Class 11

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 2 मानचित्र मापनी Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सी विधि मापनी की सार्वत्रिक विधि है?
(A) साधारण प्रकथन
(B) निरूपक भिन्न
(C) आलेखी विधि
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(B) निरूपक भिन्न

2. मानचित्र की दूरी को मापनी में किस रूप में जाना जाता है?
(A) अंश
(B) हर
(C) मापनी का प्रकथन
(D) निरूपक भिन्न
उत्तर:
(B) हर

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

3. मापनी में ‘अंश’ व्यक्त करता है-
(A) धरातल की दूरी
(B) मानचित्र की दूरी
(C) दोनों दूरियां
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(A) धरातल की दूरी

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक किसे कहते हैं?
उत्तर:
मानचित्र पर प्रदर्शित किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की दूरी तथा पृथ्वी पर उन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक दूरी के अनुपात को मापक कहते हैं।

प्रश्न 2.
मापक की हमें क्यों जरूरत पड़ती है?
उत्तर:
किसी भी क्षेत्र के बराबर आकार का मानचित्र नहीं बनाया जा सकता। यद्यपि क्षेत्र के अनुपात में कुछ छोटा मानचित्र बनाया जा सकता है। इसके लिए मापक जरूरी है। दूसरे मानचित्र पर दूरियों को मापने और विभिन्न स्थानों की सापेक्षित स्थिति ज्ञात करने के लिए भी हमें मापक की जरूरत पड़ती है।

प्रश्न 3.
मानचित्र पर मापक को कितने तरीकों से व्यक्त किया जा सकता है?
उत्तर:
तीन विधियों से-

  1. कथनात्मक मापक
  2. प्रदर्शक भिन्न (R.E.) और
  3. रैखिक मापक।

प्रश्न 4.
प्रदर्शक भिन्न (R.F.) क्या होती है?
उत्तर:
यह मापक प्रदर्शित करने वाली भिन्न होती है जिसके बाईं ओर की संख्या अंश तथा दाईं ओर की संख्या हर कहलाती है। अंश (Numerator) का मान (Value) सदा 1 होता है जो मानचित्र की दूरी को दिखाता है और हर (Denominator) धरातल की दूरी को दिखाता है। इन दोनों की इकाई सदा एक-जैसी होती है।

प्रश्न 5.
R.F. को किस मापन-प्रणाली द्वारा व्यक्त किया जाता है?
उत्तर:
प्रदर्शक भिन्न या R.E. की कोई मापन-प्रणाली नहीं होती। यह तो केवल भिन्न (Fraction) के द्वारा व्यक्त होता है।

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प्रश्न 6.
प्रदर्शक भिन्न को मापक व्यक्त करने की अन्य विधियों से बेहतर क्यों माना जाता है?
अथवा
प्रदर्शक भिन्न को अंतर्राष्ट्रीय मापक क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
R.F. किसी भी मापन-प्रणाली से जुड़ा हुआ नहीं होता। अतः हर देश में इसका प्रयोग हो सकता है, इसलिए यह एक बेहतर विधि है।

प्रश्न 7.
विकर्ण मापक का क्या लाभ है?
उत्तर:
विकर्ण मापक से मानचित्र की छोटी-से-छोटी दूरी भी सरलता से मापी जा सकती है, क्योंकि इस मापक के द्वारा 1 सें०मी० या 1 इंच का 100वां हिस्सा भी दिखाया जा सकता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मापक क्या है? स्पष्ट कीजिए।
अथवा
मापक को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
मापक की परिभाषा एवं अर्थ (Definition and Meaning of Scale)-पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का मानचित्र बनाने से पहले हम तय करते हैं कि मानचित्र की कितनी दूरी से धरातल की कितनी दूरी दिखाई जानी है। इस प्रकार हम मानचित्र की दूरी और धरातल की दूरी के बीच एक संबंध स्थापित करते हैं। यही संबंध मापक को जन्म देता है। मापक वह अनुपात है जिसमें धरातल पर मापी गई दूरियों को छोटा करके मानचित्र में प्रदर्शित किया जाता है। सरल शब्दों में, “मानचित्र पर किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की सीधी दूरी तथा पृथ्वी पर उन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक सीधी दूरी के अनुपात को मापक कहते हैं।” (Scale is the ratio between a distance measured on a map and the corresponding distance on the Earth.) इसे निम्नलिखित सूत्र में भी व्यक्त किया जा सकता है-
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 1
उदाहरण के तौर पर, मान लीजिए एक मानचित्र पर A तथा B कोई दो बिंदु हैं, जिनके बीच की दूरी 1 सें०मी० तथा धरातल पर इन्हीं दो बिंदुओं के बीच की दूरी 5 किलोमीटर है; तो उस मानचित्र का मापक 1 सें०मी० : 5 कि०मी० होगा।

प्रश्न 2.
मापक की आवश्यकता को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मापक की आवश्यकता (Necessity of Scale)-
(1) हम सभी जानते हैं कि पृथ्वी के धरातल के आकार के बराबर मानचित्र नहीं बनाया जा सकता। अगर बन भी जाए तो वह निरर्थक होगा। प्रदर्शित.किए जाने वाले क्षेत्र की तुलना में मानचित्र का काफी छोटा होना ही उसकी उपयोगिता और सार्थकता को दर्शाता है। मानचित्र आवश्यकतानुसार आकार वाला होना चाहिए। यह कार्य केवल मापक द्वारा ही हो सकता है।

(2) मापक के अभाव में मानचित्र पर विभिन्न स्थानों की सापेक्षित स्थिति (Relative Position) नहीं दिखाई जा सकती। जो मानचित्र मापक के अनुसार न बना हो वह केवल एक कच्चा रेखाचित्र (Rough Sketch) होता है।

प्रश्न 3.
मापक की विभिन्न पद्धतियों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
मापक की पद्धतियाँ (Methods of Measurement)-मापक की दो पद्धतियाँ हैं-
1. मेट्रिक प्रणाली इस प्रणाली के अंतर्गत धरातल पर किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की क्षैतिज दूरी को मापने के लिए किलोमीटर, मीटर एवं सेंटीमीटर इत्यादि का प्रयोग किया जाता है। मेट्रिक प्रणाली का उपयोग भारत तथा विश्व के अन्य अनेक देशों में किया जाता है।

2. अंग्रेज़ी प्रणाली-इस दूसरी पद्धति में मील, फल्ग, गज व फुट आदि इकाइयों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रणाली का उपयोग संयुक्त राज्य अमेरिका एवं इंग्लैंड दोनों देशों में किया जाता है। रेखीय दूरियों को मापने व प्रदर्शित करने के लिए 1957 से पूर्व इस पद्धति का प्रयोग भारत में भी किया जाता था।
मापक की पद्धतियाँ:
मापक की मेट्रिक प्रणाली

  • 1 कि०मी० = 1,000 मीटर
  • 1 मीटर = 100 सें०मी०
  • 1 सें०मी० = 10 मिलीमीटर

मापक की अंग्रेज़ी प्रणाली

  • 1 मील = 8 फर्लांग
  • 1 फर्लांग = 220 यरर्ड
  • 1 यार्ड = 3 फुट
  • 1 फुट = 12 इंच

प्रश्न 4.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 5 सें०मी० : 1 कि०मी० है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.F.) ज्ञात करें।
क्रिया:
पग 1.
धरातल की दूरी को सें०मी० में परिवर्तित कीजिए, क्योंकि मानचित्र पर दूरी सें०मी० में है। 1 कि०मी० = 1,00,000 सें०मी०।।
पग 2.
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R.F = \(\frac{5}{1,00,000}=\frac{1}{20,000}\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.F. = 1:20,000

प्रश्न 5.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 1 सें०मी० : 250 मीटर है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.E.) ज्ञात कीजिए। क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को सें०मी० में बदलिए क्योंकि मानचित्र की दूरी सें०मी० में है। 250 मीटर = 100 x 250 = 25,000 सें०मी०
पग 2.
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 2
R.F. = \(\frac { 1 }{ 25,000 }\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.E. = 1:25,000

प्रश्न 6.
एक मानचित्र का कथनात्मक मापक 3.5 सें०मी० : 7 कि०मी० है। उसका प्रदर्शक भिन्न (R.F.) . ज्ञात करें।
क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को सें०मी० में बदलिए, क्योंकि मानचित्र की दूरी सें०मी० में है।
7 कि०मी० = 7 x 1,00,000 सें०मी०
पग 2.
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R.E = \(\frac{3.5}{7,00,000}=\frac{1}{2,00,000}\) (अंश सदैव 1 रहता है)
उत्तर:
R.F. = 1:2,00,000

प्रश्न 7.
1 इंच : 8 मील वाले कथनात्मक मापक को प्रदर्शक भिन्न (R.F.) में परिवर्तित कीजिए। क्रिया : पग 1. धरातल की दूरी को इंचों में बदलिए क्योंकि मानचित्र की दूरी इंचों में है।
8 मील = 8 x 63,360 = 5,06,880 इंच
(1 मील = 63,360 इंच)
पग 2.
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R.E. = \(\frac{1}{5,06,880}\) (अंश सदैव 1 ही रहता है।)
उत्तर:
R.E. = 1:5,06,880

प्रश्न 8.
एक मानचित्र पर प्रदर्शक भिन्न \(\frac{1}{3,00,000}\) दिया गया है। इसे कि०मी० में दिखाने के लिए कथनात्मक मापक बनाइए।
क्रिया : पग 1. R.F. \(\frac{1}{3,00,000}\) ; इसे मीट्रिक प्रणाली में पढ़िए।
1 सें०मी० : 3,00,000 सें०मी०
पग 2. धरातल की दूरी को कि०मी० में बदलिए।
1 सें०मी० = \(\frac{1}{1,000}\) कि०मी०
3,00,000 सें०मी० = \(\frac{3,00,000}{1,00,000}\) = 3 कि०मी०
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 सें०मी० : 3 कि०मी०।

प्रश्न 9.
यदि प्रदर्शक भिन्न 1:2,53,440 हो तो मील दिखाने के लिए उसे कथनात्मक मापक में परिवर्तित कीजिए।
क्रिया : पग 1. R.F. = \(\frac{1}{2,53,440}\) को ब्रिटिश प्रणाली में पढ़िए।
1 इंच : 2,53,440 इंच।
पग 2. धरातल की दूरी को मीलों में बदलिए।
1 इंच = \(\frac{1}{63,360}\) माल
2,53,440 इंच = \(\frac{2,53,440}{63,360}\)= 4 मील
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 इंच : 4 मील।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

प्रश्न 10.
यदि प्रदर्शक भिन्न 1:10,00,000 हो तो मील दिखाने के लिए इसे कथनात्मक मापक में परिवर्तित कीजिए। क्रिया : पग 1. R.F. \(\frac{1}{10,00,000}\) को ब्रिटिश प्रणाली में पढ़िए।
1 इंच : 10,00,000 इंच
पग 2. धरातल की दूरी को मीलों में बदलिए।
1 इंच : \(\frac{1}{63,360}\) मील
10,00,000 इंच : \(\frac{10,00,000}{63,360}\) = 15.78 मील
उत्तर:
कथनात्मक मापक 1 इंच : 15.78 मील।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र पर मापक को प्रदर्शित करने वाली विधियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्र पर मापक प्रदर्शित करने वाली विधियों के गुण-दोषों का विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र पर मापक को प्रदर्शित करने की विधियां (Methods of Expressing Scale on a Map)-मानचित्र पर मापक को निम्नलिखित तीन विधियों द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है

  • कथनात्मक मापक (Statement of Scale)
  • प्रदर्शक भिन्न (Representative Fraction)
  • रैखिक मापक (Linear Scale)

1. कथनात्मक मापक (Statement of Scale) इस विधि में किसी मानचित्र पर उसके मापक को शब्दों में लिख दिया जाता है; जैसे 1 सेंटीमीटर : 2 किलोमीटर। इसका अर्थ यह हुआ कि मानचित्र पर 1 सेंटीमीटर की दूरी धरातल की 2 किलोमीटर की दूरी को प्रदर्शित कर रही है। कथनात्मक मापक में बाएं हाथ की ओर वाली संख्या सदैव मानचित्र पर दूरी को दिखाती है। इस विधि के अन्य नाम विवरणात्मक मापक तथा शाब्दिक विवेचन विधि भी हैं।

गुण-

  • यह एक सरल विधि है जिसे एक साधारण व्यक्ति भी समझ सकता है।
  • मापक प्रदर्शित करने की इस विधि में कम समय लगता है और किसी विशेष कुशलता की भी आवश्यकता नहीं पड़ती।
  • इस विधि से हमें दूरियों का ठीक-ठीक ज्ञान हो जाता है।

दोष-

  • कथनात्मक मापक को पढ़कर केवल वे लोग मानचित्र पर दूरियों की गणना कर सकते हैं, जो उस माप-प्रणाली से परिचित होंगे।
  • इस विधि द्वारा सीधे मानचित्र पर दूरियां नहीं मापी जा सकतीं।
  • जिन मानचित्रों में मापक शब्दों में व्यक्त किया गया होता है, उनका मूल आकार से भिन्न आकार में मुद्रित करना संभव नहीं होता, क्योंकि इससे उनका मापक अशुद्ध हो जाएगा।

2. प्रदर्शक भिन्न (Representative Fraction)-इस विधि में मापक को एक भिन्न द्वारा प्रदर्शित किया जाता है; जैसे \(\frac{1}{10,00,000}\)। इसका अंश (Numerator) सदा एक (1) होता है जो मानचित्र पर दूरी को दर्शाता है। इस भिन्न का हर (Denominator) धरातल पर दूरी को दर्शाता है। मानचित्र का मापक बदलने पर अंश वही रहता है, लेकिन हर बदल जाता है।
अन्य शब्दों में-
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 3
इस विधि की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसमें अंश और हर एक ही इकाई (Unit) में व्यक्त किए जाते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में मानचित्र का मापक 1 : 1,00,000 या 1/1,00,000 है तो इसका अर्थ यह हुआ कि मानचित्र पर दूरी की 1 इकाई धरातल पर 1,00,000 उन्हीं इकाइयों की दूरी को प्रदर्शित करती है। यदि मानचित्र पर यह इकाई 1 सें०मी० है तो धरातल पर यह 1,00,000 सें०मी० दूरी को प्रदर्शित करेगी।

गुण-
(1) इस विधि में किसी मापन-प्रणाली (Measurement System) का प्रयोग नहीं होता, केवल भिन्न का प्रयोग होता है। इसलिए मापक दिखाने की इस विधि का प्रयोग किसी भी देश की मापक प्रणाली के अनुसार किया जा सकता है। मान लो एक मानचित्र पर प्रदर्शक भिन्न = \(\frac{1}{10,00,000}\) लिखा हुआ है तो इसका अभिप्राय अलग-अलग मापन प्रणालियों में अलग-अलग होगा; जैसे-

देश/प्रणालीमानचित्र पर दूरीधरातल की दूरी
भारत व फ्रांस, जहां मेट्रिक प्रणाली है।1 सें०मी०1,00,000 सें०मी०
ब्रिटेन, जहां ब्रिटिश प्रणाली है।1 इंच1,00,000 इंच
रूस1 वर्स्ट1,00,000 वसर्ट्रूस
चीन1 चांग1,00,000 चांग

फर्क मामूली है, किंतु महत्त्वपूर्ण है

यह अनुपात (Ratio) हैयह भिन्न (Fraction) है
1: 50,000\(\frac { 1 }{ 50,000 }\)

संपरिवर्तनीयता (Convertibility) की इसी विशेषता के कारण ही इस R.F. विधि को अंतर्राष्ट्रीय मापक (International Scale) और प्राकृतिक मापक (Natural Scale) कहा जाता है।

(2) यह एक अत्यंत लोकप्रिय विधि है जिसका बहुत अधिक प्रयोग किया जाता है।

दोष-

  • इस विधि में किसी मापन-प्रणाली का प्रयोग न करके केवल भिन्न का प्रयोग किया जाता है, जिससे सीधे ही दूरियों का अनुमान नहीं लग सकता।
  • फोटोग्राफी द्वारा मानचित्र को छोटा अथवा बड़ा करने पर इसका प्रदर्शक भिन्न बदल जाता है, यद्यपि संख्या वही लिखी रहती है।
    यह विधि एक साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है।

3. रैखिक मापक (Linear Scale)-इस विधि में मानचित्र की दूरी को एक सरल रेखा द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जिसका अनुपात धरातल की दूरी से होता है। सुविधा के अनुसार इस रेखा को प्राथमिक (Primary) तथा गौण (Secondary) भागों में बांटा जाता है।

गुण-
(1) इस विधि से दूरियों को मापना सरल हो जाता है।

(2) इस विधि का सबसे बड़ा गुण यह है कि यदि मानचित्र को फोटोग्राफी द्वारा बड़ा या छोटा किया जाए तो मानचित्र पर छपा रैखिक मापक भी उसी अनुपात में बड़ा या छोटा हो जाता है। अतः मापक बड़े या छोटे किए गए मानचित्र के लिए शुद्ध रहता है। यह गुण कथनात्मक मापक और प्रदर्शक भिन्न (R.F.) विधियों में नहीं है जिस कारण मूल मानचित्र से भिन्न मापक पर बने मानचित्र में ये दो विधियां उपयुक्त नहीं होती।

दोष-

  • इस विधि का प्रयोग भी तभी हो सकता है जब हम उस मापन-प्रणाली से परिचित हों जिसका प्रयोग मापक बनाने के लिए किया गया है।
  • इस मापक को बनाने में समय भी लगता है और कुशलता की भी आवश्यकता होती है।

प्रश्न 2.
रैखिक मापक की रचना को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
रैखिक मापक की रचना (Drawing of Linear Scale)-रैखिक मापक की रचना करने से पहले हमें एक सरल रेखा को समान भागों में बांटने के तरीके आने चाहिएं क्योंकि इसके बिना शुद्ध रैखिक मापक की रचना नहीं हो सकती। इसके लिए दो विधियां हैं
प्रथम विधि : मान लीजिए AB कोई दी हुई सरल रेखा है जिसे 6 समान भागों में विभाजित करना है।
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  • A सिरे पर न्यूनकोण (Acute angle) बनाती हुई एक रेखा AC खींचो।
  • अब परकार में कोई भी दूरी भर कर AC रेखा में समान अंतर पर.छः बिंदु D, E, F, G H और I अंकित करो।
  • बिंदु IB को सरल रेखा द्वारा मिलाओ।
  • अब D, E, F, G और 4 बिंदुओं से IB रेखा के समानांतर रेखाएं खींचो।

इस प्रकार AB रेखा 6 समान भागों में बंट जाएगी (चित्र 2.1)।
दूसरी विधि : मान लीजिए AB कोई दी हुई रेखा है जिसे पाँच समान भागों में विभाजित करना है।
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  • रेखा के दोनों सिरों A और B पर विपरीत दिशाओं में दो समान न्यूनकोण (लंबकोण भी ले सकते हैं) खींचो।
  • अब परकार में कोई भी दूरी भर कर बिंदु A से पांच बिंदु C, D, E, F और G अंकित करो।
  • इसी प्रकार B बिंदु से भी उतनी ही दूरी पर पांच बिंदु C’, D’, E, F व G’ अंकित करो।
  • अब A को G’ से, C को F से, D को E’ से, E को D’ से, F को C’ से तथा G को B से मिला दीजिए।

इस प्रकार AB रेखा के पांच समान भाग बन जाएंगे।

रैखिक मापक की रचना (Drawing of Linear Scale)-जब कथनात्मक मापक अथवा प्रदर्शक भिन्न दिया हुआ है तो हम प्लेन मापक बना सकते हैं। रैखिक मापक की रचना करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिए
(1) प्रायोगिक-पुस्तिका (Practical File) में बनाई जाने वाली मापनी (Scale) की लंबाई 12 से 20 सें० मी० या 5 से 8 इंच के बीच ठीक मानी जाती है। वैसे मानचित्र के आकार के अनुसार किसी भी लंबाई की छोटी या बड़ी मापनी बनाई जा सकती है।

(2) मापक द्वारा प्रदर्शित धरातलीय दूरी सदा पूर्णांक संख्या में होनी चाहिए। पूर्णांक संख्या वह संख्या होती है जो 2, 5, 10, 15, 20, 50, 100 अथवा किसी भी अन्य संख्या से पूर्णतः विभाजित हो जाए और उसमें शेष (Remainder) न बचे।

(3) मापक को पहले सुविधानुसार मुख्य भागों (Primary Divisions) में बांटा जाता है। याद रहे प्रत्येक मुख्य भाग भी पूर्णांक संख्या को दर्शाता है।

(4) फिर बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को सुविधानुसार गौण भागों (Secondary Divisions) में बांटा जाता है। इनसे मानचित्र पर छोटी दूरियां मापी जाती हैं।

(5) शून्य सदा बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को छोड़कर अंकित किया जाता है।

(6) इस शून्य से दाईं ओर (Right Side) मुख्य भागों द्वारा दिखाई गई इकाई तथा बाईं ओर (Left side) गौण भागों द्वारा दिखाई गई इकाई अंकित की जाती है।

(7) वैसे तो विश्वविख्यात कंपनियों द्वारा बने मानचित्रों व एटलसों में मापक की तीन विधियों में से केवल एक विधि का प्रयोग होता है। विद्यार्थी क्योंकि अभी सीखने की अवस्था में हैं तो उन्हें रैखिक मापक के साथ कथनात्मक मापक या R.F. या दोनों ही लिखने चाहिएं।

प्रश्न 3.
1:2,50,000 प्रदर्शक भिन्न वाले मानचित्र के लिए एक रैखिक मापक बनाओ जिससे एक किलोमीटर की दूरी भी मापी जा सके।
क्रिया : प्रदर्शक भिन्न 1:2,50,000
पग 1.
12 सें०मी० रेखा को मुख्य तथा गौण भागों में विभक्त कीजिए।
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पग 2.
फिर इस प्रकार मापक को पूरा कीजिए।
PLAIN SCALE
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अर्थात् मानचित्र का 1 सें०मी० धरातल के 2,50,000 सें०मी० को प्रदर्शित करता है।
अथवा 1 सें०मी० = 2.5 कि०मी०
(क्योंकि 1,00,000 सें० मी० = 1 कि०मी०)
मान लो हम रैखिक मापक की लंबाई 12 सें० मी० रखना चाहते हैं। इस प्रकार इस लंबाई का मापक 12 x 2.5 = 30 कि०मी० की दूरी को प्रदर्शित करेगा। यह दूरी एक पूर्णांक संख्या है और मापक बनाने के लिए सुविधाजनक भी है। अब एक सरल रेखा 12 सें० मी० लंबी लो और इसे सिखलाई गई विधि से 6 समान भागों में बांटो। इसमें प्रत्येक मुख्य भाग 5 कि०मी०

दूरी को दिखाएगा। बाईं ओर के पहले मुख्य भाग को 5 गौण भागों में बांटो। प्रत्येक गौण भाग 1 कि०मी० को प्रदर्शित करेगा। इसकी दाईं तथा बाईं ओर कि०मी० लिखकर नीचे R.F.लिखो। इसे अंकित और सुसज्जित करके इसका शीर्षक लिखो (चित्र 2.3)।

विद्यार्थी ध्यान दें कि रैखिक मापक का डिज़ाइन जरूरी नहीं कि वैसा हो जैसा ऊपर बताया गया है। इसी R.F. से बने रैखिक मापक को नीचे दिए गए डिजाइनों से भी बनाया जा सकता है। आपने किस प्रकार का रैखिक मापक बनाना है, इसका निर्देश अपने प्राध्यापक महोदय से लें।
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प्रश्न 4.
एक मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1 : 6,33,600 है। इस मानचित्र के लिए एक रैखिक मापक बनाइए जिसमें दो कि०मी० तक की दूरी पढ़ी जा सके।
क्रिया : इस प्रश्न में दूरियां कि०मी० में पूछी गई हैं अतः प्रदर्शन भिन्न का कथनात्मक मापक में परिवर्तन भी मेट्रिक प्रणाली में किया जाएगा।
प्रदर्शक भिन्न 1 : 6,33,600
∴ 1 सें०मी० : 6,33,600 सें०मी०
अथवा 1 सें०मी० : \(\frac { 6,33,600 }{ 1,00,000 }\) = 6.336 कि०मी० (क्योंकि 1,00,000 सें०मी० = 1 कि०मी०)
हम पढ़ चुके हैं कि रैखिक मापक की लंबाई 12 से 20 सें०मी० के बीच होनी चाहिए। यदि हम 12 सें०मी० लंबा मापक लेते हैं तो यह प्रदर्शित करेगा :
6.336 x 12 = 76.032 कि०मी०
परंतु 76.032 एक पूर्णांक संख्या नहीं है। इसकी निकटतम पूर्णांक संख्या 80 है। अब 80 कि०मी० को दर्शाने वाली रेखा की लंबाई ज्ञात करनी होगी।
क्योंकि 6.336 कि०मी० = 1 सें०मी०
1 कि०मी० = \(\frac { 1 }{ 6.336 }\) सेंमी०
80 कि०मी० = \(\frac { 1×80 }{ 6.336 }\) = 12.62 सें०मी०
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प्रश्न 5.
किलोमीटर प्रदर्शित करने के लिए एक रैखिक मापक बनाओ जबकि मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1:20,00,000 . है।
क्रिया: क्योंकि दूरियां कि०मी० में पूछी गई हैं अतः प्रदर्शक भिन्न का कथनात्मक मापक में परिवर्तन भी मेट्रिक प्रणाली में किया जाएगा।
R.F. = 1 : 20,00,000
∴ 1 सें०मी० : 20,00,000 से०मी०
अथवा 1 सेंमी \(\frac { 20,00,000 }{ 1,00,000 }\) = 20 कि०मी० (क्योंकि 1,00,000 सें०मी० = 1 कि०मी०)
यदि हम मापक की लंबाई 15 सेंमी० लेते हैं तो यह 15 x 20 = 300 कि०मी० की दूरी दिखाएगा। अब एक सरल रेखा 15 सें०मी० लो उसके पांच बराबर भाग करो। प्रत्येक मुख्य भाग 60 कि०मी० को प्रदर्शित करेगा। बाईं ओर के प्रथम मुख्य भाग को 6 गौण भागों में बांटो जिसमें प्रत्येक गौण भाग 10 कि०मी० की दूरी दिखाएगा। इसके नीचे प्रदर्शक भिन्न लिख दो (चित्र 2.5)।
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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी

प्रश्न 6.
एक मानचित्र का प्रदर्शक भिन्न 1 : 63,360 है। इसके द्वारा एक ऐसा रैखिक मापक बनाओ जिस पर मील और फर्लाग पढ़े जा सकें।
क्रिया: इसमें दूरियां मीलों और फल्गों में पूरी की गई हैं। अतः प्रदर्शक भिन्न का कथनात्मक मापक भी ब्रिटिश प्रणाली में किया जाएगा।
R.F. 1 : 63,360
∴ 1 इंच : 63,360 इंच
अथवा 1 इंच = \(\frac { 63,360 }{ 63,360 }\) = 1 मा
(क्योंकि 63,360 इंच = 1 मील)
हम पढ़ चुके हैं कि रैखिक मापक की लंबाई 5 से 8 इंच के बीच होनी चाहिए। मान लीजिए हम मापक की लंबाई 6 इंच लेते हैं।
6 इंच प्रदर्शित करेंगे 1 x 6 = 6 मील को।
अब 6″ लंबी रेखा लो, उसके 6 बराबर भाग करो। प्रत्येक मुख्य भाग 1 मील को प्रदर्शित करेगा। बाईं ओर के पहले मुख्य भाग के 4 बराबर गौण भाग करो। प्रत्येक गौण भाग 2 फर्लाग को दिखाएगा (क्योंकि 1 मील में 8 फलाँग होते हैं)। इसके नीचे R.F. लिख दो (चित्र 2.6)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 2 मानचित्र मापनी 11

मानचित्र मापनी HBSE 11th Class Geography Notes

→ अंश (Numerator)-भिन्न में रेखा के ऊपर स्थित अंक को अंश कहते हैं। उदाहरण के लिए 1:50,000 के भिन्न में 1 अंश है।

→ निरूपक भिन्न-मानचित्र अथवा प्लान की मापनी को प्रदर्शित करने की एक ऐसी विधि, जिसमें मानचित्र या प्लान पर दिखाई गई दूरी तथा धरातल की वास्तविक दूरी के बीच के अनुपात को भिन्न के द्वारा प्रदर्शित किया जाता है

→ हर (Denominator)-भिन्न में रेखा के नीचे स्थित अंक को हर कहते हैं। उदाहरण के लिए, 1:50,000 के भिन्न में 50,000 हर है।

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HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

Haryana State Board HBSE 11th Class Geography Solutions Practical Work in Geography Chapter 1 मानचित्र का परिचय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

बहुविकल्पीय प्रश्न

1. रेखाओं एवं आकृतियों के मानचित्र कहे जाने के लिए निम्नलिखित में से क्या अनिवार्य है?
(A) मानचित्र रूढ़ि
(B) प्रतीक
(C) उत्तर दिशा
(D) मानचित्र मापनी
उत्तर:
(D) मानचित्र मापनी

2. एक मानचित्र जिसकी मापनी 1:4,000 एवं उससे बड़ी है, उसे कहा जाता है
(A) भूसंपत्ति मानचित्र
(B) स्थलाकृतिक मानचित्र
(C) भित्ति मानचित्र
(D) एटलस मानचित्र
उत्तर:
(A) भूसंपत्ति मानचित्र

3. निम्नलिखित में से कौन-सा मानचित्र के लिए अनिवार्य नहीं है?
(A) मानचित्र प्रक्षेप
(B) मानचित्र व्यापकीकरण
(C) मानचित्र अभिकल्पना
(D) मानचित्रों का इतिहास
उत्तर:
(D) मानचित्रों का इतिहास

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

4. मानचित्र में व्यापकीकरण का अर्थ है
(A) मानचित्र में ज्यादा से ज्यादा लक्षण दिखाना
(B) मानचित्र में विस्तृत क्षेत्रों का प्रदर्शन
(C) प्रदर्शित किए जाने वाली सूचनाओं व आंकड़ों का सरलीकरण
(D) इनमें से कोई नहीं
उत्तर:
(C) प्रदर्शित किए जाने वाली सूचनाओं व आंकड़ों का सरलीकरण

5. स्थलाकृतिक मानचित्रों के संबंध में कौन-सा कथन सत्य नहीं है?
(A) इनमें बस्तियां, धार्मिक स्थल, संचार के साधन, नहरें, कुएं आदि दिखाए जाते हैं
(B) इनकी मापनी 1:25,000 से 1:250,000 तक होती है
(C) इन्हें राज्य सरकारें प्रकाशित करती हैं
(D) इनमें प्राकृतिक लक्षणों का भी प्रदर्शन किया जाता है
उत्तर:
(C) इन्हें राज्य सरकारें प्रकाशित करती हैं

अति-लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र किसे कहते हैं ? अथवा मानचित्र की परिभाषा दीजिए।
उत्तर:
पृथ्वी सहित किसी भी खगोलीय पिंड अथवा उसके किसी भाग का मापनी के अनुसार समतल सतह पर प्रतीकात्मक निरूपण मानचित्र कहलाता है।

प्रश्न 2.
गोलाकार पृथ्वी का सही और शुद्ध प्रदर्शन किस चीज़ से होता है?
उत्तर:
ग्लोब द्वारा।

प्रश्न 3.
ग्लोब क्या है?
उत्तर:
ग्लोब, पृथ्वी अथवा किसी खगोलीय पिंड का मानव द्वारा निर्मित छोटे आकार का एक त्रि-विस्तारीय मॉडल है।

प्रश्न 4.
विस्तृत क्षेत्रों के मानचित्र ग्लोब इतने शुद्ध क्यों नहीं होते?
अथवा
सभी मानचित्र मूलतः दोषपूर्ण क्यों होते हैं?
उत्तर:
मानचित्र सपाट कागज पर बनाए जाते हैं, जबकि पृथ्वी गोलाकार है। किसी गोल आकृति को एकदम सपाट बनाना संभव नहीं होता। इसी कारण बड़े क्षेत्रों के मानचित्र प्रायः विरूपित (Distorted) अथवा दोषपूर्ण होते हैं।

प्रश्न 5.
मानचित्र को धरातल का आलेखी (Graphic) अथवा प्रतीकात्मक निरूपण क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
क्योंकि मानचित्र पर धरातलीय लक्षणों को प्रतीकों और अक्षरों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है।

प्रश्न 6.
मानचित्र के मुख्य घटक या अंग या अवयव या भाग कौन-से होते हैं?
उत्तर:
शीर्षक, मापक, संकेत, दिशा, प्रक्षेप और रूढ़ चिह्न मानचित्र के छः आवश्यक अवयव (Elements) होते हैं।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

प्रश्न 7.
मानचित्रों के दो प्रमुख वर्गीकरण कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. मापक के अनुसार।
  2. विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार।

प्रश्न 8.
मापक के अनुसार मानचित्र कितने प्रकार के होते हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
मापक के अनुसार मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-(1) बृहत मापक पर बने मानचित्र; जैसे भूकर मानचित्र और स्थलाकृतिक मानचित्र। (2) लघु मापक पर बने मानचित्र; जैसे दीवारी मानचित्र और एटलस मानचित्र।

प्रश्न 9.
बृहत मापक के मानचित्र और लघु मापक के मानचित्र में क्या अंतर होता है ?
उत्तर:
बृहत मापक के मानचित्र-बृहत मापक पर बने मानचित्र एक कागज़ पर अपेक्षाकृत थोड़े क्षेत्र को दिखाते हैं। अतः इनमें विस्तृत विवरण दिखाए जा सकते हैं। उदाहरणतः 1:50,000 के मापक पर बना भारतीय सर्वेक्षण विभाग का स्थलाकृतिक मानचित्र बृहत मापक पर बना होता है।

लघु मापक के मानचित्र-लघु मापक पर बना मानचित्र उसी आकार के कागज़ पर अपेक्षाकृत बड़े क्षेत्र का प्रदर्शन करता है। इसमें सीमित विवरण होते हैं। महाद्वीपों और देशों के मानचित्र लघु मापक पर बने होते हैं।

प्रश्न 10.
मानचित्र अलग-अलग मापकों पर क्यों बनाए जाते हैं?
उत्तर:
मानचित्र के लिए मापक का चयन हमारे उद्देश्य पर निर्भर करता है। यदि हम एक विस्तृत क्षेत्र में प्रमुख शहरों, बंदरगाहों व प्रमुख भू-आकारों का प्रदर्शन करना चाहते हैं तो हम लघु मापक का मानचित्र बनाएंगे और यदि हम एक छोटे क्षेत्र को विस्तार से दिखाना चाहते हैं तो हम बृहत मापक वाला मानचित्र बनाएंगे।

प्रश्न 11.
भूकर या कैडस्ट्रल मानचित्र किसे कहते हैं?
उत्तर:
ये बृहत मापक पर बने ऐसे मानचित्र होते हैं जो सार्वजनिक स्थानों एवं प्रत्येक भवन अथवा व्यक्तिगत क्षेत्रों की सीमाएं दर्शाते हैं। इनसे भूमि कर या लगान इकट्ठा किया जाता है। इन्हें प्लान भी कहते हैं।

प्रश्न 12.
उद्देश्य के अनुसार मानचित्रों के दो प्रमुख वर्ग कौन-से होते हैं?
उत्तर:

  1. भौतिक या प्राकृतिक मानचित्र
  2. सांस्कृतिक या मानवीय मानचित्र।

प्रश्न 13.
भौतिक तथा सांस्कृतिक मानचित्रों में अंतर बताइए।
उत्तर:
भौतिक मानचित्र प्राकृतिक तत्त्वों को दर्शाते हैं; जैसे धरातल, जलवायु, नदियां, वनस्पति, मिट्टी आदि। सांस्कृतिक मानचित्र मानवीय तत्त्वों को दर्शाते हैं; जैसे जनसंख्या, कृषि, उद्योग, परिवहन इत्यादि।

प्रश्न 14.
मानचित्रों का महत्त्व बताइए।
उत्तर:
मानचित्रों के बिना भू-तल पर भौतिक तथा सांस्कृतिक तत्त्वों के वितरण और उनके बीच संबंधों का प्रदर्शन नहीं किया जा सकता।

प्रश्न 15.
मानचित्र और प्लान में क्या अंतर है?
उत्तर:
मानचित्र बड़े क्षेत्र को छोटे मापक द्वारा प्रदर्शित करते हैं, जबकि प्लान में छोटे क्षेत्र को बड़े मापक द्वारा दिखाया जाता है। मानचित्र में कागज़ का 1 सें०मी० धरती के 2 कि०मी० को प्रदर्शित कर सकता है, जबकि प्लान में कागज़ का 1 सें०मी० धरती के 1 अथवा कुछ मीटरों को ही दिखाता है।

लघूत्तरात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
ग्लोब और मानचित्र में क्या अंतर होता है?
उत्तर:
ग्लोब और मानचित्र में निम्नलिखित अंतर होता है-

ग्लोबमानचित्र
1. ग्लोब, संपूर्ण पृथ्वी अथवा किसी खगोलीय पिंड का छोटा-सा मॉडल होता है।1. मानचित्र, पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड अथवा उसके किसी भाग को प्रदर्शित करता है।
2. बड़े ग्लोबों का निर्माण, रख-रखाव, प्रयोग और उनका लाना, ले-जाना कठिन होता है।2. मानचित्र का प्रयोग और रख-रखाव आसान है। इसे कहीं भी ले जाया जा सकता है।
3. कम जगह होने के कारण ग्लोब पर सभी महत्त्वपूर्ण स्थान व आकृतियां नहीं दिखाई जा सकतीं।3. मानचित्र पर छोटे क्षेत्रों का विस्तृत प्रदर्शन संभव है।
4. ग्लोब पर महाद्वीपों और महासागरों के आकार और आकृति (Size and shape) का विरूपण नहीं होता।4. मानचित्रों में बड़े क्षेत्रों के आकार और आकृति में अत्यधिक विरूपण आ जाता है।
5. संपूर्ण पृथ्वी का प्रदर्शन करने के लिए ग्लोब सर्वाधिक उपयुक्त होते हैं।5. पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग; जैसे गांव, ज़िला, प्रांत, देश अथवा महाद्वीप का प्रदर्शन करने के लिए मानचित्र सर्वश्रेष्ठ होते हैं।
6. ग्लोब पर पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड का केवल आधा भाग ही एक समय में दिखाई पड़ता है।6. मानचित्र पर पृथ्वी या किसी खगोलीय पिंड को संपूर्ण रूप में एक ही समय में देखा जा सकता है।

प्रश्न 2.
ग्लोब द्वारा पृथ्वी के लिए किए जाने वाले श्रेष्ठ प्रदर्शन के कारणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
ग्लोब द्वारा पृथ्वी के लिए किए जाने वाले श्रेष्ठ प्रदर्शन के कारण निम्नलिखित हैं-

  1. पृथ्वी की भांति ग्लोब भी अपने अक्ष पर स्वतंत्रतापूर्वक घूर्णन (Rotation) कर सकता है।
  2. ग्लोब पर खींची गई अक्षांश एवं देशांतर रेखाओं के जाल (Graticule) से विभिन्न स्थानों की स्थिति सुगमतापूर्वक मालूम की जा सकती है।
  3. केवल ग्लोब पर ही महाद्वीपों के सापेक्षिक आकार और स्थिति का परिशुद्ध (Precise) निरूपण संभव हो पाता है।
  4. पृथ्वी पर दूरियों और दिशाओं के सही प्रदर्शन के लिए ग्लोब एक सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।

प्रश्न 3.
ग्लोब के प्रयोग में आने वाली कठिनाइयों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
ग्लोब के प्रयोग में निम्नलिखित कठिनाइयाँ आती हैं-

  1. ग्लोब पर जगह (Space) कम होने के कारण किसी क्षेत्र विशेष का विस्तृत अध्ययन नहीं किया जा सकता।
  2. यदि ग्लोब बड़े भी बना लिए जाएँ तो उनका निर्माण, प्रयोग, रख-रखाव और उनका एक स्थान से दूसरे स्थान तक लाना, ले-जाना अत्यंत कठिन होगा।
  3. एक समय में ग्लोब का केवल आधा भाग ही देखा जा सकता है। अतः विश्व के आपस में दूर स्थित भागों के अध्ययन के लिए हमें दो ग्लोबों की आवश्यकता पड़ेगी।
  4. यदि विश्व के किसी एक भाग का ही अध्ययन करना हो तो हमें पूरे ग्लोब का प्रयोग करना पड़ता है।
  5. गोलीय (Spherical) होने के कारण ग्लोब पर किन्हीं दो स्थानों के बीच की दूरियां मापना अपेक्षाकृत कठिन है।

निबंधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
मानचित्र को परिभाषित करते हुए इसके अनिवार्य तत्त्वों का वर्णन कीजिए। अथवा मानचित्र के अनिवार्य (आवश्यक) तत्त्वों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मानचित्र की परिभाषा (Definition of a Map) संपूर्ण पृथ्वी अथवा उसके किसी भाग का समतल पृष्ठ पर समानीत मापनी द्वारा वरणात्मक, प्रतीकात्मक तथा व्यापकीकृत निरूपण मानचित्र कहलाता है। आजकल तो खगोलीय पिंडों के भी मानचित्र – बनने लगे हैं।

एफजे० मोंकहाऊस (F.J. Monkhouse) के अनुसार, “निश्चित मापनी के अनुसार, धरातल के किसी भाग के लक्षणों को समतल सतह पर प्रदर्शन करने को मानचित्र कहते हैं।” (“Map is a representation on a plane su features of part of the Earth’s surface, drawn to some specific scale.”)

बिना मापनी के खींची गई रेखाओं तथा बहुभुज को मानचित्र नहीं कहा जाता बल्कि इसे रेखाचित्र (Sketch) कहा जाता है मानचित्र के अनिवार्य तत्त्व (Essentials of a Map) मानचित्रकला (Cartography) मानचित्रों को बनाने की कला एवं
तो मानचित्र अनेक प्रकार के होते हैं किंत उनकी रचना संबंधी कछ प्रक्रियाएं या तत्त्व ऐसे होते हैं जो समान होते हैं। इनमें से यदि एक भी प्रक्रिया या तत्त्व हट जाए तो मानचित्र शुद्ध नहीं रह जाता।
1. मानचित्र शीर्षक (Map Title) शीर्षक से हमें ज्ञात होता है कि मानचित्र किस बारे में है और किस क्षेत्र का बनाया गया है। उदाहरणतः एशिया का भौतिक मानचित्र, भारत का जनसंख्या घनत्व मानचित्र अथवा भारत का वायुदाब (जुलाई) मा इत्यादि।

2. मानचित्र मापनी (Map Scale)-मापनी मानचित्र पर दर्शाए गए विभिन्न स्थानों के बीच दूरियों और प्रदर्शित क्षेत्र के क्षेत्रफल की गणना में मदद करता है। इससे मानचित्र को छोटा या बड़ा भी किया जा सकता है।

आप जानते हैं कि सभी मानचित्र लघुकरण होते हैं। मानचित्र बनाने के लिए सबसे पहले मापनी का चुनाव करना पड़ता है। किसी मानचित्र की मापनी इस बात को निर्धारित करती है कि उस मानचित्र में कितनी सूचनाओं, विषय-वस्तु एवं वास्तविकताओं का समावेश किस हद तक संभव है।

3. मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection)-आप जानते हैं कि जीऑयड की सतह सभी ओर से वक्रित (curved) है, जिसका समतल कागज पर सरल प्रदर्शन करना अर्थात् मानचित्र बनाना एक चुनौती है। विमाओं (Dimensions) के इस प्रकार बदलाव में जीऑयड के वास्तविक स्वरूप, दिशाओं, दूरियों, क्षेत्रों तथा आकारों में अनिवार्य परिवर्तन आता है। एक गोलाकार सतह को समतल सतह पर दर्शाने की प्रणाली को प्रक्षेप कहा जाता है। इस प्रणाली में अक्षांश और देशांतर रेखाओं का जाल होता है जिससे किसी स्थान की वास्तविक स्थिति निश्चित करने में मदद मिलती है। इसलिए प्रक्षेपों के चयन, उपयोग तथा निर्माण मानचित्र बनाने के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण होते हैं।

4. व्यापकीकरण (Generalisation) हर मानचित्र किसी-न-किसी उद्देश्य के लिए बनाया जाता है। कुछ मानचित्र सामान्य उद्देश्य वाले होते हैं जो सामान्य सूचनाओं को दर्शाते हैं; जैसे उच्चावच, अपवाह, मृदा, वनस्पति, परिवहन इत्यादि। लेकिन कुछ मानचित्र विशेष उद्देश्य वाले होते हैं जो एक से अधिक चुनी गई वस्तुओं को दर्शाते हैं; जैसे जनसंख्या का घनत्व, मिट्टी के प्रकार या उद्योगों की स्थिति इत्यादि। क्योंकि मानचित्र लघुकृत मापनी पर तैयार किया जाता है, इसलिए जरूरी है कि उसकी विषय-वस्तु को सावधानीपूर्वक नियोजित किया जाए और उसे व्यापकीकृत किया जाए। ऐसा करने के लिए विषय-वस्तु से संबंधित सूचनाओं (आंकड़ों) को जरूरत के अनुसार सरल कर लेना चाहिए।

5. मानचित्र अभिकल्पना (Map Design) मानचित्र अभिकल्पना में मानचित्रों की आलेखी विशिष्टताओं (Graphic Characteristics) को योजनाबद्ध किया जाता है, जिसमें शामिल हैं-उचित संकेतों का चयन, उनके आकार एवं प्रकार, लिखावट का तरीका, रेखाओं की चौड़ाई का निर्धारण, रंगों का चयन, मानचित्र में मानचित्र अभिकल्पना के विभिन्न तत्त्वों की व्यवस्था और रूढ़ चिह्न। अतः मानचित्र अभिकल्पना मानचित्र बनाने की एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें उन सिद्धांतों की गहन जानकारी की आवश्यकता होती है, जो आलेखी संचार के प्रभावों को नियंत्रित करती है।

6. मानचित्र निर्माण तथा उत्पादन (Map Construction and Production)-पुराने समय में मानचित्र बनाने एवं उनके पुनरुत्पादन का कार्य हाथों से किया जाता था। कलम एवं स्याही से मानचित्र बनाकर उनको मशीनों द्वारा छापते थे। किंतु मानचित्र बनाने तथा उनकी छपाई की तकनीकों में कंप्यूटर की सहायता मिलने के कारण मानचित्र निर्माण एवं पुनरुत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है।

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प्रश्न 2.
मानचित्रण के इतिहास पर लेख लिखिए।
उत्तर:
मानचित्रण का इतिहास (History of Map Making) मानचित्र बनाने की कला बहुत प्राचीन है। ईसा से 2,800 साल पहले मार्शल द्वीपवासी अपने द्वीपों की सापेक्षिक स्थिति दिखाने के लिए नरकटों, वृक्षों की टहनियों तथा घोंघों आदि की सहायता से चार्ट बनाया करते थे। विश्व का सबसे पुराना मानचित्र मैसोपोटामिया में बेबीलोन नगर से 320 कि०मी० उत्तर की ओर गासुर नगर के ध्वंसावशेषों को खोदने पर मिला था। आज यह मानचित्र हॉवर्ड विश्वविद्यालय के म्यूजियम में सुरक्षित है। यह मानचित्र ईसा से 2,500 वर्ष पुराना है और चिकनी मिट्टी की आग में पकी हुई टिकिया (Tablet) पर बना है। इस मानचित्र में उत्तरी ईराक प्रदेश और फरात (Euphrates) नदी दिखाई गई हैं। बेबीलोनिया के लोगों ने ही वृत्त को 360 अंशों में बांटना सिखाया।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 1
100 ई० के लगभग चीनियों ने कागज का आविष्कार कर लिया और मानचित्र बनाने लगे। पी.सिन (Pei-Hsin) को चीनी मानचित्र कला का जनक कहा जाता है।

आधुनिक मानचित्र कला की नींव अरब एवं यूनान के भूगोलवेत्ताओं द्वारा रखी गई। इन विद्वानों ने पृथ्वी की परिधि का माप तथा मानचित्र बनाने में भौगोलिक निर्देशांक (Geographical Co-ordinates) की पद्धति के उपयोग; जैसे कई महत्त्वपूर्ण योगदान दिए। इस काल के ज्ञाता मानचित्रकार एनेक्ज़ीमेंडर, इरेटॉस्थेनीज, हिपारकस और टॉलमी थे। टॉलमी ने विश्व मानचित्र बनाकर मानचित्रकला को उन्नति के शिखर पर पहुंचाया।

आधुनिक काल के आरंभिक दौर में मानचित्र बनाने की कला एवं विज्ञान को पुनर्जीवित किया गया। इसमें प्रयास किया गया कि जीऑयड को समतल सतह पर दर्शाने से होने वाली त्रुटियों को कम किया जाए। सही दिशा, दूरी एवं क्षेत्रफल के परिशुद्ध माप के लिए विभिन्न प्रक्षेपों पर मानचित्रों को खींचा गया था। वायव (Aerial) फोटोग्राफी से सतह पर होने वाले सर्वेक्षणों के तरीकों को सहयोग मिला तथा वायव फोटो के उपयोग ने 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में मानचित्र बनाने के कार्य को और भी अधिक तेज़ कर दिया।

भारत में मानचित्र कला का विकास-भारत में मानचित्र बनाने का कार्य वैदिक काल में ही शुरु हो गया था, जब खगोलीय यथार्थता तथा ब्रह्मांडिकी रहस्योद्घाटन के प्रयत्न किए गए थे। आर्यभट्ट, वाराहमिहिर तथा भास्कर आदि के पौराणिक ग्रंथों में इन अभिव्यक्तियों को सिद्धांत या नियम के निश्चित रूप में दिखाया गया था। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने पूरे विश्व को सात द्वीपों में बांटा (चित्र 1.3)। महाभारत में माना गया था कि यह गोलाकार विश्व चारों ओर से जल से घिरा है (चित्र 1.4)।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 2
टोडरमल ने भू-सर्वेक्षण तथा मानचित्र बनाने के कार्य को लगान वसूली प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग बना दिया था। इसके अतिरिक्त, शेरशाह सूरी के लगान मानचित्रों ने मध्य काल में मानचित्र बनाने के कार्य को और अधिक समृद्ध किया। पूरे देश के तत्कालीन मानचित्रों को बनाने के लिए गहन स्थलाकृतिक सर्वेक्षण 1767 में सर्वे ऑफ इंडिया की स्थापना के साथ किया गया, जिसके चरम बिंदु के रूप में 1785 में हिंदुस्तान का मानचित्र बनकर तैयार हुआ। आज सर्वे ऑफ इंडिया विभिन्न मापनियों के आधार पर पूरे देश का मानचित्र तैयार करता है।

प्रश्न 3.
मानचित्रों के वर्गीकरण का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्रों के विभिन्न प्रकारों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
मानचित्रों का वर्गीकरण (Classification of Maps) मानचित्र अनेक प्रकार के होते हैं। सामान्यतः इनका वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है-

  • मापक के अनुसार (According to Scale)
  • विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार (According to Purpose or Function)।

A. मापक के अनुसार (According to Scale) मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-

  • बृहत मापक पर बने मानचित्र (Large Scale Maps)
  • लघु मापक पर बने मानचित्र (Small Scale Maps)।

(a) बृहत मापक पर बने मानचित्र (Large Scale Maps)-बृहत मापक पर बने मानचित्र दो प्रकार के होते हैं-
1. भूकर मानचित्र अथवा प्लान (Cadastral Maps or Plan)-कैडस्ट्रल फ्रांसीसी भाषा के कैडस्टर (Cadestre) शब्द से बना है जिसका अर्थ ‘संपत्ति रजिस्टर’ से होता है। बृहत मापक पर बनाए गए नगरों के प्लान जिनमें नागरिकों के भवनों की सीमाएं अंकित हों या पटवारियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला सिजरा (Village Map) जिसमें सार्वजनिक स्थान तथा भूमि की व्यक्तिगत मानचित्र का परिचय मल्कियत दर्शाई गई हो भूकर अथवा कैडस्ट्रल मानचित्र कहलाते हैं।

ये मानचित्र सरकार द्वारा नागरिकों से भूमि, भवन जैसी अचल संपत्ति पर लगान वसूल करने के लिए बनाए जाते हैं। भू-संपत्ति मानचित्र कानूनी उद्देश्यों के लिए भू-संपत्ति की सीमाओं के निर्धारण, प्रशासन, कर (Tax) व भू-संपत्ति के प्रबंधन के लिए अत्यंत उपयोगी होते हैं। इन मानचित्रों का मापक 1″ से 110 गज़ या 1″ से 55 गज़ होता है। गांवों का भूसंपत्ति मानचित्र 1 : 4000 की मापनी पर तथा नगरों का मानचित्र 1 : 2000 और इससे अधिक मापनी पर बनाए जाते हैं।

2. स्थलाकृतिक मानचित्र (Topographical Maps)- ये भी बड़ी मापनी पर बने मानचित्र होते हैं जिन्हें वास्तविक निरीक्षण व परिशुद्ध सर्वेक्षण के बाद बनाया जाता है। भारत में स्थलाकृतिक मानचित्रों का प्रकाशन भारतीय सर्वेक्षण विभाग (Survey of India) करता है। पहले इन मानचित्रों को 1 इंच : 4 मील, 1 इंच : 2 मील तथा 1 इंच : 1 मील मापक पर बनाया जाता था, किंतु देश में मीट्रिक प्रणाली अपनाए जाने के बाद अब इन्हें 1:2,50,000, 1:50,000 तथा 1:25,000 की मापनियों पर बनाया जाता है।

ये बहुउद्देशीय (Multi-Purpose) मानचित्र होते हैं जिनमें प्राकृतिक (Natural) और मानवीय (Cultural) लक्षणों को प्रदर्शित किया जाता है। प्राकृतिक तत्त्वों में उच्चावच (पर्वत, पठार व मैदान), जल-प्रवाह, जलाशय, वन, मिट्टियों व दलदल इत्यादि दिखाए जाते हैं, जबकि मानवीय अथवा सांस्कृतिक तत्त्वों में नगर, गांव, मार्ग, संचार के साधन व नहरें, कुएं, धार्मिक स्थल आदि विस्तारपूर्वक प्रदर्शित किए जाते हैं। योजना, राष्ट्रीय सुरक्षा एवं पर्यटन आदि उद्देश्यों के लिए स्थलाकृतिक मानचित्रों का कोई मुकाबला नहीं।

(b) लघु मापक पर बने मानचित्र (Small Scale Maps)-लघु मापक पर बने मानचित्र भी दो प्रकार के होते हैं-
1. दीवारी या भित्ति मानचित्र (Wall Maps)-स्कूल, कॉलेज अथवा दफ्तरों की दीवारों पर लटकाए जाने के कारण इन्हें दीवारी मानचित्र कहते हैं। इनका मापक 1 सें०मी० से 5 कि०मी० (1:5,00,000) से लेकर 1 सें०मी० से 40 कि०मी० (1:40,00,000) या इससे भी छोटा हो सकता है। अन्य शब्दों में इनकी मापनी स्थलाकृतिक मानचित्र से छोटी, एटलस मानचित्र से बड़ी होती है। इन्हें बड़े अक्षरों में छापा जाता है ताकि वांछित सूचना दूर से पढ़ी जा सके और समझाई जा सके। ये मानचित्र पृथ्वी के विस्तृत क्षेत्रों का प्रदर्शन करते हैं; जैसे समस्त संसार, कोई महाद्वीप, देश या राज्य इत्यादि।
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2. एटलस मानचित्र (Atlas Maps)-पुस्तक के रूप में मानचित्रों के क्रमबद्ध तथा व्यवस्थित संग्रह को एटलस या मानचित्रावली कहते हैं। एटलस मानचित्रों का मापक बहुत-ही छोटा होता है जो प्रायः 1:15,00,000 से कम होता है। मापनी छोटी होने के कारण ये मानचित्र केवल प्रमुख लक्षणों को ही दर्शाते हैं तथा इनमें महत्त्वहीन तत्त्वों को छोड़ दिया जाता है। एटलस मानचित्र विश्व, महाद्वीपों, देशों या क्षेत्रों की भौगोलिक जानकारियों के आलेखी (Graphic) विश्वकोश हैं जिनके वितरण को हम एक ही नज़र में देख सकते हैं। इन मानचित्रों में उपयुक्त रंगों का प्रयोग किया जाता है जिस कारण एटलस मानचित्रों का दृश्य प्रभाव (Visual impact) ज़बरदस्त होता है।

B. विषय-वस्तु अथवा उद्देश्य अथवा प्रकार्य के अनुसार (According to Purpose or Function)भी मानचित्रों के दो वर्ग होते हैं-

  • भौतिक मानचित्र (Physical Maps)
  • सांस्कृतिक मानचित्र (Cultural Maps)

(a) भौतिक अथवा प्राकृतिक मानचित्र (Physical Maps)-इसके अंतर्गत आने वाले प्रमुख मानचित्र निम्नलिखित हैं
1. उच्चावच मानचित्र (Relief Maps)-इन मानचित्रों में पर्वत, पठार, मैदान और अपवाह तंत्र इत्यादि सामान्य स्वरूपों का चित्रण किया जाता है।

2. भू-गर्भीय मानचित्र (Geological Maps)-इन मानचित्रों में किसी क्षेत्र की भू-गर्भीय संरचना व शैल प्रकारों इत्यादि को दिखाया जाता है।

3. जलवायु मानचित्र (Climatic Maps)-इन मानचित्रों पर जलवायु के विभिन्न तत्त्वों; जैसे तापमान, वायुदाब, सापेक्षिक आर्द्रता, बादलों, वर्षा, पवनों की दिशा एवं गति तथा मौसम के अन्य तत्त्वों के वितरण को दिखाया जाता है।

4. मौसम मानचित्र (Weather Maps)-ये मानचित्र देश के मौसम विभाग द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं जो दिन के निर्दिष्ट समय पर मौसम संबंधी अवस्थाओं को दिखाते हैं।

5. मृदा मानचित्र (Soil Maps)-इन मानचित्रों पर किसी क्षेत्र में पाई जाने वाली विविध प्रकार की मिट्टियों तथा उनके वितरण को दर्शाया जाता है।

6. वनस्पति मानचित्र (Vegetation Maps)-इन मानचित्रों पर धरातल पर पाई जाने वाली विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक वनस्पति का वितरण प्रदर्शित किया जाता है।

(b) सांस्कृतिक मानचित्र (Cultural Maps) इनमें अधिक महत्त्वपूर्ण मानचित्र निम्नलिखित हैं-
1. राजनीतिक मानचित्र (Political Maps) इन मानचित्रों पर देश, प्रांत व जिलों की सीमाएं दिखाई जाती हैं। इन मानचित्रों का प्रशासनिक महत्त्व बहुत होता है।

2. जनसंख्या मानचित्र (Population Maps) इनमें जनसंख्या की विशेषताएं; जैसे वितरण, घनत्व, वृद्धि, स्थानांतरण इत्यादि को दर्शाया जाता है।

3. जातियों का मानचित्र (Racial Maps)-इन मानचित्रों में विभिन्न प्रदेशों में रहने वाली जातियों का वितरण दिखाया जाता है।

4. भाषा मानचित्र (Language Maps) ये मानचित्र भिन्न-भिन्न प्रदेशों में बोली जाने वाली भाषाओं का वितरण दिखाते हैं।

5. आर्थिक मानचित्र (Economic Maps)-इन मानचित्रों में औद्योगिक, व्यापारिक और कृषि संबंधी आर्थिक गतिविधियों के वितरण और उनसे जुड़े प्रमुख केंद्रों को दर्शाया जाता है।

6. परिवहन मानचित्र (Transport Maps)-इन मानचित्रों में सड़क-मार्ग, रेल-मार्ग, वायु-मार्ग, समुद्री-मार्ग तथा पाइप लाइनों को दर्शाया जाता है। पर्यटकों के लिए ये मानचित्र महत्त्वपूर्ण होते हैं।

HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय

प्रश्न 4.
मानचित्रों द्वारा किए जाने वाले मापनों का वर्णन कीजिए।
अथवा
मानचित्रों के उपयोग का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भूगोलवेत्ताओं के अतिरिक्त अन्य विषयों के विशेषज्ञ भी मानचित्रों का अधिकाधिक उपयोग कर रहे हैं। इस उपयोग के दौरान वे दूरी, दिशा एवं क्षेत्र को सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रकार के मापन करते हैं-
1. दूरी का मापन (Measuring Distance)-मानचित्र पर दिखाए गए रैखिक लक्षण दो प्रकार के होते हैं-

  • सीधी रेखाएं (Straight Lines)
  • टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएं (Irregular lines)

सीधी रेखा वाले लक्षणों; जैसे सड़कें, रेल की पटरियां एवं नहरों इत्यादि को मापना आसान होता है। मानचित्र की सतह पर एक मापनी (फुटा) रखकर इन्हें मापा जा सकता है। किंतु दूरियों को मापने की आवश्यकता प्रायः अव्यवस्थित रास्तों; जैसे तटीय किनारों, नदियों तथा धाराओं को मापने में होती है। इस प्रकार की आकृतियों दूरियों को मापने के लिए धागे का एक छोर प्रारंभिक बिंदु पर रखकर धागे को टेढ़े मार्ग पर रखा जाता है और आखिरी छोर पर पहुंच जाने के बाद धागे को फैलाकर उसकी सही दूरी को मापा जाता है। एक साधारण यंत्र वक्ररेखामापी के द्वारा भी यह मापी जा सकती है। दूरी को मापने के लिए वक्ररेखामापी के पहिए को रास्ते के साथ-साथ घुमाया जाता है।

2. दिशा का मापन (Measuring Direction)-दिशा, मानचित्र पर एक काल्पनिक सीधी रेखा है, जो एक समान आधार से दिशा की कोणीय स्थिति को प्रदर्शित करती है। उत्तर दिशा की ओर संकेत करने वाली रेखा बिंदु को शून्य दिशा या आधार दिशा रेखा कहते हैं। एक मानचित्र सदैव उत्तर दिशा को दर्शाता है। अन्य सभी दिशाओं का निर्धारण इसके संबंध से किया जाता है। सामान्यतः चार दिशाएं मानी जाती हैं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व एवं पश्चिम) इन्हें प्रधान दिग्बिंदु (कार्डिनल प्वाइंट) भी कहा जाता है। प्रधान दिग्बिंदुओं के बीच कई अन्य मध्यवर्ती दिशाएं होती हैं।

3. क्षेत्र का मापन (Measuring Area)-प्रशासनिक एवं भौगोलिक इकाइयों जैसी आकृतियों का मापन मानचित्र की सतह पर किया जाता है। मानचित्र उपयोगकर्ताओं द्वारा क्षेत्रों को विभिन्न तरीकों से मापा जाता है। वर्गों की एक नियमित शैली के द्वारा किसी क्षेत्र की माप की जा सकती है, हालांकि यह विधि अधिक परिशद्ध नहीं होती है। इस विधि द्वारा क्षेत्र को मापने के लिए एक प्रदीप्त (Illuminated) ट्रेसिंग टेबल के ऊपर मानचित्र के नीचे एक ग्राफ (आलेख) पेपर रखकर मानचित्र को वर्गों से ढंक लें अथवा स्क्वायर शीट पर उस क्षेत्र को ट्रेस कर लें। ‘संपूर्ण वर्गों की संख्या को ‘आंशिक वर्गों के साथ जोड़ लिया जाता है। इसके बाद एक साधारण समीकरण द्वारा क्षेत्रफल मापा जाता है।
HBSE 11th Class Practical Work in Geography Solutions Chapter 1 मानचित्र का परिचय 4
क्षेत्रफल की गणना स्थिर ध्रुवीय प्लेनीमीटर की सहायता से भी की जा सकती है।

प्रश्न 5.
भूगोल में मानचित्रों के महत्त्व (उपयोग/आवश्यकता) को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
भूगोल में मानचित्रों का महत्त्व (उपयोग/आवश्यकता) (Importance of Maps in Geography)-सूचना क्रांति के आधुनिक युग में मानचित्रों का उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। भूगोल ही नहीं, ज्ञान-विज्ञान का शायद है मानचित्रों की उपयोगिता का महत्त्व न अनुभव किया गया हो। मानचित्र सूचनाओं का अगाध स्रोत माने जाते हैं।

ये विभिन्न तकनीकों व विधियों के द्वारा भू-तल पर प्राकृतिक और मानवकृत लक्षणों की विविधता को शानदार ढंग से प्रदर्शित करते हैं। इनसे पृथ्वी तल पर पाए जाने वाले विभिन्न तत्त्वों के बीच अंतर्संबंधों का पता चलता है। जलवायु, वनस्पति, मृदा, जनसंख्या, बस्ती प्रारूपों, प्रवाह-प्रणालियों तथा भूमि-उपयोग संबंधी किसी भी मानवीय अथवा भौतिक पक्ष की खोज (Research) मानचित्रों के बिना संभव नहीं है।

यदि विश्व के सभी भागों का स्वयं भ्रमण करके भी किसी तथ्य का अध्ययन किया जाए तो भी मानचित्र आवश्यक हैं, क्योंकि तथ्यों का क्षेत्रीय स्तर पर तुलनात्मक अध्ययन और प्राप्त ज्ञान का प्रदर्शन मानचित्रों द्वारा ही संभव होता है। विश्व में जनसंख्या विस्फोट के चलते प्राकृतिक संसाधनों की खोज और उनका अंकन मानचित्रों के बिना संभव नहीं।

मानचित्रों के बिना भूगोल को न ही समझा जा सकता है और न ही उसे रोचक बनाया जा सकता है। मानचित्र हैं तो भूगोल है। एक अच्छा मानचित्र हमें इतनी सूचना, सामग्री और विचार देता है जिन्हें हम जीवन भर घूम-घूम कर भी एकत्रित नहीं कर सकते। एक मानचित्र पस्तक के सैकड़ों पन्नों के समान हो सकता है। एच०आर० मिल ने उचित कहा है, “भगोल में हमें यह सिद्धांत मान लेना चाहिए कि जिसका मानचित्र नहीं बनाया जा सकता, उसका वर्णन भी नहीं किया जा सकता।”

कहा जाता है कि ‘Either map it or scrap it’ इसी कारण मानचित्र भूगोलवेत्ता की आशुलिपि (Short hand) मानी जाती है। युद्धों में हमेशा विजय उन्हीं राष्ट्रों की हुई जिन्होंने मानचित्र बनाने और उनका अध्ययन करने में दक्षता प्राप्त की। संभवतः इसी भरोसे पर हिटलर कहा करता था, “मुझे किसी भी देश का विस्तृत मानचित्र दो और मैं उस देश पर विजय प्राप्त कर लूंगा।”

इसीलिए कहा जाता है, “मानचित्र एक भूगोलवेत्ता के मुख्य उपकरण (Tools) हैं। मानचित्रों के बिना भूगोलवेत्ता शस्त्रहीन योद्धा के समान होता है।” (“Maps are the main tools of a Geographer and without maps he is like a warrior without weapons”.)

आज मानचित्रों का उपयोग केवल भूगोल तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मानव जीवन के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पक्षों को उजागर करने वाला एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। सैनिक गतिविधियों, नाविकों, वायुयान चालकों, पर्यटकों, अन्वेषकों, योजनाकारों, नीति-निर्धारकों, राजनीतिज्ञों, प्रशासकों, विद्यार्थियों और वैज्ञानिकों सभी को अपने-अपने उद्देश्य के अनुसार मानचित्रों की आवश्यकता पड़ती है। समाचारों में भी घटना स्थलों का मानचित्रों द्वारा प्रदर्शन बढ़ रहा है। अब तो विज्ञापन का क्षेत्र भी मानचित्रों से अछूता नहीं रहा। अब कंप्यूटरों द्वारा पहले से बेहतर व शुद्ध मानचित्र अत्यंत थोड़े समय में तैयार किए जा सकते हैं। इससे अध्ययन और अध्यापन के क्षेत्र में और अधिक गुणात्मक परिवर्तन आने की संभावना है।

मानचित्र का परिचय HBSE 11th Class Geography Notes

→ जीऑयड (Geoid)-एक लध्वक्ष गोलाभ, जो पृथ्वी के वास्तविक आकार के अनुरूप हो।

→ प्रधान दिग्बिदु-उत्तर (N), दक्षिण (S), पूर्व (E) तथा पश्चिम (W)।

→ भूसंपत्ति मानचित्र बृहत मापनी पर निर्मित मानचित्र, जो कि 1:500 से 1:4,000 की मापनी पर भूसंपत्ति परिसीमा दर्शाने के लिए निर्मित किया जाता है। इसमें प्रत्येक भूमि खंड को एक संख्या द्वारा व्यक्त किया जाता है। मानचित्र कला (Map Art) मानचित्र, चार्ट, खाका तथा अन्य प्रकार के ग्राफ बनाने की कला, विज्ञान तथा तकनीक और उनका अध्ययन तथा उपयोग।

→ मानचित्र क्रम (Map Series)-किसी देश या क्षेत्र के लिए समान मापनी, प्रकार तथा विशिष्टता के साथ बनाए गए मानचित्रों का समूह।

→ मानचित्र प्रक्षेप (Map Projection) गोलाकार सतह को समतल सतह पर प्रदर्शित करने की प्रणाली।

→ रेखाचित्र-वास्तविक मापनी या अभिविन्यास के बिना मुक्त-हस्त द्वारा खींचे गए सरल मानचित्र।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
जापान में शोगुनों के उत्थान एवं पतन के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जापान के इतिहास में शोगुनों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। जापान का सम्राट मिकाडो (mikado) सर्वोच्च होता था। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द कानून समझा जाता था। वह क्योतो (Kyoto) से शासन करता था। सम्राट का प्रधान सेनापति शोगन कहलाता था। जापान के राजनीतिक इतिहास में एक नए चरण का आरंभ तब हुआ जब 1603 ई० में तोकुगावा (Tokugawa) वंश के लोगों ने शोगुन पद पर अधिकार कर लिया। इस वंश के लोग इस पद पर 1867 ई० तक कायम रहे।

तोकुगावा शोगुनों ने अपनी शक्ति में काफी वृद्धि कर ली थी। उनके शासनकाल में सम्राट् बिल्कुल महत्त्वहीन हो गया था। कोई भी व्यक्ति शोगुन की अनुमति के बिना सम्राट से नहीं मिल सकता था। सम्राट को प्रशासन में किसी प्रकार की कोई भूमिका नहीं दी गई थी। तोकुगावा शोगुनों ने एदो (Edo) को जिसे अब तोक्यो (Tokyo) के नाम से जाना जाता है अपनी राजधानी घोषित किया। उन्होंने अपने शासनकाल के दौरान अपने विरोधियों को पराजित कर जापान में कानून व्यवस्था को लागू किया।

उन्होंने एदो में एक विशाल दुर्ग का निर्माण करवाया जहाँ बड़ी संख्या में सैनिकों को रखा जाता था। वे दैम्यो, प्रमुख शहरों एवं खदानों (mines) पर भी नियंत्रण रखते थे। उन्होंने जापान को 250 क्षेत्रों (domains) में बाँटा था। प्रत्येक क्षेत्र को एक दैम्यो (daimyo) के अधीन रखा गया था। दैम्यो अपने अधीन क्षेत्र में लगभग स्वतंत्र होता था। उसे अपने अधीन क्षेत्र के लोगों को मृत्यु दंड देने का अधिकार था।

शोगुन दैम्यो पर कड़ा नियंत्रण रखते थे ताकि वे शक्तिशाली न हो जाएँ। उन्हें सैनिक सेवा करने एवं जन-कल्याण के कार्य करने के लिए बाध्य किया जाता था। शोगुन के जासूस उनकी गतिविधियों पर नियंत्रण रखते थे। प्रत्येक दैम्यो के लिए यह आवश्यक था कि वह वर्ष के चार माह राजधानी एदो में रहे।

जापान के प्रशासन में सामुराई (samurai) की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। सामुराई योद्धा वर्ग (warrior class) से संबंधित थे। वे शोगुन एवं दैम्यो को प्रशासन चलाने में प्रशंसनीय योगदान देते थे। वे अपनी वफ़ादारी, वीरता एवं सख्त जीवन के लिए प्रसिद्ध थे। केवल उन्हें तलवार धारण करने का अधिकार था। वे रणभूमि में वीरगति पाने को एक भारी सम्मान समझते थे। पराजित होने पर वे आत्महत्या कर लेते थे। आत्महत्या के लिए वे दूसरे समुदाय की तलवार से अपना पेट चीर लेते थे। इसे हरकारा (Harkara) पद्धति कहा जाता था।

उन्हें समाज का विशिष्ट वर्ग माना जाता था। अत: उन्हें अनेक सुविधाएँ प्रदान की गई थीं। तोकुगावा शासनकाल (1603-1867 ई०) में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं बौद्धिक स्तर पर अनेक उल्लेखनीय परिवर्तन हुए जिनके दूरगामी प्रभाव पड़े। 17वीं शताब्दी के अंत में तीन महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए गए जिन्होंने आधुनिक जापान के विकास की आधारशिला रखी। प्रथम, किसानों से हथियार वापस ले लिए गए। केवल सामुराई तलवार रख सकते थे। इसके परिणामस्वरूप जापान में एक लंबे समय के पश्चात् शाँति स्थापित हुई।

दूसरा, दैम्यों को अपने क्षेत्रों की राजधानियों में रहने के आदेश दिए गए तथा उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक कार्य करने दिया गया। इससे जापान के विकास को बल मिला। तीसरा, जापान की भूमि का सर्वेक्षण किया गया। इसका उद्देश्य भूमि के मालिकों तथा करदाताओं का निर्धारण करना था। कर निर्धारण भूमि की उत्पादन शक्ति के आधार पर किया जाता था। 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान का शहर एदो (Edo) विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला शहर बन गया। उस समय एदो में 10 लाख से अधिक लोग रहते थे।

इसके अतिरिक्त ओसाका (Osaka), क्योतो (Kyoto) एवं नागासाकी (Nagasaki) जापान के अन्य बड़े शहरों के रूप में उभरे। जापान में उस समय कम-से-कम 6 ऐसे शहर थे जिनकी जनसंख्या 50,000 से अधिक थी। उस समय अधिकाँश यूरोपीय देशों में एक बड़ा शहर होता था। जापान में शहरों के तीव्र विकास से व्यापार एवं वाणिज्य को बहुत बल मिला। इससे व्यापारी वर्ग बहुत धनी हुआ। इस वर्ग ने जापानी कला एवं साहित्य को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

तोकुगावा काल में जापान के लोगों में शिक्षा का काफी प्रचलन था। अनेक लोग केवल लेखन द्वारा ही अपनी जीविका चलाते थे। पुस्तकों का प्रकाशन बड़े स्तर पर किया जाता था। जापानी लोग यूरोपीय छपाई को पसंद नहीं करते थे। वे किताबों की छपाई के लिए लकड़ी के ब्लॉकों का प्रयोग करते थे। लोगों में पढ़ाई का इतना शौक था कि वे पुस्तकों को किराए पर लेकर भी पढ़ते थे। 18वीं शताब्दी में पश्चिमी देशों की अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का जापानी में अनुवाद किया गया। इससे जापान के लोगों को पश्चिम के ज्ञान के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त हुई।

तोकुगावा काल में जापान एक धनी देश था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जापान चीन से रेशम तथा भारत से वस्त्र आदि विलासी वस्तुओं का आयात करता था। इसके बदले वह सोना एवं चाँदी देता था। इसका जापानी अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा। इस कारण तोकुगावा को इन कीमती वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। उन्होंने रेशम के आयात को कम करने के उद्देश्य से 16वीं शताब्दी में निशिजन (Nishijin) में रेशम उद्योग की स्थापना की। आरंभ में केवल 31 परिवारों का एक संघ इस उद्योग से संबंधित था।

17वीं शताब्दी के अंत में इस संघ में 70,000 लोग सम्मिलित हो गए थे। इससे रेशम उद्योग को प्रोत्साहन मिला। 1713 ई० में केवल घरेलू धागे का प्रयोग करने संबंधी आदेश से इस उद्योग को अधिक बल मिला। 1859 ई० में जापान द्वारा विदेशी व्यापार आरंभ किए जाने से रेशम के व्यापार को सर्वाधिक मुनाफा मिलने लगा। इसका कारण यह था कि निशिजन का रेशम दुनिया में सबसे बेहतरीन माना जाता था। मुद्रा का बढ़ता हुआ प्रयोग तथा चावल का शेयर बाज़ार इस बात का संकेत था कि जापानी अर्थतंत्र नयी दिशाओं में विकसित हो रहा था।

1867 ई० में शोगुन पद की समाप्ति के साथ ही जापान के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। शोगुनों का पतन किसी अचानक घटना का परिणाम नहीं था। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. शोगुनों की पक्षपातपूर्ण नीति:
शोगुनों की नीति बहुत पक्षपातपूर्ण थी। उन्होंने राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर केवल तोकुगावा वंश के लोगों को ही नियुक्त किया। इसके चलते अन्य सामंती वंशों में निराशा फैली तथा उन्होंने शोगनों का अंत करने का प्रण किया।

2. गलत आर्थिक नीति :
शोगनों के शासनकाल में उनकी गलत नीतियों के चलते जापान की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई थी। विवश होकर उन्हें अपने व्यय में कटौती करनी पड़ी। इस उद्देश्य से उन्होंने अपनी सेना की संख्या में कुछ कमी कर दी। किंतु नौकरी से निकाले गए सैनिक इसे सहन करने को तैयार नहीं थे। अतः उन्होंने शोगुनों को एक सबक सिखाने का निर्णय किया।

3. किसानों की दयनीय स्थिति:
शोगुन शासनकाल में किसानों की स्थिति बहुत दयनीय थी। उन पर अनेक प्रकार के कर लगाए गए थे। इन करों को बलपूर्वक वसूल किया जाता था। विवश होकर उन्होंने विद्रोहों का दामन थामा। इन विद्रोहों के चलते जापान में अराजकता फैल गयी थी।

4. व्यापारिक वर्ग का उदय:
19वीं शताब्दी जापान के समाज में एक नवीन व्यापारिक वर्ग का उत्थान हुआ। उन्नत व्यापार के चलते इनके पास काफी धन था। इसके बावजूद सामंत वर्ग उनसे ईर्ष्या करता था। अत: व्यापारी वर्ग अपनी हीन स्थिति को समाप्त करने के लिए जापान में शोगुन व्यवस्था का अंत करना चाहता था।

5. कॉमोडोर मैथ्यू पेरी का आगमन:
अमरीका ने 24 नवंबर, 1852 ई० को कॉमोडोर मैथ्यू पेरी को जापान की सरकार के साथ एक समझौता करने के लिए भेजा। वह 3 जुलाई, 1853 ई० को जापान की बंदरगाह योकोहामा में पहुँचा। इसका उद्देश्य अमरीका एवं जापान के मध्य राजनीतिक एवं व्यापारिक संबंध स्थापित करना था। पेरी जापान की सरकार के साथ 31 मार्च, 1854 ई० को कानागावा की संधि करने में सफल हो गया।

इस संधि के अनुसार जापान की दो बंदरगाहों शीमोदा (Shimoda) एवं हाकोदाटे (Hakodate) को अमरीका के लिए खोल दिया गया। शीमोदा में अमरीका के वाणिज्य दूत को रहने की अनुमति दी गई। जापान ने अमरीका के साथ बहुत अच्छे राष्ट्र (most favoured nation) जैसा व्यवहार करने का वचन दिया। विदेशियों के प्रवेश से जापान में स्थिति ने विस्फोटक रूप धारण कर लिया। शोगुन इस स्थिति को अपने नियंत्रण में लाने में विफल रहे। अतः उन्हें अपने पद को त्यागना पड़ा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 2.
मेज़ी काल के दौरान जापान का आधुनिकीकरण किस प्रकार हुआ ? वर्णन करें।
अथवा
मेज़ी काल के दौरान जापान के आधुनिकीकरण का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मेज़ी पुनर्स्थापना को जापान के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता है। 1868 ई० में मुत्सुहितो (Mutsohito) जापान का नया सम्राट बना। वह तोक्यो (Tokyo) में सिंहासनारूढ़ हुआ। मुत्सुहितो ने 1912 ई० तक शासन किया। उसने सिंहासन पर बैठते समय ‘मेज़ी’ की उपाधि धारण की थी। मेज़ी से अभिप्राय था प्रबुद्ध सरकार (Enlightened Government)। मेजी शासनकाल के दौरान जापान में अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार किए गए।

इन सुधारों के चलते जापान की काया पलट हो गयी तथा वह एक शक्तिशाली एवं आधुनिक देश बन गया। वास्तव में मेज़ी पुनर्स्थापना के साथ जापान ने एक नए युग में प्रवेश किया। प्रसिद्ध इतिहासकार केनेथ बी० पायली के अनुसार, “मेज़ी काल (1868-1912) में जापान का पश्चिमीकरण अब तक का इतने कम समय हुआ किसी भी लोगों का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन माना जाता है।”

1. सामंती प्रथा का अंत:
मेज़ी सरकार की सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता जापान में सामंती प्रथा का अंत करना था । इससे पर्व संपर्ण जापान में सामंतों का बोलबाला था। वे अपने अधीन क्षेत्रों का शासन प्रबंध चलाते थे। इस संबंध में उन्हें व्यापक अधिकार प्राप्त थे। वे अपने अधीन क्षेत्रों के लोगों को मत्य दंड तक दे सकते थे। सेना में केवल सामुराई सामंतों को भर्ती किया जाता था। सामंतों के शक्तिशाली होने के कारण सम्राट् केवल नाममात्र का शासक रह गया था। सामंती प्रथा जापान के एकीकरण के मार्ग में सबसे प्रमुख बाधा थी।

सामंती प्रथा के चलते किसानों की स्थिति बहुत दयनीय हो गई थी। सामंत उन पर घोर अत्याचार एवं भारी शोषण करते थे। मेज़ी सरकार ने 1871 ई० में जापान में सामंती प्रथा के अंत की घोषणा की। इसके अधीन सामंतों के सभी प्रकार के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए। ऐसा करते समय सामंतों के हितों का विशेष ध्यान रखा गया। उनके लिए वार्षिक पेंशन की व्यवस्था की गई।

कुछ सामंतों को राष्ट्रीय सेना में भर्ती कर लिया गया। इस प्रकार जापान में सामंती प्रथा का अंत बिना किसी खून खराबे के हो गया। निस्संदेह इस प्रथा के अंत से जापान आधुनिकीकरण की दिशा की ओर अग्रसर हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० ए० बस के अनुसार, “सामंतवाद के अंत ने एक ऐसी व्यवस्था को खत्म किया जो पिछले एक हजार वर्ष या इससे कुछ अधिक समय से जारी थी।”2

2. शिक्षा सुधार:
मेज़ी पुनर्स्थापना के पश्चात् जापान में उल्लेखनीय शिक्षा सुधार किए गए। इससे पूर्व शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल समाज के उच्च वर्ग को ही प्राप्त था। स्त्रियों की शिक्षा की ओर तो बिल्कुल ध्यान नहीं दिया गया था। जापान में 1871 ई० में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। इसके पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तीव्रता से प्रगति हुई। संपूर्ण जापान में अनेक स्कूलों एवं कॉलेजों की स्थापना की गई। 6 वर्ष के सभी बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया।

विद्यार्थियों को अच्छे नागरिक बनने एवं राष्ट्र के प्रति वफ़ादार रहने की प्रेरणा दी जाती थी। 1877 ई० में जापान में तोक्यो विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। तकनीकी शिक्षा को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। पश्चिम की प्रसिद्ध पुस्तकों का जापानी भाषा में अनुवाद किया गया । स्त्रियों को शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित किया गया। 1901 ई० में जापानी महिला विश्वविद्यालय की स्थापना इस दिशा में एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

3. सैनिक सुधार:
मेज़ी काल में सेना को शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए अब तक जापान में कोई राष्ट्रीय सेना नहीं थी। सम्राट् केवल सामंतों की सेना पर निर्भर करता था। इस सेना में कोई आपसी तालमेल नहीं था। इस सेना में केवल सामुराई वर्ग का प्रभुत्व था। 1853 ई० में कॉमोडोर मैथ्यू पेरी के जापान आगमन के समय जापानी सेना की कमज़ोर स्थिति स्पष्ट हो गई थी। अतः जापान की सुरक्षा के लिए इसकी सेना का पुनगर्छन करना अत्यंत आवश्यक था।

इस उद्देश्य से जापानी राष्ट्रीय सेना का गठन किया गया । इसमें सभी वर्ग के लोगों को योग्यता के आधार पर भर्ती किया गया। 1872 ई० में 20 वर्ष से अधिक नौजवानों के लिए सैनिक सेवा को अनिवार्य कर दिया गया। नौसेना (navy) को भी अधिक शक्तिशाली बनाया गया। सेना को आधुनिक शस्त्रों से लैस किया गया।

4. आर्थिक सुधार:
मेज़ी काल में जापानी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक प्रशंसनीय पग उठाए गए। सरकार ने फुकोकु क्योहे (Fukoku Kyohei) का नारा दिया। इससे अभिप्राय था समृद्ध देश एवं मज़बूत सेना।।

(1) औद्योगिक विकास:
जापान में उद्योगों के विस्तार की ओर सरकार ने अपना विशेष ध्यान दिया। इस उद्देश्य से 1870 ई० में जापान में उद्योग मंत्रालय की स्थापना की गई। इस मंत्रालय की स्थापना जापानी उद्योगों के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हआ। सरकार ने भारी उद्योगों के विकास के लिए पूँजीपतियों को प्रोत्साहित किया। अत: जापान में शीघ्र ही अनेक नए कारखाने स्थापित हुए।

इनमें लोहा-इस्पात उद्योग, वस्त्र उद्योग, रेशम उद्योग, जहाज़ उद्योग एवं शस्त्र उद्योग प्रसिद्ध थे। मित्सुबिशी (Mitsubishi) एवं सुमितोमो (Sumitomo) नामक कंपनियों को जहाज़ निर्माण के लिए विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं। इन उद्योगों में यूरोप से मँगवाई गई मशीनों को लगाया गया। मजदूरों के प्रशिक्षण के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया।

(2) कृषि सुधार:
मेज़ी काल में कृषि क्षेत्र में भी प्रशंसनीय सुधार किए गए। सामंती प्रथा का अंत हो जाने से किसानों की स्थिति पहले की अपेक्षा अच्छी हो गई। 1872 ई० में सरकार के एक आदेश द्वारा किसानों को उस भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया। किसानों से बेगार लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। किसानों को कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ प्रदान की गईं।

उन्हें उत्तम किस्म के बीज दिए गए। पशओं की उत्तम नस्ल का प्रबंध किया गया। किसानों से अब अनाज की अपेक्षा नकद भू-राजस्व लिया जाने लगा। उन्हें कृषि के पुराने ढंगों की अपेक्षा आधुनिक ढंग अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। पश्चिमी देशों से अनेक कृषि विशेषज्ञों को जापान बुलाया गया। जापान में अनेक कृषि विद्यालयों की स्थापना की गई। उन प्रयासों के परिणामस्वरूप जापान के कृषि क्षेत्र में एक क्राँति आ गई। निस्संदेह इसे मेज़ी काल की एक महान् सफलता माना जा सकता है।

(3) कुछ अन्य सुधार:
जापान की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से मेज़ी काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। सर्वप्रथम यातायात के साधनों का विकास किया गया। 1870-72 ई० में जापान में तोक्यो (Tokyo) एवं योकोहामा (Yokohama) के मध्य प्रथम रेल लाइन बिछाई गई। 1894-95 ई० में जापान में 2 हज़ार मील लंबी रेल लाइन बिछाने का कार्य पूरा हो चुका था। जहाज़ निर्माण के कार्य में भी उल्लेखनीय प्रगति की गई। द्वितीय, मुद्रा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। तीसरा, 1872 ई० में जापान में बैंकिंग प्रणाली को आरंभ किया गया। 1882 ई० में बैंक ऑफ जापान (Bank of Japan) की स्थापना की गई। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० यनागा के शब्दों में, “मेज़ी पुनर्स्थापना एक आर्थिक क्राँति थी।”

5. मेज़ी संविधान:
मेज़ी काल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 1889 ई० में एक नए संविधान को लागू करना था। इस संविधान के अनुसार सम्राट् को सर्वोच्च सत्ता सौंपी गई। उसे कई प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। संपूर्ण सेना उसके अधीन थी। उसे किसी भी देश से युद्ध अथवा संधि करने का अधिकार दिया गया था। वह डायट (संसद्) के अधिवेशन को बुला सकता था तथा उसे भंग भी कर सकता था।

वह सभी मंत्रियों की नियुक्ति करता था तथा वे अपने कार्यों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी होते थे। केवल सम्राट ही मंत्रियों को बर्खास्त कर सकता था। डायट का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष तीन माह के लिए बुलाया जाता था। इसमें सदस्यों को बहस करने का अधिकार प्राप्त था। सम्राट् डायट की अनुमति के बिना लोगों पर नए कर नहीं लगा सकता था। नए संविधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे।

6. न्यायिक सुधार:
मेज़ी काल में अनेक न्यायिक सुधार भी किए गए। जापान में 1882 ई० में एक नई दंड संहिता को लागू किया गया। इसके अनुसार अपराधियों को क्रूर सजाएँ देना बंद कर दिया गया। न्यायालयों के अधिकार निश्चित कर दिए गए। दीवानी एवं फ़ौजदारी कानूनों को अलग-अलग परिभाषित किया गया। केवल ईमानदार एवं उच्च चरित्र के व्यक्तियों को न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया। अपराधियों की दशा को सुधारने के उद्देश्य से नई जेलों का निर्माण किया गया। इस प्रकार जापान न्यायिक क्षेत्र में आधुनिकीकरण के पथ पर आगे अग्रसर हुआ।

7. रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव:
मेज़ी काल में जापानियों की रोज़मर्रा की जिंदगी में अनेक महत्त्वपूर्ण बदलाव आए। इसमें जापान में हुए तीव्रता से शिक्षा के प्रसार, जापानियों की पश्चिमीकरण में दिलचस्पी एवं पत्रकारिता के प्रचार ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। मेज़ी काल से पूर्व जापान में संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन था।

इसके अधीन परिवार की कई पीढ़ियाँ परिवार के मुखिया के नियंत्रण में रहती थीं, मेजी में परिवार के बारे में लोगों के दृष्टिकोण में तीव्रता से परिवर्तन आने लगा। अब एकल परिवार का प्रचलन बढ़ने लगा। इसमें पति, पत्नी एवं उनके बच्चे रहते थे। अतः वे नए घरों जिसे जापानी में होमु (homu) कहते थे में रहने लगे।

वे घरेलू उत्पादों के लिए बिजली से चलने वाले कुकर, माँस एवं मछली भूनने के लिए अमरीकी भूनक (American grill) तथा ब्रेड सेंकने के लिए टोस्टर का प्रयोग करने लगे। जापानियों में अब पश्चिमी वेशभूषा का प्रचलन बढ़ गया। वे अब सूट एवं हैट डालने लगे। औरतों के लिबास में भी परिवर्तन आ गया। वे यूरोपीय ढंग से अपने बालों को सजाने लगीं।

वे अब सौंदर्य वृद्धि की ओर विशेष ध्यान देने लगीं। दाँतों की चमक-दमक के लिए टूथब्रश एवं ट्थपेस्ट का प्रचलन बढ़ गया। परस्पर अभिवादन के लिए हाथ मिलाने का प्रचलन लोकप्रिय हो गया। मनोरंजन के नए साधनों का विकास हुआ। लोग ट्रामों एवं मोटरगाड़ियों द्वारा सैर-सपाटों पर जाने लगे।

1878 ई० में जापान में लोगों के लिए भव्य बागों का निर्माण किया गया। लोगों की सुविधा के लिए विशाल डिपार्टमैंट स्टोर बनने लगे। 1899 ई० में जापान में सिनेमा का प्रचलन आरंभ हुआ। संक्षेप में मेज़ी काल में लोगों के रोज़मर्रा के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव आए। प्रसिद्ध इतिहासकार के० एस० लाटूरेट का यह कहना ठीक है कि, “19वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में जापान ने उल्लेखीय परिवर्तन देखे।”

प्रश्न 3.
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम निकले?
अथवा
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध के बारे में आप क्या जानते हैं ? चर्चा कीजिए।
अथवा
शिमोनोस्की की संधि क्यों व कब हुई ? इसके क्या परिणाम निकले? इसके क्या परिणाम निकले?
उत्तर:
1894-95 ई० में जापान तथा चीन के मध्य एक युद्ध हुआ। इस युद्ध का मूल कारण कोरिया था। इस युद्ध में जापान ने चीन को बहुत शर्मनाक पराजय दी। परिणामस्वरूप चीन के सम्मान को भारी आघात पहुँचा और जापान विश्व के शक्तिशाली देशों की पंक्ति में आ खड़ा हुआ।

चीन-जापान युद्ध के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. रूस की कोरिया में रुचि:
रूस की दक्षिणी पूर्वी सीमा कोरिया के साथ लगती थी। अत: उसने कोरिया पर अपना अधिकार करने की योजना बनाई। रूस ने कोरिया की सेना को पुनर्गठित करने के उद्देश्य से अपने सैनिक अधिकारियों को वहाँ भेजा। इसके बदले में कोरिया ने लजरफ की बंदरगाह रूस को दे दी। अब रूस के जहाज़ बिना किसी बाधा के इस बंदरगाह पर आ-जा सकते थे। इस प्रकार कोरिया में रूस का प्रभाव बढ़ने लगा। रूस के कोरिया में बढ़ते हुए प्रभाव को जापान सहन करने को तैयार नहीं था।

2. कोरिया की आंतरिक दशा शोचनीय:
कोरिया की आंतरिक स्थिति बड़ी दयनीय थी। वह एक निर्बल देश था। उस समय कोरिया में अशांति फैली हुई थी तथा अव्यवस्था व्याप्त थी। वहाँ जापान यह अनुभव करता था कि कोरिया की यह आंतरिक स्थिति अन्य देशों के लिए एक नियंत्रण का कार्य कर सकती है। उसे सदैव यह भय लगा रहता था कि कोई अन्य देश कोरिया पर अपना अधिकार न कर ले। चीन भी अपने वंशानुगत अधिकार के कारण किसी अन्य देश के कोरिया में हस्तक्षेप को सहन नहीं कर सकता था। इन परिस्थितियों में चीन तथा जापान में युद्ध होना अनिवार्य था।

3. कोरिया में विदेशी शक्तियों का आगमन:
कोरिया में जापान के बढ़ रहे प्रभाव को देख कर चीन बहुत चिंतित हो गया। जापान के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से उसने विदेशी शक्तियों को कोरिया में व्यापार करने के प्रयासों में अपना समर्थन दिया। परिणामस्वरूप अमरीका, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली, रूस तथा फ्राँस आदि देशों ने कोरिया से संधियाँ की तथा अपने लिए अनेक सुविधाएँ प्राप्त की।

विदेशी शक्तियों के बढ़ते हुए प्रभाव से जापान घबरा उठा। अतः जापान कोरिया को विदेशी शक्तियों के प्रभाव से मुक्त करवाना चाहता था ताकि उसकी स्वयं की स्वतंत्रता कायम रहे। इन परिस्थितियों में उसका चीन के साथ युद्ध अनिवार्य था।

4. 1885 ई० की संधि:
1885 ई० में जापान ने चीन के साथ एक संधि की। संधि के अनुसार दोनों देश इस बात पर सहमत हो गए कि वे दोनों ही कोरिया से अपनी सेनाएँ वापस बुला लेंगे। इस संधि से चीन के कई राजनीतिज्ञ असंतुष्ट हो गए। चीनी राजनीतिज्ञों का विचार था कि कोरिया चीन का ही एक अंग है तथा चीन को कोरिया में अपनी सेनाएँ रखने का पूर्ण अधिकार है। चीन के इस विचार को जापान सहन करने को तैयार नहीं था। अतः चीन-जापान के मध्य युद्ध अनिवार्य था।

5. जापान के आर्थिक हित:
चीन-जापान यद्ध के कारणों में एक कारण कोरिया में जापान के आर्थिक हित भी थे। अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए वह कोरिया की ओर ललचाई नज़रों से देख रहा था । जापान में औद्योगिक विकास आश्चर्यजनक गति से हुआ था। अब उसे अपने तैयार माल तथा कच्चे माल के लिए मंडियों की आवश्यकता थी। अपने इस उद्देश्य के लिए जापान कोरिया को उपयुक्त स्थान समझता था। इसे चीन बिल्कुल भी सहन करने को तैयार नहीं था।

6. तात्कालिक कारण:
कोरिया में ‘तोंगहाक’ (Tonghak) संप्रदाय द्वारा किया गया विद्रोह चीन-जापान युद्ध का तात्कालिक कारण बना। इस संप्रदाय के लोग विदेशियों को पसंद नहीं करते थे। कोरिया सरकार इस संप्रदाय के विरुद्ध थी तथा उसने एक अध्यादेश द्वारा इसकी सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। 1883 ई० में इस संप्रदाय के नेताओं ने उन पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की माँग की।

परंतु सरकार ने इसे अस्वीकार कर दिया। कोरिया में प्रत्येक स्थान पर विद्रोह होने लगे। आरंभ में सरकार ने इस विद्रोह का दमन कर दिया किंतु 1894 ई० में इसने भीषण रूप धारण कर लिया। विवश होकर कोरिया की सरकार ने चीन एवं जापान से सैनिक सहायता माँगी।

परंतु इन सेनाओं के पहुंचने से पहले ही विद्रोह का दमन कर दिया गया था। कोरिया सरकार ने दोनों सरकारों को अपनी-अपनी सेनाएँ वापस बुलाने की प्रार्थना की। परंतु दोनों देशों ने अपनी सेनाएँ वहाँ से न निकाली। जापानी सेनाओं ने कोरिया के राजा को बंदी बना लिया और वहाँ की सरकार का पुनर्गठन किया। पुनर्गठित सरकार ने जापान से आग्रह किया कि वह चीन की सेनाओं को कोरिया से मार भगाए। इस प्रकार 1 अगस्त, 1894 ई० को यह युद्ध आरंभ हो गया।

युद्ध से पूर्व ही जापान ने अपनी सेना का आधुनिक ढंग से पुनर्गठन कर लिया था। परंतु चीन की सेना इतनी कुशल नहीं थी तथा उसका लड़ने का ढंग भी प्राचीन ही था। यह युद्ध 9 मास तक चला। इस युद्ध में जापान को शानदार विजय प्राप्त हुई। 16-17 सितंबर, 1894 ई० को जापान ने पिंगयांग तथा यालू के युद्धों में चीन की सेनाओं को पराजित कर दिया तथा चीन की सेनाओं को कोरिया से खदेड़ दिया। फिर उसने मंचूरिया पर आक्रमण किया तथा लिआयोतुंग प्रायद्वीप की ओर चल पड़ा। जापानी सेनाओं ने तेलियनवैन तथा पोर्ट आर्थर पर अधिकार कर लिया।

जापानी सेनाओं ने फ़रवरी 1895 ई० तक शातुंग तथा वी-हाई-वी पर भी अधिकार कर लिया। परिस्थितिवश चीन जापान के साथ समझौता करने के लिए विवश हुआ। अत: 17 अप्रैल, 1895 ई० को दोनों पक्षों में शिमोनोसेकी की संधि हुई जिसके परिणामस्वरूप युद्ध का अंत हुआ। युद्ध में पराजित होने के पश्चात् माँचू सरकार ने ली-हुंग-चांग को संधि के लिए जापान भेजा। ली-हुंग-चांग ने 17 अप्रैल, 1895 ई० को जापानी अधिकारियों के साथ शिमोनोसेकी की संधि की। इस संधि की मुख्य धाराएँ निम्नलिखित अनुसार थीं-.

  • चीन ने कोरिया को एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।
  • चीन ने पोर्ट आर्थर, फारमोसा, पेस्काडोरस तथा लियाओतुंग जापान को दे दिए।
  • चीन ने माना कि वह युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में जापान को 2 करोड़ तायल देगा।
  • चीन जापान को सर्वाधिक प्रिय देश स्वीकार करेगा।
  • चीन जापान के व्यापार के लिए अपनी चार बंदरगाहें शांसी, सो चाऊ, चुंग-किंग तथा हंग चाओ खोलेगा।
  • जब तक चीन युद्ध की क्षतिपूर्ति की राशि जापान को नहीं चुकाएगा उसकी वी-हाई-वी नामक बंदरगाह जापान के पास रहेगी।

शिमोनोसेकी की संधि के कागजों पर अभी स्याही भी नहीं सूखी थी कि उसके 6 दिन पश्चात् ही फ्राँस, रूस तथा जर्मनी ने जापान को कहा कि वह लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को लौटा दे। क्योंकि उन्हें भय था कि यदि लियाओतुंग पर जापान का अधिकार हो गया तो इससे चीन को निरंतर खतरा रहेगा तथा कोरिया की स्वतंत्रता भी स्थायी नहीं रह पाएगी। विवश होकर जापान ने शिमोनोसेकी की संधि में संशोधन करना मान लिया। उसने लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को वापस कर दिया तथा इसके बदले चीन से 3 करोड तायल की अतिरिक्त धन-राशि ले ली।

चीन-जापान युद्ध में जापान ने शानदार विजय प्राप्त की तथा चीन की शर्मनाक पराजय हुई। इस युद्ध में एक छोटे से बौने (जापान) ने एक दैत्य (चीन) को पराजित किया था। इस युद्ध से दोनों देश बहुत प्रभावित हुए। प्रसिद्ध इतिहासकार एच० एफ० मैकनैर के अनुसार, “यह वास्तव में जापान को प्रथम चुनौती थी।”5 संक्षेप में इन प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. जापान की प्रतिष्ठा में वृद्धि:
जापान एशिया का एक छोटा सा देश था तथा चीन सबसे बड़ा देश था। फिर भी जापान ने चीन को पराजित कर दिया। इस युद्ध में विजय से जापान की प्रतिष्ठा को चार चाँद लग गए। सभी यूरोपीय शक्तियों को विश्वास था कि जापान पराजित होगा। परंतु उसकी विजय ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। परिणामस्वरूप उसकी शक्ति की धाक् सारे विश्व में बैठ गई। प्रसिद्ध इतिहासकार एम०ई० कैमरन के अनुसार, “जापान के हाथों चीन की पराजय के महान् एवं दूरगामी प्रभाव पड़े।”

2. चीन की प्रतिष्ठा को गहरा आघात:
जापान ने जो कि एशिया का एक छोटा सा देश था, चीन जैसे बड़े देश को पराजित कर संपूर्ण विश्व को चकित कर दिया था। चीन की इस घोर पराजय से उसकी प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर बी० वी० राव का यह कहना ठीक है कि, “चीन के लिए पराजय एवं अपमानजनक संधि ने माँचू वंश के पतन का डंका बजा दिया।”

3. चीन की लूट आरंभ:
जापान के हाथों पराजित होने से चीन की दुर्बलता सारे विश्व के आगे प्रदर्शित हो गई। इस कारण यूरोपीय शक्तियों की मनोवृत्ति में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया। पहले पश्चिमी देशों ने चीन से कई प्रकार की रियायतें प्राप्त की हुई थीं। परंतु अब वे उसके साम्राज्य का विभाजन चाहने लगीं। अतः ये सभी देश चीन की लूट में जापान के भागीदार बनने के लिए तैयार हो गए। प्रसिद्ध इतिहासकार के० एस० लाटूरेट के अनुसार, “जापान द्वारा चीनी साम्राज्य के हिस्से को हड़पने की कार्यवाही से लूट की प्रक्रिया तीव्र हो गई।”

4. चीन में सुधार आंदोलन:
चीन की अपमानजनक पराजय से चीन के देशभक्त बड़े दुःखी हुए। वे अनुभव करने लगे कि चीन को भी जापान की भाँति आधुनिक ढंग के सुधार करने चाहिएँ। परंतु उस समय के माँचू शासक बड़े रूढ़िवादी थे। अतः वे इन सुधारों के पक्ष में नहीं थे। परिणामस्वरूप चीन में माँचू विरोधी सुधार आंदोलन चल पड़ा।

5. आंग्ल-जापानी समझौते की आधारशिला:
चीन जापान युद्ध के परिणामस्वरूप आंग्ल-जापानी समझौते की नींव रखी गई। जब जापान इस युद्ध में विजयी हो रहा था तो इंग्लैंड के समाचार-पत्रों ने इसकी बहुत प्रशंसा की। उनके अनुसार इंग्लैंड और जापान के हित सामान्य थे। अतः वे जापान को भविष्य का उपयोगी मित्र मानने लगे। जापान भी इंग्लैंड से मित्रता करना चाहता था। इस प्रकार ये दोनों देश एक-दूसरे के निकट आए तथा 1902 ई० में एक समझौता किया।

6. जापान-रूस शत्रुता:
शिमोनोसेकी की संधि के पश्चात् रूस जापान के विरुद्ध हो गया। उसने फ्राँस तथा जर्मनी के साथ मिल कर जापान पर दबाव डाला कि वह लियाओतुंग प्रायद्वीय चीन को वापस कर दे। इससे जापान रूस से नाराज़ हो गया। इसके अतिरिक्त चीन-जापान युद्ध के पश्चात् जापान भी रूस के समान दूर-पूर्व में एक शक्ति के रूप में उभरा। दोनों देश महत्त्वाकांक्षी थे और यही महत्त्वाकांक्षा उन्हें 1904-05 के युद्ध की ओर ले गई।

प्रश्न 4.
रूस-जापान युद्ध 1904-05 के क्या कारण थे? इस युद्ध के क्या प्रभाव पड़े?
अथवा
रूस-जापान युद्ध 1904-05 के बारे में आप क्या जानते हैं ? इस युद्ध में जापान की सफलता के क्या कारण थे?
अथवा
रूस-जापान युद्ध के कारणों का वर्णन करो।
उत्तर:
सुदूर पूर्व में रूस तथा जापान दो महान् शक्तियाँ थीं। ये दोनों शक्तियों महत्त्वाकांक्षी थीं। ये दोनों शक्तियाँ साम्राज्यवादी नीति का अनुसरण करती थीं तथा इस नीति पर चलते हुए अपने-अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहती थीं। इसी कारण उनमें 1904-05 ई० में एक युद्ध हुआ जिसमें रूस पराजित हुआ और जापान को गौरवपूर्ण सफलता प्राप्त हुई।

I. रूस-जापान युद्ध के कारण

रूस-जापान युद्ध के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. जापान के विरुद्ध रूस का हस्तक्षेप:
1894-95 ई० में हुए चीन-जापान युद्ध में जापान ने चीन को पराजित करके एक शानदार विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध के पश्चात् हुई शिमोनोसेकी की संधि के अनुसार चीन ने अपने कुछ क्षेत्र जापान को दे दिए थे। इन प्रदेशों में एक लियाओतुंग प्रदेश भी था। उधर रूस भी अपने स्वार्थी हितों के कारण इन प्रदेशों पर नजर लगाए बैठा था।

इस कारण इस संधि के कुछ दिन पश्चात् ही उसने जापान पर दबाव डाला कि वह लियाओतुंग प्रदेश चीन को वापस कर दे। फ्राँस तथा जर्मनी ने भी रूस का समर्थन किया। अतः जापान को बाध्य होकर लियाओतुंग का प्रदेश चीन को वापस करना पड़ा। जापान रूस से अपने इस अपमान का बदला लेना चाहता था।

2. रूस-चीन गठबंधन:
लियाओतुंग का प्रदेश वापस मिलने पर चीन और रूस के संबंध मैत्रीपूर्ण हो गए। रूस ने फ्रांस के साथ मिल कर एक बड़ी राशि चीन को ऋण स्वरूप दी। 1896 ई० में उसने चीन के साथ एक रक्षात्मक गठबंधन बनाया। इस गठबंधन के अनुसार उन्होंने यह निश्चित किया कि यदि जापान रूसी प्रदेशों अथवा चीन और कोरिया पर आक्रमण करता है तो वे सम्मिलित रूप से उसका सामना करेंगे। चीन तो जापान का शत्रु था ही, अपितु यह गठबंधन बन जाने से जापान का रूस के विरुद्ध होना स्वाभाविक था।

3. लियाओतुंग पर रूस का कब्जा:
चीन में हुए ‘रियायतों के लिए संघर्ष’ (scramble for concessions) में रूस सबसे महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ प्राप्त करने में सफल रहा था। अन्य रियायतों के साथ-साथ उसने 1898 ई० में लियाओतुंग का प्रदेश भी चीन से पट्टे पर ले लिया था। रूस की इस कार्यवाही से जापान भड़क उठा था क्योंकि यही प्रदेश उसने जापान से चीन को वापस दिलवाया था और अब उस पर कब्जा कर बैठा था। निस्संदेह इसने आग में घी डालने का कार्य किया।

4. मंचूरिया की समस्या:
मंचूरिया भी रूस-जापान युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण बना। मंचूरिया चीन के उत्तरी भाग में स्थित था तथा ये दोनों देश उसमें रुचि रखते थे। लियाओतुंग पर कब्जा करने के पश्चात् रूस ने पोर्ट आर्थर को अपना शक्तिशाली समुद्री अड्डा बनाने का प्रयास किया। उसने मंचूरिया में रेलवे लाइनें भी बिछाई। मंचूरिया में जापान के भी आर्थिक हित थे। रूस के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण उसके हितों को खतरा पैदा हो गया।

बॉक्सर विद्रोह के बाद भी रूसी सेनाएँ मंचूरिया में ही थीं। वहाँ से सेना हटाने की अपेक्षा उसने चीनी सरकार से और रियायतें प्राप्त करनी चाहीं परंतु जापान तथा इंग्लैंड ने इसका विरोध किया। 1902 ई० में रूस ने वचन दिया कि वह 18 मास में अपनी सेनाएँ चीन से निकाल लेगा परंतु उसने ऐसा न किया। अतः जापान ने रूस को एक सबक सिखाने का निर्णय किया।

5. कोरिया की समस्या:
1894-95 ई० में हुए चीन-जापान युद्ध का मुख्य कारण कोरिया ही था। जापान ने इस यद्ध द्वारा कोरिया में चीन की प्रभसत्ता समाप्त कर दी थी। इस यद्ध के पश्चात रूस ने कोरिया पर जापान के अधिकार को स्वीकार कर लिया था। परंतु रूस ने उत्तरी कोरिया के जंगलों से लकड़ी काटने का सिलसिला बंद न किया। इस के अतिरिक्त उसने इस क्षेत्र में सेना भी भेजनी आरंभ कर दी थी। जापान की सरकार ने इस का विरोध दर्शाते हुए एक पत्र रूसी सरकार के पास भेजा। परंतु रूसी सरकार ने इसकी कोई परवाह न की। परिणामस्वरूप इसने स्थिति को विस्फोटक बना दिया।

6. इंग्लैंड-जापान गठबंधन :
1902 ई० में जापान तथा इंग्लैंड ने एक गठबंधन किया। इसके अधीन दोनों ने एक-दूसरे को वचन दिया कि चीन और कोरिया में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए एक-दूसरे को सहायता देंगे। संधि के अनुसार इंग्लैंड ने यह भी वचन दिया कि यदि रूस और जापान में युद्ध होता है तो वह निष्पक्ष रहेगा। परंतु यदि इस युद्ध में फ्राँस रूस की सहायता करेगा तो वह जापान का साथ देगा। इंग्लैंड के इस आश्वासन से जापान को प्रोत्साहन मिला और उसने रूस के प्रति कठोर नीति अपनानी आरंभ कर दी। जापान का यह व्यवहार भी इस युद्ध का कारण बना।

7. जापान द्वारा संधि के प्रयास:
जापान रूस की विस्तारवादी नीति से बड़ा चिंतित था। वह कोरिया तथा मंचूरिया के प्रश्न पर रूस से कोई समझौता करना चाहता था। अतः इन देशों के मध्य 1903 ई० में बातचीत आरंभ हुई जो कि फ़रवरी, 1904 ई० तक चली। जापान चाहता था कि यदि रूस कोरिया पर जापान का आधिपत्य स्वीकार कर ले तो वह मंचूरिया पर रूस का आधिपत्य स्वीकार कर लेगा। परंतु यह बातचीत किसी निष्कर्ष पर न पहुँच सकी। अंततः दोनों के मध्य 10 फ़रवरी, 1904 ई० को युद्ध आरंभ हो गया।

II. युद्ध की घटनाएँ

रूस-जापान युद्ध स्थल तथा समुद्र दोनों में लड़ा गया था। जापान के एडमिरल तोजो ने युद्ध का आरंभ करते हुए सबसे पहले पोर्ट आर्थर को चारों ओर से घेरा डाला। इसी समय जापानी सेनाओं ने रूस के स्थल मार्ग से आक्रमण किया। इस प्रकार जापानी सेनाओं ने पोर्ट आर्थर को स्थल तथा जल दोनों मार्गों द्वारा घेर लिया। रूस इस घेरे को तोड़ न सका। 10 महीनों के घेराव के बाद जापानी सेनाओं ने पोर्ट आर्थर पर कब्जा कर लिया।

यहाँ से जापानी सेनाएँ लियाओतुंग (Liaotung) की ओर बढ़ी तथा उसे भी विजय कर लिया। फ़रवरी, 1905 ई० को जापानी सेनाओं ने मंचूरिया की राजधानी मुकदेन (Mukaden) पर धावा बोल दिया। एक भयंकर युद्ध के पश्चात् रूसी सेनाएँ पराजित हुईं। रूसी सेनाएँ मुकदेन छोड़ कर भाग गईं तथा उन्होंने मंचूरिया में जापान का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। रूस के ज़ार ने अब समुद्री युद्ध में अपने हाथ आजमाने चाहे।

उसने अपनी नौसेना को बाल्टिक सागर से प्रशाँत सागर में भेजा ताकि पोर्ट आर्थर पर फिर से अधिकार किया जा सके। जब यह सेना तुशिमा (Tsushima) पहुँची तो जापानी एडमिरल तोजो (Admiral Tojo) ने इसे तहस-नहस कर दिया। इस निर्णायक लड़ाई में जापान विजयी रहा। अब तक रूस तथा जापान दोनों ही इस लड़ाई से तंग आ चुके थे। इस युद्ध के कारण जापान पर अत्यधिक आर्थिक बोझ पड़ रहा था तथा रूस की कठिनाइयाँ भी बहुत बढ़ गई थीं।

अब वे किसी संधि के लिए सोचने लगे थे। इस कार्य में संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट (Theodore Roosevelt) ने मध्यस्थता की। दोनों देशों के प्रतिनिधियों को शाँति संधि की शर्ते निर्धारित करने के लिए पोर्टसमाउथ बुलाया गया। काफी वाद-विवाद के पश्चात् । सितंबर, 1905 ई० को दोनों पक्षों में पोर्टसमाउथ की संधि हुई और युद्ध समाप्त हो गया।

पोर्टसमाउथ की संधि (Treaty of Portsmouth) संयुक्त राज्य अमरीका के राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के प्रयत्नों के फलस्वरूप रूस तथा जापान के मध्य 5 सितंबर, 1905 ई० को एक संधि हुई। इसे पोर्टसमाउथ की संधि कहा जाता है। इस संधि की शर्ते निम्नलिखित थीं

(1) कोरिया में जापान के राजनीतिक, सैनिक तथा आर्थिक हितों को रूस ने स्वीकार कर लिया।

(2) पोर्ट आर्थर तथा लियाओतुंग के प्रायद्वीप जापान को मिल गए।

(3) इस संधि में यह भी कहा गया कि रूस तथा जापान दोनों ही मंचूरिया से अपनी सेनाएं वापस बुला लेंगे। केवल रेलों की रक्षा के लिए ही कुछ सैनिक वहाँ रहेंगे।

(4) दोनों ने माना कि मंचूरिया में रेलों का उपयोग केवल व्यापारिक एवं औद्योगिक उद्देश्यों के लिए किया जाएगा।

(5) आपान को स्खालिन द्वीप का दक्षिण भाग प्राप्त हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकारों एफ० एच० माइकल एवं जी०ई० टेलर के शब्दों में, “पोर्टसमाउथ की संधि ने जापान को एशिया में एक महाद्वीपीय शक्ति के रूप में स्थापित किया।

III. जापान की सफलता के कारण

रूस-जापान युद्ध में जापान की सफलता के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(1) जापानी सैनिक तथा जनता दोनों ही देश-भक्ति की भावना से ओतप्रोत थे। सारा राष्ट्र जापान की सरकार के साथ था तथा देश के लिए मर मिटने को तैयार था। उन्होंने शत्रु को हराने के लिए तन, मन तथा धन से सरकार की सहायता की। यही राष्ट्र-भक्ति की भावना जापानियों की विजय का मूल कारण थी।

(2) जापान ने अपनी सेना का आधुनिक ढंग से पुनर्गठन कर इसे काफी शक्तिशाली. बना लिया था। इस शक्तिशाली सेना के आगे रूसी सेनाएँ टिक न सकीं।

(3) जापान ने युद्ध के आरंभ होने से पूर्व ही अपनी पूरी तैयारी कर ली थी। उसने अपने यातायात के साधनों तथा स्वास्थ्य सेवाओं का भी उचित प्रबंध किया जो उसकी विजय में सहायक सिद्ध हुईं।

(4) तोजो, आयोमा तथा नोगी आदि जापानी सेनापतियों को युद्धों का बहुत अनुभव था। अत: उन्होंने जापानी सेना का कुशल नेतृत्व किया। परिणामस्वरूप रूसी सेना जापानी सेना का मुकाबला न कर सकी एवं उसे पराजय का सामना करना पड़ा।

(5) रूस का ज़ार जापान की सैन्य शक्ति का ठीक अनुमान न लगा सका। वह यह ही समझता रहा कि युद्ध अथवा शांति का निर्णय उसी के हाथ में है। यह भ्रम ही रूस की पराजय तथा जापान की विजय का कारण बना।

(6) जापान की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति सदढ थी। वह इंग्लैंड की मित्रता पर भरोसा कर सकता था। परंत फ्राँस 1904 ई० के समझौते के कारण इंग्लैंड के विरुद्ध नहीं लड़ सकता था। अतः रूस मित्रहीन था। अतः जापान ने आसानी से उसे पराजित कर दिया।

IV. रूस-जापान युद्ध के प्रभाव

रूस-जापान युद्ध के दूरगामी प्रभाव पड़े। संक्षेप में इसके प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. रूस पर प्रभाव (Effects on Russia)-रूस-जापान युद्ध से रूस की प्रतिष्ठा को गहरी चोट लगी। ज़ार शासकों के विरुद्ध पहले ही रूसी जनता में असंतोष व्याप्त था। ऊपर से जापान जैसे छोटे-से देश से पराजित होने पर लोग उनसे और नाराज हो गए। इस पराजय से जार शासकों की शक्ति का खोखलापन सारे विश्व के सामने आ गया तथा यूरोप के लोग इसकी आलोचना करने लगे।

2. जापान पर प्रभाव (Effects on Japan)-रूस-जापान युद्ध के जापान पर भी प्रभाव पड़े। इस युद्ध में विजय के कारण अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जापान का बहुत सम्मान बढ़ा। जापान एक छोटा-सा देश था फिर भी वह विशालकाय रूस पर विजय पाने में सफल रहा। इस विजय के कारण उसकी प्रतिष्ठा को चार चाँद लग गए तथा दूर-पूर्व में उसका प्रभाव बढ़ गया।

इस विजय से जापान बहुत प्रोत्साहित हुआ। इस विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि जापान एक शक्तिशाली राष्ट्र है। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० यनागा के अनुसार,”इस प्रकार सुदूर पूर्व में एक नई शक्ति का उदय हुआ, एक छोटी पूर्वी शक्ति ने न केवल एक शक्तिशाली राष्ट्र को चुनौती प्रस्तुत की अपितु उसे कड़ी पराजय देने में भी सफलता प्राप्त की।

3. चीन पर प्रभाव (Effects on China)-रूस-जापान युद्ध के प्रभावों से चीन भी अछूता नहीं रहा। इस युद्ध के पश्चात् चीन के लोगों के मन में यह धारणा घर कर गई कि यदि उन्होंने पश्चिमी देशों के साम्राज्यवाद से छुटकारा
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पाना है तो उन्हें अपनी शक्ति का पुनर्गठन करना होगा। अतः चीन ने अपनी सेना को पुनर्गठित करने के लिए पश्चिमी युद्ध कला को अपनाया। पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से परिचित होने के लिए अनेक चीनी विदेशों में गए। अत: चीन के लोगों में एक नई जागृति का उत्थान हुआ। इसी राष्ट्रीय जागरण के परिणामस्वरूप चीन में 1911 ई० की क्रांति हुई और चीनी सम्राट् गद्दी छोड़ने पर विवश हुआ। इस प्रकार मांचू वंश का पतन हुआ तथा चीन में गणतंत्र की स्थापना हुई।

4. यूरोप पर प्रभाव (Effects on Europe)-इस युद्ध के यूरोप की राजनीति पर भी महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। युद्ध के समय जर्मनी ने रूस तथा फ्रॉस से मिल कर इंग्लैंड के विरुद्ध एक संगठन बनाने का प्रयास किया, परंतु इसमें वह सफल न हो सका। इसके विपरीत फ्रांस के प्रयत्नों से रूस और इंग्लैंड एक-दूसरे के निकट आए। इस युद्ध में रूस की पराजय से इंग्लैंड को रूस की ओर से कोई भय न रहा। इस कारण इंग्लैंड ने रूस की ओर मैत्री का हाथ बढ़ाया जिससे इंग्लैंड को बहुत लाभ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार एम० ई० कैमरन के अनुसार, “युद्ध में जापान की विजय के विश्व मामलों में गहन प्रभाव पड़े।”

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 5.
जापान में सैन्यवाद के उदय के कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जापान में सैन्यवाद के उदय के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनमें से मुख्य कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है

1. सैन्यवादियों की महत्त्वाकांक्षा:
जापान में सैन्यवादियों के उत्थान का एक महत्त्वपूर्ण कारण यह था कि वे जापान में फैली अशांति पर नियंत्रण पाने में सफल रहे। 1894-95 में चीन-जापान युद्ध में तथा 1904-05 ई० में रूस-जापान युद्ध में जापान की सफलता ने विश्व को चकित कर दिया। 1902 ई० में जापान इंग्लैंड के साथ एक समझौता करने में सफल रहा। इन कारणों से जापान की सेना की महत्त्वाकांक्षा बढ़ गई। 1931 ई० में जापानी सेना ने सरकार से परामर्श किए बिना ही मंचूरिया पर आक्रमण कर उस पर अधिकार कर लिया।

2. उदारवादियों की मृत्यु :
बहुत-से पुराने नेता सैन्यवादियों की गतिविधियों को पसंद . नहीं करते थे। वास्तव में वे सैन्यवादियों पर अंकुश रखते थे। परंतु ज्यों-ज्यों समय गुजरता गया वे बूढ़े हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के कारण सैन्यवादियों पर जो उनका अंकुश था वह समाप्त हो गया और वे अब अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हो गये। दूसरे क्षेत्रों को विजय करने की उनकी इच्छा को अब कोई नहीं दबा सकता था।

3. नवयुवक अधिकारियों की श्रेणी का उदय:
जापान में नवयुवक अधिकारियों की एक नई श्रेणी का उदय हुआ। इन लोगों का संबंध जापान की कुलीन श्रेणी से नहीं था। यहाँ यह बात याद रखने योग्य है कि कुलीन श्रेणी के लोग इन नवयुवक लोगों को केवल पसंद ही नहीं करते थे बल्कि घृणा भी करते थे। उधर ये नवयुवक अधिकारी अपनी शानदार विजयों द्वारा समाज में अपना स्थान बनाना चाहते थे। उन्हें सैनिक नेताओं का समर्थन प्राप्त था। वे जापानी सैनिकवाद में विश्वास करते थे और शक्ति का प्रयोग करना अपना अधिकार समझते थे।

4. नाजीवाद तथा फासिस्टवाद का प्रभाव:
हिटलर तथा मुसोलिनी की सफलताओं का जापानियों पर बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। अत: जापानी भी हिटलर तथा मुसोलिनी की भाँति विजयें प्राप्त करना चाहते थे। वे उनके विचारों तथा तरीकों से बहुत प्रभावित थे। विजयों की आकांक्षा रखने वाले जापानी नवयवक नाजी एवं फासिस्ट लोगों की तरह अपनी दशा को सधारना चाहते थे।

5. विरोधी नेता:
जापानी संसद् के सदस्य, उच्च अधिकारी तथा मंत्रिपरिषद् के सदस्य सैन्यवादियों के घोर विरोधी थे। अपने इस विरोध के कारण ही वे सैन्यवादियों के आतंक का निशाना बने। जापान में सैन्यवादियों का विरोध करने वालों में शिक्षक तथा पत्रकार भी शामिल थे। वे भली-भाँति समझते थे कि सैनिक खर्च में वद्धि का क्या परिणाम होगा। जापान में उस समय सरकारी आमदनी सीमित तथा खर्चे असीमित थे।

देश पर पहले ही ऋण का भारी बोझ था। अतः एक के बाद एक वित्तमंत्री ने सैनिक खर्चों में कटौती करने के सझाव रखे। जापानी सेना इसलिए तैयार नहीं थी। अतः उसने विरोधियों को अपना निशाना बनाया।

6. उच्च-पदाधिकारियों का वध:
1937 ई० तक जापान में उग्र राष्ट्रवाद का प्रसार हो चुका था। सैन्यवादियों ने उग्र-राष्ट्रवाद का प्रयोग एक हथियार के रूप में किया। पहले उन्होंने लोगों को डराया धमकाया और जब इससे काम न चला तो सैन्यवादियों ने उनका वध कर दिया। मंत्री, उच्च-पदाधिकारी, संसद् के सदस्य, पत्रकार तथा शिक्षक जो सैन्यवादियों के विरोधी थे, उन्हें पहले धमकी दी गई और जब उन्होंने इस पर भी सैन्यवादियों का विरोध करना न छोड़ा तो उनका वध कर दिया गया। इसने स्थिति को विस्फोटक बना दिया।

प्रश्न 6.
जापान पर अमरीका के कब्जे (1945-51 ई० ) के दौरान वहाँ क्या प्रगति हुई ? संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
जापान पर 1945 ई० से लेकर 1952 ई० तक अमरीका के जनरल दगलस मेकार्थर (General Douglas Mac Arthur) का शासन रहा। इसका उद्देश्य जापान का निशस्त्रीकरण करना, युद्ध अपराधियों पर अभियोग चलाना, जापान में एक लोकतांत्रिक शासन की स्थापना करना, जापान की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करना एवं शिक्षा को एक नई दिशा देना था।

वह अपने उद्देश्य में काफी सीमा तक सफल रहा। इसके परिणामस्वरूप जापान पुनः एक शक्तिशाली देश के रूप में उभरा। आज जापान की गणना विश्व के प्रसिद्ध देशों में की जाती है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर बी० वी० राव के शब्दों में, “विश्व युद्ध के पश्चात् मित्र राष्ट्रों ने जापान पर कब्जे के पश्चात् महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। ये मेज़ी काल से कहीं अधिक क्रांतिकारी थे।”

1. जापान का निरस्त्रीकरण करना :
जनरल दगलस मेकार्थर ने सर्वप्रथम अपना ध्यान जापान को निरस्त्रीकरण करने की ओर दिया। इस कार्य के लिए उसने बहुत साहस से कार्य किया। उसने जापान की थल सेना एवं नौसेना को भंग कर दिया। उनके सभी हथियारों को नष्ट कर दिया। जापान में अनिवार्य सैनिक शिक्षा एवं सेवा को बंद कर दिया गया।

युद्ध सामग्री बनाने वाले सभी उद्योगों को बंद कर दिया गया। उन्हें असैनिक सामान का उत्पादन करने का आदेश दिया गया। वैज्ञानिकों द्वारा युद्ध सामग्री की नई खोजों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया। जिन जापानी अधिकारियों ने जापान के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया था उन्हें उनके पदों से हटा दिया गया। इस प्रकार जापान का निरस्त्रीकरण जापान में एक लंबे समय के पश्चात् एक स्थायी शांति स्थापित करने में सहायक सिद्ध हुआ।

2. युद्ध अपराधियों पर अभियोग :
जापान के जो अधिकारी युद्ध के लिए जिम्मेवार थे उन पर मुकद्दमा चलाया गया। इसके लिए तोक्यो में 1946 ई० में एक अंतर्राष्ट्रीय सैनिक अदालत का गठन किया गया। इसने जापान के जनरल तोजो एवं कुछ अन्य अधिकारियों को मृत्यु दंड दिया। अनेक सैनिकों को आजीवन कारावास का दंड दिया गया। जापान की पिछली सरकार द्वारा जितने उदार राजनीतिज्ञों को कारावास में डाल दिया गया था उन्हें रिहा कर दिया गया।

उग्र राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार करने वाले व्यक्तियों को सरकारी पदों से हटा दिया गया। इसी प्रकार उग्र राष्टीय विचारधारा वाले अध्यापकों को भी हटा दिया गया। इस विचारधारा का समर्थन करने वाली समितियों को भंग कर दिया गया एवं पाठ्यक्रम से ऐसी पुस्तकों को हटा दिया गया।

3. जापान का नया संविधान :
जापान में 1947 ई० में एक नया विधान लाग किया गया। इसने 1889 ई० के मेज़ी काल में प्रचलित संविधान का स्थान ले लिया। इस संविधान के अनुसार सम्राट् से उसकी अनेक शक्तियाँ छीन ली गईं। उसे अब देवता नहीं माना जाता था। अब जापान की डायट के अधिकार बढ़ा दिए गए। इसे अब देश के कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया। न्यायपालिका को पूर्ण स्वतंत्र कर दिया गया।

नागरिक के अधिकारों में वृद्धि की गई। जापान को एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र घोषित किया गया। महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया गया। स्थानीय स्वशासन को प्रोत्साहित किया गया। निस्संदेह जापान का नया संविधान लोकतंत्र स्थापित करने की दिशा में एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

4. आर्थिक सुधार :
द्वितीय विश्व युद्ध के कारण जापान की अर्थव्यवस्था को भारी आघात लगा था। अत: जनरल दगलस मेकार्थर ने इस दिशा की ओर अपना विशेष ध्यान दिया। 1946 ई० में जापान की डायट द्वारा एक कानून पारित किया गया जिसके अनुसार अनुपस्थित ज़मींदारों (absentee landlords) को अपनी भूमि सरकार को बेचने के लिए बाध्य किया गया। सरकार ने इन जमीनों को किसानों में बाँट दिया। इससे उनकी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। 1946 ई० में मजदूरों को श्रमिक संगठन बनाने का अधिकार दिया गया।

उनकी दशा सुधारने के उद्देश्य से उनके वेतन, कार्य के समय, बेकारी भत्ते एवं बुढ़ापे के बीमे आदि की व्यवस्था की गई। जायबात्सु पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसका कारण यह था कि देश की लगभग समस्त संपत्ति उनके हाथों में एकत्र हो गई थी। सरकार ने उन्हें उनके विशेषाधिकारों से वंचित कर दिया। अमरीका ने जापान में भारी उद्योगों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष कदम उठाए। इन सुधारों के चलते जापान की अर्थव्यवस्था पुनः पटड़ी पर आ गई।

5. शिक्षा सुधार :
आधिपत्यकाल में जापान में शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किए गए। जापान की परंपरावादी (traditional) शिक्षा को परिवर्तित कर दिया गया। जापान में पश्चिम में प्रचलित आधुनिक शिक्षा को लागू किया गया। पाठ्य पुस्तकों को नए ढंग से लिखा गया। इसमें सम्राट् की उपासना, नैतिक एवं सैनिक शिक्षा की अपेक्षा लोकतंत्र पर अधिक बल दिया गया था।

शिक्षण संस्थाओं में जापान में प्रचलित शिंटो धर्म के पढ़ाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 9 वर्ष तक शिक्षा अनिवार्य एवं निःशुल्क कर दी गई। इसके बाद विद्यार्थियों को व्यावसायिक शिक्षा दी जाती थी। अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए विशेष प्रबंध किया गया। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् जापान ने विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति की।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एस० एन० सेन का यह कहना ठीक है कि, “जापान पर (अमरीका का) आधिपत्य यद्यपि 7 वर्ष तक रहा किंतु यह जापान के भावी विकास के लिए निर्णायक था।

प्रश्न 7.
1839-42 ई० के प्रथम अफ़ीम युद्ध के बारे में आप क्या जानते हैं ?
अथवा
प्रथम अफ़ीम युद्ध के कारणों एवं प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1839-42 ई० में इंग्लैंड एवं चीन के मध्य प्रथम अफ़ीम युद्ध हुआ। इस युद्ध के लिए उत्तरदायी कारणों, घटनाओं एवं प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है
I. प्रथम अफ़ीम युद्ध के कारण
(Causes of the First Opium War) चीन तथा ब्रिटेन के मध्य प्रथम अफ़ीम युद्ध नवंबर, 1839 ई० में आरंभ हुआ था। यह युद्ध 1842 ई० तक चला। निस्संदेह अफ़ीम का व्यापार ही इस युद्ध का मुख्य कारण था परंतु इसके अन्य भी अनेक कारण थे । इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. चीन एवं ब्रिटेन के तनावपूर्ण संबंध:
विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में से एक होने के कारण चीन निवासी अपनी उच्च सभ्यता पर बहुत गर्व करते थे। वहाँ के लोग पश्चिमी देशों के लोगों को निम्न मानते थे तथा उनके साथ कोई संबंध स्थापित नहीं करना चाहते थे। चीन सरकार के अफसर तथा कर्मचारी यरोपीय व्यापारियों के साथ बहत अभद्र व्यवहार करते थे तथा उन्हें अपमानजनक चीनी कों का पालन करने के लिए विवश किया जाता था। अंग्रेज़ इन अपमानजनक एवं घटिया नियमों को को तैयार नहीं थे। अत: चीन तथा ब्रिटेन के मध्य संबंध तनावपूर्ण हो गए। इसने चीन एवं ब्रिटेन के मध्य होने वाले प्रथम अफ़ीम युद्ध को अनिवार्य बना दिया।

2. चीन में यूरोपीय व्यापारियों का शोषण:
यूरोपीय व्यापारी चीन से जो भी माल खरीदते थे उस पर लिए जाने वाले कर की दर सरकार द्वारा निश्चित नहीं की गई थी। चीनी सरकार के भ्रष्ट अधिकारी उनसे मनमाने ढंग से कर वसूल करते थे जिस कारण यूरोपीय व्यापारी बहुत परेशान थे। चीन सरकार द्वारा स्थापित को-होंग (Co-Hong) नामक संस्था भी प्रायः विदेशी व्यापारियों का शोषण करती थी। चीन का सारा व्यापार को-होंग के माध्यम से ही होता था। चीन में यूरोपीय व्यापारियों का यह शोषण भी अफ़ीम युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण बना।

3. विदेशियों पर कठोर प्रतिबंध:
चीनी सरकार ने विदेशियों पर कई प्रकार के प्रतिबंध भी लगा रखे थे। विदेशी चीनी भाषा नहीं सीख सकते थे, चीनी नागरिक को दास नहीं रख सकते थे तथा न ही किसी चीनी नागरिक को अपने धर्म में दीक्षित कर सकते थे। विदेशी व्यापारी केवल व्यापार के लिए ही कैंटन में निवास कर सकते थे। इसके पश्चात् उन्हें मकाओ वापस जाना पड़ता था। वे कैंटन में अपने परिवार भी साथ नहीं ला सकते थे।

विदेशी अपनी फैक्टरियों में केवल निश्चित संख्या में ही चीनी नौकर रख सकते थे। वे चीन के आंतरिक भागों में नहीं जा सकते थे। इस कारण अंग्रेज़ चीन से अपमानजनक व्यवहार का बदला लेना चाहते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० ए० बस के अनुसार, “कैंटन में पूर्व एवं पश्चिम के मिलन ने गहरे मतभेदों को जन्म दिया जो कि युद्ध की ओर ले गए।”

4. अफ़ीम व्यापार (The Opium Trade)-अंग्रेज़ों ने 1767 ई० में चीन के साथ अफ़ीम का व्यापार आरंभ किया था। शीघ्र ही चीन में इसकी माँग बहुत बढ़ गई। चीन की सरकार ने अफ़ीम के व्यापार पर कई प्रतिबंध लगाए परंतु इसका कोई परिणाम न निकला। अब तक चीन के लोग अफ़ीम के आदी हो चुके थे तथा अंग्रेजों को इसका बहुत लाभ पहुँच रहा था।

चीन सरकार के भ्रष्ट अधिकारी भी भारी घूस लेकर इस व्यापार को प्रोत्साहन दे रहे थे। परिणामस्वरूप चीन में अफ़ीम की तस्करी में भारी वृद्धि हुई। एक अनुमान के अनुसार 1837 ई० तक चीन के व्यापार में केवल अफ़ीम का आयात ही 57% तक हो गया था। चीन की सरकार इसे सहन करने को तैयार नहीं थी। अतः युद्ध के लिए विस्फोट तैयार था।

5. तात्कालिक कारण:
7 जुलाई, 1839 ई० को एक ऐसी घटना घटी जो प्रथम अफ़ीम युद्ध का तात्कालिक कारण सिद्ध हुई। कुछ शराबी अंग्रेज़ नाविकों ने एक चीनी नाविक की हत्या कर दी। कैप्टन इलियट (Capt. Elliot) ने इन अंग्रेज़ नाविकों पर मुकद्दमा चलाकर उन्हें सजा दे दी तथा इस संबंधी चीनी सरकार को सूचित कर दिया। चीन की सरकार ने अपराधियों को उसे सौंपने के लिए कहा।

वह उन्हें अपने देश के कानूनों के अनुसार दंड देना चाहती थी। कैप्टन इलियट ने अपराधियों को सौंपने से इंकार कर दिया। इस बात पर कमिश्नर लिन ने अंग्रेजों को भेजी जाने वाली भोजन सामग्री तथा तेल की सप्लाई बंद कर दी। इसने प्रथम अफ़ीम युद्ध का बिगुल बजा दिया।

II. प्रथम अफ़ीम युद्ध की घटनाएँ

अंग्रेज़ सैनिकों तथा चीनी सैनिकों के मध्य प्रथम मुठभेड़ 3 नवंबर, 1839 ई० को हुई जिसमें ब्रिटिश सेनाओं ने चीन के तीन युद्धपोत नष्ट कर दिए। चीन की सरकार ने जनवरी, 1840 ई० को ब्रिटेन के विरुद्ध औपचारिक युद्ध की घोषणा कर दी। उधर ब्रिटेन का प्रधानमंत्री पामर्स्टन (Palmerston) भी चीन में अंग्रेज़ व्यापारियों के हितों की सुरक्षा करने के पक्ष में था। इसी उद्देश्य से उसने अप्रैल, 1840 ई० में ब्रिटेन की संसद् में चीन के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पास करवा लिया। यह युद्ध लगभग दो वर्ष (1840-42 ई०) तक चला।

अंग्रेजों की संगठित तथा श्रेष्ठ सेना का मुकाबला चीनी सैनिक न कर सके। अंग्रेजों ने सर्वप्रथम कैंटन (Canton), निंगपो (Ningpo), अमोय (Amoy) तथा हांगकांग (Hong Kong) पर अधिकार कर लिया। 1842 ई० में अंग्रेजों ने शंघाई (Shangai) पर भी अधिकार कर लिया तथा नानकिंग की ओर बढ़ने लगे। विवश होकर चीनी सम्राट ने अंग्रेजों के साथ बातचीत करने का आदेश दिया। इस बातचीत के परिणामस्वरूप 29 अगस्त, 1842 ई० को दोनों देशों के मध्य नानकिंग की संधि हुई और यह युद्ध समाप्त हो गया।

1. नानकिंग की संधि (Treaty of Nanking)-29 अगस्त, 1842 ई० को अंग्रेजों तथा चीनियों के बीच एक संधि हुई जो नानकिंग की संधि के नाम से प्रसिद्ध है। इस संधि की शर्ते निम्नलिखित थी

(1) हांगकांग का द्वीप सदा के लिए ब्रिटेन को सौंप दिया गया।

(2) ब्रिटिश लोगों को पाँच बंदरगाहों-कैंटन, अमोय, फूचाओ (Foochow), निंगपो और शंघाई में बसने तथा व्यापार करने का अधिकार दे दिया गया।

(3) क्षतिपूर्ति के रूप में चीन ने दो करोड़ दस लाख डालर अंग्रेजों को देना स्वीकार किया।

(4) को-होंग को भंग कर दिया गया। परिणामस्वरूप अब ब्रिटिश व्यापारी किसी भी चीनी व्यापारी के साथ स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकता था।

(5) आयात और निर्यात पर एक समान तथा उदार दर स्वीकार कर ली गई। (vi) चीनियों ने इस बात को स्वीकार कर लिया कि अंग्रेजों के मुकद्दमे अंग्रेज़ी कानून के अनुसार तथा उन्हीं की अदालतों में चलेंगे।

(6) यह भी शर्त रखी गई कि चीन अन्य देशों के लोगों को जो भी सुविधाएँ देगा वे अंग्रेजों को भी प्राप्त होंगी। एक अन्य इतिहासकार सी० ए० बस के शब्दों में, “यह एक युग का अंत एवं दूसरे युग का आगमन था।”

III. प्रथम अफ़ीम युद्ध के प्रभाव

प्रथम अफ़ीम युद्ध के परिणाम चीन के लिए बहुत ही विनाशकारी प्रमाणित हुए। इस युद्ध के परिणामों का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. चीन की आर्थिक समस्याओं का बढ़ना:
प्रथम अफ़ीम युद्ध का सर्वप्रथम परिणाम यह हुआ कि चीन का आर्थिक शोषण आरंभ हो गया। अंग्रेज़ अब स्वतंत्रतापूर्वक अफ़ीम का व्यापार करने लगे। इस व्यापार के कारण चीन के धन का निकास होने लगा तथा चीन की आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ गईं।

2. चीन के सम्मान को धक्का:
प्रथम अफ़ीम युद्ध के पश्चात् हुई नानकिंग की संधि के कारण चीन के सम्मान में लगातार कमी होने लगी। उसकी व्यापारिक श्रेष्ठता तथ का महत्त्व कम होने के कारण विदेशियों ने चीनी सरकार पर अपना दबाव बढाना आरंभ कर दिया। परिणामस्वरूप उन्होंने चीन से अनेक सुविधाएँ प्राप्त की। इससे चीन के सम्मान को गहरा आघात लगा।

3. खुले द्वार की नीति :
एक लंबे समय से चीन के द्वार विदेशी व्यापारियों के लिए बंद थे। विदेशी व्यापारियों को कैंटन के अतिरिक्त किसी और नगर में व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। विदेशी व्यापारी सीधे चीनी व्यापारियों के साथ व्यापार नहीं कर सकते थे। वे केवल को-होंग के माध्यम से ही अपना व्यापार कर सकते थे। परंतु इस युद्ध के पश्चात् चीन की सरकार को खुले द्वार की नीति अपनानी पड़ी। इस नीति के कारण चीन की बहुत आर्थिक हानि हुई।

4. साम्राज्यवाद का युग :
चीनी लोग यूरोपीयों से बहुत पिछड़े थे। उनकी सैनिक शक्ति भी संगठित नहीं थी। इस स्थिति का लाभ उठा कर यूरोपीयों ने चीन की सरकार पर दबाव डाला तथा अपने लिए अनेक सुविधाएँ प्राप्त कर ली। धीरे-धीरे यूरोपियों ने चीन के तटवर्ती नगरों में अपने कारखाने स्थापित कर लिए और सेना भी रखनी आरंभ कर दी। उन्होंने कुछ नगरों पर अपना शासन भी स्थापित कर लिया। इससे साम्राज्यवाद का उदय हुआ तथा चीन पराधीन होने लगा।

5. ताइपिंग विद्रोह :
प्रथम अफ़ीम युद्ध में हुई चीन की पराजय तथा नानकिंग की संधि से माँचू शासन की दुर्बलता प्रकट हो गई। इस कारण चीन के विभिन्न भागों के लोग माँचू शासन के विरुद्ध हो गए। उन्होंने समय-समय पर कई विद्रोह कर दिए। इन विद्रोहों में से ताइपिंग विद्रोह सबसे प्रसिद्ध था। इस विद्रोह ने 1850 ई० से 1864 ई० के समय के दौरान चीन के कई भागों को अपनी चपेट में ले लिया। विद्रोहियों का उद्देश्य माँचू शासन को समाप्त करके मिंग वंश का शासन पुनः स्थापित करना था। यद्यपि इस विद्रोह का दमन कर दिया गया तथापि चीन के इतिहास में यह एक महत्त्वपूर्ण घटना है।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 8.
द्वितीय अफ़ीम युद्ध का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
द्वितीय अफ़ीम युद्ध के कारणों का वर्णन कीजिए। इस युद्ध के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर:

I. द्वितीय अफ़ीम युद्ध के कारण
द्वितीय अफ़ीम युद्ध चीन तथा ब्रिटेन के मध्य 1856-60 ई० में लड़ा गया। इस युद्ध के लिए जिम्मेदार कारकों का वर्णन अग्रलिखित अनुसार है

1. अफ़ीम के व्यापार में वृद्धि :
प्रथम अफ़ीम युद्ध का मुख्य कारण अफ़ीम का अवैध व्यापार था परंतु इस युद्ध के पश्चात् हुई संधियों में इसके व्यापार संबंधी कोई निश्चित निर्णय नहीं हुआ था। अंग्रेज़ अब भी धड़ल्ले से इसका व्यापार कर रहे थे। वे अफ़ीम के व्यापार से काफी लाभ कमा रहे थे। परिणामस्वरूप भारी मात्रा में अफ़ीम चीन में आने लगी।

1842 ई० में चीन में आने वाली पेटियों की संख्या 38,000 थी जोकि 1850 ई० तक 52,000 हो गई थी। चीन की सरकार इस अवैध व्यापार से बहुत चिंतित थी परंतु इस मामले में विदेशियों पर कोई ठोस प्रतिबंध लगाने में असमर्थ थी। इस प्रकार अफ़ीम का व्यापार द्वितीय अफ़ीम युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण बना।

2. चीनियों के साथ विदेशों में दुर्व्यवहार:
नानकिंग की संधि के पश्चात् विदेशियों ने अपने व्यापार का विस्तार करना आरंभ कर दिया। उन्हें यूरोप में कुलियों की आवश्यकता थी। इसलिए उन्होंने चीन के निर्धन युवकों को धन का लालच देकर यूरोप के देशों तथा संयुक्त राज्य अमरीका आदि में भेजना आरंभ कर दिया। विदेशों में इन चीनियों से दासों जैसा व्यवहार किया जाता था। चीन की सरकार विदेशों में चीनियों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार को सहन करने को तैयार नहीं थी। इस कारण चीन तथा यूरोपियों के संबंध तनावपूर्ण हो गए।

3. अधिकारों का दुरुपयोग:
प्रथम अफ़ीम युद्ध के पश्चात् 8 अक्तूबर, 1843 ई० को हुई बोग की संधि (Treaty of Bogue) के अनुसार अंग्रेजों ने चीन में अपने देश के कानून लागू करने का अधिकार प्राप्त कर लिया था। परंतु चीन की सरकार की दुर्बलता का लाभ उठा कर वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करने लगे थे। चीन की सरकार इसे सहन करने को तैयार नहीं थी।

4. कैथोलिक प्रचारक की हत्या :
आगस्ते चैप्डेलेन (Auguste Chapdelaine) नामक कैथोलिक प्रचारक की हत्या भी द्वितीय अफ़ीम युद्ध का एक मुख्य कारण सिद्ध हुई। चैप्डेलेन फ्राँस का निवासी था। वह ईसाई धर्म के प्रचार के लिए चीन में आया था। वह अपने धर्म-प्रचार के प्रयास में चीन के आंतरिक भागों में काफी दूर तक चला गया। चीन के अधिकारियों ने इसे संधि की शर्तों का उल्लंघन माना तथा उसे बंदी बना लिया।

उस पर चीनी सरकार के विरुद्ध लोगों को भड़काने का आरोप लगाया गया। क्वांगसी की स्थानीय अदालत ने फरवरी 1856 ई० में उसे मृत्यु दंड दे दिया। चीनी सरकार के इस व्यवहार से क्षुब्ध होकर नेपोलियन तृतीय ने चीन के विरुद्ध युद्ध में इंग्लैंड को साथ देने का मन बना लिया।

5. तात्कालिक कारण :
1856 ई० में घटने वाली लोर्चा ऐरो घटना (Lorcha Arrow Incident) द्वितीय अफ़ीम युद्ध का तात्कालिक कारण बनी। 8 अक्तूबर, 1856 ई० को चीनी अधिकारियों ने लोर्चा ऐरो नामक जहाज़ को पकड़ लिया तथा उसके 14 में से 12 नाविकों को बंदी बना लिया। इन पर यह इल्जाम लगाया कि वे प्रतिबंधित अफ़ीम का व्यापार कर रहे हैं। यह जहाज़ एक चीनी व्यापारी का था किंतु इसका कप्तान एक अंग्रेज़ था।

इस जहाज़ पर ब्रिटिश झंडा लगा हुआ था। अंग्रेजों ने चीन की इस कार्यवाही की निंदा की तथा बंदी बनाए गए व्यक्तियों को छोड़ने तथा उचित मुआवजा देने के लिए कहा। चीनी अधिकारियों ने अपनी कार्यवाही को उचित ठहराया तथा अंग्रेजों की माँग मानने से इंकार कर दिया। चीनियों के इस व्यवहार से अंग्रेज रुष्ट हो गए तथा उन्होंने युद्ध का बिगुल बजा दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार इमानूएल सी० वाई० सू के शब्दों में, “1856 ई० की लोर्चा ऐरो घटना ने ब्रिटेन को अपना गुस्सा निकालने का मौका दिया।”

II. द्वितीय अफ़ीम युद्ध की घटनाएँ

1856 ई० में अंग्रेज सेनाओं ने कैंटन पर आक्रमण करके उस पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् फ्रांसीसी सेनाएँ भी ब्रिटिश सेनाओं की सहायता के लिए पहुंच गई । शीघ्र ही दोनों सेनाएँ तीनस्तीन पहुँच गईं। चीनी सरकार इस संयुक्त सेना का सामना करने में असमर्थ थी। अतः परिणामस्वरूप चीनियों ने बाध्य होकर इन देशों के साथ 26 जून, 1858 ई० को तीनस्तीन की संधि कर ली।

1. तीनस्तीन की संधि 1858 ई० (Treaty of Tientsin 1858 CE)-तीनस्तीन की संधि पर 26 जून, 1858 ई० को चीन, इंग्लैंड तथा फ्राँस की सरकारों ने हस्ताक्षर किए। इस संधि की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

(1) चीन की 11 नई बंदरगाहों को विदेशी देशों के साथ व्यापार तथा निवास के लिए खोल दिया गया।

(2) चीनी सरकार ने पश्चिमी देशों को अफ़ीम के व्यापार की अनुमति प्रदान कर दी तथा अफ़ीम के व्यापार को वैध घोषित कर दिया।

(3) चीन की ‘यांगत्सी’ नदी में पश्चिमी देशों के जहाजों को आने-जाने की अनुमति दे दी गई।

(4) चीन की सरकार ने यह भी स्वीकार कर लिया कि पश्चिमी देश चीन में अपने राजदूत नियुक्त कर सकेंगे।

(5) चीन की सरकार ने फ्रांस के रोमन कैथोलिक पादरियों को यह सुविधा प्रदान कर दी कि वे उपर्युक्त सोलह बंदरगाहों को छोड़कर कहीं भी आ-जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त वे किसी भी स्थान पर भूमि खरीद सकते हैं अथवा किराये पर भूमि लेकर गिरजाघरों का निर्माण कर सकते हैं।

(6) ईसाई धर्म के प्रचारकों को यह अधिकार दे दिया गया कि वे चीन में स्वतंत्रतापूर्वक घूम-फ़िर कर अपने धर्म का प्रचार कर सकते हैं और किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुकूल ईसाई बना सकते हैं।

(7) पश्चिमी शक्तियों के राज्य-क्षेत्रातीत अधिकारों (Extra Territorial Rights) को अधिक विस्तृत और व्यापक कर दिया गया। इसके अनुसार उन्हें चीन में निवास करने और व्यापार करने की सुविधा दी गई।

(8) चीन ने अंग्रेज़ व्यापारियों को युद्ध के हर्जाने के रूप में एक भारी धन-राशि देना स्वीकार कर लिया।

(9) इस संधि ने उन विदेशियों को जिनके पास वैध प्रवेश पत्र (legal passport) हों, चीन के किसी स्थान पर स्वतंत्रतापूर्वक घूमने-फिरने की अनुमति प्रदान कर दी।

2. युद्ध का दूसरा चरण:
26 जून, 1858 ई० को तीनस्तीन की संधि हो गई थी प चीन की सरकार ने इसे मान्यता देने से इंकार कर दिया था। चीन की इस कार्यवाही से पश्चिमी शक्तियों को बहुत आघात पहुँचा। उन्होंने चीनी सरकार पर दबाव डालने के लिए पुनः युद्ध आरंभ कर दिया। इंग्लैंड तथा फ्रांस की संयुक्त सेनाओं ने शीघ्र ही पीकिंग पर आक्रमण कर दिया।

चीन की निर्बल सेना इस आक्रमण का मुकाबला करने में नाकाम रही। संयुक्त सेनाओं ने पीकिंग पर अधिकार कर लिया तथा माँचू सम्राट् पीकिंग छोड़ कर भाग गया। विजयी सेनाओं ने नगर में भारी लूट-मार की तथा राजमहल को अग्नि भेंट कर दिया। विवश होकर चीन की सरकार को पीकिंग की संधि की शर्तों को स्वीकार करना पड़ा। पीकिंग की संधि 1860 ई० (Treaty of Peking 1860 CE)-अक्तूबर, 1860 ई० में चीन, फ्राँस तथा इंग्लैंड के मध्य की गई पीकिंग संधि की मुख्य धाराएँ निम्नलिखित थीं

(1) अफ़ीम के व्यापार को वैध मान लिया गया।

(2) चीन सरकार ने पहले केवल 5 बंदरगाहें ही विदेशी व्यापार के लिए खोली थीं। अब 11 अन्य बंदरगाहें भी खोल दी जिससे बंदरगाहों की कुल संख्या 16 हो गई।

(3) चीन की सरकार पीकिंग में अंग्रेज़ राजदूत रखने के लिए मान गई।

(4) कौलून का प्रायद्वीप इंग्लैंड को दिया गया।

(5) चीन की सरकार को युद्ध के हर्जाने के रूप में आठ-आठ मिलियन डालर इंग्लैंड तथा फ्रांस को देने पड़े।

(6) चीन ने यह भी माना कि कैथोलिक पादरियों को 16 बंदरगाहों के अतिरिक्त चीन के किसी भी भाग में जाने की अनुमति होगी। उन्हें वहाँ धर्म प्रचार करने, भूमि खरीदने तथा गिरजाघर बनाने का अधिकार होगा।

II. द्वितीय अफ़ीम युद्ध के प्रभाव

द्वितीय अफ़ीम युद्ध के पश्चात् पूर्व के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इस युद्ध के प्रभावों का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. चीन के सम्मान को धक्का :
चीन निवासी सदियों से स्वयं को पश्चिमी लोगों से सभ्य मानते थे। उन्हें अपनी सभ्यता पर बहुत गर्व था। द्वितीय अफ़ीम युद्ध में पराजित होने के कारण चीनियों को अपमानजनक संधियों पर हस्ताक्षर करने पड़े तथा विदेशियों को अपने से श्रेष्ठ मानना पड़ा। इस प्रकार उनके सम्मान को गहरा धक्का लगा।

2. चीन को आर्थिक हानि :
चीन लगभग चार वर्ष तक युद्धों में उलझा रहा। इन युद्धों में उसे भारी धन राशि खर्च करनी पड़ी। द्वितीय अफ़ीम युद्ध के दौरान इंग्लैंड तथा फ्रांस की सेनाओं ने चीन की राजधानी पीकिंग तथा अन्य नगरों में सरकारी संपत्ति को बहुत हानि पहुँचाई। इस युद्ध के पश्चात् हुई संधियों के अनुसार चीन को भारी धन राशि विजयी देशों को देनी पड़ी। इससे चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई।

3. ईसाई मत का प्रसार :
द्वितीय अफ़ीम युद्ध के पश्चात् हुई पीकिंग की संधि के अनुसार अब कैथोलिक पादरियों को 16 बंदरगाहों के साथ-साथ चीन के आंतरिक भागों में जाने तथा प्रचार करने की अनुमति मिल गई। परिणामस्वरूप ये पादरी चीन के विभिन्न भागों में बेरोक-टोक ईसाई मत का प्रचार करने लगे। उनके प्रचार से प्रभावित होकर अनेक चीनी नागरिकों ने ईसाई मत ग्रहण कर लिया।

इस कारण उनके धार्मिक तथा सामाजिक जीवन पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा। इन ईसाइयों की गतिविधियाँ ही चीन में 1899-1900 ई० में हुए बॉक्सर विद्रोह का कारण बनीं।

4. साम्राज्यवाद को प्रोत्साहन :
द्वितीय अफ़ीम युद्ध से पूर्व यूरोपीय शक्तियों का उद्देश्य केवल चीन की बंदरगाहों पर अधिकार जमाना तथा व्यापार को संचालित करना था। इस युद्ध में विजयी रहने पर उन्हें 16 बंदरगाहों पर व्यापारिक अधिकार प्राप्त हो गए। अब उन्होंने चीन में राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित करने के प्रयास आरंभ कर दिए। अब इन शक्तियों ने अपनी बस्तियाँ बसानी आरंभ कर दी तथा कई नगरों में अपना शासन भी स्थापित कर लिया। इस प्रकार उन्होंने साम्राज्यवाद को प्रोत्साहन दिया।

प्रश्न 9.
चीन के इतिहास में डॉक्टर सन-यात-सेन की भूमिका का वर्णन कीजिए। उत्तर-चीन के इतिहास में डॉ० सन-यात-सेन (1866-1925 ई०) का एक विशेष स्थान है। उन्हें आधुनिक न का निर्माता कहा जाता है। वह चीन में राष्ट्रीय एकता स्थापित करना चाहते थे। व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा गणतंत्र की स्थापना उनके जीवन का परम लक्ष्य था।

1. प्रारंभिकजीवन :
डॉ० सन-यात-सेन का जन्म 2 नवंबर, 1866 ई० को कुआंगतुंग (Kwangtung) प्रदेश के चोय-हंग (Choy-Hung) नामक एक छोटे से गाँव में हुआ था। यह गाँव कैंटन (Canton) नगर से 40 मील की दूरी पर स्थित है। इनके पिता का नाम सन-टैट-सुंग (Sun-Tat-Sung) था। डॉ० सन-यात-सेन को शिक्षा प्राप्त करने के लिए हवाई द्वीप (Hawaii Islands) में भेजा गया। उनके भाई ने डॉ० सन-यात-सेन को एंगलीकन चर्च के एक प्रसिद्ध स्कूल में भर्ती करा दिया।

इस स्कूल में उन्होंने पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की। डॉ० सन-यात सेन ने लंदन में 1887 ई० में एक मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया। 1892 ई० में उन्होंने डॉक्टरी की परीक्षा पास की और मैकाय (Macoy) नामक स्थान पर डॉक्टरी की प्रैक्टिस आरंभ कर दी। उस समय उनके ऊपर क्रांतिकारी भावनाओं का गहरा प्रभाव पड़ चुका था। वह देश की शिक्षा-प्रणाली में सुधार करना चाहते थे। उनका विचार था कि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार होने के पश्चात् ही देश उन्नति कर सकता है। वह चाहते थे कि माँचू सरकार शिक्षा के क्षेत्र में सुधार करे।

2. रिवाइव चाइना सोसाइटी की स्थापना :
डॉ० सन यात-सेन ने 24 नवंबर, 1894 ई० को होनोलल (Honolulu) में रिवाइव चाइना सोसाइटी की स्थापना की। वह स्वयं इस संस्था के चेयरमैन बने। इसे शिंग चुंग हुई (Hsing Chung Hui) के नाम से भी जाना जाता है। यह एक गुप्तचर संगठन था। आरंभ में इसके 112 सदस्य थे। 21 फरवरी, 1895 ई० को इसका मुख्यालय हांगकांग (Hong Kong) में खोला गया।

इसकी अनेक शाखाएँ चीन के विभिन्न प्रांतों में खोली गई। इसका प्रमुख उद्देश्य चीन में से माँचू शासन का अंत करना, चीनी समाज का पुनः निर्माण करना, प्रेस तथा शिक्षा के माध्यम से चीनियों में एक नवचेतना का संचार करना तथा चीन में गणतंत्र की स्थापना करना था।

3. तुंग मिंग हुई की स्थापना :
डॉ० सन-यात-सेन द्वारा 20 अगस्त, 1905 ई० को जापान की राजधानी तोक्यो (Tokyo) में तुंग मिंग हुई की स्थापना करना एक प्रशंसनीय कदम था। इस संगठन का प्रमुख उद्देश्य चीन में माँचू वंश का अंत करना, चीन को पश्चिमी देशों के शासन से मुक्त करना, चीन में लोकतंत्रीय गणतंत्र की स्थापना करना तथा भूमि का राष्ट्रीयकरण करना था। तुंग मिंग हुई की स्थापना वास्तव में चीन के इतिहास में एक मील पत्थर सिद्ध हुई।

4. डॉ० सन-यात-सेन के तीन सिद्धांत :
डॉ० सन-यात-सेन आरंभ से ही क्रांतिकारी विचारों के व्यक्ति थे। वह लोकतंत्र में विश्वास रखते थे। उन्होंने ही माँचू सरकार को हटा कर चीन में गणराज्य की स्थापना की थी। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह रूसी साम्यवाद से बहुत प्रभावित थे, फिर भी वह रूसी विचारों का अंधा-धुंध अनुसरण नहीं करना चाहते थे। वह इस बात को भली-भाँति समझते थे कि रूस श्रमिकों का देश है और चीन किसानों का।

अत: उन्होंने अपनी विचारधारा को अपने देश की परिस्थितियों के अनुकूल बनाया। डॉ० सन-यात-सेन के राजनीतिक विचार तीन सिद्धांतों पर आधारित थे। ये सिद्धांत सन-मिन-चुई (San-min Chui) के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(1) राष्ट्रीयता:
डॉ० सन-यात-सेन राष्ट्रीयता के महत्त्व को भली-भाँति समझते थे। उनके विचारानुसार चीन को जिन वर्तमान समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उसका मूल कारण चीनी लोगों में राष्ट्रीयता की भावना का अभाव है।

इसी कारण पश्चिमी देश चीन का घोर शोषण कर रहे हैं तथा जिस कारण वह विश्व का अग्रणी देश होने की अपेक्षा एक गरीब एवं कमज़ोर राष्ट्र बनकर रह गया है। अतः चीन की खुशहाली के लिए यह आवश्यक है कि चीनी लोगों में राष्ट्रवाद एवं देश-प्रेम की भावना का विकास हो। इसके लिए निम्नलिखित शर्ते आवश्यक थीं

  • चीन से माँचू वंश का अंत करना।
  • चीन को पश्चिमी राष्ट्रों के प्रभाव से मुक्त करना।
  • चीनियों में राष्ट्रीय एकता की भावना उत्पन्न करना।
  • विभिन्न समुदायों के लोगों में प्रचलित मतभेदों को दूर करना।
  • चीन की स्वतंत्रता के लिए विदेशी राष्ट्रों से सहयोग प्राप्त करना।

(2) राजनीतिक लोकतंत्र (Political Democracy)-डॉ० सन-यात-सेन राजनीतिक लोकतंत्र को बहुमूल्य मानते थे। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन विदेशों में व्यतीत किया था। अतः वह लोकतंत्र के महत्त्व से अच्छी तरह परिचित थे। यही कारण था कि वह चीन में गणतंत्रीय सरकार की स्थापना के पक्ष में थे।

वह चाहते थे कि चीन में एक शक्तिशाली सरकार की स्थापना हो किंतु यह सरकार अपने कार्यों के लिए लोगों के प्रति उत्तरदायी हो। ऐसी सरकार कभी भी निरंकुश नहीं हो सकती। लोकतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि लोगों को बिना किसी मतभेद के वोट डालने का अधिकार हो तथा वे अपनी सरकार को वापस बुलाने (recall) का अधिकार रखते हों।

(3) लोगों की आजीविका:
डॉ० सन-यात-सेन लोगों की आजीविका के महत्त्व को भली-भाँति समझते थे। यदि किसी देश के लोग भूखे हों तो उस देश का विकास किसी भी सूरत में संभव नहीं है। क्योंकि अधिकाँश चीनी कृषि, कार्य करते थे इसलिए उन्होंने इस ओर अपना विशेष ध्यान दिया। उन्होंने ‘जोतने वाले को जमीन दो’ (land to the tiller) का नारा दिया।

चीन की आर्थिक खुशहाली के लिए उसके यातायात के साधनों, उद्योगों एवं खानों का विकास किया जाना चाहिए। इसके चलते मजदूरों को संपूर्ण रोजगार प्राप्त होगा तथा वे देश के विकास के लिए कड़ी मेहनत करेंगे। इसके अतिरिक्त वह जमींदारों, व्यापारियों एवं पूँजीवादियों के हाथों में धन के केंद्रीयकरण (concentration of wealth) के विरुद्ध थे। वह सभी विशाल प्राइवेट उद्यमों (enterprises) का सरकार द्वारा राष्ट्रीयकरण (nationalisation) के पक्ष में थे।

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि डॉ० सन-यात-सेन न केवल एक महान क्रांतिकारी थे अपितु आधुनिक चीन के निर्माता थे। उन्होंने अपने अथक प्रयासों से चीनी समाज को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की। प्रसिद्ध इतिहासकार जी० डब्ल्यू० कीटन का यह कहना ठीक है कि,”डॉक्टर सन-यात-सेन ने 40 करोड़ चीनियों के लिए वही किया जो कमाल अतातुर्क ने तुर्की के लिए किया, जो लेनिन एवं स्टालिन ने रूस के लिए किया।”

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 10.
1911 ई० की चीनी क्रांति के कारणों और उसके परिणामों का वर्णन कीजिएं।
अथवा
1911 ई० की चीनी क्रांति के क्या कारण थे?
उत्तर:
1. 1911 ई० की चीनी क्रांति के कारण थे

1. माँचुओं का पतन:
माँचू शासक मंचूरिया के रहने वाले थे। उन्होंने 1644 ई० में चीन में मिंग (Ming) वंश का अंत करके छींग (Qing) अथवा मांचू वंश की स्थापना की थी। 18वीं शताब्दी के अंत में इस वंश की शान एवं शक्ति कम होने लगी। इसका कारण यह था कि माँचू शासक अब बहुत विलासी एवं भ्रष्ट हो चुके थे।

वे अब अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे थे। अतः उन्होंने प्रशासन की ओर अपना कोई ध्यान नहीं दिया। अतः प्रजा में बहुत असंतोष फैल गया था। मांचू शासकों द्वारा विदेशियों के साथ की जाने वाली अपमानजनक संधियों ने माँचू शासकों की निर्बलता को प्रकट कर दिया था। निस्संदेह चीनी इस अपमान को सहन करने को तैयार नहीं थे।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर के० टी० एस० सराओ का यह कहना ठीक है कि, “माँचू वंश के चक्र ने जिन्हें उन्हें अपनी गौरवता के शिखर पर पहुँचाया था वह अब उन्हें तीव्रता से उनके विनाश की ओर ले जा रहा था।”

2. चीन में सुधार आंदोलन :
1894-95 ई० में जापान ने चीन को पराजित कर सभी को आश्चर्य में डाल दिया था। एशिया के एक छोटे-से देश से पराजित होना चीन के लिए एक घोर अपमान की बात थी। इसके पश्चात् चीन में रियायतों के लिए संघर्ष (Battle of Concessions) आरंभ हो गया था। इसने चीन की स्थिति को अधिक दयनीय बना दिया था।

चीन को इस घोर संकट से बाहर निकालने के लिए दो छींग सुधारकों कांग यूवेई (Kang Youwei) तथा लियांग किचाउ (Liang Qichao) ने चीनी सम्राट कुआंग शू (Kuang Hsu) को कुछ महत्त्वपूर्ण सुधार लागू करने का सुझाव दिया। सम्राट् ने उनके सुझावों को मानते हुए 1898 ई० में सौ दिनों तक अनेक अध्यादेश जारी किए।

इन्हें चीनी इतिहास में सुधारों के सौ दिन (Hundred Days of Reforms) कहा जाता है। इनके अधीन चीन में एक आधुनिक प्रशासकीय व्यवस्था, शिक्षा व्यवस्था, कृषि, उद्योग, व्यापार, कानून व्यवस्था, राजस्व, रेलवे, डाक व्यवस्था, सेना एवं नौसेना, यातायात के साधनों के विकास, सिविल सर्विस में सुधार तथा संवैधानिक सरकार के गठन के बारे में उल्लेख किया गया।

यद्यपि ये सुधार बहुत प्रशंसनीय थे, किंतु इनको महारानी त्जु शी (Tzu Hsi) के विरोध के चलते लागू न किया जा सका। उसने बड़ी संख्या में सुधारकों को बंदी बना कर मौत के घाट उतार दिया। इससे चीनियों में व्यापक असंतोष फैला तथा उन्होंने ऐसे निकम्मे शासन का अंत करने का निर्णय किया। प्रसिद्ध इतिहासकार जीन चैसनिआक्स का यह कहना ठीक है कि, “वे सुधार जो कि माँचू वंश द्वारा मुक्ति के साधन के तौर पर अपनाए गए थे उनके पतन का कारण बने थे।

3. त्जु शी की मृत्यु :
त्जु शी चीन की राजनीति में सबसे प्रभावशाली महारानी थी। उसने 1861 ई० से लेकर 1908 ई० तक चीन की राजनीति में अपनी गहरी छाप छोड़ी। वह बहुत रूढ़िवादी, अहंकारी एवं षड्यंत्रकारी महिला थी। उसने अपनी चतुर कूटनीति द्वारा माँचू वंश के पतन को रोके रखा। उसने 1898 ई० में सम्राट् कुआंग शू के सुधारों को रद्द कर दिया। उसने चीनी सुधारकों का निर्ममता से दमन कर दिया। 1908 ई० में त्जु शी की मृत्यु से माँचू वंश को एक गहरा आघात लगा।

4. शिक्षा का प्रसार :
शिक्षा के प्रसार ने चीन में 1911 ई० की क्रांति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। चीन में शताब्दियों से प्राचीन शिक्षा प्रणाली प्रचलित थी। इस प्रणाली में केवल धर्मशास्त्रों के अध्ययन पर बल दिया जाता था। 1902 ई० में चीन में पीकिंग विश्वविद्यालय (Peking University) स्थापित किया गया।

1905 ई० में चीन में प्राचीन शिक्षा के अंत एवं आधुनिक शिक्षा को लागू करने की घोषणा की गई। निस्संदेह यह एक उल्लेखनीय कदम था। शिक्षा के प्रसार के कारण चीनी लोगों में एक नवचेतना का संचार, हुआ। अनेक चीनी विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से विदेशों में गए। ये विद्यार्थी पश्चिम में हुए विकास को देख कर चकित रह गए। जब ये विद्यार्थी चीन वापस लौटे तो चीन की सरकार उन्हें योग्य नौकरियाँ देने में विफल रही। इस कारण इन विद्यार्थियों में चीनी सरकार के विरुद्ध घोर निराशा फैली। अत: उन्होंने ऐसी सरकार का अंत करने का निर्णय किया।

5. आर्थिक निराशा:
चीन की दयनीय आर्थिक दशा 1911 ई० की क्रांति का एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुई। प्रथम अफ़ीम युद्ध (1839-42 ई०) के पश्चात् यूरोपीय लुटेरों ने चीन का दरवाजा बलपूर्वक खोल दिया। उन्होंने चीन में लूट-खसूट का एक ऐसा दौर आरंभ किया जिस कारण वह कंगाली के कगार पर जा पहुँचा।

चीन की तीव्रता से बढ़ती हुई जनसंख्या ने इस स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया। खाद्यान्न की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग भुखमरी का शिकार हो गए। इस घोर संकट के समय प्रकृति ने भी चीन में अपना कहर ढाया। 1910-11 ई० में चीन भयंकर बाढ़ की चपेट में आ गया। इस कारण जन-धन की अपार हानि हुई।

इससे चीन की अर्थव्यवस्था को एक गहरा आघात लगा। ऐसे समय में चीन की सरकार ने लोगों पर भारी कर लगा कर एक भयंकर भूल की। अतः चीन के लोगों ने माँचू सरकार को एक सबक सिखाने का निर्णय लिया। एच० एम० विनायके के शब्दों में, “इसने लोगों में माँचू वंश के विरुद्ध बेचैनी एवं असंतुष्टता को और बढ़ा दिया। 120

6. प्रेस की भूमिका:
1911 ई० की चीनी क्रांति लाने में प्रेस ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। चीन में समाचार-पत्रों का प्रकाशन 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में आरंभ हुआ था। चीन में प्रकाशित होने वाले प्रारंभिक समाचार-पत्र अंग्रेजी भाषा में थे। 1870 ई० में चीनी भाषा में प्रथम समाचार-पत्र प्रकाशित हुआ। इसके पश्चात् इन समाचार-पत्रों की संख्या तीव्रता से बढ़ने लगी। इन समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं ने माँचू सरकार के विरुद्ध लोगों में एक नवचेतना का संचार करने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

7. डॉ० सन-यात-सेन का योगदान:
डॉ० सन-यात-सेन ने 1911 ई० की चीनी क्रांति में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस कारण उन्हें चीनी क्रांति का पिता कहा जाता है। वह इंग्लैंड, फ्राँस, अमरीका एवं जापान के हाथों से चीन की लगातार पराजयों से बहुत निराश हुए। इन पराजयों से चीन को घोर अपमान को सहन करना पड़ा। अत: डॉ० सन-यात-सेन ने चीन से अयोग्य माँचू सरकार का अंत करने का निर्णय लिया।

इस उद्देश्य से उन्होंने 1894 ई० में होनोलूलू में रिवाइव चाइना सोसायटी (Revive China Society) तथा 1905 ई० में तोक्यो में तुंग मिंग हुई (Tung Meng Hui) की स्थापना की। प्रसिद्ध इतिहासकार इमानुएल सी० वाई० सू का यह कहना ठीक है कि, “तुंग मिंग हुई की स्थापना चीनी क्रांति के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुई क्योंकि इसने क्रांति के स्वरूप एवं दिशा को परिवर्तित कर दिया था।”

वास्तव में डॉ० सन-यात-सेन ने चीनियों में एक नई जागृति लाने एवं उनमें एकता स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किए। इस दिशा में उसके समाचार-पत्र मिन पाओ (Min Pao) ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई। निस्संदेह 1911 ई० की चीनी क्रांति में डॉ० सन-यात-सेन ने जो प्रशंसनीय भूमिका निभाई उसके लिए उनका नाम चीनी इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा।

8. तात्कालिक कारण :
चीन की सरकार द्वारा रेलों का राष्ट्रीयकरण करना 1911 ई० की चीनी क्रांति का तात्कालिक कारण सिद्ध हुआ। 1909 ई० में चीन की सरकार ने रेलमार्गों के निर्माण की एक विशाल योजना बनाई। यह कार्य प्रांतीय सरकारों को सौंपा गया। किंतु प्रांतीय सरकारें धन की कमी के कारण इन योजनाओं को संपूर्ण करने में विफल रहीं।

अतः मई 1911 ई० में चीनी सरकार ने रेलों का राष्ट्रीयकरण करने की घोषणा की। अत: रेलमार्गों के निर्माण का कार्य केंद्रीय सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। ऐसा होने से प्रांतीय गवर्नर केंद्रीय सरकार के विरुद्ध हो गए। वे क्रांतिकारयिों से मिल गए। उन्होंने 1911 ई० की चीनी क्रांति का बिगुल बजा दिया।

II. 1911 ई० की चीनी क्राँति की घटनाएँ।

10 अक्तूबर, 1911 ई० को हैंको में एक ऐसी घटना घटी जिसने क्राँति को तीव्र गति प्रदान कर दी। उस दिन हैंको में एक रूसी परिवार के घर एक बम-विस्फोट हुआ। यह घर क्रांतिकारियों का अड्डा था तथा वहाँ बमों का निर्माण किया जाता था। इस घटना के पश्चात् कई क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया तथा चीनी सरकार के हवाले कर दिया गया।

चीन की सरकार ने कुछ क्रांतिकारियों को मृत्यु दंड दे दिया। सरकार की इस दमन नीति से उत्तेजित होकर वूचांग के सैनिकों ने विद्रोह कर दिया। शीघ्र ही बहुत से ग्रामीण विद्रोही भी उनसे आ मिले। इन क्रांतिकारियों नेवू-तिंग-फंग के नेतृत्व में एक सैनिक सरकार का गठन किया तथा नानकिंग को अपनी राजधानी घोषित किया। उस समय डॉ० सन-यात-सेन अमरीका में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहा था।

वह 24 दिसंबर, 1910 ई० को शंघाई पहुँचा और सभी क्रांतिकारियों ने उसे अपना नेता मान लिया। डॉ० सन-यात-सेन ने सुझाव दिया कि माँचू वंश का अंत कर गणतंत्र की स्थापना की जाए। उसने गणतंत्र का राष्ट्रपति युआन-शी-काई को बनाने के लिए प्रस्ताव प्रस्तुत किया जिसे युआन-शी-काई ने स्वीकार कर लिया। डॉ० सन-यात-सेन ने राजनीतिक संन्यास लेने का मन बना लिया।

परिणामस्वरूप 12 फ़रवरी, 1912 ई० को एक शाही घोषणा की गई जिसके अनुसार सारी राजनीतिक शक्ति युआन शी-काई को सौंप दी गई। 13 फ़रवरी को वह प्रथम राष्ट्रपति नियुक्त हुआ और माँचू वंश का सदा के लिए अंत हो गया।

III.1911 ई० की चीनी क्रांति का महत्त्व

1911 ई० की क्रांति चीन के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इस क्रांति से चीन में तानाशाही का अंत हुआ तथा गणतंत्र स्थापित हुआ। इस क्रांति के अनेक दूरगामी परिणाम निकले। प्रसिद्ध इतिहासकार के० टी० एस० सराओ ने ठीक लिखा है कि, “1911 ई० की चीन की क्रांति आधुनिक विश्व के इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस क्रांति ने एक युग का अंत किया एवं एक नए युग का सूत्रपात किया। 22

1. माँचू वंश का अंत :
1911 ई० की क्रांति का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि लगभग तीन सौ वर्षों से स्थापित माँचू शासन का अंत हो गया। माँचू शासक अयोग्य, भ्रष्ट तथा विलासी थे। न तो वे कुशल शासन प्रबंध दे सके तथा न ही विदेशी शक्तियों का सामना कर सके। वे अत्यंत रूढ़िवादी थे। चीन के लोग ऐसे शासन से छुटकारा पाना चाहते थे। 1911-12 ई० में चीन के लोगों ने बिना कठिनाई तथा किसी का खून बहाए इस राजवंश का अंत कर दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार जॉन सेल्बी के अनुसार, “1912 ई० में कागजी ड्रेगन का अंत हो गया।”

2. राजतंत्र का अंत :
1911 ई० की क्रांति ने चीन में राजतंत्र का अंत कर दिया था। 1912 ई० में युआन-शी-काई (Yuan-Shih-Kai) चीन का प्रथम राष्ट्रपति बना था। वह गणतंत्र में विश्वास नहीं रखता था। वह राजतंत्र के पक्ष में था। 1915 ई० में उसने चीन में राजतंत्र स्थापित करने का प्रयास किया किन्तु विफल रहा। 1916 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। इसके साथ ही चीन में राजतंत्रीय विचारधारा का भी अंत हो गया।

3. नए विचार:
1911 ई० की क्रांति के कारण चीन के शिक्षित नवयुवकों में नवीन विचारों का संचार हुआ। जो युवक पश्चिमी देशों से शिक्षा प्राप्त कर के आए वे नवीन विचारों से ओत-प्रोत थे । उन्होंने अपने देश में रूढ़िवादी सामाजिक ढाँचे को बदलने के प्रयास आरंभ कर दिए। अनेकों प्रसिद्ध पश्चिमी लेखकों के ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद किया गया। पश्चिमी विचारकों से प्रेरित होकर चीनी लोगों का दृष्टिकोण बदल गया।

4. माओ-त्सेतुंग का उत्थान:
1911 ई० की क्रांति के पश्चात् युआन शी-काई की गणतंत्रीय तथा चियांग-काई-शेक (Chiang-Kai-Shek) की राष्ट्रीय सरकारें बनीं। परंतु ये सरकारें भी देश को कठिनाइयों के भंवर से बाहर न निकाल सकीं। तब 1921 ई० में साम्यवादी दल की स्थापना हुई। चियांग काई-शेक की सरकार साम्यवादी दल को समाप्त करना चाहती थी।

परंतु वह असफल रही। शनैः-शनैः साम्यवादी दल का प्रभाव गाँवों में भी बढ़ने लगा। साम्यवादियों ने चीन में 1934 ई० में एक लाँग मार्च (Long March) का आयोजन किया। इस मार्च में लगभग एक लाख लोगों ने भाग लिया। इसी मार्च के दौरान प्रसिद्ध नेता माओ-त्सेतुंग का उत्थान हुआ।

5. चीन का आधुनिकीकरण :
राष्ट्रीय सरकार स्थापित करने के पश्चात् चीन धीरे-धीरे आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर हुआ। देश में एक अस्थायी संविधान लागू किया गया। स्वास्थ्य, उद्योग, सिंचाई, संचार आदि से संबंधित कई सुधार किए गए। शिक्षा क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण सुधार हुए। मुद्रा संबंधी किए गए सुधारों से चीन में आर्थिक तथा व्यापारिक स्थिरता आई। राष्ट्रीय सरकार की विदेश नीति भी आर्थिक उत्थान में बड़ी सहायक सिद्ध हुई। निस्संदेह यह क्रांति चीन के इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

प्रश्न 11.
कुओमीनतांग के उत्थान एवं सिद्धांतों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
कुओमीनतांग चीन का एक महत्त्वपूर्ण दल था। इस दल ने चीन में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिए बड़ा सराहनीय काम किया। इस बात में कोई संदेह नहीं कि इस दल को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, फिर भी इस दल ने देश में राष्ट्रीय एकता स्थापित करने के लिये काफी कुछ किया। सच तो यह है कि इस दल का उत्थान चीन के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण घटना थी।

1. कुओमीनतांग की स्थापना :
1905 ई० में डॉ० सन-यात-सेन ने जापान में तुंग-मिंग-हुई नामक दल की स्थापना की थी। आरंभ में यह संस्था एक गुप्त समिति के रूप में कार्य करती थी, परंतु 1911 ई० की चीनी क्रांति के समय यह दल काफी शक्तिशाली हो गया था। 1912 ई० में तुंग-मिंग-हुई तथा चीन के अन्य दलों को मिला कर एक नये राष्ट्रीय दल की स्थापना की गई। इस दल का नाम कुओमीनतांग रखा गया।

जब 1913 ई० में संसद् के चुनाव हुए तो इस दल को काफी सफलता प्राप्त हुई। यह दल युआन-शी-काई के निरंकुश शासन के विरुद्ध था। परिणामस्वरूप युआन-शी-काई से इस दल का संघर्ष आरंभ हो गया। 1921 ई० में कुओमीनतांग दल ने दक्षिणी चीन में कैंटन (Canton) सरकार की स्थापना की और डॉ० सन-यात-सेन को इस प्रकार का अध्यक्ष बनाया गया।

इसी समय इस दल के पुनर्गठन की फिर से आवश्यकता अनुभव की गई। अतः डॉ० सन-यात-सेन के प्रति निष्ठा आदि की शर्तों को हटा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि इस दल की सदस्य संख्या में काफी वृद्धि हुई।

2. कुओमीनतांग दल के सिद्धांत :
कुओमीनतांग दल के सिद्धांतों की व्याख्या अनेक अवसरों पर भाषणों. लेखों तथा दल के घोषणा-पत्र द्वारा की गई थी। 1924 ई० में द सम्मेलन बुलाया गया था। इससे पहले दल के सिद्धांतों पर प्रकाश डालने के लिए घोषणा-पत्र प्रकाशित किया गया। दल के सिद्धांत डॉ० सन-यात-सेन के, जनता के तीन सिद्धांतों (Three Principles of the People) पर आधारित थे। इन तीन सिद्धांतों का वर्णन इस प्रकार है

(1) राष्ट्रीयता :
डॉ० सन-यात-सेन के तीन सिद्धांतों में पहला सिद्धाँत राष्ट्रीयता का था। डॉ० सन-यात-सेन का यह विश्वास था कि जनता में राष्ट्रवाद का विकास होना बहुत आवश्यक है। वह प्रायः चीनी जनता की तुलना रेत के ढेर से करते थे, जिसके प्रत्येक कण में आपसी समानता तो विद्यमान है परंतु मज़बूती का पूर्ण अभाव है।

राष्ट्रीयता की भावना उत्पन्न करने के लिए वह साम्राज्यवाद का विरोध तथा राष्ट्रीय मोर्चों का निर्माण आवश्यक समझते थे। यह बात याद रखने योग्य है कि डॉ० सन-यात-सेन विदेश विरोधी नहीं थे। वह तो केवल विदेशी शक्तियों की साम्राज्यवादी तथा विस्तारवादी नीतियों को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे।

(2) राजनीतिक लोकतंत्र :
डॉ० सन-यात-सेन का दूसरा सिद्धांत राजनीतिक लोकतंत्र था। वास्तव में 1911 ई० में चीन में अकस्मात् ही राज्य क्राँति हो गई थी और इस समय देश लोकतंत्र के लिए तैयार नहीं था। चीन के लोग भी लोकतंत्र को चलाने की योग्यता नहीं रखते थे, परंतु क्रांतिकारी नेता इस बात को समझ नहीं पाए थे। अतः जब वे इस बात को भली-भाँति समझ गए थे, उन्होंने लोकतंत्र की स्थापना के लिए तीन बातों का सहारा लिया।

डॉ० सन-यात-सेन चाहते थे कि देश का शासन सेना के हाथ में रहे। दूसरे स्थान पर देश में राजनीतिक चेतना जागृत करना था। तीसरी बात संवैधानिक सरकार की थी। देश का संविधान जनता द्वारा चुनी गई सभा के द्वारा तैयार किया जायेगा।

(3) जनता की जीविका :
डॉ० सन-यात-सेन का तीसरा सिद्धांत जनता की जीविका का था। डॉ० सन-यात-सेन चाहते थे कि चीन की जनता की भौतिक उन्नति हो। चीन की अधिकाँश जनता गाँवों में रहती थी और मुख्यतया कृषि पर निर्भर थी। चीन के ज़मींदारों और किसानों के बीच एक गहरी आर्थिक विषमता थी। वास्तव में देश की भौतिक उन्नति के लिए इस विषमता को दूर करना बहुत आवश्यक था।

अत: दल के कार्यक्रम में यह बात स्पष्ट कर दी गई कि भूमि का समान वितरण करके किसानों की दशा सुधारने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त बड़े उद्योगों का विकास करके उनकी पूँजी पर राज्य द्वारा नियंत्रण रखा जाए। ऐसा करना इसलिए आवश्यक था ताकि विदेशी शक्तियों के द्वारा आर्थिक शोषण को रोका जा सके।

3. कुओमीनतांग में फूट:
1925 ई० में डॉ० सन-यात-सेन की मृत्यु के पश्चात् कुओमीनतांग के सदस्यों में मतभेद उत्पन्न होने आरंभ हो गये। इस समय चियांग-काई-शेक (Chiang-Kai-Shek) ने सेना पर बहुत प्रभाव स्थापित कर लिया था। वह वाहम्पिया सैनिक अकादमी का डायरेक्टर (Director of Whampia Military Academy) था। सेना पर प्रभाव रखने के कारण उसका कैंटन पर काफी नियंत्रण था।

चियांग-काई-शेक ने मार्च, 1925 ई० में कैंटन में फ़ौजी कानून की घोषणा कर दी और उसने रूसी सलाहकारों को वापस लौट जाने का आदेश दे दिया। वह स्वयं कैंटन सरकार का मुखिया बन गया। अनेक कारणों से साम्यवादियों तथा चियांग-काई-शेक के अनुयायियों में विरोध उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप कुओमीनतांग दल के प्रभाव में कुछ कमी आई।

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प्रश्न 12.
1949 ई० की चीनी क्रांति के कारण तथा परिणाम बताएँ।
अथवा
1949 ई० की चीन की क्रांति के क्या कारण थे?
अथवा
1949 ई० की चीन की क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिए। उत्तर

I. क्रांति के लिए उत्तरदायी कारण

1949 ई० की क्राँति अकस्मात् ही नहीं आ गई थी। इस क्रांति के बीज 1911 ई० की क्रांति के समय ही बो दिए गए थे। 1911 ई० की क्रांति के पश्चात् चीन में ऐसा घटनाक्रम चला जो इसे 1949 ई० की ओर ले गया। इन घटनाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. 1911 ई० की क्रांति :
1949 ई० की क्रांति के मूल कारण 1911 ई० की क्रांति में ही छुपे हुए थे। 1911 ई० की क्रांति के परिणामस्वरूप चीन में माँचू वंश का अंत हुआ तथा गणतंत्र की स्थापना हुई। परंतु फिर भी राजसत्ता के लिए लगातार संघर्ष होता रहा। कई राजनीतिक दल अस्तित्व में आए। इनमें से कुओमीनतांग नामक साम्यवादी दल सब से महत्त्वपूर्ण दल के रूप में उभरा। कई विदेशी शक्तियाँ जैसे रूस और जापान भी किसी-न-किसी रूप में चीन की राजनीति को प्रभावित करती रहीं। ये सभी घटनाएँ 1949 ई० की क्रांति की आधारशिला बनीं।

2. चार मई का आंदोलन :
1919 ई० में वर्साय (Versailles) पेरिस में हुए शांति सम्मेलन में चीन को भारी निराशा हाथ लगी। शांति सम्मेलन के निर्णयों के परिणामस्वरूप चीनी लोगों में राष्ट्रीय भावना जागृत हुई। इस सम्मेलन में मित्र राष्ट्र चीन में जापान के प्रभाव को कम करने में असफल रहे थे। इस कारण चीन के लोग जापान के विरुद्ध हो गए। इस कारण 4 मई, 1919 ई० में 3000 से अधिक विद्यार्थियों तथा अध्यापकों ने पीकिंग (बीजिंग) के तियानमेन चौक (Tiananmen square) में एक भारी प्रदर्शन किया।

उन्होंने में शातंग (Shantang) पर दिए गए निर्णय की घोर आलोचना की। सरकार ने इस भीड पर नियंत्रण पाने के लिए बल प्रयोग से काम लिया। इतिहास में यह घटना ‘चार मई दिवस’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस घटना से चीनी लोगों में एक नई चेतना का संचार हुआ तथा 1949 ई० की क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

3. वाशिंगटन सम्मेलन :
अमरीका के प्रयासों से एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन 1921-22 ई० में वाशिंगटन में आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में नौ देशों ने भाग लिया। इन नौ देशों ने वचन दिया कि चीन की एकता, अखंडता तथा स्वतंत्रता बनाए रखी जाएगी। यह भी कहा गया कि चीन में सभी देशों को समान रूप से व्यापारिक सुविधाएँ दी जाएँगी तथा 1 जनवरी, 1923 ई० तक सभी विदेशी डाक एजेंसियाँ समाप्त कर दी जाएँगी।

एक संधि के अनुसार जापान ने शातुंग प्रांत में अपनी सभी रियायतें त्याग दी तथा सभी विदेशी शक्तियों ने अपनी सेनाएँ चीन से निकाल लीं। इस सम्मेलन से चीन को एक नया जीवन मिला। इस सम्मेलन के पश्चात् विदेशी शक्तियों का चीन में प्रभाव कम हो गया तथा चीन को सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। परंतु फिर भी चीन की सरकार जापान की साम्राज्यवादी गतिविधियों को कम न कर सकी। चीन सरकार की यही असमर्थता 1949 ई० की क्रांति का कारण सिद्ध हुई।

4. जापान द्वारा चीन पर आक्रमण :
1 जुलाई, 1937 ई० को जापान ने चीन पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध 1945 ई० तक चला। इस आक्रमण के समय नानकिंग की सरकार तथा साम्यवादियों में एक समझौता हुआ जिसके अनुसार उन्होंने मिल कर संयुक्त रूप से जापान का सामना करने का निर्णय लिया। यद्यपि इस युद्ध के दौरान चियांग-काई-शेक एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उभर कर सामने आया परंतु आठ वर्षों के इस लंबे युद्ध में चीन की पराजय से उसके समर्थक भी उसके शत्रु बन गए।

दूसरी ओर चियांग-काई-शेक भी साम्यवादियों को अपना शत्रु ही मानता रहा। फिर भी जापान के साथ युद्ध तथा द्वितीय महायुद्ध के दौरान साम्यवादियों का प्रभुत्व बना रहा। साम्यवादियों ने जापान द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों पर मार्च, 1945 ई० में अपना अधिकार कर लिया।

5. चीन में गृहयुद्ध :
1945 ई० में जापान के पतन के पश्चात् जापान द्वारा छोड़े गए क्षेत्रों पर अधिकार जमाने के प्रश्न पर साम्यवादियों तथा कुओमीनतांग में आपसी होड़-सी लग गई। परिणामस्वरूप चीन में गृहयुद्ध छिड़ गया। तभी अमरीका के प्रयासों से माओ-त्सेतुंग तथा चियांग-काई-शेक आपसी बातचीत करने के लिए सहमत हो गए। अमरीका के राष्ट्रपति ने राष्ट्रवादियों तथा साम्यवादियों में समझौता करवाने के लिए अपने विशेष दूत जॉर्ज मार्शल को भेजा। उसके प्रयासों से जनवरी 1946 ई० को समझौते पर हस्ताक्षर किए गए।

समझौते को लागू करने के लिए एक समिति का गठन किया गया जिसमें राष्ट्रीय सरकार, साम्यवादियों तथा अमरीका के प्रतिनिधियों को शामिल किया गया। फ़रवरी, 1946 ई० में हुए एक समझौते के अनुसार राष्ट्रीय सरकार तथा साम्यवादियों ने अपनी सेनाओं में कमी कर दी। यह निर्णय भी किया गया कि दोनों सेनाएँ संयुक्त कर दी जाएँ और प्रत्येक प्रदेश में साम्यवादियों की सेना को अल्पमत में रखा जाए। परंतु दोनों दलों में सरकार के स्वरूप के प्रश्न पर दरार पड़ गई। राष्ट्रवादी शक्तिशाली केंद्रीय सरकार के पक्ष में थे और साम्यवादी विकेंद्रीकरण के पक्ष में थे। इस प्रकार इस समस्या को न सुलझाया जा सका।

II. घटनाएँ

धीरे-धीरे साम्यवादी राष्ट्रवादियों पर हावी हो गए। 1946 ई० में राष्ट्रवादियों ने साम्यवादियों को उत्तर से खदेड़ दिया तथा वहाँ के मुख्य नगरों तथा रेलवे लाइनों पर अपना अधिकार जमा लिया। परंतु 1947 ई० में परिस्थितियाँ राष्ट्रवादियों के विरुद्ध हो गईं और साम्यवादियों ने उन्हें मंचूरिया के अधिकतर भागों से निकाल बाहर किया।

उन्होंने 1948 ई० में मुकदेन तथा 1949 ई० में तीनस्तीन और पीकिंग पर अपना अधिकार कर लिया। धीरे-धीरे उनका शंघाई, तथा हैंको आदि प्रदेशों पर भी अधिकार हो गया। उन्होंने 1 अक्तूबर, 1949 ई० में कैंटन पर अधिकार कर लिया जो कि राष्ट्रीय सरकार की राजधानी थी। इस प्रकार फारमोसा और कुछ द्वीपों को छोड़ कर सारे चीन पर साम्यवादियों का अधिकार हो गया।

III. 1949 ई० की चीन की क्रांति के प्रभाव

1949 ई० की क्रांति को न केवल चीन बल्कि विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण घटना माना जाता है। इस क्राँति ने जहाँ चीन के समाज को प्रभावित किया वहाँ विश्व भी इसके प्रभावों से अछूता न रहा। इस क्राँति के महत्त्वपूर्ण प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. शक्तिशाली केंद्रीय सरकार :
1949 ई० की क्राँति से चीन में एकता स्थापित हुई। केवल फारमोसा को छोड़ कर शेष सारा देश एक केंद्रीय सरकार के अधीन लाया गया। राजनीतिक एकता के साथ-साथ सारे देश में एक प्रकार का ही शासन स्थापित किया गया। अब चीन अयोग्य तथा भ्रष्ट शासन से मुक्त हो चुका था । चीन वासी अब अपने पर गर्व कर सकते थे।

2. शाँति एवं सुरक्षा:
साम्यवादी सरकार की स्थापना से चीन में काफी समय से व्याप्त अराजकता एवं अव्यवस्था का अंत हुआ तथा पूर्ण स्थायी शाँति की स्थापना हुई। साम्यवादियों ने अपनी कुशल पुलिस व्यवस्था तथा गुप्तचर व्यवस्था से क्रांति का विरोध करने वालों तथा समाज विरोधी तत्त्वों का अंत कर दिया। इससे स्थायी शाँति की स्थापना हुई तथा लोग अपने-आप को सुरक्षित अनुभव करने लगे।

3. सामाजिक सुधार:
साम्यवादी सरकार ने अनेकों सामाजिक सुधार भी किए। उन्होंने समाज में प्रचलित कई सामाजिक बुराइयों का अंत करके महान् कार्य किया। साम्यवादी सरकार ने चीन में अफ़ीम के प्रयोग पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी। मदिरापान, वेश्यावृत्ति, जुआबाजी आदि के विरुद्ध भी कानून बनाए गए। सरकार ने स्त्रियों के उत्थान की ओर भी विशेष ध्यान दिया। उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए गए। फलस्वरूप उन्हें सदियों पश्चात् चीनी समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त हुआ।

4. ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था पर प्रभाव :
1949 ई० की चीनी क्राँति से वहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत परिवर्तन आया। इस क्राँति से पूर्व छोटे किसानों की दशा बड़ी दयनीय थी तथा उनकी समस्याओं के प्रति सरकार उदासीन रहती थी। दिन भर की कड़ी मेहनत के पश्चात् भी उन्हें भर–पेट भोजन नसीब नहीं ता था। इसके विपरीत बडे-बडे जमींदार विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। 1949 ई० की क्रांति के पश्चात भमि का पुनर्विभाजन किया गया। बड़े ज़मींदारों से फालतू भूमि ले कर छोटे किसानों में बाँट दी गई। किसानों की दशा सुधारने के लिए सहकारी समितियाँ भी बनाई गईं।

प्रश्न 13.
माओ-त्सेतुंग के आरंभिक जीवन एवं सफलताओं के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग की गणना न केवल चीन अपितु विश्व के महान् व्यक्तित्वों में की जाती है। उसके आरंभिक जीवन एवं सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. आरंभिक जीवन

1. आरंभिक जीवन:
माओ-त्सेतुंग का जन्म 26 दिसंबर, 1893 ई० को चीन के हूनान (Hunan) प्रांत में स्थित एक छोटे से गाँव शाओ शां (Shao Shan) में हुआ था। उनके पिता का नाम माओ जेने-शुंग (Mao-Jane-Shung) था। वह एक गरीब किसान था। अतः उसे अपने जीवनयापन के लिए बहुत कठोर परिश्रम करना पड़ता था। 15 वर्ष की आयु में माओ-त्सेतुंग ने अपना घर छोड़ दिया एवं एक स्कूल में प्रवेश ले लिया।

माओ के जीवन पर कांग यूवेई एवं लियांग किचाउ नामक प्रसिद्ध चीनी सुधारकों, वाशिंगटन, रूसो, नेपोलियन, पीटर महान्, अब्राहिम लिंकन आदि के जीवन का बहुत प्रभाव पड़ा। 1911 ई० की चीनी क्राँति के समय माओ-त्सेतुंग डॉक्टर सन-यात-सेन की क्रांतिकारी सेना में सम्मिलित हुआ था। उसने माँचू वंश का पतन होते हुए अपनी आँखों से देखा था।

माओ-त्सेतुंग 1917 ई० में हुई रूसी क्राँति से भी बहुत प्रभावित हुआ था। उसे पढाई से विशेष लगाव था इसलिए उसने पीकिंग विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी कर ली। यहाँ उसने समाजवाद से संबंधित अनेक पुस्तकों को पढ़ा। 1921 ई० में चीन की साम्यवादी पार्टी की स्थापना हुई थी। इस समय माओ-त्सेतुंग इसका सदस्य बन गया था। शीघ्र ही वह इसके एक प्रमुख नेता बन गए।

2. लाँग मार्च 1934-35 ई०:
लाँग मार्च (लंबी यात्रा) चीन के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। 1934 ई० में चियांग-काई-शेक जो कि साम्यवादियों को अपना कट्टर दुश्मन मानता था का विनाश करने के उद्देश्य से कियांग्सी (Kiangsi) का घेराव कर लिया। कियांग्सी उस समय साम्यवादियों का एक प्रमुख केंद्र था। इस घोर संकट के समय में माओ-त्सेतुंग ने बहुत साहस से कार्य लिया।

उसने अपने अधीन एक लाख लाल सेना (Red Army) एकत्रित की तथा वह चियांग-काई-शेक के घेराव को तोड़ते हुए लंबी यात्रा पर निकल पड़ा। यह यात्रा 16 अक्तूबर, 1934 ई० को आरंभ की गई थी। उसने शांग्सी (Shanxi) तक का 6,000 मील का कठिन सफर तय किया। यह एक बहुत ज़ोखिम भरी यात्रा थी। रास्ते में उन्हें चियांग-काई-शेक की सेना का अनेक बार सामना करना पड़ा।

उन्हें भूखे-प्यासे अनेक वनों, नदियों एवं कठिन पर्वतों को पार करना पड़ा। इनके चलते करीब 80 हज़ार माओ के सैनिक रास्ते में मृत्यु का ग्रास बन गए। 370 दिनों की लंबी यात्रा के पश्चात् 20 अक्तूबर, 1935 ई० को माओ-त्सेतुंग अपने 20 हजार सैनिकों के साथ शांग्सी पहुँचने में सफल हुआ। निस्संदेह विश्व इतिहास में इस घटना की कोई उदाहरण नहीं मिलती। प्रसिद्ध इतिहासकार इमानूएल सी० वाई० सू के अनुसार, “यह साम्यवादी पार्टी के इतिहास की महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना थी तथा माओ की शक्ति को शिखर तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध हुई।”
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II. माओ-त्सेतुंग की सफलताएँ

माओ-त्सेतुंग एवं साम्यवादी दल के अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप चीन में अंतत: 1 अक्तूबर, 1949 ई० को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना (People’s Republic of China) की स्थापना हुई। निस्संदेह इससे चीनी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। चीनी लोगों को एक शताब्दी के पश्चात् विदेशी शक्तियों के शोषण से मुक्ति मिली। इस अवसर पर माओ-त्सेतुंग को चीनी गणराज्य का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उसने अपने शासनकाल (1949-76 ई०) के दौरान अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. राजनीतिक एकता की स्थापना:
माओ-त्सेतुंग ने सत्ता संभालने के पश्चात् अपना सर्वप्रथम विशेष ध्यान चीन में राजनीतिक एकता स्थापित करने की ओर दिया। चीन जैसे विशाल देश को एकता के सूत्र में बाँधना कोई साधारण बात नहीं थी। इसके लिए माओ-त्सेतुंग ने बल एवं कूटनीति दोनों का प्रयोग किया। इस उद्देश्य में वह काफ़ी सीमा तक सफल रहा।

2.1954ई० का संविधान:
चीन में 20 सितंबर, 1954 ई० को एक नया संविधान लागू किया गया। इसमें राष्ट्रीय जन कांग्रेस (National People’s Congress) को राष्ट्र की सर्वोच्च संस्था घोषित किया गया। इसके सदस्यों की संख्या 1200 रखी गई। इनका चुनाव 4 वर्ष के लिए किया जाता था। इसका अधिवेशन प्रतिवर्ष बुलाया जाता था। अध्यक्ष को देश का राष्ट्राध्यक्ष (Head of the State) घोषित किया गया। इस पद पर माओ-त्सेतुंग नियुक्त हुए।

उन्हें विशाल अधिकार दिए गए। संविधान द्वारा साम्यवादी दल को सर्वोच्च स्थान दिया गया। राज्य के सभी प्रमुख पद साम्यवादी दल के नेताओं को दिए गए। चाऊ एनलाई (Zhou Enlai) को देश का प्रथम प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। संविधान में नागरिकों को दिए गए मौलिक अधिकारों एवं न्याय व्यवस्था पर भी विस्तृत प्रकाश डाला गया है।

3. आर्थिक प्रगति:
माओ-त्सेतुंग ने चीन की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए। उसने विदेशी पूँजी एवं उनके द्वारा स्थापित कारखानों को अपने नियंत्रण में ले लिया। दसरा सरकार ने छोटे उद्योगों को संरक्षण प्रदान करके उन्हें प्रोत्साहित किया। उसने श्रमिकों की दशा सुधारने के उद्देश्य से उनकी मजदूरी बढ़ा दी।

उसने मुद्रा संबंधी कार्यों तथा ऋण के संचालन के लिए 1950 ई० बैंक ऑफ़ चाइना (People’s Bank of China) की स्थापना की उसने चीन में आर्थिक विकास के उद्देश्य से चीन की सरकार ने रूस की सरकार से सहायता प्राप्त की। उसने चीन में विशाल उद्योगों की स्थापना के उद्देश्य से 1953 ई० में प्रथम पँचवर्षीय योजना आरंभ की।

4. लंबी छलाँग वाला आंदोलन :
1958 ई० में चीन में लंबी छलाँग वाला आंदोलन चलाया गया। इसका उद्देश्य चीन में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता लाना था। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए चीन में कम्यून्स (Communes) की स्थापना की गई। 1958 ई० के अंत तक चीन में ऐसे 26,000 कम्यून्स की स्थापना की जा चुकी थी। प्रत्येक कम्यून में लगभग 5,000 परिवार होते थे। इनके अपने खेत एवं कारखाने आदि होते थे।

प्रत्येक कम्यून उत्पादन, वितरण एवं खपत आदि पर नज़र रखता था। यद्यपि सरकार द्वारा लगातार इस आंदोलन की सफलता की घोषणा की गई किंतु वास्तविकता यह थी कि यह विफल रहा। लीऊ शाओछी (Liu Shaochi) एवं तंग शीयाओफींग (Deng Xiaoping) नामक नेताओं ने कम्यून प्रथा को बदलने का प्रयास किया क्योंकि ये कुशलता से काम नहीं कर रही थीं।

अत: 1959 ई० में इस आंदोलन को वापस ले लिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० डब्ल्यूक हाल का यह कहना ठीक है कि, “लंबी छलाँग वाला आंदोलन विफल रहा तथा इसने अपने पीछे आर्थिक महामंदी तथा भारी मानव दुःखों को छोड़ा।”

5. शिक्षा का प्रसार :
माओ-त्सेतुंग शिक्षा के महत्त्व को अच्छी प्रकार से जानता था। अतः उसने शिक्षा के प्रसार के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। इस उद्देश्य से उसने संपूर्ण चीन में अनेक स्कूलों, कॉलेजों एवं विश्वविद्यालयों की स्थापना की। प्रारंभिक शिक्षा को अनिवार्य बनाया गया। किसानों एवं मजदूरों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया।

चीन में तकनीकी शिक्षा पर अधिक बल दिया गया ताकि विद्यार्थी शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् बेरोज़गार न रहें। इसलिए पाठ्यक्रम एवं पुस्तकों में आवश्यक परिवर्तन किए गए।

6. स्त्रियों की स्थिति में सुधार:
1949 ई० से पूर्व चीन में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित किया गया था। माओ-त्सेतुंग के शासनकाल में स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए गए। प्रथम, उन्हें भूमि की स्वामिनी बना दिया गया। अतः उन्हें अपनी जीविका के लिए पुरुषों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।

दूसरा, चीन के संविधान के अनुसार स्त्रियों को पुरुषों के बराबर सभी प्रकार के अधिकार दिए गए। तीसरा, 1950 ई० के विवाह कानून के अनुसार एक विवाह की प्रथा प्रचलित की गई। तलाक का अधिकार दोनों पति एवं पत्नी को समान रूप से दिया गया। चीन में वेश्यावृत्ति का उन्मूलन कर दिया गया। राज्य के सभी महत्त्वपूर्ण पदों पर स्त्रियों को नियुक्त किया गया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप चीन की स्त्रियों की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ।

7. महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति :
माओ-त्सेतुंग चीन में एक वर्गहीन समाज की स्थापना करने में विफल रहा। अतः सरकार के विरोधियों ने उसकी आलोचना करनी आरंभ कर दी। माओ इसे सहन करने को तैयार नहीं था। अतः उसने अपने विरोधियों का सफाया करने के उद्देश्य से 1966 ई० में महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्राँति को आरंभ किया।

इसके अधीन रेड गाईस (लाल रक्षक) का गठन किया गया। इसमें छात्रों एवं सैनिकों को भर्ती किया गया। उन्होंने पुरानी संस्कृति, पुराने रिवाजों एवं पुरानी आदतों के खिलाफ एक ज़ोरदार आंदोलन आरंभ किया। सभी माओ विरोधियों का निर्ममतापूर्वक दमन किया गया। उन्हें उनके पदों से हटा दिया गया। शीघ्र ही सांस्कृतिक क्राँति ने एक उग्र रूप धारण कर लिया। इससे संपूर्ण चीन में अराजकता फैल गई। इसके बावजूद इसे 1976 ई० में माओ-त्सेतुंग की मृत्यु तक जारी रखा गया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 14.
जापान एवं चीन में आधुनिकता के अपनाए गए मार्गों का संक्षिप्त वर्णन करें। क्या इनमें कोई अंतर है?
उत्तर:
जापान एवं चीन ने आधुनिकता के अलग-अलग मार्ग अपनाए। इन मार्गों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. जापान द्वारा अपनाया गया मार्ग:
जापान ने 19वीं शताब्दी तक चीन की तरह पश्चिमी देशों के प्रति तटस्थता की नीति अपनाई थी। उसने विदेशियों के साथ कोई संपर्क नहीं रखा था। 1853 ई० में अमरीका के कॉमोडोर मैथ्यू पेरी के जापान आगमन से जापान के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात हुआ। इस समय जापान ने अमरीका के साथ राजनीतिक एवं व्यापारिक संबंध स्थापित करने का निर्णय किया। अतः 1854 ई० में कॉमोडोर मैथ्यू पेरी एवं जापान की सरकार के मध्य कानागावा की संधि हो गई।

इस संधि के अनुसार जापान ने शीमोदा (Shimoda) एवं हाकोदाते (Hakodate) नामक दो बंदरगाहों को अमरीका के जहाजों के लिए खोल दिया। शीमोदा में अमरीका के वाणिज्य दूत को रहने की अनुमति दे दी गई। जापान ने अमरीका के साथ सबसे अच्छे राष्ट्र जैसा व्यवहार करने का वचन दिया।

अमरीका के पदचिन्हों पर चलते हुए हालैंड, ब्रिटेन, रूस एवं फ्राँस ने भी जापान के साथ संधियाँ कर ली तथा वे सभी विशेषाधिकार प्राप्त कर लिए जो जापान ने अमरीका को दिए थे। जापान ने इन पश्चिमी देशों के साथ ये संधियाँ अपनी इच्छा एवं बराबरी के आधार पर की थीं। इन संधियों द्वारा जापान पश्चिमी देशों का ज्ञान प्राप्त कर विकास के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहता था।

जापान में आधुनिकीकरण का नेतृत्व कुलीन वर्ग ने किया। इनके अधीन जापान ने एक उग्र राष्ट्रवाद (aggressive nationalism) को जन्म दिया। उन्होंने शोषणकारी सत्ता (repressive regime) को जारी रखा। उन्होंने लोकतंत्र की माँग को कुचल दिया तथा विरोध के स्वर को उठने नहीं दिया। जापान ने सैन्यवादियों के प्रभाव के चलते एक औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना की। इस कारण उसे अनेक युद्धों का सामना करना पड़ा। इसके चलते उसके विकास में बाधा आई।

जापान के आधुनिकीकरण में उसकी सांस्कृतिक परंपराओं ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इनका उपयोग नए रचनात्मक ढंग से किया गया। मेज़ी काल में विद्यार्थियों को यूरोपीय एवं अमरीकी प्रथाओं के अनुरूप नए विषयों को पढ़ाया जाने लगा। किंतु इस बात का विशेष ध्यान रखा गया कि जापानी निष्ठावान नागरिक बनें। अत: जापान में नैतिक शास्त्र को पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया।

इसमें सम्राट् के प्रति वफ़ादारी पर विशेष बल दिया जाता था। जापान के लोगों ने रोज़मर्रा की जिंदगी में भी केवल पश्चिमी समाजों की अंधाधुंध नकल नहीं की अपितु उन्होंने देशी एवं विदेशी को मिलाया। इसका उदाहरण जापानी लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी में आए बदलावों से लगाया जा सकता है।

2. चीन द्वारा अपनाया गया मार्ग:
चीन का आधुनिकीकरण का सफर जापान से काफी भिन्न था। चीन ने पश्चिमी देशों से अपनी दूरी बनाए रखी। परिणामस्वरूप पश्चिमी देशों को जब अफ़ीम के युद्धों के पश्चात् चीन की वास्तविक कमजोरी का ज्ञान हुआ तो अनेक देश लूट की होड़ में सम्मिलित हो गए। इसके चलते चीनी लोगों को अनेक कष्टों को सहन करना पड़ा। प्राकृतिक त्रासदियों ने लोगों के दुःखों को और बढ़ा दिया।

1949 ई० में चीन में साम्यवादी दल के सत्ता में आने से वहाँ एक नए युग का श्रीगणेश हुआ। इसने चीन में राजनीतिक एकता स्थापित की। चीनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से विशेष पग उठाए गए। साम्यवादी दल एवं उसके समर्थकों ने परंपरा का अंत करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी। उनका विश्वास था कि परंपरा के कारण ही जनसाधारण गरीबी में जकड़ा हुआ है एवं देश अविकसित है। इस कारण ही स्त्रियों की दशा दयनीय है। अतः साम्यवादी दल ने शिक्षा में अनिवार्य बदलाव किए ताकि लोगों के दृष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन आए।

उन्होंने स्त्रियों की स्थिति में सुधार लाने के उद्देश्य से उन्हें अनेक अधिकार दिए। चीन में वेश्यावृति का उन्मूलन कर दिया गया। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप चीन में आज स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर प्रत्येक क्षेत्र में कार्य कर रही हैं। आज चीनी समाज में पुनः असमानताएँ उभर रही हैं तथा परंपराएँ पुनर्जीवित होने लगी हैं। अतः चीन की आज सबसे बड़ी चुनौती इन समस्याओं से निपटने की है।

क्रम संख्या
Table

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
जापान की भौगोलिक विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
जापान प्रशांत महासागर की गोद में बसा हुआ पूर्वी एशिया का एक महान् देश है। इसे विश्व का एक अत्यंत सुंदर एवं रमणीय देश माना जाता है। इसका कारण यह है यहाँ की जलवायु बहुत स्वच्छ है। यहाँ वर्षा काफी होती है। यहाँ जंगलों, नदियों, झीलों एवं पर्वतों की बहुतायत है। जापान 3000 से अधिक द्वीपों से मिलकर बना है। इनमें से अधिकांश द्वीप छोटे हैं।

जापान के चार द्वीप होश, क्यूश, शिकोकू तथा होकाइदो प्रमुख हैं। इन द्वीपों में होंशू सबसे बड़ा है तथा जापान का केंद्र है। यहाँ जापान की राजधानी एदो (आधुनिक तोक्यो) सहित कुछ अन्य प्रसिद्ध नगर स्थित हैं। क्यूशू द्वीप चीन के निकट स्थित होने के कारण यह सर्वप्रथम यूरोप के संपर्क में आया।

प्रश्न 2.
शोगुन कौन थे ? उनकी सफलताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
शोगुन जापान के सम्राट् के प्रधान सेनापति थे। 1603 ई० में तोकुगावा वंश के लोगों ने शोगुन पद पर अधिकार कर लिया था। वह इस पद पर 1867 ई० तक कायम रहे। इस समय के दौरान उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की। उन्होंने अपने विरोधियों को पराजित कर जापान में कानून व्यवस्था को लागू किया। उन्हेंने दैम्यों पर कड़ा नियंत्रण रखा तथा उन्हें शक्तिशाली न होने दिया।

उन्होंने प्रमुख शहरों एवं खादानों पर भी नियंत्रण बनाए रखा। उन्होंने योद्धा वर्ग जिसे समुराई कहा जाता था को विशेष सुविधाएँ प्रदान की। उन्होंने कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए किसानों से हथियार वापस ले लिये। उन्होंने भूमि की उत्पादन शक्ति के आधार पर भू-राजस्व निर्धारित किया।

प्रश्न 3.
कॉमोडोर मैथ्यू पेरी कौन था ? उसके जापान आगमन का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
1852 ई० में अमरीका ने कॉमोडोर मैथ्यू पेरी को जापान की सरकार के साथ एक समझौता करने के लिए भेजा। इसका उद्देश्य अमरीका एवं जापान के मध्य राजनीतिक एवं व्यापारिक संबंध स्थापित करना था। पेरी जापान की सरकार के साथ 31 मार्च, 1854 ई० को कानागावा की संधि करने में सफल हो गया। इस संधि के अनुसार जापान की दो बंदरगाहों शीमोदा एवं हाकोदाटे को अमरीका के लिए खोल दिया गया।

शीमोदा में ” अमरीका के वाणिज्य दूत को रहने की अनुमति दी गई। जापान ने अमरीका के साथ बहुत अच्छे राष्ट्र जैसा व्यवहार करने का वचन दिया। विदेशियों के प्रवेश से जापान में स्थिति ने विस्फोटक रूप धारण कर लिया। शोगुन इस स्थिति को अपने नियंत्रण में लाने में विफल रहे। अत: उन्हें अपने पद को त्यागना पड़ा।

प्रश्न 4.
मेजी पुनर्स्थापना से पहले की वे अहम घटनाएँ क्या थीं, जिन्होंने जापान के तीव्र आधुनिकीकरण को संभव किया ?
उत्तर:
(1) 17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में शहरों के तीव्र विकास से व्यापार एवं वाणिज्य को बहत बल मिला। इससे व्यापारी वर्ग बहुत धनी हुआ। इस वर्ग ने जापानी कला एवं साहित्य को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

(2) तोकुगावा काल में जापान के लोगों में शिक्षा का काफी प्रचलन था। अनेक लोग केवल लेखन द्वारा ही अपनी जीविका चलाते थे। पुस्तकों का प्रकाशन बड़े स्तर पर किया जाता था। 18वीं शताब्दी में पश्चिमी देशों की अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का जापानी में अनुवाद किया गया। इससे जापान के लोगों को पश्चिम के ज्ञान के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्राप्त हुई।

(3) तोकुगावा काल में जापान एक धनी देश था। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि जापान चीन से रेशम तथा भारत से वस्त्र आदि विलासी वस्तुओं का आयात करता था। इसके बदले वह सोना एवं चाँदी देता था। इसका जापानी अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ा। इस कारण तोकुगावा को इन कीमती वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। उन्होंने रेशम के आयात को कम करने के उद्देश्य से 16वीं शताब्दी में निशिजन में रेशम उद्योग की स्थापना की।

प्रश्न 5.
मेजी शासनकाल की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:
(1) मेजी सरकार की सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता जापान में सामंती प्रथा का अंत करना था। मेजी, सरकार ने 1871 ई० में जापान में सामंती प्रथा के अंत की घोषणा की। इस प्रथा के अंत से जापान आधुनिकीकरण की दिशा की ओर अग्रसर हुआ।

(2) मेजी पुनर्स्थापना के पश्चात् जापान में उल्लेखनीय शिक्षा सुधार किए गए। इससे पूर्व शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार केवल समाज के उच्च वर्ग को ही प्राप्त था। जापान में 1871 ई० में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। इसके पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तीव्रता से प्रगति हुई।

(3) मेजी काल में सेना को शक्तिशाली बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। 1872 ई. में 20 वर्ष से अधिक नौजवानों के लिए सैनिक सेवा को अनिवार्य कर दिया गया। नौसेना को भी अधिक शक्तिशाली बनाया गया।

(4) जापान में उद्योगों के विस्तार की ओर सरकार ने अपना विशेष ध्यान दिया। इस उद्देश्य से 1870 ई० में जापान में उद्योग मंत्रालय की स्थापना की गई। इस मंत्रालय की स्थापना जापानी उद्योगों के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

(5) मेज़ी काल में कृषि क्षेत्र में भी प्रशंसनीय सुधार किए गए। सामंती प्रथा का अंत हो जाने से किसानों की स्थिति पहले की अपेक्षा अच्छी हो गई।

(6) मेज़ी काल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 1889 ई० में एक नए संविधान को लागू करना था। इस संविधान के अनुसार सम्राट् को सर्वोच्च सत्ता सौंपी गई। उसे कई प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे।

प्रश्न 6.
मेज़ी शासनकाल में शिक्षा के क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय सुधार बताएँ।
उत्तर:
मेजी पुनर्स्थापना के पश्चात् जापान में उल्लेखनीय शिक्षा सुधार किए गए। जापान में 1871 ई० में शिक्षा विभाग की स्थापना की गई। इसके पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में बहुत तीव्रता से प्रगति हुई। संपूर्ण जापान में अनेक स्कूलों एवं कॉलेजों की स्थापना की गई। 6 वर्ष के सभी बालक-बालिकाओं के लिए प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य कर दिया गया। 1877 ई० में जापान में तोक्यो विश्वविद्यालय की स्थापना की गई। तकनीकी शिक्षा को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया गया। पश्चिम की प्रसिद्ध पुस्तकों का जापानी भाषा में अनुवाद किया गया । स्त्रियों को शिक्षा प्राप्ति के लिए प्रेरित किया गया। 1901 ई० में जापानी महिला विश्वविद्यालय की स्थापना इस दिशा में एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

प्रश्न 7.
मेज़ी काल के मुख्य आर्थिक सुधारों पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
(1) औद्योगिक विकास-जापान में उद्योगों के विस्तार की ओर सरकार ने अपना विशेष ध्यान दिया। इस उद्देश्य से 1870 ई० में जापान में उद्योग मंत्रालय की स्थापना की गई। इस मंत्रालय की स्थापना जापानी उद्योगों के विकास के लिए एक मील पत्थर सिद्ध हुई। सरकार ने भारी उद्योगों के विकास के लिए पूँजीपतियों को प्रोत्साहित किया। अतः जापान में शीघ्र ही अनेक नए कारखाने स्थापित हुए। इनमें लोहा-इस्पात उद्योग, वस्त्र उद्योग, रेशम उद्योग, जहाज़ उद्योग एवं शस्त्र उद्योग प्रसिद्ध थे।

(2) कृषि सुधार-मेज़ी काल में कृषि क्षेत्र में भी प्रशंसनीय सुधार किए गए। सामंती प्रथा का अंत हो जाने से किसानों की स्थिति पहले की अपेक्षा अच्छी हो गई। 1872 ई० में सरकार के एक आदेश द्वारा किसानों को उस भूमि का स्वामी स्वीकार कर लिया गया। किसानों से बेगार लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। किसानों को कृषि की पैदावार बढ़ाने के लिए राज्य की ओर से विशेष सुविधाएँ प्रदान की गई। उन्हें उत्तम किस्म के बीज दिए गए। पशुओं की उत्तम नस्ल का प्रबंध किया गया। किसानों से अब अनाज की अपेक्षा नकद भू-राजस्व लिया जाने लगा। उन्हें कृषि के पुराने ढंगों की अपेक्षा आधुनिक ढंग अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।

(3) कुछ अन्य सुधार-जापान की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से मेज़ी काल में कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। सर्वप्रथम यातायात के साधनों का विकास किया गया। 1870-72 ई० में जापान में तोक्यो एवं योकोहामा के मध्य प्रथम रेल लाइन बिछाई गई। जहाज़ निर्माण के कार्य में भी उल्लेखनीय प्रगति की गई। द्वितीय, मुद्रा प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किए गए। तीसरा, 1872 ई० में जापान में बैंकिंग प्रणाली को आरंभ किया गया। 1882 ई० में बैंक ऑफ जापान की स्थापना की गई।

प्रश्न 8.
मेज़ी संविधान की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
मेज़ी काल की एक अन्य महत्त्वपूर्ण उपलब्धि 1889 ई० में एक नए संविधान को लागू करना था। इस संविधान के अनुसार सम्राट को सर्वोच्च सत्ता सौंपी गई। उसे कई प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। संपूर्ण सेना उसके अधीन थी। उसे किसी भी देश से युद्ध अथवा संधि करने का अधिकार दिया गया था। वह डायट (संसद्) के अधिवेशन को बुला सकता था तथा उसे भंग भी कर सकता था। वह सभी मंत्रियों की नियुक्ति करता था तथा वे अपने कार्यों के लिए उसके प्रति उत्तरदायी होते थे।

केवल सम्राट् ही मंत्रियों को बर्खास्त कर सकता था। डायट का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष तीन माह के लिए बुलाया जाता था। इसमें सदस्यों को बहस करने का अधिकार प्राप्त था। सम्राट् डायट की अनुमति के बिना लोगों पर नए कर नहीं लगा सकता था। नए संविधान की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें नागरिकों को कुछ मौलिक अधिकार दिए गए थे। इसके अनुसार उन्हें भाषण देने, लिखने, एकत्र होने, संगठन बनाने एवं किसी भी धर्म को अपनाने की पूर्ण स्वतंत्रता थी। सभी नागरिकों को कानून के सामने बराबर माना जाता था।

प्रश्न 9.
जापान के विकास के साथ-साथ वहाँ की रोज़मर्रा की जिंदगी में किस तरह बदलाव आए ? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
मेज़ी शासनकाल में जापानियों की रोज़मर्रा की जिंदगी में अनेक महत्त्वपूर्ण बदलाव आए। मेज़ी काल से पूर्व जापान में संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन था। मेज़ी काल में एकल परिवार का प्रचलन बढ़ने लगा। इसमें पति, पत्नी एवं उनके बच्चे रहते थे। अतः वे नए घरों जिसे जापानी में होमु कहते थे में रहने लगे।

वे घरेलू उत्पादों के लिए बिजली से चलने वाले कुकर, माँस एवं मछली भूनने के लिए अमरीकी भूनक तथा ब्रेड सेंकने के लिए टोस्टर का प्रयोग करने लगे। जापानियों में अब पश्चिमी वेशभूषा का प्रचलन बढ़ गया। वे अब सूट एवं हैट डालने लगे। औरतों के लिबास में भी परिवर्तन आ गया। वे अब सौंदर्य वृद्धि की ओर विशेष ध्यान देने लगीं। परस्पर अभिवादन के लिए हाथ मिलाने का प्रचलन लोकप्रिय हो गया। मनोरंजन के नए साधनों का विकास हुआ। लोगों की सुविधा के लिए विशाल डिपार्टमैंट स्टोर बनने लगे। 1899 ई० में जापान में सिनेमा का प्रचलन आरंभ हुआ।

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प्रश्न 10.
1894-95 ई० के चीन-जापान के युद्ध के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:
(1) रूस के कोरिया में बढ़ते हुए प्रभाव के कारण जापान को चिंता हुई। जापान ने स्वयं वहाँ अपना आधिपत्य स्थापित करने के प्रयास तीव्र कर दिए।

(2) कोरिया की आंतरिक स्थिति बड़ी दयनीय थी। वह एक निर्बल देश था। उस समय कोरिया में अशांति फैली हुई थी तथा अव्यवस्था व्याप्त थी। जापान को हर समय भय लगा रहता था कि कोई अन्य देश कोरिया पर अपना अधिकार न कर ले। चीन भी अपने वंशानुगत अधिकार के कारण किसी अन्य देश के कोरिया में हस्तक्षेप को सहन नहीं कर सकता था।

(3) कोरिया में जापान के बढ़ रहे प्रभाव को देखकर चीन बहुत चिंतित हो गया। जापान के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से उसने विदेशी शक्तियों को कोरिया में व्यापार करने के प्रयासों में अपना समर्थन दिया।

(4) चीन-जापान यद्ध के कारणों में एक कारण कोरिया में जापान के आर्थिक हित भी थे। अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए वह कोरिया की ओर ललचाई दृष्टि से देख रहा था।

(5) कोरिया में ‘तोंगहाक’ संप्रदाय द्वारा किया गया विद्रोह चीन-जापान युद्ध का तत्कालीन कारण बना। इस संप्रदाय के लोग विदेशियों को पसंद नहीं करते थे। कोरिया सरकार इस संप्रदाय के विरुद्ध थी तथा उसने एक, अध्यादेश द्वारा उसकी सभी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया। जापानी सेनाओं ने कोरिया के राजा को बंदी बना लिया। इस प्रकार 1 अगस्त, 1894 ई० को यह युद्ध आरंभ हुआ।

प्रश्न 11.
शिमोनोसेकी की संधि क्यों व कब हुई ? इसके क्या परिणाम निकले ?
उत्तर:
शिमोनोसेकी की संधि 17 अप्रैल, 1895 ई० को चीन एवं जापान के मध्य हुई। इस संधि की मुख्य धाराएँ अग्रलिखित अनुसार थीं

  • चीन ने कोरिया को एक पूर्ण स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।
  • चीन ने पोर्ट आर्थर, फारमोसा, पेस्काडोरस तथा लियाओतुंग जापान को दे दिए।
  • चीन ने माना कि वह युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में जापान को 2 करोड़ तायल देगा।
  • चीन जापान को सर्वाधिक प्रिय देश स्वीकार करेगा।
  • चीन जापान के व्यापार के लिए अपनी चार बंदरगाहें शांसी, सो चाऊ, चुंग-किंग तथा हंग चाओ खोलेगा।
  • जब तक चीन युद्ध की क्षतिपूर्ति की राशि जापान को नहीं चुकाएगा उसकी वी-हाई-वी नामक बंदरगाह जापान के पास रहेगी।

शिमोनोसेकी की संधि के कागजों पर अभी स्याही भी नहीं सूखी थी कि उसके 6 दिन पश्चात् ही फ्राँस, रूस तथा जर्मनी ने जापान को कहा कि वह लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को लौटा दे। विवश होकर जापान ने शिमोनोसेकी की संधि में संशोधन करना मान लिया। उसने लियाओतुंग प्रायद्वीप चीन को वापस कर दिया।

प्रश्न 12.
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध के कोई चार प्रमुख प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
(1) जापान की प्रतिष्ठा में वृद्धि-जापान एशिया का एक छोटा सा देश था तथा चीन सबसे बड़ा देश था। फिर भी जापान ने चीन को पराजित कर दिया। इस युद्ध में विजय से जापान की प्रतिष्ठा को चार चाँद लग गए। सभी यूरोपीय शक्तियों को विश्वास था कि जापान पराजित होगा। परंतु उसकी विजय ने सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। परिणामस्वरूप उसकी प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई।

(2) चीन की लूट आरंभ-जापान के हाथों पराजित होने से चीन की दुर्बलता सारे विश्व के आगे प्रदर्शित हो गई। इस कारण यूरोपीय शक्तियों की मनोवृत्ति में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया। पहले पश्चिमी देशों ने चीन से कई प्रकार की रियायतें प्राप्त की हुई थीं। परंतु अब वे उसके साम्राज्य का विभाजन चाहने लगीं। अतः ये सभी देश चीन की लूट में जापान के भागीदार बनने के लिए तैयार हो गए।

(3) आंग्ल-जापानी समझौते की आधारशिला-चीन-जापान युद्ध के परिणामस्वरूप आंग्ल-जापानी समझौत (1902 ई०) की नींव रखी गई। जब जापान इस युद्ध में विजयी हो रहा था तो इंग्लैंड के समाचार-पत्रों ने इसकी बहुत प्रशंसा की। उनके अनुसार इंग्लैंड और जापान के हित सामान्य थे। अतः वे जापान को भविष्य का उपयोगी मित्र मानने लरो । जापान भी इंग्लैंड से मित्रता करना चाहता था। इस प्रकार ये दोनों देश एक-दूसरे के निकट आए तथा 1902 ई० में एक समझौता किया।

(4) जापान-रूस शत्रता-शिमोनोसेकी की संधि के पश्चात रूस जापान के विरुद्ध हो गया। उसने फ्राँस तथा जर्मनी के साथ मिल कर जापान पर दबाव डाला कि वह लियाओतुंग प्रायद्वीय चीन को वापस कर दे। इससे जापान रूस से नाराज़ हो गया। इसके अतिरिक्त चीन-जापान युद्ध के पश्चात् जापान भी रूस के समान दूर-पूर्व में एक शक्ति के रूप में उभरा। दोनों देश महत्त्वाकांक्षी थे और यही महत्त्वाकांक्षा उन्हें 1904-05 के युद्ध की ओर ले गई।

प्रश्न 13.
रूस-जापान युद्ध 1904-1905 के क्या कारण थे ?
उत्तर:
(1) 1894-95 ई० में हुए चीन-जापान युद्ध में जापान ने चीन को पराजित करके एक शानदार विजय प्राप्त की थी। इस युद्ध के पश्चात् हुई शिमोनोसेकी की संधि के अनुसार चीन ने अपने कुछ क्षेत्र जापान को दिए थे। इन प्रदेशों में एक लियाओतुंग प्रदेश भी था। उस संधि के कुछ दिनों पश्चात् ही रूस ने जापान पर दबाव डाला कि वह लियाओतुंग का प्रदेश चीन को वापस कर दे।

(2) चीन में हुए रियायतों के लिए संघर्ष में रूस सब से महत्त्वपूर्ण सुविधाएँ प्राप्त करने में सफल रहा था। उसने 1898 ई० में लियाओतुंग का प्रदेश भी चीन से पट्टे पर ले लिया था। रूस की इस कार्यवाही से जापान भड़क उठा था।

(3) मंचूरिया भी रूस-जापान युद्ध का एक महत्त्वपूर्ण कारण बना। मंचूरिया चीन के उत्तरी भाग में स्थित था तथा ये दोनों देश उसमें रुचि रखते थे। उसने मंचूरिया में रेलवे लाइनें बिछाईं। अत: जापान ने रूस को एक सबक सिखाने का निर्णय किया।

(4) 1902 ई० में जापान तथा इंग्लैंड ने एक गठबंधन किया। इसके अधीन दोनों ने एक-दूसरे को वचन दिया कि चीन और कोरिया में अपने हितों को सुरक्षित रखने के लिए एक-दूसरे को सहयोग देंगे। इंग्लैंड का इस आश्वासन से जापान को प्रोत्साहन मिला और उसने रूस के प्रति कठोर नीति अपनानी आरंभ कर दी।

(5) जापान रूस की विस्तारवादी नीति से बड़ा चिंतित था। वह कोरिया तथा मंचूरिया के प्रश्न पर रूस से कोई समझौता करना चाहता था। अंततः दोनों के मध्य 10 फरवरी, 1904 ई० को युद्ध आरंभ हो गया।

प्रश्न 14.
जापान में सैन्यवाद के उत्थान के क्या कारण थे ?
उत्तर:
(1) जापान में सैन्यवादियों को एक के बाद एक सफलता प्राप्त होती गई जिसके कारण वे महत्त्वाकांक्षी हो गए। वे पूरे महाद्वीप पर नियंत्रण करना चाहते थे।

(2) बहुत-से पुराने नेता सैन्यवादियों की गतिविधियों को पसंद नहीं करते थे। वास्तव में वे सैन्यवादियों पर अंकुश रखते थे। परंतु ज्यों-ज्यों समय गुज़रता गया वे बूढ़े हो गए और उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु के कारण सैन्यवादियों पर जो उनका अंकुश था वह समाप्त हो गया और वे अपनी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हो गये।

(3) जापान में नवयुवक अधिकारियों की एक नई श्रेणी का उदय हुआ। ये नवयुवक अधिकारी अपनी शानदार विजयों द्वारा समाज में अपना स्थान बनाना चाहते थे। वे जापानी सैन्यवाद में विश्वास करते थे और शक्ति का प्रयोग करना अपना अधिकार समझते थे।

(4) सैन्यवादियों के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जापान में बहुत-सी गुप्त समितियों की स्थापना की गई थी। इनके उद्देश्यों का वर्णन इस प्रकार है-

(5) ये समितियाँ चाहती थीं कि जापान सारी दुनिया पर शासन करे। यदि ऐसा न हो सका तो जापान को समस्त देशों को विजय करना चाहिए।

(6) ये समितियाँ उदारवाद तथा प्रजातंत्र के विरुद्ध थीं। अतः इनका एक अन्य उद्देश्य पाश्चात्य देशों के सिद्धांतों का विरोध करना था।

(7) इन समितियों के सदस्य नाजीवाद तथा फासिस्टवाद में विश्वास रखते थे। वे फासिस्ट लोगों तथा नाजियों की भाँति राज्य को व्यक्ति से ऊपर मानते थे।

प्रश्न 15.
द्वितीय विश्व युद्ध का जापान पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
दूसरे विश्व युद्ध के अंत में जापान की पराजय हुई। इस पराजय के परिणामस्वरूप जापान पूर्व का अधिपति बनने के प्रयत्न में असफल रहा। युद्ध में पराजित होकर जापान का प्रदेश संकुचित होकर 1894-95 ई० की स्थिति में आ गया अर्थात् जितना कि यह चीन और जापान के युद्ध के पश्चात् बना था। जापान के पास केवल चार मुख्य द्वीप तथा कुछ छोटे द्वीप रह गए।

कोरिया को अस्थायी तौर पर रूस तथा अमरीका ने बाँट लिया। फार्मोसा चीन को लौटा दिया गया। मित्र देशों की सेना ने जनरल मेकार्थर के अधीन जापान पर अधिकार कर लिया। जापान में शासन प्रबंध के लिए एक नई सरकार स्थापित की गई, परंतु वास्तविक सत्ता मेकार्थर के हाथ में थी, क्योंकि वह मित्र शक्तियों की ओर से सर्वोच्च कमांडर था। जापानी सरकार भी साथ चलती रही तथा इसी सरकार की सहायता से जनरल मेकार्थर अपनी नीति चलाता था। वास्तव में जापान अपनी आंतरिक तथा बाह्य स्वतंत्रता का बहुत बड़ा भाग खो चुका था।

प्रश्न 16.
1960 ई० के पश्चात् जापान की प्रगति के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
1960 ई० के दशक से जापान प्रगति के पथ पर लगातार आगे बढ़ता रहा। 1964 ई० में जापान की राजधानी तोक्यो में ओलंपिक खेलों का आयोजन किया गया। इन खेलों के आयोजन में जापान ने 3 करोड़ डालर खर्च किए। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि इस समय तक जापान की अर्थव्यवस्था काफी सुदृढ़ हो चुकी थी।

इसी वर्ष जापान में शिंकासेन नामक 200 मील प्रति घंटे की रफ़तार वाली रेलगाड़ी आरंभ हुई। इसे बुलेट ट्रेन के नाम से भी जाना जाता है। इससे जापान की नयी प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुए विकास की जानकारी प्राप्त होती है। 1960 ई० के दशक में जापान में नागरिक समाज आंदोलन आरंभ हुआ। इस आंदोलन के आरंभ होने का कारण यह था कि औद्योगीकरण के कारण स्वास्थ्य और पर्यावरण पर काफी हानिकारक प्रभाव पड़ रहे थे।

1960 ई० के दशक में मिनामाता में पारे के जहर के फैलने तथा 1970 ई० के दशक में हवा के प्रदूषण से नयी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। इन समस्याओं से निपटने के लिए जापान की सरकार ने 1990 ई० के दशक में कछ कठोर पग उठाए।

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प्रश्न 17.
प्रथम अफ़ीम युद्ध पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
प्रथम अफ़ीम युद्ध चीन तथा ब्रिटेन के मध्य लड़ा गया था। यह युद्ध 1839 ई० से लेकर 1842 ई० तक चला। ब्रिटेन यूरोप की एक प्रमुख साम्राज्यवादी शक्ति था तथा वह चीन में अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था। 1800 ई० में उसने चीन में भारत से लाकर अफ़ीम बेचनी आरंभ कर दी थी। 1839 ई० तक उसका अफ़ीम का व्यापार बहुत बढ़ गया था।

अफ़ीम के इस व्यापार के कारण चीनियों का नैतिक पतन होने लगा तथा उसकी सैनिक शक्ति शिथिल पड़ने लगी। इससे चिंतित होकर चीन के शासकों ने अफ़ीम के व्यापार पर अंकुश लगाने के लिए आदेश जारी किए। परंतु ब्रिटेन ने अपना व्यापार जारी रखा। 1839 ई० में चीनियों ने ब्रिटेन के अफ़ीम से भरे जहाजों को समुद्र में डुबो दिया। परिणामस्वरूप चीन तथा ब्रिटेन में प्रथम अफ़ीम युद्ध आरंभ हो गया। यह युद्ध 29 अगस्त, 1842 ई० को हुई नानकिंग की संधि के साथ समाप्त हुआ। इस संधि के अनुसार

  • चीन को युद्ध हर्जाने के रूप में 21 मिलियन डालर की राशि ब्रिटेन को देनी पड़ी।
  • हांगकांग का द्वीप सदा के लिए ब्रिटेन को मिल गया।
  • कैंटन के अतिरिक्त फूचाओ, अमोय, निंगपो तथा शंघाई नामक बंदरगाहें भी ब्रिटेन के लिए खोल दी गईं।

प्रश्न 18.
नानकिंग की संधि कब हुई ? इसकी प्रमुख धाराएँ क्या थी ?
उत्तर:
अंग्रेजों तथा चीनियों के बीच नानकिंग की संधि 29 अगस्त, 1842 ई० को हुई। इस संधि की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • हांगकांग का द्वीप सदा के लिए ब्रिटेन को सौंप दिया गया।
  • ब्रिटिश लोगों को पाँच बंदरगाहों-कैंटन, अमोय, फूचाओ, निंगपो और शंघाई में बसने तथा व्यापार करने का अधिकार दे दिया गया।
  • क्षतिपूर्ति के रूप में चीन ने दो करोड़ दस लाख डालर अंग्रेजों को देना स्वीकार किया।
  • को-होंग को भंग कर दिया गया। परिणामस्वरूप अब ब्रिटिश व्यापारी किसी भी चीनी व्यापारी के साथ स्वतंत्र रूप से व्यापार कर सकता था।
  • आयात और निर्यात पर एक समान तथा उदार दर स्वीकार कर ली गई।
  • चीनियों ने इस बात को स्वीकार कर लिया कि अंग्रेज़ों के मुकद्दमे अंग्रेज़ी कानून के अनुसार तथा उन्हीं की अदालतों में चलेंगे।
  • यह भी शर्त रखी गई कि चीन अन्य देशों के लोगों को जो भी सुविधाएँ देगा वे अंग्रेजों को भी प्राप्त होंगी।

प्रश्न 19.
द्वितीय अफ़ीम युद्ध का तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर:
1856 ई० में घटने वाली लोर्चा ऐरो घटना द्वितीय अफ़ीम युद्ध का तात्कालिक कारण बनी। 8 अक्तूबर, 1856 ई० में चीनी अधिकारियों ने लोर्चा ऐरो नामक जहाज़ को पकड़ लिया तथा उसके 14 नाविकों में से 12 को बंदी बना लिया। यह जहाज एक चीनी व्यापारी का था तथा हांगकांग में पंजीकृत हुआ था। इस जहाज़ पर ब्रिटिश झंडा लगा हुआ था।

हैरी पार्कस नामक अंग्रेज़ अधिकारी ने चीन की इस कार्यवाही की निंदा की तथा बंदी बनाए गए व्यक्तियों को छोड़ने के लिए कहा। उसने यह भी कहा कि चीनी अधिकारी इस घटना के लिए माफी माँगें तथा भविष्य में ऐसी घटना न होने का आश्वासन दें। चीनी अधिकारियों ने अपनी कार्यवाही को उचित ठहराया तथा अंग्रेजों की माँग मानने से इंकार कर दिया।

इसके पश्चात् अंग्रेज़ अधिकारियों ने अपनी मांगों के लिए 48 घंटे का समय दिया। चीनी अधिकारियों ने बंदी बनाए गए सभी 12 नाविकों को छोड़ दिया परंतु बाकी माँगें मानने से इंकार कर दिया। चीनियों के इस व्यवहार से अंग्रेज़ रुष्ट हो गए तथा उन्होंने युद्ध का बिगुल बजा दिया।

प्रश्न 20.
तीनस्तीन की संधि के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
तीनस्तीन की संधि पर 26 जून, 1858 ई० को चीन, इंग्लैंड तथा फ्रांस की सरकारों ने हस्ताक्षर किए। इस संधि की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • चीन की 11 नई बंदरगाहों को विदेशी देशों के साथ व्यापार तथा निवास के लिए खोल दिया गया।
  • चीनी सरकार ने पश्चिमी देशों को अफ़ीम के व्यापार की अनुमति प्रदान कर दी तथा अफ़ीम के व्यापार को वैध घोषित कर दिया।
  • चीन की ‘यांगत्सी’ नदी में पश्चिमी देशों के जहाजों को आने-जाने की अनुमति दे दी गई।
  • चीन की सरकार ने यह भी स्वीकार कर लिया कि पश्चिमी देश चीन में अपने राजदूत नियुक्त कर सकेंगे।
  • ईसाई धर्म के प्रचारकों को यह अधिकार दे दिया गया कि वे चीन में स्वतंत्रतापूर्वक घम-फिर कर अपने धर्म का प्रचार कर सकते हैं और किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुकूल ईसाई बना सकते हैं।
  • पश्चिमी शक्तियों के राज्य-क्षेत्रातीत अधिकारों को अधिक विस्तृत और व्यापक कर दिया गया। इसके अनुसार उन्हें चीन में निवास करने और व्यापार करने की सुविधा दी गई।

प्रश्न 21.
आधुनिक चीन का संस्थापक किसे माना जाता है ? उसके सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।
अथवा
डॉ० सन-यात-सेन के तीन सिद्धांत क्या थे ?
उत्तर:
डॉ० सन-यात-सेन को आधुनिक चीन का संस्थापक माना जाता है। उसके राजनीतिक विचार तीन सिद्धांतों पर आधारित थे। उनका पहला सिद्धांत ‘राष्ट्रीयता’ का था। डॉ० सन-यात-सेन जानते थे कि चीन में राजनीतिक एकता का पूरी तरह अभाव है। जनता में स्थानीय तथा प्रांतीय भावनाएँ बड़ी प्रबल थीं।

इसी कारण साम्राज्यवादी शक्तियाँ चीन में अपना प्रभाव स्थापित कर रही थीं। अतः डॉ० सन-यात-सेन ने चीन में राष्ट्रीय भावनाएँ जगाने का प्रयत्न किया। राजनीतिक लोकतंत्र’ उनका दूसरा सिद्धांत था। वह चीन में लोकतंत्र स्थापित करना चाहते थे। लोकतंत्र की सफलता के लिये वह देश की सैनिक शक्ति को दृढ़ बनाना आवश्यक समझते थे।

इसके पश्चात् वह राजनीतिक चेतना का प्रसार करना चाहते थे। अंत में वह लोकतंत्रीय सरकार का निर्माण करना चाहते थे। उनका तीसरा सिद्धांत ‘जनता की आजीविका’ था। आजीविका के प्रश्न को हल करने के लिए वह चीन में भूमि का समान वितरण चाहते थे।

प्रश्न 22.
‘कुओमीनतांग’ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
1905 ई० में डॉ० सन-यात-सेन ने तुंग-मिंग-हुई नामक दल की स्थापना की थी। इस दल की स्थापना जापान में की गई थी। 1911 ई० में चीनी क्रांति के समय यह दल काफी शक्तिशाली हो गया था। वास्तव में मांचू वंश के साथ जो समझौता किया गया था, उसकी शर्ते भी इस दल के द्वारा तय की गई थीं।

परंतु गणतंत्र की स्थापना के पश्चात् जब युआन शी-काई ने निरंकुश शासन स्थापित करने का प्रयत्न किया तो डॉ० सन-यात-सेन ने छोटे-छोटे दलों को मिला कर एक नया राष्ट्रीय दल बनाने का निर्णय किया। अत: 1912 ई० में तुंग-मेंग हुई तथा चीन के अन्य दलों को मिलाकर एक नये राष्ट्रीय दल की स्थापना की गई।

इस दल का नाम कुओमीनतांग रखा गया। जब 1913 ई० में संसद् के चुनाव हुए तो इस दल को काफी सफलता प्राप्त हुई। यह दल युआन-शी-काई के निरंकुश शासन के विरुद्ध था। परिणामस्वरूप युआन-शी-काई से इस दल का संघर्ष आरंभ हो गया।

प्रश्न 23.
1911 ई० की चीनी क्रांति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन करो। .
उत्तर:
1911 ई० की चीनी क्रांति का महत्त्वपूर्ण कारण उसकी बढ़ती हुई जनसंख्या थी। इससे भोजन की समस्या गंभीर होती जा रही थी। इसके अतिरिक्त 1910-1911 ई० में भयंकर बाढ़ों के कारण लाखों लोगों की जानें गईं तथा देश में भुखमरी फैल गई। इससे लोगों में असंतोष बढ़ गया जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह की आग भड़क उठी।

क्राँति का दूसरा कारण ‘प्रवासी चीनियों का योगदान’ था। विदेशों में रहने वाले चीनी लोग काफी धनी हो गए थे। वे चीन में सत्ता परिवर्तन के पक्ष में थे। अत: उन्होंने क्रांतिकारी संस्थाओं की खूब सहायता की। माँचू सरकार के नये कर भी क्रांति लाने में सहायक सिद्ध हुए। इन करों के लगने से चीन में क्रांति की भावनाएँ भड़क उठीं।

जापान की उन्नति भी चीनी क्रांति का एक कारण था। चीन के लोग माँचू सरकार को समाप्त करके जापान की भाँति उन्नति करना चाहते थे। चीन में यातायात के साधनों का सुधार होने के कारण चीनी क्रांति के विचारों के प्रसार को काफी बल मिला। अतः यह भी क्रांति का एक अन्य कारण था।

प्रश्न 24.
1911 ई० की चीनी क्रांति का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:
(1) 1911 ई० की क्रांति का सबसे महत्त्वपूर्ण परिणाम यह निकला कि लगभग तीन सौ वर्षों से स्थापित माँचू शासन का अंत हो गया।

(2) माँचू शासन के अंत के पश्चात् युआन-शी-काई चीन का प्रथम राष्ट्रपति बना।

(3) 1911 ई० की क्रांति के कारण चीन के शिक्षित नवयुवकों में नवीन विचारों का संचार हुआ। पश्चिमी विचारकों से प्रेरित होकर चीनी लोगों का दृष्टिकोण बदल गया।

(4) राष्ट्रीय सरकार स्थापित करने के पश्चात् चीन धीरे-धीरे आधुनिकीकरण की ओर अग्रसर हुआ।

(5) चीन के लोगों को शताब्दियों से हो रहे शोषण तथा दुर्व्यवहार से छुटकारा मिला तथा आत्म-सम्मान की प्राप्ति हुई। निस्संदेह यह क्राँति चीन के इतिहास में एक नया मोड़ सिद्ध हुई।

प्रश्न 25.
चार मई आंदोलन क्या था ?
उत्तर:
1919 ई० में वर्साय पेरिस में हुए शाँति सम्मेलन में चीन को भारी निराशा हाथ लगी। शाँति सम्मेलन के निर्णयों के परिणामस्वरूप चीनी लोगों में राष्ट्रीय भावना जागृत हुई। इस सम्मेलन में मित्र राष्ट्र चीन में जापान के प्रभाव को कम करने में असफल रहे थे। इस कारण चीन के लोग जापान के विरुद्ध हो गए।

इस कारण 4 मई, 1919 ई० में 3000 से अधिक विद्यार्थियों तथा अध्यापकों ने पीकिंग (बीजिंग) के तियानमेन चौक में एक भारी प्रदर्शन किया। उन्होंने वर्साय में शातुंग पर दिए गए निर्णय की घोर आलोचना की। सरकार ने इस भीड़ पर नियंत्रण पाने के लिए बल प्रयोग से काम लिया। इतिहास में यह घटना ‘चार मई दिवस’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस घटना से चीनी लोगों में एक नई चेतना का संचार हुआ तथा 1949 ई० की क्रांति का मार्ग प्रशस्त हुआ।

प्रश्न 26.
1949 ई० की चीनी क्रांति के परिणामों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1949 ई० की चीनी क्रांति के प्रमुख परिणाम निम्नलिखित थे

(1) शक्तिशाली केंद्रीय सरकार-1949 ई० की क्राँति से चीन में एकता स्थापित हुई। केवल फारमोसा को छोड़ कर शेष सारा देश एक केंद्रीय सरकार के अधीन लाया गया। राजनीतिक एकता के साथ-साथ सारे देश में एक प्रकार का ही शासन स्थापित किया गया। अब चीन अयोग्य तथा भ्रष्ट शासन से मुक्त हो चुका था । चीन वासी अब अपने पर गर्व कर सकते थे। इस प्रकार माँचू शासन के अंत के पश्चात् प्रथम बार चीनी लोगों को शक्तिशाली केंद्रीय सरकार मिली।

(2) शाँति एवं सुरक्षा–साम्यवादी सरकार की स्थापना से चीन में काफी समय से व्याप्त अराजकता एवं अव्यवस्था का अंत हुआ तथा पूर्ण स्थायी शाँति की स्थापना हुई। साम्यवादियों ने अपनी कुशल पुलिस व्यवस्था तथा गुप्तचर व्यवस्था से क्राँति का विरोध करने वालों तथा समाज विरोधी तत्त्वों का अंत कर दिया। इससे स्थायी शाँति की स्थापना हुई तथा लोग अपने-आप को सुरक्षित अनुभव करने लगे।

(3) सामाजिक सुधार-साम्यवादी सरकार ने अनेकों सामाजिक सुधार भी किए। उन्होंने समाज में प्रचलित कई सामाजिक बुराइयों का अंत करके महान् कार्य किया। साम्यवादी सरकार ने चीन में अफ़ीम के प्रयोग पर पूर्ण रूप से रोक लगा दी। मदिरापान, वेश्यावृत्ति, जुआबाज़ी आदि के विरुद्ध भी कानून बनाए गए। सरकार ने स्त्रियों के उत्थान की ओर भी ध्यान दिया। उन्हें पुरुषों के समान अधिकार प्रदान किए गए। फलस्वरूप उन्हें सदियों पश्चात् चीनी समाज में सम्मानजनक स्थान प्राप्त हुआ।

(4) ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था पर प्रभाव-1949 ई० की चीनी क्राँति से वहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बहुत परिवर्तन आया। इस क्राँति से पूर्व छोटे किसानों की दशा बड़ी दयनीय थी। दिन भर की कड़ी मेहनत के पश्चात् भी उन्हें भर-पेट भोजन नसीब नहीं होता था। इसके विपरीत बड़े-बड़े ज़मींदार विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। 1949 ई० की क्रांति के पश्चात् भूमि का पुनर्विभाजन किया गया। बड़े ज़मींदारों से फालतू भूमि ले कर छोटे किसानों में बाँट दी गई। किसानों की दशा सुधारने के लिए सहकारी समितियाँ भी बनाई गईं।

प्रश्न 27.
माओ-त्सेतुंग के जीवन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग को आधुनिक चीन का निर्माता स्वीकार किया गया है। वह किसानों और श्रमिकों का प्रबल समर्थक था। साम्यवाद में उसका दृढ़ विश्वास था। माओ का जन्म 1893 ई० में हूनान प्रांत में स्थित शाओ-शां नामक गाँव में हुआ। उसके पिता का नाम माओ-जेने-शुंग था।माओ को वाशिंगटन, रूसो और नेपोलियन की जीवन गाथाओं ने बहुत प्रभावित किया था।

उसकी सहानुभूति किसानों के साथ थी और उसने उनके लिए काम करने का निश्चय किया। उसने अकाल से भूखी मर रही जनता पर शासकों द्वारा अत्याचार को देखा। 1917 ई० की रूसी क्रांति का युवा माओ पर गहरा प्रभाव पड़ा। वह उग्र क्रांतिकारी बन गया। उसने लाल सेना का गठन किया। 1930 ई० में वह किसानों और मजदूरों की सभा का सभापति बन गया और भूमिगत होकर काम करने लगा।

उसके सिर पर 25 लाख डालर का ईनाम था। उसने 1934 ई० में लाल सेना की सहायता से च्यांग-काई-शेक की विशाल सेना के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध आरंभ कर दिया। पाँचवें आक्रमण में उस पर इतना दबाव पड़ा कि उसने ‘महाप्रस्थान’ की योजना बनाई। माओ ने अपना संघर्ष जारी रखा। आखिर 1949 ई० में च्यांग-काई-शेक को चीन से भाग कर फारमोसा में शरण लेनी पड़ी। माओ-त्से-तुंग को चीन की सरकार का अध्यक्ष चुना गया। 1976 ई० में अपनी मृत्यु तक वह इसी पद पर बना रहा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 28.
लाँग मार्च पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
लाँग मार्च (लंबी यात्रा) चीन के इतिहास की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है। 1934 ई० में चियांग-काई-शेक जो कि साम्यवादियों को अपना कट्टर दुश्मन मानता था का विनाश करने के उद्देश्य से कियांग्सी का घेराव कर लिया। राष्ट्रवादी सेना के घेराव के कारण साम्यवादी एक गहन संकट में फंस गए। उन्हें घोर कष्टों को सहन करना पड़ा।

इस घोर संकट के समय में माओ-त्सेतुंग ने बहुत साहस से कार्य लिया। उसने अपने अधीन एक लाख लाल सेना एकत्रित की तथा वह चियांग-काई-शेक के घेराव को तोड़ते हुए लंबी यात्रा पर निकल पड़ा। यह यात्रा 16 अक्तूबर, 1934 ई० को आरंभ की गई थी। उसने शांग्सी तक का 6,000 मील का कठिन सफर तय किया। यह एक बहुत जोखिम भरी यात्रा थी।

रास्ते में उन्हें चियांग-काई-शेक की सेना का अनेक बार सामना करना पड़ा। उन्हें भूखे-प्यासे अनेक वनों, नदियों एवं कठिन पर्वतों को पार करना पड़ा। इनके चलते करीब 80 हज़ार माओ के सैनिक रास्ते में मृत्यु का ग्रास बन गए। 370 दिनों की लंबी यात्रा के पश्चात् 20 अक्तूबर, 1935 ई० को माओ-त्सेतुंग अपने 20 हजार सैनिकों के साथ शांग्सी पहुँचने में सफल हुआ। निस्संदेह विश्व इतिहास में इस घटना की कोई उदाहरण नहीं मिलती।

प्रश्न 29.
‘लंबी छलाँग वाला आंदोलन’ से क्या अभिप्राय है ? क्या यह सफल रहा ?
उत्तर:
चीन में लंबी छलाँग वाला आंदोलन 1958 ई० में चलाया गया। इसका उद्देश्य चीन में औद्योगीकरण की प्रक्रिया में तीव्रता लाना था। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए चीन में कम्यून्स की स्थापना की गई। इनके अपने खेत एवं कारखाने आदि होते थे। प्रत्येक कम्यून उत्पादन, वितरण एवं खपत आदि पर नज़र रखता था।

यद्यपि सरकार द्वारा लगातार इस आंदोलन की सफलता की घोषणा की गई किंतु वास्तविकता यह थी कि यह विफल रहा। लीऊ शाओछी एवं तंग शीयाओफींग नामक नेताओं ने कम्यून प्रथा को बदलने का प्रयास किया क्योंकि ये कुशलता से काम नहीं कर रही थीं। इसके अनेक कारण थे। प्रथम, इस आंदोलन को सफल बनाने के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था नहीं की गई थी। दूसरा, कम्यून्स द्वारा तैयार किया गया इस्पात निम्नकोटि का था। तीसरा, रूस से मतभेदों के चलते उसने चीन को आर्थिक सहायता देनी बंद कर दी थी। अतः 1959 ई० में इस आंदोलन को वापस ले लिया गया।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन चीन का सबसे महानतम इतिहासकार कौन था ?
उत्तर:
प्राचीन चीन का सबसे महानतम इतिहासकार सिमा छियन था।

प्रश्न 2.
नाइतो कोनन कौन था ?
उत्तर:
नाइतो कोनन चीनी इतिहास पर काम करने वाला एक प्रमुख जापानी विद्वान् था। उसने अपने काम में पश्चिमी इतिहास लेखन की नई तकनीकों एवं अपने पत्रकारिता के अनुभवों का प्रयोग किया। उसने 1907 ई० में क्योतो विश्वविद्यालय में प्राच्य अध्ययन का विभाग बनाने में सहायता की।

प्रश्न 3.
उगते हुए सूर्य का देश किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
उगते हुए सूर्य का देश जापान को कहा जाता है।

प्रश्न 4.
जापानी लोगों का मुख्य भोजन क्या है ?
उत्तर:
जापानी लोगों का मुख्य भोजन चावल एवं मछली है।

प्रश्न 5.2,228 Comments in moderation
चीन एवं जापान के कोई दो भौतिक अंतर बताएँ।
उत्तर:

  • चीन एक विशाल महाद्वीप है जबकि जापान एक छोटा द्वीप है।
  • चीन भूकंप क्षेत्र में नहीं आता जबकि जापान में अक्सर भूकंप आते रहते हैं।

प्रश्न 6.
शोगन कौन थे ?
उत्तर:
शोगुन जापान में सैद्धांतिक रूप से राजा के नाम पर शासन चलाते थे। वे दैम्यों पर, प्रमुख शहरों एवं खाद्यानों पर नियंत्रण रखते थे। कोई भी व्यक्ति शोगुन की अनुमति के बिना सम्राट से नहीं मिल सकता था। उनके अधीन बड़ी संख्या में सैनिक होते थे।

प्रश्न 7.
सामुराई कौन थे ?
उत्तर:
सामुराई जापान के यौद्धा वर्ग से संबंधित थे। वे शोगुन एवं दैम्यों को प्रशासन चलाने में महत्त्वपूर्ण योगदान देते थे। वे अपनी वफ़ादारी, वीरता एवं सख्त जीवन के लिए प्रसिद्ध थे।

प्रश्न 8.
दैम्यो कौन थे ?
उत्तर:
दैम्यो जापान में अपने अधीन क्षेत्र के मुखिया होते थे। वे अपने क्षेत्र में लगभग स्वतंत्र होते थे। उन्हें अपने अधीन क्षेत्र के लोगों को मृत्यु दंड देने का अधिकार था। वे सैनिक सेवा करते थे। वे लोक भलाई के कार्य भी करते थे।

प्रश्न 9.
16वीं एवं 17वीं शताब्दी में जापान को एक धनी देश क्यों समझा जाता था ?
उत्तर:
16वीं एवं 17वीं शताब्दी में जापान को एक धनी देश इसलिए समझा जाता था क्योंकि वह चीन से रेशम और भारत से कपड़े का आयात करता था। जापान इसका मूल्य सोने में चुकाता था। अत: जापान को एक धनी देश समझा जाता था।

प्रश्न 10.
जापान का कौन-सा रेशम दुनिया भर में बेहतरीन रेशम माना जाता था ?
उत्तर:
जापान का निशिजन रेशम दुनिया भर में बेहतरीन रेशम माना जाता था।

प्रश्न 11.
जापान में शोगुनों के पतन के लिए उत्तरदायी कोई दो महत्त्वपूर्ण कारण लिखें।
उत्तर:

  • शोगुनों की पक्षपातपूर्ण नीति।
  • किसानों की दयनीय स्थिति।

प्रश्न 12.
कॉमोडोर मैथ्यू पेरी कौन था ?
उत्तर:
कॉमोडोर मैथ्यू पेरी एक अमरीकी नाविक था। उसे अमरीकी सरकार ने 24 नवंबर, 1852 ई० को जापानी सरकार से बातचीत के लिए भेजा था। वह 3 जुलाई, 1853 ई० को जापान की बंदरगाह योकोहामा पहुँचने में सफल रहा। वह 1854 ई० में जापान सरकार के साथ एक संधि करने में सफल हुआ।

प्रश्न 13.
कॉमोडोर मैथ्यू पेरी की जापान के साथ 1854 ई० में हुई कानागावा संधि की कोई दो शर्ते लिखें।
उत्तर:

  • जापान की दो बंदरगाहों शीमोदा एवं हाकोदाटे को अमरीका के जहाजों के लिए खोल दिया गया।
  • शीमोदा में अमरीका के वाणिज्य दूत को रहने की अनुमति मिल गई।

प्रश्न 14.
मेज़ी पुनर्स्थापना से क्या भाव है ?
अथवा
मेज़ी पुनर्स्थापना से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1868 ई० में जापान में तोकुगावा वंश के शासन का अंत कर दिया गया एवं मुत्सुहितो जापान का नया सम्राट् बना। मुत्सुहितो ने मेज़ी नामक उपाधि को धारण किया। मेज़ी का अर्थ है प्रबुद्ध शासन। जापान के इतिहास में इस घटना को मेज़ी पुनर्स्थापना कहा जाता है।

प्रश्न 15.
मुत्सुहितो जापान का सम्राट् कब बना ? वह इस पद पर कब तक रहा ?
उत्तर:

  • मुत्सुहितो जापान का सम्राट् 1868 ई० में बना।
  • वह इस पद पर 1912 ई० तक रहा।

प्रश्न 16.
फुकोकु क्योहे से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जापान में मेज़ी काल में सरकार ने फुकोकु क्योहे का नारा दिया। इससे अभिप्राय था समृद्ध देश एवं मज़बूत सेना।

प्रश्न 17.
मेज़ी काल में शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कोई दो सुधार बताएँ।
उत्तर:

  • शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए एक अलग शिक्षा विभाग की स्थापना की गई।
  • प्राथमिक शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया।

प्रश्न 18.
मेजी काल के कोई दो सैनिक सुधार लिखें।
उत्तर:

  • सेना को अधिक शक्तिशाली बनाया गया।
  • 20 वर्ष से अधिक आयु वाले नौजवानों के लिए सेना में कार्य करना अनिवार्य कर दिया गया।

प्रश्न 19.
मेजी काल में अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण करने के उद्देश्य से कौन-से दो पग उठाए गए ?
उत्तर:

  • उद्योगों के विकास के लिए यूरोप से मशीनों का आयात किया गया।
  • मजदूरों के प्रशिक्षण के लिए विदेशी कारीगरों को बुलाया गया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

प्रश्न 20.
जायबात्सु से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जायबात्सु जापान की बड़ी व्यापारिक संस्थाएँ थीं। इन पर जापान के विशिष्ट परिवारों का नियंत्रण था। इनका प्रभुत्व दूसरे विश्व युद्ध के बाद तक अर्थव्यवस्था पर बना रहा।

प्रश्न 21.
मेज़ी संविधान को कब लागू किया गया था ? इसकी कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • मेज़ी संविधान को 1889 ई० में लागू किया गया था।
  • इसमें सम्राट् के अधिकारों की बढ़ौतरी की गई।
  • सम्राट् डायट के अधिवेशन को बुला सकता था एवं उसे भंग कर सकता था।

प्रश्न 22.
जापान की प्रथम रेलवे लाइन कब तथा कहाँ बिछाई गई थी ?
उत्तर:
जापान की प्रथम रेलवे लाइन 1870 ई. से 1872 ई० के मध्य तोक्यो एवं योकोहामा के मध्य बिछाई गई थी।

प्रश्न 23.
तनाका शोज़ो कौन था ?
उत्तर:
वह जापान की प्रथम संसद् जिसे डायट कहा जाता था का सदस्य था। उसने 1897 ई० में जापान में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ प्रथम आंदोलन आरंभ किया। उसका कथन था कि औद्योगिक प्रगति के लिए आम लोगों की बलि नहीं दी जानी चाहिए।

प्रश्न 24.
मेजी काल में जापानियों की रोजमर्रा जिंदगी में आए महत्त्वपूर्ण बदलाव क्या थे ?
उत्तर:

  • इस काल में एकल परिवार का प्रचलन बढ़ा।
  • त्पादों के लिए बिजली का प्रचलन बढ़ गया।
  • जापानी अब पश्चिमी वेशभूषा पहनने लगे।

प्रश्न 25.
फुकुजावा यूकिची कौन था ?
अथवा
फुकुजावा यूकिची के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
वह मेज़ी काल का एक प्रमुख बुद्धिजीवी था। उसने ‘ज्ञान के लिए प्रोत्साहन’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। उसने जापानी ज्ञान की कड़ी आलोचना की। उसका कथन था कि जापान को अपने में से एशिया को निकाल फेंकना चाहिए। इससे अभिप्राय था कि जापान को अपने एशियाई लक्षणों को छोड़ कर पश्चिमी लक्षणों को अपनाना चाहिए।

प्रश्न 26.
मियाके सेत्सुरे कौन था ?
उत्तर:
मियाके सेत्सुरे जापान का एक प्रसिद्ध दर्शनशास्त्री था। उसका कथन था कि विश्व सभ्यता के हित में प्रत्येक राष्ट्र को अपने विशेष हुनर का विकास करना चाहिए। अपने को अपने देश के लिए समर्पित करना अपने को विश्व को समर्पित करने के समान है।

प्रश्न 27.
उएकी एमोरी कौन था ?
उत्तर:
उएकी एमोरी जापान में जनवादी अधिकारों के आंदोलन का नेता था। वह चाहता था कि जापान सैन्यवाद की अपेक्षा लोकतंत्र पर बल दे। वह उदारवादी शिक्षा के पक्ष में था। उसका कथन था, “व्यवस्था से ज़्यादा कीमती चीज़ है, आज़ादी।” वह फ्रांसीसी क्रांति के मानवों के प्राकृतिक अधिकार एवं जन प्रभुसत्ता का प्रशंसक था।

प्रश्न 28.
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • रूस की कोरिया में दिलचस्पी।
  • कोरिया में तोंगहाक संप्रदाय द्वारा किया गया विद्रोह।

प्रश्न 29.
1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध का अंत किस संधि के साथ हुआ ? इस संधि की कोई दो धाराएँ लिखो।
उत्तर:

  • 1894-95 ई० के चीन-जापान युद्ध का अंत शिमोनोसेकी की संधि द्वारा हुआ।
  • चीन ने जापान को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता दे दी।
  • चीन ने माना कि वह युद्ध की क्षतिपूर्ति के रूप में जापान को 2 करोड़ तायल देगा।

प्रश्न 30.
1894-95 ई० के चीन-जापान यद्ध के कोई दो परिणाम लिखें।
उत्तर:

  • इसमें चीन को पराजय का सामना करना पड़ा।
  • इसमें जापान की विजय से उसके सम्मान में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 31.
रूस-जापान युद्ध कब हुआ ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • रूस-जापान युद्ध 1904-05 ई० में हुआ।
  • इसमें जापान विजयी रहा।

प्रश्न 32.
1904-05 ई० के रूस-जापान युद्ध के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • लियाओतुंग पर रूस ने कब्जा कर लिया था।
  • मँचूरिया पर रूस एवं जापान कब्जा करना चाहते थे।

प्रश्न 33.
पोर्टसमाउथ की संधि कब हुई ? इस संधि की कोई दो शर्ते लिखें।
उत्तर:

  • पोर्टसमाउथ की संधि 1905 ई० में हुई।
  • पोर्ट आर्थर एवं लियाओतुंग प्रायद्वीप जापान को मिल गए।
  • जापान को स्खालिन द्वीप का दक्षिण भाग प्राप्त हुआ।

प्रश्न 34.
1904-05 ई० के रूस-जापान युद्ध के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस युद्ध में पराजय के कारण रूस की प्रतिष्ठा को गहरा आघात लगा।
  • इस विजय से जापान को अन्य क्षेत्रों में विजय प्राप्त करने के लिए एक नया प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 35.
जापान में सैन्यवाद के उदय के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • जापान के सैन्यवादी बहुत महत्त्वाकांक्षी हो गए थे।
  • जापानी नवयुवक जापानी सैन्यवाद में विश्वास करते थे।

प्रश्न 36.
जापान में द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमरीका ने कब तथा किन दो शहरों पर एटम बम गिराये थे ?
उत्तर:
जापान में द्वितीय विश्व युद्ध के समय 1945 ई० में अमरीका ने जापान के दो शहरों हिरोशिमा एवं नागासाकी पर बम गिराए थे।

प्रश्न 37:
अमरीका ने जापान पर कब-से-कब तक कब्जा किया ? इस समय दौरान जापान पर किसने शासन किया ?
उत्तर:

  • अमरीका ने जापान पर 1945 ई० से 1952 ई० तक शासन किया।
  • इस समय के दौरान जापान पर जनरल दगलस मेकार्थर ने शासन किया।

प्रश्न 38.
जापान में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पहले चुनाव कब हुए ? इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता क्या थी ?
उत्तर:

  • जापान में द्वितीय विश्व-युद्ध के बाद पहले चुनाव 1947 ई० में हुए।
  • इसकी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें स्त्रियों को प्रथम बार मतदान करने का अधिकार दिया गया।

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प्रश्न 39.
अमरीका ने जापान में कौन-से चार महत्त्वपूर्ण सुधार किए ?
उत्तर:

  • उसने जापान में 1947 ई० में एक नया संविधान लागू किया।
  • उसने जापान में भारी उद्योगों को प्रोत्साहन दिया।
  • उसने जापान में आधुनिक शिक्षा को लागू किया।
  • उसने जापान का निरस्त्रीकरण किया।

प्रश्न 40.
जापान में कब तथा कहाँ प्रथम ओलंपिक खेलों का आयोजन किया गया था.?
उत्तर:
जापान में 1964 ई० में तोक्यो में प्रथम ओलंपिक खेलों का आयोजन किया गया था।

प्रश्न 41.
प्रथम अफ़ीम युद्ध कब एवं किनके मध्य हुआ ? इसमें कौन-विजयी रहा ?
उत्तर:

  • प्रथम अफ़ीम युद्ध 1839 ई० से 1842 ई० को इंग्लैंड एवं चीन के मध्य हुआ।
  • इसमें इंग्लैंड की विजय हुई।

प्रश्न 42.
प्रथम अफ़ीम युद्ध के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • चीनियों द्वारा यूरोपियों से किया जाने वाला घृणापूर्ण व्यवहार।
  • चीन के सम्राट् द्वारा कमिश्नर लिन की नियुक्ति।

प्रश्न 43.
प्रथम अफ़ीम युद्ध किस संधि के साथ समाप्त हुआ ? यह संधि कब हुई थी ?
उत्तर:

  • प्रथम अफ़ीम युद्ध नानकिंग की संधि के साथ समाप्त हुआ था।
  • यह संधि 1842 ई० को हुई थी।

प्रश्न 44.
नानकिंग की संधि की कोई दो शर्ते लिखें।
उत्तर:

  • हांगकांग का द्वीप ब्रिटेन को सौंपा गया।
  • ब्रिटेन के लिए पाँच चीनी बंदरगाहें व्यापार के लिए खोल दी गईं।

प्रश्न 45.
प्रथम अफ़ीम युद्ध के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस युद्ध में पराजय के कारण चीन के सम्मान को गहरा आघात लगा।
  • इससे चीन की आर्थिक समस्याएँ बढ़ गईं।

प्रश्न 46.
चीन में ताइपिंग विद्रोह कब हुआ ? इस विद्रोह का उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • चीन में ताइपिंग विद्रोह 1850-1864 ई० में हुआ था।
  • इसका उद्देश्य चीन में मिंग शासन की पुनः स्थापना करना था।

प्रश्न 47.
चीन एवं ब्रिटेन के मध्य द्वितीय अफ़ीम युद्ध कब हुआ ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • चीन एवं ब्रिटेन के मध्य द्वितीय अफ़ीम युद्ध 1856 ई० से 1860 ई० के मध्य लड़ा गया।
  • इसमें ब्रिटेन विजयी रहा।

प्रश्न 48.
चीन एवं ब्रिटेन के मध्य तीनस्तीन की संधि कब हुई ?
उत्तर:
चीन एवं ब्रिटेन के मध्य तीनस्तीन की संधि 1858 ई० में हुई।

प्रश्न 49.
रिवाइव चाइना सोसायटी की स्थापना कब तथा किसने की थी ?
उत्तर:
रिवाइव चाइना सोसायटी की स्थापना 1894 ई० में डॉक्टर सन-यात-सेन ने की थी।

प्रश्न 50.
रिवाइव चाइना सोसायटी के कोई दो प्रमुख उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • चीन से माँचू शासन का अंत करना।
  • चीनी समाज का पुनः निर्माण करना।

प्रश्न 51.
डॉक्टर सन-यात-सेन ने तुंग-मिंग-हुई की स्थापना कब की ? इसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • डॉक्टर सन-यात-सेन ने तुंग-मिंग-हुई की स्थापना 1905 ई० में की।
  • इसका उद्देश्य चीन में क्रांति करना था।

प्रश्न 52.
डॉक्टर सन-यात-सेन ने किन तीन सिद्धांतों का प्रचलन किया था ?
उत्तर:
डॉक्टर सन-यात-सेन ने राष्ट्रवाद, गणतंत्र एवं समाजवाद नामक तीन सिद्धांतों का प्रचलन किया।

प्रश्न 53.
1911 ई० की चीनी क्रांति के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • चीन में बढ़ती हुई समस्याएँ।
  • डॉक्टर सन-यात-सेन का योगदान।

प्रश्न 54.
1911 ई० की चीनी क्रांति के कोई दो परिणाम बताएँ ।
उत्तर:

  • इसने चीन में माँचू वंश का अंत कर दिया।
  • चीन में गणतंत्र की स्थापना हुई।

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प्रश्न 55.
चीन में माँचू वंश का अंत कब हुआ एवं गणतंत्र की स्थापना किसके नेतृत्व में की गई ?
उत्तर:

  • चीन में माँचू वंश का अंत 1917 ई० में हुआ।
  • चीन में गणतंत्र की स्थापना डॉक्टर सन-यात-सेन के नेतृत्व में हुई।

प्रश्न 56.
चीन में कुओमीनतांग की स्थापना किसने तथा कब की ?
उत्तर:
चीन में कुओमीनतांग की स्थापना डॉक्टर सन-यात-सेन ने 1912 ई० में की।

प्रश्न 57.
चीन में कुओमीनतांग दल के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • चीन में शाँति स्थापित करना।
  • चीनी सेना में कड़ा अनुशासन लागू करना।

प्रश्न 58.
4 मई आंदोलन कब तथा कहाँ हुआ था ?
उत्तर:
4 मई आंदोलन 1919 ई० में बीजिंग में हुआ था।

प्रश्न 59.
माओ-त्सेतुंग के जीवन पर संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग का जन्म 1893 ई० में चीन के हूनान प्रांत में स्थित शाओ-शां नामक गाँव में हुआ। उसने 1934-35 ई० में लाँग मार्च का नेतृत्व किया। माओ-त्सेतुंग ने नया लोकतंत्र नामक पुस्तक 1940 ई० में लिखी। उसके नेतृत्व में 1949 ई० की क्राँति हुई।

प्रश्न 60.
माओ-त्सेतुंग ने कौन-सी प्रसिद्ध पुस्तक तथा कब लिखी ?
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग ने नया लोकतंत्र नामक पुस्तक 1940 ई० में लिखी।

प्रश्न 61.
लाँग मार्च से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
साम्यवादियों द्वारा की गई नाकेबंदी के कारण माओ-त्सेतुंग ने 1934-35 ई० में लाँग मार्च का नेतृत्व किया। यह 6000 मील का लंबा सफर था। इस सफर के दौरान लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ा।

प्रश्न 62.
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार कब तथा किसके नेतृत्व में स्थापित हुई ?
उत्तर:
पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार 1949 ई० में माओ-त्सेतुंग के नेतृत्व में स्थापित हुई।

प्रश्न 63.
चीन में लंबी छलाँग की घोषणा कब की गई थी ? इसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • चीन में लंबी छलाँग की घोषणा 1958 ई० में की गई थी।
  • इसका उद्देश्य चीन के उद्योगों को प्रोत्साहन देना था।

प्रश्न 64.
महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्राँति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्राँति को चीन में माओ-त्सेतुंग द्वारा 1966 ई० में आरंभ किया गया था। इसका उद्देश्य चीन में प्राचीन संस्कृति को पुनः स्थापित करना एवं माओ-त्सेतुंग के विरोधियों के विरुद्ध अभियान छेड़ना था।

प्रश्न 65.
चीन में आधुनिकीकरण के लिए कब तथा किसने चार सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की ? ये चार सूत्र कौन-से थे ?
उत्तर:

  • चीन में आधुनिकीकरण के लिए 1978 ई० में तंग शीयाओफींग ने चार सूत्रीय कार्यक्रम की घोषणा की।
  • ये चार सूत्र थे-विज्ञान, उद्योग, कृषि एवं रक्षा।

प्रश्न 66.
चियांग-काई-शेक ने ताइवान की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कौन-से दो मुख्य सुधार किए ?
उत्तर:

  • उसने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए किसानों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की।
  • उसने उद्योगों के विकास पर बल दिया।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
प्राचीन चीन का सबसे महान् इतिहासकार किसे माना जाता है ?
उत्तर:
सिमा छियन को।

प्रश्न 2.
मैटियो रिक्की कौन थे ?
उत्तर:
चीन में एक जेसूइट पादरी।

प्रश्न 3.
नाइतो कोनन कौन थे ?
उत्तर:
एक प्रसिद्ध जापानी विद्वान्।

प्रश्न 4.
जापान का सबसे बड़ा द्वीप कौन-सा है ?
उत्तर:
होशू।

प्रश्न 5.
जापान की राजधानी तोक्यो को पहले किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
एदो।

प्रश्न 6.
जापान का प्रथम सम्राट् किसे माना जाता है ?
उत्तर:
जिम्मू।

प्रश्न 7.
उगते हुए सूर्य का देश किसे माना जाता है ?
उत्तर:
जापान को।

प्रश्न 8.
जापान की प्रसिद्ध मछली कौन-सी है ?
उत्तर:
साशिमी।

प्रश्न 9.
जापान में सम्राट् किस नाम से जाने जाते थे ?
उत्तर:
मिकाडो।

प्रश्न 10.
शोगुनों के उत्थान से पूर्व जापानी सम्राट् कहाँ से शासन करते थे ?
उत्तर:
क्योतो।

प्रश्न 11.
जापान में तोकुगावा कब सत्ता में आए ?
उत्तर:
1603 ई० में।

प्रश्न 12.
सामुराई कौन थे ?
उत्तर:
योद्धा वर्ग।

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प्रश्न 13.
17वीं शताब्दी के मध्य तक जापान में दुनिया में सबगे अधिक जनसंख्या वाला शहर कौन सा था।
उत्तर:
एदो।

प्रश्न 14.
16वीं शताब्दी में निशिजन किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
रेशम।

प्रश्न 15.
जापान में शोगुन पद का अं का हुआ ?
उत्तर:
1867 ई० में।

प्रश्न 16.
अमरीका का कॉमोडोर मैथ्यू पेरी जापान कब पहुँचा ?
उत्तर:
1853 ई० में।

प्रश्न 17.
जापान एवं अमरीका के मध्य कानागावा की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1854 ई० में।

प्रश्न 18.
मुत्सुहितो जापान का सम्राट् कब बना ?
उत्तर:
1868 ई० में।

प्रश्न 19.
मुत्सुहितो ने किसे जापान की राजधानी बनाया ?
उत्तर:
तोक्यो।

प्रश्न 20.
जापान में सामंती प्रथा के अंत की घोषणा कब की गई ?
उत्तर:
1871 ई० में।

प्रश्न 21.
जापान में तोक्यो विश्वविद्यालय की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1877 ई० में।

प्रश्न 22.
दि टेल ऑफ़ दि गेंजी का लेखक कौन था ?
उत्तर:
मुरासाकी शिकिबु।

प्रश्न 23.
फुकोकु क्योहे से क्या अभिप्राय था ?
उत्तर:
समूह देश एवं मज़बूत सेना।

प्रश्न 24.
जापान में विशिष्ट एवं धनी परिवार क्या कहलाते थे ?
उत्तर:
जायबात्सु।

प्रश्न 25.
1897 ई० में जापान में औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध किसने प्रथम जन आंदोलन का नेतृत्व किया था ?
उत्तर:
तनाका शोज़ो ने।

प्रश्न 26.
जापान में प्रथम आधुनिक हड़ताल कब हुई ?
उत्तर:
1886 ई० में।

प्रश्न 27.
जापान में प्रथम रेल लाइन कहाँ से कहाँ तक बिछाई गई ?
उत्तर:
तोक्यो एवं योकोहामा।

प्रश्न 28.
बैंक ऑफ़ जापान को कब खोला गया था ?
उत्तर:
1882 ई० में।

प्रश्न 29.
मेज़ी संविधान को कब लागू किया गया था ?
उत्तर:
1889 ई० में।

प्रश्न 30.
जापान में प्रथम रेडियो स्टेशन कब खुला ?
उत्तर:
1925 ई० में।

प्रश्न 31.
जापान में जनवादी अधिकारों के आंदोलन का नेता कौन था ?
उत्तर:
उएकी एमोरी।

प्रश्न 32.
‘एक गुड़िया का घर’ नामक प्रसिद्ध नाटक का लेखक कौन था ?
उत्तर:
इब्सन।

प्रश्न 33.
चीन-जापान युद्ध कब हुआ ?
उत्तर:
1894-95 ई० में।

प्रश्न 34.
चीन-जापान के मध्य शिमोनोसेकी की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1895 ई० में।

प्रश्न 35.
रूस एवं जापान के मध्य युद्ध कब हुआ ?
उत्तर:
1904-05 ई० में।

प्रश्न 36.
संयुक्त राज्य अमरीका ने जापान के किस शहर पर 6 अगस्त, 1945 ई० को प्रथम परमाणु बम गिराया ?
उत्तर:
हिरोशिमा पर।

प्रश्न 37.
जापान पर अमरीका का कब्जा कब से लेकर कब तक रहा ?
उत्तर:
1945 ई० से लेकर 1952 ई० तक।

प्रश्न 38.
तोक्यो में ओलंपिक खेलों का आयोजन कब किया गया ?
उत्तर:
1964 ई० में।

प्रश्न 39.
जापान में बुलेट ट्रेन को किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
शिंकासेन।

प्रश्न 40.
जापान में नागरिक समाज आंदोलन का विकास कब हुआ ?
उत्तर:
1960 के दशक में।

प्रश्न 41.
चीन में पीली नदीको किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
हवांग हो।

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प्रश्न 42.
चीन की सबसे बड़ी नदी कौन-सी है ?
उत्तर:
यांग्त्सी नदी।

प्रश्न 43.
चीन के सबसे प्रमुख जातीय समूह का नाम क्या है ?
उत्तर:
हान।

प्रश्न 44.
चीन का सबसे प्रसिद्ध खाना क्या कहलाता है ?
उत्तर:
डिम सम।

प्रश्न 45.
पहला अफ़ीम युद्ध कब हुआ ?
उत्तर:
1839-1842 ई०

प्रश्न 46.
पहला अफ़ीम युद्ध किनके मध्य हुआ ?
उत्तर:
इंग्लैंड एवं चीन।

प्रश्न 47.
नानकिंग की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1842 ई० में।

प्रश्न 48.
द्वितीय अफीम युद्ध कब हुआ ?
उत्तर:
1856-60 ई०।

प्रश्न 49.
तीनस्तीन की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1858 ई० में।

प्रश्न 50.
आधुनिक चीन का संस्थापक किसे माना जाता है ?
उत्तर:
डॉ० सन-यात-सेन को।

प्रश्न 51.
डॉ० सन-यात-सेन ने कितने सिद्धांतों का प्रचलन किया ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 52.
डॉ० सन-यात-सेन ने तुंग मिंग हुई की स्थापना कब की ?
उत्तर:
1905 ई० में।

प्रश्न 53.
सन-यात-सेन की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
1925 ई० में।

प्रश्न 54.
पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी ?
उत्तर:
1902 ई० में।

प्रश्न 55.
चीनी क्रांति कब हुई ?
उत्तर:
1911 ई० में।

प्रश्न 56.
चीन का प्रथम राष्ट्रपति कौन बना ?
उत्तर:
युआन-शी-काई।

प्रश्न 57.
चीन में कुओमीनतांग दल की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1921 ई० में।

प्रश्न 58.
4 मई, 1919 ई० का आंदोलन कहाँ आरंभ हुआ ?
उत्तर:
पीकिंग।

प्रश्न 59.
जापान ने चीन पर आक्रमण कब किया ?
उत्तर:
1 जुलाई, 1937 ई०।

प्रश्न 60.
चीन में लांग मार्च का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग।

प्रश्न 61.
‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1 अक्तूबर, 1919 ई०।

प्रश्न 62.
गणराज्यी चीन का प्रथम अध्यक्ष किसे नियुक्त किया गया ?
उत्तर:
माओ-त्सेतुंग को।

प्रश्न 63.
गणराज्यी चीन का प्रथम प्रधानमंत्री किसे नियुक्त किया गया ?
उत्तर:
चाऊ एनलाई को।

प्रश्न 64.
पीपुल्स बैंक ऑफ़ चाइना की स्थापना कब की गई ?
उत्तर:
1950 ई० में।

प्रश्न 65.
1958 ई० में चीन में कौन-सा आंदोलन चलाया गया ?
उत्तर:
लंबी छलाँग वाला आंदोलन।

प्रश्न 66.
तंग शीयाओफींग चीन में कब सत्ता में आया ?
उत्तर:
1976 ई० में।

प्रश्न 67.
चीन में चार आधुनिकीकरणों की घोषणा कब की गई थी ?
उत्तर:
1978 ई० में।

प्रश्न 68.
ताइवान को पहले किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
फारमोसा।

प्रश्न 69.
ताइवान की राजधानी किसे घोषित किया गया ?
उत्तर:
ताइपेइ को।

प्रश्न 70.
चियांग-काई-शेक की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
1975 ई० में।

प्रश्न 71.
ताइवान में मार्शल लॉ के अंत की घोषणा कब की गई ?
उत्तर:
1987 ई० में।

रिक्त स्थान भरिए

1. 1603 ई० में जापान में ……………… वंश की स्थापना हुई।
उत्तर:
तोकुगावा

2. मेजी पुनर्स्थापना ……………….. ई० में हुई।
उत्तर:
1868

3. ……………….. ई० में शिक्षा ग्रहण करना अनिवार्य किया गया।
उत्तर:
1870

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4. जापान की पहली रेल लाइन ……………….. ई० में बिछाई गई।
उत्तर:
1870

5. जापान में ……………….. ई० में आधुनिक बैंकिंग संस्थाओं का प्रारंभ हुआ था।
उत्तर:
1872

6. जापान में सर्वप्रथम महिलाओं द्वारा आधुनिक हड़तालों का आयोजन ……………….. ई० में हुआ था।
उत्तर:
1886

7. जापान में औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध पहला आंदोलन ………………. ई० में आरंभ किया गया।
उत्तर:
1897

8. जापान में औद्योगिक प्रदूषण के खिलाफ़ प्रथम आंदोलन …………… द्वारा आरंभ किया गया।
उत्तर:
तनाको शोज़ो

9. ‘ज्ञान के लिए प्रोत्साहन’ नामक पुस्तक की रचना जापान के महान् बुद्धिजीवी ……………… द्वारा की गई __ थी।
उत्तर:
फुकुज़ावा यूकिची

10. ‘एक गुड़िया का घर’ नामक नाटक की रचना ……………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
इबसन

11. जापान में प्रथम बार ……………….. ई० में चुनाव हुए। .
उत्तर:
1946

12. जापान में ……………….. ई० में बुलेट ट्रेन चलाई गई।
उत्तर:
1964

13. जापान में प्रथम अफ़ीम युद्ध ……………….. ई० में हुआ।
उत्तर:
1839

14. दूसरा अफ़ीम युद्ध ……………… ई० में हुआ।
उत्तर:
1856

15. मांचू साम्राज्य का अंत ………………. ई० में किया गया।
उत्तर:
1911

16. आधुनिक चीन का संस्थापक ………………. को माना जाता है।
उत्तर:
सन-यात-सेन

17. कुओमिनतांग का नेता ……………….. था।
उत्तर:
चियांग काइशेक

18. पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना ……………….. ई० में की गई।
उत्तर:
1902

19. 1945 ई० में ……………….. तथा ……………….. पर बम फेंके गए।
उत्तर:
नागासाकी, हिरोशिमा

20. चीन में साम्यवादी की स्थापना ……………… ई० में हुई।
उत्तर:
1921

21. ……………… ई० में चीनी साम्यवादी पार्टी ने गृहयुद्ध में विजय प्राप्त की।
उत्तर:
1949

22. जापान व आंग्ल अमेरिका में ……………….. ई० में भयंकर युद्ध हुआ।
उत्तर:
1945

23. जापान का आधुनिकीकरण का सफर ……………… के सिद्धान्तों पर आधारित था।
उत्तर:
पूँजीवाद

24. ……………….. को प्राचीन चीन का महानतम इतिहासकार माना जाता है।
उत्तर:
सिमा छियन

25. 1907 ई० में जापान में क्योतो विश्वविद्यालय में प्राच्य अध्ययन का विभाग बनाने में ……………….. ने सर्वाधिक सहायता की।
उत्तर:
नाइतो कोनन

26. जापान द्वारा चीन से ……………… का आयात किया जाता था
उत्तर:
रेशम

27. जापान द्वारा भारत से ……………….. का आयात किया जाता था।
उत्तर:
कपड़ा

28. ……………… ई० में विदेशी व्यापार होना आरंभ हुआ था।
उत्तर:
1859

29. ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ की सरकार ……………….. में कायम हुई।
उत्तर:
1949 ई०

30. चीन की पोट्सडैम उद्घोषणा ………….. ई० में की गई।
उत्तर:
1949

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. ‘नाइतो कोनन’ किस देश के रहने वाले थे ?
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) कनाडा
(घ) ऑस्ट्रेलिया।
उत्तर:
(ख) जापान

2. निम्नलिखित में से कौन-सा द्वीप जापान का सबसे बड़ा द्वीप है ?
(क) होंशू
(ख) क्यूशू
(ग) शिकोकू
(घ) होकाइदो।
उत्तर:
(क) होंशू

3. ‘उगते हुए सूर्य का देश’ किसे कहा जाता है ?
(क) इंडोनेशिया
(ख) जापान
(ग) कनाडा
(घ) इंग्लैंड।
उत्तर:
(ख) जापान

4. कुमे कुनीताके किस देश के रहने वाले थे ?
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) इंग्लैंड
(घ) फ्राँस।
उत्तर:
(ख) जापान

5. एदो किस शहर का पुराना नाम है ?
(क) पेरिस
(ख) टोकियो
(ग) सिडनी
(घ) लंदन।
उत्तर:
(ख) टोकियो

6. जापान में शोगुनों ने सत्ता को कब हथिया लिया था ?
(क) 1192 ई०
(ख) 1503 ई०
(ग) 1603 ई०
(घ) 1867 ई०।
उत्तर:
(क) 1192 ई०

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7. जापान में तोकगावा कब से लेकर कब तक सत्ता में रहे ?
(क) 1192 ई० से 1203 ई० तक
(ख) 1203 ई० से 1603 ई० तक
(ग) 1603 ई० से 1867 ई० तक
(घ) 1867 ई० से 1971 ई० तक।
उत्तर:
(ग) 1603 ई० से 1867 ई० तक

8. तोकुगावा शासनकाल में जापान की राजधानी कौन-सी थी ?
(क) ओसाका
(ख) एदो
(ग) क्योतो
(घ) तोक्यो।
उत्तर:
(ख) एदो

9. कॉमोडोर मैथ्यू पेरी जापान कब पहुँचा ?
(क) 1851 ई० में
(ख) 1852 ई० में
(ग) 1853 ई० में
(घ) 1854 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1853 ई० में

10. जापान में मेज़ी पुनस्र्थापना कब हुई ?
(क) 1853 ई० में
(ख) 1854 ई० में
(ग) 1868 ई० में
(घ) 1878 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1868 ई० में

11. जापान में मुत्सुहितो का शासनकाल क्या था ?
(क) 1192 ई० से 1603 ई० तक
(ख) 1603 ई० से 1867 ई० तक
(ग) 1868 ई० से 1902 ई० तक
(घ) 1868 ई० से 1912 ई० तक।
उत्तर:
(घ) 1868 ई० से 1912 ई० तक।

12. मेज़ी शासनकाल में किसे जापान की राजधानी घोषित किया गया ?
(क) एदो
(ख) तोक्यो
(ग) नागासाकी
(घ) क्योतो।
उत्तर:
(ख) तोक्यो

13. जापान में तोक्यो विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 1871 ई० में
(ख) 1875 ई० में
(ग) 1877 ई० में
(घ) 1901 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1877 ई० में

14. जापान में सैनिक सेवा को कब अनिवार्य बनाया गया था ? ।
(क) 1872 ई० में
(ख) 1876 ई० में
(ग) 1877 ई० में
(घ) 1879 ई० में।
उत्तर:
(क) 1872 ई० में

15. जापान में किसने औद्योगिक प्रदूषण के विरुद्ध प्रथम जन आंदोलन का नेतृत्व किया ?
(क) मुत्सुहितो
(ख) कुमो कुनीताके
(ग) तनाका शोज़ो
(घ) नाइतो कोनन।
उत्तर:
(ग) तनाका शोज़ो

16. जापान की पहली रेल लाइन कब बिछाई गई थी ?
(क) 1707-09
(ख) 1763-65
(ग) 1830-32
(घ) 1870-72
उत्तर:
(घ) 1870-72

17. बैंक ऑफ़ जापान की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1872 ई० में
(ख) 1875 ई० में
(ग) 1879 ई० में
(घ) 1882 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1882 ई० में।

18. मेज़ी संविधान कब लागू किया गया था ?
(क) 1869 ई० में
(ख) 1879 ई० में
(ग) 1889 ई० में
(घ) 1892 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1889 ई० में

19. फुकुज़ावा यूकिची कौन था ?
(क) जापान का एक बुद्धिजीवी
(ख) चीन का एक बुद्धिजीवी
(ग) जापान का एक दर्शनशास्त्री
(घ) जापान का एक अधिकारी।
उत्तर:
(क) जापान का एक बुद्धिजीवी

20. जापान में पहला रेडियो स्टेशन कब खुला ?
(क) 1855 ई० में
(ख) 1885 ई० में
(ग) 1915 ई० में
(घ) 1925 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1925 ई० में।

21. चीन-जापान युद्ध कब आरंभ हुआ ?
(क) 1892 ई० में
(ख) 1893 ई० में
(ग) 1894 ई० में
(घ) 1895 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1894 ई० में

22. 1894-95 ई० का चीन-जापान युद्ध किस संधि के साथ समाप्त हुआ ?
(क) शिमनोसेकी की संधि
(ख) नानकिंग की संधि
(ग) बोग की संधि
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) शिमनोसेकी की संधि

23. रूस-जापान युद्ध कब हुआ था ?
(क) 1905 ई० में
(ख) 1907 ई० में
(ग) 1909 ई० में
(घ) 1911 ई० में।
उत्तर:
(क) 1905 ई० में

24. जापान में ‘बुलेट ट्रेन’ की शुरुआत कब हुई ?
(क) 1954 ई० में
(ख) 1964 ई० में
(ग) 1974 ई० में
(घ) 1984 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1964 ई० में

25. संयुक्त राज्य अमरीका ने 6 अगस्त, 1945 ई० को जापान के किस शहर पर परमाणु बम फेंका ?
(क) नागासाकी
(ख) हिरोशिमा
(ग) तोक्यो
(घ) ओसाका।
उत्तर:
(ख) हिरोशिमा

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

26. तोक्यो में ओलंपिक खेलों का आयोजन कब किया गया था ?
(क) 1960 ई० में
(ख) 1962 ई० में
(ग) 1964 ई० में
(घ) 1965 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1964 ई० में

27. निम्नलिखित में से किस नदी को चीन का दुःख कहा जाता है ?
(क) पर्ल नदी को
(ख) पीली नदी को
(ग) यांगत्सी नदी को
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) पीली नदी को

28. प्रथम अफ़ीम युद्ध किनके मध्य हुआ ?
(क) चीन एवं जापान
(ख) इंग्लैंड एवं जापान
(ग) जापान एवं रूस
(घ) चीन एवं फ्राँस।
उत्तर:
(ख) इंग्लैंड एवं जापान

29. प्रथम अफ़ीम युद्ध कब लड़ा गया था ?
(क) 1803-05 ई० में
(ख) 1839-42 ई० में
(ग) 1856-59 ई० में
(घ) 1876-79 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1839-42 ई० में

30. नानकिंग की संधि कब हुई ?
(क) 1839 ई० में
(ख) 1842 ई० में
(ग) 1845 ई० में
(घ) 1849 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1842 ई० में

31. द्वितीय अफ़ीम युद्ध कब आरंभ हुआ ?
(क) 1854 ई० में
(ख) 1855 ई० में
(ग) 1856 ई० में
(घ) 1860 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1856 ई० में

32. 1858 ई० को चीन एवं इंग्लैंड के मध्य कौन-सी संधि हुई ?
(क) तीनस्तीन की संधि
(ख) बोग की संधि
(ग) नानकिंग की संधि
(घ) पीकिंग की संधि ।
उत्तर:
(क) तीनस्तीन की संधि

33. बॉक्सर विद्रोह किस देश में हुआ ?
(क) जापान में
(ख) चीन में
(ग) फ्रांस में
(घ) इंग्लैंड में।
उत्तर:
(ख) चीन में

34. चीन में बॉक्सर विद्रोह कब हुआ था ?
(क) 1890 ई० में
(ख) 1895 ई० में
(ग) 1900 ई० में
(घ) 1910 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1900 ई० में

35. ‘सौ दिन के सुधार’ का संबंध किस देश से है ?
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) अमरीका
(घ) भारत।
उत्तर:
(क) चीन

36. तुंग-मिंग-हुई की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1902 ई० में
(ख) 1905 ई० में
(ग) 1907 ई० में
(घ) 1911 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1905 ई० में

37. सन-यात-सेन ने कितने सिद्धांतों का प्रचलन किया था ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

38. 1911 ई० की चीनी क्रांति का नेता कौन था?
(क) लियांग किचाऊ
(ख) कंफ्यूशियस
(ग) युआन-शि-काई
(घ) डॉ० सन-यात-सेन।
उत्तर:
(घ) डॉ० सन-यात-सेन।

39. चीन में माँच वंश का अंत कब हुआ ?
(क) 1905 ई० में
(ख) 1909 ई० में
(ग) 1911 ई० में
(घ) 1912 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1911 ई० में

40. आधुनिक चीन का संस्थापक किसे माना जाता है ?
(क) कांग यूवेई
(ख) लियांग किचाउ
(ग) सन-यात-सेन
(घ) चियांग-काई-शेक ।
उत्तर:
(ग) सन-यात-सेन

41. पीकिंग विश्वविद्यालय की स्थापना कब हुई थी?
(क) 1892 ई० में
(ख) 1902 ई० में
(ग) 1906 ई० में
(घ) 1920 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1902 ई० में

42. चीन का प्रथम राष्ट्रपति कौन बना ?
(क) सन-यात-सेन
(ख) माओ-त्सेतुंग
(ग) युआन-शि-काई
(घ) शाओ तोआफ़ेन !
उत्तर:
(ग) युआन-शि-काई

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 11 आधुनिकीकरण के रास्ते

43. चीन में कुओमीनतांग दल की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1911 ई० में
(ख) 1912 ई० में
(ग) 1921 ई० में
(घ) 1922 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1912 ई० में

44. चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1912 ई० में
(ख) 1920 ई० में
(ग) 1921 ई० में
(घ) 1931 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1921 ई० में

45. पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार का गठन कब हुआ ?
(क) 1911 ई० में
(ख) 1945 ई० में
(ग) 1949 ई० में
(घ) 1951 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1949 ई० में

46. चीन में लाँग मार्च कब आरंभ हुआ था ?
(क) 1911 ई० में
(ख) 1924 ई० में
(ग) 1934 ई० में
(घ) 1935 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1934 ई० में

47. माओ-त्सेतुंग ने चीन में नया संविधान कब लागू किया ?
(क) 1949 ई० में
(ख) 1950 ई० में
(ग) 1951 ई० में
(घ) 1954 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1954 ई० में।

48. चीन में लंबी छलाँग वाला आंदोलन कब चलाया गया ?
(क) 1954 ई० में
(ख) 1956 ई० में
(ग) 1958 ई० में
(घ) 1962 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1958 ई० में

49. निम्नलिखित में से किस नेता ने नया लोकतंत्र नामक पुस्तक की रचना की ?
(क) माओ-त्सेतुंग
(ख) चियांग-काई-शेक
(ग) कुमे कुनीताके
(घ) मैटियो रिक्की।
उत्तर:
(क) माओ-त्सेतुंग

50. चीन में महान् सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति का आरंभ कब हुआ ?
(क) 1958 ई० में
(ख) 1962 ई० में
(ग) 1965 ई० में
(घ) 1966 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1966 ई० में।

51. चीन में चार आधुनिकीकरणों की घोषणा कब की गई?
(क) 1968 ई० में
(ख) 1976 ई० में
(ग) 1978 ई० में
(घ) 1928 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1978 ई० में

52. ताइवान का पहला नाम क्या था ?
(क) फारमोसा
(ख) नानकिंग
(ग) शीमोदा
(घ) हाकोदारे।
उत्तर:
(क) फारमोसा

आधुनिकीकरण के रास्ते HBSE 11th Class History Notes

→ 19वीं शताब्दी में दूर पूर्व एशिया के दो देशों जापान एवं चीन ने आधुनिकीकरण के रास्ते को अपनाया। निस्संदेह दोनों देशों के लिए एक नए युग का सूत्रपात था। जापान प्रशांत महासागर में स्थित कई द्वीपों का समूह है। इसमें चार बड़े द्वीप हैं।

→ इनके नाम हैं-होंशू, क्यूशू, शिकोकू एवं होकाइदो। इनमें होंशू सबसे बड़ा है और जापान के केंद्र में है। जापान की 50 प्रतिशत से कुछ अधिक ज़मीन पहाड़ी है। जापान की केवल 17 प्रतिशत भूमि पर ही खेती होती है।

→ जापान के पहाड़ों में अक्सर ज्वालामुखी फूटते रहते हैं। अतः जापान में भूकंप बहुत विनाश करते हैं। प्राचीन काल में जापानी सभ्यता चीनी सभ्यता से बहुत प्रभावित थी। जापान की अधिकाँश जनसंख्या जापानी है।

→ इसके अतिरिक्त यहाँ आयनू और कोरिया के कुछ लोग भी रहते हैं। जापान के लोगों का मुख्य भोजन चावल एवं मछली है। जापान की साशिमी अथवा सूशी नामक मछली दुनिया भर में प्रसिद्ध है। जापान में 1603 ई० से लेकर 1867 ई० तक तोकुगावा परिवार का शासन था। इस परिवार के लोग शोगुन पद पर कायम थे।

→ शोगुन दैम्यो, प्रमुख शहरों एवं खदानों पर नियंत्रण रखते थे। 1853 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका का नाविक कॉमोडोर मैथ्यू पेरी जापान की बंदरगाह योकोहामा पहुँचने में सफल हुआ। 1854 ई० में उसने जापान। सरकार के साथ कानागावा नामक संधि की। इसे जापान का खलना कहा जाता है।

→ इस संधि के पश्चात जापान के दरवाजे पश्चिमी देशों के लिए खुल गए एवं जापान ने आधुनिकीकरण के रास्ते को अपनाया। जापान में सम्राट मत्सहितो ने 1868 ई० से 1912 ई० तक शासन किया। उसने मेज़ी की उपाधि धारण की थी। इसलिए इस काल को मेज़ी पुनर्स्थापना कहते हैं।

→ मेज़ी शासनकाल में जापान में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय सुधार किए गए एवं उसकी स्थिति सुदृढ़ हुई। जापान ने 1894-95 ई० में चीन को पराजित कर एवं 1904-05 ई० में रूस को पराजित कर विश्व को चकित कर दिया था।

→ उसने 1910 ई० में कोरिया जो उसके लिए सामरिक महत्त्व का था को भी अपने अधीन कर लिया। जापान में सैन्यवाद के कारण वहाँ सेना बहुत शक्तिशाली हो गई थी। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान ने प्रमुख भूमिका निभाई। उसने अनेक सफलताएँ अर्जित की थीं।

→ 1945 ई० में अमरीका द्वारा हिरोशिमा एवं नागासाकी में गिराए गए दो एटम बमों के कारण उसे पराजय को स्वीकार करना पड़ा था। इस कारण जापान पर अमरीका का कब्जा हो गया था। यह कब्जा 1945 ई० से 1952 ई० तक रहा।

→ अमरीका के जापान से हटने के बाद उसने पुनः अपने गौरव को स्थापित किया। उसने अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। वह 1956 ई० में संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना। उसने 1964 ई० में अपनी राजधानी तोक्यो में ओलंपिक खेलों का आयोजन किया।

→ दूसरी ओर चीन पूर्वी एशिया का एक अत्यंत प्राचीन एवं विशाल देश है। इस विशाल क्षेत्र में अनेक नदियाँ एवं पर्वत हैं। चीन की तीन नदियाँ-पीली नदी, यांग्त्सी नदी एवं पर्ल नदी ने चीनी सभ्यता के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

→ ये नदियाँ यातायात, सिंचाई एवं उर्वरता का प्रमुख साधन हैं। यहाँ लोहे, कोयले एवं ताँबे की प्रचुरता है। यहाँ अनेक जातीय समूह रहते हैं। हान यहाँ का प्रमुख जातीय समूह है। यहाँ की प्रमुख भाषा चीनी है। चीन का सबसे स्वादिष्ट भोजन डिम-सम है। चीनी चावल एवं गेहूँ का खूब प्रयोग करते हैं।

→ चीन शताब्दियों तक विदेशियों के लिए बंद रहा। 1839–42 ई० में ब्रिटेन ने चीन को प्रथम अफ़ीम युद्ध में पराजित कर उसके दरवाज़े पश्चिमी देशों के लिए खोल दिए। चीन आरंभ में जापान की तरह आधुनिकीकरण के रास्ते को सुगमता से अपनाने को तैयार नहीं था।

→ 1856-60 ई० में ब्रिटेन ने चीन को दूसरे अफ़ीम युद्ध में पुनः पराजित किया। इससे चीन की आंतरिक कमजोरी का भेद विश्व के अन्य देशों को पता चल गया। अतः विश्व के अन्य देशों जैसे संयुक्त राज्य अमरीका, फ्राँस, रूस, जापान आदि ने चीन के अनेक प्रदेशों को अपने अधीन कर लिया।

→ इससे चीन की अखंडता के लिए एक भारी ख़तरा उत्पन्न हो गया। चीन में बढ़ते हुए विदेशी प्रभाव एवं अन्य समस्याओं के चलते 1911 ई० में चीनी क्रांति का विस्फोट हो गया। इस क्राँति के कारण चीन में माँचू वंश का अंत हुआ।

→ इस क्राँति में डॉक्टर सन-यात-सेन ने उल्लेखनीय योगदान दिया। चीन में डॉक्टर सन-यात-सेन के नेतृत्व में 1912 ई० में गणतंत्र की स्थापना हुई। 1925 ई० में डॉक्टर सन-यात-सेन की मृत्यु के पश्चात् चीन में पुनः संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई। इस समय चीन में माओ-त्सेतुंग ने नेतृत्व किया।

→ उसने चीनी लोगों को एकत्र करने में प्रशंसनीय योगदान दिया। उसके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप चीन में 1949 ई० में पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना की सरकार अस्तित्व में आई। निस्संदेह यह चीन के इतिहास में एक नए युग का संदेश था।

→ माओ त्सेतुंग जिसे 1949 ई० में चीन का अध्यक्ष बनाया गया था ने 1976 ई० में अपनी मृत्यु तक उल्लेखनीय सुधार किए। परिणामस्वरूप वह चीनी समाज को एक नई दिशा देने में सफल रहा।

→ चियांग-काई-शेक ने 1949 ई० में माओ-त्सेतुंग से पराजित होने के पश्चात् ताइवान (फारमोसा) में चीनी गणतंत्र की स्थापना कर ली थी। वह स्वयं ताइवान का राष्ट्रपति बन गया। उसने बहुत सख्ती से शासन किया एवं मार्शल लॉ को लागू किया। उसने अपने सभी विरोधियों को कठोर दंड दिए।

→ उसने ताइवान की अर्थव्यवस्था को पटड़ी पर लाने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय कदम उठाए। वह इस उद्देश्य में काफी सीमा तक सफल रहा। 1975 ई० में चियांग-काई-शेक की मृत्यु हो गई। उसके पश्चात् चीन की राजनीति में अनेक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। चीन एवं ताइवान का एकीकरण आज भी एक गंभीर मुद्दा बना हुआ है।

→ चीन एवं जापान में इतिहास लिखने की एक लंबी परंपरा रही है। इसका कारण यह था कि इसे शासकों के लिए महत्त्वपूर्ण माना जाता था। इसलिए इन देशों के शासकों ने अभिलेखों की देख-रेख एवं राजवंशों का इतिहास लिखने के लिए सरकारी विभागों की स्थापना की।

→ इन्हें सभी प्रकार की सहायता प्रदान की गई। सिमा छियन (Sima Qian) को प्राचीन चीन का सबसे महान् इतिहासकार माना जाता है। आधुनिक इतिहासकारों में चीन के लिआंग छिचाओ (Liang Qichao) एवं जापान के कुमे कुनीताके (Kume Kunitake) के नाम उल्लेखनीय हैं।

→ इटली के यात्री मार्को पोलो (Marco Polo) एवं जैसूइट पादरी मैटियो रिक्की (Mateo Ricci) ने चीन के तथा लुई फ़रॉय ने जापान के इतिहास पर काफी प्रकाश डाला है।

→ चीनी सभ्यता में विज्ञान के इतिहास पर जोजफ नीडहम (Joseph Needham) ने एवं जापानी इतिहास एवं संस्कृति पर जॉर्ज सैन्सम (George Sansom) ने उल्लेखनीय कार्य किया है।

→ नाइतो कोनन (Naito Konan) एक प्रसिद्ध जापानी विद्वान् थे। उन्होंने चीनी इतिहास पर काफी कार्य किया। उन्होंने अपने कार्य में पश्चिमी इतिहास लेखन की नयी तकनीकों तथा पत्रकारिता के अपने अनुभवों का काफी प्रयोग किया है। उन्होंने 1907 ई० में क्योतो विश्वविद्यालय (Kyoto University) में प्राच्य अध्ययन का विभाग (Department of Oriental Studies) को स्थापित किया।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तरी अमरीका की भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन करते हुए मूल निवासियों के जीवन की विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
I. भौगोलिक विशेषताएँ
उत्तरी अमरीका का महाद्वीप उत्तर ध्रुवीय (Arctic Circle) से लेकर कर्क रेखा (Tropic of Cancer) तक एवं प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) से लेकर अटलांटिक महासागर (Atlantic Ocean) तक फैला हुआ है। इसके पश्चिमी क्षेत्र में अरिज़ोना (Arizona) एवं नेवाडा (Nevada) के मरुस्थल (desert) हैं। यहाँ ही सिएरा नेवाडा (Sierra Nevada) पर्वत स्थित है।

पूर्व में विशाल मैदान, झीलें एवं मिसीसिपी (Mississippi), ओहियो (Ohio). तथा अप्पालाचियाँ (Appalachian) पर्वतों की घाटियाँ (valleys) स्थित हैं। इसके दक्षिण में मैक्सिको स्थित है। कनाडा के 40 प्रतिशत प्रदेश में वन हैं। उत्तरी अमरीका के अनेक क्षेत्र तेल, गैस एवं विभिन्न प्रकार के खनिजों से भरपूर हैं। यहाँ की प्रमुख फ़सलें गेहूँ, मकई एवं फल हैं। यहाँ का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्योग मछली उद्योग है।

II. मूल निवासी
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों एवं उनकी जीवन-शैली की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं

1. मानव का आगमन:
ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि उत्तरी अमरीका के सबसे प्रथम निवासी 30,000 वर्ष पूर्व एशिया से बेरिंग स्ट्रेट्स (Bering Straits) के रास्ते से आए। लगभग 10,000 वर्ष पूर्व वे दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। उत्तरी अमरीका में हमें जो सबसे प्राचीन मानवकृति (artefact) मिली है वह 11,000 वर्ष पुरानी है। यह एक तीर की नोक (an arrow point) थी। उत्तरी अमरीका में लगभग 5,000 वर्ष पूर्व जलवायु में स्थिरता आई। इसके परिणामस्वरूप यहाँ की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।

2. जीवन-शैली:
(1) रहन-सहन एवं भोजन (Living and Diet): यूरोपवासियों के आगमन से पूर्व उत्तरी अमरीका के मूल निवासी नदी घाटी (river valley) के साथ-साथ गाँवों में समूह (group) बनाकर रहते थे। वे मकई तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते थे। वे मछली एवं माँस का अधिक प्रयोग करते थे। वे प्रायः माँस की तलाश में लंबी यात्राएँ करते थे। उन्हें मुख्य रूप से जंगली भैंसों जिन्हें बाइसन (bison) कहते थे की तलाश रहती थी। परंतु वे उतने ही जानवरों को मारते थे जितने की उन्हें भोजन के लिए आवश्यकता होती थी।

(2) अर्थव्यवस्था:
उत्तरी अमरीका की अर्थव्यवस्था मुख्यतः एक जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था (subsistence economy) थी। वहाँ के मूल निवासी केवल उतना ही उत्पादन करते थे जो कि उनके निर्वाह के लिए आवश्यक होता था। इस कारण खेती से किसी प्रकार का अधिशेष (surplus) नहीं बचता था। इसके चलते वे केंद्रीय एवं दक्षिणी अमरीका की तरह किसी साम्राज्य की स्थापना करने में विफल रहे। उन्हें जमीन पर व्यक्तिगत मलकियत (ownership) की कोई चिंता नहीं थी क्योंकि वे उससे प्राप्त होने वाले भोजन एवं आश्रय से संतुष्ट थे। इसलिए भूमि को लेकर कबीलों में बहुत कम झगड़े होते थे।

(3) उपहारों का आदान-प्रदान:
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों की यह परंपरा थी कि वे आपस में मिलजुल कर रहते थे एवं उनके संबंध मैत्रीपूर्ण होते थे। वे आपस में बस्तुओं को खरीदते एवं बेचते नहीं थे अपितु उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। कबीलों में आपसी समझौता होने पर वे एक विशेष प्रकार की वेमपुम बेल्ट (Wampum belt) का आदान-प्रदान (exchange) करते थे। यह बेल्ट रंगीन सीपियों (coloured shells) को आपस में सिलकर तैयार की जाती थी।

(4) भाषा एवं ज्ञान:
उत्तरी अमरीका के मूल निवासी अनेक भाषाएँ बोलते थे यद्यपि वे लिखी नहीं जाती थीं। उन्हें अनेक बातों का ज्ञान था। वे जानते थे कि समय की गति चक्रिय है (Time moved in cycles)। वे जलवायु एवं प्रकृति को पढ़े-लिखे लोगों की तरह समझते थे। प्रत्येक कबीले के पास अपने इतिहास के बारे में पूरी जानकारी होती थी। यह जानकारी मौखिक रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती रहती थी। वे कुशल कारीगर भी थे। वे उत्तम प्रकार का वस्त्र बुनना जानते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

प्रश्न 2.
यूरोपीय एवं मूल निवासियों की पारस्परिक धारणाओं के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
यह जानना इतिहास का एक रोचक विषय है कि यूरोपीय जो अपने-आप को सभ्य कहते थे, की मूल निवासियों के बारे में क्या धारणाएँ थीं। दूसरी ओर उत्तरी अमरीका के मूल निवासी इन पूँजीपतियों के बारे में क्या सोचते थे।

1. ज्याँ जैक रूसो के विचार:
वह फ्राँस का एक प्रसिद्ध क था। उसके विचारानुसार मूल निवासी प्रशंसा के पात्र थे क्योंकि वे सभ्यता के कारण आई बुराइयों से अछूते थे। इसके लिए रूसो ने उनके लिए उदात्त, उत्तम जंगली (the noble savage) पद (term) का प्रयोग किया है। उसे मूल निवासियों से मिलने का अवसर प्राप्त नहीं हुआ था।

2. विलियम वड्सवर्थ के विचार:
वह इंग्लैंड का एक महान् कवि था। वह भी उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों से नहीं मिला था। वह मूल निवासियों के संबंध में लिखता है कि, “वे जंगलों में रहते हैं, जहाँ कल्पना शक्ति के पास उन्हें भाव संपन्न करने, उन्हें ऊँचा उठाने या परिष्कृत करने के अवसर बहुत कम हैं।” इससे अभिप्राय यह है कि प्रकृति के समीप रहने वालों की कल्पना शक्ति एवं भावना बहुत सीमित होती है।

3. वाशिंगटन इरविंग के विचार:
वह अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक थे। वह उत्तरी अमरीका में रहने वाले मूल निवासियों से स्वयं मिले थे। उनका कथन था कि जिन इंडियनस की असली जिंदगी को देखने का मुझे मौका मिला वे कविताओं में वर्णित अपने रूप से काफी भिन्न हैं। वे गोरे लोगों की नीयत पर भरोसा नहीं करते। जब वे गोरे लोगों के साथ रहते हैं तो बहुत कम बोलते हैं क्योंकि उन्हें नकी भाषा समझ नहीं आती।

जब मूल निवासी आपस में एकत्र होते हैं तो वे गोरों की खूब नकल उतार कर अपना मनोरंजन करते हैं। दूसरी ओर यरोपीय यह समझते हैं कि मल निवासी उनका इसलिए सम्मान करते हैं क्योंकि उन्होंने इंडियन्स को अपनी भव्यता एवं गरिमा से प्रभावित किया है। इरविंग ने इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि यूरोपीय लोग स्थानीय लोगों से जानवरों जैसा व्यवहार करते हैं।

4. थॉमस जैफ़र्सन के विचार:
वह संयुक्त राज्य अमरीका के तीसरे राष्ट्रपति थे। उन्होंने उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के संबंध में एक आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। उनका कथन था कि हमने इस अभागी नस्ल (मूल निवासियों) को सभ्य बनाने के बहुत प्रयास किए किंतु वे सभ्य नहीं बन पाए। इससे उनके उन्मूलन का औचित्य सिद्ध होता है।

5. यूरोपियनों के बारे में मूल निवासियों की धारणा:
काफी समय तक मूल निवासियों की यूरोपियों के बारे में क्या धारणा थी के बारे में हम कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सके। किंतु हाल ही में मूल निवासियों की लोक कथाओं एवं संस्कृति के अध्ययन से इस संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। इन लोक कथाओं में गोरे लोगों का मज़ाक उड़ाया गया था तथा उन्हें लालची एवं मूर्ख दर्शाया गया था।

6. व्यापार संबंधी धारणा:
यूरोपियों एवं मूल निवासियों में चीज़ों के लेन-देन को लेकर विभिन्न धारणा थी। मूल निवासी चीजों का आदान-प्रदान दोस्ती में दिए गए उपहारों का रूप समझते थें। दूसरी ओर यूरोपीय व्यापारी मछली एवं रोएंदार खाल को व्यापारिक माल समझते थे। इसे बेचकर वे अधिक-से-अधिक धन कमाना चाहते थे।

मूल निवासियों को यह समझ नहीं आता था कि यूरोपीय व्यापारी उनके सामान के बदले कभी तो बहुत सारा सामान दे देते थे तथा कभी बहुत कम। वस्तुत: उन्हें बाज़ार के बारे में तनिक भी ज्ञान नहीं था। यूरोपीय लोग रोएँदार खाल को प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में उदबिलावों (beavers मार रहे थे। इस मूल निवासी काफी परेशान थे। उन्हें यह भय था कि ये जानवर उनसे इस विध्वंस का बदला लेंगे।

7. जंगल एवं खेती से संबंधित धारणा:
यूरोपवासी उत्तरी अमरीका में लोहे के औजारों से जंगलों की सफ़ाई कर रहे थे। इसका उद्देश्य जंगलों को साफ़ कर वहाँ खेती करना था। यहाँ वे मकई व अन्य फ़सलों का उत्पादन करना चाहते थे। दूसरी ओर मूल निवासियों को यूरोपियों द्वारा की जा रही जंगलों की सफ़ाई अजीब लगती थी। वे केवल अपनी आवश्यकता के लिए फ़सलें उगाते थे।

ये लोग फ़सलों का उत्पादन बिक्री अथवा मुनाफे के लिए नहीं करते थे। वे जंगलों को अपनी शक्ति का स्रोत समझते थे। अतः वे उन्हें काटना एक पाप समझते थे। इस प्रकार जंगलों एवं खेती के प्रति यूरोपियों एवं मूल निवासियों की धारणा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी।

प्रश्न 3.
अमरीका में यूरोपियों द्वारा मूल निवासियों की बेदखली का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमरीका में यूरोपियों द्वारा मूल निवासियों की बेदखली एक अत्यंत करुणामयी कहानी प्रस्तुत करती है। इससे स्पष्ट होता है कि किस प्रकार यूरोपियों ने धोखे से मूल निवासियों को उनकी जमीनों से बेदखल किया एवं उनके लिए घोर कष्टों के द्वार खोल दिए।

1. बेदखली के ढंग:
यूरोपवासियों के अमरीका में बढ़ते हुए कदमों के साथ ही इन क्षेत्रों से मूल निवासियों को बेदखल किया जाने लगा। इसके लिए यूरोपियों ने अनेक ढंग अपनाए।

  • वे मूल निवासियों को उन स्थानों से हटने के लिए प्रेरित करते थे।
  • वे मूल निवासियों द्वारा पीछे न हटने की दशा में उन्हें धमकाते थे।
  • वे मूल निवासियों से बहुत कम मूल्य पर जमीन खरीद लेते थे तथा फिर उन्हें वहाँ से पीछे हटने के लिए बाध्य कर देते थे।
  • वे मूल निवासियों से धोखे से अधिक भूमि हड़प लेते थे तथा मूल निवासियों को वहाँ से हटा दिया जाता था।

2. चिरोकियों के प्रति अन्याय:
मूल निवासियों की बेदखली करते समय उनके साथ बहुत अन्याय किया जाता था। उन्हें किसी प्रकार के कानूनी एवं नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते थे। इसका एक उदाहरण जॉर्जिया जो कि संयुक्त राज्य अमरीका का एक राज्य है, के चिरोकी कबीले की बेदखली में देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि चिरोकी समुदाय के लोग अंग्रेजी सीखने एवं यूरोपवासियों की जीवन शैली को समझने का सबसे अधिक प्रयास कर रहे थे।

इसके बावजूद उन्हें सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था। इस संबंध में 1832 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका के मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल (John Marshall) ने एक महत्त्वपूर्ण फैसला दिया। इस फैसले में कहा गया कि चिरोकी कबीला एक विशिष्ट समुदाय है और उसके स्वत्वाधिकार वाले प्रदेश में जॉर्जिया का कानून लागू नहीं होता। परंतु तत्कालीन राष्ट्रपति एंड्रिड जैकसन (Andrew Jackson) ने इस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

उसने चिरोकियों को उनके प्रदेश से बेदखल करने के लिए एक सेना भेज दी। अतः 15000 चिरोकियों को महान् अमरीका मरुस्थल की ओर हटने के लिए बाध्य किया गया। इनमें से लगभग एक चौथायी लोग रास्ते में ही मर गए। अत: उनका यह सफर आँसुओं की राह (Trail of Tears) के नाम से जाना गया।

3. बेदखली का औचित्य:
यूरोपीय लोग स्थानीय लोगों को उनके मूल निवास से बेदखल करने को उचित ठहराते हैं। उनका कथन था कि मूल निवासी ज़मीन का ठीक प्रयोग करना नहीं जानते। इसलिए भूमि पर उनका अधिकार नहीं रहना चाहिए। वे यह कह कर भी मूल निवासियों की आलोचना करते हैं कि वे बहत आलसी थे। इसलिए वे बाज़ार के लिए उत्पादन करने में अपनी शिल्पकला (craft skills) का प्रयोग नहीं करते।

यह भी कहा गया कि वे अंग्रेज़ी नहीं सीखते एवं ढंग के वस्त्र नहीं पहनते। अत: मूल निवासी मर-खप जाने के ही योग्य हैं। उनकी बेदखली के बाद जमीनों को खेती के लिए साफ़ किया गया और जंगली भैंसों को मार दिया गया। निस्संदेह यह एक विस्फोटक स्थिति का संकेत था।

4. रिज़र्वेशंस:
यूरोपियों ने मूल निवासियों को पश्चिम की ओर धकेल दिया था। यहाँ उन्हें स्थायी तौर पर बसने के लिए अपनी ज़मीन दे दी गई थी। किंतु यदि कहीं से सोना अथवा तेल होने का पता चलता तो मूल निवासियों को उस क्षेत्र को फौरन छोड़ जाने के लिए बाध्य होना पड़ता था। उन्हें कई बार ऐसे क्षेत्रों में भेज दिया जाता था जहाँ पहले ही कबीलों की संख्या अधिक होती थी।

इसलिए उनमें आपसी लड़ाइयाँ हो जाती थीं। इस प्रकार मूल निवासी कुछ छोटे प्रदेशों में सीमित कर दिए गए थे। इन्हें रिज़र्वेशंस कहा जाता था। यह प्राय: ऐसी भूमि होती थी जिसके साथ उनका पहले से कोई संबंध नहीं होता था।

5. मूल निवासियों का प्रतिरोध:
यूरोपीय बार-बार मूल निवासियों को अपनी ज़मीन छोड़ने के लिए बाध्य करते थे। ऐसा नहीं था कि मूल निवासियों ने अपनी जमीनें बिना किसी संघर्ष के छोड़ दी हों। संयुक्त राज्य अमरीका की सेना को 1865 ई० से 1890 ई० के दौरान मूल निवासियों के अनेक विद्रोहों का दमन करना पड़ा था। इसी प्रकार कनाडा में 1869 ई० से 1885 ई० के दौरान मेटिसों (Metis) ने विद्रोहों का झंडा बुलंद कर रखा था। बाद में उनका दमन कर दिया गया था।

प्रश्न 4.
गोल्ड रश से आपका क्या अभिप्राय है? इसका संयुक्त राज्य अमरीका के उद्योगों एवं खेती के आधुनिकीकरण पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर:
दक्षिणी अमरीका की भाँति उत्तरी अमरीका के बारे में यह आशा की जाती थी कि वहाँ सोने के भंडार हैं। 1849 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलीफ़ोर्निया (California) राज्य में सोने के कुछ चिन्ह प्राप्त हुए। यह समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में यूरोपीय अपना-अपना भाग्य आजमाने कैलीफोर्निया की ओर चल पड़े। उन्हें यह आशा थी कि वहाँ से प्राप्त सोना उनकी तकदीर को पलक झपकते ही बदल देगा। इसने गोल्ड रश को जन्म दिया।

1. उद्योगों का विकास:
गोल्ड रश की घटना के दूरगामी प्रभाव पड़े। सर्वप्रथम संपूर्ण संयुक्त राज्य अमरीका में रेलवे लाइन बिछाने का काम आरंभ हुआ। इस कार्य के लिए हज़ारों चीनी श्रमिकों को लगाया गया। 1870 ई० तक बड़े पैमाने पर रेलवे का निर्माण कर लिया गया। 1885 ई० में कनाडा में रेलवे का निर्माण पूरा किया गया।

स्कॉटलैंड से आने वाले एक अप्रवासी एंड्रिउ कार्नेगी (Andrew Carnegie) का कथन था कि, “पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकत था कि, “पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकते हैं नया गणराज्य किसी एक्सप्रेस की गति से दौड़ रहा है।” रेलवे निर्माण के साथ-साथ रेलवे के अन्य साज-सामान बनाने के कारखाने भी लगाए गए। इससे कारखानों की संख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई। उस समय उद्योगों के दो प्रमुख उद्देश्य थे-

  • विकसित रेलवे का साज-सामान बनाना ताकि दूर-दूर के स्थानों को तीव्र परिवहन द्वारा जोड़ा जा सके।
  • ऐसे यंत्रों का उत्पादन करना जिनसे बड़े पैमाने पर खेती की जा सके। इससे उद्योगों को एक नया प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप संयुक्त राज्य अमरीका 1860 ई० से 1890 ई० के दौरान एक शक्तिशाली औद्योगिक देश के रूप में उभर कर सामने आया।

2. खेती का आधुनिकीकरण (Modernization of Agriculture)-इस समय संयुक्त राज्य अमरीका में ‘बड़े पैमाने पर ऐसे यंत्रों का विकास हो चुका था जिससे खेती को एक नया प्रोत्साहन मिला। खेती के लिए बहुत
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से जंगल साफ़ कर दिए गए। इससे खेती का विस्तार हुआ। 1890 ई० तक संयुक्त राज्य अमरीका में जंगली भैंसों का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया गया था। इस कारण शिकार वाली जीवनचर्या भी समाप्त हो गई।

प्रश्न 5.
ऑस्ट्रेलिया के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं ? चर्चा कीजिए।
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया के विकास का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. मानव का आगमन:
ऑस्ट्रेलिया में मानव के आगमन का इतिहास बहुत प्राचीन एवं लंबा है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है यहाँ आदिमानव 40,000 वर्ष पहले पहुँचा था। ऐसा विचार है कि ये लोग ऑस्ट्रेलिया में न्यू गिनी (New Guinea) के रास्ते पहुँचे थे। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की परंपरा के अनुसार वे कहीं बाहर से नहीं आए थे। वे सदैव से यहीं रहते थे। इन्हें ऐबॉरिजिनीज (aborigines) कहा जाता है।

2. मूल निवासियों की स्थिति:
18वीं शताब्दी में यूरोपियों के ऑस्ट्रेलिया आगमन से पूर्व यहाँ मूल निवासियों के लगभग 350 से 750 तक समुदाय थे। प्रत्येक समुदाय की अपनी अलग भाषा थी। इनमें से 200 भाषाएँ आज तक भी बोली जाती हैं। स्थानीय लोगों का एक विशाल समूह उत्तर में रहता है। इसे टॉरस स्ट्रेट टापूवासी (Torres Strait Islanders) कहते हैं। इनके लिए ऐबॉरिजिनी शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता। क्योंकि ऐसा मानना है कि वे कहीं ओर से आए हैं तथा वे एक भिन्न नस्ल से संबंधित हैं।

3. ऑस्ट्रेलिया की खोज:
1606 ई० में एक साहसी डच यात्री विलेम जांस (Willem Jansz) ऑस्ट्रेलिया पहुँचने में सफल रहा। 1642 ई० में एक अन्य डच नाविक ए० जे० तास्मान (A. J. Tasman) ऑस्ट्रेलिया के एक टापू पर पहुँचने में सफल हुआ। उसने इस टापू का नाम तस्मानिया रखा। इसी वर्ष उसने न्यूजीलैंड की भी खोज की। इस खोज के बावजूद काफी समय तक ऑस्ट्रेलिया में किसी उपनिवेश को स्थापित करने का कोई प्रयास नहीं किया गया।

1770 ई० में इंग्लैंड का प्रसिद्ध नाविक जेम्स कुक (James Cook) एक छोटे से टापू बॉटनी बे (Botany Bay) पहुँचने में सफल हुआ। उसने इस टापू का नाम न्यू साउथ वेल्स (New South Wales) रखा। यहाँ रहते हए जेम्स कुक ने एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानचित्र तैयार किया। इसमें उसने 180 स्थानों के नाम दिए थे। यह मानचित्र आने वाले नाविकों के लिए एक प्रेरणा स्रोत सिद्ध हुआ। 1788 ई० में यहाँ ब्रिटेन की प्रथम बस्ती सिडनी (Sydney) की स्थापना हुई। यहाँ ब्रिटेन के अपराधियों को देश निकाले का दंड देकर भेजा जाता था।

4. मूल निवासियों के प्रति रवैया:
दक्षिणी अमरीका एवं उत्तरी अमरीका के समान ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ने यूरोपवासियों का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। वे यूरोपवासियों की यथासंभव सहायता करते थे। इस संबंध में हमें अनेक यात्रियों के ब्योरे उपलब्ध हैं। इस कारण आरंभ में यूरोपवासियों एवं मूल निवासियों के आपसी संबंध मित्रतापूर्ण रहे। 1779 ई० में ब्रिटेन के नाविक जेम्स कुक की हवाई में किसी आदिवासी ने हत्या कर दी। इस कारण यूरोपवासी भड़क उठे।

उन्होंने इस घटना के पश्चात् आदिवासियों के विरुद्ध कठोर रवैया अपनाया। इससे दोनों समुदायों के संबंधों में कटुता आ गई। यूरोपवासियों ने धीरे-धीरे खेती के लिए जंगलों का सफाया कर दिया। उन्होंने मूल निवासियों को अपने क्षेत्रों से पीछे हटने के लिए भी बाध्य कर दिया।

5. आर्थिक विकास:
ऑस्ट्रेलिया में यूरोपीय उपनिवेशों की स्थापना के साथ ही उसके आर्थिक विकास का क्रम आरंभ हुआ। यहाँ मैरिनो भेड़ों के पालन के लिए विशाल भेड़ फार्मों की स्थापना की गई। कृषि के विकास के लिए जंगलों की सफाई की गई। यहाँ गेहूँ के उत्पादन में बहुत वृद्धि की गई। मदिरा बनाने हेतु अंगूर के विशाल बाग लगाए गए। ऑस्ट्रेलिया में खनन उद्योगों की स्थापना की गई। इससे ऑस्ट्रेलिया की समृद्धि का आधार तैयार हुआ।

6. चीनी अप्रवासी:
आरंभ में ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक विकास में मूल निवासियों से काम लिया गया। उनसे खेतों एवं खानों में कठिन परिस्थितियों में कार्य करवाया जाता था। अत: उनमें एवं दासों में कोई विशेष अंतर नहीं रह गया था। बाद में सस्ता श्रम प्राप्त करने के उद्देश्य से चीनी अप्रवासियों का सहारा लिया गया। शीघ्र ही उनकी संख्या में तीव्र वृद्धि हो गई।

इससे ऑस्ट्रेलिया की गोरी सरकार घबरा गई। उसे यह ख़तरा था कि इससे गोरे लोग एशिया के काले लोगों पर अधिक निर्भर होते जाएँगे। अत: उसने 1974 ई० तक गैर-गोरों को ऑस्ट्रेलिया से बाहर रखने की नीति अपनाई। इस वर्ष एशियाई अप्रवासियों को प्रवेश की अनुमति दी गई।

7. राजधानी की स्थापना:
1911 ई० में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी बनाने का निर्णय किया गया। इसके लिए वूलव्हीटगोल्ड (Woolwheatgold) के नाम का सुझाव दिया गया। पर अंततः इसका नाम कैनबरा (Canberra) रखा गया। यह एक स्थानीय शब्द कैमबरा (Kamberra) से बना है जिसका अर्थ है सभा स्थल।

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प्रश्न 6.
20वीं शताब्दी में ऑस्ट्रेलिया में आई बदलाव की लहर का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
20वीं शताब्दी में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के प्रति बदलाव की लहर को देखा गया। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. डब्ल्यू ० ई० एच० स्टैनर का योगदान:
काफी समय तक यूरोपवासियों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों और उनकी संस्कृति को समझने का कोई प्रयास नहीं किया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि वे मूल निवासियों के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते थे। इसके चलते उन्होंने अपनी पुस्तकों में केवल ऑस्ट्रेलिया में आकर बसने वाले यूरोपियों की उपलब्धियों का ही वर्णन किया है।

इनमें यह दिखाने का प्रयास किया गया कि वहाँ के मल निवासियों की न तो कोई परंपरा है एवं न ही कोई इतिहास। 1968 ई० में एक मानवशास्त्री डब्ल्यू. ई० एच० स्टैनर ने दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस नामक प्रसिद्ध पुस्तक का प्रकाशन किया। इस पुस्तक से यूरोपवासियों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृति को समझने की चाहत उत्पन्न हुई। निस्संदेह यह एक प्रशंसनीय कदम था।

2. हेनरी रेनॉल्डस का योगदान :
हेनरी रेनॉल्डस एक महान् लेखक था। उसकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना का नाम व्हाई वरंट वी टोल्ड (Why Weren’t We Told) था। इस पुस्तक में उसने ऑस्ट्रेलिया के इतिहास लेखन के परंपरागत ढंग की कटु आलोचना की है। यूरोपवासी कैप्टन कुक की खोज से ही ऑस्ट्रेलिया के इतिहास का आरंभ करते हैं।

हेनरी रेनॉल्डस का कथन था कि हमें ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की सभ्यता एवं संस्कृति पर भी प्रकाश डालना चाहिए। इससे यूरोपवासियों के मन में मूल निवासियों के इतिहास को जानने की एक नई प्रेरणा उत्पन्न हुई।

3. मूल निवासियों की संस्कृति का अध्ययन:
यूरोपवासियों द्वारा मूल निवासियों की संस्कति का अध्ययन करने के लिए विश्वविद्यालयों में विशेष विभागों की स्थापना हई। मल निवासियों की कला को कला दीर्घाओं (art galleries) में स्थान दिया जाने लगा। स्थानीय संस्कृति को समझने के लिए संग्रहालयों (museums) की स्थापना की गई। मूल निवासियों ने भी अपने इतिहास को लिखना आरंभ किया।

निस्संदेह यह एक प्रशंसनीय प्रयास था। 1974 ई० में ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने बहुसंस्कृतिवाद (multiculturalism) की नीति को अपनाया। इसके द्वारा मूल निवासियों, यूरोप तथा एशिया के अप्रवासियों की संस्कृतियों के प्रति बराबर सम्मान प्रकट किया गया। वास्तव में इसने एक नए युग का श्रीगणेश किया।

4. ज्यूडिथ राइट का योगदान:
ज्यूडिथ राइट ऑस्ट्रेलिया की एक महान् कवित्री थी। उसने मूल निवासियों के अधिकारों संबंधी एक ज़ोरदार अभियान चलाया। उसका कथन था कि गोरों एवं मूल निवासियों को अलग-अलग रखने से आने वाली नस्लों के लिए एक भारी ख़तरा उत्पन्न हो सकता है। इस संबंध में उसने अनेक प्रभावशाली कविताएँ लिखीं। इनका लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा।

5. टेरा न्यूलिअस नीति का अंत:
1970 ई० के दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ एवं दूसरी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में मानवाधिकार पर बल दिया जाने लगा था। इससे ऑस्ट्रेलिया के लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न हुई। उन्हें यह अहसास हुआ कि यूरोपीय लोगों ने भूमि अधिग्रहण (takeover of land) को औपचारिक (formal) बनाने के उद्देश्य से कोई समझौता नहीं किया है।

इसका कारण यह था कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार सदैव भमि को टेरा न्युलिअस कहती आई थी। इससे अभिप्राय ऐसी भमि थी जो किसी की भी नहीं है। 1992 ई० में ऑस्ट्रेलिया के हाईकोर्ट ने टेरा न्यूलिअस नीति को अवैध घोषित कर दिया। इस फैसले में 1770 ई० के पहले से ज़मीन पर मूल निवासियों के दावों को मान्यता दे दी गई।

6. मिश्रित रक्त वाले बच्चों की नीति में परिवर्तन:
ऑस्ट्रेलिया की एक अन्य गंभीर समस्या मिश्रित रक्त वाले बच्चों की थी। ये बच्चे यूरोपवासियों एवं मूल निवासियों के मध्य अवैध संबंधों के कारण उत्पन्न हुए थे। इन बच्चों को किसी प्रकार का कोई अधिकार नहीं दिया गया था। उनकी यंत्रणा का एक लंबा इतिहास था। गोरे एवं रंग-बिरंगे बच्चों को अलग-अलग करके उनके साथ एक घोर अन्याय किया जाता था।

इस कारण सरकार ने 1999 ई० में ऑस्ट्रेलिया में 1820 ई० से 1970 ई० के बीच गुम हुए बच्चों के लिए माफी माँगी। उसने 26 मई को राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस मनाने की घोषणा की। निस्संदेह यह मूल निवासियों की एक महान् विजय थी।

कालक्रम

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1497 ई०जॉन कैबोट का न्यूफाऊँडलैंड पहुँचना।
2.1507 ई०अमेरिगो डे वेसपुकी की ट्रैवेल्स प्रकाशित हुई।
3.1534 ई०जैक कार्टियर सेंट लॉरेंस पहुँचा।
4.1606 ई०डच यात्री विलेम जांस का ऑस्ट्रेलिया पहुँचना।
5.1607 ई०ब्रिटिशों ने वर्जीनिया को अपना उपनिवेश बनाया।
6.1642 ई०डच नाविक ए० जे० तास्मान का ऑस्ट्रेलिया पहुँचना।
7.1770 ई०ब्रिटेन के नाविक जेम्स कुक का ऑस्ट्रेलिया पहुँचना।
8.1783 ई०ब्रिटेन ने संयुक्त राज्य अमरीका को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता दी।
9.1788 ई०ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया के सिडनी नामक स्थान में अपनी प्रथम बस्ती स्थापित की।
10.1803 ई०संयुक्त राज्य अमरीका ने फ्राँस से लुइसियाना को खरीदा।
11.1849 ई०अमरीकी गोल्ड रश।
12.1865 ई०संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा का अंत।
13.1867 ई०संयुक्त राज्य अमरीका ने अलास्का को खरीदा।
14.1892 ई०अमरीकी फ्रंटियर का अंत।
15.1869-1885 ई०कनाडा में मेटिसों का विद्रोह।
16.1911 ई०कैनबरा को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी बनाना।
17.1934 ई०इंडियन रीऑर्गेनाइज़ेशन एक्ट का पारित होना।
19.1954 ई०डिक्लेरेशन ऑफ इंडियन राइट्स।
20.1968 ई०डब्ल्यू० ई० एच० स्टैनर द्वारा दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस का प्रकाशन।
21.1974 ई०ऑस्ट्रेलिया की सरकार द्वारा बहुसंस्कृतिवाद की नीति को अपनाना।
22.1982 ई०संयुक्त राज्य अमरीका द्वारा मूल निवासियों के अधिकारों को मान्यता देना।
23.1992 ई०ऑस्ट्रेलिया द्वारा टेरा न्यूलिअस नीति को त्यागना।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों की जीवन शैली की प्रमुख विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
(1) रहन-सहन एवं भोजन-यूरोपवासियों के आगमन से पूर्व उत्तरी अमरीका के मूल निवासी नदी घाटी के साथ-साथ गाँवों में समूह बनाकर रहते थे। वे मकई तथा विभिन्न प्रकार की सब्जियों का उत्पादन करते थे। वे मछली एवं माँस का अधिक प्रयोग करते थे। वे प्रायः माँस की तलाश में लंबी यात्राएँ करते थे। उन्हें मुख्य जिन्हें बाइसन कहते थे कि तलाश रहती थी। परंत वे उतने ही जानवरों को मारते थे कि जितने की उन्हें भोजन के लिए आवश्यकता होती थी।

(2) अर्थव्यवस्था-उत्तरी अमरीका की अर्थव्यवस्था मुख्यतः एक जीवन निर्वाह अर्थव्यवस्था थी। वहाँ के मूल निवासी केवल उतना ही उत्पादन करते थे जो कि उनके निर्वाह के लिए आवश्यक होता था। उन्हें जमीन पर व्यक्तिगत मलकियत की कोई चिंता नहीं थी क्योंकि वे उससे प्राप्त होने वाले भोजन एवं आश्रय से संतुष्ट थे।

(3) उपहारों का आदान-प्रदान-उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों की यह परंपरा थी कि वे आपस में मिलजुल कर रहते थे एवं उनके संबंध मैत्रीपूर्ण होते थे। वे आपस में वस्तुओं को खरीदते एवं बेचते नहीं थे अपितु उपहारों का आदान-प्रदान करते थे। कबीलों में आपसी समझौता होने पर वे एक विशेष प्रकार की वेमपुम बेल्ट का आदान-प्रदान करते थे।

(4) भाषा एवं ज्ञान-उत्तरी अमरीका के मूल निवासी अनेक भाषाएँ बोलते थे यद्यपि वे लिखी नहीं जाती थीं। उन्हें अनेक बातों का ज्ञान था। वे जानते थे कि समय की गति चक्रिय है। वे जलवायु एवं प्रकृति को पढ़े-लिखे लोगों की तरह समझते थे। प्रत्येक कबीले के पास अपने इतिहास के बारे में पूरी जानकारी होती थी। यह जानकारी मौखिक रूप में एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलती रहती थी। वे कुशल कारीगर भी थे। वे उत्तम प्रकार का वस्त्र बुनना जानते थे।

प्रश्न 2.
यूरोपीय व्यापारियों ने उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के साथ किस प्रकारं वस्तुओं का आदान-प्रदान किया ?
उत्तर:
यूरोपीय व्यापारियों को उत्तरी अमरीका पहुँचने पर यह ज्ञात हुआ कि स्थानीय लोग मिसीसिपी नदी के किनारे आपस में अपनी वस्तुओं के आदान-प्रदान के लिए नियमित रूप से जमा होते हैं। यहाँ उन हस्तशिल्पों अथवा खाद्य-पदार्थों का आदान-प्रदान होता था जो अन्य प्रदेशों में उपलब्ध नहीं होते थे। यूरोपीय व्यापारी भी अपने व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से इस आदान-प्रदान में सम्मिलित होने लगे। वे मूल निवासियों को कंबल, लोहे के बर्तन, बंदूकें एवं शराब देते थे।

कंबल शीत को रोकने के लिए उपयोगी सिद्ध हुए। लोहे के बर्तन मिट्टी के बर्तनों की अपेक्षा कहीं अधिक उपयोगी थे। बंदूकें जानवरों को मारने के लिए तीर-कमानों की अपेक्षा अधिक उत्तम सिद्ध हुईं। उत्तरी अमरीका के लोग यूरोपियों के आगमन से पूर्व शराब से परिचित नहीं थे। वे शीघ्र ही शराब के आदी हो गए। उनकी यह आदत यूरोपीय व्यापारियों के लिए अच्छी प्रमाणित हुई। इस कारण यूरोपीय व्यापारी मूल निवासियों पर अपनी शर्ते थोपने में सफल हुए। यूरोपियनों ने मूल निवासियों से तंबाकू की आदत ग्रहण की।

प्रश्न 3.
वाशिंगटन इरविंग कौन था ? उसने उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के बारे में क्या लिखा है ?
उत्तर:
वह अमरीका के एक प्रसिद्ध लेखक थे। वह उत्तरी अमरीका में रहने वाले मूल निवासियों से स्वयं मिले थे। उनका कथन था कि जिन इंडियन्स की असली जिंदगी को देखने का मुझे मौका मिला वे कविताओं में वर्णित अपने रूप से काफी भिन्न हैं। वे गोरे लोगों की नीयत पर भरोसा नहीं करते। जब वे गोरे लोगों के साथ रहते हैं तो बहुत कम बोलते हैं क्योंकि उन्हें उनकी भाषा समझ नहीं आती।

जब मूल निवासी आपस में एकत्र होते हैं तो वे गोरों की खूब नकल उतार कर अपना मनोरंजन करते हैं। दूसरी ओर यूरोपीय यह समझते हैं कि मूल निवासी उनका इसलिए सम्मान करते हैं क्योंकि उन्होंने इंडियन्स को अपनी भव्यता एवं गरिमा से प्रभावित किया है। इरविंग ने इस बात पर दुःख प्रकट किया है कि यूरोपीय लोग स्थानीय लोगों से जानवरों जैसा व्यवहार करते हैं।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

प्रश्न 4.
यूरोपियों एवं मूल निवासियों में व्यापार संबंधी क्या धारणा थी ?
उत्तर:
युरोपियों एवं मूल निवासियों में चीजों के लेन-देन को लेकर विभिन्न धारणा थी। मल निवासी चीज़ों का आदान-प्रदान दोस्ती में दिए गए उपहारों का रूप समझते थे। दूसरी ओर यूरोपीय व्यापारी मछली एवं रोएँदार खाल को व्यापारिक माल समझते थे। इसे बेचकर वे अधिक-से-अधिक धन कमाना चाहते थे।

मूल निवासियों को यह समझ नहीं आता था कि यूरोपीय व्यापारी उनके सामान के बदले कभी तो बहुत सारा सामान दे देते थे तथा कभी बहुत कम। वस्तुतः उन्हें बाज़ार के बारे में तनिक भी ज्ञान नहीं था। यूरोपीय लोग रोएँदार खाल को प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में उदबिलावों को मार रहे थे। इससे मूल निवासी काफी परेशान थे। उन्हें यह भय था कि ये जानवर उनसे इस विध्वंस का बदला लेंगे।

प्रश्न 5.
उत्तरी अमरीका में दास प्रथा का अंत कैसे हुआ ? संक्षेप में उत्तर दीजिए।
अथवा
संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा के प्रचलन के बारे में आप क्या जानते हैं ? इसका अंत किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
संयुक्त राज्य अमरीका में यूरोपियों के आगमन के पश्चात् दास प्रथा का प्रचलन बहुत बढ़ गया। इसका कारण यह था कि यूरोपियों ने दक्षिणी राज्यों में कपास एवं गन्ने की खेती आरंभ कर दी थी। यह कार्य दासों द्वारा करवाया जाता था। यहाँ के बाग़ान मालिकों ने बड़ी संख्या में अफ्रीका से दास खरीदने आरंभ किए। इन दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था।

अत: संयुक्त राज्य अमरीका के उत्तरी राज्यों जहाँ की अर्थव्यवस्था बागानों पर आधारित नहीं थी, में दास प्रथा को समाप्त करने के स्वर उठने लगे। दक्षिणी राज्य किसी भी कीमत पर दास प्रथा का अंत नहीं चाहते थे। अत: 1861 ई० से लेकर 1865 ई० तक दास प्रथा के प्रश्न को लेकर उत्तरी राज्यों एवं दक्षिणी राज्यों में एक भयंकर गृहयुद्ध हुआ। इस गृहयुद्ध में उत्तरी राज्यों को विजय प्राप्त हुई। अतः 1865 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा का अंत कर दिया गया। इस प्रथा के अंत में अमरीका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई।।

प्रश्न 6.
संयुक्त राज्य अमरीका में यूरोपवासियों ने मूल निवासियों को बेदखल करने के लिए कौन-से ढंग अपनाए ?
उत्तर:
जैसे-जैसे संयुक्त राज्य अमरीका में यूरोपवासियों की बस्तियों का विस्तार हुआ इन क्षेत्रों से मूल निवासियों को बेदखल कर दिया गया। इसके लिए यूरोपियों ने अनेक ढंग अपनाए।

  • वे मूल निवासियों को उन स्थानों से हटने से लिए प्रेरित करते थे।
  • वे मूल निवासियों द्वारा पीछे न हटने की दशा में उन्हें धमकाते थे।
  • वे मूल निवासियों से बहुत कम मूल्य पर जमीन खरीद लेते थे तथा फिर उन्हें वहाँ से पीछे हटने के लिए मजबूर कर देते थे।
  • वे मूल निवासियों से धोखे से अधिक भूमि हड़प लेते थे तथा मूल निवासियों को वहाँ से हटा दिया जाता था।

प्रश्न 7.
चिरोकी कौन थे ? यूरोपवासियों का उनके प्रति क्या व्यवहार था ?
उत्तर:
मूल निवासियों की बेदखली करते समय उनके साथ किसी प्रकार की सहानुभूति नहीं की जाती थी। उन्हें किसी प्रकार के कानूनी एवं नागरिक अधिकार नहीं दिए जाते थे। इसका एक उदाहरण जॉर्जिया जो कि संयुक्त राज्य अमरीका का एक राज्य है के चिरोकी कबीले की बेदखली में देखा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि चिरोकी समुदाय के लोग अंग्रेजी सीखने एवं यूरोपवासियों की जीवन शैली को समझने का सबसे अधिक प्रयास कर रहे थे।

इसके बावजूद उन्हें सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था। इस संबंध में 1832 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका के मुख्य न्यायाधीश जॉन मार्शल एक महत्त्वपूर्ण फैसला दिया। इस फैसले में कहा गया कि चिरोकी कबीला एक विशिष्ट समुदाय है और उसके स्वत्वाधिकार वाले प्रदेशों में जॉर्जिया का कानून लागू नहीं होता। परंतु तत्कालीन राष्ट्रपति एंड्रिउ जैकसन ने इस फैसले को स्वीकार करने से इंकार कर दिया।

उसने चिरोकियों को उनके प्रदेश से बेदखल करने के लिए एक सेना भेज दी। अत: 15000 चिरोकियों को महान् अमरीका मरुस्थल की ओर हटने के लिए बाध्य किया गया। इनमें से लगभग एक चौथायी लोग रास्ते में ही मर गए। अतः उनका यह सफर आँसुओं की राह के नाम से जाना गया।

प्रश्न 8.
‘गोल्ड रश’ क्या था ?
अथवा
गोल्ड रश से आपका क्या अभिप्राय है ? इससे संयुक्त राज्य अमरीका पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
दक्षिणी अमरीका की भाँति उत्तरी अमरीका के बारे में यह आशा की जाती थी कि वहाँ सोने के भंडार हैं। 1849 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलीफ़ोर्निया राज्य में सोने के कुछ चिन्ह प्राप्त हुए। यह समाचार जंगल में आग की तरह फैल गया। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में यूरोपीय अपना-अपना भाग्य आजमाने कैलीफोर्निया की ओर चल पड़े।

उन्हें यह आशा थी कि वहाँ से प्राप्त सोना उनकी तकदीर को पलक झपकते ही बदल देगा। इसने गोल्ड रश को जन्म दिया। गोल्ड रश की घटना के दूरगामी प्रभाव पड़े। सर्वप्रथम संपूर्ण संयुक्त राज्य अमरीका में रेलवे लाइन बिछाने का काम आरंभ हुआ। इस कार्य के लिए हज़ारों चीनी श्रमिकों को लगाया गया। 1870 ई० तक बड़े पैमाने पर रेलवे का निर्माण किया गया।

रेलवे निर्माण के साथ-साथ रेलवे के अन्य साज-सामान बनाने के कारखाने भी लगाए गए। इससे कारखानों की संख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई। इस समय संयुक्त राज्य अमरीका में बड़े पैमाने पर ऐसे यंत्रों का विकास हो चुका था जिससे खेती को एक नया प्रोत्साहन मिला खेती के लिए बहुत से जंगल साफ़ कर दिए गए। इससे खेती का विस्तार हुआ।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

प्रश्न 9.
आप किस प्रकार कह सकते हैं कि 20वीं शताब्दी में संयुक्त राज्य अमरीका में मूल निवासियों के संबंध में बदलाव की लहर आई ?
उत्तर:
(1) सर्वेक्षण-1928 ई० में मूल निवासियों की समस्याओं को जानने के लिए लेवाइस मेरिअम की अध्यक्षता में एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ। इसे दि प्रॉब्लम ऑफ़ इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन का नाम दिया गया। इसमें रिज़र्वेशंस में रह रहे मूल निवासियों की स्वास्थ्य एवं शिक्षा संबंधी सुविधाओं की कमी का बड़ा ही करुणामयी चित्र प्रस्तुत किया गया है।

(2) इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट 1934 ई०-1930 ई० के दशक के आते-आते गोरे अमरीकियों के मन में मूल निवासियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हुई। अब तक मूल निवासियों को नागरिकता के.सभी लाभों से वंचित रखा गया था। 1934 ई० में इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट पारित किया गया। इस एक्ट के अधीन रिज़र्वेशंस में रहने वाले मूल निवासियों को ज़मीन खरीदने और ऋण लेने का अधिकार प्रदान किया गया।

(3) डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइट्स 1954 ई०-1954 ई० में अनेक मूल निवासियों ने डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइट्स नामक दस्तावेज़ तैयार किया। इसमें कहा गया कि वे संयुक्त राज्य अमरीका की नागरिकता को इस शर्त पर स्वीकार करेंगे कि उनके रिज़र्वेशंस वापिस नहीं लिए जाएँगे तथा न ही उनकी परंपराओं में किसी प्रकार का हस्तक्षेप किया जाएगा।

(4) मूल निवासियों द्वारा अधिकारों की माँग-1969 ई० में जब अमरीका की सरकार ने यह घोषणा की कि वह आदिवासी अधिकारों को मान्यता नहीं देगी तो मूल निवासियों ने इसका धरना, प्रदर्शनों एवं वाद-विवाद द्वारा डटकर विरोध किया। अत: बाध्य होकर 1982 ई० में सरकार ने उनके अधिकारों को स्वीकृति प्रदान कर दी।

प्रश्न 10.
आप उन्नीसवीं सदी में संयुक्त राज्य अमरीका में अंग्रेजी के उपयोग के अतिरिक्त अंग्रेजों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन में कौन-सी विशेषताएँ देखते हैं ?
उत्तर:
यूरोपियों के संयुक्त राज्य अमरीका में जाकर बसने के कारण वहाँ अंग्रेज़ी का उपयोग काफी बढ़ गया। इसके अतिरिक्त वहाँ अंग्रेजों के आर्थिक एवं सामाजिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

(1) ज़मीन के प्रति यूरोपीय लोगों का दृष्टिकोण मूल निवासियों से अलग था। ब्रिटेन एवं फ्राँस से आए कुछ प्रवासी ऐसे थे जो अपने पिता का बड़ा पुत्र होने के कारण पिता की संपत्ति के उत्तराधिकरी नहीं बन सकते थे। इसलिए वे अमरीका में भू-स्वामी बनना चाहते थे।

(2) जर्मनी, स्वीडन और इटली जैसे देशों से ऐसे अप्रवासी आए जिनकी ज़मीनें बड़े किसानों के हाथों में चली गई थीं। वे ऐसी ज़मीन चाहते थे जिसे वे अपना कह सकें।

(3) पोलैंड से आए लोगों को चरगाहों में काम करना अच्छा लगता था। इसमें उन्हें काफ़ी लाभ भी प्राप्त हुआ।

(4) अमरीका में बहुत कम कीमत पर बड़ी संपत्तियाँ खरीद पाना आसान था। अत: अंग्रेजों ने बड़े-बड़े भूखंड खरीद लिए।

(5) यूरोपियों ने अपने हितों के लिए मूल निवासियों को बेदखल किया। वे मूल निवासियों की बेदखली को गलत नहीं मानते थे।

प्रश्न 11.
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों का यूरोपवासियों के प्रति क्या रवैया था ?
उत्तर:
यूरोपवासियों के आगमन पर ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ने उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। वे यूरोपवासियों की यथासंभव सहायता करते थे। मूल निवासियों के दोस्ताना व्यवहार के बारे में हमें अनेक यात्रियों के ब्यौरे उपलब्ध हैं। इससे स्पष्ट है कि आरंभ में यूरोपवासियों एवं मूल निवासियों के आपसी संबंध मित्रतापूर्ण रहे। 1779 ई० में ब्रिटेन के नाविक कैप्टन जेम्स कुक की हवाई में किसी आदिवासी ने हत्या कर दी। इस कारण यूरोपवासी तिलमिला उठे।

उन्होंने इस घटना के लिए मूल निवासियों को उत्तरदायी ठहराया। अतः उन्होंने मूल निवासियों को सबक सिखाने का निर्णय लिया। इसके चलते उन्होंने मूल निवासियों के विरुद्ध कठोर रवैया अपनाया। इससे दोनों समुदायों के संबंधों में कटुता आ गई। यूरोपवासियों ने धीरे-धीरे खेती के लिए जंगलों का सफ़ाया कर दिया। उन्होंने मूल निवासियों को अपने क्षेत्रों से पीछे हटने के लिए भी बाध्य किया।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
‘नेटिव’ शब्द से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
नेटिव अथवा मूल निवासी से अभिप्राय ऐसे व्यक्ति से है जो अपने वर्तमान निवास स्थान पर ही पैदा हुआ हो। 20वीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में यह शब्द यूरोपीय लोगों द्वारा अपने उपनिवेशों में रहने वाले मूल निवासियों के लिए प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 2.
‘सेटलर’ शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सेटलर शब्द से अभिप्राय किसी स्थान पर बाहर से आकर बसे लोगों से है। इस शब्द का प्रयोग दक्षिण अफ्रीका में डचों के लिए, आयरलैंड, न्यूज़ीलैंड तथा ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटिश लोगों के लिए और अमरीका में यूरोपीय लोगों के लिए किया जाता था।

प्रश्न 3.
उत्तरी अमरीका की कोई दो भौगोलिक विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उत्तरी अमरीका उत्तरी ध्रुवीय वृत्त से लेकर कर्क रेखा तक फैला हुआ है।
  • इसके पश्चिम में अरिज़ोना एवं नेवाडा की मरुभूमि है।

प्रश्न 4.
उत्तरी अमरीका की जलवायु में कब स्थिरता आई? इसका क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:

  • उत्तरी अमरीका की जलवायु में 5000 वर्ष पूर्व स्थिरता आई।
  • इसके परिणामस्वरूप यहाँ की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।

प्रश्न 5.
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों की जीवन शैली की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
अथवा
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • वे नदी घाटी के साथ-साथ बने गाँवों में समूह बना कर रहते थे।
  • वे उतनी ही वस्तुओं का उत्पादन करते थे जो कि उनके निर्वाह के लिए आवश्यक थीं।

प्रश्न 6.
वेमपुम बेल्ट क्या थी ?
उत्तर:
वेमपुम बेल्ट रंगीन सीपियों को आपस में सिलकर बनाई जाती थी। यह बेल्ट कबीलों में आपसी समझौते के पश्चात् सम्मान के तौर पर आदान-प्रदान की जाती थी।

प्रश्न 7.
उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों को किन बातों का ज्ञान था ?
उत्तर:

  • वे जानते थे कि समय की गति चक्रीय है।
  • वे अपने इतिहास के बारे में पूरी जानकारी रखते थे।

प्रश्न 8.
यूरोपीय एवं मूल निवासियों में किन वस्तुओं का आदान-प्रदान होता था ?
उत्तर:

  • यूरोपीय केवल लोहे के बर्तन, बंदूकें एवं शराब मूल निवासियों को देते थे।
  • मूल निवासी यूरोपियों को मछली एवं रोएँदार खाल देते थे।

प्रश्न 9.
यूरोपीय लोगों को उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों पर किस बात ने अपनी शर्ते थोपने में सक्षम बनाया ?
उत्तर:
उत्तरी अमरीका के मूल निवासी शराब से परिचित नहीं थे। परंतु यूरोपियों ने उन्हें शराब देकर शराब पीने की आदत डाल दी। इस कारण शराब उनकी कमज़ोरी बन गई। उनकी इसी कमज़ोरी के कारण यूरोपीय लोगों को उन पर अपनी शर्ते थोपने के सक्षम बनाया।

प्रश्न 10.
यूरोप के लोगों को अमरीका के मूल निवासी असभ्य क्यों प्रतीत हुए ?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में यूरोपीय लोग तीन मापदंडों-साक्षरता, संगठित धर्म और शहरीपन के आधार पर विश्वास करते थे। इस दृष्टिकोण से उन्हें अमरीका के मूल निवासी असभ्य प्रतीत हुए।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

प्रश्न 11.
वाशिंगटन इरविंग ने अमरीका के मूल निवासियों के संबंध में क्या विचार प्रकट किए ?
उत्तर:

  • वे कविताओं में वर्णित अपने रूप से काफी भिन्न हैं।
  • वे गोरे लोगों की नीयत पर भरोसा नहीं करते हैं।
  • वे गोरे लोगों की नकल कर अपना मनोरंजन करते हैं।

प्रश्न 12.
यूरोपियों एवं अमरीका के मूल निवासियों में व्यापार संबंधी धारणा में प्रमुख अंतर क्या था ?
उत्तर:

  • यूरोपीय व्यापारी मछली एवं फर को व्यापारिक माल समझते थे। वे इसे बेचकर अधिक मुनाफा कमाना चाहते थे।
  • अमरीका के मूल निवासी चीज़ों के आदान-प्रदान को दोस्ती में दिए गए उपहार समझते थे।

प्रश्न 13.
अमरीकियों के लिए ‘फ्रंटियर’ के क्या मायने थे ?
उत्तर:
यूरोपियों द्वारा जीती गई एवं खरीदी गई भूमि के कारण विस्तार होता रहता था। इस कारण अमरीका की पश्चिमी सीमा पीछे खिसकती रहती थी। इस कारण अमरीका के मूल निवासियों को भी पीछे हटने के लिए बाध्य होना पड़ता था। वे राज्य की जिस सीमा तक पहुँच जाते थे उसे फ्रंटियर कहा जाता था।

प्रश्न 14.
19वीं शताब्दी में ब्रिटेन एवं फ्रांस के लोग अमरीका क्यों आए ?
उत्तर:
ब्रिटेन एवं फ्रांस में यह परंपरा थी कि केवल बड़े पुत्र को ही संपत्ति का अधिकार मिलता था। छोटे पुत्र संपत्ति का उत्तराधिकारी नहीं बन सकते थे। अतः ऐसे लोग संपत्ति की तलाश में 19वीं शताब्दी में अमरीका में आए।

प्रश्न 15.
यूरोपियों ने संयुक्त राज्य अमरीका में खेती के विकास के लिए कौन-से दो पग उठाए ?
उत्तर:

  • उन्होंने यहाँ जंगलों की सफाई की।
  • उन्होंने 1873 ई० में खेतों के चारों ओर कंटीली तारें लगा दी ताकि फ़सलों को जानवरों द्वारा सुरक्षित रखा जा सके।

प्रश्न 16.
दक्षिणी एवं उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के बीच के फर्कों से संबंधित किसी भी बिंदु पर टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
दक्षिणी अमरीका के लोग बड़े पैमाने पर खेती करते थे जबकि उत्तरी अमरीका के लोग ऐसा नहीं करते थे। इसके चलते उत्तरी अमरीका के लोग दक्षिणी अमरीका के लोगों की तरह किसी विशाल साम्राज्य का गठन नहीं कर सके।

प्रश्न 17.
यूरोपवासियों ने संयुक्त राज्य अमरीका में मूल निवासियों को बेदखल करने के कौन-से ढंग अपनाए ?
उत्तर:

  • उन्हें अपने मूल स्थान से पीछे हटने के लिए प्रेरित किया जाता अथवा धमकाया जाता था।
  • मूल निवासियों की जमीनों को बहुत कम मूल्य पर खरीदा जाता था।
  • मूल निवासियों की जमीनों पर यूरोपवासियों ने धोखे से कब्जा कर लिया।

प्रश्न 18.
चिरोकी कौन थे ? उनके साथ क्या अन्याय किया जा रहा था ?
उत्तर:

  • रोकी संयुक्त राज्य अमरीका के जॉर्जिया नामक राज्य का एक कबीला था।
  • उन्हें अंग्रेजों की जीवन शैली सीखने के बावजूद सभी प्रकार के नागरिक अधिकारों से वंचित रखा गया था।

प्रश्न 19.
यूरोपीय किस आधार पर संयुक्त राज्य अमरीका के मूल निवासियों की बेदखली को उचित ठहराते हैं ?
उत्तर:

  • वे बहुत आलसी थे। इसलिए वे बाज़ार के लिए उत्पादन करने में अपनी शिल्पकला का प्रयोग नहीं करते हैं।
  • वे अंग्रेज़ी नहीं सीखते एवं न ही ढंग के वस्त्र पहनते हैं।
  • वे ज़मीन का अधिकतम प्रयोग करना नहीं जानते हैं।

प्रश्न 20.
रिज़र्वेशंस से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
उत्तरी अमरीका में मूल निवासियों को छोटे-छोटे प्रदेशों में सीमित कर दिया गया था। यह प्रायः ऐसी ज़मीन होती थी जिनके साथ उनका पहले कोई नाता नहीं होता था। इन ज़मीनों को रिज़र्वेशंस कहा जाता था।

प्रश्न 21.
‘गोल्ड रश’ से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
उत्तरी अमरीका में ‘गोल्ड रश’ क्या था ?
उत्तर:
यूरोपीय लोगों को इस बात की आशा थी कि उत्तरी अमरीका में भी सोने के भंडार हैं। 1849 ई० में संयुक्त राज्य अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में सोने के कुछ चिन्ह मिले। इस कारण यूरोपियों में अमरीका पहुँचने की आपाधापी फैल गयी। इसे गोल्ड रश का नाम दिया गया।

प्रश्न 22.
गोल्ड रश संयुक्त राज्य अमरीका के लिए किस प्रकार एक वरदान सिद्ध हुआ ?
उत्तर:

  • संपूर्ण संयुक्त राज्य अमरीका में रेलवे लाइनों का निर्माण किया गया।
  • इस कार्य के लिए हजारों श्रमिकों को रोजगार मिला।
  • इससे उद्योगों को एक नया प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 23.
उत्तरी अमरीका में उद्योगों के विकास के कौन-से दो प्रमुख उद्देश्य थे ?
उत्तर:

  • रेलवे के लिए साज-सामान बनाना ताकि दूर-दूर के स्थानों को उसके द्वारा जोड़ा जा सके।
  • ऐसे यंत्रों का निर्माण करना जिनसे बड़े पैमाने पर खेती की जा सके।

प्रश्न 24.
संयुक्त राज्य अमरीका में जंगली भैंसों को किस नाम से जाना जाता था ? उनका कब तक पूरा सफ़ाया कर दिया गया ?
उत्तर:

  • संयुक्त राज्य अमरीका में जंगली भैंसों को बाइसन के नाम से जाना जाता था।
  • उनका 1890 ई० तक पूरी तरह उन्मूलन कर दिया गया।

प्रश्न 25.
संयुक्त राज्य अमरीका ने इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट कब पारित किया ? इसका उद्देश्य क्या था ?
अथवा
1934 ई० का इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट क्या था ?
उत्तर:

  • संयुक्त राज्य अमरीका ने इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट 1934 ई० में पारित किया।
  • इसका उद्देश्य रिज़र्वेशंस में रहने वाले मूल निवासियों को जमीन खरीदने एवं ऋण लेने का अधिकार प्रदान करना था।

प्रश्न 26.
डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइटस नामक दस्तावेज़ कब तैयार किया गया था ? इसका महत्त्व क्या था ?
उत्तर:

  • डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइटस नामक दस्तावेज़ 1954 ई० में तैयार किया गया था।
  • इसमें मूल निवासियों द्वारा यह कहा गया था कि वे संयुक्त राज्य अमरीका की नागरिकता को इस शर्त पर स्वीकार करेंगे कि उनके न तो रिज़र्वेशंस वापस लिए जाएँगे तथा न ही उनकी परंपराओं में हस्तक्षेप किया जाएगा।

प्रश्न 27.
टॉरस स्ट्रेट टापूवासी कौन थे ?
उत्तर:
टॉरस स्ट्रेट टापूवासी ऑस्ट्रेलिया के उत्तर में रहने वाला एक विशाल समूह है। उनके लिए ऐबॉरिजिनी शब्द का प्रयोग नहीं किया जाता क्योंकि ऐसा माना जाता है कि वे कहीं और से आए थे एवं उनकी नस्ल भी अलग है।

प्रश्न 28.
कैप्टन कुक कौन था ?
उत्तर:

  • वह इंग्लैंड का नाविक था।
  • वह 1770 ई० में ऑस्ट्रेलिया के टापू बॉटनी बे पहुंचा था।

प्रश्न 29.
ऑस्ट्रेलिया पहुँचने वाला प्रथम यात्री कौन था ? वह किस देश से संबंधित था ? वह ऑस्ट्रेलिया कब पहुँचा था ?
उत्तर:

  • ऑस्ट्रेलिया पहुँचने वाला प्रथम यात्री विलेम जांस था।
  • वह डच (हालैंड) देश से संबंधित था।
  • वह 1606 ई० में ऑस्ट्रेलिया पहुंचा था।

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प्रश्न 30.
1770 ई० में इंग्लैंड का कौन-सा नाविक ऑस्ट्रेलिया के किस टापू में पहुँचा था ? उसका क्या नाम रखा गया ?
उत्तर:

  • 1770 ई० में इंग्लैंड का नाविक जेम्स कुक ऑस्ट्रेलिया के टापू बॉटनी बे पहुंचा था।
  • इस टापू का नाम न्यू साउथ वेल्स रखा गया।

प्रश्न 31.
ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटेन ने अपनी प्रथम बस्ती कहाँ तथा कब स्थापित की ? इसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • ऑस्ट्रेलिया में ब्रिटेन ने अपनी प्रथम बस्ती 1788 ई० में सिडनी में स्थापित की।
  • यहाँ ब्रिटेन के अपराधियों को देश निकाले का दंड देकर भेजा जाता था।

प्रश्न 32.
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के प्रति ब्रिटिशों का क्या दृष्टिकोण था ?
उत्तर:
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के प्रति ब्रिटिशों का आरंभ में मैत्रीपूर्ण दृष्टिकोण था। मूल निवासी ब्रिटिशों की यथा संभव सहायता करते थे। 1779 ई० में ब्रिटिश नाविक की हवाई में किसी आदिवासी द्वारा हत्या कर दिए जाने के कारण उनके दृष्टिकोण में परिवर्तन आ गया एवं उनके प्रति कठोर रवैया अपनाया।

प्रश्न 33.
यूरोपवासियों ने ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक विकास के लिए कौन-से महत्त्वपूर्ण पग उठाए ?
उत्तर:

  • यहाँ भेड़ों के पालन के लिए विशाल फार्म बनाए गए।
  • यहाँ कृषि के विकास के लिए जंगलों की सफाई की गई।
  • यहाँ मदिरा बनाने हेतु अंगूर के विशाल बाग लगाए गए।

प्रश्न 34.
चीनी अप्रवासियों के प्रति ऑस्ट्रेलिया ने क्या नीति अपनाई ?
उत्तर:
1974 ई० तक ऑस्ट्रेलिया ने चीनी अप्रवासियों के प्रति कड़ी नीति अपनाई। उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे। 1974 ई० में उन्हें ऑस्ट्रेलिया में प्रवेश की अनुमति दे दी गई।

प्रश्न 35.
किसे तथा कब ऑस्ट्रेलिया की राजधानी बनाया गया ?
उत्तर:
कैनबरा को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी 1911 ई० में बनाया गया।

प्रश्न 36.
इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को शामिल क्यों नहीं किया गया था ?
उत्तर:
इतिहास की किताबों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को इसलिए शामिल नहीं किया गया था क्योंकि यूरोपवासी उनके प्रति शत्रुता की भावना रखते थे। उन्होंने अपनी किताबों पर यह दिखाने का प्रयास किया कि वहाँ के मूल निवासियों की न तो कोई परंपरा है एवं न ही कोई इतिहास।

प्रश्न 37.
डब्ल्यू० ई० एच० स्टैनर ने कब तथा किस पुस्तक की रचना की ? इसका विषय क्या था ?
उत्तर:

  • डब्ल्यू० ई० एच० स्टैनर ने 1968 ई० में दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस नामक पुस्तक की रचना की।
  • इसका विषय यूरोपवासियों में ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों की संस्कृति को जानने के लिए जागृति उत्पन्न करना था।

प्रश्न 38.
बहुसंस्कृतिवाद नीति से आपका क्या अभिप्राय है ? ऑस्ट्रेलिया ने इस नीति को कब अपनाया ?
उत्तर:

  • बहुसंस्कृतिवाद की नीति से अभिप्राय ऐसी नीति से है जिसमें मूल निवासियों, यूरोप एवं एशिया के अप्रवासियों की संस्कृति को बराबर का सम्मान दिया जाता था।
  • ऑस्ट्रेलिया ने इस नीति को 1974 ई० में अपनाया।

प्रश्न 39.
टेरा न्यूलिअस से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:

  • टेरा न्यूलिअस नीति से अभिप्राय ऐसी भूमि से था जो किसी की भी नहीं है।
  • ऑस्ट्रेलिया ने इस नीति का अंत 1992 ई० में किया था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
कनाडा के कितने प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं ?
उत्तर:
40 प्रतिशत।

प्रश्न 2.
कनाडा का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उद्योग कौन-सा है ?
उत्तर:
मछली उद्योग।

प्रश्न 3.
उत्तरी अमरीका के सबसे प्रथम निवासी किस रास्ते से आए थे ?
उत्तर:
बेरिंग स्ट्रेट्स।

प्रश्न 4.
उत्तरी अमरीका के जंगली भैंसों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
बाइसन।

प्रश्न 5.
क्या उत्तरी अमरीका के मूल निवासी ज़मीन पर अपनी व्यक्तिगत मलकियत जताते थे ?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 6.
उत्तरी अमरीका में कबीलों में आपसी समझौता होने पर वे किसका आदान-प्रदान करते थे ?
उत्तर:
वेमपुम बेल्ट का।

प्रश्न 7.
जॉन कैबोट न्यूफाऊँडलैंड कब पहुँचा ?
उत्तर:
1497 ई० में।

प्रश्न 8.
अंग्रेजों ने वर्जीनिया को अपना उपनिवेश कब बनाया ?
उत्तर:
1607 ई० में।

प्रश्न 9.
विलियम वड्सवर्थ कौन था ?
उत्तर:
इंग्लैंड का एक महान् कवि।

प्रश्न 10.
अमरीका के किस राष्ट्रपति ने उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों के उन्मूलन को सही बताया ?
उत्तर:
थॉमस जैफ़र्सन ने।

प्रश्न 11.
उत्तरी अमरीका में रोएँदार खाल प्राप्त करने के लिए यूरोपीय किस जानवर को बड़ी संख्या में मार रहे थे ?
उत्तर:
उदबिलाव को।

प्रश्न 12.
ब्रिटेन ने अमरीका में कितने उपनिवेशों की स्थापना की थी ?
उत्तर:
13.

प्रश्न 13.
अमरीका के उपनिवेशों ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता प्राप्ति की घोषणा कब की ?
उत्तर:
1776 ई० में।

प्रश्न 14.
संयुक्त राज्य अमरीका ने फ्रांस से लुइसियाना को कब खरीदा था ?
उत्तर:
1803 ई० में।

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प्रश्न 15.
संयुक्त राज्य अमरीका ने 1867 ई० में अलास्का को किस से खरीदा था ?
उत्तर:
रूस से।

प्रश्न 16.
अमरीकी फ्रंटियर का अंत कब हुआ ?
उत्तर:
1892 ई० में।

प्रश्न 17.
अमरीका में खेती के लिए कंटीले तारों का प्रयोग कब शुरू हुआ ?
उत्तर:
1873 ई० में।

प्रश्न 18.
अमरीका में दास प्रथा के अंत के लिए किसने उल्लेखनीय भूमिका निभाई ?
उत्तर:
अब्राहम लिंकन ने।

प्रश्न 19.
चिरोकी कहाँ के निवासी थे ?
उत्तर:
जॉर्जिया के।

प्रश्न 20.
चिरोकियों का उन्मूलन का सफर किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
आँसुओं की राह।

प्रश्न 21.
कनाडा में किन्होंने 1869 ई० से 1885 ई० के दौरान विद्रोह का झंडा बुलंद किया ?
उत्तर:
मेटिसों ने।

प्रश्न 22.
गोल्ड रश कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
1849 ई० में।

प्रश्न 23.
कनाडा में रेलवे का निर्माण कब पूरा हुआ ?
उत्तर:
1885 ई० में।

प्रश्न 24.
1928 ई० में किसकी अध्यक्षता में मूल निवासियों की समस्याओं को जानने के लिए एक सर्वेक्षण प्रकाशित हुआ ?
उत्तर:
लेवाइस मेरिअम।

प्रश्न 25.
इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट कब पारित हुआ था ?
उत्तर:
1934 ई० में।

प्रश्न 26.
अमरीकी मूल निवासियों के अधिकारों को सरकार द्वारा कब स्वीकृति दी गई ?
उत्तर:
1982 ई० में।

प्रश्न 27.
ऑस्ट्रेलिया में आदिमानव कब पहुँचा ?
उत्तर:
40,000 वर्ष पहले।

प्रश्न 28.
ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
ऐबॉरिजिनीज।

प्रश्न 29.
कौन-सा डच यात्री 1606 ई० में सर्वप्रथम ऑस्ट्रेलिया पहुँचा ?
उत्तर:
विलेम जांस।

प्रश्न 30.
किस वर्ष डच यात्री ए० जे० तास्मान ऑस्ट्रेलिया पहुँचा ?
उत्तर:
1642 ई० में।

प्रश्न 31.
जेम्स कुक बॉटनी बे कब पहुँचा था ?
उत्तर:
1770 ई० में।

प्रश्न 32.
जेम्स कुक ने बॉटनी बे का नाम क्या रखा ?
उत्तर:
न्यू साउथ वेल्स।

प्रश्न 33.
ब्रिटेन ने ऑस्ट्रेलिया में अपनी प्रथम बस्ती कहाँ स्थापित की ?
उत्तर:
सिडनी में।

प्रश्न 34.
किस घटना के चलते यूरोपवासियों एवं ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों के संबंधों में बिगाड़ आ गया ?
उत्तर:
जेम्स कुक की हत्या के कारण।

प्रश्न 35.
ऑस्ट्रेलिया में बड़ी संख्या में किन भेड़ों को पाला जाता था ?
उत्तर:
मैरिनो भेड़।

प्रश्न 36.
किस वर्ष तक गैर-गोरों को ऑस्ट्रेलिया से बाहर रखने की नीति अपनाई गई ?
उत्तर:
1974 ई० तक।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

प्रश्न 37.
1911 ई० में किसे ऑस्ट्रेलिया की राजधानी घोषित किया गया ?
उत्तर:
कैनबरा।

प्रश्न 38.
दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस का लेखक कौन था ?
उत्तर:
डब्ल्यू० ई० एच० स्टैनर।

प्रश्न 39.
हेनरी रेनॉल्डस की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:
व्हाई वरंट वी टोल्ड।

प्रश्न 40.
ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने बहु-संस्कृतिवाद की नीति को कब अपनाया ?
उत्तर:
1974 ई० में।

प्रश्न 41.
ऑस्ट्रेलिया ने टेरा न्यूलिअस नीति के अंत की घोषणा कब की ?
उत्तर:
1992 ई० में।

रिक्त स्थान भरिए

1. उत्तरी अमेरिका के सबसे प्रथम निवासी . …………….. वर्ष पूर्व एशिया से आए थे।
उत्तर:
30,000

2. उत्तरी अमेरिका के सबसे प्रथम निवासी ………………. के मार्ग से आए।
उत्तर:
बेरिंग स्ट्रेट्स

3. उत्तरी अमेरिका के मूल निवासी जिन जंगली भैंसों का शिकार करते थे उन्हें ………………. कहते थे।
उत्तर:
बाइसन

4. अंग्रेजों ने प्लाइमाउथ की खोज ……………….. में की।
उत्तर:
1620 ई०

5. अमेरिका द्वारा कंटीली तारों की खोज ………………. में की गई।
उत्तर:
1873

6. संयुक्त राज अमेरिका में ……………….. ई० में दास प्रथा का अंत किया गया।
उत्तर:
1865

7. संयुक्त राज अमेरिका में दास प्रथा का अंत ………………. के प्रयत्नों के परिणामस्वरूप हुआ।
उत्तर:
अब्राहम लिंकन

8. 1849 ई० में संयुक्त राज्य अमेरिका के ……………….. राज्य में सोने के कुछ चिह्न प्राप्त हुए थे।
उत्तर:
कैलीफोर्निया

9. आस्ट्रेलिया की खोज ………………. ने की थी।
उत्तर:
विलेम जांस

10. आस्ट्रेलिया की खोज ………………. ई० में की गई थी।
उत्तर:
1606

11. 1788 ई० में ब्रिटेन में स्थापित हुई प्रथम बस्ती का नाम ……………….. था।
उत्तर:
सिडनी

12. ऑस्ट्रेलिया में ……………….. नामक भेड़ों को अत्यधिक पाला जाता था।
उत्तर:
मैरिनो

13. 1911 ई० में ऑस्ट्रेलिया की राजधानी ……………….. को बनाया गया।
उत्तर:
कैनबरा

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

14. कैनबरा को ऑस्ट्रेलिया की राजधानी ……………….. ई० में बनाया गया।
उत्तर:
1911

15. ……………….. में ऑस्ट्रेलिया द्वारा टेरा न्यूलिअस नीति का त्याग कर दिया गया।
उत्तर:
1992 ई०

16. ‘दि ग्रेट आस्ट्रेलियन साइलेंस’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना ……………. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
डब्ल्यू. ई० एच० स्टैनर

17. ‘व्हाई वरंट वी टोल्ड’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना ………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
हेनरी रेनॉल्डस

18. आस्ट्रेलिया में ‘राष्ट्रीय क्षमा याचना दिवस’ मनाने की घोषणा ……… . में की गई।
उत्तर:
1999 ई०

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. उत्तरी अमरीका के पश्चिम क्षेत्र में कौन-सा मरुस्थल स्थित है ?
(क) मिसीसिपी
(ख) अरिज़ोना
(ग) ओहियो
(घ) अप्पालाचियाँ।
उत्तर:
(ख) अरिज़ोना

2. कनाडा के कितने प्रतिशत क्षेत्र में वन हैं ?
(क) 20%
(ख) 30%
(ग) 40%
(घ) 50%.
उत्तर:
(ग) 40%

3. निम्नलिखित में से कौन-सी फ़सल उत्तरी अमरीका की प्रमुख फ़सल नहीं है ?
(क) कपास
(ख) मकई
(ग) गेहूँ
(घ) फल।
उत्तर:
(क) कपास

4. उत्तरी अमरीका में जलवायु में स्थिरता कब आई ?
(क) एक हजार वर्ष पूर्व
(ख) दो हज़ार वर्ष पूर्व
(ग) तीन हजार वर्ष पूर्व ।
(घ) पाँच हजार वर्ष पूर्व।
उत्तर:
(घ) पाँच हजार वर्ष पूर्व।

5. उत्तरी अमरीका के लोग किसके माँस का अधिक प्रयोग करते थे ?
(क) बाइसन
(ख) लामा
(ग) अल्पाका
(घ) भेड़।
उत्तर:
(क) बाइसन

6. उत्तरी अमरीका के कबीले आपसी समझौता होने पर किस वस्तु का आदान-प्रदान करते थे ?
(क) वेमपुम बेल्ट का
(ख) चमड़े की बेल्ट का
(ग) फलों का
(घ) फूलों का।
उत्तर:
(क) वेमपुम बेल्ट का

7. एंड्रिउ जैक्सन किस देश के राष्ट्रपति थे
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) फ्राँस
(घ) अमेरिका।
उत्तर:
(घ) अमेरिका।

8. अमरीका स्वतंत्र देश कब बना ?
(क) 1776 ई० में
(ख) 1779 ई० में
(ग) 1786 ई० में
(घ) 1789 ई० में।
उत्तर:
(क) 1776 ई० में

9. रूसो किस देश का निवासी था ?
(क) अमरीका
(ख) इंग्लैंड
(ग) फ्राँस
(घ) चीन।
उत्तर:
(ग) फ्राँस

10. अमरीकी फ्रंटीयर का अंत किस वर्ष हुआ ?
(क) 1803 ई० में
(ख) 1852 ई० में
(ग) 1892 ई० में
(घ) 1902 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1892 ई० में

11. किस शताब्दी में यूरोपीय लोग संयुक्त राज्य अमरीका में आकर बसने लगे थे ?
(क) 15वीं शताब्दी में
(ख) 17वीं शताब्दी में
(ग) 18वीं शताब्दी में
(घ) 19वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(घ) 19वीं शताब्दी में।

12. संयुक्त राज्य अमरीका में दास प्रथा का अंत कब हुआ ?
(क) 1861 ई० में
(ख) 1865 ई० में
(ग) 1867 ई० में
(घ) 1875 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1865 ई० में

13. संयुक्त राज्य अमरीका से मूल निवासियों की बेदखली के लिए यूरोपवासियों ने कौन-सा ढंग अपनाया ?
(क) उन्हें हटने के लिए प्रेरित किया गया
(ख) उन्हें हटने के लिए धमकाया गया
(ग) उन्होंने मूल निवासियों के साथ धोखा किया
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

14. चिरोकी कहाँ के निवासी थे ?
(क) कुज़को के
(ख) जॉर्जिया के
(ग) अलास्का के
(घ) लुइसियाना के।
उत्तर:
(ख) जॉर्जिया के

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 10 मूल निवासियों का विस्थापन

15. किनके सफर की तुलना ‘आँसुओं की राह’ से की गई ?
(क) मार्को पोलो की
(ख) चिरोकियों की
(ग) मेटिसों की
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) चिरोकियों की

16. कनाडा कब स्वयत राज्यों का एक संघ बना ?
(क) 1837 ई० में
(ख) 1847 ई० में
(ग) 1857 ई० में
(घ) 1867 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1867 ई० में।

17. ‘कनाडा-इंडियस एक्ट’ कब. पास हुआ था ?
(क) 1717 ई० में
(ख) 1749 ई० में
(ग) 1856 ई० में
(घ) 1876 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1876 ई० में।

18. ये शब्द किसने कहे, “पुराने राष्ट्र घोंघे की चाल से सरकते हैं नया गणराज्य किसी एक्सप्रैस की गति से दौड़ रहा है।”
(क) जॉन मार्शल ने
(ख) एंड्रिउ जैकसन ने
(ग) एंड्रिउ कार्नेगी ने
(घ) थॉमस जैफ़सन ने।
उत्तर:
(ग) एंड्रिउ कार्नेगी ने

19. इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट कब पास हुआ ?
(क) 1930 ई० में
(ख) 1934 ई० में
(ग) 1936 ई० में
(घ) 1940 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1934 ई० में

20. 1934 ई० के इंडियन रीऑर्गेनाइजेशन एक्ट के अधीन उत्तरी अमरीका के मूल निवासियों को कौन-सा अधिकार दिया गया ?
(क) वोट डालने का
(ख) संपत्ति खरीदने के
(ग) राष्ट्रपति पद के चुनाव का
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) संपत्ति खरीदने के

21. डिक्लेरेशन ऑफ़ इंडियन राइट्स एक्ट कब पारित किया गया ?
(क) 1924 ई० में
(ख) 1934 ई० में
(ग) 1954 ई० में
(घ) 1982 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1954 ई० में

22. ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासी जिस प्रदेश में रहते थे, वह कहलाता था
(क) टॉरस स्ट्रेट टापूवासी
(ख) बेरिंग स्ट्रेट्स टापूवासी
(ग) क्यूबेक टापूवासी
(घ) वर्जीनिया टापूवासी।
उत्तर:
(क) टॉरस स्ट्रेट टापूवासी

23. ऑस्ट्रेलिया की खोज किसने की ?
(क) कोलंबस ने
(ख) ए० जे० तास्मान ने
(ग) विलेम जांस ने
(घ) फ्रांसीसिको पिज़ारो ने।
उत्तर:
(ग) विलेम जांस ने

24. जेम्स कुक किस देश का प्रसिद्ध नाविक था ?
(क) ऑस्ट्रेलिया का
(ख) इंग्लैंड का
(ग) पुर्तगाल का
(घ) डच का।
उत्तर:
(ख) इंग्लैंड का

25. आयरलैंड किस देश का उपनिवेश था ?
(क) अमेरिका
(ख) फ्राँस
(ग) इंग्लैंड
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(ग) इंग्लैंड

26. इंग्लैंड ने अपनी प्रथम बस्ती ऑस्ट्रेलिया में कहाँ स्थापित की थी ?
(क) बॉटनी बे में
(ख) न्यू साउथ वेल्स में
(ग) सिडनी में
(घ) तस्मानिया में।
उत्तर:
(ग) सिडनी में

27. ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कहाँ है ?
(क) सिडनी
(ख) कैनबरा
(ग) मेलबोर्न
(घ) डरबन।
उत्तर:
(ख) कैनबरा

28. ऑस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा कब बनाई गई ?
(क) 1880 में
(ख) 1899 में
(ग) 1903 में
(घ) 1911 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1911 ई० में।

29. डब्ल्यू० ई० एच० स्टैनर की प्रसिद्ध पुस्तक का नाम क्या था ?
(क) व्हाई वरंट वी टोल्ड
(ख) दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस
(ग) ऑन प्लेजर
(घ) दि रिवल्यूशनिबस।
उत्तर:
(ख) दि ग्रेट ऑस्ट्रेलियन साइलेंस

30. ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने बहु-संस्कृतिवाद की नीति को कब अपनाया ?
(क) 1968 ई० में
(ख) 1970 ई० में
(ग) 1972 ई० में
(घ) 1974 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1974 ई० में।

31. ज्यूडिथ राइट कौन थी ?
(क) ऑस्ट्रेलिया की लेखिका
(ख) फ्रांस की लेखिका
(ग) पुर्तगाल की विद्वान्
(घ) ब्रिटेन की कलाकार।
उत्तर:
(क) ऑस्ट्रेलिया की लेखिका

32. इंग्लैंड ने अपनी प्रथम बस्ती ऑस्ट्रेलिया में कहाँ स्थापित की थी ?
(क) बॉटनी बे में
(ख) न्यू साउथ वेल्स में
(ग) सिडनी में
(घ) तस्मानिया में।
उत्तर:
(ग) सिडनी में

33. ‘हमें बताया क्यों नहीं गया’ का लेखक कौन है ?
(क) कैप्टन कुक
(ख) हेनरी रेनॉल्डस
(ग) एडम स्मिथ
(घ) टेकुमेस।
उत्तर:
(ख) हेनरी रेनॉल्डस

34. ऑस्ट्रेलिया में टेरा न्यूलिअस नीति का अंत कब किया गया ?
(क) 1972 ई० में
(ख) 1982 ई० में
(ग) 1992 ई० में
(घ) 1999 ई० में ।
उत्तर:
(ग) 1992 ई० में

35. ऑस्ट्रेलिया में राष्ट्रीय क्षमायाचना दिवस कब मनाया जाता है ?
(क) 5 मार्च को
(ख) 26 मई को
(ग) 20 अगस्त को
(घ) 19 नवंबर को।
उत्तर:
(ख) 26 मई को

मूल निवासियों का विस्थापन HBSE 11th Class History Notes

→ 17वीं एवं 18वीं शताब्दियों में हालैंड, इंग्लैंड एवं फ्राँस ने उत्तरी अमरीका एवं ऑस्ट्रेलिया में अपने उपनिवेश स्थापित किए। जिस समय ये यूरोपीय वहाँ पहुँचे तो वहाँ के मूल निवासी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने बहुत गर्मजोशी से इन यूरोपियों का स्वागत किया। ये मूल निवासी बहुत सादा जीवन व्यतीत करते थे।

→ वे ज़मीन पर अपनी मलकियत का दावा नहीं करते थे। वे उतनी ही फ़सलों का उत्पादन करते जितनी उनके जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक होती थीं। वे प्रमुखतः मछली एवं माँस खाते थे। वे वस्तुओं के किए गए आदान-प्रदान को दोस्ती में दिए गए उपहार समझते थे। दूसरी ओर यूरोपीय व्यापार के उद्देश्य से एवं सोना प्राप्त करने के उद्देश्य से वहाँ पहुँचे थे।

→ आरंभ में उन्होंने मूल निवासियों के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाया। मूल निवासी उनके वास्तविक उद्देश्य को भांपने में विफल रहे। धीरे-धीरे जब यूरोपियों की शक्ति में वृद्धि हो गई तो उनका वास्तविक चेहरा मूल निवासियों के सामने आया। इन यूरोपियों ने मूल निवासियों पर अनेक जुल्म किए।

→ उन्हें सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित कर दिया गया। यहाँ तक कि उन्हें अपनी ज़मीनें छोडने के लिए भी बाध्य किया गया। इस प्रकार मल निवासी दर दर की ठोकरें खाने को मजबूर हुए। मूल निवासियों ने अपने अधिकारों को पाने के लिए अनेक बार विद्रोह किए किंतु उनका दमन कर दिया गया।

→ 20वीं शताब्दी में यूरोपवासियों में मूल निवासियों के प्रति एक नई चेतना उत्पन्न हुई। अतः उत्तरी अमरीका एवं ऑस्ट्रेलिया की सरकारों ने मूल निवासियों की संस्कृति एवं अधिकारों को मान्यता प्रदान की। निस्संदेह यह मूल निवासियों की एक महान् विजय थी।

→ किंतु यह दुःख की बात है कि इस समय तक मूल निवासियों की जनसंख्या बहुत कम रह गई है। वे शहरों में बहुत कम नज़र आते हैं। यहाँ तक कि ये लोग यह भी भूल चुके हैं कि कभी इन देशों के अधिकाँश हिस्से उनके अधीन थे।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है? यह क्राँति सर्वप्रथम इग्लैंड में क्यों आई?
अथवा
औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम ब्रिटेन में ही क्यों आई ? कारण बताइए।
उत्तर:
इंग्लैंड विश्व का प्रथम ऐसा देश था जहाँ 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति का सूत्रपात हुआ। इस क्राँति के कारणों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय

औद्योगिक क्राँति वह क्राँति थी जिसका आरंभ 18वीं शताब्दी में इंग्लैंड से हुआ। इस क्राँति से अभिप्राय उस क्राँति से था जिसमें वस्तुओं का उत्पादन हाथों की अपेक्षा बड़ी-बड़ी मशीनों द्वारा किया जाता था।

II. औद्योगिक क्रांति के कारण

इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. राजनीतिक स्थिरता एवं शाँति (Political Stability and Peace):
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में राजनीतिक स्थिरता एवं शाँति थी। इससे इंग्लैंड में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय (George III) ने अपने शासनकाल (1760 ई०-1820 ई०) के दौरान इंग्लैंड को एक औद्योगिक देश बनाने के अनेक प्रयास किए। उसके ये प्रयास काफी सीमा तक सफल सिद्ध हए।

2. शक्तिशाली नौसेना (Powerful Navy):
उस समय इंग्लैंड के पास अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले सबसे अधिक शक्तिशाली नौसेना थी। इसलिए उसे ‘समुद्रों की रानी’ (Mistress of the Seas) कहा जाता था। इस नौसेना के कारण वह एक ओर अपनी विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा कर सका वहीं दूसरी ओर वह सुगमता से अपने निर्मित माल का विदेशों को निर्यात कर सका। इससे औद्योगिकीकरण को एक नया प्रोत्साहन मिला।

3. इंग्लैंड के उपनिवेश (England’s Colonies):
इंग्लैंड विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था। अतः उसके यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका में अनेक उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों से उसे इंग्लैंड के उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल सस्ती दरों पर सुगमता से प्राप्त हो जाता था। दूसरी ओर इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा निर्मित माल को यहाँ ऊँची दरों पर बलपूर्वक बेचा जाता था। इस कारण इंग्लैंड के उद्योगों ने अभूतपूर्व उन्नति की।

4. पूँजी (Capital):
किसी भी देश में उद्योगों के विकास में पूँजी की प्रमुख भूमिका होती है। उस समय इंग्लैंड में पूंजी की कोई कमी नहीं थी। इसके तीन कारण थे। प्रथम, उस समय इंग्लैंड की कृषि ने उल्लेखनीय विकास किया था। दसरा, इंग्लैंड का विश्व व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित था। तीसरा, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से व्यापक पैमाने पर धन का दोहन किया।

अतः पूँजी की प्रचुरता ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर एस० एन० सेन के शब्दों में, “ब्रिटेन में उद्योगों के विकास का सबसे महत्त्वपूर्ण कारक 18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में पूँजी का एकत्र होना था। आर्थिक विकास की गति में तीव्रता तब आई जब पूँजी को कम ब्याज पर उपलब्ध कराया गया।

5. कषि क्राँति (Agricultural Revolution):
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति से पर्व कषि क्रांति आई। इसके दो महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े। प्रथम, इस क्राँति के कारण फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई। इस कारण उद्योगों की स्थापना के लिए आवश्यक धन प्राप्त हुआ। दूसरा, कृषि क्राँति की सफलता के लिए खेतों की बाढ़बंदी (enclosure of fields) की गई।

इस कारण बडे ज़मींदारों ने अपने खेतों के आस-पास स्थित छोटे किसानों की जमीनें खरीद लीं। इस कारण ज़मींदारों के अधीन खेतों के क्षेत्र में वृद्धि हो गई। इन खेतों में कृषि के आधुनिक ढंगों को अपनाना सुगम हो गया। किंतु दूसरी ओर इससे भूमिहीन किसानों की संख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी। बेकार हो जाने के कारण वे काम की तलाश में शहरों की ओर गये। यहाँ वे कारखानों में कम मज़दूरी पर काम करने के लिए बाध्य हुए। कम वेतन पर मजदूरों की उपलब्धता ने औद्योगिक क्रांति को प्रोत्साहित किया।

6. कुशल बैंक व्यवस्था (Efficient Banking System):
इंग्लैंड की कुशल बैंक व्यवस्था ने औद्योगिक क्रांति लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहाँ बैंक ऑफ़ इंग्लैंड (Bank of England) की स्थापना 1694 ई० में हुई थी। यह इंग्लैंड का केंद्रीय बैंक था। 1820 ई० तक इंग्लैंड में 600 से अधिक प्राँतीय बैंकों की स्थापना हुई। केवल लंदन में ही 100 से अधिक बैंक थे। इन बैंकों द्वारा बड़े-बड़े उद्योगों को स्थापित करने एवं उन्हें चलाने के लिए कम दरों पर धन उपलब्ध करवाया जाता था। इससे इंग्लैंड में औद्योगीकरण को बहुत प्रोत्साहन मिला।

7. विशाल बाज़ार (Vast Market):
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड आर्थिक रूप से बहुत खुशहाल था। इसका कारण यह था कि इंग्लैंड के पास घरेलू एवं विदेशों में बहुत बड़ा बाज़ार उपलब्ध था। अतः इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा तैयार माल की सुगमता से खपत हो जाती थी। कीमतों के कम होने के कारण उनके माल की बहुत माँग थी।

8. खनिज पदार्थ (Minerals):
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में वहाँ उपलब्ध खनिज पदार्थों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहाँ कोयला एवं लोहा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। सौभाग्यवश ये दोनों खनिज एक-दूसरे के निकट ही मिल जाते थे। इन्होंने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति का आधार तैयार किया। इनके अतिरिक्त यहाँ सीसा, ताँबा एवं टिन भी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था।

9. जनसंख्या में वृद्धि (Increase in Population):
इंग्लैंड में जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हो रही थी। यूरोप के जिन 19 शहरों की जनसंख्या 1750 ई० से 1800 ई० के मध्य दोगुनी हुई उनमें से 11 ब्रिटेन में थे। इनमें लंदन सबसे बड़ा शहर था। जनसंख्या में वृद्धि से वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई। इससे उत्पादन में वृद्धि करना आवश्यक हो गया। इससे औद्योगीकरण को बहुत प्रोत्साहन मिला।

10. वैज्ञानिक उन्नति (Scientific Progress):
इंग्लैंड यूरोप का प्रथम ऐसा देश था जहाँ अनेक नवीन आविष्कार हुए। परिणामस्वरूप अनेक नए यंत्रों एवं मशीनों का आविष्कार हुआ। ये आविष्कार औद्योगिक क्रांति के लिए एक रीढ़ की हड्डी सिद्ध हुए। यातायात एवं संचार के साधनों में हुई क्राँति ने औद्योगिक क्राँति को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्रांति के दौरान होने वाले आविष्कार एवं तकनीकी परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
18वीं शताब्दी को आविष्कारों का काल कहा जाता है। इस शताब्दी में कुल मिलाकर 26,000 आविष्कार हुए। इनमें से आधे से अधिक आविष्कार 1782 ई० से 1800 ई० के मध्य हुए थे। इन आविष्कारों ने कोयला एवं लोहा, कपास की कताई एवं बुनाई, भाप की शक्ति तथा नहरों और रेलों के विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। अत: इस अध्याय में केवल इनसे संबंधित विषयों पर ही चर्चा की जाएगी।

1. कोयला एवं लोहा (Coal and Iron):
किसी भी देश में औद्योगिक क्रांति संभव नहीं है जब तक वहाँ पर्याप्त मात्रा में कोयला एवं लोहा उपलब्ध न हो। कोयले से शक्ति उत्पन्न की जाती है। इसके महत्त्व को देखते हुए इसे काला सोना (Black Gold) एवं उद्योगों की जननी (Mother of Industries) कहा जाता है। लोहे से उद्योगों में प्रयोग की जाने वाली सभी मशीनों का निर्माण किया जाता है।

इंग्लैंड इस मामले में सौभाग्यशाली था कि वहाँ कोयला एवं लौह अयस्क (iron ore) पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध था। इसके बावजूद 18वीं शताब्दी तक वहाँ इस्तेमाल योग्य लोहे की कमी थी। लोहा प्रगलन (smelting) की प्रक्रिया द्वारा लौह खनिज में से शुद्ध तरल धातु (pure liquid metal) के रूप में निकाला जाता है। अनेक शताब्दियों तक प्रगलन प्रक्रिया के लिए काठ कोयले (charcoal) का प्रयोग किया जाता था। किंतु इससे अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। प्रथम, काठ कोयला लंबी दूरी तक ले जाते समय टूट जाया करता था।

दूसरा, काठ कोयले की अशुद्धता के कारण घटिया किस्म के लोहे का उत्पादन होता था। तीसरा, काठ कोयला पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं था क्योंकि जंगलों की बड़े पैमाने पर सफ़ाई कर दी गई थी। चौथा, काठ कोयला उच्च तापमान उत्पन्न करने में असमर्थ था।

(1) अब्राहम डर्बी प्रथम 1677-1717 ई० (Abraham Darby 1 1677-1717 CE) अब्राहम डर्बी प्रथम श्रीपशायर (Shropshire) का एक प्रसिद्ध लोह उस्ताद था। 1709 ई० में उसने लोहे के प्रगलन के लि सर्वप्रथम कोक (Coke) का प्रयोग किया। कोक कोयले का शुद्ध रूप था। इसके अनेक लाभ हुए। प्रथम, यह काठ कोयले से बहुत सस्ता पड़ता था।

दूसरा, इस कारण लोह उत्पादकों के लिए बड़ी धमन भट्ठियाँ (Blast furnance) लगाना संभव हुआ। इससे लोहे के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई। तीसरा, इन भट्ठियों से जो पिघला हुआ लोहा निकलता था उसकी गुणवत्ता (quality) पहले की अपेक्षा बहुत बढ़िया थी। इस आविष्कार के परिणामस्वरूप इंग्लैंड में लोहे का उत्पादन बहुत बढ़ गया। 1737 ई० में इंग्लैंड में लोहे का उत्पादन कुल 12,000 से 15,000 टन था। 1800 ई० में यह उत्पादन बढ़कर 2,50,000 टन हो गया। निस्संदेह इस आविष्कार ने इंग्लैंड के उद्योगों के लिए एक नए युग का श्रीगणेश किया।

(2) अब्राहम डर्बी द्वितीय 1711-1763 ई० (Abraham Darby II 1711-63 CE):
वह अब्राहम डर्बी प्रथम का पुत्र था। उसने 1755 ई० में ढलवाँ लोहे (pig-iron) से पिटवाँ लोहे (wrought iron) का विकास किया। यह लोहा ढलवाँ लोहे से कम भंगुर (less brittle) होता था। यह आविष्कार इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पग सिद्ध हुआ।

(3) जोन विल्किसन 1728-1808 ई० (John Wilkinson 1728-1808 CE):
जोन विल्किसन प्रथम व्यक्ति था जिसने अपनी धमन भट्ठी (blast furnance) के लिए 1776 ई० में जेम्स वाट के स्टीम इंजन (steam engine) का प्रयोग किया। यह प्रयोग बेहद सफल रहा। उसने सर्वप्रथम लोहे की कुर्सियाँ (iron chairs), शराब की भट्ठियों (distilleries) के लिए टंकियाँ (vats) तथा लोहे की अनेक प्रकार की पाइपें (pipes) बनाईं। इससे इंग्लैंड के लोहा उद्योग को एक नई दिशा मिली।

(4) हेनरी कोर्ट 1740-1800 ई० (Henry Court 1740-1800 CE):
हेनरी कोर्ट ने 1784 ई० में आलोड़न भट्ठी (puddling furmance) का आविष्कार किया जिसके द्वारा अधिक शुद्ध और अच्छा लोहा बनाना संभव हो गया। इससे लोहा उत्पादन के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। इस लोहे से अनेक प्रकार की नवीन मशीनें बनाना सुगम हो गया। इसका कारण यह था कि यह लोहा अधिक टिकाऊ था।

इसे रोज़मर्रा की वस्तुएँ एवं मशीनें बनाने के लिए लकड़ी का बेहतर विकल्प माना जाने लगा। लकड़ी के जल सकने एवं कटने-फटने (splinter) का ख़तरा रहता था। दूसरी ओर लोहे के भौतिक एवं रासायनिक गुणधर्म (properties) को नियंत्रित किया जा सकता था।

(5) अब्राहम डर्बी तृतीय 1750-91 ई० (Abraham Darby III 1750-91 CE):
वह अब्राहम डर्बी द्वितीय का पुत्र था। उसने 1779 ई० में कोलबुकडेल (Coalbrookdale) में सेवन (Severn) नदी पर विश्व का प्रथम लोहे का पुल बनाया। बाद में यह गाँव ‘आइरनब्रिज’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

(6) हैं फरी डेवी 1778-1829 ई० (Hamphry Davy 1778-1829 CE):
हैं फरी डेवी ने 1815 ई० में सेफ़टी लैंप (safety lamp) का आविष्कार किया। यह आविष्कार खानों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन को सुरक्षित बनाने में बहुमूल्य प्रमाणित हुआ।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 9 iMG 1
(7) हेनरी बेस्सेमर 1813-98 ई० (Henry Bessemer 1813-98 CE) :
हेनरी बेस्सेमर ने 1856 ई० में लोहे को शुद्ध करके इस्पात (steel) बनाने की विधि खोज निकाली। यह बेस्सेमर प्रक्रिया (Bessemer converter) के नाम से प्रसिद्ध हुई। शीघ्र ही इस्पात का उत्पादन बहुत बढ़ गया। इसने लोहे का स्थान ले लिया। लोहे से बनी मशीनें वज़नदार होती थीं। इनमें जंग भी लग जाता था। इस्पात अपेक्षाकृत हल्का एवं मजबूत होता था। इसमें जंग लगने की कोई संभावना नहीं होती थी।

उपरोक्त आविष्कारों के चलते ब्रिटेन के लोहा उद्योग ने हैरानीजनक प्रगति की। उसने 1800 ई० से 1830 ई० के मध्य अपने उत्पादन में चार गुना वृद्धि की। उसका लोहा यूरोप में अन्य देशों से सबसे सस्ता था। 1820 ई० में एक टन ढलवाँ लोहा (pig iron) बनाने के लिए 8 टन कोयले की आवश्यकता होती थी। 1850 ई० तक केवल 2 टन कोयले से ही एक टन ढलवाँ लोहा बनाया जाने लगा। इस समय तक ब्रिटेन में विश्व का सबसे अधिक लोहा पिघलाया (smelting) जाने लगा था।

2. कपास की कताई एवं बुनाई (Cotton Spinning and Weaving):
औद्योगिक क्रांति का आरंभ वस्त्र उद्योग से हुआ। यद्यपि यह उद्योग बहुत पुराना था किंतु इसमें शताब्दियों तक कोई विशेष उन्नति नहीं हुई थी। इसका कारण यह था कि सूत कातने (spinning) के लिए चरखे अथवा तकली का प्रयोग किया जाता था। एक व्यक्ति एक ही समय में केवल एक ही धागा बना सकता था। अत: एक बुनकर (weaver) को व्यस्त रखने के लिए आवश्यक धागा कातने वालों की ज़रूरत होती थी।

इसलिए कातने वाले दिन भर कताई के काम में लगे रहते थे जबकि बुनकर बुनाई के लिए धागे का इंतज़ार करते रहते थे। इस प्रक्रिया में बहुत समय बर्बाद होता था। धागा कातने का अधिकाँश काम स्त्रियों द्वारा किया जाता था। वे कड़ी मेहनत के बावजूद बहुत कम धागा बुन पाती थीं। अत: यह उद्योग वस्त्रों की बढ़ी हुई माँग की पूर्ति कर पाने में समर्थ नहीं था। 18वीं शताब्दी के मध्य में प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण आविष्कार हुए। इनके चलते वस्त्र उद्योग में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए।

अब उत्पादन का काम कताईगरों (spinners) एवं बुनकरों (weavers) के घरों से हट कर कारखानों में होने लगा। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “लंकाशायर के वस्त्र उद्योग में सबसे विलक्षण परिवर्तन देखने को मिला, यह अब तक अंग्रेजों की एक महत्त्वहीन कऊँटी थी जो कि अब इंग्लैंड के सबसे महत्त्वपूर्ण औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हुई।

(1) जॉन के 1704-64 ई० (John Kay 1704-64 CE):
जॉन के ने 1733 ई० में फ़लाइंग शटल (flying shuttle) का आविष्कार किया। इस आविष्कार ने वस्त्र उद्योग में एक क्रांति लाने का कार्य किया। इसकी सहायता से बहुत कम समय में अधिक चौड़ा कपड़ा तैयार करना संभव हो गया। इससे बुनकरों का कार्य बहुत सुगम हो गया। इस कारण उनके द्वारा किए जाने वाले चरखे का प्रयोग शीघ्र ही अलोप हो गया।

(2) जेम्स हरग्रीन 1720-78 ई० (James Hargreaves 1720-78 CE):
फ़लाइंग शटल के आविष्कार के कारण कपड़े का उत्पादन बहुत तीव्रता से होने लगा। इस कारण धागे की माँग बहुत बढ़ गई। इस समस्या से निपटने के लिए जेम्स हरग्रीब्ज़ ने 1764 ई० में स्पिनिंग जैनी (spinning jenny) का आविष्कार किया।

जैनी, जेम्स हरग्रीब्ज की पत्नी का नाम था। स्पिनिंग जैनी एक साथ आठ से दस धागे कात सकती थी। इससे बुनकरों को आवश्यक धागा समय पर मिलने लगा। निस्संदेह इस आविष्कार ने इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग को एक नई दिशा प्रदान की।

(3) रिचर्ड आर्कराइट 1732-92 ई० (Richard Arkwright 1732-92 CE):
स्पिनिंग जैनी में एक कमी थी। उसके द्वारा काता गया सूत कच्चा होता था। इस कारण यह बुनाई करते समय बार-बार टूटता रहता था। इस कमी को दूर करने के उद्देश्य से रिचर्ड आर्कराइट ने 1769 ई० में वॉटर फ्रेम (water frame) का आविष्कार
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किया। यह सर्वप्रथम सूत कातने वाली ऐसी मशीन थी जो कि हाथ की अपेक्षा जल शक्ति से चलती थी। इसके अनेक लाभ हुए। प्रथम, इससे धागे की कताई एवं बुनाई बहुत तेजी से की जाने लगी। दूसरा, इस मशीन द्वारा बनाया जाने वाला धागा पहले की अपेक्षा अधिक मजबूत था। तीसरा, इस मशीन को चलाने के लिए किसी विशेष कारीगर की आवश्यकता नहीं थी।

उसके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए ब्रिटेन के सम्राट् जॉर्ज तृतीय (George III) ने उसे सर (Sir) की उपाधि से सम्मानित किया। प्रसिद्ध इतिहासकार एच० ए० एल० फिशर का कहना ठीक है कि, “बहुत कम अंग्रेजों ने सभ्यता पर इतना गहन प्रभाव छोड़ा जितना कि इस उत्साही लंकाशायर ने।”

(4) सैम्यूअल काम्पटन 1753-1827 ई० (Samuel Crompton 1753-1827 C.E.):
सैम्यूअल क्राम्पटन ने 1779 ई० में स्पिनिंग जैनी एवं वॉटर फ्रेम को मिला कर म्यूल (mule) नामक एक महत्त्वपूर्ण मशीन का आविष्कार किया। यह बहुत बारीक एवं मज़बूत धागा कातती थी। अतः अब बढ़िया किस्म का एवं महीन कपड़ा तैयार किया जाने लगा। इसके द्वारा तैयार किया कपड़ा शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।

प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क किशलेस्की के अनुसार, “यह सूत उत्पादन के क्षेत्र में एक निर्णायक आविष्कार था।”4 जे० एच० बेंटली एवं एच० एफ० जाईगलर के शब्दों में, “म्यूल द्वारा मज़बूत एवं उत्तम प्रकार का बढ़िया धागा तैयार किया गया जो किसी भी मानव द्वारा चरखे से तैयार नहीं किया जा सकता था तथा यह बहुत तीव्रता से तैयार होता था।

एक मजदूर जो शक्ति चालित म्यूल का प्रयोग करता था औद्योगीकरण से पूर्व किसी मज़दूर द्वारा चरखे पर काते गए सूत से सौ गुना अधिक होता था।”

( एडमंड कार्टराइट 1743-1823ई0 (Edmund Cartwright 1743-1823 CE) एडमंड कार्टराइट एक पादरी था। उसने 1785 ई० में पॉवरलूम (powerloom) का आविष्कार किया था। इसे चलाना बहुत सुगम था। यह मशीन जब भी धागा टूटता अपने आप काम करना बंद कर देती थी। इस मशीन द्वारा किसी भी प्रकार के धागे की बुनाई की जा सकती थी। इसके द्वारा बहुत तेजी से कताई एवं बुनाई की जाती थी। अतः इंग्लैंड में बढ़िया किस्म का कपड़ा बहुत सस्ता मिलने लगा।

उपरोक्त आविष्कारों ने इंग्लैंड के वस्त्र उद्योग में एक क्रांति ला दी। 1815 ई० में इंग्लैंड में 2,50,000 बुनक हथकरघे (handloom) पर कार्य करते थे। नई मशीनों के आविष्कार के कारण 1860 ई० में इनकी संख्या कम होकर केवल 3,000 रह गई। वस्त्र उद्योग इंग्लैंड का एक शक्तिशाली उद्योग सिद्ध हुआ। 1830 ई० में इस उद्योग में 5 लाख लोग कार्यरत थे। यह उद्योग प्रमुखतः स्त्रियों एवं बच्चों पर निर्भर था। इस उद्योग के लिए कच्चे माल के रूप में आवश्यक कपास संपूर्ण रूप से आयात की जाती थी।

जब इसका कपड़ा तैयार हो जाता था तो इसका अधिकांश भाग उपनिवेशों के बाजारों में बेचने के लिए भेज दिया जाता था। मार्क किशलेस्की के अनुसार, “कपास उद्योग के कारखानों में संगठित होने से वहाँ के आर्थिक जीवन में भारी परिवर्तन हआ।” एक अन्य विख्यात इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “इन आविष्कारों का परिणाम यह हुआ कि लंकाशायर ने शुद्ध कपास से उत्तम वस्त्रों का उत्पादन आरंभ कर दिया एवं जिसने भारतीय उत्पादों को पछाड़ दिया। अब बुनकरों को धागा पर्याप्त मात्रा एवं इतना सस्त उपलब्ध हो गया कि वे अब पूरा समय काम में व्यस्त रहने लगे तथा उनका वेतन भी बहुत बढ़ गया।”

3. भाप की शक्ति (Steam Power):
भाप की शक्ति का आविष्कार निस्संदेह औद्योगिक क्रांति के लिए एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुआ। जल भी शताब्दियों तक द्रवचालित शक्ति (hydraulic power) के रूप में ऊर्जा का एक प्रमुख स्रोत रहा था। किंतु इस शक्ति का प्रयोग कुछ विशेष प्रदेशों, मौसमों एवं जल प्रवाह की गति (speed of flow of the water) के अनुसार सीमित रूप में ही किया जाता था। किंतु अब इसका प्रयोग भाप की शक्ति के रूप में किया जाने लगा। इससे अनेक प्रकार की मशीनों को चलाया जा सकता था। इसके अतिरिक्त इस पर खर्चा भी कम आता था।

(1) थॉमस सेवरी 1650-1715 ई० (Thomas Savery 1650-1715 CE):
भाप की शक्ति का सर्वप्रथम प्रयोग खनन उद्योगों (mining industries) के लिए किया गया। इस समय तक कोयले एवं धातुओं की माँग में बहुत वृद्धि हो रही थी। अतः उन्हें और भी अधिक गहरी खानों से निकालने के लिए प्रयास तीव्र हो गए। किंतु ऐसा करते समय एक विकट समस्या सामने आई।

यह समस्या थी कि जब खानों की गहराई की जाती थी तब वे अचानक पानी से भर जाती थीं। खानों के पानी को बाहर निकालने के लिए 1698 ई० में थॉमस सेवरी ने माइनर्स फ्रेंड (Miner’s Friend) नामक एक स्टीम इंजन बनाया। यह प्रयोग अधिक सफल नहीं रहा। इसके दो कारण थे-प्रथम, यह छिछली गहराइयों (shallow depths) में बहुत धीरे-धीरे काम करता था। दूसरा, दबाव के अधिक हो जाने के कारण उसका बॉयलर फट जाता था।

(2) थॉमस न्यूकॉमेन 1663-1729 ई० (Thomas Newcomen 1663-1729 CE):
थॉमस न्यूकॉमेन ने 1712 ई० में भाप का एक अन्य इंजन तैयार किया। इसका उद्देश्य भी खानों में से पानी बाहर निकालना था। यह भी अपने उद्देश्य में पूर्ण सफल नहीं हुआ। यह बहुत भारी था एवं इसकी बनावट बहुत भद्दी थी। इसमें काफी मात्रा में ईंधन नष्ट होता था। अतः यह लोकप्रिय न हो सका।

(3) जेम्स वॉट 1736-1819 ई० (James Watt 1736-1819 CE):
जेम्स वॉट एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने थॉमस न्यूकॉमेन के इंजन के दोषों का गहन अध्ययन किया। उसने 1769 ई० में एक नए भाप इंजन का निर्माण किया। इसमें न्यूकॉमेन के इंजन के सभी दोषों को दूर करने में सफलता प्राप्त की गई। इंजन कम खर्चीला था। यह बहुत उपयोगी एवं व्यावहारिक था।

इसका प्रयोग न केवल कोयला खानों अपितु दूसरे उद्योगों द्वारा भी किया गया। निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी। इसने औद्योगिक क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के शब्दों में, “एक नई एवं असीम शक्ति जो कि नई सभ्यता के लिए एक शक्तिशाली साधन सिद्ध हुई मानवता की सेवा के लिए प्रस्तुत की गई।”एक अन्य लेखक आर० एम० रेनर के अनुसार, “जेम्स वॉट एक महान् मार्गदर्शक था जिसने एक ऐसे इंजन का निर्माण किया जो अभी तक के इंजनों में सबसे शक्तिशाली था तथा जिसमें ईंधन बहुत कम लगता था।”

(4) मैथ्यू बॉल्टन 1728-1809 ई० (Matthew Boulton 1728-1809 CE):
मैथ्यू बॉल्टन एक धनी कुशल व्यापारी था। उसने 1775 ई० में जेम्स वॉट के साथ मिल कर बर्मिघम में ‘सोहो फाउँडरी’ (Soho Foundary) की स्थापना की। इसमें जेम्स वॉट द्वारा तैयार किए स्टीम इंजन बड़ी संख्या में तैयार किए जाने लगे। 1800 ई० तक ऐसे 289 इंजनों को तैयार कर बेचा गया था।

मैथ्यू बॉल्टन ने इन इंजनों के निर्माण के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स वॉट को उपलब्ध करवायी थी। इन इंजनों ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्राँति को एक नई दिशा प्रदान की। इसके महत्त्व का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि 1840 ई० में ब्रिटेन में बने भाप के इंजन ही संपूर्ण यूरोप में आवश्यक ऊर्जा की 70 प्रतिशत से अधिक अश्व शक्ति (horse power) का उत्पादन कर रहे थे। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० जी० कोफिन के अनुसार, “स्टीम इंजन प्रारंभिक 19वीं शताब्दी में औद्योगिक विस्तार में निस्संदेह निर्णायक थे।”10

4. नहरें एवं रेलें (Canals and Railways) :
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में नहरों एवं रेलों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इनके बिना इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति संभव ही न थी। इनके द्वारा ही उद्योगों द्वारा तैयार माल को तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर तथा कम खर्चे में पहुँचाया जा सका। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “ब्रिटिश लोग यातायात के साधनों के विकास के बिना धन उत्पादन की नई शक्तियों का पूर्ण लाभ नहीं उठा सकते थे।”

प्रश्न 3.
इंग्लैंड में वस्त्र उद्योग में क्रांति पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं 2 का भाग 2 देखें।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 4.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षित लाभ क्या-क्या हैं ?
अथवा
इंग्लैंड में नहरों एवं रेलों के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति के विकास में नहरों एवं रेलों ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इनके बिना इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति संभव ही न थी। इनके द्वारा ही उद्योगों द्वारा तैयार माल को तीव्र गति से एक स्थान से दूसरे स्थान पर तथा कम खर्चे में पहुँचाया जा सका। प्रसिद्ध इतिहासकार रैम्जे म्योर के अनुसार, “ब्रिटिश लोग यातायात के साधनों के विकास के बिना धन उत्पादन की नई शक्तियों का पूर्ण लाभ नहीं उठा सकते थे।”

1. नहरों का विकास

18वीं शताब्दी के दूसरे मध्य में इंग्लैंड में नहरों का निर्माण आरंभ हुआ। इनका प्रमुख उद्देश्य कोयले को शहरों में स्थित उद्योगों तक पहुँचाना था। इसमें सड़क मार्ग की अपेक्षा कम समय लगता था एवं खर्चा भी कम आता था। इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट (Duke of Bridgewater) एवं जेम्स ब्रिडले (James Brindley) ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई। ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवा की वर्सले (Worsley) में अनेक कोयला खाने थीं। वह यहाँ से अपने कोयले को निकट स्थित मैनचेस्टर (Manchester) में स्थापित उद्योगों तक कम खर्च में पहँचाना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1758 ई० में जेम्स ब्रिडले जो कि एक प्रसिद्ध इंजीनियर था के साथ परामर्श किया।

जेम्स ब्रिडले ने उसे वर्सले से मैनचेस्टर तक एक नहर का निर्माण करने का परामर्श दिया। ब्रिजवार ने इस परामर्श को स्वीकार किया तथा इस कार्य के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स ब्रिडले को उपलब्ध करवायी। जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में वर्सले कैनाल (Worsley Canal) का निर्माण कार्य आरंभ किया। इस नहर द्वारा वर्सले को मैनचेस्टर के साथ जोड़ा गया। यह नहर 10 मील लंबी थी। 1761 ई० में इस नहर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा इसे यातायात के लिए खोला गया। यह इंग्लैंड की प्रथम नहर थी।

निस्संदेह यह जेम्स ब्रिडले की एक महान सफलता थी। इस नहर के कारण कोयले की कीमतें आधी हो गईं। वर्सले कैनाल की महान् सफलता को देखते हुए जेम्स ब्रिडले ने मैनचेस्टर (Manchester) से लेकर लिवरपूल (Liverpool) तक एक अन्य नहर का निर्माण कार्य आरंभ किया। इसका निर्माण कार्य 1772 ई० पूर्ण हुआ। यह नहर 28 मील लंबी थी। इससे दोनों नगरों के मध्य की दूरी काफी कम हो गयी तथा सफ़र का खर्चा केवल छठा भाग ही रह गया। इससे जेम्स ब्रिडले की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। दुर्भाग्यवश उसकी 1772 ई० में मृत्यु हो गई।

जेम्स ब्रिडले की मृत्यु के पश्चात् इंग्लैंड में नहरों का निर्माण कार्य जारी रहा। नहरों के निर्माण के अनेक लाभ थे। प्रथम, ये नहरें जिन स्थानों पर बनीं वहाँ भूमि के मूल्य बहुत बढ़ गए। दूसरा, नहरों के कारण अनेक नए शहर अस्तित्व में आए। तोसरा, इससे उद्योगों को बहुत लाभ पहुंचा। चौथा, इनसे कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला। पाँचवां, यह नहरों एवं नावों का निर्माण करने वालों के लिए भी बहुत लाभकारी प्रमाणित हुईं।

1770 ई० के दशक से लेकर 1830 ई० के दशक को इंग्लैंड की नहरों के इतिहास का सुनहरा काल (Golden Age) अथवा नहरोन्माद (Canal mania) के नाम से जाना जाता है। इस काल के दौरान इंग्लैंड में अनेकानेक नहरें बनाई गईं तथा इस कार्य पर बहुत धन व्यय किया गया। इस काल के दौरान 4000 मील लंबी नहरों का निर्माण किया गया। इन नहरों में से मरसी (Mersey), ट्रेंट (Trent), सेवन (Severn) एवं थेम्स (Thames) नामक नहरें बहुत प्रसिद्ध हुईं। प्रसिद्ध इतिहासकार क्रिस हरमन “अंग्रेजों की नहरी व्यवस्था जिसने जल यातायात का कार्य किया ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति के लिए उस समय प्रमुख भूमिका निभाई जब सड़कों का निर्माण कार्य आरंभ ही हुआ था।”

1830 ई० के पश्चात् जब रेलों का निर्माण आरंभ हो गया तो नहरों का महत्त्व कम हो गया। इसके अतिरिक्त नहरों के कुछ हिस्सों में जलपोतों की भीड़भाड़ के कारण परिवहन की गति धीमी पड़ गई। पाले, बाढ़ या सूखे के कारण नहरों का प्रयोग का समय भी सीमित हो गया।

II. रेलों का विकास

19वीं शताब्दी में इंग्लैंड में रेलों के विकास ने एक नए युग का सूत्रपात किया। इसके ब्रिटेन के समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े।

1. रिचर्ड ट्रेविथिक 1771-1833 ई० (Richard Travithick 1771-1833 CE):
रिचर्ड ट्रेविथिक इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध इंजीनियर था। उसने 1801 ई० में एक इंजन का निर्माण किया जिसे ‘पफिंग डेविल’ (puffing devil) कहा जाता था। यह इंजन ट्रकों (trucks) को कॉर्नवाल में उस खान के चारों ओर खींचकर ले जाता था जहाँ रिचर्ड काम करता था। यह इंजन बहुत भारी था।

अत: यह लंबी दूरी तय करने में विफल रहा। 1804 ई० में ट्रेविथिक विश्व का प्रथम स्टीम इंजन तैयार करने में सफल रहा। इस इंजन को पेनीडारेन (penydarren) नाम दिया गया। यह इंजन 7 टन भारी था। प्रथम दिन इसने 9 मील का सफर तय किया। इसमें 5 रेल डिब्बे थे तथा इसमें 70 यात्री सवार थे। इसे भी विशेष सफलता प्राप्त न हुई।

इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, यह रेल इंजन भी बहुत भारी था। अत: यह कमज़ोर रेल लाइनों को तोड़ देता था। दूसरा, यह अधिक समय तक अपने में भाप नहीं रख सकता था। इसके बावजूद रिचर्ड ट्रेविथिक ने इंग्लैंड में रेलों की नींव रख कर एक महान् कार्य किया।

2. जॉर्ज स्टीफेनसन 1781-1848 ई० (George Stephenson 1781-1848 CE):
जॉर्ज स्टीफेनसन इंग्लैंड का एक महान् इंजीनियर था। रेलों के विकास में उसके उल्लेखनीय योगदान को देखते हुए उसे ‘रेलों का पितामा’ (Father of Railways) कहा जाता है। उसने 1814 ई० में भाप से चलने वाला ब्लचर (blutcher) नामक इंजन तैयार किया। इसे केवल कोयला ढोने के लिए तैयार किया गया था।

यह इंजन 30 टन भार का कोयला 4 मील प्रति घंटा की रफ्तार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था। यात्रियों के लिए सर्वप्रथम रेल 1825 ई० में स्टॉकटन (Stockton) एवं डालिंगटन (Darlington) शहरों के मध्य चलाई गई। इसके इंजन को रॉकेट (rocket) का नाम दिया गया। यह भाप से चलता था। यात्रियों के लिए इसमें 30 डिब्बे लगाए गए थे।

इस इंजन को जॉर्ज स्टीफेनसन ने स्वयं प्रथम 9 मील तक चलाया था। इस यात्रा को तय करने में उसे 2 घंटे लगे थे। बाद में इस इंजन को 15 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलाया गया। निस्संदेह यह एक महान् घटना थी। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “इस साहसिक कार्य की सफलता ने रेलों का एक बड़े पैमाने पर निर्माण का युग आरंभ किया।”

1830 ई० में लिवरपल एवं मैनचेस्टर को रेलमार्ग द्वारा जोड़ा गया। 15 सितंबर, 1830 ई० को इस रेलमार्ग को इंग्लैंड के प्रधानमंत्री ड्यूक ऑफ़ विलिंगटन (Duke of Wellington) द्वारा खोला गया। यहाँ चलने वाली रेलगाड़ी ने 30 मील प्रति घंटा की रफ्तार प्राप्त की। दुर्भाग्यवश पहले ही दिन जब इस रेलमार्ग को चलाया गया था तो इंग्लैंड के एक प्रसिद्ध सांसद हसकिरस्न (Huskirson) की इस रेल इंजन से टकरा कर मृत्यु हो गई थी।

जॉर्ज स्टीफेनसन ने जो सफलता प्राप्त की उस कारण वह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हो गया तथा उसे रेलवे के चीफ़ इंजीनियर के पद से सम्मानित किया गया। 1848 ई० में जेम्स स्टीफेनसन की मृत्यु हो गई।

3. स्टीफेनसन के बाद रेलों का विकास (The Developments of Railways after Stephenson):
जॉर्ज स्टीफेनसन की मृत्यु के पश्चात् भी रेलों के निर्माण का कार्य जारी रहा। 1830 ई० से 1850 ई० के मध्य ब्रिटेन में दो चरणों में 6,000 मील लंबे रेलमार्ग का निर्माण किया गया। आई० के० बरुनल (I.K. Brunel) ने रेल मागों के रास्ते में आने वाले पुलों एवं सुरंगों (tunnels) का निर्माण किया। 1841 ई० में ब्राडशाह ने यात्रियों की सुविधा के लिए प्रथम रेलवे टाइम टेबल को बनाया। 1846 ई० में ब्रिटेन की सरकार द्वारा रेलवे के संबंध में कुछ नियम पारित किए गए।

4. प्रभाव (Effects):
रेलों के आगमन से ब्रिटेन के समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इनके कारण ब्रिटेन में शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई। अतः अनेक बड़े-बड़े शहर अस्तित्व में आए। इनमें लंदन, ब्रिस्टल, मैनचेस्टर, लीड्स, लिवरपूल, वेल्स, बर्मिंघम एवं यार्कशायर आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इस कारण ब्रिटेन में गाँवों एवं छोटे शहरों का महत्त्व कम हो गया। रेलों के कारण लोगों के लिए कम खर्च एवं कम समय में सफर करना सुगम हो गया। इस कारण बड़ी संख्या में गाँवों के लोग नौकरी की तलाश में शहरों में आ गए।

अनेक लोग शहरों में ही बस गए। नए स्थान पर आने से उनके सामाजिक बंधन ढीले हो गए। रेलों के कारण लोग छुट्टियों में दूर सैर-सपाटे के लिए जाने लगे। यह उनके मनोरंजन के लिए एक बढ़िया साधन सिद्ध हुआ। रेलों द्वारा उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल कोयला, लोहा, कपास आदि कम खर्च पर पहुँचाना सुगम हो गया। इससे इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति को एक नया बल मिला। रेलों के कारण ही इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा तैयार माल को दूर स्थानों तक पहुँचाया जा सका। रेलों के निर्माण कार्य में बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्राप्त हुआ। निस्संदेह रेलों ने ब्रिटेन के समाज को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रांति के प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति विश्व की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना थी। इस क्रांति के दूरगामी परिणाम निकले। प्रसिद्ध इतिहासकार चार्ल्स ब्रयूनिंग के अनुसार, “औद्योगिक क्रांति ने निस्संदेह यूरोपियों के जीवन को इतना प्रभावित किया जितना कि फ्रांसीसी क्रांति ने भी नहीं किया था।”

1. सामाजिक प्रभाव (Social Effects)-औद्योगिक क्रांति के उल्लेखनीय सामाजिक प्रभाव पड़े।

(1) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन की जनसंख्या में असाधारण वृद्धि हुई। इसका कारण यह था कि अनेक वैज्ञानिक खोजों के कारण मृत्यु दर में काफ़ी कमी आ गई थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न हो गया। लोगों को रोजगार की तलाश में गाँवों को छोड़ कर शहरों में आना पड़ा। यहाँ परिवार के जिस सदस्य को जिस कारखाने में नौकरी मिलती वहीं काम करने लगता। इससे परिवार का विभिन्न सदस्यों पर नियंत्रण समाप्त हो गया।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण शहरों में जनसंख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी से कारखानों फ आस-पास मजदूरों के बस जाने से वहाँ गंदी बस्तियों की स्थापना हुई।

(4) औद्योगिक क्रांति के कारण मशीनों का प्रचलन बढ़ गया। अतः मजदूरों को कम वेतन पर कार्य करने के लिए विवश होना पड़ा।

(5) उद्योगों में छोटे छोटे बच्चे एवं स्त्रियाँ भी काम करती थीं। उनसे भी बहुत भयावह परिस्थितियों में काम कराया जाता था। काम करते समय यदि उनकी मृत्यु हो जाती तो कारखाना मालिक उन्हें किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं देता था।

(6) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मजदूरों में बँट गया था। दोनों वर्गों के जीवन स्तर में बहुत अंतर था।

2. आर्थिक प्रभाव (Economic Effects):
औद्योगिक क्रांति के महत्त्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव पड़े।

(1) औद्योगिक क्रांति के कारण बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा। अत: लोगों को उत्तम वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होने लगी। इससे लोगों के जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा काफ़ी सुधार हुआ।

(2) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप लघु उद्योगों का अंत हो गया।

(3) औद्योगिक क्राँति ने कृषि क्रांति को प्रोत्साहन दिया। अतः फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई।

(4) उत्पादन में वृद्धि के कारण घरेलू एवं विदेशी व्यापार को एक नई दिशा मिली। इससे लोग बहुत समृद्धशाली हुए।

(5) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों में अद्वितीय विकास हुआ। इससे जहाँ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की एवं माल की आवाजाही भी सुविधाजनक हो गयी।

(6) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल की तथा तैयार माल को बेचने के लिए मंडियों की आवश्यकता हुई। अतः ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी नीति को अपनाया

(7) औद्योगिक क्रांति के कारण अनेक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन हुआ जिन्होंने मानव जीवन को सुखी एवं सुविधाजनक बना दिया।

(8) औद्योगिक क्रांति ने पूँजीवाद एवं बैंक प्रणाली को जन्म दिया।

3. राजनीतिक प्रभाव (Political Effects) औद्योगिक क्राँति ने ब्रिटेन के राजनीतिक जीवन को एक नई दिशा प्रदान की।

(1) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन एक धनी एवं शक्तिशाली देश बना। इस कारण वह फ्रांस एवं नेपोलियन के साथ दीर्घकालीन युद्ध करने में सक्षम हुआ। नेपोलियन के पतन में ब्रिटेन की प्रमुख भूमिका थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण अनेक नए नगर अस्तित्व में आए। इन नगरों को संसद् में प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं था। अतः संसदीय सुधारों की माँग बल पकड़ने लगी।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों का विकास हुआ। इससे राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन मिला।

(4) औद्योगिक क्राँति ने स्वतंत्रता, समानता, सामाजिक न्याय एवं समाजवाद आदि नए राजनीतिक विचारों को जन्म दिया।

(5) औद्योगिक क्राँति ने साम्राज्यवाद की भावना को जन्म दिया। इस कारण विभिन्न साम्राज्यवादी देशों में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने के लिए एक होड़ सी लग गयी। इस होड़ के विनाशकारी परिणाम निकले।

(6) पूँजीपतियों द्वारा मजदूरों का घोर शोषण किया गया। इससे उनमें एक नई जागृति उत्पन्न हुई। अतः उन्होंने अपनी मांगों के समर्थन में श्रमिक संघों (Trade Unions) के निर्माण के लिए एक लंबा संघर्ष चलाया। अंततः उन्हें सफलता प्राप्त हुई।

प्रश्न 6.
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा?
अथवा
ब्रिटेन में स्त्रियों के भिन्न-भिन्न वर्गों के जीवन पर औद्योगिक क्रांति का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप स्त्रियों की दशा भी अत्यंत दयनीय हो गई। इस क्राँति से पूर्व स्त्रियाँ कृषि कार्यों में सक्रिय हिस्सा लेती थीं। वे पशुओं की देखभाल करती थीं। वे वनों से लकड़ियाँ इकट्ठी करती थीं। वे अपने घरों में चरखे चला कर सूत कातने का कार्य भी करती थीं। औद्योगिक क्रांति के कारण उनके जीवन में भारी परिवर्तन आया। पुरुषों को शहरों में स्थापित कारखानों में मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ा।

क्योंकि उनका वेतन इतना कम था कि परिवार का पालन-पोषण करना उनके बस की बात नहीं थी अतः स्त्रियों को भी कारखानों में काम करने के लिए विवश होना पड़ा। कारखानों में स्त्रियों को बहुत भयानक परिस्थितियों में काम करना पड़ता था। उन्हें यहाँ एक ही प्रकार का कार्य 16 से 18 घंटों तक करना पड़ता था। यद्यपि वे कठोर परिश्रम करती थीं अपितु उन्हें पुरुषों की अपेक्षा बहुत कम वेतन मिलता था। कारखानों के मालिक अपना दिल बहलाने के लिए अक्सर उनका यौन शोषण करते थे।

गर्भवती होने पर उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता था क्योंकि वे कुशलतापूर्वक काम करने के योग्य नहीं रहती थीं। कुछ स्त्रियों कोयला खानों में भी काम करती थीं। यहाँ काम करने की परिस्थितियाँ कारखानों से भी भयानक थीं। यहाँ उन्हें घोर अंधेरे में कार्य करना पड़ता था। उन्हें अपनी पीठ पर रख कर कोयले का भारी वज़न भी ढोना पड़ता था।

खानों में विस्फोट हो जाने से अक्सर उनकी मृत्यु हो जाती थी अथवा वे घायल हो जाती थीं। ऐसी स्थिति में खानों के मालिक उन्हें किसी प्रकार का कोई मुआवजा नहीं देते थे। इनके अतिरिक्त अनेक स्त्रियाँ घरों में नौकरानियों के तौर पर अथवा दुकानों में सहायक के तौर पर कार्य करती थीं। घरों के मालिक अथवा उनके पुत्र एवं दुकानदार उनके साथ नाजायज संबंध स्थापित कर लेते थे। इंकार करने वाली स्त्रियों को नौकरी से निकाल दिया जाता था।

अनेक स्त्रियाँ मज़बूरीवश वेश्यावृत्ति के दलदल में फंस गई थीं। स्त्रियों को अपने कार्य के अतिरिक्त अपने घरों का कार्य भी देखना पड़ता था। अतः उन्हें आराम करने का अवसर बहुत कम प्राप्त होता था। आय के कम होने के कारण प्रायः पति-पत्नी एवं बच्चों में झगड़े होते रहते थे। संक्षेप में, औद्योगिक क्रांति के दौरान स्त्रियों की स्थिति नरक समान थी।

प्रश्न 7.
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के दौरान हुए विरोध आंदोलन की चर्चा कीजिए।
अथवा
औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटेन में हुए श्रमिक आंदोलनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
इंग्लैंड में औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप वहाँ कारखानों एवं खानों में काम करने वाले मजदूरों की दशा पशुओं से भी बदतर हो गई। अतः वे अन्य मांगों के अतिरिक्त मताधिकार प्राप्त करने के लिए आंदोलन कर रहे थे। ब्रिटेन की सरकार मजदूरों के किसी प्रकार के आंदोलन को सहन करने को तैयार नहीं थी। अतः उसने मजदूरों के प्रति दमनकारी नीति अपनाई।

1. जुड़वाँ अधिनियम 1799-1800 ई० (Combination Acts 1799-1800 CE):
ब्रिटेन की सरकार ने 1799 ई० एवं 1800 ई० में दो नियम पारित किए। इन्हें जुड़वाँ अधिनियम कहा जाता है। इन अधिनियमों के अधीन ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब मजदूर अपनी मजदूरी बढ़ाने के लिए अथवा काम के घंटों को कम करने के लिए एक-दूसरे को सहयोग नहीं कर सकते थे।

वे भाषण या लेखन द्वारा सम्राट्, संविधान अथवा सरकार के विरुद्ध नफ़रत नहीं फैला सकते थे। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने की व्यवस्था की गई। 1824 ई० में सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को रद्द कर दिया। अब मजदूरों को ब्रिटेन में ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया।

2. अनाज कानून 1815 ई० (Corn Laws 1815 CE):
1815 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने अनाज कानून पारित किए। इन कानूनों के अधीन जब तक ब्रिटेन में अनाज की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो जाए तब तक विदेश से अनाज के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इसके परिणामस्वरूप ब्रिटेन में अनेक वस्तुओं का अभाव हो गया एवं उनकी कीमतों में बहु जीवन को और भी अधिक भर बना दिया। अतः वे अनाज कानून पर लगे प्रतिबंध को हटाने की माँग करने लगे।

उस समय अधिकाँश सांसद भू-स्वामी थे इसलिए उन्होंने अनाज कानून का समर्थन किया। अत: विवश हो कर मजदूरों ने मैनचेस्टर में 1839 ई० में अनाज कानून विरोधी लीग (Anti-Corn Laws League) का निर्माण किया। इस लीग के दो प्रमुख सदस्य रिचर्ड काब्डन एवं जॉन ब्राइट (John Bright) थे। इस लीग ने अनाज कानून को रद्द किए जाने की अपनी माँग को जारी रखा। अंत में उनका आंदोलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री राबर्ट पील (Robert Peel) ने 1845 ई० में अनाज कानून को रद्द करने की घोषणा की।

3. ब्रैड के लिए दंगे (Riots for Bread):
औद्योगिक क्रांति के कारण शहरों में काम करने वाले मजदूरों की संख्या में भारी वृद्धि हो गई थी। उन्हें कारखानों में जिन भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता था उस कारण उनमें घोर रोष था। 1793 ई० में इंग्लैंड का फ्रांस के साथ एक दीर्घकालीन युद्ध आरंभ हो गया। इस युद्ध के परिणामस्वरूप ब्रिटेन में ब्रैड जो कि गरीबों का मुख्य आहार था की कीमतें आसमान छूने लगीं। इससे मजदूरों के धैर्य का बाँध टूट गया। उन्होंने ब्रैड के लिए सारे देश में दंगे आरंभ कर दिए। ऐसे दंगों का सिलसिला 1840 ई० के दशक तक चलता रहा।

4. बाड़ा पद्धति (Enclosure):
1770 ई० के दशक में ब्रिटेन में पारित किए गए बाड़ा पद्धति अथवा चकबंदी अधिनियमों ने वहाँ के गरीब लोगों में घोर रोष उत्पन्न किया। इनके अधीन शक्तिशाली ज़मींदारों ने छोटे छोटे किसानों के फार्मों को अपने बडे फार्मों में मिला लिया। इस बाडा पद्धति के कारण बडे जमींदारों को बहत लाभ पहुँचा। दूसरी ओर यह छोटे किसानों के लिए बहुत विनाशकारी सिद्ध हुई।

इस कारण वे बेरोजगार हो गए। वे न्यूनतम वेतन पर कारखानों में काम करने के लिए बाध्य हुए। इससे उनका जीवन दूभर हो गया। 1790 के दशक से वे अपने वेतन में वृद्धि की माँग करने लगे। संसद् ने उनकी माँग को स्वीकार न किया। अत: वे हड़ताल पर चले गए। सरकार ने उन्हें जबरन खदेड़ दिया।

5. लुडिज्म 1811-17 ई० (Luddism 1811-17 CE):
लुडिज्म 1811 ई० से 1817 ई० के मध्य इंग्लैंड में चलने वाला एक प्रसिद्ध आंदोलन था। इस आंदोलन को इंग्लैंड के कपड़ा मजदूरों द्वारा चलाया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व जनरल नेड लुड (General Ned Ludd) ने किया। इस आंदोलन की अनेक माँगें थीं

  • मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • स्त्रियों एवं बच्चों के काम करने के समय को कम किया जाए एवं उन्हें ख़तरनाक मशीनों पर न लगाया जाए।
  • मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार हो ।

सरकार के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने वस्त्र मशीनों को नष्ट किया। वे इन मशीनों को उनके सभी कष्टों के लिए उत्तरदायी मानते थे। लुडिवादी (Luddites) अपने चेहरे को ढक कर रखते थे तथा वे अपनी कार्यवाही प्रायः रात के समय करते थे। उन्हें साधारण लोगों का काफी समर्थन प्राप्त था।

इस आंदोलन का आरंभ 1811 ई० में नोटिंघम (Notingham) से हुआ था। इसके पश्चात् यह ब्रिटेन के अनेक अन्य प्रसिद्ध शहरों में फैल गया। आंदोलनकारियों ने अनेक सूती एवं ऊनी वस्त्र की मिलों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया। सरकार इसे कभी सहन करने को तैयार नहीं थी। अत: उसने दमन की नीति अपनाते हुए 1813 ई० में 14 लुडिवादियों को फाँसी पर चढ़ा दिया तथा अनेकों को बंदी बना कर ऑस्ट्रेलिया में भेज दिया।

6. पीटरलू नरसंहार 1819 ई० (Peterloo Massacre 1819 CE):औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मजदूरों का जीवन नरक समान हो गया था। 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में निवास करते थे। वे अर्द्धनग्न घूमते रहते थे। उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखा गया था।

16 अगस्त, 1819 ई० को 80,000 लोग मैनचेस्टर के सेंट पीटर्स (St. Peters) के मैदान में शांतिपूर्वक एकत्र हुए। उनका उद्देश्य अनाज कानूनों के विरुद्ध अपना विरोध जारी करना था तथा वोट के अधिकार, ट्रेड यूनियन बनाने के अधिकार, सार्वजनिक सभाएँ करने तथा प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार की माँग करना था। इस आंदोलन के प्रसिद्ध नेता रिचर्ड कारलाइल (Richard Carlile), जॉन कार्टराइट (John Cartwright) तथा हेनरी हंट (Henry Hunt) थे। सरकार इस शाँतिमय जनसभा को भी सहन करने को तैयार नहीं थी।

अतः सरकार ने वहाँ घुड़सवार सेना भेज दी। इस सेना ने वहाँ लोगों को तितर-बितर (disperse) करने के उद्देश्य से गोलियाँ चला दीं। इसे पीटरलू नरसंहार के नाम से जाना जाता है। इसमें 11 लोगों की मृत्यु हुई एवं 400 से अधिक घायल हुए। इस नरसंहार के कारण संपूर्ण ब्रिटेन में रोष की लहर फैल गई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 8.
इंग्लैंड में कानूनों के जरिये मजदूरों की दशा सुधारने के लिए क्या प्रयास किए गए ? क्या ये सफल सिद्ध हुए ?
उत्तर:
ब्रिटेन में काम करने वाले सभी मज़दूर जिनमें स्त्रियाँ एवं बच्चे भी सम्मिलित थे बहुत शोचनीय जीवन व्यतीत कर रहे थे। दिनभर कठोर परिश्रम करने के बावजूद उन्हें दो समय भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में रहते थे। उनकी दशा सुधारने हेतु इंग्लैंड की सरकार द्वारा अनेक कानून पारित किए गए। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. कारखाना अधिनियम 1802 ई० (Factory Act of 1802 CE):
इंग्लैंड में कारखानों में काम करने वाले मजदूरों विशेष तौर पर स्त्रियों एवं बच्चों की दशा सुधारने के उद्देश्य से 1802 ई० में प्रथम कारखाना अधिनियम पारित किया गया था। इसकी प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • कारखाना मालिकों को नियमों की पालना अवश्य करनी चाहिए।
  • कारखानों के सभी कमरे हवादार हों।
  • किसी भी बच्चे से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • किसी भी बच्चे को रात्रि में कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • रविवार के दिन सभी बच्चों को दो घंटे ईसाई धर्म के बारे में जानकारी देनी चाहिए।

मिल मालिक इस बात का ध्यान रखें कि उनके कारखाने में किसी प्रकार की कोई महामारी न फैले। यदि कोई कारखाना मालिक उपरोक्त नियमों की पालना नहीं करता है तो उस पर 2 से 5 पौंड तक जुर्माना लगाया जाए। निस्संदेह 1802 ई० का कारखाना अधिनियम मजदूरों की दशा सुधारने के लिए किया गया एक अच्छा प्रयास था। किंतु यह अधिनियम अपने उद्देश्य में अधिक सफल न रहा। इसका कारण यह था कि कारखानों की निष्पक्ष जाँच करने के लिए इंस्पेक्टरों का उचित प्रबंध न था।

2. कारखाना अधिनियम 1819 ई० (Factory Act of 1819 CE):
1819 ई० में दूसरा कारखाना अधिनियम पारित किया गया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर लगाने की पाबंदी लगा दी गई।
  • 9 से 16 वर्ष के बच्चों से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • बच्चों को रात्रि में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को भोजन के लिए 1.30 घंटे का विश्राम दिया जाए।

3. कारखाना अधिनियम 1833 ई० (Factory Act of 1833 CE):
1832 ई० में इंग्लैंड में प्रथम सधार अधिनियम पारित किया गया था। इस अधिनियम द्वारा मजदूरों की माँगों की उपेक्षा की गई थी। इस कारण उनमें घोर असंतोष था। उन्हें संतुष्ट करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1833 ई० में एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 13 से 17 वर्ष के बच्चों से 10 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • 9 से 13 वर्ष के बच्चों से 9 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को कम-से-कम 2 घंटे स्कूल भेजना अनिवार्य कर दिया गया।
  • कारखानों के निरीक्षण के लिए नियमित इंस्पेक्टर नियुक्त किए गए। उन्हें कारखाना मालिकों को नियमों की उल्लंघना करने पर दंड देने का अधिकार दिया गया।

4. खान अधिनियम 1842 ई० (Mines Act of 1842 CE):
उपरोक्त सभी कारखाना अधिनियम वस्त उद्योगों पर लागू होते थे। खानों में काम करने वालों की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया था। वे बहुत भयाव स्थितियों में काम करते थे। लॉर्ड एशले (Lord Ashley) की प्रार्थना पर सरकार ने 1842 ई० में एक शाही कमीश का गठन किया। इस कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने 1842 ई० में खान अधिनियम पारित किया। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • इसने खानों में स्त्रियों के काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • इसने 10 वर्ष से कम बच्चों के खानों में काम करने की मनाही कर दी।
  • खानों का निरीक्षण करने के लिए नियमित इंस्पेक्टरों को नियुक्त किया गया।

इस अधिनियम का विशेष महत्त्व है। इसके अनुसार खानों में काम करने वालों की दशा में सुधार करने हेतु सरकार ने प्रथम प्रयास किया था।

5. कारखाना अधिनियम 1844 ई० (Factory Act of 1844 CE):
1844 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया था। यह अधिनियम भी वस्त्र उद्योग से संबंधित था। इस अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 8 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर नहीं लगाया जा सकता।
  • 8 वर्ष से 13 वर्ष के बच्चों से एक दिन में 6.30 घंटों से अधिक काम नहीं लिया जा सकता।
  • स्त्रियों एवं युवकों से एक दिन में 12 घंटों से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस समय के दौरान उन्हें भोजन के लिए 1.30 घंटे का अवकाश होगा।
  • ख़तरनाक मशीनों के चारों ओर जंगले (fence) लगाए जाएँ।
  • बच्चों को ख़तरनाक मशीनों की सफाई के काम पर न लगाया जाए।
  • कारखानों में काम करने वालों की आयु संबंधी जाँच की जाए।
  • कारखानों में होने वाली सभी दुर्घटनाओं की जाँच होनी चाहिए।

6. कारखाना अधिनियम 1847 ई० (Factory Act of 1847 CE):
इंग्लैंड में मजदूर काफी समय से 10 घंटे काम की माँग कर रहे थे। अंत में सरकार ने उनकी यह माँग स्वीकार कर ली। अत: 1847 ई० का कारखाना अधिनियम पारित किया गया। इसके अनुसार कारखानों में काम करने वाले पुरुषों एवं स्त्रियों के लिए 10 घंटे प्रतिदिन निश्चित कर दिए गए।

7. कारखाना अधिनियम 1867 ई० (Factory Act of 1867 CE):
1867 ई० में ब्रिटेन की सरकार ने एक अन्य कारखाना अधिनियम पारित किया। इसका विशेष महत्त्व इस बात में है कि इस अधिनियम को सभी प्रकार के कारखानों में लागू किया गया था। इसके अनुसार वस्त्र उद्योग में लागू सभी नियम अब अन्य उद्योगों पर भी लागू होते थे।

8. कारखाना अधिनियम 1878 ई० (Factory Act of 1878 CE):
1878 ई० के कारखाना अधिनियम की प्रमुख धाराएँ निम्नलिखित थीं

  • 10 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • 10 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य हो।
  • 10 से 14 वर्ष तक के बच्चों से 5 घंटे तक काम लिया जा सकता था।
  • स्त्रियों के लिए सप्ताह में काम करने के लिए 56 घंटे निश्चित कर दिए गए।

उपरोक्त अधिनियमों के द्वारा कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की दशा सुधारने का सरकार द्वारा प्रयास किया गया। किंतु इन प्रयासों को कोई विशेष सफलता प्राप्त न हुई। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, कारखानों में नियमों के प्रावधानों को लागू करवाने के लिए इंस्पेक्टरों को नियुक्त किया गया था। इन इंस्पेक्टरों के वेतन बहुत कम थे।

अत: वे कारखाना मालिकों से रिश्वत ले लेते थे एवं उनके विरुद्ध कोई रिपोर्ट नहीं देते थे। दूसरा, बच्चों के माता-पिता भी उनकी आयु के बारे में झूठ बोल कर उन्हें काम पर लगवा देते थे। ऐसा वे घर का खर्च चलाने में सहायता के लिए करते थे। प्रसिद्ध इतिहासकारों डब्ल्यू० के० फर्गुसन एवं जी० बरुन के शब्दों में, “ऐसे सुधार एक गहरी बुराई के लिए कमज़ोर उपाय थे।”

प्रश्न 9.
क्या इंग्लैंड में औद्योगिक क्राँति हुई थी? इस विषय पर बहस कीजिए।
उत्तर:
क्या 18वीं एवं 19वीं शताब्दी ब्रिटेन में हुई औद्योगिक क्राँति वास्तविक रूप में एक क्रांति थी। इस संबंध में इतिहासकारों के दो पक्ष हैं। प्रथम पक्ष वाले इसे क्राँति नहीं मानते हैं। दूसरे पक्ष वाले इसे निस्संदेह एक क्रांति मानते हैं।

1. प्रथम पक्ष (First View):
कुछ इतिहासकार ब्रिटेन में आई औद्योगिक क्राँति को एक क्रांति स्वीकार नहीं करते। उनका कथन है कि औद्योगीकरण की यह प्रक्रिया बहुत धीमी थी। अतः औद्योगिक क्रांति से संबंधित परिवर्तन अचानक नहीं हुए। इसलिए इसे क्रांति की संज्ञा देना उचित प्रतीत नहीं होता। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ का कथन है कि,

“यह (औद्योगिक विकास का क्रम) 15वीं शताब्दी में आरंभ हो गया था और यह अब भी जारी है जिसके विकास में पाँच शताब्दियों का समय लगा, उसे क्राँति नहीं कहा जा सकता।”19वीं शताब्दी शुरू होने के काफी समय बाद तक भी इंग्लैंड के एक बड़े भाग में उद्योगों की स्थापना नहीं हुई थी। वहाँ जो उद्योग स्थापित हुए थे, वे प्रमुखतः लंदन, मैनचेस्टर, बर्मिंघम एवं न्यूकासल आदि शहरों में थे। इस सीमित विकास के कारण इसे क्राँति कहना ठीक नहीं है।

1760 ई० के दशक से 1820 ई० के दशक तक इंग्लैंड के सूती कपड़ा उद्योग का विकास हुआ। यह एक ऐसे कच्चे माल अर्थात् कपास पर निर्भर करता था जो कि बाहर एवं विशेष तौर पर भारत से मंगवाया जाता था। जो माल वहाँ तैयार होता था उसकी खपत इंग्लैंड में कम एवं विदेशों में अधिक होती थी। इसके अतिरिक्त इंग्लैंड में 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध तक धातु से बनी मशीनें एवं भाप की शक्ति दुर्लभ रहीं। अत: इंग्लैंड में हुई औद्योगिक क्राँति को क्राँति नहीं कहा जा सकता।

क्राँति उसे कहा जाता है जो अचानक हो एवं जिसके समाज पर दूरगामी प्रभाव हों। उदाहरण के तौर पर 1776 ई० की अमरीकी क्रांति, 1789 ई० की फ्रांसीसी क्राँति, 1911 ई० की चीनी क्राँति एवं 1917 ई० की रूसी क्राँति ने बहुत कम समय में समाज में उल्लेखनीय परिवर्तन किए। दूसरी ओर औद्योगिक क्राँति ने समाज को परिवर्तित करने में काफी समय लिया। इसलिए इसे क्राँति नहीं कहा जा सकता।

2. दूसरा पक्ष (Second View) :
अनेक इतिहासकार औद्योगिक क्रांति को एक क्रांति मानते हैं। उनका कथन है कि इस क्राँति ने समाज को व्यापक रूप से प्रभावित किया। इंग्लैंड के प्रसिद्ध दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री ऑरनॉल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee) ने ब्रिटेन में हुए औद्योगिक विकास के लिए अपनी पुस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड (Lectures on the Industrial Revolution in England) में जो 1884 ई० में प्रकाशित हुई प्रथम बार औद्योगिक परिवर्तनों के लिए क्राँति शब्द का प्रयोग किया। इसके पश्चात् इस शब्द का प्रचलन व्यापक हो गया।

इस पक्ष के इतिहासकारों का कहना है कि यद्यपि औद्योगिक परिवर्तन आने में काफी समय लग गया तथापि इन परिवर्तनों ने समाज को इतना प्रभावित किया कि इन्हें क्रांति कहना गलत न होगा। अपने पक्ष में तर्क देते हुए उनका कहना है कि

(1) उत्पादन के जो कार्य पहले हाथों से किए जाते थे वे अब मशीनों द्वारा किए जाने लगे।

(2) मशीनों को चलाने के लिए जल शक्ति की अपेक्षा भाप शक्ति का प्रयोग आरंभ हो गया।

(3) कृषि के लिए मशीनों का प्रयोग आरंभ हो गया। इस कारण कृषि के उत्पादन में काफी वृद्धि हुई।

(4) यातायात के साधनों में सुधार हुआ। पक्की सड़कों एवं नहरों का निर्माण हुआ। रेलों का प्रचलन बढ़ गया। इससे माल के आयात एवं निर्यात का कार्य सुगम एवं सस्ता हो गया। यात्रियों को भी एक स्थान से दूसरे स्थान में जाने की सुविधा हो गई।

(5) रोजगार की तलाश में बड़ी संख्या में लोग शहरों में आ गए।

(6) बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के कारण अनेक नए शहर, बीमा एवं बैंकिंग सेवाएँ अस्तित्व में आई।

(7) उत्पादन में वृद्धि के कारण देश में खुशहाली आई।

(8) इसने लघु उद्योगों का अंत कर दिया एवं विशाल कारखानों की स्थापना की।

(9) इस कारण पूँजी के उपयोग में बहुत वृद्धि हुई।

(10) इसने कारखानों में काम करने वाले मजदूरों, स्त्रियों एवं बच्चों का जीवन दूभर बना दिया।

(11) इस कारण ब्रिटेन की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी।

(12) इसने विज्ञान एवं तकनीकी ज्ञान में नवीन खोजों को प्रोत्साहित किया।

(13) श्रमिक वर्ग ने ट्रेड यूनियन एवं राजनीतिक अधिकारों की माँग की। निस्संदेह औद्योगिक परिवर्तनों ने समाज पर इतने दूरगामी प्रभाव डाले कि इन्हें क्रांति कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

क्रम संख्या

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1694 ई०बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना।
2.1698 ई०थॉमस सेवरी द्वारा माइनर्स फ्रेंड का आविष्क़ार।
3.1709 ई०अब्राहम डर्बी द्वारा लोहे के प्रगलन में कोक का सर्वप्रथम प्रयोग।
4.1712 ई०थॉमस न्यूकॉमेन द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार।
5.1733 ई०जॉन के द्वारा फ़लाइंग शटल का आविष्कार।
6.1755 ई०अब्राहम डर्बी द्वितीय द्वारा ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास।
7.1759 ई०जेम्स ब्रिंडले द्वारा वर्सले नहर का निर्माण।
8.1760-1820 ई०प्रथम औद्योगिक क्राँति।
9.1761 ई०वर्सले नहर को खोला जाना।
10.1764 ई०जेम्स हरग्रीज़ द्वारा स्पिनिंग जेनी का आविष्कार।
11.1769 ई०रिचर्ड आर्कराइट द्वारा वॉटर फ्रेम का आविष्कार।
12.1769 ई०जेम्स वॉट द्वारा भाप के इंजन का आविष्कार।
13.1775 ई०मैथ्यू बॉल्टन द्वारा सोहो की बर्मिघम में स्थापना।
14.1776 ई०जोन विल्किसन द्वारा अपनी धमन भट्ठी के लिए भाप इंजन का प्रयोग।
15.1779 ईअब्राहम डर्बी तृतीय द्वारा कोलब्नुकडेल में सेवर्न नदी पर विश्व का प्रथम लोहे का पुल बनाना।
16.1779 ई०सैम्यूअल क्राम्पटन द्वारा म्यूल का आविष्कार।
17.1784 ई०हेनरी कोर्ट द्वारा आलोड़न भट्ठी का आविष्कार।
18.1785 ई०एडमंड कार्टराइट द्वारा पॉवरलूम का आविष्कार।
19.1793-1815 ई०इंग्लैंड का फ्रॉंस के साथ युद्ध।
20.1799-1800 ई०ब्रिटेन द्वारा जुड़वाँ अधिनियम पारित करना।
21.1795-1840 ई०इंग्लैंड में ब्रेड के लिए दंगे।
22.1801 ई०रिचर्ड ट्रेविथिक द्वारा पफिंग डेविल न्ञामक रेल इंजन का निर्माण।
23.1802 ई०प्रथम कारखाना अधिनियम।
24.1814 ई०जॉर्ज स्टीफेनसन द्वारा ब्लचर नामक रेल इंजन का निर्माण।
25.1815 ई०हैंफरी डेवी द्वारा सेफ़टी लैंप का आविष्कार।
26.1815 ई०ब्रिटेन द्वारा अनाज कानून पारित करना।
27.1819 ई०पीटरलू नरसंहार, कारखाना अधिनियम।
28.1825 ई०सर्वप्रथम रेलवे का स्टॉकटन से डार्लिगटन तक आरंभ।
29.1830 ई०लिवरपूल एवं मैनचेस्टर को रेल द्वारा जोड़ा गया।
30.1833 ई०कारखाना अधिनियम।
31.1839 ई०मैनचेस्टर में अनाज विरोधी लीग की स्थापना।
32.1841 ई०ब्राडशाह द्वारा प्रथम रेलवे टाइम टेबल का प्रकाशन।
33.1842 ई०प्रथम खान अधिनियम।
34.1847 ई०10 घंटा अधिनियम।
35.1850 ई० के बादद्वितीय औद्योगिक क्राँति।
36.1856 ई०हेनरी बेस्सेमर द्वारा इस्पात की खोज।
37.1884 ई०ऑरनॉल्ड टॉयनबी की पुस्तक लेकचर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड का प्रकाशन।

संक्षिप्त उत्तरा वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्राँति से आप क्या समझते हो? किन कारणों के चलते इंग्लैंड में सबसे पहले औद्योगिक क्रांति शुरू हुई ?
अथवा
इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के लिए कौन-से प्रमुख कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
(1) अभिप्राय-औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय उस क्राँति से है जो इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्षेत्र में हुई। इस कारण वस्तुओं का उत्पादन अब बहुत तीव्रता से एवं बड़ी बड़ी मशीनों द्वारा कारखानों में किया जाने लगा।

(2) राजनीतिक स्थिरता एवं शांति-18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में राजनीतिक स्थिरता एवं शांति थी। इससे इंग्लैंड में उद्योगों की स्थापना के लिए अनुकूल वातावरण तैयार हुआ। इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय ने अपने शासनकाल (1760 ई०-1820 ई०) के दौरान इंग्लैंड को एक औद्योगिक देश बनाने के अथक प्रयास किए। उसके ये प्रयास काफी सीमा तक सफल सिद्ध हुए।

(3) शक्तिशाली नौसेना-उस समय इंग्लैंड के पास अन्य यूरोपीय देशों के मुकाबले सबसे अधिक शक्तिशाली नौसेना थी। इसलिए उसे ‘समुद्रों की रानी’ कहा जाता था। इस नौसेना के कारण वह एक ओर अपनी विदेशी आक्रमणों से सुरक्षा कर सका वहीं दूसरी ओर वह सुगमता से अपने निर्मित माल का विदेशों को निर्यात कर सका। इससे औद्योगिकीकरण को एक नया प्रोत्साहन मिला।

(4) इंग्लैंड के उपनिवेश-इंग्लैंड विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था। अत: उसके यूरोप, एशिया एवं अफ्रीका में अनेक उपनिवेश थे। इन उपनिवेशों से उसे इंग्लैंड के उद्योगों के लिए आवश्यक कच्चा माल सस्ती दरों पर सुगमता से प्राप्त हो जाता था। दूसरी ओर इंग्लैंड के उद्योगों द्वारा निर्मित माल को यहाँ ऊँची दरों पर बलपूर्वक बेचा जाता था। इस कारण इंग्लैंड के उद्योगों ने अभूतपूर्व उन्नति की।

(5) पूँजी-किसी भी देश में उद्योगों के विकास में पूँजी की प्रमुख भूमिका होती है। उस समय इंग्लैंड में पूँजी की कोई कमी नहीं थी। इसके तीन कारण थे। प्रथम, उस समय इंग्लैंड की कृषि ने उल्लेखनीय विकास किया था। दूसरा, इंग्लैंड का विश्व व्यापार पर प्रभुत्व स्थापित था। तीसरा, ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत से व्यापक पैमाने पर धन का दोहन किया। अतः पूँजी की प्रचुरता ने इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 2.
बताइए कि ब्रिटेन के औद्योगीकरण के स्वरूप पर कच्चे माल की आपूर्ति का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगीकरण के कारण ब्रिटेन में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। इन उद्योगों को चलाने हेतु कच्चे माल की अत्यधिक मात्रा में आवश्यकता थी। यह कच्चा माल बाहरी लोगों से मंगवाने की आवश्यकता पड़ी। क्योंकि हर प्रकार का कच्चा माल देश के अंदर मिलना संभव न था। इसलिए ब्रिटेन ने उन देशों के साथ मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, जहाँ से उन्हें कच्चा माल अधिक मात्रा में मिल सकता था।

अधिक लाभ कमाने के लिए वे इन देशों से कच्चा माल काफी सस्ते मूल्य पर खरीदते थे। शुरू-शुरू में ब्रिटेन के लोग व्यापारियों के रूप में एशिया तथा अफ्रीका के अनेक भागों में गए, परंतु बाद में उनकी कमज़ोर राजनीतिक स्थिति और पिछड़ेपन का लाभ उठाकर उन देशों पर अपना अधिकार कर लिया।

प्रश्न 3.
इस अवधि में किए गए आविष्कारों की दिलचस्प विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • अब्राहम डर्बी द्वारा कोक का प्रयोग बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। इससे लोहे के उत्पादन में वृद्धि हुई एवं उसकी गुणवत्ता बढ़ गई।
  • हैंफरी डेवी के सेफ़टी लैंप के कारण खानों में काम करने वाले मजदूरों का जीवन सुरक्षित हो गया।
  • जॉन के द्वारा किए गए फ़लाइंग शटल के आविष्कार के कारण बहुत कम समय में अधिक चौड़ा कपड़ा तैयार करना संभव हुआ।
  • जेम्स हरग्रीब्ज के स्पिनिंग जैनी के आविष्कार के कारण एक साथ आठ से दस धागे कातना संभव हुआ।
  • जेम्स वॉट का भाप इंजन कोयला एवं अन्य उद्योगों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ।

प्रश्न 4.
इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट्र एवं जेम्स ब्रिडले ने क्या योगदान दिया ?
उत्तर:
इंग्लैंड में नहरों के निर्माण में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट एवं जेम्स ब्रिडले ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई। ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट्र की वसले में अनेक कोयला खानें थीं। वह यहाँ से अपने कोयले को निकट स्थित मैनचेस्टर में स्थापित उद्योगों तक कम खर्च में पहुँचाना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने 1758 ई० में जेम्स ब्रिडले जो कि एक प्रसिद्ध इंजीनियर था के साथ परामर्श किया।

जेम्स ब्रिडले ने उसे वर्सले से मैनचेस्टर तक एक नहर का निर्माण करने का परामर्श दिया। ब्रिजवाट ने इस परामर्श को स्वीकार किया तथा इस कार्य के लिए आवश्यक पूँजी जेम्स ब्रिडले को उपलब्ध करवायी। जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में वर्सले कैनाल का निर्माण कार्य आरंभ किया।

इस नहर द्वारा वर्सले को मैनचेस्टर के साथ जोड़ा गया। यह नहर 10 मील लंबी थी। 1761 ई० में इस नहर का निर्माण कार्य पूरा हुआ तथा इसे यातायात के लिए खोला गया। यह इंग्लैंड की प्रथम नहर थी। निस्संदेह यह जेम्स बिंडले की एक महान् सफलता थी। इस नहर के कारण कोयले की कीमतें आधी हो गईं।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 5.
जॉर्ज स्टीफेनसन कौन था ? रेलवे के विकास में उसने क्या योगदान दिया ?
उत्तर:
जॉर्ज स्टीफेनसन इंग्लैंड का एक महान इंजीनियर था। रेलों के विकास में उसके उल्लेखनीय योगदा को देखते हए उसे ‘रेलों का पितामा’ कहा जाता है। उसने 1814 ई० में भाप से चलने वाला ब्लचर नामक इंजन तैयार किया। इसे केवल कोयला ढोने के लिए तैयार किया गया था। यह इंजन 30 टन भार का कोयला 4 मील प्रति घंटा की रफ्तार से एक पहाड़ी पर ले जा सकता था।

यात्रियों के लिए सर्वप्रथम रेल 1825 ई० में स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन शहरों के मध्य चलाई गई। इसके इंजन को रॉकेट का नाम दिया गया। यह भाप से चलता था। यात्रियों के लिए इसमें 30 डिब्बे लगाए गए थे। इस इंजन को जॉर्ज स्टीफेनसन ने स्वयं प्रथम 9 मील तक चलाया था। इस यात्रा को तय करने में उसे 2 घंटे लगे थे। बाद में इस इंजन को 15 मील प्रति घंटा की रफ्तार से चलाया गया। निस्संदेह यह एक महान् घटना थी।

प्रश्न 6.
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ क्या-क्या हैं ?
उत्तर:
नहर और रेलवे परिवहन के सापेक्षिक लाभ निम्नलिखित हैं

  • नहरों के कारण उद्योगों को बहुत लाभ पहुंचा। इसका कारण यह था कि माल की आवाजाई पर ख़र्च बहुत कम हो गया।
  • नहरों के निर्माण के कारण कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला। नहरों द्वारा सिंचाई के कारण फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई।
  • इससे नहरों एवं नावों के निर्माण में लगे लोगों को बहुत लाभ पहुंचा।
  • रेलों के कारण लोगों को कम ख़र्च एवं कम समय में सफर करना सुगम हो गया।
  • रेलों के कारण औद्योगिक क्राँति को एक नया बल मिला।

प्रश्न 7.
औद्योगिक क्रांति के सामाजिक प्रभाव लिखिए।
उत्तर:
(1) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन की जनसंख्या में असाधारण वृद्धि हुई। यह 1871 ई० में 2.5 करोड़ थी जो 1901 ई० में बढ़ कर 4 करोड़ हो गई। इसका कारण यह था कि अनेक वैज्ञानिक खोजों के कारण मृत्यु दर में काफी कमी आ गई थी।

(2) औद्योगिक क्रांति के कारण पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न हो गया। लोगों को रोजगार की तलाश में गाँवों को छोड़ कर शहरों में आना पड़ा। यहाँ परिवार के जिस सदस्य को जिस कारखाने में नौकरी मिलती वहीं काम करने लगता। इससे परिवार का विभिन्न सदस्यों पर नियंत्रण समाप्त हो गया। इससे समाज में अनेक कुरीतियों एवं अपराधों को प्रोत्साहन मिला।

(3) औद्योगिक क्रांति के कारण लंकाशायर, मैनचेस्टर, बर्मिंघम, लिवरपूल एवं लीड्स आदि शहर अस्तित्व में आए। शहरों में जनसंख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी से सफ़ाई, स्वच्छ पेय-जल, यातायात एवं शिक्षा आदि की विभिन्न समस्याएँ उत्पन्न हुईं। कारखानों के आस-पास मज़दूरों के बस जाने से वहाँ गंदी बस्तियों की स्थापना हुई।

(4) उद्योगों में छोटे-छोटे बच्चे एवं स्त्रियाँ भी काम करती थीं। उनसे भी बहुत भयावह परिस्थितियों में काम कराया जाता था। वास्तव में उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था।

प्रश्न 8.
औद्योगिक क्रांति के प्रमुख आर्थिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:
(1) औद्योगिक क्राँति के कारण बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा। अतः लोगों को उत्तम वस्तुएँ सस्ते मूल्य पर उपलब्ध होने लगीं। इससे लोगों के जीवन स्तर में पहले की अपेक्षा काफी सुधार हुआ।

(2) औद्योगिक क्रांति के परिणामस्वरूप लघु उद्योगों का अंत हो गया।

(3) औद्योगिक क्रांति ने कृषि क्राँति को प्रोत्साहन दिया। अतः फ़सलों के उत्पादन में बहुत वृद्धि हो गई।

(4) उत्पादन में वृद्धि के कारण घरेलू एवं विदेशी व्यापार को एक नई दिशा मिली। इससे लोग बहुत समृद्धशाली हुए।

(5) औद्योगिक क्रांति के कारण यातायात के साधनों में अद्वितीय विकास हुआ। संपूर्ण ब्रिटेन में सड़कों, पुलों, नहरों एवं रेलों का निर्माण किया गया। इससे जहाँ लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की सुगमता हो गई वहीं पर यह पहले की अपेक्षा काफी सस्ता हो गया। इससे माल की आवाजाही भी सुविधाजनक हो गयी।

(6) औद्योगिक क्रांति के कारण ब्रिटेन को अपने कारखानों के लिए कच्चे माल की तथा तैयार माल को बेचने के लिए मंडियों की आवश्यकता हुई। अतः ब्रिटेन ने साम्राज्यवादी नीति को अपनाया।

प्रश्न 9.
औद्योगिक क्रांति के इंग्लैंड के श्रमिकों पर कैसा प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
औद्योगिक क्राँति से मजदूर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित हुआ। मजदूरों को प्रतिदिन काफी लंबे समय तक काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। उन्हें कोई अवकाश नहीं दिया जाता था। काम के दौरान यदि कोई मजदूर सुस्त हो जाता अथवा नींद आ जाती तो उसे निर्दयता से पीटा जाता था। मालिक जब चाहता वह किसी भी मज़दूर को नौकरी से निकाल सकता था।

अत: मज़दूर के सामने अपने मालिक की शर्तों का पालन करने के अलावा कोई अन्य रास्ता न था। बीमार होने पर अथवा किसी अन्य कारण से काम पर न आने के कारण उस पर भारी जुर्माना लगाया जाता था। मज़दरों को अत्यंत भयावह स्थिति में काम करना पड़ता था। इस कारण वे भयानक बीमारियों के शिकार हो जाते थे।

यदि काम करते समय उसके साथ कोई दुर्घटना हो जाती तो कारखाना मालिक उसे किसी प्रकार का कोई मुआवज़ा नहीं देता था। संक्षेप में औद्योगिक क्रांति के कारण मजदूर वर्ग की स्थिति नरक समान हो गयी थी।

प्रश्न 10.
इंग्लैंड 1793 से 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इससे इंग्लैंड के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
इंग्लैंड 1793 ई० से लेकर 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका इंग्लैंड के उद्योगों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इस कारण इंग्लैंड एवं यूरोप के मध्य चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया। अत: अनेक उद्योगों को बाध्य होकर बंद करना पड़ा। इससे बेरोज़गारी में बढ़ौतरी हुई। खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छूने लगीं। परिणामस्वरूप ग़रीबों एवं मजदूरों के लिए जीवन दूभर हो गया। स्त्रियों एवं बच्चों की दशा पहले की अपेक्षा अधिक शोचनीय हो गई।

प्रश्न 11.
जुड़वाँ अधिनियम क्या थे ?
उत्तर:
ब्रिटेन की सरकार ने 1799 ई० एवं 1800 ई० में दो नियम पारित किए। इन्हें जुड़वाँ अधिनियम कहा जाता है। इन अधिनियमों के अधीन ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। अब मज़दूर अपनी मज़दूरी बढ़ाने के लिए अथवा काम के घंटों को कम करने के लिए एक-दूसरे को सहयोग नहीं कर सकते थे। वे भाषण या लेखन द्वारा सम्राट.

संविधान अथवा सरकार के विरुद्ध नफ़रत नहीं फैला सकते थे अथवा लोगों को उकसा नहीं सकते थे। 50 से अधिक लोगों की अनाधिकत सार्वजनिक बैठकों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। इन नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंड देने की व्यवस्था की गई। 1824 ई० में सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को रद्द कर दिया। अब मज़दूरों को ब्रिटेन में ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार प्राप्त हो गया।

प्रश्न 12.
लुडिज्म आंदोलन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
लुडिज्म आंदोलन इंग्लैंड में 1811 ई० से 1817 ई० के मध्य चला। इस आंदोलन को इंग्लैंड के कपड़ा मजदूरों द्वारा चलाया गया था। इस आंदोलन का नेतृत्व जनरल नेड लुड ने किया। इस आंदोलन की अनेक माँगें थीं-

  • मजदूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • स्त्रियों एवं बच्चों के काम करने के समय को कम किया जाए एवं उन्हें ख़तरनाक मशीनों पर न लगाया जाए।
  • मजदूरों को ट्रेड यूनियन बनाने का अधिकार हो।

सरकार के विरुद्ध अपना विरोध प्रकट करने के उद्देश्य से उन्होंने वस्त्र मशीनों को नष्ट किया। वे इन मशीनों को उनके सभी कष्टों के लिए उत्तरदायी मानते थे। लुडिवादी अपने चेहरे को ढक कर रखते थे तथा वे अपनी कार्यवाही प्रायः रात के समय करते थे। उन्हें साधारण लोगों का काफी समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन का आरंभ 1811 ई० में नोटिंघम से हुआ था।

इसके पश्चात् यह ब्रिटेन के अनेक अन्य प्रसिद्ध शहरों में फैल गया। आंदोलनकारियों ने अनेक सूती एवं ऊनी वस्त्र की मिलों पर आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर दिया। सरकार ने दमन की नीति अपनाते हुए इस आंदोलन को कुचल दिया।

प्रश्न 13.
पीटरलू नरसंहार पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
औद्योगीकरण के परिणामस्वरूप मज़दूरों का जीवन नरक समान हो गया था। 16 से 18 घंटे प्रतिदिन जी तोड़ मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी बस्तियों में निवास करते थे। वे अर्द्धनग्न घूमते रहते थे। उन्हें वोट के अधिकार से वंचित रखा गया था। 16 अगस्त, 1819 ई० को 80,000 लोग मैनचेस्टर के सेंट पीटर्स के मैदान में शांतिपूर्वक एकत्र हुए। उनका उद्देश्य अनाज कानूनों के विरुद्ध अपना विरोध जारी करना था तथा वोट के अधिकार, ट्रेड युनियन बनाने के अधिकार, सार्वजनिक सभाएँ करने तथा प्रेस की स्वतंत्रता के अधिकार की माँग करना था।

इस आंदोलन के प्रसिद्ध नेता रिचर्ड कारलाइल, जॉन कार्टराइट तथा हेनरी हंट थे। सरकार इस शांतिमय जनसभा को भी सहन करने को तैयार नहीं थी। अत: सरकार ने वहाँ घुड़सवार सेना भेज दी। इस सेना ने वहाँ लोगों को तितर-बितर करने के उद्देश्य से गोलियाँ चला दी। इस नरसंहार को पीटरलू के नाम से जाना जाता है। इसमें 11 लोगों की मृत्यु हुई एवं 400 से अधिक घायल हुए। इस नरसंहार के कारण संपूर्ण ब्रिटेन में रोष की लहर फैल गई।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.

औद्योगिक क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
औद्योगिक क्रांति से अभिप्राय उस क्राँति से है जो इंग्लैंड तथा अन्य यूरोपीय देशों में 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्षेत्र में हुई। अतः वस्तुओं का उत्पादन अब घरों की अपेक्षा विशाल कारखानों में मशीनों द्वारा किया जाने लगा।

प्रश्न 2.
ऑरनॉल्ड टॉयनबी कौन था ? उसने किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की ? इसका प्रकाशन कब हुआ ?
उत्तर:

  • ऑरनॉल्ड टॉयनबी ब्रिटेन का प्रसिद्ध दार्शनिक एवं अर्थशास्त्री था।
  • उसने लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड की रचना की।
  • इसका प्रकाशन 1884 ई० में हुआ था।

प्रश्न 3.
सर्वप्रथम किस देश में औद्योगिक क्रांति आई तथा कब ?
उत्तर:

  • सर्वप्रथम औद्योगिक क्राँति ब्रिटेन में आई।
  • यह क्राँति 1760 ई० से 1820 ई० के मध्य आई।

प्रश्न 4.
ब्रिटेन में सर्वप्रथम औद्योगिक क्रांति क्यों आई ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • ब्रिटेन के विश्व में स्थापित अनेक उपनिवेश।
  • ब्रिटेन के लोगों के पास पर्याप्त पूँजी का उपलब्ध होना।

प्रश्न 5.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई थी ? 1820 ई० तक वहाँ कितने प्रांतीय बैंकों की स्थापना हो चुकी थी ?
उत्तर:

  • बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना 1694 ई० में हुई थी।
  • 1820 ई० तक इंग्लैंड में 600 प्राँतीय बैंकों की स्थापना हो चुकी थी।

प्रश्न 6.
किन्हीं चार खनिज पदार्थों के नाम बताएँ जिन्होंने इंग्लैंड की औद्योगिक क्रांति में प्रमुख भूमिका निभाई ?
उत्तर:
इंग्लैंड की औद्योगिक क्राँति में कोयला, लोहा, सीसा एवं ताँबा ने प्रमुख भूमिका निभाई।

प्रश्न 7.
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड के किन चार प्रसिद्ध उद्योगों ने औद्योगिक क्रांति लाने में प्रशंसनीय योगदान दिया ?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड के कोयला और लोहा उद्योग, सूती वस्त्र उद्योग, भाप की शक्ति एवं रेलों के उद्योग ने प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 8.
किस खनिज को ‘काला सोना’ एवं ‘उद्योगों की जननी’ के नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:
कोयले को काला सोना एवं उद्योगों की जननी के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 9.
लोहा प्रगलन के लिए काठ कोयले के प्रयोग की कोई दो समस्याएँ लिखें।
उत्तर:

  • काठ कोयला लंबी दूरी तक ले जाते समय टूट जाता था।
  • कोयले की अशुद्धता के कारण घटिया किस्म के लोहे का उत्पादन होता था।

प्रश्न 10.
लोहा प्रगलन में कोक का प्रयोग किस प्रकार लाभकारी सिद्ध हुआ ?
उत्तर:

  • कोक में उच्च तापमान उत्पन्न करने की शक्ति थी।
  • यह काठ कोयले से बहुत सस्ता पड़ता था।
  • इसका प्रयोग बड़ी धमन भट्ठियों में किया जाना संभव हुआ।

प्रश्न 11.
जोन विल्किनसन ने लोहे का प्रयोग किन वस्तुओं के निर्माण के लिए किया ?
उत्तर:

  • उसने लोहे की कुर्सियाँ बनाईं।
  • उसने शराब की भट्ठियों के लिए टंकियाँ बनाईं।
  • उसने विभिन्न आकारों की लोहे की पाइपें बनाईं।

प्रश्न 12.
सेफ़टी लैंप का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
सेफ़टी लैंप का आविष्कार हैंफरी डेवी ने 1815 ई० में किया था।

प्रश्न 13.
फ़लाइंग शटल का आविष्कार किसने तथा कब किया ?
उत्तर:
फ़लाइंग शटल का आविष्कार जॉन के ने 1733 ई० में किया।

प्रश्न 14.
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
स्पिनिंग जेनी का आविष्कार जेम्स हरग्रीव्ज़ ने 1764 ई० में किया था।

प्रश्न 15.
वॉटर फ्रेम का आविष्कार किसने तथा कब किया था ? इसका क्या लाभ हुआ ?
उत्तर:

  • वॉटर फ्रेम का आविष्कार रिचर्ड आर्कराइट ने 1769 ई० में किया था।
  • इससे धागे की कताई एवं बुनाई बहुत तेजी से की जाने लगी।

प्रश्न 16.
सैम्यअल काम्पटन किस आविष्कार के लिए प्रसिद्ध थे ? इसका क्या लाभ हआ ?
उत्तर:

  • सैम्यूअल क्राम्पटन म्यूल आविष्कार के लिए प्रसिद्ध थे।
  • इससे कता हुआ धागा बहुत मज़बूत और बढ़िया होता था।

प्रश्न 17.
पॉवरलूम का आविष्कार किसने तथा कब किया था ?
उत्तर:
पॉवरलूम का आविष्कार एडमंड कार्टराइट ने 1785 ई० में किया था।

प्रश्न 18.
किन्हीं दो आविष्कारों के नाम बताएँ जिन्होंने वस्त्र उद्योग में क्रांति ला दी। इनके आविष्कारकों के नाम भी बताएँ।
उत्तर:

  • जॉन के की फ़लाइंग शटल।
  • जेम्स हरग्रीब्ज की स्पिनिंग जेनी।

प्रश्न 19.
भाप की शक्ति के कोई दो लाभ बताएँ।
उत्तर:

  • इससे अनेक प्रकार की मशीनों को चलाया जा सकता था।
  • इस पर खर्चा भी कम आता था।

प्रश्न 20.
अश्व शक्ति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अश्व शक्ति माप की इकाई थी। यह एक घोड़े की एक मिनट में एक फुट तक 33,000 पौंड वज़न उठाने की क्षमता के समकक्ष थी। इसका आविष्कार जेम्स वॉट ने किया था।

प्रश्न 21.
माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार किसने तथा कब किया ? इसका क्या उपयोग था ?
उत्तर:

  • माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार थॉमस सेवरी ने 1698 ई० में किया।
  • इसका प्रयोग खानों से पानी बाहर निकालने के लिए किया जाता था।

प्रश्न 22.
माइनर्स फ्रेंड क्यों असफल रहा ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • यह छिछली गहराइयों में बहुत धीरे-धीरे काम करता था।
  • दबाव के अधिक हो जाने के कारण उसका बॉयलर फट जाता था।

प्रश्न 23.
थॉमस न्यूकॉमेन के भाप के इंजन के कोई दो दोष लिखें।
उत्तर:

  • यह बहुत भारी था।
  • इसमें काफी मात्रा में ईंधन नष्ट होता था।

प्रश्न 24.
जेम्स वॉट ने भाप के इंजन का आविष्कार कब किया ? इसका कोई एक लाभ (utility) बताएँ।
उत्तर:

  • जेम्स वॉट ने भाप के इंजन का आविष्कार 1769 ई० में किया।
  • यह बहुत व्यावहारिक एवं कम खर्चीला था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 25.
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में नहरें किस उद्देश्य के साथ बनायी गई थीं ?
उत्तर:
18वीं शताब्दी में इंग्लैंड में नहरें कोयले को शहरों में स्थित उद्योगों तक पहुँचाने के लिए बनाई गई थीं। इसका कारण यह था कि इसमें सड़क मार्ग की अपेक्षा कम समय लगता था एवं खर्चा भी कम आता था।

प्रश्न 26.
वर्सले कैनाल का निर्माण किसने तथा कब किया था ? इसका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • वर्सले कैनाल का निर्माण जेम्स ब्रिडले ने 1759 ई० में किया था।
  • इसका उद्देश्य वर्सले से मैनचेस्टर तक कम खर्चे पर कोयले को पहुँचाना था।

प्रश्न 27.
वर्सले कैनाल को कब खोला गया था ? इसका क्या महत्त्व था ?
उत्तर:

  • वर्सले कैनाल को 1761 ई० में खोला गया था।
  • इस कारण इंग्लैंड में कोयले की कीमतें आधी हो गईं।

प्रश्न 28.
इंग्लैंड में नहरों के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:

  • नहरों के निर्माण से अनेक नए शहर अस्तित्व में आए।
  • नहरों का निर्माण जिन क्षेत्रों में हुआ वहाँ भूमि के मूल्य बहुत बढ़ गए।

प्रश्न 29.
जॉर्ज स्टीफेनसन ने 1814 ई० में किस रेल इंजन का निर्माण किया ? इसकी रफ्तार कितनी थी ?
उत्तर:

  • जॉर्ज स्टीफेनसन ने 1814 ई० में ब्लचर नामक रेल इंजन का निर्माण किया था।
  • इसकी रफ्तार 4 मील प्रति घंटा थी।

प्रश्न 30.
इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेलगाडी कब तथा किन दो शहरों के मध्य चलाई गई थी ?
उत्तर:
इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेलगाड़ी 1825 ई० में स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन शहरों के मध्य चलाई गई थी।

प्रश्न 31.
ब्रिटेन में रेलों के विकास के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इससे माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना सुगम हो गया।
  • लोगों के लिए सफर करना अब आसान एवं कम खर्चीला हो गया।

प्रश्न 32.
नहर और रेलवे के परिवहन के साधन के रूप में क्या-क्या लाभ हैं ?
उत्तर:

  • इससे शहरीकरण की प्रक्रिया तीव्र हुई।
  • इससे माल को एक स्थान से दसरे स्थान पर ले जाना कम खर्चीला हो गया।
  • इससे लोगों के लिए सफर करना सुगम हो गया।

प्रश्न 33.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस कारण ब्रिटेन की जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।
  • अब बड़ी मात्रा में वस्तुओं का उत्पादन मशीनों द्वारा किया जाने लगा।

प्रश्न 34.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो सामाजिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्रांति के कारण शहरी जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई।
  • इस क्राँति के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मजदूरों में बँट गया।

प्रश्न 35.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो आर्थिक प्रभाव बताएँ।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्राँति ने कृषि क्राँति को प्रोत्साहित किया।
  • इससे ब्रिटेन के घरेलू एवं विदेशी व्यापार को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 36.
औद्योगिक क्रांति के कोई दो राजनीतिक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • औद्योगिक क्राँति के कारण ब्रिटेन फ्राँस एवं नेपोलियन के साथ युद्धों का डट कर सामना कर सका।
  • मज़दूरों ने श्रमिक संघों के निर्माण के लिए एक लंबा संघर्ष चलाया।

प्रश्न 37.
कारखाना पद्धति से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कारखाना पद्धति से अभिप्राय उस पद्धति से है जिसके अंतर्गत उत्पादन घरों की अपेक्षा कारखानों में होने लगा। इनमें हाथों की अपेक्षा मशीनों द्वारा उत्पादन किया जाता था।

प्रश्न 38.
ब्रिटेन के कारखानों में प्रायः स्त्रियों एवं बच्चों को काम पर क्यों लगाया जाता था ? कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • स्त्रियों एवं बच्चों को पुरुषों की अपेक्षा कम मजदूरी देनी पड़ती थी।
  • वे काम की घटिया परिस्थितियाँ होने के बावजूद कम आंदोलित होते थे।

प्रश्न 39.
कारखानों में काम करने वाले मजदूरों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:

  • उन्हें कठोर अनुशासन में बहुत भयावह परिस्थितियों में काम करना पड़ता था।
  • उनका वेतन इतना कम था कि उन्हें दो वक्त भर पेट खाना नसीब नहीं होता था।

प्रश्न 40.
ब्रिटेन में विरोध आंदोलन आरंभ होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • कारखानों में काम करने की कठोर परिस्थितियाँ।
  • श्रमजीवी लोगों को मताधिकार प्राप्त न होना।

प्रश्न 41.
इंग्लैंड का फ्राँस के साथ युद्ध कब से कब तक चला ? इस युद्ध का कोई एक प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इंग्लैंड का फ्रांस के साथ युद्ध 1793 ई० से 1815 ई० तक चला।
  • इस कारण इंग्लैंड एवं यूरोप के मध्य चलने वाला व्यापार छिन्न-भिन्न हो गया।

प्रश्न 42.
ब्रिटेन 1793 ई० से 1815 ई० तक कई युद्धों में लिप्त रहा। इसका ब्रिटेन के उद्योगों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:

  • अनेक उद्योगों को बंद करना पड़ा।
  • बेरोज़गारी में वृद्धि हुई।
  • खाद्य पदार्थों की कीमतें बहुत बढ़ गईं।

प्रश्न 43.
ब्रिटेन की सरकार द्वारा जुड़वाँ अधिनियम कब पारित किए गए ? इनका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन की सरकार द्वारा जुड़वाँ अधिनियम 1799-1800 ई० में पारित किए गए।
  • इनका उद्देश्य श्रमिक संघों पर प्रतिबंध लगाना था।

प्रश्न 44.
ब्रिटेन में अनाज कानून कब पारित किए गए ? इनका उद्देश्य क्या था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में अनाज कानून 1815 ई० में पारित किए गए।
  • इनका उद्देश्य जब तक ब्रिटेन में अनाज की कीमत में एक स्वीकृत स्तर तक वृद्धि न हो जाए तब तक विदेश से अनाज के आयात पर प्रतिबंध लगाया जाए।

प्रश्न 45.
अनाज विरोधी कानून लीग की स्थापना कब और कहाँ की गई ? इसके दो महत्त्वपूर्ण सदस्यों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • अनाज विरोधी कानून लीग की स्थापना 1839 ई० में मैनचेस्टर में की गई।
  • इसके दो महत्त्वपूर्ण सदस्यों के नाम रिचर्ड काब्डन एवं जॉन ब्राइट थे।

प्रश्न 46.
ब्रिटेन में ब्रेड के लिए दंगे क्यों हुए. ? ये कब से लेकर कब तक चले ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में ब्रेड के लिए दंगे इसलिए हुए क्योंकि उनके मूल्यों में बहुत वृद्धि हो गई थी।
  • ऐसे दंगे 1795 ई० से लेकर 1840 ई० तक चले।

प्रश्न 47.
बाड़ा पद्धति से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
बाड़ा पद्धति से अभिप्राय शक्तिशाली ज़मींदारों द्वारा छोटे-छोटे खेतों को अपने बड़े फार्मों में सम्मिलित करना था। ब्रिटेन में ऐसा 1770 ई० के दशक में किया गया।

प्रश्न 48.
ब्रिटेन में लुडिज्म आंदोलन कब चला ? इस आंदोलन का प्रसिद्ध नेता कौन था ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन में लुडिज्म आंदोलन 1811 ई० से 1817 ई० तक चला।
  • इस आंदोलन का प्रसिद्ध नेता जनरल नेड लुड था।

प्रश्न 49.
लुडिज्म आंदोलन की कोई दो माँगें लिखें।
उत्तर:

  • मज़दूरों को न्यूनतम मजदूरी दी जाए।
  • मजदूरों को श्रमिक संघ बनाने की अनुमति दी जाए।

प्रश्न 50.
लडिज्म आंदोलन क्या था ?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 48 तथा 49 का उत्तर देंखे।

प्रश्न 51.
पीटरलू नरसंहार कब और कहाँ हुआ ?
उत्तर:
पीटरलू नरसंहार 1819 ई० में मैनचेस्टर में हुआ।

प्रश्न 52.
ब्रिटेन में प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित किया गया था ? इसकी कोई एक धारा लिखें।
उत्तर:

  • ब्रिटेन में प्रथम कारखाना अधिनियम 1802 ई० में पारित किया गया।
  • किसी भी बच्चे से 12 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।

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प्रश्न 53.
कारखाना कानून ( 1819 ई०) क्या था ?
उत्तर:

  • 9 वर्ष से कम बच्चों को कारखानों में काम पर न लगाया जाए।
  • बच्चों को भोजन के लिए 1.30 घंटे का विश्राम दिया जाए।

प्रश्न 54.
1833 ई० के कारखाना अधिनियम की कोई दो धाराएँ लिखें।
उत्तर:

  • 13 से 17 वर्ष तक के बच्चों से 10 घंटों से अधिक काम न लिया जाए।
  • कारखानों के निरीक्षण के लिए इंस्पैक्टर नियुक्त किए गए।

प्रश्न 55.
1842 ई० के खान अधिनियम की कोई दो धाराएँ लिखें।
उत्तर:

  • इसने खानों में स्त्रियों के काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • इसने खानों के निरीक्षण के लिए नियमित इंस्पैक्टर नियुक्त किए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में आई ?
उत्तर:
इंग्लैंड।

प्रश्न 2.
औद्योगिक क्राँति कब आई ?
उत्तर:
1760 ई०-1820 ई० के मध्य।

प्रश्न 3.
औद्योगिक क्रांति का अंग्रेज़ी में प्रथम बार उपयोग किसने किया ?
उत्तर:
ऑरनॉल्ड टॉयनबी ने।।

प्रश्न 4.
ऑरनॉल्ड टॉयनबी द्वारा लिखित प्रसिद्ध पुस्तक का नाम लिखें।
उत्तर:
लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड।

प्रश्न 5.
औद्योगिक क्रांति के समय इंग्लैंड में किसका शासन था ?
उत्तर:
जॉर्ज तृतीय।

प्रश्न 6.
विश्व की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति कौन था ?
उत्तर:
इंग्लैंड।

प्रश्न 7.
बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1694 ई० में।

प्रश्न 8.
काला सोना किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
कोयले को।

प्रश्न 9.
लोहे के प्रगलन के लिए सर्वप्रथम लोहे का प्रयोग किसने किया ?
उत्तर:
अब्राहम डर्बी प्रथम ने।

प्रश्न 10.
ढलवाँ लोहे से पिटवाँ लोहे का विकास कब हुआ ?
उत्तर:
1755 ई० में।

प्रश्न 11.
आलोड़न भट्ठी का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर:
हेनरी कोर्ट ने।

प्रश्न 12.
विश्व में लोहे का पहला पुल कब बनाया गया ?
उत्तर:
1779 ई० में।

प्रश्न 13.
विश्व में पहला लोहे का पुल कहाँ बनाया गया था ?
उत्तर:
कोलबुकडेल में।

प्रश्न 14.
हैंफरी डेवी किस आविष्कार के लिए प्रसिद्ध है ?
उत्तर:
सेफ़टी लैंप।

प्रश्न 15.
सेफ़टी लैंप का आविष्कार कब हुआ था ?
उत्तर:
1815 ई० में।

प्रश्न 16.
किस विज्ञानी ने लोहे को शुद्ध करके इस्पात बनाने की विधि खोज निकाली थी ?
उत्तर:
हेनरी बेस्सेमर ने।

प्रश्न 17.
जॉन के ने किसका आविष्कार किया था ?
उत्तर:
फ़लाइंग शटल का।

प्रश्न 18.
जेम्स हरग्रीब्ज़ ने स्पिनिंग जेनी का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1764 ई० में।

प्रश्न 19.
वॉटर फ्रेम का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
रिचर्ड आर्कराइट ने।

प्रश्न 20.
सैम्यूअल क्राम्पटन ने म्यूल का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1779 ई० में।

प्रश्न 21.
पॉवरलूम का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
एडमंड कार्टराइट ने।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

प्रश्न 22.
माइनर्स फ्रेंड का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
थॉमस सेवरी ने।

प्रश्न 23.
भाप इंजन का आविष्कार किसने किया था ?
उत्तर:
जेम्स वॉट ने।

प्रश्न 24.
जेम्स वॉट ने भाप इंजन का आविष्कार कब किया था ?
उत्तर:
1769 ई० में।

प्रश्न 25.
सोहो फाउँडरी का निर्माण कहाँ किया गया था ?
उत्तर:
बर्मिंघम में।

प्रश्न 26.
वर्सले कैनाल का निर्माण किसने किया था ?
उत्तर:
जेम्स ब्रिडले ने।

प्रश्न 27.
वर्सले कैनाल को किस वर्ष चालू किया गया ?
उत्तर:
1761 ई० में।

प्रश्न 28.
रिचर्ड ट्रेविथिक ने 1801 ई० में किस इंजन का निर्माण किया था ?
उत्तर:
पफिंग डेविल का।

प्रश्न 29.
‘रेलों का पितामा’ किसे कहा जाता है ?
उत्तर:
जॉर्ज स्टीफेनसन को।

प्रश्न 30.
भाप इंजन का आविष्कार कब हुआ ?
उत्तर:
1769 ई० में।

प्रश्न 31.
इंग्लैंड में प्रथम रेल को कब चलाया गया ?
उत्तर:
1825 ई० में।

प्रश्न 32.
इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य एक दीर्घकालीन युद्ध कब से कब तक चला ?
उत्तर:
1793 ई० से 1815 ई० तक।

प्रश्न 33.
ब्रिटेन की सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम कब पारित किए ?
उत्तर:
1799-1800 ई०।

प्रश्न 34.
ब्रिटेन की सरकार ने अनाज कानून कब पारित किए ?
उत्तर:
1815 ई०।

प्रश्न 35.
अनाज कानून विरोधी लीग के किसी एक नेता का नाम लिखिए।
उत्तर:
रिचर्ड काब्डन।

प्रश्न 36.
इंग्लैंड में ब्रैड के लिए दंगे कब शुरू हुए ?
उत्तर:
1795 ई० में।

प्रश्न 37.
इंग्लैंड में चलने वाले लुडिज्म आंदोलन का नेतृत्व किसने किया ?
उत्तर:
जनरल नेड लुड ने।

प्रश्न 38.
पीटरलू नरसंहार कब हुआ ?
उत्तर:
1819 ई० में।

प्रश्न 39.
इंग्लैंड की सरकार ने प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित किया था ?
उत्तर:
1802 ई० में।

प्रश्न 40.
इंग्लैंड में प्रथम खान अधिनियम कब पारित हुआ था?
उत्तर:
1842 ई० में।

प्रश्न 41.
किस अधिनियम के अधीन मज़दूरों द्वारा 10 घंटे प्रतिदिन काम की माँग को स्वीकार कर लिया गया ?
उत्तर:
कारखाना अधिनियम 1847 ई०।

रिक्त स्थान भरिए

1. ………………. पहला देश था जिसने सर्वप्रथम औद्योगिकीकरण का अनुभव किया था।
उत्तर:
इंग्लैंड

2. औद्योगिक क्राँति शब्द का अंग्रेजी में प्रयोग सर्वप्रथम ………………. ने किया था।
उत्तर:
ऑरनॉल्ड टॉयनबी

3. उजड़ा गाँव अंग्रेज़ी के सुप्रसिद्ध लेखक ……………… की कविता है।
उत्तर:
ओलिवर गोल्डस्मिथ

4. काला सोना ……………….. को कहा जाता था।
उत्तर:
कोयला

5. धमनभट्टी का आविष्कार ……………….. ई० में किया गया था।
उत्तर:
1709

6. धमनभट्टी का आविष्कार ……………… द्वारा किया गया था।
उत्तर:
अब्राहम डर्बी

7. आलोडन भट्टी का आविष्कार ……………….. ने किया था।
उत्तर:
हेनरी कोर्ट

8. फलाइंग शटल का निर्माण ……………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जॉन के

9. जेम्स हरग्रीब्ज द्वारा ……………….. का आविष्कार किया गया था।
उत्तर:
स्पीनिंग मशीन

10. वॉटर फ्रेम का आविष्कार ……………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
रिचर्ड आर्कराइट

11. सैम्यूअल क्राम्पटन द्वारा म्यूल का आविष्कार ……………….. ई० में किया गया।
उत्तर:
1779

12. भाप इंजन का आविष्कार ………….. द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जेम्स वॉट

13. इंग्लैंड की पहली नहर का नाम ……………….. था।
उत्तर:
वर्सले कैनाल

14. इंग्लैंड में पहली नहर का निर्माण ……………… द्वारा किया गया था।
उत्तर:
जेम्स ब्रिडले

15. इंग्लैंड में सर्वप्रथम रेल …………….. में चलाई गई थी।
उत्तर:
1825 ई०

16. प्रथम कारखाना अधिनियम ……………….. ई० में पारित किया गया।
उत्तर:
1802

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. औद्योगिक क्रांति का आरंभ कब हुआ ?
(क) 15वीं शताब्दी में
(ख) 16वीं शताब्दी में
(ग) 17वीं शताब्दी में
(घ) 18वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(घ) 18वीं शताब्दी में।

2. औद्योगिक क्रांति सर्वप्रथम किस देश में आरंभ हुई ?
(क) फ्राँस
(ख) इंग्लैंड
(ग) रूस
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(ख) इंग्लैंड

3. इंग्लैंड के शासक जॉर्ज तृतीय का शासनकाल कब आरंभ हुआ ?
(क) 1720 ई० में
(ख) 1750 ई० में
(ग) 1760 ई० में
(घ) 1820 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1760 ई० में

4. किस देश को ‘समुद्रों की रानी’ कहा जाता था ?
(क) भारत
(ख) चीन
(ग) इराक
(घ) इंग्लैंड।
उत्तर:
(घ) इंग्लैंड।

5. बैंक ऑफ़ इंग्लैंड की स्थापना कब हुई थी ?
(क) 1605 ई० में
(ख) 1694 ई० में
(ग) 1705 ई० में
(घ) 1734 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1694 ई० में

6. 19वीं शताब्दी के आरंभ में इंग्लैंड का कौन-सा शहर जनसंख्या के दृष्टिकोण से सबसे बड़ा था ?
(क) लंदन
(ख) लीड्स
(ग) लिवरपूल
(घ) मैनचेस्टर।
उत्तर:
(क) लंदन

7. निम्नलिखित में से किसे उद्योगों की जननी कहा जाता है ?
(क) लोहा
(ख) इस्पात
(ग) कोयला
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ग) कोयला

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

8. निम्नलिखित में से किस विद्वान् ने सर्वप्रथम कोक का प्रयोग किया ?
(क) अब्राहम डर्बी प्रथम
(ख) अब्राहम डर्बी द्वितीय
(ग) जॉन के
(घ) थॉमस सेवरी।
उत्तर:
(क) अब्राहम डर्बी प्रथम

9. आलोड़न भट्ठी का आविष्कार किसने किया ?
(क) अब्राहम डर्बी तृतीय ने
(ख) हेनरी कोर्ट ने ।
(ग) हैम्फरी डेवी ने
(घ) एडमंड कार्टराइट ने।
उत्तर:
(ख) हेनरी कोर्ट ने ।

10. विश्व का प्रथम लोहे का पुल किस नदी पर बनाया गया था ?
(क) थेम्स
(ख) सेवन
(ग) गँगा
(घ) अमेजन।
उत्तर:
(ख) सेवन

11. हैंफरी डेवी ने सेफ़टी लैंप का आविष्कार कब किया था ?
(क) 1805 ई० में
(ख) 1810 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1835 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1815 ई० में

12. हेनरी बेस्सेमर ने लोहे को शुद्ध करके इस्पात बनाने की विधि कब खोज निकाली ?
(क) 1815 ई० में
(ख) 1825 ई० में
(ग) 1836 ई० में
(घ) 1856 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1856 ई० में।

13. फ़लाइंग शटल का आविष्कारक किसने किया ?
(क) हरग्रीब्ज ने
(ख) जेम्स वॉट ने
(ग) रिचर्ड आर्कराइट ने
(घ) जॉन के ने।
उत्तर:
(घ) जॉन के ने।

14. म्यूल का आविष्कार किसने किया था ?
(क) सैम्यूअल क्राम्पटन
(ख) जॉन के
(ग) जेम्स हरग्रीव्ज
(घ) रिचर्ड आर्कराइट।
उत्तर:
(ग) जेम्स हरग्रीव्ज

15. रिचर्ड आर्कराइट ने वॉटर फ्रेम का आविष्कार कब किया ?
(क) 1733 ई० में
(ख) 1764 ई० में
(ग) 1765 ई० में
(घ) 1769 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1769 ई० में।

16. पावरलूम का आविष्कार किसने किया था ?
(क) सैम्यूअल क्राम्पटन ने
(ख) एडमंड कार्टराइट ने
(ग) जॉन के ने
(घ) रिचर्ड आर्कराइट ने।
उत्तर:
(ख) एडमंड कार्टराइट ने

17. जेम्स वॉट ने निम्नलिखित में से किसका आविष्कार किया ?
(क) पावरलूम
(ख) म्यूल
(ग) वॉटर फ्रेम
(घ) भाप इंजन।
उत्तर:
(घ) भाप इंजन।

18. वर्सले कैनाल के निर्माण में निम्नलिखित में से किसने योगदान दिया ?
(क) मैथ्यू बॉल्टन
(ख) थॉमस न्यूकॉमेन
(ग) जेम्स ब्रिडले
(घ) रिचर्ड ट्रेविथिक।
उत्तर:
(ग) जेम्स ब्रिडले

19. वर्सले कैनाल को यातायात के लिए किस वर्ष खोला गया था ?
(क) 1759 ई० में
(ख) 1761 ई० में
(ग) 1767 ई० में
(घ) 1771 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1761 ई० में

20. पफिंग डेविल नामक इंजन का आविष्कार किसने किया था ?
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक ने
(ख) जेम्स वॉट ने
(ग) जॉर्ज स्टीफेनसन ने
(घ) थॉमस सेवरी ने।
उत्तर:
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक ने

21. ‘रेलों का पितामा’ किसे कहा जाता है ?
(क) रिचर्ड ट्रेविथिक को
(ख) जॉर्ज स्टीफेनसन को
(ग) ड्यूक ऑफ़ विलिंगटन को
(घ) आई० के० बरुनल को।
उत्तर:
(ख) जॉर्ज स्टीफेनसन को

22. इंग्लैंड में प्रथम रेल को कब चलाया गया ?
(क) 1805 ई० में
(ख) 1814 ई में
(ग) 1825 ई० में
(घ) 1841 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1825 ई० में

23. इंग्लैंड की प्रथम रेल किन दो शहरों के मध्य चलाई गई ?
(क) स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन
(ख) लंदन एवं लीड्स
(ग) लंदन एवं मैनचेस्टर
(घ) स्टॉकटन एवं लिवरपूल।
उत्तर:
(क) स्टॉकटन एवं डार्लिंगटन

24. ‘सड़क-निर्माता’ किसे कहा जाता है ?
(क) जेम्स ब्रिडले को
(ख) जॉन के को
(ग) जॉन मेटकॉफ को
(घ) एडमंड कार्टराइट को।
उत्तर:
(ग) जॉन मेटकॉफ को

25. औद्योगिक क्रांति के समय मैनचेस्टर में मजदूरों का जीवनकाल क्या था ?
(क) 12 वर्ष
(ख) 15 वर्ष
(ग) 17 वर्ष
(घ) 21 वर्ष।
उत्तर:
(ग) 17 वर्ष

26. इंग्लैंड का फ्रांस के साथ एक दीर्घकालीन युद्ध कब आरंभ हुआ ?
(क) 1792 ई० में
(ख) 1793 ई० में
(ग) 1795 ई० में
(घ) 1799 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1793 ई० में

27. इंग्लैंड की सरकार ने जुड़वाँ अधिनियम को कब रद्द किया ?
(क) 1799 ई० में
(ख) 1800 ई० में
(ग) 1815 ई० में
(घ) 1824 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1824 ई० में।

28. अनाज कानून विरोधी लीग की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) लीड्स में
(ख) लंदन में
(ग) मैनचेस्टर में
(घ) बर्मिंघम में।
उत्तर:
(ग) मैनचेस्टर में

29. इंग्लैंड में ब्रैड के लिए दंगों का सिलसिला कब तक चला ?
(क) 1793 ई० तक
(ख) 1795 ई० तक
(ग) 1830 ई० तक
(घ) 1840 ई० तक।
उत्तर:
(घ)

30. लुडिज्म आंदोलन का नेतृत्व किसने किया ?
(क) जनरल नेड लुड ने
(ख) रिचर्ड काब्डन
(ग) जॉन ब्राइट
(घ) आई० के० बरुनल।
उत्तर:
(क) जनरल नेड लुड ने

31. पीटरलू नरसंहार कब हुआ था ?
(क) मार्च 1793 में
(ख) जून 1807 में
(ग) अमरर, 1819 में
(घ) दिसंबर 1830 में।
उत्तर:
(ग) अमरर, 1819 में

32. पीटरलू नरसंहार कहाँ हुआ ?
(क) लंदन में
(ख) मैनचेस्टर में
(ग) लिवरपूल में
(घ) वेल्स में।
उत्तर:
(ख) मैनचेस्टर में

33. निम्नलिखित में से कौन-सा नेता पीटरलू नरसंहार से संबंधित नहीं था ?
(क) जॉन ब्राइट
(ख) रिचर्ड कारलाइल
(ग) जॉन कार्टराइट
(घ) हेनरी हंट।
उत्तर:
(क) जॉन ब्राइट

34. इंग्लैंड में प्रथम कारखाना अधिनियम कब पारित हुआ था ?
(क) 1801 ई० में
(ख) 1802 ई० में
(ग) 1819 ई० में
(घ) 1833 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1802 ई० में

35. किस अधिनियम के अधीन इंग्लैंड के कारखानों में 9 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम करने की मनाही कर दी गई थी ?
(क) 1802 ई० के
(ख) 1819 ई० के
(ग) 1833 ई० के
(घ) 1842 ई० के।
उत्तर:
(ख) 1819 ई० के

36. किस अधिनियम के अधीन इंग्लैंड में श्रमिकों के लिए 10 घंटे का दिन निश्चित कर दिया गया ?
(क) 1833 ई०
(ख) 1842 ई०
(ग) 1844 ई०
(घ) 1847 ई०।
उत्तर:
(घ) 1847 ई०।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 9 औद्योगिक क्रांति

37. इंग्लैंड में प्रथम खान अधिनियम कब पारित हआ था ?
(क) 1833 ई० में
(ख) 1842 ई० में
(ग) 1847 ई० में
(घ) 1867 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1842 ई० में

38. ऑरनॉल्ड टॉयनबी की पुस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड का प्रकाशन … कब हुआ था ?
(क) 1842 ई० में
(ख) 1847 ई० में
(ग) 1867 ई० में
(घ) 1884 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1884 ई० में।

39. कार्ल मार्क्स एक:
(क) चिकित्सक थे
(ख) वैज्ञानिक थे
(ग) अर्थशास्त्री थे
(घ) दार्शनिक थे।
उत्तर:
(घ) दार्शनिक थे।

औद्योगिक क्रांति HBSE 11th Class History Notes

→ औद्योगिक क्रांति की गणना विश्व की प्रभावशाली क्राँतियों में की जाती है। इस क्राँति ने विश्व इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। यह क्राँति सर्वप्रथम 1760 ई० से 1820 ई० के मध्य इंग्लैंड में आई। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के उदय एवं विकास के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।

→ इनमें इंग्लैंड की राजनीतिक स्थिरता एवं शांति, उसकी शक्तिशाली नौसेना, उसके उपनिवेशों, उपलब्ध पूँजी, कृषि क्राँति, बैंकिंग व्यवस्था, विशाल बाजार, खनिज पदार्थों, वैज्ञानिक उन्नति एवं संसद् द्वारा किए गए प्रयासों ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ औद्योगिक क्रांति के दौरान इंग्लैंड के जिन उद्योगों ने प्रमख भमिका निभाई उनमें कोयला एवं लोहा उद्योग एवं बुनाई उद्योग, भाप की शक्ति तथा नहरों एवं रेलों के उद्योग प्रसिद्ध थे।

→ कोयला एवं लोहा उद्योग के विकास में अब्राहम डर्बी प्रथम, अब्राहम डर्बी द्वितीय, अब्राहम डर्बी तृतीय, जोन विल्किसन, हेनरी कोर्ट, हैम्फरी डेवी एवं हेनरी बेस्सेमर ने, कपास की कताई एवं बुनाई उद्योग के विकास में जॉन के, जेम्स हरग्रीव्ज, रिचर्ड आर्कराइट, सैम्यूअल क्राम्पटन एवं एडमंड कार्टराइट ने, भाप की शक्ति के विकास में थॉमस सेवरी, थॉमस न्यूकॉमेन, जेम्स वॉट एवं मैथ्यू बॉल्टन ने, नहरों के विकास में ड्यूक ऑफ़ ब्रिजवाट एवं जेम्स ब्रिडले ने, रेलों के विकास में रिचर्ड ट्रेविथिक एवं जॉर्ज स्टीफेनसन ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ औद्योगिक क्रांति के दूरगामी एवं महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। इसने न केवल ब्रिटेन अपितु यूरोप के समाज के स्वरूप को बदल कर रख दिया। जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि हुई। इसने पारिवारिक जीवन को छिन्न-भिन्न कर दिया।

→ समाज दो वर्गों पूँजीपतियों एवं मज़दूरों में बँट गया। पूँजीपतियों जो कि जनसंख्या का बहुत कम भाग था, के हाथ समस्त उद्योग थे। वे ऐश्वर्य का जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर समाज का अधिकाँश भाग मज़दर वर्ग से संबंधित था। कारखानों में जो उनकी दुर्दशा थी वह जानवरों से भी बदतर थी।

→ यहाँ तक कि स्त्रियाँ एवं बच्चे भी नरक समान जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य थे। औद्योगिक क्रांति के कारण वस्तुओं के उत्पादन में बहुत वृद्धि हुई। इससे ब्रिटेन के घरेलू एवं विदेशी व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला। औद्योगिक क्रांति के कारण साम्राज्यवादी भावना को बल मिला।

→ इस क्राँति के चलते ब्रिटेन फ्राँस एवं नेपोलियन के युद्धों का सामना करने में सफल हुआ। ब्रिटेन में मजदूरों ने अपनी मांगों के समर्थन में अनेक विरोध आंदोलन किए। अंततः ब्रिटेन आंदोलन किए। अंततः ब्रिटेन की सरकार ने अनेक कारखाना अधिनियमों द्वारा उनकी दशा सुधारने की चेष्टा की।

→ निस्संदेह यह ब्रिटेन के मजदूरों की एक महान् सफलता थी। औद्योगिक क्रांति पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश फ्रांस के जॉर्जिस मिशले (Georges Michelet), जर्मनी के फ्रॉइड्रिक एंजेल्स (Friedrich Engles), ब्रिटेन के ऑरनॉल्ड टॉयनबी (Arnold Toynbee), टी० एस० एश्टन (T.S. Ashton), पॉल मंतृ (Paul Mantoux) एवं एरिक हॉब्सबाम (Eric Hobsbawm) ने डाला।

→ ऑरनॉल्ड टॉयनबी ने अंग्रेजी में प्रथम बार क्राँति शब्द का प्रयोग अपनी प्रसिद्ध पस्तक लेक्चर्स ऑन दि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन इन इंग्लैंड (Lectures on the Industrial Revolution in England) में किया था। इस पुस्तक का प्रकाशन उस की मृत्यु के पश्चात् 1884 ई० में हुआ था।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे कौन-से कारण थे जिनसे 15वीं शताब्दी में यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली?
अथवा
15वीं शताब्दी में भौगोलिक खोजों के कारणों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
15वीं शताब्दी में यूरोपवासियों ने भौगोलिक खोजों का सिलसिला आरंभ किया। इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. आर्थिक उद्देश्य (Economic Motives):
यूरोपवासियों को नई खोज यात्राएँ करने में आर्थिक उद्देश्यों की प्रमुख भूमिका थी। 1453 ई० में तुर्कों द्वारा कुंस्तुनतुनिया (Constantinople) पर अधिकार से यूरोपीय व्यापार को गहरा आघात लगा। इस संकट से निपटने के लिए नए प्रदेशों की खोज करना आवश्यक था। 15वीं शताब्दी में यूरोपवासियों की आर्थिक आवश्यकताएँ बहुत बढ़ गई थीं।

नवोदित राष्ट्रीय राज्यों को अपनी सेना के लिए धन आवश्यकता थी। नए प्रदेशों की खोज करके यूरोपवासी अपने इन आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति कर सकते थे। अत: वे नए प्रदेशों की खोज करने के लिए प्रेरित हुए।

2. नए आविष्कार (New Inventions):
14वीं एवं 15वीं शताब्दियों में जहाजरानी से संबंधित नए आविष्कारों ने नाविकों की समुद्री यात्राओं को सुगम बना दिया। 1380 ई० में कुतबनुमा (compass) भाव दिशासूचक यंत्र का आविष्कार हुआ। यह एक सर्वोच्च महत्त्व का आविष्कार था। इससे नाविकों को खुले समुद्र में दिशाओं की सही जानकारी प्राप्त होती थी। 16वीं शताब्दी में एस्ट्रोलेब (astrolab) का आविष्कार हुआ।

इस यंत्र से नाविकों को भूमध्य रेखा (equator) से दूरी मापने में सहायता मिली। इस काल में यूरोपियों ने अपने जहाजों में बहुत सुधार कर लिया था। ये जहाज़ पहले से अधिक हल्के, विशाल एवं तीव्र गति से चलने वाले थे। निस्संदेह इन नवीन आविष्कारों ने समुद्री यात्राएँ करने वालों को एक नई दिशा प्रदान की। प्रसिद्ध इतिहासकार थॉमस एफ० एक्स० नोबल के शब्दों में, “14वीं एवं 15वीं शताब्दियों में जहाजरानी में सहायक सिद्ध हुए अनेक नए आविष्कारों ने खुले समुद्र में यात्राओं को सुगम एवं अधिक पूर्वानुमानित बनाया।

3. टॉलेमी की ज्योग्राफी (Ptolemy’s Geography):
टॉलेमी की ज्योग्राफी ने नए प्रदेशों की खोज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। टॉलेमी मिस्र का रहने वाला था। उसने दूसरी शताब्दी में ज्योग्राफी की रचना की। यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक 1477 ई० में मुद्रित हुई। यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इससे यूरोपवासी नए प्रदेशों की खोज करने के लिए प्रेरित हुए।

4. मार्को पोलो की यात्राएँ (Travels of Marco Polo):
मार्को पोलो इटली के शहर वेनिस का एक महान् यात्री था। वह 1275 ई० में मंगोलों के महान् नेता कुबलई खाँ (Kublai Khan) के दरबार में पीकिंग (Peking) पहुँचा। कुबलई खाँ ने उसका बहुत सम्मान किया। मार्को पोलो 17 वर्षों तक कुबलई खाँ के दरबार में रहा। इस समय के दौरान वह सरकार के कुछ महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त हुआ।

वापसी के समय वह जापान, बर्मा, भारत एवं थाइलैंड होता हुआ वापस इटली पहुँचा। यहाँ पहुँच कर उसने मार्को पोलो की यात्राएँ (Travels of Marco Polo) नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। इसमें उसने पूर्वी देशों के महान् वैभव पर विस्तृत प्रकाश डाला था। उसके विवरण में यूरोपवासियों में इन देशों की समुद्री यात्रा करने की एक होड़-सी आरंभ हो गई।

5. धार्मिक उद्देश्य (Religious Motives):
ईसाई धर्म सदैव से एक प्रचारक धर्म रहा था। ईसाई मिशनरियों ने अपने अथक प्रयासों से मध्यकाल तक संपूर्ण यूरोप में ईसाई धर्म का प्रसार कर दिया था। इसमें उन्हें अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई थी। इसके पश्चात् उन्होंने अपना ध्यान एशिया एवं अफ्रीका की तरफ किया। वे यहाँ के असभ्य लोगों को सभ्य बनाना चाहते थे। इन देशों में ईसाई धर्म का प्रसार करने के लिए बड़ी संख्या में उनके मिशनरी तैयार थे। अतः यूरोपीय व्यापारियों के साथ-साथ ईसाई मिशनरी भी इन देशों में गए। वास्तव में ईसाई धर्म के प्रसार की भावना ने नए देशों की समुद्री खोज को एक नया प्रोत्साहन दिया।

6. आईबेरियाई प्रायद्वीप का योगदान (Contribution of Iberian Peninsula):
15वीं शताब्दी में आईबेरियाई प्रायद्वीप भाव स्पेन एवं पुर्तगाल के देशों ने समुद्री खोज यात्राओं में बहुमूल्य योगदान दिया। अक्सर यह प्रश्न किया जाता है कि स्पेन एवं पुर्तगाल के शासकों ने समुद्री खोजों में अन्य देशों के मुकाबले अग्रणी भूमिका क्यों निभाई ? इसके अनेक कारण थे। प्रथम, इस समय स्पेन एवं पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था अच्छी थी जबकि यूरोप की अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर से गुजर रही थी।

दूसरा, स्पेन एवं पुर्तगाल के शासक सोना एवं धन दौलत के भंडार एकत्र कर अपने यश एवं सम्मान में वृद्धि करना चाहते थे। तीसरा, वे नई दुनिया में ईसाई धर्म का प्रसार करना चाहते थे। चौथा, धर्मयुद्धों (crusades) के कारण इन देशों की एशिया के साथ व्यापार करने में रुचि बढ़ गई। इन युद्धों के दौरान उन्हें पता चला कि इन देशों के साथ व्यापार करके वे भारी मुनाफा कमा सकते हैं। पाँचवां इन देशों के शासकों ने समुद्री खोज पर जाने वाले नाविकों को प्रत्येक संभव सहायता प्रदान की।

7. पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी का योगदान (Contribution of Prince Henry of Portugal):
पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी (1394-1460 ई०) ने समुद्री खोज यात्राओं को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। अत: वह इतिहास में हेनरी दि नेवीगेटर (Henry, the Navigator) के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसने खोज यात्राओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से सारगेस (Sargess) में एक नाविक स्कूल खोला। इस स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के लिए विश्व के अनेक देशों से नाविक, वैज्ञानिक एवं मानचित्र बनाने वाले आए।

इसके महत्त्वपूर्ण परिणाम निकले। यहाँ भावी समुद्री खोज यात्राओं की योजना तैयार की जाती थी। यहाँ लंबी दूरी की समुद्री यात्राएँ करने के लिए सुदृढ़ नावों का निर्माण किया गया जिन्हें कैरेवल (caravels) कहा जाता था। नाविकों की सहायता के लिए नए भौगोलिक मानचित्र तैयार किए गए। राजकुमार हेनरी ने व्यापार को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से पश्चिमी अफ्रीका के शासकों के साथ संबंध स्थापित किए तथा बोजाडोर (Bojador) में अपना व्यापारिक केंद्र स्थापित किया।

प्रसिद्ध इतिहासकार बी० वी० राव का यह कहना ठीक है कि, “यद्यपि वह (हेनरी) व्यावसायिक तौर पर एक नाविक नहीं था किंतु उसने भौगोलिक खोजों के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 2.
क्रिस्टोफर कोलंबस कौन था ? उसकी बहामा द्वीप यात्रा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
क्रिस्टोफर कोलंबस ने नई दुनिया (New World) की खोज में सर्वाधिक उल्लेखनीय योगदान दिया। उसका जन्म 1451 ई० में इटली के प्रसिद्ध शहर जेनेवा (Genoa) में हआ। जेनेवा इटली की एक प्रसिद्ध बंदरगाह थी। अतः यहाँ जहाज़ों का आना-जाना लगा रहता था। अतः कोलंबस के मन में बचपन से ही समुद्री यात्रा करने एवं नाम कमाने की गहरी इच्छा थी।

वह फ्रांसीसी दार्शनिक कार्डिनल पिएर डिऐली द्वारा 1410 ई० में खगोलशास्त्र (Astronomy) एवं भूगोल (Geography) पर लिखी प्रसिद्ध रचना इमगो मुंडी (Imago Mundi) से बहुत प्रभावित हुआ। अतः उसने पूर्व (the Indies) की यात्रा करने का निर्णय किया।

कोलंबस 3 अगस्त, 1492 ई० को स्पेन की एक बंदरगाह पालोस (Palos) से यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस समय उसके पास तीन जहाजों-सांता मारिया (Santa Maria), पिंटा (Pinta) तथा नीना (Nina) का एक छोटा-सा बेड़ा था। इनमें कुल 90 नाविक सवार थे। कोलंबस स्वयं सांता मारिया की कमान कर रहा था। इसमें कुल 40 नाविक थे। यह यात्रा काफी लंबी हो गई। समुद्र एवं आकाश के अतिरिक्त कुछ अन्य नज़र नहीं आता था। उनकी खाद्य सामग्री भी कम होने लगी। इससे नाविकों में बेचैनी फैल गई।

वे कोलंबस से तुरंत वापस चलने की माँग करने लगे। सहसा उन्हें 7 अक्तूबर, 1492 ई० को समुद्र के ऊपर कुछ पक्षी उड़ते दिखाई दिए। इससे उनका धैर्य बढ़ गया। उन्हें यह विश्वास हो गया कि उनका बेड़ा किसी भूमि के निकट पहुँचने वाला है। अंतत: उन्हें 12 अक्तूबर, 1492 ई० को भूमि दिखाई दी। इससे उनकी प्रसन्नता का कोई ठिकाना न रहा।

कोलंबस जिस स्थान पर पहुँचा उसने उसे इंडीज (भारत एवं भारत के पूर्व में स्थित देश) समझा। अतः उसने वहाँ के निवासियों को रेड इंडियन्स (Red Indians) कहा। वास्तव में वह बहामा द्वीप समूह के गुआनाहानि (Guanahani) नामक स्थान पर पहुंचा था। जब कोलंबस एवं उसके साथी वहाँ पहुँचे तो वहाँ रहने वाले अरावाक (The Arawaks) लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया।

अरावाक लोग इन अपरिचित लोगों को देखकर एक-दूसरे को आश्चर्य से कह रहे थे कि देखो ये लोग स्वर्गलोक से यहाँ आए हैं। इन लोगों ने दोस्ती का हाथ बढ़ाया। कोलंबस उनकी उदारता से बहुत प्रभावित हुआ। कोलंबस ने उनके संबंध में लिखा है कि, “वे बहुत उदार हैं तथा वे बुराई को नहीं जानते। वे किसी दूसरे की हत्या नहीं करते तथा न ही चोरी करते हैं तथा उनके पास हथियार भी नहीं हैं।”

कोलंबस लगभग तीन महीने गुआनाहानि में रहा। उसने इस द्वीप में स्पेन का झंडा गाड़ दिया। उसने इस द्वीप का नया नाम सैन सैल्वाडोर (San Salvador) रख दिया। उसने स्वयं को वहाँ का वाइसराय (Viceroy) घोषित कर दिया। वाइसराय का अभिप्राय है राजा का प्रतिनिधि। कोलंबस ने इस समय के दौरान क्यूबा (Cuba) एवं हिस्पानिओला (Hispaniola) की खोज की। कोलंबस ने इन स्थानों की खोजें वहाँ से सोना प्राप्त करने के उद्देश्य से की थी किंतु इसमें उसे कोई विशेष सफलता प्राप्त न हुई।

इस समय के दौरान कोलंबस को कैरिब (Carib) नाम के एक खूखार कबीले का सामना करना पड़ा। अत: कोलंबस के साथी नाविकों ने उसे वापस स्पेन चलने के लिए बाध्य किया। कोलंबस ने 4 जनवरी, 1493 ई० को स्पेन की वापसी यात्रा आरंभ की। इस समय उनका सांता मारिया नामक जहाज़ नष्ट हो गया था तथा बाकी दो अन्य जहाजों को दीमक लगनी आरंभ हो गई थी।

कोलंबस एवं उसके साथी 15 मार्च, 1493 ई० को स्पेन की बंदरगाह पालोस वापस पहुँचने में सफल रहे। उनका स्पेन के शासक फर्जीनेंड द्वारा भव्य स्वागत किया गया। कोलंबस ने भी उसे गुआनाहानि से प्राप्त कुछ बहमल्य उपहार भेंट किए। राजा इससे बहत प्रसन्न हआ। अतः उसने कोलंबस को एडमिरल ऑफ दी ओशन सी (Admiral of the Ocean Sea) नामक उपाधि तथा इंडीज का वाइसराय होने की घोषणा की। इसके पश्चात् कोलंबस ने 1493-96 ई०, 1498-1500 ई० तथा 1502-04 ई० में इंडीज की तीन बार और यात्राएँ कीं।

इस समय के दौरान कोलंबस ने वहाँ सख्ती से शासन किया। उसने वहाँ के लोगों को भारी कर देने तथा सोना देने के लिए बाध्य किया। इंकार करने पर लोगों पर घोर अत्याचार किए जाने लगे। इस कारण वहाँ के लोगों में स्पेनी शासन रोष फैलने लगा। जब यह समाचार स्पेन के शासक फर्जीनेंड को प्राप्त हआ तो उसने कोलंबस को जंजीरों में जकड़ कर दरबार में प्रस्तुत करने को कहा। उसके आदेश की पालना करते हुए कोलंबस को 7 नवंबर, 1504 ई० को दरबार में प्रस्तुत किया गया।

कोलंबस द्वारा क्षमा याचना माँगने पर रानी ईसाबेला ने उसे क्षमा कर दिया किंतु उससे वाइसराय की पदवी छीन ली गई। कोलंबस की 20 मई, 1506 ई० को अत्यंत निराशा की स्थिति में स्पेन के शहर वल्लाडोलिड (Valladolid) में मृत्यु हो गई। प्रसिद्ध इतिहासकार माईकल एच० हार्ट के अनुसार, “उसकी खोज ने नई दुनिया में खोजों एवं उपनिवेशों के युग का आरंभ करके इतिहास को एक नया मोड़ दिया। 1499 ई० में इटली के एक भूगोलवेत्ता अमेरिगो वेस्पुसी (Amerigo Vespucci) ने दक्षिण अमरीका की यात्रा की।

उसने अपनी यात्रा का विस्तृत वर्णन किया तथा दक्षिण अमरीका को नयी दुनिया (New World) के नाम से संबोधित किया। 1507 ई० में एक जर्मन प्रकाशक ने अमेरिगो वेस्पुसी के बहुमूल्य योगदान को देखते हुए नई दुनिया को अमरीका का नाम दिया।

प्रश्न 3.
हरनेडो कोटेंस कौन था? उसने मैक्सिको पर किस प्रकार विजय प्राप्त की?
उत्तर:
हरनेडो अथवा हरनन कोर्टेस जिसने मैक्सिको पर महत्त्वपूर्ण विजय प्राप्त की थी स्पेन का एक महत्त्वपूर्ण विजेता था। उसे तथा उसके सैनिकों को जिन्होंने मैक्सिको पर आक्रमण किया था इतिहास में कोक्विस्टोडोर (Conquistadores) के नाम से जाना जाता है। हरनेंडो कोर्टस का जन्म 1485 ई० में स्पेन के शहर मेडलिन (Medellin) में हुआ था। 1504 ई० में वह अपना भाग्य आजमाने क्यूबा के गवर्नर की सेना में भर्ती हो गया। यहाँ उसने क्यूबा के गवर्नर के आदेश पर अनेक सैनिक अभियानों में भाग लिया। इनमें कोर्टेस ने अपनी बहादुरी के अनेक प्रमाण दिए।

इससे प्रभावित होकर क्यूबा के गवर्नर ने 1519 ई० में कोर्टेस को मैक्सिको पर आक्रमण करने का आदेश दिया। हरनेडो कोर्टेस फरवरी, 1519 ई० में 600 स्पेनी सैनिकों, 11 जहाजों एवं कुछ तोपों के साथ क्यूबा से रवाना हुआ। शीघ्र ही वे मैक्सिको की एक बंदरगाह वेराक्रुज (Veracruz) पहुँचे। यहाँ उसे डोना मैरीना (Dona Marina) का महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला। वह स्पेनिश एवं मैक्सिकन भाषाओं में बहुत प्रवीण थी। उसके सहयोग के बिना कोर्टेस के लिए वहाँ के लोगों की भाषा समझना अत्यंत कठिन था।

डोना मैरीना ने इस कार्य को सरल कर दिया। हरनेंडो कोर्टस का कहना था कि, “परमात्मा के पश्चात् हम न्यू स्पेन की विजय के लिए डोना मैरीना के ऋणी हैं।” डोना मैरीना द्वारा अपने देश के साथ किए गए विश्वासघात के लिए मैक्सिकन लोग उसे मालिंच (Malinche) अथवा विश्वासघातिनी कहते थे। डोना मैरीना के संबंध में हमें महत्त्वपूर्ण जानकारी बर्नाल डियाज़ डेल कैस्टिलो (Bernal Diaz del Castillo) की प्रसिद्ध रचना टु हिस्ट्री ऑफ़ मैक्सिको (True History of Maxico) से प्राप्त होती है। हरनेंडो कोर्टेस ने यह जानकारी भी प्राप्त की कि अनेक कबीलों के लोगों में एजटेक शासक मोंटेजुमा द्वितीय (1502-1520 ई०) के घोर अत्याचारों के कारण भारी रोष है। ये लोग उसके शासन का अंत देखना चाहते थे।

इस स्थिति का लाभ उठाते हुए कोर्टेस ने सर्वप्रथम वहाँ के टोटोनेक (Totonacs) लोगों की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया। इसे फौरन स्वीकार कर लिया गया क्योंकि टोटोनेक एज़टेक शासन से मुक्त होना चाहते थे। स्पेनी सैनिकों ने सर्वप्रथम लैक्सकलान (Tlaxcalans) नामक एक खूखार कबीले पर आक्रमण कर दिया। इस कबीले ने स्पेनी सैनिकों से कड़ा मुकाबला किया परंतु अंततः उनकी पराजय हुई। इसके पश्चात् ट्लैक्सकलान स्पेनी सैनिकों के साथ सम्मिलित हो गए। इससे कोर्सेस का साहस बढ़ गया। इस समय तक एज़टेक शासक मोंटेजुमा द्वितीय ने कोर्टेस की ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

ट्लैक्सकलानों पर उसकी विजय के पश्चात् मोंटेजुमा द्वितीय ने अपने एक अधिकारी के हाथों अनेक बहुमूल्य उपहार कोर्टेस को इस उद्देश्य के साथ भेजे कि वह उनके साम्राज्य से वापस चला जाए। कोर्टेस ने जब इन उपहारों को देखा तो उसकी अधिक धन प्राप्त करने की लालसा बढ़ गई। इस अधिकारी ने जब वापस जाकर मोंटेजुमा द्वितीय को स्पेनवासियों की आक्रमण क्षमता, उनके बारूद एवं घोड़े के प्रयोग के बारे में बताया तो वह घबरा गया।

कोर्टेस एवं उसके सैनिकों ने 8 नवंबर, 1519 ई० को एजटेक की राजधानी टेनोक्टिटलान (Tenochtitlan) पर आक्रमण कर दिया। यहाँ तक वे बिना किसी विरोध के पहुंच गए थे। यहाँ वे राजधानी टेनोक्टिटलान की भव्यता को देखकर स्तब्ध रह गए। उन्हें लगा जैसा कि वे कोई स्वप्न देख रहे हों। यहाँ मोंटेजुमा द्वितीय ने कोर्टेस को देवता का अवतार समझ उसका भव्य स्वागत किया। शीघ्र ही कोर्टेस ने मोंटेजुमा द्वितीय को बिना किसी कारण बंदी बना लिया। वास्तव में उसके बंदी बनाए जाने से ही कोर्टेस ने मैक्सिको पर लगभग विजय प्राप्त कर ली थी।

इसी समय हरनेडो कोर्टेस को क्यूबा वापस लौटना पड़ा। अतः उसने अपने सहायक ऐल्वारैडो (Alvarado) को मैक्सिको का प्रशासन सौंपा। स्पेनी शासन बहुत अत्याचारी प्रमाणित हुआ। सोने की निरंतर माँग के कारण वहाँ के लोगों ने विद्रोह कर दिया। अतः ऐल्वारैडो ने हुइजिलपोक्टली (Huizilpochtli) के वसंतोत्सव (spring festival) के दौरान हत्याकांड का आदेश दे दिया। इसने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया।

अतः स्थिति से निपटने के लिए कोर्टेस 25 जून, 1520 ई० को वापस लौटा। पर लोगों में स्पेनी शासन के विरुद्ध बहुत रोष था। उन्होंने कोर्टेस के लिए अनेक बाधाएँ उत्पन्न कर दी। सड़क मार्ग बंद कर दिए गए। पुलों को तोड़ दिया गया। जलमार्गों को काट दिया गया। स्पेनियों को भोजन की घोर कमी का भी सामना करना पड़ा। विद्रोहियों ने अथवा स्पेनी सैनिकों ने 29 जून, 1520 ई० को मोंटेजुमा द्वितीय को मौत के घाट उतार दिया। इसके बावजूद एज़टेकों एवं स्पेनियों में लड़ाई जारी रही। 30 जून, 1520 ई० को 600 स्पेनी एवं उतने ही एज़टेक लोग मारे गए।

अतः हत्याकांड की इस भयंकर रात को इतिहास में आँसू भरी रात (Night of Tears) के नाम से जाना जाता है। अंततः कोर्टेस ने 15 अगस्त, 1521 ई० को एज़टेकों को पराजित कर उनके साम्राज्य का अंत कर दिया। इस प्रकार हरनेंडो कोर्टेस ने दो वर्षों के भीतर ही एजटेक साम्राज्य का अंत कर दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० एम० फारेगर के अनुसार, “दो वर्षों के भीतर ही कोर्टेस एवं उसकी सेना ने एजटेक साम्राज्य को नष्ट कर दिया। यह एक ऐसी शानदार सफलता थी जिसकी विजयों के इतिहास में कोई अन्य उदाहरण नहीं है।’

हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको पर कब्जा करने के पश्चात् भारी मात्रा में स्पेन के शासक चाल्र्स पँचम (Charles V) को सोना एवं बहुमूल्य आभूषण भेजे। इससे प्रसन्न होकर चार्ल्स पँचम ने हरनेंडो कोर्टेस को अनेक सम्मानों से विभूषित किया तथा उसे 1522 ई० में न्यू स्पेन (मैक्सिको का नाम अब परिवर्तित करके न्यू स्पेन रख दिया गया था।) का गवर्नर एवं कैप्टन-जनरल (Governor and Captain-General) बनाया गया।

कोर्टेस ने अपने शासनकाल के दौरान न्यू स्पेन में नए नगरों का निर्माण किया। उसने वहाँ के लोगों पर घोर अत्याचार किए। कोर्टेस के बढ़ते हुए प्रभाव के कारण उसके विरोधियों ने चार्ल्स पँचम के कान भरे। अत: चार्ल्स पँचम ने कोर्टेस की शक्तियों में कुछ कमी कर दी। इससे कोर्टेस को बहुत निराशा हुई। अतः कोर्टेस 1541 ई० में वापस स्पेन आ गया। उसकी 2 दिसंबर, 1547 ई० को सेविली (Seville) में मृत्यु हो गई। निस्संदेह हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको में स्पेनी शासन स्थापित करने में बहुमूल्य योगदान दिया।

प्रश्न 4.
फ्रांसिस्को पिज़ारो कौन था? उसने इंका साम्राज्य पर किस प्रकार विजय प्राप्त की ?
उत्तर:
फ्राँसिस्को पिज़ारो पेरू (Peru) पर अधिकार करने वाला स्पेन का एक अन्य प्रसिद्ध विजेता था। उसका जन्म 1478 ई० में स्पेन के शहर ट्रजिलो (Trujillo) में हुआ था। वह एक अत्यंत गरीब परिवार से संबंधित था। अत: वह अनपढ़ रहा। वह 1502 ई० में हिस्पानिओला (Hispaniola) में अपना भाग्य आजमाने आ गया था। यहाँ वह सेना में भर्ती हो गया। 1513 ई० में वह प्रसिद्ध नाविक बालबोआ (Balboa) के साथ यात्रा पर गया जिसने प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) की खोज की। इस यात्रा से पिज़ारो बहुत प्रेरित हुआ।

शीघ्र ही उसे इंका राज्य के बारे में यह जानकारी मिली कि यह एक सोने एवं चाँदी का देश (El-do-rado) है। अत: वह इस देश पर अधिकार करने के स्वप्न देखने लगा। 1521 ई० में हरनेंडो कोर्टेस द्वारा मैक्सिको की विजय ने उसमें नव-स्फूर्ति का संचार किया। 1528 ई० में वह पेरू पहुँचने में सफल हो गया।फ्रांसिस्को पिजारो स्पेन की वापसी यात्रा के समय वहाँ से इंका कारीगरों द्वारा बनाए गए सोने के अत्यंत सुंदर कुछ मर्तबान अपने साथ ले आया।

वह स्पेन के शासक चार्ल्स पँचम (Charles V) को 1529 ई० में मिलने में सफल हुआ। उसने अपनी भेंट के दौरान चार्ल्स पँचम को इंका साम्राज्य में उपलब्ध बहुमूल्य दौलत के बारे में जानकारी दी। इससे उसके मन में इस अपार दौलत को प्राप्त करने की इच्छा उत्पन्न हुई। अतः उसने पिज़ारो को यह वचन दिया कि यदि वह इंका साम्राज्य पर विजय प्राप्त करने में सफल हो जाता है तो उसे वहाँ का गवर्नर बना दिया जाएगा।

यह वचन पाकर पिज़ारो बहुत प्रसन्न हुआ। अतः वह इंका साम्राज्य पर आक्रमण करने के लिए किसी सुनहरी अवसर की तलाश करने लगा। 1532 ई० में इंका साम्राज्य में सिंहासन प्राप्त करने के उद्देश्य से दो भाइयों अताहुआल्पा (Atahualpa) एवं हुआस्कर (Huascar) के मध्य गृह युद्ध आरंभ हो गया। अत: यह सुनहरी अवसर देखकर पिज़ारो ने इंका साम्राज्य पर आक्रमण करने की योजना बनाई। उसने केवल 168 सैनिकों एवं 62 घोड़ों के साथ इंका साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया।

इस समय तक अताहुआल्पा ने अपने भाई को पराजित कर सिंहासन प्राप्त कर लिया था। पिज़ारो 15 नवंबर, 1532 ई० को अपने सैनिकों के साथ इंका साम्राज्य के शहर काजामारका (Cajamarca) पहुँचा। यहाँ अताहुआल्पा अपने 40,000 सैनिकों के साथ मौजूद था। इतने सैनिकों का मुकाबला करना पिज़ारो के बस की बात नहीं थी। अतः उसने एक चाल द्वारा अताहुआल्पा को 16 नवंबर, 1532 ई० को बंदी बना लिया। अताहुआल्पा ने अपनी मुक्ति के लिए पिज़ारो को एक कमरा भर सोने की फिरौती देने का प्रस्ताव किया।

उस समय तक के इतिहास में इतनी बड़ी फिरौती कभी नहीं दी गई थी। इसके बावजूद पिज़ारो ने 29 अगस्त, 1533 ई० को राजा का वध करवा दिया। अताहुआल्पा के वध के कारण इंका साम्राज्य के सैनिकों में घोर निराशा फैल गई थी। अतः पिज़ारो एवं उसके सैनिकों ने नवंबर 1533 ई० में सुगमता से इंका साम्राज्य की राजधानी कुजको (Cuzco) पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह यह पिज़ारो की एक महान् सफलता थी। दो सौ से भी कम सैनिकों के साथ 6 लाख लोगों के साम्राज्य पर अधिकार करने की कोई अन्य उदाहरण इतिहास में नहीं मिलती।

पिज़ारो के सैनिकों ने कुज़को पर अधिकार करने के पश्चात् वहाँ भयंकर लूटमार की। पिज़ारो ने 1535 ई० में लिमा (Lima) को पेरू की नई राजधानी बनाया। अपने शासन के दौरान पिज़ारो ने इंका साम्राज्य के लोगों पर घोर अत्याचार किए। उसने बड़ी संख्या में लोगों को गुलाम बना लिया तथा उन्हें अधिक-से-अधिक धन देने के लिए विवश किया। अत: 1534 ई० में वहाँ के लोगों ने स्पेनी शासन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह दो वर्षों तक जारी रहा। 26 जून, 1541 ई० को लिमा में पिजारो के एक विरोधी गुट ने उसका वध कर दिया। इस प्रकार स्पेन के इस महान् विजेता का दुःखद अंत हुआ।

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प्रश्न 5.
16वीं शताब्दी में ब्राजील के पुर्तगाली प्रशासन के संबंध में आप क्या जानते हैं? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्राज़ील पर पुर्तगालियों का कब्जा संयोगवश ही हुआ। पुर्तगाली शासक मनोल (Manoel) के आदेश पर पेड्रो अल्वारिस कैनाल (Pedro Alvares Cabral) 9 मार्च, 1500 ई० को 13 जहाजों के एक बेड़े के साथ पुर्तगाल की बंदरगाह तागुस (Tagus) से भारत के लिए रवाना हुआ। समुद्री तूफानों से बचने के लिए वह अपने जहाजों के साथ 22 अप्रैल, 1500 ई० को ब्राजील के तट पर पहुँचा। उसके वहाँ पहुँचने पर वहाँ के मूल निवासियों (natives) ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। कैब्राल ब्राज़ील में एक सप्ताह रुकने के पश्चात् पूर्व की ओर चल दिया।

उसने ब्राजील की खोज संबंधी पुर्तगाली शासक को अवगत किया। आरंभ में पुर्तगालियों ने ब्राजील की ओर कम ध्यान दिया। इसका प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सोना अथवा चाँदी मिलने की संभावना बहुत कम थी। वहाँ केवल ब्राजीलवुड (Brazilwood) नामक वृक्ष पाया जाता था। इससे लाल रंजक (red dye) तैयार की जाती थी। ब्राजीलवुड के नाम के आधार पर ही यूरोपवासियों ने इस प्रदेश का नाम ब्राजील रखा।

पुर्तगाली शासक ने आरंभिक 30 वर्षों में ब्राजील में व्यापारियों को व्यापार करने की अनुमति बदले में वे सरकार को कर देते थे। ब्राजील के मूल निवासी इन व्यापारियों को लोहे के चाकू, छरियों एवं आरियों के बदले में जिन्हें वे अदभत मानते थे. पेड़ों को काटने तथा उन्हें जहाजों तक ले जाने के लिए तैयार हो गए। इसके अतिरिक्त वे इनके बदले में बहुत से बंदर, मुर्गियाँ, तोते, शहद तथा अन्य वस्तुएँ देने के लिए तैयार रहते थे। ब्राजील के मूल निवासी इस बात को समझने में असमर्थ रहे कि पुर्तगाली एवं फ्रांसीसी लोग इस लकड़ी की तलाश में इतनी दूर से क्यों आते हैं तथा घोर परेशानियाँ क्यों झेलते हैं।

पुर्तगालियों के ब्राजील में बढ़ते हुए व्यापार के कारण फ्रांसीसी व्यापारी उनसे ईर्ष्या करने लगे। अत: वे भी ब्राजील पहुंच गए। अतः पुर्तगाली एवं फ्रांसीसी व्यापारियों के मध्य अनेक भयंकर लड़ाइयाँ हुई। इन लड़ाइयों में अंततः पुर्तगालियों की विजय हुई। 1533 ई० में पुर्तगाली शासक जॉन तृतीय (John II) ने ब्राज़ील को 15 आनुवंशिक कप्तानियों (hereditary captaincies) में बाँट दिया। प्रत्येक कप्तानी का प्रमुख डोनाटेरियस (Donatarius) कहलाता था।

उसे विशाल शक्तियाँ प्रदान की गई थीं। उसे लोगों पर कर लगाने तथा उन्हें भूमि अनुदान देने का अधिकार दिया गया था। वे स्थानीय लोगों को गुलाम भी बना सकते थे। उनका मूल निवासियों के प्रति व्यवहार बहुत क्रूर था। 1540 के दशक में पुर्तगालियों ने ब्राजील में व्यापक पैमाने पर गन्ना उपजाने एवं वहाँ चीनी मिलें चलाने का कार्य शुरू किया। इस चीनी की यूरोप के बाजारों में बहुत माँग थी। अत: उन्हें इस व्यापार से बहुत लाभ होने लगा। पुर्तगाली इन चीनी मिलों में काम करने के लिए स्थानीय लोगों पर निर्भर थे।

इन लोगों की चीनी मिलों में काम करने की कोई दिलचस्पी न थी क्योंकि यह काम बहुत नीरस था। अत: पुर्तगालियों ने इन लोगों को गुलाम बना कर वहाँ काम करने के लिए बाध्य किया। पर्तगालियों के घोर अत्याचार से बचने के लिए इन लोगों ने अपने गाँव खाली कर दिए तथा जंगलों में जाकर शरण ली। अत: बहुत कम लोग गाँवों में बचे थे। अत: मिल मालिकों को अफ्रीका से गुलाम मंगवाने के लिए बाध्य होना पडा। स्पेनी उपनिवेशों-एजटेक साम्राज्य एवं इंका साम्राज्य-में स्थिति इससे बिल्कुल विपरीत थी। वहाँ स्थानीय लोगों ने खेतों एवं खानों में काम करने का विरोध नहीं किया।

अतः स्पेनियों को वहाँ गुलामों की आवश्यकता नहीं पड़ी। ब्राजील में डोनाटेरियसों के क्रूर व्यवहार के कारण वहाँ के लोगों में पुर्तगाली प्रशासन के विरुद्ध विरोध बढ़ता जा रहा था। अतः 1549 ई० में पुर्तगाली शासक ने ब्राजील के शासन को सीधा अपने हाथों में लेने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से ब्राज़ील में एक गवर्नर-जनरल को नियुक्त किया गया। उसे अपने सभी कार्यों के लिए राजा के प्रति उत्तरदायी बनाया गया। सैल्वाडोर (Salvador) को ब्राजील की राजधानी घोषित किया गया।

इस समय से जेसुइट पादरियों (Jesuit missionaries) ने ब्राज़ील जाना आरंभ कर दिया था। इन पादरियों ने दास प्रथा की कड़े शब्दों में आलोचना की। जेसुइट पादरी एंटोनियो वीइरा का कथन था, “जो भी आदमी दूसरों की स्वतंत्रता छीनता है और उस स्वतंत्रता को वापस लौटाने की क्षमता रखते हुए भी नहीं लौटाता, वह अवश्य ही महापाप का भागी होता है। इसके अतिरिक्त इन पादरियों ने वहाँ के मल निवासियों के साथ अच्छा बर्ताव किए जाने का पक्ष लिया। इन कारणों से यूरोपवासी इन जेसुइट पादरियों को पसंद नहीं करते थे। इन पादरियों ने ब्राज़ील में ईसाई धर्म का खूब प्रचार किया।

प्रश्न 6.
साम्राज्यवाद से क्या अभिप्राय है? साम्राज्यवाद के उत्थान के लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
साम्राज्यवाद से तात्पर्य उस तीव्र इच्छा से है जिसके कारण एक शक्तिशाली देश राजनीतिक और आर्थिक दृष्टि से पिछडे हए किसी दूसरे देश पर बलपूर्वक अधिकार जमाने का प्रयास करता है। इतिहास साक्षी है कि प्राचीनकाल से ही राजाओं की इच्छा दूसरे प्रदेशों पर कब्जा करने की रही है। साम्राज्यवाद शब्द विश्व में पहली बार 16वीं शताब्दी में छपा था।

19वीं शताब्दी में साम्राज्वाद को एक नया रूप सामने आया। इस नवीन साम्राज्यवाद के पीछे राजनीति भावना की अपेक्षा आर्थिक भावना अधिक प्रबल थी। साम्राज्यवादी देश उनके नियंत्रण में आए देशों का खूब शोषण करते थे। साम्राज्यवाद को बढ़ावा देने में पुर्तगाल, स्पेन, इंग्लैंड, फ्रांस, रूस एवं जापान ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। 19वीं शताब्दी में सामाज्यवाद के प्रसार के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. कच्चे माल की आवश्यकता (Necessity for Raw Materials):
औद्योगीकरण के अधीन यूरोपियन देशों में बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई। इन उद्योगों को चलाने हेतु कच्चे माल की अत्यधिक मात्रा में आवश्यकता थी। हर प्रकार का कच्चा माल देश के अंदर मिलना संभव न था। इसलिए यूरोपीय लोगों ने उन देशों के साथ मेल जोल बढ़ाना शुरू कर दिया था, जहां से उन्हें कच्चा माल अधिक मात्रा में मिल सकता था।

अधिक लाभ कमाने के लिए वे इन देशों से कच्चा माल काफ़ी सस्ते मूल्य पर खरीदते थे। आरंभ में इन यूरोपीय देशों के लोग व्यापारियों के रूप में एशिया तथा अफ्रीका के अनेक भागों में गए। परंतु बाद में उनकी कमजोर राजनैतिक स्थिति और पिछड़ेपन का लाभ उठा कर उन देशों पर अपना अधिकार कर लिया। इन स्थानों पर अधिकार करने हेतु इन देशों में परस्पर होड़ लग गई। इस प्रकार कच्चे माल की आवश्यकता ने साम्राज्यवाद को जन्म दिया।

2. नई मंडियों की खोज (The Search for New Markets):
यूरोप के देशों में औद्योगिक क्रांति के आने से बहुत-से नए और बड़े-बड़े कारखानों की स्थापना हुई। इन कारखानों में पहले से कहीं अधिक माल तैयार होने लगा। यह माल उस देश की आवश्यकताओं से कहीं अधिक होता था। अधिक लाभ कमाने के लिए और देश में मूल्य नियंत्रण रखने के लिए, इस माल को विदेशों में बेचना बहुत आवश्यक था।

इस माल को वे यूरोप के देशों में नहीं बेच सकते थे क्योंकि इनमें से बहुत-से देशों ने संरक्षण नीति को अपनाया हुआ था। इसके अधीन उन्होंने कानून पास करके विदेशों से तैयार माल खरीदने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसीलिए इन देशों ने अपना तैयार माल बेचने के लिए नई मंडियों की खोज शुरू कर दी। परिणामस्वरूप इन देशों ने एशिया तथा अफ्रीका से बहुत-से देशों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार साम्राज्यवाद की भावना को प्रोत्साहन मिला।

3. जनसंख्या में वृद्धि (Increase in Population):
19वीं शताब्दी से यूरोप के कुछ बड़े देशों में जनसंख्या में निरंतर वृद्धि हो रही थी। इन देशों में से इंग्लैंड, जर्मनी तथा फ्राँस प्रमुख थे। इस बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण लोगों को रोजगार देने तथा उन्हें बसाने की समस्या ने जटिल रूप धारण कर लिया था। इस समस्या पर नियंत्रण पाने के लिए बड़े राष्ट्रों ने अतिरिक्त जनसंख्या को अपने अधीन उपनिवेशों में भेजना आरंभ कर दिया। ये लोग या तो प्रमुख प्रशासनिक एवं सैनिक पदों पर लग गए अथवा उन्होंने वहाँ अपने उद्योग स्थापित कर लिए। धीरे धीरे उन्होंने इन उपनिवेशों में अपना प्रभाव बढ़ा लिया।

4.ईसाई प्रचारक (Christian Missionaries):
ईसाई प्रचारकों ने भी साम्राज्यवाद के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इन प्रचारकों ने पिछड़े देशों में जा कर अपने धर्म का प्रचार किया। उन्होंने वहाँ के लोगों में फैले धार्मिक अंधविश्वासों को दूर करने का यत्न किया। इस प्रकार अनेक लोगों ने प्रभावित होकर उनके धर्म में शामिल होना आरंभ कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने धन का लालच देकर अनेक लोगों को अपने धर्म में शामिल करना शुरू कर दिया। इस प्रकार धीरे-धीरे उनका प्रभाव एशियाई और अफ्रीकी देशों में बढ़ना शुरू हो गया।

5. उच्चतम सभ्यता में विश्वास (Faith in Higher Civilization):
19वीं शताब्दी में यूरोप के अधिकाँश देशों में एक नई राष्ट्रीय जागृति का विकास हुआ। इस विकास के फलस्वरूप यूरोप के प्रमुख देश अपनी सभ्यता पर अधिक गर्व करने लग पड़े। उनके अनुसार केवल उनकी सभ्यता ही विश्व में विकसित सभ्यता थी। उन्होंने अपनी-अपनी सभ्यता का विकास अविकसित देशों में करना आवश्यक समझा। उनका कहना था कि “हीन जातियों को सभ्य बनाना श्रेष्ठ जातियों का कर्तव्य है।” अधिक-से-अधिक उपनिवेशों को अपने प्रभावाधीन लाने को वे अपने राष्ट्र के लिए सम्मान का चिह्न मानते थे।

6. अतिरिक्त पूँजी का लगाना (Investment of Extra Capital):
औद्योगिक प्रगति के फलस्वरूप यूरोपीय देशों के लोग बहुत धनवान् हो गए। इनके पास पूँजी की मात्रा बढ़ गई, परंतु इस समय ब्याज की दर कम होने के कारण वे पूँजी को बैंकों में रखना नहीं चाहते थे। वे उपनिवेशों में इस अतिरिक्त पूँजी को उद्योग स्थापित करने में लगाना चाहते थे।

अत: उन्होंने अधीनस्थ उपनिवेशों में उद्योग स्थापित किए। वहाँ का कच्चा माल सस्ते दाम पर लेकर निर्मित माल अधिक दामों पर बेचना आरंभ कर दिया। इस प्रकार अपनी पूँजी से अधिक-से-अधिक लाभ प्राप्त करने हेतु उन्होंने अधीन उपनिवेशों में अधिक-से-अधिक कारखाने आदि स्थापित करके अपना प्रभाव बढ़ाना शुरू कर दिया।

7. देशों का पिछडापन (Backwardness of the Countries):
एशिया तथा अफ्रीका के अधिकाँश देश रोपियन देशों से अनेक पक्षों से पिछडे हए थे। उनके पास न तो आधनिक शस्त्र थे और न ही अच्छी प्रशिक्षित सेना। इसके अतिरिक्त उनमें राजनीतिक एकता का भी अभाव था। वे परस्पर लड़ते-झगड़ते रहते थे। इन कारणों से वे यूरोपियन देशों का मुकाबला न कर सके। अतः यूरोप के शक्तिशाली राष्ट्रों के लिए इन पिछड़े देशों पर अधिकार करना सुगम हो गया।

8. यातायात और संचार के साधन (Means of Transport and Communications) :
यातायात तथा संचार के साधनों के विकास ने साम्राज्यवाद की भावना को प्रोत्साहन दिया। भाप से चलने वाले जहाजों तथा रेलगाड़ियों ने एक स्थान से दूसरे स्थान पर यात्रा को सरल बना दिया। अब यूरोपीय देशों द्वारा उपनिवेशों के आंतरिक भागों से कच्चा माल प्राप्त करने तथा वहाँ अपने देश का बना माल बेचने का कार्य पहले से कहीं सुगम हो गया। तार के द्वारा दूर-दूर के स्थानों के साथ संपर्क संभव हो पाया। इस प्रकार यातायात और संचार के साधनों ने साम्राज्यवाद के विस्तार कार्य को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सुगम बना दिया।

प्रश्न 7.
अरावाक कौन थे? उनके जीवन की मुख्य विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अरावाकी कबीले के लोग कैरीबियन सागर में स्थित छोटे-छोटे द्वीप समूहों जिन्हें आजकल बहामा (Bahamas) कहा जाता है एवं वृहत्तर एंटिलीज (Greater Antilles) में रहते थे। वे अरावाकी लुकायो (Arawakian Lucayos) के नाम से भी जाने जाते थे। वे बहुत शाँतिप्रिय लोग थे। वे लड़ने की अपेक्षा बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसंद करते थे। उन्हें कैरिब (Caribs) नामक एक खूखार कबीले ने दक्षिण अथवा लघु ऐंटिलीज (Lesser Antilles) से सहजता से खदेड़ दिया था।

अरावाकी लोग अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित रहते थे। उनका न तो कोई राजा था तथा न ही कोई सेना। चर्च का भी उनके जीवन पर कोई नियंत्रण न था। इस प्रकार वे एक स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे। उनमें बहु विवाह प्रथा प्रचलित थी। वे स्त्रियों का बहुत सम्मान करते थे। वे कुशल नौका निर्माता थे। वे नौकाओं में बैठकर खुले समुद्र की यात्रा करते थे एवं मछलियाँ पकड़ते थे। उनके प्रमुख शस्त्र तीर एवं कमान थे। इनके द्वारा वे पशुओं का शिकार करते थे। इनके अतिरिक्त वे खेती का धंधा भी करते थे।

उनकी प्रमुख फ़सलें मक्का (corn), मीठे आलू (sweet potatoes), कंद-मूल (tubers) एवं कसावा (cassava) थे। वे खेती का अधिक विस्तार नहीं कर सके क्योंकि उनके पास घने जंगलों की सफाई करने के लिए लोहे की कुल्हाड़ी नहीं थी। अरावाकी गाँवों में रहते थे। उनके घर साधारण प्रकार के थे। यद्यपि वे सोने के गहने पहनते थे किंतु वे यूरोपियों की तरह सोने को उतना महत्त्व नहीं देते थे। यदि कोई यूरोपीय उन्हें सोने के बदले काँच के मनके (glass beads) दे देता था तो वे बहुत प्रसन्नता से इन्हें स्वीकार करते थे।

इसका कारण यह था कि काँच का मनका उन्हें अधिक सुंदर लगता था। वे बुनाई की कला में बहुत निपुण थे। उनके हैमक (Hammock) नामक झूले को देखकर यूरोपीय भी दंग रह गए थे। अरावाकियों का धर्म में अटूट विश्वास था। वे जीववादी (Animists) थे। उनका विश्वास था कि निर्जीव वस्तुओं-पत्थर एवं पेड़ आदि में भी जीवन होता है। वे जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे। शमन लोग (Shamans) लोगों के कष्टों को दूर करने में प्रमुख भूमिका निभाते थे।

अरावाकी बहुत उदार थे। 1492 ई० में जब क्रिस्टोफर कोलंबस (Cristopher Columbus) बहामा द्वीप में पहुँचा तो अरावाकियों ने उसका गर्मजोशी के साथ स्वागत किया। कोलंबस उनकी उदारता से बहुत प्रभावित हुआ था। इस बारे में उसने अपने रोज़नामचे (log-book) में लिखा, “वे इतने ज्यादा उदार एवं सरल स्वभाव के लोग हैं कि अपना सब कुछ देने को तैयार हैं। वे कभी इंकार नहीं करते; बल्कि वे सदा बाँटने को तत्पर रहते हैं और इतना अधिक प्यार जताते हैं कि मानो उनका प्यार भरा कलेजा ही बाहर निकल आएगा।’
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 8 iMG 1
स्पेनी प्रशासन के अधीन अरावाकियों पर घोर अत्याचार किए गए। उन्हें सोने एवं चाँदी की खानों में कार्य करने के लिए बाध्य किया गया। इस कारण अरावाकी उनके विरुद्ध हो गए। स्पेनियों ने उनका क्रूरता से दमन किया। इसके अतिरिक्त यूरोपियों के आगमन से बहामा में अनेक भयंकर बीमारियाँ फैल गईं। इनके चलते स्पेनियों के संपर्क में आने के बाद 25 वर्ष के अंदर ही अरावाकी सभ्यता लुप्त हो गई। निस्संदेह यह एक दुःखदायी अध्याय था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 8.
एजटेक सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? इस सभ्यता के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
एजटेक एक युद्धप्रिय एवं यायावर कबीला था। वे उत्तर मैक्सिको के रहने वाले थे। वे भोजन की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। एजटेकों ने मैक्सिको की मध्यवर्ती घाटी में 12वीं शताब्दी में बसने का निर्णय किया। मैक्सिको नाम एजटेकों के एक प्रमुख देवता मैक्सिली (Mexitli) के नाम पर पड़ा था।

1. एटेक साम्राज्य (Aztec Empire):
एजटेकों ने एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की थी। इसकी सीमाएं 2 लाख वर्ग किलोमीटर तक फैली हुई थीं। 15वीं शताब्दी में एजटेकों की शक्ति अपने शिखर पर थी। उस समय एजटेक साम्राज्य में 38 प्राँत थे। प्रत्येक प्रांत का मुखिया एक सैनिक गवर्नर होता था। उसकी सहायता के लिए एक सैनिक दल होता था। ये सैनिक लोगों से कर वसूल करते थे तथा गैर-एजटेक लोगों पर घोर अत्याचार करते थे। जॉन ए० गैरटी एवं पीटर गे के अनुसार, “एजटेक खन के प्यासे लोग थे तथा उनका साम्राज्य एक राजनीतिक राज्य की अपेक्षा सैनिक राज्य अधिक था।”

2. सम्राट की स्थिति (Position of the Emperor):
समाज में सम्राट् का स्थान सर्वोच्च था। उसे निरंकुश शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द कानून समझा जाता था। कोई भी उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। वह भव्य महलों में निवास करता था। उसके दरबार में विशेष नियमों का पालन किया जाता था। प्रजा उसकी देवता समान उपासना करती थी। उसे पृथ्वी पर सूर्य देवता का प्रतिनिधि समझा जाता था। राजा का चुनाव अभिजात वर्ग द्वारा किया जाता था।

3. कला (Art):
एजटेक शासक महान् कला प्रेमी थे। पाँचवें एज़टेक सम्राट् मोटेजुमा प्रथम (Montezuma I) ने 1325 ई० में टेनोस्टिटलान (Tenochtitlan) नामक राजधानी का निर्माण करवाया। इसका मैक्सिको झील के मध्य निर्माण किया गया था। इसे भव्य महलों, मंदिरों एवं उपवनों से सुसज्जित किया गया था। इस शहर की भव्यता को देखकर बाद में आने वाले स्पेनवासी भी चकित रह गए थे। 16वीं शताब्दी में इसकी गणना अमरीका के सबसे बड़े शहरों में की जाती थी।

4. श्रेणियों (Classes):
एज़टेक समाज श्रेणीबद्ध था। इसमें अभिजात वर्ग (aristocracy) को सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। इसमें शाही परिवार के सदस्य, पुरोहित, सैनिक अधिकारी एवं कुछ धनी व्यापारी सम्मिलित थे। उन्हें राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त किया जाता था। वे भव्य महलों में निवास करते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

समाज में उनकी बहुत प्रतिष्ठा थी। व्यापारियों को सरकारी राजदूतों एवं गुप्तचरों के रूप में कार्य करने का अवसर दिया जाता था। समाज में प्रतिभाशाली शिल्पियों, चिकित्सकों एवं अध्यापकों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों का था। उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। युद्धबंदियों को दास बना लिया जाता था। गरीब लोग भी विवश होकर अपने बच्चों को दासों के रूप में बेच देते थे।

5. व्यवसाय (Occupations):
एज़टेक लोग विभिन्न प्रकार के व्यवसाय करते थे। उनका मुख्य व्यवसाय कृषि था। क्योंकि एजटेक लोगों के पास भूमि की कमी थी इसलिए उन्होंने एक विशेष ढंग को अपनाया। वे सरकंडे (reed) की चटाइयाँ (mats) बुनकर उन्हें मिट्टी एवं पत्तों से ढक कर मैक्सिको झील में कृत्रिम टापू (artificial islands) बना लेते थे।

इन्हें चिनाम्पा (chinampas) कहा जाता था। इस भूमि पर स्वामित्व किसी व्यक्ति विशेष का नहीं अपितु कुल का होता था। यहाँ की प्रमुख फ़सलें मक्का (corn), फलियाँ (beans), कद्दु (pumpkins), कसावा (manioc root), आलू (potatoes) आदि थीं। कृषि के अतिरिक्त एजटेक लोग वस्त्र बनाने, गहने बनाने, मिट्टी के बर्तन बनाने तथा धातुओं के औजार बनाने का कार्य भी करते थे।

6. शिक्षा (Education):
एजटेक लोग शिक्षा पर विशेष बल देते थे। अभिजात वर्ग के बच्चे जिन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते थे उन्हें कालमेकाक (Calmecac) कहा जाता था। यहाँ उन्हें पुरोहित एवं योद्धा बनने का प्रशिक्षण दिया जाता था। उस समय एजटेक समाज में इन दोनों व्यवसायों की विशेष माँग थी। सामान्य लोगों के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते थे उन्हें तेपोकल्ली (Telpochcalli) कहा जाता था। यहाँ लड़कों को सैन्य प्रशिक्षण, कृषि एवं व्यापार करना सिखाया जाता था। उन्हें धर्म, उत्सवी गीतों एवं इतिहास संबंधी शिक्षा भी दी जाती थी। लड़कियों को घरेलू कार्यों की एवं नैतिक शिक्षा दी जाती थी।

7. स्त्रियों की स्थिति (Position of women):
एजटेक समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। कुछ स्त्रियाँ पुरोहित का कार्य करती थीं। इस व्यवसाय को समाज में विशेष सम्मान प्राप्त था। कुछ स्त्रियाँ पुरुषों के साथ कृषि कार्य करती थीं। कुछ स्त्रियाँ दुकानदारी का कार्य भी करती थीं। अधिकांश स्त्रियाँ घरेलू जीवन व्यतीत करती थीं। उस समय लड़कियों का विवाह प्रायः 16 वर्ष की आयु में कर दिया जाता था। विवाह के समय बहुत जश्न मनाया जाता था। उस समय लड़कियों को दहेज देने की प्रथा प्रचलित थी।

8. धर्म (Religion):
एजटेक लोग अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनका पंचांग (calendar) 18 माह में विभाजित था। प्रत्येक माह किसी विशेष देवी-देवता को समर्पित था। सूर्य देवता उनका सबसे प्रमुख देवता था। वह विश्व की सभी घटनाओं की जानकारी रखता था तथा पापियों को दंड देता था। युद्ध देवता उनका दूसरा महत्त्वपूर्ण देवता था।

युद्ध में विजय अथवा पराजय उसकी कृपा पर निर्भर करती थी। अन्न देवी (corn goddess) उनकी प्रमुख देवी थी। उसे सभी देवताओं की जननी समझा जाता था। इन देवी-देवताओं की स्मृति में विशाल एवं भव्य मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इन मंदिरों में इन देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। इन देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से प्रति वर्ष बड़ी संख्या में लोगों की बलियाँ दी जाती थीं। एजटेक . लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। उनमें अनेक प्रकार के अंध-विश्वास भी प्रचलित थे।

9. पतन (Decline):
1519 ई० में स्पेन के हरनेडो कोर्टस (Hernando Cortes) ने एज़टेक साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया। उसने दो वर्षों के भीतर ही संपूर्ण एजटेक सभ्यता को रौंद डाला। एज़टेक साम्राज्य का इतनी शीघ्र पतन क्यों हो गया इसके लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। सर्वप्रथम, एजटेक शासकों ने लोगों पर भारी कर लगाए थे। इस कारण उनमें भारी असंतोष था। दूसरा, एज़टेक शासकों की लगातार लड़ाइयों के कारण सैनिक भी ऊब चुके थे।

तीसरा, एज़टेक शासकों ने जिन नवीन क्षेत्रों को अपने अधीन किया वहाँ के लोगों पर घोर अत्याचार किए। इस कारण उनमें घोर असंतोष था। चौथा, एजटेक साम्राज्य में रोजाना बड़ी संख्या में युद्धबंदियों एवं गैर एज़टेक लोगों को बलि चढ़ा दिया जाता था। इस कारण लोग ऐसे अत्याचारी शासन का अंत करना चाहते थे। अतः इन लोगों ने हरनेडो कोर्टेस के आक्रमण के समय उसकी यथासंभव सहायता की। अतः ऐसे साम्राज्य का डूबना कोई हैरानी की बात नहीं थी।

प्रश्न 9.
इंका सभ्यता के बारे में आप क्या जानते हैं ? इस सभ्यता के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
इंका सभ्यता दक्षिण अमरीका की सबसे प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली सभ्यता थी। इस सभ्यता की स्थापना 12वीं शताब्दी में मैंको कपाक (Manco Capac) ने पेरू (Peru) में की थी। उसने कुजको (Cuzco) को अपनी राजधानी घोषित किया। यह सभ्यता 15वीं शताब्दी में अपनी उन्नति के शिखर पर थी। इस सभ्यता का सबसे शाक्तशाली शासक पचकुटी इंका (Pachacuti Inca) था। वह नौवां इंका शासक था। वह 1438 ई० में सिंहासन पर बैठा था। उसके शासनकाल में इंका साम्राज्य की सीमाओं में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। इंका साम्राज्य उत्तर में इक्वेडोर (Ecuador) से लेकर दक्षिण में चिली (Chile) तक फैला हुआ था। इसका क्षेत्रफल 3000 मील था तथा इसकी जनसंख्या 10 लाख से अधिक थी।

1. सम्राट् की स्थिति (Position of the Emperor):
इंका साम्राज्य में सम्राट् की स्थिति सर्वोच्च थी। उसे सूर्य देवता का पुत्र समझा जाता था। राज्य के सभी लोग अपने सम्राट् की देवता समान उपासना करते थे। सम्राट को अनेक शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द कानून समझा जाता था। सम्राट् की आज्ञा का उल्लंघन करना मृत्यु को निमंत्रण देना था। इंका सम्राट् अताहुआल्पा (Atahualpa) का कथन था कि, “मेरे साम्राज्य में मेरी इच्छा के बिना न तो कोई पक्षी उड़ सकता है तथा न ही कोई पत्ता हिल सकता है।

2. प्रशासन (Administration):
इंका शासक कुशल प्रशासक थे। उनके प्रशासन का मुख्य उद्देश्य लोक भलाई था। इंका शासकों ने प्रशासन की कुशलता के उद्देश्य से इसे अनेक प्रांतों में विभाजित किया था। प्रत्येक प्रांत का मुखिया एक गवर्नर होता था। वह अभिजात वर्ग से संबंधित होता था। वह अपने अधीन प्रांत में कानून एवं व्यवस्था के लिए उत्तरदायी होता था। उसकी सहायता के लिए कुछ सैनिक एवं अन्य अधिकारी होते थे। इंका साम्राज्य में अनेक कबीले थे। प्रत्येक कबीला स्वतंत्र रूप से वरिष्ठों की सभा (Council of Elders) द्वारा शासित होता था।

इनका चुनाव कबीले के सदस्यों द्वारा लोकतांत्रिक ढंग से किया जाता था। प्रत्येक कबीला अपने कार्यों के लिए शासक के प्रति उत्तरदायी था। शासक उनके कार्यों पर प्रभावी ढंग से नियंत्रण रखता था। निस्संदेह इंका शासकों का प्रशासन बहुत उच्च कोटि का था। प्रसिद्ध इतिहासकार पी० एस० फ्राई के कथनानुसार, “इंका ने अपने विशाल साम्राज्य का प्रशासन एक कुशल संगठन द्वारा चलाया जिसका मुकाबला प्राचीन काल रोम के साथ किया जा सकता है।”

3. भवन निर्माण (Architecture):
इंका सभ्यता के लोग महान् भवन निर्माता थे। कुजको (Cuzco) एवं माचू-पिच्चू (Machu-Picchu) नामक शहरों में बने उनके भव्य महल, किले, मंदिर एवं अन्य भवन उनकी उच्च कोटि की भवन निर्माण कला को दर्शाते हैं। इन भवनों की दीवारों को बनाते समय वे विशाल पत्थरों का प्रयोग करते थे। इनमें से कुछ पत्थरों का वजन 100 टन से भी अधिक तक होता था। इन पत्थरों को वे मजदूरों एवं रस्सियों के सहयोग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। इन पत्थरों को जो कि वास्तव में बड़ी चट्टानें होती थीं बहुत बारीकी से तराशा जाता था।

इन पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए इंका मिस्त्री किसी गारे अथवा सीमेंट का प्रयोग नहीं करते थे। इसके बावजूद उनके द्वारा बनवाए गए भवन बहुत मज़बूत होते थे। इन भवनों को शल्क पद्धति (flaking) द्वारा सुंदर बनाया जाता था। भवनों के अतिरिक्त इंका लोगों ने पहाड़ों के मध्य संपूर्ण साम्राज्य में सड़कें, पुल एवं सुरंगें बनाईं। इनसे उनके इंजीनियरिंग कौशल का पता चलता है। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० एच० हाल का यह कथन ठीक है कि, “इंका भवन निर्माण कला के शिखरों को नई दुनिया में भी नहीं छुआ जा सका है।”

4. विभिन्न श्रेणियाँ (Various Classes):
इंका समाज विभिन्न श्रेणियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान सम्राट् को प्राप्त था। वह भव्य महलों में रहता था। वह बहुमूल्य वस्त्र पहनता था। उसकी देखभाल के लिए बड़ी संख्या में नौकर होते थे। उसके मनोरंजन के लिए बड़ी संख्या में रखैलें (concubines) भी होती थीं। सम्राट् के पश्चात् दूसरा स्थान कुलीनों (nobles) एवं पुरोहितों (priests) को प्राप्त था।

उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे एक समृद्ध जीवन व्यतीत करते थे। शिक्षक, डॉक्टर एवं सैनिक मध्य वर्ग से संबंधित थे। उनका जीवन निर्वाह भी सुगमता से हो जाता था। किसान एवं दस्तकार साधारण वर्ग से संबंधित थे। उन्हें अपने जीवन निर्वाह के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों को प्राप्त था। उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था। ई० एम० बर्नस एवं अन्य के शब्दों में, “इंका समाज मानव समुदायों में पाए जाने वाले सबसे कठोर समाजों में से एक था।”

5. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women):
समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। उनका परिवार में पूर्ण सम्मान किया जाता था। उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार दिया गया था। वे अपना पति चुनने के लिए भी स्वतंत्र थीं। उनमें बाल विवाह की प्रथा प्रचलित नहीं थी। विधवा को दुबारा विवाह करने की अनुमति थी। अधिकाँश स्त्रियाँ घरेलू होती थीं। कुछ स्त्रियाँ पुरोहित का कार्य करती थीं। उस समय की स्त्रियाँ त्योहारों में बढ़ चढ़ कर भाग लेती थीं।

6. शिक्षा (Education):
इंका समाज में शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाता था। प्रत्येक बच्चे को शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्कूल भेजा जाता था। लड़कों को प्रायः सैनिक एवं पुरोहित बनने संबंधी शिक्षा दी जाती थी। अधिकाँश लड़कियों को घरेलू कार्यों संबंधी शिक्षा दी जाती थी। कुछ लड़कियाँ पुरोहित संबंधी प्रशिक्षण ग्रहण करती थीं। उस समय विद्यार्थियों को मौखिक (oral) शिक्षा दी जाती थी।

इसका कारण यह था कि इंका समाज में कोई लेखन प्रणाली प्रचलित नहीं थी। वे अपना हिसाब क्विपु (quipu) प्रणाली से रखते थे। इससे चीजों को स्मरण रखने में मदद मिलती थी। इसमें एक डंडा होता था जिस पर विभिन्न रंगों की रस्सियों से गाँठ बाँधी जाती थी। प्रत्येक गाँठ एक किस्म का संकेत होती थी जिससे उस वस्तु का अनुमान लगाया जाता था। इंका लोगों की प्रशासनिक भाषा क्वेचुआ (Quechua) थी।

7. विभिन्न व्यवसाय (Various Occupations):
इंका समाज में विभिन्न प्रकार के व्यवसाय प्रचलित थे। उस समय के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। इसे इंका सभ्यता का आधार माना जाता था। उस समय पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत (terraces) बनाए जाते थे। इन खेतों की सिंचाई के लिए नहरें बनाई जाती थीं। उनकी प्रमुख फ़सलें मक्का (corn) एवं आलू (potatoes) थीं।

उस समय कुछ लोग पशुपालन का कार्य करते थे। वे लामा (Ilama) तथा अल्पाका (Alpaca) नामक पशुओं को पालते थे। इनसे वे भार ढोने का कार्य करते थे। इनसे ऊन प्राप्त की जाती थी तथा इनका माँस खाया जाता था। इनके अतिरिक्त उस समय वस्त्र उद्योग, मिट्टी के बर्तन बनाने का उद्योग एवं सोने, चाँदी एवं ताँबे के आभूषण बनाने के उद्योग भी प्रसिद्ध थे। कुछ लोग खानों से धातु निकालने का कार्य भी करते थे।

8. धर्म (Religion):
इंका लोगों का जीवन धर्म से बहुत प्रभावित था। यद्यपि वे अनेक देवी-देवताओं में विश्वास रखते थे किंतु सूर्य उनका प्रमुख देवता था। उनका विश्वास था कि उनका प्रथम शासक मैंको कपाक सूर्य का पुत्र था। अतः इंका शासकों ने सूर्य देवता की स्मृति में साम्राज्य भर में अनेक भव्य एवं विशाल मंदिरों का निर्माण करवाया। इन मंदिरों को सोने से सजाया जाता था।

इन मंदिरों में इंका के मृत शासकों के शवों को रखा जाता था। इन मंदिरों में उपासना के लिए बड़ी संख्या में पुरोहितों को नियुक्त किया जाता था। सर्य देवता को प्रसन्न करने के लिए जानवरों की एवं कभी-कभी मनुष्य की बलियाँ दी जाती थीं। विशेष अवसरों पर राजा स्वयं विशेष धूम-धड़के के साथ इन मंदिरों में उपासना के लिए आता था। इंका लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। उनमें अनेक प्रकार के अंध-विश्वास भी प्रचलित थे।

9. पतन (Decline):
इंका सभ्यता के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, 1532 ई० में स्पेनी आक्रमण से पूर्व इंका साम्राज्य कमज़ोर हो गया था। इसका कारण सिंहासन प्राप्ति के लिए वहाँ अताहुआल्पा (Atahualpa) एवं उसके भाई हुआस्कर (Huascar) में गृह युद्ध आरंभ हो गया था। अताहुआल्पा ने सिंहासन प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की तथा उसने अपने भाई हुआस्कर को बंदी बना लिया था। दूसरा, अताहुआल्पा एक योग्य शासक प्रमाणित न हुआ। वह विशाल सेना के होते हुए भी स्पेनी आक्रमणकारियों का सामना न कर सका।

तीसरा, फ्राँसिस्को पिज़ारो (Francisco Pizarro) जिसके नेतृत्व में स्पेनी सैनिकों ने इंका साम्राज्य पर आक्रमण किया था बहुत अनुभवी था। उसने बहुत चतुराई से अताहुआल्पा को बंदी बना लिया था। चौथा, यूरोपियों के आगमन के कारण इंका साम्राज्य में अनेक बीमारियाँ फैल गई थीं। इस कारण वहाँ बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का शिकार हो गए थे। पाँचवां, इंका लोग अपने तीरों एवं तलवारों से स्पेनी बंदूकों एवं तोपों का सामना करने में विफल रहे । अतः उनकी सभ्यता का लोप हो गया।

प्रश्न 10.
माया सभ्यता की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। इस सभ्यता का पतनं क्यों हुआ?
उत्तर:
माया सभ्यता मैक्सिको की एक महत्त्वपूर्ण सभ्यता थी। यह सभ्यता 300 ई० से 900 ई० के दौरान अपनी उन्नति के शिखर पर पहुँची । इस सभ्यता के महत्त्वपूर्ण केंद्र मैकि महत्त्वपूर्ण केंद्र मैक्सिको (Maxico), ग्वातेमाला (Guatemala), होंडुरास (Honduras) एवं अल-सैल्वाडोर (El Salvador) में थे। यद्यपि माया सभ्यता का अंत 16वीं शताब्दी में हुआ किंतु इसका पतन 11वीं शताब्दी से आरंभ हो गया था।

1. माया शासन पद्धति (Maya Polity):
माया सभ्यता की शासन पद्धति के संबंध में हमें कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं है। माया शासक सामान्यतः पुरुष हुआ करते थे। कभी-कभी रानियाँ भी शासन करती थीं। राजा का पद पैतृक होता था। उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका बड़ा पुत्र सिंहासन पर बैठता था। राजा का बहादुर होना अनिवार्य था।

एक बहादुर राजा ही साम्राज्य का विस्तार एवं उसकी सुरक्षा कर सकता था। राजा के सिंहासन पर बैठते समय देवताओं को प्रसन्न करने के उद्देश्य से मानव बलि दी जाती थी। राजा अभिजात वर्ग (nobility) एवं पुराहितों (priests) की सहायता से शासन चलाता था। राजा भव्य महलों में रहता था। उसकी सेवा में बड़ी संख्या में लोग, दास एवं दासियाँ होते थे।

2. श्रेणियाँ (Classes):
माया समाज अनेक श्रेणियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पुरोहितों को प्राप्त था। राजा उनके परामर्श के बिना कोई कार्य नहीं करता था। समाज में दूसरा स्थान अभिजात वर्ग को प्राप्त था। अभिजात वर्ग के लोग राज्य के महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त थे। पुरोहित एवं अभिजात वर्ग के लोग बहुत बहुमूल्य वस्त्र पहनते थे तथा वे बहुत ऐश्वर्यपूर्ण जीवन व्यतीत करते थे।

उनकी सेवा में भी अनेक दास-दासियाँ होते थे। समाज की अधिकाँश जनसंख्या किसान वर्ग से संबंधित थी। उन्हें अपने जीवन निर्वाह के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों को प्राप्त था। उनकी दशा अत्यंत दयनीय थी।

3. कृषि (Agriculture):
माया लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। उन्होंने पत्थर की कुल्हाड़ी (stone axe) तथा आग के द्वारा अनेक घने जंगलों का सफाया किया। इस भूमि को उन्होंने कृषि योग्य बनाया। उनके कृषि करने के ढंग उन्नत एवं कुशलतापूर्वक थे। अतः उस समय फ़सलों की भरपूर पैदावार होती थी। माया किसान सबसे अधिक मक्का (corn) का उत्पादन करते थे। इसका कारण यह था कि माया लोगों के अनेक धार्मिक क्रियाकलाप एवं उत्सव मक्का बोने, उगाने एवं काटने से जुड़े होते थे। इसके अतिरिक्त वे सेम (beans), आलू (potatoes), कपास (cotton) आदि फ़सलों का उत्पादन करते थे।

4. धर्म (Religion):
माया लोगों का धर्म में अटूट विश्वास था। वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनके दो प्रमुख देवता सूर्य देवता एवं मक्का देवता थे। इनके अतिरिक्त वे अग्नि देवता, वन देवता, भूमि देवता एवं वर्षा देवता आदि की भी उपासना करते थे। वे अपने देवी-देवताओं की स्मृति में भव्य मंदिरों एवं सुंदर मूर्तियों का निर्माण करते थे।

इन मंदिरों की देखभाल के लिए बड़ी संख्या में पुरोहितों को नियुक्त किया जाता था। माया लोग अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुओं की बलियाँ देते थे। कुछ विशेष अवसरों पर मानव बलियाँ भी दी जाती थीं। माया लोग मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। उनमें अनेक प्रकार के अंध विश्वास भी प्रचलित थे।

5. कला (Art):
माया लोग कला के महान् प्रेमी थे। उन्होंने यूनानी एवं रोमनों की तरह भवन निर्माण कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने अनेक भव्य नगरों, महलों, पिरामिडों, मंदिरों एवं वेधशालाओं (observatories) का निर्माण करवाया। माया लोगों ने जिन नगरों का निर्माण किया उनमें टिक्ल (Tikal), कोपान (Copan), पालेंक (Palenque), कोबा (Coba), युकाटान (Ukatan), चिचेन इटजा (Chichen Itza), बोनामपाक (Bonamapak), कलाक्मुल (Kalakmul) तथा उक्समल (Uxmal) आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

इन नगरों को अनेक भव्य भवनों, उद्यानों एवं फव्वारों से सुसज्जित किया गया था। माया कलाकारों द्वारा बनाए गए महलों को देखकर व्यक्ति चकित रह जाता है। ये महल बहुत विशाल एवं सुंदर थे। माया लोगों ने बहुत विशाल पिरामिड (pyramids) बनवाए। इन पिरामिडों के ऊपर मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इन मंदिरों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। ये मूर्तियाँ देखने में बिल्कुल सजीव लगती थीं।

माया कलाकारों ने जिन मंदिरों का निर्माण किया उनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध आठवीं शताब्दी ग्वातेमाला में निर्मित टिक्ल मंदिर था। यह मंदिर 229 फुट ऊँचा था। इस मंदिर में बनी मूर्तियाँ एवं चित्र इसकी शान में चार चाँद लगाते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार टी० एच० वालबैंक के अनुसार, “कला के क्षेत्र में माया भवन निर्माण कला एवं मर्ति कला ने अद्वितीय उन्नति की।”

6. पंचांग (Calendar):
माया सभ्यता ने पंचांग के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण देन दी। उन्होंने दो प्रकार के पंचांग तैयार किए। प्रथम पंचांग धर्म-निरपेक्ष था। इसमें सौर पंचांग की तरह वर्ष में 365 दिन होते थे। उनके वर्ष में 18 माह होते थे। प्रत्येक माह में 20 दिन होते थे। शेष पाँच दिनों को दुर्भाग्यपूर्ण समझा जाता था। माया लोगों का दूसरा पंचांग धार्मिक था। इसमें वर्ष में 260 दिन होते थे। इसे पुराहितों के लिए धार्मिक कर्मकांडों के लिए तैयार किया गया था।

7. लिपि (Script):
माया सभ्यता की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि उनकी लिपि थी। यह अमरीका की प्रथम सभ्यता थी जिसने सर्वप्रथम लिपि का विकास किया। उनकी लिपि चित्रात्मक (pictographic) थी। माया लेखन के उदाहरण प्रस्तर पट्टों पर उत्कीर्ण अभिलेखों (carved inscriptions on the stelae) एवं पुस्तकों जिन्हें कोडिसेज (codices) कहा जाता था में पाए गए हैं। इनमें माया शासकों से संबंधित महत्त्वपूर्ण घटनाओं एवं खगोल विद्या (astronomical information) संबंधी सूचनाएँ दर्ज की जाती थीं। दुर्भाग्यवश इस लिपि को अभी तक पूर्णतः पढ़ने में सफलता प्राप्त नहीं की जा सकी है।

8. पतन (Downfall):
माया सभ्यता का पतन 11वीं शताब्दी में आरंभ हो गया था। माया सभ्यता का पतन क्यों हुआ इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि माया सभ्यता का अंत वहाँ आने वाले भयंकर भूकंपों एवं समुद्री तूफानों के कारण हुआ। कुछ अन्य के विचारों के अनुसार माया सभ्यता का विनाश वहाँ फैलने वाली भयंकर बीमारियों के कारण हुआ। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का शिकार हो गए थे। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि माया सभ्यता का अंत वहाँ आए जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ।

वहाँ काफी लंबे समय तक सूखा पड़ा। इस कारण फ़सलें नष्ट हो गई एवं लोग भूखे मर गए। कुछ इतिहासकारों का कथन है कि माया सभ्यता के पतन में वहाँ होने वाले किसान विद्रोहों ने प्रमुख भूमिका निभाई। अधिकाँश इतिहासकारों का मानना है कि माया सभ्यता का अंत 1519 ई० में हरनेंडो कोर्टेस के आक्रमण के कारण हुआ। उसने 1521 ई० में मैक्सिको को अपने अधीन कर लिया था। शीघ्र ही उसने ग्वातेमाला, निकारागुआ एवं होंडुरास पर कब्जा करके माया सभ्यता का अंत कर दिया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 11.
ओलाउदाह एक्वियानो कौन था? उसकी यात्रा का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
गुलाम के रूप में पकड़ कर ब्राज़ील ले जाए गए ग्यारह वर्षीय अफ्रीकी लड़के की यात्रा का वर्णन करें।
उत्तर:
ओलाउदाह एक्वियानो नाईजीरिया (Nigeria) का रहने वाला था। 11 वर्ष की उम्र में उसे गुलाम बना लिया गया था। उसे गुलाम के रूप में ब्राज़ील में बेच दिया गया। वहाँ से उसे इंग्लैंड के एक कप्तान ने खरीद लिया। 1766 ई० में उसने अपने स्वामी से मुक्ति प्राप्त कर ली। इसके पश्चात् उसने विभिन्न देशों में दासता के विरुद्ध प्रचार किया। 1789 ई० में उसकी आत्मकथा दि इनटरेस्टिंग नैरेटिव ऑफ़ दि लाइफ ऑफ़ ओलाउदाह एक्वियानो (The Interesting Narrative of the Life of Olaudah Equiano) प्रकाशित हुई।

यह पुस्तक शीघ्र ही संपूर्ण विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई तथा इसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में ओलाउदाह एक्वियानो ने एक गुलाम के रूप में अपनी यात्रा तथा गुलामों के जीवन के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। ओलाउदाह एक्वियानो ने अपनी आत्मकथा (autobiography) में लिखा है कि उसका जन्म 1745 ई० में नाईजीरिया में हुआ था। मैंने कभी अंग्रेज़ों अथवा समुद्र के बारे में नहीं सुना था।

एक दिन जब मेरे माता-पिता खेतों में कार्य करने गए थे तो उस दिन दो पुरुषों एवं एक स्त्री जो कि अफ्रीकी थे ने मेरे घर पर धावा बोल दिया। वे मुझे तथा मेरी छोटी बहन को बंदी बना कर ले गए। उस समय मेरी आयु 11 वर्ष थी। आगे आने वाले 6 अथवा 7 महीनों के दौरान मुझे कई अफ्रीकी मालिकों को बेचा जाता रहा। हमें बंदरगाह की ओर पैदल ले जाया जाता रहा। मेरे साथ बहत से अन्य लोग थे जिन्हें गुलाम बनाया गया था। इन सभी को जंजीरों से जकड कर पंक्ति के रूप में ले जाया जाता था।

जिन लोगों ने हमें खरीदा था वे हमारे साथ-साथ चलते थे। अधिक शोर मचाने वालों अथवा भागने का प्रयास करने वालों की हंटर से ज़बरदस्त पिटाई की जाती थी। एक शाम को हम बंदरगाह के किनारे पहुंच गए। मुझे बहुत से अन्य गुलामों के साथ बंदरगाह पर खड़े एक जहाज में दूंस दिया गया। जहाज़ में सवार नाविकों की डरावनी शकलें देखकर मैं काँप गया। मुझे लगा कि मैं बुरी आत्माओं की दुनिया में आ गया हूँ तथा ये लोग कर खा जाएँगे।

जहाज़ में गलामों का जीवन नरक समान था। उनमें विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ जैसे चेचक, पेचिश तथा पीला बुखार आदि फैल गई थीं। इससे उनके दुःख बहुत बढ़ गए थे। इन घातक बीमारियों के कारण तथा बिना किसी इलाज के रोज़ाना अनेक गुलामों की मत्य हो जाती थी। दर्द से कराह रहे इन गलामों की आवाज़ सुन कर दिल दहल जाता था।

एक दिन अवसर पाकर दो गुलामों ने पानी में कूदकर आत्महत्या कर ली। मुझे यह अवसर प्राप्त नहीं हुआ नहीं तो मैं भी ऐसा ही करता। जब जहाज़ के सदस्यों को इस घटना की जानकारी मिली तो उन्होंने सभी गुलामों की जम कर पिटाई की तथा हम पर निगरानी बढ़ा दी गई।

जब यह जहाज़ अंततः ब्राजील की बंदरगाह पर पहुँचा तो बहुत से गुलाम खरीदने वाले व्यापारी जहाज़ पर चढ़ आए। उनकी शकलें बहुत डरावनी थीं। ऐसा लगता था कि वे हमें खा जाएंगे। उन्हें देखकर बहुत से गुलाम काँपने लगे। इसी समय जहाज़ पर वहाँ पहले से रह रहे दो अफ्रीकी गुलाम आए तथा उन्होंने हमें समझाया कि उन्हें यहाँ मारने के लिए नहीं अपितु काम करने के लिए लाया गया है। मुझे खेतों में कार्य करने के लिए लगाया गया। यहाँ गुलामों पर घोर अत्याचार किए जाते थे।

अफ्रीका में गुलामों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं किया जाता था। वहाँ गुलामों को परिवार के सदस्यों के रूप में सम्मिलित कर लिया जाता था। कुछ समय पश्चात् मुझे एक गोरे व्यक्ति ने खरीद लिया तथा वह अपने साथ मुझे इंग्लैंड ले आया। वह एक व्यापारी था। उसके साथ मैं अनेक बार वेस्टइंडीज़ (West Indies) गया। 1766 ई० में मेरे स्वामी ने मुझे मुक्त कर दिया। इसके पश्चात् ओलाउदाह एक्वियानो ने 1797 ई० में अपनी मृत्यु तक गुलाम प्रथा के विरुद्ध एक जोरदार अभियान चलाया। इस प्रकार इतिहास में सदैव के लिए उसका नाम अमर हो गया।

प्रश्न 12.
दास व्यापार के बारे में आप क्या जानते हैं ? इस प्रथा का उन्मूलन किस प्रकार हुआ?
उत्तर:
दास व्यापार आधुनिक विश्व इतिहास के माथे पर एक कलंक समान था। इस प्रथा ने 15वीं शताब्दी में अपने पाँव यूरोप में पसारने आरंभ किए। 16वीं शताब्दी में यह प्रथा दक्षिण एवं उत्तरी अमरीका में भी फैल गई। यह प्रथा 17वीं एवं 18वीं शताब्दियों में अपनी उन्नति के शिखर पर थी। आरंभ में पराजित हए लोगों को गुलाम बना लिया जाता था।

बाद में बड़ी संख्या में दासों को अफ्रीका से पकड़ कर इन देशों में बेचा जाने लगा। वास्तव में दास प्रथा ने एक व्यापार का रूप धारण कर लिया था। इन दासों पर जो अमानवीय अत्याचार किए जाते थे उनका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। दास व्यापार के कारण न केवल अफ्रीका अपितु यूरोप एवं अमरीका के समाजों पर दूरगामी प्रभाव पड़े।

1. दास प्रथा का जन्म (Origin of Slavery):
15वीं शताब्दी में जब कुछ पुर्तगाली एवं स्पेनी नाविक अफ्रीका गए तो वे अपने साथ वहाँ से कुछ दासों को भी ले आए। इन गुलामों को घरों, खेतों एवं खानों में कार्य पर लगाया गया। 16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों एवं स्पेनियों ने दक्षिण अमरीका के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया था। वहाँ इन देशों के सैनिकों ने स्थानीय लोगों को पराजित कर उन्हें गुलाम बना लिया था। इन लोगों से गुलाम के रूप में कार्य करवाना अत्यंत कठिन सिद्ध हुआ। इस समस्या से निपटने के लिए यूरोपियों ने नई दुनिया में अफ्रीका से गुलाम मंगवाने आरंभ कर दिए थे।

2. दास व्यापार (Slave Trade):
17वीं एवं 18वीं शताब्दियों में नई दुनिया में दासों की माँग में अभूतपूर्व वृद्धि हो गई थी। इसका कारण था कि जंगलों की सफाई के लिए, खेतों के लिए एवं खानों में कार्य करने के लिए सस्ते श्रम की आवश्यकता थी। अत: यूरोपवासियों ने अफ्रीका के साथ गुलामों का व्यापार आरंभ कर दिया था। ये व्यापारी अपनी माँग अफ्रीका के स्थानीय नेताओं को देते थे।

अफ्रीका के स्थानीय नेता काफी प्रभावशाली होते थे। उन्होंने अपने अधीन कछ सेना रखी होती थी। इन सैनिकों की सहायता से वे रात के समय अफ्रीका के अंदरूनी भागों में छापे मार कर लोगों को बलपूर्वक गुलाम बना लेते थे। इन गुलामों में अधिकाँश संख्या युवा गुलामों की होती थी। इन गुलामों को यूरोपीय व्यापारियों को बेच दिया जाता था।

इसके बदले यूरोपीय व्यापारी उन्हें दक्षिण अमरीका से लाए गए खाद्य पदार्थ देते थे। ये अफ्रीकी लोगों के प्रमुख खाद्य पदार्थ थे। कभी-कभी उन्हें नकद धन भी दिया जाता था। यूरोपीय व्यापारी अफ्रीकी गुलामों को जहाजों में लाद कर नई दुनिया में ले आते थे। बंदरगाह पर पहुँचने पर ये व्यापारी इन दासों को दो से तीन गुना अधिक मुनाफे पर ज़रूरतमंदों को बेच देते थे।

3. दासों का जीवन (Life of Slaves):
अधिकाँश दास खेतों में मजदूरी का कार्य करते थे। कुछ गुलाम खानों में भी काम करते थे। इन्हें अत्यंत भयावह स्थितियों में कार्य करना पड़ता था। गुलामों से प्रतिदिन 14 से 16
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घंटे कार्य लिया जाता था। कार्य के दौरान भी उन्हें जंजीरों से जकड़ कर रखा जाता था ताकि वे भागने न पाएँ। कार्य के दौरान यदि कोई गुलाम सुस्त कार्य करता तो उसकी निगरानी करने वाला गोरा निरीक्षक उसकी हंटर द्वारा जमकर पिटाई करता। उस पर अनेक प्रकार के अन्य अमानवीय अत्याचार किए जाते थे।

कठोर श्रम करने के बावजूद इन गुलामों को दो समय भर पेट खाना भी नसीब नहीं होता था। रात्रि के समय उन्हें गंदी झोंपड़ियों में धकेल दिया जाता था। इस समय भी वे जंजीरों से जकड़े रहते थे। वे नाम मात्र के वस्त्र पहनते थे। संक्षेप में गुलामों का जीवन जानवरों से भी बदतर था। एरिक विलियम्स (Eric Williams) प्रथम आधुनिक इतिहासकार था जिसने 1940 के दशक में अपनी पुस्तक कैपिटलिज्म एंड स्लेवरी (Capitalism and Slavery) में गुलामों के दु:खों पर काफी प्रकाश डाला है।

4. दासों पर प्रतिबंध (Restrictions on Slaves):
दासों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे। वे अपने मालिकों से अनुमति पत्र लिए बिना अपने कार्य को नहीं छोड़ सकते थे। वे किसी प्रकार का कोई नशा नहीं कर सकते थे। वे अपने पास किसी प्रकार का कोई हथियार नहीं रख सकते थे। उन्हें पढ़ने तथा लिखने का भी कोई अधिकार न था। वे गोरे लोगों के विरुद्ध चाहे वे उन्हें जान से मार दें अथवा इनकी स्त्रियों के साथ बलात्कार करें कोई शिकायत दर्ज नहीं करवा सकते थे। दसरी ओर वे गोरे लोगों पर हाथ नहीं उठा सकते थे। इनमें से किसी नियम का उल्लंघन करने पर संबंधित गुलाम को कड़ा दंड दिया जाता था।

5. दास व्यापार के प्रभाव (Impacts of the Slave Trade):
दास व्यापार के अनेक दूरगामी परिणाम निकले। प्रथम, यह प्रथा अफ्रीका के लिए विशेष तौर पर विनाशकारी सिद्ध हई। इस प्रथा के कारण अफ्रीका के अधिकांश पुरुषों को दास बना लिया गया। अतः उनकी स्त्रियों को अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा। वे खेतों में काम करने के लिए बाध्य हुईं।

यह कार्य पहले पुरुष किया करते थे। दूसरा, इस प्रथा के चलते दासों को घोर अत्याचारों का सामना करना पड़ा। उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था। बाध्य होकर अनेक बार दास या तो भाग जाते थे या फिर विद्रोह कर देते थे। दास व्यापार यूरोपियों के लिए बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ। दासों को खानों एवं खेतों में कार्य पर लगाया गया। उनके खून-पसीने के कारण यूरोपीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिली।

6. दास प्रथा का उन्मूलन (The Abolition of Slavery):
दासों के साथ किए जाने वाले अमानुषिक व्यवहार के कारण अनेक देशों में इस क्रूर प्रथा के विरुद्ध आवाज़ बुलंद होने लगी। बहुत से नेताओं ने इस प्रथा का अंत करने के लिए अपनी सरकारों को प्रेरित किया। इसके लिए उन्हें एक लंबा संघर्ष करना पड़ा। सर्वप्रथम डेनमार्क (Denmark) ने 1803 ई० में दासों के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया।

यह निस्संदेह दास प्रथा का उन्मूलन करने की दिशा में उठाया गया प्रथम महत्त्वपूर्ण पग था। डेनमार्क का अनुसरण करते हुए ब्रिटेन ने 1807 ई० में, फ्राँस ने 1814 ई० में, नीदरलैंड ने 1817 ई० में तथा स्पेन ने 1845 ई० में गुलामों के व्यापार पर पूर्णत: निषेध लगा दिया। 1833 ई० में सर्वप्रथम ब्रिटेन ने दास प्रथा का अंत करने की घोषणा की। इसके पश्चात् फ्राँस ने 1848 ई० में, संयुक्त राज्य अमरीका ने 1865 ई० में, क्यूबा ने 1886 ई० में तथा ब्राजील ने 1888 ई० में दास प्रथा का अंत कर दिया। दास प्रथा का उन्मूलन निस्संदेह एक नए युग का संकेत था।

क्रचन सेख्याबर्षघटना
1.1325 ई०एजटेक की राज्धानी टेनोक्टिटलान का निर्माण।
2.1380 ई०कुलबनुमा का आविष्कार।
3.1410 ई०कार्डिनल पिएर ड्विऐेली ने ‘इमगो मुंड़ी’ की रचना की।
4.1438 ई०इंका सम्र्राज्य का सबसे शब्तिशाली शासक पचकुटी इंका सिंहासन पर बैठा।
5.1453 ई०तुर्कों द्वारा कुस्तुनदुनिया पर अधिकार।
6.1477 ई०टॉलेमी की ज्योग्राफ़ी प्रकाशित हुई।
7.1492 ई०कोलेंबस द्वारा बहामा द्वीप समूह की खोज।
8.1499 ई०अमेरिगो वेस्पुसी ने यदिण अमरीका की यात्रा की।
9.22 अप्रैल, 1500 ई०पेट्गो अल्वारिस कैज्राल ब्राजील पहूँचज।
10.1502 ई०मेंटेजुमा द्वितीय एजटेक सम्नाट् बना।
11.1507 ई०नयी दुनिया को अमरीका का नाम दिया गया।
12.1519 ई०हरनेंड़ो कोटेंस द्वारा एजटेक सात्राज्प पर आक्रमण।
13.30 जून, 1520 ई०औसू भरी रात।
14.15 अगस्त, 1521 ई०एजटेक साम्राज्म का अंत।
15.1522 ई०हरनेंडो कोर्टेस को न्यू स्पेन (मैक्सिको) का गवर्नर एवं कैप्टन-जनरल बनाया गया।
16.1532 ई०अताहुआल्पा इंका साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा। फ्राँसिस्को पिज़ारो ने इंका साम्राज्य को जीता।
17.1532 ई०पुर्तगाली शासक ने ब्राज़ील का शासन सीधा अपने हाथों में लिया।
18.1549 ई०ओलाउदाह एक्वियानो की आत्मकथा ‘दि इनटरेस्टिंग नैंरेटिव ऑफ़ दि लाइफ ऑफ़ ओलाउदाह एक्वियानो’ का प्रकाशन।
19.1789 ई०ओलाइदाह एक्वियानो की आत्मकथा ‘दि इनटरेस्टिंग
20.1797 ई०नैरैटिव ऑफ़ दि लाइफ ऑफ ओलाउदाह एक्वियनो’ का प्रकाशन।
21.1803 ई०ओसाउदाह एक्वियानो की मृत्यु हुई।
22.1833 ई०ड़नमार्क ने दास व्यापार पर सर्वप्रथन प्रतिबंध लगापा।
23.1865 ई०ब्रिटेन ने दास प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।
24.1888 ई०संयुक्त राज्च अमरीका ने दास प्रथा पर प्रतिबंध लगाया।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
ऐसे कौन-से कारण थे जिनसे 15वीं शताब्दी में यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली ?
अथवा
भौगोलिक खोजों के क्या कारण थे ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में निम्नलिखित कारणों ने यूरोपीय नौचालन में सहायता दी
(1) नए प्रदेशों की खोज कर वहाँ से सोना-चाँदी प्राप्त करना।

(2) विदेशों में ईसाई धर्म का प्रसार करना।

(3)1380 ई० में कुतबनुमा अथवा दिशासूचक का आविष्कार हुआ। इस कारण नाविकों को खुले समुद्र में दिशाओं को सही जानकारी प्राप्त हुई। इस कारण समुद्री यात्राएँ अधिक सुरक्षित हो गई।

(4) समुद्री यात्रा पर जाने वाले यूरोपीय जहाजों में भी काफी सुधार हो चुका था। इससे नाविकों को समुद्र पार जाने के लिए प्रेरणा मिली।

(5) 1477 ई० में टॉलेमी की प्रसिद्ध पुस्तक ज्योग्राफी का प्रकाशन हुआ। इसमें अनेक देशों से संबंधित बहुमूल्य भौतिक जानकारी दी गई थी। इसने नाविकों को समुद्री यात्राएँ करने के लिए प्रेरित किया।

(6) 15वीं शताब्दी में आईबेरियाई प्रायद्वीप अर्थात् स्पेन एवं पुर्तगाल के शासकों ने समुद्री यात्राएँ करने वाले नाविकों को दिल खोलकर सहायता प्रदान की।

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प्रश्न 2.
15वीं शताब्दी में आईबेरियाई प्रायद्वीप ने भौगोलक खोजों के क्षेत्र में क्या योगदान दिया ?
अथवा
किन कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने 15वीं शताब्दी में सबसे पहले अटलांटिक महासागर के पार जाने का साहस किया ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में आईबेरियाई प्रायद्वीप भाव स्पेन एवं पुर्तगाल के देशों ने समुद्री खोज यात्राओं में बहुमूल्य योगदान दिया। अक्सर यह प्रश्न किया जाता है कि स्पेन एवं पुर्तगाल के शासकों ने समुद्री खोजों में अन्य देशों के मुकाबले अग्रणी भूमिका क्यों निभाई ? इसके अनेक कारण थे। प्रथम, इस समय स्पेन एवं पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था अच्छी थी जबकि यूरोप की अर्थव्यवस्था गिरावट के दौर से गुजर रही थी।

दूसरा, स्पेन एवं पुर्तगाल के शासक सोना एवं धन दौलत के भंडार एकत्र कर अपने यश एवं सम्मान में वृद्धि करना चाहते थे। तीसरा, वे नई दुनिया में ईसाई धर्म का प्रसार करना चाहते थे। चौथा, धर्मयुद्धों के कारण इन देशों की एशिया के साथ व्यापार करने में रुचि बढ़ गई। इन युद्धों के दौरान उन्हें पता चला कि इन देशों के साथ व्यापार करके वे भारी मुनाफा कमा सकते हैं।

पाँचवां, स्पेन के शासकों द्वारा दिए जाने वाले इकरारनामों जिन्हें कैपिटुलैसियोन कहा जाता था लोगों को महासागरी शूरवीर बनने के लिए प्रोत्साहित किया। इन इकरारनामों द्वारा स्पेन के शासक ने नई दुनिया के प्रदेशों को जीतने वाले नेताओं को पुरस्कार के रूप में शासन का अधिकार दिया। छठा, इन देशों के शासकों ने समुद्री खोज पर जाने वाली नाविकों को प्रत्येक संभव सहायता प्रदान की।

प्रश्न 3.
नए आविष्कारों ने किस प्रकार भौगोलिक खोजों के उत्साहित किया ?
उत्तर:
14वीं एवं 15वीं शताब्दियों में जहाजरानी से संबंधित नए आविष्कारों ने नाविकों की समुद्री यात्राओं को सुगम बना दिया। 1380 ई० में कुतबनुमा भाव दिशासूचक यंत्र का आविष्कार हुआ। यह एक सर्वोच्च महत्त्व का आविष्कार था। इससे नाविकों को खुले समुद्र में दिशाओं की सही जानकारी प्राप्त होती थी।

इससे सुदूर समुद्री यात्राएँ करना संभव हुआ। 16वीं शताब्दी में एस्ट्रोलेब का आविष्कार हुआ। इस यंत्र से नाविकों को भूमध्य रेखा से दूरी मापने में सहायता मिली। इसी शताब्दी में बतिस्ता ने विश्व का ठीक मानचित्र बनाया। इससे नाविकों को स्थानों के मध्य दूरी जानने में सहायता मिली। 1609 ई० में दूरबीन के आविष्कार ने नाविकों को दूर तक देखना संभव बनाया।

इस कारण वे आने वाले किसी ख़तरे से परिचित हो सकते हैं। सबसे बढ़कर इस काल में यूरोपियों ने अपने जहाजों में बहुत सुधार कर लिया था। ये जहाज़ पहले से अधिक हल्के, विशाल एवं तीव्र गति से चलने वाले थे। निस्संदेह इन नवीन आविष्कारों ने समद्री यात्राएँ करने वालों को एक नई दिशा प्रदान की।

प्रश्न 4.
क्रिस्टोफर कोलंबस पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
क्रिस्टोफर कोलंबस ने नयी दुनिया की खोज में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसका जन्म 1451 ई० में इटली के शहर जिनोआ में हुआ था। उसे बचपन से ही समुद्री यात्राएँ करने का शौक था। 1492 ई० में स्पेन के शासक फर्जीनेंड ने समुद्री यात्राओं संबंधी उसकी योजना को स्वीकृति दी। कोलंबस 3 अगस्त, 1492 ई० को स्पेन की बंदरगाह पालोस से यात्रा के लिए रवाना हुआ। इस समय उसके पास तीन जहाज़-सांता मारिया, पिंटा तथा नीना थे।

वह 12 अक्तूबर, 1492 ई० को बहामा द्वीप समूह के गुआनाहानि पहुँचा। कोलंबस ने इसे इंडीज समझा। अत: उसने वहाँ के निवासियों को रेड इंडियन्स कहा। वह यहाँ के निवासियों के भव्य स्वागत एवं उदारता से बहुत प्रभावित हुआ। कोलंबस ने इस द्वीप का नाम सैन सैल्वाडोर रखा। कोलंबस की इस महत्त्वपूर्ण सफलता से प्रभावित होकर फर्जीनेंड ने उसे एडमिरल ऑफ़ दी ओशन सी की उपाधि से सम्मानित किया। उसे सैन सैल्वाडोर का वाइसराय नियुक्त किया गया। उसने अपने शासनकाल के दौरान यहाँ के लोगों पर घोर अत्याचार किए। 1506 ई० में क्रिस्टोफर कोलंबस की मृत्यु हो गई।

प्रश्न 5.
हरनेंडो कोर्टेस कौन था ?
उत्तर:
हरनेंडो कोर्टेस स्पेन का एक प्रसिद्ध विजेता (कोंक्विस्टोडोर) था। उसका जन्म 1485 ई० में स्पेन के शहर मेडिलन में हुआ था। 1504 ई० में वह क्यूबा के गवर्नर की सेना में भर्ती हो गया था। उसने अनेक सैनिक अभियानों में भाग लिया एवं महत्त्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित की। उसकी बहादुरी एवं योग्यता से प्रभावित होकर क्यूबा के गवर्नर ने हरनेंडो कोर्टेस को 1519 ई० में मैक्सिको पर आक्रमण करने की ज़िम्मेदारी सौंपी। हरनेडो कोर्टेस 1519 ई० में 600 स्पेनी सैनिकों के साथ मैक्सिको के लिए रवाना हुआ। उसे डोना मैरीना का बहुमूल्य सहयोग मिला।

उसके सहयोग के बिना हरनेडो कोर्टेस के लिए वहाँ के लोगों की भाषा समझना अत्यंत कठिन था। उस समय मैक्सिको में एजटेक शासक मोंटेजमा द्वितीय का शासन था। लोग उसके अत्याचारों से बहत दःखी थे। अतः हरनेंडो कोर्टेस बिना किसी विरोध के एज़टेक साम्राज्य की राजधानी टेनोक्टिटलान में 8 नवंबर, 1519 ई० को पहुँच गया था।

उसने धोखे से मोंटेजुमा द्वितीय को बंदी बना लिया। 1521 ई० तक हरनेंडो कोर्टेस ने संपूर्ण एज़टेक साम्राज्य को अपने अधीन कर लिया था। 1522 ई० में उसने मैक्सिको का नाम परिवर्तित करके न्यू स्पेन रख दिया। हरनेंडो कोर्टेस ने 1522 ई० से लेकर 1541 ई० तक न्यू स्पेन के गवर्नर के रूप में शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान उसने वहाँ के लोगों पर घोर अत्याचार किए। 1547 ई० में उसकी मृत्यु हो गयी।

प्रश्न 6.
फ्राँसिस्को पिज़ारो के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पिज़ारो स्पेन का एक प्रसिद्ध विजेता था। उसका जन्म 1478 ई० में स्पेन के में हुआ था। 1502 ई० में वह सेना में भर्ती हो गया था। वह 1521 ई० में हरनेंडो कोर्टेस की मैक्सिको विजय से बहुत प्रभावित हुआ। वह 1528 ई० में अपना भाग्य आजमाने पेरू चला गया। अगले वर्ष वह वहाँ से स्पेन वापसी यात्रा के समय इंका कारीगरों द्वारा बनाए गए कुछ सोने के बर्तन साथ ले आया था। उसने उन्हें स्पेन के शासक चार्ल्स पँचम को भेंट किया तथा पेरू में उपलब्ध अपार दौलत के बारे में जानकारी दी।

अतः उसने पिज़ारो को पेरू पर आक्रमण करने एवं वहाँ शासन करने की अनुमति दे दी। 1532 ई० में पेरू में सिंहासन प्राप्त करने के लिए दो भाइयों में गृहयुद्ध आरंभ हो गया था। इसके अतिरिक्त वहाँ चेचक के भयंकर रूप में फैलने से बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो गयी थी। यह स्वर्ण अवसर देखकर फ्रांसिस्को पिज़ारो ने 15 नवंबर, 1532 ई० को पेरू पर आक्रमण कर दिया था। उसने धोखे से पेरू के नव-नियुक्त शासक अताहुआल्पा को बंदी बना लिया था। अताहुआल्पा द्वारा भारी फिरौती देने के बावजूद भी उसका वध कर दिया गया।

इसके पश्चात् पिज़ारो ने सुगमता से संपूर्ण इंका साम्राज्य पर अधिकार कर लिया। 1535 ई० में उसने लिमा को पेरू साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। अपने शासनकाल के दौरान पिज़ारो ने वहाँ के लोगों पर घोर अत्याचार किए। परिणामस्वरूप 26 जून, 1541 ई० को पिज़ारो का लिमा में वध कर दिया गया।

प्रश्न 7.
अरावाकी सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
(1) अरावाकी लोग बहुत शाँतिप्रिय थे। वे लड़ने की अपेक्षा बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसंद करते थे।

(2) अरावाकी लोग अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित रहते थे। उनका न तो कोई राजा था तथा न ही कोई सेना। चर्च का भी उनके जीवन पर कोई नियंत्रण न था। इस प्रकार वे एक स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे।

(3) वे कुशल नौका निर्माता थे। वे नौकाओं में बैठकर खुले समुद्र की यात्रा करते थे एवं मछलियाँ पकड़ते थे। उनके प्रमुख शस्त्र तीर एवं कमान थे। इनके द्वारा वे पशुओं का शिकार करते थे।

(4) अरावाकी गाँवों में रहते थे। उनके घर साधारण प्रकार के थे। यद्यपि वे सोने के गहने पहनते थे। किंतु वे यूरोपियों की तरह सोने को उतना महत्त्व नहीं देते थे।

(5) वे बुनाई की कला में बहुत निपुण थे। उनके हैमक नामक झूले को देखकर यूरोपीय भी दंग रह गए थे।

(6) अरावाकियों का धर्म के अटूट विश्वास था। वे जीववादी थे। उनका विश्वास था कि निर्जीव वस्तुओं पत्थर एवं पेड़ आदि में भी जीवन होता है। वे जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे।

प्रश्न 8.
एजटेक सभ्यता की प्रमुख विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
(1) एजटेक समाज में सम्राट् का स्थान सर्वोच्च था। उसे पृथ्वी पर सूर्य देवता का प्रतिनिधि समझा जाता था।

(2) एज़टेक शासक महान् कला प्रेमी थे। एजटेक सम्राट् मोंटेजुमा प्रथम ने 1325 ई० में टेनोक्टिटलान नामक राजधानी का निर्माण करवाया।

(3) एज़टेक समाज श्रेणीबद्ध था। इसमें अभिजात वर्ग को सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों का था। उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय थी।

(4) एजटेक लोग विभिन्न प्रकार के व्यवसाय करते थे। उनका मुख्य व्यवसाय कृषि था।

(5) एजटेक लोग शिक्षा पर विशेष बल देते थे। अभिजात वर्ग के बच्चे जिन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते थे। उनको कालमेकाक कहा जाता था।

(6) एज़टेक समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था। कुछ स्त्रियाँ पुरोहित का कार्य करती थीं।

(7) धर्म एज़टेक लोगों का जीवन का मुख्य आधार था। सूर्य देवता उनका सबसे प्रमुख देवता था। युद्ध देवता और अन्न देवी उनके प्रमुख देवी-देवता थे।

प्रश्न 9.
एजटेक और मेसोपोटामयी सभ्यताओं की तुलना कीजिए।
उत्तर:

  • एज़टेक एवं मेसोपोटामयी दोनों ही सभ्यताएँ एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई थीं।
  • दोनों ही सभ्यताओं के समाज में सम्राट् को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
  • दोनों ही सभ्यताओं का समाज श्रेणीबद्ध था। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों को दिया गया था। उनकी स्थिति अत्यंत शोचनीय थी।
  • दोनों ही सभ्यताओं के लोगों के जीवन में धर्म की प्रमुख भूमिका थी। लोग अपने देवी-देवताओं की स्मृति में भव्य मंदिरों का निर्माण करते थे।
  • दोनों ही सभ्यताओं के समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उन्हें अनेक अधिकार प्राप्त थे।
  • एजटेक समाज में शिक्षा पर विशेष बल दिया जाता था। मेसोपोटामयी सभ्यता के लोग कम शिक्षित थे।

प्रश्न 10.
इंका लोगों की संस्कृति की प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • इंका साम्राज्य में सम्राट की स्थिति सर्वोच्च थी। उसे सूर्य देवता का पुत्र समझा जाता था।
  • इंका सभ्यता के लोग महान् भवन निर्माता थे। कुजको एवं माचू-पिच्चू नामक शहर उनकी उच्च कोटि की कला के प्रतीक हैं।
  • इंका समाज अनेक श्रेणियों में विभाजित था। समाज में सबसे निम्न स्थान दासों को प्राप्त था। उनका जीवन नरक समान था।
  • इंका समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी। उनका परिवार में काफ़ी सम्मान किया जाता था। उन्हें अनेक अधिकार भी प्राप्त थे।
  • इंका समाज में शिक्षा को विशेष महत्त्व दिया जाता था। सभी बच्चों को अनिवार्य रूप से शिक्षा ग्रहण करने के लिए स्कूल भेजा जाता था।
  • इंका समाज में नैतिकता पर विशेष बल दिया जाता था। लोग सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 11.
इंका सभ्यता के लोग महान् भवन निर्माता थे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:
इंका सभ्यता के लोग महान् भवन निर्माता थे। कुजको एवं माचू-पिच्चू नामक शहरों में बने उनके भव्य महल, किले, मंदिर एवं अन्य भवन उनकी उच्च कोटि की भवन-निर्माण कला को दर्शाते हैं। इन भवनों की दीवारों को बनाते समय वे विशाल पत्थरों का प्रयोग करते थे। इनमें से कुछ पत्थरों का वज़न 100 टन से भी अधिक तक होता था। इन पत्थरों को वे मजदूरों एवं रस्सियों के सहयोग से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे।

इन पत्थरों को जो कि वास्तव में बड़ी चट्टानें होती थीं बहुत बारीकी से तराशा जाता था। इन पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए इंका मिस्त्री किसी गारे अथवा सीमेंट का प्रयोग नहीं करते थे। इसके बावजूद उनके द्वारा बनवाए गए भवन इतने मज़बूत होते थे कि सैंकड़ों वर्ष बीत जाने के बाद एवं कुछ विनाशकारी भूकंपों के बावजूद वे नष्ट नहीं हुए। इन भवनों को शल्क पद्धति द्वारा सुंदर बनाया जाता था। भवनों के अतिरिक्त इंका लोगों ने पहाड़ों के मध्य संपूर्ण साम्राज्य में सड़कें, पुल एवं सुरंगें बनाईं। इनसे उनके इंजीनियरिंग कौशल का पता चलता है।

प्रश्न 12.
माया लोगों की अति महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:
(1) माया समाज अनेक श्रेणियों में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पुरोहितों को प्राप्त था। राजा उनके परामर्श के बिना कोई कार्य नहीं करता था।

(2) माया लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि था। उनके कृषि करने के ढंग उन्नत एवं कुशलतापूर्वक थे। अतः उस समय फ़सलों की भरपूर पैदावार होती थी।

(3) माया लोगों का धर्म में अटूट विश्वास था। वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनके दो प्रमुख देवता सूर्य देवता एवं मक्का देवता थे।

(4) माया लोग कला के महान् प्रेमी थे। उन्होंने यूनानी एवं रोमनों की तरह भवन निर्माण कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनका आठवीं शताब्दी ग्वातेमाला में निर्मित टिक्ल मंदिर सर्वाधिक प्रसिद्ध था।

(5) माया सभ्यता की पंचांग के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण देन थी। उन्होंने दो प्रकार के पंचांग तैयार किए। प्रथम पंचांग धर्म-निरपेक्ष था। दूसरा पंचांग धार्मिक था।

(6) माया सभ्यता अमरीका की प्रथम सभ्यता थी जिसने सर्वप्रथम लिपि का विकास किया।

प्रश्न 13.
माया सभ्यता की कला के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
माया लोग कला के महान् प्रेमी थे। उन्होंने यूनानी एवं रोमनों की तरह भवन निर्माण कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने अनेक भव्य नगरों, महलों, पिरामिडों, मंदिरों एवं वेधशालाओं का निर्माण करवाया। माया लोगों ने जिन नगरों का निर्माण किया उनमें टिक्ल, कोपान, पालेंक, कोबा, युकाटान, बोनामपाक तथा उक्समल आदि के नाम उल्लेखनीय हैं।

इन नगरों को अनेक भव्य भवनों, उद्यानों एवं फव्वारों से सुसज्जित किया गया था। माया कलाकारों द्वारा बनाए गए महलों को देखकर व्यक्ति चकित रह जाता है। ये महल बहुत विशाल एवं सुंदर थे। इनमें शाही परिवार के अतिरिक्त अनेक अन्य व्यक्तियों के लिए निवास स्थान बनाए जाते थे। इन महलों की छतों एवं दीवारों को अनेक प्रकार के चित्रों से सुसज्जित किया जाता था।

इन चित्रों में चटकीले रंग भरे गए हैं। माया लोगों ने बहुत विशाल पिरामिड बनवाए। इन पिरामिडों के ऊपर मंदिरों का निर्माण किया जाता था। इन मंदिरों में अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित की जाती थीं। ये मूर्तियाँ देखने में बिल्कुल सजीव लगती थीं।

प्रश्न 14.
माया सभ्यता का पतन क्यों हुआ ?
उत्तर:
माया सभ्यता का पतन क्यों हुआ इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि माया सभ्यता का अंत वहाँ आने वाले भयंकर भूकंपों एवं समुद्री तूफानों के कारण हुआ। कुछ अन्य के विचारों के अनुसार माया सभ्यता का विनाश वहाँ फैलने वाली भयंकर बीमारियों के कारण हुआ। इस कारण बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का शिकार हो गए थे।

कुछ इतिहासकारों का विचार है कि माया सभ्यता का अंत वहाँ आए जलवायु परिवर्तन के कारण हुआ। वहाँ काफ़ी लंबे समय तक सूखा पड़ा। इस कारण फ़सलें नष्ट हो गई एवं लोग भूखे मर गए। कुछ इतिहासकारों का कथन है कि माया सभ्यता के पतन में वहाँ होने वाले किसान विद्रोहों ने प्रमुख भूमिका निभाई।

अधिकाँश इतिहासकारों का माना है कि माया सभ्यता का अंत 1519 ई० में हरनेंडो कोर्टेस के आक्रमण के कारण हुआ। उसने 1521 ई० में मैक्सिको को अपने अधीन कर लिया था।

प्रश्न 15.
ओलाउदाह एक्वियानो कौन था ?
उत्तर:
ओलाउदाह एक्वियानो नाईजीरिया का रहने वाला था। 11 वर्ष की उम्र में उसे गुलाम बना लिया गया था। उसे गुलाम के रूप में दक्षिण अमरीका में बेच दिया गया। वहाँ से उसे इंग्लैंड के एक कप्तान ने खरीद लिया। 1766 ई० में उसने अपने स्वामी से मुक्ति प्राप्त कर ली। इसके पश्चात् उसने विभिन्न देशों में दास्ता के विरुद्ध प्रचार किया। 1789 ई० में उसकी आत्मकथा दि इनटरेस्टिंग नैरैटिव ऑफ़ दि लाइफ ऑफ़ ओलाउदाह एक्वियानो प्रकाशित हुई।

यह पुस्तक शीघ्र ही संपूर्ण विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई तथा इसका विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया। इस पुस्तक में ओलाउदाह एक्वियानो ने एक गुलाम के रूप में अपनी यात्रा तथा गुलामों के जीवन के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। गुलाम प्रथा का अंत करने में इस पुस्तक ने प्रमुख भूमिका निभाई।

प्रश्न 16.
दासों के जीवन पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण अमरीका में दासों का जीवन नरक समान था। उनसे अधिकांशतः खेती का कार्य करवाया जाता था। कुछ गुलाम खानों में भी काम करते थे। इन्हें अत्यंत भयावह स्थितियों में कार्य करना पड़ता था। कार्य के दौरान उन्हें जंजीरों से जकड़ कर रखा जाता था ताकि वे भागने न पाएँ। उन पर अनेक प्रकार के अन्य अमानवीय अत्याचार किए जाते थे। इन अत्याचारों के कारण अनेक गुलामों की मृत्यु हो जाती थी।

इसके बावजूद गोरे लोगों पर किसी प्रकार का न तो कोई मुकद्दमा चलता था तथा न ही उन्हें कोई सज़ा दी जाती थी। कठोर श्रम करने के बावजूद इन गलामों को दो समय भर पेट खाना भी नसीब नहीं होता था। वे गंदी झोंपडियों में रहते थे। वे अर्द्धनग्न घमते रहते थे। घरों में कार्य करने वाले दासों की स्थिति यद्यपि कुछ अच्छी थी, किंतु उन्हें भी अपने मालिकों के घोर अत्याचारों को सहन करना पड़ता था।

प्रश्न 17.
दास व्यापार के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर:
दास व्यापार के अनेक दूरगामी परिणाम निकले। प्रथम, यह व्यापार विशेष रूप से अफ्रीका के लिए हानिकारक सिद्ध हुआ। दास व्यापार 15वीं शताब्दी में बहुत छोटे पैमाने पर आरंभ हुआ था। इस व्यापार ने 17वीं एवं 18वीं शताब्दियों में बहुत विकास कर लिया था। इस व्यापार के चलते अफ्रीका के दो तिहाई पुरुषों को दास बना कर यूरोप की मंडियों में बेच दिया गया था।

अतः अफ्रीका में लिंग अनुपात गड़बड़ा गया। अफ्रीका में स्त्रियों की संख्या बहुत बढ़ गई। उन्हें अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ा। वे खेतों में काम करने के लिए बाध्य हुईं। यह कार्य पहले पुरुष किया करते थे। दूसरा, इस प्रथा के चलते दासों को घोर अत्याचारों का सामना करना पड़ा। उनका जीवन नरक समान था।

बाध्य होकर अनेक बार दास या तो भाग जाते थे या फिर विद्रोह कर देते थे। दास व्यापार यूरोपियों के दृष्टिकोण से बहुत लाभकारी प्रमाणित हुआ। दासों की मेहनत के परिणामस्वरूप यूरोपीय अर्थव्यवस्था ने उल्लेखनीय प्रगति की।

प्रश्न 18.
दास प्रथा का उन्मूलन किस प्रकार हुआ ?
उत्तर:
दासों के साथ किए जाने वाले अमानुषिक व्यवहार के कारण अनेक देशों में इस क्रूर प्रथा के विरुद्ध आवाज़ बुलंद होने लगी। बहत-से नेताओं ने इस प्रथा का अंत करने के लिए अपनी सरकारों को प्रेरित किया। इसके लिए उन्हें एक लंबा संघर्ष करना पड़ा। अंत में उनकी प्रेरणा रंग लाई। इसके चलते सर्वप्रथम डेनमार्क ने 1803 ई० में दासों के व्यापार पर प्रतिबंध लगा दिया।

यह निस्संदेह दास प्रथा का उन्मूलन करने की दिशा में उठाया गया प्रथम महत्त्वपूर्ण पग था। डेनमार्क का अनुसरण करते हुए ब्रिटेन ने 1807 ई० में, फ्राँस ने 1814 ई० में, नीदरलैंड ने 1817 ई० में तथा स्पेन ने 1845 ई० में गुलामों के व्यापार पर पूर्णतः निषेध लगा दिया। 1833 ई० में सर्वप्रथम ब्रिटेन ने दास प्रथा का अंत करने की घोषणा की।

इसके पश्चात् फ्राँस ने 1848 ई० में, संयुक्त राज्य अमरीका ने 1865 ई० में, क्यूबा ने 1886 ई० में तथा ब्राज़ील ने 1888 ई० में दास प्रथा का अंत कर दिया। दास प्रथा का उन्मूलन निस्संदेह एक नए युग का संकेत था।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
कोई ऐसे दो कारण बताएँ जिनसे 15वीं शताब्दी में सबसे पहले यूरोपीय नौचालन को सहायता मिली ?
उत्तर:

  • 14वीं एवं 15वीं शताब्दियों में जहाजरानी से संबंधित नए आविष्कारों ने नाविकों की समुद्री यात्राओं को सुगम बना दिया।
  • पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी ने यूरोपीय नौचालन को यथासंभव सहायता प्रदान की।

प्रश्न 2.
किन कारणों से स्पेन और पुर्तगाल ने पंद्रहवीं शताब्दी में सबसे पहले अटलांटिक महासागर के पार जाने का साहस किया ?
उत्तर:

  • उस समय स्पेन और पुर्तगाल की अर्थव्यवस्था अच्छी थी। इस कारण वे अटलांटिक महासागर के पार जाने का खर्चा उठा सकने में सक्षम थे।
  • स्पेन एवं पुर्तगाल के शासकों ने अटलांटिक महासागर के पार जाने वाले नाविकों की प्रत्येक संभव सहायता की।
  • ईसाई प्रचारक वहाँ ईसाई धर्म का प्रचार करना चाहते थे।

प्रश्न 3.
कुतबनुमा का आविष्कार कब हुआ ? इसने नौचालन को कैसे प्रेरित किया ?
उत्तर:

  • कुतबनुमा का आविष्कार 1380 ई० में हुआ।
  • इसने नाविकों को खुले समुद्र में दिशाओं की सही जानकारी प्रदान की। इससे सुदूर समुद्री यात्राएं करना संभव हआ।

प्रश्न 4.
टॉलेमी कहाँ का निवासी था ? उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ? इसका प्रकाशन कब हुआ था ?
उत्तर:

  • टॉलेमी मित्र का निवासी था।
  • उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम ज्योग्राफी था।
  • इसका प्रकाशन 1477 ई० में हुआ था।

प्रश्न 5.
मार्को पोलो कौन था ?
उत्तर:

  • मार्को पोलो इटली के शहर वेनिस का एक महान् यात्री था।
  • वह 1275 ई० में मंगोलों के महान् नेता कुबलई खाँ के दरबार में पीकिंग पहुंचा।
  • उसने मार्को पोलो की यात्राएँ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की।

प्रश्न 6.
रीकांक्वेस्टा (Reconquista) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
रीकांक्वेस्टा से अभिप्राय है पुनर्विजय। ईसाई राजाओं ने 1492 ई० में आईबेरियन प्रायद्वीप को अरबों के कब्जे से छडा लिया था। इस सैनिक विजय को रीकांक्वेस्टा कहा जाता है।

प्रश्न 7.
कैपिटुलैसियोन (Capitulaciones) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कैपिटुलैसियोन से अभिप्राय स्पेन के शासक द्वारा दिए गए इकरारनामों से है। इन इकरारनामों द्वारा स्पेन के शासक ने नए जीते गए प्रदेशों पर उन्हें जीतने वाले अभियानों के नेताओं को पुरस्कार के रूप में उनका शासनाधिकार दिया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 8.
कौन-सी नयी खाद्य वस्तुएँ दक्षिणी अमरीका से बाकी दुनिया को भेजी जाती है ?
उत्तर:
दक्षिणी अमरीका से तंबाकू, आलू, गन्ने की चीनी, ककाओ, रबड़, लाल मिर्च, मक्का, कसावा एवं कुमाला नामक नयी खाद्य वस्तुएँ बाकी दुनिया को भेजी जाती थीं।

प्रश्न 9.
कार्डिनल पिएर डिऐली (Cardinal Pierre di Ailly) कौन था ?
उत्तर:

  • वह एक प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक था।
  • उसने खगोलशास्त्र एवं भूगोल पर ‘इमगो मुंडी’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की।

प्रश्न 10.
क्रिस्टोफर कोलंबस कहाँ का निवासी था ? वह बहामा द्वीप समूह में कब पहुँचा ?
उत्तर:

  • क्रिस्टोफर कोलंबस इटली का निवासी था।
  • वह बहामा द्वीप समूह में 12 अक्तूबर, 1492 ई० को पहुँचा।

प्रश्न 11.
कोलंबस गुआनाहानि कब पहुँचा ? उसने इस द्वीप का क्या नाम रखा ?
उत्तर:

  • कोलंबस गुआनाहानि 12 अक्तूबर, 1492 ई० को पहुंचा।
  • उसने इस द्वीप का नाम सैन सैल्वाडोर रखा।

प्रश्न 12.
कोलंबस का नाम क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर:

  • उसने नयी दुनिया की खोज की।
  • उसने उपनिवेशों के युग का आरंभ किया।
  • उसने यूरोप को कच्चे माल एवं खनिज पदार्थों के नए स्रोत दिए।

प्रश्न 13.
नयी दुनिया को अमरीका का नाम किसने, कब तथा किसकी स्मृति में दिया ?
उत्तर:
नयी दुनिया को अमरीका का नाम एक जर्मन प्रकाशक ने 1507 ई० में अमेरिगो वेस्पुसी की स्मृति में दिया।

प्रश्न 14.
कोक्विस्टोडोर (Conquistadores) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कोक्विस्टोडोर से अभिप्राय स्पेनी विजेताओं एवं उनके सैनिकों से है जिन्होंने नयी दुनिया में अपने साम्राज्य स्थापित किए।

प्रश्न 15.
हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको पर कब आक्रमण किया था ? उस समय वहाँ का शासक कौन
उत्तर:

  • हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको पर 1519 ई० में आक्रमण किया था।
  • उस समय वहाँ का शासक मोंटेजुमा द्वितीय था।

प्रश्न 16.
डोना मैरीना (Dona Marina) कौन थी ?
उत्तर:
वह मैक्सिको की एक राजकुमारी थी। उसकी माँ ने उसे टैबैस्को लोगों को एक दासी के रूप में बेच दिया था। वह स्पेनिश एवं मैक्सिकन भाषाओं में बहुत प्रवीण थी। उसने हरनेंडो कोर्टेस के लिए दुभाषिये का काम किया था। उसके सहयोग के बिना हरनेंडो कोर्टेस के लिए मैक्सिको पर विजय पाना अत्यंत कठिन था।

प्रश्न 17.
मोंटेजुमा द्वितीय कौन था ?
उत्तर:
मोटेजुमा द्वितीय मैक्सिको का शासक था। वह इस पद पर 1502 ई० से 1520 ई० तक रहा। वह अपने अत्याचारों के कारण प्रजा में बहुत बदनाम था। हरनेंडो कोर्टेस ने 1519 ई० में उसकी राजधानी टेनोक्टिटलान पर आक्रमण कर धोखे से बंदी बना लिया था। 29 जून, 1520 ई० को मोंटेजुमा द्वितीय को मौत के घाट उतार दिया गया।

प्रश्न 18.
हरनेंडो कोर्टस क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
हरनेंडो कोर्टेस स्पेन का एक प्रसिद्ध कोक्विस्टोडोर था। उसने 1519 ई० में मैक्सिको पर आक्रमण कर इसके शासक मोंटेजुमा द्वितीय को बंदी बना लिया था। उसने 1521 ई० में मैक्सिको पर कब्जा कर एज़टेक साम्राज्य का अंत कर दिया था। उसे स्पेन के शासक चार्ल्स पँचम ने न्यू स्पेन (मैक्सिको) का गवर्नर एवं कैप्टन-जनरल नियुक्त किया था। वह इस पद पर 1541 ई० तक रहा।

प्रश्न 19.
फ्रांसिस्को पिज़ारो कौन था ?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पिज़ारो स्पेन का एक प्रसिद्ध विजेता था। उसने 1532 ई० में पेरू में स्थापित इंका साम्राज्य पर आक्रमण कर दिया था। उसने धोखे से इसके शासक अताहुआल्पा को बंदी बना लिया। उसने अताहुआल्पा से भारी फिरौती लेने के बावजूद उसका 1533 ई० में वध कर दिया। उसने इंका साम्राज्य में भयंकर लूटमार की। उसने 1535 ई० में लिमा को पेरू की नई राजधानी बनाया। 26 जून, 1541 ई० को पिज़ारो का लिमा में उसके विरोधियों ने वध कर दिया।

प्रश्न 20.
पेड्रो अल्वारिस कैब्राल का नाम क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
पेड्रो अल्वारिस कैब्राल पुर्तगाल का एक प्रसिद्ध नाविक था। उसने 22 अप्रैल, 1500 ई० को ब्राज़ील की खोज की। पुर्तगालियों ने यहाँ से मिलने वाली ब्राज़ीलवुड का भरपूर लाभ उठाया। इससे लाल रंजक (red dye) तैयार की जाती थी।

प्रश्न 21.
आरंभ में पुर्तगालियों ने ब्राज़ील की ओर कम ध्यान क्यों दिया ?
उत्तर:
आरंभ में पुर्तगालियों ने ब्राजील की ओर कम ध्यान इसलिए दिया क्योंकि वहाँ सोना अथवा चाँदी मिलने की संभावना बहुत कम थी। दूसरा, पुर्तगाली उस समय पश्चिमी भारत के साथ अपना व्यवसाय करने के लिए अधिक उत्सुक थे।

प्रश्न 22.
यूरोपीय जेसुइट पादरियों के विरुद्ध क्यों थे ?
उत्तर:

  • वे सभी लोगों की स्वतंत्रता के पक्ष में थे।
  • उन्होंने दास प्रथा की कड़े शब्दों में आलोचना की।
  • उन्होंने यूरोपियों को मूल निवासियों के साथ अच्छा बर्ताव करने का परामर्श दिया।

प्रश्न 23.
पोटोसी (Potosi) को नरक का मुख किसने कहा और क्यों ?
उत्तर:
पोटोसी को नरक का मुख एक संन्यासी डोमिनिगो डि सैंटो टॉमस (Dominigo de Santo Tomas) ने कहा। इसका कारण यह था कि प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में इंडियन लोग जो यहाँ की खानों में काम करते थे मृत्यु का ग्रास बन जाते थे। इन खानों के मालिक इन लोगों के साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार करते थे।

प्रश्न 24.
दक्षिणी अमरीका को लैटिन अमरीका क्यों कहा जाता है ?
उत्तर
दक्षिणी अमरीका को लैटिन अमरीका इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहाँ स्पेनी एवं पुर्तगाली दोनों ही भाषाएँ बोली जाती थीं। ये दोनों ही भाषाएँ लैटिन भाषा परिवार से संबंधित हैं। अतः दक्षिणी अमरीका को लैटिन अमरीका कहा जाने लगा।

प्रश्न 25.
अरावाकी लुकायो कौन थे?
उत्तर:

  • वे बहुत शांतिप्रिय लोग थे।
  • वे लड़ने की अपेक्षा बातचीत से झगड़ा निपटाना अधिक पसंद करते थे।

प्रश्न 26.
अरावाकी सभ्यता की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • वे अपने वंश के बुजुर्गों के अधीन संगठित रहते थे।
  • उनमें बहु-विवाह प्रथा प्रचलित थी।

प्रश्न 27.
अरावाकी लोगों का आरंभ में स्पेनियों के प्रति कैसा व्यवहार था ? बाद में इस व्यवहार में परिवर्तन क्यों आया ?
उत्तर:

  • अरावाकी लोगों का आरंभ में स्पेनियों के प्रति व्यवहार मैत्रीपूर्ण था।
  • बाद में इस व्यवहार में परिवर्तन का कारण स्पेनियों द्वारा मूल निवासियों के प्रति अपनाई गई क्रूर नीति थी।

प्रश्न 28.
तुपिनांबा लोग कहाँ रहते थे ? वे खेती के लिए घने जंगलों का सफ़ाया क्यों न कर सके ?
उत्तर:

  • तुपिनांबा लोग दक्षिणी अमरीका के पूर्वी तट पर रहते थे।
  • वे खेती के लिए घने जंगलों का सफाया इसलिए नहीं कर सके क्योंकि उनके पास पेड़ काटने के लिए लोहे का कुल्हाड़ा नहीं था।

प्रश्न 29.
स्पेनियों के संपर्क में आने के बाद 25 वर्ष के अंदर ही अरावाकी सभ्यता लुप्त क्यों हो गई ? कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • स्पेनियों ने अरावाकियों का क्रूरता से दमन किया।
  • स्पेनियों के आगमन से अरावाकियों में अनेक भयंकर बीमारियाँ फैल गईं। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में अरावाकियों की मृत्यु हो गई।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 30.
एजटेक साम्राज्य की राजधानी का नाम क्या था ? इसका निर्माण कब किया गया था ?
उत्तर:

  • एज़टेक साम्राज्य की राजधानी का नाम टेनोक्टिटलान (Tenochtitlan) था।
  • इसका निर्माण 1325 ई० में किया गया।

प्रश्न 31.
एज़टेक की राजधानी टेनोक्टिटलान का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • इसका निर्माण 1325 ई० में किया गया था।
  • इसे भव्य महलों, मंदिरों एवं उपवनों से सुसज्जित किया गया था।

प्रश्न 32.
एज़टेक सभ्यता की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • एजटेक समाज में सम्राट को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
  • एज़टेक समाज श्रेणीबद्ध था। अभिजात वर्ग को विशेष अधिकार प्राप्त थे।

प्रश्न 33.
एजटेक समाज में सम्राट् की स्थिति क्या थी ?
उत्तर:

  • एज़टेक समाज में सम्राट को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
  • उसे निरंकुश शक्तियाँ प्राप्त थीं।
  • उसे पृथ्वी पर सूर्य देवता का प्रतिनिधि समझा जाता था।

प्रश्न 34.
चिनाम्पा. (Chinampas) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
चिनाम्पा मैक्सिको झील में बने कृत्रिम टापू थे। इन्हें सरकंडे की बहुत बड़ी चटाइयाँ बुनकर इन्हें मिट्टी तथा पत्तों से ढककर बनाया जाता था। ये अत्यंत उपजाऊ थे।

प्रश्न 35.
कालमेकाक (Calmecac) तथा तेपोकल्ली (Telpochcally) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • कालमेकाक एजटेक लोगों के वे स्कल थे जिनमें अभिजात वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे।
  • तेपोकल्ली वे स्कल थे जिनमें साधारण वर्ग के बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे।

प्रश्न 36.
एज़टेक समाज में लड़कों एवं लड़कियों को किस प्रकार की शिक्षा दी जाती थी ?
उत्तर:

  • एज़टेक समाज में लड़कों को पुरोहित एवं सैनिक बनने की शिक्षा दी जाती थी।
  • एजटेक समाज में लड़कियों को घरेलू कार्यों की शिक्षा दी जाती थी।

प्रश्न 37.
एज़टेक समाज में स्त्रियों की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
एजटेक समाज में स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी थी। वे शिक्षा प्राप्त करती थीं। वे सामान्यतः घरेलू कार्य करती थीं। कुछ स्त्रियाँ खेती का एवं कुछ पुरोहित का कार्य भी करती थीं। उनका विवाह प्रायः 16 वर्ष की आयु में किया जाता था।

प्रश्न 38.
एजटेक लोगों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • सूर्य देवता एवं युद्ध देवता उनके दो प्रमुख देवते थे।
  • वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए मनुष्यों की बलियाँ देते थे।

प्रश्न 39.
एजटेक सभ्यता के पतन के कोई दो प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर:

  • एज़टेक शासकों ने गैर-एज़टेक लोगों पर घोर अत्याचार किए। इस कारण उनमें भारी असंतोष था।
  • एज़टेक साम्राज्य में रोजाना बड़ी संख्या में लोगों की बलि दी जाती थी। अत: वे ऐसे शासन का अंत करना चाहते थे।

प्रश्न 40.
एजटेक और मेसोपोटामई सभ्यता की तुलना कीजिए।
उत्तर:

  • एज़टेक और मेसोपोटामई सभ्यताएँ एक विशाल क्षेत्र में फैली हुई थीं।
  • दोनों सभ्यताओं के समाजों में दासों को सबसे निम्न स्थान प्राप्त था।
  • दोनों सभ्यताओं में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी।

प्रश्न 41.
इंका सभ्यता का संस्थापक कौन था ? उसकी राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर:

  • इंका सभ्यता का संस्थापक मैंको कपाक था।
  • उसकी राजधानी का नाम कुजको था।

प्रश्न 42.
इंका सभ्यता का सबसे शक्तिशाली शासक कौन था ? वह सिंहासन पर कब बैठा था ?
उत्तर:

  • इंका सभ्यता का सबसे शक्तिशाली शासक पचकुटी इंका था।
  • वह 1438 ई० में सिंहासन पर बैठा था।

प्रश्न 43.
इंका साम्राज्य की राजधानी एवं प्रशासनिक भाषा का नाम बताएँ।
उत्तर:

  • इंका साम्राज्य की राजधानी का नाम कुजको (Cuzco) था।
  • इंका साम्राज्य की प्रशासनिक भाषा कवेचुआ (Quechua) थी।

प्रश्न 44.
इंका सभ्यता की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
अथवा
इंका समाज की कोई दो विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:

  • इंका साम्राज्य में सम्राट की स्थिति सर्वोच्च थी।
  • इंका समाज विभिन्न श्रेणियों में विभाजित था।
  • इंका सभ्यता का आधार कृषि था।

प्रश्न 45.
इंका लोग उच्चकोटि के भवन निर्माता थे। कैसे ?
उत्तर:

  • उन्होंने कुजको एवं माचू-पिच्चू में भव्य महलों, किलों एवं मंदिरों का निर्माण किया।
  • उन्होंने पहाड़ों के बीच इक्वेडोर से चिली तक अनेक सड़कें बनाईं।

प्रश्न 46.
इंका भवनों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • वे अपने भवनों में विशाल पत्थरों का प्रयोग करते थे।
  • वे अपने भवनों को शल्क पद्धति (flaking) द्वारा सुंदर बनाते थे।

प्रश्न 47.
“इंका समाज में स्त्रियों की स्थिति अच्छी थी।” कोई दो तर्क दें।
उत्तर:

  • उनका परिवार में पूर्ण सम्मान किया जाता था।
  • उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था।

प्रश्न 48.
क्विपु (quipu) से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
क्विपु इंका लोगों की एक प्रणाली थी। इससे चीजों को स्मरण रखने में सहायता मिलती थी। इसमें एक डंडा होता था जिसमें विभिन्न रंगों की रस्सियों से गाँठ बाँधी जाती थी। प्रत्येक गाँठ एक किस्म का संकेत देती थी जिससे उस वस्तु का अनुमान लगाया जाता था।

प्रश्न 49.
इंका कृषि की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • वे कृषि के लिए पहाड़ों में सीढ़ीदार खेत (terraces) बनाते थे।
  • उनकी दो प्रमुख फ़सलें मक्का एवं आलू थीं।

प्रश्न 50.
इंका लोग लामा (Ilama) का पालन क्यों करते थे ?
उत्तर:

  • वे इससे भार ढोने का कार्य लेते थे।
  • वे इससे ऊन प्राप्त करते थे।
  • वे इसका माँस खाते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 51.
इंका लोगों के धार्मिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उनका प्रमुख देवता सूर्य था।
  • वे अपने देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जानवरों एवं कभी-कभी मनुष्यों की बलियाँ देते थे।
  • वे मृत्यु के बाद जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 52.
इंका सभ्यता के पतन के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • इंका शासक अताहुआल्पा एक योग्य शासक प्रमाणित न हुआ।
  • इंका स्पेनी आक्रमणकारी फ्रांसिस्को पिज़ारो का सामना न कर सके।

प्रश्न 53.
माया काल का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • माया सभ्यता का आरंभ 1500 ई० पू० में हुआ था।
  • यह सभ्यता 300 ई० से 900 ई० के दौरान बहुत प्रफुल्लित हुई।
  • इस सभ्यता का अंत 1519 ई० में हुआ।

प्रश्न 54.
माया सभ्यता की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उनकी सभ्यता का मुख्य आधार मक्के की खेती थी।
  • माया समाज में पुरोहितों को मुख्य स्थान प्राप्त था।

प्रश्न 55.
मक्के की खेती माया सभ्यता का मुख्य आधार क्यों थी ?
उत्तर:
मक्के की खेती माया सभ्यता का मख्य आधार इसलिए थी क्योंकि उनके अनेक धार्मिक क्रियाकलाप एवं उत्सव मक्का बोने, उगाने एवं काटने से जुड़े थे।

प्रश्न 56.
माया लोगों के धार्मिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • वे अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। उनके दो प्रमुख देवता सूर्य देवता एवं मक्का देवता थे।
  • वे मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे।

प्रश्न 57.
माया मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध मंदिर कौन-सा था ? इसकी स्थापना कब और कहाँ की गई थी ?
उत्तर:

  • माया मंदिरों में सबसे प्रसिद्ध मंदिर टिक्ल था।
  • इसकी स्थापना 8वीं शताब्दी में ग्वातेमाला में की गई थी।

प्रश्न 58.
माया पंचांग कितनी प्रकार के थे ? इनमें वर्ष में कितने दिन होते थे ?
उत्तर:

  • माया पंचांग दो प्रकार के थे।
  • इनमें एक वर्ष में 365 दिन एवं दूसरे में 260 दिन होते थे।

प्रश्न 59. माया लिपि की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • माया लिपि चित्रात्मक थी।
  • इस लिपि को अभी तक पूरी तरह पढ़ा नहीं जा सका है।

प्रश्न 60.
माया सभ्यता के पतन के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • इस सभ्यता के पतन में किसानों के विद्रोह मुख्य रूप से उत्तरदायी थे।
  • 1519 ई० में हरनेंडो कोर्टेस के आक्रमण ने माया सभ्यता के पतन का डंका बजा दिया।

प्रश्न 61.
ओलाउदाह एक्वियानो (Olaudah Equiano) कहाँ का निवासी था ? जब उसे गुलाम बनाया गया तो उसकी आयु क्या थी ?
उत्तर:

  • ओलाउदाह एक्वियानो नाईजीरिया का निवासी था।
  • जब उसे गुलाम बनाया गया तो उसकी आयु 11 वर्ष थी।

प्रश्न 62.
ओलाउदाह एक्वियानो ने अपनी आत्मकथा कब लिखी ? इसका नाम क्या था ?
उत्तर:

  • ओलाउदाह एक्वियानो ने अपनी आत्मकथा 1789 ई० में लिखी।
  • इसका नाम दि इनटरेस्टिंग नैरैटिव ऑफ़ दि लाइफ ऑफ़ ओलाउदाह एक्वियानो था।

प्रश्न 63.
आधुनिक इतिहासकार एरिक विलियम्स ने कब तथा किस पुस्तक की रचना की ? इसका विषय क्या था ?
उत्तर:

  • आधुनिक इतिहासकार एरिक विलियम्स ने 1940 के दशक में कैपिटलिज्म एंड स्लेवरी’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की।
  • इसका मुख्य विषय अफ्रीकी दासों के कष्टों का वर्णन करना था।

प्रश्न 64.
दासों पर लगे कोई दो प्रतिबंध बताएँ।
उत्तर:

  • वे अपने मालिकों से अनुमति पत्र लिए बिना अपने कार्य को नहीं छोड़ सकते थे।
  • वे अपने पास किसी किस्म का कोई हथियार नहीं रख सकते थे।।

प्रश्न 65.
किन्हीं दो देशों के नाम बताएँ जिन्होंने दास प्रथा का उन्मूलन किया। ऐसा कब किया गया ?
उत्तर:

  • ब्रिटेन एवं संयुक्त राज्य अमरीका ने दास प्रथा का उन्मूलन किया।
  • ऐसा क्रमवार 1833 ई० एवं 1865 ई० में किया गया।

प्रश्न 66.
दास प्रथा के कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • अफ्रीका के अधिकांश पुरुषों को दास बना कर यूरोप में बेच दिया गया। इससे अफ्रीका में लिंग अनुपात गड़बड़ा गया।
  • दासों की मेहनत के कारण यूरोपीय अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा मिली।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

प्रश्न 1.
यूरोपवासियों ने खोज यात्राओं का श्रीगणेश किस शताब्दी में किया ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में।

प्रश्न 2.
15वीं शताब्दी में किन दो देशों ने समुद्री यात्राओं को प्रोत्साहित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया ?
उत्तर:
पुर्तगाल एवं स्पेन।

प्रश्न 3.
तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर कब अधिकार किया ?
उत्तर:
1453 ई० में।

प्रश्न 4.
कुतबनुमा का आविष्कार कब हुआ था ?
उत्तर:
1380 ई० में।

प्रश्न 5.
विश्व का ठीक मानचित्र किसने बनाया था ?
उत्तर:
बतिस्ता ने।

प्रश्न 6.
टॉलेमी की ज्योग्राफ़ी किस वर्ष प्रकाशित हुई ?
उत्तर:
1477 ई० में।

प्रश्न 7.
मार्को पोलो कुबलई खाँ के दरबार में कब पहुँचा था ?
उत्तर:
1275 ई० में।

प्रश्न 8.
समुद्री खोज यात्राओं को प्रोत्साहित करने वाला राजकुमार हेनरी किस देश से संबंधित था ?
उत्तर:
पुर्तगाल।

प्रश्न 9.
क्रिस्टोफर कोलंबस किस देश का निवासी था ?
उत्तर:
इटली का।

प्रश्न 10.
इमगो मुंडी का लेखक कौन था ?
उत्तर:
कार्डिनल पिएर डिऐली।

प्रश्न 11.
क्रिस्टोफर कोलंबस गुआनाहानि कब पहुँचा ?
उत्तर:
1492 ई० में।

प्रश्न 12.
गुआनाहानि में कौन लोग रहते थे ?
उत्तर:
अरावाक।

प्रश्न 13.
कोलंबस ने गुआनाहानि में रहने वाले लोगों को किस नाम से पुकारा ?
उत्तर:
रेड इंडियन्स।

प्रश्न 14.
कोलंबस ने गुआनाहानि का नाम क्या रखा ?
उत्तर:
सैन सैल्वाडोर।

प्रश्न 15.
कोलंबस की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
1506 ई० में।

प्रश्न 16.
हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको पर कब आक्रमण किया ?
उत्तर:
1519 ई० में।

प्रश्न 17.
हरनेंडो कोर्टस के मैक्सिको आक्रमण के दौरान किसने उसे बहुमूल्य सहयोग दिया ?
उत्तर:
डोना मैरीना ने।

प्रश्न 18.
टु हिस्ट्री ऑफ़ मैक्सिको का लेखक कौन था ?
उत्तर:
बर्नाल डियाज़ डेल कैस्टिलो।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 8 संस्कृतियों का टकराव

प्रश्न 19.
हरनेंडो कोर्टेस के आक्रमण के समय वहाँ किस एजटेक शासक का शासन था ?
उत्तर:
मोंटेजुमा द्वितीय का।

प्रश्न 20.
एजटेक साम्राज्य की राजधानी का नाम क्या था।
उत्तर:
टेनोक्टिटलान।

प्रश्न 21.
आँसू भरी रात की घटना कब हुई ?
उत्तर:
30 जून, 1520 ई०।

प्रश्न 22.
हरनेंडो कोर्टेस ने एज़टेक साम्राज्य का अंत कब किया ?
उत्तर:
1521 ई० में।

प्रश्न 23.
हरनेंडो कोर्टेस ने मैक्सिको का क्या नाम रखा ?
उत्तर:
न्यू स्पेन।

प्रश्न 24.
पेरू पर किसने अधिकार किया ?
उत्तर:
फ्राँसिस्को पिज़ारो ने।

प्रश्न 25.
फ्राँसिस्को पिज़ारो ने किसे पेरू की राजधानी घोषित किया ?
उत्तर:
लिमा को।

प्रश्न 26.
ब्राजील की खोज किसने की ?
उत्तर:
पेड्रो अल्वारिस कैब्राल ने।

प्रश्न 27.
ब्राज़ील किस वृक्ष के लिए जाना जाता था ?
उत्तर:
ब्राज़ीलवुड के लिए।

प्रश्न 28.
पुर्तगाल ने ब्राज़ील का शासन कब सीधा अपने हाथों में ले लिया ?
उत्तर:
1549 ई० में।

प्रश्न 29.
पुर्तगाल ने किसे ब्राज़ील की राजधानी घोषित किया?
उत्तर:
सैल्वाडोर को।

प्रश्न 30.
अरावाकी लुकायो नामक कबीला कहाँ रहता था ?
उत्तर:
बहामा एवं वृहत्तर एंटिलीज में।

प्रश्न 31.
हैमक क्या थे ?
उत्तर:
एक प्रकार का झूला।

प्रश्न 32.
एजटेक साम्राज्य कहाँ फैला हुआ था ?
उत्तर:
मैक्सिको में।

प्रश्न 33.
एजटेक साम्राज्य की राजधानी टेनोक्टिटलान का निर्माण कब किया गया था ?
उत्तर:
1325 ई० में।

प्रश्न 34.
एजटेक समाज में सबसे निम्न स्थान किसे प्राप्त था ?
उत्तर:
दासों को।

प्रश्न 35.
मैक्सिको झील में जो कृत्रिम टापू बनाए गए थे वे क्या कहलाते थे ?
उत्तर:
चिनाम्पा।

प्रश्न 36.
एजटेक साम्राज्य में अभिजात वर्ग के बच्चे जिन स्कूलों में पढ़ते थे वे क्या कहलाते थे ?
उत्तर:
कालमेकाक।

प्रश्न 37.
एज़टेकों का प्रमुख देवता कौन था ?
उत्तर:
सूर्य देवता।

प्रश्न 38.
दक्षिण अमरीका की सबसे प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली सभ्यता कौन-सी थी ?
उत्तर:
इंका सभ्यता।

प्रश्न 39.
इंका साम्राज्य का संस्थापक किसे माना जाता है ?
उत्तर:
मैंको कपाक को।।

प्रश्न 40.
इंका साम्राज्य की राजधानी का क्या नाम था ?
उत्तर:
कुजको।

प्रश्न 41.
इंका साम्राज्य का सबसे शक्तिशाली शासक कौन था ?
उत्तर:
पचकुटी इंका।

प्रश्न 42.
माचू-पिच्चू नामक प्रसिद्ध शहर का निर्माण किस सभ्यता ने किया था ?
उत्तर:
इंका सभ्यता ने।

प्रश्न 43.
इंका साम्राज्य में किसे सर्वोच्च स्थान प्राप्त था ?
उत्तर:
सम्राट् को।

प्रश्न 44.
इंका साम्राज्य में विद्यार्थियों को शिक्षा किस प्रकार दी जाती थी ?
उत्तर:
मौखिक।

प्रश्न 45.
इंका साम्राज्य के लोगों की प्रशासनिक भाषा कौन-सी थी ?
उत्तर:
क्वेचुआ।

प्रश्न 46.
माया सभ्यता कहाँ फैली थी ?
उत्तर:
मैक्सिको में।

प्रश्न 47.
माया सभ्यता के लोग किस फ़सल का सर्वाधिक उत्पादन करते थे ?
उत्तर:
मक्का का।

प्रश्न 48.
माया लोगों का प्रमुख देवता कौन था ?
उत्तर:
सूर्य देवता।

प्रश्न 49.
माया लोगों ने टिक्ल मंदिर का निर्माण कहाँ करवाया था ?
उत्तर:
ग्वातेमाला में।

प्रश्न 50.
माया लोगों ने कितने प्रकार के पंचांग तैयार किए थे ?
उत्तर:
दो।

प्रश्न 51.
माया लोगों की लिपि कैसी थी ?
उत्तर:
चित्रात्मक।

प्रश्न 52.
ओलाउदाह एक्वियानो कहाँ का निवासी था ?
उत्तर:
नाईजीरिया का।

प्रश्न 53.
दि इनटरेस्टिंग नैरेटिव ऑफ दि लाइफ ऑफ़ ओलाउदाह एक्वियानो का प्रकाशन किस वर्ष हुआ था ?
उत्तर:
1789 ई० में

प्रश्न 54.
17वीं-18वीं शताब्दियों में यूरोपीय देश अधिकाँश दास कहाँ से प्राप्त करते थे ?
उत्तर:
अफ्रीका से।

प्रश्न 55.
कैपिटलिज्म एंड स्लेवरी का लेखक कौन था ?
उत्तर:
एरिक विलियम्स।

प्रश्न 56.
संयुक्त राज्य अमरीका ने दास प्रथा पर कब प्रतिबंध लगाया ?
उत्तर:
1865 ई० में।

रिक्त स्थान भरिए

1. यूरोपवासियों ने खोज यात्राओं का सर्वप्रथम आरंभ ……………… सदी में किया।
उत्तर:
15वीं

2. स्पेन के हरनेंडो कोर्टेस ने ……………….. में मैक्सिको पर आक्रमण कर दिया था।
उत्तर:
1519 ई०

3. एज़टेक की राजधानी का नाम ……………….. था।
उत्तर:
टेनोक्टिटलान

4. माया संस्कृति का संबंध ………………. देश से था।
उत्तर:
मैक्सिको

5. माया संस्कृति के लोगों के द्वारा टिक्ल मंदिर का निर्माण ……………….. में करवाया गया था।
उत्तर:
ग्वातेमाला

6. इंका साम्राज्य की स्थापना ……………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
मैंको कपाक

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7. टॉलेमी ने ……………….. नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की।
उत्तर:
ज्योग्रफ़ी

8. तुर्कों ने कुस्तुनतुनिया पर विजय ……………….. ई० में प्राप्त की।
उत्तर:
1453

9. क्रिस्टोफर ……………….. का निवासी था।
उत्तर:
इटली

10. स्पेनिश भाषा के अनुसार ‘बाओ’ शब्द का अर्थ है …………. ।
उत्तर:
भारी जहाज़

11. वास्कोडिगामा ……………….. ई० में कालीकट पहुँचा।
उत्तर:
1498

12. अमेरिका नाम का सर्वप्रथम प्रयोग एक जर्मन के प्रकाशक द्वारा ………………. ई० में किया गया।
उत्तर:
1507

13. ‘टू हिस्ट्री ऑफ मैक्सिको’ नामक पुस्तक की रचना …………. द्वारा की गई।
उत्तर:
बर्नार्ड

14. फ्रांसीसको पिज़ारो ने ……………….. को पेरु की राजधानी घोषित किया।
उत्तर:
लिमा को

15. स्पेन के फिलिप द्वितीय द्वारा बेगार की प्रथा पर ……………….. ई० में रोक लगा दी गई थी।
उत्तर:
1601

16. एरिक विलियम्स की सुप्रसिद्ध रचना का नाम ……………….. था।
उत्तर:
कैपिटलिज्म एंड स्लेवरी

17. संयुक्त राज्य अमेरिका ने ……………….. ई० में दास प्रथा पर रोक लगा दी थी।
उत्तर:
1865

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. 15वीं से 17वीं शताब्दियों के दौरान यूरोपवासियों और उत्तरी एवं दक्षिणी अमरीका के मूल निवासियों के बीच हुए संघर्ष की जानकारी का प्रमुख स्रोत क्या है ?
(क) भवन
(ख) यात्रियों की डायरियाँ
(ग) जेसुइट धर्म प्रचारकों के विवरण
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

2. दूरबीन की खोज कब हुई ?
(क) 1409 ई० में
(ख) 1469 ई० में
(ग) 1609 ई० में
(घ) 1709 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1609 ई० में

3. दिशासूचक यंत्र का आविष्कार कब हुआ था ?
(क) 1280 ई० में
(ख) 1320 ई० में
(ग) 1380 ई० में
(घ) 1420 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1380 ई० में

4. टॉलेमी की ज्योग्राफ़ी किस वर्ष प्रकाशित हुई थी ?
(क) 1475 ई० में
(ख) 1477 ई० में
(ग) 1478 ई० में
(घ) 1479 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1477 ई० में

5. तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर कब अधिकार कर लिया था ?
(क) 1433 ई० में
(ख) 1443 ई० में
(ग) 1453 ई० में
(घ) 1463 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1453 ई० में

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6. मार्कोपोलो किस देश का निवासी था ?
(क) फ्राँस का
(ख) इटली का
(ग) रूस का
(घ) अमेरिका का।
उत्तर:
(ख) इटली का

7. कोलंबस का जन्म स्थान कहाँ था ?
(क) जेनेवा
(ख) पुर्तगाल
(ग) फ्राँस
(घ) स्पेन।
उत्तर:
(ख) पुर्तगाल

8. कोलंबस गुआनाहानि कब पहुँचा ?
(क) 1410 ई० में
(ख) 1451 ई० में
(ग) 1482 ई० में
(घ) 1492 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1492 ई० में।

9. कोलंबस ने गुआनाहानि के लोगों को किस नाम से संबोधित किया ?
(क) रेड इंडियन्स
(ख) ब्लैक इंडियनस
(ग) अरावाक
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) रेड इंडियन्स

10. कोलंबस ने गुआनाहानि में किस देश का झंडा गाड़ा था ?
(क) पुर्तगाल का
(ख) इटली का
(ग) स्पेन का
(घ) मैक्सिको का।
उत्तर:
(ग) स्पेन का

11. निम्नलिखित में से किसने दक्षिण अमरीका को नयी दुनिया का नाम दिया ?
(क) कोलंबस ने
(ख) अमेरिगो वेस्पुसी ने
(ग) हरनेंडो कोर्टेस ने
(घ) डोना मैरीना ने।
उत्तर:
(ख) अमेरिगो वेस्पुसी ने

12. हरनेडो कोर्टेस और उसके सैनिकों जिन्होंने मैक्सिको पर आक्रमण किया था इतिहास में किस नाम से जाना जाता है ?
(क) कोंक्विस्टोडोर
(ख) मालिंचिस्टा
(ग) लैक्सकलान
(घ) कैरिब।
उत्तर:
(क) कोंक्विस्टोडोर

13. बर्नाल डियाज़ डेल कैस्टिलो ने किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की ?
(क) इमगो मुंडी
(ख) ट्र हिस्ट्री ऑफ़ मैक्सिको ।
(ग) ट्र हिस्ट्री ऑफ़ अमरीका
(घ) दि प्रिंस।
उत्तर:
(ख) ट्र हिस्ट्री ऑफ़ मैक्सिको ।

14. हरनेंडो कोर्टस ने मैक्सिको पर कब आक्रमण किया था ? ।
(क) 1509 ई० में
(ख) 1511 ई० में
(ग) 1519 ई० में
(घ) 1521 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1519 ई० में

15. हरनेंडो कोटेंस ने जब मैक्सिको पर आक्रमण किया तो वहाँ किसका शासन था ?
(क) मोंटेजुमा प्रथम का
(ख) मोंटेजुमा द्वितीय का
(ग) अताहुआल्पा का
(घ) हुआस्कर का।
उत्तर:
(ख) मोंटेजुमा द्वितीय का

16. आँसू भरी रात की घटना किस दिन हुई ?
(क) 19 जन. 1520 ई० को
(ख) 29 जन 1500 ई० को
(ग) 30 जून, 1520 ई० को
(घ) 29 जुलाई, 1520 ई० को।
उत्तर:
(ग) 30 जून, 1520 ई० को

17. हरनेंडो कोर्टेस ने एजटेक साम्राज्य का अंत कब किया ?
(क) 1519 ई० में
(ख) 1520 ई० में
(ग) 1521 ई० में
(घ) 1522 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1521 ई० में

18. हरनेंडो कोर्टेस को मैक्सिको विजय के लिए किसने बहुमूल्य सहयोग दिया था ?
(क) मोंटेजुमा द्वितीय ने
(ख) डोना मैरीना ने
(ग) अमेरिगो वेस्पुसी ने
(घ) काजामारका ने।
उत्तर:
(ख) डोना मैरीना ने

19. अताहुआल्पा इंका साम्राज्य का शासक कब बना ?
(क) 1529 ई० में
(ख) 1530 ई० में
(ग) 1531 ई० में
(घ) 1532 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1532 ई० में।

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20. इंका साम्राज्य की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) पेरू
(ख) लिमा
(ग) कुजको
(घ) टेनोक्टिटलान।
उत्तर:
(ग) कुजको

21. निम्नलिखित में से किसने इंका साम्राज्य पर अधिकार कर लिया था ?
(क) कोलंबस ने
(ख) फ्राँसिस्को पिज़ारो ने
(ग) हरनेंडो कोर्टेस ने
(घ) डोना मैरीना ने।
उत्तर:
(ख) फ्राँसिस्को पिज़ारो ने

22. 1533 ई० में पुर्तगाल के राजा ने ब्राजील को कितने आनुवंशिक कप्तानियों में बाँट दिया था?
(क) 13
(ख) 14
(ग) 15
(घ) 16
उत्तर:
(ग) 15

23. पुर्तगाल के शासक ने किसे ब्राज़ील की राजधानी घोषित किया ?
(क) कुजको को
(ख) सैल्वाडोर को
(ग) क्यूबा को
(घ) सैन सैल्वाडोर को।
उत्तर:
(ख) सैल्वाडोर को

24. एंटोनियो वीइरा कौन था ?
(क) जेसुइट
(ख) कैथोलिक पादरी
(ग) फ्रांसीसी व्यापारी
(घ) पुर्तगाली नाविक।
उत्तर:
(क) जेसुइट

25. अरावाकी लोगों की प्रमुख फ़सल कौन-सी थी ?
(क) मक्का
(ख) कसावा
(ग) मीठे आलू
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

26. अरावाकी जो झूले बनाते थे वे किस नाम से जाने जाते थे ?
(क) कुजको
(ख) कसावा
(ग) हैमक
(घ) डोनाटेरियस।
उत्तर:
(ग) हैमक

27. एजटेकों ने अपने विशाल साम्राज्य की स्थापना कहाँ की थी ?
(क) मैक्सिको में
(ख) ब्राज़ील में
(ग) स्पेन में
(घ) इटली में।
उत्तर:
(क) मैक्सिको में

28. एज़टेकों ने मैक्सिको नाम अपने किस प्रमुख देवता के नाम पर रखा था ?
(क) युद्ध देवता
(ख) कुजको
(ग) मैक्सिली
(घ) कालमेकाक।
उत्तर:
(ग) मैक्सिली

29. एजटेकों ने मैक्सिको झील में जो कृत्रिम टापू बनवाए वे क्या कहलाते थे ?
(क) चिनाम्पा
(ख) हैमक
(ग) माचू-पिच्चू
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) चिनाम्पा

30. एजटेकों की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) कुजको
(ख) टेनोक्टिटलान
(ग) सैल्वाडोर
(घ) लिमा।
उत्तर:
(ख) टेनोक्टिटलान

31. एज़टेक समाज में सर्वोच्च स्थान किसे प्राप्त था ?
(क) अभिजात वर्ग को
(ख) पुरोहितों को
(ग) सैनिकों को
(घ) दासों को।
उत्तर:
(क) अभिजात वर्ग को

32. एनटेक साम्राज्य में अभिजात वर्ग के बच्चे जिन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते थे वे क्या कहलाते थे ?
(क) तेपोकल्ली
(ख) कालमेकाक
(ग) हैमक
(घ) डोनाटेरियस।
उत्तर:
(ख) कालमेकाक

33. एजटेक साम्राज्य के लोग किस देवी की प्रमुख रूप से उपासना करते थे ?
(क) मातृदेवी
(ख) अन्न देवी
(ग) मिनर्वा
(घ) डायना।
उत्तर:
(ख) अन्न देवी

34. इंका साम्राज्य की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 10वीं शताब्दी में
(ख) 12वीं शताब्दी में
(ग) 13वीं शताब्दी में
(घ) 15वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(ख) 12वीं शताब्दी में

35. इंका साम्राज्य की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) बहामा में
(ख) ब्राज़ील में
(ग) पेरू में
(घ) मैक्सिको में।
उत्तर:
(ग) पेरू में

36. इंका साम्राज्य का सबसे महान् शासक कौन था ?
(क) मैंको कपाक
(ख) पचकुटी इंका
(ग) अताहुआल्पा
(घ) हुआस्कर।
उत्तर:
(ख) पचकुटी इंका

37. निम्नलिखित में से किस शहर का निर्माण इंका साम्राज्य के लोगों ने किया था ?
(क) उर
(ख) मारी
(ग) माचू-पिच्चू
(घ) लिमा।
उत्तर:
(ग) माचू-पिच्चू

38. इंका साम्राज्य के लोगों की प्रशासनिक भाषा क्या थी ?
(क) अंग्रेज़ी
(ख) फ्राँसीसी
(ग) क्विपु
(घ) क्वेचुआ।
उत्तर:
(घ) क्वेचुआ।

39. निम्नलिखित में से किस का साम्राज्य के लोग पालते थे ?
(क) भेड़
(ख) गाय
(ग) लामा
(घ) बाइसन।
उत्तर:
(ग) लामा

40. इंका साम्राज्य का अंत कब हुआ ?
(क) 1530 ई० में
(ख) 1532 ई० में
(ग) 1632 ई० में
(घ) 1638 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1532 ई० में

41. माया समाज में सबसे निम्न स्थान किसे प्राप्त था ?
(क) पुरोहितों को
(ख) दासों को
(ग) व्यापारियों को
(घ) किसानों को।
उत्तर:
(ख) दासों को

42. माया सभ्यता के लोग निम्न में से किस फ़सल का सर्वाधिक उत्पादन करते थे ?
(क) आलू
(ख) कपास
(ग) सेम
(घ) मक्का
उत्तर:
(घ) मक्का

43. माया सभ्यता द्वारा निर्मित टिक्ल मंदिर का निर्माण किस शताब्दी में किया गया था ?
(क) 7वीं शताब्दी में
(ख) 8वीं शताब्दी में
(ग) 9वीं शताब्दी में
(घ) 10वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(ख) 8वीं शताब्दी में

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44. माया सभ्यता के लोगों ने कितने प्रकार के पंचांग बनाए थे ?
(क) एक
(ख) दो
(ग) तीन
(घ) चार।
उत्तर:
(ख) दो

45. ओलाउदाह एक्वियानो कौन था ?
(क) दास
(ख) दार्शनिक
(ग) चिकित्सक
(घ) अध्यापक।
उत्तर:
(क) दास

46. ओलाउदाह एक्वियानो कहाँ का निवासी था ?
(क) साइबेरिया का
(ख) नाइजीरिया का
(ग) तंजानिया का
(घ) केन्या का।
उत्तर:
(ख) नाइजीरिया का

47. कैपिटलिज्म एंड स्लेवरी का लेखक कौन था ?
(क) जॉन विलियम्स
(ख) एरिक विलियम्स
(ग) कार्डिनल पिएर डिऐली
(घ) मार्को पोलो।
उत्तर:
(ख) एरिक विलियम्स

48. निम्नलिखित में से किस देश ने 1865 ई० में दास प्रथा पर प्रतिबंध लगाया था ?
(क) डेनमार्क
(ख) ब्रिटेन
(ग) संयुक्त राज्य अमरीका
(घ) फ्राँस।
उत्तर:
(ग) संयुक्त राज्य अमरीका

संस्कृतियों का टकराव HBSE 11th Class History Notes

→ 15वीं शताब्दी में यूरोपवासियों द्वारा की गई भौगोलिक खोजों ने एक नए युग का सूत्रपात किया। इन भौगोलिक खोजों को नए आविष्कारों, टॉलेमी की ज्योग्राफी, मार्को पोलो की यात्राओं, आर्थिक एवं धार्मिक उद्देश्यों एवं पुर्तगाल के राजकुमार हेनरी के बहुमूल्य योगदान ने प्रेरित किया। इन खोजों के अनेक दूरगामी परिणाम निकले।

→ 1492 ई० में क्रिस्टोफर कोलंबस ने बहामा द्वीप समूह के गुआनाहानि नामक स्थान पर स्पेन का झंडा गाड़ा। उसने इस द्वीप का नाम सैन-सैल्वाडोर रखा। यहाँ के अरावाकी लोगों ने जिस गर्मजोशी से कोलंबस का स्वागत किया उससे वह चकित रह गया। 1499 ई० में इटली के अमेरिगो वेस्पुसी ने दक्षिण अमरीका की यात्रा की।

→ उसने इसे नई दुनिया के नाम से संबोधित किया। 1507 ई० में एक जर्मन प्रकाशक ने अमेरिगो वेस्पुसी की स्मृति में नयी दुनिया को अमरीका का नाम दिया। स्पेन के हरनेडो कोर्टेस ने 1519 ई० में मैक्सिको पर आक्रमण कर दिया था। इस आक्रमण के दौरान उसे डोना मैरीना ने बहुमूल्य योगदान दिया।

→ कोर्टेस ने मैक्सिको के शासक मोंटेजुमा द्वितीय को धोखे से बंदी बना लिया। 1521 ई० में कोर्टेस ने एज़टेकों को पराजित कर उनके साम्राज्य का अंत कर दिया। हरनेंडो कोर्टेस 1522 ई० से लेकर 1547 ई० तक मैक्सिको जिसे अब न्यू स्पेन का नाम दिया गया था का गवर्नर एवं कैप्टन-जनरल रहा।

→ अपने शासनकाल के दौरान उसने वहाँ के मूल निवासियों पर घोर अत्याचार किए। स्पेन के एक अन्य प्रसिद्ध विजेता फ्रांसिस्को पिज़ारो ने पेरू में स्थापित इंका साम्राज्य पर 1532 ई० में आक्रमण कर दिया। उसने धोखे से वहाँ के शासक अताहुआल्पा को बंदी बना लिया।

→ इस कारण उसने सुगमता से 1533 ई० में इंका साम्राज्य की राजधानी कुज़को पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् उसने वहाँ भयंकर लूटमार की। पिज़ारो ने 1541 ई० तक पेरू में शासन किया। उसने लिमा को पेरू की नई राजधानी बनाया। 1500 ई० में पुर्तगाल का नाविक पेड्रो अल्वारिस कैबाल संयोगवश ब्राज़ील पहुँच गया था।

→ आरंभ में पुर्तगालियों ने ब्राज़ील की ओर कम ध्यान दिया। इसका प्रमुख कारण यह था कि वहाँ सोना अथवा चाँदी मिलने की संभावना बहुत कम थी। ब्राज़ील में केवल ब्राज़ीलवुड नामक इमारती लकड़ी मिलती थी। 1549 ई० में पुर्तगाल के शासक ने ब्राज़ील का शासन सीधे अपने हाथों में ले लिया था। यहाँ आए जेसुइट पादरियों ने दास प्रथा की कटु आलोचना की।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण से आपका क्या अभिप्राय है? इसके उत्थान के क्या कारण थे?
उत्तर:
I. पुनर्जागरण का अर्थ

पुनर्जागरण का अंग्रेज़ी रूप रेनेसाँ है जो कि मूल रूप से फ्रांसीसी भाषा का शब्द है। रिनेसाँ का अर्थ है फिर जागना। इतिहास में इसे नया जन्म, नई जागृति, बौद्धिक चेतना तथा सांस्कृतिक जागृति के नामों से भी जाना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “शाब्दिक रूप में पुनर्जागरण से अभिप्राय बाहरी किसी एजेंसी के नियंत्रण के बिना विचारों एवं उस पर कार्य करने की स्वतंत्रता है।”

II. पुनर्जागरण के उत्थान के कारण

पुनर्जागरण के उत्थान के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

1. सामंतवाद का पतन (Decline of Feudalism):
सामंतवाद के पतन ने पुनर्जागरण की आधारशिला तैयार की। मध्यकालीन समाज में सामंतवाद का व्यापक प्रचलन था। परंतु 14वीं शताब्दी के पश्चात् इसका पतन होना आरंभ हो गया था। इसका पतन मध्य वर्ग की शक्ति के कारण हुआ। इसी मध्य वर्ग ने अपने सम्राटों को सेना के संगठन के लिए आवश्यक धन-राशि प्रदान की थी।

अतः सम्राट् सामंतों पर निर्भर न रहे। व्यापार तथा वाणिज्य में उन्नति होने से मध्य वर्ग के व्यापारियों को बहुत लाभ हुआ। परंतु सामंतों की भूमि के किराये में कोई विशेष वृद्धि न हुई। इस कारण सामंतों को इन व्यापारियों से कर्ज लेने पड़े। इस कर्जे के कारण कई सामंत दीवालिए हो गए और उन्हें अपनी ज़मीनें बेचनी पड़ी। परिणामस्वरूप सामंतवाद को भारी धक्का लगा तथा उसका पतन हो गया।

2. धर्मयुद्ध (Crusades):
11वीं शताब्दी के अंत से लेकर 13वीं शताब्दी के मध्य तक ईसाई मत के पवित्र स्थान जेरुसलम के कारण मुसलमानों तथा ईसाइयों के बीच लगातार युद्ध लड़े गए। इन्हें धर्मयुद्ध का नाम दिया जाता के दौरान पश्चिमी देशों के विद्वान् पूर्वी देशों की सभ्यता के संपर्क में आए। उस समय पूर्वी देशों की सभ्यता पश्चिमी देशों की सभ्यता से प्राचीन तथा विकसित थी। धर्मयुद्धों में भाग लेने वाले व्यक्तियों ने पूर्व के नवीन विचार ग्रहण किये।

इससे उनका बौद्धिक स्तर अधिक उन्नत हो गया। मध्य युग में प्रायः लोगों का विश्वास था कि व्यक्ति के इस लोक तथा परलोक की सभी आवश्यकताएँ केवल चर्च तथा ईसाई धर्म के द्वारा पूर्ण हो सकती हैं। परंतु धर्मयुद्धों से लौटने वाले लोगों ने इस विश्वास का खंडन किया। इस तरह लोगों के मस्तिष्क पर चर्च का प्रभाव कम होने लगा। धर्मयुद्धों के माध्यम से ही यूनान के वैज्ञानिक ग्रंथ, अरबी अंक, बीजगणित, नवीन दिग्दर्शक यंत्र और कागज़ पश्चिमी यूरोप में पहुँचे।

अतः स्पष्ट है कि धर्मयुद्धों ने नवीन विचारों तथा धारणाओं का प्रसार किया और पुराने विचारों, विश्वासों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया। फलस्वरूप पुनर्जागरण का प्रारंभ हुआ। विख्यात इतिहासकार बी० के० गोखले का यह कहना ठीक है कि, “धर्मयुद्धों ने ईसाइयों के दृष्टिकोण को परिवर्तित किया तथा उन्हें चर्च के बाहर झांकने के लिए बाध्य किया।”

3. व्यापारिक समृद्धि (Commercial Prosperity):
पुनर्जागरण का एक प्रेरक तत्त्व था-व्यापार का उदय एवं विकास। धर्मयुद्धों के कारण जहाँ नवीन विचारधाराएँ पनपीं, वहाँ यूरोप के पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। अनेक यूरोपीय व्यापारी जेरुसलम तथा एशिया माइनर के तटों पर बस गये। इनके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय व्यापारी विभिन्न देशों में पहुंचे।

उन्हें नये विचारों तथा प्रगतिशील तत्त्वों की जानकारी हुई। स्वदेश वापस लौटने पर ये व्यापारी नये विचारों को अपने साथ लाए। व्यापारी वर्ग ने चर्च की आलोचना करके उसके महत्त्व को कम करने का प्रयास किया। चर्च सूद लेने को पाप मानता था, परंतु व्यापारी वर्ग सूद को व्यापारिक उन्नति के लिए आवश्यक समझता था। इसलिए व्यापारियों ने चर्च का विरोध किया।

4. छापेखाने का आविष्कार (Invention of Press):
यूरोप के लोगों ने अरबवासियों से कागज़ बनाने की कला सीखी। पंद्रहवीं शताब्दी से पूर्व कागज़ पर छपाई कठिन भी थी और महँगी भी, परंतु इसके पश्चात् स्थिति में परिवर्तन आया।

1455 ई० में जर्मनी के जोहानेस गटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) नामक व्यक्ति ने एक ऐसी टाइप मशीन का आविष्कार किया जो आधुनिक प्रेस की अग्रदूत कही जा सकती है। मुद्रण यंत्र के इस चमत्कारी आविष्कार ने बौद्धिक विकास का द्वार खोल दिया। इस छापेखाने में 1455 ई० में बाईबल की 150 प्रतियाँ छपी। धीरे-धीरे इस

स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आए। अब पुस्तकें अधिक और सस्ती छपने लगीं। इस प्रकार ज्ञान के प्रसार से अंध विश्वास तथा रूढियों के बँधन ढीले पड़ने लगे और उनमें आत्म-विश्वास जागने लगा। अत: स्पष्ट है कि छापेखाने का आविष्कार पुनर्जागरण का प्रमुख प्रेरक तत्त्व बना। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० वी० राव के अनुसार,

“छापेखाने के आविष्कार ने जो यूरोप में पद्रहवीं शताब्दी के मध्य में हुआ था, को सर्वाधिक महत्त्व का माना जाना चाहिए। यदि छापेखाने का आविष्कार न होता तो संभवतः शेष यूरोप में पुनर्जागरण इतनी शीघ्र न फैलता।”

5. कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार (Occupation of Constantinople by the Turks):
1453 ई० में तुर्कों ने पूर्वी रोमन साम्राज्य (बाइजेंटाइन) की राजधानी कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया था। यह एक युग प्रवर्तक घटना सिद्ध हुई। पहला, कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार हो जाने से यूरोप से पूर्वी देशों में जाने वाले स्थल मार्ग पर अब तुर्कों का अधिकार हो गया। तुर्क लोग व्यापारियों को लूट लिया करते थे।

अत: यूरोप का पूर्वी देशों के साथ होने वाला व्यापार बंद हो गया। अत: यूरोप के लोग किसी नए व्यापारिक मार्ग की खोज के लिए आतर हो उठे। परिणामस्वरूप अमरीका की खोज हुई तथा भारत और पूर्वी देशों में जलमार्ग ढूँढ निकाला गया। दूसरा, कुंस्तुनतुनिया पिछले दो सौ वर्षों से ज्ञान, दर्शन तथा कला का महान् केंद्र था। तुर्कों के लिए तलवार का तो महत्त्व था परंतु उनके लिए ज्ञान की न कोई उपयोगिता थी और न ही कोई महत्त्व।

अत: इस विख्यात नगर से आजीविका की खोज में हजारों यूनानी विद्वान्, दार्शनिक तथा कलाकार इटली, फ्रांस, जर्मनी, इंग्लैंड आदि देशों में चले गए। वे अपने साथ प्राचीन रोम तथा यूनान का ज्ञान-विज्ञान तथा नई चिंतन पद्धति भी ले गये। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि कुंस्तुनतुनिया पर तुर्कों का अधिकार पुनर्जागरण के उत्थान का कारण बना।

6. मंगोल साम्राज्य का उदय (Rise of Mongol Empire):
मंगोल साम्राज्य के उदय से पुनर्जागरण की धारा को बल मिला। तेरहवीं शताब्दी में प्रसिद्ध मध्य एशियाई विजेता चंगेज़ खाँ की मृत्यु हो गई। उसके बाद कुबलई खाँ ने एक विशाल परंतु शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। इस विशाल मंगोल साम्राज्य में रूस, पोलैंड, हंगरी आदि प्रदेश सम्मिलित थे। यहाँ विद्वानों, धर्म प्रचारकों और व्यापारियों का सम्मान था। इस संपर्क ने विचार-विनिमय और ज्ञान के आदान-प्रदान का मार्ग खोला। इससे यूरोप के लोगों पर काफी प्रभाव पड़ा।

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प्रश्न 2.
किन कारणों के चलते इटली में पुनर्जागरण का जन्म हुआ?
उत्तर:
यूरोप में पुनर्जागरण का वास्तविक आरंभ इटली से हुआ था। इसके पश्चात् यह यूरोप के अन्य देशों में फैला। इटली में पुनर्जागरण के आरंभ के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित
अनुसार है

1. इटली का एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र होना (Italy was a famous Trade Centre):
इटली एक प्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र था। इटली का विदेशी व्यापार बडा उन्नत था। इटली की स्थिति ने इसे विशिष्टता प्रदान की। मध्यकाल में अरब व्यापारियों का एशियाई सामान इसी देश में बिकता था। यहीं से फिर ये वस्तुएँ अन्य यूरोपीय देशों
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को भेजी जाती थीं। इसके अतिरिक्त उत्तरी यूरोप से आने वाले व्यापारी भी इटली हो कर ही पश्चिम एशिया जाते थे। इस प्रकार इटली एक सुप्रसिद्ध व्यापारिक केंद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। इटली के इस बढ़ते व्यापार तथा उसकी समृद्धि ने पुनर्जागरण की प्रवृत्तियों को बल प्रदान किया।

2. प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान (Birth Place of Ancient Roman Civilisation):
इटली में पुनर्जागरण के पनपने का एक अन्य कारण यह भी था कि यह प्राचीन रोमन सभ्यता का जन्म स्थान रहा था। इटली के नगरों में विद्यमान प्राचीन रोमन सभ्यता के अनेक स्मारक आज भी लोगों को पुनर्जागरण की याद दिलाते हैं।

वे इटली को प्राचीन रोम की भाँति महान् देखना चाहते थे। इस तरह प्राचीन रोमन संस्कृति पुनर्जागरण के लिए प्रेरणा का स्रोत सिद्ध हुई। सर्वप्रथम दाँते की रचनाओं में इस प्रेरणा के चिह्न देखने को मिले हैं।

3. ईसाई धर्म का प्रसिद्ध केंद्र (Famous Centre of Christianity):
रोम सारे पश्चिमी यरोपीय ईसाई जगत का केंद्र था। पोप यहीं निवास करता था। कुछ पोप पुनर्जागरण की भावना से प्रेरित होकर विद्वानों को रोम लाए और उनसे यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद कराया। पोप निकोलस पंचम (1447-1455 ई०) के कार्य सराहनीय हैं।

उसने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की। संत पीटर का गिरजाघर भी उसने बनाया। कहते हैं कि उसके अधीन लगभग सारा रोम निर्मित हुआ। इन कार्यों का प्रभाव अन्य स्थानों पर भी पड़ना स्वाभाविक था।

4. उपयुक्त राजनीतिक दशा (Favourable Political Condition):
राजनीतिक दृष्टि से इटली पुनर्जागरण के लिए उपयुक्त था। पवित्र रोमन साम्राज्य का पतन हो रहा था। उत्तरी इटली में अनेक स्वतंत्र नगर-राज्यों का उदय हो चुका था। इसके अतिरिक्त इटली में सामंती प्रथा भी अधिक दृढ़ नहीं थी। परिणामस्वरूप इन नगर-राज्यों में स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता का वातावरण था। इससे वहाँ के नागरिकों ने नवीन विचारों का स्वागत किया और नवीन विचारों को जन्म दिया।

5. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education):
मध्यकालीन यूरोप में शिक्षा पर धर्म का प्रभाव था। परंतु इटली में व्यापार के विकास के कारण शिक्षा धर्म के बंधनों से मुक्त थी। यहाँ पाठ्यक्रम में व्यावसायिक ज्ञान, भौगोलिक ज्ञान आदि को उपयुक्त स्थान प्राप्त था। परिणामस्वरूप विज्ञान तथा तर्क को बल मिला।

यहाँ मध्यकाल में यूरोप के सर्वप्रथम विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई थी। इनमें बोलोनिया, पादुआ, रोम एवं फ्लोरेंस विश्वविद्यालयों के नाम प्रसिद्ध हैं। इन्होंने इटली के लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

6. तुर्कों का कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार (Occupation of Constantinople by the Turks):
1453 ई० में तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर अधिकार कर लिया। वहाँ के अधिकाँश यूनानी विद्वान्, कलाकार और व्यापारी भाग कर सबसे पहले इटली के नगरों में आए और यहाँ पर आश्रय लिया और कालांतर में वहीं बस गए।

ये विद्वान् अपने साथ प्राचीन यूनानी साहित्य की अनेक अनमोल पांडुलिपियाँ भी लाए। यूरोप के लोगों को इन ग्रंथों में समाए ज्ञान का कोई परिचय नहीं था। इसके अतिरिक्त इन विद्वानों में से अनेक इटली के विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों में शिक्षक नियुक्त

प्रश्न 3.
पुनर्जागरण काल में साहित्य के क्षेत्र में हुए विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। इस काल में यूरोप में अनेक ऐसे विद्वान् हुए जिन्होंने साहित्य के विकास में चार चाँद लगा दिए। उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. फ्रांसिस्को पेट्रार्क 1304-1374 ई० (Francesco Petrarch 1304-1374 CE):
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता (Father of Renaissance) कहा जाता है। उसका जन्म 1304 ई० में इटली के नगर फ्लोरेंस में हुआ था। उसने अपनी शिक्षा बोलोनिया (Bologna) विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उसने अपना अधिकाँश समय प्राचीन लातीनी ग्रंथों के अध्ययन में लगाया।

उसने संपूर्ण यूरोप में मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया। उसने लौरा (Laura) नामक एक स्त्री जिसे वह बेहद प्यार करता था पर अनेक कविताएँ लिखीं। साहित्य के क्षेत्र में उसके उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे 1341 ई० में रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी के अनुसार, “वह मानवतावाद को प्रोत्साहित करने वाला प्रथम व्यक्ति था तथा उसका समकालीनों पर गहरा प्रभाव पड़ा।

2. दाँते अलिगहियरी 1265-1321 ई० (Dante Alighieri 1265-1321 CE):
दाँते अलिगहियरी की गणना इटली के महान् कवियों में की जाती है। उसका जन्म 1265 ई० में फ्लोरेंस के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। यद्यपि उसका चर्च में पूर्ण विश्वास था किंतु उसने पादरियों के भ्रष्टाचारी जीवन की कटु आलोचना की। उसने अनेक पुस्तकों की रचना की।

इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय डिवाईन कॉमेडी (Divine Comedy) थी। इस काल्पनिक कथा में दाँते ने नर्क तथा स्वर्ग की यात्रा का वर्णन किया है। दाँते के उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे ठीक ही प्राचीन एवं आधुनिक दुनिया के मध्य एक पुल माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले का यह कहना ठीक है कि, “उसे (दाँते को) ठीक ही पुनर्जागरण साहित्य का सुबह का तारा कहा जाता है।”

3. जोवान्ने बोकासियो 1313-1375 ई० (Giovanni Boccaccio 1313-1375 CE):
जोवान्ने बोकासियो 14वीं शताब्दी का एक महान् साहित्यकार एवं मानवतावादी था। उसका जन्म 1313 ई० में पेरिस में हुआ था। किंतु उसने अपना जीवन फ्लोरेंस में व्यतीत किया था। वह फ्राँसिस्को पेट्रार्क का शिष्य था। वह एक प्रसिद्ध कहानीकार था।

उसकी सबसे महान् रचना का नाम डेकामेरोन (Decameron) था। इसे इतालवी भाषा में लिखा गया था तथा इसमें 100 कहानियों का वर्णन किया गया है। इसके प्रकाशन से उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई। इन कहानियों में उसने सामंतवाद एवं समाज में फैले नैतिक भ्रष्टाचार का बाखूबी से वर्णन किया है। वास्तव में बोकासियो का गद्य क्षेत्र में वही स्थान है जो पेट्रार्क एवं दाँते का कविता के क्षेत्र में।

4. जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला 1463-1494 ई० (Giovanni Pico della Mirandola 1463 1494 CE):
वह फ्लोरेंस का एक महान् मानवतावादी था। वह प्लेटो के विचारों से बहुत प्रभावित था। अत: उसने फ्लोरेंस में मार्सिलो फीसिनो (Marsilo Ficino) के साथ मिलकर प्लेटोनिक अकेडमी (Platonic Academy) की स्थापना की।

इसमें विभिन्न विद्वानों एवं लेखकों को गोष्ठियों के लिए आमंत्रित किया जाता था। उसने 1486 ई० में औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन (Oration on the Dignity of Man) की रचना की। इसमें उसने मानव एवं वाद-विवाद के महत्त्व पर प्रकाश डाला है।

5. निकोलो मैक्यिावेली 1469-1527 ई० (Niccolo Machiavelli 1469-1527 CE):
निकोलो मैक्यिावेली इटली का एक महान् विद्वान् एवं देशभक्त था। उसका जन्म 1469 ई० में फ्लोरेंस में हुआ था। उसने चर्च में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की। वह इटली की दयनीय राजनीतिक स्थिति को दूर कर उसके प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता था।

उसने 1513 ई० में दि प्रिंस (The Prince) नामक एक ग्रंथ की रचना की। यह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हुआ। इसका यूरोप की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया था। इसमें उसने उस समय इटली में प्रचलित राजनीतिक दशा एवं राजाओं द्वारा प्रशासन में अपनाए जाने वाले नियमों का विस्तृत वर्णन किया है। इस कारण इस ग्रंथ को राजाओं की बाईबल (Bible of the Kings) कहा जाता है। यह ग्रंथ आने वाले शासकों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत रहा।

6. जेफ्री चॉसर 1340-1400 ई० (Geoffrey Chaucer 1340-1400 CE):
जेफ्री चॉसर की गणना इंग्लैंड के महान् कवियों में की जाती है। वास्तव में यह जेफ्री चॉसर ही था जिसे इंग्लैंड में पुनर्जागरण की स्थापना का श्रेय दिया जाता है। उसने 1390 ई० में दि कैंटरबरी टेल्स (The Canterbury Tales) की रचना की। इससे हमें मध्यकालीन इंग्लैंड के समाज की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।

इस ग्रंथ के अध्ययन से जेफ्री चॉसर की प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यह ग्रंथ शीघ्र ही विश्व में बहुत लोकप्रिय हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकारों डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “चॉसर का अंग्रेजी भाषा के लिए वही योगदान था जो कि इतालवी भाषा के लिए दाँते एवं पेट्रार्क का था।”

7. सर टॉमस मोर 1478-1533 ई० (Sir Thomas More 1478-1533 CE):
सर टॉमस मोर इंग्लैंड का एक महान् लेखक था। वह इंग्लैंड के जान कोलेट (John Colet) एवं हालैंड के डेसीडेरियस इरेस्मस (Desiderius Erasmus) से बहुत प्रभावित था। उसकी रचना यूटोपिया (Utopia) जिसका प्रकाशन 1516 ई० में किया गया था ने एक तहलका मचा दिया।

इसमें उसने समकालीन समाज तथा शासन में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की तथा एक आदर्श समाज की तस्वीर प्रस्तुत की है। इसे लेखक ने लातीनी भाषा में लिखा था। बाद में इसका अंग्रेज़ी में अनुवाद किया गया।

8. डेसीडेरियस इरेस्मस 1466-1536 ई० (Desiderius Erasmus 1466-1536 CE):
डेसीडेरियस इरेस्मस हालैंड का सर्वाधिक श्रेष्ठ साहित्यकार था। उसने यूनानी एवं लातीनी भाषाओं का गहन अध्ययन किया था। उसने अनेक पुस्तकों की रचना की। इनमें से सर्वाधिक प्रसिद्ध दि प्रेज़ ऑफ़ फॉली (The Praise of Folly) थी।

इसका प्रकाशन 1509 ई० में हुआ था। इसमें उसने चर्च में फैले भ्रष्टाचार का विस्तृत वर्णन किया है। उसने पादरियों के विलासी जीवन की कटु आलोचना की है। इरेस्मस में व्यंग्य कसने की अद्भुत योग्यता थी।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण काल में कला के क्षेत्र में हुए विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में कला के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। मध्यकाल में कला का अपना स्वतंत्र स्थान नहीं था। इसमें मौलिकता एवं सुंदरता का अभाव था। पुनर्जागरण काल में कला धार्मिक बँधनों से मुक्त हो गई तथा यह यथार्थवादी (realistic) बन गई। वास्तव में कला ने पुनर्जागरण काल में एक नए युग में प्रवेश किया।

1. चित्रकला (Painting):
मध्यकाल में चित्रकला धर्म की जंजीरों से जकड़ी हुई थी। उस समय केवल ईसाई धर्म से संबंधित चित्र ही बनाए जाते थे। ये चित्र बिल्कुल सादा होते थे। इनमें केवल कुछ निश्चित रंगों का ही प्रयोग किया जाता था। इस प्रकार चित्रकला का क्षेत्र सीमित था। पुनर्जागरण काल में चित्रकला के क्षेत्र में एक नई क्राँति आई। इस काल में चित्रकारों ने धार्मिक नियमों का त्याग कर दिया।

उन्होंने मानव जीवन एवं प्राकृतिक दृश्यों से संबंधित अत्यंत सुंदर चित्र बनाए। अब ये गिरजाघरों के लिए नहीं अपितु व्यक्तिगत भवनों की सजावट के लिए बनाए जाने लगे। इनमें मानवतावाद एवं धर्मनिरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इन चित्रों को पूर्व की तुलना में अधिक रंगीन एवं चटख बनाया गया। अब चित्रकारी के लिए तेल रंगों (oil painting) का प्रयोग किया जाने लगा। ये रंग पक्के होते थे। अब त्रि-आयामी

(1) जोटो 1267-1337 ई० (Giotto 1267-1337 CE):
जोटो इटली का एक महान् चित्रकार था। उसने चित्रकला को एक नई दिशा प्रदान करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने अत्यंत सुंदर प्राकृतिक चित्र बनाए। ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते थे। उसका सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्र असिसि (Assis) था। इसमें बाल ईसा मसीह को दिखाया गया है।

उसने चर्च की दीवारों पर भी अनेक चित्र बनाए। उसने चित्रों की पृष्ठभूमि के लिए कुछ नए रंगों का प्रयोग किया। उसके चित्रों ने आने वाले चित्रकारों को एक नई प्रेरणा दी।

(2) लियोनार्डो दा विंसी 1452-1519 ई० (Leonardo da Vinci 1452-1519 CE):
लियोनार्डो दा विंसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह विश्व में एक चित्रकार के रूप में अधिक लोकप्रिय हुआ। उसका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में 1452 ई० में हुआ था। उसने अपने जीवनकाल में अनेक चित्र बनाए।

इन चित्रों को देख कर उसकी प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसके बनाए चित्रों मोना लीसा (Mona Lisa) एवं दि लास्ट सपर (The Last Supper) ने विश्व ख्याति प्राप्त की।

ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते हैं। मोना लीसा एक साधारण स्त्री का चित्र है। इस चित्र को बनाने में लियोनार्डो को चार वर्ष लगे। इस चित्र में मोना लीसा की मुस्कान इतनी मधुर है कि इसे देखने वाला व्यक्ति आज भी चकित रह जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के शब्दों में, “मोना लीसा एक ऐसा चित्र है जिससे उत्कृष्ठ चित्र आज तक नहीं बनाया जा सका।”

दि लास्ट सपर नामक चित्र मिलान स्थित सेंट मेरिया के गिरजाघर की दीवार पर बनाया गया है। इसमें ईसा मसीह को अपने साथियों के साथ एक मेज़ पर अपना अंतिम भोजन करते हुए दिखाया गया है। यह चित्र उच्च कोटि की मानवतावादी भावनाओं को प्रकट करता है। निस्संदेह लियोनार्डो दा विंसी पुनर्जागरण काल का सबसे महान् चित्रकार था। प्रसिद्ध इतिहासकार सी०.जे० एच० हेज़ के अनुसार, “लियोनार्डो ने अन्य कलाकारों के मुकाबले अपने युग को सबसे अधिक प्रभावित किया।”

(3) अल्बर्ट ड्यूरर 1471-1528 ई० (Albrecht Durer 1471-1528 CE):
अल्बर्ट ड्यूरर की गणना जर्मनी के महान् चित्रकारों में की जाती है। उसे बचपन से ही चित्रकारी में विशेष रुचि थी। 1494 ई० में अपनी इटली यात्रा के दौरान वह वहाँ के चित्रकारों से बहुत प्रभावित हुआ।

उसने प्रकृति से एवं मानव से संबंधित अनेक चित्र बनाए। उसके बनाए चित्रों में 1508 ई० में बनाया गया प्रार्थना रत हस्त (Praying Hands) बहुत लोकप्रिय हुआ। इससे 16वीं शताब्दी की इतालवी संस्कृति का आभास होता है।

(4) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती 1475-1564 ई० (Michael Angelo Buonarroti 1475-1564 CE):
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती इटली का एक अन्य प्रतिभाशाली व्यक्ति था। वह एक श्रेष्ठ चित्रकार, प्रवीण मूर्तिकार, कुशल भवन निर्माता एवं उच्च कोटि का कवि था। वास्तव में वह प्रत्येक क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने की योग्यता रखता था। उसका नाम रोम के

1. सिस्टीन चैपल (Sistine Chapel) की भीतरी छत पर बनाए 145 चित्रों के कारण सदैव के लिए अमर हो गया है। इन चित्रों से माईकल ऐंजेलो के कौशल एवं प्रतिभा का प्रमाण मिलता है। इसी चर्च की दीवार पर माईकल ऐंजेलो ने लास्ट जजमेंट (Last Judgement) नामक एक उच्च कोटि का चित्र को बनाया।

2. भवन निर्माण कला (Architecture):
पुनर्जागरण काल में भवन निर्माण कला के क्षेत्र में भी एक नयी क्राँति आई। इस काल में मध्यकाल में प्रचलित गौथिक शैली को छोड दिया गया। इस काल में भवन निर्माण कला की शास्त्रीय शैली (classical style) को अपनाया गया। इस शैली में डिज़ाइन, सजावट, विशालता एवं भव्यता पर विशेष बल दिया गया। इस काल में शिल्पकारों एवं चित्रकारों ने भवनों को गुंबदों, चित्रों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया।

(1) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी 1377-1446 ई० (Philippo Brunelleschi 1377-1446 CE):
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध भवन निर्माता था। वह प्रथम ऐसा व्यक्ति था जिसने गौथिक शैली की अपेक्षा शास्त्रीय शैली (classical style) को अपनाया। उसने भवन निर्माण कला के संबंध में काफी गहन अध्ययन किया था।

उसने 1436 ई० में फ्लोरेंस के कथीड्रल में दि ड्यूमा नामक गुंबद तैयार किया। इसने उसका नाम सदैव के लिए अमर कर दिया। यह गुंबद बहुत भव्य एवं विशाल था। इससे आने वाले भवन निर्माताओं को एक नई प्रेरणा मिली।

(2) दोनातल्लो 1386-1466 ई० (Donatello 1386-1466 CE):
दोनातल्लो इटली का एक महान् मूर्तिकार था। उसने 1416 ई० में मूर्तिकला के क्षेत्र में एक नई शैली का विकास किया। उसने यूनानी एवं रोमन मूर्तियों का गहन अध्ययन किया था। उसके द्वारा निर्मित मूर्तियों में से फ्लोरेंस में बनाई गई यंग ऐंजलस (Young Angels) नामक मूर्ति, पादुआ के जनरल गाटामेलाटा (Gattamelata) एवं वेनिस के सेंट मार्क (St. Mark) नामक मूर्तियों के नाम उल्लेखनीय हैं। ये मूर्तियाँ दोनातल्लो की दक्षता का प्रमाण देती हैं।

(3)माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती 1475-1564 ई० (Michael Angelo Buonarroti 1475-1564CE):
इटली के माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती न केवल एक महान् चित्रकार थे अपितु वह अपनी मूर्तिकला एवं भवन निर्माण कला के लिए भी प्रसिद्ध थे। माईकल ऐंजेलो ने अनेक भव्य एवं सुंदर मूर्तियों का निर्माण किया था। इनमें दो मूर्तियाँ दि पाइटा (The Pieta) एवं डेविड (David) के नाम उल्लेखनीय हैं।

इसमें मेरी को ईसा मसीह के मृतक शरीर को गोद में लिए हुए दिखाया गया है। उसकी दूसरी मूर्ति डेविड के नाम से जानी जाती है इन दोनों मूर्तियों को पुनर्जागरण काल की सर्वश्रेष्ठ मूर्तियाँ माना जाता है। इनके अतिरिक्त माईकल ऐंजेलो ने सेंट पीटर गिरजाघर के गुंबद का भव्य डिज़ाइन बनाया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में क्या विकास हुआ?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में अद्वितीय विकास हुआ। मध्यकाल में लोगों के जीवन पर चर्च का जबरदस्त प्रभाव था। इस काल में मानव जीवन का उद्देश्य परमात्मा को पाना एवं परलोक के बारे सोचना था। अत: इस काल में लोगों की विज्ञान में कोई दिलचस्पी नहीं थी। पुनर्जागरण काल में लोगों के दृष्टिकोण में भारी परिवर्तन आ गया।

वे प्रत्येक वस्तु को तर्क की कसौटी पर परखने लगे। इससे नवीन खोजों का मार्ग प्रशस्त हुआ। लोगों को वास्तविक ज्ञान की जानकारी देने के उद्देश्य से 1662 ई० में लंदन में रॉयल सोसाइटी (Royal Society) तथा 1666 ई० में फ्राँस में पेरिस अकादमी (Paris Academy) की स्थापना की गई। संक्षेप में वैज्ञानिक खोजों ने लोगों के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिए।

1. निकोलस कोपरनिकस 1473-1543 ई० (Nicholas Copernicus 1473-1543 CE):
निकोलस कोपरनिकस पोलैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने खगोल विज्ञान (astronomy) के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया। उसने उस समय प्रचलित इस सिद्धांत को असत्य सिद्ध किया कि पृथ्वी सभी ग्रहों का केंद्र है तथा सूर्य एवं अन्य ग्रह इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं।

कोपरनिकस ने सिद्ध किया कि पृथ्वी गोल है तथा यह अन्य ग्रहों की तरह सर्य की परिक्रमा करती है। चर्च ने कोपरनिकस के इस सिद्धांत की कट आलोचना की तथा इसे बाईबल की शिक्षा के विरुद्ध माना। यही कारण था कि कोपरनिकस के विचारों संबंधी पस्तक दि रिवल्यशनिबस (De Revolutionibus) का प्रकाशन उसकी मृत्यु के पश्चात् हुआ। निस्संदेह कोपरनिकस के इस सिद्धांत ने विज्ञान के क्षेत्र में एक नए युग का सूत्रपात किया।

2. अंड्रीयस वेसेलियस 1514-1564 ई० (Andreas Vesalius 1514-1564 CE):
अंड्रीयस वेसेलियस इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान का प्राध्यापक था। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ (dissection) की। निस्संदेह यह एक महान् वैज्ञानिक उपलब्धि थी। इससे आधुनिक शरीर-क्रिया विज्ञान (physiology) का आरंभ हुआ। उसने 1543 ई० में ऑन एनॉटमी (On Anatomy) नामक एक बहुमूल्य ग्रंथ की रचना की।

3. गैलिलियो गैलिली 1564-1642 ई० (Galileo Galilei 1564-1642 CE):
गैलिलियो गैलिली इटली का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने कोपरनिकस के इस सिद्धांत का समर्थन किया कि सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र है तथा पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसकी परिक्रमा करते हैं। उसने 1609 ई० में दूरबीन (Telescope) तैयार की जिससे सूर्य तथा चाँद आदि ग्रहों को देखा जा सकता था।

निस्संदेह यह एक महान् उपलब्धि थी। गैलिलियो ने दि मोशन (The Motion) नामक एक बहुमूल्य ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने यह सिद्ध किया कि भारी एवं हल्की वस्तुएँ एक ही गति से पृथ्वी पर गिरती हैं। गैलिलियो को अपने विचारों के लिए चर्च की कटु आलोचना का शिकार होना पड़ा।

4. जोहानेस कैप्लर 1571-1630 (Johannes Kepler 1571-1630 CE):
जोहानेस कैप्लर जर्मनी का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। वह जर्मन विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान का प्रोफैसर था। उसने कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री (Cosmographical Mystery) नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने खगोलीय रहस्य के बारे में विस्तृत प्रकाश डाला है। इसमें उसने कोपरनिकस के सिद्धांत को लोकप्रिय बनाया। इसमें उसने यह सिद्ध किया कि सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार (circles) के रूप में नहीं अपितु अंडाकार गति से घूमते हैं।

5. विलियम हार्वे 1578-1657 ई० (William Harvey 1578-1657 CE):
विलियम हार्वे इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1628 ई० में यह सिद्ध किया कि रक्त हृदय से चलकर धमनियों तथा नाड़ियों से होता हुआ पुनः वापस हृदय में पहुँच जाता है। इसे रुधिर परिसंचरण (Blood circulation) कहा जाता है। निस्संदेह चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में यह एक क्रांतिकारी देन थी।

6. आइज़क न्यूटन 1642-1717 ई० (Issac Newton 1642-1717 CE):
आइज़क न्यूटन इंग्लैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने 1687 ई० में प्रिंसिपिया मैथेमेटिका (Principia Mathematica) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का प्रकाशन किया। इस | विज्ञान के अनेक नए सिद्धांतों की खोज का वर्णन किया है। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत (Law of Gravitation) था। इसमें उसने सिद्ध किया कि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के कारण प्रत्येक वस्तु ऊपर से नीचे की ओर खींचती है।

प्रश्न 6.
पुनर्जागरण के यूरोपीय समाज पर पड़े विभिन्न प्रभावों पर प्रकाश डालें।
अथवा
पुनर्जागरण के सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पुनर्जागरण को विश्व इतिहास में एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण आंदोलन माना जाता है। इस आंदोलन के कारण लोगों का सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक तथा राजनीतिक जीवन बहुत प्रभावित हुआ। इन प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. सामाजिक तथा धार्मिक प्रभाव

1. जिज्ञासा की भावना (Spirit of Inquiry):
पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि लोगों में जिज्ञासा की भावना उत्पन्न हुई तथा उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया। अब उन्होंने शताब्दियों से प्रचलित अंध विश्वासों तथा रीति-रिवाजों को त्याग दिया। वे अब प्रत्येक विचार को तर्क की कसौटी पर परखने लगे। उनमें अधिक-से-अधिक ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा पैदा हुई। परिणामस्वरूप नए-नए आविष्कार हुए जिससे लोगों की जीवन पद्धति परिवर्तित हो गई।

2. मानवतावाद की भावना (Spirit of Humanism):
मानवतावाद की भावना का उत्पन्न होना पुनर्जागरण की एक अन्य महत्त्वपूर्ण देन है। इस काल के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य से संबंधित विषयों को प्रमुख स्थान दिया तथा मनुष्य के कल्याण पर बल दिया। उन्होंने धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित प्रतिबंधों की घोर आलोचना की। उन्होंने मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया। पेट्रार्क, दाँते तथा इरेस्मस उस काल के प्रसिद्ध मानवतावादी थे।

3. स्त्रियों की स्थिति में सुधार (Uplift of Women):
पुनर्जागरण से पूर्व स्त्रियों की स्थिति बहुत बदतर थी। उन्हें समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण काल में स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया तथा उन्हें पुरुषों के समान स्थान प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप उनमें जागृति आई। अब वे शिक्षा ग्रहण करने लगीं। साहित्य के अध्ययन से उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया।

4. नैतिकता का पतन (Decline of Morality) :
पुनर्जागरण का समाज पर एक बुरा प्रभाव यह पड़ा कि लोगों की नैतिकता का पतन हो गया। पुनर्जागरण से पूर्व लोग प्रायः धार्मिक होते थे। परंतु अब वे भौतिकवादी बन गए। इससे लोगों के पास काफी धन एकत्र हो गया तथा वे विलासी जीवन बिताने लगे। इस प्रभाव से पादरी भी अछूते न रहे तथा वे भी भ्रष्ट एवं चरित्रहीन हो गए।

5. चर्च के महत्त्व में कमी (Decline in the Importance of Church):
पुनर्जागरण के कारण लोगों का दृष्टिकोण विशाल हो गया था। अब वे आँखें मूंद कर चर्च पर विश्वास नहीं करते थे। इस कारण चर्च की प्रतिष्ठा को चोट पहुँची। विज्ञान में हुए नए-नए आविष्कारों के कारण लोगों में तर्कशीलता की भावना पैदा हुई। अब वे खोखले रीति-रिवाजों तथा अंध-विश्वासों का अनुसरण करने को तैयार न रहे। परिणामस्वरूप चर्च की बुराइयाँ लोगों के सामने आने लगीं तथा समाज में चर्च का महत्त्व कम होने लगा।

II. सांस्कृतिक प्रभाव

1. साहित्य का विकास (Development of Literature):
पुनर्जागरण के कारण साहित्य के क्षेत्र में आश्चर्य विकास हआ। इस विकास के परिणामस्वरूप अनेक नई पस्तकों की रचना हई। इतालवी. फ्राँसीसी. अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन, डच आदि भाषाओं में अनेकों विद्वानों ने अपनी रचनाएँ लिखीं। इस काल के साहित्यकारों में दाँते, पेट्रार्क, बोकासियो, मैक्यिावेली, मिरांदोला, जेफ्री चॉसर, टॉमस मोर तथा इरेस्मस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवतावादी विचारों का प्रसार किया तथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

2. शिक्षा का विकास (Progress of Education):
पुनर्जागरण से पूर्व शिक्षा केवल चर्च द्वारा ही प्रदान की जाती थी। पुनर्जागरण के कारण शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आया। विभिन्न देशों में नए-नए स्कूलों, कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना होने लगी। अब लोग चर्च से शिक्षा ग्रहण करने की अपेक्षा इन नए शिक्षण संस्थानों में जाने लगे। परिणामस्वरूप आधुनिक शिक्षा का विकास होने लगा। छापेखाने का आविष्कार हो जाने से लोगों को अब शीघ्र तथा सस्ती पुस्तकें प्राप्त होने लगीं।

3. ललित कलाओं का विकास (Development of Fine Arts):
पुनर्जागरण काल में चित्रकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल के चित्रकारों ने मानव जीवन से संबंधित चित्र बनाने आरंभ कर दिये थे तथा इन चित्रों में धर्म-निरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी। इस काल में चित्रों के लिए प्रयोग होने वाले रंगों में भी परिवर्तन आया।

लियोनार्डो द विंसी, माईकल ऐंजेलो, राफेल, ब्रूनेलेशी, दोनातल्लो आदि ने चित्रकला में अपना विशेष योगदान दिया। इस काल में मूर्तिकला के क्षेत्र में उल्लेखनीय विकास हुआ। इस काल के मूर्तिकारों में लोरेंजो जिबर्टी, दोनातल्लो, माईकल ऐंजेलो आदि के नाम वर्णनीय हैं।

4. वैज्ञानिक आविष्कार (Scientific Inventions):
पुनर्जागरण काल में लोगों का दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया था। परिणामस्वरूप नए-नए वैज्ञानिक आविष्कार हुए। कोपरनिकस, केप्लर, गैलिलियो आदि ने अपनी खोजों से यह सिद्ध किया कि सूर्य ब्रह्मांड का केंद्र है तथा शेष सभी ग्रह इसके गिर्द चक्कर लगाते हैं। इससे पूर्व यह धारणा थी कि सभी ग्रह पृथ्वी के गिर्द घूमते हैं। न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत पेश किया। छापाखाना, गोला बारूद तथा कंपास आदि के आविष्कारों ने भी मानव जीवन पर क्रांतिकारी प्रभाव डाले।

5. भौगोलिक खोजें (Geographical Discoveries):
पुनर्जागरण काल में हुई भौगोलिक खोजों से एक नए युग का प्रादुर्भाव हुआ। इस काल में अनेक देशों के नाविकों ने समुद्री यात्राएँ की तथा नए-नए समुद्री मार्गों का पता लगाया। कोलंबस, वास्को-डी-गामा, मैगलन, कैबट, लैबरोडोर इस काल के प्रसिद्ध नाविक थे। इन्होंने अमरीका, भारत, कनाडा, अफ्रीका तथा चीन आदि देशों तक पहुँचने के लिए नए-नए समुद्री मार्गों की खोज की। इन भौगोलिक खोजों के कारण यूरोपीय देशों के व्यापार में बड़ी वृद्धि हुई तथा उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन मिला।

II. आर्थिक प्रभाव

1. व्यापार तथा वाणिज्य का विकास (Development of Trade and Commerce):
पुनर्जागरण से पूर्व लोग धार्मिक विचारों में विश्वास रखते थे परंतु अब वे तर्कशील तथा भौतिकवादी बन गए थे। वे अपना परलोक सुधारने की अपेक्षा वर्तमान जीवन को सुखी तथा आनंदपूर्ण बनाने की ओर ज्यादा ध्यान देने लगे। उनकी रुचि अब धन-दौलत इकट्ठी करने की हो गई। उनकी यह प्रवृत्ति व्यापार तथा वाणिज्य के विकास में बड़ी सहायक सिद्ध हुई।

2. उद्योगों का विकास (Development of Industry):
पुनर्जागरण के परिणामस्वरूप पैदा हुए वातावरण के कारण उद्योगों के क्षेत्र में भी पर्याप्त विकास हुआ। अमीर वर्ग अपने धन का प्रयोग करके और अधिक धन कमाना चाहता था। उनकी इसी लालसा ने उद्योगों के विकास को प्रोत्साहन दिया। उद्योगों का विकास होने के परिणामस्वरूप पूँजीवाद का जन्म हुआ।

3. उपनिवेशवाद को प्रोत्साहन (Impetus to Colonialism):
पुनर्जागरण काल में उद्योगों का विकास होने के कारण उद्योगों में अधिक मात्रा में माल बनने लगा। उद्योगपति अपना माल बेच कर अधिक-से-अधिक पैसा कमाना चाहते थे। इस माल को बेचने के लिए उन्हें मंडियों की आवश्यकता थी। अत: विभिन्न देशों के सम्राटों ने अपने नाविकों को दूर-दूर के स्थानों पर जाने के लिए नए समुद्री मार्गों को खोजने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप इन नाविकों ने नए समुद्री मार्गों की खोज की तथा अमरीका, एशिया तथा अफ्रीका आदि में पहुँचने में सफल हुए। वहाँ पर इन देशों ने अपने उपनिवेश स्थापित कर लिए।

IV. राजनीतिक प्रभाव

1. प्रबल राजतंत्र का उदय (Rise of Strong Monarchy):
पुनर्जागरण काल में हुए साहित्य के विकास के कारण लोगों के राजनीतिक विचारों में बड़ा परिवर्तन आया। प्राचीन रोमन साहित्य के अध्ययन से यूरोपीय शासकों को प्राचीन रोमन साम्राज्य की शक्ति तथा शानो-शौकत का पता चला तो उनके मन में भी शक्तिशाली राज्य स्थापित करने का विचार आया।

उनमें यह विचार प्रचलित हो गया था कि नैतिकता के मूल्यों की परवाह किए बिना उन्हें उचित अनुचित ढंग अपना कर अपने राज्यों का विस्तार करना चाहिए। गोला-बारूद का आविष्कार हो जाने के कारण सामंतों का पतन हो चुका था तथा सम्राटों की स्थिति मज़बूत हो गई थी। अब तक चर्च भी शक्तिहीन हो गया था। इन सभी परिस्थितियों ने शक्तिशाली राजतंत्रों के उत्थान को संभव बना दिया।

2. सामंतवाद का पतन (Downfall of Feudalism) :
मध्यकाल में सामंतवाद का बोल-बाला था। सामंत बहुत ही शक्तिशाली थे तथा सम्राट सेना के लिए उन पर ही निर्भर करते थे। परंतु गोला-बारूद के आविष्कार के परिणामस्वरूप स्थिति में परिवर्तन आ गया। इस कारण सम्राट् शक्तिशाली हो गए तथा उनकी सामंतों पर निर्भरता समाप्त हो गई। अब सम्राट विद्रोही सामंतों को कुचलने में सक्षम हो गए।

3. युद्ध के नवीन ढंग (New Mode of Warfare):
मध्यकाल में प्रायः युद्ध में तलवारों, नेजों तथा भालों आदि का ही प्रयोग किया जाता था। परंतु पुनर्जागरण काल में बारूद का आविष्कार हो जाने के कारण युद्ध के ढंग में युद्धों में तोपखाने का प्रयोग होने लगा। इसी शक्तिशाली सेना की सहायता से विभिन्न यूरोपीय सम्राट विभिन्न स्थानों पर विजय प्राप्त करके अपने उपनिवेश स्थापित करने में सफल रहे।

प्रश्न 7.
धर्म सुधार आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है? इसके कारणों तथा उद्देश्यों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन पुनर्जागरण के बाद आधुनिक युग की दूसरी महानतम् घटना मानी जाती है। इस आंदोलन का उदय पुनर्जागरण की कोख से ही हुआ। यह आंदोलन वास्तव में पोप तथा चर्च के विरुद्ध एक प्रतिक्रिया थी जो 16वीं शताब्दी में यूरोप के देशों में हुई।

एक अन्य इतिहासकार फर्डिनांड शेविल के अनुसार, “वास्तव में यह एक प्रकार का दोहरा आंदोलन था जिसका उद्देश्य एक ओर ईसाइयों के जीवन का नैतिक उत्थान करना था तथा दूसरी ओर पोप की सत्ता को धार्मिक क्षेत्र में कम करना था।”

I. धर्म सुधार आंदोलन से अभिप्राय

16वीं शताब्दी से पूर्व चर्च ग्रीक आर्थोडॉक्स तथा रोमन कैथोलिक नामक दो भागों में बँटा हुआ था। ग्रीक आर्थोडॉक्स का पूर्वी यूरोप तथा रोमन कैथोलिक का पश्चिमी यूरोप में प्रभुत्व था। ग्रीक आर्थोडॉक्स चर्च का केंद्र कुंस्तुनतुनिया था जबकि रोमन कैथोलिक चर्च का केंद्र रोम था। 1453 ई० में तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया सहित पूर्वी यूरोप के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया था।

परिणामस्वरूप आर्थोडॉक्स चर्च का महत्त्व कम हो गया। परंतु रोमन कैथोलिक का महत्त्व अभी भी बना हुआ था। वस्तुतः धर्म-सुधार आंदोलन रोम कैथोलिक चर्च तथा इसको संचालित करने वाले पोप के विरुद्ध ही चलाया गया था।

कैथोलिक चर्च एक शक्ति संपन्न संस्था थी। इसके अनुयायियों पर इसका पूर्ण नियंत्रण था। जन्म से लेकर मृत्यु तक व्यक्ति की सभी रस्में चर्च के नियमों के अनुसार ही होती थीं। कोई भी व्यक्ति चर्च के नियमों का उल्लंघन नहीं कर सकता था। पोप की शक्ति के आगे तो सम्राटों की शक्ति भी फीकी पड़ जाती थी। सम्राट् तथा उसकी प्रजा चर्च के अधीन ही होते थे।

चर्च की अपनी सरकार होती थी तथा उसने अपने कानून, अपने न्यायालय एवं अपनी ही पुलिस स्थापित की होती थी। प्रत्येक व्यक्ति को चर्च को कर देना पड़ता था।

सम्राट अपने राज्य के कानून चर्च पर लागू नहीं कर सकता था। यदि कोई चर्च के नियमों का उल्लंघन करता था तो उसे धर्म से निष्कासित कर दिया जाता था। यदि कोई सम्राट् चर्च के विरुद्ध कार्य करता था तो पोप उसे सिंहासन से उतार सकता था। इस प्रकार पोप असीम शक्तियों का स्वामी था। जॉन मैरीमेन के अनुसार, “चर्च एक अर्ध-स्वतंत्र संस्था थी जो लोगों के राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन के प्रत्येक पक्ष में हस्तक्षेप करता था।”

पोप धर्म का मुखिया तो था ही, इसके साथ-साथ वह राजनीतिक मामलों में भी हस्तक्षेप करता रहता था। परिणामस्वरूप राजाओं के साथ उसके संबंध सुखद नहीं रहते थे। उनमें व्यापक तनाव रहता था। सम्राट् पोप के प्रभाव से मुक्त होने के यत्न करते रहते थे। धीरे-धीरे चर्च में कई दोष आ गए तथा वहाँ पाप के अड्डे बन गए।

पादरी चरित्रहीन हो गए तथा विलासी जीवन बिताने लगे। इस कारण लोगों में रोष उत्पन्न हुआ तथा उन्होंने चर्च के विरुद्ध आवाज़ उठानी आरंभ कर दी। परिणामस्वरूप 16वीं शताब्दी में धर्म-सुधार आंदोलन आरंभ हुआ जिसे सम्राटों तथा जनता ने अपना पूर्ण सहयोग दिया।

II. धर्म-सुधार आंदोलन के कारण

धर्म-सुधार आंदोलन के उदय तथा विकास में जिन कारणों ने सहायता पहुँचाई उनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. चर्च की बुराइयाँ (Evils of the Church):
धर्म-सुधार आंदोलन का मुख्य कारण चर्च में व्याप्त बुराइयाँ थीं जिनके कारण लगभग पिछले 200 वर्षों से चर्च बदनाम हो रहा था। चर्च के संगठन में भ्रष्टाचार तथा दुराचार का बोलबाला था। उच्च अधिकारी से लेकर पादरी तक सभी का चरित्र पतित हो चुका था। चर्च के अधिकारी अपने कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे तथा बड़े लालची हो गए थे।

वे विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे तथा हर समय रंगरलियों में डूबे रहते थे। कई पादरियों ने शराब पीना, जुआ खेलना तथा शिकार खेलना आरंभ कर दिया था। पादरियों के इन्हीं अनैतिक कार्यों के कारण जन-साधारण चर्च के विरुद्ध हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “चर्च के नैतिक पतन से लोगों का विश्वास डगमगा गया।”

2. पोप तथा पादरियों के विशेषाधिकार (Privileges of the Pope and the Priests):
यूरोप की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार पादरियों को विशेषाधिकार प्राप्त थे। देश का कोई भी कानून उन पर लागू नहीं होता था। कोई अपराध करने पर भी उनके ऊपर किसी न्यायालय में मुकद्दमा नहीं चलाया जा सकता था। मध्यकाल में पोप बिल्कुल निरंकुश होते थे तथा उनकी शक्ति पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता था।

वे अपनी शक्तियों का दुरप्रयोग करने लगे थे। इस काल के पोपों ने धन इकट्ठा करने के साथ भोग-विलास का जीवन भी आरंभ कर दिया था। धर्म के सबसे बड़े व्यक्ति के इस प्रकार के चरित्र से लोगों के मन को बड़ी ठेस पहुँची। इसने धर्म-सुधार आंदोलन का आधार तैयार किया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

3. चर्च की विशाल धन-संपत्ति (Vast Wealth of the Church) :
यूरोप के विभिन्न देशों में चर्च ने विशाल संपत्ति इकट्ठी कर ली थी। इसी प्रकार फ्राँस तथा अन्य देशों में भी चर्च ने काफी संपत्ति इकट्ठी कर ली थी। चर्च की संपत्ति बढ़ने के कई साधन थे जैसे चर्च को दान दी गई भूमि। चर्च किसानों से उनके उत्पादन का दसवाँ भाग कर के रूप में लेता था।

यह कर भी उसकी आय का एक बड़ा साधन था। सम्राट् चर्च की संपत्ति पर कर नहीं लगा सकते थे। इस विशाल संपत्ति के कारण पादरी भ्रष्ट हो गये थे। उन्होंने धार्मिक कार्यों तथा निर्धनों की सहायता करने की अपेक्षा स्वार्थी हितों की पूर्ति करनी आरंभ कर दी थी। इस कारण लोग चर्च के विरुद्ध हो गए।

4. राजनीतिक क्षेत्र में पोप का हस्तक्षेप (Pope’s Interference in the Political Affairs):
पोप केवल धार्मिक दृष्टि से ही निरंकुश शासक नहीं था, अपितु राजनीतिक क्षेत्र में भी उसका पूरा प्रभाव था। वह स्वयं को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझता था। ईसाई राज्यों पर अपना कड़ा नियंत्रण रखने के उद्देश्य से उसने अपने एजेंट नियुक्त किए हुए थे।

ये एजेंट पोप के आदेशों का पालन करवाने का कार्य करते थे। यदि कोई सम्राट् पोप के आदेशों के विपरीत कार्य करता था तो पोप उसे दंड दे सकता था। वह सम्राट को पदच्युत कर सकता था।

चर्च की संपत्ति के कारण भी कई बार पोप तथा सम्राटों में झगड़ा हो जाता था। पोप का यह विश्वास था कि चर्च की संपत्ति पर कर लगाने का अधिकार किसी सम्राट के पास नहीं है। परंतु कई सम्राटों ने पोप की इस धारणा को चनौती दी। इन सम्राटों ने पोप के आदेशों की कोई परवाह न की तथा चर्च पर कर लगा दिए।

इससे पोप की प्रतिष्ठा तथा शक्ति को गहरा आघात पहँचा। फलस्वरूप पोप की स्थिति दर्बल हो गई और लोग धर्म सधार के लिए प्रेरित हए। फर्डीनांड शेविल के अनुसार, “पोप द्वारा धन इकट्ठा करने तथा उसके राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप करने के कारण यूरोप के लोगों ने उसका विरोध किया।”

5. राष्ट्रीय राज्यों का उदय (Rise of Nation States) :
पुनर्जागरण से पर्व यरोप के कई देशों में सामंतवाद का प्रभुत्व था। इस सामंती व्यवस्था में अनेकों दोष व्याप्त थे। इन दोषों को दूर करने के उद्देश्य से कई राज्यों में शासकों ने सामंतों को शक्तिहीन करने के सफल प्रयास किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्राँस, पुर्तगाल, स्पेन, हंगरी, पोलैंड, हालैंड, स्काटलैंड, डेनमार्क आदि राष्ट्रीय राज्य उदय हुए।

ये राष्ट्रीय राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्ति पाना चाहते थे। इस कार्य के लिए फ्राँस. इंग्लैंड तथा स्पेन के सम्राट आगे आए। उन्होंने अपने राज्य में स्थित चर्च की संपत्ति पर कर लगाया। उनके अनुसार किसी सम्राट को पदच्युत करने का पोप द्वारा दिया जाने वाला आदेश अनुचित है।

6. पुनर्जागरण का प्रभाव (Influence of the Renaissance):
पनर्जागरण एक ऐसी क्रांति थी जिसने धार्मिक अंध-विश्वासों एवं रूढ़िवादी मान्यताओं पर कड़ा प्रहार किया और यूरोपवासियों में एक नई चेतना जागृत की। इसके प्रभाव से यरोप के लोगों का दष्टिकोण आलोचनात्मक एवं तार्किक हो गया। अब वे तर्क की कसौटी पर कसे बिना किसी भी तथ्य को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। छापेखाने के आविष्कार के कारण उनमें नवचेतना का संचार हुआ। वे चर्च में फैले भ्रष्टाचार से अवगत हुए। अत: उनमें व्याप्त असंतोष आक्रोश में बदल गया। इस बात ने धर्म-सुधार आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया।

7. धर्म-सुधारकों द्वारा पोप का विरोध (Opposition of Pope by the Religious Reformers):
धर्म-सुधार आंदोलन के आरंभ तथा प्रसार में यूरोप के धर्म-सुधारकों ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इन धर्म-सुधारकों ने लोगों के सामने तत्कालीन धार्मिक व्यवस्था के दोषों का भांडा फोड़ दिया। इन धर्म-सुधारकों में सबसे प्रसिद्ध जॉन वार्डक्लिफ (John Wvcliffe) था।

उसने तथा उसके शिष्य जॉन हस्स (John Huss) ने पोप तथा चर्च के विरुद्ध जोरदार प्रचार किया। चर्च का विरोध करने के कारण पोप ने उन्हें ईसाई धर्म से निकाल दिया। डरेस्मस (Erasmus) एक अन्य विद्वान था। उसने बाईबल की गलतियों में संशोधन किया तथा उसका लातीनी भाषा में रूपांतर तैयार किया। उसने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘इन प्रेज़ ऑफ़ फॉली’ (In Praise of Folly) में चर्च की भ्रष्टाचारी प्रथाओं का खंडन किया। इस पुस्तक के कारण पोप की प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुँची।

8. तात्कालिक कारण : पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री (Immediate Cause-Sale of Indulgences):
पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बना। उन दिनों पोप को रोम में सेंट पीटर गिरजाघर के निर्माण के लिए धन चाहिए. था। उसने धन इकट्ठा करने के लिए पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचना आरंभ कर दिया।

इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद कर कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता था। 1517 ई० में जोहानन टेट्ज़ेल (Johanan Tetzel) नामक एक पादरी पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचने के लिए विटेनबर्ग पहुँचा। जब वह वहाँ यह पाप स्वीकारोक्ति पत्र बेच रहा था तो मार्टिन लूथर ने उसका विरोध किया।

मार्टिन लूथर विटेनबर्ग में एक प्रोफेसर था। चर्च में व्याप्त दोषों के कारण उसके मन में पहले ही चर्च विरुद्ध तूफान उठ रहा था। मार्टिन लूथर ने इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। इसने धर्म सुधार आंदोलन का श्रीगणेश किया।

III. धर्म सुधार आंदोलन का उद्देश्य

धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित अनुसार थे

  • पोप तथा अन्य धर्म अधिकारियों के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाना।
  • चर्च अधिकारियों का नैतिक जीवन में सुधार लाना।
  • चर्चों में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना तथा धर्म अधिकारियों का ध्यान आध्यात्मिकता की ओर लगाना।
  • राष्ट्रीय चर्च की स्थापना पर बल देना।
  • जनसाधारण को मोक्ष-प्राप्ति के लिए पोप पर आश्रित न रख कर परमात्मा पर आश्रित बनाना।
  • प्रत्येक मानव को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना।

इन सब उद्देश्यों के होते हए भी यह कहा जा सकता है कि मल रूप से यह आंदोलन यरोप की प्राचीन रूढिवादिता को समाप्त करने के लिए चलाया गया जिसके लिए 13वीं शताब्दी में प्रयास किये जा रहे थे। डब्ल्यू० के० फरग्युसन एवं जी ब्रन के शब्दों में, “यद्यपि 13वीं शताब्दी में चर्च की व्यवस्था में कुछ परिवर्तन हुए थे, परंतु ये परिवर्तन आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं थे।”

प्रश्न 8.
यूरोप के विभिन्न देशों में चले धर्म सुधार आंदोलनों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन के प्रसार में मुख्य भूमिका जर्मनी के प्रसिद्ध विद्वान् मार्टिन लूथर ने निभाई। मार्टिन लूथर के अतिरिक्त उलरिक ज्विंगली, जौं कैल्विन, जॉन वाईक्लिफ तथा इग्नेशियस लोयोला ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया। धर्म-सुधार आंदोलन में विभिन्न नेताओं द्वारा दिए योगदान का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. मार्टिन लूथर 1483-1546 ई० (Martin Luther 1483-1546 CE)-मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म सुधार आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 10 नवंबर, 1483 ई० को जर्मनी के एक निर्धन किसान के घर हुआ था। प्रारंभ में लूथर पोप विरोधी नहीं था, परंतु 1517 ई० में एक ऐसी घटना घटी जिससे वह पोप विरोधी हो गया।

लूथर ने देखा कि विटेनबर्ग में टेट्ज़ेल नामक एक पादरी लोगों को पाप स्वीकारोक्ति-पत्र बेच रहा था। टेट्ज़ेल यह प्रचार कर रहा था कि कोई भी व्यक्ति जो इन पाप स्वीकारोक्ति-पत्र को खरीद लेगा वह अपने पापों से मुक्त हो जाएगा तथा सीधे स्वर्ग को जाएगा। भोली-भाली जनता के साथ इस प्रकार किए जा रहे मजाक तथा शोषण के विरुद्ध मार्टिन लूथर ने आवाज़ उठाई।

उसने विटेनबर्ग के चर्च के द्वार पर अपने 95 थिसेज़ लटका दिए। इन थिसेज़ों में उसने चर्च के भ्रष्ट उपायों द्वारा धन इकट्ठा करने की कड़ी आलोचना की। उसने धर्म शास्त्रियों को इन थिसेज़ों के बारे में बहस करना की चुनौती दी। लेकिन पोप ने लूथर के विरोध को कोई महत्त्व नहीं दिया। लूथर ने 1519 ई० में लिपजिग में एक वाद-विवाद में मनुष्य तथा ईश्वर के बीच पोप की मध्यस्थता को निरर्थक बताया।

यह मार्टिन लथर की चर्च की निरंकशता को खली चनौती थी। इसका लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पडा तथा वे चर्च के विरोधी हो गए। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी के अनुसार, “मार्टिन लूथर आधुनिक समय के महान् धार्मिक व्यक्तियों में से एक था।

2. उलरिक ज्विंगली 1484-1531 ई० (Ulrich zwingli 1484-1531 CE):
उलरिक ज्विंगली स्विट्ज़रलैंड में हुआ। उसने बेसेल विश्वविद्यालय से एम० ए० की डिग्री प्राप्त की तथा एक पादरी बन गया। 1518 ई० में वह ज्यूरिख के चर्च का पादरी नियुक्त हुआ। परंतु चर्च में फैले भ्रष्टाचार तथा अंध-विश्वासों के कारण शीघ्र ही उसका मन असंतुष्ट हो गया। उस पर मार्टिन लूथर का बहुत प्रभाव था। उसने चर्च में फैले भ्रष्टाचारों एवं दोषों की कड़े शब्दों में आलोचना की। उसने पोप की सर्वोच्चता को मानने से इंकार कर दिया।

उसका कथन था कि लोग चर्च की अपेक्षा बाईबल को अपने जीवन का मार्गदर्शक बनाएँ। उसने उन सभी दूषित प्रथाओं को बंद करने की माँग की जिनके विरुद्ध जर्मनी में मार्टिन लूथर ने आंदोलन चलाया था। उसने लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा दी। उसकी 1531 ई० में कैथोलिकों (Catholics) के साथ हुए एक संघर्ष में मृत्यु हो गई।

3. जौं कैल्विन 1509-64 ई० (Jean Calvin 1509-64 CE):
जौं कैल्विन ने फ्राँस में धर्म-सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया था। वह भी मार्टिन लूथर की भाँति 16वीं शताब्दी का एक महान् सुधारक था। जौं कैल्विन का जन्म फ्रांस के नोपॅन (Noyon) नगर में 10 जुलाई, 1509 ई० को हुआ था। वह एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखता था। बचपन से ही उसकी धार्मिक विचारों में रुचि थी। उसने अपनी उच्च शिक्षा पेरिस विद्यालय से प्राप्त की। यहाँ उसने कानून की शिक्षा के साथ-साथ धर्मशास्त्रों का भी गहन अध्ययन किया।

उसके मन पर लूथर के विचारों का बड़ा प्रभाव पड़ा था। उसका ईश्वर की सर्वोच्चता में दृढ़ विश्वास था। उसका विचार था कि ईश्वर सर्वव्यापक तथा सर्वशक्तिमान है तथा उसने इस सृष्टि की रचना की है। वह मनुष्य को ईश्वर का ही रूप मानता था। चर्च तथा राज्य के संबंध में उसके विचार मार्टिन लूथर से कुछ भिन्न थे। मार्टिन लूथर राज्यों को सर्वोच्च मानता था। परंतु जौं कैल्विन का मानना था कि चर्च का ईश्वर की सर्वोच्चता के प्रतिनिधि के रूप में महत्त्व होना चाहिए। वह चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार का विरोधी था।

1533 ई० में जौं कैल्विन कैथोलिक धर्म त्याग कर स्विट्ज़रलैंड में स्थित बेसेल नगर में आ गया। यहाँ रहते हुए 1536 ई० में उसने ‘इंस्टीच्यूट ऑफ़ क्रिश्चियन रिलिजन’ (‘The Institute of the Christian Religion’) नामक प्रसिद्ध पुस्तक प्रकाशित की। यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक में उसने ईसाई धर्म की बड़ी सुंदर ढंग से व्याख्या की तथा लोगों को पवित्र जीवन जीने की प्रेरणा दी। जौं कैल्विन पादरियों द्वारा पवित्र जीवन जीने तथा भोग-विलास से दूर रहने पर बल देता था। प्रसिद्ध इतिहासकार ए० जे० ग्रांट के अनुसार, “कुछ ही वर्षों में कैल्विन की प्रसिद्धि महाद्वीप के बहुत से भागों में फैल गई थी।”

4. जॉन वाईक्लिफ 1320-84 ई० (John Wycliffe 1320-84 CE):
चर्च में व्याप्त भ्रष्टाचार तथा अन्य दोषों के विरुद्ध आवाज़ इंग्लैंड में तो जर्मनी से पहले ही उठने लगी थी। इंग्लैंड में सर्वप्रथम चर्च के विरुद्ध आवाज़ जॉन वाईक्लिफ ने उठाई थी। वह पोप को धरती पर ईश्वर का प्रतीक नहीं मानता था क्योंकि उसके अनुसार पोप द्वारा अपनाया गया जीवन का ढंग धर्म के सिद्धांतों के विपरीत था।

वह तीर्थ स्थानों की यात्रा को व्यर्थ मानता था। उसका मानना था कि भ्रष्ट पादरियों के द्वारा दर्शाए गए रास्ते को अपना कर कोई भी व्यक्ति मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। उसका महान् कार्य बाईबल का अंग्रेजी में अनुवाद करना था। इसमें उसने लोगों को ईसाई मत के सच्चे सिद्धांतों को अपनाने के लिए कहा।

1384 ई० में जॉन वाईक्लिफ की मृत्यु हो गई। उसके शिष्य लोलार्ड (Lollards) कहलाए। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० के० गोखले के अनुसार, “जॉन वाईक्लिफ समाज के सभी वर्गों पर प्रभावशाली प्रभाव डालने में सफल हुआ।”

5. इग्नेशियस लोयोला 1493-1566 ई० (Ignatius Loyola 1493-1566 CE):
इग्नेशियस लोयोला स्पेन का निवासी था। उसने 1540 ई० में सोसाइटी ऑफ़ जीसस (Society of Jesus) की स्थापना की। इसका उद्देश्य रोमन कैथोलिक चर्च के प्रभाव को पुनः स्थापित करना एवं प्रोटेस्टेंटों के बढ़ रहे प्रभाव को रोकना था।

इसके सदस्य बहुत ईमानदार, शिक्षित तथा अनुशासित थे। उन्होंने ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए अथक प्रयास किए। परिणामस्वरूप यह सोसाइटी न केवल स्पेन अपितु विश्व भर में लोकप्रिय हुई। इग्नेशियस लोयोला के अनुयायी जेसुइट (Jesuits) कहलाए।

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प्रश्न 9.
धर्म सुधार आंदोलनों के विभिन्न प्रभावों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
धर्म-सुधार आंदोलन के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। निस्संदेह इस आंदोलन ने यूरोपीय समाज को एक नई दिशा देने में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की। डॉक्टर अरुण भट्टाचार्जी का यह कहना ठीक है कि, “धर्म-सुधार आंदोलन फ्रांस की क्रांति की तरह एक महान् सामाजिक-राजनीतिक घटना थी जिसके यूरोप के इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़े।”

1. चर्च में फूट (Schism in the Church):
धर्म-सुधार आंदोलन का यूरोपीय लोगों के जीवन पर एक महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पडा कि चर्च दो भागों में विभाजित हो गया। अब यह कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट नामक शाखाओं में बँट गया। कैथोलिक शाखा वाले पोप की सर्वोच्चता में विश्वास रखते थे जबकि प्रोटेस्टेंट वालों का मानना था कि पोप अथवा पादरी किसी व्यक्ति को मुक्ति प्राप्त करने में कोई सहायता नहीं कर सकते।

व्यक्ति को मुक्ति केवल बाईबल के सिद्धांतों के अनुसार चल कर ही मिल सकती है। चर्च में पड़ी यह दरार धीरे-धीरे इतनी पक्की हो गई कि यूरोप के भिन्न-भिन्न देशों में कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट लोगों की विभिन्न शाखाएँ स्थापित हो गई।

2. धार्मिक अत्याचार (Religious Persecution):
धर्म-सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप यूरोप के लोग दो विरोधी संप्रदायों में विभाजित हो गए। धीरे-धीरे इन दोनों संप्रदायों में विरोधी भावनाएँ बढ़ने लगीं। इन विरोधी भावनाओं ने इतना गंभीर रूप धारण कर लिया कि वे धार्मिक असहनशीलता का प्रदर्शन करने लगे। प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिक दोनों संप्रदाय अपने ही ढंग से अपने-अपने सिद्धांतों का प्रचार करने लगे। दोनों संप्रदाय एक-दूसरे की निंदा करने लगे। शासक भी केवल अपने मत के लोगों से सहनशीलता का प्रदर्शन करते थे तथा विरोधी पर बहुत अत्याचार करते थे।

3. गृह युद्ध तथा विद्रोह (Civil Wars and Rebelions):
धर्म-सुधार आंदोलन के कारण प्रोटेस्टेंट तथा कैथोलिक एक-दूसरे के शत्रु बन गए। उनमें शत्रुता इतनी बढ़ गई कि वे एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए। परिणामस्वरूप विभिन्न देशों में धर्म के नाम पर युद्ध हुए जिनमें हजारों लोगों को अपने प्राण गँवाने पड़े।

4. शिक्षा का प्रसार (Spread of Education):
धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् शिक्षा के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण प्रसार हुआ। ईसाई मत की दोनों शाखाओं के समर्थकों ने अधिक-से-अधिक लोगों को अपने अनुयायी बनाने के लिए शिक्षा पर अधिक बल दिया। प्रोटेस्टेंटों ने शिक्षा के प्रसार के लिए बहुत प्रयत्न किए ताकि अधिक-से-अधिक लोग शिक्षित हो कर बाईबल को पढ़ें तथा उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में अपनाएँ।

5. देशी भाषाओं का विकास (Development of Vernacular Languages):
धर्म-सुधार आंदोलन ने विभिन्न देशी भाषाओं के विकास में भी अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। क्योंकि सभी सुधारक लोगों को ईसाई धर्म का वास्तविक ज्ञान दिलाना चाहते थे इस लिए उन्होंने अपने प्रचार के लिए देशी भाषाओं को ही माध्यम बनाया। विभिन्न देशी भाषाओं में बाईबल का अनुवाद किया गया।

6. कला तथा साहित्य का विकास (Development of Art and Literature):
मध्यकाल में कला तथा साहित्य पर चर्च का बहुत प्रभाव था। उस समय कलाकृतियाँ तथा चित्र केवल धर्म से संबंधित ही बनाए जाते थे। गिरजाघरों, ईसा मसीह तथा संतों के चित्रों का कार्य केवल पोप की देख-रेख में ही किया जाता था। धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् इस क्षेत्र में परिवर्तन आ गया।

अब कला का विषय धार्मिक न हो कर धर्म-निरपेक्ष हो गया। अब साधारण मनुष्य के जीवन से संबंधित कलाकृतियाँ बनाई जाने लगीं। इसी प्रकार साहित्य के क्षेत्र में भी परिवर्तन आ गया। अनेक सुधारकों ने प्राचीन ग्रंथों को पढ़ने तथा देशी भाषाओं में अनुवाद करने की प्रेरणा दी। परिणामस्वरूप अनेक नवीन ग्रंथ रचे गए।

7. व्यापार तथा वाणिज्य का विकास (Development of Trade and Commerce):
पुरातन कैथोलिकों की यह विचारधारा थी कि अधिक धन संचित करना तथा उसे ब्याज के लिए देना धर्म के विरुद्ध कार्य है। परंतु धर्म सुधारक इस विचारधारा को गलत मानते थे। जौं कैल्विन के अनुसार अधिक धन कमाना तथा ब्याज पर उधार देना उचित है।

उसके इस विचार का व्यापारियों, उत्पादकों तथा बैंकरों ने स्वागत किया तथा व्यापार एवं वाणिज्य को विकसित करने के लिए प्रेरित हुए। परिणामस्वरूप विभिन्न यूरोपीय देशों में इसका बहुत विकास हुआ। कई प्रोटेस्टेंट शासकों ने व्यापारियों तथा उद्योगपतियों को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने कैथोलिकों के विचारों की कोई परवाह न की।

8. धार्मिक युद्ध (Religious wars):
धर्म-सुधार आंदोलन के पश्चात् कई देशों ने प्रोटेस्टेंट धर्म को राजकीय धर्म घोषित कर दिया। परंतु दूसरी ओर कई अन्य देशों में प्राचीन कैथोलिक धर्म ही प्रचलित था। इन दोनों धर्मों के देश आपस में शत्रु बन गए। परिणामस्वरूप 16वीं तथा 17वीं शताब्दी में इनमें कई धर्म-युद्ध हुए। इसके विनाशकारी परिणाम निकले।

9. राष्ट्रीय राज्यों की शक्ति में वृद्धि (Strengthening of the Nation States):
राष्ट्रीय राज्यों का उदय धर्म-सुधार आंदोलन से पूर्व ही हो चुका था। धर्म-सुधार आंदोलन के परिणामस्वरूप उनकी शक्ति में और वृद्धि हो गई। नव स्थापित प्रोटेस्टेंट देशों के शासकों ने पोप तथा चर्च की शक्ति को समाप्त करके राष्ट्रीय चर्च स्थापित किए और उन्हें अपने अधीन कर लिया। उन्होंने पोप को भेजी जाने वाली राशि भी बंद कर दी। अब वे इतने शक्तिशाली हो गए कि उनके राज्यों में पोप का हस्तक्षेप बंद हो गया।

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1300 ई०इटली के पादुआ विश्वविद्यालय में मानवतावाद को पढ़ाया जाने लगा।
2.1304 ई०फ्राँसिस्को पेट्रार्क का फ्लोरेंस में जन्म।
3.1341 ई०फ्राँसिस्को पेट्रार्क को रोम में राजकवि की उपाधि से सम्मानित करना।
4.1390 ई०जेफ्री चॉसर द्वारा दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन।
5.1436 ई०फिलिप्पो ब्रूनेशेशी द्वारा फ्लोरेंस में डयूमा तैयार करना।
6.1455 ई०जोहानेस गुटेनबर्ग द्वारा बाईबल का प्रकाशन।
7.1486 ई०जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला द्वारा ‘ऑरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन’ का प्रकाशन।
8.1495 ई०लियोनार्डों द विंसी द्वारा दि लास्ट सपर नामक चित्र तैयार करना।
9.1508 ई०अल्बर्ट ड्यूरर द्वारा प्रार्थना रत हस्त नामक चित्र को तैयार करना।
10.1509 ई०डेसीडेरियस इरस्मस द्वारा दि प्रेज़ ऑफ़ फ़ॉली का प्रकाशन।
11.1513 ई०निकोलो मैक्यिावेली द्वारा दि प्रिंस नामक ग्रंथ का प्रकाशन।
12.1517 ई०जर्मनी के मार्टिन लूथर द्वारा कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान छेड़ना।
13.1543 ई०अंड्रीयस वेसेलियस द्वारा ऑन एनॉटमी नामक ग्रंथ की  रचना।
14.1540 ई०इग्नेशियस लोयोला द्वारा स्पेन में सोसाइटी ऑफ़ जीसस नामक संस्था की स्थापना।
15.1628 ई०विलियम हार्वे द्वारा ह्वदय को रुधिर परिसंचरण से जोड़ना।
16.1662 ई०रॉयल सोसाइटी लंदन की स्थापना।
17.1666 ई०पेरिस अकादमी की स्थापना।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
पुनर्जागरण के उत्थान के लिए कौन-से प्रमुख कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
(1) सामंतवाद का पतन-सामंतवाद का पतन पुनर्जागरण के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कारणों में से एक था। मध्यकालीन समाज की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता सामंती प्रथा थी। परंतु 14वीं शताब्दी के पश्चात् इसका पतन होना आरंभ हो गया था। इसका पतन मध्य वर्ग की शक्ति के कारण हुआ। इसी मध्य वर्ग ने अपने-अपने सम्राटों को सेना के संगठन के लिए आवश्यक धन-राशि प्रदान की थी जिस कारण सम्राट् सामंतों पर निर्भर न रहे।

(2) धर्मयद-धर्मयद्धों ने यरोप को नवीनता प्रदान की। धर्मयद्धों के माध्यम से ही यनान के वैज्ञानिक ग्रंथ. अरबी अंक, बीजगणित, नवीन दिग्दर्शक यंत्र और कागज़ पश्चिमी यूरोप में पहुँचे। अतः स्पष्ट है कि धर्मयुद्धों ने नवीन विचारों तथा धारणाओं का प्रसार किया और पुराने विचारों, विश्वासों तथा संस्थाओं पर प्रहार किया। फलस्वरूप पुनर्जागरण का प्रारंभ हुआ।

(3) व्यापारिक समृद्धि-पुनर्जागरण का एक प्रेरक तत्त्व था-व्यापार का उदय एवं विकास। धर्मयुद्धों के कारण जहाँ नवीन विचारधाराएँ पनपीं, वहाँ यूरोप के पूर्वी देशों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित हुए। अनेक यूरोपीय व्यापारी जेरुसलम तथा एशिया माइनर के तटों पर बस गये। इनके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। व्यापारिक समृद्धि के कारण यूरोपीय व्यापारी विभिन्न देशों में पहुंचे। उन्हें नये विचारों तथा प्रगतिशील तत्त्वों की जानकारी हुई। स्वदेश वापस लौटने पर ये व्यापारी नये विचारों को अपने साथ लाए।

(4) छापेखाने का आविष्कार-1455 ई० में जर्मनी के जोहानेस गुटेनबर्ग ने एक ऐसी टाइप मशीन का आविष्कार किया जो आधुनिक प्रेस की अग्रदूत कही जा सकती है। मुद्रण यंत्र के इस चमत्कारी आविष्कार ने बौद्धिक विकास का द्वार खोल दिया। कैक्सटन ने 1477 ई० में ब्रिटेन में छापाखाना स्थापित किया। धीरे-धीरे इस यंत्र का प्रयोग इटली, जर्मनी, स्पेन, फ्राँस आदि देशों में आरंभ हो गया। कागज़ और मुद्रण यंत्र के आविष्कार से स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन आए।

प्रश्न 2.
पुनर्जागरण का आरंभ इटली में क्यों हुआ?
अथवा
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ?
उत्तर:
(1) इटली महान् रोमन साम्राज्य का केंद्र रहा था। अपनी विशिष्ट भौगोलिक स्थिति के कारण यह व्यापार एवं ज्ञान का एक प्रसिद्ध केंद्र था। 1453 ई० में कुंस्तुनतुनिया के पतन के पश्चात् वहाँ से अनेक यूनानी विद्वान् पलायन कर इटली आ बसे थे। इससे इटली में पुनर्जागरण आंदोलन का आधार तैया

(2) इटली के पूर्वी देशों से बढ़ रहे व्यापार के कारण यहाँ के व्यापारियों को काफ़ी धनी बना दिया था। इन धनी व्यापारियों ने कलाकारों एवं साहित्यकारों की खुले दिल से सहायता की। निस्संदेह इससे इटली में पुनर्जागरण को प्रोत्साहन मिला।

(3) इटली प्राचीन रोमन सभ्यता का केंद्र था। इटली के लोग अपने प्राचीनकाल के गौरव को पुनः स्थापित करना चाहते थे। इससे इटली में पुनर्जागरण की एक नई प्रेरणा मिली।

(4) इटली में एक लंबे समय तक शांति का वातावरण रहा। इससे कला तथा साहित्य के विकास को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

(5) रोम के कुछ पोप भी विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करते थे। उन्होंने कुछ प्रसिद्ध यूनानी पांडुलिपियों का लातीनी भाषा में अनुवाद करवाया। पोप निकोलस पंचम (1447-1455 ई०) ने वैटिकन पुस्तकालय की स्थापना की एवं संत पीटर का गिरजाघर भी बनवाया। निस्संदेह पोप के इन कार्यों ने इटली में पुनर्जागरण आंदोलन के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

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प्रश्न 3.
मानवतावाद से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
मानवतावादी विचारों के क्या अभिलक्षण थे?
उत्तर:
मानवतावाद पुनर्जागरण काल की एक प्रमुख विशेषता थी। इसका उदय सर्वप्रथम 14वीं शताब्दी में इटली में हुआ। इसका कारण यह था कि इटली में शिक्षा के प्रसार के कारण लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न हो गई थी। इटली के लोग आर्थिक दृष्टिकोण से बहुत खुशहाल थे। उनके विदेशों से बढ़ते हुए संपर्क ने मानवतावादी विचारधारा को जन्म दिया।

मानवतावाद का अर्थ है मानव जीवन में रुचि लेना, मानव की समस्याओं का अध्ययन करना, मानव का आदर करना, मानव जीवन के महत्त्व को स्वीकार करना तथा उसके जीवन को सुखी, समृद्ध एवं उन्नत बनाना। मानवतावादी धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित बँधनों को समाप्त करके उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में थे।

इसलिए मानवतावादी धर्मशास्त्र के अध्ययन के स्थान पर मानवतावादी अध्ययन पर अधिक बल देते थे। 15वीं शताब्दी के आरंभ में मानवतावादी शब्द उन अध्यापकों के लिए प्रयुक्त होता था जो व्याकरण, अलंकारशास्त्र, कविता, इतिहास एवं नीतिदर्शन विषय पढ़ाते थे। फ्रांसिस्को पेट्रार्क को मानवतावाद का पिता कहा जाता है।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण से क्या अभिप्राय है?
अथवा
नवजागरण की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
नवजागरण की मुख्य विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:
14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक के समय के दौरान यूरोप की सांस्कृतिक परंपराओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। इससे पूर्व मध्यकाल में यूरोप के लोगों पर चर्च का प्रभाव था। इस काल में लोग इहलोक की अपेक्षा परलोक की अधिक चिंता करते थे। पुनर्जागरण लोगों के लिए एक नए युग का संदेश लेकर आया।

यह आंदोलन सर्वप्रथम इटली में आरंभ हुआ था। इटली के फ्लोरेंस, वेनिस एवं रोम नामक नगरों ने, जो कला एवं विद्या के विश्वविख्यात केंद्र बने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। वास्तव में इटली ने जो चिंगारी जलायी वह शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में एक मशाल का रूप धारण कर गई।

यूरोप के साहित्यकारों एवं कलाकारों ने यूरोपीय साहित्य एवं कला को एक नई दिशा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका उद्देश्य मानवतावाद का प्रसार करना था। मानवतावाद में मनुष्य को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया था। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति हुई उसने मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिए।

प्रश्न 5.
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को पुनर्जागरण का पिता कहा जाता है। उसका जन्म 1304 ई० में इटली के नगर फ्लोरेंस में हुआ था। उसने अपनी शिक्षा बोलोनिया विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। उसने कुछ समय वकालत की नौकरी की। किंतु उसकी साहित्य में अधिक दिलचस्पी थी। अतः उसने अपनी नौकरी छोड़ दी तथा अपना अधिकाँश समय प्राचीन लातीनी ग्रंथों के अध्ययन में लगाया।

वह रोमन लेखकों सिसरो एवं वर्जिल से बहुत प्रभावित हुआ था। उसने संपूर्ण यूरोप में मानवतावादी विचारधारा को प्रोत्साहित किया। उसने लौरा नामक एक स्त्री जिसे वह बेहद प्यार करता था पर अनेक कविताएँ लिखीं। साहित्य के क्षेत्र में उसके उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे 1341 ई० में रोम में ‘राजकवि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया था।

प्रश्न 6.
निकोलो मैक्यिावेली कौन था? वह क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
निकोलो मैक्यिावेली (1469-1527 ई०) इटली का एक महान् विद्वान् एवं देशभक्त था। उसका जन्म 1469 ई० में फ्लोरेंस में हुआ था। उसने यूनानी एवं लातीनी साहित्य का गहन अध्ययन किया था। उसने चर्च में प्रचलित बुराइयों की कटु आलोचना की। वह इटली की दयनीय राजनीतिक स्थिति को दूर कर उसके प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना चाहता था।

उसने 1513 ई० में दि प्रिंस नामक एक ग्रंथ की रचना की। यह शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हुआ। इसका यूरोप की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया गया था। इसमें उसने उस समय इटली में प्रचलित राजनीतिक दशा एवं राजाओं द्वारा प्रशासन में अपनाए जाने वाले नियमों का विस्तृत वर्णन किया है। इस कारण इस ग्रंथ को राजाओं की बाईबल कहा जाता है। यह ग्रंथ आने वाले शासकों के लिए भी एक प्रेरणा स्रोत रहा।

प्रश्न 7.
लियोनार्डो दा विंसी कौन था? वह क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
लियोनार्डो दा विंसी बहुमुखी प्रतिभा का व्यक्ति था। वह न केवल एक महान् चित्रकार अपितु एक कुशल इंजीनियर, वैज्ञानिक, मूर्तिकार एवं संगीतकार भी था। वह विश्व में एक चित्रकार के रूप में अधिक लोकप्रिय हुआ। उसका जन्म इटली के फ्लोरेंस नगर में 1452 ई० में हुआ था। उसे बचपन से ही चित्रकला में विशेष रुचि थी। उसने अपने जीवनकाल में अनेक चित्र बनाए ।

इन चित्रों को देख कर उसकी प्रतिभा का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उसके चित्रों में प्रकाश एवं छाया, रंगों का चयन एवं मानव शरीर के विभिन्न अंगों का प्रदर्शन बहुत सोच समझ कर किया गया है। उसके बनाए चित्रों मोना लीसा एवं दि लास्ट सपर ने विश्व ख्याति प्राप्त की। ये चित्र देखने में बिल्कुल सजीव लगते हैं। मोना लीसा एक साधारण स्त्री का चित्र है।

इस चित्र को बनाने में लियोनार्डो को चार वर्ष लगे। इस चित्र में मोना लीसा की मुस्कान इतनी मधुर है कि इसे देखने वाला व्यक्ति आज भी चकित रह जाता है। दि लास्ट सपर नामक चित्र मिलान स्थित सेंट मेरिया के गिरजाघर की दीवार पर बनाया गया है।

प्रश्न 8.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती कौन था? उसने चित्रकला के क्षेत्र क्या योगदान दिया?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती इटली का एक अन्य प्रतिभाशाली व्यक्ति था। वह एक श्रेष्ठ चित्रकार, प्रवीण मूर्तिकार, कुशल भवन निर्माता एवं उच्च कोटि का कवि था। वास्तव में वह प्रत्येक क्षेत्र में असाधारण प्रदर्शन करने की योग्यता रखता था। उसका नाम रोम के सिस्टीन चैपल की भीतरी छत पर बनाए 145 चित्रों के कारण सदैव के लिए अमर हो गया है।

इन चित्रों को उसने 1508 ई० से 1512 ई० तक बनाया। इन चित्रों से माईकल ऐंजेलो के कौशल एवं प्रतिभा का प्रमाण मिलता है। इन चित्रों को देखकर आज भी कला प्रेमी चकित रह जाते हैं। इसी चर्च की दीवार पर माईकल ऐंजेलो ने लास्ट जजमेंट नामक चित्र को बनाया। इस चित्र को बनाने में उसे 8 वर्ष लगे। निस्संदेह यह संसार का एक उच्च कोटि का चित्र है।

प्रश्न 9.
पुनर्जागरण के समाज पर पड़े प्रमुख प्रभाव बताएँ।
उत्तर:
(1) जिज्ञासा की भावना-पुनर्जागरण का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव यह पड़ा कि लोगों में जिज्ञासा की भावना उत्पन्न हुई तथा उनका दृष्टिकोण वैज्ञानिक हो गया। अब उन्होंने शताब्दियों से प्रचलित अंध-विश्वासों तथा रीति-रिवाजों को त्याग दिया। वे अब प्रत्येक विचार को तर्क की कसौटी पर परखने लगे।

(2) मानवतावाद की भावना-मानवतावाद की भावना का उत्पन्न होना पुनर्जागरण की एक अन्य महत्त्वपूर्ण देन है। इस काल के साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य से संबंधित विषयों को प्रमुख स्थान दिया तथा मनुष्य के कल्याण पर बल दिया। उन्होंने धर्म द्वारा मनुष्य पर लगाए गए अनुचित प्रतिबंधों की घोर आलोचना की। उन्होंने मनुष्य की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का समर्थन किया।

(3) स्त्रियों की स्थिति में सुधार-पुनर्जागरण से पूर्व स्त्रियों की स्थिति बहुत बदतर थी। उन्हें समाज में कोई सम्मानजनक स्थान प्राप्त नहीं था। पुनर्जागरण काल में स्त्रियों की स्थिति में कुछ सुधार आया तथा उन्हें पुरुषों के समान स्थान प्राप्त हुआ। परिणामस्वरूप उनमें जागृति आई। अब वे शिक्षा ग्रहण करने लगीं। साहित्य के अध्ययन से उनका दृष्टिकोण विशाल हो गया।

(4) साहित्य का विकास-पुनर्जागरण के कारण साहित्य के क्षेत्र में आश्चर्यजनक विकास हुआ। इस विकास के परिणामस्वरूप अनेक नई पुस्तकों की रचना हुई। इतालवी, फ्रांसीसी, अंग्रेजी, स्पेनी, जर्मन, डच आदि भाषाओं में अनेकों विद्वानों ने अपनी रचनाएँ लिखीं। इस काल के साहित्यकारों में दाँते, पेट्रार्क, बोकासियो, मैक्यिावेली, मिरांदोला, जेफ्री चॉसर, टॉमस मोर तथा इरेस्मस आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन्होंने अपनी रचनाओं में मानवतावादी विचारों का प्रसार किया तथा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 10.
सत्रहवीं शताब्दी के यूरोपीयों को विश्व किस प्रकार भिन्न लगा ? उसका एक सुचिंतित विवरण दीजिए।
उत्तर:
सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीयों को विश्व निम्नलिखित भागों में भिन्न लगा

  • इस शताब्दी में यूरोप के अनेक देशों में नगरों की संख्या में तीव्रता से बढ़ौतरी हो रही थी।
  • नगरों के लोग यह सोचने लगे थे कि वे गाँवों के लोगों से अधिक सभ्य हैं।
  • फ्लोरेंस, वेनिस और रोम जैसे नगर कला तथा विद्या के केंद्र बन गए थे।
  • मुद्रण के आविष्कार के कारण लोगों में नव चेतना का संचार हुआ।
  • चर्च के बारे में लोगों के विचारों में परिवर्तन आ गया था।

प्रश्न 11.
धर्म-सुधार आंदोलन से आपका क्या अभिप्राय है? उस आंदोलन के प्रमुख उद्देश्य क्या थे?
अथवा
प्रोटेस्टेंट धर्म सुधार का अर्थ बताइए।
उत्तर:
(1) अभिप्राय-धर्म-सुधार आंदोलन से अभिप्राय उस आंदोलन से है जो 16वीं एवं 17वीं शताब्दियों में यूरोप में चर्च में प्रचलित कुरीतियों को दूर करने के लिए चलाया गया था।
(2) उद्देश्य-धर्म-सुधार आंदोलन के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित अनुसार थे-

  • पोप तथा अन्य धर्म अधिकारियों के असीमित अधिकारों पर अंकुश लगाना।
  • उनके नैतिक जीवन में सुधार लाना।
  • चर्चों में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना तथा धर्म अधिकारियों का ध्यान आध्यात्मिकता की ओर लगाना।
  • राष्ट्रीय चर्च की स्थापना पर बल देना।
  • जनसाधारण को मोक्ष-प्राप्ति के लिए पोप पर आश्रित न रख कर परमात्मा पर आश्रित बनाना।
  • प्रत्येक मानव को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करना।

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प्रश्न 12.
धर्म-सुधार आंदोलन के उदय के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
(1) चर्च में व्याप्त बुराइयाँ-धर्म-सुधार आंदोलन का मुख्य कारण चर्च में व्याप्त बुराइयाँ थीं। चर्च के संगठन में भ्रष्टाचार तथा दुराचार का बोलबाला था। उच्च अधिकारी से लेकर पादरी तक सभी का चरित्र पतित हो चुका था। चर्च के अधिकारी अपने कर्तव्यों की ओर कोई ध्यान नहीं देते थे तथा बड़े लालची हो गए थे। वे विलासी जीवन व्यतीत करने लगे थे तथा हर समय रंगरलियों में डूबे रहते थे। कई पादरियों ने शराब पीना, जुआ खेलना तथा शिकार खेलना आरंभ कर दिया था। पादरियों के इन्हीं अनैतिक कार्यों के कारण जन-साधारण चर्च के विरुद्ध हो गया।

(2) राजनीतिक क्षेत्र में पोप का हस्तक्षेप-चर्च की संपत्ति के कारण भी कई बार पोप तथा सम्राटों में झगड़ा हो जाता था। पोप का यह विश्वास था कि चर्च की संपत्ति पर कर लगाने का अधिकार किसी सम्राट् के पास नहीं है। परंतु कई सम्राटों ने पोप की इस धारणा को चुनौती दी। इन सम्राटों ने पोप के आदेशों की कोई परवाह न की तथा चर्च पर कर लगा दिए। इससे पोप की प्रतिष्ठा तथा शक्ति को गहरा आघात पहुँचा। फलस्वरूप पोप की स्थिति दुर्बल हो गई और लोग धर्म सुधार के लिए प्रेरित हुए।

(3) राष्ट्रीय राज्यों का उदय-पुनर्जागरण से पूर्व यूरोप के कई देशों में सामंतवाद का प्रभुत्व था। सभी प्रशासकीय शक्तियों का प्रयोग अधिकतर सामंत ही करते थे। इस सामंती व्यवस्था में अनेकों दोष व्याप्त थे। इन दोषों को दूर करने के उद्देश्य से कई राज्यों में शासकों ने सामंतों को शक्तिहीन करने के सफल प्रयास किए। परिणामस्वरूप इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, हंगरी, पोलैंड, हालैंड, स्काटलैंड तथा डेनमार्क आदि राष्ट्रीय राज्य उदय हुए। ये राष्ट्रीय राज्य चर्च के प्रभाव से मुक्ति पाना चाहते थे।

(4) तात्कालिक कारण-पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्रों की बिक्री धर्म-सुधार आंदोलन का तात्कालिक कारण बनी। उन दिनों पोप को रोम में सेंट पीटर गिरजाघर के निर्माण के लिए धन चाहिए था। उसने धन इकटा करने के लिए पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचना आरंभ कर दिया। इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद कर कोई भी व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो सकता था। 1517 ई० में टेट्जेल नामक एक पादरी पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को बेचने के लिए विटेनबर्ग पहुँचा। जब वह वहाँ यह पाप स्वीकारोक्ति पत्र बेच रहा था तो मार्टिन लूथर ने उसका विरोध किया।

प्रश्न 13.
मार्टिन लूथर कौन था? उसने धर्म-सुधार आंदोलन में क्या योगदान दिया?
अथवा
मार्टिन लूथर की मुख्य शिक्षाओं को लिखें।
उत्तर:
मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म-सुधार आंदोलन में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 10 नवंबर, 1483 ई० को जर्मनी के एक निर्धन किसान के घर हुआ था। प्रारंभ में लूथर पोप विरोधी नहीं था, परंतु 1517 ई० में एक ऐसी घटना घटी जिससे वह पोप विरोधी हो गया। लूथर ने देखा कि विटेनबर्ग में टेट्ज़ेल नामक एक पादरी लोगों को पाप स्वीकारोक्ति-पत्र बेच रहा था।

टेट्ज़ेल यह प्रचार कर रहा था कि कोई भी व्यक्ति जो इन पाप स्वीकारोक्ति पत्रों को खरीद लेगा वह अपने पापों से मुक्त हो जाएगा तथा सीधे स्वर्ग को जाएगा। भोली-भाली जनता के साथ इस प्रकार किए जा रहे मजाक तथा शोषण के विरुद्ध मार्टिन लूथर ने आवाज़ उठाई। उसने विटेनबर्ग के चर्च के द्वार पर अपने 95 थिसेज़ लटका दिए। इन थिसेज़ों में उसने चर्च द्वारा भ्रष्ट उपायों द्वारा धन इकट्ठा करने की कड़ी आलोचना की।

उसने धर्म शास्त्रियों को इन थिसेजों के बारे में बहस करने की चुनौती दी। लेकिन पोप ने लूथर के विरोध को कोई महत्त्व नहीं दिया। मार्टिन लूथर ने 1519 ई० में लिपजिग में एक वाद-विवाद में मनुष्य तथा ईश्वर के बीच पोप की मध्यस्थता को निरर्थक बताया। यह मार्टिन लूथर की चर्च की निरंकुशता को खुली चुनौती थी। इसका लोगों के मनों पर गहरा प्रभाव पड़ा तथा वे चर्च के विरोधी हो गए।

प्रश्न 14.
ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
15वीं एवं 16वीं शताब्दियों में अनेक कारणों से ईसाई धर्म के अंतर्गत वाद-विवाद आरंभ हो गया था। इस काल में उत्तरी यूरोप के विश्वविद्यालयों के अनेक विद्वान् मानवतावादी विचारों की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने ईसाई धर्म ग्रंथों के अध्ययन पर अधिक ध्यान दिया। ईसाई चर्च के अनेक सदस्य मानवतावादी सिद्धांत की ओर आकर्षित हुए।

उन्होंने ईसाइयों को आवश्यक कर्मकांडों को त्यागने के लिए प्रेरित किया एवं इनकी कड़ी आलोचना की। वे मानव को एक मुक्त विवेकपूर्ण कर्ता समझते थे। उनका कथन था मानव को अपनी खुशी इसी संसार में वर्तमान में मिलेगी। इंग्लैंड के टॉमस मोर एवं हालैंड के इरेस्मस ने चर्च को जन साधारण की लूट-खसूट करने वाली एक संस्था बताया।

पाप स्वीकारोक्ति नामक दस्तावेज़ यात्रियों द्वारा लोगों को ठगने का सबसे सरल तरीका था। किसान चर्च द्वारा लगाए गए अनेक प्रकार के करों से परेशान थे। राजा भी चर्च की दखलअंदाजी को पसंद नहीं करते थे। अत: 1517 ई० में जर्मनी के मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध एक ज़ोरदार अभियान चलाया।

प्रश्न 15.
विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अरबियों का क्या योगदान था ?
उत्तर:
विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में अरबियों का उल्लेखनीय योगदान था। 14वीं शताब्दी में अनेक यूरोपीय विद्वानों ने प्लेटो एवं अरस्तु द्वारा लिखे ग्रंथों के अनुवादों को पढ़ना आरंभ किया। इन ग्रंथों का अनुवाद यूरोपीय विद्वानों ने नहीं अपितु अरब विद्वानों ने किया था। अरबी भाषा में प्लेटो को अफलातून एवं एरिसटोटिल को अरस्तु के नामों से जाना जाता था।

यनानी विद्वानों ने अरबियों के प्राकतिक विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, औषधि विज्ञान एवं रसायन विज्ञान से संबंधित ग्रंथों का अनुवाद करके उनके ज्ञान को यूरोपियों तक पहुँचाया। मुस्लिम लेखकों जिनमें अरबी हकीम इब्न सिना तथा आयुविज्ञान विश्वकोष के लेखक अल-राज़ी सम्मिलित थे जो इटली में बहुत प्रसिद्ध थे। स्पेन के अरबी दार्शनिक इब्न रुश्द के दार्शनिक ज्ञान को ईसाई दार्शनिकों ने न केवल अपनाया अपितु इसकी बहुत प्रशंसा की।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
रेनेसाँ से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
रेनेसाँ एक फ्रांसीसी शब्द है जिससे. अभिप्राय है पुनर्जन्म अथवा पुनर्जागरण। यह आंदोलन 14वीं से 17वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के अनेक देशों में चला। इस आंदोलन ने कला तथा साहित्य को एक नया प्रोत्साहन दिया। इसने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न की।

प्रश्न 2.
जैकब बहार्ट (Jacob Burckhardt) कौन था ?
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट स्विट्जरलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय का एक प्रसिद्ध इतिहासकार था। उन्होंने 1860 ई० में ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। इसमें उन्होंने इटली में साहित्य, वास्तुकला एवं चित्रकला के क्षेत्रों में हुए विकास पर प्रकाश डाला है।

प्रश्न 3.
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी कौन था ?
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी वेनिस का एक प्रसिद्ध अधिकारी था। उसने 1534 ई० में ‘दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की। इसमें लेखक ने वेनिस के संयुक्तमंडल (Commonwealth) के संबंध में विस्तृत जानकारी प्रदान की है।

प्रश्न 4.
पुनर्जागरण के उत्थान के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • सामंतवाद का पतन।
  • छापेखाने का आविष्कार।

प्रश्न 5.
धर्मयुद्ध किस प्रकार पुनर्जागरण लाने में सहायक सिद्ध हुए ?
उत्तर:

  • यूरोपवासी पूर्वी देशों के लोगों एवं सभ्यता के संपर्क में आए।
  • इन युद्धों ने भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 6.
जोहानेस गुटेनबर्ग कौन था ?
उत्तर:
जोहानेस गुटेनबर्ग मेन्ज़ (जर्मनी) के निवासी थे। उन्होंने 1455 ई० में छापेखाने का आविष्कार किया। इस छापेखाने में 1455 ई० में बाईबल की 150 प्रतियाँ छपी। बौद्धिक क्रांति लाने में छापेखाने का आविष्कार एक मील पत्थर सिद्ध हुआ।

प्रश्न 7.
छापेखाने के आविष्कार ने किस प्रकार पुनर्जागरण में सहायता दी ? कोई दो बिंदु लिखिए।
उत्तर:

  • इससे साहित्य एवं ज्ञान का प्रसार हुआ।
  • इससे लोगों में एक नई जागृति आई।

प्रश्न 8.
पुनर्जागरण यूरोप के किस देश से आरंभ हुआ था ?
उत्तर:
पुनर्जागरण यूरोप के इटली देश से आरंभ हुआ था।

प्रश्न 9.
इटली में पुनर्जागरण के आरंभ होने के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • इटली के अनेक नगर वाणिज्य एवं व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे।
  • इटली के अनेक विद्वानों ने अंध-विश्वासों का खंडन किया एवं मानवतावाद का प्रचार किया।

प्रश्न 10.
पादुआ और बोलोनिया विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र थे। क्यों ?
उत्तर:
पादआ और बोलोनिया व्यापार एवं वाणिज्य के प्रसिद्ध केंद्र थे। अत: यहाँ वकीलों एवं नोटरी की बहत अधिक आवश्यकता होती थी। वे नियमों को लिखते, उनकी व्याख्या करते एवं समझौते तैयार करते थे। अत: यहाँ के विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र बन गए।

प्रश्न 11.
वेनिस और समकालीन फ्रांस में ‘अच्छी सरकार’ के विचारों की तुलना कीजिए।
उत्तर:
वेनिस इटली का एक प्रसिद्ध गणराज्य था। यह चर्च एवं सामंतों के प्रभाव से मुक्त था। नगर के धनी व्यापारी एवं महाजन नगर के प्रशासन में मुख्य भूमिका निभाते थे। दूसरी ओर फ्रांस में निरंकुश राजतंत्र स्थापित था। यहाँ के आम नागरिक सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित थे।

प्रश्न 12.
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के किन तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया ?
उत्तर:
चौदहवीं और पंद्रहवीं शताब्दियों में यूनानी और रोमन संस्कृति के धार्मिक, साहित्यिक तथा कलात्मक तत्त्वों को पुनर्जीवित किया गया।

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प्रश्न 13.
मानवतावादी विचारों का अनुभव सबसे पहले इतालवी शहरों में क्यों हुआ ?
उत्तर:

  • इटली में सर्वप्रथम ऐसे विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई जहाँ मानवतावादी विषयों को पढ़ाया जाता था।
  • इटली के विद्वानों ने अनेक मानवतावादी ग्रंथों की रचना की।

प्रश्न 14.
मानवतावाद से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
मानवतावाद से अभिप्राय एक ऐसे आंदोलन से है जिसमें परलोक की अपेक्षा मानव के महत्त्व पर अधिक बल दिया जाता है। इसमें मानव जीवन में रुचि, मानव की समस्याओं का अध्ययन, मानव का सम्मान, मानव जीवन को सुखी, समृद्ध एवं उन्नत बनाने पर विशेष बल दिया गया है। 15वीं शताब्दी में मानवतावाद यूरोप में बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 15.
फ्रांसिस्को पेट्रार्क कौन था?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध लेखक था। उसे पुनर्जागरण का पिता के नाम से जाना जाता है। उसने साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने मानवतावादी विचारों का प्रसार किया।

प्रश्न 16.
जोटो कौन था?
उत्तर:
जोटो इटली के नगर फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध कलाकार था। उसने ऐसे चित्र बनाए जो देखने में बिल्कुल सजीव लगते थे। उससे पहले कलाकार जिन चित्रों को बनाते थे वे बेजान-से होते थे।

प्रश्न 17.
दाते अलिगहियरी कौन था ? उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम लिखें।
उत्तर:

  • दाँते अलिगहियरी फ्लोरेंस का एक प्रसिद्ध कवि था।
  • उसकी प्रसिद्ध रचना का नाम डिवाईन कॉमेडी था।

प्रश्न 18.
‘रेनेसों व्यक्ति’ से क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
‘रेनेसा व्यक्ति’ का प्रयोग उस मनुष्य के लिए किया जाता है जिसकी अनेक रुचियाँ हों तथा जो अनेक कलाओं में कुशल हो। पुनर्जागरण काल में ऐसे अनेक महान् लोग हुए जो अनेक रुचियों रखते थे और कई कलाओं में कुशल थे। इनमें लियोनार्डो दा विंसी, फिलिप्पो ब्रूनेलेशी एवं लोरेंजो वल्ला आदि थे।

प्रश्न 19.
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को नए युग का नाम क्यों दिया ?
उत्तर:
मानवतावादियों ने 15वीं शताब्दी के आरंभ को मध्यकाल से अलग करने के लिए नए युग का नाम दिया। उनका यह तर्क था कि मध्य युग में चर्च ने लोगों की सोच को बुरी तरह जकड़ रखा था इसलिए वे वास्तविक ज्ञान से कोसों दूर थे। 15वीं शताब्दी में लोगों को इस ज्ञान की पुनः जानकारी हुई।

प्रश्न 20.
अल्बर्ट ड्यूरर कौन था ?
उत्तर:
अल्बर्ट ड्यूरर इटली का एक प्रसिद्ध चित्रकार था। उसने 1508 ई० में ‘प्रार्थना रत हस्त’ नामक चित्र बनाया। यह चित्र बहुत लोकप्रिय हुआ। यह चित्र 16वीं शताब्दी की इतालवी संस्कृति का आभास कराता है जब यहाँ के लोग बहुत धार्मिक विचारों के थे।

प्रश्न 21.
दोनातल्लो का नाम क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
दोनातल्लो फ्लोरेंस का एक महान् मूर्तिकार था। उसने 1416 ई० में अनेक भव्य मूर्तियाँ बनाई। इनमें यंग ऐंजलस, सेंट मार्क एवं गाटामेलाटा नामक मूर्तियाँ बहुत प्रसिद्ध हुईं। ये मूर्तियाँ देखने में बिल्कुल सजीव लगती हैं।

प्रश्न 22.
अंडीयस वेसेलियस क्यों प्रसिद्ध थे ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस पादुआ विश्वविद्यालय में आयुर्विज्ञान के प्राध्यापक थे। वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने सूक्ष्म परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की। इससे आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञान (Physiology) का प्रारंभ हुआ।

प्रश्न 23.
लियोनार्द्ध दा विंसी कौन था ? उसके दो प्रसिद्ध चित्रों के नाम बताएं।
अथवा
लियोनाङ्के दा विंसी कौन था ?
उत्तर:

  • लियोनार्डो दा विंसी फ्लोरेंस का एक महान् चित्रकार एवं मूर्तिकार था।
  • उसके दो प्रसिद्ध चित्रों के नाम मोना लीसा एवं दि लास्ट सपर थे।

प्रश्न 24.
पुनर्जागरण काल में बने चित्रों की कोई दो विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:

  • इस काल में बने चित्र अधिक रंगीन एवं चटख थे।
  • इन चित्रों में धर्म-निरपेक्षता की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

प्रश्न 25.
यथार्थवाद से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पुनर्जागरण काल में शरीर विज्ञान, रेखागणित, भौतिकी एवं सौंदर्य की उत्कृष्ट भावना ने इतालवी कला को एक नया रूप प्रदान किया। इसे यथार्थवाद के नाम से जाना जाने लगा। यथार्थवाद की यह परंपरा 19वीं शताब्दी तक चलती रही।

प्रश्न 26.
पुनर्जागरण काल की वास्तुकला की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • इस काल में शास्त्रीय शैली (classical style) के अनुसार भवनों का निर्माण किया गया।
  • इस काल के चित्रकारों और शिल्पकारों ने भवनों को चित्रों एवं मूर्तियों से सुसज्जित किया।

प्रश्न 27.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोती क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती पुनर्जागरण काल का सर्वाधिक प्रसिद्ध मूर्तिकार, चित्रकार एवं भवन निर्माता था। उसकी प्रतिभा का प्रमाण हमें रोम के सिस्टीन नामक गिरजाघर के भीतर बनाए गए चित्रों, दि पाइटा नामक प्रतिमा, दि लास्ट जजमेंट नामक चित्र एवं सेंट पीटर गिरजे के गुंबद के डिजाइन को देखने से मिलता है।

प्रश्न 28.
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी कौन था ?
उत्तर:
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी पुनर्जागरण काल का एक प्रसिद्ध मूर्तिकार एवं भवन निर्माता था। उसने फ्लोरेंस के कथीड्रल के गुंबद का डिजाइन बनाया था। इसे ‘दि ड्यूमा’ के नाम से जाना जाता है। यह अपनी उच्च कोटि की कला शैली के लिए प्रसिद्ध है।

प्रश्न 29.
जेफ्री चॉसर कौन था ?
उत्तर:
जेफ्री चॉसर इंग्लैंड का प्रसिद्ध लेखक था। उसने 1390 ई० में दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन किया। यह ग्रंथ अनेक कहानियों का संग्रह है। इससे हमें मध्यकालीन इंग्लैंड के समाज के संबंध में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है। यह ग्रंथ संपूर्ण विश्व में बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 30.
निकोलो मैक्यिावेली क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
वह पुनर्जागरण काल का इटली का सबसे प्रसिद्ध विद्वान् था। उसने 1513 ई० में दि प्रिंस नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने उस समय की राजनीतिक समस्याओं का वर्णन किया है एवं शासन संबंधी नियमों पर प्रकाश डाला है।

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प्रश्न 31.
निकोलस कोपरनिकस कौन था ?
अथवा
कोपरनिकस क्रांति पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
निकोलस कोपरनिकस पोलैंड का प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी था। उसने इस प्रचलित मत को अपनी पुस्तक ‘दि रिवल्यूशनिबस’ में यह असत्य सिद्ध किया कि पृथ्वी सभी ग्रहों का केंद्र है और अन्य ग्रह इसके इर्द-गिर्द चक्कर काटते हैं। उसने यह प्रमाणित किया कि पृथ्वी सहित सभी ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर काटते हैं।

प्रश्न 32.
जोहानेस कैप्लर क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
जोहानेस कैप्लर जर्मनी का एक प्रसिद्ध खगोल विज्ञानी था। उसने ‘कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने सिद्ध किया कि पृथ्वी एवं अन्य ग्रह सूर्य के चारों ओर वृत्ताकार रूप से नहीं अपितु अंडाकार गति से घूमते हैं।

प्रश्न 33.
गैलिलियो गैलिली कौन था ?
उत्तर:
गैलिलियो गैलिली इटली का एक महान् वैज्ञानिक एवं गणितकार था। उसने दि मोशन नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने प्रमाणित किया कि सूर्य ही ब्रह्मांड का केंद्र है और पृथ्वी एवं अन्य ग्रह इसके इर्द गिर्द चक्कर काटते हैं।

प्रश्न 34.
आइज़क न्यूटन कौन था ?
उत्तर:
आइज़क न्यूटन 17वीं शताब्दी इंग्लैंड का एक महान् वैज्ञानिक था। उसने 1687 ई० में ‘प्रिंसिपिया मैथेमेटिका’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का प्रकाशन किया। इसमें उसने गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का वर्णन किया था। इस कारण उसकी विश्व में ख्याति बहुत बढ़ गई।

प्रश्न 35.
अंड्रीयस वेसेलियस कौन था ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस 16वीं शताब्दी इटली का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1543 ई० में ऑन एनॉटमी नामक ग्रंथ की रचना की। इसमें उसने शरीर रचना विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डाला है।

प्रश्न 36.
विलियम हार्वे क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
विलियम हार्वे (1578-1657 ई०) इंग्लैंड का एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक था। उसने 1628 ई० में यह सिद्ध किया कि रक्त हृदय से चलकर धमनियों तथा नाड़ियों से होता हुआ पुनः हृदय में पहुँच जाता है। इसे रुधिर परिसंचरण (blood circulation) का नाम दिया गया।

प्रश्न 37.
मानवतावादी युग में व्यापारी परिवारों में स्त्रियों की स्थिति के कोई दो बिंदु बताएँ।
उत्तर:

  • दुकानदारों की स्त्रियाँ दुकानों को चलाने में उनकी सहायता करती थीं।
  • व्यापारी परिवार की स्त्रियाँ परिवार के कारोबार को संभालती थीं।

प्रश्न 38.
कसांद्रा फेदले कौन थी ?
उत्तर:
वह वेनिस की एक प्रसिद्ध महिला थी। वह मानवतावादी विचारों की पक्षधर थी। उसने सभी महिलाओं को शिक्षा प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उसने पादुआ विश्वविद्यालय में भाषण दिया था।

प्रश्न 39.
ईसाबेला दि इस्ते कौन थी ?
उत्तर:
वह मंटुआ की एक प्रतिभाशाली महिला थी। उसने अपने पति की अनुपस्थिति में अपने राज्य पर शासन किया था। उसका दरबार बौद्धिक प्रतिभा के लिए प्रसिद्ध था। उसने पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं को अपनी पहचान बनाए रखने पर बल दिया।

प्रश्न 40.
पुनर्जागरण के कोई दो प्रमुख प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • इस कारण सामंतवाद को गहरा आघात लगा।
  • इस कारण कला एवं साहित्य को एक नया प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 41.
धर्म-सुधार आंदोलन क्या था ? इस आंदोलन के दो कारण लिखो।
उत्तर:

  • धर्म-सुधार आंदोलन से अभिप्राय मध्यकालीन समाज में आई धार्मिक कुरीतियों को दूर करने के लिए चलाए गए आंदोलन से है।
  • चर्च में भ्रष्टाचार बहत फैल गया था।
  • पोप द्वारा पाप स्वीकारोक्ति पत्र की बिक्री।

प्रश्न 42.
धर्म-सुधार आंदोलन के कोई दो उद्देश्य बताएँ।
उत्तर:

  • चर्च में फैले भ्रष्टाचार को समाप्त करना।
  • लोगों के जीवन में नैतिक सुधार करना।

प्रश्न 43.
पाप स्वीकारोक्ति (Indulgences) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पाप स्वीकारोक्ति एक ऐसा दस्तावेज़ था जो किसी व्यक्ति द्वारा किए गए उसके सभी पापों से मुक्ति दिलवा सकता था। यह वास्तव में पादरियों द्वारा जन-साधारण से धन ऐंठने का एक नया ढंग निकाला गया था। इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति पादरी को धन देकर इसे प्राप्त कर सकता था एवं पापों से छुटकारा पा सकता था।

प्रश्न 44.
मार्टिन लूथर क्यों प्रसिद्ध था?
उत्तर:
मार्टिन लूथर ने जर्मनी में धर्म-सुधार आंदोलन का सफल नेतृत्व किया था। उसने 1517 ई० में कैथोलिक चर्च में फैले भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए एक जोरदार आंदोलन का आरंभ किया था। उसका यह आंदोलन काफी सीमा तक सफल रहा।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
14वीं शताब्दी में यूरोपीय इतिहास की जानकारी देने वाले किसी एक प्रमुख स्त्रोत का नाम लिखें।
उत्तर:
मुद्रित पुस्तकें।

प्रश्न 2.
रेनेसाँ से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पुनर्जन्म।

प्रश्न 3.
‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट।

प्रश्न 4.
जैकब बर्कहार्ट किस जर्मन इतिहासकार का शिष्य था ?
उत्तर:
लियोपोल्ड वॉन रांके।

प्रश्न 5.
पुनर्जागरण का उत्थान किस शताब्दी में हुआ ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में।

प्रश्न 6.
पुनर्जागरण सर्वप्रथम किस देश में आरंभ हुआ ?
उत्तर:
इटली में।

प्रश्न 7.
छापेखाने का आविष्कार किसने किया ?
उत्तर:
जोहानेस गुटेनबर्ग ने।

प्रश्न 8.
छापेखाने का आविष्कार कब हुआ था ?
उत्तर:
1455 ई० में।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 9.
‘दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो कोंतारिनी।

प्रश्न 10.
11वीं शताब्दी में इटली के दो प्रसिद्ध विश्वविद्यालय कौन-से थे ?
उत्तर:
बोलोनिया एवं पादुआ।

प्रश्न 11.
पुनर्जागरण का पिता किसे माना जाता है ?
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क को।

प्रश्न 12.
फ्राँसिस्को पेट्रार्क इटली में किस नगर का निवासी था ?
उत्तर:
फ्लोरेंस।

प्रश्न 13.
डिवाईन कॉमेडी का लेखक कौन था ?
उत्तर:
दाँते अलिगहियरी।

प्रश्न 14.
किसी एक प्रसिद्ध मानवतावादी का नाम लिखें।
उत्तर:
फ्रांसिस्को पेट्रार्क।

प्रश्न 15.
जोवान्ने बोकासियो की महान् रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:
डेकामेरोन।

प्रश्न 16.
किस वर्ष जोवान्ने पिको देल्ला मिरांदोला की रचना औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन प्रकाशित हुई ?
उत्तर:
1486 ई०।

प्रश्न 17.
निकोलो मैक्यिावेली की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:
दि प्रिंस।

प्रश्न 18.
दि कैंटरबरी टेल्स का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जेफ्री चॉसर।

प्रश्न 19.
सर टॉमस मोर की रचना यूटोपिया का प्रकाशन कब हुआ था ?
उत्तर:
1516 ई०।

प्रश्न 20.
दि प्रेज़ ऑफ फॉली का लेखक कौन था ?
उत्तर:
डेसीडेरियस इरेस्मस।

प्रश्न 21.
जोटो किस देश का प्रसिद्ध चित्रकार था ?
उत्तर:
इटली।

प्रश्न 22.
किस प्रसिद्ध चित्रकार ने ‘मोना लीसा’ एवं ‘दि लास्ट सपर’ नामक प्रसिद्ध चित्र बनाए ?
उत्तर:
लियोनार्डो दा विंसी।

प्रश्न 23.
मोना लीसा कौन थी ?
उत्तर:
एक साधारण स्त्री।

प्रश्न 24.
अल्बर्ट ड्यूरर के प्रसिद्ध चित्र का नाम क्या था ?
उत्तर:
प्रार्थना रत हस्त।

प्रश्न 25.
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती किस देश का निवासी था ?
उत्तर:
इटली।

प्रश्न 26.
फिलिप्पो ब्रूनेलेशी ने भवनों के निर्माण के लिए किस शैली को अपनाया ?
उत्तर:
शास्त्रीय शैली।

प्रश्न 27.
‘दि पाइटा’ एवं ‘डेविड’ नामक प्रसिद्ध चित्रों का निर्माण किसने किया ?
उत्तर:
माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती।

प्रश्न 28.
लंदन में रॉयल सोसाइटी की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1662 ई० में।

प्रश्न 29.
फ्रांस में पेरिस अकादमी की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1666 ई० में।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

प्रश्न 30.
पुनर्जागरण काल के किसी एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक का नाम लिखें।
उत्तर:
आइज़क न्यूटन।

प्रश्न 31.
निकोलस कोपरनिकस किस देश का प्रसिद्ध विज्ञानी था ?
उत्तर:
पोलैंड का।

प्रश्न 32.
‘ऑन एनॉटमी’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस।।

प्रश्न 33.
जोहानेस कैप्लर ने किस प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी ?
उत्तर:
कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।

प्रश्न 34.
विलियम हार्वे ने ‘रुधिर परिसंचरण’ का आविष्कार कब किया ?
उत्तर:
1628 ई० में।

प्रश्न 35.
गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत किस विज्ञानी से जुड़ा है ?
उत्तर:
आइज़क न्यूटन।

प्रश्न 36.
पुनर्जागरण काल की किसी एक प्रसिद्ध स्त्री का नाम लिखें।
उत्तर:
कसांद्रा फेदेले।

प्रश्न 37.
ईसाबेला दि इस्ते कहाँ की निवासी थी ?
उत्तर:
मंटुआ की।

प्रश्न 38.
यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
16वीं शताब्दी में।

प्रश्न 39.
यूरोप में धर्म सुधार आंदोलन को आरंभ करने का प्रमुख कारण क्या था ?
उत्तर:
चर्च में व्याप्त बुराइयाँ।

प्रश्न 40.
‘इन प्रेज़ ऑफ़ फॉली’ का लेखक कौन था ?
उत्तर:
डेसीडेरियस इरेस्मस।

प्रश्न 41.
जर्मनी में धर्म सुधार आंदोलन का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
मार्टिन लूथर।

प्रश्न 42.
वर्मज की सभा कब हुई ?
उत्तर:
18 अप्रैल, 1521 ई०।

प्रश्न 43.
मार्टिन लूथर की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
1546 ई० में।

प्रश्न 44.
उलरिक ग्विंगली किस देश से संबंधित था ?
उत्तर:
स्विट्जरलैंड।

प्रश्न 45.
इंस्टीच्यूट ऑफ क्रिश्चियन रिलिजन का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
जाँ कैल्विन।

प्रश्न 46.
जॉन वाइक्लिफ के शिष्य क्या कहलाए ?
उत्तर:
लोलार्ड।

प्रश्न 47.
सोसाइटी ऑफ़ जीसस की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
1540 ई० में।

बह-विकल्पीय प्रश्न

1. 14वीं शताब्दी में फ्लोरेंस, वेनिस तथा रोम …………….. तथा …………… के मुख्य केंद्र बन गए थे।
उत्तर:
कला, विद्या

2. 19वीं शताब्दी में स्विट्जरलैंड के प्रसिद्ध इतिहासकार …………. ने पुनर्जागरण शब्द पर अत्यधिक बल दिया।
उत्तर:
जैकब बर्कहार्ट

3. ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली’ नामक पुस्तक की रचना …………….. ने की थी।
उत्तर:
जैकब बहार्ट

4. बहार्ट द्वारा ‘दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसौं इन इटली’ नामक पुस्तक की रचना ……………….. ई० ___ में की गई।
उत्तर:
1860

5. “दि कॉमनवेल्थ एंड गवर्नमेंट ऑफ़ वेनिस’ नामक ग्रंथ की रचना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
कार्डिनल गेसपारो

6. पेट्रार्क को रोम में ……………….. ई० में राजकवि की उपाधि से सम्मानित किया गया था।
उत्तर:
1341

7. दि कैंटरबरी टेल्स का प्रकाशन ……………….. द्वारा किया गया।
उत्तर:
जेफ्री चॉसर

8. कोलंबस ……………… ई० में अमेरिका पहुँचे।
उत्तर:
1492

9. लियोनार्डो दा विंसी की प्रसिद्ध रचना ……………….. है।
उत्तर:
मोना लीसा

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10. 11वीं शताब्दी में ‘पादुआ’ तथा ……………… विश्वविद्यालय विधिशास्त्र के अध्ययन केंद्र रहे।
उत्तर:
बोलोनिया

11. फ्लोरेंस ……………….. के सबसे जीवंत बौद्धिक नगर के रूप में जाना जाता था।
उत्तर:
इटली

12. फलोरेंस के मानवतावादी जोवान्ने पिको देल्ला मिरांढोला ने …………….. पुस्तक की रचना की।
उत्तर:
औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन

13. बेल्जियम मूल के ………………. ने सूक्ष्म-परीक्षण के लिए मनुष्य के शरीर की चीर-फाड़ की।
उत्तर:
अंड्रीयस वेसेलियस

14. जोहानेस गुटेनबर्ग ………………. के रहने वाले थे।
उत्तर:
जर्मनी

15. निकोलो मैक्यावेली ने ……………… ग्रंथ की रचना की।
उत्तर:
दि प्रिंस

16. मटुंआ राज्य की सर्वाधिक प्रतिभाशाली स्त्री का नाम …………… था।
उत्तर:
ईसाबेला दि इस्ते

17. मार्टिन लूथर द्वारा ……………….. ई० में कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान आरंभ किया गया।
उत्तर:
1517

18. इग्नेशियस लोयोला ने 1540 ई० में …………….. नामक संस्था की स्थापना की।
उत्तर:
सोसायटी ऑफ़ जीसस

19. ………….. ने यह घोषणा की कि पृथ्वी समेत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
उत्तर:
निकोलस कोपरनिकस

20. फ्रांस में पेरिस अकादमी की स्थापना ………….. में की गई थी।
उत्तर:
1666 ई०

रिका स्थान भरिए

1. छापेखाने का आविष्कारक किसे माना जाता है ?
(क) फाँसिस्को पेट्रार्क को
(ख) सर टामस मोर को
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी को
(घ) जोहानेस गुटेनबर्ग को।
उत्तर:
(घ) जोहानेस गुटेनबर्ग को।

2. गुटेनबर्ग किस देश का रहने वाला था?
(क) फ्रॉस
(ख) इंग्लैंड
(ग) चीन
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(घ) जर्मनी।

3. तुर्कों ने कुंस्तुनतुनिया पर कब अधिकार किया था ?
(क) 1433 ई० में
(ख) 1453 ई० में
(ग) 1463 ई० में
(घ) 1473 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1453 ई० में

4. पुनर्जागरण का आरंभ किस देश से हुआ था ?
(क) इंग्लैंड
(ख) फ्राँस
(ग) इटली
(घ) जर्मनी।
उत्तर:
(ग) इटली

5. मानवतावाद का पिता किसे कहा जाता है ?
(क) फ्राँसिस्को पेट्रार्क
(ख) जोवान्ने बोकासियो
(ग) दाँते अलिगहियरी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) फ्राँसिस्को पेट्रार्क

6. डिवाईन कॉमेडी की रचना किसने की है ?
(क) गुटेनबर्ग ने
(ख) दाँते ने
(ग) कोपरनिकस ने
(घ) लूथर ने।
उत्तर:
(ख) दाँते ने

7. औरेशन ऑन दि डिगनिटी ऑफ़ मैन का प्रकाशन किस वर्ष हुआ था ?
(क) 1476 ई० में
(ख) 1480 ई० में
(ग) 1485 ई० में
(घ) 1486 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1486 ई० में।

8. दि प्रिंस का लेखक कौन था ?
(क) निकोलो मैक्यिावेली
(ख) सर टॉमस मोर
(ग) दोनातल्लो
(घ) मार्टिन लूथर।
उत्तर:
(क) निकोलो मैक्यिावेली

9. जेफ्री चॉसर ने किस प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की ?
(क) यूटोपिया
(ख) दि प्रिंस
(ग) दि कैंटरबरी टेल्स
(घ) दि प्रेज ऑफ़ फॉली।
उत्तर:
(ग) दि कैंटरबरी टेल्स

10. यूटोपिया का लेखक कौन था ?
(क) डेसीडेरियस इरेस्मस
(ख) सर टॉमस मोर
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी
(घ) अल्बर्ट ड्यूरर।
उत्तर:
(ख) सर टॉमस मोर

11. दि प्रेज़ ऑफ़ फॉली का प्रकाशन किस वर्ष हुआ था ?
(क) 1309 ई० में
(ख) 1409 ई० में
(ग) 1509 ई० में
(घ) 1609 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1509 ई० में

12. जोटो किस देश का महान् चित्रकार था ?
(क) जर्मनी
(ख) फ्राँस
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) इटली।
उत्तर:
(घ) इटली।

13. ‘मोना लीसा’ नामक चित्र किसने बनाया था ?
(क) लियोनार्डो दा विंसी
(ख) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती
(ग) फिलिप्पो ब्रूनेलेशी
(घ) दोनातल्लो ।
उत्तर:
(क) लियोनार्डो दा विंसी

14. अल्बर्ट ड्यूरर ने प्रार्थना रत हस्त चित्र को कब बनाया था ?
(क) 1507 ई० में
(ख) 1508 ई० में
(ग) 1509 ई० में
(घ) 1512 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1508 ई० में

15. निम्नलिखित में से किस कलाकार ने दि पाइटा नामक मूर्ति का निर्माण किया ?
(क) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती
(ख) दोनातल्लो
(ग) लियोनार्डो दा विंसी
(घ) जोटो।
उत्तर:
(क) माईकल ऐंजेलो बुआनारोत्ती

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 7 बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ

16. रॉयल सोसाइटी की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) लंदन
(ख) पेरिस
(ग) रोम
(घ) नेपल्स।
उत्तर:
(क) लंदन

17. ‘स्फटिक प्रासाद’ कहाँ स्थित है ?
(क) लंदन में
(ख) पेरिस में
(ग) मास्को में
(घ) सिडनी में।
उत्तर:
(क) लंदन में

18. पेरिस अकादमी की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 1662 ई० में
(ख) 1666 ई० में
(ग) 1675 ई० में
(घ) 1680 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1666 ई० में

19. निकोलस कोपरनिकस किस देश का महान् विज्ञानी था ?
(क) इंग्लैंड
(ख) चीन
(ग) पोलैंड
(घ) भारत।
उत्तर:
(ग) पोलैंड

20. ऑन एनॉटमी का लेखक कौन था ?
(क) निकोलस कोपरनिकस
(ख) जोहानेस कैप्लर
(ग) आइज़क न्यूटन
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।
उत्तर:
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।

21. निम्नलिखित में से किसने दूरबीन का आविष्कार किया ?
(क) विलियम हार्वे
(ख) जोहानेस कैप्लर
(ग) गैलिलियो गैलिली
(घ) अंड्रीयस वेसेलियस।
उत्तर:
(ग) गैलिलियो गैलिली

22. जोहानेस कैप्लर द्वारा लिखित पुस्तक का नाम लिखें।
(क) दि रिवल्यूशनिबास
(ख) ऑन एनॉटमी
(ग) दि मोशन
(घ) कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।
उत्तर:
(घ) कॉस्मोग्राफ़िकल मिस्ट्री।

23. विलियम हार्वे ने रुधिर परिसंचरण को कब सिद्ध किया ?
(क) 1618 ई० में
(ख) 1628 ई० में
(ग) 1638 ई० में
(घ) 1648 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1628 ई० में

24. किस विज्ञानी ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत प्रस्तुत किया ?
(क) आइज़क न्यूटन
(ख) विलियम हार्वे
(ग) निकोलस कोपरनिकस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) आइज़क न्यूटन

25. कसांद्रा फेदेले कहाँ की निवासी थी ?
(क) पादुआ
(ख) वेनिस
(ग) मंटुआ
(घ) रोम।
उत्तर:
(ख) वेनिस

26. मार्टिन लूथर किस देश का निवासी था ?
(क) जर्मनी
(ख) फ्राँस
(ग) अमरीका
(घ) इटली।
उत्तर:
(क) जर्मनी

27. मार्टिन लूथर ने कैथोलिक चर्च के विरुद्ध अभियान कब छेड़ा ?
(क) 1507 ई० में
(ख) 1517 ई० में
(ग) 1527 ई० में
(घ) 1537 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1517 ई० में

28. उलरिक धिंगली किस देश से संबंधित था ?
(क) जर्मनी
(ख) इटली
(ग) फ्राँस
(घ) स्विट्जरलैंड।
उत्तर:
(घ) स्विट्जरलैंड।

29. लोलार्ड किसके शिष्य थे ?
(क) जॉन वाईक्लिफ
(ख) जौं कैल्विन
(ग) इग्नेशियस लोयोला
(घ) मार्टिन लूथर।
उत्तर:
(क) जॉन वाईक्लिफ

30. सोसाइटी ऑफ़ जीसस का संस्थापक कौन था ?
(क) जौं कैल्विन
(ख) उलरिक ज्विंगली
(ग) इग्नेशियस लोयोला
(घ) जॉन वाईक्लिफ।
उत्तर:
(ग) इग्नेशियस लोयोला

बदलती हुई सांस्कृतिक परंपराएँ HBSE 11th Class History Notes

→ 14वीं शताब्दी से लेकर 17वीं शताब्दी तक के समय के दौरान यूरोप की सांस्कृतिक परंपराओं में उल्लेखनीय परिवर्तन हुए। इससे पूर्व मध्यकाल में यूरोप के लोगों पर चर्च का प्रभाव था। इस काल में लोग इहलोक की अपेक्षा परलोक की अधिक चिंता करते थे।

→ पुनर्जागरण लोगों के लिए एक नए युग का संदेश लेकर आया। यह आंदोलन सर्वप्रथम इटली में आरंभ हुआ था। इटली के फ्लोरेंस, वेनिस एवं रोम नामक नगरों ने, जो कला एवं विद्या के विश्वविख्यात केंद्र बने लोगों में एक नई जागृति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ वास्तव में इटली ने जो चिंगारी जलायी वह शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में एक मशाल का रूप धारण कर गई। यूरोप के साहित्यकारों एवं कलाकारों ने यूरोपीय साहित्य एवं कला को एक नई दिशा प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनका उद्देश्य मानवतावाद का प्रसार करना था।

→ मानवतावाद में मनुष्य को विशेष महत्त्व प्रदान किया गया था। पुनर्जागरण काल में विज्ञान के क्षेत्र में जो प्रगति हुई उसने मनुष्य के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन कर दिए।

→ इसी काल में यूरोप में धर्म-सुधार आंद का उदय हुआ। इसका उद्देश्य चर्च में फैली बुराइयों को दूर करना था। इस आंदोलन को सफल बनाने में जर्मनी के मार्टिन लूथर, स्विटज़रलैंड के उलरिक ज्विंगली एवं फ्रांस के जौं कैल्विन का उल्लेखनीय योगदान था।

→ वास्तव में पुनर्जागरण एवं धर्म-सुधार आंदोलन ने यूरोपीय समाज की सांस्कृतिक परंपराओं को बदलने में प्रमुख भूमिका निभाई। इस काल के यूरोपीय इतिहास की जानकारी के लिए बहुत अधिक सामग्री दस्तावेजों, पुस्तकों, चित्रों, मूर्तियों, भवनों एवं वस्त्रों से प्राप्त होती है।

→ इन्हें यूरोप तथा अमरीका के अभिलेखागारों, कला चित्रशालाओं एवं संग्रहालयों में सुरक्षित रखा हुआ है। स्विट्जरलैंड के ब्रेसले विश्वविद्यालय के इतिहासकार जैकब बर्कहार्ट (Jacob Burckhardt) ने रेनेसाँ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग 1860 ई० में प्रकाशित अपनी पुस्तक दि सिविलाईजेशन ऑफ़ दि रेनेसाँ इन इटली (The Civilisation of the Renaissance in Italy) में किया है। वह जर्मन इतिहासकार लियोपोल्ड वॉन रांके (Leopold Von Ranke) का विद्यार्थी था।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित तीन वर्ग कौन-से थे? इनकी प्रमुख विशेषताएँ क्या थी?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों में बँटा हुआ था। प्रथम वर्ग में पादरी, दूसरे वर्ग में कुलीन एवं तीसरे वर्ग में किसान सम्मिलित थे। प्रथम दो वर्गों में बहुत कम लोग सम्मिलित थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। समाज की अधिकाँश जनसंख्या तीसरे वर्ग से संबंधित थी। उनकी स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें अपने गुज़ारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। इन तीनों वर्गों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. पादरी वर्ग (The Clergy):
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग में सम्मिलित थे। इस वर्ग में पोप, आर्कबिशप एवं बिशप सम्मिलित थे। यह वर्ग बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था। इसका चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था। चर्च के अधीन विशाल भूमि होती थी, जिससे उसे बहुत आमदनी होती थी। लोगों द्वारा दिया जाने वाला दान भी चर्च की आय का एक प्रमुख स्रोत था।

इनके अतिरिक्त चर्च किसानों पर टीथ (tithe) नामक कर लगाता था। यह किसानों की कुल उपज का दसवाँ भाग होता था। चर्च की इस विशाल आय के चलते पादरी वर्ग बहुत धनी हो गया था। इस वर्ग का यूरोप के शासकों पर भी बहुत प्रभाव था। ये शासक पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखते थे। कुलीन वर्ग भी पादरी वर्ग का बहुत सम्मान करता था।

पादरी वर्ग को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे राज्य को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। वे विशाल एवं भव्य महलों में रहते थे। यद्यपि वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे किन्तु वे स्वयं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। वे चर्च की संपत्ति का दुरुपयोग करने से नहीं हिचकिचाते थे। लोगों को धर्मोपदेश देने का कार्य निम्न वर्ग के पादरी करते थे।

2. कुलीन वर्ग (The Nobility):
कुलीन वर्ग दूसरे वर्ग में सम्मिलित था। यूरोपीय समाज में इस वर्ग की विशेष भूमिका थी। केवल कुलीन वर्ग के लोगों को ही प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। कुलीन इन जागीरों पर एक छोटे राजे के समान शासन करते थे।

वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा मुकद्दमों का निर्णय देते थे। वे अपने अधीन सेना रखते थे। उन्हें सिक्के जारी करने का भी अधिकार प्राप्त था पर कर लगाने का भी अधिकार था। वे कृषकों से बेगार लेते थे। उनके पशु किसानों की खेती उजाड़ देते थे, किंतु इन पशुओं को रोकने का साहस उनमें नहीं था। कुलीन अपने क्षेत्र में आने वाले माल पर चुंगी लिया करते थे।

कलीन वर्ग बहत धनवान था। राज्य की अधिकाँश संपत्ति उनके अधिकार में थी। वे विशाल महलों में रहते थे। वे बहुत विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। उनकी सेवा में बड़ी संख्या में नौकर-नौकरानियाँ होती थीं। संक्षेप में कुलीन वर्ग की यूरोपीय समाज में उल्लेखनीय भूमिका थी। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन के अनुसार, “उच्च श्रेणी (कुलीन वर्ग) को अधिकाँश विशेषाधिकार प्राप्त थे तथा उसके पास अधिकाँश दौलत थी।

3. किसान (The Peasants):
किसान यूरोपीय समाज के तीसरे वर्ग से संबंधित थे। तीसरे वर्ग की गणना यूरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में की जाती थी। यूरोपीय समाज की कुल जनसंख्या का 85% से 90% भाग किसान थे। उस समय समाज में दो प्रकार के किसान थे। ये थे स्वतंत्र किसान एवं कृषकदास। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(क) स्वतंत्र किसान (Free Peasants):
यूरोपीय समाज में स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। यद्यपि वे अपनी भूमि सामंतों से प्राप्त करते थे किंतु वे इस पर अपनी इच्छानुसार खेती करते थे। सामंत इन किसानों से बेगार नहीं लेते थे। उन पर कृषकदासों की तरह प्रतिबंध नहीं लगे हुए थे। वे केवल निश्चित मात्रा में सामंतों को भूमि कर प्रदान करते थे।

(ख) कृषकदास (Serfs):
यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या कृषकदास से संबंधित थी। कृषकदासों का जीवन नरक के समान था। उनके प्रमुख कर्त्तव्य ये थे-

(1) वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत (लॉर्ड) की सेना में कार्य करना।

(2) उसे एवं उसके परिवार के सदस्यों को सप्ताह में तीन अथवा उससे कुछ अधिक दिन सामंत की जागीर पर जा कर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाले उत्पादन को श्रम अधिशेष (labour rent) कहा जाता था।

(3) वह मेनर में स्थित सड़कों, पुलों तथा चर्च आदि की मुरम्मत करता था।

(4) वह खेतों के आस-पास बाड़ बनाता था।

(5) वह जलाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करता था।

(6) वह अपने सामंत के लिए पानी भरता था, अन्न पीसता था तथा दुर्ग की मरम्मत करता था।

कृषकदास जानवरों से भी बदतर जीवन व्यतीत करते थे। 16 से 18 घंटे रोजाना कड़ी मेहनत करने के बावजूद उन्हें दो समय भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। वे गंदी झोंपड़ियों में निवास करते थे। इन झोंपड़ियों में रोशनी का एवं गंदे पानी की निकासी का कोई प्रबंध नहीं था। वर्षा के दिनों में इन झोंपड़ियों में पानी भर जाता था। इससे बीमारियाँ फैलने का सदैव ख़तरा बना रहता था।

जब किसी वर्ष किसी कारण फ़सलें बर्बाद हो जाती थीं तो कृषकदासों की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक दयनीय हो जाती थी। ऐसे अवसरों पर वे बड़ी संख्या में मृत्यु का ग्रास बन जाते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार बी० चौधरी के अनुसार, “किसानों की दशा संतोषजनक से कहीं दूर थी। किसानों पर उनकी पारिवारिक जिम्मेवारी बहुत अधिक थी तथा उनकी मांगों एवं स्रोतों में नियमित तौर पर बहुत अंतर था।”

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोप में किसानों की स्थिति का वर्णन करें। B.S.E.H. (Mar. 2016)
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में किसानों की स्थिति का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं० 1 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 3.
सामंतवादी व्यवस्था में दूसरे वर्ग (अभिजात वर्ग) की स्थिति व महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया करके प्रश्न नं० 1 का भाग 2 का उत्तर देखें।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 4.
सामंतवाद से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:
सामंतवाद ने मध्यकालीन यूरोप के समाज एवं अर्थव्यवस्था पर दूरगामी प्रभाव डाले। यूरोप में इस संस्था का उदय 9वीं शताब्दी में हुआ था। 14वीं शताब्दी तक इसका फ्राँस, जर्मनी, इंग्लैंड एवं इटली आदि देशों पर व्यापक प्रभाव रहा।

I. सामंतवाद से अभिप्राय

सामंतवाद को मध्ययुगीन यूरोपीय सभ्यता का आधार स्तंभ कहा जाता है। यह जर्मन शब्द फ़्यूड (Feud) से बना है। इससे अभिप्राय है भूमि का एक टुकड़ा अथवा जागीर। इस प्रकार सामंतवाद का संबंध भूमि अथवा जागीर से है। सामंतवाद को समझना कोई सरल कार्य नहीं है। इसका कारण यह है कि सामंतवाद के विभिन्न देशों में लक्षणता में भिन्नता थी। प्रसिद्ध इतिहासकार डब्ल्यू० टी० हेन्स के अनुसार, “सामंतवाद वह प्रथा थी जिसमें लॉर्ड अपने अधीन सामंतों को सैनिक सेवा एवं व्यक्तिगत वफ़ादारी के बदले भूमि अनुदान में देता था।”

वास्तव में सामंतवाद एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें राजा अपने अधीन बड़े सामंतों को उनकी सैनिक एवं राजनीतिक सेवाओं के बदले बड़ी-बड़ी जागीरें देता था। ये बड़े सामंत आगे छोटे सामंतों को उनकी सेवाओं के बदले छोटी जागीरें बाँटते थे। इस प्रकार सामंतवादी व्यवस्था पूरी तरह भूमि के स्वामित्व तथा भूमि वितरण पर आधारित थी।

II. सामंतवाद की विशेषताएँ

सामंतवाद की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं-

1. राजा (The King):
सैद्धांतिक रूप में राजा समस्त भूमि का स्वामी होता था। सामंती अधिक्रम (hierarchy) में राजा का स्थान सर्वोच्च था। मध्यकाल में राजा के पास न तो स्थायी सेना होती थी एवं न ही उसके पास आय
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के पर्याप्त साधन होते थे। इसलिए राजा के लिए दूर के क्षेत्रों पर नियंत्रण रखना एवं अपने राज्य की सुरक्षा करना कठिन था। इसलिए उसने अपनी भूमि का एक बहुत बड़ा भाग अपने अधीन बड़े-बड़े सामंतों में बाँट दिया। इन सामंतों को लॉर्ड कहा जाता था। ये लॉर्ड राजा के प्रति वफादार रहने की सौगंध खाते थे। वे राजा को सैनिक एवं राजनीतिक सेवाएँ प्रदान करते थे।

ये लॉर्ड अपनी कुछ भूमि को छोटे सामंतों में बाँट देते थे। इसी प्रकार ये छोटे सामंत अपनी कुछ भूमि को नाइटों में बाँटते थे। इस प्रकार सामंतवादी व्यवस्था में राजा सबसे ऊपर एवं नाइट सबसे नीचे होता था।

2. सामंत (The Feudal Lords):
सामंत (लॉर्ड) अपनी जागीर के अंदर सर्वशक्तिशाली होता था। उसके अधीन एक सेना होती थी। वह इस सेना में बढ़ोत्तरी कर सकता था। वह बाहरी शत्रुओं से अपने अधीन सामंतों की रक्षा करता था। वह अपना न्यायालय भी लगाता था। वह अपनी जागीर में रहने वाले लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देता था। उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था। किसी में भी उसके निर्णयों के विरुद्ध अपील करने का साहस नहीं होता था। वह अपनी मुद्रा भी प्रचलित कर सकता था।

यदि उसके अधीन कोई सामंत अपनी सेवाओं में असफल रहता तो वह उसकी जागीर छीन सकता था। कभी-कभी लॉर्ड इतने शक्तिशाली हो जाते थे कि वे राजा की परवाह नहीं करते थे। सामंत को अनेक कर्तव्यों का पालन करना पड़ता था। उसे समय-समय पर अपने स्वामी के दरबार में उपस्थित होना पड़ता था। दरबार में वह अपने स्वामी को विभिन्न मामलों में सलाह देता था।

वह अपने स्वामी को आवश्यकता पड़ने पर सैनिक सहायता भेजता था। उसे स्वयं युद्ध की स्थिति में 40 दिन सैनिक सेवा करनी पड़ती थी। उसे अपने स्वामी के दुर्ग की रक्षा के लिए भी प्रबंध करना पड़ता था।

3. मेनर (Manor):
लॉर्ड का आवास क्षेत्र मेनर कहलाता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें कुछ गाँवों से लेकर अनेक गाँव सम्मिलित होते थे। प्रत्येक मेनर में एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर सामंत का दुर्ग होता था। यह दुर्ग जितना विशाल होता था उससे उस लॉर्ड की शक्ति का आंकलन किया जाता था। इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक चौड़ी खाई होती थी।

इसे सदैव पानी से भर कर रखा जाता था। प्रत्येक मेनर में एक चर्च, एक कारखाना एवं कृषकदासों की अनेक झोंपड़ियाँ होती थीं। मेनर में एक विशाल कृषि फार्म होता था।

इसमें सभी आवश्यक फ़सलों का उत्पादन किया जाता था। मेनर की चरागाह पर पशु चरते थे। मेनरों में विस्तृत वन होते थे। इन वनों में लॉर्ड शिकार करते थे। गाँव वाले यहाँ से जलाने के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे। मेनर में प्रतिदिन के उपयोग के लिए लगभग सभी वस्तुएँ उपलब्ध होती थीं। इसके बावजूद मेनर कभी आत्मनिर्भर नहीं होते थे।

इसका कारण यह था कि कुलीन वर्ग के लिए विलासिता की वस्तुएँ, आभूषण एवं हथियार आदि तथा नमक एवं धातु के बर्तन बाहर से मंगवाने पड़ते थे। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन के शब्दों में, “मेनर व्यवस्था ने आरंभिक मध्यकाल की आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक गतिविधियों पर प्रभुत्व स्थापित किया।

4. नाइट (The Knights):
नाइट का यूरोपीय समाज में विशेष सम्मान किया जाता था। 9वीं शताब्दी यूरोप में निरंतर युद्ध चलते रहते थे। इसलिए साम्राज्य की सुरक्षा के लिए एक स्थायी सेना की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को नाइट नामक एक नए वर्ग ने पूर्ण किया। नाइट अपने लॉर्ड से उसी प्रकार संबंधित थे जिस प्रकार लॉर्ड राजा के साथ संबंधित था।

लॉर्ड अपनी विस्तृत जागीर का कुछ भाग नाइट को देता था। इसे फ़ीफ़ (Fief) कहा जाता था। इसका आकार सामान्य तौर पर 1000 एकड़ से 2000 एकड़ के मध्य होता था। कुछ फ़ीफें 5000 एकड़ तक बंड़ी होती थीं। इसे उत्तराधिकार में प्राप्त किया जा सकता था। प्रत्येक फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च, पनचक्की (watermill), मदिरा संपीडक (wine press) एवं किसानों के लिए झोंपडियाँ आदि की व्यवस्था होती थी।

नाइट को अपनी फ़ीफ़ में व्यापक अधिकार प्राप्त थे। फ़ीफ़ की सुरक्षा का प्रमुख उत्तरदायित्व नाइट पर था। उसके अधीन एक सेना होती थी। नाइट अपना अधिकाँश समय अपनी सेना के साथ गुजारते थे। वे अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देते थे। वे अपनी सेना में अनुशासन पर विशेष बल देते थे। उनकी सेना की सफलता पर लॉर्ड की सफलता निर्भर करती थी क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर लॉर्ड उनकी सेना का प्रयोग करता था।

प्रसन्न होने पर लॉर्ड उनकी फ़ीफ़ में बढौत्तरी कर देता था। नाइट अपने अधीन फ़ीफ़ में कर एकत्र करता था एवं लोगों के मकद्दमों निर्णय देता था। फ़ीफ़ को जोतने का कार्य कृषकों द्वारा किया जाता था। नाइट फ़ीफ़ के बदले अपने लॉर्ड को युद्ध में उसकी तरफ से लड़ने का वचन देता था। वह उसे एक निश्चित धनराशि भी देता था।

गायक नाइट की वीरता की कहानियाँ लोगों को गीतों के रूप में सुना कर उनका मनोरंजन करते थे। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट वर्ग का भी पतन हो गया।

5. कृषकदास (Seris):
यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या कृषकदास से संबंधित थी। उनका जीवन जानवरों से भी बदतर था। वे अपने लॉर्ड अथवा नाइट की जागीर पर जा कर काम करते थे। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने लॉर्ड की आज्ञा के अनुसार अनेक अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इन कार्यों के लिए उन्हें किसी प्रकार का कोई वेतन नहीं मिलता था।

उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे। वे लॉर्ड की अनुमति के बिना उसकी जागीर छोड़ कर नहीं जा सकते थे। सामंत उन पर घोर अत्याचार करते थे। इसके बावजूद वे सामंतों के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं कर सकते थे। कड़ी मेहनत के बावजूद वे अक्सर भूखे ही रहते थे। उनकी रहने की झोंपड़ियाँ गंदी होती थीं। वे नाममात्र के ही वस्त्र पहनते थे। संक्षेप में उनका जीवन नरक के समान था।

प्रश्न 5.
सामंतवाद के पतन के प्रमुख कारण क्या थे?
अथवा
सामंतवाद के पतन के मुख्य कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सामंत प्रथा के पतन के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे

1. लोगों की दयनीय स्थिति (Pitiable Condition of the People):
सामंतवाद के अधीन लोगों एवं विशेष तौर पर कृषकों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लोग सामंतों के घोर अत्याचारों के कारण बेहद दु:खी थे। वे सामंत के विरुद्ध किसी से कोई शिकायत नहीं कर सकते थे। दूसरी ओर सामंत अपने न्यायालय लगाते थे। इन न्यायालयों में सामंत अपनी इच्छानुसार लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देता था।

इन निर्णयों को अंतिम माना जाता था। सामंत लोगों को अनेक प्रकार के कर देने के लिए बाध्य करते थे। उसके मेनर के लोग सामंत की इच्छा के विरुद्ध कोई कार्य नहीं कर सकते थे। घोर परिश्रम के बाद लोगों को दो समय भरपेट खाना नसीब नहीं होता था। संक्षेप में लोगों में सामंतों के प्रति बढ़ता हुआ आक्रोश उनके पतन का एक प्रमुख कारण सिद्ध हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर हंस राज का यह कहना ठीक है कि, “सामंतवाद का पतन मुख्यतः इसलिए हुआ क्योंकि इसमें लोगों की भलाई की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया था।’

2. धर्मयुद्धों का प्रभाव (Impact of the Crusades):
11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के ईसाइयों एवं मध्य एशिया के मुसलमानों के बीच जेरुसलम (Jerusalem) को लेकर युद्ध लड़े गए। ये युद्ध इतिहास में धर्मयुद्धों (crusades) के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन धर्मयुद्धों में पोप (Pope) की अपील पर बड़ी संख्या में सामंत अपने सैनिकों समेत सम्मिलित हुए। इन धर्मयुद्धों में जो काफी लंबे समय तक चले में बड़ी संख्या में सामंत एवं उनके सैनिक मारे गए। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाया तथा उन्होंने सुगमता से बचे हुए सामंतों का दमन कर दिया। इस प्रकार धर्मयुद्ध सामंतों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए।

3. कृषकों के विद्रोह (Peasants’ Revolts):
14वीं शताब्दी यूरोप में हुए कृषकों के विद्रोहों ने सामंतवादी प्रथा के पतन में प्रमुख भूमिका निभाई। 1347 ई० से 1350 ई० के दौरान यूरोप में भयानक ब्यूबोनिक प्लेग फैली। इसे ‘काली मौत’ (black death) के नाम से जाना जाता है। इसके चलते यूरोप की जनसंख्या का एक बड़ा भाग मृत्यु का ग्रास बन गया।

इसमें अधिकाँश संख्या कृषकों की थी। अतः बचे हुए कृषक अधिक मज़दूरी की मांग करने लगे। किंतु सामंतों ने उनकी इस उचित माँग को स्वीकार न किया। वे कृषकों का पहले की तरह शोषण करते रहे। अत: बाध्य होकर यूरोप में अनेक स्थानों पर कृषकों ने सामंतों के विरुद्ध विद्रोह का झंडा गाड़ दिया।

इन विद्रोहों में 1358 ई० में फ्रांस के किसानों द्वारा किया गया विद्रोह जिसे जैकरी (jacquerie) विद्रोह कहा जाता था एवं 1381 ई० में इंग्लैंड के विद्रोह उल्लेखनीय हैं। यद्यपि इन विद्रोहों का दमन कर दिया गया था किंतु इन विद्रोहों के कारण किसानों में एक नवचेतना का संचार हुआ।

4. राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान (Rise of Nation States):
सामंतवाद के उदय के कारण राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। सामंतों को अनेक अधिकार प्राप्त थे। उनके अधीन एक विशाल सेना भी होती थी। सामंतों के सहयोग के बिना राजा कुछ नहीं कर सकता था। धीरे-धीरे परिस्थितियों में बदलाव आया।

15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई। इन राज्यों के शासक काफी शक्तिशाली थे। उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली एवं आधुनिक सेना का गठन किया था। इस सेना को तोपों एवं बारूद से लैस किया गया। दूसरी ओर सामंतों के अधीन जो सेना थी उसकी लड़ाई के ढंग एवं हथियार परंपरागत थे। अत: नए शासकों को सामंतों की शक्ति कुचलने में किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।

5. मध्य श्रेणी का उत्थान (Rise of the Middle Class):
15वीं एवं 16वीं शताब्दी यूरोप में मध्य श्रेणी का उत्थान सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। मध्य श्रेणी में व्यापारी, उद्योगपति एवं पूंजीपति सम्मिलित थे। इस काल में यूरोप में व्यापार के क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति हो रही थी। इस कारण समाज में मध्य श्रेणी को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ।

इस श्रेणी ने सामंतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का अंत करने के लिए शासकों से सहयोग किया। शासक पहले ही सामंतों के कारण बहुत परेशान थे। अतः उन्होंने मध्य श्रेणी के लोगों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया। मध्य श्रेणी द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग के कारण ही शासक अपनी स्थायी एवं शक्तिशाली सेना का गठन कर सके। इससे सामंतों की शक्ति को एक गहरा आघात लगा।

6. मुद्रा का प्रचलन (Circulation of Money):
सामंतवादी काल में वस्तु-विनिमय (barter system) की प्रथा प्रचलित थी। मध्य युग में मुद्रा का प्रचलन आरंभ हुआ। यह कदम यूरोपीय अर्थव्यवस्था के लिए एक क्रांतिकारी परिवर्तन सिद्ध हुआ। अब प्रत्येक वस्तु मुद्रा के माध्यम से खरीदी जाने लगी। मुद्रा के प्रचलन से लोगों को सामंतों के जुल्मों से छुटकारा मिला।

इसका कारण यह था कि पहले वे अपनी लगभग सभी आवश्यकताओं के लिए सामंतों पर निर्भर थे। मुद्रा के प्रचलन से वे कहीं से भी वस्तु खरीद सकते थे। इसके अतिरिक्त मुद्रा के प्रचलन के कारण राजाओं के लिए अब स्थायी सेना रखना संभव हुआ।

7. नगरों का उत्थान (Rise of Towns):
15वीं शताब्दी में यूरोप में नगरों का उत्थान सामंतवाद के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। इस काल में जो नए नगर बने उनमें वेनिस, जेनेवा, फ्लोरेंस, पेरिस, लंदन, फ्रैंकफर्ट, एम्स्टर्डम एवं मीलान आदि के नाम उल्लेखनीय थे। ये नगर शीघ्र ही व्यापार एवं उद्योग के केंद्र बन गए। इन नगरों में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता प्राप्त थी।

इसलिए बहुत से कृषकदास (serfs) सामंतों के अत्याचारों से बचने के लिए नगरों में आ बसे। इन नगरों में उन्हें व्यवसाय के अच्छे अवसर प्राप्त थे। इसके अतिरिक्त गाँवों के अनेक लोग नगरों में इसलिए आ कर बस गए क्योंकि वहाँ बेहतर सुविधाएँ उपलब्ध थीं। इस प्रकार नगरों के उत्थान से सामंतवाद को गहरा आघात लगा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 6.
सामंतवाद से आप क्या समझते हैं ? इसके पतन के क्या कारण थे?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 4 का भाग I एवं प्रश्न नं. 5 का उत्तर देखें।

प्रश्न 7.
“मध्यकाल यूरोप में चर्च एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी।” क्या आप इस कथन से सहमत हैं? वर्णन कीजिए।
अथवा
यूरोप में चर्च और समाज के संबंधों पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप के समाज पर जिस संस्था ने सर्वाधिक प्रभाव डाला वह चर्च थी। वास्तव में चर्च का जन्म से लेकर कब्र तक लोगों के जीवन पर पूर्ण नियंत्रण था। इसके अपने नियम एवं न्यायालय थे। इन नियमों का उल्लंघन करने का साहस कोई नहीं करता था। यहाँ तक कि राजे भी इन नियमों का पालन करने में अपनी भलाई समझते थे। यदि कोई व्यक्ति इन नियमों का उल्लंघन करता तो चर्च द्वारा उसे दंडित किया जाता था। प्रसिद्ध इतिहासकार जे० ई० स्वैन का यह कथन ठीक है कि, “हमारे लिए यह कल्पना करना कठिन है कि मध्य युग में चर्च का प्रभाव कितना व्यापक था।”

1. चर्च के कार्य (Functions of the Church): मध्यकाल में चर्च अनेक प्रकार के कार्य करता था।

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए थे जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक था।
  • चर्च की देखभाल के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी।
  • चर्च में धर्मोपदेश दिए जाते थे तथा सामूहिक प्रार्थना की जाती थी।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी।
  • इसके द्वारा रोगियों, गरीबों, विधवाओं एवं अनाथों की देखभाल की जाती थी।
  • यहाँ विवाह की रस्में पूर्ण की जाती थीं।
  • यहाँ वसीयतों एवं उत्तराधिकार के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
  • यहाँ धर्मविद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाए जाते थे एवं उन्हें दंडित किया जाता था।
  • यह कृषकों से उनकी उपज का दसवाँ भाग कर के रूप में एकत्रित करता था। इस कर को टीथ (tithe) कहते थे।
  • यह श्रद्धालुओं से दान भी एकत्रित करता था। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० डी० हेज़न ने ठीक लिखा है कि, “इस प्रकार चर्च राज्य के भीतर एक राज्य था जो कि अनेक ऐसे कार्यों को करता था जो कि अधिकाँशतः आधुनिक समाज के सिविल अधिकारियों द्वारा किए जाते हैं।”

2. चर्च का संगठन (Organization of the Church):
चर्च में अनेक प्रकार के अधिकारी कार्य करते थे। इन अधिकारियों का समाज में बहत सम्मान किया जाता था। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे राज्य को किसी प्रकार का कर नहीं देते थे। उन्हें सैनिक सेवा से भी मुक्त रखा जाता था। उनके प्रमुख कार्यों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

(1) पोय (Pope)-पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। वह रोम में निवास करता था। मध्यकाल में उसे शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता था। उसका अपना न्यायालय था जहाँ वह विवाह, तलाक, वसीयत एवं उत्तराधिकार से संबंधित मुकद्दमों के निर्णय देता था। उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था।

वह यूरोपीय शासकों को पदच्युत करने की भी क्षमता रखता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। कोई भी यहाँ तक कि शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। संक्षेप में पोप की शक्तियाँ असीम थीं। प्रसिद्ध लेखकों डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “पोप निरंकुश शासक की तरह सर्वोच्च था तथा जिसके निर्णयों के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकती थी।”

(2) आर्कबिशप (Archbishop):
पोप के बाद दूसरा स्थान आर्कबिशप का था। वह प्रांतीय बिशपों पर अपना नियंत्रण रखता था तथा उनके कार्यों की देखभाल करता था। उसका अपना न्यायालय होता था यहाँ वह बिशपों के निर्णयों के विरुद्ध की गई अपीलों को सुनता था। वह बिशपों की नियुक्ति भी करता था।

(3) बिशप (Bishop):
बिशप चर्च का एक महत्त्वपूर्ण अधिकारी होता था। प्रांत के सभी चर्च उसके अधीन होते थे। उनका अपना एक न्यायालय होता था। यहाँ वे चर्च से संबंधित विभिन्न मुकद्दमों की सुनवाई करते थे। वह पादरियों की नियुक्ति भी करते थे। ।

(4) पादरी (Priest):
मध्यकाल में चर्च में पादरी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती थी। वह रविवार के दिन चर्च में आने वाले लोगों को धर्मोपदेश सनाता था। वह लोगों की दःख-तकलीफों को सनता था। वह लोगों के सखी जीवन के लिए सामूहिक प्रार्थनाएँ करता था। वह जन्म, विवाह एवं मृत्यु से संबंधित सभी प्रकार के संस्कारों को संपन्न करवाता था। वह पोप से प्राप्त सभी आदेशों का पालन करवाता था। पादरियों के लिए कुछ विशेष योग्यताएँ निर्धारित की गई थीं। पादरी विवाह नहीं करवा सकते थे। कृषकदास, अपंग व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं।

3. मठवाद (Monasticism):
मध्यकाल में लोगों पर चर्च का प्रभाव स्थापित करने में मठवाद ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उस समय कुछ ऐसे धार्मिक व्यक्ति थे जो एकांत का जीवन पसंद करते थे। अत: वे आबादी से दूर जिन भवनों में रहते थे उन्हें मठ (monasteries) अथवा ऐबी (abbeys) कहते थे। इनमें रहने वाले भिक्षुओं को मंक (monk) एवं भिक्षुणियों को नन (nun) कहा जाता था। कुछ मठों को छोड़ कर अधिकाँश मठों में भिक्षु एवं भिक्षुणियाँ अलग-अलग रहती थीं।

उन्हें अत्यंत कठोर नियमों का पालन करना पड़ता था। उन्हें पवित्रता का जीवन व्यतीत करना पड़ता था। वे विवाह नहीं करवा सकते थे। उन्हें संपत्ति रखने का कोई अधिकार नहीं था। वे ईश्वर अराधना में अपना जीवन व्यतीत करते थे। वे प्रसिद्ध पाँडुलिपियों की प्रतिलिपियाँ तैयार करते थे। वे लोगों को शिक्षा देने का कार्य करते थे। वे लोगों को उपदेश देते थे तथा उन्हें पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते थे।

वे रोगियों की सेवा करते थे। वे मठ में आने वाले यात्रियों की देखभाल करते थे। वे मठ को दान दी गई भूमि पर कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे।

जे० एच० बेंटली एवं एच० एफ० जाईगलर के शब्दों में,
“क्योंकि मठवासियों द्वारा समाज में विभिन्न भूमिकाएं निभाई जाती थीं इसलिए वे ईसाई धर्म के प्रचार में शक्तिशाली कार्यकर्ता सिद्ध हुए।

(क) सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict):
मध्यकाल यूरोप में जिन मठों की स्थापना हुई उनमें 529 ई० इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट (St. Benedict) सर्वाधिक प्रसिद्ध था। इसकी स्थापना इटली के महान् सेंट बेनेडिक्ट (480-547 ई०) ने की थी। उसने बेनेडिक्टीन (Benedictine) मठों में रहने वाले भिक्षुओं के लिए एक हस्तलिखित पुस्तक लिखी। इसके 73 अध्याय थे। इसमें भिक्षुओं के मार्गदर्शन के लिए नियमों का वर्णन किया गया था। प्रमुख नियम ये थे-

  • प्रत्येक मठवासी विवाह नहीं करवा सकता था।
  • वे अपने पास संपत्ति नहीं रख सकते थे।
  • उन्हें मठ के प्रधान ऐबट (abbot) की आज्ञा का पालन करना पड़ता था।
  • उन्हें बोलने की आज्ञा कभी-कभी ही दी जानी चाहिए।
  • प्रत्येक भिक्षु-भिक्षुणी को कुछ समय रोज़ाना शारीरिक श्रम करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को अपना अधिकाँश समय अध्ययन में व्यतीत करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को एक निश्चित समय में खाना खाना चाहिए एवं सोना चाहिए।
  • प्रत्येक मठवासी को जनसाधारण को शिक्षा देनी चाहिए एवं रोगियों की सेवा करनी चाहिए।
  • प्रत्येक मठ इस प्रकार बनाना चाहिए कि आवश्यकता की समस्त वस्तुएँ-जल, चक्की, उद्यान, कार्यशाला सभी उसकी सीमा के अंदर हों। इन नियमों का पालन सदियों तक किया जाता रहा।

(ख) क्लूनी (Cluny):
मध्यकाल यूरोप में स्थापित होने वाला दूसरा प्रसिद्ध मठ क्लूनी थां। इसकी स्थापना 910 ई० में विलियम प्रथम ने फ्राँस में बरगंडी (Burgundi) नामक स्थान में की थी। इस मठ की स्थापना का कारण यह था कि मठों में भ्रष्टाचार एवं चरित्रहीनता का बोलबाला हो गया था। अतः इनमें सुधारों की आवश्यकता महसूस की जाने लगी थी।

अतः क्लूनी मठ द्वारा सेंट बेनेडिक्ट के नियमों का कड़ाई से पालन पर बल दिया गया। इसने कछ नए नियम भी बनाए। शीघ्र ही क्लनी मठ बहत लोकप्रिय हो गया। इस मठ को लोकप्रिय बनाने में आबेस हिल्डेगार्ड (Abbess Hildegard) ने उल्लेखनीय योगदान दिया। वह बहुत प्रतिभाशाली थी। उसके प्रचार कार्य एवं लेखन ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव डाला।

उसने जर्मनी, फ्राँस तथा स्विट्जरलैंड में अथक प्रचार किया। उसने स्त्रियों की दशा सुधारने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार आर० टी० मैथ्यू के अनुसार, “हिल्डेगार्ड बहुत प्रतिभाशाली थी एवं उसने एक उत्तम देन दी। उसने विशेषतः उस समय के प्रचलित विश्वास का खंडन किया कि स्त्रियों को पढ़ाना एवं लिखाना ख़तरनाक है।”

(ग) फ्रायर (Friars):
13वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में भिक्षुओं (monks) नए समूह का उत्थान हुआ। ये भिक्षु फ्रायर कहलाते थे। वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण करते थे। वे ईसा मसीह (Jesus Christ) के संदेश को लोगों तक पहुँचाते थे। वे जनसाधारण की भाषा में प्रचार करते थे। उन्होंने चर्च के गौरव को स्थापित करने एवं लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। फ्रायर लोगों द्वारा दिए गए दान से अपनी जीविका चलाते थे। वे दो संघों (orders) में विभाजित थे।

इनके नाम थे फ्राँसिस्कन (Franciscan) एवं डोमिनिकन (Dominican)। फ्राँसिस्कन संघ की स्थापना असीसी (Assisi) के संत फ्रांसिस (St. Francis) ने की थी। उनकी गणना मध्य युग के श्रेष्ठ व्यक्तियों में की जाती थी। उन्होंने गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करने का संदेश दिया। उन्होंने शिष्टता के नियमों का पालन करने, शिक्षा के प्रसार एवं श्रम के महत्त्व पर विशेष बल दिया।

उन्होंने जर्मनी, फ्राँस, हंगरी, स्पेन एवं सुदूरपूर्व (Near East) की यात्रा कर लोगों को उपदेश दिया। उनके जादुई व्यक्तित्व से प्रभावित होकर बड़ी संख्या में लोग उनके शिष्य बने। डोमिनिकन संघ के संस्थापक स्पेन (Spain) के संत डोमिनीक (St. Dominic) थे। उन्होंने जनभाषा में अपना किया।

उन्होंने पाखंडी लोगों की कटु आलोचना की। उन्होंने पुजारी वर्ग में फैली अज्ञानता को दूर करने का बीड़ा उठाया। उनके शिष्य बहुत विद्वान थे। वे विश्वविद्यालयों में दर्शनशास्त्र एवं धर्मशास्त्र पढ़ाने का कार्य करते थे। इस संघ का प्रभाव फ्रांसिस्कन संघ जितना व्यापक नहीं था। 14वीं शताब्दी में मठवाद का महत्त्व कुछ कम हो गया था। इसके दो प्रमुख कारण थे।

प्रथम, मठ में भ्रष्टाचार फैल गया था। दूसरा, भिक्षु, भिक्षुणी एवं फ्रायर ने अब विलासिता का जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था। इंग्लैंड के दो प्रमुख कवियों लैंग्लैंड (Langland) ने अपनी कविता पियर्स प्लाउमैन (Piers Plowman) तथा जेफ्री चॉसर

4. चर्च के प्रभाव (Effects of Church):
मध्य युग में चर्च का यूरोपीय समाज पर जितना व्यापक प्रभाव था उतना प्रभाव किसी अन्य संस्था का नहीं था। इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया। इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया। इसने रोगियों की देखभाल के लिए अनेक अस्पताल बनवाए। इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

चर्च एवं मठों के द्वारा लोगों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती थी। अनेक चर्च अधिकारी विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य भी करते थे। इससे लोगों में एक नव जागृति का संचार हुआ। आबेस हिल्डेगार्ड ने स्त्रियों की दशा का उत्थान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

चर्च ने लोगों को युद्ध की अपेक्षा शांति का पाठ पढ़ाया। संक्षेप में चर्च के यूरोपीय समाज पर दूरगामी एवं व्यापक प्रभाव पड़े। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर बी० वी० राव के अनुसार,”किसी भी अन्य संस्था ने मध्यकालीन यूरोप के लोगों को इतना प्रभावित नहीं किया जितना कि ईसाई चर्च ने।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 8.
मध्यकाल में मठवाद के विकास के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
नोट-इस प्रश्न के उत्तर के लिए विद्यार्थी कृपया प्रश्न नं0 7 के भाग 3 का उत्तर देखें।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के कारणों, विशेषताओं एवं महत्त्व का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप के अधिकाँश नगर लोप हो चुके थे। इसका कारण यह था कि रोमन साम्राज्य पर आक्रमण करने वाले बर्बर आक्रमणकारियों ने रोमन साम्राज्य के अनेक नगरों का विनाश कर दिया था। 11वीं शताब्दी से परिस्थितियों में परिवर्तन आना आरंभ हुआ। इससे मध्यकालीन यूरोप में अनेक नगरों का उत्थान हुआ। यद्यपि ये नगर आधुनिक नगरों की तुलना में भव्य एवं विशाल नहीं थे किंतु उन्होंने उस समय के समाज को काफी सीमा तक प्रभावित किया। बी० के० गोखले के अनुसार, “मध्यकालीन नगरों ने यूरोपीय संस्कृति एवं सभ्यता को महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।”

I. नगरों के उत्थान के कारण

मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. कृषि का विकास (Development of Agriculture):
रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप में अराजकता का बोलबाला था। इससे कृषि एवं व्यापार को गहरा आघात लगा। अर्थव्यवस्था के तबाह हो जाने से बड़ी संख्या में नगर उजड़ गए थे। धीरे-धीरे परिस्थिति में परिवर्तन आया। इससे कृषि के विकास को बल मिला। फ़सलों के अधिक उत्पादन के कारण कृषक धनी हुए।

इन धनी किसानों को अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न को बेचने तथा अपने लिए एवं कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए एक बिक्री केंद्र की आवश्यकता हुई। शीघ्र ही बिक्री केंद्रों में दुकानों, घरों, सड़कों एवं चर्चों का निर्माण हुआ। इससे नगरों के विकास की आधारशिला तैयार हुई।

2. व्यापार का विकास (Development of Trade):
11वीं शताब्दी में यूरोप एवं पश्चिम एशिया के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्गों का विकास आरंभ हुआ। इससे व्यापार को एक नई दिशा मिली। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, पुर्तगाल एवं बेल्जियम के व्यापारियों ने मुस्लिम एवं अफ्रीका के व्यापारियों के साथ संबंध स्थापित किए। व्यापार में आई इस तीव्रता ने नगरों के विकास को एक नया प्रोत्साहन दिया।

3. धर्मयुद्ध (Crusades):
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए थे। इन धर्मयुद्धों का वास्तविक उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम (Jerusalem) को मुसलमानों के अधिकार से स्वतंत्र करवाना था। इन धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे भव्य, मुस्लिम नगरों को देखकर चकित रह गए।

इन धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। इसका कारण यह था कि यूरोपीय देशों में रेशम, मलमल, गरम मसालों एवं विलासिता की वस्तुओं की माँग बहुत बढ़ गई थी। इससे व्यापारी धनी हुए जिससे नगरों के विकास को बल मिला।।

4. नगरों की स्वतंत्रता (Freedom of Towns):
मध्यकाल में यह कहावत प्रचलित थी-नगर की हवा बनाती है। (town air makes free.) अनेक कृषकदास (serfs) जो स्वतंत्र होने की इच्छा रखते थे तथा जो अपने सामंत द्वारा किए जाने वाले अत्याचारों से दुःखी थे नगरों में जाकर छिप जाते थे। यदि कोई कृषकदास अपने सामंत की नजरों से एक वर्ष तथा एक दिन तक छिपे रहने में सफल हो जाता तो उसे स्वतंत्र कर दिया जाता था।

वह नगर में रहने वाले विभिन्न विचारों वाले लोगों से मिलता था। यहाँ उसे अपनी स्थिति में सुधार करने के अनेक अवसर प्राप्त थे। वह किसी भी व्यवसाय को अपना सकता था। यहाँ वह कोई भी विलास सामग्री खरीद सकता था। कृषकदास रहते हुए वह इस संबंध में स्वप्न में भी नहीं सोच सकता था। संक्षेप में नगरों के स्वतंत्र जीवन ने नगरों के विकास में बहुमूल्य योगदान दिया।

एक अन्य प्रसिद्ध इतिहासकार मार्क किशलेस्की का यह कहना ठीक है कि, “अनेक कृषक जो अपने सामान्य जीवन से निराश थे के लिए नगर एक पनाहगाह थे।”

II. नगरों की विशेषताएँ

मध्यकाल यूरोप में अनेक नए नगरों का उत्थान हुआ। इन नगरों में प्रमुख थे वेनिस (Venice), फ्लोरेंस (Florence), मिलान (Milan), जेनेवा (Genoa), नेपल्स (Naples), लंदन (London), क्लोन (Cologne), प्रेग (Prague), वियाना (Vienna), बार्सिलोना (Barcelona), रोम (Rome), आग्स्बर्ग (Augusburg) आदि। इन नगरों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. आधारभूत सुविधाओं की कमी (Lack of Basic Amenities):
मध्यकालीन यूरोप में यद्यपि अनेक नगरों का उत्थान हुआ था किंतु ये प्राचीन काल अथवा आधुनिक काल में बने नगरों की तरह भव्य एवं विशाल नहीं थे। यहाँ तक कि इन नगरों में आधारभूत सुविधाओं की बहुत कमी थी।

ये नगर बिना किसी योजना के बनाए जाते थे। जहाँ कहीं जगह मिलती वहीं मकान बना दिए जाते थे। ये मकान लकड़ी के बने हुए होते थे तथा एक दूसरे से सटे हुए होते थे। अत: आग लग जाने की सूरत में संपूर्ण नगर के नष्ट होने का ख़तरा रहता था। नगरों की गलियाँ बहुत तंग होती थीं। सड़कें कम चौड़ी एवं कच्ची होती थीं।

लोगों को पीने के लिए स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं था। घरों से जल निकासी (drainage) का कोई प्रबंध नहीं था। लोग घरों का कूड़ा-कर्कट बाहर गलियों फेंक देते थे। इस कारण अक्सर महामारियाँ फैल जाती थीं एवं बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का ग्रास हो जाते थे। इन कारणों के चलते नगरों में रहने वाले लोगों की संख्या बहुत कम थी।

2. सुरक्षा व्यवस्था (Defence Arrangements) :
मध्यकाल यूरोप को यदि युद्धों एवं आक्रमणों का काल कह दिया जाए तो इसमें कोई अतिकथनी नहीं होगी। इस अराजकता का चोरों एवं लुटेरों ने खूब फायदा उठाया। नगरों की सुरक्षा व्यवस्था की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। इस उद्देश्य से नगरों के चारों ओर एक विशाल दीवार बनाई जाती थी। इस विशाल दीवार के अतिरिक्त नगर की सुरक्षा के लिए नगर के चारों ओर एक विशाल खाई बनाई जाती थी। इस खाई को सदैव पानी से भरा रखा जाता था। इसका उद्देश्य यह था कि कोई भी आक्रमणकारी सुगमता से नगर पर आक्रमण न कर सके।

3. श्रेणियों की भूमिका (Role of Guilds):
मध्यकालीन नगरों में रहने वाले अधिकाँश लोग व्यापारी थे। प्रत्येक शिल्प अथवा उद्योग ने व्यापार को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से अपनी-अपनी श्रेणियाँ संगठित कर ली थीं। ये श्रेणियाँ उत्पाद की गुणवत्ता, उसके मूल्य एवं बिक्री पर नियंत्रण रखती थीं। प्रत्येक श्रेणी का अपना एक प्रधान नियुक्त किया जाता था।

श्रेणी के नियमों का उल्लंघन करने वालों, घटिया माल का उत्पादन करने वालों एवं ग्राहकों से निर्धारित मूल्यों से अधिक वसूल करने वालों के विरुद्ध श्रेणी सख्त कदम उठाती थी। श्रेणी अपने अधीन कार्य करने वाले कारीगरों एवं शिल्पकारों के कल्याण के लिए बहुत कार्य करती थी। यह बीमारी, दुर्घटना एवं वृद्धावस्था के समय अपने सदस्यों को आर्थिक सहायता देती थी। यह विधवाओं एवं अनाथ बच्चों की भी देखभाल करती थी। यह अपने सदस्यों के लिए मनोरंजन की भी व्यवस्था करती थी।

4. कथील नगर (Cathedral Towns):
12वीं शताब्दी में फ्रांस में कथीड्रल कहे जाने वाले विशाल चर्चों का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। शीघ्र ही यूरोप के अन्य देशों में भी कथीलों का निर्माण शुरू हुआ। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। सामान्यजन अपने श्रम द्वारा एवं अन्य वस्तुओं द्वारा इनके निर्माण में सहयोग देते थे। कथील बहुत विशाल एवं भव्य होते थे।

इन्हें पत्थर से बनाया जाता था। इनके निर्माण में काफी समय लगता था। अतः कथीड्रल के आस-पास अनेक प्रकार के लोग बस गए। उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बाज़ार भी स्थापित हो गए। इस प्रकार कथीलों ने नगरों का रूप धारण कर लिया। कथीलों का निर्माण इस प्रकार किया गया था कि पादरी की आवाज, भिक्षुओं के गीत, लोगों की प्रार्थना की घंटियाँ दूर-दूर तक सुनाई पड़ें। कथील की खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच (stained glass) का प्रयोग किया जाता था।

III. नगरों का महत्त्व

मध्यकाल में नगरों ने यूरोपीय सभ्यता एवं संस्कृति पर गहन प्रभाव डाला। नगरों की उल्लेखनीय भूमिका के संबंध में हम निम्नलिखित तथ्यों से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं

1. राजनीतिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Political Field):
13वीं शताब्दी तक यूरोप के अनेक नगर बहुत समृद्ध हो गए थे। उन्होंने देश की राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। समृद्ध नगर निवासी

1. उन्होंने राजा को स्थायी सेना के गठन में भी सहयोग दिया। इस कारण राजाओं की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुआ। वे पहले की अपेक्षा शक्तिशाली हो गए। इससे सामंतों की शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने अमीरों द्वारा दिए जाने वाले समर्थन के बदले उन्हें संसद में बैठने की अनमति दी। इन अमीरों ने शासन संबंधी सरकारी नीति को काफी सीमा तक प्रभावित किया। राजा ने कुछ अमीरों को नगर पर शासन करने के अधिकार पत्र भी दिए।

2. आर्थिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Economic Field):
मध्यकालीन नगरों ने आर्थिक क्षेत्र में निस्संदेह उल्लेखनीय योगदान दिया। नगरों द्वारा अनेक ऐसी वस्तुओं का उत्पादन किया जाता था जो समाज के लिए आवश्यक थीं। व्यापारी अपने फालतू माल का विदेशों में निर्यात करते थे तथा वे आवश्यक माल का आयात भी करते थे। इससे नगरों की समृद्धि में वृद्धि हुई।

नगरों में लोगों की सुविधा के लिए अक्सर मेलों का आयोजन किया जाता था। इन मेलों में देशी एवं विदेशी प्रत्येक प्रकार का माल मिलता था। नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए श्रेणियों (guilds) का गठन किया गया था। ये श्रेणियाँ व्यापार के अतिरिक्त नगर शासन को भी प्रभावित करती थीं।

3. सामाजिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Social Field):
मध्यकालीन नगरों ने यूरोप के सामाजिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। ये नगर सामंतों के प्रभाव से मुक्त थे। अतः यहाँ रहने वाले लोग अपनी इच्छानुसार किसी भी व्यवसाय को अपना सकते थे अथवा अपनी मेहनत से किसी भी पद पर पहुँच सकते थे। वे विवाह करवाने के लिए स्वतंत्र थे।

वे जब चाहे कोई भी संपत्ति खरीद सकते थे अथवा उसे बेच सकते थे। नगरों में धन के एकत्र होने से लोगों के सामाजिक जीवन में भी परिवर्तन हुआ। धनी लोगों ने अपने लिए विशाल घर बना लिए थे। वे विलासिता का जीवन व्यतीत करने लगे थे। नगरों के उत्थान से यूरोप के समाज में दो नए वर्ग– श्रमिक वर्ग एवं मध्य वर्ग अस्तित्व में आए। मध्य वर्ग ने यूरोप के समाज को एक नई दिशा देने में प्रशंसनीय योगदान दिया।

4. सांस्कृतिक क्षेत्र में देन (Contribution in the Cultural Field):
नगरों के उत्थान के परिणामस्वरूप यूरोप ने सांस्कृतिक क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति की। नगरों के धनी लोगों ने नगरों के सौंदर्य को बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक उद्यान लगवाए। उन्होंने सड़क मार्गों एवं यातायात के साधनों का विकास किया। उन्होंने भवन निर्माण कला, चित्रकला एवं साहित्य को प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप इन सभी क्षेत्रों में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई। वास्तव में इसने यूरोप में पुनर्जागरण की आधारशिला रखी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 10.
मध्यकालीन यूरोप में सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले कारकों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
मध्यकालीन यूरोप में कृषि प्रौद्योगिकी में आए मूलभूत परिवर्तनों को लिखिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोप में अनेक ऐसे परिवर्तन आए जिन्होंने सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों पर गहन प्रभाव डाला। इन परिवर्तनों का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. पर्यावरण (Environment):
5वीं शताब्दी से लेकर 10वीं शताब्दी तक यूरोप का अधिकाँश भाग विशाल जंगलों से घिरा हुआ था। इन जंगलों के कारण कृषि योग्य भूमि बहुत कम रह गई थी। अनेक कृषकदास अपने सामंतों के अत्याचारों से बचने के लिए जंगलों में जाकर शरण ले लेते थे। इस काल के दौरान संपूर्ण यूरोप जबरदस्त शीत लहर की चपेट में था।

इस शीत लहर के चलते फ़सलों की उपज का काल बहुत कम अवधि का रह गया था। इससे फ़सलों के उत्पादन में बहुत कमी आ गई। 11वीं शताब्दी में यूरोप के वातावरण में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव आया। अब तापमान में वृद्धि होने लगी।

इससे फ़सलों के लिए आवश्यक तापमान उपलब्ध हो गया। इससे फ़सलों के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई। तापमान में वृद्धि के कारण यूरोप के अनेक भागों के वन क्षेत्रों में काफी कमी आई। परिणामस्वरूप कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।

2. भूमि का उपयोग (Land Use):
प्रारंभिक मध्यकाल यूरोप में प्रचलित कृषि तकनीक बहुत पुरानी किस्म की थी। इसके बावजूद लॉर्ड अपनी आय को बढ़ाने का प्रयास करते रहते थे। यद्यपि कृषि के उत्पादन को बढ़ाना संभव नहीं था इसलिए कृषकों को मेनरों की जागीर (manorial estate) की समस्त भूमि को कृषि योग्य बनाने के लिए बाध्य किया जाता था।

इसके लिए उन्हें निर्धारित समय से भी अधिक समय तक काम करना पड़ता था। कृषक क्योंकि अपने लॉर्ड के अत्याचारों का खुल कर सामना नहीं कर सकते थे इसलिए उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध का सहारा लिया। वे अपने खेतों पर अधिक समय काम करने लगे और उपज का अधिकाँश भाग अपने पास रखने लगे। चरागाहों एवं वन भूमि के लिए भी कृषकों और लॉर्डों के मध्य विवाद आरंभ हो गए। इसका कारण यह था कि लॉर्ड इस भूमि को अपनी व्यक्तिगत संपत्ति समझते थे जबकि कृषक इसे संपूर्ण समुदाय से संबंधित समझते थे।

3. नयी कृषि प्रौद्योगिकी (New Agricultural Technology):
11वीं शताब्दी तक यूरोप में नयी कृषि प्रौद्योगिकी के प्रमाण मिलते हैं। अब लकड़ी से बने हलों के स्थान पर लोहे के हलों का प्रयोग किया जाने लगा। ये हल भारी नोक वाले होते थे। इससे भूमि को अधिक गहरा खोदना संभव हुआ। अब साँचेदार पटरों (mould boards) का उपयोग किया जाने लगा।

इनके द्वारा उपरि मृदा को सुगमता से पलटा जा सकता था। अब हल को गले के स्थान पर बैलों के कंधों से बाँधा जाने लगा। इस तकनीकी परिवर्तन से बैलों की एक बड़ी परेशानी दूर हुई। इसके अतिरिक्त उन्हें पहले की अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति मिल गई। घोड़ों के खुरों पर अब लोहे की नाल लगाने का प्रचलन आरंभ हो गया। इससे उनके खुर अब सुरक्षित हो गए।

मध्यकालीन यूरोप में भूमि के उपयोग के तरीकों में परिवर्तन आया। कृषि के लिए पहले दो खेतों वाली व्यवस्था (two-field system) प्रचलित थी। इसके स्थान पर अब तीन खेतों वाली व्यवस्था का प्रयोग होने लगा। इस व्यवस्था के अधीन कृषक अपने खेतों को तीन भागों में बाँटते थे। एक भाग में शरद ऋतु में गेहूँ अथवा राई (rye) बो सकते थे।

दूसरे भाग में बसंत ऋतु में मटर (peas), सेम (beans) तथा मसूर (lentils) की खेती की जाती थी। इनका प्रयोग मनुष्यों द्वारा किया जाता था। घोड़ों के उपयोग के लिए जौ (oats) एवं बाजरे (barley) का उत्पादन किया जाता था। तीसरे खेत को खाली रखा जाता था। इसका प्रयोग चरागाह के लिए किया जाता था। इस प्रकार वे प्रत्येक वर्ष खेतों का प्रयोग बदल-बदल कर करने लगे। इससे फ़सलों के उत्पादन में हैरानीजनक वृद्धि हुई।

फ़सलों के उत्पादन में वृद्धि के महत्त्वपूर्ण परिणाम सामने आए। भोजन की उपलब्धता अब पहले की अपेक्षा दुगुनी हो गई। मटर, सेम एवं मसूर आदि के प्रयोग से अब लोगों को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक मात्रा में प्रोटीन मिलने लगा। जौ एवं बाजरा अब पशुओं के लिए एक अच्छा चारे का स्रोत बन गया। इससे वे अधिक ताकतवर बने। इस कारण वे अब अधिक कार्य करने योग्य हो गए।

कृषि के विकास के कारण यूरोप में जनसंख्या में तीव्रता से वृद्धि होने लगी। अत: लोगों द्वारा आवास की माँग बढ़ जाने के कारण कृषि अधीन क्षेत्र कम होने लगा। कृषि में हुए विकास के परिणामस्वरूप सामंतवाद पर गहरा प्रभाव पड़ा। व्यक्तिगत संबंध जो कि सामंतवाद की प्रमुख आधारशिला थे कमज़ोर पड़ने लगे।

प्रश्न 11.
किन कारणों के चलते यूरोपीय समाज को 14वीं शताब्दी में संकट का सामना करना पड़ा ?
अथवा
चौदहवीं सदी की शुरुआत तक यूरोप का आर्थिक विकास धीमा पड़ गया। क्यों ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में यूरोप में आए संकट के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

1. पर्यावरण में परिवर्तन (Change in Environment):
13वीं शताब्दी के अंत में उत्तरी यूरोप के पर्यावरण में पुनः परिवर्तन आया। इस कारण गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया। गर्मी का मौसम बहुत छोटा रह गया। इस कारण भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई। इससे घोर खाद्य संकट उत्पन्न हो गया। भयंकर तूफानों एवं सागरीय बाढ़ों ने भी कृषि अधीन काफी भूमि को नष्ट कर दिया। इसने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया।

इसके अतिरिक्त भू-संरक्षण (soil conservation) के अभाव के कारण भूमि की उपजाऊ शक्ति बहुत कम हो गई थी। दूसरी ओर जनसंख्या में तीव्र वृद्धि के कारण उपलब्ध संसाधन बहुत कम पड़ गए। इससे अकालों का जन्म हुआ।

1315 ई० और 1317 ई० के दौरान यूरोप में भयंकर अकाल पड़े। इस कारण बड़ी संख्या में लोगों की मृत्यु हो गई। चरागाहों की कमी के कारण पशुओं को पर्याप्त चारा उपलब्ध न हो सका। परिणामस्वरूप 1320 ई० के दशक में बड़ी संख्या में पशु मारे गए।

2. चाँदी की कमी (Shortage of Silver):
14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई। इन दोनों देशों में विश्व की सर्वाधिक चाँदी की खानें थीं। यहाँ से अन्य यूरोपीय देशों को चाँदी का निर्यात किया जाता था। उस समय अधिकाँश यूरोपीय देशों में चाँदी की मुद्रा का प्रचलन था। अत: इस धातु की कमी के कारण यूरोपीय व्यापार को जबरदस्त आघात लगा। इसका कारण यह था कि चाँदी के अभाव में मिश्रित धातु की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इसे व्यापारी स्वीकार करने को तैयार न थे।

3. ब्यूबोनिक प्लेग (Bubonic Plague):
14वीं शताब्दी में यूरोप में ब्यूबोनिक प्लेग ने भयंकर रूप धारण कर लिया था। यह एक संक्रामक बीमारी (contagious disease) थी जो चूहों से फैलती थी। इसे काली मौत (black death) कहा जाता था। इसका कारण यह था कि यह बीमारी जिस व्यक्ति को लगती थी उसका रंग काला पड जाता था।

इस बीमारी के प्रथम लक्षण 1347 ई० में सिसली (Sicily) में देखने को मिले। यहाँ एशिया से व्यापार के लिए आए जलपोतों के साथ चूहे भी आ गए थे। इससे वहाँ प्लेग फैल गई। शीघ्र ही यह 1348 ई० से 1350 ई० के दौरान यूरोप के अनेक देशों में फैल गई। यह बीमारी जिसे लग जाती थी उसकी मृत्यु निश्चित थी।

परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में लोग मृत्यु का ग्रास बन गए। इस कारण यूरोप की जनसंख्या जो 1300 ई० में 730 लाख थी कम होकर 1400 ई० में 450 लाख रह गई। प्लेग के कारण व्यापक पैमाने पर सामाजिक विस्थापन हुआ। आर्थिक मंदी ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया। इस कारण विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा।

जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की उपलब्धता बहुत कम हो गई। इस कारण मजदूरों की माँग बहुत बढ़ गई। इसके चलते मज़दूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई। दूसरी ओर मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों में गिरावट के कारण लॉर्डों (सामंतों) की आय बहुत कम हो गई। इसके चलते उन्होंने मजदूरी संबंधी कृषकों से किए समझौतों का पालन करना बंद कर दिया।

इस कारण कृषकों एवं लॉर्डों के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया। परिणामस्वरूप अनेक स्थानों पर कृषक विद्रोह करने के लिए बाध्य हो गए। इनमें से 1323 ई० में फलैंडर्स (Flanders), 1358 ई० में फ्राँस एवं 1381 ई० में इंग्लैंड में हुए विद्रोह प्रमुख थे। यद्यपि इन विद्रोहों का दमन कर दिया गया था किंतु इन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि कृषकों के साथ अब क्रूर व्यवहार नहीं किया जा सकता। प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड एल० ग्रीवस का यह कहना ठीक है कि, “प्लेग के सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव बहुत प्रभावशाली थे।”

प्रश्न 12.
राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारणों एवं सफलताओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
राष्ट्रीय राज्यों की विशेषताओं एवं सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। बाद में इन राज्यों का पतन क्यों हुआ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों (Nation States) का गठन हुआ। इसने आधुनिक युग का श्रीगणेश किया। राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारणों, विशेषताओं एवं सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार हैं

I. राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के कारण

16वीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप में इंग्लैंड, फ्रांस, स्पेन एवं पुर्तगाल आदि में राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान हुआ। राष्ट्रीय राज्यों से अभिप्राय ऐसे राज्यों से था जिसके नागरिक अपने आपको एक राष्ट्र से संबंधित समझते थे। उनकी अपनी भाषा एवं साहित्य होता था। उनका अपने राष्ट्र के साथ विशेष प्यार होता था। वे अपने राष्ट्र के हितों के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार रहते थे। राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. सामंतवाद का पतन (Decline of Feudalism):
16वीं शताब्दी के आरंभ में सामंतवाद का पतन राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए एक महत्त्वपूर्ण कारण सिद्ध हुआ। मध्यकाल सामंत बहुत शक्तिशाली थे। उनकी अपनी सेना होती थी। यहाँ तक कि राजा भी उनके प्रभावाधीन थे। लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियों में बदलाव आया।

सामंतों के घोर अत्याचारों के कारण लोग उनके विरुद्ध हो गए। धर्मयुद्धों में भाग लेने के कारण बड़ी संख्या में सामंत मारे गए। इनसे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। सामंतों के पतन ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान की आधारशिला तैयार की। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “16वीं शताब्दी तक सामंतवाद का पतन हो रहा था एवं सामंत इस स्थिति में नहीं रहे कि वे शाही निरंकुशता का विरोध कर सकें।”

2. चर्च का प्रभाव (Influence of the Church):
मध्यकाल में चर्च का यूरोप के शासकों एवं लोगों पर गहन प्रभाव था। इसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं। कोई भी व्यक्ति अथवा शासक चर्च की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखता था। क्योंकि चर्च के पास अपार संपत्ति थी इसलिए यह शीघ्र ही भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया। 16वीं शताब्दी के आरंभ तक यूरोप के लोगों का दृष्टिकोण विशाल हो गया था।

अतः वे चर्च में फैले भ्रष्टाचार को सहन करने के लिए तैयार नहीं थे। धर्मयुद्धों के दौरान पोप ने यूरोपीय देशों को नेतृत्व प्रदान किया था। इन युद्धों में अंततः यूरोपीयों को पराजय का सामना करना पड़ा। इससे चर्च के सम्मान को गहरा आघात लगा। परिणामस्वरूप राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के लिए स्वर्ण अवसर प्राप्त हुआ।

3. धर्मयुद्ध (The Crusades):
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 11वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के दौरान लड़े गए। इन धर्मयुद्धों में बड़ी संख्या में सामंत मारे गए थे। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। चर्च के इन युद्धों के दौरान यूरोपीय शासकों को पूर्वी देशों में प्रचलित शासन व्यवस्था की जानकारी प्राप्त हई।

वे यहाँ प्रचलित निरंकश राजतंत्र (absolute monarchy) से बहत प्रभावित हए। अतः उन्होंने इस को यूरोपीय देशों में लागू करने का निर्णय किया। यूरोप में फैली अराजकता को दूर करने के उद्देश्य से लोगों ने इस दिशा में शासकों को पूर्ण सहयोग दिया। निस्संदेह यह कदम यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण प्रमाणित हुआ।

4. मध्य वर्ग का उत्थान (The Rise of the Middle Class):
मध्य वर्ग के उत्थान ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ग के लोग धनी एवं व्यापारी थे। उन्होंने अपने व्यापार एवं वाणिज्य के प्रोत्साहन एवं सुरक्षा हेतु निरंकुश राजतंत्र की स्थापना में बड़ा सक्रिय सहयोग दिया। उन्होंने सामंतों के घोर अत्याचारों से बचने एवं अराजकता के वातावरण को दूर करने के लिए निरंकुश राजाओं के हाथ मज़बूत करने का निर्णय किया।

क्योंकि उस समय संसद् में कुलीन वर्ग का बोलबाला था इसलिए मध्य वर्ग यह कामना करता था कि इस पर राजा की सर्वोच्चता स्थापित हो। इस उद्देश्य से मध्य वर्ग ने राजा को नियमित कर देने का वचन दिया।

इन करों के कारण राजा अपनी एक शक्तिशाली सेना का गठन कर सका। इस सेना के चलते राजा अपने राज्य के सामंतों का दमन कर सका। निस्संदेह मध्य वर्ग का उत्थान युरोपीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण मोड सिद्ध हआ। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के अनुसार, “मध्य वर्ग का उत्थान एवं इसका राजाओं के साथ समझौता शायद मध्य काल से आधुनिक काल के बीच के परिवर्तन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।”

5. शक्तिशाली शासकों का उत्थान (Rise of Powerful Rulers):
यह सौभाग्य ही था कि 15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में अनेक शक्तिशाली शासकों का उत्थान हुआ। इनमें फ्राँस का लुई ग्यारहवाँ (Louis XI), इंग्लैंड का हेनरी सातवाँ (Henery VII), स्पेन के फर्जीनेंड (Ferdinand) एवं ईसाबेला (Isabella) तथा ऑस्ट्रिया के मैक्समिलन (Maximilian) के नाम उल्लेखनीय हैं।

इन शासकों ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को बंदूकों एवं बड़ी तोपों से लैस किया गया। इस सेना के सहयोग से इन शासकों ने सामंतों की शक्ति का सुगमता से दमन किया। इसका कारण यह था कि सामंतों की सेना कमज़ोर थी। ये सैनिक अपने तीर एवं तलवारों के साथ तोपों का मुकाबला न कर सके।

6. विद्वानों के लेख (Writings of the Scholars):
15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ यूरोप में अनेक ऐसे विद्वान हुए जिन्होंने अपने लेखों द्वारा राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें इटली के लेखक मैक्यिावेली (Machiavelli), फ्रांसीसी लेखक बोदिन (Bodin) एवं इंग्लैंड के लेखक थॉमस हॉब्स (Thomas Hobbes) के नाम उल्लेखनीय हैं। मैक्यिावेली का ग्रंथ दि प्रिंस (The Prince) 1513 ई० में प्रकाशित हुआ।

इस ग्रंथ ने शीघ्र ही संपूर्ण यूरोप में धूम मचा दी। इस ग्रंथ में लेखक ने निरंकुश राजतंत्र की खूब प्रशंसा की तथा इस प्रणाली को अन्य सभी प्रकार की प्रणालियों से उत्तम बताया। इसका कथन था कि केवल राजा ही अपने राज्य के हितों के बारे में बेहतर जानता है। इसलिए उसे सदैव लोगों द्वारा समर्थन दिया जाना चाहिए। इन ग्रंथों का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा तथा वे राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना के समर्थन में आगे आए।

II. राष्ट्रीय राज्यों की विशेषताएँ

राष्ट्रीय राज्यों की प्रमुख विशेषताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

(1) ऐसा विश्वास किया जाता था कि उनका अपना राज्य सर्वोच्च है तथा किसी अन्य राज्य को उनके राज्य की प्रभुसत्ता एवं क्षेत्रीय अखंडता (territorial integrity) को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।

(2) ऐसे राज्य में राजा ही सर्वोच्च होता है। वह ही कानून का निर्माण करता है एवं उसकी व्याख्या करता है। उसके निर्णयों को अंतिम समझा जाता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता। वास्तव में राजा की इच्छा को ही कानून समझा जाता है।

(3) ऐसे राज्यों में राजी ही राज्य की सुरक्षा एवं उसके विस्तार के लिए उत्तरदायी होता है। इसलिए उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को आधुनिक शस्त्रों से लैस किया जाता था।

(4) ऐसे राज्यों में व्यक्तियों को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

(5) ऐसे राज्य राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त वे आर्थिक तौर पर आत्म-निर्भर (self-sufficient) होते हैं।

(6) ऐसे राज्यों में राजा को लोगों पर कर लगाने का अधिकार होता है। लोगों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे इन करों की अदायगी समय पर करें।

(7) ऐसे राज्यों द्वारा सदैव विदेशों में अपने उपनिवेश (colonies) स्थापित करने के प्रयास किए जाते हैं।

III. राष्ट्रीय राज्यों की सफलताएँ

राष्ट्रीय राज्यों को अनेक सफलताएँ प्राप्त करने का श्रेय प्राप्त है।

  • उन्होंने सामंतों की शक्ति का दमन कर लोगों को उनके अत्याचारों से मुक्त किया।
  • उन्होंने अपने राज्यों में फैली अराजकता को दूर कर शाँति की स्थापना की।
  • उन्होंने लोगों को अपने शासकों का सम्मान करने एवं उन्हें पूर्ण सहयोग देने का सबक सिखाया।
  • उन्होंने लोगों में एक नई राष्ट्रीय चेतना का संचार किया। इसके यूरोप के भावी इतिहास पर दूरगामी प्रभाव पड़े।
  • उन्होंने अपने-अपने राज्यों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से उल्लेखनीय पग उठाए। इससे देश की कृषि एवं उद्योगों को प्रोत्साहन मिला।
  • उन्होंने अपने राज्य की भाषा एवं साहित्य के विकास के लिए बहुमूल्य योगदान दिया। प्रसिद्ध इतिहासकार सी० जे० एच० हेज़ के शब्दों में, “16वीं शताब्दी में राष्ट्रीय राजतंत्र के उत्थान के साथ यूरोपीय लोगों में राष्ट्रीय जागृति एवं राष्ट्रीय देशभक्ति उत्पन्न हुई।”

IV. राष्ट्रीय राज्यों के पतन के कारण

16वीं शताब्दी में यद्यपि यूरोप में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई थी किंतु अनेक कारणों से बाद में इनका पतन हो गया। इन कारणों का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है-

(1) आरंभ में राष्ट्रीय राज्यों के शासकों ने सामंतों का दमन कर आंतरिक शांति की स्थापना की। इससे उन्हें लोगों का पूर्ण सहयोग मिला। बाद में ये शासक अपने राज्यों के विस्तार के लिए दूसरे राज्यों के साथ लंबे युद्धों में उलझ गए। इस कारण पुनः अराजकता फैली। अत: लोग ऐसे राज्यों का अंत चाहने लगे।

(2) राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना के समय वहाँ के शासकों ने अनेक लोकप्रिय कार्य किए। इससे लोग बहुत प्रसन्न हुए। उन्हें लंबे समय के पश्चात् अत्याचारी सामंतों से छुटकारा प्राप्त हुआ। सत्ता हाथ में आने के पश्चात् अनेक राष्ट्रीय शासक अपने कर्तव्यों को भूल गए। उन्होंने लोगों पर अनेक अनुचित कानून लाद दिए। अतः लोग ऐसे शासकों के विरुद्ध हो गए।

(3) राष्ट्रीय राज्यों के अनेक शासक सत्ता एवं धन हाथ आते ही विलासप्रिय हो गए। उन्होंने अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करना आरंभ कर दिया। ऐसे राज्यों का अंत निश्चित था।

(4) 1776 ई० में अमरीका की क्राँति एवं 1789 ई० में फ्रांसीसी क्राँति ने राष्ट्रीय राज्यों को एक गहरा आघात पहुँचाया।

क्रम संख्यावर्षघटना
1.529 ई०इटली में सेंट बेनेडिक्ट मठ की स्थापना।
2.768-814 ई०फ्राँस के शासक शॉर्लमेन का शासनकाल।
3.910 ई०बरगंडी में क्लूनी मठ की स्थापना।
4.1066 ई॰नारमंडी के विलियम द्वारा इंग्लैंड पर अधिकार।
5.1100 ई०फ्राँस में कथीड्रलों का निर्माण।
6.1315-1317 ई०यूरोप में भयंकर अकाल।
7.1323 ई०कृषकों का फलैंडर्स में विद्रोह।
8.1347-1350 ई०यूरोप में ब्यूबोनिक प्लेग का फैलना।
9.1358 ई०कृषकों का फ्राँस में विद्रोह।
10.1381 ई०कृषकों का इंग्लैंड में विद्रोह।
11.1337-1453 ई०इंग्लैंड एवं फ्राँस के मध्य सौ वर्षीय युद्ध।
12.1455-1485 ई०इंग्लैंड एवं फ्राँस के मध्य गुलाबों का युद्ध।
13.1461-1483 ई०फ्राँस में लुई ग्यारहवें का शासनकाल।
14.1469 ई०आरागान के युवराज फर्डीनेंड एवं कास्तील की राजकुमारी ईसाबेला का विवाह।
15.1485 ई०इंग्लैंड में हेनरी सप्तम द्वारा ट्यूडर वंश की स्थापना।
16.1485-1509 ई०इंग्लैंड के शासक हेनरी सप्तम का शासनकाल।
17.1492 ई०स्पेन का ग्रेनाडा पर अधिकार।
18.1494 ई०पुर्तगाल के शासक की स्पेन के साथ टार्डींसिलास की संधि।
19.1603 ई०जेम्स प्रथम द्वारा इंग्लैंड में स्टुअर्ट वंश की स्थापना।
20.1603-1625 ई०इंग्लैंड के शासक जेम्स प्रथम का शासनकाल।
21.1614 ई०फ्राँस के शासक लुई तेरहवें द्वारा एस्टेट्स जनरल को भंग करना।
22.1625-1649 ई०इंग्लैंड के शासक चार्ल्स प्रथम का शासनकाल।
23.1642-1649 ई०इंग्लैंड में गृहयुद्ध।
24.1789 ई०प्राँस की क्राँति।
25.1848 ई०जर्मनी की क्राँति।
26.1917 ई०रूस की क्राँति।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित तीन वर्ग कौन-से थे ? समाज पर इनके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज तीन वर्गों-पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान वर्ग में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पादरी वर्ग को प्राप्त था। पादरियों को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था। इसलिए समाज द्वारा उनका विशेष सम्मान किया जाता था। यहाँ तक कि राजा भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। कृषकदास, अपाहिज व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। कुलीन वर्ग को समाज में दूसरा स्थान प्राप्त था। इस वर्ग के लोग प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त थे। उन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे भव्य महलों में रहते थे एवं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे।

किसान यूरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में सम्मिलित थे। यूरोप की अधिकाँश जनसंख्या इस वर्ग से संबंधित थी। इनमें स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। अधिकाँश किसान कृषकदास थे। उन्हें अपने गुज़ारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वास्तव में उनका जीवन नरक के समान था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी वर्ग की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में पादरी प्रथम वर्ग में सम्मिलित थे। इस वर्ग में पोप, आर्कबिशप एवं बिशप सम्मिलित थे। यह वर्ग बहुत शक्तिशाली एवं प्रभावशाली था। इसका कारण यह था कि उनका चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था। चर्च के अधीन विशाल भूमि होती थी, जिससे उसे बहुत आमदनी होती थी। लोगों द्वारा दिया जाने वाला दान भी चर्च की आय का एक प्रमुख स्त्रोत था।

इनके अतिरिक्त चर्च किसानों पर टीथ नामक कर लगाता था। चर्च की इस विशाल आय के चलते पादरी वर्ग बहुत धनी हो गया था। इस वर्ग का यूरोप के शासकों पर भी बहत प्रभाव था। ये शासक पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं रखते थे। कलीन वर्ग भी पादरी वर्ग का बहुत सम्मान करता था। पादरी वर्ग को अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

वे राज्य को किसी प्रकार का कोई कर नहीं देते थे। वे विशाल एवं भव्य महलों में रहते थे। यद्यपि वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने का उपदेश देते थे किंतु वे स्वयं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। दूसरी ओर लोगों को धर्मोपदेश देने का कार्य निम्न वर्ग के पादरी करते थे। उनके वेतन कम थे। उनकी दशा शोचनीय थी। पादरी वर्ग में यह असमानता वास्तव में इस वर्ग के माथे पर एक कलंक समान थी।

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प्रश्न 3.
मध्यकालीन समाज में कुलीन वर्ग की क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग दूसरे वर्ग में सम्मिलित था। यूरोपीय समाज में इस वर्ग की विशेष भूमिका थी। केवल कुलीन वर्ग के लोगों को ही प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था। उन्हें अनेक प्रकार के विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। उनके पास विशाल जागीरें होती थीं। कुलीन इन जागीरों पर एक छोटे राजे के समान शासन करते थे।

वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा मुकद्दमों का निर्णय देते थे। वे अपने अधीन सेना रखते थे। उन्हें सिक्के जारी करने का भी अधिकार प्राप्त था। उन्हें लोगों पर कर लगाने का भी अधिकार था। वे कृषकों से बेगार लेते थे। उनके पशु किसानों की खेती उजाड़ देते थे, किंतु इन पशुओं को रोकने का साहस उनमें नहीं था। कुलीन अपने क्षेत्र में आने वाले माल पर चुंगी लिया करते थे। कुलीन वर्ग बहुत धनवान् था। राज्य की अधिकाँश संपत्ति उनके अधिकार में थी। वे विशाल महलों में रहते थे। वे बहुत विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कृषकदासों के लिए कौन-से कर्त्तव्य निश्चित किए गए थे ?
उत्तर:
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कृषक दासों के लिए निम्नलिखित कर्तव्य निश्चित किए गए थे

  • वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत (लॉर्ड) की सेना में कार्य करना।
  • उसे एवं उसके परिवार के सदस्यों को सप्ताह में तीन अथवा उससे कुछ अधिक दिन सामंत की जागीर पर जा कर काम करना पड़ता था। इस श्रम से होने वाले उत्पादन को श्रम अधिशेष कहा जाता था।
  • वह मेनर में स्थित सड़कों, पुलों तथा चर्च आदि की मुरम्मत करता था।
  • वह खेतों के आस-पास बाड़ बनाता था।
  • वह जलाने के लिए लकड़ियाँ एकत्र करता था।
  • वह अपने सामंत के लिए पानी भरता था, अन्न पीसता था तथा दुर्ग की मुरम्मत करता था।
  • वह अपने स्वामी को शत्रु द्वारा बंदी बनाए जाने पर उसे धन देकर छुड़ाता था।
  • वह राजा को टैली नामक कर भी देता था। इस कर की कोई निश्चित दर नहीं थी। यह राजा की इच्छा पर निर्भर करता था।
  • कृषकदास की स्त्रियाँ एवं बच्चे सूत कातने, वस्त्र बुनने, मोमबत्ती बनाने एवं मदिरा के लिए अंगूरों का रस निकालने का काम करते थे।

प्रश्न 5.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में प्रचलित सामंतवादी प्रथा पर एक संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
सामंतवाद मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसमें राजा अपने बड़े सामंतों एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों में जागीरों का बंटवारा करते थे। ऐसा कुछ शर्तों के अधीन किया जाता था। रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में फैली अराजकता एवं केंद्रीय सरकारों के कमजोर होने के कारण राजाओं के लिए सामंतों का सहयोग लेना आवश्यक हो गया था।

सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में हुआ। इनमें फ्राँस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली एवं स्पेन के नाम उल्लेखनीय थे। सामंतवाद के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने यूरोपीय समाज में कानून व्यवस्था लागू करने, कुशल प्रशासन देने, निरंकुश राजतंत्र पर नियंत्रण लगाने एवं कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

सामंतवादी व्यवस्था ने दूसरी ओर शासकों को कमज़ोर किया। इसने किसानों का घोर शोषण किया। इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया। यह राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हुई। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद का अनेक कारणों के चलते पतन हो गया।

प्रश्न 6.
मेनर से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
लॉर्ड का आवास क्षेत्र मेनर कहलाता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें थोड़े से गाँवों से लेकर अनेक गाँव सम्मिलित होते थे। प्रत्येक मेनर में एक ऊँची पहाड़ी की चोटी पर सामंत का दुर्ग होता था। यह दुर्ग जितना विशाल होता था उससे उस लॉर्ड की शक्ति का आंकलन किया जाता था। इस दुर्ग की सुरक्षा के लिए चारों ओर एक चौड़ी खाई होती थी।

इसे सदैव पानी से भर कर रखा जाता था। प्रत्येक मेनर में एक चर्च, एक कारखाना एवं कृषकदासों की अनेक झोंपड़ियाँ होती थीं। मेनर में एक विशाल कृषि फार्म होता था। इसमें सभी आवश्यक फ़सलों का उत्पादन किया जाता था। मेनर की चरागाह पर पशु चरते थे। मेनरों में विस्तृत वन होते थे। इन वनों में लॉर्ड शिकार करते थे। गाँव वाले यहाँ से जलाने के लिए लकड़ी प्राप्त करते थे।

मेनर में प्रतिदिन के उपयोग के लिए लगभग सभी वस्तुएँ उपलब्ध होती थीं। इसके बावजूद मेनर कभी आत्मनिर्भर नहीं होते थे। इसका कारण यह था कि कुलीन वर्ग के लिए विलासिता की वस्तुएँ, आभूषण एवं हथियार आदि तथा नमक एवं धातु के बर्तन बाहर से मंगवाने पड़ते थे। इसके बावजूद मेनर सामंती व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी।

प्रश्न 7.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ ?
उत्तर:
नाइट का यूरोपीय समाज में विशेष सम्मान किया जाता था। 9वीं शताब्दी यूरोप में निरंतर युद्ध चलते रहते थे। इसलिए साम्राज्य की सरक्षा के लिए एक स्थायी सेना की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को नाइट नामक एक नए वर्ग ने पूर्ण किया। नाइट अपने लॉर्ड से उसी प्रकार संबंधित थे जिस प्रकार लॉर्ड राजा के साथ संबंधित था।

लॉर्ड अपनी विस्तृत जागीर का कुछ भाग नाइट को देता था। इसे फ़ीफ़ कहा जाता था। इसका आकार सामान्य तौर पर 1000 एकड़ से 2000 एकड़ के मध्य होता था। प्रत्येक फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च, पनचक्की, मदिरा संपीडक एवं किसानों के लिए झोंपड़ियाँ आदि की व्यवस्था होती थी। नाइट को अपनी फीफ़ में व्यापक अधिकार प्राप्त थे।

फ़ीफ़ की सुरक्षा का प्रमुख उत्तरदायित्व नाइट पर था। उसके अधीन एक सेना होती थी। नाइट अपना अधिकाँश समय अपनी सेना के साथ गुजारते थे। वे अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देते थे। वे बनावटी लड़ाइयों द्वारा अपने रणकौशल का अभ्यास करते थे। वे अपनी सेना में अनुशासन पर विशेष बल देते थे। उनकी सेना की सफलता पर लॉर्ड की सफलता निर्भर करती थी क्योंकि आवश्यकता पड़ने पर लॉर्ड उनकी सेना का प्रयोग करता था।

प्रसन्न होने पर लॉर्ड उनकी फ़ीफ़ में बढ़ोत्तरी कर देता था। गायक नाइट की वीरता की कहानियाँ लोगों को गीतों के रूप में सुना कर उनका मनोरंजन भी करते थे। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट वर्ग का भी पतन हो गया।

प्रश्न 8.
सामंतवाद के प्रमुख गुण बताएँ।
उत्तर:
(1) कुशल प्रशासन-सामंतों ने मध्यकाल यूरोप में कुशल शासन व्यवस्था स्थापित की। इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूरोप में फैली अराजकता को दूर करने में सफलता प्राप्त की। सामंतों ने राजा को सेना तैयार करने में उल्लेखनीय योगदान दिया। इसके अतिरिक्त सामंत अपने अधीन जागीर में राजा के एक अधिकारी के रूप में भी कार्य करते थे। वे अपनी जागीर में शांति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय भी लगाते थे तथा लोगों के झगड़ों का निर्णय भी देते थे।

(2) निरंकुश राजतंत्र पर अंकुश-सामंतवाद की स्थापना से पूर्व यूरोप के शासक निरंकुश थे। उनकी शक्तियाँ असीम थीं। वे प्रशासन की ओर कम ध्यान देते थे। वे अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। अतः लोगों के कष्टों को सुनने वाला कोई न था। इन परिस्थितियों में सामंत आगे आए। उन्होंने निरंकुश शासकों एवं उन्हें जनता की भलाई करने के लिए बाध्य किया। निस्संदेह यह सामंतवाद की एक महान उपलब्धि थी।

(3) शूरवीरता को प्रोत्साहन-सामंतवाद में शूरवीरता के विकास पर विशेष बल दिया जाता था। सभी सामंत बहुत बहादुर होते थे। वे सदैव अपना रणकौशल दिखाने के लिए तैयार होते थे। वे रणक्षेत्र में विजय प्राप्त करने अथवा वीरगति को प्राप्त करने को बहुत गौरवशाली समझते थे। अतः सामंतवादी काल में बहादुरी दिखाने वाले सामंतों का समाज द्वारा विशेष सम्मान किया जाता था।

(4) कला तथा साहित्य को योगदान-सामंतवाद ने कला तथा साहित्य को बहुमूल्य योगदान दिया। सामंतों ने गोथिक शैली में दुर्गों एवं भवनों का निर्माण किया। उनके द्वारा बनवाए गए भवन अपनी सुंदरता एवं भव्यता के लिए विख्यात थे। उन्होंने चित्रकला को भी प्रोत्साहित किया। अत: इस काल में चित्रकला ने उल्लेखनीय विकास किया। इनके अतिरिक्त इस काल में साहित्य ने भी खूब प्रगति की।

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प्रश्न 9.
सामंतवाद के मुख्य दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
(1) कमज़ोर शासक-सामंत प्रथा के अधीन शासक केवल नाममात्र के ही शासक रह गए थे। राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। उनके अधीन एक विशाल सेना होती थी। वे ही अपने अधीन जागीर में कानून एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए उत्तरदायी थे। वे अपने न्यायालय लगाते थे तथा लोगों के मुकद्दमों का निर्णय देते थे। राजा अपने सभी कार्यों के लिए सामंतों की सहायता पर निर्भर करता था।

(2) किसानों का शोषण-सामंत प्रथा किसानों के लिए एक अभिशाप सिद्ध हुई। इस प्रथा के अधीन किसानों का घोर शोषण किया गया। किसानों को सामंत के खेतों में काम करने के लिए बाध्य किया जाता था। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने सामंत के कई प्रकार के अन्य कार्य भी करने पड़ते थे। इन कार्यों के लिए उन्हें कुछ नहीं दिया जाता था।

(3) युद्धों को प्रोत्साहन-सामंत प्रथा ने मध्यकालीन यूरोप में अराजकता फैलाने में प्रमुख भूमिका निभाई। इसका कारण यह था कि वे अपने स्वार्थी हितों की पूर्ति के लिए आपसी युद्धों में उलझ जाते थे। सभी सामंतों के अधीन एक विशाल सेना होती थी। इसलिए उन पर नियंत्रण पाना बहुत कठिन होता था। सामंत अवसर देखकर राजा के विरुद्ध विद्रोह करने से भी नहीं चूकते थे। अराजकता के इस वातावरण में न केवल लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा अपितु इससे संबंधित देश की अर्थव्यवस्था को भी भारी आघात पहँचता था।

(4) राष्ट्रीय एकता में बाधा-सामंत प्रथा राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक बड़ी बाधा सिद्ध हई। इसका कारण यह था कि लोग अपने सामंत से जुड़े हुए थे। अतः वे अपने सामंत के प्रति अधिक वफ़ादार थे। वे अपने राजा से कोसों दूर थे। इसका कारण यह था कि उस समय लोगों में राष्ट्रीय चेतना न के बराबर थी। उनकी दुनिया तो उनके मेनर तक ही सीमित थी। मेनर के बाहर की घटनाओं का उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। निस्संदेह इसके हानिकारक परिणाम निकले।

प्रश्न 10.
फ्रांस के सर्फ और रोम के दास के जीवन की दशा की तुलना कीजिए।
उत्तर:
(1) फ्रांस के सर्फ-फ्रांस के सर्फ का जीवन जानवरों से भी बदतर था। वे अपने लॉर्ड अथवा नाइट की जागीर पर काम करते थे। इस कार्य के लिए उन्हें कोई वेतन नहीं मिलता था। उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगे हुए थे। वे लॉर्ड की अनुमति के बिना उसकी जागीर को नहीं छोड़ सकते थे। सामंत उन पर घोर अत्याचार करते थे। इसके बावजूद वे सामंतों के विरुद्ध कोई शिकायत नहीं कर सकते थे।

(2) रोम के दास-रोम के दासों का जीवन भी नरक समान था। अमीरों के पास इन दासों की भरमार होती थी। अधिकाँश दास युद्धबंदी होते थे। अवांछित बच्चों को भी दास बनाया जाता था। दासों के मालिक उन पर घोर अत्याचार करते थे। उनमें जागीरों पर 16 से 18 घंटे प्रतिदिन कार्य लिया जाता था। दासों को एक-दूसरे से जंजीरों से बाँध कर रखा जाता था, ताकि वे भागने का दुस्साहस न करें। स्त्री दासों का यौन शोषण किया जाता था।

प्रश्न 11.
सामंतवाद के पतन के प्रमुख कारण बताएँ।
उत्तर:
(1) धर्मयुद्धों का प्रभाव-11वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य यूरोप के ईसाइयों एवं मध्य एशिया के मुसलमानों के बीच जेरुसलम को लेकर युद्ध लड़े गए। ये युद्ध इतिहास में धर्मयुद्धों के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन धर्मयुद्धों में पोप की अपील पर बड़ी संख्या में सामंत अपने सैनिकों समेत सम्मिलित हुए। इन धर्मयुद्धों में जो काफी लंबे समय तक चले में बड़ी संख्या में सामंत एवं उनके सैनिक मारे गए। इससे उनकी शक्ति को गहरा आघात लगा। राजाओं ने इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठाया तथा उन्होंने सुगमता से बचे हुए सामंतों का दमन कर दिया। इस प्रकार धर्मयुद्ध सामंतों के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए।

(2) राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान-सामंतवाद के उदय के कारण राज्य की वास्तविक शक्ति सामंतों के हाथों में आ गई थी। सामंतों को अनेक अधिकार प्राप्त थे। उनके अधीन एक विशाल सेना भी होती थी। सामंतों के सहयोग के बिना राजा कुछ नहीं कर सकता था। 15वीं शताब्दी के अंत एवं 16वीं शताब्दी के आरंभ में अनेक राष्ट्रीय राज्यों की स्थापना हुई।

इन राज्यों के शासक काफी शक्तिशाली थे। उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली एवं आधुनिक सेना का गठन किया था। अत: नए शासकों को सामंतों की शक्ति कुचलने में किसी विशेष कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा।

(3) मध्य श्रेणी का उत्थान-15वीं एवं 16वीं शताब्दी यूरोप में मध्य श्रेणी का उत्थान सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हआ। मध्य श्रेणी में व्यापारी, उद्योगपति एवं पंजीपति सम्मिलित थे। इस काल में यरोप में व्यापार के क्षेत्र में तीव्रता से प्रगति हो रही थी। इस कारण समाज में मध्य श्रेणी को विशेष सम्मान प्राप्त हुआ। इस श्रेणी ने सामंतों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों का अंत करने के लिए शासकों से सहयोग किया।

शासक पहले ही सामंतों के कारण बहुत परेशान थे। अतः उन्होंने मध्य श्रेणी के लोगों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त करना आरंभ कर दिया। मध्य श्रेणी द्वारा दिए गए आर्थिक सहयोग के कारण ही शासक अपनी स्थायी एवं शक्तिशाली सेना का गठन कर सके। इससे सामंतों की शक्ति को एक गहरा आघात लगा।

प्रश्न 12.
मध्यकालीन मठों का क्या कार्य था ?
उत्तर:
मध्यकालीन मठों के प्रमुख कार्य निम्नलिखित थे

  • मठों द्वारा लोगों को उपदेश देने का कार्य किया जाता था।
  • उनके द्वारा प्रसिद्ध पांडुलिपियों को तैयार करवाया जाता था।
  • वे लोगों को शिक्षा दने का कार्य करते थे।
  • वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने की प्रेरणा देते थे।
  • वे रोगियों की सेवा करते थे।
  • वे मठ में आने वाले यात्रियों की देखभाल करते थे।
  • वे मठ को दान में दी गई भूमि पर कृषि एवं पशुपालन का कार्य करते थे।
  • मठ के नियमों की उल्लंघना करने वाले को कठोर दंड दिए जाते थे।

प्रश्न 13.
मध्यकालीन यूरोप में चर्च के कार्य क्या थे ?
उत्तर:
मध्यकाल में चर्च अनेक प्रकार के कार्य करता था।

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए थे जिनका पालन करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक था।
  • चर्च की देखभाल के लिए अनेक अधिकारियों की नियुक्ति की जाती थी।
  • चर्च में धर्मोपदेश दिए जाते थे तथा सामूहिक प्रार्थना की जाती थी।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा भी दी जाती थी।
  • इसके द्वारा रोगियों, गरीबों, विधवाओं एवं अनाथों की देखभाल की जाती थी।
  • यहाँ विवाह की रस्में पूर्ण की जाती थीं।
  • यहाँ वसीयतों एवं उत्तराधिकार के मामलों की सुनवाई की जाती थी।
  • यहाँ धर्म विद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाए जाते थे एवं उन्हें दंडित किया जाता था।
  • चर्च कृषकों से उनकी उपज का दसवाँ भाग कर के रूप में एकत्रित करता था। इस कर को टीथ (tithe) कहते थे।
  • चर्च श्रद्धालुओं से दान भी एकत्रित करता था।

प्रश्न 14.
पोप कौन था ? मध्यकालीन युग में उसकी क्या स्थिति थी ?
उत्तर:
पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। वह रोम में निवास करता था। मध्यकाल में उसके हाथों में अनेक शक्तियाँ थीं। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर अपना नियंत्रण रखता था। उसका अपना न्यायालय था जहाँ वह विवाह, तलाक, वसीयत एवं उत्तराधिकार से संबंधित मुकद्दमों के निर्णय देता था।

उसके निर्णयों को अंतिम माना जाता था। वह यूरोपीय शासकों को पदच्युत करने की भी क्षमता रखता था। वह किसी भी सिविल कानून को जो उसकी नज़र में अनुचित हो, को रद्द कर सकता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था। कोई भी यहाँ तक कि शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करता था। संक्षेप में पोप की शक्तियाँ असीम थीं।

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प्रश्न 15.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज पर चर्च के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:
मध्य युग में चर्च का यूरोपीय समाज पर जितना व्यापक प्रभाव था उतना प्रभाव किसी अन्य संस्था का नहीं था। इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया। इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया।

इसने रोगियों की देखभाल के लिए अनेक अस्पताल बनवाए। इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया। चर्च एवं मठों के द्वारा लोगों को मुफ्त शिक्षा प्रदान की जाती थी। अनेक चर्च अधिकारी विश्वविद्यालयों में अध्यापन का कार्य भी करते थे। इससे लोगों में एक नव जागृति का संचार हुआ। चर्च ने असभ्य बर्बरों को ईसाई धर्म में सम्मिलित कर उन्हें सभ्य बनाया।

चर्च ने लोगों को युद्ध की अपेक्षा शांति का पाठ पढ़ाया। कोई भी शासक चर्च के आदेशों की उल्लंघना करने का साहस नहीं कर सकता था। 25 दिसंबर को ईसा मसीह के जन्म दिन को क्रिसमस एवं ईसा के शूलारोपण तथा उसके पुनर्जीवित होने को ईस्टर ने त्योहारों का रूप धारण कर लिया था। इन पवित्र दिनों में संपूर्ण यूरोप में छुट्टियाँ होती थीं।

अतः लोग मिल-जुल कर इनका आनंद लेते थे। इससे लोगों में एकता की भावना को बल मिला। संक्षेप में चर्च के यूरोपीय समाज पर दूरगामी एवं व्यापक प्रभाव पड़े।

प्रश्न 16.
मध्यकालीन यूरोप में नगरों के उत्थान के प्रमुख कारण क्या थे?
उत्तर:
(1) कृषि का विकास-मध्यकाल यूरोप में कृषि के विकास को बल मिला। फ़सलों के अधिक उत्पादन के कारण कृषक धनी हुए। इन धनी किसानों को अपनी आवश्यकता से अधिक खाद्यान्न को बेचने तथा अपने लिए एवं कृषि के लिए आवश्यक वस्तुओं को खरीदने के लिए एक बिक्री केंद्र की आवश्यकता हुई। शीघ्र ही बिक्री केंद्रों में दुकानों, घरों, सड़कों एवं चर्चों का निर्माण हुआ। इससे नगरों के विकास की आधारशिला तैयार हुई।

(2) व्यापार का विकास-11वीं शताब्दी में यूरोप एवं पश्चिम एशिया के मध्य अनेक नए व्यापारिक मार्गों का विकास आरंभ हुआ। इससे व्यापार को एक नई दिशा मिली। इटली, जर्मनी, इंग्लैंड, पुर्तगाल एवं बेल्जियम के व्यापारियों ने मुस्लिम एवं अफ्रीका के व्यापारियों के साथ संबंध स्थापित किए। व्यापार में आई इस तीव्रता ने नगरों के विकास को एक नया प्रोत्साहन दिया।

(3) धर्मयुद्ध-धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए थे। इन धर्मयुद्धों का वास्तविक उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम को मुसलमानों के आधिपत्य से मुक्त करवाना था। इन धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे भव्य मुस्लिम नगरों को देखकर चकित रह गए। इन धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला। इससे व्यापारी धनी हुए जिससे नगरों के विकास को बल मिला।

प्रश्न 17.
कथील नगरों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
12वीं शताब्दी में फ्रांस में कथील कहे जाने वाले विशाल चर्चों का निर्माण कार्य आरंभ हुआ। शीघ्र ही यूरोप के अन्य देशों में भी कथीलों का निर्माण शुरू हुआ। इनका निर्माण मठों की देख-रेख में होता था। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। सामान्यजन अपने श्रम द्वारा एवं अन्य वस्तुओं द्वारा इनके निर्माण में सहयोग देते थे।

कथील बहुत विशाल एवं भव्य होते थे। इन्हें पत्थर से बनाया जाता था। इनके निर्माण में काफी समय लगता था। अत: कथीड्रल के आस-पास अनेक प्रकार के लोग बस गए। उनकी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए बाज़ार भी स्थापित हो गए। इस प्रकार कथीलों ने नगरों का रूप धारण कर लिया। कथीलों के भवन अत्यंत मनोरम थे।

इनका निर्माण इस प्रकार किया गया था कि पादरी की आवाज़, भिक्षुओं के गीत, लोगों की प्रार्थना की घंटियाँ दूर-दूर तक सुनाई पड़ें। कथीड्रल की खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था।

इस कारण दिन के समय सूर्य की पर्याप्त रोशनी अंदर आ सकती थी। रात्रि के समय जब कथीड्रल में मोमबत्तियाँ जलाई जाती थीं तो खिड़कियों के शीशों पर बने ईसा मसीह के जीवन से संबंधित चित्रों को स्पष्ट देखा जा सकता था। निस्संदेह नगरों के विकास में कथीलों की उल्लेखनीय भूमिका थी।

प्रश्न 18.
किन कारणों से 14वीं शताब्दी यूरोप में संकट उत्पन्न हुआ ?
उत्तर:
(1) पर्यावरण में परिवर्तन-13वीं शताब्दी के अंत में उत्तरी यूरोप के पर्यावरण में पुन: परिवर्तन आया। इस कारण गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया। गर्मी का मौसम बहुत छोटा रह गया। इस कारण भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई। इससे घोर खाद्य संकट उत्पन्न हो गया। भयंकर तूफानों एवं सागरीय बाढ़ों ने भी कृषि अधीन काफी भूमि को नष्ट कर दिया। इसने स्थिति को अधिक विस्फोटक बना दिया। .

(2) चाँदी की कमी-14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई। इन दोनों देशों में विश्व की सर्वाधिक चाँदी की खानें थीं। यहाँ से अन्य यूरोपीय देशों को चाँदी का निर्यात किया जाता था। उस समय अधिकाँश यूरोपीय देशों में चाँदी की मुद्रा का प्रचलन था। अतः इस धातु की कमी के कारण यूरोपीय व्यापार को ज़बरदस्त आघात लगा। इसका कारण यह था कि चाँदी के अभाव में मिश्रित धातु की मुद्रा का प्रचलन किया गया। इसे व्यापारी स्वीकार करने को तैयार न थे।

(3) ब्यूबोनिक प्लेग-प्लेग के कारण व्यापक पैमाने पर सामाजिक विस्थापन हुआ। आर्थिक मंदी ने स्थिति को अधिक गंभीर बना दिया। इस कारण विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा। जनसंख्या में कमी के कारण मजदूरों की उपलब्धता बहुत कम हो गई। इस कारण मजदूरों की माँग बहुत बढ़ गई। इसके चलते मज़दूरी की दरों में 250 प्रतिशत तक की वृद्धि हो गई।

दूसरी ओर मजदूरी की दरें बढ़ने तथा कृषि संबंधी मूल्यों में गिरावट के कारण लॉर्डों (सामंतों) की आय बहुत कम हो गई। इसके चलते उन्होंने मजदूरी संबंधी कृषकों से किए समझौतों का पालन बंद कर दिया। इस कारण कृषकों एवं लॉर्डों के मध्य तनाव उत्पन्न हो गया।

प्रश्न 19.
मध्य वर्ग के उत्थान ने यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर:
मध्य वर्ग के उत्थान ने राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस वर्ग के लोग धनी एवं व्यापारी थे। उन्होंने अपने व्यापार एवं वाणिज्य के प्रोत्साहन एवं सुरक्षा हेतु निरंकुश राजतंत्र की स्थापना में बड़ा सक्रिय सहयोग दिया। उन्होंने सामंतों के घोर अत्याचारों से बचने एवं अराजकता के वातावरण को दूर करने के लिए निरंकुश राजाओं के हाथ मज़बूत करने का निर्णय किया।

क्योंकि उस समय संसद् में कुलीन वर्ग का बोलबाला था। इसलिए मध्य वर्ग यह कामना करता था कि इस पर राजा की सर्वोच्चता स्थापित हो। इस उद्देश्य से मध्य वर्ग ने राजा को नियमित कर देने का वचन दिया। इन करों के कारण राजा अपनी एक शक्तिशाली सेना का गठन कर सका। इस सेना के चलते राजा अपने राज्य के सामंतों का दमन कर सका।

इसके अतिरिक्त मध्य वर्ग ने राजा को अनेक मेहनती अधिकारी प्रदान किए। इन अधिकारियों के सहयोग से राजा अपनी प्रजा को कुशल शासन प्रदान कर सका। निस्संदेह मध्य वर्ग का उत्थान यूरोपीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हुआ।

प्रश्न 20.
राष्ट्रीय राज्य की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
राष्ट्रीय राज्यों की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

(1) ऐसा विश्वास किया जाता था कि उनका अपना राज्य सर्वोच्च है तथा किसी अन्य राज्य को उनके राज्य की प्रभुसत्ता एवं क्षेत्रीय अखंडता को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं है।

(2) ऐसे राज्य में राजा ही सर्वोच्च होता है। वह ही कानून का निर्माण करता है एवं उसकी व्याख्या करता है। उसके निर्णयों को अंतिम समझा जाता है। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता। वास्तव में जो राजा को अच्छा लगता है उसे ही कानून समझा जाता है।

(3) ऐसे राज्यों में राजा ही राज्य की सुरक्षा एवं उसके विस्तार के लिए उत्तरदायी होता है। इसलिए उन्होंने अपने अधीन एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना को आधुनिक शस्त्रों से लैस किया जाता था।

(4) ऐसे राज्यों में व्यक्तियों को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा जाता है।

(5) ऐसे राज्य राजनीतिक तौर पर स्वतंत्र होते हैं। इसके अतिरिक्त वे आर्थिक तौर पर आत्मनिर्भर होते हैं।

(6) ऐसे राज्यों में राजा को लोगों पर कर लगाने का अधिकार होता है। लोगों का यह कर्त्तव्य होता है कि वे इन करों की अदायगी समय पर करें।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकाल किसे कहते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • 5वीं शताब्दी ई० से लेकर 15वीं शताब्दी के आरंभ के काल को मध्यकाल कहा जाता है।
  • इस काल के दौरान बड़े-बड़े साम्राज्यों का पतन हो गया तथा छोटे-छोटे राज्य अस्तित्व में आए।
  • यह काल अशांति एवं अव्यवस्था का काल था।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तीन वर्ग कौन-से थे ? ये समाज की किस श्रेणी में सम्मिलित थे ?
उत्तर:

  • मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तीन वर्ग पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान थे।
  • पादरी वर्ग समाज की प्रथम श्रेणी में, कुलीन वर्ग द्वितीय श्रेणी में एवं किसान तीसरी श्रेणी में सम्मिलित थे।

प्रश्न 3.
पादरी वर्ग को यूरोपीय समाज में क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता था ?
उत्तर:

  • इस वर्ग का चर्च पर पूर्ण नियंत्रण था।
  • शासक भी पोप की आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे।
  • इस वर्ग को समाज में अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे।

प्रश्न 4.
‘टीथ’ से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
टीथ एक प्रकार का कर था। इसे चर्च द्वारा किसानों से लिया जाता था। यह किसानों की कुल उपज का दसवां भाग होता था। यह चर्च की आय का एक प्रमुख स्रोत था।

प्रश्न 5.
चर्च की आय के दो प्रमुख स्रोत कौन-से थे ?
उत्तर:

  • किसानों से प्राप्त किया जाने वाला टीथ नामक कर।
  • धनी लोगों द्वारा अपने कल्याण तथा मरणोपरांत अपने रिश्तेदारों के कल्याण के लिए दिया जाने वाला दान।

प्रश्न 6.
मध्यकालीन यूरोप में कुलीन वर्ग को कौन-से विशेषाधिकार प्राप्त थे ? कोई दो बताएँ।
उत्तर:

  • वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे।
  • वे अपने अधीन सेना रखते थे।

प्रश्न 7.
कृषकदासों के कोई दो कर्त्तव्य बताएँ।
उत्तर:

  • वे राजा को टैली नामक कर देते थे।
  • उन्हें वर्ष में कम-से-कम 40 दिन सामंत की सेना में कार्य करना पड़ता था।

प्रश्न 8.
कृषकदासों पर लगे कोई दो प्रतिबंध लिखें।
उत्तर:

  • वे सामंत की अनुमति के बिना उसकी जागीर नहीं छोड़ सकते थे।
  • वे अपने पुत्र-पुत्रियों के विवाह सामंत की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे।

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प्रश्न 9.
सामंतवाद से आपका क्या अभिप्राय है ?
अथवा
आर्थिक संदर्भ में सामंतवाद को समझाइए।
उत्तर:
सामंतवाद जर्मन भाषा के शब्द फ़्यूड से बना है। इससे अभिप्राय है, भूमि का एक टुकड़ा अथवा जागीर। इस प्रकार सामंतवाद का संबंध भूमि अथवा जागीर से है। इस व्यवस्था में राजा को समस्त भूमि का स्वामी समझा जाता था। वह कुछ शर्तों के साथ अपने बड़े सामंतों में भूमि बाँटता था। ये सामंत इसी प्रकार आगे अपने अधीन छोटे सामंतों को भूमि बाँटते थे। संपूर्ण व्यवस्था भूमि के स्वामित्व एवं वितरण पर निर्भर करती थी।

प्रश्न 10.
सामंतवाद के उदय के कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् केंद्रीय शक्ति बहुत कमज़ोर हो गई थी।
  • विदेशी आक्रमणों के कारण पश्चिमी यूरोप में अराजकता का बोलबाला था।

प्रश्न 11.
शॉर्लमेन कौन था ?
उत्तर:
शॉर्लमेन फ्रांस का एक प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था। उसने 768 ई० से 814 ई० तक शासन किया। उसने फ्रांस में सामंतवादी व्यवस्था लागू की। उसने फ्रांस में उल्लेखनीय सुधार किए। उसे पोप लियो तृतीय ने 800 ई० में पवित्र रोमन सम्राट् की उपाधि से सम्मानित किया था।

प्रश्न 12.
फ्रांस के प्रारंभिक सामंती समाज के दो लक्षणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सामंतों को अपनी जागीरों पर व्यापक न्यायिक एवं अन्य अधिकार प्राप्त थे।
  • कृषक सामंतों को श्रम सेवा प्रदान करते थे।

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प्रश्न 13.
विलियम कौन था ?
उत्तर:
वह फ्रांस के एक प्रांत नारमंडी का ड्यूक था। उसने 1066 ई० में इंग्लैंड के सैक्सन शासक हैरलड को हैस्टिंग्ज़ की लड़ाई में पराजित कर इंग्लैंड पर अधिकार कर लिया था। इस महत्त्वपूर्ण विजय के पश्चात् उसने इंग्लैंड में सामंतवादी व्यवस्था को लागू किया।

प्रश्न 14.
सामंतवादी व्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • राजा समस्त भूमि का स्वामी होता था। वह इसे कुछ शर्तों के आधार पर बड़े सामंतों में बाँटता था।
  • सामंत अपनी जागीर में सर्वशक्तिशाली होते थे। उन्हें असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं।

प्रश्न 15.
मेनर से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
मेनर लॉर्ड का आवास क्षेत्र होता था। इसका आकार एक जैसा नहीं होता था। इसमें प्रतिदिन के उपयोग की प्रत्येक वस्तु मिलती थी। यहाँ लॉर्ड का दुर्ग, कृषि फार्म, कारखाने, चर्च, वन एवं कृषकों की झोंपड़ियाँ होती थीं। कोई भी व्यक्ति लॉर्ड की अनुमति के बिना मेनर को छोड़कर नहीं जा सकता था।

प्रश्न 16.
नाइट एक अलग वर्ग क्यों बने और उनका पतन कब हुआ ?
उत्तर:
9वीं शताब्दी यूरोप में स्थानीय युद्ध एक सामान्य बात थी। इन युद्धों के लिए कुशल घुड़सवारों की आवश्यकता थी। इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए नाइट एक अलग वर्ग बने। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद के पतन के साथ ही नाइट का पतन हुआ।

प्रश्न 17.
फ़ीफ़ क्या थी ?
उत्तर:
लॉर्ड द्वारा नाइट को जो जागीर दी जाती थी उसे फ़ीफ़ कहते थे। यह 1000 से 2000 एकड़ में फैली होती थी। फ़ीफ़ में नाइट के लिए घर, चर्च और उस पर निर्भर व्यक्तियों के लिए व्यवस्था होती थी। फ़ीफ़ को कृषक जोतते थे। इसकी रक्षा का भार नाइट पर होता था।

प्रश्न 18.
नाइट के कोई दो कर्त्तव्य बताएँ।
उत्तर:

  • वह अपने लॉर्ड को युद्ध में उसकी तरफ से लड़ने का वचन देता था।
  • वह अपने लॉर्ड को एक निश्चित धनराशि देता था।

प्रश्न 19.
सामंतवाद के कोई दो गुण बताएँ।
उत्तर:

  • इसने कानून एवं व्यवस्था की स्थापना की।
  • इसने निरंकुश राजतंत्र पर अंकुश लगाया।

प्रश्न 20.
सामंतवाद की कोई दो हानियाँ लिखें।
उत्तर:

  • इसने शासकों को कमजोर बनाया।
  • इसने युद्धों को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 21.
सामंतवाद के पतन के लिए उत्तरदायी कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • कृषकों के विद्रोह।
  • राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान।

प्रश्न 22.
मध्यकाल में चर्च के प्रमुख कार्य क्या थे ?
उत्तर:

  • इसने सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी अनेक नियम बनाए।
  • यहाँ विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती थी।
  • यहाँ गरीबों, अनाथों, रोगियों एवं विधवाओं की देखभाल की जाती थी।

प्रश्न 23.
पोप कौन था ?
उत्तर:
पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी था। उसे पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था। वह चर्च से संबंधित सभी प्रकार के नियमों को बनाता था। वह चर्च की समस्त गतिविधियों पर नियंत्रण रखता था। वह चर्च से संबंधित विभिन्न अधिकारियों की नियुक्ति भी करता था।

प्रश्न 24.
पादरी के प्रमुख कार्य क्या थे ?
उत्तर:

  • वह लोगों के सुखी जीवन के लिए चर्च में सामूहिक प्रार्थनाएँ करता था।
  • वह पोप से प्राप्त सभी आदेशों को लागू करवाता था।
  • वह जन्म, विवाह एवं मृत्यु से संबंधित सभी प्रकार के संस्कारों को संपन्न करवाता था।

प्रश्न 25.
मध्यकालीन मठों के क्या कार्य थे ?
उत्तर:

  • मठों द्वारा लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने पर बल दिया जाता था।
  • मठों द्वारा लोगों को शिक्षा दी जाती थी।
  • मठों द्वारा रोगियों की सेवा की जाती थी एवं यात्रियों की देखभाल की जाती थी।

प्रश्न 26.
सेंट बेनेडिक्ट की स्थापना कब और कहाँ हुई थी ?
उत्तर:
सेंट बेनेडिक्ट की स्थापना 529 ई० में इटली में हुई थी।

प्रश्न 27.
सेंट बेनेडिक्ट के भिक्षुओं के लिए बनाए गए कोई दो नियम लिखें।
उत्तर:

  • प्रत्येक मठवासी विवाह नहीं करवा सकता था।
  • उन्हें मठ के प्रधान ऐबट की आज्ञा का पालन करना पड़ता था।

प्रश्न 28.
क्लूनी मठ की स्थापना कब, कहाँ एवं किसने की थी ?
उत्तर:
क्लूनी मठ की स्थापना 910 ई० में फ्रांस में बरगंडी नामक स्थान पर विलियम प्रथम ने की थी।

प्रश्न 29.
आबेस हिल्डेगार्ड कौन थी ?
उत्तर:
आबेस हिल्डेगार्ड जर्मनी की एक प्रतिभाशाली भिक्षुणी थी। उसने क्लूनी मठ के विकास के लिए उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने चर्च की प्रार्थनाओं के लिए 77 सामुदायिक गायन लिखे। उसके प्रचार कार्य एवं लेखन ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव डाला।

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प्रश्न 30.
फ्रायर कौन थे ?
उत्तर:
13वीं शताब्दी के आरंभ में यूरोप में भिक्षुओं के एक नए समूह का उत्थान हुआ जिसे फ्रायर कहा जाता था। वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण करते थे। वे ईसा मसीह के संदेश को जनता तक पहुँचाते थे। वे जनसाधारण की भाषा में प्रचार करते थे। उन्होंने चर्च के गौरव को स्थापित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 31.
संत फ्राँसिस कौन थे ?
उत्तर:
संत फ्रांसिस असीसी के एक प्रसिद्ध संत थे। उन्होंने फ्रांसिस्कन संघ की स्थापना की थी। उन्होंने गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करने का संदेश दिया। उन्होंने शिष्टता के नियमों का पालन करने, शिक्षा का प्रचार करने एवं श्रम के महत्त्व पर विशेष बल दिया। उनका संघ बहुत लोकप्रिय हुआ।

प्रश्न 32.
संत डोमिनीक कौन थे ?
उत्तर:
संत डोमिनीक स्पेन के एक प्रसिद्ध संत थे। उन्होंने डोमिनिकन संघ की स्थापना की। उन्होंने जन-भाषा में अपना प्रचार किया। उन्होंने पाखंडी लोगों की कटु आलोचना की। उन्होंने पुजारी वर्ग में फैली अज्ञानता को दूर करने का निर्णय किया। उनके शिष्य बहुत विद्वान् थे। उन्होंने लोगों में एक नई जागृति लाने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 33.
14वीं शताब्दी में मठवाद के महत्त्व के कम होने के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • मठों में भ्रष्टाचार बहुत फैल गया था।
  • भिक्षु-भिक्षुणियों ने अब विलासिता का जीवन व्यतीत करना आरंभ कर दिया था।

प्रश्न 34.
मध्यकाल में चर्च के यूरोपीय समाज पर क्या प्रमुख प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इसने लोगों को आपसी भाईचारे एवं प्रेम का संदेश दिया।
  • इसने गरीबों एवं अनाथों को आश्रय प्रदान किया।
  • इसने शिक्षा के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

प्रश्न 35.
मध्यकालीन यूरोपीय नगरों की कोई दो विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:

  • इनमें आधारभूत सुविधाओं की कमी होती थी।
  • इन नगरों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रबंध किया जाता था।

प्रश्न 36.
मध्यकालीन यूरोप में स्थापित श्रेणियों के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • श्रेणी द्वारा वस्तुओं के मूल्य निर्धारित किए जाते थे।
  • श्रेणी द्वारा व्यापार संबंधी नियम बनाए जाते थे।

प्रश्न 37.
कथीड्रल क्या थे ?
उत्तर:
12वीं शताब्दी में फ्रांस में विशाल चर्चों का निर्माण आरंभ हुआ। इन्हें कथीड्रल कहा जाता था। इनके निर्माण के लिए धनी लोगों द्वारा दान दिया जाता था। इनका निर्माण मठों की देख-रेख में होता था। इन्हें पत्थरों से बनाया जाता था। इनकी खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था।

प्रश्न 38.
मध्यकालीन यूरोपीय नगरों का महत्त्व क्या था ?
उत्तर:

  • नगरों के उत्थान के कारण राजे शक्तिशाली हुए।
  • नगरों में लोग स्वतंत्र जीवन व्यतीत करते थे।
  • नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए श्रेणियों का गठन किया गया।

प्रश्न 39.
मध्यकालीन यूरोप के सामाजिक एवं आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने वाले दो महत्त्वपूर्ण कारक कौन-से थे ?
उत्तर:

  • पर्यावरण में परिवर्तन।
  • नई कृषि प्रौद्योगिकी।

प्रश्न 40.
11वीं शताब्दी में यूरोप के वातावरण में हुए परिवर्तन के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इस कारण तापमान में वृद्धि हो गई।
  • इस कारण फ़सलों के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई।
  • तापमान में वद्धि के कारण यरोप के अनेक भागों के वन क्षेत्रों में कमी आई।

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प्रश्न 41.
11वीं शताब्दी में यूरोप में नई कृषि प्रौद्योगिकी के कोई दो उदाहरण दें।
उत्तर:

  • अब लोहे के हलों का प्रयोग आरंभ हुआ।
  • अब कृषि के लिए तीन खेतों वाली व्यवस्था का प्रचलन आरंभ हुआ।

प्रश्न 42.
मध्यकाल में फ़सलों के उत्पादन में वृद्धि के कारण कौन-से दो महत्त्वपूर्ण परिणाम सामने आए ?
उत्तर:

  • भोजन की उपलब्धता अब पहले की अपेक्षा दुगुनी हो गई।
  • पशुओं के लिए अब अच्छे चारे की उपलब्धता हो गई।

प्रश्न 43.
जनसंख्या के स्तर में होने वाले लंबी अवधि के परिवर्तन ने किस प्रकार यूरोप की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित किया ?
उत्तर:

  • अच्छे आहार से जीवन अवधि लंबी हो गई।
  • लोगों द्वारा आवास की माँग बढ़ जाने के कारण कृषि अधीन क्षेत्र कम होने लगा।
  • इससे नगरों के उत्थान में सहायता मिली।

प्रश्न 44.
13वीं शताब्दी में नई कृषि प्रौद्योगिकी के कारण कौन-से दो प्रमुख लाभ हुए ?
उत्तर:

  • नई कृषि प्रौद्योगिकी के कारण किसानों को कम श्रम की आवश्यकता होती थी।
  • किसानों को अब अन्य गतिविधियों के लिए अवसर प्राप्त हुआ।

प्रश्न 45.
कृषि में हुए विकास के परिणामस्वरूप सामंतवाद पर क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • इससे व्यक्तिगत संबंधों को गहरा आघात लगा।
  • अब कृषक अपनी फ़सल को नकदी के रूप में बेचने लगे।
  • इससे बाजारों के विकास को प्रोत्साहन मिला।

प्रश्न 46.
14वीं शताब्दी यूरोप में आए संकट के कौन-से दो प्रमुख कारण उत्तरदायी थे ?
उत्तर:

  • पर्यावरण में परिवर्तन।
  • चाँदी की कमी।

प्रश्न 47.
13वीं शताब्दी में उत्तरी यूरोप में आए पर्यावरण परिवर्तन के क्या प्रभाव पड़े ?
उत्तर:

  • अब गर्मी का स्थान शीत ऋतु ने ले लिया।
  • गर्मी का मौसम छोटा होने से भूमि की उत्पादन क्षमता बहुत कम हो गई।
  • इससे अकालों का दौर आरंभ हो गया।

प्रश्न 48.
14वीं शताब्दी में किन दो देशों में चाँदी की कमी आई? इसका मुख्य प्रभाव क्या पड़ा ?
उत्तर:

  • 14वीं शताब्दी में ऑस्ट्रिया एवं सर्बिया में चाँदी की कमी आ गई।
  • इस कारण व्यापार को जबरदस्त आघात पहुँचा।

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प्रश्न 49.
14वीं शताब्दी में किस बीमारी को काली मौत कहा जाता था ? यह यूरोप में कब फैली ?
उत्तर:

  • 14वीं शताब्दी में ब्यूबोनिक प्लेग को काली मौत कहा जाता था।
  • यह यूरोप में 1347 ई० से 1350 ई० के मध्य फैली।

प्रश्न 50.
14वीं शताब्दी में यूरोप के किसानों ने विद्रोह क्यों किए ?
उत्तर:
14वीं शताब्दी में यूरोप के किसानों ने इसलिए विद्रोह किए क्योंकि सामंतों ने किसानों से किए मजदूरी संबंधी समझौतों का पालन बंद कर दिया था।

प्रश्न 51.
16वीं शताब्दी में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान के प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • सामंतवाद का पतन।
  • मध्य वर्ग का उत्थान।
  • चर्च का प्रभाव।

प्रश्न 52.
मैक्यिावेली के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम क्या था ? यह कब प्रकाशित हुआ ?
उत्तर:

  • मैक्यिावेली के प्रसिद्ध ग्रंथ का नाम ‘दि प्रिंस’ था।
  • इसका प्रकाशन 1513 ई० में हुआ था।

प्रश्न 53.
राष्ट्रीय राज्यों की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उनका अपना राज्य सर्वोच्च है।
  • राजा को असीम शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।

प्रश्न 54.
इंग्लैंड में ट्यूडर वंश की स्थापना किसने तथा कब की ?
उत्तर:
इंग्लैंड में ट्यूडर वंश की स्थापना हेनरी सप्तम ने 1485 ई० में की।

प्रश्न 55.
गुलाबों का युद्ध कब तथा किसके मध्य चला ?
उत्तर:
गुलाबों का युद्ध 1455 ई० से 1485 ई० के मध्य इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य चला।

प्रश्न 56.
सौ वर्षीय युद्ध कब तथा किन दो देशों के मध्य हुआ ?
उत्तर:
सौ वर्षीय युद्ध 1337 ई० से लेकर 1453 ई० तक इंग्लैंड एवं फ्रांस के मध्य चला।

प्रश्न 57.
लुई ग्यारहवाँ कहाँ का शासक था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • लुई ग्यारहवाँ फ्रांस का शासक था।
  • उसने 1461 ई० से 1483 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 58.
लुई ग्यारहवें की कोई दो सफलताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने सामंतों की शक्ति का दमन किया।
  • उसने चर्च पर अंकुश लगाया।

प्रश्न 59.
राष्ट्रीय राज्यों की कोई दो सफलताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उन्होंने सामंतों की शक्ति का दमन कर लोगों को उनके अत्याचारों से मुक्त किया।
  • उन्होंने लोगों में एक नई राष्ट्रीय चेतना का संचार किया।

प्रश्न 60.
राष्ट्रीय राज्यों के पतन के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • राष्ट्रीय राज्यों के शासक अपना अधिकाँश समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करने लगे।
  • राष्ट्रीय राज्यों के शासकों ने अनेक अनुचित कानून लागू किए। इस कारण लोग उनके विरुद्ध हो गए।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में कितने वर्ग प्रचलित थे ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 2.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के प्रथम वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
पादरी।

प्रश्न 3.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के द्वितीय वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग।

प्रश्न 4.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज के तृतीय वर्ग में कौन सम्मिलित था ?
उत्तर:
कृषक वर्ग।

प्रश्न 5.
टीथ क्या होता था ?
उत्तर:
टीथ किसानों द्वारा चर्च को दिया जाने वाला कर था।

प्रश्न 6.
मध्यकाल में क्या प्रत्येक व्यक्ति पादरी बन सकता था ?
उत्तर:
नहीं।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज में किन्हें विशेषाधिकार प्राप्त थे ?
उत्तर:
पादरी एवं कुलीन वर्ग को।

प्रश्न 8.
किस वर्ग के लोगों को प्रशासन एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त किया जाता था ?
उत्तर:
कुलीन वर्ग के।

प्रश्न 9.
मध्यकालीन यूरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या किस वर्ग से संबंधित थी ?
उत्तर:
तृतीय वर्ग से।

प्रश्न 10.
राजा कृषकों पर कौन-सा कर लगाता था ?
उत्तर:
टैली।

प्रश्न 11.
कृषकदास को अपने सामंत की सेना में वर्ष में कम-से-कम कितने दिन कार्य करना पड़ता था ?
उत्तर:
40 दिन।

प्रश्न 12.
कृषकदास किस प्रकार का जीवन व्यतीत करते थे ?
उत्तर:
दयनीय।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 6 तीन वर्ग

प्रश्न 13.
यूरोप में सामंतवादी व्यवस्था का उदय कब हुआ ?
उत्तर:
9वीं शताब्दी में।

प्रश्न 14.
फ़यूड शब्द से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
जागीर।

प्रश्न 15.
किसी एक यूरोपीय देश का नाम बताएँ जहाँ मध्यकाल में सामंतवाद का प्रसार हुआ था ?
उत्तर:
फ्राँस।

प्रश्न 16.
फ्रांस के उस महान् विद्वान् का नाम बताएँ जिसने सामंतवादी व्यवस्था पर विस्तृत प्रकाश डाला है ?
उत्तर:
मार्क ब्लॉक।

प्रश्न 17.
जर्मनी की किस जनजाति ने 486 ई० में गॉल पर अधिकार कर लिया था ?
उत्तर:
फ्रैंक।

प्रश्न 18.
शॉर्लमेन फ्रांस का शासक कब बना ?
उत्तर:
768 ई० में।

प्रश्न 19.
पोप ने शॉर्लमेन को पवित्र रोमन सम्राट् की उपाधि से कब सम्मानित किया.था ?
उत्तर:
800 ई० में।

प्रश्न 20.
इंग्लैंड में सामंतवाद का प्रसार कब हुआ ?
उत्तर:
11वीं शताब्दी में।

प्रश्न 21.
हैस्टिग्ज की लड़ाई कब हुई ?
उत्तर:
1066 ई० में।

प्रश्न 22.
इंग्लैंड का नाम किसका रूपांतरण है ?
उत्तर:
एंजिललैंड का।

प्रश्न 23.
सामंतवादी व्यवस्था में मेनर क्या होता था ?
उत्तर:
लॉर्ड का आवास क्षेत्र।

प्रश्न 24.
सामंत द्वारा नाइट को दिए जाने वाला भूमि का टुकड़ा क्या कहलाता था ?
उत्तर:
फ़ीफ़।

प्रश्न 25.
नाइट का पतन कब हुआ ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी में।

प्रश्न 26.
सामंतों ने किस शैली में दुर्गों एवं भवनों का निर्माण किया ?
उत्तर:
गोथिक।

प्रश्न 27.
क्या धर्मयुद्ध सामंतवादी व्यवस्था के लिए विनाशकारी सिद्ध हुए ?
उत्तर:
हाँ।

प्रश्न 28.
पोप कौन था ?
उत्तर:
चर्च का सर्वोच्च अधिकारी।

प्रश्न 29.
पोप कहाँ निवास करता था ?
उत्तर:
रोम में।

प्रश्न 30.
प्रांतीय बिशपों पर नियंत्रण कौन रखता था ?
उत्तर:
आर्क बिशप।

प्रश्न 31.
मठ का प्रधान कौन होता था ?
उत्तर:
ऐबट

प्रश्न 32.
मठों में कौन रहता था ?
उत्तर:
भिक्षु।

प्रश्न 33.
भिक्षुणियों को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
नन।

प्रश्न 34.
मठों को किस अन्य नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:
ऐबी।

प्रश्न 35.
इटली में सेंट बेनेडिक्ट नामक मठ की स्थापना कब की गई थी ?
उत्तर:
529 ई० में।

प्रश्न 36.
910 ई० में बरगंडी में किस प्रसिद्ध मठ की स्थापना की गई थी ?
उत्तर:
क्लूनी।

प्रश्न 37.
आबेस हिल्डेगार्ड कौन थी ?
उत्तर:
जर्मनी की एक प्रसिद्ध नन।

प्रश्न 38.
उन भिक्षुओं को क्या कहा जाता था जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देते थे ?
उत्तर:
फ्रायर।

प्रश्न 39.
फ्रायर किन दो संघों में विभाजित थे ?
उत्तर:
फ्राँसिस्कन एवं डोमिनिकन।

प्रश्न 40.
फ्रांसिस्कन संघ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
संत फ्राँसिस।

प्रश्न 41.
डोमिनिकन संघ का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
संत डोमिनीक।

प्रश्न 42.
इंग्लैंड के किन दो प्रसिद्ध कवियों ने मठवासियों के जीवन पर पर्याप्त प्रकाश डाला है ?
उत्तर:
लैंग्लैंड एवं जेफ्री चॉसर।

प्रश्न 43.
विश्व में 25 दिसंबर क्यों प्रसिद्ध है ?
उत्तर:
ईसा मसीह के जन्म के कारण।

प्रश्न 44.
मध्यकाल यूरोप में उदय होने वाले किन्हीं दो प्रसिद्ध नगरों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • रोम
  • वेनिस।

प्रश्न 45.
कथील नगरों का निर्माण कहाँ शुरू हुआ ?
उत्तर:
फ्राँस में।

प्रश्न 46.
कथीड्रल की खिड़कियों में किस काँच का प्रयोग किया जाता था ?
उत्तर:
अभिरंजित।

प्रश्न 47.
किस सदी से यूरोप के तापमान में वृद्धि होती चली गई ?
उत्तर:
11वीं सदी से।

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प्रश्न 48.
किस सदी तक विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकियों में बदलाव के प्रमाण मिलते हैं ?
उत्तर:
11वीं सदी तक।

प्रश्न 49.
कोई एक उदाहरण दें जिससे कृषि प्रौद्योगिकी में बदलाव के प्रमाण मिलते हैं ?
उत्तर:
लोहे की भारी नोक वाले हलों का प्रयोग।

प्रश्न 50.
मध्यकालीन यूरोप में कितने खेतों वाली व्यवस्था का प्रयोग आरंभ हुआ ?
उत्तर:
तीन।

प्रश्न 51.
14वीं शताब्दी में यूरोप में आए घोर संकट का कोई एक कारण बताएँ।
उत्तर:
पर्यावरण में परिवर्तन।

प्रश्न 52.
मध्यकाल में यूरोप में सबसे भयंकर अकाल कब पड़े ?
उत्तर:
1315 से 1317 ई० के मध्य।

प्रश्न 53.
‘काली मौत’ किसे कहा जाता था ?
उत्तर:
प्लेग को।

प्रश्न 54.
यूरोप में सर्वप्रथम प्लेग कब फैली ?
उत्तर:
1347 ई० में।

प्रश्न 55.
फ्रांस में कृषकों ने कब विद्रोह किया ?
उत्तर:
1358 ई० में।

प्रश्न 56.
यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का गठन कब आरंभ हुआ ?
उत्तर:
15वीं शताब्दी के अंत में।

प्रश्न 57.
लुई ग्यारहवाँ कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
फ्राँस का।

प्रश्न 58.
ऑस्ट्रिया का प्रसिद्ध निरंकुश शासक कौन था ?
उत्तर:
मैक्समिलन।

प्रश्न 59.
हेनरी सातवाँ कहाँ का शासक था ?
उत्तर:
इंग्लैंड का।

प्रश्न 60.
इंग्लैंड में ट्यूडर राजवंश की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
1485 ई० में।

प्रश्न 61.
जेम्स प्रथम इंग्लैंड का शासक कब बना ?
उत्तर:
1603 ई० में।

प्रश्न 62.
चार्ल्स प्रथम को फाँसी कब दी गई ?
उत्तर:
1649 ई० में।

प्रश्न 63.
सौ वर्षीय युद्ध किन दो देशों के मध्य लड़ा गया था ?
उत्तर:
फ्राँस तथा इंग्लैंड।

प्रश्न 64.
लुई तेरहवें ने एस्टेट्स जनरल को कब भंग किया ?
उत्तर:
1614 ई० में।

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प्रश्न 65.
पुर्तगाल एवं स्पेन के मध्य टार्डीसिलास की संधि कब हुई ?
उत्तर:
1494 ई० में।

रिक्त स्थान भरिए

1. सामंतवाद जर्मन भाषा के शब्द ……………… से बना है।
उत्तर:
फ्यूड

2. फ्रांस में 768 ई० से 814 ई० तक ……………… ने शासन किया।
उत्तर:
शॉर्लमेन

3. फ्रांस के समाज के मुख्यतः तीन वर्ग पादरी, अभिजात तथा ……………… वर्ग थे।
उत्तर:
कृषक

4. लॉर्ड का आवास क्षेत्र ………………. कहलाता था।
उत्तर:
मेनर

5. फ्रांस की कुशल अश्वसेना को ……………….. कहा जाता था।
उत्तर:
नाइट

6. फ्रांस में लॉर्ड द्वारा नाइट को दी जाने वाली भूमि को ……………… कहते थे।
उत्तर:
फ़ीफ़

7. चर्च द्वारा कृषकों से लिए जाने वाले कर के अधिकार को ……………….. कहा जाता था।
उत्तर:
टीथ

8. पादरियों के निवास स्थान को ……………… कहा जाता था।
उत्तर:
मोनेस्ट्री

9. आर्थिक संस्था का आधार
उत्तर:
गिल्ड

10. फ्रांस में कृषकों का विद्रोह ……………….. ई० में चला।
उत्तर:
1381

11. फ्रांस एवं इंग्लैंड के मध्य ………………. युद्ध 1337 ई० से 1453 ई० तक चला।
उत्तर:
सौ वर्षीय

12. इंग्लैंड में हेनरी सप्तम द्वारा 1485 ई० में ……………….. वंश की स्थापना की गई।
उत्तर:
ट्यूडर

13. ……………. ई० में पुर्तगाल की स्पेन के साथ टार्डीसिलास की संधि हुई।
उत्तर:
1494

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. मध्यकालीन यूरोपीय समाज कितने वर्गों में विभाजित था ?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) पाँच।
उत्तर:
(ख) तीन

2. मध्यकालीन यूरोपीय समाज में किस वर्ग को समाज में सर्वोच्च स्थान प्राप्त था ?
(क) कुलीन वर्ग
(ख) अध्यापक वर्ग
(ग) कृषक वर्ग
(घ) पादरी वर्ग।
उत्तर:
(घ) पादरी वर्ग।

3. चर्च किसानों पर जो कर लगाता था वह क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) टीथ
(ग) ऐबी
(घ) टैली।
उत्तर:
(ख) टीथ

4. मध्यकालीन यरोपीय समाज की अधिकाँश जनसंख्या किस वर्ग से संबंधित थी ?
(क) कृषक वर्ग
(ख) कुलीन वर्ग
(ग) पादरी वर्ग
(घ) व्यापारी वर्ग।
उत्तर:
(क) कृषक वर्ग

5. कृषकदासों पर निम्नलिखित में से कौन-सा प्रतिबंध लगा हुआ था ?
(क) वे सामंत की अनुमति के बिना उसकी जागीर को नहीं छोड़ सकते थे।
(ख) वे अपने पुत्र-पुत्रियों का विवाह सामंत की अनुमति के बिना नहीं कर सकते थे।
(ग) वे अपने स्वामी के अत्याचारी होने पर उसके विरुद्ध कोई अपील नहीं सकते थे।
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

6. फ़्यूड किस भाषा का शब्द है ?
(क) जर्मन
(ख) फ्रैंच
(ग) अंग्रेजी
(घ) फ़ारसी।
उत्तर:
(क) जर्मन

7. शॉर्लमेन किस देश का शासक था ?
(क) चीन
(ख) जापान
(ग) इंग्लैंड
(घ) फ्राँस।
उत्तर:
(घ) फ्राँस।

8. निम्नलिखित में से किस देश में सामंतवाद का सर्वप्रथम उदय हुआ ?
(क) फ्राँस
(ख) जर्मनी
(ग) ऑस्ट्रिया
(घ) स्पेन।
उत्तर:
(क) फ्राँस

9. लॉर्ड का आवास क्षेत्र क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) नाइट
(ग) मेनर
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) मेनर

10. लॉर्ड अपनी जागीर में से नाइट को जो भाग देता था वह क्या कहलाता था ?
(क) फ़ीफ़
(ख) टैली
(ग) टीथ
(घ) मेनर।
उत्तर:
(क) फ़ीफ़

11. सामंतवाद का पतन किस सदी में हुआ ?
(क) 12वीं सदी में
(ख) 13वीं सदी में
(ग) 14वीं सदी में
(घ) 15वीं सदी में।
उत्तर:
(घ) 15वीं सदी में।

12. सामंतवाद के पतन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उत्तरदायी था ?
(क) धर्मयुद्धों का प्रभाव
(ख) राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान
(ग) मुद्रा का प्रचलन
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

13. निम्नलिखित में से किसे यूरोप में ‘काली मौत’ के नाम से जाना जाता था ?
(क) हैजा को
(ख) प्लेग को
(ग) कैंसर को
(घ) एड्स को।
उत्तर:
(ख) प्लेग को

14. मध्यकाल में निम्नलिखित में से कौन-सा चर्च का कार्य था ?
(क) सामाजिक एवं धार्मिक रीति-रिवाजों संबंधी नियम बनाना
(ख) विद्यार्थियों को शिक्षा देना
(ग) धर्म विद्रोहियों के विरुद्ध मुकद्दमे चलाना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

15. चर्च का सर्वोच्च अधिकारी कौन था ?
(क) पादरी
(ख) बिशप
(ग) पोप
(घ) आर्क बिशप।
उत्तर:
(ग) पोप

16. कैथोलिक चर्च का मुखिया कौन होता था ?
(क) पोप
(ख) पादरी
(ग) कृषक
(घ) राजा।
उत्तर:
(क) पोप

17. पोप का निवास स्थान कहाँ था ?
(क) पेरिस
(ख) रोम
(ग) लंदन
(घ) जेनेवा।
उत्तर:
(ख) रोम

18. मध्यकाल यूरोप में भिक्षुओं के निवास स्थान क्या कहलाते थे ?
(क) मेनर
(ख) ऐबी
(ग) फ़ीफ़
(घ) जागीर।
उत्तर:
(ख) ऐबी

19. मठ का प्रधान क्या कहलाता था ?
(क) पादरी
(ख) पोप
(ग) आर्क बिशप
(घ) ऐबट।
उत्तर:
(घ) ऐबट।

20. बरगंडी में स्थापित प्रसिद्ध मठ कौन-सा था ?
(क) बेनेडिक्टीन
(ख) क्लूनी
(ग) ऐबी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) क्लूनी

21. फ्रायर कौन थे ?
(क) चर्च अधिकारी
(ख) प्रांतीय अधिकारी
(ग) मेनर अधिकारी
(घ) भिक्षु।
उत्तर:
(घ) भिक्षु।

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22. क्लूनी मठ को लोकप्रिय बनाने में किसने उल्लेखनीय योगदान दिया ?
(क) आबेस हिल्डेगार्ड
(ख) सेंट बेनेडिक्ट
(ग) संत फ्राँसिस
(घ) संत डोमिनीक।
उत्तर:
(क) आबेस हिल्डेगार्ड

23. ‘पियर्स प्लाउमैन’ का लेखक कौन था ?
(क) जेफ्री चॉसर
(ख) लैंग्लैंड
(ग) आबेस हिल्डेगार्ड
(घ) शॉर्लमेन।
उत्तर:
(ख) लैंग्लैंड

24. ईसा मसीह का जन्म दिन किस दिन मनाया जाता है ?
(क) 15 दिसंबर को
(ख) 20 दिसंबर को
(ग) 25 दिसंबर को
(घ) 1 जनवरी को।
उत्तर:
(ग) 25 दिसंबर को

25. मध्यकालीन यूरोप में नगरों के विकास में किसने योगदान दिया ?
(क) कृषि का विकास
(ख) व्यापार का विकास
(ग) धर्मयुद्ध
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

26. कथील नगरों का निर्माण किस देश में आरंभ हुआ ?
(क) इंग्लैंड
(ख) फ्राँस
(ग) ऑस्ट्रेलिया
(घ) इटली।
उत्तर:
(ख) फ्राँस

27. नगरों में व्यापार के कुशल संचालन के लिए निम्नलिखित में से किसका गठन किया गया ?
(क) मठों का
(ख) मेनर का
(ग) श्रेणी का
(घ) कथीलों का।
उत्तर:
(ग) श्रेणी का

28. 11वीं शताब्दी में निम्नलिखित में से किस कारक ने सामाजिक-आर्थिक संबंधों को प्रभावित किया ?
(क) पर्यावरण के परिवर्तन ने
(ख) कृषि के लिए नई भूमि के उपयोग ने
(ग) नई कृषि प्रौद्योगिकी ने
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

29. 11वीं शताब्दी में कृषि प्रौद्योगिकी में कौन-सा परिवर्तन आया ?
(क) लकड़ी के स्थान पर लोहे के हलों का प्रयोग
(ख) साँचेदार पटरों का प्रयोग
(ग) घोड़े के खुरों पर अब लोहे के नाल लगायी जाने लगी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

30. 14वीं शताब्दी में यूरोप में आए घोर संकट का प्रमुख कारण क्या था ?
(क) पर्यावरण में परिवर्तन
(ख) प्लेग का फैलना
(ग) चाँदी की कमी
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

31. ‘काली मौत’ के प्रथम लक्षण यूरोप में कब देखने को मिले थे ?
(क) 1347 ई० में
(ख) 1348 ई० में
(ग) 1350 ई० में
(घ) 1357 ई० में।
उत्तर:
(क) 1347 ई० में

32. यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों का उत्थान कब हुआ ?
(क) 14वीं शताब्दी में
(ख) 15वीं शताब्दी में
(ग) 16वीं शताब्दी में
(घ) 17वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(ख) 15वीं शताब्दी में

33. निम्नलिखित में से किस देश में राष्ट्रीय राज्यों का सर्वप्रथम उत्थान हुआ ?
(क) फ्राँस
(ख) स्पेन
(ग) इंग्लैंड
(घ) पुर्तगाल।
उत्तर:
(ग) इंग्लैंड

तीन वर्ग HBSE 11th Class History Notes

→ 9वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी तक पश्चिमी यूरोप का समाज तीन वर्गों-पादरी वर्ग, कुलीन वर्ग एवं किसान वर्ग में विभाजित था। समाज में सर्वोच्च स्थान पादरी वर्ग को प्राप्त था। पादरियों को पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि समझा जाता था।

→ इसलिए समाज द्वारा उनका विशेष सम्मान किया जाता था। यहाँ तक कि राजा भी उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे। उन्हें अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे सभी प्रकार के करों से मुक्त थे। कृषकदास, अपाहिज व्यक्ति एवं स्त्रियाँ पादरी नहीं बन सकती थीं। कुलीन वर्ग को समाज में दूसरा स्थान प्राप्त था।

→ इस वर्ग के लोग प्रशासन, चर्च एवं सेना के उच्च पदों पर नियुक्त थे। उन्हें भी अनेक विशेषाधिकार प्राप्त थे। वे भव्य महलों में रहते थे एवं विलासिता का जीवन व्यतीत करते थे। किसान यरोपीय समाज के सबसे निम्न वर्ग में सम्मिलित थे। यूरोप की अधिकाँश जनसंख्या इस वर्ग से संबंधित थी।

→ इनमें स्वतंत्र किसानों की संख्या बहुत कम थी। अधिकांश किसान कृषकदास थे। उन्हें अपने गुजारे के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी। वास उनका जीवन नरक के समान था।

→ सामंतवाद मध्यकालीन पश्चिमी यूरोप की एक महत्त्वपूर्ण संस्था थी। इसमें राजा अपने बड़े सामंतों एवं बड़े सामंत अपने छोटे सामंतों में जागीरों का बँटवारा करते थे। ऐसा कुछ शर्तों के अधीन किया जाता था।

→ रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् पश्चिमी यूरोप में फैली अराजकता एवं केंद्रीय सरकारों के कमजोर होने के कारण राजाओं के लिए सामंतों का सहयोग लेना आवश्यक हो गया था। सामंतवाद का प्रसार यूरोप के अनेक देशों में हुआ।

→ इनमें फ्राँस, इंग्लैंड, जर्मनी, इटली एवं स्पेन के नाम उल्लेखनीय थे। सामंतवाद के यूरोपीय समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़े। इसने यूरोपीय समाज में कानून व्यवस्था लागू करने, कुशल प्रशासन देने, निरंकुश राजतंत्र पर नियंत्रण लगाने एवं कला एवं साहित्य को प्रोत्साहन देने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

→ सामंतवादी व्यवस्था ने दूसरी ओर शासकों को कमज़ोर किया, किसानों का घोर शोषण किया, युद्धों को प्रोत्साहित किया एवं राष्ट्रीय एकता के मार्ग में एक प्रमुख बाधा सिद्ध हुई। 15वीं शताब्दी में सामंतवाद का अनेक कारणों के चलते पतन हो गया।

→ मध्यकाल में पश्चिमी यूरोप में चर्च भी एक शक्तिशाली संस्था थी। इसका समाज पर गहन प्रभाव था। वास्तव में चर्च द्वारा ही सभी प्रकार के सामाजिक एवं धार्मिक नियम बनाए जाते थे। पोप चर्च का सर्वोच्च अधिकारी होता था। वह रोम में निवास करता था।

→ चर्च के अन्य अधिकारी-आर्कबिशप, बिशप एवं पादरी आदि पोप के निर्देशों के अनुसार कार्य करते थे। चर्च के विकास में मठवाद ने प्रशंसनीय योगदान दिया। मठ में रहने वाले भिक्षु-भिक्षुणियों के लिए अनेक नियम बनाए गए थे, जिनका पालन करना आवश्यक था।

→ वे लोगों को पवित्र जीवन व्यतीत करने, शिक्षा प्राप्त करने एवं गरीबों एवं रोगियों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करते थे। 529 ई० में इटली में स्थापित सेंट बेनेडिक्ट एवं 910 ई० में बरगंडी में स्थापित क्लूनी मठ विशेष रूप से उल्लेखनीय थे।

→ क्लूनी मठ की स्थापना विलियम प्रथम ने की थी। इस मठ को लोकप्रिय बनाने में जर्मनी की भिक्षुणी आबेस हिल्डेगार्ड ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 13वीं शताब्दी में फ्रायर नामक भिक्षुओं का उत्थान हुआ।

→ वे मठों में रहने की अपेक्षा बाहर भ्रमण कर लोगों को ईसा मसीह के संदेश से अवगत करवाते थे। फ्रायर दो संघों फ्रांसिस्कन एवं डोमिनिकन में विभाजित थे। मध्यकाल में चर्च ने लोगों में एक नई जागति उत्पन्न करने में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ मध्यकाल यरोप में नगरों का विकास एक महान उपलब्धि थी। इसका कारण यह था कि रोमन साम्राज्य के पतन के पश्चात् यूरोप के अनेक नगर बर्बर आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिए गए थे। नगरों के उत्थान में कृषि एवं व्यापार के विकास, धर्मयुद्धों के प्रभाव एवं नगरों की स्वतंत्रता ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

→ इस काल में जिन नगरों का उत्थान हुआ उनमें महत्त्वपूर्ण वेनिस, मिलान, वियाना, प्रेग, रोम, लंदन, नेपल्स एवं जेनेवा आदि थे। इन नगरों की सुरक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया जाता था। इसका कारण यह था कि उस समय युद्ध एक साधारण बात थी।

→ इन नगरों में आधारभूत सुविधाओं की कमी थी। मध्यकालीन नगर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। व्यापार को प्रोत्साहित करने में श्रेणियों की प्रमुख भूमिका थी। 1100 ई० के पश्चात् फ्राँस में कथील नगरों का निर्माण हुआ। शीघ्र ही ऐसे नगर यूरोप के अन्य शहरों में भी बनाए जाने लगे।

→ इन नगरों में पत्थर के विशाल चर्च बनाए जाते थे। चर्च में खिड़कियों के लिए अभिरंजित काँच का प्रयोग किया जाता था। मध्यकालीन नगरों ने यूरोपीय सभ्यता एवं संस्कृति पर दूरगामी प्रभाव डाले।

→ 16वीं शताब्दी में यूरोप में राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान को यूरोप के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना माना जाता है। इस काल में सामंतवाद के पतन, चर्च के प्रभाव, धर्मयुद्धों के कारण, मध्यवर्ग के उत्थान, शक्तिशाली शासकों के उदय एवं विद्वानों के लेखों के कारण राष्ट्रीय राज्यों के उत्थान में सहायता मिली।

→ राष्ट्रीय राज्य वे राज्य होते हैं जिसमें राजा सर्वोच्च होता है एवं उसकी शक्तियाँ असीम होती हैं। किसी भी व्यक्ति को उसकी आज्ञा का उल्लंघन करने का अधिकार नहीं होता।

→ इंग्लैंड में राष्ट्रीय राज्य स्थापित करने में हेनरी सप्तम, जेम्स प्रथम एवं चार्ल्स प्रथम ने, फ्रांस में लुई ग्यारहवें ने, स्पेन में फर्डीनेंड एवं ईसाबेला ने एवं पुर्तगाल में राजकुमार हेनरी ने उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ इन राष्ट्रीय राज्यों ने अनेक उल्लेखनीय सफलताएँ प्राप्त की। बाद में अनेक कारणों से इन राष्ट्रीय राज्यों का पतन हो गया।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
12वीं शताब्दी में यायावरिता के स्वरूप का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था। 12वीं शताब्दी में चंगेज़ खाँ के उत्थान से पूर्व मंगोल यायावरिता के स्वरूप की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. प्रमुख व्यवसाय (Chief occupations):
12वीं शताब्दी में यायावरी कबीलों का प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। उस समय मंगोलिया में अनेक अच्छी चरागाहें थीं। अल्ताई पहाड़ों की बर्फीली चोटियों से निकलने वाले सैंकड़ों झरनों तथा ओनोन (Onon) एवं सेलेंगा (Selenga) नदियों के पानी के कारण यहाँ हरी घास प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती थी।

मंगोल जिन पशुओं का पालन करते थे उनमें प्रमुख थे घोड़े एवं भेड़ें। इनके अतिरिक्त वे गायों, बकरियों एवं ऊँटों का पालन भी करते थे। इन पशुओं का प्रयोग वे दूध, माँस एवं ऊन प्राप्त करने के लिए तथा सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ढोने के लिए करते थे। घोड़ों का प्रयोग वे घुड़सवारी के लिए करते थे। मंगोल घोड़ों पर सवार होकर ही युद्धों में भाग लेते थे।

कुछ मंगोल शिकार संग्राहक (hunter gatherers) थे। वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे एवं मछलियाँ पकडते थे। वे साइबेरियाई वनों में रहते थे। वे पशुपालक लोगों की तुलना में अधिक गरीब होते थे। उस समय मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं। अतः यायावरी कबीले कृषि कार्य नहीं करते थे। इस कारण यायावरी कबीलों की अर्थव्यवस्था घनी जनसंख्या वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में समर्थ नहीं थी। अतः यहाँ कोई नगर नहीं उभर पाया।

2. निवास स्थान (Dwellings):
यायावरी कबीले चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। अतः वे किसी स्थान में स्थाई रूप से नहीं रहते थे। मंगोल गोलाकार तंबुओं में रहते थे जिसे वे जर (ger) कहते थे। जनसाधारण लोगों के तंबू छोटे आकार के होते थे। धनी लोगों के तंबुओं का आकार बड़ा होता था। ये तंबु सन के बने होते थे। इन तंबुओं का प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर होता था। इसका कारण यह था कि मंगोलिया में शीत हवाएँ उत्तर की ओर से आती थीं। तंबू को दो भागों में बाँटा जाता था। एक भाग मेहमानों के लिए होता था। दूसरा भाग घर के सदस्यों के लिए होता था।

3. समाज (Society):
यायावरी समाज की मूल इकाई परिवार थी। उस समय परिवार पितृपक्षीय (patriarchal) होते थे। परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति इसकी देखभाल करता था। धनी परिवार बहुत विशाल होते थे। उनके पास अधिक संख्या में पशु एवं चारागाहें होती थीं। इस कारण उनके अनेक अनुयायी होते थे तथा स्थानीय राजनीति में उनकी उल्लेखनीय भूमिका होती थी।

प्राकृतिक आपदाओं जैसे भीषण शीत ऋतु के दौरान एकत्रित की गई शिकार एवं अन्य सामग्रियों के समाप्त हो जाने की स्थिति में अथवा वर्षा न होने पर घास के मैदानों के सूख जाने की स्थिति चारागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।

इस कारण वे लटपाट करने के लिए बाध्य हो जाते थे। अतः परिवारों के समूह अपनी रक्षा हेतु अधिक शक्तिशाली कुलों से मित्रता कर लेते थे तथा परिसंघ का गठन कर लेते थे। अधिकांश परिसंघ छोटे एवं अल्पकालिक होते थे। उस समय परिवार में पुत्र का होना बहुत आवश्यक माना जाता था।

उस समय मंगोल समाज में बहु-विवाह (polygamy) प्रथा प्रचलित थी। उस समय स्त्रियाँ समाज में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। वे न केवल घरेलू कार्य करती थीं अपितु आवश्यकता पड़ने पर रणभूमि में दुश्मनों से लोहा लेती थीं।

4. भोजन (Diet) :
यायावरी लोगों का प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। मंगोल घोड़े का माँस खाने के बहुत शौकीन थे। वे गायों, भेड़ों एवं बकरियों का माँस भी खाते थे। इनके अतिरिक्त वे कुत्तों, लोमड़ियों, खरगोशों तथा चूहों का माँस भी खाते थे। वे सामान्य तौर पर पकाए हुए अथवा उबले हुए माँस का प्रयोग करते थे। कभी-कभी वे कच्चा माँस भी खा जाते थे। बचे हुए माँस को वे चमड़े के थैले में रख लेते थे।

वे खाने के बर्तनों की सफाई की ओर बहुत कम ध्यान देते थे। वे घोड़ी का दूध पीने के बहुत शौकीन थे। इसे कुम्मी (kumiss) कहा जाता था। धनी लोग शराब पीने के भी शौकीन थे। इसे. चीन से मंगवाया जाता था। इसके सेवन को बहुत सम्मानजनक समझा जाता था।

5. पोशाक (Dress):
यायावरी लोग सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। वे सूती एवं रेशमी वस्त्रों का चीन से आयात करते थे। ऊनी वस्त्र वे स्वयं बनाते थे। जनसाधारण के वस्त्र सामान्य प्रकार के होते थे। धनी लोग बहुमूल्य वस्त्रों को धारण करते थे। सर्दियों से बचाव के लिए वे फर के कोट एवं टोप पहनते थे। स्त्रियों के वस्त्र एवं उनके सिर पर डालने वाला टोप विशेष प्रकार से बना होता था।

6. मृतकों का संस्कार (Disposal of the Dead):
यायावरी लोग रात्रि के समय अपने मृतकों का संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे। मंगोल मृत्यु के पश्चात् जीवन में विश्वास रखते थे। अतः वे शवों के साथ खाने-पीने की वस्तुएँ एवं बर्तनों आदि को भी रखते थे। धनी व्यक्तियों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुएँ, उसके घोड़ों, नौकरों एवं स्त्रियों को भी दफ़न किया जाता था। प्रायः शवों को उस स्थान पर दफ़न किया जाता था जिसका चुनाव उसने अपने जीवनकाल में किया हो अथवा जो स्थान उसे सबसे अधिक प्रिय हो।

7. व्यापार (Trade):
स्टेपी क्षेत्र अथवा मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः यायावरी कबीले व्यापार के लिए अपने पड़ोसी देश चीन पर निर्भर करते थे। उनका व्यापार वस्तु-विनिमय (barter) पर आधारित था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीले चीन से कृषि उत्पाद एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे। इनके बदले वे घोड़ों, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे।

कभी-कभी दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने हेतु सैनिक कार्यवाही कर बैठते थे एवं लूटपाट में भी सम्मिलित हो जाते थे। इस संघर्ष में यायावरों को कम हानि होती थी। इसका कारण यह था कि वे लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे। चीन को इन यायावरी आक्रमणों से बहुत क्षति पहुँचती थी। अतः चीनी शासकों ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए ‘चीन की महान् दीवार’ को अधिक मज़बूत किया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 2.
चंगेज़ खाँ कौन था? उसके प्रारंभिक जीवन एवं उत्थान के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ यायावर साम्राज्य अथवा मंगोलों का सबसे महान् एवं प्रसिद्ध शासक था। चंगेज़ खाँ के प्रारंभिक जीवन के बारे में हमें अधिक जानकारी प्राप्त नहीं है। प्राप्त स्रोतों के आधार पर हमें जो जानकारी प्राप्त हुई है उसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार है

1. जन्म एवं माता-पिता (Birth and Parents):
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ इस संबंध में इतिहासकारों में मतभेद हैं। अधिकांश इतिहासकारों का कथन है कि चंगेज़ खाँ का जन्म 1162 ई० में हुआ। कुछ इतिहासकारों का विचार है कि चंगेज खाँ का जन्म 1167 ई० में हुआ। चंगेज़ खाँ का जन्म मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था। उसके पिता का नाम येसूजेई (Yesugei) था। वह एक छोटे से कबीले कियात (Kiyat) का मुखिया था। वह बोरजिगिद (Borjigid) कुल से संबंधित था।

चंगेज खाँ की माता का नाम ओलुन-के (Oelun-eke) था। वह ओंगीरत (Onggirat) कबीले से संबंधित थी। चंगेज खाँ का बचपन का नाम तेमुजिन (Temujin) था। कहा जाता है कि जिस समय बालक का जन्म हुआ उस समय उसका पिता येसूजेई अपने एक विरोधी तातार (Tatar) कबीले के मुखिया तेमुजिन को पराजित कर वापस लौटा था। अत: मंगोलियाई परंपरा के अनुसार नव जन्मे बालक का नाम तेमुजिन रखा गया।

2. तेमुजिन की कठिनाइयाँ (DImculties of Temujin):
तेमुजिन की अल्पायु में उसके पिता येसूजेई की धोखे से तातार कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। येसूजेई की हत्या का समाचार सुनकर तेमुजिन की माँ ओलुन इके पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पाँच बच्चों को लेकर कहाँ जाए। कियात कबीले के लोग तेमुजिन को अपना मुखिया स्वीकार करने को तैयार नहीं थे क्योंकि वह स्वयं अभी एक बच्चा था।

इस संकट के समय में ओलुन-इके ने अपना धैर्य न खोया। वह शिकार कर एवं जंगली फल खाकर अपना एवं अपने बच्चों का गुजारा करती रही। वह तेमुजिन को अपने कबीले की गौरव गाथाएँ सुनाकर एक नई प्रेरणा स्रोत उत्पन्न करती रही।

3. तेमुजिन के बहादुरी भरे कारनामे (Acts of Bravery of Temujin):
तेमुजिन जब युवा हुआ तो उसमें अदम्य उत्साह था। एक बार उसके विरोधी कबीले वालों ने तेमुजिन पर अचानक आक्रमण कर उसे बंदी बना लिया। निस्संदेह यह तेमुजिन के लिए सबसे विकट स्थिति थी।

ऐसे समय में तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया। एक दिन जब कबीले के लोग रंगरलियों में मस्त थे तो यह स्वर्ण अवसर देखकर तेमुजिन वहाँ से भागने में सफल हुआ। वह वापस अपने परिवार के सदस्यों के साथ आ मिला। यह घटना उसके जीवन में एक नया मोड़ सिद्ध हुई। एक दिन कुछ चोरों ने तेमुजिन के परिवार के आठ घोड़ों को चुरा लिया।

जब तेमुजिन को इसका पता चला तो वह फौरन अपने घोड़े पर अकेला ही उनके पीछे हो लिया। रास्ते में बोघूरचू (Boghurchu) नामक एक युवक उसके साथ हो लिया। इन दोनों ने चोरों को घेर लिया तथा अत्यंत बहादुरी से अपने घोड़ों को छुड़वा लिया। इस प्रकार बोधूरचू तेमुजिन का प्रथम मित्र बना। वे सदैव एक विश्वस्त साथी के रूप में एक-दूसरे के साथ रहे। जब तेमुजिन 18 वर्ष का हुआ तो उसका विवाह बोरटे के साथ हो गया। इस विवाह के कारण तेमुजिन की स्थिति कुछ सुदृढ़ हुई।

तेमुजिन ने जमूका (Jamuqa) को जो कि जजीरात (Jajirat) कबीले से संबंधित था को अपना सगा भाई (आंडा anda) बनाया। इसके पश्चात् तेमुजिन तुगरिल खाँ (Tughril Khan) अथवा ओंग खाँ (Ong Khan) से आशीर्वाद लेने उसके दरबार में पहुंचा।

वह कैराईट (Kereyite) कबीले का मुखिया था तथा तेमुजिन के पिता का सगा भाई (आंडा) बना था। तुगरिल खाँ ने उसका गर्मजोशी से स्वागत किया। इसी समय के दौरान मेरकिट (Merkit) कबीले के मुखिया ने तेमुजिन के कैंप पर आक्रमण कर दिया तथा उसकी पत्नी बोरटे को बंदी बनाकर अपने साथ ले गया।

इस संकट के समय में जमूका एवं तुगरिल खाँ ने तेमुजिन की बहुमूल्य सहायता की। अत: वह अपनी पत्नी बोरटे को मेरकिट कबीले के चंगुल से छुड़ाने में सफल रहा। प्रसिद्ध इतिहासकार जॉर्ज वर्नडस्की के अनुसार, “मेरकिटों के विरुद्ध अभियान के दौरान तेमुजिन ने बहुत बहादुरी दिखायी तथा उसने अनेक नए मित्र बनाए। वास्तव में यह उसके जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुई।”

4. तेमुजिन का चंगेज खाँ बनना (Temujin became Genghis Khan):
अपनी आरंभिक सफलताओं न का साहस बढ़ गया था। इसी समय जमूका, तेमुजिन एवं तुगरिल खाँ के मध्य बढ़ते हुए मैत्रीपूर्ण संबंधों के कारण ईर्ष्या करने लगा। उसने तेमुजिन के सभी विरोधी कबीलों के साथ गठजोड़ आरंभ कर दिया था। तेमुजिन इसे सहन करने को तैयार नहीं था। अतः उसने तुगरिल खाँ के सहयोग से जमूका को कड़ी पराजय दी।

निस्संदेह यह तेमुजिन की एक महान् सफलता थी। इसके पश्चात् तेमुजिन ने शक्तिशाली तातार, नेमन एवं कैराईट कबीलों को पराजित किया। स्वयं तुगरिल खाँ जो बाद में तेमुजिन का शत्रु बन गया था उससे पराजित हुआ।

इस कारण तेमुजिन स्टेपी क्षेत्र की राजनीति में सबसे प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में उभरा। तेमुजिन की इन महान् उपलब्धियों को देखते हुए कुरिलताई (quriltai) जो कि मंगोल सरदारों की एक सभा थी, ने 1206 ई० में उसे चंगेज़ खाँ (सार्वभौम शासक) की उपाधि से सम्मानित किया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 3.
चंगेज खाँ की विजयों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए। उसकी सफलता के क्या कारण थे?
उत्तर:
1206 ई० में चंगेज़ खाँ मंगोलों का नया शासक बना। उसने सर्वप्रथम अपनी स्थिति को सुदृढ़ बनाने की ओर ध्यान दिया। इस उद्देश्य से चंगेज़ खाँ ने अपनी एक विधि संहिता यास (Yasa) को लागू किया। इसके पश्चात् उसने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया। इस सेना के सहयोग से चंगेज खाँ ने महान् सफलताएँ प्राप्त की। इन सफलताओं का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. उत्तरी चीन की विजय (Conquest of Northern China):
चंगेज़ खाँ ने सर्वप्रथम अपना ध्यान चीन की ओर दिया। उस समय चीन तीन राज्यों में विभाजित था। प्रथम राज्य उत्तर-पश्चिमी प्रांत था। यहाँ तिब्बती मूल के सी सिआ (Hsi Hsia) लोगों का शासन था। दूसरे राज्य में चीन का उत्तरी क्षेत्र आता था। यहाँ चिन राजवंश का शासन था। तीसरे राज्य में चीन का दक्षिणी क्षेत्र सम्मिलित था। यहाँ शंग राजवंश का शासन था।

चीन पर आक्रमण करने से पूर्व चंगेज़ खाँ ने अपनी सेना को संबोधित करते हुए कहा, “चीन के शासकों ने हमारे पूर्वजों एवं मेरे संबंधियों का बहुत अपमान किया है। अब वह महान् परमात्मा मुझे यह भरोसा दिलाता है कि विजय हमारी होगी। चीन के इस राज्य में उसने मुझे अवसर एवं शक्ति दी है ताकि मैं अपने पूर्वजों के अपमान का बदला ले सकूँ।

चीन के विरुद्ध चंगेज़ खाँ का अभियान एक लंबे समय तक चला। 1209 ई० में चंगेज़ खाँ ने सर्वप्रथम सी सिआ लोगों को सुगमता से पराजित कर दिया। 1215 ई० में चंगेज़ खाँ ने पीकिंग (Peking) पर कब्जा करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात् चंगेज़ खाँ ने पीकिंग में भयंकर लूटमार मचाई। चिन शासक को भी बाध्य होकर अपनी एक पुत्री का विवाह चंगेज़ खाँ से करना पड़ा। चंगेज़ खाँ की यह विजय उसके लिए बहुत निर्णायक सिद्ध हुई।

2. करा खिता की विजय (Conquest of Qara Khita):
चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन की विजय के पश्चात् अपना ध्यान करा खिता की विजय की ओर किया। इस उद्देश्य से उसने 1218 ई० में 20,000 सैनिकों को मंगोल सेनापति जेब (Jeb) की अधीनता में करा खिता भेजा। उस समय करा खिता में कुचलुग (Kuchlug) का शासन था।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 iMG 1

जेब ने सुगमता से कुचलुग को पराजित कर करा खिता पर अधिकार कर लिया। इस विजय के कारण मंगोल साम्राज्य की सीमाएँ अमू दरिया (Amu Darya), तूरान (Turan) एवं ख्वारज़म (Khwarazm) राज्य तक फैल गईं।

3. ख्वारज़म शाह के विरुद्ध अभियान (The Campaign against the Khwarazm Shah):
1200 ई० में मुहम्मद (Muhammad) ख्वारज़म का नया शाह बना था। उसने अपने शासनकाल में अनेक क्षेत्रों पर अधिकार कर अपने साम्राज्य का काफी विस्तार कर लिया था। ऐसे शक्तिशाली साम्राज्य से टक्कर लेना चंगेज़ खाँ के लिए कोई सहज कार्य न था। 1218 ई० में चंगेज़ खाँ ने चार सदस्यों का एक व्यापारिक मंडल मुहम्मद के पास भेजा।

जब यह मंडल ख्वारजम साम्राज्य के ओट्रार (Otrar) नामक स्थान पर ठहरा तो वहाँ के गवर्नर इनाल खाँ (Inal Khan) ने मुहम्मद के इशारे पर इन सदस्यों का वध कर दिया तथा उनका सामान लूट लिया। जब यह समाचार चंगेज़ खाँ को मिला तो उसने मुहम्मद को संदेश भेजा कि वह इनाल खाँ के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करे तथा उसे बंदी बनाकर उसके दरबार में भेजे। मुहम्मद ने ऐसा करने से इंकार कर दिया। परिणामस्वरूप चंगेज़ खाँ आग बबूला हो गया। उसने मुहम्मद को एक अच्छा सबक सिखाने का निर्णय किया।

उसने लगभग एक लाख सैनिकों की विशाल सेना के साथ ख्वारज़म साम्राज्य पर 1219 ई० में आक्रमण कर दिया। मंगोल सेना ने जिस ओर रुख किया वही भयंकर तबाही मचा दी। लाखों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया एवं अनेक नगरों एवं गाँवों का ऐसा विनाश किया गया कि जिसे सुनकर रूह भी काँप उठे। 1219 ई० से 1222 ई० के दौरान मंगोल सेना ने ओट्रार (1219 ई०), बुखारा (1220 ई०), समरकंद (1220 ई०), बल्ख (1221 ई०), मर्व (1221 ई०), निशापुर (1221 ई०) एवं हेरात (1222 ई०) पर कब्जा कर लिया। मुहम्मद ने मंगोल सेना का सामना करने का साहस न किया।

वह एक स्थान से दूसरे स्थान पर भागता रहा। उसका पीछा करते हुए मंगोल सेनाएँ अज़रबैजान (Azerbaizan) तक चली गईं। यहाँ मंगोल सेना ने क्रीमिया (Crimea) में रूसी सेना को कड़ी पराजय दी। मुहम्मद का पुत्र जलालुद्दीन भाग कर भारत आ गया। चंगेज़ खाँ उसका पीछा करता हुआ 1221 ई० में भारत आ पहुँचा। यहाँ की भयंकर गर्मी के कारण एवं चंगेज़ खाँ के ज्योतिषी द्वारा दिए गए अशुभ संकेतों के कारण चंगेज़ खाँ ने वापस मंगोलिया लौटने का निर्णय किया।

4. साम्राज्य का विस्तार (Extent of the Empire):
चंगेज़ खाँ की 1227 ई० में मृत्यु हो गई थी। अपनी मृत्यु से पूर्व उसने एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। उसका साम्राज्य अब फ़ारस से लेकर पीकिंग तक तथा साईबेरिया से लेकर सिंध तक फैला था। यह साम्राज्य इतना विशाल था कि किसी भी यात्री को मंगोल साम्राज्य की यात्रा एक सिरे से दूसरे सिरे तक करने के लिए दो वर्ष का समय लग जाता था। चंगेज़ खाँ ने कराकोरम (Karakoram) को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया था।

चंगेज़ खाँ की गणना विश्व के महान् विजेताओं में की जाती है। उसने 20 वर्ष के अल्प काल में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर सबको स्तब्ध कर दिया था। उसकी सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1) चंगेज़ खाँ स्वयं जन्मजात सेनापति था। वह जिस ओर रुख करता सफलता उसके कदम चूमती थी।

2) चंगेज़ खाँ ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था। यह सेना बहुत अनुशासित थी। इस सेना का मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था।

3) चंगेज़ खाँ का जासूसी विभाग अत्यंत कुशल था। उनके द्वारा दी गई जानकारी उसके लिए बहुत बहुमूल्य सिद्ध होती थी।

4) चंगेज़ खाँ मनोवैज्ञानिक युद्ध (psychological warfare) के महत्त्व को भली-भाँति जानता था। अत: जब भी किसी स्थान के लोग उसकी सेना का मुकाबला करने का साहस करते तो उसकी सेना वहाँ इतना विनाश करती जिसे सुनकर लोग थर-थर काँपने लगते थे। अतः लोग बिना लड़ाई किए ही उसके समक्ष आत्म-समर्पण कर देते थे।

5) मंगोल सैनिक घुडसवारी एवं तीरंदाजी में इतने कशल थे कि शत्र भौचक्के रह जाते थे।

6) चंगेज़ खाँ आमतौर पर शीत ऋतु में अपने अभियान आरंभ करता था। इस ऋतु में नदियाँ बर्फ के कारण जम जाती थीं। अत: इन नदियों को पार करना सुगम हो जाता था।

7) चंगेज़ खाँ ने शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए घेराबंदी यंत्र (siege engine) एवं नेफ़था (naphtha) बमबारी का व्यापक प्रयोग किया। इनके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार,

“यद्यपि चंगेज़ ख़ाँ अनपढ़ था किंतु वह साइरस, डेरियस तथा सिकंदर से महान् सेनापति था तथा उसके कारनामों ने नेपोलियन तथा हिटलर को भी मात कर दिया था।”

प्रश्न 4.
मंगोल प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?
अथवा
मंगोल प्रशासन के सैनिक एवं नागरिक प्रशासन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ यद्यपि अपना संपूर्ण जीवन युद्धों में ही उलझा रहा इसके बावजूद वह एक कुशल प्रशासक भी प्रमाणित हुआ। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसका प्रशासन इतना अच्छा था कि यह लगभग उसी रूप में उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी रहा।

I. सैनिक प्रशासन
चंगेज़ खाँ एक महान् योद्धा था। अत: उसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार एवं इसकी सुरक्षा के लिए सैनिक प्रशासन की ओर विशेष ध्यान दिया। मंगोलों के सैनिक प्रशासन की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. भर्ती (Recruitment):
चंगेज़ खाँ के समय सभी स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य था। केवल पुरोहितों, डॉक्टरों एवं विद्वानों को इसमें छूट दी गई थी। अधिकारियों की भर्ती का कार्य केवल चंगेज़ खाँ के हाथों में था। प्रायः ऊँचे और बहुत ही विश्वसनीय अधिकारियों के पुत्रों को अफसर पद पर नियुक्त किया जाता था।

2. संगठन (Organization) :
चंगेज़ खाँ की सेना पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी। यह 10, 100, 1000 एवं 10,000 सैनिकों की इकाइयों में विभाजित थी। 10 सैनिकों की इकाई को पलाटून, 100 सैनिकों की इकाई को कंपनी, 1000 सैनिकों की इकाई को ब्रिगेड तथा 10,000 सैनिकों की इकाई को तुमन कहा जाता था। चंगेज़ खाँ से पूर्व एक इकाई में एक ही कुल (clan) अथवा कबीले (tribe) के सैनिक होते थे। चंगेज़ खाँ ने इस प्रथा को समाप्त कर दिया। उसकी इकाइयों में विभिन्न कुलों एवं कबीलों के सैनिकों को सम्मिलित किया जाता था।

3. रचना (Composition):
चंगेज़ खाँ की सेना में विभिन्न मंगोल जनजातियों के लोग सम्मिलित थे। उसने विभिन्न देशों के लोगों को जिन्हें उसने अपने अधीन किया, को भी सेना में भर्ती किया। इसमें उसकी सत्ता को स्वेच्छा से स्वीकार करने वाले तुर्की मूल के उइगुर (Uighurs) लोग सम्मिलित थे। यहाँ तक कि चंगेज़ खाँ ने अपनी सेना में कैराईटों (Kereyits) को भी सम्मिलित किया। कैराईट चंगेज़ खाँ के कट्टर शत्र थे।

4. प्रशिक्षण (Training):
चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उसने संपूर्ण सेना को अपने चार पुत्रों के अधीन किया। वे विशेष कप्तानों को नियुक्त करते थे जिन्हें नोयान (noyans) कहा जाता था। इनके अतिरिक्त सैनिकों को प्रशिक्षण देने में ऐसे व्यक्तियों ने भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जिन्हें चंगेज़ खाँ अपना सगा भाई (आंडा) कहता था।

5. अनुशासन (Discipline):
चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अनेक नियम बनाए थे। इनका उल्लंघन करने वाले सैनिकों को मृत्यु दंड दिया जाता था। ये नियम थे-

  • युद्ध के आरंभ होने पर छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • सभी सैनिकों के लिए आवश्यक था कि वे अपने अधिकारियों के आदेश का पालन करें।
  • कोई भी सैनिक अपनी इकाई को छोड़कर किसी दूसरी इकाई में नहीं जा सकता था।
  • युद्ध में जाने से पहले सभी सैनिकों को अपने हथियारों का निरीक्षण कर लेना चाहिए।
  • कोई भी सैनिक अपने अधिकारियों की अनुमति के बिना लूटपाट न करे।
  • अधिकारियों द्वारा अनुमति मिलने पर ही लूटपाट आरंभ की जाए। लूट के धन से अधिकारियों एवं खाँ का हिस्सा दिया जाना चाहिए।

6. सेना की कुल संख्या (Total Strength of the Army):
चंगेज़ खाँ की सेना की कुल संख्या के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं। इसका कारण यह है कि आरंभ में उसकी सेना की संख्या कम थी। जैसे-जैसे उसके साम्राज्य का विस्तार होता गया वैसे-वैसे उसके सैनिकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होती चली गई। अनुमानतयः यह 1 लाख से 1.5 लाख के मध्य थी।।

7. हथियार एवं सामान (Arms and Equipments):
उस समय घुड़सवार सेना का युग था। अतः प्रत्येक सैनिक के पास एक से अधिक घोड़े होते थे। ये घोड़े बहुत फुर्तीले थे। प्रत्येक घोड़ा एक दिन में सहजता से 100 मील दौड़ सकता था। हल्के घुड़सवार (light cavalry) सैनिकों के पास दो धनुष (bows) एवं दो तरकस (quivers) होते थे जिनमें अनेक तीर रखे जाते थे। मंगोल सैनिक तीरअंदाज़ी में बहुत कुशल थे।

उनके द्वारा छोड़े गए तीर 200 से 300 गज की दूरी तक तबाही मचाने की समर्था रखते थे। उनके तीर इतने नुकीले होते थे कि वे लोहे में भी सुराख कर सकते थे। ये तीर शत्रु सेना में तहलका मचा देते थे। भारी घुड़सवार (heavy cavalry) सैनिक तलवारों एवं भालों से लैस होते थे। मंगोल सैनिक इन्हें चलाने में बहुत दक्ष थे। इनके अतिरिक्त मंगोल सैनिक शत्रु के दुर्गों का विनाश करने के लिए घेराबंदी यंत्र (siege engine) एवं नेफ़था बमबारी (naphtha bombardment) का प्रयोग करते थे।

प्रत्येक मंगोल सैनिक लोहे का टोप (helmet) छाती एवं भुजाओं पर लोहे के कवच (armour) डालते थे। वे चमड़े के भारी बूट डालते थे। वे सर्दियों में फर का कोट एवं फर का टोप पहनते थे। प्रत्येक सैनिक के पास एक चमड़े का बैग होता था। इसमें कुछ खाने-पीने का सामान, व रखे जाते थे। घोड़ों की सुरक्षा के लिए उन्हें चमड़े का कवच पहनाया जाता था।

8. लड़ाई का ढंग (Mode of warfare):
कोई भी अभियान आरंभ करने से पूर्व मंगोल खानों द्वारा कुरिलताई की सभा का आयोजन किया जाता था। इसमें युद्ध के उद्देश्यों एवं योजना के संबंध में विस्तृत चर्चा की जाती थी। इस सभा में सभी कप्तान सम्मिलित होते थे तथा वे खाँ से विशेष निर्देश प्राप्त करते थे। युद्ध आरंभ होने से पूर्व मंगोल जासूसों द्वारा शत्रु देश में झूठी अफ़वाहें फैलाई जाती थीं। इसका उद्देश्य शत्रु सैनिकों के मनोबल को नीचा करना था। शत्रु देश के सैनिकों को बिना लड़ाई के आत्म-समर्पण करने अथवा विनाश की चेतावनी दी जाती थी।

मंगोल सैनिक जिस प्रदेश पर आक्रमण करना होता था उसे चारों ओर से घेरा डाल लेते थे। यदि किसी स्थान पर शत्रु सेना का सामना करना पड़ता तो मंगोल सैनिक वहाँ से पीछे भागने का नाटक करते। शत्रु सेना उन्हें भगौड़ा समझ कर उनका पीछा करती। निश्चित स्थान पर पहुँचने पर मंगोल सैनिक शत्रु सेना पर टूट पड़ते एवं उन्हें कड़ी 167 पराजय देते। इसके पश्चात् मंगोल वहाँ इतनी भयंकर लूटमार करते कि उनका नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते थे। इससे मंगोलों की विजय का काम सुगम हो जाता था। प्रसिद्ध इतिहासकार जॉर्ज वनडस्की के अनुसार,

“13वीं शताब्दी में मंगोल सेना युद्ध का एक शक्तिशाली यंत्र थी। निस्संदेह यह उस समय के विश्व में सर्वोत्तम थी।”

II. नागरिक प्रशासन

मंगोल यायावर समाज से संबंधित थे। इसलिए उनका नागरिक प्रशासन न तो अधिक उत्तम था एवं न ही अच्छी प्रकार संगठित । इसके बावजूद यह उस समय की परिस्थितियों के अनुकूल था। मंगोलों के नागरिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. खाँ की स्थिति (Position of Khan):
मंगोल साम्राज्य में खाँ (सम्राट) की स्थिति सर्वोच्च थी। उसे असीम शक्तियाँ प्राप्त थीं। उसके द्वारा राज्य की सभी आंतरिक एवं बाह्य नीतियाँ तैयार की जाती थीं। राज्य की समस्त सेना उसके अधीन होती थी तथा उसके निर्देश अनुसार कार्य करती थी। राज्य के सभी उच्च पदों की नियुक्ति चाहे वे सैनिक हों अथवा असैनिक उसके द्वारा की जाती थी।

उसे किसी देश के साथ युद्ध करने अथवा उससे संधि करने का अधिकार प्राप्त था। वह प्रजा पर कोई भी नया कर लगा सकता था अथवा पुराने करों को हटा सकता था अथवा उन्हें कम या अधिक कर सकता था। उसके मुख से निकला प्रत्येक शब्द प्रजा के लिए कानून होता था। कोई भी व्यक्ति इसका उल्लंघन नहीं कर सकता था। ऐसा करने पर उसे मृत्यु दंड दिया जाता था। यद्यपि खाँ की शक्ति किसी तानाशाह से कम नहीं थी किंतु उसकी शक्तियों पर कुरिलताई द्वारा कुछ अंकुश ज़रूर लगाया जाता था।

2. नागरिक प्रशासकों की भूमिका (Role of Civil Administrators):
चंगेज़ खाँ स्वयं अनपढ़ था तथा वह यायावर समाज से संबंधित था। उसने अपनी बहादुरी से एक विशाल साम्राज्य की स्थापना कर ली थी। इसमें विभिन्न जातियों एवं सभ्य समाजों से संबंधित लोग थे। ऐसे लोगों पर शासन करना कोई सुगम कार्य न था। इस कार्य में मंगोल उसकी सहायता करने में असमर्थ थे।

अतः चंगेज़ खाँ ने अपने अधीन किए गए सभ्य समाजों में से नागरिक प्रशासकों को भर्ती किया। चंगेज़ खाँ उनकी भर्ती के समय केवल उनकी योग्यता को प्रमुख रखता था। वह उनकी जाति अथवा धर्म को कोई महत्त्व नहीं देता था। इन नागरिक प्रशासकों ने मंगोल साम्राज्य की नींव को सुदृढ़ करने एवं उसे संगठित करने में प्रशंसनीय भूमिका निभाई।

यहाँ तक कि इन्होंने मंगोल शासकों को प्रशासन के प्रति अपनी नीतियाँ बदलने में काफी सीमा तक प्रभाव डाला। इनमें चीनी मंत्री ये-लू-चुत्साई (Yeh-lu-Chut sai) तथा इल-खानी शासक गज़न खाँ के वज़ीर रशीदुद्दीन (Rashiduddin) के नाम उल्लेखनीय हैं।

3. उलुस (Ulus):
मंगोल प्रशासन की एक उल्लेखनीय विशेषता चंगेज़ खाँ द्वारा उलुस का गठन करना था। इसके अनुसार चंगेज़ खाँ ने नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चारों पुत्रों को दे दिया। उलुस से भाव किसी निश्चित भू-भाग से नहीं था क्योंकि इनमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासक जैसी थी।

उनके अधीन अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) थीं। वे अपने अधीन क्षेत्रों से लोगों को सेना में भर्ती कर सकते थे। उन्हें लोगों पर नए कर लगाने का अधिकार दिया गया था। इसके चलते बाद में जोची ने दक्षिणी रूस में गोल्डन होर्ड (Golden Horde) एवं तोलूई के वंशजों ने चीन में युआन वंश एवं ईरान में इल-खानी वंशों की स्थापना की।

4. याम (Yam) :
चंगेज़ खाँ की एक बहुमूल्य देन याम की स्थापना करना था। याम एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। मंगोल साम्राज्य में प्रत्येक 25 मील की दूरी पर ऐसी चौकियाँ स्थापित की गई थीं। इन चौकियों में घुड़सवार संदेशवाहक तथा फुर्तीले घोड़े सदैव तैनात रहते थे।

घुड़सवार संदेशवाहक सभी प्रकार के सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। इन यामों में ठहरने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए उनके खाने पीने का पूरा इंतजाम किया जाता था। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से एक प्रकार के पास जारी किए जाते थे।

इन पासों को फ़ारसी में पैज़ा (paiza) तथा मंगोल भाषा में जेरेज़ (gerege) कहते थे। प्रत्येक याम में यात्रियों को इन पासों के अनुसार सुविधाएँ दी जाती थीं। इन चौकियों के कारण सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया जाता था। इस सुविधा के लिए व्यापारी सरकार को बाज़ (baz) नामक कर देते थे। इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए मंगोल सरकार को अपने पशुओं का दसवाँ हिस्सा देते थे। इसे कुबकुर (kubcur) कहा जाता था।

इस संस्था का उद्देश्य मंगोल साम्राज्य के दूरस्थ स्थानों पर नियंत्रण रखना एवं संपूर्ण साम्राज्य की महत्त्वपूर्ण घटनाओं की जानकारी प्राप्त करना था। याम संस्था अपने उद्देश्य में काफी सीमा तक सफल रही। जॉर्ज वर्नडस्की के अनुसार,

“यह (याम) बहुत ही लाभकारी तथा भली-भाँति संचालित संस्था थी।”

5. यास (Yasa):
मंगोल प्रशासन चलाने में यास की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। यास वे विधि नियम थे जिन्हें चंगेज़ खाँ के शासनकाल में 1206 ई० में कुरिलताई द्वारा पारित किया गया था। इन नियमों को 1218 ई० में अंतिम रूप दिया गया था। ये नियम उसके उत्तराधिकारियों के समय में भी जारी रहे। ये नियम मंगोल सेना, शिकार, डाक प्रणाली, नैतिक एवं सामाजिक व्यवस्था से संबंधित थे।

इन नियमों को मंगोलों ने पराजित लोगों पर भी लागू किया। वास्तव में यास ने मंगोलों को एक सूत्र में पिरोने, उनकी अपनी कबीलाई पहचान बनाए रखने, जटिल शहरी समाजों पर शासन करने तथा एक विश्वव्यापी मंगोल साम्राज्य की स्थापना में प्रशंसनीय योगदान दिया।

6. प्रजा का सुख (Welfare of the Subjects) :
मंगोल प्रशासन की एक अन्य विशेषता यह थी कि मंगोल शासक अपनी प्रजा के सुख का सदैव ध्यान रखते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि चंगेज़ खाँ एवं अन्य मंगोल शासकों ने अनेक प्रदेशों को विजित करने के उद्देश्य से वहाँ भयंकर विनाश किया।

किंतु इन प्रदेशों को अपने साम्राज्य में सम्मिलित करने के पश्चात् वहाँ नगरों का पुनः निर्माण किया तथा शांति व्यवस्था स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए। मंगोल शासकों ने सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया। उन्होंने व्यापारियों को बहुत प्रोत्साहन दिया। लोगों पर बहुत कम कर लगाए गए थे।

7. धार्मिक नीति (Religious Policy):
मंगोल शासकों का धर्म में बहुत विश्वास था। वे मुख्य रूप से तेंगरी (Tengri) भाव सूर्य देवता की उपासना करते थे। वे इसे सर्वशक्तिमान् मानते थे। वे इसे प्रसन्न करने के लिए जानवरों एवं विशेषतः घोड़ों की बलियाँ देते थे। वे पवित्र धार्मिक लोगों जिन्हें शामन (shamans) कहा जाता था का विशेष सम्मान करते थे। मंगोल शासकों की विशेषता थी कि उन्होंने सभी धर्मों ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, बौद्ध एवं ताओ आदि के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

उन्होंने सब धर्मों के लोगों को अपने रीति-रिवाजों का पालन करने की पूर्ण छूट दी थी। उनके साम्राज्य में नौकरियाँ बिना किसी धार्मिक मतभेद के योग्यता के आधार पर दी जाती थीं। निस्संदेह यायावर समाज के शासकों द्वारा अपनाई गई धार्मिक सहनशीलता की नीति उस युग की एक महान् उपलब्धि थी। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर जे० जे० सांडर्स के अनुसार,

“एशिया के महाद्वीप में कभी भी इतनी धार्मिक स्वतंत्रता नहीं दी गई तथा विभिन्न मिशनरियों ने अपने धर्म का प्रचार करने का इतना प्रयास कभी नहीं किया।”
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 5 iMG 2

क्रम संख्यावर्षघटना
1.1162 ई०तेमुजिन का जन्म।
2.1206 ई。कुरिलताई द्वारा तेमुजिन को चंगेज़ खाँ घोषित करना। चंगेज़ खाँ द्वारा यास की घोषणा।
3.1209 ई०चीन के उत्तर-पश्चिमी प्राँत के सी-सिआ लोगों को पराजित करना।
4.1215 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा पीकिंग पर अधिकार करना।
5.1218 ई。चंगेज़ खाँ द्वारा करा रिता की विजय।
6.1219 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा ओट्रार पर अधिकार।
7.1220 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा बुखारा एवं समरकंद पर अधिकार।
8.1221 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा बल्ख, मर्व एवं निशापुर पर अधिकार।
9.1222 ई०चंगेज़ खाँ द्वारा हेरात पर अधिकार।
10.1227 ई०चंगेज़ खाँ की मृत्यु।
11.1229-41 ई。ओगोदेई का शासनकाल।
12.1234 ई。ओगोदेई द्वारा चीन पर अधिकार।
13.1236-42 ई०चंगेज़ खाँ के पोते बाटू द्वारा रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर अधिकार।
14.1246-48 ई०गुयूक का शासनकाल।
15.1251-59 ई०मोंके का शासनकाल।
16.1254 ई०फ्राँस के शासक लुई नौवें के राजदूत विलियम का मोंके के दरबार में पहुँचना।
17.1258 ई०मंगोलों का बगदाद पर अधिकार एवं अब्बासी वंश का अंत।
18.1260-94 ई०कुबलई खाँ का शासनकाल।
19.1260 ई०कुबलई खाँ द्वारा चीन में यूआन वंश की स्थापना।
20.1275-92 ई०वेनिस यात्री माक्को पोलो द्वारा चीन की यात्रा।
21.1295-1304 ई०गज़न खाँ का शासनकाल।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ? उनके समाज की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया में रहने वाला एक यायावर समूह था। ये लोग मूलतः घुमक्कड़ थे। वे पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। उनका समाज विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इन कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। लूटमार करना उनकी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग था। वे चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनके परिवार पितृपक्षीय थे। अतः परिवार में पुत्र का होना आवश्यक समझा जाता था।

उस समय धनी परिवार बहुत विशाल होते थे। उस समय बहु-विवाह का प्रचलन था। उनका प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। वे सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। मंगोल अपने मृतकों का रात्रि के समय संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे तथा उनके साथ कुछ आवश्यक वस्तुएँ भी रखते थे। क्योंकि उस समय स्टेपी क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी इसलिए मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे।

प्रश्न 2.
मंगोल और बेदोइन समाज की यायावरी विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, यह बताइए कि आपके विचार में किस तरह ऐतिहासिक अनुभव एक-दूसरे से भिन्न थे ? इन भिन्नताओं से जुड़े कारणों को समझाने के लिए आप क्या स्पष्टीकरण देगें?
उत्तर:
मंगोल स्टेपी क्षेत्र के यायावर कबीले थे। यह क्षेत्र बहुत मनोरम एवं पहाड़ी था। दूसरी ओर बेदोइन अरब के रेगिस्तानी क्षेत्रों में रहते थे। वे अपने लिए भोजन एवं पशुओं के लिए चारे की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान आते-जाते रहते थे। उनका मुख्य भोजन खजूर एवं मुख्य पशु ऊँट था। इसके विपरीत मंगोल यायावरों के पास हरी-भरी विशाल चरागाहें थीं। उनके पास पानी की कोई कमी नहीं थी।

उनके प्रदेश में ओनोन तथा सेलेंगा जैसी नदियाँ तथा बर्फीली पहाड़ियों से निकलने वाले सैकड़ों झरने भी थे। उनके मुख्य पशु घोड़े एवं भेड़ें थीं। वे शिकारी संग्राहक थे। उनका मुख्य व्यवसाय व्यापार करना था। दूसरी ओर बेदोइन शिकारी संग्राहक नहीं थे। वे मुख्यतः पशुपालक थे। उनकी भिन्नता का मुख्य कारण उनके प्रदेश की भौगोलिक भिन्नताएँ थीं।

प्रश्न 3.
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
उत्तर:
स्टेपी क्षेत्र अथवा मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी। अतः यायावरी कबीले व्यापार के लिए अपने पड़ोसी देश चीन पर निर्भर करते थे। उनका व्यापार वस्तु-विनिमय पर आधारित था। यह व्यवस्था दोनों पक्षों के लिए लाभकारी थी। यायावर कबीले चीन से कृषि उत्पाद एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे। इनके बदले वे घोड़ों, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे। कभी-कभी दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने हेतु सैनिक कार्यवाही कर बैठते थे एवं लूटपाट में भी सम्मिलित हो जाते थे। इस संघर्ष में यायावरों को कम हानि होती थी।

इसका कारण यह था कि वे लूटपाट कर संघर्ष क्षेत्र से दूर भाग जाते थे। चीन को इन यायावरी आक्रमणों से बहुत क्षति पहुँचती थी। अत: चीनी शासकों ने अपनी प्रजा की रक्षा के लिए ‘चीन की महान् दीवार’ को अधिक मज़बूत किया।

प्रश्न 4.
चंगेज़ खाँ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
चंगेज़ खाँ ने यायावर साम्राज्य की स्थापना में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 1162 ई० में हुआ था। उसका बचपन का नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई था तथा वह कियात कबीले का मुखिया था। उसकी माता का नाम ओलुन-इके था। तेमुजिन का विवाह बोरटे के साथ हुआ था। उसके बचपन में ही उसके पिता की एक विरोधी कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसलिए उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

इसके बावजूद तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया। इस संकट के समय उसे बोघूरचू, जमूका तथा तुगरिल खाँ ने बहुमूल्य सहयोग दिया। तेमुजिन ने अनेक शक्तिशाली कबीलों को पराजित कर अपने नाम की धाक जमा दी। उसकी सफलताओं को देखते हुए कुरिलताई ने 1206 ई० में तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से सम्मानित किया।

चंगेज़ खाँ ने 1227 ई० तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन एवं करा खिता को विजित किया। उसने ख्वारज़म के शाह मुहम्मद को पराजित कर उसके अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। उसने कराकोरम को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। चंगेज़ खाँ ने मंगोल साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के उद्देश्य से अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया।

उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसकी महान् सफलताओं को देखते हुए उसे आज भी मंगोलिया के इतिहास में महान् राष्ट्र-नायक के रूप में स्मरण किया जाता है।

प्रश्न 5.
मंगोल कबीलों की मुख्य विशेषताएँ बताइए।
उत्तर:
(1) मंगोल कबीले नृजातीय और भाषायी संबंधी के कारण आपस में जुड़े हुए थे। परंतु उपलब्ध आर्थिक संसाधनों के अभाव के कारण उनका समाज अनेक पितृपक्षीय वंशों में विभाजित था।

(2) धनी-परिवार विशाल होते थे। उनके पास अधिक संख्या में पशु और चरण भूमि होती थी। स्थानीय राजनीति में भी उनका अधिक दबदबा होता था। इसलिए उनके अनेक अनुयायी होते थे।

(3) समय-समय पर आने वाली प्राकृतिक आपदाओं जैसे कि भीषण शीत-ऋतु के दौरान उनके द्वारा एकत्रित शिकार-सामग्रियाँ तथा अन्य खाद्य भंडार समाप्त हो जाते थे। वर्षा न होने पर घास के मैदान भी सूख जाते थे। इसलिए उन्हें चरागाहों की खोज में भटकना पड़ता था।

(4) मंगोल कबीलों में आपसी संघर्ष भी होता था। पशुधन प्राप्त करने के लिए वे लूटपाट भी करते थे।

(5) प्रायः परिवारों के समूह आक्रमण करने अथवा अपनी रक्षा करने के लिए शक्तिशाली कुलों से मित्रता कर लेते थे और परिसंघ बना लेते थे।

प्रश्न 6.
चंगेज़ खाँ की सफलता के प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की सफलता के प्रमुख कारण निम्नलिखित थे
1) चंगेज़ खाँ स्वयं जन्मजात सेनापति था। वह जिस ओर रुख करता सफलता उसके कदम चूमती थी। अतः उसका नाम सुनते ही शत्रु की रूह कॉप जाती थी।

2) चंगेज़ खा ने एक शक्तिशाली सेना का गठ यह सेना बहुत अनुशासित थी। इस सेना का मुकाबला करना कोई सहज कार्य न था।

3) चंगेज़ खाँ का जासूसी विभाग अत्यंत कशल था। उसके जासस कोई भी युद्ध आरंभ होने से पूर्व उसके शत्र के संबंध में प्रत्येक छोटी से-छोटी जानकारी उपलब्ध करवाते थे। यह जानकारी उसके लिए बहुत बहमुल्य सिद्ध होती थी।

4) चंगेज़ खाँ मनोवैज्ञानिक युद्ध के महत्त्व को भली-भाँति जानता था। अतः जब भी किसी स्थान के लोग उसकी सेना का मुकाबला करने का साहस करते तो उसकी सेना वहाँ इतना विनाश करती जिसे सुनकर लोग थर-थर काँपने लगते थे। अतः लोग बिना लड़ाई किए ही उसके समक्ष आत्म-समर्पण कर देते थे।

5) मंगोल सैनिक घुड़सवारी एवं तीरंदाज़ी में इतने कुशल थे कि शत्रु भौचक्के रह जाते थे।

6) चंगेज़ खाँ ने शत्रु दुर्गों को नष्ट करने के लिए घेराबंदी यंत्र एवं नेफ़था बमबारी का व्यापक प्रयोग किया। इनके युद्ध में घातक प्रभाव होते थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 7.
यास से आपका क्या अभिप्राय है ? इसके प्रमुख नियम क्या हैं ?
उत्तर:
यास वे विधि नियम थे, जिन्हें चंगेज़ खाँ के शासनकाल में कुरिलताई द्वारा पारित किया गया था। इसके प्रमुख नियम निम्नलिखित थे

1) लोगों को एक परमात्मा में विश्वास रखना चाहिए जो कि स्वर्ग एवं पृथ्वी का स्वामी है। वह ही जीवन एवं मृत्यु, अमीरी तथा ग़रीबी देता है।

2) धार्मिक नेताओं, परामर्शदाताओं, पुरोहितों, मस्जिदों की देखभाल करने वालों, डॉक्टरों एवं शवों को स्नान कराने वालों को राज्य की तरफ से मुफ्त भोजन दिया जाना चाहिए।

3) जो भी व्यक्ति कुरिलताई से मान्यता प्राप्त किए बिना अपने आपको खाँ घोषित करता है उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए।

4) जिन कबीलों ने मंगोलों की अधीनता स्वीकार कर ली हो उनके मुखिया महत्त्वपूर्ण उपाधियाँ धारण नहीं कर सकते।

5) जो कोई शासक अथवा कबीला मंगोलों की अधीनता स्वीकार नहीं करता उसके साथ किसी प्रकार का कोई समझौता न किया जाए।

6) सभी धर्मों का सम्मान किया जाए। सभी धर्मों के पुरोहितों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा जाए।

7) किसी चलते हुए दरिया में वस्त्र धोकर अथवा मलमूत्र द्वारा गंदा करने पर कड़ा प्रतिबंध था। ऐसा करने वालों को मृत्यु दंड दिया जाता था।

प्रश्न 8.
चंगेज़ खाँ ने सेना में अनुशासन बनाए रखने के लिए कौन-से नियम बनाए ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। वह अनुशासनहीन सेना को एक भीड़ मात्र समझता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य से अनेक नियम बनाए थे। इनका उल्लंघन करने वाले सैनिकों को मृत्यु दंड दिया जाता था। ये नियम थे

  • युद्ध के आरंभ होने पर छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • सभी सैनिकों के लिए आवश्यक था कि वे अपने अधिकारियों के आदेश का पालन करें।
  • कोई भी सैनिक अपनी इकाई को छोड़कर किसी दूसरी इकाई में नहीं जा सकता था।
  • युद्ध में जाने से पहले सभी सैनिकों को अपने हथियारों का निरीक्षण कर लेना चाहिए।
  • कोई भी सैनिक अपने अधिकारियों की अनुमति के बिना लूटपाट न करे।
  • अधिकारियों द्वारा अनुमति मिलने पर ही लूटपाट आरंभ की जाए। लूट के धन से अधिकारियों एवं खाँ का हिस्सा दिया जाना चाहिए।

प्रश्न 9.
चंगेज़ खाँ के सैनिक प्रशासन की प्रमुख विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ के समय सभी स्वस्थ व्यक्तियों के लिए सेना में भर्ती होना अनिवार्य था। केवल पुरोहितों, डॉक्टरों एवं विद्वानों को इसमें छूट दी गई थी।
  • चंगेज़ खाँ की सेना पुरानी दशमलव पद्धति के अनुसार गठित की गई थी। यह 10,100, 1000 एवं 10,000 सैनिकों की इकाइयों में विभाजित थी।
  • चंगेज़ खाँ की सेना में विभिन्न मंगोल जनजातियों के लोग सम्मिलित थे।
  • चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण पर विशेष बल दिया। उसने विशेष कप्तानों को नियुक्त किया था, जिन्हें नोयान कहा जाता था।
  • चंगेज़ खाँ सेना में अनुशासन को विशेष महत्त्व देता था। वह अनुशासनहीन सेना को एक भीड़ मात्र समझता था। उसने सेना में अनुशासन बनाए रखने के उद्देश्य में अनेक नियम बनाए थे।

प्रश्न 10.
चंगेज़ खाँ को मंगोलों का सबसे महान् शासक क्यों माना जाता था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ को निम्नलिखित कारणों से मंगोलों का सबसे महान शासक माना जाता था

  • उसने मंगोलों को एक झंडे के अधीन एकत्रित किया।
  • उसने लंबे समय से चली आ रही कबीलाई लड़ाइयों का अंत किया।
  • उसने मंगोलों को चीनियों द्वारा किए जा रहे शोषण से मुक्ति दिलवाई।
  • उसने एक महान् साम्राज्य की स्थापना की।
  • उसके व्यापार द्वारा मंगोलों को समृद्ध बनाया।
  • उसने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया।

प्रश्न 11.
याम से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की एक बहुमूल्य देन याम की स्थापना करना था। याम एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। मंगोल साम्राज्य में प्रत्येक 25 मील की दूरी पर ऐसी चौकियाँ स्थापित की गई थीं। इन चौकियों में घुड़सवार संदेशवाहक तथा फुर्तीले घोड़े सदैव तैनात रहते थे। घुड़सवार संदेशवाहक सभी प्रकार के सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे।

प्रत्येक घुड़सवार अपने घोड़े के गले में एक घंटी बाँध कर रखता था। जब वह किसी याम के निकट पहुँचता तो इस घंटी की आवाज़ सुन कर संदेशवाहक अपने घोड़े के साथ आगे गंतव्य तक बढ़ने के लिए तैयार हो जाता।

इन यामों में ठहरने वाले यात्रियों की सुविधा के लिए उनके खाने-पीने का पूरा इंतजाम किया जाता था। यात्रियों की सुरक्षा के लिए सरकार की तरफ से एक प्रकार के पास जारी किए जाते थे। इन पासों को फ़ारसी में पैजा तथा मंगोल भाषा में जेरेज़ कहते थे। ये पास तीन प्रकार-सोने, चाँदी एवं लोहे के होते थे। प्रत्येक याम में यात्रियों को इन पासों के अनुसार सुविधाएँ दी जाती थीं। इन चौकियों के कारण सड़क मार्गों को सुरक्षित बनाया जाता था।

प्रश्न 12.
उलुस से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
मंगोल प्रशासन की एक उल्लेखनीय विशेषता चंगेज़ खाँ द्वारा उलुस का गठन करना था। इसके अनुसार चंगेज़ खाँ ने नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का उत्तरदायित्व अपने चारों पुत्रों को दे दिया। उसके सबसे ज्येष्ठ पुत्र जोची को रूसी स्टेपी का प्रदेश दिया गया। उसके दूसरे पुत्र चघताई को तूरान का स्टेपी क्षेत्र तथा पामीर पर्वत का उत्तरी क्षेत्र दिया गया। चंगेज़ खाँ ने संकेत दिया कि उसका तीसरा पुत्र ओगोदेई उसका उत्तराधिकारी होगा।

उसके सबसे छोटे पुत्र तोलुई को मंगोलिया का क्षेत्र दिया गया। उलुस से भाव किसी निश्चित भू-भाग से नहीं था क्योंकि इनमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासक जैसी थी। उनके अधीन अलग-अलग सैन्य टुकड़ियाँ (तामा) थीं। वे अपने अधीन क्षेत्रों से लोगों को सेना में भर्ती कर सकते थे। उन्हें लोगों पर नए कर लगाने का अधिकार दिया गया था।

प्रश्न 13.
मंगोलों की हरकारा पद्धति क्या थी?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ द्वारा स्थापित एक फुर्तीली संचार व्यवस्था को हरकारा पद्धति कहा जाता था। इस कारण राज्य के दूर स्थित स्थानों में आपसी संपर्क बना रहता था। निश्चित की गई दूरी पर निर्मित सैनिक, चौकियों में स्वस्थ एवं बलवान घोड़े एवं घुड़सवार तैनात रहते थे। इस संचार पद्धति के संचालन के लिए मंगोल यायावर अपने घोड़ों अथवा अन्य पशुओं का दसवां भाग प्रदान करते थे। इसे कुबकुर कर कहते थे। यायावर लोग यह कर अपनी इच्छा से प्रदान करते थे। इससे उन्हें अनेक लाभ प्राप्त होते थे। चंगेज़ खाँ की मृत्यु के पश्चात् मंगोलों ने इस पद्धति में और भी सुधार किए। इस कारण महान् खाँनों को अपने विस्तृत साम्राज्य के सुदूर स्थानों में होने वाली घटनाओं पर निगरानी रखने में सहायता मिलती थी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 14.
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को पसंद नहीं करते थे । क्यों?
उत्तर:
विजित लोग अपने मंगोल शासकों को निम्नलिखित कारणों से पसंद नहीं करते थे

  • मंगोलों ने अपने युद्धों के दौरान अनेक भव्य नगरों को नष्ट कर दिया था।
  • मंगोलों ने कृषि भूमि को भारी हानि पहुँचाई थी।
  • उनके आक्रमणों के दौरान विजित क्षेत्रों के व्यापार को व्यापक पैमाने पर क्षति पहुंची थी।
  • इन युद्धों के कारण दस्तकारी वस्तुओं का उत्पादन लगभग ठप्प हो गया था।
  • इन युद्धों के दौरान बड़ी संख्या में लोग मारे गए थे तथा कइयों को दास बना लिया गया था।
  • इन युद्धों के दौरान समाज के प्रत्येक वर्ग के लोगों को भारी कष्टों का सामना करना पड़ा था।

प्रश्न 15.
कुबलई खाँ पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
कुबलई खाँ ने 1260 ई० में पीकिंग में यूआन वंश की स्थापना की घोषणा की। कुबलई खाँ ने 1294 ई० तक शासन किया। कुबलई खाँ एक योग्य एवं महान् शासक प्रमाणित हुआ। उसने सर्वप्रथम उत्तरी चीन में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया। उसने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसके पश्चात् उसने अरिक बुका को पराजित किया। 1280 ई० में कुबलई खाँ ने दक्षिण चीन के शुंग शासक को पराजित करने में सफलता प्राप्त की।

निस्संदेह यह कुबलई खाँ की एक महान् सफलता थी। इसके पश्चात् उसने बर्मा, चंपा एवं कंबोडिया के शासकों को पराजित किया। कुबलई खाँ ने न केवल अपने साम्राज्य का विस्तार ही किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। उसने चीन में प्रचलित परंपराओं को जारी रखा। उसने अनेक नई सड़कों का निर्माण किया एवं पुरानी की मुरम्मत करवाई। उसने सड़कों के किनारे छाया वाले वृक्ष लगवाए। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए सराएँ बनवाईं।

उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उसने सिविल सर्विस में उल्लेखनीय सुधार किए। उसने राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक कदम उठाए। उसने 1282 ई० में कागज़ की मुद्रा का प्रचलन किया। उसने अकालों से निपटने के लिए भी अनेक प्रयास किए। यद्यपि कुबलई खाँ का झुकाव बौद्ध धर्म की ओर था किंतु उसने अन्य धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ?
उत्तर:
मंगोल मध्य एशिया के आधुनिक मंगोलिया प्रदेश में रहने वाला एक यायावर समूह था। यह समूह विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इनमें प्रमुख थे मंगोल, तातार, नेमन एवं खितान । मंगोल पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे।

प्रश्न 2.
खानाबदोश या यायावर साम्राज्य से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
खानाबदोश या यायावर लोग मूलतः घुमक्कड़ होते हैं। ये सापेक्षिक तौर पर एक अविभेदित आर्थिक जीवन एवं प्रारंभिक राजनैतिक संगठन के साथ परिवारों के समूह में संगठित होते हैं।

प्रश्न 3.
मंगोलों का सबसे बहुमूल्य स्रोत किसे माना जाता है ? इसका रचयिता कौन था ?
उत्तर:

  • मंगोलों का सबसे बहुमूल्य स्रोत ‘मंगोलों का गोपनीय इतिहास’ को माना जाता है।
  • इसका रचयिता ईगोर दे रखेविल्ट्स था।

प्रश्न 4.
मंगोलों के समय में स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर क्यों नहीं उभर पाया ?
उत्तर:

  • मंगोलों ने कृषि को नहीं अपनाया था।
  • मंगोलों की पशुपालक एवं शिकार संग्राहक अर्थव्यवस्थाएँ भी घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में असमर्थ थीं।

प्रश्न 5.
मंगोलों के धनी परिवारों के अनेक अनुयायी क्यों होते थे ?
उत्तर:

  • उनके पास अधिक संख्या में पश एवं चारण भमि होती थी।
  • वे स्थानीय राजनीति में काफी प्रभावशाली होते थे।

प्रश्न 6.
मंगोल कबीलों को चरागाहों की खोज में क्यों भटकना पड़ता था ?
उत्तर:

  • शीत ऋतु में मंगोल कबीलों द्वारा एकत्रित की गई खाद्य सामग्री समाप्त हो जाती थी।
  • वर्षा न होने से घास मैदान सूख जाते थे।

प्रश्न 7.
मंगोलों के निवास स्थान को क्या कहा जाता था ? इसकी कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • मंगोलों के निवास स्थान को जर (तंबू) कहा जाता था।
  • इसका प्रवेश द्वार दक्षिण की ओर होता था ताकि उत्तर से आने वाली शीत हवाओं से बचा जा सके।
  • जर को दो भागों में बाँटा जाता था। एक भाग मेहमानों के लिए एवं दूसरा घर के सदस्यों के लिए होता था।

प्रश्न 8.
मंगोल कृषि कार्य क्यों नहीं करते थे ?
उत्तर:

  • उस समय स्टेपी क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं।
  • वहाँ केवल सीमित काल में ही कृषि करना संभव था।

प्रश्न 9.
12वीं शताब्दी में मंगोल समाज की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उस समय परिवार पितृपक्षीय होते थे।
  • उस समय समाज में बहु-विवाह प्रणाली प्रचलित थी।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

प्रश्न 10.
मंगोल अपने मृतकों का संस्कार कैसे करते थे ?
उत्तर:
मंगोल अपने मृतकों के शवों को जमीन में दफनाते थे। वे उनके साथ दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएँ एवं बर्तनों आदि को भी दफनाते थे। धनी लोगों के शवों के साथ अनेक बहुमूल्य वस्तुओं, घोड़ों, नौकरों एवं स्त्रियों आदि को भी दफ़न किया जाता था।

प्रश्न 11.
मंगोल कौन थे ? मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
अथवा
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ?
अथवा
मंगोलों के लिए व्यापार क्यों इतना महत्त्वपूर्ण था ? कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
मंगोल स्टेपी क्षेत्र में रहते थे। इस क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी। उनके लिए व्यापार जीविका का एकमात्र साधन था। अतः मंगोलों के लिए व्यापार बहुत महत्त्वपूर्ण था।

प्रश्न 12.
मंगोल चीन से किन वस्तुओं का आयात-निर्यात करते थे ?
अथवा
चीन से मंगोलों को कौन-सी वस्तुएँ निर्यात की जाती थीं?
उत्तर:

  • मंगोल चीन से कृषि उत्पादों एवं लोहे के उपकरणों का आयात करते थे।
  • मंगोल चीन को घोड़े, फर एवं शिकारी जानवरों का निर्यात करते थे।

प्रश्न 13.
वाणिज्यिक क्रियाकलापों में मंगोलों को कभी-कभी तनाव का सामना क्यों करना पड़ता था ?
उत्तर:
कभी-कभी व्यापार करने वाले दोनों पक्ष अधिक लाभ कमाने की होड़ में सैनिक कार्यवाही कर देते थे एवं लूटपाट में सम्मिलित हो जाते थे। इस कारण उन्हें तनाव का सामना करना पड़ता था।

प्रश्न 14.
चीन की महान् दीवार क्यों बनवाई गई थी ?
उत्तर:
चीन की महान् दीवार इसलिए बनवाई गई थी क्योंकि यायावर कबीले चीन पर बार-बार आक्रमण करते रहते थे। इन आक्रमणों से चीन की सुरक्षा के लिए यह दीवार बनवाई गई थी।

प्रश्न 15.
चंगेज़ खाँ कौन था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ मंगोलों का सबसे महान् नेता था।
  • उसने 1206 ई० से 1227 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 16.
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ ? उसका प्रारंभिक नाम क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का जन्म 1162 ई० में हुआ।
  • उसका प्रारंभिक नाम तेमुजिन था।

प्रश्न 17.
चंगेज़ खाँ के पिता का नाम क्या था ? वह किस कबीले का मुखिया था ?
उत्तर:

  • चंगेज खाँ के पिता का नाम येसूजेई था।
  • वह कियात कबीले का मुखिया था।

प्रश्न 18.
चंगेज़ खाँ का नाम तेमुजिन क्यों रखा गया था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ का नाम तेमुजिन इसलिए रखा गया था क्योंकि उसके जन्म के समय उसके पिता येसूजेई ने तातार कबीले के मुखिया तेमुजिन को पराजित किया था। अतः मंगोलियाई परंपरा के अनुसार नव-जन्में बालक का नाम तेमुजिन रखा गया।

प्रश्न 19.
आंडा (anda) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
आंडा से अभिप्राय ऐसे व्यक्तियों से है जिन्हें मंगोल सौगंध के आधार पर अपना सगा भाई बना लेते थे।

प्रश्न 20.
तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से कब तथा किसने सम्मानित किया था ? इससे क्या भाव था ?
उत्तर:

  • तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से 1206 ई० में कुरिलताई ने सम्मानित किया था।
  • इससे भाव था सार्वभौम शासक।

प्रश्न 21.
खाँ की उपाधि से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
खाँ की उपाधि से अभिप्राय है सार्वभौम शासक। कुरिलताई ने तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से 1206 ई० में सम्मानित किया था।

प्रश्न 22.
कुरिलताई से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कुरिलताई प्रतिष्ठित मंगोल सरदारों के कबीले की एक सभा थी।

प्रश्न 23.
कुरिलताई के कोई दो प्रमुख कार्य बताएँ।
उत्तर:

  • उत्तराधिकार संबंधी निर्णय लेना।।
  • राज्य के भविष्य एवं अभियानों संबंधी निर्णय लेना।

प्रश्न 24.
चंगेज़ खाँ की कोई दो महत्त्वपूर्ण विजयें बताएँ।
उत्तर:

  • उत्तरी चीन की विजय।
  • ख्वारज़म की विजय।

प्रश्न 25.
चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया ? उस समय वहाँ किस राजवंश का शासन था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर 1215 ई० में अधिकार किया।
  • उस समय वहाँ चिन राजवंश का शासन था।

प्रश्न 26.
चंगेज खाँ ने खारजम पर आक्रमण कब किया ? इसका तात्कालिक कारण क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ ने ख्वारज़म पर 1219 ई० में आक्रमण किया था।
  • इसका तात्कालिक कारण यह था कि ओट्रार के गवर्नर ने वारज़म शाह के इशारे पर चंगेज़ खाँ के एक व्यापारिक मंडल के चार सदस्यों की हत्या कर दी थी।

प्रश्न 27.
यदि इतिहास नगरों में रहने वाले साहित्यकारों के लिखित विवरणों पर निर्भर करता है तो यायावर समाजों के बारे में हमेशा प्रतिकूल विचार ही रखे जाएँगे। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:
हाँ, मैं इस कथन से सहमत हूँ। इसका कारण यह है कि यायावर नगरों में भयंकर लूटमार करते थे तथा उन्हें नष्ट कर देते थे।

प्रश्न 28.
क्या आप इसका कारण बताएँगे कि फ़ारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की इतनी बढ़ा-चढ़ा कर संख्या क्यों बताई है ?
उत्तर:
फ़ारसी इतिवृत्तकारों ने मंगोल अभियानों में मारे गए लोगों की संख्या इतनी बढ़ा-चढ़ा कर इसलिए बताई है क्योंकि वे मंगोलों को क्रूर हत्यारा दर्शाना चाहते थे।

प्रश्न 29.
चंगेज़ खाँ की मृत्यु कब हुई ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ की मृत्यु 1227 ई० में हुई।

प्रश्न 30.
चंगेज़ खाँ का साम्राज्य कहाँ से कहाँ तक फैला हुआ था ? उसकी राजधानी का नाम क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का साम्राज्य फ़ारस से लेकर पीकिंग तक तथा साईबेरिया से लेकर सिंध तक फैला था।
  • उसकी राजधानी का नाम कराकोरम था।

प्रश्न 31.
चंगेज़ खाँ की सफलता के दो प्रमुख कारण क्या थे ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ स्वयं एक महान् सेनापति था।
  • चंगेज़ खाँ ने एक शक्तिशाली सेना का गठन किया था।

प्रश्न 32.
चंगेज़ खाँ की अलोकप्रियता के दो कारण लिखिए।
अथवा
चंगेज़ खाँ द्वारा विजित लोगों को अपने नवीन यायावर शासकों से कोई लगाव न था। इसके कोई दो कारण बताएँ।
अथवा
क्या कारण था कि 13वीं शताब्दी में चीन, ईरान और पूर्वी यूरोप के अनेक नगरवासी स्टेपी के गिरोहों को भय और घृणा की दृष्टि से देखते थे ?
उत्तर:

  • मंगोलों ने अपने युद्धों के दौरान अनेक नगरों का विनाश कर दिया था।
  • मंगोलों ने युद्धों के दौरान लाखों की संख्या में लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

प्रश्न 33.
यास से क्या अभिप्राय है ? इसका प्रचलन कब और किसने किया ?
अथवा
यांस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • यास से अभिप्राय है विधि संहिता।
  • इसका प्रचलन 1206 ई० में चंगेज़ खाँ ने किया।

प्रश्न 34.
यास क्या था? इसके दो सैनिक नियम क्या थे?
उत्तर:

  • यास चंगेज़ खाँ की विधि संहिता थी।
  • युद्ध आरंभ होने की स्थिति में छुट्टी पर गए सभी सैनिक तुरंत रिपोर्ट करें।
  • कोई भी सैनिक अपने कमांडर की अनुमति के बिना लूटमार नहीं कर सकता।

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प्रश्न 35.
यास के कोई दो महत्त्वपूर्ण नियम बताएँ।
उत्तर:

  • जो भी व्यक्ति कुरिलताई से मान्यता प्राप्त किए बिना अपने आपको खाँ घोषित करता है उसे मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए।
  • सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए तथा उनके पुरोहितों को सभी प्रकार के करों से मुक्त रखा जाना चाहिए।

प्रश्न 36.
यास के बारे में परवर्ती मंगोलों का चिंतन किस तरह चंगेज़ खाँ की स्मृति के साथ जुड़े हुए उनके तनावपूर्ण संबंधों को उजागर करता है ?
उत्तर:
परवर्ती मंगोल यास को चंगेज़ खाँ की विधि संहिता कह कर पुकारते थे। वे स्वयं का यास लागू करना चाहते थे। इससे उनके तनावपूर्ण संबंध उजागर होते हैं।

प्रश्न 37.
चंगेज़ खाँ के सैनिक प्रशासन की कोई दो प्रमुख विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उसने अपनी सेना को दशमलव पद्धति के अनुसार गठित किया।
  • उसकी सेना में न केवल विभिन्न मंगोल जनजातियों अपितु विभिन्न देशों के लोग सम्मिलित थे।

प्रश्न 38.
मंगोलों के नागरिक प्रशासन की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • मंगोल प्रशासन में खाँ की स्थिति सर्वोच्च थी।
  • मंगोलों ने अपने नागरिक प्रशासकों को योग्यता के आधार पर भर्ती किया था।

प्रश्न 39.
उलुस से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
उलुस का गठन चंगेज़ खाँ ने किया था। इसके अधीन चंगेज़ खाँ ने अपने पुत्रों को नव-विजित क्षेत्रों पर शासन करने का अधिकार दिया था। उलुस से भाव किसी निश्चित क्षेत्र से नहीं था क्योंकि इसमें लगातार परिवर्तन होता रहता था। उलुस में चंगेज़ खाँ के पुत्रों की स्थिति उप-शासकों जैसी थी।

प्रश्न 40.
ये-लू-चुत्साई कौन था ?
उत्तर:
ये-लू-चुत्साई एक चीनी मंत्री था। उसे मंगोलों ने 1215 ई० के आक्रमण के दौरान बँदी बना लिया था। उसने मंगोल प्रशासन को एक नया स्वरूप देने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई।

प्रश्न 41.
याम (yam) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
याम की स्थापना चंगेज़ खाँ ने की थी। यह एक प्रकार की सैनिक चौकियाँ थीं। यहाँ से घुड़सवार संदेशवाहक सरकारी संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते थे। इन यामों में यात्रियों के ठहरने का पूरा प्रबंध था।

प्रश्न 42.
कुबकुर से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
कुबकुर एक प्रकार का कर था। इसके अधीन मंगोल यायावर अपने पशु समूहों से अपने घोड़े अथवा अन्य पशुओं का दसवाँ हिस्सा सरकार को देते थे। मंगोल इन पशुओं का प्रयोग अपनी संचार व्यवस्था को बनाए रखने के लिए करते थे।

प्रश्न 43.
पैज़ा (paiza) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
पैज़ा एक प्रकार के पास थे जिन्हें यात्रियों की सुरक्षा एवं सुविधा के लिए मंगोल सरकार द्वारा जारी किया जाता था। ये पास तीन प्रकार सोने, चाँदी एवं लोहे के होते थे। इसे यात्री अपने माथे पर बाँधते थे। इन पासों के आधार पर ही इन यात्रियों एवं व्यापारियों को यामों में सुविधाएँ दी जाती थीं।

प्रश्न 44.
मंगोलों के धार्मिक जीवन की कोई दो विशेषताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • मंगोलों का प्रमुख देवता तेंगरी था। वे उसे सर्वशक्तिमान समझते थे।
  • मंगोल शासकों ने विभिन्न धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

प्रश्न 45.
चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी ओगोदेई था।
  • उसने 1229 ई० से 1241 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 46.
ओगोदेई की कोई दो प्रमुख सफलताएँ लिखिए।
उत्तर:

  • उसने उत्तरी चीन में अपनी स्थिति को सुदृढ़ किया।
  • उसने ईरान के शासक जलालुद्दीन को कड़ी पराजय दी।

प्रश्न 47.
ओगोदेई के कोई दो प्रमुख प्रशासनिक सुधार बताएँ।
उत्तर:

  • उसने मंगोल साम्राज्य में अनेक न्यायालयों की स्थापना की।
  • उसने करों को नियमित कर मंगोल अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया।

प्रश्न 48.
बाटू कौन था ?
उत्तर:
बाटू चंगेज़ खाँ का पोता था। उसने 1236 ई० से 1242 ई० तक अपने अभियानों के दौरान रूस, हंगरी, पोलैंड एवं ऑस्ट्रिया पर अधिकार कर मंगोल साम्राज्य के विस्तार में प्रशंसनीय योगदान दिया। उसने दक्षिण रूस में सुनहरा गिरोह की स्थापना की।

प्रश्न 49.
मोंके कौन था ?
उत्तर:
मोंके चंगेज़ खाँ का पोता एवं तोलूई का पुत्र था। वह 1251 ई० से 1259 ई० तक मंगोलों का महान् खाँ रहा। वह चंगेज़ खाँ के उत्तराधिकारियों में सबसे योग्य प्रमाणित हुआ।

प्रश्न 50.
कुबलई खाँ कौन था ?
उत्तर:
कुबलई खाँ चीन में मंगोलों का एक प्रसिद्ध शासक था। उसने 1260 ई० से 1294 ई० तक शासन किया। उसने दक्षिण चीन को अपने अधीन किया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया एवं अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाया। उसकी राजधानी का नाम पीकिंग था।

प्रश्न 51.
प्रसिद्ध वेनिस यात्री मार्को पोलो ने चीन की यात्रा कब की तथा वह किसके दरबार में रहा ?
अथवा
मार्को पोलो कौन था ?
उत्तर:

  • प्रसिद्ध वेनिस यात्री मार्को पोलो ने चीन की यात्रा 1275 ई० से 1292 ई० तक की।
  • वह कुबलई खाँ के दरबार में रहा।
  • उसने कुबलई खाँ के शासनकाल के बारे में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

प्रश्न 52.
हुलेगु ने बग़दाद पर कब अधिकार किया ? उसने किस खलीफ़ा का वध किया ? वह किस वंश से संबंधित था ?
उत्तर:

  • हुलेगु ने बग़दाद पर 1258 ई० में अधिकार किया।
  • उसने खलीफ़ा अल-मुस्तासिम का वध किया।
  • वह अब्बासी वंश से संबंधित था।

प्रश्न 53.
फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार जुवाइनी किस शासक का दरबारी इतिहासकार था ? उसकी रचना का नाम क्या था ?
उत्तर:

  • फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार जुवाइनी हुलेगु का दरबारी इतिहासकार था।
  • उसकी रचना का नाम हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड था।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

प्रश्न 1.
मंगोल कौन थे ?
उत्तर:
मध्य एशिया का एक यायावर समूह।

प्रश्न 2.
बर्बर शब्द यूनानी भाषा के किस शब्द से उत्पन्न हुआ है ?
उत्तर:
बारबोस।

प्रश्न 3.
मंगोल कहाँ का रहने वाला एक यायावर समूह था ?
उत्तर:
मध्य एशिया का।

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प्रश्न 4.
मंगोलों का गोपनीय इतिहास का लेखक कौन था ?
उत्तर:
ईगोर दे रखेविल्ट्स।।

प्रश्न 5.
मंगोल जिन तंबुओं में रहते थे उन्हें क्या कहा जाता था ?
उत्तर:
जर।

प्रश्न 6.
मंगोलों का सर्वाधिक प्रसिद्ध नेता कौन था ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ।

प्रश्न 7.
चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ था ?
उत्तर:
1162 ई० में।

प्रश्न 8.
चंगेज़ खाँ किस कुल से संबंधित था ?
उत्तर:
बोरजिगिद।

प्रश्न 9.
चंगेज खाँ के बचपन का नाम क्या था ?
उत्तर:
तेमुजिन।

प्रश्न 10.
मंगोलों के किस शासक को समुद्री खाँ की उपाधि दी गई थी ?
उत्तर:
चंगेज़ खाँ।

प्रश्न 11.
मंगोलों द्वारा बुखारा पर आधिपत्य कब स्थापित किया गया ?
उत्तर:
1221 ई०।

प्रश्न 12.
मंगोलों ने हिरात पर अपना अधिकार कब स्थापित किया ?
उत्तर:
1222 ई०।

प्रश्न 13.
चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया था ?
उत्तर:
1215 ई० में।

प्रश्न 14.
चंगेज़ खाँ ने यास का प्रचलन कब किया था ?
उत्तर:
1206 ई० में।

प्रश्न 15.
चंगेज़ खाँ ने सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए किन्हें नियुक्त किया था ?
उत्तर:
नोयान को।

प्रश्न 16.
ये-लू-चुत्साई कौन था ?
उत्तर:
एक चीनी मंत्री।

प्रश्न 17.
मंगोल साम्राज्य में व्यापारी अपनी सुरक्षा के लिए कौन-सा कर देते थे ?
उत्तर:
बाज़।

प्रश्न 18.
चंगेज़ खाँ का उत्तराधिकारी कौन था ?
उत्तर:
ओगोदेई।

प्रश्न 19.
मंगोलों ने बग़दाद पर कब अधिकार कर लिया था ?
उत्तर:
1258 ई० में।

प्रश्न 20.
पीकिंग में यूआन वंश का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
कुबलई खाँ ने।

प्रश्न 21.
इल-खानी वंश का संस्थापक कौन था ?
उत्तर:
हुलेगु।

प्रश्न 22.
हिस्ट्री-ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड का लेखक कौन था ?
उत्तर:
जुवाइनी।

प्रश्न 23.
मंगोलों ने अब्बासी वंश का अंत कब किया ?
उत्तर:
1258 ई०।

प्रश्न 24.
चीन में यूआन राजवंश का अंत कब हुआ ?
उत्तर:
1368 ई०।

प्रश्न 25.
गजन खाँ किस वंश का शासक था ?
उत्तर:
इल-खानी।

प्रश्न 26.
मंगोलों ने गोल्डन होर्ड की स्थापना कहाँ की थी ?
उत्तर:
दक्षिण रूस में।

रिक्त स्थान भरिए

1. चंगेज़ खाँ का जन्म .. ……………. ई० में हुआ।
उत्तर:
1162

2. चंगेज़ खाँ का प्रारंभिक नाम …………….. था।
उत्तर:
तेमुजिन

3. मंगोलों द्वारा चंगेज़ खाँ को …………….. तथा …………….. उपाधि से नवाजा गया।
उत्तर:
समुद्री खाँ, सार्वभौम शासक

4. मंगोलों का महानायक …………….. को घोषित किया गया।
उत्तर:
चंगेज़ खाँ

5. मंगोलों द्वारा निशापुर पर आधिपत्य …………….. ई० में किया गया।
उत्तर:
122

6. मंगोलों ने बग़दाद पर अधिकार व अब्बासी खिलाफ़त का अंत …………….. ई० में किया।
उत्तर:
1258

7. चीन में 1368 ई० में …………….. राजवंश का अंत हो गया।
उत्तर:
यूआन

8. मंगोलों द्वारा पीकिंग को ……………. ई० में लूटा गया।
उत्तर:
1215

9. ईरान में 1295-1304 ई० तक ……………. का शासन काल रहा।
उत्तर:
गज़न खाँ

10. गज़न खाँ सिंहासन पर …………….. ई० में बैठा।
उत्तर:
1295 ई०

11. जोची की मृत्यु …………….. ई० में हुई थी।
उत्तर:
1227

12. चंगेज़ खाँ के बड़े पुत्र जोची के पुत्र का नाम …………….. था।
उत्तर:
बाटू

बहु-विकल्पीय प्रश्न

1. 13वीं-14वीं शताब्दी में स्थापित विश्व का सबसे महत्त्वपूर्ण खानाबदोश साम्राज्य था
(क) मंगोल
(ख) हूण
(ग) हुआंग डी
(घ) गोवांग।
उत्तर:
(क) मंगोल

2. मंगोल कहाँ के निवासी थे ?
(क) मध्य एशिया के
(ख) भूमध्यसागर के
(ग) टुंड्रा के
(घ) चीन के।
उत्तर:
(क) मध्य एशिया के

3. यायावर से आपका क्या अभिप्राय है ?
(क) लुटेरे
(ख) कबीला
(ग) घुमक्कड़
(घ) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) घुमक्कड़

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

4. मंगोलों का प्रमुख व्यवसाय क्या था ?
(क) कृषि
(ख) पशुपालन
(ग) व्यापार
(घ) शिकार।
उत्तर:
(ख) पशुपालन

5. मंगोल निम्नलिखित में से किस जानवर को सबसे अधिक महत्त्व देते थे ?
(क) ऊँट
(ख) भेड़
(ग) घोड़ा
(घ) गाय।
उत्तर:
(ग) घोड़ा

6. मंगोलों के समय में स्टेपी क्षेत्र में कोई नगर क्यों नहीं उभर पाया ?
(क) मंगोलों ने कृषि को नहीं अपनाया था
(ख) मंगोलों की अर्थव्यवस्था घनी आबादी वाले क्षेत्रों का भरण-पोषण करने में असमर्थ थी
(ग) मंगोलों का निवास स्थाई नहीं था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

7. मंगोलों ने कृषि कार्य को क्यों नहीं अपनाया ?
(क) क्योंकि वे कृषि को पसंद नहीं करते थे
(ख) क्योंकि वे अपनी सभी खाद्य वस्तुएँ चीन से मंगवाते थे
(ग) क्योंकि मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ग) क्योंकि मंगोलिया की भौगोलिक परिस्थितियाँ कृषि के अनुकूल नहीं थीं

8. 12वीं शताब्दी में यायावरी समाज में धनी परिवार विशाल क्यों होते थे ?
(क) उनके पास बड़ी संख्या में पशु एवं चारण भूमि होती थी
(ख) उनके बड़ी संख्या में अनुयायी होते थे
(ग) उनका स्थानीय राजनीति में बहुत दबदबा होता था
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

9. मंगोलों को चरागाहों की खोज में क्यों भटकना पडता था ?
(क) क्योंकि मंगोलिया में चरागाहों की बहत कमी थी
(ख) वर्षा न होने पर घास के मैदान सूख जाते थे
(ग) क्योंकि मंगोल बड़ी संख्या में पशुपालन का कार्य करते थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) वर्षा न होने पर घास के मैदान सूख जाते थे

10. मंगोलों के लिए व्यापार क्यों महत्त्वपूर्ण था ?
(क) क्योंकि इनसे राज्य को काफी धन प्राप्त होता था
(ख) क्योंकि इससे व्यापारी बहुत प्रसन्न थे।
(ग) क्योंकि मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ग) क्योंकि मंगोलिया में संसाधनों की बहुत कमी थी

11. मंगोल साम्राज्य की स्थापना किसने की थी?
(क) रोमानोव
(ख) माँचू
(ग) तैमूर लंग
(घ) चंगेज़ खाँ।
उत्तर:
(घ) चंगेज़ खाँ।

12. चंगेज खाँ कौन था ?
(क) चीनियों का प्रसिद्ध नेता
(ख) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता
(ग) ईरानियों का प्रसिद्ध नेता
(घ) जापानियों का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(ख) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता

13. चंगेज़ खाँ का जन्म कब हुआ ?
(क) 1160 ई० में
(ख) 1162 ई० में
(ग) 1165 ई० में
(घ) 1167 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1162 ई० में

14. चंगेज़ खाँ का वास्तविक नाम क्या था ?
(क) तेमुजिन
(ख) माँचू
(ग) तातार
(घ) कगान।
उत्तर:
(क) तेमुजिन

15. कुरिलताई से क्या भाव है ?
(क) मंगोल सरदारों की सभा
(ख) मंगोलिया का प्रसिद्ध पर्वत
(ग) मंगोलिया की प्रसिद्ध नदी
(घ) मंगोलिया का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(क) मंगोल सरदारों की सभा

16. चंगेज़ खाँ मंगोलों का शासक कब बना ?
(क) 1203 ई० में
(ख) 1205 ई० में
(ग) 1206 ई० में
(घ) 1209 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1206 ई० में

17. चंगेज़ खाँ ने पीकिंग पर कब अधिकार किया था ?
(क) 1206 ई० में
(ख) 1209 ई० में
(ग) 1213 ई० में
(घ) 1215 ई० में।
उत्तर:
(घ) 1215 ई० में।

18. चंगेज खाँ की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) कराकोरम
(ख) बुखारा
(ग) पीकिंग
(घ) हेरात।
उत्तर:
(क) कराकोरम

19. यास से आपका क्या अभिप्राय है?
(क) विधि संहिता
(ख) मंगोल प्राँत
(ग) मंगोल सेनापति
(घ) मंगोल हरकारा पद्धति।
उत्तर:
(क) विधि संहिता

20. यास का प्रचलन किसने किया ?
(क) ओगोदेई ने
(ख) अल-मुस्तासिम ने
(ग) चंगेज़ खाँ ने
(घ) जुवाइनी ने।
उत्तर:
(ग) चंगेज़ खाँ ने

21. ये-लू-चुत्साई कौन था ?
(क) फ़ारसी का प्रसिद्ध इतिहासकार
(ख) एक चीनी मंत्री
(ग) मंगोलों का प्रसिद्ध नेता
(घ) तातारों का प्रसिद्ध नेता।
उत्तर:
(ख) एक चीनी मंत्री

22. पैजा अथवा जेरेज़ क्या था ?
(क) यात्रियों को दिया जाने वाला पास
(ख) सेना का एक महत्त्वपूर्ण पद
(ग) प्रांत का मुखिया
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) यात्रियों को दिया जाने वाला पास

23. चंगेज़ खाँ की मृत्यु कब हुई थी?
(क) 1206 ई० में
(ख) 1226 ई० में
(ग) 1227 ई० में
(घ) 1237 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1227 ई० में

24. चंगेज़ खाँ के बाद मंगोलिया का शासक कौन बना ?
(क) ओगोदेई
(ख) जोची
(ग) तोलुई
(घ) चघताई।
उत्तर:
(क) ओगोदेई

25. ओगोदेई ने चीन पर कब अधिकार कर लिया था ?
(क) 1231 ई० में
(ख) 1232 ई० में
(ग) 1234 ई० में
(घ) 1241 ई० में।
उत्तर:
(ग) 1234 ई० में

26. बाटू कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ का पोता
(ख) कुबलई खाँ का पोता
(ग) तैमूर का पुत्र
(घ) मोंके का पुत्र।
उत्तर:
(क) चंगेज़ खाँ का पोता

27. मोंके कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ का पोता
(ख) ओगोदेई का पोता
(ग) जमूका का पुत्र
(घ) ओंग खाँ का पुत्र।
उत्तर:
(क) चंगेज़ खाँ का पोता

28. मंगोलों के किस नेता ने बग़दाद पर अधिकार कर लिया था ?
(क) चंगेज़ खाँ
(ख) ओगोदेई
(ग) जोची
(घ) हुलेगु।
उत्तर:
(घ) हुलेगु।

29. यूआन वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) चंगेज़ खाँ
(ख) ओगोदेई
(ग) बाटू
(घ) कुबलई खाँ।
उत्तर:
(घ) कुबलई खाँ।

30. कुबलई खाँ की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) कराकोरम
(ख) पीकिंग
(ग) शंघाई
(घ) बगदाद।
उत्तर:
(ख) पीकिंग

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 5 यायावर साम्राज्य

31. कुबलई खाँ के दरबार में कौन-सा महान् यात्री पहुंचा था ?
(क) मार्कोपोलो
(ख) कोलंबस
(ग) ह्यनसांग
(घ) वास्कोडिगामा।
उत्तर:
(क) मार्कोपोलो

32. इल-खानी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) ओगोदेई
(ख) कुबलई खाँ
(ग) हुलेगु
(घ) जोची।
उत्तर:
(ग) हुलेगु

33. जुवाइनी की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या था ?
(क) हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड
(ख) मंगोलों का गोपनीय इतिहास
(ग) हिस्ट्री ऑफ़ द मंगोलस
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) हिस्ट्री ऑफ़ द कनकरर ऑफ़ द वर्ल्ड

34. गज़न खाँ किस वंश का प्रसिद्ध शासक था ?
(क) सी सिया
(ख) तातार
(ग) इल-खानी
(घ) यूआन।
उत्तर:
(ग) इल-खानी

35. गोल्डन होर्ड की स्थापना कहाँ की गई थी?
(क) रूसी स्टेपी क्षेत्र में
(ख) मंगोलिया में
(ग) ईरान में
(घ) जापान में।
उत्तर:
(क) रूसी स्टेपी क्षेत्र में

यायावर साम्राज्य HBSE 11th Class History Notes

→ मंगोल मध्य एशिया में रहने वाला एक यायावर समूह था। ये लोग मूलतः घुमक्कड़ थे। वे पशुपालक एवं शिकार संग्राहक थे। उनका समाज विभिन्न कबीलों में विभाजित था। इन कबीलों में आपसी लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। लूटमार करना उनकी जीवन शैली का एक अभिन्न अंग था।

→ वे चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते रहते थे। वे तंबुओं में निवास करते थे। उनके परिवार पितृपक्षीय थे। अतः परिवार में पुत्र का होना आवश्यक समझा जाता था। उस समय धनी परिवार बहुत विशाल होते थे।

→ उस समय बहु-विवाह का प्रचलन था। उनका प्रमुख भोजन माँस एवं दूध था। वे सूती, रेशमी एवं ऊनी वस्त्र पहनते थे। मंगोल अपने मृतकों का रात्रि के समय संस्कार करते थे। वे शवों को जमीन में दफ़न करते थे तथा उनके साथ कुछ आवश्यक वस्तुएँ भी रखते थे।

→ क्योंकि उस समय स्टेपी क्षेत्र में संसाधनों की बहुत कमी थी इसलिए मंगोलों ने चीन के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित किए थे। मंगोलों एवं चीनियों द्वारा की जाने वाली लूटमार के कारण इनके संबंधों में आपसी दरार भी उत्पन्न हो जाती थी।

→ चंगेज़ खाँ ने यायावर साम्राज्य की स्थापना में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। उसका जन्म 1162 ई० में हुआ था। उसका बचपन का नाम तेमुजिन था। उसके पिता का नाम येसूजेई था तथा वह कियात कबीले का मुखिया था।

→ उसकी माता का नाम ओलुन-इके था। तेमुजिन का विवाह बोरटे के साथ हुआ था। उसके बचपन में ही उसके पिता की एक विरोधी कबीले द्वारा हत्या कर दी गई थी। इसलिए उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद तेमुजिन ने अपना धैर्य न खोया।

→ इस संकट के समय उसे बोघूरचू, जमुका तथा तुगरिल खाँ ने बहुमूल्य सहयोग दिया। तेमुजिन ने अनेक शक्तिशाली कबीलों को पराजित कर अपने नाम की धाक जमा दी। उसकी सफलताओं को देखते हुए कुरिलताई ने 1206 ई० में तेमुजिन को चंगेज़ खाँ की उपाधि से सम्मानित किया।

→ चंगेज़ खाँ ने 1227 ई० तक शासन किया। अपने शासनकाल के दौरान चंगेज़ खाँ ने उत्तरी चीन एवं करा खिता को विजित किया। उसने ख्वारज़म के शाह मुहम्मद को पराजित कर उसके अनेक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

→ उसने कराकोरम को मंगोल साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। चंगेज़ खाँ ने मंगोल साम्राज्य की सुरक्षा एवं विस्तार के उद्देश्य से अपनी सेना को शक्तिशाली बनाया। उसने नागरिक प्रशासन में भी अनेक उल्लेखनीय सुधार किए। उसकी महान् सफलताओं को देखते हुए उसे आज भी मंगोलिया के इतिहास में महान् राष्ट्र-नायक (national hero) के रूप में स्मरण किया जाता है।

→ चंगेज़ खाँ की मृत्यु के पश्चात् ओगोदेई (1229-41 ई०), गुयूक (1246-48 ई०) एवं मोंके (1251-59 ई०) ने शासन किया। उन्होंने मंगोल साम्राज्य के विस्तार एवं संगठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। मोंके की मृत्यु के पश्चात् मंगोल साम्राज्य अनेक वंशों में विभाजित हो गया था।

→ इनमें चीन में कुबलई खाँ द्वारा स्थापित किया गया यूआन वंश, ईरान में हुलेगु द्वारा स्थापित किया गया इल-खानी वंश एवं दक्षिण रूस में बाटू द्वारा स्थापित किया गया गोल्डन होर्ड वंश उल्लेखनीय थे। स्टेपी निवासियों का अपना साहित्य लगभग न के बराबर था।

→ अतः यायावरी समाज के बारे हमारा ज्ञान मुख्य तौर पर इतिवृत्तों (chronicles), यात्रा वृत्तांतों (travelogues) तथा नगरीय साहित्यकारों के दस्तावेजों (documents produced by city based literateurs) से प्राप्त होता है। इन लेखकों की यायावरों के जीवन संबंधी सूचनाएँ अज्ञात एवं पूर्वाग्रहों (biased) से ग्रस्त हैं।

→ इनमें यायावर समुदायों को आदिम बर्बर (primitive barbarians) एवं मंगोलों को स्टेपी लुटेरों के रूप में पेश किया गया। मंगोलों पर सबसे बहुमूल्य शोध कार्य 18वीं एवं 19वीं शताब्दी में रूसी विद्वानों ने किया।

→ इनमें बोरिस याकोवालेविच ब्लाडिमीरस्टॉव (Boris Yakovlevich Vladimirtsov) एवं वैसिली ब्लैदिमिरोविच बारटोल्ड (Vasily Vladimirovich Bartold) के नाम उल्लेखनीय हैं। हमें पारमहाद्वीपीय (transcontinental) मंगोल साम्राज्य के विस्तार से संबंधित महत्त्वपूर्ण जानकारी चीनी, मंगोलियाई, फ़ारसी, अरबी, इतालवी, लातीनी, फ्रांसीसी एवं रूसी स्रोतों से मिलती है।

→ मंगोलों के इतिहास पर बहुमूल्य प्रकाश डालने वाले दो महत्त्वपूर्ण स्रोत ईगोर दे रखेविल्ट्स (Igor de Rachewiltz) की रचना मंगोलों का गोपनीय इतिहास (The Secret History of the Mongols) तथा मार्को पोलो (Marco Polo) का यात्रा वृत्तांत (travels) हैं।

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HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

Haryana State Board HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई० Important Questions and Answers.

Haryana Board 11th Class History Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

निबंधात्मक उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों के सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक जीवन की मुख्य विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में जाहिलिया (Jahiliya) अथवा अज्ञानता के युग का बोलबाला था। उस समय अरब में बदू (Bedouins) लोगों की प्रमुखता थी। बढ़े खानाबदोश कबीले थे। वे चरागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी।

उस समय अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उन्हें केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज में अन्य अनेक कुप्रथाएँ भी प्रचलित थीं। उस समय अरब के लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी देवता होता था। उस समय के लोग अनेक प्रकार के अंध-विश्वासों एवं जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे।

क्योंकि अरब का अधिकाँश क्षेत्र बंजर, वनस्पति रहित एवं दुर्गम था इसलिए अरबों का आर्थिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। अरबों का कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन भी नहीं था। उनमें एकता एवं राष्ट्रीयता की भावना बिल्कुल नहीं थी। एडवर्ड मैक्नल बर्नस के अनुसार,

“अरब जो कि एक रेगिस्तानी प्रायद्वीप था इस्लाम की स्थापना से पूर्व इतना पिछड़ा हुआ था कि इसके दो प्रमुख पड़ोसी साम्राज्यों-रोम एवं ईरान ने अरब प्रदेशों में अपने साम्राज्य का विस्तार करना उचित नहीं समझा।

I. सामाजिक जीवन

सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित थीं

1. परिवार (Family):
परिवार अरबों के समाज का मूल आधार था। उस समय अरब में संयुक्त परिवार प्रणाली का प्रचलन था। उस समय परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे। परिवार का सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति इसका मुखिया होता था। वह समस्त परिवार पर नियंत्रण रखता था। परिवार के सभी सदस्य उसके आदेशों का पालन करते थे। परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था। मुखिया की मृत्यु के पश्चात् परिवार का दायित्व उसके ज्येष्ठ पुत्र पर आता था। डॉक्टर के० ए० फारिक के अनुसार,

“पिता को अपने परिवार पर निरंकुश शक्ति प्राप्त थी तथा वह उनके जीवन एवं मौत का स्वामी था।”

2. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women):
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति बहत बदतर थी। उस समय पत्री के जन्म को परिवार के लिए अपशगन समझा जाता था लड़कियों को जन्म लेते ही जमीन में दफन कर दिया जाता था।

निस्संदेह यह एक निंदनीय कुप्रथा थी। उस समय समाज में जो अधिकार पुरुषों को दिए गए थे स्त्रियों को उनसे वंचित रखा गया था। उस समय स्त्रियों को शिक्षा देने का प्रचलन नहीं था। अतः वे अनपढ़ रहती थीं। उनका विवाह बहुत कम उम्र में ही कर दिया जाता था।

उस समय समाज में बहु-विवाह प्रथा प्रचलित थी। इसके अतिरिक्त उस समय पुरुषों में अनेक रखैलें रखने की प्रथा भी प्रचलित थी। वास्तव में उस समय समाज में स्त्री को केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। उस समय समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। यहाँ तक कि पुत्र अपनी विधवा माँ के साथ एवं अपनी बहनों के साथ विवाह कर लेता था।

पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा उसके निकटतम संबंधियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करने से नहीं हिचकिचाती थी। उस समय स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार से वंचित रखा गया था। इससे समाज में उनकी स्थिति अधिक दयनीय हो गई थी। प्रोफेसर के० अली का यह कहना उचित है कि, “उस समय स्त्रियों की स्थिति किसी भी समकालीन अन्य देश की स्त्रियों की स्थिति की अपेक्षा बहुत खराब थी।”

3. शिक्षा (Education):
अरब शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पिछड़े हुए थे। अधिकाँश अरब अनपढ़ थे। उस समय स्त्रियों को शिक्षा देने को कोई प्रचलन नहीं था। अनपढ़ता के कारण अरब समाज में व्यापक अंधविश्वास प्रचलित थे।

4. लोगों का नैतिक स्तर (Standard of People’s Morality):
उस समय अरब समाज में अनैतिकता का व्यापक प्रचलन था। उस समय लूटमार करना तथा लोगों के साथ धोखा करना एक सामान्य बात थी। लोगों में शराब पीने, अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करने तथा जुआ खेलने का प्रचलन बहुत था। उस समय स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक सामान्य बात मानी जाती थी। निस्संदेह यह अरब समाज के पतन का संकेत था।

5. मनोरंजन (Entertainments) :
उस समय अरब के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन नृत्य एवं गान था। वे बाँसुरी एवं गिटार के बहुत शौकीन थे। उस समय जुए का व्यापक प्रचलन था। वे पशुओं की लड़ाइयाँ भी देखते थे। वे शिकार खेलने के भी शौकीन थे।

6. वेश-भूषा एवं भोजन (Dress and Diet):
उस समय बदू लोगों में लंबे कुर्ते एवं पजामा पहनने का प्रचलन था। वे कुर्तों के ऊपर ऊँट की खाल से बना एक ढीला-ढाला चोगा (cloak) पहनते थे। इसके अतिरिक्त सिर पर पगड़ी बाँधते थे। उच्च वर्ग के लोगों के वस्त्र बहुत कीमती होते थे। स्त्रियाँ सलवार एवं कमीज़ पहनती थीं।

वे इसके ऊपर बुर्का पहनती थीं। उनका प्रमुख भोजन खजूर एवं दूध था। इसके अतिरिक्त वे गेहूँ, बाजरा, अंगूर, खुमानी, सेब, बादाम एवं केले आदि का भी प्रयोग करते थे। वे ऊँट, भेड़ एवं बकरियों का माँस खाते थे। उच्च वर्ग के लोगों में मदिरापान का बहुत प्रचलन था।

7. दास प्रथा (Slavery):
उस समय अरब समाज में दास प्रथा का काफी प्रचलन था। उस समय युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को दास बना लिया जाता था। उस समय दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। उन्हें अपनी इच्छा से विवाह करने की अनुमति नहीं थी। ऐसा करने वाले दासों को कठोर दंड दिया जाता था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

II. आर्थिक जीवन

इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों का आर्थिक जीवन पिछड़ा हुआ था। यहाँ की अधिकाँश भूमि बंजर है। यहाँ वर्षा बहुत कम होती है। यहाँ जनसंख्या बहुत विरल है। यहाँ यातायात एवं संचार के साधन बहुत कम थे। इसके बावजूद अरब लोगों ने आर्थिक क्षेत्र में जो प्रगति की उसका संक्षिप्त वर्णन अग्रलिखित अनुसार है

1. कृषि (Agriculture):
अरब की भूमि रेतीली होने के कारण अनउपजाऊ है। यहाँ वर्षा नाम मात्र होती है। कई बार तो लगातार तीन अथवा चार वर्षों तक वर्षा नहीं होती। यहाँ नदियाँ भी बहुत कम हैं। ये नदियाँ भी सदैव नहीं बहतीं। अतः यहाँ सिंचाई के साधनों की बहुत कमी है। अत: यहां फ़सलों का उत्पादन बहुत कम होता है।

फ़सलों का उत्पादन केवल उन्हीं क्षेत्रों में होता है जहाँ सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं तथा भूमि उपजाऊ है। यहाँ की प्रमुख फ़सल खजूर है। अल-हिजाज (al-Hijajh) तथा अल-मदीना (al-Madinah) खजूर उत्पादन के दो प्रसिद्ध केंद्र थे। खजूर का अरब लोगों के जीवन में विशेष महत्त्व है। यह अरब लोगों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है। इसका पेय (beverage) बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।

इसकी गुठली (crushed stones) ऊँट के लिए रोज़ाना भोजन उपलब्ध करवाती है। खजूर के पेड़ की छाल से रस्सियाँ (ropes) तथा चटाइयाँ (mats) बनाई जाती हैं। इसकी लकड़ी आग जलाने का एकमात्र साधन है। प्रोफेसर के० अली का यह कथन बिल्कुल ठीक है कि,

“अरब में खजूर को पेड़ों की रानी कहा जाता है। यह गरीब तथा धनी दोनों की एक समान मित्र है जिसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे सोचा नहीं जा सकता है।”

अरब में जौ (barley) का उत्पादन भी बड़े पैमाने पर किया जाता है। इसका चारा घोड़ों को खिलाया जाता है तथा आटा मनुष्यों के काम आता है। यमन में गेहूँ का उत्पादन बहुत बड़ी मात्रा में होता था। उमान में बाजरा (millet) तथा चावल का उत्पादन किया जाता था। इनके अतिरिक्त समुद्र तटीय क्षेत्रों (coastal areas) में अनेक प्रकार की सब्जियों तथा फलों का उत्पादन किया जाता था। फलों में अनार, सेब, खुमानी, बादाम तथा केले प्रसिद्ध थे।

2. पशुपालन (Cattle Rearing):
अरब लोगों का दूसरा प्रमुख व्यवसाय पशुपालन था। ऊँट, घोड़ा, भेड़, तथा बकरी उनके प्रमुख पालतू जानवर थे। इन जानवरों में ऊँट को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था। उसे रेगिस्तान का जहाज़ (ship of the desert) कहा जाता है। उसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। ऊँट 57° सेंटीग्रेड के उच्च तापमान में भी एक दिन में 160 किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। वह 300 किलोग्राम से अधिक का भार ढो सकता है।

वह कई दिनों तक बिना पानी पीये जीवित रह सकता है। यह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है। लोग ऊँटनी का दूध पीते हैं, इसका माँस खाते हैं, इसकी खाल का तंबू बनाते हैं तथा इसके गोबर का आग के लिए प्रयोग करते हैं। इसके मूत्र से दवाइयाँ बनाई जाती हैं। इसे शेख़ की दौलत का प्रतीक माना जाता है। बद् इसे विवाह के अवसर पर दहेज के रूप में देते हैं। ऊँट के महत्त्व के संबंध में डॉक्टर ए० रहीम ने लिखा है कि, “ऊँट जिसे रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है अरबों का सबसे उपयोगी पशु है।

ऊँट के बिना रेगिस्तानी जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता।”

अरबी घोड़े विश्व में अपनी उत्तम नस्ल के लिए प्रसिद्ध हैं। इन्हें दौलत का प्रतीक माना जाता था। बदुओं के जीवन में घोडे का विशेष महत्त्व था। उनके द्वारा किए जाने वाले आक्रमणों में घोड़ों की विशेष भूमिका होती थी। घोड़े तीव्र गति से इधर-उधर आ जा सकते थे। शिकार करते समय भी घोड़ों का प्रयोग किया जाता था। अरब लोग दूध एवं माँस के लिए भेड़ एवं बकरियाँ भी पालते थे। वे भेड़ों से ऊन भी प्राप्त करते थे।

3. व्यापार (Trade):
इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार अधिक उन्नत न था। इसके लिए चार प्रमुख कारण उत्तरदायी थे। प्रथम, बदुओं की लूटमार द्वारा देश में अराजकता का वातावरण था। दूसरा, उस समय व्यापारिक मार्ग सुरक्षित न थे। तीसरा, उस समय अरब में उद्योग विकसित नहीं थे। चौथा, उस समय यातायात के साधन उन्नत न थे।

अरब अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति शहरों में लगने वाली मंडियों से करते थे। इन मंडियों से वे खाद्य पदार्थ एवं पशु प्राप्त करते थे। कुछ धनी व्यापारी ईरान, मेसोपोटामिया, सीरिया, मिस्र एवं इथियोपिया आदि देशों के साथ व्यापार करते थे। वे इन देशों को ऊँटों, घोड़ों, फलों तथा शराब आदि का निर्यात करते थे।

III. धार्मिक जीवन

इस्लाम के उदय से पूर्व अरब निवासी धार्मिक रूप से भी बहुत पिछड़े हुए थे। वे एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था। एक कबीले के लोग दूसरे कबीले के देवी-देवता से नफरत करते थे। वे अपने देवी-देवता को सर्वोच्च मानते थे। वे इन देवी-देवताओं की स्मृति में विशाल मस्जिदों का निर्माण करते थे तथा उनमें इनकी मूर्तियाँ रखी जाती थीं। अकेले मक्का में 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इसे अरब का सबसे पवित्र स्थान माना जाता था।

प्रत्येक वर्ष अरब के विभिन्न भागों व्या में लोग यहाँ लगने वाले उक्ज (ukaj) मेले के अवसर पर एकत्र होते थे। अरब लोग अपने देवी देवताओं को प्रसन्न करने के लिए जानवरों की बलियाँ देते थे। कभी-कभी मानव बलि भी दी जाती थी। हबल (Hubal) अरबों का सबसे प्रसिद्ध देवता था। अल-उज़्ज़ा (al-Uzza), अल-लत (al-Lat) एवं अल-मना (al Manah) को अल्लाह की तीन पुत्रियाँ माना जाता था। अतः इनकी उपासना विशेष श्रद्धा के साथ की जाती थी। प्रोफेसर जोसेफ हेल के अनुसार,

“अरब अभिलेखों में दिए गए विशाल देवताओं के नामों से पता चलता है कि वहाँ धर्म को कितना महत्त्व दिया जाता था। अरबों में अनेक प्रकार के अंध-विश्वास प्रचलित थे। वे सूर्य, चंद्रमा, तारों, पत्थरों एवं वृक्षों की भी उपासना करते थे। वे जादू-टोनों एवं भूत-प्रेतों में भी विश्वास करते थे। उनका मृत्यु के पश्चात् जीवन, कर्म तथा पुनर्जन्म में भी पूर्ण विश्वास था।

IV. राजनीतिक जीवन

इस्लाम उदय से पूर्व अरब के लोगों का राजनीतिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। उनका कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन नहीं था। केंद्रीय सत्ता के अभाव के कारण जिसकी लाठी उसकी भैंस (might is right) का बोलबाला था। अरबों में पशुओं, चरागाहों, भूमि तथा पानी के लिए जातीय लड़ाइयाँ चलती रहती थीं। बढ़े लोग लूटपाट में लीन रहते थे।

उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीला राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होता था। उस समय अरबों में राष्ट्रीय भावना का अभाव था। वे केवल अपने कबीले के प्रति वफ़ादार होते थे। प्रत्येक कबीले का अपना मुखिया होता था जिसे शेख़ (sheikh) कहा जाता था। उसका चुनाव व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता एवं उदारता के आधार पर किया जाता था।

कबीले के लोग उसका बहुत सम्मान करते थे। वह अपने कबीले के लोगों की देखभाल करता था तथा उनके झगड़ों का निपटारा करता था। देश में कोई एक कानून नहीं था। प्रत्येक कबीले के अपने अलग कानून थे। उस समय ‘खून का बदला खून’ का नियम बहुत प्रचलित था। शेख़ कबीले के लोगों की प्रसन्नता तक अपने पद पर बना रह सकता था। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि इस्लाम के उदय से पूर्व अरब के लोग सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं राजनीतिक दृष्टिकोणों से पिछड़े हुए थे। निस्संदेह इसने अरब में इस्लाम के उदय का आधार तैयार किया।

प्रश्न 2.
पैगंबर मुहम्मद के जीवन के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की गणना विश्व के महान् व्यक्तियों में की जाती है। उनके जीवन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. जन्म तथा माता-पिता (Birth and Parentage):
पैगंबर मुहम्मद का जन्म 29 अगस्त, 570 ई० को मक्का में हुआ था। उनके पिता का नाम अब्दुल्ला (Abdullah) था। वह अरब के एक प्रसिद्ध कबीले कुरैश (Quraysh) से संबंधित था। अब्दुल्ला एक छोटा व्यापारी था। मुहम्मद के जन्म समय अब्दुल्ला सीरिया में व्यापार के सिलसिले में गया था।

वापसी समय वह मदीना (Medina):
में बीमार पड़ गया तथा वहीं उसकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार मुहम्मद अपने पिता के प्यार से वंचित रह गया। उसकी माता का नाम अमीना (Amina) था। जब मुहम्मद 6 वर्ष के हुए तो उनकी माता ने भी इस संसार को सदैव के लिए अलविदा कह दी।

2. बचपन (Childhood):
मुहम्मद के माता-पिता की मृत्यु के पश्चात् मुहम्मद की देखभाल का उत्तरदायित्व उनक चाचा अबू तालिब (Abu Talib) ने संभाला। उसने मुहम्मद का पालन-पोषण बहुत लाड-प्यार के साथ किया। उन्हें बचपन में ही भेड़ों एवं ऊँटों की रखवाली के काम पर लगा दिया गया था। मुहम्मद अपना अवकाश का समय प्रभु भक्ति में व्यतीत करते थे। वह अपने अच्छे स्वभाव एवं ईमानदारी के कारण लोगों में बहुत प्रिय थे।

3. विवाह (Marriages):
मुहम्मद का प्रथम विवाह 595 ई० में खदीज़ा (Khadija) से हुआ। उस समय मुहम्मद की आयु 25 वर्ष थी तथा खदीज़ा की आयु 40 वर्ष थी। खदीज़ा मक्का की एक धनी विधवा थी। वह ऊँटों का व्यापार करती थी। उसने मुहम्मद की ईमानदारी एवं विश्वसनीयता के संबंध में सुन रखा था। अत: उसने मुहम्मद को व्यापार के सिलसिले में अपने पास रख लिया।

उसने मुहम्मद को व्यापार के संबंध में सीरिया भेजा। यहाँ मुहम्मद ने अपनी योग्यता एवं ईमानदारी के बल पर अच्छा मुनाफा कमाया। इससे खदीज़ा बहुत प्रभावित हुई।

अतः खदीजा ने मुहम्मद से विवाह का प्रस्ताव रखा। मुहम्मद ने खदीज़ा के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। यह विवाह मुहम्मद के जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुआ। इस विवाह से मुहम्मद की प्रसिद्धि बढ़ गई। 619 ई० में खदीज़ा की मृत्यु के पश्चात् मुहम्मद ने कुछ अन्य विवाह किए थे। मुहम्मद की पत्नियों में आयशा (Aisha) सर्वाधिक प्रसिद्ध थी। वह इस्लाम के प्रथम खलीफ़ा अबू बकर (Abu Bakr) की पुत्री थी। डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “मुहम्मद का खदीज़ा के साथ विवाह उसके जीवन की एक अति महत्त्वपूर्ण घटना थी।”

4. इलहाम की प्राप्ति (Attainment of Enlightenment):
पैगंबर मुहम्मद मक्का में स्थित एक पहाड़ी में हीरा नामक गुफा में जाकर ध्यान लगाते थे। मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) की प्राप्ति हुई। इस रात को शक्ति की रात कहा जाता है। यह रात रमजान (Ramadan) के अंत में पड़ती है। उस समय मुहम्मद की आयु 40 वर्ष थी। इसके पश्चात् मुहम्मद पैगंबर मुहम्मद के नाम से लोकप्रिय हुए।

5. मक्का में प्रचार (Preaching in Mecca):
पैगंबर मुहम्मद ने इलहाम प्राप्त करने के पश्चात् अपना प्रचार कार्य अपने परिवार एवं रिश्तेदारों में किया। इसे सर्वप्रथम उसकी पत्नी खदीजा एवं पुत्रियों ने स्वीकार किया। 612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश मक्का में दिया। उन्होंने लोगों को बताया कि अल्लाह एक है तथा मुहम्मद उसके पैगंबर (संदेशवाहक) हैं।

उन्होंने मूर्ति पूजा का कट्टर विरोध किया तथा इन्हें नष्ट करना मुसलमानों का प्रथम धार्मिक कर्त्तव्य बताया। उन्होंने केवल एक अल्लाह की इबादत पर बल दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों को जिन्हें मुसलमान कहा जाता था, को अल्लाह के समक्ष आत्म-समर्पण करने के लिए प्रेरित किया। इसलिए उनके धर्म का नाम इस्लाम पड़ा।

6. मदीना को हिजरत (Emigration to Medina):
पैगंबर मुहम्मद की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण मक्का के अनेक प्रभावशाली लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे। दूसरा, पैगंबर मुहम्मद अरब समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों को दूर कर इसे एक नई दिशा देना चाहते थे। इसे मक्का के रूढ़िवादी लोग पसंद नहीं करते थे। अतः बाध्य होकर पैगंबर मुहम्मद 28 जून, 622 ई० को मक्का से मदीना कूच कर गए।

वह 2 जुलाई, 622 ई० को मदीना पहुँचे। इस घटना को मुस्लिम इतिहास में हिजरत कहा जाता है। यह घटना पैगंबर मुहम्मद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। इस वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर का आरंभ हुआ। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर जोसेफ हेल के शब्दों में, “यह पैगंबर के जीवन एवं कार्य में एक निर्णायक मोड़ तथा इस्लाम के इतिहास में एक महान् मोड़ सिद्ध हुआ।”

7. बद्र की लड़ाई (Battle of Badr):
मुसलमानों जो कि पैगंबर मुहम्मद के अनुयायी थे तथा मक्का के कुरैशों के मध्य 13 मार्च, 624 ई० को मदीना के निकट एक निर्णायक लड़ाई हुई। यह लड़ाई इतिहास में बद्र की लड़ाई के नाम से प्रसिद्ध है। मदीना में पैगंबर मुहम्मद के बढ़ते हुए प्रभाव को मक्का के कुरैश सहन न कर सके। कुरैश पैगंबर मुहम्मद को एक सबक सिखाना चाहते थे।

बद्र नामक स्थान पर हुई लड़ाई में पैगंबर मुहम्मद के सैनिकों ने रणक्षेत्र में वे जौहर दिखाए कि कुरैशी सैनिकों को कड़ी पराजय का सामना करना पड़ा। यह पैगंबर मुहम्मद की प्रथम निर्णायक विजय थी। डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “बद्र की लड़ाई के इस्लाम के इतिहास में दूरगामी प्रभाव पड़े।

यह उसी प्रकार महत्त्वपूर्ण थी जिस प्रकार बेस्तील के दुर्ग का फ्रांसीसी क्रांतिकारियों द्वारा नष्ट करना।” प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर के० ए० निज़ामी का यह कहना उचित है कि, “बद्र की लड़ाई इस्लाम के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई।”

8. उहुद की लड़ाई (Battle of Uhud):
कुरैश बद्र की लड़ाई में हुई अपनी अपमानजनक पराजय का बदला लेना चाहते थे। अबू सूफयान ने मुसलमानों को पराजित करने का प्रण लिया। इसके अतिरिक्त कुरैश मदीना में पैगंबर मुहम्मद के बढ़ते हुए प्रभाव से चिंतित थे। इससे उनके राजनीतिक एवं व्यापारिक हितों को नुकसान पहुँच सकता था।

अतः अब सफयान के नेतृत्व में लगभग 3000 सैनिक मदीना की ओर चल पड़े। पैगंबर मुहम्मद ने उनका सामना करने का निर्णय किया। 21 मार्च, 625 ई० को दोनों सेनाओं के मध्य उहुद नामक पहाड़ी (Mount Uhud) पर लड़ाई हुई। इस लड़ाई में पैगंबर मुहम्मद घायल हो गए तथा उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा।

9. खंदक की लड़ाई (Battle of Ditch):
उहुद की लड़ाई में पराजित होने के पश्चात् भी मुसलमानों ने अपना धैर्य न खोया। उन्होंने अपनी पराजय का बदला लेने के उद्देश्य से अपनी सेना को संगठित किया। दूसरी ओर जब कुरैशों को मुसलमानों की सैनिक गतिविधियों की सूचना मिली तो वे इसे सहन न कर सके। अतः उन्होंने मुसलमानों को सबक सिखाने का निर्णय किया। पैगंबर मुहम्मद ने शत्रुओं का सामना करने के लिए एक योजना बनाई। इसके अधीन मदीना नगर के चारों ओर खाइयाँ खुदवा दीं।

जब 13 मार्च, 627 ई० को अबू सूफयान के नेतृत्व में गठजोड़ सैनिक मदीना पहुंचे तो वे खाइयों को देख कर भौंचक्के रह गए। यह स्वर्ण अवसर देख मुसलमानों ने उन पर आक्रमण कर दिया। खाई के कारण इस लड़ाई को खंदक की लड़ाई कहा जाता है। इस लड़ाई में मुसलमानों ने मक्का सैनिकों को पराजित कर दिया। इस कड़ी पराजय के पश्चात् मक्का सैनिकों की प्रतिष्ठा धूल में मिल गई। इस निर्णायक विजय से मुसलमानों का साहस बहुत बढ़ गया।

10. मक्का की विजय (Conquest of Mecca):
मक्का की विजय पैगंबर मुहम्मद की एक अन्य महत्त्वपूर्ण सफलता थी। इस लड़ाई का कारण यह था कि हुदेबिया की संधि के अनुसार कुरैशों ने मुसलमानों को मक्का की यात्रा करने की अनुमति न दी। अत: पैगंबर मुहम्मद ने उनसे दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया। अत: उसने 1 जनवरी, 630 ई० को 10,000 सैनिकों के साथ मक्का पर आक्रमण कर दिया। मक्का में पैगंबर मुहम्मद का बहुत कम विरोध किया गया।

अतः पैगंबर मुहम्मद ने सुगमता से मक्का पर अधिकार कर लिया। मक्का को इस्लामी राज्य की धार्मिक राजधानी घोषित किया गया। इस निर्णायक विजय से पैगंबर महम्मद के नाम को चार चाँद लग गए। अनेक लोग इस्लाम में सम्मिलित हो गए। प्रसिद्ध इतिहासकार सर अब्दुल्ला सहरावर्दी के अनुसार, प्रोफेसर के० अली के शब्दों में, “मक्का की विजय ने इस्लाम में एक नए युग का आरंभ किया।”

11. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु (Death of Prophet Muhammad):
पैगंबर मुहम्मद की 8 जून, 632 ई० में मदीना में मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व पैगंबर मुहम्मद ने न केवल अणुओं के समान बिखरे हुए कबीलों में एकता स्थापित की अपितु अरब समाज को एक नई दिशा देने में सफलता भी प्राप्त की। उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण इस्लाम के इतिहास में उनका नाम सदैव के लिए अमर रहेगा।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 3.
पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
अथवा
इस्लाम की प्रमुख शिक्षाएं क्या थी ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद अथवा इस्लाम की शिक्षाएँ बहुत सरल एवं प्रभावशाली थीं। इन शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा एवं वे बड़ी संख्या में इस्लाम में सम्मिलित हुए।

1. अल्लाह एक है (God is One):
पैगंबर मुहम्मद ने अपनी शिक्षाओं में बार-बार इस बात पर बल दिया कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। वह संसार की रचना करता है। वह इसकी पालना करता है। वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है। उसकी अनुमति के बिना संसार का पत्ता तक नहीं हिल सकता।

वह अत्यंत दयावान् है । वह पापी लोगों के पापों को क्षमा कर सकता है। वह सदैव रहने वाला है। कोई भी अन्य देवी-देवता उसके सामने ऐसे है जैसे सूर्य के सामने तारा। अत: पैगंबर मुहम्मद ने केवल एक अल्लाह की इबादत का संदेश दिया।

2. इस्लाम के पाँच स्तंभ (Five Pillars of Islam):
इस्लाम में पाँच सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है। इनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है। अतः इन्हें इस्लाम के पाँच स्तंभ कहा जाता है।

(1) कलमा पढना (Reciting Kalma):
प्रत्येक मसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह कलमा पढे। इसमें बताया गया है कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। मुहम्मद साहब उसके रसूल (पैगंबर) हैं। कुरान को अल्लाह द्वारा भेजा गया है।

(2) नमाज़ (Namaz):
प्रत्येक मुसलमान का दूसरा कर्त्तव्य यह है कि वह दिन में पाँच बार नमाज़ अवश्य पढ़े। नमाज़ पढ़ने से व्यक्ति का अल्लाह से संपर्क हो जाता है। उसकी रहमत से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा वह मनभावन फल प्राप्त करता है।
HBSE 11th Class History Important Questions Chapter 4 iMG 1
(3) रोजा (Rauja):
रमजान के महीने रोज़ा (व्रत) रखना प्रत्येक मुसलमान का तीसरा धार्मिक कर्त्तव्य है। इस माह में सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीना वर्जित है। सूर्यास्त के पश्चात् ही मुसलमान कुछ खान-पान कर सकते हैं। इस माह के दौरान मुसलमानों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया गया है।

(4) ज़कात (Zakat):
ज़कात का अर्थ है दान देना। इसके अधीन प्रत्येक मुसलमान का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी कुल आय का 2/2% दान दे। इसे गरीबों की सहायता, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिदों के निर्माण पर खर्च किया जाता है।

(5) हज (Hajj):
प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम-से-कम एक बार हज़ करे भाव मक्का की यात्रा पर जाए। आर० टी० मैथियू एवं एफ० डी० प्लैट के अनुसार, पाँच स्तंभ मुसलमानों के धार्मिक जीवन का आधार हैं।”

3. कर्म सिद्धांत में विश्वास (Belief in Karma Theory):
इस्लाम में कर्म सिद्धांत पर विशेष बल दिया गया है। इसके अनुसार जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा। किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकारा नहीं मिलेगा। कुरान के अनुसार कयामत के दिन स्वर्ग एवं नरक का निर्णय इस जन्म में किए गए कर्मों के अनुसार ही होगा।

4. नैतिक सिद्धांत (Moral Principles):
कुरान में अनेक नैतिक नियमों का वर्णन किया गया है। इसमें कहा गया है कि-

  • सदैव सत्य बोलो।
  • सदैव अपने माता-पिता का सम्मान करो।
  • सदैव अपने अतिथियों का आदर करो।
  • सदैव अपने छोटों से प्यार करो।
  • सदैव सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करो।
  • पापों से सदैव दूर रहो।
  • कभी लालच एवं घृणा मत करो।
  • कभी किसी को धोखा एवं कष्ट न दो।
  • सदैव गरीबों, अनाथों एवं बीमारों की सेवा करो।
  • सदैव नशीले पदार्थों से दूर रहो।।

5. समानता में विश्वास (Faith in Equality):
इस्लाम में समानता को विशेष महत्त्व दिया गया है। इसके अनुसार सभी एक अल्लाह के बच्चे हैं। अतः सभी भाई-बहन हैं । इस्लाम में अमीर-गरीब, जाति, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को एक समान अधिकार दिए गए हैं।

6. मूर्ति पूजा का खंडन (Denounced Idol Worship):
इस्लाम मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है। पैगंबर मुहम्मद के समय में अरब देश में मूर्ति पूजा का बहुत प्रचलन था। केवल काबा में ही सैंकड़ों मूर्तियाँ स्थापित की गई थीं। पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने मक्का पर अधिकार करने के पश्चात् काबा में सभी मूर्तियों को नष्ट कर डाला। पैगंबर मुहम्मद का कथन था कि हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।

7. स्त्रियों की स्थिति (Position of Women):
पैगंबर मुहम्मद से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें केवल मनोरंजन एवं भोग विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज ने जो अधिकार पुरुषों को दिए थे स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था। पैगंबर मुहम्मद ने पुरुषों एवं स्त्रियों को बराबर अधिकार दिए जाने के पक्ष में प्रचार किया। उन्होंने मुसलमानों को यह संदेश दिया कि वे अपनी पत्नियों के साथ कभी भी दुर्व्यवहार करें।

उन्होंने बहु-विवाह पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से यह नियम बनाया कि कोई भी पुरुष एक समय में चार से अधिक पत्नियाँ नहीं रख सकता। उन्होंने विधवाओं को सम्मान देने के पक्ष में प्रचार किया। प्रसिद्ध लेखक डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार “वास्तव में जो सम्मान पैगंबर मुहम्मद ने स्त्रियों को दिया वह विश्व द्वारा अभी प्राप्त किया जाना है”

प्रश्न 4.
इस्लाम के प्रथम चार खलीफ़ों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने अरब समाज को एक नई दिशा देने में उल्लेखनीय योगदान दिया। 632 ई० में उनकी मृत्यु से इस्लाम पर एक घोर संकट उत्पन्न हो गया। इसका कारण यह था कि पैगंबर मुहम्मद का अपना कोई पुत्र न था एवं उन्होंने किसी को भी अपना उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं किया था। अतः उम्मा (umma) ने निर्वाचन पद्धति द्वारा अबू बकर को पैगंबर मुहम्मद का उत्तराधिकारी नियुक्त किया। इससे खिलाफ़त संस्था का उदय हुआ। पैगंबर मुहम्मद के उत्तराधिकारी खलीफ़ा कहलाए। खिलाफ़त के प्रमुख उद्देश्य थे-

  • इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना,
  • कबीलों पर नियंत्रण कायम रखना,
  • राज्य के लिए संसाधन जुटाना,
  • पैगंबर द्वारा आरंभ किए गए कार्यों को जारी रखना,
  • आवश्यकता पड़ने पर जिहाद (धर्म युद्ध) की घोषणा करना,
  • गरीबों, अपाहिजों एवं यतीमों की सहायता करना। आरंभिक चार खलीफ़ों के पैगंबर मुहम्मद के साथ नज़दीकी एवं गहरे संबंध थे। उन्होंने 632 ई० से लेकर 661 ई० तक शासन किया। उन्ह वपूर्ण योगदान दिया। इसका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

I. अबू बकर : 632-634 ई०
अबू बकर खलीफ़ा के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वह इस पद पर 632 ई० से 634 ई० तक रहे। वह पैगंबर मुहम्मद के ससुर थे। जिस समय वह खलीफ़ा के पद पर निर्वाचित हुए तो उस समय उन्हें अनेक विकट समस्याओं का सामना करना पड़ा। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद ने किसी उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं की थी।

इस कारण अरब के विभिन्न भागों में अनेक नकली पैगंबर प्रकट हो गए। दूसरा, मक्का एवं मदीना में अनेक ऐसे लोग थे जो इस्लाम का विरोध कर रहे थे तीसरा, ईसाई एवं यहूदी भी इस्लाम के लिए एक कड़ी चुनौती बने हुए थे। अबू बकर ने सर्वप्रथम नकली पैगंबरों के विद्रोहों का दमन किया। इससे अरब में शांति स्थापित हुई। इसके पश्चात् अबू बकर ने मुस्लिम साम्राज्य के विस्तार की योजना बनाई।

अतः उसने शीघ्र ही सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्यों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। उन्होंने मदीना (Madina) को अपनी राजधानी बनाए रखा। 634 ई० में अबू बकर की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने उमर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

वास्तव में अपने दो वर्षों के शासनकाल में अबू बकर ने इस्लाम को संगठित एवं इसका प्रसार करने में बहुमूल्य योगदान दिया। डॉक्टर माजिद अली खाँ के अनुसार, “उसे इस्लाम के इतिहास में एक विशेष स्थान प्राप्त है।”

II. उमर : 634-644 ई०
उमर आरंभिक चार खलीफ़ाओं में से सबसे महान् थे। वह कुरैश कबीले से संबंधित थे तथा उनकी नियुक्ति अबू बकर द्वारा की गई थी। वह खलीफ़ा के पद पर 634 ई० में नियुक्त हुए। वह इस पद पर 644 ई० तक रहे। वह एक महान खलीफ़ा प्रमाणित हए। उन्होंने अपनी दरदष्टि से जान लिया था कि उम्मा को केवल व्यापार और साधारण करों के बल पर संगठित नहीं रखा जा सकता।

इसके लिए उन्हें अधिक धन की आवश्यकता थी। यह धन उन्हें केवल विजय अभियानों के रूप में मारे जाने वाले छापों से प्राप्त लूट से मिल सकता था इस उद्देश्य से तथा इस्लाम के प्रसार के लिए उन्होंने अबू बकर की विस्तारवादी नीति को जारी रखा। उस समय इस्लामी राज्य के पश्चिम में बाइजेंटाइन (Byzantine) तथा पूर्व में ससानी (Sasanian) साम्राज्य स्थित थे।

बाइजेंटाइन साम्राज्य ईसाई धर्म को एवं ससानी साम्राज्य ज़रतुश्त धर्म (Zoroastrianism) को संरक्षण (patronise) प्रदान करता था। इन दोनों साम्राज्यों की कुछ समय पूर्व तक बहुत धाक थी। किंतु अब धार्मिक संघर्षों तथा अभिजात वर्गों के विद्रोहों के कारण वे अपने पतन की ओर अग्रसर थे।

इस स्वर्ण अवसर का लाभ उठा कर खलीफ़ा उमर ने 637 ई० से 642 ई० के समय के दौरान सीरिया, इराक, ईरान और मिस्र पर महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की। उनके अधीन अरबों ने 643 ई० में उत्तरी अफ्रीका में त्रिपोली को अपने अधिकार में कर लिया। मुसलमानों की इन सफलताओं के लिए खलीफ़ा उमर की योजनाएँ, मुसलमानों का धार्मिक जोश, उनके अनुभवी सेनापति एवं विरोधियों की कमज़ोरियाँ उत्तरदायी थीं। खलीफ़ा उमर न केवल एक महान विजेता था अपित एक कशल प्रशासक भी था।

उन्होंने अपने इस्लामी साम्राज्य को 8 प्रांतों में विभाजित किया। प्रत्येक प्राँत एक गवर्नर के अधीन होता था। उसे अमीर अथवा वली कहा जाता था। उसे अनेक शक्तियाँ प्राप्त थीं तथा वह अपने कार्यों के लिए खलीफ़ा के प्रति उत्तरदायी था। प्राँतों को आगे जिलों में विभाजित किया गया था। जिले का अध्यक्ष आमिल कहलाता था। खलीफ़ा उमर ने केंद्रीय राज्यकोष जिसे बैत अल-माल (Bait al-mal) कहा जाता था, को सुदृढ़ करने के लिए अनेक पग उठाए। उसने कृषि में अनेक उल्लेखनीय सुधार किए।

उसने शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक स्कूल खुलवाए। उसने साम्राज्य के विभिन्न भागों में अनेक मस्जिदों का निर्माण भी करवाया। उसने अपनी सेना को भी अच्छी प्रकार संगठित किया था। निस्संदेह खलीफ़ा उमर की उपलब्धियाँ महान् थीं। 3 नवंबर, 644 ई० को खलीफ़ा उमर की मदीना की मस्जिद में नमाज़ पढ़ते समय किसी ने हत्या कर दी। एक अन्य इतिहासकार डॉक्टर माजिद अली खाँ के अनुसार, “उसका खलीफ़ा काल निस्संदेह इस्लाम का स्वर्ण युग था।”

III. उथमान : 644-656 ई०
उथमान मुसलमानों का तीसरा खलीफ़ा था। वह इस पद पर 644 ई० से 656 ई० तक रहा। उसका संबंध उमय्यद वंश के कुरैश परिवार से था। उथमान भी अन्य खलीफ़ाओं की तरह महत्त्वाकांक्षी था। अतः सिंहासन पर बैठते ही उसने सर्वप्रथम इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की ओर ध्यान दिया। इस उद्देश्य से उसने अपनी सेना को संगठित किया।

उसने अपने शासनकाल में साइप्रस, खुरासान, काबुल, गज़नी, हेरात, ट्यूनीशिया तथा लीबिया आदि प्रदेशों पर विजय प्राप्त की। उसने प्रजा की भलाई के लिए भी अनेक कार्य किए।

उसने प्रशासन पर अधिक नियंत्रण रखने के उद्देश्य से अपने निकट संबंधियों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त किया। इससे लोगों में उनके शासन के विरुद्ध असंतोष फैला। परिणामस्वरूप 17 जून, 656 ई० को उथमान की हत्या कर दी गई। डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार, “खलीफ़ा उथमान की हत्या इस्लाम के इतिहास की सबसे दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी।

खलीफ़ा उथमान की हत्या के पश्चात् 24 जून, 656 ई० को अली मुसलमानों के चौथे खलीफ़ा बने। वह 661 ई० तक इस पद पर रहे। वह कुरैश कबीले के बानू हाशिम परिवार से संबंधित थे। वह पैगंबर मुहम्मद के चाचा अबू तालिब के पुत्र थे। खलीफ़ा बनने के शीघ्र पश्चात् अली ने अपनी राजधानी मदीना से बदल कर कुफा (Kufa) बना ली। अली के शासनकाल में मुसलमान दो संप्रदायों में विभाजित हो गए। उसके समर्थक शिया कहलाए जबकि उसके विरोधी सुन्नी।

9 दिसम्बर, 656 ई० को अली एवं उसके विरोधियों के मध्य ऊँटों की लड़ाई (Battle of Camels) हुई। इस लड़ाई में अली के विरोधियों का नेतृत्व पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा (Aishah) ने किया। इस लड़ाई में यद्यपि अली विजित हुआ किंतु इससे उसकी समस्याएँ कम न हुईं। प्रसिद्ध इतिहासकार पी० के० हिट्टी के अनुसार, “वंशानुगत लड़ाइयों ने जिन्होंने समय-समय पर इस्लाम में उथल-पुथल की तथा जिन्होंने इसकी आधारशिला को हिला दिया था, का आरंभ हुआ।”

अली के शासनकाल में सीरिया का गवर्नर मुआविया (Muawiyah) था। वह उथमान का संबंधी था तथा वह उसकी हत्या के लिए अली को उत्तरदायी समझता था। अली ने उसका दमन करना चाहा। अतः दोनों के मध्य 28 जुलाई, 657 ई० को सिफ्फिन की लड़ाई (Battle of Siffin) हुई। इस लड़ाई में अली पराजित हुआ तथा उसे संधि के लिए बाध्य होना पड़ा।

इस कारण उसके अनुयायी दो धड़ों में बँट गए। एक धड़ा उसके प्रति वफ़ादार रहा। दूसरा धड़ा उसके विरुद्ध हो गया। यह धड़ा खरजी (Kharjis) कहलाया। खरजी धड़े के एक सदस्य द्वारा 24 जनवरी, 661 ई० को कुफा (इराक) की एक मस्जिद में अली की हत्या कर दी गई। इस प्रकार खलीफ़ा अली का दुःखद अंत हुआ।

प्रश्न 5.
उमय्यद वंश के उत्थान एवं पतन का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उमय्यद वंश की गणना इस्लाम के इतिहास के महत्त्वपूर्ण राजवंशों में की जाती है। इस वंश की स्थापना 661 ई० में मुआविया ने की थी। इस वंश के शासकों ने 750 ई० तक शासन किया। इस वंश के उत्थान एवं पतन का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है-

I. उमय्यदों का उत्थान

उमय्यदों के उत्थान एवं विकास में निम्नलिखित खलीफ़ों ने प्रशंसनीय योगदान दिया

1. मुआविया 661-680 ई० (Muawiyah 661-680 CE):
उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था। खलीफ़ा बनने से पूर्व वह सीरिया का गवर्नर था। वह 661 ई० से 680 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। जिस समय वह खलीफ़ा बना उस समय उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं। वह एक दृढ़ निश्चय का व्यक्ति था।

अतः उसने इन चुनौतियों का साहसपूर्ण सामना किया। उसने सर्वप्रथम दमिश्क (Damascus) को अपनी राजधानी बनाया। उसने 663 ई० में खरिजाइटों (Kharijites) जिन्होंने खलीफ़ा के विरुद्ध कुफा (Kufa) में विद्रोह कर दिया था, का सख्ती के साथ दमन किया। लगभग इसी समय खलीफ़ा अली के समर्थकों ने इराक में विद्रोह कर दिया।

मुआविया ने एक विशाल सेना भेजकर उनके विद्रोह का दमन किया। 667 ई० में मुआविया के प्रसिद्ध सेनापति उकाबा (Ukaba) ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकाँश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की। वह प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने डाक-व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार किए।

ऐसा करके उसने साम्राज्य के सभी हिस्सों को एक-दूसरे के साथ जोड़ा। उसने अपराधियों पर नियंत्रण रखने के उद्देश्य से पुलिस विभाग की स्थापना की। उसने न्याय प्रणाली में महत्त्वपूर्ण सुधार किए। उसने राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए। उसने एक शक्तिशाली नौसेना का भी गठन किया। प्रोफेसर के० अली के अनुसार, “उसने एक कुशल सरकार का गठन किया तथा अराजकता का कायाकल्प कर एक अनुशासित मुस्लिम समाज की स्थापना की। मुआविया की सफलताओं के कारण उसे मुस्लिम जगत के महान् शासकों में से एक माना जाता है।”

2. याजिद 680-683 ई० (Yazid 680-683 CE):
680 ई० में मुआविया की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र याजिद उसका उत्तराधिकारी बना। मुआविया ने उसे अपने जीवनकाल में ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था। वह 683 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसके खलीफ़ा बनते ही पूर्व खलीफ़ा अली के पुत्र हुसैन (Husayn) ने उसका विरोध किया। अत: उसका सामना करने के लिए याजिद ने उमर-बिन-सेद (Umar bin-Said) के नेतृत्व में 4000 सैनिक भेजे।

दोनों के मध्य 10 अक्तूबर, 680 ई० को करबला की लड़ाई (Battle of Karbala) हुई। इस लड़ाई में हुसैन पराजित हुआ। उसे गिरफ्तार कर उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। इससे शिया मुसलमान उमय्यद वंश के कट्टर विरोधी बन गए। प्रसिद्ध इतिहासकार एलेक्जेंडर पापाडोपोउलो के शब्दों में, “यद्यपि उसकी (हुसैन की) मौत का कम राजनीतिक प्रभाव पड़ा किंतु इसने उसे शिआओं का महान् शहीद बना दिया।”

इस अराजकता का लाभ उठाकर अब्दुल्ला-इब्न-जुबैर (Abdullah-ibn-Zubayr) ने मक्का में अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। उसके भड़काने पर मदीना के लोगों ने भी खलीफ़ा के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। निस्संदेह यह खलीफ़ा की शक्ति के लिए एक गंभीर चुनौती थी। अतः याजिद ने उकबा (Uqbah) के नेतृत्व में 12,000 की सेना मदीना भेजी। इस सेना ने मदीना के विद्रोह का दमन किया। यहाँ तीन दिनों तक भयंकर लूटमार की गई। इसके पश्चात् मक्का को घेरा डाल दिया गया।

इस घेरे के दौरान काबा में आग लग गई। इस कारण मुसलमानों में रोष फैल गया। अतः घेरे को उठा लिया गया। इसके शीघ्र पश्चात् ही याजिद की मृत्यु हो गई। उसका शासनकाल वास्तव में इस्लाम के इतिहास में एक कलंक सिद्ध हुआ।

3. मुआविया द्वितीय एवं मारवान 683-685 ई० (Muawiyah II and Marwan 683-685 CE):
683 ई० में याजिद की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र मुआविया द्वितीय नया खलीफ़ा बना। वह एक नम्र स्वभाव का व्यक्ति था। कुछ माह के शासन के पश्चात् 684 ई० में उसकी मृत्यु हो गई। अतः मारवान को 684 ई० में नया खलीफ़ा बनाया गया। वह मुआविया प्रथम का चचेरा भाई था। उसकी भी एक वर्ष पश्चात् मृत्यु हो गई। अत: उसके शासनकाल को इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व प्राप्त नहीं है।

4. अब्द-अल-मलिक 685-705 ई० (Abd-al-Malik 685-705 CE)-अब्द-अल-मलिक की गणना हान् खलीफ़ाओं में की जाती है। वह 685 ई० से 705 ई० तक खलीफा के पद पर रहा। अब्द 17. अल-मलिक ने सर्वप्रथम इराक में अल-मुख्तियार बिन अबू उबैद (Al-Mukhtiar bin Abu Ubayed) के विद्रोह का दमन किया। इसके पश्चात् उसने अपना ध्यान एक अन्य प्रमुख शत्रु इन जुबैर (Ibn Zubayr) की ओर किया। इब्न जुबैर ने मक्का में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी थी।

वह 692 ई० में अब्द-अल-मलिक के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया था। अब्द-अल-मलिक ने बाइजेंटाइन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। इसके पश्चात् अब्द-अल-मलिक के सेनापति हसन इब्न नूमैन (Hasan Ibn Numan) ने पश्चिमी अफ्रीका के कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार अब्द-अल-मलिक के शासनकाल में इस्लामी साम्राज्य का खूब विस्तार हुआ। अब्द-अल-मलिक न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी था।

उसने इस्लामी साम्राज्य को संगठित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय उपाय भी किए। उसने अरबी (Arabic) को राज्य की भाषा घोषित किया। उसने इस्लामी सिक्कों को जारी किया। इनमें सोने के सिक्के को दीनार एवं चाँदी के सिक्के को दिरहम कहा जाता था। ये सिक्के रोमन सिक्के दिनारियस (denarius) तथा ईरानी सिक्के द्राख्या (drachm) की नकल थे। इन सिक्कों पर अरबी भाषा लिखी गई थी। इन सिक्कों पर एक तरफ अब्द-अल-मलिक का नाम तथा उसकी तस्वीर अंकित थी।

इसकी दूसरी तरफ यह लिखा था कि ‘अल्लाह के सिवाय कोई अन्य खुदा नहीं है और अल्लाह का कोई शरीक नहीं है।’ (There is no God but Allah and he had no partner.) अब्द-अल मलिक के ये सिक्के बहुत लोकप्रिय हुए तथा आने वाली कई शताब्दियों तक जारी रहे। उसने साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए।

उसे कला से भी बहुत प्यार था। जेरुसलम (Jerusalem) में उसके द्वारा बनवाई गई डोम ऑफ़ दी रॉक (Dome of the Rock) इस्लामी वास्तुकला का प्रथम महत्त्वपूर्ण नमूना है। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर ए० रहीम के शब्दों में, “उसके अधीन अरब साम्राज्य का विस्तार एवं उसकी समृद्धि अपनी चरम सीमा पर थी”

5. वालिद प्रथम 705-715 ई० (Walid I 705-715 CE)—वालिद प्रथम उमय्यद वंश का एक अन्य प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली शासक था। वह अब्द-अल-मलिक का पुत्र था। वह 705 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ था। वह इस पद पर 715 ई० तक रहा। उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार एवं इसके संगठन में प्रशंसनीय योगदान दिया।

वालिद प्रथम ने सर्वप्रथम मध्य एशिया के अनेक प्रदेशों बुखारा (Bukhara), समरकंद (Samarkand) आदि में इस्लामी झंडा फहराया। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के सेनापति मुहम्मद-बिन-कासिम (Muhammad bin-Qasim) ने सिंध के शासक दाहिर को पराजित कर सिंध पर अधिकार कर लिया।

वालिद प्रथम के समय मित्र के गवर्नर मूसा-इन-नूसैर (Musa-ibn-Nusayr) ने पश्चिमी अफ्रीका के अनेक प्रदेशों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। 711-12 ई० में वालिद प्रथम के दो सेनापतियों तारिक (Tariq) एवं मूसा (Musa) ने स्पेन पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह इसे वालिद प्रथम के शासनकाल की सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता माना जाता है।

वालिद प्रथम ने इस्लामी साम्राज्य को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक प्रजा हितकारी कार्य किए। उसने अनेक सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय पग उठाए। निस्संदेह वालिद प्रथम के शासनकाल ने इस्लाम के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। अंत में हम प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के० अली के इन शब्दों से सहमत हैं,

“उसका (वालिद प्रथम का) शासनकाल शाँति एवं खुशहाली का काल था।”20 6. सुलेमान 715-717 ई० (Sulayman 715-717 CE)-715 ई० में वालिद प्रथम की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई सुलेमान नया खलीफ़ा बना। वह 717 ई० तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का इस्लाम के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है। उसका केवल एक महत्त्वपूर्ण कार्य अपनी मृत्यु से पहले अपने पुत्र उमर द्वितीय को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करना था।

7. उमर द्वितीय 717-720 ई० (Umar II 717-720 CE)-उमर द्वितीय 717 ई० से 720 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। अपने अल्प शासनकाल में उसने इस्लामी साम्राज्य के विस्तार की अपेक्षा इसके संगठन की ओर विशेष ध्यान दिया। उसने मवालियों (mawalis) के प्रति उदार नीति अपनाई एवं मुसलमानों के बराबर अधिकार दिए।

मवाली वे गैर-अरबी मुसलमान थे जिन्होंने इस्लाम को ग्रहण कर लिया था। उसने इस्लाम के प्रसार के उद्देश्य से इसे ग्रहण करने वाले लोगों को विशेष सुविधाएँ प्रदान की। उसने साम्राज्य में फैले भ्रष्टाचार को दूर किया। उसने लोगों को निष्पक्ष न्याय देने का प्रयास किया। उसने साम्राज्य की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से अनेक महत्त्वपूर्ण पग उठाए। निस्संदेह उमर द्वितीय के शासनकाल को इस्लाम के इतिहास का शाँति काल कहा जा सकता है।

II. उमय्यद वंश का पतन

उमय्यद शासक वंश के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे।
(1) उमय्यद वंश के कुछ खलीफ़ों को छोड़कर अधिकाँश खलीफ़ों ने प्रशासन की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। अतः ऐसे साम्राज्य का डूबना निश्चित था।

(2) उमय्यद वंश के शासक साम्राज्य के हितों की अपेक्षा अपने स्वार्थी हितों में अधिक व्यस्त रहते थे। ऐसे साम्राज्य के सूर्य को अस्त होने से कोई रोक नहीं सकता था।

(3) उमय्यद शासक गैर-अरबों के साथ बहुत मतभेद करते थे। इससे वे उमय्यद वंश के घोर विरोधी हो गए।

(4) उमय्यद वंश के शासक अपनी सेना को नियमित तन्खवाह न दे सके। इस कारण सैनिक भी अपने शासकों से रुष्ट रहते थे। ऐसा साम्राज्य कभी स्थायी नहीं हो सकता।

(5) शिया वंश के लोग उमय्यदों के कट्टर दुश्मन थे। अत: वे उमय्यदों से बदला लेने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे।

(6) उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अब्बासियों (Abbasids) ने दवा (dawa) नामक एक सुनियोजित आंदोलन चलाया। इस आंदोलन ने उमय्यद वंश के पतन का डंका बजा दिया।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 6.
अब्बासी वंश के उत्थान एवं पतन के बारे में आप क्या जानते हैं ? वर्णन कीजिए। उत्तर

I. अब्बासियों का उत्थान

अब्बासियों के उत्थान में निम्नलिखित खलीफ़ों ने उल्लेखनीय योगदान दिया

1. अबू-अल-अब्बास 750-754 ई० (Abu-al-Abbas 750-754 CE) अबू-अल-अब्बास ने 750 ई० में अब्बासी वंश की स्थापना की। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अरब की राजनीतिक दशा बहुत शोचनीय थी। साम्राज्य के अनेक स्थानों पर विद्रोहियों ने उत्पात मचा रखा था। वे अबू-अल-अब्बास को खलीफ़ा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। इस कारण नए खलीफ़ा ने सर्वप्रथम अपना ध्यान उमय्यद विद्रोहियों की ओर किया तथा उनका निर्ममता से दमन किया गया। वह इतना क्रूर था कि उसने अल-सफा (Al-Saffah) (रक्तपात करने वाला) की उपाधि धारण की। 754 ई० में उसकी मृत्यु हो गई।

2. अल-मंसूर 754-775 ई० (AI-Mansur 754-775 CE)-754 ई० में अबू-अल-अब्बास की मृत्यु के पश्चात् उसका भाई अल-मंसूर नया खलीफ़ा बना। उसका वास्तविक नाम अबू जफ़र (Abu Jafar) था। उसने अब्बासी वंश को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय पग उठाए। उसने सर्वप्रथम विद्रोहियों को सबक सिखाया। उसने 762 ई० में बग़दाद (Baghdad) को अब्बासियों की राजधानी घोषित किया। उसने बाइजेंटाइन आक्रमण को भी सफलतापूर्वक रोका। अब्बासी अल-मंसूर ने न केवल अपनी योग्यता से साम्राज्य का विस्तार किया अपितु इसका कुशलतापूर्वक संगठन भी किया।

उसने अपने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में विभाजित कि का शासन चलाने के लिए अत्यंत योग्य गवर्नरों को नियुक्त किया गया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से साम्राज्य में अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। उसे कला से भी बहुत प्यार था। उसने अपनी राजधानी बग़दाद को अनेक महलों, मस्जिदों, भवनों एवं उद्योगों से सुसज्जित किया। उसने अपने दरबार में अनेक विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। उसने न्याय व्यवस्था को अधिक कुशल बनाया।

उसने कृषि तथा व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए उल्लेखनीय पग उठाए। अल-मंसूर की इन शानदार सफलताओं को देखते हुए उसे ठीक ही अब्बासी साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है। प्रसिद्ध इतिहासकार पी० के० हिट्टी के अनुसार, “अल-मंसूर अब्बासियों के महान् खलीफ़ाओं में से एक था। उसने न कि अल शफा ने नए वंश की सुदृढ़ता से स्थापना की।”

3. अल-महदी 775-785 ई० (AI-Mahdi 775-785 CE)-775 ई० में अल-मंसूर की मृत्यु के पश्चात् उसका पुत्र अल महदी अब्बासियों का नया खलीफ़ा बना। वह 785 ई० तक इस पद पर रहा। उसने अपने शासनकाल में लोक भलाई के अनेक कार्य किए। उसने अनेक सड़कों का निर्माण किया। उसने यात्रियों की सुविधा के लिए अनेक कुओं एवं सराओं का निर्माण करवाया। उसने शिक्षा को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से अनेक मकतब एवं मदरसे खुलवाए। उसने गरीबों, अपाहिजों एवं विधवाओं की धन द्वारा सहायता की।

उसने बुजुर्गों के लिए पैंशन निश्चित की। उसने डाक-व्यवस्था का विकास किया। उसने अनेक भवनों एवं मस्जिदों का निर्माण करवाया। उसने कला तथा साहित्य को प्रोत्साहित किया। उसने कृषि तथा व्यापार के विकास के लिए अनेक पग उठाए। उसने सीरिया एवं खुरासान के विद्रोहों का दमन किया। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य के शासक कांस्टैनटाइन छठे (Constantine VI) को पराजित कर उसे एक अपमानजनक संधि करने के लिए बाध्य किया।

4. अल-हादी 785-786 ई० (AI-Hadhi 785-786 CE)-785 ई० में अल-हादी नया खलीफ़ा बना। वह अल-महदी का पुत्र था। वह केवल एक वर्ष तक इस पद पर रहा। उसके शासनकाल का अब्बासियों के इतिहास में कोई विशेष महत्त्व नहीं है।

5. हारुन-अल-रशीद 786-809 ई० (Harun-al-Rashid 786-809 CE) हारुन-अल-रशीद अब्बासियों का सबसे महान् एवं शक्तिशाली खलीफ़ा था। वह खलीफ़ा अल-हादी का छोटा भाई था। वह 786 ई० से 809 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसने अब्बासी वंश के गौरव को पुनः स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक उल्लेखनीय कार्य किए।

उसने अपनी तलवार के बल पर न केवल आंतरिक विद्रोहों का दमन किया अपितु अब्बासी साम्राज्य का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने उस समय के शक्तिशाली फ्रैंक (Frank) शासक शॉर्लमेन (Charlemagne) के साथ मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित किए। हारुन-अल-रशीद ने अपने साम्राज्य को संगठित करने के उद्देश्य से प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए।

उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया। उसने अनेक प्रसिद्ध विद्वानों, संगीतकारों एवं गायकों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया था। उसके शासनकाल में लिखी गई सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक एक हजार एक रातें (The Thousand and One Nights) थी। उसने अनेक अस्पतालों एवं सरायों का निर्माण करवाया। उसने अपनी राजधानी में अनेक विशाल महल, भवन, मस्जिदें एवं बाग बनवाए। वह प्रजा के दुःखों को दूर करने के लिए सदैव तैयार रहता था।

वास्तव में उसके शासनकाल में अब्बासी साम्राज्य में इतनी प्रगति हुई कि ‘इसे स्वर्ण युग’ के नाम से स्मरण किया जाता है। निस्संदेह हारुन-अल-रशीद एक महान् शासक था। प्रसिद्ध लेखक प्रोफेसर मासूदुल हसन के अनुसार, “हारुन-अल-रशीद के अधीन अब्बासी राज्य अपनी उन्नति के शिखर पर पहुँच गया था 122 डॉक्टर ए० रहीम के अनुसार, “खलीफ़ा हारुन इतिहास के सर्वाधिक सफल शासकों में से एक था।”

6. अल-अमीन 809-813 ई० (Al-Amin 809-813 CE)-अल-अमीन 809 ई० से 813 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। वह एक अयोग्य एवं विलासी खलीफ़ा प्रमाणित हुआ। इसलिए वह जनसाधारण की सहानुभूति खो बैठा था। इस कारण 809 ई० में अल-अमीन एवं उसके भाई अल-मामुन के मध्य गृह-युद्ध आरंभ हो गया। यह गृह-युद्ध 813 ई० तक चलता रहा। इस गृह-युद्ध के अंत में अल-अमीन पराजित हुआ एवं वह मारा गया। इस प्रकार अल-अमीन के यशहीन शासन का अंत हुआ।

7. अल-मामुन 813-833 ई० (AI-Mamun 813-833 CE)-813 ई० में अल-मामुन अब्बासी वंश का नया खलीफ़ा बना। वह 833 ई० तक इस पद पर रहा। वह एक महान् सेनापति एवं योग्य शासक प्रमाणित हुआ। जिस समय वह सिंहासन पर बैठा उस समय अब्बासी साम्राज्य के चारों ओर अराजकता एवं विद्रोह का वातावरण था। अल-मामुन इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने ईरान, मिस्र, सीरिया, अर्मीनिया, खुरासान एवं यमन में खिलाफ़त के विरुद्ध उठने वाले विद्रोहों का दमन किया।

उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य के विरुद्ध अपनी सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उसने अपने साम्राज्य में शाँति स्थापित करने में सफलता प्राप्त की। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। अत: उसके शासनकाल में प्रजा बहुत खुशहाल थी। उसने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई। उसे कला एवं साहित्य से बहुत प्यार था। उसके दरबार में अनेक प्रसिद्ध कवियों, इतिहासकारों एवं विद्वानों ने उसके नाम को चार चाँद लगाए।

8. बाद के खलीफ़े (Later Caliphs)-अल-मामुन की मृत्यु के साथ ही अब्बासी राजवंश का पतन आरंभ हो गया था। इसका कारण यह था कि उसके पश्चात् आने वाले सभी खलीफ़े अल-वथिक (al-Wathiq), अल-मुतव्वकिल (al-Mutawakkil) तथा मुनतासिर (Muntasir) आदि सभी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। अब्बासी वंश का अंतिम खलीफ़ा अल-मुस्तासिम (al-Mustasim) था। 1258 ई० में चंगेज़ खाँ के पोते हुलेगू (Hulegu) ने बग़दाद पर आक्रमण कर अब्बासी राजवंश का अंत कर दिया।

II. अब्बासी वंश का पतन

अब्बासी वंश के खलीफ़ों ने 750 ई० से 1258 ई० तक शासन किया। इस वंश के पतन के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे–
(1) अल-मामुन के सभी उत्तराधिकारी अयोग्य एवं निकम्मे निकले। उन्होंने प्रशासन की ओर अपना ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य का पतन निश्चित था

(2) 9वीं शताब्दी में बग़दाद का दूर के प्रांतों पर नियंत्रण कम हो गया। इससे विद्रोहों को प्रोत्साहन मिला। परिणामस्वरूप अब्बासी साम्राज्य में अराजकता फैली।

(3) 9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य में अनेक गुटों एवं छोटे-छोटे राजवंशों का उदय हो गया था। इनकी आपसी लड़ाइयाँ अब्बासी साम्राज्य के लिए घातक सिद्ध हुईं।

(4) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी सेना को शक्तिशाली बनाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ऐसे साम्राज्य के पतन को भला कौन रोक सकता था।

(5) अरबों एवं गैर-अरबों के मध्य चलने वाले लगातार संघर्ष ने अब्बासी साम्राज्य को खोखला बना दिया।

(6) अब्बासी खलीफ़ों ने अपनी विलासिता के लिए लोगों पर भारी कर लगा दिए। इससे लोगों में असंतोष फैला एवं वे उनके विरुद्ध हो गए।

प्रश्न 7.
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं ? वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था काफी अच्छी थी। इस काल में मुसलमानों ने अनेक नए क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया था। इन क्षेत्रों की भूमि बहुत उपजाऊ थी। अतः कृषि को बहुत प्रोत्साहन मिला।

इस काल में अनेक उद्योग धंधों ने बहुत उन्नति कर ली थी। इससे वाणिज्य एवं व्यापार को एक नई दिशा मिली। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था को स्थापित करने के उद्देश्य से अनेक प्रशंसनीय पग उठाए। निस्संदेह इससे लोगों का आर्थिक जीवन बहुत समृद्ध हुआ।

1. कृषि (Agriculture)—मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सिंचाई साधनों का विकास, किया।

उन्होंने साम्राज्य के अनेक भागों में बाँधों, नहरों एवं कुओं का निर्माण किया। उन्होंने उन किसानों को भू-राजस्व एवं अन्य करों में रियायत दी जो कृषि के अधीन नयी भूमि को लाते थे। कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था। राज्य द्वारा भू-राजस्व निश्चित किया जाता था एवं इसे एकत्र किया जाता था। अरबों ने जिन नए ।

प्रदेशों को जीता था उन प्रदेशों में जहाँ भूमि गैर-मुसलमानों के हाथों में रही वहीं उन्हें खराज कर देना पड़ता था। यह पैदावार के अनुसार 20% से लेकर 50% होता था। जो कृषि योग्य भूमि मुसलमानों के अधीन होती थी उस पर उन्हें 10% भू-राजस्व कर देना पड़ता था। इस भेदभाव के चलते अनेक गैर-मुसलमानों ने इस्लाम को ग्रहण कर लिया था।

इससे राज्य की आय कम हो गयी। इस स्थिति से निपटने के लिए खलीफ़ाओं ने पहले धर्मांतरण को निरुत्साहित किया एवं बाद में भू-राजस्व की दर एक समान कर दी।

उत्तरी अफ्रीका, उत्तरी इराक, सीरिया एवं मिस्त्र के मैदान अनाज की भरपूर पैदावार के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। अरब एवं इराक खजूरों की पैदावार के लिए विख्यात थे। इस काल में अनेक नयी फ़सलों जैसे कपास, नील, आम, संतरा, केला, तरबूज, पालक (spinach) तथा बैंगन (brinjals) का उत्पादन आरंभ किया गया। इन फ़सलों को यूरोप में निर्यात किया जाता था।

2. उद्योग (Industries)-उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों के शासनकाल में उद्योग के क्षेत्र में बहुमुखी विकास हुआ। उस समय समरकंद (Samarkand) कागज़ उद्योग के लिए विशेष रूप से विख्यात था। उस समय बग़दाद काँच के सामान, आभूषण तथा रेशम उद्योग के लिए प्रसिद्ध था। बुखारा दरियों के उद्योग के लिए, दमिश्क इस्पात उद्योग के लिए, कुफा रेशम उद्योग के लिए, कोरडोबा (Cordoba) चमड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। इनके अतिरिक्त उस समय आभूषण, सूती एवं ऊनी वस्त्र, फर्नीचर एवं दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं के उद्योग भी स्थापित थे।

3. वाणिज्य एवं व्यापार (Trade and Commerce)–अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार दोनों उन्नत थे। आंतरिक व्यापार के लिए मुख्यतः ऊँटों का प्रयोग किया जाता था। इनके अतिरिक्त घोड़ों एवं गधों का भी प्रयोग किया जाता था। विदेशी व्यापार जल एवं स्थल दोनों मार्गों से किया जाता था। अरबी साम्राज्य के यूरोप, अफ्रीका, भारत एवं चीन के देशों के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे। पाँच शताब्दियों तक अरबी एवं ईरानी व्यापारियों का समुद्री व्यापार पर एकाधिकार रहा।

उस समय व्यापार के लिए लाल सागर, फ़ारस की खाड़ी एवं रेशम मार्ग प्रसिद्ध थे। रेशम मागे चीन से भारत होता हुआ बगदाद तक जाता था। अरबी व्यापारी विदेशों का कागज़, सूती एवं ऊनी वस्त्र, काँच का सामान, चीनी, खजूर एवं बारूद का निर्यात करते थे। इनके बदले वे विदेशों से रेशम, चाय, गर्म 1, सोना, विलासिता का सामान, हाथी दाँत एवं गुलामों का आयात करते थे। उस समय व्यापार संतुलन इस्लामी साम्राज्य के पक्ष में था।

4. शहरीकरण (Urbanization)-इस्लामी साम्राज्य के विस्तार, कृषि एवं उद्योगों के विकास ने शहरीकरण की प्रक्रिया को तीव्र किया। अत: अनेक नए शहर अस्तित्व में आए । इन शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अरब सैनिकों को बसाना था। ये सैनिक स्थानीय प्रशासन चलाने एवं उनकी पुरक्षा में प्रमुख भूमिका निभाते थे।

इन फ़ौजी शहरों को मिस्त्र (misr) कहा जाता था। इन शहरों में इराक में स्थित कुफा, बसरा एवं बग़दाद, मिस्र में स्थित काहिरा एवं फुस्तात एवं स्पेन में स्थित कोरडोबा नामक शहर प्रसिद्ध थे। ये सभी शहर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। एक शहर का दूसरे शहर के साथ परस्पर संपर्क स्थापित किया गया था। इससे व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला।

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प्रश्न 8.
सूफ़ी मत से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी प्रमुख शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:

I. सूफ़ी मत से अभिप्राय

मध्यकाल में इस्लाम में धार्मिक विचारों वाले लोगों का एक नया समूह अस्तित्व में आया जिसे सूफी कहा जाता था। सूफ़ी शब्द से क्या अभिप्राय है इससे संबंधित विद्वानों के विचारों में विभिन्नता है। कुछेक विद्वानों के विचारानुसार उनको सूफ़ी इसलिए कहा जाता था, क्योंकि वे साफ़ (शुद्ध) हृदय वाले थे। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार उनको सूफ़ी इसलिए कहा जाता था क्योंकि परमात्मा के दरबार में वे प्रथम सफ़ (पंक्ति) में खड़े होते थे।

II. सूफ़ी मत की शिक्षाएँ

सूफी मत की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित अनुसार हैं

1. अल्लाह एक है (Unity of Allah)-सूफ़ियों के अनुसार परमात्मा एक है जिसको वे अल्लाह कहते हैं। वह सर्वोच्च, शक्तिशाली तथा सर्वव्यापक है। प्रत्येक स्थान पर उसका आदेश चलता है तथा कोई भी उसकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकता। वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है। वह अमर है तथा आवागमन के चक्करों से मुक्त है। वह ही इस सृष्टि का रचयिता, इसकी सुरक्षा करने वाला तथा इसको नष्ट करने वाला है। इन कारणों से सूफी एक अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं करते हैं।

2. पूर्ण आत्म-त्याग (Complete Self-surrender)-अल्लाह के समक्ष पूर्ण आत्म-त्याग सूफ़ी मत के प्रमुख सिद्धांतों में से एक है। उनके अनुसार प्रत्येक सूफ़ी को साँसारिक मोह-माया तथा अपनी इच्छाओं को मिटाकर स्वयं को अल्लाह के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य उस अल्लाह की दया प्राप्त कर सकता है तथा उसके बिगड़े हुए कार्य ठीक हो सकते हैं।

3. पीर (Pir)-सूफी मत में पीर या गुरु को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। वह अपने मुरीदों की रूहानी उन्नति पर पूर्ण दृष्टि रखता है, ताकि वे इस भवसागर से पार हो सकें तथा अल्लाह के साथ एक हो सकें। एक सच्चा पीर जो स्वयं साँसारिक लगाव से दूर हो तथा जिसने रूहानी ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, वह ही अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जा सकता है।

4. इबादत (Worship)-सूफ़ी अल्लाह की इबादत (पूजा) पर जोर देते हैं। उनके अनुसार मात्र अल्लाह की इबादत करने से ही मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। उनके अनुसार अल्लाह की इबादत नमाज़ द्वारा, रोज़े रखकर, दान करके तथा मक्का की यात्रा करके की जा सकती है। मनुष्य को शुद्ध हृदय से अल्लाह की इबादत करनी चाहिए।

5. नमाज़ (Prayer) सूफ़ियों के अनुसार नमाज़ पढ़ना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्त्तव्य है। इसके द्वारा मनुष्य अपनी आत्मा की आवाज़ परमात्मा तक पहुँचा सकता है। ऐसी नमाज़ सच्चे हृदय से पढ़ी जानी चाहिए। अशुद्ध हृदय से पढ़ी गयी नमाज को पूर्ण रूप से व्यर्थ बताया गया है तथा कुरान में ऐसे व्यक्ति की कड़े शब्दों में आलोचना की गई है।

6. रोजे रखना (Fasting)-सूफ़ी रोज़े रखने में विश्वास रखते थे। ऐसा करने वाले व्यक्ति की आत्मा शुद्ध होती है। रोज़ा रखने से अभिप्राय मात्र खाने-पीने की वस्तुओं से परहेज़ करने को ही नहीं, बल्कि प्रत्येक प्रकार की बुराइयों से दूर रहने के लिए कहा गया है।

7. दान (Charity)-संसार के समस्त धर्मों में दान देने के संबंध में प्रचार किया गया है, परंतु सूफ़ी धर्म वालों ने इसको आवश्यक माना है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए जिसकी अपनी आवश्यकता से अधिक आय है को कुछ भाग दान देना आवश्यक है। ऐसा एकत्रित किया गया धन निर्धनों तथा ज़रूरतमंद लोगों में बाँटा जाता है। मनुष्यों से सहानुभूति करने को दान का ही एक भाग समझा गया है। कुरान में निर्धनों की सेवा करने तथा गुलामों को आज़ाद करने को बहुत अच्छा बताया गया है।

8. मक्का की यात्रा (Pilgrimage to Mecca)-मक्का की यात्रा करने को सूफ़ी विशेष महत्त्व देते हैं। सत्य हृदय से की गई इस यात्रा से मनुष्य इस संसार से मुक्ति प्राप्त कर सकता है तथा उसके समस्त कष्ट दूर हो जाते हैं।

9. भक्ति संगीत (Devotional Music)-सूफ़ी भक्ति संगीत पर बहुत जोर देते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि भक्ति संगीत मानवीय हृदयों में अल्लाह के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव के कारण मनुष्य के बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं तथा वह अल्लाह के समीप पहुँच जाता है। सूफ़ियों की धार्मिक संगीत सभाओं को समा कहा जाता है।

10. मानवता से प्रेम (Love of Mankind)-मानवता की सेवा करना सूफ़ी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इससे संबंधित वे मनुष्यों के बीच किसी जाति-पाति, रंग या नस्ल आदि का भेदभाव नहीं करते। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही अल्लाह की संतान हैं। इसलिए उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना । का अपमान करना है।

प्रश्न 9.
केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में साहित्य के विकास का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मध्यकाल में केंद्रीय इस्लामी देशों ने साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति की। अनेक लेखकों ने साहित्य के विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। कुछ महत्त्वपूर्ण लेखकों के योगदान का संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. इन सिना (Ibn Sina)—इब्न सिना मध्य काल अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था। उसे यूरोप में एविसेन्ना (Avicenna) के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म 980 ई० में बुखारा में हुआ था। इब्न सिना ने चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी रचना अल-कानून-फिल-तिब (al-Qanun fil-Tibb) विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई। इसमें चिकित्सा सिद्धांतों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है।

इसमें इब्न सिना के प्रयोगों एवं अनुभवों की जानकारी दी गई है। इस पुस्तक का प्रयोग यूरोप में अनेक वर्षों तक एक प्रमाणिक पाठ्य-पुस्तक के रूप में किया जाता रहा है। प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के० अली के अनुसार, “इब्न सिना की कानून’ कई शताब्दियों तक चिकित्सा की बाईबल रही।”24

2. अबू नुवास (Abu Nuwas)—अबू नुवास खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद का प्रसिद्ध दरबारी कवि था। उसने दरबारी जीवन पर अनेक कविताएँ लिखीं। उसने शराब एवं प्रेम जैसे नए विषयों को छुआ। उसकी कविताओं में ईरानी कवियों की छाप देखी जा सकती है। उसे आधुनिक अरबी कविता का एक महान् कवि माना जाता है।

3. रुदकी (Rudki)-रुदकी समानी दरबार का एक महान् कवि था। उसे नयी फ़ारसी कविता का जनक माना जाता है। वह प्रथम कवि था जिसने ग़ज़ल (lyrical poems) एवं रुबाइयाँ (quatrains) लिखीं। रुबाई चार पंक्तियों वाले छंद को कहते हैं। इसका प्रयोग प्रियतम के सौंदर्य का वर्णन करने, संरक्षक की प्रशंसा करने एवं दार्शनिक विचारों का वर्णन करने के लिए किया जाता है।

4. उमर खय्याम (Umar Khayyam)-उमर खय्याम एक महान् कवि, खगोल वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ था। उसका जन्म 1048 ई० में निशापुर (Nishapur) जो कि सल्जुक साम्राज्य की राजधानी थी, में हुआ। उमर खय्याम की गणना विश्व के प्रसिद्ध फ़ारसी कवियों में की जाती है। उसकी रुबाइयों ने लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव छोड़ा। इसी कारण आज विश्व की अनेक भाषाओं में उसकी रुबाइयों का अनुवाद किया जा चुका है। उसने गणित एवं खगोल विज्ञान के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उसने रिसाला (Risala) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की।

5. फिरदौसी (Firdausi) फिरदौसी महमूद गज़नवी का सर्वाधिक प्रसिद्ध फ़ारसी का दरबारी कवि था। उसका जन्म 950 ई० में खरासान में हुआ था। उसने 30 वर्ष की अथक मेहनत के पश्चात् शाहनामा (Shahnama) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें 60,000 पद दिए गए हैं। इसे इस्लामी साहित्य की एक सर्वश्रेष्ठ कृति माना जाता है। इसमें प्रारंभ से लेकर अरबों की विजय तक ईरान के इतिहास का काव्यात्मक शैली में वर्णन किया गया है। फिरदौसी के काव्य क्षेत्र में दिए गए उल्लेखनीय योगदान के कारण उसे ठीक ही ‘फ़ारस का होमर’ (Homer of Persia) कहा जाता है।

6. एक हजार एक रातें (The Thousand and One Nights)—यह अनेक प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है। इन कहानियों को अनेक लेखकों द्वारा विभिन्न समयों में लिखा गया था। यह संग्रह मूल रूप से भारतीय-फ़ारसी भाषा में था। दसवीं शताब्दी में इसका अनुवाद अरबी भाषा में बग़दाद में किया गया था। इन कहानियों को शहरज़ाद (Shahrzad) द्वारा अपने पति को हरेक रात को एक-एक करके सुनाया गया था।

इस कारण इस संग्रह को अरबी रातें (The Arabian Nights) के नाम से भी जाना जाता है। बाद में मामलुक काल में इसमें और कहानियाँ जोड़ दी गईं। इन कहानियों को मनुष्य को शिक्षा देने एवं मनोरंजन करने के उद्देश्य से लिखा गया था। ये कहानियाँ अरबी साहित्य में प्रमुख स्थान रखती हैं।

अल-जद्रीज (AIL Iahim) अल-जहीज़ बसरा का एक प्रसिद्ध लेखक था। वह यनानी दर्शन से बहत प्रभावित था। उसने विभिन्न विषयों पर अनेक पुस्तकें लिखीं। इन पुस्तकों में किताब-अल-बखाला (Kitab-al Bukhala) एवं किताब-अल-हैवान (Kitab-al-Hayawan) सर्वाधिक प्रसिद्ध थीं। प्रथम पुस्तक में कंजूसों की कहानियाँ दी गई हैं तथा लालच के बारे में बताया गया है। द्वितीय पुस्तक में जानवरों की कहानियाँ दी गई हैं। इसके अतिरिक्त इसमें अरबी परंपराओं एवं अंध-विश्वासों का वर्णन किया गया है। अल-जहीज़ के लेखों ने आने वाले लेखकों पर गहन प्रभाव डाला है।

8. ताबरी (Tabari)—ताबरी की गणना अरब के महान् इतिहासकारों में की जाती है। उसकी तारीख-अल रसूल वल मुलक (Tarikh-al-Rasul Wal Muluk) एक अमर रचना है। इसमें उसने संसार की रचना से लेकर 915 ई० तक समूचे मानव इतिहास का वर्णन किया है। इसमें उसने इस्लामी धर्म प्रचारकों एवं राजाओं के इतिहास का विशेष वर्णन किया है। ताबरी ने अपनी पुस्तक में क्रमानुसार घटनाओं का वर्णन किया है। अतः इसे अरबी इतिहास की सबसे प्रामाणिक पुस्तक माना जाता है।

9. अल्बरुनी (Alberuni)-अल्बरुनी ग्यारहवीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। उसका जन्म 973 ई० में खीवा (Khiva) में हुआ था। उसने खगोल विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का गहन अध्ययन किया था। जब महमूद गजनवी ने 1017 ई० में खीवा पर विजय प्राप्त की तो अल्बरुनी को बंदी बना लिया गया।

अल्बरुनी को गज़नी लाया गया। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महमूद गजनवी ने उसे अपने दरबार का रत्न बनाया। वह महमूद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों के समय उसके साथ भारत आया। भारत में उसने जो कुछ अपनी आँखों से देखा उसके आधार पर उसने एक बहुमूल्य पुस्तक तहकीक-मा-लिल हिंद (Tahqiq ma-lil Hind) की रचना की।

इसे तारीख-ए-हिंद (Tarikh-i-Hind) के नाम से भी जाना जाता है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था। यह 11वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को जानने के लिए हमारा एक विश्वसनीय एवं प्रमाणिक स्रोत है। उसके इस बहुमूल्य योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उसे सदैव स्मरण किया जाता रहेगा। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉक्टर जे० एस० मिश्रा के अनुसार, “तहकीक-मा-लिल हिंद उसके (अल्बरुनी) महान् कार्यों में से एक था, जिसमें उसने भारतीय विषयों जैसे विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का बहुत स्पष्ट ढंग से वर्णन किया है।”

प्रश्न 10.
धर्मयुद्धों के बारे में आप क्या जानते हैं ? इनके क्या परिणाम निकले ? .
उत्तर:
मध्यकालीन विश्व इतिहास में धर्मयुद्धों को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। ये धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य लड़े गए। इन धर्मयुद्धों की कुल संख्या 8 थी। इन धर्मयुद्धों का उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम (Jerusalem) को मुसलमानों के आधिपत्य से मुक्त करवाना था। इन धर्मयुद्धों के दूरगामी परिणाम निकले।

ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य धर्मयुद्धों के लिए अनेक कारण उत्तरदायी थे। इनका संक्षिप्त वर्णन निम्नलिखित अनुसार है

1. अरबों द्वारा जेरुसलम पर अधिकार (Occupation of Jerusalem by the Arabs)—जेरुसलम ईसा मसीह के जीवन से संबंधित था। इसलिए यह ईसाइयों के लिए बहुत पवित्र भूमि थी। 638 ई० में अरबों ने जेरुसलम पर अधिकार कर लिया था। ईसाइयों के लिए इसे सहन करना कठिन था। अत: वे इसे वापस प्राप्त करने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की तलाश में थे।

2. सल्जुक तुर्कों के ईसाइयों पर अत्याचार (Atrocities of Saljuk Turks on Christians)-सल्जुक तुर्कों ने 1071 ई० में जेरुसलम पर अपना अधिकार कर लिया था। वे कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। अत: वे अपने साम्राज्य में ईसाई धर्म की उन्नति को सहन नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने ईसाइयों पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए। जेरुसलम में रहने वाले ईसाइयों पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए गए। ईसाइयों को तलवार के बल पर इस्लाम धर्म में सम्मिलित किया जाता।

इस्लाम धर्म स्वीकार न करने वाले ईसाइयों को अनेक प्रकार के कर देने के लिए बाध्य किया गया। निस्संदेह इससे स्थिति विस्फोटक हो गई। डॉक्टर एफ० सी० कौल एवं डॉक्टर एच० जी० वारेन के अनुसार, “इस प्रकार सल्जुक तुर्कों को जंगली जानवर समझा जाने लगा जिससे पवित्र शहर (जेरुसलम) को मुक्त करवाना आवश्यक समझा गया।”26

3. तात्कालिक कारण (Immediate Cause)-ईसाइयों का खून मुसलमानों से बदला लेने के लिए खौल रहा था। वास्तव में युद्ध के लिए बारूद पूर्ण रूप से तैयार था। उसे केवल एक चिंगारी दिखाने की आवश्यकता थी। 1092 ई० में सल्जुक सुलतान मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् उसके साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया। बाइजेंटाइन सम्राट् एलेक्सियस प्रथम (Alexius I) ने यह स्वर्ण अवसर देख कर जेरुसलम एवं अन्य क्षेत्रों पर अधिकार करने की योजना बनाई।

इस उद्देश्य से उसने पोप अर्बन द्वितीय (Pope Urban II) को सहयोग देने की अपील की। पोप अर्बन द्वितीय इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। ऐसा करके वह अपने प्रभाव में वृद्धि करना चाहता था। उसने 26 नवंबर, 1095 ई० को फ्रांस के क्लेयरमांट (Clermont) नामक नगर में एक विशाल जनसभा का आयोजन किया। इसमें उसने ईसा मसीह के पवित्र स्थान जेरुसलम की रक्षा के लिए समस्त ईसाइयों को धर्मयुद्ध में सम्मिलित होने के लिए प्रेरित किया।

I. प्रथम धर्मयुद्ध : 1096-1099 ई०

प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ 1096 ई० में हुआ। पोप अर्बन द्वितीय के भाषण से उत्तेजित होकर लगभग 70 हजार धर्मयोद्धा (Crusaders) पीटर दा हरमिट (Peter the Hermit) के नेतृत्व में जेरुसलम को मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए चल पड़े। इन धर्मयोद्धाओं ने कुंस्तुनतुनिया (Constantinople) पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार आरंभ कर दी।

तुर्क मुसलमानों ने जो कि अत्यधिक संगठित थे ने, अधिकाँश धर्मयोद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया। इसी दौरान फ्राँस, जर्मनी एवं इटली के शासकों ने एक विशाल सेना गॉडफ्रे (Godfrey) के नेतृत्व में जेरुसलम की ओर रवाना की। इन सैनिकों ने एडेस्सा (Edessa) एवं एंटीओक (Antioch) पर अधिकार कर लिया।

उन्होंने 15 जुलाई, 1099 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह यह उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण सफलता थी। जेरुसलम पर अधिकार करने के पश्चात् धर्मयोद्धाओं ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही प्रथम धर्मयुद्ध का अंत हो गया। गॉडफ्रे को जेरुसलम का शासक घोषित कर दिया गया।

इस प्रदेश को आउटरैमर (Outremer) भाव समुद्रपारीय भूमि का नाम दिया गया। ए० जे० ग्रांट एवं डी० पी० जे० फिंक के अनुसार, “प्रथम धर्मयुद्ध प्रत्येक पक्ष से सबसे महान् एवं सर्वाधिक सफल था।”

II. द्वितीय धर्मयुद्ध : 1147-1149 ई०

मुसलमानों ने 25 दिसंबर, 1144 ई० को एडेस्सा (Edessa) पर अधिकार कर लिया। इसके पश्चात् मुसलमानों ने इस नगर में भयंकर लूटमार की। एडेस्सा का पतन निस्संदेह धर्मयोद्धाओं के लिए एक घोर अपमान की बात थी। इससे संपूर्ण यूरोप में मुसलमानों के विरुद्ध एक रोष लहर फैल गई। संत बर्नार्ड (St. Bernard) ने जेरुसलम की सुरक्षा के लिए धर्मयोद्धाओं में एक नई स्फूर्ति का संचार किया।

इससे द्वितीय धर्मयुद्ध के लिए विस्फोट तैयार हो गया। इस धर्मयुद्ध में फ्रांस के शासक लुई सप्तम (Louis VII) एवं जर्मनी के शासक कोनार्ड तृतीय (Conard III) ने हिस्सा लिया। दोनों शासकों की संयुक्त सेनाएँ 1147 ई० में सीरिया की ओर चल पड़ी।

इससे द्वितीय धर्मयुद्ध आरंभ हो गया। ये सैनिक एंटीओक (Antioch) पहुँचे। यहाँ दमिशक (Damascus) को घेरा डालने का निर्णय किया गया। यह घेरा कई माह तक चलता रहा। इस समय के दौरान जर्मनी एवं फ्रांस के शासकों के मध्य गहरे मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरूप उनके सैनिक वापस लौट गए एवं द्वितीय धर्मयुद्ध विफल हो गया। प्रसिद्ध इतिहासकारों एफ० सी० कौल एवं एच० जी० वारेन का यह कहना ठीक है कि, “द्वितीय धर्मयुद्ध बिना कुछ प्राप्त किए समाप्त हो गया सिवाए इसके कि इसने व्यक्तिगत लालच एवं असमर्थता प्रकट की। 28

III. तृतीय धर्मयुद्ध 1189-1192 ई०

1171 ई० में सलादीन (Saladin) ने मिस्र में सत्ता हथिया ली थी। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता 1187 ई० में जेरुसलम पर अधिकार करना था। जेरुसलम पर अधिकार से संपूर्ण ईसाई जगत् में तहलका फैल गया। अतः यूरोप के ईसाइयों ने जेरुसलम पर पुनः अधिकार करने का निर्णय किया। इस उद्देश्य से जर्मनी के सम्राट फ्रेडरिक बारबरोसा (Fraderick Barbarosa),

फ्रांस के सम्राट फिलिप ऑगस्ट्स (Philip Augustus) तथा इंग्लैंड के सम्राट रिचर्ड (Richard) ने संयुक्त रूप से आक्रमण करने का निर्णय किया। अतः उन्होंने 1189 ई० में तीसरे धर्मयुद्ध की घोषणा कर दी। किंतु उन्हें कोई विशेष सफलता नहीं मिली। अंत बाध्य होकर रिचर्ड ने 1192 ई० में सलादीन के साथ समझौता कर लिया। इस समझौते के अधीन सलादीन ने ईसाइयों को जेरुसलम में उपासना की आज्ञा दे दी। प्रसिद्ध लेखक पी० एस० फ्राई के अनुसार, “यह सलादीन की उदारता का प्रतिरूप था।”

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

IV. अन्य धर्मयुद्ध 1202-72 ई०

1202 ई० से 1272 ई० के मध्य ईसाइयों एवं यूरोपियों के मध्य पाँच अन्य धर्मयुद्ध हुए। चौथा धर्मयुद्ध 1202 ई० से 1204 ई०, पाँचवां धर्मयुद्ध 1216 ई० से 1220 ई०, छठा धर्मयुद्ध 1228 ई०, सातवां धर्मयुद्ध 1249 ई० से 1254 ई० एवं आठवां धर्मयुद्ध 1270 ई० से 1272 ई० के मध्य हुआ। इन धर्मयुद्धों के दौरान ईसाइयों को बहुत कम सफलताएँ मिलीं। अंततः वे अपने उद्देश्यों में विफल रहे। 1291 ई० में मिस्त्र के शासकों ने पूर्ण रूप से ईसाइयों को फिलिस्तीन से बाहर निकालने में सफलता प्राप्त की।

V. धर्मयुद्धों के परिणाम

धर्मयोद्धा पवित्र भूमि जेरुसलम पर अधिकार करने में विफल रहे किंतु इसके दूरगामी परिणाम निकले।

  • धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा एवं गौरव में बहुत वृद्धि हुई।
  • धर्मयुद्धों के कारण सामंतों की शक्ति का पतन हुआ एवं राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई।
  • धर्मयुद्धों के दौरान मुसलमानों एवं ईसाइयों ने एक-दूसरे के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। इससे दोनों समुदायों के मध्य नफ़रत की भावना फैली।
  • धर्मयुद्धों में यूरोपीय स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण उनकी स्थिति में सुधार आया एवं उनका दृष्टिकोण विशाल हुआ।
  • धर्मयुद्धों के कारण सामंतों के प्रभाव में कमी आई। इससे लोगों को उनके अत्याचारों से छुटकारा मिला।
  • धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे मुस्लिम नगरों एवं विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति को देखकर चकित रह गए।
  • धर्मयुद्धों के कारण पश्चिम एवं पूर्व के मध्य व्यापार को एक नया प्रोत्साहन मिला।
  • व्यापार के विकास ने भौगोलिक खोजों को प्रोत्साहित किया।
  • धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों एवं मुसलमानों का एक-दूसरे से संपर्क हुआ। वे एक-दूसरे की संस्कृति से प्रभावित हुए।
  • धर्मयुद्धों ने युद्ध कला को भी प्रभावित किया।

इस काल में सुरक्षा के उद्देश्य से विशाल दुर्गों का निर्माण किया गया। इन दुर्गों को ध्वस्त करने के लिए नए हथियारों एवं बारूद की खोज की गई। धर्मयुद्धों के प्रभाव के बारे में लिखते हुए प्रोफेसर के० अली का कथन है कि, “विश्व के इतिहास में धर्मयुद्धों के महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़े।”

क्रम संख्यावर्षघटटना
1.570 ई०पैंगंबर मुहम्मद का मक्का में जन्म।
2.595 ई०पैगंबर मुल्तम्मद का खदीज़ा से विवाहा।
3.610 ई०पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) प्राप्त हुआ।
4.612 ई०पैगंबर मुहम्मद द्वारा प्रथम सार्वर्जनिक उपदेश।
5.622 ई०पैगंबर मुहम्पद द्वारा मक्का से मदीना हिजरत।
6.624 ई०बढ़ की लड़ाई।
7.625 ई०उहुद की लड़ाई।
8.627 ई०खंदक की लड़ाई।
9.628 ई०प्रेद्षेविया की संधि।
10.630 ई०मक्का की विजय।
11.632 ई०पैंगंबर मुहम्मद की मदीना में मृत्यु।
12.632-634 ई०प्रथन खली फ़्रो अबू बकर का शासनकाल।
13.634-644 ई०दिलीय खलीक़ा उभर का श्रासनकाल।
14.638 ई०अरबों द्वारा जेरस्सलम पर अधिकार।
15.644-656 ई०तृतीय बलीफ़ा उथमान का शासनकाल।
16.650 ई०कुरान का संकलन।
17.656-661 ई०चतुर्थ खलीफ़ा अली का श्रासनकाल।
18.656 ई०रैंटों की लड़ाई।
19.657 ई०सिष्सिन की लड़ाई।
20.680 ई०करवला की लक़ाई।
21.685-705 ई०अब्द-अल-यलिक का शासनकाल। अरबी को साम्राज्य की भाषा घोषित करना एवं इस्लामी सिक्के जारी करना। जैल्सलय में ‘डोम आँफ़ दी रॉक नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण।
22.750 ई०उमय्यद वंश का अंत। अबू-अल-अब्बास द्वारा अख्बासी वेश की स्थापना।
23.750-754 ई०अस्बू-अल-अब्यास का शासनकाल।
24.786-809 ई०हारन-अल-रशीद का शासनकाल।
25.801 ई०बसरा की प्रसिद्ध सूकी संत राबिया की मृत्यु।
26.809 ई०अल-अमीन एवं अल-मामुन के मध्य गृहु युद्ध का आरंभ।
27.820 ई०ताहिरी वंश की बुरासान में ताहिर द्वारा स्थापना। निशापुर को राजधानी बनाना।
28.850 ई०समारा में अल-मुतव्वकिल नामक मस्जिद का निर्माण।
29.861 ई०धुलनुन मिस्री की मिस्र में मृत्यु।
30.868 ई०अहमद-इब्न-तुलुन द्वारा तुलुनी वंश की मिस्न में स्थापना।
31.873 ई०ताहिरी वंश का याकूब द्वारा अंत।
32.874-999 ई०समानी वंश का शासन।
33.909 ई०अल-महदी द्वारा फ़ातिमी वंश की स्थापना।
34.932 ई०मुइज-उद्-दौला द्वारा डेलाम में बुवाही वंश की स्थापना। शिराज को राजधानी घोषित करना।
35.945 ई०बुवाहियों द्वारा बग़ाद पर कब्ज़ा।
36.969 ई०फ़ातिमी खलीफ़ा द्वारा बग़दाद पर अधिकार।
37.973 ई०काहिरा को फ़ातिमी साम्राज्य की राजधानी घोषित करना।
38.962-1186 ई०गज़नी वंश का शासन।
39.980 ई०इब्न सिना (एविसेन्ना) का बुखारा में जन्म।
40.1030 ई०महमूद गज़नवी की मृत्यु।
41.1037 ई०तुग़रिल बेग़ एवं छागरी बेग़ द्वारा सल्जुक वंश की स्थापना।
42.1055 ई०सल्जुक तुर्कों द्वारा बग़दाद पर अधिकार। बुवाही वंश का अंत।
43.1063-1072 ई०सल्जुक सुल्तान अल्प अरसलन का शासनकाल।
44.1092 ई०सल्जुक सुल्तान मलिक शाह की मृत्यु।
45.1095 ई०पोप अर्बन द्वितीय द्वारा प्रथम धर्मयुद्ध का आह्वान।
46.1096-1099 ई०प्रथम धर्मयुद्ध।
47.1099 ई०जेरुसलम पर ईसाइयों का अधिकार।
48.1144 ई०तुर्कों द्वारा एडेस्सा पर अधिकार।
49.1147-49 ई०दूसरा धर्मयुद्ध।
50.1171 ई०सलादीन मिस्र का शासक बना।
51.1187 ई०मुसलमानों द्वारा जेरुसलम पर पुन: अधिकार।
52.1189-1192 ई०तीसरा धर्मयुद्ध।
53.1192 ई०इंग्लैंड के शासक रिचर्ड द्वारा सलादीन के साथ समझौता।
54.1258 ई०मंगोलों द्वारा बग़दाद पर कब्ज़ा।
55.1291 ई०मिस्न के शासकों द्वारा ईसाइयों को फिलिस्तीन से बाहर निकालना।

संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बदूओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर:
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब में जाहिलिया अथवा अज्ञानता के युग का बोलबाला था। उस समय अरब में बदू लोगों की प्रमुखता थी। बद् खानाबदोश कबीले थे। वे चरागाह की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमते रहते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके जीवन की एक प्रमुख विशेषता थी।

उस समय अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत शोचनीय थी। उन्हें केवल एक भोग-विलास की वस्तु समझा जाता था। समाज में अन्य अनेक कुप्रथाएँ भी प्रचलित थीं। उस समय अरब के लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे। प्रत्येक कबीले का अपना अलग देवी-देवता होता था।

उस समय के लोग अनेक प्रकार के अंध-विश्वासों एवं जादू-टोनों में भी विश्वास रखते थे। क्योंकि अरब का अधिकाँश क्षेत्र बंजर, वनस्पति रहित एवं दुर्गम था इसलिए अरबों का आर्थिक जीवन भी बहुत पिछड़ा हुआ था। अरबों का कोई व्यवस्थित राजनीतिक संगठन भी नहीं था। उनमें एकता एवं राष्ट्रीयता की भावना बिल्कुल नहीं थी।

प्रश्न 2.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम से पूर्व अरब की स्थिति कैसी थी ?
उत्तर:
सातवीं वीं शताब्दी ई० में इस्लाम से पूर्व अरब की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक स्थिति बहुत शोचनीय थी। अरब के बदू लोग खानाबदोशी जीवन व्यतीत करते थे। वे लूटमार करते थे एवं आपस में झगड़ते रहते थे। समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उन्हें केवल एक विलासिता की वस्तु समझा जाता था। उन्हें किसी प्रकार का कोई अधिकार प्राप्त नहीं था।

लोग नैतिक दृष्टि से बहुत गिर चुके थे। लोगों के साथ धोखा करना, भ्रष्टाचार एवं स्त्रियों की इज्जत लूटना एक सामान्य बात थी। समाज में दासों पर घोर अत्याचार किए जाते थे। उस समय अरब में कृषि, उद्योग एवं व्यापार बहुत पिछड़े हुए थे। अरब लोगों में मूर्ति पूजा का व्यापक प्रचलन था तथा वे अंध-विश्वासों में विश्वास रखते थे। उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। उनमें एकता एवं राष्ट्रीय भावना का अभाव था।

प्रश्न 3.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब कबीलों के बारे में आप क्या जानते हैं?
उत्तर:
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब कबीलों की मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित थीं
(1) उस समय अरब लोग कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीले का मुखिया शेख कहलाता था। उसका चुनाव कुछ हद तक पारिवारिक संबंधों के आधार परंतु मुख्य रूप से व्यक्तिगत साहस तथा बुद्धिमत्ता के आधार पर किया जाता था।

(2) प्रत्येक कबीले के अपने देवी-देवता होते थे। इनका मूर्तियों के रूप में मस्जिदों में उपासना की जाती थी।

(3) अधिकांश कबीले खानाबदोश होते थे। वे अपने लिए भोजन तथा ऊँटों के लिए चारे की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान में आते-जाते रहते थे।

(4) कुछ कबीले स्थायी रूप से शहरों में बस गये थे। ये कबीले व्यापार अथवा कृषि का कार्य करते थे।

(5) गैर-अरब व्यक्ति (मवाली) धर्मांतरण के बाद कबीले का सदस्य बन सकता था, किंतु उसके साथ समानता का व्यवहार नहीं किया जाता था।

प्रश्न 4.
इस्लाम के उदय से पूर्व अरब समाज के सामाजिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
(1) अरबों के समाज का मूल आधार परिवार था। उस समय संयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी। परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे।

(2) मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। पुत्री के जन्म को परिवार के लिए अपशगुन माना जाता था। समाज में जो अधिकार पुरुषों को दिए गए थे, स्त्रियों को उन सभी अधिकारों से वंचित रखा गया था।

(3) उस समय शिक्षा के क्षेत्र में अरब लोग पिछड़े हुए थे। अधिकाँश अरब अनपढ़ थे। स्त्रियों की शिक्षा की ओर कोई ध्यान नहीं दिया जाता था।

(4) उस समय अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। लूटमार करना तथा लोगों के साथ धोखा करना। उस समय एक सामान्य बात थी। स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक गर्व की बात मानी जाती थी।

(5) उस समय अरब के लोग विभिन्न साधनों से अपना मनोरंजन करते थे। नृत्य एवं गान उनके मनोरंजन का प्रमुख साधन था।

(6) उस समय बदुओं का प्रमुख भोजन खजूर एवं दूध था। वे इसके अतिरिक्त गेहूँ, बाजरा, अंगूर, खुमानी, सेब, बादाम एवं केले आदि का भी प्रयोग करते थे। वे ऊँट, भेड़ एवं बकरियों का माँस खाते थे।

(7) उस समय अरब समाज में दास प्रथा का व्यापक प्रचलन था। युद्ध में बंदी बनाए गए लोगों को दास बना लिया जाता था। दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था।

प्रश्न 5.
अरब लोगों में ऊँट का क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
अरब लोगों के जीवन में ऊँट को सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता था। उसे रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है। उसके बिना रेगिस्तान में जीवन के बारे में सोचा नहीं जा सकता। ऊँट 57° सेंटीग्रेड के उच्च तापमान में भी एक दिन में 160 किलोमीटर का सफर तय कर सकता है। वह 300 किलोग्राम से अधिक का भार ढो सकता है। वह कई दिनों तक बिना पानी पीये जीवित रह सकता है।

यह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है। लोग ऊँटनी का दूध पीते हैं, इसका माँस खाते हैं, इसकी खाल का तंबू बनाते हैं तथा इसके गोबर का आग के लिए प्रयोग करते हैं। इसके मूत्र से दवाइयाँ बनाई जाती हैं। इसे शेख़ की दौलत का प्रतीक माना जाता है। बढ़े इसे विवाह के अवसर पर दहेज के रूप में देते हैं। ऊँट के महत्त्व के संबंध में खलीफ़ा उमर ने लिखा है कि, “अरबवासी वहीं फलते-फूलते हैं जहाँ ऊँट होता है।”

प्रश्न 6.
पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद इस्लाम के संस्थापक थे। उनका जन्म 570 ई० में कुरैश कबीले में हुआ। उनके माता पिता की शीघ्र मृत्यु हो गई थी। अत: उनका बचपन अनेक कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। उनका 595 ई० में खदीज़ा के साथ विवाह हुआ। 610 ई० में पैगंबर मुहम्मद को मक्का की हीरा नामक गुफा में नया ज्ञान प्राप्त हुआ। यह ज्ञान उन्हें महादूत जिबरील द्वारा दिया गया।

612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का में अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक नए समाज का गठन किया जिसे उम्मा का नाम दिया गया। मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विचारों से सहमत न थे। अतः वे उसके कट्टर विरोधी बन गए। विवश होकर 622 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से मदीना को हिजरत की। उन्होंने 630 ई० में मक्का पर विजय प्राप्त की।

यह उनके जीवन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी। पैगंबर मुहम्मद ने लोगों को एक अल्लाह, आपसी भाईचारे, सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने एवं स्त्रियों का सम्मान करने का संदेश दिया। उनकी सरल शिक्षाओं से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित हुए एवं वे इस्लाम में सम्मिलित हुए। 632 ई० में पैगंबर मुहम्मद जन्नत (स्वर्ग) चले गए।

प्रश्न 7.
पैगंबर मुहम्मद ने हिजरत क्यों की ? इसका इस्लाम में क्या महत्त्व था ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की बढ़ती हुई लोकप्रियता के कारण मक्का के अनेक प्रभावशाली लोग उनसे ईर्ष्या करने लगे। इसके दो प्रमुख कारण थे। प्रथम, पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे। उस समय मक्का में काबा नामक स्थान पर 360 देवी-देवताओं की मूर्तियाँ थीं। इनके दर्शनों के लिए प्रत्येक वर्ष लाखों लोग मक्का की यात्रा पर आते थे।

यह काबा पर नियंत्रण करने वाले पुजारी वर्ग तथा कुरैश कबीले के लोगों के लिए आय का एक प्रमुख स्रोत था। अत: पैगंबर मुहम्मद द्वारा मूर्ति पूजा की आलोचना उनके लिए एक गंभीर ख़तरे की चेतावनी थी। दूसरा, पैगंबर मुहम्मद अरब समाज में प्रचलित अंध-विश्वासों को दूर कर इसे एक नई दिशा देना चाहते थे। इसे मक्का के रूढ़िवादी लोग पसंद नहीं करते थे। अतः उन्होंने अपने स्वार्थी हितों को देखते हुए लोगों को पैगंबर मुहम्मद

के विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। इन लोगों ने अनेक बार पैगंबर मुहम्मद को जान से मारने का प्रयास किया तथा उनके अनुयायियों को कठोर यातनाएँ दीं। अतः बाध्य होकर पैगंबर मुहम्मद 28 जून, 622 ई० को मक्का से मदीना कूच कर गए। वह 2 जुलाई, 622 ई० को मदीना पहुँचे। इस घटना को मुस्लिम इतिहास में हिजरत कहा जाता है। यह घटना पैगंबर मुहम्मद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ सिद्ध हुई। इस वर्ष से मुस्लिम कैलेंडर का आरंभ हुआ।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 8.
हज़रत मुहम्मद साहिब कौन थे ? उनकी प्रमुख शिक्षाएँ क्या थी ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद की मुख्य शिक्षाओं को लिखिए।
उत्तर:
हज़रत मुहम्मद साहिब इस्लाम के संस्थापक थे। उनकी प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित हैं–

(1) अल्लाह एक है-पैगंबर मुहम्मद ने अपनी शिक्षाओं में बार-बार इस बात पर बल दिया कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। वह जो चाहे कर सकता है। वह संसार की रचना करता है। वह इसकी पालना करता है। वह जब चाहे इसे नष्ट कर सकता है। संसार की सभी वस्तुएँ उसके नियंत्रण में हैं। उसकी अनुमति के बिना संसार का पत्ता तक नहीं हिल सकता। वह अत्यंत दयावान् है।

(2) कर्म सिद्धांत में विश्वास-इस्लाम में कर्म सिद्धांत पर विशेष बल दिया गया है। इसके अनुसार जैसा करोगे वैसा भरोगे, जैसा बीजोगे वैसा काटोगे। यदि कर्म अच्छे होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरा करोगे तो बुरा होगा। किसी भी स्थिति में कर्मों से छुटकरा नहीं मिलेगा। कुरान के अनुसार कयामत के दिन स्वर्ग एवं नरक का निर्णय इस जन्म में किए गए कर्मों के अनुसार ही होगा।

(3) समानता में विश्वास-इस्लाम में समानता को विशेष महत्त्व दिया गया है। इसके अनुसार सभी एक अल्लाह के बच्चे हैं। अत: सभी भाइ-बहन हैं। इस्लाम में अमीर-गरीब, जाति, भाषा, लिंग आदि के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता। सभी को एक समान अधिकार दिए गए हैं।

(4) मूर्ति पूजा का खंडन-इस्लाम मूर्ति पूजा का कट्टर विरोधी है। पैगंबर मुहम्मद के समय में अरब देश में मूर्ति पूजा का बहुत प्रचलन था। केवल काबा में ही सैंकड़ों मूर्तियाँ स्थपित की गई थीं। पैगंबर मुहम्मद ने मूर्ति पूजा का जोरदार शब्दों में खंडन किया। उन्होंने मक्का पर अधिकार करने के पश्चात् काबा में सभी मूर्तियों को नष्ट कर डाला। पैगंबर मुहम्मद का कथन था कि हमें केवल एक अल्लाह की उपासना करनी चाहिए।

प्रश्न 9.
इस्लाम के पाँच स्तंभ क्या हैं ?
उत्तर:
इस्लाम में पाँच सिद्धांतों पर विशेष बल दिया गया है। इनका पालन करना प्रत्येक मुसलमान का कर्तव्य है। अतः इन्हें इस्लाम के पाँच स्तंभ कहा जाता है।

(1) कलमा पढ़ना-प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्तव्य है कि वह कलमा पढ़े। इसमें बताया गया है कि अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च एवं सर्वशक्तिमान है। मुहम्मद साहब उसके रसूल (पैगंबर) हैं। कुरान को अल्लाह द्वारा भेजा गया है।

(2) नमाज-प्रत्येक मुसलमान का दूसरा कर्त्तव्य यह है कि वह दिन में पाँच बार नमाज़ अवश्य पढ़े। नमाज़ पढने से व्यक्ति का अल्लाह से संपर्क हो जाता है। उसकी रहमत से मनुष्य के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं तथा वह मनभावन फल प्राप्त करता है। नमाज़ से पहले हाथ-पाँव एवं मुँह को धोना ज़रूरी है। नाबालिगों एवं पागलों को छोड़कर अन्य सभी मुसलमानों के लिए नमाज़ पढ़ना अनिवार्य है।

(3) रोज़ा-रमजान के महीने रोज़ा (व्रत) रखना प्रत्येक मुसलमान का तीसरा धार्मिक कर्त्तव्य है। इस माह में सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी खाना-पीना वर्जित है। सूर्यास्त के पश्चात् ही मुसलमान कुछ खान-पान कर सकते हैं। इस माह के दौरान मुसलमानों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने पर विशेष बल दिया गया है।

(4) ज़कात-ज़कात का अर्थ है दान देना। इसके अधीन प्रत्येक मुसलमान का यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी कुल आय का 272% दान दे। इसे गरीबों की सहायता, इस्लाम के प्रचार एवं मस्जिदों के निर्माण पर खर्च किया जाता है।

(5) हज-प्रत्येक मुसलमान का यह धार्मिक कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में कम-से-कम एक बार हज करे भाव मक्का की यात्रा पर जाए।

प्रश्न 10.
कुरान पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
कुरान अरबी भाषा का शब्द है। इससे अभिप्राय है पुस्तक। कुरान इस्लाम की पवित्र पुस्तक है। इसे सम्मान से कुरान शरीफ़ कहा जाता है। इसकी रचना अरबी भाषा में की गई है। इसमें 114 अध्याय हैं। इनकी लंबाई क्रमिक रूप से घटती जाती है। इसका आखिरी अध्याय सबसे छोटा है। इसमें इस्लाम की शिक्षाओं एवं नियमों का वर्णन किया गया है।

मुस्लिम परंपरा के अनुसार कुरान उन संदेशों का संग्रह है जो खुदा ने अपने दूत जिबरील द्वारा पैगंबर मुहम्मद को 610 ई० से 632 ई० के मध्य मक्का में एवं मदीना में दिए। इसका संकलन 650 ई० में किया गया। आज जो सबसे प्राचीन कुरान हमारे पास है वह 9वीं शताब्दी से संबंधित है। कुरान शरीफ़ का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। मुसलमान कुरान को ख़ुदा की वाणी मानते हैं एवं इसका विशेष सम्मान करते हैं।

प्रश्न 11.
खिलाफ़त संस्था का निर्माण कैसे हुआ ? इसके क्या उद्देश्य थे?
उत्तर:
632 ई० में पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् कोई भी व्यक्ति वैध रूप से इस्लाम का अगला उत्तराधिकारी होने का दावा नहीं कर सकता था। अत: इस्लामी राजसत्ता उम्मा को सौंप दी गई। इससे नयी प्रक्रियाओं के लिए अवसर उत्पन्न हुए। किंतु इससे मुसलमानों में गहरे मतभेद भी पैदा हो गए। इससे खिलाफ़त संस्था का निर्माण हुआ।

इसमें समुदाय का नेता (अमीर-अल-मोमिनिन) पैगंबर का प्रतिनिधि (खलीफ़ा) बन गया। प्रथम चार खलीफ़ाओं ने पैगंबर के साथ अपने गहरे नज़दीकी संबंधों के आधार पर अपनी शक्तियों का औचित्य स्थापित किया। उन्होंने पैगंबर द्वारा दिए मार्ग-निर्देशों के अनुसार उनके कार्य को आगे बढ़ाया। खिलाफ़त के दो प्रमुख उद्देश्य थे। प्रथम, उम्मा के कबीलों पर नियंत्रण स्थापित करना। द्वितीय, राज्य के लिए संसाधन जुटाना।

प्रश्न 12.
आरंभिक खलीफ़ाओं के अधीन अरब सम्राज्य के प्रशासनिक ढाँचे की मुख्य विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • प्रांतों का अध्यक्ष गवर्नर और कबीलों के मुखिया को बनाया गया।
  • केंद्र के राजस्व के दो मुख्य स्रोत थे। प्रथम मुसलमानों द्वारा अदा किए जाने वाले कर तथा आक्रमणों के दौरान मिलने वाली लट से प्राप्त हिस्सा।
  • खलीफ़ा के सैनिक रेगिस्तान के किनारे बसे शहरों कुफ़ा और बसरा में शिविरों में रहते थे ताकि वे खलीफ़ा के नियंत्रण में बने रहें।
  • शासक वर्ग और सैनिकों को लूट में से हिस्सा मिलता था और मासिक अदायगियाँ प्राप्त होती थीं।
  • गैर-मुस्लिम लोगों द्वारा करों को अदा करने पर उन्हें राज्य के संरक्षित लोग (धिम्मीस) माना जाता था तथा उन्हें काफ़ी अधिक स्वायत्तता दी जाती थी।

प्रश्न 13.
अबू बकर कौन था ? उसकी प्रमुख उपलब्धियों का वर्णन करें।
उत्तर:
अबू बकर खलीफ़ा के पद पर नियुक्त होने वाले प्रथम व्यक्ति थे। वह इस पद पर 632 ई० से 634 ई० तक रहे। जिस समय वह खलीफ़ा के पद पर निर्वाचित हुए तो उस समय उन्हें अनेक विकट समस्याओं का सामना करना पड़ा। अबू बकर इन समस्याओं से घबराने वाला व्यक्ति नहीं था। उसने अपनी योग्यता एवं अथक प्रयासों से इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया।

अबू बकर ने सर्वप्रथम नकली पैगंबरों के विद्रोहों से निपटने के लिए एक शक्तिशाली संघ का गठन किया। इसका नेतृत्व खालिद इब्न-अल-वालिद को सौंपा। खालिद ने 6 माह के दौरान ही इन नकली पैगंबरों को एक ऐसा सबक सिखाया कि उन्होंने पुनः विद्रोह करने का कभी साहस नहीं किया। इससे मुसलमानों में जहाँ एक ओर नव-स्फूर्ति का संचार हुआ वहीं दूसरी ओर अरब में शाँति स्थापित हुई।

इसके पश्चात् अबू बकर ने मुस्लिम साम्राज्य के विस्तार की योजना बनाई। अतः उसने शीघ्र ही सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्यों पर विजय प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की। इन विजयों में खालिद ने उल्लेखनीय योगदान दिया। इसलिए उसे अल्लाह की तलवार की उपाधि से सम्मानित किया गया। उन्होंने मदीना को अपनी राजधानी बनाए रखा। 634 ई० में अबू बकर की मृत्यु हो गई। अपनी मृत्यु से पूर्व उन्होंने उमर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।

प्रश्न 14.
मुआविया कौन था ? उसकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:
उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था। वह 661 ई० से 680 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। जिस समय वह खलीफ़ा बना उस समय उसके समक्ष अनेक चुनौतियाँ थीं। वह एक दृढ़ निश्चय वाला व्यक्ति था। अत: उसने इन चुनौतियों का साहसपूर्ण सामना किया। उसने सर्वप्रथम दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया। उसने 663 ई० में खरिजाइटों जिन्होंने खलीफ़ा के विरुद्ध कुफा में विद्रोह कर दिया था, का सख्ती के साथ दमन किया।

लगभग इसी समय खलीफ़ा अली के समर्थकों ने इराक में विद्रोह कर दिया। ये लोग बहुत शक्तिशाली थे। इसके बावजूद मुआविया ने अपना धैर्य न खोया। उसने एक विशाल सेना भेजकर उनके विद्रोह का दमन किया। इस प्रकार मुआविया की एक बड़ी सिरदर्दी दूर हुई। 667 ई० में मुआविया के प्रसिद्ध सेनापति उकाबा ने उत्तरी अफ्रीका के अधिकाँश क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया।

मुआविया बाइजेंटाइन साम्राज्य को अपने अधीन करना चाहता था किंतु उसकी यह इच्छा अनेक कारणों से पूर्ण न हो सकी। मुआविया के सैनिक तुर्किस्तान पर अधिकार करने में सफल रहे। मुआविया न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी सिद्ध हुआ। उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों तथा प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया। उसने खलीफ़ा पद के गौरव में बहुत वृद्धि की।

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प्रश्न 15.
अब्द-अल-मलिक उमय्यद वंश का सबसे महान खलीफ़ा था। सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
अब्द-अल-मलिक की गणना उमय्यद वंश के महान् खलीफ़ाओं में की जाती है। वह मारवान का पुत्र था। वह 685 ई० में खलीफ़ा के पद पर नियुक्त हुआ। वह 705 ई० तक इस पद पर रहा। उसे अपने शासनकाल के आरंभ में घोर समस्याओं का सामना करना पड़ा था। उसने न केवल इन समस्याओं पर नियंत्रण पाया अपितु मुस्लिम साम्राज्य को संगठित करने में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। अब्द-अल-मलिक की शक्ति को सर्वप्रथम इराक में अल-मुख्तियार बिन अबू उबैद ने चुनौती दी। अब्द-अल-मलिक ने बड़ी कुश्लता से इस विद्रोह का दमन किया।

इसके पश्चात् उसने अपना ध्यान एक अन्य प्रमुख शत्रु इन जुबैर की ओर किया। इन जुबैर ने मक्का में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी थी। वह 692 ई० में अब्द-अल-मलिक के साथ हुई एक लड़ाई में मारा गया था। अब्द-अल-मलिक ने बाइजेंटाइन साम्राज्य के अनेक क्षेत्रों पर अधिकार करने में सफलता प्राप्त की। वह न केवल एक महान् विजेता अपितु एक कुशल शासन प्रबंधक भी था। उसने इस्लामी साम्राज्य को संगठित करने के लिए अनेक उल्लेखनीय उपाय भी किए। उसने अरबी को राज्य की भाषा घोषित किया।

उसने इस्लामी सिक्कों को जारी किया। इनमें सोने के सिक्के को दीनार एवं चाँदी के सिक्के को दिरहम कहा जाता था। इन सिक्कों पर अरबी भाषा लिखी गई थी। अब्द-अल-मलिक के ये सिक्के बहुत लोकप्रिय हुए तथा आने वाली कई शताब्दियों तक जारी रहे।

प्रश्न 16.
अब्बासी क्रांति से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
अब्बासी क्रांति के महत्त्व पर प्रकाश डालें।
उत्तर:
750 ई० में अब्बासियों के आगमन ने इस्लाम के इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात किया। उमय्यद वंश के अधिकाँश खलीफ़े अपना समय सुरा एवं सुंदरी के संग व्यतीत करते थे। इस कारण वे प्रशासन की ओर अपना कोई ध्यान नहीं दे सके। इसके अतिरिक्त मवालियों (यह गैर अरबी मुसलमान थे) को अरबी मुसलमानों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था। अत: वे उमय्यदों को सत्ता से बाहर निकालने के लिए किसी स्वर्ण अवसर की प्रतीक्षा में थे।

उमय्यद साम्राज्य में फैली अराजकता का लाभ उठाते हुए अबू मुस्लिम ने खुरासान में 747 ई० में उमय्यद वंश के विरुद्ध दवा नामक आंदोलन आरंभ किया। इस आंदोलन का उद्देश्य उमय्यद वंश को सत्ता से बाहर करना था। इस आंदोलन ने उमय्यद शासन को अत्याचारी एवं इस्लामी सिद्धांतों के विरुद्ध बताया। 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने कुफा में अपने खलीफ़ा होने की घोषणा कर दी।

उमय्यद खलीफ़ा मारवान द्वितीय इसे सहन न कर सका। अत: वह 12,000 सैनिकों के साथ अबू-अल-अब्बास का मुकाबला करने के लिए चल पड़ा। उसका सामना करने के लिए अबू-अल-अब्बास ने अपने चाचा अब्दुल्ला-इब्न-अली के नेतृत्व में एक सेना को भेजा।

5 जनवरी, 750 ई० में हुई जबकि लड़ाई में खलीफ़ा मारवान द्वितीय की पराजय हुई। इससे उमय्यद वंश का अंत हुआ। इस प्रकार अब्बासी क्रांति सफल हुई तथा अब्बासियों का शासन स्थापित हुआ।

प्रश्न 17.
अब्बासी शासन का महत्त्व क्या था ?
उत्तर:
अब्बासी शासन निम्नलिखित कारणों से अति महत्त्वपूर्ण था

  • इससे अरबों के प्रभाव में गिरावट आई जबकि ईरानी संस्कृति का महत्त्व बढ़ गया।
  • अब्बासियों ने इराक और खुरासान की अपेक्षाकृत अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सेना एवं नौकरशाही का पुनर्गठन गैर-कबीलाई आधार पर किया।
  • अब्बासी शासकों ने खिलाफ़त की धार्मिक स्थिति और कार्यों को मज़बूत बनाया तथा इस्लामी संस्थाओं और विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया।
  • उन्होंने सरकार और साम्राज्य की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए राज्य के केंद्रीय स्वरूप को बनाए रखा।
  • उन्होंने उमय्यदों के शानदार शाही वास्तुकला और राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपराओं को जारी रखा।

प्रश्न 18.
हारुन-अल-रशीद को अब्बासी वंश का सबसे महान् खलीफ़ा क्यों माना जाता है ?
उत्तर:
हारुन-अल-रशीद अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा था। वह 786 ई० से 809 ई० तक खलीफ़ा के पद पर रहा। उसने अब्बासी वंश के गौरव को पुनः स्थापित करने के लिए अथक प्रयास किए। उसने न केवल आंतरिक विद्रोहों को कुचला अपितु अब्बासी साम्राज्य का दूर-दूर तक विस्तार किया। उसने सर्वप्रथम अफ्रीका के लोगों द्वारा वहाँ अरब खलीफ़ा के गवर्नर के विरुद्ध भड़के विद्रोह को कठोरता से कुचला। याहिया बिन-अब्दुल्ला जो कि खलीफ़ा अली से संबंधित था, ने अपने आपको डेलाम में खलीफ़ा घोषित कर दिया था।

निस्संदेह यह हारुन-अल-रशीद की सत्ता के लिए एक गंभीर ख़तरा था। हारुन-अल-रशीद ने एक योजना के अधीन उसे बंदी बना लिया एवं बाद में मौत के घाट उतार दिया। उसने अर्मीनिया में खारिजियों तथा खुरासान के विद्रोह का दमन किया। उसने उस समय के शक्तिशाली फ्रैंक शासक शॉर्लमेन के साथ मित्रतापूर्वक संबंध स्थापित किए। उसने अपने साम्राज्य को संगठित करने के उद्देश्य से प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए। उसने प्रजा की भलाई के लिए अनेक पग उठाए। उसने शिक्षा को प्रोत्साहित किया।

उसने अनेक प्रसिद्ध विद्वानों, संगीतकारों एवं गायकों को अपने दरबार में संरक्षण प्रदान किया था। उसने अनेक अस्पतालों एवं सरायों का निर्माण करवाया। उसने अपनी राजधानी में अनेक विशाल महल, भवन, मस्जिदें एवं बाग बनवाए। वास्तव में उसके शासनकाल में अब्बासी साम्राज्य में इतनी प्रगति हुई कि इसे ‘स्वर्ण युग’ के नाम से स्मरण किया जाता है।

प्रश्न 19.
इस्लाम धर्म के शीघ्र फैलने के प्रमुख क्या कारण थे ?
उत्तर:

  • अरबवासियों में इस्लाम के प्रसार के लिए विशेष धार्मिक जोश था।
  • पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाएँ बहुत सरल थीं। इनका लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा।
  • इस्लाम में अमीर-ग़रीब एवं जाति-पाति का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। इससे यह धर्म शीघ्र ही लोकप्रिय हो गया।
  • इस्लाम के प्रसार में अनेक खलीफ़ों ने उल्लेखनीय योगदान दिया।
  • इस्लाम के उदय के समय रोमन साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो चुका था।

प्रश्न 20.
फ़ातिमी वंश के उत्थान एवं पतन की संक्षिप्त चर्चा करें।
उत्तर:
फ़ातिमी वंश एक प्रसिद्ध राजवंश था। इस वंश की स्थापना 909 ई० में अल-महदी ने उत्तरी अफ्रीका में की थी। यह वंश अपने आपको पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज मानते हैं। यह मुसलमानों के शिया संप्रदाय से संबंधित है। अल-महदी ने 909 ई० से 934 ई० तक शासन किया। उसने अनेक प्रदेशों- एलेक्जेंडरिया, सीरिया, माल्टा, सारडीनिया एवं कोर्सिका आदि को अपने अधीन किया।

उसने महदीया को अपनी राजधानी घोषित किया। फ़ातिमी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध सुल्तान अल-मुइज़ था। उसने 965 ई० से 975 ई० तक शासन किया। उसके शासनकाल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता 969 ई० में मिस्त्र पर विजय प्राप्त करना था। 973 ई० में काहिरा को फ़ातिमी साम्राज्य की नई राजधानी घोषित किया गया। इसकी स्थापना मंगल ग्रह के उदय होने के दिन की गई थी।

अल-मुइज़ ने न केवल फ़ातिमी साम्राज्य का विस्तार ही किया अपितु इसे अच्छी प्रकार से संगठित भी किया। अल-मुइज़ के उत्तराधिकारियों ने 1171 ई० तक शासन किया। 1171 ई० में सालादीन ने अल-अज़िद को पराजित कर फ़ातिमी वंश का अंत कर दिया।

प्रश्न 21.
सल्जुक वंश के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गज़नवी वंश के खंडहरों पर सल्जुक वंश की स्थापना हुई। इस वंश की स्थापना तुग़रिल बेग एवं उसके भाई छागरी बेग ने 1037 ई० में खुरासान को जीत कर की थी। उन्होंने निशापुर को अपनी राजधानी घोषित किया। वे तुर्क जाति से संबंधित थे। तुग़रिल बेग ने सल्जुक साम्राज्य के विस्तार में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण सफलता 1055 ई० में बग़दाद पर अधिकार करना था। इससे बग़दाद में बुवाही शासन का अंत हुआ एवं इस पर पुनः सुन्नी मुसलमानों का शासन स्थापित हो गया।

इससे प्रभावित होकर खलीफ़ा अल-कायम ने तुगरिल बेग को सुल्तान की उपाधि से सम्मानित किया। 1063 ई० में तुगरिल बेग की मृत्यु के पश्चात् उसका भतीजा अल्प अरसलन नया सुल्तान बना। उसने 1072 ई० तक शासन किया। वह एक योग्य शासक प्रमाणित हुआ। उसके शासनकाल में सल्जुक साम्राज्य का विस्तार अनातोलिया तक हो गया। उसका पुत्र मलिक शाह भी एक योग्य सुल्तान था।

उसने 1072 ई० से 1092 ई० तक शासन किया। उसके वज़ीर निजाम-उल-मुलक ने सल्जुक साम्राज्य के विस्तार एवं संगठन में उल्लेखनीय योगदान दिया। मलिक शाह की मृत्यु के पश्चात् सल्जुक साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया तथा इसका अंत 1300 ई० में हो गया।

प्रश्न 22.
मध्यकालीन इस्लामी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कोई तीन विशेषताएँ लिखो।
उत्तर:
(1) कृषि-मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था। उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों ने कृषि को प्रोत्साहित करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने सिंचाई साधनों का विकास किया। उन्होंने साम्राज्य के अनेक भागों में बाँधों, नहरों एवं कुओं का निर्माण किया। उन्होंने उन किसानों को भू-राजस्व एवं अन्य करों में रियायत दी जो कृषि के अधीन नयी भूमि को लाते थे। कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था।

(2) उद्योग-उमय्यद एवं अब्बासी खलीफ़ों के शासनकाल में उद्योग के क्षेत्र में बहुमुखी विकास हुआ। उस समय समरकंद कागज़ उद्योग के लिए विशेष रूप से विख्यात था। बाद में कागज़ उद्योग के केंद्र मेसोपोटामिया, ईरान, अरब, मिस्र एवं स्पेन में भी स्थापित किए गए। उस समय बग़दाद काँच के सामान, आभूषण तथा रेशम उद्योग के लिए प्रसिद्ध था। बुखारा दरियों के उद्योग के लिए, दमिश्क इस्पात उद्योग के लिए, कुफा रेशम उद्योग के लिए, कोरडोबा चमड़ा उद्योग के लिए प्रसिद्ध केंद्र थे। इनके अतिरिक्त उस समय आभूषण, सूती एवं ऊनी वस्त्र, फर्नीचर एवं दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं के उद्योग भी स्थापित थे।

(3) वाणिज्य एवं व्यापार-अरबों का आंतरिक एवं विदेशी व्यापार दोनों उन्नत थे। आंतरिक व्यापार के लिए मुख्यतः ऊँटों का प्रयोग किया जाता था। विदेशी व्यापार जल एवं स्थल दोनों मार्गों से किया जाता था। अरबी साम्राज्य के यूरोप, अफ्रीका, भारत एवं चीन के देशों के साथ अच्छे व्यापारिक संबंध थे। अरबी व्यापारी विदेशों को कागज़, सूती एवं ऊनी वस्त्र, काँच का सामान, चीनी, खजूर एवं बारूद का निर्यात करते थे विदेशों से रेशम, चाय, गर्म मसाले, सोना, विलासिता का सामान, हाथी दाँत एवं गुलामों का आयात करते थे। उस समय व्यापार संतुलन इस्लामी साम्राज्य के पक्ष में था।

प्रश्न 23.
इस्लामी साम्राज्य में स्थापित शहरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:
इस्लामी साम्राज्य में स्थापित शहरीकरण की प्रमुख विशेषताएँ अग्रलिखित हैं

(1) ये सभी शहर व्यापार के प्रसिद्ध केंद्र थे। एक शहर का दूसरे शहर के साथ परस्पर संपर्क स्थापित किया गया था। इससे व्यापार को बहुत प्रोत्साहन मिला।

(2) इन सभी शहरों में विशाल जनसंख्या रहती थी तथा इनमें तीव्रता से वृद्धि होती रहती थी। 850 ई० के लगभग बग़दाद की जनसंख्या 10 लाख हो गई थी।

(3) इन सभी शहरों के केंद्र में एक विशाल एवं भव्य मस्जिद का निर्माण किया जाता था। यहाँ सामूहिक नमाज़ पढ़ी जाती थी। इसके अतिरिक्त नागरिकों एवं सैनिकों के घरों के निकट भी मस्जिदों, गिरजाघरों एवं सिनेगोगों की स्थापना की गई थी। मस्जिद मुसलमानों के, गिरजाघर ईसाइयों के तथा सिनेगोग यहूदियों के प्रार्थना घर थे।

(4) प्रत्येक शहर में मंडियों की अच्छी व्यवस्था की जाती थी। इन मंडियों में विभिन्न प्रकार की दुकानें होती थीं।

(5) शहर के बाहर कब्रिस्तान बनाए जाते थे। कसाई की दुकानों एवं चमड़े की वस्तुएँ बनाने वाली दुकानों को भी शहर से बाहर रखा जाता था।

(6) शहरों में नागरिकों को अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त थीं तथा यहाँ नौकरी के अवसर अधिक होते थे। इसलिए लोग शहरों में रहना पसंद करते थे।

प्रश्न 24.
सूफी मत को परिभाषित कीजिए। इसकी शिक्षाएँ क्या थी ? ।
अथवा
सूफ़ी मत से आपका क्या अभिप्राय है ? इसकी शिक्षाओं का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
उत्तर:
सूफ़ी मत से अभिप्राय-सूफ़ी मत इस्लाम का एक संप्रदाय था। वे बहुत उदार विचारों वाले थे। वे 12 सिलसिलों अथवा वर्गों में बँटे हुए थे। प्रत्येक सिलसिला एक पीर के अधीन होता था। सूफ़ी मत की प्रमुख शिक्षाएँ निम्नलिखित थीं

(1) अल्लाह एक है-सूफ़ियों के अनुसार परमात्मा एक है जिसको वे अल्लाह कहते हैं। वह सर्वोच्च, शक्तिशाली तथा सर्वव्यापक है। प्रत्येक स्थान पर उसका आदेश चलता है तथा कोई भी उसकी आज्ञा के विरुद्ध नहीं जा सकता। वह प्रत्येक स्थान पर उपस्थित है। वह अमर है तथा आवागमन के चक्करों से मुक्त है। वह ही इस सृष्टि का रचयिता, इसकी सुरक्षा करने वाला तथा इसको नष्ट करने वाला है। इन कारणों से सूफ़ी एक अल्लाह के अतिरिक्त किसी अन्य की पूजा नहीं करते हैं।

(2) पीर-सूफ़ी मत में पीर या गुरु को सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। वह अपने मुरीदों की रूहानी उन्नति पर पूर्ण दृष्टि रखता है, ताकि वे इस भवसागर से पार हो सकें तथा अल्लाह के साथ एक हो सकें। एक सच्चा पीर जो स्वयं साँसारिक लगाव से दूर हो तथा जिसने रूहानी ज्ञान प्राप्त कर लिया हो, वह ही अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जा सकता है।

(3) भक्ति संगीत-सूफ़ी भक्ति संगीत पर बहुत ज़ोर देते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि भक्ति संगीत मानवीय हृदयों में अल्लाह के प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। इसके प्रभाव के कारण मनुष्य के बुरे विचार नष्ट हो जाते हैं तथा वह अल्लाह के समीप पहुँच जाता है। सूफ़ियों की धार्मिक संगीत सभाओं को समा कहा जाता है।

(4) मानवता से प्रेम-मानवता की सेवा करना सूफ़ी अपना परम कर्त्तव्य मानते हैं। इससे संबंधित वे मनुष्यों के बीच किसी जाति-पाति, रंग या नस्ल आदि का भेदभाव नहीं करते। उनके अनुसार सभी मनुष्य एक ही अल्लाह की संतान हैं। इसलिए उनके बीच किसी प्रकार का भेदभाव करना उस सर्वोच्च अल्लाह का अपमान करना है।

प्रश्न 25.
इल सिना कौन था ? वह क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
इब्न सिना मध्य काल अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था। उसे यूरोप में एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था। उसका जन्म 980 ई० में बुखारा में हुआ था। उसका दर्शन यूनानी दर्शन से प्रभावित था। वह इस्लाम के इस सिद्धांत में विश्वास नहीं रखता था कि कयामत के दिन व्यक्ति फिर से जिंदा हो जाता है। इस कारण उसे कट्टर मुसलमानों के घोर विरोध का सामना करना पड़ा। इब्न सिना ने चिकित्सा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया। उसकी रचना अल-कानून-फिल-तिब विश्व में बहुत लोकप्रिय हुई।

इसमें चिकित्सा सिद्धांतों पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। इसमें इब्न सिना के प्रयोगों एवं अनुभवों की जानकारी दी गई है। इसमें 760 प्रमुख औषधियों का उल्लेख किया गया है। इसमें पानी से फैलने वाले संक्रामक रोगों का वर्णन किया गया है। इसमें जलवायु और पर्यावरण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों पर प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक का प्रयोग यूरोप में अनेक वर्षों तक एक प्रमाणिक पाठ्य-पुस्तक के रूप में किया जाता रहा है।

प्रश्न 26.
अल्बरुनी पर एक संक्षिप्त नोट लिखें।
उत्तर:
अल्बरुनी ग्यारहवीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। उसका जन्म 973 ई० में खीवा में हुआ था। उसने खगोल विज्ञान, गणित, भूगोल, दर्शन, इतिहास एवं धर्म का गहन अध्ययन किया था। जब महमूद गज़नवी ने 1017 ई० में खीवा पर विजय प्राप्त की तो अल्बरुनी को बंदी बना लिया गया।

अल्बरुनी को गज़नी लाया गया। उसकी प्रतिभा से प्रभावित होकर महमद गज़नवी ने उसे अपने दरबार का रत्न बनाया। वह महमद गज़नवी के भारतीय आक्रमणों के समय उसके साथ भारत आया। भारत में जो कुछ अपनी आँखों से देखा उसके आधार पर उसने एक बहुमूल्य पुस्तक तहकीक-मा-लिल हिंद की रचना की।

इसे तारीख-ए-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। इसे अरबी भाषा में लिखा गया था। यह 11वीं शताब्दी के भारतीय इतिहास को जानने के लिए हमारा एक विश्वसनीय एवं प्रामाणिक स्रोत है। उसके इस बहुमूल्य योगदान के कारण भारतीय इतिहास में उसे सदैव स्मरण किया जाता रहेगा।

प्रश्न 27.
रोमन साम्राज्य के वास्तुकलात्मक रूपों से इस्लामी वास्तुकलात्मक रूप कैसे भिन्न थे?
उत्तर:
(1) रोमन वास्तुकला-रोमन सम्राटों को वास्तुकला से विशेष लगाव था। उन्होंने विशाल संख्या में महलों, भवनों तथा कोलोसियमों का निर्माण किया था। इन भवनों के निर्माण के लिए पत्थरों, संगमरमर तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। इन भवनों को मेहराबों, विशाल गुम्बदों तथा गोलाकार छतों द्वारा सुंदर बनाया जाता था। उनके भवन यूनानी भवन निर्माण कला से प्रेरित थे।

(2) इस्लामी वास्तुकला-इस्लामी वास्तुकला ईरानी वास्तुकला से प्रेरित थी। इस्लामी शासकों ने विशाल संख्या में महलों, मस्जिदों तथा अन्य भवनों को निर्माण करवाया। उनके भवनों में पत्थरों, चट्टानों, संगमरमर तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। उनके भवनों को गुम्बदों, मीनारों, मेहराबों तथा स्तंभों से सुसज्जित किया जाता था। इन भवनों की दीवारों पर विभिन्न चित्र बनाए जाते थे।

प्रश्न 28.
धर्मयुद्ध किनके मध्य हुए? इनके लिए कौन-से कारण उत्तरदायी थे?
उत्तर:
धर्मयुद्ध यूरोपीय ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य हुए। इन धर्मयुद्धों के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे–

(1) जेरुसलम ईसाइयों के लिए बहुत पवित्र भूमि थी। इसका संबंध ईसा के क्रूसीकरण तथा पुनः जीवित होने से था। इस स्थान पर अरबों ने 638 ई० में अधिकार कर लिया था। ईसाई इसे सहन करने को तैयार नहीं थे।

(2) सल्जुक तुर्कों ने 1071 ई० में जेरुसलम पर अपना अधिकार कर लिया था। वे कट्टर सुन्नी मुसलमान थे। अतः वे अपने साम्राज्य में ईसाई धर्म की उन्नति को सहन नहीं कर सकते थे। अत: उन्होंने ईसाइयों पर घोर अत्याचार शुरू कर दिए।

(3) 1092 ई० में सल्जक सल्तान मलिक शाह की मत्य के पश्चात उसके साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया। बाइजेंटाइन सम्राट एलेक्सियस प्रथम ने यह स्वर्ण देखकर जेरुसलम पर अधिकार करने की योजना बनाई।

(4) पोप अर्बन द्वितीय ने 1095 ई० में फ्राँस के क्लेयरमांट नामक नगर में ईसाइयों को जेरुसलम की रक्षा के लिए समस्त ईसाइयों को धर्मयुद्ध में सम्मिलित होने की अपील की। इसका ईसाइयों पर जादुई प्रभाव पड़ा तथा वे युद्ध के लिए तैयार हो गए।

प्रश्न 29.
प्रथम धर्मयुद्ध पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ 1096 ई० में हुआ। पोप अर्बन द्वितीय के भाषण से उत्तेजित होकर लगभग 70 हज़ार धर्मयोद्धा पीटर दा हरमिट के नेतृत्व में जेरुसलम को मुसलमानों से मुक्त कराने के लिए चल पड़े। सम्राट आलेक्सियस प्रथम ने उन्हें धैर्य से काम लेने तथा सैनिकों के वहाँ पहुँचने तक इंतज़ार करने के लिए कहा। किंतु इन धर्मयोद्धाओं ने जो धार्मिक जोश से प्रेरित थे, इस परामर्श को ठुकरा दिया। इन धर्मयोद्धाओं ने कुंस्तुनतुनिया पर आक्रमण कर वहाँ लूटमार आरंभ कर दी।

तुर्क मुसलमानों ने जो कि अत्यधिक संगठित थे, ने अधिकाँश धर्मयोद्धाओं को मौत के घाट उतार दिया। इस घटना से धर्मयोद्धाओं के प्रोत्साहन में कोई कमी नहीं आई। फ्राँस, जर्मनी एवं इटली के शासकों ने एक विशाल सेना गॉडफ्रे के नेतृत्व में जेरुसलम की ओर रवाना की। इन सैनिकों ने एडेस्सा एवं एंटीओक पर अधिकार कर लिया। उन्होंने 15 जुलाई, 1099 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया। निस्संदेह यह उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण सफलता थी। जेरुसलम पर अधिकार करने के पश्चात् धर्मयोद्धाओं ने बड़ी संख्या में मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके साथ ही प्रथम धर्मयुद्ध का अंत हो गया।

प्रश्न 30.
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
यूरोप एवं एशिया पर धर्मयुद्धों के निम्नलिखित प्रभाव पड़े

(1) धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा काफी बढ़ गई। जर्मनी, फ्राँस, इंग्लैंड एवं हंगरी आदि के शासक पोप के निर्देशों का पालन करने के लिए सदैव तैयार रहते थे। परिणामस्वरूप दो शताब्दियों तक पोप ने यूरोप की राजनीति में प्रमुख भूमिका निभाई।

(2) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों की शक्ति का पतन हुआ एवं राजाओं की शक्ति में वृद्धि हुई।

(3) धर्मयुद्धों के सफल संचालन के लिए लोगों ने दिल खोल कर चर्च को दान दिए। इस कारण चर्चों के पास अपार दौलत एकत्र हो गई। इस धन के चलते धीरे-धीरे चर्चों में भ्रष्टाचार फैल गया।

(4) धर्मयुद्धों के दौरान मुसलमानों एवं ईसाइयों ने एक-दूसरे के क्षेत्रों में भारी लूटमार की। इससे दोनों समुदायों के मध्य नफ़रत की भावना फैली।

(5) धर्मयुद्धों में यूरोपीय स्त्रियों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कारण उनकी स्थिति में सुधार आया एवं उनका दृष्टिकोण विशाल हुआ।

(6) धर्मयुद्धों के कारण सामंतों के प्रभाव में कमी आई। इससे लोगों को उनके अत्याचारों से राहत मिली।

(7) धर्मयुद्धों के कारण यूरोपियों के ज्ञान में बहुत वृद्धि हुई। वे मुस्लिम नगरों एवं विज्ञान के क्षेत्रों में हुई प्रगति को देखकर चकित रह गए।

अति संक्षिप्त उत्तरों वाले प्रश्न

प्रश्न 1.
इग्नाज़ गोल्डजिहर (Ignaz Goldziher) कौन था ?
उत्तर:

  • वह हंगरी का एक यहूदी था।
  • उसने काहिरा के इस्लामी कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की थी।
  • उसने जर्मन भाषा में इस्लाम से संबंधित अनेक पुस्तकों की रचना की।

प्रश्न 2.
सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं ?
उत्तर:

  • वे खानाबदोश जीवन व्यतीत करते थे।
  • वे लूटमार करते थे एवं आपस में झगड़ते रहते थे।
  • ऊँट उनका प्रमुख साथी था एवं खजूर उनका प्रमुख खाद्य पदार्थ था।

प्रश्न 3.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब समाज की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उस समय अरब के अधिकाँश लोग अनपढ थे।
  • उस समय अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था।

प्रश्न 4.
सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब परिवार कैसे थे ?
उत्तर:

  • उस समय सयुक्त परिवार प्रणाली प्रचलित थी।
  • उस समय परिवार पितृतंत्रात्मक होते थे।
  • परिवार में पुत्र का होना आवश्यक माना जाता था।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 5.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। कैसे ?
उत्तर:

  • अधिकाँश लड़कियों को जन्म लेते ही मार दिया जाता था।
  • स्त्रियों को लगभग सभी अधिकारों से वंचित रखा जाता था।
  • उन्हें केवल एक भोगविलास की वस्तु समझा जाता था।

प्रश्न 6.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरब समाज में अनैतिकता का बोलबाला था। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ?
उत्तर:

  • उस समय लूटमार करना एवं धोखा देना एक सामान्य बात थी।
  • उस समय शराब पीने एवं जुआ खेलने का प्रचलन बहुत था।
  • स्त्रियों के साथ अनैतिक संबंध स्थापित करना एक गर्व की बात मानी जाती थी।

प्रश्न 7.
सातवीं शताब्दी ई० में दासों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था ?
उत्तर:

  • उस समय दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था।
  • उन पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे।

प्रश्न 8.
सातवीं शताब्दी ई० में अरबों के आर्थिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उस समय अरबों का आर्थिक जीवन बहुत पिछड़ा हुआ था।
  • यहाँ की जनसंख्या बहुत विरल थी।

प्रश्न 9.
अरबों के जीवन में खजूर का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • यह अरब लोगों का प्रमुख खाद्य पदार्थ है।
  • इसका पेय बहुत स्वास्थ्यवर्धक माना जाता है।
  • इसकी गुठली ऊँट का प्रमुख भोजन है।

प्रश्न 10.
अरबों के जीवन में ऊँट को क्यों महत्त्वपूर्ण माना जाता है ?
उत्तर:

  • ऊँटों को रेगिस्तान का जहाज़ कहा जाता है।
  • वह बदू लोगों के यातायात का प्रमुख साधन है।
  • इसका माँस खाया जाता है, दूध पीया जाता है एवं खालों का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 11.
सातवीं शताब्दी ई० में अरबों का व्यापार उन्नत क्यों न था ? कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय अरब में अराजकता का वातावरण था।
  • उस समय उद्योगों का विकास नहीं हुआ था।

प्रश्न 12.
पैगंबर मुहम्मद के जन्म से पूर्व अरबों के धार्मिक जीवन की दो प्रमुख विशेषताएँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उस समय लोग एक अल्लाह की अपेक्षा अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे।
  • लोग एक-दूसरे के देवी-देवता से घृणा करते थे।

प्रश्न 13.
अरब कबीलों की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • प्रत्येक कबीला राजनीतिक दृष्टि से स्वतंत्र होता था।
  • प्रत्येक कबीले का मुखिया शेख़ कहलाता था।

प्रश्न 14.
इस्लाम का संस्थापक किसे माना जाता है ? उनका जन्म कब और कहाँ हुआ ?
अथवा
हज़रत मुहम्मद साहिब का जन्म कब और कहाँ हुआ था ?
उत्तर:

  • इस्लाम का संस्थापक पैगंबर मुहम्मद को माना जाता है।
  • उनका जन्म 29 अगस्त, 570 ई० को मक्का में हुआ था।

प्रश्न 15.
पैगंबर मुहम्मद का संबंध किस कबीले से था तथा यह कबीला कहाँ रहता था?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद का संबंध कुरैश कबीले से था।
  • यह कबीला मक्का में रहता था।

प्रश्न 16.
खदीजा कौन थी ? पैगंबर मुहम्मद का उससे विवाह कब हुआ ?
उत्तर:

  • खदीज़ा मक्का की एक धनी विधवा थी।
  • पैगंबर मुहम्मद का उससे 595 ई० में विवाह हुआ।

प्रश्न 17.
पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) कहाँ प्राप्त हुआ था ? उस समय उनकी आयु क्या थी ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद को इलहाम (ज्ञान) मक्का में स्थित हीरा नामक एक गुफ़ा में प्राप्त हुआ।
  • उस समय उनकी आयु 40 वर्ष की थी।

प्रश्न 18.
उस महादूत का नाम बताओ जिसने पैगंबर मुहम्मद को अल्लाह का संदेश दिया था। उस रात को इस्लाम में किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:

  • उस महादूत का नाम जिबरील था जिसने पैगंबर मुहम्मद को अल्लाह का संदेश दिया था।
  • उस रात को इस्लाम में ‘शक्ति की रात’ कहा जाता है।

प्रश्न 19.
पैगंबर मुहम्मद ने किस धर्म की स्थापना की? इस धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम लिखिए।
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद ने इस्लाम धर्म की स्थापना की।
  • इस धर्म की पवित्र पुस्तक का नाम कुरान है।

प्रश्न 20.
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश कहाँ और कब दिया ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश मक्का में 612 ई० में दिया।

प्रश्न 21.
उम्मा (Umma) से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद द्वारा स्थापित समाज को उम्मा का नाम दिया गया।
  • इसमें सभी को एक समान अधिकार प्राप्त थे।
  • इसमें लोग धर्म द्वारा एक दूसरे से जुड़े हुए थे।

प्रश्न 22.
मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विरुद्ध क्यों हुए ? कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद मूर्ति पूजा के कटु आलोचक थे।
  • रूढ़िवादी पैगंबर मुहम्मद की शिक्षाओं को पसंद नहीं करते थे।

प्रश्न 23.
पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना कब पहुँचे ? इस घटना को इस्लाम में किस नाम से जाना जाता है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना 2 जुलाई, 622 ई० को पहुँचे।
  • इस घटना को इस्लाम में हिज़रत के नाम से जाना जाता है।

प्रश्न 24.
हिज़रत से क्या अभिप्राय है ? इस्लाम में इसका क्या महत्त्व है ?
अथवा
हिज़रत से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद द्वारा मक्का से मदीना जाने की घटना को हिज़रत कहा जाता है। यह घटना 622 ई० में हुई।
  • इस वर्ष मुस्लिम कैलेंडर लागू हुआ।

प्रश्न 25.
बद्र की लड़ाई कब एवं किसके मध्य हुई ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • बद्र की लड़ाई 13 मार्च, 624 ई० को पैगंबर मुहम्मद एवं कुरैशों के मध्य हुई।
  • इसमें पैगंबर मुहम्मद विजयी रहे।

प्रश्न 26.
पैगंबर मुहम्मद ने मक्का पर कब विजय प्राप्त की ? इस विजय का क्या महत्त्व है ?
उत्तर:

  • पैगंबर मुहम्मद ने मक्का पर 1 जनवरी, 630 ई० में विजय प्राप्त की।
  • इस शानदार विजय से पैगंबर मुहम्मद की प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हुई।

प्रश्न 27.
इस्लाम धर्म के संस्थापक कौन थे ? उनकी दो शिक्षाएँ बताइए।
उत्तर:

  • इस्लाम धर्म के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद थे।
  • अल्लाह एक है। वह सर्वोच्च है।
  • लोगों को सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए।

प्रश्न 28.
इस्लाम के कोई दो स्तंभ बताएँ।
उत्तर:

  • प्रत्येक मुसलमान को एक दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़नी चाहिए।
  • प्रत्येक मुसलमान को अपने जीवन काल में एक बार हज की यात्रा करनी चाहिए।

प्रश्न 29.
इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ का क्या नाम है ? यह किस भाषा में है ?
अथवा
कुरान क्या है?
उत्तर:

  • इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ का नाम कुरान है।
  • यह अरबी भाषा में है।

प्रश्न 30.
पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कब और कहाँ हुई ?
उत्तर:
पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु 8 जून, 632 ई० को मदीना में हुई।

प्रश्न 31
उलेमा से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
उलेमा मुसलमानों के धार्मिक विद्वान् थे। वे अपना समय कुरान पर टीका लिखने और मुहम्मद की प्रामाणिक उक्तियों को लेखबद्ध करने में लगाते थे। वे लोगों को शरीआ के अनुसार जीवन व्यतीत करने के लिए प्रेरित करते थे।

प्रश्न 32.
खलीफा किसे कहा जाता था ?
उत्तर:
खलीफ़ा हज़रत मुहम्मद साहिब के उत्तराधिकारियों को कहा जाता था। उनका प्रमुख कार्य इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना था।

प्रश्न 33.
पहले चार खलीफ़ाओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
पहले चार खलीफ़ाओं के नाम अबू बकर, उमर, उथमान एवं अली थे।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 34.
मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा अबू बकर था ।
  • उसका शासनकाल 632 ई० से 634 ई० तक था।

प्रश्न 35.
अबू बकर की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने नकली पैगंबरों के विद्रोहों का दमन किया।
  • उसने सीरिया, इराक, ईरान एवं बाइजेंटाइन साम्राज्य पर विजय प्राप्त की।

प्रश्न 36.
मुसलमानों का दूसरा खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • मुसलमानों का दूसरा खलीफ़ा उमर था।
  • उसका शासनकाल 634 ई० से 644 ई० तक था।

प्रश्न 37.
खलीफ़ा उमर की कोई दो महत्त्वपूर्ण सफलताएँ लिखें।
उत्तर:

  • उसने ससानी साम्राज्य एवं बाइजेंटाइन साम्राज्य पर महत्त्वपूर्ण विजयें प्राप्त की।
  • उसने एक कुशल प्रशासन की स्थापना की।

प्रश्न 38.
हिजरी सन् से आपका क्या अभिप्राय है?
अथवा
इस्लामी पंचांग का वर्णन कीजिए।
अथवा
इस्लामी कैलेंडर के बारे में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
हिजरी सन् की स्थापना खलीफ़ा उमर ने की थी। इसका प्रथम वर्ष 622 ई० में पड़ता है। हिजरी सन् की तारीख को जब अंग्रेज़ी में लिखा जाता है तो वर्ष के बाद ए० एच० लगाया जाता है। हिज़री वर्ष चंद्र वर्ष है तथा यह 354 दिनों का होता है।

प्रश्न 39.
जकात से क्या अभिप्राय है ?
अथवा
जज़िया क्या था ?
अथवा
जकात एवं जज़िया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:

  • जकात एक धार्मिक कर था जो मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था। यह उनकी आय का 212% होता था।
  • जज़िया एक कर था जो गैर-मुसलमानों पर लगाया जाता था। इसके बदले सरकार उन्हें उनकी संपत्ति एवं जीवन की सुरक्षा का वचन देती थी।

प्रश्न 40. धिम्मीस कौन थे ?
उत्तर:
धिम्मीस वे संरक्षित लोग थे जिन्हें अपनी संपत्ति एवं जीवन की सुरक्षा के लिए सरकार को जजिया कर देना पड़ता था।

प्रश्न 41.
खलीफ़ा उथमान की हत्या कब और क्यों की गई ?
उत्तर:

  • खलीफ़ा उथमान की हत्या 17 जून, 656 ई० में की गई।
  • इसका कारण यह था कि उसने अपने निकट संबंधियों को राज्य के उच्च पदों पर नियुक्त कर दिया था।

प्रश्न 42.
ऊँटों की लड़ाई कब एवं किनके मध्य हुई ? इसमें कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • ऊँटों की लड़ाई 9 दिसंबर, 656 ई० को खलीफ़ा अली एवं पैगंबर मुहम्मद की पत्नी आयशा (Aishah) के मध्य हुई।
  • इसमें विजय अली की हुई।

प्रश्न 43.
उमय्यद वंश का संस्थापक कौन था ? इस वंश का शासनकाल बताएँ।
उत्तर:

  • उमय्यद वंश का संस्थापक मुआविया था।
  • इस वंश ने 661 ई० से 750 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 44.
उमय्यद वंश के संस्थापक का नाम एवं उसका शासनकाल बताएँ।
उत्तर:

  • उमय्यद वंश के संस्थापक का नाम मुआविया था।
  • उसने 661 ई० से 680 ई० तक शासन किया।

प्रश्न 45.
मुआविया की दो प्रमुख उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने बाइजेंटाइन साम्राज्य की राजदरबारी रस्मों एवं प्रशासनिक संस्थाओं को अपनाया।
  • उसने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से अनेक पग उठाए।

प्रश्न 46.
उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा अब्द-अल-मलिक था।
  • उसका शासनकाल 685 ई० से 705 ई० तक था।

प्रश्न 47.
अब्द-अल-मलिक की दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने अरबी को प्रशासन की भाषा बनाया।
  • उसने इस्लामी सिक्के जारी किए।

प्रश्न 48.
अब्द-अल-मलिक द्वारा जारी सिक्कों की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • इन सिक्कों पर अरबी भाषा अंकित थी।
  • इन सिक्कों पर अब्द-अल-मलिक का नाम एवं उसकी तस्वीर अंकित थी।

प्रश्न 49.
डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण किसने तथा कहाँ किया था ?
उत्तर:
डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण अब्द-अल-मलिक द्वारा जेरुसलम में किया गया।

प्रश्न 50.
उमय्यद वंश के पतन के लिए जिम्मेवार कोई दो कारण बताएँ।
उत्तर:

  • अधिकाँश उमय्यद खलीफ़े विलासप्रिय थे। अतः उन्होंने प्रशासन की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
  • उनके अधिकारी स्वार्थी हितों में अधिक व्यस्त रहते थे ।

प्रश्न 51.
अब्बासी क्राँति से आपका क्या तात्पर्य है ?
अथवा
अब्बासी क्राँति से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अब्बासी क्राँति से हमारा तात्पर्य उस क्राँति से है जिसके अधीन अबू मुस्लिम ने खुरासान से दवा नामक आंदोलन आरंभ किया। इस क्राँति ने 750 ई० में उमय्यद वंश का अंत कर दिया एवं अब्बासी वंश की स्थापना की।

प्रश्न 52.
अब्बासी वंश की स्थापना किसने तथा कब की ?
उत्तर:
अब्बासी वंश की स्थापना 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने की थी।

प्रश्न 53.
खलीफ़ा अल-मंसूर की कोई दो महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ बताएँ।
उत्तर:

  • उसने बग़दाद को अब्बासी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया।
  • उसने कला एवं शिक्षा को प्रोत्साहित किया।

प्रश्न 54.
खलीफ़ा अल-महदी का शासनकाल क्या था ? उसका शासनकाल किस लिए प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • खलीफ़ा अल-महदी का शासनकाल 775 ई० से 785 ई० था।
  • उसका शासनकाल लोक भलाई कार्यों के लिए प्रसिद्ध था।

प्रश्न 55.
अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद था ।
  • उसका शासनकाल 786 ई० से 809 ई० तक था।

प्रश्न 56.
खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद की दो प्रमुख उपलब्धियाँ क्या थी ?
उत्तर:

  • उलने अफ्रीका के गवर्नर याहिया-बिन-अब्दुल्ला के विद्रोह का दमन किया।
  • उसने शक्तिशाली फ्रैंक शासक शॉर्लमेन (Charlemagne) से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित किए।

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

प्रश्न 57.
खलीफ़ा अल-मामुन का शासनकाल क्या था ? उसकी कोई एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताएँ।
उत्तर:

  • खलीफ़ा अल-मामुन ने 813 ई० से 833 ई० तक शासन किया।
  • उसने सभी धर्मों के प्रति सहनशीलता की नीति अपनाई।

प्रश्न 58.
अब्बासी वंश के पतन के दो प्रमुख कारण लिखें।
उत्तर:

  • अल-मामुन के सभी उत्तराधिकारी अयोग्य एवं निकम्मे निकले।
  • अब्बासी साम्राज्य के गुटों में चलने वाले लगातार संघर्षों ने इसके पतन की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया।

प्रश्न 59.
फ़ातिमी वंश का संस्थापक कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • फ़ातिमी वंश का संस्थापक अल-महदी था।
  • उसका शासनकाल 909 ई० से 934 ई० तक था।

प्रश्न 60.
गज़नवी वंश का संस्थापक कौन था ? उसने इस वंश की स्थापना कब तथा कहाँ की थी ?
उत्तर:

  • गज़नवी वंश का संस्थापक अल्पतिगीन था।
  • उसने इस वंश की स्थापना 962 ई० में गज़नी में की थी।

प्रश्न 61.
गज़नवी वंश का सबसे महान् सुल्तान कौन था ? उसका शासनकाल क्या था ?
उत्तर:

  • गज़नवी वंश का सबसे महान् सुल्तान महमूद गज़नी था।
  • उसने 998 ई० से 1030 ई० तक शासन किया

प्रश्न 62.
सल्जुक वंश की स्थापना किसने तथा कब की थी ?
उत्तर:
सल्जुक वंश की स्थापना तुग़रिल बेग एवं उसके भाई छागरी बेग ने 1037 ई० में की थी।

प्रश्न 63.
मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य की अर्थव्यवस्था की कोई दो विशेषताएँ बताएँ।
उत्तर:

  • उस समय के लोगों का प्रमुख व्यवसाय कृषि था।
  • इस काल में वाणिज्य एवं व्यापार का अभूतपूर्व विकास हुआ।

प्रश्न 64.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों की कृषि की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • कृषि भूमि पर राज्य का सर्वोपरि नियंत्रण होता था।
  • सरकार द्वारा कृषि को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से किसानों को विशेष सहूलतें दी जाती थीं।

प्रश्न 65.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में स्थित किन्हीं चार प्रसिद्ध उद्योगों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • कागज़ उद्योग
  • आभूषण उद्योग
  • रेशम उद्योग
  • चमड़ा उद्योग।

प्रश्न 66.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों द्वारा विदेशों को निर्यात की जाने वाली किन्हीं चार वस्तुओं के नाम लिखें।
उत्तर:

  • कागज़
  • चीनी
  • खजूर
  • बारूद।

प्रश्न 67.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों द्वारा विदेशों से आयात की जाने वाली किन्हीं चार वस्तुओं के नाम लिखें।
उत्तर:

  • रेशम
  • चाय
  • गर्म मसाले
  • सोना।

प्रश्न 68.
मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य में नए शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य क्या था ? इन शहरों को किस नाम से जाना जाता था ?
उत्तर:

  • मध्यकाल में इस्लामी साम्राज्य में नए शहरों की स्थापना का मुख्य उद्देश्य अरब सैनिकों को बसाना था।
  • इन शहरों को मिस्र के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 69.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में अस्तित्व में आए चार नए शहरों के नाम बताएँ।
उत्तर:

  • कुफा
  • बसरा
  • काहिरा
  • बग़दाद।

प्रश्न 70.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों के शहरीकरण की कोई दो विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • इन शहरों के केंद्र में एक विशाल एवं भव्य मस्जिद का निर्माण किया जाता था।
  • प्रत्येक शहर में एक केंद्रीय मंडी एवं अन्य छोटी मंडियों का निर्माण किया जाता था।

प्रश्न 71.
सिनेगोग से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
सिनेगोग यहूदियों के प्रार्थना घर को कहा जाता था।

प्रश्न 72.
अरबों, ईरानियों व तुर्कों द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृति के उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
(i) अरब साम्राज्य में मुस्लिम, ईसाई एवं यहूदी धर्म के लोग रहते थे।
(ii) ईरानी साम्राज्य में मुस्लिम तथा एशियाई संस्कृतियों का विकास हुआ।
(iii) तुर्की साम्राज्य में मिस्री, इरानी, सीरियाई तथा भारतीय संस्कृतियों का विकास हुआ।

प्रश्न 73.
सूफ़ी कौन थे? उनकी दो शिक्षाएँ लिखें।
उत्तर:

  • सूफ़ी इस्लाम से संबंधित एक संप्रदाय था।
  • अल्लाह एक है। वह सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिशाली है।
  • सूफी मत में पीर को विशेष महत्त्व दिया जाता है। वह अपने शिष्यों को अंधकार से ज्योति की ओर ले जाता है।

प्रश्न 74.
राबिया कौन थी ?
उत्तर:

  • वह सूफ़ी मत से संबंधित प्रथम प्रसिद्ध महिला संत थी।
  • वह बसरा की रहने वाली थी।
  • उसने अल्लाह की प्रशंसा में अनेक छोटी कविताएँ लिखीं।

प्रश्न 75.
बयाज़िद बिस्तामी क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह ईरान का एक प्रसिद्ध सूफ़ी संत था।
  • उसके समकालीन प्रसिद्ध सूफी संतों के साथ गहरे संबंध थे।
  • उसने फ़ना (खुदा में लीन) का उपदेश दिया।

प्रश्न 76.
धुलनुन मिस्त्री कौन था ?
उत्तर:

  • वह मिस्र का एक प्रसिद्ध सूफी संत था।
  • उसने लोगों को मानवता के साथ प्रेम का संदेश दिया।
  • उसकी 861 ई० में मिस्र में मृत्यु हो गई।

प्रश्न 77.
इब्न सिना कौन था ?
उत्तर:

  • वह मध्यकाल में अरब का एक महान् दार्शनिक एवं चिकित्सक था।
  • उसने अल-कानून-फिल-तिब नामक प्रसिद्ध चिकित्सक ग्रंथ लिखा।
  • उसे यूरोप में एविसेन्ना के नाम से जाना जाता था।

प्रश्न 78.
अबू नुवास क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद का प्रसिद्ध दरबारी कवि था।
  • उसने दरबारी जीवन पर अनेक कविताएँ लिखीं।
  • उसने शराब एवं प्रेम जैसे अनेक इस्लाम में प्रतिबंधित विषयों को छुआ।

प्रश्न 79.
रुदकी कौन था ?
उत्तर:

  • वह समानी दरबार का एक महान् कवि था।
  • उसे नयी फ़ारसी कविता का जनक माना जाता है।
  • उसने अनेक गज़लें एवं रुबाइयाँ लिखीं।

प्रश्न 80.
उमर खय्याम क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:

  • वह अरब का एक महान् कवि, खगोल वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ था।
  • उसने फ़ारसी में अनेक उच्च कोटि की रुबाइयाँ लिखीं।
  • उसने रिसाला नामक ग्रंथ की रचना की।

प्रश्न 81.
फिरदौसी कौन था? उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:

  • वह महमूद गजनवी का प्रसिद्ध दरबारी कवि था।
  • उसने फ़ारसी में प्रसिद्ध ग्रंथ शाहनामा की रचना की।

प्रश्न 82.
कलीला व दिमना क्या है ?
उत्तर:
कलीला व दिमना एक पुस्तक का नाम है। इसमें जानवरों की कहानियों का संग्रह है। इब्न-अल मुक्फ्फा ने इस पुस्तक का पहलवी से अरबी में अनुवाद किया। यह मूल रूप से संस्कृत की प्रसिद्ध पुस्तक पंचतंत्र का अनुवाद है।

प्रश्न 83.
‘एक हजार एक रातें’ क्या है ?
उत्तर:
यह अनेक प्रसिद्ध कहानियों का संग्रह है। इसे अरबी रातें के नाम से भी जाना जाता है। इन कहानियों को शहरजाद द्वारा अपने पति को सुनाया गया था। इन कहानियों का उद्देश्य मनोरंजन एवं शिक्षा देना था।

प्रश्न 84.
अल-जहीज कौन था ?
उत्तर:
वह बसरा का एक प्रसिद्ध लेखक था। वह यूनानी दर्शन से बहुत प्रभावित था। उसने किताब-अल बुखाला एवं किताब-अल-हैवान नामक प्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। इनमें कंजूसों एवं जानवरों की कहानियाँ दी गई हैं।

प्रश्न 85.
ताबरी क्यों प्रसिद्ध था ?
उत्तर:
वह अरब का एक महान इतिहासकार था। उसने तारीख-अल-रसल-वल मलक नामक प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की। इसमें संसार के आरंभ से लेकर 915 ई. तक के इतिहास का वर्णन किया गया है। इसे एक प्रामाणिक एवं विश्वसनीय ग्रंथ माना जाता है। इसका अंग्रेजी में 38 खंडों में अनुवाद किया गया है।

प्रश्न 86.
अल्बरुनी कौन था? उसकी रचना का नाम लिखिए।
उत्तर:
वह 11वीं शताब्दी का एक महान् विद्वान् एवं इतिहासकार था। वह महमूद गजनवी का प्रसिद्ध दरबारी था। वह महमूद गज़नवी के साथ भारत आया था। उसने आँखों देखी घटनाओं के आधार पर तहकीक-मा-लिल हिंद नामक ग्रंथ की रचना की। इसे तारीख-ए-हिंद के नाम से भी जाना जाता है। यह 11वीं शताब्दी भारतीय इतिहास को जानने का एक प्रमुख स्रोत है।

प्रश्न 87.
मध्यकाल में इस्लामी प्रदेशों में बनाई गई मस्जिदों की कोई दो विशेषताएं बताएँ।
उत्तर:

  • प्रत्येक मस्जिद में एक खुला बरामदा होता था। यहाँ लोग नमाज पढ़ते थे।
  • प्रत्येक मस्जिद के साथ एक मीनार होती थी। यहाँ मुल्ला चढ़ कर बाँग देता था ताकि लोग नमाज़ के लिए एकत्र हो सकें।

प्रश्न 88.
धर्मयुद्ध किनके मध्य चले ? इन धर्मयुद्धों की संख्या कितनी थी ?
उत्तर:

  • धर्मयुद्ध ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य चले।
  • इन धर्मयुद्धों की संख्या 8 थी।

प्रश्न 89.
धर्मयों के कोई दो प्रमख कारण लिखें।
उत्तर:

  • अरबों ने 638 ई० में जेरुसलम पर अधिकार कर लिया था। ईसाई इसे सहन करने को तैयार नहीं
  • सल्जुक तुर्क जेरुसलम में रहने वाले ईसाइयों पर घोर अत्याचार कर रहे थे।

प्रश्न 90.
प्रथम धर्मयुद्ध कब से लेकर कब तक चला ? इस धर्मयुद्ध में कौन विजयी रहा ?
उत्तर:

  • प्रथम धर्मयुद्ध 1096 ई० से 1099 ई० तक चला।
  • इस धर्मयुद्ध में ईसाई विजयी रहे।

प्रश्न 91.
द्वितीय धर्मयद्ध कब आरंभ हआ ? यह कब तक चला ?
उत्तर:

  • द्वितीय धर्मयुद्ध 1147 ई० में आरंभ हुआ।
  • यह 1149 ई० तक चला।

प्रश्न 92.
तृतीय धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ ? इसमें सम्मिलित किन्हीं दो यूरोपीय शासकों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • तृतीय धर्मयुद्ध 1189 ई० में आरंभ हुआ।
  • इसमें सम्मिलित दो यूरोपीय शासकों के नाम जर्मनी का शासक फ्रेडरिक बारबरोसा एवं फ्रांस का शासक फिलिप ऑगस्ट्स था।

प्रश्न 93.
यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा ?
अथवा
धर्मयुद्धों के क्या परिणाम निकले ?
उत्तर:

  • धर्मयुद्धों के कारण पोप की प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि हुई।
  • इसने यूरोप में सामंतवाद के पतन की प्रक्रिया को तीव्र कर दिया।
  • धर्मयुद्धों के कारण ईसाइयों एवं मुसलमानों के संबंधों में कटुता आ गई।

रिका स्थान भरिए

1. अरब में इस्लाम का उदय …………….. ई० में हुआ।
उत्तर:
612

2. पैंगबर मुहम्मद का जन्म ……………. ई० में हुआ।
उत्तर:
570

3. पैगंबर मुहम्मद ने …………… के विस्तार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।
उत्तर:
इस्लाम

4. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु …………….. ई० में हुई।
उत्तर:
632

5. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् …………… संस्था का निर्माण हुआ।
उत्तर:
खिलाफ़त

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6. बाइजेंटाइन साम्राज्य …………….. धर्म को बढ़ावा देता था।
उत्तर:
ईसाई

7. ससानी साम्राज्य …………… धर्म को संरक्षण देता था।
उत्तर:
ज़रतुश्त

8. अरब साम्राज्य में गैर-मुस्लिम लोगों को …………….. तथा …………….. कर अदा करने पड़ते थे।
उत्तर:
खराज, जज़िया

9. अरब साम्राज्य में ‘ऊँटों की लड़ाई’ …………… ई० में हुई।
उत्तर:
656

10. अब्बासी क्रांति अरब में …………….. ई० में आई।
उत्तर:
750

11. अब्बासियों ने ……………. को अपनी राजधानी घोषित किया।
उत्तर:
बग़दाद

12. गज़नी सल्तनत की स्थापना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
अल्पतिगीन

13. खलीफ़ा अल-कायम ने ……………. को सुलतान की उपाधि प्रदान की।
उत्तर:
तुगरिल बेग

14. प्रथम धर्मयुद्ध का आरंभ …………….. ई० में हुआ।
उत्तर:
1096

15. ……………. ई० में तीसरे धर्मयुद्ध का आरंभ हुआ।
उत्तर:
1189

16. अरब साम्राज्य के लोगों का मुख्य व्यवसाय …………….. था।
उत्तर:
कृषि

17. बयाज़िद बिस्तामी सूफी संत …………….. का रहने वाला था।
उत्तर:
ईरान

18. शाहनामा नामक पुस्तक की रचना …………….. द्वारा की गई थी।
उत्तर:
फिरदौसी

19. बसरा के अल-जहीज ने …………….. पुस्तक की रचना की।
उत्तर:
किताब अल-बुखाला,

20. मंगोलों ने बगदाद पर ………….. ई० में अधिकार किया।
उत्तर:
1258

बह-विकल्पीय प्रश्न

1. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों की जानकारी का हमारा प्रमुख स्त्रोत क्या है ?
(क) तवारीख
(ख) कुरान
(ग) जीवनियाँ
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

2. प्रशासनिक इतिहास का बढ़िया स्त्रोत किसे माना जाता है ?
(क) पेपाइरस
(ख) सिक्के
(ग) शिलालेख
(घ) हदीथ।
उत्तर:
(क) पेपाइरस

3. इस्लाम के उदय से पूर्व अरबों के धार्मिक जीवन की प्रमुख विशेषता क्या थी ?
(क) अरब अनेक देवी-देवताओं की उपासना करते थे
(ख) अरब मूर्तियों की उपासना करते थे ।
(ग) अरबों की तीन प्रमुख देवियां अल-उज्जा, अल-लत एवं अल-मना थीं
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

4. अरब में कबीले का मुखिया क्या कहलाता था ?
(क) शेख
(ख) मवाली
(ग) उम्मा
(घ) मुरव्वा।
उत्तर:
(क) शेख

5. अरब में किन लोगों की प्रमुखता थी ?
(क) कुरैश
(ख) बदू
(ग) मुसलमान
(घ) मवाली।
उत्तर:
(ख) बदू

6. इस्लाम का संस्थापक कौन था ?
(क) पैगंबर मुहम्मद
(ख) अबू बकर
(ग) चंगेज़ खाँ
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद

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7. इस्लाम की स्थापना कब की गई थी ?
(क) 7वीं शताब्दी में
(ख) 8वीं शताब्दी में
(ग) 9वीं शताब्दी में
(घ) 10वीं शताब्दी में।
उत्तर:
(क) 7वीं शताब्दी में

8. पैगंबर मुहम्मद का जन्म कब हुआ था ?
(क) 570 ई० पू० में
(ख) 570 ई० में
(ग) 610 ई० में
(घ) 612 ई० में।
उत्तर:
(ख) 570 ई० में

9. पैगंबर मुहम्मद का जन्म कहाँ हुआ था ?
(क) मदीना में
(ख) मक्का में
(ग) कुफा में
(घ) दमिश्क में।
उत्तर:
(ख) मक्का में

10. पैगंबर मुहम्मद का संबंध किस कबीले से था ?
(क) हाशिम
(ख) अब्बास
(ग) कुरैश
(घ) उमय्यद।
उत्तर:
(क) हाशिम

11. पैगंबर मुहम्मद को जब इलहाम प्राप्त हुआ तो उस समय उनकी आयु क्या थी ?
(क) 30 वर्ष
(ख) 35 वर्ष
(ग) 40 वर्ष
(घ) 42 वर्ष।
उत्तर:
(ग) 40 वर्ष

12. मुहम्मद साहिब ने अपने पैगंबर होने की घोषणा कब की ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रचार कार्य कब आरंभ किया ?
(क) 610 ई० में
(ख) 612 ई० में
(ग) 615 ई० में
(घ) 622 ई० में।
उत्तर:
(ख) 612 ई० में

13. पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रथम प्रवचन कहाँ किया ?
(क) मक्का में
(ख) मदीना में
(ग) ईरान में
(घ) बद्र में।
उत्तर:
(क) मक्का में

14. इस्लाम में किस घटना को हिजरत कहा जाता है ?
(क) जब पैगंबर मुहम्मद का जन्म हुआ
(ख) जब पैगंबर मुहम्मद को ज्ञान प्राप्त हुआ
(ग) जब पैगंबर मुहम्मद ने अपना प्रचार आरंभ किया
(घ) जब पैगंबर महम्मद मक्का से मदीना गए।
उत्तर:
(घ) जब पैगंबर महम्मद मक्का से मदीना गए।

15. पैगंबर मुहम्मद मक्का से मदीना कब गए ?
अथवा
पैगंबर मुहम्मद ने हिजरत कब की ?
(क) 612 ई० में
(ख) 615 ई० में
(ग) 622 ई० में
(घ) 632 ई० में।
उत्तर:
(ग) 622 ई० में

16. इस्लामी कैलेंडर की शुरुआत कब से हुई ?
(क) 622 ई० में
(ख) 632 ई० में
(ग) 570 ई० में
(घ) 612 ई० में।
उत्तर:
(क) 622 ई० में

17. बद्र की लड़ाई कब हुई थी ?
(क) 612 ई० में
(ख) 622 ई० में
(ग) 624 ई० में
(घ) 634 ई० में।
उत्तर:
(ग) 624 ई० में

18. पैगंबर महम्मद ने मक्का पर कब विजय प्राप्त की ?
(क) 627 ई० में
(ख) 628 ई० में
(ग) 630 ई० में
(घ) 635 ई० में।
उत्तर:
(ग) 630 ई० में

19. पैगंबर मुहम्मद ने किसे इस्लामी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया ?
(क) काबा को
(ख) मक्का को
(ग) मदीना को
(घ) जेरुसलम को।
उत्तर:
(ग) मदीना को

20. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कब हुई थी ?
(क) 612 ई० में
(ख) 622 ई० में
(ग) 632 ई० में
(घ) 637 ई० में।
उत्तर:
(ग) 632 ई० में

21. पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु कहाँ हुई थी ?
(क) ईरान में
(ख) मदीना में
(ग) मक्का में
(घ) सीरिया में।
उत्तर:
(ख) मदीना में

22. इस्लाम की धार्मिक पुस्तक है
(क) सुन्नत
(ख) हदीस
(ग) कुरान
(घ) कयास।
उत्तर:
(ग) कुरान

23. कुरान किस भाषा में लिखी गई थी ?
(क) उर्दू में
(ख) फ़ारसी में
(ग) अरबी में
(घ) अंग्रेजी में।
उत्तर:
(ग) अरबी में

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24. पैगंबर मुहम्मद के उपदेशों का संग्रह किस नाम से जाना जाता है ?
(क) कुरान
(ख) हदीस
(ग) सुन्नत
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(क) कुरान

25. पैगंबर मुहम्मद की शिक्षा थी
(क) अल्लाह एक है
(ख) मूर्ति पूजा मत करो
(ग) पवित्र जीवन व्यतीत करो
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

26. प्रत्येक मुसलमान के लिए एक दिन में कितनी बार नमाज पढ़ना आवश्यक है ?
(क) एक बार
(ख) दो बार
(ग) पाँच बार
(घ) सात बार।
उत्तर:
(ग) पाँच बार

27. खिलाफ़त का उद्देश्य क्या था ?
(क) इस्लाम की रक्षा एवं प्रसार करना
(ख) कबीलों पर नियंत्रण स्थापित करना
(ग) राज्य के लिए संसाधन जुटाना
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

28. मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कौन था ?
(क) अबू बकर
(ख) उमर
(ग) अली
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) अबू बकर

29. अबू बकर मुसलमानों का प्रथम खलीफ़ा कब नियुक्त हुआ था ?
(क) 622 ई० में
(ख) 632 ई० में
(ग) 634 ई० में
(घ) 642 ई० में।
उत्तर:
(ख) 632 ई० में

30. निम्नलिखित में से कौन-सा कर गैर-मुसलमानों से प्राप्त किया जाता था ?
(क) जकात
(ख) जज़िया
(ग) फे
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(ख) जज़िया

31. भिम्मीस से क्या अभिप्राय है ?
(क) ये संरक्षित लोग थे
(ख) ये जिला अधिकारी थे
(ग) ये भू-राजस्व अधिकारी थे
(घ) ये शासक वर्ग से संबंधित थे।
उत्तर:
(क) ये संरक्षित लोग थे

32. ऊँटों की लड़ाई कब हुई ?
(क) 644 ई० में
(ख) 645 ई० में
(ग) 656 ई० में
(घ) 657 ई० में।
उत्तर:
(ग) 656 ई० में

33. उमय्यद वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) अली
(ख) उथमान
(ग) मुआविया
(घ) अल मंसूर।
उत्तर:
(ग) मुआविया

34. निम्नलिखित में से किस खलीफ़ा ने दमिश्क को अपनी राजधानी बनाया ?
(क) मुआविया
(ख) अली
(ग) अब्द-अल-मलिक
(घ) याजिद।
उत्तर:
(क) मुआविया

35. उमय्यद वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ?
(क) मुआविया
(ख) अब्द-अल-मलिक
(ग) याजिद
(घ) सुलेमान।
उत्तर:
(ख) अब्द-अल-मलिक

36. उस खलीफ़ा का नाम बताएं जिसे ‘राजाओं का पिता’ कहा जाता था।
अथवा
उस खलीफ़ा का नाम बताएँ जिसने इस्लामी सिक्कों का प्रचलन किया।
(क) अब्द-अल-मलिक
(ख) अल मंसूर
(ग) अल महदी
(घ) उथमान।
उत्तर:
(क) अब्द-अल-मलिक

37. अब्द-अल-मलिक ने ‘डोम ऑफ़ दी रॉक’ नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण कहाँ करवाया था ?
(क) मदीना में
(ख) समारा में
(ग) जेरुसलम में
(घ) बग़दाद में।
उत्तर:
(ग) जेरुसलम में

38. अब्द-अल-मलिक के सिक्कों पर कौन-सी भाषा अंकित थी ?
(क) उर्दू
(ख) अरबी
(ग) फ़ारसी
(घ) पहलवी।
उत्तर:
(ख) अरबी

39. उमय्यद वंश का अंतिम खलीफ़ा कौन था ?
(क) मुआविया
(ख) अब्द-अल-मलिक
(ग) वालिद द्वितीय
(घ) मारवान द्वितीय।
उत्तर:
(घ) मारवान द्वितीय।

40. उमय्यद वंश के पतन के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा कारण उत्तरदायी था ?
(क) उमय्यद वंश के अधिकाँश खलीफे विलासप्रिय थे
(ख) उमय्यद वंश के अधिकारी स्वार्थी थे
(ग) शिया वंश के लोग उमय्यद शासन के कट्टर विरोधी थे
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

41. किस आंदोलन ने उमय्यद वंश को उखाड़ फेंका ?
(क) दवा
(ख) धर्मयुद्ध
(ग) जिहाद
(घ) मवाली।
उत्तर:
(क) दवा

42. अब्बासी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) अबू बकर
(ख) अली
(ग) मुआविया
(घ) अबू-अल-अब्बास।
उत्तर:
(घ) अबू-अल-अब्बास।

43. अब्बासी कौन थे ?
(क) पैगंबर मुहम्मद के चाचा अल-अब्बास के वंशज
(ख) पैगंबर मुहम्मद की पुत्री फ़ातिमा के वंशज
(ग) अबू बकर के वंशज
(घ) अब्बास नगर के निवासी।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद के चाचा अल-अब्बास के वंशज

44. अब्बासियों की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) बग़दाद
(ख) कुफा
(ग) मक्का
(घ) मदीना।
उत्तर:
(क) बग़दाद

45. अब्बासी वंश का सर्वाधिक प्रसिद्ध खलीफ़ा कौन था ?
(क) अबू-अल-अब्बास
(ख) हारुन-अल-रशीद
(ग) अल-अमीन
(घ) अल-मामुन।
उत्तर:
(ख) हारुन-अल-रशीद

46. किस मंगोल नेता ने 1258 ई० में बग़दाद पर कब्जा कर लिया था ?
(क) चंगेज़ खाँ ने
(ख) हुलेगू ने
(ग) अब्दुल्ला ने
(घ) कुबलई खाँ ने।
उत्तर:
(ख) हुलेगू ने

47. ताहिरी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) ताहिर
(ख) याकूब
(ग) तलहा
(घ) अल्पतिगीन।
उत्तर:
(क) ताहिर

48. तुलुनी वंश की स्थापना कहाँ हुई थी ?
(क) मिस्र में
(ख) खुरासान में
(ग) ट्रांसोक्सियाना में
(घ) समरकंद में।
उत्तर:
(क) मिस्र में

49. बुवाही वंश की स्थापना कहाँ की गई थी ?
(क) डेलाम में
(ख) काहिरा में
(ग) समरकंद में
(घ) फुस्तात में।
उत्तर:
(क) डेलाम में

HBSE 11th Class history Important Questions Chapter 4 इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई०

50. फ़ातिमी वंश की राजधानी का नाम क्या था ?
(क) बग़दाद
(ख) कुफा
(ग) काहिरा
(घ) दमिश्क।
उत्तर:
(ग) काहिरा

51. फ़ातिमा कौन थी ?
(क) पैगंबर मुहम्मद की बेटी
(ख) खलीफ़ा उमर की बेटी
(ग) फ़ातिमी वंश की संस्थापक
(घ) इनमें से कोई नहीं।
उत्तर:
(क) पैगंबर मुहम्मद की बेटी

52. गजनवी वंश का संस्थापक कौन था ?
(क) सुबकतिगीन
(ख) अल्पतिगीन
(ग) महमूद गज़नवी
(घ) अल्प अरसलन।
उत्तर:
(ख) अल्पतिगीन

53. सल्जुक तुर्कों ने किसे अपनी राजधानी घोषित किया था ?
(क) बग़दाद को
(ख) काहिरा को
(ग) निशापुर को
(घ) मक्का को।
उत्तर:
(ग) निशापुर को

54. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों के लोगों का मुख्य व्यवसाय क्या था ?
(क) कृषि
(ख) व्यापार
(ग) उद्योग
(घ) पशुपालन।
उत्तर:
(क) कृषि

55. अरब की सबसे प्रसिद्ध पैदावार क्या थी ?
(क) खजूर
(ख) कपास
(ग) चाय
(घ) पटसन।
उत्तर:
(क) खजूर

56. मध्यकाल में समरकंद किस उद्योग के लिए प्रसिद्ध था ?
(क) कागज़ उद्योग
(ख) आभूषण उद्योग
(ग) वस्त्र उद्योग
(घ) चमड़ा उद्योग।
उत्तर:
(क) कागज़ उद्योग

57. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में निम्नलिखित में से कौन-सा नगर व्यापार के लिए प्रसिद्ध था ?
(क) बगदाद
(ख) दमिश्क
(ग) अलेपो
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

58. बसरा शहर कहाँ स्थित है ?
(क) ईरान में
(ख) इराक में
(ग) मिस्र में
(घ) चीन में।
उत्तर:
(ख) इराक में

59. काहिरा शहर कहाँ स्थित है ?
(क) फ्राँस में
(ख) इराक में
(ग) इटली में
(घ) मिस्र में।
उत्तर:
(घ) मिस्र में।

60. केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों में किस प्रकार के सिक्के प्रचलित थे ?
(क) स्वर्ण
(ख) चाँदी
(ग) ताँबा
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(घ) उपरोक्त सभी।

61. केंद्रीय इस्लामी प्रदेश स्वर्ण कहाँ से प्राप्त करते थे ?
(क) एशिया से
(ख) अफ्रीका से
(ग) अमरीका से
(घ) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(ख) अफ्रीका से

62. गेनिज़ा अभिलेख कहाँ से प्राप्त हुए थे ?
(क) फुस्तात से
(ख) काहिरा से
(ग) बग़दाद से
(घ) समरकंद से।
उत्तर:
(क) फुस्तात से

63. राबिया कहाँ की प्रसिद्ध महिला संत थी ?
(क) कुफा की
(ख) बसरा की
(ग) बग़दाद की
(घ) समरकंद की।
उत्तर:
(ख) बसरा की

64. बयाजिद बिस्तामी का संबंध किस देश से था ?
(क) ईरान से
(ख) इराक से
(ग) स्पेन से
(घ) अफ़गानिस्तान से।
उत्तर:
(क) ईरान से

65. निम्नलिखित में से कौन काहिरा का प्रसिद्ध सूफी संत था ?
(क) बयाज़िद बिस्तामी
(ख) धुलनुन मिस्त्री
(ग) इन-अल-फ़रीद
(घ) मंसूर-अल-हल्लाज।
उत्तर:
(ग) इन-अल-फ़रीद

66. इब्न सिना को यूरोप में किस नाम से जाना जाता था ?
(क) ताबरी
(ख) बालाधुरी
(ग) एविसेन्ना
(घ) अबू नुवास।
उत्तर:
(ग) एविसेन्ना

67. उमर ख्य्याम का नाम क्यों प्रसिद्ध है ?
(क) नाटकों के लिए
(ख) कहानियों के लिए
(ग) गज़लों के लिए
(घ) रुबाइयों के लिए।
उत्तर:
(घ) रुबाइयों के लिए।

68. उमर खय्याम द्वारा लिखित पुस्तक का नाम क्या था ?
(क) शाहनामा
(ख) पंचतंत्र
(ग) एक हजार एक रातें
(घ) रिसाला।
उत्तर:
(घ) रिसाला।

69. शाहनामा का लेखक कौन था ?
(क) फिरदौसी
(ख) रुदकी
(ग) मसूदी
(घ) अल-जहीज।
उत्तर:
(क) फिरदौसी

70. ‘एक हजार एक रातें’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना किस भाषा में की गई थी ?
(क) फ़ारसी में
(ख) अरबी में
(ग) पहलवी में
(घ) उर्दू में।
उत्तर:
(क) फ़ारसी में

71. अल-जहीज़ कहाँ का प्रसिद्ध लेखक था ?
(क) काहिरा का
(ख) कुफा का
(ग) बग़दाद का
(घ) बसरा का।
उत्तर:
(घ) बसरा का।

72. अरब का महान् इतिहासकार किसे माना जाता है ?
(क) ताबरी को
(ख) अल्बरुनी को
(ग) मुकदसी को
(घ) अल-जहीज को।
उत्तर:
(क) ताबरी को

73. ताबरी की प्रसिद्ध रचना का नाम क्या है ?
(क) तहकीक मा लिल हिंद
(ख) तारीख अल-रसूल वल मुलक
(ग) किताब-अल-हैवान
(घ) अहसान-अल-तकसीम।
उत्तर:
(ख) तारीख अल-रसूल वल मुलक

74. ‘तहकीक-मा-लिल हिंद’ का लेखक कौन था ?
(क) अल्बरुनी
(ख) मसूदी
(ग) बालाधुरी
(घ) अल-जहीज।
उत्तर:
(क) अल्बरुनी

75. डोम ऑफ़ दी रॉक नामक प्रसिद्ध मस्जिद का निर्माण कहाँ किया गया था ?
(क) बगदाद में
(ख) काहिरा में
(ग) जेरुसलम में
(घ) कुफा में।
उत्तर:
(ग) जेरुसलम में

76. धर्मयुद्ध किनके मध्य हुए?
(क) यहूदियों एवं ईसाइयों के मध्य
(ख) ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य
(ग) पारसियों एवं मुसलमानों के मध्य
(घ) मुसलमानों एवं हिंदुओं के मध्य।
उत्तर:
(ख) ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य

77. किस स्थान को लेकर ईसाइयों एवं मुसलमानों के मध्य धर्मयुद्ध हुए ?
(क) बगदाद
(ख) मक्का
(ग) मदीना
(घ) जेरुसलम।
उत्तर:
(घ) जेरुसलम।

78. प्रथम धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ?
(क) 1095 ई० में
(ख) 1096 ई० में
(ग) 1097 ई० में
(घ) 1098 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1096 ई० में

79. प्रथम धर्मयुद्ध के दौरान निम्नलिखित में से किसकी पराजय हुई ?
(क) ईसाइयों की
(ख) मुसलमानों की
(ग) पारसियों की
(घ) यहूदियों की।
उत्तर:
(ख) मुसलमानों की

80. द्वितीय धर्मयुद्ध कब से लेकर कब तक चला?
(क) 1144 ई० से 1149 ई० तक
(ख) 1145 ई० से 1147 ई० तक
(ग) 1146 ई० से 1150 ई० तक
(घ) 1147 ई० से 1149 ई० तक।
उत्तर:
(घ) 1147 ई० से 1149 ई० तक।

81. सलादीन कहाँ का शासक था?
(क) मिस्र का
(ख) बग़दाद का
(ग) रोम का
(घ) फ्राँस का।
उत्तर:
(क) मिस्र का

82. तृतीय धर्मयुद्ध कब आरंभ हुआ था?
(क) 1187 ई० में
(ख) 1189 ई० में
(ग) 1191 ई० में
(घ) 1291 ई० में।
उत्तर:
(ख) 1189 ई० में

83. ईसाइयों एवं मुसलमानों में कुल कितने धर्मयुद्ध हुए थे?
(क) दो
(ख) तीन
(ग) चार
(घ) आठ।
उत्तर:
(घ) आठ।

इस्लाम का उदय और विस्तार : लगभग 570-1200 ई० HBSE 11th Class History Notes

→ सातवीं शताब्दी ई० में इस्लाम के उदय से पूर्व अरब सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक एवं धार्मिक क्षेत्रों में बहुत पिछड़ा हुआ था। अरब के बदू लोग खानाबदोशी जीवन व्यतीत करते थे। लूटमार करना एवं आपस में झगड़ना उनके लिए एक सामान्य बात थी।

→  समाज में स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। लोगों का नैतिक स्तर अपने न्यूनतम स्तर पर था।

→ समाज में दासों के साथ बहुत क्रूर व्यवहार किया जाता था। उस समय अरब में कृषि, उद्योग एवं व्यापार उन्नत न थे। अरब लोगों में मूर्ति पूजा का व्यापक प्रचलन था तथा वे अंध-विश्वासों में विश्वास रखते थे।

→ उस समय अरब लोग अनेक कबीलों में बँटे हुए थे। प्रत्येक कबीले का मुखिया एक शेख होता था। उसका चुनाव व्यक्तिगत साहस एवं बुद्धिमत्ता के आधार पर किया जाता था।

→ 570 ई० में इस्लाम के संस्थापक पैगंबर मुहम्मद का जन्म कुरैश कबीले में हुआ। माता-पिता की शीघ्र मृत्यु के कारण उनका बचपन अनेक कठिनाइयों में व्यतीत हुआ। 595 ई० में खदीजा के साथ उनका विवाह उनके जीवन में एक नया मोड़ प्रमाणित हुआ। 610 ई० में पैगंबर मुहम्मद को मक्का की हीरा नामक गुफ़ा में नया ज्ञान प्राप्त हुआ।

→ यह ज्ञान उन्हें महादूत जिबरील ने दिया। 612 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का में अपना प्रथम सार्वजनिक उपदेश दिया। इस अवसर पर उन्होंने एक नए समाज का गठन किया जिसे उम्मा का नाम दिया गया।

→ मक्का के लोग पैगंबर मुहम्मद के विचारों से सहमत न थे। अत: वे उसके दुश्मन बन गए। बाध्य होकर 622 ई० में पैगंबर मुहम्मद ने मक्का से मदीना को हिज़रत की। 630 ई० में उन्होंने मक्का पर विजय प्राप्त की। निस्संदेह यह उनके जीवन की एक महान् सफलता थी।

→ पैगंबर मुहम्मद ने लोगों को एक अल्लाह, आपसी भाईचारे, सादा एवं पवित्र जीवन व्यतीत करने एवं स्त्रियों का सम्मान करने का संदेश दिया। उनकी इन शिक्षाओं का लोगों के दिलों पर जादुई प्रभाव पड़ा एवं वे बड़ी संख्या में इस्लाम में सम्मिलित हुए। 632 ई० में पैगंबर मुहम्मद हमें सदैव के लिए अलविदा कह गए।

→ पैगंबर मुहम्मद की मृत्यु के पश्चात् खिलाफ़त संस्था का उदय हुआ। इसका प्रमुख उद्देश्य इस्लाम का प्रसार करना एवं कबीलों पर नियंत्रण रखना था। 632 ई० से लेकर 661 ई० के मध्य चार खलीफ़ों-अबू बकर, उमर, उथमान एवं अली ने शासन किया। इन खलीफ़ों ने इस्लाम के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

→ ये सभी खलीफ़े पैगंबर मुहम्मद के निकट संबंधी थे। 661 ई० में मुआविया ने उमय्यद वंश की स्थापना की। उसने दमिश्क को इस्लामी साम्राज्य की राजधानी घोषित किया। उमय्यद वंश का सबसे महान् खलीफ़ा अब्द-अल-मलिक था। उसने 685 ई० से 705 ई० तक शासन किया।

→ उसने इस्लामी सिक्के चलाए, अरबी को राज्य की भाषा घोषित किया एवं जेरुसलम में प्रसिद्ध डोम ऑफ़ दी रॉक नामक मस्जिद का निर्माण किया। उमय्यद वंश के शासकों ने 750 ई० तक

→ शासन किया। 750 ई० में अबू-अल-अब्बास ने अब्बासी वंश की स्थापना की। इस वंश के शासकों ने 1258 ई० तक शासन किया। हारुन-अल-रशीद (786-809 ई०) अब्बासी वंश का सबसे महान् खलीफ़ा प्रमाणित हुआ। 9वीं शताब्दी में अब्बासी साम्राज्य का विखंडन आरंभ हो गया था।

→ अतः अनेक सल्तनतों का उदय हुआ। इनमें ताहिरी वंश (820-873 ई०), समानी वंश (874-999 ई०), तुलुनी वंश (868-905 ई०), बुवाही वंश (932-1055 ई०), फ़ातिमी वंश (909-1171 ई०), गज़नवी वंश (962-1186 ई०) एवं सल्जुक वंश (1037-1300 ई०) के नाम उल्लेखनीय हैं।

→ मध्यकालीन इस्लामी देशों की अर्थव्यवस्था काफी प्रफुल्लित थी। इसका कारण यह था कि उन्होंने कृषि एवं उद्योग के क्षेत्र में काफी प्रगति कर ली थी। इस कारण उनके व्यापार को एक नई दिशा प्राप्त हुई। इस काल में सूफ़ी मत का उत्थान हुआ। राबिया, बयाज़िद बिस्तामी, धुलनुन मिस्त्री, मंसूर-अल-हल्लाज़ एवं इब्न-अल-फरीद सूफी मत के लोकप्रिय संत थे।

→ सूफ़ी मत की शिक्षाएँ अत्यंत साधारण थीं। अत: इनका लोगों पर जादुई प्रभाव पड़ा। इस काल में साहित्य के क्षेत्र में अद्वितीय प्रगति हुई। इब्न सिना, अबु नुवास, रुदकी, उमर खय्याम, फिरदौसी, इब्न अल-मुक्फ्फा , अल जहीज, बालाधुरी, ताबरी एवं मसूदी आदि लेखकों ने साहित्य के क्षेत्र में बहुमूल्य योगदान दिया।

→ 1096 ई० से 1272 ई० के मध्य ईसाइयों एवं मुसलमानों में 8 धर्मयुद्ध लड़े गए। इन धर्मयुद्धों का उद्देश्य ईसाइयों द्वारा अपनी पवित्र भूमि जेरुसलम को मुसलमानों के कब्जे से स्वतंत्र करवाना था। इन धर्मयुद्धों के अंत में ईसाई विफल रहे। इन धर्मयुद्धों के दूरगामी परिणाम निकले।

→ 600 ई० से 1200 ई० के दौरान केंद्रीय इस्लामी प्रदेशों के इतिहास की जानकारी के लिए हमें बड़ी संख्या में विभिन्न स्रोत उपलब्ध हैं। इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय ऐतिहासिक एवं अर्ध-ऐतिहासिक रचनाएँ हैं। इनमें से अधिकाँश रचनाएँ अरबी (Arabic) भाषा में हैं।

→ इनमें सर्वाधिक उल्लेखनीय ताबरी (Tabri) की तारीख अल रसूल वल मुलक (Tarikh al-Rasul-Wal Muluk) है। इसमें इस्लामी इतिहास पर बहुमूल्य प्रकाश डाला गया है। अरबी की तुलना में फ़ारसी में लिखे गए ऐतिहासिक ग्रंथ बहुत कम हैं।

→ ये ग्रंथ ईरान एवं मध्य एशिया के इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। सीरियाक (Syriac) भाषा में लिखे गए ईसाई ग्रंथ भी कम संख्या में हैं किंतु ये आरंभिक इस्लाम के इतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। अर्ध-ऐतिहासिक रचनाओं में जीवन चरित (biographies), पैगंबर मुहम्मद के कथनों एवं कार्यों के रिकॉर्ड (हदीथ) एवं कुरान की टीकाएँ (commentaries) सम्मिलित हैं।

→ इनके अतिरिक्त उस समय की प्रसिद्ध कानूनी पुस्तकें, भूगोल, यात्रा वृतांत एवं साहित्यिक रचनाएँ भी इस्लामी इतिहास के बारे में जानकारी प्रदान करती हैं।

→ दस्तावेज़ी साक्ष्य (documentary evidence) भी इस्लामी इतिहास के बारे में महत्त्वपूर्ण रोशनी डालते हैं। इनसे हमें उस काल की महत्त्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक एवं धार्मिक जानकारी प्राप्त होती है। इनका महत्त्व इस बात में है कि ये अपने मूल रूप में उपलब्ध हैं तथा इनमें मनमाने ढंग से परिवर्तन नहीं किया जा सकता।

→ प्रशासनिक इतिहास की जानकारी के लिए यूनानी एवं अरबी पैपाइरस (papyri) तथा गेनिज़ा अभिलेख (Geniza records) काफी उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। मुद्राशास्त्र (सिक्कों का अध्ययन) तथा पुरालेखशास्त्र (शिलालेखों का अध्ययन) उस काल के आर्थिक, राजनीतिक एवं कला इतिहास की महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं।

→ वास्तव में इस्लाम के इतिहास ग्रंथ लिखे जाने का कार्य 19वीं शताब्दी में जर्मनी एवं नीदरलैंड के विश्वविद्यालयों के अध्यापकों द्वारा आरंभ किया गया। फ्राँसीसी एवं ब्रिटिश शोधकर्ताओं ने भी औपनिवेशिक हितों के चलते इस्लाम का अध्ययन किया। ईसाई पादरियों ने भी इस्लाम से संबंधित कुछ पुस्तकें लिखीं।

→ इनका उद्देश्य यद्यपि इस्लाम का ईसाई धर्म से तुलना करना था। इग्नाज़ गोल्डज़िहर (Ignaz Goldziher) जो कि हंगरी का एक प्रसिद्ध यहूदी था

→ हिरा के इस्लामी कॉलेज में अध्ययन किया। उसने जर्मन भाषा में इस्लाम से संबंधित अनेक पुस्तकों की रचना की। इन विद्वानों को अरबी एवं फ़ारसी भाषा की अच्छी जानकारी थी। इन्हें प्राच्यविद (Orientalists) कहा जाता है।

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