर सीकरी में किसने कराया?
(A) अकबर ने
(B) शाहजहाँ ने
(C) औरंगजेब ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(A) अकबर ने

63. अकबर ने सभी धर्मों का सार ग्रहण कर किस नए मत की नींव डाली ?
(A) सूफी मत की
(B) भक्ति मत की
(C) दीन-ए-इलाही मत की
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दीन-ए-इलाही मत की

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
भारत में मुग़ल साम्राजय की स्थापना 1526 ई० में बाबर ने की थी।

प्रश्न 2.
मुग़ल शब्द की उत्पत्ति किस शब्द से हुई ?
उत्तर:
मुग़ल शब्द की उत्पत्ति मंगोल शब्द से हुई।

प्रश्न 3.
मुगल शासक स्वयं को क्या कहते थे ?
उत्तर:
मुगल शासक स्वयं को तैमूरी वंशज कहते थे।

प्रश्न 4.
बाबर का जन्म स्थान कौन-सा है ?
उत्तर:
फरगाना बाबर का जन्म स्थान है।

प्रश्न 5.
हुमायूँ को भारत से बाहर किसने निकाला ?
उत्तर:
हमा को भारत से बाहर शेरशाह सरी ने निकाला।

प्रश्न 6.
अकबर का जन्म कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर:
अकबर का जन्म 1542 ई० में सिन्ध के पास अमरकोट नामक स्थान पर हुआ।

प्रश्न 7.
हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर कहाँ पर था ?
उत्तर:
हुमायूँ की मृत्यु के समय अकबर पंजाब के कलानौर नामक स्थान पर था।

प्रश्न 8.
अकबर ने तीर्थ यात्रा कर व जजिया कर कब हटाया ?
उत्तर:
अकबर ने तीर्थ यात्रा कर 1563 ई० तथा जजिया कर 1564 ई० में हटाया।

प्रश्न 9.
1611 ई० में शादी के बाद जहाँगीर ने मेहरुनिसा को क्या नाम दिया ?
उत्तर:
1611 ई० में शादी के बाद जहाँगीर ने मेहरुनिसा को ‘नूरजहाँ’ नाम दिया।

प्रश्न 10.
खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि किसने और क्यों दी ?
उत्तर:
खुर्रम को शाहजहाँ की उपाधि जहाँगीर ने मेवाड़-विजय के उपलक्ष्य में दी।

प्रश्न 11.
औरंगजेब का शासन काल कब-से-कब तक था ?
उत्तर:
औरंगज़ेब का शासन काल 1658 से 1707 ई० तक रहा।

प्रश्न 12.
उत्तर मुगलकाल का समय क्या था ?
उत्तर:
उत्तर मुगलकाल 1707 से 1857 ई० तक था।

प्रश्न 13.
नादिरशाह ने भारत पर कब आक्रमण किया तथा किसे पराजित किया ?
उत्तर:
नादिरशाह ने भारत पर 1739 ई० में आक्रमण कर मुहम्मदशाह को पराजित किया।

प्रश्न 14.
अन्तिम मुगल सम्राट की मृत्यु कब व कहाँ हुई ?
उत्तर:
अन्तिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर की मृत्यु 1862 ई० में रंगून. में हुई।

प्रश्न 15.
मुगलकाल में इतिवृत्त कहाँ रचे गए ?
उत्तर:
मुगलकाल में इतिवृत्त शाही दरबार के संरक्षण में ‘किताबखाना’ में रचे गए।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 16.
हुमायूँनामा किसकी रचना है ?
उत्तर:
हुमायूँनामा गुलबदन बेगम की रचना है।

प्रश्न 17.
अकबरनामा का लेखक कौन था ?
उत्तर:
अबुल फज़्ल अकबरनामा का लेखक था।

प्रश्न 18.
शाहजहाँनामा किसकी रचना है ?
उत्तर:
शाहजहाँनामा अब्दुल हमीद लाहौरी की रचना है।

प्रश्न 19.
मुहम्मद काजिम की रचना का नाम लिखें।
उत्तर:
मुहम्मद काजिम की रचना ‘आलमगीरनामा’ है।

प्रश्न 20.
तुक-ए-जहाँगीरी या जहाँगीरनामा का लेखक कौन है ?
उत्तर:
जहाँगीरनामा का लेखक स्वयं जहाँगीर है।

प्रश्न 21.
मुगलकाल में दरबारी भाषा कौन-सी थी ?
उत्तर:
मुगलकाल में दरबार की भाषा फारसी थी।

प्रश्न 22.
महाभारत का फारसी भाषा में अनुवाद किस नाम से हुआ ?
उत्तर:
महाभारत का फारसी भाषा में अनुवाद ‘रज्मनामा’ के नाम से हुआ।

प्रश्न 23.
पाण्डुलिपियों का लेखन स्थल क्या कहलाता था ?
उत्तर:
पाण्डुलिपियों का लेखन स्थल ‘किताबखाना’ कहलाता था।

प्रश्न 24.
अकबर के समय में लेखन की सर्वाधिक पसंद की जाने वाली शैली का क्या नाम था ?
उत्तर:
अकबर के समय में लेखन की सर्वाधिक पसंद की जाने वाली शैली ‘नस्तलिक’ कहलाती थी।

प्रश्न 25.
अकबर ने मुहम्मद हुसैन को क्या खिताब दिया था ?
उत्तर:
अकबर ने मुहम्मद हुसैन को ‘जरीन कलम (सोने की कलम)’ का खिताब दिया।

प्रश्न 26.
ईरानी दरबार का सबसे अधिक चर्चित चित्रकार कौन था ?
उत्तर:
ईरानी दरबार का सबसे अधिक चर्चित चित्रकार विहजाद था।

प्रश्न 27.
अकबरनामा व बादशाहनामा में लगभग कितने चित्र हैं ?
उत्तर:
इन दोनों में से प्रत्येक में लगभग 150 से अधिक चित्र हैं।

प्रश्न 28.
अबुल फज्ल ने अकबरनामा कब लिखा ?
उत्तर:
अबुल फज़्ल ने अकबरनामा 1589 से 1602 के बीच लिखा।

प्रश्न 29.
मुगलकाल के इतिवृत्तों के अनुवाद का कार्य किस संस्थान द्वारा करवाया गया ?
उत्तर:
मुगलकाल के इतिवृत्तों के अनुवाद का कार्य एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल (1784) द्वारा करवाया गया।

प्रश्न 30.
अकबरनामा का सबसे अच्छा अंग्रेजी अनुवाद किसका माना जाता है ?
उत्तर:
अकबरनामा का सबसे अच्छा अंग्रेजी अनुवाद हेनरी बेवरिज का माना जाता है।

प्रश्न 31.
मुगल राज्य को दैवीय राज्य सर्वप्रथम किसने वर्णित किया ?
उत्तर:
मुग़ल राज्य को दैवीय राज्य सर्वप्रथम अबुल फज्ल ने वर्णित किया।

प्रश्न 32.
चित्रकारों ने मुग़लों के राज्य को दैवीय राज्य कैसे स्पष्ट किया ?
उत्तर:
चित्रकारों ने मुग़ल शासकों के चेहरे को विशेष प्रभामंडल में दिखाया जैसे देवताओं को दिखाते हैं।

प्रश्न 33.
अकबर ने अपनी सारी जनता को एक जैसा स्वीकार करते हुए कौन-सी नीति अपनाई ?
उत्तर:
अकबर ने सभी के साथ मतभेद न करते हुए ‘सुलह-ए-कुल’ की नीति अपनाई।

प्रश्न 34.
‘न्याय की जंजीर’ किस शासक ने लगवाई ?
उत्तर:
‘न्याय की जंजीर’ जहाँगीर ने लगवाई।

प्रश्न 35.
आगरा शहर की नींव कब व किसने रखी ?
उत्तर:
आगरा शहर की नींव सिकंदर लोधी ने 1504 ई० में रखी।

प्रश्न 36.
आगरा का लालकिला किसने बनवाया ?
उत्तर:
आगरा का लालकिला अकबर ने बनवाया।

प्रश्न 37.
फतेहपुर सीकरी मुग़लों की राजधानी कब रही ?
उत्तर:
फतेहपुर सीकरी मुग़लों की राजधानी 1570 ई० से 1585 ई० तक रही।

प्रश्न 38.
जहाँगीर की मनपसंद जगह कौन-सी थी ?
उत्तर:
जहाँगीर की मनपसंद जगह लाहौर थी।

प्रश्न 39.
शाहजहाँ की दिल्ली को क्या नाम दिया गया?
उत्तर:
शाहजहाँ की दिल्ली को शाहजहाँनाबाद का नाम दिया गया।

प्रश्न 40.
शाहजहाँ के काल में अभिवादन के कौन-से नए तरीके जुड़े ?
उत्तर:
शाहजहाँ के काल में अभिवादन के नए तरीके ‘तसलीम’ व ‘जमींबोस’ जुड़े।

प्रश्न 41.
मुगल शासकों द्वारा प्रातःकाल जनता को दर्शन देने की प्रथा क्या कहलाती थी ?
उत्तर:
मुगल शासकों द्वारा प्रातःकाल जनता को दर्शन देने की प्रथा ‘झरोखा’ कहलाती थी।

प्रश्न 42.
मुगलशाही दरबार में कौन-सा ईरानी त्योहार धूमधाम से मनाया जाता था ?
उत्तर:
मुगलशाही दरबार में ‘नौरोज’ नामक ईरानी त्योहार धूमधाम से मनाया जाता था।

प्रश्न 43.
मयूर सिंहासन को कौन लूटकर ले गया ?
उत्तर:
मयूर सिंहासन को नादिरशाह लूटकर ले गया।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 44.
शाही परिवार के अतिरिक्त अन्य लोगों के लिए मुग़ल दरबार की सर्वोच्च पदवी कौन-सी थी ?
उत्तर:
शाही परिवार के अतिरिक्त मुग़ल दरबार की सर्वोच्च पदवी ‘आसफखां’ की थी।

प्रश्न 45.
मुगल शासकों से मिलने के लिए दी जाने वाली भेंट क्या कहलाती थी ?
उत्तर:
मुग़ल शासकों से मिलने के लिए दी जाने वाली भेंट ‘नज़राना’ कहलाती थी।

प्रश्न 46.
‘हरम’ का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
उत्तर:
हरम का शाब्दिक अर्थ है ‘पवित्र स्थान’

प्रश्न 47.
मुगलकाल में राजनीति में महिलाओं की शुरुआत किससे हुई ?
उत्तर:
मुगलकाल में राजनीति में महिलाओं की शुरुआत नूरजहाँ से हुई।

प्रश्न 48.
किस राजपूत शासक ने मुगलों से वैवाहिक संबंधों की शुरुआत की ?
उत्तर:
आमेर के राजा बिहारी मल (भारमल) ने मुग़लों से वैवाहिक संबंधों की शुरुआत की।

प्रश्न 49.
मुगलकाल में दरबार की कार्रवाई को किस नाम से दर्ज किया जाता था ?
उत्तर:
मुगलकाल में दरबारी कार्रवाई ‘अखबारात-ए-दरबार-ए-मुअल्ला’ के नाम से दर्ज की जाती थी।

प्रश्न 50.
मुगलकाल में प्रांत को क्या कहते थे ? इसका मुखिया कौन होता था ?
उत्तर:
मुगलकाल में प्रांत को सूबा कहते थे। सूबे का मुखिया सूबेदार कहलाता था।

प्रश्न 51.
‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना कब की गई थी?
उत्तर:
‘दीन-ए-इलाही’ की स्थापना 1582 ई० में की गई थी।

प्रश्न 52.
मुगलों व ईरान के बीच झगड़े की जड़ कौन-सा शहर था ?
उत्तर:
मुगलों व ईरान के बीच झगड़े की जड़ कन्धार शहर था।

प्रश्न 53.
कन्धार मुगलों के हाथ से अन्तिम बार कब निकल गया ?
उत्तर:
कन्धार अन्तिम बार मुगलों के हाथ से 1649 ई० में निकल गया।

प्रश्न 54.
मुगलकाल में ‘मक्का व मदीना’ किस साम्राज्य का हिस्सा थे ?
उत्तर:
मुगलकाल में मक्का व मदीना तुर्की साम्राज्य ‘ऑटोमन साम्राज्य’ का हिस्सा थे।

प्रश्न 55.
अकबर के दरबार में पहला जेसुइट मिशन कब आया ?
उत्तर:
अकबर के दरबार में पहला जेसुइट मिशन 1580-82 ई० में आया।

प्रश्न 56.
अकबर ने अपने बेटे मुराद का शिक्षक किसे नियुक्त किया ?
उत्तर:
अकबर ने अपने बेटे मुराद का शिक्षक फादर मान्सेरेट को नियुक्त किया।

प्रश्न 57.
अकबर ने इबादतखाना की स्थापना कब व कहाँ की ?
उत्तर:
अकबर ने इबादतखाना की स्थापना 1575 ई० में फतेहपुर सीकरी में की।

प्रश्न 58.
मनसबदारों की भर्ती कौन करता था ?
उत्तर:
मनसबदारों की भर्ती स्वयं सम्राट करता था।

प्रश्न 59.
मनसबदार की भर्ती सम्बन्धी रिकॉर्ड को क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
उसे हकीकत कहा जाता था।

प्रश्न 60.
मनसबदारों की कितनी श्रेणियाँ थीं ?
उत्तर:
अबुल फल के अनुसार मनसबदारों की 60 श्रेणियाँ थीं, परन्तु वास्तविक श्रेणियाँ 33-34 से ऊपर नहीं थीं।

प्रश्न 61.
अकबर के समय में भूमि को मापने के लिए किस उपकरण का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
अकबर के समय में भूमि को मापने के लिए 33 इंच का गज प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 62.
मनसबदारी प्रणाली किसने शुरू की थी ?
उत्तर:
मनसबदारी प्रणाली अकबर ने आरम्भ की थी।

प्रश्न 63. सबसे बड़ा मनसबदार पद कितने सैनिकों पर था ?
उत्तर:
सबसे बड़ा मनसबदार पद 10000 सैनिकों पर था।

प्रश्न 64.
किन सम्राटों की चित्रकला में रुचि थी ?
उत्तर:
अकबर तथा जहाँगीर की चित्रकला में रुचि थी।

प्रश्न 65.
बाबर ने हैरात में क्या देखा था ?
उत्तर:
बाबर ने हैरात में ईरानी चित्रकला के नमूने देखे थे।

प्रश्न 66.
हमजानामा को चित्रित करने का काम कब पूरा हुआ था ?
उत्तर:
हमजानामा को चित्रित करने का काम अकबर के समय में पूरा हुआ था।

प्रश्न 67.
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था किसने नियन्त्रित की?
उत्तर:
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था राजा टोडरमल ने नियन्त्रित की।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
जहाँगीर कौन था?
उत्तर:
अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से शासक बना । उसने अकबर की नीतियों को आगे बढ़ाया। उसने अपने जीवन का अधिकतर समय लाहौर में बिताया। 1611 ई० में उसने मेहरूनिसा (बाद में नूरजहाँ) से शादी की। नूरजहाँ शासन में इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने शासन व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। विजयों की दृष्टि से जहाँगीर मेवाड़ व कांगड़ा जैसे क्षेत्रों को जीत पाया, जिनको प्राप्त करने में अकबर को सफलता नहीं मिली थी परन्तु 1622 ई० में वह कन्धार को खो बैठा। उसके काल में उसके बेटे खुर्रम ने विद्रोह कर दिया जिससे वह काफी कमजोर हुआ। 1627 ई० में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई। जहाँगीर अपनी न्याय की जंजीर के कारण काफी विख्यात हुआ जो उसने आगरे के किले में लगवाई थी जिसको कोई भी फरियादी खींचकर न्याय की माँग कर सकता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 2.
शाहजहाँ कौन था?
उत्तर:
जहाँगीर के बाद उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। खुर्रम ने अपने पूर्वजों की नीति का अनुसरण किया। अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद उसने ताजमहल का निर्माण प्रारंभ करवाया। दक्षिण के बारे में उसने बीजापुर, गोलकुण्डा व अहमदनगर के सन्दर्भ में सन्तुलित नीति अपनाई। ईरान के शासक से वह 1638 ई० में कैन्धार जीतने में सफल रहा। 1640-45 ई० तक उसने मध्य एशिया की विजय का अभियान चलाया जिसको वह जीत तो पाया परन्तु यह विजय अस्थायी रही। इसके बाद ईरानी शासक ने 1649 ई० में कन्धार पर फिर कब्जा कर लिया जिसको औरंगजेब के दो तथा दारा शिकोह के एक अभियान द्वारा जीता नहीं जा सका। उसके शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध था जो 1657-58 ई० में लड़ा गया। इसमें उसके तीन पुत्र दारा शिकोह, मुराद व शुजा मारे गए तथा औरंगजेब सफल रहा। उसने 1658 ई० में शाहजहाँ को गद्दी से हटाकर जेल में डाल दिया। इस तरह शाहजहाँ की मृत्यु 7 वर्ष जेल में रहने के बाद हुई।

प्रश्न 3.
मुगलों की हरम व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शाही परिवार के हरम में महिलाओं की प्रमुखता थी। इसमें सभी महिलाएँ बराबर की तथा एक-जैसी हैसियत वाली नहीं थीं। हरम में प्रमुख महिलाओं को मोटे तौर पर तीन नामों से जाना जाता था।

  • बेगम-शाही परिवार में सबसे ऊँचा स्थान बेगमों का था। बेगम प्रायः कुलीन परिवार से संबंधित होती थी।
  • अगहा-ये सामान्य कुलीन परिवारों से थीं। ये भी शादी की परंपरा के बाद ही हरम में आती थीं।
  • अगाचा-हरम में इनका दर्जा तीसरा था। इन्हें उपपत्नियों का दर्जा प्राप्त था। इन्हें इनके खर्चे के अनुरूप मासिक भत्ता व दर्जे के अनुरूप उपहार इत्यादि मिलते थे।

प्रश्न 4.
इतिवृत्त के उद्देश्य लिखें।
उत्तर:
मुगलकाल में रचे गए इतिवृत्त बहुत सोची-समझी नीति का उद्देश्य थे। विभिन्न इतिहासकारों व विद्वानों ने इस बारे में अपने-अपने मतों की अभिव्यक्ति की है जिनमें से ये पक्ष उभरकर सामने आते हैं

  • इतिवृत्तों के माध्यम से मुग़ल शासक अपनी प्रजा के सामने एक प्रबुद्ध राज्य की छवि बनाना चाहते थे।
  • इतिवृत्तों के वृत्तांत के माध्यम से शासक उन लोगों को संदेश देना चाहते थे जिन्होंने राज्य का विरोध किया था तथा भविष्य में भी कर सकते थे। उन्हें यह बताना चाहते थे कि यह राज्य बहुत शक्तिशाली है तथा उनका विद्रोह कभी सफल नहीं होगा।
  • इतिवृत्तों के माध्यम से शासक अपने राज्य के विवरणों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहते थे।

प्रश्न 5.
अकबरनामा की विषयवस्तु पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
अकबरनामा में राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया गया है। लेखक ने किसी घटना का पूरा विवरण प्राप्त करने के लिए संबंधित पक्षों की जानकारी भी दी है। उसने अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक व सांस्कृतिक पक्षों को स्पष्ट रूप से लिखा है। उसने अपने वर्णन में समय व तिथियों के अनुरूप परिवर्तन को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने अकबर के साम्राज्य में रहने वाले मुस्लिमों, हिंदुओं, जैनों व बौद्धों की जीवन-शैली, परम्पराओं तथा आपसी तालमेल को काफी महत्त्व दिया है। उसने अकबर के साम्राज्य को मिश्रित संस्कृति के केन्द्र के रूप में प्रस्तुत किया है।

अबुल फल का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। उसे अपना साप्ताहिक लेखन दरबार में पढ़ना होता था। इसलिए उसने अलंकृत भाषा को महत्त्व दिया। इस भाषा में लय व कथन शैली विशेष रूप से उभरकर सामने आई है। क्षेत्र-विशेष का वर्णन करते हुए उसने उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में किया है। उसके इस प्रयास से भारतीय फारसी शैली का विकास हुआ।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सुलह-ए-कुल की नीति के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अकबर ने सुलह-ए-कुल (Absolute peace) की नीति अर्थात् सभी के साथ सुलह (किसी से मतभेद नहीं) की नीति अपनाई। यह अकबर की सोची-समझी नीति थी। इसे बाद के शासकों ने भी इसे अपनाया। औरंगज़ेब ने इस नीति में बदलाव करने के प्रयास किए तो परिणाम घातक रहे। …

(i) नीति का अर्थ-मुगल कालीन इतिवृत्तों ने इस नीति को अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त किया है। हाँ, इतना सभी मानते हैं कि मुगल साम्राज्य में भिन्न-भिन्न जातियों व समुदायों के लोग रहते थे। शासक इस साम्राज्य में शान्ति व स्थायित्व का स्रोत था। इसलिए वह सभी नृजातीय समूहों व समुदायों से ऊपर था तथा वह इन सभी वर्गों के बीच मध्यस्थता करता था। क्योंकि न्याय व शान्ति का मार्ग तालमेल से निकलता था। अतः यह नीति मुगल शासकों व साम्राज्य के लिए आदर्श बनी। अबुल फज़्ल, सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। उसके अनुसार सुलह-ए-कुल इस सिद्धांत पर आधारित था कि राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुंचे तथा प्रजा शांति से रहे।

(ii) नीति को व्यवहार में लाना-मुग़ल शासक विशेषकर अकबर ने धर्म व राजनीति दोनों के संबंधों को समझने का प्रयास किया। उसने इनकी सीमा व महत्त्व को समझा। इस समझ के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूरी तरह धर्म का त्याग संभव नहीं है लेकिन धर्म की कट्टरता को त्यागकर अवश्य चला जाए। उसने धर्म को राजनीति से भी थोड़ा दूर करने का प्रयास किया। इस कड़ी में उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर, यह सन्देश दिया कि गैर इस्लामी प्रजा से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। उसने युद्ध में पराजित सैनिकों को दास बनाने पर रोक लगाई तथा जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन को गैर-कानूनी घोषित किया। अकबर ने अपने साम्राज्य में गौ -वध को देश द्रोह घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी।

अकबर ने इन फैसलों के माध्यम से धार्मिक पक्षपात को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो साथ ही बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं का सम्मान भी किया। उसने राज्य के सभी अधिकारियों को सुलह-ए-कुल के नियमों के पालन करने के निर्देश दिए। इस तरह अकबर अपनी इस नीति के द्वारा राज्य में शांति व स्थायित्व का आधार बनाने में सफल रहा।

प्रश्न 2.
मनसबदारी प्रथा के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मुग़ल नौकरशाही में मनसबदारी प्रमुख थी। यह सैनिक व असैनिक दोनों के लिए थी। मनसब शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है-पद। इस शब्द की व्याख्या के अनुसार जो भी व्यक्ति मुगलों की सेवा में आता था तो उसे एक मनसब दिया जाता था। वह मनसब उसकी दरबार में पहचान, जिम्मेदारी व हैसियत तीनों बातों का अहसास कराता था। मनसब में जात व सवार दो शब्दों . का प्रयोग होता था। जात शब्द व्यक्ति के पद (status) को स्पष्ट करता था जबकि सवार उसके पास ऊँट, घोड़े, बैल इत्यादि सैनिक क्षमता का बोध कराता था। इससे यदि किसी व्यक्ति की 1000 की जात मनसब व 1000 की सवार मनसब है तो वह मनसबदार प्रथम श्रेणी में होता था, यदि जात की तुलना में सवार 500 या इसके आस-पास थे तो वह द्वितीय श्रेणी में आता था तथा यदि उसके सवार नाममात्र थे या थे ही नहीं वह तृतीय श्रेणी में आता था।

इसी श्रेणी के आधार पर उसका वेतन निर्धारित होता था जबकि इसी आधार पर उसे दरबार में जगह मिलती थी। यहाँ तक कि शासक के शिविर में भी उसी अनुरूप उसका तंबूकक्ष (Tent Room) बनता था। मनसबदारी व्यवस्था की खास बात यह थी कि मनसबदार चाहे 20 के रैंक का हो या 5,000 का वह सीधे शासक से जुड़ा होता था। वह किसी अन्य व्यक्ति के लिए जिम्मेदार नहीं होता था। मुगलकाल में सामान्य रूप से 1000 से बड़े पद के मनसबदार को उमरा (अमीर वर्ग का बहुवचन) कहा जाता था। मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति व पद मुक्ति की शक्तियाँ स्वयं शासक के पास होती थीं।

प्रश्न 3.
अकबर के धर्म संबंधी विचारों का वर्णन करें।
उत्तर:
अकबर ने धर्म संबंधी उदारता की धारणा शासन के प्रारंभिक दिनों में ही अपना ली थी। इसके व्यवहार और उदार विचारों से ईसाई पादरियों को तो यहाँ तक लगा कि शासक ने इस्लाम त्याग दिया है तथा वह ईसाई धर्म का सदस्य बन गया है। वास्तव में उनकी यह समझ तत्कालीन यूरोप की धार्मिक असहिष्णुता की नीति को स्पष्ट करती है क्योंकि इस काल में वहाँ धर्म संबंधी तालमेल का अभाव था।

अकबर ने इस तरह का व्यवहार केवल जेसुइट (ईसाई प्रचारकों) के प्रति नहीं किया बल्कि हिंदू, जैन, फारसी, बौद्ध धर्म में विश्वास. करने वाले सभी धर्मों के साथ किया। वह सभी के साथ तालमेल अपनी सुलह-ए-कुल की नीति के तहत करना चाहता रस्कार नहीं बल्कि सभी का एक-दूसरे के साथ मिलकर चलने का भाव था। अकबर की समझ यहाँ हमें और स्पष्ट होती है कि उसने फतेहपुर सीकरी में स्थापित इबादत खाना में मुसलमानों, हिंदुओं, जैन, फारसियों व ईसाइयों सभी की बातें सुनीं। उनके वाद-विवाद व विचार अभिव्यक्ति पर अपने तर्क दिए। इस विचार-विमर्श से उसे सभी धर्मों की अच्छी बातें जानने का मौका मिला। इस्लाम के कुछ लोगों की कट्टरपंथी सोच भी वह समझ पाया।

(i) सूर्य व अग्नि का उपासक (Devotee of Fire and the Sun)-विभिन्न धर्मों के बारे में अपनी समझ विकसित हो के बाद अकबर सूर्य पर केंद्रित स्व-कल्पित दैवीय उपासना के सिद्धांत की ओर बढ़ा जिसे अबुल फज्ल ने अकबरनामा में दैवीय सिद्धांत के साथ जोड़ दिया। अकबर इस सिद्धांत के माध्यम से विभिन्न धर्म व दर्शन के ग्राही (स्वीकारने) वाले रूप की ओर बढ़ा। इस दैवीय सिद्धांत के पीछे प्रेरक शक्ति यह थी कि इस नीति से शत्रुओं पर आसानी से नियंत्रण पाया जा सकता है। वास्तव में यह सिद्धांत शासक को सबका शासक बनाता है, न कि किसी वर्ग विशेष का।

(ii) दीन-ए-इलाही (Din-I-Ilahi)-अकबर उदारवादी रास्तों पर चलकर इस रास्ते पर पहुँचा कि सभी धर्मों की अच्छी बातों को मिलाकर एक धर्म बनाया जा सकता है जो सभी को स्वीकार हो सकता है। अपने अनुभव के आधार पर उसने 1582 ई० में ‘दीन-ए-इलाही’ (‘तोहिद-ए-इहाली’) की स्थापना की जिसमें सभी धर्मों की अच्छी बातें थीं। अकबर ने इसे अपनाने पर भी किसी को बाध्य नहीं दिया। इसलिए इस नए मत को मानने वालों की संख्या सैकड़ों में रही। इसकी भी अकबर ने परवाह नहीं की।

कुल मिलाकर स्पष्ट है कि अकबर ने औपचारिक धर्म को महत्त्व न देकर साम्राज्य की जरूरत के रूप में धर्म को देखा। इसने अकबर की छवि तो उच्च बनाई साथ ही अन्य लोगों को भी मार्ग दिया कि भारत में धर्म संबंधी कौन-सी नीति कारगर है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगल वंश का परिचय देते हुए मुख्य मुग़ल शासकों के बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल शब्द की उत्पत्ति मंगोल से हुई है। मंगोल से यह शब्द बदलकर मोगोल व मौगिल्ज बना तथा अन्ततः मुगल रूप में स्थापित हो गया। मुगल शासक स्वयं को तैमूरी कहते थे। मुगल तैमूरी इसलिए कहलाते थे क्योंकि वे पितृपक्ष से तैमूर के वंशज थे। बाबर (प्रथम मुगल शासक) मातृपक्ष से चंगेज का वंशज था लेकिन वह चंगेज के साथ अपना नाम जोड़ना उचित नहीं समझता था। वह चंगेज व अन्य मंगोलों को बर्बर (बद्द या यायावर) कहता था।

1. बाबर (Babur)-मुगल वंश के संस्थापक बाबर का जन्म 14 फरवरी, 1483 को मध्य-एशिया के फरगाना (वर्तमान में उजबेगिस्तान) में हुआ। 1494 ई० में बाबर अपने पिता उमर शेख मिर्जा की मृत्यु के बाद फरगाना का शासक बना। आपसी पारिवारिक लड़ाई के कारण उसने 1497 ई० में यह राज्य खो दिया तथा इधर-उधर ठोकरें खाने के लिए मजबूर हो गया। उसने 1504 ई० में काबुल तथा 1507 ई० में कन्धार को जीता। बाबर ने 1519 से 1526 ई० तक उसने भारत पर पाँच आक्रमण किए तथा वह सभी में सफल रहा। 1526 ई० में उसने पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अन्तिम सुल्तान इब्राहिम लोधी को हराकर मुगल वंश की नींव रखी। उसने 1527 ई० में खानवा, 1528 ई० में चन्देरी तथा 1529 ई० में घाघरा की लड़ाइयाँ जीतकर अपने राज्य को सुदृढ़ आधार दिया। 1530 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

2. हुमायूँ (Humayun)-बाबर की मृत्यु के बाद हुमायूँ शासक बना। उसे गुजरात के शासक बहादुर शाह तथा बिहार क्षेत्र के मुखिया शेरशाह से निरन्तर युद्ध करने पड़े। शेरशाह ने उसे 1540 ई० में बेलग्राम (कन्नौज) के युद्ध में पराजित कर दिया तथा उसे भारत से निर्वासित होना पड़ा। उसने निर्वासन का कुछ समय काबुल, सिन्ध व अमरकोट में बिताया तथा अन्त में ईरान के शासक तहमास्म के पास शरण ली। ईरान के शासक की मदद से उसने काबुल, कन्धार व मध्य एशिया के क्षेत्रों को जीता। उसने 1555 ई० में शेरशाह के कमजोर उत्तराधिकारियों को हराकर एक बार फिर दिल्ली व आगरा पर अधिकार कर लिया। 1556 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 Img 1

3. अकबर (Akbar)-हुमायूँ की मृत्यु के समय उसका पुत्र अकबर पंजाब के कलानौर में था। उसे वहीं पर शासक घोषित कर दिया गया। इस बीच रेवाड़ी के हेमू ने दिल्ली में अव्यवस्था का लाभ उठाकर कब्जा कर लिया। इस तरह अकबर व हेमू के बीच 1556 ई० में पानीपत के मैदान में दूसरा युद्ध हुआ तथा अकबर को विजय मिली। अकबर ने अपनी प्रारंभिक सफलताएँ अपने शिक्षक व संरक्षक बैहराम खाँ के नेतृत्व में पाईं। तत्पश्चात् उसने प्रत्येक क्षेत्र में साम्राज्य का विस्तार किया। उसने आन्तरिक दृष्टि से अपने राज्य का विस्तार कर इसे विशाल, सुदृढ़ तथा समृद्ध बनाया। उसने राजपूतों व स्थानीय प्रमुखों के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए। उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर हटाकर गैर-इस्लामी जनता को यह एहसास करवाने का प्रयास किया कि वह उनका भी शासक है। वह अपने राजनीतिक, प्रशासनिक व उदारवादी व्यवहार के कारण मुगल शासकों में महानतम स्थान प्राप्त करने में सफल रहा। 1605 ई० में उसकी मृत्यु के समय उसका साम्राज्य राजनीतिक दृष्टि से विशाल व शान्त, अन्तर्राष्ट्रीय दृष्टि से बहुत शक्तिशाली तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध था।

4. जहाँगीर (Jahangir)-अकबर की मृत्यु के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से शासक बना। 1611 ई० में उसने मेहरूनिसा (बाद में नूरजहाँ) से शादी की। नूरजहाँ शासन में इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसने शासन-व्यवस्था को अपने हाथ में ले लिया। 1627 ई० में लाहौर में उसकी मृत्यु हो गई। जहाँगीर अपनी न्याय की जंजीर के कारण काफी विख्यात हुआ जो उसने आगरे के किले में लगवाई थी।

5. शाहजहाँ (Shahajahan)-जहाँगीर के बाद उसका पुत्र खुर्रम, शाहजहाँ के नाम से गद्दी पर बैठा। अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद उसने ताजमहल का निर्माण प्रारंभ करवाया। ईरान के शासक से वह 1638 ई० में कन्धार जीतने में सफल रहा। ईरानी शासक ने 1649 ई० में कन्धार पर फिर कब्जा कर लिया। उसके शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना उसके पुत्रों में उत्तराधिकार का युद्ध था जो 1657-58 ई० में लड़ा गया। इसमें उसके तीन पुत्र दारा शिकोह, मुराद व शुजा मारे गए तथा औरंगजेब सफल रहा। उसने 1658 ई० में शाहजहाँ को गद्दी से हटाकर जेल में डाल दिया। इस तरह शाहजहाँ की मृत्यु 7 वर्ष जेल में रहने के बाद हुई।

6. औरंगजेब (Aurangzeb)-1658 ई० में अपने भाइयों को हराकर व पिता को बन्दी बनाकर औरंगजेब सत्ता प्राप्त करने में सफल रहा। वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी को पसन्द करता था, लेकिन धार्मिक दृष्टि से संकीर्ण था। उसकी संकीर्णता के चलते हुए गैर-मुस्लिम प्रजा तथा मुस्लिमों में शिया उसके विरोधी हो गए। उसे जाटों, सतनामियों, राजपूतों, सिक्खों व मराठों के विद्रोहों का सामना करना पड़ा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 2.
इतिवृत्त क्या हैं? ये क्यों लिखे गए? मुगलकाल के प्रमुख इतिवृत्त कौन-कौन से हैं ?
उत्तर:
मुग़ल शासकों के दरबार में स्वयं शासकों या दरबारियों द्वारा जिन पुस्तकों की रचना की गई उन्हें इतिवृत्त कहा जाता है। इतिवृत्त (क्रॉनिकल्स) मुगलकालीन इतिहास की जानकारी का बहुत महत्त्वपूर्ण स्रोत है। सभी मुग़ल शासकों ने इतिवृत्तों के लेखन की ओर विशेष ध्यान दिया जिसके कारण हमें घटनाओं व शासन संबंधी विभिन्न पक्षों की व्यवस्थित

1. रचना के उद्देश्य (Purpose of the Writings)-मुगलकाल में रचे गए इतिवृत्त बहुत सोची-समझी नीति का उद्देश्य थे। विभिन्न इतिहासकारों व विद्वानों ने इस बारे में अपने-अपने मतों की अभिव्यक्ति की है जिनमें से ये पक्ष उभरकर सामने आते हैं

  • इतिवृत्तों के माध्यम से मुगल शासक अपनी प्रजा के सामने एक प्रबुद्ध राज्य की छवि बनाना चाहते थे।
  • इतिवृत्तों के वृत्तांत के माध्यम से शासक उन लोगों को संदेश देना चाहते थे जिन्होंने राज्य का विरोध किया था तथा भविष्य में भी कर सकते थे। उन्हें यह बताना चाहते थे कि यह राज्य बहुत शक्तिशाली है तथा उनका विद्रोह कभी सफल नहीं होगा।
  • इतिवृत्तों के माध्यम से शासक अपने राज्य के विवरणों को भावी पीढ़ियों तक पहुँचाना चाहते थे।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 Img 2

2. इतिवृत्तों की विषय-वस्तु (Subjects of Chronicles)-मुग़ल शासकों ने इतिवृत्त लेखन का कार्य दरबारियों को दिया। अधिकतर इतिवृत्त शासक की देख-रेख में लिखे जाते थे या उसे पढ़कर सुनाए जाते थे। कुछ शासकों ने आत्मकथा लेखन का कार्य स्वयं किया। इस माध्यम से ये शासक स्वयं को प्रबुद्ध वर्ग में स्थापित करना चाहते थे, साथ ही अन्य लेखकों का मार्गदर्शन भी करना चाहते थे। इन सभी पक्षों से यह स्पष्ट होता है कि इन इतिवृत्तों के केन्द्र में स्वयं शासक व उसका परिवार रहता था। इस कारण इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासक, शाही परिवार, दरबार, अभिजात वर्ग, युद्ध व प्रशासनिक संस्थाएँ रहीं। इन इतिवृत्तों की विषय-वस्तु शासकों के नाम अथवा उनके द्वारा धारण उपाधियों की पुष्टि भी करना था। इसलिए इनके नाम सीधे तौर पर इतिवृत्त शासकों के नाम से जुड़े थे।

मुगलकाल के प्रमुख इतिवृत्तों में हैं-बाबरनामा या तुक-ए-बाबरी लेखक बाबर, हुमायूँनामा लेखिका हुमायूँ की बहन गुलबदन बेगम, अकबरनामा-लेखक अबुल फज़्ल, तुज्क-ए-जहाँगीरी लेखक जहाँगीर, शाहजहाँनामा लेखक मामुरी, बादशाहनामा (शाहजहाँ पर आधारित) लेखक-अब्दुल हमीद लाहौरी, आलमगीरनामा लेखक मुहम्मद काजिम इत्यादि हैं। विभिन्न इतिवृत्तों के नामों व लेखकों के नामों से यह स्पष्ट होता है कि मुग़ल शासक स्वयं के इतिहास-लेखन में पूरी रुचि लेते थे। इसके लिए वे इनके लेखकों को प्रत्येक तरह का संरक्षण भी देते थे तथा दरबार में उचित सम्मान भी। अधिकतर स्थितियों में इन इतिवृत्तों के लेखक शासक के अति नजदीकी मित्र होते थे।

प्रश्न 3.
मुगलों की मौलिक भाषा कौन-सी थी? उनके इतिवृत्त किस भाषा में मिलते हैं? इस काल में फारसी कैसे तथा किस-किस रूप में प्रचलन में आई?
उत्तर:
मुग़ल मूलतः मध्य एशिया से थे तथा इनकी मौलिक भाषा तुर्की थी। तुर्की भाषा में भी बाबर चगताई मूल का था, अतः उसकी भाषा ‘चगताई तुर्की’ थी। उसने अपनी आत्मकथा इसी भाषा में लिखी।

अकबर ने फारसी भाषा को दरबार की भाषा घोषित किया। उसने अपने दरबार में उन लोगों को स्थान व सम्मान दिया जो इस भाषा के ज्ञाता थे। शाही परिवार के सदस्यों को इस भाषा को सीखने का वातावरण दिया। फारसी को अपनाने के मुख्य कारण ईरान व मुगलों के संबंध कहे जा सकते हैं। हुमायूँ ने 15 वर्ष ईरान में निर्वासन में बिताए व उन लोगों के संपर्क में आया। उसने सत्ता मिलने के बाद उन्हें उनकी योग्यता के अनुरूप पद दिए। ईरानी दरबार इस काल में सांस्कृतिक विकास व बौद्धिकता का केन्द्र माना जाता था। अकबर उससे भी प्रभावित हुआ। अकबर की मिलनसार छवि के कारण भी ईरान से विद्वानों का एक दल मुगल दरबार में पद पाने के लिए आया। अकबर ने उन्हें समुचित स्थान दिया। इस तरह यह भाषा दरबार में अलग से अपनी पहचान बनाने में सफल रही। इसके बाद प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इसके ज्ञाता हो गए। इस तरह बहुत कम समय में लेखाकारों, प्रशासनिक अधिकारियों व अभिजात वर्ग के लोगों ने इसे सीख लिया।

(i) फारसी का भारतीयकरण-फारसी मुगल दरबार व प्रशासन तंत्र की भाषा तो बन गई, लेकिन इसका स्वरूप ईरान वाला नहीं था। मुगल साम्राज्य काफी विस्तृत था। इस साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्थानी, मराठी, बंगाली व तमिल भाषाएँ बोली जाती थीं। इन क्षेत्रों में जंब फारसी गई तो स्थानीय विद्वानों ने अपने-अपने क्षेत्रों की शब्दावली व मुहावरों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग किया। फारसी पर सर्वाधिक प्रभाव हिंदवी (उत्तर भारत की जन सामान्य की भाषा) का पड़ा। इन दोनों भाषाओं के संपर्क के कारण एक नई भाषा ‘उर्दू अस्तित्व में आई। यह भाषा हिंदवी में बोली जाती थी तथा फारसी लिपि में लिखी जाती थी।

(ii) अनुवाद कार्य-मुग़लकाल में अकबर के शासन व उसके बाद मौलिक लेखन कार्य फारसी में हुआ। इसके साथ बहुत-सी पुस्तकों का अनुवाद भी फारसी में किया गया। प्रारंभ में बाबरनामा का तुर्की से अनुवाद किया गया। इसके बाद अकबर ने महाभारत व रामायण नामक संस्कृत ग्रन्थों के अनुवाद का आदेश दिया। महाभारत का अनुवाद ‘रज्मनामा’ (युद्धों की पुस्तक) के रूप में हुआ। यह पुस्तक फारसी के विद्वानों में बहुत लोकप्रिय हुई। अनुवादित रूप में यह पुस्तक ईरान व मध्य एशिया भी गई।

प्रश्न 4.
पांडुलिपियों में चित्रकारी की क्या भूमिका थी? जानकारी दें।
उत्तर:
मुग़ल शासकों ने जहाँ इतिवृत्त लिखने की दिशा में बहुत ध्यान दिया, वहीं उन्होंने इस बात का भी पूरा ध्यान रखा कि इतिवृत्त सामान्य-से-सामान्य व्यक्ति को समझ में आ सके। सामान्य रूप से पुस्तक या किसी रचना में किसी भाव या विषय की अभिव्यक्ति शब्दों से नहीं हो पाती, बल्कि दृश्य उसको स्पष्ट कर देते हैं। यह बात पांडुलिपियों पर भी लागू होती है। मुग़ल शासकों व पांडुलिपि के लेखकों को इस बात का ज्ञान था। इसलिए हमने किताबखाना में काम करने वाले व्यक्तियों में चित्रकार का वर्णन भी किया है।

जब कोई भी इतिवृत्त लेखक लेखन कार्य करता था एवं यह महसूस करता था कि उक्त स्थान पर दृश्य की आवश्यकता है तो वह उस पृष्ठ पर उतनी जगह खाली छोड़ देता था। यदि बड़े चित्र की आवश्यकता होती तो आस-पास के पृष्ठों को छोड़ दिया जाता था। फिर चित्रकार लेखक से बातचीत कर किसी अन्य कागज पर विषय संबंधी चित्र बनाता था। फिर उसे उस पृष्ठ पर चिपका दिया जाता था या फिर पांडुलिपि के साथ संलग्न कर दिया जाता था। .

1. चित्रकारी का उद्देश्य (Aims of Paintings)-इतिवृत्त पर चित्रकारी मात्र भावों की अभिव्यक्ति नहीं थी बल्कि कई और पक्षों को भी स्पष्ट करती थी; जैसे

• चित्रकारी पांडुलिपि के सौन्दर्य का अभिन्न अंग थी। किसी भी पांडुलिपि को उस समय तक पढ़ने के योग्य नहीं माना जाता था जब तक वह चित्रित न हो।

• राजा व राज्य की शक्ति के बारे में जो बात शब्दों में न कही जा सके उसे चित्र के माध्यम से दिखाया जाता था। उदाहरण के लिए शाही दरबार की अधिकतर चित्रकारी में शासक के साथ शेर व गाय अथवा शेर व बकरी के चित्र मिलते हैं। इसका अर्थ साफ है कि शासक शक्तिशाली व निर्बल सभी को संरक्षण देता था।

• जनता तक विभिन्न संदेश भेजने के लिए भी शासक इस कला का प्रयोग करते थे; जैसे कि उनके लिए साम्राज्य में रहने वाले सभी बराबर हैं। वे किसी भी तरह से उनमें अन्तर नहीं देखते।
अकबर के दरबारी लेखक अबुल फज्ल ने चित्रकारी को ‘जादुई कला’ कहा है। वह कहता है कि चित्रकारी निर्जीव को सजीव की भाँति प्रस्तुत करने की क्षमता रखती है।

2. पांडुलिपियों पर चित्रण (Paintings on Manuscripts)-मुग़ल शासकों ने पांडुलिपि चित्रण की ओर विशेष ध्यान दिया। अकबर के काल में चित्रित होने वाली मुख्य पांडुलिपियों में बाबरनामा, हुमायूनामा, अकबरनामा, (महाभारत का अनुवाद), तारीख-ए-अल्फी व तैमूरनामा थीं। बाद के शासकों ने अपने इतिवृत्तों विशेषकर तज्क-ए-जहाँगीरी व शाहजहाँनामा को चित्रित करवाया। इसके साथ ही उन्होंने पहले लिखे गए इतिवृत्तों की और पांडुलिपियों को तैयार करवाकर उन्हें चित्रित करवाया। ये पांडुलिपियाँ सैकड़ों की संख्या में किताबखाना में रखी गई थीं। मुगल शासकों द्वारा जिस तरह से पांडुलिपियों को चित्रित करवाया, उसकी नकल यूरोप के शासकों ने भी की। इस काल में चित्रित पुस्तकों को उपहार में देना एक प्रकार की परंपरा बन गई थी।

प्रश्न 5.
इतिवृत्त अकबरनामा पर संक्षिप्त निबंध लिखें।।
उत्तर:
मुगल वंश की जानकारी देने वाले इतिवृत्तों की संख्या बहुत अधिक है। इनमें जो सर्वाधिक चर्चित तथा सूचनाओं से परिपूर्ण है, वह है अकबरनामा। यह इतिवृत्त बहुत विस्तृत है तथा इसमें 150 से अधिक चित्रों को चित्रित किया गया है। इन चित्रों में दरबार, विभिन्न युद्धों, मोर्चाबन्दी का विवरण, शिकार, विवाह तथा भवन निर्माण के दृश्य हैं।

अकबरनामा का लेखन अबुल फज़्ल द्वारा किया गया। वह शेख नागौरी का पुत्र तथा फैजी का भाई था। वह अरबी, फारसी, तुर्की व यूनानी का ज्ञाता था। वह उदारवादी चिन्तक तथा सूफीवादी विचारधारा से प्रभावित था। अकबर से उसकी भेंट उसके बड़े भाई फैजी ने करवाई तथा वह उन्नति करता हुआ फैजी से काफी आगे निकल गया। अकबर उसके तर्क तथा वाद-विवाद करने की योग्यता से बहुत प्रभावित हुआ। उसने अकबर की विचारधारा को उदारवादी बनाने में बहुत योगदान दिया। वह अकबर के अति नजदीकी मित्रों में से एक रहा।

(1) अकबरनामा का लेखन (Writing of Akbarnama) अकबर ने अबुल फज्ल को अकबरनामा को लिखने का आदेश 1589 ई० में दिया। उसने इसके लिखने में कुल 13 वर्ष का समय लगाया। इस काल में उसने कई बार इस पुस्तक के कई प्रारूप तैयार किए। अन्ततः इसे अन्तिम रूप दिया। इस पुस्तक में घटनाओं का क्रमानुसार विवरण है। लेखक ने इसे अधिक-से-अधिक मौलिक दस्तावेजों तथा जानकार व्यक्तियों के मौलिक प्रमाण लेकर लिखा है।

अकबरनामा तीन खण्डों में विभाजित है। इसके प्रथम दो भाग ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी देते हैं जबकि तीसरा भाग आइन-ए-अकबरी है। . अबुल फज्ल ने पहले खण्ड में पृथ्वी पर मानव की उत्पत्ति का आधार आदम को मानकर वहीं से लेखन प्रारंभ किया। उसने इस कड़ी में पैगम्बर मोहम्मद, भारत में दिल्ली सल्तनत का संक्षिप्त परिचय देते हुए अकबर के शासन काल के प्रारंभिक 30 वर्षों का वर्णन किया है। अकबरनामा के दूसरे खण्ड में अकबर के 30वें वर्ष से लेकर 46वें वर्ष तक के शासन का वर्णन है। इसके बाद वह अपना लेखन जारी रखना चाहता था लेकिन 1602 ई० में अकबर के पुत्र सलीम (बाद में जहाँगीर) ने विद्रोह कर दिया। इसी दौरान सलीम ने एक षड्यंत्र द्वारा वीर सिंह बुंदेला के हाथों अबुल फज्ल की हत्या करवा दी।

(i) अकबरनामा की विषय-वस्तु (Subject-Matter of Akbarnama)-अकबरनामा में राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया गया है। लेखक ने किसी घटना का पूरा विवरण प्राप्त करने के लिए संबंधित पक्षों की जानकारी भी दी है। उसने अकबर के साम्राज्य के भौगोलिक, सामाजिक, प्रशासनिक व सांस्कृतिक पक्षों को स्पष्ट रूप से लिखा है। उसने अपने वर्णन में समय व तिथियों के अनुरूप परिवर्तन को अधिक महत्त्व नहीं दिया। उसने अकबर के साम्राज्य में रहने वाले मुस्लिमों, हिंदुओं, जैनों व बौद्धों की जीवन-शैली, परम्पराओं तथा आपसी तालमेल को काफी महत्त्व दिया है। उसने अकबर के साम्राज्य को मिश्रित संस्कृति के केन्द्र के रूप में प्रस्तुत किया है।

अबुल फज़्ल का भाषा पर पूर्ण अधिकार था। उसे अपना साप्ताहिक लेखन दरबार में पढ़ना होता था। इसलिए उसने अलंकृत भाषा को महत्त्व दिया। इस भाषा में लय व कथन शैली विशेष रूप से उभरकर सामने आई है। क्षेत्र-विशेष का वर्णन करते हुए उसने उस क्षेत्र की स्थानीय भाषा के शब्दों का प्रयोग भी प्रचुर मात्रा में किया है। उसके इस प्रयास से भारतीय फारसी शैली का विकास हुआ।

(ii) अकबरनामा का अनुवाद (Translation of Akbarmama)-अकबरनामा के अनुवाद का कार्य बंगाल सिविल सर्विसज़ के अधिकारी हेनरी बेवरिज (Henry Beveridge) ने अपने हाथ में लिया। उसने कड़ी मेहनत के बाद इस पुस्तक का अनुवाद किया।

प्रश्न 6.
मुगलों के राजत्व सिद्धांत के आदर्श क्या थे ? उनकी व्याख्या करें।
उत्तर:
मुगलों ने भारत पर लगभग दो शताब्दियों तक शासन किया। उन्होंने अपने शासन में कुछ सिद्धान्तों को महत्त्व दिया। ये सिद्धांत भारत की परंपरागत शासन-व्यवस्था से भी जुड़े तथा दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों से भी। इनके राजत्व के सिद्धांत में मध्य-एशियाई तत्त्व भी थे तो ईरान का प्रभाव भी साफ दिखाई देता है। मुग़ल इतिवृत्तों में मुग़ल राज्य को आदर्श राज्य वर्णित किया है जिसमें निम्नलिखित विशेषताएँ प्रस्तुत की गई हैं

1. मुग़ल राज्य : एक दैवीय राज्य (Mughal State :ADivine State)-मुगलकाल के सभी इतिवृत्त इस बात की जानकारी देते हैं कि मुगल शासक राजत्व के दैवीय सिद्धान्त में विश्वास करते थे। उनका विश्वास था कि उन्हें शासन करने की शक्ति स्वयं ईश्वर ने प्रदान की है। ईश्वर की इस तरह की कृपा सभी व्यक्तियों पर नहीं होती, बल्कि व्यक्ति-विशेष पर ही होती है।

मुगल शासकों के दैवीय राजत्व के सिद्धांत को सर्वाधिक महत्त्व अबुल फज़्ल ने दिया। वह इसे फर-ए-इज इज़ादी (ईश्वर से प्राप्त) बताता है। वह इस विचार के लिए प्रसिद्ध ईरानी सूफी शिहाबुद्दीन सहरावर्दी (1191 में मृत्यु) से प्रभावित था। उसने इस तरह के विचार ईरान के शासकों के लिए प्रस्तुत किए थे। भारत में अबुल फल के पिता शेख मुबारक नागौरी ने इसे समझा तथा अपने बेटे फज्ल व फैजी को बताया। अबुल फज्ल ने यह सिद्धांत अकबर के लिए प्रस्तुत किया। अबुल फज्ल का यह मत इतिवृत्तों में विचार बना तथा फिर चित्रकारों ने उन्हें चित्रित किया। चित्रकारों ने मुगल शासकों के चित्रों के चारों ओर प्रभा मण्डल बना दिया। यह प्रभा मण्डल सामान्य रूप से हिन्दू धर्म में देवी-देवताओं की तस्वीरों में होता है जबकि यूरोप में ईसा व वर्जिन मेरी के चित्रों में देखने को मिलता है।

2. सुलह-ए-कुल की नीति (Policy of Sulh-i-Kul)-अकबर की सुलह-ए-कुल (Absolute peace) की नीति अर्थात् सभी के साथ सुलह (किसी से मतभेद नहीं) की थी।

(i) नीति का अर्थ-मुगलकालीन इतिवृत्तों ने इस नीति को अलग-अलग ढंग से अभिव्यक्त किया है। हाँ, इतना सभी मानते हैं कि मुग़ल साम्राज्य में भिन्न-भिन्न जातियों व समुदायों के लोग रहते थे। शासक इस साम्राज्य में शान्ति व स्थायित्व का स्रोत था। इसलिए वह सभी नृजातीय समूहों व समुदायों से ऊपर था तथा वह इन सभी वर्गों के बीच मध्यस्थता करता था। क्योंकि न्याय व शान्ति का मार्ग तालमेल से निकलता था, अतः यह नीति मुग़ल शासकों व साम्राज्य के लिए आदर्श बनी। अबुल फज़्ल, सुलह-ए-कुल (पूर्ण शांति) के आदर्श को प्रबुद्ध शासन का आधार बताता है। उसके अनुसार सुलह-ए-कुल इस सिद्धांत पर आधारित था कि राज्य सत्ता को क्षति नहीं पहुंचे तथा प्रजा शांति से रहे।

(ii) नीति को व्यवहार में लाना-मुगल शासक विशेषकर अकबर ने धर्म व राजनीति दोनों के संबंधों को समझने का प्रयास किया। उसने इनकी सीमा व महत्त्व को समझा। इस समझ के बाद यह निष्कर्ष निकाला कि पूरी तरह धर्म का त्याग संभव नहीं है लेकिन धर्म की कट्टरता को त्यागकर अवश्य चला जाए। उसने धर्म को राजनीति से भी थोड़ा दूर करने का प्रयास किया। इस कड़ी में उसने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर तथा 1564 ई० में जजिया कर को समाप्त कर, यह सन्देश दिया कि गैर-इस्लामी प्रजा से कोई भेद-भाव नहीं किया जाएगा। उसने युद्ध में पराजित सैनिकों को दास बनाने पर रोक लगाई तथा जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन को गैर-कानूनी घोषित किया। अकबर ने अपने साम्राज्य में गौ-वध को देशद्रोह घोषित करते हुए उस पर रोक लगा दी।

अकबर ने इन फैसलों के माध्यम से धार्मिक पक्षपात को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो साथ ही बहुसंख्यक वर्ग की भावनाओं का सम्मान भी किया। उसने राज्य के सभी अधिकारियों को सुलह-ए-कुल के नियमों के पालन करने के निर्देश दिए। इस तरह अकबर अपनी इस नीति के द्वारा राज्य में शांति व स्थायित्व का आधार बनाने में सफल रहा।

3. सामाजिक अनुबंध पर आधारित न्यायपूर्ण प्रभुसत्ता (Just Sovereignty Based on Social Contract)-मुगल शासकों ने न्याय को विशेष महत्त्व दिया। वे यह मानते थे कि न्याय व्यवस्था ही उनसे सही अर्थों में प्रजा के साथ संबंधों की व्याख्या है। अबुल फज़्ल ने अकबर के प्रभुसत्ता के सिद्धांत को स्पष्ट किया है। उसके अनुसार बादशाह अपनी प्रजा के चार तत्त्वों-जीवन (जन), धन (माल), सम्मान और विश्वास (दीन) की रक्षा करता है। इसके बदले में जनता से आशा करता है कि वह राजाज्ञा का पालन करे तथा अपनी आमदनी (संसाधनों) में से कुछ हिस्सा राज्य को दे। अबुल फज़्ल स्पष्ट करता है कि इस तरह का चिन्तन किसी न्यायपूर्ण संप्रभु का ही हो सकता है जिसे दैवीय मार्गदर्शन प्राप्त हो।

मगल शासकों ने सामाजिक अनबंध पर आधारित न्याय को अपनाया तथा जनता में प्रचारित भी किया। इसके लिए विभिन्न प्रकार के प्रतीकों को प्रयोग में लाया गया। इसमें सर्वाधिक कार्य चित्रकारों के माध्यम से करवाया गया। मुगल शासकों ने दरबार तथा सिंहासन के आस-पास विभिन्न स्थानों पर जो चित्रकारी करवाई उसमें वो शेर तथा बकरी या शेर तथा गाय साथ-साथ बैठे दिखाई देते हैं। उनकी चित्रकारी जनता को यह सन्देश देने का साधन था कि इस राज्य में सबल या दुर्बल दोनों परस्पर मिलकर रह सकते हैं। इनमें भी कुछ चित्रों में शासक को शेर पर सवार दिखाया गया है जो इस बात का संदेश है कि उसके साम्राज्य में उनसे शक्तिशाली कोई नहीं था। कुल मिलाकर यह स्पष्ट है कि मुगलों ने विभिन्न प्रतीकों के माध्यम से न्याय को प्रदर्शित करने का प्रयास किया तथा स्पष्ट किया कि इसका आधार सामाजिक अनुबंध है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार

प्रश्न 7.
मुग़लों की राजधानियाँ कौन-कौन सी थीं ? इन राजधानी नगरों का वर्णन करें।
उत्तर:
राजधानी नगर मुगलों की सभी गतिविधियों का केन्द्र थे। मुगलों के राजधानी नगर को राज्य का हृदय-स्थल कह दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। मुगलों का राजधानी नगर कभी एक नहीं रहा बल्कि समय व स्थिति के अनुरूप उसमें बदलाव आते रहे। मुगलों के आने से पूर्व भारत में दिल्ली सल्तनत थी। स्वाभाविक है कि दिल्ली ही इस काल में राजधानी रहा। 1504 ई० में सिकन्दर लोदी ने आगरा शहर की नींव रखी। इससे सत्ता का एक और केन्द्र बन गया तथा गतिविधियों का संचालन दोनों नगरों से होने लगा। बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई में विजय के बाद पहले दिल्ली पर फिर आगरा पर कब्जा किया।

(i) मुग़ल साम्राज्य का प्रारंभिक काल-बाबर ने अपनी राजधानी आगरा को रखा। वहाँ पर उसने अपनी आवश्यकता के अनुरूप कुछ भवन बनवाए तथा अधिकतर की मुरम्मत करवाई। उसकी मृत्यु के बाद हुमायूँ ने भी आगरा को ही राजधानी बनाया। जिस समय वह शेरशाह से पराजित हुआ तो उसने कुछ समय के लिए दिल्ली को राजधानी बनाया। वहाँ पर उसने ‘दीन-पनाह’ नामक भवन का निर्माण भी करवाया।

(ii) अकबर के काल में राजधानी-पानीपत के दूसरे युद्ध (1556) के बाद अकबर ने दिल्ली व आगरा पर नियंत्रण किया। 1556-60 ई० तक अकबर ने अपने संरक्षक बैहराम खाँ के नेतृत्व में शासन किया। उस समय राजधानी आगरा थी लेकिन शाही वंश के अधिकतर सदस्य दिल्ली में रहते थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 Img 3
1560 ई० के बाद अकबर ने आगरा में लाल किले का निर्माण प्रारंभ करवाया। उसने इसे सुरक्षा की दृष्टि से मजबूत तथा आवश्यकता की दृष्टि से काफी विशाल बनवाया। उसने इसके लिए आस-पास के क्षेत्रों से लाल-बलुआ पत्थर मंगवाया तथा 1568 ई० तक इस किले का अधिकतर हिस्सा बनकर तैयार हो गया। जिस समय आगरा में किले का निर्माण हो रहा था, उस समय अकबर सूफी मत के प्रभाव में आ गया। इसी कड़ी में उसे आगरा के पास सीकरी नामक स्थान पर एक सूफी सन्त सलीम चिश्ती की जानकारी मिली। उसके बाद वह उसका अनुयायी बन गया। सलीम चिश्ती के प्रति अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए अकबर ने 1570 ई० में सीकरी का नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी किया तथा इस स्थल को राजधानी घोषित कर दिया। यह स्थान आगरा-अजमेर मार्ग पर था तथा लोगों की पसंदीदा जगह थी। इस तरह फतेहपुर सीकरी राजधानी व तीर्थ स्थल दोनों रूपों में उभरकर सामने आया।

(iii) जहाँगीर व शाहजहाँ के काल में राजधानियाँ-जहाँगीर का राज्यारोहण आगरा में हुआ था तो यही स्थल राजधानी था। 1611 ई० में नूरजहाँ के साथ विवाह के उपरांत वह लाहौर चला गया। उसने वहाँ रावी नदी के तट पर एक लाल किले का निर्माण करवाया। जहाँगीर की मनपसंद जगह लाहौर थी। अतः यह उसकी राजधानी भी रहा तथा उसने अधिकतर समय वहाँ गुजारा। जहाँगीर गर्मियों के दिनों में अपना समय श्रीनगर में बिताया करता था। इस हेतु उसने शालीमार व निशात बागों का निर्माण भी करवाया। इस तरह यह स्थल भी उसकी अस्थायी राजधानी रहे। ‘. जहाँगीर के बाद शाहजहाँ ने प्रारंभ में एक दशक तक अपनी राजधानी आगरा रखी। वहाँ ताजमहल का निर्माण करवाया। 1640 ई० में उसने अपना ध्यान दिल्ली की ओर दिया। उसने दिल्ली के प्राचीन आबादी क्षेत्र के पास नया शहर बसाया जिसे शाहजहानाबाद का नाम दिया। इस क्षेत्र में उसने लालकिला, जामा मस्जिद, चाँदनी-चौक बाजार का निर्माण करवाया। 1648 ई० में शाहजहाँ ने आगरा की बजाय यहाँ अधिक समय बिताना प्रारंभ कर दिया। शाहजहाँ का नया नगर विशाल व भव्य था।

(iv) औरंगजेब काल में राजधानी-औरंगज़ेब ने अपनी राजधानी की गतिविधियाँ दिल्ली से चलाईं, परन्तु उसने आगरा के महत्त्व को कम नहीं होने दिया। प्रारंभ में वह आगरा के किले से इसलिए कटा रहा क्योंकि वहाँ शाहजहाँ बन्दी था। अपने जीवन के अन्तिम 25 वर्ष उसने दक्षिण में बिताए। वहाँ मराठवाड़ा क्षेत्र में वह शिविर से प्रशासन चलाता रहा। अन्ततः औरंगाबाद नामक स्थान पर उसने दम तोड़ दिया।

प्रश्न 8.
मुगलों के शाही दरबार के बारे में आप क्या जानते हो? इस बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य का हृदय दरबार था जिसे शाही दरबार कहा गया है। शाही दरबार में सबसे महत्त्वपूर्ण स्थल राजसिंहासन अथवा तख्त होता था। इस पर बैठकर शासक शासन के कार्यों को संचालित करता था। राजसिंहासन एक ऐसे स्तंभ का प्रतीक माना जाता था मानो इस पर पृथ्वी टिकी हो। राजसिंहासन के ऊपर बनी छतरी, शासक की कांति (चमक) सूर्य की कांति से अलग करने वाली मानी जाती थी। राजसिंहासन को ईश्वर के प्रतीक व उपहार के रूप में देखा जाता था। राजसिंहासन के सामने बहुत बड़ा आँगन होता था, जिसकी भव्यता, सजावट, कालीन व पर्दे शासक व साम्राज्य की पहचान माने जाते थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 Img 4

(i) दरबारी शिष्टाचार-मुगलों का दरबार चाहे काफी बड़ा हो, लेकिन वहाँ भीड़-भाड़ की स्थिति कभी नहीं होती थी। दरबार में कौन कहाँ होगा, किस स्थिति में होगा, कौन प्रवेश करेगा तथा कौन जाएगा सब कुछ एक निश्चित नियम के अनुरूप होता था। दूसरे शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि दरबार में शासक की आज्ञा के बिना परिंदा भी पर नहीं मार सकता था।

(ii) दरबार में अभिवादन-दरबार में अभिवादन के तरीके भी व्यक्ति की हैसियत तथा पहुँच को स्पष्ट करते थे। अभिवादन में सामने जितना बड़ा व्यक्ति होता था, उतना ही झुकना दरबारी परंपरा थी। अभिवादन का सबसे उच्चतम रूप ‘सिजदा’ अर्थात् दंडवत लेटना था। यह केवल शासक के समक्ष ही होता था। शाहजहाँ के काल में चार तसलीम (झुककर चार बार हाथ को जमीन से माथे की ओर लाना) तथा जमींबोसी (झुककर जमीन चूमना) भी अपनाए जाने लगे थे। अभिवादन का एक सामान्य तरीका कोर्निश भी था। इसके अनुसार दरबारी अपने दाएँ हाथ की हथेली को अपनी छाती पर रखकर आगे की ओर सिर झुकाता था। यह इस बात का प्रतीक था कि अभिवादन करने वाला व्यक्ति इंद्रिय व मन स्थल को हाथ लगाते हुए झुककर विनम्रता से अपने को प्रस्तुत कर रहा है।

(iii) झरोखा-झरोखा मुग़ल दरबारी व्यवस्था की अकबर द्वारा जोड़ी गई परंपरा थी। यह प्राचीन भारतीय शासकों से ली गई थी। इसमें शासक प्रातः उठते ही सामान्य प्रार्थना इत्यादि के बाद अपने महल के एक विशेष हिस्से में बनी खिड़की (झरोखे) पर सूर्य की ओर मुँह करके बैठ जाता था। इस जगह के ठीक नीचे काफी खुली जगह होती थी जिसमें सैनिक, व्यापारी, कृषक, शिल्पकार यहाँ तक की बीमार बच्चों के साथ औरतें होती थीं। वे सूर्योदय से पहले वहाँ एकत्रित हो जाते थे तथा शासक की झलक पाते ही ऊँची आवाज में बोलते थे ‘बादशाह सलामत’ । अकबर द्वारा प्रारंभ की गई यह परंपरा अटूट चलती रही तथा उसका यह विश्वास था कि इससे जनता का सत्ता में विश्वास बनता था। औरंगज़ेब ने बाद में इसे गैर-इस्लामी घोषित करते हुए बन्द कर दिया था।

(iv) शाही उत्सव व समारोह-मुगल दरबार में सामान्य प्रशासनिक गतिविधियों के अतिरिक्त कुछ विशेष उत्सव व समारोह होते थे। उस दिन दरबार को विशिष्ट ढंग से सजाया जाता था। सजाने के लिए रंग-बिरंगे ढंग से सजे डिब्बों में रखी मोमबत्तियाँ, महल की दीवारों पर विभिन्न तरह के बंदनवार (सज्जा के लिए विशेष रूप से तैयार चीजें) तथा विभिन्न तरह की सुगंधित चीजों का प्रयोग किया जाता था। शाही उत्सव व समारोह तीन तरह के होते थे।

a. सामूहिक सामाजिक समारोहों में ईद, शब-ए-बारात तथा (हिजरी कैलेंडर के 8वें महीने की 14वीं तारीख या सावन की रात्रि का त्योहार) होली व दीवाली प्रमुख होते थे। इनमें जनता के विभिन्न वर्गों के लोग दरबार में शाही परिवार के सदस्यों के साथ भाग लेते थे।

b. शाही विशिष्ट समारोह में सिंहासनारोहण की वर्षगाँठ, सूर्यवर्ष व चंद्रवर्ष के अनुरूप शासक के जन्म का कार्यक्रम तथा वसंतागमन पर फारसी त्योहार नौरोज मुख्य थे। इनमें शासक का जन्मदिन अन्यों की तुलना में अधिक शोभायमान तथा खर्चीला होता था।

c. शाही दरबार का तीसरा समारोह व उत्सव शहजादों की शादियों का होता था। यह इतना मंहगा, मनमोहक व आकर्षक होता था कि सामान्य व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता था।

प्रश्न 9.
मुग़ल शासकों के परिवार का वर्णन करते हुए शाही परिवार की महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगल शासन-व्यवस्था में शासक प्रमुख होता था। परंतु यह ध्यान रहना चाहिए कि उसका अकेले तौर पर कोई अस्तित्व नहीं था। प्रशासन की प्रत्येक गतिविधि में उसके परिवार के सदस्यों की भूमिका अहम् होती थी। शासक के परिवार को शाही परिवार कहा जाता था। शाही परिवार के सदस्यों को दरबार से अलग वर्णित करते हुए इतिवृत्तों में सर्वाधिक प्रचलित शब्द ‘हरम’ मिलता है। हरम शब्द शासक के निवास की ओर संकेत करता है। शाब्दिक रूप से हरम का अर्थ ‘पवित्र स्थान’ होता है। इतिवृत्तों में हरम के वर्णन में शासक, उसकी पत्नी, उपपत्नी, उसके नजदीक व दूर के रिश्तेदार, वास्तविक माता, धाय माता, सौतेली माता, उपमाता, बहन, पुत्री, चाची, मौसी उनके बच्चे व पुत्रों की पत्नियाँ व उनके सहयोगी होते थे। इसके अतिरिक्त महिला परिचारिकाएँ, गुलाम व दास-दासी भी इस परिवार का अंग होते थे।

अकबर के शासन काल से पहले मुग़लों के शाही परिवार में एक वर्ग विशेष के लोग थे। परन्तु अकबर ने जब राजपूतों के साथ वैवाहिक, राजनीतिक व मैत्री संबंध स्थापित किए तो पारिवारिक संरचना में बदलाव आया। इसमें सबसे बड़ा बदलाव तो यह था कि अब पादशाह बेगम (मुख्य पत्नी) अर्थात् हरम की राजपूत पत्नियाँ बनीं।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 Img 5

1. हरम की व्यवस्था (System of Haram)-शाही परिवार के हरम में महिलाओं की प्रमुखता थी। इसमें सभी महिलाएँ बराबर की तथा एक जैसी हैसियत वाली नहीं थीं। हरम में प्रमुख महिलाओं को मोटे तौर पर तीन नामों से जाना जाता था।

बेगम-शाही परिवार में सबसे ऊँचा स्थान बेगमों का था। बेगम प्रायः कुलीन परिवार से संबंधित होती थी। उनके साथ विवाह एक निश्चित परंपरा के अनुरूप होता था। वे मेहर (दहेज) के रूप में काफी धन इत्यादि लाती थी। पहले ही दिन से इनका सम्मान होता था। शासक जिस बेगम को सर्वाधिक चाहता था उसे पादशाह

बेगम (मुख्य पत्नी) का खिताब दिया जाता था। उसकी स्थिति अन्य बेगमों की तुलना में अच्छी होती थी।
अगहा-हरम में इनका स्थान दूसरे नंबर पर था। ये सामान्य कुलीन परिवारों से थीं। ये भी शादी की परंपरा के बाद ही हरम में आती थीं।
अगाचा-हरम में इनका दर्जा तीसरा था। इन्हें उपपत्नियों का दर्जा प्राप्त था। इन्हें इनके खर्चे के अनुरूप मासिक भत्ता व दर्जे के अनुरूप उपहार इत्यादि मिलते थे।

2. शाही परिवार की महिलाओं का राजनीति में हस्तक्षेप (Interferance in Politics by the Women of Royal Family)-कई बार शाही परिवार की महिलाएँ भी राजनीति में सक्रिय रहती थीं। उदाहरण के लिए नूरजहाँ के राजनीति में आने के बाद हरम की स्थिति व पहचान दोनों बदल गई। 1611 ई० से 1626 ई० तक जहाँगीर के शासन काल में नूरजहाँ ने प्रत्येक गतिविधि में हिस्सा लिया। वह झरोखे पर बैठती थी तथा सिक्कों पर उसका नाम आता था। ‘नूरजहाँ गुट’ सही अर्थों में जहाँगीर के शासन में सारे फैसले करता था। जहाँगीर ने तो यहाँ तक कह दिया था कि मैंने बादशाहत नूरजहाँ को दे दी है, मुझे कुछ प्याले शराब तथा आधा सेर माँस के अतिरिक्त कुछ नहीं चाहिए। शाहजहाँ के शासन काल में उसकी पुत्री जहाँआरा तथा रोशनआरा लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक फैसलों में शामिल होती थीं। वे उच्च पदों पर आसीन मनसबदारों की भाँति वार्षिक वेतन लेती थीं। जहाँआरा (शाहजहाँ की बड़ी बेटी) तो सूरत की बंदरगाह (भारत की विदेशी व्यापार की उस समय सबसे बड़ी बंदरगाह) से निरंतर राजस्व की वसूली
करती थी।

हरम की प्रमुख महिलाओं ने इमारतों व बागों का निर्माण कार्य करवाया। नूरजहाँ ने आगरा में एतमादुद्दौला (अपने पिता) के मकबरे का निर्माण करवाया। शालीमार व निशात बागों को बनवाने में भी उसकी मुख्य भूमिका थी। इसी प्रकार दिल्ली में शाहजहाँनाबाद की कई कलात्मक योजनाओं में जहाँआरा की भूमिका थी। उसने शाहजहाँनाबाद में आँगन, बाग व एक दोमंजिला कारवाँ-सराय का निर्माण करवाया। दिल्ली के चाँदनी चौक की रूप-रेखा भी उसके द्वारा ही तैयार की गई थी।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में नौकरशाही पर निबंध लिखें।
उत्तर:
मुगल साम्राज्य एक संतुलित तथा व्यवस्थित राज्य था। इसे यह रूप देने वाला वर्ग नौकरशाहों का था। इन नौकरशाहों पर मुगलों ने विश्वास भी किया तथा इन पर नियंत्रण भी रखा, जिसके कारण मुग़ल प्रशासन संगठित व उच्च आदर्शों वाला बन पाया। मुगलों के प्रशासन में भारतीय व विदेशी तत्त्वों का मिश्रण था। इसमें केंद्रीय व प्रांतीय शासन में ईरानी व मध्य एशियाई तत्त्व .
अधिक थे जबकि स्थानीय प्रशासन के अधिकतर तत्त्व भारतीय थे।

1. नौकरशाहों की नियुक्ति प्रक्रिया-मुग़ल शासन में शासक सबसे ऊपर थे। उनकी शक्तियाँ असीम थीं। अबुल फज्ल स्पष्ट करता है कि मुग़ल साम्राज्य में सत्ता की संपूर्ण क्रिया एकमात्र बादशाह में निहित थी। साम्राज्य के बाकी सभी लोग उसके आदेशों की पालना करते थे। वह व्यवस्था को चलाने के लिए योग्यता के आधार पर अधिकारियों की नियुक्ति करता था। इन्हीं लोगों के सहारे मुगल शासक एक प्रभावशाली तंत्र खड़ा कर सके। नियुक्ति के संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यहाँ किसी व्यक्ति के दरबार में आने तथा सेवा से निवृत्त होने की कोई आयु नहीं थी। जिस भी व्यक्ति को सेवा में लेना होता था, शासक उससे बातचीत कर संबंधित विभाग के वरिष्ठ व्यक्ति को कहता था कि उसे दरबार में प्रस्तुत करे। इस तरह आदेश का पालन करते हुए संबंधित व्यक्ति की विस्तृत जाँच-पड़ताल करके सेवा में लेने का फैसला किया जाता था।

2. मनसबदारी प्रथा-मुग़ल नौकरशाही में मनसबदारी प्रमुख थी। यह सैनिक व असैनिक दोनों के लिए थी। मनसब शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है-पद। इस शब्द की व्याख्या के अनुसार जो भी व्यक्ति मुग़लों की सेवा में आता था तो उसे एक मनसब दिया जाता था। वह मनसब उसकी दरबार में पहचान, जिम्मेदारी व हैसियत तीनों बातों का अहसास कराता था। मनसब में जात व सवार दो शब्दों का प्रयोग होता था। जात शब्द व्यक्ति के पद (status) को स्पष्ट करता था जबकि सवार उसके पास ऊँट, घोड़े, बैल इत्यादि सैनिक क्षमता का बोध कराता था। इससे यदि किसी व्यक्ति की 1000 की जात मनसब व 1000 की सवार मनसब है तो वह मनसबदार प्रथम श्रेणी में होता था, यदि जात की तुलना में सवार 500 या इसके आस-पास थे तो वह द्वितीय श्रेणी में आता था तथा यदि उसके सवार नाममात्र थे या थे ही नहीं वह तृतीय श्रेणी में आता था।

इसी श्रेणी के आधार पर उसका वेतन निर्धारित होता था जबकि इसी आधार पर उसे दरबार में जगह मिलती थी। यहाँ तक कि शासक के शिविर में भी उसी अनुरूप उसका तंबूकक्ष (Tent-Room) बनता था। मनसबदारी व्यवस्था की खास बात यह थी कि मनसबदार चाहे 20 के रैंक का हो या 5,000 का वह सीधे शासक से जुड़ा होता था। वह किसी अन्य व्यक्ति के लिए जिम्मेदार नहीं होता था। मुगलकाल में सामान्य रूप से 1000 से बड़े पद के मनसबदार को उमरा (अमीर वर्ग का बहुवचन) कहा जाता था। मनसबदारों की नियुक्ति, पदोन्नति व पद मुक्ति की शक्तियाँ स्वयं शासक के पास होती थीं।

3. नौकरशाहों के प्रति दरबार का व्यवहार-मुगल दरबार में नौकरी पाना बेहद कठिन कार्य था। दूसरी ओर अभिजात व सामान्य वर्ग के लोग शाही सेवा को शक्ति, धन व उच्च सामाजिक प्रतिष्ठा का एक साधन मानते थे। नौकरी में आने वाले व्यक्ति से आवेदन लिया जाता था, फिर मीरबख्शी की जाँच-पड़ताल के बाद उसे दरबार में प्रस्तुत होना होता था। मीर बख्शी के साथ-साथ दीवान-ए-आला (वित्तमंत्री) तथा सद्र-उस-सुदुर (जन कल्याण, न्याय व अनुदान का मंत्री) भी उस व्यक्ति को कागज तैयार करवाकर अपने-अपने कार्यालयों की मोहर लगाते थे। फिर वे शाही मोहर के लिए मीरबख्शी के द्वारा ले जाए जाते थे। ये तीनों मंत्री दरबार में दाएँ खड़े होते थे, बाईं ओर नियुक्ति व पदोन्नति पाने वाला व्यक्ति खड़ा होता था। शासक उससे कुछ औपचारिक बात करके उसे दरबार के प्रति वफादार रहने की बात कहता था तथा संकेत करता था कि वह किस स्थान पर खड़ा हो। इस तरह उस व्यक्ति की नियुक्ति तथा पदोन्नति मानी जाती थी।

4. नौकरशाहों पर नियंत्रण-शासक द्वारा नौकरशाहों पर नियंत्रण के लिए कुछ नियम बनाए गए थे। उनके अनुसार शासक सामान्य रूप से इनके प्रति कठोर व्यवहार रखता था। नियमित निरीक्षण में इन्हें किसी तरह की छूट नहीं थी। थोड़ा-सा भी शक होने या अनुशासन की उल्लंघना करने पर इन्हें दण्ड दिया जाता था। इनकी कभी भी कहीं भी बदली की जा सकती थी। कोई भी अधिकारी किसी भी कार्य को करने की मनाही नहीं कर सकता था। इन सबके अतिरिक्त यह कि इनका पद पैतृक नहीं होता था अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति को नए सिरे से जीवन की शुरुआत करनी होती थी। किसी भी अभिजात वर्ग के व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी सम्पत्ति, उसकी सन्तान को नहीं दी जाती थी बल्कि यह स्वतः ही बादशाह या दरबार की सम्पत्ति बन जाती थी।

प्रश्न 11.
मुगलों की विदेश नीति का परिचय देते हुए उनकी ईरान व तुर्की साम्राज्य के प्रति नीति का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगल शासकों की विदेश नीति काफी परिपक्व थी। शासक जिस तरह की उपाधियों या पदवियों को धारण करते थे उनका असर पड़ोसी राज्यों पर अवश्य होता था। जहाँगीर (विश्व पर कब्जा करने वाला), शाहजहाँ (विश्व का शासक) तथा आलमगीर (विश्व का स्वामी) द्वारा धारण की गई उपाधियाँ खास थीं। इतिवृत्तों के लेखकों ने इन उपाधियों की व्याख्या व अर्थों का हवाला बार-बार दिया ताकि मुगल अविजित क्षेत्रों पर भी राजनीतिक नियंत्रण बना सकें तथा एक बार विजित करने के उपरांत उनका उस पर हमेशा के लिए हक बना रहे। इस तरह से स्पष्ट होता है कि मुग़ल अपने साम्राज्य की सीमा विस्तार के लिए हमेशा प्रयासरत रहते थे। उनकी इस नीति के आधार पर ही उनके पड़ोसी देशों के साथ संबंधों का निर्धारण होता था। इन रिश्तों में कूटनीतिक चाल व संघर्ष साथ-साथ चलता था। इस कड़ी में पड़ोसी राज्यों के साथ क्षेत्रीय हितों के तनाव व राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता चलती रहती थी। इसके साथ-साथ दूतों का . आदान-प्रदान भी होता रहता था।

1. ईरान के प्रति नीति (Policy Towards Perssia)-भौगोलिक दृष्टि से मुगल साम्राज्य की स्थिति वर्तमान भारत से थोड़ी भिन्न थी। उस समय पड़ोसी देशों में सबसे बड़ी सीमा ईरान में लगती थी। ऐसे में स्वाभाविक है कि दोनों के बीच कूटनीतिक संबंध भी रहे, तनाव की स्थितियाँ भी रहीं तथा संघर्ष भी हुआ। भारत व ईरान के बीच सामरिक व व्यापारिक महत्त्व का शहर कन्धार था। यही स्थल मुगलों व सफावियों के बीच झगड़े की जड़ रहा। झगड़े की शुरुआत 1507 ई० में बाबर द्वारा कन्धार पर कब्जा करने से प्रारंभ हुई थी तथा उसके बाद यह इन दोनों वंशों के बीच प्रतिष्ठा का प्रतीक भी बन गया जिसके कारण दोनों के बीच लंबे समय तक कंधार पर अधिकार के लिए संघर्ष चला तथा 1649 में ईरान ने अन्ततः इस पर कब्जा कर लिया। शाहजहाँ ने तीन अभियान भेजे, परंतु वे सफल नहीं हो सके। इसके बाद कन्धार कभी भी मुग़ल साम्राज्य व भारत का हिस्सा नहीं रह सका। औरंगज़ेब ने कन्धार को प्राप्त करने की बजाय क्षेत्र में शान्ति को महत्त्व दिया।

2. तुर्की साम्राज्य से संबंध (Relation with Ottomans Empire)-ईरान से आगे तुर्की साम्राज्य था जिसे सामान्य भाषा में ऑटोमन साम्राज्य के नाम से जाना जाता है। इस साम्राज्य में वर्तमान सऊदी अरब, कुवैत, सीरिया, जॉर्डन, ईरान व पश्चिमी एशिया के कई और देश थे। मुगलकाल में ऑटोमन (तुर्की) साम्राज्य धार्मिक व व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। धार्मिक दृष्टि से इसलिए क्योंकि मक्का व मदीना जैसे ऐतिहासिक शहर इस क्षेत्र में थे जिनके प्रति लोगों में श्रद्धा थी। दूसरा यह कि व्यापार का अन्तर्राष्ट्रीय मार्ग रेशम मार्ग इस क्षेत्र से गुजरता था। भारत का थल मार्ग से होने वाला 80% व्यापार इस क्षेत्र से होता था।

मुगल शासकों ने ऑटोमन साम्राज्य के बारे में यह नीति अपनाई कि उन्हें इस क्षेत्र के विदेशी व्यापार से जो लाभ होता था, उसका काफी हिस्सा वे इस क्षेत्र के धर्म स्थलों के विकास पर लगाते थे तथा कुछ पैसा फकीरों इत्यादि में बाँट देते थे। इसके कारण मुगलों की छवि भी बहुत उच्च बनी। मक्का व मदीना की देख-रेख करने वाले व्यक्तियों को मुगलों से आने वाले धन की प्रतीक्षा रहती थी।

औरंगजेब ने धन भेजने के कारणों व उद्देश्यों के बारे में विस्तृत जाँच करवाई। उसे पता चला कि इसके कारण मुगलों की अन्तर्राष्ट्रीय छवि तो जरूर अच्छी बनती है लेकिन धन का दुरुपयोग भी हो रहा है। इसलिए उसने इस धन को नियंत्रित किया तथा स्पष्ट किया कि इस धन का वितरण भारत में हो। औरंगजेब के इस कदम की प्रतिक्रिया भारत व मक्का-मदीना दोनों जगह हुई। यहाँ के कट्टरपंथियों ने इसे अनुचित करार दिया जबकि उदार लोगों ने सही व संतुलित कार्य कहा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि ऑटोमन साम्राज्य धार्मिक व व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था। मुगलों ने इसे उचित महत्त्व देकर कार्रवाई की।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत : मुगल दरबार Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. ‘अकबरनामा’ का लेखक कौन था?
(A) अकबर
(B) गुलबदन बेगम
(C) अबुल फज्ल
(D) बाबर
उत्तर:
(C) अबुल फज्ल

2. ‘आइन-ए-अकबरी’ रचना है
(A) अकबर की
(B) बाबर की
(C) अबुल फज्ल की
(D) जहाँगीर की
उत्तर:
(C) अबुल फज्ल की

3. ‘आइन-ए-अकबरी’ का लेखन पूरा हुआ
(A) 1556 ई० में
(B) 1565 ई० में
(C) 1590 ई० में
(D) 1598 ई० में
उत्तर:
(D) 1598 ई० में

4. शाह नहर की मरम्मत किसने करवाई थी?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहाँगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(D) शाहजहाँ ने

5. मुगलकाल में आर्थिक इतिहास की जानकारी देने वाला सबसे प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है
(A) बाबरनामा
(B) अकबरनामा
(C) आइन-ए-अकबरी
(D) तुजक-ए-जहाँगीरी
उत्तर:
(C) आइन-ए-अकबरी

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

6. मुगलकालीन स्रोतों में रैयत’ शब्द का अर्थ लिया जाता है
(A) कृषक से
(B) प्रजा से
(C) दोनों से
(D) किसी से नहीं
उत्तर:
(C) दोनों से

7. मुगलकाल में कृषक श्रेणी में नहीं आता था
(A) ज़मींदार
(B) खुद-काश्त
(C) पाहि-काश्त
(D) मुंजारा
उत्तर:
(A) ज़मींदार

8. पानीपत की पहली लड़ाई कब हुई थी?
(A) 1517 ई० में
(B) 1526 ई० में
(C) 1556 ई० में
(D) 1761 ई० में
उत्तर:
(B) 1526 ई० में

9. मुगलकाल में सरकारी भूमि कहलाती थी
(A) जागीर
(B) मदद-ए-मास
(C) खिराज
(D) खालिसा
उत्तर:
(D) खालिसा

10. किसी अधिकारी या मनसबदार को उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला भू-क्षेत्र कहलाता था
(A) जागीर
(B) मदद-ए-मास
(C) खिराज
(D) खालिसा
उत्तर:
(A) जागीर

11. रहट का सामान्य तौर पर सिंचाई के लिए प्रयोग प्रारंभ हुआ
(A) गुप्तकाल में
(B) मौर्य काल में
(C) मुगलकाल में
(D) ब्रिटिश काल में
उत्तर:
(C) मुगलकाल में

12. अकबर की मृत्यु कब हुई थी ?
(A) 1530 ई० में
(B) 1605 ई० में
(C) 1556 ई० में
(D) 1707 ई० में
उत्तर:
(B) 1605 ई० में

13. मुग़लकाल में कौन-सी नई फसल कृषि व्यवस्था का हिस्सा बनी?
(A) तम्बाकू
(B) रेशम
(C) मक्का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

14. रबी की फसल की कटाई होती थी
(A) जून-जुलाई में
(B) अक्तूबर-नवम्बर में
(C) दिसम्बर-जनवरी में
(D) मार्च-अप्रैल में
उत्तर:
(D) मार्च-अप्रैल में

15. जाति व्यवस्था में महत्त्व दिया जाता था
(A) सामाजिक हैसियत को
(B) पैतृक व्यवसाय को
(C) जातीय बंधनों को
(D) उपर्युक्त सभी को
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी को

16. ‘आईन-ए-अकबरी’ कितने भागों का संकलन है?
(A) 4
(B) 5
(C) 6
(D) 3
उत्तर:
(D) 3

17. ग्राम पंचायत के फैसले प्रायः किए जाते थे
(A) कृषक वर्ग द्वारा
(B) बहुमत द्वारा
(C) गाँव के प्रभावी लोगों द्वारा
(D) सरकार के निर्देशों द्वारा
उत्तर:
(C) गाँव के प्रभावी लोगों द्वारा

18. ग्राम पंचायत के मुखिया का चुनाव प्रायः होता था
(A) बहुमत के आधार पर
(B) पैतृक आधार पर
(C) सर्वसम्मति से
(D) सरकारी अधिकारियों द्वारा
उत्तर:
(B) पैतृक आधार पर

19. मुगल काल में पंचायत का मुखिया कौन होता था?
(A) मनसबदार
(B) आमिल
(C) दीवान
(D) मुकद्दम या मंडल
उत्तर:
(D) मुकद्दम या मंडल

20. जातीय पंचायत का कठोरतम दंड था
(A) मृत्यु दंड देना
(B) ज़मीन से बेदखल करना
(C) सामाजिक बहिष्कार
(D) कैद में डालना
उत्तर:
(C) सामाजिक बहिष्कार

21. निम्न-वर्ग के व्यक्ति को यदि पंचायत में न्याय नहीं मिलता तो वह क्या करता था?
(A) बदले में सामाजिक बहिष्कार
(B) कोतवाल के पास शिकायत
(C) गाँव छोड़कर भाग जाना
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) गाँव छोड़कर भाग जाना

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

22. ग्राम समाज में कृषक एवं गैर-कृषक का अन्तर समाप्त हो जाता था
(A) फसल की कटाई, निराई व बुआई के समय
(B) पंचायत के फैसले करते हुए
(C) किसी सामूहिक कार्यक्रम में
(D) ज़मींदार के आगमन पर
उत्तर:
(A) फसल की कटाई, निराई व बुआई के समय

23. गैर-कृषि कार्य की सेवा के बदले अनाज देने की प्रथा के लिए 18वीं शताब्दी में कौन-सा शब्द अधिक प्रयोग होने लगा?
(A) खरायती
(B) जजमानी
(C) सेवा शुल्क
(D) साझीदारी
उत्तर:
(B) जजमानी

24. पश्चिमी स्रोतों में भारतीय गाँव को कहा गया है
(A) शिविरिम
(B) अविकसित व पिछड़े हुए
(C) एक छोटा गणराज्य
(D) ये सभी
उत्तर:
(C) एक छोटा गणराज्य

25. कृषि के कार्य में महिला साथ देती थी
(A) फसल कटाई में
(B) अनाज से दाना निकालने में
(C) फसल की निराई में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

26. गैर-कृषि कार्य में यह कार्य मात्र महिलाओं का माना जाता था
(A) खाना पकाने का
(B) सूत कातने का
(C) मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए मिट्टी बनाने का
(D) उपर्युक्त सभी का
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी का

27. मुगलकाल में महिलाओं के बारे में प्रमाण मिलते हैं
(A) विधवा पुनर्विवाह के
(B) दुल्हन की कीमत लेने के
(C) महिला का भू-स्वामी होने के
(D) उपर्युक्त सभी के
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी के

28. पंचायतें महिलाओं को न्याय देते समय ध्यान रखती थीं
(A) महिला की जाति का
(B) शिकायतकर्ता का शोषक से रिश्ते का
(C) दोनों का
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दोनों का

29. जंगलवासी मुगल राज्य को उपलब्ध कराते थे
(A) हाथी
(B) हथियार
(C) लकड़ी
(D) रेशम
उत्तर:
(A) हाथी

30. जंगलवासियों की व्यवस्था में परिवर्तन का कारण था
(A) जंगल के उत्पादनों का वाणिज्यिक होना
(B) जंगल के सरदारों का सरकारी सेवा में जाना
(C) जंगलों की कटाई से कृषि का विस्तार
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. कृषि संबंधों में वह वर्ग कौन-सा था जो कृषि उत्पादन पर कब्जा करता था, लेकिन स्वयं कृषि नहीं करता था?
(A) कृषक
(B) ज़मींदार
(C) राजस्व अधिकारी
(D) बिचौलिए
उत्तर:
(B) ज़मींदार

32. निम्नलिखित ज़मींदार की श्रेणी नहीं थी
(A) प्रारंभिक
(B) मध्यस्थ
(C) स्वायत्त मुखिया
(D) खुद-काश्त
उत्तर:
(D) खुद-काश्त

33. मुगलकाल में भूमि की मिल्कियत होती थी
(A) ज़मींदार के पास
(B) कृषक के पास
(C) सरकार के पास
(D) पटवारी के पास
उत्तर:
(A) ज़मींदार के पास

34. जमींदारी प्राप्त करने का मुख्य स्रोत था
(A) पैतृक पद्धति
(B) युद्ध द्वारा क्षेत्र पर अधिकार
(C) जंगल की सफाई
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

35. राज्य की आर्थिक नीतियों के विरुद्ध विद्रोह किया
(A) कृषकों ने
(B) ज़मींदारों ने
(C) दोनों ने
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) दोनों ने

36. अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था को नाम दिया जाता था
(A) टोडरमल का बन्दोबस्त
(B) स्थायी बन्दोबस्त
(C) महालवाड़ी
(D) रैयतवाड़ी
उत्तर:
(A) टोडरमल का बन्दोबस्त

37. मुगलकाल में कर एकत्रित व निर्धारित करने वाला अधिकारी था
(A) मीर-ए-अर्ज
(B) मीरबक्शी
(C) अमील गुज़ार
(D) दरोगा
उत्तर:
(C) अमील गुज़ार

38. मुगलकाल में सर्वाधिक उपजाऊ जमीन को कहा जाता था
(A) परौती
(B) चचर
(C) पोलज
(D) बंजर
उत्तर:
(C) पोलज

39. मुगलकाल में कर एकत्रित करने की पद्धति थी
(A) जब्ती
(B) गल्ला बक्शी
(C) कनकूत
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

40. मुगलकाल में यूरोप के साथ भारत का अधिकतर व्यापार होने लगा था
(A) जल मार्ग से
(B) थल मार्ग से
(C) दोनों से
(D) किसी से नहीं
उत्तर:
(A) जल मार्ग से

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

41. मुगलकाल में भारत में अधिक चाँदी एकत्रित हई
(A) चाँदी खानों से
(B) विदेशी व्यापार से
(C) पुश्तैनी संपत्ति से
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) विदेशी व्यापार से

42. 1690 ई० के आस-पास आने वाला इटली का यात्री था
(A) बर्नियर
(B) मनूची
(C) कारेरी
(D) तैवर्नियर
उत्तर:
(C) कारेरी

43. मुद्रा के अधिक प्रसार से मुख्य रूप से परिवर्तन आया
(A) राजस्व एकत्रित के तरीकों में
(B) आन्तरिक व्यापार में
(C) ग्राम व शहर के संबंधों में
(D) उपर्युक्त सभी में
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी में

44. तकावी क्या थी?
(A) उर्वर भूमि
(B) किसानों का ऋण
(C) नगदी फसल पर मामूली कर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) किसानों का ऋण

45. करोड़ी कौन थे?
(A) उत्तर भारत में राजस्व वसूलने वाले वे अधिकारी जिनसे एक करोड़ रुपए का राजस्व राजकोष को प्राप्त होता था
(B) वैसे अधिकारी जो कानूनगो द्वारा उपलब्ध कराए गए तथ्यों और आँकड़ों का निरीक्षण करते थे
(C) उपर्युक्त दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) उपर्युक्त दोनों

46. किस मुग़ल शासक ने सर्वप्रथम अकाल के समय राहत कार्य को शुरू किया था?
(A) जहाँगीर
(B) शाहजहाँ
(C) औरंगजेब
(D) अकबर
उत्तर:
(D) अकबर

47. अकबर के किस दीवान ने भू-राजस्व उपज के स्थान पर नगद जमा करवाने की प्रथा को आरंभ किया था?
(A) टोडरमल
(B) मानसिंह
(C) मुजफ्फर खाँ
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) टोडरमल

48. भू-राजस्व के लिए अकबर ने किस संवत को अपनाया?
(A) विक्रमी संवत्
(B) हिजरी संवत्
(C) इलाही संवत्
(D) ईस्वी
उत्तर:
(C) इलाही संवत्

49. माप और उस पर कर निर्धारण की प्रणाली को क्या कहा जाता है?
(A) काकूत
(B) नसक
(C) गल्ला बख्शी
(D) जब्ती
उत्तर:
(D) जब्ती

50. मुकद्दम को माल गुजारी वसूल करने के बदले में दस्तूरी के रूप में उपज का कितने प्रतिशत मिलता था?
(A) 2 1/2%
(B) 5%
(C) 5 1/2%
(D) 7%
उत्तर:
(A) 2 1/2%

51. डॉ० सतीश चन्द्र के अनुसार मुगलों के पतन का मुख्य कारण क्या था?
(A) औरंगज़ेब की धार्मिक नीति
(B) कमज़ोर उत्तराधिकारी
(C) औरंगज़ेब की दक्षिण नीति
(D) जागीरदारी को चलाने का ढाँचा
उत्तर:
(D) जागीरदारी को चलाने का ढाँचा

52. अकबर की राजधानी थी
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) फतेहपुर सीकरी
(D) अजमेर
उत्तर:
(C) फतेहपुर सीकरी

53. कनकूत की विशेषता क्या थी?
(A) यह अपेक्षाकृत कम था
(B) इसमें समय कम लगता था
(C) राजस्व अधिकारी की आवश्यकता नहीं थी
(D) अनाज को खलिहान में देखना नहीं पड़ता था
उत्तर:
(D) अनाज को खलिहान में देखना नहीं पड़ता था

54. आसामी क्या था?
(A) बहुत-से जमींदारी गाँवों का समूह
(B) एक अकेला किसान
(C) भू-राजस्व वसूल करने वाले अधिकारी
(D) जिनकी फसल अच्छी हो
उत्तर:
(B) एक अकेला किसान

55. मुगलकाल के अंत में जमींदारी प्रथा में कुछ परिवर्तन हुआ, निम्नलिखित में से कौन-सा उससे सम्बन्धित नहीं था?
(A) जाट, सिक्ख और सतनामी जैसे किसान विद्रोहों के पीछे जमींदारों का ही हाथ था
(B) जब-जब जाट या मराठा जमींदारों को अपने विद्रोहों में सफलता हाथ लगी, उन्होंने जमींदार और शासक दोनों की भूमिका अदा की
(C) दूसरे भू-राजस्व किसानों ने जमींदारी अधिकारों की मांग नहीं की
(D) ब्रिटिश शासन की स्थापना के बाद जमींदारों के अधिकारों में मुगलकाल की अपेक्षा काफी वृद्धि हो गई
उत्तर:
(C) दूसरे भू-राजस्व किसानों ने जमींदारी अधिकारों की मांग नहीं की

56. जमींदारी प्रथा के बारे में कौन-सा कथन सत्य है?
(A) जमींदारों ने छोटे-छोटे दुर्ग बनाए और इनकी देखभाल के लिए छोटी-सी फौज रखी
(B) जमींदारों में भी उप-विभाजन था जो मध्यस्थ जमींदारों के रूप में जाने जाते थे
(C) मध्यस्थ जमींदार बहुत-से लाभों को प्राप्त करते थे यथा लगान रहित भूमि दलाली, उपकर आदि
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

57. मुगलकालीन भारत में दो मुख्य कृषक वर्ग थे
(A) खुद-काश्त व पाहि-काश्त
(B) किसान और जमींदार
(C) जमींदार और जागीरदार
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) खुद-काश्त व पाहि-काश्त

58. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है?
(A) जागीर कभी भी स्थानांतरित नहीं होती थी
(B) जागीरदारों का अपनी जागीरों पर स्थायी कब्जा होता था
(C) जागीरदारों के पास न्यायिक अधिकार नहीं थे
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) जागीरदारों के पास न्यायिक अधिकार नहीं थे।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
पानीपत की पहली लड़ाई कब हुई?
उत्तर:
पानीपत की पहली लड़ाई 1526 ई० में हुई।

प्रश्न 2.
मुगलकाल में कितने प्रतिशत लोग गाँव में रहते थे?
उत्तर:
मुगलकाल में 85% से अधिक लोग गाँव में रहते थे।

प्रश्न 3.
अबुल फज्ल की किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखो।
उत्तर:
‘अकबरनामा’ व ‘आइन-ए-अकबरी’

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 4.
आइन-ए-अकबरी का लेखन कब पूरा हुआ?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी का लेखन 1598 ई० में पूरा हुआ।

प्रश्न 5.
आइन-ए-अकबरी कुल कितने खण्डों में प्रकाशित है?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी कुल तीन खण्डों में प्रकाशित है।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में कृषि व्यवस्था को जानने के लिए अधिक पाण्डुलिपियाँ किस क्षेत्र में मिली हैं?
उत्तर:
मुगल साम्राज्य की कृषि व्यवस्था को जानने वाली पाण्डुलिपियाँ गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र व बंगाल से मिली हैं।

प्रश्न 7.
खुद-काश्त कौन थे?
उत्तर:
जो किसान स्वयं अपनी खेती करते थे, खुद-काश्त कहलाते थे।

प्रश्न 8.
तीन तरह के कृषकों के नाम लिखो।
उत्तर:
खुद-काश्त, पाहि व मुंजारा।

प्रश्न 9.
मुगलकाल में भूमि के दो प्रकार कौन-कौन से थे?
उत्तर:
खालिसा व जागीर।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में सरकारी जमीन क्या कहलाती थी?
उत्तर:
मुगलकाल में सरकारी ज़मीन खालिसा कहलाती थी।

प्रश्न 11.
‘हिंदुस्तान में गाँव व शहर पलभर में उजड़ जाते थे।’ यह कथन किसका है?
उत्तर:
यह कथन बाबर का है।

प्रश्न 12.
भारत में मुगलकाल में कृषि व्यवस्था सिंचाई के लिए किस पर आश्रित थी?
उत्तर:
मुगलकाल में कृषि सिंचाई के लिए मानसून की वर्षा पर निर्भर थी।

प्रश्न 13.
मुग़लकाल में फसल चक्र को किन दो नामों से जाना जाता था?
उत्तर:
मुगलकाल में फसल चक्र को खरीफ व रबी के नामों से जाना जाता था।

प्रश्न 14.
भारत में तम्बाकू कौन लाए?
उत्तर:
भारत में तम्बाकू पुर्तगाली लाए।

प्रश्न 15.
ग्रामीण व्यवस्था में व्यक्ति के लिए कठोर दण्ड क्या था?
उत्तर:
ग्रामीण व्यवस्था में व्यक्ति को ग्राम तथा जाति से बाहर निकालना सबसे कठोर दंड था।

प्रश्न 16.
मुगलकाल में ग्राम व्यवस्था का संचालन कौन करता था?
उत्तर:
मुगलकाल में ग्राम व्यवस्था का संचालन पंचायत करती थी।

प्रश्न 17.
गाँव में झगड़ों का निपटारा कौन करता था?
उत्तर:
गाँव में झगड़ों का निपटारा पंचायत करती थी।

प्रश्न 18.
ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था का नियमन कैसे किया जाता था?
उत्तर:
ग्रामीण व्यवस्था में जाति व्यवस्था का नियमन ‘जाति की पंचायत’ द्वारा किया जाता था।

प्रश्न 19.
गाँव में गैर-कृषि कार्य करने वालों की औसत संख्या क्या थी?
उत्तर:
गाँव में गैर-कृषि कार्य करने वालों की औसत संख्या 25 से 30% थी।

प्रश्न 20.
प्रारंभिक पश्चिमी स्रोतों में गाँव को क्या कहा गया है?
उत्तर:
प्रारंभिक पश्चिमी स्रोतों में गाँव को ‘एक छोटा गणराज्य’ कहा गया है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 21.
मुगलकाल में गाँव में आपस में विनिमय कैसे होता था?
उत्तर:
मुगलकाल में गाँव के लोग आपस में विनिमय वस्तुओं से करते थे।

प्रश्न 22.
क्या महिलाएँ मुगलकाल में भूमि की मालिक हो सकती थीं?
उत्तर:
हाँ, इस काल में महिलाएँ भूमि की मालिक हो सकती थीं।

प्रश्न 23.
जंगलवासियों का जीवन कैसा था?
उत्तर:
जंगलवासियों का जीवन प्रकृतिमूलक था।

प्रश्न 24.
जंगलवासियों पर राज्य किसके लिए आश्रित था?
उत्तर:
जंगलवासियों पर राज्य हाथियों के लिए आश्रित था।

प्रश्न 25.
मुगलकाल में ज़मींदारों को किन-किन नामों से जाना जाता था?
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदार प्रारंभिक, मध्यस्थ व स्वायत्त मुखिया के नाम से जाने जाते थे।

प्रश्न 26.
मुगलकाल में ज़मींदारी का मुख्य आधार क्या था?
उत्तर:
मुगलकाल में ज़मींदारी मुख्य रूप से पैतृक आधार पर मिलती थी।

प्रश्न 27.
राज्य के विरुद्ध विद्रोहों में कृषक व ज़मींदार की आपसी स्थिति क्या थी?
उत्तर:
राज्य के विरुद्ध विद्रोहों में कृषक व ज़मींदार साथ-साथ थे।

प्रश्न 28.
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था का मुखिया कौन था?
उत्तर:
अकबर के काल में भू-राजस्व व्यवस्था का मुखिया राजा टोडरमल था।

प्रश्न 29.
मुगलकाल में सबसे अच्छी ज़मीन को क्या कहा गया?
उत्तर:
मुगलकाल में सबसे अच्छी ज़मीन को पोलज कहा गया।

प्रश्न 30.
मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली पद्धति क्या थी?
उत्तर:
मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए प्रयुक्त होने वाली पद्धति जब्ती थी।

प्रश्न 31.
इटली के किस यात्री ने अपने वृत्तांत में यह बताया है कि विश्व का सारा सोना-चाँदी भारत में एकत्रित होता है?
उत्तर:
यह जानकारी इटली के यात्री जोवान्नी कारेरी ने दी।

प्रश्न 32.
मुगल वंश के समकालीन चीन में कौन-सा वंश था?
उत्तर:
मुगल वंश के समकालीन चीन में मिंग वंश था।

प्रश्न 33.
16वीं व 17वीं शताब्दी में ईरान पर किस वंश का शासन था?
उत्तर:
इस काल में ईरान पर सफावी वंश का शासन था।

प्रश्न 34.
गाँव में लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था?
उत्तर:
गाँव में लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था।

प्रश्न 35.
मुगलकाल में मुख्य फसलें कौन-कौन सी थीं?
उत्तर:
मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, बाजरा, चना, दालें, कपास, गन्ना, नील, तिलहनी फसलें, पोस्त आदि थीं।

प्रश्न 36.
कंधार में किस प्रकार की गेहूँ पैदा होती थी?
उत्तर:
कंधार में एक विशेष प्रकार की श्वेत गेहूँ पैदा होती थी।

प्रश्न 37.
उस समय दलहनी फसलें कौन-कौन सी होती थीं?
उत्तर:
उस समय मूंग, मोठ, माश, अरहर, लोबिया आदि मुख्य दलहनी फसलें पैदा होती थीं।

प्रश्न 38.
सबसे बढ़िया नीलं कहाँ पर पैदा होता था?
उत्तर:
सबसे बढ़िया नील ब्याना तथा खरखेज नामक स्थानों में उत्पन्न होता है।

प्रश्न 39.
उस समय भूमि को कितने भागों में बाँटा जाता था?
उत्तर:
उस समय भूमि को चार भागों में बाँटा जाता था(i) पोलज, (ii) परौती, (ii) चचर, (iv) बंजर।

प्रश्न 40.
पोलज और परौती पर भूमि कर कितना था?
उत्तर:
पोलज और परौती भूमि पर भूमि कर 1/3 भाग था।

प्रश्न 41.
कौन-से शहरों में शाही कारखानों की स्थापना की गई थी?
उत्तर:
उस समय लाहौर, आगरा, फतेहपुर सीकरी, अहमदाबाद आदि नगरों में शाही कारखानों की स्थापना की गई थी।

प्रश्न 42.
उस समय प्रसिद्ध उद्योग कौन-सा था?
उत्तर:
उस समयं सूती कपड़ा उद्योग प्रसिद्ध उद्योग था।

प्रश्न 43.
उस समय दरियाँ कौन-से शहरों में बनाई जाती थीं?
उत्तर:
मुलतान, लाहौर, फतेहपुर सीकरी, अलवर, जौनपुर आदि स्थानों पर दरियाँ बनाई जाती थीं।

प्रश्न 44.
रेशमी कपड़ा तैयार करने के उद्योग कौन-से थे?
उत्तर:
अहमदाबाद, बिहार तथा बंगाल में रेशमी कपड़ा उद्योग थे।

प्रश्न 45.
ऊनी गलीचों तथा शालों का प्रसिद्ध उद्योग कहाँ पर था?
उत्तर:
कश्मीर में।

प्रश्न 46.
रेशमी कागज़ तैयार करने का उद्योग कहाँ पर था?
उत्तर:
रेशमी कागज़ तैयार करने का उद्योग स्यालकोट में था।

प्रश्न 47.
युद्ध शस्त्र बनाने का कारखाना कहाँ पर था?
उत्तर:
लाहौर तथा गुजरात में युद्ध शस्त्र बनाने के उद्योग थे।

प्रश्न 48.
भारत का व्यापार किन-किन देशों से होता था?
उत्तर:
भारत का व्यापार लंका, बर्मा, जावा, सुमात्रा, तिब्बत, नेपाल, ईरान, मध्य एशिया, मिस्र, पूर्वी अफ्रीका, यूरोप आदि देशों से होता था।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आइन-ए-अकबरी क्यों लिखी गई?
अथवा
आइन-ए-अकबरी’ का लेखन क्यों किया गया?
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी अकबर के दरबारी अबुल फज़्ल द्वारा लिखी गई। इसका मुख्य उद्देश्य अकबर के शासन काल की घटनाओं के साथ-साथ सामाजिक व आर्थिक पक्ष को जानना था। दूसरों शब्दों में आइन-ए-अकबरी के लेखन का उद्देश्य अकबर के शासन काल के शाही कानूनों को सारांश में लिखना था।

प्रश्न 2.
आइन-ए-अकबरी के खण्डों के नाम लिखो।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी के तीन खण्ड हैं। इसके पहले खण्ड का नाम मंजिल आबादी, दूसरे खण्ड का नाम सिपह आबादी तथा तीसरे का नाम मुल्क आबादी है।

प्रश्न 3.
आइन-ए-अकबरी की किन्हीं दो सीमाओं या दोषों का वर्णन करो।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी की दो सीमाओं का वर्णन इस प्रकार से है
(i) आइन-ए-अकबरी पूरी तरह से दरबारी संरक्षण में लिखी गई है। लेखक कहीं भी अकबर के विरुद्ध कोई शब्द प्रयोग नहीं कर पाया। उसने विभिन्न विद्रोहों के कारणों व दमन को भी एकपक्षीय ढंग से प्रस्तुत किया है।

(ii) आइन-ए-अकबरी में विभिन्न स्थानों पर जोड़ में गलतियाँ पाई गई हैं। यहाँ यह माना जाता है कि गलतियाँ अबुल फज़्ल के सहयोगियों की गलती से हुई होगी या फिर नकल उतारने वालों की गलती से।

प्रश्न 4.
खुद-काश्त कौन थे? उनका समाज में क्या स्थान था?
उत्तर:
खुद-काश्त दो शब्दों के मेल से बना है खुद एवं काश्त। जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो अपनी भूमि को स्वयं जोतता हो अर्थात् अपनी भूमि पर स्वयं खेती करने वाला। इस व्याख्या के अनुसार कृषक अपनी भूमि का मालिक होता था। वह अपने गाँव में ही परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर खेती करता था। वह अपनी भूमि को बेचने, गिरवी रखने या हस्तान्तरित करने का अधिकार रखता था। उसे ज़मीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। वे गाँव में सबसे ऊँचे स्थान पर थे।

प्रश्न 5.
मुगलकाल में मिल्कियत के आधार पर भूमि के दो प्रकार लिखें।
उत्तर:
मुगलकाल में भूमि को खालिसा व जागीर में बाँटा गया है।
(i) खालिसा-खालिसा सरकारी भूमि को कहा जाता था अर्थात् ऐसी भूमि जिसका भू-राजस्व सीधे सरकारी कोष में जमा होता था। इस ज़मीन पर कृषि खुद-काश्त, पाहि-काश्त या मुंजारे करते थे तथा राजस्व सरकारी अधिकारी एकत्रित करते थे।

(ii) जागीर-जागीर उस भू-क्षेत्र को कहा जाता था जिसका राजस्व किसी सरकारी अधिकारी या मनसबदार को उसकी सेवा के बदले दिया जाता था। मनसबदार या जागीरदार, इस जमीन के प्रायः मालिक नहीं होते थे। उन्हें राज्य द्वारा समय-समय पर स्थानान्तरित किया जाता था।

प्रश्न 6.
मुगलकाल में कौन-कौन सी नई फसलें कृषि व्यवस्था का हिस्सा बनीं?
उत्तर:
मुगलकाल में कुछ नई फसलें भी उत्पादित की जाने लगी थीं। इन फसलों में पहला नाम रेशम का था। इस फसल का जीव (कीड़ा) चीन से लाया गया तथा यह बंगाल में बहुत अधिक प्रचलन में आयी। इस काल में नई दूसरी फसल तम्बाकू थी। यह फसल पुर्तगालियों द्वारा 17वीं सदी के प्रारंभ (1603) में अफ्रीकी क्षेत्र से लाई गई। इस काल में अन्य आने वाली फसलों में मक्का, जई, पटसन इत्यादि थीं।

प्रश्न 7.
ग्राम पंचायत का गठन कैसे होता था?
उत्तर:
ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजुर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थीं इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था।

प्रश्न 8.
मुगलकाल के आर्थिक इतिहास की जानकारी के बाह्य स्रोतों का वर्णन करो।
उत्तर:
बाह्य स्रोतों में मुख्य रूप से ईस्ट इंडिया कम्पनी व अन्य यूरोपीय कम्पनियों व व्यापारियों के दस्तावेज हैं। ये दस्तावेज प्रत्यक्ष तौर पर आर्थिक पक्ष की जानकारी कम ही देते हैं, लेकिन बीच-बीच में अच्छा प्रकाश डालते हैं। इन दस्तावेजों में डायरी, संस्मरण, सरकारी व निजी दस्तावेज हैं। इनमें भारत के व्यापार, आयात-निर्यात, विभिन्न क्षेत्रों में होने वाला कृषि व गैर-कृषि उत्पादन का वर्णन भी है। स्थानीय लोगों की जीवन-शैली व आर्थिक जरूरतों पर ये अधिक प्रकाश डालते हैं। इनका वर्णन दरबारी प्रभाव से मुक्त है।

प्रश्न 9.
पाहि-काश्त से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
पाहि का अर्थ होता है-पड़ोसी अर्थात् वह व्यक्ति जो पड़ोस के गाँव की ज़मीन पर खेती करता था। वह दूसरे गाँव की ज़मीन ठेके पर लेता था या खरीद लेता था। इसका कारण दूसरे गाँव की भूमि का अच्छा होना था। कृषक अकाल इत्यादि के समय मजबूरी में कृषि करता था। कुछ स्रोतों में पाहि शब्द की व्याख्या अपने ही गाँव में पड़ोसी की खेती जोतने के रूप में भी की गई है। इस कृषक को शर्तों के अनुरूप खेती करनी होती थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 10.
मुगलकाल में व्यापारिक फसलों या जिन्स-ए-कामिल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मुगलकाल में जिन्स-ए-कामिल शब्द का अर्थ उन फसलों से लगाया जाता है जिससे राज्य को कर अधिक मिलता था। गन्ना व कपास सबसे अच्छी फसल कही जाती थी। राज्य के द्वारा भी इन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता था। कपास मध्य भारत, दक्षिणी क्षेत्र, बंगाल, गुजरात एवं राजपूताना के क्षेत्रों में उगाई जाती थी। गन्ना पंजाब, दिल्ली, आगरा, बंगाल व अवध क्षेत्र में अधिक मिलता था। तिलहन की फसलें संपूर्ण उत्तरी भारत में उगती थीं। अलीगढ़, ब्याना, आगरा, पटना व बनारस क्षेत्र के नील की विश्व में बहुत अधिक माँग थी। दक्षिण के क्षेत्र में गर्म मसाले पैदा होते थे।

प्रश्न 11.
एक ‘छोटा गणराज्य’ क्या था? इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
एक ‘छोटा गणराज्य’ भारतीय गाँव था, जिसे पश्चिमी लेखकों द्वारा यह शब्द दिया गया है। उनके अनुसार भारत में गाँव आत्मनिर्भर, बहुसंस्कृतीय, अपनी आवश्यकताओं की सभी चीजों का उत्पादन करने वाले थे। यह आन्तरिक प्रशासन के लिए किसी पर निर्भर नहीं थे। इस तरह उनका मानना है कि गाँव छोटी इकाई अवश्य है, लेकिन इनका अस्तित्व स्वतंत्र है। गाँव के लोग सामूहिक स्तर पर संसाधनों व श्रम का बँटवारा करते थे, जबकि सभी को मालूम था कि उनमें सामाजिक बराबरी नहीं है। इस समाज में कुछ ज़मीन के मालिक थे, जबकि कुछ दूसरों की कृषि पर सेवा देकर जीवन-यापन करते थे।

प्रश्न 12.
मुगलकाल में जातीय पंचायत की संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर:
मुगल काल में लगभग सभी गाँव में कई जातियाँ होती थीं। प्रत्येक जाति की अपनी एक पंचायत होती थी। ये जातीय पंचायत गाँव की परिधि के बाहर भी महत्त्व रखती थीं। इनका अस्तित्व क्षेत्रीय आधार पर भी होता था। ये बहुत शक्तिशाली होती थीं। ये पंचायतें अपनी जाति (बिरादरी) के झगड़ों का निपटारा करती थीं। जातीय परंपरा व बन्धनों के दृष्टिकोण से ये ग्रामीण पंचायतों की तुलना में अधिक कठोर थीं। दीवानी झगड़ों का निपटारा, शादियों के जातिगत मानदंड, कर्मकांडीय गतिविधियों का आयोजन तथा अपने व्यवसाय को मजबूत करना इनके काम थे।

प्रश्न 13.
ग्राम समाज में कृषक व गैर-कृषक वर्ग के आपसी संबंधों का उल्लेख करें।
उत्तर:
मुगलकाल में कृषक व गैर-कृषक समुदाय ग्रामीण संरचना का अटूट हिस्सा था। कृषक समुदाय, फसल की कटाई, जुताई, बिजाई इत्यादि के कार्य स्वयं नहीं कर पाता था। वह इस कार्य के लिए गैर-कृषकों का सहयोग लेता था और ये गैर-कृषक कृषि के मुख्य काम के समय अपने सारे कार्य छोड़कर कृषि कार्य में जुट जाते थे।

प्रश्न 14.
मुगलकाल में ग्रामीण व्यवस्था में क्या-क्या परिवर्तन हुए?
उत्तर:
मुगलकाल में ग्रामीण व्यवस्था में बदलाव आए। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की।

प्रश्न 15.
दस्तकार के रूप में महिलाएँ क्या-क्या करती थीं?
उत्तर:
मुगलकाल में महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गँधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं।

प्रश्न 16.
जंगलवासियों के जीवन में बदलाव के किन्हीं दो कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगलकाल में जंगलवासियों के जीवन में बदलाव के दो कारक इस प्रकार हैं

  • वाणिज्यिक खेती व व्यापार के कारण जंगलों की सफाई की गई तथा शहद, मधु व लाख की खरीद-बेच ने उनकी परम्परागत जीवन-शैली को बदला।
  • राज्यों की विस्तारवादी नीति व हाथियों की आवश्यकता ने जंगलवासियों को प्रभावित किया। राज्य ने उन्हें संरक्षण दिया और उन्होंने राज्य को हाथी दिए।

प्रश्न 17.
मुगलकाल में ज़मींदार के अधिकार व कर्त्तव्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
मुगलकाल में जमींदारों के पास अपनी ज़मीन की खरीद, बेच, हस्तांतरण, गिरवी रखने का अधिकार था। विभिन्न तरह के प्रशासनिक पदों पर इन्हें नियुक्त किया जाता था। अपने क्षेत्र में विशेष पोशाक, घोड़ा, वाद्य यन्त्र बजाने का अधिकार इनके पास था। भू-राजस्व से इन्हें एक निश्चित मात्रा में कमीशन मिलता था। इनके पास अपनी सेना होती थी। ज़मींदारों के कर्त्तव्यों के बारे में कहा जा सकता है कि अपने क्षेत्र में शांति व्यवस्था स्थापित करने की जिम्मेदारी इनकी थी। इनके क्षेत्र से शासक व शाही परिवार का कोई सदस्य गुजरता था तो उन्हें वहाँ उपस्थित होना पड़ता था। राज्य के प्रति स्वामीभक्ति इनका सबसे बड़ा कर्त्तव्य था। कुछ ज़मींदार अपने क्षेत्र में धर्मशालाएँ बनवाना व कुएँ खुदवाना भी जरूरी समझते थे।

प्रयन 18.
ज़मींदार व कृषकों के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल के कुछ साक्ष्यों के अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि जमींदार वर्ग अपने अधीन कृषक वर्ग का शोषण करता था, जिसके कारण इस वर्ग की छवि शोषक वर्ग के रूप में उभरकर सामने आती है। इसके साथ-साथ साक्ष्य इस बात पर भी प्रकाश डालते हैं कि कृषकों के साथ इस वर्ग के संबंधों में पैतृकवाद व संरक्षणवाद भी था। इस बात के पक्ष में हम दो तर्क दे सकते हैं

(i) मुगलकाल में भक्ति व सूफी आन्दोलन के संतों व फकीरों ने अपने उपदेशों व गीतों में समाज की बुराइयों, जातिगत समस्याओं व अत्याचारों की कड़ी निन्दा की है। उन्होंने कहीं भी ज़मींदार वर्ग की शोषक के रूप में आलोचना नहीं की, बल्कि राजस्व अधिकारियों के प्रति सामान्य कृषक वर्ग को विद्रोही बताया है।

(ii) 17वीं शताब्दी में भारत के विभिन्न हिस्सों में कृषकों के विद्रोह हुए। इन विद्रोहों में कृषकों ने ज़मींदारों के विरुद्ध कभी बगावत नहीं की, बल्कि इन विद्रोहों में ज़मींदार कृषक के साथ दिखे।

प्रश्न 19.
अकबर के काल में भूमि के विभाजन को स्पष्ट करें।
उत्तर:
अकबर के काल में उपजाऊपन के आधार पर भूमि को निम्नलिखित चार हिस्सों में विभाजित किया गया

  • पोलज-कृषक की सबसे उपजाऊ भूमि को पोलज कहा गया। इस ज़मीन पर वर्ष में नियमित फसल होती थी। इस पर सिंचाई व्यवस्था भी ठीक थी।
  • परौती यह वह ज़मीन थी जो एक फसल के बाद कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दी जाती थी अर्थात् यह ज़मीन वर्ष में केवल एक फसल देती थी।
  • चाचर (छाछर) यह ज़मीन 2 से 4 वर्षों में एक फसल अच्छी देती थी। प्रायः जब काफी बरसात होती थी तब इसमें फसल ठीक होती थी।
  • बंजर-इस ज़मीन पर कभी-कभार फसल होती थी। कई बार पाँच वर्ष तक जोत में नहीं आती थी। यह ज़मीन रेतीली, उबड़-खाबड़ तथा चरागाह क्षेत्र वाली थी।

प्रश्न 20.
16वीं व 17वीं सदी के एशिया के प्रमुख राजवंशों के नाम लिखें।
उत्तर:
16वीं व 17वीं शताब्दी में एशिया के अलग-अलग क्षेत्रों में शक्तिशाली साम्राज्यों की स्थापना हुई। इस काल में चीन में मिंग साम्राज्य, ईरान में सफावी साम्राज्य, तुर्की में आटोमन साम्राज्य तथा भारत में मुग़ल साम्राज्य स्थापित हुआ।

प्रश्न 21.
मुग़लों की टकसालों पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध-चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इनकी टकसाल शाही राजधानी दिल्ली व आगरा के अतिरिक्त लाहौर, इलाहाबाद, अजमेर, बुरहानपुर में स्थापित की।

प्रश्न 22.
मुद्रा प्रणाली के प्रसार के मजदूरों पर क्या प्रभाव पड़े?
उत्तर:
मुगलकाल में मुद्रा-प्रणाली के प्रचलन से वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आई। गाँवों से बिकने के लिए फसलें व अन्य उत्पादन शहर में आने लगा तथा इसी तरह शहर की चीजें गाँवों में जाने लगीं। इससे गाँव व शहर के बीच अन्तर कम हुआ, इसी तरह राज्य द्वारा भी कर एकत्रित करने के लिए जिन्स की तुलना में मुद्रा (नकद) को महत्त्व दिया गया।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
आइन-ए-अकबरी कब व क्यों लिखी गई? इसके विभिन्न भागों का वर्णन करें।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी अकबर के शासन काल में अबुल फज्ल द्वारा लिखी गई रचना है। अबुल फज्ल अकबर का दरबारी लेखक था। अकबर के आदेश से अबुल फज़्ल ने ‘अकबरनामा’ को लिखना प्रारम्भ किया। अकबरनामा के तीन खण्ड हैं। इन खण्डों में तीसरा खण्ड आइन-ए-अकबरी है। विस्तृत जानकारी होने के कारण इसे अलग रचना मान लिया गया तथा इस रचना के ही तीन खण्ड बन गए। आइन-ए-अकबरी के लेखन का उद्देश्य अकबर के शासन काल के शाही कानूनों को सारांश में लिखना था। इस तरह आइन-ए-अकबरी इतिहास लेखन का एक हिस्सा थी जो बाद में अकबर के साम्राज्य, प्रान्तों, क्षेत्रों व शाही कानूनों का एक दस्तावेज बन गई। अकबर के शासनकाल के 42वें वर्ष में अर्थात् 1598 में अबुल फज्ल ने इसे पाँच संशोधनों के बाद पूरा किया। आइन-ए-अकबरी पाँच भागों में विभाजित है जिसमें से पहले तीन का एक खण्ड है तथा शेष दो अलग-अलग खण्डों में प्रकाशित है। पाँचों भागों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है

(i) पहला भाग-आइन-ए-अकबरी के पहले भाग को ‘मंजिल आबादी’, का नाम दिया गया है। इस हिस्से में शाही-आवास, दरबार, कोष, मुद्रा, मूल्यवान वस्तुओं के रख-रखाव व उनके नाप-तोल इत्यादि के बारे में बताया गया है।

(ii) दूसरा भाग-आइन के दूसरे भाग को ‘सिपह आबादी’ के नाम से जाना जाता है। इस भाग में मुगल सेना व उसके विभिन्न अंगों, नागरिक प्रशासन, मनसबदारी व्यवस्था व मनसबों की संख्या के बारे में बताया गया है। इस भाग में विद्वानों, कवियों तथा कलाकारों की जीवनियों को भी संक्षिप्त में दर्ज किया गया है।

(iii) तीसरा भाग-आइन के तीसरे भाग को ‘मुल्क आबादी’ का नाम दिया गया है। इसमें मुग़ल साम्राज्य के 12 प्रान्तों (उत्तर भारत) के बारे में जानकारी दी गई है। इस जानकारी में राजस्व की दरें, उनको एकत्रित करने की पद्धति व प्रान्तों की भौगोलिक स्थिति को विस्तार से स्पष्ट किया है। उसने प्रत्येक प्रान्त को अलग-अलग अध्यायों में विभाजित किया है। बीच-बीच में उसने प्रान्तों की स्थलाकृति व रेखाचित्र भी बनाए हैं।

(iv) चौथा व पाँचवाँ भाग आइन के चौथे व पाँचवें भाग में भारत की धार्मिक, सांस्कृतिक व साहित्यिक परम्पराओं का उल्लेख किया गया है। इन दोनों भागों के लिए अबुल फज़्ल ने अधिकतर जानकारी अलबेरुनी के वृत्तांत से ली है। अबुल फज्ल ने आइन के अन्त में अकबर के शुभ वचनों को संकलित किया है।

प्रश्न 2.
आइन-ए-अकबरी कृषि एवं आर्थिक इतिहास लेखन का महत्त्वपूर्ण स्रोत है, इस पर अपने विचार दें।
उत्तर:
आइन-ए-अकबरी सूचना व जानकारी की दृष्टि से बेजोड़ है। इसके लेखन में अबुल-फज़्ल अन्य मध्यकालीन लेखकों की तुलना में काफी आगे निकल गया। उस समय के ज्यादातर लेखक प्रायः युद्ध, राजनीति, दरबारी गतिविधियों व वंशों के गुणगान को महत्त्व देते हैं। जबकि अबुल-फज़्ल ने राजनीति, अर्थव्यवस्था, धर्म, समाज सभी विषयों को बड़ी कुशलता से प्रस्तुत किया है। आइन के महत्त्वपूर्ण पक्ष को निम्नलिखित बिन्दुओं के रूप में समझ सकते हैं

(i) अबुल-फल स्वयं स्वीकार करता है कि उसने पुस्तक को त्रुटि रहित बनाने का प्रयास किया। इस हेतु उसने यह पुस्तक पाँच बार लिखी तथा हर बार जानकारी में संशोधन किया है अर्थात् उसने इसे जल्दी की बजाय अच्छा करने पर जोर दिया।

(ii) उसने सूचनाओं को बड़े स्तर पर एकत्रित किया एवं करवाया। इसके लिए उसने हर तरह के प्रयास किए। उसने उन्हें संकलित कर जिस तरह क्रमबद्ध ढंग से प्रस्तुत किया, वह कोई सरल कार्य नहीं था।

(iii) राज्य की आर्थिक नीतियों, भू-राजस्व को निर्धारित करने की पद्धति, फसलों, सिंचाई इत्यादि पर प्रकाश डालने वाला यह एकमात्र ग्रन्थ है। इस अभाव में मध्यकाल को ठीक तरह से समझना बेहद कठिन कार्य है।

(iv) मुगलकाल में गैर-कृषि उत्पादन, उनका विनिमय, उनके मिलने के स्थल तथा शासक द्वारा उनके प्रोत्साहन के बारे में उसकी जानकारी हमें तत्कालीन व्यापार व उद्योग व्यवस्था को समझने में सहायता करती है।

(v) मुगलकालीन ग्रामीण समाज, मनसबदारी प्रणाली, कृषक-ज़मींदार व राज्य के सम्बन्धों, वस्तुओं के भावों का वर्णन उसने जिस तरह किया है, वह तत्कालीन भारत को समझने में तो मदद करता ही है, साथ में विश्व के अन्य भागों से तुलना करने का आधार भी देता है।

आइन-ए-अकबरी के बारे में यह कहा जा सकता है कि अबुल-फज़्ल द्वारा रचित यह ग्रन्थ हर प्रकार की जानकारी से भरपूर है। इसकी कुछ सीमाएँ भी रहीं, परन्तु ये बहुत कम हैं। इस तरह की कमियाँ लगभग प्रत्येक तरह के स्रोत में होती हैं। निस्सन्देह अबुल-फल अपने समकालीन व अन्य मध्यकालीन लेखकों से आगे था। अपने लेखन में जहाँ वह अच्छी जानकारी दे पाया वही स्वयं का एवं अकबर का नाम भी उचित ढंग से उभार पाया है। आइन-ए-अकबरी ने मुगलकाल के पुनर्निर्माण के लिए शोधकर्ताओं व इतिहासकारों को प्रचुर मात्रा में सामग्री उपलब्ध कराई है।

प्रश्न 3.
मुगलकाल में कृषकों की विभिन्न श्रेणियों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल में कृषक के लिए मोटे तौर पर रैयत या मुज़रियान शब्द का प्रयोग होता था। कई स्थानों पर कृषक के लिए किसान व आसामी शब्द भी प्रचलन में थे। 17वीं शताब्दी के स्रोतों में खुद-काश्त व पाहि-काश्त इत्यादि शब्दों का प्रयोग कृषकों के लिए मिलता है। यह शब्द उनकी प्रकृति में अन्तर को स्पष्ट करता है। कहीं-कहीं यह विभिन्न क्षेत्रों के भाषायी अन्तर के कारण हैं। इन अन्तरों को समझने के लिए इनकी संक्षिप्त व्याख्या को जानना आवश्यक है।

(i) रैयत-रैयत शब्द प्रारम्भिक स्रोतों में प्रजा के लिए प्रयोग हुआ। फिर यह कृषक के लिए ही प्रयुक्त किया जाने लगा तथा कृषक शब्द के बहुवचन (अर्थात् अधिक संख्या) के लिए रिआया शब्द का प्रयोग हुआ। यह शब्द सभी तरह के कृषकों के लिए प्रयोग में लाया गया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 5

(ii) खुद-काश्त-कृषक श्रेणी में यह शब्द ऊँचे दर्जे के किसानों के लिए प्रयोग होता है। खुद-काश्त दो शब्दों के मेल से बना है-खुद एवं काश्त। जिसका अर्थ है वह व्यक्ति जो अपनी भूमि को स्वयं जोतता हो अर्थात् अपनी भूमि पर स्वयं खेती करने वाला। इस व्याख्या के अनुसार कृषक अपनी भूमि का मालिक होता था। वह अपने गाँव में ही परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर खेती करता था। वह अपनी भूमि को बेचने, गिरवी रखने या हस्तान्तरित करने का अधिकार रखता था। उसे ज़मीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था।

(iii) पाहि-काश्त-पाहि का अर्थ होता है-पड़ोसी अर्थात् वह व्यक्ति जो पड़ोस के गाँव की ज़मीन पर खेती करता था। वह दूसरे गाँव की ज़मीन ठेके पर लेता था या खरीद लेता था। इसका कारण दूसरे गाँव की भूमि का अच्छा होना था। अकाल इत्यादि के समय मजबूरी में कृषि करता था। कुछ स्रोतों में पाहि शब्द की व्याख्या अपने ही गाँव में पड़ोसी की खेती जोतने के रूप में भी की गई है। इस कृषक को शर्तों के अनुरूप खेती करनी होती थी।

(iv) मुज़रियान या मुंजारा-यह कृषकों की श्रेणी में सबसे निचले दर्जे पर था। उसके पास हल व बैल तो अपने थे लेकिन वह ज़मीन का मालिक नहीं था। उसके पास भूमि खरीदने व ठेके पर लेने की क्षमता भी नहीं थी। अतः वह किसी भी किसान के साथ हिस्सेदार व बँटाईदार के रूप में खेती करता था। उत्पादन को बाद में एक निश्चित मात्रा में बाँट लिया जाता था। इस वर्ग की संख्या काफी थी व इसकी स्थिति हमेशा दयनीय थी। ज़मीन का मालिक उसे प्रतिवर्ष अपनी शर्तों के अनुरूप खेती करने को देता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 4.
मुगलकाल की सिंचाई तकनीक के बारे में आप क्या जानते हैं? अथवा 16वीं-17वीं शताब्दी में कृषि के लिए कौन-से सिंचाई साधनों का इस्तेमाल होता था?
उत्तर:
मुगलकाल में कृषि प्रकृति पर निर्भर थी। जिन क्षेत्रों में जिस तरह की वर्षा होती थी लोग उसी तरह की फसलें पैदा करते थे। कहीं-कहीं नदियों का पानी भी सिंचाई के लिए प्रयोग में आता था। कम वर्षा वाले क्षेत्र में सिंचाई के लिए कृषक को कृत्रिम साधनों का प्रयोग भी करना पड़ा। सिंचाई के कृत्रिम साधन निम्नलिखित थे

(i) रहट-यह रहट लकड़ी या लोहे के पहियों वाला था। स्रोतों में रहट के लिए प्रशियिन बहिल’ शब्द का प्रयोग किया गया है। बाबर ने अपनी आत्मकथा में भारत में सिंचाई प्रणाली व रहट के प्रयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी है।

(ii) जलाशयों से सिंचाई-कृषक कुछ स्थानों पर प्राकृतिक जलाशयों के साथ-साथ कृत्रिम जलाशय भी खोद लेते थे। इन जलाशयों में वर्षा का पानी एकत्रित हो जाता था जो एक सीमित क्षेत्र की सिंचाई करता था।

(iii) नहरों से सिंचाई-राज्य के द्वारा भी जोत क्षेत्र को बढ़ाने के लिए सिंचाई हेतु कुछ मदद की गई। उदाहरण के लिए शाहजहाँ ने पंजाब में शाह नहर का निर्माण करवाया। इसी तरह फिरोज शाह द्वारा जिस नहर का निर्माण करवाकर हिसार पानी लाया गया था उसकी अकबर व शाहजहाँ के काल में फिर से खुदाई करवाई गई।

प्रश्न 5.
मुगलकाल में कौन-कौन सी फसलें किस-किस क्षेत्र में उत्पादित होती थीं?
उत्तर:
मुगलकाल की मुख्य फसलें गेहूँ, चावल, जौ, ज्वार, कपास, बाजरा, तिलहन, ग्वार इत्यादि थीं। सामान्यतः कृषक खाद्यान्नों का ही उत्पादन करते थे। ये फसलें भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उगाई जाती थीं। चावल मुख्य रूप से उन क्षेत्रों में होता था जहाँ अधिक वर्षा होती थी। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जौ, ज्वार, बाजरा इत्यादि बोए जाते थे, जबकि गेहूँ लगभग भारत के प्रत्येक क्षेत्र में बोई जाती थी। फसलों के उत्पादन में सर्वाधिक महत्त्व मानसून पवनों का था। ‘आइन-ए-अकबरी’ में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादित होने वाली फसलों पर प्रकाश डाला गया है। उसके अनुसार आगरा व मालवा क्षेत्र में 39 फसलें तथा दिल्ली, लाहौर, मुलतान व गुजरात क्षेत्र में 43 फसलें प्रचलन में थीं।

मुगलकाल में कुछ फसलों के लिए जिन्स-ए-कामिल शब्द का प्रयोग हुआ है। इसका अर्थ उन फसलों से लगाया जाता है जिससे राज्य को कर अधिक मिलता था। गन्ना व कपास सबसे अच्छी फसल कही जाती थी। राज्य के द्वारा भी इन फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास किया जाता था। कपास मध्य भारत, दक्षिणी क्षेत्र, बंगाल, गुजरात एवं राजपूताना के क्षेत्रों में उगाई जाती थी। गन्ना पंजाब, दिल्ली, आगरा, बंगाल व अवध क्षेत्र में अधिक मिलता था। .

मुगलकाल में कुछ नई फसलें भी व्यापार के लिए उत्पादित की जाने लगी थीं। इन फसलों में पहला नाम रेशम का था। इस फसल का जीव (कीड़ा) चीन से लाया गया तथा यह बंगाल में बहुत अधिक प्रचलन में आई। इसी फसल के कारण बंगाल का रेशमी कपड़ा विश्वविख्यात हो गया। इस काल में नई दूसरी फसल तम्बाकू थी। यह फसल पुर्तगालियों द्वारा 17वीं सदी के प्रारंभ (1603) में अफ्रीकी क्षेत्र से लाई गई। इस काल में अन्य आने वाली फसलों में मक्का, जई, पटसन इत्यादि थीं। 17वीं शताब्दी में आने वाली फसलों में टमाटर, आलू व हरी मिर्च कही जा सकती हैं। भारत में ये नई फसलें व सब्जियाँ अफ्रीका, स्पेन व अरब क्षेत्र से आईं।

प्रश्न 6.
ग्राम पंचायत में निम्न वर्ग की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
ग्राम पंचायतों पर मुख्य रूप से उच्च वर्ग का प्रभुत्व था। वह वर्ग अपनी मनमर्जी के फैसले पंचायत के माध्यम से लागू करवाता था। सामान्य-तौर पर निम्न वर्ग के लोग पंचायत की इस तरह की कार्रवाई को झेल लेते थे। परन्तु स्रोतों में विशेषकर महाराष्ट्र व राजस्थान से प्राप्त दस्तावेजों में इस तरह के प्रमाण मिले हैं जिनमें निम्न वर्ग ने विरोध किया हो। इन दस्तावेज़ों में ऊँची जातियों व सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध जबरन कर वसूली या गार की शिकायत है। जिसके अनुसार निम्न वर्ग के लोग स्पष्ट करते हैं कि उनका शोषण किया जा रहा है तथा उन्हें उनसे न्याय की उम्मीद भी नहीं है। ये शिकायतें बड़े ज़मींदार तथा अधिकारियों के नाम लिखी गई हैं।

शिकायत के अनुसार पंचायत की बैठक होती थी। सबसे पहले पंचायत शिकायतकर्ता को समझाने का प्रयास करती थी। उसके विरोध करने की स्थिति में समझौता करवाने का प्रयास किया जाता। पंचायत के फैसले सभी स्थितियों में एक जैसे नहीं होते थे बल्कि व्यक्ति की जाति व सामाजिक हैसियत का ध्यान रखा जाता था। पंचायत के फैसले से यदि शिकायतकर्ता सन्तुष्ट नहीं होता था तो वह विरोध के कठोर रास्ते अपनाता था। विरोध की शैली में वह विद्रोही हो जाता था या फिर गाँव छोड़कर भाग जाता था। खेतिहर का गाँव से भागना कृषक समुदाय के लिए नुकसानदायक था, क्योंकि इन्हीं मजदूरों के सहारे तो खेती सम्भव थी। इस काल में जमीन की कमी नहीं थी, बल्कि मेहनत करने वाले अर्थात् श्रम शक्ति की कमी थी। श्रम शक्ति कम होने का भय ग्राम के उच्च वर्ग को सताता था। इस तरह पंचायत इस बात का ध्यान रखती थी कि निम्न वर्ग के लोगों को विद्रोही न होना पड़े, इसके लिए विभिन्न तरह के दबाव प्रयोग में लाकर खेतिहरों पर अंकुश रखती थी।

प्रश्न 7.
मुग़लकाल में ग्रामीण दस्तकार से क्या आशय है? इनके कृषक वर्ग से संबंध कैसे होते थे?
उत्तर:
ग्रामीण दस्तकार से अभिप्राय उन लोगों से है जो गाँव में रहकर बुनाई, कताई, रंगरेजी, कपड़े की छपाई, मिट्टी के बर्तनों का बनाना, कृषि के उपकरणों का निर्माण करना, जूते एवं चमड़े की चीज़ों का निर्माण करते थे। 18वीं शताब्दी के दस्तावेज़ों से यह पुष्टि होती है कि ऐसे ग्रामीण दस्तकारों की संख्या काफी थी। औसत रूप में यह संख्या 25 से 30 प्रतिशत तक होती थी।

जैसा कि स्पष्ट है कि कृषक व गैर-कृषक समुदाय (ग्रामीण दस्तकार) ग्रामीण संरचना का अटूट हिस्सा था। इनके बीच में इस तरह के संबंध थे कि कई बार इनमें अन्तर करना कठिन होता था। ऐसा इसलिए था क्योंकि कृषक समुदाय, फसल की कटाई, जुताई, बिजाई इत्यादि के कार्य स्वयं नहीं कर पाता था। वह इस कार्य के लिए इन दस्तकारों का सहयोग लेता था और ये दस्तकार भी कृषि के मुख्य काम के समय अपने सारे कार्य छोड़कर कृषि कार्य में जुट जाते थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 6
ग्रामीण दस्तकार अपनी सेवाएँ पूरे ग्रामीण समुदाय को देता था। इन दस्तकारों को सेवा के बदले नकद वेतन नहीं मिलता था, बल्कि कृषक फसल आने के बाद एक हिस्सा इन्हें दे देता था। कई बार दस्तकार को स्थायी तौर पर गाँव में बसाने के लिए उसे ज़मीन दे दी जाती थी। ज़मीन कितनी तथा किस तरह की शर्तों में दी जाएगी, यह फैसला गाँव की पंचायत करती थी। महाराष्ट्र में दस्तकारों को पुश्तैनी तौर पर दी जाने वाली भूमि मीरास या (वतन) कहलाती थी। जब कोई दस्तकार इस तरह भूमि का मालिक बन जाता था, तो उसकी सामाजिक हैसियत भी बदल जाती थी। ग्रामीण समाज में दस्तकारों की सेवा-शर्तों का फैसला मुख्य रूप से पंचायत करती थी। कई बार दस्तकार, कृषक व खेतिहर मजदूर आपस में बैठकर फैसला कर लेते थे कि अदायगी कैसे तथा कब होगी।

प्रश्न 8.
ग्राम ‘एक छोटा गणराज्य’ था। इस आशय को स्पष्ट करें।
उत्तर:
भारतीय ग्राम व्यवस्था को पश्चिमी इतिहासकारों ने अलग-अलग ढंग से अध्ययन की विषय-वस्तु बनाया है। उन्होंने अपने अध्ययनों में गाँव के लिए ‘छोटा गणराज्य’ शब्द का प्रयोग किया है। ‘छोटा गणराज्य’ कहने वाले लेखकों ने गाँव के बारे में कहा कि भारत में गाँव आत्मनिर्भर, बहुसंस्कृतीय, अपनी आवश्यकताओं की सभी चीज़ों का उत्पादन करने वाले थे। ये आन्तरिक प्रशासन के लिए किसी पर निर्भर नहीं थे। इस तरह उनका मानना है कि गाँव छोटी इकाई अवश्य है, लेकिन इनका अस्तित्व स्वतंत्र है।

प्राचीनकाल से ही ग्रामों की यह व्यवस्था चली आ रही थी। इन लेखकों का मानना है कि गाँव के लोग सामूहिक स्तर पर संसाधनों व श्रम का बँटवारा करते थे, जबकि सभी को मालूम था कि उनमें सामाजिक बराबरी नहीं है। इस समाज में कुछ ज़मीन के मालिक थे, जबकि कुछ दूसरों की कृषि पर सेवा देकर जीवन-यापन करते थे। जाति व सामाजिक चिन्तन (स्त्री-पुरुष) के आधार पर ग्राम में विषमताएँ थीं। गाँव में शक्तिशाली लोग साधनों पर भी नियंत्रण रखते थे, गाँव के फैसले करते थे तथा शोषण भी करते थे। फिर भी सामान्य तौर पर एक-दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करते थे।

भारतीय ग्राम प्राचीनकाल से छोटे गणराज्य के रूप में कार्य कर रहे थे। मुगलकाल में इस व्यवस्था में थोड़ा-बहुत बदलाव आना शुरू हो गया था। इस काल में शहरीकरण का थोड़ा विकास हुआ जिसके चलते गाँव व शहर के बीच व्यापारिक रिश्ते बढ़े। इस कड़ी में वस्तु-विनिमय की बजाय नकद धन का अधिक प्रयोग होने लगा। इसी तरह मुग़ल शासकों ने भू-राजस्व की वसूली जिन्स के साथ-साथ नकदी में भी प्रारंभ की। शासक की ओर से नकदी को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इस काल में विदेशी व्यापार में भी वृद्धि हुई। विदेशों को निर्यात होने वाली चीजें गाँव में बनती थीं। इस व्यापार से नकद धन मिलता था। इस तरह धीरे-धीरे मजदूरी का भुगतान भी नकद किया जाने लगा। इस काल में खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलें भी उगाई जाने लगीं, जिसमें कृषक को पर्याप्त मात्रा में लाभ होता था। रेशम तथा नील मुगलकाल में अत्यधिक लाभ देने वाली फसलें मानी जाती थीं।

प्रश्न 9.
मुगलकालीन कृषि समाज में महिलाओं की स्थिति पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकालीन समाज में स्त्री व पुरुष दोनों के बीच श्रम विभाजन काफी हद तक नियोजित था। महिलाएँ पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं।

मुगलकाल में दस्तकार महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गूंधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं। इस काल में इनकी गैर-कृषि कार्यों में माँग लगातार बढ़ी थी। जिन-जिन चीज़ों का वाणिज्यीकरण हो रहा था तथा लाभ के साथ जुड़ती जा रही थीं, उसी के अनुरूप महिलाओं की श्रम शक्ति की माँग भी बढ़ रही थी। इस माँग की पूर्ति के लिए अब महिलाएँ नियोक्ता के घर जाकर काम करने लग गई थीं। यहाँ तक कि बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था होने लगी थी, जहाँ महिलाएँ सामूहिक तौर पर बैठकर कार्य करने लगी थीं। इस तरह से महिलाओं के लिए चारदीवारी के बंधन कुछ कमजोर होने लगे थे।

प्रश्न 10.
मुगलकाल में जमींदार कौन थे? उनकी प्रमुख श्रेणियों का वर्णन करो।
उत्तर:
मुगलकाल में जो व्यक्ति कृषि व्यवस्था का केंद्र था तथा भूमि का मालिक था, जमींदार कहलाता था। उसे ज़मीन के बारे में सारे अधिकार प्राप्त थे अर्थात् वह अपनी जमीन को बेच सकता था या किसी को हस्तांतरित कर सकता था। वह अपनी भूमि से कर एकत्रित करके राज्य को देता था। इस तरह यह वर्ग अपने से ऊपर तथा नीचे वाले दोनों वर्गों पर प्रभाव रखता था। ज़मींदार के सन्दर्भ में एक खास बात यह भी है कि वह खेती की कमाई खाता था, लेकिन स्वयं खेती नहीं करता था। बल्कि वह अपने अधीन कृषकों व मजदूरों से कृषि करवाता था। . जमींदार अपने अधिकारों के कारण गाँव व क्षेत्र में सामाजिक तौर पर भी पहचान रखता था। उसकी यह स्थिति पैतृक थी तथा राज्य उसकी इस स्थिति में सामान्य-तौर पर बदलाव नहीं कर सकता था। मुगलकाल में ज़मींदार की तीन श्रेणियाँ थीं। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(i) प्रारंभिक ज़मींदार-ये ज़मींदार वो थे जो अपनी ज़मीन का राजस्व स्वयं कोष में जमा कराते थे। एक गाँव में प्रायः ऐसे ज़मींदार 4 या 5 ही हुआ करते थे।

(ii) मध्यस्थ ज़मींदार-ये ज़मींदार वो थे जो अपने आस-पास के क्षेत्रों के ज़मींदारों से कर वसूल करते थे तथा उसमें से कमीशन के रूप में एक हिस्सा अपने पास रखकर कोष में जमा कराते थे। ऐसे ज़मींदार या तो एक गाँव में एक या फिर दो या तीन गाँवों का एक होता था।

(iii) स्वायत्त मुखिया ये ज़मींदार बहुत बड़े क्षेत्र के मालिक होते थे। कई बार इनके पास 200 या इससे अधिक गाँव भी होते थे। इनकी पहचान स्थानीय राजा की तरह होती थी। सरकारी तन्त्र भी उनके प्रभाव में होता था। इनके क्षेत्र में कर एकत्रित करने में सरकार के अधिकारी भी सहयोग देते थे। ये बहुत साधन सम्पन्न होते थे।

प्रश्न 11.
मुगलकाल में ज़मींदारी कैसे-कैसे प्राप्त की जाती थी? इस बारे में किन्हीं पाँच पहलुओं पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मुगलकाल में कोई व्यक्ति ज़मींदार कैसे बनता था एवं किस तरह से शक्तियाँ हासिल करता था, इस बारे में साक्ष्य प्रकाश डालते हैं। इनमें से कुछ का वर्णन इस प्रकार है

(i) ज़मींदारी प्राप्त करने का पहला कारण पैतृक माना जाता है, जिसके अनुसार वंशीय व जातीय आधार पर जिन लोगों को यह अधिकार था वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता रहता था। अबुल-फल इस बारे में स्पष्ट करता है कि ब्राह्मण, राजपूत व अन्य उच्च जातियों की यह स्थिति थी। कुछ मुस्लिम ज़मींदार भी इस श्रेणी में आ गए थे।

(ii) पश्चिमी भारत के कुछ दस्तावेज युद्ध में जीत कर इसकी उत्पत्ति से जोड़ते हैं। इनके अनुसार शक्तिशाली वर्ग युद्ध जीतकर क्षेत्र पर कब्जा कर लेता था तथा कमजोर लोगों को वहाँ से बेदखल कर देता था। उसके बाद अपनी ताकत के सहारे ये लोग राज्य से मिल्कियत का प्रमाण-पत्र भी ले लेते थे।

(iii) कुछ लोगों ने अपने सहयोगियों से मिलकर जंगलों की सफाई कर अपनी बस्तियाँ बसाईं तथा धीरे-धीरे इनका विस्तार कर लिया। इस तरह इन्हें ज़मींदारी अधिकार मिल गए। ये ज़मींदार प्रायः छोटे रहे।

(iv) कुछ जातियों व परिवारों ने स्वयं को संगठित कर ऐसी राजनीति बनाई कि बड़े भू-क्षेत्र पर उनका कब्जा हो। उसके बाद राज्य को सहयोग देकर उन क्षेत्रों से कर एकत्रित करने का अधिकार ले लिया। इसके बाद अपने-अपने क्षेत्र में जमींदारियाँ स्थापित करने में कामयाब रहे। उत्तर भारत में कुछ राजपूत व जाट परिवार तथा बंगाल में किसान पशुचारी वर्ग से सदगोप जैसी जातियों के लोगों ने ऐसा ही किया।

(v) इनके अतिरिक्त कुछ लोगों ने शाही सेवा करके, व्यापार इत्यादि में लाभ कमाकर ज़मीन खरीदकर, अन्य व्यक्ति से हस्तांतरण करवाकर भी जमींदारियाँ लीं। किसी-किसी व्यक्ति को राज्य द्वारा उसकी सैनिक व असैनिक सेवा से प्रभावित होकर उन्हें जमींदारियाँ दीं। आर्थिक स्थिति के अच्छा होने से कुछ सामान्य वर्ग की जातियों के लोगों द्वारा भी जमींदारियाँ खरीदी गईं।

प्रश्न 12.
मुगलकाल में अकबर ने किस तरह की भू-राजस्व व्यवस्था को महत्त्व दिया? उसने भूमि को किस तरह विभाजित करवाया?
उत्तर:
मुगलकाल में राज्य की आय का प्रमुख स्रोत भू-राजस्व था। मुगल शासक अकबर को विरासत में आर्थिक दृष्टि से कमजोर राज्य मिला था। उसने अपने राज्य की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए एक प्रशासन तंत्र को खड़ा किया। इस कार्य में उसे टोडरमल जैसा दीवान मिला। उसने जिस तरह से कार्य किए उससे राज्य आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हो गया। तत्कालीन साक्ष्यों में इस व्यवस्था को टोडरमल का बन्दोबस्त बताया है।

अकबर के निर्देशानुसार उसके दीवान टोडरमल ने प्राप्त सूचनाओं का अध्ययन कर विशेषज्ञों की राय ली। फिर उसने यह फैसला किया कि सरकार को पता चले कि उसके साम्राज्य में जोत क्षेत्र कितना है। इसके लिए सारे साम्राज्य की ज़मीन की नपाई की गई। (इसमें काफी जंगली क्षेत्र व पहाड़ी क्षेत्र नहीं आ पाया।) इस नपाई के आधार पर साम्राज्य को 182 परगनों में बाँटा गया। प्रत्येक परगने की आय लगभग एक करोड़ रुपए थी।

जमीन की नपाई के बाद यह सोचा गया कि कर का निर्धारण कैसे हो? इसके लिए दीवान ने कर एकत्रित करने वाले अधिकारी अमील-गुजार को स्पष्ट किया कि राज्य नकद वसूली को महत्त्व देता है। परन्तु यह कृषक की मर्जी पर है कि वह जिन्स (फसल) के रूप में भुगतान करता है तो भी उसे कष्ट नहीं होना चाहिए। इसके बाद कर निर्धारण सभी क्षेत्रों व कृषकों से एक समान नहीं किया गया बल्कि यह भूमि के उपजाऊपन के आधार पर था। उपजाऊपन के आधार पर भूमि को चार हिस्सों में विभाजित किया।

  • पोलज-कृषक की सबसे उपजाऊ भूमि को पोलज कहा गया। इस ज़मीन पर वर्ष में नियमित फसल होती थी। इस पर सिंचाई व्यवस्था भी ठीक थी।
  • परौती-यह वह ज़मीन थी जो एक फसल के बाद कुछ दिनों के लिए खाली छोड़ दी जाती थी अर्थात् यह ज़मीन वर्ष में केवल एक फसल देती थी।
  • चचर (छाछर)-यह ज़मीन 2 से 4 वर्षों में एक फसल अच्छी देती थी। प्रायः जब काफी बरसात होती थी तब इसमें फसल ठीक होती थी।
  • बंजर-इस ज़मीन पर कभी-कभार फसल होती थी। कई बार पाँच वर्ष तक जोत में नहीं आती थी। यह ज़मीन रेतीली, उबड़-खाबड़ तथा चरागाह क्षेत्र वाली थी।

ज़मीन के इस बँटवारे के बाद पहली दोनों किस्म की ज़मीन को फिर तीन भागों में बाँटा जाता था जिसे उत्तम, मध्यम व खराब का नाम दिया जाता था।

प्रश्न 13.
मुगलकाल में कर एकत्रित करने की प्रमुख विधियाँ कौन-सी थीं? वर्णन करें।
उत्तर:
अकबर के काल में भूमि की नपाई व बँटवारे के बाद टोडरमल ने कर एकत्रित करने की ओर ध्यान दिया। सबसे पहले उसने जमा व हासिल के बीच अन्तर के कारणों को समझा, फिर उसके समाधान के लिए कदम उठाए ताकि निर्धारित व वसूल किए. गए कर के बीच का अन्तर समाप्त हो। मुगलकाल में कर एकत्रित करने के लिए तीन प्रणालियाँ अपनाई गईं

(i) जन्ती प्रणाली-मुगलकाल में सर्वाधिक प्रचलन इस प्रणाली का रहा। यह प्रणाली पंजाब, दिल्ली, आगरा, इलाहाबाद, मालवा, अजमेर, अवध व मुलतान क्षेत्र में अपनाई गई। इस प्रणाली के अनुसार सरकार कृषक से आगामी 5 से 10 वर्ष का समझौता कर लेती थी कि वह आगामी इन दिनों में प्रतिवर्ष इतना कर देता रहेगा। इसके लिए कृषक का पिछले 5 वर्ष का रिकार्ड देखा जाता था। इस नीति से सरकार की आय आगामी कुछ वर्षों के लिए निश्चित हो जाती थी।

(ii) गल्ला बख्शी-कर एकत्रित करने की यह प्रणाली सिंध, कश्मीर, काबुल व गुजरात में अपनाई गई। यह थोड़ी-सी कठिन थी, लेकिन फिर भी इसे अपनाया जाता था। इस प्रणाली के अनुसार कृषक फसल के रोपने के बाद पटवारी को सूचना देता था कि उसने अपने खेत में यह फसल बोई है। सूचना प्राप्ति के महीने तक पटवारी अन्न संबंधित अधिकारियों को लेकर खेत में जाता था तथा खड़ी फसल की स्थिति को देखकर अनुमान लगाता था कि प्रति एकड़ कितनी फसल हो जाएगी। उसी आधार पर कृषक से समझौता किया जाता था।

(iii) कनकूत (नसक) कर एकत्रित करने की यह प्रणाली सबसे अधिक जोखिम वाली थी तथा फसल कटाई के समय अपनाई जाती थी। इसमें एक तो कृषक द्वारा सूचना न देने का भय रहता था। दूसरा फसल पूरे क्षेत्र में एक साथ कटती थी। इससे कई बार अधिकारी मौके पर पहुँच नहीं पाते थे। इस बारे में अलग-अलग साक्ष्य अलग-अलग ढंग से जानकारी देते हैं। परन्तु इन सब में यह स्पष्ट है कि यह मुख्य रूप से फसल कटने पर ली जाती थी। मौके पर सरकारी अधिकारी अपना हिस्सा ले जाते थे और किसान अपना।

प्रश्न 14.
16वीं व 17वीं शताब्दी में व्यापार संबंधी परिवर्तन पर नोट लिखो।
उत्तर:
16वीं व 17वीं शताब्दी में एशिया व यूरोप, दोनों में हो रहे आर्थिक परिवर्तनों से भारत को काफी लाभ हो रहा था। जल व स्थल मार्ग के व्यापार से भारत की चीजें पहले से अधिक दुनिया में फैली तथा नई-नई वस्तुओं का व्यापार भी प्रारंभ हुआ। इस व्यापार की खास बात यह थी कि भारत से विदेशों को जाने वाली मदों में उपयोग की चीजें थीं तथा बदले में भारत में चाँदी आ रही थी। भारत में चाँदी की प्राकृतिक दृष्टि से कोई खान नहीं थी। उसके बाद भी विश्व की चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत में ‘एकत्रित हो रहा था। चाँदी के साथ-साथ व्यापार विनिमय से भारत में सोना भी आ रहा था।

भारत में विश्व-भर से सोना-चाँदी आने के कारण मुगल साम्राज्य समृद्ध हुआ। इसके चलते हुए अर्थव्यवस्था में कई तरह के बदलाव आए। मुग़ल शासकों के द्वारा शुद्ध चाँदी की मुद्रा का प्रचलन किया गया। सूरत इस काल में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार के बहुत बड़े (यूरोपीय यात्रियों के अनुसार सबसे बड़े) केन्द्र के रूप में उभरा। बाह्य व्यापार में मुद्रा के प्रचलन का प्रभाव आन्तरिक व्यापार पर भी पड़ा। इसमें भी अब वस्तु-विनिमय के स्थान पर मुद्रा विनिमय अधिक प्रचलन में आने लगी। शहरों में बाजार बड़े आकार के होने लगे। गाँवों से बिकने के लिए फसलें व अन्य उत्पादन शहर में आने लगा तथा इसी तरह शहर की चीजें गाँवों में जाने लगीं।

इससे गाँव व शहर के बीच अन्तर ही कम नहीं हुआ, बल्कि मुद्रा का विस्तार भी तेजी से हुआ। इसी कारण राज्य द्वारा भी कर एकत्रित करने के लिए जिन्स की तुलना में मुद्रा (नकद) को महत्त्व दिया जाने लगा। इस मुद्रा के प्रसार ने, मजदूरों को भी नकद मजदूरी देने की स्थितियाँ दीं। इन सारी स्थितियों में अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिली। इसके कारण कृषक वर्ग ने भी खाद्यान्न फसलों के साथ-साथ नकदी फसलों का उत्पादन करना शुरू किया। इससे कृषक भी समृद्ध हुए जिनके कारण गाँव की स्थिति में भी बदलाव आना प्रारंभ हुआ।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
मुगलकालीन समाज में ग्राम पंचायतों के कार्यों का वर्णन करो।
उत्तर:
ग्रामीण समुदाय में एक अति महत्त्वपूर्ण पंचायत व्यवस्था थी। गाँव की सारी व्यवस्था, आपसी संबंध तथा स्थानीय प्रशासन का संचालन पंचायत द्वारा ही किया जाता था। ग्राम पंचायत में मुख्य रूप से गाँव के सम्मानित बुजुर्ग होते थे। इन बुजुर्गों में भी उनको महत्त्व दिया जाता था जिनके पास पुश्तैनी ज़मीन या सम्पत्ति होती थी। प्रायः गाँव में कई जातियाँ होती थी इसलिए पंचायत में भी इन विभिन्न जातियों के प्रतिनिधि होते थे। परन्तु इसमें विशेष बात यह है कि साधन सम्पन्न व उच्च जातियों को ही पंचायत में महत्त्व दिया जाता था। खेती पर आश्रित भूमिहीन वर्ग को पंचायत में शामिल अवश्य किया जाता था, लेकिन उन्हें महत्त्व नहीं दिया जाता था। हाँ, इतना अवश्य है कि पंचायत में लिए गए फैसले को मानना सभी के लिए जरूरी था। प्रायः सामान्य दर्जे के काम करने वालों को पंचायत में निर्णय के लिए नहीं बुलाया जाता था, बल्कि फैसले की जानकारी देने व उसे लागू करने के लिए ही बुलाया जाता था।

गाँव की पंचायत मुखिया के नेतृत्व में कार्य करती थी। इसे मुख्य रूप से मुकद्दम या मंडल कहते थे। मुकद्दम या मंडल का चुनाव पंचायत द्वारा किया जाता था। इसके लिए गाँव के पंचायती बुजुर्ग बैठकर किसी एक व्यक्ति के नाम पर सहमत हो जाते थे। मुखिया के कार्यों में पटवारी मदद करता था। गाँव की आमदनी, खर्च व अन्य विकास कार्यों को करवाने की जिम्मेदारी उसकी होती थी। गाँव की जातीय व्यवस्था तथा सामाजिक बंधनों को लागू करने में वह अधिक समय लगाता था।

पंचायत के कार्य-ग्राम पंचायत को गाँव के विकास तथा व्यवस्था की देख-रेख में कार्य करने होते थे। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(a) गाँव की आय व खर्च का नियंत्रण पंचायत करती थी। गाँव का अपना एक खजाना होता था जिसमें गाँव के प्रत्येक परिवार का हिस्सा होता था। इस खजाने से पंचायत गाँव में विकास कार्य कराती थी। इसके साथ-साथ पंचायत उन मुख्य अधिकारियों की सेवा (खातिरदारी) पर खर्च करती थी जो गाँव के दौरे पर आते थे।

(b) गाँव में प्राकृतिक आपदाओं विशेषकर बाढ़ व अकाल की स्थिति में भी पंचायत विशेष कदम उठाती थी। इसके लिए वह अपने कोष का प्रयोग तो करती ही थी साथ में सरकार से तकावी (विशेष आर्थिक सहायता) के लिए भी कार्य करती थी।

(c) गाँव के सामुदायिक कार्य जिन्हें कोई एक व्यक्ति या कृषक नहीं कर सकता था तो वह कार्य पंचायत द्वारा किए जाते थे। इनमें छोटे-छोटे बाँध बनाना, नहरों व तालाबों की खुदाई करवाना, गाँव के चारों ओर मिट्टी की बाड़ बनवाना तथा सुरक्षा के लिए कार्य करना इत्यादि प्रमुख थे।

(d) गाँव की सामाजिक संरचना विशेषकर जाति व्यवस्था के बंधनों को लागू करवाना भी पंचायत का मुख्य काम था। पंचायत किसी व्यक्ति को जाति की हदों को पार करने की आज्ञा नहीं देती थी। पंचायत शादी के मामले व व्यवसाय के मामले में इन बंधनों को कठोरता से लागू करती थी।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 7

(e) गाँव में न्याय करना पंचायत का अति महत्त्वपूर्ण कार्य था। गाँव में हर प्रकार के झगड़े व सम्पत्ति-विवाद का समाधान पंचायत करती थी। पंचायत दोषी व्यक्ति को कठोर दण्ड दे सकती थी, जिसमें व्यक्ति का सामाजिक बहिष्कार तक होता था। किसी व्यक्ति को एक सीमित समय (विशेष अवस्था में असीमित भी) के लिए गाँव से बाहर निकाल दिया जाता था। संबंधित व्यक्ति को निर्धारित समय अवधि में गाँव को छोड़ना पड़ता था। इस दण्ड के कारण वह मात्र गाँव में अपमानित नहीं होता था बल्कि उसे जातीय पेशे को भी त्यागना पड़ता था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य

प्रश्न 2.
मुगलकाल में जंगलवासियों का जीवन कैसा था? उसमें किस तरह के परिवर्तन आ रहे थे?
उत्तर:
मुगलकाल में भारत का विशाल भू-क्षेत्र जंगलों से सटा था तथा यहाँ के लोग आदिवासी थे, जो कबीलों की जिन्दगी जीते थे। तत्कालीन स्रोतों व रचनाओं में इन आदिवासियों के लिए ‘जंगली’ शब्द का प्रयोग किया गया है। मुगलकालीन स्रोतों व साहित्य में यह शब्द उन लोगों के लिए प्रयोग किया जाता था, जो जंगलों में प्राकृतिक जीवन-शैली के अनुरूप रह रहे थे। जंगलों के उत्पादों, शिकार व स्थानांतरित कृषि के सहारे वे लोग अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे। उनके कार्य मौसम (जलवायु) के अनुकूल होते थे अर्थात् उन्हें प्रकृति जो उपलब्ध कराती थी, उसे ही ये स्वीकार कर लेते थे। उदाहरण के लिए हम मध्य भारत में रहने वाले भीलों की बात कर सकते हैं।

ये लोग मानसून के दिनों में खेती करते, बसंत के दिनों में जंगल के उत्पाद एकत्रित करते, गर्मियों में मछलियों को पकड़ते तथा सर्दियों के दिनों में शिकार करते थे। ये अपनी इस तरह की गतिविधियाँ सैकड़ों सालों से जंगलों से घूमते-फिरते करते आ रहे थे। सरकार व राज्य का जंगलों व आदिवासियों के बारे में विचार अच्छा नहीं था, क्योंकि राज्य मानता था कि जंगल में राज्य विरोधी व अराजकता वाली गतिविधियाँ चलती थीं। राज्य कभी भी जंगली जीवन जीने वालों को नियंत्रित नहीं कर पाया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 Img 8

मुगलकाल में जंगल की व्यवस्था व जीवन-शैली में तेजी से बदलाव आया। विभिन्न तरह के व्यापारियों, सरकारी अधिकारियों एवं स्वयं शासक भी विभिन्न अवसरों पर जंगलों में जाया करते थे। इस तरह अब जंगल का जीवन पहले की तरह स्वतंत्र व शान्त नहीं रहा, बल्कि समाज के आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से प्रभावित होने लगा। 16वीं व 17वीं सदी में राज्यों की विस्तारवादी नीति से भी जंगली जनजातियों का जीवन प्रभावित हुआ। वे कबीले शिकार बने जिसके दोनों ओर शक्तिशाली राज्य थे। आइन-ए-अकबरी में स्पष्ट किया गया है कि विभिन्न स्थानीय राजाओं का जोत क्षेत्र बढ़ा। इसका कारण साफ था कि अकबर के शासन काल में राजनीतिक दृष्टि से शान्ति स्थापित हुई तथा राज्य स्थायी भी हुआ। इस बात का लाभ क्षेत्रीय शक्तियों ने उठाकर विभिन्न जंगली क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया।

जंगल के क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों में तेजी आई। जिस तरह से सूफी सन्तों व फकीरों की कार्य प्रणाली से कृषक समुदाय प्रभावित हुआ वैसे ही जंगलवासी भी प्रभावित हुए। इस तरह इस्लाम धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में भी फैलने लगा। इस्लाम अपनाने के बाद इन लोगों की परंपराएँ इत्यादि भी बदलीं। इस तरह जंगलवासियों के जीवन व व्यवस्था में काफी बदलाव आया। इस काल में जंगलवासियों की दूरियाँ गाँव व नगरों से कम हुई वहीं राज्य के साथ भी संबंधों में बदलाव आया।

प्रश्न 3.
मुग़ल काल की उत्पादन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
सामान्य तौर पर किसी भी काल का अध्ययन करते समय पुरुषों का वर्णन मिलता है। महिलाओं के बारे में जानकारी बहुत सीमित होती है। विभिन्न स्रोतों से इस बात का पता चलता है कि मुगल काल की उत्पादन प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। कृषक, खेतिहर या दस्तकारों के परिवारों की महिलाएँ विभिन्न कामों में अपनी सेवाएँ देती थीं।

1. कृषि में भूमिका-मुगलकालीन समाज में स्त्री व पुरुष दोनों के बीच श्रम विभाजन काफी हद तक नियोजित था। महिलाएँ पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर कार्य किया करती थीं। कार्य विभाजन की कड़ी में सामाजिक तौर पर यह माना जाता था कि पुरुष बाहर के कार्य करेंगे तथा महिलाएँ चारदीवारी के अन्दर। यहाँ विभिन्न स्रोतों में महिलाएँ कृषि उत्पादन व विशेष कार्य अवसरों पर साथ-साथ चलती हुई प्रतीत होती हैं। इस व्यवस्था में पुरुष खेत जोतने व हल चलाने का कार्य करते थे, जबकि महिलाएँ निराई, कटाई व फसल से अनाज निकालने के कार्य में हाथ बँटाती थीं। फसल की कटाई व बिजाई के अवसर पर जहाँ श्रम शक्ति की आवश्यकता होती थी तो परिवार का प्रत्येक सदस्य उसमें शामिल होता था ऐसे में महिला कैसे पीछे रह सकती थी। सामान्य दिनचर्या में भी कृषक व खेतिहर मजदूर प्रातः जल्दी ही काम पर जाता था तो खाना, लस्सी व पानी इत्यादि को उसके पास पहुँचाना महिला के कार्य का हिस्सा माना जाता था। इसी तरह जब पुरुष खेत में होता था तो घर पर पशुओं की देखभाल का सारा कार्य महिलाएँ करती थीं। अतः स्पष्ट है कि कृषि उत्पादन में महिला की भागीदारी काफी महत्त्वपूर्ण थी।

जहाँ महिलाएँ कृषि उत्पादन में बराबर की हिस्सेदारी लेती थीं, वहीं समाज के लोगों के मन में कुछ पूर्वाग्रह देखे जा सकते हैं। जैसे राजस्थान व गुजरात से प्राप्त स्रोतों से पता चलता है कि रजस्वला (मासिक धम) की स्थिति में महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने नहीं दिया जाता था। इसी तरह वे बंगाल में इन्हीं दिनों में पान के बागान में नहीं जा सकती थीं। समाज की इस बारे में धारणा का यह पक्ष हो सकता है कि इस तरह के प्रतिबन्ध के कारण महिला को उन दिनों में अधिक कार्य नहीं करना पड़ता होगा। इसलिए उन पर सामाजिक व धार्मिक बंधन लगा दिए गए।

2. दस्तकार महिलाएँ दस्तकार महिलाएँ सूत कातने, बर्तन बनाने के लिए मिट्टी को साफ करने, भिगोने तथा गूंधने का कार्य करती थीं। वे कपड़े की बुनाई-कढ़ाई भी करती थीं। सामान्य तौर पर जब कृषि कार्य का अधिक दबाव नहीं होता था तो महिलाएँ कुछ-न-कुछ दस्तकारी के कार्य करती रहती थीं। मुग़ल काल में इनकी गैर-कृषि कार्यों में माँग लगातार बढ़ी थी। जिन-जिन चीज़ों का वाणिज्यीकरण हो रहा था तथा लाभ के साथ जुड़ती जा रही थीं, उसी के अनुरूप महिलाओं की श्रम शक्ति की माँग भी बढ़ रही थी। इस माँग की पूर्ति के लिए अब महिलाएँ नियोक्ता के घर जाकर काम करने लग गई थीं। यहाँ तक कि बाजारों में भी ऐसी व्यवस्था होने लगी थी, जहाँ महिलाएँ सामूहिक तौर पर बैठकर कार्य करने लगी थीं। इस तरह से महिलाओं के लिए चारदीवारी के बंधन कुछ कमजोर होने लगे थे।

3. परिवार की श्रम शक्ति की वृद्धि-मुग़ल काल में मानव की श्रम शक्ति का बहुत अधिक महत्त्व था। ऐसे में महिलाओं का महत्त्व और अधिक बढ़ गया था क्योंकि उसमें परिवार वृद्धि की क्षमता थी। इसी कारण इस समाज में लोग उसे वंश-वृद्धि (श्रम वृद्धि) के संसाधन के तौर पर देखते थे। दूसरी ओर, बार-बार बच्चों को जन्म देने व कुपोषण के कारण महिलाओं की मृत्यु-दर काफी अधिक थी। इस मृत्यु के कारण महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कम थी। इस कम संख्या के कारण कृषक व दस्तकारी जातियों में तलाकशुदा महिलाओं व विधवाओं को पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त था। जबकि साधन-सम्पन्न परिवारों में इस तरह की प्रथा नहीं के बराबर थी। उनमें तो सती प्रथा का प्रचलन काफी अधिक था।

इससे पता चलता है कि साधन-सम्पन्न परिवारों की तुलना में सामान्य वर्ग की महिलाएँ उत्पादन प्रक्रिया में अधिक हिस्सा लेती थीं। इसलिए उनका महत्त्व भी अधिक था। यह इस बात से भी स्पष्ट होता है कि तात्कालिक स्रोतों में दहेज का वर्णन कम है जबकि ‘दुल्हन की कीमत’ का वर्णन अधिक है, अर्थात् वर पक्ष द्वारा शादी करने के लिए खर्च करना एक सामान्य बात थी। इस तरह महिला का महत्त्व परिवार की श्रम शक्ति में वृद्धि के लिए काफी माना जाता था। इस महत्त्व के कारण परिवार में महिला पर नियंत्रण रखना जरूरी समझा जाता था। यह समाज भी वर्तमान की भाँति पुरुष प्रधान समाज था। इसलिए सामाजिक तौर पर परिवार व समुदाय द्वारा महिला पर प्रतिबन्ध लगाए जाते थे। चारित्रिक दृष्टि से मात्र शक के आधार पर ही उन्हें भारी दण्डों का सामना करना पड़ता था।

4. महिलाओं द्वारा अधिकार माँगना-पश्चिमी भारत विशेषकर राजस्थान, गुजरात व महाराष्ट्र से इस तरह के स्रोत मिले हैं जिनमें महिलाओं ने अन्याय व शोषण के विरुद्ध आवाज उठाई। महिलाओं ने ग्राम पंचायत के पास प्रार्थना-पत्र भेजकर उससे न्याय व मुआवजे की माँग की है। महिलाओं द्वारा अपने पतियों की बेवफाई का विरोध भी किया गया है। इस तरह की शिकायतों में वे स्पष्ट करती हैं कि पति उनका व बच्चों का ध्यान नहीं रखता है और न ही उन्हें भरण-पोषण की चीजें उपलब्ध कराता है।

महिलाओं के प्रार्थना-पत्रों पर उनके नाम अंकित नहीं मिलते बल्कि वे अपना हवाला परिवार के मुखिया की माँ, पत्नी व बहन के रूप में देती हैं। पंचायत फैसले देते समय उनका कितना पक्ष लेती थी यह विभिन्न स्थितियों में अलग-अलग था। सामान्य तौर पर पुरुषों को पंचायतें दण्ड नहीं देती थीं। हाँ, इस बात का दबाव जरूर डालती थी कि वे परिवार की देखभाल की सही जिम्मेदारी निभाए।

5. महिला : भू-स्वामिनी के रूप में मुग़ल काल में विभिन्न स्रोतों से यह स्पष्ट है कि यह समाज पुरुष प्रधान था। वहीं कुछ साक्ष्य विशेषकर पंजाब से ऐसे भी मिले है जिनमें महिला को ज़मीन व पुश्तैनी सम्पत्ति का मालिक बताया गया है। इन स्रोतों से स्पष्ट है कि महिलाएँ अपनी सम्पत्ति व ज़मीन के क्रय-विक्रय में अपनी भूमिका निभाती थीं व सक्रिय हिस्सेदारी रखती थीं। कुछ परिवारों (हिन्दू व मुस्लिम) में ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी। वे पूरी सक्रियता के साथ अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करती थीं। उस जमींदारी में वे कृषकों, खेतिहरों व कर एकत्रित करने वाले कारिन्दों को दिशा-निर्देश देती थीं। ऐसे मामलों में वे पंचायत के फैसलों में हिस्सा लेने को छोड़कर हर तरह के कार्य करती थीं। बंगाल के कुछ साक्ष्य भी महिलाओं के कुछ स्थानों पर ज़मींदार होने की पुष्टि करते हैं। 18वीं सदी के राज्यों में भी सबसे बड़ी व मशहूर जमींदारियों का वर्णन है। उनमें भी राज-परिवार की एक महिला को सर्वप्रमुख बताया गया है।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 8 किसान, ज़मींदार और राज्य : कृषि समाज और मुगल साम्राज्य Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसके काल में हुई?
(A) अलाऊद्दीन खिलजी
(B) मुहम्मद तुगलक
(C) बाबर
(D) अकबर
उत्तर:
(B) मुहम्मद तुगलक

2. विजयनगर साम्राज्य का पहला शासक था
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(A) हरिहर राय

3. विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे
(A) हसन गंगू
(B) कृष्णदेव राय
(C) विजालय
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय
उत्तर:
(D) हरिहर राय एवं बुक्का राय

4. हम्पी के अवशेषों की जानकारी सर्वप्रथम किस व्यक्ति ने दी?
(A) जॉन मार्शल
(B) आर०जी०बैनर्जी
(C) डी०आर० साहनी
(D) कॉलिन मैकेन्जी
उत्तर:
(D) कॉलिन मैकेन्जी

5. ‘गजपति’ की उपाधि किस क्षेत्र के शासक लेते थे?
(A) विजयनगर
(B) बहमनी
(C) उड़ीसा
(D) महाराष्ट्र
उत्तर:
(C) उड़ीसा

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

6. किस हथियार के प्रयोग ने पुर्तगालियों को भारत के तटीय क्षेत्रों में शक्तिशाली बनाया?
(A) तलवार
(B) बंदूक
(C) तोपखाना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बंदूक

7. विजयनगर का पहला राजवंश था
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(A) संगम वंश

8. तालीकोटा का युद्ध कब लड़ा गया?
(A) 1526 ई० में
(B) 1556 ई० में
(C) 1565 ई० में
(D) 1576 ई० में
उत्तर:
(C) 1565 ई० में

9. विजयनगर के शासकों को कहा जाता था
(A) सुल्तान
(B) राय
(C) सम्राट
(D) महाराजा
उत्तर:
(B) राय

10. संस्कृत साहित्य में यूनानियों तथा उत्तर:पश्चिम से आने वालों को कहा गया है
(A) तुर्क
(B) मलेच्छ
(C) यवन
(D) मंगोल
उत्तर:
(C) यवन

11. विजयनगर साम्राज्य में स्थानीय सैनिक प्रमुखों को कहा जाता था
(A) नायक
(B) विजेता
(C) कुलीन
(D) शहजादा
उत्तर:
(A) नायक

12. 15वीं शताब्दी के प्रारंभ में विजयनगर में किस जलाशय का निर्माण किया गया?
(A) कमल पुरम
(B) शाही जलाशय
(C) विरुपाक्ष
(D) हम्पी जलाशय
उत्तर:
(A) कमल पुरम

13. अब्दुर रज्जाक ने विजयनगर में दुर्गों की कितनी पंक्तियाँ बताई हैं?
(A) 5
(B) 7
(C) 8
(D) 10
उत्तर:
(B) 7

14. शहरी क्षेत्र विजयनगर साम्राज्य में कहाँ स्थित था?
(A) पूर्व में
(B) पश्चिम में
(C) मध्य में
(D) उत्तर:पूर्व में
उत्तर:
(D) उत्तर:पूर्व में

15. डोमिंगो पेस द्वारा ‘विजय का भवन’ किसे कहा गया है?
(A) अस्तबल क्षेत्र को
(B) शाही महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) धार्मिक स्थल को
उत्तर:
(C) महानवमी डिब्बे को

16. हम्पी का नाम किस स्थानीय देवी-देवता से माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष से
(B) विठ्ठल से
(C) पम्पा देवी से
(D) विष्णु से
उत्तर:
(C) पम्पा देवी से

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

17. मंदिरों का प्रवेश द्वार कहलाता था
(A) देव द्वार
(B) शाही द्वार
(C) नगरालय
(D) गोपुरम्
उत्तर:
(D) गोपुरम्

18. धार्मिक केंद्र में सबसे ऊँची इमारत होती थी
(A) गोपुरम्
(B) गर्भ गृह
(C) मंडप
(D) देव स्थल
उत्तर:
(A) गोपुरम्

19. विजयनगर में सबसे बड़ा मंदिर था
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विठ्ठल का
(D) जिन्जी का
उत्तर:
(A) विरुपाक्ष का

20. रथ की आकृति वाला मंदिर किस देवता का माना जाता है?
(A) विरुपाक्ष का
(B) विष्णु का
(C) विट्ठल का
(D) पम्पा देवी का
उत्तर:
(C) विठ्ठल का

21. नायकों द्वारा विजयनगर साम्राज्य में कहाँ गोपुरम् बनवाया गया था?
(A) हम्पी में
(B) मदुरई में
(C) धार्मिक केंद्र में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) मदुरई में

22. विजयनगर की खुदाई में मुख्य रूप से शामिल थे
(A) जॉन एम० फ्रिटज
(B) जॉर्ज मिशेल
(C) एम०एस० नागराज
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

23. बाजार का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है
(A) अब्दुर रज्जाक ने
(B) डोमिंगो पेस ने
(C) वास्कोडिगामा ने
(D) बरबोसा ने
उत्तर:
(B) डोमिंगो पेस ने

24. विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक माना जाता है
(A) हरिहर राय
(B) बुक्का राय
(C) कृष्णदेव राय
(D) देवराय प्रथम
उत्तर:
(C) कृष्णदेव राय

25. विजयनगर का समकालीन दक्षिण भारतीय राज्य कौन-सा था?
(A) वारंगल
(B) काकतिया
(C) चोल
(D) बहमनी
उत्तर:
(D) बहमनी

26. किस मुगल शासक ने विजयनगर के शासक कृष्णदेव राय का वर्णन किया है?
(A) बाबर ने
(B) अकबर ने
(C) जहांगीर ने
(D) शाहजहाँ ने
उत्तर:
(A) बाबर ने

27. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
(A) 1320 ई० में
(B) 1336 ई० में
(C) 1350 ई० में
(D) 1380 ई० में
उत्तर:
(B) 1336 ई० में

28. ‘हम्पी’ क्षेत्र में साम्राज्य होने की बात सबसे पहले कब सामने आई?
(A) 1800 ई० में
(B) 1850 ई० में
(C) 1920-21 ई० में
(D) 1956 ई० में
उत्तर:
(A) 1800 ई० में

29. विजयनगर का वर्तमान नाम है
(A) हम्पी
(B) विजयनगर
(C) विजयवाड़ा
(D) बीजापुर
उत्तर:
(A) हम्पी

30. विजयनगर साम्राज्य काल में घोड़ों के व्यापारियों को कहा जाता था
(A) नगर सेठ
(B) तवरम
(C) अश्वपालक
(D) कुदिरई चेट्टी
उत्तर:
(D) कुदिरई चेट्टी

31. भारत में बंदूक लाने का श्रेय दिया जाता है
(A) अंग्रेज़ों को
(B) फ्रांसीसियों को
(C) पुर्तगालियों को
(D) डचों को
उत्तर:
(C) पुर्तगालियों को

32. विजयनगर साम्राज्य का अन्तिम राजवंश कौन-सा था?
(A) संगम वंश
(B) सुलुव वंश
(C) तुलुव वंश
(D) अराविदु वंश
उत्तर:
(C) तुलुव वंश

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

33. तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की सेना का नेतृत्व किसने किया?
(A) हरिहर ने
(B) बुक्का राय ने
(C) कृष्णदेव राय ने
(D) राम राय ने
उत्तर:
(D) राम राय ने

34. 1565 ई० में युद्ध तालीकोटा के किस क्षेत्र में हुआ?
(A) राक्षसी-तांगड़ी में
(B) चन्द्रगिरी में
(C) पेनुकोण्डा में
(D) गोलकुण्डा में
उत्तर:
(A) राक्षसी-तांगड़ी में

35. तालीकोटा की हार के बाद विजयनगर के शासकों ने अपनी राजधानी बनाई
(A) विजयनगर
(B) पेनुकोण्डा
(C) गोलकुण्डा
(D) मैसूर
उत्तर:
(B) पेनुकोण्डा

36. कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या सुलझाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका थी
(A) मुगल शासकों की
(B) विजयनगर के दरबारियों की
(C) बीजापुर के सुल्तान की
(D) जनता की
उत्तर:
(C) बीजापुर के सुल्तान की

37. सैनिक प्रमुख के साथ-साथ प्रशासनिक कार्य करने वाले वर्ग को विजयनगर में क्या नाम दिया जाता था?
(A) राय
(B) अमीर
(C) नायक
(D) अमर-नायक
उत्तर:
(D) अमर-नायक

38. तुंगभद्रा नदी विजयनगर से किस दिशा में थी?
(A) दक्षिण
(B) दक्षिण पूर्व
(C) पश्चिम
(D) उत्तर पूर्व
उत्तर:
(D) उत्तर पूर्व

39. कालीकट का वर्तमान नाम है
(A) कोजीकोड
(B) मालाबर
(C) त्रिअनन्तपुरम
(D) कोलकट्यम
उत्तर:
(A) कोजीकोड

40. विजयनगर के शासक जल प्रबंधन करते थे
(A) राजकीय क्षेत्र के लिए
(B) धार्मिक केंद्र के लिए
(C) कृषि क्षेत्र के लिए
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

41. सुरक्षा दृष्टि से विजयनगर का आश्चर्यजनक पहलू है
(A) मन्दिरों की बेजोड़ सुरक्षा
(B) शाही क्षेत्र की किलेबंदी
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी
(D) हथियारों में बंदूक का प्रयोग
उत्तर:
(C) कृषि क्षेत्र की किलेबंदी

42. “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं” ये पंक्तियां किस यात्री ने लिखीं?
(A) डोमिंगो पेस मे
(B) बरबोसा ने
(C) अब्दुर रज्जाक ने
(D) नूनिज़ ने
उत्तर:
(B) बरबोसा ने

43. 11000 वर्ग फीट के आधार पर 40 फीट ऊँचे विशाल मंच को पुरातत्वविदों ने क्या नाम दिया है?
(A) महानवमी डिब्बा
(B) शाही केंद्र
(C) कल्याण मंडप
(D) सिंहासन मंडप
उत्तर:
(A) महानवमी डिब्बा

44. राजकीय केंद्र में सबसे सुन्दर भवन किसे माना जाता है?
(A) हजार राम मन्दिर को
(B) कमल महल को
(C) महानवमी डिब्बे को
(D) कल्याण मंडप को
उत्तर:
(B) कमल महल को

45. कमल भवन के नजदीक बहुत बड़ी संख्या में किस पशु की रख-रखाव की व्यवस्था विजयनगर के शासकों ने की?
(A) हाथी
(B) घोड़ा
(C) ऊँट
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) हाथी

46. धार्मिक केंद्र में लोगों की श्रद्धा सबसे अधिक किस मन्दिर में थी?
(A) विठ्ठल
(B) विरुपाक्ष
(C) चन्नकेशव
(D) वृहदेश्वर
उत्तर:
(B) विरुपाक्ष

47. विरुपाक्ष मन्दिर का कौन-सा प्रवेश द्वार सबसे ऊँचा, भव्य व मुख्य है?
(A) पूर्वी
(B) पश्चिमी
(C) उत्तरी
(D) दक्षिणी
उत्तर:
(A) पूर्वी

48. विट्ठल देवता का संबंध किस देवता के साथ जोड़ा जाता है?
(A) सूर्य के साथ
(B) शिव के साथ
(C) विष्णु के साथ
(D) जगन्नाथ के साथ
उत्तर:
(C) विष्णु के साथ

49. हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व स्थल कब घोषित किया गया?
(A) 1952 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(C) 1976 ई० में

50. यूनेस्को द्वारा हम्पी को विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
(A) 1960 ई० में
(B) 1968 ई० में
(C) 1976 ई० में
(D) 1986 ई० में
उत्तर:
(D) 1986 ई० में

51. वर्तमान में हम्पी को कौन संरक्षित कर रहा है?
(A) भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग
(B) कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किसने की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना हरिहर एवं बुक्का ने की।

प्रश्न 2.
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना कब हुई?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ई० में हुई।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 3.
विजयनगर के शासकों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों को राय कहा जाता था।

प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका किस घटना की मानी जाती है?
उत्तर:
विजयनगर के पतन में सबसे अधिक भूमिका तालीकोटा के युद्ध की मानी जाती है।

प्रश्न 5.
विजयनगर साम्राज्य में इटली के किस यात्री ने यात्रा की?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में इटली के अब्दुर रज्जाक ने यात्रा की।

प्रश्न 6.
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन किसने किया?
उत्तर:
विजयनगर शहर का सबसे अधिक वर्णन डोमिंगो पेस ने किया।

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच क्या कहलाता था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शाही केंद्र पर बना विशाल मंच ‘महानवमी डिब्बा’ कहलाता था।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
विजयनगर शहर में ‘कमल महल’ के नजदीक बड़ा भवन हाथियों का अस्तबल के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9.
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर किस देवता का था?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में सबसे महत्त्वपूर्ण मंदिर विरुपाक्ष देवता का था।

प्रश्न 10.
महाराष्ट्र में किस देवता को ‘विट्ठल देव’ कहा जाता था?
उत्तर:
महाराष्ट्र में विष्णु को ‘विठ्ठल देव’ कहा जाता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ किस देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है?
उत्तर:
विजयनगर में विरुपाक्ष के साथ पम्पा देवी का विवाह उत्सव प्रतिवर्ष मनाया जाता है।

प्रश्न 12.
विजयनगर के मानचित्र में किस अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है?
उत्तर:
विजयनगर के मानचित्र में I (आई) अंग्रेजी वर्ण को प्रयोग में नहीं लाया गया है।

प्रश्न 13.
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में कब शामिल किया गया?
उत्तर:
‘हम्पी’ शहर को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत में सन् 1986 में शामिल किया गया।

प्रश्न 14.
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर कौन बताता है?
उत्तर:
विजयनगर को विश्व का सबसे समृद्ध शहर डोमिंगो पेस बताता है।

प्रश्न 15.
विजयनगर का क्या अर्थ है?
उत्तर:
विजयनगर का अर्थ है-विजय का शहर।

प्रश्न 16.
कॉलिन मैकेन्ज़ी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी किससे मिली?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी को विजयनगर की प्रारम्भिक जानकारी विरुपाक्ष व पम्पा देवी के पुजारियों से मिली।

प्रश्न 17.
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर कब बना?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्ज़ी भारत का सर्वेयिर 1815 ई० में बना।

प्रश्न 18.
दक्षिण (बहमनी) के शासक क्या कहलाते थे?
उत्तर:
दक्षिण (बहमनी) के शासक सुल्तान कहलाते थे।

प्रश्न 19.
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर किस देवता से जुड़ा है?
उत्तर:
तंजावुर का ऐतिहासिक मन्दिर बृहदेश्वर देवता से जुड़ा है।

प्रश्न 20.
कुदिरई चेट्टी कौन थे?
उत्तर:
कुदिरई चेट्टी घोड़ों के व्यापारी थे।

प्रश्न 21.
विजयनगर साम्राज्य के प्रथम राजवंश का नाम बताइए।
उत्तर:
विजयनगर का पहला वंश संगम वंश था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 22.
कृष्णदेव राय किस वंश से संबंधित था?
उत्तर:
कृष्णदेव राय तुलुव वंश से संबंधित था।

प्रश्न 23.
विजयनगर का अंतिम वंश कौन-सा था?
उत्तर:
विजयनगर का अंतिम वंश अराविदु वंश था।

प्रश्न 24.
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान किसने करवाया?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में उत्तराधिकार की समस्या का समाधान बीजापुर के सुल्तान ने करवाया।

प्रश्न 25.
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन किस यात्री ने दिया है?
उत्तर:
कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय बनवाने का वर्णन डोमिंगो पेस ने दिया है।

प्रश्न 26.
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने क्या नाम दिया है?
उत्तर:
नगर में प्रवेश के लिए बने प्रवेश द्वारों की स्थापत्य कला को विशेषज्ञों ने इंडो-इस्लामिक नाम दिया है।

प्रश्न 27.
राजकीय केंद्र में लगभग कितने मन्दिर थे?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में लगभग 60 से अधिक मन्दिर थे।

प्रश्न 28.
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर कौन-सा है?
उत्तर:
राजकीय केंद्र में सबसे भव्य मन्दिर हजारराम मन्दिर है।

प्रश्न 29.
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत कौन-सी बनाई जाती थी?
उत्तर:
विजयनगर के शासकों द्वारा सबसे अधिक ऊँची इमारत गोपुरम् बनाई जाती थी।

प्रश्न 30.
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल 1976 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 31.
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल कब घोषित किया गया?
उत्तर:
हम्पी को विश्व पुरातत्व स्थल 1986 ई० में घोषित किया गया।

प्रश्न 32.
‘विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं, यह बात किसने कही?
उत्तर:
विजयनगर में आप हर वस्तु पा सकते हैं’ यह बात यात्री डोमिंगो पेस ने कही।

प्रश्न 33.
‘गजपति’ का क्या अर्थ है?
उत्तर:
‘गजपति’ का अर्थ हाथियों का स्वामी है।

प्रश्न 34.
विजयनगर के शासक कौन-सी उपाधि धारण करते थे?
उत्तर:
विजयनगर के शासक ‘हिन्दू सूरतराणा’ की उपाधि धारण करते थे।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य की खोज में कॉलिन मैकेन्ज़ी की क्या भूमिका है?
उत्तर:
कॉलिन मैकेन्जी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी में अभियंता व पुरातत्वविद था। उसने विरुपाक्ष तथा पम्पा देवी के मंदिरों के पुजारियों से जानकारी प्राप्त की। उसने विजयनगर के क्षेत्र का सर्वेक्षण करवाया तथा रिपोर्ट प्रकाशित की। उसने इसके बाद इस क्षेत्र का मानचित्र भी तैयार करवाया। उसकी रिपोर्ट व मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया जिसके फलस्वरूप विजयनगर की खोज हुई।

प्रश्न 2.
अमर-नायक कौन थे? उनके क्या कार्य थे?
उत्तर:
अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 5.
विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था की चर्चा करें।
उत्तर:
विजयनगर में आवास क्षेत्र शहर के किलेबन्द क्षेत्र में था। सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं थी। शहर में विभिन्न धर्मों के लोग अलग-अलग क्षेत्रों में रहते थे। इस शहर के उत्तर:पूर्व क्षेत्र में साधन-सम्पन्न वर्ग के लोग रहते थे।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य के शाही स्थल की जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

प्रश्न 7.
मंदिरों के मंडपों के प्रकार व महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मंदिरों के अंदर विभिन्न तरह के मंडप होते थे। जिनकी पहचान, उत्सव व अनुष्ठान के आधार पर की जाती थी। ताजपोशी तथा शादी उत्सव का मंडप बड़े सभागार में होता था। समाज के कार्यक्रमों व सामान्य अवसरों की परंपराओं, विवाह, दान, सामाजिक कार्यों सभा इत्यादि के लिए मंडप अलग होते थे। कुछ मंडप धार्मिक केंद्र के बाह्य क्षेत्र में भी थे।

प्रश्न 8.
विजयनगर शहर की खुदाई का नेतृत्व किन-किन लोगों द्वारा किया गया?
उत्तर:
विजयनगर के उत्खनन (खुदाई) कार्य को करने वाले जॉन एम. फ्रिट्ज (John M. Fritz), जॉर्ज मिशेल (George Michell) तथा एम.एस. नागराज राव (M.S. Nagraja Rao) थे जो प्रारंभ से अंत तक खुदाई के कार्य से जुड़े रहे। इन्होंने पत्थरों की बीच की जगह, दरवाजों के छज्जों तथा मीनारों के बीच के विभिन्न बिन्दुओं की कल्पना की। .

प्रश्न 9.
डोमिंगो पेस विजयनगर शहर का वर्णन किस तरह करता है?
उत्तर:
डोमिंगो एक विदेशी यात्री था। उसने 16वीं शताब्दी में विजयनगर की यात्रा की। उसने शहर की बनावट, सड़कों व गलियों को बहुत अच्छा बताया। उसने विजयनगर के बाजार के बारे में लिखा कि यहाँ प्रत्येक वस्तु मिलती थी; जैसे कि अनाज, बहुमूल्य धातुएं तथा मोम इत्यादि।

प्रश्न 10.
विजयनगर शहर में कृषि क्षेत्र की किलेबंदी के लाभ व हानियाँ बताएँ।
उत्तर:
विजयनगर के खेतों को किलेबन्दी में लेने का सबसे बड़ा लाभ यह था कि लोगों के साथ-साथ फसलों की भी सुरक्षा हो जाती थी। इससे युद्ध काल में खाद्यान्न का संकट नहीं आता था। लेकिन इस व्यवस्था का दोष यह था कि यह महँगी थी। दूर-दराज तक के क्षेत्रों को किलेबन्दी में काफी खर्च करना पड़ता था।

प्रश्न 11.
विजयनगर के बाजार में मिलने वाली चीज़ों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर का बाजार उपयोगी वस्तुओं की दृष्टि से काफी समृद्ध था। इसमें अनाज, दालें विभिन्न तरह के फल व सब्जियाँ, मांस तथा पशु-पक्षी मिलते थे। विभिन्न तरह के आभूषण, कपड़ा तथा अश्व भी यहाँ मिलते थे।

प्रश्न 12.
विजयनगर के हाथियों के अस्तबल के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा था। यह कमल महल के समीप था। इतने बड़े अस्तबल को देखकर यह अनुमान लगाया जाना सरल है कि रायों की सेना में हाथियों की संख्या काफी थी।

प्रश्न 13.
विजयनगर साम्राज्य में शासकों व व्यापारियों के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को शासकों द्वारा संरक्षण दिया गया था। व्यापारी साम्राज्य के लिए अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ से ही राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए। 1498 ई० में पुर्तगालियों के भारत के पश्चिमी तट पर आने के बाद इन्होंने व्यापारिक प्रतिस्पर्धा में भाग लिया।
IMG
विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इसके कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी।

प्रश्न 14.
कृष्णदेव राय के व्यापार व व्यापारियों के बारे में क्या विचार थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक था। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। इस पुस्तक में उसने व्यापारियों के बारे में लिखा–“एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात हो सके। उसके अनुसार शासक को रोज बैठक में बुलाकर, व्यापारियों को तोहफे देकर तथा उचित मुनाफे की स्वीकृति देकर उन्हें अपने साथ जोड़ना चाहिए।

कृष्णदेव राय के इस चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर, व्यापार को बढ़ावा देना चाहता था।

प्रश्न 15.
हरिहर व बुक्का राय के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
हरिहर व बुक्का राय विजयनगर साम्राज्य के संस्थापक थे। उन्होंने 1336 ई० में इसकी स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का राय (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई।

प्रश्न 16.
विजयनगर का पतन कैसे हुआ?
अथवा विजयनगर साम्राज्य के पतन के क्या कारण थे?
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। इस तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की, जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया।

प्रश्न 17.
विजयनगर साम्राज्य में नायक कौन थे? उनकी गतिविधियाँ क्या थीं?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत सेना प्रमुखों को नायक कहा जाता था। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे।

प्रश्न 18.
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले प्रमुख यात्री कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
विजयनगर शहर का वृत्तांत देने वाले यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफानासी निकितिन (Afanaci Niktian), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) है। इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 19.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी?
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य के रायों ने सुरक्षा व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया। नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी। फारस का दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। उसके अनुसार इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी थी।

प्रश्न 20.
विजयनगर में सड़कों की व्यवस्था की संक्षिप्त जानकारी दें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने सड़कों को विशेष महत्त्व दिया। विजयनगर की चारदीवारी के अंदर प्रवेश करने के लिए प्रवेश द्वार थे। ये सुरक्षित तो थे ही साथ में स्थापत्य कला की दृष्टि से भी विशेष थे। प्रत्येक प्रकार की दीवार पर अलग-अलग स्थापत्य कला से प्रवेश द्वार बने थे। किलेबंद बस्ती के प्रवेश द्वार पर मेहराब थी जिसके ऊपर गुंबद था। कला इतिहासकार इसे तुर्की प्रभाव का होने के कारण इंडो-इस्लामिक (हिंद-इस्लामी) संस्कृति बताते हैं। प्रवेश द्वार से होकर आंतरिक भाग तक पक्की सड़कें थीं। ये सड़कें पहाड़ी व मैदानी दोनों क्षेत्रों में थीं। नगरीय क्षेत्र, धार्मिक व राजकीय क्षेत्र को सड़कों से जोड़ा गया था। इन सड़कों के दोनों ओर बाजार थे। मंदिरों के प्रवेश द्वारों के साथ सड़कों की चौड़ाई थोड़ी अधिक होती थी। सड़कों को पत्थरों द्वारा पक्का किया गया था।

प्रश्न 21.
शाही केंद्र में कौन-कौन से प्रमुख भवन थे?
उत्तर:
शाही केंद्र में शाही महल केंद्र था। विभिन्न अनुष्ठानों का आयोजन स्थल महानवमी डिब्बा भी इसी क्षेत्र में था। सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है। इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल भवन बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

प्रश्न 22.
विजयनगर शहर के धार्मिक केंद्र के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विजयनगर के राय शासकों ने कई मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। एक स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है।

बरबोसा का उल्लेख
बरबोसा ने विजयनगर की प्रजा के धर्म संबंधी आचरण को लिखा है। प्रस्तुत है उसका एक अंश “राजा ने उन्हें इतनी स्वतंत्रता दी है कि प्रत्येक व्यक्ति  अपने उपासना स्थल, पर आ-जा सके और बिना कोई परेशानी झेले अपने धर्म का पालन कर सके। चाहे वह ईसाई हो या यहूदी मूर हो या कोई अन्य। न केवल शासक बल्कि लोग भी एक दूसरे के साथ बराबरी व न्याय का बर्ताव रखते थे।”

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस  बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के | लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का |  प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं।

प्रश्न 23.
गोपुरम् क्या थे? इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मंदिर के प्रवेश द्वार को गोपुरम् या राजकीय प्रवेश द्वार कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है। इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था।

प्रश्न 24. विरुपाक्ष मन्दिर का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
विरुपाक्ष स्थानीय परंपराओं के अनुरूप शिव के रूप में सबसे महत्त्वपूर्ण देवता था। इस मंदिर का देवस्थल, वर्गाकार था तथा दो प्रवेश द्वार थे। मंदिर का अपना एक जलाशय था। मंदिर में दो बड़े सभागार व मंडप थे जिनको स्तंभों वाले बरामदे से जोड़ा गया था। इस मंदिर का मंडप कृष्णदेव राय के द्वारा राज्यरोहण के अवसर पर बनाया गया था। इसके स्तंभों पर चित्रों को विशेष कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया था। मंदिर का देवालय बीच में था। भले ही वह छोटे से क्षेत्र में था लेकिन आस्था व उपासना की दृष्टि से यही सबसे महत्त्वपूर्ण था क्योंकि यह मंदिर का गर्भ गृह था तथा देवता की परंपरागत मूर्ति भी यहीं थी। .

प्रश्न 25.
विट्ठल मन्दिर के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
विट्ठल महाराष्ट्र क्षेत्र में विष्णु के रूप में पूजे जाते थे। महाराष्ट्र के बाद यह देवता कर्नाटक में भी लोकप्रिय हुआ। यह मंदिर सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक था। इसमें भी सभागार, मंडप व देवालय था। इसकी विशेष महत्ता इसका स्थापत्य था। यह मंदिर रथ के आकार पर आधारित था।

प्रश्न 26.
मन्दिर क्षेत्र में सभागार की क्या भूमिका थी?
उत्तर:
मंदिर में सर्वाधिक प्रयोग स्थल सभागार थे। सभागार का आकार उसकी मान्यता व आवश्यकता के अनुरूप था। इन सभागारों में संगीत, नृत्य व नाटक इत्यादि के कार्यक्रम चलते रहते थे। देवताओं की मूर्तियों को स्थापना के समय या विशेष उत्सवों पर बाहर नहीं लाया जाता था। देवी-देवताओं के विवाह उत्सव के अवसर पर सभागारों की छटा बेहद सुंदर होती थी। देवी-देवताओं के सार्वजनिक दर्शन तथा झूला इत्यादि झुलाने के लिए विशिष्ट मूर्तियों का प्रयोग होता था।

प्रश्न 27.
हम्पी का खनन मानचित्र कैसे तैयार किया गया?
उत्तर:
सर्वप्रथम पूरे हम्पी क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें I (आई) शब्द का प्रयोग नहीं किया गया फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया। फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

प्रश्न 28.
हम्पी की खनन प्रक्रिया से हमें किस-किस चीज की जानकारी मिल पाई?
उत्तर:
हम्पी की खनन प्रक्रिया द्वारा हम विजयनगर साम्राज्य के युग को समझ सके। इस क्रिया में हम विभिन्न भवनों, मार्गों, क्षेत्रों व जलाशयों के बारे में जानकारी भी ले सके। स्थापत्य कला तथा उसकी विभिन्न शैली तक भी पहुँच सके। इन भवनों के उद्देश्य तथा सांस्कृतिक महत्त्व के साथ-साथ हम निर्माणकर्ताओं की सोच इत्यादि के बारे में भी अनुमान लगा पाए। साम्राज्य की राजधानी की किलेबंदी तथा प्रतिरक्षा के बारे में भी काफी हद तक हमारी समझ बनी है। शासक तथा नायक वर्ग की विभिन्न चीजें व भवनों के आधार पर उनकी जीवन-शैली का अनुमान लगाया जा सका।

प्रश्न 29.
विजयनगर की जानकारी हेतु अभी किन-किन प्रश्नों का जवाब ढूँढ़ना बाकी है?
उत्तर:
विजयनगर की अभी तक शाही परिवार व भवनों के बारे में मिली जानकारी द्वारा हम उस स्थान पर बसे लोगों, उनके आपसी संबंधों, बच्चों के जीवन तथा उनकी गतिविधियों को नहीं जान पाए हैं, शहरी केंद्र के आस-पास ग्रामीण क्षेत्रों व इनके आपसी संबंधों को समझना अभी बाकी है। भवनों को बनाने वाले विशेषज्ञों की सोच, उनकी दैनिक मजदूरी व समाज में उनका स्थान, की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं है। भवन निर्माण में उनका साथ देने वाले कारीगर, राजगीर, पत्थर काटने वाले व्यक्तियों की जानकारी भी हमारे पास नहीं है, मजदूर, निर्माण सामग्री का स्थल, यातायात व संचार के मुख्य साधन इत्यादि अनेक पक्ष ऐसे हैं जिनकी जानकारी अभी अधूरी है।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर की खोज पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर का नाम वर्तमान में हम्पी है जो दक्षिण के एक ऐतिहासिक साम्राज्य विजयनगर की धरोहर से समृद्ध था। परन्तु समय बीतने के साथ यह विस्मृति के गर्भ में चला गया। कंपनी के एक अभियंता कॉलिन मैकेन्जी ने एक प्राचीन स्थल के बारे में खोज-बीन शुरू की। वहाँ पर विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के दो प्राचीन मंदिर थे। इन्हीं मंदिरों के पुजारियों से उसे इस स्थान के बारे में जानकारी प्राप्त हुई जिसके आधार पर उसने विस्तृत सर्वेक्षण करवाया और उसकी रिपोर्ट को प्रकाशित किया। उसने इस क्षेत्र का प्रथम मानचित्र तैयार किया। उसकी हम्पी संबंधी रिपोर्ट और मानचित्र ने इतिहासकारों को आकर्षित किया। इस क्षेत्र की खोज के प्रति उनका रुझान बढ़ गया। 1836 ई० में पुरातत्वविदों व अभिलेखज्ञाताओं ने इस क्षेत्र (हम्पी) के मंदिरों तथा अन्य स्थानों से अभिलेख एकत्रित किए। सन् 1856 में छाया चित्रकारों ने यहाँ के भवनों के चित्र संकलित करने आरंभ किए। इस प्रकार परत-दर-परत विस्मृत नगर सामने आने लगे। इतिहासकारों ने उपलब्ध पुरातात्विक सामग्री तथा यात्रियों के वृत्तांत और स्थानीय साहित्य (तेलुगु, तमिल, कन्नड़ व संस्कृत में) के आधार पर इस नगर के इतिहास का पुनर्निर्माण किया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 6

प्रश्न 2.
विजयनगर के शासकों व व्यापारियों के बीच संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों के व्यापारियों से संबध काफी अच्छे थे। इस साम्राज्य को संपन्न बनाने में व्यापारी वर्ग ने अपना योगदान दिया। इन व्यापारियों को रायों द्वारा संरक्षण दिया गया था। रायों की सफलता में अश्व सेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। इनके अश्व अरब व मध्य-एशिया से आते थे। प्रारंभ में राय अश्वों के लिए अरब व्यापारियों पर निर्भर थे। परंतु समय के साथ-साथ यहाँ कुदिरई चेट्टी (घोड़ों के व्यापारियों) का वर्ग पैदा हो गया। इन्होंने राज्य को पर्याप्त मात्रा में घोड़े उपलब्ध करवाए।

विजयनगर मसालों, रत्नों एवं आभूषणों (रत्नों) के बाजार व व्यापार के लिए जाना जाता था। यहाँ की जनता की समृद्धि का ज्ञान उनकी जीवन-शैली, विदेशी वस्तुओं की माँग तथा रत्न व आभूषणों से होता था। इस जीवन-शैली व माँग के कारण व्यापारी लगातार उन्नति के मार्ग पर थे। इसके साथ ही राज्य के राजस्व में भी निरंतर वृद्धि हो रही थी। कृष्णदेव राय विजयनगर का सबसे प्रतापी शासक कहा जाता है। उसने तेलुगु भाषा में ‘अमुक्त मल्यद’ नामक पुस्तक लिखी। कृष्णदेव राय के चिन्तन से पता चलता है कि राय व्यापारियों को किस तरह प्रोत्साहित कर व्यापार को बढ़ावा देना चाहते थे।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 3.
कृष्णदेव राय का विजयनगर साम्राज्य के विकास में क्या योगदान था?
उत्तर:
1336 ई० में हरिहर व बुक्का राय दो भाइयों ने विजयनगर साम्राज्य की स्थापना की। इस साम्राज्य का प्रथम शासक हरिहर (1336-56) बना तथा उसने राज्य के लिए नियम कानून बनाए। उसकी मृत्यु के पश्चात् बुक्का (1356-1377) शासक बना। उसने प्रशासन व राज्य की समृद्धि की ओर ध्यान दिया। उसके समय में ही पड़ोसी राज्य बहमनी के साथ संघर्ष की शुरुआत हुई। उसके पश्चात् हरिहर द्वितीय (1377-1405) तथा देवराय प्रथम (1406-22) शासक बने। इन्होंने बहमनी से संघर्ष जारी रखा। साथ ही आर्थिक विकास, कृषि व व्यापार को भी प्रोत्साहन दिया। उनके बाद देवराय द्वितीय (1422-46) शासक बना। उसने इस साम्राज्य की सीमा का खूब विस्तार किया। फारसी यात्री अब्दुर रज्जाक ने उसकी खुले मन से प्रशंसा की है।

इसके बाद इस साम्राज्य में कई कमजोर शासक आए जिनको बहमनी के शासकों ने पराजित कर इनकी सीमा को छोटा कर दिया। विजयनगर अपने चरमोत्कर्ष पर कृष्णदेव राय (1509-29) के शासन काल में पहुँचा। उसने सुलुवों के राज्य को नष्ट कर सत्ता पर अधिकार कर लिया। उसने 1512 ई० में तुंगभद्रा व कृष्णा नदियों के बीच के क्षेत्र रायचूर, दोआब, 1514 ई० में उड़ीसा तथा 1520 ई० में बीजापुर के शासक को पराजित कर साम्राज्य का विस्तार किया। साथ ही उसने आंतरिक दृष्टि से भी राज्य को सुदृढ़ किया। उसका काल शांति, समृद्धि तथा मंदिरों के निर्माण के लिए जाना जाता है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 7

प्रश्न 4.
विजयनगर के पतन की स्थितियों को अपने शब्दों में लिखें। ,
उत्तर:
कृष्णदेव राय की मृत्यु के बाद विजयनगर में दरबारी तनाव, गुटबंदी व षड्यंत्रों की शुरुआत हो गई। कृष्णदेव राय के उत्तराधिकारियों को दरबारियों तथा सेनापतियों से चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1542 ई० में विजयनगर साम्राज्य का एक हिस्सा अराविदु वंश के हाथों में आ गया। उन्होंने पेनुकोण्डा को राजधानी बनाया। बाद में उन्होंने राजधानी चन्द्रगिरी (तिरुपति के पास) से 17वीं शताब्दी तक शासन किया। दक्षिण में कई नई शक्तियाँ भी उभरीं जिन्होंने विजयनगर के राजनैतिक समीकरण को काफी कमजोर किया।

अन्ततः बहमनी साम्राज्य के तीन राज्यों-बीजापुर, अहमदनगर व गोलकुण्डा की संयुक्त सेना ने 1565 ई० में विजयनगर पर आक्रमण किया। विजयनगर का नेतृत्व रामराय ने किया। यह युद्ध तालीकोटा (वास्तव में राक्षसी-तांगड़ी क्षेत्र) में हुआ। इस युद्ध में विजयनगर की हार हुई तथा विजयी सेना ने विजयनगर शहर में भारी लूटमार की। जिससे यह क्षेत्र पूरी तरह उजड़ गया तथा अराविदु वंश नाम-मात्र के लिए पेनुकोण्डा व चन्द्रगिरी से शासन चलाता रहा।
अतः विजयनगर के पतन का मुख्य कारण बहमनी राज्यों से उसकी हार थी।

प्रश्न 5.
विजयनगर के राय, नायकों व अमर-नायकों के आपसी संबंधों का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे।

इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था।

प्रश्न 6.
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी कौन-सी थी? उसका वृत्तांत किन यात्रियों ने दिया है? किसी एक का वर्णन करें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की राजधानी स्वयं विजयनगर शहर था। इसकी संरचना व स्थापत्य कला की दृष्टि से यह महत्त्वपूर्ण शहर था। यह शहर वे सारी विशेषताएँ रखता था जो किसी भी शक्तिशाली राज्य की राजधानी की जरूरत होती थी। इस शहर के मन्दिर, भवन तथा अन्य अवशेष व्यापक रूप में मिले हैं। नायक व अमर-नायकों के अभिलेख तथा यात्रियों का वृत्तांत ने शहर के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। 15वीं शताब्दी के यात्रियों में इटली के निकोलो दे कॉन्ती (Nicolo-De-Konti), फारस के अब्दुर रज्जाक (Abdur Razak) तथा रूस के अफ़ानासी निकितिन (Afanaci Niktian) मुख्य हैं। 16वीं शताब्दी के यात्रियों में दुआर्ते बरबोसा (Duarate Barbosa), डोमिंगो पेस (Domingo Pesh) तथा पुर्तगाल के फर्नावो नूनिज़ (Fernao Nuniz) के नाम आते हैं।

इन सभी ने इस शहर में प्रवास किया तथा अलग-अलग पक्षों की जानकारी दी। उदाहरण के लिए डोमिंगो पेस के वृत्तांत को दिया जा सकता है। उसके अनुसार, “इस शहर का परिमाप मैं यहाँ लिख नहीं रहा हूँ, क्योंकि यह एक स्थान से पूरी तरह नहीं देखा जा सकता, पर मैं एक पहाड़ पर चढ़ा जहाँ से मैं इसका एक बड़ा भाग देख पाया। मैं इसे पूरी तरह नहीं देख पाया, क्योंकि यह कई पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ और देखने में अत्यंत सुन्दर। इसमें पेड़ों के कई उपवन हैं। आवासों के बगीचों में तथा पानी की कई नालियाँ जो इसमें आती हैं। इसमें कई स्थानों पर झीलें भी हैं तथा राजा के महल के समीप ही खजूर के पेड़ों का बगीचा तथा अन्य फल प्रदान करने वाले वृक्ष थे।”

प्रश्न 7.
विजयनगर साम्राज्य की जल आवश्यकताओं को किस प्रकार पूरा किया जाता था?
उत्तर:
विजयनगर में जल प्रबंधन की एक निश्चित योजना थी। इस ओर शासकों ने विशेष ध्यान दिया। विजयनगर प्राकृतिक दृष्टि से पहाड़ियों के बीच था। इसके उत्तर:पूर्व में तुंगभद्रा नदी बहती थी। पहाड़ियों की जल धाराओं से यहाँ एक प्राकृतिक कुण्ड बना है। वहाँ पर शासकों ने बाँधों (जलाशयों) का निर्माण किया। इन बाँधों से पानी लेकर बड़े-बड़े कुण्डों में एकत्रित किया जाता था। इस क्षेत्र में आज भी कमलपुरम् नामक एक जलाशय है जिसका निर्माण 15वीं सदी में किया गया था। इन जलाशयों से कृषि में सिंचाई की जरूरत को पूरा किया।

इसके साथ ही शासकों द्वारा नहर के माध्यम से इस जलाशय का पानी शहर के मुख्य हिस्से ‘राजकीय केंद्र’ तक पहुँचाया गया। इस नहर को संगम वंश के शासकों द्वारा तैयार करवाया गया। यह नहर नगर के शहरी व धार्मिक केंद्र की पानी की आवश्यकता की पूर्ति करती थी। साथ ही यह कृषि क्षेत्र की सिंचाई भी करती थी। शासक विभिन्न जलाशयों का निर्माण करवाना गौरव की बात समझते थे। इसके लिए आर्थिक साधन कहीं बाधा नहीं बनते थे। डोमिंगो पेस ने कृष्णदेव राय द्वारा जलाशय निर्माण पर भी जानकारी दी जिसमें स्पष्ट किया गया है कि 15 से 20 हजार व्यक्ति वहीं कार्य करते थे। जलाशय एक निश्चित योजना के अनुरूप बना था।

प्रश्न 8.
विजयनगर की सुरक्षा व्यवस्था के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य व नगर की किलेबंदी बेजोड़ थी, जिसके बारे में हमें जानकारी फारस के दूत तथा यात्री अब्दुर रज्जाक से मिलती है। वह सुरक्षा व्यवस्था से प्रभावित होकर लिखता है कि यहाँ दुर्गों की सात पंक्तियाँ हैं। इन दुर्गों की पंक्तियों में केवल शहर का आवासी क्षेत्र नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्र, जंगलों व जलाशयों के क्षेत्र को चारदीवारी के अंदर लिया गया है। वह बताता है कि सबसे बाहरी दीवार चारों ओर बनी पहाड़ियों को आपस में जोड़ती है। उसके अनुसार यह संरचना विशाल तथा शुण्डाकार थी। इस दीवार को बनाने के लिए मिट्टी, चूना या किसी अन्य जोड़ने वाली चीज का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि पत्थरों को फानाकार बनाकर आपस में जोड़ा गया। ये पत्थर खिसकते नहीं थे। दीवारों का आंतरिक भाग मिट्टी व मलबे के मिश्रण से बना था। दीवार में आयताकार व वर्गाकार बुर्ज भी बने थे। उसे इस किलेबंदी में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात खेतों की दीवार द्वारा घेराबंदी लगी।

विजयनगर भारतीय ऐतिहासिक संदर्भ में पहला ऐसा साम्राज्य है जिसने खेतों की भी किलेबंदी की। यह व्यवस्था महँगी जरूर थी, लेकिन इसके परिणाम सुखद थे। कृषि क्षेत्र के बाद दूसरी किलेबंदी नगरीय केंद्र के आंतरिक भाग की होती थी तथा तीसरी शासकीय केंद्र की जिसमें शाही महल, दरबार, सेना व अस्तबल इत्यादि होते थे। इस किलेबंदी की विशेष बात यह होती थी कि ज्यों-ज्यों अंदर की ओर आते थे त्यों-त्यों दीवारों की ऊँचाई बढ़ती जाती थी।

प्रश्न 9. विजयनगर शहर की आवास व्यवस्था कैसी थी? वर्णन करें।
उत्तर:
शहर की आवास व्यवस्था-किलेबंद चारदीवारी के अंदर थी। पुरातत्वविदों को सारे शहर में एक जैसी बस्ती नहीं मिली है बल्कि भवन निर्माण पद्धति के आधार पर उन्हें आसानी से समझा जा सकता है। पुरातत्वविदों ने शहर के उत्तर:पूर्वी कोने को भवन-निर्माण के आधार पर ही मुस्लिम रिहायशी मोहल्ला घोषित किया है। इसी क्षेत्र में अच्छी किस्म की चीनी मिट्टी की वस्तुएँ भी मिली हैं। जो इस बात को प्रमाणित करती हैं कि यहाँ साधन सम्पन्न लोग रहते होंगे। भवन चाहे मंदिर हों या मस्जिद एक जैसे सामान से बने हैं। मंदिर व मस्जिद की मौलिक विशेषताओं को छोड़कर ये सभी हम्पी के मन्दिरों जैसे ही हैं।

शहरी आवास व्यवस्था में पुरातत्वविदों ने एक नई चीज पाई कि इस क्षेत्र में बहुत-से विविध उपासना स्थल मिले हैं। स्थापत्य कला व शहर की बसावट से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ कई संप्रदायों के लोग रहते थे जो अपने-अपने उपासना स्थलों में उपासना करते थे। वे इनका रख-रखाव भी करते थे। स्थापत्य अवशेषों में कुओं, बरसात के पानी के जलाशयों तथा मंदिर के जलाशयों का काफी मात्रा में मिलना, इस बात का उदाहरण है कि ये पानी के स्रोत स्थानीय लोगों की जल से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति करते थे।

प्रश्न 10.
विजयनगर साम्राज्य के शाही आवास पर नोट लिखें।
उत्तर:
विजयनगर साम्राज्य की सारी प्रशासनिक व्यवस्था का संचालन जिस स्थल से होता था उसे शाही स्थल कहा गया है। पुरातत्वविदों ने इसे शाही केंद्र तथा राजकीय केंद्र इत्यादि नाम भी दिए हैं। शाही निवास, दरबार के अति महत्त्वपूर्ण भवनों के अतिरिक्त यहाँ 60 से अधिक मंदिर थे। यह इस बात का प्रमाण है कि शासक इन मन्दिरों व उपासना स्थलों को बनाकर जनता में यह संदेश देना चाहता था कि वह सबका शासक है इसलिए सभी उसे स्वीकार करें। इस तरह शाही स्थल पर मंदिरों का होना शासक द्वारा वैधता को प्राप्त करने का एक तरीका कहा जा सकता है।

विजयनगर के खनन में 30 ऐसे भवन मिले हैं जो आकार में काफी बड़े हैं। इन्हें पुरातत्वविदों ने महलों का नाम दिया है। इन भवनों में धर्म से संबंधित कार्य नहीं किए जाते थे। इन भवनों व उपासना स्थलों के बीच मुख्य अंतर यह था कि उपासना स्थलों में ईंट-पत्थर इत्यादि प्रयोग में लाए गए हैं जबकि इनमें विभिन्न प्रकार की सामग्री का पुनः प्रयोग भी किया गया है। इन भवनों में सामग्री की पवित्रता की अपेक्षा मजबूती पर ध्यान दिया गया है। शाही आवास में महानवमी डिब्बा, सभा मंडप, कमल महल व हाथियों के अस्तबल जैसे भवन थे।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 8

प्रश्न 11.
शाही आवास में राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त कौन-कौन से भवन थे? वर्णन करें।
उत्तर:
शाही केंद्र या राजकीय केंद्र राजमहल या महानवमी डिब्बे के अतिरिक्त बहुत-से ऐसे भवन हैं जिनके प्रयोग के बारे में तो निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। अनुमान आकार, स्थापत्य निर्माण शैली व भवन की स्थिति के अनुरूप लगाए गए हैं। इन भवनों में सबसे सुंदर भवन कमल (लोटस) महल है। इसकी मेहराबों पर बहुत सुंदर डिज़ाइन बनाए गए हैं तथा इन मेहराबों को दूर से देखने के बाद कमल जैसी आकृति बनती है, इसलिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों व यात्रियों (अंग्रेज) ने इसे यह नाम दिया। इसके उद्देश्य के बारे में स्पष्टता नहीं है, परंतु यह स्वीकार किया जाता है कि शासक यहाँ अपने सलाहकारों को मिलता था। अतः यह एक तरह का परिषदीय भवन था।

विजयनगर में सर्वाधिक मंदिरों वाले स्थल को धार्मिक केंद्र कहा गया है लेकिन राजकीय केंद्र में भी एक अत्यंत दर्शनीय व भव्य स्थल ‘हज़ार राम मंदिर’ है। यह मंदिर केवल शाही परिवार के सदस्यों द्वारा प्रयोग में लाया जाता था। मन्दिर के देवस्थल पर आज मूर्तियाँ नहीं हैं, लेकिन दीवारों पर उत्कीर्ण चित्र सुरक्षित हैं। इन चित्रों में कुछ रामायण के दृश्यों को अभिव्यक्त करते हैं इसलिए इस मंदिर का नाम राम के साथ जोड़ा गया। इसकी दीवारों पर घोड़े व हाथियों के चित्र बने हैं। शाही क्षेत्र में हाथियों का अस्तबल बहुत बड़ा है। यह कमल महल के समीप था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

प्रश्न 12.
गोपुरम् क्या थे? ऐतिहासिक दृष्टि से इनका क्या महत्त्व था?
उत्तर:
मन्दिर का प्रवेश द्वार गोपुरम् कहा जाता था। गोपुरम् किसी भी मंदिर एवं शहर की पहचान थे। ये कई मील से देखे जा सकते थे। शासक सबसे अधिक खर्च इसी पर करते थे। गोपुरम् शासक की पहचान तथा प्रतिष्ठा का प्रतीक माना जाता था। इसलिए शासक स्थापत्य कला, तकनीक, ऊँचाई सभी दृष्टिकोणों से इसे विशिष्ट बनाना चाहते थे। विरुपाक्ष मंदिर, जिसका निर्माण शताब्दियों तक चलता रहा था, इसका महत्त्वपूर्ण द्वार पूर्वी क्षेत्र में है, जिसे पूर्वी गोपुरम् कहा जाता है। इसका निर्माण कृष्णदेव राय के द्वारा कराया गया था। गोपुरम् की ऊँचाई के समान मंदिर या नगर का कोई और भवन नहीं होता था। उदाहरण के लिए विरुपाक्ष मंदिर के मुख्य गोपुरम् को कह सकते हैं कि यह 15 मंजिलों में बना है जिसमें पहली मंजिल की ऊँचाई 23 फीट है तथा सबसे ऊपरी मंजिल 11 फीट ऊँचाई रखती है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
विजयनगर साम्राज्य के धार्मिक केंद्र पर नोट लिखो।
उत्तर:
विजयनगर के शासकों ने अधिकतर मंदिरों का निर्माण विजयनगर शहर के तुंगभद्रा नदी से सटे क्षेत्र में करवाया। इस स्थान पर काफी मात्रा में मंदिर व उपासना स्थल होने के कारण इस क्षेत्र को धार्मिक केंद्र के नाम से जाना जाता था। यह क्षेत्र पहाड़ियों के बीच था। स्थानीय लोक मान्यताओं के अनुसार, ये पहाड़ियाँ बाली व सुग्रीव के राज्य की रक्षा करती थीं। अन्य लोक परंपरा इस क्षेत्र का संबंध स्थानीय मातृदेवी, पम्पा देवी से जोड़ती है। परंपरा अनुसार इस देवी ने इन्हीं पहाड़ियों में शिव के एक रूप माने जाने वाले देवता ‘विरुपाक्ष’ से शादी करने के लिए तपस्या की थी जिसमें वह अन्ततः सफल भी रही।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 Img 9

इसलिए इस क्षेत्र में आज भी विरुपाक्ष मंदिर में इस विवाह को स्मरण करने के लिए विवाह का आयोजन होता है। इन पहाड़ियों में कुछ जैन मंदिर भी मिले हैं। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह क्षेत्र कई मतों में विश्वास करने वाले लोगों (हिंदू, मुस्लिम, जैन इत्यादि) की आस्था का केंद्र था लेकिन स्थानीय तौर पर सबसे अधिक महत्त्व विरुपाक्ष के मंदिर को दिया जाता है।

धार्मिक केंद्र में इतने अधिक उपासना स्थलों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि विभिन्न आस्थाओं व विचारधाराओं के लोग आपस में मिल-जुल कर रहते थे तथा शासक भी यह दिखाने का प्रयास करता था कि वह किसी एक विशेष मत का शासक नही हैं। वह मंदिरों के माध्यम से अपनी सत्ता की राजनैतिक वैधता प्राप्त करता था। वह इन मंदिरों को दान, धन व जमीन दोनों रूपों में देता था।

मंदिर केवल आस्था को ही दिशा नहीं देते थे, बल्कि शिक्षा का केंद्र भी थे। इन स्थानों पर विभिन्न तरह की सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियाँ भी होती थीं। इन कार्यक्रमों के कारण समाज का एक बड़ा वर्ग इनसे जुड़ा रहता था। शासकों की देखा-देखी नायक भी अपने क्षेत्रों के मंदिरों का निर्माण करवाते व दान देते थे। इसी तरह जनता भी उनकी नकल करती थी। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि विजयनगर का धार्मिक केंद्र एक महत्त्वपूर्ण स्थल था।

प्रश्न 2.
विजयनगर की जानकारी के स्रोत कौन-कौन से हैं? इसके खनन की प्रक्रिया पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
विजयनगर की जानकारी के स्रोत हमें विभिन्न रूपों में मिलते हैं। इनमें पुरातात्विक सामग्री, साहित्यिक स्रोत तथा विदेशी यात्रियों के वृत्तांत शामिल हैं। इनमें से अध्ययनकर्ताओं ने फोटोग्राफ, मानचित्र, उपलब्ध भवनों की खड़ी संरचनाएँ व मूर्तियों की ओर विशेष ध्यान दिया है। मैकेन्जी द्वारा प्रारंभ के सर्वेक्षण के पश्चात् जो रिपोर्ट दी गई, उसको अभिलेखों के वर्णन तथा यात्रियों के वृत्तांत के साथ जोड़ा गया। 1976 ई० में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित करवा दिया। 1980 के दशक में खनन कार्य और अधिक गहन, व्यापक, योजनाबद्ध किया गया। इसके परिणामस्वरूप विजयनगर के अवशेष सामने आए। विजयनगर की जानकारी का मुख्य स्रोत पुरातात्विक सामग्री है। यह पुरातात्विक सामग्री एक खुदाई या खनन प्रक्रिया के बाद ही प्रयोग हो सकी है। संक्षेप में हम इस प्रक्रिया को इस तरह समझ सकते हैं

1. खनन मानचित्र–सर्वप्रथम पूरे क्षेत्र के फोटोग्राफ लिए गए तथा मानचित्र का निर्माण किया गया। इसके पहले चरण में संपूर्ण क्षेत्र को 25 वर्गाकार भागों में बांटा गया। जिन्हें अंग्रेजी वर्णमाला के अक्षर A से Z का नाम दिया गया। इसमें (I) (आई) अक्षर का प्रयोग नहीं हुआ। फिर उस प्रत्येक भाग को 25 भागों में बांटा गया। फिर उन्हें क्रमशः AA, AB, AC या BA, BB, BC की क्रिया अपनाते हुए ZAसे .ZZ तक अर्थात् 25 टुकड़ों को आगे 25 छोटे वर्गाकार टुकड़ों में बांटा गया फिर इन टुकड़ों को अन्य छोटी इकाइयों में आगे-से-आगे विभाजित किया जाता रहा। जब तक प्रत्येक फुट का क्षेत्र मानचित्र के दायरे में नहीं आ गया।

2. खनन कार्य-पूरे क्षेत्र को इस तरह विभाजित करके खनन कार्य प्रारंभ किया गया। इसके बाद अलग-अलग क्षेत्र को अलग-अलग विशेषज्ञ की देख-रेख में बांटा गया तथा फिर गहन खनन का कार्य प्रारंभ हुआ। अलग-अलग क्षेत्रों में संरचनाएँ बाहर आने लगीं, लेकिन इन्होंने आकार तब लिया जब आपस में इन टुकड़ों को जोड़ दिया गया। फिर यहाँ से देवस्थल, मंडप, विशाल गोपुरम्, शाही स्थल, धार्मिक केंद्र, सड़क, बरामदे, बाजार इत्यादि के अवशेष सामने आए। इन सभी स्थलों की पहचान स्तंभों के आधार पर की गई। प्राप्त अवशेषों में लकड़ी की कोई भी चीज उपलब्ध नहीं हो सकी।

प्रश्न 3.
नायक व अमर नायक व्यवस्था के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नायक व अमर नायक व्यवस्था (The System of Nayak and Amar Nayak)-विजयनगर साम्राज्य में शासन का प्रमुख राय होता था। राय अपने साम्राज्य में आंतरिक व बाह्य तौर पर शांति व सुरक्षा के लिए सेना पर निर्भर था। इस साम्राज्य में सेना अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रमुखों के नियंत्रण में होती थी। इन सेना प्रमुखों का किलों पर नियंत्रण होता था। इनके पास शस्त्रधारी सैनिक भी होते थे। ये प्रायः भ्रमणशील होते थे तथा हमेशा उपजाऊ भूमि पर नियंत्रण करना चाहते थे। इनकी भाषा प्रायः तेलुगु या कन्नड़ थी। इन्हें स्थानीय किसानों का समर्थन मिलता रहता था। सेना के प्रमुखों या सेनापतियों के वर्ग को नायक कहा जाता था। ये नायक सामान्यतः विद्रोही प्रवृत्ति के होते थे। अतः इन्हें शक्ति के सहारे ही नियंत्रित किया जाता था।

नायक से ही अमर-नायक बना है। अमर-नायक सैनिक प्रमुख तो थे ही, साथ ही उन्हें राय द्वारा प्रशासनिक शक्ति भी दी गई थी। जबकि नायक के पास प्रशासनिक शक्तियाँ नहीं थीं। इस तरह अमर-नायक, नायक की तुलना में अधिक महत्त्वपूर्ण थे। अमर शब्द फारसी के अमीर शब्द से मिलता-जुलता है जिसका अर्थ ऊँचे पद के कुलीन व्यक्ति से लिया जाता है। मान्यता अनुसार अमर शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के समर शब्द से हुई है जिसका अर्थ युद्ध व लड़ाई से लिया जाता है। इससे स्पष्ट है कि अमर-नायक प्रशासन व सेना में प्रमुख व्यक्ति होते थे। वे किसानों, दस्तकारों व व्यापारियों से भू-राजस्व व अन्य कर वसूलते थे। इस वसूली राशि में से एक हिस्सा अपने व्यक्तिगत खर्च, सेना, हाथी व घोड़ों के रख-रखाव के लिए रख लेते थे। शेष राजस्व राशि राय के खजाने में जमा करवाते थे। इन्हीं नायकों के सहारे रायों ने साम्राज्य का विस्तार किया तथा आंतरिक तौर पर शांति स्थापित कर समृद्धि का वातावरण बनाया। रायों के भवन निर्माण व स्थापत्य कला के विकास के लिए धन इन्हीं के द्वारा जुटाया गया।

अमर-नायक व नायक तथा राय में कुछ औपचारिक रिश्ते थे। वे वर्ष में एक बार उपहारों सहित दरबार में उपस्थित होकर स्वामीभक्ति प्रकट करते थे। राय अपनी शक्ति-प्रदर्शन तथा शक्ति संतुलन के लिए इन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानातंरित कर देता था। बाद में कई अमर-नायक बहुत शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने अपनी शक्ति को बढ़ाकर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए थे। इससे जहाँ रायों की राज्य पर पकड़ कमजोर हुई, वहीं राज्य विघटन की ओर गया।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 7 एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर Read More »

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

Haryana State Board HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

बहुविकल्पीय प्रश्न

निम्नलिखित प्रत्येक प्रश्न के अन्तर्गत कुछेक वैकल्पिक उत्तर दिए गए हैं। ठीक उत्तर का चयन कीजिए

1. धार्मिक विश्वास व आचार में समन्वय अधिक देखने को मिला
(A) शिव की उपासना में
(B) विष्णु की उपासना में
(C) देवी की उपासना में
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

2. समाजशास्त्री रेडफील्ड ने सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा को नाम दिया
(A) महान व लघु
(B) उच्च व कमजोर
(C) पूर्वी व पश्चिमी
(D) उत्तरी व दक्षिणी
उत्तर:
(A) महान व लघु

3. देवियों की उपासना को प्रारंभ में किस नाम से जाना गया?
(A) मातृ पूजा
(B) तंत्रवाद
(C) लक्ष्मी पूजा
(D) दुर्गा पूजा
उत्तर:
(B) तंत्रवाद

4. मध्यकाल में बौद्ध धर्म में कौन सी नई शाखा पनपी?
(A) हीनयान
(B) महायान
(C) वज्रयान
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(C) वज्रयान

5. हिन्दू धर्म की परंपरा के अनुसार कौन-सा मार्ग मोक्ष से नहीं जुड़ा?
(A) ज्ञान
(B) कर्म
(C) भक्ति
(D) दान
उत्तर:
(D) दान

6. अलवार व नयनार परंपरा भारत के किस क्षेत्र में पनपी?
(A) गुजरात
(B) तमिलनाडु
(C) महाराष्ट्र
(D) कर्नाटक
उत्तर:
(B) तमिलनाडु

7. तमिल वेद किस रचना को माना जाता है?
(A) नलयिरादिव्यप्रबंधम्
(B) लोक मीमांसा
(C) तोलकापियम
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) नलयिरादिव्यप्रबंधम्

8. अंडाल नामक अलवार स्त्रीभक्त किसकी उपासना करती थी?
(A) विष्णु
(B) शिव
(C) देवी
(D) जगन्नाथ
उत्तर:
(A) विष्णु

9. चोल शासकों के मन्दिर नहीं हैं
(A) चिदम्बरम में
(B) गगैकोंडचोलपुरम में
(C) कांचीपुरम में
(D) तंजावुर में
उत्तर:
(C) कांचीपुरम में

10. दसवीं शताब्दी तक कितने अलवारों की कविताओं का संकलन हो गया था?
(A) 10
(B) 12
(C) 14
(D) 16
उत्तर:
(B) 12

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

11. कंधे पर लघु शिवलिंग धारियों को कन्नड़ साहित्य में कहा गया है
(A) जंगम
(B) वीरशैव
(C) लिंगायत
(D) दाता
उत्तर:
(A) जंगम

12. कर्नाटक में भक्ति आंदोलन के प्रमुख माने जाते हैं।
(A) सुन्दरम
(B) बासवन्ना
(C) विश्वेरिया
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बासवन्ना

13. त्रिपक्षीप संघर्ष में शामिल नहीं थे
(A) पाल
(B) प्रतिहार
(C) चोल
(D) राष्ट्रकूट
उत्तर:
(C) चोल

14. दिल्ली सल्तनत की स्थापना कब हुई?
(A) 1025 ई० में
(B) 1191 ई० में
(C) 1206 ई० में
(D) 1526 ई० में
उत्तर:
(C) 1206 ई० में

15. भारत पर पहला अरब आक्रमण किसने किया?
(A) महमूद गजनवी ने
(B) मुहम्मद-बिन-कासिम ने
(C) मुहम्मद गोरी ने
(D) बाबर ने
उत्तर:
(B) मुहम्मद-बिन-कासिम ने

16. इस्लामी राज्य में गैर-इस्लामी जनता को क्या कहा जाता था?
(A) यवन
(B) मलेच्छ
(C) निम्न
(D) जिम्मी
उत्तर:
(D) जिम्मी

17. अकबर ने जजिया कब हटाया?
(A) 1560 ई० में
(B) 1562 ई० में
(C) 1564 ई० में
(D) 1576 ई० में
उत्तर:
(C) 1564 ई० में

18. मुस्लिम व्यापारियों द्वारा मातृगृहता व मातृकुलीयता की परंपरा किस क्षेत्र में अपनाई गई?
(A) असम
(B) केरल
(C) पंजाब
(D) सिन्ध
उत्तर:
(B) केरल

19. सूफी संतों ने इस्लाम में इन्सान-ए-कामिल किसे घोषित किया?
(A) पैगम्बर मोहम्मद को
(B) खलीफा अबुबकर को
(C) मुइनुद्दीन चिश्ती को
(D) अकबर को
उत्तर:
(A) पैगम्बर मोहम्मद को

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

20. इस्लामिक साहित्य में सूफी आंदोलन को क्या नाम दिया गया है?
(A) सिलसिला
(B) खानकाह
(C) दरगाह
(D) तसत्वुफ
उत्तर:
(D) तसत्वुफ

21. सूफी संत के अनुयायी आम भाषा में क्या कहलाते थे?
(A) मुर्शीद
(B) भिक्षु
(C) मुरीद
(D) जोगी
उत्तर:
(C) मुरीद

22. सूफी संत के निवास को क्या कहा जाता था?
(A) आश्रम
(B) खानकाह
(C) दरगाह
(D) मस्जिद
उत्तर:
(B) खानकाह

23. भारत में सूफी आंदोलन का कौन-सा सिलसिला अधिक लोकप्रिय हुआ?
(A) चिश्ती
(B) कादरी
(C) सुहरावर्दी
(D) नक्शबंदी
उत्तर:
(A) चिश्ती

24. मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है?
(A) दिल्ली में
(B) जयपुर में
(C) लाहौर में
(D) अजमेर में
उत्तर:
(D) अजमेर में

25. निजामुद्दीन औलिया की दरगाह कहाँ है?
(A) दिल्ली में
(B) जयपुर में
(C) लाहौर में
(D) अजमेर में
उत्तर:
(A) दिल्ली में

26. अमीर खुसरो किसे अपना गुरु (श्रद्धेय) मानते थे?
(A) मुइनुद्दीन चिश्ती को
(B) कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी को
(C) निजामुद्दीन औलिया को
(D) सलीम चिश्ती को
उत्तर:
(C) निजामुद्दीन औलिया को

27. मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर अकबर ने कितनी बार यात्रा की?
(A) 10
(B) 14
(C) 18
(D) 20
उत्तर:
(B) 14

28. ‘वे दिल्ली का चिराग नहीं बल्कि मुल्क का चिराग थे?’ ये किसके बारे में कहा गया?
(A) निजामुद्दीन औलिया के बारे में
(B) नसीरुद्दीन-ए-चिराग के बारे में
(C) दाता-ए-गंज बख्श के बारे में
(D) उपर्युक्त सभी के बारे में
उत्तर:
(B) नसीरुद्दीन-ए-चिराग के बारे में

29. मलिक मुहम्मद जायसी की रचना कौन-सी है?
(A) पृथ्वीराज रासो
(B) तजाकिरा
(C) पद्मावत
(D) तहकीक-ए-हिन्द
उत्तर:
(C) पद्मावत

30. चिश्ती शेख प्रायः पसन्द नहीं करते थे
(A) ऐश्वर्यपूर्ण जीवन
(B) राज दरबार में ऊँचे पद
(C) शासकों की गोष्ठियों में शामिल होना
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

31. ‘बीजक’ किसकी रचना मानी जाती है?
(A) सूरदास की
(B) तुलसीदास की
(C) कबीरदास की
(D) मीराबाई की
उत्तर:
(C) कबीरदास की

32. संत कबीर का गुरु किन्हें माना जाता है?
(A) रामानंद को
(B) रामानुज को
(C) शंकराचार्य को
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) रामानंद को

33. श्री गुरु नानक देव जी का जन्म कब हुआ?
(A) 1398 ई० में
(B) 1419 ई० में
(C) 1469 ई० में
(D) 1526 ई० में
उत्तर:
(C) 1469 ई० में

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

34. ‘आदि ग्रंथ’ का संकलन किसने किया?
(A) श्री गुरु नानक देव जी ने
(B) श्री गुरु अर्जुन देव जी ने
(C) श्री गुरु तेग बहादुर जी ने
(D) श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने
उत्तर:
(B) श्री गुरु अर्जुन देव जी ने

35. मीराबाई की शादी किस परिवार में हुई?
(A) जयपुर के परिवार में
(B) जोधपुर के परिवार में
(C) बीकानेर के परिवार में
(D) मेवाड़ के परिवार में
उत्तर:
(D) मेवाड़ के परिवार में

36. मीराबाई किसकी उपासक थी?
(A) विष्णु की
(B) शिवजी की
(C) श्रीकृष्ण की
(D) श्रीराम की
उत्तर:
(C) श्रीकृष्ण की

37. मीराबाई के गुरु कौन माने जाते हैं?
(A) रैदास
(B) दादू
(C) नामदेव
(D) मलुकदास
उत्तर:
(A) रैदास

38. असम क्षेत्र में भक्ति आंदोलन के संत कवि थे
(A) चैतन्य
(B) शंकरदेव
(C) नामदेव
(D) रामानंद
उत्तर:
(B) शंकरदेव

39. सूफी संतों की बातचीत पर आधारित रचना कहलाती है
(A) तजकिरा
(B) मुलफुज़ात
(C) रिहला
(D) रूबाई
उत्तर:
(B) मुलफुज़ात

40. सूफी संतों के जीवनी संस्मरण पर आधारित रचना को कहा जाता है
(A) तजकिरा
(B) मुलफुज़ात
(C) रिला
(D) रूबाई
उत्तर:
(A) तजकिरा

41. जगन्नाथ का शाब्दिक अर्थ क्या है?
(A) शिव का अवतार
(B) विष्णु का अवतार
(C) संपूर्ण विश्व का स्वामी
(D) सभी का संरक्षक
उत्तर:
(C) संपूर्ण विश्व का स्वामी

42. उड़ीसा में जगन्नाथ के साथ पूजा जाने वाला उनका भाई या अन्य देवता कौन-सा है?
(A) विष्णु
(B) बलराम (बलभद्र)
(C) सूर्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(B) बलराम (बलभद्र)

43. श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी कौन थे?
(A) श्री गुरु तेग बहादुर जी
(B) श्री गुरु अंगद देव जी
(C) श्री गुरु अर्जुन देव जी
(D) श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी
उत्तर:
(B) श्री गुरु अंगद देव जी

44. धार्मिक समन्वय की श्रृंखला में भारत के विभिन्न हिस्सों में नए देवी-देवताओं की पूजा होने लगी। ये मुख्य रूप से किस देवी-देवता के प्रतीक थे?
(A) विष्णु
(B) शिव
(C) लक्ष्मी या पार्वती
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

45. तमिलनाडु में भक्ति परंपरा से जुड़े संत कहलाते थे
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) (A) व (B) दोनों
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) (A) व (B) दोनों

46. अलवार व नयनारों के किस विचार ने उन्हें सामान्य समुदाय में लोकप्रिय बनाया?
(A) वैदिक चिन्तन ने
(B) मन्दिरों के प्रति लगाव ने
(C) धन-सम्पदा पूर्ण जीवन ने
(D) उनके जाति के प्रति दृष्टिकोण ने
उत्तर:
(D) उनके जाति के प्रति दृष्टिकोण ने

47. चोल शासकों द्वारा सर्वाधिक मन्दिर किस देवता के बनाए गए?
(A) शिव
(B) ब्रह्मा
(C) राम
(D) कृष्ण
उत्तर:
(A) शिव

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

48. कर्नाटक में भक्ति आन्दोलन की प्रारंभिक परंपरा किस नाम से लोकप्रिय हुई?
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) वीरशैव
(D) सूफी
उत्तर:
(C) वीरशैव

49. वीरशैव परम्परा में लिंग धारण करने वालों को क्या कहा जाता था?
(A) अलवार
(B) नयनार
(C) धर्म रक्षक
(D) लिंगायत
उत्तर:
(D) लिंगायत

50. लिंगायतों ने विरोध किया
(A) पुनर्जन्म के सिद्धान्त का
(B) कठोर जाति प्रथा का
(C) स्थापित ब्राह्मणीय व्यवस्था की कठोरता का
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

51. भारत में इस्लाम ने प्रवेश किया
(A) व्यापार के माध्यम से
(B) विजय अभियान के हिस्से के रूप में
(C) सांस्कृतिक परिवर्तन की अदला-बदली से
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(D) उपर्युक्त सभी

52. सैद्धांतिक रूप में इस्लामिक राज्य में कानून का स्रोत माना जाता है?
(A) शरियत को
(B) खलीफा के आदेश को
(C) शासक के कथन को
(D) काजी के निर्णय को
उत्तर:
(A) शरियत को

53. अकबर ने पहली बार अजमेर में ‘नवाज शरीफ’ की यात्रा कब की?
(A) 1556 ई० में
(B) 1562 ई० में
(C) 1568 ई० में
(D) 1572 ई० में
उत्तर:
(B) 1562 ई० में

54. निम्नलिखित में एक भक्ति आन्दोलन का प्रचारक नहीं था
(A) महात्मा बुद्ध
(B) कबीर
(C) रामानन्द
(D) गुरु नानक
उत्तर:
(A) महात्मा बुद्ध

55. “हिन्दू और मुसलमान एक ही मिट्टी से बने हैं।” ये शब्द किस संत के हैं?
(A) शंकराचार्य
(B) जयदेव
(C) कबीर
(D) गुरु नानक
उत्तर:
(C) कबीर

56. भारत के किस भाग में भक्ति आन्दोलन आरम्भ हुआ?
(A) उत्तरी भारत
(B) दक्षिणी भारत
(C) पूर्वी भारत
(D) पश्चिमी भारत
उत्तर:
(B) दक्षिणी भारत

57. निम्नलिखित में से सूफी मत का प्रचारक कौन था?
(A) विवेकानन्द
(B) रामानन्द
(C) मुईनुद्दीन
(D) कबीर
उत्तर:
(C) मुईनुद्दीन

58. ‘गीत गोविन्द’ का रचयिता कौन था?
(A) जयदेव
(B) नामदेव
(C) सोमदेव
(D) रामानन्द
उत्तर:
(A) जयदेव

59. प्रथम सिक्ख गुरु कौन थे?
(A) गुरु नानक देव जी
(B) गुरु अमर दास
(C) श्री गुरु तेग बहादुर जी
(D) श्री गुरु अर्जुन देव जी
उत्तर:
(A) गुरु नानक देव जी

60. “परमात्मा मन्दिरों और मस्जिदों की चार दीवारियों में बन्द नहीं है, वह तो किसी अच्छे हृदय में वास करता है।” ये किसके शब्द हैं?
(A) महात्मा बुद्ध
(B) कबीर
(C) महावीर
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) कबीर

61. ‘रामचरितमानस’ की रचना किसने की थी?
(A) सूरदास
(B) जयदेव
(C) कबीर
(D) तुलसीदास
उत्तर:
(D) तुलसीदास

62. “सो क्यों मन्दा आखिये, जित जम्मे राजान।” ये शब्द किसके हैं?
(A) शंकराचार्य
(B) कबीर
(C) गुरु नानक
(D) रामानन्द
उत्तर:
(C) गुरु नानक

63. निम्नलिखित में भक्ति आन्दोलन का कौन प्रचारक नहीं था?
(A) गुरु नानक
(B) कबीर
(C) तुलसीदास
(D) गुरु गोबिन्द सिंह
उत्तर:
(D) गुरु गोबिन्द सिंह

64. सल्तनत काल में सूफी मत का प्रचार निम्नलिखित ने किया
(A) मलिक काफूर ने
(B) निजामुद्दीन औलिया ने
(C) रामानन्द ने
(D) फिरोज़ तुगलक ने
उत्तर:
(B) निजामुद्दीन औलिया ने

65. भक्ति आन्दोलन ने सबसे गहरी चोटी मारी
(A) ब्राह्मणों पर
(B) क्षत्रियों पर
(C) वैश्यों पर
(D) शूद्रों पर
उत्तर:
(A) ब्राह्मणों पर

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

66. भक्ति आन्दोलन (निर्गुण भक्ति) में निम्नलिखित में से किस पर अधिक जोर दिया गया?
(A) हिन्दू-मुस्लिम पृथक्-पृथक् हैं
(B) कर्म-काण्डों में विश्वास
(C) मूर्ति-पूजा का विरोध
(D) मूर्ति-पूजा में विश्वास
उत्तर:
(C) मूर्ति-पूजा का विरोध

67. मध्यकाल में अधिक सम्मान होता था
(A) ब्राह्मणों का
(B) राजपूतों का
(C) शूद्रों का
(D) मुसलमानों का
उत्तर:
(A) ब्राह्मणों का

68. दक्षिणी भारत में भक्त प्रचारक थे
(A) एकनाथ व नामदेव
(D) कबीर तथा नानक
(C) रामानन्द तथा चैतन्य
(D) उपर्युक्त सभी
उत्तर:
(A) एकनाथ व नामदेव

69. ‘गरीब नवाज’ किस शहर में स्थित है?
(A) आगरा
(B) दिल्ली
(C) जयपुर
(D) अजमेर
उत्तर:
(D) अजमेर

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
उपासना पद्धति में लघु व महान परंपरा किस चिन्तक का विचार है?
उत्तर:
उपासना पद्धति में लघु व महान परंपरा रॉबर्ट रेडफील्ड का विचार है।

प्रश्न 2.
उड़ीसा का जगन्नाथ मन्दिर किस स्थान पर है?
उत्तर:
उड़ीसा का जगन्नाथ मन्दिर पुरी में है।

प्रश्न 3.
तमिलनाडु में विष्णु भक्तों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
तमिलनाडु में विष्णु भक्तों को अलवार कहा जाता था।

प्रश्न 4.
तमिलनाडु में शिव भक्तों को क्या कहा जाता था?
उत्तर:
तमिलनाडु में शिव भक्तों को नयनार कहा जाता था।

प्रश्न 5.
तमिल क्षेत्र में बहु-चर्चित स्त्रीभक्त कौन थी?
उत्तर:
तमिल क्षेत्र में बहु-चर्चित स्त्रीभक्त अंडाल थी।

प्रश्न 6.
कर्नाटक में नवीन संत आंदोलन किससे माना जाता है?
उत्तर:
कर्नाटक में नवीन संत आंदोलन बासवन्ना से माना जाता है।

प्रश्न 7.
कर्नाटक का भक्ति आंदोलन किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर:
कर्नाटक का भक्ति आंदोलन वीरशैव लिंगायत के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 8.
मुहम्मद-बिन-कासिम ने भारत पर आक्रमण कब किया?
उत्तर:
मुहम्मद-बिन-कासिम ने भारत पर 711 ई० में आक्रमण किया।

प्रश्न 9.
इस्लामिक राज्य में गैर-इस्लामिक प्रजा को क्या कहते हैं?
उत्तर:
इस्लामिक राज्य में गैर-इस्लामिक प्रजा को जिम्मी कहते हैं।

प्रश्न 10.
भारत में प्रवासी संप्रदायों के लिए संस्कृत साहित्य में क्या नाम दिया गया है?
उत्तर:
भारत में प्रवासी संप्रदायों के लिए संस्कृत साहित्य में मलेच्छ नाम दिया गया है।

प्रश्न 11.
इस्लाम की आदर्श पुस्तक कौन-सी है?
उत्तर:
इस्लाम की आदर्श पुस्तक कुरान है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 12.
शेख (संत) का निवास स्थान क्या कहलाता था?
उत्तर:
शेख (संत) का निवास स्थान खानकाह कहलाता था।

प्रश्न 13.
शेख संत की कब्र पर बना स्मारक क्या कहलाता है?
उत्तर:
शेख संत की कब्र पर बना स्मारक दरगाह कहलाता है।

प्रश्न 14.
मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह कहाँ है?
उत्तर:
मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह अजमेर में है।

प्रश्न 15.
बर्नी व खुसरो किसके शिष्य थे?
उत्तर:
बर्नी व खुसरो निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।

प्रश्न 16.
मुगल शासकों द्वारा बार-बार किस दरगाह में यात्रा की गई?
उत्तर:
मुगल शासकों द्वारा बार-बार अजमेर शरीफ की दरगाह में यात्रा की गई।

प्रश्न 17.
श्री गुरु नानक देव जी की किन्हीं दो रचनाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
जपु जी साहिब, आसा दी वार ।

प्रश्न 18.
कबीर जी का जन्म स्थान किसे माना जाता है?
उत्तर:
कबीर जी का जन्म काशी में माना जाता है।

प्रश्न 19.
‘कबीर ग्रन्थावली’ का संकलन किसने किया?
उत्तर:
‘कबीर ग्रन्थावली’ का संकलन दादू पंथियों ने किया।

प्रश्न 20.
श्री गुरु नानक देव जी ने उपासना की पद्धति कौन-सी दी?
उत्तर:
श्री गुरु नानक देव जी ने उपासना की नाम जाप पद्धति दी।

प्रश्न 21.
खालसा पंथ की स्थापना कब और किसने की?
उत्तर:
खालसा पंथ की स्थापना 1699 ई० में श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने की।

प्रश्न 22.
मीराबाई किस क्षेत्र की राजकुमारी थी?
उत्तर:
मीराबाई मेड़ता की राजकुमारी थी।

प्रश्न 23.
‘जपुजी साहिब’ की रचना किसने की थी?
उत्तर:
‘जपुजी साहिब’ की रचना श्री गुरु नानक देव जी ने की थी।

प्रश्न 24.
शंकरदेव के इष्ट देव कौन थे?
उत्तर:
शंकरदेव के इष्ट देव विष्णु थे।

प्रश्न 25.
श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी कौन थे?
उत्तर:
श्री गुरु नानक देव जी के उत्तराधिकारी श्री गुरु अंगद देव जी थे।

प्रश्न 26.
भक्ति आन्दोलन से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन से अभिप्राय भक्ति द्वारा मोक्ष की प्राप्ति करना है।

प्रश्न 27.
सूफी मत के पंजाब में प्रसिद्ध प्रचारक कौन थे?
उत्तर:
सूफी मत के पंजाब में प्रसिद्ध प्रचारक बाबा फरीद थे।

प्रश्न 28.
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रचारक कौन थे?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रचारक शंकराचार्य, कबीर, गुरु नानक तथा चैतन्य थे।

प्रश्न 29.
भक्ति आन्दोलन का जन्म कहाँ हुआ?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन का जन्म दक्षिणी भारत में हुआ।

प्रश्न 30.
भक्ति आन्दोलन का एक राजनीतिक प्रभाव बताइए।
उत्तर:
अकबर ने सहनशीलता की नीति को अपनाया।

प्रश्न 31.
कोई एक सूफी सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:
एकेश्वरवाद तथा रहस्यवाद।

प्रश्न 32.
भक्ति आन्दोलन का एक उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन का एक उद्देश्य हिन्दू-मुस्लिम एकता है।

प्रश्न 33.
भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों की भाषा क्या थी?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के प्रचारकों की भाषा सरल स्थानीय भाषा थी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 34.
भक्ति आन्दोलन के कारण से पंजाब में कौन-से नए धर्म का जन्म हुआ?
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के कारण से पंजाब में सिक्ख धर्म का जन्म हुआ।

प्रश्न 35.
गुरु नानक ने कौन-सी भाषा में प्रचार किया?
उत्तर:
गुरु नानक ने पंजाबी भाषा में प्रचार किया।

प्रश्न 36.
पहली बार हिन्दी भाषा में भक्ति आन्दोलन का प्रचार किसने किया?
उत्तर:
पहली बार हिन्दी भाषा में भक्ति आन्दोलन का प्रचार रामानन्द ने किया।

प्रश्न 37.
सूफी मत का उदय कहाँ हुआ?
उत्तर:
सूफी मत का उदय ईरान में हुआ।

प्रश्न 38.
महाराष्ट्र के सन्तों के नाम लिखो।
उत्तर:
महाराष्ट्र के सन्तों के नाम संत तुकाराम, नामदेव, एकनाथ, रामदास आदि थे।

प्रश्न 39.
चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति आन्दोलन का प्रचार कहाँ किया?
उत्तर:
चैतन्य महाप्रभु ने भक्ति आन्दोलन का प्रचार बंगाल में किया।

प्रश्न 40.
उत्तरी भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना किसने की?
उत्तर:
उत्तरी भारत में सुहरावर्दी सम्प्रदाय की स्थापना शेख बहाउद्दीन जगरिया ने की।

प्रश्न 41.
सूफी मत के नक्शबन्दिया सम्प्रदाय के संस्थापक कौन थे?
उत्तर:
सूफी मत के नक्शबन्दिया सम्प्रदाय के संस्थापक बहाउद्दीन नक्शबन्द थे।

प्रश्न 42.
सूफी मत के कादरी सम्प्रदाय की स्थापना किसने की?
उत्तर:
सूफी मत के कादरी सम्प्रदाय की स्थापना नासिरुद्दीन महमूद जिलानी ने की।

प्रश्न 43.
‘खानकाह’ किसे कहते थे?
उत्तर:
सूफी संतों के आश्रम को ‘खानकाह’ कहते थे।

प्रश्न 44.
सूफी मत में पीर तथा मुरीद से क्या अर्थ था?
उत्तर:
पीर गुरु को तथा मुरीद शिष्य को कहा जाता था।

प्रश्न 45.
जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर कहाँ है?
उत्तर:
जगन्नाथ का विश्व प्रसिद्ध मन्दिर पुरी (उड़ीसा) में है।

प्रश्न 46.
जगन्नाथ को किसका रूप माना गया?
उत्तर:
जगन्नाथ को विष्णु का रूप माना गया।

प्रश्न 47.
भक्ति विचारधारा के दो रूप कौन-कौन से थे?
उत्तर:
भक्ति विचारधारा के दो रूप निर्गुण व सगुण थे।

प्रश्न 48.
कर्नाटक में शिव भक्तों को क्या कहा गया?
उत्तर:
कर्नाटक में शिव भक्तों को वीरशैव कहा गया।

प्रश्न 49.
कर्नाटक में शिव के वे भक्त जो लिंग धारण करते थे, क्या कहलाते थे?
उत्तर:
कर्नाटक में शिव के वे भक्त जो लिंग धारण करते थे लिंगायत कहलाते थे।

प्रश्न 50.
पुनर्जन्म के बारे में लिंगायतों का क्या विश्वास था?
उत्तर:
वे इसे अस्वीकार करते थे।

प्रश्न 51.
इस्लाम में धर्मशास्त्री क्या कहलाता है?
उत्तर:
इस्लाम में धर्मशास्त्री उलेमा कहलाता है।

प्रश्न 52.
इस्लाम के मुख्य दो मत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
इस्लाम के मुख्य दो मत शिया व सुन्नी हैं।

प्रश्न 53.
मातृ-गृहता व मातृकुलीयता की परंपरा भारत के किस राज्य में थी?
उत्तर:
मातृ-गृहता व मातृकुलीयता की परंपरा भारत के केरल राज्य में थी।

प्रश्न 54.
चरार-ए-शरीफ की मस्जिद कहाँ है?
उत्तर:
चरार-ए-शरीफ की मस्जिद कश्मीर में है।

प्रश्न 55.
सूफी मत में पीर की आत्मा का परमात्मा से मिलन क्या कहलाता है?
उत्तर:
सूफी मत में पीर की आत्मा का परमात्मा से मिलन उर्स कहलाता है।

प्रश्न 56.
सूफी संत की दरगाह पर की गई प्रार्थना क्या कहलाती है?
उत्तर:
सूफी संत की दरगाह पर की गई प्रार्थना जियारत कहलाती है।

प्रश्न 57.
कबीर इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर अल्लाह, खुदा, हजरत व पीर को किस रूप में देखते है?
उत्तर:
कबीर इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर अल्लाह, खुदा, हजरत व पीर को सत्य के रूप में देखते हैं।

प्रश्न 58.
कबीर ने शब्द व शून्य की अभिव्यंजनाएँ किससे ली हैं?
उत्तर:
कबीर ने शब्द व शून्य की अभिव्यंजनाएँ योगी परंपरा से लीं हैं।

प्रश्न 59.
‘पद्मावत’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
‘पद्मावत’ का लेखक ‘मलिक मुहम्मद जायसी’ था।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 60.
पाँचवें सिक्ख गुरु कौन थे?
उत्तर:
पाँचवें सिक्ख गुरु, गुरु अर्जुन देव जी थे।

प्रश्न 61.
दसवें व अन्तिम सिक्ख गुरु थे?
उत्तर:
दसवें व अन्तिम सिक्ख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी थे।

प्रश्न 62.
सूफी संतों की बातचीत पर आधारित ग्रन्थ क्या कहलाता है?
उत्तर:
सूफी संतों की बातचीत पर आधारित ग्रन्थ मुलफुजात कहलाता है।

अति लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
सांस्कृतिक समन्वय की कड़ी में ‘महान’ व ‘लघु’ परंपरा से क्या आशय है?
उत्तर:
सांस्कृतिक समन्वय की परंपरा-जिन आदर्शों को उच्च वर्ग के लोग मानते थे अर्थात् जो परंपरा उच्च वर्ग की थी एवं अधिक प्रभावी थी, उसे ‘महान्’ परंपरा की संज्ञा दी गई। दूसरी ओर स्थानीय जन-साधारण में फली-फूली परंपरा को ‘लघु’ परंपरा कहा गया है। ‘लघु’ व ‘महान्’ के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान से साँझी भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति का विकास हुआ है। लेकिन यह मेल-मिलाप सदैव सौहार्दपूर्ण स्थितियों में नहीं रहा, बल्कि द्वन्द्वपूर्ण था अर्थात् सौहार्द के साथ-साथ मतभेद व तनाव भी इसका हिस्सा थे।

प्रश्न 2.
तंत्रवाद व तंत्रवादी विचारधारा से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
धार्मिक उपासना पद्धति में देवी की उपासना को तंत्रवाद या तांत्रिक के नाम से भी जाना गया। इस पूजा पद्धति में स्त्री, पुरुष तथा सभी वर्गों व वर्गों के लोग शामिल होते थे। इस विचारधारा का प्रभाव शैव व बौद्ध धर्म पर भी पड़ा। बौद्ध धर्म में भी नई धारा विकसित हुई जिसे वज्रयान का नाम दिया गया तथा इस विचारधारा में महात्मा बुद्ध को विष्णु का अवतार स्वीकार कर लिया गया। यह बौद्ध धर्म की तंत्रवादी विचारधारा थी।

प्रश्न 3.
अलवार व नयनार परंपरा क्या थी?
उत्तर:
अलवार व नयनार परंपरा का संबंध तमिलनाडु क्षेत्र से था। भक्ति आंदोलन के प्रारंभिक क्षेत्र में जो भक्त विष्णु की पूजा करते थे, अलवार कहलाते थे। जबकि शिव की पूजा करने वाले नयनार कहलाते थे। अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। वे अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया। इस तरह ये स्थल तीर्थ-स्थलों के रूप में उभरे।

प्रश्न 4.
अलवार नयनार परंपरा में शामिल महिलाओं के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
अलवार नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी। नयनार परंपरा में कराइक्काल अम्मइयार नामक महिला को बहुत सम्मान मिला जिसने घोर तपस्या की। इन परंपराओं में शामिल स्त्रियों ने सामाजिक कर्तव्यों को त्याग दिया, लेकिन वे किसी वैकल्पिक व्यवस्था की सदस्या अर्थात् भिक्षुणी इत्यादि नहीं बनीं। इनकी जीवन-शैली व रचनाएँ पितृसत्तात्मक व्यवस्था को खुली चुनौती थीं।

प्रश्न 5.
वीरशैव परंपरा पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
वीरशैव परंपरा कर्नाटक क्षेत्र में थी। इसको बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण संत ने नेतृत्व दिया। बासवन्ना चालुक्य राजा के दरबार में मंत्री थे। वे शिव के उपासक थे। उनकी विचारधारा को बहुत लोकप्रियता मिली। उनके अनुयायी शिव के उपासक अर्थात् वीरशैव कहलाए। उनमें से जो लिंग धारण करते थे, उन्हें लिंगायत कहा जाता था। इस समुदाय के लोग शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं, इन लिंगधारी पुरुषों को लोग बहुत सम्मान देते हैं तथा श्रद्धा व्यक्त करते हैं। कन्नड़ भाषा में इन्हें जंगम या यायावर भिक्षु कहा जाता है।

प्रश्न 6.
नाथ, सिद्ध व जोगी कौन थे? इनकी गतिविधियों का क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
मध्यकालीन नाथ, सिद्ध व जोगी उत्तरी भारत के वे लोग थे जो ब्राह्मणीय पूजा-पद्धति व विचारधारा को स्वीकार नहीं करते थे। इन नाथ, सिद्ध व जोगियों में कुछ शिल्पी या जुलाहे थे। ब्राह्मणीय व्यवस्था में उन्हें ‘निम्न’ दर्जा प्राप्त था। परंतु भक्ति परंपरा में उन्हें बहुत सम्मान मिला। साथ ही उनकी दस्तकारियों को भी प्रोत्साहन मिला। सांस्कृतिक व आर्थिक दोनों स्तरों पर उनका योगदान रहा। दस्तकारी की गतिविधियों के कारण नगरीय क्षेत्रों का विस्तार हुआ तथा इनकी चीजों की माँग मध्य व पश्चिमी एशिया में बहुत अधिक बढ़ी जिससे व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 7.
उलेमा से क्या अभिप्राय है? इनकी शासन में क्या भूमिका थी?
उत्तर:
उलेमा इस्लाम में धर्मशास्त्री होता है। यह आलिम का बहुवचन है। आलिम का अर्थ होता है ज्ञानी अर्थात् जिसके पास इलम (ज्ञान) है वह आलिम कहलाएगा तथा आलिमों का समूह उलेमा। इस समूह (उलेमा) का यह कर्त्तव्य था कि शासन-व्यवस्था में शासक को सलाह भी दे तथा इस्लाम धर्म की रक्षा हेतु कार्य भी करे। लेकिन व्यवहार में इस्लाम को कठोरता से प्रचलन में लाना आसान नहीं था क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। शासक को प्रजा की भावना को ध्यान में रखना पड़ता था। इसलिए उलेमा प्रायः शासक का सलाहकार रहा। वह प्रायः शासक को अपने दबाव में नहीं ले पाया। वे ऊँचे पदों पर नियुक्त अवश्य थे।

प्रश्न 8.
मुगल शासकों ने जनता से जुड़ने के लिए कैसी नीति अपनाई?
उत्तर:
मुगल शासक सल्तनत काल के शासकों की तुलना में अधिक व्यावहारिक थे। उन्होंने प्रायः उलेमा वर्ग के दबाव को अस्वीकार करते हुए कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं, बल्कि सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी। वस्तुतः अकबर ने गैर-इस्लामिक (हिंदू) को जिम्मी नहीं वरन् उन्हें बिना किसी भेदभाव के प्रजा स्वीकार किया। इस तरह के कार्य अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा यहाँ तक कि औरंगजेब द्वारा भी किए गए।

प्रश्न 9.
भारत में इस्लाम लोक प्रचलन में कैसे आया? इसका क्या प्रभाव रहा?
उत्तर:
भारत में इस्लाम के आगमन से हुए परिवर्तन मात्र शासक वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के जन-सामान्य के विभिन्न वर्गों; जैसे कृषक, शिल्पी, सैनिक, व्यापारी इत्यादि से भी जुड़े थे। समाज के बहुत-से लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी जीवन-शैली व परंपराओं का पूरी तरह परित्याग नहीं किया, लेकिन इस्लाम की आधार स्तम्भ पाँच बातें अवश्य स्वीकार कर लीं। इन्होंने अपनी अभिव्यक्ति भी स्थानीय भाषा में ही जारी रखी, जिससे पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिन्दी, गुजराती जैसी भाषाओं को विकास के लिए बल मिला क्योंकि इन भाषाओं के लोगों ने कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इनका प्रयोग किया। इसी तरह नई लिपि भी सामने आई, जिसमें प्रमुख रूप से खोजकी लिपि थी जिसे खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय द्वारा विकसित किया गया। पंजाब, सिन्ध व गुजरात में व्यापारी लोग इसका प्रयोग करते थे जिसे लंडा या लांडी हिन्दी भी कहा जाता था।

प्रश्न 10.
मध्यकालीन समाज व साहित्य में समुदायों के नामकरण का क्या आधार था?
उत्तर:
मध्यकालीन समाज व साहित्य में समुदायों का नामकरण भौगोलिक व भाषायी आधार पर होता था। उस समाज में प्रायः हिन्दू व मुस्लिम जैसे शब्द इस तरह प्रयोग नहीं होते थे। 8वीं से 14वीं शताब्दी के संस्कृत ग्रन्थों व अभिलेखों में मुसलमान शब्द का प्रयोग शायद ही हुआ हो, बल्कि समुदायों के नाम उनके जन्म के क्षेत्र के आधार पर प्रयोग होते थे; जैसे तुर्की, ताजिक, फारसी, अरबी व अफगान इत्यादि। प्राचीनकाल में भी नाम भौगोलिक आधार पर ही प्रयुक्त होते थे। जैसे अफगानों को शक तथा यूनान के लोगों को यवन इत्यादि। संस्कृत साहित्य में प्रवासियों तथा उन लोगों के लिए, जो वर्ण-व्यवस्था में शामिल नहीं थे, मलेच्छ शब्द का प्रयोग होता है। यह शब्द इस बात की पुष्टि भी करता है कि इन प्रवासियों की भाषा संस्कृत भाषायी परिवार की नहीं है।’

प्रश्न 11.
सूफी सिलसिलों का नामकरण कैसे हुआ?
उत्तर:
सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक खाजा इसहाक, शामी, चिश्ती, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है कि चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

प्रश्न 12.
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे गियासपुर क्षेत्र में थी। इसमें एक बड़ा कमरा तथा कई छोटे कमरे थे। इस खानकाह क्षेत्र में शेख का परिवार, सेवक, अनुयायी स्थायी तौर पर रहते तथा उपासना करते थे। अतिथियों के लिए भी यहाँ विशेष जगह थी। खानकाह एक बड़ा क्षेत्र था जो चारदीवारी से घिरा था, जिसके कारण आस-पास के लोग बाह्य आक्रमण (विशेषकर मंगोल) के समय यहाँ शरण लेते थे। शेख स्वयं एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे। वहीं उनकी अपने विशिष्ट अनुयायियों तथा अतिथियों से भेंट होती थी। खुले आंगन व निवास क्षेत्र एक गलियारे के साथ जुड़ा था। खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी।

प्रश्न 13.
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह पर कौन-कौन आता था?
उत्तर:
निजामुद्दीन औलिया की खानकाह पर समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन एवं व्यापारी आदि आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने, इबादत करने, ताबीज लेने के लिए भी यहाँ लोग आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आते थे। विशिष्ट व बौद्धिक वर्ग में अमीर खुसरो जैसे गायक, कवि अमीर हसन सिजनी जैसे दरबारी तथा जिआऊद्दीन बरनी जैसे इतिहासकार भी आते थे।

प्रश्न 14.
शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर जाने वाले अति विशिष्ट लोगों में किस-किस का नाम आता है?
उत्तर:
मुहम्मद बिन तुगलक सल्तनत काल का पहला सुल्तान था जिसने मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा की। इसके बाद विभिन्न राज परिवार के लोग तथा शासक यहाँ आते रहे जिसके कारण यह लोकप्रिय होती गई। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया। अकबर अपने जीवन में चौदह बार यहाँ आया। वह यहाँ निरंतर 1580 ई० तक आता रहा। उसने प्रत्येक बार इस दरगाह को दान व भेंट दी। इसके बाद यह दरगाह मुगल परिवार के सदस्यों की यात्रा की पहली पसन्द बन गई। शाहजहाँ की बड़ी पुत्री जहाँआरा की 1643 ई० में इस स्थल की यात्रा काफी महत्त्वपूर्ण मानी जाती है।

प्रश्न 15.
चिश्ती सिलसिले की दरगाहों पर संगीत का कार्यक्रम क्यों तथा कैसे होता था?
उत्तर:
चिश्ती सिलसिले की दरगाहों पर उपासना का एक ढंग संगीत भी था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कव्वाली का कार्यक्रम अमीर खुसरो द्वारा किया जाता था। उन्होंने कौल (कव्वाली के प्रारंभ में गाई जाने वाली कहावत) को प्रारंभ कर चिश्ती दरगाह की सभा को नई दिशा दी। दरगाह पर संगीत के कार्यक्रम में पहले कौल, फिर फारसी, हिन्दी या उर्दू में कविता (कई बार तीनों का मिश्रण वाली) गाई जाती थी। फिर कौल से.सभा का समापन होता था। चिश्ती उपासना पद्धति में इस तरह संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई।

प्रश्न 16.
कबीर की जानकारी के प्रमुख साक्ष्य कौन-से हैं?
उत्तर:
कबीर की जानकारी के साक्ष्य उनकी कविताओं या उनकी मृत्यु के उपरान्त लिखी गई जीवनियों में हैं। कबीर की रचनाओं का संकलन भिन्न-भिन्न रूपों में विभिन्न लोगों ने किया है। वाराणसी व उत्तर-प्रदेश के क्षेत्र में कबीर की मुख्य रचना ‘बीजक’ का संकलन कबीर पंथियों द्वारा किया गया है। राजस्थान में कबीर ग्रन्थावली को दादू-पंथियों ने तैयार करवाया है। कबीर के कई पद आदिग्रंथ में भी संकलित हैं। ये सभी संकलन उनकी मृत्यु के बाद हुए। इनका प्रकाशन उन्नीसवीं शताब्दी में हुआ।

प्रश्न 17.
संत कबीर के साहित्य का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कबीर का काव्य निर्गुण कवियों की श्रृंखला में संत भाषा व खड़ी बोली में है, जिसे सधुक्कड़ी का नाम दिया जाता है। उनकी कुछ रचनाएँ दैनिक जीवन की भाषा के विपरीत या उल्टे अर्थ वाली भाषा में हैं। उन्हें उलटबाँसी उक्तियाँ कहा जाता है। उलटबाँसी की उक्तियाँ का तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की जटिलता की ओर संकेत करता है। कबीर कई जगह अभिव्यंजना शैली (विपरीत भाव शैली) का प्रयोग भी करते हैं जैसे ‘समदरि लागि आगि’ इस तरह की भाषा को समझना व उसका भाव लगाना भी सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं होता।

प्रश्न 18.
कबीर का अध्ययन वर्तमान में चुनौतीपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
कबीर के बारे में अध्ययन इसलिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि कई गुटों व.मतों के लोग उन्हें अपनों से जोड़ते हैं तथा उसी के अनुरूप उनके पदों का प्रयोग करते हैं। अभी तक कबीर के बारे में यह प्रमाणित नहीं हो पाया है कि वे जन्म से हिन्दू थे या मुस्लिम। यह विवाद 17वीं शताब्दी में उनकी जीवनी-लेखन के साथ ही प्रारंभ हुआ था तथा आज भी जारी है। जनश्रुति व वैष्णव परंपरा के अनुसार कबीर जन्म से हिन्दू थे तथा उनका पालन-पोषण एक मुस्लिम जुलाहे के द्वारा किया गया। यह मुस्लिम जुलाहा भी कुछ समय पहले ही इस्लाम में आया था। इसी तरह कबीर के गुरु रामानंद माने जाते हैं जबकि ऐतिहासिक दृष्टि से दोनों के समय में काफी अधिक अंतर है।

प्रश्न 19.
गुरु नानक देव जी की प्रमुख शिक्षाओं व चिन्तन पर प्रकाश डालिए।
उत्तर:
गुरु नानक देव जी की शिक्षाएँ उनके भजनों व उपदेशों में पाई जाती हैं जिनके आधार पर स्पष्ट है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि को नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने भाषा में जटिलता को महत्त्व न देकर अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 20.
मीराबाई का संक्षिप्त परिचय दें।
उत्तर:
मीराबाई प्रमुख राजपूत मेवाड़ परिवार की वधू तथा मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक कन्या थी। उनका विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ। उन्होंने सामाजिक दायित्व व बन्धन तोड़ते हुए एवं पति की आज्ञा न मानते हुए घर त्याग दिया। मीरा ने गृहस्थ जीवन का रास्ता बदलकर विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना पति मानकर घुमक्कड़ जीवन जीना चुना। उन्होंने अपने गीतों व भजनों में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वस्व न्यौछावर करने की बात कही है।

प्रश्न 21.
जाति-प्रथा के बारे में अलवारों का क्या मत है?
उत्तर:
अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। उन्होंने वैदिक ब्राह्मणों की तुलना में विष्णु भक्तों को प्राथमिकता दी, ये भक्त चाहे किसी भी जाति अथवा वर्ण से थे। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे।

प्रश्न 22.
भारत में इस्लाम का प्रारंभ कैसे हुआ?
उत्तर:
7वीं शताब्दी में इसके उदय के पश्चात् यह धर्म पश्चिमी एशिया में तेजी से फैला और कालांतर में यह भारत में भी पहुँचा। भारत में शुरू में यह व्यापारियों के साथ पहुँचा। फिर राजनीतिक व अन्य कारणों से भी इसका विस्तार हुआ। दिल्ली सल्तनत व मुगल साम्राज्य इसके उदाहरण हैं।

प्रश्न 23.
इस्लाम की पाँच मौलिक शिक्षाएँ कौन-सी हैं?
उत्तर:
इस्लाम की मौलिक शिक्षाएँ इस प्रकार हैं

  • अल्लाह एकमात्र ईश्वर है।
  • पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत अर्थात् शाहद हैं।
  • दिन में पाँच बार नमाज पढ़नी चाहिए।
  • खैरात (ज़कात) बाँटनी चाहिए।
  • जीवन में एक बार हज की यात्रा पर मक्का जाना चाहिए।

प्रश्न 24.
सूफी शब्द से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। सूफीज्म शब्द हमें प्रकाशित रूप में 19वीं सदी में मिलता है। इस्लामिक साहित्य में इसके लिए तसव्वुफ शब्द मिलता है। कुछ विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कुछ अन्य विद्वान सूफी को सोफिया (यानि वे शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं।

प्रश्न 25.
सूफी आंदोलन में सिलसिला से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
सिलसिले का अर्थ है जंजीर अर्थात् वह विचारधारा जो मुर्शीद को मुरीद से जोड़ती है, सिलसिला कहलाता है। सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है।

प्रश्न 26.
‘गरीब नवाज’ की दरगाह के बारे में संक्षेप में बताएँ।
उत्तर:
अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है जिन्हें लोग ‘गरीब नवाज़’ की दरगाह कहते हैं। यह शेख के आचरण, धर्मनिष्ठा व आध्यात्मिकता के कारण विख्यात हुए। मुहम्मद बिन तुगलक सल्तनत काल का पहला सुल्तान था जिसने इस दरगाह की यात्रा की। इसके बाद विभिन्न राज परिवार के लोग तथा शासक यहाँ आते रहे जिसके कारण यह लोकप्रिय होती गई। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया।

प्रश्न 27.
भक्ति आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
भक्ति शब्द की उत्पत्ति “भज्’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ सेवा से लिया जाता है। भक्ति व्यापक अर्थ में मनुष्य द्वारा ईश्वर या इष्टदेव के प्रति पूर्ण समर्पण होता है जिसके अनुरूप व्यक्ति स्वयं को अपने श्रद्धेय में समा लेता है। इसमें सामाजिक रूढ़ियाँ, ताना-बाना, मर्यादाएँ तथा बंधनों की भूमिका नहीं होती। बल्कि सरलता, समन्वय की भावना तथा पवित्र जीवन पर बल दिया जाता है।

प्रश्न 28.
श्री गुरु नानक देव जी की विचारधारा को फैलाने में श्री गुरु अर्जुन देव जी का क्या योगदान है? ।
उत्तर:
श्री गुरु अर्जुन देव जी ने श्री गुरु नानक देव जी के विचारों को संकलित कर एक ग्रन्थ की रचना की जिसे आदि ग्रंथ के रूप में मान्यता मिली। इनके प्रवचनों को ‘गुरबानी’ कहा गया। सत्रहवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी आदि ग्रंथ में जोड़ दिया। अब यह ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब के नाम से जाना जाने लगा।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 29.
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने किस पंथ की स्थापना की? अथवा ‘खालसा पंथ की स्थापना कैसे हुई?
उत्तर:
श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की स्थापना की तथा उन्हें पाँच प्रतीक-बिना कटे केश, कृपाण, कछहरा, कंघा और लोहे का कड़ा धारण करने के लिए कहा। इस तरह दसवें गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय यह समुदाय सामाजिक, धार्मिक व सैनिक दृष्टि से संगठित हो गया।

प्रश्न 30.
असम के प्रमुख संत कवि कौन थे? उन्होंने किस मत का प्रचार किया?
उत्तर:
शंकरदेव असम में वैष्णव धर्म के प्रचारक थे। उनके उपदेश भगवद्गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे। इसलिए इनका धर्म ‘भगवती धर्म’ के नाम से विख्यात हुआ। उन्होंने अपना समर्पण भगवान विष्णु के प्रति व्यक्त करते हुए उपदेश दिए। उन्होंने कीर्तन व श्रद्धावान भक्तों, सत्संग में भगवान विष्णु के उच्चारण पर बल दिया। उनके प्रार्थना स्थल सत्र (मठ) तथा नामघर कहे जाते थे।

प्रश्न 31.
धार्मिक परंपरा को जानने के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर:
धार्मिक परंपराओं के इतिहास की जानकारी के स्रोतों में मूर्तिकला, स्थापत्य कला, धर्मगुरुओं के संदेश व कहानियाँ इसके प्रमुख स्रोत होते हैं। इनके अतिरिक्त धर्म प्रमुख को समझने के लिए बाद की पीढ़ियों व अनुयायियों द्वारा उनके बारे में रचे गए गीत तथा काव्य रचनाएँ भी इतिहास लेखन में महत्त्वपूर्ण होती हैं।

लघु-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
भारत में धार्मिक विश्वास व आचरण में समन्वय से क्या आशय है? अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
भारत में विभिन्न विश्वासों व आचरणों में विश्वास करने वाले लोग प्राचीन काल से ही रहे हैं। इनका आपस में जुड़कर चलना ही विश्वास व आचरण का समन्वय है। इस समन्वय से हमें अनेक देवी-देवताओं के बारे में जानकारी मिलती है। इन देवी-देवताओं में से कुछ प्राचीनकाल के हैं और कुछ कालांतर में दृष्टिगत हुए इन देवी-देवताओं में विष्णु, शिव और देवी की आराधना की परिपाटी अधिक विस्तृत हुई। भारत के विभिन्न समुदायों में विचारों व विश्वासों का आदान-प्रदान होता रहा। धार्मिक विश्वासों में दो प्रक्रियाएँ साथ-साथ चलीं। इनमें एक प्रक्रिया ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की थी। यह परंपरा मूल रूप से उच्च वर्गीय परंपरा थी जो वैदिक ग्रंथों में फली-फूली। इन्होंने ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में भी रचे। विशेषतः पौराणिक ग्रंथों में यह परंपरा काफी सरल रूप में सामने आई। वैदिक परंपरा का यह सरल साहित्य सामान्य लोगों के लिए था अर्थात् स्त्रियों व शूद्रों के लिए जो वैदिक ज्ञान से परिचित नहीं थे, वे भी इसे ग्रहण कर सकते थे। दूसरी परंपरा शूद्र, स्त्रियों व अन्य सामाजिक वर्गों के बीच स्थानीय स्तर पर विकसित हुई, विश्वास प्रणालियों पर आधारित थी। अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की ऐसी प्रणालियाँ काफी लंबे समय में विकसित हुईं।

इन दोनों अर्थात् ब्राह्मणीय व स्थानीय परंपराओं के संपर्क में आने से एक-दूसरे में मेल-मिलाप हुआ। यही मेल-मिलाप समाज की गंगा-जमुनी संस्कृति है। ब्राह्मणीय ग्रंथों में शूद्र व अन्य सामाजिक वर्गों के आचरणों व आस्थाओं को स्वीकृति मिली। इससे इस परंपरा को नया रूप मिला। दूसरी ओर सामान्य लोगों ने कुछ सीमा तक ब्राह्मणीय परंपरा को स्थानीय विश्वास परंपरा में शामिल कर लिया। इसका एक बेहतरीन उदाहरण उड़ीसा में पुरी में देखने को मिलता है। यहाँ स्थानीय देवता जगन्नाथ अर्थात् संपूर्ण विश्व का स्वामी था। बारहवीं सदी तक आते-आते उन्होंने अपने इस देवता को विष्णु के रूप में स्वीकार कर लिया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि प्रतिमा का रूप वही रखा, जो पहले से चला आ रहा था। धार्मिक विश्वास व पूजा पद्धतियों का यह मेल-मिलाप केवल ब्राह्मणीय व स्थानीय पद्धतियों में नहीं था, बल्कि अनेक धार्मिक विचारधाराओं व पद्धतियों के बीच निरंतर चलता रहा। इसने समाज को नई दिशा दी।

प्रश्न 2.
तमिलनाडु की अलवार व नयनार संत परंपरा पर नोट लिखें।
उत्तर:
तमिलनाडु क्षेत्र में छठी शताब्दी भक्ति परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इस परंपरा का नेतृत्व विष्णु भक्त अलवारों तथा शिव भक्त नयनारों ने किया। ये अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। ये अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया। इस तरह ये स्थल तीर्थ स्थलों के रूप में उभरे। संत-कवियों के भजनों को मन्दिरों में अनुष्ठान के समय गाया जाने लगा तथा इन संतों की प्रतिमा भी इष्टदेव के साथ स्थापित कर दी गई। इस तरह इन संतों की भी पूजा प्रारंभ हो गई।

अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे। समाज ने इन संतों व उनकी रचनाओं को पूरा सम्मान दिया तथा उन्हें वेदों जितना प्रतिष्ठित बताया। अलवार संतों के एक मुख्य काव्य ‘नलयिरादिव्यप्रबंधम्’ को तमिल वेद के रूप में मान्यता भी मिली। अलवार नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उदाहरण के लिए अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी। नयनार परंपरा में कराइक्काल अम्मइयार नामक महिला को बहुत सम्मान मिला जिसने घोर तपस्या की। उसकी रचनाओं को सुरक्षित रखा गया। इन परंपराओं में शामिल पुरुषों व स्त्रियों ने सामाजिक बंधनों को त्याग दिया। स्थानीय लोग उनकी उपासना, उनके विचारों व कार्यों के कारण करते थे।

प्रश्न 3.
अलवारों व नयनारों के राज्य के साथ संबंधों का वर्णन अपने शब्दों में करें।
उत्तर:
तमिल क्षेत्र में अलवार व नयनार संत जब अपनी पहचान बना चुके थे, उस समय पल्लव, पांड्य व चोल वंशों के राज्यों ने अलवार-नयनार भक्ति-परंपरा को भी अनुदान दिया। इस अनुदान के सहारे विष्णु व शिव के मंदिरों का निर्माण काफी अधिक मात्रा में हुआ।

चोल शासकों ने चिदम्बरम, तंजावुर तथा गंगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। इन मन्दिरों में शिव की कांस्य प्रतिमाओं को बड़े स्तर पर स्थापित किया। अलवार व नयनार संत वेल्लाल कृषकों व सामान्य जनता में ही सम्मानित नहीं थे, बल्कि शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। सुन्दर मन्दिरों का निर्माण व उनमें मूर्तियों (कांस्य, लकड़ी, पत्थर व अन्य धातुओं) की स्थापना के अतिरिक्त शासक वर्ग ने संत कवियों के गीतों व विचारों को भी महत्त्व दिया, जिसके कारण वे और अधिक लोकप्रिय हुए। अब उनके भजनों को मन्दिरों में गाने पर महत्त्व दिया जाने लगा। संत कवियों के भजनों के संकलन का एक तमिल ग्रन्थ ‘तवरम’ शासकों के द्वारा संकलित करवाया गया। दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का एक और ग्रन्थ संकलित किया गया। यह ग्रन्थ ‘नलयिरादिव्यप्रबन्धम’ (चार हजार पावन रचनाएँ) के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 4.
कर्नाटक की वीरशैव व लिंगायत परंपरा पर नोट लिखें।
उत्तर:
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक क्षेत्र में एक नए आंदोलन की शुरुआत हुई जिसको बासवन्ना (1106-68) नामक ब्राह्मण संत ने नेतृत्व दिया। बासवन्ना को कर्नाटक क्षेत्र में बहुत लोकप्रियता मिली। वे शिव के उपासक थे। उनके अनुयायी वीरशैव कहलाए। इस समुदाय के लोग शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं तथा पुरुष अपने बाएं कंधे पर, चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग को धारण करते हैं। इन्हें लिंगायत कहा जाता है।

लिंगायत समुदाय के लोगों ने जाति व्यवस्था का विरोध किया। ये लोग पुनर्जन्म का भी विरोध करते हैं। इनका मानना है कि वे मृत्यु के बाद भक्त शिव में विलीन हो जाते हैं और पुनः संसार में नहीं लौटते। वे धर्मशास्त्रों में वर्णित श्राद्ध संस्कार को भी नहीं करते। वे अंतिम संस्कार अपनी स्थानीय विधि अनुसार करते हुए मृत शरीर को दफनाते हैं। इन्होंने ब्राह्मणीय धर्मशास्त्रों की मान्यताओं को नहीं स्वीकारा। उन्होंने वयस्क विवाह तथा विधवा पुनर्विवाह को मान्यता प्रदान की। इस समुदाय में अधिकतर वे लोग शामिल हुए जिनको ब्राह्मणवादी व्यवस्था में विशेष महत्त्व नहीं मिला। उन्होंने बासवन्ना के वचनों को गीतों व कविताओं के रूप में गाया। इन्हीं गीतों के माध्यम से वे ब्राह्मणवादी व्यवस्था पर चोट भी करते हैं।

प्रश्न 5.
भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना के बाद शासक व शासितों के संबंध कैसे रहे?
उत्तर:
अरब क्षेत्र में इस्लाम के उदय के पश्चात् यह विश्व के बहुत बड़े हिस्से में फैल गया और भारत में भी आया। भारत पर पहला अरब आक्रमण 711 ई० में सिन्ध पर हुआ तथा उसके बाद आक्रमणों का सिलसिला जारी रहा। इसी कड़ी में पहले दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। दिल्ली सल्तनत (1206-1526) के बाद 1526 से 1707 तक यहाँ मुगलवंश का शासन रहा। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् 18वीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्य उभर कर आए, उनमें भी कुछ इस्लाम को मानने वाले थे। इस प्रकार भारत में इस्लाम परंपरा में विश्वास रखने वाले शासकों ने दीर्घ अवधि तक अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखा। इस राजनीतिक व्यवस्था के सामाजिक, धार्मिक व सांस्कृतिक आयाम भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं रहे। क्योंकि यहाँ शासक इस्लाम में विश्वास करने वाला था तथा जनता का बहुसंख्यक वर्ग गैर-इस्लामी था।

इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले शासक से उम्मीद की जाती थी कि वह सैद्धांतिक व व्यावहारिक रूप में कुरान के दिशा-निर्देशों के अनुरूप शासन करे तथा उलेमा से मार्गदर्शन ले। लेकिन व्यवहार में यह सब प्रचलन में लाना आसान नहीं था। क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। इसलिए शासक को प्रजा की भावना को ध्यान में रखना पड़ता था। सल्तनत काल भारत में इस्लामी राज्य का प्रारंभिक चरण रहा। इन शासकों को बीच की नीति अपनानी पड़ी। मुगल शासकों ने इस बारे में कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं बल्कि

सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 6.
सूफी आंदोलन से क्या अभिप्राय है? इसके विकास में खानकाह व दरगाह की भूमिका पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। हाँ यह स्पष्ट है कि सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग

सूफियों के सामान्य सिद्धांत

  • कुरान में पूर्ण आस्था।
  • हजरत मुहम्मद के जीवन को आदर्श मानना।
  • धर्म सम्मत भोजन ग्रहण करना
  • आराम की वस्तुओं का त्याग करना।
  • दूसरों द्वारा कष्ट पहुँचाने पर कष्ट का अनुभव करना।
  • आदर्शपूर्ण नियम बनाना व उनका पालन करना।

ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कुछ अन्य विद्वान सूफी को सोफिया (यानि वे शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं। इस तरह इस शब्द की | उत्पत्ति के बारे में एक मत तो नहीं हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि इस्लाम में 10वीं सदी के बाद अध्यात्म, वैराग्य व रहस्यवाद में विश्वास करने वाली सूचियों की | संख्या काफी थी तथा ये काफी लोकप्रिय हुए। इस तरह 11वीं शताब्दी तक सूफीवाद एक विकसित आंदोलन बन गया।

सूफी आंदोलन के विकास का केन्द्र खानकाह व दरगाह थी। खानकाह सूफी सिलसिले में शेख (संत, फकीर) अर्थात् पीर या मुर्शीद का निवास होती थी। जहाँ शेख के अनुयायी उनसे आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति व आशीर्वाद प्राप्त करते थे। खानकाहों में ही सिलसिले के नियमों का निर्माण होता था तथा शेख व जन-सामान्य के बीच रिश्तों की सीमा का निर्धारण किया जाता था।

पीर अर्थात् शेख की मृत्यु के बाद उन्हें जिस स्थान पर दफनाया जाता था वह दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) कहलाती थी। दरगाह मुरीदों तथा जन-सामान्य के लिए भक्ति स्थल बन जाती थी। दरगाह पर लोग ज़ियारत (दर्शन) करने आते थे। धीरे-धीरे ज़ियारत विशेष अवसरों विशेषकर बरसी के साथ जुड़ गया। यह ज़ियारत उर्स नाम से जानी जाती थी जिसका अर्थ ईश्वर से पीर की आत्मा के मिलन से लिया जाता था। इस तरह लोग अपनी आध्यात्मिक, ऐहिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु दरगाहों पर आने लगे। इस तरह शेख का लोग वली (ईश्वर के मित्र) के रूप में आदर करने लगे तथा उनके आशीर्वाद से मिली बरकत को विभिन्न प्रकार के करामात से जोड़ने लगे। इस तरह धीरे-धीरे इन केंद्रों पर इस आन्दोलन का बहुत विकास हुआ।

प्रश्न 7.
सिलसिले से क्या अभिप्राय है? इनके नामकरण पर टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
12वीं शताब्दी तक सूफी आंदोलन वैचारिक तौर पर बँटने लगा तथा इन विभाजित समूहों को सिलसिलों का नाम दिया गया। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंजीर जो शेख, पीर या मुर्शीद को अपने अनुयायियों (मुरीदों) से जोड़ती है। इस जंजीर में पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद, फिर शेख तथा फिर उनके उत्तराधिकारी खलीफा होते थे। सिलसिले में शामिल होने वाले व्यक्ति को एक अनुष्ठान द्वारा दीक्षा दी जाती थी।

सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वाले के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म-स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

सिलसिले का नामकरण उनकी शैली व आदर्शों के साथ भी जुड़ा है। कुछ सूफी फकीरों ने सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या कर नवीन मतों की नींव रखी। इन नवीन मतों में जो शरिया में विश्वास करते थे उन्हें बा-शरिया कहते थे तथा जो शरिया की अवहेलना करते थे उन्हें बे-शरिया कहा जाता था।

प्रश्न 8.
खानकाह क्या थी? चिश्ती खानकाह की कार्यप्रणाली अपने शब्दों में लिखें।
उत्तर:
सूफी संत, शेख या पीर जिस स्थान पर रहते थे, उसे खानकाह कहा जाता था। चिश्ती सिलसिले को लोकप्रिय बनाने में भी खानकाह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। हमें दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया के समय के खानकाह से उनके जीवन की जानकारी मिलती है, जिसके आधार पर हम चिश्ती सिलसिले को समझ सकते हैं। यह खानकाह दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्र में यमुना नदी के किनारे गियासपुर क्षेत्र में थी। इस खानकाह क्षेत्र में शेख का परिवार, सेवक, अनुयायी स्थायी तौर पर रहते तथा उपासना करते थे। अतिथियों के लिए भी यहाँ विशेष जगह थी। खानकाह एक बड़ा क्षेत्र था जो चारदीवारी से घिरा हुआ था।

खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी। यहाँ समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन, व्यापारी आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने एवं इबादत करने, ताबीज लेने के लिए यहाँ आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आते थे। विशिष्ट व बौद्धिक वर्ग में अमीर खुसरो जैसे गायक, कवि अमीर हसन सिजनी जैसे दरबारी तथा जिआऊद्दीन बरनी जैसे इतिहासकार आते थे। आने वाले सभी लोग शेख के समक्ष झुककर आदर देते थे। अनुयायी उन्हें पीने को पानी देते थे। नए अनुयायियों को यहाँ दीक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 9.
चिश्ती दरगाह पर जियारत कैसे होती थी? वर्णन करें।
उत्तर:
चिश्ती संतों की दरगाह उनके अनुयायियों तथा जन-सामान्य के लिए तीर्थ-स्थल बन गए। लोग इन स्थानों पर जियारत के लिए जाते हैं तथा संत से आशीर्वाद (बरकत) की कामना करते हैं। लोगों के लिए सर्वाधिक श्रद्धा का स्थल अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह भी थी जिन्हें लोग ‘गरीब नवाज़’ की दरगाह कहते थे। मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने यहाँ पहली इमारत का निर्माण करवाया। दिल्ली व गुजरात के मार्ग पर होने के कारण यह दरगाह यात्रियों के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बन गई। अकबर अपने जीवन में कुल चौदह बार यहाँ आया। वह यहाँ निरंतर 1580 ई० तक आता रहा। उसने प्रत्येक बार इस दरगाह को दान व भेंट दी।

चिश्ती सिलसिले की सभी दरगाहों पर उपासना का एक ढंग नृत्य व संगीत भी था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर कव्वाली का कार्यक्रम अमीर खुसरो द्वारा किया जाता था। चिश्ती उपासना पद्धति में इस तरह संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई।

प्रश्न 10.
सूफी संतों के राज्य के साथ कैसे संबंध रहे? इस बारे में जानकारी दें।
उत्तर:
सूफी सिलसिलों की राज्य के साथ संबंध के बारे में धारणा भिन्न-भिन्न थी। चिश्ती संप्रदाय के अनुयायी व शेख संयम व सादगी पसंद थे। वे सत्ता से दूर रहने का प्रयास करते थे। वे राज व्यवस्था से कटते भी नहीं थे। यदि राज्य द्वारा बिना माँगे दान दिया जाता था तो वे स्वीकार करते थे। इस भाव के आधार पर शासकों ने समय-समय पर खानकाहों को भूमि व दान दिया। चिश्ती विभिन्न तरह के दान को एकत्रित रखने की बजाय उन्हें खाने, वस्त्र पहनने एवं बाँटने तथा समा की महफिलों का आयोजन करने पर विश्वास करते थे। वे ऐसा करना नैतिक दायित्व समझते थे।

दूसरी ओर, संतों की लोकप्रियता के कारण शासक उनसे संपर्क रखना चाहते थे, क्योंकि शासक जनता में उनकी पकड़ से शासन को स्थायी करना चाहते थे। शासकों को मालूम था कि प्रजा का बहुसंख्यक वर्ग गैर-इस्लामी है। कभी-कभार सुल्तानों व सूफियों के बीच आचरण व शासन-व्यवस्था को लेकर तनाव भी हो जाता था। दोनों उम्मीद करते थे कि दूसरा उन्हें झुककर प्रणाम करे या कदम चूमे। ऐसे में शेख को उसके अनुयायी आडंबरपूर्ण ऊँची पदवी दे देते थे। जैसे . निजामुद्दीन औलिया के शिष्य व अनुयायी उन्हें सुल्तान-उल-मशेख (शेखों में सुल्तान) कहकर संबोधित करते थे। सुहरावर्दी व नक्शबंदी सिलसिले की बात करें तो वे क्रमशः दिल्ली सल्तनत के सुल्तानों व मुगल शासकों से जुड़े रहे। उन्होंने शासन का पूरा लाभ उठाया। अतः स्पष्ट है कि सभी सूफी सिलसिलों की राज्य संबंधी धारणा एक-जैसी नहीं थी।

प्रश्न 11.
कबीर की जानकारी के स्रोतों का वर्णन करते हुए, उनकी भाषा-शैली की जानकारी दें।
उत्तर:
कबीरदास भक्ति आंदोलन के संत कवियों में काफी महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। कबीर की जानकारी के साक्ष्य उनकी कविताओं या उनकी मृत्यु के उपरान्त लिखी गई जीवनियों में हैं। वाराणसी व उत्तर-प्रदेश के क्षेत्र में कबीर की मुख्य रचना ‘बीजक’ का संकलन कबीर पंथियों द्वारा किया गया है, जबकि राजस्थान में कबीर ग्रन्थावली को दादू-पंथियों ने तैयार करवाया है। इसी तरह कबीर के कई पद आदिग्रंथ में भी संकलित हैं। ये सभी संकलन उनकी मृत्यु के बाद हुए। कबीर का काव्य निर्गुण कवियों की श्रृंखला में संत भाषा व खड़ी बोली में है, जिसे सधुक्कड़ी का नाम दिया जाता है। उनकी कुछ रचनाओं में दैनिक जीवन की भाषा के विपरीत या उल्टे अर्थ में प्रयोग किया है, इसलिए उन्हें उलटबाँसी उक्तियाँ कहा जाता है। उलटबाँसी की उक्तियों का तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की जटिलता की ओर संकेत करता है। कबीर कई जगह अभिव्यंजना शैली (विपरीत भाव शैली) का प्रयोग भी करते हैं, जैसे ‘समदरि लागि आगि’ इस तरह की भाषा को समझना व उसका भाव लगाना भी सामान्य परिस्थितियों में संभव नहीं होता।

प्रश्न 12.
कबीर का दर्शन किन-किन विचारधाराओं से प्रभावित है? कबीर का अध्ययन इतिहासकारों के लिए चुनौतीपूर्ण क्यों है?
उत्तर:
कबीर के विचार विभिन्न धर्मों तथा दर्शन से प्रभावित हैं। इस्लामी दर्शन से प्रभावित होकर वे सत्य को अल्लाह, हजरत, खुदा व पीर कहते थे। इसी दर्शन में वे एकेश्वरवाद व मूर्तिभंजन का खुला समर्थन करते थे। वेदांत दर्शन से वे अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मा व आत्मा इत्यादि पक्षों को लेते थे। योगी परंपरा से शब्द व शून्य इत्यादि भावों को स्वीकार करते थे। सूफी विचारधारा के जिक्र (मन में धारण करना) व इश्क (प्रेम) को महत्त्व देते थे, जबकि हिन्दू दर्शन ‘नाम सिमरन’ परंपरा को जीवन की सफलता का रहस्य कहते थे।

इतिहासकारों के लिए कबीर का अध्ययन चुनौतीपूर्ण रहा है, क्योंकि विभिन्न भाषाओं व क्षेत्रों में संकलित कबीर-साहित्य में भी मतभेद है। कुछ लोगों का विश्वास है कि इसमें सभी पद कबीर रचित नहीं हैं। फिर भी विद्वान भाषाशैली व विषयवस्तु के आधार पर कबीर के पदों को ढूंढने का प्रयास करते हैं। परन्तु अभी तक इसमें आंशिक सफलता मिली है। कबीर के बारे में अध्ययन और कठिन होने का एक कारण यह भी है कि कई गुटों व मतों के लोग उन्हें अपनों से जोड़ते हैं तथा उसी के अनुरूप उनके पदों का प्रयोग करते हैं। विभिन्न संप्रदाय तथा समूह उन्हें अपना प्रेरक मानते हैं। कबीर की विचारधारा उस युग में समाज में विभिन्न वर्गों के लिए प्रासंगिक थी तथा आज भी अपना अलग महत्त्व रखती है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 13.
गुरु नानक देव जी पर नोट लिखें।
उत्तर:
गुरु नानक देव जी भक्ति परंपरा में निर्गुण संत कवि परंपरा से जुड़े हैं। उनका जन्म 1469 ई० में एक हिन्दू परिवार में वर्तमान पाकिस्तान के तलवंडी (वर्तमान में ननकाना साहब) नामक स्थान पर हुआ। इनका जन्म-स्थान इस्लाम बहुल क्षेत्र था जिस कारण उन्हें इस समुदाय के लोगों के व्यवहार व जीवन को समझने का भरपूर अवसर मिला। पारिवारिक पृष्ठभूमि व्यापारिक होने के कारण उन्होंने लेखाकार.का प्रशिक्षण लिया तथा फारसी सीखी। उनका विवाह छोटी आयु में हो गया तथा पारिवारिक जिम्मेदारी भी काफी थी, लेकिन वे अपना अधिकतर समय सूफी व भक्त संतों के साथ बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर के क्षेत्रों की यात्रा करके विभिन्न प्रकार के अनुभव प्राप्त किए।

गुरु नानक के संदेश उनके भजनों व उपदेशों में पाए जाते हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि को नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही। उन्होंने अपने अनुयायियों (संगत) के लिए नियम निर्धारित किए तथा उन्हें संगठित किया। उन्होंने सामूहिक उपासना पर बल दिया तथा अपने अनुयायी अंगद को उत्तराधिकारी मानते हुए उन्हें गुरु पद पर आसीन किया।

प्रश्न 14.
मीराबाई के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
मीराबाई भक्ति संत कवि परंपरा में सगुणमार्गी विचारधारा से संबंधित है। वह एक कृष्ण भक्त कवयित्री थी। उनकी जीवनी के स्रोत उनके भजन हैं जिन्हें पीढ़ी-दर-पीढ़ी समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा गाया गया। मीराबाई राजपूताना मेवाड़ परिवार की वधू तथा मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक कन्या थी। उनका विवाह उनकी इच्छा के अनुरूप नहीं हुआ। इसलिए उन्होंने सामाजिक दायित्व व बन्धन तोड़ते हुए एवं पति की आज्ञा न मानते हुए घर त्याग दिया। एक जनश्रुति के अनुसार उन्हें मेवाड़ के शाही सिसोदिया वंश द्वारा जहर देकर मारने का प्रयास भी किया गया। मीरा ने गृहस्थ जीवन का रास्ता बदलकर विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना पति मानकर घुमक्कड़ जीवन जीना चुना। उन्होंने अपने गीतों व भजनों में भगवान श्रीकृष्ण को सर्वस्व न्यौछावर करने की बात कही है।

मीराबाई ने पारिवारिक मर्यादाओं को ही नहीं तोड़ा बल्कि समाज की जातिवादी व्यवस्था की भी परवाह नहीं की। मीरा के गुरु रैदास एक चर्मकार थे। उस रूढ़िवादी समाज में राजपूत परिवार का इस तरह से सामान्य जाति से संबंध होना भी बड़ा अपराध था, परंतु उसने इस बात की परवाह नहीं की। मीराबाई के चारों ओर अनुयायियों की भीड़ नहीं लगी तथा न ही उन्होंने किसी समुदाय की नींव डाली। फिर भी गुजरात, राजस्थान व उत्तर भारत के लोगों द्वारा उनके पद गाए जाते हैं तथा वह समाज के एक बड़े वर्ग का प्रेरणा स्रोत है।

प्रश्न 15.
सूफी परंपरा के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं? वर्णन करें।
उत्तर:
सूफी परंपरा की जानकारी के स्रोत काफी हैं जिनको इतिहास लेखन में सामग्री के रूप में अधिक प्रयोग किया जा सकता है। इनका संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

(1) ‘कश्फ-उल-महजुब’ अली बिन उस्मान हुजविरी (मृत्यु 1071) द्वारा सूफी विचार व आचरण पर लिखित प्रारंभिक मुख्य पुस्तक है। इस पुस्तक में यह ज्ञान मिलता है कि बाह्य परंपराओं ने भारत के सूफी चिन्तन को कैसे प्रभावित किया।

(2) मुलफुज़ात (सूफी संतों की बातचीत) फारसी के कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी द्वारा संकलित है। इस कवि द्वारा शेख निजामुद्दीन औलिया की बातचीत को आधार बनाकर ‘फवाइद-अल-फुआद’ ग्रन्थ लिखा गया। इसके बाद भी विभिन्न शेखों की अनुमति से इस तरह की रचनाएँ लिखी गईं। इनका उद्देश्य शेखों के उपदेशों एवं कथनों को संकलित करना होता था।

(3) मक्तुबात लिखे हुए पत्रों का संकलन होता है जिसे या तो स्वयं शेख ने लिखा था या उसके किसी करीबी अनुयायी ने। इन पत्रों में धार्मिक सत्य, अनुभव, अनुयायियों के लिए आदर्श जीवन-शैली व शेख की आकांक्षाओं का पता चलता है। शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के लिखे पत्र ‘मक्तुबात-ए-इमाम रब्बानी’ में संकलित हैं जिसमें अकबर की उदारवादी तथा असांप्रदायिक विचारधारा का ज्ञान मिलता है।

(4) ‘तजकिरा’ सूफी संतों की जीवनियों का स्मरण होता है। भारत में पहला सूफी तजकिरा मीर खुर्द किरमानी का सियार-उल-औलिया है, जो चिश्ती संतों के बारे में है। भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण तजकिरा ‘अख्बार-उल-अखयार’ है। तजकिरा में सिलसिले की प्रमुखता स्थापित करने का प्रयास किया जाता था। इसके साथ ही आध्यात्मिक वंशावली की महिमा को बढ़ा-चढ़ा कर लिखा जाता था। इस तरह तजकिरा में कल्पनीय अद्भुत व अविश्वसनीय बातें भी होती हैं।

प्रश्न 16.
सूफी आंदोलन पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
इस्लाम के रहस्यवाद का दूसरा नाम सूफी है। विद्वानों ने ‘सूफी’ शब्द के अनेक अर्थ बताए हैं। कुछ का मानना है कि सूफी का अर्थ ‘ज्ञानी’ (सोफिया) होता है। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति को सूफी कहा जाता है। ‘सूफी’ शब्द ‘सफा’ से बना है जिसका अभिप्राय साफ-सुथरा अथवा पवित्र होता है। सूफी मत के सिद्धान्तों को निम्नलिखित प्रकार से दर्शाया जा सकता है
(1) परमात्मा के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा एक है। उनका मानना था कि वह अद्वितीय पदार्थ निरपेक्ष है, अगोचर है, अपरिमित है और नानात्व से परे है, वही परम सत्य है।

(2) सूफी साधक आत्मा को ईश्वर का अंग मानते हैं। वह सत्य प्रकाश का अभिन्न अंग है, परन्तु मनुष्य के शरीर में उसका अस्तित्व खो जाता है।

(3) जगत के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि परमात्मा की कृपा से ही अग्नि, हवा, जल तथा पृथ्वी का निर्माण हुआ।

(4) मनुष्य के संबंध में सूफी साधकों का विचार था कि मनुष्य परमात्मा के सभी गुणों को अभिव्यक्त करता है।

(5) सूफी साधकों ने पूर्ण मानव को अपना गुरु (मुर्शीद) माना। बिना आध्यात्मिक गुरु के मनुष्य कभी कुछ प्राप्त नहीं कर सकता।

(6) प्रेम को प्रायः सभी धर्मों में परमात्मा को प्राप्त करने का सर्वश्रेष्ठ साधक माना है। सूफ़ियों ने भी इसी प्रेम के द्वारा परमात्मा को प्राप्त करने की आशा की।
मुस्लिम सूफी फकीरों ने अपने निवास के लिए हिन्दू पद्धति के अनुसार आश्रम बनवाए, जिन्हें ‘खानकाह’ कहा जाता था। भारत में सूफी सम्प्रदायों का विशेष रूप से प्रभाव था।

प्रश्न 17.
भक्ति आन्दोलन के प्रसार के पाँच कारण बताएँ।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन मध्य काल में बहुत अधिक लोकप्रिय हुआ। इसके लोकप्रिय होने के मुख्य पाँच कारण निम्नलिखित हैं

1. भक्ति मार्ग की सरलता-सामान्य तौर पर यह मान्यता है कि ज्ञान-मार्ग तथा कर्म-मार्ग की तुलना में भक्ति-मार्ग आसान है। हिन्दू धर्म में ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के लिए व्यापक साहित्य उपलब्ध है। आम आदमी के लिए यह मार्ग आसान तथा जटिलता से रहित था। अतः यह लोकप्रिय होता चला गया।

2. जाति व्यवस्था की जटिलता तथा भेदभाव-वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा ने धीरे-धीरे जटिल रूप ग्रहण कर लिया था। इस व्यवस्था में भेदभाव भी विद्यमान था। कुछ जातियों को निम्न माना जाता था। इन निम्न जातियों को धर्म-शास्त्र का अध्ययन करने की अनुमति नहीं थी। भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों कबीर, नानक, नामदेव, रविदास आदि ने इसका विरोध किया। उन्होंने जनता में इन आन्दोलनों को लोकप्रिय होने का आधार प्रदान किया।

3. इस्लाम का प्रभाव-इस्लाम के भाई-चारे की भावना, एकेश्वरवाद की धारणा आदि ने हिन्दू समाज को प्रभावित किया तथा भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने इन बातों को स्वीकार कर आन्दोलन चलाया, परन्तु अनेक विद्वान् इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि वैदिक संस्कृति तथा हिन्दू धर्म में भक्ति मार्ग विद्यमान था।

4. वैष्णव आचार्यों के कार्य-दक्षिण के वैष्णव मत के आचार्यों ने दक्षिण भारत में विष्णु भक्ति को फैलाने का कार्य किया। अलवार सन्तों के बाद रामानुज ने दक्षिण में वैष्णव मत का प्रचार-प्रसार किया। इससे भक्ति ने आन्दोलन का रूप ग्रहण किया।

5. समन्वय की भावना-यह भी बताया जाता है कि सूफी आन्दोलन पर ‘योगियों’ तथा ‘सिद्धों’ का अत्यधिक प्रभाव था। इसी प्रकार भक्ति आन्दोलन पर भी सूफीवाद का प्रभाव स्वीकारा जाता है। दोनों आन्दोलन इस्लाम और हिन्दू धर्मों में बेहतर समन्वय स्थापित करना चाहते थे तथा आपसी कट्टरता को कम करना चाहते थे।

प्रश्न 18.
भक्ति आन्दोलन की पाँच प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन एक सरल आन्दोलन था। जन-साधारण को इसके विचार अच्छे लगे। इसकी लोकप्रियता का कारण इसकी विचारधारा थी। इस आन्दोलन की विचारधारा की पाँच विशेषताएँ इस प्रकार हैं

1. एकेश्वरवाद में निष्ठा-भक्ति की धारणा का अर्थ एकेश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा माना गया। ईश्वर को अलग-अलग नामों से पुकारा जा सकता है। भक्ति में दो सम्प्रदाय उभरकर आए। एक वे जो सगुण रूप की उपासना करते थे तथा दूसरे वे जो निर्गुण रूप को मानते थे। उनका कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करता है।

2. ईश्वर के प्रति समर्पण तथा प्रेम पर बल-भक्ति का मुख्य साधन ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण-भाव तथा प्रेम-भाव की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया। उपासक अपने आपको प्रभु चरणों में समर्पित कर प्रभु से एकाकार करने का प्रयत्न करता था।

3. गुरु की महत्ता पर बल-गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ बताया जाता है अन्धकार से प्रकाश में ले जाने वाला। भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने ‘गुरु’ की महिमा को स्वीकार किया। गुरु, जिसने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया है और अब जो दूसरे को मार्ग दिखा सकता है, को ईश्वर के समान दर्जा प्रदान किया गया।

4. मानव मात्र की समानता में विश्वास-भक्ति आन्दोलन से जुड़े सभी संतों ने मानव मात्र की समानता पर बल दिया। संसार के सभी मानवों को उस परम शक्ति (ईश्वर) की सन्तान स्वीकार किया गया। उनमें मौलिक समानता स्वीकार करते हुए किसी भी प्रकार के भेदभाव को अस्वीकार कर दिया गया।

5. मन की शुद्धता तथा पवित्र जीवन पर बल-भक्ति आन्दोलन के संचालकों ने हृदय की शुद्धता तथा पवित्र जीवन पर बल दिया। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि भक्ति के आचरण से सभी बातें जुड़ी हैं तथा सभी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। इससे सभी में प्रेम-भाव पैदा होता है। सर्व से प्रेम-भाव सब प्रकार के भेदों को स्वतः ही समाप्त कर देता है।

दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
तमिलनाडु की भक्ति परंपरा के विभिन्न पक्षों का उल्लेख करें।
उत्तर:
भक्ति परंपरा की शुरुआत वर्तमान तमिलनाडु क्षेत्र में छठी शताब्दी में मानी जाती है। प्रारंभ में इस परंपरा का नेतृत्व विष्णु भक्त अलवारों तथा शिव भक्त नयनारों ने किया। ये अलवार तथा नयनार संतों के रूप में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते थे। ये अपने इष्टदेव की स्तुति में भजन इत्यादि गाते थे। इन संतों ने कुछ स्थानों को अपने इष्टदेव का निवास स्थान घोषित कर दिया जहाँ पर बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण किया गया।

1. जाति-प्रथा के बारे में अलवार-नयनार संतों का दृष्टिकोण-अलवार व नयनार संतों ने जाति प्रथा का खंडन किया तथा ब्राह्मणों की प्रभुता को भी अस्वीकारा। उन्होंने सभी को एक ईश्वर की संतान घोषित किया। इन्होंने वैदिक ब्राह्मणों की तुलना में विष्णु भक्तों को प्राथमिकता दी। वे भक्त चाहे किसी भी जाति अथवा वर्ण से थे। अलवार व नयनार संत ब्राह्मण समाज, शिल्पकार और किसान समुदाय से थे। इनमें से कुछ तो ‘अस्पृश्य’ समझी जाने वाली जातियों में से भी थे। अलवार समाज ने इन संतों व उनकी रचनाओं को पूरा सम्मान दिया तथा उन्हें वेदों जितना प्रतिष्ठित बताया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 1

2. अलवार-नयनार परंपरा में महिला संत-अलवार-नयनार परंपरा में केवल पुरुष ही नहीं थे, बल्कि स्त्रियाँ भी शामिल थीं। उदाहरण के लिए अंडाल नामक अलवार स्त्री के भक्ति गीत उस समय बहुत लोकप्रिय हुए तथा आज भी गाए जाते हैं। वह स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती थी।

3. अलवारों व नयनारों के राज्य के साथ संबंध-जिस समय तमिल क्षेत्र में अलवार व नयनार संत अपनी पहचान बना रहे थे, उस समय पल्लव, पांड्य व चोल वंशों का राज्य इस क्षेत्र पर था। इन राज्यों ने अलवार-नयनार भक्ति-परंपरा को भी फलने-फूलने के भरपूर अवसर दिए। इस अनुदान के सहारे विष्णु व शिव के मंदिरों का निर्माण काफी अधिक मात्रा में हुआ।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 2
चोल शासकों ने चिदम्बरम, तंजावुर तथा गगैकोंडचोलपुरम में विशाल शिव मन्दिरों का निर्माण करवाया। इन मन्दिरों में शिव की कांस्य प्रतिमाओं
को बड़े स्तर पर स्थापित किया। शासक वर्ग ने संत कवियों के गीतों व विचारों को भी महत्त्व दिया, जिसके कारण वे और अधिक लोकप्रिय हुए। अब उनके भजनों को मन्दिरों में गाने पर महत्त्व दिया जाने लगा। संत कवियों के भजनों के संकलन का एक तमिल ग्रन्थ ‘तवरम’ शासकों के प्रयासों का परिणाम है।

प्रश्न 2.
भारत में इस्लामी राज्य कैसे स्थापित हुआ? यह जन-सामान्य में कैसे लोकप्रिय हुआ?
उत्तर:
अरब क्षेत्र में इस्लाम का उदय विश्व के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना है। 7वीं शताब्दी में इसके उदय के पश्चात् यह धर्म पश्चिमी एशिया में तेजी से फैला और कालांतर में यह भारत में भी पहुँचा। भारत पर पहला अरब आक्रमण 711 ई० में सिन्ध पर हुआ तथा उसके बाद आक्रमणों का सिलसिला जारी रहा। इसी कड़ी में पहले दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई। दिल्ली सल्तनत (1206-1526) में मामुलक, खलजी, तुगलक, सैयद व लोधी वंश के शासकों ने शासन किया। इसके बाद 1526 से 1707 तक यहाँ मुगलवंश का शासन रहा। 1707 ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् 18वीं शताब्दी में क्षेत्रीय राज्य उभर कर आए, उनमें भी कुछ इस्लाम को मानने वाले थे। इस प्रकार भारत में इस्लाम परंपरा में विश्वास रखने वाले शासकों ने दीर्घ अवधि तक अपना राजनीतिक वर्चस्व बनाए रखा।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 3
1. शासन में उलेमा वर्ग की भूमिका-उलेमा इस्लाम में धर्मशास्त्री को बोलते हैं जो आलिम का बहुवचन है। आलिम का अर्थ होता है ज्ञानी अर्थात् जिसके पास इलम (ज्ञान) है वह आलिम कहलाएगा तथा आलिमों का समूह उलेमा। इस समूह (उलेमा) का यह कर्त्तव्य था कि शासन-व्यवस्था में शासक को सलाह भी दे तथा धर्म की रक्षा हेतु संतुलित व्याख्या भी करे। लेकिन व्यवहार में भारत में इस्लाम को कठोरता से प्रचलन में लाना आसान नहीं था। क्योंकि शासित जनता भारत में गैर-इस्लामिक (हिन्दू व अन्य) थी। इसलिए शासक ने उलेमा वर्ग को शासन पर हावी नहीं होने दिया।

2. शासकों की नीति-सल्तनत काल तक तो भारत में इस्लामी राज्य का प्रारंभिक चरण रहा। इन शासकों ने व्यावहारिक नीति अपनाकर राज्य को सुरक्षित किया। मुगल शासकों ने इस बारे में कुछ भिन्न कदम उठाए तथा जनता को यह एहसास करवाया कि वे मात्र मुस्लिम समाज के शासक नहीं हैं बल्कि सभी समुदायों के हैं। इस बारे में उन्होंने शासितों के लिए काफी लचीली नीति अपनाई। जैसे अकबर ने 1563 ई० में तीर्थ यात्रा कर में छूट दी, 1564 ई० में जजिया कर हटाया, विभिन्न मन्दिरों व धार्मिक संस्थाओं के लिए भूमि अनुदान दिए तथा कर इत्यादि में छूट दी। वस्तुतः अकबर ने गैर-इस्लामिक (हिंदू) को जिम्मी नहीं वरन् उन्हें बिना किसी भेदभाव के प्रजा स्वीकार किया।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 4

3. इस्लाम की लोक प्रचलित परंपरा-इस्लाम के भारत में आगमन के पश्चात् जो परिवर्तन हुए वे मात्र शासक वर्ग तक सीमित नहीं थे, बल्कि संपूर्ण उपमहाद्वीप के जन-सामान्य के विभिन्न वर्गों; जैसे कृषक, शिल्पी, सैनिक, व्यापारी इत्यादि से भी जुड़े थे। समाज के बहुत-से लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया। उन्होंने अपनी जीवन-शैली व परंपराओं का पूरी तरह परित्याग नहीं किया, लेकिन इस्लाम की आधार स्तम्भ पाँच बातें अवश्य स्वीकार कर लीं।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 5

4. नई भाषाओं व परंपरा को महत्त्व-सामाजिक संदर्भ में सूफी सन्तों द्वारा विचारों की अभिव्यक्ति स्थानीय भाषा में की गई। . इसी कारण पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिन्दी, गुजराती जैसी भाषाओं को बल मिला क्योंकि इन भाषाओं के लोगों ने कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए इनका प्रयोग किया।

5. स्थापत्य कला पर प्रभाव- इस्लाम का लोक प्रचलन जहाँ भाषा व साहित्य में देखने को मिलता है, वहीं स्थापत्य कला (विशेषकर मस्जिद) के निर्माण में भी स्पष्ट दिखाई देता है। भारतीय उपमहाद्वीप में जो मस्जिदें बनीं उनमें मौलिकताएँ तो मस्जिद वाली हैं लेकिन छत की स्थिति, निर्माण का सामान, सज्जा के तरीके व स्तंभों के बनाने की विधि अलग थी। इनको जन-सामान्य ने अपनी भौगोलिक व परंपरा के अनुरूप बनाया। इससे स्पष्ट होता है कि इस्लामिक स्थापत्य स्थानीय लोक प्रचलन का एक हिस्सा बन गया।

प्रश्न 3.
सूफी आन्दोलन क्या था? भारत में इसका विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
सूफी शब्द की उत्पत्ति के बारे में सभी इतिहासकार एकमत नहीं हैं। हाँ यह स्पष्ट है कि सूफीवाद का अंग्रेजी समानार्थक शब्द सूफीज्म है। सूफीज्म शब्द हमें प्रकाशित रूप में 19वीं सदी में मिलता है। इस्लामिक साहित्य में इसके लिए तसव्वुफ शब्द मिलता है। कुछ विद्वान यह स्वीकारते हैं कि यह शब्द ‘सूफ’ से निकला है जिसका अर्थ है ऊन अर्थात् जो लोग ऊनी खुरदरे कपड़े पहनते थे उन्हें सूफी कहा जाता था। कुछ विद्वान सूफी शब्द की उत्पत्ति ‘सफा’ से मानते हैं जिसका अर्थ साफ होता है। इसी तरह कछ अन्य विद्वान सफी को सोफिया (यानि शुद्ध आचरण) से जोड़ते हैं। इस तरह इस शब्द की उत्पत्ति के बारे में एक मत तो नहीं हैं, लेकिन इतना अवश्य है कि इस्लाम में 10वीं सदी के बाद अध्यात्म, वैराग्य व रहस्यवाद में विश्वास करने वाली सूचियों की संख्या काफी थी तथा ये काफी लोकप्रिय हुए। इस तरह 11वीं शताब्दी तक सूफीवाद एक विकसित आंदोलन बन गया।

सूफिया के सामान्य सिद्धात

  • करान में पूर्ण आस्था।
  • हजरत मुहम्मद के जीवन को आदर्श मानना।
  • धर्म सम्मत भोजन ग्रहण करना
  • आराम की वस्तुओं का त्याग करना।
  • दूसरों द्वारा कष्ट पहुँचाने पर कष्ट का अनुभव न करना।
  • आदर्शपूर्ण नियम बनाना व उनका पालन करना।

1. सूफी आंदोलन के केन्द्र खानकाह व दरगाह-सूफी आंदोलन के विकास का केन्द्र खानकाह व दरगाह थी। खानकाह सूफी सिलसिले में शेख (संत, फकीर) अर्थात् पीर या मुर्शीद का निवास होती थी, जहाँ शेख के अनुयायी उनसे आध्यात्मिक ज्ञान, शक्ति व आशीर्वाद प्राप्त करते थे। खानकाहों में ही सिलसिले | के नियमों का निर्माण होता था तथा शेख व जन-सामान्य के बीच रिश्तों की सीमा का निर्धारण किया जाता था। पीर अर्थात् शेख की मृत्यु के बाद उन्हें जिस स्थान पर दफनाया जाता था वह दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) कहलाती थी। दरगाह मुरीदों तथा जन-सामान्य के लिए भक्ति-स्थल बन जाती थी। दरगाह पर लोग ज़ियारत (दर्शन) करने आते थे। धीरे-धीरे ज़ियारत विशेष अवसरों विशेषकर बरसी के साथ जुड़ गया। यह ज़ियारत उर्स नाम से जानी जाती थी जिसका अर्थ ईश्वर से पीर की आत्मा के मिलन से लिया जाता था। इस तरह लोग अपनी आध्यात्मिक, ऐहिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कामनाओं की पूर्ति हेतु दरगाहों पर आने लगे। इस तरह शेख का लोग वली (ईश्वर के मित्र) के रूप में आदर करने लगे तथा उनके आशीर्वाद से मिली बरकत को विभिन्न प्रकार के करामात से जोड़ने लगे।

2. सिलसिलों की भूमिका भारत में सूफी आन्दोलन विभिन्न सिलसिलों द्वारा फैलाया गया। इन सूफी सिलसिलों के नाम मुख्य रूप से उनके स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े। जैसे चिश्ती सिलसिले का नाम उसके संस्थापक ख्वाजा इसहाक, शामी, चिश्ती, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी तथा नक्शबंदी सिलसिला बहाऊद्दीन नक्शबन्द के नाम से पड़ा। यहाँ पर ध्यान देने योग्य है चिश्ती सिलसिले के संस्थापक ख्वाज़ा इसहाक शामी का चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान में स्थित उनके जन्म-स्थान चिश्ती नामक शहर से जुड़ा है।

भारत में मुख्य रूप से चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी, नक्शबंदी, शतारी व फिरदोसी सिलसिले स्थापित हुए। परंतु इन सब में सर्वाधिक प्रमुख तथा लोकप्रिय चिश्ती सिलसिला हुआ।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 4.
भारत में सूफी सिलसिला क्यों तथा कैसे लोकप्रिय हुआ?
उत्तर:
भारतीय उपमहाद्वीप में कई सिलसिलों की स्थापना हुई। इनमें सर्वाधिक सफलता चिश्ती सिलसिले को मिली, क्योंकि जन-मानस इसके साथ अधिक जुड़ पाया। चिश्ती सिलसिले की स्थापना ख्वाजा इसहाक शामी चिश्ती ने की। परंतु भारत में इसकी स्थापना का श्रेय मुईनुद्दीन चिश्ती को जाता है। मुईनुद्दीन चिश्ती का जन्म 1141 ई० में ईरान में हुआ। इस सिलसिले के अन्य संतों में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी, हमीदुद्दीन नागौरी, निजामुद्दीन औलिया व शेख सलीम चिश्ती – इत्यादि थे। इनकी कार्य-प्रणाली, जीवन-शैली व ज्ञान ने भारत के जन-सामान्य को आकर्षित किया। इस सिलसिले के लोकप्रिय होने के कारणों का वर्णन इस प्रकार है
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 6
1. चिश्ती खानकाह की कार्य प्रणाली-चिश्ती सिलसिले को लोकप्रिय बनाने में भी खानकाह की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। हमें दिल्ली स्थित निजामुद्दीन औलिया के समय के खानकाह के जीवन की जानकारी विभिन्न साक्ष्यों में मिलती है जिसके आधार पर हम चिश्ती सिलसिले को समझ सकते हैं।

खानकाह में एक सामुदायिक रसोई (लंगर) फुतूह (बिना माँगे दान) से निरन्तर चलती थी। यहाँ सुबह से शाम तक समाज के प्रत्येक वर्ग के लोग, सैनिक, दास, धनी-निर्धन, व्यापारी आते थे। इसके अतिरिक्त गायक, हिन्दू-मुस्लिम, जोगी, कलंदरज्ञान लेने वाले, विचार-विमर्श करने, इबादत करने, ताबीज लेने के लिए यहाँ आते थे। कुछ लोग अपने विवादों का समाधान करवाने या यात्रा विश्राम के लिए भी यहाँ आने वाले सभी लोग शेख के समक्ष झुककर आदर देते थे। अनुयायी उन्हें पीने को पानी देते थे। नए अनुयायियों को यहाँ दीक्षा दी जाती थी व यौगिक क्रियाएँ करवाई जाती थीं।

2. चिश्ती दरगाह में उपासना पद्धति-जैसा कि बताया गया है चिश्ती संतों की दरगाह उनके अनुयायियों तथा जन-सामान्य के लिए तीर्थ-स्थल बन गए। लोग इन स्थानों पर जियारत के लिए जाते थे तथा संत से आशीर्वाद (बरकत) की कामना करते थे। विगत शताब्दियों से समाज के सभी वर्गों के लोग इन दरगाहों में आस्था व्यक्त करते रहे हैं। चिश्ती सिलसिले की सभी दरगाहों पर उपासना का एक ढंग नृत्य व संगीत था। इसमें सबसे महत्त्वपूर्ण कव्वाली होती थी। कव्वाल इस गायन के द्वारा रहस्यवादी गुणगान करते थे एवं इस तरह आध्यात्मिक संगीत द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास करते थे। चिश्ती उपासना पद्धति में संगीत सभा निरंतर लोकप्रिय होती गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन पर भक्ति परंपरा का प्रभाव था।

3. सूफी परंपरा व भाषा-सूफी फकीरों व संतों की लोकप्रियता का एक मुख्य कारण यह भी है कि उन्होंने स्थानीय भाषा में अपने विचारों को अभिव्यक्ति दी। चिश्ती सिलसिले के शेख व अनुयायी तो मुख्य रूप से हिंदवी में बात करते थे। सूफियों ने ईश्वर के प्रति आस्था व मानवीय-प्रेम को कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। इनकी भाषा भी सामान्य व्यक्ति की थी।

प्रश्न 5.
सूफी मत पर हिन्दू मत का क्या प्रभाव पड़ा? भारतीय समाज में सूफी मत की क्या भूमिका रही?
उत्तर:
सूफी आन्दोलन इस्लाम से जुड़ा था, परन्तु उस पर हिन्दू मत का प्रभाव था। उसने इस मत से कई चीजें ग्रहण की।

(क) सूफी मत पर हिन्दू मत का प्रभाव

1. आत्मा के संबंध में विचार-अलबिरुनी के कथानुसार आत्मा के सम्बन्ध में सूफी सिद्धान्त पतंजलि के ‘योगसूत्र’ के सिद्धान्त की ही तरह है। सूफी रचनाओं में यह विचार अभिव्यक्त है कि “प्रतिदान प्राप्त करने के उद्देश्य से शरीर आत्मा का ही मूर्त रूप होता है।” अलबिरुनी ने आत्म-विकास के रूप में दैवी प्रेम के सूफी सिद्धान्त की पहचान भगवद्गीता के समानान्तर अनुच्छेदों से की है। तेरहवीं शताब्दी तक भारतीय सूफीयों का सामना कनकटे (खंडित कर्ण वाले) योगियों अथवा गोरखनाथ के नाथ अनुयायियों से हुआ। शेख निजामुद्दीन औलिया इस सिद्धान्त से प्रभावित थे कि मानव-शरीर शिव तथा शक्ति के रूप में विभक्त होता है। इस आधार पर सिर से नाभि तक का भाग जो शिव से सम्बद्ध होता है, आध्यात्मिक होता है। नाभि से नीचे का भाग जो शक्ति से सम्बद्ध होता है, लौकिक होता है। शेख निजामुद्दीन औलिया योग के इस सिद्धान्त से प्रभावित थे कि बच्चे के नैतिक चरित्र का निर्धारण बच्चे के गर्भावस्था में आने के समय से ही हो जाता है।

2. योग तथा प्राणायाम का प्रभाव हठयोग की पुस्तक अमृतकुण्ड का तेरहवीं शताब्दी में अरबी तथा फारसी में अनुवाद किया गया था। इसका सूफी मत पर स्थायी प्रभाव पड़ा। शेख नासिरुद्दीन चिराग-ए-देहलवी ने कहा था कि प्राणायाम सूफी मत का सारतत्व है। प्राणायाम आरम्भ में जानबूझ कर किया गया कार्य होता है, परन्तु बाद में स्वचलित हो जाता है। उन्होंने सिद्धों के रूप में प्रसिद्ध योगियों की भान्ति प्राणायाम का अभ्यास करने पर अधिक बल दिया। यौगिक मुद्राएँ तथा प्राणायाम चिश्तिया सूफी पद्धति का अभिन्न अंग बन गईं। शेख हमीदुद्दीन नागौरी के हिन्दी पदों से भी योग का प्रभाव दृष्टिगत होता है।

3. नाथ सिद्धान्तों (अलख) का प्रभाव-चिश्तिया शेख अब्दुल कुद्स गंगोही पर नाथ सिद्धान्तों का दूरगामी प्रभाव पड़ा था। उनका हिन्दी उपनाम अलख (अगोचर) था। उनका कथन है कि अगोचर भगवान् (अलख निरंजन) अदृश्य है। एक अन्य पद में शेख ने अलख निरंजन की पहचान ईश्वर (खुदा) से की है। रुसदनामा में योगी संत गौरखनाथ के सन्दर्भो में उनकी तुलना परमसत्ता के अन्तिम सत्य से की गई है। इन दृष्टान्तों से प्रकट होता है कि सूफी धार्मिक विश्वासों पर हिन्दू तन्त्रवाद की क्रियाओं का स्पष्ट भाव था।

4. ऋषि परंपरा को स्वीकारना-कश्मीर की शैव महिला योगी लल्ल या लाल देड़ (लल्ल योगेश्वरी) द्वारा व्यक्त विचारों के साथ सूफी धारणाओं का समन्वय शेख नूरुद्दीन ऋषि के ऋषि आन्दोलन में परिलक्षित होता है। नूरुद्दीन और उनके अनुयायियों ने हिन्दू सन्तों के समान ही अपने को ऋषि कहलाना प्रारम्भ किया था। पन्द्रहवीं शताब्दी के बंगाल में नाथपंथी विचारों को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। अकबर के दरबार में फारसी में संस्कृत ग्रंथों के अनुवाद से मुसलमानों को हिन्दू दर्शन की वेदान्त शाखा का परिचय मिला। सूफी संत जनता की भाषा में उपदेश देते थे तथा हिन्दी, बंगाली, पंजाबी, कश्मीरी आदि सभी प्रान्तीय भाषाओं के विकास में उनका अत्यधिक योगदान रहा।

(ख) भारतीय समाज में सूफी धर्म की भूमिका

मध्ययुगीन भारतीय समाज में सूफी सन्तों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की।

1. हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में समन्वय-इस धर्म का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान हिन्दू-मुस्लिम सम्प्रदायों में समन्वय की भावना पैदा करना था। सूफी सन्तों ने सामाजिक सेवा को व्यावहारिक रूप दिया और उसे परमात्मा की सेवा का एकमात्र साधन बताया।

2. नैतिक आचरण को बढ़ावा-सूफी सन्तों ने अपने शिष्यों में समाज सेवा, सद्व्यवहार और क्षमा आदि गुणों पर जोर दिया। उन लोगों ने जनता के चरित्र तथा उनके दृष्टिकोण को सुधारने का प्रयास किया।

3. राज्य नीति को प्रभावित करना-सुलतानों के रूढ़िवादी इस्लामी विचार भी इन सन्तों को मान्य नहीं थे। अतः उन्होंने शक्ति प्रलोभन तथा तलवार द्वारा धर्म परिवर्तन की नीति का अनुमोदन नहीं किया। वे राजनीति से अलग रहे। उन्होंने लोगों से स्पष्ट कहा कि इस अन्धकारमय युग में प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि लेखनी, वाणी, धन तथा पद से दुख संतप्त प्रजा की सेवा करे। इस प्रकार उन्होंने शासकों के हृदय में प्रजा की भलाई की भावना पैदा की।

4. क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में योगदान-एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन करके उन्होंने पारस्परिक मतभेदों को दूर करने की चेष्टा की। खड़ी बोली, जो कि सर्वसाधारण की भाषा थी, के विकास में सूफी सन्तों ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके अतिरिक्त पंजाबी, गुजराती आदि क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में योगदान दिया।

प्रश्न 6.
भक्ति आन्दोलन क्या था? इसकी उत्पत्ति व प्रसार के कारणों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
भक्ति शब्द की उत्पत्ति ‘भज्’ शब्द से हुई है जिसका अर्थ सेवा से लिया जाता है। भक्ति व्यापक अर्थ में मनुष्य द्वारा ईश्वर या इष्टदेव के प्रति पूर्ण समर्पण होता है

भक्ति आंदोलन की विशेषताएँ

  • एकेश्वरवाद में निष्ठा।
  • ईश्वर के प्रति समर्पण।
  • गुरु को अत्यधिक महत्त्व देना।
  • मानव मात्र की समानता में विश्वास ।
  • जीवन की पवित्रता को महत्त्व।
  • धर्म की सरलता में विश्वास।
  • समाज की बुराइयों का विरोध।
  • हिन्द-मस्लिम एकता को महत्त्व।
  • प्रेम की शुद्धता को महत्त्व।

जिसके अनुरूप व्यक्ति स्वयं को अपने श्रद्धेय में समा लेता है। इसमें सामाजिक रूढ़ियाँ, ताना-बाना, मर्यादाएँ तथा बंधनों की भूमिका नहीं होती। बल्कि सरलता, समन्वय की भावना तथा पवित्र जीवन पर बल दिया जाता है। भक्ति संत कवियों ने समाज की रूढ़ियों व नकारात्मक चीजों का विरोध कर, उसके प्रत्येक वर्ग को अपने साथ जोड़ा, जिनके चलते हुए समाज का एक बड़ा वर्ग इनका अनुयायी व समर्थक बन गया। सभी भक्त कवियों ने मोटे तौर पर एक ईश्वर में विश्वास, ईश्वर के प्रति निष्ठा व प्रेम तथा गुरु के महत्त्व पर बल दिया। साथ ही मानव मात्र की समानता, जीवन की पवित्रता, सरल धर्म तथा समन्वय की भावना के लिए कहा। इन संत कवियों में सगुण व निर्गुण के आधार पर अंतर था। सगुण के कुछ संत कवि भगवान राम के रूप में लीन थे जबकि कुछ को कृष्ण का रूप पसन्द था। इन्हीं आधारों पर इन्हें राममार्गी तथा कृष्णमार्गी कहा जाता था।

भक्ति आन्दोलन की उत्पत्ति और प्रसार के कारण-यद्यपि भक्ति तथा सूफी आन्दोलनों के संदर्भ में प्रचलित धारणाओं का विश्लेषण करते हुए इन आन्दोलनों की उत्पत्ति के संबंध में भी विचार व्यक्त किए हैं, परन्तु भक्ति आन्दोलन की उत्पत्ति तथा प्रसार के कारण को विस्तार से जानना उपयोगी होगा। विभिन्न विद्वानों द्वारा इसकी उत्पत्ति और प्रसार के बारे में निम्नलिखित कारण बताए जाते हैं

1. भक्ति मार्ग की सरलता-सामान्य तौर पर यह मान्यता है कि ज्ञान-मार्ग तथा कर्म-मार्ग की तुलना में भक्ति-मार्ग आसान है। हिन्दू धर्म में ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करने के लिए व्यापक साहित्य उपलब्ध है। अनेक दर्शनों (छठ दर्शन) के द्वारा इसकी जानकारी प्राप्त होती है। दूसरा कर्म-काण्डों एवं पूजा-पाठ की क्रियाओं को अपनाना भी जटिल था। यद्यपि गीता में इन तीनों मार्गों का सम्मिलन किया गया तथा एक के बिना दूसरे को अछूत बताया गया है, परन्तु आम आदमी के लिए यह मार्ग आसान तथा जटिलता से रहित था। अतः यह लोकप्रिय होता चला गया।

2. जाति व्यवस्था की जटिलता तथा भेदभाव-वर्ण व्यवस्था तथा जाति प्रथा ने धीरे-धीरे जटिल रूप ग्रहण कर लिया था। इस व्यवस्था में भेदभाव भी विद्यमान था। कुछ जातियों को निम्न माना जाता था। इन निम्न जातियों को धर्म-शास्त्र अध्ययन की अनुमति नहीं थी। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को दूर करने का प्रयत्न बौद्ध धर्म द्वारा किया गया था, जो कि एक समय में बहुत लोकप्रिय हुआ, परन्तु राजपूतकाल में बौद्ध-धर्म का पतन होता चला गया। अतः इस समय लोग ऐसे मार्ग की ओर देख रहे थे जो उन्हें आसानी से अपनी जीविका कमाते हुए ईश्वर तक पहुँचने का या मोक्ष का मार्ग प्रदान करे। भक्ति आन्दोलन के अनेक सन्तों कबीर, नानक, नामदेव, रविदास आदि ने अपने स्वयं के उदाहरणं देते हुए जनता में इन आन्दोलनों को लोकप्रिय होने का आधार प्रदान किया।

3. हिंदुओं द्वारा धर्मान्तरण तथा अछूतों की असहाय अवस्था-इस्लाम के आगमन पर भारत में हिन्दुओं द्वारा इस्लाम मत अपनाया जाने लगा। यह मत बदलने वाले लोग निम्न जातियों तथा अछूत मानी जानी वाली जातियों में से थे, जिनको सवर्ण माने जाने वाले हिन्दुओं द्वारा हेय दृष्टि से देखा जाता था। अछूतों को तो वर्ण व्यवस्था से बाहर ही माना जाता था। उत्तर-वैदिक काल के पश्चात् अछूतों की दशा में बहुत गिरावट आई। बौद्ध मत भी अपने आपको जाति प्रथा से पूर्णरूप से मुक्त नहीं कर सका। ऐसी अवस्था में अछूतों की दशा अधिक असहाय रूप में उभरी। भक्ति आन्दोलन ने जाति के बन्धनों को पूरी तरह से अस्वीकार किया। मात्र ईश्वर-समर्पण तथा ईश्वर-भजन पर जोर दिया। इस प्रकार यह विचार व्यक्त किया जाता है कि हिन्दू धर्म में सुधार लाने, धर्मान्तरण पर रोक लगाने तथा अछूतों को मुक्ति का मार्ग दिलाने की आवश्यकताओं के कारण भक्ति आन्दोलन का उदय तथा प्रसार हुआ।

4. इस्लाम का प्रभाव-ताराचन्द्र, हुमायूँ कबीर आदि इतिहासकारों ने भक्ति आन्दोलन के लिए इस्लाम के सम्पर्कों को महत्त्वपूर्ण माना है। इस्लाम के भाईचारे की भावना, एकेश्वरवाद की धारणा आदि ने हिन्दू समाज को प्रभावित किया तथा भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने इन बातों को स्वीकार कर आन्दोलन चलाया, परन्तु अनेक विद्वान् इस मत को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि वैदिक संस्कृति तथा हिन्दू धर्म में भक्ति मार्ग विद्यमान था। उत्तर वैदिक काल में उपनिषदों ने ‘एक’ की बात को स्थापित कर दिया तथा भक्ति को अन्य मार्गों से जोड़ने का कार्य गीता के द्वारा किया गया था।

5. वैष्णव आचार्यों के कार्य दक्षिण के वैष्णव मत के आचार्यों ने दक्षिण भारत में विष्णु भक्ति को फैलाने का कार्य किया। अलवार सन्तों के बाद रामानुज ने दक्षिण में वैष्णव मत का प्रचार व प्रसार किया। ये लोग, विष्णु (बारह अवतारों में से एक ) के अनन्य भक्त थे। उनके सम्प्रदाय में अधिकतर लोग निम्न जातियों से थे, परन्तु ब्राह्मण, स्त्रियाँ तथा कुछ राजा भी इस सम्प्रदाय में शामिल हो गए। भक्ति गीतों के माध्यम से इन्होंने वैष्णव मत का प्रचार व प्रसार किया। इस प्रकार प्रारम्भ में वैष्णव भक्ति दक्षिण में उपजी तथा धीरे-धीरे इसका प्रचार उत्तर में हुआ और इसने भक्ति आन्दोलन का रूप ग्रहण किया जिसमें अनेक सम्प्रदाय शामिल थे। संक्षेप में यह स्वीकार किया जा सकता है कि भक्ति आंदोलन की उत्पत्ति में किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता। तत्कालीन परिस्थितियों तथा अनेक कारणों ने इसकी उत्पत्ति और प्रसार में योगदान दिया।

प्रश्न 7.
संत कबीर कौन थे? भक्ति संत परम्परा में उनके महत्त्व को स्पष्ट करें। अथवा संत कबीर के जीवन और उपदेशों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन के एक प्रमुख संत कबीर का जन्म 1440 ई० में एक विधवा के यहाँ हुआ माना जाता है। लोक-लज्जा के भय से उसने नवजात शिशु को वाराणसी में लहरतारा के पास एक तालाब के समीप छोड़ दिया। निःसन्तान जुलाहा नीरु तथा उसकी पत्नी नीमा उसे उठा लाए और उसका नाम कबीर रखा। इस प्रकार कबीर का प्रारम्भिक जीवन एक मुस्लिम परिवार में बीता, लेकिन कबीर ने स्वयं को हिन्दू-मुस्लिम से परे रखकर एक योगी कहा। कबीर की शिक्षा-दीक्षा किसी संस्था में नहीं हुई। उन्होंने जो कुछ प्राप्त किया, वह उनके जीवन का गहरा अनुभव था। वे भक्ति और सूफी सन्तों के सम्पर्क में आए। रामानन्द का प्रभाव कबीर पर सबसे अधिक था। रामानन्द ने उन्हें रामभक्ति का मन्त्र दिया। हिन्दू धर्म तथा दर्शन सम्बन्धी शिक्षा दी। कबीर की शिक्षा देशाटन, सत्संगति तथा विभिन्न सम्प्रदायों के साथ सम्पर्क का परिणाम था। स्वयं सिकन्दर लोधी ने उनके प्रभाव को स्वीकार किया था।

कबीर ने जो कुछ भी प्राप्त किया था वह सब उन्होंने समाज को अर्पित कर दिया। उनकी भाषा से यह निष्कर्ष निकलता है कि उन्होंने खूब पर्यटन किया होगा। उनकी भाषा में खड़ी बोली, पूर्वी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी, अरबी, फारसी आदि भाषाओं के शब्दों का प्रचुर प्रयोग हुआ है। कबीर ने रमैणी, शब्द, साखी तथा छन्दों में साहित्य की रचना की। उनकी रचनाओं के संकलन को बीजक कहा जाता है। गुरु ग्रन्थ साहिब में उनकी रचनाओं को शामिल किया गया है। संत कबीर ने अपनी शिक्षाओं में निम्नलिखित बातों पर मुख्य तौर पर जोर दिया

1. धर्म की सहजता कबीर ने धर्म को जन-साधारण रूप देने के लिए उसकी सहजता पर बल दिया। कबीर मत में साधन सहज होना चाहिए। प्रतिदिन के जीवन के साथ धर्म साधना का कोई विरोध नहीं होना चाहिए। कबीर ने इस सत्य को खूब समझा था। यही कारण है कि वे संन्यासियों के शिरोमणि होकर भी सहज बने रहे। धर्म में सहजता के कारण कबीर का दर्शन भी सहज हो गया।

2. कर्मयोग पर बल-पहली बार कबीर ने धर्म को अकर्मण्यता से हटाकर कर्मयोग की भूमि पर टिकाया था और उसे सहज बनाकर जन-साधारण के लिए ग्राह्य बनाया।

3. बाह्य आडम्बरों का खण्डन-कबीर ने किसी भी धार्मिक विश्वास, लोक तथा वेद के अन्धानुकरण को स्वीकार नहीं किया। हिन्दू धर्म के आचारों; जैसे पूजा, उत्सव, वेदपाठ, तीर्थयात्रा, व्रत, छुआछूत तथा कर्मकाण्डों पर कबीर ने कस-कसकर व्यंग्य किया। कबीर के अनुसार यदि विचार शुद्ध एवं पवित्र नहीं हैं तो धर्म भी पवित्र नहीं हो सकता। उन्होंने हिन्दुओं की मूर्ति-पूजा को व्यर्थ कहा तथा दूसरी ओर इन्होंने मुसलमानों के नमाज पढ़ने के ढंग पर तीखा प्रहार किया।

4. कबीर की धर्म-निरपेक्षता कबीर के युग में दो धर्मों, संस्कृतियों एवं सभ्यताओं का संघर्ष था। कबीर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच समानता का प्रतिपादन करके तथा पारस्परिक विरोध को समाप्त करके उन्हें एकता के सूत्र में बांधना चाहते थे।

5. भक्ति भावना-कबीर ने भक्ति मार्ग को कर्म मार्ग तथा ज्ञान मार्ग से श्रेष्ठ बताते हुए कहा कि जब तक आराध्य के प्रति भक्ति भाव नहीं है, तब तक जप, तप, संयम, स्नान, ध्यान आदि सब व्यर्थ हैं। वे आत्म अनुभव को ही एक मात्र ज्ञान मानते हैं जो भक्ति भाव के बिना नहीं हो सकता तथा जिसे वह प्राप्त होता है वह अन्य को यह अनुभव दे नहीं सकते।
कबीर ने लिखा है

“आत्म अनुभव ग्यान की जो कोई पूछे बात।
सो गूंगा गुढ़ खाइके कहै कौन मुख स्वाद।”

कबीर ने भक्ति को पराकाष्ठा पर पहुँचाया। उनके अनुसार, भक्ति आत्म अनुभव है तथा उसमें मुक्ति की मांग का भी समर्पण है। कबीर का यह कथन बहुत गहन तथा गहरा है।

“राता माता नाम का, पीया प्रेम अधाय।
मतवाला दीदार का, मांगे मुक्ति बलाय।”

6. गुरु की महत्ता पर बल-कबीर ने अपनी भक्ति में गुरु को बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। कबीर की दृष्टि में गुरु वह साधु है जिसे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्त है। उन्होंने ठीक ही कहा है

“गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, जिन गोबिन्द दियो बताय।”

7. अद्वैतवाद पर बल-निर्गुणवादी कबीर ईश्वर के सगुण रूप को भले ही न मानते हों किन्तु कण-कण में उस मूल तत्त्व की व्याप्ति को एवं उसकी कृपा के प्रसाद को कभी नहीं नकारते। मानव शरीर जिस तत्त्व से चलायमान है वह आत्मा है। कबीर ने परम ब्रह्म को मूल तत्त्व की संज्ञा दी है। यही अद्वैत तत्त्व है। आत्मा सर्वव्यापी है। वह निराकार, निर्विकार एवं अनन्त है। कबीर के आत्मा सम्बन्धी विचार गीता पर आधारित हैं।

8. कुरीतियों तथा अन्धविश्वासों का खण्डन-कबीर एक महान् समाज-सुधारक थे। हिन्दू समाज की जाति प्रथा, नारी वर्ग का नैतिक अवमूल्यन, पर्दा प्रथा, बाल विवाह उनके लिए सहानुभूति का विषय बन गया था। निम्न जातियों पर उच्च वर्ग का घोर अत्याचार, शिक्षा के अभाव में जादू-टोना, शकुन-अपशकुन, जीव-हिंसा, मांस भक्षण, वेश्यागमन, अन्धविश्वास आदि कुरीतियाँ समाज की जड़ें खोखली कर रही थीं। कबीर ने तटस्थ होकर सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं को देखा था और अपने प्रबल व्यक्तित्व से इन्हें मिटाने का प्रयास किया।

अतः कहा जा सकता है कि मध्ययुगीन समाज-सुधारकों में कबीर का व्यक्तित्त्व और कृतित्व है। वे मात्र भक्त ही नहीं वरन् एक भविष्यद्रष्टा, युगस्रष्टा, समाज सुधारक, महात्मा तथा एक महान् उच्च गुणों से सम्पन्न मानव भी थे।

प्रश्न 8.
गुरु नानक देव जी कौन थे? इनके जीवन व शिक्षाओं पर प्रकाश डालें।
अथवा गुरु नानक देव जी के मुख्य उपदेशों का वणन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ?
उत्तर:
गुरु नानक देव जी सिक्ख धर्म के संस्थापक थे। उनका जन्म 1469 ई० में आधुनिक पाकिस्तान में तलवंडी (ननकाना साहब) में हुआ। इनका परिवार व्यापार करता था। इनका विवाह छोटी आयु में हो गया तथा पारिवारिक जिम्मेदारी भी काफी थी लेकिन वे अपना काफी समय सूफी व भक्त संतों के साथ बिताते थे। उन्होंने दूर-दूर के क्षेत्रों की यात्रा करके विभिन्न प्रकार के अनुभव पाए। … गुरु नानक देव जी के संदेश उनके भजनों व उपदेशों में पाए जाते हैं जिसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों; जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप को नकारा। उन्होंने हिन्दू व मुस्लिम दोनों धर्मों के ग्रन्थों की पवित्रता को भी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने ईश्वर के आकार, रूप, लिंग इत्यादि नकारते हुए निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। उन्होंने रब या ईश्वर की उपासना का मार्ग निरंतर स्मरण तथा नाम के जाप को बताया। उन्होंने अपनी बात क्षेत्रीय लोक भाषा (पंजाबी) में कही। उन्होंने सामूहिक उपासना पर बल दिया तथा अपने अनुयायी अंगद को उत्तराधिकारी मानते हुए उन्हें गुरु पद पर आसीन किया। इस तरह वे दूसरे गुरु बने तथा उनके बाद गुरु बनाने की परंपरा लगभग दो शताब्दियों तक चलती रही तथा गुरु गोबिंद सिंह दसवें गुरु तक इस परंपरा का निर्वाह किया गया। इनकी शिक्षाओं का संक्षेप में वर्णन इस प्रकार है

1. मानव समानता मध्यकालीन एकेश्वरवादी धार्मिक सिद्धान्त में अन्तर्निहित मानवीय समानता के नैतिक विचारों के अनुरूप हैं। इनका विचार था कि जाति के अनुसार सोचना मूर्खता है। किसी व्यक्ति का सम्मान ईश्वर के प्रति उसकी निष्ठा के कारण होना चाहिए, न कि उसकी सामाजिक स्थिति के कारण। इनका कहना है, “ईश्वर व्यक्ति के गुणों को जानता है, पर वह उसकी जाति के बारे में नहीं पूछता, क्योंकि दूसरे लोक में कोई जाति नहीं है।” उनका उद्देश्य अपने अनुयायियों में समानता और बन्धुत्व की भावना का संचार करना था। गुरु नानक देव जी छुआछूत के सिद्धांत में विश्वास नहीं करते थे जिसने समाज को अनेक टुकड़ों में विभाजित कर दिया . था।

2. अकाल पुरुष-गुरु नानक देव जी ने निराकार (आकार-रहित) ईश्वर की कल्पना की और इस निराकार ईश्वर को इन्होंने अकाल पुरुष (अनन्त एवं अनादि ईश्वर) की संज्ञा दी।

3. अन्धविश्वासों तथा रूढ़िवाद की निन्दा-गुरु नानक देव जी बड़े गहन और सशक्त विचारों वाले व्यक्ति थे। अतः इन्होंने बड़ी स्पष्टता या सार्वजनिक जीवन के नैतिक मापदण्डों, सामाजिक व्यवहारों एवं विश्वासों का निर्धारण किया। ये धार्मिक एवं सामाजिक अंधविश्वासों के भयंकर विरोधी थे और इन्हें सांस्कृतिक एवं सामाजिक पिछड़ेपन का प्रतीक मानते थे। इन्होंने अन्धविश्वासों को धार्मिक मूल्यों से पृथक् करने के लिए लोगों को शिक्षित किया। हिन्दू और इस्लाम दोनों के अन्धविश्वासों और रूढ़िवाद की निन्दा की गई।

4. एकेश्वर-गुरु नानक देव जी एकेश्वरवादी थे और कुछ अन्य भक्ति सन्तों के विपरीत इनका एकेश्वरवाद अनन्य था। इनका अवतारवाद में विश्वास नहीं था। इन्होंने यह शिक्षा दी कि सम्पूर्ण जगत् में एक ही ईश्वर है, अन्य कोई नहीं है। गुरु नानक

5. सद्गुणों पर बल-गुरु नानक देव जी का कहना है कि सद्गुणों के बिना भक्ति नहीं हो सकती। सच्चाई निःसन्देह बड़ी है, लेकिन सच्चा जीवन उससे भी बढ़कर है। व्यक्ति को विनम्रता, दया, क्षमा और मधुरवाणी जैसे गुणों को कर्मठतापूर्वक अपनाना चाहिए। सत्य की खोज करने वाले व्यक्ति का प्राथमिक कर्त्तव्य ईश्वर का स्मरण है। ईश्वर का नाम याद करो तथा सब कुछ छोड़ दो। सिमरन ईश्वर की भक्ति की पद्धति है। ईश्वर कहीं बाहर नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति के अन्तःस्थल में निवास करता है। ईश्वर सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त है, शरीर में भी निवास करता है। सत्य बोलो, तब तुम अपने भीतर ईश्वर का अनुभव करोगे। नानक ईश्वर पर सर्वशक्तिमान यथार्थ के रूप में विश्वास करते थे, लेकिन इन्होंने दृढ़तापूर्वक कहा कि प्रेम एवं भक्ति के द्वारा व्यक्तिगत मानवीय आत्मा का ईश्वर के साथ मिलन हो सकता है।
HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 Img 7

प्रश्न 9.
भक्ति आन्दोलन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं? वर्णन करें।
उत्तर:
भक्ति आन्दोलन मध्यकाल का एक सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन था। इसने इस समाज को दिशा दी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं…

1. एकेश्वरवाद में निष्ठा-भक्ति आन्दोलन के संत एक ईश्वर (एकेश्वर) की सत्ता में निष्ठा रखते थे। उनका मानना था कि राम, रहीम, अल्लाह, ईश्वर, ओंकार सब उसी एक सत्ता के मनुष्यों द्वारा दिए गए नाम हैं। भक्त एक ही ईश्वर की उपासना करते थे। भक्ति में दो सम्प्रदाय उभरकर आए। एक वे जो सगुण रूप की उपासना करते थे तथा दूसरे वे जो निर्गुण रूप को मानते थे। सगुण उपासक वैष्णव के रूप में प्रसिद्ध हुए। इनके आराध्य देव राम और कृष्ण रहे। निर्गुण मतानुयायी मूर्ति-पूजा को नहीं मानते थे। उनका कहना था कि ईश्वर सर्वव्यापी है तथा प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में निवास करता है।

2. ईश्वर के प्रति समर्पण तथा प्रेम पर बल-भक्ति का मुख्य साधन ईश्वर के चरणों में पूर्ण समर्पण-भाव तथा प्रेम-भाव की उत्पत्ति को स्वीकार किया गया। उपासक अपने आपको प्रभु चरणों में समर्पित कर प्रभु से एकाकार करने का प्रयत्न करता था। इसमें ईश्वर के प्रति प्रेम-भाव को महत्त्वपूर्ण माना जाता था। कबीर ने दिव्य प्रेम पर अत्यधिक बल दिया। सन्तों का मत था कि समर्पण भाव से काम, क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार आदि पर नियन्त्रण किया जा सकता है। अहंकार को मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा माना गया। समर्पण, ईश-कृपा तथा गुरु-भक्ति से अहंकार की समाप्ति संभव मानी गई।

3. गुरु की महत्ता पर बल-गुरु शब्द का शाब्दिक अर्थ अन्धकार से प्रकाश में ले जाने वाला बताया जाता है। भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने ‘गुरु’ की महिमा को स्वीकार किया। गुरु जिसने ईश्वर का साक्षात्कार कर लिया और अब जो मार्ग दिखा सकता हो। गरु को ईश्वर के समान दर्जा प्रदान किया गया। संत कबीर ने गुरु को वह नाव बताई जो शिष्य को भवसागर से पार उतार सकती है। सन्तों ने स्वीकार किया कि गुरु मनुष्य को उसके वास्तविक स्वरूप का दर्शन करवा सकता है। गुरु वह द्वार है, जहाँ से ईश्वर का मार्ग साफ हो जाता है। गुरु निकटता से ही अहंकार से छुटकारा प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार गुरु नानक देव जी ने स्वीकारा “गुरु भक्ति ही नाव है, वह दिव्य घर में पहुँचाने की सीढ़ी है, वह मनुष्य की सोई आत्मा को जगाता है और सेवा, प्रेम तथा भक्ति के मार्ग पर चलने में सहायता देता है।

4. मानव मात्र की समानता में विश्वास-सभी भक्ति आन्दोलन से जुड़े सन्तों ने मानव मात्र की समानता पर बल दिया। उन्होंने जाति, वर्ग, धर्म या लिंग के भेद के आधार पर समाज में मानव की असमानता को अस्वीकार किया। संसार के सभी मनुष्यों को उस परम शक्ति (ईश्वर) की सन्तान स्वीकार किया गया। संतों का विश्वास था कि स्वार्थी लोगों ने (चाहे वे धर्म से जुड़े थे या राजनीति से जुड़े थे) अपने हित साधन के लिए मानव जाति को विभिन्न जातियों या सम्प्रदायों में बांट दिया है। संतों ने प्रेम, भाईचारे तथा शान्ति से रहने का उपदेश दिया। सन्तों ने कहा कि परमात्मा की कृपा से हृदय में प्रेम उपजने पर भक्त के लिए अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, जात-पात के भेद स्वतः ही समाप्त हो जाते हैं तथा इस प्रकार भक्ति-मार्ग मानव मात्र में समानता की स्थापना करने में सहायक सिद्ध हुआ। इस रूप में भक्ति आन्दोलन, समतावादी आन्दोलन था।

5. पवित्र जीवन पर बल–भक्ति आन्दोलन ने पवित्र जीवन पर बल दिया। पवित्र जीवन को आचरण के साथ-साथ खान-पान व शुद्ध एवं मेहनत की कमाई से जोड़ा गया। प्राचीन योग परम्परा से सम्बन्धित नियमों पर बल दिया गया। अनेक संत स्वयं अपने हाथ से काम करते थे तथा सादा जीवन व प्रभु-भक्ति का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे। नानक, कबीर, रविदास, नामदेव का जीवन इस दृष्टि से उल्लेखनीय है जिन्होंने लोगों के समक्ष अपना उदाहरण प्रस्तुत किया तथा अपने शिष्यों को प्रेरणा प्रदान की।

6. धार्मिक सरलता पर बल-भक्ति आन्दोलन के सभी सन्तों ने धर्म की सरलता पर बल दिया। धर्म के नाम पर चल रहे अनेक आडम्बरों, अन्ध-विश्वासों, दिखावे, कर्म-काण्डों तथा ढकोसलों का खण्डन किया। यहाँ तक कि अनेक सन्तों ने मूर्ति पूजा का भी विरोध किया। कबीर तथा नानक इनमें प्रमुख थे। हिन्दू धर्म तथा इस्लाम के अनेक रीति-रिवाज़ों को अस्वीकार किया गया। पुरोहित वर्ग की अधिसत्ता तथा कर्म-काण्डों की निन्दा की गई। मुल्ला के द्वारा ऊँचे स्वर में अल्लाह को पुकारने को आडम्बर करार दिया गया। धर्म में यज्ञों तथा कर्म-काण्डों के लिए कोई स्थान स्वीकार नहीं किया गया। यहाँ तक कि उपवास, रोजों, तीर्थयात्रा, गेरुए वस्त्रों, शरीर पर राख लगाने, कुण्डल डालने, दाढ़ी-मूंछ रखने, सिर मुंडवाने आदि को बाह्य आडम्बर बताया तथा इनका मजाक भी उड़ाया। सच्चा धर्म उसे स्वीकारा, जिसमें सरलता हो। आडम्बरों के स्थान पर मानवीय गुणों तथा नैतिकता पर जोर दिया गया हो। बाहरी दिखावे को नहीं वरन् आन्तरिक शुद्धता को धर्म का आधार माना गया। कबीर ने कहा वह व्यक्ति अधिक धार्मिक तथा पुण्यात्मा है जिसका मन पवित्र है। ईमानदारी, भाई-चारे, प्रेम, सहयोग, दया, अहिंसा आदि मानवीय गुणों को सरल धर्म का आधार स्वीकार किया।

7. समन्वयवाद की भावना-भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तकों ने हिन्दू तथा इस्लाम में समन्वयवादी भावना के आधार पर सौहार्दपूर्ण संबंध स्थापित करने के प्रयत्न किए। भक्ति और सूफी आन्दोलनों में अनेक सन्तों के शिष्य सभी धर्मों और सम्प्रदायों से संबंध रखने वाले थे। कबीर तथा नानक ने इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कार्य किया। नानक पर इस्लाम की परंपराओं की छाप देखी जा सकती है। इसी प्रकार बल्लभाचार्य राजनीति से अलग रहकर धर्म और संस्कृति के माध्यम से इन दोनों धर्मों के अनुयायियों के बीच सामंजस्य चाहते थे। भक्ति तथा सूफी सन्तों के द्वार शूद्रों, ब्राह्मणों, मुसलमानों, अमीर-गरीब सभी के लिए खुले रहते थे।

8. समाज सुधार-यद्यपि भक्ति आन्दोलन मूलतः एक धार्मिक आन्दोलन था, परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि धर्म और समाज की व्यवस्था आपस में पूरी तरह से जुड़ी होती है। धर्म में सुधार का सीधा प्रभाव समाज पर भी पड़ता रहा है। इस दृष्टि से भक्ति आन्दोलन के द्वारा समाज सुधार के कार्य भी किए गए। भक्ति आन्दोलन ने जाति प्रथा का घोर विरोध किया। अस्पृश्यता को परमात्मा तथा मानवता के खिलाफ अपराध बताया। स्त्रियों की दशा को सुधारने के प्रयत्न भी किए। अनेक संतों ने सती प्रथा, कन्या वध तथा दास प्रथा का भी विरोध किया। यही नहीं, उन्होंने अत्यधिक धन संग्रह तथा आर्थिक असमानता पर भी प्रहार किया। यह महत्त्वपूर्ण तथ्य है कि एक भक्त की स्थिति में पहुंचने पर भक्त के हृदय से यह सामाजिक दोष स्वतः ही दूर हो जाते हैं। वह जाति-पाति, छुआछूत से ऊपर उठ जाता है।

HBSE 12th Class history Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ

प्रश्न 10.
भक्ति आन्दोलन के प्रमुख प्रभावों का वर्णन करें।
उत्तर:
मध्यकालीन भारतीय समाज के सभी क्षेत्रों को भक्ति आन्दोलन ने प्रभावित किया। सभी क्षेत्रों में इसके दूरगामी प्रभाव रहे। भारत में मिली-जुली संस्कृति (Composite Culture) के निर्माण में भक्ति आन्दोलन ने अहम् भूमिका निभाई।

1. धार्मिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन के सन्तों ने हिन्दू धर्म की कुरीतियों, बाह्य आडम्बरों, कर्मकाण्डों आदि का खण्डन किया। इससे इस धर्म में सुधार हुआ। बड़ी संख्या में लोगों ने भक्ति आन्दोलन की शिक्षाओं का पालन करना शुरू किया। हिन्दू धर्म तथा दर्शन के वास्तविक स्वरूप को सन्तों ने सारे देश में फैलाने का कार्य किया। भक्ति ने उत्तरी भारत तथा दक्षिणी भारत के सांस्कृतिक सम्पर्कों को भी बढ़ावा दिया। सगुण तथा निर्गुण भक्ति ने हिन्दू धर्म को नया जोश प्रदान किया। इस तरह भक्ति आन्दोलन, जिसे हिन्दू धर्म में सुधार आन्दोलन भी स्वीकार किया जाता है, ने हिन्दू धर्म को सर्वप्रिय बनाने में सहयोग दिया। इससे धर्मान्तरण में कमी आई। इस्लाम के एकेश्वरवाद, भाई-चारे की भावना व सामाजिक समानता के आदर्शों को भक्ति सन्तों ने अपनी शिक्षाओं में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। निर्गुण उपासकों ने मूर्तिपूजा का खण्डन किया।

भक्ति आंदोलन से कालान्तर में नए-नए सम्प्रदायों का जन्म हुआ। इन सम्प्रदायों का आधार विभिन्न सन्तों द्वारा विशेष सिद्धान्तों पर बल देना या उनकी परम्परा को आगे बढ़ाना था। उदाहरण के लिए कबीर, दादू, चैतन्य, तुकाराम के अनुयायियों ने कबीरपंथ, दादूपंथ, काली बाबा वरकरी पंथ आदि की स्थापना कर ली। गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं ने सिक्ख धर्म का रूप धारण कर लिया। गुरु नानक देव प्रथम गुरु माने गए तथा गुरु परम्परा में नौ अन्य गुरु हुए और अन्त में गुरु ग्रन्थ साहिब को गुरु का स्थान प्रदान किया गया। गुरु ग्रन्थ साहिब में भक्ति सन्तों और सूफी सन्तों की वाणी को प्रमुख स्थान दिया गया।

2. सामाजिक प्रभाव-सामाजिक स्तर पर सन्तों द्वारा जाति प्रथा को समाप्त तो नहीं किया जा सका, परन्तु सन्तों के जाति प्रथा के विरोध ने यह सिद्ध कर दिया कि मानव अपने अच्छे कर्मों तथा प्रयत्नों से उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है चाहे उसका जन्म किसी भी जाति में हुआ हो या उसका व्यवसाय कुछ भी हो। रामानन्द निम्न जातियों के लोगों को गुरु मन्त्र देकर अमर हो गए। कबीर जुलाहे थे परन्तु मध्यकाल की महान् संत परम्परा में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त हुआ। रविदास को तथाकथित निम्न जाति से होने पर भी समाज में उच्च स्थान प्राप्त हुआ। कहते हैं कि धन्ना भक्त से भगवान् ने स्वयं अन्न ग्रहण किया। इस प्रकार सन्तों ने अपने आचरण तथा प्रयत्नों के आधार पर जाति प्रथा पर प्रहार किया। भक्ति आंदोलन से सामाजिक समरसता, सुख शान्ति एवं सामाजिक दायित्व की भावना को बल मिला। इससे मानवता की सेवा को बढ़ावा मिला।

3. राजनीतिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन का प्रभाव राजनीतिक क्षेत्र में देखा जा सकता है। अकबर की धार्मिक नीति तथा दीन-ए-इलाही की स्थापना पर भक्ति तथा सूफी आन्दोलन की अमिट छाप रही है। उसने भारतीय समाज के सभी धर्मों तथा सम्प्रदायों से सद्व्यवहार की नीति अपनाई। राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए। अकबर की धार्मिक सहनशीलता तथा समानता की नीति ने उसकी राजनीतिक सफलताओं को प्रभवित किया। इसके अतिरिक्त सिक्ख तथा मराठा शक्ति के उदय में भी भक्ति आंदोलन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

4. सांस्कृतिक प्रभाव-भक्ति आन्दोलन के प्रादेशिक भाषा तथा साहित्य के विकास व कला क्षेत्र में उल्लेखनीय सांस्कृतिक प्रभाव रहे हैं। भक्ति सन्तों का प्रभाव पंजाब से दक्षिण भारत तथा गुजरात से बंगाल तक देखा जा सकता है। जहाँ-जहाँ ये संत उपदेश देते थे, स्थानीय शब्द उनकी भाषा का माध्यम व अंग बन जाते थे। इस रूप में भारतीय प्रादेशिक भाषाओं का विकास तथा उसमें साहित्य की रचना भक्ति आन्दोलन की महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक देन है। ब्रजभाषा, खड़ी बोली, पंजाबी, बंगाली, उड़िया, आसामी, गुजराती, राजस्थानी आदि में उनके उपदेशों तथा रचनाओं ने इन भाषाओं के विकास में योगदान दिया। कबीर, नानक देव, मीरा, दादूदयाल, तुलसीदास, सूरदास, चैतन्य, ज्ञानेश्वर, जयदेव, नामदेव, तुकाराम आदि सन्तों का प्रादेशिक भाषा और साहित्य की उन्नति में सराहनीय योगदान रहा। भक्ति तथा सूफी आन्दोलन के कारण समाज में सहनशीलता का वातावरण तैयार हुआ। इससे इस्लाम की कला परंपराएँ जिस पर ईरान तथा मध्य एशिया का प्रभाव मुख्य था तथा भारतीय कला परंपराओं का संगम हुआ। स्थापत्य (Architecture) में इसे इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला के नाम से जाना जाता है। इसी प्रकार चित्रकला में भी ईरानी तथा भारतीय चित्रकला ने एक-दूसरे को प्रभावित किया। संगीत के क्षेत्र में भी भक्ति सन्तों का प्रभाव देखा जा सकता है।

सूफी सन्तों ने भी संगीत कला को प्रभावित किया। अमीर खुसरो ने भारतीय धुनों के आधार पर कव्वाली और ख्याल जैसी संगीत शैलियों का आविष्कार किया। वाद्य यत्रों में सितार (ईरानी तम्बूरे तथा भारतीय वीणा का मिश्रण) तबले का आविष्कार हुआ। इस्लामी जगत् के वाद्य यन्त्र (सारंगी, रूबाब, शहनाई) का भारत में प्रचलन हुआ। इसी प्रकार भक्ति तथा सूफी आन्दोलनों के संयुक्त प्रभाव के परिणामस्वरूप कला का विकास हुआ। संक्षेप में हम कह सकते हैं कि भक्ति आन्दोलन ने सूफी आन्दोलन के साथ मिलकर भारतीय समाज को व्यापक रूप से प्रभावित किया जिसकी अमिट छाप भारतीय संस्कृति, धर्म, राजनीति, समाज, प्रादेशिक भाषाओं एवं साहित्य कला एवं स्थापत्य आदि क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देती है।

HBSE 12th Class History Important Questions Chapter 6 भक्ति-सूफी परंपराएँ : धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ Read More »