Author name: Prasanna

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन एवं उसमें भारत की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य युद्धों को रोक कर विश्व में शान्ति की स्थापना करना है। पिछले कुछ वर्षों से विश्व राजनीति में बहत महत्त्वपूर्ण परिव मद्देनज़र संयुक्त राष्ट्र संघ में भी बदलावों की मांग की जा रही है, क्योंकि बदलते परिवेश में संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यप्रणाली तथा इसके अंगों में कुछ दोष उत्पन्न हो गए, जिन्हें दूर करना आवश्यक है। इसीलिए समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र संघ के विभिन्न अंगों में पुनर्गठन की मांग की जाती रही है।

1. सुरक्षा परिषद् का पुनर्गठन-संयुक्त राष्ट्र संघ के जिस अंग में सबसे अधिक सुधारों की मांग या पुनर्गठन की बात की जा रही है, वह है, सुरक्षा परिषद् । वास्तव में यह सुरक्षा परिषद् ही है, जहां सदस्य देशों को समान अधिकार नहीं मिले हैं। सरक्षा परिषद में वर्तमान समय में कल 15 सदस्य देश हैं, जिनमें से 5 स्थाई तथा 10 अस्थाई देश हैं। पांच स्थाई देशों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन) को वीटो का अधिकार प्राप्त है जोकि अन्य देशों को प्राप्त नहीं है।

प्राय: यह कहा जाता है कि सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या उस अनुपात में नहीं बढ़ी, जिस अनुपात में महासभा की संख्या बढ़ी है। अतः सुरक्षा परिषद् में और सदस्यों को शामिल किए जाने की माँग की जाती रही है। विश्व के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण देश जैसे भारत, जर्मनी, जापान तथा ब्राज़ील स्थाई सदस्यता के लिए समय-समय पर अपना दावा पेश करते रहें, परन्तु पांचों स्थाई देश ऐसे किसी भी प्रसार का विरोध कर रहे हैं। कुछ सदस्य देशों का तर्क है कि वीटो की धारणा को समाप्त करना चाहिए, परन्तु स्थाई देश इस पर भी सहमत नहीं है। सदस्यता बढ़ाने के साथ साथ सुरक्षा परिषद् में प्रक्रियात्मक, कार्यप्रणाली, पारदर्शिता तथा उत्तरदायी सुधारों की भी आवश्यकता है।

2. महासभा का पुनर्गठन-संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा एक अन्य महत्त्वपूर्ण अंग है। यद्यपि महासभा में सभी 193 सदस्य देशों को समान अधिकार प्राप्त हैं, परन्तु फिर भी इसमें समय-समय पर सुधारों की मांग उठती रही है। रष्ट्र संघ के भतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने यह सझाव दिया है कि महासभा में सर्वसम्मति की प्रक्रिया को समाप्त कर देना चाहिए, क्योंकि इससे कुछ देश अपने विचारों को दूसरों पर थोपने का प्रयास करते हैं। इसके साथ-साथ कोफी अन्नान ने महासभा के प्रस्तावों को लागू करने, महासभा के अध्यक्ष को अधिक शक्तिशाली बनाने पर भी जोर दिया।

3. मानव अधिकार परिषद्-संयुक्त राष्ट्र संघ ने मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग का निर्माण किया था, परन्तु समय-समय पर अमेरिका जैसे देशों ने इस आयोग को बदनाम करने का प्रयास किया। तत्पश्चात् भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने मानवाधिकार आयोग को समाप्त करके एक छोटे परन्तु दृढ़ मानव अधिकार परिषद् की स्थापना की बात कही। इसके आधार पर एक 47 सदस्यीय मानवाधिकार परिषद् बनाई गई।

4. संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सेना सम्बन्धी प्रस्ताव-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य युद्धों को रोक कर विश्व में शान्ति बनाए रखना है। परन्तु इसकी अपनी स्थायी सेना नहीं है। संकट के समय यह सदस्य देशों की शान्ति सेना का निर्माण करता है, परन्तु इस प्रकार शान्ति सेना के निर्माण की प्रक्रिया में काफ़ी समय लग जाता है तथा संकट और अधिक बढ़ जाता है। इसलिए कई विद्वान् समय-समय पर यह विचार देते रहे कि संयुक्त राष्ट्र संघ की अपनी एक स्थाई सेना होनी चाहिए, जो संकट आने पर जल्दी कार्यवाही कर सके।

भारत की स्थिति-ऊपर जितने भी पुनर्गठन एवं सुधारों की चर्चा की गई है, उन सभी में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका एवं स्थिति है, या हो सकती है। भारत सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता का एक मज़बूत उम्मीदवार है और कई देश इसका समर्थन भी कर रहे हैं। महासभा के पुनर्गठन में भारत अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति दर्ज करा सकता है। नई मानवाधिकार परिषद् के 47 सदस्यों में से एक भारत भी है और यदि संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थाई सेना की धारणा वास्तविकता में बदलती है, तो भारत उसमें भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।

प्रश्न 2.
विश्व राजनीति में उभरे नए अन्तर्राष्ट्रीय पात्रों की व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व राजनीति में कुछ नए अन्तर्राष्ट्रीय पात्रों का उदय हुआ है, जिन्हें हम अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों एवं स्वयं सेवी संगठनों (N.G.O.) के रूप में पहचान सकते हैं।

1. अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठन (International Economic Organisation):
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरे नये अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों का वर्णन इस प्रकार है

(1) गैट समझौता (Gatt Agreement):
अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् गैट समझौते को सबसे पहला आर्थिक समझौता कहा जा सकता है। गैट समझौते की शुरुआत 1947 में हुई। इसे डंकल समझौता भी कहा जाता है।

(2) विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organisation-W.T.O.):
1 जनवरी, 1995 को गैट समझौते का स्थान विश्व व्यापार संगठन ने ले लिया। वर्तमान समय में इसकी सदस्य संख्या 161 है। यह संगठन विश्व स्तर पर व्यापार के नियमों को निश्चित करता है।

(3) यूरोपीयन संघ (European Union):
यूरोपीयन संघ यूरोप का एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक क्षेत्रीय संगठन है। इसकी स्थापना 1992 में की गई। आज युरोपीयन संघ को विश्व में प्रभावशाली आर्थिक शक्ति के रूप में देखा जाता है।

(4) आसियान (ASEAN):
आसियान, दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का एक क्षेत्रीय आर्थिक संगठन है। इसकी स्थापना 1967 में की गई। आसियान का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास की गति में तेजी लाना है।

(5) सार्क (SAARC):
सार्क अर्थात् दक्षिण-एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन, दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक संगठन है। इसकी स्थापना 1985 में की गई। सार्क का उद्देश्य सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।

2. गैर-सरकारी संगठन (Non-Governmental Organisation-N.G.0.):
गैर-सरकारी संगठनों को भी अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उभरे नये पात्रों के रूप में पहचाना जाता है। गैर-सरकारी संगठन उन्हें कहा जाता है, जो सरकार के संगठन के भाग नहीं होते। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुच्छेद 71 के अनुसार, “गैर-सरकारी संगठन वह है, जो न सरकार है और न ही सदस्य राज्य, उनकी भूमिका केवल सलाहकारी होती है।”

गैर-सरकारी संगठनों को 20वीं शताब्दी में अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ, जब ऐसा प्रतीत होने लगा कि अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियां एवं समझौते तथा विश्व व्यापार संगठन पूंजीवादियों के पक्ष में कार्य कर रहे हैं, तब इसके प्रति सन्तुलन के लिए मानववादी मुद्दों, पोषणकारी विकास तथा विकासशील देशों की सहायता के लिए गैर-सरकारी संगठनों का उदय हुआ। कुछ महत्त्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन इस प्रकार हैं

(1) अन्तर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसायटी (International Red Cross Society):
अन्तर्राष्ट्रीय रेड क्रॉस सोसायटी एक महत्त्वपूर्ण गैर-सरकारी संगठन है। इसका मुख्य कार्य युद्ध एवं संकट के समय असहाय लोगों की मदद करना है।

(2) एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International):
एमनेस्टी इंटरनेशनल एक अन्य महत्त्वपूर्ण गैर सरकारी संगठन है। यह संगठन अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिपोर्ट तैयार एवं प्रकाशित करवाता है।

(3) ह्यमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch):
ह्यमन राइट्स वॉच भी एक गैर-सरकारी संगठन है, जिसका मुख्य कार्य मानवाधिकारों की अवहेलना की ओर विश्वभर के मीडिया का ध्यान आकर्षित करवाना है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों एवं सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
दूसरे विश्व युद्ध के बाद 24 अक्तूबर, 1945 को अनेक प्रयासों के परिणामस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारंभिक सदस्य बना। संयुक्त राष्ट्र चार्टर अथवा संविधान में प्रस्तावना के अतिरिक्त 111 अनुच्छेद हैं जिनमें संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्यों, नियमों, अंगों तथा इनकी शक्तियों और क्षेत्राधिकारों का उल्लेख है।

संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य (Objectives of the United Nations):
संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना में ही इस संगठन के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। प्रस्तावना में एक आदर्श और गरिमामय विश्व समाज की स्थापना की बात कही गयी है। प्रस्तावना में कहा गया है कि, “हम संयुक्त राष्ट्र के लोग आने वाली पीढ़ियों को उस भावी-विश्व युद्ध से बचाएंगे जिसने हमारे जीवन काल में ही दो बार मानव जाति पर बहुत अधिक अत्याचार किए हैं। हम मनुष्यों के मूल अधिकारों, व्यक्ति के सम्मान और छोटे-बड़े सब राष्ट्र के नर-नारियों के समान अधिकारों में फिर से श्रद्धा बनाएंगे।

हम ऐसा वातावरण उत्पन्न करेंगे जिससे न्याय स्थापित हो सके और अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा संधियों के लिए आदर की भावना बढ़ सके। हम अधिक व्यापक स्वतन्त्रता के द्वारा अपने जीवन स्तर को ऊंचा करेंगे और समाज को प्रगतिशील बनाएंगे तथा इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सहिष्णुता और शान्तिपूर्वक अच्छे पड़ोसियों के समान रहने के लिए तथा इस बात को निश्चित करने के लिए कि सैनिक बल प्रयोग सामान्य हित के अतिरिक्त अन्य किसी अवसर पर नहीं किया जाएगा तथा अन्तर्राष्ट्रीय यन्त्र के सब जातियों को आर्थिक सामाजिक उन्नति में प्रयोग करने के लिए यह दृढ निश्चय करते हैं कि उन लक्ष्यों की पूर्ति के लिए हमेशा सहयोग प्रदान करेंगे।

इसलिए हमारी सरकारों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के इस घोषणा-पत्र को स्वीकार किया है और हम एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना करते हैं जो संयुक्त राष्ट्र के नाम से प्रसिद्ध होगा।” चार्टर के अनुच्छेद एक में संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों का अधिक विस्तार से वर्णन किया गया है कि संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन-समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त सम्बन्धी मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना, आर्थिक, सामाजिक अथवा मानवतावादी स्वरूप पर आश्रित अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को सुलझाने में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग प्राप्त करना तथा इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के निमित्त एक केन्द्र का कार्य करना।

सानफ्रांसिस्को में आयोजित सम्मेलन में इस उद्देश्य के लिए नियुक्त समिति ने इसके चार उद्देश्य बतलाए

(1) अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना तथा आक्रामक कार्यवाही को रोक कर शान्ति और अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरों को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास करना और शान्तिपूर्वक उपायों से उन विवादों का हल निकालना।

(2) विविध राष्ट्रों के बीच समान अधिकार, स्वाभिमान तथा जनता के आत्म-निर्णय के अधिकार के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना तथा विश्वशान्ति को सुदृढ़ करने के लिए विविध उपाय करना।

(3) अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा मानवीय समस्याओं के समाधान के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना तथा मानव अधिकारों तथा मूलभूत स्वाधीनता के अधिकार तथा जाति, रंग, भाषा, धर्म तथा लिंग के आधार पर भेदभाव को मिटाने के लिए प्रयास करना तथा इस दिशा में किये जाने वाले प्रयासों को प्रोत्साहित करना।

(4) उपर्युक्त उद्देश्यों के लिए तथा उन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विविध राष्ट्रों के प्रयासों के बीच सामंजस्य की स्थापना के उद्देश्य से एक केन्द्र का कार्य करना। संयक्त राष्ट द्वारा विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति-संयुक्त राष्ट्र संघ के उद्देश्य अत्यन्त आदर्शात्मक, व्यापक तथा अन्तर्राष्ट्रीय शांति एवं सहयोग को बढ़ावा देने वाले हैं।

लेकिन अपनी स्थापना से लेकर अब तक संयुक्त राष्ट्र को अपने उद्देश्यों की प्राप्ति से आशानुरूप सफलता प्राप्त नहीं हुई है। विशेष रूप से राजनीतिक विषयों पर तो संयुक्त राष्ट्र महाशक्तियों के द्वन्द्व का शिकार होकर रह गया है।महाशक्तियों ने अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए न तो संयुक्त राष्ट्र की कभी चिन्ता की और न अब कर रही है।

लेकिन गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में संयुक्त राष्ट्र की सफलता उल्लेखनीय रही है। बीमारियों को दूर करने, मानवाधिकारों की रक्षा, वैज्ञानिक शोध, सांस्कृतिक आदान-प्रदान आदि के लिए संयुक्त राष्ट्र के प्रयास सराहनीय रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्त-इसके लिए प्रश्न नं० 4 देखें।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सिद्धान्तों की व्याख्या करो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के चार्टर की प्रस्तावना और अनुच्छेद 1 में संघ के उद्देश्यों का वर्णन किया गया है। लेकिन उद्देश्यों का उल्लेख कर देना ही पर्याप्त नहीं होता। इनकी प्राप्ति के लिए यह भी आवश्यक था कि सदस्यों के मार्ग. दर्शन के लिए कुछ सिद्धान्तों का उल्लेख चार्टर में किया जाता। अत: अनुच्छेद 2 में इन प्रमुख सिद्धान्तों की व्यवस्था । की गई है।

ये सिद्धान्त अन्तर्राष्ट्रीय आधार के उन नियमों की तरह हैं जो संयुक्त राष्ट्र और उनके सदस्य राज्यों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। अनुच्छेद 2 में स्पष्ट कहा गया है कि अनुच्छेद 1 में दिए गए उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संघ और उसके सदस्य निम्नलिखित सिद्धान्तों के अनुसार कार्य करेंगे

(1) संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की प्रभुसत्ता की समानता के आधार पर की गई है।

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अन्तर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे ताकि निर्धारित अधिकारों की प्राप्ति सभी को हो सके।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य राज्य अपने विवादों का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग तथा इस प्रकार करेंगे कि अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति, सुरक्षा और न्याय को किसी प्रकार का भय न हो।

(4) सभी सदस्य राष्ट्र अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्ता को आघात पहुंचाने वाला कार्य नहीं करेंगे। इसके साथ ही वे कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जो संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र और उद्देश्यों के विपरीत या असंगत हो।

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र के अन्तर्गत लिए गए किसी कार्य के सन्दर्भ में सभी प्रकार की सहायता देंगे अर्थात् उस राष्ट्र की मदद नहीं करेंगे जिसके विरुद्ध संयुक्त राष्ट्र संघ कोई निरोधात्मक अथवा प्रतिरोधात्मक कार्यवाही कर रहा हो।

(6) विश्व-शान्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपेक्षित उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र संघ इस बात का प्रयास करेगा कि वे सभी राष्ट्र जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य नहीं हैं, घोषणा-पत्र के आधार पर आधारभूत सिद्धान्तों के अनुरूप कार्य कर रहे हैं।

(7) संयुक्त राष्ट्र संघ किसी भी राज्य के ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा जो उसके आन्तरिक हैं, न यह कोई भी कार्य करेगा, जिसको धमकी या दबाव कहा जा सके।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंग कौन-कौन से हैं ? उनकी रचना तथा उनके मुख्य कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रमुख अंर्गों का वर्णन करें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् के संगठन, शक्तियों एवं कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर अनुसार 6 मुख्य अंग हैं जिनके द्वारा संघ अपने बहुमुखी कर्तव्यों को पूरा करता है। ये अंग हैं-महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्, ट्रस्टीशिप कौंसिल, अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय . तथा सचिवालय। इन अंगों के संगठन, शक्तियों तथा कामों का विवरण नीचे दिया जा रहा है

1. महासभा (The General Assembly):
महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे बड़ा तथा मुख्य चार्टर अंग है। यह एक प्रकार की विश्व संसद् है जिसका मुख्य काम विचार-विमर्श करना है। रचना (Composition) महासभा में संयुक्त राष्ट्र संघ के सारे सदस्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 देश सदस्य हैं। इन 193 देशों के प्रतिनिधियों को मिलाकर महासभा बनती है। हर सदस्य देश इसमें अपने 5 प्रतिनिधि भेज सकता है, परन्तु हर देश का एक ही मत होता है। इसके कार्य तथा शक्तियां (Its power and Functions)-महासभा के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं

1. निर्वाचित कार्य-महासभा 2/3 बहुमत से सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों को दो साल के लिए चुनती है। महासभा आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के सदस्य भी चुनती है। यह ट्रस्टीशिप कौंसिल के कुछ सदस्य चुनती है। सुरक्षा परिषद् तथा महासभा अलग-अलग मत प्रयोग करके अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जजों का चुनाव करती है। महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सचिव को नियुक्त करती है।

2. विचारशील कार्य-महासभा का सबसे महत्त्वपूर्ण काम चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना तथा उसके आधार पर सिफ़ारिश करना है।

3. अन्य अंगों पर नियन्त्रण महासभा संयुक्त राष्ट्र के दूसरे अंगों एजेन्सियों पर नियन्त्रण करती है तथा उनके कार्यों का नियन्त्रण करती है।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग महासभा राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शिक्षा-सम्बन्धी क्षेत्रों में अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने के लिए विचार करके सुझाव दे सकती है।

5. बजट-संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट की ज़िम्मेदारी महासभा पर है। महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ के बजट पर विचार करती है, उसको पास करती है।

6. संशोधन कार्य-संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में महासभा 2/3 बहुमत से संशोधन करने की सिफ़ारिश कर सकती है।

2. सुरक्षा परिषद् (The Security Council):
सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र संघ की कार्यपालिका के समान है। चार्टर के अनुसार अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा बनाने की ज़िम्मेदारी सुरक्षा परिषद् पर है। रचना (Composition)-सुरक्षा परिषद् के कुल 15 सदस्य होते हैं। ये सदस्य दो प्रकार के होते हैं-स्थायी और अस्थायी। पांच सदस्य स्थायी हैं-ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, संयुक्त राज्य अमेरिका और साम्यवादी चीन। इसके 10 अस्थायी सदस्य दो वर्षों के लिए महासभा चुनती है।

वोट डालने की विधि (Voting Procedure)-सुरक्षा परिषद् में प्रत्येक सदस्य को एक मत डालने का अधिकार दिया गया है। सुरक्षा परिषद् में कार्य-विधि के मामलों (Procedural matters) में जैसे कार्य सूची (Agenda) को तैयार करने के लिए 15 में से कम-से-कम 9 सदस्यों के मत पक्ष में होने चाहिएं, परन्तु अन्य सभी मामलों के लिए 9 मतों में 5 बड़ी शक्तियों अर्थात् अमेरिका, साम्यवादी चीन, रूस, फ्रांस तथा ग्रेट ब्रिटेन के मत अवश्य ही शामिल होने चाहिएं।

सुरक्षा परिषद् के कार्य तथा शक्तियां (Functions and Powers of the Security Council):
संयुक्त राष्ट्र के अंगों में सुरक्षा परिषद् का एक महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसके मुख्य कार्य तथा शक्तियां निम्नलिखित हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति को बनाए रखना,
  • संयुक्त राष्ट्र के नए सदस्यों का चुनाव, 3 संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन।
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् (The Economic and Social Council)

आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक समस्याओं को हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र में आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् की स्थापना की गई है।

3. रचना (Composition):
आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् की सदस्य संख्या 54 है। ये सदस्य महासभा द्वारा दो-तिहाई बहुमत से तीन वर्ष के लिए चुने जाते हैं और एक-तिहाई सदस्य प्रति वर्ष रिटायर हो जाते हैं। हर सदस्य देश को एक वोट का अधिकार होता है और इस परिषद् के निर्णय साधारण बहुमत से किये जाते हैं।

इसके कार्य (Its Functions) आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के कार्यों का वर्णन चार्टर के अनुच्छेद 55 में किया गया है। सामाजिक-आर्थिक परिषद् सदस्य राज्यों के बीच सामाजिक-आर्थिक सहयोग को बढ़ाने सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण गतिविधियां संचालित करती है।

4. ट्रस्टीशिप कौंसिल (The Trusteeship Council) :
ट्रस्टीशिप कौंसिल जिसने लीग की मैंडेट प्रणाली का स्थान लिया है, का उद्देश्य पिछड़े हुए देशों का विकसित देशों के नेतृत्व में उन्नति दिलाना है ताकि वे शीघ्रता से स्वशासन के लिए तैयार हो सकें। इस प्रणाली के अधीन सुरक्षित प्रदेशों पर निगरानी करने के लिए संयुक्त राष्ट्र-ट्रस्टीशिप कौंसिल की स्थापना की गई। यह परिषद् तीन प्रकार के प्रदेशों की निगरानी करती है

  • वे प्रदेश, जो द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामस्वरूप शत्रु राज्यों से छीने गए।
  • वे प्रदेश, जो लीग के समय मैंडेट प्रणाली के अधीन थे।
  • वे प्रदेश, जो अपनी मर्जी से इस प्रणाली के अधीन किए गए।

रचना (Composition) ट्रस्टीशिप कौंसिल में सुरक्षा परिषद् के सारे स्थाई सदस्य होते हैं। इनके अलावा सुरक्षित प्रदेशों का प्रबन्ध चलाने वाले देश भी इसके सदस्य होते हैं। इन दोनों तरह के कुल सदस्यों के बराबर महासभा इस परिषद् के लिए सदस्य चुनती है। इस परिषद् की साल में दो बैठकें होती हैं। इसके निर्णय बहुमत से होते हैं। इनके उद्देश्य तथा कार्य (Its Aims and Functions) ट्रस्टीशिप कौंसिल के चार मुख्य उद्देश्य हैं, जिनकी पूर्ति यह परिषद् करती हैं। वे अग्रलिखित हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा में वृद्धि करना।
  • सुरक्षित प्रदेशों का विकास करना ताकि वे स्वतन्त्रता के योग्य हो सकें।
  • मौलिक मानवीय अधिकारों के लिए वातावरण बनाना।
  • सामाजिक, आर्थिक तथा व्यापारिक विषयों में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्य देशों में समानता लाना।

5. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय (International Court of Justice) :
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का न्यायिक अंग है जिसे विश्व न्यायालय भी कहा जाता है। रचना (Composition) अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सरक्षा परिषद अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। जज 9 साल के लिए चुने जाते हैं। एक-तिहाई न्यायाधीश अर्थात् पांच जज हर तीन वर्ष बाद रिटायर होते हैं और उनकी जगह 5 जज चुन लिये जाते हैं।

इसका क्षेत्राधिकार (Its Jurisdiction)-अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों से सम्बन्धित सभी विषय इसके पास ले जाए जा सकते हैं। इस न्यायालय में केवल राज्यों के झगड़े ही ले जाए जा सकते हैं, व्यक्तियों के नहीं। इस न्यायालय का क्षेत्राधिकार तीन प्रकार का है

  • अनिवार्य क्षेत्राधिकार,
  • ऐच्छिक क्षेत्राधिकार,
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार।

6. सचिवालय (The Secretariat):
संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रबन्धक काम चलाने के लिए चार्टर के अनुसार सचिवालय स्थापित किया गया है, जिसमें संगठन की ज़रूरत अनुसार कर्मचारी होते हैं जिनका मुखिया महासचिव होता है। महासचिव जिसे संसार का मुख्य प्रशासकीय अधिकारी कहा जा सकता है, सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा नियुक्त करती है। यह 5 साल के लिए चुना जाता है।

सचिवालय के 9 विभाग है और हर भाग का मुखिया उप-महासचिव होता है। संयुक्त राष्ट्र के सचिवालय में दुनिया के अनेक देशों के नागरिक काम करते हैं, किन्तु उन सबकी वफ़ादारी विश्व संस्था के प्रति होती है। सचिवालय के अधिकारियों के लिए स्वतन्त्र रूप से अपने कार्यों को करने के लिए कई सुविधाएं दी गई हैं। सचिवालय संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों की कार्यवाहियों को लिखता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय संघर्षों को प्रकाशित करता है।

प्रश्न 6.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका पर एक लेख लिखें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आने वाली पीढ़ियों को युद्ध से बचाने के लिए 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना की गई। संयुक्त राष्ट्र संघ के आरम्भ में 51 सदस्य थे और वर्तमान में सदस्य संख्या 193 है। भारत संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य है और इसे विश्व-शान्ति के लिए महत्त्वपूर्ण संस्था मानता है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भारत के योगदान का वर्णन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है

1. भारत और संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना-भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के लिए सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य बन गया। सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

2. संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता बढ़ाने में भारत की भूमिका-भारत की सदा ही यह नीति रही है कि विश्व शान्ति को बनाए रखने के लिए और संयुक्त राष्ट्र संघ की सफलता के लिए संसार के सभी देशों को, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखते हैं, सदस्य बनना चाहिए। इसलिए 1950 से लेकर अगले 20 वर्षों तक लगातार जब भी संयुक्त राष्ट्र संघ में साम्यवादी चीन को सदस्य बनाने का प्रश्न आया, भारत ने सदैव इसका समर्थन किया।

परन्तु अमेरिका सुरक्षा परिषद् में चीन की सदस्यता के प्रस्ताव पर वीटो का प्रयोग करता रहा। 1972 में अमेरिका के चीन के प्रति दृष्टिकोण बदलने पर ही चीन संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बना। भारत ने बंगला देश को संयुक्त राष्ट्र संघ का सदस्य बनवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

3. संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों में भारत का स्थान-संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। 1954 में भारत की श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा (General Assembly) की अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। 1956 में स्वर्गीय डॉ० राधाकृष्ण यूनेस्को के प्रधान चुने गये।

भारत आठ बार सुरक्षा परिषद् का सदस्य रह चुका है और 30 सितम्बर, 1991 को भारत ने सुरक्षा परिषद् के अध्यक्ष का कार्यभार एक महीने के लिए सम्भाला। सामाजिक और आर्थिक परिषद् का भारत लगभग निरन्तर सदस्य चला आ रहा है। भारत के डॉ० नगेन्द्र सिंह को 1973 और 1982 में पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया था। फिर फरवरी, 1985 में उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया था। 1989 में भारत के आर० एस० पाठक को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश चुना गया।

जनवरी, 2003 में प्रथम भारतीय महिला पुलिस अधिकारी किरण बेदी संयुक्त राष्ट्र नागरिक पुलिस सलाहकार नियुक्त हुई। वे इस प्रतिष्ठित पद पर नियुक्त होने वाली न केवल प्रथम भारतीय अपितु विश्व की प्रथम महिला अधिकारी भी हैं। 27 अप्रैल, 2012 को न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। नवम्बर, 2017 में दलवीर भण्डारी को पुनः अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुन लिया गया।

4. अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की दृष्टि से भारत का योगदान-संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य विश्व शान्ति एवं सुरक्षा बनाए रखना है। भारत में विश्व-शान्ति सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका वर्णन हम इस प्रकार कर सकते हैं

(i) कोरिया की समस्या-1950 में उत्तर कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र संघ ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के प्रतिरोध के लिए भेजीं। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया। भारत ने इस युद्ध को समाप्त कराने तथा युद्धबन्दियों का आदान-प्रदान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत को तटस्थ राष्ट्र आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।

(ii) स्वेज नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर का राष्ट्रीकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस और इज़राइल ने मिलकर मित्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें यह कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए। स्वेज नहर समस्या को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(iii) कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। इस परिस्थिति का लाभ उठाते हुए बैल्जियम ने कांगो में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र संघ की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो भेजी। वास्तव में संयुक्त राष्ट्र सेना में सबसे बड़ी टुकड़ी भारतीय बटालियन की थी।

(iv) अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करने चाहिएं और संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

(v) अफ़गानिस्तान की समस्या-अफ़गानिस्तान की समस्या हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

(vi) खाड़ी युद्ध-भारत ने फरवरी, 1991 को खाड़ी युद्ध में गैर-सैनिक ठिकानों को निशाना बनाए जाने पर चिन्ता व्यक्त करते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की तुरन्त बैठक बुलाकर खाड़ी की मौजूदा स्थिति की समीक्षा करने की मांग की। सुरक्षा परिषद् में पूरी स्थिति की समीक्षा कर यह देखा कि खाड़ी में अमेरिका और बहुराष्ट्रीय देशों की सैनिक कार्रवाई सुरक्षा परिषद् के प्रस्ताव 678 के अनुसार है या नहीं। उपर्युक्त समस्याओं के अतिरिक्त भारत ने अन्य समस्याओं को सुलझाने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. उपनिवेशवाद का विरोध-भारत उपनिवेशवाद का सदा ही विरोधी रहा है और भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में उपनिवेशवाद के विरुद्ध आवाज बुलन्द की। बंगला देश को स्वतन्त्र करवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। संयुक्त राष्ट्र संघ ने जिन उपनिवेशों को स्वतन्त्रता दिलाने का प्रयत्न किया है, भारत ने इसका समर्थन किया है।

6. रंग-भेद के विरुद्ध संघर्ष- भारत ने रंग-भेद की नीति को विश्व-शान्ति के लिए खतरा माना है। रंग-भेद पक्षपात का सबसे व्यापक अभ्यास तथा भ्रष्टपूर्ण प्रदर्शित उदाहरण एशिया तथा अफ्रीका के काले वर्गों के प्रति गोरों की धारणा थी। रंग-भेद नीति में दक्षिण अफ्रीकी सरकार सबसे आगे रही है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में कई बार रंग-भेद की नीति के विरुद्ध आवाज़ उठाई और विश्व जनमत तैयार किया, जिसके फलस्वरूप संयुक्त राष्ट्र संघ ने अनेक प्रस्ताव पारित किए।

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7. निःशस्त्रीकरण के प्रयासों में भारत का सहयोग-संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में महासभा और सुरक्षा परिषद् दोनों के ऊपर यह जिम्मेवारी डाली गई है कि वे निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें। भारत की नीति यही है कि निःशस्त्रीकरण के द्वारा ही विश्व-शान्ति को बनाए रखा जा सकता है और अणु शक्ति का प्रयोग केवल मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। भारत पूर्ण निःशस्त्रीकरण के पक्ष में है और उसने संयुक्त राष्ट्र के निःशस्त्रीकरण सम्बन्धी प्रयासों का हमेशा समर्थन किया है।

8. मानव अधिकारों की रक्षा-भारत मानव अधिकारों का महान् समर्थक है। भारत ने अपने नागरिकों को लगभग वे सभी अधिकार दिए हैं, जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित किए गए हैं। जब भी किसी देश ने मानव अधिकारों का उल्लंघन किया है, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में उसके विरुद्ध आवाज उठाई और संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों की रक्षा के लिए उचित कार्यवाही की।

9. गट-निरपेक्ष आन्दोलन-भारत गट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक है और इस आन्दोलन ने शीत यद्ध को कम किया है और संयुक्त राष्ट्र को पूरी तरह दो गुटों में विभक्त होने से बचाया है।

10. आर्थिक और सामाजिक समस्याओं को हल करने में भारत की भूमिका-भारत का सदा यह विचार रहा है कि विश्व-शान्ति की स्थायी स्थापना तभी हो सकती है, यदि आर्थिक और सामाजिक अन्याय को समाप्त किया जाए। भारत ने इस दिशा में महत्त्वपूर्ण कार्य किए हैं। भारत ने आर्थिक दशा से पिछड़े देशों के विकास पर विशेष बल दिया है और विकसित देशों को अविकसित देशों की अधिक-से-अधिक सहायता करने के लिए कहा है।

11. पर्यावरण की रक्षा-पर्यावरण का प्रदषण मानवता के लिए खतरा बन गया है। संसार के जीवनदायी वन एवं नदियां ही नहीं, धरती, वनस्पतियां और विश्व महासागर भी प्रदूषण की चपेट में आते जा रहे हैं। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने कई बार कहा था कि विश्व पर्यावरण की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र को प्रभावशाली कदम उठाने चाहिएं।

12. संयुक्त राष्ट्र की कार्य प्रणाली सुधारने में भारत की भूमिका-1 फरवरी, 1992 को सुरक्षा परिषद् की शिखर बैठक हुई ताकि सुरक्षा परिषद् को अधिक प्रभावशाली बनाया जा सके। भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने 15 – सदस्यीय सुरक्षा परिषद् के विस्तार और विश्व के सबसे बड़े संगठन को और अधिक लोकतान्त्रिकरण पर जोर दिया।

संयुक्त राष्ट्र की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव ने संयुक्त राष्ट्र के पूर्वगठन और सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता पर बल दिया। इसके अतिरिक्त भारत ने संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न अंगों में विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग की। निष्कर्ष-भारत विश्व-शान्ति व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र के साथ सहयोग देता है और भारत का अटल विश्वास है कि संयुक्त राष्ट्र विश्व-शान्ति को बनाए रखने का महत्त्वपूर्ण यन्त्र है।

प्रश्न 7.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार के लिए कुछ सुझाव दीजिए।
अथवा
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के सुधार के लिये सुझाव दीजिये।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे शक्तिशाली अंग है। सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा का पूरा उत्तरदायित्व सुरक्षा परिषद् को सौंप दिया गया है। यद्यपि सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है, तथापि इसमें कुछ कमियां हैं, जिनमें सुधारों की मांग समय-समय पर उठती रहती है। निम्नलिखित कारणों से सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जाती रही है

1. संयुक्त राष्ट्र की बढ़ती हुई सदस्य संख्या-सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग करने वाले राष्ट्रों, जिनमें भारत भी शामिल है, का कहना है कि जिस अनुपात में संयुक्त राष्ट्र में सदस्य राष्ट्रों की संख्या बढ़ी है, उसी अनुपात में सुरक्षा परिषद् में सदस्य राष्ट्रों की संख्या नहीं बढ़ी है। अत: सुरक्षा परिषद् को अधिक लोकतान्त्रिक बनाने के लिए सुरक्षा परिषद् में सदस्यों की संख्या, विशेषकर स्थाई सदस्यों की संख्या बढ़ायी जानी चाहिए।

2. नई चुनौतियां-विश्व में उभर रही नई चुनौतियों का सामना करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग चल रही है।

3. असमान प्रभुसत्ता-सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या 15 है, जिनमें 5 स्थाई सदस्य हैं, जिन्हें वीटो (Veto) प्राप्त है, जबकि 10 अस्थाई सदस्य हैं। इससे पता चलता है कि सुरक्षा परिषद् में समानता के अधिकार को मान्यता न देकर असमान प्रभुसत्ता का अस्तित्व पाया जाता है, अतः कई सदस्य राष्ट्र इस भेदभाव को समाप्त करना चाहते हैं।

4. वीटो की समस्या-वीटो की समस्या को समाप्त करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जा रही है।

5. महाशक्तियों के प्रभत्व को कम करना-सरक्षा परिषद में 5 सदस्य राष्ट्रों (अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस और चीन) को वीटो शक्ति दी गई है, जिससे वे अधिक शक्तिशाली हो गये हैं, अतः उनके प्रभुत्व को कम करने के लिए भी सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग की जा रही है।

सुरक्षा परिषद् में किए जाने वाले सुधार

1. सुरक्षा परिषद् की सदस्य संख्या बढ़ाई जाए-सुधारों की मांग करने वाले सदस्य राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर इसे अधिक लोकतान्त्रिक बनाने की मांग कर रहे हैं। विशेषकर स्थाई सदस्यों की संख्या में बढ़ोत्तरी की मांग जोर पकड़ती जा रही है।

2. वीटो की समाप्ति-सुरक्षा परिषद् की कार्यप्रणाली को व्यवस्थित एवं लोकतान्त्रिक बनाने के लिए या तो वीटो की शक्ति को समाप्त कर देना चाहिए, या फिर इसे सीमित कर देना चाहिए।

3. समान सदस्यता-सुरक्षा परिषद् में अस्थाई सदस्यों की धारणा को समाप्त करके सबको समान स्तर की सदस्यता प्रदान करनी चाहिए।

4. सुरक्षा परिषद् को महासभा के प्रति अधिक जवाबदेह बनाया जाए-सुरक्षा परिषद् में सुधारों की मांग करने वालों का कहना है कि यदि सुरक्षा परिषद् को विश्व के लोगों का विश्वास जीतना है, तो इसे महासभा के प्रति और अधिक जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।

5. सामाजिक और आर्थिक कार्य सुरक्षा परिषद् को दिए जाने की मांग-कई विचारक कहते हैं कि सुरक्षा परिषद् को केवल राजनीतिक कार्य ही दिये जाते हैं जिससे इसके सदस्यों में सदैव मतभेद उत्पन्न होते रहते हैं, अतः इनमें सहयोग उत्पन्न करने के लिए सुरक्षा परिषद् को कुछ सामाजिक और आर्थिक कार्य भी दिये जाने चाहिएं।

प्रश्न 8.
एक विश्व संस्था के रूप में संयुक्त राष्ट्र की सफलताओं और असफलताओं पर एक संक्षिप्त लेख लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को भावी पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए हुई थी। संयुक्त राष्ट्र ने 1945 से लेकर अब तक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को हल किया है। संयुक्त राष्ट्र ने विश्व शान्ति को बनाए रखने, युद्धों को रोकने तथा महाशक्तियों में टकराव को रोकने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की है। संयुक्त राष्ट्र को जहां अनेक सफलताएं प्राप्त हुई हैं वहीं इसे असफलताओं का भी सामना करना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की सफलताओं एवं असफलताओं का वर्णन इस प्रकार है

1. राजनीतिक उपलब्धियां-संयुक्त राष्ट्र ने अनेक अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें से कुछ विवाद इस प्रकार हैं-रूस-ईरान विवाद, यूनान विवाद, सीरिया और लेबनान की समस्या, इण्डोनेशिया की समस्या कोर्फ़ चैनल विवाद, कोरिया समस्या, स्वेज़ नहर की समस्या, कांगो समस्या, यमन विवाद, कुवैत-ईराक विवाद आदि।

2. निःशस्त्रीकरण-संयक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के लिए अनेक प्रयास किए हैं और आज भी कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र ने नि:शस्त्रीकरण के लिए अनेक सम्मेलनों का आयोजन किया है।

3. अन्तरिक्ष का मानव कल्याण के लिए प्रयोग-संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों के फलस्वरूप ही महासभा में एक प्रस्ताव पारित किया गया कि बाहरी अन्तरिक्ष का प्रयोग केवल शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा।

4. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग-संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के देशों को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जहां अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श होता है। संयुक्त राष्ट्र ने विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है।

5. अन्य उपलब्धियां-संयुक्त राष्ट्र ने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक इत्यादि गैर-राजनीतिक क्षेत्रों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

संयुक्त राष्ट्र की असफलताएं-संयुक्त राष्ट्र को निम्नलिखित मामलों में असफलताओं का मुंह देखना पड़ा है

  • संयुक्त राष्ट्र की स्थापना का उद्देश्य युद्धों को रोकना और विश्व में शान्ति स्थापित करना है। परन्तु संयुक्त राष्ट्र इस उद्देश्य में पूर्णरूप से सफल नहीं हुआ।
  • संयुक्त राष्ट्र अनेक राजनीतिक तथा अन्य झगड़ों को दूर करने में असफल रहा है।
  • नि:शस्त्रीकरण की दिशा में संयुक्त राष्ट्र की कोई महान् उपलब्धि नहीं रही है।
  • दक्षिणी अफ्रीका की रंगभेद की नीति के विषय में संयुक्त राष्ट्र कारगर नहीं रहा।
  • मानवाधिकारों की सुरक्षा के बारे में संयुक्त राष्ट्र प्रभावकारी भूमिका नहीं निभा सका।
  • महाशक्तियों की मनमानी रोकने में संयुक्त राष्ट्र बुरी तरह से असफल रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र कब स्थापित हुआ? क्या भारत इसका मूल रूप से सदस्य है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है, जिसकी स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई थी। संयुक्त राष्ट्र संघ का अपना संविधान है जिसे चार्टर (Charter) कहा जाता है और यह चार्टर सान फ्रांसिस्को सम्मेलन में तैयार किया गया था। संयुक्त राष्ट्र का मुख्य कार्यालय अमेरिका के प्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में स्थित है।

आरम्भ में संयुक्त राष्ट्र के 51 सदस्य थे, परन्तु आजकल इसकी सदस्य संख्या 193 है। भारत इसके आरम्भिक सदस्यों में से है। संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म निर्णय के सिद्धान्त पर आश्रित मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों का विकास करना और इन सामान्य उद्देश्यों की पूर्ति के लिए राष्ट्रों के कार्यों को चलाने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है।

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प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के किन्हीं चार उद्देश्यों का संक्षेप में वर्णन करें।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय समस्याओं के लिए अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग की प्राप्ति करना।
  • मानवीय अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं के लिए सम्मान बढ़ाना।

प्रश्न 3.
भारत की संयुक्त राष्ट्र के भिन्न-भिन्न अंगों में क्या भूमिका रही है ?
उत्तर:
भारत अनेक बार संयुक्त राष्ट्र के भिन्न-भिन्न अंगों का सदस्य रह चुका है, जैसे कि

  • भारत सुरक्षा परिषद् का आठ बार अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत ने सुरक्षा परिषद् के सदस्य के रूप में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • भारत सामाजिक तथा आर्थिक परिषद् का सदस्य अनेक बार रह चुका है और अब पिछले कुछ वर्षों से भारत इस परिषद् का निरन्तर सदस्य चला आ रहा है।
  • 1956 में भारत की श्रीमती विजयलक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्षा चुनी गई।
  • 1956 ई० में राधाकृष्णन यूनेस्को के अध्यक्ष चुने गए।
  • सर बेनेगल राव 1950 के दशक में अन्तर्राष्टीय न्यायालय के जज रह चके हैं।

डॉ० नगेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय य के न्यायाधीश और बाद में मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। इसके अतिरिक्त श्री रामस्वरूप पाठक अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। 27 अप्रैल, 2012 को न्यायमूर्ति दलवीर भण्डारी को अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुना गया। नवम्बर, 2017 में दलवीर भण्डारी को पुन: अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का न्यायाधीश चुन लिया गया।

प्रश्न 4.
सुरक्षा परिषद् पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका के समान है। इसके कुल 15 सदस्य होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं- स्थायी और अस्थायी। पांच स्थायी सदस्य हैं-अमेरिका, रूस, फ्रांस, चीन और इंग्लैंड। इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य दो वर्षों के लिए महासभा द्वारा चुने जाते हैं। सुरक्षा परिषद् के पांच स्थायी सदस्यों को निषेधाधिकार (Veto) प्राप्त है। इसका अभिप्राय यह है कि यदि कोई स्थायी सदस्य सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में अपना मत देता है तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।

उल्लेखनीय है कि यदि कोई सदस्य विरोध स्वरूप सुरक्षा परिषद् की बैठक से अनुपस्थित रहता है तो उसे निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाता। सुरक्षा परिषद् का प्रमुख कार्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखना है। इसके अतिरिक्त सुरक्षा परिषद् नए सदस्यों को महासभा की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाती है। इसके अलावा यह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीशों व महासचिव के चुनाव में भी भाग लेती है। संयुक्त राष्ट्र के चार्टर में संशोधन के विषय में भी सुरक्षा परिषद् महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

प्रश्न 5.
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के कोई चार कार्य लिखिये।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) के महासचिव के कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र का एक सचिवालय होता है जिसका मुखिया महासचिव होता है। महासचिव जिसे विश्व का प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी कहा जा सकता है। महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफ़ारिश पर महासभा करती है। यह 5 वर्ष के लिए चुना जाता है। इस समय श्री एन्टोनियो गुटेरस संयुक्त राष्ट्र के महासचिव हैं।

(1) महासचिव सचिवालय के सभी कर्मचारियों पर निरीक्षण रखता है। महासचिव संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न गतिविधियों में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

(2) यह महासभा, सुरक्षा परिषद्, आर्थिक व सामाजिक परिषद्, ट्रस्टीशिप कौंसिल की कार्यवाही में हिस्सा ले सकता है।

(3) यह महासभा के सामने संयुक्त राष्ट्र के कार्यों की वार्षिक रिपोर्ट पेश करता है।

(4) महासचिव सुरक्षा परिषद् का ध्यान किसी ऐसे विषय की ओर दिलाने का कार्य भी करता है जो अन्तर्राष्टीय शांति एवं सरक्षा के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है। महासचिव का अन्तर्राष्टीय शांति बनाने रखने में बड़ा हाथ होता है।

प्रश्न 6.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों का हल करने के लिए हेग में एक न्याय का अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय स्थापित किया गया है। इस न्यायालय में 15 न्यायाधीश होते हैं। न्यायाधीशों का चुनाव महासभा तथा सुरक्षा सुरक्षा परिषद् द्वारा अलग अलग स्वतन्त्र तौर पर किया जाता है। न्यायाधीश 9 वर्ष के लिए चुने जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के पास अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय संधियों से सम्बन्धित सभी विषय ले जाए जा सकते हैं। इस न्यायालय में केवल राज्यों के ही झगड़े ले जाए जा सकते हैं, व्यक्तियों के नहीं। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय का क्षेत्राधिकार तीन प्रकार का है

  • अनिवार्य क्षेत्राधिकार
  • ऐच्छिक क्षेत्राधिकार
  • सलाहकारी क्षेत्राधिकार।

अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संधियों, अन्तर्राष्ट्रीय कानून, अन्तर्राष्ट्रीय दायित्व को भंग करने वाले तथ्यों व क्षतिपूर्ति से सम्बन्धित मामलों में सम्बन्धित पक्षों को सुनता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय सम्बन्धित राज्यों की सहमति से ही किसी अभियोग की सुनवाई करता है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र महासभा व सुरक्षा परिषद् को आवश्यकतानुसार किसी मामले में सलाह भी दे सकता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को सुलझाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

प्रश्न 7.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में भारत की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए 1945 में सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके वह संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य बन गया। भारत की सिफारिश पर चार्टर में मानवाधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहित करने का उद्देश्य जोड़ा गया। संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों और विशेष एजेन्सियों में भारत को महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त रहा है। भारत सुरक्षा परिषद् का आठ बार अस्थायी सदस्य रह चुका है।

भारत ने विश्व शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जब भी संसार में किसी भी भाग में तनाव या झगड़ा उत्पन्न हुआ है तो भारत ने तनाव को कम करने तथा झगड़े को हल करने के प्रयास किए हैं। कोरिया, स्वेज़ नहर, कांगो, साइप्रस, अलजीरिया, लीबिया, अफ़गानिस्तान आदि की समस्याओं को हल करने में भारत ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। जब कभी सुरक्षा परिषद् ने किसी देश में शान्ति स्थापित करने के लिए सेनाओं की मांग की तो भारत ने अपनी सेनाएं भेजी हैं।

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प्रश्न 8.
अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति तथा सुरक्षा की दृष्टि से भारत के योगदान की चर्चा करो।
अथवा
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका अभिनीत की है ?
उत्तर:
भारत ने विश्व-शान्ति तथा सुरक्षा को बनाए रखने में संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसका वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है
1. कोरिया समस्या-1950 में उत्तरी कोरिया ने दक्षिणी कोरिया पर आक्रमण कर दिया। संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध को रोकने के लिए 16 राष्ट्रों की सेनाएं उत्तरी कोरिया के विरुद्ध भेजी। भारत के सैनिकों ने भी इस कार्यवाही में भाग लिया।

2. स्वेज नहर की समस्या-जुलाई, 1956 में मिस्र के राष्ट्रपति ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इस पर इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा इज़राइल ने मिलकर मिस्र पर आक्रमण कर दिया। भारत ने इन देशों की निन्दा की और महासभा द्वारा पारित उस प्रस्ताव का समर्थन किया जिसमें कहा गया कि युद्ध को तुरन्त बन्द कर दिया जाए।

3. कांगो समस्या-स्वतन्त्रता प्राप्त करने पर कांगो में राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई। लुमुम्बा ने संयुक्त राष्ट्र से सैनिक सहायता की अपील की। संयुक्त राष्ट्र की अपील पर भारत ने अपनी सेना कांगो में भेजी।।

4. अरब-इजराइल विवाद-1967 में अरब-इज़राइल युद्ध में इज़राइल ने अरब क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। भारत की नीति यह रही है कि इज़राइल को अरब क्षेत्र खाली करना चाहिए और संयुक्त राष्ट्र द्वारा पारित सभी प्रस्तावों को मानना चाहिए।

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र के कोई चार सिद्धांत लिखिए।
उत्तर:
(1) संयुक्त राष्ट्र की स्थापना सदस्य राष्ट्रों की प्रभुसत्ता की समानता के आधार पर की गई है।

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अंतर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे ताकि निर्धारित अधिकारों की प्राप्ति सभी को हो सके।

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी सदस्य राज्य अपने विवादों का समाधान शांतिपूर्ण ढंग तथा इस प्रकार करेंगे कि अंतर्राष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय को किसी प्रकार का भय न हो।

(4) सभी सदस्य राष्ट्र अपने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों के क्षेत्र में किसी भी राष्ट्र की राजनीतिक स्वतन्त्रता तथा प्रभुसत्ता को आघात पहुंचाने वाला कार्य नहीं करेंगे। इसके साथ ही वे कोई भी ऐसा कार्य नहीं करेंगे जो संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पत्र और उद्देश्यों के विपरीत या असंगत हो।

प्रश्न 10.
शीत युद्ध की समाप्ति के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ को सफल बनाने के लिए चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रासंगिक सुधार करना चाहिए।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए।
  • विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए एक शांति संस्थापक आयोग का गठन करना चाहिए।
  • विश्व में व्याप्त किसी भी प्रकार के आतंकवाद की निंदा एवं उसे नियन्त्रित करना।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र शैक्षणिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संघ (UNESCO) पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन जिसे प्रायः यूनेस्को के नाम से पुकारा जाता है, ने राष्ट्र संघ के अधीन बनाई गई अन्तर्राष्ट्रीय विद्वानों के सहयोगी संगठन का स्थान लिया है। यूनेस्को की स्थापना 4 नवम्बर, 1946 की गई। इनकी स्थापना के लिए लन्दन में 1 नवम्बर से 16 नवम्बर, 1945 तक एक सम्मेलन हुआ। इस सम्मेलन में 44 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सम्मेलन की कार्यवाही बड़ी उत्साहपूर्ण वातावरण में चली। विभिन्न पहलुओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया गया। इंग्लैंड तथा फ्रांस की सरकारों के प्रतिनिधियों ने इस संगठन के संविधान का निर्माण किया। लगभग एक वर्ष के बाद संविधान के स्वीकृत होने पर यूनेस्को की 4 नवम्बर, 1946 को विधिवत् स्थापना की गई। समझौते द्वारा संयुक्त राष्ट्र ने इस संगठन को अपने विशिष्ट अभिकरण के रूप में स्वीकार कर लिया। इसका प्रमुख उद्देश्य शिक्षा, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक कार्यों का प्रचार-प्रसार करना है।

प्रश्न 12.
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की कोई चार विशेषताएँ लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन प्रभुसत्ता सम्पन्न राज्यों का एक संगठन होता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन में सभी सदस्य राज्यों को समान समझा जाता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का संचालन स्थायी अभिकरणों एवं प्रक्रियाओं द्वारा चलाया जाता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की स्थापना सदस्य राज्यों द्वारा अपने सामान्य हितों की प्राप्ति के लिए होती है।

प्रश्न 13.
भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे को मजबूत करने वाले दो कारण बताएं।
उत्तर:
1. विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश-भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे का प्रमुख कारण यह है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक एवं जिम्मेदार देश है। भारत में नियमित समय पर चुनाव होते हैं तथा सभी लोगों को समान रूप से मताधिकार प्राप्त हैं।

2. संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत की भूमिका-भारत के सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यता के दावे का एक अन्य प्रमुख कारण यह है कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सदैव सकारात्मक भूमिका निभाई है तथा विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के संयुक्त राष्ट्र के कार्य में सदैव सहयोग दिया है।

प्रश्न 14.
एक ध्रुवीय युग में संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की आवश्यकता के कोई चार कारण लिखिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ की आवश्यकता के कोई चार कारण लिखिये।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र निम्नलिखित कारणों से एक अपरिहार्य संगठन हैं

1. विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए अपरिहार्य है। विश्व में बढ़ते आतंकवाद एवं भय को समाप्त करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्था की ही आवश्यकता है।

2. अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र ने विश्व के देशों को एक ऐसा मंच प्रदान किया है जहां अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर विचार-विमर्श होता है। संयुक्त राष्ट्र ने विभिन्न देशों के बीच राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, वैज्ञानिक आदि अनेक क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है।

3. मानवाधिकार की रक्षा के लिए संयुक्त राष्ट्र की आवश्यकता है।

4. निःशस्त्रीकरण के लिए संयुक्त राष्ट्र की आवश्यकता है।

प्रश्न 15.
भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से क्या लाभ प्राप्त हुए हैं ?
उत्तर:
भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सदस्यता से निम्नलिखित लाभ प्राप्त हुए हैं

  • भारत के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। विश्व बैंक ने पंचवर्षीय योजनाओं के लिए तकनीकी विशेषज्ञ एवं ऋण उपलब्ध करवाया है।
  • यूनेस्को ने भारत में शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया है।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ ने उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान के कई क्षेत्रों को कृषि युक्त बनाने का प्रयास किया है।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में कई प्रकार की बीमारियों को रोकने एवं समाप्त करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 16.
सुरक्षा परिषद् के स्थायी और अस्थायी सदस्यता के लिए सुझाए गए किन्हीं चार मानदण्डों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सुरक्षा परिषद् में उन नये देशों को शामिल किया जाए, जिनका मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिकॉर्ड अच्छा है।
  • सुरक्षा परिषद् में नये सदस्यों को शामिल करने का एक अन्य मानदण्ड भूगोलिक आधार है।
  • आर्थिक आधार पर भी सुरक्षा परिषद् की सदस्यता बढ़ाये जाने का सुझाव दिया जा रहा है।
  • कुछ विद्वानों का विचार है कि उन देशों को सुरक्षा परिषद् में शामिल किया जाए जिन्होंने विश्व शांति स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

प्रश्न 17.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के संगठन एवं कार्य लिखें।
उत्तर:
महासभा संयुक्त राष्ट्र संघ का सबसे बड़ा मुख्य चार्टर अंग है। यह एक प्रकार की विश्व संसद् है जिसका मुख्य काम विचार-विमर्श करना है। महासभा में संयुक्त राष्ट्र संघ के सारे सदस्यों को प्रतिनिधित्व मिलता है। इस समय संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 देश सदस्य हैं। इन 193 देशों के प्रतिनिधियों को मिलाकर महासभा बनती है। हर सदस्य देश इसमें अपने 5 प्रतिनिधि भेज सकता है, परन्तु हर देश का एक ही मत होता है।

1. निर्वाचित कार्य-महासभा 2/3 बहुमत से सुरक्षा परिषद् के 10 अस्थायी सदस्यों को दो साल के लिए चुनती है। महासभा आर्थिक तथा सामाजिक परिषद् के सदस्य भी चुनती है। यह ट्रस्टीशिप कौंसिल के कुछ सदस्य चुनती है। सुरक्षा परिषद् तथा महासभा अलग-अलग मत प्रयोग करके अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के 15 जजों का चुनाव करती है। महासभा सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर संयुक्त राष्ट्र के मुख्य सचिव को नियुक्त करती है।।

2. विचारशील कार्य-महासभा का सबसे महत्त्वपूर्ण काम चार्टर के अधीन सारे विषयों पर विचार करना तथा उसके आधार पर सिफ़ारिश करना है।

प्रश्न 18.
राष्ट्र संघ की असफलता के कोई चार कारण बताएं।
उत्तर:
राष्ट्र संघ की असफलता के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी हैं

  • राष्ट्र संघ में विभिन्न देशों को असमान प्रतिनिधित्व प्राप्त था।
  • राष्ट्र संघ की अपनी कोई सेना नहीं थी।
  • राष्ट्र संघ में ब्रिटेन तथा फ्रांस जैसे बड़े देशों का प्रभाव अधिक था, जबकि कमज़ोर देशों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था।
  • राष्ट्र संघ की असफलता के लिए सदस्य देशों की अव्यावहारिक नीतियां भी ज़िम्मेदार हैं।

प्रश्न 19.
अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए सुरक्षा परिषद् किन चार तरीकों का प्रयोग करती है ?
उत्तर:
1. वार्ता-इससे अभिप्राय है कि दो राष्ट्रों में अपने विवाद का समाधान करने हेतु बातचीत करना। बातचीत राष्ट्रों के मध्य भी हो सकती है और ऐसी बातचीत उनके प्रतिनिधियों के मध्य भी हो सकती है।

2. सत्सेवा और मध्यस्थता-यदि सम्बद्ध दोनों पक्षों में वार्ता का ढंग अपनाने पर समस्या का कोई समाधान नहीं निकलता तो अन्य देशों द्वारा उस विवाद के समाधान के लिए अपनी सेवाएं प्रदान की जा सकती हैं।

3. वाद-विवाद-यह विधि महासभा या सुरक्षा परिषद् द्वारा ग्रहण की जाती है। महासभा या सुरक्षा परिषद् द्वारा विवादग्रस्त दोनों पक्षों के प्रतिनिधियों को अपने तर्क एवं दावे प्रस्तुत करने के लिए कहा जाता है। इस प्रकार दोनों विरोधी ‘पक्षों को बिना किसी भय के अपने विचार व्यक्त करने के लिए एक मंच मिल जाता है और वाद-विवाद के माध्यम से विवाद के समाधान की आशा बढ़ जाती है।

4. जांच-इस विधि में विवाद के तथ्यों की जांच की जाती है। इस जांच द्वारा उन वास्तविकताओं का पता लगाया जाता है जिनसे विवादी पक्षों के मतभेदों को समाप्त किया जा सके।

प्रश्न 20.
शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व में हुए ऐसे कोई चार परिवर्तन लिखें जिनसे संयुक्त राष्ट्र संघ प्रभावित हुआ है ?
उत्तर:

  • 1991 में सोवियत संघ का पतन हो गया एवं संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति बन गया।
  • पिछले कुछ वर्षों में चीन ने उभरती हुई महाशक्ति के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है।
  • 9/11 की आतंकवादी घटना ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावित किया है।
  • विश्व में एड्स, आतंकवाद, जनसंहार, परमाणु हथियार, पर्यावरण क्षरण, वैश्विक तापन, महामारी तथा गृह युद्ध जैसी समस्याएं संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावित कर रही हैं।

प्रश्न 21.
विश्व बैंक के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
विश्व बैंक निम्नलिखित कार्य करता है

  • विश्व बैंक मानवीय विकास से सम्बन्धित कई महत्त्वपूर्ण कार्य करता है।
  • विश्व बैंक विश्व स्तर आधारभूत ढांचा तैयार करवाने में अपनी भूमिका निभाता है।
  • विश्व बैंक सदस्य देशों को अनुदान एवं ऋण प्रदान करता है।
  • विश्व बैंक अधिक ग़रीब देशों को अनुदान या ऋण देकर उन्हें वापिस नहीं लेता।

प्रश्न 22.
सितम्बर, 2005 में संयुक्त राष्ट्र संघ को अधिक प्रभावशाली एवं प्रांसगिक बनाने के लिए पास किए गए कोई चार प्रस्ताव लिखें।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) में सुधार के कोई चार सुझाव दीजिये।
उत्तर:

  • विश्व शान्ति को बढ़ावा देने के लिए एक शान्ति संस्थापक आयोग का गठन करना चाहिए।
  • विश्व में व्याप्त किसी भी प्रकार के आंतकवाद की निन्दा एवं उसे नियन्त्रित करना।
  • एक लोकतान्त्रिक कोष का गठन करना।
  • यदि कोई देश अपने नागरिकों की रक्षा में सक्षम नहीं है, तो विश्व समुदाय को उसकी रक्षा करनी चाहिए।

प्रश्न 23.
संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की सुरक्षा परिषद् के कार्यों का वर्णन कीजिए।
अथवा
संयुक्त राष्ट्र संघ के सुरक्षा परिषद् के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
सुरक्षा-परिषद् के निम्नलिखित कार्य हैं

(1) सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे मामले पर तुरन्त विचार कर सकती है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के भंग होने का भय हो।

(2) सुरक्षा-परिषद् आक्रामक कार्यवाहियों, विश्व शान्ति के लिए खतरे की सम्भावनाओं और शान्ति भंग किए जाने वाले कार्यों के विषय में कार्यवाही कर सकता है।

(3) सुरक्षा परिषद् प्रादेशिक समस्याएं सुलझाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

(4) चार्टर के अनुच्छेद 83 के अनुसार सामरिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के सम्बन्ध में संयुक्त राष्ट्र ने जो दायित्व ग्रहण किए हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी सुरक्षा परिषद् की है।

प्रश्न 24.
विश्व व्यापार संगठन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में हुई थी। यह संगठन ‘जेनरल एग्रीमेंट ऑन ट्रेड एवं टैरिफ’ के उत्तराधिकारी के रूप में सामने आया है। वर्तमान समय में इसके सदस्यों की संख्या 161 है। यह संगठन वैश्विक व्यापार के नियमों को निश्चित करता है। इस संगठन में प्रत्येक निर्णय सदस्य देशों की सहमति पर लिया जाता है।

यद्यपि यह संगठन विश्व स्तर पर व्यापारिक नियमों को निश्चित करता है, परन्तु फिर भी इस पर अमेरिका, यूरोपीय देशों तथा जापान जैसे देशों का प्रभाव अधिक है, जोकि अपने आर्थिक हितों की पूर्ति के लिए इस संगठन का दुरुपयोग करते हैं। इसीलिए विकासशील देश इस संगठन की कार्यप्रणाली से सन्तुष्ट नहीं रहते। विकासशील देशों का यहां आरोप है कि विश्व व्यापार संगठन की कार्यप्रणाली पारदर्शी नहीं है तथा यह संगठन बड़ी शक्तियों के प्रभाव में कार्य करता है।

प्रश्न 25.
ह्यूमन राइट वॉच के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:

  • ह्यूमन राइट वॉच विश्व स्तर पर मानवाधिकारों को बढ़ावा देने वाला एक स्वयं सेवी संगठन है।
  • ह्यूमन राइट वॉच मानवाधिकारों के उल्लंघन की ओर विश्व मीडिया का ध्यान आकर्षित करता है।
  • ह्यूमन राइट वॉच ने बारूदी सुरंगों पर रोक लगाने का प्रयास किया है।
  • ह्यूमन राइट वॉच बाल सैनिकों के प्रयोग को रोकने के लिए प्रयासरत है।।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 26.
विश्व के किन्हीं चार प्रमख अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • विश्व व्यापार संगठन-विश्व व्यापार संगठन की स्थापना सन् 1995 में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों के विषय में नियम बनाने के लिए की गई थी।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष-अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष वैश्विक स्तर पर वित्त व्यवस्था की देखभाल करता है।
  • गैट समझौता-गट समझौते का मुख्य उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में विकासशील देशों को समान रूप से भागीदार बनाना है।
  • विश्व बैंक-विश्व बैंक की स्थापना सन् 1946 में हुई। इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों में पुनर्निर्माण एवं विकास में सहायता देना है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ क्या है ?
अथवा
संयुक्त राष्ट्र का निर्माण कब हुआ था ?
उत्तर:
द्वितीय विश्वयुद्ध की भयानक तबाही देखकर संसार के सभी भागों में प्रत्येक मनुष्य सोचने लगा कि यदि ऐसा एक और युद्ध हुआ तो विश्व तथा मानव जाति का सर्वनाश हो जाएगा। अतः अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति स्थापित करने की दिशा में प्रयास किए जाने लगे। इसके लिए किसी विश्व समुदाय का होना ज़रूरी था।

अत: 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित करना, राष्ट्रों के बीच जन समुदाय के लिए समान अधिकारों तथा आत्म-निर्णय के सिद्धान्त के लिए राष्ट्रों के कार्यों को समन्वय करने के लिए एक केन्द्र का कार्य करना है। आरम्भ में उसके 51 राष्ट्र सदस्य थे और वर्तमान में इसके 193 राष्ट्र सदस्य हैं।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में वीटो’ शक्ति का प्रयोग करने वाले देशों के नाम बताइये।
उत्तर:
सुरक्षा परिषद् संयुक्त राष्ट्र की कार्यपालिका है। सुरक्षा परिषद् की कुल सदस्य संख्या 15 है। इनमें 10 अस्थायी सदस्य हैं तथा 5 स्थायी सदस्य हैं। 5 स्थायी सदस्यों को सुरक्षा परिषद् में वीटो अधिकार प्राप्त है। ये देश हैं-अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस तथा चीन।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र के महासचिव की नियुक्ति कैसे की जाती है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की नियुक्ति सुरक्षा परिषद् की सिफारिश पर महासभा करती है। महासचिव के लिए उम्मीदवार का नाम सुरक्षा परिषद् के 9 सदस्यों द्वारा समर्थित होना चाहिए। इन नौ सदस्यों में से पांच सदस्य राजनीतिक विज्ञान ( स्थायी होने चाहिए।

यदि पांच स्थायी सदस्यों में से एक स्थायी सदस्य भी निषेधाधिकार का प्रयोग कर दे तो महासचिव के पद के नामांकित व्यक्ति का नाम निरस्त हो जाता है। सुरक्षा परिषद् द्वारा नामित उम्मीदवार को महासभा में उपस्थिति तथा मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत प्राप्त करना पड़ता है। बहुमत प्राप्त करने के पश्चात् सम्बन्धित उम्मीदवार को संयुक्त राष्ट्र का महासचिव चुन लिया जाता है।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों (Specialised Agencies) के नाम लिखो।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की चार विशिष्ट एजेन्सियों के नाम इस प्रकार हैं

  • अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन।
  • संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन।
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन।
  • खाद्य एवं कृषि संगठन।

प्रश्न 5.
निषेधाधिकार पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।
उत्तर:
निषेधाधिकार या वीटो सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की महत्त्वपूर्ण शक्ति है। निषेधाधिकार का अर्थ है स्थायी सदस्यों द्वारा संयुक्त राष्ट्र में किसी प्रस्ताव को पास होने से रोकना। इसका अभिप्राय यह है कि यदि पांच स्थायी सदस्यों में से कोई भी एक सदस्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में रखे गए प्रस्ताव के विरोध में वोट डाल दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं होगा। उल्लेखनीय है कि सुरक्षा परिषद् में यदि कोई सदस्य अनुपस्थित रहता है तो उसको निषेधाधिकार का प्रयोग नहीं माना जाएगा।

  • प्रश्न 6.
    संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) के कोई दो उद्देश्य बताइए।
    उत्तर:
  • संयुक्त राष्ट्र का मुख्य उद्देश्य शान्ति एवं सुरक्षा कायम रखना है तथा युद्धों को रोकना और अन्तर्राष्ट्रीय विवादों को शान्तिपूर्ण साधनों द्वारा हल करना है।
  • भिन्न-भिन्न राज्यों के बीच समान अधिकारों के आधार पर मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों की स्थापना करना है।

प्रश्न 7.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.O.) के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:
विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुख्य कार्य इस प्रकार हैं

  • दवाओं और स्वास्थ्य से सम्बद्ध वस्तुओं के लिए उचित मानक (Standard) निर्धारित करना।
  • स्वास्थ्य के लिए प्रशासकीय नियमों का अध्ययन करके उनमें सुधारार्थ प्रयास करना।

प्रश्न 8.
हमें अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की क्यों आवश्यकता पड़ती है? कोई दो कारण बताइए।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय संगठन युद्ध और शान्ति के विषयों में मदद करते हैं।
  • राष्ट्रों के समक्ष कई बार ऐसी मुश्किल एवं बड़ी समस्या आ जाती है कि वे अकेला उसका हल नहीं निकाल सकता। इसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय संगठन की आवश्यकता पड़ती है।

प्रश्न 9.
संयुक्त राष्ट्र संघ (U.N.O.) के कोई दो सिद्धान्त बताइए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र सदस्यों की संप्रभु समानता पर आधारित है।
  • संयुक्त राष्ट्र के सभी सदस्य ईमानदारी से घोषणा-पत्र के अन्तर्गत निर्धारित दायित्वों का पालन करेंगे।

प्रश्न 10.
उन भारतीय अधिकारियों के नाम लिखो जो संयुक्त राष्ट्र में महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य करते रहे हैं।
उत्तर:

  • 1953 में श्रीमती विजय लक्ष्मी पण्डित महासभा की अध्यक्ष चुनी गई।
  • डॉ० राधाकृष्णन और मौलाना अबुल कमाल आजाद यूनेस्को के अध्यक्ष चुने गए।
  • राजकुमारी अमृतकौर विश्व स्वास्थ्य संगठन की अध्यक्ष चुनी गई थी।
  • 1956 में श्री वी० आर० सेठ खाद्य और कृषि संगठन के अध्यक्ष चुने गए थे।
  • डॉ० नगेन्द्र सिंह अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश और बाद में मुख्य न्यायाधीश बनाए गए थे।

प्रश्न 11.
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना में भारत की भूमिका का संक्षिप्त वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945 को की गई। भारत ने संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के लिए सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भाग लिया और चार्टर पर हस्ताक्षर करके संयुक्त राष्ट्र का प्रारम्भिक सदस्य बना। सानफ्रांसिस्को सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि श्री ए. रामास्वामी मुदालियर ने इस बात पर जोर दिया कि युद्ध को रोकने के लिए आर्थिक और सामाजिक न्याय का महत्त्व सर्वाधिक होना चाहिए। भारत की सिफ़ारिश पर चार्टर में मानव अधिकारों और मौलिक स्वतन्त्रताओं को बिना किसी भेदभाव के प्रोत्साहन करने का उद्देश्य जोड़ा गया।

प्रश्न 12.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन से अभिप्राय इस संगठन में कुछ महत्त्वपूर्ण बदलाव करने से है। पिछले कुछ वर्षों से विश्व राजनीति में बहुत बदलाव आए हैं और बदलते परिवेश में संयुक्त राष्ट्र संघ के अंगों एवं कार्यप्रणाली में कुछ दोष उत्पन्न हो गए हैं, जिससे कारण समय-समय इसके पुनर्गठन की मांग की जाती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 13.
संयुक्त राष्ट्र संघ के किन दो महत्त्वपूर्ण अंगों में सुधार की मांग की जा रही है ?
उत्तर:
1. सुरक्षा परिषद्-संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् में सुधार की सबसे अधिक मांग की जा रही है। क्योंकि इसमें सदस्य देशों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता।

2. महासभा-संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में भी समय-समय पर सुधार की मांग ली जाती रही है। भूतपूर्व महासचिव कोफी अन्नान के अनुसार महासभा में सर्वसम्मति की प्रक्रिया को समाप्त कर देना चाहिए तथा महासभा अध्यक्ष को आर्थिक शक्तिशाली बनना चाहिए।

प्रश्न 14.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन में भारत की स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के पुनर्गठन में भारत की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। भारत सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता का एक मजबूत उम्मीदवार है। नई मानवाधिकार परिषद् के 47 सदस्यों में से एक भारत भी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा में सुधारों तथा इसकी स्थाई सेना की धारणा में भी भारत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

प्रश्न 15.
वैश्विक तापवृद्धि (Global Warming) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
वैश्विक तापवृद्धि से अभिप्राय कई कारणों से विश्व के तापमान के बढ़ने से है। वैश्विक तापवृद्धि क्लोरो फ्लोरो कार्बन कहलाने वाले कुछ रसायनों के फैलाव के कारण हो रही है। वैश्विक तापवृद्धि से समुद्री तटीय देशों के डूबने का खतरा बढ़ गया है क्योंकि समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ने लगी है।

प्रश्न 16.
अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के कोई दो कार्य बताएं।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष विश्व स्तर पर वित्त व्यवस्था को नियन्त्रित करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष विभिन्न देशों की अपील पर उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करता है।

प्रश्न 17.
विश्व को संयुक्त राज्य अमेरिका से क्यों डर लगता है ? कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति रह गया है।
  • अमेरिका को अपनी इच्छानुसार कार्य करने से कोई देश या संगठन रोकने में सक्षम नहीं है।

प्रश्न 18.
संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिन्ह का वर्णन करें।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ एक विश्व संस्था है। अत: संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतीक चिन्ह में विश्व का मानचित्र बना हुआ है, तथा इसे चारों तरफ जैतून की पत्तियां हैं जोकि विश्व शान्ति का सन्देश देती हैं।

प्रश्न 19.
भारत कितनी बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है ?
उत्तर:
भारत अब तक आठ बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत सन् 1950, 1967, 1977, 1972, 1984, छठी बार 1991 में सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य रह चुका है। भारत सातवीं बार सुरक्षा परिषद् का अस्थायी सदस्य जनवरी 2011 से दिसम्बर 2012 तथा आठवीं बार जनवरी 2021 से दिसम्बर, 2022 तक चुना गया है।

प्रश्न 20.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय की व्याख्या करें।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय संयुक्त राष्ट्र का न्यायिक अंग है जिसे विश्व न्यायालय भी कहा जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में 15 जज होते हैं जिन्हें महासभा तथा सुरक्षा परिषद् अलग-अलग स्वतन्त्र तौर पर चुनती है। जज 9 साल के लिए चुने जाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय कानून तथा अन्तर्राष्ट्रीय सन्धियों से सम्बन्धित सभी विषय इसके पास ले जाए जा सकते हैं।

प्रश्न 21.
अन्तर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी (IAEA) के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्टीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी परमाण उर्जा के शान्तिपर्ण उपयोग को बढावा देती है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आण्विक ऊर्जा एजेन्सी समय-समय पर परमाणु सुविधाओं की जांच करती है ताकि नागरिक संयन्त्रों का प्रयोग सैनिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए न किया जा सके।

प्रश्न 22.
एमनेस्टी इंटरनेशनल के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • एमनेस्टी इंटरनेशनल सम्पूर्ण विश्व में मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करता है।
  • एमनेस्टी इंटरनेशनल विश्व स्तर पर मानवाधिकारों से सम्बन्धित रिपोर्ट तैयार करता है तथा उसे प्रकाशित करता है।

प्रश्न 23.
अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन के कोई दो कार्य लिखें।
उत्तर:

  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन विभिन्न देशों के मजदूरों के वेतन तथा काम करने का समय निश्चिय करता है।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संगठन मज़दूरों में प्रचलित बेकारी को रोकने का प्रयास करता है।

प्रश्न 24.
सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्यों के विशेषाधिकार को क्यों समाप्त नहीं किया जा सकता है ? कोई दो कारण दीजिए।
उत्तर:
(1) सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों के विशेषाधिकार इसलिए समाप्त नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के घोषणा-पक्ष में इन देशों को विशेष महत्त्व दिया गया है।

(2) यदि स्थाई सदस्यों के विशेषाधिकार समाप्त कर दिए जाएं, तो हो सकता है कि इन शक्तिशाली देशों की रुचि संयुक्त राष्ट्र संघ में न रहे, तथा ये देश इस संगठन से बाहर आकर अपनी इच्छानुसार कार्य करना शुरू कर दें।

प्रश्न 25.
भारत के संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के दावे के लिए कोई दो तर्क दीजिए।
उत्तर:
(1) भारत को संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता इसलिए मिलनी चाहिए, क्योंकि भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है। भारत में कुल जनसंख्या का 1/5 भाग निवास करता है।

(2) भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के सभी अंगों में दी गई अपनी भूमिका को प्रभावशाली ढंग से निभाया है।

प्रश्न 26.
भारत की संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् की स्थाई सदस्यता का विरोध करने वाले देशों के द्वारा दिए किन्हीं दो तर्कों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • आलोचक देश भारत के परमाणु हथियारों को लेकर चिंतित हैं।
  • आलोचकों का कहना है, कि भारत पाकिस्तान के साथ सम्बन्धों को लेकर सुरक्षा परिषद् में अप्रभावी रहेगा।

प्रश्न 27.
संयुक्त राष्ट्र के मुख्य अंगों के नाम लिखिए।
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र के 6 अंग हैं-

  • महासभा
  • सुरक्षा परिषद्
  • आर्थिक तथा सामाजिक परिषद्
  • ट्रस्टीशिप कौंसिल
  • अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय
  • सचिवालय।

प्रश्न 28.
सुरक्षा परिषद् के कार्य लिखिए।
उत्तर:

  • सुरक्षा परिषद् किसी ऐसे मामलों पर तुरन्त विचार कर सकती है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा के भंग होने का भय हो।
  • सुरक्षा परिषद् आक्रामक कार्यवाहियों, विश्व शान्ति के लिए खतरे की सम्भावनाओं और शान्ति भंग किए जाने वाले कार्यों के विषय में कार्यवाही कर सकती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

प्रश्न 29.
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में क्या भूमिका अदा की है ?
उत्तर:
भारत ने विश्व शान्ति की स्थापना में बहुत-ही महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। 1950 में संयुक्त राष्ट्र के अन्तर्गत उत्तर कोरिया के विरुद्ध भेजी गई सेनाओं में भारत ने भी अपनी सेना भेजी थी। सन् 1956 में मिस्त्र में स्वेज़ नहर के संकट को हल करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत ने संयुक्त राष्ट्र के निवेदन पर कांगों में अपनी सेनाएं भेजी तथा 1976 में अरब-इज़रायल विवाद को सुलझाने में अपना योगदान दिया।

प्रश्न 30.
विश्व के किन्हीं दो अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • संयुक्त राष्ट्र संघ-संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 24 अक्तूबर, 1945, को विश्व में शान्ति एवं व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई थी।
  • विश्व व्यापार संगठन-विश्व व्यापार संगठन की स्थापना 1995 में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार एवं आर्थिक गतिविधियों के विषय में नियम बनाने के लिए की गई थी।

प्रश्न 31.
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अर्थ लिखें।
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय संगठन का अर्थ सम्प्रभु राज्यों द्वारा अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए बनाए गए संगठनों से लिया जाता है। टुंकिन के अनुसार, “अन्तर्राष्ट्रीय संगठन राज्यों का ऐसा समूह है, जिसकी स्थापना सन्धि के आधार पर होती है तथा जिसका उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार अपने लक्ष्यों को प्राप्त करना होता है।”

प्रश्न 32.
संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावना की कोई दो व्यवस्थाएं बताएं।
उत्तर:

  • भविष्य की पीढ़ियों को युद्ध की विभीषका से बचाना।
  • मानवाधिकारों, मनुष्य के गौरव और उसके महत्त्व, पुरुषों एवं महिलाओं एवं छोटे और बड़े राष्ट्रों के समान अधिकारों पर विश्वास का अनुमोदन करना।

प्रश्न 33.
विश्व व्यापार संगठन कब बना?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन सन् 1995 में बना।

प्रश्न 34.
संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् के पांच स्थाई सदस्य देशों के नाम लिखें।
उत्तर:

  • अमेरिका
  • इंग्लैण्ड
  • फ्रांस
  • रूस
  • चीन।

प्रश्न 35.
“विश्व व्यापार संगठन” (W.T.0.) क्या है ?
उत्तर:
विश्व व्यापार संगठन का निर्माण 1 जनवरी, 1995 को हुआ था। यह संगठन विश्व व्यापार को नियमित और नियन्त्रित करने के लिए उत्तरदायी है। यह संगठन सभी सदस्य राष्ट्रों को अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बिना किसी भेदभाव के व्यापार करने की व्यवस्था करता है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्न में से किसे अन्तर्राष्ट्रीय संगठन माना जाता है ?
(A) सार्क
(B) आसियान
(C) संयुक्त राष्ट्र संघ
(D) यूरोपीयन संघ।
उत्तर:
(C) संयुक्त राष्ट्र संघ।

2. निम्न में से कौन-सा क्षेत्रीय आर्थिक संगठन है ?
(A) यूरोपीयन संघ
(B) आसियान
(C) सार्क
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

3. निम्न में से कौन-सा गैर सरकारी संगठन है ?
(A) अन्तर्राष्ट्रीय रेडक्रास सोसाइटी
(B) एमनेस्टी इंटरनेशनल
(C) ह्यमन राइट्स वॉच
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

4. संयुक्त राष्ट्र संघ के वर्तमान महासचिव कौन हैं ?
(A) एन्टोनियो गुटेरस
(B) बुतरस घाली
(C) कोफी अन्नान
(D) सी० घनपाला।
उत्तर:
(A) एन्टोनियो गुटेरस।

5. निम्न में से कौन-सा संयुक्त राष्ट्र संघ का एक अभिकरण है ?
(A) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन
(B) विश्व स्वास्थ्य संगठन
(C) अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

6. संयुक्त राष्ट्र संघ के अंग हैं
(A) 6
(B) 5
(C) 4
(D) 13
उत्तर:
(A) 6

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

7. संयुक्त राष्ट्र के सहस्त्राब्दिक प्रस्ताव (Millennium Declaration) पर कब हस्ताक्षर किये गए ?
(A) सितम्बर, 1995
(B) जून, 1999
(C) सितम्बर, 2000
(D) मार्च, 2001
उत्तर:
(C) सितम्बर, 2000

8. संयुक्त राष्ट्र संघ के अधीन ‘शान्ति निर्माण आयोग’ की स्थापना कब की गई ?
(A) दिसम्बर, 2005
(B) मार्च, 2003
(C) जून, 2002
(D) अगस्त, 2000
उत्तर:
(A) दिसम्बर, 2005

9. विश्व स्वास्थ्य संगठन (W.H.0.) का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) जेनेवा
(B) काठमाण्डू
(C) पेरिस
(D) लंदन।
उत्तर:
(A) जेनेवा।

10. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) की स्थापना हुई ?
(A) वर्ष, 1951 में
(B) वर्ष, 1955 में
(C) वर्ष, 1941 में
(D) वर्ष, 1945 में।
उत्तर:
(D) वर्ष, 1945 में

11. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल कितने अनुच्छेद हैं?
(A) 395
(B) 111
(C) 174
(D) 152
उत्तर:
(B) 111

12. निम्न में से कौन-सा देश संयुक्त राष्ट्र संघ का प्रारम्भिक सदस्य है ?
(A) पाकिस्तान
(B) बंग्लादेश
(C) भारत
(D) नेपाल।
उत्तर:
(C) भारत।

13. संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय स्थित है
(A) लंदन में
(B) न्यूयार्क में
(C) नई दिल्ली में
(D) हेग में।
उत्तर:
(B) न्यूयार्क में।

14. प्रारम्भ में संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने सदस्य थे ?
(A) 47
(B) 46
(C) 51
(D) 55
उत्तर:
(C) 51

15. वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र संघ के सदस्यों की संख्या है
(A) 197
(B) 196
(C) 193
(D) 195
उत्तर:
(C) 193

16. संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल होता है
(A) 2 वर्ष
(B) 4 वर्ष
(C) 5 वर्ष
(D) 6 वर्ष।
उत्तर:
(C) 5 वर्ष।

17. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय स्थित है
(A) न्यूयार्क में
(B) बीजिंग में
(C) हेग में
(D) दिल्ली में।
उत्तर:
(C) हेग में।

18. ‘संयुक्त राष्ट्र बाल आपात्कालीन कोष’ (UNICEF) का मुख्यालय स्थित है :
(A) पेरिस में
(B) रोम में
(C) जेनेवा में
(D) न्यूयार्क में।
उत्तर:
(D) न्यूयार्क में।

19. वह पहला कौन-सा भारतीय था, जो महासभा का अध्यक्ष बना ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) सी० राजगोपालाचार्य
(C) एस० राधाकृष्णन
(D) विजयलक्ष्मी पण्डित।
उत्तर:
(D) विजयलक्ष्मी पण्डित।

20. संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् के कितने देश स्थायी सदस्य हैं ?
(A) 5
(B) 10
(C) 15
(D) 27
उत्तर:
(A) 5

21. संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) का मुख्यालय कहां पर स्थित है ?
(A) बीजिंग में
(B) नई दिल्ली में
(C) हेग में
(D) न्यूयार्क में।
उत्तर:
(D) न्यूयार्क में।

22. संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में संशोधन की विधि का उल्लेख किस अनुच्छेद में किया गया है ?
(A) 108
(B) 99
(C) 111
(D) 102
उत्तरं:
(A) 108

23. अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) न्यूयार्क में
(B) हेग में
(C) नई दिल्ली में
(D) ढाका में।
उत्तर:
(B) हेग में।

24. ‘यूनेस्को’ (UNESCO) का मुख्यालय कहाँ पर स्थित है ?
(A) नई दिल्ली
(B) पेरिस
(C) कराची
(D) लंदन।
उत्तर:
(B) पेरिस।

25. विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना कब हुई ?
(A) 1 जनवरी, 1995 को
(B) 4 दिसम्बर, 1995 को
(C) 8 जनवरी, 1995 को
(D) 3 सितम्बर, 2000 को।
उत्तर:
(A) 1 जनवरी, 1995 को।

26. विश्व व्यापार संगठन (W.T.O.) अस्तित्व में कब आया ?
(A) 1 जनवरी, 1995 को
(B) 1 फरवरी, 1995 को
(C) 1 दिसम्बर, 1994 को
(D) 1 दिसम्बर, 1995 को।
उत्तर:
(A) 1 जनवरी, 1995 को।

27. निम्न एक भारतीय सन् 1982 में अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय के न्यायाधीश चुने गये थे ?
(A) डॉ० नगेंद्र सिंह
(B) डॉ० राधाकृष्णन
(C) एच० एम० बेग
(D) ए० एन० रे।
उत्तर:
(A) डॉ० नगेंद्र सिंह।

28. अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का मुख्यालय स्थित है :
(A) जेनेवा में
(B) न्यूयार्क में
(C) वाशिंगटन में
(D) पेरिस में।
उत्तर:
(D) जेनेवा में।

रिक्त स्थान भरें

(1) प्रतिवर्ष संयुक्त राष्ट्र संघ दिवस ……………….. को मनाया जाता है।
उत्तर:
24 अक्तूबर,

(2) संयुक्त राष्ट्र संघ में ……………….. मूल संस्थापक सदस्य हैं।
उत्तर:
51

(3) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना ……………… 1945 को हुई।
उत्तर:
24, अक्तूबर

(4) भारत संयुक्त राष्ट्र संघ का …………. देश है।
उत्तर:
संस्थापक

(5) संयुक्त राष्ट्र संघ के ………….. अंग हैं।
उत्तर:
6

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 6 अंतर्राष्ट्रीय संगठन

(6) संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्य उद्देश्य …………….. की स्थापना करना है।
उत्तर:
विश्व शांति

(7) संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल …………….. अनुच्छेद है।
उत्तर:
111

(8) संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य देशों की संख्या …… है।
उत्तर:
5

(9) संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना का मुख्य उद्देश्य …………. है।
उत्तर:
विश्व शांति

(10) सुरक्षा परिषद् के स्थायी सदस्यों की कुल संख्या …………… है।
उत्तर:
5

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कितने अनुच्छेद हैं ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल 111 अनुच्छेद हैं।

प्रश्न 2.
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय कहां स्थित है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय न्यूयार्क में स्थित है।

प्रश्न 3.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय इसके कुल कितने सदस्य थे ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के समय इसके कुल 51 सदस्य थे।

प्रश्न 4.
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल कितना होता है ?
उत्तर:
संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

प्रश्न 5.
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय कहां स्थित है ?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय हेग में स्थित है।

प्रश्न 6.
कौन-सी भारतीय नागरिक संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनी ?
उत्तर:
विजयलक्ष्मी पण्डित संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनी।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
पाकिस्तान एवं नेपाल में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव की चर्चा करें।
उत्तर:
पाकिस्तान एवं नेपाल दक्षिण एशिया के दो महत्त्वपूर्ण देश हैं। इन देशों का दुर्भाग्य यह रहा है कि यहाँ कभी भी लम्बे समय तक लोकतन्त्र कायम नहीं रह पाया है। लोकतन्त्र की स्थापना के कुछ वर्षों के बाद ही इन दोनों देशों में क्रमशः सैनिक तानाशाही एवं राजशाही कायम हो जाती है।

1. पाकिस्तान में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव (Democratisation and its reversals in Pakistan) 1947 में पाकिस्तान के निर्माण के समय लोकतान्त्रिक पद्धति में विश्वास जताया गया, परन्तु शीघ्र ही इस प्रक्रिया में बाधा पहुंची जब अयूब खान ने पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही लागू कर दी। तब से लेकर वर्तमान समय तक पाकिस्तान में कभी लोकतन्त्र सफलतापूर्वक कायम नहीं रह पाया। अयूब खान के बाद याहया खान तथा जिया उल हक ने पाकिस्तान में सैनिक तानाशाही को बनाये रखा। पाकिस्तान में लोकतन्त्र को कुछ हद तक सफलता 1990 के दशक में मिली, जब पहले नवाज़ शरीफ तथा बाद में बेनजीर भुट्टो ने लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव जीतकर अपनी-अपनी सरकारें बनाईं।

इन दोनों सरकारों के बनने से यह आशा बंधने लगी थी कि पाकिस्तान अब लोकतन्त्र के मार्ग पर बिना किसी बाधा के चलता रहेगा परन्तु यह आशा ज्यादा समय तक कायम नहीं रह पाई, क्योंकि अक्तूबर, 1999 में पाकिस्तानी सेना के जनरल परवेज मुशर्रफ ने नवाज शरीफ सरकार को हटाकर सत्ता अपने हाथों में ले ली। परवेज मुशर्रफ ने लोकतान्त्रिक ढांचे को समाप्त करके सम्पूर्ण शक्तियाँ अपने हाथों में ले लीं। उनके द्वारा समय-समय पर दिए गए बयानों से यह पता चलता है कि वह लम्बे समय तक पाकिस्तान के शासक बने रहना चाहते थे।

2007 के अन्त में मुशर्रफ ने सेना प्रमुख का पद छोड दिया तथा जनवरी, 2008 में चुनाव करवाने की घोषणा की परन्तु दिसम्बर, 2007 में बेनजीर भुट्टो की एक चुनाव रैली में हत्या कर दी गई। इससे पाकिस्तान में पुनः लोकतन्त्र की बहाली को एक ज़ोरदार झटका लगा। जनवरी में करवाए जाने वाले चुनावों को 18 फरवरी, 2008 को करवाये जाने की घोषणा की गई। इन चुनावों में मुस्लिम लीग एवं पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को संयुक्त रूप से बहुमत प्राप्त हुआ तथा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता सैयद यूसफ रजा गिलानी को प्रधानमन्त्री बनाया गया।

18 अगस्त, 2008 को परवेज मुशर्रफ ने लगातार बढ़ते दबाव के कारण राष्ट्रपति पद से त्याग-पत्र दे दिया। 6 सितम्बर, 2008 को पाकिस्तान के नये राष्ट्रपति का चुनाव हुआ। इस चुनाव में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता आसिफ अली जरदारी भारी बहुमत से राष्ट्रपति निर्वाचित हुए। इस प्रकार जनवरी, 2008 से लेकर सितम्बर, 2008 तक पाकिस्तान में पुनः लोकतन्त्र को स्थापित करने की प्रक्रिया चलती रही। अब पाकिस्तानी राजनीतिक दलों एवं नेताओं पर यह दायित्व है, कि वे अपने यहां लोकतान्त्रिक जड़ों को और मज़बूत करें।

2. नेपाल में लोकतन्त्रीकरण एवं इसके उलटाव (Democratisation and its reversals in Nepal) नेपाल भारत का एक महत्त्वपूर्ण पड़ोसी देश है। नेपाल में भी समय-समय पर लोकतन्त्र की स्थापना की गई, परन्तु वहां पर प्रायः लोकतन्त्र का उलटाव होता रहा है। 1959 में नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना की गई, परन्तु 1962 में नेपाल नरेश महेन्द्र ने लोकतान्त्रिक व्यवस्था को समाप्त करके शासन सत्ता पर अपना अधिकार जमा लिया। नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों, छात्र संघों तथा श्रम संगठनों ने अनेक निरन्तर आन्दोलन जारी रखा। अन्ततः 1991 में नेपाल में पुनः लोकतान्त्रिक सरकार की स्थापना हुई।

परन्तु इस बार भी नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था स्थिर होकर कार्य नहीं कर पाई। इसी दौरान नेपाल नरेश वीरेन्द्र एवं उसके परिवार की अज्ञात परिस्थितियों में सामूहिक हत्या कर दी गई। राजा वीरेन्द्र के पश्चात् उनके भाई ज्ञानेन्द्र नेपाल नरेश बने, इनके समय में नेपाल में लोकतन्त्र ठीक तरह से नहीं चल पाया तथा इन्होंने नेपाल में संसद् को भंग करके शासन की सभी शक्तियां अपने हाथ में ले लीं, जिसके विरोध में नेपाल में व्यापक विरोध आन्दोलन हुए। अन्ततः अप्रैल, 2006 में नेपाल नरेश को आपात्काल की घोषणा वापस लेनी पड़ी। संसद् को पुनः बहाल करना पड़ा तथा गिरिजा प्रसाद कोइराला को देश का प्रधानमन्त्री नियुक्त किया।

नेपाल के सात राजनीतिक दलों ने मिलकर नये संविधान की रचना की तथा 28 मई, 2008 को पिछले 240 वर्षों से चले आ रहे राजतंत्र को सदैव के लिए समाप्त कर दिया। 15 अगस्त, 2008 को संविधान सभा में प्रधानमन्त्री के निर्वाचन के लिए चुनाव हुआ। इस चुनाव में सी० पी० एन० (एम०) के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचण्ड’ प्रधानमन्त्री चुने गए। प्रचण्ड राजशाही समाप्त होने के पश्चात् नेपाल के प्रथम प्रधानमन्त्री बने। परन्तु मई, 2009 में प्रचण्ड ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके स्थान पर सी० पी० एन०-यू० एम० एल० गठबन्धन ने माधव कुमार को नेपाल का प्रधानमन्त्री बनाया।

परंतु माओवादियों के विरोध के कारण माधव कुमार नेपाल को जन, 2010 में अपने पद से त्याग-पत्र देना पड़ा। नेपाल में नवम्बर, 2013 में लोकतान्त्रिक ढंग से चुनाव हुए। इन चुनावों के परिणामों के आधार पर नेपाली कांग्रेस पार्टी के नेता श्री सुशील कोइराला नेपाल के प्रधानमन्त्री बने। 20 सितम्बर, 2015 संविधान लागू किया गया। यद्यपि वर्तमान समय में नेपाल में लोकतान्त्रिक व्यवस्था बहाल हुई है, परन्तु इसे लम्बे समय तक बनाये रखने की आवश्यकता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 2.
भारत और श्रीलंका के बीच सहयोग और विवाद के क्षेत्रों का परीक्षण कीजिए।
अथवा
भारत के श्रीलंका के साथ पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारत और श्रीलंका के सम्बन्ध लगभग दो हज़ार वर्षों से अधिक पुराने हैं। भारत पर ब्रिटिश शासन स्थापित होने पर श्रीलंका भी इंग्लैण्ड के अधीन हो गया। 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब श्रीलंका ने भारत का समर्थन नहीं किया, जिससे भारतीयों की भावना को ठेस पहुंची। यद्यपि तब से लेकर अब तक दोनों के बीच सम्बन्धों में परिवर्तन आया है और सम्बन्ध सुधरे हैं परन्तु फिर भी दोनों देशों के बीच कुछ विषयों पर मतभेद पाया जाता है। दोनों देशों के बीच पाए जाने वाले विवाद और सहयोग का वर्णन इस प्रकार है

विवाद का विषय
1. श्रीलंका में भारतीय वंशजों की समस्या-भारत और श्रीलंका में तनाव का कारण श्रीलंका में बसे लाखों भारतीयों की समस्या रही है। श्रीलंका की स्वतन्त्रता के समय लगभग 10 लाख भारतीय मूल के नागरिक वहां रह रहे थे। श्रीलंका में 1949 में नागरिक अधिनियम पास कर दिया गया। लगभग सभी भारतीय मूल के निवासियों (8.2 लाख) ने इस अधिनियम के अन्तर्गत नागरिकता के लिए प्रार्थना की परन्तु अक्तूबर, 1964 तक केवल एक लाख 34 हजार व्यक्तियों को ही नागरिकता प्राप्त हुई। श्रीलंका सरकार ने जिन भारतीयों को नागरिकता प्रदान नहीं की थी उन्हें तुरन्त भारत चले जाने के लिए कहा। परन्तु सरकार का कहना था कि जो व्यक्ति कई पीढ़ियों से वहां रहे हैं उनको निकालना गलत है और वे वहीं के नागरिक हैं न कि भारत के। यह समस्या अब भी पूरी तरह से हल नहीं हुई है।

2. तमिल समस्या- भारत और श्रीलंका के सम्बन्धों में तनाव का महत्त्वपूर्ण कारण तमिल समस्या है। 1984 में म्भीर हो गई कि दोनों देशों के सम्बन्धों में काफ़ी तनाव रहा। तमिल समस्या से निपटने के लिए प्रधानमन्त्री राजीव गांधी ने शान्ति सेना भी भेजी। लेकिन आज भी यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है। तमिल शरणार्थी-मार्च, 1990 में श्रीलंका से कई हज़ार शरणार्थी भारत आए हैं। इन शरणार्थियों की समस्या आज भी बनी हुई है।

सहयोग के विषय
1. कच्चा टीबू द्वीप:
कच्चा टीबू द्वीप की समस्या को हल करने के लिए जून, 1974 में दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अनुसार कच्चा टीबू द्वीप श्रीलंका को दे दिया गया।

2. संयक्त आयोग की स्थापना:
दोनों देशों के विदेश मन्त्रियों ने जलाई, 1991 में संयक्त आयोग के गठन के समझौते पर हस्ताक्षर किए। 17 फरवरी, 1992 में संयुक्त आयोग की दो दिवसीय बैठक के बाद भारत और श्रीलंका ने व्यापार, आर्थिक और प्रौद्योगिक के क्षेत्र में आपसी सहयोग का दायरा बढ़ाने का फैसला किया।

3. द्विपक्षीय मुक्त व्यापार क्षेत्र:
दिसम्बर, 1998 में श्रीलंका के राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुंगा और भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी के बीच दोनों देशों के मध्य एक मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने का समझौता हुआ। इस समझौते के परिणामस्वरूप जहां दोनों देशों का व्यापार बढ़ेगा वहां इन देशों के आपसी सम्बन्ध भी मजबूत होंगे। जून, 2002 में श्रीलंका के प्रधानमन्त्री श्री रानिल विक्रमसिंघे चार दिन की सरकारी यात्रा पर भारत आए। श्री विक्रमसिंघे की इस यात्रा के दौरान भारत ने श्रीलंका को 3 लाख टन गेहूँ उपलब्ध कराने की पेशकश और साथ ही भारतीय उत्पादों की खरीद के लिए 10 करोड़ डॉलर की साख सुविधा की सहमति भी प्रदान की। इससे दोनों देशों के सम्बन्धों में सहयोग उत्पन्न हुआ।

2 जून, 2005 को श्रीलंका की राष्ट्रपति चन्द्रिका कुमार तुंगा भारत यात्रा पर आईं। उन्होंने भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ० मनमोहन से द्विपक्षीय, क्षेत्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर बातचीत की। अगस्त, 2008 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह 15वें सार्क सम्मेलन में भाग लेने के लिए श्रीलंका की यात्रा पर गए। इस यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपाक्षे से मिले। इस बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने लिट्टे की समस्या सहित द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

जून, 2011 में श्रीलंका के राष्ट्रपति महिन्द्रा राजपाक्षे भारत यात्रा पर आए तथा दोनों ने सुरक्षा एवं विकास से सम्बन्धित सात समझौतों पर हस्ताक्षर किये। मई, 2014 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए श्रीलंका के राष्ट्रपति श्री महिन्द्रा राजपाक्षे भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

मार्च 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने श्रीलंका के लोगों को वीजा ऑन अराइवल देने की घोषणा की। अक्तूबर, 2016 में श्री लंका के राष्ट्रपति श्री सेना भारत हुए बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। मई 2017 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय मुद्दों चर्चा की।

अक्तूबर 2018 में श्रीलंका के प्रधानमन्त्री ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने बुनियादी स्तर के चलाए जाने वाले कार्यक्रमों को गति प्रदान करने पर सहमति प्रकट की। जून, 2019 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने श्रीलंका की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा एवं आतंकवाद पर चर्चा की। नवम्बर 2019 में श्री लंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने भारत की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। फरवरी 2020 में श्रीलंका के प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग एवं सुरक्षा पर बातचीत की।

प्रश्न 3.
भारत तथा पाकिस्तान के सम्बन्धों का परीक्षण कीजिए।
उत्तर:
15 अगस्त, 1947 को भारत स्वतन्त्र हुआ, परन्तु साथ ही भारत का विभाजन भी हुआ और पाकिस्तान का जन्म हुआ। पाकिस्तान का जन्म ब्रिटिश शासकों की ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति का परिणाम था। पाकिस्तान भारत का पड़ोसी देश है, जिसके कारण भारत-पाक सम्बन्धों का महत्त्व है। विस्थापित, सम्पत्ति, देशी रियासतों की संवैधानिक स्थिति, नहरी पानी, सीमा-निर्धारण, वित्तीय और व्यापारिक समायोजन, जूनागढ़, हैदराबाद तथा कश्मीर और कच्छ के विवादों के लिए भारत और पाकिस्तान में युद्ध होते रहे हैं और तनावपूर्ण स्थिति बनी रही है।

कश्मीर विवाद (Kashmir Controversy)-स्वतन्त्रता से पूर्व कश्मीर भारत के उत्तर-पश्चिमी कोने में स्थित एक देशी रियासत थी। पाकिस्तान ने पश्चिमी सीमा प्रान्त के कबाइली लोगों (Tribesmen) को प्रेरणा और सहायता देकर कश्मीर पर आक्रमण करवा दिया। इस पर जम्मू-कश्मीर के राजा हरी सिंह ने 22 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर को भारत में शामिल करने की प्रार्थना की। 27 अक्तूबर को भारत सरकार ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया। भारत ने पाकिस्तान से कबाइलियों को मार्ग न देने के लिए कहा परन्तु पाकिस्तान पूरी सहायता देता रहा। इस पर लॉर्ड माऊंटबेटन के परामर्श पर भारत सरकार ने 1 जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र चार्टर की 34वीं और 38वीं धारा के अनुसार सुरक्षा परिषद् से पाकिस्तान के विरुद्ध शिकायत की और अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को आक्रमणकारियों की सहायता बन्द करने को कहें।

कश्मीर और संयुक्त राष्ट:
परन्तु सुरक्षा परिषद् कश्मीर विवाद का कोई समाधान करने में असफल रही। 21 अप्रैल, 1948 को सुरक्षा परिषद् ने 5 सदस्यों को भारत और पाकिस्तान के लिए संयुक्त आयोग (U.N.C.I.P.) की नियुक्ति की और 1 जनवरी, 1949 को कश्मीर में युद्ध विराम हो गया। सन् 1965 का पाक आक्रमण-सन् 1965 में भारत को दो बार पाकिस्तान के आक्रमण का शिकार होना पड़ा पहली बार अप्रैल में कच्छ के रणक्षेत्र में और दूसरी बार सितम्बर में कश्मीर में।

सितम्बर, 1965 में पाकिस्तानी सेनाओं ने अन्तर्राष्ट्रीय सीमा का उल्लंघन करके छम्ब क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया। अन्त में सुरक्षा परिषद् के 20 सितम्बर के प्रस्ताव का पालन करते हुए दोनों पक्षों ने 22-23 सितम्बर की सुबह 3-30 बजे युद्ध बन्द कर दिया। इस समय तक भारतीय सेनाएँ लाहौर के दरवाजे तक पहंच चुकी थीं। ताशकन्द समझौता-10 जनवरी, 1966 को सोवियत संघ के प्रधानमन्त्री श्री कोसिगन के प्रयत्न से दोनों देशों में ताशकन्द समझौता हो गया जिसके द्वारा भारत के प्रधानमन्त्री तथा पाकिस्तान के राष्ट्रपति इस बात पर सहमत हो गए कि दोनों देशों के सभी सशस्त्र सैनिक 25 फरवरी, 1966 से पूर्व उस स्थान पर वापस बुला लिए जाएंगे जहां वे 5 अगस्त, 1965 से पूर्व थे तथा दोनों पक्ष युद्ध विराम रेखा पर युद्ध-विराम शर्तों का पालन करेंगे।

1969 में अयूब खां के हाथ से सत्ता निकल कर जनरल याहिया खां के हाथों में आ गई। याहिया खां ने भारत के साथ अमैत्रीपूर्ण नीति का अनुसरण किया। 1971 का युद्ध-1971 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बंगला देश) में जनता ने याहिया खां की तानाशाही के विरुद्ध स्वतन्त्रता का आन्दोलन आरम्भ कर दिया। याहिया खां ने आन्दोलन को कुचलने के लिए सैनिक शक्ति का प्रयोग किया। भारत ने बंगला देश के मुक्ति संघर्ष में उसका साथ दिया। मुक्ति संघर्ष के समय लगभग एक करोड़ शरणार्थियों को भारत में आना पड़ा। इससे भारत की आर्थिक व्यवस्था पर बड़ा बोझ पड़ा।

पाकिस्तान ने 3 दिसम्बर, 1971 को भारत पर आक्रमण कर दिया। भारत ने पाकिस्तान को सबक सिखाने का निश्चय किया और पाकिस्तान के आक्रमण का डटकर मुकाबला किया। 5 दिसम्बर को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय संसद् में बंगला देश गणराज्य के उदय की सूचना दी। 16 दिसम्बर, 1971 में ढाका में जनरल नियाज़ी ने आत्म-समर्पण के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर दिए और लगभग 1 लाख सैनिकों ने आत्म-समर्पण कर दिया।

शिमला सम्मेलन-3, जुलाई 1972 को दोनों देशों के बीच एक समझौता हुआ, जो शिमला समझौते के नाम से प्रसिद्ध हुआ। शिमला समझौते के पश्चात् द्वि-पक्षीय वार्तालाप के सिद्धान्तों को प्रोत्साहन दिया गया। मार्च, 1977 में जनता सरकार की स्थापना के पश्चात् भारत-पाक सम्बन्धों में और सुधार हुआ। श्रीमती गांधी सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनवरी, 1980 में प्रधानमन्त्री बनने पर भारत-पाक सम्बन्ध को सुधारने पर बल दिया, परन्तु सोवियत सेना के अफ़गानिस्तान में होने से स्थिति काफ़ी खराब हो गई। जनवरी-फरवरी, 1982 में पाकिस्तान के विदेश मन्त्री आगाशाह भारत आए और उन्होंने युद्ध-वर्जन सन्धि का प्रस्ताव पेश किया जिस पर श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारत-पाक में सहयोग बढ़ाने के लिए संयुक्त आयोग की स्थापना का सुझाव दिया।

श्री राजीव गांधी की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध सहयोग के प्रयास-1985 में भारत और पाकिस्तान के कई मन्त्रियों और अधिकारियों की एक-दूसरे के देशों में यात्राएं हुईं। व्यापार, कृषि, विज्ञान, तकनीकी और संस्कृति के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए कुछ समझौते भी हुए। प्रधानमन्त्री राजीव गांधी की पाकिस्तान यात्रा-29 दिसम्बर, 1988 को प्रधानमन्त्री राजीव गांधी दक्षेस (दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग) शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान गए और उनकी पाकिस्तान की प्रधानमन्त्री बेनजीर भुट्टो से भारत-पाक सम्बन्धों पर भी बातचीत हुई।

31 दिसम्बर, 1988 को भारत और पाकिस्तान ने आपसी सम्बन्ध सद्भावनापूर्ण बनाने के उद्देश्य से शिमला समझौते के करीब 16 वर्ष बाद तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए जिनमें एक-दूसरे के परमाणु संयन्त्रों पर आक्रमण नहीं करने सम्बन्धी समझौता काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। राष्टीय मोर्चा सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध दिसम्बर, 1989 में वी० पी० सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार बनी। इस सरकार के अल्पकालीन कार्यकाल में भारत-पाक सम्बन्धों में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई।

नरसिम्हा राव की सरकार और भारत-पाक सम्बन्ध राष्ट्रमण्डल शिखर सम्मेलन में भाग लेने आए भारत और पाक के प्रधानमन्त्री ने 17 अक्तूबर, 1991 को हरारे में बातचीत की। 1 जनवरी, 1992 को भारत और पाकिस्तान द्वारा यह समझौता लागू कर दिया गया, जिससे एक-दूसरे के आण्विक ठिकानों और सुविधाओं पर हमला न करने की व्यवस्था की गई थी। पाक परमाणु कार्यक्रम-पाक परमाणु कार्यक्रम में भारत काफी समय से चिन्तित है। पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम से चिन्तित होकर भारत ने भी मई, 1998 में पांच परमाणु परीक्षण किए जिसके मुकाबले में पाकिस्तान ने छः परमाणु परीक्षण किए।

बस सेवा के लिए भारत-पाक समझौता-17 फरवरी, 1999 को भारत और पाकिस्तान ने नई दिल्ली और लाहौर के बीच बस सेवा प्रारम्भ करने के लिए एक समझौता किया। 20 जनवरी, 1999 को भारत-पाक सम्बन्धों में एक नया अध्याय उस समय खुला जब भारतीय प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं बस से लाहौर तक गए। ऐतिहासिक लाहौर घोषणा के अन्तर्गत भारत व पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर सहित सभी विवादों को गम्भीरता से हल करने पर सहमत हुए और दोनों ने एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने का विश्वास व्यक्त किया।

कारगिल मुद्दा-पाकिस्तान ने लाहौर घोषणा को रौंदते हुए भारत के कारगिल व द्रास क्षेत्र में व्यापक घुसपैठ करवाई। अनंत धैर्य के पश्चात् 26 मई, 1999 को भारत ने पाकिस्तान के इस विश्वासघात का करारा जवाब दिया। 12 अक्तूबर, 1999 को पाकिस्तान में सेना ने शासन पर अपना कब्जा कर लिया। लेकिन पाकिस्तान के जनरल परवेज़ मुशर्रफ ने भी भारत के साथ सम्बन्धों में मधुरता का कोई संकेत नहीं दिया। आगरा शिखर वार्ता-पाकिस्तान के शासक परवेज मुशर्रफ भारत के आमन्त्रण पर जुलाई, 2001 में भारत आए। भारत में दोनों देशों के बीच शिखर वार्ता हुई, जिसमें कश्मीर समस्या का समाधान, प्रायोजित आतंकवाद, एटमी लड़ाई का खतरा, सियाचिन से सेना की वापसी, व्यापार की सम्भावनाएं, युद्धबन्दियों की रिहाई एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान मुख्य मुद्दे थे, परन्तु मुशर्रफ के अड़ियल रवैये के कारण यह वार्ता विफल रही।

भारतीय संसद् पर हमला-13 दिसम्बर, 2001 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद ने भारतीय संसद् पर हमला किया जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत खराब हो गये तथा दोनों देशों ने सीमा पर फौजें तैनात कर दी, परन्तु विश्व समुदाय के हस्तक्षेप एवं पाकिस्तान द्वारा लश्कर-ए-तोइबा एवं जैश-ए-मोहम्मद पर पाबन्दी लगाए जाने से दोनों देशों में तनाव कुछ कम हुआ।
प्रधानमन्त्री वाजपेयी की इस्लामाबाद यात्रा-जनवरी, 2004 में भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी चार दिन के लिए ‘दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन’ (सार्क) के शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद गए।

अपनी यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति व प्रधानमन्त्री से मुलाकात की। इस शिखर सम्मेलन से दोनों देशों के बीच तनाव में कमी आई और दोनों ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति व्यक्त की। मुम्बई पर आतंकवादी हमला—26 नवम्बर, 2008 को पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों ने मुम्बई के होटलों पर कब्जा करके कई व्यक्तियों को मार दिया। भारत ने पाकिस्तान में चल रहे आतंकवादी शिविरों को बन्द करने की मांग की, जिसे पाकिस्तान ने नहीं माना, इससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जुलाई 2009 में मिस्र में 15वें गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दौरान मिले तथा दोनों नेताओं ने परस्पर द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। इस बैठक के दौरान दोनों देशों ने विवादित मुद्दों को परस्पर बातचीत द्वारा हल करने की बात को दोहराया था।

25 फरवरी, 2010 को भारत एवं पाकिस्तान के विदेश सचिवों की नई दिल्ली में बातचीत हुई। इस बातचीत के दौरान भारत ने पाकिस्तान को वांछित आतंकवादियों को भारत को सौंपने को कहा। – अप्रैल, 2010 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री सार्क सम्मेलन के दौरान भूटान में मिले। इस बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। नवम्बर 2011 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मालद्वीप मे 17वें सार्क शिखर सम्मेलन के दौरान मिले। इस बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सम्बन्धों पर बातचीत की।

दिसम्बर, 2012 में पाकिस्तान के आन्तरिक मंत्री श्री रहमान मलिक भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने वीजा नियमों को और सरल बनाया। सितम्बर, 2013 में संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने द्विपक्षीय मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने सभी विवादित मुद्दों को बातचीत द्वारा हल करने पर सहमति जताई। मई, 2014 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ श्री नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

जुलाई, 2015 में भारत एवं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान रूस के शहर उफा में मुलाकात की। इस बैठक में दोनों नेताओं ने आतंकवाद एवं द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। 25 दिसम्बर, 2015 को भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अचानक पाकिस्तान पहुंच कर दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार लाने का प्रयास किया। 2016 में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पठानकोट एवं उरी में आतंकवादी हमले किये, जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध और अधिक खराब हो गए। भारत ने 29 सितम्बर, 2016 को सर्जीकल स्ट्राईक करके कई पाकिस्तानी समर्थित आतंकवादियों को मार गिराया।

नवम्बर, 2018 में भारत-पाकिस्तान ने करतारपुर कॉरिडोर को बनाने की घोषणा की। यह कॉरिडोर 9 नम्वम्बर, 2019 को खोला गया। करतारपुर साहब सिक्खों का पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां गुरु नानक देव जी ने अपने जीवन के 18 साल बिताए थे। नवम्बर 2018 में सिख समुदाय के लिए भारत एवं पाकिस्तान द्वारा करतारपुर कॉरिडोर खोलने के लिए बनी सहमति एक अच्छा कदम बताया जा सकता है।

14 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने पुलवामा में आंतकी हमला करके भारत के 40 सैनिक शहीद कर दिये, जिसके जवाब में भारत ने 26 फरवरी, 2019 को पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी अड्डे बालाकोट में हवाई हमला करके 250 से 300 आतंकवादी मार गिराये। उपर्युक्त विवरण के आधार पर यह स्पष्ट्र रूप से कहा जा सकता है कि भारत और पाकिस्तान के सम्बन्ध न तो सामान्य थे, और न ही सामान्य हैं। समय के साथ-साथ दोनों देशों में कटुता बढ़ती जा रही है। यह खेद का विषय है कि दोनों देशों में इस कड़वाहट को दोनों देशों के पढ़े-लिखे नागरिक भी दूर करने में असफल रहे। वास्तव में दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध तब तक स्थापित नहीं हो सकते जब तक कि दोनों देशों के बीच अनेक विवादास्पद मुद्दों को हल नहीं किया जाता।

प्रश्न 4.
पाकिस्तान के साथ भारत के सम्बन्धों को किस प्रकार सुधारा जा सकता है ?
उत्तर:
भारत एवं पाकिस्तान दक्षिण एशिया के दो महत्त्वपूर्ण और पड़ोसी देश हैं। इन दोनों के सम्बन्ध अधिकांशतः तनावपूर्ण ही रहे हैं, इनके सम्बन्धों को निम्नलिखित ढंग से सुधारा जा सकता है

1. राजनीतिक स्तर पर प्रयास-भारत व पाकिस्तान दोनों राजनीतिक स्तर पर प्रयास करके आपसी सम्बन्धों को सुधार सकते हैं। दोनों देशों को सभी विवादित मुद्दों का शांतिपूर्ण हल खोजना चाहिए। पाकिस्तान को भारत विरोधी आतंकवादी गतिविधियां बन्द कर देनी चाहिएं। दोनों देशों के नेताओं को एक-दूसरे देश की अधिक-से-अधिक यात्राएं करके आपसी विश्वास बढ़ाना चाहिए। दोनों देशों को राजनीतिक समझौते करने चाहिएं। बस-सेवा, रेल सेवा तथा वायु सेवा की शुरुआत इसी प्रकार के समझौते हैं।

2. आर्थिक स्तर पर प्रयास-दोनों देशों को आपसी सम्बन्ध सुधारने के लिए न केवल राजनीतिक स्तर पर ही प्रयास करने चाहिए बल्कि आर्थिक स्तर पर भी प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों को मिलकर भारतीय उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली बेरोज़गारी तथा ग़रीबी को दूर करने के प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों को एक-दूसरे की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करना चाहिए।

3. सामाजिक स्तर पर प्रयास- भारत और पाकिस्तान को अपने सम्बन्ध सुधारने के लिए सामाजिक स्तर पर प्रयास करने चाहिएं। दोनों देशों में एक-दूसरे के सगे-सम्बन्धी रहते हैं। दोनों सरकारों को चाहिए कि वे समय-समय इन लोगों को आपस में मिलने की सुविधा प्रदान करें, ताकि दोनों देशों में तनाव कम हो। इस स्तर पर दोनों सरकारों ने कुछ कदम उठाएं भी हैं, जैसे रेल सेवा, बस सेवा तथा वायु सेवा की पुनः शुरुआत इसी प्रकार के प्रयासों में शामिल हैं।

4. सांस्कृतिक स्तर पर प्रयास-दोनों देशों की सरकारों को अपने सांस्कृतिक सम्बन्ध भी सुधारने चाहिएं। दोनों देशों के बीच साहित्य-कला, संस्कृति तथा खेल गतिविधियों का आदान-प्रदान होना चाहिए। दोनों देशों को वीज़ा की सुविधा को और आसान बनाना चाहिए, ताकि कोई भी इच्छुक कलाकार, साहित्य प्रेमी, बुद्धिजीवी या पत्रकार को वीज़ा लेने में परेशानी न हो।

5. तकनीकी तथा चिकित्सा सेवा का आदान-प्रदान-दोनों देश तकनीकी ज्ञान तथा चिकित्सा के क्षेत्र में भी साथ काम करके आपसी सम्बन्ध सुधार सकते हैं। पिछले कुछ समय में कई पाकिस्तानी बच्चों तथा व्यक्तियों का सफल इलाज भारत में किया गया है। इसी तरह पाकिस्तान तकनीकी क्षेत्र में भी भारत की मदद ले सकता है। उपरोक्त प्रयासों का यदि ईमानदारी से पालन किया जाए तो यकीनी तौर पर भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध सुधर सकते हैं।

प्रश्न 5.
भारत तथा बांग्लादेश के बीच मधुर एवं तनावपूर्ण सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
बांग्लादेश के अस्तित्व और उसकी स्वतन्त्रता का श्रेय भारत को है। 1971 में बांग्लादेश स्वतन्त्र देश बना। इससे पूर्व बांग्लादेश पाकिस्तान का हिस्सा तथा पूर्वी पाकिस्तान कहलाता था। बांग्लादेश की स्वतन्त्रता के लिए भारत के जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी। 6 दिसम्बर, 1971 को भारत ने बांग्लादेश को मान्यता दे दी।

1971 की मैत्री सन्धि:
शेख मुजीबुर्रहमान 12 जनवरी, 1972 को बांग्लादेश के प्रधानमन्त्री बने। फरवरी, 1972 में जब वे भारत आए तो उन्होंने कहा था, “भारत और बांग्लादेश की मित्रता चिरस्थायी है, उसे दुनिया की कोई ताकत तोड़ नहीं सकती।” 19 मार्च, 1972 को भारत और बांग्लादेश में 25 वर्ष की अवधि के लिए मित्रता और सहयोग की सन्धि हुई। इस सन्धि की महत्त्वपूर्ण बातें इस प्रकार थीं

  • आर्थिक, तकनीकी, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में दोनों देश एक-दूसरे के साथ सहयोग करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे की अखण्डता व सीमाओं का सम्मान करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
  • दोनों देश किसी तीसरे देश को कोई ऐसी सहायता नहीं देंगे जो दोनों में किसी देश के हित के विरुद्ध हो।
  • दोनों देश उपनिवेशवाद का विरोध करेंगे।

बांग्लादेश को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनाने में भारत की सहायता-बांग्लादेश ने 9 अगस्त, 1972 को संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के लिए प्रार्थना-पत्र भेजा। भारत के प्रयास के फलस्वरूप और रूस से सहयोग से बांग्लादेश . संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बन गया। शेख मुजीबुर्रहमान की भारत यात्रा-1974 में शेख मुजीबुर्रहमान ने भारत यात्रा की तथा 1975 में गंगा जल के . बंटवारे से सम्बन्धित विवाद को बातचीत द्वारा समाप्त करने की कोशिश की।

सम्बन्धों में परिवर्तन-15 अगस्त, 1975 को बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की परिवार सहित हत्या कर दी गई। शेख की हत्या के बाद भारत-बांग्लादेश के सम्बन्धों में तेजी से परिवर्तन आ गया। नवम्बर, 1975 में जनरल ज़ियाउर्रहमान राष्ट्रपति बने। तब से बांग्लादेश में भारत-विरोधी प्रचार तेज़ हो गया।

जनता सरकार और भारत-बांग्लादेश देश सम्बन्ध-मार्च, 1977 में भारत में जनता पार्टी की सरकार बनी और दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार की किरण दिखाई दी। अक्तूबर, 1977 में फरक्का समझौता हुआ। जुलाई, 1983 में भारत तथा बांग्लादेश में तीस्ता (Teesta) नदी में जल-वितरण को लेकर एक तदर्थ समझौता हुआ। अक्तूबर, 1983 में बांग्लादेश के मुख्त मार्शल-ला प्रशासक जनरल इरशाद की दो दिवसीय भारतीय यात्रा से दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के एक नए अध्याय का सूत्रपात हुआ।

नवम्बर, 1985 में भारत तथा बांग्ला देश ने फरक्का के पानी के बंटवारे के सम्बन्ध में अगले तीन वर्षों के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह 1982 के समझौते पर आधारित था। चकमा शरणार्थियों की समस्या-बांग्लादेश से अप्रैल, 1990 में लगभग 60 हजार चकमा शरणार्थी भारत आ चुके हैं। चकमा शरणार्थियों की वापसी के लिए कई बार बातचीत हुई परन्तु अभी तक कोई समझौता नहीं हुआ है। इसका कारण यह है कि बांग्लादेश की सरकार चकमा शरणार्थियों की सुरक्षा को विश्वसनीय गारण्टी नहीं देती।

तीन बीघा गलियारे का हस्तांतरण-26 मई, 1992 को बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री बेगम खालिदा ज़िया भारत आईं। दोनों देशों में तीन बीघा पर एक समझौता हुआ जिसके अन्तर्गत 26 जून, 1992 को भारत ने तीन बीघा गलियारा बांग्लादेश को पट्टे पर सौंप दिया। परन्तु गलियारे पर प्रशासनिक अधिसत्ता भारत की ही रहेगी।

गंगा जल पर भारत व बांग्लादेश के बीच समझौता-12 दिसम्बर, 1996 को भारत और बांग्लादेश में फरक्का गंगा जल बंटवारे पर एक ऐतिहासिक समझौता हुआ जिससे पिछले दो दशकों से चले आ रहे विवाद का अन्त हो गया। इस समझौते से गंगा में पानी की कमी के मौसम में भी दोनों को बराबर मात्रा में पानी देने की व्यवस्था की गई है। ये समझौता 30 वर्षों के लिए किया गया।

प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद की भारत यात्रा-जून, 1998 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद भारत आईं और उन्होंने प्रधानमन्त्री वाजपेयी से बातचीत की। दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों ने इस बात पर जोर दिया कि द्विपक्षीय समस्याओं का हल द्विपक्षीय वार्ता द्वारा होना चाहिए। जनवरी, 1999 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद तीन दिन की यात्रा पर भारत आईं। प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजिद ने कहा कि उसकी सरकार पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी और भारत के आतंकवादियों को पड़ोसी देशों में गुप्त गतिविधियां चलाने के लिए अपने देश का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगी।

19 जून, 1999 को भारत व बांग्लादेश के सम्बन्धों में सुधार लाने के लिए दोनों देशों के बीच बस सेवा प्रारम्भ की गई। स्वयं भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी कोलकाता से चली इस बस की अगुवाई के लिए ढाका पहुंचे। अपनी इस बांग्लादेश की यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री ने बांग्लादेश को ₹200 करोड़ का कर्ज देने का समझौता किया। इसके अतिरिक्त भारत ने बांग्लादेश से ‘प्रशुल्क रहित आयात’ के लिए भी सैद्धान्तिक रूप से स्वीकृति प्रदान की।

भारत और बांग्लादेश ने 9 अप्रैल, 2000 को अगरतला और ढाका के बीच एक नई बस सेवा चलाने का निर्णय किया। सन् 2000 में दोनों देशों के बीच आर्थिक सम्बन्ध और मजबूत हुए। भारत ने कुछ चुनिंदा बांग्ला देशी वस्तुओं को बिना किसी तटकर के देश में प्रवेश की इजाजत दी। जून, 2005 में दोनों देशों के विदेश सचिवों में अनेक समस्याओं पर बातचीत हुई और दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार हुआ। अप्रैल, 2008 में भारत व बांग्लादेश के बीच 43 वर्षों के पश्चात् कोलकाता तथा ढाका के मध्य ‘मैत्री एक्सप्रेस’ रेलगाड़ी चलाई गई। बांग्लादेश में 29 दिसम्बर, 2008 को आम चुनाव हुए।

इन चुनावों में शेख हसीना की पार्टी को जबरदस्त चुनावी सफलता मिली तथा शेख हसीना देश की प्रधानमन्त्री बनी। शेख हसीना के बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री बनने से भारत-बांग्लादेश सम्बन्ध और अधिक घनिष्ठ होने की आशा बढ़ी है। बांग्लादेशी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा-जनवरी, 2010 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत यात्रा पर आईं।

इस यात्रा के दौरान भारत ने बांग्लादेश को 250 मेगावाट बिजली देने की घोषणा की तथा बांग्लादेश के 300 छात्रों को प्रतिवर्ष छात्रवृत्ति देने की घोषणा की। दूसरी ओर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने घोषणा की, कि वह अपने क्षेत्र का प्रयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने देंगी। 6-7 सितम्बर, 2011 को भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बांग्ला देश की यात्रा की इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने पारस्परिक सहयोग के 4 समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

जून, 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किये। अक्तूबर, 2016 में बांग्लादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना बिम्स्टेक में भाग लेने के लिए भारत आई। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। अप्रैल 2017 में बांग्ला देश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना भारत यात्रा पर आई। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 22 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। मई 2018 में बंगलादेशी प्रधानमंत्री भारत यात्रा पर आई।

इस दौरान दोनों देशों ने रोहिंय्या मुद्दे सहित द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। अक्तूबर, 2019 में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री ने भारत की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने 7 महत्त्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किये। संक्षेप में भारत ने बांग्लादेश को हर परिस्थिति व समय पर सहायता दी है, लेकिन भारत को बांग्लादेश से वैसा सहयोग प्राप्त नहीं हुआ जिसकी भारत आशा रखता है। 17 दिसम्बर, 2020 को भारत एवं बांग्ला देश के प्रधानमन्त्रियों ने आभासी (Virtual) मुलाकात की। इस दौरान दोनों देशों ने आपसी सम्बन्धों एवं कोरोना महामारी पर चर्चा की।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 6.
भारत और नेपाल के पारस्परिक सम्बन्धों का मूल्यांकन कीजिए।
अथवा
भारत और नेपाल के आपसी सम्बन्धों में विवाद और सहयोग के मुख्य मुद्दों का विवेचन कीजिए।
उत्तर:
नेपाल, भारत और चीन के बीच तिब्बत क्षेत्र में स्थित है और चारों ओर से पहाड़ों से घिरा हुआ है। भारत और नेपाल धर्म, संस्कृति और भौगोलिक दृष्टि से एक-दूसरे के जितने करीब हैं, उतने विश्व के शायद ही कोई अन्य देश हों। नेपाल की अर्थव्यवस्था बहुत हद तक भारत पर निर्भर करती है। दोनों देशों के बीच खुली सीमा है। आवागमन पर कोई रोक नहीं है। सन् 1950 से 1960 तक दोनों देशों के सम्बन्ध बहुत मित्रतापूर्ण रहे। कश्मीर के प्रश्न पर नेपाल ने भारत का समर्थन किया तथा उसे भारत का अभिन्न अंग बताया। भारत ने आर्थिक क्षेत्र से नेपाल की बहुत सहायता की। 1952 में प्रारम्भ किया गया भारतीय सहायता कार्यक्रम धीरे-धीरे आकार तथा क्षेत्र में फैलता गया। नेपाली वित्त मन्त्रालय के एक वक्तव्य के अनुसार सन् 1951 से जुलाई, 1964 के बीच नेपाल द्वारा प्राप्त की गई विदेशी सहायता में संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ के बाद भारत का तीसरा स्थान है।

दोनों देशों में तनावपूर्ण काल-1960 में नेपाल महाराजा ने संसद् को भंग कर नेताओं को जेल में डाल दिया। इस पर भारत के प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू ने नेपाल के महाराजा की आलोचना करते हुए कहा कि, “नेपाल से लोकतन्त्र समाप्त हो गया।” इससे दोनों देशों के सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण नहीं रहे। सहयोग का काल-1975 में नेपाल नरेश भारत आए जिससे दोनों देशों में पुनः अच्छे सम्बन्ध स्थापित हो सके। दिसम्बर, 1977 में प्रधानमन्त्री मोरारजी देसाई ने नेपाल की यात्रा की और दोनों देशों में मित्रता बढ़ी। जनवरी, 1980 में श्रीमती इन्दिरा गांधी के पुनः सत्ता में आने पर भारत-नेपाल सम्बन्धों में सुधार हुआ। 3 फरवरी, 1983 को नेपाल के प्रधानमन्त्री भारत आए और दोनों देशों में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हुए। भारत ने सड़क निर्माण, बिजली, संचार, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्रों में नेपाल की भरपूर मदद की है। 1987 में दोनों देशों ने संयुक्त आयोग के गठन पर समझौता किया।

तनावपूर्ण सम्बन्ध-भारत-नेपाल व्यापार तथा पारगमन सन्धि नवीकरण न होने से दोनों देशों के सम्बन्धों में कटुता आ गई। भारत एक समन्वित सन्धि के पक्ष में था जबकि नेपाल मार्च, 1989 तक जारी व्यवस्था के तहत दो अलग सन्धियाँ करने के लिए जोर देता रहा। 5 दिसम्बर, 1991 को नेपाल के प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला भारत की दो दिन की यात्रा पर आए। यात्रा की समाप्ति पर 6 दिसम्बर, 1991 को दोनों देशों के बीच पांच सन्धियों पर हस्ताक्षर किए गए।

प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव की नेपाल यात्रा-19 अक्तूबर, 1992 को भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव तीन दिन की यात्रा पर नेपाल गए। भारत और नेपाल के विभिन्न क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने, भारत को नेपाल के उदार शो पर निर्यात वद्धि करने और विपल जल संसाधनों का दोनों देशों से साझे हित में प्रयोग करने पर सहमति व्यक्त की। इसके अलावा दोनों देशों में आपसी हित के कई मुद्दों पर बातचीत हुई। नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-अप्रैल, 1995 में नेपाल के प्रधानमन्त्री मनमोहन अधिकारी भारत की यात्रा पर आए और उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में सुधार हुआ।

नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-फरवरी, 1996 में नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री शेर बहादुर दोऊबा भारत की यात्रा पर आए। नेपाल और भारत के मध्य आपसी सहयोग में कई समझौते हुए। नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री दोऊबा ने कहा कि उनका देश शीघ्र ही नेपाल भारत के मध्य सम्पन्न 1950 की सन्धि की समीक्षा के लिए एक आयोग गठित करेगा। महाकाली सन्धि-29 फरवरी, 1996 को भारत और नेपाल ने सिंचाई और बिजली उत्पाद के लिए महाकाली नदी के पानी का उपयोग करने के लिए एक सन्धि पर हस्ताक्षर किए।

नेपाल के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-दोनों देशों के बीच तनाव को कम करने तथा अन्य विषयों पर बातचीत करने के उद्देश्य से अगस्त, 2000 में नेपाल के प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला भारत की यात्रा पर आए। भारत की सुरक्षा चिन्ता को देखते हुए नेपाली प्रधानमन्त्री ने भारत को यह आश्वासन दिया कि वह अपनी भूमि से भारत के विरुद्ध कोई भी आतंकवादी गतिविधि नहीं चलने देगा और आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में भारत का साथ देगा।। – नेपाल में आपातकाल एवं भारतीय प्रधानमन्त्री द्वारा मदद का आश्वासन-24 नवम्बर, 2001 को नेपाल में माओवादियों ने 50 सुरक्षा कर्मियों की हत्या कर दी, जिस कारण नेपाल में आपात्काल लागू कर दिया गया। 30 नवम्बर, 2001 को भारतीय प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने नेपाल को हर सम्भव सहायता देने की बात की।

1 फरवरी, 2005 को नरेश ज्ञानेन्द्र ने शेर बहादुर दोऊबा सरकार को बर्खास्त करके सत्ता की कमान अपने हाथ में ले ली जिस पर भारत ने नेपाल को सैन्य सप्लाई रोक दी। 29 अप्रैल, 2005 को नरेश ज्ञानेन्द्र ने आपात्काल को हटा दिया और अनेक नेताओं को रिहा कर दिया। भारत ने नेपाल को आंशिक रूप से सैन्य सप्लाई बहाल करने की घोषणा की और नेपाल में शीघ्र ही बहुदलीय लोकतन्त्र की बहाली की उम्मीद जताई। 28 मई, 2008 को नेपाल में राजतन्त्र को सदैव के लिए समाप्त कर दिया गया तथा 15 अगस्त, 2008 को सी०पी०एन० (एम०) के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचण्ड’ को प्रधानमंत्री चुना गया। सितम्बर, 2008 में नेपाली प्रधानमंत्री ‘प्रचण्ड’ भारत यात्रा पर आए, जिससे दोनों देशों के सम्बन्धों में और सुधार आया।

नेपाली राष्ट्रपति की भारत यात्रा-जनवरी, 2010 में नेपाल के राष्ट्रपति श्री राम बरन यादव भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग के चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए। जनवरी-फरवरी-2011 में नेपाल के राष्ट्रपति पुनः भारत की 10 दिवसीय यात्रा पर भारत आए तथा भारतीय प्रधानमन्त्री से द्वि-पक्षीय मुद्दों पर बातचीत की, जिसमें भारत-नेपाल मैत्री सन्धि के नवीनीकरण का मुद्दा भी शामिल था।

मई, 2014 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भाग लेने के लिए नेपाल के प्रधानमन्त्री श्री सुशील कोइराला भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। अगस्त, 2014 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान उन्होंने नेपाल को ₹ 61 अरब की मदद देने की घोषणा की।

अक्तूबर, 2016 में नेपाल के प्रधानमन्त्री पुष्प कमल ‘दहल प्रचण्ड’ बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। अगस्त 2017 में नेपाली प्रधानमन्त्री भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 8 महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये। अगस्त 2018 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बिम्स्टेक सम्मेलन में भाग लेने के लिए नेपाल की यात्रा की। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी बातचीत की। 17 अगस्त, 2020 को भारत एवं नेपाल के प्रधानमन्त्रियों के बीच आभासी (Virtual) मुलाकात हुई। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की।

प्रश्न 7.
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (दक्षेस) की पृष्ठभूमि एवं इसकी स्थापना के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) दक्षिण एशिया के आठ देशों-भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, मालदीव, अफगानिस्तान और श्रीलंका का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। 14वें सार्क सम्मेलन में जोकि 2007 में भारत में हुआ था, अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था। इस संगठन की स्थापना आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग द्वारा दक्षिणी एशिया के लोगों के कल्याण के लिए की गई थी।

सार्क की स्थापना (Establishment of SAARC):
द्वितीय महायुद्ध के बाद विश्व दो गुटों-पूंजीवादी गुट और साम्यवादी गुट में बंट गया था। पूंजीवादी गुट का नेतृत्व अमेरिका जबकि साम्यवादी गुट का नेतृत्व सोवियत संघ करने लगा। विश्व में आर्थिक सहयोग और सुरक्षात्मक उद्देश्यों को लेकर क्षेत्रीय संगठन बनने लगे। आपसी संगठन बनाने की यह प्रक्रिया पूरे यूरोप और धीरे-धीरे विश्व भर में फैलने लगी। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बहुत-से देश स्वतन्त्र हुए थे। ये देश सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, शैक्षणिक आदि क्षेत्रों में अत्यन्त पिछड़े हुए थे। एक ओर ये नव-स्वतन्त्र देश महाशक्तियों की गुटीय राजनीति से अलग रहना चाहते थे और दूसरी ओर सामाजिक-आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थे।

इस दृष्टि से पिछड़े देशों (तीसरी दुनिया) में क्षेत्रीय संगठन बनाने की प्रक्रिया शुरू हुई। विशेषतया एशिया में क्षेत्रीय संगठन बनाने की प्रक्रिया 1967 में आसियान (ASEAN) की स्थापना से प्रारम्भ हुई जिसमें-ब्रुनेई, इण्डोनेशिया, फिलीपीन्स, मलेशिया, सिंगापुर, दारुस्सलाम और थाइलैंड शामिल हुए। तुर्की, ईरान और पाकिस्तान ने भी विकास के लिए क्षेत्रीय सहयोग की व्यवस्था की। जुलाई, 1975 में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए बांग्लादेश, भारत, फिलीपीन्स, लाओस, श्रीलंका, थाइलैंड आदि देशों ने समझौता किया।

दक्षिण एशियाई देशों में सामाजिक, जातीय, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक मूल्यों की सामान्य सांझ है और तीव्र विकास की इच्छा भी है लेकिन इनमें कई बातों पर आपसी अविश्वास की भावना भी देखी जा सकती है। विशेष रूप से इन देशों के सुरक्षात्मक हित, विभिन्न राजनीतिक संस्कृति भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद और इस क्षेत्र में भारत की विशेष स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं। 70 के दशक के अंत में बांग्लादेश के दिवंगत राष्ट्रपति जिआउर्रहमान ने एक विचार दिया था कि दक्षिण एशिया के सात देशों को मिलकर इस क्षेत्र की समस्याओं पर विचार करना चाहिए और आर्थिक विकास के लिए प्रयास करना चाहिए।

आपसी सहयोग की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग के लिए बांग्लादेश कार्यकारी पत्र (Bangladesh Working paper on South Asian Regional Cooperation) जारी किया गया जिसमें सहयोग के 11 प्रमुख बिन्दुओं पर बल दिया गया। ये 11 प्रमुख बिन्दु थे दूर संचार, यातायात, जहाजरानी, शैक्षणिक व सांस्कृतिक सहयोग, वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग, कृषि अनुसंधान, पर्यटन, संयुक्त उपक्रम, बाजार प्रोत्साहन मौसम विज्ञान।

दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।’ दूसरी धारा में से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे की सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

राजनीतिक विज्ञान अनेक अध्ययनों के पश्चात् 1-2 अगस्त, 1983 को दिल्ली में सात देशों-भारत, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, मालदीव और बांग्लादेश के विदेश मंत्रियों की एक बैठक हई। इस बैठक में सातों देशों के विदेश मन्त्रियों ने दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। समझौते की उद्घोषणा में कहा गया कि दक्षिणी एशिया में आपसी सहयोग लाभदायक, वांछनीय और आवश्यक है और इससे क्षेत्र के लोगों के जीवन को सुधारने में मदद और प्रोत्साहन मिलेगा।

अन्ततः दक्षिणी एशियाई देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन बांग्ला देश की राजधानी ढाका में हुआ जिसमें 8 दिसम्बर, 1985 को सार्क घोषणा-पत्र (Charter) को स्वीकार किया गया। इस प्रकार औपचारिक रूप से दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) अस्तित्व में आया। इस संगठन की स्थापना में भारत की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रही। इसके प्रथम शिखर सम्मेलन के अन्त तक भारत का योगदान इसमें विशेष स्थान रखता है। इसका प्रमुख कारण यह है कि भारत दक्षिणी एशिया का एक प्रमुख देश है और सार्क की सफलता या असफलता बहुत सीमा तक भारत के सक्रिय सहयोग पर ही निर्भर करती है।

निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क दक्षिणी एशिया के आठ देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यह एक राजनीतिक संगठन नहीं है। यह सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, तकनीकी व वैज्ञानिक हितों की पूर्ति के लिए आपसी सहयोग पर आधारित अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। इस संगठन का उदय भी अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं से प्रेरित है। सार्क की स्थापना में भारत की सक्रिय भागीदारी रही है।

प्रश्न 8.
सार्क के लक्ष्य और सिद्धान्त क्या हैं ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव, अफगानिस्तान और भूटान का एक अन्तर्राष्ट्रीय संगठन है। अप्रैल, 2007 में दिल्ली में 14वें सार्क सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था। इस संगठन की स्थापना भी बदलते हए अन्तर्राष्टीय वातावरण के सन्दर्भ में हई।

इस संगठन की स्थापना बांग्लादेश के दिवंगत शासनाध्यक्ष जिआउर्रहमान की पहल पर हई। इसके लिए 1-2 अगस्त, 1983 को नई दिल्ली में इन सात देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। इस बैठक में सदस्य देशों ने आपसी सहयोग के कुछ मुद्दों पर एक सहमति पत्र तैयार किया। इस सहमति पत्र के आधार पर दिसम्बर, 1985 में ढाका में सार्क देशों के शासनाध्यक्षों का प्रथम शिखर सम्मेलन हुआ। इस शिखर सम्मेलन में 8 दिसम्बर को सार्क का घोषणा-पत्र स्वीकार किया गया।

सार्क के सिद्धान्त (Principles of SAARC):
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे। दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के ‘द्वि-पक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा। सार्क सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, समानता, क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता का सम्मान करता है और किसी दूसरे देश के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। सार्क एक राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इसका उद्देश्य आपसी सहयोग द्वारा विकास करना है। इसके लिए सदस्य देश आपसी सहयोग को प्राथमिकता देंगे।

सार्क के उद्देश्य (Objectives of the SAARC):
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के चार्टर में इसके निम्नलिखित उद्देश्यों का वर्णन किया गया है

  • दक्षिण एशियाई देशों के लोगों का कल्याण और जीवन में गुणात्मकता लाना।
  • आर्थिक वृद्धि, सामाजिक प्रगति और सांस्कृतिक विकास।
  • सामूहिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना।
  • अन्य देशों के साथ सहयोग करना।
  • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ सहयोग करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मजबूत बनाना।
  • एक-दूसरे की समस्याओं के लिए आपसी विश्वास, समझबूझ और सहृदयता विकसित करना।

निष्कर्ष (Conclusion):
इस प्रकार स्पष्ट है कि सार्क एक ऐसा संगठन है जो सदस्य देशों की प्रभुसत्ता, स्वतन्त्रता, समानता व अखण्डता में विश्वास रखते हुए क्षेत्रीय विकास को बढ़ावा देने के लिए आपसी सहयोग की अपेक्षा रखता है। सार्क क्षेत्रीय विकास एवं कल्याण के लिए बनाया गया संगठन है। यह कोई सैनिक या राजनीति गठबन्धन नहीं है। सार्क के घोषणा पत्र में यह स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इसमें द्वि-पक्षीय मामलों पर बहस नहीं की जाएगी। किन्तु इसकी बैठकों में कई बार द्वि-पक्षीय मामले उठाने का भी प्रयास किया गया है। आमतौर पर पाकिस्तान की ओर से यह प्रयास अधिक होता है। भारत ने सदैव इसका विरोध किया है। सार्क क्षेत्रीय सहयोग के लिए बनाया गया है और यदि यह निर्धारित सिद्धान्तों का पालन करे तो घोषित उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है।

प्रश्न 9.
सार्क की महत्त्वपूर्ण गतिविधियां क्या रही हैं ? उनमें भारत की भूमिका क्या है ?
अथवा
दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) द्वारा अपने अस्तित्व में किए गए मुख्य कार्य कौन-से हैं ? इनमें भारत की भूमिका क्या रही है ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन का उद्देश्य इन देशों के बीच अधिकाधिक क्षेत्रों में सहयोग स्थापित करना है ताकि समस्याएं एक-दूसरे की सहायता से हल हो सकें। दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ की स्थापना करने वाली घोषणा के अनुच्छेद 10 की पहली धारा में कहा गया है कि ‘सारे निर्णय सर्वसम्मति से होंगे।

दूसरी धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि सार्क के दो सदस्यों के द्विपक्षीय’ मामलों पर विचार नहीं किया जाएगा।’ सार्क कोई राजनीतिक संघ या मंच नहीं है। इस संघ का उद्देश्य सामूहिक सहयोग है। सभी सदस्य एक-दूसरे को सम्प्रभुता को मान्यता देते हैं और कोई देश किसी दूसरे के आन्तरिक मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा और सभी सदस्य सामूहिक हित के लिए काम करेंगे।

प्रथम शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संघ का प्रथम शिखर सम्मेलन 1985 में ढाका में हआ। इस सम्मेलन में सभी सदस्यों ने पारस्परिक सहयोग के लिए अपनी वचनबद्धता पर सहमति प्रकट की। द्वितीय शिखर सम्मेलन-द्वितीय शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1986 में भारत में बंगलौर में हुआ।

इन देशों ने 1990 तक सार्वभौमिक प्रतिरक्षण, सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा, मातृ-शिशु पोषाहार, साफ़ सुरक्षित पेय जल की व्यवस्था और 2000 से पूर्व समुचित आवास के लक्ष्य निर्धारित किए। तृतीय शिखर सम्मेलन-सार्क का तीसरा शिखर सम्मेलन नवम्बर, 1987 में काठमांडू में हुआ। इस सम्मेलन में तीन ऐतिहासिक निर्णय लिए गए

  • आतंकवाद को समाप्त करने का समझौता हुआ।
  • दक्षिण एशियाई खाद्य सुरक्षा भण्डार की स्थापना का निर्णय किया गया।
  • तीसरा महत्त्वपूर्ण निर्णय सार्क क्षेत्र के पर्यावरण की रक्षा के उपाय करने के लिए पर्यावरण सम्बन्धी अध्ययन करना है।

चौथा शिखर सम्मेलन-सार्क का चौथा सम्मेलन श्रीलंका की अशान्त स्थिति के कारण वहां न होकर 29 सितम्बर, 1988 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुआ। इस सम्मेलन का विशेष महत्त्व है क्योंकि यह सम्मेलन पाकिस्तान में लोकतन्त्र की बहाली के बाद हुआ। इस सम्मेलन में महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए गए

(1) इस सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राष्ट्रीय संसदों के सदस्य एक विशेष सार्क पत्र दस्तावेज़ पर किसी भी देश की यात्रा कर सकेंगे तथा उन्हें वीज़ा लेने की ज़रूरत नहीं होगी।

(2) नशीले पदार्थों के ग़लत प्रयोग को रोकने हेतु जोरदार अभियान जारी रखने का संकल्प किया।

(3) इस सम्मेलन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि ‘सार्क 2000’ का निर्माण है। ‘सार्क 2000’ एक क्षेत्रीय योजना की अवधारणा है। इस योजना द्वारा शताब्दी के अन्त तक इस क्षेत्र के एक अरब से ज्यादा लोगों की आवास, शिक्षा और साक्षरता की आवश्यकताएं पूरी की जा सकें।

(4) संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के अनुसार वर्ष 1989 को ‘बालिका वर्ष’ के रूप में मनाने का आह्वान किया ग

(5) परमाणु निःशस्त्रीकरण का भी निर्णय लिया गया।

(6) शिखर सम्मेलन के निर्णय के अनुसार इस क्षेत्र का कोई भी देश सार्क का सदस्य बन सकता है, यदि वह इसके घोषणा-पत्र के सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों में विश्वास रखता है। कोलम्बो सम्मेलन-21 दिसम्बर, 1991 को सार्क का सम्मेलन कोलम्बो में हुआ। सार्क के सातों देश क्षेत्र में व्यापार को उदार बनाने पर सहमत हो गए। सातों सदस्य देशों ने नि:शस्त्रीकरण की सामान्य प्रवृत्तियों का स्वागत किया। घोषणा-पत्र में मानव अधिकारों की रक्षा की बात कही गई है।

ढाका शिखर सम्मेलन-12 दिसम्बर, 1992 को सार्क का शिखर सम्मेलन ढाका (बांग्लादेश) में होना था, परन्तु भारत के आग्रह पर स्थगित कर दिया गया और 13 जनवरी, 1993 को शिखर सम्मेलन होना निश्चित किया गया।13 जनवरी को भी यह सम्मेलन न हो सका। यह सम्मेलन 10 और 11 अप्रैल को ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में दक्षेस राष्ट्रों के नेताओं ने सातों राष्ट्रों के बीच एक ‘महाबाज़ार’ का निर्माण करने तथा दक्षिण एशिया के स्वतन्त्र व्यक्तित्व पर विशेष बल दिया।

नई दिल्ली सम्मेलन-2 मई, 1995 को सार्क का आठवां शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आरम्भ हुआ। इस सम्मेलन की मुख्य उपलब्धि आपसी सहयोग के क्षेत्र में दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था (साप्टा) पर सदस्य राष्ट्रों की सहमति है। सभी सदस्य राज्यों ने वर्ष 1995 को ‘दक्षेस ग़रीबी उन्मूलन वर्ष’ मनाने का फैसला किया। नौवां शिखर सम्मेलन-मई, 1997 में मालदीव की राजधानी माले में सार्क का नौवां शिखर सम्मेलन हुआ। माले शिखर सम्मेलन में सन् 2001 तक दक्षेस में मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) स्थापित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

दक्षेस का दसवां शिखर सम्मेलन-दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन का दसवां शिखर सम्मेलन तीन दिन के लिए कोलम्बो में 28 जुलाई, 1998 को प्रारम्भ हुआ और 31 जुलाई को समाप्त हुआ। दक्षेस ने सदस्य देशों की सभी क्षेत्रों में स्मृद्धि के लिए व्यापक आर्थिक और सामाजिक कार्यसूची की घोषणा की। सदस्य देशों ने परमाणु हथियारों को पूरी तरह से नष्ट करने और प्रभावशाली अन्तर्राष्ट्रीय नियन्त्रण के तहत विश्वभर में परमाणु नि:शस्त्रीकरण को बढ़ावा देने की आवश्यकता की अपनी वचनबद्धता को दोहराया।

दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन-दक्षेस का 11वां शिखर सम्मेलन नेपाल की राजधानी काठमांडू में भारत एवं पाकिस्तान के तनाव के बीच 5 एवं 6 फरवरी, 2002 को हुआ। इस सम्मेलन में अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये, जैसे कि आतंकवाद को समाप्त करने एवं दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) को शीघ्र लागू करने के फैसले लिए। इसके अतिरिक्त महिलाओं की खरीद-फरोख्त पर रोक और एड्स के मुकाबले के लिए सामूहिक पहल की बात भी दक्षेस घोषणा में कही गई।

12वां सार्क शिखर सम्मेलन, जनवरी-2004:
‘दक्षेस’ देशों का 12वां शिखर सम्मेलन 4 जनवरी, 2004 को इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुआ। इस सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी ने किया। सम्मेलन के अन्त में 11 पृष्ठों का एक साझा घोषणा-पत्र (इस्लामाबाद घोषणा-पत्र) जारी किया गया। इस सम्मेलन की प्रमुख बातें निम्नलिखित रहीं

  • दक्षिणी एशियाई मुक्त व्यापार व्यवस्था’ (साफ्टा) को मन्जूरी दी गई। यह समझौता 1 जनवरी, 2006 से लागू होगा।
  • दक्षिणी एशिया से ग़रीबी, पिछड़ापन आदि दूर करने के लिए सामाजिक घोषणा-पत्र जारी किया गया।
  • 1987 में किए गए आतंकवाद निरोधक सार्क समझौते की समीक्षा की गई तथा आतंकवाद पर प्रभावी रोकथाम लगाने पर सहमति हुई।
  • दक्षेस पुरस्कार आरम्भ करने का निर्णय लिया गया।

13वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 13वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2005 में ढाका में हुआ। इस सम्मेलन में एक जुट होकर आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष करने की घोषणा की गई।

14वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन अप्रैल, 2007 में भारत में हुआ। इस सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया।

15वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 15वां शिखर सम्मेलन अगस्त, 2008 में श्रीलंका में हुआ। इस सम्मेलन में सार्क क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने एवं आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष करने की घोषणा की गई।

16वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 16वां शिखर सम्मेलन 28-29 अप्रैल, 2010 को भूटान की राजधानी थिम्पू में हुआ। सम्मेलन के दौरान 2011-2020 के दशक को ‘डिकेड ऑफ़ इन्ट्रीजनल कनेक्टिविटी इन सार्क के रूप में मानने का निर्णय लिया गया। सम्मेलन में आतंकवाद की आलोचना करते इसे समाप्त करने के लिए पारस्परिक सहयोग पर जोर दिया गया।

17वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 17वां शिखर सम्मेलन 10-11 नवम्बर, 2011 को मालदीव में हुआ। इस सम्मेलन में राष्ट्रों के आपसी व्यापार, आपदा प्रबन्धन, समुद्री दस्युओं से निपटने की समस्या व वैश्विक आर्थिक संकट के मुद्दों पर चर्चा हुई।

18वां सार्क शिखर सम्मेलन:
सार्क का 18वां शिखर सम्मेलन 26-27 नवम्बर, 2014 में नेपाल में हुआ। शिखर सम्मेलन के घोषणा-पत्र में 36 बिन्दुओं पर 15 साल के भीतर सहमति बनाते हुए आगे बढ़ने पर जोर दिया गया है। इसमें सार्क देशों में आतंकवाद, उग्रवाद और धार्मिक अतिवाद नियंत्रण के लिए तंत्र विकसित करने का उल्लेख किया गया है। साथ ही वीजा सरलीकरण एवं जन-सम्पर्क बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

भारत की भूमिका:

  • सार्क का दूसरा सम्मेलन 1986 में श्री राजीव गांधी की अध्यक्षता में बैंगलौर में हुआ।
  • 1987 में भारत ने सार्क को ₹ 150 लाख की मदद दी।
  • सार्क द्वारा संरक्षित अन्न भण्डार कायम करने के लिए भारत ने 1,53,200 टन खाद्यान्न का योगदान दिया।
  • 1992 में दिल्ली में सार्क का प्रथम सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ।
  • पहली दक्षेस विदेश मन्त्रियों की बैठक 1996 को दिल्ली में हुई।
  • सार्क व्यापार मेले का आयोजन भी भारत में किया गया।
  • भारत ने सार्क देशों के समक्ष द्विपक्षीय मुक्त व्यापार का प्रस्ताव रखा।
  • भारत, नेपाल एवं भूटान के साथ मुक्त व्यापार कर रहा है।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
दक्षिण एशिया, एशिया महाद्वीप के दक्षिण में स्थित है। इसके उत्तर में हिमालय पर्वत, दक्षिण में हिन्द महासागर, पश्चिम में अरब सागर तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी स्थित है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल तथा श्रीलंका को शामिल किया जाता है। अफ़गानिस्तान तथा म्यांयार को भी प्रायः दक्षिण एशिया में ही मान लिया जाता है।

प्रश्न 2.
‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना पर एक टिप्पणी लिखें।
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1-2 अगस्त, 1983 को सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली की बैठक में की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन 7-8 दिसम्बर, 1985 को ढाका में हुआ। इस प्रकार औपचारिक रूप से सार्क की स्थापना हुई। दक्षेस के सदस्य हैं भारत, मालदीव, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका, भूटान और नेपाल। अप्रैल, 2007 में दिल्ली में हुए 14वें सार्क शिखर सम्मेलन में अफगानिस्तान को सार्क का आठवां सदस्य बनाया गया था।

प्रश्न 3.
सार्क के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ?
अथवा
सार्क (SAARC) के मुख्य उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • दक्षेस के राज्य अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें।
  • क्षेत्र की अधिक-से-अधिक सामाजिक और सांस्कृतिक उन्नति करना।
  • दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्म-विश्वास पैदा करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में आपसी सहयोग को मज़बूत करना।
  • अन्य क्षेत्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों में सहयोग करना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 4.
दक्षेस (SAARC) का क्या अर्थ है ? इसके महत्त्व का वर्णन करें।
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना अगस्त, 1983 में सात देशों के विदेश मन्त्रियों की नई दिल्ली में बैठक की गई। दक्षेस का प्रथम शिखर सम्मेलन दिसम्बर, 1985 में ढाका (बांग्ला देश) में हुआ। इस प्रकार 1985 में सार्क की औपचारिक स्थापना हो गई। सार्क का मुख्य उद्देश्य दक्षिण एशिया के राष्ट्रों की समस्याओं को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाना है और इन राष्ट्रों में राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्रों में विकास करना है।

महत्त्व:

  • सार्क के कारण दक्षिण एशिया के देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
  • क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।

प्रश्न 5.
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) पर संक्षिप्त नोट लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के सभी सदस्य देशों ने प्रारम्भ से ही व्यापारिक उद्देश्यों के लिए आपस में सहयोग करने पर बल दिया है। विशेषतया 90 के दशक में एशियाई क्षेत्र के देशों के लिए आर्थिक एवं व्यापारिक क्षेत्रों में सहयोग करना और भी आवश्यक था क्योंकि इस दौरान यूरोप व विश्व के भागों में व्यापारिक उद्देश्यों के लिए क्षेत्रीय संगठन बन रहे थे।

इससे दक्षिणी एशिया के देशों को उनके साथ व्यापार करने में अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ रहा था। इस दृष्टि से 1993 में ढाका शिखर सम्मेलन में सार्क देशों ने आपस में एक ‘सुपर बाज़ार’ स्थापित करने पर बल दिया। इस सम्मेलन में सदस्य देशों ने ‘दक्षिण एशियाई वरीयता व्यापार व्यवस्था’ (साप्टा) पर हस्ताक्षर किए।

दिसम्बर, 1995 तक सभी सदस्य देशों ने साप्टा को स्वीकृति प्रदान कर दी और यह अस्तित्व में आया। ‘साप्टा’ के अन्तर्गत देशों ने आपसी व्यापार पर से विभिन्न वस्तुओं पर से मात्रात्मक एवं गुणात्मक प्रतिबन्ध हटा लिए हैं। अनेक व्यापारिक बाधाओं को हटा लिया गया है। इससे सार्क देशों के बीच सहयोग बढ़ने में सहायता मिली है।

प्रश्न 6.
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) पर टिप्पणी लिखिए।
अथवा
‘साफ्टा’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
‘साफ्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ (साफ्टा) की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हो अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो। ‘साफ्टा’ की स्थापना इसी उद्देश्य के लिए की गई थी।

यह भी आशा की गई थी कि 21वीं शताब्दी के शुरू होने से पहले ‘साप्टा’ का स्थान साफ्टा ले लेगा। सार्क के 10वें शिखर सम्मेलन (ढाका) में यह निर्णय लिया गया कि ‘साफ्टा’ के सम्बन्ध में एक विशेषज्ञ समिति की स्थापना की जाए जो 2001 की एक सन्धि तक पहुंचने के लिए अपना निष्कर्ष दे। जनवरी, 2004 में इस्लामाबाद (पाकिस्तान) में हुए 12वें सार्क शिखर सम्मेलन में सदस्य देशों ने दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (साफ्टा) समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते के लागू होने से यह आशा की जा सकती है कि इससे दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

प्रश्न 7.
सार्क देशों के सम्मुख उपस्थित किन्हीं चार समस्याओं का वर्णन कीजिए।
अथवा
दक्षेस (सार्क) की किन्हीं चार प्रमुख समस्याओं का वर्णन करें।
अथवा
दक्षेस (सार्क) के सामने मुख्य समस्याएं क्या हैं ? उनका वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • सार्क की सफलता में सदैव भारत-पाक के कटु सम्बन्ध रुकावट पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर पूर्ण विश्वास नहीं रख पा रहे हैं।
  • सार्क के अधिकांश देशों में आन्तरिक अशान्ति एवं अस्थिरता इसके मार्ग में रुकावट है।
  • सार्क देशों में अधिक मात्रा में अनपढ़ता, बेरोज़गारी तथा भूखमरी पाई जाती है, जोकि इसकी सफलता में बाधा पैदा करती है।

प्रश्न 8.
सार्क के सचिवालय की रचना का वर्णन करें।
उत्तर:

  • सार्क के चार्टर के अनुच्छेद 8 में सचिवालय की व्यवस्था की गई है। 16 जनवरी, 1987 को बैंगलौर (बंगलुरु) में हुए दूसरे सार्क सम्मेलन में सचिवालय की स्थापना की घोषणा की गई।
  • सार्क का सचिवालय नेपाल की राजधानी काठमाण्डू में बनाया गया है।
  • सार्क का एक महासचिव होता है, जोकि दो वर्ष के लिए सदस्य राष्ट्रों में से ही चुना जाता है।
  • सचिवालय अपने कार्यों को सात विभागों के माध्यम से सम्पन्न करता है।

प्रश्न 9.
‘शिमला समझौते’ पर एक संक्षिप्त लेख लिखें।
उत्तर:
दिसम्बर, 1971 में भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में ऐतिहासिक मात दी। इस युद्ध के पश्चात् 3 जुलाई, 1972 को भारत-पाकिस्तान ने शिमला में एक समझौते पर हस्ताक्षर किये, जिसे शिमला समझौता कहा जाता है। इस समझौते की प्रमुख शर्ते इस प्रकार हैं

  • दोनों राष्ट्र अपने पारस्परिक झगड़ों को द्विपक्षीय बातचीत और मान्य शान्तिपूर्ण ढंगों से हल करने के लिए दृढ़-संकल्प हैं।
  • दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखण्डता, राजनीतिक स्वतन्त्रता और सार्वभौम समानता का सम्मान करेंगे।
  • दोनों राष्ट्र एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखण्डता और राजनीतिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध बल प्रयोग या धमकी का प्रयोग नहीं करेंगे।
  • दोनों देशों द्वारा परस्पर विरोधी प्रचार नहीं किया जाएगा।
  • दोनों देश परस्पर सामान्य सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रयत्न करेंगे।

प्रश्न 10.
दक्षिण एशिया में आर्थिक वैश्वीकरण के कोई चार प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण दक्षिण एशिया में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में सूचना क्रान्ति एवं प्रौद्योगिकी का विकास एवं विस्तार हुआ।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र को बढ़ावा मिला।
  • आर्थिक वैश्वीकरण के कारण इस क्षेत्र में विदेशी निवेश बढ़ा है।

प्रश्न 11.
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कोई चार कारण बताइए।
उत्तर:
(1) कश्मीर के विषय में दोनों के विचार परस्पर विरोधी हैं तथा कश्मीर की समस्या का समाधान असम्भव प्रतीत होता है।

(2) पाकिस्तान अधिक मात्रा में अमेरिका से सैनिक सहायता प्राप्त करता है, जिसका भारत ने सदा विरोध किया है।

(3) पाकिस्तान भारत को आरम्भ से ही अपना राजनीतिक शत्रु मानता है तथा पाकिस्तान शासक स्वयं को शासन गद्दी पर सुशोभित रखने के लिए भारत विरोधी प्रचार करके पाकिस्तानी लोगों की भावनाओं को प्रायः उत्तेजित करते रहते हैं।

(4) पाकिस्तान की भारत के प्रति आतंकवादी गतिविधियां दोनों देशों में तनाव का कारण बनी रहती हैं।

प्रश्न 12.
दक्षेस (सार्क) की समस्याओं को दूर करने के लिये कोई चार सुझाव दीजिये।
अथवा
दक्षेस (SAARC) को सफल बनाने के लिए कोई चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • दक्षेस देशों को विश्वास बहाली प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रतिरक्षा पर होते व्यय को कम करना चाहिए।
  • क्षेत्र में सांस्कृतिक सम्पर्क के कार्यक्रमों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • टकराव एवं द्वेष पैदा करने वाले मुद्दों को हल करने का प्रयास करना चाहिए।
  • दक्षेस देशों में व्याप्त ग़रीबी, भुखमरी, अशिक्षा, अन्धविश्वास एवं सामाजिक कुरीतियों इत्यादि को दूर करना चाहिए।

प्रश्न 13.
पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता के किन्हीं चार कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:
पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता के निम्नलिखित कारण हैं

  • पाकिस्तान में लोकतन्त्र के मार्ग में सेना ने सदैव बाधा उत्पन्न की है।
  • पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता ने भी लोकतन्त्र को सफलतापूर्वक कार्य नहीं करने दिया।
  • पश्चिमी देशों ने अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए पाकिस्तान में लोकतन्त्र को सफल नहीं होने दिया।
  • पाकिस्तान में लोकतन्त्र की असफलता का एक अन्य कारण उसकी आन्तरिक ढांचागत संरचना है।

प्रश्न 14.
पाकिस्तान में सैनिक शासन की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • पाकिस्तान में संविधान निर्माण के पश्चात् सैनिक शासक जनरल अयूब खान ने शासन पर अपना अधिकार जमा लिया।
  • अयूब खान के पश्चात् जनरल याहिया खान ने शासन सम्भाल लिया।
  • 1977 में जनरल जिया उल हक ने लोकतान्त्रिक सरकार को हटाकर शासन प्रणाली की बागडोर अपने हाथों में ले ली।
  • 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट कर अपनी तानाशाही स्थापित कर ली।

प्रश्न 15.
बांग्लादेश में सैनिक शासन की व्याख्या करें।
उत्तर:
सन् 1975 में शेख मुजीबुर्रहमान ने संविधान में संशोधन करके संसदीय शासन प्रणाली की जगह अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाया। उन्होंने अपनी अवामी लीग पार्टी को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियों को समाप्त कर दिया। परन्तु अगस्त, 1975 में सेना ने उनके खिलाफ बगावत करके उन्हें जान से मार दिया। इसके पश्चात् सैनिक शासक जियाउर्रहमान बांग्लादेश के शासक बने, परन्तु कुछ समय पश्चात् उनकी भी हत्या कर दी गई तथा उनके स्थान पर लेफ्टीनेंट जनरल एच० एम० इरशाद ने बांग्लादेश में सैनिक शासन कायम किया। जनरल इरशाद 1990 तक बांग्लादेश पर शासन करते रहे।

प्रश्न 16.
भारत सरकार किन कारणों से बांग्लादेश सरकार से अप्रसन्न रहती है ?
उत्तर:
भारत सरकार निम्नलिखित कारणों से बांग्लादेश सरकार से नाराज़ रहती है

  • भारत में अवैध रूप से लाखों बांग्लादेशी रह रहे हैं, जिन पर बांग्लादेश की सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।
  • बांग्लादेश में भारत विरोधी कट्टरपंथी बढ़ते जा रहे हैं।
  • बांग्लादेश सरकार द्वारा भारतीय सेना को अपने क्षेत्र के प्रयोग की मनाही करना।
  • भारत एवं म्यांमार के बीच प्राकृतिक गैस समझौते को पूरा न होने देना।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
दक्षिण एशिया को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया सात देशों भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल तथा श्रीलंका का एक समूह है, जोकि एक ही भू-राजनीतिक धरातल पर स्थित है, परन्तु प्रत्येक देश अपनी विविधताओं एवं संस्कृतियों के कारण अपना विशिष्ट एवं विभिन्न स्थान रखता है।

प्रश्न 2.
सार्क (दक्षेस) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
सार्क दक्षिण एशिया के आठ देशों का एक सहयोग संगठन है। इस संगठन की स्थापना 1985 में ढाका में की गई। सार्क में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालदीव, नेपाल, श्रीलंका तथा अफगानिस्तान शामिल हैं। इस संगठन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य सदस्य में आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।

प्रश्न 3.
दक्षेस (SAARC) के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
अथवा
‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • सार्क का मुख्य उद्देश्य यह है कि दक्षिण एशिया के राज्यों में सहयोग बढ़े और एक-दूसरे के विकास में सकारात्मक सहायता प्रदान करें।
  • सार्क का एक अन्य महत्त्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि सार्क के सदस्य देश अपनी आपसी समस्याओं का समाधान शांतिपूर्ण ढंग से करें।

प्रश्न 4.
सार्क (SAARC) का क्षेत्रीय सहयोग के साधन के रूप में क्या प्रभाव पड़ा है ?,
उत्तर:

  • सार्क के कारण दक्षिण एशियाई देश एक-दूसरे के समीप आए हैं और कुछ सामान्य समस्याओं को हल करने में सार्क सफल रहा है।
  • क्षेत्र के बाहर के देशों का हस्तक्षेप काफ़ी कम हो गया है।
  • सार्क ने एक संरक्षित अन्न भण्डार की स्थापना की है जो सदस्य राष्ट्रों की आत्म-निर्भरता का सूचक है।

प्रश्न 5.
सीमा पारीय आतंकवाद पर नोट लिखिए।
उत्तर:
भारत पाकिस्तान की ओर से सीमा पारीय आतंकवाद से लम्बे समय से ग्रसित हैं। पाकिस्तान भारत को अस्थिर करने के लिए अपने यहां आतंकवादियों को प्रशिक्षित करके, उन्हें सीमा पार अर्थात् भारत भेज देता है, जो भारत आकर निर्दोष लोगों की हत्याएं करते हैं।

प्रश्न 6.
भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
भारत और पाकिस्तान में कभी भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध नहीं रहे। इन दोनों में तनाव के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

(1) भारत-पाक सम्बन्धों में तनाव का एक महत्त्वपूर्ण कारण कश्मीर का मामला है। पाकिस्तान के नेताओं ने कई बार कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में उठाया है जिसे भारत नापसंद करता है।

(2) भारत और पाकिस्तान में तनावपूर्ण सम्बन्धों का एक कारण यह है कि पाकिस्तान पिछले कई वर्षों से पंजाब और कश्मीर के आतंकवादियों की सभी तरह से सहायता कर रहा है।

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प्रश्न 7.
फरवरी, 1996 में भारत और नेपाल के बीच हुई सन्धि का महत्त्व लिखें।
उत्तर:
फरवरी, 1996 में भारत और नेपाल में महाकाली घाटी के समन्वित विकास के लिए एक महत्त्वपूर्ण सन्धि पर हस्ताक्षर करके विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इस सन्धि से दोनों देशों के बीच चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया। इस सन्धि के बाद उम्मीद की जा रही है कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में दोनों देशों में अधिक समीपता आएगी। आर्थिक क्षेत्रों में भी दोनों देशों का विकास होगा।

प्रश्न 8.
‘सार्क’ देशों की एकजुटता में आने वाली किन्हीं दो बाधाओं या समस्याओं का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • सार्क देशों की एकजुटता में सदा ही भारत-पाकिस्तान के कटु सम्बन्ध बाधा पैदा करते हैं।
  • सार्क के सदस्य देश भारत जैसे बड़े देश पर विश्वास नहीं कर पाते।

प्रश्न 9.
मार्च, 1972 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई 25 वर्ष की सन्धि की कोई दो बातें बताइए।
उत्तर:

  • दोनों देश एक-दूसरे की अखण्डता का सम्मान करेंगे।
  • दोनों देश एक-दूसरे के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

प्रश्न 10.
‘शिमला समझौता’ कब और किन के बीच हुआ ?
उत्तर:
शिमला समझौता 3 जुलाई, 1972 को भारत एवं पाकिस्तान के बीच हुआ।

प्रश्न 11.
सार्क को प्रभावशाली बनाने के लिए भारत द्वारा किए गए कोई दो प्रयास बताएँ।
उत्तर:

  • भारत ने 1987 में सार्क को 150 लाख रुपये की मदद दी।
  • भारत ने सार्क द्वारा संरक्षित अन्न भण्डार कायम करने के लिए 153200 टन खाद्यान्न का योगदान दिया।

प्रश्न 12.
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) की व्याख्या करें।
उत्तर:
दक्षिण एशियाई अधिमानिक व्यापार व्यवस्था (SAPTA) जनवरी, 1996 में अस्तित्व में आया। साप्टा के अन्त में सार्क देशों ने आपसी व्यापार पर से विभिन्न वस्तुओं पर से मात्रात्मक एवं गुणात्मक प्रतिबन्ध हटा लिए हैं। इसके अन्तर्गत सार्क देशों ने अनेक व्यापारिक बाधाओं को हटा लिया, जिससे इन देशों में आर्थिक सहयोग को बढ़ावा मिला।

प्रश्न 13.
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र (SAFTA) की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
‘साफ्टा’ का उद्देश्य सार्क देशों के मध्य व्यापारिक सहयोग को बढ़ाकर एक ‘दक्षिण एशिया मुक्त व्यापार क्षेत्र’ की स्थापना करना है। मुक्त व्यापार क्षेत्र से अभिप्राय सदस्य देशों के बीच ऐसे व्यापार से है, जो कस्टम और प्रशुल्क के प्रतिबन्धों से मुक्त हों अर्थात् ऐसा क्षेत्र जिसमें वस्तुओं का स्वतन्त्र आवागमन हो।

प्रश्न 14.
भारत एवं श्रीलंका के बीच किन्हीं दो समान विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • भारत एवं श्रीलंका दोनों ही इंग्लैण्ड के उपनिवेश रहे हैं तथा दोनों देशों को दूसरे विश्व युद्ध के बाद स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।
  • स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात् दोनों ही देशों ने सफलतापूर्वक लोकतान्त्रिक व्यवस्था की स्थापना की।

प्रश्न 15.
नेपाल की शासन व्यवस्था की व्याख्या करें। नेपाल एवं बांग्लादेश की शासन व्यवस्थाओं का उदाहरण देते हुए बताएं कि दक्षिण एशियाई लोग किस प्रकार की शासन व्यवस्था चाहते हैं ?
उत्तर:
नेपाल में 2006 तक संवैधानिक राजतन्त्र था तथा राजा ही सभी शक्तियों का स्वामी था तथा राजा ने कई बार सरकार को बर्खास्त करके कार्यपालिका शक्तियां भी अपने हाथों में ले ली थीं। परंतु नेपाल के नागरिकों राजनीतिक दलों ने 2008 में वहां पर प्रजातान्त्रिक शासन व्यवस्था की स्थापना की। नेपाल एवं बांग्लादेश के उदाहरणों से स्पष्ट है कि दक्षिण एशियाई लोग लोकतान्त्रिक व्यवस्था चाहते हैं।

प्रश्न 16.
(क) SAFTA और (ख) SAARC का पूरा नाम लिखें। सार्क की स्थापना का मुख्य कारण क्या है ?
उत्तर:
(क) SAFTA-South Asia Free Trade Agreement.
(ख) SAARC-South Asian Association for Regional Cooperation. सार्क की स्थापना का कारण-सार्क की स्थापना का मुख्य कारण दक्षिण एशिया के देशों का आर्थिक विकास करना है।

प्रश्न 17.
भारत के कोई चार पड़ोसी देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • चीन
  • पाकिस्तान
  • नेपाल
  • बांग्लादेश।

प्रश्न 18.
बांग्लादेश की स्थापना कब हुई ? इसका मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
बांग्लादेश की स्थापना सन् 1971 में हुई। 1971 से पहले बांग्लादेश पाकिस्तान का ही एक भाग था। 1971 में पाकिस्तानी शासकों के तानाशाही रवैये के विरुद्ध बांग्लादेशियों ने आन्दोलन किया जिसे पाकिस्तान सरकार ने दबाने का भरपूर प्रयास किया। परन्तु भारत ने पाकिस्तान को युद्ध में हराकर बांग्लादेश राज्य की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 19.
शान्ति सेना क्या थी, इसे सफलता क्यों नहीं मिली ?
उत्तर:
1987 में भारत-श्रीलंका के बीच हुए समझौते के अनुसार भारत ने लिट्टे के विरुद्ध अपनी सेनाएं भेजी, जिसे शांति सेना कहा जाता है। परन्तु धीरे-धीरे श्रीलंका में ही इस शांति सेना का विरोध होने लगा, परिणामस्वरूप 1989 से शान्ति सेना वापस भारत आने लगी।

प्रश्न 20.
श्रीलंका में जातीय संघर्ष के कोई दो कारण लिखिये।
उत्तर:

  • श्रीलंका में बहुसंख्यक सिंहलियों ने धर्म और भाषा के आधार पर एक नए राज्य के निर्माण के प्रयास शुरू किये गए, जिसका तमिलों ने विरोध किया।
  • श्रीलंका सरकार की तमिलों के प्रति भेदभाव तथा उपेक्षा की नीति ने भी जातीय संघर्ष को बढ़ाया।

प्रश्न 21.
दक्षिण एशिया में शान्ति की स्थापना के दो उपाय लिखिए।
उत्तर:
दक्षिण एशिया में निम्नलिखित ढंग से शान्ति स्थापना की जा सकती है

1. राजनीतिक स्थिरता-दक्षिण एशिया के अधिकांश देशों में राजनीतिक अस्थिरता पाई जाती है। अत: दक्षिण एशिया में शान्ति स्थापना के लिए आवश्यक है कि इन देशों में राजनीतिक स्थिरता पैदा की जाए।

2. आतंकवाद की समाप्ति-प्रायः सभी दक्षिण एशियाई देश आतंकवाद से प्रभावित हैं। अत: दक्षिण एशिया में शान्ति स्थापना के लिए आतंकवाद की समाप्ति आवश्यक है।

प्रश्न 22.
पाकिस्तान की स्थापना कब हुई थी ? इसका मुख्य कारण क्या था ?
उत्तर:
पाकिस्तान की स्थापना सन् 1947 में हुई। इसकी स्थापना का मुख्य कारण मुस्लिम लीग की हठधर्मिता एवं जिन्नाह का द्वि-राष्ट्र का सिद्धान्त था।

प्रश्न 23.
पाकिस्तान में लोकतन्त्रीकरण के मार्ग की कोई दो कठिनाइयां लिखिये।
उत्तर:

  • पाकिस्तान में सेना का प्रभाव बहुत अधिक है।
  • पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरता अधिक पाई जाती है।

प्रश्न 24.
फरक्का समस्या का संबंध किन दो देशों से है ?
उत्तर:
फरक्का समस्या का संबंध भारत एवं बांग्लादेश से है।

प्रश्न 25.
‘सार्क’ (SAARC) के प्रारम्भिक सदस्य देशों की संख्या कितनी थी? इनके नाम लिखें।
उत्तर:
सार्क प्रारम्भिक सदस्य देशों की संख्या सात थी, जिसमें भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालद्वीप, नेपाल तथा श्रीलंका शामिल हैं।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. निम्नलिखित में से कौन-सा देश दक्षिण एशिया के देशों में शामिल हैं
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) श्रीलंका
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. सार्क एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है
(A) यूरोप का
(B) दक्षिण एशिया का
(C) अफ्रीका का
(D) दक्षिण अमेरिका।
उत्तर:
(B) दक्षिण एशिया का।

3. 14वें सार्क सम्मेलन में किस देश को सार्क में शामिल किया गया ?
(A) अफ़गानिस्तान
(B) भारत
(C) चीन
(D) पाकिस्तान।
उत्तर:
(A) अफ़गानिस्तान।

4. वर्तमान में नेपाल किस प्रकार का राष्ट्र है ?
(A) हिन्दू राष्ट्र
(B) मुस्लिम राष्ट्र
(C) ईसाई राष्ट्र
(D) धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र।
उत्तर:
(D) धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र।

5. भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ ?
(A) 13 दिसम्बर, 1999 को
(B) 11 जनवरी, 2001 को
(C) 13 दिसम्बर, 2001 को
(D) 11 जनवरी, 2002 को।
उत्तर:
(C) 13 दिसम्बर, 2001 को।

6. सार्क की स्थापना कब की गई थी ?
(A) 1990
(B) 1985
(C) 1980
(D) 1979.
उत्तर:
(B) 1985.

7. ‘सार्क’ (SAARC) का प्रथम शिखर सम्मेलन निम्नलिखित देश में हुआ
(A) भारत में
(B) पाकिस्तान में
(C) बांग्लादेश में
(D) श्रीलंका में।
उत्तर:
(C) बांग्लादेश में।

8. ‘सार्क’ (SAARC) का मुख्यालय स्थित है
(A) नई दिल्ली (भारत) में
(B) कराची (पाकिस्तान) में
(C) काठमांडू (नेपाल) में
(D) कोलम्बो (श्रीलंका) में।
उत्तर:
(C) काठमांडू (नेपाल) में।

9. परवेज मुशर्रफ ने किस वर्ष प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ का तख्ता पलट किया था ?
(A) 1999 में
(B) 2000 में
(C) 2001 में
(D) 2002 में।
उत्तर:
(A) 1999 में।

10. नेपाल में लोगों ने किस वर्ष राजतन्त्र के विरुद्ध सफल आन्दोलन किया ?
(A) 2007 में
(B) 2005 में
(C) 2006 में
(D) 2004 में।
उत्तर:
(C) 2006 में।

11. दक्षिण एशियाई देशों में सबसे लोकप्रिय खेल कौन-सा है ?
(A) हॉकी
(B) फुटबाल
(C) क्रिकेट
(D) बॉक्सिंग।
उत्तर:
(C) क्रिकेट।

12. मालदीव कब गणतन्त्र बना ?
(A) 1968 में
(B) 1969 में
(C) 1970 में
(D) 1971 में।
उत्तर:
(A) 1968 में।

13. श्रीलंका ने किस वर्ष स्वतन्त्रता प्राप्त की?
(A) 1947 में
(B) 1957 में
(C) 1948 में
(D) 1958 में।
उत्तर:
(C) 1948 में।

14. 1965 में भारत पर किस देश ने आक्रमण किया था ?
(A) पाकिस्तान
(B) चीन
(C) अमेरिका
(D) इरान।
उत्तर:
(A) पाकिस्तान।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

15. बांग्लादेश की स्थापना हुई :
(A) सन् 1950 में
(B) सन् 1965 में
(C) सन् 1971 में
(D) सन् 1981 में।
उत्तर:
(C) सन् 1971 में।

16. 1971 में बांग्लादेश के मुद्दे पर किस देश ने भारत पर आक्रमण किया ?
(A) श्रीलंका
(B) पाकिस्तान
(C) अमेरिका
(D) जापान।
उत्तर:
(B) पाकिस्तान।

17. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत का पड़ोसी देश है ?
(A) पाकिस्तान
(B) अमेरिका
(C) इंग्लैण्ड
(D) रूस।
उत्तर:
(A) पाकिस्तान।

18. निम्न में से एक भारत का पड़ोसी देश नहीं है?
(A) पाकिस्तान
(B) चीन
(C) जापान
(D) बांग्लादेश।
उत्तर:
(C) जापान।

19. भारत का विभाजन कब हुआ ?
(A) 1919
(B) 1945
(C) 1949
(D) 1947.
उत्तर:
(D) 1947.

20. भारत के विभाजन से कौन-सा नया देश अस्तित्व में आया ?
(A) रूस
(B) जर्मनी
(C) पाकिस्तान
(D) जापान।
उत्तर:
(C) पाकिस्तान।

21. सन् 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय भारत का प्रधानमन्त्री कौन था ?
(A) जवाहर लाल नेहरू
(B) इन्दिरा गांधी
(C) मोरारजी देसाई
(D) चरण सिंह।
उत्तर:
(B) इन्दिरा गांधी।

22. शिमला समझौता कब हुआ ?
(A) सन् 1962 में
(B) सन् 1972 में
(C) सन् 1974 में
(D) सन् 1976 में।
उत्तर:
(B) सन् 1972 में।

23. ‘शिमला समझौता’ किनके बीच हुआ था?
(A) भारत-चीन के
(B) चीन-पाकिस्तान के
(C) भारत-पाकिस्तान के
(D) भारत-रूस के।
उत्तर:
(C) भारत-पाकिस्तान के।

24. “भूटान अथवा नेपाल पर कोई भी आक्रमण भारत पर आक्रमण माना जायेगा।”यह किसका कथन है ?
(A) श्रीमती इन्दिरा गांधी
(B) सरदार पटेल
(C) पं० नेहरू
(D) राजगोपालाचार्य।
उत्तर:
(C) पं० नेहरू।

25. ‘सार्क’ (SAARC) की स्थापना कब हुई?
(A) 1982 में
(B) 1985 में
(C) 1986 में
(D) 1990 में।
उत्तर:
(B) 1985 में।

26. ‘कच्छथीव द्वीप’ विवाद का मसला किन देशों के मध्य है ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-बांग्लादेश
(C) भारत-श्रीलंका
(D) भारत-नेपाल।
उत्तर:
(C) भारत-श्रीलंका।

27. सार्क के अब तक कितने सम्मेलन हो चुके हैं ?
(A) 10
(B) 11
(C) 12
(D) 18.
उत्तर:
(D) 18.

28. 18वां सार्क सम्मेलन कहां पर हुआ ?
(A) नेपाल
(B) पाकिस्तान
(C) भारत
(D) भूटान।
उत्तर:
(A) नेपाल।

29. सार्क का उद्देश्य है
(A) दक्षिण एशियाई देशों में सहयोग बढ़े
(B) दक्षेस के राज्य समस्याओं का समाधान शान्तिपूर्ण ढंग से करें
(C) दक्षिण एशिया के देशों में सामूहिक आत्मविश्वास पैदा करना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

30. ‘सार्क’ (SAARC) के गठन का प्रारम्भिक विचार किस नेता ने दिया ?
(A) राजीव गांधी
(B) जिया उर-रहमान ने
(C) बेनजीर भुट्टो ने
(D) जी० पी० कोइराला ने।
उत्तर:
(B) जिया उर-रहमान ने।

31. सन् 1966 में भारत और पाकिस्तान के बीच कौन-सा समझौता हुआ ?
(A) लाहौर समझौता
(B) ताशकन्द समझौता
(C) शिमला समझौता
(D) आगरा समझौता।
उत्तर:
(B) ताशकन्द समझौता।

32. निम्नलिखित देशों में से सार्क (SAARC) का सदस्य है ?
(A) भारत
(B) इंग्लैण्ड
(C) अमेरिका
(D) रूस।
उत्तर:
(A) भारत।

33. निम्नलिखित देशों में से ‘सार्क’ (SAARC) का सदस्य नहीं है ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) बांग्लादेश
(D) चीन।
उत्तर:
(D) चीन।

34. साफ्टा को कब लागू करने का निर्णय लिया गया ?
(A) 1 जनवरी, 2002
(B) 1 जनवरी, 2003
(C) 1 जनवरी, 2004
(D) 1 जनवरी, 2006.
उत्तर:
(D) 1 जनवरी, 2006.

35. वर्तमान में ‘सार्क’ (SAARC) में कितने देश हैं ?
(A) छह
(B) सात
(C) आठ
(D) नौ।
उत्तर:
(C) आठ।

36. सार्क का 14वां शिखर सम्मेलन किस देश में हुआ ?
(A) भारत में
(B) पाकिस्तान में
(C) श्रीलंका में
(D) अफ़गानिस्तान में।
उत्तर:
(A) भारत में।

37. निम्न में से एक देश ‘सार्क’ का सदस्य नहीं है ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) भूटान
(D) चीन।
उत्तर:
(A) चीन।

38. अब नेपाल किस प्रकार का राष्ट्र है ?
(A) धर्म निरपेक्ष राष्ट्र
(B) मुस्लिम राष्ट्र
(C) हिन्दू राष्ट्र
(D) ईसाई राष्ट्र।
उत्तर:
(A) धर्म निरपेक्ष राष्ट्र।

39. फरक्का समस्या का सम्बन्ध है
(A) भारत-श्रीलंका से
(B) भारत-बांग्लादेश से
(C) भारत-भूटान से
(D) भारत-चीन से।
उत्तर:
(B) भारत-बांग्लादेश से।

रिक्त स्थान भरें

(1) सन् 2006 से, नेपाल एक ……………….. राज्य है।
उत्तर:
लोकतन्त्रीय,

(2) श्रीलंका ने अंग्रेजों से सन् …………….. में स्वतन्त्रता प्राप्त की।
उत्तर:
1948

(3) कच्चा टीबू द्वीप विवाद का मसला भारत और ………… के बीच है।
उत्तर:
श्रीलंका

(4) पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमन्त्री ………….. हैं।
उत्तर:
इमरान खान

(5) चकमा शरणार्थी समस्या भारत और ………….. के मध्य है।
उत्तर:
बांग्लादेश

(6) पाकिस्तान की स्थापना का मुख्य कारण भारत का ………… था।
उत्तर:
विभाजन

(7) मई 2014 में पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री श्री …………….. भारत आए।
उत्तर:
नवाज शरीफ

(8) नेपाल में सन् ……………. में लोकतन्त्र की स्थापना हुई।
उत्तर:
2006

(9) सार्क (SAARC) का सचिवालय …………… में स्थित है।
उत्तर:
काठमाण्डू।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
सार्क (SAARC) के किस सदस्य देश में आज भी राजतंत्र मौजूद है ?
अथवा
किस सार्क (SAARC) देश में वर्तमान में भी राजतंत्र है ?
उत्तर:
भूटान में।

प्रश्न 2.
वर्तमान में SAARC (दक्षेस) के कुल कितने देश सदस्य हैं ?
उत्तर:
वर्तमान में दक्षेस के कुल आठ देश सदस्य हैं।

प्रश्न 3.
बांग्लादेश की स्थापना कब हुई ?
अथवा
बांग्लादेश कब अस्तित्व में आया ?
उत्तर:
बांग्लादेश की स्थापना सन्1971 में हुई।

प्रश्न 4.
दक्षिण एशिया का कौन-सा देश सैनिक तानाशाही से प्रभावित रहा है ?
उत्तर:
पाकिस्तान।

प्रश्न 5.
अमेरिका ने किस वर्ष अफगानिस्तान पर हमला किया ?
उत्तर:
अमेरिका ने अफगानिस्तान पर सन् 2001 में हमला किया।

प्रश्न 6.
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला कब हुआ ?
उत्तर:
भारतीय संसद् पर आतंकवादी हमला दिसम्बर, 2001 में हुआ।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 5 समकालीन दक्षिण एशिया

प्रश्न 7.
चकमा शरणार्थी समस्या किन दो देशों के मध्य बनी हुई है ?
उत्तर:
भारत-बांग्लादेश के बीच।

प्रश्न 8.
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर:
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का दूसरा स्थान है।

प्रश्न 9.
भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकाने बालाकोट पर कब हमला किया ?
उत्तर:
26 फरवरी, 2019 को।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
माओ युग के पश्चात् आर्थिक रूप में उभरे चीन की व्याख्या करो।
अथवा
किस आधार पर यह कहा जा सकता है, कि 2040 तक चीन दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति होगा जो अमेरिका से आगे निकल जाएगा ? विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
माओ-त्से-तुंग ने 1949 में साम्यवादी क्रांति द्वारा चीन में साम्यवादी शासन की नींव रखी। इसके पश्चात् साम्यवादी चीन ने बड़ी तेज़ी से अपना विकास किया है तथा अमेरिका के मुकाबले सत्ता के एक महत्त्वपूर्ण विकल्प के रूप में सामने आया है। माओ युग के पश्चात् 1978 से आर्थिक क्षेत्र में चीन की सफलता को एक महाशक्ति के रूप में देखा जा रहा है।

आर्थिक सुधारों को लागू करके चीन ने वर्तमान समय में ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली है, कि कई आर्थिक विशेषज्ञों का यह अनुमान है कि 2040 तक चीन की आर्थिक व्यवस्था अमेरिका की आर्थिक व्यवस्था से भी आगे निकल जायेगी। चीन की विशाल जनसंख्या, विशाल क्षेत्र तथा तकनीक उसके आर्थिक विकास के लिए बहुत मददगार साबित हो रहे हैं।

1950 एवं 1960 के दशक में चीन अपना उतना आर्थिक विकास नहीं कर पा रहा था, जितना वह चाहता था, क्योंकि तब यही विशाल जनसंख्या रुकावट बन रही थी, कृषि परम्परागत ढंग से की जा रही थी, जिससे जनसंख्या के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। इसके साथ चीन की जनसंख्या लगातार तेजी से बढ़ रही थी जो उसकी आर्थिक विकास की दर में बाधा बन रही थी।

इन सभी बाधाओं को दूर करने के लिए 1970 के दशक में चीनी शासकों ने कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णय लिए। 1972 में चीन ने अमेरिका से अपने राजनीतिक एवं आर्थिक सम्बन्ध बनाए। 1973 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने कृषि, उद्योग, सेना तथा विज्ञान प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव पेश किये। 1978 में चीनी नेता देंग श्याओपेंग ने खुले द्वार (Open Door) की नीति की घोषणा करके आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।

चीनी नेताओं ने विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए रूसी आर्थिक मॉडल ‘शॉक थेरेपी’ को न अपनाकर चरणबद्ध ढंग से अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के लिए खोला। 1982 एवं 1998 में चीन ने क्रमशः कृषि एवं औद्योगिकीकरण का निजीकरण किया, ताकि विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया जा सके।

चीन ने आर्थिक विकास के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों की स्थापना की। कृषि एवं उद्योगों के निजीकरण से चीन की आर्थिक व्यवस्था को मजबूती मिली। चीन अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त करते हुए 2001 में विश्व व्यापार संगठन में भी शामिल हो गया। वर्तमान समय में चीन एशिया की एक ऐसी आर्थिक शक्ति बन गया है, कि विश्व के सभी बड़े देश चीन के साथ अपने आर्थिक सम्बन्ध बनाये रखना चाहते हैं। 1997 में आसियान देशों में आए आर्थिक संकट को समाप्त करने में चीनी अर्थव्यवस्था ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यद्यपि विश्व स्तर पर चीन पिछले कुछ वर्षों से एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है, परन्तु फिर भी चीनी अर्थव्यवस्था में कुछ कमियां हैं। उदाहरण के लिए चीन में लगातार बेरोज़गारी बढ़ रही है। महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में कोई बहुत आर्थिक सुधार नहीं हुआ है। चीन में अमीरों एवं ग़रीबों में भी बड़ी तेजी से अन्तर बढ़ता जा रहा है।

चीन की आर्थिक स्थिति में जो कमियां हमें दिखाई दे रही हैं, वे कमियां अधिकांश देशों में पाई जाती हैं। इस आधार पर चीन की आर्थिक व्यवस्था में विकास को कम करके नहीं आंका जा सकता। यदि आज अधिकांश देश एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां चीन के साथ मिलकर व्यापार करना चाहती हैं उद्योग लगाना चाहती हैं, तो इससे स्पष्ट पता चलता है कि वर्तमान समय में चीन ने तेजी से अपना आर्थिक विकास किया है।

प्रश्न 2.
यूरोपीय संघ की रचना एवं विस्तार की व्याख्या करें।
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली आदि का यूरोप से सैनिक महत्त्व समाप्त हो गया और यूरोप में केवल एक ही बड़ी शक्ति रह गई-सोवियत संघ । सोवियत संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़ी तेजी से पूर्वी देशों को साम्यवादी रंग में रंगना शुरू कर दिया जिसके कारण पश्चिमी यूरोप के पूंजीवादी देशों में भय पैदा हो गया। इसे ध्यान में रखते हुए ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधानमन्त्री चर्चिल ने यूरोपीय समुदाय की व्यवस्था की स्थापना पर बल दिया। अन्य पश्चिमी देशों ने इस पर अपनी सहमति प्रकट कर दी। उन देशों द्वारा सहमति प्रकट करने के दो कारण थे। पहला अपनी सुरक्षा के लिए मिलकर कदम उठाना।

दूसरे सामाजिक व आर्थिक एकीकरण द्वारा अपने को शक्तिशाली व खुशहाल बनाना। सर्वप्रथम इस तरह की सन्धि मार्च, 1946 में इंग्लैंड-फ्रांस के मध्य जर्मन के सम्भावित आक्रमण को ध्यान में रखकर की गई। बाद में बेल्जियम, नीदरलैंड व लक्समबर्ग भी सन्धि में शामिल हो गए। सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाले राष्ट्रों ने वचन दिया कि यदि हस्ताक्षर करने वाले सदस्य राष्ट्रों पर कोई देश आक्रमण सा आक्रमण अन्य राष्ट्रों पर भी किया गया आक्रमण समझा जाएगा। ऐसे समय में सन्धि पर हस्ताक्षर करने वाले अन्य देश उसे सैनिक तथा दूसरे तरह की सहायता देंगे। पश्चिमी राष्ट्रों को यह डर बैठ गया था कि सोवियत संघ उनकी सुरक्षा के लिए खतरा है।

इसी सन्धि में पश्चिमी यूरोप की समृद्धि व एकीकरण के लिए इन देशों में सामाजिक तथा आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए तीन समुदायों यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय, यूरोपीय आर्थिक समुदाय तथा यूरोपीय आण्विक ऊर्जा समुदायों की स्थापना की जिनका विस्तृत वर्णन निम्नलिखित है

(क) यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय-इस समुदाय की स्थापना 18 अप्रैल, 1951 में फ्रांस के विदेश मन्त्री शुमा के सुझाव पर की गई। इस समुदाय का मुख्य कार्य हस्ताक्षर करने वाले सदस्य राष्ट्रों के कोयले एवं इस्पात के उत्पादन व वितरण पर नियन्त्रण रखना और इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करके सदस्य राज्यों के कोयले व इस्पात के साधनों की एक सामान्य मण्डी बनाकर उनके उपयोग की सुव्यवस्था करना।

(ख) यूरोपीय आर्थिक समुदाय-1947 में अमेरिकी विदेश मन्त्री मार्शल द्वारा प्रस्तुत योजना के आधार पर ही यूरोपीय राज्यों ने आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए 1948 में एक यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन का निर्माण किया। इस पर फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, बेल्जियम, इटली आदि देशों ने हस्ताक्षर किए। इस समुदाय का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों में चुंगी की दीवारों को गिराना तथा खेती-बाड़ी, मज़दूरों, यातायात के सम्बन्ध में नीतियां बनाना है।

विश्व के विभिन्न प्रादेशिक आर्थिक संगठनों में यूरोपीय आर्थिक समुदाय सर्वाधिक सफल रहा है। इस संगठन के सभी सदस्य समृद्ध विकसित देश हैं। अमेरिकी राज्यों के संगठन की भांति कोई एक राष्ट्र इसमें सर्वाधिक शक्तिशाली नहीं है। इसीलिए यह राष्ट्र मिलकर आर्थिक एवं औद्योगिक दृष्टि से अमेरिका व सोवियत संघ से श्रेष्ठ हो गए हैं। जर्मनी के एकीकरण के बाद इसके 12 सदस्य राष्ट्रों ने इसकी अधिक सुदृढ़ता पर बल दिया।

(ग) यूरोपीय आण्विक शक्ति समुदाय-यह संगठन यूरोप में आण्विक शक्ति का शांतिपूर्ण ढंग से प्रयोग का पक्षधर है। इसकी स्थापना जनवरी, 1958 में हुई और इसके चार्टर पर फ्रांस, जर्मनी गणराज्य, इटली, हालैण्ड, बेल्जियम और लक्मसबर्ग ने हस्ताक्षर किए। इस समुदाय का सदस्य बनने के लिए ब्रिटेन ने भी आवेदन किया जिसे अस्वीकार कर दिया गया।

(घ) यूरोपीय मुक्त व्यापार समुदाय-इस प्रादेशिक संगठन की स्थापना ब्रिटेन के प्रयासों से हुई क्योंकि यूरोपीय सामान्य मंडी से ग्रेट ब्रिटेन के आर्थिक हितों को हानि पहुंची थी। इसके अन्तर्गत तट कर कम करने की व्यवस्था की है। इसके अतिरिक्त सदस्य राष्ट्रों को गैर-सदस्य राष्ट्रों से चुंगी लेने का अधिकार प्रदान किया गया है। परन्तु ब्रिटेन को राष्ट्र मण्डल के सदस्य देशों के साथ व्यापार करने की छूट दी गई।

(ङ) यूरोपीय प्रतिरक्षा समुदाय-इस सन्धि का उद्देश्य यूरोप में एक साझी सेना, साझा बजट और राष्ट्रीय हितों से उठा हुआ एक राजनीतिक संगठन बनाना था। इसकी स्थापना मई, 1952 में हुई। इस सन्धि के परिणामस्वरूप सम्भावित साम्यवादी आक्रमण के भय को पूर्णतः खत्म कर दिया गया। परन्तु शीघ्र ही इसको समाप्त कर दिया गया, क्योंकि

  • सोवियत नेता स्टालिन की मत्य से सम्भावित रूसी आक्रमण की आशंका कम हो गई थी,
  • आण्विक हथियारों के आविष्कार ने स्थल सेना के महत्त्व को कम कर दिया।

यूरोपियन संघ का संगठन (Organisation of European Union):
यूरोपियन संघ की स्थापना 1992 में हुई। 1992 में मैस्ट्रिच सन्धि के द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय को यूरोपियन संघ में परिवर्तित कर दिया गया। यूरोपियन संघ की संगठनात्मक व्यवस्था इस प्रकार है

1. आयोग (Commission):
यूरोपियन संघ के आयोग में सदस्यों की नियुक्ति सदस्य देश चार वर्ष की अधि के लिए करते हैं। आयोग परिषद् को कार्यवाही के प्रस्ताव भेजता है। आयोग परिषद् द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करता है। आयोग सन्धियों की सुरक्षा का भी कार्य करता है।

2. मन्त्रिपरिषद् (Council of Ministers):
मन्त्रिपरिषद् में निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाते हैं, मन्त्रिपरिषद् का प्रधान पद सदस्य देशों को बारी-बारी से प्राप्त होता है।

3. यूरोपीय संसद् (European Parliament):
यूरोपीय संसद् के सदस्यों का निर्वाचन सदस्य देशों द्वारा प्रत्यक्ष रूप में किया जाता है। यूरोपीय संसद् विभिन्न वैधानिक प्रस्तावों पर सलाह देती है।

4. यूरोपीय न्यायालय (European Court of Justice):
यूरोपीय न्यायालय विभिन्न सन्धियों के विषय में पैदा होने वाले मतभेदों का निपटारा करता है।

5. यूरोपियन संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद्-यूरोपियन संघ की आर्थिक एवं सामाजिक परिषद् यूरोपियन संसद् को आर्थिक एवं सामाजिक विषय में सलाह देती है।

6. यूरोपियन निवेश बैंक (European Investment Bank):
यूरोपियन निवेश बैंक का मुख्य उद्देश्य साझे बाजार के सन्तुलित विकास के लिए कार्य करना है। युरोपियन निवेश बैंक विभिन्न कार्यों के लिए धन देकर संघ के हितों की रक्षा करता है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

प्रश्न 3.
यूरोपीय संघ एक अधिराष्ट्रीय संगठन के रूप में कैसे उभरा ? इसकी सीमाएं क्या हैं ?
उत्तर:
यूरोपीय संघ यूरोप के देशों का एक महत्त्वपूर्ण संगठन है। पिछले कुछ वर्षों में यूरोपीय संघ की शक्तियों में व्यापक वृद्धि हुई है, जिसके कारण यह संगठन एक अधिराष्ट्रीय संगठन के रूप में उभरा है। यूरोपीय संघ ने अपना राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव स्थापित करने के लिए चौतरफा प्रयास किये हैं। यूरोपीय संगठन यूरोपीय देशों का एक क्षेत्रीय संगठन है। यूरोपीय संघ का अपना झण्डा, गान, स्थापना दिवस तथा मुद्रा दिवस है, जो इसे शक्तिशाली स्थिति प्रदान करते हैं।

यूरोपीय संघ का विश्व राजनीति में आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक तथा सैनिक महत्त्व बहुत अधिक है। यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। फ्रांस संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य है तथा इसके पास परमाणु हथियार भी हैं। यूरोपीय संघ के पास विश्व की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। ये सभी तत्त्व यूरोपीय संघ को एक अधिराष्ट्रीय संगठन के रूप में स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परन्तु इसके साथ-साथ यूरोपीय संघ की कुछ सीमाएँ थीं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • यूरोपीय संघ के अलग-अलग देशों की अलग-अलग विदेश नीति और रक्षा नीति है, जो प्रायः एक-दूसरे के विरुद्ध जाती हैं।
  • यूरोपीय संघ के कई देशों ने अपने यहां यूरो मुद्रा लागू नहीं की। ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमन्त्री मारग्रेट थैचर ने ब्रिटेन को यूरोपीय बाजार से अलग रखा।
  • डेनमार्क और स्वीडन ने मास्ट्रिस्ट संधि का विरोध किया।
  • जून, 2016 में इंग्लैण्ड के लोगों ने जनमत संग्रह के द्वारा यूरोपीय संघ से अलग होने का निर्णय किया, जिससे यूरोपीय संघ की प्रगति बाधित हुई।

प्रश्न 4.
‘आसियान’ से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आसियान-दक्षिण-पूर्वी एशियाई राष्ट्रों की संस्था (ASEAN-Association of South East Asian Nations) है। इनकी स्थापना वियतनामी संकट, कम्बोडिया संकट व इस क्षेत्र के देशों के पारस्परिक प्रयत्नों से विकास करने की आवश्यकता ने मिलकर दक्षिण-पूर्वी राष्ट्रों को एक क्षेत्रीय संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया।

अगस्त, 1967 में इण्डोनेशिया, फिलीपाइन्ज, मलेशिया, थाइलैण्ड तथा सिंगापुर ने इसकी स्थापना की। 1984 में ब्रुनई भी इसका सदस्य बन गया। 1995 में वियतनाम तथा 1997 में लाओस तथा म्यांमार भी इस संगठन के सदस्य बन गए। आगे चल कर कम्बोडिया भी इसका सदस्य बन गया। आसियान दक्षिण-पूर्वी राष्ट्रों द्वारा गठित एक असैनिक, आर्थिक व सांस्कृतिक समुदाय है। इसके गठन के समय इसके निम्नलिखित उद्देश्य स्थापित किए गए

  • सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक सहयोग को बढ़ाया जाए।
  • इस क्षेत्र में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास की गति में तेजी लाई जाए।
  • क्षेत्रीय शान्ति तथा सुरक्षा स्थापित करना।
  • कृषि व्यापार तथा उद्योग के विकास में सहयोग।

आसियान की सर्वोच्च प्रमुख संस्था शिखर सम्मेलन है। इसमें सदस्य राष्ट्रों के राज्याध्यक्ष एवं शासनाध्यक्ष भाग लेते हैं। इसकी दूसरी संस्था मन्त्री सम्मेलन है। इसमें सदस्य राज्यों के विदेश मन्त्री भाग लेते हैं और वर्ष में इसकी एक बार बैठक होना अनिवार्य है। इसका स्थाई सचिवालय इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में है।

इसके प्रशासकीय कार्य महासचिव द्वारा सम्पन्न किए जाते हैं। आसियान की आर्थिक गतिविधियां (Economic Activities of ASEAN)-आसियान दक्षिण पूर्वी देशों का एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक संगठन है। 2003 में आसियान का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (GDP) 700 बिलियन डालर था, जोकि प्रतिवर्ष औसतन 4% की दर से बढ़ रहा है।

आसियान में विश्व जनसंख्या का 8% भाग शामिल है। आसियान देशों ने अपने क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 1998 में ‘हनोई सम्मेलन’ में दक्षिण-पूर्वी एशिया में स्वतन्त्र व्यापार (AFTA-Asean Free Trade Area) को समय से पहले ही लागू करने पर सहमति जताई। इसके अन्तर्गत ‘विजन 2020’ के अन्तर्गत क्षेत्रीय आर्थिक एकीकरण, वित्तीय सहयोग तथा व्यापार उदारीकरण के विभिन्न उपायों पर जोर दिया गया।

1996 में भारत को आसियान में पूर्ण वार्ताकार का दर्जा प्राप्त हुआ। भारत का आसियान देशों से लगभग ₹ 30000 करोड़ का व्यापार होता है। यद्यपि आसियान ने आर्थिक क्षेत्र में कुछ महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की हैं, परन्तु फिर भी समय-समय पर इसे कुछ समस्याओं का समाना करना पड़ा है। आसियान देश से आतंकवाद से जूझ रहे हैं, इण्डोनेशिया तथा मलेशिया में धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा मिल रहा है तथा 1998 की तरह पैदा होने वाले आर्थिक संकट आसियान को निरन्तर चुनौती दे रहे हैं।

प्रश्न 5.
आसियान में भारत की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
आसियान में भारत की भूमिका का वर्णन इस प्रकार है

1. भारत आंशिक वार्ताकार के रूप में सन् 1991 में भारत आसियान का आंशिक वार्ताकार भागीदार सदस्य बना था।

2. भारत पूर्ण वार्ताकार के रूप में-1995 में भारत को आसियान में पूर्ण वार्ताकार भागीदार सदस्य बना लिया गया। भारत ने इस स्थिति से लाभ उठाकर आसियान देशों से सम्बन्ध मज़बत किये।

3. दूसरा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन 2003-7-8 अक्तूबर, 2003 में बाली (इण्डोनेशिया) में दूसरा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन सम्पन्न हुआ। इस सम्मेलन में भारत और आसियान ने मुक्त व्यापार क्षेत्र पर हस्ताक्षर किये। भारत ने आसियान के चार सदस्य देशों कम्बोडिया, लाओस, म्यांमार और वियतनाम के लिए आयात शुल्क में एक तरफ रियायतों की पेशकश की थी।

4. तीसरा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन 2004-30 नवम्बर 2004 को तीसरा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन लाओस की राजधानी बैन्शियाने में हुआ। इस सम्मेलन में भारत ने आसियान के साथ मिलकर एक एशियाई आर्थिक समुदाय बनाने का सुझाव दिया था, जिसमें चीन, जापान और दक्षिण कोरिया शामिल होंगे।

5. चौथा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन 2005-10 दिसम्बर, 2005 को मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में चौथा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आसियान देशों से भारत में चूंजी निवेश करने की अपील की। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में आसियान देशों के मध्य परस्पर सहयोग का प्रस्ताव रखा।

6. पांचवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-जनवरी, 2007 में फिलीपींस में पांचवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन आयोजित हआ। इस सम्मेलन में भारत ने भारत-आसियान सम्बन्धों को और मज़बूत करने पर जोर दिया।

7. छठा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-2007-21 नवम्बर, 2007 को सिंगापुर में छठा भारत-आसियान शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इसमें प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पर्यावरण सरंक्षण के लिए एक भारत आसियान ग्रीन फंड स्थापित करने का सुझाव दिया था तथा भारत की ओर से इस फंड में 50 लाख डालर देने की घोषणा की थी।

8. सातवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-अक्तूबर, 2009 में थाइलैण्ड में सातवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था। इस सम्मेलन में भारत ने आसियान से सम्बन्ध और मजबूत करने के लिए भारत आसियान राउंड टेबल स्थापित करने की बात की।

9. आठवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-भारत-आसियान के बीच 8वां शिखर सम्मेलन 29 अक्तूबर, 2010 को हनोई में हुआ। इस सम्मेलन में बोलते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने कहा कि भारत एवं आसियान में व्यापक आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए ‘सेवा एवं निवेश समझौता’ (Service and investment Agreement) आवश्यक है।

10. नौवां भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-नवम्बर, 2011 में भारत-आसियान के बीच नौवीं बैठक हई। इस बैठक में भारतीय प्रधानमंत्री ने 2012-15 के लिए भारत-आसियान के 82 सूत्रीय प्लान ऑफ एक्शन के तहत पारस्परिक सहयोग की कई परियोजनाएं प्रस्तावित की।

11. भारत-आसियान शिखर सम्मेलन 2012-नवम्बर, 2012 में भारत-आसियान के बीच 10वीं बैठक नामपेन्ह (कम्बोडिया) में हुई। इस सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह ने आसियान देशों को भारत के ढांचागत क्षेत्र में निवेश का न्यौता देते हुए आग्रह किया कि विश्व की 1/4 आबादी वाले आसियान संगठन के सदस्य देश सेवा क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता का लाभ उठाएं। उन्होंने कहा कि सामुद्रिक सुरक्षा, आतंकवाद से लड़ाई एवं आपदा प्रबन्धन के विषय पर आसियान एवं भारत के हित साझा हैं।

12. 20-21 दिसम्बर, 2012 को भारत में भारत-आसियान यादगारी शिखर सम्मेलन (India-ASEAN Commemorative Summit) हुआ। इस शिखर सम्मेलन का आयोजन भारत-आसियान सम्बन्धों के 20 वर्ष पूर्ण इस अवसर पर भारत एवं आसियान के 10 देशों ने अन्तराष्ट्रीय कानून के आधार पर विवादित समुद्र में समुद्री सुरक्षा एवं आने-जाने की स्वतन्त्रता सम्बन्धी द्विपक्षीय सहयोग को मज़बूत किया। इस अवसर पर सेवा एवं निवेश के क्षेत्र में स्वतंत्र व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) पर भी अन्तिम निर्णय लिया गया।

13. भारत-आसियान शिखर-सम्मेलन 2014- भारत-आसियान के बीच 12वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2014 में म्यामांर में हआ। इस सम्मेलन में बोलते हुए भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आसियान देशों को भारत के आर्थिक विकास के नए सफर में भागीदार बनने का निमन्त्रण दिया।

14. भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-2015-भारत-आसियान के बीच 13वां शिखर सम्मेलन 21 नवम्बर, 2015 को मलेशिया में हुआ। इस सम्मेलन में बोलते हुए भारतीय प्रधानमंत्री ने आतंकवाद को पूरी मानवता के लिए खतरा बताया।

15. भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-2016- भारत-आसियान के बीच 14वां शिखर सम्मेलन सितम्बर 2016 में लाओस में हुआ। इस सम्मेलन में भारत-आसियान के बीच सहयोग के विभिन्न मुद्दों एवं साझा परियोजनाओं पर चर्चा की गई। भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए आतंकवाद को विश्व समुदाय के लिए खतरा बताया।

16. भारत-आसियान शिखर सम्मेलन-भारत-आसियान के बीच 15वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2017 में फिलीपीन्स में हुआ था। इस सम्मेलन में क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद एवं आर्थिक विकास पर चर्चा की गई।

17. गणतन्त्र दिवस पर आसियान देश-26 जनवरी, 2018 को भारतीय गणतन्त्र दिवस पर सभी आसियान देशों के अध्यक्षों को मेहमान के रूप में बुलाया गया था। भारत में पहली बार गणतन्त्र दिवस पर मेहमानों को बुलाने में व्यक्तियों की अपेक्षा क्षेत्र को महत्त्व दिया गया।

18. भारत-आसियान के बीच, 16वां शिखर सम्मेलन नवम्बर, 2019 में बैंकाक (थाइलैण्ड) में हुआ। इस सम्मेलन में भारत-आसियान व्यापार, क्षेत्रीय सुरक्षा एवं आतंकवाद पर चर्चा की गई।

प्रश्न 6.
भारत के चीन के साथ बदलते हुए सम्बन्धों की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
भारत और चीन में पहले गहरी मित्रता थी परन्तु सन् 1962 में चीन ने भारत पर अचानक आक्रमण करके इसको शत्रुता में परिवर्तित कर दिया। आज भी चीन ने भारत की कुछ भूमि पर अपना अधिकार जमाया हुआ है। भारत चीन से सम्बन्ध सुधारने के लिए प्रयत्नशील है परन्तु चीन अभी भी शत्रुतापूर्ण रुख अपनाए हुए है। चीन के प्रति मैत्रीपूर्ण नीति-आरम्भ से ही भारत ने साम्यवादी चीन के प्रति मैत्रीपूर्ण और तुष्टिकरण की नीति अपनाई। पहले उसने चीन को मान्यता दी और फिर संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रवेश का समर्थन किया।

29. अप्रैल, 1954 को चीन के साथ एक व्यापारिक समझौता करके भारत ने तिब्बत में प्राप्त बहिर्देशीय अधिकारों (Extra-territorial Rights) को चीन को दे दिया और स्वयं कुछ भी प्राप्त नहीं किया। समझौते के समय दोनों देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों के प्रति विश्वास दिलाया। सन् 1955 में बांडुंग सम्मेलन में इन्हीं सिद्धान्तों का विस्तार किया गया। चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई, 1954 में भारत की यात्रा पर आए और पं० नेहरू ने चीन का दौरा किया। इसके पश्चात् भारत और चीन के सम्बन्धों में तनाव आना शुरू हो गया।

1962 का चीनी आक्रमण-चीन ने 20 अक्तूबर, 1962 को भारत पर बड़े पैमाने पर आक्रमण किया। भारत को इस युद्ध में अपमानजनक पराजय का मुंह देखना पड़ा और चीन ने भारत की हजारों वर्ग मील भूमि पर कब्जा कर लिया। इससे पं० नेहरू की शान्तिपूर्ण नीतियों को गहरी चोट पहुंची। कांग्रेस (इ) की सरकार और भारत-चीन सम्बन्ध (Government of Congress (I) and India-China Relations) भारत में सहयोग करने की चीनी नेताओं की इच्छा तथा सम्बन्ध सुधारने के लिए प्रयास-जनवरी, 1980 में श्रीमती गांधी के प्रधानमन्त्री बनने के बाद चीनी नेता कई बार भारत से सम्बन्ध सुधारने की इच्छा व्यक्त कर चुके हैं।

चीन के प्रधानमन्त्री झाओ जियांग ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान 3 जून, 1981 को कहा कि एशिया के दो बड़े देश चीन और भारत को शांतिपूर्वक रहना चाहिए। यह क्षेत्रीय और विश्व के स्थायित्व दोनों के हित में है। 15 अगस्त, 1984 को भारत और चीन में व्यापारिक समझौता हुआ जो कि निश्चय ही महत्त्वपूर्ण घटना है। राजीव गांधी की सरकार और भारत-चीन सम्बन्ध–दिसम्बर, 1988 में प्रधानमन्त्री राजीव गांधी पांच दिन की यात्रा पर चीन पहुंचे। पिछले 34 वर्षों के दौरान किसी भी भारतीय प्रधानमन्त्री की यह पहली चीन यात्रा थी। राजीव गांधी की चीन यात्रा से दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों में एक नया अध्याय शुरू हुआ।

11 दिसम्बर, 1991 को चीन के प्रधानमन्त्री ली फंग भारत की यात्रा पर आने वाले पिछले 31 वर्षों में पहले प्रधानमन्त्री हैं। दोनों देशों के प्रधानमन्त्रियों ने पंचशील के सिद्धान्त में आस्था दोहराते हुए इस बात पर बल दिया कि किसी देश को दूसरे देश के आंतरिक मामलों में दखल देने का अधिकार नहीं दिया जा सकता। दोनों नेताओं ने यह विश्वास व्यक्त किया है कि दोनों देशों के सीमा विवाद का ‘उचित’ और ‘सम्मानजनक’ हल निकलेगा और तीन दशक पुराना यह मुद्दा द्विपक्षीय सम्बन्ध मज़बूत बनाने में आड़े नहीं आएगा।

प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिम्हा राव की चीन यात्रा-सितम्बर, 1988 में भारत के प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव चार दिन की सरकारी यात्रा पर चीन गए। वहां पर चार ऐतिहासिक समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, जिसके कारण भारत व चीन के मध्य सम्बन्धों में सुधारों का एक और अध्याय जुड़ गया।

चीन के राष्ट्रपति च्यांग जेमिन की भारत की यात्रा-28 नवम्बर, 1996 को चीन के राष्ट्रपति च्यांग ज़ेमिन भारत की यात्रा पर आए जिससे दोनों देशों के बीच सम्बन्धों का एक नया युग शुरू हुआ है। चीन के राष्ट्रपति च्यांग जेमिन की पहली भारत यात्रा के दौरान परस्पर विश्वास भावना और सीमा पर शान्ति कायम रखने के उपायों पर विस्तृत विचार-विमर्श के पश्चात् दोनों देशों ने चार महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

परमाणु परीक्षण तथा भारत-चीन सम्बन्ध-11 मई व 13 मई, 1998 को भारत ने पांच परमाणु परीक्षण किये। चीन ने परमाणु परीक्षणों को लेकर भारत की कड़ी निन्दा ही नहीं की बल्कि चीन ने अपने सरकारी न्यूज़ के जरिए फिर से अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा ठोंक कर पुराने विकार को जन्म दे दिया।

चीन ने यहां तक कहा कि भारत से उसके पड़ोसियों को ही नहीं बल्कि चीन को भी खतरा पैदा हो गया है। दलाईलामा की प्रधानमन्त्री वाजपेयी से मुलाकात-अक्तूबर, 1998 में तिब्बत के धार्मिक नेता दलाईलामा ने भारत के प्रधानमन्त्री वाजपेयी से बातचीत की जिस पर चीन ने कड़ी आपत्ति उठाई।

भारतीय राष्ट्रपति की चीन यात्रा-मई, 2000 में भारतीय राष्ट्रपति के० आर० नारायणन चीन की यात्रा पर गए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग के अनेक विषयों पर बातचीत हुई। चीनी नेता ली फंग की भारत यात्रा-जनवरी, 2001 में चीन के वरिष्ठ नेता ली फंग भारत आए। उन्होंने भारत के प्रधानमन्त्री वाजपेयी से मुलाकात कर क्षेत्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय और द्विपक्षीय महत्त्व के मुद्दों पर विचार-विमर्श किया। चीनी नेता ने भारत की धरती में किसी भी रूप में और किसी भी स्थान में उठने वाले आतंकवाद की निंदा की।

चीन के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-चीन के प्रधानमन्त्री झू रोंग्ली (Zhu Rongli) ने जनवरी, 2002 में भारत की यात्रा की। रूस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद का मिलकर सामना करने की बात कही। इसके अतिरिक्त दोनों देशों के बीच अंतरिक्ष, विज्ञान और प्रौद्योगिकी और ब्रह्मपुत्र नदी पर पानी सम्बन्धी सूचनाओं के आदान-प्रदान से सम्बन्धित छ: समझौते किये गये। भारतीय प्रधानमन्त्री वाजपेयी की चीन यात्रा-जून, 2003 में भारतीय प्रधानमन्त्री वाजपेयी की चीन यात्रा से दोनों देशों के सम्बन्धों में और सुधार हुआ। जहां भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना, वहीं पर चीन ने भी सिक्किम को भारत का हिस्सा माना।

चीन ने भारत में 50 करोड़ डालर निवेश करने के लिए एक (कोष) बनाने की घोषणा की। मई, 2004 में चीन ने सिक्किम को अपने नक्शे में एक अलग राष्ट्र दिखाना बन्द करके सिक्किम को भारत का अभिन्न अंग मान लिया। नवम्बर, 2004 में आसियान बैठक में भाग लेने के लिए भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह लाओस गए। वहां पर उन्होंने चीनी प्रधानमन्त्री वेन जियाबाओ के साथ बातचीत की। बातचीत के दौरान सीमा विवाद सुलझाने पर चर्चा के अतिरिक्त द्विपक्षीय व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान व लोगों की एक-दूसरे के यहां आवाजाही बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह की चीन यात्रा-जनवरी, 2008 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह चीन यात्रा पर गए। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई महत्त्वपूर्ण समझौते हुए। अक्तूबर, 2009 में चीन ने भारतीय प्रधानमन्त्री की अरुणाचल प्रदेश यात्रा पर आपत्ति उठाई थी तथा उसे अपने देश का भाग बताया था।

इसी तरह तिब्बतियों के धर्म गुरु दलाई लामा की तवांग यात्रा पर भी चीन ने आपत्ति जताई थी। परन्तु भारत ने इन दोनों आपत्तियों को नकारते हुए अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग बताया था। इसी सन्दर्भ में अक्तूबर, 2009 में दोनों देशों के प्रधानमन्त्री आसियान सम्मेलन के दौरान थाइलैण्ड में मिले। बैठक के दौरान दोनों देशों ने बातचीत द्वारा आपसी विवादों को हल करने की बात कही थी।

भारतीय राष्ट्रपति की चीन यात्रा- भारतीय राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल 26 मई से 31 मई, 2010 तक चीन यात्रा पर गई थीं। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने पारस्परिक सहयोग के तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किए। चीनी प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-दिसम्बर, 2010 में चीनी प्रधानमन्त्री भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 6 समझौतों पर हस्ताक्षर किये तथा 2015 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 बिलियन डालर तक ले जाने पर सहमति प्रदान की।

चीनी प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-मई, 2013 में चीनी प्रधानमन्त्री भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आठ समझौतों पर हस्ताक्षर किए। जुलाई 2014 में ब्राजील में हुए ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी एवं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात हुई। प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुलाकात में सीमा विवाद समेत कई मुख्य मुद्दों को चीनी राष्ट्रपति के समक्ष उठाया । मई 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने चीन की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रेलवे, खनन जैसे क्षेत्रों में 24 समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

अक्तूबर 2016 में चीनी राष्ट्रपति शीन जिनपिंग भारत में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के लिए भारत आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय बातचीत में विभिन्न महत्त्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की। म्बर 2017 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी चीन में आयोजित ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीन यात्रा पर गए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय मुद्दों पर भी चर्चा की। जून 2018 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी चीन यात्रा पर गए। इस दौरान दोनों देशों ने महत्त्वपूर्ण द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की।

अक्तूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद, परस्पर व्यापार तथा क्षेत्रीय सुरक्षा पर बातचीत की। 15-16 जून, 2020 की रात को गलवान घाटी में भारत एवं चीन के सैनिकों के बीच हुई झड़प में भारत के 20 सैनिक शहीद हो गए, जबकि चीन के 45-50 सैनिक मारे गए। ये झड़प चीन की साम्राज्यवादी लालसा के कारण हुई, जिससे दोनों देशों के सम्बन्ध खराब हो गए।

संक्षेप में, भारत-चीन सम्बन्ध मैत्रीपूर्ण नहीं हैं, परन्तु उम्मीद है कि जब दोनों देश मतभेद दूर करके और मैत्री बढ़ाने की दिशा में ईमानदारी से आगे बढ़ेंगे तो वे सीमा विवाद का भी स्थायी हल ढूंढ लेंगे। दोनों देशों के आपसी मैत्री और सहयोग को मजबूत करने के वाणिज्य-व्यापार के क्षेत्रों में हुए समझौते से भी काफ़ी बल मिलेगा।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
अमेरिका के मुकाबले में सत्ता के किन्हीं चार विकल्पों की चर्चा करें।
उत्तर:
1. यूरोपियन यूनियन-अमेरिका के मुकाबले यूरोपियन यूनियन सत्ता के एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरा है, क्योंकि विश्व स्तर पर यूरोपियन यूनियन का आर्थिक, सैनिक, राजनीतिक तथा कूटनीतिक रूप में काफ़ी प्रभाव है।

2. आसियान-अमेरिका के मुकाबले दक्षिण पूर्वी देशों के संगठन आसियान को एक विकल्प के रूप में देखा जाता है। विश्व की 8% जनसंख्या इस संगठन से सम्बन्धित है।

3. चीन-चीन बड़ी तेजी से सैनिक एवं आर्थिक रूप से विकास करके अमेरिका के मुकाबले सत्ता के विकल्प के रूप में उभर रहा है।

4. भारत-1990 के दशक से भारत ने इतनी तेज़ी से अपना आर्थिक विकास किया है कि कई आर्थिक विशेषज्ञों ने आने वाले समय में भारत को भी सत्ता के एक विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 2.
चीन के सन्दर्भ में आधुनिकीकरण के चार प्रस्तावों से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
1970 के दशक में चीन ने अपने आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों को सुधारते हुए कई अन्य महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। इसी कड़ी में 1973 में प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने कृषि, उद्योग, सेना और विज्ञान प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव रखे। 1978 में चीनी नेता देंग श्याओपेंग ने खुले द्वार (Open door) की नीति की घोषणा करके आर्थिक सुधारों की शुरुआत की।

चीनी नेताओं ने विवेकपूर्ण निर्णय लेते हुए रूसी आर्थिक मॉडल ‘शॉक थेरेपी’ को न अपनाकर चरणबद्ध ढंग से अपनी अर्थव्यवस्था को विश्व बाज़ार के लिए खोला। 1982 एवं 1998 में चीन ने क्रमश: कृषि एवं औद्योगिकीकरण का निजीकरण किया, ताकि विदेशी निवेशकों को आकर्षित किया जा सके।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

प्रश्न 3.
आपके अनुसार निम्न कार्टून में क्या सन्देश है ? इस कार्टून में दो पहिये किसका प्रतिनिधित्व कर रहे हैं ?
उत्तर:
उपरोक्त कार्टून में चीन के दोहरेपन को इंगित किया गया है, क्योंकि एक तरफ तो वह साम्यवादी विचारधारा वाले देशों का नेता होने की बात करता है, जबकि दूसरी ओर अपनी अर्थव्यवस्था में डालर को आमन्त्रित कर रहा है। कार्टून के दोनों पहियों में से एक साम्यवादी विचारधारा को प्रतिनिधित्व कर रहा है, तो दूसरा पहिया पूंजीवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व कर रहा है।

प्रश्न 4.
भारतीय प्रधानमन्त्री चीन की यात्रा पर जा रहे हैं और आपको उनके लिए एक संक्षिप्त नोट तैयार करने के लिए कहा गया है। आप अपने नोट में सीमा विवाद एवं आर्थिक सहयोग से सम्बन्धित भारत एवं चीन की स्थिति का एक-एक तर्क दें।
उत्तर:
भारत और चीन के सम्बन्ध यद्यपि 1960 के दशक में बहुत अच्छे नहीं रहे, परन्तु वर्तमान परिस्थितियों में दोनों देशों के आपसी सम्बन्धों का विशेष महत्त्व है। भारतीय प्रधानमन्त्री की चीन यात्रा पर कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर बातचीत होनी है, जिसमें सीमा विवाद एवं आर्थिक सहयोग शामिल है। भारतीय स्थिति के अनुसार सीमा विवाद में चीन को थोड़ा पीछे हटना चाहिए तथा आर्थिक सहयोग को और अधिक बढ़ावा देना चाहिए। दूसरी तरफ चीन सीमा विवाद में भारत के पक्ष को गलत मानता है तथा आर्थिक क्षेत्र में अपने समान की बिक्री के लिए भारत से अधिक-से अधिक मदद की इच्छा रखता है।

प्रश्न 5.
यूरोपीय संघ के विस्तार की व्याख्या करें।
उत्तर:
यूरोपीय संघ निम्नलिखित चरणों के पश्चात् अपने वास्तविक रूप में सामने आया

1. यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय- इस समुदाय की स्थापना 18 अप्रैल, 1951 में फ्रांस के विदेश मन्त्री शुमां के सुझाव पर की गई। इस समुदाय का कार्य सदस्य राज्यों के कोयले इस्पात के साधनों की एक सामान्य मण्डी बनाकर इनके उपयोग की व्यवस्था करना है।

2. यूरोपीय आर्थिक समुदाय–1947 में अमेरिकी विदेशी मन्त्री मार्शल द्वारा प्रस्तुत योजना के आधार पर ही यूरोपीय राज्यों ने आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए 1948 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय का निर्माण किया।

3. यूरोपीय मुक्त व्यापार समुदाय- इस संगठन की स्थापना ब्रिटेन के प्रयासों से की गई। 4. यूरोपीय संघ-1992 में अन्ततः यूरोपीय संघ की स्थापना की गई। 1992 में मैस्ट्रिच सन्धि के द्वारा यूरोपीय आर्थिक समुदाय को यूरोपियन संघ में परिवर्तित कर दिया गया।

प्रश्न 6.
आसियान की आर्थिक गतिविधियों को स्पष्ट करते हुए इसके सत्ता के एक विकल्प के रूप में उभरने की व्याख्या करें।
उत्तर:
आसियान दक्षिण-पूर्वी देशों का एक महत्त्वपूर्ण संगठन है। 2003 में आसियान का संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (G.D.P.) 700 बिलियन डालर था, जो कि प्रतिवर्ष औसतन 4% की दर से बढ़ रहा है। आसियान में विश्व जनसंख्या का 8% भाग शामिल है। आसियान देशों ने अपने क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए 1998 में ‘हनोई सम्मेलन’ में दक्षिण-पूर्व एशिया में स्वतन्त्र व्यापार (AFTA-Asean Free Trade Area) को समय से ही लागू करने पर सहमति जताई।

इसके अन्तर्गत ‘विजन 2020’ के अन्तर्गत क्षेत्रीय आर्थिक समीकरण, वित्तीय सहयोग तथा व्यापार उदारीकरण के विभिन्न उपायों पर जोर दिया गया। 1996 में भारत को आसियान में पूर्णवार्ताकार का दर्जा प्राप्त हुआ। आसियान आर्थिक क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों के कारण सत्ता के एक विकल्प के रूप में उभर रहा है।

प्रश्न 7.
‘आसियान’ (ASEAN) के किन्हीं चार प्रमुख उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:
आसियान के चार उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  • सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक सहयोग को बढ़ाया जाए।
  • इस क्षेत्र में आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास की गति में तेजी लाई जाए।
  • क्षेत्रीय शान्ति तथा सुरक्षा स्थापित करना।
  • कृषि व्यापार तथा उद्योग के विकास में सहयोग।

प्रश्न 8.
यूरोपीय संघ की कोई चार साझी विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • यूरोपीय संघ की साझी मुद्रा, स्थापना दिवस, गान एवं झण्डा है।
  • यूरोपीय संघ का आर्थिक, राजनीतिक, कूटनीतिक एवं सैनिक प्रभाव बहुत अधिक है।
  • फ्रांस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् का स्थायी सदस्य हैं।
  • यूरोपीय संघ आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक मामलों में दखल देने में सक्षम है।

प्रश्न 9.
अमेरिकी डालर के प्रभुत्व के लिए यूरो कैसे ख़तरा बन सकता है ?
उत्तर:
वर्तमान समय में विश्व में डॉलर मुद्रा का प्रचलन ही अधिक है। इससे हमें अमेरिकन अर्थव्यवस्था के प्रभाव का पता चलता है, कि किस तरह अमेरिका ने सम्पूर्ण विश्व पर अपना आर्थिक प्रभुत्व जमा रखा है। परन्तु धीरे धीरे उसके इस आर्थिक प्रभुत्व को कुछ अन्य शक्तियां चुनौती दे रही हैं। उनमें से एक है, यूरोपियन यूनियन । अमेरिकन डॉलर के मुकाबले यूरो मुद्रा का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।

2005 में यूरोपियन यूनियन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था थी तथा इसका सकल घरेलू उत्पाद लगभग 12000 अरब डालर है, जोकि अमेरिका से ज्यादा था। विश्व व्यापार में भी यूरोपियन यूनियन की भागीदारी अमेरिका के मुकाबले तीन गुना अधिक है। यूरोपियन, यूनियन विश्व व्यापार संगठन में भी एक प्रभावशाली समूह के रूप में कार्य कर रहा है। अतः डॉलर के मुकाबले यूरो का प्रभाव बढ़ता ही जा रहा है।

प्रश्न 10.
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप के सामने आने वाली किन्हीं चार समस्याओं का वर्णन करें।
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् यूरोप के सामने निम्नलिखित समस्याएं आईं

  • यूरोप के सामने सबसे बड़ी समस्या अपने आर्थिक पुनर्निर्माण की थी, जोकि विश्व युद्ध में तहस-नहस हो चुकी थी।
  • यूरोपीय देश अपनी पारस्परिक शत्रुता को लेकर असमंजस में थे, कि वे शत्रुता को यहीं छोड़ दें, या उसे आगे बढ़ाएं।
  • यूरोपीय देशों के सामने विश्व स्तर पर अपने आर्थिक एवं राजनीतिक सम्बन्धों को नये ढंग से प्रतिपादित करने की भी समस्या थी।
  • यूरोपीय देशों के सामने यूरोपीय नागरिकों की नष्ट हुई मान्यताओं एवं मूल्यों को भी बहाल करने की समस्या थी।

प्रश्न 11.
यूरोपीय संघ के देशों के बीच पाए जाने वाले कोई चार मतभेद लिखें।
उत्तर:
यूरोपीय संघ के देशों के बीच निम्नलिखित मतभेद पाए जाते हैं

  • यूरोपीय देशों की विदेश एवं रक्षा नीति में परस्पर विरोध पाया जाता है।
  • यूरोप के कुछ देशों में यूरो मुद्रा को लागू करने के सम्बन्ध में मतभेद हैं।
  • इराक युद्ध का ब्रिटेन ने समर्थन किया, जबकि फ्रांस एवं जर्मनी ने विरोध किया।
  • डेन्मार्क तथा स्वीडन जैसे देशों ने मास्ट्रिस्ट सन्धि तथा यूरो मुद्रा के प्रचलन का विरोध किया।

प्रश्न 12.
भारत और आसियान के सम्बन्धों के किन्हीं चार बिन्दुओं की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • भारत एवं आसियान परस्पर मुक्त व्यापार सन्धि करने के प्रयास में हैं।
  • भारत ने सिंगापुर एवं थाइलैंड से मुक्त व्यापार सन्धि कर ली है। ये दोनों देश आसियान के सदस्य हैं।
  • भारत आसियान की आर्थिक शक्ति के प्रति आकर्षित हुआ है।
  • हाल के वर्षों में भारत एवं आसियान ने कई व्यापारिक समझौते किए हैं।

प्रश्न 13.
साम्यवादी चीन ने 1949 के पश्चात् अपनी औद्योगिक अर्थव्यवस्था को मज़बूती प्रदान करने के लिए क्या प्रयास किए ? कोई चार प्रयास लिखें।
उत्तर:

  • चीन ने 1949 के पश्चात् अपने घरेलू आर्थिक संसाधनों द्वारा ही अपना औद्योगिक विकास किया है।
  • चीन ने सरकारी नियन्त्रण वाले बड़े उद्योगों को बढ़ावा दिया।
  • चीन में आयात किए हुए सामान को घरेलू स्तर पर तैयार किया।
  • सभी नागरिकों को रोज़गार एवं सामाजिक कल्याण की सुविधाओं का लाभ देने के क्षेत्र में लाया गया।

प्रश्न 14.
साम्यवादी चीन द्वारा 1970 के दशक में किये गए किन्हीं चार आर्थिक सुधारों का वर्णन करें।
अथवा
चीन द्वारा किए गये किन्हीं चार आर्थिक सुधारों का वर्णन कीजिये।
उत्तर:
साम्यवादी चीन द्वारा 1970 के दशक में निम्नलिखित आर्थिक सुधार किए गए

  • चीन में 1972 में संयुक्त राज्य अमेरिका से सम्बन्ध स्थापित करके राजनीतिक एवं आर्थिक एकांतवास को समाप्त किया।
  • 1973 में चीनी प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई ने कृषि, उद्योग, सेना एवं विज्ञान प्रौद्योगिकी के चार प्रस्ताव पेश किए।
  • 1978 में देंग-श्याओ-पेंग ने चीन में आर्थिक सुधारों और खुले द्वार की नीति को अपनाया।
  • चीन ने शॉक थेरेपी को न अपनाकर चरणबद्ध ढंग से अपनी अर्थव्यवस्था को खोला।

प्रश्न 15.
चीन द्वारा किए गए आर्थिक सुधारों के लाभों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए। (H.B. 2018)
उत्तर:

  • चीन द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों से गतिहीन हो चुकी अर्थव्यवस्था सम्भल गई।
  • कृषि का निजीकरण करने से कृषि उत्पादनों एवं ग्रामीण आय में वृद्धि हुई।
  • चीन द्वारा अपनाई गई आर्थिक नीतियों से ग्रामीण उद्योगों की संख्या में वृद्धि हुई।
  • कृषि एवं उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में चीन की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज़ रही।

प्रश्न 16.
चीन की अर्थव्यवस्था में पाई जाने वाली कोई चार कमियां बताएं।
उत्तर:
चीन की अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित कमियां पाई जाती हैं

  • चीन में हुए आर्थिक सुधारों का लाभ सभी वर्गों को समान रूप से प्राप्त नहीं हुआ।
  • चीन में काफ़ी संख्या में महिला बेरोज़गारी पाई जाती है।
  • चीनी अर्थव्यवस्था से भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला तथा पर्यावरण खराब हुआ।
  • चीन द्वारा अपनाई गई अर्थव्यवस्था से ग्रामीण एवं शहरी नागरिकों में आर्थिक असमानता बढ़ी है।

प्रश्न 17.
मैकमोहन रेखा पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
मैकमोहन रेखा द्वारा भारत-चीन सीमा का निर्धारण किया गया है। सर हैनरी मैकमोहन 1914 में भारत के विदेश सचिव थे। उन्होंने तिब्बती प्रतिनिधि मण्डल के साथ विचार-विमर्श करके इस सीमा का निर्धारण किया था। चीन इस सीमा निर्धारण के पक्ष में नहीं था, लेकिन उसे सीमा निर्धारण के बाद इसकी सूचना दे दी गई थी।

सन् 1956 तक चीन ने मैकमोहन रेखा से इन्कार करने की स्पष्ट रूप से घोषणा नहीं की थी, परन्तु 1956 के बाद उसने इस रेखा सम्बन्धी अपनी आपत्तियां जतानी शुरू कर दीं। चीन की सरकार ने मैकमोहन रेखा को कभी मान्यता नहीं दी और न ही दे रही है। इसलिए भारत-चीन में सीमा विवाद चला आ रहा है।

प्रश्न 18.
यूरोपीय संघ के मुख्य उद्देश्य क्या हैं ? इनकी व्याख्या कीजिए।
उत्तर:

  • यूरोप को बांटने वाले विवादों को हमेशा के लिए समाप्त करना।
  • यूरोप की प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करना एवं आर्थिक शक्ति तथा सांस्कृतिक परम्परा के अनुसार भूमिका को निभाना।
  • आर्थिक तथा मुद्रा स्थायित्व का प्रबन्ध करना।
  • सदस्य राज्यों की आर्थिक गतिविधियों को समन्वित करना।

प्रश्न 19.
भारत-चीन के मध्य विवाद के कोई दो मुद्दे बताएं।
अथवा
भारत और चीन के बीच तनाव के किन्हीं चार कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. तिब्बत की समस्या- भारत-चीन विवाद की सबसे बड़ी समस्या तिब्बत की समस्या है। चीन ने सदैव तिब्बत पर अपना दावा किया, जबकि भारत इस समस्या को तिब्बतवासियों की भावनाओं को ध्यान में रखकर सुलझाना चाहता है।

2. सीमा विवाद- भारत-चीन के बीच विवाद का एक कारण सीमा विवाद भी है। भारत ने सदैव मैकमोहन रेखा को स्वीकार किया, परन्तु चीन ने नहीं। सीमा विवाद धीरे-धीरे इतना बढ़ गया कि इसने आगे चलकर युद्ध का रूप धारण कर लिया।

3. भारत द्वारा दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना।

4. चीन द्वारा भारत की चिन्ताओं की परवाह न करते हुए पाकिस्तान को परमाणु एवं सैनिक सहायता प्रदान करना।

प्रश्न 20.
‘आसियान’ (ASEAN) के किन्हीं चार कार्यों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • आसियान सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं प्रशासनिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • आसियान सदस्य देशों के हितों की रक्षा करता है।
  • आसियान अपने क्षेत्र में शान्ति एवं व्यवस्था बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  • आसियान कृषि व्यापार एवं उद्योगों को प्रोत्साहित कर रहा है।

प्रश्न 21.
विश्व राजनीति में यूरोपीय संघ की भूमिका का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • यूरोपीय संघ ने विश्व शान्ति के प्रयासों को बढ़ावा दिया है।
  • इसने विश्व राजनीति में से अमेरिकी प्रभुत्व को कम किया है।
  • इसने संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावशाली बनाया है।
  • इसने यूरो मुद्रा की शुरुआत करके डालर के प्रभाव को कम किया है।

प्रश्न 22.
ब्रेक्सिट (BREXIT) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
इंग्लैण्ड में 23 जून, 2016 को इस विषय पर मतदान हुआ, कि इंग्लैण्ड को यूरोपीय संघ में रहना चाहिए या नहीं। इस जनगत संग्रह में 52% लोगों ने यूरोपीय संघ से अलग होने के पक्ष में मतदान किया, जबकि 48% लोगों ने यूरोपीय संघ के साथ रहने के पक्ष में मतदान किया। इंग्लैण्ड के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री डेविड कैमरॉन यूरोपीय संघ में रहने के पक्ष में थे।

अत: उन्होंने BREXIT के मुद्दे पर त्याग पत्र दे दिया, तथा श्रीमती थेरेसा में (Smt. Theresha May) को इंग्लैण्ड का नया प्रधानमंत्री बनाया गया। इस प्रकार 43 साल तक यूरोपीय संघ का सदस्य रहने के पश्चात् इंग्लैण्ड ने इससे अलग होने का निर्णय किया। इस घटना को ही ब्रेक्सिट (BREXIT) कहा जाता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
यूरोपियन संघ क्या है ?
उत्तर:
यूरोपियन संघ यूरोप के देशों का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय संगठन है। यूरोपियन संघ का आर्थिक, सैनिक, राजनीतिक तथा कूटनीतिक रूप में विश्व राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान है और यहां अमेरिका के मुकाबले सत्ता के एक मज़बूत विकल्प के रूप में उभर रहा है।

प्रश्न 2.
आसियान से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आसियान दक्षिण पूर्वी एशियाई राष्ट्रों की संस्था है। इसकी स्थापना वियतनामी संकट, कम्बोडिया संकट व इस क्षेत्र के देशों के पारस्परिक प्रयत्नों से विकास करने की आवश्यकता ने मिलकर दक्षिण-पूर्वी राष्ट्रों को एक क्षेत्रीय संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। अगस्त, 1967 में इण्डोनेशिया, फिलीपीन्स, मलेशिया, थाईलैण्ड तथा सिंगापुर ने इसकी स्थापना की।

प्रश्न 3.
भारत और चीन के आर्थिक सम्बन्धों की व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत और चीन के आर्थिक सम्बन्ध राजनीतिक सम्बन्धों की अपेक्षा अधिक अच्छे हैं। 2006 में दोनों देशों के बीच लगभग 18 अरब डालर का व्यापार हो रहा था। आर्थिक सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए दोनों देशों ने मतभेद को भुलाकर सहयोग का मार्ग चुना है। विश्व स्तर पर चीन एवं भारत ने विश्व व्यापार संगठन में एक जैसी नीतियां अपनाई हैं।

प्रश्न 4.
1978 से पहले एवं बाद में चीन की आर्थिक नीतियों में कोई दो अन्तर बताएं।
उत्तर:
(1) 1978 से पहले चीन ने आर्थिक क्षेत्र में एकान्तवास की नीति अपना रखी थी, जबकि 1978 के पश्चात् चीन ने आर्थिक क्षेत्र में खुले द्वार की नीति अपनाई।
(2) 1978 से पहले चीन में कृषि का निजीकरण नहीं हुआ था, परन्तु 1978 के बाद चीन में कृषि का निजीकरण कर दिया गया।

प्रश्न 5.
यूरोपीय संघ के निर्माण के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • यूरोपीय संघ का निर्माण यूरोप के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए किया गया।
  • यूरोपीय संघ का निर्माण इसीलिए भी किया गया, ताकि अमेरिका की आर्थिक शक्ति का मुकाबला किया जा सके।

प्रश्न 6.
अमेरिका के मुकाबले में सत्ता के किन्हीं दो विकल्पों की चर्चा करें।
उत्तर:
1. यूरोपियन यूनियन-अमेरिका के मुकाबले यूरोपियन यूनियन सत्ता के एक बेहतर विकल्प के रूप में उभरा है।
2. भारत-1990 के दशक से भारत ने इतनी तेजी से अपना आर्थिक विकास किया है कि कई आर्थिक विशेषज्ञों ने आने वाले समय में भारत को भी सत्ता के एक विकल्प के रूप में देखना शुरू कर दिया है।

प्रश्न 7.
यूरोपीय संघ के विस्तार के कोई दो चरण लिखें।
उत्तर:
1. यूरोपीय आर्थिक समुदाय-1947 में अमेरिकी विदेश मन्त्री मार्शल द्वारा प्रस्तुत योजना के आधार पर यूरोपीय राज्यों ने आर्थिक पुनर्निर्माण के लिए 1948 में यूरोपीय आर्थिक समुदाय का निर्माण किया।
2. यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय-इस समुदाय की स्थापना 18 अप्रैल, 1951 में फ्रांस के विदेश मंत्री शुमां के सुझाव पर की गई।

प्रश्न 8.
यूरोपीय संघ और आसियान के किन्हीं दो समान सहयोगी निर्णयों की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • यूरोपीय संघ और आसियान जैसे संगठनों ने अपने-अपने क्षेत्र में उत्पन्न होने वाले तनावों को कम करने का प्रयास किया है।
  • यूरोपीय संघ और आसियान ने अपने-अपने क्षेत्रों में आर्थिक विकास के लिए कई प्रकार के आर्थिक निर्णय लिए।

प्रश्न 9.
मार्शल योजना क्या थी ? इसने यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन के गठन का रास्ता कैसे बनाया ?
उत्तर:
मार्शल योजना अमेरिका द्वारा दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनाई गई थी, ताकि यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था को पुनर्गठित किया जा सके। क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान अधिकांश यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था ख़राब हो चुकी थी। मार्शल योजना के अन्तर्गत ही 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन की स्थापना की गई, जिसके माध्यम से पश्चिमी यूरोप के देशों को आर्थिक मदद दी गई।

प्रश्न 10.
यूरोपीय संघ में कितने सदस्य देश हैं ? सन् 2016 में किस देश में यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ने के लिए जनमत संग्रह करवाया गया ?
उत्तर:
यूरोपीय संघ में 28 सदस्य देश हैं। सन् 2016 में इंग्लैण्ड में यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ने के लिए जनमत संग्रह करवाया गया।

प्रश्न 11.
यूरोपीय संघ की मुद्रा का क्या नाम है ? इसका प्रचलन कब शुरू हुआ ?
उत्तर:
यूरोपीय संघ की मुद्रा का नाम यूरो है। इसका 2002 में शुरू हुआ।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

प्रश्न 12.
यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
यूरोपीय कोयला एवं इस्पात समुदाय की स्थापना 18 अप्रैल, 1951 में फ्रांस के विदेश मंत्री शुमां के सुझाव पर की गई। इस समुदाय का मुख्य कार्य हस्ताक्षर करने वाले सदस्य राष्ट्रों के कोयले एवं इस्पात के उत्पादन व वितरण पर नियन्त्रण रखना और इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करके सदस्य राज्यों के कोयले व इस्पात के साधनों की एक सामान्य मण्डी बनाकर उनके उपयोग की सुव्यवस्था करना था।

प्रश्न 13.
यूरोपीय संघ के झण्डे के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
यूरोपीय संघ के झण्डे में सोने के रंग के सितारों का एक घेरा है, जो यूरोप के लोगों की एकता और भाईचारे का प्रतीक है। इस झण्डे में 12 सितारे हैं, क्योंकि यूरोप में 12 की संख्या को पूर्णता, एकता और समग्रता का प्रतीक माना जाता है।

प्रश्न 14.
आसियान के झण्डे की व्याख्या करें।
उत्तर:
आसियान के झण्डे में धान की दस बालियों को दर्शाया गया है, ये दस बालियां दक्षिण पूर्व एशिया के दस देशों को दर्शाती हैं जो आपस में परस्पर मित्रता, एकता एवं भाईचारे का व्यवहार करते हैं। झण्डे में दिया गया गोला (वृत्त) आसियान की एकता का प्रतीक है।

प्रश्न 15.
चीन में खेती एवं उद्योगों का निजीकरण कब किया गया ?
उत्तर:
चीन में खेती का निजीकरण सन् 1982 एवं उद्योगों का निजीकरण सन् 1998 में किया गया।

प्रश्न 16.
‘आसियान’ (ASEAN) के वर्तमान सदस्य देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • कंबोडिया
  • इंडोनेशिया
  • मलेशिया
  • म्यांमार
  • फिलीपींस
  • सिंगापुर
  • थाइलैंड
  • वियतनाम
  • ब्रूनेई
  • लाओस।

प्रश्न 17.
‘आसियान’ (ASEAN) के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • आसियान सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक तथा प्रशासनिक सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • आसियान का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य क्षेत्रीय शान्ति तथा सुरक्षा स्थापित करना है।

प्रश्न 18.
चीन की ‘खुले द्वार की नीति’ को स्पष्ट करें।
उत्तर:
1978 में चीनी नेता श्याओपेंग ने ‘खुले द्वार’ (Open door) की नीति की घोषणा करके आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, जिसके फलस्वरूप चीन ने लगातार उन्नति की तथा आगे चलकर एक आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। इससे चीन में तेजी से बदलती प्रवृत्तियों का पता चलता है।

प्रश्न 19.
चीन में विदेशी व्यापार की वृद्धि के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • चीन में विदेशी व्यापार की वृद्धि का एक प्रमुख कारण 1978 में ‘खुले द्वार’ की नीति की घोषणा करना था।
  • चीन ने विदेशी निवेश एवं व्यापार को आकर्षित करने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (Special Economic Zone-SEZ) का निर्माण किया।

प्रश्न 20.
‘आसियान विजन-2020’ की कोई एक मुख्य बात लिखें।
उत्तर:
‘आसियान विजन -2020’ में अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय में आसियान की एक बर्हिमुखी भूमिका को प्रमुखता दी गई है।

प्रश्न 21.
चीन की नई आर्थिक नीति की कोई दो असफलताएं बताएं।
उत्तर:

  • चीन की नई आर्थिक नीति के अन्तर्गत जारी सुधारों का लाभ सभी क्षेत्रों को नहीं मिल पाया है।
  • चीन में नई आर्थिक नीति से बेरोज़गारी बढ़ी है। चीन में लगभग 10 करोड़ लोग बेरोज़गार हैं।

प्रश्न 22.
‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ के नारे के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
‘हिन्दी-चीनी भाई-भाई’ का नारा 1950 के दशक में अस्तित्व में आया। इस नारे का उद्देश्य भारत-चीन सम्बन्धों को मजबूत करना था। चीन के प्रधानमन्त्री चाऊ-एन-लाई, की 1954 में भारत यात्रा के दौरान यह नारा और अधिक लोकप्रिय हो गया। परन्तु धीरे-धीरे भारत एवं चीन में सीमा विवाद बढ़ने तथा 1962 में चीन द्वारा भारत पर आक्रमण से यह नारा महत्त्वहीन हो गया।

प्रश्न 23.
चीन की बदलती व्यवस्था के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
1. विदेशी सम्बन्धों में सुधार-चीन की बदलती व्यवस्था का प्रमुख कारण 1970 के दशक में चीन द्वारा विदेशी सम्बन्धों को बढ़ावा देना था। 1972 में चीन ने अमेरिका से सम्बन्ध बनाकर अपना एकांतवास समाप्त किया।

2. आधुनिकीकरण पर बल-चीन में आधुनिकीकरण पर बहुत बल दिया जा रहा है। इसीलिए 1982 के संविधान में जगह-जगह उन्नत विज्ञान व तकनीक, समाजवादी आधुनिकीकरण, वैज्ञानिक खोज, औद्योगिक अनुसन्धान व खोज आदि शब्दावली का प्रयोग किया गया है।

प्रश्न 24.
द्वि-धवीय व्यवस्था के टूटने के पश्चात् अमेरिका के वैकल्पिक सत्ता के रूप में उभरे किन्हीं दो क्षेत्रीय संगठनों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:

  • यूरोपीय यूनियन।
  • आसियान।

प्रश्न 25.
संयुक्त मुद्रा किसे कहते हैं ?
उत्तर:
संयुक्त मुद्रा से अभिप्राय ऐसी मुद्रा से है, जिसका प्रचलन दो या दो से अधिक देशों में हो। इस प्रकार की मुद्रा के प्रचलन के लिए सदस्य देश परस्पर समझौता करते हैं, ताकि सम्बन्धित देशों में उस मुद्रा को वैध माना जाए। यूरोप में संयुक्त मुद्रा जिसे ‘यूरो मुद्रा’ कहते हैं, का प्रचलन है।

प्रश्न 26.
चीन के सन्दर्भ में नेपोलियन ने क्या कहा था ?
उत्तर:
चीन के सन्दर्भ में नेपोलियन ने कहा था, कि “वहां एक दैत्य सो रहा है, उसे सोने दो, यदि वह जाग गया तो दुनिया को हिला देगा।”

प्रश्न 27.
‘एशिया का रोगी’ किस देश को कहा जाता था ?
उत्तर:
‘एशिया का रोगी’ चीन देश को कहा जाता था।

प्रश्न 28.
माओ के बाद चीन के उदय का एक कारण लिखें।
उत्तर:
माओ के बाद चीन के उदय का एक प्रमुख कारण चीन द्वारा खुले द्वार की नीति को अपनाना था।

प्रश्न 29.
चीन में साम्यवादी क्रान्ति कब और किसके नेतृत्व में हुई?
उत्तर:
चीन में साम्यवादी क्रान्ति सन् 1949 में माओ-त्से-तुंग के नेतृत्व में हुई।

प्रश्न 30.
भारत और चीन के बीच तनाव के कोई दो कारण लिखें।
अथवा
भारत और चीन के मध्य दो मुख्य विवाद कौन-से हैं ?
उत्तर:

  • भारत और चीन में महत्त्वपूर्ण विवाद सीमा का विवाद है। चीन ने भारत की भूमि पर कब्जा कर रखा है।
  • चीन का तिब्बत पर कब्जा और भारत का दलाई लामा को राजनीतिक शरण देना।

प्रश्न 31.
यूरोपीय संघ की स्थापना कब और किस संधि के द्वारा हुई ?
उत्तर:
यूरोपीय संघ की स्थापना सन् 1992 में मैस्ट्रिच संधि के द्वारा हुई।

प्रश्न 32.
आसियान शैली क्या है ?
उत्तर:
आसियान शैली आसियान सदस्यों के अनौपचारिक और सहयोगपूर्ण कामकाज का स्वरूप है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. अमेरिका के मुकाबले सत्ता के विकल्प के रूप में उभर कर सामने आया है
(A) यूरोपीय संघ
(B) आसियान
(C) भारत एवं चीन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

2. आसियान संगठन है
(A) दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का
(B) यूरोपीय देशों का
(C) दक्षिण एशिया के देशों का ।
(D) उत्तरी अमेरिका के देशों का।
उत्तर:
(A) दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का।

3. चीन में आधुनिकीकरण के चार प्रस्ताव कब दिये गए ?
(A) 1965
(B) 1973
(C) 1985
(D) 1990.
उत्तर:
(B) 1973.

4. भारत एवं चीन के आर्थिक सम्बन्ध
(A) खराब हैं
(B) अच्छे हैं
(C) नहीं हैं
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(B) अच्छे हैं।

5. SEZ का अर्थ लिया जाता है ?
(A) Service Economic Zone
(B) Several Economic Zone
(C) Special Earth Zone
(D) Special Economic Zone.
उत्तर:
(D) Special Economic Zone.

6. मैस्ट्रिच सन्धि पर हस्ताक्षर कब हुए
(A) 25 अप्रैल, 1994
(B) 25 फरवरी, 2003
(C) 7 फरवरी, 1992
(D) 23 दिसम्बर, 2005.
उत्तर:
(C)7 फरवरी, 1992.

7. जनसंख्या की दृष्टि से चीन का विश्व में कौन-सा स्थान है ?
(A) प्रथम
(B) द्वितीय
(C) चतुर्थ
(D) दसवां।
उत्तर:
(A) प्रथम।

8. मार्शल योजना का संबंध निम्न में से किस देश से है ?
(A) ब्रिटेन
(B) संयुक्त राज्य अमेरिका
(C) भारत
(D) भू० पू० सोवियत संघ ।
उत्तर:
(B) संयुक्त राज्य अमेरिका।

9. एकल यूरोपियन अधिनियम (Single European Act) कब लागू हुआ ?
(A) मई, 1982
(B) जुलाई, 1987
(C) मार्च, 1990
(D) दिसम्बर, 2000.
उत्तर:
(B) जुलाई, 1987.

10. भारत तथा चीन के बीच तनाव का मुख्य कारण है:
(A) नदी जल बंटवारा
(B) घुसपैठ की समस्या
(C) सीमा विवाद
(D) सीमा पार आतंकवाद।
उत्तर:
(C) सीमा विवाद।

11. यूरोपीय संघ की स्थापना कब हुई ?
(A) 1987 में
(B) 1989 में
(C) 1992 में
(D) 1996 में।
उत्तर:
(C) 1992 में।

12. यूरोप में यूरो मुद्रा का प्रचलन कब शुरू हुआ ?
(A) 2000 में
(B) 2001 में
(C) 2002 में
(D) 2003 में।
उत्तर:
(C) 2002 में।

13. भारत-आसियान (ASEAN) के बीच ‘मुक्त व्यापार समझौता’ कब लागू हुआ ?
(A) 1 दिसम्बर, 2009 को
(B) 1 जनवरी, 2010 को
(C) 1 जनवरी, 2009 को
(D) 1 जनवरी, 2009 को।
उत्तर:
(B) 1 जनवरी, 2010 को।

14. यूरोपीय संसद् का पहला प्रत्यक्ष चुनाव कब हुआ ?
(A) सन् 1957 में
(B) सन् 1959 में
(C) सन् 1969 में
(D) सन् 1979 में।
उत्तर:
(D) सन् 1979 में।

15. ‘आसियान’ (ASEAN) की स्थापना कब हुई?
(A) 1961 में
(B) 1965 में
(C) 1967 में
(D) 1969 में।
उत्तर:
(C) 1967 में।

16. चीन में साम्यवादी क्रान्ति कब हुई ?
(A) 1949 में
(B) 1955 में
(C) 1957 में
(D) 1965 में।
उत्तर:
(A) 1949 में।

17. चीन ने ‘मुक्त द्वार’ की नीति कब प्रारम्भ की?
(A) 1968 में
(B) 1978 में
(C) 1984 में
(D) 1988 में।
उत्तर:
(B) 1978 में।

18. चीन में कृषि क्षेत्र का निजीकरण कब किया गया ?
(A) 1954 में
(B) 1972 में
(C) 1995 में
(D) 1982 में।
उत्तर:
(D) 1982 में।

19. चीन में उद्योगों का निजीकरण कब किया गया था ?
(A) 1991 में
(B) 1998 में
(C) 1999 में
(D) 2001 में।
उत्तर:
(B) 1998 में।

20. किस वर्ष चीन विश्व व्यापार संगठन का सदस्य बना ?
(A) 1997 में
(B) 2001 में
(C) 2003 में
(D) 2008 में।
उत्तर:
(B) 2001 में।

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21. इंग्लैण्ड में, यूरोपीय संघ से अलग (BREXIT) होने के लिए जनमत संग्रह कब हुआ था?
(A) 23 जून, 2016
(B) 23 जून, 2015
(C) 23 जून, 2014
(D) 23 जून, 2013.
उत्तर:
(A) 23 जून, 2016.

22. चीन द्वारा तिब्बत को अपने क्षेत्र में शामिल करने का प्रयास कब किया गया था ?
(A) 1950 में
(B) 1960 में
(C) 1970 में
(D) 1980 में।
उत्तर:
(A) 1950 में।

23. चीन ने भारत पर कब आक्रमण किया ?
(A) 1962 में
(B) 1965 में
(C) 1967 में
(D) 1971 में।
उत्तर:
(A) 1962 में।

24. ‘पंचशील समझौता’ किनके बीच हुआ?
(A) भारत-पाकिस्तान
(B) भारत-चीन
(C) भारत-रूस
(D) भारत-बांग्लादेश।
उत्तर:
(B) भारत-चीन।

25. भारतीय प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी ने चीन यात्रा कब की ?
(A) 1985 में
(B) 1988 में
(C) 1990 में
(D) 1991 में।
उत्तर:
(B) 1988 में।

26. चीन में यातायात का सबसे लोकप्रिय साधन कौन-सा है ?
(A) साइकिल
(B) मोटर साइकिल
(C) कार
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) साइकिल।

27. आसियान का उद्देश्य है
(A) सदस्य देशों में आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं प्रशासनिक सहयोग को बढ़ाया जाए
(B) क्षेत्रीय शान्ति एवं सुरक्षा स्थापित की जाए
(C) कृषि, व्यापार एवं उद्योग में विकास एवं सहयोग किया जाए
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

28. ‘आसियान’ (ASEAN) में सम्मिलित सदस्य देशों की संख्या कितनी है?
(A) 8
(B) 10
(C) 12
(D) 15.
उत्तर:
(B) 10.

29. भारत और चीन के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा कौन-सी है ?
(A) मैकमोहन रेखा
(B) रेडक्लिफ रेखा
(C) नेहरू रेखा
(D) माओ-रेखा।
उत्तर:
(A) मैकमोहन रेखा।

30. जापान की अर्थव्यवस्था का विश्व में कौन-सा स्थान है ?
(A) प्रथम
(B) द्वितीय
(C) तृतीय
(D) दसवां।
उत्तर:
(C) तृतीय।

रिक्त स्थान भरें

(1) 20 अक्तूबर, 1962 को ……………. ने भारत पर आक्रमण किया।
उत्तर:
चीन

(2) चीन ने 1972 में ………………. के साथ दोतरफा संबंध शुरू किये (देश का नाम)।
उत्तर:
अमेरिका

(3) ‘चीन ने खुले द्वार’ की नीति सन् ………… में प्रारंभ की।
उत्तर:
1978

(4) चीन ने भारत पर सन् …………… में आक्रमण किया।
उत्तर:
1962

(5) चीन में सन् 1949 में श्री …………………. के नेतृत्व में साम्यवादी क्रान्ति हुई थी।
उत्तर:
माओ-त्से-तुंग

(6) यूरोपीय संघ के झण्डे में ………. …………. सितारे हैं।
उत्तर:
12

(7) यूरोपीय संघ की स्थापना …………………. वर्ष में हुई।
उत्तर:
1992

(8) 1954 में भारत और चीन के बीच ………………… समझौता हुआ।
उत्तर:
पंचशील

(9) सन् 1992 में यूरोपीय संघ की स्थापना ………………… सन्धि के द्वारा हुई।
उत्तर:
मैस्ट्रिच संधि

(10) आसियान (ASEAN) में शामिल सदस्य देशों की संख्या ……………….. है।
उत्तर:
दस

(11) भारत और चीन के मध्य ………… अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा है।
उत्तर:
मैकमोहन रेखा

(12) आसियान (ASEAN) में शामिल सदस्य देशों की संख्या …………. है।
उत्तर:
दस।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
आसियान (ASEAN) की स्थापना कब हुई ?
उत्तर:
सन् 1967 में।

प्रश्न 2.
जापान की अर्थव्यवस्था का विश्व में कौन-सा स्थान है ?
उत्तर:
जापान की अर्थव्यवस्था का विश्व में तीसरा स्थान है।

प्रश्न 3.
आसियान (ASEAN) में कितने देश सदस्य हैं ?
उत्तर:
आसियान के 10 देश सदस्य हैं।

प्रश्न 4.
यूरोपीय संघ की मुद्रा को किस नाम से जाना जाता है ?
अथवा
यूरोपीय संघ की मुद्रा का क्या नाम है ?
उत्तर:
यूरो मुद्रा।

प्रश्न 5.
चीन में कृषि क्षेत्र का निजीकरण कब किया गया ?
उत्तर:
सन् 1982 में।

प्रश्न 6.
भारत में चीन के मध्य अन्तर्राष्ट्रीय सीमा रेखा’ को किस नाम से जाना जाता है ?
अथवा
भारत और चीन के मध्य भारत द्वारा मान्यता प्राप्त सीमा रेखा कौन-सी है ?
उत्तर:
मैकमोहन रेखा।

प्रश्न 7.
क्या भारत ASEAN (आसियान) का सदस्य देश है ?
उत्तर:
नहीं, भारत आसियान का सदस्य नहीं है।

प्रश्न 8.
चीन में ‘साम्यवादी क्रान्ति’ कब हुई थी ?
उत्तर:
सन् 1949 में।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 4 सत्ता के वैकल्पिक केंद्र

प्रश्न 9.
चीन में ‘खुले द्वार की नीति’ की घोषणा कब की गयी थी ?
उत्तर:
सन् 1978.

प्रश्न 10.
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का कौन-सा स्थान है ?
उत्तर:
जनसंख्या की दृष्टि से विश्व में भारत का दूसरा स्थान है।

प्रश्न 11.
भारत ने पूरब की ओर देखो’ की नीति कब अपनायी ?
उत्तर:
सन् 1991 में।

प्रश्न 12.
‘पंचशील समझौते’ पर किन दो देशों ने हस्ताक्षर किए ?
उत्तर:
भारत एवं चीन ने।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
अफ़गानिस्तान युद्ध एवं खाड़ी युद्धों के सन्दर्भ में एक ध्रुवीय विश्व के विकास की व्याख्या करें।
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् शीत युद्ध की भी समाप्ति हो गई। इस प्रकार 1990 के दशक में विश्व में दो गुटों के बीच पाई जाने वाली कड़वाहट नहीं रही। परन्तु द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के समाप्त होने के पश्चात् विश्व तेज़ी से एक ध्रुवीय व्यवस्था में तबदील होने लगा और वो एक ध्रुव अमेरिका है। सोवियत संघ के पतन के बाद विश्व में कोई भी देश अमेरिका को चुनौती देने की स्थिति में नहीं था।

इस अवस्था का फायदा उठाकर अमेरिका ने भी विश्व में अपने प्रभाव को और अधिक बढ़ाना शुरू कर दिया तथा विश्व के कई क्षेत्रों में उसने सैनिक हस्तक्षेप किया। निम्नलिखित घटनाओं के वर्णन से एक ध्रुवीय विश्व (अमेरिका का एकाधिकार) के विकास का पता चलता है

1. प्रथम खाड़ी युद्ध (First Gulf War):
अमेरिका के एकाधिकार अर्थात् एक ध्रुवीय विश्व की शुरुआत हम प्रथम खाड़ी युद्ध को मान सकते हैं। जब अमेरिका ने अपनी सैनिक शक्ति के बल पर कुवैत को इराक से स्वतन्त्र करवाया था। अगस्त, 1990 में इराक के तानाशाह शासक सद्दाम हुसैन ने अपने छोटे से पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया। अमेरिका ने कुवैत को स्वतन्त्र कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

विश्व के 34 देशों की लगभग 6 लाख, 70 हजार की फ़ौज ने इराक पर हमला कर दिया। इस सैनिक अभियान में लगभग 75% सैनिक अमेरिका के थे और अमेरिका ही इस युद्ध को निर्देशित एवं नियन्त्रित कर रहा था। इतनी बड़ी फ़ौज के सामने इराक ज्यादा दिन तक नहीं टिक सका और उसे कुवैत से पीछे हटना पड़ा। इस युद्ध ने विश्व में अमेरिका की सैनिक ताकत को बहुत अधिक बढा दिया तथा विश्व एक ध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ने लगा।

2. सूडान एवं अफ़गानिस्तान पर अमेरिकन प्रक्षेपास्त्र हमला (American Missile Attack on Sudan and Afghanistan):
1998 में नैरोबी (कीनिया) तथा दारे-सलाम (तंजानिया) में अमेरिकन दूतावासों पर बम विस्फोट हुए। इन बम विस्फोटों का जिम्मेदार अल-कायदा को माना गया। परिणामस्वरूप अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिटन ने अल-कायदा के ठिकानों पर प्रक्षेपास्त्र हमले की आज्ञा दी।

जिसके कारण अमेरिका सूडान एवं अफ़गानिस्तान में अल-कायदा के ठिकानों पर क्रूज प्रक्षेपास्त्रों से हमला किया। अमेरिका ने इस सम्बन्ध में विश्व आलोचनाओं को नजरअंदाज कर दिया। इस घटना से साबित हो गया कि अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति है क्योंकि अन्य कोई भी देश इस प्रकार का हमला करने का साहस नहीं कर सकता।

3. 9/11 की घटना एवं अफ़गानिस्तान युद्ध (Incident of 9/11 and Afghanistan War):
विश्व में एक बड़ी आतंकवादी घटना तब घटी जब 11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर एवं पेंटागन पर जबरदस्त आतंकवादी हमला किया गया। इस हमले में लगभग 3000 लोग मारे गए। इस आतंकवादी हमले में भी अल-कायदा के शामिल होने की शंका जाहिर की गई। परिणामस्वरूप अमेरिका ने बदले की कार्यवाही करते हुए अफ़गानिस्तान जोकि अल-कायदा का गढ़ बन चुका था, में युद्ध की घोषणा कर दी।

यद्यपि अमेरिका अल-कायदा तथा तालिबान को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाया, परन्तु उसने इसकी शक्ति को बहुत कम अवश्य कर दिया। इस ले को रोकने के लिए यद्यपि कई देशों ने अमेरिका से आग्रह किया, परन्तु अमेरिका ने किसी बात पर ध्यान न देते हुए हमला जारी रखा। इससे स्पष्ट होता है कि अमेरिका विश्व की एक बड़ी सैनिक ताकत था तथा विश्व एक ध्रुवीय हो गया था।

4. द्वितीय खाड़ी युद्ध (Second Gulf War):
विश्व के एक ध्रुवीय होने की पुष्टि एक अन्य महत्त्वपूर्ण घटना से हुई, जब अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने मार्च, 2003 में व्यापक विनाश के हथियारों का आरोप लगाकर इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध को संयुक्त राष्ट्र की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी। इस युद्ध में भी अमेरिका ने इराक के शासक सद्दाम हुसैन को हटाकर उसके स्थान पर अपनी कठपुतली सरकार बना दी, परन्तु अमेरिका वहां पर शान्ति कायम न रख पाया।

विश्व के किसी भी देश की आलोचना की परवाह न करते हुए अमेरिका ने इराक पर युद्ध थोपा था। … उपरोक्त घटनाओं से स्पष्ट होता है कि इन घटनाओं के कारण विश्व तेज़ी से एक ध्रुवीय होता चला गया और अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति है, जबकि अन्य कोई भी देश उसके समान शक्तिशाली नहीं है।

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प्रश्न 2.
अमेरिका की आर्थिक एवं विचारधारात्मक वर्चस्वता एवं इसकी चुनौती का वर्णन करें।
उत्तर:
1. अमेरिका की आर्थिक वर्चस्वता एवं चुनौतियां (Dominance and Challenges to the U.S. in Economy):
अमेरिका विश्व की एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक महाशक्ति है। विश्व के सभी महत्त्वपूर्ण आर्थिक सम्मेलनों पर अमेरिका का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। परन्तु वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका को जापान, चीन एवं भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है। जापान 1970 एवं 1980 के दशक से ही आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देता आया है। परन्तु 1980 के बाद से चीन भी एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में अमेरिका को चुनौती दे रहा है।

जहां जापान अमेरिका का एक सहयोगी रहा है, वहीं चीन अमेरिका का प्रतियोगी माना जाता है। चीन अमेरिका की आर्थिक प्रभावशीलता को कम करने के लिए अपनी ही राष्ट्रीय मुद्रा का अवमूल्यन करने से भी गुरेज नहीं करता। चीन के साथ-साथ 1990 के दशक में भारत ने भी अमेरिका की आर्थिक वर्चस्वता को चुनौती देनी शुरू कर दी। चीन ने अमेरिका को उत्पादन आधारित विकास पर परम्परागत उपायों पर जोर देते हुए चुनौती दी है तो भारत ने वैश्विक सेवा के क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती दी है।

2. अमेरिका की विचारधारात्मक वर्चस्वता एवं चुनौतियां (Dominance and Challenges to the U.S. in Ideology)-सोवियत संघ के विघटन एवं शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व में अमेरिका जनित विचारधारा पूंजीवाद एवं प्रजातन्त्रवाद की वर्चस्वता बढ़ गई। शीत युद्ध दो विचारधाराओं के बीच भी टकराव था, जिसमें अमेरिका की प्रजातन्त्र पर आधारित विचारधारा की विजय हुई।

अत: 1991 के बाद अमेरिका ने विचारधारात्मक रूप से भी विश्व में वर्चस्व कायम किया तथा अधिकांश देश इस ओर बढ़ रहे हैं, परन्तु पिछले 10 वर्षों में अमेरिका की इस विचारधारा को आतंकवादी विचारधारा से लगातार चुनौतियां मिल रही हैं। आतंकवादी संगठनों ने नैरोबी तथा दारे-सलाम के अमेरिकी दूतावासों, अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सैन्टर तथा पेंटागन पर एवं इंग्लैण्ड में बम विस्फोट एवं हवाई हमला करके लगातार अमेरिका की प्रजातन्त्रात्मक विचारधारा को चुनौती दी है।

प्रश्न 3.
1991 के पश्चात् भारत-अमेरिका सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
शीत यद्ध की समाप्ति के पश्चात विश्व राजनीति में बहत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए, भारत भी इससे अछता नहीं रहा तथा इसने भी अमेरिका के साथ अपने सम्बन्धों को बढ़ाना शुरू कर दिया। वैसे भी वर्तमान बदलती परिस्थितियों में सभी राष्ट्र एक-दूसरे के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बनाने के लिए तत्पर हैं। इसी दिशा में भारत एवं अमेरिका भी कदम बढ़ा रहे हैं। भारत एवं अमेरिका के सम्बन्ध अब तनावपूर्ण परिस्थितियों से निकलकर सामान्य बल्कि घनिष्ट एवं मैत्रीपूर्ण हो रहे हैं।

भारत-अमेरिका के सम्बन्धों में एक नया मोड़ देने के लिए भारत के प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिम्हा राव 6 दिन की सरकारी यात्रा पर मई, 1994 को अमेरिका गए। वहां पर आपसी सहयोग के क्षेत्र में 4 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए, परन्तु परमाणु अप्रसार सन्धि और व्यापक परमाणु प्रसार निषेध सन्धि (C.T.B.T.) पर मतभेद बने रहे। 11 मई और 31 मई, 1998 को वाजपेयी की सरकार ने परमाणु परीक्षण किए, जिस पर अमेरिका ने भारत के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए।

इसमें सन्देह नहीं है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबन्ध सन्धि (सी० टी० बी० टी०) के विषय पर आज भी मतभेद बने हुए हैं, परन्तु मई, 1999 से भारत एवं अमेरिका के सम्बन्धों में सुधार हुआ है। मई, 1999 में भारत ने पाक घुसपैठियों को कारगिल से बाहर निकालने के लिए सैनिक कार्यवाही प्रारम्भ की। पूरे कारगिल संकट के दौरान अमेरिका भारत के साथ खड़ा रहा और उसने पाकिस्तान को उसकी ग़लतियों के लिए फटकारा।

21 मार्च, 2000 को अमेरिकन राष्ट्रपति बिल क्लिटन पांच दिन के लिए भारत की सरकारी यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान अमेरिका एवं भारत ने आर्थिक क्षेत्र में अनेक समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके अतिरिक्त भारत अमेरिकी सम्बन्धों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए विज़न-2000 नामक दस्तावेज़ पर भी हस्ताक्षर किये गए। अमेरिकी राष्ट्रपति की इस यात्रा से भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में एक नए युग का सूत्रपात हुआ है।

8 सितम्बर, 2000 को भारतीय प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी अमेरिका की यात्रा पर गए। अपने लम्बे व्यस्त में प्रधानमन्त्री वाजपेयी ने अमेरिकी राष्टपति बिल क्लिटन सहित अनेक प्रमुख नेताओं और व्यापारिक संस्थाओं से बातचीत की। इस दौरान आपसी हित के विभिन्न विषयों पर व्यापक बातचीत हुई।11 सितम्बर, 2001 को आतंकवादियों ने अमेरिका के अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानों पर हमला किया जिसमें हजारों लोगों की मौत हुई। भारत सहित विश्व समुदाय ने इस हमले की कड़ी आलोचना की। भारत ने आतंकवाद को रोकने और उसके उन्मूलन में अमेरिका का समर्थन किया।

नवम्बर, 2001 में अमेरिका के रक्षामन्त्री रूमसफील्ड भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद के विरुद्ध मिलकर लड़ने का फैसला किया। इस यात्रा की महत्त्वपूर्ण घटना यह रही कि अमेरिका भारत को सैनिक साजो-सामान देने के लिए तैयार हो गया। इसके साथ ही अमेरिका ने जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद पर भारत की चिन्ताओं पर सहमति जताई। नवम्बर, 2001 में भारत के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अमेरिका की यात्रा की।

वाजपेयी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश के साथ शिखर वार्ता के दौरान आतंकवाद के खिलाफ लड़ने, नई रणनीतिक योजना बनाने, परमाणु क्षेत्र में शान्तिपूर्ण उद्देश्यों के लिए संयुक्त रूप से कार्य करने, सुरक्षा सहयोग को बढ़ाने एवं अफ़गानिस्तान के अच्छे भविष्य के लिए मिलकर काम करने की बात की। दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद् पर आतंकवादियों ने हमला किया। इस हमले में शामिल सभी आतंकवादी पाकिस्तानी नागरिक थे। इसके विरोध में पाकिस्तान के प्रति सख्त रवैया अपनाया और भारी मात्रा में सीमा पर सेना की तैनाती कर दी।

इससे भारत व पाकिस्तान के बीच युद्ध का वातावरण बन गया। इस बीच अनेक अमेरिकी उच्चाधिकारियों ने भारत और पाकिस्तान को युद्ध टालने की सलाह दी। अमेरिका ने अनेक बार पाकिस्तान सरकार को आतंकवादी गतिविधियां संचालित करने से मना किया। इन आतंकवादी हमलों से भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ है। जनवरी, 2002 में भारत के रक्षामन्त्री श्री जार्ज फर्नांडीस अमेरिका यात्रा पर गए। वहां पर फर्नांडीस ने अमेरिका के रक्षामन्त्री श्री रूम्सफील्ड के साथ एक सुरक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए।

असैनिक परमाणु समझौता–भारत एवं संयुक्त राज्य अमेरिका ने अपने सम्बन्धों की और मज़बूती प्रदान करते हुए 2005 में असैनिक परमाणु समझौता किया, जिस पर पूर्ण रूप से 11 अक्तूबर, 2008 को दोनों देशों द्वारा हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते से दोनों देश और भी निकट आ गए। भारत एवं अमेरिका अब तीन विशेष क्षेत्रों पर सहयोग बढ़ाने के लिए सहमत हो गए हैं। ये हैं

  • मानवता के हित में परमाणु कार्यक्रम
  • मानवीय अन्तरिक्ष कार्यक्रम
  • उच्च तकनीकी व्यापार।

नवम्बर, 2009 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह अमेरिका यात्रा पर गए। इस यात्रा के दौरान प्रधानमन्त्री अमेरिकन राष्ट्रपति बराक ओबामा से मिले तथा दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सम्बन्धों पर बातचीत की। दोनों देशों ने साझा बयान जारी करते हुए अफ़गानिस्तान एवं पाकिस्तान में आतंकी अभयारण्यों को समाप्त करने का संकल्प लिया। नवम्बर, 2010 में अमेरिका के राष्ट्रपति श्री बराक हुसैन ओबामा भारत यात्रा पर आए। अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थाई सदस्यता के दावे का समर्थन किया।

सितम्बर, 2013 में भारतीय प्रधानमन्त्री ने अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों में आतंकी गतिविधियों से लेकर एच-1 बी वीजा, सिविल परमाणु करार और सामरिक सहयोग पर बातचीत की। __ जनवरी, 2015 में अमेरिकन राष्ट्रपति ने भारत की यात्रा की। वे 26 जनवरी की गणतंत्र दिवस की परेड में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने नागरिक परमाणु समझौता तथा स्वच्छ ऊर्जा जैसे महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

सितम्बर 2015 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने सामरिक साझेदारी को और बेहतर बनाने का निर्णय लिया तथा सुरक्षा, आतंकवाद से निपटने, रक्षा, आर्थिक साझेदारी तथा जलवायु परिवर्तन पर सहयोग को और गति देने पर सहमति व्यक्त की। जून 2016 एवं 2017 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने आतंकवाद, सुरक्षा, स्वच्छ ऊर्जा तथा एन० एस० जी० में भारत को शामिल करने पर बातचीत की।

सितम्बर, 2019 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान 22 सितम्बर, 2019 को हयूस्टन में आयोजित ‘हाउदी मोदी’ कार्यक्रम में अमेरिकन राष्ट्रपति श्री डॉनाल्ड ट्रम्प ने भी भाग लिया, जोकि भारत-अमेरिका के लगातार हो रहे अच्छे सम्बन्धों का उदाहरण है। 24 सितम्बर, 2019 को दोनों देशों ने आतंकवाद, ऊर्जा, विश्व सुरक्षा एवं व्यापार पर चर्चा की।

फरवरी 2020 में अमेरिकन राष्ट्रपति श्री डोनाल्ड ट्रम्प भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने द्विपक्षीय सहयोग एव सुरक्षा को बढ़ाने पर जोर दिया। दोनों देशो ने जलवायु परिवर्तन, स्वच्छ ऊजी एव आतंकवाद पर भी चचा की। उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भारत-अमेरिका के सम्बन्ध न केवल सामान्य हो रहे हैं अपितु मैत्रीपूर्ण होते जा रहे हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 4.
एक ध्रुवीय विश्व पर एक निबन्ध लिखें।
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व धीरे-धीरे दो गुटों में बंट गया। एक गुट का नेता उदारवादी देश अमेरिका था तो दूसरे गुट का नेता साम्यवादी देश सोवियत संघ था। द्वितीय युद्ध के पश्चात् लगभग 15 वर्षों तक इन दोनों देशों में अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनने की होड़ लगी रही। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय विश्व पूर्ण रूप से द्वि-ध्रुवीय (Bipolar) था। विश्व के अधिकांश देश इन दोनों गुटों में बंटे हुए थे।

परन्तु द्वितीय विश्व युद्ध के 15 या 20 वर्षों के बाद विश्व राजनीति में धीरे-धीरे परिवर्तन आने लगे जिससे विश्व द्वि-ध्रुवीय के स्थान पर बहु ध्रुवीय (Multi polar) बनने लगा। उदाहरण के लिए 1955 में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की शुरुआत हुई, जिसकी संख्या अधिक-से-अधिक होती चली गई। इस आन्दोलन की स्थापना ही दोनों गुटों से अलग रहने के लिए की गई थी।

क्योंकि भारत गुट निरपेक्ष आन्दोलन का नेता था। इसलिए भारत की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक स्वाभिमानी तथा क्षेत्रीय महाशक्ति के रूप में होने लगी। चीन एशिया में धीरे-धीरे एक महाशक्ति के रूप में उभरने लगा था। उधर पश्चिमी यूरोप के देश अपनी कुशलता एवं संचालन के बल पर एक शक्तिशाली केन्द्र बनते जा रहे थे।

फ्रांस एक और महाशक्ति का रूप लेता जा रहा था। विश्व राजनीति में जापान तथा पश्चिमी जर्मनी आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहे समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व थे। इसके अतिरिक्त ब्राज़ील, इण्डोनेशिया तथा मिस्र इत्यादि जैसे देशों ने भी विश्व राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करनी शुरू कर दी थी। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि तत्कालीन परिस्थितियों में अमेरिका एवं सोवियत संघ के अतिरिक्त कुछ अन्य शक्तियां भी थीं जो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रही थीं। अतः विश्व एक प्रकार से द्वि ध्रुवीय के स्थान पर बहु-ध्रुवीय बनने लगा।

इसके पश्चात् 1980 के दशक के अन्त एवं 1990 के दशक के प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्तर पर परिवर्तन आए। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन सोवियत संघ का विघटन एवं शीत युद्ध की समाप्ति था। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की सक्रियता भी थोड़ी कम हो गई। पूर्वी यूरोप के अधिकांश साम्यवादी देशों में पूंजीवादी हवा चलने लगी। इन सभी परिस्थितियों ने विश्व को बहु-ध्रुवीय के स्थान पर एक ध्रुवीय (Unipolar) बनाने में मदद की। एक ध्रुवीय विश्व का नेता अमेरिका था, क्योंकि उसे किसी भी अन्य शक्ति से चुनौती नहीं मिल पा रही थी। अतः वह विश्व राजनीति में एकमात्र महाशक्ति रह गया था जिसके कारण विश्व एक ध्रुवीय होता चला गया।

प्रश्न 5.
एक-ध्रुवीय व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य कारण लिखो।
उत्तर:
एक ध्रुवीय व्यवस्था का अर्थ-1980 के दशक के अन्त एवं 1990 के दशक के प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक परिवर्तन आए। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन सोवियत संघ का विघटन एवं शीत युद्ध की समाप्ति था। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की सक्रियता भी थोड़ी कम हो गई। पूर्वी यूरोप के अधिकांश साम्यवादी देशों में आतंकवादी हवा चलने लगी।

इन सभी परिस्थितियों ने विश्व को बहु-ध्रुवीय के स्थान पर एक-ध्रुवीय (Unipolar) बनाने में मदद की। एक-ध्रुवीय विश्व का नेता अमेरिका था, क्योंकि उसे किसी भी अन्य शक्ति से चुनौती नहीं मिल पा रही थी। अतः वह विश्व राजनीति में एक महाशक्ति रह गया था जिसके कारण विश्व एक-ध्रुवीय होता चला गया। एक-ध्रुवीय व्यवस्था के मुख्य कारण 1990 के दशक में विश्व के एक ध्रुवीय होने के निम्नलिखित कारण थे

1. शीत युद्ध की समाप्ति:
शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व को एक-ध्रुवीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। सोवियत संघ का 1991 में विघटन हो गया। सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप रूस ने सोवियत संघ का स्थान लिया, परन्तु रूस सोवियत संघ जितना शक्तिशाली कभी नहीं रहा। इन सब कारणों से अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा जिससे विश्व एक-ध्रुवीय बन गया, क्योंकि अमेरिका को कोई भी देश चुनौती देने की स्थिति में नहीं था।

2. रूस की कमज़ोर स्थिति:
जैसा कि हम वर्णन कर चुके हैं कि सोवियत संघ के पतन के बाद उसका स्थान रूस ने लिया। परन्तु रूस कभी भी सोवियत संघ जैसी प्रभावशाली स्थिति प्राप्त न कर सका। इसके कारण अमेरिका पर अंकुश लगाने वाली कोई शक्ति नहीं थी, जिसके कारण विश्व पर अमेरिका का प्रभाव बढ़ता ही गया तथा विश्व एक ध्रुवीय हो गया।

3. पूर्वी यूरोप में परिवर्तन:
सोवियत संघ के पतन के बाद पूर्वी यूरोप में कई ऐसे परिवर्तन हुए जिससे अमेरिका का प्रभाव विश्व राजनीति में बढ़ता ही चला गया। पूर्वी यूरोप के अधिकांश देश, जो पहले सोवियत संघ के प्रभाव क्षेत्र में थे, धीरे-धीरे साम्यवाद के प्रभाव से बाहर आकर पश्चिमी यूरोप के पूंजीवादी देशों से अपने सम्बन्ध बनाने लगे। ये परिवर्तन विश्व राजनीति में अमेरिका के प्रभाव को बढ़ाने वाले साबित हुए।

4. साम्यवादी देशों में उदारवादी परिवर्तन:
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् न केवल पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों में ही उदारवादी परिवर्तन हुए, बल्कि विश्व के अन्य साम्यवादी देशों में भी उदारवादी परिवर्तन हुए, जिससे अमेरिका की भूमिका विश्व राजनीति में महत्त्वपूर्ण हो गयी।

5. नाटो का विस्तार:
शीत युद्ध के प्रारम्भिक वर्षों में अमेरिका ने नाटो का निर्माण किया था। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद भी अमेरिका ने नाटो को न केवल बनाए रखा, बल्कि इसका सम्यवादी देशों में विस्तार भी किया। र्तमान समय में रूस भी नाटो का एक सदस्य देश है। अतः स्पष्ट है कि नाटो के और अधिक विस्तार एवं शक्तिशाली होने से अमेरिका की विश्व राजनीति में धमक और अधिक बढ़ी है तथा विश्व एक-ध्रुवीय बन गया।

6. अमेरिका के विश्व राजनीति में बढ़ते प्रभाव एवं विश्व के एक ध्रुवीय होने का एक कारण विश्व राजनीति में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रासंगिकता में कमी आना है।

7. विश्व राजनीति में अमेरिका के प्रभाव के बढ़ने का एक कारण यह है, कि इसके लिए स्वयं अमेरिका ने बहुत अधिक प्रयास किए हैं।

8. आतंकवाद की समस्या ने विश्व राजनीति में अमेरिका के प्रभाव को और अधिक बढ़ाया है। 9. इराक एवं अफ़गानिस्तान में अमेरिका के सैनिक हस्तक्षेप ने भी उसके प्रभाव में वृद्धि की है।

10. उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त वर्तमान समय में अमेरिका विश्व राजनीतिक में जो भूमिका निभा रहा है, उसने भी उसके प्रभाव को बढ़ाया है।

प्रश्न 6.
एक-ध्रुवीय व्यवस्था के लाभ लिखिए।
उत्तर:
एक-ध्रुवीय विश्व के निम्नलिखित लाभ हुए हैं
1. शान्तिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना (Establishment of Peaceful System):
एक-ध्रुवीय विश्व का है, कि इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्तिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना हो सकती है। द्वि-ध्रुवीय विश्व में दोनों गुटों, अमेरिका एवं सोवियत संघ में सदैव शीत युद्ध चलता रहा है, जिसके कारण अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भय व आतंक का वातावरण बना रहता था। परन्तु 1991 में सोवियत संघ के पतन एवं शीत युद्ध के समाप्त होने से विश्व स्तर पर शान्ति की स्थापना सम्भव हो सकी।

2. साम्यवाद के उग्रवादी व्यवहार पर नियन्त्रण (Control over Extremism of Communism):
एक ध्रुवीय विश्व का एक और महत्त्वपूर्ण लाभ यह हुआ है कि इसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्यवाद के उग्रवादी व्यवहार पर नियन्त्रण लग गया। 1991 में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् साम्यवादी विचारधारा को बहुत अधिक नुकसान हुआ, साम्यवादी विचारधारा के साधनों में बहुत कमी आ गई है, जिससे रूस तथा चीन जैसे साम्यवादी देशों के उग्रवादी व्यवहार में कुछ कमी आई। शीत युद्ध तथा द्वि-ध्रुवीय विश्व के समय सोवियत संघ विश्व के अन्य देशों में तथा चीन एशिया के देशों में साम्यवादी विचारधारा का बड़ी उग्रता से प्रचार तथा विस्तार करते थे, परन्तु एक ध्रुवीय विश्व में इस प्रकार की उग्रता पर नियन्त्रण लग गया।

3. तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा (Encouragement to Technological and Scientific Development):
एक-ध्रुवीय विश्व में तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा मिला है। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तथा शीत युद्ध समाप्त हो गया, तब द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था भी समाप्त हो गई, इसके पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर नव-निर्माण एवं पुनर्निर्माण की भी आवश्यकता अनुभव की गई, जिससे तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा दिया गया। क्योंकि नव-निर्माण एवं पुनर्निर्माण तब तक सम्भव नहीं था, जब तक तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा न मिले।

4. यूरोप में शान्ति एवं एकीकरण की प्रक्रिया का आरम्भ (Beginning of Peace and Integration Process in Europe):
एक-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह हुआ, कि इससे यूरोप में शान्ति एवं एकीकरण की प्रक्रिया का आरम्भ हुआ। द्वि-ध्रुवीय विश्व के अन्तर्गत यूरोप में सदैव तनाव बना रहता था, जर्मनी का विभाजन भी हो गया था। परन्तु द्वि-ध्रुवीय के समाप्त होने तथा एक-ध्रुवीय के अस्तित्व में आने से यूरोप में न केवल शान्ति स्थापित हुई, बल्कि जर्मनी जैसे देशों का एकीकरण भी हुआ।

5. उदारवाद का अधिक लोकप्रिय होना (Increasing Popularity of Liberalism)-एक-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह हुआ है कि इसने उदारवादी विचारधारा या उदारवाद को अधिक लोकप्रिय बनाया। द्वि-ध्रुवीय विश्व में सदैव उदारवाद एवं साम्यवाद में तनाव चलता रहता था जिसके कारण किसी भी विचारधारा को बढ़ावा नहीं मिल पाता था। परन्तु द्वि-ध्रुवीय विश्व की समाप्ति एवं एक-ध्रुवीय विश्व (पूंजीवादी) के अस्तित्व में आने से उदारवाद को अधिक बढ़ावा मिला तथा इसकी लोकप्रियता में वृद्धि हुई।

विश्व के अधिकांश राज्य (यहां तक कि साम्यवादी राज्य भी) उदारवादी विचारधारा को अपनाने लगे। इस विचारधारा के अन्तर्गत मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया गया। उदारवाद के कारण, निजीकरण एवं वैश्वीकरण को भी बढ़ावा मिला, जिससे विभिन्न निर्धन, विकासशील एवं अविकसित देशों को विकास करने के अधिक अवसर प्राप्त हुए। आधुनिक समय में कल्याणकारी राज्य की धारणा ने जन्म लिया। राज्यों के नागरिकों पर कुछ कर लगाकार उससे जन-कल्याण के कई कार्य किए।

6. शान्ति स्थापना में सहायक (Helpful in Peace Process):
एक-ध्रुवीय विश्व में विश्व स्तर पर शान्ति स्थापना में सहायता मिलती है। द्वि-ध्रुवीय विश्व में दोनों गुटों में तनाव रहता था। परन्तु एक-ध्रुवीय विश्व में ऐसी स्थिति नहीं थी। यदि विश्व के किसी एक भाग में तनाव पैदा होता है, तो विश्व में केवल एक महाशक्ति होने के कारण विश्व स्तर पर शान्ति बनाने का उत्तरदायित्व उस पर ही अधिक होता है, तथा किसी दूसरे शक्तिशाली गुट के न होने से वह शीघ्र निर्णय लेने में भी स्वतन्त्र रहता है ताकि तनाव को समाप्त किया जा सके।

7. जनता के जीवन स्तर में सुधार (Improvement in the Living Standard of People):
एक-ध्रुवीय विश्व का एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह हुआ है, कि इससे विश्व स्तर पर जनता के जीवन-स्तर में काफी सुधार आया है। एक ध्रुवीय विश्व में उदारवाद, निजीकरण, वैश्वीकरण तथा कल्याणकारी राज्य की धारणा को अधिक बढ़ावा मिला है, इन सभी परिवर्तनों से जनता को अधिक-से-अधिक रोजगार के अवसर प्राप्त हुए हैं, न केवल अपने देश में ही, बल्कि विश्व के अन्य देशों में भी। इससे उनके जीवन स्तर पर काफ़ी सुधार आया है।

8. आर्थिक विकास को बढ़ावा (Encouragement to Economic Development):
एक-ध्रुवीय विश्व का एक अन्य महत्त्वपूर्ण लाभ यह रहा है कि इसमें आर्थिक विकास को अधिक महत्त्व एवं बढ़ावा दिया गया है। इसमें विश्व स्तर पर आर्थिक सुधार लागू करने, वित्तीय घाटों को कम करने तथा लोगों के आर्थिक जीवन में सुधार जैसे विषय शामिल थे।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 7.
एक-ध्रुवीय विश्व के अवगुण लिखें। (Write the demerits of Unipolar World.)
उत्तर:
एक-ध्रुवीय विश्व के जहां कुछ लाभ हैं, वहीं पर कुछ दोष या हानियां भी हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. नव-साम्राज्यवाद का उदय (Rise of New Imperialism):
एक-ध्रुवीय विश्व का सबसे बड़ा दोष यह है, कि इस एक तरह से पुनः साम्राज्यवाद का उदय हुआ है, इसे हम नव-साम्राज्यवाद भी कह सकते हैं। अमेरिका ने विश्व के अधिकांश देशों में बड़ी-बड़ी कम्पनियां खोलकर वहां पर आर्थिक प्रभुत्व जमाकर साम्राज्यवाद को बढ़ावा दिया है।

2. अमेरिका का बढ़ता प्रभुत्व (Increasing Importance of America):
एक-ध्रुवीय विश्व का एक दोष यह है कि इसके अन्तर्गत विश्व राजनीति में अमेरिका का अनावश्यक प्रभुत्व बढ़ गया। प्रभुत्व बढ़ने से अमेरिका ने अनावश्यक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। विश्व का कोई भी क्षेत्र अमेरिकन हस्तक्षेप से अछूता नहीं रहता है। इराक, अफ़गानिस्तान, पनामा, क्यूबा, सोमालिया, उत्तरी कोरिया तथा ईरान जैसे राज्य अमेरिकन हस्तक्षेप के उदाहरण हैं। समय-समय पर विश्व के अन्य राज्यों द्वारा अमेरिका की इस प्रकार की कार्यवाहियों की आलोचना भी होती रही है, परन्तु अमेरिका पर इसका कोई प्रभाव नहीं।

3. वैश्विक आतंकवाद की समस्या (Problem of Global Terrorism):
वर्तमान समय की एक महत्त्वपूर्ण समस्या वैश्विक आतंकवाद है। हालांकि आतंकवाद की समस्या द्वि-ध्रुवीय विश्व में भी थी, परन्तु तब इसका क्षेत्र बहत अधिक नहीं था, परन्तु एक-ध्रुवीय विश्व में आतंकवाद की समस्या ने पूरे विश्व को चिन्तित कर रखा है। सितम्बर, 2001 में अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सैन्टर पर आतंकवादी हमला, दिसम्बर, 2001 में भारतीय संसद् पर हमला, मार्च 2003 में रूस के एक सिनेमा घर में दर्शकों को बन्दी बनाना, जून 2006 में लन्दन में बम विस्फोट तथा जुलाई, 2006 में बम्बई की ट्रेनों में सिलसिलेवार बम विस्फोट इस आतंकवादी समस्या के उदाहरण हैं।

4. आर्थिक सहायता में पक्षपात (Discrimination Regarding Financial Help):
एक-ध्रुवीय विश्व में अमेरिका एक महाशक्ति के रूप में समय-समय पर विश्व के ग़रीब एवं पिछड़े देशों को आर्थिक सहायता प्रदान करता है, परन्तु कुछ देशों का यह आरोप है, कि अमेरिका विभिन्न देशों की आर्थिक सहायता देते समय पक्षपात करता है। अमेरिका उन देशों को अधिक आर्थिक सहायता देता है, जो उसकी नीतियों का आंख मूंदकर समर्थन करते हैं, या जो देश अमेरिका के पिछलग्गू हैं।

5. संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता में कमी (Decline of effectiveness of U.N.O.):
एक-ध्रुवीय विश्व का सबसे बड़ा दोष यह रहा है कि इसमें संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशाली में बहुत कमी आई है। अमेरिका के द्वारा विश्व राजनीति में जो अनावश्यक हस्तक्षेप किया जाता है, उसमें संयुक्त राष्ट्र रोकने में असफल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की बैठकों में अमेरिका अपने प्रभाव से कई विषयों में अपने पक्ष में प्रस्ताव पास कर लेता है।

6. आर्थिक संकट (Economic Crises):
एक-ध्रुवीय विश्व में यद्यपि उदारवाद, निजीकरण, वैश्वीकरण एवं आर्थिक विकास की बात की जाती है, परन्तु वास्तविकता यह है कि, इस आर्थिक उदारीकरण के दौर में भी कई देशों में भुखमरी, बेरोज़गारी तथा ग़रीबी पाई जाती है।

प्रश्न 8.
क्या अमेरिका के वर्चस्व की कोई सीमाएं हैं ? संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका बहुत शक्तिशाली देश है, विशेषकर शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात्। विश्व की प्रत्येक अन्तर्राष्ट्रीय घटना चाहे वह आर्थिक हो, राजनीतिक हो, सांस्कृतिक हो, या कोई अन्य हो, सभी पर अमेरिका के प्रभाव को देखा जा सकता है। परन्तु इस प्रभाव पर कुछ सीमाएं भी हैं। ऐतिहासिक तौर पर कोई भी साम्राज्य अजेय नहीं रहा तथा लगभग सभी साम्राज्यों का समय के साथ-साथ नाश हो गया। इसी तरह अमेरिकन व्यवस्था में कुछ इस प्रकार की सीमाएं हैं, जो उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं

अमेरिकी वर्चस्व की राह में मुख्य रूप से तीन व्यवधान हैं

1. अमेरिका की संस्थागत बनावट-अमेरिका के वर्चस्व का प्रथम व्यवधान अमेरिका की स्वयं की संस्थागत बनावट है। अमेरिका में सरकार के तीनों अंग एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं तथा कार्यपालिका अमेरिकी सैनिक अभियानों पर अंकुश लगाता है।

2. उन्मुक्त समाज-अमेरिकन वर्चस्व की राह में दूसरा व्यवधान अमेरिकी उन्मुक्त समाज है। अमेरिकी उन्मुक्त समाज में शासन के उद्देश्य और ढंगों को लेकर संदेह बना रहता है।

3. नाटो-अमेरिकन वर्चस्व के मार्ग का तीसरा महत्त्वपूर्ण व्यवधान ‘नाटो’ है और आने वाले दिनों में अमेरिकी वर्चस्व को नाटो द्वारा ही कम किया जा सकता है।

लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक-ध्रुवीय विश्व से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व धीरे-धीरे दो गुटों में बंट गया। एक गुट का नेता उदारवादी देश अमेरिका था तो दूसरे गुट का नेता साम्यवादी देश सोवियत संघ था। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् लगभग 15 वर्षों तक इन दोनों देशों में अधिक-से-अधिक शक्तिशाली बनने की होड़ लगी रही। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस समय विश्व पूर्ण रूप से द्वि-ध्रुवीय (Bipolar) था। परन्तु 1980 के दशक के अन्त एवं 1990 के दशक के प्रारम्भ में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक स्तर पर परिवर्तन आए।

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सबसे बड़ा परिवर्तन सोवियत संघ का विघटन एवं शीत युद्ध की समाप्ति था। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की सक्रियता भी थोड़ी कम हो गई। पूर्वी यूरोप के अधिकांश साम्यवादी देशों में आतंकवादी हवा चलने लगी। इन सभी परिस्थितियों ने विश्व को बह-ध्रुवीय के स्थान पर एक-ध्रवीय (Unipolar) बनाने में मदद की। एक ध्रुवीय विश्व का नेता अमेरिका था, क्योंकि उसे किसी भी अन्य शक्ति से चुनौती नहीं मिल पा रही थी। अतः वह विश्व राजनीति में एकमात्र महाशक्ति रह गया था जिसके कारण विश्व एक-ध्रुवीय होता चला गया।

प्रश्न 2.
विश्व के एक-ध्रुवीय होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:
1. शीत युद्ध की समाप्ति:
शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व को एक-ध्रुवीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अमेरिका एवं सोवियत संघ में एक-दूसरे से अधिक शक्तिशाली होने के लिए युद्ध चल रहा था। विश्व में शक्ति सन्तुलन इन दो महाशक्तियों के हाथ में ही थी। परन्तु 1980 के दशक में सोवियत संघ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव ने पैट्राइस्का तथा ग्लासनोस्ट की नीति अपनाई, जिसके कारण सोवियत संघ का 1991 में विघटन हो गया।

सोवियत संघ के विघटन के परिणामस्वरूप रूस ने सोवियत संघ का स्थान लिया, परन्तु रूस सोवियत संघ जितना शक्तिशाली कभी नहीं रहा। इन सब कारणों से अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा जिससे विश्व एक-ध्रुवीय बन गया, क्योंकि अमेरिका को कोई भी देश चुनौती देने की स्थिति में नहीं था।

2. रूस की कमज़ोर स्थिति:
सोवियत संघ के पतन के बाद उसका स्थान रूस ने लिया। परन्तु रूस कभी भी सोवियत संघ जैसी प्रभावशाली स्थिति प्राप्त न कर सका। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में रूस कभी निर्णायक भूमिका नहीं निभा सका। अफ़गानिस्तान समस्या तथा इराक समस्या इनका उदाहरण है। इसके कारण अमेरिका पर अंकुश लगाने वाली कोई शक्ति नहीं थी, जिसके कारण विश्व पर अमेरिका का प्रभाव स्थापित हो गया तथा विश्व एक-ध्रुवीय हो गया।

प्रश्न 3.
प्रथम खाड़ी युद्ध के कारणों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • इराक द्वारा कुवैत पर कब्ज़ा : प्रथम खाड़ी युद्ध का सबसे बड़ा कारण इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा करना था।
  • अमेरिका की युद्ध की इच्छा : प्रथम खाड़ी युद्ध के लिए अमेरिका की युद्ध की इच्छा भी ज़िम्मेदार थी।
  • सोवियत संघ का पतन : सोवियत संघ के पतन के पश्चात् अमेरिका पर लगाम कसने वाला कोई था।
  • सयुक्त राष्ट्र संघ की असफलता : प्रथम खाड़ी युद्ध के पहले संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी सही भूमिका नहीं निभा पाया।

प्रश्न 4.
अमेरिका ने अफ़गानिस्तान पर हमला क्यों किया ?
उत्तर:

1. 9/11 की घटना:
11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर एवं पेंटागन आतंकवादी हमला किया गया। इस हमले में लगभग 3000 लोग मारे गए। इस आतंकवादी हमले में अल-कायदा के शामिल होने की शंका जाहिर की गई। परिणामस्वरूप अमेरिका ने बदले की कार्यवाही करते हुए अफ़गानिस्तान जोकि अल-कायदा का गढ़ बन चुका था, में युद्ध की घोषणा कर दी।

2. अफ़गानिस्तान में तालिबान एवं अल-कायदा का शासन:
अमेरिका ने अफ़गानिस्तान में युद्ध इसलिए शुरू गानिस्तान में 2001 में तालिबान एवं अलकायदा जैसे आतंकवादी संगठनों का शासन था, जो विश्व स्तर पर आतंकवादी गतिविधियां कर रहे थे। अतः अमेरिका ने इन आतंकवादी संगठनों को समाप्त करने के लिए भी अफ़गानिस्तान में युद्ध किया।

प्रश्न 5.
शीत युद्ध के बाद भारत-अमेरिकी सम्बन्धों पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
1990-91 में प्रमुख साम्यवादी देश सोवियत संघ विखंडित हो गया और इसके 15 गणराज्य नए राज्यों के रूप में सामने आए। विश्व परिदृश्य पर यह घटना अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानी जाती है। सोवियत संघ के विखण्डन से अमेरिका और सोवियत संघ के बीच चलने वाला शीत युद्ध भी समाप्त हो गया। पूर्व और पश्चिम के देशों में विचारधारात्मक शत्रुता की कड़वाहट समाप्त हो गई।

ऐसे में अमेरिका की रुचि पूर्वी देशों की अर्थव्यवस्थाओं या बाज़ारों में बढ़ गई। भारतीय अर्थव्यवस्था भी विविधतापूर्ण और व्यापक है। भारत को अपने आर्थिक विकास के लिए तकनीकी, आर्थिक और भौतिक मंदद की आवश्यकता है। अमेरिका भी आर्थिक दृष्टि से भारत के महत्त्व को पहचानने लगा है। धीरे-धीरे दोनों देशों के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है।

दूसरी ओर भारत और अमेरिका को आतंकवादी गतिविधियों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए भी दोनों देशों के बीच आपसी सूझ-बूझ का वातावरण तैयार हुआ है। शीत युद्ध के बाद अमेरिका व भारत के बीच अनेक समझौते हुए और दोनों देशों के राष्ट्रपतियों व उच्चाधिकारियों ने एक-दूसरे के यहां यात्राएं की।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 6.
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को किन देशों से चुनौती मिल रही है ?
उत्तर:
अमेरिका विश्व की एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक महाशक्ति है। विश्व के सभी महत्त्वपूर्ण आर्थिक सम्मेलनों पर अमेरिका का प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है, परन्तु वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में अमेरिका को जापान, चीन एवं भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है। जापान 1970 एवं 1980 के दशक से ही आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देता आया है। परन्तु 1980 के बाद से चीन भी एक महत्त्वपूर्ण आर्थिक शक्ति के रूप में अमेरिका को चुनौती दे किर रहा है।

जहां जापान, अमेरिका का एक सहयोगी रहा है, वहीं चीन अमेरिका का प्रतियोगी माना जाता है। चीन अमेरिका . की आर्थिक प्रभावशीलता को कम करने के लिए अपनी ही राष्ट्रीय मुद्रा का अवमूल्यन करने से भी गुरेज नहीं करता। चीन के साथ-साथ 1990 के दशक में भारत ने भी अमेरिका की आर्थिक वर्चस्वता को चुनौती देनी शुरू कर दी। चीन ने अमेरिका को उत्पादन आधारित विकास पर परम्परागत उपायों पर जोर देते हुए चुनौती दी है, तो भारत ने वैश्विक सेवा के क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती दी है।

प्रश्न 7.
अमेरिकी वर्चस्व के रास्ते में उत्पन्न किन्हीं चार चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमेरिकी वर्चस्व के मार्ग में मुख्य रूप से निम्न चुनौतियां हैं

1. अमेरिका की संस्थागत बनावट:
अमेरिका के वर्चस्व की प्रथम चुनौती अमेरिका की स्वयं की संस्थागत बनावट है। अमेरिका में सरकार के तीनों अंग एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं तथा कार्यपालिका अमेरिकी सैनिक अभियानों पर अंकुश लगाती है।

2. उन्मुक्त समाज:
अमेरिकन वर्चस्व की राह में दूसरी चुनौती अमेरिकी उन्मुक्त समाज है। अमेरिकी उन्मुक्त समाज में शासन के उद्देश्य और ढंगों को लेकर संदेह बना रहता है।

3. नाटो:
अमेरिकन वर्चस्व के मार्ग की तीसरी महत्त्वपूर्ण चुनौती ‘नाटो’ है और आने वाले दिनों में अमेरिकी वर्चस्व को नाटो द्वारा ही कम किया जा सकता है।

4. आर्थिक क्षेत्र में चुनौती:
अमेरिका को चीन, भारत, यूरोपीय संघ तथा जापान से लगातार चुनौती मिल रही है जो उसके वर्चस्व में बाधा बनती है।

प्रश्न 8.
‘आपरेशन डेजर्ट स्टार्म’ पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध, जोकि 1990-1991 में हुआ था, को ‘ऑपरेशन डेजर्ट-स्टॉर्म’ के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध इराक एवं अमेरिका गठबन्धन सेनाओं के बीच लड़ा गया। 1990 में इराक के तानाशाह शासक सद्दाम हुसैन ने अपने छोटे से पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया। कुवैत को स्वतन्त्र कराने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में 34 देशों के लगभग 6 लाख 70 हजार सैनिकों ने इराक के खिलाफ़ युद्ध छेड़ दिया।

प्रश्न 9.
अमेरिकी वर्चस्व से निपटने के कोई चार सुझाव दीजिए।
उत्तर:

  • अमेरिकी वर्चस्व से निपटने का सबसे अच्छा उपाय बैंड बैगन की रणनीति है।
  • एक देश को अपने आपको अमेरिका की नजरों से छुपा कर रखना चाहिए।
  • अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाओं को मज़बूत करना चाहिए।
  • विभिन्न देशों को सामूहिक सुरक्षा का सिद्धान्त अपनाना चाहिए।

प्रश्न 10.
वर्चस्वता के इतिहास की व्याख्या करें।
उत्तर:
विश्व राजनीति में ऐसे बहुत कम अवसर आए हैं, जब सम्पूर्ण विश्व पर किसी एक देश की वर्चस्वता स्थापित हुई। इतिहास में अमेरिका से पहले ऐसे अवसर केवल दो बार ही आए हैं, जब किसी देश या संघ ने अमेरिका की तरह अपना वर्चस्व कायम किया हो। 1660 से लेकर 1713 ई० तक फ्रांस का वर्चस्व था जबकि 1860 से लेकर 1910 तक ब्रिटेन का वर्चस्व रहा।

ब्रिटेन ने समुद्री व्यापार के बल पर अपना वर्चस्व कायम किया। वर्चस्वता के विषय में इतिहास से हमें यह भी सीख मिलती है कि सदैव किसी एक देश का वर्चस्व स्थापित नहीं रह सकता। समय आने पर एक शक्तिशाली देश का स्थान दूसरा देश ले लेता है।

प्रश्न 11.
1990 के दशक में विश्व के एक-ध्रुवीय होने के क्या कारण थे ?
अथवा
विश्व को एक-धुव्रीय बनाने के लिए उत्तरदायी किन्हीं चार अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियों का वर्णन करें।
उत्तर:
1990 के दशक में विश्व के एक-ध्रुवीय होने के निम्नलिखित कारण थे

1. शीत युद्ध की समाप्ति (End of Cold War):
शीत युद्ध की समाप्ति ने विश्व को एक-ध्रुवीय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् अमेरिका विश्व की एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा, जिससे विश्व एक-ध्रुवीय बन गया, क्योंकि अमेरिका को कोई भी देश चुनौती देने की स्थिति में नहीं था।

2. रूस की कमज़ोर स्थिति (Weaker Position of Russia):
जैसा कि हम ऊपर वर्णन कर चुके हैं जो सोवियत संघ के पतन के बाद उसका स्थान रूस ने लिया। परन्तु रूस कभी भी सोवियत संघ जैसी प्रभावशाली स्थिति प्राप्त न कर सका।

3. पूर्वी यूरोप में परिवर्तन (Changes in East Europe):
सोवियत संघ के पतन के बाद पूर्वी यूरोप में कई ऐसे परिवर्तन हुए जिससे अमेरिका का प्रभाव विश्व राजनीति में बढ़ता ही चला गया।

4. साम्यवादी देशों में उदारवादी परिवर्तन (Liberal Changes in Communist Countries):
सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् न केवल पूर्वी यूरोप के साम्यवादी देशों में ही उदारवादी परिवर्तन हुए, बल्कि विश्व के अन्य साम्यवादी देशों में भी उदारवादी परिवर्तन हुए, जिससे अमेरिका की भूमिका विश्व राजनीति में महत्त्वपूर्ण हो गयी।

प्रश्न 12.
वर्तमान विश्व में अमेरिका के एकाधिकार का क्या अर्थ है ? अमेरिका के एकाधिकार को बनाए रखने वाले कोई दो तत्त्व बताएं।
उत्तर:
वर्तमान विश्व में अमेरिका के एकाधिकार का अर्थ यह है कि अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक शक्तिशाली देश है तथा पूरे विश्व में उसका प्रभाव है। विश्व राजनीति में अमेरिका की इच्छानुसार ही निर्णय लिए जाते हैं तथा यदि कोई देश अमेरिका की इच्छानुसार कार्य नहीं करता तो अमेरिका उस पर कई तरह के प्रतिबन्ध लगा देता है तथा आवश्यकता पड़ने पर सैनिक शक्ति का भी प्रयोग करता है। वर्तमान विश्व में अमेरिका के एकाधिकार को बनाये रखने में दो तत्त्वों ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • सैनिक शक्ति-वर्तमान विश्व में अमेरिका के एकाधिकार को बनाये रखने में अमेरिका की सैनिक शक्ति का महत्त्वपूर्ण योगदान है।
  • आर्थिक शक्ति-सैनिक शक्ति के साथ-साथ अमेरिका की अर्थव्यवस्था ने भी विश्व में अमेरिका के एकाधिकार को बनाये रखा है।

प्रश्न 13.
एक ध्रुवीय व्यवस्था के कोई चार लाभ लिखिए।
उत्तर:
1. शान्तिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना- एक ध्रुवीय विश्व का सर्वप्रथम लाभ यह है, कि इससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्तिपूर्ण व्यवस्था की स्थापना हो सकती है।

2. साम्यवाद के उग्रवादी व्यवहार पर नियन्त्रण-एक-ध्रुवीय विश्व का एक और महत्त्वपूर्ण लाभ यह हआ है कि इसमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर साम्यवाद के उग्रवादी व्यवहार पर नियन्त्रण लग गया।

3. तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा-एक-ध्रुवीय विश्व में तकनीकी एवं वैज्ञानिक विकास को बढ़ावा मिला है।

4. यूरोप में शान्ति एवं एकीकरण की प्रक्रिया का आरम्भ-एक-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह हुआ, कि इससे यूरोप में शान्ति एवं एकीकरण की प्रक्रिया का आरम्भ हुआ।

प्रश्न 14.
सैन्य शक्ति के रूप में अमेरिका के वर्चस्व की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अमेरिका की वर्तमान शक्ति की रीढ़ उसकी सैन्य क्षमता है। वर्तमान समय में अमेरिका की सैन्य शक्ति अन्य देशों के मुकाबले अद्भुत एवं अनूठी है। वर्तमान समय में अमेरिका अपनी सैन्य क्षमता के बल पर विश्व के किसी भी भाग पर हमला कर सकता है उसका हमला भी अचूक एवं संहारक होता है। अमेरिका अपनी सेना को यद्धभमि में दर रखकर भी विरोधी देश को उसके अपने घर में ही पूरी तरह से शक्तिहीन करके लाचार बना सकता है। आज अमेरिका की सैन्य शक्ति का अंदाजा इसी बाते से लगाया जा सकता है कि वह 12 सर्वाधिक सैन्य खर्च करने वाले देशों से भी ज्यादा अकेला ही अपनी सेना पर खर्च करता है।

प्रश्न 15.
अमेरिका के वर्चस्व के ढांचागत शक्ति के रूप की संक्षेप में व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अमेरिका के वर्चस्व में ढांचागत शक्ति का भी विशेष योगदान है। वर्चस्व के ढांचागत शक्ति का अर्थ वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी इच्छा चलाने वाले एक देश की आवश्यकता होती है, जो अपने मतलब की वस्तुओं को बनाये रखता है। अमेरिका विश्व की अर्थव्यवस्था तथा प्रौद्योगिकी के प्रत्येक भाग में विद्यमान है। अमेरिका की विश्व अर्थव्यवस्था में 28% की भागेदारी है।

विश्व की तीन अग्रणी कम्पनियों में से एक अमेरिकन कम्पनी है। विश्व के आर्थिक संगठनों जैसे-विश्व व्यापार संगठन, विश्व बैंक तथा विश्व मुद्रा कोष पर अमेरिकन प्रभाव स्पष्ट देखा जा सकता है। इससे स्पष्ट है कि अमेरिकन वर्चस्व में उसकी ढांचागत शक्ति की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

प्रश्न 16.
अमेरिका के वर्चस्व की सांस्कृतिक शक्ति के रूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् विश्व में अमेरिका ही एकमात्र महाशक्ति रह गया था तथा उसने शक्ति तेजी से और भी बढ़ानी शुरू कर दी। परिणामस्वरूप उसका कई पक्षों से विश्व पर वर्चस्व स्थापित हो गया, जैसे-सैनिक शक्ति के रूप, ढांचागत व्यवस्था के रूप में तथा सांस्कृतिक रूप में। सांस्कृतिक वर्चस्व का अर्थ सहमति गढ़ने की ताकत से है।

कोई प्रभुत्वशाली वर्ग या देश अपने प्रभाव में रहने वाले लोगों को इस तरह सहमत करता है, कि वे दुनिया को उसी दृष्टिकोण से देखें । अमेरिका भी वर्तमान समय में सांस्कृतिक रूप में ताकतवर है। बीसवीं शताब्दी तथा 21वीं शताब्दी के आरम्भ में सांस्कृतिक क्षेत्र में जो बदलाव या परिवर्तन आ रहे हैं वे सब अमेरिकन संस्कृति के ही प्रतिबिम्ब हैं। उदाहरण के लिए अमेरिका में प्रचलित जीन्स को आज अधिकांश देशों के लोग पहनने के अभ्यस्त हो गये हैं।

प्रश्न 17.
अमेरिका की आर्थिक प्रबलता उसकी ढांचागत शक्ति से पृथक् नहीं है। वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमेरिका की आर्थिक प्रबलता उनकी ढांचागत शक्ति में ही पाई जाती है। अमेरिका अपनी ढांचागत शक्ति के कारण ही विश्व में आर्थिक प्रभुत्व बनाए हुए है, तथा विश्व आर्थिक संस्थाओं को नियन्त्रित कर रहा है। विश्व में सार्वजनिक वस्तुओं को उपलब्ध कराने में अमेरिका ने अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। क्योंकि अमेरिका के पास इस प्रकार का आधारभूत ढांचा है, कि वह सम्पूर्ण विश्व से सम्पर्क कर सके।

उदाहरण के लिए अमेरिका अपनी नौसेना की शक्ति के कारण व्यापारिक जलयानों को नियन्त्रित करता है। कम्प्यूटर एवं इंटरनेट की शक्ति के कारण विश्व में आदान-प्रदान होने वाली सूचनाओं पर नियन्त्रण रखता है। अमेरिका की विश्व अर्थव्यवस्था में लगभग 28% भागेदारी है। एम० बी० ए० अमेरिकन ढांचागत शक्ति का एक अन्य उदाहरण है। अतः स्पष्ट है कि अमेरिका की आर्थिक प्रबलता उनकी ढांचागत शक्ति में ही पाई जाती है।

प्रश्न 18.
एक आक्रमण में सैनिक बल प्राय: जिन चार नियत कार्यों को पूरा करना चाहते हैं, उनका उल्लेख कीजिए। इराक पर आक्रमण में किस कार्य में अमेरिका की गम्भीर कमज़ोरी सामने प्रतिबिम्बित हुई ?
उत्तर:
एक आक्रमण में सैनिक बल प्रायः जिन चार नियत कार्यों को पूरा करना चाहते हैं, वे हैं-

  • युद्ध जीतना,
  • अपरोध करना,
  • दण्ड देना,
  • कानून व्यवस्था बहाल करना।

अमेरिका ने इराक युद्ध में दिखा दिया, कि उसकी युद्ध जीतने की क्षमता बहुत अधिक है, तथा वह सैनिक शक्ति में बाकी अन्य देशों से बहुत आगे है। अमेरिका की अवरोध करने एवं दण्ड देने की क्षमता भी बहुत अधिक है। इराक के विषय में अमेरिका की सैन्य क्षमता बल की केवल एक कमज़ोरी नज़र आती है, और वह यह है कि अमेरिका इराक में कानून एवं व्यवस्था स्थापित नहीं कर पाया।

प्रश्न 19.
‘बैंड-वैगन’ की रणनीति से क्या अभिप्राय है ? यह छुपा’ की रणनीति से कैसे भिन्न है ?
उत्तर:
‘बैंड वैगन’ की रणनीति अमेरिका के वर्चस्व से सम्बन्धित है। विश्व के रणनीतिकारों के लिए सदैव यह एक कठिन प्रश्न रहा है, कि अमेरिका के वर्चस्व से कैसे निपटा जाए। कुछ रणनीतिकारों का मानना है, कि अमेरिका से संघर्ष करने की अपेक्षा उसके वर्चस्व के साये में आकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए।

उदाहरण के लिए एक देश के आर्थिक विकास के लिए निवेश करना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा व्यापार को बढ़ावा देना आवश्यक है और ये सभी आवश्यकताएं अमेरिका के साथ रह कर पूरी हो सकती हैं। इस रणनीति को ही ‘बैंड वैगन’ रणनीति कहा जाता है। ‘छुपा’ की रणनीति ‘बैंड वैगन’ की रणनीति से अलग है। इस नीति के अन्तर्गत एक देश अपने आप को इस प्रकार छुपा लेता है, कि वह अमेरिका की नज़रों में न चढ़ पाए।

प्रश्न 20.
एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था के कोई चार दोष लिखें।
अथवा
एक-ध्रुवीय व्यवस्था के किन्हीं चार दोषों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
1. नव-साम्राज्यवाद का उदय:
एक-ध्रुवीय विश्व का सबसे बड़ा दोष यह है, कि इस एक तरह से पुनः साम्राज्यवाद का उदय हुआ है, इसे हम नव-साम्राज्यवाद भी कह सकते हैं।

2. अमेरिका का बढ़ता प्रभुत्व:
एक-ध्रुवीय विश्व का एक दोष यह है कि इसके अन्तर्गत विश्व राजनीति में अमेरिका का अनावश्यक प्रभुत्व बढ़ गया। प्रभुत्व बढ़ने से अमेरिका ने विश्व के कई राज्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया।

3. वैश्विक आतंकवाद की समस्या:
एक-ध्रुवीय विश्व में आतंकवाद की समस्या ने पूरे विश्व को चिन्तित कर रखा है।

4. आर्थिक सहायता में पक्षपात:
अमेरिका उन देशों को अधिक आर्थिक सहायता देता है, जो उसकी नीतियों का आँख मूंदकर समर्थन करते हैं, या जो देश अमेरिका के पिछलग्गू हैं।

प्रश्न 21.
अमेरिकी वर्चस्व के रास्ते की किन्हीं चार चुनौतियों का वर्णन कीजिए।
अथवा
अमेरिकी वर्चस्व के रास्ते में उत्पन्न किन्हीं तीन बाधाओं का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
1. अमेरिका की संस्थागत बनावट:
अमेरिका के वर्चस्व का प्रथम व्यवधान अमेरिका की स्वयं की संस्थागत बनावट है। अमेरिका में सरकार के तीनों अंग एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं, तथा कार्यपालिका अमेरिकी सैनिक अभियानों पर अंकुश लगाता है।

2. उन्मुक्त समाज:
अमेरिकन वर्चस्व की राह में दूसरा व्यवधान अमेरिकी उन्मुक्त समाज है। अमेरिकी अनमुक्त समाज में शासन के उद्देश्य और ढंगों को लेकर संदेह बना रहता है।

3. नाटो:
अमेरिकन वर्चस्व के मार्ग का तीसरा महत्त्वपूर्ण व्यवधान ‘नाटो’ है और आने वाले दिनों में अमेरिकी वर्चस्व को नाटो द्वारा ही कम किया जा सकता है।

4. आर्थिक क्षेत्र में चुनौती-अमेरिका को चीन, भारत, यूरोपीय यूनियन तथा जापान से निरन्तर चुनौती मिल रही है, जो उसके वर्चस्व में बाधा बनती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 22.
भारत और अमेरिका के बीच तनाव के कोई चार कारण लिखिये।
उत्तर:

  • भारत के पास परमाणु हथियारों का होना, दोनों देशों के बीच तनाव का कारण है।
  • अमेरिका चाहता है कि भारत सी० टी० बी० टी० एवं एन० पी० टी० पर हस्ताक्षर करें, परन्तु भारत सदैव इनकार करता रहा है।
  • भारत के विरोध के बावजूद भी अमेरिका पाकिस्तान के हथियारों की पूर्ति करता है।
  • पर्यावरणीय मुद्दों पर भी दोनों देशों में मतभेद पाया जाता है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर
विश्व राजनीति में जब किसी एक देश का ही अधिक प्रभाव हो तथा अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय निर्णय उसकी इच्छानुसार लिए जाएं, तो उसे एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था कहा जाता है। जैसे वर्तमान समय में विश्व एक-ध्रुवीय है तथा अमेरिका इसका नेता बना हुआ है।

प्रश्न 2.
विश्व व्यवस्था के एक-ध्रुवीय होने के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • विश्व व्यवस्था को एक-ध्रुवीय होने का एक सोवियत संघ का पतन होना था।
  • शीत युद्ध की समाप्ति के कारण भी विश्व व्यवस्था एक-ध्रुवीय बन गई।

प्रश्न 3.
एक-ध्रुवीय विश्व में अमेरिका कैसे अपना प्रभाव जमा रहा है ?
उत्तर:

  • अमेरिका अधिकांश देशों में आर्थिक हस्तक्षेप कर रहा है।
  • अमेरिका आवश्यकता पड़ने पर सैनिक शक्ति भी प्रयोग कर रहा है।

प्रश्न 4.
‘ऑपरेशन डेजर्ट-स्टॉर्म’ से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
‘ऑपरेशन डेजर्ट-स्टॉर्म’ क्या था ?
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध, जोकि 1990-1991 में हुआ था, को ऑपरेशन डेजर्ट-स्टॉर्म के नाम से जाना जाता है। यह युद्ध इराक एवं अमेरिका गठबन्धन सेनाओं के बीच लड़ा गया। अगस्त, 1990 में इराक के तानाशाह शासक सद्दाम हुसैन ने अपने छोटे से पड़ोसी देश कुवैत पर कब्जा कर लिया। कुवैत को स्वतन्त्र कराने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में 34 देशों के लगभग 6 लाख 70 हजार सैनिकों ने इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

प्रश्न 5.
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका ने कब और कौन-सा ऑपरेशन चलाया।
अथवा
सन् 2001 में अमेरिका पर हुए आतंकी हमले के लिए किस आंतकवादी गुट को जिम्मेदार माना गया?
उत्तर:
11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर एवं पेंटागन पर ज़बरदस्त आतंकवादी हमला किया गया। इस हमले में लगभग 3000 लोग मारे गए। इस आतंकवादी हमले के लिए अलकायदा को ज़िम्मेदार माना गया। परिणामस्वरूप अमेरिका ने बदले की कार्यवाही करते हुए अफ़गानिस्तान जोकि अल-कायदा का गढ़ बन चुका था, में युद्ध की घोषणा कर दी।

प्रश्न 6.
अमेरिका द्वारा 2003 में इराक पर किये गए हमले के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश ने मार्च 2003 में व्यापक विनाश के हथियारों का आरोप लगाकर इराक के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। इस युद्ध को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्वीकृति प्राप्त नहीं थी। इस युद्ध में अमेरिका ने इराक के शासक सद्दाम हुसैन को हटाकर उनके स्थान पर कठपुतली सरकार बना दी, परन्तु अमेरिका वहां पर शान्ति कायम न रख पाया।

पश्न 7.
आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका ने कब और कौन-सा आपरेशन चलाया?
उत्तर:
आंतकवाद के खिलाफ अमेरिका ने अक्तूबर, 2001 में आपरेशन एन्ड्रयूरिंग फ्रीडम चलाया।

प्रश्न 8.
कोई दो उदाहरण देते हुए एक-ध्रुवीय विश्व के विकास की व्याख्या करें।
उत्तर:
1. प्रथम खाड़ी युद्ध-एक-ध्रुवीय विश्व की शुरुआत प्रथम खाड़ी युद्ध से मानी जा सकती है, जब अमेरिका ने अपनी सैनिक शक्ति के बल पर कुवैत को इराक से स्वतन्त्र करवाया था।

2. 9/11 की घटना एवं अफ़गानिस्तान युद्ध-11 सितम्बर, 2001 को अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर एवं पेंटागन पर जबरदस्त आतंकवादी हमला हुआ। अमेरिका ने इस घटना के लिए तालिबान एवं अलकायदा को दोषी मानते हुए अफ़गानिस्तान पर हमला किया।

प्रश्न 9.
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को किन देशों से चुनौती मिल रही है ?
उत्तर:
आर्थिक क्षेत्र में अमेरिका को जापान, चीन एवं भारत से कड़ी चुनौती मिल रही है। जापान 1970 एवं 1980 के दशक से ही आर्थिक एवं तकनीकी क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती देता आया है। चीन ने अमेरिका को उत्पादन आधारित विकास पर परम्परागत उपायों पर जोर देते हुए चुनौती दी है, तो भारत ने वैश्विक सेवा के क्षेत्र में अमेरिका को चुनौती दी है।

प्रश्न 10.
विचारधारात्मक क्षेत्र में अमेरिका को किस प्रकार की चुनौतियां मिल रही हैं ?
उत्तर:
1991 में सोवियत संघ के पतन के बाद अमेरिका ने विचारधारात्मक रूप से भी विश्व में वर्चस्व कायम किया, परन्तु पिछले 10 वर्षों में अमेरिका की इस विचारधारा को आतंकवादी विचारधारा से लगातार चुनौतियां मिल रही हैं। आतंकवादी संगठनों ने नैरोबी तथा दारे-सलाम के अमेरिकी दूतावासों, अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर तथा पेंटागन पर एवं इंग्लैण्ड में बम विस्फोट एवं हवाई हमला करके लगातार अमेरिका की प्रजातान्त्रिक विचारधारा को च

प्रश्न 11.
प्रथम खाड़ी युद्ध के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा-प्रथम खाड़ी युद्ध का सबसे बड़ा कारण इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा करना था।
  • अमेरिका की युद्ध की इच्छा-प्रथम खाड़ी युद्ध के लिए अमेरिका की युद्ध की इच्छा भी ज़िम्मेदार थी।

प्रश्न 12.
वर्चस्व से क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में वर्चस्व का अर्थ शक्ति का केवल एक ही केन्द्र का होना है। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में प्राय: सभी देश शक्ति प्राप्त करना एवं उसे बनाये रखना चाहते हैं। यह शक्ति सैनिक शक्ति, राजनीतिक प्रभाव, आर्थिक शक्ति और सांस्कृतिक प्रभाव के रूप में होती है।

प्रश्न 13.
इराक पर अमेरिकी आक्रमण के कोई दो उद्देश्य लिखिए।
उत्तर:

  • इराक पर अमेरिकी आक्रमण का प्रथम उद्देश्य अमेरिका द्वारा इराक के तेल भण्डारों पर कब्जा करना था।
  • अमेरिका की यह इच्छा थी कि इराक में उसकी पसन्द के अनुसार सरकार का निर्माण हो ताकि तेल उत्पादक देश उसके मित्र एवं सहयोगी बने रहें।

प्रश्न 14.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका के शक्तिशाली होने के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • अमेरिका का युद्ध के समय एवं बाद में निर्यात बहुत बढ़ चुका था, जिससे विश्व में उसका प्रभाव बढ़ गया।
  • द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका ने जापान के विरुद्ध परमाणु बमों का प्रयोग किया, जिससे विश्व में उसका प्रभाव बहुत बढ़ गया।

प्रश्न 15.
अमेरिकी वर्चस्व के रास्ते में किन्हीं दो चुनौतियों का उल्लेख करें।
उत्तर:
1. अमेरिका की संस्थागत बनावट-अमेरिका के वर्चस्व का प्रथम व्यवधान अमेरिका की स्वयं की संस्थागत बनावट है। अमेरिका में सरकार के तीनों अंग एक-दूसरे से स्वतन्त्र हैं, तथा कार्यपालिका अमेरिकी सैनिक अभियानों पर अंकुश लगाता है।

2. उन्मुक्त समाज-अमेरिका वर्चस्व की राह में दूसरा व्यवधान अमेरिकी उन्मुक्त समाज है। अमेरिकी अनमुक्त समाज में शासन के उद्देश्य और ढंगों को लेकर संदेह बना रहता है।

प्रश्न 16.
विश्व का पहला बिजनेस स्कूल कब और कहां खोला गया था ?
उत्तर:
विश्व का पहला बिजनेस स्कूल सन् 1881 में अमेरिका में खुला था।

प्रश्न 17.
अमेरिकी वर्चस्व के तीन रूप कौन-से हैं ?
अथवा
अमेरिकी वर्चस्व के तीनों रूपों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • सैन्य शक्ति के रूप में अमेरिका का वर्चस्व।
  • ढांचागत शक्ति के रूप में अमेरिका का वर्चस्व।
  • सांस्कृतिक शक्ति के रूप में अमेरिका का वर्चस्व ।

प्रश्न 18.
प्रथम खाड़ी युद्ध को कम्प्यूटर युद्ध या वीडियो गेमवार क्यों कहा जाता है ? व्याख्या करें।
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध में अमेरिका ने बहुत ही उच्च तकनीक के स्मार्ट बमों का प्रयोग किया, इसलिए इसे कम्प्यूटर युद्ध की संज्ञा दी जाती है। इस युद्ध का विभिन्न देशों के टेलीविज़नों पर व्यापक प्रसार हुआ। इसलिए इसे वीडियो गेमवार भी कहा जाता है।

प्रश्न 19.
वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक वस्तओं से आप क्या अर्थ लेते हैं ?
उत्तर:
वैश्विक स्तर पर सार्वजनिक वस्तुओं से अभिप्राय ऐसी वस्तुओं से है, जिसका उपयोग प्रत्येक देश या प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से कर सके। उस पर किसी प्रकार की रुकावट या कमी न आए। वायु, पानी, सड़क तथा समुद्री व्यापार वैश्विक सार्वजनिक वस्तुओं के महत्त्वपूर्ण उदाहरण हैं।

प्रश्न 20.
ब्रेटनवुड प्रणाली से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
ब्रेटनवुड प्रणाली के अन्तर्गत विश्व व्यापार के नियम एवं उपनियम बनाए जाते हैं। इस प्रणाली के अन्तर्गत बनाए गए नियम एवं कानून संयुक्त राज्य अमेरिका के पक्ष में थे और ये नियम एवं कानून आज भी विश्व व्यापार में बुनियादी संरचना की भूमिका निभा रहे हैं।

प्रश्न 21.
अमरीकी वर्चस्व से निबटने के कोई दो सुझाव दीजिये।
उत्तर:

  • अमेरिका के वर्चस्व के साये में (बैंड वैगन) आकर अधिक से अधिक लाभ उठाया जाए।
  • एक देश को अपने आप को इस प्रकार छुपा लेना चाहिए ताकि वह अमेरिका की नज़रों में न आ पाए।

प्रश्न 22.
बैंड-वैगन राजनीति का क्या अर्थ है ?
अथवा
‘बैंड-वैगन’ रणनीति क्या है ?
उत्तर:
रणनीतिकारों का मानना है, कि अमेरिका से संघर्ष करने की अपेक्षा उसके वर्चस्व के साये में आकर अधिक-से-अधिक लाभ उठाना चाहिए। उदाहरण के लिए एक देश के आर्थिक विकास के लिए निवेश करना, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा व्यापार को बढ़ावा देना आवश्यक है और ये सभी आवश्यकताएं अमेरिका के साथ रह कर पूरी हो सकती हैं। इस रणनीति को ही ‘बैंड वैगन’ रणनीति कहा जाता है।

प्रश्न 23.
अमेरिका के सांस्कृतिक वर्चस्व के कोई दो उदाहरण दीजिये।
उत्तर:

  • विश्व में लोगों द्वारा अमेरिका द्वारा प्रचलित जीन्स पहनी जा रही है।
  • अमेरिका में प्रचलित जंक फूड (फास्टफूड) विश्व में लोकप्रिय हो गया है।

प्रश्न 24.
‘पेंटागन’ अमेरिका में क्या है ?
उत्तर:
‘पेंटागन’ अमेरिका में रक्षा मन्त्रालय है।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. शीत युद्ध के बाद विश्व बना हुआ है :
(A) एक-ध्रुवीय
(B) द्वि-ध्रुवीय
(C) बहु-ध्रुवीय
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) एक-ध्रुवीय।

2. 1990-91 में अमेरिका एवं भिन्न देशों द्वारा इराक पर किए गए हमले को क्या नाम दिया गया ?
(A) ऑपरेशन इराकी फ्रीडम
(B) ऑपरेशन एन्ड्यूरिंग फ्रीडम
(C) ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(C) ऑपरेशन डेजर्ट स्टार्म।

3. 9/11 की घटना के समय अमेरिका का राष्ट्रपति कौन था ?
(A) बिल क्लिटन
(B) जार्ज बुश
(C) जिमी कार्टर
(D) निक्सन।
उत्तर:
(B) जार्ज बुश।

4. मार्च 2003 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने इराक पर आक्रमण किस नाम से किया?
(A) आपरेशन एंड्यूरिंग फ्रीडम
(B) आपरेशन डेजर्ट स्टार्म
(C) आपरेशन इराकी फ्रीडम
(D) आपरेशन ब्लू-स्टार।
उत्तर:
(C) आपरेशन इराकी फ्रीडम।

5. अमेरिका की आर्थिक वर्चस्वता को कौन चुनौती दे रहा है ?
(A) जापान
(B) चीन
(C) भारत
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

6. इराक ने कुवैत पर कब आक्रमण किया ?
(A) 1990 में
(B) 1991 में
(C) 1992 में
(D) 1993 में।
उत्तर:
(A) 1990 में।

7. 9/11 की आतंकवादी घटना के लिए किसे ज़िम्मेदार माना जाता है ?
(A) इंग्लैण्ड
(B) फ्रांस
(C) चीन
(D) तालिबान एवं अलकायदा।
उत्तर:
(D) तालिबान एवं अलकायदा।

8. अमेरिकन वर्चस्व का क्षेत्र है-
(A) राजनीतिक क्षेत्र
(B) आर्थिक क्षेत्र
(C) सांस्कृतिक क्षेत्र
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

9. विश्व राजनीति में अमेरिकन प्रभुत्व की शुरुआत कब से हुई ?
(A) 1985
(B) 1980
(C) 1986
(D) 1991.
उत्तर:
(D) 1991.

10. ‘कम्प्यूटर युद्ध’ किस युद्ध को कहा जाता है ?
(A) प्रथम खाड़ी युद्ध
(B) द्वितीय खाड़ी युद्ध
(C) इराक युद्ध
(D) अफ़गान युद्ध।
उत्तर:
(A) प्रथम खाड़ी युद्ध।

11. प्रथम खाड़ी युद्ध कब हुआ था ?
(A) 1990-91
(B) 1995-96
(C) 1997-98
(D) 1998-99.
उत्तर:
(A) 1990-91.

12. प्रथम खाड़ी युद्ध हुआ था
(A) भारत एवं इराक के बीच
(B) इरान एवं इराक के बीच
(C) इरान एवं मिस्त्र के बीच
(D) इराक एवं अमेरिकी गठबंधन सेनाओं के बीच।
उत्तर:
(D) इराक एवं अमेरिकी गठबंधन सेनाओं के बीच।

13. प्रथम खाड़ी युद्ध का क्या कारण था ?
(A) इराक द्वारा कुवैत पर कब्जा
(B) अमेरिका की युद्ध की इच्छा
(C) सोवियत संघ का पतन
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

14. दूसरा खाड़ी युद्ध कब हुआ था ?
(A) मार्च, 2003
(B) मई, 2008
(C) अक्तूबर, 2004
(D) जनवरी, 2005.
उत्तर:
(A) मार्च, 2003.

15. दूसरा खाड़ी युद्ध किनके बीच हुआ था ?
(A) इरान एवं मिस्र के बीच
(B) भारत एवं इराक के बीच
(C) इरान एवं इराक के बीच ।
(D) इराक एवं अमेरिकी गठबंधन सेनाओं के बीच।
उत्तर:
(D) इराक एवं अमेरिकी गठबंधन सेनाओं के बीच।

16. अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने कोसावो में सैन्य कार्यवाही कब की थी ?
(A) 1996
(B) 1999
(C) 2000
(D) 2001.
उत्तर:
(B) 1999.

17. पेंटागन क्या है ?
(A) अमेरिकी रक्षा मन्त्रालय
(B) अमेरिकी गृह मन्त्रालय
(C) अमेरिकी शिक्षा मन्त्रालय
(D) अमेरिकी कानून मन्त्रालय।
उत्तर:
(A) अमेरिकी रक्षा मन्त्रालय।

18. विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिका की हिस्सेदारी कितनी है ?
(A) 28%
(B) 25%
(C) 20%
(D) 15%.
उत्तर:
(A) 28%.

19. निम्न में से प्रभुत्व (वर्चस्व) का क्या अर्थ लिया जाता है ?
(A) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का एक ही केन्द्र होना
(B) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के दो केन्द्र होना
(C) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति के अनेक केन्द्र होना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में शक्ति का एक ही केन्द्र होना।

20. संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति कौन हैं ?
(A) जार्ज बुश
(B) बराक ओबामा
(C) हिलेरी क्लिंटन
(D) डोनाल्ड ट्रम्प।
उत्तर:
(B) बराक ओबामा।

21. अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति हैं
(A) हिलेरी क्लिंटन
(B) जो बाइडेन
(C) बराक ओबामा
(D) कमला हैरिस
उत्तर:
(B) जो बाइडेन।

22. कौन-सा देश विश्व में सबसे अधिक रक्षा पर खर्च करता है ?
(A) भारत
(B) चीन
(C) अमेरिका
(D) रूस।
उत्तर:
(C) अमेरिका।

23. अमेरिका कब एक देश बना ?
(A) 1770 में
(B) 1776 में
(C) 1789 में
(D) 1792 में।
उत्तर:
(B) 1776 में।

24. दूसरा खाड़ी युद्ध कब हुआ था ?
(A) मार्च, 2003
(B) मार्च, 2008
(C) मई, 2004
(D) जून, 2005.
उत्तर:
(A) मार्च, 2003.

25. 9/11 की आतंकवादी घटना का संबंध किस देश से है ?
(A) भारत से
(B) चीन से
(C) अमेरिका से
(D) पाकिस्तान से।
उत्तर:
(C) अमेरिका से।

26. 1881 में विश्व का प्रथम बिजनेस स्कूल कहां खुला था ?
(A) भारत में
(B) चीन में
(C) अमेरिका में
(D) जापान में।
उत्तर:
(C) अमेरिका में।

27. संयुक्त राज्य अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले को किस नाम से पुकारा जाता है?
(A) इलेवन-नाइन
(B) नाइन-इलेवन
(C) गृहयुद्ध
(D) तालिबानी युद्ध।
उत्तर:
(B) नाइन-इलेवन।

28. सद्दाम हुसैन कब पकड़े गए ?
(A) मार्च, 2001 में
(B) जून, 2003 में
(C) दिसम्बर, 2003 में
(D) जुलाई, 2005 में।
उत्तर:
(C) दिसम्बर, 2003 में।

29. किस युद्ध को कम्प्यूटर युद्ध के नाम से जाना जाता है ?
(A) इराकी युद्ध
(B) प्रथम खाड़ी युद्ध
(C) द्वितीय खाड़ी युद्ध
(D) वियतनाम युद्ध।
उत्तर:
(B) प्रथम खाड़ी युद्ध।

रिक्त स्थान भरें

(1) विश्व का प्रथम बिजनेस स्कूल ……………… में खुला था।
उत्तर:
अमेरिका,

(2) अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति ……………… हैं ।
उत्तर:
बराक हुसैन ओबामा,

(3) इराक ने कुवैत पर वर्ष …………….. में आक्रमण किया।
उत्तर:
1990,

(4) प्रथम खाड़ी युद्ध सन् ………………. में लड़ा गया।
उत्तर:
1991,

(5) शीत युद्ध के बाद विश्व व्यवस्था ………………. बन गई।
उत्तर:
एक-धुव्रीय।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
नाइन-इलेवन की घटना का संबंध किस देश से है ?
उत्तर:
अमेरिका।

प्रश्न 2.
पेंटागन अमेरिका में क्या है ?
अथवा
संयुक्त राज्य अमेरिका में पेंटागन किसे कहा गया है ?
उत्तर:
रक्षा मन्त्रालय।

प्रश्न 3.
अमेरिका में हुए आतंकवादी हमले को किस नाम से पुकारा जाता है ?
उत्तर:
नाइन-इलेवन की आतंकवादी घटना।

प्रश्न 4.
वर्ल्ड-ट्रेड सेंटर पर 9/11 के आक्रमण में लगभग कितने लोग मारे गए थे ?
उत्तर:
लगभग 3000 लोग मारे गए थे।

प्रश्न 5.
अमेरिका में आजकल किन भारतीयों की मांग अधिक है ?
उत्तर:
कम्प्यूटर इंजीनियर ।

प्रश्न 6.
अमेरिका ने किस वर्ष इराक पर आक्रमण किया था ?
उत्तर:
सन् 2003 में।

प्रश्न 7.
अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति का नाम बताएं।
उत्तर:
श्री जो बाइडेन।

प्रश्न 8.
भारत-पाकिस्तान सीमा विवाद में अमेरिका ने किस देश का साथ दिया?
उत्तर:
पाकिस्तान का।

प्रश्न 9.
सद्दाम हुसैन किस वर्ष कारावास के लिए पकड़ा गया था?
उत्तर:
दिसम्बर, 2003 में।

प्रश्न 10.
2001 में विश्व व्यापार केन्द्र (अमेरिका) पर आक्रमण के लिए उत्तरदायी कौन था?
अथवा
विश्व व्यापार केन्द्र (अमेरिका) पर 2001 के आक्रमण के लिए कौन उत्तरदायी था ?
उत्तर:
अल कायदा नामक आतंकवादी संगठन।

प्रश्न 11.
भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर विवाद पर अमेरिका ने किसका साथ दिया?
उत्तर:
पाकिस्तान का।

प्रश्न 12.
1881 में विश्व का प्रथम बिजनस स्कूल कहां खुला था?
उत्तर:
अमेरिका में।

प्रश्न 13.
अमेरिका के प्रथम अश्वेत राष्ट्रपति कौन थे?
उत्तर:
श्री बराक हुसैन ओबामा।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 3 समकालीन विश्व में अमरीकी वर्चस्व

प्रश्न 14.
अमेरिका की आर्थिक वर्चस्वता को कौन चुनौती दे रहा है ?
उत्तर:
(1) यूरोपियन यूनियन,
(2) आसियान,
(3) चीन,
(4) भारत,
(5) जापान।

प्रश्न 15.
किस वर्ष में आतंकवादियों ने विश्व व्यापार केन्द्र को धराशायी किया था ?
उत्तर:
सन् 2001 में।

प्रश्न 16.
कम्प्यूटर युद्ध किस युद्ध को कहा जाता है ?
उत्तर:
प्रथम खाड़ी युद्ध को कम्प्यूटर युद्ध कहा जाता है। यह युद्ध सन् 1990-91 में हुआ था।

प्रश्न 17.
9/11 की घटना के समय अमेरिका का राष्ट्रपति कौन था ?
उत्तर:
श्री जॉर्ज बुश।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

निबन्धात्मक प्रश्न

प्रश्न 1.
विश्व राजनीति में उभरी नई हस्तियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
1990 के दशक में विश्व राजनीति में बहुत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए। 1991 में शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था समाप्त हो गई तथा विश्व तेज़ी से एक ध्रुवीय होता चला गया, जिसके प्रभाव को कम करने के लिए कुछ प्रयास भी किये, यूरोपीय संघ की स्थापना इसी प्रकार का प्रयास माना जा सकता है। इसके साथ 1991 में शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् विश्व राजनीति में कुछ नई हस्तियां या राज्य उभरे जिनका वर्णन इस प्रकार है

1. रूस (Russia):
शीत युद्ध की समाप्ति पर रूस, सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में उभर कर सामने आया, यद्यपि रूस न तो सोवियत संघ के समान सैनिक रूप से शक्तिशाली था और न ही आर्थिक रूप से। अत: रूस को अपनी आर्थिक व्यवस्था को ठीक करके अपना विकास करना था। इसके लिए रूस ने अपने सैनिक खर्चों में कमी करना शुरू किया।

परन्तु इसका एक परिणाम यह निकला कि रूस में बेरोजगारी बढ़ने लगी तथा रूस की आर्थिक व्यवस्था संकट में पड़ गई जिसके परिणामस्वरूप 1992 में रूस में आर्थिक सुधारों को लागू करने की बात की जाने लगी। रूस में समय-समय पर कुछ ऐसी घटनाएं होती रहीं, जिससे रूस को आर्थिक एवं राजनीतिक हानि उठानी पड़ी है।

उदाहरण के लिए 1994 एवं 1999 में चेचन्या विद्रोह, 2000 में परमाणु पनडुब्बी कुर्सक् की जलसमाधि, 2002 में चेचन विद्रोहियों द्वारा मास्को की रंगशाला में लोगों को बन्दी बनाना तथा 2004 में चेचन विद्रोहियों द्वारा ही बेसलान में 1100 स्कूली बच्चों, शिक्षकों तथा अभिभावकों को बन्दी बनाना इत्यादि इसमें शामिल हैं।

इन घटनाओं से रूस की आर्थिक व्यवस्था को काफ़ी हानि पहुंची तथा विश्व स्तर पर भी रूस के महत्त्व में कमी आई। इसके साथ-साथ रूस के अमेरिका के सम्बन्ध भी उतार व चढ़ाव वाले रहे। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् रूस को विश्वास था कि वह अब अपने आर्थिक विकास पर जोर देगा, विश्व राजनीति में पुनः शक्तिशाली बन कर उभरेगा, भारत के साथ अपने सम्बन्धों को और अधिक सुदृढ़ करेगा। कुछ कठिनाइयों के बावजूद भी वर्तमान राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने इन सभी आशाओं को आगे बढ़ाया है।

2. बलकान युद्ध (Balkan States):
बलकान राज्यों में अल्बानिया, बुल्गारिया, बोसनिया तथा हरजेगोविनिया, यूनान, क्रोशिया, मान्टेनीग्रो, मेसेडोनिया तथा तुर्की शामिल हैं। बलकान को प्रायः बलकान प्रायद्वीप भी कह दिया जाता है, क्योंकि यह तीन दिशाओं से पानी से घिरा हुआ है। दक्षिण तथा पश्चिम में भूमध्य सागर की शाखाएं तथा पूर्वी भाग की ओर काला सागर स्थित है। 1980 के दशक में बलकान क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आए, जिनसे निपटने के लिए इस क्षेत्र के देशों ने 1988 में बेलग्रेड में एक बैठक आयोजित की।

इस सभा में सभी देशों ने विस्तृत आर्थिक सहयोग के लिए आपस में हाथ मिलाए। 1990 में युगोस्लाविया के विखण्डन ने बलकान राज्यों की एकता को कम करने का काम किया। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् नाटो ने बलकान क्षेत्र में अपने प्रभाव को जमाने का प्रयास किया। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् बलकान क्षेत्र में भी साम्यवाद के स्थान पर राष्ट्रवाद की विचारधारा बढ़ती जा रही थी।

यद्यपि यूगोस्लाविया संकट ने बलकान क्षेत्र में अस्थिरता पैदा की, परन्तु फिर भी शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् बलकान देशों ने विश्व स्तर पर अपनी एक नई पहचान बनाई है तथा स्वयं को विश्व की लोकतान्त्रिक विचारधारा के साथ जोड़ दिया है।

3. केन्द्रीय एशियाई राज्य (Central Asian States):
शीत युद्ध एवं द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की समाप्ति का प्रभाव केन्द्रीय एशियाई राज्यों पर भी पड़ा। सोवियत संघ के विघटन से केन्द्रीय एशिया में कुछ नये राज्यों का उदय हुआ। इनमें उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, किरघिस्तान तथा ताजिकिस्तान शामिल हैं।

इस क्षेत्र में शीत युद्ध के पश्चात् अमेरिका ने प्राय: सभी देशों से अपने सम्बन्धों को मधुर बनाने के प्रयास किये। अमेरिका ने इस क्षेत्र में लोकतान्त्रिक संस्थाओं के निर्माण पर जोर दिया। शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् इस क्षेत्र में स्थायित्व, आर्थिक विकास, परमाणु हथियारों पर रोक तथा मानवाधिकारों पर बल दिया गया। इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अमेरिका ने इस क्षेत्र के देशों को अपना सहयोग दिया।

प्रश्न 2.
भारत-रूस सम्बन्धों की व्याख्या कीजिए। (Explain Indo-Russia relations.)
उत्तर:
सन् 1991 में भूतपूर्व सोवियत संघ का विघटन हो गया और उसके 15 गणराज्यों ने स्वयं को स्वतन्त्र राज्य घोषित कर दिया। रूस भी इन्हीं में से एक है। फरवरी, 1992 में भारतीय प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन को विश्वास दिलाया कि भारत के साथ रूस के सम्बन्ध में कोई गिरावट नहीं आएगी और वे पहले की ही तरह मित्रवत् और सहयोग पूर्ण बने रहेंगे।

आज भारत और रूस में घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। रूस के राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन तीन दिन की ऐतिहासिक यात्रा पर 27 जनवरी, 1993 को दिल्ली पहुंचे। राष्ट्रपति येल्तसिन और प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव वार्ता में मुख्यत: आर्थिक एवं व्यापारिक विवादों के समाधान और द्विपक्षीय सहयोग के लिए एजेंडे पर विशेष जोर दिया गया।

दोनों देशों के बीच 10 समझौते हुए जिनमें रुपया-रूबल विनिमय दर तथा कर्जे की मात्रा व भुगतान सम्बन्धी जटिल समस्याओं पर हुआ समझौता विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दोनों देशों में 20 वर्ष के लिए मैत्री एवं सहयोग की सन्धि हुई। यह सन्धि 1971 की सन्धि से इस रूप से भिन्न है कि इसमें सामरिक सुरक्षा सम्बन्धी उपबन्ध शामिल नहीं है। लेकिन 14 उपबन्धों वाली इस नई सन्धि में यह प्रावधान अवश्य रखा गया है कि दोनों देश ऐसा कोई काम नहीं करेंगे जिससे एक-दूसरे के हितों पर आंच आती है। वाणिज्य तथा आर्थिक सम्बन्धों के संवर्धन के लिए चार समझौते सम्पन्न हुए। इन समझौतों से व्यापार में भारी वृद्धि की आशा की गई है।

भारत रूस समझौतों से रूस को निर्यात करने वाले भारतीय व्यापारियों की परेशानी भी दूर हो गई है। भारतीय सेनाओं के लिए रक्षा कलपुर्जो की नियमित सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए रूसी राष्ट्रपति द्वारा प्रस्तुत त्रिसूत्रीय फार्मूला दोनों देशों ने स्वीकार कर लिया। इस सहमति से भारत को रूस की रक्षा उपकरणों और प्रौद्योगिकी प्राप्त होगी और संयुक्त उद्यमों में भी उसकी भागीदारी होगी। राजनीतिक स्तर पर राष्ट्रपति येल्तसिन तथा प्रधानमन्त्री नरसिम्हा राव की सहमति भारत की सबसे बड़ी राजनीतिक सफलता है।

रूसी राष्ट्रपति ने कश्मीर के मामले पर भारत की नीति का पूर्ण समर्थन किया और यह वचन दिया कि रूस पाकिस्तान को किसी भी तरह की तकनीकी तथा सामरिक सहायता नहीं देगा। रूस संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भी कश्मीर के मुद्दे पर भारत को समर्थन प्रदान करेगा। सुरक्षा परिषद् की स्थायी सदस्यता के लिए भी रूस भारत के दावे का समर्थन करेगा।

भारत के प्रधानमन्त्री की रूस यात्रा-29 जून, 1994 को भारत के प्रधानमन्त्री श्री पी० वी० नरसिम्हा राव रूस की यात्रा पर गए। भारत और रूस के मध्य वहां आपसी सहयोग व सैनिक सहयोग के क्षेत्र में 11 समझौते हुए। प्रधानमन्त्री राव की इस यात्रा से भारत और रूस के मध्य नवीनतम तकनीक के आदान-प्रदान के क्षेत्र पर बल दिया गया। रूस के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-दिसम्बर, 1994 में रूस के प्रधानमन्त्री विक्टर चेरनोमिर्दीन भारत की यात्रा पर आए। भारत और रूस के बीच आठ समझौते हुए। इन समझौतों में सैनिक और तकनीकी सहयोग भी शामिल हैं। इन समझौतों का भविष्य की दृष्टि से अत्यधिक महत्त्व है।

प्रधानमन्त्री एच० डी० देवगौड़ा की रूस यात्रा-मार्च, 1997 में भारत के प्रधानमन्त्री एच०डी० देवगौड़ा रूस गए। उन्होंने रूस के राष्ट्रपति येल्तसिन और प्रधानमन्त्री चेरनोमिर्दिन से बातचीत कर परम्परागत मित्रता बढ़ाने के लिए कई उपायों पर द्विपक्षीय सहमति हासिल की। रूस ने भारत को परमाणु रिएक्टर देने के पुराने निर्णय को पुष्ट किया।

परमाणु परीक्षण-11 मई, 1998 को भारत ने तीन और 13 मई को दो परमाणु परीक्षण किए। अमेरिका ने भारत के विरुद्ध आर्थिक प्रतिबन्ध लगाए जिसकी रूस ने कटु आलोचना की। 21 जून, 1998 को रूस के परमाणु ऊर्जा मन्त्री देवगेनी अदामोव और भारत के परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ० आर० चिदम्बरम ने नई दिल्ली में तमिलनाडु के कुरनकुलम में अढाई अरब की लागत से बनने वाले परमाणु ऊर्जा संयन्त्र के सम्बन्ध में समझौता किया।

रूस के प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-दिसम्बर, 1998 में रूस के प्रधानमन्त्री प्रिमाकोव भारत की यात्रा पर आए। 21 दिसम्बर, 1998 को दोनों देशों ने आपसी सहयोग के सात समझौतों पर हस्ताक्षर किए। दोनों देशों के रक्षा सहयोग की अवधि सन् 2000 से 2010 तक बढ़ाने का निर्णय किया। रूसी प्रतिरक्षा मन्त्री की भारत यात्रा-मार्च, 1999 को रूस के प्रतिरक्षा मन्त्री मार्शल इगोर दमित्रियेविच सर्गियेव (Marshall Igor Dmitrievich Suergeyev) पांच दिन के लिए भारत की यात्रा पर आए।

22 मार्च, 1999 को रूसी प्रतिरक्षा मन्त्री ने भारत के साथ एक महत्त्वपूर्ण रक्षा समझौता किया जिसके अन्तर्गत भारतीय सेना अधिकारियों को रूस के सैनिक शिक्षण संस्थाओं में प्रशिक्षण दिया जाएगा। भारतीय प्रतिरक्षा मन्त्री जार्ज फर्नांडीज़ ने इस रक्षा समझौते को भारत और मास्को के बीच दीर्घकालीन समझौता बताया।

रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा-अक्तूबर, 2000 में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत की यात्रा पर आए। अपनी यात्रा के दौरान रूसी राष्ट्रपति ने भारत के साथ क्षेत्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के अलावा के अनेक विषयों पर बातचीत की। दोनों देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद, विघटनवाद, संगठित मज़हबी अपराध और मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ़ सहयोग करने पर भी सहमति जताई। दोनों देशों ने आपसी हित के 17 विभिन्न विषयों पर समझौते किए। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समझौता सामरिक भागीदारी का घोषणा-पत्र रहा।

भारत के प्रधानमन्त्री की रूस यात्रा-नवम्बर, 2001 में भारत के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी रूस यात्रा पर गए। वाजपेयी एवं रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने शिखर वार्ता करके ‘मास्को घोषणा पत्र’ जारी किया जिसमें आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात कही गई। रूस ने सुरक्षा परिषद् में भारत की स्थायी सदस्यता के दावे का भरपूर समर्थन किया। इसके अतिरिक्त अन्य कई क्षेत्रों में भी दोनों देशों के बीच समझौते हुए।

रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा-दिसम्बर, 2004 में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने भारत की यात्रा की। भारत एवं रूस ने आतंकवाद से एकजुट तरीके से निपटने एवं आर्थिक व्यापारिक सहयोग बढ़ाने के सामरिक महत्त्व के एक संयुक्त घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किये। रूस ने संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता के लिए भारत का वीटो सहित समर्थन किया। रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा-दिसम्बर, 2008 में रूस के राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव भारत यात्रा पर आए तथा भारत के साथ अपने सम्बन्धों को और प्रगाढ़ बनाया।

भारतीय प्रधानमन्त्री की रूस यात्रा-भारत के प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह दिसम्बर, 2009 में भारत-रूस वार्षिक शिखर बैठक में भाग लेने के लिए रूस यात्रा पर गये। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने असैन्य परमाणु समझौता किया। रूसी प्रधानमन्त्री की भारत यात्रा-मार्च, 2010 में रूसी प्रधानमन्त्री श्री ब्लादिमीर पुतिन भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने सुरक्षा एवं सहयोग के पाँच समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा-दिसम्बर, 2010 में भारत-रूस वार्षिक शिखर वार्ता में भाग लेने के लिए रूस के राष्ट्रपति दमित्री मेदवेदेव भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों दोनों दोनों देशों ने 30 समझौतों पर हस्ताक्षर किये। भारतीय प्रधानमन्त्री की रूस यात्रा-दिसम्बर, 2011 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रूस की यात्रा की।

इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने पारस्परिक सहयोग के चार विभिन्न समझौतों पर हस्ताक्षर किये। रूसी राष्ट्रपति की भारत यात्रा-दिसम्बर, 2012 में रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भारत-रूस वार्षिक शिखर वार्ता में भाग लेने के लिए भारत यात्रा पर आए। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने रक्षा एवं सहयोग के 10 समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

भारतीय प्रधानमन्त्री की रूस यात्रा-3 अक्तूबर, 2013 में भारतीय प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह ने रूस की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने कुडनकुलम बिजली परियोजना, राकेट, मिसाइल, नौसैना, प्रौद्योगिकी और हथियार प्रणाली के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने का फैसला किया। दिसम्बर, 2014 में रूसी राष्ट्रपति श्री ब्लादिमीर पुतिन ने भारत की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 20 समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

दिसम्बर, 2015 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रूस की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने सुरक्षा, व्यापार एवं स्वच्छ ऊर्जा जैसे 16 महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। अक्तूबर, 2016 में रूसी राष्ट्रपति श्री ब्लादिमीर पुतिन भारत यात्रा पर आए। उन्होंने भारत में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में भाग लिया तथा भारत के साथ 16 समझौतों पर भी हस्ताक्षर किये। – जून 2017 में भारतीय प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रूस की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 5 महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये। अक्तूबर 2018 में रूसी राष्ट्रपति श्री ब्लादिमीर पुतिन वार्षिक शिखर वार्ता के लिए भारत यात्रा पर आए। इस दौरान दोनों देशों ने आठ महत्त्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये।

सितम्बर, 2019 में भारतीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने रूस की यात्रा की। इस यात्रा के दौरान दोनों देशों ने 15 समझौतों पर हस्ताक्षर किये। निःसन्देह भारत और रूस में मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित हो चुके हैं। सभी विवाद हल हो चुके हैं, गतिरोध दूर हो चुके हैं और नए सम्बन्ध स्थापित हो चुके हैं। दोनों देशों के बीच एक नई समझदारी हुई है जो नई विश्व-व्यवस्था में योगदान कर सकती है। रूस पुरानी मित्रता को निरन्तर निभा रहा है और यह निर्विवाद है कि भारत और रूस के बीच विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग बढ़ने से दोनों देशों की ताकत बढ़ेगी।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 3.
सोवियत संघ के विघटन के मुख्य कारण क्या थे ?
उत्तर:
सोवियत संघ के विघटन के निम्नलिखित कारण थे

(1) सोवियत संघ राजनीतिक और आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था।

(2) उपभोक्ता वस्तुओं की कमी ने सोवियत संघ के नागरिकों में असंतोष भर दिया।

(3) सोवियत संघ के लोग मिखाइल गोर्बाचेव के सुधारों की धीमी गति से सन्तुष्ट नहीं थे।

(4) सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन लगभग 70 सालों तक रहा है। परन्तु वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। इस कारण सोवियत संघ के नागरिक इस पार्टी से छुटकारा पाना चाहते थे।

(5) सोवियत संघ ने समय-समय पर अत्याधुनिक एवं हथियार बनाकर अमेरिका की बराबरी करने का प्रयास किया, परन्तु धीरे-धीरे उसे इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी।

(6) अत्यधिक खर्चों के कारण सोवियत संघ बुनियादी ढांचे एवं तकनीकी क्षेत्र में पिछड़ता गया।

(7) सोवियत संघ राजनीतिक एवं आर्थिक तौर पर अपने नागरिकों के समक्ष पूरी तरह सफल नहीं हो पाया।

(8) 1979 में अफ़गानिस्तान में सैनिक हस्तक्षेप के कारण सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था और भी कमज़ोर हो गई।

प्रश्न 4.
द्वि-ध्रवीयकरण के लाभ तथा हानियाँ लिखो।
अथवा
द्वि-ध्रुवीयकरण के लाभ लिखिए।
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीयकरण के लाभ

1. विचारधाराओं को प्रोत्साहन-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह है कि इस विश्व व्यवस्था के अन्तर्गत विचारधाराओं को बहुत महत्त्व एवं प्रोत्साहन दिया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद दोनों गुटों ने अर्थात् अमेरिका तथा सोवियत संघ ने अपनी-अपनी विचारधाराओं को प्रोत्साहित किया। जहां अमेरिका ने पूंजीवादी विचारधारा को बढ़ावा दिया, वहीं सोवियत संघ ने साम्यवादी विचारधारा को प्रोत्साहन दिया।

2. शक्ति में समानता-द्वि-ध्रुवीय विश्व में दोनों गुटों की शक्ति लगभग समान होती है। दोनों गुटों में शक्ति बराबर होने से सदैव संघर्ष की शक्ति बनी रहती है।

3. शान्ति स्थापना में सहायक-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक महत्त्वपूर्ण लाभ यह है कि इसके द्वारा विश्व में शान्ति स्थापना में सहायता मिलती है। द्वि-ध्रुवीय विश्व में जो प्रतिस्पर्धा पैदा होती है या जो संघर्ष पैदा होता है, वह केवल दोनों गुटों तक ही सीमित रहता है। शेष विश्व इस संघर्ष से अछूता रहता है।

द्वि-धुवीयकरण की हानियाँ

1. शस्त्रीकरण को बढावा-द्वि-ध्रुवीय विश्व का सबसे पहला दोष या हानि यह है कि इस व्यवस्था के कारण शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिलता है। दोनों गुटों में एक-दूसरे से अधिक शक्तिशाली होने के लिए सदैव प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। इसके लिए दोनों गुट सभी तरह के हथकण्डे अपनाते हैं, जिससे शस्त्रीकरण एक महत्त्वपूर्ण साधन है। शस्त्रीकरण से विश्व में शस्त्र दौड़ को बढ़ावा मिलता है तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सदैव तनाव बना रहता है।

2. युद्धों को बढ़ावा-द्वि-ध्रुवीय विश्व के कारण सदैव युद्ध का खतरा मंडराता रहता है। द्वि-ध्रुवीय विश्व में दोनों गुट सदैव एक-दूसरे से आगे निकलने के प्रयास में रहते हैं। इसके लिए दोनों गुट एक-दूसरे को सदैव हानि पहुंचाने की कोशिश में लगे रहते हैं जिससे सदैव युद्ध की सम्भावना बनी रहती है।

3. अशान्त वातावरण-द्वि-ध्रुवीय में जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि सदैव शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिलता है, युद्ध की सम्भावना बनी रहती है। इन सभी स्थितियों में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अशान्त वातावरण की स्थिति रहती है, लोगों में सदैव भय एवं आतंक व्याप्त रहता है।

प्रश्न 5.
उत्तर साम्यवादी राज्यों से आपका क्या अभिप्राय है ? लोकतान्त्रिक राजनीति व पूंजीवाद को अपनाने के मुख्य तीन कारण लिखिए।
उत्तर:
1990 के दशक में शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन से कई नये राज्य विश्व राजनीति में उभर कर सामने आए, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा रहे थे। इन्हें ही उत्तर-साम्यवादी राज्य कहा जाता है। इन दोनों में तथा सोवियत गुट के कुछ अन्य साम्यवादी देशों में धीरे-धीरे लोकतांत्रिक राजनीति और पूंजीवाद का प्रवेश ने लगा। उदाहरण के लिए पूर्वी जर्मनी तथा पश्चिमी जर्मनी जब एक हए तब पूर्वी जर्मनी में जोकि शीत युद्ध के समय सोवियत संघ के साथ था, में लोकतान्त्रिक एवं पूंजीवाद की हवा चलने लगी थी। निम्नलिखित कारणों से इन देशों ने लोकतान्त्रिक राजनीति एवं पूंजीवाद को अपनाया

(1) उत्तर साम्यवादी देशों को यह लग रहा था कि उनके आर्थिक पिछड़ेपन का कारण उनकी शासन व्यवस्था थी। इसी कारण इन उत्तर साम्यवादी देशों ने अपने देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ आर्थिक सुधारों को लागू किया।

(2) उत्तर-साम्यवादी राज्यों ने अपने राज्य में लोकतान्त्रिक व्यवस्था को अपनाने के लिए इसे अपनाया। (3) इन राज्यों ने अपने देशों में राजनीतिक स्थिरता के लिए इस व्यवस्था को अपनाया।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
द्वि-ध्रुवीय विश्व के अर्थ की व्याख्या करें।
उत्तर:
द्वितीय महायुद्ध के बाद एक महत्त्वपूर्ण घटना यह घटी कि अधिकांश महाशक्तियाँ कमज़ोर हो गईं और केवल अमेरिका और रूस ही ऐसे देश बचे जो अब भी शक्तिशाली कहला सकते थे। इस प्रकार युद्ध के उपरान्त शक्ति का एक नया ढांचा (New Power Structure) विश्व स्तर पर उभरा जिसमें केवल दो ही महाशक्तियां थीं जो अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावशाली थीं। ये शक्तियां थीं-सोवियत रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका।

दो गुटों, ब्लाक या कैम्प (Block or Camp) में बंटे विश्व को द्वि-ध्रुवीय विश्व का नाम एक अंग्रेज़ी इतिहासकार टायनबी (Toynbee) ने दिया था। उन दिनों में टायनबी ने लिखा था, “विश्व के सभी देश कुछ न कुछ मात्रा में अमेरिका या रूस पर आश्रित हैं। कोई भी पूर्णत: इन दोनों से स्वतन्त्र नहीं है।” यही द्वि-ध्रुवीय विश्व है। नार्थऐज और ग्रीव के अनुसार, “द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में जो प्रमुख परिवर्तन आया वह था अमेरिका और रूस का महाशक्तियों के रूप में उदय होना और साथ ही साथ यूरोप विश्व कूटनीति के केन्द्र के रूप में पतन होना।”

मॉर्गेन्थो के अनुसार, द्वितीय महायुद्ध के बाद “संयुक्त राज्य अमेरिका और सोवियत रूस की अन्य देशों की तुलना में शक्ति इतनी अधिक बढ़ गई थी कि वह स्वयं ही एक-दूसरे को सन्तुलित कर सकते थे। इस प्रकार शक्ति सन्तुलन बहुध्रुवीय से द्वि-ध्रुवीय में बदल गया था।” इस प्रकार द्वितीय महायद्ध के बाद कई वर्षों तक ये दो महाशक्तियाँ ही विश्व स्तर पर प्रभत्वशाली बनी रहीं और समस्त अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का केन्द्र बिन्दु थीं। शक्ति संरचना का यह रूप ही द्वि-ध्रुवीय या द्वि-केन्द्रीय विश्व या व्यवस्था के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

प्रश्न 2.
द्वितीय विश्व के बिखराव के कोई चार कारण लिखें।
अथवा
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था की समाप्ति के लिये उत्तरदायी कोई चार कारण लिखें।
अथवा
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था की समाप्ति हेतु उत्तरदायी किन्हीं चार कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन के निम्नलिखित कारण थे

1. अमेरिकी गुट में फूट-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक प्रमुख कारण अमेरिकी गुट में फूट पड़ना था। फ्रांस तथा इंग्लैंड जैसे देश अमेरिका पर अविश्वास करने लगे थे।

2. सोवियत गुट में फूट-जिस प्रकार अमेरिकी गुट में फूट द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक कारण बनी, वहीं सोवियत गुट में पड़ी फूट ने भी द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था को पतन की ओर धकेला।

3. सोवियत संघ का पतन-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सोवियत संघ का पतन था। एक गुट के पतन से द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था स्वयमेव ही समाप्त हो गई।

4. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका भी थी। गट-निरपेक्ष आन्दोलन ने अधिकांश विकासशील देशों को दोनों गटों से अलग रहने की सलाह दी।

प्रश्न 3.
उत्तर साम्यवादी शासन व्यवस्थाओं में लोकतान्त्रिक राजनीति एवं पूंजीवाद के प्रवेश का वर्णन करें।
उत्तर:
1990 के दशक में शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन से कई नये राज्य विश्व राजनीति में उभर कर सामने आए, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा रहे थे। इन दोनों में तथा सोवियत गुट के कुछ अन्य साम्यवादी देशों में धीरे-धीरे लोकतान्त्रिक राजनीतिक और पूंजीवाद का प्रवेश होने लगा। उदाहरण के लिए पूर्वी जर्मनी तथा पश्चिमी जर्मनी जब एक हुए तब पूर्वी जर्मनी में जोकि शीत युद्ध के समय सोवियत संघ के साथ था में लोकतान्त्रिक एवं पूंजीवाद की हवा चलने लगी थी।

उत्तर साम्यवादी देशों को यह लग रहा था कि उनके आर्थिक पिछड़ेपन का कारण उनकी शासन व्यवस्था थी। इसी कारण इन उत्तर साम्यवादी देशों ने अपने देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था के साथ आर्थिक सुधारों को लागू किया। चीन जैसे साम्यवादी देश ने भी 1990 के दशक में पश्चिम आधारित आर्थिक व्यवस्था को धीरे-धीरे अपने राज्य में लागू किया। उत्तर साम्यवादी देशों में लोकतान्त्रिक राजनीति एवं पूँजीवाद को बढ़ावा देने में अमेरिका ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 4.
भारत के उत्तर साम्यवादी देशों के साथ सम्बन्धों का वर्णन करें।
उत्तर:
भारत ने शीत युद्ध की समाप्ति एवं सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् उत्तर-साम्यवादी देशों से अपने सम्बन्धों को नई दिशा देने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए। सोवियत संघ से अलग होने वाले 15 गणराज्यों से . अपने सम्बन्ध बनाने के लिए भारतीय प्रधानमन्त्री, राष्ट्रपति एवं अन्य महत्त्वपूर्ण नेताओं ने इन देशों की यात्राएं की तथा कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

भारत ने तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान तथा किरगिस्तान से राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा कूटनीतिक सहयोग के लिए एक विशेष ढांचे का निर्माण किया। 1993 में भारतीय प्रधानमन्त्री पी० वी० नरसिम्हा राव ने उजबेकिस्तान तथा कजाखिस्तान की यात्रा करके उनके साथ आर्थिक एवं सांस्कृतिक सम्बन्धों को मजबूत किया। इसी तरह भारत ने मध्य पूर्व के अन्य उत्तर साम्यवादी देशों तथा यूरोप एवं एशिया के उत्तर साम्यवादी देशों से अपने सम्बन्ध मज़बूत बनाए।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 5.
द्वि-ध्रुवीय विश्व के विकास के क्या कारण थे ?
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय विश्व के विकास के निम्नलिखित कारण थे

1. शीत युद्ध का जन्म-द्वि-ध्रुवीय विश्व के विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारण शीत युद्ध था। शीत युद्ध के कारण ही विश्व अमेरिकन एवं सोवियत गुट के रूप में दो भागों में विभाजित हो गया था।

2. सैनिक गठबन्धन-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक कारण सैनिक गठबन्धन था। सैनिक गठबन्धन के कारण अमेरिका एवं सोवियत संघ में सदैव संघर्ष चलता रहता था।

3. पुरानी महाशक्ति का पतन-दूसरे विश्व युद्ध के बाद इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली तथा जापान जैसी पुरानी महाशक्तियों का पतन हो गया तथा विश्व में अमेरिका एवं सोवियत संघ दो ही शक्तिशाली देश रह गए थे इस कारण विश्व द्वि-ध्रुवीय हो गया।

4. अमेरिका की विश्व राजनीति में सक्रिय भूमिका-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक अन्य कारण अमेरिका का विश्व राजनीति में सक्रिय भाग लेना भी था।

प्रश्न 6.
सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था की किन्हीं चार विशेषताओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था भी अमेरिका की ही भान्ति अन्य देशों से बहुत आगे थी।
  • सोवियत संघ की संचार प्रणाली बहुत अधिक विकसित एवं उन्नत थी।
  • सोवियत संघ के पास ऊर्जा संसाधन के विशाल भण्डार थे, जिसमें खनिज तेल, लोहा, इस्पात एवं मशीनरी शामिल हैं।
  • सरकार ने अपने नागरिकों को सभी प्रकार की बुनियादी सुविधाएं प्रदान कर रखी थी, जिसमें स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा, चिकित्सा सुविधा तथा यातायात सुविधा शामिल हैं।

प्रश्न 7.
सोवियत प्रणाली की कोई चार विशेषताएं लिखिए।
उत्तर:

  • सोवियत संघ की राजनीतिक प्रणाली समाजवादी व्यवस्था पर आधारित थी।
  • सोवियत प्रणाली आदर्शों एवं समतावादी समाज पर बल देती है।
  • सोवियत प्रणाली पूंजीवादी एवं मुक्त व्यापार के विरुद्ध थी।
  • सोवियत प्रणाली में कम्युनिस्ट पार्टी को अधिक महत्त्व दिया जाता था।

प्रश्न 8.
सोवियत संघ में पाई जाने वाली नौकरशाही की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • सोवियत संघ में नौकरशाही धीरे-धीरे तानाशाही एवं सत्तावादी होती चली गई।
  • नौकरशाही के उदासीन व्यवहार से नागरिकों की दिनचर्या मश्किल होती गई।
  • सोवियत संघ की नौकरशाही किसी के भी प्रति उत्तरदायी नहीं थी।
  • नौकरशाही में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार भी बढ़ता गया।

प्रश्न 9.
मिखाइल गोर्बाचेव के समय में सोवियत संघ में घटित होने वाली किन्हीं चार घटनाओं का वर्णन करें।
उत्तर:

  • गोर्बाचेव के समय कई साम्यवादी देश लोकतान्त्रिक ढांचे में ढलने लगे थे।
  • गोर्बाचेव द्वारा शुरू की गई सुधारों की प्रक्रिया से कई साम्यवादी नेता असन्तुष्ट थे।
  • गोर्बाचेव के साथ सोवियत संघ में धीरे-धीरे राजनीतिक एवं आर्थिक संकट गहराने लगा।
  • पूर्वी यूरोप की कई साम्यवादी सरकारें एक के बाद एक गिरने लगीं।

प्रश्न 10.
सोवियत संघ के विघटन के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:

  • सोवियत संघ राजनीतिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर हो चुका था।
  • उपभोक्ता वस्तुओं की कमी ने सोवियत संघ के नागरिकों में असंतोष भर दिया।
  • सोवियत संघ के लोग मिखाइल गोर्बाचेव के सुधारों की धीमी गति से सन्तुष्ट नहीं थे।
  • सोवियत संघ में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन लगभग 70 सालों तक रहा है। परन्तु वह किसी के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। इस कारण सोवियत संघ के नागरिक इस पार्टी से छुटकारा पाना चाहते थे।

प्रश्न 11.
सोवियत संघ के विघटन के विश्व राजनीति पर पड़ने वाले कोई चार प्रभाव लिखें।
अथवा
सोवियत संघ के विघटन के कोई चार परिणाम लिखिए।
उत्तर:
सोवियत संघ के पतन के निम्नलिखित चार परिणाम निकले

  • सोवियत संघ के पतन से द्वितीय विश्व युद्ध से जारी शीत युद्ध समाप्त हो गया।
  • सोवियत संघ के पतन से खतरनाक एवं परमाणु हथियारों की होड़ समाप्त हो गई।
  • पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के समर्थक अमेरिका का प्रभाव पहले से और अधिक बढ़ गया।
  • विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी पूंजीवादी समर्थक आर्थिक संस्थाएं विभिन्न देशों की प्रभावशाली सलाहकार बन गईं।

प्रश्न 12.
शॉक थेरेपी के अन्तर्गत किये गए किन्हीं चार कार्यों का उल्लेख करें।
उत्तर:
शॉक थेरेपी के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्य किये गए

  • शॉक थेरेपी द्वारा साम्यवादी अर्थव्यवस्था को समाप्त करके सम्पत्ति का निजीकरण करना था।
  • शॉक थेरेपी के अन्तर्गत मुक्त व्यापार को बढ़ावा दिया गया।
  • शॉक थेरेपी के अन्तर्गत सोवियत संघ के आर्थिक गठबन्धनों को समाप्त करके इन देशों को पश्चिमी देशों से जोड़ दिया गया।
  • शॉक थेरेपी के अन्तर्गत सामूहिक खेती को निजी खेती में बदल दिया गया।

प्रश्न 13.
शॉक-थेरेपी के कोई चार परिणाम लिखिये ।
उत्तर:
शॉक थेरेपी के निम्नलिखित परिणाम निकले

  • शॉक थेरेपी के कारण नागरिकों के लिए आजीविका कमाना कठिन हो गया।
  • शॉक थेरेपी के कारण रूसी मुद्रा रूबल का काफ़ी अवमूल्यन हो गया।
  • शॉक थेरेपी के कारण मुद्रा स्फीति के बढ़ने से महंगाई कई गुना बढ़ गई।
  • शॉक थेरेपी के कारण सोवियत संघ की औद्योगिक व्यवस्था कमजोर हो गई तथा उसे औने-पौने दामों में निजी हाथों में बेच दिया गया।

प्रश्न 14.
भारत को रूस के साथ अच्छे सम्बन्ध रखकर प्राप्त होने वाले लाभ बताएं ।
उत्तर:
भारत को रूस के साथ अच्छे सम्बन्ध रखकर निम्नलिखित लाभ हुए हैं

  • रूस ने सदैव अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर कश्मीर मुद्दे पर भारत का साथ दिया है।
  • भारत को रूस से सदैव अत्याधुनिक हथियार प्राप्त हुए हैं, जो भारतीय सेना को शक्तिशाली बनाने में सहायक हुए हैं।
  • भारत रूस के माध्यम से काफ़ी हद तक अपनी ऊर्जा की आवश्यकताएं पूरी करता है।
  • रूस ने भारत को परमाणु क्षेत्र में भी हर सम्भव सहयोग दिया है।

प्रश्न 15.
भारत-सोवियत संघ के आर्थिक सम्बन्धों की व्याख्या करें।
उत्तर:
भारत-सोवियत संघ के मध्य आर्थिक सम्बन्धों का वर्णन इस प्रकार है

  • सोवियत संघ ने विशाखापट्टनम, बोकारो तथा भिलाई के इस्पात करखानों को आर्थिक एवं तकनीकी सहायता प्रदान की है।
  • सोवियत संघ ने भारत को सदैव कम मूल्यों पर हथियार दिये हैं।
  • सोवियत संघ ने भारत की सार्वजनिक कम्पनियों को भी हर तरह की सहायता प्रदान की है।
  • सोवियत संघ ने भारत के साथ उस समय रुपये के माध्यम से भी व्यापार किया जब भारत के पास विदेशी मुद्रा की कमी थी।

प्रश्न 16.
द्वि-ध्रुवीयकरण के चार लाभ लिखें।
उत्तर:

  • विचारधाराओं को प्रोत्साहन-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह है कि इस विश्व व्यवस्था के अन्तर्गत विचारधाराओं को बहुत महत्त्व एवं प्रोत्साहन दिया जाता है।
  • शान्ति स्थापना में सहायक-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक महत्त्वपूर्ण लाभ है कि इसके द्वारा विश्व में शान्ति स्थापना में सहायता मिलती है।
  • शक्ति की समानता-द्वि-ध्रुवीय विश्व में दोनों गुटों की शक्ति लगभग समान होती है।
  • तनावों को कम करने में सहायक-द्वि-ध्रुवीयकरण अन्तर्राष्ट्रीय तनावों को कम करने में सहायक होती है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
“द्वि-ध्रुवीयता’ से क्या तात्पर्य है ?
अथवा
“द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था” से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था का अर्थ यह है कि विश्व का दो गुटों में बंटा होना। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व पूंजीवादी तथा साम्यवादी दो गुटों में बंट गया। पूंजीवादी गुट का नेता अमेरिका एवं साम्यवादी गुट का नेता सोवियत संघ था। नार्थ ऐज और ग्रीव के अनुसार, “द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था में जो प्रमुख परिवर्तन आया वह था, अमेरिका और रूस का महाशक्तियों के रूप में उदय होना और साथ ही यूरोप विश्व कूटनीति के केन्द्र के रूप में पतन होगा।”

प्रश्न 2.
द्वितीय महायुद्ध से निकली शक्ति संरचना की कोई दो विशेषताएं लिखें।
उत्तर:

  • द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् विभिन्न राष्ट्रों की शक्ति स्थिति में परिवर्तन आया था, जिसके कारण शक्ति की एक नई संरचना का उदय हुआ।
  • द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् लगभग सभी साम्राज्यवादी देश शक्तिहीन हो चुके थे, जिससे उनके अधीन अधिकांश देश स्वतन्त्र हो गए।

प्रश्न 3.
द्वि-ध्रुवीय विश्व के कोई दो लाभ लिखें।
उत्तर:

1. विचारधाराओं को प्रोत्साहन-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक लाभ यह है कि इस विश्व व्यवस्था के अन्तर्गत विचारधाराओं को बहुत महत्त्व एवं प्रोत्साहन दिया जाता है।
2. शान्ति स्थापना में सहायक-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक महत्त्वपूर्ण लाभ है कि इसके द्वारा विश्व में शान्ति स्थापना में सहायता मिलती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 4.
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था की कोई दो हानियाँ बताइए।
उत्तर:
1. शस्त्रीकरण को बढ़ावा-द्वि-ध्रुवीय विश्व की सबसे बड़ी हानि यह है कि इसमें शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिलता है, जिससे अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर सदैव तनाव बना रहता है।
2. युद्धों को बढ़ावा-द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में दोनों गुट एक-दूसरे को सदैव हानि पहुंचाने की कोशिश में लगे रहते हैं, जिससे सदैव युद्ध की सम्भावना बनी रहती है।

प्रश्न 5.
द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान विश्व दो गुटों में बंटा था, एक गुट अमेरिका का था तथा दूसरा गुट सोवियत संघ का था। लगभग सम्पूर्ण विश्व इन दो गुटों में था। इसलिए विश्व को द्वि-ध्रुवीय कहा जाता था। परन्तु 1991 में सोवियत संघ का विघटन हो जाने से विश्व का एक ध्रुव समाप्त हो गया। इसी को द्वि-ध्रुवीय का पतन कहा जाता है।

प्रश्न 6.
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था के पतन के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:
1. सोवियत संघ का पतन-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक कारण सोवियत संघ का पतन था। एक गुट के पतन से द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था अपने आप समाप्त हो गई।
2. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका-द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भी भूमिका थी। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अधिकांश विकासशील देशों को दोनों गुटों से अलग रहने की सलाह दी।

प्रश्न 7.
मध्य एशियाई देशों के नाम लिखें।
उत्तर:
मध्य एशियाई देशों मे उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, किरघिस्तान तथा ताजिकिस्तान शामिल हैं।

प्रश्न 8.
बलकान राज्यों के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
बलकान का अर्थ टूटन या विभाजन होता है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में अनेकों बड़े-बड़े साम्राज्यों का विघटन हुआ, जिसके कारण कई छोटे-बड़े राज्य अस्तित्व में आए। बलकान राज्यों में अल्बानिया, बुल्गारिया, बोसनिया, हरजेगोविनिया, यूनान, क्रोशिया, मान्टेनीग्रो, मेसेडोनिया तथा तुर्की शामिल हैं। बलकान क्षेत्र को यूरोप के दंगल का अखाड़ा माना जाता रहा है।

प्रश्न 9.
बलकान को प्रायः बलकान प्रायद्वीप क्यों कहा जाता है ?
उत्तर:
बलकान को प्राय: बलकान प्रायद्वीप इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह तीन दिशाओं से पानी से घिरा हुआ है। इसके दक्षिण तथा पश्चिम में भूमध्य सागर की शाखाएं तथा पूर्वी भाग की ओर काला सागर स्थित है।

प्रश्न 10.
रूस में राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
सोवियत संघ के पतन के पश्चात् रूस इसके उत्तराधिकारी के रूप में सामने आया तथा इसके प्रथम राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन बने। येल्तसिन ने रूस की आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को ठीक करने के लिए कदम उठाए। बोरिस येल्तसिन ने भारत जैसे अपने अन्य मित्र देशों से अच्छे सम्बन्ध बनाए रखे तथा अमेरिका एवं पश्चिमी यूरोप से भी अपने सम्बन्ध सुधारने के प्रयास किए।

प्रश्न 11.
रूस में ब्लादिमीर पुतिन की भूमिका का वर्णन करें।
उत्तर:
ब्लादिमीर पतिन 2000 में येल्तसिन के स्थान पर रूस के राष्टपति बने। पतिन ने चेचन विद्रोहियों के विरुद्ध कडा रुख अपनाया। उन्होंने रूस की आर्थिक व्यवस्था को ठीक किया तथा अमेरिका के साथ मिलकर हथियारों में कमी करने का प्रयास किया। ब्लादिमीर पुतिन के शासनकाल में रूस पुनः शक्ति केन्द्र के रूप में उभर रहा है।

प्रश्न 12.
विश्व राजनीति में उभरी किन्हीं दो हस्तियों की व्याख्या करें।
उत्तर:
1. रूस-शीत युद्ध की समाप्ति पर रूस, सोवियत संघ के उत्तराधिकारी के रूप में उभर कर सामने आया। कुछ कठिनाइयों के बावजूद वर्तमान राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने रूसी आशाओं को आगे बढ़ाया है।
2. केन्द्रीय एशियाई राज्य-शीत युद्ध एवं सोवियत संघ की समाप्ति से केन्द्रीय एशिया में कुछ नये राज्यों का उदय हुआ, जिसमें उजबेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कजाखिस्तान, किरघिस्तान तथा ताजिकिस्तान शामिल हैं।

प्रश्न 13.
ब्लादिमीर लेनिन के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
ब्लादिमीर लेनिन रूस के बोल्शेविक साम्यवादी दल का संस्थापक था। उसके नेतृत्व में 1917 में जार के विरुद्ध क्रान्ति हुई थी। लेनिन ने रूस की खराब हुई आर्थिक व्यवस्था को ठीक किया तथा रूस में साम्यवादी शासन को मज़बूत किया। लेनिन ने रूस में मार्क्सवाद के विचारों को व्यावहारिक रूप प्रदान किया।

प्रश्न 14.
द्वितीय विश्व किसे कहते हैं ?
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व दो गुटों में बंट गया। एक गुट का नेतृत्व पूंजीवादी देश संयुक्त राज्य अमेरिका कर रहा था। इस गुट के देशों को पहली दुनिया भी कहा जाता है। दूसरे गुट का नेतृत्व साम्यवादी सोवियत संघ कर रहा था, इस गुट के देशों को ही दूसरी दुनिया कहा जाता है।

प्रश्न 15.
बर्लिन की दीवार के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान जर्मनी दो भागों में बंट गया था। पश्चिमी जर्मनी संयुक्त राज्य अमेरिका के प्रभाव में था जबकि पूर्वी जर्मनी साम्यवादी सोवियत संघ के प्रभाव में थे। सन् 1961 में दोनों भागों के बीच में एक दीवार बना दी गई, जिसे बर्लिन की दीवार कहते थे। यह दीवार पूर्वी जर्मनी तथा पश्चिमी जर्मनी को बांटती थी। 9 नवम्बर, 1989 को इस दीवार को तोड़कर जर्मनी का एकीकरण कर दिया गया।

प्रश्न 16.
सोवियत प्रणाली के कोई दो दोष लिखिए।
उत्तर:

  • सोवियत साम्यवादी व्यवस्था धीरे-धीरे सत्तावादी हो गई थी, इसमें नौकरशाही का प्रभाव बढ़ गया था।
  • सोवियत साम्यवादी व्यवस्था में केवल एक ही दल साम्यवादी दल का ही शासन था, जोकि किसी के प्रति भी उत्तरदायी नहीं था।

प्रश्न 17.
जोजेफ स्टालिन के समय में सोवियत संघ द्वारा प्राप्त कोई दो उपलब्धियां लिखें।
उत्तर:

  • जोजेफ स्टालिन के शासनकाल के समय सोवियत संघ एक महाशक्ति के रूप में स्थापित हुआ।
  • जोजेफ स्टालिन के शासनकाल में सोवियत संघ में औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया गया।

प्रश्न 18.
सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था में गतिरोध क्यों आया ? कोई दो कारण दें।
उत्तर:

  • सोवियत संघ ने लगातार अपने संसाधनों को परमाणु एवं सैनिक कार्यों में खर्च किया, जिससे सोवियत संघ में आर्थिक संसाधनों की कमी हो गई।
  • सोवियत संघ के पिछलग्गू देशों का आर्थिक भार भी सोवियत संघ पर ही पड़ता था जिससे धीरे-धीरे सोवियत संघ आर्थिक तौर पर कमज़ोर होता चला गया।

प्रश्न 19.
सोवियत संघ में राजनैतिक गतिरोध पैदा करने में कम्युनिस्ट पार्टी किस प्रकार जिम्मेदार थी, कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • कम्युनिस्ट पार्टी ने सोवियत संघ में लगभग 70 साल शासन किया, परन्तु वे किसी के प्रति भी जवाबदेह नहीं थी।
  • कम्युनिस्ट पार्टी के गैर-ज़िम्मेदार एवं अक्षम होने के कारण धीरे-धीरे सोवियत संघ में भ्रष्टाचार फैलने लगा।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 20.
1917 की रूसी क्रान्ति के कोई दो कारण लिखें।
उत्तर:

  • रूस के तत्कालीन शासक जार के उदासीन व्यवहार एवं पूंजीवादी प्रणाली का समर्थन करने के कारण क्रान्ति हुई।
  • रूस में आदर्शवादी एवं समतामूलक समाज की स्थापना के लिए क्रान्ति हुई।

प्रश्न 21.
सोवियत संघ के विघटन के कोई दो कारण लिखिये।
अथवा
भूतपूर्व सोवियत संघ के पतन के कोई दो कारण लिखिए।
उत्तर:

  • सोवियत संघ के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण तत्कालीन सोवियत संघ के राष्ट्रपति गोर्बाचेव द्वारा चलाये गए राजनीतिक एवं आर्थिक सुधार कार्यक्रम थे।
  • सोवियत संघ के पतन का दूसरा तत्कालिक कारण सोवियत संघ के गणराज्यों में प्रजातान्त्रिक एवं उदारवादी भावनाएं पैदा होना है।

प्रश्न 22.
सोवियत संघ के पतन के कोई दो सकारात्मक परिणाम लिखिए।
उत्तर:

  • सोवियत संघ के पतन के कारण शीत युद्ध भी समाप्त हो गया।
  • सोवियत संघ के पतन के साथ ही खतरनाक अस्त्रों-शस्त्रों की होड़ भी समाप्त हो गई।

प्रश्न 23.
अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति होने के काई दो दुष्परिणाम लिखें।
उत्तर:

  • अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति होने के कारण वह अनावश्यक रूप से कई क्षेत्रों में राजनीतिक एवं सैनिक हस्तक्षेप करने लगा।
  • अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति होने के कारण विश्व के अधिकांश आर्थिक संगठनों पर अमेरिका का प्रभुत्व स्थापित हो गया।

प्रश्न 24.
‘इतिहास की सबसे बड़ी गैराज सेल’ के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
सोवियत संघ के पतन के पश्चात् अस्तित्व में आये गणराज्यों ने ‘शॉक थेरेपी’ की विधि द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को ठीक करने का प्रयास किया। परन्तु ‘शॉक थेरेपी’ के परिणामस्वरूप लगभग पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को लाभ की अपेक्षा हानि हुई। रूस में राज्य नियन्त्रित औद्योगिक ढांचा ढहने लगा। लगभग 90% उद्योगों को निजी कम्पनियों को बेचा गया, इसे ही इतिहास की सबसे बड़ी गैराज सेल’ कहा जाता है।

प्रश्न 25.
‘शॉक थेरेपी’ के सामाजिक कल्याण की योजनाओं पर पड़ने वाले कोई दो प्रभाव लिखें।
उत्तर:

  • ‘शॉक थेरेपी’ के प्रयोग के परिणामस्वरूप सामाजिक कल्याण की पुरानी संस्थाओं को बन्द कर दिया गया, जिससे लोगों को मदद मिलनी बन्द हो गई।
  • लोगों को दी जा रही विभिन्न सुविधाओं को बन्द कर दिया गया।

प्रश्न 26.
सोवियत संघ की भारत को कोई दो राजनीतिक देनों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • सोवियत संघ ने कश्मीर के मुद्दे पर सदैव भारत का साथ दिया है।
  • सोवियत संघ ने 1971 के युद्ध में भारत की मदद की, जिसके कारण बंगला देश नामक एक नया देश अस्तित्व में आया।

प्रश्न 27.
सोवियत संघ द्वारा भारत को दी जाने वाली सैनिक सहायता का वर्णन करें।
उत्तर:
सोवियत संघ ने सदैव ही भारत को सैनिक सहायता प्रदान की है। सोवियत संघ ने समय-समय पर भारत को लड़ाकू जहाज़, युद्धपोत, टैंक तथा अन्य प्रकार की आधुनिक तकनीक प्रदान की है। सोवियत संघ ने कई प्रकार के हथियार एवं मिसाइल संयुक्त रूप से भी तैयार किये हैं। दोनों देशों ने समय-समय पर संयुक्त सैनिक अभ्यास किए। सोवियत संघ ने भारत की सेना को आधुनिक बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

प्रश्न 28.
सोवियत संघ एवं भारत के कोई दो सांस्कृतिक सम्बन्ध बताएं।
उत्तर:

  • सोवियत संघ तथा भारत के लेखकों एवं साहित्यकारों ने समय-समय पर एक-दूसरे की यात्रा की, जिससे दोनों देशों के सांस्कृतिक सम्बन्धों में मजबूती आई है।
  • भारतीय संस्कृति विशेषकर हिन्दी फिल्में सोवियत संघ में काफी लोकप्रिय हैं।

प्रश्न 29.
सोवियत प्रणाली की कोई दो मुख्य विशेषताएँ लिखिये।
उत्तर:

  • सोवियत राजनीतिक प्रणाली की धुरी कम्युनिस्ट पार्टी थी।
  • सोवियत राजनीतिक प्रणाली में किसी अन्य दल या विरोधी दल को जगह नहीं दी गई थी।

प्रश्न 30.
शॉक थेरेपी के कोई दो परिणाम लिखिये।
उत्तर:

  • शॉक थेरेपी के कारण सम्बन्धित देशों की अर्थव्यवस्था नष्ट हो गई।
  • शॉक थेरेपी के परिणामस्वरूप रूस में लगभग 90 प्रतिशत उद्योगों को निजी हाथों एवं कम्पनियों को बेच दिया गया।

प्रश्न 31.
तृतीय विश्व के देशों से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
तृतीय विश्व से अभिप्राय उन देशों से है, जो लम्बी पराधीनता के पश्चात् स्वतन्त्र हुए, इन देशों में अधिकांशतः एशिया, अफ्रीका तथा दक्षिण अमेरिका के देशों को शामिल किया जाता है। तृतीय विश्व के देशों में भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान, ब्राजील, मैक्सिको, क्यूबा, घाना तथा नाइजीरिया इत्यादि देशों को शामिल किया जाता है।

प्रश्न 32.
शॉक थेरेपी किन दो मुख्य सिद्धान्तों पर आधारित थी ?
अथवा
शॉक थेरेपी के कोई दो मुख्य सिद्धान्त लिखिए।
उत्तर:

  • मुक्त व्यापार
  • निजी सम्पत्ति एवं निजी स्वामित्व।

प्रश्न 33.
‘शॉक थेरेपी’ मॉडल किसके द्वारा निर्देशित था ?
उत्तर:
‘शॉक थेरेपी’ मॉडल विश्व स्तर की अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक संस्थाएं जैसे कि विश्व बैंक, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष इत्यादि द्वारा निर्देशित था।

प्रश्न 34.
बर्लिन की दीवार कब बनी और कब विध्वंस हुई ?
उत्तर:
बर्लिन की दीवार सन् 1961 में बनी और 1989 में विध्वंस हुई थी।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न 

1. द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का मुख्य कारण था
(A) शीत युद्ध की समाप्ति
(B) सोवियत संघ का पतन
(C) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।।

2. सोवियत संघ में किस दल की प्रधानता थी ?
(A) अनुदार दल की
(B) लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी
(C) साम्यवादी दल
(D) डेमोक्रेटिक पार्टी।
उत्तर:
(C) साम्यवादी दल।

3. मिखाइल गोर्बाचोव ने सोवियत संघ में लागू की
(A) पैट्राइस्का
(B) ग्लासनोस्त
(C) उपरोक्त दोनों
(D) कोई नहीं।
उत्तर:
(C) उपरोक्त दोनों।

4. भारत एवं रूस के सम्बन्ध किस प्रकार के रहे हैं
(A) अच्छे रहे हैं
(B) खराब रहे हैं
(C) गतिहीन रहे हैं
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) अच्छे रहे हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

5. रूस के वर्तमान राष्ट्रपति हैं
(A) बोरिस येल्तसिन
(B) ब्लादिमीर पुतिन
(C) प्रिमाकोव
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) ब्लादिमीर पुतिन

6. बर्लिन की दीवार कब बनाई गई थी ?
(A) 1950
(B) 1955
(C) 1961
(D) 1965.
उत्तर:
(C) 1961.

7. ‘बर्लिन की दीवार’ को कब गिराया गया?
(A) 1979 में
(B) 1961 में
(C) 1986 में
(D) 1989 में।
उत्तर:
(D) 1989 में।

8. निम्न में से कौन-सा समय लेनिन के जीवन काल से सम्बन्धित है ?
(A) 1920 से 1974 तक
(B) 1935 से 1995 तक
(C) 1930 से 1970 तक
(D) 1870 से 1924 तक।
उत्तर:
(D) 1870 से 1924 तक।

9. पूर्व सोवियत संघ का विघटन कब हुआ ?
(A) सन् 1990 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1992 में
(D) सन् 1993 में।
उत्तर:
(B) सन् 1991 में।

10. जर्मनी का एकीकरण कब हुआ ?
(A) सन् 1930 में
(B) सन् 1990 में
(C) सन् 1993 में
(D) सन् 1995 में।
उत्तर:
(B) सन् 1990 में।

11. यूरोपियन संघ ने यूरोपियन संविधान कब पारित किया ?
(A) 1994
(B) 1997
(C) 1995
(D) 2005.
उत्तर:
(A) 1994.

12. मिखाइल गोर्बाचोव ने कब अपने पद से त्याग-पत्र दिया ?
(A) 25 दिसम्बर, 1991
(B) 1 जनवरी, 1990
(C) 12 मार्च, 1990
(D) 16 जून, 1991.
उत्तर:
(A) 25 दिसम्बर, 1991.

13. वर्साय सन्धि औपचारिक रूप से कब समाप्त हुई ?
(A) जुलाई, 1991 में
(B) जुलाई, 1992 में
(C) जून, 1993 में
(D) जून, 1990 में।
उत्तर:
(A) जुलाई, 1991 में।

14. शीत युद्ध का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रतीक है
(A) बर्लिन दीवार
(B) अफगान संकट
(C) वियतनाम युद्ध
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) बर्लिन दीवार।

15. रूस में साम्यवादी क्रान्ति कब हुई ?
(A) 1907 में
(B) 1947 में
(C) 1917 में
(D) 1957 में।
उत्तर:
(C) 1917 में।

16. मिखाइल गोर्बाचोव किस वर्ष सोवियत संघ की साम्यवादी पार्टी के महासचिव चुने गए थे ?
(A) मार्च, 1985
(B) मार्च, 1980
(C) मार्च, 1979
(D) मार्च, 1977
उत्तर:
(A) मार्च, 1985.

17. भारत व सोवियत संघ में मित्रता संधि किस वर्ष में हुई ?
(A) सन् 1966 में
(B) सन् 1970 में
(C) सन् 1971 में
(D) सन् 1972 में।
उत्तर:
(C) सन् 1971 में।

18. सोवियत संघ से अलग होने वाली घोषणा करने वाला पहला सोवियत गणराज्य कौन-सा था ?
(A) उक्रेन
(B) कजाखिस्तान
(C) तुर्कमेनिस्तान
(D) लिथुआनिया।
उत्तर:
(D) लिथुआनिया।

19. बोरिस येल्तसिन कब रूस के राष्ट्रपति बने थे ?
(A) 1991 में
(B) 1992 में
(C) 1993 में
(D) 1994 में।
उत्तर:
(A) 1991 में।

20. रूसी संसद् ने कब सोवियत संघ से अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की ?
(A) जून, 1990
(B) जून, 1994
(C) जून, 1995
(D) जून 1993.
उत्तर:
(A) जून, 1990.

21. प्रथम विश्व किन देशों को कहा जाता है ?
(A) पूँजीवादी देशों को
(B) साम्यवादी देशों को
(C) विकासशील देशों
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) पूँजीवादी देशों को।

22. निम्न में से कौन दूसरे-विश्व के देश कहे जाते हैं ?
(A) गुलाम देश
(B) नव स्वतन्त्र देश
(C) दूसरे विश्व युद्ध के बाद के गरीब देश
(D) पूर्व सोवियत संघ और सोवियत गुट के देश।
उत्तर:
(D) पूर्व सोवियत संघ और सोवियत गुट के देश।

23. तीसरे विश्व के देशों में किसे शामिल किया जाता है ?
(A) पूँजीवादी देशों को
(B) साम्यवादी देशों को
(C) विकासशील देशों को
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(C) विकासशील देशों को।

24. प्रथम विश्व में किस देश को शामिल किया जाता है
(A) अमेरिका
(B) ब्रिटेन
(C) फ्रांस
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।।

25. द्वितीय विश्व में कौन-से देश शामिल थे ?
(A) सोवियत संघ
(B) पोलेण्ड
(C) हंगरी
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

26. तीसरे विश्व में शामिल देश है
(A) भारत
(B) ब्राजील
(C) घाना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

27. प्रथम विश्व का नेतृत्व किसके हाथों में था ?
(A) अमेरिका
(B) सोवियत संघ
(C) भारत
(D) इंग्लैंड।
उत्तर:
(A) अमेरिका।

28. द्वितीय विश्व का नेतृत्व किसके हाथ में था ?
(A) अमेरिका
(B) सोवियत संघ
(C) भारत
(D) फ्रांस।
उत्तर:
(B) सोवियत संघ।

29. द्वितीय विश्व के बिखराव का कारण है
(A) स्टालिन की आक्रामक नीतियां
(B) चीन की आकाक्षाएं
(C) गुट निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

30. बल्कान (Balkan) का शाब्दिक अर्थ है
(A) सम्बन्ध
(B) टूटन
(C) सन्धि
(D) युद्ध।
उत्तर:
(B) टूटन।

31. कोमीकॉन (COMECON) का सम्बन्ध निम्न में से किस देश से है ?
(A) ब्रिटेन से
(B) संयुक्त राज्य अमेरिका से
(C) भूतपूर्व सोवियत संघ से
(D) जापान से।
उत्तर:
(C) भूतपूर्व सोवियत संघ से।

32. सोवियत राजनीतिक प्रणाली मुख्यतः आधारित थी।
(A) पूंजीवादी व्यवस्था पर
(B) समाजवादी व्यवस्था पर
(C) उदारवादी व्यवस्था पर
(D) लोकतांत्रिक व्यवस्था पर।
उत्तर:
(B) समाजवादी व्यवस्था पर ।

रिक्त स्थान भरें

(1) …………..ने 1985 में सोवियत संघ में सुधारों की शुरूआत की।
उत्तर:
गोर्बाचोव,

(2) …………… पार्टी का पूर्व सोवियत संघ की राजनीतिक व्यवस्था पर दबदबा था।
उत्तर:
साम्यवादी,

(3) सोवियत संघ ने सन् …………… में अफ़गानिस्तान में हस्तक्षेप किया।
उत्तर:
1979,

(4) गोर्बाचोव ने पैट्राइस्का एवं …………… की व्यवस्था लागू की।
उत्तर:
ग्लासनोस्ट।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
सोवियत संघ का विघटन कब हुआ ?
अथवा
सोवियत संघ का विघटन किस वर्ष में हुआ ?
उत्तर:
सन् 1991 में।

प्रश्न 2.
किस दल का पूर्व सोवियत संघ की राजनीतिक व्यवस्था पर नियत्रंण था ?
अथवा
द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था के दौर में सोवियत संघ में किस दल का प्रभुत्व था ?
उत्तर:
साम्यवादी दल।

प्रश्न 3. भारत-सोवियत संघ के बीच ‘मित्रता सन्धि’ किस वर्ष में हुई थी ?
अथवा
भारत-सोवियत संघ मित्रता सन्धि किस वर्ष में हुई ?
उत्तर:
सन् 1971 में।

प्रश्न 4.
‘दूसरी दुनिया के देश किन्हें कहा गया ?
उत्तर:
भूतपूर्व सोवियत संघ एवं उसके सहयोगी देशों को दूसरी दुनिया के देश कहा गया।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 2 दो ध्रुवीयता का अंत

प्रश्न 5.
सत्तावादी समाजवादी व्यवस्था से लोकतन्त्रीय पूंजीवादी व्यवस्था का संक्रमण विश्व बैंक तथा अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से प्रभावित हुआ। इस संक्रमण को क्या कहा जाता है ?
उत्तर:
इस संक्रमण को शॉक थेरेपी कहा जाता है।

प्रश्न 6.
रूस में साम्यवादी क्रांति किस वर्ष में हुई ?
उत्तर:
सन् 1917 में।

प्रश्न 7.
किसी एक बालकन देश का नाम बताइए।
उत्तर:
बुल्गारिया।

प्रश्न 8.
सोवियत संघ के विघटन के समय उसका राष्ट्रपति कौन था ?
उत्तर:
मिखाइल गोर्बाचेव।

प्रश्न 9.
बोरिस येल्तसिन कौन था ?
उत्तर:
बोरिस येल्तसिन रूस का प्रथम राष्ट्रपति था।

प्रश्न 10.
बर्लिन की दीवार कब गिरी ?
उत्तर:
सन् 1989 में।

प्रश्न 11.
द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का कोई एक कारण बताइए।
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय विश्व के पतन का एक महत्त्वपूर्ण कारण सोवियत संघ का पतन था।

प्रश्न 12.
बर्लिन की दीवार का गिरना किस बात का प्रतीक था ?
उत्तर:
शीत युद्ध की समाप्ति का।

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HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर Important Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
शीतयुद्ध से आप क्या समझते हैं ? इसके प्रमुख लक्षणों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
शीतयुद्ध क्या है ?
द्वितीय विश्व-युद्ध वह घटना थी जिसने विरोधी विचारधारा में विश्वास रखने वाले राज्यों रूस तथा अमेरिका को एक-दूसरे के साथ सहयोग करने पर बाध्य कर दिया था। रूस ने अपने विरोधी राज्य अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी राज्यों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर धुरी राष्ट्रों के विरुद्ध लडाई लडी।

रूस और पश्चिमी राज्यों के इस युद्धकालीन सहयोग को देखते हुए यह आशा की जाने लगी थी कि युद्ध के बाद विश्व में अवश्य ही स्थायी शान्ति की स्थापना की जाएगी। युद्ध काल के यह मित्र शान्तिकाल की समस्याओं का समाधान भी मिलजुल कर निकालेंगे तथा विश्व में शान्ति और सुरक्षा की स्थापना में भी सहयोग करेंगे। परन्तु युद्धकालीन सहयोग तथा मित्रता शान्तिकालीन बोझ सहन न कर सकी और मित्रता का यह रेत का महल एकदम ढह गया।

द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद इन दोनों राज्यों के सम्बन्धों में आश्चर्यजनक मोड़ आया। इनके सम्बन्ध तनावपूर्ण होते चले गए। युद्ध काल के साथी युद्ध के बाद एक-दूसरे के लिए अजनबी बन गए। इतना ही नहीं वे एक-दूसरे के प्राणों के प्यासे हो गए। आज तक दोनों के सम्बन्ध उसी प्रकार शत्रुता, कटुता तथा वैमनस्य से परिपूर्ण चले आ रहे हैं। इन्हीं सम्बन्धों की व्याख्या के लिए शीत युद्ध शब्द का प्रयोग किया जाता है।

शीतयुद्ध को विभिन्न विद्वानों के द्वारा परिभाषित किया गया है। के० पी० एस० मैनन के शब्दों में, “शीत युद्ध जैसा कि विश्व ने अनुभव किया दो विचारधाराओं, दो पद्धतियों, दो गुटों, दो राज्यों और जब वह पराकाष्ठा पर था दो व्यक्तियों के मध्य दृढ़ संघर्ष था।

विचारधारा भी पूंजीवादी तथा साम्यवादी, पद्धतियां भी संसदीय जनतन्त्र तथा सर्वहारा वर्ग की तानाशाही, गुट के नाटो तथा वार्सा पैकट, राज्य के संयुक्त राज्य अमेरिका तथा सोवियत संघ तथा व्यक्ति के जोसफ स्टालिन तथा जॉन फास्टर डलेस।” इसी प्रकार एक अन्य लेखक के शब्दों में, “शीत युद्ध ने वास्तव में 1945 के बाद के समय में एक ऐसे युग का सूत्रपात किया जो न शान्ति का था न युद्ध का, इसने पूर्व पश्चिम के विभाजन अविश्वास, शंका तथा शत्रुता को अपरत्व प्रदान कर दिया था।”

पण्डित जवाहर लाल नेहरू ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि यह दिमागों में युद्ध के विचारों को प्रश्रय देने वाला युद्ध है। नोर्थेज ग्रीब्ज के शब्दों में, “हमने देखा है कि किस प्रकार 1945 में प्रमुख धुरी राष्ट्रों जर्मनी तथा जापान की पराजय के बाद 15 वर्षों तक अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों पर दो महाशक्तियों अमेरिका तथा रूस की निरन्तर विरोधता का प्रभुत्व रहा। इसमें उनके साथी परन्तु अधीनस्थ राज्य भी लिप्त थे। इस स्थिति को वाल्टर लिपमैन के द्वारा शीतयुद्ध कहकर पुकारा गया जिसकी विशेषता दो गुटों में उग्र शत्रुता थी।”

इसी प्रकार फ्लोरैंस एलेट तथा मिखाईल समरस्किल ने अपनी पुस्तक ‘A Dictionary of Politics’ में शीतयुद्ध को राज्यों में तनाव की वह स्थिति जिसमें प्रत्येक पक्ष स्वयं को शक्तिशाली बनाने तथा दूसरे को निर्बल बनाने की वास्तविक युद्ध के अतिरिक्त नीतियां अपनाता है, बताया है।

डॉ० एम० एस० राजन (Dr. M.S. Rajan) के अनुसार, “शीतयुद्ध शक्ति-संघर्ष की राजनीति का मिला-जुला परिणाम दो विरोधी विचारधाराओं के संघर्ष का परिणाम है, दो प्रकार की परस्पर विरोधी पद्धतियों का परिणाम है, विरोधी चिन्तन पद्धतियों और संघर्षपूर्ण राष्ट्रीय हितों की अभिव्यक्ति है जिनका अनुपात समय और परिस्थितियों के अनुसार एक-दूसरे के पूरक के रूप में बदलता रहा है।”

पं० जवाहर लाल नेहरू (Pt. Jawahar Lal Nehru) के अनुसार, “शीतयुद्ध पुरातन शक्ति-सन्तुलन की अवधारणा का नया रूप है, यह दो विचारधाराओं का संघर्ष न होकर, दो भीमाकार शक्तियों का आपसी संघर्ष है।”

जॉन फॉस्टर डलेस (John Foster Dales) के अनुसार, “शीतयुद्ध नैतिक दृष्टि से धर्म युद्ध था, अच्छाई का बुराई के विरुद्ध, सही का ग़लत के विरुद्ध एवं धर्म का नास्तिकों के विरुद्ध संघर्ष था।”

लुईस हाले (Louis Halle) के अनुसार, “शीतयुद्ध परमाणु युग में एक ऐसी तनावपूर्ण स्थिति है, जो शस्त्र-युद्ध से एकदम भिन्न किन्तु इससे अधिक भयानक युद्ध है। यह एक ऐसा युद्ध है, जिसने अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को हल करने की अपेक्षा उन्हें और उलझा दिया। विश्व के सभी देश और सभी समस्याएं चाहे वह वियतनाम हो, चाहे कश्मीर या कोरिया हो अथवा अरब-इज़रायल संघर्ष हो-सभी शीतयुद्ध में मोहरों की तरह प्रयोग किए गए।”

इस प्रकार शीतयुद्ध से अभिप्राय दो राज्यों अमेरिका तथा रूस अथवा दो गुटों के बीच व्याप्त उन कटु सम्बन्धों के इतिहास से है जो तनाव, भय, ईर्ष्या पर आधारित है। इसके अन्तर्गत दोनों गुट एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए प्रादेशिक संगठनों के निर्माण, सैनिक गठबन्धन, जासूसी, आर्थिक सहायता, प्रचार सैनिक हस्तक्षेप अधिकाधिक शस्त्रीकरण जैसी बातों का सहारा लेते हैं। –
शीत युद्ध की विशेषताएँ

(1) शीत युद्ध एक ऐसी स्थिति भी है जिसे मूलत: ‘गर्म शान्ति’ कहा जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में न तो पूर्ण रूप से शान्ति रहती है और न ही वास्तविक युद्ध’ होता है, बल्कि शान्ति एवं युद्ध के मध्य की अस्थिर स्थिति बनी रहती है।

(2) शीत युद्ध, युद्ध का त्याग नहीं, अपितु केवल दो महाशक्तियों के प्रत्यक्ष टकराव की अनुपस्थिति माना जाएगा।

(3) यद्यपि इसमें प्रत्यक्ष युद्ध नहीं होता है, किन्तु यह स्थिति युद्ध की प्रथम सीढ़ी है जिसमें युद्ध के वातावरण का निर्माण होता रहता है।

(4) शीत युद्ध एक वाक्युद्ध था जिसके अन्तर्गत दो पक्ष एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते थे जिसके कारण छोटे-बड़े सभी राष्ट्र आशंकित रहते हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 2.
पश्चिमी गुट के अनुसार रूस किस प्रकार शीतयुद्ध के लिए ज़िम्मेदार था ?
अथवा
शीतयुद्ध उत्पन्न होने के मूलभूत कारणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
8 मई, 1945 को यूरोप में युद्ध का अन्त हुआ। 25 अप्रैल, 1945 को रूस तथा अमेरिका की सेनाओं का यूरोप के मध्य आमना-सामना हो गया। दोनों सेनाएं ऐलबे (Elbe) नदी के किनारों पर खड़ी हो गई थीं तथा यही समकालिक इतिहास की वह प्रमुख अवस्था थी जो कभी नहीं बदली, इस प्रमुख अवस्था का कारण कोई अणु बम्ब या साम्यवाद नहीं था।

इसका कारण था जर्मनी तथा अन्य यूरोपियन राज्यों का रूस तथा अमेरिका में बंटवारा। इस विभाजन के कारण ही शीत युद्ध का प्रारम्भ हुआ। यह तो मात्र एक ऐतिहासिक तथ्य है। इस स्थिति तक पहुंचने के पीछे वास्तव में कई मुख्य कारण थे। शीतयुद्ध के लिए पूर्व तथा पश्चिम दोनों एक-दूसरे को उत्तरदायी ठहराते हैं। दोनों ही को एक दूसरे के विरुद्ध कुछ शिकायतें हैं जिनको एक-दूसरे के अनुसार शीतयुद्ध के कारण कहा जाता है।

पश्चिमी गुट के अनुसार रूस का उत्तरदायित्व (Responsibility of Russia according to Western Block)-पश्चिमी राष्ट्र शीत युद्ध के लिए निम्न कारणों से रूस को उत्तरदायी समझते हैं–

1. विचारधारा सम्बन्धित कारण (Ideological Reason):
पश्चिमी विचारधारा के अनुसार साम्यवाद के सिद्धान्त तथा व्यवहार में इसके जन्म से ही शीत युद्ध के कीटाणु भरे हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर रूस द्वितीय विजेता के रूप में प्रकट हुआ था तथा यह द्वितीय महान् शक्ति था। अमेरिका तथा रूस वास्तव में दो ऐसी पद्धतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें कभी तालमेल नहीं हो सकता तथा जो पूर्णतया एक-दूसरे की विरोधी पद्धतियां हैं।

अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देश पूंजीवादी लोकतन्त्र में विश्वास करते हैं तथा रूस साम्यवाद में, यह कहा जा सकता है कि शीतयुद्ध तो उसी समय आरम्भ हो गया था जब 1918 में रूस में क्रान्ति हुई थी तथा उसके परिणामस्वरूप वहां साम्यवादी पद्धति की स्थापना हुई थी, पश्चिमी राष्ट्रों ने तभी से रूस को सन्देह की दृष्टि से देखना आरम्भ कर दिया था। उन्होंने रूस की क्रान्ति को असफल बनाने के प्रयास भी किए। इससे रूस तथा पश्चिमी राज्यों में गहरी दरार उत्पन्न हो गई यही कारण था कि एक लम्बे समय तक रूस तथा पश्चिमी राज्य फासिज्म के विरुद्ध एक न हो सके।

यहां तक कि 1914 में जब तक जर्मनी ने रूस पर आक्रमण न कर दिया वह इस युद्ध को एक साम्राज्यवादी युद्ध मानता रहा। रूस पर जर्मनी के आक्रमण के बाद पश्चिमी राज्यों ने उससे मित्रता कर ली, पर सैद्धान्तिक मतभेद यूं का यूं मौजूद रहा। इधर रूस ने भी अपने आप को विश्व साम्यवादी क्रान्ति को समर्पित कर दिया अर्थात् साम्यवादी विचारधारा में यह सिद्धान्त था कि वह बाकी के विश्व में भी साम्यवादी क्रान्ति को फैलाए।

रूस ने पहले पहल तो प्रकट तथा प्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया कि इसका अर्थ था कि पश्चिमी राज्यों में पूंजीवादी तथा प्रजातान्त्रिक ढांचे को नष्ट करना जिसके बिना इस प्रकार की क्रान्ति सफल नहीं हो सकती थी। अतः जब तक रूस स्पष्ट रूप से विश्व साम्यवादी क्रान्ति को पाने के लक्ष्य को त्याग न दे तो पश्चिमी देशों के लिए उस पर सन्देह करना स्वाभाविक ही है क्योंकि इस प्रकार की क्रान्ति उनके लिए मृत्यु का प्रत्यक्ष सन्देश है।

2. रूस की विस्तारवादी नीति (Extentionist Policy of Russia):
शीतयुद्ध के लिए एक अन्य कारण के लिए भी पश्चिमी राज्य रूस को उत्तरदायी ठहराते हैं। उनका कहना है कि युद्ध के बाद भी रूस ने अपनी विस्तारवादी नीति को जारी रखा। जार बादशाहों के काल में भी रूस पूर्वी यूरोप पर तथा विशेषकर बल्कान प्रायद्वीप के देशों पर अपना प्रभाव जमाना चाहता था। रूस की इस साम्यवादी नीति को सिद्ध करने के लिए कुछ उदाहरण भी दिए जाते हैं।

एक तो स्टालिन याल्टा सम्मेलन में किए गए अपने वादों से मुकर गया तथा उसने पूर्वी यूरोप के देशों में निष्पक्ष चुनाव पान पर अपनी समर्थक सरकारें बना लीं। उसने ईरान से अपनी सेनाओं को न हटाया। तुर्की पर भी अनुचित दबाव डालने का प्रयास किया गया। इस प्रकार अमेरिका के मन में उसकी विस्तारवादी नीति के बारे सन्देह होता चला गया जिसको रोकने के लिए उसने भी कुछ कदम उठाए जिन्होंने शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

3. रूस द्वारा याल्टा समझौते की अवहेलना (Violation of Yalta agreement by Russia):
पश्चिमी राज्यों की रूस के विरुद्ध सबसे बड़ी शिकायत यह थी कि उसने याल्टा सम्मेलन में किए गए अपने वादों का खुलेआम उल्लंघन किया। याल्टा सम्मेलन में निर्णय किया गया था कि पोलैण्ड में एक मिश्रित सरकार बनाई जाएगी तथा यह कहा गया कि उसमें फासिस्टों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाएगा। वहां पर फासिस्ट कौन हैं इस बात का निर्णय करने का अधिकार उस शक्ति को होगा जिसका वहां पर आधिपत्य होगा। रूस ने पोलैण्ड में लुबनिन सरकार की स्थापना कर रखी थी।

उसमें कुछ परिवर्तन करके लन्दन की प्रवासी सरकार के भी कुछ प्रतिनिधि ले लिए गए। परन्तु सभी महत्त्वपूर्ण विभाग कम्युनिस्ट मन्त्रियों के हाथों में थे। इतना ही नहीं वहां पर जिसने भी रूस का इस बात पर विरोध किया रूस ने उसे फासिस्ट करार कर गिरफ्तार कर लिया। इस प्रकार पोलैण्ड में कुछ समय के बाद पूर्णतया साम्यवादी सरकार की स्थापना हो गई। पश्चिमी देशों ने इनका विरोध किया क्योंकि यह उनके अनुसार याल्टा समझौते का खुला उल्लंघन था।

पोलैण्ड के साथ-साथ याल्टा सम्मेलन में अन्य पूर्वी यूरोप के देशों के बारे में भी यही निर्णय किया गया था कि वहां पर निष्पक्ष तथा स्वतन्त्र चुनाव करवाए जाएंगे। रूस ने यह वचन दिया था कि वह उसकी सेनाओं के द्वारा स्वतन्त्र कराए गए राज्यों में चुनाव कराएगा। रूस के द्वारा चीन में भी याल्टा समझौते की अवहेलना की गई थी। मन्चूरिया में रूस की सेनाओं ने राष्ट्रवादी सेनाओं को घुसने नहीं दिया। इसके विपरीत साम्यवादी सेनाओं को न केवल घुसने ही दिया बल्कि उनको वह युद्ध सामग्री भी सौंप दी जो जापानी सेनाएं भागते समय छोड़ गई थीं इससे भी मित्र राष्ट्रों का क्षुब्ध होना अनिवार्य था।

4. जापान के विरुद्ध युद्ध में सम्मिलित होने में रूस की अनिच्छा (Unwillingness of Russia to enter into war against Japan):
चाहे रूस जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा करने को तैयार हो गया था पर वास्तव में उसने ऐसा अनिच्छापूर्वक किया था तथा वह इस युद्ध में सम्मिलित नहीं होना चाहता था। उसने इसके लिए कितनी ही शर्ते मित्र राष्ट्रों से मनवाईं, फिर भी जापान के विरुद्ध युद्ध की घोषणा तभी की जब अमेरिका ने जापान पर अणु बम्ब का प्रहार किया तथा उसकी हार निश्चित हो गई।

5. ईरान तथा टर्की में रूसी हस्तक्षेप (Russian intervention in Iran and Turkey):
द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा रूस की सेनाएं ईरान में प्रवेश कर गई थीं। ईरान के उत्तरी भाग पर रूस की सेनाओं का अधिकार था। पश्चिमी राष्ट्रों ने उसके इस कदम को सर्वथा अनुचित बताकर अपना क्षोभ प्रकट किया तथा रूस को चेतावनी भी दी। उन्होंने इन देशों की सुरक्षा सम्बन्धित कुछ कदम भी उठाए क्योंकि यह देश नहीं चाहते थे कि रूस अपनी विस्तारवादी नीति के अन्तर्गत इन देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर ले। इससे भी दोनों पक्षों में कटुता में वृद्धि हुई तथा शीत युद्ध को प्रोत्साहन मिला।

6. यूनान में रूस का हस्तक्षेप (Russian Intervention in Greece):
1944 में हुए एक समझौते के अन्तर्गत रूस ने यूनान पर इंग्लैण्ड का प्रभुत्व स्वीकार कर लिया था। इंग्लैण्ड ने यूनान पर अधिकार करने के बाद वहां के साम्यवादी दल का विरोध किया जिसके परिणामस्वरूप 1945 में होने वाले चुनावों में राज्यसत्तावादियों की विजय तथा साम्यवादियों की पराजय हुई। इस पर साम्यवादियों ने यूनान की सरकार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध प्रारम्भ कर दिया। ब्रिटेन इस हाल में नहीं था, कि इस विद्रोह का मुकाबला कर पाता इसलिए उसने यूनान से अपनी सेनाएं वापस हटाने का निश्चय किया।

पश्चिमी देशों के अनुसार इस साम्यवादी विद्रोह में स्पष्ट रूप से रूस का हाथ था। उनके अनुसार यूनान के पड़ोसी साम्यवादी राज्य यूनान के विद्रोहियों की सहायता कर रहे थे। इस प्रकार पश्चिमी देशों के लिए रूस का बढ़ता प्रभाव चिन्ता का विषय था जिसको रोकने के लिए अमेरिका ने ‘ट्रमैन सिद्धान्त’ (Trueman Doctrine) के अन्तर्गत यूनानी सरकार की आर्थिक सहायता का निश्चय किया और यही सिद्धान्त शीत युद्ध की दिशा में पश्चिम की ओर से एक महत्त्वपूर्ण कदम था, इस प्रकार यूनान में रूसी हस्तक्षेप ने भी शीत युद्ध के बढ़ाने में योगदान दिया।

7. जर्मनी पर भारी क्षति तथा अन्य समस्याएं (Heavy reparation on Germany and other roblems):
इसमें कोई सन्देह नहीं कि द्वितीय विश्व युद्ध में सबसे अधिक हानि रूस को उठानी पड़ी थी इसलिए उसने याल्टा सम्मेलन में जर्मनी से क्षतिपूर्ति के लिए 10 अरब डालर की मांग की, अमेरिका के राष्ट्रपति रूजवैल्ट ने इस मांग को भविष्य में विचार करने के लिए मान लिया पर रूस ने इसको अन्तिम मान्यता समझा तथा उसने जर्मनी के उद्योग को नष्ट करते हुए सभी मशीनों का रूस में स्थानान्तरण करना आरम्भ कर दिया।

इससे पहले से ही अस्त-व्यस्त जर्मन अर्थव्यवस्था और भी अधिक छिन्न-भिन्न हो गई। इससे अमेरिका तथा इंग्लैण्ड काफ़ी नाराज़ हुए क्योंकि उनको ‘जर्मनी की आर्थिक सहायता करनी पड़ी यही नहीं रूस ने जर्मनी से सम्बन्धित अन्तर्राष्ट्रीय समझौतों का भी उल्लंघन किया।

8. रूस द्वारा अमेरिका विरोधी प्रचार तथा अमेरिका में साम्यवादी गतिविधियां (Anti-American propaganda by Russia and Communist activities in America): युद्ध समाप्त होने से पहले ही रूसी समाचार-पत्रों प्रावदा (Pravada) तथा इजवेस्तिया (Izvestia) इत्यादि ने अमेरिका विरोधी प्रचार अभियान आरम्भ कर दिया। इनमें आलोचनात्मक लेख इत्यादि प्रकाशित होने लगे जिनसे अमेरिका के सरकारी तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों में भारी क्षोभ फैला।

9. संयुक्त राष्ट्र में रूस का व्यवहार (Russian behaviour in the U.N.):
संयुक्त राष्ट्र अभी अपना कार्य ठीक ढंग से चला भी न पाया था कि रूस ने अपने निषेधाधिकार (Veto Power) का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया।1961 तक अमेरिका ने इस अधिकार का प्रयोग एक बार भी नहीं किया जबकि रूस ने इस काल में 65 बार इसका प्रयोग किया था। इस पर पश्चिमी राष्ट्रों ने यह धारणा बना ली कि रूस ने अपने निषेधाधिकार द्वारा संयुक्त राष्ट्र में पश्चिमी देशों के प्रत्येक प्रस्ताव को ठुकराने की नीति अपना ली है तथा वह संयुक्त राष्ट्र को असफल है। इससे भी दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा। – शीतयुद्ध के लिए पश्चिमी गुट किस प्रकार ज़िम्मेदार था ? इसके लिए प्रश्न नं0 3 देखें।

प्रश्न 3.
शीतयुद्ध को बढ़ावा देने में पश्चिमी गुट किस प्रकार ज़िम्मेदार था ?
उत्तर:
शीतयुद्ध को बढ़ावा देने में कुछ हाथ पश्चिमी गुट का भी था। जिस प्रकार पश्चिमी राज्यों ने अपनी शिकायतों के द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि शीतयुद्ध के कारणों के लिए रूस उत्तरदायी था उसी प्रकार रूस को पश्चिमी देशों से काफ़ी शिकायतें थीं। इसलिए रूस के अनुसार युद्ध के बाद के तनाव तथा कटुता के लिए उत्तरदायित्व पश्चिमी देशों का था। रूस की पश्चिमी देशों के विरुद्ध अग्रलिखित शिकायतें थीं

1. अमेरिका की विस्तारवादी नीति (Extentionist Policy of America):
साम्यवादी लेखकों के अनुसार शीत युद्ध का प्रमुख कारण अमेरिका की संसार पर प्रभुत्व जमाने की साम्राज्यवादी आकांक्षा में निहित है। वे कहते हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध ने जर्मनी तथा इटली को धूल में मिलते हुए देखा है। चीन गृह युद्ध में उलझा हुआ था। इंग्लैण्ड प्रथम श्रेणी की शक्ति से तृतीय श्रेणी की शक्ति बन चुका था। फ्रांस की विजय मात्र औपचारिक थी। इस प्रकार जो एक मात्र पूंजीवादी देश बिना खरोंच खाए विश्व शक्ति के रूप में उभरा था वह अमेरिका था।

युद्ध के अन्त में वह एकमात्र अणु शक्ति था। उसके नियन्त्रण में दुनिया की 60% दौलत थी। उसके पास शक्तिशाली जलसेना तथा शायद सबसे शक्तिशाली वायुसेना थी क्योंकि अमेरिका का आन्तरिक ढांचा पूंजीवादी था। अतः सरकारी मशीनरी बड़े-बड़े करोड़पतियों के हाथ में थी जिनका एकमात्र उद्देश्य अधिक-से-अधिक लाभ कमाना था। अमेरिका के विश्व प्रभुत्व के स्वप्न के रास्ते में एकमात्र रुकावट रूस द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला विरोध था तथा इसी कारण अमेरिका रूस से घृणा करता था।

2. युद्ध के समय रूस के सन्देह (Doubts of Russia during the War):
1945 में जर्मनी को पता चल गया था कि वह अधिक देर तक नहीं लड़ सकेगा। जर्मनी का यह विचार था कि यदि वह पश्चिमी राष्ट्रों से कोई समझौता कर लेता है तथा उनके सामने समर्पण करता है तो पश्चिमी देश उसके साथ इतना बुरा व्यवहार नहीं करेंगे। वे जो भी व्यवहार करेंगे वह अन्तर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार होगा।

परन्तु यदि वे रूस के सामने समर्पण करते हैं तो रूस निश्चय ही उनके साथ बुरा व्यवहार करेगा क्योंकि उन्होंने रूस पर बहुत अधिक अत्याचार किए थे तथा उनको डर था कि यदि वे रूस के सामने समर्पण करते हैं तो वह अवश्य ही उनसे बदला लेगा। अत: वे रूस के सामने समर्पण नहीं करना चाहते थे।

जर्मनी के साथ समर्पण की बातचीत चल रही थी। जर्मनी पूर्व में बहत ज़ोर से लड रहा था पर पश्चिम में उसने हथियार डालने आरम्भ कर दिए थे। रूस ने इस बात पर सन्देह किया कि कहीं पश्चिमी राष्ट्र नाजियों के साथ कोई समझौता न कर ले। रूज़वैल्ट की मृत्यु पर ट्रमैन अमेरिका का राष्ट्रपति बना जो और भी ज़्यादा रूस विरोधी था। इसलिए रूस को और भी अधिक सन्देह हुआ कि कहीं अमेरिका जर्मनी से कोई गुप्त सन्धि न कर ले।

रूस ने अमेरिका पर यह आरोप भी लगाया कि उसने इटली तथा फ्रांस के फासिस्ट तत्त्वों से सम्पर्क स्थापित किया था। उधर ब्रिटेन भी यूनान में साम्यवाद विरोधी लोगों का समर्थन कर रहा था। रूस को यह भी शिकायत थी कि फिनलैण्ड के साथ उसका युद्ध छिड़ने तथा उसके द्वारा लैनिनग्राड पर आक्रमण किए जाने पर भी अमेरिका ने काफी समय तक उससे अपने राजनैतिक सम्बन्ध विच्छेद नहीं किए थे। इस प्रकार युद्ध के काल में पश्चिमी राष्ट्रों की कुछ ऐसी गतिविधियां रहीं जो रूस के सन्देह का स्पष्ट कारण थीं।

3. पश्चिम द्वारा रूस के सुरक्षा हितों की अवहेलना (Western Block ignored Russian interest about its defence):
ज्यों ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो रूस तथा पश्चिमी राष्ट्रों के बीच अपने-अपने प्रभाव क्षेत्रों को स्थापित करने की एक होड़ लग गई थी। रूस ने पश्चिमी राष्ट्रों से ये कभी नहीं पूछा कि वे अपने अधिकृत प्रदेशों में किस प्रकार की शासन प्रणाली की स्थापना करने जा रहे हैं। परन्तु पश्चिमी राष्ट्रों ने इस बात पर बल दिया कि रूस अपने अधिकृत देशों में स्वतन्त्र निर्वाचनों के आधार पर प्रजातन्त्र की स्थापना करे।

परन्तु रूस ऐसा नहीं करना चाहता था। पश्चिमी राष्ट्र इन देशों में युद्ध से पहले वाली व्यवस्था स्थापित करना चाहते थे पर ये पुरानी सरकारें रूस विरोधी थीं। अत: रूस अपने सुरक्षा हितों को देखते हुए इन देशों में किस प्रकार अपनी विरोधी सरकारों की स्थापना करवा सकता था जब कि पश्चिमी देश ऐसा करने पर बल दे रहे थे। अपने अधिकृत क्षेत्रों में सरकारें बनाते समय उन्होंने रूस की बात भी न पूछी थी। इस प्रकार रूस का नाराज़ होना स्वाभाविक था।

4. पश्चिमी देशों द्वारा युद्ध के समय द्वितीय मोर्चा खोलने में देरी (Delay in opening second front by Western Countries during the War):
जब फ्रांस की हार हो गई तथा जर्मनी ने रूस पर आक्रमण कर दिया तो इंग्लैण्ड तथा अमेरिका ने अपने ही हितों को ध्यान में रखते हुए रूस की सहायता करने की सोची, रूस ने इन दोनों देशों को फ्रांस की ओर से बार-बार दूसरा मोर्चा खोलने को कहा ताकि युद्ध का जो सारा दबाव इस समय रूस पर पड़ा था जर्मनी के दो स्थानों पर लड़ने के कारण कम हो जाए, परन्तु इन दोनों देशों ने यह बहाना बनाकर कि अभी हम तैयारी नहीं हुई है दूसरा मोर्चा खोलने में पर्याप्त विलम्ब किया जिसका परिणाम यह निकला कि युद्ध का सारा बोझ अकेले रूस पर पड़ा जिसके परिणामस्वरूप रूस को धन-जन की भारी हानि उठानी पड़ी।

रूस को मालूम हो गया कि यदि वह स्वयं को सुरक्षित रखना चाहता है तो उसे अपने तथा जर्मनी के बीच के राज्यों पर अपना अधिकार कर लेना चाहिए। उसका यह इरादा भांप कर चर्चिल ने जब दूसरा मोर्चा खोलने की बात की तो कहा कि हमारी सेनाएं फ्रांस की ओर से नहीं बलकान प्रायद्वीप से होकर उत्तर की ओर बढ़े। इस बात ने रूस के सन्देह की और भी पुष्टि कर दी।

5. युद्ध के समय पश्चिम द्वारा रूस की अपर्याप्त सहायता (Insufficient aid by West during War):
रूस को पश्चिमी देशों से यह भी शिकायत थी कि उन्होंने युद्ध काल में रूस की अत्यन्त अल्प मात्रा में सहायता की। 1941-42 के आरम्भिक काल में जो सहायता पश्चिमी राज्यों ने रूस को दी वह रूस द्वारा उत्पन्न कुल युद्ध सामग्री का केवल 4% थी। वास्तव में पश्चिमी राष्ट्र यह चाहते थे कि रूस जर्मनी के साथ लड़कर कमजोर हो जाए।

इसलिए उन्होंने उसकी बहुत कम सहायता की वह भी तब जब उन्हें यह विश्वास हो गया कि जर्मनी द्वारा रूस को पूर्णतया नष्ट कर दिया जाना स्वयं उनके अपने हित में नहीं था। 1943 में अवश्य उन्होंने इसलिए सहायता में वृद्धि की थी। पर तब तक रूस को यह विश्वास हो चुका था कि पश्चिमी राष्ट्र वास्तव में उसकी सहायता न करके उसे निर्बल बना देना चाहते हैं।

6. लैण्डलीज कानून को समाप्त करना (End of Land Lease):
युद्ध काल में रूस को अमेरिका से लैण्डलीज कानून के अन्तर्गत सहायता मिल रही थी। रूस पहले इसी सहायता से असन्तुष्ट था क्योंकि यह सहायता अपर्याप्त थी। फिर भी रूस समझता था कि युद्ध के बाद अपने पुनर्निर्माण के लिए भी उसको अमेरिका से सहायता मिलती रहेगी। पर ब I (Trueman) राष्ट्रपति बना जो रूस विरोधी था। उसने लैण्डलीज कानून को बन्द कर दिया तथा वह थोड़ी-सी सहायता भी बन्द कर दी। उधर पश्चिमी देश रूस के क्षतिपूर्ति के दावों का भी विरोध कर रहे थे। इससे रूस को विश्वास हो गया कि पश्चिमी देश उसकी समृद्धि तथा प्रगति को नहीं देखना चाहते।

7. एटम बम्ब का रहस्य गुप्त रखना (Secret of Atom Bomb):
अमेरिका ने युद्ध की समाप्ति पर एटम बम्ब का आविष्कार कर लिया था। अमेरिका तथा रूस युद्ध में जर्मनी के विरुद्ध मित्र राष्ट्र थे। रूस ने पश्चिमी राष्ट्रों को पूर्ण सहयोग प्रदान किया था पर अमेरिका ने एटम बम्ब के रहस्य को रूस से सर्वथा गुप्त रखा जबकि इंग्लैण्ड तथा कनाडा को इसका पता था।

इस बात से स्टालिन बड़ा क्षुब्ध हुआ तथा उसने इसको एक भारी विश्वासघात माना इसका परिणाम यह निकला कि न केवल दोनों की मित्रता टूट गई बल्कि रूस ने अपनी सुरक्षा के बारे में चिन्तित होकर अस्त्र-शस्त्र बनाने में लग गया और उसने भी केवल “वर्षों में ही अणु बम्ब का आविष्कार कर लिया। इसके बाद तो दोनों में शस्त्रास्त्रों की एक होड़ लग गई जिसने शीत युद्ध को प्रोत्साहित करने में बहुत योगदान दिया।”

8. पश्चिम द्वारा रूस विरोधी प्रचार अभियान (Anti-Russian Propaganda by West):
युद्ध काल में ही पश्चिमी देशों की प्रैस रूस विरोधी प्रचार करने लगी थी। बाद में तो पश्चिमी राज्यों ने खुले आम रूस की आलोचना करनी आरम्भ कर दी। जिस रूस ने जर्मनी की पराजय को सरल बनाया उसके विरुद्ध मित्र राष्ट्रों का यह प्रचार उसको क्षुब्ध करने के लिए पर्याप्त था। मार्च, 1946 में चर्चिल ने अपने फुल्टन भाषण में स्पष्ट कहा था

“हमें तानाशाही के एक स्वरूप के स्थान पर दूसरे के संस्थापन को रोकना चाहिए।” यह दूसरा स्वरूप साम्यवाद के सिवाय और क्या हो सकता है ? राष्ट्रपति ट्रमैन ने उपराष्ट्रपति तथा तत्कालीन वाणिज्य सचिव को इस बात पर त्याग-पत्र देने के लिए कहा कि उन्होंने रूस तथा अमेरिका की मैत्री की बात कही न ने सीनेट के सामने रूस की नीति को स्पष्ट रूप से आक्रामक बताया था। इस प्रकार इस प्रचार ने एक ऐसे वातावरण का निर्माण किया जिसमें दोनों एक-दूसरे के प्रति घृणा, वैमनस्य की भावना में डूब गए।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 4.
द्वि-ध्रुवीयकरण के विकास के कारणों को लिखिए। (Write the causes of the development of Bi-polarisation.)
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय विश्व के विकास के निम्नलिखित कारण थे

1. शीत युद्ध का जन्म-द्वि-ध्रुवीय विश्व के विकास का एक महत्त्वपूर्ण कारण शीत युद्ध था। शीत युद्ध के कारण ही विश्व अमेरिकन एवं सोवियत गुट के रूप में दो भागों में विभाजित हो गया था।

2. सैनिक गठबन्धन-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक कारण सैनिक गठबन्धन था। सैनिक गठबन्धन के कारण अमेरिका एवं सोवियत संघ में सदैव संघर्ष चलता रहता था।

3. पुरानी महाशक्ति का पतन-दूसरे विश्व युद्ध के बाद इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी, इटली तथा जापान जैसी पुरानी महाशक्तियों का पतन हो गया तथा विश्व में अमेरिका एवं सोवियत संघ दो ही शक्तिशाली देश रह गए थे इस कारण विश्व द्वि-ध्रुवीय हो गया।

4. अमेरिका की विश्व राजनीति में सक्रिय भूमिका-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक अन्य कारण अमेरिका का विश्व राजनीति में सक्रिय भाग लेना भी था।

5. कमज़ोर राष्ट्रों को आर्थिक मदद-अमेरिका एवं सोवियत संघ विश्व के निर्धन एवं कमजोर राष्ट्रों को अपनी तरफ करने के लिए उन्हें आर्थिक मदद देते थे, जिस कारण अधिकांश निर्धन एवं कमज़ोर राष्ट्र दोनों गुटों में से एक गुट के साथ ही लेते थे।

6. शस्त्रीकरण-द्वि-ध्रुवीय विश्व का एक अन्य कारण शस्त्रीकरण था। दोनों गुट एक-दूसरे से आगे निकलने के लिए शस्त्रों की दौड़ में लगे रहते थे।

7. विकास की इच्छा-अमेरिका एवं सोवियत संघ की अधिक-से-अधिक विकास की इच्छा ने भी दोनों देशों को एक-दूसरे के विरुद्ध कर दिया, तथा विश्व द्वि-ध्रुवीय हो गया।

8. परस्पर प्रतियोगिता-अमेरिका एवं सोवियत संघ में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ ने दोनों देशों के बीच आर्थिक एवं राजनीतिक प्रतियोगिता शुरू कर दी, इस कारण भी विश्व द्वि-ध्रुवीय विश्व की ओर मुड़ने लगा।

प्रश्न 5.
द्वि-ध्रुवीय विश्व की चुनौतियों का वर्णन करें। (Discuss the challenges of Bipolarity.)
उत्तर:
द्वि-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था शीत युद्ध के दौरान स्थापित हुई थी जब विश्व दो गुटों में बंट गया था, एक गुट .. का नेतृत्व अमेरिका कर रहा था, तो दूसरे गुट का नेतृत्व सोवियत संघ कर रहा था। शीत युद्ध के दौरान ही द्वि-ध्रुवीय . विश्व को चुनौतियां मिलनी शुरू हो गई थी, जिसमें सबसे महत्त्वपूर्ण चुनौती गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (NAM) तथा नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order-NIEO) की थीं, जिनका वर्णन इसं प्रकार है

1. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन (Non-aligned Movement-NAM):
शीत युद्ध के दौरान द्वि-ध्रुवीय विश्व को सबसे बड़ी चुनौती गट-निरपेक्ष आन्दोलन से मिली। शीत युद्ध के दौरान जब विश्व तेज़ी से दो गटों में बंटता जा रहा था, तब गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने विश्व के देशों, विशेषकर विकासशील एवं नव स्वतन्त्रता प्राप्त देशों को एक तीसरा : विकल्प प्रदान किया, जिससे ये देश किसी गुट में शामिल होने की अपेक्षा स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी विदेशी नीति का: संचालन कर सकें। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना 1961 में यूगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में की गई।

गुट निरपेक्ष आन्दोलन को शुरू करने में भारत के प्रधानमन्त्री श्री पं० जवाहर लाल नेहरू, यूगोस्लाविया के शासक जोसेफ ब्रॉन टीटो तथा मिस्त्र के शासक गमाल अब्दुल नासिर ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अब तक सम्मेलन हो चुके हैं। 1961 में इसके 25 सदस्य थे, जोकि अब बढ़कर 120 हो गए हैं। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने दोनों गुटों में पाए जाने वाले शीत युद्ध को कम करने का प्रयास किया, इसने इसे एक अव्यावहारिक तथा खतरनाक नीति माना।

इसके साथ गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की नीति सदैव नाटो, वारसा पैक्ट, सीटो तथा सैन्टो जैसे सैनिक गठबन्धनों से दूर रहने की रही है, जिनका निर्माण अमेरिकी एवं सोवियत गुटों ने किया था। वास्तव में ऐसे सैनिक गठबन्धन प्रभाव क्षेत्र उत्पन्न करते हैं, और हथियारों की दौड़ को बढ़ावा देकर विश्व शान्ति को खतरा उत्पन्न करते हैं। गुट-निरपेक्ष देश प्रत्येक विषय पर उसके गुण-दोष के अनुसार विचार करते हैं, न कि किसी महाशक्ति के आदेश के अनुसार । अतः स्पष्ट है कि गुट-निरपेक्ष आन्दोलन सदैव द्वि-ध्रुवीय विश्व के लिए चुनौती बना रहा है।

2. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था (New International Economic Order-NIEO):
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के साथ-साथ नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था ने भी सदैव द्वि-ध्रुवीय विश्व को चुनौती दी है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तथा तीसरे विश्व के देशों ने पुरानी विश्व अर्थव्यवस्था को समाप्त करके नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के जन्म तथा स्थापना को प्रोत्साहित किया। 70 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था मुख्य विषय बन गया।

नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का उद्देश्य विकासशील देशों को खाद्य सामग्री उपलब्ध करना, साधनों को विकसित देशों से विकासशील देशों में भेजना, वस्तुओं सम्बन्धी समझौते करना, बचाववाद (Protectionism) को समाप्त करना तथा पुरानी परम्परावादी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के स्थान पर निर्धन तथा वंचित देशों के साथ न्याय करना है। 70 के दशक में नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र, गट-निरपेक्ष आन्दोलन, विकसित देशों व विकासशील देशों ने विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए गए।

राष्ट्र संघ की महासभा के छठे विशेष अधिवेशन में महासभा ने नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक-व्यवस्था की स्थापना के लिए महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम बनाया, संयुक्त राष्ट्र संघ के साथ-साथ गुट-निरपेक्ष देशों ने भी नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था के निर्माण का प्रयास किया। विकासशील देशों को गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के पश्चात् नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था ने एक ऐसा संघ उपलब्ध करवाया है जहां से ये विकासशील द्वि-ध्रुवीय विश्व के ताने-बाने से बच सकें।

प्रश्न 6.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से आप क्या समझते हैं ? इसकी प्रकृति का वर्णन करें।
उत्तर:
द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद यूरोपीय उपनिवेशवादी प्रणाली के विघटन के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कई ऐसे घटक उपस्थित हुए जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की प्रकृति और रंग-रूप को बदल दिया। इन घटकों में एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका में नए राज्यों के उदय ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन उत्पन्न किया। “इन राष्ट्रों का यत्न अन्तर्राष्ट्रीय खेल को इस प्रकार परिवर्तित करना है जिससे अनेक राष्ट्रीय हितों की पर्ति हो और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित हो और उस ऐतिहासिक प्रक्रिया की समाप्ति हो जिसने उपनिवेशवाद को जन्म दिया था।”

अधिकांश नए राज्यों ने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसे आन्दोलन को चुना जिसे गुट-निरपेक्षता (Non alignment) की संज्ञा दी जाती है। Belgrade Conference (1961) से लेकर Harare Conference (1986) तक गुट-निरपेक्षता का समूचा इतिहास इन नए देशों के उपर्युक्त उद्देश्य को ही ध्वनित करता है। प्रो० के० पी० मिश्रा के शब्दों में “गुट-निरपेक्षता एक ऐसा सैद्धान्तिक योगदान है जो लोकप्रिय हो रहा है और जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में मूल परिवर्तन लाए जाने के लिए उचित वातावरण उत्पन्न कर रहा है।”

गुट-निरपेक्षता का जन्म (Origin of Non-alignment)-वास्तव में गुट-निरपेक्षता का जन्म भारत में हुआ। सुबीमल दत्त ने अपनी पुस्तक ‘With Nehru in the Foreign Office’ में यह लिखा है-“राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान हरिपुरा सत्र (1939) में गुट-निरपेक्षता की नीति को स्वीकार किया गया था।” हमा और दर्शन भी गुट-निरपेक्षता को स्वीकार करते हैं। गांधी जी के शब्दों में “भारत को सभी का मित्र होना चाहिए और किसी का भी शत्रु नहीं होना चाहिए।” स्वतन्त्रता से पूर्व भी जब जवाहर लाल नेहरू अन्तरिम सरकार में विदेशी मामलों का कार्यभारी था, उसने यह घोषणा की थी कि भारत गुटों से पृथक् रहेगा।

1946 में दोबारा उसने घोषणा की कि भारत अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति बनाएगा। उसके अपने शब्दों में-“यथासम्भव हम गुटों से दूर रहना चाहते हैं। इन गुटों के कारण ही युद्ध हुए हैं और इनके कारण पहले से भी अधिक भयंकर युद्ध हो सकते हैं।” बर्मा के प्रधानमन्त्री ने 1948 में यही बात कही थी “ब्रिटेन, अमेरिका और रूस इन तीनों बड़ी शक्तियों के साथ बर्मा के मित्रतापूर्ण सम्बन्ध होने चाहिएं।” 1950 में फिर यह घोषणा की गई कि बर्मा किसी एक गुट के विरुद्ध किसी दूसरे गुट के साथ सम्बद्ध नहीं होना चाहता।” स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद इंडोनेशिया ने भी इस भावना को प्रकट किया।

कई विद्वान् गुट-निरपेक्षता का जन्म शीत युद्ध में मानते हैं। गुट-निरपेक्ष देशों की 1973 की Algier’s Conference में इस बात की चर्चा की गई कि गुट-निरपेक्षता शीत युद्ध का परिणाम है अथवा उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष का परिणाम है। Fidel Castro ने यह तर्क दिया कि गुट-निरपेक्षता उपनिवेशवाद तथा साम्राज्यवाद विरोधी आन्दोलन है।

F. N. Haskar के शब्दों में-“जहां तक भारत का सम्बन्ध है गुट-निरपेक्षता का आरम्भ बेलग्रेड में नहीं हुआ। न ही इसका आरम्भ अप्रैल, 1955 में बाण्डंग में हुए अफ्रीकन-एशियन राष्ट्रों के सम्मेलन में हुआ। इसकी जड़ ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध किए गए स्वतन्त्रता संग्राम में है और नेहरू और गांधी द्वारा प्रदर्शित विचारों और विश्व दृष्टिकोण में है।”

हम यह कह सकते हैं कि चाहे यह संगठनात्मक रूप शीतयुद्ध के दौरान मिला किन्तु निश्चित रूप से यह शीतयुद्ध की उपज नहीं है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ (Meaning of Non-alignment)-जैसे कि ऊपर कहा गया है कि गुट-निरपेक्षता की जड़ें द्वितीय महायुद्ध के बाद के उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक संघर्षों में है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है उस शीतयुद्ध में विचार, निर्णय तथा कार्य की स्वतन्त्रता बनाए रखना जो सैनिक तथा अन्य गठजोड़ों को प्रोत्साहन देता है।

इसका उद्देश्य शान्ति और सहयोग के क्षेत्रों को विस्तृत करना है। अतः गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी भी देश को प्रत्येक मुद्दे पर गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने की स्वतन्त्रता; उसे राष्ट्रीय हित के आधार पर और विश्व शान्ति के आधार पर निर्णय लेने की स्वतन्त्रता न कि किसी निर्धारित दृष्टिकोण के आधार पर या किसी बड़ी शक्ति से गठजोड़ होने के आधार पर निर्णय लेना।

गुट-निरपेक्षता की प्रकृति (Nature of Non-alignment) अधिकांश पाश्चात्य विद्वान् इस शब्द में ‘Non’ लगे होने के कारण इसे नकारात्मक अवधारणा समझते हैं। वे इसे तटस्थता समझ लेते हैं क्योंकि यह शीतयुद्ध के प्रति प्रतिक्रिया है। वे इसे उभरते राष्ट्रवाद की एक आंशिक उपज समझते हैं। अफ्रीको-एशियन राष्ट्रवाद धुरी प्रणाली की एक क्रिया है। उसकी सही प्रकृति निम्नलिखित विचार बिन्दुओं में दर्शाई जा सकती है

1. गुट-निरपेक्षता तटस्थता नहीं है (Non-alignment is not Neutrality):
गुट-निरपेक्षता की अवधारणा तटस्थता की अवधारणा से बिल्कुल भिन्न है। तटस्थता का अर्थ किसी भी मुद्दे पर उसके गुण-दोषों के भिन्न उसमें भाग न लेना है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ है, पहले से ही किसी मुद्दे पर उसके गुण-दोषों को दृष्टि में रखे बिना अपना दृष्टिकोण तथा पत्र बनाए रखना।

इसके विपरीत गुट-निरपेक्षता का अर्थ है अपना दृष्टिकोण पहले से ही घोषित न करना। कोई भी गुट-निरपेक्ष देश किसी भी मुद्दे के पैदा होने पर उसे अपने दृष्टिकोण से देखकर निर्णय करता था, न कि किसी बड़ी शक्ति के दृष्टिकोण से देखकर। तटस्थता की धारणा केवल युद्ध के समय संगत है और तटस्थता का अर्थ है अपने आपको युद्ध से अलग करना। परन्तु गुट-निरपेक्षता की धारणा युद्ध एवं शान्ति दोनों में प्रासंगिक है।

2. राष्ट्र हित और अन्तर्राष्ट्रवाद का समन्वय (Synthesis of National Interest and Internationalism):
विश्व में शान्ति बनाए रखने के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति का अर्थ है राष्ट्र हित और अन्तर्राष्ट्रवाद का समन्वय। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के नेताओं ने इस आन्दोलन को अपनी पुरातन सभ्यता की परम्पराओं पर तथा पाश्चात्य उदारवादी परम्पराओं पर आधारित किया है।

3. विश्व शान्ति की चिन्ता (Concern for World Peace):
गुट-निरपेक्षता आन्दोलन का सम्बन्ध विश्व में शान्ति स्थापना करना है। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि आधुनिक युद्ध बहुत थोड़े समय में सारे विश्व को नष्ट कर सकता है। साथ ही गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में हिंसात्मक ढंग से हल करने के विरुद्ध हैं। उनके विचार में युद्ध समस्या को सुलझाने के स्थान पर उसे और जटिल बना देता है।

4. आर्थिक सहायता लेना (Seeking Economic Assistance):
गुट-निरपेक्षता आन्दोलन में सम्मिलित होने वाले सभी देश अविकसित हैं अथवा विकासोन्मुखी हैं। गुट-निरपेक्ष देशों ने आर्थिक क्षेत्र में आत्म-निर्भरता प्राप्त करने का यत्न किया है। उन्होंने अपने साधनों को इकट्ठा करके विकसित देशों पर अपनी निर्भरता को घटाने का यत्न किया है। गट-निरपेक्ष देशों में से भारत आत्म-विश्वास और आत्म-निर्भरता प्राप्त करने का भरसक प्रयत्न करके इन देशों के लिए उदाहरण बनने जा रहा है।

5. अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर निर्णय की स्वतन्त्रता (Independence of Judgement on International Issues):
गुट-निरपेक्षता आन्दोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें सम्मिलित होने वाले देश अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर अपना निर्णय करने में स्वतन्त्र हैं।

6. उपनिवेशवाद तथा जातिवाद का विरोध (Opposition to Colonialism and Racialism):
गुट निरपेक्ष देश उपनिवेशवाद तथा जातिवाद के विरोधी हैं। सुकार्नो तथा नेहरू विशेष तौर पर इस बात से सम्बन्धित थे कि उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष बल पकड़ जाएगा। गुट-निरपेक्ष देशों, विशेषतः भारत ने Zimbabve Rhodesia की स्वतन्त्रता के लिए विशेष समर्थन दिया था। दक्षिणी अफ्रीका में अपनाए जा रहे जातिवाद का भी गुट-निरपेक्षता आन्दोलन ने विरोध किया है।

7. शक्ति की राजनीति का विरोध (Opposition to Power Politics):
Morgenthau तथा Schwar zenberger अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को शक्ति के लिए संघर्ष मानते हैं। शक्ति का अर्थ किसी विशेष व्यक्ति का दूसरे व्यक्तियों के मस्तिष्क और कार्यों पर नियन्त्रण। गुट-निरपेक्षता कम-से-कम सिद्धान्त में शक्ति की राजनीति का एक खेल है। यह प्रभाव राजनीति (Influence Politics) में विश्वास रखती है। प्रभाव राजनीति शक्ति की राजनीति से इस दृष्टि से भिन्न है कि यह समझाने-बुझाने (Persuasion) में विश्वास रखती है जबकि शक्ति बल द्वारा दूसरों से अपनी इच्छा का काम करवाना चाहती है।

8. नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना (Establishment of New International Economic Order) :
इस तथ्य के होते हुए भी कि नये राष्ट्रों ने स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली है, आर्थिक दृष्टि से अब भी विकसित देश उन पर हावी हैं। वे ऐसी आर्थिक प्रणाली में बंधे हुए हैं जो निर्धनों और अविकसित देशों का शोषण कर रखती हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 7.
‘गुट-निरपेक्ष आन्दोलन’ से आप क्या समझते हैं ? इसके मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन करें।
अथवा
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष का अर्थ-इसके लिए प्रश्न नं० 6 देखें। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त-गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित हैं

  • सदस्य देशों संप्रभुता, राष्ट्रीय स्वाधीनता, क्षेत्रीय अखण्डता एवं सुरक्षा की रक्षा करना।
  • साम्राज्यवाद, रंगभेद एवं उपनिवेशवाद का विरोध करना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति एवं सुरक्षा को बनाए रखना।
  • राष्ट्रीय स्वतन्त्रता आन्दोलनों का समर्थन करना।
  • विकासशील एवं विकसित देशों के बीच पाई जाने वाली असमानता को दूर करना।
  • शस्त्रों की होड़ को रोककर निःशस्त्रीकरण को लागू करना।
  • एक देश के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का विरोध करना।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ को मजबूत बनाना।
  • गट-निरपेक्ष देशों को आत्म-निर्भर बनाने का प्रयास करना।

प्रश्न 8.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में होने वाली गतिविधियों में भारत की भूमिका का परीक्षण कीजिए ।
अथवा
‘तटस्थता’ व ‘गुट-निरपेक्षता’ में अन्तर स्पष्ट कीजिए। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका बताइए।
उत्तर:
तटस्थता तथा गुट-निरपेक्षता में अन्ग-तटस्थता युद्ध या युद्ध जैसी स्थिति से सम्बन्धित है, जबकि गुट-निरपेक्षता युद्ध और शान्ति दोनों से सम्बनि तटस्थता एक नकारात्मक धारणा है, जो किसी पक्ष की ओर से युद्ध में भाग लेने से रोकती है, जबकि गुट निरपेक्ष एक सकारात्मक नीति है जो विषय के महत्त्व के अनुसार उसमें किसी गुट-निरपेक्ष राष्ट्र की रुचि निर्धारित करती है।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में गुट-निरपेक्षता की नीति को लागू करने का श्रेय भारत के पहले प्रधानमन्त्री जवाहरलाल नेहरू को है। गुट-निरपेक्षता को विचार से नीति एवं नीति से आन्दोलन बनाने में भारत की भूमिका सराहनीय रही है। एक सक्रिय सदस्य के रूप में भारत ने सदैव गुट-निरपेक्ष का सम्मान एवं समर्थन किया। भारत की भूमिका निर्गुट आन्दोलन की हर गतिविधि में अहम रही है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में होने वाली गतिविधियों में भारत ने निम्नलिखित भूमिका अभिनीत की है

(1) भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जन्मदाता है।

(2) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्व शान्ति पर बल देता है। भारत के प्रधानमन्त्री लाल बहादुर शास्त्री ने इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए द्वितीय शिखर सम्मेलन में विश्व शान्ति के लिए पांच सूत्री प्रस्ताव पेश किया जिसमें मुख्यतः-सीमा विवादों को विवेक एवं शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने, अणु शस्त्रों के निर्माण एवं प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगाने एवं संयुक्त राष्ट्र का समर्थन करने पर बल दिया।

(3) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का सातवां शिखर सम्मेलन 1983 में श्रीमती इन्दिरा गांधी की अध्यक्षता में दिल्ली में हुआ।

(4) 1983 में भारत के प्रयत्नों से बहुत-सी समस्याओं-ईरान-इराक युद्ध, कम्पूचिया की समस्या, हिन्द महासागर में शान्ति बनाए रखना एवं पारस्परिक आर्थिक सहयोग आदि पर सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किए गए।

(5) नाम (NAM) के अध्यक्ष के रूप में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर सर्वसम्मति प्राप्त करके एवं गुट-निरपेक्ष तथा विश्व के देशों के हितों की रक्षा करके इस आन्दोलन को ओर भी शक्ति प्रदान की।

(6) नाम के अध्यक्ष के रूप में भारत ने पूर्ण निशस्त्रीकरण हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव पेश किया।

(7) 1985 में घोषित नई दिल्ली घोषणा पत्र श्री राजीव गांधी के निशस्त्रीकरण सम्बन्धी चार सूत्रीय योजना पर आधारित था।

(8) राजीव गांधी की अध्यक्षता में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने दक्षिण-दक्षिण सहयोग, उत्तर-दक्षिण, उत्तर-दक्षिण वार्तालाप, नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ-व्यवस्था, संयुक्त राष्ट्र संघ की सक्रिय भूमिका आदि विषयों पर जोर दिया।

(9) भारत की पहल पर ‘अफ्रीका कोष’ कायम किया गया।

(10) भारत ने अफ्रीका कोष को, 50 करोड़ रु० की राशि दी।

(11) भारत को 1986 एवं 1989 में अफ्रीका कोष का अध्यक्ष चुना गया। ऋण, पूंजी-निवेश तथा अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था जैसे कई आर्थिक प्रस्तावों का मूल प्रारूप भारत ने बनाया।

(12) 1989 के बेलग्रेड सम्मेलन में भारत ने पृथ्वी संरक्षण कोष कायम करने का सुझाव दिया और सदस्य राष्ट्रों ने इसका भारी समर्थन किया।

(13) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दसवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, वातावरण सुरक्षा, आतंकवाद जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उठाया। भारत का यह रुख जकार्ता घोषणा में शामिल किया गया कि आतंकवाद प्रादेशिक अखण्डता एवं राष्ट्रों की सुरक्षा को एक भयानक चुनौती है।

(14) भारत ने ही गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों का ध्यान विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण की तरफ खींचा।

(15) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के महत्त्व एवं सदस्य राष्ट्रों की इसमें निष्ठा बनाए रखने के लिए भारत ने द्विपक्षीय मामले सम्मेलन में न खींचने की बात कही जिसे सदस्य राष्ट्रों ने स्वीकार किया।

(16) 1997 में दिल्ली में गट-निरपेक्ष देशों के विदेश मन्त्रियों का शिखर सम्मेलन हआ।

(17) बारहवें शिखर सम्मेलन में भारत ने विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, विश्व शान्ति एवं आतंकवाद से निपटने के लिए एक विश्वव्यापी सम्मेलन बुलाने का प्रस्ताव पेश किया, जिसका सदस्य राष्ट्रों ने समर्थन किया।

(18) तेरहवें शिखर सम्मेलन में सक्रिय भूमिका अभिनीत करते हुए भारत ने आतंकवाद एवं इसके समर्थकों की कड़ी आलोचना कर विश्व शान्ति पर बल दिया।

(19) भारत ने क्यूबा में हुए 14वें, मिस्र में हुए 15वें तथा इरान में हुए 16वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए आतंकवाद को समाप्त करने का आह्वान किया।

(20) भारत ने वेनुजुएला में हुए 17वें एवं अजरबैजान में हुए 18वें शिखर सम्मेलन में भाग लेते हुए विकास के लिए वैश्विक शांति की स्थापना पर बल दिया।
अत: गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका सदैव सराहनीय रही है।

प्रश्न 9.
शीत-युद्धोपरान्त काल में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की व्याख्या करो।
उत्तर:
शीत युद्ध के पश्चात् आज की बदली हुई परिस्थितियों में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका में भी बदलाव आया है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन नए विश्व के निर्माण के लिए प्रयत्नशील है जो शान्ति, मैत्री एवं सम्पन्नता से परिपूर्ण हो। वातावरण समय में गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका एवं महत्त्व दोनों ही बढ़ा रहा है या ऐसा कहा जाए कि गुट निरपेक्ष आन्दोलन की बढ़ती भूमिका ने उसे महत्त्वपूर्ण आन्दोलन बना दिया है।

विश्वीकरण की तीव्र होती प्रक्रिया के कारण विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों ने खुला बाजार नीति को अपनाया है। विकसित देशों की बहु-राष्ट्रीय कम्पनियां विकासशील देशों में पूंजी निवेश करती हैं ताकि दोनों राष्ट्रों को लाभ हो। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ऐसी बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों से विकासशील देशों के हितों की रक्षा करता है। आज गुट-निरपेक्ष आन्दोलन शक्ति गुटों में नहीं अपितु विकसित एवं विकासशील देशों में आर्थिक सम्बन्धों में सन्तुलन पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है।

आज गुट-निरपेक्ष आन्दोलन सदस्य राष्ट्रों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रयास कर रहा है। अब यह विकसित देशों से विकासशील एवं पिछड़े देशों के लिए आर्थिक एवं तकनीकी मदद प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण के लिए समर्पित है। कार्टाजेना सम्मेलन में परमाणु हथियारों के समूल नाश के लिए धीमे एवं सीमित प्रयासों पर सदस्य राष्ट्रों ने चिंता व्यक्त की।

बारहवें शिखर सम्मेलन में परमाणु हथियारों की होड़ को रोकने एवं उन्हें नष्ट करने के लिए एक बहु-पक्षीय समझौते पर बल दिया। इस सम्मेलन में निशस्त्रीकरण एवं आतंकवाद से निपटने के लिए विश्वव्यापी सम्मेलन बुलाने का सुझाव दिया गया।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के निर्माण के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों को अमीर एवं विकसित राष्ट्रों के प्रभुत्व से निकालने के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तत्पर है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन यह देखता है कि कोई एक शक्ति केन्द्र सारी दुनिया पर अपना प्रभुत्व न कायम कर ले। विश्व को महायुद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन इसके सदस्य राष्ट्र अहम् भूमिका निभा रहे हैं।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्वव्यापी दरिद्रता को दूर करने की कोशिश कर रहा है। कोलंबिया सम्मेलन में विकासशील देशों में भूख, ग़रीबी, निरक्षरता तथा पेयजल की कमी से निपटने के लिए प्रयास करने पर बल दिया गया। लन अब संयक्त राष्ट्र संघ में सधार के लिए भी मांग करता है यह इसे अमेरिका की दादागिरी से बचाने के लिए प्रयासरत है। अतः गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की भूमिका शीत युद्ध के बाद बढ़ गई है।

अब यह केवल नव स्वतन्त्र राष्ट्रों की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए ही नहीं प्रयासरत अपितु अपने विश्वव्यापी स्वरूप के कारण अब यह विश्वव्यापी निशस्त्रीकरण, विश्वशान्ति एवं सुरक्षा, सम्पन्नता, आर्थिक-सामाजिक उन्नति, सहयोग एवं मानवाधिकारों की रक्षा के लिए भी प्रयासरत है। अब गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विश्वव्यापी समस्याओं एवं मामलों की ओर भी ध्यान दे रहा है।

प्रश्न 10.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था से आप क्या समझते हैं ?
अथवा
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मुख्य विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवाद व उपनिवेशवाद का पतन होना आरम्भ हो गया था। साम्राज्यवादी व औपनिवेशिक शक्तियों की पकड़ अपने उपनिवेशों पर ढीली पड़ने लगी थी क्योंकि साम्राज्यवादी शक्तियां ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बैल्जियम आदि इस स्थिति में नहीं थे कि वे अपने उपनिवेशों पर अपना कब्जा जमा सकें। अतः उन्होंने अपने अपने उपनिवेशों को आजाद करना आरम्भ कर दिया जिसके परिणामस्वरूप 50 व 60 के दशक में एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका के सैंकड़ों देश अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के मंच पर उभरे।

सदियों तक यूरोपीय देशों ने इन क्षेत्रों पर अपना नियन्त्रण बनाए रखा और इन देशों का शोषण किया। इन उपनिवेशों का आर्थिक शोषण कर करके यूरोपीय देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को बहुत मज़बूत बनाया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विश्व की अर्थव्यवस्था को बहुत धक्का लगा। इसलिए इस युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने अपने आर्थिक पुनरुत्थान और एकीकरण की तरफ ध्यान देना आरम्भ कर दिया ताकि अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर सकें।

नव-स्वतन्त्र अथवा विकासशील देशों को अपनी आर्थिक व्यवस्था के विकास के लिए विकसित देशों की मदद की आवश्यकता थी। राजनीतिक स्वतन्त्रता की प्राप्ति तथा नए देशों ने अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त होने के कारण संयुक्त राष्ट्र की संख्या तिगुनी हो गई थी। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन तथा तीसरे विश्व के देशों ने पुरानी विश्व अर्थव्यवस्था को समाप्त करके नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था (New International Economic Order) के जन्म तथा स्थापना को प्रोत्साहित किया। 70 के दशक में इन विकासशील देशों ने राजनीतिक स्वतन्त्रता के साथ-साथ आर्थिक स्वतन्त्रता की मांग भी आरम्भ कर दी जिसके परिणामस्वरूप एक नई अवधारणा नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का प्रचलन हुआ। यह 70 के दशक में अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों में मुख्य विषय बन गया।

नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था क्या है ? (What is NIEO ?)-नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था है जिसका उद्देश्य विकासशील देशों को खाद्य-सामग्री उपलब्ध कराना है, साधनों को विकसित देशों में विकासशील देशों में भेजना, वस्तओं सम्बन्धी समझौते करना, बचाववाद को समाप्त करना तथा पुरानी परम्परावादी औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के स्थान पर निर्धन तथा वंचित देशों के साथ न्याय करने के उद्देश्य से नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना करना है। 70 के दशक में इन विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना की मांग की क्योंकि अमेरिका व यूरोपीय देश इस बात के लिए सदैव तत्पर रहे कि विकासशील देशों की तैयार वस्तुएं अमेरिका व यूरोपीय आर्थिक बाजार में प्रवेश न कर सकें।

पुरानी व्यवस्था विकासशील अथवा कम विकसित अथवा तृतीय विश्व के हितों की अवहेलना करते हुए बनाई गई है जिसका उद्देश्य विकसित राष्ट्रों के हितों व उनकी आवश्यकताओं की रक्षा करना है जबकि विकासशील देशों का उद्देश्य यह है कि नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के तहत विकसित राष्ट्रों के लिए एक आचार संहिता बनाकर तथा कम विकसित राष्ट्रों के उचित अधिकारों को मानकर अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को सबके लिए समान तथा न्यायपूर्ण बनाना है।’

“नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का विश्वास विकासशील देशों में सहयोग स्थापित करना तथा अन्तर्राष्ट्रीय सहयोग में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को मजबूत बनाना है। इसका विश्वास विश्व में एक ऐसी लोकतन्त्रीय व्यवस्था स्थापित करना है जिससे प्रत्येक राष्ट्र को समानता का व्यवहार मिले और ऐसी आर्थिक स्थिति बने जिससे विश्व में उसका राजनीतिक स्थायित्व सुनिश्चित हो सके।” 70 के दशक के बाद इन विकासशील देशों ने आर्थिक समानता की मांग करनी आरम्भ कर दी। विकासशील राष्ट्र बिना किसी देरी के उत्तर-दक्षिणी वार्ता की मांग करते हैं। परन्तु विकसित राष्ट्र किसी भी कीमत पर इस तर्क को स्वीकार नहीं करते जिसके कारण इनके मध्य विवाद (Conflict) पैदा हो गया।

इस विवाद को उत्तर-दक्षिणी विवाद (North-South Conflict) के नाम से भी पुकारते हैं क्योंकि जितने भी विकसित देश हैं वे भू-मध्य रेखा के उत्तर में और विकासशील देश भू-मध्य रेखा के दक्षिण में स्थित हैं। उस समय की आर्थिक व्यवस्था संकटों के दौर में से गुजर रही थी। इस समय तक विकसित देशों में भी एक स्थायित्व की स्थिति आ चुकी थी अर्थात् विकसित देशों ने लगभग प्रत्येक क्षेत्र में विकास कर लिया था, जिसके परिणामस्वरूप उनका आर्थिक विकास थम गया था। मुद्रा स्फीति की दर बढ़ रही थी। मुद्रा स्फीति की समस्या पर रोक लगाने हेतु ही विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग जोरों से आरम्भ कर दी।

यह विश्व के आर्थिक साधनों के आदर्श विभाजन पर बल देती है तथा ऐसे साधनों को उपाय में लाना चाहती है जिससे कि ग़रीब देशों में प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि हो सके। इस व्यवस्था को जन्म देने में मुख्यतः तीन बातें सामने आती हैं-प्रथम, विकसित देशों को विकासशील देशों के साथ अपनी पूंजी में भाग देना चाहिए।

द्वितीय, मुद्रा स्फीति की बढ़ती हुई दर पर रोक लगाने के लिए यह आवश्यक है कि इस नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर बल दिया जाए। ततीय, आर्थिक साधनों के आदर्श विभाजन के लिए विकासशील देशों द्वारा विकसित देशों पर दबाव डालना। वास्तव में, इस अवधारणा ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक और राजनीतिक प्रक्रिया के घनिष्ठ सम्बन्ध को उभार कर सामने रखा है। जब तक आर्थिक व्यवस्था परिवर्तित नहीं होती तब तक न्यायपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था भी स्थापित नहीं की जा सकती।

पुरानी अर्थव्यवस्था की विशेषताएं (Features of the Old Economic Order): विकसित देशों द्वारा स्थापित पुरानी अर्थव्यवस्था की निम्नलिखित विशेषताएं हैं

(1) पुरानी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत विश्व में पूर्वी व पश्चिमी गुटों में अन्तर पाया जाता था, नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के मुद्दे को लेकर उत्तर-दक्षिण में भी विवाद था।

(2) पुरानी आर्थिक व्यवस्था विकसित देशों के हितों की रक्षा करती थी जिससे सारा लेन-देन विकसित देशों में ही होता था जो कि भेदभाव रहित उदारवादी व्यापार पर आधारित था जिससे विश्व में खुले व्यापार की नीति को प्रोत्साहन मिला।

(3) पुरानी अर्थव्यवस्था राष्ट्रवाद से ओत-प्रोत थी। इस पर कुछेक राष्ट्रों का एकाधिकार था। यह व्यवस्था तर्कहीन, अन्यायपूर्ण और असंगत थी।

(4) पुरानी अर्थव्यवस्था के अन्तर्गत विकसित राष्ट्रों ने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को इस तरह नियमित कर रखा था कि विकसित देशों को विकासशील देशों में आसान शर्तों पर माल बेचने की छूट प्राप्त थी।

80 के दशक के अन्त तक विकसित देशों को भी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। कई साम्यवादी देशों का पतन हो गया और वहां प्रजातान्त्रिक सरकारों की स्थापना हुई। इस दशक में विकासशील देशों ने भी उत्तर-दक्षिण विवाद की बजाए उत्तर-दक्षिण वार्ता (North-South Dialogue) पर बल देना आरम्भ कर दिया। 1975 तक इन विकासशील देशों की अन्तर्राष्ट्रीय धन-सम्पदा आदि का पूरा उपभोग विकसित राष्ट्रों ने किया। विकसित देशों का मत था कि अगर विकासशील देश पिछड़ गए हैं तो उनके पीछे उनकी पिछड़ी तकनीक है, जिसके कारण वे अपनी प्राकृतिक सम्पदा का उपभोग नहीं कर पाए हैं।

इसीलिए विकासशील देशों ने पुरानी अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को खत्म करना चाहा। पुरानी अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के तीन भाग थे प्रथम-पश्चिमी देशों की आत्मनिर्भरता की व्यवस्था द्वितीय-उत्तर-दक्षिण की निर्भरता की व्यवस्था तृतीया- पूर्व-पश्चिम की स्वतन्त्रता की व्यवस्था पूर्वी देश अपनी आत्मनिर्भरता के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर हैं। इस व्यवस्था में विकासशील देशों की कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं थी।

विश्व अर्थव्यवस्था पर कुछेक विकसित देशों का एकाधिकार है। विश्व का मुनाफा भी इन्हीं देशों के हाथ में है। इसके अतिरिक्त एक अन्य कारण धन तथा व्यापारिक मण्डियों पर एकाधिकार था। जिसका कच्चे माल की मण्डियों पर नियन्त्रण होगा उसका तैयार माल की मण्डियों पर नियन्त्रण होना स्वाभाविक है। इस तरह इन विकसित देशों ने अविकसित तथा विकासशील देशों का दोहरा शोषण किया जिससे विकसित व विकासशील देशों में असमानता फैल गई।

उपर्युक्त आधारों पर ही 70 के दशक में विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग की ताकि ये देश अपना आर्थिक विकास कर सकें। विकासशील देशों की मांग है कि विकसित देश अपने देशों के अतिरिक्त साधनों को विकासशील देशों को दे दें ताकि आर्थिक रूप से पिछड़े हुए विकासशील देश लाभ उठा सकें। यदि इस दिशा में विकासशील राष्ट्र प्रगति करते हैं तो इससे विकसित देशों को भी फायदा होगा और नई मण्डियां प्राप्त होंगी। चूंकि अब इन देशों ने लम्बी परतन्त्रता के बाद स्वतन्त्रता प्राप्त कर ली है।

अतः विकसित देशों का नैतिक कर्त्तव्य बनता है कि वे इन देशों की आर्थिक मदद करें ताकि ये देश भी आत्मनिर्भर बन सकें। इसके द्वारा ऐसी व्यवस्था की जाएगी ताकि आर्थिक न्याय की प्राप्ति हो सके। नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत बहुत प्रयत्नों द्वारा विकसित देश विकासशील देशों को अपनी आय का 0.7% भाग ही देने को तैयार हुए हैं जोकि बहुत कम हैं।

नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धान्त (Basic Principles of NIEO) विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना के लिए कुछ बुनियादी सिद्धान्त निर्धारित किए हैं, जिनका वर्णन इस प्रकार है

  • कच्चे माल की कीमत को घटाने-बढ़ाने पर रोक लगाई जाए तथा कच्चे माल और तैयार माल की कीमतों में अन्तर न होना।
  • बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की गतिविधियों पर समुचित प्रतिबन्ध,
  • विकासशील देशों पर वित्तीय ऋणों के भार को कम करना,
  • विश्व मौद्रिक व्यवस्था का सामान्यीकरण करना,
  • खनिज पदार्थों और सभी तरह की आर्थिक गतिविधियों पर किसी राष्ट्र की सम्प्रभुता की स्थापना करना।
  • विकासशील देशों द्वारा तैयार माल के निर्यात को प्रोत्साहन देना।
  • दोनों के मध्य तकनीकी उत्थान की खाई को समाप्त करना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 11.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों द्वारा किये गए प्रयासों का वर्णन करें।
उत्तर:
70 के दशक में नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना हेतु विभिन्न संगठनों जैसे संयुक्त राष्ट्र, गुट-निरपेक्ष आन्दोलन, विकसित देशों व विकासशील देशों ने विभिन्न स्तरों पर यत्न किए। इन संगठनों द्वारा किए गए प्रयासों का वर्णन इस प्रकार है

1. संयुक्त राष्ट्र द्वारा किए गए प्रयत्न (UN efforts at the establishment of NIEO)

(क) 1 मई, 1974 को संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा के छठे विशेष अधिवेशन में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना में उठाए जाने वाले कुछ कार्यक्रमों को निश्चित किया जैसे कि

  • व्यापार व विकास सम्बन्धी प्रारम्भिक कच्चे माल की समस्याओं को हल किया जाए।
  • अन्तर्राष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था और विकासशील देशों की वित्तीय सहायता देने सम्बन्धी मामलों को निपटाया जा सके।
  • विकासशील देशों द्वारा अत्यधिक औद्योगिकीकरण की दिशा में प्रयास हो।
  • विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों को तकनीक का हस्तान्तरण किया जाए।
  • बहु-राष्ट्रीय कम्पनियों व निगमों की गतिविधियों का संचालन तथा नियन्त्रण।
  • राज्यों के आर्थिक कार्यों व कर्तव्यों का एक चार्टर बनाया जाए जिसमें प्रत्येक राज्यों के अधिकार व कर्त्तव्य का वितरण हो।
  • विकासशील देशों के मध्य पारस्परिक सहयोग पर बल।

(ख) व्यापार और विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (UNCTAD) सितम्बर, 1975 में संयुक्त राष्ट्र की महासभा का विकास तथा अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक सहयोग’ पर सातवां विशेष अधिवेशन उत्तर-दक्षिण वार्ता के लिए काफ़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ क्योंकि इसमें तृतीय विश्व तथा पश्चिमी दोनों द्वारा अपनी समझौता वार्ताओं पर यथार्थवाद का प्रदर्शन किया गया। 77 का समूह (Group of 77) तथा पश्चिम के बीच सहानुभूतिपूर्व सहयोग के फलस्वरूप समझौता पास हुआ जो तीसरे विश्व की प्रगति के मार्ग में मील का पत्थर प्रमाणित हुआ।

इन सभी सम्मेलनों का उद्देश्य अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को सम्प्रभु, समानता तथा सहयोग के आधार पर स्थापित करने हेतु पुनर्गठित करना है ताकि इनमें से भेदभाव को हटाकर इसे न्याय पर आधारित किया जा सके। अंकटाड के कई सम्मेलनों ने इस दिशा में कार्य किए जैसे-प्रगतिशील सिद्धान्तों का निर्माण, शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व के सिद्धान्त को विकसित किया जाए, पक्षपातपूर्व रवैये की समाप्ति, सांझी निधि का निर्माण किया जाए जिससे विकासशील देशों के ऋण का भार कम हो सके।

(ग) संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO) के प्रयास-नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की स्थापना के लिए संयुक्त राष्ट्र के औद्योगिक विकास संगठन ने भी अपने स्तर पर प्रयास आरम्भ कर दिए। इस संगठन (UNIDO) का उद्देश्य तीसरे विश्व के देशों का औद्योगिक विकास करना है। इस दिशा में इसने कुछ महत्त्वपूर्ण सम्मेलन बुलाए।

2. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन द्वारा किए गए प्रयास (Efforts of NAM) एशिया, अफ्रीका और लेटिन अमेरिका ने नव-स्वतन्त्र राष्ट्रों ने मिलकर गुट-निरपेक्ष आन्दोलन आरम्भ किया था। यह नव-स्वतन्त्र राष्ट्र अपना राजनीतिक, आर्थिक तथा सामाजिक कारणों से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के रूप में एकत्र हुए। साम्राज्यवादी आर्थिक ढांचे से दबे हुए इन देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था निर्मित करने का प्रयत्न किया। गुट-निरपेक्ष देशों के लुसाका सम्मेलन (1970) में इन देशों की आर्थिक समस्याओं की तरफ ध्यान दिलाया गया। गुट-निरपेक्ष राष्ट्रों के विदेश मन्त्रियों के 1975 के

लीमा सम्मेलन (LIMA Conference) में आर्थिक तथा सामाजिक विकास के लिए एक संहति कोष (So Fund) की स्थापना की स्वीकृति दी गई। 1983 में नई दिल्ली में हुए गुट-निरपेक्ष देशों के सातवें शिखर सम्मेलन में भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की आवश्यकता की ओर विशेष ध्यान दिलाया। इसके अतिरिक्त G-15 के विभिन्न सम्मेलनों में भी इसकी स्थापना की दिशा में मांग उठाई गई।

3. विकसित देशों के प्रयास (Efforts of Developed Countries):
80 के दशक के आरम्भ में पूर्व व बाद में विकसित देशों को भी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ा क्योंकि तेल उत्पादक देशों ने तेल की कीमतों में भारी वृद्धि कर दी थी जिसके परिणामस्वरूप विश्व की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। अतः विकसित देशों ने भी नई व्यवस्था की ओर ध्यान देना शरू किया। विकासशील देशों की मांगों की तरफ विकसित देशों ने सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना आरम्भ कर दिया था।

विकसित देशों को आर्थिक विकास व सहयोग के संगठन (OECO) विश्व बैंक, IMF तथा GATT आदि ने बचाववाद (Protectionism) की नीति को छोड़कर उन्हें अपने हितों की रक्षा के लिए नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का सुझाव दिया। विकासशील देशों ने भी उत्तर-दक्षिण विवाद की जगह उत्तर-दक्षिण वार्ता पर बल देना आरम्भ कर दिया। काफ़ी प्रयत्नों के द्वारा विकसित देश विकासशील देशों को अपनी आय का 0.7% हिस्सा देने को तैयार हो गए।

4. विकासशील देशों के प्रयास (Efforts of Developing Countries):
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में शामिल सभी देश विकासशील देश हैं, परन्तु विकासशील देशों में सभी गुट-निरपेक्ष देश शामिल नहीं हैं। विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना की दिशा में निम्नलिखित प्रयत्न किए

(1) संयुक्त राष्ट्र की महासभा के 1974 में हुए सम्मेलन में विकासशील देशों ने नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की स्थापना की मांग की।

(2) विकासशील देशों ने अंकडाट में विभिन्न सम्मेलनों में नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग को मनवाने के लिए प्रयत्न किए।

(3) विकासशील देशों ने 1977 के पेरिस में सम्पन्न Conference on Trade Co-operation में भी मांग उठाई। इस सम्मेलन में उत्तर-दक्षिण के देशों ने अपने-अपने मत प्रस्तुत किए।

(4) 1982 में विकासशील देशों का नई दिल्ली में सम्मेलन हुआ। इसमें विकासशील देशों को आत्मनिर्भर बनाने और पारस्परिक सहयोग के आठ बिन्दुओं पर भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने बल दिया।

इस प्रकार विकासशील देशों ने संयुक्त राष्ट्र व उसके बाहर के सम्मेलनों, गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के सम्मेलनों, राष्ट्र मण्डल के शिखर सम्मेलनों, G-15 एवं G-77 के सम्मेलनों में इस मांग को उठाकर लोकमत बनाने की कोशिश की। जी 15 की नौवीं बैठक जमैका (Jamaica) में फरवरी, 1999 में हुई और इसमें 17 देशों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में विश्व आर्थिक व्यवस्था में विकासशील देशों को अधिक भागीदारी दिए जाने की मांग की गई। यह भी सुझाव दिया गया कि WTO, WB तथा IMF जैसी आर्थिक संस्थाओं में अधिक सहयोग व तालमेल होना चाहिए।

प्रश्न 12.
शीत युद्ध में भारत की क्या प्रतिक्रिया रही ? गुट-निरपेक्षता की नीति ने किस प्रकार भारत का हित साधन किया ?
उत्तर:
शीत युद्ध के दौरान भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। गुट-निरपेक्ष नेता के रूप में उभर कर भारत ने न केवल स्वयं को अमेरिका एवं सोवियत संघ दोनों से अपने आपको अलग रखा, बल्कि नव स्वतन्त्रता प्राप्त देशों एवं विकासशील देशों को भी दोनों शक्ति गुटों से अलग रखने का प्रयास किया।

स्वतन्त्रता के पश्चात् पं० जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा तथा अन्य कई स्थानों पर यह स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत किसी गुट में शामिल नहीं होगा और भारत गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण करेगा। पं० जवाहरलाल नेहरू ने यह भी स्पष्ट किया था कि गुट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मामलों के प्रति उदासीनता नहीं है।

सन् 1949 में प्रधानमन्त्री नेहरू ने अमरीकी कांग्रेस के समक्ष भाषण देते हुए कहा था, “जहां स्वतन्त्रता खतरे में हो न्याय खतरे में हो या यदि कहीं आक्रमण किया जा रहा हो वहां हम उदासीन नहीं रह सकते और न ही रहेंगे। हमारी नीति उदासीनता की नीति नहीं है। हमारी नीति यह है कि शान्ति स्थापना के लिए सक्रिय रूप से प्रयत्न किया जाए तथा जहां तक सम्भव हो सके शान्ति को सुदृढ़ आधार प्रदान किया जाए।”

उदाहरण के लिए 50 के दशक में हुए कोरिया युद्ध एवं स्वेज नहर के संकट को समाप्त करने के लिए भारत ने सक्रिय भूमिका निभाई। भारत ने शीत युद्ध के दौरान उन सभी अन्तर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय संगठनों को बनाये रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई जो दोनों शक्ति गुटों में से किसी के साथ नहीं जुड़े थे।

यद्यपि कई आलोचकों का यह कहना है कि गुट-निरपेक्षता का आदर्श भारत के राष्ट्रीय हितों एवं मूल्यों से मेल नहीं खाता, परन्तु यह तर्क उचित नहीं है, क्योंकि भारत न केवल अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वतन्त्र निर्णय ले सका, बल्कि ऐसे पक्ष का साथ देता था, जिससे भारत को लाभ हो। इसके साथ-साथ दोनों महाशक्तियों ने भारत से अच्छे सम्बन्ध बनाए रखने का प्रयास किया, यदि एक गुट भारत के विरुद्ध होता तो दूसरा गुट भारत की मदद को आ जाता था।

यद्यपि कई आलोचक भारत की गुट-निरपेक्षता को सिद्धान्तहीन एवं विरोधाभासी बताते हैं। क्योंकि भारत ने सन् 1971 में सोवियत संघ से एक बीस वर्षीय सन्धि कर ली थी। परन्तु हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तत्कालीन परिस्थितियों में इस प्रकार की सन्धि करना भारत के लिए आवश्यक हो गया था। अधिकांश तौर पर भारत ने दोनों गुटों से अलग रहने की नीति ही अपनाई।

भारत ने निम्नलिखित ढंग से अपना हित साधन किया

1. आर्थिक पुनर्निर्माण- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाकर अपना आर्थिक पुनर्निर्माण किया क्योंकि किसी गुट में शामिल न होने से उसे सभी देशों से सहायता प्राप्त होती रही।

2. स्वतन्त्र नीति निर्माण- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाकर स्वतन्त्रतापूर्वक अपनी नीतियों का निर्माण किया।

3. भारत की प्रतिष्ठा में बढ़ोत्तरी-गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने से भारत की प्रतिष्ठा में भी वृद्धि हुई।

4. दोनों गुटों से अधिक सहायता-गुट-निरपेक्ष देश होने के कारण भारत को दोनों गुटों से आर्थिक सहायता प्राप्त होती रही।

प्रश्न 13.
भारतीय गुट-निरपेक्षता के स्वरूप का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
भारतीय गुट-निरपेक्षता के स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है

1. भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है-भारत की निर्गुटता की नीति उदासीनता की नीति नहीं है क्योंकि भारत ने स्वयं को अन्तर्राष्ट्रीय राज्य नीति से दूर नहीं रखा है, अपितु भारत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय भूमिका अभिनीत करता है।

2. सैन्य समझौतों का विरोध-भारत सैन्य समझौतों का विरोध करता है। अतः भारत सेन्टो (CENTO), नाटो (NATO), सीटो (SEATO), वारसा सन्धि (WARSA-PACT) आदि में सम्मिलित नहीं हुआ है।

3. शक्ति राजनीति से दूर रहना-भारत शक्ति राजनीति का विरोध करता है और प्रत्येक राष्ट्र के शक्तिशाली बनने के अधिकार को स्वीकार करता है।

4. शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति-भारत का पंचशील के सिद्धान्तों पर पूर्ण विश्वास है। शान्तिमय सह-अस्तित्व तथा अहस्तक्षेप की नीति पंचशील के दो प्रमुख सिद्धान्त हैं। भारत शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व की नीति का समर्थन करता है।

5. स्वतन्त्र विदेश नीति-भारत अपनी स्वतन्त्र विदेश नीति पर कार्यान्वयन करता है। भारत अपनी विदेश नीति का निर्माण किसी भी अन्य देश के प्रभावाधीन नहीं करता, अपितु स्वेच्छा से स्वतन्त्र रूप में करता है। भारत दोनों शक्ति गुटों में से किसी भी गुट का सदस्य नहीं है।

6. निर्गुट देशों के मध्य गुटबन्दी नहीं है-कुछ आलोचकों का मत है कि निर्गुटता की नीति गुट-निरपेक्ष देशों की गुटबन्दी है। किन्तु आलोचकों का यह विचार उचित नहीं है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ गुट-निरपेक्ष देशों का तृतीय गुट स्थापित करना नहीं है।

प्रश्न 14.
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म कैसे हुआ ? UNCTAD ने 1972 की अपनी रिपोर्ट में किन सुधारों को प्रस्तावित किया ?
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था की धारणा का जन्म- इसके लिए प्रश्न नं० 10 देखें। UNCTAD द्वारा दिये गए सुधार-UNCTAD ने 1972 में अपनी रिपोर्ट में निम्नलिखित प्रस्ताव दिये

  • अल्पविकसित देशों को अपने उन प्राकृतिक संसाधनों पर नियन्त्रण प्राप्त होगा, जिनका दोहन एवं दुरुपयोग विकसित कर सकते हैं।
  • अल्पविकसित देश विकसित देशों के बाज़ार में भी अपना माल बेच सकेंगे।
  • विकसित देशों से आयातित प्रौद्योगिकी की लागत कम होगी।
  • अल्पविकसित देशों की अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं में भूमिका बढ़ेगी।

प्रश्न 15.
भारत द्वारा गुट-निरपेक्षता की नीति को अपनाने के मुख्य कारण लिखिए।
उत्तर:
भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति को जोश में आकर नहीं अपनाया बल्कि यह गम्भीर चिन्तन का फल था और इसको अपनाने के मुख्य कारण इस प्रकार थे थिक पुननिर्माण-प्रथम, भारत कई वर्षों के साम्राज्यवादी शोषण के बाद स्वतन्त्र हुआ था और इसके सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश के आर्थिक पुनर्निर्माण का था। यह कार्य शान्ति के वातावरण में हो सकता था न कि तनावपूर्ण स्थिति में। अतः भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था क्योंकि यदि भारत किसी गुट में सम्मिलित होता तो इससे स्थिति और भी तनावपूर्ण हो जाती जोकि भारत के लिए ठीक नहीं थी।

2. स्वतन्त्र नीति निर्धारण के लिए-द्वितीय, भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई क्योंकि भारतीय राष्ट्रीयता प्रत्येक क्षेत्र में पूर्ण स्वतन्त्र रहने की उत्कट अभिलाषी थी। भारत को स्वतन्त्रता हजारों देश-प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। अतः भारतीयों के लिए स्वतन्त्रता अमूल्य थी। किसी गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था। भारत यह अनुभव करता था कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में उसे भाग लेने का पूर्ण अधिकार है और यदि भारत किसी गुट में शामिल हो जाता तो भारत को अपना यह अधिकार खो देना पड़ता। अत: पूर्ण स्वतन्त्रता की इच्छा के कारण भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए-तृतीय, भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए ठीक गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया गया।

4. शान्ति का समर्थक-गुट-निरपेक्षता की नीति का ऐतिहासिक आधार पर भी समर्थन किया जाता है। भारत का इतिहास यह बताता है कि भारत ने सदैव शान्ति की नीति का अनुसरण किया है। उसकी कभी भी विस्तारवादी महत्त्वाकांक्षाएं नहीं रहीं। इस प्रकार गुट-निरपेक्षता की नीति भारत के परम्परागत दर्शन तथा आदर्शों की आधुनिक युग में राजनीतिक अभिव्यक्ति है।

5. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही। भारत दोनों गुटों द्वारा मिलने वाली सहायता का आनन्द उठाता रहा। यदि भारत एक ही गुट में शामिल हो जाता तो शायद वह न केवल एक ही गुट की सहायता लेता बल्कि दूसरे गुट वाले देश भारत को घृणा की दृष्टि से देखते।

6. भौगोलिक दशा-भारत की भौगोलिक दशा ऐसी थी कि यदि भारत पश्चिमी या साम्यवादी गुट में सम्मिलित हो जाता तो उसके अस्तित्व को संकट उत्पन्न हो जाता।

7. एशिया के हित के लिए-एशिया के नए स्वतन्त्र राष्ट्रों में पश्चिम के प्रति घृणा थी और भारत को सभी एशियाई देश प्रतिष्ठा से देख रहे थे। यदि भारत पश्चिमी गुट से मिल जाता तो एशिया के देशों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता। अन्य देश भी भारत के अनुसरण करते हुए पश्चिम में मिलना प्रारम्भ कर देते।

लघु उत्तरीय प्रश्न 

प्रश्न 1.
शीत युद्ध से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शीत युद्ध से अभिप्राय दो राज्यों अमेरिका तथा भूतपूर्व सोवियत संघ अथवा दो गुटों के बीच व्याप्त उन बन्धों के इतिहास से है जो तनाव, भय, ईर्ष्या पर आधारित था। इसके अन्तर्गत दोनों गुट एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए प्रादेशिक संगठनों के निर्माण, सैनिक गठबन्धन, जासूसी, आर्थिक सहायता, प्रचार, सैनिक हस्तक्षेप, अधिकाधिक शस्त्रीकरण जैसी बातों का सहारा लेते थे।

फ्लोरेंस एलेट तथा मिखाइल समरस्किल ने अपनी पुस्तक ‘A Dictionary of Politics’ में शीत युद्ध को “राज्यों में तनाव की वह स्थिति जिसमें प्रत्येक पक्ष स्वयं को शक्तिशाली बनाने तथा दूसरे को निर्बल बनाने की वास्तविक युद्ध के अतिरिक्त नीतियां अपनाता है” बताया है। – डॉ० एम० एस० राजन (Dr. M.S. Rajan) के अनुसार, “शीत युद्ध शक्ति-संघर्ष की राजनीतिक का मिला-जुला परिणाम है, दो विरोधी विचारधाराओं के संघर्ष का परिणाम है, दो प्रकार की परस्पर विरोधी पद्धतियों का परिणाम है, विरोधी चिन्तन पद्धतियों और संघर्षपूर्ण राष्ट्रीय हितों की अभिव्यक्ति है जिनका अनुपात समय और परिस्थितियों के अनुसार एक-दूसरे के पूरक के रूप में बदलता रहा है।”

पं० जवाहर लाल नेहरू (Pt. Jawahar Lal Nehru) के अनुसार, “शीत युद्ध पुरातन शक्ति-सन्तुलन की अवधारणा का नया रूप है, यह दो विचारधाराओं का संघर्ष न होकर दो भीमाकार शक्तियों का आपसी संघर्ष है।”

प्रश्न 2.
शीत युद्ध के कोई चार परिणाम लिखिए।
उत्तर:
शीत युद्ध के परिणामों का वर्णन इस प्रकार है

1. विश्व का दो गुटों में विभाजन-शीत युद्ध का प्रथम परिणाम यह हुआ कि विश्व का दो गुटों में विभाजन हो अमेरिका के साथ हो गया, तो दूसरा गुट सोवियत संघ के साथ हो गया।

2. सैनिक गठबन्धनों की राजनीति-शीत युद्ध का एक परिणाम यह हुआ कि इसके कारण सैनिक गठबन्धनों की उत्पत्ति हुई तथा सैनिक गठबन्धनों को शीत युद्ध के एक साधन के रूप में प्रयोग किया जाने लगा। अमेरिका ने जहां नाटो, सीटो तथा सैन्टो जैसे सैनिक गठबंधन बनाये, वहां सोवियत संघ ने वार्सा पैक्ट का निर्माण किया।

3. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति-शीत युद्ध के कारण गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की उत्पत्ति हुई। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य नव-स्वतन्त्रता प्राप्त राष्ट्रों को दोनों गुटों से अलग रखना था।

4. शस्त्रीकरण को बढ़ावा-शीत युद्ध का अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर एक प्रभाव यह पड़ा कि इससे शस्त्रीकरण को बढ़ावा मिला। दोनों गुट एक-दूसरे पर अधिक-से-अधिक प्रभाव जमाने के लिए खतरनाक शस्त्रों का संग्रह करने लगे थे।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 3.
शीत युद्ध को बढ़ावा देने में सोवियत संघ किस प्रकार ज़िम्मेदार था ? कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:
शीत युद्ध को बढ़ावा देने में सोवियत संघ निम्नलिखित कारणों से ज़िम्मेदार था

1. विचारधारा सम्बन्धित कारण (Ideological Reason):
पश्चिमी विचारधारा के अनुसार साम्यवाद के सिद्धान्त तथा व्यवहार में इसके जन्म से ही शीत युद्ध के कीटाणु भरे हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर रूस द्वितीय विजेता के रूप में प्रकट हुआ था तथा यह द्वितीय महान् शक्ति था। अमेरिका तथा रूस वास्तव में दो ऐसी नधित्व करते हैं जिनमें कभी तालमेल नहीं हो सकता तथा जो पर्णतया एक-दसरे की विरोधी पद्धतियां हैं।

2. रूस की विस्तारवादी नीति (Extentionist Policy of Russia):
शीत युद्ध के लिए एक अन्य कारण के लिए भी पश्चिमी राज्य रूस को उत्तरदायी ठहराते हैं। उनका कहना है कि युद्ध के बाद भी रूस ने अपनी विस्तारवादी नीति को जारी रखा। इस प्रकार अमेरिका के मन में उसकी विस्तारवादी नीति के बारे में सन्देह होता चला गया, जिसको रोकने के लिए उसने भी कुछ कदम उठाए जिन्होंने शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

प्रश्न 4.
शीत युद्ध को बढ़ावा देने में अमेरिका किस प्रकार ज़िम्मेदार था ?
उत्तर:
शीत यद्ध को बढावा देने में अमेरिका निम्नलिखित कारणों से जिम्मेदार था

1. अमेरिका की विस्तारवादी नीति (Extentionist Policy of America):
साम्यवादी लेखकों के अनुसार शीत युद्ध का प्रमुख कारण अमेरिका की संसार पर प्रभुत्व जमाने की साम्राज्यवादी आकांक्षा में निहित है।

2. एटम बम्ब का रहस्य गुप्त रखना (Secret of Atom Bomb):
अमेरिका ने युद्ध की समाप्ति पर एटम बम्ब का आविष्कार कर लिया था।

3. पश्चिमी द्वारा रूस विरोधी प्रचार अभियान (Anti-Russian Propaganda by West):
युद्ध काल में ही पश्चिमी देशों की प्रैस रूस विरोधी प्रचार करने लगी थीं। बाद में तो पश्चिमी राज्यों ने खुले आम रूस की आलोचना करनी आरम्भ कर दी। जिस रूस ने जर्मनी की पराजय को सरल बनाया उसके विरुद्ध मित्र राष्ट्रों को यह प्रचार उसको क्षुब्ध करने के लिए पर्याप्त था।

4. अमेरिका का जापान पर अधिकार जमाने का कार्यक्रम (American Programme of Occupation of Japan):
पहले यह निर्णय किया था कि कोरिया तथा मन्चूरिया में जापानी सेनाओं का आत्मसमर्पण रूस स्वीकार करेगा। पर तब यह पता नहीं था कि जापान इतना शीघ्र आत्म-समर्पण कर देगा। इसके लिए बाद में रूस की सहायता की आवश्यकता न पड़ी।

अणु बम्ब के आविष्कार तथा प्रयोग ने जापान को शीघ्र आत्म-समर्पण करने पर बाध्य कर दिया। अमेरिका ने जापान के लिए एक कमीशन बनाने का सुझाव दिया। इस बात से रूस को शक हो गया कि अमेरिका जापान पर अपना अधिकार जमाये रखना चाहता है। इस कारणों से दोनों में तनाव पैदा हो गया।

प्रश्न 5.
शीत युद्ध के कोई चार लक्षण लिखिए।
उत्तर:
(1) शीत युद्ध एक ऐसी स्थिति भी है जिसे मूलतः ‘गर्म शान्ति’ कहा जाना चाहिए। ऐसी स्थिति में न तो पूर्ण रूप से शान्ति रहती है और न ही ‘वास्तविक युद्ध’ होता है, बल्कि शान्ति एवं युद्ध के मध्य की अस्थिर स्थिति बनी रहती है।

(2) शीत युद्ध, युद्ध का त्याग नहीं, अपितु केवल दो महाशक्तियों के प्रत्यक्ष टकराव की अनुपस्थिति माना जाएगा।

(3) यद्यपि इसमें प्रत्यक्ष युद्ध नहीं होता है, किन्तु यह स्थिति युद्ध की प्रथम सीढ़ी है। जिसमें युद्ध के वातावरण का निर्माण होता रहता है।
(4) शीत युद्ध एक वाक्युद्ध था जिसके अन्तर्गत दो पक्ष एक-दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाते रहते थे जिसके कारण छोटे-बड़े सभी राष्ट्र आशंकित रहते हैं।

प्रश्न 6.
नये शीत युद्ध का विश्व राजनीति पर प्रभाव लिखें।
उत्तर:
नए शीत युद्ध का विश्व राजनीति पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ा है। पुराने शीत युद्ध के समय यूरोप की औपनिवेशिक शक्तियां भूतपूर्व उपनिवेशों में अपना कार्य कर रही थीं पर अब उनका स्थान अमेरिका ने ले लिया है। वह इन देशों के प्रतिक्रियावादी शासनों का पक्ष लेता है। उसकी इस बात ने इन देशों के मार्क्सवादी नेताओं रूस की तरफ अधिक-से-अधिक झुकने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस प्रकार इन देशों के प्रति अमेरिका का दृष्टिकोण विकासशील राज्यों में मार्क्सवाद के फैलने का कारण बना। दूसरे नए शीत युद्ध में असंलग्न आन्दोलन को एक नई गति प्रदान की है तथा अधिक-से-अधिक राज्यों की इसमें सम्मिलित होने की सम्भावना है। यद्यपि तीसरे विश्व के कुछ राज्यों ने दोनों महाशक्तियों को उनकी सेनाएं या शस्त्र अपनी भूमि पर रखने की सुविधाएं दी हैं पर फिर वे अपनी स्वायत्तता को बनाए रखने के इच्छुक हैं।

इस प्रकार अधिक-से-अधिक राज्यों में असंलग्न आन्दोलन में शामिल होने की प्रवृत्ति दिखाई देती है। इसी प्रकार नए शीत युद्ध के कारण जिसके अन्तर्गत उच्चकोटि की शस्त्र तकनीक होड़ सम्बन्धित है। दोनों महाशक्तियों प्रत्यक्ष झगड़े की अपेक्षा विकासशील राज्यों में अप्रत्यक्ष टकराव में लगी रही हैं।

प्रश्न 7.
देतान्त से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
आधुनिक अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में देतान्त शब्द का प्रयोग प्रायः किया जाता है। यह शब्द वास्तव में फ्रांसीसी भाषा का शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है शिथिलता। देतान्त के आज के अर्थ में सहयोग तथा प्रतियोगिता दोनों ही बातें आती हैं। इसका अर्थ अमेरिका एवं सोवियत संघ दोनों राज्यों में तनाव शैथिल्य से है अर्थात् दोनों राज्यों में जो पहले शीत युद्ध में लगे हुए थे तनाव में शिथिलता आई तथा वे प्रतियोगी रहते हुए भी एक-दूसरे से सहयोग कर सकते हैं।

इस प्रकार यह दोनों के सम्बन्धों के सामान्यीकरण की विधि है। आपस में हानिकारक तनावयुक्त सम्बन्धों के स्थान पर मित्रतापूर्ण सहयोग की स्थापना से है। इस प्रकार 1970 के आस-पास अमेरिकन राष्ट्रपति निकसन तथा रूस के प्रधानमन्त्री खुश्चेव के प्रयत्नों से रूस तथा अमेरिका के आपसी तनाव में जो कमी आई तथा सम्बन्धों में जो कुछ समन्वय या सहयोग की भावना उत्पन्न हुई उसी के लिए शब्द देतान्त का प्रयोग किया जाता है।

प्रश्न 8.
देतान्त के उदय के क्या कारण थे ?
उत्तर:
देतान्त के उदय के निम्नलिखित कारण थे
(1) रूस तथा अमेरिका के बीच शस्त्रों की होड़ बढ़ती जा रही थी जिनसे नए-नए अधिक-से-अधिक घातक अणु शस्त्रों का निर्माण हो रहा था। संघर्ष की नीति पर चलने का परिणाम केवल आण्विक युद्ध के रूप में निकल सकता था। इसलिए उनको एहसास हुआ कि इन दोनों के बीच तनाव तथा संघर्ष की अपेक्षा सहयोग की आवश्यकता है। इस प्रकार अणु युद्ध के भय ने दोनों को निकट आने पर बाध्य कर दिया।

(2) अणु युद्ध की सम्भावना को कई अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं ने जैसे कोरिया का युद्ध तथा विशेषकर क्यूबा के संकट ने सिद्ध कर दिया था। अत: इन घटनाओं का भी दोनों राज्यों पर प्रभाव पड़ा तथा उन्हें आपसी तनाव को कम करने की आवश्यकता का अनुभव होने लगा।

(3) इसी प्रकार देतान्त के लिए उत्तरदायी एक कारण चीन तथा रूस के बीच बढ़ने वाले मतभेद थे। प्रारम्भ में तो रूस तथा चीन मित्र थे तथा इसमें रूस की शक्ति काफ़ी बढ़ गई थी पर 1962 के रूस तथा चीन में विवाद हो गया। अब रूस के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह चीन के सामने अपनी स्थिति को सुदृढ रखने के लिए अमेरिका से अपने सम्बन्धों को सुधारे।

(4) कुछ विचारकों का यह भी मत है कि रूस ने अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के कारण भी अमेरिका से मित्रता स्थापित करने का प्रयास किया।

प्रश्न 9.
पुराने शीत युद्ध और नये शीत युद्ध में अन्तर बताएं।
उत्तर:
पुराने शीत युद्ध और नये शीत युद्ध में निम्नलिखित अन्तर पाए जाते हैं

1. क्षेत्र की व्यापकता के आधार पर अन्तर-पुराने शीत और नये शीत युद्ध में प्रथम अन्तर यह है कि पुराने शीत युद्ध की अपेक्षा नये शीत युद्ध का क्षेत्र अधिक व्यापक है।

2. हथियारों के आधार पर अन्तर-पुराने शीत युद्ध की अपेक्षा नये शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों के पास अधिक परिष्कृत एवं घातक हथियार थे, इसमें परमाणु, जैविक व रासायनिक हथियार शामिल हैं।

3. स्वरूप के आधार पर अन्तर-पुराने शीत युद्ध के दौरान जहां अमेरिकन गुट द्वारा साम्यवाद का विरोध किया गया, वहीं नये शीत युद्ध के दौरान अमेरिकन गुट द्वारा केवल सोवियत संघ का विरोध किया गया।

4. सोवियत संघ एवं अमेरिका की मजबूरी-पुराने शीत युद्ध एवं नये शीत युद्ध में एक अन्तर यह है कि जहां पुराने शीत युद्ध को जारी रखना सोवियत संघ की मजबूरी थी, वहीं नया शीत युद्ध अमेरिकन गुट की मजबूरी था।

प्रश्न 10.
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है ? इसके मुख्य उद्देश्य बताइए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है कि किसी शक्ति गुट में शामिल न होना और शक्ति गुटों के सैनिक बन्धनों व अन्य बन्धनों व अन्य सन्धियों से दूर रहना। पण्डित नेहरू ने कहा था, “जहां तक सम्भव होगा हम उन शक्ति-गुटों से अलग रहना चाहते हैं जिनके कारण पहले भी महायुद्ध हुए हैं और भविष्य में भी हो सकते हैं।” गुट-निरपेक्षता का यह भी अर्थ है कि देश अपनी नीति का निर्माण स्वतन्त्रता से करेगा न कि किसी गुट के दबाव में आकर।

गुट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में तटस्थता नहीं है बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना है। पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने स्पष्ट कहा था कि गुट-निरपेक्षता का अर्थ अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के प्रति शीतयुद्ध का दौर उदासीनता नहीं है। स्वर्गीय प्रधानमन्त्री इन्दिरा गान्धी के अनुसार, “गुट-निरपेक्षता में न तो तटस्थता और न ही समस्याओं के प्रति उदासीनता है। इसमें सिद्धान्तों के आधार पर सक्रिय और स्वतन्त्र रूप में निर्णय करने की भावना निहित है।” भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति एक सकारात्मक नीति है, केवल नकारात्मक नहीं है।
गुट-निरपेक्षता के उद्देश्य-इसके लिए प्रश्न नं० 33 देखें।

प्रश्न 11.
क्या ‘गुट-निरपेक्षता’ का अभिप्राय तटस्थता है ? संक्षेप में स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी शक्तिशाली राष्ट्र का पिछलग्गू न बनकर अपना स्वतन्त्र मार्ग अपनाना। गुटों से अलग रहने की नीति का तात्पर्य अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में ‘तटस्थता’ कदापि नहीं है। कई पाश्चात्य लेखकों ने गुट निरपेक्षता के लिए तटस्थता अथवा तटस्थतावाद शब्द का प्रयोग किया है उनमें मॉर्गेन्थो, पीस्टर लायन, हेमिल्टन, फिश आर्मस्ट्रांग तथा कर्नल लेवि आदि ने इस नीति के लिए तटस्थता शब्द का प्रयोग कर भ्रम पैदा कर दिया है। वास्तव में दोनों नीतियां शान्ति व युद्ध के समय संघर्ष में नहीं उलझतीं, परन्तु तटस्थता निष्क्रियता व उदासीनता की नीति है, जबकि गुट-निरपेक्षता सक्रियता की नीति है।

तटस्थ देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों या घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्णतया निष्पक्ष रहते हैं और वे किसी अन्तर्राष्ट्रीय घटना या विषय के सम्बन्ध में अपने विचार अभिव्यक्त नहीं करते हैं। गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय विषयों के प्रति निष्पक्ष या उदासीन नहीं होते, अपितु वे इन विषयों में पूर्ण रुचि लेते हैं और प्रत्येक विषय के गुणों को सम्मुख रखते हुए उसके सम्बन्ध में निर्णय करने हेतु स्वतन्त्र होते हैं और अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका भी अभिनीत करते हैं। अतः गुट-निरपेक्षता की नीति का अभिप्राय निष्पक्षता या उदासीनता की नीति नहीं है।

प्रश्न 12.
भारत की गुट-निरपेक्षता नीति की पांच प्रमुख विशेषताएं बताइए।
उत्तर:

  • भारत किसी गुट का सदस्य नहीं है। भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति स्वतन्त्र है।
  • भारत की गुट-निरपेक्ष विदेश नीति सभी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने पर बल देती है।
  • भारत की गुट-निरपेक्ष विदेश नीति साम्राज्यवाद के विरुद्ध है।
  • भारत की गुट-निरपेक्ष नीति रंग भेदभाव की नीति के विरुद्ध है।
  • भारत की गुट-निरपेक्ष नीति विकासशील देशों के आपसी सहयोग पर बल देती है।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 13.
शीतयुद्ध में भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कोई चार कारण बताओ।
अथवा
शीत युद्ध के समय भारत की गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के कोई चार कारण लिखिए।
उत्तर:
भारत के गुट-निरपेक्षता की नीति अपनाने के निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण कारण हैं

1. आर्थिक पुनर्निर्माण-स्वतन्त्रता के पश्चात् भारत के सामने सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न देश का आर्थिक पुनर्निर्माण था। अतः भारत के लिए किसी गुट का सदस्य न बनना ही उचित था ताकि सभी देशों से आर्थिक सहायता प्राप्त की जा सके।

2. स्वतन्त्र नीति-निर्धारण के लिए-भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति इसलिए भी अपनाई ताकि भारत स्वतन्त्र नीति का निर्धारण कर सके। भारत को स्वतन्त्रता हजारों देश प्रेमियों के बलिदान के बाद मिली थी। किसी एक गुट में सम्मिलित होने का अर्थ इस मूल्यवान् स्वतन्त्रता को खो बैठना था।

3. भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए गुट-निरपेक्षता की नीति का निर्माण किया गया। यदि भारत स्वतन्त्र विदेश नीति का अनुसरण करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं पर निष्पक्ष रूप से अपना निर्णय देता तो दोनों गुट उसके विचारों का आदर करेंगे और अन्तर्राष्ट्रीय तनाव में कमी होगी और भारत की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

4. दोनों गुटों से आर्थिक सहायता- भारत ने गुट-निरपेक्षता की नीति का अनुसरण इसलिए भी किया ताकि दोनों गुटों से सहायता प्राप्त की जा सके और हुआ भी ऐसा ही।

प्रश्न 14.
बांडुंग सम्मेलन (1955) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अप्रैल, 1955 में बांडंग स्थान में एशिया और अफ्रीकी राष्टों का एक सम्मेलन हआ जिसमें 29 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उपस्थित सभी देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों को स्वीकार करने के साथ साथ इनका विस्तार भी किया, अर्थात् पांच सिद्धान्तों के स्थान पर दस सिद्धान्तों की स्थापना की गई। इस सम्मेलन में एशियाई तथा अफ्रीकी देशों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया तथा महान् शक्तियों का अनावश्यक अनुसरण न करने पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में सभी राज्यों की पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्नता और राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने, किसी राज्य पर सैनिक आक्रमण न करने तथा किसी राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर बल दिया गया।

प्रश्न 15.
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन सितम्बर, 1961 में बेलग्रेड में हुआ। इस सम्मेलन में 25 एशियाई तथा अफ्रीकी व एक यूरोपीय राष्ट्र ने भाग लिया। लैटिन अमेरिका में तीन राष्ट्रों ने पर्यवेक्षकों के रूप में सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन में महाशक्तियों से अपील की गई कि वे विश्व शान्ति तथा निःशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें तथा परमाणु परीक्षण न करें।

विश्व के सभी भागों तथा रूपों में उप-निवेशवाद, साम्राज्यवाद, नव उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद की घोर निन्दा की गई। सम्मेलन में अंगोला, कांगो, अल्जीरिया तथा ट्यूनीशिया के स्वतन्त्रता संघर्षों का समर्थन किया गया। बेलग्रेड सम्मेलन में 20 सूत्रीय घोषणा-पत्र को स्वीकार किया गया। इस घोषणा-पत्र में कहा गया कि विकासशील राष्ट्र बिना किसी भय व बाँधा के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास को प्रेरित करें। बेलग्रेड सम्मेलन गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में बहुत महत्त्व रखता है।

प्रश्न 16.
नेहरू और गुट-निरपेक्ष आन्दोलन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
1947 में जब भारत स्वतन्त्र हुआ तब पूंजीवाद तथा साम्यवाद में वैचारिक विभाजन, नस्लवाद, पिछड़े देशों की स्वतन्त्र नीति निर्माण की इच्छा इत्यादि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक वातावरण के प्रमुख विषय थे। भारत की भी यह प्रबल इच्छा थी कि वह गुटीय राजनीति से दूर रहकर अपनी इच्छा से विदेश नीति का निर्माण करे। ऐसे में भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री पं० जवाहर लाल नेहरू के व्यक्तित्व एवं विचारधारा ने प्रमुख भूमिका निभाई। पं० नेहरू ने भारतीय विदेश नीति को गुट-निरपेक्षता की नीति पर आधारित किया।

लेकिन यह गुट-निरपेक्षता नकारात्मक तथा तटस्थवादी नहीं थी बल्कि सकारात्मक थी। पं. नेहरू के शासनकाल में गुट-निरपेक्षता की नीति को पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई। जहां तक अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का प्रश्न है तो इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पं० नेहरू ने गुट-निरपेक्षता की नीति के आधार पर भारत को एक अलग पहचान दिलाई।

एशिया और अफ्रीका के नव-स्वतन्त्र देश गुट-निरपेक्षता की नीति के कारण ही पं० नेहरू और भारत सरकर को मानवता का प्रवक्ता मानते थे। नेहरू के कट्टर आलोचक भी इस बात को स्वीकार करते थे कि उनकी नीति भारत की अन्तर्राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुई है। नेहरू के जीवित रहते गुट-निरपेक्ष आन्दोलन कई ऊंचाइयों को छूने लगा था। हम आज भी इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की बुनियाद और उसका अस्तित्व नेहरू के ही परिपक्व नेतृत्व की देन है।

प्रश्न 17.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं दो संस्थापकों के नामों का उल्लेख कीजिए। पहला गुट-निरपेक्ष आन्दोलन शिखर सम्मेलन किन तीन कारकों की परिणति था ?
उत्तर:
गट-निरपेक्ष आन्दोलन के दो मुख्य संस्थापकों में, भारत के प्रधानमन्त्री पं० जवाहरलाल नेहरू एवं युगोस्लाविया के जोसेफ ब्राज़ टीटो शामिल हैं। पहला गुट-निरपेक्ष आन्दोलन शिखर सम्मेलन निम्नलिखित तीन कारकों की परिणति था

(1) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के पाँचों संस्थापक देशों (भारत, युगोस्लाविया, मिस्र, इंडोनेशिया तथा घाना) के बीच सहयोग की इच्छा।
(2) प्रथम गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की दूसरी परिणति शीत युद्ध का प्रसार और इसका बढ़ता हुआ दायरा था।
(3) 1960 के दशक में बहुत-से नव स्वतन्त्रता प्राप्त देशों का उदय हुआ, जिन्हें एक मंच की आवश्यकता थी और वो मंच गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने प्रदान किया।

प्रश्न 18.
क्यूबा प्रक्षेपास्त्र संकट पर एक नोट लिखें।
उत्तर:
क्यूबा अमेरिका के तट से लगा एक छोटा-सा द्वीपीय देश है। क्यूबा साम्यवादी विचारधारा से प्रभावित देश है। 1960 के दशक में जब शीत युद्ध पूरे जोरों पर था, तब सोवियत संघ को इस बात की आशंका थी कि अमेरिका क्यूबा पर आक्रमण करके उसे अपने साथ मिला लेगा। यद्यपि सोवियत संघ क्यूबा को हर तरह की सहायता देता था, परन्तु फिर भी इससे वह सन्तुष्ट नहीं था। अन्ततः 1962 में सोवियत संघ ने क्यूबा में सैनिक अड्डा स्थापित करके वहां पर परमाणु प्रक्षेपास्त्र स्थापित कर दिये। इन प्रक्षेपास्त्रों के कारण अमेरिका पहली बार किसी देश के परमाणु हमले के निशाने पर आ गया।

इससे अमेरिका में हलचल मच गई। अमेरिकन राष्ट्रपति कनेडी ने अमेरिकी लड़ाकू बेड़ों को सोवियत लडाक बेडों को रोकने का आदेश दिया। इससे दोनों देशों के बीच युद्ध की सम्भावना पैदा हो गई। इसे ही क्यूबा प्रक्षेपास्त्र संकट कहा जाता है। युद्ध में अत्यधिक विनाश को देखते हुए दोनों देशों ने युद्ध न करने का निर्णय किया तथा सोवियत संघ ने भी अपने जहाजों की गति या तो धीमी कर ली या वापस हो लिए।

प्रश्न 19.
शीत युद्ध के समय कोई भयंकर एवं विनाशकारी युद्ध नहीं हुआ, कोई चार कारण बताएं।
उत्तर:

  • परमाणु युद्ध से होने वाली हानि को सहने में दोनों पक्ष सक्षम नहीं थे।
  • दोनों पक्ष एक-दूसरे की शक्ति एवं पराक्रम से डरे हुए तथा आशंकित थे।
  • युद्ध होने की स्थिति में इतना अधिक विनाश होता कि उसे किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा सकता था।
  • परमाणु युद्ध की स्थिति में इतना अधिक विनाश होता कि विजेता का निर्णय करना मुश्किल हो जाता।

प्रश्न 20.
शीत युद्ध की कोई चार सैनिक विशेषताओं का उल्लेख करें।
उत्तर:

  • शीत युद्ध में दो शक्तिशाली गुट शामिल थे।
  • दोनों गुटों के पास परमाणु हथियार थे।
  • दोनों गुटों ने सैनिक गठबन्धन किये हुए थे।
  • शीत युद्ध के दौरान दोनों गुटों एवं उनके सहयोगियों से यह आशा की जाती थी कि वे तर्क पूर्ण एवं उत्तरदायित्व वाला व्यवहार करेंगे।

प्रश्न 21.
नाटो संगठन के किन्हीं चार उद्देश्यों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • नाटो संगठन के सदस्य देश शान्ति के समय एक-दूसरे को आर्थिक सहयोग देंगे।
  • एक देश पर आक्रमण सभी देशों पर आक्रमण समझा जाएगा तथा सभी देश उसका मिलकर मुकाबला करेंगे।
  • नाटो के सदस्य देशों के परस्पर आपसी विवाद को बातचीत द्वारा हल किया जाएगा।
  • प्रत्येक देश अपनी सैनिक शक्ति को संगठित करेगा।

प्रश्न 22.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से भारत को प्राप्त होने वाले कोई चार लाभ बताएं ।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष नीति अपनाने के कारण भारत वैश्विक मामलों में स्वतन्त्र भूमिका निभा सका है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन से भारत को विभिन्न देशों से आर्थिक सहयोग बढ़ाने में मदद मिली है।
  • गुट-निरपेक्ष नीति अपनाने के कारण भारत दोनों गुटों से आर्थिक लाभ प्राप्त करने में सफल रहा है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के कारण भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्राप्त हुई है।

प्रश्न 23.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की कोई चार सीमाएं लिखें।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन देश राजनीतिक तथा आर्थिक विकसित देशों को कोई कठोर चुनौती नहीं दे पाए हैं।
  • गुट निरपेक्ष आन्दोलन को भारत-पाकिस्तान सम्बन्धों ने नकारात्मक ढंग से प्रभावित किया है।
  • गुट निरपेक्ष आन्दोलन ईरान-इराक युद्ध को नहीं रोक पाया।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन इराक द्वारा कुवैत पर किये गए आक्रमण को नहीं रोक पाया।

प्रश्न 24.
संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वैश्विक प्रणाली के सुधार के लिए दिए किन्हीं चार प्रस्तावों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • विकासशील देशों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियन्त्रण होगा।
  • विकासशील देश भी अप:’ माल पश्चिमी देशों में बेच सकते हैं।
  • विकासशील देशों को कम लागत पर पश्चिमी देशों से प्रौद्योगिकी प्राप्त होगी।
  • अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक संगठनों में विकासशील देशों की भूमिका को बढ़ाया जाएगा।

प्रश्न 25.
उपनिवेशवाद के अर्थ की व्याख्या करें।
उत्तर:
उपनिवेशवाद का अर्थ है कि एक शक्तिशाली देश द्वारा कमज़ोर देश को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेकर उनका आर्थिक शोषण करना। जैसा कि ब्रिटिश साम्राज्य भारत के विरुद्ध करता था। जे० ए० हाब्सन के अनुसार, “उपनिवेशवाद, राष्ट्रीयता का प्राकृतिक बहाव है, इस परीक्षण, प्रतिनिधि संस्कृति को नए प्राकृतिक तथा सामाजिक वातावरण में, जिनमें वे अपने आप को पाते हैं, प्रतिरोपित करने की औपनिवेशिक शक्ति से किया जा सकता है।”

प्रश्न 26.
शीत युद्ध के दौरान दोनों महाशक्तियों को छोटे सहयोगियों की आवश्यकता क्यों थी ? कोई चार तर्क दें।
अथवा
महाशक्तियों को शीत युद्ध के युग में मित्र राष्ट्रों की आवश्यकता क्यों थी ?
उत्तर:

  • महाशक्तियां छोटे देशों के साथ सैन्य गठबन्धन इसलिए करती थीं, ताकि उन देशों से वे अपने हथियार एवं सेना का संचालन कर सकें।
  • महाशक्तियां छोटे देशों में सैनिक ठिकाने बनाकर दुश्मन देश की जासूसी करते थे।
  • छोटे देश सैन्य गठबन्धन के अन्तर्गत आने वाले सैनिकों को अपने खर्चे पर अपने देश में रखते थे, जिससे महाशक्तियों पर आर्थिक दबाव कम पड़ता था।
  • महाशक्तियां छोटे देशों पर आसानी से अपनी इच्छा थोप सकती थीं।

प्रश्न 27.
गुट-निरपेक्ष देशों में शामिल अधिकांश को”अल्प विकसित देशों” का दर्जा क्यों दिया गया ?
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष देशों में शामिल अधिकांश को अल्प विकसित देश इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनका पूर्ण रूप से विकास नहीं हो पाया था। द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद यूरोपीय, उपनिवेशवादी प्रणाली के विघटन के साथ ही अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर कई ऐसे घटक उपस्थित हुए, जिन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की प्रकृति और रंग-रूप को बदल दिया। इन घटकों में एशिया, अफ्रीका तथा लेटिन अमेरिका में नए राज्यों के उदय ने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा परिवर्तन कर दिया। परन्तु अधिकांश देश आर्थिक रूप से जर्जर स्थिति में थे। इसलिए इन्हें अल्प विकसित देश कहा जाता है।

प्रश्न 28.
ऐसी किन्हीं चार वास्तविकताओं का उल्लेख कीजिए जिसने विश्व राजनीति में शीत युद्ध के पश्चात् बदलाव लाया।
उत्तर:
शीत युद्ध के पश्चात् निम्नलिखित कारणों से विश्व राजनीति में बदलाव आए–

  • शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही दोनों गुटों में चलने वाला वैचारिक संघर्ष भी समाप्त हो गया और यह विवाद भी समाप्त हो गया कि क्या समाजवादी व्यवस्था पूंजीवादी व्यवस्था को परास्त कर सकेगी।
  • शीत युद्ध के पश्चात् विश्व में शक्ति सम्बन्ध बदल गए तथा विचारों एवं संस्थाओं के सापेक्षिक प्रभाव भी बदल गए।
  • शीत युद्ध के पश्चात् उदारीकरण एवं निजीकरण ने विश्व राजनीति को बहुत अधिक प्रभावित किया है।
  • शीत युद्ध के पश्चात् उदारवादी लोकतान्त्रिक राज्यों का उदय हुआ, जो राजनीतिक जीवन के लिए सर्वोत्तम प्रणाली है।

प्रश्न 29.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ न तो अन्तर्राष्ट्रीय मामलों से अलग-अलग रहना था और न ही तटस्थता था। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता की धारणा स्वयं को न तो अन्तर्राष्ट्रीय विषयों से अलग ही रखती है और न ही वह तटस्थ रहती है अर्थात् गुट-निरपेक्षता. की धारणा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर होती प्रत्येक महत्त्वपूर्ण घटना में अपनी सकारात्मक भूमिका निभाती है। गुट-निरपेक्षता की अवधारणा तटस्थता की अवधारणा से बिलकुल भिन्न है।

तटस्थता का अर्थ किसी भी मुद्दे पर उसके गुण-दोषों के भिन्न उसमें भाग न लेना है। तटस्थता का अर्थ है, पहले से ही किसी मुद्दे पर उसके गुण-दोषों को दृष्टि में रखे बिना अपना दृष्टिकोण तथा पक्ष बनाए रखना। इसके विपरीत गुट-निरपेक्षता का अर्थ शीतयुद्ध का दौर है अपना दृष्टिकोण पहले से ही घोषित न करना।

कोई भी गुट-निरपेक्ष देश किसी भी मुद्दे के पैदा होने पर उसे अपने दृष्टिकोण से देखकर निर्णय करता था, न कि किसी बड़ी शक्ति के दृष्टिकोण से देखकर। तटस्थता की धारणा केवल युद्ध के समय संगत है और तटस्थता का अर्थ है अपने आपको युद्ध से अलग करना। परन्तु गुट-निरपेक्षता की धारणा युद्ध एवं शान्ति दोनों में प्रासंगिक है।

प्रश्न 30.
शीत युद्ध के चार कारण लिखें।
अथवा
शीत युद्ध के कोई चार प्रमुख कारण लिखिये।।
उत्तर:
1. विचारधारा सम्बन्धित कारण-पश्चिमी विचारधारा के अनुसार साम्यवाद के सिद्धान्त तथा व्यवहार में इसके जन्म से ही शीत युद्ध के कीटाणु भरे हुए थे। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति पर रूस द्वितीय विजेता के रूप में प्रकट हुआ था तथा यह द्वितीय महान् शक्ति था। अमेरिका तथा रूस वास्तव में दो ऐसी पद्धतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनमें कभी तालमेल नहीं हो सकता तथा जो पूर्णतया एक-दूसरे की विरोधी पद्धतियां हैं।

2. रूस की विस्तारवादी नीति-शीत युद्ध के लिए एक अन्य कारण के लिए भी पश्चिमी राज्य रूस को उत्तरदायी ठहराते हैं। उनका कहना है कि युद्ध के बाद भी रूस ने अपनी विस्तारवादी नीति को जारी रखा। इस प्रकार अमेरिका के मन में उसकी विस्तारवादी नीति के बारे में सन्देह होता चला गया, जिसको रोकने के लिए उसने भी कुछ कदम उठाए जिन्होंने शीत युद्ध को बढ़ावा दिया।

3. अमेरिका की विस्तारवादी नीति-साम्यवादी लेखकों के अनुसार शीत युद्ध का प्रमुख कारण अमेरिका की संसार पर प्रभुत्व जमाने की साम्राज्यवादी आकांक्षा में निहित था।

4. एटम बम का रहस्य गुप्त रखना-अमेरिका द्वारा सोवियत संघ से एटम बम का रहस्य गुप्त रखना भी शीत युद्ध का एक कारण है।

प्रश्न 31.
विकासशील देशों की मुख्य मांगें क्या हैं ? कोई चार बताएं।
अथवा
विकासशील देशों की किन्हीं चार मुख्य मांगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:

  • विकासशील देशों की प्रथम मांग नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था को लागू करना है, ताकि विकसित एवं विकासशील देशों में समानता आ सके।
  • विकासशील देश सदैव इस बात की मांग करते रहे हैं कि विकसित देश उनके आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए धन प्रदान करें, क्योंकि विकसित देशों ने विकासशील देशों का शोषण करके ही धन कमाया है।
  • विकासशील देश संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने लिए और अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका की मांग कर रहे हैं।
  • विकासशील देशों पर वित्तीय ऋणों के भार को कम करना।

प्रश्न 32.
कठोर द्वि-ध्रुवीयता से आपका क्या अभिप्राय है ?
उत्तर:
कठोर द्वि-ध्रुवीयता से अभिप्राय शीत युद्ध के 1945 से 1955 के समय काल से लिया जाता है जब दोनों गुटों ने अपने-अपने सदस्य राज्यों को पूर्ण रूप से नियन्त्रित कर रखा था। इस समय काल में दोनों गुटों में शामिल कोई भी सदस्य राज्य अपनी आन्तरिक एवं विदेश नीति बनाने में पूर्ण रूप से स्वतन्त्र नहीं था, बल्कि उसे अपने गुट के नेता के अनुसार ही नीतियां बनानी पड़ती थीं। इसीलिए सदस्य राज्यों की नीतियां पूर्ण रूप से वाशिंगटन एवं मास्को के आस-पास ही घूमती थीं।

प्रश्न 33.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के किन्हीं चार उद्देश्यों का वर्णन करो।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों को शक्ति गुटों से अलग रखना है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाना है।
  • सदस्य देशों में सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना।
  • उपनिवेशवाद एवं साम्राज्यवाद को समाप्त करना इसका एक मुख्य उद्देश्य रखा गया है।

प्रश्न 34.
क्या शीत युद्ध की समाप्ति के बाद गुट-निरपेक्ष आन्दोलन प्रासंगिक रह गया है ? स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
शीत युद्ध की समाप्ति के पश्चात् गुट-निरपेक्ष आन्दोलन निम्नलिखित कारणों से प्रासंगिक है

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
  • निशस्त्रीकरण, विश्व शांति एवं मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
  • यह आन्दोलन नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था की स्थापना के लिए आवश्यक है।
  • विकसित एवं विकासशील देशों में सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए प्रासंगिक है।

अति लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1.
शीत युद्ध का अर्थ स्पष्ट करें।
अथवा
“शीत युद्ध” से आपका क्या अभिप्राय है?
उत्तर:
शीत युद्ध से अभिप्राय दो राज्यों अमेरिका तथा रूस अथवा दो गुटों के बीच व्याप्त उन कटु सम्बन्धों के इतिहास से है, जो तनाव, भय तथा ईर्ष्या पर आधारित है। इसके अन्तर्गत दोनों गुट एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाने के लिए प्रादेशिक संगठनों के निर्माण, सैनिक गठबन्धन, जासूसी, आर्थिक सहायता, प्रचार, सैनिक हस्तक्षेप तथा अधिकाधिक शस्त्रीकरण जैसी बातों का सहारा लेते हैं।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 2.
शीत युद्ध की कोई दो परिभाषाएं दें।
उत्तर:
1. पं० नेहरू के अनुसार, “शीत युद्ध पुरातन सन्तुलन की अवधारणा का नया रूप है। यह दो विचारधाराओं का संघर्ष न होकर, दो भीमाकार शक्तियों का आपसी संघर्ष है।”
2. जान फास्टरं डलेस के अनुसार, “शीत युद्ध नैतिक दृष्टि से धर्म युद्ध था अच्छाई का बुराई के विरुद्ध, सही का ग़लत के विरुद्ध एवं धर्म का नास्तिकों के विरुद्ध संघर्ष था।”

प्रश्न 3.
शीत युद्ध के कोई दो कारण बताएं।
उत्तर:

  • पश्चिमी विचारधारा के अनुसार, साम्यवाद के सिद्धान्त तथा व्यवहार में इसके जन्म से ही शीत युद्ध के कीटाणु भरे हुए थे।
  • साम्यवादी लेखकों के अनुसार शीत युद्ध का प्रमुख कारण अमेरिका की संसार पर प्रभाव जमाने की महत्त्वाकांक्षा में निहित है।

प्रश्न 4.
गुट-निरपेक्षता के कोई दो उद्देश्य लिखें।
उत्तर:

  • गट-निरपेक्षता आन्दोलन का मख्य उद्देश्य सदस्य देशों को शक्ति गटों से अलग रखना था।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाना था।

प्रश्न 5.
देतान्त से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
देतान्त (Detente) एक फ्रांसीसी शब्द है, जिसका शाब्दिक अर्थ है, शिथिलता अथवा तनाव शैथिल्य। जिन राज्यों में पहले तनावयुक्त स्पर्धा, ईर्ष्या तथा विरोध के सम्बन्ध रहे हों, उनमें इस प्रकार के सम्बन्धों के स्थान पर मित्रतापूर्वक सम्बन्धों का स्थापित हो जाना। अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में देतान्त शब्द का प्रयोग मुख्य रूप से दो महान् शक्तियों अर्थात् रूस तथा अमेरिका के सन्दर्भ में किया जाता है।

प्रश्न 6.
किसी एक परमाणु युद्ध की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
विश्व में अब तक केवल एक बार परमाणु बमों का प्रयोग किया गया था। अगस्त, 1945 में संयुक्त राज्य अमेरिका ने दूसरे विश्व युद्ध के समय जापान के दो शहरों हिरोशिमा एवं नागासाकी पर परमाणु बम गिराये थे। इन बमों से इन दोनों शहरों को अत्यधिक हानि हुई। सैंकड़ों लोग मारे गए एवं लाखों लोग घायल एवं अपाहिज हो गए। इस परमाणु युद्ध का प्रभाव जापान के दोनों शहरों तथा लोगों पर आज भी देखा जा सकता है। इस घटना के तुरन्त बाद जापान ने अपनी हार स्वीकार कर ली और द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया।

प्रश्न 7.
द्वितीय महायुद्ध में मित्र राष्ट्रों के समूह में शामिल किन्हीं चार देशों के नाम लिखिए।
उत्तर:

  • इंग्लैंड,
  • फ्रांस,
  • रूस,
  • संयुक्त राज्य अमेरिका।

प्रश्न 8.
सोवियत संघ तथा अमेरिका के द्वारा परस्पर विरोधी दुष्प्रचार ने किस प्रकार शीत युद्ध को बढ़ावा दिया ?
उत्तर:
सोवियत संघ तथा अमेरिका के द्वारा परस्पर विरोधी दुष्प्रचार ने शीत युद्ध को बहुत अधिक बढ़ावा दिया। सभी समाचार-पत्रों प्रावदा तथा इजवेस्तिया इत्यादि ने अमेरिका विरोधी प्रचार अभियान शुरू किया। इसमें आलोचनात्मक लेख प्रकाशित किये गए। इसी तरह पश्चिमी देशों ने भी सोवियत संघ की आलोचना करते हुए सोवियत संघ को ‘गुण्डों का नीच गिरोह’ तक कहा। अमेरिकी समाचार-पत्रों ने आगे लिखा कि साम्यवाद के प्रसार से इसाई सभ्यता को डूबने का खतरा है। इस प्रकार के लेखों ने शीत युद्ध को और अधिक बढ़ावा दिया।

प्रश्न 9.
अपरोध का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
परमाणु युद्ध होने की स्थिति में विजेता का निर्णय करना असम्भव हो जाता है। यदि एक गुट दूसरे गुट पर आक्रमण करके उसके परमाणु हथियारों को नष्ट करने का प्रयास करता है, तब भी विरोधी गुट के पास इतने परमाणु हथियार बचे रहते हैं, जिससे वह विरोधी देश पर आक्रमण करके उसे तहस-नहस कर सकता है। इस प्रकार की स्थिति को अपरोध की स्थिति कहते हैं।

प्रश्न 10.
गुट-निरपेक्षता का अर्थ बताएं।
अथवा
गुट-निरपेक्षता का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है, किसी शक्ति गुट में शामिल न होना और शक्ति गुटों से सैनिक बन्धनों व अन्य सन्धियों से दूर रहना। गुट-निरपेक्षता का अर्थ तटस्थता नहीं है, बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं के हल के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाना है। गुट-निरपेक्षता का अर्थ बराबर दूरी भी नहीं है, क्योंकि गुट-निरपेक्ष देश अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में उस देश या गुट का पक्ष लेते हैं, जो सही हो।।

प्रश्न 11.
बांडुंग सम्मेलन (1955) पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
अप्रैल, 1955 में बांडंग स्थान में एशिया और अफ्रीकी राष्टों का एक सम्मेलन हआ जिसमें 29 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में उपस्थित सभी देशों ने पंचशील के सिद्धान्तों को स्वीकार करने के साथ साथ इनका विस्तार भी किया, अर्थात् पांच सिद्धान्तों के स्थान पर दस सिद्धान्तों की स्थापना की गई।

इस सम्मेलन में एशियाई तथा अफ्रीकी देशों के आधुनिकीकरण पर जोर दिया गया तथा महान् शक्तियों का अनावश्यक अनुसरण न करने पर बल दिया गया। इस सम्मेलन में सभी राज्यों की पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्नता और राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने, किसी राज्य पर सैनिक आक्रमण न करने तथा किसी राज्य के आन्तरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने पर बल दिया गया।

प्रश्न 12.
बेलग्रेड शिखर सम्मेलन पर एक संक्षिप्त नोट लिखो।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन सितम्बर, 1961 में बेलग्रेड में हुआ। इस सम्मेलन में 25 एशियाई तथा अफ्रीकी व एक यूरोपियन राष्ट्र ने भाग लिया। लैटिन अमेरिका के तीन राष्ट्रों ने पर्यवेक्षकों के रूप में सम्मेलन में भाग लिया। सम्मेलन में महाशक्तियों से अपील की गई कि वे विश्व शान्ति तथा निशस्त्रीकरण के लिए कार्य करें।

विश्व के सभी भागों एवं रूपों में उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, नव-उपनिवेशवाद तथा नस्लवाद की घोर निन्दा की गई। बेलग्रेड सम्मेलन में 20 सूत्रीय घोषणा-पत्र को स्वीकार किया गया। इस घोषणा में कहा गया कि विकासशील राष्ट्र बिना किसी भय व बाधा के आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विकास को प्रेरित करें।

प्रश्न 13.
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था (NIEO) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था से अभिप्राय है विकासशील देशों को खाद्य सामग्री उपलब्ध कराना, साधनों को विकसित देशों से विकासशील देशों में भेजना, वस्तुओं सम्बन्धी समझौते करना तथा पुरानी परम्परावादी उपनिवेशिक अर्थव्यवस्था के स्थान पर निर्धन तथा वंचित देशों के साथ न्याय करना। नई अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था के अन्तर्गत, विकसित राष्ट्रों के लिए एक आचार-संहिता बना कर तथा कम विकसित राष्ट्रों के उचित अधिकारों को मानकर अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था को सबके लिए समान तथा न्यायपूर्ण बनाना है।

प्रश्न 14.
उत्तरी एटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
उत्तरी एटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) विश्व का एक महत्त्वपर्ण सैनिक संगठन है जिसका निर्माण 1949 युद्ध के दौरान किया गया था। नाटो में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, कनाडा तथा पश्चिमी जर्मनी जैसे देश शामिल हैं। इस संगठन की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पश्चिमी यूरोप में सोवियत संघ के विस्तार को रोकना था।

प्रश्न 15.
वारसा पैक्ट से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
वारसा पैक्ट शीत युद्ध के दौरान नाटो के उत्तर में साम्यवादी देशों द्वारा मई, 1955 में बनाया गया क्षेत्रीय सैनिक गठबन्धन था। इस संगठन में सोवियत संघ, पोलैण्ड, पूर्वी जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया, हंगरी, बुल्गारिया तथा रूमानिया जैसे साम्यवादी देश शामिल थे। सोवियत संघ इस संगठन का सर्वेसर्वा था। परन्तु शीत युद्ध की समाप्ति के साथ ही फरवरी, 1991 में वारसा पैक्ट भी समाप्त हो गया।

प्रश्न 16.
केन्द्रीय सन्धि संगठन (सैन्टो) से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
केन्द्रीय सन्धि संगठन आरम्भ में बगदाद समझौते (1955) के रूप में सामने आया जोकि तुर्की और इराक के बीच हुआ था। परन्तु 1959 में इराक इस सन्धि से अलग हो गया जिसके कारण इसका नाम बदलकर सैन्टो कर दिया गया। सैन्टो में ईरान, पाकिस्तान, इंग्लैण्ड तथा अमेरिका थे। इस सन्धि का निर्माण मुख्य रूप से सोवियत संघ के विरुद्ध ही किया गया था। परन्तु 1979 में यह संगठन समाप्त हो गया।

प्रश्न 17.
दक्षिण-पूर्वी एशिया सन्धि संगठन (सीटो) का क्या अर्थ है ?
उत्तर:
दक्षिण-पूर्वी एशिया सन्धि संगठन (सीटो) की स्थापना 1954 में की गई। इस संगठन में ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, ब्रिटेन, न्यूज़ीलैण्ड, पाकिस्तान, फिलीपाइन्स, थाइलैण्ड तथा अमेरिका शामिल थे। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-पूर्वी एशिया में साम्यवादी प्रसार को रोकना था। परन्तु 1977 में यह संगठन समाप्त हो गया।

प्रश्न 18.
शीत युद्ध के उदाहरण सहित दो अखाड़ों का वर्णन करें।
उत्तर:

  • अफ़गानिस्तान-शीत युद्ध का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अखाड़ा अफगानिस्तान रहा है।
  • संयुक्त राष्ट्र-शीत युद्ध का दूसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अखाड़ा संयुक्त राष्ट्र रहा है।

प्रश्न 19.
गुट-निरपेक्ष आंदोलन को शुरू करने वाले तीन मुख्य देशों और उनके नेताओं के नाम लिखिए।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का जन्म शीत युद्ध के दौरान हुआ। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य भी स्वयं को शीत युद्ध से दूर रखना था। भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक देश है। भारत के तत्कालीन प्रधानमन्त्री पं० नेहरू, युगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो और मिस्त्र के तत्कालिक राष्ट्रपति जमाल नासिर गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक हैं।

प्रश्न 20.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के कोई चार महत्त्व लिखें।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने सदस्य देशों में सामाजिक एवं आर्थिक सहयोग को बढावा दिया है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाया है।।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने उपनिवेशवाद को समाप्त करने में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन ने सदस्य देशों को शीत युद्ध से दूर रखा।

प्रश्न 21.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में भारत की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • भारत गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक देश है।
  • भारत ने गुट-निरपेक्ष देशों को आतंकवाद के विरुद्ध एकजुट होने का आह्वान किया है।
  • भारत की पहल पर अफ्रीका कोष कायम किया गया।
  • भारत ने गुट-निरपेक्ष देशों का ध्यान निःशस्त्रीकरण की तरफ खींचा।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

प्रश्न 22.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को आरम्भिक दौर में एक दिशा एवं आकार प्रदान करने में भारत की भूमिका की व्याख्या करें।
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन को प्रारम्भिक दौर में एक दिशा एवं आकार प्रदान करने में भारत की भूमिका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही है। गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के उदय के समय इसकी संख्या केवल 25 थी, परन्तु भारत के प्रयासों से अब इसकी संख्या 120 हो गई है। इसी प्रकार 1955 में बांडुंग सम्मेलन तथा 1961 में हुए बेलग्रेड सम्मेलन में इस आन्दोलन के मुख्य सिद्धान्तों एवं उद्देश्यों को निर्धारित करने में भारत ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रश्न 23.
उपनिवेशीकरण की समाप्ति एवं गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के विस्तार के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन एवं उपनिवेशीकरण की समाप्ति एक-दूसरे से सम्बन्धित है। जैसे-जैसे उपनिवेश समाप्त होते गए, वैसे-वैसे गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का विस्तार होता गया। क्योंकि अधिकांश उपनिवेशी राज्य स्वतन्त्र होकर गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में शामिल होते गए। इसीलिए जहां 1961 के बेलग्रेड सम्मेलन में केवल 25 देश शामिल थे, वहीं 2019 में हुए अजरबैजान सम्मेलन में इनकी संख्या 120 थी।

प्रश्न 24.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रकृति की व्याख्या करें।
उत्तर:
गट-निरपेक्ष आन्दोलन की प्रकति अपने आप में अनोखी है। वास्तव में इस आन्दोलन की प्रकति विषमांग स्वरूप की रही है। उदाहरण के लिए इसमें विकासशील देशों की संख्या अधिक है, जबकि विकसित देशों की कम। गुट-निरपेक्ष देशों में वैचारिक समानता का भी अभाव है अर्थात् इस आन्दोलन में उदारवादी, साम्यवादी तथा सुधारवादी सभी प्रकार के देश शामिल हैं। इस आन्दोलन में भिन्न-भिन्न जातियों एवं क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व प्राप्त है।

प्रश्न 25.
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के अन्तर्गत ‘अफ्रीकी सहायता कोष’ तथा ‘पृथ्वी संरक्षण कोष’ की स्थापना कब, कहां और किस देश की पहल पर हुई ?
उत्तर:
अफ्रीकी कोष की स्थापना भारत की पहल पर सन् 1986 में जिम्बाबवे की राजधानी हरारे में हुए 8वें गुट निरपेक्ष आन्दोलन के शिखर सम्मेलन में की गई जबकि ‘पृथ्वी संरक्षण कोष’ की भी स्थापना भारत की पहल पर ही 1989 में युगोस्लाविया की राजधानी बेलग्रेड में हुए 9वें गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के शिखर सम्मेलन में की गई।

प्रश्न 26.
‘आंशिक परमाण प्रतिबन्ध सन्धि 1963’ के विषय में आप क्या जानते हैं ?
उत्तर:
आंशिक परमाणु प्रतिबन्ध सन्धि 5 अगस्त, 1963 में की गई। इस सन्धि का प्रमुख उद्देश्य परमाणु परीक्षणों को नियन्त्रित करना था। इस सन्धि पर अमेरिका, सोवियत संघ तथा ब्रिटेन ने हस्ताक्षर किये थे। यह सन्धि 10 अक्तूबर, 1963 को लागू हो गई। इस सन्धि के अन्तर्गत वायुमण्डल, पानी के अन्दर तथा बाहरी अन्तरिक्ष में परमाणु परीक्षण करने पर प्रतिबन्ध लगाया गया था।

प्रश्न 27.
स्टार्ट-II सन्धि की व्याख्या करें।
उत्तर:
स्टार्ट-II (Strategic Arms Reduction Treaty-II) अर्थात् सामाजिक अस्त्र न्यूनीकरण सन्धि पर 3 जनवरी, 1993 को अमेरिका एवं रूस ने हस्ताक्षर किए। इस सन्धि का मुख्य उद्देश्य खतरनाक हथियारों को नियन्त्रित करने एवं उनकी संख्या कम करने से है, ताकि जनसंहार को रोका जा सके।

प्रश्न 28.
1919 में सोवियत संघ के पतन के बाद भारत किन दो तरीकों से रूस से सम्बन्ध रखकर लाभान्वित हुआ ?
उत्तर:

  • भारत रूस से भी उसी प्रकार सम्बन्ध बनाने में सफल रहा, जिस प्रकार सोवियत संघ के साथ थे।
  • भारत को रूस के माध्यम से इससे अलग हुए गणराज्यों से भी सम्बन्ध बनाने में आसानी हुई।

प्रश्न 29.
निम्नलिखित में से गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के दो संस्थापकों के नामों की पहचान करें
(क) यासर अराफात
(ख) नेलसन मंडेला
(ग) डॉ० सुकर्णो
(घ) मार्शल टीटो।
उत्तर:
(ग) डॉ० सुकर्णो,
(घ) मार्शल टीटो।

प्रश्न 30.
1945 से 1990 तक किन्हीं दो महत्त्वपूर्ण विश्व राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या करें।
उत्तर:

  • दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात् विश्व राजनीति में अमेरिका एवं सोवियत संघ और अधिक मज़बूत होकर उभरे।
  • इस समय दोनों गुटों से अलग रहने वाले देशों ने गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की शुरुआत की।

प्रश्न 31.
शीत युद्ध अपनी चरम सीमा पर कब पहुंचा ?
उत्तर:
शीत युद्ध अपनी चरम सीमा पर सन् 1962 में पहुंचा, जब सोवियत संघ ने क्यूबा में परमाणु प्रक्षेपास्त्र तैनात कर दिये थे। इसमें सोवियत संघ एवं अमेरिका में युद्ध की स्थिति पैदा हो गई।

प्रश्न 32.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका की विदेश नीति के कोई दो सिद्धान्त बताएं।
उत्तर:

  • द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने विश्व में स्वतन्त्रता एवं समानता की रक्षा को उस समय उद्देश्य बनाया।
  • अमेरिका की विदेश नीति का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त विश्व में साम्यवाद के प्रसार को रोकना था।

प्रश्न 33.
शीत युद्ध के युग में एक पूर्वी गठबन्धन और तीन पश्चिमी गठबन्धनों के नाम लिखिए।
उत्तर:
शीत युद्ध के युग में पूर्वी गठबन्धन द्वारा वारसा पैक्ट तथा पश्चिमी गठबन्धन द्वारा नाटो, सैन्टो तथा सीटो जैसे गठबन्धन बनाए।

प्रश्न 34.
शीत युद्ध के दायरे से आप क्या समझते हैं ?
उत्तर:
शीत युद्ध के दायरों से हमारा अभिप्राय यह है कि विश्व के किन-किन क्षेत्र विशेष या देश विशेष के कारण शीत युद्ध बढ़ा अथवा शीत युद्ध का प्रभाव किन क्षेत्रों में अधिक देखा गया। उदाहरण के लिए शीत युद्ध के दायरे में अफ़गानिस्तान को शामिल किया जा सकता है।

प्रश्न 35.
कोई दो कारण दीजिए कि छोटे देशों ने शीत युद्ध के युग की मैत्री सन्धियों में महाशक्तियों के साथ अपने-आप को क्यों जोड़ा ?
उत्तर:

  • छोटे देश महाशक्तियों के साथ अपने निजी हितों की रक्षा के लिए जुड़े।
  • छोटे देश महाशक्तियों के साथ इसलिए जुड़े क्योंकि उन्हें स्थानीय प्रतिद्वन्द्वी, देश के विरुद्ध सुरक्षा, हथियार तथा आर्थिक सहायता मिलती थी।

प्रश्न 36.
गुट-निरपेक्षता के मुख्य उद्देश्य बताएं।
अथवा
गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के कोई दो उद्देश्य लिखिये।
उत्तर:

  • गुट-निरपेक्षता का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों को शक्ति गुटों से अलग रखना था।
  • गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का उद्देश्य विकासशील देशों के सम्मान एवं प्रतिष्ठा को बढ़ाना था।

प्रश्न 37.
तृतीय विश्व के देशों द्वारा नई अन्तर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की मांग करने के कोई दो कारण लिखिये।
उत्तर:

  • पूर्वी एवं दक्षिणी विश्व के देश अपनी आत्मनिर्भरता के लिए पश्चिमी देशों पर निर्भर थे।
  • विश्व अर्थव्यवस्था पर विकसित देशों का एकाधिकार ।

वस्तुनिष्ठ प्रश्न

1. शीत युद्ध किन दो गुटों से सम्बन्धित था ?
(A) चीन-पाकिस्तान
(B) अमेरिका गुट-सोवियत गुट
(C) फ्रांस-ब्रिटेन
(D) जर्मनी-इटली।
उत्तर:
(B) अमेरिका गुट-सोवियत गुट।

2. निम्न में से शीत युद्ध का सही अर्थ क्या है ?
(A) अमेरिकी एवं सोवियत गुट के बीच व्याप्त कटु सम्बन्ध जो तनाव, भय एवं ईर्ष्या पर आधारित थे।
(B) तानाशाही व्यवस्था
(C) लोकतान्त्रिक व्यवस्था
(D) दोनों में से कोई नहीं।
उत्तर:
(A) अमेरिकी एवं सोवियत गुट के बीच व्याप्त कटु सम्बन्ध जो तनाव, भय एवं ईर्ष्या पर आधारित थे।

3. अमेरिकन गुट ने किस सैनिक गठबन्धन का निर्माण किया ?
(A) नाटो
(B) सीटो
(C) सैन्टो
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

4. सोवियत गुट ने निर्माण किया
(A) नाटो
(B) सीटो
(C) वारसा पैक्ट
(D) सैन्टो।
उत्तर:
(C) वारसा पैक्ट।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

5. भारत ने शीत युद्ध से अलग रहने के लिए किस आन्दोलन की शुरुआत की ?
(A) असहयोग आन्दोलन
(B) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन
(C) सविनय अवज्ञा आन्दोलन
(D) भारत छोड़ो आन्दोलन।
उत्तर:
(B) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन।

6. नाटो (NATO) सन्धि का निर्माण कब किया गया ?
(A) सन् 1945 में
(B) सन् 1947 में
(C) सन् 1949 में
(D) सन् 1951 में।
उत्तर:
(C) सन् 1949 में।

7. ‘वारसा संधि’ का निर्माण कब हुआ ?
(A) सन् 1955 में
(B) सन् 1950 में
(C) सन् 1952 में
(D) सन् 1954 में।
उत्तर:
(A) सन् 1955 में।

8. पूंजीवादी देश है
(A) अमेरिका
(B) फ्रांस
(C) इंग्लैंड
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

9. सोवियत गुट (साम्यवादी गुट) में कौन-सा देश शामिल था ?
(A) पोलैण्ड
(B) पूर्वी जर्मनी
(C) बुल्गारिया
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

10. क्यूबा मिसाइल संकट कब हुआ ?
(A) सन् 1959 में
(B) सन् 1961 में
(C) सन् 1962 में
(D) सन् 1965 में।
उत्तर:
(C) सन् 1962 में।

11. शीत युद्ध का आरंभ कब हुआ ?
(A) प्रथम विश्व युद्ध के पहले
(B) प्रथम विश्व युद्ध के बाद
(C) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
(D) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के बाद।
उत्तर:
(C) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद।

12. शीतयुद्ध निम्न में से किसी एक से सम्बन्धित हैं
(A) राजनीतिक अविश्वास से
(B) सैनिक प्रतिस्पर्धा से
(C) वैचारिक मतभेद से
(D) उपरोक्त तीनों से।
उत्तर:
(D) उपरोक्त तीनों से।

13. शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच कौन-सा महाद्वीप अखाड़े के रूप में सामने आया ?
(A) एशिया
(B) दक्षिण अमेरिका
(C) यूरोप
(D) अफ्रीका।
उत्तर:
(C) यूरोप।

14. महाशक्तियों के लिए छोटे देश लाभदायक थे
(A) अपने भू-क्षेत्र के कारण
(B) तेल और खनिज के कारण
(C) सैनिक ठिकाने के कारण
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

15. द्वितीय विश्व युद्ध कब समाप्त हुआ?
(A) सन् 1939 ई० में
(B) सन् 1941 ई० में
(C) सन् 1943 ई० में
(D) सन् 1945 ई० में।
उत्तर:
(D) सन् 1945 ई० में।

16. वारसा पैक्ट किस वर्ष समाप्त कर दिया गया था ?
(A) 1982
(B) 1984
(C) 1991
(D) 1995.
उत्तर:
(C) 1991

17. पूंजीवादी गुट का नेता कौन था ?
(A) सोवियत संघ
(B) अमेरिका
(C) भारत
(D) चीन।
उत्तर:
(B) अमेरिका।

18. साम्यवादी गुट का नेता कौन था ?
(A) भारत
(B) अमेरिका
(C) चीन
(D) सोवियत संघ।
उत्तर:
(D) सोवियत संघ।

19. शीत युद्ध के दौरान विश्व कितने गुटों में बँटा हुआ था ?
(A) दो गुटों में
(B) तीन गुटों में
(C) चार गुटों में
(D) उपर्युक्त में से कोई भी नहीं।
उत्तर:
(A) दो गुटों में।

20. क्यूबा का सम्बन्ध किस महाशक्ति से था ?
(A) सोवियत संघ
(B) अमेरिका
(C) जापान
(D) भारत।
उत्तर:
(A) सोवियत संघ।

21. शीत युद्ध का प्रारम्भ कब हुआ ?
(A) प्रथम विश्व युद्ध से पहले
(B) प्रथम विश्व युद्ध के बाद
(C) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद
(D) गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के बाद।
उत्तर:
(C) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद।

22. अगस्त, 1945 में अमेरिका ने जापान के किन दो शहरों पर परमाणु बम गिराए ?
(A) हिरोशिमा एवं नागासाकी
(B) हिरोशिमा एवं टोक्यो
(C) क्योवे एवं नागासाकी
(D) टोक्यो एवं नागासाकी।
उत्तर:
(A) हिरोशिमा एवं नागासाकी।

23. गोर्बाचोव कब सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने ?
(A) 1980
(B) 1982
(C) 1984
(D) 1985
उत्तर:
(D) 1985.

24. पूर्वी और पश्चिमी जर्मनी के मध्य बनी ‘बर्लिन की दीवार’ को कब गिराया गया ?
(A) सन् 1979 में
(B) सन् 1986 में
(C) सन् 1989 में
(D) सन् 1990 में।
उत्तर:
(C) सन् 1989 में।

25. जर्मनी का एकीकरण कब हुआ ?
(A) 1980 में
(B) 1990 में
(C) 1991 में
(D) 1995 में।
उत्तर:
(B) 1990 में।

26. सोवियत संघ का विघटन कब हुआ था ?
(A) 1985
(B) 1999
(C) 1995
(D) 1991.
उत्तर:
(D) 1991.

27. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के संस्थापक हैं ?
(A) पं० जवाहर लाल नेहरू
(B) जोसेफ ब्रॉज टीटो
(C) गमाल अब्दुल नासिर
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

28. पहला गुट-निरपेक्ष आन्दोलन कहां हुआ था ?
(A) नई दिल्ली
(B) बेलग्रेड
(C) टोक्यो
(D) मास्को।
उत्तर:
(B) बेलग्रेड।

29. पहले गुट-निरपेक्ष आन्दोलन में कितने देश शामिल हुए थे ?
(A) 20
(B) 25
(C) 30
(D) 35.
उत्तर:
(B) 25.

30. निम्नलिखित में से एक देश गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का संस्थापक देश है ?
(A) भारत
(B) पाकिस्तान
(C) नेपाल
(D) मालदीव।
उत्तर:
(A) भारत।

31. निम्न में से किस वर्ष बांडुंग सम्मेलन हुआ ?
(A) 1950
(B) 1952
(C) 1955
(D) 1960.
उत्तर:
(C) 1955.

32. अभी तक गुट-निरपेक्षता के कितने शिखर सम्मेलन हो चुके हैं ?
(A) 14
(B) 17
(C) 16
(D) 18.
उत्तर:
(D) 18.

33. गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का 18वां सम्मेलन कब हुआ ?
(A) 2019
(B) 2004
(C) 2005
(D) 2006.
उत्तर:
(A) 2019.

34. पूर्वी एवं पश्चिमी जर्मनी का एकीकरण किस वर्ष हुआ ?
(A) सन् 1990 में
(B) सन् 1991 में
(C) सन् 1992 में
(D) सन् 1993 में।
उत्तर:
(A) सन् 1990 में।

35. गुट निरपेक्ष देशों की वर्तमान सदस्य संख्या कितनी है?
(A) 114
(B) 116
(C) 118
(D) 120.
उत्तर:
(D) 120.

36. निम्न एक शीत युद्ध का परिणाम है
(A) एक धुव्रीय व्यवस्था
(B) द्वि-धुव्रीय व्यवस्था
(C) बहु-धुव्रीय व्यवस्था
(D) उपरोक्त में से कोई नहीं।
उत्तर:
(B) द्वि-धुव्रीय व्यवस्था।

37. शीत युद्ध के अंत का सबसे बड़ा प्रतीक था
(A) नाटो का गठन
(B) वारसा पैक्ट का गठन
(C) सैन्टो का गठन
(D) बर्लिन की दीवार का गिरना।
उत्तर:
(D) बर्लिन की दीवार का गिरना।

HBSE 12th Class Political Science Important Questions Chapter 1 शीतयुद्ध का दौर

38. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का आरम्भ कब हुआ ?
(A) 1970 के दशक में
(B) 1980 के दशक में
(C) 1990 के दशक में
(D) 2000 के दशक में।
उत्तर:
(A) 1970 के दशक में।

39. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का सम्बन्ध किन देशों से है ?
(A) पूंजीवादी देशों से
(B) विकसित देशों से
(C) विकासशील देशों से
(D) साम्यवादी देशों से।
उत्तर:
(C) विकासशील देशों से।

40. नई अन्तर्राष्ट्रीय आर्थिक व्यवस्था का क्या उद्देश्य है ?
(A) विकासशील देशों पर वित्तीय ऋणों के भार को कम करना
(B) विकासशील देशों द्वारा तैयार माल के निर्णय को प्रोत्साहन देना
(C) विकसित एवं विकासशील देशों के बीच तकनीकी विकास के अन्तर को समाप्त करना
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(D) उपरोक्त सभी।

41. विकासशील तथा विकसित देशों के बीच पाये जाने वाले विवाद को किस नाम से जाना जाता है ?
(A) उत्तर-दक्षिण विवाद
(B) पूर्व-पश्चिम विवाद
(C) उत्तर-पश्चिम विवाद
(D) उपरोक्त सभी।
उत्तर:
(A) उत्तर-दक्षिण विवाद।

42. “शीतयुद्ध का वातावरण निलंबित मृत्युदण्ड के वातावरण के समान तनावपूर्ण होता है।” यह कथन किसका है ?
(A) स्टालिन
(B) चर्चिल
(C) पं०. जवाहर लाल नेहरू
(D) माओ-त्से तुंग।
उत्तर:
(C) पं० जवाहर लाल नेहरू।

रिक्त स्थान भरें

(1) वारसा सन्धि का निर्माण सन् ………… में हुआ।
उत्तर:
(1) 1955,

(2) अभी तक गुट-निरपेक्ष देशों के …………. शिखर सम्मेलन हो चुके हैं।
उत्तर:
18,

(3) द्वितीय विश्व युद्ध सन् 1939 से सन् ………… की अवधि में हुआ।
उत्तर:
1945,

(4) सन् 1961 में गुट-निरपेक्ष देशों का प्रथम सम्मेलन ……………. में हुआ।
उत्तर:
बेलग्रेड,

(5) ………….. संकट के समय शीत युद्ध अपनी चरम सीमा पर था।
उत्तर:
क्यूबा प्रक्षेपास्त्र,

(6) …………… का परिणाम द्वि-ध्रुवीय व्यवस्था थी।
उत्तर:
शीत युद्ध,

(7) क्यूबा मिसाइल संकट सन् ……………. में हुआ।
उत्तर:
1962

(8) …………. को शीत युद्ध की चरम परिणति माना जाता है।
उत्तर:
क्यूबा मिसाइल संकट,

(9) यू-2; विमान जासूसी कांड का सम्बन्ध …………… से माना जाता है।
उत्तर:
शीत युद्ध।

एक शब्द/वाक्य में उत्तर दें

प्रश्न 1.
गुट-निरपेक्ष देशों का 16वां शिखर सम्मेलन अगस्त 2012 में किस देश में हुआ ?
उत्तर:
तेहरान।

प्रश्न 2.
नाटो (NATO) सन्धि का निर्माण कब हुआ ?
उत्तर:
सन् 1949 में।

प्रश्न 3.
शीत युद्ध के दौरान महाशक्तियों के बीच कौन-सा महाद्वीप अखाड़े के रूप में सामने आया ?
उत्तर:
यूरोप

प्रश्न 4.
भारत ने शीत युद्ध से अलग रहने के लिए किस आन्दोलन की शुरुआत की ?
उत्तर:
भारत ने शीत युद्ध से अलग रहने के लिए गुट-निरपेक्ष आन्दोलन की शुरुआत की।

प्रश्न 5.
गुटं-निरपेक्षता का अर्थ लिखें।
उत्तर:
गुट-निरपेक्षता का अर्थ है किसी गुट में शामिल न होना और स्वतन्त्र नीति का अनुसरण करना।

प्रश्न 6.
जर्मनी का एकीकरण किस वर्ष में हुआ?
उत्तर:
सन् 1990 में।

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HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

HBSE 12th Class Political Science भारतीय राजनीति : नए बदलाव Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
उन्नी-मुन्नी ने अखबार की कुछ कतरनों को बिखेर दिया है। आप इन्हें कालक्रम के अनुसार व्यवस्थित करें
(क) मण्डल आयोग की सिफ़ारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा
(ख) जनता दल का गठन
(ग) बाबरी मस्जिद का विध्वंस
(घ) इन्दिरा गांधी की हत्या
(ङ) राजग सरकार का गठन
(च) संप्रग सरकार का गठन
(छ) गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम।
उत्तर:
(क) इन्दिरा गांधी की हत्या (सन् 1984)
(ख) जनता दल का गठन (सन् 1988)
(ग) मण्डल आयोग की सिफ़ारिश और आरक्षण विरोधी हंगामा (सन् 1990)
(घ) बाबरी मस्जिद का विध्वंस (सन् 1992)
(ङ) राजग सरकार का गठन (सन् 1999)
(च) गोधरा की दुर्घटना और उसके परिणाम (सन् 2002)
(छ) संप्रग सरकार का गठन (सन् 2004)

प्रश्न 2.
निम्नलिखित में मेल करें
(क) सर्वानुमति की राजनीति – (i) शाहबानो मामला
(ख) जाति आधारित दल – (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार
(ग) पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय – (iii) गठबन्धन सरकार
(घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत – (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति
उत्तर:
(क) सर्वानुमति की राजनीति – (iv) आर्थिक नीतियों पर सहमति
(ख) जाति आधारित दल – (ii) अन्य पिछड़ा वर्ग का उभार
(ग) पर्सनल लॉ और लैंगिक न्याय – (i) शाहबानो मामला
(घ) क्षेत्रीय पार्टियों की बढ़ती ताकत – (iii) गठबन्धन सरकार

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 3.
1989 के बाद की अवधि में भारतीय राजनीति के मुख्य मुद्दे क्या रहे हैं ? इन मुद्दों से राजनीतिक दलों के आपसी जुड़ाव के क्या रूप सामने आए हैं ?
उत्तर:
1989 के बाद भारतीय राजनीति में जो मुद्दे उभरे, उनमें कांग्रेस का कमज़ोर होना, मण्डल आयोग की सिफारिशें एवं आन्दोलन, आर्थिक सुधारों को लागू करना, राजीव गांधी की हत्या तथा अयोध्या मामला प्रमुख हैं। इन सभी मुद्दों ने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की तथा भारत में गठबन्धनवादी सरकारों का युग शुरू हुआ जो वर्तमान समय में भी जारी है।

1989 में वी०पी० सिंह की सरकार को आश्चर्यजनक ढंग से वाम मोर्चा एवं भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही समर्थन दिया, इसी तरह आगे चलकर अपने राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए कई ऐसे दलों ने आपस में समझौता किया, जोकि परस्पर कट्टर विरोधी थे, उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी का समझौता, भारतीय जनता पार्टी एवं बहुजन समाज पार्टी का समझौता तथा दक्षिण में कांग्रेस एवं डी० एम० के० पार्टी का समझौता इत्यादि। ये सभी समझौते 1989 के बाद बने गठबन्धन सरकारों के कारण ही हुए।

प्रश्न 4.
“गठबन्धन की राजनीति के इस नए दौर में राजनीतिक दल विचारधारा को आधार मानकर गठजोड़ नहीं करते हैं।’ इस कथन के पक्ष या विपक्ष में आप कौन-से तर्क देंगे ?
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 13 देखें।

प्रश्न 5.
आपात्काल के बाद के दौर में भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। इस दौर में इस पार्टी के विकास-क्रम का उल्लेख करें।
उत्तर:
आपात्काल के बाद निस्संदेह भाजपा एक महत्त्वपूर्ण शक्ति के रूप में उभरी। सन् 1980 में अपनी स्थापना के बाद भाजपा भारतीय राजनीति में सदैव आगे ही बढ़ती रही। 1989 के नौवीं लोकसभा चुनाव में इसे 88 सीटें प्राप्त हुईं तथा इसके समर्थन से जनता दल की सरकार बनी। 1996 में हुए 11 वीं लोकसभा के चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभर कर सामने आई तथा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व के केन्द्र में पहली बार सरकार का निर्माण किया।

1998 में हुए 12वीं लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने सर्वाधिक 181 सीटें जीतकर पुन: वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनाई। 1999 में हुआ 13वीं लोकसभा का चुनाव भाजपा ने राजग के घटक के रूप में लड़ा तथा इस गठबन्धन ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। अतः एक बार फिर वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने गठबन्धन सरकार बनाई। इस पार्टी ने अप्रैल-मई, 2004 में हुए 14वें लोकसभा चुनाव में 138 एवं अप्रैल-मई, 2009 में हुए 15वीं लोकसभा चुनाव में 116 सीटें जीतकर, दोनों बार लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी।

2014 एवं 2019 में हुए 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनावों में भाजपा ने क्रमश: 282 एवं 303 सीटें जीतकर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया तथा श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में सरकार का निर्माण किया। केन्द्र के अतिरिक्त भाजपा ने समय-समय पर उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, अमस, त्रिपुरा, झारखण्ड, उत्तराखण्ड, दिल्ली, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश तथा हरियाणा में अपने दम पर सरकारें बनाई तथा पंजाब, महाराष्ट्र उड़ीसा, जम्मू-कश्मीर, बिहार तथा गोवा जैसे राज्यों में गठबन्धन सरकार का निर्माण किया।

प्रश्न 6.
कांग्रेस के प्रभुत्व का दौर समाप्त हो गया है। इसके बावजूद देश की राजनीति पर कांग्रेस का असर लगातार कायम है। क्या आप इस बात से सहमत हैं ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
देश की राजनीति पर से, यद्यपि कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हो गया है, परन्तु अभी कांग्रेस का असर कायम है। क्योंकि अब भी भारतीय राजनीति कांग्रेस के इर्द-गिर्द ही घूम रही है तथा सभी राजनीतिक दल अपनी नीतियां एवं योजनाएं कांग्रेस को ध्यान में रखकर बनाते हैं। 2004 के 14वीं एवं 2009 में 15वीं लोकसभा के चुनावों में इसने अन्य दलों के सहयोग से केन्द्र में सरकार बनाई।

इसके साथ-साथ जुलाई, 2007 में हुए राष्ट्रपति के चुनाव में भी इस दल की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। अतः कहा जा सकता है कि कमज़ोर होने के बावजूद भी कांग्रेस का असर भारतीय राजनीति पर कायम है। यद्यपि 2014 एवं 2019 में 16वीं एवं 17वीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को केवल 44 एवं 52 सीटें ही मिल पाई थीं।

प्रश्न 7.
अनेक लोग सोचते हैं कि सफल लोकतन्त्र के लिए दो-दलीय व्यवस्था ज़रूरी है। पिछले बीस सालों के भारतीय अनुभवों को आधार बनाकर एक लेख लिखिए और इसमें बताइए कि भारत की मौजूदा बहुदलीय व्यवस्था के क्या फायदे हैं ?
उत्तर:
भारत में बहुदलीय प्रणाली है। कई विद्वानों का विचार है कि भारत में बहु-दलीय प्रणाली उचित ढंग से कार्य नहीं कर पा रही है तथा यह भारतीय लोकतन्त्र के लिए बाधाएं पैदा कर रही है। अत: भारत को द्वि-दलीय प्रणाली अपनानी चाहिए। परन्तु पिछले बीस सालों के अनुभव के आधार पर यहा कहा जा सकता है कि बहु-दलीय प्रणाली से भारतीय राजनीतिक व्यवस्था को निम्नलिखित फायदे हुए हैं

1. विभिन्न मतों का प्रतिनिधित्व-बहु-दलीय प्रणाली के कारण भारतीय राजनीति में सभी वर्गों तथा हितों को प्रतिनिधित्व मिल जाता है। इस प्रणाली से कच्चे लोकतन्त्र की स्थापना होती है।

2. मतदाताओं को अधिक स्वतन्त्रता-अधिक दलों के कारण मतदाताओं को अपने वोट का प्रयोग करने के लिए अधिक स्वतन्त्रताएं होती हैं। मतदाताओं के लिए अपने विचारों से मिलते-जुलते दल को वोट देना आसान हो जाता है।

3. राष्ट दो गुटों में नहीं बंटता-बहु दलीय प्रणाली होने के कारण भारत कभी भी दो विरोधी गुटों में विभाजित नहीं हुआ।

4. मन्त्रिमण्डल की तानाशाही स्थापित नहीं होती-बहु-दलीय प्रणाली के कारण भारत में मन्त्रिमण्डल तानाशाह नहीं बन सकता।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 9 भारतीय राजनीति : नए बदलाव

प्रश्न 8.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें
उत्तर:
भारत की दलगत राजनीति ने कई चुनौतियों का सामना किया है। कांग्रेस-प्रणाली ने अपना खात्मा ही नहीं किया, बल्कि कांग्रेस के जमावड़े के बिखर जाने से आत्म-प्रतिनिधित्व की नयी प्रवृत्ति का भी ज़ोर बढ़ा। इससे दलगत व्यवस्था और विभिन्न हितों की समाई करने की इसकी क्षमता पर भी सवाल उठे। राजव्यवस्था के सामने एक महत्त्वपूर्ण काम एक ऐसी दलगल व्यवस्था खड़ी करने अथवा राजनीतिक दलों को गढ़ने की है, जो कारगर तरीके से विभिन्न हितों को मुखर और एकजुट करें…
(क) इस अध्याय को पढ़ने के बाद क्या आप दलगत व्यवस्था की चुनौतियों की सूची बना सकते हैं ?
(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमें एकजुटता का होना क्यों ज़रूरी है ?
(ग) इस अध्याय में आपने अयोध्या विवाद के बारे में पढ़ा। इस विवाद ने भारत के राजनीतिक दलों की समाहार की क्षमता के आगे क्या चुनौती पेश की?
उत्तर:
(क) इस अध्याय में दलगत व्यवस्था की निम्नलिखित चुनौतियां उभर कर सामने आती हैं

  • गठबन्धन राजनीति को चलाना
  • कांग्रेस के कमजोर होने से खाली हुए स्थान को भरना
  • पिछड़े वर्गों की राजनीति का उभरना
  • अयोध्या विवाद का उभरना
  • गैर-सैद्धान्तिक राजनीतिक समझौतों का होना
  • गुजरात दंगों से साम्प्रदायिक दंगे होना।

(ख) विभिन्न हितों का समाहार और उनमें एकजुटता का होना जरूरी है, क्योंकि तभी भारत अपनी एकता और अखण्डता को बनाए रखकर विकास कर सकता है।

(ग) अयोध्या विवाद भारत के राजनीतिक दलों के सामने साम्प्रदायिकता की चुनौती पेश की तथा भारत में साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक दलों की राजनीति बढ़ गई।

भारतीय राजनीति : नए बदलाव HBSE 12th Class Political Science Notes

→ भारत में 1990 के दशक से लोकतान्त्रिक उमड़ एवं गठबन्धन राजनीति में वृद्धि हुई है।
→ 1989 तक भारत में केवल दो ही राजनीतिक दलों (कांग्रेस एवं जनता पार्टी) के पास सत्ता रही।
→ 1989 से लेकर अब तक सत्ता कई दलों में विभाजित रही।
→ भारतीय जनता पार्टी ने गठबन्धन राजनीति को अलग स्वरूप प्रदान करते हुए राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन का निर्माण किया।
→ 1989 के पश्चात् केन्द्र सरकार के निर्माण में क्षेत्रीय दलों का प्रभाव अधिक रहा।
→ 1988 में जनता दल की स्थापना हुई तथा 1989 के चुनावों में जीत हासिल कर के इस दल ने सरकार बनाई।
→ भारतीय जनता पार्टी की स्थापना 1980 में हुई।
→ 1989 के पश्चात् भारत में गठबन्धन या मिली-जुली सरकारों की अधिकता रही है।
→ गठबन्धनवादी सरकार के मुख्य उदाहरण राष्ट्रीय मोर्चा सरकार, संयुक्त मोर्चा सरकार, राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार तथा संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार है।
→ 2009 के 15वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की सरकार बनी।
→ 2014 के 16वीं लोकसभा के चुनावों के पश्चात् केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार बनी।
→ 2019 के 17वीं लोकसभा के पश्चात् केन्द्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में पुनः राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन की सरकार बनी।

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HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

HBSE 12th Class Political Science क्षेत्रीय आकांक्षाएँ Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
निम्नलिखित में मेल करें :

अ
क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति
ब

राज्य

(क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य के निर्माण(i) नागालैंड/मिज़ोरम
(ख) भाषायी पहचान और केन्द्र के साथ तनाव(ii) झारखण्ड/छत्तीसगढ़
(ग) क्षेत्रीय असन्तुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण(iii) पंजाब
(घ) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी मांग(iv) तमिलनाडु

उत्तर:

अ
क्षेत्रीय आकांक्षाओं की प्रकृति
ब

राज्य

(क) सामाजिक-धार्मिक पहचान के आधार पर राज्य के निर्माण(iii) पंजाब
(ख) भाषायी पहचान और केन्द्र के साथ तनाव(iv) तमिलनाडु
(ग) क्षेत्रीय असन्तुलन के फलस्वरूप राज्य का निर्माण(i) नागालैंड/मिज़ोरम
(घ) आदिवासी पहचान के आधार पर अलगाववादी मांग(ii) झारखण्ड/छत्तीसगढ़

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 2.
पूर्वोत्तर के लोगों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति कई रूपों में होती है। बाहरी लोगों के खिलाफ आन्दोलन, ज्यादा स्वायत्तता की मांग के आन्दोलन और अलग देश बनाने की मांग करना ऐसी ही कुछ अभिव्यक्तियां हैं। पूर्वोत्तर के मानचित्र पर इन तीनों के लिए अलग-अलग रंग भरिए और दिखाइए कि किस राज्य में कौन-सी प्रवृत्ति ज्यादा प्रबल है ?
उत्तर:
(1) बाहरी लोगों के खिलाफ आन्दोलन-असम
(2) ज्यादा स्वायत्तता की मांग के आन्दोलन-मेघालय
(3) अलग देश बनाने की मांग-मिजोरम
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प्रश्न 3.
पंजाब समझौते के मुख्य प्रावधान क्या थे ? क्या ये प्रावधान पंजाब और उसके पड़ोसी राज्यों के बीच तनाव बढ़ाने के लिए कारण बन सकते हैं ? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 2 देखें।

प्रश्न 4.
आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने के क्या कारण थे ?
उत्तर:
आनन्दपुर साहिब प्रस्ताव के विवादास्पद होने का मुख्य कारण यह था, कि इस प्रस्ताव में पंजाब सूबे के लिए अधिक स्वायत्तता की मांग की गई, जोकि परोक्ष रूप से एक अलग सिख राष्ट्र की मांग को बढ़ावा देती है।

प्रश्न 5.
जम्मू-कश्मीर की अंदरूनी विभिन्नताओं की व्याख्या कीजिए और बताइए कि इन विभिन्नताओं के कारण इस राज्य में किस तरह अनेक क्षेत्रीय आकांक्षाओं ने सर उठाया है।
उत्तर:
जम्मू-कश्मीर में अधिकांश रूप में अंदरूनी विभिन्नताएं पाई जाती हैं। जम्मू-कश्मीर में राज्य में जम्मू, कश्मीर और लद्दाख के क्षेत्र शामिल हैं। जम्मू पहाड़ी क्षेत्र है, इसमें हिन्दू, मुस्लिम और सिख अर्थात् कई धर्मों एवं भाषाओं के लोग रहते हैं। कश्मीर में मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या अधिक है और यहां पर हिन्दू अल्पसंख्यक हैं।

जबकि लद्दाख पर्वतीय क्षेत्र हैं, इसमें बौद्ध, मुस्लिम की आबादी है। इतनी विभिन्नताओं के कारण यहां पर कई क्षेत्रीय आकांक्षाएं पैदा होती रहती हैं। जम्मू-कश्मीर में कई राजनीतिक दल हैं, जो जम्मू-कश्मीर के लिए स्वायत्तता की मांग करते रहते हैं। इसमें नेशनल काफ्रैंस सबसे महत्त्वपूर्ण दल है। इसके अतिरिक्त कुछ उग्रवादी संगठन भी हैं, जो धर्म के नाम पर जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करना चाहते हैं।

महत्त्वपूर्ण नोट-5-6 अगस्त, 2019 को केन्द्र सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया। इस कारण जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त हो गया है। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर का विभाजन करके लद्दाख को इससे अलग कर दिया गया है। अब जम्मू-कश्मीर एक राज्य नहीं है बल्कि जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख दो केन्द्र शासित प्रदेश बना दिये गए हैं। अत: अब भारत में 28 राज्य एवं 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं।

प्रश्न 6.
कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर विभिन्न पक्ष क्या हैं ? इनमें कौन-सा पक्ष आपको समुचित जान पड़ता है ? अपने उत्तर के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर:
कश्मीर के क्षेत्रीय स्वायत्तता के मसले पर मुख्य रूप से दो पक्ष सामने आते हैं। प्रथम पक्ष वह है, जो धारा 370 को समाप्त करना चाहता है, जबकि दूसरा पक्ष वह है, जो इस राज्य को और अधिक स्वायत्तता देना चाहता है। इन दोनों पक्षों यदि उचित ढंग से अध्ययन किया जाए तो प्रथम पक्ष अधिक उचित दिखाई पड़ता है।

जो लोग धारा 370 के समाप्त करने के पक्ष में हैं, उनका तर्क है कि इस धारा के कारण यह राज्य भारत के साथ पूरी तरह नहीं मिल पाया है। इसके साथ-साथ जम्मू-कश्मीर को अधिक स्वायत्तता देने से कई प्रकार की राजनीतिक एवं सामाजिक समस्याएं भी पैदा होती हैं। महत्त्वपूर्ण नोट-5-6 अगस्त, 2019 को केन्द्र सरकार ने धारा 370 को समाप्त कर दिया। इस कारण जम्मू-कश्मीर का विभाजन करके लद्दाख को इससे अलग कर दिया गया है। अब जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख दो केन्द्र शासित प्रदेश बना दिये गए हैं। अतः अब भारत में 28 राज्य एवं 8 केन्द्र शासित प्रदेश हैं।

प्रश्न 7.
असम आन्दोलन सांस्कृतिक अभिमान और आर्थिक पिछड़ेपन की मिली-जुली अभिव्यक्ति था। व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों (निबन्धात्मक प्रश्न) में प्रश्न नं० 5 देखें।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 8 क्षेत्रीय आकांक्षाएँ

प्रश्न 8.
हर क्षेत्रीय आन्दोलन अलगाववादी मांग की तरफ अग्रसर नहीं होता। इस अध्याय से उदाहरण देकर इस तथ्य की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
भारत के कई क्षेत्रों से काफी समय से कुछ अलगाववादी आन्दोलन चल रहे हैं, परन्तु सभी आन्दोलन अलगाववादी आन्दोलन नहीं होते, अर्थात् कुछ क्षेत्रीय आन्दोलन भारत से अलग नहीं होना चाहते, बल्कि अपने लिए अलग राज्य की मांग करते हैं, जैसे झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का आन्दलोन, छत्तीसगढ़ के आदिवासियों द्वारा चलाया गया आन्दोलन तथा तेलंगाना प्रजा समिति द्वारा चलाया गया आन्दोलन इत्यादि। आगे चलकर झारखण्ड, छत्तीसगढ़ तथा तेलंगाना राज्य बन गए।

प्रश्न 9.
भारत के विभिन्न भागों से उठने वाली क्षेत्रीय मांगों से ‘विविधता में एकता’ के सिद्धान्त की अभिव्यक्ति होती है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं ? तर्क दीजिए।
उत्तर:
भारत में विभिन्न जातियों के आगमन के कारण इसकी संस्कृति में सम्मिश्रण पाया जाता है। यहां पर भौगोलिक, जलवायु, सामाजिक मान्यताओं, धर्म, भाषा, साहित्य, कला, रहन-सहन, रीति-रिवाजों, खान-पान, वेष-भूषा आदि में विभिन्नताएं व विविधताएं पाई जाती हैं किन्तु इन विविधताओं में सहयोग एकता व सह-अस्तित्व की स्पष्ट झलक प्राप्त होती है।

विभिन्न धार्मिक विश्वासों के बावजूद ईश्वर की एकता, धर्म-निरपेक्षता, सहयोग, कर्म, उदारता, सहिष्णुता, करुणा, सत्य पर दृढ़ श्रद्धा आदि विचारों पर प्रत्येक भारतीय की समान आस्था है। यद्यपि बढ़ती हुई जनसंख्या, विशाल भू-क्षेत्र, सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधताओं के अन्तर ने कई प्रकार के विरोध व टकराव पैदा किए हैं, किन्तु भारतीय सभ्यता की विशिष्टता तथा पहचान उसके परिवर्तन के साथ निरन्तरता, सहयोग व सद्भावना में निहित है। सहयोग तथा पारस्परिक भाईचारा व अनेकता में बसी हुई एकता ही भारत की पहचान है।

प्रश्न 10.
नीचे लिखे अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें
हजारिका का एक गीत….. एकता की विजय पर है; पूर्वोत्तर के सात राज्यों को इस गीत में एक ही माँ की सात बेटियां कहा गया है…… मेघालय अपने रास्ते गई….. अरुणाचल भी अलग हुई और मिज़ोरम असम के द्वार पर दूल्हे की तरह दूसरी बेटी से ब्याह रचाने को खड़ा है…… इस गीत का अन्त असमी लोगों की एकता को बनाए रखने के संकल्प के साथ होता है और इसमें समकालीन असम में मौजूद छोटी-छोटी कौमों को भी अपने साथ एकजुट रखने की बात कही गई है…… करबी और मिजिंग भाई-बहन हमारे ही प्रियजन हैं।

(क) लेखक यहां किस एकता की बात कह रहा है ?
(ख) पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के अन्य राज्य क्यों बनाए गए ?
(ग) क्या आपको लगता है कि भारत के सभी क्षेत्रों के ऊपर एकता की यही बात लागू हो सकती है ? क्यों ?
उत्तर:
(क) लेखक यहां पर पूर्वोत्तर राज्यों की एकता की बात कर रहा है।

(ख) सभी समुदायों की सांस्कृतिक पहचान बनाए रखने के लिए तथा आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए पुराने राज्य असम से अलग करके पूर्वोत्तर के अन्य राज्य बनाए गए।

(ग) भारत के सभी क्षेत्रों पर एकता की यह बात लागू हो सकती है, क्योंकि भारत के सभी राज्यों में अलग-अलग धर्मों एवं जातियों के लोग रहते हैं तथा देश की एकता एवं अखण्डता के लिए उनमें एकता कायम करना आवश्यक है।

क्षेत्रीय आकांक्षाएँ HBSE 12th Class Political Science Notes

→ भारत में क्षेत्रीय आकांक्षाएं एवं संघर्ष देखने को मिलता है।
→ भारत में क्षेत्र्वाद को बढ़ावा मिला है।
→ भारत में क्षेत्रीय दलों का विका स हुआ है।
→ भारत के महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दलों में इण्डियन नेशनल लोकदल, डी० एम० के०, अन्ना डी० एम० के०, तेलुगू देशम, शिरोमणि अकाली दल तथा नेशनल कान्फ्रेंस शामिल हैं।
→ इण्डियन नेशनल लोकदल हरियाणा का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है।
→ 1980 के दशक के प्रारम्भ में पंजाब में राजनीतिक एवं सामाजिक अस्थिरता फैलने लगी थी।
→ केन्द्र की श्रीमती इन्दिरा गांधी की सरकार ने परिणामस्वरूप 5 जून, 1984 को पंजाब में ‘ब्लू स्टार आपरेशन’ के अन्तर्गत कार्यवाही की।
→ 31 अक्तूबर, 1984 को श्रीमती गांधी की हत्या कर दी गई।
→ श्रीमती गांधी की हत्या के कारण दिल्ली में बड़े पैमाने पर सिक्ख विरोधी दंगे हुए जिसमें लगभग 2000 सिक्ख पुरुष, स्त्री एवं बच्चे मारे गए।
→ 1985 में प्रधानमन्त्री श्री राजीव गांधी एवं अकाली नेताओं के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ, जिसे पंजाब समझौते के नाम से जाना जाता है।
→ भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र सात राज्यों (असम, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर, नागालैण्ड, मिजोरम एवं त्रिपुरा) से मिलकर बनता है।
→ असम गण परिषद् असम का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्रीय दल है।

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HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

HBSE 12th Class Political Science जन आंदोलनों का उदय Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
चिपको आन्दोलन के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन सा कथन गलत है
(क) यह पेड़ों की कटाई को रोकने के लिए चला एक पर्यावरण आन्दोलन था।
(ख) इस आन्दोलन ने पारिस्थितिकी और आर्थिक शोषण के मामले उठाए।
(ग) यह महिलाओं द्वारा शुरू किया गया शराब-विरोधी आन्दोलन था।
(घ) इस आन्दोलन की मांग थी कि स्थानीय निवासियों का अपने प्राकृतिक संसाधनों पर नियन्त्रण होना चाहिए।
उत्तर:
(ग) यह महिलाओं द्वारा शुरू किया गया शराब-विरोधी आन्दोलन था।

प्रश्न 2.
नीचे लिखे कुछ कथन गलत हैं। इनकी पहचान करें और ज़रूरी सुधार के साथ उन्हें दुरुस्त करके दोबारा लिखें
(क) सामाजिक आन्दोलन भारत के लोकतन्त्र को हानि पहुंचा रहे हैं।
(ख) सामाजिक आन्दोलनों की मुख्य ताकत विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच व्याप्त उनका जनाधार है।
(ग) भारत के राजनीतिक दलों ने कई मुद्दों को नहीं उठाया। इसी कारण सामाजिक आन्दोलनों का उदय हुआ।
उत्तर:
(क) सामाजिक आन्दोलन भारत के लोकतन्त्र को बढ़ावा दे रहे हैं।
(ख) यह कथन पूर्ण रूप से सही है।
(ग) यह कथन पूर्ण रूप से सही है।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 3.
उत्तर प्रदेश के कुछ भागों में (अब उत्तराखण्ड) 1970 के दशक में किन कारणों से चिपको आन्दोलन का जन्म हुआ ? इस आन्दोलन का क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
भारत में पर्यावरण से सम्बन्धित सर्वप्रथम आन्दोलन चिपको आन्दोलन के रूप में जाना जाता है। चिपको आन्दोलन 1972 में हिमालय क्षेत्र में उत्पन्न हुआ। चिपको आन्दोलन का अर्थ है-पेड़ से चिपक जाना अर्थात् पेड़ को आलिंग्न बद्ध कर लेना। चिपको आन्दोलन की शुरुआत उस समय हुई जब एक ठेकेदार ने गांव के समीप पड़ने वाले जंगल के पेड़ों को कटाने का फैसला किया। लेकिन गांव वालों ने इसका विरोध किया। परन्तु जब एक दिन गांव के सभी पुरुष गांव के बाहर गए हुए थे, तब ठेकेदार ने पेड़ों को काटने के लिए अपने कर्मचारियों को भेजा।

इसकी जानकारी जब गांव की महिलाओं को मिली, तब वे एकत्र होकर जंगल पहुंच गईं तथा पेड़ों से चिपक गईं। इस कारण ठेकेदार के कर्मचारी पेड़ों को काट न सके। इस घटना की जानकारी पूरे देश में समाचार-पत्रों के द्वारा फैल गई। पर्यावरण संरक्षण से सम्बन्धित इस आन्दोलन को भारत में विशेष स्थान प्राप्त है। इस आन्दोलन की सफलता ने भारत में चलाए गए अन्य आन्दोलनों को भी प्रभावित किया। इस आन्दोलन से ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक जागरूकता के आन्दोलन चलाए गए।

प्रश्न 4.
भारतीय किसान यूनियन किसानों की दुर्दशा की तरफ ध्यान आकर्षित करने वाला अग्रणी संगठन है। नब्बे के दशक में इसने किन मुद्दों को उठाया और इसे कहां तक सफलता मिली ?
उत्तर:
भारतीय किसान यूनियन ने गन्ने और गेहूं के सरकारी खरीद मूल्य में बढ़ोत्तरी, कृषि उत्पादों के अन्तर्राष्ट्रीय आवाजाही पर लगी रोक को हटाने, समुचित दर पर गारंटीशुदा बिजली आपूर्ति करने, किसानों के बकाया कर्ज माफ करने तथा किसानों के लिए पेन्शन आदि जैसे मुद्दों को उठाया। इस संगठन ने राज्यों में मौजूद अन्य किसान संगठनों के साथ मिलकर अपनी कुछ मांगों को मनवाने में सफलता प्राप्त की।

प्रश्न 5.
आन्ध्र प्रदेश में चले शराब विरोधी आन्दोलन ने देश का ध्यान कुछ गम्भीर मुद्दों की तरफ खींचा। ये मुद्दे क्या थे ?
उत्तर:
आन्ध्र प्रदेश में चले शराब विरोधी आन्दोलन में निम्नलिखित मुद्दे उभरे

  • शराब पीने से पुरुषों का शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होना।
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था का प्रभावित होना।
  • शराबखोरी के कारण ग्रामीणों पर कर्ज का बोझ बढ़ना।
  • पुरुषों द्वारा अपने काम से गैर-हाजिर रहना।
  • शराब माफिया के सक्रिय होने से गांवों में अपराधों का बढ़ना।
  • शराबखोरी से परिवार की महिलाओं से मारपीट एवं तनाव होना।

प्रश्न 6.
क्या आप शराब विरोधी आन्दोलन को महिला आन्दोलन का दर्जा देंगे ? कारण बताएं।
उत्तर:
शराब विरोधी आन्दोलन को महिला आन्दोलन का दर्जा दिया जा सकता है, क्योंकि अब तक जितने भी शराब विरोधी आन्दोलन हुए हैं, उनमें महिलाओं की भूमिका सबसे महत्त्वपूर्ण रही है।

प्रश्न 7.
नर्मदा बचाओ आन्दोलन ने नर्मदा घाटी की बांध परियोजनाओं का विरोध क्यों किया ?
उत्तर:
नर्मदा बांध परियोजना के विरुद्ध नर्मदा बचाओ आन्दोलन चलाया गया। आन्दोलन के समर्थकों का यह मत है कि बांध परियोजना के पूर्ण होने पर कई लाख लोग बेघर हो जायेंगे।

प्रश्न 8.
क्या आन्दोलन और विरोध की कार्रवाइयों से देश का लोकतन्त्र मज़बूत होता है ? अपने उत्तर की पुष्टि में उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 11 देखें।

प्रश्न 9.
दलित-पैंथर्स ने कौन-से मुद्दे उठाए ?
उत्तर:
दलित पँथर्स ने दलित समुदाय से सम्बन्धित सामाजिक असमानता, जातिगत आधार पर भेदभाव, दलित महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, दलितों का सामाजिक एवं आर्थिक उत्पीड़न तथा दलितों के लिए आरक्षण जैसे मुद्दे उठाए।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 7 जन आंदोलनों का उदय

प्रश्न 10.
निम्नलिखित अवतरण को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें ….लगभग सभी नए सामाजिक आन्दोलन नयी समस्याओं जैसे-पर्यावरण का विनाश, महिलाओं की बदहाली, आदिवासी संस्कृति का नाश और मानवाधिकारों का उल्लंघन….. के समाधान को रेखांकित करते हुए उभरे। इनमें से कोई भी अपने आप में समाज व्यवस्था के मूलगामी बदलाव के सवाल से नहीं जुड़ा था।

इस अर्थ में ये आन्दोलन अतीत की क्रान्तिकारी विचारधाराओं से एकदम अलग हैं। लेकिन, ये आन्दोलन बड़ी बुरी तरह बिखरे हुए हैं और यही इनकी कमज़ोरी है….सामाजिक आन्दोलनों का एक बड़ा दायरा ऐसी चीजों की चपेट में है कि वह एक ठोस तथा एकजुट जन आन्दोलन का रूप नहीं ले पाता और न ही वंचितों और गरीबों के लिए प्रासंगिक हो पाता है। ये आन्दोलन बिखरे-बिखरे हैं, प्रतिक्रिया के तत्त्वों से भरे हैं, अनियत हैं और बुनियादी सामाजिक बदलाव के लिए इनके पास कोई फ्रेमवर्क नहीं है। ‘इस’ या ‘उस’ के विरोध (पश्चिमी-विरोधी, पूंजीवाद विरोधी, विकास-विरोधी, आदि) में चलने के कारण इनमें कोई संगति आती हो अथवा दबे-कुचले लोगों और हाशिए के समुदायों के लिए ये प्रासंगिक हो पाते हों-ऐसी बात नहीं।

(क) नए सामाजिक आन्दोलन और क्रान्तिकारी विचारधाराओं में क्या अन्तर है ?
(ख) लेखक के अनुसार सामाजिक आन्दोलन की सीमाएं क्या-क्या हैं ?
(ग) यदि सामाजिक आन्दोलन विशिष्ट मुद्दों को उठाते हैं तो आप उन्हें ‘बिखरा’ हुआ कहेंगे या मानेंगे कि वे अपने मुद्दे पर कहीं ज्यादा केन्द्रित हैं। अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क दीजिए।
उत्तर:
(क) क्रान्तिकारी विचारधाराएं समाज व्यवस्था के मूलगामी बदलाव के साथ जुड़ी हुई होर्ती हैं, जबकि नये सामाजिक आन्दोलन समाज व्यवस्था के मूलगामी बदलाव के साथ जुड़े हुए नहीं हैं।

(ख) सामाजिक आन्दोलन बिखरे हुए हैं तथा उनमें एकजुटता का अभाव है। सामाजिक आन्दोलनों के पास सामाजिक बदलाव के लिए कोई ढांचागत योजना नहीं है।

(ग) सामाजिक आन्दोलन द्वारा उठाए गए विशिष्ट मुद्दों के कारण यह कहा जा सकता है कि ये आन्दोलन अपने मुद्दे पर अधिक केन्द्रित हैं।

जन आंदोलनों का उदय HBSE 12th Class Political Science Notes

→ भारत में स्वतन्त्रता के बाद कई नवीन सामाजिक आन्दोलनों का उदय हुआ है।
→ भारत में किसानों से सम्बन्धित कई आन्दोलन चलाए गए हैं जैसे तिभागा आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन, नक्सलवाड़ी आन्दोलन इत्यादि।
→ किसान आन्दोलनों पर समय-समय पर राजनीति होती रही है।
→ महिलाओं के अधिकारों के लिए कई महिला आन्दोलन चलाए गये हैं।
→ भारत में राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना की गई।
→ स्थानीय स्वः-शासन की संस्थाओं में महिलाओं के लिए 1/3 स्थान आरक्षित किये गए हैं।
→ भारत में 1950 में ही महिलाओं को मताधिकार प्रदान कर दिया गया था।
→ भारत में पर्यावरण एवं विकास से प्रभावित लोगों के लिए आन्दोलन चलाए गए हैं।
→ 1972 में चिपको आन्दोलन चलाया गया।
→ मेधा पाटेकर, बाबा आमटे तथा सुन्दर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में नर्मदा बचाओ आन्दोलन चल रहा है।
→ टिहरी बांध परियोजना एवं शांत घाटी परियोजना से सम्बन्धित भी पर्यावरणीय आन्दोलन चलाए गए।
→ भारत सरकार ने 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में पिछड़ी जाति आयोग की स्थापना की।
→ 1978 में बी० पी० मण्डल की अध्यक्षता में पिछड़ी जाति आयोग की स्थापना की गई।
→ मण्डल आयोग ने 1980 में सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की।
→ 1990 में वी० पी० सिंह सरकार ने मण्डल आयोग की सिफारिशों को लागू करने की घोषणा की, जिसका व्यापक विरोध हुआ।

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HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

Haryana State Board HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Textbook Exercise Questions and Answers.

Haryana Board 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

HBSE 12th Class Political Science कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना Textbook Questions and Answers

प्रश्न 1.
1967 के चुनावों के बारे में निम्नलिखित में कौन-कौन से बयान सही हैं
(क) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव में विजयी रही, लेकिन कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव वह हार गई।
(ख) कांग्रेस लोकसभा के चुनाव भी हारी और विधानसभा के भी।
(ग) कांग्रेस को लोकसभा में बहुमत नहीं मिला, लेकिन उसने दूसरी पार्टियों के समर्थन से एक गठबन्धन सरकार बनाई।
(घ) कांग्रेस केन्द्र में सत्तासीन रही और उसका बहुमत भी बढ़ा।
उत्तर:
(क) सही
(ख) गलत
(ग) गलत
(घ) गलत।

प्रश्न 2.
निम्नलिखित का मेल करें
(क) सिंडिकेट – (i) कोई निर्वाचित जन-प्रतिनिधि जिस पार्टी के टिकट से जीता हो, उस पार्टी को छोड़कर अगर दूसरे दल में चला जाए।
(ख) दल-बदल – (ii) लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा।
(ग) नारा – (iii) कांग्रेस और इसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना।
(घ) ग़ै-कांग्रेसवाद – (iv) कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह ।
उत्तर:
(क) सिंडिकेट – (iv) कांग्रेस के भीतर ताकतवर और प्रभावशाली नेताओं का एक समूह।
(ख) दल-बदल – (i) कोई निर्वाचित जन-प्रतिनिधि जिस पार्टी के टिकट से जीता हो, उस पार्टी को छोड़कर अगर दूसरे दल में चला जाए।
(ग) नारा – (ii) लोगों का ध्यान आकर्षित करने वाला एक मनभावन मुहावरा।
(घ) गैर-कांग्रेसवाद – (iii) कांग्रेस और इसकी नीतियों के खिलाफ़ अलग-अलग विचारधाराओं की पार्टियों का एकजुट होना।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 3.
निम्नलिखित नारे से किन नेताओं का सम्बन्ध है
(क) जय जवान, जय किसान
(ख) इन्दिरा हटाओ
(ग) ग़रीबी हटाओ।
उत्तर:
(क) श्री लाल बहादुर शास्त्री
(ख) सिंडीकेट
(ग) श्रीमती इन्दिरा गांधी।

प्रश्न 4.
1971 के ‘ग्रैंड अलायन्स’ के बारे में कौन-सा कथन ठीक है ?
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।
(ख) इसके पास एक स्पष्ट राजनीतिक तथा विचारधारात्मक कार्यक्रम था।
(ग) इसका गठन सभी गैर-कांग्रेसी दलों ने एकजुट होकर किया था।
उत्तर:
(क) इसका गठन गैर-कम्युनिस्ट और गैर-कांग्रेसी दलों ने किया था।

प्रश्न 5.
किसी राजनीतिक दल को अपने अन्दरूनी मतभेदों का समाधान किस तरह करना चाहिए ? यहां कुछ समाधान दिए गए हैं। प्रत्येक पर विचार कीजिए और उसके सामने उसके फ़ायदों और घाटों को लिखिए।
(क) पार्टी के अध्यक्ष द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना।
(ख) पार्टी के भीतर बहुमत की राय पर अमल करना।
(ग) हरेक मामले पर गुप्त मतदान कराना।
(घ) पार्टी के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं से सलाह करना।
उत्तर:
(क) पार्टी के मतभेदों को दूर करने के लिए पार्टी अध्यक्ष के बताए मार्ग पर चलने से पार्टी में एकता और अनुशासन बना रहेगा, परन्तु इससे एक व्यक्ति की तानाशाही स्थापित होने का खतरा बना रहता है।

(ख) मतभेदों को दूर करने के लिए बहुमत की राय जानने से यह लाभ होगा कि इससे अधिकांश सदस्यों की राय का पता चलेगा, परन्तु बहुमत की राय मानने से अल्पसंख्यकों की उचित बात की अवहेलना की सम्भावना बनी रहेगी।

(ग) पार्टी के मतभेदों को दूर करने के लिए गुप्त मतदान की प्रक्रिया अपनाने से प्रत्येक सदस्य अपनी बात स्वतन्त्रतापूर्वक रख सकेगा, परन्तु गुप्त मतदान में क्रॉस वोटिंग का खतरा बना रहता है।

(घ) पार्टी मतभेदों को दूर करने के लिए वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं की सलाह का विशेष लाभ होगा, क्योंकि वरिष्ठ नेताओं के पास अनुभव होता है तथा सभी सदस्य उनका आदर करते हैं, परन्तु वरिष्ठ एवं अनुभवी व्यक्ति नये विचारों एवं मूल्यों को अपनाने से कतराते हैं।

प्रश्न 6.
निम्नलिखित में से किसे/किन्हें 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार के कारण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है? अपने उत्तर की पुष्टि में तर्क कीजिए
(क) कांग्रेस पार्टी में करिश्माई नेता का अभाव।
(ख) कांग्रेस पार्टी के भीतर टूट।
(ग) क्षेत्रीय, जातीय और साम्प्रदायिक समूहों की लामबन्दी को बढ़ाना।
(घ) गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता।
(ङ) कांग्रेस पार्टी के अन्दर मतभेद।
उत्तर:
गैर-कांग्रेसी दलों के बीच एकजुटता तथा कांग्रेस पार्टी के अन्दर मतभेद 1967 के चुनावों में कांग्रेस की हार का मुख्य कारण है। 1967 के चुनावों में अधिकांश विपक्षी दलों ने एकजुट होकर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद बने हुए थे।

प्रश्न 7.
1970 के दशक में इन्दिरा गांधी की सरकार किन कारणों से लोकप्रिय हुई थी ?
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 4 देखें।

प्रश्न 8.
1960 के दशक की कांग्रेस पार्टी के सन्दर्भ में ‘सिंडिकेट’ का क्या अर्थ है ? सिंडिकेट ने कांग्रेस पार्टी में क्या भूमिका निभाई ?
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 6 देखें।

प्रश्न 9.
कांग्रेस पार्टी किन मसलों को लेकर 1969 में टूट की शिकार हुई ?
उत्तर:
इसके लिए अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्नों में (निबन्धात्मक प्रश्न) प्रश्न नं० 3 देखें।

HBSE 12th Class Political Science Solutions Chapter 5 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना

प्रश्न 10.
निम्नलिखित अनुच्छेद को पढ़ें और इसके आधार पर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दें इन्दिरा गांधी ने कांग्रेस को अत्यन्त केन्द्रीकृत और अलोकतान्त्रिक पार्टी संगठन में तब्दील कर दिया, जबकि नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस शुरुआती दशकों में एक संघीय, लोकतान्त्रिक और विचारधाराओं के समाहार का मंच थी।
नयी और लोकलुभावन राजनीति ने राजनीतिक विचारधारा को महज चुनावी विमर्श में बदल दिया। कई नारे उछाले गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं था कि उसी के अनुकूल सरकार की नीतियां भी बनानी थीं-1970 के दशक के शुरुआती सालों में अपनी बड़ी चुनावी जीत के जश्न के बीच कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन के तौर पर मर गई।
(क) लेखक के अनुसार नेहरू और इन्दिरा गांधी द्वारा अपनाई गई रणनीतियों में क्या अन्तर था ?
(ख) लेखक ने क्यों कहा है कि सत्तर के दशक में कांग्रेस ‘मर गई’ ?
(ग) कांग्रेस पार्टी में आए बदलावों का असर दूसरी पार्टियों पर किस तरह पड़ा ?
उत्तर:
(क) पं. नेहरू पार्टी के नेताओं से विचार-विमर्श करके अपनी रणनीतियां बनाते थे, जबकि श्रीमती गांधी कई बार बिना किसी से कोई परामर्श किये ही रणनीतियां बनाती थीं।

(ख) लेखक ने इसलिए कहा कि कांग्रेस पार्टी मर गई, क्योंकि श्रीमती गांधी के समय पार्टी संगठन को महत्त्व नहीं दिया जाता था।

(ग) कांग्रेस पार्टी में आए बदलावों से दूसरी पार्टियों को एकजुट होने में सहायता मिली।

 कांग्रेस प्रणाली : चुनौतियाँ और पुनर्स्थापना HBSE 12th Class Political Science Notes

→ पं० जवाहर लाल नेहरू 1947 से 1964 तक भारत के प्रधानमन्त्री रहे।

→ मई, 1964 में पं. नेहरू की मृत्यु के पश्चात् श्री लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमन्त्री बने।

→ जनवरी, 1966 में श्री लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के पश्चात् श्रीमती इन्दिरा गांधी देश की प्रधानमन्त्री बनी।

→ 1967 के चौथे आम चुनाव में चुनावी बदलाव हुआ और राज्य स्तर पर गैर कांग्रेसवाद की शुरुआत हुई।

→ 1969 में कांग्रेस पार्टी का विभाजन हो गया, जिसके कई कारण थे, जैसे दक्षिण-पंथी एवं वामपंथी विषय पर कलह, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के विषय में मतभेद, युवा तुर्क एवं सिंडीकेट के बीच कलह तथा मोरारजी देसाई से वित्त विभाग वापिस लेना इत्यादि।

→ 1971 के चुनावों में श्रीमती इन्दिरा गांधी को ऐतिहासिक जीत प्राप्त हुई।

→ श्रीमती इन्दिरा गांधी की जीत के कई कारण थे-जैसे–श्रीमती गांधी का चमत्कारिक नेतृत्व, समाजवादी नीतियां, कांग्रेस दल पर श्रीमती गांधी की पकड, श्रीमती गांधी के पक्ष में वोटों का ध्रुवीकरण तथा ग़रीबी हटाओ का नारा।

→ ग़रीबी हटाओ का नारा 1971 के चुनाव में श्रीमती इन्दिरा गांधी ने दिया।

→ 1971 के चुनावों में जहां श्रीमती गांधी ने ‘ग़रीबी हटाओ’ का नारा दिया, वहीं उनके विरोधियों ने इन्दिरा हटाओ का नारा दिया, जिसे मतदाताओं ने पसन्द नहीं किया तथा श्रीमती गांधी के पक्ष में मतदान किया।

→ श्रीमती गांधी की सरकार द्वारा ग़रीबी हटाने के लिए कई कार्यक्रम चलाए गए।

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